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शायद बचपन थमां गै उसदे च असुरक्षा दी भावना कुतै घर बनाइयै बैठी दी ही, जिसदा उसी पता गै अदूं लग्गेआ जदूं सामधाम मानसी उसदी ज़िंदगी च आई। शायद बचपन से ही उसमें असुरक्षा की भावना कहीं घर बनाकर बैठ गई थी, जिसका उसे पता ही तब लगा जब प्रतक्ष्य मानसी उसकी ज़िंदगी में आई। |
सोचदा, तमामे कन्नै शेरा उट्ठेआ ते खुहै बक्खी टुरी पेआ तां हाको बी रैह्मतां गी पुनदी घरै गी टुरी गेई। सोचते हुए, गुस्से के साथ शेरा उठा और कुएं की तरफ चल पड़ा तो हाको भी रेह्मतां की निंदा करते हुए घर की तरफ चल पड़ी। |
आखदे, एड्डा नड़ोआ उस इलाके च नां कदें अग्गें होआ ते नां होना। कहते हैं, इतना जनाज़ा उस इलाके में न कभी पहले हुए और न होगा। |
इ’नें हाल्लें च मजबूर होइयै में ञ्यानें गी लेइयै शैह्र आई गेई ही। इन हालात में मजबूर हो कर मैं बच्चों को लेकर शहर आ गई थी। |
हालांकि इस संग्रैह् दियां सब्भै क्हानियां चपासम दी बिगड़दी हालत गी विशे बनाइयै लिखियां गेदियां न पर इं’दे च कुदरत दे शलैपे दा वर्णन मनै उप्पर इक अनमिट तस्वीर बनांदा जंदा ऐ। हालांकि इस संग्रह की सभी कहानियां पर्यावरण की बिगड़ती हालत को विषय बनाकर लिखी गई हैं पर इनमें प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन मन पर एक अमिट तस्वीर बनाता जाता है। |
एह् ते बड़े भागें आह्ली गल्ल ऐ जे कल्ल बी तुंʼदे दर्शन होङन । यह तो बड़े सौभाग्य की बात है कि कल आपके दर्शन होंगे। |
1988 च गै ओम गोस्वामी हुंदा अगला क्हानी-संग्रैह् ‘न्हेरै घिरी दी इक पुली’ छपेआ। 1988 में ही ओग गोस्वामी का अगला कहानी-संग्रह 'न्हेरै घिरी दी इक पुली' छपा। |
तेह्रमीं दी पढ़ाई शुरू होई गेदी ही । तेरहवीं की पढ़ाई शुरू हो चुकी थी। |
पैह्लें में समझदी ही जे लोक मातरेआं गी ऐह्में जानियै बदनाम करदे न, पर हुन में केह् समझां ? पहले मैं समझती थी कि लोग सौतेली मां को यूं ही जान बूझकर बदनाम करते हैं, पर अब मैं क्या समझूं? |
ओह् अपने ढंगा नै जानदियां न जे लड़दे मर्दें लेई इं’दे कोल अपनी जान दे इलावा होर बी बड़ा किश ऐ। वह अपने तरीके से जानती हैं कि संघर्ष करते पुरुषों के लिए उनके पास अपनी जान के इलावा और भी बहुत कुछ है। |
चौं ग्राएं दी लंबड़दारी ऐ, दिनें औंदे कोई मनाही ही केह् इस्सी? चार गांव की नम्बरदारी है, दिन में आते कोई मनाही थी क्या इसे? |
घर च रसोई दे फ्रिज खाने-पीने आह्ले समान्ना कन्नै भरोचे दे रौंह्दे । घर में रसोई के फ्रिज खाने-पीने वाले सामान से भरे रहते। |
परगाशो गी लेइयै मासी टुरी गेई तां शैंकर बोल्लेआ, ”पता निं एह् केह् होई जा’रदा ऐ।“ "परगाशो को लेकर मासी चली गई तो शंकर बोला, ""पता नहीं यह क्या हो रहा है।""" |
स’ञां जिस बेल्लै ओह् दफ्तरा दा बाह्र आया तां तक्कर ओह्दा चित्त स्थिर होई गेआ हा। उसने फैसला करी लैता हा। शाम के जिस वक्त वह दफ्तर से बाहर आया तब तक उसका मन स्थिर हो गया था। उसने फैसला कर लिया था। |
ते उप्पर बड़ा बड्डा चबक्खै लक्कड़ी दा जंगला हा, जेह्ड़ा बड़ा डिजाइनदार हा । और उसके ऊपर बहुत बड़ा लकड़ी का जाल था, जो बहुत डिज़ाइन वाला था। |
तुसेंगी इत्थें गै चाह् थ्होई जाग । आपको यहीं चाय मिल जाएगी। |
जनानियें दी बी मिलनी होई । महिलाओं की भी मिलनी हुई। |
इसदे च इक भोली-भाली मसूम कुड़ी कन्नै उसदे पिता दे हिरख भरोचे व्यहार दा बड़ा नाज़क जेहा ते दिलचस्प चित्रण ऐ। इसमें एक भोली-भाली मासूम लड़की के साथ उसके पिता के प्यार भरे व्यवहार का बेहद नाज़ुक और दिलचस्प चित्रण है। |
अस मां-पुत्तर दोऐ मरी जाह्गे तां भामें एह् त’ुंदे कश परतोई औग।“ मस्तो ने दमैं हत्थ जोड़ी दित्ते। "हम मां-बेटा दोनों मर जाएंगे तो चाहे यह आपके पास वापिस आ जाएगी।"" मस्तो ने दोनों हाथ जोड़ दिये।" |
कोई हल्के-फुल्के विशे आह्ली कताब, रसाला जां कुसै संत-म्हात्मा दी जीवनी लेई औंदे । कोई हल्के विषय की पुस्तक, कोई मैगजीन या किसी संत की जीवनी लेकर आते। |
असेंगी जीवन दे हर मोड़ पर कोई-ना-कोई समझौता करना पौंदा ऐ, ते इʼयां गै पराने रिश्ते खत्म होन लगदे न, ते उंʼदा थाह्र नमें रिश्ते लेई लैंदे न । हमें जीवन के हर मोड़ पर कोई-न-कोई समझौता करना पड़ता है, और ऐसे ही पुराने रिश्ते खत्म होने लगते हैं, और उनकी जगह नए रिश्ते ले लेते हैं। |
कुसुम गी पता लग्गा तां इक-दो बारी ओह् बी दिक्खन आई । कुसुम को पता चला तो एक-दो बार वह भी देखने आई। |
ब्हांटे-खेढ च ‘कली पान’ ते ‘तंगा-चोट’- द’ऊं रूपें च खेढी जंदी ऐ। कंचा-खेल में 'कली-पान' और 'तंगा-चोट' दो रूपों में खेला जाता है। |
फ्ही शेरे गी ध्रोइयै दिक्खेआ ते रोह्लू गी लेइयै अंदर टुरी गेआ। फिर शेरे को ध्यान से देखा और रोहलू को लेकर अंदर चला गया। |
इं’दे चा किश क्हानियां कत्थ-शैली च न, किश प्रतीकात्मक ते किश मनोविज्ञानक विशें उप्पर न। इनमें से कुछ कहानियां कथा-शैली में हैं, कुछ प्रतीकात्मक तथा कुछ मनोवैज्ञानिक विषयों पर हैं। |
ताया जी ने पैह्लें उतरियै, बैल्ल बजाई । ताया जी ने पहले उतरकर, घंटी बजाई। |
हून इ’यां लगदा ऐ जिन्ना जीना हा जी लेआ। अब यूं लगता है जितना जीना था जी लिया। |
सोचन लगा जे आखा’रदा ते ठीक गै। सोचने लगा कि कह तो ठीक ही रहा है। |
ओह्दे बचार यकदम बदली गे हे। उसके विचार एकदम बदल गए थे। |
कन्नै आह्ले कूपे आह्ली कुड़ी फ्ही केशव कश आई गेदी ही । साथ वाले कूपे वाली लड़की फिर केशव के पास आ गई थी। |
मनै च खतोला जागेआ जे एह् कुड़ी अज्ज मेरे पर गै ते पट्टू नेईं पा करदी, कुतै मिगी गै गाह्क ते नेईं बनाऽ दी? मन में खलबली मची कि यह लड़की आज मुझ पर ही तो डोरे नहीं डाल रही, कहीं मुझे ही ग्राहक तो नहीं बना रही? |
में अंदरो-अंदर स्हाब लाई लेदा हा जे कालेज च चार बजे कोला पैह्लें छुट्टी होई जंदी ऐ । मैंने मन ही मन में हिसाब लगा लिया था कि कालेज में चार बजे से पहले छुट्टी हो जाती है। |
पर हल्ली में अंग्रेज़ी दियां कताबां पूरी चाल्ली समझने च समर्थ नेईं ही । लेकिन अभी मैं अंग्रेज़ी की किताबों को पूरी तरह से समझने में समर्थ नहीं थी।। |
किट्ठै बेहियै रुट्टी खागे, चाह् पीगे । साथ बैठकर खाना खाएंगे, चाय पियेंगे। |
जे.सी.ओ. ने मास्टर होरें गी धिक्के देई-देई जीपा पिच्छें ब्हालेआ ते दरोआजा बाह्रा बंद करी लाक लाई ओड़ेआ। जे.सी.ओ. ने मास्टर जी को धक्के दे-दे कर जीप के पीछे बिठाया और दरवाज़ा बाहर से बंद कर के लॉक लगा दिया। |
दस मिंट रेह् न बस निकलने इच्च। दस मिनट रहे हैं बस निकलने में। |
नेईं तां इस किस्मां दी शांति ते उ’न्नै कदें मसूस नेई कीती। हून ओह् दुनिया गी इक नमीं नजरी कन्नै दिक्खै करदा हा। नहीं तो इस किस्म की शांति तो उसने कभी महसूस नहीं की। अब वह दुनिया को एक नई नज़र से देख रहा था। |
किश दिनें दे अलाज मगरा, में घर जाई सकङ, ते फ्ही उत्थें पट्टियां करने आस्तै कम्पौंडर रोज दोऐ बेल्लै आई सकदा ऐ । कुछ दिनों के उपचार के बाद, मैं घर जा सकूँगी, और फिर वहां पट्टी करने के लिए कंपाउंडर रोज दो बार आ सकता है। |
केह् आखेआ प्यार करदियां ओ ? क्या कहा प्यार करती हैं? |
जुगल, जगत ते अंकल जी ? जुगल, जगत और अंकल जी ? |
शायद आश्रम वाले बी उʼनें गी सूचना देई ओड़न । शायद आश्रम वाले भी उन्हें सूचना दे देंगे। |
‘‘मौती थमां केह् डरना अम्मां, जित्थै जिसलै औनी, आई जानी।’’ चिडू ने गलाया हा। """मौत से क्या डरना आम्मा, जहाँ जब आनी, आ जानी।"" चिड़ू ने कहा था।" |
तसल्ली करियै शेरे ने ड्योढी खोह्ल्ली तां अंदर औंदे अल्फ़दीनै सनाया जे शाह् होर राती दे परतोई आए दे न। तसल्ली कर के शेरे ने ड्योढ़ी खोली तो अंदर आते अल्फदीन ने सुनाया कि शाह जी रात के वापस आये हैं। |
सारी धार काले स्याह, राक्शें साहीं डरौने कुप्पड़ें कन्नै भरोई दी ही। सारी पहाड़ी काले अंधेरे, राक्षसों जैसी डरावनी चट्टानों के साथ भरी हुई थी। |
केशव नै थोह्ड़ा मुस्कराइयै आखेआ , ‘‘ मैडम, तुसें मेरे बैगा चा केह् लैना ऐ ?’’ "केशव ने थोड़ा मुस्कुरा कर कहा, ""मैडम, आपको मेरे बैग में से क्या लेना है ?""" |
ड्योढी उ’न्नै अल्फ़दीनै दे घरा जंदे गै चाढ़ी लेई दी ही। ड्योढ़ी उसने अल्फदीन के घर से जाते ही बंद कर ली थी। |
एड्डे पुज्जे दे स्वामी ब्रह्मानंद जी ने अपने कोला दूर लौह्के सत्यानंद विश्वानंद जी गी अपना चेला बनाई लेआ – एह् बड़ी खुशी ते गौह् आह्ली गल्ल ही । इतने पहुंचे हुए स्वामी ब्रह्मानंद ने अपने से बहुत छोटे सत्यानंद विश्वानंद को अपना शिष्य बना लिया– यह बहुत खुशी और गर्व की बात थी। |
पर बरसांती च छड़ा चिप-चिप, मच्छरें ते मक्खियें दा जोर । लेकिन बरसात में केवल चिप-चिप, मच्छरों और मक्खियों का ज़ोर। |
ते मेरे इस शक्क गी शामा दे जवाब ने जकीन च बदली ओड़ेआ । और मेरे संदेह को शामा के उत्तर ने निश्चय में बदल दिया । |
मां रोज दपैह्री’लै कुड़ी गी साधु कश लेई जंदी। मां रोज़ दोपहर में लड़की को साधु के पास ले जाती। |
दिन घ्रोंदे दरबार पुज्जे हे। दिन ढलते दरबार पहुँच गए थे। |
पर मां-प्यो ते मां-प्यो गै होंदे न । लेकिन मां-बाप तो मां-बाप ही होते हैं। |
रात चाननी ही, सै दिये-बत्ती दी लोड़ र्नेइं ही। रात चांदनी थी, इसलिए दीया-बाती की ज़रूरत नहीं थी। |
माया जोरें हस्सियै मजा लैंदे होई बोल्ली, कुसै होर दै गेआ होगा। माया ज़ोर से हंस कर मज़ा लेते हुए बोली, किसी और के यहां गए होंगे। |
इक ते महेश गै । एक तो महेश ही। |
ओह्दे मगरा कोई फिल्म चली, कोई नेईं चली, पर मेरा नांऽ बड्डे-बड्डे प्रोड्यूसरें च आई गेआ। उसके पश्चात कोई फिल्म चली, कोई नहीं चली, पर मेरा नाम बड़े-बड़े प्रोड्यूसरों में आ गया। |
किश पात्तर जीवन दा सुख सिर्फ बʼरें च नेईं मिथदे, ओह् लम्मी आरबला दी कामना दे थाह्र अपनी जिंदगी दे बचे दे बʼरें च होर जीवन भरदे न (सʼञ, पोआर) । कुछ पात्र जीवन का सुख केवल वर्षों में नहीं तय करते, वह लम्बी आयु की कामना की जगह अपनी ज़िंदगी के बचे हुए वर्षों में और जीवन भरते हैं (स'ञ, पोआर)। |
”इ’यै कोई सत्त ज्हार।“ """यही कोई सात हज़ार।""" |
पिता जी ने ‘नर्सिंग होम’ चा बच्चे दे जनम दा स्हेई टाइम पुच्छियै अपने दफ्तर दे इक मलाजम गी कागजा पर लिखियै पंडित जी कोल भेजी ओड़ेआ, तां जे जेह्ड़ियां धार्मिक रसमां पूरियां करनियां न, ते होर मां-बेटे दे ग्रैहें बारै च बी पता लग्गी जाऽ । पिता जी ने नर्सिंग होम से बच्चे के जन्म का सही समय पूछकर अपने दफ्तर के एक कर्मचारी को कागज पर लिखकर पंडित जी के पास भेज दिया, ताकि जो धार्मिक रस्में पूरी करनी हैं और मां-बेटे के ग्रहों के बारे में भी पता चल जाए। |
सट्ट गु’त्ती गी नशाना बनाइयै बाही जंदी ऐ, इस करी चीजां गु’त्ती बिच पौंदियां न ते किश बाह्र। खड्डे को निशाना बनाकर चोट की जाती है, इस लिए चीज़ें खड्डे के अंदर पड़ती हैं और कुछ बाहर। |
मेरी मनोस्थिति इन्नी बदली गेई जे में आपूं गै अपने आपै गी इक दर्शक आंगर दिक्खन लगा जे हून में केह् करना ऐ? मेरी मनोस्थिति इतनी बदल गई कि मैं खुद ही अपने आप को एक दर्शक की तरह देखने लगा कि अब मुझे क्या करना है? |
उ’नेंगी बझोआ हा ओह् हाथी मत्थेआ हेठ रु’लके न। उन्हें महसूस हुआ था कि वह हाथी मत्था से नीचे गिर गए हैं। |
कर्ण अपने बेलाग-लपेट आह्ले सभाऽ कारण मिगी पति कोला बद्ध अपने दोस्त लगदे न । कर्ण अपने बेलाग-लपेट वाले स्वभाव के कारण मुझे पति से ज़्यादा अपने दोस्त लगते हैं। |
”हूं ऊ ऊ...!“ नजीर ने सोचें पेदे ङ्हूरा भरेआ। """हूं ऊ ऊ...!"" नजीर ने सोच मे पड़े हुए हुंकारा भरा।" |
अम्मां दी गल्ल सुनी ओह् गलांदा, पर अम्मां जेह्के चिडू धारा लभदे न, ओह् ख’ल्लें कु’त्थै औंदे, बापू दी मौत धारा होई ही, उ’नेंगी धारां लाडलियां हियां, ओह् उस्सै धारा, उस्सै जाड़ा फिरदे होने कुतै कोई चिडू बनी। अम्मा की बात सुनकर वह कहता, पर अम्मा जो चिड़ू पहाड़ी पर मिलते हैं, वह नीचे कहाँ आते हैं, बापू की मौत पहाड़ी पर हुई थी, उन्हें पहाड़ी पसंद थी, वह उसी पहाड़ी, उसी जंगल में फिरते होंगे कहीं कोई चिड़ू बनकर। |
बाकी लोकें गी अखबारें राहें पता लग्गी गै जाग । बाकी लोगों को अखबार के जरिये पता लग ही जाएगा। |
मिगी सैनफ्रांसिस्को चलने लेई मजबूर नेईं कर । मुझे सैनफ्रांसिस्को चलने के लिए मजबूर मत करो। |
मतलब मेद घट्ट गै, पर है । मतलब उम्मीद कम है, पर है। |
सारें दियां नजरां हून रवि ते उसदी लाड़ी उप्पर हियां । सबकी नज़रें अब रवि और उसकी पत्नी पर थीं। |
छंदा, मिगी अपने चरणें कोला दूर नेईं करेओ । कृपा, मुझे अपने चरणों से कभी दूर न करना। |
अदूं उʼन्नै आखेआ हा जागत होंदा ते चंगा हा, चलो अगली बारी सेही ते हस्सी पेआ हा । तब उसने कहा था लड़का होता तो अच्छा था, चलो अगली बार सही और हंस पड़ा था। |
पर एह् सब किश चुप-चपीते होई जंदा, कोई शब्द बोलने दी लोड़ गै नेईं ही सेही होंदी । पर ये सब कुछ चुपचाप हो जाता, कोई शब्द बोलने की जरूरत ही नहीं महसूस होती। |
ब’रा 2007 च ओम गोस्वामी हुंदा क्हानी-संग्रैह् ‘बर्लिन दी दीवार’ नांऽ कन्नै छपेआ। वर्ष 2007 में ओम गोस्वामी का कहानी-संग्रह 'बर्लिन दी दीवार' नाम से छपा। |
रवि ते शांति प्रिया होरें आए दे त्रिया दिन हा । रवि और शांति प्रिया को आये हुए तीसरा दिन था। |
बब्बै-पुत्तरै दे रि’ते गी लेइयै ओह् ऐह्में जानी दियां सोचां सोचन लगी पेदा हा। बाप-बेटे के रिश्ते को लेकर वह ऐसे ही फिज़ूल सोचें सोचने लग पड़ा था। |
मिगी चेता ऐ जे में ते जुगल कोठे पर खेढा देहे जे साढ़ी नौकरैनी दर्शना असेंगी लैन आई । मुझे याद है कि जुगल और मैं छत पर खेल रहे थे जब हमारी नौकरानी दर्शना हमें लेने आई। |
समां बड़ी शैल चाल्ली गुजरा दा हा । समय बहुत अच्छी तरह से गुजर रहा था। |
अमित उʼनेंगी दिक्खियै बड़ा खुश होंदा । अमित उन्हें देखकर बहुत खुश होता। |
उ’द्दा अक्खना हा जे इस कन्नै इक जंदरा लाइयै सारा घर बंद होई सकदा। उसका कहना था कि इसके साथ एक ताला लगाकर पूरा घर बंद हो सकता है। |
अस प्रवचन मुक्कने कोला किश चिर पैह्लें बाह्र आइयै उत्थें खड़ोई गे जित्थुंआ होइयै स्वामी जी ने दूए पासै जाना हा । हम प्रवचन समाप्त होने से कुछ समय पहले बाहर आकर वहाँ खड़े हो गये जहाँ से होकर स्वामी जी ने दूसरी ओर जाना था। |
जेकर तू चाहें तां तेरे प्रवचन कराने दा बंदोबस्त बी कीता जाई सकदा ऐ । यदि तुम चाहो तो तुम्हारे लिए प्रवचन कराने की व्यवस्था की जा सकती है। |
तूं ओह्दे कशा पुच्छी दिक्ख तुगी इन्नी दूर बखले देस जाना चाहि दा जां नेईं। तुम उससे पूछ कर देखो तुम्हें इतनी दूर पराए देश जाना चाहिए या नहीं। |
कमला ते उसदी इक स्हेलड़ी अचला अक्सर उसदे कोल औंदियां। कमला और उसकी एक सहेली अचला अक्सर उसके पास आतीं। |
पर एह् मन इन्ना चैंचल ऐ जे इक थाह्रा टिकदा गै नेईं किस चाल्ली अपने बस कीता जाऽ? लेकिन ये मन इतना चंचल है कि एक जगह टिकता ही नहीं, कैसे अपने बस में किया जाए। |
”आ’ऊं माह्नू आं, खोत्ता नेईं जे सवेरे थमां रातीं तगर भार गै ढोंदा र’वां।“ """मैं इन्सान हूँ, गधा नहीं कि सुबह से रात तक भार ही ढोता रहूं।""" |
फ्ही रुट्टी दा दौर खत्म होआ । फिर खाने का दौर खत्म हुआ। |
असें बी सोची लेआ जे बरोध करने दा कोई फैदा नेईं होन लगा, गल्ल चाची दी गै मनोनी ऐ । हमने भी सोच लिया कि विरोध करने का कोई लाभ नहीं होने लगा, बात चाची की मानी जानी है। |
चन्नु नै बड्डा काला चैस्टर ते सिरा उप्पर डींगी फैल्ट टोपी लाई दी ही । चन्नू ने बड़ा काला चैस्टर और सिर के ऊपर टेढ़ी फैल्ट टोपी लगाई हुई थी। |
वाक्य दा मुंढला ऐश ते इस्सै रूप च कायम ऐ पर अगला हिस्सा ‘‘केह्ड़ा रंग मल्लेआ’’ च अनूदत होई गेदा ऐ। "वाक्य का मुख्य भाग इसी रूप में कायम रहता है लेकिन अगले भाग का अनुवाद ""केह्ड़ा रंग मल्लेआ"" में किया गया है।" |
सेई जा चुप्प करियै । सो जा चुप करके। |
दर्शना मासी उस्सी चुप कराने दी कोशश करदी । दर्शना मौसी उसे चुप कराने की कोशिश करती। |
ब’रा 2009 च डा0 मनोज हुंदा क्हानी-संग्रैह् ‘पंदरां क्हानियां’ छपेआ। वर्ष 2009 में डॉ. मनोज का कहानी-संग्रह 'पंदरां क्हानियां' छपा। |
बाकी जे किश ओह् मिगी दस्सग, ओह् सब में तुसेंगी सनाई ओड़ङ । बाकी जो कुछ वह मुझे बताएगा, वह सब मैं आपको सुना दूंगा। |
इक कस्बे दा आम जनेहा नांऽ चेते दी सरहद दे उस पारा धुंद दी बुक्कल मारे दे उ’नेंगी चग्घे चघाऽ करदा हा। एक कस्बे का आम सा नाम याद की सरहद के उस पार धुंध की चादर तान कर उनको चिढ़ा रहा था। |
बडलै सुंदर तुसें गी सारी गल्ल सनाई ओड़ग । सुबह सुंदर तुम्हें पूरी बात बता देगा। |
गनिये दी अम्मां जिन्ने चिर जींदी रेही, हिंदुएं कन्नै बड़ा कीणा करदी रेही, ते करदा गनिया बी घट्ट नेईं हा। रैह्मतां इ’यां बी बड़ी कलेशी ही। गनिये की अम्मा जितनी देर जिंदा रही, हिंदुओं के साथ बहुत घृणा करती रही, और करता गनिया भी कम नहीं था। रैहमतां ऐसे भी बहुत क्लेशी थी। |
जुगल कन्नै-कन्नै मिʼम्मी बड़ा रोई । जुगल के साथ मैं भी बहुत रोई। |
उ’आं, ओह्दे नग्गर औने दी खबर हूनै तगर सारे म्हल्लै ते तकरीबन पूरे नग्गरै च पुज्जी गेदी ही- जंगली अग्गी आंगर। वैसे, उसके नगर आने की खबर अब तक पूरे मोह्ल्ले में तकरीबन पूरे नगर में पहुच गई थी - जंगल की आग की तरह। |
मतियें क्हानियें दे मुक्ख पात्तरें कन्नै आम कोला हटियै किश खास घटी चुके दा ऐ। अधिकतर कहानियों के मुख्य पात्रों के साथ आम से हटकर कुछ खास घट चुका है। |
जिसलै ओह् हितेश जी दे बैड्ड कोल पुज्जे, में अग्गें होइयै, उʼनेंगी नमस्ते कीती, ते पुच्छेआ, ‘डाक्टर साह्ब, कैसी तबीयत ऐ इंʼदी ? जब वह हितेश जी के बेड के पास पहुंचे, मैंने आगे बढ़कर उसको नमस्ते की और पूछा, 'डॉक्टर साहब, कैसी तबीयत है इनकी? |
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