text stringlengths 19 64.8k | category stringclasses 89
values | row_number int64 0 183k | title stringclasses 0
values | token_count int64 10 10.2k |
|---|---|---|---|---|
साख निर्माण मुद्रा के प्रचलन के बाद ही साख का निर्माण संभव हो पाया है। व्यक्ति अपनी अतिरिक्त आय को बैकों में जमा करता है और इसी प्राथमिक जमाओं के आधार पर व्यापारिक बैंक साख का निर्माण करते है। मुद्रा के द्वारा ही साख का निर्माण हो सकता है। | अर्थशास्त्र | 4,600 | null | 49 |
आर्थिक विकास का सूचकांक मुद्रा के द्वारा ही हम प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय का अनुमान लगा सकते है और यह भी देख सकते है कि क्या राष्ट्रीय आय के वितरण में समानता है और अगर राष्ट्रीय आय के वितरण में समानता है तो हम कह सकते है कि आर्थिक विकास हो रहा है मुद्रा के द्वारा ही हम विभिन्न देशों के आर्थिक विकास की तुलना कर सकते ... | अर्थशास्त्र | 4,601 | null | 69 |
पूंजी की गतिशीलता में वृद्धि वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं की एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में बहुत कठिनाई होती थी मुद्रा के द्वारा हम पूंजी को एक स्थान से दूसरे स्थान, एक उद्योग से दूसरे उद्योग में आसानी से ले जा सकते है। पूंजी के गतिशील होने के कारण पूंजी की उत्पादकता बढ़ती है और देश का उत्पादन बढ़ता है। | अर्थशास्त्र | 4,602 | null | 64 |
सामाजिक कल्याण का मापक वर्तमान समय में विश्व के सभी देशों को सरकारों का लक्ष्य आधिकतम सामाजिक कल्याण तथा देश में उपलब्ध संसाधनों का कुशलतापूर्वक विदोहन करना है और सरकार मुद्रा द्वारा ही तय कर पाती है कि राष्ट्रीय आय में से कितना भाग सामाजिक कल्याण पर खर्च करना है। सामाजिक कल्याण में शिक्षा, बिजली पानी मनोरंजन, आवास, सा... | अर्थशास्त्र | 4,603 | null | 66 |
=== अनार्थिक क्षेत्र में मुद्रा का महत्व === मुद्रा ने न केवल आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित किया बल्कि सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। मुद्रा का अनार्थिक क्षेत्र में महत्व निम्नलिखित हैः | अर्थशास्त्र | 4,604 | null | 37 |
सामाजिक क्षेत्र में महत्व मुद्रा के विकास के कारण लोगों को सामाजिक तथा आर्थिक दासता से छुटकारा मिल गया है। सामान्तवादी युग में जब मुद्रा का विकास नहीं हुआ था लोग बड़े जमीदारों के पास सेवकों के रूप में काम करते थे ओर वे अपने व्यवसाय को बदल नहीं सकते थे लेकिन मुद्रा के विकास के बाद लोग अपना व्यवसाय अपनी इच्छा से चुन सकते... | अर्थशास्त्र | 4,605 | null | 75 |
राजनैतिक क्षेत्र में मुद्रा का महत्व लोग मुद्रा के रूप में सरकारों को कर देते है और सरकार को जो करों से प्राप्त आय होती है उसे सार्वजनिक व्यय के रूप में जनता के ऊपर खर्च किया जाता है। कर देने के कारण ही लोगों में राजनैतिक चेतना का विकास हुआ मुद्रा द्वारा ही सरकार देश के विकास के लिए कल्याणकारी योजनाएं शुरू कर सकती है। | अर्थशास्त्र | 4,606 | null | 66 |
कला के क्षेत्र में मुद्रा का महत्व मुद्रा द्वारा ही कला का मूल्यांकन करना संभव हो पाया है। प्रत्येक कल्याणकारी देश की सरकार मुद्रा के रूप में उस देश के कला प्रेमियों को प्रोत्साहन देती है ताकि वे अपनी कला को विकसित कर सके इस प्रकार कहा जा सकता है कि मुद्रा के द्वारा ही कला का विकास संभव हो पाया है। | अर्थशास्त्र | 4,607 | null | 62 |
== मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त == मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त में मुद्रा के मूल्य का निर्धारण प्राचीन काल से कैसे होता आया है या विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने मुद्रा के मूल्य के निर्धारण में अपने क्या-2 विचार प्रदर्शित किये इन सब बातों का अध्ययन किया जाता है। मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त का प्रतिपादन सबसे पहले 1566 में जीन बो... | अर्थशास्त्र | 4,608 | null | 143 |
=== मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त का समीकरण === मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त के दो समीकरण हैः 1. फिशर का समीकरण 2. कैम्ब्रिज समीकरण | अर्थशास्त्र | 4,609 | null | 23 |
==== फिशर का समीकरण ==== इरंविग फिशर ने अपने नकद व्यवसाय दृष्टिकोण का प्रतिपादन सन् 1911 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'The Purchasing Power fo Money' में किया। फिशर के नकद व्यवसाय दृष्टिकोण के अनुसार व्यापार की मात्रा तथा चलन वेग के स्थिर रहने पर मुद्रा की पूर्ति तथा कीमत स्तर में प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है। फिशर के अन... | अर्थशास्त्र | 4,610 | null | 86 |
PT=MV+M'V' जहाँ, P = मुद्रा का मूल्य T = वस्तुओं ओर सेवाओं की कुल मात्रा जो मुद्रा के द्वारा खरीदी जायेगी M = करेन्सी की मात्रा M' = साख मुद्रा की मात्रा V = मुद्रा का चलन वेग V' = साख मुद्रा का चलन वेग ऊपर लिखे हुए समीकरण में बताया गया है कि ( MV + M'V' ) मुद्रा की कुल पूर्ति है तथा ( PT ) मुद्रा की मांग को प्रदर्षित ... | अर्थशास्त्र | 4,611 | null | 75 |
मुद्रा की पूर्ति मुद्रा की पूर्ति में हम मुद्रा की मात्रा तथा मुद्रा के चलन वेग को शामिल करते है। मुद्रा की मात्रा में हम करेन्सी की मात्रा तथा साख मुद्रा की मात्रा को शामिल करते हैं। | अर्थशास्त्र | 4,612 | null | 37 |
M + M' = नोट + सिक्के + साख मुद्रा मुद्रा की चलन गति से अभिप्राय यह है कि मुद्रा की एक इकाई द्वारा एक वर्ष में कितनी बार वस्तुंए तथा सेवायें खरीदी जाती है। | अर्थशास्त्र | 4,613 | null | 35 |
चलन गति = कुल राष्ट्रीय उत्पाद/प्रचलन में मुद्रा मुद्रा की मांग मुद्रा द्वारा हम विभिन्न अवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं इसलिए मुद्रा की मांग करते है। फिशर के विनिमय समीकरण में मुद्रा की मांग में व्यापारिक सौदे तथा कीमत स्तर को शामिल करते है। 1. व्यापारिक सौदों से अभिप्रायः एक वर्ष में बाजार मे ब्रिकी के लिए आने वाले सभी... | अर्थशास्त्र | 4,614 | null | 120 |
===== फिशर के समीकरण की आलोचना ===== फिशर के समीकरण की निम्नलिखित आलोचनाएँ हैः | अर्थशास्त्र | 4,615 | null | 14 |
1. अवास्तविक मान्यताएँ फिशर ने अपने समीकरण में कई अवास्तविक मान्यताओं को शामिल किया है। जैसे कीमत स्तर को निष्क्रिय तत्व तथा मुद्रा की पूर्ति को सक्रिय तत्व माना गया है और व्यापारिक सौदों तथा मुद्रा की चलन गति को स्थिर मान लिया गया है। | अर्थशास्त्र | 4,616 | null | 45 |
2. मुद्रा की पूर्ति को अधिक महत्व इरविंग फिशर ने अपने सिद्धान्त में मुद्रा की मांग की अपेक्षा मुद्रा की पूर्ति को अधिक महत्व दिया है। फिशर ने बताया कि मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होने पर कीमत स्तर परिवर्तित होता है जबकि मुद्रा की माँग का कीमत स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार फिशर केवल मुद्रा के पूर्ति पक्ष क... | अर्थशास्त्र | 4,617 | null | 68 |
3. कीमत स्तर को निष्क्रिय मानना इरविग फिशर ने कीमत स्तर की एक निष्क्रिय तत्व माना है बल्कि कीमत स्तर एक सक्रिय तत्व है। कीमत स्तर में परिवर्तन होने में अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र प्रभावित होते है। कीमत स्तर में वृद्धि होने से उद्यमी के लाभ के स्तर पर भी वृद्धि होती है। इस प्रकार कीमत स्तर को निष्क्रिय तत्व मानना गलत बा... | अर्थशास्त्र | 4,618 | null | 64 |
4. पूर्ण रोजगार फिशर का परिमाण सिद्धान्त केवल पूर्ण रोजगार की अवस्था में लागू होता है। परन्तु प्रो. केन्ज के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अपूर्ण रोजगार की अवस्था पाई जाती है और यह सिद्धान्त अपूर्ण रोजगार की अवस्था में लागू नहीं होगा। | अर्थशास्त्र | 4,619 | null | 42 |
5. व्यापार चक्रों की व्याख्या करने में असफल फिशर का परिमाण सिद्धान्त व्यापार चक्रों की व्याख्या करने में असफल रहा है। यह मंदी तथा तेजी की स्थिति में मुद्रा की पूर्ति तथा कीमत स्तर की व्याख्या नहीं कर पाता है क्योंकि यह व्यापारिक सौदों का आकार तथा मुद्रा की चलन गति को स्थिर मान लेता है। | अर्थशास्त्र | 4,620 | null | 56 |
6. ब्याज की दर के प्रभाव की अवहेलना इरविंग फिशर का सिद्धान्त कीमतों पर ब्याज की दर के प्रभाव की व्याख्या नहीं कर पाता है। सबसे पहले मुद्रा की पूर्ति बढ़ती है मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होने से ब्याज की दर कम होती है ब्याज की दर में कमी होने से निवेश बढ़ता है निवेश बढ़ने से आय तथा उत्पादन बढ़ता है आय तथा उत्पादन बढ़ने ... | अर्थशास्त्र | 4,621 | null | 96 |
7. अमौद्रिक तत्वों के प्रभाव की अवहेलना कीमत स्तर को कई संस्थागत राजनैतिक, अन्तर्राष्ट्रीय, तकनीकी तथा मनोवैज्ञानिक तत्व प्रभावित करते हैं परन्तु फिशर ने इन सब तत्वों की अवहेलना की है। फिशर मानता है कि कीमत स्तर पर केवल मुद्रा की पूर्ति का ही प्रभाव पड़ता है। | अर्थशास्त्र | 4,622 | null | 47 |
== मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की मान्यताएँ == 1. करेन्सी तथा बैंक रोजगार की स्थिति में होती है। 2. अर्थव्यवस्था पूर्ण रोजगार की स्थिति मे होती है। 3. व्यापारिक सौदों की मात्रा को स्थिर मान लिया गया है। 4. मुद्रा की पूर्ति को सरकार तथा केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित किया जाता है। 5. मुद्रा की मात्रा को सक्रिय तत्व माना... | अर्थशास्त्र | 4,623 | null | 81 |
=== नकद शेष समीकरण === नकद शेष समीकरण कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्रियों से सम्बन्धित है। इसमें मार्शल, पीगू रोबर्टसन तथा केन्ज आदि को शामिल किया जाता है। कैम्ब्रिज सिद्धान्त मुद्रा की मांग को अधिक महत्व प्रदान करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार मुद्रा के मूल्य पर मुद्रा की मांग का अधिक प्रभाव पड़ता है क्योंकि मुद... | अर्थशास्त्र | 4,624 | null | 152 |
==== विभिन्न नकद शेष समीकरण ==== 1. मार्शल का समीकरण 2. पीगू का समीकरण 3. रोबर्टसन का समीकरण 4. केन्ज का समीकरण नकद शेष समीकरण की आलोचनाएं नकद शेष समीकरण की निम्नलिखित आलोचनाएं हैं 1. इस सिद्धान्त में कुछ मान्यतायें अवास्तविक है जैसे ज्ञ और ज् को स्थिर मान लिया है। परन्तु ज्ञ और ज् वास्तविक जीवन में स्थिर नहीं होते है।... | अर्थशास्त्र | 4,625 | null | 139 |
== केन्ज का मुद्रा सिद्धान्त == समष्टि अर्थशास्त्र के पिता जे. ए. केन्ज ने अपनी पुस्तकों 'A Trealise on Money' तथा 'The General Theory fo Employment Interest and Money' में मुद्रा के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। मुद्रा के परम्परागत परिमाण सिद्धान्त के अनुसार मुद्रा के परिमाण में परिवर्तन का कीमतों के साथ सीधा सम्बंध ह... | अर्थशास्त्र | 4,626 | null | 123 |
केन्ज के मुद्रा सिद्धान्त का आधारभूत समीकरण केन्ज ने राष्ट्रीय आय को उत्पादन के साधनों को किये जाने वाले भुगतान तथा आकस्मिक लाभ को जोड़ बताया है | अर्थशास्त्र | 4,627 | null | 27 |
Y=E + Q Y = राष्ट्रीय आय E = उत्पादन के साधनों को किया गया भुगतान Q = आकस्मिक लाभ 2. कुल उत्पादन को पूंजीगत वस्तुएँ तथा उपभोग वस्तुओं का जोड़ बताया है। | अर्थशास्त्र | 4,628 | null | 33 |
O = R + C O = उत्पाद R = उपभोग वस्तुएं C = पूंजीगत वस्तुएं केन्ज के मुद्रा सिद्धान्त की व्याख्या केन्ज ने अपने मुद्रा के सिद्धान्त की व्याख्या दो आधारभूत तत्वों के द्वारा की है। 1. केन्ज के अनुसार कीमत स्तर तथा मुद्रा की मात्रा के बीच विपरीत संबंध होता है। 2. पूर्ण रोजगार की स्थिति से पहले जितना मुद्रा की मात्रा को बढ़... | अर्थशास्त्र | 4,629 | null | 344 |
=== केन्ज के मुद्रा सिद्धान्त की मान्यताएं === केन्ज के मुद्रा सिद्धान्त की निम्नलिखित मान्यताएं हैः 1. उत्पादन के साधनों की पूर्ति कीमत लोचदार होती है। 2. इस सिद्धान्त में बेरोजगारी के समय उत्पादन की पूर्ति लोच की इकाई के बराबर माना गया है। 3. पूर्ण रोजगार की स्थिति में साधनों की पूर्ति को नहीं बढ़ाया जा सकता। 4. इस स... | अर्थशास्त्र | 4,630 | null | 95 |
=== केन्ज के मुद्रा सिद्धान्त की आलोचना === केन्ज के मुद्रा सिद्धान्त की निम्नलिखित आलोचनाएं हैः 1. केन्ज का मुद्रा का सिद्धान्त पूर्ण रोजगार की मान्यता पर आधारित है परन्तु वास्तविक जीवन में कभी पूर्ण रोजगार सन्तुलन नहीं पाया जाता है। 2. इस सिद्धान्त में बताया गया है कि जब मुद्रा की पूर्ति को बढ़ाया जाता है तो ब्याज की... | अर्थशास्त्र | 4,631 | null | 132 |
== इन्हें भी देखें == भारतीय रुपया मुद्रा (भाव भंगिमा) मुद्रा (संगीत) | अर्थशास्त्र | 4,632 | null | 12 |
== बाहरी कड़ियाँ == प्राचीन भारतीय मुद्राएँ (गूगल पुस्तक ; लेखक - राजवन्त राव, प्रदीप कुमार राव) भारतीय मुद्रा के निर्माण की कहानी भारतीय मुद्रा का इतिहास (भारतीय रिजर्व बैंक) | अर्थशास्त्र | 4,633 | null | 30 |
मुद्रा स्फीति दर मुद्रा स्फीति,मूल्य सूचकांक की वृद्धि की दर, को मापने का तरीका है। | अर्थशास्त्र | 4,634 | null | 15 |
मुद्रास्फीति (inflation) या महंगाई किसी अर्थव्यवस्था में समय के साथ विभिन्न माल और सेवाओं की कीमतों (मूल्यों) में होने वाली एक सामान्य बढ़ौतरी को कहा जाता है। जब सामान्य मूल्य बढ़ते हैं, तब मुद्रा की हर ईकाई की क्रय शक्ति (purchasing power) में कमी होती है, अर्थात् पैसे की किसी मात्रा से पहले जितनी माल या सेवाओं की मात... | अर्थशास्त्र | 4,635 | null | 140 |
== मापन == मुद्रास्फीति का माप मुद्रास्फीति दर (inflation rate) से करा जाता है, यानि एक वर्ष से दूसरे वर्ष के बीच मूल्य वृद्धि का प्रतिशत। उदाहरण के लिएः 1990 में एक सौ रुपए में जितना सामान आता था, अगर 2000 में उसे खरीदने के लिए दो सौ रुपए व्यय करने पड़े है तो माना जाएगा कि मुद्रा स्फीति शत-प्रतिशत बढ़ गई। अधिक मुद्रास... | अर्थशास्त्र | 4,636 | null | 113 |
== कारण == मुद्रास्फीति के कई कारण हो सकते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो भागो में बाँट सकते हैं: | अर्थशास्त्र | 4,637 | null | 20 |
मांग कारक (demand pull) मूल्य वृद्धि कारक (cost push) मांग कारक माल सेवा की मांग में वृद्धि से पैदा होते हैं जबकि मूल्य वृद्धि कारक स्पष्टतः मूल्य वृद्धि अथवा माल सेवा की आपूर्ति में कमी से उत्पन्न होते हैं। | अर्थशास्त्र | 4,638 | null | 39 |
=== मांग कारक === बढ़ता सरकारी व्यय - जो की विगत कई सालों से बढ़ रहा हो जिस से सामान्य जनता के हाथों में अधिक धन आ जाता हैं जो उनकी खरीद क्षमता को बढाता है। यह मुख्य रूप से गैर योजना व्यय (Unplanned expenditure) है जो की अनुत्पादक प्रकृति का होता है तथा केवल क्रय क्षमता में तथा मांग में वृद्धि करता है। घाटे की पूर्ति त... | अर्थशास्त्र | 4,639 | null | 103 |
=== मूल्य वृद्धि कारक === उत्पादन-आपूर्ति में उतार चढ़ाव: जब कभी उत्पादन में अत्यधिक उतार चढ़ाव आता हैं या प्राप्त उत्पादन को मुनाफा कमाने वाले लोग जमा कर लेते हैं। उत्पादकता से अधिक वेतन वृद्धि लागत मूल्य को बढ़ाते हैं जो नतीजतन मूल्य में वृद्धि कर देते हैं, साथ ही मांग तथा क्रय क्षमता में भी वृद्धि होती हैं जो पहले व... | अर्थशास्त्र | 4,640 | null | 143 |
== मुद्रा स्फीति के प्रभाव == मुद्रास्फीति के किसी अर्थव्यवस्था के आर्थिक क्षेत्र तथा अनार्थिक क्षेत्र पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते है- | अर्थशास्त्र | 4,641 | null | 21 |
1. निवेशकर्ता पर प्रभाव निवेशकर्ता दो प्रकार के होते है। पहले प्रकार के निवेशकर्ता वे होते है जो सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करते है। सरकारी प्रतिभूतियों से निश्चित आय प्राप्त होती है तथा दूसरे निवेशकर्ता वे होते है जो संयुक्त पूंजी कम्पनियों के हिस्से खरीदते है। इनकी आय मुद्रास्फीति के होने पर बढ़ती है। मुद्रास्फीति... | अर्थशास्त्र | 4,642 | null | 68 |
2. निश्चित आय के वर्ग पर प्रभाव निश्चित आय के वर्ग में वे सब लोग आते है जिनकी आय निश्चित होती है जैसे श्रमिक, अध्यापक, बैंक कर्मचारी आदि। मुद्रास्फीति के कारण वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बढ़ती है जिसका प्रभाव निश्चित आय वर्ग पर पड़ता है। इस प्रकार मुद्रास्फीति के कारण निश्चित आय वर्ग नुकसान उठाता है। | अर्थशास्त्र | 4,643 | null | 57 |
3. कृषकों पर प्रभाव मुद्रास्फीति का कृषक वर्ग पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि कृषक वर्ग उत्पादन करता है तथा मुद्रास्फीति के दौरान उत्पादन की कीमतें बढ़ती है। इस प्रकार मुद्रास्फीति के दौरान कृषक वर्ग को लाभ मिलता है। | अर्थशास्त्र | 4,644 | null | 39 |
4. ऋणी और ऋणदाता पर प्रभाव मुद्रास्फीति का ऋणदाता पर प्रतिकूल तथा ऋणी पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। क्योंकि जब ऋणदाता अपने रुपये किसी को उधार देता है तो मुद्रास्फीति होने के कारण उसके रुपये का मूल्य कम हो जायेगा। इस प्रकार ऋणदाता को मुद्रास्फीति से हानि तथा ऋणी को लाभ होता है। | अर्थशास्त्र | 4,645 | null | 53 |
5. बचत पर प्रभाव मुद्रास्फीति का बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि मुद्रास्फीति होने के कारण वस्तुओं पर किये जाने वाले व्यय में वृद्धि होती है। इससे बचत की सम्भावना कम हो जायेगी। दूसरी और मुद्रास्फीति से मुद्रा के मूल्य में कमी होगी और लोग बचत करना ही नहीं चाहेगें। | अर्थशास्त्र | 4,646 | null | 51 |
6. भुगतान संतुलन पर प्रभाव मुद्रास्फीति के समय वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि होती है। इसके कारण हमारे निर्यात मँहगे हो जायेगें तथा आयात सस्ते हो जायेगें। नियार्तों में कमी होगी तथा आयतों में वृद्धि होगी जिसके कारण भुगतान सन्तुलन प्रतिकूल हो जायेगा। | अर्थशास्त्र | 4,647 | null | 45 |
7. सार्वजनिक ऋणों पर प्रभाव मुद्रास्फीति के कारण सार्वजनिक ऋणों में वृद्धि हो जाती है क्योंकि जब कीमत स्तर में वृद्धि होती है तो सरकार को सार्वजनिक योजनाओं पर अपने व्यय को बढ़ाना पड़ता है इस व्यय की पूर्ति के लिए सरकार जनता से ऋण लेती है। अतः मुद्रास्फीति के कारण सार्वजनिक ऋणों में वृद्धि होती है। | अर्थशास्त्र | 4,648 | null | 57 |
8. करों पर प्रभाव मुद्रास्फीति के कारण सरकार के सार्वजनिक व्यय में बहुत वृद्धि होती है। सरकार अपने व्यय की पूर्ति के लिए नये-नये कर लगाती है तथा पुराने करों में वृद्धि करती है। इस प्रकार मुद्रास्फीति के कारण करों के भार में वृद्धि होती हे। | अर्थशास्त्र | 4,649 | null | 46 |
9. नैतिक प्रभाव मुद्रास्फीति के कारण व्यापारी वर्ग लालच में अंधा हो जाता है और जमाखोरी, मुनाफाखोरी तथा मिलावट आदि का प्रयोग उत्पादन को बेचने में करते है। सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते है तथा व्यक्तियों में नैतिक मूल्यों का पतन होता है। | अर्थशास्त्र | 4,650 | null | 45 |
10. उत्पादकों पर प्रभाव मुद्रास्फीति के कारण उत्पादक तथा उद्यमी वर्ग को लाभ प्राप्त होता है क्योंकि उत्पादक जिन वस्तुओं का उत्पादन करते है उनकी कीमते बढ़ रही होता है तथा मजदूरी में भी वृद्धि कीमतों की तुलना में कम होती है। इस प्रकार मुद्रास्फीति से उद्यमी तथा उत्पादकों का फायदा होता है। | अर्थशास्त्र | 4,651 | null | 53 |
== मुद्रास्फीति को नियन्त्रित करने के उपाय == मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैः | अर्थशास्त्र | 4,652 | null | 19 |
=== मौद्रिक उपाय === मौद्रिक नीति के द्वारा भी हम मुद्रा की पूर्ति को नियमित कर मुद्रास्फीति को नियत्रित कर सकते है। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित मौद्रिक उपायों को प्रयोग में लाया जा सकता है। | अर्थशास्त्र | 4,653 | null | 38 |
1. मुद्रा की मात्रा पर नियंत्रण मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित करके मुद्रास्फीति पर काबू पाया जा सकता है और मुद्रा की मात्रा को केन्द्रीय बैक द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार जब केन्द्रीय बैंक मुद्रा की मात्रा पर कड़ा नियंत्रण लागू करे तो मुद्रा की मात्रा नियंत्रित हो जायेगी। | अर्थशास्त्र | 4,654 | null | 52 |
2. साख नियंत्रण बढ़ती हुई कीमतों पर काबू पाने के लिए केन्द्रीय बैंक साख को नियंत्रित कर सकती है। साख को नियत्रित करने के लिए केन्द्रीय बैंक परिमाणात्मक तथा गुणात्मक दोनों प्रकार के उपायों को प्रयोग में ला सकती है। इन उपायों के अन्तर्गत बैंक दर में वृद्धि, रेपो दर तथा रिवर्स रेपो दर में वृद्धि, न्यूनतम नकद कोष में वृद्ध... | अर्थशास्त्र | 4,655 | null | 78 |
3. विमुद्रीकरण अगर मुद्रास्फीति पर नियंत्रण कर पाना संभव न हो तो सरकार विमुद्रीकरण का भी सहारा ले सकती हैं। विमुद्रीकरण के अन्तर्गत सरकार पुरानी करेन्सी की जगह नई करेन्सी लेकर आती है। जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रण में लाया जा सकता है। | अर्थशास्त्र | 4,656 | null | 42 |
=== राजकोषीय उपाय === राजकोषीय उपायों में हम निम्नलिखित उपायों को शामिल कर सकते हैः 1. सार्वजनिक व्ययों में कमी-- सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि से लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होती है। क्रयशक्ति में वृद्धि होने से मांग में वृद्धि होगी तथा मांग में वृद्धि होने से कीमत स्तर में वृद्धि होगी। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय में कम... | अर्थशास्त्र | 4,657 | null | 66 |
2. सार्वजनिक ऋणों में वृद्धि कीमतों में वृद्धि मांग में वृद्धि होने के कारण होती है जिससे सार्वजनिक ऋणों में वृद्धि हो जाती है।मांग को कम करने के लिए सरकार निजी व्यक्तियों से ऋण ले सकती है। जब निजी क्षेत्र से ऋण लिया जायेगा तो निजी क्षेत्र के व्यय में कमी हो जायेगी। इस प्रकार सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि करके भी मुद्रास... | अर्थशास्त्र | 4,658 | null | 67 |
3. करों में वृद्धि मुद्रास्फीति के कारण सार्वजनिक व्यय में वृद्धि होती है। इस व्यय की पूर्ति के लिए सरकार नये-नये कर लगाती है तथा पुराने करों की दरों में वृद्धि करती है। करों की दरों में वृद्धि का उत्पादन पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। | अर्थशास्त्र | 4,659 | null | 45 |
4. घाटे की वित्त व्यवस्था में कमी घाटे की वित व्यवस्था उस समय अपनाई जाती है जब सरकार की आय उसके द्वारा किए गए व्यय से कम रह जाती है घाटे की वित व्यवस्था में सरकार नई मुद्रा को जारी करती है और अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति को बढ़ाती है। अतः मुद्रास्फीति को नियत्रित करने के लिए घाटे की वित्त व्यवस्था को कम करना होगा। | अर्थशास्त्र | 4,660 | null | 66 |
=== अन्य उपाय === मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक तथा राजकोषीय उपायों के अतिरिक्त कुछ अन्य उपाय भी है। | अर्थशास्त्र | 4,661 | null | 21 |
1. उत्पादन में वृद्धि उत्पादन में वृद्धि करके भी मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि मुद्रास्फीति उस समय पैदा होती है जब कुल मांग कुल पूर्ति से ज्यादा हो जाता है। इस प्रकार हम कुल पूर्ति या उत्पादन को बढ़ाकर मुद्रास्फीति को नियात्रित कर सकते हैं। | अर्थशास्त्र | 4,662 | null | 48 |
2. बचत को प्रोत्साहन देकर बचत को बढ़ाकर भी मुद्रास्फीति को नियत्रित कर सकते है। सरकार द्वारा बचत को प्रोत्साहित करने वाली योजनाएं चलानी चाहिए। जब बचत में वृद्धि होती है तो निजी व्ययों में कमी होगी तथा मांग स्वयं ही कम हो जायेगी तथा कीमत स्तर नियंत्रण में आ जायेगा। | अर्थशास्त्र | 4,663 | null | 51 |
3. कीमत निंयत्रण तथा राशन व्यवस्था राशन व्यवस्था मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था है। राशनिंग व्यवस्था में कीमत स्तर भी ज्यादा नहीं बढ़ता तथा सब लोगों को अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएं भी मिल जाती है। | अर्थशास्त्र | 4,664 | null | 37 |
== इन्हें भी देखें == मुद्रा (विनिमय माध्यम) मुद्रा आपूर्ति | अर्थशास्त्र | 4,665 | null | 10 |
मुर्ग़ी का खेल (chicken), जिसे बाज़-बटेर खेल (hawk-dove game) या बर्फ़ के टीले का खेल (snow-drift game) भी कहा जाता है, खेल सिद्धांत में दो प्रतिद्वंदियों के बीच होने वाला एक प्रकार का संघर्ष है। इसमें दोनों के बीच में एक ऐसी प्रतियोगिता शुरू हो जाती है जिसमें दोनों में से कोई भी पीछे नहीं हटना चाहता लेकिन किसी के भी न... | अर्थशास्त्र | 4,666 | null | 289 |
== इन्हें भी देखें == खेल सिद्धांत क्यूबाई मिसाइल संकट | अर्थशास्त्र | 4,667 | null | 10 |
यूरोपीय ऋण संकट (European debt crisis) सन २०१० में यूनान से आरम्भ हुआ और एक के बाद दूसरे यूरोपीय देश को अपने चपेटे में लिये जा रहा है। इन देशों का बजट घाटा बेलगाम बढ रहा है। यूनान जून २०१५ में दिवालिया हो गया तथा कई अन्य देश दिवालिया होने की कगार पर खड़े हैं। यह संकट यूनान, आयरलैण्ड, इटली, स्पेन, पुर्तगाल आदि को अपने च... | अर्थशास्त्र | 4,668 | null | 78 |
== इन्हें भी देखें == यूनान का सरकारी ऋण संकट | अर्थशास्त्र | 4,669 | null | 10 |
== बाहरी कड़ियाँ == यूरोपीय संकट और दूसरी मंदी की ओर विश्व अर्थव्यवस्था यूरो संकट : बम का मुकाबला भाले से मौन स्वीकृति की कीमत ! 2011 Dahrendorf Symposium - Changing the Debate on Europe – Moving Beyond Conventional Wisdoms 2011 Dahrendorf Symposium Blog Interactive Map of the Debt Crisis Economist Magazine, 9 फ़रवरी 2... | अर्थशास्त्र | 4,670 | null | 163 |
राजनीतिक अर्थशास्त्र (political economy) या राजकीय अर्थशास्त्र किसी समाज में राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के बँटवारे की जानकारी देते हुए बताता है कि सत्ता का यह वितरण वैकासिक और अन्य नीतियों पर किस तरह का प्रभाव डाल रहा है। इसी बात को इस तरह भी कहा जा सकता है कि राजनीतिक अर्थशास्त्र उन बुद्धिसंगत फ़ैसलों का अध्ययन करता है ... | अर्थशास्त्र | 4,671 | null | 147 |
== परिचय == अट्ठारहवीं सदी के मध्य में प्रकाशित ऐडम स्मिथ की रचना वेल्थ ऑफ़ नेशंस से लेकर उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित जॉन स्टुअर्ट मिल की रचना प्रिंसिपल्स ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनॉमी और कार्ल मार्क्स की रचना 'कैपिटल : अ क्रिटीक ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनॉमी' तक के लम्बे दौर में अर्थशास्त्र का अनुशासन मुख्य तौर से 'राजनीतिक अर्थशास्त्र'... | अर्थशास्त्र | 4,672 | null | 1,263 |
== सन्दर्भ == 1. जेम्स स्टुअर्ट मिल (1844), एसेज़ ऑन द अनसेटल्ड क्वेश्चंस ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनॉमी, जेडब्ल्यू पार्कर, लंदन. 2. कार्ल मार्क्स (1867/1976), कैपिटल : अ क्रिटीक ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनॉमी, पेंगुइन. 3. ए. ड्रैज़ेन (2000), पॉलिटिकल इकॉनॉमी इन मैक्रोइकॉनॉमिक्स, प्रिंसटन युनिवर्सिटी प्रेस, प्रिंसटन, एनजे. 4. ए. लिंडबेक (... | अर्थशास्त्र | 4,673 | null | 73 |
सरकार द्वारा वसूले गए सभी प्रकार के कर और शुल्क, निवेशों पर प्राप्त ब्याज और लाभांश तथा विभिन्न सेवाओं के बदले प्राप्त रकम को राजस्व प्राप्ति या राजस्व (अंग्रेजी में: Revenue) कहा जाता है। हिन्दी में [संप्राप्ति]] और राजस्व दो अलग- अलग अर्थ वाले शब्द हैं, परन्तु इन दोनो शब्दों के लिये अंग्रेजी में एक ही शब्द Revenue का... | अर्थशास्त्र | 4,674 | null | 67 |
विभिन्न सरकारी विभागों और सेवाओं पर खर्च, ऋण पर ब्याज की अदायगी और सब्सिडियों पर होने वाले व्यय को राजस्व व्यय कहते हैं। राजस्व व्यय करों, शुल्कों, फ़ीसों, जुर्माना आदि प्रकार की मदों से किए जाते हैं। | अर्थशास्त्र | 4,675 | null | 37 |
रुपया (रु॰) (हिंदी और उर्दू: रुपया, संस्कृत: रूप्यकम् से उत्प्रेरित जिसका अर्थ चांदी का सिक्का है) भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मॉरीशस और सेशल्स में उपयोग मे आने वाली मुद्रा का नाम है। प्रबुद्ध इंटरटेनमेंट नेचुआ जलालपुर गोपालगंज बिहार द्बारा जन मानस को रुपया की महता को दर्शाते हूए " रूपया' टेली फिल्म भोजपुरी का नि... | अर्थशास्त्र | 4,676 | null | 124 |
== नामकरण विक्कीतिवारी == 2000"रुपया" शब्द का उद्गम संस्कृत के शब्द रुप् या रुप्याह् मे निहित है, जिसका अर्थ कच्ची चांदी होता है और रूप्यकम् का अर्थ चांदी का सिक्का है। कालांतर मे पूरे उपमहाद्वीप मे मौद्रिक प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए तीनों धातुओं के सिक्कों का मानकीकरण किया गया। | अर्थशास्त्र | 4,677 | null | 51 |
== मूल्य == ‘रुपया’ आज तक प्रचलन मे है। भारत मे ब्रिटिश राज के दौरान भी यह प्रचलन मे रहा, इस दौरान इसका वजन ११.६६ ग्राम था और इसके भार का ९१.७% तक शुद्ध चांदी थी। १९वीं शताब्दी के अंत मे रुपया प्रथागत ब्रिटिश मुद्रा विनिमय दर, के अनुसार एक शिलिंग और चार पेंस के बराबर था वहीं यह एक पाउंड स्टर्लिंग का १ / १५ हिस्सा था। उ... | अर्थशास्त्र | 4,678 | null | 149 |
== मूल्य वर्ग == पहले रुपए (११.६६ ग्राम) को १६ आने या ६४ पैसे या १९२ पाई में बांटा जाता था। रुपये का दशमलवीकरण १८६९ में सीलोन (श्रीलंका) में, १९५७ में भारत मे और १९६१ में पाकिस्तान में हुआ। इस प्रकार अब एक भारतीय रुपया १०० पैसे में विभाजित हो गया। भारत में कभी कभी पैसे के लिए नया पैसा शब्द भी इस्तेमाल किया जाता था। भार... | अर्थशास्त्र | 4,679 | null | 90 |
असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बोली जाने वाली असमिया और बांग्ला भाषाओं में, रुपये को टका के रूप में जाना जाता है और भारतीय बैंक नोटों पर भी इसी रूप में लिखा जाता है। भारत और पाकिस्तान की मुद्रा १, २, ५, १०, २०, ५०, १००, २००, ५०० और २००० रुपये के मूल्यवर्ग में जारी की जाती है, वहीं पाकिस्तान मे ५००० रुपये का नोट भी ज... | अर्थशास्त्र | 4,680 | null | 88 |
वर्ष २०१० में भारत सरकार द्वारा एक रुपये के लिये प्रतीक चिह्न निर्धारित करने हेतु एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जूरी द्वारा सभी प्रविष्टियों में से पाँच डिजाइनों को चुना गया जिनमें से अन्तिम रूप से आइआइटी के प्रवक्ता उदय कुमार के डिजाइन को चुना गया। | अर्थशास्त्र | 4,681 | null | 48 |
== यह भी देखे == रुपए का इतिहास खाड़ी रुपया | अर्थशास्त्र | 4,682 | null | 10 |
== बाहरी कड़ियाँ == भारतीय मुद्रा के निर्माण की कहानी Archived 2010-03-25 at the वेबैक मशीन चांदी से टांका रहा है हमारे रुपये का (अर्थकाम) पैसों के बारे में महान व्यक्तियों के विचार | अर्थशास्त्र | 4,683 | null | 33 |
रोज़गार, ब्याज़ और धन का सामान्य सिद्धांत (द जनरल थ्योरी ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट, इंटरेस्ट एंड मनी) अंग्रेजी अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसने आर्थिक विचार में गहन बदलाव किया, जिससे मैक्रोइकॉनॉमिक्स ने आर्थिक सिद्धांत में एक केंद्रीय स्थान दिया और इसकी शब्दावली में बहुत योगदान दिया - "... | अर्थशास्त्र | 4,684 | null | 110 |
== बाहरी कड़ियाँ == Introduction by Paul Krugman to The General Theory of Employment, Interest and Money, by John Maynard Keynes Full text on marxists.org Reply to Viner, QJE, 1937. A valuable paper in which Keynes restates many of his ideas in the light of criticisms. It has no agreed title and is also known as 'The G... | अर्थशास्त्र | 4,685 | null | 89 |
लाभांश (अंग्रेज़ी:dividend / डिविडेंड) किसी कंपनी के लाभ में भागीदारों का अंश होता है जो वह कंपनी लाभ कमाने पर अपने शेयरधारकों को देती है। किसी ज्वाइंट स्टॉक कंपनी में लाभांश, शेयरों के निश्चित मूल्य के आधार पर मिलता है। इस मामले में शेयरधारक उसके शेयर के अनुपात में डिविडेंड ग्रहण करता है। डिविडेंड पैसे, शेयर या अन्य क... | अर्थशास्त्र | 4,686 | null | 404 |
== प्रकार == लाभांश मुख्यत: तीन प्रकार के होते हैं: | अर्थशास्त्र | 4,687 | null | 10 |
=== नकद लाभांश === कैश डिविडेंड कैश डिविडेंड का भुगतान चेक के रूप में किया जाता है। इस प्रकार अर्जित आय पर शेयरधारक को कर अदा करना पड़ता है। एक सामान्य उदाहरण लें, तो यदि किसी व्यक्ति के पास १००० शेयर हैं और यदि उनका कैश डिविडेंड मूल्य १ रुपये हैं तो उसे डिविडेंड के रूप में १००० रुपये मिलेंगे।. | अर्थशास्त्र | 4,688 | null | 60 |
=== प्रतिभूति लाभांश === स्टॉक डिविडेंड स्टॉक डिविडेंड में कंपनी शेयरधारक को मिलने वाले लाभ के एवज में और शेयर दे देती है। इस डिविडेन्ड के उदाहरण स्वरूप १००० शेयर रखने वाले को पांच प्रतिशत का डिविडेंड लाभ होने पर कंपनी उसे पांच अतिरिक्त शेयर देगी। | अर्थशास्त्र | 4,689 | null | 46 |
=== संपत्ति लाभांश === प्रॉपर्टी डिविडेंड प्रॉपर्टी डिविडेंड में लाभांश कमाने के रूप में कंपनी शेयरधारक को कोई सम्पत्ति देती है, लेकिन कंपनी प्राय: ऐसे डिविडेंड यदा-कदा ही देती है। यह पूर्णतया शेयरधारक की इच्छा पर निर्भर करता है कि डिविडेंड के रूप में मिले हुए शेयर को अपने पास रखे या उन्हें बेच दे। लाभांश घोषित करने की... | अर्थशास्त्र | 4,690 | null | 123 |
== कर == निवेशक को मिलने वाला लाभांश कर-मुक्त होता है। हालांकि यह व्यक्ति-विशेष के अनुसार अलग-अलग होता है, लेकिन ब्याज पर कर लगता है। ऐसा इसलिये हैं, क्योंकि ब्याज को खर्च माना जाता है और लाभांश को निवेशक का लाभ मानते हैं। यदि कंपनी अपनी आय, जिसमें लाभांश भी शामिल हैं, पर कर अदा कर चुकी है, तो उसके बाद लभांश पर कर लेने... | अर्थशास्त्र | 4,691 | null | 131 |
बड़े निवेशकों के लिए लाभप्रद: बड़े निवेशकों, जिनके पास ज्यादा मात्रा में स्टॉक है, उनके लिए कर बचाने का ये बेहतर विकल्प है। कई मामलों में अन्य माध्यमों से हुई आय पर अधिक कर अदा करना पड़ जाता है। ऐसे में लाभांश के माध्यम से पैसा आने पर यह बोझ कम हो जाता है। टैक्स की संरचना: कर के लिहाज से प्रत्येक स्थिति में लाभांश बेहत... | अर्थशास्त्र | 4,692 | null | 139 |
== इन्हें भी देखें == पूँजी कैश डिविडेंट या लाभांश at Finoहिंदी बोनस शेयर at Finoहिंदी | अर्थशास्त्र | 4,693 | null | 16 |
== बाहरी कड़ियाँ == Dividends शेयर बाजार में लाभांश Dividends शेयर बाजार में लाभांश वीडियो लाभांश यील्ड गणना {{date=जून 2023 {Finoहिन्दी Archived 2021-06-26 at the वेबैक मशीन | अर्थशास्त्र | 4,694 | null | 27 |
अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका का अध्ययन लोक वित्त (Public finance) कहलाता है। यह अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो सरकार के आय (revenue) तथा व्यय का आकलन करती है। अर्थात सार्वजनिक वित्त सरकार के आय व व्यय का विस्तृत अध्ययन है। इसके द्वारा राज्य द्वारा अर्जित आय तथा सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा किए गए व्यय का लेखा जोखा प्र... | अर्थशास्त्र | 4,695 | null | 230 |
== सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र == सार्वजनिक राजस्व: सार्वजनिक वित्त के विषय क्षेत्र में हम धन को एकत्रित करने तथा विविध गतिविधियों में इसके वितरण का अध्ययन करते हैं। सार्वजनिक राजस्व का सम्बन्ध आय प्राप्ति के साधनों कराधान के सिद्धान्तों तथा उनकी समस्याओं से है। अन्य शब्दों में, करों से प्राप्त होने वाली सब प्रकार की आय... | अर्थशास्त्र | 4,696 | null | 280 |
== सार्वजनिक वित्त की प्रकृति == सार्वजनिक वित्त की प्रकृति से अभिप्राय इस बात की विवेचना से है कि सार्वजनिक वित्त विज्ञान है अथवा कला है या दोनों ही है। सार्वजनिक वित्त की प्रकृति के विषय में यह भी प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह केवल वास्तविक विज्ञान है या आदर्शात्मक विज्ञान भी। | अर्थशास्त्र | 4,697 | null | 53 |
=== सार्वजनिक वित्त एक वास्तविक विज्ञान है === विज्ञान किसी विषय का क्रमागत अध्ययन है जिसमें तथ्यों के कारण तथा परिणाम का अध्ययन किया जाता है। सार्वजनिक वित्त में सरकार के आय तथा व्यय सम्बन्धी विषय का क्रमागत अध्ययन किया जाता है। इसमें सरकार की आय तथा व्यय सम्बन्धी तथ्यों में पाये जाने वाले कारण तथा परिणाम के सम्बन्ध क... | अर्थशास्त्र | 4,698 | null | 284 |
=== सार्वजनिक वित्त एक कला है === कला निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ज्ञान का प्रयोग है। सार्वजनिक वित्त, राजस्व नीति द्वारा सरकार की आय तथा व्यय सम्बन्धी ज्ञान का प्रयोग पूर्ण रोजगार, आर्थिक समानता, आर्थिक विकास, कीमत स्थिरता आदि उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये किया जाता है। उदाहरण के लिए, आर्थिक समानता के लक्ष्... | अर्थशास्त्र | 4,699 | null | 135 |
Subsets and Splits
No community queries yet
The top public SQL queries from the community will appear here once available.