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उसके पहले चुंगी का बैरियर था जो ऊपर उठा हुआ था। | 1 |
एक रोज़ कमेटी वाले साँझ के समय भी परचार करने चले आए और होते होते क़दामत पसंदों के गढ़ में पहुँच गए। | 4 |
संस्कृत पढ़ी है।'' ठीक है। देखिए, बाबा विश्वनाथ हैं।' मित्र की तरह पर उतरे गले से कहा। | 2 |
गाँव में सब मिलाकर आठ पंचायतें हैं। | 1 |
उसे काम करना पसंद था और वो अपना काम जानता था और अपने काम से उसे लगन थी। | 1 |
कोई एक महीना के बाद में श्रीनगर गया और इस से ये कह के गया कि तीसरे दिन लौट आऊँगा। | 4 |
? | 5 |
हमरी संवाद लेले जाहु रे संवदिया या-या !...’’ बड़ी बहुरिया के संवाद का प्रत्येक शब्द उसके मन में कांटे की तरह चुभ रहा है- किसके भरोसे यहां रहूंगी? | 4 |
सोचा कि उसकी ठोड़ी के सिरे पर अगर एक तिल भी होता...। | 0 |
मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे यह मेरे हृदय की धड़कनों में से रो-रोकर बज रही हो। | 1 |
महुआ घटवारिन गाते समय उसके सामने सावन-भादों की नदी उमड़ने लगती है, अमावस्या की रात और घने बादलों में रह-रह कर बिजली चमक उठती है। | 4 |
गाँववालों ने आज तक कोई ऐसी चीज़ नहीं खरीदी, जिसमें जलाने-बुझाने का झंझट हो। | 1 |
किंतु, इस आक्रोश की काली धारा के समीप एक और स्रोत बह रहा था, जिसका रंग बिल्कुल भी काला नहीं था। | 1 |
चतुरी आँख मूँदकर शायद साहब का ध्यान करने लगा, फिर सस्वर एक पद गुनगुनाकर गाने लगा, फिर एक-एक कड़ी गाकर अर्थ समझाने लगा। | 4 |
संकोच, लज्जा, मार्जित मधुर उच्चारण, निर्भिक नम्रता, शिष्ट अलाप, सजधज उसी तरह। | 1 |
उसे ख़ूब सजाया। | 4 |
वो अपने आप को पच्चीस बरस का नौजवान समझने लगा। | 4 |
ज़िन्दगी में ऐसे भी दिन देखने थे! वे भी दिन थे कि जब अपने लिए मुर्गे का शोरबा तक नहीं बचता था! और एक दिन यह है। | 2 |
तीसरी तरफ़ ईरानी की दुकान, चौथी तरफ़ घोड़ बंदर रोड का नाका। | 1 |
अपनी सजा पूरी करके सीताराम घर लौटे। | 4 |
अब तुम मुझको छोड़कर नहीं जा सकते, तुम्हारा रहस्य मुझ पर खुल चुका है।" कच-" नहीं देवयानी, नहीं, ऐसा न कहो।" देवयानी- "क्या कहा, नहीं? | 2 |
जीवन के दूसरे परिच्छेद में भी सुख की अपेक्षा दु:ख ही अधिक है। | 0 |
पता चलते ही कुब्जा ने चोंच मार-मार राधा को ढकेल दिया और फिर अण्डे फोड़कर ढूंठ जैसे पैरों से सब ओर छितरा दिए। | 4 |
शिक्षण-पोषण के लिए अनाथ-आश्रम में भर्ती कर देने के उद्देश्य से बालिका को भी साथ ले गया। | 4 |
लाल बेल्ट वाला चपरासी, आस-पास की भीड़ से उदासीन, अपने स्टूल पर बैठा मन ही मन कुछ हिसाब कर रहा था। | 1 |
जब सीमा उस की आग़ोश में होगी। | 4 |
मगर उस दिन हलों का कंधे पर उठा कर छे मील तक ले जाने और पैदल ही वापस आने की वजह से मैं बहुत थक गया था। | 1 |
बस यह मेरा अंतिम निश्चय है। | 2 |
ग्यारह बजे गॉँव में हलचल मच गई। | 4 |
जीवन के और काम इसलिए करता था कि आदत थी। | 1 |
यह नहीं कि रुपये के लिए जान दे दे। | 1 |
उस के पतले पतले हाथों की फूली हुई रगें सर का ख़फ़ीफ़ सा इर्तिआश और चेहरे की गहिरी लकीरें उस की मतानत-ओ-संजीदगी में इज़ाफ़ा करती थीं। | 1 |
आप न आयी होतीं तो मैं उसी के सिर इसे पटक देता। | 2 |
हमेशा गाड़ी और गाड़ीवानों की भीड़ लगी रहती हैं | 3 |
कुएं में छलाँग क्यूँ न लगा दी? | 0 |
वो एक दम संजीदा हो गई। | 4 |
कुछ ही लमहों के बाद एक टूटी-फूटी जगत और ढही हुई छूहियाँ सर्राटे से निकल गईं और वह सोचता रह गया कि क्या वह वही कुआँ था। | 1 |
एक दिन पन्ना ने कहा — तेरा वंश कैसे चलेगा? | 2 |
दफ़्फ़अतन लक्षमण ने अपने आपको एक बड़ी सी आँख बनते देखा, जिसमें गोरे गोरे बाज़ू, झंकारते हुए पाज़ेब, सरकते हुए पल्लू और न जाने क्या कुछ समा गया। | 4 |
बोढ़ी उठाकर बोले, ‘ओहो हो! आप धन्य हैं। ’ | 2 |
लोगों को लक्षमण के यूँ मजरूह होने का बहुत अफ़सोस था। | 1 |
खलील- लीजिए आपने भी बनाना शुरू कर दिया। | 2 |
एक महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। | 4 |
नगाड़े की आवाज सुनते ही हीराबाई की पुकार कानों के पास मँडराने लगती- भैया ...मीता ...हिरामन ...उस्ताद गुरू जी! हमेशा कोई-न-कोई बाजा उसके मन के कोने में बजता रहता, दिन-भर। कभी हारमोनियम, कभी नगाड़ा, कभी ढोलक और कभी हीराबाई की पैजनी। | 4 |
नाना का हाथ खुला हुआ था और उन्हें भविष्य के लिए कुछ जोड़ने की फिक्र कभी नहीं रही। | 1 |
सूर्य डूब रहा था। | 1 |
वज़ीर आबाद का मशहूर जंक्शन, वज़ीर आबाद का मशहूर शहर, जहां हिन्दोस्तान भर के लिए छुरियां और चाक़ू तैयार होते हैं। | 1 |
वो पहले से भी ज़्यादा मुस्तइद हो कर अपने काम में जुट गया। | 4 |
शास्त्री जी ने पूछा। | 1 |
स्टैंड पर एक बस आई उस ने उस का नंबर न देखा और जब चंद मुसाफ़िर उतरे तो वो फ़ौरन उस में सवार हो गई। | 4 |
मेरे लायक़ कोई ख़िदमत हो तो फ़रमाईए। | 2 |
धीरे-धीरे दोनों मोर बच्चे बढ़ने लगे। | 1 |
शशि की इच्छा थी कि उसके इस छोटे से भाई को मन बहलाने की जितनी ही प्रकार की विद्या आती है, सबकी सब बहनोई के आगे प्रकट हो जाएे। | 1 |
केदार का चौदहवाँ साल था। | 1 |
सौदागर के नौकरों ने बहुत डराया-धमकाया- चुप रहो, नहीं तो उठा कर पानी में फेंक देंगे। | 4 |
मैं आज दाम लेकर ही उठूंगी। | 2 |
शोरगुल बढ़कर शांत हो गया। | 4 |
थोड़ी ही देर में सेक्रेटेरिएट में यह बात फैल गई कि दबा हुआ आदमी शायर है। | 4 |
लेकिन ध्यान से सुपर्णा के पढ़ने का कारण कुछ और है। | 1 |
मगर हँसी को होंठों से बाहर न आने दिया। | 4 |
सामने वो घर है। | 1 |
अगर मैंने लड़कों को पुकारा और वह न आयें तो? | 2 |
पापी पेट के लिए नौकरी तो करनी ही पड़ेगी, पर हाँ इस हाय-हत्या से बचने का एक उपाय है। | 2 |
उस ने दुकान पर जाना छोड़ दिया। | 4 |
रात के दो बजे मैं अंबाले से चली और दस मील आगे जा कर रोक दी गई। | 4 |
उस समय मेरी आयु थी तेईस, अब हो गई है सत्ताईस। | 1 |
अब तो बहुत ही शीघ्र मातृहीन शिशु ने अपनी कठोरहृदया दीदी का हृदय जीत लिया। | 4 |
सालभर बाद जब आंदोलन में प्रतिक्रिया हुई; | 4 |
वह मां के पास गई, मां कोई पुस्तक देख रही थी। | 4 |
तुम ख़ुश-क़िस्मत हो कि तुम्हें ऐसा ख़ान-दान मिल गया जहां हर आदमी नेक और शरीफ़ है ” | 2 |
देखने में अधिक सुंदर न थे। | 1 |
...ऐसे बड़ी बहुरिया ने कहा है कि यदि छुट्टी हुई तो दशहरा के समय गंगाजी के मेले में आकर मां से भेंट-मुलाकात कर जाऊंगी। ’’ | 4 |
बहुत दिनों बाद घर लौटकर पुराने साथियों को पाकर नीलमणि बहुत खुश हुआ आनन्दपूर्वक घूमने-फिरने लगा। | 4 |
आप क्यों इसे मुँह लगाते हैं? | 2 |
कानों में चांदी के बाले झुलाती, पांव में छोटी सी पाज़ेब खनकाती जब वो अपनी सहेलियों के साथ उसके ठेले के गिर्द खड़ी हो जाती तो चन्द्रु समझ जाता कि अब उसकी शामत आई है। | 1 |
मुंह अत्यंत भारी करके बोले, अनुपम, जाओ तुम सभा में जाकर बैठो! शंभूनाथ बाबू बोले, नहीं, अब सभा में बैठना नहीं होगा। | 2 |
हस्ब-ए-मामूल इस दफ़ा भी आमों के दो टोकरे आए गले सड़ने दाने अलग किए गए जो अच्छे थे उन को मुंशी करीम बख़्श ने अपनी निगरानी में गिनवा कर नए टोकरों में रखवाया। | 4 |
मजाक थी कि औरत यों जिद करती। | 1 |
रग्घू को मेरे लड़के फूटीआँखों नहीं भाते। | 1 |
जितनी देर तुलादान का आटा घर में रहा, वो रोटी अपने चचा के हाँ खाता रहा। | 4 |
हलवाई ने ताश की गड्डी फटी हुई डब्बी में रखते हुए सिर हिलाकर कहा और अपनी गद्दी पर जा बैठा। | 4 |
मैं तो समझती थी कि तुममें भी कुछ कस-बल है। | 2 |
इतना मैं जानता था कि अब वह पहला ज़माना नहीं है जब एक सदी में कोई एकाध ही जीनियस हुआ करता था। | 0 |
वैद्य का बैठका था ही। | 1 |
संध्या के बाद दीया-बत्ती के समय जयगोपाल बाबू ने आकर कहा-" शहर का डॉक्टर नहीं मिला, वह दूर कहीं मरीज देखने गया है।" और इसके साथ ही यह भी कहा-" मुकदमे के कारण मुझे अभी इसी समय बाहर जाना पड़ रहा है। | 2 |
“बड़ी तेज़ आँख है तेरी!” भारी गरदन वाले अधेड़ व्यक्ति ने, जो उस परिवार का पिता था, गेंद उसके हाथ से लेते हुए गिलगिली हँसी के साथ कहा। “किस तरह चिमगादड़ की तरह लपका था! ” | 2 |
“क्या हर्ज है अगर इस टोकरे में से दो आम निकाल लिए जाएं। ” तो मुंशी करीम बख़्श से ये जवाब मिलता। “ और आजाऐंगे इतना बेताब होने की क्या ज़रूरत है। ” | 2 |
तब तक आधी चरस भी खत्म न हुई थी। | 1 |
और मेरी ये हालत है कि नाक में दम आ चुका है और मर्द औरत को मुसीबत में मुबतला कर के आप अलग हो जाते हैं, ये मर्द.....! मय्या ने कुछ बासमती, दालें और नमक वग़ैरा रसोई में बिखेर दिया और फिर एक भीगी हुई तराज़ू में उसे तौलने लगी। | 2 |
कई जगहों से बातचीत हुई, कई सगाइयाँ आयीं: पर उसने हामी न भरी। | 4 |
रातों को वो अजीब अजीब से ख़्वाब देखती। | 1 |
जुनूबी अमरीका में बहुत बड़ा धंदा है इस का! मेरी लड़की के दो बच्चे भी हैं। | 2 |
वो उसे कई हकीमों के पास ले गई। | 4 |
उसने ससुर, अजिया ससुर और जाने के पीढ़ियों के ससुरगणों की उपार्जित जगह-जमीन में से सुई की नोक के बराबर भी देने की उदारता नहीं दिखाई। | 4 |
आगे एक नहर आती थी ज़रा ज़रा वक़फ़े के बाद मैं रोक दी जाती, जूंही कोई डिब्बा नहर के पुल पर से गुज़रता, लाशों को ऐन नीचे नहर के पानी में गिरा दिया जाता। | 1 |
वो कह न सकी सारी बात और चुपकी दुबकी पड़ी रही और अपने बदन की तरफ़ देखती रही जो कि बटवारे के बाद अब “देवी” का बदन हो चुका था। | 1 |
कन्या के पिता को इतना घमंड कलियुग पूर्ण रूप से आ गया है! | 1 |
पूरे दो सौ आदमी निकाले गए। | 4 |
ठेले वाले के साथ एक छोटा सा छोकरा भी था जो गाहक को बड़ी मुस्तइद्दी से एक प्लेट और एक साफ़ सुथरी नैपकिन भी पेश करता था और पानी भी पिलाता था। | 1 |
और कई अपने कोठों और चौबारों पर से देख रहे थे। | 1 |
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