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ख़बर मिली थी वे कई दिनों से मछली और चूहों को झुलसाकर खा रहे हैं।
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छोटा बोला, और अमें छोड़कर दफ्तर जाते हैं, दिन भर नई आते, बाबू अच्छे नई हैं।
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पहले मेरी ही ओर आया। मैंने कहा, ‘ आइए बैठिए। ’ उसने मंडली की ओर अवहेलना की दृष्टि से देखा और बोला, ‘ अभी नहीं, फिर आऊँगा। ’
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मुझे उस दिन की याद आई, जब रहमत के साथ मिनी का प्रथम परिचय हुआ था।
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2 कहना व्यर्थ है, विवाह के उपलक्ष्य में कन्या पक्ष को ही कलकत्ता आना पड़ा।
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‘सवांग’ नहीं है, यह बात ठीक है।
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चूल्हे पर चढ़ाया दूध उफना जा रहा था।
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...सौदागर का एक नौकर महुआ को देखते ही मोहित हो गया था।
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तोता मर गया।
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...बोलते क्यों नहीं?' लालमोहर ने कहा,' इलाम-बकसीस दे रही है मालकिन, ले लो हिरामन! हिरामन ने कट कर लालमोहर की ओर देखा।
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अब द्वा र पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा?
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उसने भी नहीं की होगी।
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मैंने साहब की मिजाजपुरसी करनी चाही।
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उन हदों को धुँदला देने में लाजवंती ख़ुद भी तो मुम्मिद साबित हुई थी।
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धीरे-धीरे इनकी भैंसों का भय भी चला गया।
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माल-असबाब की मालकिन तू है ही, अनाज- पानी तेरे ही हाथ है, अब रह क्या गया है?
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मेरे बाद इनकी देख-रेख करने बाला कोई नहीं रहता।
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हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे?
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उसके माथे के ठीक बीच में एक फूली हुई नाड़ी थी जिसकी धडक़न दूर से ही नज़र आती थी।
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सरदार, दीवान और छड़ीदार के मुँह में बोली नहीं। पंचों के चेहरे उतर गए थे।
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उस के दिल की रानी आ चुकी थी और उस के दिल का ख़ला पट चुका था।
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लाल चंद, जिसे अपना असर-ओ-रसूख़ इस्तेमाल कर के सुंदर लाल और ख़लीफ़ा कालका प्रशाद ने राशन डपवे दिया था, दौड़ा दौड़ा आया और अपनी गाड़े की चादर से हाथ फैलाए हुए बोलाः “बधाई हो सुंदर लाल। ”
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तोता उड़ गया।
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भैया और भौजी को वह मुँह नहीं दिखा सकेगा कभी। ...नीलाम की बोली उसके कानों के पास गूँज गई- एक-दो-तीन! दारोगा और मुनीम में बात पट नहीं रही थी
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शारदा दौड़ी दौड़ी दूसरे कमरे में गई और दौड़ी दौड़ी वापिस आई।
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उसने कहा: “ बाबा मेरी कहानी ... मेरी कहानी ...” “भोले . ...मेरे बच्चे?
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आमों के टोकरे ग़ुसलख़ाने में रखवा कर जब वो गर्म कमरे में लेटा तो पंखा झलते झलते एक दम उस का सर चकराया।
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अपने हमेशा के लिए गैर हो जाते हैं।
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...संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी!
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क्या मालूम! अमरीका तक हो आया हूँ
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वैसे वह शान्त भाव से कड़वी दवा भी पी लेता था और सुई भी लगवा लेता था।
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जब उसने कबूतर की तरफ़ से आँखें हटाईं तो उसे जैसे नये सिरे से हमारी मौजूदगी का एहसास हुआ।
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एक ख़्वाब-नाक सिम्फनी और सोई हुई झील के बीच में चांद की क्षति खड़ी थी।
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चांद ने ये सब कुछ उस की हैरान पुतलीयों से झांक के देखा फिर यकायक कहीं किसी पेड़ पर एक बुलबुल नग़मासरा हो उठी और कश्तीयों में चिराग़ झिलमिलाने लगे और तंगों से परे बस्ती में गीतों की मद्धम सदा बुलंद हुई।
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जैसे मुझे शैतान ने सीधा जहन्नुम से धक्का देकर पंजाब में भेज दिया हो।
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सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाधि दी गई है- इसलिए भी कि उसे वह लता सबसे अधिक प्रिय थी- इसलिए भी कि उस लघुगात का, किसी वासंती दिन, जुही के पीताभ छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, मुझे संतोष देता है .
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जिसका जी चाहेगा खायेगा, जिसका जी न चाहेगा, न खायेगा।
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आजकल शहर से पाँच कोस दूर के गाँववाले भी अपने को शहरू समझने लगे हैं।
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फिर उसने पाव भर मक्खन निकाला और उसे कूज़े में डाल कर कुँएँ के साफ़ पानी से छाछ की खटास को धो डाला।
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सामने खड़े नेपाली सिपाही को पुकार कर कहा,' इन लोगों को क्यों आने दिया इधर?'' हिरामन!' ...वही फेनूगिलासी आवाज किधर से आई?
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मियॉँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ।
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हिंदुस्तान के उलमा ने भी यही फतवा दिया, पर यहाँ खास मेरे घर कुर्बानी हुई।
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शास्त्रिणी जी ने गर्वित स्‍वीकारोक्ति दी।' कौशल' कार्यालय सजाया गया।
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अपने से बाहर वह मुझे भी दिखाई नहीं देता।
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उसके अर्थ में अनर्थ पैदा करना आनंद खोना था।
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जब भोले ने देखा कि मैं बाहर जाने के लिए तय्यार हूँ तो उस का चेहरा इस तरह मद्धम पड़ गया जैसे गुज़िश्ता शब को आसमान के एक कोने में मशाल की मानिंद रौशन सितारा मुसलसल देखते रहने की वजह से मांद पड़ गया था।
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मिट्टी के बरतन से टपकते हुए छोवा-गुड़ को उँगलियों से चाटती हुई चंपिया आई और माँ के तमाचे खा कर चीख पड़ी-' मुझे क्यों मारती है-ए-ए-ए! सहुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है-एँ-एँ-एँ-एँ!'' सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़ कर बैठी हुई थी! बोल, गले पर लात दे कर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो फिर कभी' बाजे न मुरलिया' गाते सुना! चाल सीखने जाती है
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सोचते थे कि मैं समस्त राजपूत जाति की वीरता का वारिस हूँ।
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मगर वो बे-एतिनाई बर्तता, आख़िर उस की आँख एक शोख़-ओ-शुंग लड़की जिस का नाम सीमा था, लड़ गई।
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उसने दरवाज़ा बाहर से बंद कर के अपने माथे का पसीना पोंछा।
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बूढ़े ने बाहर डाकिये को बैठा देख समझ लिया कि बात हाथ से निकल गयी, अब बोझ उठाने का क्या फायदा?
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जिले के अंग्रेज हाकिमों को आम पहुंचाने की पितामह के समय से प्रथा है।
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किताब खोली तो उस में से एक रुका निकला जो उस के नाम था।
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खाना तो खाना ही है, आज न खाऊँगा, कल खाऊँगा, लेकिन अभी मुझसे न खाया जायगा।
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उसने छिले हुए घुटनों पर थोड़ी रेत डाल ली, और थोड़ी-सी रेत अपनी हथेली पर लेकर उसे फूँक से उड़ा दिया।
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पन्ना की बातें सुनकर मुलिया समझ गयी कि अपने पौ बारह हैं।
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जिस्म छीछड़ा सा। दोपली टोपियां सी मालूम होती थीं।
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एक घड़ी ख़रीदी जो नसीमा की चौड़ी कलाई के लिए मुनासिब-ओ-मौज़ूं थी माँ ख़ामोश रही कि वो नाराज़ न हो जाये।
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परन्तु इस विजय के होते हुए भी उनके चेहरों पर विजय का उल्लास नहीं था, प्रत्युत ग्लानि ही छाई थी।
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सावित्री कभी- कभी सोचती, हींग वाला खान तो नहीं मार डाला गया?
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भात में तो अभी देर हैं।
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कल से पानी चढ़ा हुआ है, परसों तक खेत पुर जायगा।
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ऐसी ही जवान है, जैसे तुम हो।
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वो कराची में भी सिद्धू हलवाई के घर की सीढ़ीयों के पीछे एक तंग-ओ-तारीक कोठरी में सोता था और बांद्रे में वही सीढ़ीयों के अक़ब में उसे जगह मिली थी।
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कोई गाहक उसके पास नहीं फटका।
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लक्षमण ने पटका बाँधा और ग़ुरूर से विष्णु की दुकान के शीशे में अपनी पगड़ी को देखा।
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मैं अकेला हूँ, इसलिए तुम सब मिलकर मुझे मारो।
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प्लेटफार्म पर अंधेरे में खड़े गार्ड ने अपनी एक आंख वाली लालटेन हिलाई, गाड़ी चल दी; मैं जंगले के पास बैठा रहा।
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उसने चन्द्रु के लिए चाट बेचने का धंदा तय किया।
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हाँ, वह सचमुच लाल पान की बेगम है!
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जिन्दगी खैरियत से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट जाऍंगे।
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रोटी-पोटी तैयार कर चुकी क्या?' बिरजू के बाप ने मुस्कराकर पूछा।
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मोहन लजाकर हंसने लगा।
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पतले पतले होंट जो दाँत निकल जाने के बाद अंदर की तरफ़ सिमटे रहते थे, हल्के सुर्ख़ थे, ख़ून की इस कमी के बाइस उस के चेहरे पर ऐसी सफ़ाई पैदा होगई थी जो अच्छी तरह मुँह धोने के बाद थोड़ी देर तक क़ायम रहा करती है।
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यूँ तो अक्सर बहनें भाइयों के हाँ जा कर उन्हें राखी बांधती हैं
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?
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खाया नहीं गया।
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हाँ! अब मुझे याद आया।
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उस अमराई में सावन के लगते ही झूला पड़ जाता और विजयादशमी तक पड़ा रहता।
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कोई लड़का रोता है, तो दौड़ा आता है, देख अम्माँ, क्या हुआ, बच्चा क्यों रोता है?
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फसादों में जब उसके और बहुत सारे पास−पड़ोसी मारे गये तो उसने मुसलमान बन जाने की विनती की।
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रास्ते में मुझे कुछ कष्ट न होगा।
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दो दिन तक आनंदी कोप-भवन में रही। न कुछ खाया न पिया, उनकी बाट देखती रही।
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जानते नहीं, हम इस समय पूजा पर रहते हैं।
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तुम्हारे पिता- वे यहां डॉक्टर हैं उनका नाम शंभूनाथ सेन है।
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उसने झटके से पुरुष के हाथ से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
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चुस्त पाएजामा जिस में से उस की मज़बूत पिंडलियां अपनी तमाम मज़बूती दिखा रही थीं।
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" ठहरो", सुपरिन्‍टेंडेंट बोला-" मैं अंडर-सेक्रेटरी से मशविरा कर लूं।" सु‍परिन्‍टेंडेंट अंडर सेक्रेटरी के पास गया।
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“हट!” पुरुष उसे बाँह से धकेलकर आगे बढ़ गया।
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राक्षस हैं सब! बड़ी बहुरिया आंच के खूंट से पांच रूपए का एक गन्दा नोट निकालकर बोली, ‘‘पूरा राह खर्च भी नहीं जुटा सकी।
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नीलाभ ग्रीवा के कारण मोर का नाम रखा गया
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मगर वो सिर्फ़ गूँगा था बहरा न था।
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नौकरी बुरी जरूर है पर पेट का सवाल उससे भी बुरा है।
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उस के हाथ में एक हल्की से जरीब थी।
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हाँ तुम उस के साथ खाना खा रही थीं, एक ही रकाबी में और वो तुम्हारे मुँह में और तुम उस के मुँह में लुक़्मे डाल रही थीं।
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मैं- आप ऐसे बौड़म काश मुल्क में और ज्यादा होते।
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दासियाँ पकड़कर ले चलीं, तो रानी साहिबा को आँसुओं में देखती हुई उसी अनिंद्य हिन्दी में हिरनी क्षमा-प्रार्थना करती हुई बोली-“सरकार, मेरा कुछ कुसूर नहीं है। ”
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हीराबाई फिर लेट गई।
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देखा गया, गाड़ी छूटने का समय बीत चुकने पर भी और एक डिब्बा जोड़ा गया, तब कहीं ट्रेन छूटी।
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पहले तो वह घर के बाहर निकलते ही उन्हें डाँट बैठता था, पर आज वह मूर्ति के समान निश्चल बैठा रहा।
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