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प्रिलिम्स के लियेः
वन और अधिकार क्षेत्र, 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976, मौलिक कर्त्तव्य, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत।
मेन्स के लियेः
वन और संबंधित कानून।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes- NCST) के अध्यक्ष ने कहा कि वन (संरक्षण) नियम 2022 में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के उल्लंघन को लेकर NCST का दृष्टिकोण पहले जैसा ही रहेगा, भले ही पर्यावरण मंत्रालय ने इन चिंताओं को खारिज़ कर दिया है।
संबंधित मुद्देः
- वन भूमि के परिवर्तन हेतु सहमति उपखंडः
- सितंबर 2022 में अन्य उद्देश्यों के लिये वन भूमि के परिवर्तन हेतु सहमति उपखंड को हटाने का प्रस्ताव करने वाले नए नियमों के प्रावधान पर चिंता जताते हुए आयोग ने सिफारिश की थी कि इन नियमों को तुरंत रोक दिया जाना चाहिये।
- जवाब में मंत्रालय ने ज़ोर देकर कहा है कि नियम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत बनाए गए थे और NCST की इन नियमों के वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के उल्लंघन की आशंका "कानूनी रूप से तर्कसंगत नहीं" थी।
- मंत्री ने कहा कि दो वैधानिक प्रक्रियाएँ समानांतर थीं और एक-दूसरे पर निर्भर नहीं थीं।
- सितंबर 2022 में अन्य उद्देश्यों के लिये वन भूमि के परिवर्तन हेतु सहमति उपखंड को हटाने का प्रस्ताव करने वाले नए नियमों के प्रावधान पर चिंता जताते हुए आयोग ने सिफारिश की थी कि इन नियमों को तुरंत रोक दिया जाना चाहिये।
- ग्राम सभाओं की सहमतिः
- NCST ने बताया था कि FCR 2022 ने चरण 1 की मंज़ूरी से पहले अनिवार्य रूप से ग्राम सभाओं की सहमति लेने के प्रावधानों को खत्म कर दिया है, इस प्रक्रिया को चरण 2 की मंज़ूरी के बाद पूरा करने के लिये छोड़ दिया है।
- सरकार के अनुसार, FCR 2022 में पहले से ही वन भूमि के परिवर्तन का प्रावधान है , "केवल वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों के निपटान सहित सभी प्रावधानों को पूरा करने एवं अनुपालन के बाद" और ग्राम सभाओं की सहमति को अनिवार्य करने वाले अन्य कानूनों के संचालन पर भी रोक नहीं लगाता है।
- NCST ने बताया था कि FCR 2022 ने चरण 1 की मंज़ूरी से पहले अनिवार्य रूप से ग्राम सभाओं की सहमति लेने के प्रावधानों को खत्म कर दिया है, इस प्रक्रिया को चरण 2 की मंज़ूरी के बाद पूरा करने के लिये छोड़ दिया है।
वन (संरक्षण) नियम, 2022 के प्रावधानः
- समितियों का गठनः
- इसने सलाहकार समिति, प्रत्येक एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालयों में एक क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश (UT) सरकार के स्तर पर एक स्क्रीनिंग समिति का गठन किया।
- क्षतिपूरक वनीकरणः
- पर्वतीय या पहाड़ी राज्य वन भूमि को अपने भौगोलिक क्षेत्र के दो-तिहाई से अधिक कवर करने वाले हरित आवरण के साथ या राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश अपने भौगोलिक क्षेत्र के एक-तिहाई से अधिक को कवर करने वाले वन भूमि केअंतरण में सक्षम होंगे, इसके अलावा अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, जहांँ कवर 20% से कम है, में प्रतिपूरक वनरोपण करना।
- निजी वृक्षारोपण की अनुमतिः
- यह नियम निजी पार्टियों के लिये वृक्षारोपण करने और उस भूमि को उन कंपनियों को बेचने का प्रावधान करता है जो आवश्यक प्रतिपूरक वनीकरण लक्ष्यों से प्रेरित हैं।
- नवीन नियमों से पहले, राज्य निकाय FAC को दस्तावेज़ अग्रेषित करते थे जिसमें इस स्थिति की जानकारी भी शामिल होती थी कि क्या संबद्ध क्षेत्र में स्थानीय लोगों के वन अधिकारों का निपटान किया गया था।
- यह नियम निजी पार्टियों के लिये वृक्षारोपण करने और उस भूमि को उन कंपनियों को बेचने का प्रावधान करता है जो आवश्यक प्रतिपूरक वनीकरण लक्ष्यों से प्रेरित हैं।
- ग्राम सभा की सहमति की आवश्यकता नहींः
- नए नियमों के अनुसार, एक परियोजना जिसे एक बार FC द्वारा अनुमोदित कर राज्य के अधिकारियों को सौंप दी जाएगी, प्रतिपूरक निधि और भूमि एकत्र करेंगे एवं इसे अंतिम अनुमोदन के लिये संसाधित करेंगे।
- पहले ग्राम सभा या क्षेत्र के गाँवों में शासी निकाय की सहमति के लिये वन भूमि के परिवर्तन हेतु लिखित सहमति की आवश्यकता होती थी।
- नए नियमों के अनुसार, एक परियोजना जिसे एक बार FC द्वारा अनुमोदित कर राज्य के अधिकारियों को सौंप दी जाएगी, प्रतिपूरक निधि और भूमि एकत्र करेंगे एवं इसे अंतिम अनुमोदन के लिये संसाधित करेंगे।
- वनों में निर्माण कार्य की अनुमतिः
- वन सुरक्षा उपायों और आवासीय इकाइयों (एकमुश्त छूट के रूप में 250 वर्ग मीटर के क्षेत्र तक) सहित वास्तविक उद्देश्यों के लिये संरचनाओं के निर्माण/निर्माण कार्य के अधिकार की अनुमति है।
भारत में वनों की स्थितिः
- परिचयः
- भारत वन स्थिति रिपोर्ट, 2021 के अनुसार, कुल वन और वृक्ष आवरण अब 7,13,789 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 21.71% है, यह वर्ष 2019 के 21.67% की तुलना में अधिक है।
- वनावरण (क्षेत्रवार): मध्य प्रदेश> अरुणाचल प्रदेश> छत्तीसगढ़> ओडिशा> महाराष्ट्र।
- श्रेणीः
- आरक्षित वनः
- आरक्षित वन सबसे अधिक प्रतिबंधित वन होते हैं और राज्य सरकार द्वारा उन वन भूमि या बंजर भूमि पर निर्धारित किये जाते हैं जो सरकार की संपत्ति है।
- स्थानीय लोगों को आरक्षित वनों में तब तक जाने की अनुमति नहीं है जब तक कि कोई वन अधिकारी बंदोबस्त प्रक्रिया के दौरान उन्हें आधिकारिक तौर पर अनुमति नहीं देता।
- संरक्षित वनः
- राज्य सरकार को आरक्षित वनों के अलावा ऐसी किसी भी भूमि को संरक्षित वनों के रूप में गठित करने का अधिकार है, जिस पर सरकार का स्वामित्त्व है और ऐसे वनों के उपयोग के संबंध में नियम जारी करने की शक्ति है।
- इस शक्ति का उपयोग ऐसे वृक्षों जिनकी लकड़ी, फल या अन्य गैर-लकड़ी उत्पादों में राजस्व बढ़ाने की क्षमता है, पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करने के लिये किया जाता है।
- ग्राम वनः
- सुरक्षा का स्तरः
- आरक्षित वन > संरक्षित वन > ग्राम वन।
- आरक्षित वनः
- संवैधानिक प्रावधानः
- 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से शिक्षा, नापतौल एवं न्याय प्रशासन, वन, वन्यजीवों तथा पक्षियों के संरक्षण को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था।
- राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत अनुच्छेद 48A के मुताबिक, राज्य पर्यावरण संरक्षण व उसको बढ़ावा देने का काम करेगा तथा देश भर में जंगलों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा की दिशा में कार्य करेगा।
- संविधान के अनुच्छेद 51A (g) में कहा गया है कि वनों एवं वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा।
- यह औपनिवेशिक वन नीति का सरल विस्तार था। इस अधिनियम में समग्र वन क्षेत्र को कुल भूमि क्षेत्र के एक- तिहाई तक बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980:
- इसने निर्धारित किया कि वन क्षेत्रों में स्थायी कृषि-वानिकी का अभ्यास करने के लिये केंद्रीय अनुमति आवश्यक है। उल्लंघन या परमिट की कमी को एक आपराधिक कृत्य माना गया।
- राष्ट्रीय वन नीति, 1988:
- राष्ट्रीय वन नीति का अंतिम उद्देश्य प्राकृतिक विरासत के रूप में वनों के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना था।
- राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रमः
- इसे निम्नीकृत वन भूमि के वनीकरण के लिये वर्ष 2000 में लागू किया गया है। इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
- अन्य संबंधित अधिनियमः
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006:
- यह वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक वनवासी (OTFD) जो पीढ़ियों से जंगलों में निवास कर रहे हैं, को वन भूमि पर उनके वन अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न 1. भारत में एक विशेष राज्य में निम्नलिखित विशेषताएँ हैंः (वर्ष 2012)
निम्नलिखित में से किस राज्य में उपरोक्त सभी विशेषताएँ हैं?
उत्तरः (A)
प्रश्न 2. राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये कौन सा मंत्रालय नोडल एजेंसी है? (वर्ष 2021)
उत्तरः (D)
प्रिलिम्स के लियेः
वनीकरण, भारत राज्य वन रिपोर्ट, 2019, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006।
मेन्स के लियेः
वन के प्रावधान (संरक्षण) नियम, 2022, वन संरक्षण अधिनियम, 1980, राष्ट्रीय वन नीति, 1988, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने वन (संरक्षण) नियम, 2022 जारी किया है।
- यह वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 4 और वन (संरक्षण) नियम, 2003 के अधिक्रमण (Supersession) में प्रदान किया गया है।
वन (संरक्षण) नियम, 2022 के प्रावधानः
- समितियों का गठनः
- इसने एक सलाहकार समिति, प्रत्येक एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालयों में एक क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश (UT) सरकार के स्तर पर एक स्क्रीनिंग समिति का गठन किया।
- सलाहकार समितिः
- सलाहकार समिति की भूमिका इसके लिये संदर्भित प्रस्तावों और केंद्र सरकार द्वारा संदर्भित वनों के संरक्षण से जुड़े किसी भी मामले के संबंध में संबंधित धाराओं के तहत अनुमोदन प्रदान करने के संबंध में सलाह देने या सिफारिश करने तक सीमित है।
- परियोजना स्क्रीनिंग समितिः
- MoEFCC ने वन भूमि के अंतरण से जुड़े प्रस्तावों की प्रारंभिक समीक्षा के लिये प्रत्येक राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश में एक परियोजना स्क्रीनिंग समिति के गठन का निर्देश दिया है।
- पांँच सदस्यीय समिति प्रत्येक महीने कम-से-कम दो बार बैठक करेगी और राज्य सरकारों को समयबद्ध तरीके से परियोजनाओं पर सलाह देगी।
- 5-40 हेक्टेयर के बीच की सभी गैर-खनन परियोजनाओं की समीक्षा 60 दिनों की अवधि के भीतर की जानी चाहिये और ऐसी सभी खनन परियोजनाओं की समीक्षा 75 दिनों के भीतर की जानी चाहिये।
- बड़े क्षेत्र वाली परियोजनाओं के लिये समिति को कुछ और समय मिलता है, जिसमें 100 हेक्टेयर से अधिक की गैर-खनन परियोजनाओं के लिये 120 दिन और खनन परियोजनाओं के लिये 150 दिन शामिल है।
- क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समितियाँः
- सभी रैखिक परियोजनाओं (सड़कों, राजमार्गों आदि), 40 हेक्टेयर तक की वन भूमि से जुड़ी परियोजनाएंँ और जिन्होंने सर्वेक्षण के प्रयोजन के लिये उनकी सीमा के बावजूद 0.7 तक कैनोपी घनत्व वाली वन भूमि के उपयोग का अनुमान लगाया है, उनकी एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालय में जांँच की जाएगी।
- प्रतिपूरक वनीकरणः
- पर्वतीय या पहाड़ी राज्य वन भूमि को अपने भौगोलिक क्षेत्र के दो-तिहाई से अधिक कवर करने वाले हरित आवरण के साथ, या राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश अपने भौगोलिक क्षेत्र के एक-तिहाई से अधिक को कवर करने वाले वन भूमि केअंतरण में सक्षम होंगे, इसके अलावा अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, जहांँ कवर 20% से कम है, में प्रतिपूरक वनरोपण करना।
वन संरक्षण के लिये अन्य पहलेंः
- भारतीय वन नीति, 1952:
- यह औपनिवेशिक वन नीति का एक सरल विस्तार था। हालांकि इसमें कुल भूमि क्षेत्र का एक- तिहाई तक वन आवरण बढ़ाने का प्रावधान शामिल था।
- उस समय जंगलों से प्राप्त अधिकतम वार्षिक राजस्व राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता थी। दो विश्व युद्धों, रक्षा की आवश्यकता, विकासात्मक परियोजनाएँ जैसे- नदी घाटी परियोजनाएँ, लुगदी, कागज़ और प्लाईवुड जैसे उद्योग तथा राष्ट्रीय हित की वन उपज पर बहुत अधिक निर्भरता के परिणामस्वरूप जंगलों के विशाल क्षेत्रों से राजस्व जुटाने के लिये राज्यों को मंज़ूरी दे दी गई।
- यह औपनिवेशिक वन नीति का एक सरल विस्तार था। हालांकि इसमें कुल भूमि क्षेत्र का एक- तिहाई तक वन आवरण बढ़ाने का प्रावधान शामिल था।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980:
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 ने निर्धारित किया कि वन क्षेत्रों में स्थायी कृषि वानिकी का अभ्यास करने के लिये केंद्रीय अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा उल्लंघन या परमिट की कमी को एक अपराध माना गया।
- इसने वनों की कटाई को सीमित करने, जैवविविधता के संरक्षण और वन्यजीवों को बचाने का लक्ष्य रखा। हालांँकि हाँंकि यह अधिनियम वन संरक्षण के प्रति अधिक आशा प्रदान करता है लेकिन यह अपने लक्ष्य में सफल नहीं था।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 ने निर्धारित किया कि वन क्षेत्रों में स्थायी कृषि वानिकी का अभ्यास करने के लिये केंद्रीय अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा उल्लंघन या परमिट की कमी को एक अपराध माना गया।
- राष्ट्रीय वन नीति, 1988:
- राष्ट्रीय वन नीति का अंतिम उद्देश्य एक प्राकृतिक विरासत के रूप में वनों के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना था।
- इसने वाणिज्यिक सरोकारों से वनों की पारिस्थितिक भूमिका और भागीदारी प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने के लिये एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट बदलाव किया।
- इसमें देश के भौगोलिक क्षेत्र के 33% हिस्से को वन और वृक्षों से आच्छादित करने के लक्ष्य की परिकल्पना की गई है।
- राष्ट्रीय वन नीति का अंतिम उद्देश्य एक प्राकृतिक विरासत के रूप में वनों के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना था।
- राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रमः
- इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वर्ष 2000 से निम्नीकृत वन भूमि के वनीकरण के लिये लागू किया गया है।
- अन्य संबंधित अधिनियमः
- 1972 का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1986 का पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और 2002 का जैवविविधत अधिनियम।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) अधिनियम, 2006:
- यह वन-निवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकारों एवं वन भूमि पर कब्ज़ेको पहचानने के लिये बनाया गया है जो पीढ़ियों से ऐसे जंगलों में रह रहे हैं।
भारत में वनः
- परिचयः
- भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2021 के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्षावरण क्षेत्र अब 7,13,789 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 21.71% है, जो 2019 के 21.67% से अधिक है।
- वनावरण (क्षेत्रफल में): मध्य प्रदेश> अरुणाचल प्रदेश> छत्तीसगढ़> ओडिशा> महाराष्ट्र।
- वर्गीकरणः
- आरक्षित वनः
- आरक्षित वनः आरक्षित वन सबसे अधिक प्रतिबंधित वन हैं और किसी भी वन भूमि या बंजर भूमि जो कि सरकार की संपत्ति है, राज्य सरकार द्वारा आरक्षित होती है।
- आरक्षित वनों में किसी वन अधिकारी द्वारा विशेष रूप से अनुमति के बिना स्थानीय लोगों की आवाजाही निषिद्ध है।
- आरक्षित वनः
संरक्षित वनः
- राज्य सरकार को आरक्षित भूमि के अलावा अन्य किसी भी भूमि को, जो कि सरकार की संपत्ति है, संरक्षित करने का अधिकार है।
- इस शक्ति का उपयोग ऐसे वृक्षों जिनकी लकड़ी, फल या अन्य गैर-लकड़ी उत्पादों में राजस्व बढ़ाने की क्षमता है, पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करने के लिये किया जाता है।
ग्राम वनः
- सुरक्षा का स्तरः
- आरक्षित वन > संरक्षित वन > ग्राम वन।
- संवैधानिक प्रावधानः
- 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से शिक्षा, नापतौल एवं न्याय प्रशासन, वन, वन्यजीवों तथा पक्षियों के संरक्षण को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था।
- संविधान के अनुच्छेद 51A (g) में कहा गया है कि वनों एवं वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा।
- राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत अनुच्छेद 48A के मुताबिक, राज्य पर्यावरण संरक्षण व उसको बढ़ावा देने का काम करेगा और देश भर में जंगलों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा की दिशा में कार्य करेगा।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नः
निम्नलिखित राज्यों में से किसमें उपर्युक्त सभी विशेषताएँ हैं?
अतः विकल्प A सही उत्तर है।
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प्रिलिम्स के लियेः वन और अधिकार क्षेत्र, बयालीसवाँ संशोधन अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ छिहत्तर, मौलिक कर्त्तव्य, वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत। मेन्स के लियेः वन और संबंधित कानून। चर्चा में क्यों? हाल ही में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि वन नियम दो हज़ार बाईस में वन अधिकार अधिनियम, दो हज़ार छः के उल्लंघन को लेकर NCST का दृष्टिकोण पहले जैसा ही रहेगा, भले ही पर्यावरण मंत्रालय ने इन चिंताओं को खारिज़ कर दिया है। संबंधित मुद्देः - वन भूमि के परिवर्तन हेतु सहमति उपखंडः - सितंबर दो हज़ार बाईस में अन्य उद्देश्यों के लिये वन भूमि के परिवर्तन हेतु सहमति उपखंड को हटाने का प्रस्ताव करने वाले नए नियमों के प्रावधान पर चिंता जताते हुए आयोग ने सिफारिश की थी कि इन नियमों को तुरंत रोक दिया जाना चाहिये। - जवाब में मंत्रालय ने ज़ोर देकर कहा है कि नियम वन अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी के तहत बनाए गए थे और NCST की इन नियमों के वन अधिकार अधिनियम , दो हज़ार छः के उल्लंघन की आशंका "कानूनी रूप से तर्कसंगत नहीं" थी। - मंत्री ने कहा कि दो वैधानिक प्रक्रियाएँ समानांतर थीं और एक-दूसरे पर निर्भर नहीं थीं। - सितंबर दो हज़ार बाईस में अन्य उद्देश्यों के लिये वन भूमि के परिवर्तन हेतु सहमति उपखंड को हटाने का प्रस्ताव करने वाले नए नियमों के प्रावधान पर चिंता जताते हुए आयोग ने सिफारिश की थी कि इन नियमों को तुरंत रोक दिया जाना चाहिये। - ग्राम सभाओं की सहमतिः - NCST ने बताया था कि FCR दो हज़ार बाईस ने चरण एक की मंज़ूरी से पहले अनिवार्य रूप से ग्राम सभाओं की सहमति लेने के प्रावधानों को खत्म कर दिया है, इस प्रक्रिया को चरण दो की मंज़ूरी के बाद पूरा करने के लिये छोड़ दिया है। - सरकार के अनुसार, FCR दो हज़ार बाईस में पहले से ही वन भूमि के परिवर्तन का प्रावधान है , "केवल वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों के निपटान सहित सभी प्रावधानों को पूरा करने एवं अनुपालन के बाद" और ग्राम सभाओं की सहमति को अनिवार्य करने वाले अन्य कानूनों के संचालन पर भी रोक नहीं लगाता है। - NCST ने बताया था कि FCR दो हज़ार बाईस ने चरण एक की मंज़ूरी से पहले अनिवार्य रूप से ग्राम सभाओं की सहमति लेने के प्रावधानों को खत्म कर दिया है, इस प्रक्रिया को चरण दो की मंज़ूरी के बाद पूरा करने के लिये छोड़ दिया है। वन नियम, दो हज़ार बाईस के प्रावधानः - समितियों का गठनः - इसने सलाहकार समिति, प्रत्येक एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालयों में एक क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश सरकार के स्तर पर एक स्क्रीनिंग समिति का गठन किया। - क्षतिपूरक वनीकरणः - पर्वतीय या पहाड़ी राज्य वन भूमि को अपने भौगोलिक क्षेत्र के दो-तिहाई से अधिक कवर करने वाले हरित आवरण के साथ या राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश अपने भौगोलिक क्षेत्र के एक-तिहाई से अधिक को कवर करने वाले वन भूमि केअंतरण में सक्षम होंगे, इसके अलावा अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, जहांँ कवर बीस% से कम है, में प्रतिपूरक वनरोपण करना। - निजी वृक्षारोपण की अनुमतिः - यह नियम निजी पार्टियों के लिये वृक्षारोपण करने और उस भूमि को उन कंपनियों को बेचने का प्रावधान करता है जो आवश्यक प्रतिपूरक वनीकरण लक्ष्यों से प्रेरित हैं। - नवीन नियमों से पहले, राज्य निकाय FAC को दस्तावेज़ अग्रेषित करते थे जिसमें इस स्थिति की जानकारी भी शामिल होती थी कि क्या संबद्ध क्षेत्र में स्थानीय लोगों के वन अधिकारों का निपटान किया गया था। - यह नियम निजी पार्टियों के लिये वृक्षारोपण करने और उस भूमि को उन कंपनियों को बेचने का प्रावधान करता है जो आवश्यक प्रतिपूरक वनीकरण लक्ष्यों से प्रेरित हैं। - ग्राम सभा की सहमति की आवश्यकता नहींः - नए नियमों के अनुसार, एक परियोजना जिसे एक बार FC द्वारा अनुमोदित कर राज्य के अधिकारियों को सौंप दी जाएगी, प्रतिपूरक निधि और भूमि एकत्र करेंगे एवं इसे अंतिम अनुमोदन के लिये संसाधित करेंगे। - पहले ग्राम सभा या क्षेत्र के गाँवों में शासी निकाय की सहमति के लिये वन भूमि के परिवर्तन हेतु लिखित सहमति की आवश्यकता होती थी। - नए नियमों के अनुसार, एक परियोजना जिसे एक बार FC द्वारा अनुमोदित कर राज्य के अधिकारियों को सौंप दी जाएगी, प्रतिपूरक निधि और भूमि एकत्र करेंगे एवं इसे अंतिम अनुमोदन के लिये संसाधित करेंगे। - वनों में निर्माण कार्य की अनुमतिः - वन सुरक्षा उपायों और आवासीय इकाइयों सहित वास्तविक उद्देश्यों के लिये संरचनाओं के निर्माण/निर्माण कार्य के अधिकार की अनुमति है। भारत में वनों की स्थितिः - परिचयः - भारत वन स्थिति रिपोर्ट, दो हज़ार इक्कीस के अनुसार, कुल वन और वृक्ष आवरण अब सात,तेरह,सात सौ नवासी वर्ग किलोमीटर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का इक्कीस.इकहत्तर% है, यह वर्ष दो हज़ार उन्नीस के इक्कीस.सरसठ% की तुलना में अधिक है। - वनावरण : मध्य प्रदेश> अरुणाचल प्रदेश> छत्तीसगढ़> ओडिशा> महाराष्ट्र। - श्रेणीः - आरक्षित वनः - आरक्षित वन सबसे अधिक प्रतिबंधित वन होते हैं और राज्य सरकार द्वारा उन वन भूमि या बंजर भूमि पर निर्धारित किये जाते हैं जो सरकार की संपत्ति है। - स्थानीय लोगों को आरक्षित वनों में तब तक जाने की अनुमति नहीं है जब तक कि कोई वन अधिकारी बंदोबस्त प्रक्रिया के दौरान उन्हें आधिकारिक तौर पर अनुमति नहीं देता। - संरक्षित वनः - राज्य सरकार को आरक्षित वनों के अलावा ऐसी किसी भी भूमि को संरक्षित वनों के रूप में गठित करने का अधिकार है, जिस पर सरकार का स्वामित्त्व है और ऐसे वनों के उपयोग के संबंध में नियम जारी करने की शक्ति है। - इस शक्ति का उपयोग ऐसे वृक्षों जिनकी लकड़ी, फल या अन्य गैर-लकड़ी उत्पादों में राजस्व बढ़ाने की क्षमता है, पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करने के लिये किया जाता है। - ग्राम वनः - सुरक्षा का स्तरः - आरक्षित वन > संरक्षित वन > ग्राम वन। - आरक्षित वनः - संवैधानिक प्रावधानः - बयालीसवें संशोधन अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ छिहत्तर के माध्यम से शिक्षा, नापतौल एवं न्याय प्रशासन, वन, वन्यजीवों तथा पक्षियों के संरक्षण को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था। - राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत अनुच्छेद अड़तालीस एम्पीयर के मुताबिक, राज्य पर्यावरण संरक्षण व उसको बढ़ावा देने का काम करेगा तथा देश भर में जंगलों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा की दिशा में कार्य करेगा। - संविधान के अनुच्छेद इक्यावन एम्पीयर में कहा गया है कि वनों एवं वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा। - यह औपनिवेशिक वन नीति का सरल विस्तार था। इस अधिनियम में समग्र वन क्षेत्र को कुल भूमि क्षेत्र के एक- तिहाई तक बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया। - वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी: - इसने निर्धारित किया कि वन क्षेत्रों में स्थायी कृषि-वानिकी का अभ्यास करने के लिये केंद्रीय अनुमति आवश्यक है। उल्लंघन या परमिट की कमी को एक आपराधिक कृत्य माना गया। - राष्ट्रीय वन नीति, एक हज़ार नौ सौ अठासी: - राष्ट्रीय वन नीति का अंतिम उद्देश्य प्राकृतिक विरासत के रूप में वनों के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना था। - राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रमः - इसे निम्नीकृत वन भूमि के वनीकरण के लिये वर्ष दो हज़ार में लागू किया गया है। इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। - अन्य संबंधित अधिनियमः - अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी अधिनियम, दो हज़ार छः: - यह वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासी जो पीढ़ियों से जंगलों में निवास कर रहे हैं, को वन भूमि पर उनके वन अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न प्रश्न एक. भारत में एक विशेष राज्य में निम्नलिखित विशेषताएँ हैंः निम्नलिखित में से किस राज्य में उपरोक्त सभी विशेषताएँ हैं? उत्तरः प्रश्न दो. राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम, दो हज़ार छः के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये कौन सा मंत्रालय नोडल एजेंसी है? उत्तरः प्रिलिम्स के लियेः वनीकरण, भारत राज्य वन रिपोर्ट, दो हज़ार उन्नीस, वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम एक हज़ार नौ सौ बहत्तर, अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम, दो हज़ार छः। मेन्स के लियेः वन के प्रावधान नियम, दो हज़ार बाईस, वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी, राष्ट्रीय वन नीति, एक हज़ार नौ सौ अठासी, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ बहत्तर। चर्चा में क्यों? हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वन नियम, दो हज़ार बाईस जारी किया है। - यह वन अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी की धारा चार और वन नियम, दो हज़ार तीन के अधिक्रमण में प्रदान किया गया है। वन नियम, दो हज़ार बाईस के प्रावधानः - समितियों का गठनः - इसने एक सलाहकार समिति, प्रत्येक एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालयों में एक क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश सरकार के स्तर पर एक स्क्रीनिंग समिति का गठन किया। - सलाहकार समितिः - सलाहकार समिति की भूमिका इसके लिये संदर्भित प्रस्तावों और केंद्र सरकार द्वारा संदर्भित वनों के संरक्षण से जुड़े किसी भी मामले के संबंध में संबंधित धाराओं के तहत अनुमोदन प्रदान करने के संबंध में सलाह देने या सिफारिश करने तक सीमित है। - परियोजना स्क्रीनिंग समितिः - MoEFCC ने वन भूमि के अंतरण से जुड़े प्रस्तावों की प्रारंभिक समीक्षा के लिये प्रत्येक राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश में एक परियोजना स्क्रीनिंग समिति के गठन का निर्देश दिया है। - पांँच सदस्यीय समिति प्रत्येक महीने कम-से-कम दो बार बैठक करेगी और राज्य सरकारों को समयबद्ध तरीके से परियोजनाओं पर सलाह देगी। - पाँच-चालीस हेक्टेयर के बीच की सभी गैर-खनन परियोजनाओं की समीक्षा साठ दिनों की अवधि के भीतर की जानी चाहिये और ऐसी सभी खनन परियोजनाओं की समीक्षा पचहत्तर दिनों के भीतर की जानी चाहिये। - बड़े क्षेत्र वाली परियोजनाओं के लिये समिति को कुछ और समय मिलता है, जिसमें एक सौ हेक्टेयर से अधिक की गैर-खनन परियोजनाओं के लिये एक सौ बीस दिन और खनन परियोजनाओं के लिये एक सौ पचास दिन शामिल है। - क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समितियाँः - सभी रैखिक परियोजनाओं , चालीस हेक्टेयर तक की वन भूमि से जुड़ी परियोजनाएंँ और जिन्होंने सर्वेक्षण के प्रयोजन के लिये उनकी सीमा के बावजूद शून्य.सात तक कैनोपी घनत्व वाली वन भूमि के उपयोग का अनुमान लगाया है, उनकी एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालय में जांँच की जाएगी। - प्रतिपूरक वनीकरणः - पर्वतीय या पहाड़ी राज्य वन भूमि को अपने भौगोलिक क्षेत्र के दो-तिहाई से अधिक कवर करने वाले हरित आवरण के साथ, या राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश अपने भौगोलिक क्षेत्र के एक-तिहाई से अधिक को कवर करने वाले वन भूमि केअंतरण में सक्षम होंगे, इसके अलावा अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, जहांँ कवर बीस% से कम है, में प्रतिपूरक वनरोपण करना। वन संरक्षण के लिये अन्य पहलेंः - भारतीय वन नीति, एक हज़ार नौ सौ बावन: - यह औपनिवेशिक वन नीति का एक सरल विस्तार था। हालांकि इसमें कुल भूमि क्षेत्र का एक- तिहाई तक वन आवरण बढ़ाने का प्रावधान शामिल था। - उस समय जंगलों से प्राप्त अधिकतम वार्षिक राजस्व राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता थी। दो विश्व युद्धों, रक्षा की आवश्यकता, विकासात्मक परियोजनाएँ जैसे- नदी घाटी परियोजनाएँ, लुगदी, कागज़ और प्लाईवुड जैसे उद्योग तथा राष्ट्रीय हित की वन उपज पर बहुत अधिक निर्भरता के परिणामस्वरूप जंगलों के विशाल क्षेत्रों से राजस्व जुटाने के लिये राज्यों को मंज़ूरी दे दी गई। - यह औपनिवेशिक वन नीति का एक सरल विस्तार था। हालांकि इसमें कुल भूमि क्षेत्र का एक- तिहाई तक वन आवरण बढ़ाने का प्रावधान शामिल था। - वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी: - वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी ने निर्धारित किया कि वन क्षेत्रों में स्थायी कृषि वानिकी का अभ्यास करने के लिये केंद्रीय अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा उल्लंघन या परमिट की कमी को एक अपराध माना गया। - इसने वनों की कटाई को सीमित करने, जैवविविधता के संरक्षण और वन्यजीवों को बचाने का लक्ष्य रखा। हालांँकि हाँंकि यह अधिनियम वन संरक्षण के प्रति अधिक आशा प्रदान करता है लेकिन यह अपने लक्ष्य में सफल नहीं था। - वन संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ अस्सी ने निर्धारित किया कि वन क्षेत्रों में स्थायी कृषि वानिकी का अभ्यास करने के लिये केंद्रीय अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा उल्लंघन या परमिट की कमी को एक अपराध माना गया। - राष्ट्रीय वन नीति, एक हज़ार नौ सौ अठासी: - राष्ट्रीय वन नीति का अंतिम उद्देश्य एक प्राकृतिक विरासत के रूप में वनों के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना था। - इसने वाणिज्यिक सरोकारों से वनों की पारिस्थितिक भूमिका और भागीदारी प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने के लिये एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट बदलाव किया। - इसमें देश के भौगोलिक क्षेत्र के तैंतीस% हिस्से को वन और वृक्षों से आच्छादित करने के लक्ष्य की परिकल्पना की गई है। - राष्ट्रीय वन नीति का अंतिम उद्देश्य एक प्राकृतिक विरासत के रूप में वनों के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना था। - राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रमः - इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वर्ष दो हज़ार से निम्नीकृत वन भूमि के वनीकरण के लिये लागू किया गया है। - अन्य संबंधित अधिनियमः - एक हज़ार नौ सौ बहत्तर का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ छियासी का पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और दो हज़ार दो का जैवविविधत अधिनियम। - अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम, दो हज़ार छः: - यह वन-निवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकारों एवं वन भूमि पर कब्ज़ेको पहचानने के लिये बनाया गया है जो पीढ़ियों से ऐसे जंगलों में रह रहे हैं। भारत में वनः - परिचयः - भारत वन स्थिति रिपोर्ट-दो हज़ार इक्कीस के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्षावरण क्षेत्र अब सात,तेरह,सात सौ नवासी वर्ग किलोमीटर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का इक्कीस.इकहत्तर% है, जो दो हज़ार उन्नीस के इक्कीस.सरसठ% से अधिक है। - वनावरण : मध्य प्रदेश> अरुणाचल प्रदेश> छत्तीसगढ़> ओडिशा> महाराष्ट्र। - वर्गीकरणः - आरक्षित वनः - आरक्षित वनः आरक्षित वन सबसे अधिक प्रतिबंधित वन हैं और किसी भी वन भूमि या बंजर भूमि जो कि सरकार की संपत्ति है, राज्य सरकार द्वारा आरक्षित होती है। - आरक्षित वनों में किसी वन अधिकारी द्वारा विशेष रूप से अनुमति के बिना स्थानीय लोगों की आवाजाही निषिद्ध है। - आरक्षित वनः संरक्षित वनः - राज्य सरकार को आरक्षित भूमि के अलावा अन्य किसी भी भूमि को, जो कि सरकार की संपत्ति है, संरक्षित करने का अधिकार है। - इस शक्ति का उपयोग ऐसे वृक्षों जिनकी लकड़ी, फल या अन्य गैर-लकड़ी उत्पादों में राजस्व बढ़ाने की क्षमता है, पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करने के लिये किया जाता है। ग्राम वनः - सुरक्षा का स्तरः - आरक्षित वन > संरक्षित वन > ग्राम वन। - संवैधानिक प्रावधानः - बयालीसवें संशोधन अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ छिहत्तर के माध्यम से शिक्षा, नापतौल एवं न्याय प्रशासन, वन, वन्यजीवों तथा पक्षियों के संरक्षण को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था। - संविधान के अनुच्छेद इक्यावन एम्पीयर में कहा गया है कि वनों एवं वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा। - राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत अनुच्छेद अड़तालीस एम्पीयर के मुताबिक, राज्य पर्यावरण संरक्षण व उसको बढ़ावा देने का काम करेगा और देश भर में जंगलों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा की दिशा में कार्य करेगा। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्नः निम्नलिखित राज्यों में से किसमें उपर्युक्त सभी विशेषताएँ हैं? अतः विकल्प A सही उत्तर है।
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वरुण धवन ने शादी के बाद अब अपनी हल्दी सेरेमनी की तस्वीरें शेयर की हैं।
वरुण धवन ने शादी के बाद अब अपनी हल्दी सेरेमनी की तस्वीरें शेयर की हैं।
करीना कपूर खान ने सोशल मीडिया पर अपनी कई फोटोज शेयर की हैं, जिसमें वो योगा करती दिखाई दे रही हैं।
RRR एसएस राजामौली की फिल्म है। इसमें आलिया के अलावा कई बड़े कलाकार दिखाई देंगे।
वरुण धवन ने अपनी लॉन्ग टाइम गर्लफ्रेंड नताशा दलाल का हाथ हमेशा के लिए थाम लिया है।
'उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक' साल 2019 में रिलीज हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की थी।
इन तस्वीरों में वरुण और नताशा मेहमानों के साथ पोज देते दिखाई दे रहे हैं।
वरुण धवन और नताशा दलाल शादी के बंधन में बंध गए हैं। नताशा का एक वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है।
करण जौहर ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर नताशा दलाल और वरुण धवन की शादी की फोटो पोस्ट की है।
मालदीव को सेलेब्स का फेवरेट वेकेशन प्लेस माना जाता है। आए दिन कोई ना कोई सेलेब्रिटी मालदीव में छुट्टियां मनाते स्पॉट किया जाता है। हाल ही में सारा अली खान भी मालदीव से छुट्टियां मनाकर वापस लौटी हैं। सारा मे सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं।
तमन्ना भाटिया अपने विचार रखने के लिए इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट किया।
केएल राहुल और अथिया शेट्टी के बीच रिलेशनशिप की खबरें आती रही हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर तस्वीरों और कमेंट्स के जरिए इन दोनों के रिश्ते की गहराई सामने आती रही है। हाल ही में दोनों एकसाथ डिनर करते नजर आए।
वरुण धवन और नताशा दलाल की शादी हो गई है।
खबरों की मानें तो शादी के बाद वरुण धवन और नताशा दलाल हनीमून के लिए इस खूबसूरत जगह पर जाएंगे।
वरुण धवन और नताशा दलाल की शादी के वेन्यू से मंडप की तस्वीर सामने आ गई है।
नेशनल गर्ल चाइल्ड डे के अवसर पर रविवार को अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने सिनेमा की ताकत के बारे में बात की, जिनसे समाज में बदलाव आता है और जिसका लाभ महिलाओं को मिलता है।
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वरुण धवन ने शादी के बाद अब अपनी हल्दी सेरेमनी की तस्वीरें शेयर की हैं। वरुण धवन ने शादी के बाद अब अपनी हल्दी सेरेमनी की तस्वीरें शेयर की हैं। करीना कपूर खान ने सोशल मीडिया पर अपनी कई फोटोज शेयर की हैं, जिसमें वो योगा करती दिखाई दे रही हैं। RRR एसएस राजामौली की फिल्म है। इसमें आलिया के अलावा कई बड़े कलाकार दिखाई देंगे। वरुण धवन ने अपनी लॉन्ग टाइम गर्लफ्रेंड नताशा दलाल का हाथ हमेशा के लिए थाम लिया है। 'उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक' साल दो हज़ार उन्नीस में रिलीज हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की थी। इन तस्वीरों में वरुण और नताशा मेहमानों के साथ पोज देते दिखाई दे रहे हैं। वरुण धवन और नताशा दलाल शादी के बंधन में बंध गए हैं। नताशा का एक वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है। करण जौहर ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर नताशा दलाल और वरुण धवन की शादी की फोटो पोस्ट की है। मालदीव को सेलेब्स का फेवरेट वेकेशन प्लेस माना जाता है। आए दिन कोई ना कोई सेलेब्रिटी मालदीव में छुट्टियां मनाते स्पॉट किया जाता है। हाल ही में सारा अली खान भी मालदीव से छुट्टियां मनाकर वापस लौटी हैं। सारा मे सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं। तमन्ना भाटिया अपने विचार रखने के लिए इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट किया। केएल राहुल और अथिया शेट्टी के बीच रिलेशनशिप की खबरें आती रही हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर तस्वीरों और कमेंट्स के जरिए इन दोनों के रिश्ते की गहराई सामने आती रही है। हाल ही में दोनों एकसाथ डिनर करते नजर आए। वरुण धवन और नताशा दलाल की शादी हो गई है। खबरों की मानें तो शादी के बाद वरुण धवन और नताशा दलाल हनीमून के लिए इस खूबसूरत जगह पर जाएंगे। वरुण धवन और नताशा दलाल की शादी के वेन्यू से मंडप की तस्वीर सामने आ गई है। नेशनल गर्ल चाइल्ड डे के अवसर पर रविवार को अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने सिनेमा की ताकत के बारे में बात की, जिनसे समाज में बदलाव आता है और जिसका लाभ महिलाओं को मिलता है।
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कोडरमाः बागीटांड स्टेडियम में बुधवार को मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना अंतर्गत परिसंपत्ति वितरण एवं दुधारु पशु मेला सह गव्य प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।
प्रदर्शनी का उद्घाटन कृषि पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के मंत्री बादल पत्रलेख ने किया।
मौके पर कृषि मंत्री ने कहा कि हमारी सरकार चार लाख 24 हजार बिरसा किसान बनायेगी।
बिरसा किसान तकदीर और तदबीर बदलने में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि 80 प्रतिशत लोग किसान है, हमारे अन्न दाता हैं, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में मात्र 12 प्रतिशत ही हिस्सा है।
कृषि विभाग को और मजूबत करने के लिए राज्य सरकार के द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं।
माइका क्षेत्र में कोडरमा का नया पहचान कायम होगा इसके लिए सरकार के द्वारा नई दिशा में कार्य किये जा रहे हैं।
पिछले साल की तुलना में धान अधिप्राप्ति दुगुनी से भी ज्यादा हुआ है, इस बेहतर कार्य के लिए जिला प्रशासन की पूरी टीम को बधाई दिया।
उन्होंने कहा कि किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उनका हक है और इस हक को झारखंड सरकार दिलाने के लिए पूरी तरह से प्रयासरत हैं।
कहा कि माइका खादानों के चालू होने से कोडरमा जिले के लगभग 50 हजार परिवारों को रोजगार मिलेगा।
गव्य विकास प्रक्षेत्र अंतर्गत दो दुधारु गाय का वितरण, कामधेनु डेयरी फार्मिंग अंतर्गत 5 एवं 10 गाय की योजना, हस्त एवं विद्युत चालित चैप कटर का वितरण, प्रगतिशील डेयरी कृषकों को सहायता व तकनीकी इनुपुट सामग्रियों का वितरण शामिल है।
उपायुक्त रमेश घोलप ने बताया कि मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत कोडरमा जिले में चालू वित्तिय वर्ष 2020-21 में पशुधन प्रक्षेत्र की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत 683 लाभुक परिवार तथा गव्य विकास प्रक्षेत्र के विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत 387 लाभुक, परिवार के बीच कुल चार, करोड़ 36 लाख 54 हजार रुपये की योजना क्रियांवित की जा रही है, इसमें राज्य सरकार द्वारा दो करोड़ 4 लाख 62 हजार रुपये का अनुदान डीबीटी के माध्मय से उनके बैंक खाता में हस्तांतरित की जा रही हैं।
कृषि मंत्री के द्वारा मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत लाभुकों को स्वीकृति पत्र वितरण किया गया।
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कोडरमाः बागीटांड स्टेडियम में बुधवार को मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना अंतर्गत परिसंपत्ति वितरण एवं दुधारु पशु मेला सह गव्य प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। प्रदर्शनी का उद्घाटन कृषि पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के मंत्री बादल पत्रलेख ने किया। मौके पर कृषि मंत्री ने कहा कि हमारी सरकार चार लाख चौबीस हजार बिरसा किसान बनायेगी। बिरसा किसान तकदीर और तदबीर बदलने में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि अस्सी प्रतिशत लोग किसान है, हमारे अन्न दाता हैं, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में मात्र बारह प्रतिशत ही हिस्सा है। कृषि विभाग को और मजूबत करने के लिए राज्य सरकार के द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं। माइका क्षेत्र में कोडरमा का नया पहचान कायम होगा इसके लिए सरकार के द्वारा नई दिशा में कार्य किये जा रहे हैं। पिछले साल की तुलना में धान अधिप्राप्ति दुगुनी से भी ज्यादा हुआ है, इस बेहतर कार्य के लिए जिला प्रशासन की पूरी टीम को बधाई दिया। उन्होंने कहा कि किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उनका हक है और इस हक को झारखंड सरकार दिलाने के लिए पूरी तरह से प्रयासरत हैं। कहा कि माइका खादानों के चालू होने से कोडरमा जिले के लगभग पचास हजार परिवारों को रोजगार मिलेगा। गव्य विकास प्रक्षेत्र अंतर्गत दो दुधारु गाय का वितरण, कामधेनु डेयरी फार्मिंग अंतर्गत पाँच एवं दस गाय की योजना, हस्त एवं विद्युत चालित चैप कटर का वितरण, प्रगतिशील डेयरी कृषकों को सहायता व तकनीकी इनुपुट सामग्रियों का वितरण शामिल है। उपायुक्त रमेश घोलप ने बताया कि मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत कोडरमा जिले में चालू वित्तिय वर्ष दो हज़ार बीस-इक्कीस में पशुधन प्रक्षेत्र की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत छः सौ तिरासी लाभुक परिवार तथा गव्य विकास प्रक्षेत्र के विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत तीन सौ सत्तासी लाभुक, परिवार के बीच कुल चार, करोड़ छत्तीस लाख चौवन हजार रुपये की योजना क्रियांवित की जा रही है, इसमें राज्य सरकार द्वारा दो करोड़ चार लाख बासठ हजार रुपये का अनुदान डीबीटी के माध्मय से उनके बैंक खाता में हस्तांतरित की जा रही हैं। कृषि मंत्री के द्वारा मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत लाभुकों को स्वीकृति पत्र वितरण किया गया।
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आज जंग का 19वां दिन है. रूसी फौज अभी कीव से तो दूर है लेकिन यूक्रेन के दूसरे शहरों में रूसी हमले लगातार जारी है. धीरे धीके रूसी सेना कीव की ओर कूच कर रही है. आज यूक्रेन के 24 सूबों में से कम से कम 19 प्रांतों में रूस के हवाई हमले का अलर्ट जारी किया गया है. 18वें दिन रूस ने यूक्रेन के यावोरिव आर्मी ट्रेनिंग फैसिलिटी पर हमला बोला और करीब 180 लोगों को मार गिराया. रूस के मुताबिक ये सभी विदेशी भाड़े के सैनिक थे. उधर यूक्रेन ने रूस के चार विमानों और तीन हेलिकॉप्टर्स को मार गिराने का दावा किया. इस बीच, आज दोनों देश के बीच चौथे दौर की बातचीत होनी है.
The Russian army is still far from Kyiv, but Russian attacks continue in other cities of Ukraine. Slowly the Russian army is marching towards Kyiv. Today an alert has been issued for Russian airstrikes in at least 19 of Ukraine's 24 provinces.
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आज जंग का उन्नीसवां दिन है. रूसी फौज अभी कीव से तो दूर है लेकिन यूक्रेन के दूसरे शहरों में रूसी हमले लगातार जारी है. धीरे धीके रूसी सेना कीव की ओर कूच कर रही है. आज यूक्रेन के चौबीस सूबों में से कम से कम उन्नीस प्रांतों में रूस के हवाई हमले का अलर्ट जारी किया गया है. अट्ठारहवें दिन रूस ने यूक्रेन के यावोरिव आर्मी ट्रेनिंग फैसिलिटी पर हमला बोला और करीब एक सौ अस्सी लोगों को मार गिराया. रूस के मुताबिक ये सभी विदेशी भाड़े के सैनिक थे. उधर यूक्रेन ने रूस के चार विमानों और तीन हेलिकॉप्टर्स को मार गिराने का दावा किया. इस बीच, आज दोनों देश के बीच चौथे दौर की बातचीत होनी है. The Russian army is still far from Kyiv, but Russian attacks continue in other cities of Ukraine. Slowly the Russian army is marching towards Kyiv. Today an alert has been issued for Russian airstrikes in at least उन्नीस of Ukraine's चौबीस provinces.
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जम्मू के तेज गेंदबाज मलिक और मध्य प्रदेश के तेज गेंदबाज सेन ने इंडियन प्रीमियर लीग के 2022 सत्र के दौरान अपनी तेज गति से क्रिकेट विश्व को प्रभावित किया था।
मलिक ने जून में अपने पदार्पण के बाद से भारत के लिए तीन टी20 खेले हैं और वह टी20 तथा वनडे सीरीज दोनों के लिए भारतीय टीम के सदस्य हैं। सेन को टी20 सीरीज की समाप्ति के बाद वनडे सीरीज में भारत की तरफ से पदार्पण करने का मौका मिल सकता है।
जहीर के हवाले से प्राइम वीडियो ने कहा, "यह एक रोमांचक सीरीज होगी। मैं इन पिचों पर उमरान मलिक को परफॉर्म करता देखने के लिए बेताब हूं। यह दौरा उनके और कुलदीप सेन के लिए बड़ा अनुभव साबित होगा। न्यूजीलैंड की पिचें तेज गेंदबाजों को मदद करेंगी और इससे दोनों टीमों के भाग्य में अंतर आएगा। "
जहीर इस दौरे के लिए हिंदी कमेंट्री टीम का हिस्सा होंगे। उनके साथ आशीष नेहरा, अजित आगरकर, अजय जडेजा, मोहम्मद कैफ और विवेक राजदान रहेंगे।
जहीर ने भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण को सलाह दी कि पहले टी20 के स्थल वेलिंगटन के लिए अपनी रणनीति अच्छी तरह तैयार कर लें जहां हवा तेज चलती है। उन्होंने कहा कि तेज हवा के विपरीत और उसके साथ गेंदबाजी करना आपकी लय को प्रभावित करता है, इसलिए ऐसी परिस्थितियों में गेंदबाजी करने के लिए तैयार रहें।
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जम्मू के तेज गेंदबाज मलिक और मध्य प्रदेश के तेज गेंदबाज सेन ने इंडियन प्रीमियर लीग के दो हज़ार बाईस सत्र के दौरान अपनी तेज गति से क्रिकेट विश्व को प्रभावित किया था। मलिक ने जून में अपने पदार्पण के बाद से भारत के लिए तीन टीबीस खेले हैं और वह टीबीस तथा वनडे सीरीज दोनों के लिए भारतीय टीम के सदस्य हैं। सेन को टीबीस सीरीज की समाप्ति के बाद वनडे सीरीज में भारत की तरफ से पदार्पण करने का मौका मिल सकता है। जहीर के हवाले से प्राइम वीडियो ने कहा, "यह एक रोमांचक सीरीज होगी। मैं इन पिचों पर उमरान मलिक को परफॉर्म करता देखने के लिए बेताब हूं। यह दौरा उनके और कुलदीप सेन के लिए बड़ा अनुभव साबित होगा। न्यूजीलैंड की पिचें तेज गेंदबाजों को मदद करेंगी और इससे दोनों टीमों के भाग्य में अंतर आएगा। " जहीर इस दौरे के लिए हिंदी कमेंट्री टीम का हिस्सा होंगे। उनके साथ आशीष नेहरा, अजित आगरकर, अजय जडेजा, मोहम्मद कैफ और विवेक राजदान रहेंगे। जहीर ने भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण को सलाह दी कि पहले टीबीस के स्थल वेलिंगटन के लिए अपनी रणनीति अच्छी तरह तैयार कर लें जहां हवा तेज चलती है। उन्होंने कहा कि तेज हवा के विपरीत और उसके साथ गेंदबाजी करना आपकी लय को प्रभावित करता है, इसलिए ऐसी परिस्थितियों में गेंदबाजी करने के लिए तैयार रहें।
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परिकलित करने के लिए संबंधित आयातक को हुई हानि के लिए उपयुक्त रूप से समायोजन किए हैं। सीमा प्रशुल्क अधिनियम, 1975 की धारा 9क तथा नियमावली के अनुबंध-1 के पैरा 5 का संदर्भ देते हुए घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि पाटन मार्जिन के निर्धारण के लिए संबद्ध पक्षकारों के लिए निर्यात कीमत उस कीमत के आधार पर निर्मित की जानी है जिस पर आयातित वस्तु स्वतंत्र क्रेता को (आयात तथा पुनः बिक्री के बीच किए गए और लाभ के लिए शुल्कों तथा करों सहित लागत के लिए) उचित अनुमति के बाद पहले बेचे गई है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि कोरिया गणराज्य के निर्यातक भारत में अपने संबद्ध पक्षकारों को उच्च कीमतों पर संबद्ध सामानों का निर्यात कर रहे हैं और संबद्ध आयातक पाटनरोधी जांच की स्थिति में नोटिस से बचने के लिए आयात कीमतों से कम कीमतों पर असंबद्ध ग्राहकों को संबद्ध सामानों की बिक्री कर रहे हैं।
घ. घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि निर्दिष्ट प्राधिकारी ने प्राथमिक जांच परिणाम में अलग पाटन मार्जिन के संबंध में मैसर्स डोंगबू स्टील कं. लि. के अनुरोध को सही रद्द किया है क्योंकि चेन में संबंधित व्यापारियों ने उत्तर नहीं दिया है और वह प्राधिकारी की विगत परिपाटी के अनुरूप है। आवेदक ने ऑस्ट्रेलिया तथा चीन जन. गण. के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "लो ऐश मेटालर्जिकल कोक" के आयातों के संबंध में पाटनरोधी जांच के मामले का संदर्भ दिया है जिसमें यह पाया कि चूंकि भारतीय ग्राहक तक पूरी मूल्य श्रृंखला के लिए अनिवार्य सूचना, भारतीय ग्राहकों को निर्यात करते समय असंबद्ध व्यापारी द्वारा दावा किए गए समायोजन उस बिक्री के निबंधन एवं शर्तें जांच के लिए उपलब्ध नहीं हैं, अतः प्राधिकारी अलग पाटन मार्जिन निर्धारित करने की स्थिति में नहीं हैं। आवेदक ने उन जांचों का संदर्भ भी दिया है जहां निर्दिष्ट प्राधिकारी ने पूरी मूल्य श्रृंखला तक दी गई सूचना के अभाव में अलग पाटन मार्जिन नहीं दिया है। ये निम्नलिखित हैंः
इंडोनेशिया, थाइलैंड और सिंगापुर के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "अनकोटेड कॉपियर पेपर"
मलेशिया, चीन जन. गण., चीनी तैपई और संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "सोलर सेल चाहे वे आंशिक रूप से असेंबल किए गए हों अथवा नहीं अथवा पूर्णतः से मॉडलों में हों अथवा पैनलों में हों अथवा ग्लास पर हों अथवा कुछ अन्य उपयुक्त रूपों में हों"; और
iii. ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ और सिंगापुर के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "फ्लेक्सिबल स्लेबस्टॉक पॉलयॉल"।
ङ. घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि प्राधिकारी को इस तथ्य का सत्यापन करना चाहिए कि शुकन ट्रेडिंग एंड प्राइम रिसोर्स के प्रश्नावली के उत्तरों के अभाव में डोंगबू ने भारत को अपने 85 प्रतिशत निर्यात की सूचना दी है या नहीं। घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि मैनुअल का पैरा 12.20 अपने आप में विरोधाभासी है। पैरा 12.20 के आरंभ में प्राधिकारी उत्तरदाता उत्पादक के लिए अपने सभी निर्यातकों, व्यापारियों, आयातकों आदि सहित पूर्ण उत्तर दायर करना अनिवार्य बनाते हैं, जो भारत को विचाराधीन उत्पादों के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्यातों में पाटन मार्जिन की अलग दर लेने के लिए शामिल हैं। उसके बाद पैरा 12.20 की मद (iv) में यह उल्लेख किया गया है कि यदि भारत को निर्यातों की कुल मात्रा के 30 प्रतिशत से अधिक हिस्से वाले असंबद्ध निर्यातक सहयोग नहीं करते तो उत्तरदाता उत्पादक को असहयोग माना जाए। जैसा कि देखा जा सकता है कि दोनों विवरण एक दूसरे के विरोधाभासी हैं।
च. घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि मैनुअल उस समय जारी किया गया था जब प्राधिकारी उत्पादक एवं निर्यातक के लिए, दोनों को एक साथ लेकर, शुल्क के संयुक्त रूप की सिफारिश किया करते थे। एक उदाहरण देखें। । उत्पादक क तीन भिन्न व्यापारियों ख, ग और घ के माध्यम से भारत को निर्यात करता है। ग जांच में भाग नहीं लेता और अन्य पक्षकार विधिवत रूप से सहयोग करते हैं। पूर्व के परिदृश्य में यदि भारतीय प्राधिकारी इन पक्षकारों को सहयोगी मानेंगे तो निर्यातक ख और ग के साथ उत्पादक क के संयोजन के लिए अलग शुल्क दर निर्धारित की जाएगी। निर्यातक ग के माध्यम से उत्पादक क द्वारा किया गया कोई भी निर्यात उच्च अवशिष्ट शुल्क के अध्यधीन होगा। तथापि, प्राधिकारी ने अब अपनी परिपाटी बदली है और केवल उत्पादक विशिष्ट शुल्क की सिफारिश करते हैं। अब नई परिपाटी में यदि भारतीय प्राधिकारी इन पक्षकारों को सहयोगी मानते हैं तो फिर अलग शुल्क दर केवल उत्पादक क के लिए निर्धारित की जाएगी।
यहां तक कि यदि उत्पादक क निर्यातक ग के माध्यम से निर्यात करता है तो इस अलग शुल्क दर का लाभ उपलब्ध होगा। घरेलू उद्योग अनुरोध करता है कि मैनुअल में निर्धारित परिपाटी वर्तमान परिवर्तित परिदृश्य में लागू नहीं हो सकती जब प्राधिकारी ने शुल्क तालिका में शुल्क प्रदान करने के तरीके को बदल कर दिया है।
छ. डोंगबू ने अनुरोध किया है कि प्राथमिक जांच परिणाम जारी करने के बाद मैसर्स शकुन ट्रेडिंग ने अपनी प्रश्नावली के उत्तर दायर किए हैं। घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि प्राधिकारी को इस आधार पर मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा दायर प्रश्नावली के उत्तर को रद्द करना चाहिए कि वह उत्तर जांच के बहुत ही देरी के चरण में दायर किए गए हैं क्योंकि प्राधिकारी ने पहले ही प्रश्नावली के उत्तर प्राधिकारी के समक्ष दायर करने के लिए सभी हितबद्ध पक्षकारों को पूरा समय दिया था। यह भी अनुरोध किया गया था कि डोंगबू अपने अपने लिखित अनुरोधों में स्वयं ही स्वीकार किया है कि यहां तक कि मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा अब दायर प्रश्नावली के उत्तर में कमी है और वह अपूर्ण है। घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि मैनुअल के पैरा 12.20 में यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि "यदि असंबद्ध कंपनियों से सूचना पूर्ण नहीं है तो उत्तर रद्द किया जा सकता है।" यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि यदि उत्पादक के असंबद्ध व्यापारी द्वारा पूर्ण उत्तर दायर नहीं किया जाता है तो प्राधिकारी उत्पादक के उत्तर को रद्द कर देंगे। यदि प्राधिकारी प्राथमिक जांच परिणाम के बाद कमी वाले प्रश्नावली के उत्तर स्वीकार करते हैं और मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा दी गई सूचना पर विचार करते हैं तो प्राधिकारी एक बहुत ही बुरा पूर्वोदाहरण निर्धारित करेंगे। प्राधिकारी ने चीन जन. गण. और जापान के मूल के अथवा वहां से निर्यातित सभी प्रकार के 1, 1, 1, 2-टेट्राफ्लोरोथीन अथवा आर-134ए के आयातों के संबंध में पाटनरोधी जांच में अंतिम परिणाम के पैरा 26 (viii) और 29 (ix) में इस आधार पर प्रश्नावली के उत्तर रद्द किए थे कि प्रश्नावली के उत्तर प्राथमिक जांच परिणाम के बाद दायर किए गए हैं। प्राधिकारी ने चीन जन. गण. के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "पैरासिटामॉल" के आयातों पर लगाए गए पाटनरोधी शुल्क की दूसरी निर्णायक समीक्षा जांच के अंतिम जांच परिणाम में निम्नलिखित टिप्पणी की
"20. प्राधिकारी नोट करते हैं कि मैसर्स हेबेईजिहेंग (ग्रुप) फार्मास्युटिकल कं. लि. ने उत्तर काफी देरी से दायर किए और देरी से उत्तर प्रस्तुत करने के लिए कोई उपयुक्त तथा संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया। यह नोट किया जाता है कि किसी जांच में भाग लेने का अधिकार असीमित नहीं हो सकता।"
ज. उपर्युक्त के मद्देनजर, प्राधिकारी को मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा दायर उत्तर को रद्द करना चाहिए और डोंगबू स्टील को अलग शुल्क दर प्रदान नहीं करनी चाहिए।
झ. जांच की अवधि के दौरान डोंगकुक ने भारत में अपने संबंधित आयातक (डोंगकुक स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड) को सीधे निर्यात किए। कुछ निर्यात असंबद्ध कोरियाई निर्यातकों यथा ह्योसंग टीएनसी कारपोरेशन और एसके नेटवर्क्स के माध्यम से भी किए गए हैं। एसके नेटवर्क्स ने निर्यातक प्रश्नावली के उत्तर दायर नहीं किए हैं। एसके नेटवर्क्स से प्रश्नावली के उत्तर के अभाव में भारत में पूरी निर्यात श्रृंखला उपलब्ध नहीं है और तद्नुसार पूरे समूह द्वारा दायर उत्तर को रद्द किया जाना चाहिए।
ञ. डोंगकुक ने अन्य आपूर्तिकर्ता (पोस्को हो सकता है) से भी विचाराधीन उत्पाद की खरीद की है। यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि क्या अन्य उत्पादकों से डोंगकुक द्वारा खरीदा गया विचाराधीन उत्पाद भारत को निर्यात किया गया है अथवा नहीं। यदि डोंगकुक ने भारत को किसी अन्य उत्पादक द्वारा विनिर्मित उत्पाद का निर्यात किया है और उस उत्पादक ने जांच में भाग नहीं लिया है तो पूरे समूह द्वारा दायर पूरा उत्तर रद्द किया जाना चाहिए।
ट. डोंगकुक स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (संबद्ध आयातक) द्वारा दायर उत्तर से यह देखा जा सकता है कि उसको वर्ष 2017-18 के दौरान हानियां (अन्य आय तथा मालसूची में परिवर्तनों के समायोजन के बाद) हो रही थीं। वर्ष 2017-18 के लिए डोंगकुक स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को हुई हानियां निम्नलिखित रूप में देखी जा सकती हैंः
|
परिकलित करने के लिए संबंधित आयातक को हुई हानि के लिए उपयुक्त रूप से समायोजन किए हैं। सीमा प्रशुल्क अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ पचहत्तर की धारा नौक तथा नियमावली के अनुबंध-एक के पैरा पाँच का संदर्भ देते हुए घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि पाटन मार्जिन के निर्धारण के लिए संबद्ध पक्षकारों के लिए निर्यात कीमत उस कीमत के आधार पर निर्मित की जानी है जिस पर आयातित वस्तु स्वतंत्र क्रेता को उचित अनुमति के बाद पहले बेचे गई है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि कोरिया गणराज्य के निर्यातक भारत में अपने संबद्ध पक्षकारों को उच्च कीमतों पर संबद्ध सामानों का निर्यात कर रहे हैं और संबद्ध आयातक पाटनरोधी जांच की स्थिति में नोटिस से बचने के लिए आयात कीमतों से कम कीमतों पर असंबद्ध ग्राहकों को संबद्ध सामानों की बिक्री कर रहे हैं। घ. घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि निर्दिष्ट प्राधिकारी ने प्राथमिक जांच परिणाम में अलग पाटन मार्जिन के संबंध में मैसर्स डोंगबू स्टील कं. लि. के अनुरोध को सही रद्द किया है क्योंकि चेन में संबंधित व्यापारियों ने उत्तर नहीं दिया है और वह प्राधिकारी की विगत परिपाटी के अनुरूप है। आवेदक ने ऑस्ट्रेलिया तथा चीन जन. गण. के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "लो ऐश मेटालर्जिकल कोक" के आयातों के संबंध में पाटनरोधी जांच के मामले का संदर्भ दिया है जिसमें यह पाया कि चूंकि भारतीय ग्राहक तक पूरी मूल्य श्रृंखला के लिए अनिवार्य सूचना, भारतीय ग्राहकों को निर्यात करते समय असंबद्ध व्यापारी द्वारा दावा किए गए समायोजन उस बिक्री के निबंधन एवं शर्तें जांच के लिए उपलब्ध नहीं हैं, अतः प्राधिकारी अलग पाटन मार्जिन निर्धारित करने की स्थिति में नहीं हैं। आवेदक ने उन जांचों का संदर्भ भी दिया है जहां निर्दिष्ट प्राधिकारी ने पूरी मूल्य श्रृंखला तक दी गई सूचना के अभाव में अलग पाटन मार्जिन नहीं दिया है। ये निम्नलिखित हैंः इंडोनेशिया, थाइलैंड और सिंगापुर के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "अनकोटेड कॉपियर पेपर" मलेशिया, चीन जन. गण., चीनी तैपई और संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "सोलर सेल चाहे वे आंशिक रूप से असेंबल किए गए हों अथवा नहीं अथवा पूर्णतः से मॉडलों में हों अथवा पैनलों में हों अथवा ग्लास पर हों अथवा कुछ अन्य उपयुक्त रूपों में हों"; और iii. ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ और सिंगापुर के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "फ्लेक्सिबल स्लेबस्टॉक पॉलयॉल"। ङ. घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि प्राधिकारी को इस तथ्य का सत्यापन करना चाहिए कि शुकन ट्रेडिंग एंड प्राइम रिसोर्स के प्रश्नावली के उत्तरों के अभाव में डोंगबू ने भारत को अपने पचासी प्रतिशत निर्यात की सूचना दी है या नहीं। घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि मैनुअल का पैरा बारह.बीस अपने आप में विरोधाभासी है। पैरा बारह.बीस के आरंभ में प्राधिकारी उत्तरदाता उत्पादक के लिए अपने सभी निर्यातकों, व्यापारियों, आयातकों आदि सहित पूर्ण उत्तर दायर करना अनिवार्य बनाते हैं, जो भारत को विचाराधीन उत्पादों के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्यातों में पाटन मार्जिन की अलग दर लेने के लिए शामिल हैं। उसके बाद पैरा बारह.बीस की मद में यह उल्लेख किया गया है कि यदि भारत को निर्यातों की कुल मात्रा के तीस प्रतिशत से अधिक हिस्से वाले असंबद्ध निर्यातक सहयोग नहीं करते तो उत्तरदाता उत्पादक को असहयोग माना जाए। जैसा कि देखा जा सकता है कि दोनों विवरण एक दूसरे के विरोधाभासी हैं। च. घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि मैनुअल उस समय जारी किया गया था जब प्राधिकारी उत्पादक एवं निर्यातक के लिए, दोनों को एक साथ लेकर, शुल्क के संयुक्त रूप की सिफारिश किया करते थे। एक उदाहरण देखें। । उत्पादक क तीन भिन्न व्यापारियों ख, ग और घ के माध्यम से भारत को निर्यात करता है। ग जांच में भाग नहीं लेता और अन्य पक्षकार विधिवत रूप से सहयोग करते हैं। पूर्व के परिदृश्य में यदि भारतीय प्राधिकारी इन पक्षकारों को सहयोगी मानेंगे तो निर्यातक ख और ग के साथ उत्पादक क के संयोजन के लिए अलग शुल्क दर निर्धारित की जाएगी। निर्यातक ग के माध्यम से उत्पादक क द्वारा किया गया कोई भी निर्यात उच्च अवशिष्ट शुल्क के अध्यधीन होगा। तथापि, प्राधिकारी ने अब अपनी परिपाटी बदली है और केवल उत्पादक विशिष्ट शुल्क की सिफारिश करते हैं। अब नई परिपाटी में यदि भारतीय प्राधिकारी इन पक्षकारों को सहयोगी मानते हैं तो फिर अलग शुल्क दर केवल उत्पादक क के लिए निर्धारित की जाएगी। यहां तक कि यदि उत्पादक क निर्यातक ग के माध्यम से निर्यात करता है तो इस अलग शुल्क दर का लाभ उपलब्ध होगा। घरेलू उद्योग अनुरोध करता है कि मैनुअल में निर्धारित परिपाटी वर्तमान परिवर्तित परिदृश्य में लागू नहीं हो सकती जब प्राधिकारी ने शुल्क तालिका में शुल्क प्रदान करने के तरीके को बदल कर दिया है। छ. डोंगबू ने अनुरोध किया है कि प्राथमिक जांच परिणाम जारी करने के बाद मैसर्स शकुन ट्रेडिंग ने अपनी प्रश्नावली के उत्तर दायर किए हैं। घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि प्राधिकारी को इस आधार पर मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा दायर प्रश्नावली के उत्तर को रद्द करना चाहिए कि वह उत्तर जांच के बहुत ही देरी के चरण में दायर किए गए हैं क्योंकि प्राधिकारी ने पहले ही प्रश्नावली के उत्तर प्राधिकारी के समक्ष दायर करने के लिए सभी हितबद्ध पक्षकारों को पूरा समय दिया था। यह भी अनुरोध किया गया था कि डोंगबू अपने अपने लिखित अनुरोधों में स्वयं ही स्वीकार किया है कि यहां तक कि मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा अब दायर प्रश्नावली के उत्तर में कमी है और वह अपूर्ण है। घरेलू उद्योग ने अनुरोध किया कि मैनुअल के पैरा बारह.बीस में यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि "यदि असंबद्ध कंपनियों से सूचना पूर्ण नहीं है तो उत्तर रद्द किया जा सकता है।" यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि यदि उत्पादक के असंबद्ध व्यापारी द्वारा पूर्ण उत्तर दायर नहीं किया जाता है तो प्राधिकारी उत्पादक के उत्तर को रद्द कर देंगे। यदि प्राधिकारी प्राथमिक जांच परिणाम के बाद कमी वाले प्रश्नावली के उत्तर स्वीकार करते हैं और मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा दी गई सूचना पर विचार करते हैं तो प्राधिकारी एक बहुत ही बुरा पूर्वोदाहरण निर्धारित करेंगे। प्राधिकारी ने चीन जन. गण. और जापान के मूल के अथवा वहां से निर्यातित सभी प्रकार के एक, एक, एक, दो-टेट्राफ्लोरोथीन अथवा आर-एक सौ चौंतीसए के आयातों के संबंध में पाटनरोधी जांच में अंतिम परिणाम के पैरा छब्बीस और उनतीस में इस आधार पर प्रश्नावली के उत्तर रद्द किए थे कि प्रश्नावली के उत्तर प्राथमिक जांच परिणाम के बाद दायर किए गए हैं। प्राधिकारी ने चीन जन. गण. के मूल के अथवा वहां से निर्यातित "पैरासिटामॉल" के आयातों पर लगाए गए पाटनरोधी शुल्क की दूसरी निर्णायक समीक्षा जांच के अंतिम जांच परिणाम में निम्नलिखित टिप्पणी की "बीस. प्राधिकारी नोट करते हैं कि मैसर्स हेबेईजिहेंग फार्मास्युटिकल कं. लि. ने उत्तर काफी देरी से दायर किए और देरी से उत्तर प्रस्तुत करने के लिए कोई उपयुक्त तथा संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया। यह नोट किया जाता है कि किसी जांच में भाग लेने का अधिकार असीमित नहीं हो सकता।" ज. उपर्युक्त के मद्देनजर, प्राधिकारी को मैसर्स शकुन ट्रेडिंग द्वारा दायर उत्तर को रद्द करना चाहिए और डोंगबू स्टील को अलग शुल्क दर प्रदान नहीं करनी चाहिए। झ. जांच की अवधि के दौरान डोंगकुक ने भारत में अपने संबंधित आयातक को सीधे निर्यात किए। कुछ निर्यात असंबद्ध कोरियाई निर्यातकों यथा ह्योसंग टीएनसी कारपोरेशन और एसके नेटवर्क्स के माध्यम से भी किए गए हैं। एसके नेटवर्क्स ने निर्यातक प्रश्नावली के उत्तर दायर नहीं किए हैं। एसके नेटवर्क्स से प्रश्नावली के उत्तर के अभाव में भारत में पूरी निर्यात श्रृंखला उपलब्ध नहीं है और तद्नुसार पूरे समूह द्वारा दायर उत्तर को रद्द किया जाना चाहिए। ञ. डोंगकुक ने अन्य आपूर्तिकर्ता से भी विचाराधीन उत्पाद की खरीद की है। यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि क्या अन्य उत्पादकों से डोंगकुक द्वारा खरीदा गया विचाराधीन उत्पाद भारत को निर्यात किया गया है अथवा नहीं। यदि डोंगकुक ने भारत को किसी अन्य उत्पादक द्वारा विनिर्मित उत्पाद का निर्यात किया है और उस उत्पादक ने जांच में भाग नहीं लिया है तो पूरे समूह द्वारा दायर पूरा उत्तर रद्द किया जाना चाहिए। ट. डोंगकुक स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर उत्तर से यह देखा जा सकता है कि उसको वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के दौरान हानियां हो रही थीं। वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के लिए डोंगकुक स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को हुई हानियां निम्नलिखित रूप में देखी जा सकती हैंः
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कोलबेड मीथेन क्या है?
चर्चा में क्यों?
हाल ही में केंद्र सरकार ने राज्य द्वारा संचालित कोयला खदान से कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited-CIL) को आगामी दो से तीन वर्षों के लिये 2 एमएमएससीबी (Million Metric Standard Cubic Metres-MMSCB) प्रतिदिन कोलबेड मीथेन के उत्पादन का निर्देश दिया है।
मुख्य बिंदुः
- कोलबेड मीथेन (Coalbed Methane-CBM) एक अपरंपरागत गैस का भंडार है। यह कोयले की चट्टानों में प्रत्यक्ष तौर पर मौजूद रहती है।
- मीथेन गैस कोयले की परतों के नीचे पाई जाती है। इसे ड्रिल किया जाता है तथा नीचे उपस्थित भूमिगत जल को हटाकर इसे प्राप्त किया जाता है।
- भारत कोयले के भंडार के मामले में विश्व में पाँचवें स्थान पर है तथा इस दृष्टिकोण से CBM स्वच्छ उर्जा का एक बेहतर विकल्प हो सकता है।
- पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अंतर्गत हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (Directorate General of Hydrocarbon-DGH) के अनुसार, भारत में CBM भंडार लगभग 92 ट्रिलियन क्यूबिक फीट या 2,600 बिलियन क्यूबिक मीटर है।
- देश के 12 राज्यों में कोयला तथा CBM भंडार पाए जाते हैं। जहाँ गोंडवाना निक्षेप (Gondwana Sediments) में यह बहुतायत में मौजूद है।
- वर्तमान में CBM का उत्पादन झारखंड के रानीगंज, झरिया तथा बोकारो कोलफील्ड में होता है।
- आगामी समय में सरकार दामोदर-कोयल घाटी तथा सोन घाटी में CBM के उत्पादन का कार्य प्रारंभ कर सकती है।
CBM का महत्त्वः
- CBM का उपयोग विद्युत उत्पादन में, वाहनों के ईंधन में संपीडित प्राकृतिक गैस (Compressed Natural Gas-CNG) के तौर पर, खाद (Fertiliser) के निर्माण में किया जा सकता है।
- इसके अलावा इसका प्रयोग औद्योगिक इकाइयों में जैसे- सीमेंट उद्योग, रोलिंग मिलों में, स्टील प्लांट तथा मीथेनॉल के उत्पादन में किया जा सकता है।
- CBM एक स्वच्छ ईंधन है जो कि तुलनात्मक रूप से अन्य ईंधनों की अपेक्षा कम प्रदूषण उत्पन्न करता है।
प्रीलिम्स के लियेः
मेन्स के लियेः
चर्चा में क्यों?
महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिये प्रतिवर्ष 25 नवंबर को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस (International Day for the Elimination of Violence against Women) मनाया जाता है।
प्रमुख बिंदुः
- इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस का आयोजन संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2030 तक महिला हिंसा उन्मूलन कार्यक्रम के तहत चलाए गए यूनाइट अभियान (UNiTE campaign) के अंतर्गत किया गया।
- वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिये यूनाइट अभियान चलाया गया।
- इस वर्ष की थीम ऑरेंज द वर्ल्डः जनरेशन इक्वलिटी स्टैंड अगेंस्ट रेप (Orange the world: Generation Equality Stand Against Rape) है।
- इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिये 16 डेज एक्टिविज्म अगेंस्ट जेंडर बेस्ड वाॅइलेंस कैम्पेन (16 Days Activism Against Gender Based Violence Campaign) का आयोजन 25 नवंबर से 10 दिसंबर तक किया जाएगा।
- संयुक्त राष्ट्र महिला ( United Nation's Women) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, विश्व भर में लगभग 15 मिलियन किशोर लडकियाँ (15-19 आयु वर्ग) अपने जीवन में कभी-न-कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं।
- इसके अलावा 3 बिलियन महिलाएँ वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) की शिकार होती हैं।
- आँकड़ों के अनुसार, करीब 33% महिलाओं व लड़कियों को शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है।
- हिंसा की शिकार 50% से अधिक महिलाओं की हत्या उनके परिजनों द्वारा ही की जाती है।
- वैश्विक स्तर पर मानव तस्करी के शिकार लोगों में 50% वयस्क महिलाएं हैं।
- रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में लगभग 650 मिलियन महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हुआ है।
- WHO की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन 3 में से 1 महिला किसी न किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा का शिकार होती है।
भारत के संदर्भ मेंः
- हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Record Bureau) द्वारा राष्ट्रीय अपराध 2017 रिपोर्ट जारी की गई।
- रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कुल 3,59,849 मामले दर्ज़ किये गए।
- इस सूची में सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किये गए, इसके बाद क्रमशः महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।
- महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कुल मामलों में 27.9% मामले पति या परिजनों द्वारा किये गए उत्पीड़न के अंतर्गत दर्ज़ किये गए।
- इसके अलावा अपमान के उद्देश्य से किये हमले (21.7%), अपहरण (20.5%) और बलात्कार (7%) के मामले सामने आए।
भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम :
- भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद 15(1) में राज्यों को आदेश दिया गया है कि केवल धर्म, मूलवंश, लिंग, जाति, जन्मस्थान के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जाएगा।
- महिलाओं की सुरक्षा के लिये घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 पारित किया गया।
- महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के लिये कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 लाया गया।
संयुक्त राष्ट्र महिला (United Nations Women):
- वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र के महासभा द्वारा संयुक्त राष्ट्र महिला का गठन किया गया।
- यह संस्था महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के क्षेत्र में कार्य करती है।
- इसके तहत संयुक्त राष्ट्र तंत्र के 4 अलग-अलग प्रभागों के कार्यों को संयुक्त रूप से संचालित किया जाता हैः
- महिलाओं की उन्नति के लिये प्रभाग (Division for the Advancement of Women -DAW)
- महिलाओं की उन्नति के लिये अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (International Research and Training Institute for the Advancement of Women -INSTRAW)
- लैंगिक मुद्दों और महिलाओं की उन्नति पर विशेष सलाहकार कार्यालय (Office of the Special Adviser on Gender Issues and Advancement of Women-OSAGI)
- महिलाओं के लिये संयुक्त राष्ट्र विकास कोष (United Nations Development Fund for Women-UNIFEM)
चर्चा में क्यों?
हाल ही में पाकिस्तान द्वारा भारत को अपने हवाई क्षेत्र के उपयोग से इनकार करने के मामले को भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (International Civil Aviation Organisation-ICAO) के समक्ष उठाया है।
क्या था मामला?
- भारत ने 28 अक्तूबर, 2019 को प्रधानमंत्री की सऊदी अरब यात्रा के लिये पाकिस्तान से ओवरफ्लाइट क्लीयरेंस की मांग की थी।
- पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन का हवाला देते हुए इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था।
ICAO क्या है?
- यह संयुक्त राष्ट्र (United Nations-UN) की एक विशिष्ट एजेंसी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1944 में राज्यों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन अभिसमय (शिकागो कन्वेंशन) के संचालन तथा प्रशासन के प्रबंधन हेतु की गई थी।
- अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संबंधी अभिसमय/कन्वेंशन पर 7 दिसंबर, 1944 को शिकागो में हस्ताक्षर किये गए। इसलिये इसे शिकागो कन्वेंशन भी कहते हैं।
- शिकागो कन्वेंशन ने वायु मार्ग के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय परिवहन की अनुमति देने वाले प्रमुख सिद्धांतों की स्थापना की और ICAO के निर्माण का भी नेतृत्व किया।
- इसका एक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय हवाई परिवहन की योजना एवं विकास को बढ़ावा देना है ताकि दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन की सुरक्षित तथा व्यवस्थित वृद्धि सुनिश्चित हो सके।
- भारत इसके 193 सदस्यों में से है।
- इसका मुख्यालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में है।
प्रीलिम्स के लियेः
मेन्स के लियेः
चर्चा में क्यों?
हाल ही में अमेरिका के एक शीर्ष राजनयिक द्वारा चीन की अंतर्राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाए गए हैं।
मुख्य बिंदुः
- अमेरिकी राजनयिक ने चीन की अंतर्राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं तथा 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (Belt and Road Initiative- BRI) के तहत ऋण देने की प्रथाओं की कड़ी आलोचना की है।
- अमेरिकी राजनयिक ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (China Pakistan Economic Corridor- CPEC) की व्यावसायिक व्यवहार्यता (commercial Viability) पर भी सवाल उठाया है।
आलोचना के प्रमुख बिंदुः
- अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि चीन अमेरिकी नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय नियमों और मानदंडों से संबंधित प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक है।
- अमेरिकी राजनयिक के अनुसार, जब 'देंग शियाओपिंग' (Deng Xiaoping) ने वर्ष 1978 में चीन में 'ओपन डोर पॉलिसी' (Open Door Policy) की घोषणा की थी तब यूरोप और जापान की कंपनियों ने चीन में निवेश किया जिससे चीन को लाभ हुआ पर चीन ने यह नीति पाकिस्तान में नहीं अपनाई तथा चीन द्वारा पाकिस्तान में किया गया निवेश केवल चीन के लिये ही लाभप्रद रहा।
- चीन की CPEC परियोजना पाकिस्तान के युवाओं और वहाँ की कंपनियों को वह अवसर प्रदान नहीं करती है जो अवसर दशकों पहले चीन को विभिन्न देशों द्वारा चीन में निवेश करने के कारण प्राप्त हुए थे और यही कारण है कि चीन एवं पाकिस्तान के बीच एकतरफा व्यापारिक संबंध हैं।
- अमेरिकी राजनयिक ने CPEC की आलोचना ऋण, लागत, पारदर्शिता में कमी और नौकरियाँ प्रदान न करने के संबंध में की।
- हालाँकि अमेरिकी राजनयिक ने चीन की बुनियादी ढाँचे संबंधी परियोजनाओं तथा ऋण प्रदान करने की प्रथाओं की आलोचना की परंतु चीन के लोगों तथा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए चीनी और अमेरिकी नागरिकों के बीच मित्रता को परंपरागत बताया।
- अमेरिकी राजनयिक ने BRI परियोजना के तहत चीन की ऋण प्रदान करने की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि चीन आमतौर पर विभिन्न देशों को ऋण प्रदान करता है पर 'पेरिस क्लब' (Paris Club) का सदस्य नहीं है।
(Paris Club):
- पेरिस क्लब की स्थापना वर्ष 1956 में विकासशील और उभरते (Emerging) देशों की ऋण समस्याओं के समाधान के लिये की गई थी।
- इसकी स्थापना के समय विश्व शीत युद्ध, अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह की जटिलता, वैश्विक स्तर पर विनिमय दर के मानकों का अभाव और अफ्रीका के कुछ देशों द्वारा औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता की प्राप्ति जैसी परिस्थितियाँ विद्यमान थीं।
- अर्जेंटीना ने एक बड़ी ऋण धोखाधड़ी के लिये वैश्विक समुदाय से सहायता की अपील की जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1956 में फ्राँस द्वारा पेरिस में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसे पेरिस क्लब कहा गया।
- इसका सचिवालय पेरिस में स्थित है।
- चीन विश्व स्तर पर सबसे बड़ा ऋणदाता होने के बावजूद अपने समग्र ऋण की जानकारी नहीं देता है अतः न तो पेरिस क्लब, न IMF और न ही क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ (Credit Rating Agencies) इन वित्तीय लेन-देनों की निगरानी कर पाती हैं।
- चीन से ऋण लेने वाले देशों द्वारा इतने बढ़े ऋण चुकाने में विफल होने पर ऋण प्राप्तकर्त्ता देशों की विकास परियोजनाएँ बाधित होती हैं तथा उन देशों की संप्रभुता में कमी आती है।
- श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह तथा मालदीव में रनवे का निर्माण चीन की संदिग्ध वाणिज्यिक व्यवहार्यता वाली परियोजनाओं के वित्तपोषण के उदाहरण हैं।
- 2017 में श्रीलंका ने बकाया ऋण नहीं चुका पाने के कारण चीन को हंबनटोटा बंदरगाह का परिचालन पट्टा 99 साल के लिये सौंप दिया।
- अमेरिकी राजनयिक ने 'क्वाड' (Quadrilateral Strategic Dialogue- QUAD) की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि इस समूह में शामिल ऑस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका और भारत बुनियादी ढाँचे के विकास के लिये निवेश की तलाश कर रहे देशों को यथार्थवादी विकल्प प्रदान कर सकते हैं।
- QUAD देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक सितंबर के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान न्यूयॉर्क में हुई थी।
प्रीलिम्स के लियेः
मेन्स के लियेः
चर्चा में क्यों?
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labor Force Survey- PLFS) के आँकड़ों के अनुसार भारत में जनवरी-मार्च, 2019 (तिमाही) के दौरान शहरी बेरोज़गारी दर में कमी आई है।
मुख्य बिंदुः
- साप्ताहिक स्थिति के आधार पर जारी PLFS के आँकड़ों के अनुसार, जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान शहरी बेरोज़गारी दर 9.3 प्रतिशत, अक्तूबर-नवंबर, 2018 के दौरान 9.9 प्रतिशत, जुलाई-सितंबर, 2018 के दौरान 9.7 प्रतिशत तथा अप्रैल-जून, 2018 के दौरान 9.8 प्रतिशत थी।
- हालाँकि इन आँकड़ों में महिलाओं की बेरोज़गारी दर जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान 11.6 प्रतिशत, अक्तूबर-दिसंबर, 2018 के दौरान 12.3 प्रतिशत और अप्रैल-जून, 2018 के दौरान 12.8 प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों की बेरोज़गारी दर जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान 8.7 प्रतिशत, अक्तूबर-दिसंबर, 2018 के दौरान 9.2 प्रतिशत और अप्रैल-जून, 2018 के दौरान 9 प्रतिशत थी।
- सभी आयु-वर्ग की महिलाओं में राज्यवार आँकड़ों में जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान जम्मू कश्मीर में सर्वाधिक 38.2 प्रतिशत, उत्तराखंड में 33.7 प्रतिशत तथा केरल में 21.5 प्रतिशत बेरोज़गारी दर है।
- सभी आयु-वर्गों के पुरुषों में सर्वाधिक बेरोज़गारी दर ओडिशा में 15.6 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 13 प्रतिशत तथा दिल्ली में 12.9 प्रतिशत है।
श्रम शक्ति भागीदारी दरः
(Labour Force Participation Rate)
- नवीनतम तिमाही आँकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष और उससे उपर के आयु-वर्ग की श्रम शक्ति भागीदारी दर जनवरी-मार्च, 2019 की तिमाही के दौरान 46.5 प्रतिशत रही जो कि पिछली तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर, 2018) के दौरान 46.8 प्रतिशत थी।
- 15 वर्ष और उससे उपर के आयु-वर्ग की महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान 19.1 प्रतिशत और अक्तूबर-दिसंबर, 2018 के दौरान 19.5 प्रतिशत थी, जबकि इसी आयु वर्ग के पुरुषों की श्रम शक्ति भागीदारी दर जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान 73.4 प्रतिशत थी तथा अक्तूबर-दिसंबर, 2018 के दौरान यह दर 73.6 प्रतिशत थी।
- जनवरी-मार्च, 2019 के दौरान 15-29 वर्ष आयु-वर्ग के युवाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर 37.7 प्रतिशत जबकि अक्तूबर-दिसंबर, 2018 के दौरान 38.2 प्रतिशत थी।
- 15 वर्ष और उससे उपर के आयु वर्ग की महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर उत्तर प्रदेश (6 प्रतिशत) तथा बिहार (5.6 प्रतिशत) में सबसे कम थी।
नोट- उपर्युक्त सभी आँकड़े शहरी क्षेत्र से संबंधित हैं।
(Periodic Labor Force Survey- PLFS):
- यह रिपोर्ट राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (National Sample Survey Organisation- NSSO) द्वारा जारी की जाती है।
- जुलाई, 2017 से जून, 2018 के लिये पहली PLFS रिपोर्ट मई, 2019 में जारी की गई थी।
- जुलाई, 2018 से जून, 2019 के लिये दूसरी PLFS रिपोर्ट अभी जारी नहीं की गई है।
चर्चा में क्यों?
हाल ही में गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs- MHA) ने चेन्नामनेनी रमेश (Chennamaneni Ramesh) की नागरिकता रद्द कर दी, चेन्नामनेनी वेमुलावाड़ा (तेलंगाना) से विधानसभा के सदस्य (Member of the Legislative Assembly- MLA) हैं।
- MHA के अनुसार, चेन्नामनेनी रमेश ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 (1) (f) के तहत नागरिकता के संबंध में धोखाधड़ी, गलत प्रतिनिधित्व और फर्जी तरीके से तथ्यों को छुपाया है।
- ध्यातव्य है कि कोई ऐसा व्यक्ति जो भारतीय नागरिक नहीं है, वह किसी भी चुनाव को लड़ने या मतदान करने का पात्र नहीं है।
- नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5 में पंजीकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने का प्रावधान है।
- धारा 5 (1) (f) भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण हेतु निम्नांकित श्रेणियों में से किसी से संबद्ध होना चाहिये;
- कोई व्यक्ति, जो पूरी आयु एवं क्षमता का हो तथा उसके माता-पिता भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हो।
- या वह पंजीकरण का इस प्रकार का आवेदन देने से एक वर्ष पूर्व से भारत में रह रहा हो।
- धारा 10 किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता से वंचित करने के अधिकार से संबंधित है।
- धारा 10 (2) में यह प्रावधान है कि केंद्र सरकार, किसी नागरिक (जो पंजीकरण द्वारा ऐसा है) को भारतीय नागरिकता से वंचित कर सकती है, यदिः
- नागरिक सामान्य रूप से सात वर्षों की निरंतर अवधि से भारत से बाहर निवास कर रहा हो।
- हालाँकि भारत में यह सुनिश्चित करने के लिये भी आवश्यक प्रावधान है कि कहीं नागरिकता को मनमाने ढंग से तो रद्द नहीं किया गया है।
- अधिनियम की धारा 10 (3) के अनुसार, इस धारा के तहत केंद्र सरकार किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता से वंचित नहीं करेगी जब तक कि यह संतुष्ट न हो कि यह जन हित के अनुकूल नहीं है कि उक्त व्यक्ति भारत का नागरिक बना रहे।
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court-SC) के हाल के निर्णयों में समीक्षा/पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर करने की बात की जा रही है। जहाँ एक ओर याचिकाकर्त्ताओं ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बाबरी मस्ज़िद-राम जन्मभूमि और दूरसंचार राजस्व मामले में दिये गए निर्णय की समीक्षा करने की योजना बनाई है। वहीं दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला निर्णय की समीक्षा करने पर तो सहमति जताई लेकिन राफेल मामले की जाँच करने से इंकार कर दिया।
ऐसे में समीक्षा याचिका के संदर्भ में बहुत से मुद्दे चर्चा का विषय बन गए हैंः
समीक्षा याचिका (Review petition) क्या है?
संविधान के अनुसार, SC द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम निर्णय होता है। हालाँकि अनुच्छेद 137 के तहत SC को अपने किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है। इसका कारण यह है कि किसी भी मामले में SC द्वारा दिया गया निर्णय भविष्य में सुनवाई के लिये आने वाले मामलों के संदर्भ में निश्चितता प्रदान करता है।
- समीक्षा याचिका में SC के पास यह शक्ति होती है कि वह अपने पूर्व के निर्णयों में निहित 'स्पष्टता का अभाव' तथा 'महत्त्वहीन आशय' की गौण त्रुटियों की समीक्षा कर उनमें सुधार कर सकता है।
पेटेंट त्रुटी (Patent Error)
एक त्रुटी जो स्वयं स्पष्ट है अर्थात् जिसे किसी भी जटिल तर्क या तर्क की लंबी प्रक्रिया में शामिल किये बिना प्रदर्शित किया जा सकता है।
- वर्ष 1975 के एक फैसले में, तत्कालीन न्यायमूर्ति कृष्ण/कृष्णा अय्यर ने कहा था कि एक समीक्षा याचिका को तभी स्वीकार किया जा सकता है जब न्यायालय द्वारा दिये गए किसी निर्णय में भयावह चूक या अस्पष्टता जैसी स्थिति उत्पन्न हुई हो।
- SC द्वारा समीक्षाओं को स्वीकार करना दुर्लभ होता है, इसका जीवंत उदाहरण सबरीमाला और राफेल मामलों में देखने को मिलता है।
- पिछले वर्ष SC ने केंद्र सरकार की याचिका पर मार्च 2018 के फैसले की समीक्षा करने की अनुमति दी थी, जिसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार अधिनियम को कमज़ोर कर दिया था।
किस आधार पर याचिकाकर्त्ता SC के फैसले की समीक्षा की माँग कर सकता है?
- नए और महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों की खोज, जिन्हें पूर्व की सुनवाई के दौरान शामिल नहीं किया गया था।
- दस्तावेज़ में कोई त्रुटि अथवा अस्पष्टता रही हो।
- कोई अन्य पर्याप्त कारण (अर्थात् ऐसा कारण जो अन्य दो आधारों के अनुरूप हो)।
समीक्षा याचिका कौन दायर कर सकता है?
- नागरिक प्रक्रिया संहिता और उच्चतम न्यायालय के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो फैसले से असंतुष्ट है, समीक्षा याचिका दायर कर सकता है भले ही वह उक्त मामले में पक्षकार हो अथवा न हो।
- हालाँकि न्यायालय प्रत्येक समीक्षा याचिका पर विचार नही करता है। यह (न्यायालय) समीक्षा याचिका को तभी अनुमति देता है जब समीक्षा करने का कोई महत्त्वपूर्ण आधार दिखाता हो।
- SC अपने पूर्व के फैसले पर अडिग रहने के लिये बाध्य नहीं है, सामुदायिक हितों और न्याय के हित में वह इससे हटकर भी फैसले कर सकता है।
- संक्षेप में SC एक स्वयं सुधार संस्था है।
- उदाहरण के तौर पर, केशवानंद भारती मामले (1973) में SC ने अपने पूर्व के फैसले गोलकनाथ मामले (1967) से हटकर फैसला दिया।
- उच्चत्तम न्यायालय द्वारा निर्मित वर्ष 1996 के नियमों के अनुसार समीक्षा याचिका निर्णय की तारीख के 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिये।
- कुछ परिस्थितियों में, न्यायालय समीक्षा याचिका दायर करने की देरी को माफ़ कर सकती है यदि याचिकाकर्ता देरी के उचित कारणों को अदालत के सम्मुख प्रदर्शित करे।
- न्यायालय के नियमों के मुताबिक "वकीलों की मौखिक दलीलों के बिना याचिकाओं की समीक्षा की जाएगी।
- समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई उन न्यायधीशों द्वारा भी की जा सकती है जिन्होंने उन पर निर्णय दिया था।
- यदि कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त या अनुपस्थित होता है तो वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्थापन किया जा सकता है।
अपवादः (जब न्यायालय मौखिक सुनवाई की अनुमति देता है)
- वर्ष 2014 के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि "मृत्युदंड" के सभी मामलों की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा खुली अदालत में की जाएगी।
अयोध्या के फैसले की समीक्षा किस आधार पर की जानी है?
- अभी तक केवल ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने कहा है कि वह निर्णय समीक्षा कराएगा। उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य याचिकाकर्त्ता इस मत पर विभाजित हैं।
- हालाँकि अभी तक इस आधार का खुलासा नहीं किया गया है जिसके आधार पर समीक्षा याचिका दायर की जाएगी।
- हालाँकि ध्वस्त बाबरी मस्ज़िद के बदले सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को दी गई 5 एकड़ ज़मीन का मुद्दा महत्त्वपूर्ण है जिसे आधार बनाकर समीक्षा याचिका दायर की जा सकती है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्डः
यह एक गैर-सरकारी संगठन है जिसे वर्ष 1973 में गठित किया गया था जो मुस्लिम पर्सनल लाॅ (शरीयत) की सुरक्षा और इसको प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिये कार्य करता है।
यदि समीक्षा याचिका असफल हो जाये तो?
- यदि SC द्वारा समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया जाता है तो भी SC से दोबारा समीक्षा करने का अनुरोध किया जा सकता है। इस प्रकार की याचिका को आरोग्यकर/सुधारात्मक याचिका अर्थात् क्यूरेटिव पिटीशन कहा जाता है।
- रूपा हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) मामले में SC ने पहली बार सुधारात्मक याचिका शब्दावली का प्रयोग किया।
- सुधारात्मक याचिका को SC में अनुच्छेद 142 के अंतर्गत दाखिल किया जा सकता है।
चर्चा में क्यों?
पिछले कुछ समय से भारत सरकार मणिपुर के 23 कुकी और ज़ोमी समूहों (Kuki and Zomi groups) के साथ शांति वार्ता को किसी परिणाम पर पहुँचाने का प्रयास कर रही है। इस संदर्भ में न केवल ये जनजातीय समूह चर्चा का विषय बने हुए हैं बल्कि भारत सरकार के इन प्रयासों की पृष्ठभूमि भी महत्त्वपूर्ण हो गई है।
- 15 अक्तूबर, 1949 को भारतीय संघ में विलय से पहले मणिपुर एक रियासत थी। यहाँ नगा, कुकी और मैती सहित कईं जातीय समुदाय निवास करते हैं।
- मणिपुर के विलय और पूर्ण विकसित राज्य (वर्ष 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला) का दर्जा मिलने में हुई देरी से मणिपुर के लोगों में असंतोष की भावना उत्पन्न हुई।
- प्राकृतिक संसाधनों पर अतिव्यापी दावों के संबंध में अलग-अलग आकांक्षाओं और कथित असुरक्षा के कारण विभिन्न जातीय समुदाय एक दूसरे से दूर होते चले गए।
- शुरुआती दौर में मणिपुर में एक स्वतंत्र राज्य की मांग को लेकर आंदोलन हुआ और राज्य की स्थापना के साथ यह आंदोलन समाप्त हो गया। परंतु, वर्ष 1978 में यहाँ पुनः हिंसक आंदोलन शुरू हुआ और लोगों ने विकास तथा पिछड़ेपन को आधार बनाकर भारतीय गणराज्य से अलग होने की मांग की।
- इसके अलावा वर्ष 1990 के दशक की शुरुआत में नगा एवं कुकी के बीच हुए जातीय संघर्ष के बाद, नगा आधिपत्य और दावे का सामना करने के लिये कई तरह के कुकी संगठनों का भी जन्म हुआ। इसके फलस्वरूप वर्ष 1998 में कुकी नेशनल फ्रंट (Kuki National Front-KNF) का गठन हुआ।
- कुकी जनजाति के लोग एक अलग राज्य की मांग करते हैं। ये लोग एक उग्रवादी संगठन मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट की छत्रछाया में काम करते हैं।
- इस दौरान नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (National Socialist Council of Nagalim) अर्थात् Issac (वर्ष 1988 में गठित) ने मणिपुर के कुछ ऐसे क्षेत्रों को नगालैंड में मिलाये जाने की मांग की, जिनमें बड़ी संख्या में कुकी जनजाति निवास करती हैं।
हालाँकि वर्ष 2008 में दो बड़े संगठनों [कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन (KNO) और यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (UPF)] के तहत कुकी और ज़ोमिस से संबंधित 20 उग्रवादी समूहों ने भारत सरकार एवं मणिपुर सरकार के साथ SoO (Suspension of Operations) समझौते पर हस्ताक्षर किये। समझौते का उद्देश्य चरमपंथी समूहों द्वारा की गई मांगों पर चर्चा करना और मणिपुर में शांति स्थापित लाना है।
मणिपुर के लोगों को तीन मुख्य जातीय समुदायों में बाँटा गया है- मैती जो घाटी में निवास करते हैं और 29 प्रमुख जनजातियाँ, जो पहाड़ियों में निवास करती हैं, को दो मुख्य नृवंश-समुदायों (Ethno-Denominations); नगा और कुकी-चिन में विभाजित किया जाता हैं।
नगा समूह में ज़ेलियानग्रोंग (Zeliangrong), तंगखुल (Tangkhul), माओ (Mao), मैरम (Maram), मारिंग (Maring) और ताराओ (Tarao) शामिल हैं।
- चिन-कुकी समूह (Chin-Kuki group) में गंगटे (Gangte), हमार (Hmar), पेइती (Paite), थादौ (Thadou), वैपी (Vaiphei), जोऊ/ज़ो (Zou), आइमोल (Aimol), चिरु (Chiru), कोइरेंग (Koireng), कोम (Kom), एनल (Anal), चोथे (Chothe), लमगांग (Lamgang), कोइरो (Koirao), थंगल (Thangal), मोयोन (Moyon) और मोनसांग (Monsang) शामिल हैं।
- चिन पद का प्रयोग पड़ोसी राज्य म्याँमार के चिन प्रांत के लोगों के लिये किया जाता है जबकि भारतीय क्षेत्र में चिन लोगों को कुकी कहा जाता है। अन्य समूहों जैसे पेइती, जोऊ/ज़ो, गंगटे और वैपी अपनी पहचान ज़ोमी के रूप में करते हैं तथा स्वयं को कुकी नाम से दूर रखते हैं।
- यह इस बात पर विशेष ध्यान दिये जाने की ज़रूरत है कि सभी विभिन्न जातीय समूह एक ही मंगोलॉयड समूह (Mongoloid group) के हैं और उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं में बहुत करीबी समानताएँ हैं।
हालाँकि मैती हिंदू रीति-रिवाज़ों का पालन करने वाला जनजातीय समूह हैं, यह अपने आसपास की पहाड़ी जनजातियों से सांस्कृतिक रूप से भिन्न है।
उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण क्या है?
चर्चा में क्यों?
हाल ही में सरकार ने आँकड़ों की गुणवत्ता के मद्देनज़र वर्ष 2017-18 के दौरान उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (Consumer Expenditure Survey) जारी करने से मना कर दिया।
उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण क्या है?
- यह एक पंचवर्षीय सर्वेक्षण है जिसे सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वन मंत्रालय के (Ministry of Statistics and Programme Implementation-MOSPI) के राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (National Sample Survey Office-NSSO) द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
- उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (Consumer Expenditure Survey-CES), पूरे देश के शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त सूचना के आधार पर घरेलू स्तर पर होने वाले व्यय के पैटर्न को दर्शाता है।
- इस सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर किसी परिवार द्वारा वस्तुओं (खाद्य एवं गैर-खाद्य) तथा सेवाओं पर किये जाने वाले औसत खर्च एवं मासिक प्रति व्यक्ति व्यय (Monthly Per Capita Expenditure-MPCE) का अनुमान लगाया जाता है।
उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (CES) की उपयोगिताः
- मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग के अनुमान से किसी अर्थव्यवस्था में मांग तथा वस्तुओं और सेवाओं को लेकर लोगों की प्राथमिकताओं का अंदाजा लगाया जाता है।
- इसके अलावा यह लोगों के जीवन स्तर एवं विभिन्न पैमानों पर आर्थिक संवृद्धि को दर्शाता है।
- यह संरचनात्मक विसंगतियों की पहचान करता है तथा आर्थिक नीतियों के निर्माण में मददगार साबित होता है जिससे मांग के पैटर्न का पता लगाया जा सके एवं वस्तु तथा सेवाओं के उत्पादकों को मदद मिल सके।
- CES एक विश्लेषणात्मक प्रक्रिया है जिसका प्रयोग सरकारें जीडीपी तथा अन्य वृहत आर्थिक संकेतकों के पुनर्निर्धारण (Rebasing) के लिये करती हैं।
विगत सर्वेक्षण (वर्ष 2011-12) के आँकड़ेः
।मासिक प्रति व्यक्ति व्यय (MPCE)
।भोजन पर खर्च (MPCE का प्रतिशत)
- वर्ष 2011-12 के आँकड़ों के अनुसार, बेहतर सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले राज्य तथा पिछड़े राज्यों के बीच असमानता में वृद्धि हुई है।
- MPCE के मामले में शीर्ष पाँच प्रतिशत राज्यों में यह ग्रामीण क्षेत्रों के लिये 2,886 रुपए था, जबकि निचले पाँच प्रतिशत राज्यों के लिये 616 रुपए था।
- शीर्ष पाँच प्रतिशत राज्यों के शहरी क्षेत्रों के लिये MPCE 6,383 रुपए था, जबकि निचले पाँच प्रतिशत राज्यों के लिये यह 827 रुपए था।
वर्ष 2017-18 के सर्वेक्षण पर विवादः
- हाल ही में मीडिया द्वारा यह दावा किया गया कि MPCE पर वर्ष 2017-18 के आँकड़ों में वर्ष 1972-73 के बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई है जो कि 3.7% है।
- इसके अनुसार वास्तविक कीमतों पर वर्ष 2011-12 में MPCE 1,501 रुपए (मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित) था जो वर्ष 2017-18 में घटकर 1,446 रुपए रह गया।
- इसके अलावा मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित उपभोग व्यय (Inflation Adjusted Consumption Expenditure) ग्रामीण क्षेत्रों में 8.8 प्रतिशत घट गया, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसमें 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
- इसके विपरीत सरकार का मानना है कि वस्तु एवं सेवाओं के वास्तविक उत्पादन को दर्शाने वाले प्रशासनिक आँकड़ों से ज्ञात होता है कि विगत वर्षों में लोगों के उपभोग व्यय में न केवल वृद्धि हुई है बल्कि उनके उपभोग के पैटर्न में भी विविधता आई है।
- सरकार का यह भी कहना है कि अधिकांश परिवारों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी सामाजिक सेवाओं के उपभोग में वृद्धि हुई है।
- इसलिये सरकार इस सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों को लेकर संतुष्ट नहीं थी तथा इस मामले को विशेषज्ञों की एक समिति के पास भेजा गया।
- समिति का कहना है कि इस सर्वेक्षण में कई अनियमितताएँ हैं तथा इसमें प्रयुक्त शोध विधि को लेकर भी कई बदलाव किये जाने की आवश्यकता है।
- इसके अलावा कुछ अर्थशास्त्रियों का सरकार के विपरीत तर्क है कि मई 2019 में NSSO द्वारा प्रकाशित आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey-PLFS) 2017-18 के अनुसार, देश में बेरोज़गारी पिछले 45 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है तथा वेतन में स्थिरता बनी हुई है।
- इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा प्रकाशित जीडीपी के आँकड़ों के मुताबिक, वर्तमान वित्तीय वर्ष के अप्रैल-जून तिमाही में निजी अंतिम उपभोग व्यय (Private Final Consumption Expenditure) पिछली 18 तिमाहियों के न्यूनतम स्तर पर था।
सरकार के निर्णय का प्रभावः
- सरकार द्वारा CES के आँकड़े न जारी करने के इस निर्णय से वर्तमान उपभोक्ताओं के व्यय पैटर्न की सही जानकारी नहीं मिलेगी जिससे नीति निर्माताओं को आर्थिक सुधार से संबंधित रणनीति बनाने में मुश्किल होगी।
- वर्ष 2017-18 के आँकड़े न जारी होने से सरकार अगला सर्वेक्षण वर्ष 2020-21 या 2021-22 में जारी करेगी। इससे वर्ष 2011-12 में जारी आँकड़ों के बाद 9 या 10 वर्षों का अंतराल आएगा।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) के विशेष आँकड़े प्रसार मानक (Special Data Dissemination Standard-SDDS) का भागीदार होने के नाते भारत वृहत स्तर के आर्थिक आँकड़े (Macro-Economic Data) प्रकाशित करने के लिये बाध्य है।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की एनुअल आब्ज़रवेंस रिपोर्ट (Annual Observance Report) 2018 के अनुसार, भारत अपने आर्थिक आँकड़ों के प्रकाशन में प्रायः देरी करता है जो SDDS के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
- राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (National Accounts Statistics) पर सलाहकार समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि वर्ष 2017-18 को जीडीपी के आधार वर्ष के तौर पर पुनर्निर्धारण हेतु प्रयोग करना उचित नहीं होगा क्योंकि इसके द्वारा जारी डेटा भविष्य में संदेहास्पद हो सकते हैं।
RAPID FIRE करेंट अफेयर्स (26 नवंबर)
- हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को अंगीकार किये जाने की 70वीं वर्षगाँठ है।
- 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू होने से पहले 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया था।
- 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष चुना गया, जो अंत तक इस पद पर बने रहे। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के अन्य प्रमुख सदस्य थे।
- संविधान सभा के सदस्यों का पहला सेशन 9 दिसंबर, 1947 को आयोजित हुआ। इसमें संविधान सभा के 207 सदस्य थे।
- संविधान की ड्रॉफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर थे। इन्हें भारत के संविधान का निर्माता भी कहा जाता है।
- भारतीय संविधान को तैयार करने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन का समय लगा था।
- सरकार ने 19 नवंबर, 2015 को राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में घोषित किया था। यानी कि वर्ष 2015 से संविधान दिवस मनाने की शुरुआत हुई।
संविधान दिवस मनाने का उद्देश्य नागरिकों को संविधान के प्रति सचेत करना, समाज में संविधान के महत्त्व का प्रसार करना है। साथ ही भारतीय संविधान में व्यक्त किये गए मूल्यों और सिद्धांतों को नागरिकों के समक्ष दोहराना तथा सभी देशवासियों को भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने में अपनी उचित भूमिका निभाने के लिये प्रोत्साहित करना।
- भारत में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन के जन्मदिन को 'राष्ट्रीय दुग्ध दिवस' (National Milk Day) के रूप में मनाया जाता है।
- वर्ष 2014 में 26 नवंबर के दिन भारतीय डेयरी एसोसिएशन (Indian Dairy Association-IDA) ने पहली बार यह दिवस मनाने की पहल की थी।
- वर्ष 1970 में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि तथा ग्रामीण क्षेत्र की आय बढ़ाने को दृष्टिगत रखते हुए 'ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत की गई।
- दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश का अग्रणी राज्य है, जबकि गुजरात स्थित अमूल देश की सबसे बड़ी दुग्ध सहकारी संस्था है।
विश्व दुग्ध दिवस 1 जून को मनाया जाता है। विश्व दुग्ध दिवस 2019 की थीम- 'ड्रिंक मिल्क टुडे एंड एवरीडे' (Drink Milk: Today & Everyday) रखी गई है। वर्ष 2001 में पहली बार विश्व दुग्ध दिवस मनाया गया था।
- दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अलग-अलग स्थानों पर प्यूरीफाइंग टॉवर या स्मॉग टॉवर लगाने का खाका तैयार करें।
- स्मॉग टावर एक बहुत बड़ा एयर प्यूरीफायर है। यह अपने आसपास से प्रदूषित हवा या उसके कणों को सोख लेता है और फिर वापस पर्यावरण में साफ हवा छोड़ता है।
- घर पर लगने वाले आम प्यूरीफायर की तरह यह बिजली से चलते हैं। इनमें से कुछ को सोलर पावर से भी चलाया जा सकता है।
- स्मॉग टॉवर का पहला प्रोटोटाइप चीन की राजधानी बीजिंग में लगाया गया। इसे बाद में चीन के तियानजिन और क्राको शहर में भी लगाया गया।
दिल्ली की एक स्टार्टअप कंपनी ने 40 फुट लंबा ऐसा प्यूरीफायर बनाया है जो उसके 3 किलोमीटर के दायरे में रह रहे 75 हज़ार लोगों को स्वच्छ हवा दे सकता है। इसके निर्माता कुरीन सिस्टम्स को हाल ही में 'दुनिया के सबसे लंबे और साथ ही सबसे मजबूत प्यूरीफायर' के लिये पेटेंट मिला है।
सिटी क्लीनरः
- छोटे टावर को सिटी क्लीनर भी कहा जाता है। स्मॉग टावर और सिटी क्लीनर के अंतर की बात करें तो सिटी क्लीनर स्मॉग टॉवर से बेहतर होता है।
- प्रायः स्मॉग टावर हवा को साफ करने के लिये आयनाइजेशन तकनीक का उपयोग करता है। इसमें हवा का आयनीकरण प्रदूषकों को पूरी तरह नहीं समाप्त तो नहीं कर पाता, लेकिन ऑक्सीजन से प्रदूषकों को अलग कर देता है। इसके विपरीत सिटी क्लीनर में हवा का आयनीकरण पूरी तरह प्रदूषकों को खत्म करता है। हमारे देश में ऐसे एक टावर की अनुमानित लागत डेढ़ से दो करोड़ रुपए के बीच है।
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कोलबेड मीथेन क्या है? चर्चा में क्यों? हाल ही में केंद्र सरकार ने राज्य द्वारा संचालित कोयला खदान से कोल इंडिया लिमिटेड को आगामी दो से तीन वर्षों के लिये दो एमएमएससीबी प्रतिदिन कोलबेड मीथेन के उत्पादन का निर्देश दिया है। मुख्य बिंदुः - कोलबेड मीथेन एक अपरंपरागत गैस का भंडार है। यह कोयले की चट्टानों में प्रत्यक्ष तौर पर मौजूद रहती है। - मीथेन गैस कोयले की परतों के नीचे पाई जाती है। इसे ड्रिल किया जाता है तथा नीचे उपस्थित भूमिगत जल को हटाकर इसे प्राप्त किया जाता है। - भारत कोयले के भंडार के मामले में विश्व में पाँचवें स्थान पर है तथा इस दृष्टिकोण से CBM स्वच्छ उर्जा का एक बेहतर विकल्प हो सकता है। - पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अंतर्गत हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय के अनुसार, भारत में CBM भंडार लगभग बानवे ट्रिलियन क्यूबिक फीट या दो,छः सौ बिलियन क्यूबिक मीटर है। - देश के बारह राज्यों में कोयला तथा CBM भंडार पाए जाते हैं। जहाँ गोंडवाना निक्षेप में यह बहुतायत में मौजूद है। - वर्तमान में CBM का उत्पादन झारखंड के रानीगंज, झरिया तथा बोकारो कोलफील्ड में होता है। - आगामी समय में सरकार दामोदर-कोयल घाटी तथा सोन घाटी में CBM के उत्पादन का कार्य प्रारंभ कर सकती है। CBM का महत्त्वः - CBM का उपयोग विद्युत उत्पादन में, वाहनों के ईंधन में संपीडित प्राकृतिक गैस के तौर पर, खाद के निर्माण में किया जा सकता है। - इसके अलावा इसका प्रयोग औद्योगिक इकाइयों में जैसे- सीमेंट उद्योग, रोलिंग मिलों में, स्टील प्लांट तथा मीथेनॉल के उत्पादन में किया जा सकता है। - CBM एक स्वच्छ ईंधन है जो कि तुलनात्मक रूप से अन्य ईंधनों की अपेक्षा कम प्रदूषण उत्पन्न करता है। प्रीलिम्स के लियेः मेन्स के लियेः चर्चा में क्यों? महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिये प्रतिवर्ष पच्चीस नवंबर को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। प्रमुख बिंदुः - इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस का आयोजन संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष दो हज़ार तीस तक महिला हिंसा उन्मूलन कार्यक्रम के तहत चलाए गए यूनाइट अभियान के अंतर्गत किया गया। - वर्ष दो हज़ार आठ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिये यूनाइट अभियान चलाया गया। - इस वर्ष की थीम ऑरेंज द वर्ल्डः जनरेशन इक्वलिटी स्टैंड अगेंस्ट रेप है। - इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिये सोलह डेज एक्टिविज्म अगेंस्ट जेंडर बेस्ड वाॅइलेंस कैम्पेन का आयोजन पच्चीस नवंबर से दस दिसंबर तक किया जाएगा। - संयुक्त राष्ट्र महिला द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, विश्व भर में लगभग पंद्रह मिलियन किशोर लडकियाँ अपने जीवन में कभी-न-कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। - इसके अलावा तीन बिलियन महिलाएँ वैवाहिक बलात्कार की शिकार होती हैं। - आँकड़ों के अनुसार, करीब तैंतीस% महिलाओं व लड़कियों को शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। - हिंसा की शिकार पचास% से अधिक महिलाओं की हत्या उनके परिजनों द्वारा ही की जाती है। - वैश्विक स्तर पर मानव तस्करी के शिकार लोगों में पचास% वयस्क महिलाएं हैं। - रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में लगभग छः सौ पचास मिलियन महिलाओं का विवाह अट्ठारह वर्ष से पहले हुआ है। - WHO की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन तीन में से एक महिला किसी न किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा का शिकार होती है। भारत के संदर्भ मेंः - हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा राष्ट्रीय अपराध दो हज़ार सत्रह रिपोर्ट जारी की गई। - रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कुल तीन,उनसठ,आठ सौ उनचास मामले दर्ज़ किये गए। - इस सूची में सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किये गए, इसके बाद क्रमशः महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। - महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कुल मामलों में सत्ताईस.नौ% मामले पति या परिजनों द्वारा किये गए उत्पीड़न के अंतर्गत दर्ज़ किये गए। - इसके अलावा अपमान के उद्देश्य से किये हमले , अपहरण और बलात्कार के मामले सामने आए। भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम : - भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद पंद्रह में राज्यों को आदेश दिया गया है कि केवल धर्म, मूलवंश, लिंग, जाति, जन्मस्थान के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जाएगा। - महिलाओं की सुरक्षा के लिये घरेलू हिंसा अधिनियम दो हज़ार पाँच पारित किया गया। - महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के लिये कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न अधिनियम, दो हज़ार तेरह लाया गया। संयुक्त राष्ट्र महिला : - वर्ष दो हज़ार दस में संयुक्त राष्ट्र के महासभा द्वारा संयुक्त राष्ट्र महिला का गठन किया गया। - यह संस्था महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के क्षेत्र में कार्य करती है। - इसके तहत संयुक्त राष्ट्र तंत्र के चार अलग-अलग प्रभागों के कार्यों को संयुक्त रूप से संचालित किया जाता हैः - महिलाओं की उन्नति के लिये प्रभाग - महिलाओं की उन्नति के लिये अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान - लैंगिक मुद्दों और महिलाओं की उन्नति पर विशेष सलाहकार कार्यालय - महिलाओं के लिये संयुक्त राष्ट्र विकास कोष चर्चा में क्यों? हाल ही में पाकिस्तान द्वारा भारत को अपने हवाई क्षेत्र के उपयोग से इनकार करने के मामले को भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के समक्ष उठाया है। क्या था मामला? - भारत ने अट्ठाईस अक्तूबर, दो हज़ार उन्नीस को प्रधानमंत्री की सऊदी अरब यात्रा के लिये पाकिस्तान से ओवरफ्लाइट क्लीयरेंस की मांग की थी। - पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन का हवाला देते हुए इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। ICAO क्या है? - यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी है, जिसकी स्थापना वर्ष एक हज़ार नौ सौ चौंतालीस में राज्यों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन अभिसमय के संचालन तथा प्रशासन के प्रबंधन हेतु की गई थी। - अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संबंधी अभिसमय/कन्वेंशन पर सात दिसंबर, एक हज़ार नौ सौ चौंतालीस को शिकागो में हस्ताक्षर किये गए। इसलिये इसे शिकागो कन्वेंशन भी कहते हैं। - शिकागो कन्वेंशन ने वायु मार्ग के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय परिवहन की अनुमति देने वाले प्रमुख सिद्धांतों की स्थापना की और ICAO के निर्माण का भी नेतृत्व किया। - इसका एक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय हवाई परिवहन की योजना एवं विकास को बढ़ावा देना है ताकि दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय नागरिक विमानन की सुरक्षित तथा व्यवस्थित वृद्धि सुनिश्चित हो सके। - भारत इसके एक सौ तिरानवे सदस्यों में से है। - इसका मुख्यालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में है। प्रीलिम्स के लियेः मेन्स के लियेः चर्चा में क्यों? हाल ही में अमेरिका के एक शीर्ष राजनयिक द्वारा चीन की अंतर्राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाए गए हैं। मुख्य बिंदुः - अमेरिकी राजनयिक ने चीन की अंतर्राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं तथा 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' के तहत ऋण देने की प्रथाओं की कड़ी आलोचना की है। - अमेरिकी राजनयिक ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर भी सवाल उठाया है। आलोचना के प्रमुख बिंदुः - अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि चीन अमेरिकी नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय नियमों और मानदंडों से संबंधित प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक है। - अमेरिकी राजनयिक के अनुसार, जब 'देंग शियाओपिंग' ने वर्ष एक हज़ार नौ सौ अठहत्तर में चीन में 'ओपन डोर पॉलिसी' की घोषणा की थी तब यूरोप और जापान की कंपनियों ने चीन में निवेश किया जिससे चीन को लाभ हुआ पर चीन ने यह नीति पाकिस्तान में नहीं अपनाई तथा चीन द्वारा पाकिस्तान में किया गया निवेश केवल चीन के लिये ही लाभप्रद रहा। - चीन की CPEC परियोजना पाकिस्तान के युवाओं और वहाँ की कंपनियों को वह अवसर प्रदान नहीं करती है जो अवसर दशकों पहले चीन को विभिन्न देशों द्वारा चीन में निवेश करने के कारण प्राप्त हुए थे और यही कारण है कि चीन एवं पाकिस्तान के बीच एकतरफा व्यापारिक संबंध हैं। - अमेरिकी राजनयिक ने CPEC की आलोचना ऋण, लागत, पारदर्शिता में कमी और नौकरियाँ प्रदान न करने के संबंध में की। - हालाँकि अमेरिकी राजनयिक ने चीन की बुनियादी ढाँचे संबंधी परियोजनाओं तथा ऋण प्रदान करने की प्रथाओं की आलोचना की परंतु चीन के लोगों तथा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए चीनी और अमेरिकी नागरिकों के बीच मित्रता को परंपरागत बताया। - अमेरिकी राजनयिक ने BRI परियोजना के तहत चीन की ऋण प्रदान करने की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि चीन आमतौर पर विभिन्न देशों को ऋण प्रदान करता है पर 'पेरिस क्लब' का सदस्य नहीं है। : - पेरिस क्लब की स्थापना वर्ष एक हज़ार नौ सौ छप्पन में विकासशील और उभरते देशों की ऋण समस्याओं के समाधान के लिये की गई थी। - इसकी स्थापना के समय विश्व शीत युद्ध, अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह की जटिलता, वैश्विक स्तर पर विनिमय दर के मानकों का अभाव और अफ्रीका के कुछ देशों द्वारा औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता की प्राप्ति जैसी परिस्थितियाँ विद्यमान थीं। - अर्जेंटीना ने एक बड़ी ऋण धोखाधड़ी के लिये वैश्विक समुदाय से सहायता की अपील की जिसके परिणामस्वरूप वर्ष एक हज़ार नौ सौ छप्पन में फ्राँस द्वारा पेरिस में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसे पेरिस क्लब कहा गया। - इसका सचिवालय पेरिस में स्थित है। - चीन विश्व स्तर पर सबसे बड़ा ऋणदाता होने के बावजूद अपने समग्र ऋण की जानकारी नहीं देता है अतः न तो पेरिस क्लब, न IMF और न ही क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ इन वित्तीय लेन-देनों की निगरानी कर पाती हैं। - चीन से ऋण लेने वाले देशों द्वारा इतने बढ़े ऋण चुकाने में विफल होने पर ऋण प्राप्तकर्त्ता देशों की विकास परियोजनाएँ बाधित होती हैं तथा उन देशों की संप्रभुता में कमी आती है। - श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह तथा मालदीव में रनवे का निर्माण चीन की संदिग्ध वाणिज्यिक व्यवहार्यता वाली परियोजनाओं के वित्तपोषण के उदाहरण हैं। - दो हज़ार सत्रह में श्रीलंका ने बकाया ऋण नहीं चुका पाने के कारण चीन को हंबनटोटा बंदरगाह का परिचालन पट्टा निन्यानवे साल के लिये सौंप दिया। - अमेरिकी राजनयिक ने 'क्वाड' की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि इस समूह में शामिल ऑस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका और भारत बुनियादी ढाँचे के विकास के लिये निवेश की तलाश कर रहे देशों को यथार्थवादी विकल्प प्रदान कर सकते हैं। - QUAD देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक सितंबर के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान न्यूयॉर्क में हुई थी। प्रीलिम्स के लियेः मेन्स के लियेः चर्चा में क्यों? आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार भारत में जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान शहरी बेरोज़गारी दर में कमी आई है। मुख्य बिंदुः - साप्ताहिक स्थिति के आधार पर जारी PLFS के आँकड़ों के अनुसार, जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान शहरी बेरोज़गारी दर नौ.तीन प्रतिशत, अक्तूबर-नवंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान नौ.नौ प्रतिशत, जुलाई-सितंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान नौ.सात प्रतिशत तथा अप्रैल-जून, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान नौ.आठ प्रतिशत थी। - हालाँकि इन आँकड़ों में महिलाओं की बेरोज़गारी दर जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान ग्यारह.छः प्रतिशत, अक्तूबर-दिसंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान बारह.तीन प्रतिशत और अप्रैल-जून, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान बारह.आठ प्रतिशत थी, जबकि पुरुषों की बेरोज़गारी दर जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान आठ.सात प्रतिशत, अक्तूबर-दिसंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान नौ.दो प्रतिशत और अप्रैल-जून, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान नौ प्रतिशत थी। - सभी आयु-वर्ग की महिलाओं में राज्यवार आँकड़ों में जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान जम्मू कश्मीर में सर्वाधिक अड़तीस.दो प्रतिशत, उत्तराखंड में तैंतीस.सात प्रतिशत तथा केरल में इक्कीस.पाँच प्रतिशत बेरोज़गारी दर है। - सभी आयु-वर्गों के पुरुषों में सर्वाधिक बेरोज़गारी दर ओडिशा में पंद्रह.छः प्रतिशत, मध्य प्रदेश में तेरह प्रतिशत तथा दिल्ली में बारह.नौ प्रतिशत है। श्रम शक्ति भागीदारी दरः - नवीनतम तिमाही आँकड़ों के अनुसार, पंद्रह वर्ष और उससे उपर के आयु-वर्ग की श्रम शक्ति भागीदारी दर जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस की तिमाही के दौरान छियालीस.पाँच प्रतिशत रही जो कि पिछली तिमाही के दौरान छियालीस.आठ प्रतिशत थी। - पंद्रह वर्ष और उससे उपर के आयु-वर्ग की महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान उन्नीस.एक प्रतिशत और अक्तूबर-दिसंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान उन्नीस.पाँच प्रतिशत थी, जबकि इसी आयु वर्ग के पुरुषों की श्रम शक्ति भागीदारी दर जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान तिहत्तर.चार प्रतिशत थी तथा अक्तूबर-दिसंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान यह दर तिहत्तर.छः प्रतिशत थी। - जनवरी-मार्च, दो हज़ार उन्नीस के दौरान पंद्रह-उनतीस वर्ष आयु-वर्ग के युवाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर सैंतीस.सात प्रतिशत जबकि अक्तूबर-दिसंबर, दो हज़ार अट्ठारह के दौरान अड़तीस.दो प्रतिशत थी। - पंद्रह वर्ष और उससे उपर के आयु वर्ग की महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर उत्तर प्रदेश तथा बिहार में सबसे कम थी। नोट- उपर्युक्त सभी आँकड़े शहरी क्षेत्र से संबंधित हैं। : - यह रिपोर्ट राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा जारी की जाती है। - जुलाई, दो हज़ार सत्रह से जून, दो हज़ार अट्ठारह के लिये पहली PLFS रिपोर्ट मई, दो हज़ार उन्नीस में जारी की गई थी। - जुलाई, दो हज़ार अट्ठारह से जून, दो हज़ार उन्नीस के लिये दूसरी PLFS रिपोर्ट अभी जारी नहीं की गई है। चर्चा में क्यों? हाल ही में गृह मंत्रालय ने चेन्नामनेनी रमेश की नागरिकता रद्द कर दी, चेन्नामनेनी वेमुलावाड़ा से विधानसभा के सदस्य हैं। - MHA के अनुसार, चेन्नामनेनी रमेश ने नागरिकता अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ पचपन की धारा पाँच के तहत नागरिकता के संबंध में धोखाधड़ी, गलत प्रतिनिधित्व और फर्जी तरीके से तथ्यों को छुपाया है। - ध्यातव्य है कि कोई ऐसा व्यक्ति जो भारतीय नागरिक नहीं है, वह किसी भी चुनाव को लड़ने या मतदान करने का पात्र नहीं है। - नागरिकता अधिनियम, एक हज़ार नौ सौ पचपन की धारा पाँच में पंजीकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने का प्रावधान है। - धारा पाँच भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण हेतु निम्नांकित श्रेणियों में से किसी से संबद्ध होना चाहिये; - कोई व्यक्ति, जो पूरी आयु एवं क्षमता का हो तथा उसके माता-पिता भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हो। - या वह पंजीकरण का इस प्रकार का आवेदन देने से एक वर्ष पूर्व से भारत में रह रहा हो। - धारा दस किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता से वंचित करने के अधिकार से संबंधित है। - धारा दस में यह प्रावधान है कि केंद्र सरकार, किसी नागरिक को भारतीय नागरिकता से वंचित कर सकती है, यदिः - नागरिक सामान्य रूप से सात वर्षों की निरंतर अवधि से भारत से बाहर निवास कर रहा हो। - हालाँकि भारत में यह सुनिश्चित करने के लिये भी आवश्यक प्रावधान है कि कहीं नागरिकता को मनमाने ढंग से तो रद्द नहीं किया गया है। - अधिनियम की धारा दस के अनुसार, इस धारा के तहत केंद्र सरकार किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता से वंचित नहीं करेगी जब तक कि यह संतुष्ट न हो कि यह जन हित के अनुकूल नहीं है कि उक्त व्यक्ति भारत का नागरिक बना रहे। चर्चा में क्यों? सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णयों में समीक्षा/पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात की जा रही है। जहाँ एक ओर याचिकाकर्त्ताओं ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बाबरी मस्ज़िद-राम जन्मभूमि और दूरसंचार राजस्व मामले में दिये गए निर्णय की समीक्षा करने की योजना बनाई है। वहीं दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला निर्णय की समीक्षा करने पर तो सहमति जताई लेकिन राफेल मामले की जाँच करने से इंकार कर दिया। ऐसे में समीक्षा याचिका के संदर्भ में बहुत से मुद्दे चर्चा का विषय बन गए हैंः समीक्षा याचिका क्या है? संविधान के अनुसार, SC द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम निर्णय होता है। हालाँकि अनुच्छेद एक सौ सैंतीस के तहत SC को अपने किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है। इसका कारण यह है कि किसी भी मामले में SC द्वारा दिया गया निर्णय भविष्य में सुनवाई के लिये आने वाले मामलों के संदर्भ में निश्चितता प्रदान करता है। - समीक्षा याचिका में SC के पास यह शक्ति होती है कि वह अपने पूर्व के निर्णयों में निहित 'स्पष्टता का अभाव' तथा 'महत्त्वहीन आशय' की गौण त्रुटियों की समीक्षा कर उनमें सुधार कर सकता है। पेटेंट त्रुटी एक त्रुटी जो स्वयं स्पष्ट है अर्थात् जिसे किसी भी जटिल तर्क या तर्क की लंबी प्रक्रिया में शामिल किये बिना प्रदर्शित किया जा सकता है। - वर्ष एक हज़ार नौ सौ पचहत्तर के एक फैसले में, तत्कालीन न्यायमूर्ति कृष्ण/कृष्णा अय्यर ने कहा था कि एक समीक्षा याचिका को तभी स्वीकार किया जा सकता है जब न्यायालय द्वारा दिये गए किसी निर्णय में भयावह चूक या अस्पष्टता जैसी स्थिति उत्पन्न हुई हो। - SC द्वारा समीक्षाओं को स्वीकार करना दुर्लभ होता है, इसका जीवंत उदाहरण सबरीमाला और राफेल मामलों में देखने को मिलता है। - पिछले वर्ष SC ने केंद्र सरकार की याचिका पर मार्च दो हज़ार अट्ठारह के फैसले की समीक्षा करने की अनुमति दी थी, जिसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार अधिनियम को कमज़ोर कर दिया था। किस आधार पर याचिकाकर्त्ता SC के फैसले की समीक्षा की माँग कर सकता है? - नए और महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों की खोज, जिन्हें पूर्व की सुनवाई के दौरान शामिल नहीं किया गया था। - दस्तावेज़ में कोई त्रुटि अथवा अस्पष्टता रही हो। - कोई अन्य पर्याप्त कारण । समीक्षा याचिका कौन दायर कर सकता है? - नागरिक प्रक्रिया संहिता और उच्चतम न्यायालय के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो फैसले से असंतुष्ट है, समीक्षा याचिका दायर कर सकता है भले ही वह उक्त मामले में पक्षकार हो अथवा न हो। - हालाँकि न्यायालय प्रत्येक समीक्षा याचिका पर विचार नही करता है। यह समीक्षा याचिका को तभी अनुमति देता है जब समीक्षा करने का कोई महत्त्वपूर्ण आधार दिखाता हो। - SC अपने पूर्व के फैसले पर अडिग रहने के लिये बाध्य नहीं है, सामुदायिक हितों और न्याय के हित में वह इससे हटकर भी फैसले कर सकता है। - संक्षेप में SC एक स्वयं सुधार संस्था है। - उदाहरण के तौर पर, केशवानंद भारती मामले में SC ने अपने पूर्व के फैसले गोलकनाथ मामले से हटकर फैसला दिया। - उच्चत्तम न्यायालय द्वारा निर्मित वर्ष एक हज़ार नौ सौ छियानवे के नियमों के अनुसार समीक्षा याचिका निर्णय की तारीख के तीस दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिये। - कुछ परिस्थितियों में, न्यायालय समीक्षा याचिका दायर करने की देरी को माफ़ कर सकती है यदि याचिकाकर्ता देरी के उचित कारणों को अदालत के सम्मुख प्रदर्शित करे। - न्यायालय के नियमों के मुताबिक "वकीलों की मौखिक दलीलों के बिना याचिकाओं की समीक्षा की जाएगी। - समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई उन न्यायधीशों द्वारा भी की जा सकती है जिन्होंने उन पर निर्णय दिया था। - यदि कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त या अनुपस्थित होता है तो वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्थापन किया जा सकता है। अपवादः - वर्ष दो हज़ार चौदह के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि "मृत्युदंड" के सभी मामलों की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा खुली अदालत में की जाएगी। अयोध्या के फैसले की समीक्षा किस आधार पर की जानी है? - अभी तक केवल ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने कहा है कि वह निर्णय समीक्षा कराएगा। उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य याचिकाकर्त्ता इस मत पर विभाजित हैं। - हालाँकि अभी तक इस आधार का खुलासा नहीं किया गया है जिसके आधार पर समीक्षा याचिका दायर की जाएगी। - हालाँकि ध्वस्त बाबरी मस्ज़िद के बदले सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को दी गई पाँच एकड़ ज़मीन का मुद्दा महत्त्वपूर्ण है जिसे आधार बनाकर समीक्षा याचिका दायर की जा सकती है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्डः यह एक गैर-सरकारी संगठन है जिसे वर्ष एक हज़ार नौ सौ तिहत्तर में गठित किया गया था जो मुस्लिम पर्सनल लाॅ की सुरक्षा और इसको प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिये कार्य करता है। यदि समीक्षा याचिका असफल हो जाये तो? - यदि SC द्वारा समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया जाता है तो भी SC से दोबारा समीक्षा करने का अनुरोध किया जा सकता है। इस प्रकार की याचिका को आरोग्यकर/सुधारात्मक याचिका अर्थात् क्यूरेटिव पिटीशन कहा जाता है। - रूपा हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले में SC ने पहली बार सुधारात्मक याचिका शब्दावली का प्रयोग किया। - सुधारात्मक याचिका को SC में अनुच्छेद एक सौ बयालीस के अंतर्गत दाखिल किया जा सकता है। चर्चा में क्यों? पिछले कुछ समय से भारत सरकार मणिपुर के तेईस कुकी और ज़ोमी समूहों के साथ शांति वार्ता को किसी परिणाम पर पहुँचाने का प्रयास कर रही है। इस संदर्भ में न केवल ये जनजातीय समूह चर्चा का विषय बने हुए हैं बल्कि भारत सरकार के इन प्रयासों की पृष्ठभूमि भी महत्त्वपूर्ण हो गई है। - पंद्रह अक्तूबर, एक हज़ार नौ सौ उनचास को भारतीय संघ में विलय से पहले मणिपुर एक रियासत थी। यहाँ नगा, कुकी और मैती सहित कईं जातीय समुदाय निवास करते हैं। - मणिपुर के विलय और पूर्ण विकसित राज्य का दर्जा मिलने में हुई देरी से मणिपुर के लोगों में असंतोष की भावना उत्पन्न हुई। - प्राकृतिक संसाधनों पर अतिव्यापी दावों के संबंध में अलग-अलग आकांक्षाओं और कथित असुरक्षा के कारण विभिन्न जातीय समुदाय एक दूसरे से दूर होते चले गए। - शुरुआती दौर में मणिपुर में एक स्वतंत्र राज्य की मांग को लेकर आंदोलन हुआ और राज्य की स्थापना के साथ यह आंदोलन समाप्त हो गया। परंतु, वर्ष एक हज़ार नौ सौ अठहत्तर में यहाँ पुनः हिंसक आंदोलन शुरू हुआ और लोगों ने विकास तथा पिछड़ेपन को आधार बनाकर भारतीय गणराज्य से अलग होने की मांग की। - इसके अलावा वर्ष एक हज़ार नौ सौ नब्बे के दशक की शुरुआत में नगा एवं कुकी के बीच हुए जातीय संघर्ष के बाद, नगा आधिपत्य और दावे का सामना करने के लिये कई तरह के कुकी संगठनों का भी जन्म हुआ। इसके फलस्वरूप वर्ष एक हज़ार नौ सौ अट्ठानवे में कुकी नेशनल फ्रंट का गठन हुआ। - कुकी जनजाति के लोग एक अलग राज्य की मांग करते हैं। ये लोग एक उग्रवादी संगठन मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट की छत्रछाया में काम करते हैं। - इस दौरान नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम अर्थात् Issac ने मणिपुर के कुछ ऐसे क्षेत्रों को नगालैंड में मिलाये जाने की मांग की, जिनमें बड़ी संख्या में कुकी जनजाति निवास करती हैं। हालाँकि वर्ष दो हज़ार आठ में दो बड़े संगठनों [कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट ] के तहत कुकी और ज़ोमिस से संबंधित बीस उग्रवादी समूहों ने भारत सरकार एवं मणिपुर सरकार के साथ SoO समझौते पर हस्ताक्षर किये। समझौते का उद्देश्य चरमपंथी समूहों द्वारा की गई मांगों पर चर्चा करना और मणिपुर में शांति स्थापित लाना है। मणिपुर के लोगों को तीन मुख्य जातीय समुदायों में बाँटा गया है- मैती जो घाटी में निवास करते हैं और उनतीस प्रमुख जनजातियाँ, जो पहाड़ियों में निवास करती हैं, को दो मुख्य नृवंश-समुदायों ; नगा और कुकी-चिन में विभाजित किया जाता हैं। नगा समूह में ज़ेलियानग्रोंग , तंगखुल , माओ , मैरम , मारिंग और ताराओ शामिल हैं। - चिन-कुकी समूह में गंगटे , हमार , पेइती , थादौ , वैपी , जोऊ/ज़ो , आइमोल , चिरु , कोइरेंग , कोम , एनल , चोथे , लमगांग , कोइरो , थंगल , मोयोन और मोनसांग शामिल हैं। - चिन पद का प्रयोग पड़ोसी राज्य म्याँमार के चिन प्रांत के लोगों के लिये किया जाता है जबकि भारतीय क्षेत्र में चिन लोगों को कुकी कहा जाता है। अन्य समूहों जैसे पेइती, जोऊ/ज़ो, गंगटे और वैपी अपनी पहचान ज़ोमी के रूप में करते हैं तथा स्वयं को कुकी नाम से दूर रखते हैं। - यह इस बात पर विशेष ध्यान दिये जाने की ज़रूरत है कि सभी विभिन्न जातीय समूह एक ही मंगोलॉयड समूह के हैं और उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं में बहुत करीबी समानताएँ हैं। हालाँकि मैती हिंदू रीति-रिवाज़ों का पालन करने वाला जनजातीय समूह हैं, यह अपने आसपास की पहाड़ी जनजातियों से सांस्कृतिक रूप से भिन्न है। उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण क्या है? चर्चा में क्यों? हाल ही में सरकार ने आँकड़ों की गुणवत्ता के मद्देनज़र वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के दौरान उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण जारी करने से मना कर दिया। उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण क्या है? - यह एक पंचवर्षीय सर्वेक्षण है जिसे सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वन मंत्रालय के के राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाता है। - उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण , पूरे देश के शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त सूचना के आधार पर घरेलू स्तर पर होने वाले व्यय के पैटर्न को दर्शाता है। - इस सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर किसी परिवार द्वारा वस्तुओं तथा सेवाओं पर किये जाने वाले औसत खर्च एवं मासिक प्रति व्यक्ति व्यय का अनुमान लगाया जाता है। उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण की उपयोगिताः - मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग के अनुमान से किसी अर्थव्यवस्था में मांग तथा वस्तुओं और सेवाओं को लेकर लोगों की प्राथमिकताओं का अंदाजा लगाया जाता है। - इसके अलावा यह लोगों के जीवन स्तर एवं विभिन्न पैमानों पर आर्थिक संवृद्धि को दर्शाता है। - यह संरचनात्मक विसंगतियों की पहचान करता है तथा आर्थिक नीतियों के निर्माण में मददगार साबित होता है जिससे मांग के पैटर्न का पता लगाया जा सके एवं वस्तु तथा सेवाओं के उत्पादकों को मदद मिल सके। - CES एक विश्लेषणात्मक प्रक्रिया है जिसका प्रयोग सरकारें जीडीपी तथा अन्य वृहत आर्थिक संकेतकों के पुनर्निर्धारण के लिये करती हैं। विगत सर्वेक्षण के आँकड़ेः ।मासिक प्रति व्यक्ति व्यय ।भोजन पर खर्च - वर्ष दो हज़ार ग्यारह-बारह के आँकड़ों के अनुसार, बेहतर सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले राज्य तथा पिछड़े राज्यों के बीच असमानता में वृद्धि हुई है। - MPCE के मामले में शीर्ष पाँच प्रतिशत राज्यों में यह ग्रामीण क्षेत्रों के लिये दो,आठ सौ छियासी रुपयापए था, जबकि निचले पाँच प्रतिशत राज्यों के लिये छः सौ सोलह रुपयापए था। - शीर्ष पाँच प्रतिशत राज्यों के शहरी क्षेत्रों के लिये MPCE छः,तीन सौ तिरासी रुपयापए था, जबकि निचले पाँच प्रतिशत राज्यों के लिये यह आठ सौ सत्ताईस रुपयापए था। वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के सर्वेक्षण पर विवादः - हाल ही में मीडिया द्वारा यह दावा किया गया कि MPCE पर वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के आँकड़ों में वर्ष एक हज़ार नौ सौ बहत्तर-तिहत्तर के बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई है जो कि तीन.सात% है। - इसके अनुसार वास्तविक कीमतों पर वर्ष दो हज़ार ग्यारह-बारह में MPCE एक,पाँच सौ एक रुपयापए था जो वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह में घटकर एक,चार सौ छियालीस रुपयापए रह गया। - इसके अलावा मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित उपभोग व्यय ग्रामीण क्षेत्रों में आठ.आठ प्रतिशत घट गया, जबकि शहरी क्षेत्रों में इसमें दो प्रतिशत की वृद्धि हुई है। - इसके विपरीत सरकार का मानना है कि वस्तु एवं सेवाओं के वास्तविक उत्पादन को दर्शाने वाले प्रशासनिक आँकड़ों से ज्ञात होता है कि विगत वर्षों में लोगों के उपभोग व्यय में न केवल वृद्धि हुई है बल्कि उनके उपभोग के पैटर्न में भी विविधता आई है। - सरकार का यह भी कहना है कि अधिकांश परिवारों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी सामाजिक सेवाओं के उपभोग में वृद्धि हुई है। - इसलिये सरकार इस सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों को लेकर संतुष्ट नहीं थी तथा इस मामले को विशेषज्ञों की एक समिति के पास भेजा गया। - समिति का कहना है कि इस सर्वेक्षण में कई अनियमितताएँ हैं तथा इसमें प्रयुक्त शोध विधि को लेकर भी कई बदलाव किये जाने की आवश्यकता है। - इसके अलावा कुछ अर्थशास्त्रियों का सरकार के विपरीत तर्क है कि मई दो हज़ार उन्नीस में NSSO द्वारा प्रकाशित आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के अनुसार, देश में बेरोज़गारी पिछले पैंतालीस वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है तथा वेतन में स्थिरता बनी हुई है। - इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा प्रकाशित जीडीपी के आँकड़ों के मुताबिक, वर्तमान वित्तीय वर्ष के अप्रैल-जून तिमाही में निजी अंतिम उपभोग व्यय पिछली अट्ठारह तिमाहियों के न्यूनतम स्तर पर था। सरकार के निर्णय का प्रभावः - सरकार द्वारा CES के आँकड़े न जारी करने के इस निर्णय से वर्तमान उपभोक्ताओं के व्यय पैटर्न की सही जानकारी नहीं मिलेगी जिससे नीति निर्माताओं को आर्थिक सुधार से संबंधित रणनीति बनाने में मुश्किल होगी। - वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह के आँकड़े न जारी होने से सरकार अगला सर्वेक्षण वर्ष दो हज़ार बीस-इक्कीस या दो हज़ार इक्कीस-बाईस में जारी करेगी। इससे वर्ष दो हज़ार ग्यारह-बारह में जारी आँकड़ों के बाद नौ या दस वर्षों का अंतराल आएगा। - अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विशेष आँकड़े प्रसार मानक का भागीदार होने के नाते भारत वृहत स्तर के आर्थिक आँकड़े प्रकाशित करने के लिये बाध्य है। - अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की एनुअल आब्ज़रवेंस रिपोर्ट दो हज़ार अट्ठारह के अनुसार, भारत अपने आर्थिक आँकड़ों के प्रकाशन में प्रायः देरी करता है जो SDDS के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। - राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी पर सलाहकार समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि वर्ष दो हज़ार सत्रह-अट्ठारह को जीडीपी के आधार वर्ष के तौर पर पुनर्निर्धारण हेतु प्रयोग करना उचित नहीं होगा क्योंकि इसके द्वारा जारी डेटा भविष्य में संदेहास्पद हो सकते हैं। RAPID FIRE करेंट अफेयर्स - हर साल छब्बीस नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को अंगीकार किये जाने की सत्तरवीं वर्षगाँठ है। - छब्बीस जनवरी, एक हज़ार नौ सौ पचास को भारत का संविधान लागू होने से पहले छब्बीस नवंबर, एक हज़ार नौ सौ उनचास को इसे अपनाया गया था। - ग्यारह दिसंबर एक हज़ार नौ सौ छियालीस को संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष चुना गया, जो अंत तक इस पद पर बने रहे। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के अन्य प्रमुख सदस्य थे। - संविधान सभा के सदस्यों का पहला सेशन नौ दिसंबर, एक हज़ार नौ सौ सैंतालीस को आयोजित हुआ। इसमें संविधान सभा के दो सौ सात सदस्य थे। - संविधान की ड्रॉफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर थे। इन्हें भारत के संविधान का निर्माता भी कहा जाता है। - भारतीय संविधान को तैयार करने में दो साल ग्यारह महीने और सत्रह दिन का समय लगा था। - सरकार ने उन्नीस नवंबर, दो हज़ार पंद्रह को राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से छब्बीस नवंबर को संविधान दिवस के रूप में घोषित किया था। यानी कि वर्ष दो हज़ार पंद्रह से संविधान दिवस मनाने की शुरुआत हुई। संविधान दिवस मनाने का उद्देश्य नागरिकों को संविधान के प्रति सचेत करना, समाज में संविधान के महत्त्व का प्रसार करना है। साथ ही भारतीय संविधान में व्यक्त किये गए मूल्यों और सिद्धांतों को नागरिकों के समक्ष दोहराना तथा सभी देशवासियों को भारतीय लोकतंत्र को मज़बूत करने में अपनी उचित भूमिका निभाने के लिये प्रोत्साहित करना। - भारत में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन के जन्मदिन को 'राष्ट्रीय दुग्ध दिवस' के रूप में मनाया जाता है। - वर्ष दो हज़ार चौदह में छब्बीस नवंबर के दिन भारतीय डेयरी एसोसिएशन ने पहली बार यह दिवस मनाने की पहल की थी। - वर्ष एक हज़ार नौ सौ सत्तर में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि तथा ग्रामीण क्षेत्र की आय बढ़ाने को दृष्टिगत रखते हुए 'ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत की गई। - दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश का अग्रणी राज्य है, जबकि गुजरात स्थित अमूल देश की सबसे बड़ी दुग्ध सहकारी संस्था है। विश्व दुग्ध दिवस एक जून को मनाया जाता है। विश्व दुग्ध दिवस दो हज़ार उन्नीस की थीम- 'ड्रिंक मिल्क टुडे एंड एवरीडे' रखी गई है। वर्ष दो हज़ार एक में पहली बार विश्व दुग्ध दिवस मनाया गया था। - दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अलग-अलग स्थानों पर प्यूरीफाइंग टॉवर या स्मॉग टॉवर लगाने का खाका तैयार करें। - स्मॉग टावर एक बहुत बड़ा एयर प्यूरीफायर है। यह अपने आसपास से प्रदूषित हवा या उसके कणों को सोख लेता है और फिर वापस पर्यावरण में साफ हवा छोड़ता है। - घर पर लगने वाले आम प्यूरीफायर की तरह यह बिजली से चलते हैं। इनमें से कुछ को सोलर पावर से भी चलाया जा सकता है। - स्मॉग टॉवर का पहला प्रोटोटाइप चीन की राजधानी बीजिंग में लगाया गया। इसे बाद में चीन के तियानजिन और क्राको शहर में भी लगाया गया। दिल्ली की एक स्टार्टअप कंपनी ने चालीस फुट लंबा ऐसा प्यूरीफायर बनाया है जो उसके तीन किलोग्राममीटर के दायरे में रह रहे पचहत्तर हज़ार लोगों को स्वच्छ हवा दे सकता है। इसके निर्माता कुरीन सिस्टम्स को हाल ही में 'दुनिया के सबसे लंबे और साथ ही सबसे मजबूत प्यूरीफायर' के लिये पेटेंट मिला है। सिटी क्लीनरः - छोटे टावर को सिटी क्लीनर भी कहा जाता है। स्मॉग टावर और सिटी क्लीनर के अंतर की बात करें तो सिटी क्लीनर स्मॉग टॉवर से बेहतर होता है। - प्रायः स्मॉग टावर हवा को साफ करने के लिये आयनाइजेशन तकनीक का उपयोग करता है। इसमें हवा का आयनीकरण प्रदूषकों को पूरी तरह नहीं समाप्त तो नहीं कर पाता, लेकिन ऑक्सीजन से प्रदूषकों को अलग कर देता है। इसके विपरीत सिटी क्लीनर में हवा का आयनीकरण पूरी तरह प्रदूषकों को खत्म करता है। हमारे देश में ऐसे एक टावर की अनुमानित लागत डेढ़ से दो करोड़ रुपए के बीच है।
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नोट : सारंगपुर पेज के लिए लीड समाचारः -किसी को ड्रायवर सीट और किसी को आपातकालीन द्वार से निकाला -पेयजल योजना की पाइपलाइन के लिए खोदे गड्ढे बन रहे मुसीबत -नपा की लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे लोग सचित्र एसआरपी 9 गड्ढे मे. . . madhya pradeshSat, 01 Sep 2018 01:53 AM (IST)
बीते साल बस हादसों में आधा सैकड़ा से ज्यादा मौतें होने के बाद परिवहन विभाग ने यात्री बसों के संचालन के लिए कुछ नियम तय किए थे। जिसमें आपातकालीन द्वार, अग्निशमन यंत्र, फर्स्ट एड बाक्स, चालक-परिचालक की वर्दी, उनका वेरीफिकेश. . . madhya pradeshMon, 16 Jul 2018 06:14 PM (IST)
जिला योजना भवन में जिला अस्पताल के कायाकल्प प्रोजेक्ट की समीक्षा की गई। समीक्षा में जिला भिंड के मॉडल पर जिला अस्पताल के उन्नयन के लिए ड्रेनेज सिस्टम, आपातकालीन द्वार, गार्डन, प्रवेश क्षेत्र, लैब, डॉक्टरों की ड्यूटी से स. . . madhya pradeshMon, 22 Jan 2018 08:46 PM (IST)
-अनदेखी : यात्रियों के लिए नहीं हैं सुविधाएं, ओवरलोडिंग भी जमकर हो रही- नलखेड़ा। नईदुनिया न्यूज बसों में सफर करने वाले यात्रियों को कई परेशानी उठानी पड़ रही है। खटारा हालत में दौड़ रही कई बसों में खिड़कियां, दरवाजे तक टूट. . . madhya pradeshThu, 18 May 2017 07:08 PM (IST)
- बसों में न किराया सूची चस्पा, न फिटनेस की जानकारी खुरई। नवदुनिया न्यूज यहां के बस स्टैंड से चलने वाली बसों के संचालन में लापरवाही बरती जा रही है। बस संचालक परिवहन विभाग के नियमों का मखौल उड़ा रहे हैं। इसका खामियाजा य. . . madhya pradeshWed, 05 Apr 2017 04:00 AM (IST)
परिवहन आयुक्त के आदेश बाद गुरूवार से यात्री बसों की जांच परिवहन विभाग और पुलिस द्वारा की गई। 30 बसों की जांच के दौरान तीन बसें ऐसे मिली, जिनके आपातकालीन द्वार काफी मश्क्कत के बाद भी नहीं खोले जा सके। जिसके बाद तीनों बसों. . . madhya pradeshThu, 01 Sep 2016 11:29 PM (IST)
स्टेशन पर प्रवेश, निकासी के अलावा आपातकालीन द्वार भी बनाए गए हैं। madhya pradeshWed, 16 Mar 2016 02:21 PM (IST)
खंडवा। नियमों का पालन नहीं करने वाले बस ऑपरेटरों पर बुधवार को परिवहन विभाग ने कार्रवाई की। 5 अनफिट बसों के परमिट निरस्त कर दिए गए हैं। इसी के साथ 15 बस ऑपरेटरों को नोटिस दिए गए। आपातकालीन खिड़की की जगह आपातकालीन द्वार लगा. . . madhya pradeshThu, 14 May 2015 04:00 AM (IST)
बुरहानपुर। मुसाफिरों की सुविधा के लिए राज्य शासन द्वारा बनाए नियमों को यात्री बसों के चालक-संचालक हवा में उड़ा रहे हैं। इस पर कई वाहन चालकों को जल्दी ही नियमों की शर्तों पर खरा उतरने की हिदायत दी गई। कुछ वाहनों पर चालानी . . . madhya pradeshSat, 09 May 2015 08:22 AM (IST)
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अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक डा. रामकरण शर्मा और हाल ही में यूपी पीसीएस की परीक्षा पास करने वाली अंशु मलिक ने बागपत के विभिन्न विद्यालयों के विधार्थियों से लाइव वेबिनार कार्यक्रम के माध्यम से उनकी जिज्ञासाएं जानी तथा उनके सवालों के जवाब दिए।
सिलाना की बेटी अंशु मलिक ने कहा कि बेटियां किसी भी रूप में बेटों से कम नहीं है। अंशु ने बच्चों से बड़े सपने देखने की अपील की। अमेरिका से बच्चों के सवालों के जवाब दे रहे अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक डा. रामकरण शर्मा ने विज्ञान को बड़े ही सरल शब्दों में बच्चों को समझाया। डा. रामकरण शर्मा ने कहा कि आप कभी भी अपनी परिस्थितियों को दोष न दें बल्कि चुनौतियों को स्वीकार करके उनका समुचित निदान ढूंढने का प्रयास करें। डा. रामकरण ने एक कार्यक्रम विज्ञान की बात, स्कूल अध्यापक के साथ में भी 100 अधिक स्कूल शिक्षक को संबोधित किया। विज्ञान की बात I-STEM (IISc Banglore) और NEEV (IIT दिल्ली) की एक पहल है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षकों और उनके छात्रों (कक्षा 1 से 8 वीं) के लिए, तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करने और उन्हें विज्ञान के बारे में जागरूक करने और प्रेरित करने के लिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में विज्ञान की जरुरत सबसे ज्यादा बढ़ गया है। जब पूरा विश्व कोरोना की वजह से बंद हो गया था, उस समय देश के वैज्ञानिक और डाक्टर सबसे आगे आए और लोगों की जिंदगी बचाने का काम किया। ये बातें युवा वैज्ञानिक डॉ. संजीव कुमार श्रीवास्तव और डॉ. उपदेश वर्मा ने भी कही। इन सभी ने कहा कि भारत को सच्चे मायने में आत्म निर्भर बनाना हैं तो भारत के जो नौनिहाल अपनी पढ़ाई की शुरूआत करने जा रहे उनके अंदर वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा।
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अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक डा. रामकरण शर्मा और हाल ही में यूपी पीसीएस की परीक्षा पास करने वाली अंशु मलिक ने बागपत के विभिन्न विद्यालयों के विधार्थियों से लाइव वेबिनार कार्यक्रम के माध्यम से उनकी जिज्ञासाएं जानी तथा उनके सवालों के जवाब दिए। सिलाना की बेटी अंशु मलिक ने कहा कि बेटियां किसी भी रूप में बेटों से कम नहीं है। अंशु ने बच्चों से बड़े सपने देखने की अपील की। अमेरिका से बच्चों के सवालों के जवाब दे रहे अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक डा. रामकरण शर्मा ने विज्ञान को बड़े ही सरल शब्दों में बच्चों को समझाया। डा. रामकरण शर्मा ने कहा कि आप कभी भी अपनी परिस्थितियों को दोष न दें बल्कि चुनौतियों को स्वीकार करके उनका समुचित निदान ढूंढने का प्रयास करें। डा. रामकरण ने एक कार्यक्रम विज्ञान की बात, स्कूल अध्यापक के साथ में भी एक सौ अधिक स्कूल शिक्षक को संबोधित किया। विज्ञान की बात I-STEM और NEEV की एक पहल है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षकों और उनके छात्रों के लिए, तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करने और उन्हें विज्ञान के बारे में जागरूक करने और प्रेरित करने के लिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में विज्ञान की जरुरत सबसे ज्यादा बढ़ गया है। जब पूरा विश्व कोरोना की वजह से बंद हो गया था, उस समय देश के वैज्ञानिक और डाक्टर सबसे आगे आए और लोगों की जिंदगी बचाने का काम किया। ये बातें युवा वैज्ञानिक डॉ. संजीव कुमार श्रीवास्तव और डॉ. उपदेश वर्मा ने भी कही। इन सभी ने कहा कि भारत को सच्चे मायने में आत्म निर्भर बनाना हैं तो भारत के जो नौनिहाल अपनी पढ़ाई की शुरूआत करने जा रहे उनके अंदर वैज्ञानिक सोच को विकसित करना होगा।
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जोफ्रा आर्चर ने सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ सिर्फ एक विकेट लिया और वह भी डेविड वॉर्नर का.
नई दिल्ली. राजस्थान रॉयल्स (Rajasthan Royals) के पेसर जोफ्रा आर्चर (Jofra Archer) यूएई में खेले जा रहे इंडियन प्रीमियर लीग के इस सीजन में काफी इंप्रेस कर रहे हैं. टी-20 टूर्नामेंट में आमतौर पर बल्लेबाजों का बोलबाला रहता है, लेकिन इस बार गेंदबाजों की तूती बोल रही है. ऐसे में जोफ्रा आर्चर अपनी पेस के दम पर दुनिया के बेस्ट बल्लेबाजों के छक्के छुड़ाने में लगे हुए हैं. राजस्थान रॉयल्स ने अपना पिछला मैच सनराइजर्स (Sunrisers Hyderabad) के खिलाफ रविवार को खेला. इस मैच में राजस्थान ने हैदराबाद को 5 विकेट से मात दी. इस मैच में जोफ्रा आर्चर ने सिर्फ एक विकेट लेकर खुद के लिए ब्रांड न्यू एक्सबॉक्स (XBox) जीत लिया है.
XBoxदरअसल, इस टूर्नामेंट के शुरू होने से पहले जोफ्रा आर्चर एक्सबॉक्स यूके को टैग करते हुए एक ट्वीट किया था. आर्चर ने एक्सबॉक्स यूके से उस ट्वीट में पूछा था कि आईपीएल 2020 (IPL 2020) में कितने विकेट लेने पर उन्हें फ्री एक्सबॉक्स मिल सकता है. आर्चर ने यह ट्वीट टूर्नामेंट शुरू होने से एक दिन पहले यानी 18 सितंबर को किया था. आईपीएल 2020 का आगाज 19 सितंबर से मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच मैच के साथ हुआ था.
जोफ्रा आर्चर के इस ट्वीट पर एक्सबॉक्स यूके ने भी जवाब दिया था. एक्सबॉक्स यूके ने जवाब देते हुए कहा था कि सिर्फ एक. . . . डेविड वॉर्नर. बता दें कि डेविड वॉर्नर (David Warner) आईपीएल में सनराइजर्स हैदराबाद के कप्तान हैं और ऑरेंज कैप के दावेदारों में से एक हैं. वॉर्नर ने 2019 आईपीएल में 12 मैचों में 69. 20 की औसत से 692 रन बनाकर ऑरेंज कैप जीती थी.
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जोफ्रा आर्चर ने सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ सिर्फ एक विकेट लिया और वह भी डेविड वॉर्नर का. नई दिल्ली. राजस्थान रॉयल्स के पेसर जोफ्रा आर्चर यूएई में खेले जा रहे इंडियन प्रीमियर लीग के इस सीजन में काफी इंप्रेस कर रहे हैं. टी-बीस टूर्नामेंट में आमतौर पर बल्लेबाजों का बोलबाला रहता है, लेकिन इस बार गेंदबाजों की तूती बोल रही है. ऐसे में जोफ्रा आर्चर अपनी पेस के दम पर दुनिया के बेस्ट बल्लेबाजों के छक्के छुड़ाने में लगे हुए हैं. राजस्थान रॉयल्स ने अपना पिछला मैच सनराइजर्स के खिलाफ रविवार को खेला. इस मैच में राजस्थान ने हैदराबाद को पाँच विकेट से मात दी. इस मैच में जोफ्रा आर्चर ने सिर्फ एक विकेट लेकर खुद के लिए ब्रांड न्यू एक्सबॉक्स जीत लिया है. XBoxदरअसल, इस टूर्नामेंट के शुरू होने से पहले जोफ्रा आर्चर एक्सबॉक्स यूके को टैग करते हुए एक ट्वीट किया था. आर्चर ने एक्सबॉक्स यूके से उस ट्वीट में पूछा था कि आईपीएल दो हज़ार बीस में कितने विकेट लेने पर उन्हें फ्री एक्सबॉक्स मिल सकता है. आर्चर ने यह ट्वीट टूर्नामेंट शुरू होने से एक दिन पहले यानी अट्ठारह सितंबर को किया था. आईपीएल दो हज़ार बीस का आगाज उन्नीस सितंबर से मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच मैच के साथ हुआ था. जोफ्रा आर्चर के इस ट्वीट पर एक्सबॉक्स यूके ने भी जवाब दिया था. एक्सबॉक्स यूके ने जवाब देते हुए कहा था कि सिर्फ एक. . . . डेविड वॉर्नर. बता दें कि डेविड वॉर्नर आईपीएल में सनराइजर्स हैदराबाद के कप्तान हैं और ऑरेंज कैप के दावेदारों में से एक हैं. वॉर्नर ने दो हज़ार उन्नीस आईपीएल में बारह मैचों में उनहत्तर. बीस की औसत से छः सौ बानवे रन बनाकर ऑरेंज कैप जीती थी. .
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कपड़े में लगे इंक के दाग को आप भी कुछ ही मिनट में आसानी से साफ करना चाहते हैं तो फिर इस 1 चीज से 5 मिनट के अंदर साफ कर सकते हैं। आइए जानते हैं कैसे।
How To Remove Ink Stains From Clothes: छोटे बच्चों के कपड़े में या फिर बड़ों के कपड़े में इंक का दाग लगना कोई बड़ी बात नहीं है। इंक के दाग को साफ करना भी आसान नहीं होता है। खासकर जब सफ़ेद शर्ट, टी-शर्ट या जींस में इंक का दाग लगता है तो कई लोग घबराने भी लगते हैं कि दाग साफ होगा की नहीं।
सफ़ेद कपड़े में जब इंक का दाग लगता है तो कई लोग उस कपड़े को दोबारा पहनते भी नहीं है। ऐसे में अगर आपके भी किसी पसंदीदा कपड़े में इंक का दाग लग गया है तो अब उस कपड़े को साइड में रखने की जरूरत नहीं है।
इस लेख में हम आपको एक ऐसी चीज के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके इस्तेमाल से सिर्फ 5 मिनट के अंदर कपड़े में लगे इंक के दाग को साफ कर सकते हैं। आइए जानते हैं।
कपड़े में लगे इंक के दाग को साफ करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन दाग को साफ करने से पहले आपको कुछ टिप्स को फ़ॉलो करने की ज़रूरत है। इसके लिए सबसे पहले 1/2 लीटर पानी को गर्म कर लें। अब इस गर्म पानी में दाग लगे हिस्से को डालकर लगभग 5 मिनट के लिए छोड़ दें। इससे दाग नरम होता है और बाद में सफाई करना आसान होता है।
जी हां, जिस 1 चीज से सिर्फ 5 मिनट में इंक के दाग को साफ करने के बारे में बात कर रहे हैं उसका नाम हाइड्रोजन पेरॉक्साइड है। हालांकि, यह सभी घरों में उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में आप इसे मार्केट से खरीद सकते हैं।
- सबसे पहले 1 मग पानी में 2-3 चम्मच डिटर्जेंट पाउडर को डालकर अच्छे से मिक्स कर लें।
- अब इस मिश्रण को किसी बर्तन में रखकर गुनगुना कर लें। इसके बाद इसमें 2 चम्मच हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को डालकर अच्छे से मिक्स कर लें।
- इसके बाद कपड़े में लगे हुए दाग वाले हिस्से को मिश्रण में डुबोकर 5 मिनट के लिए छोड़ दें।
- 5 मिनट क्लीनिंग ब्रश या हाथों से रगड़कर साफ कर लें।
- सबसे पहले एक बाउल में 2 चम्मच बेकिंग सोडा और 2 चम्मच हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को डालें।
- अब इसमें पानी की कुछ बूंदों को दलकर गाढ़ा मिश्रण बना लें।
- इसके बाद मिश्रण को इंक लगे दाग पर अच्छे से लगाकर 5 मिनट के लिए छोड़ दें।
- 5 मिनट बाद क्लीनिंग ब्रश से रगड़कर साफ कर लें और पानी से धो लें।
हाइड्रोजन पेरॉक्साइड और बेकिंग सोडा के अलावा अन्य कई चीजों के इस्तेमाल से कपड़े में लगे इन के दाग को आसानी से साफ कर सकते हैं। इसके लिए हाइड्रोजन पेरॉक्साइड में नींबू का रस या फिर सिरके को मिक्स करने भी इस्तेमाल कर सकते हैं। पकड़ों से इंक के दाग को साफ करने के लिए अमोनिया पाउडर का इस्तेमाल करना भी एक बेस्ट उपाय हो सकता है।
अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर जरूर शेयर करें और इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।
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आपकी स्किन और शरीर आपकी ही तरह अलग है। आप तक अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी लाना हमारा प्रयास है, लेकिन फिर भी किसी भी होम रेमेडी, हैक या फिटनेस टिप को ट्राई करने से पहले आप अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें। किसी भी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia. com पर हमसे संपर्क करें।
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कपड़े में लगे इंक के दाग को आप भी कुछ ही मिनट में आसानी से साफ करना चाहते हैं तो फिर इस एक चीज से पाँच मिनट के अंदर साफ कर सकते हैं। आइए जानते हैं कैसे। How To Remove Ink Stains From Clothes: छोटे बच्चों के कपड़े में या फिर बड़ों के कपड़े में इंक का दाग लगना कोई बड़ी बात नहीं है। इंक के दाग को साफ करना भी आसान नहीं होता है। खासकर जब सफ़ेद शर्ट, टी-शर्ट या जींस में इंक का दाग लगता है तो कई लोग घबराने भी लगते हैं कि दाग साफ होगा की नहीं। सफ़ेद कपड़े में जब इंक का दाग लगता है तो कई लोग उस कपड़े को दोबारा पहनते भी नहीं है। ऐसे में अगर आपके भी किसी पसंदीदा कपड़े में इंक का दाग लग गया है तो अब उस कपड़े को साइड में रखने की जरूरत नहीं है। इस लेख में हम आपको एक ऐसी चीज के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके इस्तेमाल से सिर्फ पाँच मिनट के अंदर कपड़े में लगे इंक के दाग को साफ कर सकते हैं। आइए जानते हैं। कपड़े में लगे इंक के दाग को साफ करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन दाग को साफ करने से पहले आपको कुछ टिप्स को फ़ॉलो करने की ज़रूरत है। इसके लिए सबसे पहले एक/दो लीटरटर पानी को गर्म कर लें। अब इस गर्म पानी में दाग लगे हिस्से को डालकर लगभग पाँच मिनट के लिए छोड़ दें। इससे दाग नरम होता है और बाद में सफाई करना आसान होता है। जी हां, जिस एक चीज से सिर्फ पाँच मिनट में इंक के दाग को साफ करने के बारे में बात कर रहे हैं उसका नाम हाइड्रोजन पेरॉक्साइड है। हालांकि, यह सभी घरों में उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में आप इसे मार्केट से खरीद सकते हैं। - सबसे पहले एक मग पानी में दो-तीन चम्मच डिटर्जेंट पाउडर को डालकर अच्छे से मिक्स कर लें। - अब इस मिश्रण को किसी बर्तन में रखकर गुनगुना कर लें। इसके बाद इसमें दो चम्मच हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को डालकर अच्छे से मिक्स कर लें। - इसके बाद कपड़े में लगे हुए दाग वाले हिस्से को मिश्रण में डुबोकर पाँच मिनट के लिए छोड़ दें। - पाँच मिनट क्लीनिंग ब्रश या हाथों से रगड़कर साफ कर लें। - सबसे पहले एक बाउल में दो चम्मच बेकिंग सोडा और दो चम्मच हाइड्रोजन पेरॉक्साइड को डालें। - अब इसमें पानी की कुछ बूंदों को दलकर गाढ़ा मिश्रण बना लें। - इसके बाद मिश्रण को इंक लगे दाग पर अच्छे से लगाकर पाँच मिनट के लिए छोड़ दें। - पाँच मिनट बाद क्लीनिंग ब्रश से रगड़कर साफ कर लें और पानी से धो लें। हाइड्रोजन पेरॉक्साइड और बेकिंग सोडा के अलावा अन्य कई चीजों के इस्तेमाल से कपड़े में लगे इन के दाग को आसानी से साफ कर सकते हैं। इसके लिए हाइड्रोजन पेरॉक्साइड में नींबू का रस या फिर सिरके को मिक्स करने भी इस्तेमाल कर सकते हैं। पकड़ों से इंक के दाग को साफ करने के लिए अमोनिया पाउडर का इस्तेमाल करना भी एक बेस्ट उपाय हो सकता है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर जरूर शेयर करें और इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ। Image Credit: आपकी स्किन और शरीर आपकी ही तरह अलग है। आप तक अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी लाना हमारा प्रयास है, लेकिन फिर भी किसी भी होम रेमेडी, हैक या फिटनेस टिप को ट्राई करने से पहले आप अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें। किसी भी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia. com पर हमसे संपर्क करें।
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ख्यातं सामायिकं नाम व्रतं चाणुव्रतार्थिनाम् । अतीचारविनिर्मुक्तं भवेत्संसारविच्छिदे ॥१९४ स्यात्प्रोषधोपवासाख्यं व्रतं च परमौषधम् । जन्ममृत्युजरातङ्क विध्वंसनविचक्षणम् ।।१९५ चतुर्द्धाशनसंन्यासो यावद यामाश्च षोडश । स्थिति निरवद्यस्थाने व्रतं प्रोषधसंज्ञकम् ॥१९६ कर्तव्यं तदवश्यं स्यात्पर्वण्यां प्रोषधव्रतम् । अष्टभ्यां च चतुर्दश्यां यथाशक्त्यापि चान्यदा ॥ १९७ धारणाहि त्रयोदश्यां मध्याह्न कृतभोजनः । तिष्ठेत्स्थानं समासाद्य नीरागं निरवद्यकम् ॥ १७८ तत्रैव निवसेद् रात्रौ जागरूको यथाबलम् । प्रातरादिदिनं कृत्स्नं धर्मध्यानैर्नयेद् व्रती ॥ १९९ जलपानं निषिद्धं स्यान्मुनिवत्तत्र प्रोषधे । न निषिद्धाऽनिषिद्धा स्थादर्हत्पूजा जलादिभिः ॥२०० यदा सा क्रियते पूजा न दोषोऽस्ति तदापि वै । न क्रियते सा तदाप्यत्र दोषो नास्तीह कश्चन ।। २०१ एवमित्यादि तत्रैव नीत्वा रात्रि स धर्मधीः । कृतक्रियोऽशनं कुर्यान्मध्याह्न पारणादिने ॥२०२
रहित सामायिकका पाठ पढ़ता है या शीघ्रता के साथ पढ़ता है या पढ़ते-पढ़ते भूल जाता है या कुछ छोड़कर आगे पढ़ने लगता है तब उसके स्मृत्यनुपस्थान नामका सामायिकका पाँचवाँ अतिचार होता है ।।१९३।। इस प्रकार अणुव्रत धारण करनेवाले व्रती श्रावकोंके लिये सामायिक नामके शिक्षाव्रतका स्वरूप कहा । यदि इस व्रतको अतिचाररहित पालन किया जाय तो इस जीवके संसार परिभ्रमणका अवश्य ही नाश हो जाता है और मोक्षकी प्राप्ति अवश्य होती है ।।१९४।।
आगे प्रोषधोपवासव्रतका स्वरूप कहते हैं । जन्म, मरण, बुढ़ापा, रोग आदि संसार सम्बन्धी समस्त दुःखों को, समस्त रोगोंको नाश करनेके लिये यह प्रोपधोपवास नामका व्रत एक विलक्षण और सबसे उत्तम औषधि है ।। १९५।। सोलह पहर तक चार प्रकारके आहारका त्याग कर देना और जिनालय आदि किसी भी निर्दोष स्थान में रहना प्रोषधोपवासव्रत कहलाता
॥१९६।। यह प्रोषधोपवास नामका व्रत अष्टमी और चतुर्दशी इन दोनों पर्वोके दिनोंमें अवश्य करना चाहिये ।।१९७।। यदि चतुर्दशीको प्रोषधोपवास करना हो तो इस व्रतको त्रयोदशीके दिन ही ग्रहण करना चाहिये । त्रयोदशी के दिन मध्याह्नमें या दोपहरके समय एक बार भोजन करना चाहिए तथा भोजन के बाद किसी निर्दोप और रागरहित स्थानमें जाकर रहना चाहिये ।।१९८।। बाकी दिन उसे वहीं बिताना चाहिये, रात्रि में भी वहीं निवास करना चाहिये । उस रातको अपनी शक्तिके अनुसार जगते रहना चाहिये । प्रातःकाल उठकर उस व्रती श्रावकको वह समस्त दिन धर्मध्यानसे विताना चाहिये ।।१९९।। प्रोपधोपवास के दिन उस व्रती श्रावकको जल नहीं पीना चाहिये । आचार्योंने प्रोषधोपवासके दिन मुनियोंके समान ही जलपानका निषेध किया है । इसमें भी इतना और समझ लेना चाहिये कि उस व्रती श्रावकको जलके पोनेका निषेध है, जल चन्दन अक्षत आदि आठों द्रव्योंसे भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करनेका निषेध नहीं है ।। २००।। प्रोपघोपवासके दिन भगवान् अरह्न्तदेवकी पूजा करनेके लिये आचार्यों को ऐसी आज्ञा है कि प्रती श्रावक यदि प्रोपवोषवाससे दिन भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करे तो भी कोई दोप नहीं है । यदि उस दिन वह पूजा न करे तो भी कोई दोप नहीं है ।। २०१।। उस धर्मात्मा व्रती श्रावकको वहीं पर उस दिनकी रात्रि व्यतीत करनी चाहिये तथा पारणाके दिन अर्थात् पूर्णिमा के दिन प्रातः काल उठकर पूजा, स्वाध्याय, ध्यान आदि अपना नित्य कर्तव्य करना चाहिये और दोपहर के समय एक वार भोजन करना चाहिये ।। २०२।। धारणाके दिनसे लेकर अर्थात् त्रयोदशीसे लेकर तीन दिन तक त्रयोदशी, चतुर्दशी ओर पूर्णिमा इन तीनों दिन उसे ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिये । यह
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ख्यातं सामायिकं नाम व्रतं चाणुव्रतार्थिनाम् । अतीचारविनिर्मुक्तं भवेत्संसारविच्छिदे ॥एक सौ चौरानवे स्यात्प्रोषधोपवासाख्यं व्रतं च परमौषधम् । जन्ममृत्युजरातङ्क विध्वंसनविचक्षणम् ।।एक सौ पचानवे चतुर्द्धाशनसंन्यासो यावद यामाश्च षोडश । स्थिति निरवद्यस्थाने व्रतं प्रोषधसंज्ञकम् ॥एक सौ छियानवे कर्तव्यं तदवश्यं स्यात्पर्वण्यां प्रोषधव्रतम् । अष्टभ्यां च चतुर्दश्यां यथाशक्त्यापि चान्यदा ॥ एक सौ सत्तानवे धारणाहि त्रयोदश्यां मध्याह्न कृतभोजनः । तिष्ठेत्स्थानं समासाद्य नीरागं निरवद्यकम् ॥ एक सौ अठहत्तर तत्रैव निवसेद् रात्रौ जागरूको यथाबलम् । प्रातरादिदिनं कृत्स्नं धर्मध्यानैर्नयेद् व्रती ॥ एक सौ निन्यानवे जलपानं निषिद्धं स्यान्मुनिवत्तत्र प्रोषधे । न निषिद्धाऽनिषिद्धा स्थादर्हत्पूजा जलादिभिः ॥दो सौ यदा सा क्रियते पूजा न दोषोऽस्ति तदापि वै । न क्रियते सा तदाप्यत्र दोषो नास्तीह कश्चन ।। दो सौ एक एवमित्यादि तत्रैव नीत्वा रात्रि स धर्मधीः । कृतक्रियोऽशनं कुर्यान्मध्याह्न पारणादिने ॥दो सौ दो रहित सामायिकका पाठ पढ़ता है या शीघ्रता के साथ पढ़ता है या पढ़ते-पढ़ते भूल जाता है या कुछ छोड़कर आगे पढ़ने लगता है तब उसके स्मृत्यनुपस्थान नामका सामायिकका पाँचवाँ अतिचार होता है ।।एक सौ तिरानवे।। इस प्रकार अणुव्रत धारण करनेवाले व्रती श्रावकोंके लिये सामायिक नामके शिक्षाव्रतका स्वरूप कहा । यदि इस व्रतको अतिचाररहित पालन किया जाय तो इस जीवके संसार परिभ्रमणका अवश्य ही नाश हो जाता है और मोक्षकी प्राप्ति अवश्य होती है ।।एक सौ चौरानवे।। आगे प्रोषधोपवासव्रतका स्वरूप कहते हैं । जन्म, मरण, बुढ़ापा, रोग आदि संसार सम्बन्धी समस्त दुःखों को, समस्त रोगोंको नाश करनेके लिये यह प्रोपधोपवास नामका व्रत एक विलक्षण और सबसे उत्तम औषधि है ।। एक सौ पचानवे।। सोलह पहर तक चार प्रकारके आहारका त्याग कर देना और जिनालय आदि किसी भी निर्दोष स्थान में रहना प्रोषधोपवासव्रत कहलाता ॥एक सौ छियानवे।। यह प्रोषधोपवास नामका व्रत अष्टमी और चतुर्दशी इन दोनों पर्वोके दिनोंमें अवश्य करना चाहिये ।।एक सौ सत्तानवे।। यदि चतुर्दशीको प्रोषधोपवास करना हो तो इस व्रतको त्रयोदशीके दिन ही ग्रहण करना चाहिये । त्रयोदशी के दिन मध्याह्नमें या दोपहरके समय एक बार भोजन करना चाहिए तथा भोजन के बाद किसी निर्दोप और रागरहित स्थानमें जाकर रहना चाहिये ।।एक सौ अट्ठानवे।। बाकी दिन उसे वहीं बिताना चाहिये, रात्रि में भी वहीं निवास करना चाहिये । उस रातको अपनी शक्तिके अनुसार जगते रहना चाहिये । प्रातःकाल उठकर उस व्रती श्रावकको वह समस्त दिन धर्मध्यानसे विताना चाहिये ।।एक सौ निन्यानवे।। प्रोपधोपवास के दिन उस व्रती श्रावकको जल नहीं पीना चाहिये । आचार्योंने प्रोषधोपवासके दिन मुनियोंके समान ही जलपानका निषेध किया है । इसमें भी इतना और समझ लेना चाहिये कि उस व्रती श्रावकको जलके पोनेका निषेध है, जल चन्दन अक्षत आदि आठों द्रव्योंसे भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करनेका निषेध नहीं है ।। दो सौ।। प्रोपघोपवासके दिन भगवान् अरह्न्तदेवकी पूजा करनेके लिये आचार्यों को ऐसी आज्ञा है कि प्रती श्रावक यदि प्रोपवोषवाससे दिन भगवान् अरहन्तदेवकी पूजा करे तो भी कोई दोप नहीं है । यदि उस दिन वह पूजा न करे तो भी कोई दोप नहीं है ।। दो सौ एक।। उस धर्मात्मा व्रती श्रावकको वहीं पर उस दिनकी रात्रि व्यतीत करनी चाहिये तथा पारणाके दिन अर्थात् पूर्णिमा के दिन प्रातः काल उठकर पूजा, स्वाध्याय, ध्यान आदि अपना नित्य कर्तव्य करना चाहिये और दोपहर के समय एक वार भोजन करना चाहिये ।। दो सौ दो।। धारणाके दिनसे लेकर अर्थात् त्रयोदशीसे लेकर तीन दिन तक त्रयोदशी, चतुर्दशी ओर पूर्णिमा इन तीनों दिन उसे ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिये । यह
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शिमला 15 जून (वार्ता) हिमाचल में मानसून आने से पहले ही बारिश का दौर शुरू हो गया है। प्रदेश में 18 जून तक 'यलो अलर्ट' जारी रहेगा जबकि 23 जून के बाद हिमाचल में प्री मानसून की बौछारें शुरू हो जाएंगी।
प्रदेश में बुधवार रात को मंडी व बिलासपुर सहित कई क्षेत्रों में जहां भारी बारिश हुई हैं, तो वहीं राजधानी शिमला सहित प्रदेश के कई क्षेत्रों में आज भी बारिश का दौर जारी रहा।
वहीं, कांगड़ा जिला के कई क्षेत्रों में बारिश के साथ-साथ तूफान भी आया है, जिसके कारण किसानों-बागबानों की फसलों को नुकसान हुआ है। आज भी प्रदेश के कई जिलों में भारी बारिश के आसार है। इसको लेकर मौसम विज्ञान केंद्र शिमला ने यलो अलर्ट जारी किया है। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के अनुसार प्रदेश के दस जिलों में तेज तूफान के साथ भारी बारिश होगी। लाहुल-स्पीति व किन्नौर जिला को छोडकर सभी जिलों के लिए 'यलो अलर्ट' जारी किया है।
इस दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से तेज हवाएं चलने के भी आसार हैं। मौसम विभाग की माने तो आने वाले कुछ दिनों तक प्रदेश में बारिश, ओलावृष्टि और तूफान का दौर जारी रहेगा। प्रदेश में 18 जून तक 'यलो अलर्ट' जारी रहेगा। आगामी 23 जून के बाद हिमाचल में प्री मानसून की बौछारें शुरू हो जाएंगी।
लाहौल स्पीति जिले में 13050 फुट उंचे दर्रा पर बर्फ के दीदार करने आधे से ज्यादा पर्यटक रोहतांग की वादियां नहीं निहार पाए। राहनीनाला में सड़क खराब हो गई है जिस कारण वाहन दर्रे की चढ़ाई नहीं चढ़ पा रहे हैं और बर्फ में फंस रहे हैं।
पर्यटक वाहनों का मढ़ी पहुंचना कर शुरु हो गया लेकिन राहनीनाला में सड़क खराब होने व एक तरफा ही बर्फ हटाने के चलते भारी ट्रेफिक जाम लग रहा है। दिन भर पर्यटक भूखे प्यासे ट्रैफिक जाम में फंसे रहे। हालांकि सभी 1200 परमिंट बुक हो चुके थे लेकिन उत्साहित पर्यटकों का रोमांच ट्रैफिक जाम ने आधा कर दिया। पर्यटन कारोबारी दर्रे में पर्यटकों का इंतजार करते ही रह गए। कोई 1200 पर्यटक वाहनों में आधे ही दर्रे तक पहुंच पाए जबकि आधे ट्रैफिक जाम में फंसे होने के कारण दर्रे के नीचले भाग से ही लौट आए।
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शिमला पंद्रह जून हिमाचल में मानसून आने से पहले ही बारिश का दौर शुरू हो गया है। प्रदेश में अट्ठारह जून तक 'यलो अलर्ट' जारी रहेगा जबकि तेईस जून के बाद हिमाचल में प्री मानसून की बौछारें शुरू हो जाएंगी। प्रदेश में बुधवार रात को मंडी व बिलासपुर सहित कई क्षेत्रों में जहां भारी बारिश हुई हैं, तो वहीं राजधानी शिमला सहित प्रदेश के कई क्षेत्रों में आज भी बारिश का दौर जारी रहा। वहीं, कांगड़ा जिला के कई क्षेत्रों में बारिश के साथ-साथ तूफान भी आया है, जिसके कारण किसानों-बागबानों की फसलों को नुकसान हुआ है। आज भी प्रदेश के कई जिलों में भारी बारिश के आसार है। इसको लेकर मौसम विज्ञान केंद्र शिमला ने यलो अलर्ट जारी किया है। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के अनुसार प्रदेश के दस जिलों में तेज तूफान के साथ भारी बारिश होगी। लाहुल-स्पीति व किन्नौर जिला को छोडकर सभी जिलों के लिए 'यलो अलर्ट' जारी किया है। इस दौरान तीस से चालीस किलोग्राममीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से तेज हवाएं चलने के भी आसार हैं। मौसम विभाग की माने तो आने वाले कुछ दिनों तक प्रदेश में बारिश, ओलावृष्टि और तूफान का दौर जारी रहेगा। प्रदेश में अट्ठारह जून तक 'यलो अलर्ट' जारी रहेगा। आगामी तेईस जून के बाद हिमाचल में प्री मानसून की बौछारें शुरू हो जाएंगी। लाहौल स्पीति जिले में तेरह हज़ार पचास फुट उंचे दर्रा पर बर्फ के दीदार करने आधे से ज्यादा पर्यटक रोहतांग की वादियां नहीं निहार पाए। राहनीनाला में सड़क खराब हो गई है जिस कारण वाहन दर्रे की चढ़ाई नहीं चढ़ पा रहे हैं और बर्फ में फंस रहे हैं। पर्यटक वाहनों का मढ़ी पहुंचना कर शुरु हो गया लेकिन राहनीनाला में सड़क खराब होने व एक तरफा ही बर्फ हटाने के चलते भारी ट्रेफिक जाम लग रहा है। दिन भर पर्यटक भूखे प्यासे ट्रैफिक जाम में फंसे रहे। हालांकि सभी एक हज़ार दो सौ परमिंट बुक हो चुके थे लेकिन उत्साहित पर्यटकों का रोमांच ट्रैफिक जाम ने आधा कर दिया। पर्यटन कारोबारी दर्रे में पर्यटकों का इंतजार करते ही रह गए। कोई एक हज़ार दो सौ पर्यटक वाहनों में आधे ही दर्रे तक पहुंच पाए जबकि आधे ट्रैफिक जाम में फंसे होने के कारण दर्रे के नीचले भाग से ही लौट आए।
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पाकिस्तान की ओर से रिहाइशी इलाकों को निशाना बनाकर गोलीबारी की जा रही, वहीं बीएसएफ के जवान मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं। आपको बता दें कि बुधवार दोपहर भी पाकिस्तानी सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास सेना के गश्ती दल पर गोलीबारी की थी, जिसमें एक सैनिक शहीद हो गया था।
पाकिस्तान की तरफ से हुई गोलीबारी में सेना के शहीद जवान राजेश खत्री का अंतिम संस्कार आज किया जाएगा। उससे पहले सुबह 9 बजे श्रीनगर में शहीद को श्रद्धाजलि दी जाएगी। इसके बाद पार्थिव शरीर सुबह 11 बजे एयरक्राफ्ट से वाराणसी भेजा जाएगा, जहां अंतिम संस्कार किया जाएगा। शहीद राजेश नेपाल के रहने वाले थे।
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पाकिस्तान की ओर से रिहाइशी इलाकों को निशाना बनाकर गोलीबारी की जा रही, वहीं बीएसएफ के जवान मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं। आपको बता दें कि बुधवार दोपहर भी पाकिस्तानी सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास सेना के गश्ती दल पर गोलीबारी की थी, जिसमें एक सैनिक शहीद हो गया था। पाकिस्तान की तरफ से हुई गोलीबारी में सेना के शहीद जवान राजेश खत्री का अंतिम संस्कार आज किया जाएगा। उससे पहले सुबह नौ बजे श्रीनगर में शहीद को श्रद्धाजलि दी जाएगी। इसके बाद पार्थिव शरीर सुबह ग्यारह बजे एयरक्राफ्ट से वाराणसी भेजा जाएगा, जहां अंतिम संस्कार किया जाएगा। शहीद राजेश नेपाल के रहने वाले थे।
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पटनाः बिहार में शिक्षक भर्ती नीति में बदलाव किए जाने पर शिक्षक अभ्यर्थियों का विरोध तेज हो गया है। वहीं, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार सुमन ने शिक्षक भर्ती नियमावली में संशोधन का विरोध करते हुए शिक्षक अभ्यर्थियों के लिए फिर से "डोमिसाइल नीति" लागू करने की मांग की है। सुमन ने कहा कि हम पार्टी शिक्षक अभ्यर्थियों की मांग का समर्थन करती है।
"हम पार्टी शिक्षक अभ्यर्थियों के साथ सड़क पर उतरेगी"
संतोष कुमार सुमन ने कहा कि डोमिसाइल नीति को हटाए जाने के खिलाफ हमारी पार्टी भी शिक्षक अभ्यर्थियों के साथ सड़क पर उतरेगी। हमारे एक-एक कार्यकर्ता डोमिसाइल नीति के पक्ष में उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा की डोमिसाइल नीति हटाने के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों की मांग का समर्थन करते हैं। डोमिसाइल नीति हटा कर हमारे बिहार के बच्चों के साथ की गई हक मारी को बिहार की जनता माफ नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि सीएम से पीएम बनने का सपना देखने वाले ने बिहारी प्रतिभावान अभ्यर्थियों के साथ खिलवाड़ किया है।
"हम पार्टी डोमिसाइल नीति को लागू करने के पक्ष में"
वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि हम पार्टी डोमिसाइल नीति को लागू करने के पक्ष में है और शिक्षक अभ्यर्थियों के संघर्ष में पार्टी उनके साथ खड़ी रहेगी। बता दें कि शिक्षक बहाली में डोमिसाइल नीति हटाने के विरोध में बीटेट/सीटेट/एसटेट पास अभ्यर्थी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को भी शिक्षक भर्ती प्रतियोगिता में बिहार के बाहर के लोगों को भी शामिल होने का मौका देने के राज्य सरकार के विवादित फैसले के खिलाफ राजधानी पटना में भारी प्रदर्शन किया गया। मध्य पटना स्थित डाक बंगला चौराहे पर युवाओं और युवतियों ने जमकर प्रदर्शन किया, जिसकी वजह से यातायात बाधित हुआ। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया और हंगामा कर रहे कुछ अभ्यर्थियों को हिरासत में भी लिया।
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पटनाः बिहार में शिक्षक भर्ती नीति में बदलाव किए जाने पर शिक्षक अभ्यर्थियों का विरोध तेज हो गया है। वहीं, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार सुमन ने शिक्षक भर्ती नियमावली में संशोधन का विरोध करते हुए शिक्षक अभ्यर्थियों के लिए फिर से "डोमिसाइल नीति" लागू करने की मांग की है। सुमन ने कहा कि हम पार्टी शिक्षक अभ्यर्थियों की मांग का समर्थन करती है। "हम पार्टी शिक्षक अभ्यर्थियों के साथ सड़क पर उतरेगी" संतोष कुमार सुमन ने कहा कि डोमिसाइल नीति को हटाए जाने के खिलाफ हमारी पार्टी भी शिक्षक अभ्यर्थियों के साथ सड़क पर उतरेगी। हमारे एक-एक कार्यकर्ता डोमिसाइल नीति के पक्ष में उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा की डोमिसाइल नीति हटाने के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों की मांग का समर्थन करते हैं। डोमिसाइल नीति हटा कर हमारे बिहार के बच्चों के साथ की गई हक मारी को बिहार की जनता माफ नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि सीएम से पीएम बनने का सपना देखने वाले ने बिहारी प्रतिभावान अभ्यर्थियों के साथ खिलवाड़ किया है। "हम पार्टी डोमिसाइल नीति को लागू करने के पक्ष में" वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि हम पार्टी डोमिसाइल नीति को लागू करने के पक्ष में है और शिक्षक अभ्यर्थियों के संघर्ष में पार्टी उनके साथ खड़ी रहेगी। बता दें कि शिक्षक बहाली में डोमिसाइल नीति हटाने के विरोध में बीटेट/सीटेट/एसटेट पास अभ्यर्थी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को भी शिक्षक भर्ती प्रतियोगिता में बिहार के बाहर के लोगों को भी शामिल होने का मौका देने के राज्य सरकार के विवादित फैसले के खिलाफ राजधानी पटना में भारी प्रदर्शन किया गया। मध्य पटना स्थित डाक बंगला चौराहे पर युवाओं और युवतियों ने जमकर प्रदर्शन किया, जिसकी वजह से यातायात बाधित हुआ। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया और हंगामा कर रहे कुछ अभ्यर्थियों को हिरासत में भी लिया।
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जिंदा रहने के लिए और सही से काम करने के लिए हमारे शरीर को ताकत की ज़रूरत होती है। हमारे शरीर को काम करने के लिए ताकत भोजन देता है इसलिए भोजन महत्वपूर्ण होता है। हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खाने से हमें प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन आदि की ज़रूरत होती है। ये सारी चीज़े हमें शाकाहार और मांसाहार दोनों ही खानों से मिलती हैं।
शाकाहारी भोजन में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स होते है जो शरीर को हार्ट प्रॉब्लम, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कैंसर आदि से बचाते हैं। लेकिन इसके फायदों के साथ क्या आप इससे होने वाले नुकसान के बारें में जानते है।
हाल ही में इंडियन डाइटीशियन एसोसिएशन की एक रिपोर्ट सामने आई हैं जिसने शाकाहारी खाने पर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पूरी तरह से प्रोटीन नहीं लेने वाले लोगों की संख्या 50 फीसदी तक हैं।
इस रिपोर्ट के मुताबिक केवल शाकाहारी खाना हमारे शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा नहीं कर पाता है जिसके लिए हमें अलग से शरीर को प्रोटीन देना जरूरी है।
वहीं इस रिपोर्ट के अनुसार शाकाहारी खाने का सबसे बुरा असर प्रेग्नेंट महिलाओं पर होता है। एक्सपर्ट का कहना है कि गर्भवती महिलाओं के संबंध में ये एक गंभीर मसला है।
क्योंकि वो अलग से प्रोटीन लेने में सक्षम नहीं होती है जिससे उन्हे और उनके बच्चे पर नुकसान हो सकता है। हालांकि वो इस कमी को पूरा करने के लिए अपनी डाइट में दूध को शामिल कर सकती हैं।
इस रिपोर्ट के बारे में पैथोलॉजिस्ट बी सेसीकेरन का कहना है कि हम प्रोटीन को अलग-अलग तरीकों से शरीर में ले सकते हैं।
हमारा शरीर अनाज और दालों के अनुपात को 5:1 के रेशियो में पचाने की क्षमता रखता है जबकि दूध 65 फीसदी तक ही पचाने की क्षमता रखता है। इसके साथ ही एक्सपर्ट का कहना है कि भारतीयों में प्रोटीन की आवश्यकता को लेकर जागरुकता कम है।
शाकाहारी भोजन करने वालों में एक समय के बाद विटामिन बी 12, ज़िंक , ओमेगा- 3 , विटामिन D 3 , सल्फर और खून की कमी हो सकती है।
शाकाहारी खाने में मौजूद लौह तत्व आसानी से शरीर में पच नहीं पाते है जिसकी वजह से अक्सर खून की कमी होने की परेशानी पैदा हो जाती है। महिलाओं को होने वाली माहवारी आदि के कारण यह समस्या होने की संभावना और अधिक होती है।
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जिंदा रहने के लिए और सही से काम करने के लिए हमारे शरीर को ताकत की ज़रूरत होती है। हमारे शरीर को काम करने के लिए ताकत भोजन देता है इसलिए भोजन महत्वपूर्ण होता है। हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खाने से हमें प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन आदि की ज़रूरत होती है। ये सारी चीज़े हमें शाकाहार और मांसाहार दोनों ही खानों से मिलती हैं। शाकाहारी भोजन में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स होते है जो शरीर को हार्ट प्रॉब्लम, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कैंसर आदि से बचाते हैं। लेकिन इसके फायदों के साथ क्या आप इससे होने वाले नुकसान के बारें में जानते है। हाल ही में इंडियन डाइटीशियन एसोसिएशन की एक रिपोर्ट सामने आई हैं जिसने शाकाहारी खाने पर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पूरी तरह से प्रोटीन नहीं लेने वाले लोगों की संख्या पचास फीसदी तक हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक केवल शाकाहारी खाना हमारे शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा नहीं कर पाता है जिसके लिए हमें अलग से शरीर को प्रोटीन देना जरूरी है। वहीं इस रिपोर्ट के अनुसार शाकाहारी खाने का सबसे बुरा असर प्रेग्नेंट महिलाओं पर होता है। एक्सपर्ट का कहना है कि गर्भवती महिलाओं के संबंध में ये एक गंभीर मसला है। क्योंकि वो अलग से प्रोटीन लेने में सक्षम नहीं होती है जिससे उन्हे और उनके बच्चे पर नुकसान हो सकता है। हालांकि वो इस कमी को पूरा करने के लिए अपनी डाइट में दूध को शामिल कर सकती हैं। इस रिपोर्ट के बारे में पैथोलॉजिस्ट बी सेसीकेरन का कहना है कि हम प्रोटीन को अलग-अलग तरीकों से शरीर में ले सकते हैं। हमारा शरीर अनाज और दालों के अनुपात को पाँच:एक के रेशियो में पचाने की क्षमता रखता है जबकि दूध पैंसठ फीसदी तक ही पचाने की क्षमता रखता है। इसके साथ ही एक्सपर्ट का कहना है कि भारतीयों में प्रोटीन की आवश्यकता को लेकर जागरुकता कम है। शाकाहारी भोजन करने वालों में एक समय के बाद विटामिन बी बारह, ज़िंक , ओमेगा- तीन , विटामिन D तीन , सल्फर और खून की कमी हो सकती है। शाकाहारी खाने में मौजूद लौह तत्व आसानी से शरीर में पच नहीं पाते है जिसकी वजह से अक्सर खून की कमी होने की परेशानी पैदा हो जाती है। महिलाओं को होने वाली माहवारी आदि के कारण यह समस्या होने की संभावना और अधिक होती है।
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210 पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास
2. "राज्य का जन्म जीवन के लिए हुआ और शुभ तथा सुखी जीवन के लिए वह जीवित है"- इस सिद्धान्त को ऐतिहासिक अभिव्यक्ति अरस्तू ने ही दी है, यद्यपि प्लेटो के विचार इसका प्राधार है ।
3. अरस्तू हो वह प्रथम विचारक है जिसने सर्वप्रथम यह अनुभव किया है कि राज्य को अन्तिम समस्या व्यक्ति की स्वतन्नता और राज्य की सत्ता मे सामञ्जस्य स्थापित करना है। कानून की प्रमुता, कानून को विशुद्ध बुद्धि समझना आदि की जो धारणा अरस्तू ने व्यक्त की है उनमे स्वतन्त्रता मोर सत्ता का सामञ्जस्य निहित है । अरस्तू का यह कथन भी एक सार्वकालिक सत्य है कि जनता ही सरकार के आचरण पर अन्तिम निर्णय करने की अधिकारिणी है। आज के लगभग सभी प्रगतिशीलं राज्यों में इसे निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाता है ।
4. अरस्तू जनमत को विद्वानो याँ विशेषज्ञों की राय से अधिक महत्व देता है। आज भी ससार के अधिकांश फैसले जनता के रुख को देखकर दिए जाते हैं ।
5. अरस्तू का संविधानवाद पर बल देना एक महत्त्वपूर्ण सार्वभौमिक तथ्य है । सविधानवाद के इस एक शब्द में वह सब कुछ समाया हुआ है जो यूरोप एवं वर्तमानकालीन विश्व के विचार को अरस्तू के ग्रन्थ 'पॉलिटिक्स' से उत्तराधिकार मे प्राप्त हुआ है । वास्तव में कानून को सम्प्रभु बनाकर और शासन को कानून के अधीनस्वीकार करके अरस्तू ने समग्र संसार के सविधानवादियों का पिता होने की ख्याति प्राप्त कर ली है । सन्त टॉमस का कानून के प्रति सम्मान और उनका सविधानवाद प्रमुखत अरस्तू द्वारा ही प्रेरित है । बार्केर के शब्दों में, "अरस्त ने सन्त टॉमस को शिखाया, सन्त टॉमस के द्वारा उसने कैथोलिक यूरोप को सिसाया, सन्त टॉमस के द्वारा उसने रिचार्ड हूकर को भी सिखाया जिसके कानून तथा सरकार के सिद्धान्त का उद्गम यही है 'न्यायप्रिय हूकर लॉक के शिक्षकों में से एक था......लॉक का सिद्धान्त बर्क को मिला। प्ररस्त की 'पॉलिटिक्स' तथा 17वीं तथा 19वी शताब्दी के अग्रेजी राजनैतिक विचार के वातावरण मे न केवल दृष्टान्त का साम्य है बल्कि एक हद तक सयोग भी है ।"
6 अरस्तू का मध्यम मार्ग (Golden Mean ) का विचार वर्तमान राजनीति के नियन्त्रण एवं सन्तुलन ( Checks and Balances ) के विचार का के जनक है । केटलिन ( Catlin ) के शब्दों में, "इन्फ्यूशियस के बाद, सामान्य ज्ञान और मध्यम मार्ग का सर्वोच्च सुधारक ग्रस्त हो है ।"I
7. अरस्तु के दर्शन का सातयाँ शाश्वत तत्त्व उदार लोकतन्त्र (Liberal Democracy) का समर्थन है। अरस्तू ने यद्यपि अतिवादी लोकतन्त्र ( Extreme Democracy) और भीड द्वारा शासन करने वाले लोकतन्त्र का विरोध किया, लेकिन साथ ही सब तरह के अघिनायकों अथवा तानाशाहों के शासन का भी वह उम्र विरोधी है।
1 "After Confucious, Aristotle is the supreme apostle of commonsease and of golden means,
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दो सौ दस पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास दो. "राज्य का जन्म जीवन के लिए हुआ और शुभ तथा सुखी जीवन के लिए वह जीवित है"- इस सिद्धान्त को ऐतिहासिक अभिव्यक्ति अरस्तू ने ही दी है, यद्यपि प्लेटो के विचार इसका प्राधार है । तीन. अरस्तू हो वह प्रथम विचारक है जिसने सर्वप्रथम यह अनुभव किया है कि राज्य को अन्तिम समस्या व्यक्ति की स्वतन्नता और राज्य की सत्ता मे सामञ्जस्य स्थापित करना है। कानून की प्रमुता, कानून को विशुद्ध बुद्धि समझना आदि की जो धारणा अरस्तू ने व्यक्त की है उनमे स्वतन्त्रता मोर सत्ता का सामञ्जस्य निहित है । अरस्तू का यह कथन भी एक सार्वकालिक सत्य है कि जनता ही सरकार के आचरण पर अन्तिम निर्णय करने की अधिकारिणी है। आज के लगभग सभी प्रगतिशीलं राज्यों में इसे निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाता है । चार. अरस्तू जनमत को विद्वानो याँ विशेषज्ञों की राय से अधिक महत्व देता है। आज भी ससार के अधिकांश फैसले जनता के रुख को देखकर दिए जाते हैं । पाँच. अरस्तू का संविधानवाद पर बल देना एक महत्त्वपूर्ण सार्वभौमिक तथ्य है । सविधानवाद के इस एक शब्द में वह सब कुछ समाया हुआ है जो यूरोप एवं वर्तमानकालीन विश्व के विचार को अरस्तू के ग्रन्थ 'पॉलिटिक्स' से उत्तराधिकार मे प्राप्त हुआ है । वास्तव में कानून को सम्प्रभु बनाकर और शासन को कानून के अधीनस्वीकार करके अरस्तू ने समग्र संसार के सविधानवादियों का पिता होने की ख्याति प्राप्त कर ली है । सन्त टॉमस का कानून के प्रति सम्मान और उनका सविधानवाद प्रमुखत अरस्तू द्वारा ही प्रेरित है । बार्केर के शब्दों में, "अरस्त ने सन्त टॉमस को शिखाया, सन्त टॉमस के द्वारा उसने कैथोलिक यूरोप को सिसाया, सन्त टॉमस के द्वारा उसने रिचार्ड हूकर को भी सिखाया जिसके कानून तथा सरकार के सिद्धान्त का उद्गम यही है 'न्यायप्रिय हूकर लॉक के शिक्षकों में से एक था......लॉक का सिद्धान्त बर्क को मिला। प्ररस्त की 'पॉलिटिक्स' तथा सत्रहवीं तथा उन्नीसवी शताब्दी के अग्रेजी राजनैतिक विचार के वातावरण मे न केवल दृष्टान्त का साम्य है बल्कि एक हद तक सयोग भी है ।" छः अरस्तू का मध्यम मार्ग का विचार वर्तमान राजनीति के नियन्त्रण एवं सन्तुलन के विचार का के जनक है । केटलिन के शब्दों में, "इन्फ्यूशियस के बाद, सामान्य ज्ञान और मध्यम मार्ग का सर्वोच्च सुधारक ग्रस्त हो है ।"I सात. अरस्तु के दर्शन का सातयाँ शाश्वत तत्त्व उदार लोकतन्त्र का समर्थन है। अरस्तू ने यद्यपि अतिवादी लोकतन्त्र और भीड द्वारा शासन करने वाले लोकतन्त्र का विरोध किया, लेकिन साथ ही सब तरह के अघिनायकों अथवा तानाशाहों के शासन का भी वह उम्र विरोधी है। एक "After Confucious, Aristotle is the supreme apostle of commonsease and of golden means,
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अहमदाबादः गुजरात के वलसाड जिले में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की गोली मारकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया है. यह घटना सोमवार (8 मई) सुबह की है. वारदात को उस वक़्त अंजाम दिया गया, जब भाजपा नेता अपनी पत्नी के साथ मंदिर के दर्शन करने गए थे. पुलिस के अनुसार, घटना वलसाड जिले के राता क्षेत्र में हुई. जिले के भाजपा उपाध्यक्ष शैलेष पटेल अपने परिवार के साथ सुबह दर्शन के लिए शिव मंदिर पहुंचे थे. जब वह दर्शन के बाद यहां से लौट ही रहे थे, उसी समय बाइक पर सवार चार लोगों ने शैलेष पटेल पर गोलीबारी कर उनकी हत्या कर दी.
चार राउंड फायरिंग के बाद हत्यारे मौके से भाग निकले. माना जा रहा है कि पुरानी दुश्मनी के कारण इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया है. जिस समय शैलेष पटेल की हत्या हुई, उस वक़्त उनका परिवार भी उनके साथ था. हालांकि, परिवार ने अब शव का अंतिम संस्कार करने से साफ़ मना कर दिया है. परिवार का कहना है कि इस पूरे मामले में जब तक इंसाफ नहीं मिलता और आरोपी गिरफ्तार नहीं कर लिए जाते, तब तक वह शव का दाह संस्कार नहीं करेंगे.
परिजनों का आरोप है कि दिन-दहाड़े अगर इस प्रकार से हत्या होती है तो यूपी और गुजरात में अंतर क्या है. जानकारी के अनुसार, शैलेष पटेल प्रत्येक सोमवार को अपनी पत्नी के साथ शिव मंदिर में दर्शन के लिए जाते थे. आज सुबह 7. 15 बजे के लगभग वो अपनी पत्नी के साथ शिव मंदिर पहुंचे थे. जिस वक़्त आरोपियों ने वारदात को अंजाम दिया, उस वक़्त शैलेष पटेल गाड़ी में बैठकर अपनी पत्नी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. इसी दौरान अचानक एक शख्स उनके पास पहुंचा. शैलेष कुछ समझ पाते इससे पहले ही एक बाइक उनके पास आई. उसमें सवार आरोपियों ने शैलेष पर चार राउन्ड फायर कर दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई .
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अहमदाबादः गुजरात के वलसाड जिले में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की गोली मारकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया है. यह घटना सोमवार सुबह की है. वारदात को उस वक़्त अंजाम दिया गया, जब भाजपा नेता अपनी पत्नी के साथ मंदिर के दर्शन करने गए थे. पुलिस के अनुसार, घटना वलसाड जिले के राता क्षेत्र में हुई. जिले के भाजपा उपाध्यक्ष शैलेष पटेल अपने परिवार के साथ सुबह दर्शन के लिए शिव मंदिर पहुंचे थे. जब वह दर्शन के बाद यहां से लौट ही रहे थे, उसी समय बाइक पर सवार चार लोगों ने शैलेष पटेल पर गोलीबारी कर उनकी हत्या कर दी. चार राउंड फायरिंग के बाद हत्यारे मौके से भाग निकले. माना जा रहा है कि पुरानी दुश्मनी के कारण इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया है. जिस समय शैलेष पटेल की हत्या हुई, उस वक़्त उनका परिवार भी उनके साथ था. हालांकि, परिवार ने अब शव का अंतिम संस्कार करने से साफ़ मना कर दिया है. परिवार का कहना है कि इस पूरे मामले में जब तक इंसाफ नहीं मिलता और आरोपी गिरफ्तार नहीं कर लिए जाते, तब तक वह शव का दाह संस्कार नहीं करेंगे. परिजनों का आरोप है कि दिन-दहाड़े अगर इस प्रकार से हत्या होती है तो यूपी और गुजरात में अंतर क्या है. जानकारी के अनुसार, शैलेष पटेल प्रत्येक सोमवार को अपनी पत्नी के साथ शिव मंदिर में दर्शन के लिए जाते थे. आज सुबह सात. पंद्रह बजे के लगभग वो अपनी पत्नी के साथ शिव मंदिर पहुंचे थे. जिस वक़्त आरोपियों ने वारदात को अंजाम दिया, उस वक़्त शैलेष पटेल गाड़ी में बैठकर अपनी पत्नी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. इसी दौरान अचानक एक शख्स उनके पास पहुंचा. शैलेष कुछ समझ पाते इससे पहले ही एक बाइक उनके पास आई. उसमें सवार आरोपियों ने शैलेष पर चार राउन्ड फायर कर दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई .
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साथ प्राप्त एकत्वमें निवास कर सके तथा प्रकृति दिव्य ज्ञान, दिव्य शक्ति और दिव्य आनन्दकी क्रियाका क्षेत्र बन जाय ।
यदि वह इसी चीजको अपने जीवनका चरम उद्देश्य बना ले और बाकी सभी चीजोंको इसी एक उद्देश्यके अधीन कर देनेके लिये तैयार हो जाय तो केवल तभी वह ऐसा करनेमें सफल हो सकता है। अन्यथा इस जीवनमें वह केवल थोड़ीसी तैयारी ही कर सकता है एक प्रकारका प्रारंभिक संपर्क प्राप्त कर सकता और अपनी प्रकृतिके किसी अंगमें थोडासा आध्यात्मिक परिवर्तन ला सकता है ।
सभी लोग अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार कोई-न-कोई योग कर सकते है यदि उनमें उसे करने की इच्छा हो । परन्तु ऐसे थोड़ेसे लोग होते हैं जिनके विषय में यह कहा जा सकता है कि वे इस योगके अधिकारी है। केवल कुछ लोग ही क्षमताका विकास कर सकते हैं, दूसरे नहीं कर सकते ।
अर्थात् कोई व्यक्ति एकमात्र अपनी निजी क्षमताके बलपर उसे नहीं कर सकता । वस, प्रश्न है अपने आपको इस प्रकार तैयार करना जिसमें कि अपनी निजी नही, वल्कि दिव्य शक्ति पूर्ण रूपमें अपने अन्दर आ जाय जो इस कार्यको, हमारी अनुमति और अभीप्सा रहनेपर, पूरा कर सकती है ।
यह कहना कठिन है कि कोई विशिष्ट गुण मनुष्यको योग्य बनाता है अथवा उसका अभाव अयोग्य । किसीमें प्रबल कामावेग, शंका-संदेह, विद्रोह-भाव हो सकता है और फिर भी अन्तमें वह सफल हो सकता है, जब कि दूसरा व्यक्ति असफल हो सकता है । यदि किसीके अन्दर मौलिक सच्चाई हो, सभी चीजोंके बावजूद अन्ततक चले जानेका संकल्प हो और सरल- निश्छल बने रहनेकी तत्परता हो तो साधनामें यही सबसे उत्तम सुरक्षा देनेवाली वस्तु होती है ।
जब कोई सच्ची ( यौगिक) चेतनामें प्रवेश करता है तो तुम देखते हो कि सब कुछ किया जा सकता है, यदि अभी केवल जरा-सा प्रारम्भ ही क्यों न किया गया हो; प्रारम्भ करना पर्याप्त है, क्योंकि दिव्य शक्ति, भागवत वल-सामर्थ्य वहां विद्यमान
है। वास्तवमे देखा जाय तो बाहरी प्रकृतिकी क्षमतापर सफलता निर्भर नही करती, (बाह्य प्रकृतिके लिये सपूर्ण आत्मातिक्रमण असम्भव रूपमें कठिन प्रतीत होता है ), परन्तु आतरिक सत्ताके वलपर और आतरिक सत्ताके लिये सव कुछ सम्भव है । मनुष्यको केवल आतरसत्ताके साथ संपर्क स्थापित करना होगा और आंतरकी सहायतासे वाह्य दृष्टि ओर चेतनाको परिवर्तित करना होगा। यही साधनाका कार्य है और मच्चाई, अभीप्सा तथा धैर्य होनेपर उसका आना सुनिश्चित है।
तुम्हे यह समझ लेना चाहिये कि ये मनोभाव ऐसे आक्रमण है जिनका तुम्हें तुरन्त परित्याग कर देना चाहिये क्योकि ये और किसी चीजपर नही, बल्कि अपने ऊपर अविश्वास तथा असमर्थताके सुझावोंपर अवलवित होते है जिनका कोई अर्थ नहीं होता, क्योंकि सच पूछा जाय तो तुम अपनी क्षमता और योग्यताके वलपर नहीं बल्कि भगवान्की कृपा तथा अपनेसे कही महत्तर किसी दिव्य शक्तिकी सहायतासे ही साधनाके लक्ष्यको सिद्ध कर सकते हो। तुम्हें इस बातको याद रखना होगा और जब ये सूचनाए आये तो इनसे अपनेको पृथक् कर लेना होगा, कभी भी इन्हें न तो स्वीकार करना होगा या न इनके वशमें होना होगा। किसी साधकमें यदि प्राचीन ऋषियों और तपस्वियोका सामर्थ्य या विवेकानन्दका वल भी हो तो भी वह अपनी साधनाके प्रारम्भिक वर्षोमे लगातार अच्छी स्थिति या भगवान्के साथ एकत्व या अटूट पुकार या अभीप्साकी ऊचाईको बनाये रखनेकी आशा नहीं कर सकता । समस्त प्रकृतिको अध्यात्मभावापन्न बनानेमें लम्बा समय लगता है और जबतक यह नही हो जाता तबतक उतार-चढाव अवश्य होगा । एक प्रकारके सतत विश्वास और धैर्यको विकसित करन होगा प्राप्त करना होगा जरा भी कम नही जव कि परिस्थितियां प्रतिकूल क्योंकि जब वे अनुकूल होती है, विश्वास और धैर्यको बनाये रखना आसान होता है ।
यह कहनेकी आवश्यकता नही कि जिन गुणोंकी चर्चा तुम करते हो वे आध्यात्मिक पथकी ओर जानेमें सहायक होते है, जब कि जिन दोपोंको तुम गिनाते हो उनमें से प्रत्येक इस पथका एक बहुत बड़ा रोड़ा है। आध्यात्मिक प्रयासके लिये सच्चाईका होना विशेष रूपसे अत्यन्त आवश्यक है और कुटिलता एक स्थायी बाधा है । सात्त्विक प्रकृतिको आध्यात्मिक जीवनके लिये सदासे अत्यन्त उपयुक्त और अनुकूल माना जाता रहा है, जब कि राजसिक प्रकृति अपनी कामनाओं और आवेगोंके द्वारा भाराक्रात रहती है । और आध्यात्मिकता एक ऐसी चीज है जो द्वन्होंसे परे होती है, और इसके लिये सबसे अधिक आवश्यकता होती है एक सच्ची ऊर्ध्वमुखी
अभीप्साकी । यह अभीप्सा राजसिक मनुष्यमें भी उठ सकती है और सात्विक मनुष्यमें भी । यदि यह उठती है तो उसके द्वारा राजसिक मनुष्य ठीक उसी तरह अपनी दुर्बलताओं और कामनाओं और आवेगोंसे ऊपर उठकर भागवत पवित्रता और ज्योति और प्रेमतक पहुँच सकता है जैसे कि दूसरा अपने पुण्योंसे ऊपर उठकर वहां पहुँच सकता है । अवश्य ही, यह केवल तभी हो सकता है जब कि वह अपनी निम्न प्रकृतिको जीत ले और अपने अन्दरसे उसे निकाल फेंके; क्योंकि, वह यदि फिरसे उसमें गिर जाय तो यह सम्भव है कि वह पथसे पतित हो जाय अथवा कम-से-कम, जबतक वह गिरावटकी स्थिति बनी रहे तबतक, उसके कारण अपनी आंतरिक प्रगति करनेसे रुका रहे । पर तो भी, धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास में प्रायः ही बडे-बड़े पापियोंका महान् सन्तोंमें, कम गुणगाली या गुणहीन मनुष्योंका आध्यात्मिक विज्ञासुओं और ईश्वर प्रेमियोमें परिवर्तन होता रहा है जैसे, यूरोपमें सन्त ऑगस्टीन, भारतमे चैतन्यके जगाई और मधाई, विल्वमंगल तथा अनेक दूसरे लोग । भगवान्का गृह किसी व्यक्तिके लिये बन्द नही रहता जो सच्चाईके साथ उसके दरवाजोंको खटखटाता है, चाहे पहले उसमें जितनी भी भूल-भ्रांतियां और दोप-त्रुटियां क्यों न रही हों । मानवीय गुण और मानवीय दोप हमारे अन्दर विद्यमान दिव्य तत्त्वके सफेद और काले आवरण हैं जिन्हें यदि एक बार वह तत्त्व भेद दे तो इन दोनोंके भीतरसे वह आत्माकी ऊंचाइयोंकी ओर प्रज्वलित हो सकता
भगवान्के सम्मुख विनम्रता भी आव्यात्मिक जीवनका एक अपरिहार्य गुण है, और आध्यात्मिक घमंड, दंभ या मिथ्याभिमान और अपने-आपपर ही भरोसा सर्वदा नीचेकी ओर धकेलते हैं । परन्तु भगवान्पर विश्वास और अपनी आध्यात्मिक भवि तव्यतापर विश्वास ( अर्थात् यह भाव कि चूँकि मेरा हृदय और अन्तरात्मा भगवान्को खोजते है, मैं उन्हें प्राप्त करने में असफल नही हो सकता ) - ये मार्गकी कठिनाइ योंको देखते हुए बहुत आवश्यक हैं। दूसरोंके प्रति घृणा-भाव रखना अनुचित है, विशेषकर इस कारण कि भगवान् सबके अन्दर विराजमान हैं। स्पष्ट ही मनुष्योंकी क्रियाएं और अभीप्साएं तुच्छ और मूल्यहीन नही है, क्योंकि समस्त जीवन ही अन्तरात्माका अन्धकारसे निकलकर ज्योतिकी ओर अग्रसर होना है। परन्तु हमारा मनोभाव यह है कि मनुष्यजाति मनद्वारा गृहीत सामान्य उपायोंसे, राजनीति, सामाजिक सुधार, लोकोपकार आदिके द्वारा अपनी सीमाओंसे बाहर नहीं जा सकती -- ये चीजें केवल सामयिक या स्थानिक औषधियां हो सकती हैं। निस्तार पानेका एकमात्र सच्चा उपाय है चेतनाका परिवर्तन, होनेकी एक महत्तर, विशालतर और विशुद्धतर पद्धति में परिवर्तन, और उसी परिवर्तनपर आधारित जीवन और कर्म । अतएव उसी चीजकी ओर समस्त शक्तियोंको मोड़ देना चाहिये जब एक बार आध्यात्मिक जागृति पूर्ण हो जाय । इसका अर्थ अवहेलना करना नहीं है, बल्कि जो उपाय निष्फल ज्ञात हुए उनके बदले मात्र फलदायी साधनोंको पसन्द करना है ।
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साथ प्राप्त एकत्वमें निवास कर सके तथा प्रकृति दिव्य ज्ञान, दिव्य शक्ति और दिव्य आनन्दकी क्रियाका क्षेत्र बन जाय । यदि वह इसी चीजको अपने जीवनका चरम उद्देश्य बना ले और बाकी सभी चीजोंको इसी एक उद्देश्यके अधीन कर देनेके लिये तैयार हो जाय तो केवल तभी वह ऐसा करनेमें सफल हो सकता है। अन्यथा इस जीवनमें वह केवल थोड़ीसी तैयारी ही कर सकता है एक प्रकारका प्रारंभिक संपर्क प्राप्त कर सकता और अपनी प्रकृतिके किसी अंगमें थोडासा आध्यात्मिक परिवर्तन ला सकता है । सभी लोग अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार कोई-न-कोई योग कर सकते है यदि उनमें उसे करने की इच्छा हो । परन्तु ऐसे थोड़ेसे लोग होते हैं जिनके विषय में यह कहा जा सकता है कि वे इस योगके अधिकारी है। केवल कुछ लोग ही क्षमताका विकास कर सकते हैं, दूसरे नहीं कर सकते । अर्थात् कोई व्यक्ति एकमात्र अपनी निजी क्षमताके बलपर उसे नहीं कर सकता । वस, प्रश्न है अपने आपको इस प्रकार तैयार करना जिसमें कि अपनी निजी नही, वल्कि दिव्य शक्ति पूर्ण रूपमें अपने अन्दर आ जाय जो इस कार्यको, हमारी अनुमति और अभीप्सा रहनेपर, पूरा कर सकती है । यह कहना कठिन है कि कोई विशिष्ट गुण मनुष्यको योग्य बनाता है अथवा उसका अभाव अयोग्य । किसीमें प्रबल कामावेग, शंका-संदेह, विद्रोह-भाव हो सकता है और फिर भी अन्तमें वह सफल हो सकता है, जब कि दूसरा व्यक्ति असफल हो सकता है । यदि किसीके अन्दर मौलिक सच्चाई हो, सभी चीजोंके बावजूद अन्ततक चले जानेका संकल्प हो और सरल- निश्छल बने रहनेकी तत्परता हो तो साधनामें यही सबसे उत्तम सुरक्षा देनेवाली वस्तु होती है । जब कोई सच्ची चेतनामें प्रवेश करता है तो तुम देखते हो कि सब कुछ किया जा सकता है, यदि अभी केवल जरा-सा प्रारम्भ ही क्यों न किया गया हो; प्रारम्भ करना पर्याप्त है, क्योंकि दिव्य शक्ति, भागवत वल-सामर्थ्य वहां विद्यमान है। वास्तवमे देखा जाय तो बाहरी प्रकृतिकी क्षमतापर सफलता निर्भर नही करती, , परन्तु आतरिक सत्ताके वलपर और आतरिक सत्ताके लिये सव कुछ सम्भव है । मनुष्यको केवल आतरसत्ताके साथ संपर्क स्थापित करना होगा और आंतरकी सहायतासे वाह्य दृष्टि ओर चेतनाको परिवर्तित करना होगा। यही साधनाका कार्य है और मच्चाई, अभीप्सा तथा धैर्य होनेपर उसका आना सुनिश्चित है। तुम्हे यह समझ लेना चाहिये कि ये मनोभाव ऐसे आक्रमण है जिनका तुम्हें तुरन्त परित्याग कर देना चाहिये क्योकि ये और किसी चीजपर नही, बल्कि अपने ऊपर अविश्वास तथा असमर्थताके सुझावोंपर अवलवित होते है जिनका कोई अर्थ नहीं होता, क्योंकि सच पूछा जाय तो तुम अपनी क्षमता और योग्यताके वलपर नहीं बल्कि भगवान्की कृपा तथा अपनेसे कही महत्तर किसी दिव्य शक्तिकी सहायतासे ही साधनाके लक्ष्यको सिद्ध कर सकते हो। तुम्हें इस बातको याद रखना होगा और जब ये सूचनाए आये तो इनसे अपनेको पृथक् कर लेना होगा, कभी भी इन्हें न तो स्वीकार करना होगा या न इनके वशमें होना होगा। किसी साधकमें यदि प्राचीन ऋषियों और तपस्वियोका सामर्थ्य या विवेकानन्दका वल भी हो तो भी वह अपनी साधनाके प्रारम्भिक वर्षोमे लगातार अच्छी स्थिति या भगवान्के साथ एकत्व या अटूट पुकार या अभीप्साकी ऊचाईको बनाये रखनेकी आशा नहीं कर सकता । समस्त प्रकृतिको अध्यात्मभावापन्न बनानेमें लम्बा समय लगता है और जबतक यह नही हो जाता तबतक उतार-चढाव अवश्य होगा । एक प्रकारके सतत विश्वास और धैर्यको विकसित करन होगा प्राप्त करना होगा जरा भी कम नही जव कि परिस्थितियां प्रतिकूल क्योंकि जब वे अनुकूल होती है, विश्वास और धैर्यको बनाये रखना आसान होता है । यह कहनेकी आवश्यकता नही कि जिन गुणोंकी चर्चा तुम करते हो वे आध्यात्मिक पथकी ओर जानेमें सहायक होते है, जब कि जिन दोपोंको तुम गिनाते हो उनमें से प्रत्येक इस पथका एक बहुत बड़ा रोड़ा है। आध्यात्मिक प्रयासके लिये सच्चाईका होना विशेष रूपसे अत्यन्त आवश्यक है और कुटिलता एक स्थायी बाधा है । सात्त्विक प्रकृतिको आध्यात्मिक जीवनके लिये सदासे अत्यन्त उपयुक्त और अनुकूल माना जाता रहा है, जब कि राजसिक प्रकृति अपनी कामनाओं और आवेगोंके द्वारा भाराक्रात रहती है । और आध्यात्मिकता एक ऐसी चीज है जो द्वन्होंसे परे होती है, और इसके लिये सबसे अधिक आवश्यकता होती है एक सच्ची ऊर्ध्वमुखी अभीप्साकी । यह अभीप्सा राजसिक मनुष्यमें भी उठ सकती है और सात्विक मनुष्यमें भी । यदि यह उठती है तो उसके द्वारा राजसिक मनुष्य ठीक उसी तरह अपनी दुर्बलताओं और कामनाओं और आवेगोंसे ऊपर उठकर भागवत पवित्रता और ज्योति और प्रेमतक पहुँच सकता है जैसे कि दूसरा अपने पुण्योंसे ऊपर उठकर वहां पहुँच सकता है । अवश्य ही, यह केवल तभी हो सकता है जब कि वह अपनी निम्न प्रकृतिको जीत ले और अपने अन्दरसे उसे निकाल फेंके; क्योंकि, वह यदि फिरसे उसमें गिर जाय तो यह सम्भव है कि वह पथसे पतित हो जाय अथवा कम-से-कम, जबतक वह गिरावटकी स्थिति बनी रहे तबतक, उसके कारण अपनी आंतरिक प्रगति करनेसे रुका रहे । पर तो भी, धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास में प्रायः ही बडे-बड़े पापियोंका महान् सन्तोंमें, कम गुणगाली या गुणहीन मनुष्योंका आध्यात्मिक विज्ञासुओं और ईश्वर प्रेमियोमें परिवर्तन होता रहा है जैसे, यूरोपमें सन्त ऑगस्टीन, भारतमे चैतन्यके जगाई और मधाई, विल्वमंगल तथा अनेक दूसरे लोग । भगवान्का गृह किसी व्यक्तिके लिये बन्द नही रहता जो सच्चाईके साथ उसके दरवाजोंको खटखटाता है, चाहे पहले उसमें जितनी भी भूल-भ्रांतियां और दोप-त्रुटियां क्यों न रही हों । मानवीय गुण और मानवीय दोप हमारे अन्दर विद्यमान दिव्य तत्त्वके सफेद और काले आवरण हैं जिन्हें यदि एक बार वह तत्त्व भेद दे तो इन दोनोंके भीतरसे वह आत्माकी ऊंचाइयोंकी ओर प्रज्वलित हो सकता भगवान्के सम्मुख विनम्रता भी आव्यात्मिक जीवनका एक अपरिहार्य गुण है, और आध्यात्मिक घमंड, दंभ या मिथ्याभिमान और अपने-आपपर ही भरोसा सर्वदा नीचेकी ओर धकेलते हैं । परन्तु भगवान्पर विश्वास और अपनी आध्यात्मिक भवि तव्यतापर विश्वास - ये मार्गकी कठिनाइ योंको देखते हुए बहुत आवश्यक हैं। दूसरोंके प्रति घृणा-भाव रखना अनुचित है, विशेषकर इस कारण कि भगवान् सबके अन्दर विराजमान हैं। स्पष्ट ही मनुष्योंकी क्रियाएं और अभीप्साएं तुच्छ और मूल्यहीन नही है, क्योंकि समस्त जीवन ही अन्तरात्माका अन्धकारसे निकलकर ज्योतिकी ओर अग्रसर होना है। परन्तु हमारा मनोभाव यह है कि मनुष्यजाति मनद्वारा गृहीत सामान्य उपायोंसे, राजनीति, सामाजिक सुधार, लोकोपकार आदिके द्वारा अपनी सीमाओंसे बाहर नहीं जा सकती -- ये चीजें केवल सामयिक या स्थानिक औषधियां हो सकती हैं। निस्तार पानेका एकमात्र सच्चा उपाय है चेतनाका परिवर्तन, होनेकी एक महत्तर, विशालतर और विशुद्धतर पद्धति में परिवर्तन, और उसी परिवर्तनपर आधारित जीवन और कर्म । अतएव उसी चीजकी ओर समस्त शक्तियोंको मोड़ देना चाहिये जब एक बार आध्यात्मिक जागृति पूर्ण हो जाय । इसका अर्थ अवहेलना करना नहीं है, बल्कि जो उपाय निष्फल ज्ञात हुए उनके बदले मात्र फलदायी साधनोंको पसन्द करना है ।
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अनेकान्त दृष्टिलभ्य बौद्धिक अहिंसा का विकास किया जाए तो अन्य भी बहुत सारे संघर्ष टल सकते हैं ।
जहां कही भय या द्वैधभाव बढ़ता है, उसका कारण एकान्त आग्रह ही है। एक रोगी कहे कि मिठाई बहुत हानिकारक वस्तु है - उस स्थिति में स्वस्थ व्यक्ति को एकाएक झेंपना नहीं चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि कोई भी निरपेक्ष वस्तु लाभदायक या हानिकारक नहीं होती । उसकी लाभ और हानि की वृत्ति किसी व्यक्ति विशेष के साथ जुड़ने से बनती है। जहर किसी के लिए जहर है, वही किसी दूसरे के लिए अमृत होता है। परिस्थिति के परिवर्तन में जहर जिसके लिए जहर होता है, उसी के लिए अमृत भी बन जाता है।
११४ गृहस्थ
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अनेकान्त दृष्टिलभ्य बौद्धिक अहिंसा का विकास किया जाए तो अन्य भी बहुत सारे संघर्ष टल सकते हैं । जहां कही भय या द्वैधभाव बढ़ता है, उसका कारण एकान्त आग्रह ही है। एक रोगी कहे कि मिठाई बहुत हानिकारक वस्तु है - उस स्थिति में स्वस्थ व्यक्ति को एकाएक झेंपना नहीं चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि कोई भी निरपेक्ष वस्तु लाभदायक या हानिकारक नहीं होती । उसकी लाभ और हानि की वृत्ति किसी व्यक्ति विशेष के साथ जुड़ने से बनती है। जहर किसी के लिए जहर है, वही किसी दूसरे के लिए अमृत होता है। परिस्थिति के परिवर्तन में जहर जिसके लिए जहर होता है, उसी के लिए अमृत भी बन जाता है। एक सौ चौदह गृहस्थ
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आईएफएफआई गोवा 2017 के दूसरे दिन (21 नवंबर, 2017), एफटीआईआई की शैक्षणिक पत्रिका 'लेंसलाइट' के विशेष संस्करण के अनावरण के बाद शोमैन सुभाष घई ने आईएफएफआई गोवा 2017में मास्टरक्लास के दौरान फिल्म के दीवानों एवं छात्रों को रोमांचित कर दिया और उन्हें उनकी कला का सम्मान करने तथा संबंधित क्षेत्रों में अपनी पहचान स्थापित करने संबंधी बहुमूल्य सुझाव दिया।
विख्यात शोमैन सुभाष घई ने मास्टरक्लास के दौरान फिल्मों को चाहने वाले श्रोताओं को एक फिल्मकार के रूप में अपने संघर्ष, विफलताओं तथा दिलचस्प वाकयों को सुना कर आनंदित और रोमांचित कर दिया कि किस प्रकार उन्होंने कई अन्य विषयों के अतिरिक्त कालीचरण, विधाता, खलनायक एवं कर्मा जैसी सुपरहिट संगीतमय फिल्में बनाईं।
'भविष्य में क्या' के साथ बातचीत की शुरुआत करते हुए सुभाष घई ने अपने व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीवन से संबंधित कई टॉपिक को छुआ जिसने सभागार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित किया।
उन्होंने एक साल में शीर्ष निर्माताओं को छह कहानियां बेचने से लेकर दिलीप कुमार एवं राजकुमार के बीच दरार पर विवादों के बावजूद 11 महीने में सौदागर बनाने के वाकये का जिक्र किया। साथ ही, यह भी बताया कि 2017 हिन्दी सिनेमा के लिए कोई सार्थक वर्ष नहीं रहा है। उपस्थित जनसमूह के साथ सुभाष घई की बातचीत एक रहस्योद्घाटन साबित हुई।
सुभाष घई आईएफएफआई गोवा में नियमित रूप से आते रहे हैं और समारोह के आयोजकों को अपने बहुमूल्य परामर्श देते रहे हैं। आईएफएफआई का 48वां संस्करण गोवा में 20 से 28 नवंबर, 2017 तक मनाया जा रहा है।
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Posted On: आईएफएफआई गोवा दो हज़ार सत्रह के दूसरे दिन , एफटीआईआई की शैक्षणिक पत्रिका 'लेंसलाइट' के विशेष संस्करण के अनावरण के बाद शोमैन सुभाष घई ने आईएफएफआई गोवा दो हज़ार सत्रहमें मास्टरक्लास के दौरान फिल्म के दीवानों एवं छात्रों को रोमांचित कर दिया और उन्हें उनकी कला का सम्मान करने तथा संबंधित क्षेत्रों में अपनी पहचान स्थापित करने संबंधी बहुमूल्य सुझाव दिया। विख्यात शोमैन सुभाष घई ने मास्टरक्लास के दौरान फिल्मों को चाहने वाले श्रोताओं को एक फिल्मकार के रूप में अपने संघर्ष, विफलताओं तथा दिलचस्प वाकयों को सुना कर आनंदित और रोमांचित कर दिया कि किस प्रकार उन्होंने कई अन्य विषयों के अतिरिक्त कालीचरण, विधाता, खलनायक एवं कर्मा जैसी सुपरहिट संगीतमय फिल्में बनाईं। 'भविष्य में क्या' के साथ बातचीत की शुरुआत करते हुए सुभाष घई ने अपने व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक जीवन से संबंधित कई टॉपिक को छुआ जिसने सभागार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित किया। उन्होंने एक साल में शीर्ष निर्माताओं को छह कहानियां बेचने से लेकर दिलीप कुमार एवं राजकुमार के बीच दरार पर विवादों के बावजूद ग्यारह महीने में सौदागर बनाने के वाकये का जिक्र किया। साथ ही, यह भी बताया कि दो हज़ार सत्रह हिन्दी सिनेमा के लिए कोई सार्थक वर्ष नहीं रहा है। उपस्थित जनसमूह के साथ सुभाष घई की बातचीत एक रहस्योद्घाटन साबित हुई। सुभाष घई आईएफएफआई गोवा में नियमित रूप से आते रहे हैं और समारोह के आयोजकों को अपने बहुमूल्य परामर्श देते रहे हैं। आईएफएफआई का अड़तालीसवां संस्करण गोवा में बीस से अट्ठाईस नवंबर, दो हज़ार सत्रह तक मनाया जा रहा है।
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क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका (CSA) ने 2020-21 सीजन के लिए घरेलू अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है, जिसमें वह इंग्लैंड, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान की टीमों की मेजबानी करेगी। साउथ अफ्रीका की टीम मार्च में भारत दौरे पर आई थी। कोरोनावायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते सीरीज रद्द कर दी गई थी। इसके बाद से ही साउथ अफ्रीका ने कोई सीरीज नहीं खेली है।
घरेलू सीजन के अनुसार, दक्षिण अफ्रीकी टीम इंग्लैंड के खिलाफ 27 नवंबर से नौ दिसंबर तक तीन टी20 और तीन वनडे मैचों की सीरीज खेलेगी। इसके बाद वह 26 दिसंबर से सात जनवरी तक श्रीलंका के खिलाफ दो टेस्ट मैच खेलेगी।
इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई टीम फरवरी-मार्च में तीन टेस्ट मैचों की टेस्ट सीरीज के लिए दक्षिण अफ्रीका का दौरा करेगी। ऑस्ट्रेलिया के बाद पाकिस्तान भी अप्रैल के अंत में तीन वनडे और तीन टी20 मैचों की सीरीज खेलने की दक्षिण अफ्रीका जाएगी।
सीएसए के कार्यवाहक सीईओ कुगेंद्री गोवेंडर ने एक बयान में कहा, हमें घरेलू सीजन के लिए पुरुषों के अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है। हमारे क्रिकेट फैन्स के लिए अधिक खुशखबरी देने के लिए यह एक खुशी है। पिछले सप्ताह की पुष्टि के बाद इंग्लैंड के खिलाफ मैचों और घरेलू सीजन का कार्यक्रम जारी।
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क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका ने दो हज़ार बीस-इक्कीस सीजन के लिए घरेलू अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है, जिसमें वह इंग्लैंड, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान की टीमों की मेजबानी करेगी। साउथ अफ्रीका की टीम मार्च में भारत दौरे पर आई थी। कोरोनावायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते सीरीज रद्द कर दी गई थी। इसके बाद से ही साउथ अफ्रीका ने कोई सीरीज नहीं खेली है। घरेलू सीजन के अनुसार, दक्षिण अफ्रीकी टीम इंग्लैंड के खिलाफ सत्ताईस नवंबर से नौ दिसंबर तक तीन टीबीस और तीन वनडे मैचों की सीरीज खेलेगी। इसके बाद वह छब्बीस दिसंबर से सात जनवरी तक श्रीलंका के खिलाफ दो टेस्ट मैच खेलेगी। इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई टीम फरवरी-मार्च में तीन टेस्ट मैचों की टेस्ट सीरीज के लिए दक्षिण अफ्रीका का दौरा करेगी। ऑस्ट्रेलिया के बाद पाकिस्तान भी अप्रैल के अंत में तीन वनडे और तीन टीबीस मैचों की सीरीज खेलने की दक्षिण अफ्रीका जाएगी। सीएसए के कार्यवाहक सीईओ कुगेंद्री गोवेंडर ने एक बयान में कहा, हमें घरेलू सीजन के लिए पुरुषों के अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है। हमारे क्रिकेट फैन्स के लिए अधिक खुशखबरी देने के लिए यह एक खुशी है। पिछले सप्ताह की पुष्टि के बाद इंग्लैंड के खिलाफ मैचों और घरेलू सीजन का कार्यक्रम जारी।
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यहाँ पहुँच भी गयी है। आज सुबह ही माली ने यह सूचना दी थी । मदाम ह्यूगों ने वात पूरी की।
इस वार सब लोग वास्तव में चकित रह गये और एक दूसरे की तरफ देखने लगे । क्या ? नाना आ गयी ! वे लोग तो सोच रहे थे कि कल तक नाना आयेगी और वे उससे पहले ही पहुँच जायँगे । केवल जर्ज इन लोगों में से किसी की तरफ नहीं देख रहा था ।
खाना लगभग खत्म हो चुका था और वे सब बाद को घूमने जाने की बात कर रहे थे । फॉशेरी काउन्टेस सैवाइन के प्रति और भी ज्यादा आकर्षित हो गया था । फॉशेरी ने फलों की तश्तरी उनकी तरफ बढ़ायी और उन दोनों के हाथ छू गये-खें मिल गयीं और सैवाइन की
की रहस्यपूर्ण गहराइयों में फॉशेरी खो गया । ऊदे रंग के रेशम के गाउन के नीचे से उभरती हुई सैवाइन के शरीर की नाजुक मगर उत्तेजक गोलाइयों ने फॉशेरी को पूर्णतया मोहित कर लिया। सैवाइन की उस एक गहरी दृष्टि में फॉशेरी को एक नया सन्देश मिला ।
सव लोग खाने की मेज से उठ पड़े - सबसे पीछे डगेनेंट और फॉशेरी रह गये थे। डगेनेंट एस्टील के दुबले- लकड़ी की तरह सूखे हुए शरीर के बारे में भद्दे मजाक कर रहा था लेकिन वह फौरन ही गम्भीर हो गया, जव फॉशेरी ने उसे बताया कि एस्टील के साथ शादी करने वालों को चार लाख फ्रैंक दहेज में मिलेंगे।
वर्षा होनी शुरू हो गयी थी इसलिए उन लोगों में से कोई बाहर घूमने नहीं जा रहा था । जार्ज खाना खत्म होने के बाद फौरन ही अपने कमरे में चला गया था। जितने लोग वाहर से आये थे वे सव जानते थे कि इस विशेष समय पर वे लोग वहाँ क्यों इकट्ठे हुए हैं । लेकिन 'वीनस' के इतने चाहने वालों में काउन्ट मफेट ही सिर्फ ऐसे थे जिनके दिल को इच्छा, वासना, क्रोध और उत्तेजना भकभोर डाल रही थी। उनके अन्दर तड़प थी - आग थी जो उनके व्यक्तित्व को
श्रन्दर ही अन्दर जताये डाल रही थी । उनको गुस्सा या रहा था। गाना ने तो उनसे वायदा किया था --नाना उनकी प्रतीक्षा कर रही थी फिर क्यों यह यहाँ दो दिन पहले चली आयी ? काउन्ट ने निश्चय कर लिया कि वह रात को सोने के बाद नाना के यहाँ अवश्य जायेंगे ।
गत को जब काउन्ट नाना के यहाँ जाने के लिए 'लॉ फान्दे' के प्रदाते के बाहर निकले तो जार्ज उनके पीछे-पीछे था । काउन्ट लम्बे रास्ते से नाना के घर की तरफ बढ़े और जार्ज नजडीक रास्ते से नदी पार करके नाना के घर पहुँच गया। उसकी आँखों में और निराशा के ग्रांगू थे। मर्केट उससे क्यों मिलने श्रा रहा था ? नाना ने अवश्य ही उससे मिलने का वायदा किया होगा । नाना को श्राश्चर्य हुआ जार्ज की इस ईर्ष्या पर, उसने जार्ज को अपने श्रालिंगन में बांध कर समझाया । वह गलत समझ रहा है, उसने किसी से मिलने का वायदा नहीं किया था। मगर मफेट या रहा था तो उसमें नाना का क्या टोप ? जार्ज भी कितना बुधू है कि बिना कारण इतना दुसी और परेशान हो गया। नाना ने अपने बच्चे की कसम खाकर कहा कि वह जार्ज के अतिरिक्त किसी और से प्रेम नहीं करती। यह कहते हुए उसने जार्ज को चूम लिया और उसके दिये। और जब जार्ज कुछ शांत हुआ तो नाना बोली'तुम जानते हो कि यह सब तुम्हारे ही लिए तो है। लेकिन, जार्ज स्टीनर भी छा गया है और ऊपर कमरे में है; उसे यहाँ से भेज देना तो असम्भव है !'
'स्टीनर के यहाँ होने में मुझे कोई श्रापत्ति नहीं !'
'टीनरमी अपने कमरे में ही है - मैंने बहाना कर दिया है कि मेरी तबियत टीक नहीं है। तुम जाकर मेरे कमरे में छिप जाम्रो - में श्रमी थोड़ी देर में तो हूँ ।' नाना ने कहा।
जार्ज हर्ष से उछल
पड़ा । तब तो यह सन्य मालूम पड़ता है कि
नाना उससे थोड़ा-बहुत प्रेम अवश्य करती है । और जार्ज सोचने लगा कि कल की भाँति आज फिर वही सब कुछ होगा। तभी वाहर घण्टों वजी और जार्ज नाना के कमरे में जाकर एक पर्दे के पीछे छिप
काउन्ट मफेट के आने से नाना कुछ परेशान हो गयी थी । उसने वास्तव में पैरिस में काउन्ट से वायदा कर दिया था और वह यह चाहती थी कि अपना वायदा निभाये भी । काउन्ट जैसे बड़े आदमी को फँसा कर लाभ ही लाभ था । लेकिन कल जो कुछ हुआ था वह नाना पहले तो नहीं जानती थी और उस बात ने बहुत अन्तर ला दिया था । जो कुछ कल हुआ था वह कितना शांत, सुखद और सुन्दर था, और वैसा अगर हमेशा हो सकता तो कितना अच्छा होता ! लेकिन अब तो यह मफेट आ गया था ! पिछले तीन महीनों से नाना उसे वरावर टालती आ रही थी और इस कारण काउन्ट की उत्तेजना दूनी-चौगुनी बढ़ गयी थी । काउन्ट भी इन्तजार करना पड़ेगा । उन्हें अच्छा लगे तो चले
जायँ । जार्ज से बेवफाई करने से अच्छा तो यह है कि वह इन स को - इनके धन और उपहारों को छोड़ दे ।
काउन्ट एक कुर्सी पर बैठे हुए थे । वैसे ऊपर से वह काफी श दिखायी पड़ते थे लेकिन उनके हाथ काँप रहे थे । नाना के प्रलोभ ने उनके अन्दर तूफान जैसी उत्तेजना पैदा कर दी थी - एक भयं वासना जो उनके शरीर को अन्दर ही खाये जा रही थी । वादशाह एक सम्मानित दरवारी- समाज का एक प्रतिष्ठित सदस्य रात को कमरे की तनहाई में अक्सर रो रो पड़ता था, चीख उठता था, व उत्तेजना से । उनकी आँखों के सामने नाना का वही नग्न और म रूप हमेशा नाचा करता था और उनके शरीर का हर परमाणु ऊ को पाने की तीव्र इच्छा से पैदा हुई पीड़ा से तिलमिला उठता था ।
फाते समय भी उनके दिल में वही स्वाय मचल रहे थे इस बार यहाँ पहुँच कर वह अपने दिल में धधकती हुई उत्तेजना को अवश्य शात कर लेना चाहते थे-गर जरूरत होती तो वह जबरदस्ती करने को भी तैयार थे। थोड़ी देर बात करने के बाद ही फाउन्ट ने नाना को अपनी बाहों में भर लेने का प्रयत्न किया ।
'नहीं नहीं ! यह क्या कर रहे हैं श्राप !" नाना ने बिना नाराक हुए-मुस्कुराते हुए कड्डा ।
लेकिन काउन्ड ने नाना को श्रालिंगन में जन ही लिया- उनके दाँत मिचे हुए थे। श्रर जितना ही नाना ने उनके बाहुपाश से छूटने का प्रयत्न किया, उतनी ही उनकी पाशविकता बढ़ती गयी। काउन्ट ने साफ-साफ कह दिया कि वह क्या चाहते हैं । श्रम तो कुछ देर भी इन्तजार करना काउन्ट के लिए असम्भव था । नाना श्रम बहुत प्रेम से बोल रही थी ताकि उसके मना करने से काउन्ट को उतनी पीड़ा न पहुँचे।
'मुनो - डालिङ्ग ~ इस समय यह कैसे सम्भव हो सकता है - स्टीनर ऊपर के कमरे में है !"
लेविन मफेट को उजत्तेना ने बिल्कुल पागल बना दिया था। नाना को कुछ डर लगने लगा था फाउन्ट से, इस अवस्था में देस कर । मफेट के मुँह से वासना के धधकते हुए शब्द निकल रहे थे। नाना ने उनके मुँह पर हाथ रख कर उन्हें शांत करने की कोशिश की। स्टीनर सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था - नाना जीव दुविधा में थी। उसने मपेट से कहा : 'छोड़ दो - देसो स्टीनर श्रा रहा है - छोड़ दो !"
जब स्टीनर कमरे में घुसा तो नाना श्राराम कुर्सी पर लेटी हुई कह रही थी- 'मुझे तो गाँव का जीवन बहुत ही प्यारा लगता है।'
स्टीनर को देखकर वह उसी शात भाव से बोली : दिलो, डार्लिंग -
नाना उससे थोड़ा-बहुत प्रेम अवश्य करती है। और जार्ज सोचने लगा कि कल की भाँति फिर वही सब कुछ होगा । तभी बाहर घण्टों वजी और जार्ज नाना के कमरे में जाकर एक पर्दे के पीछे छिप
काउन्ट मफेट के आने से नाना कुछ परेशान हो गयी थी । उसने वास्तव में पैरिस में काउन्ट से वायदा कर दिया था और वह यह चाहती थी कि अपना वायदा निभाये भी । काउन्ट जैसे बड़े आदमी को फँसा कर लाभ ही लाभ था। लेकिन कल जो कुछ हुआ था वह नाना पहले तो नहीं जानती थी और उस बात ने बहुत अन्तर ला दिया था । जो कुछ कल हुआ था वह कितना शांत, सुखद और सुन्दर था, और वैसा अगर हमेशा हो सकता तो कितना अच्छा होता ! लेकिन अब तो यह मफेट या गया था ! पिछले तीन महीनों से नाना उसे वरावर टालती आ रही थी और इस कारण काउन्ट की उत्तेजना दूनी चौगुनी बढ़ गयी थी । काउन्ट इन्तजार करना पड़ेगा । उन्हें अच्छा लगे तो चज्ञे जायें । जार्ज से बेवफाई करने से तो यह है कि वह इन सब अच्छा को - इनके धन और उपहारों को छोड़ दे ।
काउन्ट एक कुर्सी पर बैठे हुए थे । वैसे ऊपर से वह काफी शांत दिखायी पड़ते थे लेकिन उनके हाथ काँप रहे थे । नाना के प्रलोभनों ने उनके अन्दर तूफान जैसी उत्तेजना पैदा कर दी थी - एक भयंकर वासना जो उनके शरीर को अन्दर ही खाये जा रही थी । वादशाह का एक सम्मानित दरवारी-समाज का एक प्रतिष्ठित सदस्य रात को अपने कमरे की तनहाई में अक्सर रो रो पड़ता था, चीख उठता था, कुंठित उत्तेजना से । उनकी आँखों के सामने नाना का वही नग्न और मांसल रूप हमेशा नाचा करता था और उनके शरीर का हर परमाणु उस रूप को पाने की तीव्र इच्छा से पैदा हुई पीड़ा से तिलमिला उठता था 'लॉM
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यहाँ पहुँच भी गयी है। आज सुबह ही माली ने यह सूचना दी थी । मदाम ह्यूगों ने वात पूरी की। इस वार सब लोग वास्तव में चकित रह गये और एक दूसरे की तरफ देखने लगे । क्या ? नाना आ गयी ! वे लोग तो सोच रहे थे कि कल तक नाना आयेगी और वे उससे पहले ही पहुँच जायँगे । केवल जर्ज इन लोगों में से किसी की तरफ नहीं देख रहा था । खाना लगभग खत्म हो चुका था और वे सब बाद को घूमने जाने की बात कर रहे थे । फॉशेरी काउन्टेस सैवाइन के प्रति और भी ज्यादा आकर्षित हो गया था । फॉशेरी ने फलों की तश्तरी उनकी तरफ बढ़ायी और उन दोनों के हाथ छू गये-खें मिल गयीं और सैवाइन की की रहस्यपूर्ण गहराइयों में फॉशेरी खो गया । ऊदे रंग के रेशम के गाउन के नीचे से उभरती हुई सैवाइन के शरीर की नाजुक मगर उत्तेजक गोलाइयों ने फॉशेरी को पूर्णतया मोहित कर लिया। सैवाइन की उस एक गहरी दृष्टि में फॉशेरी को एक नया सन्देश मिला । सव लोग खाने की मेज से उठ पड़े - सबसे पीछे डगेनेंट और फॉशेरी रह गये थे। डगेनेंट एस्टील के दुबले- लकड़ी की तरह सूखे हुए शरीर के बारे में भद्दे मजाक कर रहा था लेकिन वह फौरन ही गम्भीर हो गया, जव फॉशेरी ने उसे बताया कि एस्टील के साथ शादी करने वालों को चार लाख फ्रैंक दहेज में मिलेंगे। वर्षा होनी शुरू हो गयी थी इसलिए उन लोगों में से कोई बाहर घूमने नहीं जा रहा था । जार्ज खाना खत्म होने के बाद फौरन ही अपने कमरे में चला गया था। जितने लोग वाहर से आये थे वे सव जानते थे कि इस विशेष समय पर वे लोग वहाँ क्यों इकट्ठे हुए हैं । लेकिन 'वीनस' के इतने चाहने वालों में काउन्ट मफेट ही सिर्फ ऐसे थे जिनके दिल को इच्छा, वासना, क्रोध और उत्तेजना भकभोर डाल रही थी। उनके अन्दर तड़प थी - आग थी जो उनके व्यक्तित्व को श्रन्दर ही अन्दर जताये डाल रही थी । उनको गुस्सा या रहा था। गाना ने तो उनसे वायदा किया था --नाना उनकी प्रतीक्षा कर रही थी फिर क्यों यह यहाँ दो दिन पहले चली आयी ? काउन्ट ने निश्चय कर लिया कि वह रात को सोने के बाद नाना के यहाँ अवश्य जायेंगे । गत को जब काउन्ट नाना के यहाँ जाने के लिए 'लॉ फान्दे' के प्रदाते के बाहर निकले तो जार्ज उनके पीछे-पीछे था । काउन्ट लम्बे रास्ते से नाना के घर की तरफ बढ़े और जार्ज नजडीक रास्ते से नदी पार करके नाना के घर पहुँच गया। उसकी आँखों में और निराशा के ग्रांगू थे। मर्केट उससे क्यों मिलने श्रा रहा था ? नाना ने अवश्य ही उससे मिलने का वायदा किया होगा । नाना को श्राश्चर्य हुआ जार्ज की इस ईर्ष्या पर, उसने जार्ज को अपने श्रालिंगन में बांध कर समझाया । वह गलत समझ रहा है, उसने किसी से मिलने का वायदा नहीं किया था। मगर मफेट या रहा था तो उसमें नाना का क्या टोप ? जार्ज भी कितना बुधू है कि बिना कारण इतना दुसी और परेशान हो गया। नाना ने अपने बच्चे की कसम खाकर कहा कि वह जार्ज के अतिरिक्त किसी और से प्रेम नहीं करती। यह कहते हुए उसने जार्ज को चूम लिया और उसके दिये। और जब जार्ज कुछ शांत हुआ तो नाना बोली'तुम जानते हो कि यह सब तुम्हारे ही लिए तो है। लेकिन, जार्ज स्टीनर भी छा गया है और ऊपर कमरे में है; उसे यहाँ से भेज देना तो असम्भव है !' 'स्टीनर के यहाँ होने में मुझे कोई श्रापत्ति नहीं !' 'टीनरमी अपने कमरे में ही है - मैंने बहाना कर दिया है कि मेरी तबियत टीक नहीं है। तुम जाकर मेरे कमरे में छिप जाम्रो - में श्रमी थोड़ी देर में तो हूँ ।' नाना ने कहा। जार्ज हर्ष से उछल पड़ा । तब तो यह सन्य मालूम पड़ता है कि नाना उससे थोड़ा-बहुत प्रेम अवश्य करती है । और जार्ज सोचने लगा कि कल की भाँति आज फिर वही सब कुछ होगा। तभी वाहर घण्टों वजी और जार्ज नाना के कमरे में जाकर एक पर्दे के पीछे छिप काउन्ट मफेट के आने से नाना कुछ परेशान हो गयी थी । उसने वास्तव में पैरिस में काउन्ट से वायदा कर दिया था और वह यह चाहती थी कि अपना वायदा निभाये भी । काउन्ट जैसे बड़े आदमी को फँसा कर लाभ ही लाभ था । लेकिन कल जो कुछ हुआ था वह नाना पहले तो नहीं जानती थी और उस बात ने बहुत अन्तर ला दिया था । जो कुछ कल हुआ था वह कितना शांत, सुखद और सुन्दर था, और वैसा अगर हमेशा हो सकता तो कितना अच्छा होता ! लेकिन अब तो यह मफेट आ गया था ! पिछले तीन महीनों से नाना उसे वरावर टालती आ रही थी और इस कारण काउन्ट की उत्तेजना दूनी-चौगुनी बढ़ गयी थी । काउन्ट भी इन्तजार करना पड़ेगा । उन्हें अच्छा लगे तो चले जायँ । जार्ज से बेवफाई करने से अच्छा तो यह है कि वह इन स को - इनके धन और उपहारों को छोड़ दे । काउन्ट एक कुर्सी पर बैठे हुए थे । वैसे ऊपर से वह काफी श दिखायी पड़ते थे लेकिन उनके हाथ काँप रहे थे । नाना के प्रलोभ ने उनके अन्दर तूफान जैसी उत्तेजना पैदा कर दी थी - एक भयं वासना जो उनके शरीर को अन्दर ही खाये जा रही थी । वादशाह एक सम्मानित दरवारी- समाज का एक प्रतिष्ठित सदस्य रात को कमरे की तनहाई में अक्सर रो रो पड़ता था, चीख उठता था, व उत्तेजना से । उनकी आँखों के सामने नाना का वही नग्न और म रूप हमेशा नाचा करता था और उनके शरीर का हर परमाणु ऊ को पाने की तीव्र इच्छा से पैदा हुई पीड़ा से तिलमिला उठता था । फाते समय भी उनके दिल में वही स्वाय मचल रहे थे इस बार यहाँ पहुँच कर वह अपने दिल में धधकती हुई उत्तेजना को अवश्य शात कर लेना चाहते थे-गर जरूरत होती तो वह जबरदस्ती करने को भी तैयार थे। थोड़ी देर बात करने के बाद ही फाउन्ट ने नाना को अपनी बाहों में भर लेने का प्रयत्न किया । 'नहीं नहीं ! यह क्या कर रहे हैं श्राप !" नाना ने बिना नाराक हुए-मुस्कुराते हुए कड्डा । लेकिन काउन्ड ने नाना को श्रालिंगन में जन ही लिया- उनके दाँत मिचे हुए थे। श्रर जितना ही नाना ने उनके बाहुपाश से छूटने का प्रयत्न किया, उतनी ही उनकी पाशविकता बढ़ती गयी। काउन्ट ने साफ-साफ कह दिया कि वह क्या चाहते हैं । श्रम तो कुछ देर भी इन्तजार करना काउन्ट के लिए असम्भव था । नाना श्रम बहुत प्रेम से बोल रही थी ताकि उसके मना करने से काउन्ट को उतनी पीड़ा न पहुँचे। 'मुनो - डालिङ्ग ~ इस समय यह कैसे सम्भव हो सकता है - स्टीनर ऊपर के कमरे में है !" लेविन मफेट को उजत्तेना ने बिल्कुल पागल बना दिया था। नाना को कुछ डर लगने लगा था फाउन्ट से, इस अवस्था में देस कर । मफेट के मुँह से वासना के धधकते हुए शब्द निकल रहे थे। नाना ने उनके मुँह पर हाथ रख कर उन्हें शांत करने की कोशिश की। स्टीनर सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था - नाना जीव दुविधा में थी। उसने मपेट से कहा : 'छोड़ दो - देसो स्टीनर श्रा रहा है - छोड़ दो !" जब स्टीनर कमरे में घुसा तो नाना श्राराम कुर्सी पर लेटी हुई कह रही थी- 'मुझे तो गाँव का जीवन बहुत ही प्यारा लगता है।' स्टीनर को देखकर वह उसी शात भाव से बोली : दिलो, डार्लिंग - नाना उससे थोड़ा-बहुत प्रेम अवश्य करती है। और जार्ज सोचने लगा कि कल की भाँति फिर वही सब कुछ होगा । तभी बाहर घण्टों वजी और जार्ज नाना के कमरे में जाकर एक पर्दे के पीछे छिप काउन्ट मफेट के आने से नाना कुछ परेशान हो गयी थी । उसने वास्तव में पैरिस में काउन्ट से वायदा कर दिया था और वह यह चाहती थी कि अपना वायदा निभाये भी । काउन्ट जैसे बड़े आदमी को फँसा कर लाभ ही लाभ था। लेकिन कल जो कुछ हुआ था वह नाना पहले तो नहीं जानती थी और उस बात ने बहुत अन्तर ला दिया था । जो कुछ कल हुआ था वह कितना शांत, सुखद और सुन्दर था, और वैसा अगर हमेशा हो सकता तो कितना अच्छा होता ! लेकिन अब तो यह मफेट या गया था ! पिछले तीन महीनों से नाना उसे वरावर टालती आ रही थी और इस कारण काउन्ट की उत्तेजना दूनी चौगुनी बढ़ गयी थी । काउन्ट इन्तजार करना पड़ेगा । उन्हें अच्छा लगे तो चज्ञे जायें । जार्ज से बेवफाई करने से तो यह है कि वह इन सब अच्छा को - इनके धन और उपहारों को छोड़ दे । काउन्ट एक कुर्सी पर बैठे हुए थे । वैसे ऊपर से वह काफी शांत दिखायी पड़ते थे लेकिन उनके हाथ काँप रहे थे । नाना के प्रलोभनों ने उनके अन्दर तूफान जैसी उत्तेजना पैदा कर दी थी - एक भयंकर वासना जो उनके शरीर को अन्दर ही खाये जा रही थी । वादशाह का एक सम्मानित दरवारी-समाज का एक प्रतिष्ठित सदस्य रात को अपने कमरे की तनहाई में अक्सर रो रो पड़ता था, चीख उठता था, कुंठित उत्तेजना से । उनकी आँखों के सामने नाना का वही नग्न और मांसल रूप हमेशा नाचा करता था और उनके शरीर का हर परमाणु उस रूप को पाने की तीव्र इच्छा से पैदा हुई पीड़ा से तिलमिला उठता था 'लॉM
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विशेष बच्चों की संस्था आशा का झरना में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा जारी दिशा निर्देशों के अनुसरण में पूर्ण मानकों के अनुरूप दिव्यांगों के लिए सुगम्य शौचालय व रैम्प का निर्माण करवाया गया है।
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीरी) पिलानी के मुख्य वैज्ञानिक प्रोफेसर भाउसाहेब बोतरे ने सुगम्य शौचालय व रैम्प का उद्घाटन किया। एक्सेस ऑडिटर सुदीप गोयल के निर्देशन में यह निर्माण कार्य पूरा हुआ।
इसके साथ ही बोतरे ने संस्था द्वारा दिव्यांग जनों के उत्थान के लिए किए जा रहे विभिन्न प्रयासों की सराहना की व सीरी द्वारा दिव्यांग जनों की गतिशीलता को बढ़ाने के लिए विकसित की जा रही टेक्नोलॉजी की जानकारी भी दी।
This website follows the DNPA Code of Ethics.
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विशेष बच्चों की संस्था आशा का झरना में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा जारी दिशा निर्देशों के अनुसरण में पूर्ण मानकों के अनुरूप दिव्यांगों के लिए सुगम्य शौचालय व रैम्प का निर्माण करवाया गया है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान पिलानी के मुख्य वैज्ञानिक प्रोफेसर भाउसाहेब बोतरे ने सुगम्य शौचालय व रैम्प का उद्घाटन किया। एक्सेस ऑडिटर सुदीप गोयल के निर्देशन में यह निर्माण कार्य पूरा हुआ। इसके साथ ही बोतरे ने संस्था द्वारा दिव्यांग जनों के उत्थान के लिए किए जा रहे विभिन्न प्रयासों की सराहना की व सीरी द्वारा दिव्यांग जनों की गतिशीलता को बढ़ाने के लिए विकसित की जा रही टेक्नोलॉजी की जानकारी भी दी। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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नई दिल्ली : इन दिनों बॉलीवुड के गलियारों में एक नए कपल की आहट सुनाई दे रही है। हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के किंग खान शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान और महानायक अमिताभ बच्चन के नातिन अगस्त के बारे में। खबरों की माने तो सुहाना खान - अगस्त्य नंदा को डेट कर रही है। यह दोनों ही अक्सर साथ में देखे जाते हैं। कई मौकों पर यह एक दूसरे के हाथ में हाथ थामे नजर आए हैं। आपको बता दें कि इन दोनों की पहली मुलाकात जोया अख्तर के सेट पर हुई थी। यह दोनों ही जोया अख्तर की फिल्म 'द आर्चीज' से अपना बॉलीवुड डेब्यू करने जा रहे हैं।
सुहाना खान और श्वेता बच्चन के बेटे अगस्त नंदा अपने बॉलीवुड डेब्यू को लेकर बिल्कुल तैयार है। इन दोनों को पहली बार 'द आर्चीज' में देखा जाने वाला है। वही इनके रिलेशनशिप के बारे में बात करें तो कहा जा रहा है कि इनकी दोस्ती इसी फिल्म के सेट से शुरू हुई थी। सूत्रों की माने तो अगस्त्य अपनी फैमिली से सुहाना खान को मिलवा भी चुके हैं। बताया जाता है कि पिछले साल क्रिसमस की पार्टी पर अगस्त्य, सुहाना को अपने घर भी लेकर गए थे। इस दौरान उन्होंने सुहाना को अपना पार्टनर बताते हुए सभी से मिलवाया।
गौरतलब है कि अगस्त्य की मां श्वेता बच्चन को भी सुहाना काफी अच्छी लगती है। वहीं इनके करियर की बात करें तो यह दोनों जोया अख्तर के प्रोजेक्ट से बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने के लिए तैयार हैं। इस फिल्म में उनके साथ बोनी कपूर की छोटी बेटी और अभिनेत्री जानवी कपूर की बहन खुशी कपूर भी इस फिल्म का हिस्सा होगी। इनके अलावा इस फिल्म में वेदांग रैना, मिहिर अहूजा और युवराज मेंडा नजर आएंगे। इनकी ये फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर इसी साल रिलीज होगी।
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नई दिल्ली : इन दिनों बॉलीवुड के गलियारों में एक नए कपल की आहट सुनाई दे रही है। हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के किंग खान शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान और महानायक अमिताभ बच्चन के नातिन अगस्त के बारे में। खबरों की माने तो सुहाना खान - अगस्त्य नंदा को डेट कर रही है। यह दोनों ही अक्सर साथ में देखे जाते हैं। कई मौकों पर यह एक दूसरे के हाथ में हाथ थामे नजर आए हैं। आपको बता दें कि इन दोनों की पहली मुलाकात जोया अख्तर के सेट पर हुई थी। यह दोनों ही जोया अख्तर की फिल्म 'द आर्चीज' से अपना बॉलीवुड डेब्यू करने जा रहे हैं। सुहाना खान और श्वेता बच्चन के बेटे अगस्त नंदा अपने बॉलीवुड डेब्यू को लेकर बिल्कुल तैयार है। इन दोनों को पहली बार 'द आर्चीज' में देखा जाने वाला है। वही इनके रिलेशनशिप के बारे में बात करें तो कहा जा रहा है कि इनकी दोस्ती इसी फिल्म के सेट से शुरू हुई थी। सूत्रों की माने तो अगस्त्य अपनी फैमिली से सुहाना खान को मिलवा भी चुके हैं। बताया जाता है कि पिछले साल क्रिसमस की पार्टी पर अगस्त्य, सुहाना को अपने घर भी लेकर गए थे। इस दौरान उन्होंने सुहाना को अपना पार्टनर बताते हुए सभी से मिलवाया। गौरतलब है कि अगस्त्य की मां श्वेता बच्चन को भी सुहाना काफी अच्छी लगती है। वहीं इनके करियर की बात करें तो यह दोनों जोया अख्तर के प्रोजेक्ट से बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने के लिए तैयार हैं। इस फिल्म में उनके साथ बोनी कपूर की छोटी बेटी और अभिनेत्री जानवी कपूर की बहन खुशी कपूर भी इस फिल्म का हिस्सा होगी। इनके अलावा इस फिल्म में वेदांग रैना, मिहिर अहूजा और युवराज मेंडा नजर आएंगे। इनकी ये फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर इसी साल रिलीज होगी।
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Kabir Singh Box Office Collection Day 13: शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी की फिल्म 'कबीर सिंह' बॉक्स ऑफिस पर मजबूती के साथ टिकी हुई है। फिल्म ने रिलीज के दूसरे वीक में 200 करोड़ के क्लब में एंट्री मार ली है। अब फैन्स की निगाहें फिल्म के 250 करोड़ के क्लब में शामिल होने पर टिकी हैं। शाहिद कपूर के करियर की सोलो हिट फिल्म 'कबीर सिंह' इस साल की तेजी के साथ 100 करोड़ के क्लब में शामिल होने वाली फिल्मों में से एक है। ट्रेड पंडितों का अनुमान है कि अब 'कबीर सिंह' 'उरी' के लाइफटाइम कलेक्शन (245 करोड़) को भी पार कर इस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन सकती है।
'कबीर सिंह' ने सोमवार (1 जुलाई) को 9 करोड़ 7 लाख रुपए, मंगलवार (2 जुलाई) को फिल्म ने 8 करोड़ 31 लाख रुपए की कमाई की। बुधवार ( 3 जुलाई) को फिल्म 7 करोड़ 53लाख रुपए की कमाई करने में सफल रही है। ऐसे में फिल्म का कुल कलेक्शन 206 करोड़ 48 लाख रुपए हो गया है। फिल्म के कलेक्शन को देखते हुए माना जा रहा है कि फिल्म की आने वाले तीसरे वीक में भी कमाई जारी रह सकती है।
#KabirSingh is 200 Not Out ... Hits double century at the BO, but shows no signs of fatigue... [Week 2] Fri 12. 21 cr, Sat 17. 10 cr, Sun 17. 84 cr, Mon 9. 07 cr, Tue 8. 31 cr, Wed 7. 53 cr. Total: ₹ 206. 48 cr. India biz.
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शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी स्टारर फिल्म 21 जून को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। फिल्म ने रिलीज वाले दिन ही 20 करोड़ 21 लाख रुपए की धमाकेदार कमाई की थी। बुधवार (3 जुलाई) की कमाई को मिलाकर 200 करोड़ के क्लब में शामिल होने वाली 'कबीर सिंह' को वीकेंड का भरपूर फायदा मिल सकता है। दरअसल वीकेंड पर लोग मनोरंजन के लिए सिनेमाघरों का रुख ज्यादा करते हैं। हालांकि वीकेंड के अलावा 'कबीर सिंह' ने वीक डेज में भी बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया है।
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Kabir Singh Box Office Collection Day तेरह: शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी की फिल्म 'कबीर सिंह' बॉक्स ऑफिस पर मजबूती के साथ टिकी हुई है। फिल्म ने रिलीज के दूसरे वीक में दो सौ करोड़ के क्लब में एंट्री मार ली है। अब फैन्स की निगाहें फिल्म के दो सौ पचास करोड़ के क्लब में शामिल होने पर टिकी हैं। शाहिद कपूर के करियर की सोलो हिट फिल्म 'कबीर सिंह' इस साल की तेजी के साथ एक सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने वाली फिल्मों में से एक है। ट्रेड पंडितों का अनुमान है कि अब 'कबीर सिंह' 'उरी' के लाइफटाइम कलेक्शन को भी पार कर इस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन सकती है। 'कबीर सिंह' ने सोमवार को नौ करोड़ सात लाख रुपए, मंगलवार को फिल्म ने आठ करोड़ इकतीस लाख रुपए की कमाई की। बुधवार को फिल्म सात करोड़ तिरेपनलाख रुपए की कमाई करने में सफल रही है। ऐसे में फिल्म का कुल कलेक्शन दो सौ छः करोड़ अड़तालीस लाख रुपए हो गया है। फिल्म के कलेक्शन को देखते हुए माना जा रहा है कि फिल्म की आने वाले तीसरे वीक में भी कमाई जारी रह सकती है। #KabirSingh is दो सौ Not Out ... Hits double century at the BO, but shows no signs of fatigue... [Week दो] Fri बारह. इक्कीस cr, Sat सत्रह. दस cr, Sun सत्रह. चौरासी cr, Mon नौ. सात cr, Tue आठ. इकतीस cr, Wed सात. तिरेपन cr. Total: दो सौ छः रुपया. अड़तालीस cr. India biz. India biz. India biz. शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी स्टारर फिल्म इक्कीस जून को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। फिल्म ने रिलीज वाले दिन ही बीस करोड़ इक्कीस लाख रुपए की धमाकेदार कमाई की थी। बुधवार की कमाई को मिलाकर दो सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने वाली 'कबीर सिंह' को वीकेंड का भरपूर फायदा मिल सकता है। दरअसल वीकेंड पर लोग मनोरंजन के लिए सिनेमाघरों का रुख ज्यादा करते हैं। हालांकि वीकेंड के अलावा 'कबीर सिंह' ने वीक डेज में भी बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया है।
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मुंगेर. सोशल मीडिया पर IPS का प्रोफाइल बनाकर झारखंड (Jharkhand) के एक युवक ने मुंगेर (Munger) की एक युवती को पहले शादी का झांसा दिया, फिर उससे 24 लाख रुपये भी ऐंठ लिए. मामला सामने आने के बाद डीआईजी मनु महाराज (DIG Manu Maharaj) ने उसकी गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं.
दरअसल पूरा मामला यूं है कि धनबाद का रहने वाला एक युवक ने खुद को आइपीएस बताया. इसी आधार पर वह मुंगेर के कासिमबाजार थाना क्षेत्र निवासी कृष्णदेव पोद्दार की बेटी के साथ शादी करने की कोशिश में था. शादी के एवज में वह लड़की के परिजनों से उसने फॉर्चूनर गाड़ी खरीदने के लिए 23 लाख 87 हजार रुपये भी ऐंठ लिए.
दरअसल यह मामला तब सामने आया जब डीआइजी मनु महाराज के जनता दरबार में एक फरियादी आए. उन्होंने पहले से ही कासिम बाजार थाना में मामला दर्ज करवाया था. लेकिन, पुलिस ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है. इस मामले में आवेदन मिलते ही डीआईजी ने एसपी एवं कासिम बाजार थाना को ठगी के आरोपी को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया.
दरअसल युवती के आवेदन में कहा गया है कि मुंगेर के मकससपुर निवासी कृष्णदेव पोद्दार ने अपनी बेटीअनुष्का राज की शादी धनबाद के ललन कुमार अग्रवाल के बेटे राहुल के साथ तय की थी. सोशल मीडिया के आधार पर मिली जानकारी के अनुसार रिश्ते की बात आगे बढ़ी थी. तब लड़के के पिता ललन कुमार ने कहा था कि उसका लड़का राहुल आईपीएस की ट्रैनिंग हैदराबाद में ले रहा है और ट्रेनिंग के बाद शादी कर लेगा.
शादी के लिए ने लड़की वालों से एक 24 लाख रुपये की फॉर्चूनर गाड़ी की मांग की गई. कृष्णदेव ने 10 लाख रूपये कैश और 13 लाख 87 हजार रूपया उसके एक्सिस बैंक धनबाद के खाते में जमा भी करवा दिया था. इसी बीच जानकारी दी गई कि लड़के के पिता की हार्ट अटैक से मौत हो गई है. लेकिन श्राद्ध कर्म के कुछ ही दिनों के बाद ही लड़का शादी से इंकार करने लगा.
बहुत मनाने पर भी तैयार नहीं हुआ. इसके बाद पुलिस को जानकारी नहीं देने का दबाव बनाते हुए बाद में गाली-गलौज के साथ ही लड़की को जान से भी मारने की धमकी देने लगा. आवेदन में जो आरोप लगाए गए हैं उसके अनुसार जब लड़के से आपीएस का ज्वाइंग लेटर मांगा गया तो उसने नहीं दिया. काफी प्रेशर देने पर ज्वाइंग लेटर और पे स्लिप दिया जो फर्जी निकला. इसके बाद उन्हे ठगी का अहसास हुआ.
लड़की के पिता के अनुसार उन्होंने 10 जुलाई 2019 को कासिम बाजार थाना में आवेदन दिया. जिस पर थाना में कांड संख्या 166/19 दर्ज किया गया. लेकिन इस मामले में पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया.
बहरहाल अब मामला डीआइजी मनु महाराज के संज्ञान में है और उन्होंने तत्काल उचित कार्रवाई का निर्देश दिया है. साथ ही डीआईजी ने आमजनों से अपील की है की रिश्ता स्थापित करने से पहले सही तरिके से जांच परख लें.
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मुंगेर. सोशल मीडिया पर IPS का प्रोफाइल बनाकर झारखंड के एक युवक ने मुंगेर की एक युवती को पहले शादी का झांसा दिया, फिर उससे चौबीस लाख रुपये भी ऐंठ लिए. मामला सामने आने के बाद डीआईजी मनु महाराज ने उसकी गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं. दरअसल पूरा मामला यूं है कि धनबाद का रहने वाला एक युवक ने खुद को आइपीएस बताया. इसी आधार पर वह मुंगेर के कासिमबाजार थाना क्षेत्र निवासी कृष्णदेव पोद्दार की बेटी के साथ शादी करने की कोशिश में था. शादी के एवज में वह लड़की के परिजनों से उसने फॉर्चूनर गाड़ी खरीदने के लिए तेईस लाख सत्तासी हजार रुपये भी ऐंठ लिए. दरअसल यह मामला तब सामने आया जब डीआइजी मनु महाराज के जनता दरबार में एक फरियादी आए. उन्होंने पहले से ही कासिम बाजार थाना में मामला दर्ज करवाया था. लेकिन, पुलिस ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है. इस मामले में आवेदन मिलते ही डीआईजी ने एसपी एवं कासिम बाजार थाना को ठगी के आरोपी को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया. दरअसल युवती के आवेदन में कहा गया है कि मुंगेर के मकससपुर निवासी कृष्णदेव पोद्दार ने अपनी बेटीअनुष्का राज की शादी धनबाद के ललन कुमार अग्रवाल के बेटे राहुल के साथ तय की थी. सोशल मीडिया के आधार पर मिली जानकारी के अनुसार रिश्ते की बात आगे बढ़ी थी. तब लड़के के पिता ललन कुमार ने कहा था कि उसका लड़का राहुल आईपीएस की ट्रैनिंग हैदराबाद में ले रहा है और ट्रेनिंग के बाद शादी कर लेगा. शादी के लिए ने लड़की वालों से एक चौबीस लाख रुपये की फॉर्चूनर गाड़ी की मांग की गई. कृष्णदेव ने दस लाख रूपये कैश और तेरह लाख सत्तासी हजार रूपया उसके एक्सिस बैंक धनबाद के खाते में जमा भी करवा दिया था. इसी बीच जानकारी दी गई कि लड़के के पिता की हार्ट अटैक से मौत हो गई है. लेकिन श्राद्ध कर्म के कुछ ही दिनों के बाद ही लड़का शादी से इंकार करने लगा. बहुत मनाने पर भी तैयार नहीं हुआ. इसके बाद पुलिस को जानकारी नहीं देने का दबाव बनाते हुए बाद में गाली-गलौज के साथ ही लड़की को जान से भी मारने की धमकी देने लगा. आवेदन में जो आरोप लगाए गए हैं उसके अनुसार जब लड़के से आपीएस का ज्वाइंग लेटर मांगा गया तो उसने नहीं दिया. काफी प्रेशर देने पर ज्वाइंग लेटर और पे स्लिप दिया जो फर्जी निकला. इसके बाद उन्हे ठगी का अहसास हुआ. लड़की के पिता के अनुसार उन्होंने दस जुलाई दो हज़ार उन्नीस को कासिम बाजार थाना में आवेदन दिया. जिस पर थाना में कांड संख्या एक सौ छयासठ/उन्नीस दर्ज किया गया. लेकिन इस मामले में पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया. बहरहाल अब मामला डीआइजी मनु महाराज के संज्ञान में है और उन्होंने तत्काल उचित कार्रवाई का निर्देश दिया है. साथ ही डीआईजी ने आमजनों से अपील की है की रिश्ता स्थापित करने से पहले सही तरिके से जांच परख लें. .
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रायपुर। छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने ब्लॉक कांग्रेस कमेटियों में अध्यक्षों की नियुक्ति की है. संगठन ने इन अध्यक्षों को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश महामंत्री ( संगठन) चंद्रशेखर शुक्ला ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है.
कांग्रेस ने 7 जिलों के 8 ब्लॉक के लिए अध्यक्षों के नाम जारी किए हैं. इनमें बलरामपुर, जशपुर, गरियाबंद, बलौदाबाजार, बिलासपुर ग्रामीण, बालोद और मुंगेली जिले शामिल हैं.
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रायपुर। छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने ब्लॉक कांग्रेस कमेटियों में अध्यक्षों की नियुक्ति की है. संगठन ने इन अध्यक्षों को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश महामंत्री चंद्रशेखर शुक्ला ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है. कांग्रेस ने सात जिलों के आठ ब्लॉक के लिए अध्यक्षों के नाम जारी किए हैं. इनमें बलरामपुर, जशपुर, गरियाबंद, बलौदाबाजार, बिलासपुर ग्रामीण, बालोद और मुंगेली जिले शामिल हैं.
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अयोध्या प्रसाद खत्री अयोध्या प्रसाद खत्री (१८५७-४ जनवरी १९०५) का नाम हिंदी पद्य में खड़ी बोली हिन्दी के प्रारम्भिक समर्थकों और पुरस्कर्ताओं में प्रमुख है। उन्होंने उस समय हिन्दी कविता में खड़ी बोली के महत्त्व पर जोर दिया जब अधिकतर लोग ब्रजभाषा में कविता लिख रहे थे। उनका जन्म बिहार में हुआ था बाद में वे बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में कलक्टरी के पेशकार पद पर नियुक्त हुए। १८७७ में उन्होंने हिन्दी व्याकरण नामक खड़ी बोली की पहली व्याकरण पुस्तक की रचना की जो बिहार बन्धु प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई थी। उनके अनुसार खड़ीबोली गद्य की चार शैलियाँ थीं- मौलवी शैली, मुंशी शैली, पण्डित शैली तथा मास्टर शैली। १८८७-८९ में इन्होंने "खड़ीबोली का पद्य" नामक संग्रह दो भागों में प्रस्तुत किया जिसमें विभिन्न शैलियों की रचनाएँ संकलित की गयीं। इसके अतिरिक्त सभाओं आदि में बोलकर भी वे खड़ीबोली के पक्ष का समर्थन करते थे। सरस्वती मार्च १९०५ में प्रकाशित "अयोध्याप्रसाद" खत्री शीर्षक जीवनी के लेखक पुरुषोत्तमप्रसाद ने लिखा था कि खड़ी बोली का प्रचार करने के लिए इन्होंने इतना द्रव्य खर्च किया कि राजा-महाराजा भी कम करते हैं। १८८८ में उन्होंने 'खडी बोली का आंदोलन' नामक पुस्तिका प्रकाशित करवाई। भारतेंदु युग से हिन्दी-साहित्य में आधुनिकता की शुरूआत हुई। इसी दौर में बड़े पैमाने पर भाषा और विषय-वस्तु में बदलाव आया। इतिहास के उस कालखंड में, जिसे हम भारतेंदु युग के नाम से जानते हैं, खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बन गई लेकिन पद्य की भाषा के रूप में ब्रजभाषा का बोलबाला कायम रहा। अयोध्या प्रसाद खत्री ने गद्य और पद्य की भाषा के अलगाव को गलत मानते हुए इसकी एकरूपता पर जोर दिया। पहली बार इन्होंने साहित्य जगत का ध्यान इस मुद्दे की तरफ खींचा, साथ ही इसे आंदोलन का रूप दिया। हिंदी पुनर्जागरण काल में स्रष्टा के रूप में जहाँ एक ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसा प्रतिभा-पुरुष खड़ा था तो दूसरी ओर द्रष्टा के रूप में अयोध्याप्रसाद खत्री जैसा अद्वितीय युगांतरकारी व्यक्तित्व था। इसी क्रम में खत्री जी ने 'खड़ी-बोली का पद्य` दो खंडों में छपवाया। इस किताब के जरिए एक साहित्यिक आंदोलन की शुरूआत हुई। हिन्दी कविता की भाषा क्या हो, ब्रजभाषा अथवा खड़ीबोली हिन्दी? जिसका ग्रियर्सन के साथ भारतेंदु मंडल के अनेक लेखकों ने प्रतिवाद किया तो फ्रेडरिक पिन्काट ने समर्थन। इस दृष्टि से यह भाषा, धर्म, जाति, राज्य आदि क्षेत्रीयताओं के सामूहिक उद्घोष का नवजागरण था। जुलाई २००७ में बिहार के शहर मुजफ्फरपुर में उनकी समृति में 'अयोध्या प्रसाद खत्री जयंती समारोह समिति' की स्थापना की गई। इसके द्वारा प्रति वर्ष हिंदी साहित्य में विशेष योगदन करने वाले किसी विशिष्ट व्यक्ति को अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जाता है। पुरस्कार में अयोध्या प्रसाद खत्री की डेढ़ फुट ऊँची प्रतिमा, शाल और नकद राशि प्रदान की जाती है। ५-६ जुलाई २००७ को पटना में खड़ी बोली के प्रथम आंदोलनकर्ता अयोध्या प्रसाद खत्री की १५०वीं जयंती आयोजित की गई। संस्था के अध्यक्ष श्री वीरेन नंदा द्वारा श्री अयोध्या प्रसाद खत्री के जीवन तथा कार्यों पर केन्द्रित 'खड़ी बोली का चाणक्य' शीर्षक फिल्म का निर्माण किया गया है। .
24 संबंधोंः पटना, बिहार, ब्रजभाषा, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, भाषा, मुजफ्फरपुर, मुजफ्फरपुर जिला, सरस्वती पत्रिका, साहित्य, हिन्दी, खड़ीबोली, गद्य, काव्य, १८५७, १८७७, १८८७, १८८८, १८८९, १९०५, २००७, २००९, ४ दिसम्बर, ४ जनवरी, ८ जुलाई।
पटना (पटनम्) या पाटलिपुत्र भारत के बिहार राज्य की राजधानी एवं सबसे बड़ा नगर है। पटना का प्राचीन नाम पाटलिपुत्र था। आधुनिक पटना दुनिया के गिने-चुने उन विशेष प्राचीन नगरों में से एक है जो अति प्राचीन काल से आज तक आबाद है। अपने आप में इस शहर का ऐतिहासिक महत्व है। ईसा पूर्व मेगास्थनीज(350 ईपू-290 ईपू) ने अपने भारत भ्रमण के पश्चात लिखी अपनी पुस्तक इंडिका में इस नगर का उल्लेख किया है। पलिबोथ्रा (पाटलिपुत्र) जो गंगा और अरेन्नोवास (सोनभद्र-हिरण्यवाह) के संगम पर बसा था। उस पुस्तक के आकलनों के हिसाब से प्राचीन पटना (पलिबोथा) 9 मील (14.5 कि॰मी॰) लम्बा तथा 1.75 मील (2.8 कि॰मी॰) चौड़ा था। पटना बिहार राज्य की राजधानी है और गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर अवस्थित है। जहां पर गंगा घाघरा, सोन और गंडक जैसी सहायक नदियों से मिलती है। सोलह लाख (2011 की जनगणना के अनुसार 1,683,200) से भी अधिक आबादी वाला यह शहर, लगभग 15 कि॰मी॰ लम्बा और 7 कि॰मी॰ चौड़ा है। प्राचीन बौद्ध और जैन तीर्थस्थल वैशाली, राजगीर या राजगृह, नालन्दा, बोधगया और पावापुरी पटना शहर के आस पास ही अवस्थित हैं। पटना सिक्खों के लिये एक अत्यंत ही पवित्र स्थल है। सिक्खों के १०वें तथा अंतिम गुरु गुरू गोबिंद सिंह का जन्म पटना में हीं हुआ था। प्रति वर्ष देश-विदेश से लाखों सिक्ख श्रद्धालु पटना में हरमंदिर साहब के दर्शन करने आते हैं तथा मत्था टेकते हैं। पटना एवं इसके आसपास के प्राचीन भग्नावशेष/खंडहर नगर के ऐतिहासिक गौरव के मौन गवाह हैं तथा नगर की प्राचीन गरिमा को आज भी प्रदर्शित करते हैं। एतिहासिक और प्रशासनिक महत्व के अतिरिक्त, पटना शिक्षा और चिकित्सा का भी एक प्रमुख केंद्र है। दीवालों से घिरा नगर का पुराना क्षेत्र, जिसे पटना सिटी के नाम से जाना जाता है, एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र है। .
बिहार भारत का एक राज्य है। बिहार की राजधानी पटना है। बिहार के उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखण्ड स्थित है। बिहार नाम का प्रादुर्भाव बौद्ध सन्यासियों के ठहरने के स्थान विहार शब्द से हुआ, जिसे विहार के स्थान पर इसके अपभ्रंश रूप बिहार से संबोधित किया जाता है। यह क्षेत्र गंगा नदी तथा उसकी सहायक नदियों के उपजाऊ मैदानों में बसा है। प्राचीन काल के विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहा यह प्रदेश, वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के सबसे पिछड़े योगदाताओं में से एक बनकर रह गया है। .
ब्रजभाषा मूलतः ब्रज क्षेत्र की बोली है। (श्रीमद्भागवत के रचनाकाल में "व्रज" शब्द क्षेत्रवाची हो गया था। विक्रम की 13वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी तक भारत के मध्य देश की साहित्यिक भाषा रहने के कारण ब्रज की इस जनपदीय बोली ने अपने उत्थान एवं विकास के साथ आदरार्थ "भाषा" नाम प्राप्त किया और "ब्रजबोली" नाम से नहीं, अपितु "ब्रजभाषा" नाम से विख्यात हुई। अपने विशुद्ध रूप में यह आज भी आगरा, हिण्डौन सिटी,धौलपुर, मथुरा, मैनपुरी, एटा और अलीगढ़ जिलों में बोली जाती है। इसे हम "केंद्रीय ब्रजभाषा" भी कह सकते हैं। ब्रजभाषा में ही प्रारम्भ में काव्य की रचना हुई। सभी भक्त कवियों ने अपनी रचनाएं इसी भाषा में लिखी हैं जिनमें प्रमुख हैं सूरदास, रहीम, रसखान, केशव, घनानंद, बिहारी, इत्यादि। फिल्मों के गीतों में भी ब्रजभाषा के शब्दों का प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है। .
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (९ सितंबर १८५०-७ जनवरी १८८५) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ्य परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुंदर (१८६७) नाटक के अनुवाद से होती है। यद्यपि नाटक उनके पहले भी लिखे जाते रहे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ बनाया। उन्होंने 'हरिश्चंद्र पत्रिका', 'कविवचन सुधा' और 'बाल विबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे।। वेबदुनिया। स्मृति जोशी भारतेन्दु जी ने मात्र ३४ वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया। .
भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को व्यक्त करते है और इसके लिये हम वाचिक ध्वनियों का उपयोग करते हैं। भाषा मुख से उच्चारित होनेवाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह है जिनके द्वारा मन की बात बतलाई जाती है। किसी भाषा की सभी ध्वनियों के प्रतिनिधि स्वन एक व्यवस्था में मिलकर एक सम्पूर्ण भाषा की अवधारणा बनाते हैं। व्यक्त नाद की वह समष्टि जिसकी सहायता से किसी एक समाज या देश के लोग अपने मनोगत भाव तथा विचार एक दूसरे पर प्रकट करते हैं। मुख से उच्चारित होनेवाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह जिनके द्वारा मन की बात बतलाई जाती है। बोली। जबान। वाणी। विशेष - इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं। अपने समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही अभ्यस्त होने के कारण अच्छी तरह जानते हैं, पर दूसरे देशों या समाजों की भाषा बिना अच्छी़ तरह नहीं आती। भाषाविज्ञान के ज्ञाताओं ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित करके उनमें से प्रत्येक की अलग अलग शाखाएँ स्थापित की हैं और उन शाखाकों के भी अनेक वर्ग उपवर्ग बनाकर उनमें बड़ी बड़ी भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं अथाव बोलियों को रखा है। जैसे हमारी हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के आर्य वर्ग की भारतीय आर्य शाखा की एक भाषा है; और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। पास पास बोली जानेवाली अनेक उपभाषाओं या बोलियों में बहुत कुछ साम्य होता है; और उसी साम्य के आधार पर उनके वर्ग या कुल स्थापित किए जाते हैं। यही बात बड़ी बड़ी भाषाओं में भी है जिनका पारस्परिक साम्य उतना अधिक तो नहीं, पर फिर भी बहुत कुछ होता है। संसार की सभी बातों की भाँति भाषा का भी मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से अब तक बराबर विकास होता आया है; और इसी विकास के कारण भाषाओं में सदा परिवर्तन होता रहता है। भारतीय आर्यों की वैदिक भाषा से संस्कुत और प्राकृतों का, प्राकृतों से अपभ्रंशों का और अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। सामान्यतः भाषा को वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। भाषा आभ्यंतर अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। यही नहीं वह हमारे आभ्यंतर के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परम्परा से विच्छिन्न है। इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं। अपने समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही अभ्यस्त होने के कारण अच्छी तरह जानते हैं, पर दूसरे देशों या समाजों की भाषा बिना अच्छी़ तरह सीखे नहीं आती। भाषाविज्ञान के ज्ञाताओं ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित करके उनमें से प्रत्येक की अलग अलग शाखाएँ स्थापित की हैं और उन शाखाओं के भी अनेक वर्ग-उपवर्ग बनाकर उनमें बड़ी बड़ी भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं अथाव बोलियों को रखा है। जैसे हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के आर्य वर्ग की भारतीय आर्य शाखा की एक भाषा है; और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। पास पास बोली जानेवाली अनेक उपभाषाओं या बोलियों में बहुत कुछ साम्य होता है; और उसी साम्य के आधार पर उनके वर्ग या कुल स्थापित किए जाते हैं। यही बात बड़ी बड़ी भाषाओं में भी है जिनका पारस्परिक साम्य उतना अधिक तो नहीं, पर फिर भी बहुत कुछ होता है। संसार की सभी बातों की भाँति भाषा का भी मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से अब तक बराबर विकास होता आया है; और इसी विकास के कारण भाषाओं में सदा परिवर्तन होता रहता है। भारतीय आर्यों की वैदिक भाषा से संस्कृत और प्राकृतों का, प्राकृतों से अपभ्रंशों का और अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। प्रायः भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिये लिपियों की सहायता लेनी पड़ती है। भाषा और लिपि, भाव व्यक्तीकरण के दो अभिन्न पहलू हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और दो या अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है। उदाहरणार्थ पंजाबी, गुरूमुखी तथा शाहमुखी दोनो में लिखी जाती है जबकि हिन्दी, मराठी, संस्कृत, नेपाली इत्यादि सभी देवनागरी में लिखी जाती है। .
मुज़फ्फरपुर उत्तरी बिहार राज्य के तिरहुत प्रमंडल का मुख्यालय तथा मुज़फ्फरपुर ज़िले का प्रमुख शहर एवं मुख्यालय है। अपने सूती वस्त्र उद्योग, लोहे की चूड़ियों, शहद तथा आम और लीची जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिये यह जिला पूरे विश्व में जाना जाता है, खासकर यहाँ की शाही लीची का कोई जोड़ नहीं है। यहाँ तक कि भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी यहाँ से लीची भेजी जाती है। 2017 मे मुजफ्फरपुर स्मार्ट सिटी के लिये चयनित हुआ है। अपने उर्वरक भूमि और स्वादिष्ट फलों के स्वाद के लिये मुजफ्फरपुर देश विदेश मे "स्वीटसिटी" के नाम से जाना जाता है। मुजफ्फरपुर थर्मल पावर प्लांट देशभर के सबसे महत्वपूर्ण बिजली उत्पादन केंद्रो मे से एक है। .
मुजफ्फरपुर जिला, बिहार के ३८ जिलों में से एक है। इसका प्रशासकीय मुख्यालय मुजफ्फरपुर है। यह जिला उत्तर में पूर्वी चंपारण और सीतामढ़ी, दक्षिण में वैशाली और सारण, पूर्व में समस्तीपुर और दरभंगा तथा पश्चिम में गोपालगंज से घिरा है। हिंदी और मैथिली यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हैं, जबकि बज्जिका यहाँ की स्थानीय बोली .
सरस्वती हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध रूपगुणसम्पन्न प्रतिनिधि पत्रिका थी। इस पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से सन १९०० ई० के जनवरी मास में प्रारम्भ हुआ था। ३२ पृष्ठ की क्राउन आकार की इस पत्रिका का मूल्य ४ आना मात्र था। १९०३ ई० में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक हुए और १९२० ई० तक रहे। इसका प्रकाशन पहले झाँसी और फिर कानपुर से होने लगा था। महवीर प्रसाद द्विवेदी के बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवी दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवीलाल चतुर्वेदी और श्रीनारायण चतुर्वेदी सम्पादक हुए। १९०५ ई० में काशी नागरी प्रचारिणी सभा का नाम मुखपृष्ठ से हट गया। 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका कार्यभार संभाला। एक ओर भाषा के स्तर पर और दूसरी ओर प्रेरक बनकर मार्गदर्शन का कार्य संभालकर द्विवेदी जी ने साहित्यिक और राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया। द्विवेदी जी ने भाषा की समृद्धि करके नवीन साहित्यकारों को राह दिखाई। उनका वक्तव्य हैः महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ नए रचनाकारों को भाषा का महत्त्व समझाया व गद्य और पद्य के लिए राह निर्मित की। महावीर प्रसाद द्विवेदी की यह पत्रिका मूलतः साहित्यिक थी और हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त से लेकर कहीं-न-कहीं निराला के निर्माण में इसी पत्रिका का योगदान था परंतु साहित्य के निर्माण के साथ राष्ट्रीयता का प्रसार करना भी इनका उद्देश्य था। भाषा का निर्माण करना साथ ही गद्य-पद्य के लिए खड़ी बोली को ही प्रोत्साहन देना इनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था। मई १९७६ के बाद इसका प्रकाशन बन्द हो गया।लगभग अस्सी वर्षों तक यह पत्रिका निकली I अंतिम बीस वर्षों तक इसका सम्पादन पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने किया I .
किसी भाषा के वाचिक और लिखित (शास्त्रसमूह) को साहित्य कह सकते हैं। दुनिया में सबसे पुराना वाचिक साहित्य हमें आदिवासी भाषाओं में मिलता है। इस दृष्टि से आदिवासी साहित्य सभी साहित्य का मूल स्रोत है। .
हिन्दी या भारतीय विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। केंद्रीय स्तर पर दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। यह हिन्दुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्द का प्रयोग अधिक हैं और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हालांकि, हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत का संविधान में कोई भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी और इसकी बोलियाँ सम्पूर्ण भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। भारत और अन्य देशों में भी लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की और नेपाल की जनता भी हिन्दी बोलती है।http://www.ethnologue.com/language/hin 2001 की भारतीय जनगणना में भारत में ४२ करोड़ २० लाख लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा बताया। भारत के बाहर, हिन्दी बोलने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में 648,983; मॉरीशस में ६,८५,१७०; दक्षिण अफ्रीका में ८,९०,२९२; यमन में २,३२,७६०; युगांडा में १,४७,०००; सिंगापुर में ५,०००; नेपाल में ८ लाख; जर्मनी में ३०,००० हैं। न्यूजीलैंड में हिन्दी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसके अलावा भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में १४ करोड़ १० लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, मौखिक रूप से हिन्दी के काफी सामान है। लोगों का एक विशाल बहुमत हिन्दी और उर्दू दोनों को ही समझता है। भारत में हिन्दी, विभिन्न भारतीय राज्यों की १४ आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग १ अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है। हिंदी हिंदी बेल्ट का लिंगुआ फ़्रैंका है, और कुछ हद तक पूरे भारत (आमतौर पर एक सरल या पिज्जाइज्ड किस्म जैसे बाजार हिंदुस्तान या हाफ्लोंग हिंदी में)। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी उनमें हिन्दी भी प्रमुख होगी। 'देशी', 'भाखा' (भाषा), 'देशना वचन' (विद्यापति), 'हिन्दवी', 'दक्खिनी', 'रेखता', 'आर्यभाषा' (स्वामी दयानन्द सरस्वती), 'हिन्दुस्तानी', 'खड़ी बोली', 'भारती' आदि हिन्दी के अन्य नाम हैं जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखण्डों में एवं विभिन्न सन्दर्भों में प्रयुक्त हुए हैं। .
खड़ी बोली वह बोली है जिसपर ब्रजभाषा या अवधी आदि की छाप न हो। ठेंठ हिंदी। आज की राष्ट्रभाषा हिंदी का पूर्व रूप। इसका इतिहास शताब्दियों से चला आ रहा है। यह परिनिष्ठित पश्चिमी हिंदी का एक रूप है। .
सामान्यतः मनुष्य की बोलने या लिखने पढ़ने की छंदरहित साधारण व्यवहार की भाषा को गद्य (prose) कहा जाता है। इसमें केवल आंशिक सत्य है क्योंकि इसमें गद्यकार के रचनात्मक बोध की अवहेलना है। साधारण व्यवहार की भाषा भी गद्य तभी कही जा सकती है जब यह व्यवस्थित और स्पष्ट हो। रचनात्मक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए गद्य को मनुष्य की साधारण किंतु व्यस्थित भाषा या उसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति कहना अधिक समीचीन होगा। .
काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो। अर्थात् वहजिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रसगंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्द को 'काव्य' कहा है। 'अर्थ की रमणीयता' के अंतर्गत शब्द की रमणीयता (शब्दलंकार) भी समझकर लोग इस लक्षण को स्वीकार करते हैं। पर 'अर्थ' की 'रमणीयता' कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है। साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ का लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार 'रसात्मक वाक्य ही काव्य है'। रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य की आत्मा है। काव्यप्रकाश में काव्य तीन प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र। ध्वनि वह है जिस, में शब्दों से निकले हुए अर्थ (वाच्य) की अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय (व्यंग्य) प्रधान हो। गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण हो। चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य के चमत्कार हो। इन तीनों को क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाशकार का जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के उद्रेक पर नहीं। काव्य के दो और भेद किए गए हैं, महाकाव्य और खंड काव्य। महाकाव्य सर्गबद्ध और उसका नायक कोई देवता, राजा या धीरोदात्त गुंण संपन्न क्षत्रिय होना चाहिए। उसमें शृंगार, वीर या शांत रसों में से कोई रस प्रधान होना चाहिए। बीच बीच में करुणा; हास्य इत्यादि और रस तथा और और लोगों के प्रसंग भी आने चाहिए। कम से कम आठ सर्ग होने चाहिए। महाकाव्य में संध्या, सूर्य, चंद्र, रात्रि, प्रभात, मृगया, पर्वत, वन, ऋतु, सागर, संयोग, विप्रलम्भ, मुनि, पुर, यज्ञ, रणप्रयाण, विवाह आदि का यथास्थान सन्निवेश होना चाहिए। काव्य दो प्रकार का माना गया है, दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह है जो अभिनय द्वारा दिखलाया जाय, जैसे, नाटक, प्रहसन, आदि जो पढ़ने और सुनेन योग्य हो, वह श्रव्य है। श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और पद्य। पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद कहे जा चुके हैं। गद्य काव्य के भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका। चंपू, विरुद और कारंभक तीन प्रकार के काव्य और माने गए है। .
कोई विवरण नहीं।
1877 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .
1887 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .
१८८८ ग्रेगोरी कैलंडर का एक अधिवर्ष है। .
१८८९ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .
1905 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .
वर्ष २००७ सोमवार से प्रारम्भ होने वाला ग्रेगोरी कैलंडर का सामान्य वर्ष है। .
२००९ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। वर्ष २००९ बृहस्पतिवार से प्रारम्भ होने वाला वर्ष है। संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को एवं आइएयू ने १६०९ में गैलीलियो गैलिली द्वारा खगोलीय प्रेक्षण आरंभ करने की घटना की ४००वीं जयंती के उपलक्ष्य में इसे अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष घोषित किया है। .
4 दिसंबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 338वॉ (लीप वर्ष में 339 वॉ) दिन है। साल में अभी और 27 दिन बाकी है। .
४ जनवरी ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 4थॉ दिन है। साल में अभी और 361 दिन बाकी हैं (लीप वर्ष में 362)। .
८ जुलाई ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का १८९वॉ (लीप वर्ष में १९० वॉ) दिन है। वर्ष में अभी और १७६ दिन बाकी है। .
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अयोध्या प्रसाद खत्री अयोध्या प्रसाद खत्री का नाम हिंदी पद्य में खड़ी बोली हिन्दी के प्रारम्भिक समर्थकों और पुरस्कर्ताओं में प्रमुख है। उन्होंने उस समय हिन्दी कविता में खड़ी बोली के महत्त्व पर जोर दिया जब अधिकतर लोग ब्रजभाषा में कविता लिख रहे थे। उनका जन्म बिहार में हुआ था बाद में वे बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में कलक्टरी के पेशकार पद पर नियुक्त हुए। एक हज़ार आठ सौ सतहत्तर में उन्होंने हिन्दी व्याकरण नामक खड़ी बोली की पहली व्याकरण पुस्तक की रचना की जो बिहार बन्धु प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई थी। उनके अनुसार खड़ीबोली गद्य की चार शैलियाँ थीं- मौलवी शैली, मुंशी शैली, पण्डित शैली तथा मास्टर शैली। एक हज़ार आठ सौ सत्तासी-नवासी में इन्होंने "खड़ीबोली का पद्य" नामक संग्रह दो भागों में प्रस्तुत किया जिसमें विभिन्न शैलियों की रचनाएँ संकलित की गयीं। इसके अतिरिक्त सभाओं आदि में बोलकर भी वे खड़ीबोली के पक्ष का समर्थन करते थे। सरस्वती मार्च एक हज़ार नौ सौ पाँच में प्रकाशित "अयोध्याप्रसाद" खत्री शीर्षक जीवनी के लेखक पुरुषोत्तमप्रसाद ने लिखा था कि खड़ी बोली का प्रचार करने के लिए इन्होंने इतना द्रव्य खर्च किया कि राजा-महाराजा भी कम करते हैं। एक हज़ार आठ सौ अठासी में उन्होंने 'खडी बोली का आंदोलन' नामक पुस्तिका प्रकाशित करवाई। भारतेंदु युग से हिन्दी-साहित्य में आधुनिकता की शुरूआत हुई। इसी दौर में बड़े पैमाने पर भाषा और विषय-वस्तु में बदलाव आया। इतिहास के उस कालखंड में, जिसे हम भारतेंदु युग के नाम से जानते हैं, खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बन गई लेकिन पद्य की भाषा के रूप में ब्रजभाषा का बोलबाला कायम रहा। अयोध्या प्रसाद खत्री ने गद्य और पद्य की भाषा के अलगाव को गलत मानते हुए इसकी एकरूपता पर जोर दिया। पहली बार इन्होंने साहित्य जगत का ध्यान इस मुद्दे की तरफ खींचा, साथ ही इसे आंदोलन का रूप दिया। हिंदी पुनर्जागरण काल में स्रष्टा के रूप में जहाँ एक ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसा प्रतिभा-पुरुष खड़ा था तो दूसरी ओर द्रष्टा के रूप में अयोध्याप्रसाद खत्री जैसा अद्वितीय युगांतरकारी व्यक्तित्व था। इसी क्रम में खत्री जी ने 'खड़ी-बोली का पद्य` दो खंडों में छपवाया। इस किताब के जरिए एक साहित्यिक आंदोलन की शुरूआत हुई। हिन्दी कविता की भाषा क्या हो, ब्रजभाषा अथवा खड़ीबोली हिन्दी? जिसका ग्रियर्सन के साथ भारतेंदु मंडल के अनेक लेखकों ने प्रतिवाद किया तो फ्रेडरिक पिन्काट ने समर्थन। इस दृष्टि से यह भाषा, धर्म, जाति, राज्य आदि क्षेत्रीयताओं के सामूहिक उद्घोष का नवजागरण था। जुलाई दो हज़ार सात में बिहार के शहर मुजफ्फरपुर में उनकी समृति में 'अयोध्या प्रसाद खत्री जयंती समारोह समिति' की स्थापना की गई। इसके द्वारा प्रति वर्ष हिंदी साहित्य में विशेष योगदन करने वाले किसी विशिष्ट व्यक्ति को अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जाता है। पुरस्कार में अयोध्या प्रसाद खत्री की डेढ़ फुट ऊँची प्रतिमा, शाल और नकद राशि प्रदान की जाती है। पाँच-छः जुलाई दो हज़ार सात को पटना में खड़ी बोली के प्रथम आंदोलनकर्ता अयोध्या प्रसाद खत्री की एक सौ पचासवीं जयंती आयोजित की गई। संस्था के अध्यक्ष श्री वीरेन नंदा द्वारा श्री अयोध्या प्रसाद खत्री के जीवन तथा कार्यों पर केन्द्रित 'खड़ी बोली का चाणक्य' शीर्षक फिल्म का निर्माण किया गया है। . चौबीस संबंधोंः पटना, बिहार, ब्रजभाषा, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, भाषा, मुजफ्फरपुर, मुजफ्फरपुर जिला, सरस्वती पत्रिका, साहित्य, हिन्दी, खड़ीबोली, गद्य, काव्य, एक हज़ार आठ सौ सत्तावन, एक हज़ार आठ सौ सतहत्तर, एक हज़ार आठ सौ सत्तासी, एक हज़ार आठ सौ अठासी, एक हज़ार आठ सौ नवासी, एक हज़ार नौ सौ पाँच, दो हज़ार सात, दो हज़ार नौ, चार दिसम्बर, चार जनवरी, आठ जुलाई। पटना या पाटलिपुत्र भारत के बिहार राज्य की राजधानी एवं सबसे बड़ा नगर है। पटना का प्राचीन नाम पाटलिपुत्र था। आधुनिक पटना दुनिया के गिने-चुने उन विशेष प्राचीन नगरों में से एक है जो अति प्राचीन काल से आज तक आबाद है। अपने आप में इस शहर का ऐतिहासिक महत्व है। ईसा पूर्व मेगास्थनीज ने अपने भारत भ्रमण के पश्चात लिखी अपनी पुस्तक इंडिका में इस नगर का उल्लेख किया है। पलिबोथ्रा जो गंगा और अरेन्नोवास के संगम पर बसा था। उस पुस्तक के आकलनों के हिसाब से प्राचीन पटना नौ मील लम्बा तथा एक.पचहत्तर मील चौड़ा था। पटना बिहार राज्य की राजधानी है और गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर अवस्थित है। जहां पर गंगा घाघरा, सोन और गंडक जैसी सहायक नदियों से मिलती है। सोलह लाख से भी अधिक आबादी वाला यह शहर, लगभग पंद्रह कि॰मी॰ लम्बा और सात कि॰मी॰ चौड़ा है। प्राचीन बौद्ध और जैन तीर्थस्थल वैशाली, राजगीर या राजगृह, नालन्दा, बोधगया और पावापुरी पटना शहर के आस पास ही अवस्थित हैं। पटना सिक्खों के लिये एक अत्यंत ही पवित्र स्थल है। सिक्खों के दसवें तथा अंतिम गुरु गुरू गोबिंद सिंह का जन्म पटना में हीं हुआ था। प्रति वर्ष देश-विदेश से लाखों सिक्ख श्रद्धालु पटना में हरमंदिर साहब के दर्शन करने आते हैं तथा मत्था टेकते हैं। पटना एवं इसके आसपास के प्राचीन भग्नावशेष/खंडहर नगर के ऐतिहासिक गौरव के मौन गवाह हैं तथा नगर की प्राचीन गरिमा को आज भी प्रदर्शित करते हैं। एतिहासिक और प्रशासनिक महत्व के अतिरिक्त, पटना शिक्षा और चिकित्सा का भी एक प्रमुख केंद्र है। दीवालों से घिरा नगर का पुराना क्षेत्र, जिसे पटना सिटी के नाम से जाना जाता है, एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र है। . बिहार भारत का एक राज्य है। बिहार की राजधानी पटना है। बिहार के उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखण्ड स्थित है। बिहार नाम का प्रादुर्भाव बौद्ध सन्यासियों के ठहरने के स्थान विहार शब्द से हुआ, जिसे विहार के स्थान पर इसके अपभ्रंश रूप बिहार से संबोधित किया जाता है। यह क्षेत्र गंगा नदी तथा उसकी सहायक नदियों के उपजाऊ मैदानों में बसा है। प्राचीन काल के विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहा यह प्रदेश, वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के सबसे पिछड़े योगदाताओं में से एक बनकर रह गया है। . ब्रजभाषा मूलतः ब्रज क्षेत्र की बोली है। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ्य परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुंदर नाटक के अनुवाद से होती है। यद्यपि नाटक उनके पहले भी लिखे जाते रहे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ बनाया। उन्होंने 'हरिश्चंद्र पत्रिका', 'कविवचन सुधा' और 'बाल विबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे।। वेबदुनिया। स्मृति जोशी भारतेन्दु जी ने मात्र चौंतीस वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया। . भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को व्यक्त करते है और इसके लिये हम वाचिक ध्वनियों का उपयोग करते हैं। भाषा मुख से उच्चारित होनेवाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह है जिनके द्वारा मन की बात बतलाई जाती है। किसी भाषा की सभी ध्वनियों के प्रतिनिधि स्वन एक व्यवस्था में मिलकर एक सम्पूर्ण भाषा की अवधारणा बनाते हैं। व्यक्त नाद की वह समष्टि जिसकी सहायता से किसी एक समाज या देश के लोग अपने मनोगत भाव तथा विचार एक दूसरे पर प्रकट करते हैं। मुख से उच्चारित होनेवाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह जिनके द्वारा मन की बात बतलाई जाती है। बोली। जबान। वाणी। विशेष - इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं। अपने समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही अभ्यस्त होने के कारण अच्छी तरह जानते हैं, पर दूसरे देशों या समाजों की भाषा बिना अच्छी़ तरह नहीं आती। भाषाविज्ञान के ज्ञाताओं ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित करके उनमें से प्रत्येक की अलग अलग शाखाएँ स्थापित की हैं और उन शाखाकों के भी अनेक वर्ग उपवर्ग बनाकर उनमें बड़ी बड़ी भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं अथाव बोलियों को रखा है। जैसे हमारी हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के आर्य वर्ग की भारतीय आर्य शाखा की एक भाषा है; और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। पास पास बोली जानेवाली अनेक उपभाषाओं या बोलियों में बहुत कुछ साम्य होता है; और उसी साम्य के आधार पर उनके वर्ग या कुल स्थापित किए जाते हैं। यही बात बड़ी बड़ी भाषाओं में भी है जिनका पारस्परिक साम्य उतना अधिक तो नहीं, पर फिर भी बहुत कुछ होता है। संसार की सभी बातों की भाँति भाषा का भी मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से अब तक बराबर विकास होता आया है; और इसी विकास के कारण भाषाओं में सदा परिवर्तन होता रहता है। भारतीय आर्यों की वैदिक भाषा से संस्कुत और प्राकृतों का, प्राकृतों से अपभ्रंशों का और अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। सामान्यतः भाषा को वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। भाषा आभ्यंतर अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। यही नहीं वह हमारे आभ्यंतर के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परम्परा से विच्छिन्न है। इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं। अपने समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही अभ्यस्त होने के कारण अच्छी तरह जानते हैं, पर दूसरे देशों या समाजों की भाषा बिना अच्छी़ तरह सीखे नहीं आती। भाषाविज्ञान के ज्ञाताओं ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित करके उनमें से प्रत्येक की अलग अलग शाखाएँ स्थापित की हैं और उन शाखाओं के भी अनेक वर्ग-उपवर्ग बनाकर उनमें बड़ी बड़ी भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं अथाव बोलियों को रखा है। जैसे हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के आर्य वर्ग की भारतीय आर्य शाखा की एक भाषा है; और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। पास पास बोली जानेवाली अनेक उपभाषाओं या बोलियों में बहुत कुछ साम्य होता है; और उसी साम्य के आधार पर उनके वर्ग या कुल स्थापित किए जाते हैं। यही बात बड़ी बड़ी भाषाओं में भी है जिनका पारस्परिक साम्य उतना अधिक तो नहीं, पर फिर भी बहुत कुछ होता है। संसार की सभी बातों की भाँति भाषा का भी मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से अब तक बराबर विकास होता आया है; और इसी विकास के कारण भाषाओं में सदा परिवर्तन होता रहता है। भारतीय आर्यों की वैदिक भाषा से संस्कृत और प्राकृतों का, प्राकृतों से अपभ्रंशों का और अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। प्रायः भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिये लिपियों की सहायता लेनी पड़ती है। भाषा और लिपि, भाव व्यक्तीकरण के दो अभिन्न पहलू हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और दो या अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है। उदाहरणार्थ पंजाबी, गुरूमुखी तथा शाहमुखी दोनो में लिखी जाती है जबकि हिन्दी, मराठी, संस्कृत, नेपाली इत्यादि सभी देवनागरी में लिखी जाती है। . मुज़फ्फरपुर उत्तरी बिहार राज्य के तिरहुत प्रमंडल का मुख्यालय तथा मुज़फ्फरपुर ज़िले का प्रमुख शहर एवं मुख्यालय है। अपने सूती वस्त्र उद्योग, लोहे की चूड़ियों, शहद तथा आम और लीची जैसे फलों के उम्दा उत्पादन के लिये यह जिला पूरे विश्व में जाना जाता है, खासकर यहाँ की शाही लीची का कोई जोड़ नहीं है। यहाँ तक कि भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी यहाँ से लीची भेजी जाती है। दो हज़ार सत्रह मे मुजफ्फरपुर स्मार्ट सिटी के लिये चयनित हुआ है। अपने उर्वरक भूमि और स्वादिष्ट फलों के स्वाद के लिये मुजफ्फरपुर देश विदेश मे "स्वीटसिटी" के नाम से जाना जाता है। मुजफ्फरपुर थर्मल पावर प्लांट देशभर के सबसे महत्वपूर्ण बिजली उत्पादन केंद्रो मे से एक है। . मुजफ्फरपुर जिला, बिहार के अड़तीस जिलों में से एक है। इसका प्रशासकीय मुख्यालय मुजफ्फरपुर है। यह जिला उत्तर में पूर्वी चंपारण और सीतामढ़ी, दक्षिण में वैशाली और सारण, पूर्व में समस्तीपुर और दरभंगा तथा पश्चिम में गोपालगंज से घिरा है। हिंदी और मैथिली यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हैं, जबकि बज्जिका यहाँ की स्थानीय बोली . सरस्वती हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध रूपगुणसम्पन्न प्रतिनिधि पत्रिका थी। इस पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से सन एक हज़ार नौ सौ ईशून्य के जनवरी मास में प्रारम्भ हुआ था। बत्तीस पृष्ठ की क्राउन आकार की इस पत्रिका का मूल्य चार आना मात्र था। एक हज़ार नौ सौ तीन ईशून्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक हुए और एक हज़ार नौ सौ बीस ईशून्य तक रहे। इसका प्रकाशन पहले झाँसी और फिर कानपुर से होने लगा था। महवीर प्रसाद द्विवेदी के बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवी दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, देवीलाल चतुर्वेदी और श्रीनारायण चतुर्वेदी सम्पादक हुए। एक हज़ार नौ सौ पाँच ईशून्य में काशी नागरी प्रचारिणी सभा का नाम मुखपृष्ठ से हट गया। एक हज़ार नौ सौ तीन में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका कार्यभार संभाला। एक ओर भाषा के स्तर पर और दूसरी ओर प्रेरक बनकर मार्गदर्शन का कार्य संभालकर द्विवेदी जी ने साहित्यिक और राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया। द्विवेदी जी ने भाषा की समृद्धि करके नवीन साहित्यकारों को राह दिखाई। उनका वक्तव्य हैः महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ नए रचनाकारों को भाषा का महत्त्व समझाया व गद्य और पद्य के लिए राह निर्मित की। महावीर प्रसाद द्विवेदी की यह पत्रिका मूलतः साहित्यिक थी और हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त से लेकर कहीं-न-कहीं निराला के निर्माण में इसी पत्रिका का योगदान था परंतु साहित्य के निर्माण के साथ राष्ट्रीयता का प्रसार करना भी इनका उद्देश्य था। भाषा का निर्माण करना साथ ही गद्य-पद्य के लिए खड़ी बोली को ही प्रोत्साहन देना इनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था। मई एक हज़ार नौ सौ छिहत्तर के बाद इसका प्रकाशन बन्द हो गया।लगभग अस्सी वर्षों तक यह पत्रिका निकली I अंतिम बीस वर्षों तक इसका सम्पादन पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने किया I . किसी भाषा के वाचिक और लिखित को साहित्य कह सकते हैं। दुनिया में सबसे पुराना वाचिक साहित्य हमें आदिवासी भाषाओं में मिलता है। इस दृष्टि से आदिवासी साहित्य सभी साहित्य का मूल स्रोत है। . हिन्दी या भारतीय विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। केंद्रीय स्तर पर दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। यह हिन्दुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्द का प्रयोग अधिक हैं और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हालांकि, हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत का संविधान में कोई भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। हिन्दी और इसकी बोलियाँ सम्पूर्ण भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। भारत और अन्य देशों में भी लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की और नेपाल की जनता भी हिन्दी बोलती है।http://www.ethnologue.com/language/hin दो हज़ार एक की भारतीय जनगणना में भारत में बयालीस करोड़ बीस लाख लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा बताया। भारत के बाहर, हिन्दी बोलने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में छः सौ अड़तालीस,नौ सौ तिरासी; मॉरीशस में छः,पचासी,एक सौ सत्तर; दक्षिण अफ्रीका में आठ,नब्बे,दो सौ बानवे; यमन में दो,बत्तीस,सात सौ साठ; युगांडा में एक,सैंतालीस,शून्य; सिंगापुर में पाँच,शून्य; नेपाल में आठ लाख; जर्मनी में तीस,शून्य हैं। न्यूजीलैंड में हिन्दी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसके अलावा भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में चौदह करोड़ दस लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, मौखिक रूप से हिन्दी के काफी सामान है। लोगों का एक विशाल बहुमत हिन्दी और उर्दू दोनों को ही समझता है। भारत में हिन्दी, विभिन्न भारतीय राज्यों की चौदह आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग एक अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है। हिंदी हिंदी बेल्ट का लिंगुआ फ़्रैंका है, और कुछ हद तक पूरे भारत । भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी उनमें हिन्दी भी प्रमुख होगी। 'देशी', 'भाखा' , 'देशना वचन' , 'हिन्दवी', 'दक्खिनी', 'रेखता', 'आर्यभाषा' , 'हिन्दुस्तानी', 'खड़ी बोली', 'भारती' आदि हिन्दी के अन्य नाम हैं जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखण्डों में एवं विभिन्न सन्दर्भों में प्रयुक्त हुए हैं। . खड़ी बोली वह बोली है जिसपर ब्रजभाषा या अवधी आदि की छाप न हो। ठेंठ हिंदी। आज की राष्ट्रभाषा हिंदी का पूर्व रूप। इसका इतिहास शताब्दियों से चला आ रहा है। यह परिनिष्ठित पश्चिमी हिंदी का एक रूप है। . सामान्यतः मनुष्य की बोलने या लिखने पढ़ने की छंदरहित साधारण व्यवहार की भाषा को गद्य कहा जाता है। इसमें केवल आंशिक सत्य है क्योंकि इसमें गद्यकार के रचनात्मक बोध की अवहेलना है। साधारण व्यवहार की भाषा भी गद्य तभी कही जा सकती है जब यह व्यवस्थित और स्पष्ट हो। रचनात्मक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए गद्य को मनुष्य की साधारण किंतु व्यस्थित भाषा या उसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति कहना अधिक समीचीन होगा। . काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो। अर्थात् वहजिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रसगंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्द को 'काव्य' कहा है। 'अर्थ की रमणीयता' के अंतर्गत शब्द की रमणीयता भी समझकर लोग इस लक्षण को स्वीकार करते हैं। पर 'अर्थ' की 'रमणीयता' कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है। साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ का लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार 'रसात्मक वाक्य ही काव्य है'। रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य की आत्मा है। काव्यप्रकाश में काव्य तीन प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र। ध्वनि वह है जिस, में शब्दों से निकले हुए अर्थ की अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय प्रधान हो। गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण हो। चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य के चमत्कार हो। इन तीनों को क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाशकार का जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के उद्रेक पर नहीं। काव्य के दो और भेद किए गए हैं, महाकाव्य और खंड काव्य। महाकाव्य सर्गबद्ध और उसका नायक कोई देवता, राजा या धीरोदात्त गुंण संपन्न क्षत्रिय होना चाहिए। उसमें शृंगार, वीर या शांत रसों में से कोई रस प्रधान होना चाहिए। बीच बीच में करुणा; हास्य इत्यादि और रस तथा और और लोगों के प्रसंग भी आने चाहिए। कम से कम आठ सर्ग होने चाहिए। महाकाव्य में संध्या, सूर्य, चंद्र, रात्रि, प्रभात, मृगया, पर्वत, वन, ऋतु, सागर, संयोग, विप्रलम्भ, मुनि, पुर, यज्ञ, रणप्रयाण, विवाह आदि का यथास्थान सन्निवेश होना चाहिए। काव्य दो प्रकार का माना गया है, दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह है जो अभिनय द्वारा दिखलाया जाय, जैसे, नाटक, प्रहसन, आदि जो पढ़ने और सुनेन योग्य हो, वह श्रव्य है। श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और पद्य। पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद कहे जा चुके हैं। गद्य काव्य के भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका। चंपू, विरुद और कारंभक तीन प्रकार के काव्य और माने गए है। . कोई विवरण नहीं। एक हज़ार आठ सौ सतहत्तर ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। . एक हज़ार आठ सौ सत्तासी ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। . एक हज़ार आठ सौ अठासी ग्रेगोरी कैलंडर का एक अधिवर्ष है। . एक हज़ार आठ सौ नवासी ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। . एक हज़ार नौ सौ पाँच ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। . वर्ष दो हज़ार सात सोमवार से प्रारम्भ होने वाला ग्रेगोरी कैलंडर का सामान्य वर्ष है। . दो हज़ार नौ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। वर्ष दो हज़ार नौ बृहस्पतिवार से प्रारम्भ होने वाला वर्ष है। संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को एवं आइएयू ने एक हज़ार छः सौ नौ में गैलीलियो गैलिली द्वारा खगोलीय प्रेक्षण आरंभ करने की घटना की चार सौवीं जयंती के उपलक्ष्य में इसे अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष घोषित किया है। . चार दिसंबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का तीन सौ अड़तीसवॉ दिन है। साल में अभी और सत्ताईस दिन बाकी है। . चार जनवरी ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का चारथॉ दिन है। साल में अभी और तीन सौ इकसठ दिन बाकी हैं । . आठ जुलाई ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का एक सौ नवासीवॉ दिन है। वर्ष में अभी और एक सौ छिहत्तर दिन बाकी है। .
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IPL 2023: इंडियन प्रीमियर लीग का 16वां सीजन अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। इस सीजन में कई युवा और सीनियर खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से सबको लुभाया। एक खिलाड़ी ऐसा भी है जिसके फ्लॉप प्रदर्शन ने अब उसकी चिंता बढ़ा दी है. हम जिस टीम इंडिया के खिलाड़ी की बात कर रहे हैं उसके पास इस साल आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन करने का मौका था.
मालूम हो कि आईपीएल 2023 में दिल्ली कैपिटल्स और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच मैच खेला गया था। इस मैच में दिल्ली को 27 रन से हार का सामना करना पड़ा था। इस हार के बाद उसके प्लेऑफ में पहुंचने की उम्मीदें लगभग खत्म हो गई थीं. दिल्ली कैपिटल्स की टीम के आईपीएल 2023 से बाहर होते ही एक भारतीय क्रिकेटर का करियर लगभग खत्म हो जाएगा और जल्द ही यह खिलाड़ी भी संन्यास की घोषणा कर सकता है। बता दें कि हम यहां जिस खिलाड़ी की बात कर रहे हैं। वह कोई और नहीं बल्कि भारतीय खिलाड़ी मनीष पांडे हैं।
भारत के क्रिकेटर मनीष पांडे का करियर 33 साल की उम्र में खत्म होता नजर आ रहा है और जल्द ही इस खिलाड़ी को संन्यास की घोषणा करनी पड़ सकती है। टीम इंडिया के फ्लॉप क्रिकेटर मनीष पांडे को दिल्ली कैपिटल्स ने आईपीएल 2023 में खेलने के लगातार मौके दिए थे, लेकिन इस खिलाड़ी ने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी हैं। दिल्ली कैपिटल्स के बल्लेबाज मनीष पांडे आईपीएल 2023 में बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए हैं। मनीष पांडे ने आईपीएल 2023 के 9 मैचों में 20. 00 की खराब औसत से सिर्फ 160 रन बनाए हैं।
बुधवार को चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाफ आईपीएल मैच में मनीष पांडे को दिल्ली कैपिटल्स की टीम ने नंबर 4 पर बल्लेबाजी के लिए उतारा, लेकिन वह 29 गेंदों में महज 27 रन की धीमी पारी खेलकर आउट हो गए। मनीष पांडे बेहद खराब फॉर्म में चल रहे हैं। मनीष पांडे को कई मौके दिए गए, लेकिन वह हर बार फ्लॉप साबित हुए।
आपको बता दें कि चयनकर्ताओं ने पहले ही मनीष पांडे का भारतीय क्रिकेट टीम से पत्ता काट दिया है और अब वह हमेशा के लिए आईपीएल से बाहर हो सकते हैं। बता दें कि मनीष पांडे ने पिछले साल भी लखनऊ में खराब प्रदर्शन किया था, जिसके चलते मनीष को लखनऊ ने ड्रॉप कर दिया था। लेकिन फिर इस साल दिल्ली ने मनीष को चुना और उन्होंने यहां परफॉर्म किया। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली अगले साल मनीष को भी ड्रॉप कर देगी।
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IPL दो हज़ार तेईस: इंडियन प्रीमियर लीग का सोलहवां सीजन अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। इस सीजन में कई युवा और सीनियर खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से सबको लुभाया। एक खिलाड़ी ऐसा भी है जिसके फ्लॉप प्रदर्शन ने अब उसकी चिंता बढ़ा दी है. हम जिस टीम इंडिया के खिलाड़ी की बात कर रहे हैं उसके पास इस साल आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन करने का मौका था. मालूम हो कि आईपीएल दो हज़ार तेईस में दिल्ली कैपिटल्स और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच मैच खेला गया था। इस मैच में दिल्ली को सत्ताईस रन से हार का सामना करना पड़ा था। इस हार के बाद उसके प्लेऑफ में पहुंचने की उम्मीदें लगभग खत्म हो गई थीं. दिल्ली कैपिटल्स की टीम के आईपीएल दो हज़ार तेईस से बाहर होते ही एक भारतीय क्रिकेटर का करियर लगभग खत्म हो जाएगा और जल्द ही यह खिलाड़ी भी संन्यास की घोषणा कर सकता है। बता दें कि हम यहां जिस खिलाड़ी की बात कर रहे हैं। वह कोई और नहीं बल्कि भारतीय खिलाड़ी मनीष पांडे हैं। भारत के क्रिकेटर मनीष पांडे का करियर तैंतीस साल की उम्र में खत्म होता नजर आ रहा है और जल्द ही इस खिलाड़ी को संन्यास की घोषणा करनी पड़ सकती है। टीम इंडिया के फ्लॉप क्रिकेटर मनीष पांडे को दिल्ली कैपिटल्स ने आईपीएल दो हज़ार तेईस में खेलने के लगातार मौके दिए थे, लेकिन इस खिलाड़ी ने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी हैं। दिल्ली कैपिटल्स के बल्लेबाज मनीष पांडे आईपीएल दो हज़ार तेईस में बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए हैं। मनीष पांडे ने आईपीएल दो हज़ार तेईस के नौ मैचों में बीस. शून्य की खराब औसत से सिर्फ एक सौ साठ रन बनाए हैं। बुधवार को चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाफ आईपीएल मैच में मनीष पांडे को दिल्ली कैपिटल्स की टीम ने नंबर चार पर बल्लेबाजी के लिए उतारा, लेकिन वह उनतीस गेंदों में महज सत्ताईस रन की धीमी पारी खेलकर आउट हो गए। मनीष पांडे बेहद खराब फॉर्म में चल रहे हैं। मनीष पांडे को कई मौके दिए गए, लेकिन वह हर बार फ्लॉप साबित हुए। आपको बता दें कि चयनकर्ताओं ने पहले ही मनीष पांडे का भारतीय क्रिकेट टीम से पत्ता काट दिया है और अब वह हमेशा के लिए आईपीएल से बाहर हो सकते हैं। बता दें कि मनीष पांडे ने पिछले साल भी लखनऊ में खराब प्रदर्शन किया था, जिसके चलते मनीष को लखनऊ ने ड्रॉप कर दिया था। लेकिन फिर इस साल दिल्ली ने मनीष को चुना और उन्होंने यहां परफॉर्म किया। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली अगले साल मनीष को भी ड्रॉप कर देगी।
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फ्रांस नौसेना के उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क (Christophe Prazuck) अपने तीन दिवसीय भारत दौरे पर हैं। उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क (Christophe Prazuck) को दिल्ली में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।
फ्रांस नौसेना के उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क (Christophe Prazuck) अपने तीन दिवसीय भारत दौरे पर हैं। उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क (Christophe Prazuck) को दिल्ली में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। क्रिस्टोफ प्रज़क (Christophe Prazuck) 1979 में फ्रांस की नौसेना में भर्ती हुए थे।
उनके पिता स्टीफेन प्रजक नौसेना में रियर-एडमिरल थे। 1984 से 1989 तक वह पनडुब्बी बलों में शामिल हो गए। 1989 से 1991 तक वह कैलिफोर्निया के मोंटेरी में यूनाइटेड स्टेट्स नेवल पोस्ट ग्रेजुएट किया। फिजिकल ओशनोग्राफी में उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।
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फ्रांस नौसेना के उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क अपने तीन दिवसीय भारत दौरे पर हैं। उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क को दिल्ली में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। फ्रांस नौसेना के उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क अपने तीन दिवसीय भारत दौरे पर हैं। उप एडमिरल क्रिस्टोफ प्रज़क को दिल्ली में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। क्रिस्टोफ प्रज़क एक हज़ार नौ सौ उन्यासी में फ्रांस की नौसेना में भर्ती हुए थे। उनके पिता स्टीफेन प्रजक नौसेना में रियर-एडमिरल थे। एक हज़ार नौ सौ चौरासी से एक हज़ार नौ सौ नवासी तक वह पनडुब्बी बलों में शामिल हो गए। एक हज़ार नौ सौ नवासी से एक हज़ार नौ सौ इक्यानवे तक वह कैलिफोर्निया के मोंटेरी में यूनाइटेड स्टेट्स नेवल पोस्ट ग्रेजुएट किया। फिजिकल ओशनोग्राफी में उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।
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Punjab Election 2022 के दौरान एक अजीबोगरीब खबर सामने आई है। यहां एक ही पार्टी से एक ही सीट पर 2 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतर गए हैं। इसको लेकर लोग पूछ रहे हैं कि असली कौन है। हालांकि, अब इसको लेकर बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी (BSP) के अध्यक्ष जसवीर सिंह गढ़ी ने किया है कि बरजिंदर सिंह हुसैनपुर ने नवांशहर से अपना नामांकन पार्टी के 'फर्जी' टिकट पर दाखिल किया है, जबकि आधिकारिक उम्मीदवार पहले ही पर्चा दाखिल कर चुके हैं।
BSP के प्रत्याशी नछत्तर पाल ने कुछ दिन पहले अपना नामांकन दाखिल किया था। हुसैनपुर ने बाद में एक वीडियो मैसेज में कहा था कि पाल को कुछ लोगों ने बहका दिया था और वो नामांकन वापस लेंगे। उपायुक्त और जिला निर्वाचन अधिकारी विशेष सारंगल की ओर से जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया कि हुसैनपुर ने बसपा प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया। लेकिन अभी तक नामांकन वापस नहीं हुआ।
सूचना मिलने के बाद पंजाब में बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष गढ़ी नवांशहर गए और निर्वाचन अधिकारी से मुलाकात की है। बाद में नछत्तर पाल और शिअद के नवांशहर प्रभारी जरनैल सिंह वाहिद के साथ, गढ़ी ने बसपा से बरजिंदर सिंह हुसैनपुर के नामांकन को 'फर्जी' करार दिया और कहा कि नवांशहर से पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नछत्तर पाल हैं।
ऐसे में यहां पर एक सीट पर एक ही पार्टी के दो उम्मीदवारों के नामांकन की चर्चा से इस सीट पर अटकलों का दौर तेज हो गया है। गौरतलब है कि बीएसपी इस बार पंजाब में विधान सभा का चुनाव शिरोमणि अकाली दल के साथ लड़ रही है।
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Punjab Election दो हज़ार बाईस के दौरान एक अजीबोगरीब खबर सामने आई है। यहां एक ही पार्टी से एक ही सीट पर दो प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतर गए हैं। इसको लेकर लोग पूछ रहे हैं कि असली कौन है। हालांकि, अब इसको लेकर बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी के अध्यक्ष जसवीर सिंह गढ़ी ने किया है कि बरजिंदर सिंह हुसैनपुर ने नवांशहर से अपना नामांकन पार्टी के 'फर्जी' टिकट पर दाखिल किया है, जबकि आधिकारिक उम्मीदवार पहले ही पर्चा दाखिल कर चुके हैं। BSP के प्रत्याशी नछत्तर पाल ने कुछ दिन पहले अपना नामांकन दाखिल किया था। हुसैनपुर ने बाद में एक वीडियो मैसेज में कहा था कि पाल को कुछ लोगों ने बहका दिया था और वो नामांकन वापस लेंगे। उपायुक्त और जिला निर्वाचन अधिकारी विशेष सारंगल की ओर से जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया कि हुसैनपुर ने बसपा प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया। लेकिन अभी तक नामांकन वापस नहीं हुआ। सूचना मिलने के बाद पंजाब में बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष गढ़ी नवांशहर गए और निर्वाचन अधिकारी से मुलाकात की है। बाद में नछत्तर पाल और शिअद के नवांशहर प्रभारी जरनैल सिंह वाहिद के साथ, गढ़ी ने बसपा से बरजिंदर सिंह हुसैनपुर के नामांकन को 'फर्जी' करार दिया और कहा कि नवांशहर से पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नछत्तर पाल हैं। ऐसे में यहां पर एक सीट पर एक ही पार्टी के दो उम्मीदवारों के नामांकन की चर्चा से इस सीट पर अटकलों का दौर तेज हो गया है। गौरतलब है कि बीएसपी इस बार पंजाब में विधान सभा का चुनाव शिरोमणि अकाली दल के साथ लड़ रही है।
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दूसरी बात सरकारी और सरकार से सम्बद्ध स्कूलों और कालेजों के बहिष्कार की थी । मेरा अनुभव बताता था कि इसमें हमें बहुत सफलता नहीं मिलेगी। मैंने बंगाल-विच्छेद के समय कलकत्ते में उस आन्दोलन को अच्छी तरह देखा था, जो सरकारी स्कूलों के विरुद्ध चला था। वहां भी यह प्रयत्न हुआ था कि राष्ट्रीय विद्यालय खोला जाये । उस 'नेशनल कौंसिल आफ एजुकेशन' को ऐसे-ऐसे व्यक्तियों की सहायता तथा सहानुभूति मिली थी, जो केवल राजनीतिक पुरुष ही नहीं थे । सर गुरुदास बनर्जी, जो हाइकोर्ट की जजी से पेंशन पा चुके थे और जो पहले कलकत्ता युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रह चुके थे, इसके बड़े पक्षपाती और सहायक थे । इसलिए उसे गवर्नमेंट के विरोध का भी विशेष भय नहीं था । कांग्रेस तथा आन्दोलन के प्रोग्राम में भी बहिष्कार की बात नहीं थी । उसमें अच्छे-अच्छे कुछ उत्साही युवक, जिन्होंने युनिवर्सिटी में बड़ा नाम पाया था, शरीक हुए थे। उनमें से विख्यात लेखक श्री विनयकुमार सरकार हैं, जिन्होंने एम. ए. की परीक्षा में स्वर्णपदक और सर्वप्रथम स्थान पाया था । इतने पर भी उसमें उतना उत्साह नहीं देखा गया; क्योंकि वहां से शिक्षा पाये हुए विद्यार्थियों को किसी प्रकार जीविका निर्वाह का रास्ता नहीं मिलता था । इससे मैं डरता था कि यहां भी यदि हम इस पर जोर देंगे तो विद्यार्थियों में, और विशेष करके उनके अभिभावकों में, बहुत उत्साह नहीं आवेगा, और तब यह कार्यक्रम जोरों से चल नहीं सकेगा । मैंने बैठक में अपने इस विचार को भी रखा था; पर कुछ भाइयों को मेरी बात नहीं जंची; क्योंकि वे समझते थे कि मैं बहुत डरपोक हूं और यों ही अपने सामने अनावश्यक भय खड़ा कर लेता हूं ।
बात यह है कि हमारे देश में विद्या अर्थकरी है। जो पढ़ता है उसे कुछ कमाना चाहिए । उसकी जिंदगी ऐसी बन जाती है कि वह पुराने तरीके से रह नहीं सकता। उसके अपने रहन-सहन में भी अधिक खर्च पड़ने लगता है। घर वाले आधुनिक शिक्षा दिलाने में खर्च काफी करते हैं और आशा रखते हैं कि उस शिक्षा से वह उस पूंजी को अगर बढ़ा न सकेगा तो कम-से-कम कायम रख सकेगा । वह शिक्षा भी ऐसी हुआ करती है कि शिक्षा समाप्त होने के बाद सरकारी नौकरी या वकालत की तरह के पेशे को छोड़कर दूसरा कोई काम भी नहीं मिलता। आरम्भ में, जब ऐसी विद्या प्राप्त किये हुए लोगों की संख्या कम थी, लोगों ने पैसे भी खूब कमाये थे । पर जैसे-जैसे अंगरेजी शिक्षा का प्रचार बढ़ता गया, शिक्षितों की संख्या बढ़ती गयी, पैसे कमाने का मौका कम होने लगा; क्योंकि इन नौकरियों और पेशों में जाने वालों की संख्या बढ़ने लगी, फलतः आपस की होड़ से कठिनाई भी बढ़ने लगी । इसलिए, यद्यपि सरकारी अंगरेजी शिक्षा से भी उतनी आशा नहीं की जा सकती थी, तथापि राष्ट्रीय शिक्षा के मुकाबले अर्थकरी होने में वह अब भी बहुत बढ़ी चढ़ी थी । इसलिए मेरा विचार था कि हम पहले कार्यक्रम के अनुसार लड़कों को स्कूल-कालेज छोड़ने के लिए कहें, और जब देखें कि उनकी संख्या काफी होती जा रही है तब अपनी ओर से विद्यालय इत्यादि
का प्रबंध करें । मैं यह भी सोचता था कि विद्यालय खोल देने के बाद उसको चलाते रहना चाहिए । यदि हम ऐसा न कर सकेंगे तो इसका असर अच्छा न होगा। इसलिए मैं विद्यालय खोलने अथवा परीक्षा लेने के पक्ष में शुरू में नहीं था ।
मैंने जो कुछ ऊपर कहा है उसका यह अर्थ नहीं है कि मैं आधुनिक शिक्षा की त्रुटियों को नहीं समझता था । मैं समझ गया था कि आधुनिक शिक्षा बिलकुल निकम्मी है। विदेशी भाषा द्वारा दी जाने के कारण इसमें समय और शक्ति की बहुत बरबादी है। इससे वह स्वाभाविक मानसिक विकास नहीं हो पाता जो अपनी भाषा द्वारा दी गयी शिक्षा से होता है । स्पष्ट है कि जहां शब्दों के अर्थ स्मरण रखने में ही सारा समय लग जाता है वहां उसके समझने और चिंतन के लिए कैसे समय मिल सकता है ? इसलिए, यदि और कुछ नहीं तो केवल इस एक ही दोष के कारण वह शिक्षा सर्वथा अनिष्टकर है। विदेशी भाषा सीखने और जानने में दोष नहीं है। जानना अच्छा है। आज की दुनिया में कम-से-कम किसी एक योरोपीय भाषा का परिचय एक प्रकार से अनिवार्य-सा हो गया है । तो भी भाषा जान लेना और उससे अपना काम निकालना एक बात है, और विदेशी भाषा को सारी शिक्षा का माध्यम बनाना बिलकुल दूसरी बात है। हम उसे माध्यम बनाने के विरोधी हैं, सीखने के नहीं। मैं यह भी समझता था कि इस शिक्षा की नींव पड़ी थी अंगरेज हाकिमों की आवश्यकता की पूर्ति • के कारण । वह आवश्यकता थी अंगरेजी पढ़े-लिखे देशी लोगों की, जिनका सहयोग वे अपना कारबार चलाने में अनिवार्य समझते थे । वे कुछ ऐसे हिन्दुस्तानियों को चाहते थे जो रूप-रेखा में तो हिन्दुस्तानी हों, पर विचार और मानसिक वृत्ति में अंगरेज ही हों। उन्होंने यह भी चाहा था कि उनके दफ्तरों के काम चलाने के लिए ऐसे सस्ते हिन्दुस्तानी पैदा किये जायें, जो अंगरेजी सीखकर उनका सब काम अंगरेजी में ही कर दें । इस तरह, अंगरेजों को हिन्दुस्तानी भाषा से परिचित होने की आवश्यकता नहीं होगी । इसलिए शिक्षा की पद्धति भी कुछ ऐसी बनी थी कि विशेषतः उसी जरूरत के मुताबिक लोग तैयार किये जा सकें । हां, ऐसे तैयार होने वालों में कुछ तो ऐसे जरूर निकल आवेंगे जो स्वतंत्र रूप से कुछ विचार करने की शक्ति भी प्राप्त कर लेंगे और जो बिलकुल सरकार पर ही भरोसा न रखेंगे। ऐसे अगर कुछ निकलें तो निकलें; पर शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य दफ्तरी लोगों को तैयार करना ही था। ऐसा ही उसका फल भी हुआ । इसलिए मैं इस शिक्षा का पक्षपाती तो किसी तरह भी न था; पर राष्ट्रीय शिक्षा में जो दिक्कतें मैं देखता था उनसे कुछ डरकर आहिस्ता-आहिस्ता कदम बढ़ाना चाहता था । सबसे ज्यादा मुझे इस बात की चिंता थी कि शुरू होकर किसी काम का शीघ्र ही बंद हो जाना और किसी नतीजे तक न पहुंचना लोगों को हतोत्साहित करेगा। इसलिए, यदि हम काम थोड़ा भी करें तो हर्ज नहीं, पर जो करें वह ठोस होना चाहिए ।
पहले कह चुका हूं कि हम लोग बिहार में पूना के फरगुसन कालेज के ढंग का एक
कालेज खोलने का विचार चम्पारन में ही कर रहे थे। कुछ रुपये भी जमा कर लिये थे। पर वह विचार स्थगित कर दिया गया था; क्योंकि गांधीजी ने कहा था कि सरकार से सम्बद्ध शिक्षालय खोलने से कोई फायदा नहीं है - यदि ऐसा करना ही चाहते हो तो बिलकुल नयी पद्धति से पढ़ाने वाली राष्ट्रीय संस्था खोलो । उनकी वह बात भी हम लोग भूले नहीं थे । इसलिए मैं कुछ ठहरकर यह देख लेना मुनासिब समझता था कि देश और विशेषकर विद्यार्थी समुदाय असहयोग के मैदान में किस तरह आता है। कुछ भाइयों का विचार था कि असहयोग को सफल बनाने के लिए जब तक हम विद्यार्थियों के सामने कोई दूसरी शिक्षा-संस्था नहीं प्रस्तुत कर देंगे तब तक वे सरकारी विद्यालयों को छोड़कर नहीं आवेंगे । इसलिए विद्यार्थियों को सरकारी विद्यालयों से हटाने - असहयोग कराने के लिए राष्ट्रीय विद्यालय का होना आवश्यक है। मैं इस प्रकार प्रलोभन देकर असहयोग कराना पसंद नहीं करता था । मैं चाहता था कि विद्यार्थियों को देश के नाम पर और सरकारी शिक्षा की त्रुटियों को बताकर हटाना अच्छा होगा । जब वे इस तरह सब कुछ समझ-बूझकर असहयोग करेंगे तभी उनका असहयोग टिकाऊ हो सकेगा। अगर वे यह समझकर असहयोग करेंगे कि वहां भी उनको नौकरी दिलाने वाली शिक्षा मिलेगी और इस तरह उन्हें कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा, जो उनका निश्चय टिकाऊ न होगा। हमारे विद्यालय में आकर जब वे यह देखेंगे कि उनको उतनी सुविधा नहीं है जितनी सरकारी विद्यालयों में थी, तो वे हताश होकर फिर वापस चले जायेंगे। मैं चाहता था कि केवल ऐसे ही लोग आवें जो यह समझ लें कि यह रास्ता कंटकाकीर्ण है - इसमें कष्ट है और उसे झेलने के ही लिए हम जा रहे हैं, न कि उन कुछ सुविधाओं के लिए जो सहयोग करने वालों को प्राप्त हैं ।
यह सब बहस चल ही रही थी और हम लोग सोच ही रहे थे कि मजहरुल हक साहब ने एक राष्ट्रीय स्कूल खोल दिया, जिसके प्रधान अध्यापक हुए लाट बाबू (श्री रामकिशोर लाल नन्दक्युलियार), जो हाल ही में विलायत से एम. ए. और बैरिस्ट्री पास कर लौटे थे । दिसम्बर के आरम्भ में गांधीजी मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद के साथ, दौरे पर निकले। वह बिहार में भी आये। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयों पर भी चढ़ाई की थी। थोड़ी सफलता भी मिली थी, पर पूरी नहीं । उसी चढ़ाई के फलस्वरूप काशी विद्यापीठ और जामे - मिल्लिया (दिल्ली) का जन्म हुआ था। बिहार में उन लोगों के आने से बड़ा उत्साह उमड़ा। बिहार के विद्यार्थी भी उस लहर में बह चले ।
सरकारी शिक्षा से असहयोग का अर्थ था किसी भी शिक्षा संबंधी संस्था से संबंध न रखना । मैं पटना युनिवर्सिटी के सिनेट और सिंडिकेट का मेम्बर था । युनिवर्सिटी के कामों में काफी दिलचस्पी भी लिया करता था । युनिवर्सिटी ने एक कमिटी मुकर्रर की थी । कलकत्ता युनिवर्सिटी की स्थिति पर विचार करने के लिए नियुक्त सैडलर कमिटी की रिपोर्ट पर विचार करके पटना युनिवर्सिटी में आवश्यक सुधार की सिफारिश करने का भार उस कमिटी
दिया गया था। मैं भी उस कमिटी का एक सदस्य था। उसमें मैंने काफी परिश्रम किया था । मेरा विशेष प्रयत्न यह था कि युनिवर्सिटी, कम-से-कम मैट्रिकुलेशन की परीक्षा तक के लिए, मातृभाषा को ही शिक्षा का माध्यम मान ले। इस पर कमिटी के अंदर काफी वाद-विवाद रहा। यह प्रश्न सिनेट के सामने आने वाला था । सिनेट की बैठक नवम्बर के महीने में होने वाली थी। मैंने यह सोचा कि इस प्रस्ताव को यदि मैं सिनेट में स्वीकार करा सकूंगा तो यह भी राष्ट्रीय शिक्षा का ही एक काम होगा। इसलिए मैंने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि यद्यपि मैंने असहयोगी होने का निश्चय कर लिया है तथापि मैं सिनेट की बैठक तक सिनेट और सिंडिकेट से नहीं हटूंगा। मैं जानता था कि सिनेट में इसके विरुद्ध प्रांत के बड़े-बड़े लोग थे । अभी तक लोगों के मन में अंगरेजी भाषा के लिए यह मोह था कि बचपन से ही अगर यह नहीं पढ़ी जायेगी तो इसका पूरा ज्ञान नहीं हो सकेगा और हमारे युवक संसार की होड़ में पीछे रह जायेंगे । यद्यपि सैडलर कमिटी ने भी मातृभाषा द्वारा शिक्षा देने पर जोर दिया था तथापि हमारे अपने देश के लोग इसके विरोधी थे।
सिनेट के सामने, प्रस्ताव के समर्थन में, मैंने एक बहुत जबरदस्त भाषण किया, जिसमें दलीलों के अतिरिक्त भावुकता की मात्रा भी काफी थी । जहां तक मैं समझ सका, उसका असर लोगों पर काफी पड़ा। हमारे विरोधियों में मिस्टर सुलतान अहमद, मिस्टर ख्वाजा मुहम्मद नूर, जस्टिस ज्वाला प्रसाद, प्रोफेसर यदुनाथ सरकार प्रभृति थे। कुछ ने अपने भाषणों से विरोध किया, कुछ चुप रहे; पर सम्मति विरोध में दी । हमारे समर्थक दो अंगरेज निकले - प्रोफेसर हामिल्टन और प्रोफेसर ड्यूक । इनसे मैंने कुछ कहा नहीं था और न इनसे
इस विषय में कभी विचार - विनिमय ही हुआ था । पर दोनों ने, केवल शिक्षा की उपयोगिता की दृष्टि से मेरे प्रस्ताव का जोरों से समर्थन किया । प्रस्ताव बहुमत से स्वीकृत हुआ। सिनेट की यह सिफारिश हुई कि युनिवर्सिटी के नियमों में ऐसा परिवर्तन किया जाये जिससे मैट्रिक परीक्षा तक की शिक्षा मातृभाषा द्वारा दी जा सके। इस प्रस्ताव को पास कराकर मैं बहुत खुश हुआ। किंतु सिनेट की बैठक समाप्त होते ही मैंने सिनेट और सिंडिकेट से इस्तीफा दे दिया।
उन दिनों सर हविलैंड लिमेजर गवर्नर की कौंसिल के एक मेम्बर थे । वह सिनेट के भी मेम्बर थे । सुना कि उनको मेरे इस्तीफा देने से रंज हुआ; क्योंकि वह जानते थे कि मैं युनिवर्सिटी में अच्छा काम कर रहा था। मुझे किसी तरह युनिवर्सिटी से असहयोग न करने देने के लिए ही, उन्हीं की अनुमति से, बहुत से सरकारी लोगों ने मेरे उस प्रस्ताव के पक्ष में सम्मति देकर उसे पास कराया था । यह बात मुझे इस्तीफा भेजने के बाद मालूम हुई । मुझ पर जोर भी डाला गया कि मैं इस्तीफा वापस ले लूं, पर मैंने वैसा नहीं किया। मैंने सोचा कि एक ओर राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचार करना, सरकारी शिक्षा के दोष बताना और विद्यार्थियों को सरकारी विद्यालयों से निकल आने को प्रोत्साहित करना, और दूसरी ओर सरकारी शिक्षा से संबंध रखने वाली सर्वोच्च संस्था (युनिवर्सिटी) में बने रहना परस्पर विरोधी बातें हैं। यह बिलकुल गलत रास्ता होगा। इसलिए मैं इस्तीफा वापस लेने पर राजी नहीं हुआ।
अगर मैं युनिवर्सिटी में रह गया होता तो जिस प्रस्ताव को इतने परिश्रम से मैंने सिनेट में पास कराया था,उसको कार्यान्वित करने में भी शायद सफल होता । निश्चित रूप से कुछ भी आज कहना सम्भव नहीं है; पर यह दुख की बात है कि सिनेट के निश्चय के बाद भी उसके अनुसार काम नहीं किया गया। अंगरेजी माध्यम की शिक्षा प्रायः बीस बरसों तक बनी रही ! हाल में मैट्रिक तक के लिए, अंगरेजी और हिसाब छोड़कर, और विषयों की शिक्षा और परीक्षा का माध्यम मातृभाषा बनी है। इन बीस बरसों में देश की स्थिति में कितना अंतर हो गया है, यह वही जानता है जिसने बीस बरसों के पूर्व सार्वजनिक हित के कार्यों में भाग लिया हो और जो आज भी लेता हो । युनिवर्सिटी भी आखिर इस आवश्यक सुधार को ज्यादा दिन न रोक सकी । बीस बरसों के बाद उसने भी इसे स्वीकार कर ही लिया है ।
कलकत्ते में असहयोग का प्रस्ताव पास होने के बाद ही मैं कौंसिल की अपनी उमीदवारी से हट गया । चुनाव नवम्बर के महीने में ही होने वाला था । इसलिए सब से पहले इसी कार्यक्रम पर जोर देना जरूरी समझा गया । हम लोगों ने बिहार में बहुत परचे छपवाये । उसमें जनता से अपील की गयी कि जो लोग इस चुनाव में खड़े हो रहे हैं उनको कोई भी वोट न दे । कुछ लोग दौरे पर भी निकले। जगह-जगह सभाएं करके लोगों को वही बात बतायी गयी। मैंने भी कुछ दौरा किया । स्मरण है कि कार्तिक पूर्णिमा के मेले के अवसर पर मैं 'दरौली' (जिला सारन) गया था। वहां सभा हुई थी जिसमें मैंने भाषण किया था। हम लोगों की इच्छा और कोशिश थी कि कोई उमीदवार ही न खड़ा हो; पर इसमें हम सफल नहीं हुए। सभी स्थानों के लिए उमीदवार खड़े हो गये । कुछ तो बिना विरोध चुने गये; पर जहां वोट देने का मौका मिला, वहां जनता ने बहुत कम संख्या में वोट दिया। मेरा ख्याल है कि बिहार में शायद बीस-पचीस प्रतिशत से अधिक वोटरों ने वोट नहीं दिया था ।
जब महात्माजी दिसम्बर में बिहार के दौरे पर आये, प्रायः उसके थोड़े ही दिन पहले, एक घटना बिहार में हुई थी, जिसका जिक्र जरूरी है। ऊपर कहा जा चुका है कि चम्पारन में नील संबंधी जांच समाप्त हो जाने पर गांधीजी ने कई जगहों में पाठशालाएं खोली थीं । इनके अलावा उस जागृति का नतीजा सूबे की कई जगहों में किसी-न-किसी रूप में देखने में आया । इस जागृति में होमरूल आन्दोलन ने भी काफी मदद पहुंचायी थी । एक रूप इसका यह हुआ कि जहां-तहां किसान सभाएं कायम हुई, जो जमींदारों के विरुद्ध किसानों की शिकायतों को जाहिर करने लगीं। चम्पारन में भी एक किसान सभा बन गयी, जो किसानों की मदद करना अपना कर्तव्य समझती थी । उधर नये विधान के कारण यह भी स्पष्ट होने लगा कि जनता को कुछ हद तक मताधिकार मिलेगा और कौंसिल के चुनाव में किसानों को हिस्सा लेना पड़ेगा। किसान सभाओं को इससे भी प्रोत्साहन मिला । जमींदार भी कुछ घबराये । वे सोचने लगे कि हम ऐसा संगठन करें कि नये विधान के चुनाव में सफलतापूर्वक भाग ले सकें । उन्होंने नीलवरों के साथ एक समझौता किया और नीलवर जमींदार संस्था कायम की । इससे किसानों और शिक्षित वर्ग में कुछ खलबली मची और रोष पैदा हुआ ।
उस समय के समाचारपत्रों के देखने से पता चलेगा कि इस संगठन के विरोध में खुल्लम-खुल्ला मुकाबला करने की बात कही गयी । इस संस्था का जन्म मुजफ्फरपुर में हुआ था। पर इसकी शाखाएं और और जगहों में भी बनती गयीं। दरभंगा के महाराजधिराज इसके सभापति थे ।
इन्हीं दिनों श्री रामरक्ष ब्रह्मचारी ने चम्पारन जिले के बेतिया सबडिवीजन के 'मछरगांवा' गांव में जाकर काम शुरू किया। वह स्थायी रूप से प्राम- संगठन का काम करना चाहते थे । वहां के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक साथ दिया था । बहुतेरे स्वयंसेवक काम करने के लिए तैयार थे। वहां वह जो कुछ कर रहे थे, मेरे परामर्श से कर रहे थे। जब एक बार मैं वहां गया तो वहां का संगठन देखकर मुझे बहुत आनन्द हुआ। लोगों में ऐसी पंचायतें कायम करना जो आपस के झगड़े मिटा दें, बच्चों की शिक्षा के लिए पाठशालाएं खोलना, गांवों की सफाई, किसानों की शिकायतें दूर कराने का प्रयत्न करना - यही मुख्य कार्यक्रम थे । वहां एक आश्रम बना जिसका खर्च जनता 'मुठिया' (घर-घर से एक-एक मुट्ठी अन्न) द्वारा जुटाती थी । संगठन का काम अच्छा चल रहा था । लोगों में उत्साह भी काफी था। पुलिस और निलहे गोरे इस प्रकार के संगठन को पसंद नहीं करते थे - विशेष करके पुलिस वाले; क्योंकि उनकी धांधली वहां नहीं चल सकती थी । उसी इलाके में पुलिस ने एक बड़ा कांड
कर डाला ।
एक आदमी ने किसी के विरुद्ध पुलिस-दारोगा के पास नालिश कर दी । जहां यह वाकया हुआ था, उसके पास के ही गांव में दारोगा किसी दूसरे मुकदमे की तहकीकात कर रहे थे। उन्होंने पुलिस के सिपाहियों और गांव के दफादार को भेजा कि जिसके विरुद्ध नालिश की गयी थी उसे और कुछ दूसरे लोगों को भी पकड़ लाओ । उन्होंने इस तरह जाने से इंकार कर दिया । जोर लगाने पर भी वे नहीं गये । दारोगाजी को गुस्सा आया । तफसील की सारी बातें यहां देना अनावश्यक है। दारोगा ने जिले के सदर मुकाम से मिलिटरी- पुलिस बुलवा ली । कई गांवों को पुरानी रीति के अनुसार लुटवा लिया । लोगों के साथ बड़ी सख्तियां हुईं । यहां तक कि स्त्रियां भी सुरक्षित न रहने पायीं । ब्रह्मचारी रामरक्ष के साथी सर्वश्री ध्वजा प्रसाद, रामविनोद सिंह और मनोरंजन प्रसाद ने वहां की धांधली की खबरें अखबारों में छपवा दीं। रामरक्ष गिरफ्तार कर लिये गये। बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमिटी ने, जांच के लिए, श्री मजहरुल हक साहब की प्रधानता में एक कमिटी बनायी। उस कमिटी ने जनता की शिकायतों को ही ठीक बताया और गर्वनमेंट की लीपा-पोती को गलत ठहराया ।
यह आन्दोलन जोरों से चल ही रहा था जब गांधीजी बिहार में पहुंचे। वह चम्पारन जाने पर घटनास्थल पर भी गये । उन गांवों के लोगों से भी उनकी भेंट हुई । इसी यात्रा में गांधीजी ने अहिंसा की एक ऐसी व्याख्या दी जो अभी तक जहां-तहां लोगों को समझानी पड़ती है । उन्होंने कहा था - "पुरुषों ने, स्त्रियों और घरबार को छोड़, भागकर बड़ी कायरता
दिखलायी थी । उनका धर्म था कि अपनी जान देकर उनकी रक्षा करते । पर यदि उनमें इस प्रकार बिना हाथ उठाये मरने की शक्ति नहीं थी तो उनको, चाहे जिस तरह हो सकता, मुकाबला करना चाहिए था। अपने धर्म में स्थित रहकर, बिना हाथ उठाये, मर जाना ही सच्ची अहिंसा है; पर डर से भाग जाना बड़ी भारी हिंसा है। भागने से बेहतर है कि जो कुछ मिले उसे हाथ में लेकर मुकाबला किया जाये।" मैंने यह महात्माजी के शब्दों में नहीं कहा है । यह सारांश मात्र है । ब्रह्मचारी रामरक्ष और दूसरों पर जो मुकदमे चले वे कई महीनों तक पेशी में रहे। अंत में सब झूठ साबित हुए। सब लोगों की रिहाई हो गयी ।
महात्माजी की यात्रा से आन्दोलन ने अधिक जोर पकड़ा। कौंसिल का चुनाव खतम हो चुका था। अब अधिक जोर स्कूल-कालेजों के खाली करने पर था । हम लोगों ने भी निश्चय किया कि एक राष्ट्रीय महाविद्यालय (कालेज) खोला जाये । पटना-गया रोड पर भाड़े पर एक मकान लेकर कालेज खोला गया । मैं जिस मकान में रहा करता था उसके पास ही यह मकान भी था । अब मैंने सोच लिया कि भाड़े पर अपने लिए मकान रखना, जब वकालत छोड़ ही दी है, अनावश्यक है; 150 रुपये मासिक का यह खर्च बंद कर देना चाहिए । इसलिए मैंने अपना मकान छोड़ दिया। महाविद्यालय में ही जाकर रहने लगा। कानून की पुस्तकों को अपने मित्र श्री शम्भुशरण वर्मा के पास रख दिया। वे पुस्तकें उनके ही साथ उनके जीवन-भर रहीं। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद फिर दूसरे मित्र के पास चली गयीं, जहां आज तक उनके काम आ रही हैं ।
पटने के इंजीनियरिंग स्कूल के विद्यार्थियों का वहां के प्रिंसिपल से किसी विषय में मतभेद हो गया। विद्यार्थियों ने हड़ताल कर दी। एक साथ जलूस बनाकर श्री मजहरुल हक साहब के पास, जो उन दिनों सिकंदर मंजिल में फ्रेजर रोड पर रहा करते थे, गये। उनसे कहा कि हम लोगों ने स्कूल छोड़ दिया है, हमको स्थान दीजिए। मजहरुल हक साहब बड़े भावुक और निर्भीक व्यक्ति थे । उनके त्याग की शक्ति भी अपूर्व थी । उस समय वह बहुत ही ऐश-आराम से उस बड़ी कोठी में रहा करते थे। अपने लिए एक बड़ी कोठी और भी बनवा रहे थे। सब कुछ छोड़कर, उन लड़कों को साथ लेकर, पटना-दानापुर सड़क पर एक बगीचे में चले गये। वहां उनके एक परिचित सज्जन का छोटा-सा मकान था । वहीं रहने लगे । जाड़े के दिन थे। खूब सर्दी पड़ रही थी । वह स्थान गंगा के किनारे होने के कारण कुछ अधिक ठंडा था। घने बगीचों से घिरे रहने के कारण वहां की जमीन में कुछ सील भी थी । तब भी मजहरुल हक साहब वहां कुछ दिनों तक उसी छोटे बंगले में रहे । आहिस्ता-आहिस्ता वहां ताड़ की चटाइयों के कुछ झोंपड़े भी बन गये । लड़के भी बड़े उत्साही थे, कष्ट का ख्याल न करके उनके साथ आनन्द से रहने लगे। उसी स्थान का नाम उन्होंने 'सदाकत आश्रम' रखा। कुछ दिनों में वही बीहड़ स्थान, जहां से रात में नौ बजे के बाद किसी राही का गुजरना खतरनाक समझा जाता था, गुलजार हो गया। वहां चर्खों का एक कारखाना खोल दिया
गया । सभी लड़के चखें बनाने में लग गये। आहिस्ता-आहिस्ता हक साहब ने अपने पैसों से ही मकान बनवाना शुरू कर दिया। कुछ दूसरे लड़के भी जाकर उनके साथ रहने लगे। वह स्वयं वहीं रहते, लड़कों को पढ़ाते और वही मोटा खाना खाते जो लड़के खाते । लड़के अधिकांश हिन्दू ही थे । हक साहब का ख्याल था कि कोई लड़का यह न समझे कि वह अपने हृदय में हिन्दू-मुसलमान का भेद, किसी प्रकार से भी रखते हैं। इसलिए वह सबको एक तरह से मानते थे । लड़के भी उनको पिता की तरह पूज्य समझते थे । वैसा ही उन पर विश्वास भी रखते थे ।
इस संबंध में यहां एक बात का उल्लेख कर देना अच्छा होगा । इसी बात से उस महान व्यक्ति के सच्चे भावों का पता चलेगा । हक साहब के साथ एक बहुत गरीब घर का मुसलमान लड़का रहा करता था। उन्होंने देखा था कि लड़का पढ़ने में तेज है। उनके दिल पर इसका भी असर पड़ा था कि मुसलमान होकर भी उसने हिन्दी और संस्कृत पढ़ी थी । वह कालेज के फर्स्ट या सेकेंड इयर में पढ़ता था । नाम था मुहम्मद खलील । हक साहब उसे बहुत मानते थे । असहयोग का आरम्भ होने पर उसने भी कालेज छोड़ दिया। हक साहब के साथ ही उनकी कोठी छोड़कर सदाकत आश्रम में जाकर रहने लगा । एक-डेढ़ साल के बाद मैंने सुना कि हक साहब ने उसको आश्रम से निकाल दिया । मुहम्मद खलील ने भी आकर मुझसे कहा कि वह रंज हो गये हैं, आप सिफारिश करके उनको शांत कर दीजिए । हक साहब की मेहरबानी मेरे ऊपर बराबर रहा करती थी । वह दिल से मुझे प्यार किया करते थे । इसलिए मैंने मुहम्मद खलील के बारे में उनसे कहा । उस समय तक मुहम्मद खलील सारे बिहार में विख्यात हो गये थे। उन्होंने असहयोग का आरम्भ होते ही एक राष्ट्रीय भजन बनाया था, जो उन दिनों बहुत प्रचलित हो गया था । वह वास्तव में बहुत सुंदर, हृदयग्राही और मर्मस्पर्शी गान था । उसका टेक था - 'भारतजननि तेरी जय, तेरी जय हो ।' उन दिनों शायद ही ऐसी कोई सभा होती जिसमें यह गीत बड़े उत्साह से न गाया जाता ।
जब मैंने हक साहब से कहा कि मुहम्मद खलील की कोई गलती हो तो माफ कीजिए, तो उन्होंने बहुत बहुत ही दुख के साथ मुझसे कहा - "मैं तुम्हारी बात कभी नहीं टालता, पर इस समय मजबूर हूं । तुम नहीं जानते कि खलील ने कितना बुरा काम किया है । इसीलिए तुम सिफारिश कर रहे हो । मैंने जिस चीज को अपने सारे जीवन का मुख्य उद्देश्य बना लिया है, जिसके लिए आज तक सब कुछ करता आया हूं और आज फकीर बन गया हूं, उस पर इसने ठेस लगायी है। मैंने अब तक की सारी जिंदगी में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया है। उसी में आज भी लगा हुआ हूं। आश्रम में रहकर इसने हिन्दू लड़कों के साथ ऐसा बर्ताव किया है जिससे वे लड़के, जो मुझ पर विश्वास करके प्रेमवश मेरे पास आ गये हैं, हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव समझने लगे। इसने मेरे सारे जीवन के बने-बनाये काम को बिगाड़ने का प्रयत्न किया है । इसने इस बात की कोशिश की है कि लड़कों को मुसलमान बनावे । मैं
सब कुछ माफ कर सकता हूं; पर इस तरह इस्लाम के नाम पर विश्वासी लड़कों के साथ विश्वासघात करना बरदाश्त नहीं कर सकता । अब मैं जान गया हूं कि हिन्दी और संस्कृत भी इसने ढोंग के लिए पढ़ी है । एक दिन यह हिन्दू-मुस्लिम फसाद भी करा देगा। मैं इसे आश्रम में हरगिज न रहने दूंगा।"
यह वही मुहम्मद खलील थे, जो कुछ दिनों बाद 'खलील दास' के नाम से विख्यात हुए। इनके संबंध में जनता समझती है कि इन्होंने कई स्थानों में हिन्दू-मुस्लिम नाइत्तफाकी का संगठन किया । इसके बहुत बुरे फल, दंगा-फसाद के रूप में, देखने में आये । इन दंगों में बहुत-से हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपनी जानें गंवायीं । जब मैंने कई बरसों के बाद इनके संबंध में इस तरह की शिकायतें सुनीं तब मुझे हक साहब की भविष्यवाणी याद आयी । उनके वे उद्गार - वे मर्म-भरे शब्द - कानों में एक बार फिर गूंज उठे ।
राष्ट्रीय महाविद्यालय खोल दिया गया। मैं उसका प्रिंसिपल बनाया गया। उसके अध्यापकों में श्री बदरीनाथ वर्मा जो उस समय बिहार नेशनल (बी. एन) कालेज (पटना) में अंगरेजी के प्रोफेसर थे, श्री जगन्नाथ प्रसाद एम. ए. काव्यतीर्थ - जो पटना कालेज में संस्कृत के प्रोफेसर थे, श्री प्रेमसुन्दर बोस - जो भागलपुर के टी. एन. जुबिली कालेज में फिलासफी के प्रोफेसर थे, अपने-अपने पदों से इस्तीफा देकर आ जुटे। इनके अलावा श्री जगतनारायण लाल, श्री रामचरित्र सिंह, श्री अब्दुल बारी प्रभृति भी आ गये । हमने कालेजों के उन लड़कों को, जो पढ़ना चाहते थे, पढ़ाना शुरू कर दिया । अभी प्रायः वही विषय पढ़ाये जाते जो सरकारी कालेजों में पढ़ाये जाते थे । जो रुपया चम्पारन यात्रा के समय महाविद्यालय के लिए जमा किया गया था, इसी में खर्च किया जाने लगा ।
उधर युनिवर्सिटी की परीक्षाओं का समय नजदीक आ रहा था। कुछ भाइयों का, विशेषकर मौलवी शफी दाऊदी का, विचार था कि हम लोगों को उन लड़कों की परीक्षा भी लेना चाहिए जो सरकारी परीक्षाओं में शरीक होना नहीं चाहते। इसलिए यह भी आवश्यक हो गया कि परीक्षाओं का संगठन किया जाये। महात्मा गांधी ने भी बिहार से जाने के समय कहा था कि बिहार में भी विद्यापीठ होना चाहिए। मेरे यह कहने पर कि हमारे पास रुपये नहीं हैं, उन्होंने कहा कि चिंता न करो, अगर काम ठीक तरह से होगा तो रुपयों की कमी न होगी। जब नागपुर कांग्रेस के बाद वह दुबारा बिहार के दौरे पर आये तो झरिया में पचास-साठ हजार रुपये जमा करके मेरे पास तार दिया कि पटने आ रहा हूं, विद्यापीठ के उद्घाटन का प्रबंध करो । उसी मकान में, जहां, हमने महाविद्यालय खोल रक्खा था, उन्होंने आकर विद्यापीठ का उद्घाटन किया। श्री मजहरुल हक साहब उसके चांसलर मुकर्रर किये गये । हमने बाजाब्ता सिनेट वगैरह भी बना लिया । हम लोग पाठ्यक्रम निर्धारित करने के काम में लग गये ।
यह सब देखकर सरकारी कालेज में पढ़ने वाले लड़कों में भी बहुत उत्साह उमड़ा। एक दिन पचास-साठ लड़के जलूस बनाकर, पटना कालेज और साइंस कालेज छोड़कर, सीधे
पटना-गया रोड पर हमारे महाविद्यालय में आ गये। इनमें पटना युनिवर्सिटी के अच्छे-से-अच्छे विद्यार्थी भी थे । कुछ तो रह गये, जो आज सारे प्रांत में फैले हुए हैं और आज भी सूबे के प्रमुख लोगों में हैं। कुछ ने कुछ दिनों तक तो काम किया; पर जब आन्दोलन कुछ ढीला पड़ा तो फिर सरकारी कालेज में वापस चले गये। वहां से वे अच्छी तरह पास करके सरकारी नौकरी में चले गये । आज वे ऊंचे ओहदे तक पहुंचकर सरकारी काम कर रहे हैं । कुछ तो शीघ्र ही वापस चले गये और फिर अपनी पुरानी रीति से काम करने लगे ।
असहयोग के मुख्य चार अंग चार बहिष्कार थे - (1) सरकारी उपाधियों और खिताबों को छोड़ देना, (2) सरकारी शिक्षा संस्थाओं से संबंध विच्छेद, जिसका अर्थ था कि न उनमें खुद शिक्षा ग्रहण करना और न अपने बाल-बच्चों को वहां शिक्षा पाने देना, (3) कौंसिल में न जाना और उनसे किसी प्रकार का लाभ न उठाना, (4) सरकारी अदालतों से संबंध छोड़ना अर्थात उनमें न मुकदमे दायर करना और न उनमें वकालत या मुखतारकारी या नौकरी करना । आशा की जाती थी कि हममें से प्रत्येक इन चारों बहिष्कारों को, जहां तक जो उससे संबंध रखता हो, पूरा करेगा। मुझे तो कोई खिताब या उपाधि नहीं मिली थी; पर मेरे भाई साहब को कोआपरेटिव सोसाइटी कायम करने और उनमें दिलचस्पी लेने के लिए 'रायसाहब' का खिताब मिला था। मैंने उनसे कभी खिताब छोड़ने के लिए नहीं कहा, पर उन्होंने खुद ही नागपुर कांग्रेस के कुछ बाद उसे वापस कर दिया। इसका संयोग इस तरह के घटा (जब असहयोग आन्दोलन जोर पकड़ने लगा तो बिहार - उड़ीसा की सरकार के मंत्री मिस्टर हैलेट ने (जिन्होंने अभी युक्तप्रांत के गवर्नर के पद से अवकाश ग्रहण किया है) एक गश्ती चिट्ठी निकाली जिसमें उन्होंने कहा कि म्युनिसिपैलिटी और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड भी एक प्रकार से सरकार के अंग हैं; इसलिए उनके सदस्य और कर्मचारी किसी तरह असहयोग में भाग नहीं ले सकते । इससे लोगों में और भी रोष पैदा हुआ। मेरे भाई उस समय छपरा म्युनिसिपैलिटी के वाइस चेयरमैन और ऑनरेरी मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने अपने खिताब को वापस कर दिया । मजिस्ट्रेटी से भी इस्तीफा दे दिया। साथ ही उन्होंने यह भी साफ कह दिया कि वह जनता द्वारा चुने गये हैं, इसलिए वह वाइस चेयरमैनी से नहीं हटेंगे - अपना वह काम करते रहेंगे ।
भाई साहब के लड़के जनार्दन ने हाल ही में मैट्रिक पास करके हिन्दू युनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग कालेज में नाम लिखाया था। मेरे दो लड़कों में मृत्युंजय, जो हाल ही कालाआजार (काला ज्वर) से बचकर अब अच्छा हो गया था, मैट्रिक में पढ़ता था; पर उमर कम होने के कारण युनिवर्सिटी के नियमानुसार परीक्षा में बैठने से रोक लिया गया था ।
दूसरा लड़का धनंजय स्कूल के किसी निचले दर्जे में पढ़ता था। तीनों लड़के कालेज और स्कूल से हटा लिये गये। तीनों में कोई भी फिर सरकारी स्कूल या कालेज में नहीं गया । जनार्दन कीर्त्यानन्द आयरन स्टील वर्क्स के लोहे के कारखाने में कुछ दिनों के बाद काम सीखने लगा । वहां एक-डेढ़ साल काम सीखने के बाद वह विलायत चला गया । उसको विदेश में लोहे का काम सीखने के लिए एक छात्रवृत्ति मिल गयी । उसी से वह अपना सब काम चला लेता, घर से भाई साहब को थोड़ा ही बहुत खर्च करना पड़ा । मृत्युंजय बिहार विद्यापीठ में पढ़ने लगा और वहां का स्नातक हुआ। छपरे में राष्ट्रीय स्कूल जब तक चलता रहा, धन्नू पढ़ता रहा। उसके बाद उसने घर ही पर जो कुछ शिक्षा मिल सकी, प्राप्त की। मैं ऊपर कह चुका हूं कि मैंने किस तरह युनिवर्सिटी से संबंध-विच्छेद कर लिया था । वकालत मैंने छोड़ ही दी थी । इस तरह ईश्वर की दया से हम लोगों ने अपने शरीर से और व्यक्तिगत रूप से असहयोग का कार्यक्रम यथासाध्य पूरा किया।
उस समय तक बिहार में कांग्रेस का संगठन नहीं के बराबर था। प्रांतीय कांग्रेस कमिटी थी । उसके मंत्री नवाब सरफराज हुसेन खां थे । मैं भी उनका सहायक था । इसी तरह जिलों में भी कहीं-कहीं किसी जिला कमिटी का कोई मंत्री था । पर उन दिनों बाजाब्ता मेम्बर बनने की प्रथा न थी । जो चाहता था अपने को मेम्बर समझ लेता था । प्रतिनिधियों का चुनाव भी बाजाब्ता नहीं हुआ करता था। जो कांग्रेस के जलसे के समय पहुंच जाते थे, प्रतिनिधि बन जाते थे। जिले या प्रांत के नामधारी मंत्री उनको प्रमाण पत्र दे देते थे । वे 10 रुपये फीस दाखिल करके प्रतिनिधि हो जाते थे। ऐसे ही प्रतिनिधि कांग्रेस के सालाना जलसे के समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के मेम्बर चुन देते । उस चुनाव में अधिक होड़ नहीं होती थी । अक्सर प्रांत के कुछ प्रमुख लोग, जो कांग्रेस में दिलचस्पी लिया करते थे, चुन दिये जाते थे । अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के नियमानुसार बिहार प्रांत को उसे 1500 रुपये वार्षिक चंदा देना पड़ता था । एक प्रकार से यह बात मान ली गयी थी कि जो लोग 100 रुपये देंगे, वे ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के मेम्बर चुने जायेंगे। इसलिए, बहुतेरे ऐसे लोग, जो यह शर्त पूरी नहीं कर सकते थे, कभी उमीदवार होने की हिम्मत नहीं करते थे । इससे यह न समझना चाहिए कि सभी चुने गये सदस्य यह 100 रुपये अदा कर देते थे। उन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के मंत्री थे राजमहेन्द्री के सुविख्यात कांग्रेस-कर्मी श्री सुब्बाराव पांतलु । मुझे याद है कि वह अक्सर पटने में यह चंदा जमा करते । तो भी यह हर साल अदा नहीं होता ! 1920 में कई हजार रुपये बिहार के नाम पर बाकी पड़े थे !
नागपुर कांग्रेस ने कांग्रेस की नियमावली बदल दी । उसने सभी जगहों में कांग्रेस का मेम्बर बनाना अनिवार्य कर दिया। प्रत्येक सूबे को उसकी आबादी के प्रति लाख पर एक प्रतिनिधि चुनने का ही अधिकार दिया। इस प्रकार प्रतिनिधियों की संख्या परिमित हो गयी । उसने यह भी अनिवार्य कर दिया कि प्रतिनिधियों का चुनाव केवल कांग्रेस के मेम्बर
ही कर सकते हैं। वह भी किसी कांग्रेस कमिटी की बाजाब्ता बैठक में ही । चुने हुए प्रतिनिधियों की सूची अधिवेशन के कई दिन पहले ही अखिल भारतीय कमिटी के दफ्तर में पहुंच जानी चाहिए। उस सूची में जिनके नाम दिये गये होते थे उन्हें छोड़, बिना विशेष कारण के, कोई दूसरा प्रतिनिधि नहीं हो सकता था। सूची के नामों में हेरफेर तभी हो सकता था, जब कोई चुना हुआ प्रतिनिधि इस्तीफा दे देता और उसकी खाली जगह पर कोई नया चुनाव हो जाता । इसका प्रमाण प्रांतीय मंत्री को देना होता ।
इन नियमों के कारण अब कांग्रेस के चुनाव में काफी सख्ती आ जाने वाली थी, अब पुरानी नीति चलने वाली न थी । इसलिए नये सिरे से संगठन करके बाजाब्ता चुनाव कर लेना आवश्यक हो गया था । कांग्रेस ने इसके लिए समय भी निर्धारित कर दिया था । प्रांतीय कमिटी को नये नियमों के अनुसार अपने नियम भी बना लेने का अधिकार दिया गया था। इसलिए सोचा गया कि जब तक नया संगठन न हो जाये, एक छोटी कमिटी बना दी जाये, जो सब काम करेगी। पुराने बहुतेरे कांग्रेसी नेता अब कांग्रेस से अलग हो गये थे । कुछ तो कांग्रेस के सिद्धांत बदलने के कारण और कुछ वे, जिनको सिद्धांत (Creed) अगर मंजूर भी था तो असहयोग के कार्यक्रम से विरोध था । इसलिए भी पुनःसंगठन आवश्यक था। इस कमिटी का मंत्री मैं बनाया गया। सभापति हुए मौलाना मजहरुल हक साहब। इसको पुनस्संघटन समिति ( Reorganisation Committee) का नाम दिया गया । कमिटी ने अपना काम बड़े उत्साह के साथ आरम्भ किया। हम जहां जाते, कांग्रेस के मेम्बर बनाने की बात करते और असहयोग का प्रचार तो करते ही ।
बहुतेरे वकील, मुखतार और विद्यार्थी - जिन्होंने अपने-अपने काम छोड़ दिये थे - सारे प्रांत में फैल गये । वे सभी जगहों में कांग्रेस का संदेश पहुंचाने लगे । प्रायः सभी जिलों में राष्ट्रीय पाठशालाएं खुल गयीं; कुछ तो मैट्रिक कक्षा तक के लिए और कुछ नीचे के दर्जे तक । सबका संबंध बिहार विद्यापीठ के साथ हो गया। मैं समझता हूं कि मैट्रिक पाठशालाओं की संख्या 50 के लगभग होगी और प्राइमरी शालाएं प्रायः दो-ढाई सौ । सब पाठशालाओं में, जो बिहार विद्यापीठ से सम्बद्ध थीं, 20 से 25 हजार तक विद्यार्थी शिक्षा पाने लगे। बहुतेरे लोग, जिन्होंने दूसरा काम छोड़ा था, इन पाठशालाओं में शिक्षक बन
उन दिनों प्रांत-भर में अनगिनत सभाएं हुई होंगी। किसी भी जिले का शायद ही कोई हिस्सा बचा होगा जहां कार्यकर्ता न पहुंचे हों और जहां सभा करके कांग्रेस का कार्यक्रम और संदेश लोगों को न बताया गया हो । मैंने सारे सूबे का चक्कर लगाया । 1921 में ही पहले-पहल सारे सूबे का परिचय हुआ। असंख्य कार्यकर्ताओं से जान-पहचान भी हो गयी । मैं वकालत तो किया करता था, पर बड़ी सभाओं में बहुत बोलने का अभ्यास नहीं था, लड़कपन से ही सभाओं में भाग लिया करता था । असहयोग के प्रचार में असंख्य
सभाओं में भाषण करने पड़े । नतीजा यह हुआ कि सभाओं में बोलते समय जो थोड़ा संकोच हुआ करता था, वह निकल गया। मैं अब धड़ल्ले से भाषण कर सकता था । जिन जिलों में लोग भोजपुरी बोला करते हैं उनमें जाता तो भोजपुरी में ही भाषण करता। दूसरी जगहों में शुद्ध हिन्दी में । मुझे स्मरण नहीं है कि पुरूलिया में मैंने उस साल भाषण किया या नहीं, यद्यपि यह याद है कि पुरूलिया में मैंने कभी बंग्ला में भी भाषण किया है। सभाएं भी कुछ छोटी-मोटी नहीं होती थीं। पांच-दस हजार का जमाव होना तो कोई बड़ी बात नहीं थी। दस हजार लोगों की सभा में आसानी से मैं सब लोगों तक अपनी आवाज पहुंचा सकता था । उससे अधिक संख्या होने पर परिश्रम पड़ता था । मेरा अनुमान है कि पंद्रह हजार तक की सभा में यदि लोग शांत रहते तो मैं अपनी आवाज पहुंचा सकता, पर बहुत अधिक परिश्रम पड़ता और पेट में दर्द हो जाता । मुझे यह भी याद है कि बीस-पचीस हजार के मजमे में भी मैंने उस साल में भाषण किये थे । एक सभा छपरा जिले में हथुआ में हुई थी । वहां न मालूम किस तरह खबर उड़ गयी थी कि सभा में महात्मा गांधी आने वाले हैं। इसलिए वहां प्रायः पचास हजार का जमाव हो गया । हजार कोशिश करने पर भी सभा ठीक नहीं जम सकी । यद्यपि मैने अपनी पूरी शक्ति-भर जोर लगाकर एक छोटा-सा भाषण किया, तथापि मुझे शक है कि थोड़े ही लोगों ने उसे सुना या समझा ।
मैं भाषण करते समय देखा करता था कि सभा में उपस्थित लोगों पर उसका कैसा प्रभाव पड़ रहा है। जहां अच्छा प्रभाव पड़ता नजर आता और जनता सुनने के लिए उत्सुक और समझदार मालूम पड़ती वहां का भाषण भी, मैं खुद समझ सकता था कि, अच्छा हो जाया करता था। जहां ये बातें नहीं होतीं वहां भाषण भी ऐसा-वैसा ही होता । भाषण भी कुछ छोटे नहीं होते । कांग्रेस का इतिहास, खिलाफत आन्दोलन और पंजाब संबंधी जुल्म तथा स्वराज्य की आवश्यकता के अलावा असहयोग का कार्यक्रम में सभी सभाओं में बहुत विस्तार के साथ बताता । इसमें प्रायः एक-डेढ़ घंटा लग जाता । जहां दस हजार तक का जमाव होता वहां तो पूरे विस्तार के साथ डेढ़ घंटे या इससे अधिक देर तक भी बोल लेता । जहां इससे अधिक जनता एकत्र होती वहां कुछ संक्षेप करना पड़ता । बीस हजार से अधिक लोगों की सभा में आध घंटे से ज्यादा नहीं बोल सकता था । इस तरह मैं सारे सूबे में दौरा करता रहा। दूसरे साथी भी यही कर रहे थे ।
असहयोग आन्दोलन में सभी नेता शरीक नहीं हुए। कांग्रेस के पुराने और वयोवृद्ध नेताओं ने, जो असहयोग में शरीक नहीं हुए, एक दूसरी संस्था 'बिहार प्रांतीय लीग' के नाम से कायम की। देश के नरम दल के समाचारपत्रों में इसकी चर्चा बहुत चली; पर यह संस्था कुछ कर न सकी । इसके संबंध में पीछे कुछ सुनने में नहीं आया। हमारे सूबे में एक बात की खूबी थी । मतभेद होते हुए भी आपस में संघर्ष नहीं हुआ। हम लोगों का आपस का व्यवहार भी ज्यों का त्यों बना रहा । पर इतने लोगों के अलग हो जाने के कारण, विशेष करके नागपुर में कांग्रेस की नियमावली और उसके विधान में बहुत अदल-बदल हो जाने के कारण, कांग्रेस कमिटियों का पुनःसंगठन आवश्यक हो गया । यह संगठन कई महीनों में जाकर पूरा हुआ । जून के अंत तक जिला कमिटियां बाजाब्ता बनकर प्रांतीय कमिटी का चुनाव कर सकीं । तब फिर अखिल भारतीय कमिटी के नये सदस्य चुने गये ।
कांग्रेस के पुनःसंगठन के प्रश्न के साथ-साथ कुछ और भी प्रश्न उपस्थित हो गये । समाचारपत्रों के लिए बिहार अच्छा सूबा नहीं है। पहले बहुत परिश्रम और त्याग से बिहार टाइम्स' और 'बिहारी' निकाले गये थे; पर आर्थिक कठिनाइयों के कारण दोनों बंद हो चुके थे। 'बिहार टाइम्स' के जन्मदाता और मुख्य कार्यकर्ता बाबू महेशनारायण (अब स्वर्गीय) थे । उन्होंने उसे अपनी जिंदगी में चलाया था। श्री सच्चिदानन्द सिंह (अब डाक्टर) की भी अखबार-नवीसी में बहुत दिलचस्पी रही है। इन्होंने अपने निजी 'हिन्दुस्तान रिव्यू के अलावा इन अखबारों की भी धन और कलम से पूरी सहायता की थी । 'बिहारी' को बनैली राज से बहुत मदद मिली थी । एक प्रकार से वही उसके बंद होने का कारण भी हुआ। दूसरा अखबार हथुआ के महाराजा की ओर से 'एक्सप्रेस' नाम से निकलता था । घाटे पर बहुत दिनों तक चलकर वह भी बंद हो गया। 1918 में पटने के सभी नेताओं ने विशेष करके श्री सच्चिदानन्द सिंह (अब डाक्टर) और श्री हसन इमाम ने, एक अखबार की जरूरत बहुत महसूस करके निश्चय किया कि एक पत्र निकाला जाये । उसका नाम श्री सिंह के कहने के अनुसार 'सर्चलाइट' रख दिया गया । वह सप्ताह में दो बार निकला करता था । उसके डाइरेक्टरों में श्री सिंह, श्री हसन इमाम प्रभृति थे । नये लोगों में श्री ब्रजकिशोर प्रसाद थे और
मैं भी था । आन्दोलन आरम्भ होने पर 'सर्चलाइट' के सामने यह प्रश्न आया कि वह असहयोग का समर्थन करे या नहीं? पैसा खर्च करने वालों में मुख्य श्री हसन इमाम और श्री सिंह थे । वे असहयोग के पक्षपाती नहीं थे। इधर सारे सूबे में असहयोग की लहर इस तरह उमड़ रही थी कि उसके खिलाफ जाने का अर्थ था 'सर्चलाइट' का हमेशा के लिए लोकप्रियता खो देना । इसके अलावा डाइरेक्टरों में भी हम लोग थे जो असहयोग में शरीक थे। उसके सम्पादक श्री मुरलीमनोहर प्रसाद भी असहयोग के पूरे पक्षपाती थे। ऐसी अवस्था में, आपस के इस मतभेद के कारण, नीति निर्धारित कर देना आवश्यक हो गया ।
1920 से, सर्चलाइट प्रेस से ही, हिन्दी साप्ताहिक 'देश' भी निकला करता था, जिसका नाम-निहादी सम्पादक मैं समझा जाता था । असहयोग ने राजनीति को, अंगरेजी-पढ़े कुछ वकील-बैरिस्टरों और बड़े-बड़े व्यापारियों के अंगरेजी तरीके से सजे कमरों से बाहर निकालकर, गांवों के बरगदों के साये के नीचे और गांवों के खेत-खलिहानों तक पहुंचा दिया था । वहां अंगरेजी का गुजर नहीं था । जो जनता तक पहुंचना चाहता था उसे देशी भाषा की शरण लेनी पड़ती थी । इसलिए हम लोगों ने सोचा कि 'सर्चलाइट' से ज्यादा उपयोगी 'देश' होगा । हमने श्री हसन इमाम और श्री सिंह से सर्चलाइट' और 'देश' के संबंध में यह समझौता कर लिया कि 'सर्चलाइट' अपने सम्पादकीय लेखों में असहयोग का न तो विरोध करेगा और न समर्थन । पर दूसरों के लेख, लेखक के नाम के साथ, चाहे वे पक्ष में हों अथवा विपक्ष में, छाप सकेगा। 'देश' हम लोगों का पत्र हो जायेगा । अब से उसका घाटा और नफा हम लोगों का होगा। उसकी नीति हम जैसी चाहेंगे वैसी ही होगी; पर वह सर्चलाइट प्रेस में छपाई देकर छपा करेगा ।
इस तरह एक हिन्दी साप्ताहिक हमारे हाथ में आ गया । अंगरेजी 'सर्चलाइट' भी अगर सहायक नहीं तो विरोधी भी न रहा । हम यह भी समझते थे कि हम लोग उसमें लेख लिखा करेंगे। पर यह आशा पूरी नहीं हुई; क्योंकि आन्दोलन में इतना काम बढ़ गया कि लेख लिखने का समय ही न मिला । 'देश' ने प्रचार कार्य में बहुत सहायता पहुंचायी । ग्राहकों की संख्या भी बहुत बढ़ गयी । विज्ञापन भी बहुत मिलने लगे । हम लोग तो आन्दोलन में लगे थे । 'देश' के प्रबंध पर ध्यान नहीं दे सके। जैसे-जैसे ग्राहकों की संख्या बढ़ती गयी, प्रबंधक की गलती से घाटे की मात्रा भी वैसे ही बढ़ती गयी । कुछ दिनों के बाद जब हमने हिसाब देखा तो मालूम हुआ कि विज्ञापन की दर इतनी कम कर दी गयी थी कि उसमें जितना खर्च पड़ता था उतना भी विज्ञापनों से नहीं मिलता था । इसलिए जैसे-जैसे बिकने वाली प्रतियों की संख्या बढ़ी, घाटा भी बढ़ता गया। हमने यह देखा कि बहुतेरों के माल का प्रचार हम अपने खर्च से सारे प्रांत में जोरों से कर रहे थे; पर यह ज्ञान बहुत नुकसान उठा लेने के बाद हुआ । इस प्रकार उस समय 'देश' पर जो बोझ पड़ा, वह उसके गले में हमेशा के लिए एक भारी पत्थर-सा बंध गया ।
जन-आन्दोलन कुछ दिनों के बाद ढीला पड़ा । 'देश' की बिक्री भी कुछ कम हो गयी । अंत में आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसे बंद कर देना पड़ा। जितने दिनों तक आन्दोलन का जोर रहा,वह खूब काम करता रहा और बहुत लोकप्रिय भी हो गया था।
'सर्चलाइट' निर्धारित नीति पर चल रहा था। कुछ दिनों के बाद श्री हसन इमाम और श्री सिंह उससे अलग हो गये । वह हम लोगों के अधिकार में पूरी तरह से आ गया। यहां हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि उन दोनों ने यद्यपि पैसे और परिश्रम से इसे शुरू में बहुत सहायता पहुंची थी, तथापि उसे बड़ी उदारता से हम लोगों के हाथों में आने दिया। जबसे यह स्थिति हो गयी, 'सर्चलाइट' पूरा-पूरा कांग्रेसी पत्र हो गया। उसके सम्पादक श्री मुरलीमनोहर प्रसाद के मिजाज के अनुकूल यही था । जब 1930-34 का सत्याग्रह चला और कांग्रेस की आज्ञा निकली कि जो समाचारपत्र स्वतंत्रतापूर्वक सच्ची घटनाएं न छाप सकें और अपने स्वतंत्र विचार न प्रकट कर सकें, वे सरकारी हुक्म मानने के बजाय अपना प्रकाशन ही बंद कर दें, तो 'सर्चलाइट' उन बहुत ही अल्प संख्यक पत्रों में से एक था जिसने कांग्रेस की आज्ञा का पूरी तरह से पालन किया । यह सब होते हुए भी 'सर्चलाइट' कभी आर्थिक कठिनाइयों से मुक्त नहीं हुआ। अंत में हम लोगों को उसका स्वत्व श्री बिड़ला ब्रदर्स को इस शर्त पर दे देना पड़ा कि उसकी आर्थिक व्यवस्था वह करेंगे; पर उसकी सम्पादकीय नीति में हम लोगों का ही अधिकार रहेगा। यह निश्चय 1941 के अंत में हुआ । तब से बिड़ला बंधु बहुत कुछ खर्च कर चुके हैं। अभी वह अर्थ संकट से बाहर हो ही रहा था कि 1942 के आन्दोलन में सरकार ने उसे बंद कर देने का हुक्म निकाल दिया। सम्पादक भी हम लोगों के साथ नजरबंद कर दिये गये। जहां आज मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूं, वह भी साथ हैं ।
ऊपर कहा जा चुका है कि कांग्रेस का सालाना जलसा 1920 के दिसम्बर में नागपुर में हुआ था । मैं इस अधिवेशन में भी अपनी अस्वस्थता के कारण शरीक न हो सका था; पर सुना कि अधिवेशन में इतने प्रतिनिधि आये थे जितने शायद कभी किसी अधिवेशन में नहीं आये
। इसका एक कारण भी था - कुछ लोग समझते थे कि असहयोग संबंधी प्रस्ताव पर नागपुर में फिर विचार किया जायेगा । अतः दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने पक्ष को बल पहुंचाने के लिए अधिक-से-अधिक संख्या में वहां आये थे। पर दोनों पक्षों में समझौता हो गया । अंत में कुछ हेर-फेर के साथ असहयोग का निश्चय कायम रह गया। इस प्रस्ताव के द्वारा देश को क्रमशः असहयोग का आदेश दिया गया। सरकारी खिताबों को छोड़ना, कौंसिल से अलग रहना, जो कांग्रेस के निश्चय के विरुद्ध कौंसिल में गये हैं उनसे किसी प्रकार की सेवा न लेना, गवर्नमेंट से सम्बद्ध शिक्षालयों से अलग रहना और अदालतों का बहिष्कार - आरम्भ में यही मुख्य कार्यक्रम था। फिर क्रमशः सरकारी नौकरी छोड़ना और कर-बंदी का आदेश मिलने पर उसे भी करने का निश्चय हुआ। साथ ही, शिक्षा के लिए गैर-सरकारी राष्ट्रीय शिक्षालयों की स्थापना, आपस के झगड़ों को सुलझाने के लिए पंचायत की स्थापना, चर्खा-प्रचार और विदेशी वस्त्र - बहिष्कार - ये आवश्यक बतलाये गये थे ! हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य और अहिंसा पर भी जोर दिया गया था ।
नागपुर के निश्चय के बाद वे सभी लोग, जो पहले कुछ दुविधा में थे, अब दृढ़ होकर असहयोग में लग गये । महात्माजी ने यह भी कह दिया कि कांग्रेस के कार्यक्रम को यदि लोग पूरा कर दें, तो स्वराज एक बरस के भीतर ही हो जायेगा। लोगों ने एक बरस की बात मन में घर ली । शर्तों को पूरा करने के प्रयत्न में जी-जान से सब लग गये। ऊपर कही हुई सभाओं में प्रचार का यही मुख्य उद्देश्य था ।
ऊपर कहा जा चुका है कि सारे सूबे (बिहार) में असंख्य कार्यकर्ता काम करने लगे और स्वराज्य तथा असहयोग का संदेश गांव-गांव में पहुंचाने लगे। थोड़े ही दिनों में अद्भुत जागृति देखने में आने लगी। सरकार भी अपनी ओर से चुप न रही । वह देखती थी कि इस
प्रचार का फल यह हो रहा है कि जनता में उसका रोब एकबारगी उठता जा रहा है, लोग निर्भीक होते जा रहे हैं। हम भी कांग्रेस की ओर से इस बात का पूरा ख्याल रखते थे कि उत्साह में जनता की ओर से कहीं ज्यादती न हो जाये । इसलिए नागपुर के बाद प्रांतीय कमिटी ने जो आदेश निकाला उसमें शांति और अहिंसा पर पूरा जोर दिया गया - साफ-साफ कहा गया कि किसी के साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती न की जाये । हम समझते थे, और कार्यकर्ताओं को भी यही समझाने का प्रयत्न किया गया, कि हम बल प्रयोग में सरकार से हार जायेंगे; क्योंकि उसके पास साधन हैं, हमारे पास नहीं । इसके अलावा असहयोग की मुख्य शर्त अहिंसा है। उसके द्वारा जनता को भी हम अपनी ओर खींच सकते हैं । यदि हमारी ओर से जोर-जबरदस्ती हुई तो इसका नतीजा उल्टा होगा, हमें एक दिन पछताना पड़ेगा। इसलिए जहां कहीं भाषण किया जाता, इस पर जोर दिया जाता । जो पर्चा निकाला जाता उसमें भी इसी पर जोर दिया जाता। गवर्नमेंट इसकी खोज में रहती कि कहीं भी कुछ अशांति हो तो धर दबाया जाये । उसे इसका मौका ही न मिलता !
मुजफ्फरपुर जिले में महंगी के कारण कई जगहों में हाटों की लूट हो गयी। दरभंगा जिले और चम्पारन जिले में भी एकाध जगह ऐसा ही हुआ । सरकार को वह बहाना मिल गया जो वह खोज रही थी। हम लोग शराब बंदी का भी प्रचार किया करते थे। इसका असर भी काफी पड़ रहा था। आबकारी की दूकानों का ठेका मार्च के महीने में दिया जाता है। बिक्री कम होती जा रही थी। सरकार को डर हो गया कि आमदनी का यह एक बड़ा जरिया खतरे में पड़ गया। इन दोनों बातों को लेकर दमन जारी हो गया। दमन मुजफ्फरपुर जिले से ही आरम्भ हुआ। और जिलों में भी जल्द ही फैल गया। चम्पारन में लौरिया कांड के समय से ही कुछ दमन चल रहा था । वहां अब और भी जोर लगाया जाने लगा । दमन का आरम्भिक रूप यह हुआ कि क़ार्यकर्ताओं पर,दफा 107 जाब्ता फौजदारी के अनुसार, मुचलका देने के मुकदमे चलाये गये । दफा 144 जाब्ता फौजदारी के अनुसार कार्यकर्ताओं को सभा में भाषण करने और जलूस वगैरह में शरीक होने से मना किया गया। इतने दिनों के बाद यह कहना तो मुश्किल है कि कितने आदमियों पर इस तरह के मुकदमे चलाये गये; परं इतना निश्चय ही कहा जा सकता है कि लोगों ने जमानत नहीं दी । जिन पर मुकदमा चलाया जाता वे जेल चले जाते । हां, मुकदमे में जहां-तहां लोगों ने पैरवी की। कहीं-कहीं मुकदमा अंत में खारिज करना पड़ा; क्योंकि कोई सबूत न मिला । बात तो यह थी कि सभा करने के सिवा, जिसमें असहयोग का कार्यक्रम समझाया जाता, हमारे आदमी दूसरा कोई काम कर भी नहीं रहे थे। जो हाट-लूट की लहर चली थी उसके रोकने में हमारे आदमियों ने बहुत मदद की थी। जहां कहीं से खबर आ गयी, वहां दौड़कर पहुंच जाते और जनता को समझा-बुझाकर संभाल लेते । लुटेरों से मुकाबला करने के लिए जनता को तैयार भी कर देते। पर सरकार तो आन्दोलन को रोकना चाहती थी । इसलिए उसने लुटेरों के बदले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को ही अधिक जरूरी और मुनासिब समझा।
थोड़े ही दिनों में सैकड़ों कार्यकर्ता इस प्रकार के मुकदमों के शिकार हो गये। प्रांतीय सरकार के प्रधान सेक्रेटरी मिस्टर टेनी ने एक सर्कुलर निकाला जिसमें जिले के अधिकारियों को प्रोत्साहन दिया गया कि वे आन्दोलन को दबावें । स्वायत्तशासन विभाग के मंत्री मिस्टर हैलेट ने दूसरा सर्कुलर निकाला जिसमें बताया गया कि म्युनिसिपैलिटियां और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड सरकार के अंग हैं, अतः उनके सदस्यों और कर्मचारियों को असहयोग में भाग लेना नहीं चाहिए। 'हांके भीम होंहि चौगूना' - जिले के अधिकारी तो यह चाहते ही थे । उन्होंने 107 और 144 की नोटिसों की झड़ी लगा दी । सैकड़ों आदमी गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये ।
मैं मजहरुल हक साहब के साथ आरा जाने वाला था । हक साहब किसी कारण से वहां न जा सके। मैं अकेला ही गया । आरा स्टेशन पर उतरते ही मुझे 144 की नोटिस मिली कि 9 बजे से 5 बजे तक किसी जलूस और सभा में शहर के अंदर मैं शरीक नहीं हो सकता । मेरे सामने एक संकट आकर उपस्थित हो गया। नोटिस भी पुरमजाक थी। उन दिनों मैट्रिक परीक्षा हो रही थी । आरा भी उसका एक केंद्र था। नोटिस में मनाही का कारण बतलाया गया था कि जलूस और सभा से परीक्षार्थियों के काम में हर्ज होगा और वे रुष्ट होंगे।
नागपुर कांग्रेस ने निश्चय किया था कि अखिल भारतीय कमिटी की आज्ञा जब तक न हो, सत्याग्रह न किया जाये । जब इस प्रकार की कार्रवाई सरकार की ओर से होने लगी अथवा इसकी सम्भावना मालूम हुई, तो हमने प्रांतीय कमिटी की ओर से आदेश निकाल दिया था कि इस तरह के हुक्मों को मान लेना चाहिए; क्योंकि कांग्रेस ने अभी तक सत्याग्रह का आदेश नहीं दिया है। हां, जहां कहीं आत्म-प्रतिष्ठा की बात आ जाये, वहां दूसरी बात है।
मैंने नोटिस पाकर निश्चय किया कि मुझे इसे मान लेना चाहिए । इसलिए स्टेशन से मैं शहर के अंदर नहीं गया । मैं प्रायः दोपहर को पहुंचा था। स्टेशन से, म्युनिसिपैलिटी के बाहर, नजदीक के ही एक गांव में चला गया। वहां पर दोपहर के समय ठहर गया। वहीं एक बड़ी सभा हो गयी, जिसमें देहात के अलावा शहर के भी काफी लोग आ गये ! फिर शाम को 5 बजे के बाद शहर में गया। वहां भी एक बड़ी सभा हो गयी जहां मैंने अपने कार्यक्रम को पूरा किया। इस तरह इस नोटिस का नतीजा यह हुआ कि एक सभा के बदले दो सभाएं ही गयीं। जनता का उत्साह भी बहुत बढ़ गया । मैं भभुआ जाने वाला था । वहां भी हमारे जाने के पहले ही कुछ मनाही की नोटिस निकल गयी। मैं वहां गया तो जरूर था; पर याद नहीं है के नोटिस का क्या हुआ ।
उस समय प्रांतीय कौंसिल की बैठक हो रही थी । जो लोग कौंसिल में शरीक हुए थे वे कांग्रेस के आदेश के विरुद्ध वहां गये थे। पर सरकारी सर्कुलरों को लेकर और मुझ पर जो नोटिस निकली थी उसे लेकर उन्होंने वहां बहस छेड़ दी। साथ ही, जो आम तौर पर दमन बल रहा था, उसकी भी कड़ी समालोचना हुई । अखबारों में इन सब बातों के छपने पर सूबे
के बाहर के पत्रों ने भी बिहार सरकार की कार्रवाइयों - विशेष करके उसके सर्कुलरों और दमन - नीति - की कड़ी समालोचना की । बात बहुत बढ़ गयी । मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी सबडिवीजन के सबडिवीजनल अफसर मिस्टर ली, जिन्होंने इस तरह की कार्रवाइयों से बहुत ख्याति पायी थी, कुछ दिनों के बाद वहां से बदल दिये गये । मालूम नहीं कि इस देशव्यापी आन्दोलन के कारण उनकी बदली हुई अथवा और किसी कारण से; पर लोगों में यह धारणा हुई कि आन्दोलन ही उनकी बदली का कारण था ।
शराब बंदी के कारण कहीं-कहीं सरकारी अफसरों ने धांधली मचायी । हजारीबाग जिले के 'चतरा' में खेतों में शराब बिकने लगी। जनता में शराब का प्रचार तो बहुतेरे अफसर कर ही रहे थे । कहीं-कहीं कार्यकर्ता और स्वयंसेवकों पर शराब बंदी में भाग लेने के कारण मुकदमे भी चलाये गये ।
हमारे कार्यक्रम में पंचायत कायम करना भी एक मुख्य कार्य था । बहुत जगहों में पंचायतें कायम हुईं । बहुतेरे मुकदमे फैसल होने लगे । कहीं-कहीं लोगों ने पंचायती फैसले को मनवाने के लिए जातीय बहिष्कार का सहारा लिया। हमने इसे प्रांतीय कमिटी की ओर से रोका, तो भी जहां-तहां कुछ हो ही गया। एक जगह तो पंचायत का इतना रोब हो गया था कि वह सरकारी अदालतों की तरह काम कर रही थी । लोग बाजाब्ता मुकदमे दायर करने और उन्हें फैसल कराने के लिए फीस देते थे । अधिकांश फैसले लोग मान लेते थे; पर कहीं-कहीं दिक्कत पैदा होती । एक कमजोरी यह हुई कि पुराने-पुराने सड़े-गले मुकदमे भी कुछ लोग पंचायत में लाने लगे, जिसका नतीजा यह होता कि पंचायत अगर बहुत पुराना कहकर उसे न सुने तो उसकी शिकायत हो कि यह भी सरकारी अदालत की तरह इंसाफ न देखकर तमादी की बात करती है और यदि फैसला करना चाहे तो उसके फैसले को मनवाने का साधन नहीं था ।
पंचायत को ही लेकर गिरिडीह में एक बड़ा वाकया हो गया। वहां पंचायत का फैसला न मानने के कारण एक आदमी का बहिष्कार किया गया । बहिष्कृत आदमी को कुएं से पानी नहीं भरने दिया गया। उसका घड़ा तोड़ दिया गया। पुलिस ने घड़ा तोड़ने वाले को गिरफ्तार किया। उसके साथ बहुत लोग थाने तक आये । वहां तथा जेल के सामने वाकया हो गया। पुलिस का कहना था कि जनता ने ढेले फेंके और पुलिस पर हमला किया । दारोगा ने अपनी पिस्तौल से गोली चलायी । बहुत लोग घायल हुए । जेल और थाने का कुछ नुकसान हुआ । कुछ लोगों पर मुकदमे चलाये गये । इसकी खबर पाते ही डाक्टर महमूद के साथ मैं वहां गया। लोग शांत किये गये । मुकदमे में शहर के बहुतेरे धनी लोग फांस लिये गये थे । ऐसे लोगों में से कुछ ने तो माफी मांग ली; पर दूसरों पर मुकदमे चले । अंत में क्या हुआ, मुझे याद नहीं है ।
थोड़े ही दिनों बाद, मार्च 1921 में, बेजवाड़ा में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक हुई । वहां निश्चय हुआ कि लोकमान्य तिलक के स्मारक के रूप में एक करोड़ रुपये स्वराज्य के काम के लिए, तिलक स्वराज फंड के नाम से, 30 जून तक जमा कर लिये जायें बीस लाख चर्खे जारी हो जायें और कांग्रेस के एक करोड़ मेम्बर बना लिये जायें। बेजवाड़ा पहुंचने के पहले महात्माजी दौरा कर रहे थे। मैं कलकत्ते से ही महात्माजी के साथ उड़ीसा गया। वहां उन दिनों अकाल था। महात्माजी को इसकी खबर पहले से थी । उन्होंने कुछ मदद भी करायी थी । अकाल पीड़ितों को महात्माजी के आगमन की खबर मिली थी । बहुतेरे दूर-दूर से आये थे । महात्माजी ने उनके अस्थि-पंजरों को देखा । वह बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने एक लेख में उड़ीसा के नंगे-भूखे कंकालों का जबरदस्त जिक्र किया । मैंने कई बार उन गरीबों की याद करके उन्हें आह भरते भी देखा है। एक बड़े मकान में वह ठहराये गये थे । एक ओर श्री जगन्नाथजी का विशाल मंदिर, पंडों और धनी-मानी लोगों का सुखमय जीवन, महात्माजी के स्वागत के लिए धूमधाम, और दूसरी ओर ये नंगे-भूखे
कंकाल !
उड़ीसा की ही किसी सभा में महात्माजी ने बहुत मार्के का भाषण किया था, जिसका असर आज तक मेरे दिल पर है । सभा में किसी ने महात्माजी से प्रश्न किया कि आप अंगरेजी शिक्षा के विरुद्ध क्यों हैं - अंगरेजी शिक्षा ने ही तो राजा राममोहन राय, लोकमान्य तिलक और आपको पैदा किया है ? महात्माजी ने उत्तर में कहा - "मैं तो कुछ नहीं हूं; पर लोकमान्य तिलक भी जो हैं उससे कहीं अधिक बड़े हुए होते यदि उनको अंगरेजी द्वारा शिक्षा का बोझ ढोना न पड़ा होता । राजा राममोहन और लोकमान्य तिलक श्री शंकराचार्य, गुरु नानक, गुरु गोविन्दसिंह और कबीर दास के मुकाबले में क्या हैं ? आज तो सफर के और प्रचार के इतने साधन मौजूद हैं। उन लोगों के समय में तो कुछ नहीं था, तो भी उन्होंने विचार की दुनिया में कितनी बड़ी क्रांति मचा दी थी।" अंगरेजी राज्य के संबंध में भी उन्होंने कहा कि मुगल राज्य में अकबर के समय में राणा प्रताप और औरंगजेब के दिनों में शिवाजी जैसे वीरों के लिए सुअवसर था, आज वह कहां है ? इस प्रकार एक बड़े प्रभावशाली भाषण
में उन्होंने यह दिखला दिया कि यह हम लोगों का मोह है जो अंगरेजी शिक्षा को ही देशोन्नति का कारण बताते हैं। हां, अंगरेजी जानना बुरा नहीं है। उसे हम में से बहुतेरों को जानना होगा । हम उसे सीखेंगे भी; पर आज की तरह वह शिक्षा का माध्यम और साधन नहीं रह सकती ।
उड़ीसा से महात्माजी के साथ मैं बेजवाड़ा गया। रास्ते के दृश्य अवर्णनीय हैं। जैसा उत्साह अपने सूबे में देखा था वैसा ही आंध्र प्रदेश में भी देखने में आया । वही जनता की भीड़, वही दसों दिशाओं को गुंजाने वाले नारे! स्टेशनों पर वही जन समूह, चलती रेलगाड़ी के किनारे लाइन पर लोगों का वही जमघट और वही विराट सभाएं । मुझे याद है कि विजयनगर में हम लोग रात को प्रायः तीन बजे रेल से उतरे । सारे शहर में लोगों ने दीवाली मनायी थी !
हम बिहार के प्रतिनिधि बेजवाड़ा से लौटते समय रेल में कार्यक्रम पूरा करने के संबंध में परस्पर बातें करने लगे। एक प्रकार से पटना पहुंचते-पहुंचते यह निश्चय कर लिया गया कि यह काम कैसे पूरा किया जायेगा। रुपये जमा करने और चर्खा चलाने की ओर लोगों का विशेष ध्यान गया । मैं भी दिन-रात सारे सूबे में दौड़ता और रुपये जमा करने में लगा रहा । सब जिलों में कार्यकर्ता इस काम में दिलोजान से लग गये । रुपये जैसे-जैसे जमा होते, बैंक में जमा होते । हम लोगों ने कई प्रकार की रसीदें छपवा ली थीं, जिनसे यह सुविधा होती कि प्रत्येक आदमी को रसीद लिखकर देने की जरूरत नहीं होती। कम-से-कम चार आने की रसीद थी । बड़ी रकमों के लिए लिखकर रसीद दे दी जाती । इसके पहले बिहार में सार्वजनिक काम के लिए जन-साधारण से इस प्रकार कभी रुपये नहीं मांगे गये थे। हम भी नहीं जानते थे कि हम कहां तक सफल होंगे। पर लोगों में उत्साह देखकर आशा बढ़ती जाती थी । हमको बहुत बड़े और धनी लोगों से बहुत ज्यादा नहीं मिला। पर हर जिले में मझोले दर्जे के लोगों ने बहुत उत्साहपूर्वक चंदा दिया। अंत में 30 जून तक हमने सात-आठ लाख के लगभग जमा कर लिया। 30 जून को गांधीजी को तार द्वारा इसकी सूचना दे दी गयी । इस काम में सब से ज्यादा उत्साह तिरहुत डिवीजन के जिलों ने दिखाया - यद्यपि और जिले भी कुछ बहुत पीछे नहीं थे ।
बिहार के कई जिलों में घूमते-घूमते काफी अनुभव हुआ। कहीं-कहीं कुछ दिलचस्प घटनाएं भी हुईं । मनोविनोद के लिए एक घटना का वर्णन कर देता हूं ।
जून का महीना था। मैं रांची जिले में तिलक स्वराज्य कोष के लिए रुपया जमा करने गया । वहां के कार्यकर्ताओं ने मेरे लिए दो दिनों का कार्यक्रम, जिले के विभिन्न स्थानों में जाने के लिए, बना लिया। पहले दिन रांची से मोटर पर चलकर 10 बजे तक 'बुंडू' पहुंच वहां का काम समाप्त करना था। दोपहर का भोजन रांची ही वापस आकर करना था। सेपहर को 'खूंटी' जाना था । रात तक फिर रांची वापस आना था। दूसरे दिन सवेरे लोहरदगा जाना था। वहां से दोपहर तक वापस आकर तीसरे पहर की गाड़ी से पटने के लिए रवाना होना था ।
हम लोग रांची में सवेरे ही नहा-धोकर तैयार हो गये। टैक्सी के आने में कुछ देर हो गयी । हम सात आदमी, जिनमें एक ड्राइवर और दूसरा क्लीनर था, उस पर सवार होकर रवाना हुए। यह सोचा गया था कि दोपहर को रांची में ही आकर भोजन करना होगा । इसलिए हमने साथ में कुछ भी न लिया । जो कुर्ते पहने और चादर लिये हुए थे, वही सारा सामान था । डाक्टर पूर्ण मित्र ने, जो वहां के नेता थे, साथ में एक छोटा-सा बेग रख लिया था, जिसकी खबर हम लोगों को उस समय नहीं थी। कुछ दूर जाने पर, एक जंगल में पहुंचने पर, मोटर में कुछ टूट गया। ड्राइवर ने मरम्मत शुरू की और कहा कि बस दस-पांच मिनट में तैयार कर लूंगा । मरम्मत में देर होने लगी । ज्यों-ज्यों हम घबराते, वह आश्वासन देता जाता। दो-तीन घंटों के बाद उसने कहा कि लोहार की जरूरत होगी। तलाश करने पर एक गांव मिला, जहां लोहार के घर जाकर उसने कुछ पीट-पाट कर दुरुस्त कराया। जंगल में कुछ भी खाने-पीने का सामान नजर नहीं आता था । इमली के वृक्ष थे। उनमें इमली के फल के गुच्छे लटक रहे थे। हम लोग उन्हें तोड़-तोड़कर जबान और दांत खट्टे करते रहे। दोपहर के बाद प्यास ने जोर किया। फिर गांव तलाश करके लोटा-बाल्टी मंगनी मांगी गयी । बहुत दूर से पानी लाकर प्यास बुझायी गयी ।
जब मरम्मत का काम जारी था, एक दूसरी मोटर पर सवार पुलिस वाले जाते हुए नजर आये । हम लोगों को देखकर उन्होंने अपनी गाड़ी रोक ली । हमने उनसे कहा कि हम 'बुंडू' शीघ्र ही पहुंचते हैं, आप वहां कह दें कि मोटर बिगड़ने के कारण हम लोगों के आने में कुछ विलम्ब हो रहा है। उन्होंने मोटर रोककर हम लोगों का हाल जान लेने की शिष्टता तो की थी; पर यह संवाद वहां पहुंचाने की भद्रता नहीं की ! वहां जो जनता कुछ दूर-दूर के गांवों से भी आयी थी, हम लोगों का तीन-चार बजे तक इंतजार करके जहां-तहां चली गयी ।
अंत में मोटर मरम्मत हो गयी। हम लोग पांच-छः बजे शाम तक 'बुंडू' पहुंचे। जो लोग गांवों से आये थे,वे तो चले गये थे। पर खास 'बुंडू' के लोगों में हमारे पहुंचने की खबर बात की बात में पहुंच गयी । सभा जुट गयी । हस्ब- मामूल वहां भी भाषण हुआ। रुपये जमा किये गये । जहां तक मुझे याद है, वहां सात-आठ सौ रुपये के लगभग धन एकत्र हुआ।
काम खत्म करके हम लोग तुरंत चलने के लिए तैयार हुए । पर दिन भर केवल इमलियों पर ही बीता था, इसलिए वहां के लोगों ने भोजन कर लेने का आग्रह किया । हमने भी उसे मान लिया । रसोई तैयार होते-हवाते 9-10 बज गये । अंत में भोजन करके यह विचार होने लगा कि अब क्या किया जाये ? उस दिन 'खूंटी' का प्रोग्राम छूट चुका था । दूसरे दिन लोहरदगा का प्रोग्राम किसी तरह छूटना न चाहिए । तीसरे पहर की गाड़ी से पटने के लिए रवाना होना भी अत्यंत आवश्यक था । कुछ लोगों का विचार हुआ - विशेषकर मोटर वाला इस पर जोर देने लगा कि रात को चलना ठीक नहीं है, रास्ते में जंगल है। खतरा है, मोटर भी न मालूम कहीं बिगड़ गयी तो रात का समय बड़ा भयानक होगा। मैं
समझता था कि वह बहाना कर रहा है - इतनी देर तक मोटर की मरम्मत की गयी थी, और वह ठीक चली भी थी, अब क्या बिगड़ेगी ? विशेषकर दूसरे दिन के कार्यक्रम की मुझे चिंता थी। मैंने बहुत जोर लगाया कि नहीं, जरूर चला ही जाये ।
अंत में प्रायः 11-12 बजे रात में उसी टूटी मोटर पर हम सात आदमी सवार होकर रवाना हुए। बीच में थोड़ी ही दूर पर, एक घाट है जहां कुछ ऊंची चढ़ाई है । उस चढ़ाई पर चढ़ते समय मोटर फिर टूट गयी । जहां मोटर टूटी वहां से प्रायः दो-ढाई सौ गज और ऊपर चढ़ना था। उसके बाद उतार था । उतार में यदि इंजिन न भी काम करे, तो मोटर आसानी से चली जायेगी, ऐसा ड्राइवर ने कहा । हम लोगों ने भी ऐसा ही अनुमान किया । घाट से उतरकर ही एक डाक बंगला था । हमने सोचा कि डाक बंगले तक अगर हम किसी तरह पहुंच जायें तो वहां रात आराम से कटेगी, हम सो सकेंगे। अपनी बेवकूफी से और उत्साह में हमने यह निश्चय किया कि जो थोड़ी चढ़ाई है उसे हम लोग मोटर ढकेल करके ही पार कर लेंगे । इसलिए हमने मोटर को आगे ढकेलना शुरू किया । 20-30 गज तक मोटर ढकेल ले गये । वहां ढाल बहुत कम थी और ऊंचाई अधिक । मोटर का ऊपर चढ़ना कठिन था; पर हम लोगों ने जोर लगाया । नतीजा यह हुआ कि चंद गज ऊपर ढकेलने के बाद मोटर उलटे पीछे की ओर झुकी । हम अपनी सारी शक्ति लगाकर उसे रोकने लगे। किसी-न-किसी तरह उसे एक खड्ड में गिरने से हम बचा सके । इसके बाद अब फिर हिम्मत न हुई कि मोटर ढकेलने की कोशिश की जाये।
रात के शायद 12-1 बजे होंगे। मध्य जंगल में हम सात आदमी किसी तरह मोटर में बैठकर आये थे । दिन-भर की थकान के बाद रात को सोना भी आवश्यक था। ड्राइवर, उस निर्जन स्थान की भयानक बातें कहकर, हम लोगों को डराता भी जाता था। उसने कहा कि यहां हिंसक जानवरों और चोर-डाकुओं, दोनों का डर था । हमने कहा कि चोर-डाकू हमसे लेंगे ही क्या, हमारे पास तो कुछ नहीं है। हां, यदि जंगली जानवर आ जाये तो उसका भय अवश्य है । मैंने यह कह तो दिया; पर मुझे यह नहीं मालूम था कि डाक्टर ने बुंडू के मिले रुपयों को अपने बेग में रख लिया था । वह बेग साथ ही था। उस समय मेरी बात सुनकर डाक्टर भी कुछ न बोले । मैं भी दूसरे दिन सुबह तक इसी भूल में था कि हमारे हाथ बिलकुल खाली हैं।
हम सलाह कर ही रहे थे कि जंगल के भीतर से गरगराहट सुन पड़ी। ड्राइवर तो बहुत डर गया । कहने लगा,यह आवाज बनैले जानवर की है। कुछ ही देर में आवाज बंद हो गयी । हम सब शांत होकर किसी तरह मोटर में बैठ गये। कुछ देर बाद जब फिर कुछ चित्त शांत हुआ तो हमने सोचा कि मोटर वहीं छोड़ दी जाये और हम लोग डाक बंगले तक पैदल चलकर वहां सोवें, फिर सवेरे मोटर का कुछ प्रबंध किया जायेगा। मगर ड्राइवर इस पर राजी न हुआ। जब हम लोगों ने कहा कि हम लोग चले जाते हैं, तुम मोटर के साथ यहीं ठहरो, तो वह रोने-चिल्लाने
अंत में यह निश्चय हुआ कि तीन आदमी मोटर के साथ ठहर जायें, बाकी चार आदमी डाक-बंगले पर चले जायें । रात चांदनी थी, यही एक चीज थी जिससे कुछ हिम्मत बनी रहती थी । डाक-बंगला पहुंचते-पहुंचते हम लोग प्यास के मारे परेशान थे । डाक बंगले में कोई था नहीं; दरवाजे बंद थे । हमने सोचा कि दरवाजा किसी तरह खोला जाये । इसमें हम सफल भी हो गये । अंदर से टटोलकर एक बाल्टी निकाली गयी। दो चारपाइयां और दो मेजें थीं । वे भी बाहर निकाली गयीं। पर बाल्टी से तो प्यास बुझती न थी, कुएं और डोरी की आवश्यकता रह ही गयी । हम लोग फिर एक बार डाक बंगले के आसपास चौकीदार की खोज में निकले । कुछ दूर पर देखा कि एक आदमी एक बच्चे को बगल में लेकर गाढ़ी नींद में सोया हुआ है। उस घोर जंगल में बच्चे के साथ उस आदमी को इस प्रकार निश्चित सोते देखकर हम अचम्भे में आ गये । वह बहुत पुकारने पर जगा । ऊंघते ऊंघते ही उसने कहा कि डोरी तो नहीं है, पर कुआं जंगल में थोड़ी ही दूर घुसने पर मिलेगा ।
प्यास से हम लोग परेशान थे । इसलिए फिर कुएं की तलाश में निकले । वंह मिला भी । अपनी चादरों को जोड़कर डोरी बनायी गयी । उसी से बाल्टी में पानी निकाला गया । पानी पीकर हम लोगों में से कुछ तो चारपाई पर और कुछ टेबुल पर सो रहे । सोने का समय थोड़ा ही मिला। सवेरे उठकर, मुंह-हाथ धोकर, हम लोगों ने सोचा कि यहां तो कोई सवारी मिलने वाली नहीं है, इसलिए रांची की ओर हम लोग पैदल ही बढ़ें; कोई गांव मिल जायेगा तो वहां कुछ खाने का भी प्रबंध हो सकेगा ।
सब लोग चलने पर राजी नहीं थे । इसलिए मैं तथा एक आदमी और दोनों चल पड़े। वहां से तीन-चार मील जाने पर एक गांव मिला, जहां कुछ चने मिले । प्रायः 9 बज़ चले थे । चने चबाकर हम लोग कुछ विश्राम करने लगे। धूप कड़ी हो गयी थी । शीतल हवा चल रही थी । तुरंत नींद आ गयी । प्रायः एक-डेढ़ घंटे के बाद किसी ने आकर जगाया। मालूम हुआ कि रांची के भाइयों ने कल दोपहर तक हमारी बाट जोही । जब हम नहीं पहुंचे तो दूसरी टैक्सी करके हमारी खोज में कुछ लोगों को भेजा। उन्होंने भूल यह की कि इस टैक्सी पर भी प्रायः पूरा बोझ लेकर तीन-चार आदमी आये । हम लोग पांच आदमी तो, मोटर वालों को छोड़कर, एक गाड़ी का बोझ पहले से थे ही । हमने कहा कि हममें से जो लोग अभी पीछे छूटे थे उनको पहले रांची पहुंचाओ, फिर दुबारा मोटर ले आओ तो हम दोनों चलेंगे। उन्होंने भी इसे पसंद किया। हम लोग प्रायः डेढ़-दो घंटे और आराम से सोये । फिर जब मोटर प्रायः एक बजे के करीब आयी तो रांची गये । वहां कुछ भोजन करके, सेपहर की गाड़ी से सीधे पटने के लिए रवाना हो गये ।
इतनी दिलचस्प तो नहीं, पर इस प्रकार की कई घटनाएं उन दिनों के सफर में होती
रहीं ।
हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य और खादी प्रचार
जुलाई 1921 में बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का अधिवेशन हुआ। वहां बिहार के और लोगों के साथ मैं भी गया। अधिवेशन में काफी उत्साह था, क्योंकि तुरंत एक करोड़ रुपये जमा करने का कार्यक्रम सफलतापूर्वक देश ने पूरा कर लिया था। चर्खे के संबंध में भी काफी प्रचार हुआ था। हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य तो मानो पूर्ण रूप से स्थापित जान पड़ता था । हम लोग यह नहीं समझ सकते थे कि यह कभी फिर टूटेगा । इन कारणों से उस अधिवेशन में कुछ लोगों ने इस बात पर बहुत जोर दिया कि सत्याग्रह शुरू करना चाहिए।
उधर गवर्नमेंट की ओर से भी कुछ कार्रवाइयां हो रही थीं, जिनसे बहुत लोग क्षुब्ध थे । हमने यद्यपि बहुत बड़ा आन्दोलन सारे देश में चलाया था, तथापि वह वैध था। कानून तोड़ा नहीं गया था - यद्यपि भाषणों में काफी आजादी बरती जाती थी । कांग्रेसी लोगों के रहन-सहन और चाल-ढाल में साहस, उत्साह और सबसे अधिक निडरपन टपका करता था । गवर्नमेंट जहां-तहां कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया करती थी। देश में इस प्रकार कई सौ आदमी जेलखानों में थे। बिहार में हुई गिरफ्तारियों और दमन का जिक्र ऊपर किया गया है । इन कारणों से भी लोगों ने बहुत जोर दिया कि सत्याग्रह शुरू कर देना चाहिए ।
महात्मा गांधी ने अभी सब रखने की सलाह दी । चर्खा-प्रचार और उसके द्वारा विदेशी वस्त्र-बहिष्कार 30 सितम्बर तक पूरा करने का निश्चय हुआ। उन्होंने कहा कि जो कार्यक्रम कांग्रेस ने निर्धारित कर दिया है उसको पूरा करना चाहिए और तभी सत्याग्रह में सफलता की आशा की जा सकेगी। इसलिए अभी तैयारी पर जोर देते हुए सत्याग्रह का निश्चय स्थगित रहा। पर एक दूसरी चीज ऐसी आ गयी जिसने सत्याग्रह का बीज बो दिया।
गवर्नमेंट की ओर से घोषणा की गयी कि जाड़ों में प्रिंस आफ वेल्स (इंग्लैंड के युवराज) हिन्दुस्तान की यात्रा करेंगे। उन्होंने शायद सोचा था कि जनता में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध इतना प्रचार हो रहा है, लोगों में इतना उत्साह और जोश बढ़ रहा है, इसके रोकने में यह यात्रा सहायक होगी। वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने एक बार आन्दोलन के संबंध में कहा था कि इससे मैं घबरा गया हूं, चक्कर में पड़ गया हूं (puzzled and perplexed) । अब
लार्ड रीडिंग यहां वायसराय बनकर आ गये थे । वह इंग्लैंड के चतुर नीतिज्ञों में समझे जाते थे । उन्होंने कुछ ही दिन पहले अमेरिका में राजदूत के पद पर रहकर अमेरिका को लड़ाई में इंग्लैंड के पक्ष में ले आने का कौशल दिखलाया था और अब इंग्लैंड के चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्त थे । हो सकता है कि यह (युवराज-यात्रा) उनकी चातुरी का नतीजा हो । हो सकता है, नीतिज्ञों ने समझा हो कि जैसे बंगविच्छेद के बाद बंगाल में बहुत असंतोष फैल गया था और जब वह किसी प्रकार दमन-नीति से दबाया नहीं जा सका तब सम्राट पंचम जार्ज हिन्दुस्तान में अपना अभिषेक कराने आये और यहां की जनता तथा सभी लोगों ने बड़े उत्साह के साथ उनका स्वागत किया वैसे ही इस बार भी युवराज के आगमन से हिन्दुस्तान की जनता में राजभक्ति उमड़ पड़ेगी और आन्दोलन खुद-ब-खुद कमजोर पड़ जायेगा । युवराज के इस समय हिन्दुस्तान में आने का कोई भी दूसरा कारण देखने में नहीं आता था ।
अखिल भारतीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव स्वीकार किया जिसमें यह अनुरोध किया गया कि गवर्नमेंट यहां युवराज के लाने का निश्चय छोड़ दे । उसमें साफ-साफ कहा गया कि के गवर्नमेंट के लिए, अपनी गिरती हुई लोकप्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने के हेतु, सम्राट के पुत्र और भावी सम्राट का इस प्रकार इस्तेमाल करना मुनासिब नहीं है । यह भी बतला दिया गया कि देश की यह बात यदि गवर्नमेंट स्वीकार नहीं करेगी तो मजबूरन हमको इस यात्रा का बहिष्कार करना पड़ेगा-यद्यपि युवराज के साथ हमारा कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है, वरन् उनके लिए हम लोगों के हृदय में आदर ही है, तथापि उनका बहिष्कार भी अनिवार्य हो जायेगा। इस प्रस्ताव द्वारा साफ-साफ चेतावनी दे दी गयी कि गवर्नमेंट की इस चालबाजी का नतीजा अच्छा न होगा और देश को सत्याग्रह के लिए तैयारी करने का आदेश दिया जायेगा ।
बकरीद का समय भी निकट आ गया था। बिहार और संयुक्त प्रांत में यह समय हमेशा बहुत नाजुक समझा जाता है; क्योंकि जहां-तहां गाय की कुर्बानी के लिए हिन्दू-मुस्लिम दंगा-फसाद हो जाया करते हैं। इस बार सोचा गया कि इस हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के जमाने में भी यदि बलवा-फसाद हुआ तो इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा। सोचा गया कि इस अवसर का उपयोग हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के बढ़ाने में करना चाहिए। इस संबंध में बहुत प्रचार हुआ । महात्माजी का रास्ता यह था कि हम मुसलमानों के खिलाफ लड़कर उनसे गाय की रक्षा नहीं करा सकते और उनको मारकर हम गोरक्षा का फल भी अच्छा नहीं
पा सकते । इसलिए यह उन पर ही छोड़ना चाहिए कि वे अपने हिन्दू भाइयों की भावना को ठेस न लगाकर, भाईचारे के व्यवहार से खुद गोवध बंद करें - हिन्दुओं की जोर-जबरदस्ती से नहीं, बल्कि अपने प्रेम-भाव और उदार विचार से ।
इस सिलसिले में अली-बंधुओं के साथ महात्माजी ने कुछ स्थानों का दौरा भी किया । इसी दौरे के सिलसिले में वह बिहार में भी आये । इस दौरे में महात्माजी शाहाबाद, । गया और
पटना जिलों में ही गये जहां बकरीद के अवसर पर कुछ गड़बड़ी का भय था । मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद सुभानी उनके साथ थे। महात्माजी का कार्यक्रम बहुत ही संगीन था - एक दिन में कई जगहों में सभाएं और बहुत दूर तक मोटर से सफर । मुझे याद है कि एक दिन वह संध्या को भोजन भी नहीं कर पाये, क्योंकि सूर्यास्त के बाद वह भोजन नहीं करते और सूर्यास्त के पहले इसके लिए समय नहीं मिला । मैं सफर में साथ रहा । सभी जगहों में आपस के मेल-जोल की बातें ही कही गयीं । साथ-ही-साथ, खादी-चर्खा के प्रचार की बातें भी की गयीं। बड़े संतोष और गौरव की बात है कि मुसलमान नेताओं ने - यद्यपि वे कुर्बानी करने के अपने स्वत्व को नहीं छोड़ना चाहते थे तथापि - जनता में प्रचार किया कि आदमी स्वत्व रखकर भी उसके व्यवहार करने या न करने का फैसला खुद कर सकता है; इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि भाईचारा और रवादारी के ख्याल से, जहां तक हो सके, कुछ ऐसा न करें जिससे हिन्दुओं का दिल दुखे ।
इसी वक्त हकीम अजमल खां तथा दूसरे नेताओं ने भी बड़ी करामात दिखलायी। फलस्वरूप उस साल की बकरीद केवल शांति के साथ ही नहीं बीती, बल्कि गायों की कुर्बानी भी इतनी कम हुई जितनी शायद कभी पहले भी न हुई थी। इसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ने एक-दूसरे की भावनाओं की प्रतिष्ठा की। किसी तरफ जोर आजमाइश की कोशिश नहीं हुई। दोनों ने एक-दूसरे की रवादारी और भाईचारे पर भरोसा किया । उनका यह भरोसा निष्फल नहीं गया ।
बिहार के कुछ भागों में, विशेष करके उत्तर बिहार के जिलों में, चर्खे का चलना कभी एकबारगी बंद नहीं हुआ था - यद्यपि वह बहुत कम हो गया था। इस आन्दोलन से उसको नवजीवन मिला । चर्खा-प्रचार के लिए, तिलक स्वराज्य कोष से, रुपये भी मिले । हमारे प्रांत में भी काम शुरू किया गया । काम तो हमने शुरू किया; पर शास्त्रीय ज्ञान हमको कुछ भी न था । उत्साह था, पर व्यापार-बुद्धि नहीं थी । इसलिए जो काम उस समय हुआ उसका केवल यह फल हुआ कि खादी का प्रचार तो हुआ, पर पैसे का भी काफी नुकसान हुआ । जब मैं गांधीजी के उस कथन पर अब विचार करता हूं, जिसको उन्होंने आन्दोलन के आरम्भ में ही कहा था, तो मुझे उनकी दूरदर्शिता और कार्य कौशल का एक और भी ज्वलंत दृष्टांत मिल जाता है । उन्होंने कहा था कि हमारे राष्ट्रीय स्कूल चर्खा - शाला होने चाहिए और इसी के ज्ञान को प्राप्त करने और बढ़ाने में राष्ट्रीय शालाओं को लग जाना चाहिए - चर्खा द्वारा ही हम युवकों को सहस्रों की संख्या में काम दे सकेंगे और जनता की धनवृद्धि में सहायक हो सकेंगे। उन्होंने साबरमती आश्रम में उद्योग- शाला खोलकर चर्खा संबंधी खोज का काम भी जारी कर दिया। पर राष्ट्रीय शिक्षा के अधिकारी इस मर्म को पूरी तरह नहीं समझ सके; उन्होंने विद्यापीठों और उनके अधीन की पाठशालाओं को चर्खाशाला नहीं बनाया - यद्यपि सभी जगहों में चर्खा चलाना एक अनिवार्य विषय बना दिया गया था।
चर्खे चलने लगे; पर शास्त्र का ज्ञान शिक्षकों को तो था ही नहीं, बच्चों को वे कहां से देते ? इस तरह अंधों का नेतृत्व अंधे करने लगे ! अतः चर्खा ठीक रास्ते पर कुछ दिनों तक नहीं आ सका। आज हम इस अदूरदर्शिता के लिए किसी को दोष नहीं दे सकते; क्योंकि ऐसा होना स्वाभाविक-सा था । सब लोगों की आंखें भावी स्वराज्य की ओर, जो एक राजनीतिक परिवर्तन की सीमित चीज समझी जाती थी, लगी हुई थीं । कांग्रेस के अंदर भी कुछ लोग, विशेष करके महाराष्ट्र वाले, खादी चर्खे का विरोध करते ही रहे। पर इन त्रुटियों के रहते हुए भी खादी का प्रचार खूब हुआ। अभी शुद्ध और अशुद्ध खादी का भेद लोग इतना नहीं समझते थे। जो मोटा कपड़ा हाथ-क्रर्षे पर का बुना हुआ होता उसे ही खादी समझकर खरीदते । महात्माजी ने कहा था कि सत्याग्रह के लिए खादी का प्रचार अत्यंत आवश्यक है और प्रचार का सबूत आंखों को ही मिलना चाहिए । अर्थात जब चारों ओर लोगों को खादी पहने हम देखेंगे तो हम समझ लेंगे कि इसका प्रचार हो गया - इसके लिए पुस्तकों और लेखों तथा अखबारों में छपे आंकड़ों में, अथवा किसी से पूछ करके, सबूत ढूंढने की जरूरत नहीं होगी ।
बिहार के इस दौरे में गांधीजी ने खादी पर काफी जोर दिया । कोकटी का कपड़ा, जो दरभंगा जिले के मधुबनी इलाके में बनता था, काफी महीन और सुंदर तथा मुलायम होता है। उसको देखकर लोग चकित हो जाते थे। इसका व्यापार अभी तक मरा नहीं था । इसका विशेष कारण यह था कि इस कपड़े का खर्च नेपाल-दरबार में और वहां की संभ्रांत जनता में काफी था। वहां के लिए ही यह कपड़ा, विशेष करके उस इलाके में जो नेपाल की सरहद पर ही है, बहुत बना करता था । उस इलाके की बनी हुई कुछ धोतियां भी पेश की गयीं, जिनको देखकर, विशेषकर मुझे याद है कि मौलाना मुहम्मद अली, बहुत ही संतुष्ट हुए थे । बिहारशरीफ जैसे मोमिनों के एक बड़े मुख्य स्थान पर गांधीजी गये और उन लोगों ने मदद करने का वचन भी दिया ।
बिहार-यात्रा समाप्त करने के पहले गांधीजी अपने साथियों के साथ पटने आये । सदाकत आश्रम में ठहरे। अखिल भारतीय कांग्रेस की नयी बनी हुई कार्यकारिणी की बैठक वहीं हुई । बम्बई की अखिल भारतीय कमिटी में वर्किंग कमिटी का चुनाव हुआ था। मैं भी सदस्य चुना गया था। इसलिए मैं भी उस बैठक में शरीक हुआ। इस बैठक में विशेषकर इसी बात पर जोर दिया गया कि विदेशी वस्त्र बहिष्कार का कार्यक्रम पूरा होना चाहिए और इसके लिए चर्खा-प्रचार आवश्यक है।
बिहार से गांधीजी कलकत्ते होते आसाम चले गये। मैं बिहार में खादी संगठन और चर्खा-प्रचार के लिए घूमने लगा। प्रांतीय कमिटी ने इस काम के लिए कुछ लोगों की एक समिति बना दी। सभी जिलों में इस काम के लिए कुछ लोग नियुक्त कर दिये गये । काम खूब जोरों से चलने लगा। सरकार अपनी ओर से चुप नहीं रही । उसको भय हो गया कि
विदेशी कपड़ों की दूकानों पर पहरा बैठाया जायेगा । कांग्रेस ने कपड़े के व्यापारियों से अनुरोध किया था कि वे विदेशी कपड़े का व्यापार छोड़ दें और जो विदेशी माल उनके पास मौजूद है उसे विदेशों में ही बेचने का प्रबंध करें - भारतवर्ष में यहीं के बने कपड़े ही बेचें । इसी निश्चय से डरकर बिहार सरकार के नये प्रधानमंत्री (चीफ सेक्रेटरी) मिस्टर सिफ्टन ने एक दूसरी विज्ञप्ति निकाली, जिसमें जिला अफसरों को प्रोत्साहन दिया गया कि वे विदेशी वस्त्र संबंधी प्रचार करें और जनता को यह बतावें कि विदेशी वस्त्र के बिना लोगों को बहुत कष्ट होगा - कपड़ा बहुत महंगा हो जायेगा । और जहां कहीं कांग्रेसी लोग जोर लगावें, गिरफ्तार किये जायें । पहले इस प्रकार की एक विज्ञप्ति चीफ सेक्रेटरी रेनी ने असहयोग के संबंध में निकाली ही थी । अब विदेशी वस्त्र को लेकर और भी जोरदार नीति की घोषणा सरकार ने कर दी । मालूम होने लगा कि एक-न- एक दिन मुठभेड़ हो ही जायेगी। पर हम अपना काम दृढ़ता - किंतु सहिष्णुता के साथ करते गये। काम खूब जोरों से आगे बढ़ता
गांधीजी आसाम का दौरा समाप्त करके कलकत्ता वापस आये । वहां फिर वर्किंग कमिटी की बैठक हुई जिसमें शरीक होने के लिए मैं वहां गया ।
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दूसरी बात सरकारी और सरकार से सम्बद्ध स्कूलों और कालेजों के बहिष्कार की थी । मेरा अनुभव बताता था कि इसमें हमें बहुत सफलता नहीं मिलेगी। मैंने बंगाल-विच्छेद के समय कलकत्ते में उस आन्दोलन को अच्छी तरह देखा था, जो सरकारी स्कूलों के विरुद्ध चला था। वहां भी यह प्रयत्न हुआ था कि राष्ट्रीय विद्यालय खोला जाये । उस 'नेशनल कौंसिल आफ एजुकेशन' को ऐसे-ऐसे व्यक्तियों की सहायता तथा सहानुभूति मिली थी, जो केवल राजनीतिक पुरुष ही नहीं थे । सर गुरुदास बनर्जी, जो हाइकोर्ट की जजी से पेंशन पा चुके थे और जो पहले कलकत्ता युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रह चुके थे, इसके बड़े पक्षपाती और सहायक थे । इसलिए उसे गवर्नमेंट के विरोध का भी विशेष भय नहीं था । कांग्रेस तथा आन्दोलन के प्रोग्राम में भी बहिष्कार की बात नहीं थी । उसमें अच्छे-अच्छे कुछ उत्साही युवक, जिन्होंने युनिवर्सिटी में बड़ा नाम पाया था, शरीक हुए थे। उनमें से विख्यात लेखक श्री विनयकुमार सरकार हैं, जिन्होंने एम. ए. की परीक्षा में स्वर्णपदक और सर्वप्रथम स्थान पाया था । इतने पर भी उसमें उतना उत्साह नहीं देखा गया; क्योंकि वहां से शिक्षा पाये हुए विद्यार्थियों को किसी प्रकार जीविका निर्वाह का रास्ता नहीं मिलता था । इससे मैं डरता था कि यहां भी यदि हम इस पर जोर देंगे तो विद्यार्थियों में, और विशेष करके उनके अभिभावकों में, बहुत उत्साह नहीं आवेगा, और तब यह कार्यक्रम जोरों से चल नहीं सकेगा । मैंने बैठक में अपने इस विचार को भी रखा था; पर कुछ भाइयों को मेरी बात नहीं जंची; क्योंकि वे समझते थे कि मैं बहुत डरपोक हूं और यों ही अपने सामने अनावश्यक भय खड़ा कर लेता हूं । बात यह है कि हमारे देश में विद्या अर्थकरी है। जो पढ़ता है उसे कुछ कमाना चाहिए । उसकी जिंदगी ऐसी बन जाती है कि वह पुराने तरीके से रह नहीं सकता। उसके अपने रहन-सहन में भी अधिक खर्च पड़ने लगता है। घर वाले आधुनिक शिक्षा दिलाने में खर्च काफी करते हैं और आशा रखते हैं कि उस शिक्षा से वह उस पूंजी को अगर बढ़ा न सकेगा तो कम-से-कम कायम रख सकेगा । वह शिक्षा भी ऐसी हुआ करती है कि शिक्षा समाप्त होने के बाद सरकारी नौकरी या वकालत की तरह के पेशे को छोड़कर दूसरा कोई काम भी नहीं मिलता। आरम्भ में, जब ऐसी विद्या प्राप्त किये हुए लोगों की संख्या कम थी, लोगों ने पैसे भी खूब कमाये थे । पर जैसे-जैसे अंगरेजी शिक्षा का प्रचार बढ़ता गया, शिक्षितों की संख्या बढ़ती गयी, पैसे कमाने का मौका कम होने लगा; क्योंकि इन नौकरियों और पेशों में जाने वालों की संख्या बढ़ने लगी, फलतः आपस की होड़ से कठिनाई भी बढ़ने लगी । इसलिए, यद्यपि सरकारी अंगरेजी शिक्षा से भी उतनी आशा नहीं की जा सकती थी, तथापि राष्ट्रीय शिक्षा के मुकाबले अर्थकरी होने में वह अब भी बहुत बढ़ी चढ़ी थी । इसलिए मेरा विचार था कि हम पहले कार्यक्रम के अनुसार लड़कों को स्कूल-कालेज छोड़ने के लिए कहें, और जब देखें कि उनकी संख्या काफी होती जा रही है तब अपनी ओर से विद्यालय इत्यादि का प्रबंध करें । मैं यह भी सोचता था कि विद्यालय खोल देने के बाद उसको चलाते रहना चाहिए । यदि हम ऐसा न कर सकेंगे तो इसका असर अच्छा न होगा। इसलिए मैं विद्यालय खोलने अथवा परीक्षा लेने के पक्ष में शुरू में नहीं था । मैंने जो कुछ ऊपर कहा है उसका यह अर्थ नहीं है कि मैं आधुनिक शिक्षा की त्रुटियों को नहीं समझता था । मैं समझ गया था कि आधुनिक शिक्षा बिलकुल निकम्मी है। विदेशी भाषा द्वारा दी जाने के कारण इसमें समय और शक्ति की बहुत बरबादी है। इससे वह स्वाभाविक मानसिक विकास नहीं हो पाता जो अपनी भाषा द्वारा दी गयी शिक्षा से होता है । स्पष्ट है कि जहां शब्दों के अर्थ स्मरण रखने में ही सारा समय लग जाता है वहां उसके समझने और चिंतन के लिए कैसे समय मिल सकता है ? इसलिए, यदि और कुछ नहीं तो केवल इस एक ही दोष के कारण वह शिक्षा सर्वथा अनिष्टकर है। विदेशी भाषा सीखने और जानने में दोष नहीं है। जानना अच्छा है। आज की दुनिया में कम-से-कम किसी एक योरोपीय भाषा का परिचय एक प्रकार से अनिवार्य-सा हो गया है । तो भी भाषा जान लेना और उससे अपना काम निकालना एक बात है, और विदेशी भाषा को सारी शिक्षा का माध्यम बनाना बिलकुल दूसरी बात है। हम उसे माध्यम बनाने के विरोधी हैं, सीखने के नहीं। मैं यह भी समझता था कि इस शिक्षा की नींव पड़ी थी अंगरेज हाकिमों की आवश्यकता की पूर्ति • के कारण । वह आवश्यकता थी अंगरेजी पढ़े-लिखे देशी लोगों की, जिनका सहयोग वे अपना कारबार चलाने में अनिवार्य समझते थे । वे कुछ ऐसे हिन्दुस्तानियों को चाहते थे जो रूप-रेखा में तो हिन्दुस्तानी हों, पर विचार और मानसिक वृत्ति में अंगरेज ही हों। उन्होंने यह भी चाहा था कि उनके दफ्तरों के काम चलाने के लिए ऐसे सस्ते हिन्दुस्तानी पैदा किये जायें, जो अंगरेजी सीखकर उनका सब काम अंगरेजी में ही कर दें । इस तरह, अंगरेजों को हिन्दुस्तानी भाषा से परिचित होने की आवश्यकता नहीं होगी । इसलिए शिक्षा की पद्धति भी कुछ ऐसी बनी थी कि विशेषतः उसी जरूरत के मुताबिक लोग तैयार किये जा सकें । हां, ऐसे तैयार होने वालों में कुछ तो ऐसे जरूर निकल आवेंगे जो स्वतंत्र रूप से कुछ विचार करने की शक्ति भी प्राप्त कर लेंगे और जो बिलकुल सरकार पर ही भरोसा न रखेंगे। ऐसे अगर कुछ निकलें तो निकलें; पर शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य दफ्तरी लोगों को तैयार करना ही था। ऐसा ही उसका फल भी हुआ । इसलिए मैं इस शिक्षा का पक्षपाती तो किसी तरह भी न था; पर राष्ट्रीय शिक्षा में जो दिक्कतें मैं देखता था उनसे कुछ डरकर आहिस्ता-आहिस्ता कदम बढ़ाना चाहता था । सबसे ज्यादा मुझे इस बात की चिंता थी कि शुरू होकर किसी काम का शीघ्र ही बंद हो जाना और किसी नतीजे तक न पहुंचना लोगों को हतोत्साहित करेगा। इसलिए, यदि हम काम थोड़ा भी करें तो हर्ज नहीं, पर जो करें वह ठोस होना चाहिए । पहले कह चुका हूं कि हम लोग बिहार में पूना के फरगुसन कालेज के ढंग का एक कालेज खोलने का विचार चम्पारन में ही कर रहे थे। कुछ रुपये भी जमा कर लिये थे। पर वह विचार स्थगित कर दिया गया था; क्योंकि गांधीजी ने कहा था कि सरकार से सम्बद्ध शिक्षालय खोलने से कोई फायदा नहीं है - यदि ऐसा करना ही चाहते हो तो बिलकुल नयी पद्धति से पढ़ाने वाली राष्ट्रीय संस्था खोलो । उनकी वह बात भी हम लोग भूले नहीं थे । इसलिए मैं कुछ ठहरकर यह देख लेना मुनासिब समझता था कि देश और विशेषकर विद्यार्थी समुदाय असहयोग के मैदान में किस तरह आता है। कुछ भाइयों का विचार था कि असहयोग को सफल बनाने के लिए जब तक हम विद्यार्थियों के सामने कोई दूसरी शिक्षा-संस्था नहीं प्रस्तुत कर देंगे तब तक वे सरकारी विद्यालयों को छोड़कर नहीं आवेंगे । इसलिए विद्यार्थियों को सरकारी विद्यालयों से हटाने - असहयोग कराने के लिए राष्ट्रीय विद्यालय का होना आवश्यक है। मैं इस प्रकार प्रलोभन देकर असहयोग कराना पसंद नहीं करता था । मैं चाहता था कि विद्यार्थियों को देश के नाम पर और सरकारी शिक्षा की त्रुटियों को बताकर हटाना अच्छा होगा । जब वे इस तरह सब कुछ समझ-बूझकर असहयोग करेंगे तभी उनका असहयोग टिकाऊ हो सकेगा। अगर वे यह समझकर असहयोग करेंगे कि वहां भी उनको नौकरी दिलाने वाली शिक्षा मिलेगी और इस तरह उन्हें कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा, जो उनका निश्चय टिकाऊ न होगा। हमारे विद्यालय में आकर जब वे यह देखेंगे कि उनको उतनी सुविधा नहीं है जितनी सरकारी विद्यालयों में थी, तो वे हताश होकर फिर वापस चले जायेंगे। मैं चाहता था कि केवल ऐसे ही लोग आवें जो यह समझ लें कि यह रास्ता कंटकाकीर्ण है - इसमें कष्ट है और उसे झेलने के ही लिए हम जा रहे हैं, न कि उन कुछ सुविधाओं के लिए जो सहयोग करने वालों को प्राप्त हैं । यह सब बहस चल ही रही थी और हम लोग सोच ही रहे थे कि मजहरुल हक साहब ने एक राष्ट्रीय स्कूल खोल दिया, जिसके प्रधान अध्यापक हुए लाट बाबू , जो हाल ही में विलायत से एम. ए. और बैरिस्ट्री पास कर लौटे थे । दिसम्बर के आरम्भ में गांधीजी मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद के साथ, दौरे पर निकले। वह बिहार में भी आये। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालयों पर भी चढ़ाई की थी। थोड़ी सफलता भी मिली थी, पर पूरी नहीं । उसी चढ़ाई के फलस्वरूप काशी विद्यापीठ और जामे - मिल्लिया का जन्म हुआ था। बिहार में उन लोगों के आने से बड़ा उत्साह उमड़ा। बिहार के विद्यार्थी भी उस लहर में बह चले । सरकारी शिक्षा से असहयोग का अर्थ था किसी भी शिक्षा संबंधी संस्था से संबंध न रखना । मैं पटना युनिवर्सिटी के सिनेट और सिंडिकेट का मेम्बर था । युनिवर्सिटी के कामों में काफी दिलचस्पी भी लिया करता था । युनिवर्सिटी ने एक कमिटी मुकर्रर की थी । कलकत्ता युनिवर्सिटी की स्थिति पर विचार करने के लिए नियुक्त सैडलर कमिटी की रिपोर्ट पर विचार करके पटना युनिवर्सिटी में आवश्यक सुधार की सिफारिश करने का भार उस कमिटी दिया गया था। मैं भी उस कमिटी का एक सदस्य था। उसमें मैंने काफी परिश्रम किया था । मेरा विशेष प्रयत्न यह था कि युनिवर्सिटी, कम-से-कम मैट्रिकुलेशन की परीक्षा तक के लिए, मातृभाषा को ही शिक्षा का माध्यम मान ले। इस पर कमिटी के अंदर काफी वाद-विवाद रहा। यह प्रश्न सिनेट के सामने आने वाला था । सिनेट की बैठक नवम्बर के महीने में होने वाली थी। मैंने यह सोचा कि इस प्रस्ताव को यदि मैं सिनेट में स्वीकार करा सकूंगा तो यह भी राष्ट्रीय शिक्षा का ही एक काम होगा। इसलिए मैंने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि यद्यपि मैंने असहयोगी होने का निश्चय कर लिया है तथापि मैं सिनेट की बैठक तक सिनेट और सिंडिकेट से नहीं हटूंगा। मैं जानता था कि सिनेट में इसके विरुद्ध प्रांत के बड़े-बड़े लोग थे । अभी तक लोगों के मन में अंगरेजी भाषा के लिए यह मोह था कि बचपन से ही अगर यह नहीं पढ़ी जायेगी तो इसका पूरा ज्ञान नहीं हो सकेगा और हमारे युवक संसार की होड़ में पीछे रह जायेंगे । यद्यपि सैडलर कमिटी ने भी मातृभाषा द्वारा शिक्षा देने पर जोर दिया था तथापि हमारे अपने देश के लोग इसके विरोधी थे। सिनेट के सामने, प्रस्ताव के समर्थन में, मैंने एक बहुत जबरदस्त भाषण किया, जिसमें दलीलों के अतिरिक्त भावुकता की मात्रा भी काफी थी । जहां तक मैं समझ सका, उसका असर लोगों पर काफी पड़ा। हमारे विरोधियों में मिस्टर सुलतान अहमद, मिस्टर ख्वाजा मुहम्मद नूर, जस्टिस ज्वाला प्रसाद, प्रोफेसर यदुनाथ सरकार प्रभृति थे। कुछ ने अपने भाषणों से विरोध किया, कुछ चुप रहे; पर सम्मति विरोध में दी । हमारे समर्थक दो अंगरेज निकले - प्रोफेसर हामिल्टन और प्रोफेसर ड्यूक । इनसे मैंने कुछ कहा नहीं था और न इनसे इस विषय में कभी विचार - विनिमय ही हुआ था । पर दोनों ने, केवल शिक्षा की उपयोगिता की दृष्टि से मेरे प्रस्ताव का जोरों से समर्थन किया । प्रस्ताव बहुमत से स्वीकृत हुआ। सिनेट की यह सिफारिश हुई कि युनिवर्सिटी के नियमों में ऐसा परिवर्तन किया जाये जिससे मैट्रिक परीक्षा तक की शिक्षा मातृभाषा द्वारा दी जा सके। इस प्रस्ताव को पास कराकर मैं बहुत खुश हुआ। किंतु सिनेट की बैठक समाप्त होते ही मैंने सिनेट और सिंडिकेट से इस्तीफा दे दिया। उन दिनों सर हविलैंड लिमेजर गवर्नर की कौंसिल के एक मेम्बर थे । वह सिनेट के भी मेम्बर थे । सुना कि उनको मेरे इस्तीफा देने से रंज हुआ; क्योंकि वह जानते थे कि मैं युनिवर्सिटी में अच्छा काम कर रहा था। मुझे किसी तरह युनिवर्सिटी से असहयोग न करने देने के लिए ही, उन्हीं की अनुमति से, बहुत से सरकारी लोगों ने मेरे उस प्रस्ताव के पक्ष में सम्मति देकर उसे पास कराया था । यह बात मुझे इस्तीफा भेजने के बाद मालूम हुई । मुझ पर जोर भी डाला गया कि मैं इस्तीफा वापस ले लूं, पर मैंने वैसा नहीं किया। मैंने सोचा कि एक ओर राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचार करना, सरकारी शिक्षा के दोष बताना और विद्यार्थियों को सरकारी विद्यालयों से निकल आने को प्रोत्साहित करना, और दूसरी ओर सरकारी शिक्षा से संबंध रखने वाली सर्वोच्च संस्था में बने रहना परस्पर विरोधी बातें हैं। यह बिलकुल गलत रास्ता होगा। इसलिए मैं इस्तीफा वापस लेने पर राजी नहीं हुआ। अगर मैं युनिवर्सिटी में रह गया होता तो जिस प्रस्ताव को इतने परिश्रम से मैंने सिनेट में पास कराया था,उसको कार्यान्वित करने में भी शायद सफल होता । निश्चित रूप से कुछ भी आज कहना सम्भव नहीं है; पर यह दुख की बात है कि सिनेट के निश्चय के बाद भी उसके अनुसार काम नहीं किया गया। अंगरेजी माध्यम की शिक्षा प्रायः बीस बरसों तक बनी रही ! हाल में मैट्रिक तक के लिए, अंगरेजी और हिसाब छोड़कर, और विषयों की शिक्षा और परीक्षा का माध्यम मातृभाषा बनी है। इन बीस बरसों में देश की स्थिति में कितना अंतर हो गया है, यह वही जानता है जिसने बीस बरसों के पूर्व सार्वजनिक हित के कार्यों में भाग लिया हो और जो आज भी लेता हो । युनिवर्सिटी भी आखिर इस आवश्यक सुधार को ज्यादा दिन न रोक सकी । बीस बरसों के बाद उसने भी इसे स्वीकार कर ही लिया है । कलकत्ते में असहयोग का प्रस्ताव पास होने के बाद ही मैं कौंसिल की अपनी उमीदवारी से हट गया । चुनाव नवम्बर के महीने में ही होने वाला था । इसलिए सब से पहले इसी कार्यक्रम पर जोर देना जरूरी समझा गया । हम लोगों ने बिहार में बहुत परचे छपवाये । उसमें जनता से अपील की गयी कि जो लोग इस चुनाव में खड़े हो रहे हैं उनको कोई भी वोट न दे । कुछ लोग दौरे पर भी निकले। जगह-जगह सभाएं करके लोगों को वही बात बतायी गयी। मैंने भी कुछ दौरा किया । स्मरण है कि कार्तिक पूर्णिमा के मेले के अवसर पर मैं 'दरौली' गया था। वहां सभा हुई थी जिसमें मैंने भाषण किया था। हम लोगों की इच्छा और कोशिश थी कि कोई उमीदवार ही न खड़ा हो; पर इसमें हम सफल नहीं हुए। सभी स्थानों के लिए उमीदवार खड़े हो गये । कुछ तो बिना विरोध चुने गये; पर जहां वोट देने का मौका मिला, वहां जनता ने बहुत कम संख्या में वोट दिया। मेरा ख्याल है कि बिहार में शायद बीस-पचीस प्रतिशत से अधिक वोटरों ने वोट नहीं दिया था । जब महात्माजी दिसम्बर में बिहार के दौरे पर आये, प्रायः उसके थोड़े ही दिन पहले, एक घटना बिहार में हुई थी, जिसका जिक्र जरूरी है। ऊपर कहा जा चुका है कि चम्पारन में नील संबंधी जांच समाप्त हो जाने पर गांधीजी ने कई जगहों में पाठशालाएं खोली थीं । इनके अलावा उस जागृति का नतीजा सूबे की कई जगहों में किसी-न-किसी रूप में देखने में आया । इस जागृति में होमरूल आन्दोलन ने भी काफी मदद पहुंचायी थी । एक रूप इसका यह हुआ कि जहां-तहां किसान सभाएं कायम हुई, जो जमींदारों के विरुद्ध किसानों की शिकायतों को जाहिर करने लगीं। चम्पारन में भी एक किसान सभा बन गयी, जो किसानों की मदद करना अपना कर्तव्य समझती थी । उधर नये विधान के कारण यह भी स्पष्ट होने लगा कि जनता को कुछ हद तक मताधिकार मिलेगा और कौंसिल के चुनाव में किसानों को हिस्सा लेना पड़ेगा। किसान सभाओं को इससे भी प्रोत्साहन मिला । जमींदार भी कुछ घबराये । वे सोचने लगे कि हम ऐसा संगठन करें कि नये विधान के चुनाव में सफलतापूर्वक भाग ले सकें । उन्होंने नीलवरों के साथ एक समझौता किया और नीलवर जमींदार संस्था कायम की । इससे किसानों और शिक्षित वर्ग में कुछ खलबली मची और रोष पैदा हुआ । उस समय के समाचारपत्रों के देखने से पता चलेगा कि इस संगठन के विरोध में खुल्लम-खुल्ला मुकाबला करने की बात कही गयी । इस संस्था का जन्म मुजफ्फरपुर में हुआ था। पर इसकी शाखाएं और और जगहों में भी बनती गयीं। दरभंगा के महाराजधिराज इसके सभापति थे । इन्हीं दिनों श्री रामरक्ष ब्रह्मचारी ने चम्पारन जिले के बेतिया सबडिवीजन के 'मछरगांवा' गांव में जाकर काम शुरू किया। वह स्थायी रूप से प्राम- संगठन का काम करना चाहते थे । वहां के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक साथ दिया था । बहुतेरे स्वयंसेवक काम करने के लिए तैयार थे। वहां वह जो कुछ कर रहे थे, मेरे परामर्श से कर रहे थे। जब एक बार मैं वहां गया तो वहां का संगठन देखकर मुझे बहुत आनन्द हुआ। लोगों में ऐसी पंचायतें कायम करना जो आपस के झगड़े मिटा दें, बच्चों की शिक्षा के लिए पाठशालाएं खोलना, गांवों की सफाई, किसानों की शिकायतें दूर कराने का प्रयत्न करना - यही मुख्य कार्यक्रम थे । वहां एक आश्रम बना जिसका खर्च जनता 'मुठिया' द्वारा जुटाती थी । संगठन का काम अच्छा चल रहा था । लोगों में उत्साह भी काफी था। पुलिस और निलहे गोरे इस प्रकार के संगठन को पसंद नहीं करते थे - विशेष करके पुलिस वाले; क्योंकि उनकी धांधली वहां नहीं चल सकती थी । उसी इलाके में पुलिस ने एक बड़ा कांड कर डाला । एक आदमी ने किसी के विरुद्ध पुलिस-दारोगा के पास नालिश कर दी । जहां यह वाकया हुआ था, उसके पास के ही गांव में दारोगा किसी दूसरे मुकदमे की तहकीकात कर रहे थे। उन्होंने पुलिस के सिपाहियों और गांव के दफादार को भेजा कि जिसके विरुद्ध नालिश की गयी थी उसे और कुछ दूसरे लोगों को भी पकड़ लाओ । उन्होंने इस तरह जाने से इंकार कर दिया । जोर लगाने पर भी वे नहीं गये । दारोगाजी को गुस्सा आया । तफसील की सारी बातें यहां देना अनावश्यक है। दारोगा ने जिले के सदर मुकाम से मिलिटरी- पुलिस बुलवा ली । कई गांवों को पुरानी रीति के अनुसार लुटवा लिया । लोगों के साथ बड़ी सख्तियां हुईं । यहां तक कि स्त्रियां भी सुरक्षित न रहने पायीं । ब्रह्मचारी रामरक्ष के साथी सर्वश्री ध्वजा प्रसाद, रामविनोद सिंह और मनोरंजन प्रसाद ने वहां की धांधली की खबरें अखबारों में छपवा दीं। रामरक्ष गिरफ्तार कर लिये गये। बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमिटी ने, जांच के लिए, श्री मजहरुल हक साहब की प्रधानता में एक कमिटी बनायी। उस कमिटी ने जनता की शिकायतों को ही ठीक बताया और गर्वनमेंट की लीपा-पोती को गलत ठहराया । यह आन्दोलन जोरों से चल ही रहा था जब गांधीजी बिहार में पहुंचे। वह चम्पारन जाने पर घटनास्थल पर भी गये । उन गांवों के लोगों से भी उनकी भेंट हुई । इसी यात्रा में गांधीजी ने अहिंसा की एक ऐसी व्याख्या दी जो अभी तक जहां-तहां लोगों को समझानी पड़ती है । उन्होंने कहा था - "पुरुषों ने, स्त्रियों और घरबार को छोड़, भागकर बड़ी कायरता दिखलायी थी । उनका धर्म था कि अपनी जान देकर उनकी रक्षा करते । पर यदि उनमें इस प्रकार बिना हाथ उठाये मरने की शक्ति नहीं थी तो उनको, चाहे जिस तरह हो सकता, मुकाबला करना चाहिए था। अपने धर्म में स्थित रहकर, बिना हाथ उठाये, मर जाना ही सच्ची अहिंसा है; पर डर से भाग जाना बड़ी भारी हिंसा है। भागने से बेहतर है कि जो कुछ मिले उसे हाथ में लेकर मुकाबला किया जाये।" मैंने यह महात्माजी के शब्दों में नहीं कहा है । यह सारांश मात्र है । ब्रह्मचारी रामरक्ष और दूसरों पर जो मुकदमे चले वे कई महीनों तक पेशी में रहे। अंत में सब झूठ साबित हुए। सब लोगों की रिहाई हो गयी । महात्माजी की यात्रा से आन्दोलन ने अधिक जोर पकड़ा। कौंसिल का चुनाव खतम हो चुका था। अब अधिक जोर स्कूल-कालेजों के खाली करने पर था । हम लोगों ने भी निश्चय किया कि एक राष्ट्रीय महाविद्यालय खोला जाये । पटना-गया रोड पर भाड़े पर एक मकान लेकर कालेज खोला गया । मैं जिस मकान में रहा करता था उसके पास ही यह मकान भी था । अब मैंने सोच लिया कि भाड़े पर अपने लिए मकान रखना, जब वकालत छोड़ ही दी है, अनावश्यक है; एक सौ पचास रुपयापये मासिक का यह खर्च बंद कर देना चाहिए । इसलिए मैंने अपना मकान छोड़ दिया। महाविद्यालय में ही जाकर रहने लगा। कानून की पुस्तकों को अपने मित्र श्री शम्भुशरण वर्मा के पास रख दिया। वे पुस्तकें उनके ही साथ उनके जीवन-भर रहीं। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद फिर दूसरे मित्र के पास चली गयीं, जहां आज तक उनके काम आ रही हैं । पटने के इंजीनियरिंग स्कूल के विद्यार्थियों का वहां के प्रिंसिपल से किसी विषय में मतभेद हो गया। विद्यार्थियों ने हड़ताल कर दी। एक साथ जलूस बनाकर श्री मजहरुल हक साहब के पास, जो उन दिनों सिकंदर मंजिल में फ्रेजर रोड पर रहा करते थे, गये। उनसे कहा कि हम लोगों ने स्कूल छोड़ दिया है, हमको स्थान दीजिए। मजहरुल हक साहब बड़े भावुक और निर्भीक व्यक्ति थे । उनके त्याग की शक्ति भी अपूर्व थी । उस समय वह बहुत ही ऐश-आराम से उस बड़ी कोठी में रहा करते थे। अपने लिए एक बड़ी कोठी और भी बनवा रहे थे। सब कुछ छोड़कर, उन लड़कों को साथ लेकर, पटना-दानापुर सड़क पर एक बगीचे में चले गये। वहां उनके एक परिचित सज्जन का छोटा-सा मकान था । वहीं रहने लगे । जाड़े के दिन थे। खूब सर्दी पड़ रही थी । वह स्थान गंगा के किनारे होने के कारण कुछ अधिक ठंडा था। घने बगीचों से घिरे रहने के कारण वहां की जमीन में कुछ सील भी थी । तब भी मजहरुल हक साहब वहां कुछ दिनों तक उसी छोटे बंगले में रहे । आहिस्ता-आहिस्ता वहां ताड़ की चटाइयों के कुछ झोंपड़े भी बन गये । लड़के भी बड़े उत्साही थे, कष्ट का ख्याल न करके उनके साथ आनन्द से रहने लगे। उसी स्थान का नाम उन्होंने 'सदाकत आश्रम' रखा। कुछ दिनों में वही बीहड़ स्थान, जहां से रात में नौ बजे के बाद किसी राही का गुजरना खतरनाक समझा जाता था, गुलजार हो गया। वहां चर्खों का एक कारखाना खोल दिया गया । सभी लड़के चखें बनाने में लग गये। आहिस्ता-आहिस्ता हक साहब ने अपने पैसों से ही मकान बनवाना शुरू कर दिया। कुछ दूसरे लड़के भी जाकर उनके साथ रहने लगे। वह स्वयं वहीं रहते, लड़कों को पढ़ाते और वही मोटा खाना खाते जो लड़के खाते । लड़के अधिकांश हिन्दू ही थे । हक साहब का ख्याल था कि कोई लड़का यह न समझे कि वह अपने हृदय में हिन्दू-मुसलमान का भेद, किसी प्रकार से भी रखते हैं। इसलिए वह सबको एक तरह से मानते थे । लड़के भी उनको पिता की तरह पूज्य समझते थे । वैसा ही उन पर विश्वास भी रखते थे । इस संबंध में यहां एक बात का उल्लेख कर देना अच्छा होगा । इसी बात से उस महान व्यक्ति के सच्चे भावों का पता चलेगा । हक साहब के साथ एक बहुत गरीब घर का मुसलमान लड़का रहा करता था। उन्होंने देखा था कि लड़का पढ़ने में तेज है। उनके दिल पर इसका भी असर पड़ा था कि मुसलमान होकर भी उसने हिन्दी और संस्कृत पढ़ी थी । वह कालेज के फर्स्ट या सेकेंड इयर में पढ़ता था । नाम था मुहम्मद खलील । हक साहब उसे बहुत मानते थे । असहयोग का आरम्भ होने पर उसने भी कालेज छोड़ दिया। हक साहब के साथ ही उनकी कोठी छोड़कर सदाकत आश्रम में जाकर रहने लगा । एक-डेढ़ साल के बाद मैंने सुना कि हक साहब ने उसको आश्रम से निकाल दिया । मुहम्मद खलील ने भी आकर मुझसे कहा कि वह रंज हो गये हैं, आप सिफारिश करके उनको शांत कर दीजिए । हक साहब की मेहरबानी मेरे ऊपर बराबर रहा करती थी । वह दिल से मुझे प्यार किया करते थे । इसलिए मैंने मुहम्मद खलील के बारे में उनसे कहा । उस समय तक मुहम्मद खलील सारे बिहार में विख्यात हो गये थे। उन्होंने असहयोग का आरम्भ होते ही एक राष्ट्रीय भजन बनाया था, जो उन दिनों बहुत प्रचलित हो गया था । वह वास्तव में बहुत सुंदर, हृदयग्राही और मर्मस्पर्शी गान था । उसका टेक था - 'भारतजननि तेरी जय, तेरी जय हो ।' उन दिनों शायद ही ऐसी कोई सभा होती जिसमें यह गीत बड़े उत्साह से न गाया जाता । जब मैंने हक साहब से कहा कि मुहम्मद खलील की कोई गलती हो तो माफ कीजिए, तो उन्होंने बहुत बहुत ही दुख के साथ मुझसे कहा - "मैं तुम्हारी बात कभी नहीं टालता, पर इस समय मजबूर हूं । तुम नहीं जानते कि खलील ने कितना बुरा काम किया है । इसीलिए तुम सिफारिश कर रहे हो । मैंने जिस चीज को अपने सारे जीवन का मुख्य उद्देश्य बना लिया है, जिसके लिए आज तक सब कुछ करता आया हूं और आज फकीर बन गया हूं, उस पर इसने ठेस लगायी है। मैंने अब तक की सारी जिंदगी में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया है। उसी में आज भी लगा हुआ हूं। आश्रम में रहकर इसने हिन्दू लड़कों के साथ ऐसा बर्ताव किया है जिससे वे लड़के, जो मुझ पर विश्वास करके प्रेमवश मेरे पास आ गये हैं, हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव समझने लगे। इसने मेरे सारे जीवन के बने-बनाये काम को बिगाड़ने का प्रयत्न किया है । इसने इस बात की कोशिश की है कि लड़कों को मुसलमान बनावे । मैं सब कुछ माफ कर सकता हूं; पर इस तरह इस्लाम के नाम पर विश्वासी लड़कों के साथ विश्वासघात करना बरदाश्त नहीं कर सकता । अब मैं जान गया हूं कि हिन्दी और संस्कृत भी इसने ढोंग के लिए पढ़ी है । एक दिन यह हिन्दू-मुस्लिम फसाद भी करा देगा। मैं इसे आश्रम में हरगिज न रहने दूंगा।" यह वही मुहम्मद खलील थे, जो कुछ दिनों बाद 'खलील दास' के नाम से विख्यात हुए। इनके संबंध में जनता समझती है कि इन्होंने कई स्थानों में हिन्दू-मुस्लिम नाइत्तफाकी का संगठन किया । इसके बहुत बुरे फल, दंगा-फसाद के रूप में, देखने में आये । इन दंगों में बहुत-से हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपनी जानें गंवायीं । जब मैंने कई बरसों के बाद इनके संबंध में इस तरह की शिकायतें सुनीं तब मुझे हक साहब की भविष्यवाणी याद आयी । उनके वे उद्गार - वे मर्म-भरे शब्द - कानों में एक बार फिर गूंज उठे । राष्ट्रीय महाविद्यालय खोल दिया गया। मैं उसका प्रिंसिपल बनाया गया। उसके अध्यापकों में श्री बदरीनाथ वर्मा जो उस समय बिहार नेशनल कालेज में अंगरेजी के प्रोफेसर थे, श्री जगन्नाथ प्रसाद एम. ए. काव्यतीर्थ - जो पटना कालेज में संस्कृत के प्रोफेसर थे, श्री प्रेमसुन्दर बोस - जो भागलपुर के टी. एन. जुबिली कालेज में फिलासफी के प्रोफेसर थे, अपने-अपने पदों से इस्तीफा देकर आ जुटे। इनके अलावा श्री जगतनारायण लाल, श्री रामचरित्र सिंह, श्री अब्दुल बारी प्रभृति भी आ गये । हमने कालेजों के उन लड़कों को, जो पढ़ना चाहते थे, पढ़ाना शुरू कर दिया । अभी प्रायः वही विषय पढ़ाये जाते जो सरकारी कालेजों में पढ़ाये जाते थे । जो रुपया चम्पारन यात्रा के समय महाविद्यालय के लिए जमा किया गया था, इसी में खर्च किया जाने लगा । उधर युनिवर्सिटी की परीक्षाओं का समय नजदीक आ रहा था। कुछ भाइयों का, विशेषकर मौलवी शफी दाऊदी का, विचार था कि हम लोगों को उन लड़कों की परीक्षा भी लेना चाहिए जो सरकारी परीक्षाओं में शरीक होना नहीं चाहते। इसलिए यह भी आवश्यक हो गया कि परीक्षाओं का संगठन किया जाये। महात्मा गांधी ने भी बिहार से जाने के समय कहा था कि बिहार में भी विद्यापीठ होना चाहिए। मेरे यह कहने पर कि हमारे पास रुपये नहीं हैं, उन्होंने कहा कि चिंता न करो, अगर काम ठीक तरह से होगा तो रुपयों की कमी न होगी। जब नागपुर कांग्रेस के बाद वह दुबारा बिहार के दौरे पर आये तो झरिया में पचास-साठ हजार रुपये जमा करके मेरे पास तार दिया कि पटने आ रहा हूं, विद्यापीठ के उद्घाटन का प्रबंध करो । उसी मकान में, जहां, हमने महाविद्यालय खोल रक्खा था, उन्होंने आकर विद्यापीठ का उद्घाटन किया। श्री मजहरुल हक साहब उसके चांसलर मुकर्रर किये गये । हमने बाजाब्ता सिनेट वगैरह भी बना लिया । हम लोग पाठ्यक्रम निर्धारित करने के काम में लग गये । यह सब देखकर सरकारी कालेज में पढ़ने वाले लड़कों में भी बहुत उत्साह उमड़ा। एक दिन पचास-साठ लड़के जलूस बनाकर, पटना कालेज और साइंस कालेज छोड़कर, सीधे पटना-गया रोड पर हमारे महाविद्यालय में आ गये। इनमें पटना युनिवर्सिटी के अच्छे-से-अच्छे विद्यार्थी भी थे । कुछ तो रह गये, जो आज सारे प्रांत में फैले हुए हैं और आज भी सूबे के प्रमुख लोगों में हैं। कुछ ने कुछ दिनों तक तो काम किया; पर जब आन्दोलन कुछ ढीला पड़ा तो फिर सरकारी कालेज में वापस चले गये। वहां से वे अच्छी तरह पास करके सरकारी नौकरी में चले गये । आज वे ऊंचे ओहदे तक पहुंचकर सरकारी काम कर रहे हैं । कुछ तो शीघ्र ही वापस चले गये और फिर अपनी पुरानी रीति से काम करने लगे । असहयोग के मुख्य चार अंग चार बहिष्कार थे - सरकारी उपाधियों और खिताबों को छोड़ देना, सरकारी शिक्षा संस्थाओं से संबंध विच्छेद, जिसका अर्थ था कि न उनमें खुद शिक्षा ग्रहण करना और न अपने बाल-बच्चों को वहां शिक्षा पाने देना, कौंसिल में न जाना और उनसे किसी प्रकार का लाभ न उठाना, सरकारी अदालतों से संबंध छोड़ना अर्थात उनमें न मुकदमे दायर करना और न उनमें वकालत या मुखतारकारी या नौकरी करना । आशा की जाती थी कि हममें से प्रत्येक इन चारों बहिष्कारों को, जहां तक जो उससे संबंध रखता हो, पूरा करेगा। मुझे तो कोई खिताब या उपाधि नहीं मिली थी; पर मेरे भाई साहब को कोआपरेटिव सोसाइटी कायम करने और उनमें दिलचस्पी लेने के लिए 'रायसाहब' का खिताब मिला था। मैंने उनसे कभी खिताब छोड़ने के लिए नहीं कहा, पर उन्होंने खुद ही नागपुर कांग्रेस के कुछ बाद उसे वापस कर दिया। इसका संयोग इस तरह के घटा एक गश्ती चिट्ठी निकाली जिसमें उन्होंने कहा कि म्युनिसिपैलिटी और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड भी एक प्रकार से सरकार के अंग हैं; इसलिए उनके सदस्य और कर्मचारी किसी तरह असहयोग में भाग नहीं ले सकते । इससे लोगों में और भी रोष पैदा हुआ। मेरे भाई उस समय छपरा म्युनिसिपैलिटी के वाइस चेयरमैन और ऑनरेरी मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने अपने खिताब को वापस कर दिया । मजिस्ट्रेटी से भी इस्तीफा दे दिया। साथ ही उन्होंने यह भी साफ कह दिया कि वह जनता द्वारा चुने गये हैं, इसलिए वह वाइस चेयरमैनी से नहीं हटेंगे - अपना वह काम करते रहेंगे । भाई साहब के लड़के जनार्दन ने हाल ही में मैट्रिक पास करके हिन्दू युनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग कालेज में नाम लिखाया था। मेरे दो लड़कों में मृत्युंजय, जो हाल ही कालाआजार से बचकर अब अच्छा हो गया था, मैट्रिक में पढ़ता था; पर उमर कम होने के कारण युनिवर्सिटी के नियमानुसार परीक्षा में बैठने से रोक लिया गया था । दूसरा लड़का धनंजय स्कूल के किसी निचले दर्जे में पढ़ता था। तीनों लड़के कालेज और स्कूल से हटा लिये गये। तीनों में कोई भी फिर सरकारी स्कूल या कालेज में नहीं गया । जनार्दन कीर्त्यानन्द आयरन स्टील वर्क्स के लोहे के कारखाने में कुछ दिनों के बाद काम सीखने लगा । वहां एक-डेढ़ साल काम सीखने के बाद वह विलायत चला गया । उसको विदेश में लोहे का काम सीखने के लिए एक छात्रवृत्ति मिल गयी । उसी से वह अपना सब काम चला लेता, घर से भाई साहब को थोड़ा ही बहुत खर्च करना पड़ा । मृत्युंजय बिहार विद्यापीठ में पढ़ने लगा और वहां का स्नातक हुआ। छपरे में राष्ट्रीय स्कूल जब तक चलता रहा, धन्नू पढ़ता रहा। उसके बाद उसने घर ही पर जो कुछ शिक्षा मिल सकी, प्राप्त की। मैं ऊपर कह चुका हूं कि मैंने किस तरह युनिवर्सिटी से संबंध-विच्छेद कर लिया था । वकालत मैंने छोड़ ही दी थी । इस तरह ईश्वर की दया से हम लोगों ने अपने शरीर से और व्यक्तिगत रूप से असहयोग का कार्यक्रम यथासाध्य पूरा किया। उस समय तक बिहार में कांग्रेस का संगठन नहीं के बराबर था। प्रांतीय कांग्रेस कमिटी थी । उसके मंत्री नवाब सरफराज हुसेन खां थे । मैं भी उनका सहायक था । इसी तरह जिलों में भी कहीं-कहीं किसी जिला कमिटी का कोई मंत्री था । पर उन दिनों बाजाब्ता मेम्बर बनने की प्रथा न थी । जो चाहता था अपने को मेम्बर समझ लेता था । प्रतिनिधियों का चुनाव भी बाजाब्ता नहीं हुआ करता था। जो कांग्रेस के जलसे के समय पहुंच जाते थे, प्रतिनिधि बन जाते थे। जिले या प्रांत के नामधारी मंत्री उनको प्रमाण पत्र दे देते थे । वे दस रुपयापये फीस दाखिल करके प्रतिनिधि हो जाते थे। ऐसे ही प्रतिनिधि कांग्रेस के सालाना जलसे के समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के मेम्बर चुन देते । उस चुनाव में अधिक होड़ नहीं होती थी । अक्सर प्रांत के कुछ प्रमुख लोग, जो कांग्रेस में दिलचस्पी लिया करते थे, चुन दिये जाते थे । अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के नियमानुसार बिहार प्रांत को उसे एक हज़ार पाँच सौ रुपयापये वार्षिक चंदा देना पड़ता था । एक प्रकार से यह बात मान ली गयी थी कि जो लोग एक सौ रुपयापये देंगे, वे ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के मेम्बर चुने जायेंगे। इसलिए, बहुतेरे ऐसे लोग, जो यह शर्त पूरी नहीं कर सकते थे, कभी उमीदवार होने की हिम्मत नहीं करते थे । इससे यह न समझना चाहिए कि सभी चुने गये सदस्य यह एक सौ रुपयापये अदा कर देते थे। उन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के मंत्री थे राजमहेन्द्री के सुविख्यात कांग्रेस-कर्मी श्री सुब्बाराव पांतलु । मुझे याद है कि वह अक्सर पटने में यह चंदा जमा करते । तो भी यह हर साल अदा नहीं होता ! एक हज़ार नौ सौ बीस में कई हजार रुपये बिहार के नाम पर बाकी पड़े थे ! नागपुर कांग्रेस ने कांग्रेस की नियमावली बदल दी । उसने सभी जगहों में कांग्रेस का मेम्बर बनाना अनिवार्य कर दिया। प्रत्येक सूबे को उसकी आबादी के प्रति लाख पर एक प्रतिनिधि चुनने का ही अधिकार दिया। इस प्रकार प्रतिनिधियों की संख्या परिमित हो गयी । उसने यह भी अनिवार्य कर दिया कि प्रतिनिधियों का चुनाव केवल कांग्रेस के मेम्बर ही कर सकते हैं। वह भी किसी कांग्रेस कमिटी की बाजाब्ता बैठक में ही । चुने हुए प्रतिनिधियों की सूची अधिवेशन के कई दिन पहले ही अखिल भारतीय कमिटी के दफ्तर में पहुंच जानी चाहिए। उस सूची में जिनके नाम दिये गये होते थे उन्हें छोड़, बिना विशेष कारण के, कोई दूसरा प्रतिनिधि नहीं हो सकता था। सूची के नामों में हेरफेर तभी हो सकता था, जब कोई चुना हुआ प्रतिनिधि इस्तीफा दे देता और उसकी खाली जगह पर कोई नया चुनाव हो जाता । इसका प्रमाण प्रांतीय मंत्री को देना होता । इन नियमों के कारण अब कांग्रेस के चुनाव में काफी सख्ती आ जाने वाली थी, अब पुरानी नीति चलने वाली न थी । इसलिए नये सिरे से संगठन करके बाजाब्ता चुनाव कर लेना आवश्यक हो गया था । कांग्रेस ने इसके लिए समय भी निर्धारित कर दिया था । प्रांतीय कमिटी को नये नियमों के अनुसार अपने नियम भी बना लेने का अधिकार दिया गया था। इसलिए सोचा गया कि जब तक नया संगठन न हो जाये, एक छोटी कमिटी बना दी जाये, जो सब काम करेगी। पुराने बहुतेरे कांग्रेसी नेता अब कांग्रेस से अलग हो गये थे । कुछ तो कांग्रेस के सिद्धांत बदलने के कारण और कुछ वे, जिनको सिद्धांत अगर मंजूर भी था तो असहयोग के कार्यक्रम से विरोध था । इसलिए भी पुनःसंगठन आवश्यक था। इस कमिटी का मंत्री मैं बनाया गया। सभापति हुए मौलाना मजहरुल हक साहब। इसको पुनस्संघटन समिति का नाम दिया गया । कमिटी ने अपना काम बड़े उत्साह के साथ आरम्भ किया। हम जहां जाते, कांग्रेस के मेम्बर बनाने की बात करते और असहयोग का प्रचार तो करते ही । बहुतेरे वकील, मुखतार और विद्यार्थी - जिन्होंने अपने-अपने काम छोड़ दिये थे - सारे प्रांत में फैल गये । वे सभी जगहों में कांग्रेस का संदेश पहुंचाने लगे । प्रायः सभी जिलों में राष्ट्रीय पाठशालाएं खुल गयीं; कुछ तो मैट्रिक कक्षा तक के लिए और कुछ नीचे के दर्जे तक । सबका संबंध बिहार विद्यापीठ के साथ हो गया। मैं समझता हूं कि मैट्रिक पाठशालाओं की संख्या पचास के लगभग होगी और प्राइमरी शालाएं प्रायः दो-ढाई सौ । सब पाठशालाओं में, जो बिहार विद्यापीठ से सम्बद्ध थीं, बीस से पच्चीस हजार तक विद्यार्थी शिक्षा पाने लगे। बहुतेरे लोग, जिन्होंने दूसरा काम छोड़ा था, इन पाठशालाओं में शिक्षक बन उन दिनों प्रांत-भर में अनगिनत सभाएं हुई होंगी। किसी भी जिले का शायद ही कोई हिस्सा बचा होगा जहां कार्यकर्ता न पहुंचे हों और जहां सभा करके कांग्रेस का कार्यक्रम और संदेश लोगों को न बताया गया हो । मैंने सारे सूबे का चक्कर लगाया । एक हज़ार नौ सौ इक्कीस में ही पहले-पहल सारे सूबे का परिचय हुआ। असंख्य कार्यकर्ताओं से जान-पहचान भी हो गयी । मैं वकालत तो किया करता था, पर बड़ी सभाओं में बहुत बोलने का अभ्यास नहीं था, लड़कपन से ही सभाओं में भाग लिया करता था । असहयोग के प्रचार में असंख्य सभाओं में भाषण करने पड़े । नतीजा यह हुआ कि सभाओं में बोलते समय जो थोड़ा संकोच हुआ करता था, वह निकल गया। मैं अब धड़ल्ले से भाषण कर सकता था । जिन जिलों में लोग भोजपुरी बोला करते हैं उनमें जाता तो भोजपुरी में ही भाषण करता। दूसरी जगहों में शुद्ध हिन्दी में । मुझे स्मरण नहीं है कि पुरूलिया में मैंने उस साल भाषण किया या नहीं, यद्यपि यह याद है कि पुरूलिया में मैंने कभी बंग्ला में भी भाषण किया है। सभाएं भी कुछ छोटी-मोटी नहीं होती थीं। पांच-दस हजार का जमाव होना तो कोई बड़ी बात नहीं थी। दस हजार लोगों की सभा में आसानी से मैं सब लोगों तक अपनी आवाज पहुंचा सकता था । उससे अधिक संख्या होने पर परिश्रम पड़ता था । मेरा अनुमान है कि पंद्रह हजार तक की सभा में यदि लोग शांत रहते तो मैं अपनी आवाज पहुंचा सकता, पर बहुत अधिक परिश्रम पड़ता और पेट में दर्द हो जाता । मुझे यह भी याद है कि बीस-पचीस हजार के मजमे में भी मैंने उस साल में भाषण किये थे । एक सभा छपरा जिले में हथुआ में हुई थी । वहां न मालूम किस तरह खबर उड़ गयी थी कि सभा में महात्मा गांधी आने वाले हैं। इसलिए वहां प्रायः पचास हजार का जमाव हो गया । हजार कोशिश करने पर भी सभा ठीक नहीं जम सकी । यद्यपि मैने अपनी पूरी शक्ति-भर जोर लगाकर एक छोटा-सा भाषण किया, तथापि मुझे शक है कि थोड़े ही लोगों ने उसे सुना या समझा । मैं भाषण करते समय देखा करता था कि सभा में उपस्थित लोगों पर उसका कैसा प्रभाव पड़ रहा है। जहां अच्छा प्रभाव पड़ता नजर आता और जनता सुनने के लिए उत्सुक और समझदार मालूम पड़ती वहां का भाषण भी, मैं खुद समझ सकता था कि, अच्छा हो जाया करता था। जहां ये बातें नहीं होतीं वहां भाषण भी ऐसा-वैसा ही होता । भाषण भी कुछ छोटे नहीं होते । कांग्रेस का इतिहास, खिलाफत आन्दोलन और पंजाब संबंधी जुल्म तथा स्वराज्य की आवश्यकता के अलावा असहयोग का कार्यक्रम में सभी सभाओं में बहुत विस्तार के साथ बताता । इसमें प्रायः एक-डेढ़ घंटा लग जाता । जहां दस हजार तक का जमाव होता वहां तो पूरे विस्तार के साथ डेढ़ घंटे या इससे अधिक देर तक भी बोल लेता । जहां इससे अधिक जनता एकत्र होती वहां कुछ संक्षेप करना पड़ता । बीस हजार से अधिक लोगों की सभा में आध घंटे से ज्यादा नहीं बोल सकता था । इस तरह मैं सारे सूबे में दौरा करता रहा। दूसरे साथी भी यही कर रहे थे । असहयोग आन्दोलन में सभी नेता शरीक नहीं हुए। कांग्रेस के पुराने और वयोवृद्ध नेताओं ने, जो असहयोग में शरीक नहीं हुए, एक दूसरी संस्था 'बिहार प्रांतीय लीग' के नाम से कायम की। देश के नरम दल के समाचारपत्रों में इसकी चर्चा बहुत चली; पर यह संस्था कुछ कर न सकी । इसके संबंध में पीछे कुछ सुनने में नहीं आया। हमारे सूबे में एक बात की खूबी थी । मतभेद होते हुए भी आपस में संघर्ष नहीं हुआ। हम लोगों का आपस का व्यवहार भी ज्यों का त्यों बना रहा । पर इतने लोगों के अलग हो जाने के कारण, विशेष करके नागपुर में कांग्रेस की नियमावली और उसके विधान में बहुत अदल-बदल हो जाने के कारण, कांग्रेस कमिटियों का पुनःसंगठन आवश्यक हो गया । यह संगठन कई महीनों में जाकर पूरा हुआ । जून के अंत तक जिला कमिटियां बाजाब्ता बनकर प्रांतीय कमिटी का चुनाव कर सकीं । तब फिर अखिल भारतीय कमिटी के नये सदस्य चुने गये । कांग्रेस के पुनःसंगठन के प्रश्न के साथ-साथ कुछ और भी प्रश्न उपस्थित हो गये । समाचारपत्रों के लिए बिहार अच्छा सूबा नहीं है। पहले बहुत परिश्रम और त्याग से बिहार टाइम्स' और 'बिहारी' निकाले गये थे; पर आर्थिक कठिनाइयों के कारण दोनों बंद हो चुके थे। 'बिहार टाइम्स' के जन्मदाता और मुख्य कार्यकर्ता बाबू महेशनारायण थे । उन्होंने उसे अपनी जिंदगी में चलाया था। श्री सच्चिदानन्द सिंह की भी अखबार-नवीसी में बहुत दिलचस्पी रही है। इन्होंने अपने निजी 'हिन्दुस्तान रिव्यू के अलावा इन अखबारों की भी धन और कलम से पूरी सहायता की थी । 'बिहारी' को बनैली राज से बहुत मदद मिली थी । एक प्रकार से वही उसके बंद होने का कारण भी हुआ। दूसरा अखबार हथुआ के महाराजा की ओर से 'एक्सप्रेस' नाम से निकलता था । घाटे पर बहुत दिनों तक चलकर वह भी बंद हो गया। एक हज़ार नौ सौ अट्ठारह में पटने के सभी नेताओं ने विशेष करके श्री सच्चिदानन्द सिंह और श्री हसन इमाम ने, एक अखबार की जरूरत बहुत महसूस करके निश्चय किया कि एक पत्र निकाला जाये । उसका नाम श्री सिंह के कहने के अनुसार 'सर्चलाइट' रख दिया गया । वह सप्ताह में दो बार निकला करता था । उसके डाइरेक्टरों में श्री सिंह, श्री हसन इमाम प्रभृति थे । नये लोगों में श्री ब्रजकिशोर प्रसाद थे और मैं भी था । आन्दोलन आरम्भ होने पर 'सर्चलाइट' के सामने यह प्रश्न आया कि वह असहयोग का समर्थन करे या नहीं? पैसा खर्च करने वालों में मुख्य श्री हसन इमाम और श्री सिंह थे । वे असहयोग के पक्षपाती नहीं थे। इधर सारे सूबे में असहयोग की लहर इस तरह उमड़ रही थी कि उसके खिलाफ जाने का अर्थ था 'सर्चलाइट' का हमेशा के लिए लोकप्रियता खो देना । इसके अलावा डाइरेक्टरों में भी हम लोग थे जो असहयोग में शरीक थे। उसके सम्पादक श्री मुरलीमनोहर प्रसाद भी असहयोग के पूरे पक्षपाती थे। ऐसी अवस्था में, आपस के इस मतभेद के कारण, नीति निर्धारित कर देना आवश्यक हो गया । एक हज़ार नौ सौ बीस से, सर्चलाइट प्रेस से ही, हिन्दी साप्ताहिक 'देश' भी निकला करता था, जिसका नाम-निहादी सम्पादक मैं समझा जाता था । असहयोग ने राजनीति को, अंगरेजी-पढ़े कुछ वकील-बैरिस्टरों और बड़े-बड़े व्यापारियों के अंगरेजी तरीके से सजे कमरों से बाहर निकालकर, गांवों के बरगदों के साये के नीचे और गांवों के खेत-खलिहानों तक पहुंचा दिया था । वहां अंगरेजी का गुजर नहीं था । जो जनता तक पहुंचना चाहता था उसे देशी भाषा की शरण लेनी पड़ती थी । इसलिए हम लोगों ने सोचा कि 'सर्चलाइट' से ज्यादा उपयोगी 'देश' होगा । हमने श्री हसन इमाम और श्री सिंह से सर्चलाइट' और 'देश' के संबंध में यह समझौता कर लिया कि 'सर्चलाइट' अपने सम्पादकीय लेखों में असहयोग का न तो विरोध करेगा और न समर्थन । पर दूसरों के लेख, लेखक के नाम के साथ, चाहे वे पक्ष में हों अथवा विपक्ष में, छाप सकेगा। 'देश' हम लोगों का पत्र हो जायेगा । अब से उसका घाटा और नफा हम लोगों का होगा। उसकी नीति हम जैसी चाहेंगे वैसी ही होगी; पर वह सर्चलाइट प्रेस में छपाई देकर छपा करेगा । इस तरह एक हिन्दी साप्ताहिक हमारे हाथ में आ गया । अंगरेजी 'सर्चलाइट' भी अगर सहायक नहीं तो विरोधी भी न रहा । हम यह भी समझते थे कि हम लोग उसमें लेख लिखा करेंगे। पर यह आशा पूरी नहीं हुई; क्योंकि आन्दोलन में इतना काम बढ़ गया कि लेख लिखने का समय ही न मिला । 'देश' ने प्रचार कार्य में बहुत सहायता पहुंचायी । ग्राहकों की संख्या भी बहुत बढ़ गयी । विज्ञापन भी बहुत मिलने लगे । हम लोग तो आन्दोलन में लगे थे । 'देश' के प्रबंध पर ध्यान नहीं दे सके। जैसे-जैसे ग्राहकों की संख्या बढ़ती गयी, प्रबंधक की गलती से घाटे की मात्रा भी वैसे ही बढ़ती गयी । कुछ दिनों के बाद जब हमने हिसाब देखा तो मालूम हुआ कि विज्ञापन की दर इतनी कम कर दी गयी थी कि उसमें जितना खर्च पड़ता था उतना भी विज्ञापनों से नहीं मिलता था । इसलिए जैसे-जैसे बिकने वाली प्रतियों की संख्या बढ़ी, घाटा भी बढ़ता गया। हमने यह देखा कि बहुतेरों के माल का प्रचार हम अपने खर्च से सारे प्रांत में जोरों से कर रहे थे; पर यह ज्ञान बहुत नुकसान उठा लेने के बाद हुआ । इस प्रकार उस समय 'देश' पर जो बोझ पड़ा, वह उसके गले में हमेशा के लिए एक भारी पत्थर-सा बंध गया । जन-आन्दोलन कुछ दिनों के बाद ढीला पड़ा । 'देश' की बिक्री भी कुछ कम हो गयी । अंत में आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसे बंद कर देना पड़ा। जितने दिनों तक आन्दोलन का जोर रहा,वह खूब काम करता रहा और बहुत लोकप्रिय भी हो गया था। 'सर्चलाइट' निर्धारित नीति पर चल रहा था। कुछ दिनों के बाद श्री हसन इमाम और श्री सिंह उससे अलग हो गये । वह हम लोगों के अधिकार में पूरी तरह से आ गया। यहां हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि उन दोनों ने यद्यपि पैसे और परिश्रम से इसे शुरू में बहुत सहायता पहुंची थी, तथापि उसे बड़ी उदारता से हम लोगों के हाथों में आने दिया। जबसे यह स्थिति हो गयी, 'सर्चलाइट' पूरा-पूरा कांग्रेसी पत्र हो गया। उसके सम्पादक श्री मुरलीमनोहर प्रसाद के मिजाज के अनुकूल यही था । जब एक हज़ार नौ सौ तीस-चौंतीस का सत्याग्रह चला और कांग्रेस की आज्ञा निकली कि जो समाचारपत्र स्वतंत्रतापूर्वक सच्ची घटनाएं न छाप सकें और अपने स्वतंत्र विचार न प्रकट कर सकें, वे सरकारी हुक्म मानने के बजाय अपना प्रकाशन ही बंद कर दें, तो 'सर्चलाइट' उन बहुत ही अल्प संख्यक पत्रों में से एक था जिसने कांग्रेस की आज्ञा का पूरी तरह से पालन किया । यह सब होते हुए भी 'सर्चलाइट' कभी आर्थिक कठिनाइयों से मुक्त नहीं हुआ। अंत में हम लोगों को उसका स्वत्व श्री बिड़ला ब्रदर्स को इस शर्त पर दे देना पड़ा कि उसकी आर्थिक व्यवस्था वह करेंगे; पर उसकी सम्पादकीय नीति में हम लोगों का ही अधिकार रहेगा। यह निश्चय एक हज़ार नौ सौ इकतालीस के अंत में हुआ । तब से बिड़ला बंधु बहुत कुछ खर्च कर चुके हैं। अभी वह अर्थ संकट से बाहर हो ही रहा था कि एक हज़ार नौ सौ बयालीस के आन्दोलन में सरकार ने उसे बंद कर देने का हुक्म निकाल दिया। सम्पादक भी हम लोगों के साथ नजरबंद कर दिये गये। जहां आज मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूं, वह भी साथ हैं । ऊपर कहा जा चुका है कि कांग्रेस का सालाना जलसा एक हज़ार नौ सौ बीस के दिसम्बर में नागपुर में हुआ था । मैं इस अधिवेशन में भी अपनी अस्वस्थता के कारण शरीक न हो सका था; पर सुना कि अधिवेशन में इतने प्रतिनिधि आये थे जितने शायद कभी किसी अधिवेशन में नहीं आये । इसका एक कारण भी था - कुछ लोग समझते थे कि असहयोग संबंधी प्रस्ताव पर नागपुर में फिर विचार किया जायेगा । अतः दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने पक्ष को बल पहुंचाने के लिए अधिक-से-अधिक संख्या में वहां आये थे। पर दोनों पक्षों में समझौता हो गया । अंत में कुछ हेर-फेर के साथ असहयोग का निश्चय कायम रह गया। इस प्रस्ताव के द्वारा देश को क्रमशः असहयोग का आदेश दिया गया। सरकारी खिताबों को छोड़ना, कौंसिल से अलग रहना, जो कांग्रेस के निश्चय के विरुद्ध कौंसिल में गये हैं उनसे किसी प्रकार की सेवा न लेना, गवर्नमेंट से सम्बद्ध शिक्षालयों से अलग रहना और अदालतों का बहिष्कार - आरम्भ में यही मुख्य कार्यक्रम था। फिर क्रमशः सरकारी नौकरी छोड़ना और कर-बंदी का आदेश मिलने पर उसे भी करने का निश्चय हुआ। साथ ही, शिक्षा के लिए गैर-सरकारी राष्ट्रीय शिक्षालयों की स्थापना, आपस के झगड़ों को सुलझाने के लिए पंचायत की स्थापना, चर्खा-प्रचार और विदेशी वस्त्र - बहिष्कार - ये आवश्यक बतलाये गये थे ! हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य और अहिंसा पर भी जोर दिया गया था । नागपुर के निश्चय के बाद वे सभी लोग, जो पहले कुछ दुविधा में थे, अब दृढ़ होकर असहयोग में लग गये । महात्माजी ने यह भी कह दिया कि कांग्रेस के कार्यक्रम को यदि लोग पूरा कर दें, तो स्वराज एक बरस के भीतर ही हो जायेगा। लोगों ने एक बरस की बात मन में घर ली । शर्तों को पूरा करने के प्रयत्न में जी-जान से सब लग गये। ऊपर कही हुई सभाओं में प्रचार का यही मुख्य उद्देश्य था । ऊपर कहा जा चुका है कि सारे सूबे में असंख्य कार्यकर्ता काम करने लगे और स्वराज्य तथा असहयोग का संदेश गांव-गांव में पहुंचाने लगे। थोड़े ही दिनों में अद्भुत जागृति देखने में आने लगी। सरकार भी अपनी ओर से चुप न रही । वह देखती थी कि इस प्रचार का फल यह हो रहा है कि जनता में उसका रोब एकबारगी उठता जा रहा है, लोग निर्भीक होते जा रहे हैं। हम भी कांग्रेस की ओर से इस बात का पूरा ख्याल रखते थे कि उत्साह में जनता की ओर से कहीं ज्यादती न हो जाये । इसलिए नागपुर के बाद प्रांतीय कमिटी ने जो आदेश निकाला उसमें शांति और अहिंसा पर पूरा जोर दिया गया - साफ-साफ कहा गया कि किसी के साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती न की जाये । हम समझते थे, और कार्यकर्ताओं को भी यही समझाने का प्रयत्न किया गया, कि हम बल प्रयोग में सरकार से हार जायेंगे; क्योंकि उसके पास साधन हैं, हमारे पास नहीं । इसके अलावा असहयोग की मुख्य शर्त अहिंसा है। उसके द्वारा जनता को भी हम अपनी ओर खींच सकते हैं । यदि हमारी ओर से जोर-जबरदस्ती हुई तो इसका नतीजा उल्टा होगा, हमें एक दिन पछताना पड़ेगा। इसलिए जहां कहीं भाषण किया जाता, इस पर जोर दिया जाता । जो पर्चा निकाला जाता उसमें भी इसी पर जोर दिया जाता। गवर्नमेंट इसकी खोज में रहती कि कहीं भी कुछ अशांति हो तो धर दबाया जाये । उसे इसका मौका ही न मिलता ! मुजफ्फरपुर जिले में महंगी के कारण कई जगहों में हाटों की लूट हो गयी। दरभंगा जिले और चम्पारन जिले में भी एकाध जगह ऐसा ही हुआ । सरकार को वह बहाना मिल गया जो वह खोज रही थी। हम लोग शराब बंदी का भी प्रचार किया करते थे। इसका असर भी काफी पड़ रहा था। आबकारी की दूकानों का ठेका मार्च के महीने में दिया जाता है। बिक्री कम होती जा रही थी। सरकार को डर हो गया कि आमदनी का यह एक बड़ा जरिया खतरे में पड़ गया। इन दोनों बातों को लेकर दमन जारी हो गया। दमन मुजफ्फरपुर जिले से ही आरम्भ हुआ। और जिलों में भी जल्द ही फैल गया। चम्पारन में लौरिया कांड के समय से ही कुछ दमन चल रहा था । वहां अब और भी जोर लगाया जाने लगा । दमन का आरम्भिक रूप यह हुआ कि क़ार्यकर्ताओं पर,दफा एक सौ सात जाब्ता फौजदारी के अनुसार, मुचलका देने के मुकदमे चलाये गये । दफा एक सौ चौंतालीस जाब्ता फौजदारी के अनुसार कार्यकर्ताओं को सभा में भाषण करने और जलूस वगैरह में शरीक होने से मना किया गया। इतने दिनों के बाद यह कहना तो मुश्किल है कि कितने आदमियों पर इस तरह के मुकदमे चलाये गये; परं इतना निश्चय ही कहा जा सकता है कि लोगों ने जमानत नहीं दी । जिन पर मुकदमा चलाया जाता वे जेल चले जाते । हां, मुकदमे में जहां-तहां लोगों ने पैरवी की। कहीं-कहीं मुकदमा अंत में खारिज करना पड़ा; क्योंकि कोई सबूत न मिला । बात तो यह थी कि सभा करने के सिवा, जिसमें असहयोग का कार्यक्रम समझाया जाता, हमारे आदमी दूसरा कोई काम कर भी नहीं रहे थे। जो हाट-लूट की लहर चली थी उसके रोकने में हमारे आदमियों ने बहुत मदद की थी। जहां कहीं से खबर आ गयी, वहां दौड़कर पहुंच जाते और जनता को समझा-बुझाकर संभाल लेते । लुटेरों से मुकाबला करने के लिए जनता को तैयार भी कर देते। पर सरकार तो आन्दोलन को रोकना चाहती थी । इसलिए उसने लुटेरों के बदले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को ही अधिक जरूरी और मुनासिब समझा। थोड़े ही दिनों में सैकड़ों कार्यकर्ता इस प्रकार के मुकदमों के शिकार हो गये। प्रांतीय सरकार के प्रधान सेक्रेटरी मिस्टर टेनी ने एक सर्कुलर निकाला जिसमें जिले के अधिकारियों को प्रोत्साहन दिया गया कि वे आन्दोलन को दबावें । स्वायत्तशासन विभाग के मंत्री मिस्टर हैलेट ने दूसरा सर्कुलर निकाला जिसमें बताया गया कि म्युनिसिपैलिटियां और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड सरकार के अंग हैं, अतः उनके सदस्यों और कर्मचारियों को असहयोग में भाग लेना नहीं चाहिए। 'हांके भीम होंहि चौगूना' - जिले के अधिकारी तो यह चाहते ही थे । उन्होंने एक सौ सात और एक सौ चौंतालीस की नोटिसों की झड़ी लगा दी । सैकड़ों आदमी गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये । मैं मजहरुल हक साहब के साथ आरा जाने वाला था । हक साहब किसी कारण से वहां न जा सके। मैं अकेला ही गया । आरा स्टेशन पर उतरते ही मुझे एक सौ चौंतालीस की नोटिस मिली कि नौ बजे से पाँच बजे तक किसी जलूस और सभा में शहर के अंदर मैं शरीक नहीं हो सकता । मेरे सामने एक संकट आकर उपस्थित हो गया। नोटिस भी पुरमजाक थी। उन दिनों मैट्रिक परीक्षा हो रही थी । आरा भी उसका एक केंद्र था। नोटिस में मनाही का कारण बतलाया गया था कि जलूस और सभा से परीक्षार्थियों के काम में हर्ज होगा और वे रुष्ट होंगे। नागपुर कांग्रेस ने निश्चय किया था कि अखिल भारतीय कमिटी की आज्ञा जब तक न हो, सत्याग्रह न किया जाये । जब इस प्रकार की कार्रवाई सरकार की ओर से होने लगी अथवा इसकी सम्भावना मालूम हुई, तो हमने प्रांतीय कमिटी की ओर से आदेश निकाल दिया था कि इस तरह के हुक्मों को मान लेना चाहिए; क्योंकि कांग्रेस ने अभी तक सत्याग्रह का आदेश नहीं दिया है। हां, जहां कहीं आत्म-प्रतिष्ठा की बात आ जाये, वहां दूसरी बात है। मैंने नोटिस पाकर निश्चय किया कि मुझे इसे मान लेना चाहिए । इसलिए स्टेशन से मैं शहर के अंदर नहीं गया । मैं प्रायः दोपहर को पहुंचा था। स्टेशन से, म्युनिसिपैलिटी के बाहर, नजदीक के ही एक गांव में चला गया। वहां पर दोपहर के समय ठहर गया। वहीं एक बड़ी सभा हो गयी, जिसमें देहात के अलावा शहर के भी काफी लोग आ गये ! फिर शाम को पाँच बजे के बाद शहर में गया। वहां भी एक बड़ी सभा हो गयी जहां मैंने अपने कार्यक्रम को पूरा किया। इस तरह इस नोटिस का नतीजा यह हुआ कि एक सभा के बदले दो सभाएं ही गयीं। जनता का उत्साह भी बहुत बढ़ गया । मैं भभुआ जाने वाला था । वहां भी हमारे जाने के पहले ही कुछ मनाही की नोटिस निकल गयी। मैं वहां गया तो जरूर था; पर याद नहीं है के नोटिस का क्या हुआ । उस समय प्रांतीय कौंसिल की बैठक हो रही थी । जो लोग कौंसिल में शरीक हुए थे वे कांग्रेस के आदेश के विरुद्ध वहां गये थे। पर सरकारी सर्कुलरों को लेकर और मुझ पर जो नोटिस निकली थी उसे लेकर उन्होंने वहां बहस छेड़ दी। साथ ही, जो आम तौर पर दमन बल रहा था, उसकी भी कड़ी समालोचना हुई । अखबारों में इन सब बातों के छपने पर सूबे के बाहर के पत्रों ने भी बिहार सरकार की कार्रवाइयों - विशेष करके उसके सर्कुलरों और दमन - नीति - की कड़ी समालोचना की । बात बहुत बढ़ गयी । मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी सबडिवीजन के सबडिवीजनल अफसर मिस्टर ली, जिन्होंने इस तरह की कार्रवाइयों से बहुत ख्याति पायी थी, कुछ दिनों के बाद वहां से बदल दिये गये । मालूम नहीं कि इस देशव्यापी आन्दोलन के कारण उनकी बदली हुई अथवा और किसी कारण से; पर लोगों में यह धारणा हुई कि आन्दोलन ही उनकी बदली का कारण था । शराब बंदी के कारण कहीं-कहीं सरकारी अफसरों ने धांधली मचायी । हजारीबाग जिले के 'चतरा' में खेतों में शराब बिकने लगी। जनता में शराब का प्रचार तो बहुतेरे अफसर कर ही रहे थे । कहीं-कहीं कार्यकर्ता और स्वयंसेवकों पर शराब बंदी में भाग लेने के कारण मुकदमे भी चलाये गये । हमारे कार्यक्रम में पंचायत कायम करना भी एक मुख्य कार्य था । बहुत जगहों में पंचायतें कायम हुईं । बहुतेरे मुकदमे फैसल होने लगे । कहीं-कहीं लोगों ने पंचायती फैसले को मनवाने के लिए जातीय बहिष्कार का सहारा लिया। हमने इसे प्रांतीय कमिटी की ओर से रोका, तो भी जहां-तहां कुछ हो ही गया। एक जगह तो पंचायत का इतना रोब हो गया था कि वह सरकारी अदालतों की तरह काम कर रही थी । लोग बाजाब्ता मुकदमे दायर करने और उन्हें फैसल कराने के लिए फीस देते थे । अधिकांश फैसले लोग मान लेते थे; पर कहीं-कहीं दिक्कत पैदा होती । एक कमजोरी यह हुई कि पुराने-पुराने सड़े-गले मुकदमे भी कुछ लोग पंचायत में लाने लगे, जिसका नतीजा यह होता कि पंचायत अगर बहुत पुराना कहकर उसे न सुने तो उसकी शिकायत हो कि यह भी सरकारी अदालत की तरह इंसाफ न देखकर तमादी की बात करती है और यदि फैसला करना चाहे तो उसके फैसले को मनवाने का साधन नहीं था । पंचायत को ही लेकर गिरिडीह में एक बड़ा वाकया हो गया। वहां पंचायत का फैसला न मानने के कारण एक आदमी का बहिष्कार किया गया । बहिष्कृत आदमी को कुएं से पानी नहीं भरने दिया गया। उसका घड़ा तोड़ दिया गया। पुलिस ने घड़ा तोड़ने वाले को गिरफ्तार किया। उसके साथ बहुत लोग थाने तक आये । वहां तथा जेल के सामने वाकया हो गया। पुलिस का कहना था कि जनता ने ढेले फेंके और पुलिस पर हमला किया । दारोगा ने अपनी पिस्तौल से गोली चलायी । बहुत लोग घायल हुए । जेल और थाने का कुछ नुकसान हुआ । कुछ लोगों पर मुकदमे चलाये गये । इसकी खबर पाते ही डाक्टर महमूद के साथ मैं वहां गया। लोग शांत किये गये । मुकदमे में शहर के बहुतेरे धनी लोग फांस लिये गये थे । ऐसे लोगों में से कुछ ने तो माफी मांग ली; पर दूसरों पर मुकदमे चले । अंत में क्या हुआ, मुझे याद नहीं है । थोड़े ही दिनों बाद, मार्च एक हज़ार नौ सौ इक्कीस में, बेजवाड़ा में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक हुई । वहां निश्चय हुआ कि लोकमान्य तिलक के स्मारक के रूप में एक करोड़ रुपये स्वराज्य के काम के लिए, तिलक स्वराज फंड के नाम से, तीस जून तक जमा कर लिये जायें बीस लाख चर्खे जारी हो जायें और कांग्रेस के एक करोड़ मेम्बर बना लिये जायें। बेजवाड़ा पहुंचने के पहले महात्माजी दौरा कर रहे थे। मैं कलकत्ते से ही महात्माजी के साथ उड़ीसा गया। वहां उन दिनों अकाल था। महात्माजी को इसकी खबर पहले से थी । उन्होंने कुछ मदद भी करायी थी । अकाल पीड़ितों को महात्माजी के आगमन की खबर मिली थी । बहुतेरे दूर-दूर से आये थे । महात्माजी ने उनके अस्थि-पंजरों को देखा । वह बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने एक लेख में उड़ीसा के नंगे-भूखे कंकालों का जबरदस्त जिक्र किया । मैंने कई बार उन गरीबों की याद करके उन्हें आह भरते भी देखा है। एक बड़े मकान में वह ठहराये गये थे । एक ओर श्री जगन्नाथजी का विशाल मंदिर, पंडों और धनी-मानी लोगों का सुखमय जीवन, महात्माजी के स्वागत के लिए धूमधाम, और दूसरी ओर ये नंगे-भूखे कंकाल ! उड़ीसा की ही किसी सभा में महात्माजी ने बहुत मार्के का भाषण किया था, जिसका असर आज तक मेरे दिल पर है । सभा में किसी ने महात्माजी से प्रश्न किया कि आप अंगरेजी शिक्षा के विरुद्ध क्यों हैं - अंगरेजी शिक्षा ने ही तो राजा राममोहन राय, लोकमान्य तिलक और आपको पैदा किया है ? महात्माजी ने उत्तर में कहा - "मैं तो कुछ नहीं हूं; पर लोकमान्य तिलक भी जो हैं उससे कहीं अधिक बड़े हुए होते यदि उनको अंगरेजी द्वारा शिक्षा का बोझ ढोना न पड़ा होता । राजा राममोहन और लोकमान्य तिलक श्री शंकराचार्य, गुरु नानक, गुरु गोविन्दसिंह और कबीर दास के मुकाबले में क्या हैं ? आज तो सफर के और प्रचार के इतने साधन मौजूद हैं। उन लोगों के समय में तो कुछ नहीं था, तो भी उन्होंने विचार की दुनिया में कितनी बड़ी क्रांति मचा दी थी।" अंगरेजी राज्य के संबंध में भी उन्होंने कहा कि मुगल राज्य में अकबर के समय में राणा प्रताप और औरंगजेब के दिनों में शिवाजी जैसे वीरों के लिए सुअवसर था, आज वह कहां है ? इस प्रकार एक बड़े प्रभावशाली भाषण में उन्होंने यह दिखला दिया कि यह हम लोगों का मोह है जो अंगरेजी शिक्षा को ही देशोन्नति का कारण बताते हैं। हां, अंगरेजी जानना बुरा नहीं है। उसे हम में से बहुतेरों को जानना होगा । हम उसे सीखेंगे भी; पर आज की तरह वह शिक्षा का माध्यम और साधन नहीं रह सकती । उड़ीसा से महात्माजी के साथ मैं बेजवाड़ा गया। रास्ते के दृश्य अवर्णनीय हैं। जैसा उत्साह अपने सूबे में देखा था वैसा ही आंध्र प्रदेश में भी देखने में आया । वही जनता की भीड़, वही दसों दिशाओं को गुंजाने वाले नारे! स्टेशनों पर वही जन समूह, चलती रेलगाड़ी के किनारे लाइन पर लोगों का वही जमघट और वही विराट सभाएं । मुझे याद है कि विजयनगर में हम लोग रात को प्रायः तीन बजे रेल से उतरे । सारे शहर में लोगों ने दीवाली मनायी थी ! हम बिहार के प्रतिनिधि बेजवाड़ा से लौटते समय रेल में कार्यक्रम पूरा करने के संबंध में परस्पर बातें करने लगे। एक प्रकार से पटना पहुंचते-पहुंचते यह निश्चय कर लिया गया कि यह काम कैसे पूरा किया जायेगा। रुपये जमा करने और चर्खा चलाने की ओर लोगों का विशेष ध्यान गया । मैं भी दिन-रात सारे सूबे में दौड़ता और रुपये जमा करने में लगा रहा । सब जिलों में कार्यकर्ता इस काम में दिलोजान से लग गये । रुपये जैसे-जैसे जमा होते, बैंक में जमा होते । हम लोगों ने कई प्रकार की रसीदें छपवा ली थीं, जिनसे यह सुविधा होती कि प्रत्येक आदमी को रसीद लिखकर देने की जरूरत नहीं होती। कम-से-कम चार आने की रसीद थी । बड़ी रकमों के लिए लिखकर रसीद दे दी जाती । इसके पहले बिहार में सार्वजनिक काम के लिए जन-साधारण से इस प्रकार कभी रुपये नहीं मांगे गये थे। हम भी नहीं जानते थे कि हम कहां तक सफल होंगे। पर लोगों में उत्साह देखकर आशा बढ़ती जाती थी । हमको बहुत बड़े और धनी लोगों से बहुत ज्यादा नहीं मिला। पर हर जिले में मझोले दर्जे के लोगों ने बहुत उत्साहपूर्वक चंदा दिया। अंत में तीस जून तक हमने सात-आठ लाख के लगभग जमा कर लिया। तीस जून को गांधीजी को तार द्वारा इसकी सूचना दे दी गयी । इस काम में सब से ज्यादा उत्साह तिरहुत डिवीजन के जिलों ने दिखाया - यद्यपि और जिले भी कुछ बहुत पीछे नहीं थे । बिहार के कई जिलों में घूमते-घूमते काफी अनुभव हुआ। कहीं-कहीं कुछ दिलचस्प घटनाएं भी हुईं । मनोविनोद के लिए एक घटना का वर्णन कर देता हूं । जून का महीना था। मैं रांची जिले में तिलक स्वराज्य कोष के लिए रुपया जमा करने गया । वहां के कार्यकर्ताओं ने मेरे लिए दो दिनों का कार्यक्रम, जिले के विभिन्न स्थानों में जाने के लिए, बना लिया। पहले दिन रांची से मोटर पर चलकर दस बजे तक 'बुंडू' पहुंच वहां का काम समाप्त करना था। दोपहर का भोजन रांची ही वापस आकर करना था। सेपहर को 'खूंटी' जाना था । रात तक फिर रांची वापस आना था। दूसरे दिन सवेरे लोहरदगा जाना था। वहां से दोपहर तक वापस आकर तीसरे पहर की गाड़ी से पटने के लिए रवाना होना था । हम लोग रांची में सवेरे ही नहा-धोकर तैयार हो गये। टैक्सी के आने में कुछ देर हो गयी । हम सात आदमी, जिनमें एक ड्राइवर और दूसरा क्लीनर था, उस पर सवार होकर रवाना हुए। यह सोचा गया था कि दोपहर को रांची में ही आकर भोजन करना होगा । इसलिए हमने साथ में कुछ भी न लिया । जो कुर्ते पहने और चादर लिये हुए थे, वही सारा सामान था । डाक्टर पूर्ण मित्र ने, जो वहां के नेता थे, साथ में एक छोटा-सा बेग रख लिया था, जिसकी खबर हम लोगों को उस समय नहीं थी। कुछ दूर जाने पर, एक जंगल में पहुंचने पर, मोटर में कुछ टूट गया। ड्राइवर ने मरम्मत शुरू की और कहा कि बस दस-पांच मिनट में तैयार कर लूंगा । मरम्मत में देर होने लगी । ज्यों-ज्यों हम घबराते, वह आश्वासन देता जाता। दो-तीन घंटों के बाद उसने कहा कि लोहार की जरूरत होगी। तलाश करने पर एक गांव मिला, जहां लोहार के घर जाकर उसने कुछ पीट-पाट कर दुरुस्त कराया। जंगल में कुछ भी खाने-पीने का सामान नजर नहीं आता था । इमली के वृक्ष थे। उनमें इमली के फल के गुच्छे लटक रहे थे। हम लोग उन्हें तोड़-तोड़कर जबान और दांत खट्टे करते रहे। दोपहर के बाद प्यास ने जोर किया। फिर गांव तलाश करके लोटा-बाल्टी मंगनी मांगी गयी । बहुत दूर से पानी लाकर प्यास बुझायी गयी । जब मरम्मत का काम जारी था, एक दूसरी मोटर पर सवार पुलिस वाले जाते हुए नजर आये । हम लोगों को देखकर उन्होंने अपनी गाड़ी रोक ली । हमने उनसे कहा कि हम 'बुंडू' शीघ्र ही पहुंचते हैं, आप वहां कह दें कि मोटर बिगड़ने के कारण हम लोगों के आने में कुछ विलम्ब हो रहा है। उन्होंने मोटर रोककर हम लोगों का हाल जान लेने की शिष्टता तो की थी; पर यह संवाद वहां पहुंचाने की भद्रता नहीं की ! वहां जो जनता कुछ दूर-दूर के गांवों से भी आयी थी, हम लोगों का तीन-चार बजे तक इंतजार करके जहां-तहां चली गयी । अंत में मोटर मरम्मत हो गयी। हम लोग पांच-छः बजे शाम तक 'बुंडू' पहुंचे। जो लोग गांवों से आये थे,वे तो चले गये थे। पर खास 'बुंडू' के लोगों में हमारे पहुंचने की खबर बात की बात में पहुंच गयी । सभा जुट गयी । हस्ब- मामूल वहां भी भाषण हुआ। रुपये जमा किये गये । जहां तक मुझे याद है, वहां सात-आठ सौ रुपये के लगभग धन एकत्र हुआ। काम खत्म करके हम लोग तुरंत चलने के लिए तैयार हुए । पर दिन भर केवल इमलियों पर ही बीता था, इसलिए वहां के लोगों ने भोजन कर लेने का आग्रह किया । हमने भी उसे मान लिया । रसोई तैयार होते-हवाते नौ-दस बज गये । अंत में भोजन करके यह विचार होने लगा कि अब क्या किया जाये ? उस दिन 'खूंटी' का प्रोग्राम छूट चुका था । दूसरे दिन लोहरदगा का प्रोग्राम किसी तरह छूटना न चाहिए । तीसरे पहर की गाड़ी से पटने के लिए रवाना होना भी अत्यंत आवश्यक था । कुछ लोगों का विचार हुआ - विशेषकर मोटर वाला इस पर जोर देने लगा कि रात को चलना ठीक नहीं है, रास्ते में जंगल है। खतरा है, मोटर भी न मालूम कहीं बिगड़ गयी तो रात का समय बड़ा भयानक होगा। मैं समझता था कि वह बहाना कर रहा है - इतनी देर तक मोटर की मरम्मत की गयी थी, और वह ठीक चली भी थी, अब क्या बिगड़ेगी ? विशेषकर दूसरे दिन के कार्यक्रम की मुझे चिंता थी। मैंने बहुत जोर लगाया कि नहीं, जरूर चला ही जाये । अंत में प्रायः ग्यारह-बारह बजे रात में उसी टूटी मोटर पर हम सात आदमी सवार होकर रवाना हुए। बीच में थोड़ी ही दूर पर, एक घाट है जहां कुछ ऊंची चढ़ाई है । उस चढ़ाई पर चढ़ते समय मोटर फिर टूट गयी । जहां मोटर टूटी वहां से प्रायः दो-ढाई सौ गज और ऊपर चढ़ना था। उसके बाद उतार था । उतार में यदि इंजिन न भी काम करे, तो मोटर आसानी से चली जायेगी, ऐसा ड्राइवर ने कहा । हम लोगों ने भी ऐसा ही अनुमान किया । घाट से उतरकर ही एक डाक बंगला था । हमने सोचा कि डाक बंगले तक अगर हम किसी तरह पहुंच जायें तो वहां रात आराम से कटेगी, हम सो सकेंगे। अपनी बेवकूफी से और उत्साह में हमने यह निश्चय किया कि जो थोड़ी चढ़ाई है उसे हम लोग मोटर ढकेल करके ही पार कर लेंगे । इसलिए हमने मोटर को आगे ढकेलना शुरू किया । बीस-तीस गज तक मोटर ढकेल ले गये । वहां ढाल बहुत कम थी और ऊंचाई अधिक । मोटर का ऊपर चढ़ना कठिन था; पर हम लोगों ने जोर लगाया । नतीजा यह हुआ कि चंद गज ऊपर ढकेलने के बाद मोटर उलटे पीछे की ओर झुकी । हम अपनी सारी शक्ति लगाकर उसे रोकने लगे। किसी-न-किसी तरह उसे एक खड्ड में गिरने से हम बचा सके । इसके बाद अब फिर हिम्मत न हुई कि मोटर ढकेलने की कोशिश की जाये। रात के शायद बारह-एक बजे होंगे। मध्य जंगल में हम सात आदमी किसी तरह मोटर में बैठकर आये थे । दिन-भर की थकान के बाद रात को सोना भी आवश्यक था। ड्राइवर, उस निर्जन स्थान की भयानक बातें कहकर, हम लोगों को डराता भी जाता था। उसने कहा कि यहां हिंसक जानवरों और चोर-डाकुओं, दोनों का डर था । हमने कहा कि चोर-डाकू हमसे लेंगे ही क्या, हमारे पास तो कुछ नहीं है। हां, यदि जंगली जानवर आ जाये तो उसका भय अवश्य है । मैंने यह कह तो दिया; पर मुझे यह नहीं मालूम था कि डाक्टर ने बुंडू के मिले रुपयों को अपने बेग में रख लिया था । वह बेग साथ ही था। उस समय मेरी बात सुनकर डाक्टर भी कुछ न बोले । मैं भी दूसरे दिन सुबह तक इसी भूल में था कि हमारे हाथ बिलकुल खाली हैं। हम सलाह कर ही रहे थे कि जंगल के भीतर से गरगराहट सुन पड़ी। ड्राइवर तो बहुत डर गया । कहने लगा,यह आवाज बनैले जानवर की है। कुछ ही देर में आवाज बंद हो गयी । हम सब शांत होकर किसी तरह मोटर में बैठ गये। कुछ देर बाद जब फिर कुछ चित्त शांत हुआ तो हमने सोचा कि मोटर वहीं छोड़ दी जाये और हम लोग डाक बंगले तक पैदल चलकर वहां सोवें, फिर सवेरे मोटर का कुछ प्रबंध किया जायेगा। मगर ड्राइवर इस पर राजी न हुआ। जब हम लोगों ने कहा कि हम लोग चले जाते हैं, तुम मोटर के साथ यहीं ठहरो, तो वह रोने-चिल्लाने अंत में यह निश्चय हुआ कि तीन आदमी मोटर के साथ ठहर जायें, बाकी चार आदमी डाक-बंगले पर चले जायें । रात चांदनी थी, यही एक चीज थी जिससे कुछ हिम्मत बनी रहती थी । डाक-बंगला पहुंचते-पहुंचते हम लोग प्यास के मारे परेशान थे । डाक बंगले में कोई था नहीं; दरवाजे बंद थे । हमने सोचा कि दरवाजा किसी तरह खोला जाये । इसमें हम सफल भी हो गये । अंदर से टटोलकर एक बाल्टी निकाली गयी। दो चारपाइयां और दो मेजें थीं । वे भी बाहर निकाली गयीं। पर बाल्टी से तो प्यास बुझती न थी, कुएं और डोरी की आवश्यकता रह ही गयी । हम लोग फिर एक बार डाक बंगले के आसपास चौकीदार की खोज में निकले । कुछ दूर पर देखा कि एक आदमी एक बच्चे को बगल में लेकर गाढ़ी नींद में सोया हुआ है। उस घोर जंगल में बच्चे के साथ उस आदमी को इस प्रकार निश्चित सोते देखकर हम अचम्भे में आ गये । वह बहुत पुकारने पर जगा । ऊंघते ऊंघते ही उसने कहा कि डोरी तो नहीं है, पर कुआं जंगल में थोड़ी ही दूर घुसने पर मिलेगा । प्यास से हम लोग परेशान थे । इसलिए फिर कुएं की तलाश में निकले । वंह मिला भी । अपनी चादरों को जोड़कर डोरी बनायी गयी । उसी से बाल्टी में पानी निकाला गया । पानी पीकर हम लोगों में से कुछ तो चारपाई पर और कुछ टेबुल पर सो रहे । सोने का समय थोड़ा ही मिला। सवेरे उठकर, मुंह-हाथ धोकर, हम लोगों ने सोचा कि यहां तो कोई सवारी मिलने वाली नहीं है, इसलिए रांची की ओर हम लोग पैदल ही बढ़ें; कोई गांव मिल जायेगा तो वहां कुछ खाने का भी प्रबंध हो सकेगा । सब लोग चलने पर राजी नहीं थे । इसलिए मैं तथा एक आदमी और दोनों चल पड़े। वहां से तीन-चार मील जाने पर एक गांव मिला, जहां कुछ चने मिले । प्रायः नौ बज़ चले थे । चने चबाकर हम लोग कुछ विश्राम करने लगे। धूप कड़ी हो गयी थी । शीतल हवा चल रही थी । तुरंत नींद आ गयी । प्रायः एक-डेढ़ घंटे के बाद किसी ने आकर जगाया। मालूम हुआ कि रांची के भाइयों ने कल दोपहर तक हमारी बाट जोही । जब हम नहीं पहुंचे तो दूसरी टैक्सी करके हमारी खोज में कुछ लोगों को भेजा। उन्होंने भूल यह की कि इस टैक्सी पर भी प्रायः पूरा बोझ लेकर तीन-चार आदमी आये । हम लोग पांच आदमी तो, मोटर वालों को छोड़कर, एक गाड़ी का बोझ पहले से थे ही । हमने कहा कि हममें से जो लोग अभी पीछे छूटे थे उनको पहले रांची पहुंचाओ, फिर दुबारा मोटर ले आओ तो हम दोनों चलेंगे। उन्होंने भी इसे पसंद किया। हम लोग प्रायः डेढ़-दो घंटे और आराम से सोये । फिर जब मोटर प्रायः एक बजे के करीब आयी तो रांची गये । वहां कुछ भोजन करके, सेपहर की गाड़ी से सीधे पटने के लिए रवाना हो गये । इतनी दिलचस्प तो नहीं, पर इस प्रकार की कई घटनाएं उन दिनों के सफर में होती रहीं । हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य और खादी प्रचार जुलाई एक हज़ार नौ सौ इक्कीस में बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का अधिवेशन हुआ। वहां बिहार के और लोगों के साथ मैं भी गया। अधिवेशन में काफी उत्साह था, क्योंकि तुरंत एक करोड़ रुपये जमा करने का कार्यक्रम सफलतापूर्वक देश ने पूरा कर लिया था। चर्खे के संबंध में भी काफी प्रचार हुआ था। हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य तो मानो पूर्ण रूप से स्थापित जान पड़ता था । हम लोग यह नहीं समझ सकते थे कि यह कभी फिर टूटेगा । इन कारणों से उस अधिवेशन में कुछ लोगों ने इस बात पर बहुत जोर दिया कि सत्याग्रह शुरू करना चाहिए। उधर गवर्नमेंट की ओर से भी कुछ कार्रवाइयां हो रही थीं, जिनसे बहुत लोग क्षुब्ध थे । हमने यद्यपि बहुत बड़ा आन्दोलन सारे देश में चलाया था, तथापि वह वैध था। कानून तोड़ा नहीं गया था - यद्यपि भाषणों में काफी आजादी बरती जाती थी । कांग्रेसी लोगों के रहन-सहन और चाल-ढाल में साहस, उत्साह और सबसे अधिक निडरपन टपका करता था । गवर्नमेंट जहां-तहां कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया करती थी। देश में इस प्रकार कई सौ आदमी जेलखानों में थे। बिहार में हुई गिरफ्तारियों और दमन का जिक्र ऊपर किया गया है । इन कारणों से भी लोगों ने बहुत जोर दिया कि सत्याग्रह शुरू कर देना चाहिए । महात्मा गांधी ने अभी सब रखने की सलाह दी । चर्खा-प्रचार और उसके द्वारा विदेशी वस्त्र-बहिष्कार तीस सितम्बर तक पूरा करने का निश्चय हुआ। उन्होंने कहा कि जो कार्यक्रम कांग्रेस ने निर्धारित कर दिया है उसको पूरा करना चाहिए और तभी सत्याग्रह में सफलता की आशा की जा सकेगी। इसलिए अभी तैयारी पर जोर देते हुए सत्याग्रह का निश्चय स्थगित रहा। पर एक दूसरी चीज ऐसी आ गयी जिसने सत्याग्रह का बीज बो दिया। गवर्नमेंट की ओर से घोषणा की गयी कि जाड़ों में प्रिंस आफ वेल्स हिन्दुस्तान की यात्रा करेंगे। उन्होंने शायद सोचा था कि जनता में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध इतना प्रचार हो रहा है, लोगों में इतना उत्साह और जोश बढ़ रहा है, इसके रोकने में यह यात्रा सहायक होगी। वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने एक बार आन्दोलन के संबंध में कहा था कि इससे मैं घबरा गया हूं, चक्कर में पड़ गया हूं । अब लार्ड रीडिंग यहां वायसराय बनकर आ गये थे । वह इंग्लैंड के चतुर नीतिज्ञों में समझे जाते थे । उन्होंने कुछ ही दिन पहले अमेरिका में राजदूत के पद पर रहकर अमेरिका को लड़ाई में इंग्लैंड के पक्ष में ले आने का कौशल दिखलाया था और अब इंग्लैंड के चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्त थे । हो सकता है कि यह उनकी चातुरी का नतीजा हो । हो सकता है, नीतिज्ञों ने समझा हो कि जैसे बंगविच्छेद के बाद बंगाल में बहुत असंतोष फैल गया था और जब वह किसी प्रकार दमन-नीति से दबाया नहीं जा सका तब सम्राट पंचम जार्ज हिन्दुस्तान में अपना अभिषेक कराने आये और यहां की जनता तथा सभी लोगों ने बड़े उत्साह के साथ उनका स्वागत किया वैसे ही इस बार भी युवराज के आगमन से हिन्दुस्तान की जनता में राजभक्ति उमड़ पड़ेगी और आन्दोलन खुद-ब-खुद कमजोर पड़ जायेगा । युवराज के इस समय हिन्दुस्तान में आने का कोई भी दूसरा कारण देखने में नहीं आता था । अखिल भारतीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव स्वीकार किया जिसमें यह अनुरोध किया गया कि गवर्नमेंट यहां युवराज के लाने का निश्चय छोड़ दे । उसमें साफ-साफ कहा गया कि के गवर्नमेंट के लिए, अपनी गिरती हुई लोकप्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने के हेतु, सम्राट के पुत्र और भावी सम्राट का इस प्रकार इस्तेमाल करना मुनासिब नहीं है । यह भी बतला दिया गया कि देश की यह बात यदि गवर्नमेंट स्वीकार नहीं करेगी तो मजबूरन हमको इस यात्रा का बहिष्कार करना पड़ेगा-यद्यपि युवराज के साथ हमारा कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है, वरन् उनके लिए हम लोगों के हृदय में आदर ही है, तथापि उनका बहिष्कार भी अनिवार्य हो जायेगा। इस प्रस्ताव द्वारा साफ-साफ चेतावनी दे दी गयी कि गवर्नमेंट की इस चालबाजी का नतीजा अच्छा न होगा और देश को सत्याग्रह के लिए तैयारी करने का आदेश दिया जायेगा । बकरीद का समय भी निकट आ गया था। बिहार और संयुक्त प्रांत में यह समय हमेशा बहुत नाजुक समझा जाता है; क्योंकि जहां-तहां गाय की कुर्बानी के लिए हिन्दू-मुस्लिम दंगा-फसाद हो जाया करते हैं। इस बार सोचा गया कि इस हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के जमाने में भी यदि बलवा-फसाद हुआ तो इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा। सोचा गया कि इस अवसर का उपयोग हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य के बढ़ाने में करना चाहिए। इस संबंध में बहुत प्रचार हुआ । महात्माजी का रास्ता यह था कि हम मुसलमानों के खिलाफ लड़कर उनसे गाय की रक्षा नहीं करा सकते और उनको मारकर हम गोरक्षा का फल भी अच्छा नहीं पा सकते । इसलिए यह उन पर ही छोड़ना चाहिए कि वे अपने हिन्दू भाइयों की भावना को ठेस न लगाकर, भाईचारे के व्यवहार से खुद गोवध बंद करें - हिन्दुओं की जोर-जबरदस्ती से नहीं, बल्कि अपने प्रेम-भाव और उदार विचार से । इस सिलसिले में अली-बंधुओं के साथ महात्माजी ने कुछ स्थानों का दौरा भी किया । इसी दौरे के सिलसिले में वह बिहार में भी आये । इस दौरे में महात्माजी शाहाबाद, । गया और पटना जिलों में ही गये जहां बकरीद के अवसर पर कुछ गड़बड़ी का भय था । मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद सुभानी उनके साथ थे। महात्माजी का कार्यक्रम बहुत ही संगीन था - एक दिन में कई जगहों में सभाएं और बहुत दूर तक मोटर से सफर । मुझे याद है कि एक दिन वह संध्या को भोजन भी नहीं कर पाये, क्योंकि सूर्यास्त के बाद वह भोजन नहीं करते और सूर्यास्त के पहले इसके लिए समय नहीं मिला । मैं सफर में साथ रहा । सभी जगहों में आपस के मेल-जोल की बातें ही कही गयीं । साथ-ही-साथ, खादी-चर्खा के प्रचार की बातें भी की गयीं। बड़े संतोष और गौरव की बात है कि मुसलमान नेताओं ने - यद्यपि वे कुर्बानी करने के अपने स्वत्व को नहीं छोड़ना चाहते थे तथापि - जनता में प्रचार किया कि आदमी स्वत्व रखकर भी उसके व्यवहार करने या न करने का फैसला खुद कर सकता है; इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि भाईचारा और रवादारी के ख्याल से, जहां तक हो सके, कुछ ऐसा न करें जिससे हिन्दुओं का दिल दुखे । इसी वक्त हकीम अजमल खां तथा दूसरे नेताओं ने भी बड़ी करामात दिखलायी। फलस्वरूप उस साल की बकरीद केवल शांति के साथ ही नहीं बीती, बल्कि गायों की कुर्बानी भी इतनी कम हुई जितनी शायद कभी पहले भी न हुई थी। इसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ने एक-दूसरे की भावनाओं की प्रतिष्ठा की। किसी तरफ जोर आजमाइश की कोशिश नहीं हुई। दोनों ने एक-दूसरे की रवादारी और भाईचारे पर भरोसा किया । उनका यह भरोसा निष्फल नहीं गया । बिहार के कुछ भागों में, विशेष करके उत्तर बिहार के जिलों में, चर्खे का चलना कभी एकबारगी बंद नहीं हुआ था - यद्यपि वह बहुत कम हो गया था। इस आन्दोलन से उसको नवजीवन मिला । चर्खा-प्रचार के लिए, तिलक स्वराज्य कोष से, रुपये भी मिले । हमारे प्रांत में भी काम शुरू किया गया । काम तो हमने शुरू किया; पर शास्त्रीय ज्ञान हमको कुछ भी न था । उत्साह था, पर व्यापार-बुद्धि नहीं थी । इसलिए जो काम उस समय हुआ उसका केवल यह फल हुआ कि खादी का प्रचार तो हुआ, पर पैसे का भी काफी नुकसान हुआ । जब मैं गांधीजी के उस कथन पर अब विचार करता हूं, जिसको उन्होंने आन्दोलन के आरम्भ में ही कहा था, तो मुझे उनकी दूरदर्शिता और कार्य कौशल का एक और भी ज्वलंत दृष्टांत मिल जाता है । उन्होंने कहा था कि हमारे राष्ट्रीय स्कूल चर्खा - शाला होने चाहिए और इसी के ज्ञान को प्राप्त करने और बढ़ाने में राष्ट्रीय शालाओं को लग जाना चाहिए - चर्खा द्वारा ही हम युवकों को सहस्रों की संख्या में काम दे सकेंगे और जनता की धनवृद्धि में सहायक हो सकेंगे। उन्होंने साबरमती आश्रम में उद्योग- शाला खोलकर चर्खा संबंधी खोज का काम भी जारी कर दिया। पर राष्ट्रीय शिक्षा के अधिकारी इस मर्म को पूरी तरह नहीं समझ सके; उन्होंने विद्यापीठों और उनके अधीन की पाठशालाओं को चर्खाशाला नहीं बनाया - यद्यपि सभी जगहों में चर्खा चलाना एक अनिवार्य विषय बना दिया गया था। चर्खे चलने लगे; पर शास्त्र का ज्ञान शिक्षकों को तो था ही नहीं, बच्चों को वे कहां से देते ? इस तरह अंधों का नेतृत्व अंधे करने लगे ! अतः चर्खा ठीक रास्ते पर कुछ दिनों तक नहीं आ सका। आज हम इस अदूरदर्शिता के लिए किसी को दोष नहीं दे सकते; क्योंकि ऐसा होना स्वाभाविक-सा था । सब लोगों की आंखें भावी स्वराज्य की ओर, जो एक राजनीतिक परिवर्तन की सीमित चीज समझी जाती थी, लगी हुई थीं । कांग्रेस के अंदर भी कुछ लोग, विशेष करके महाराष्ट्र वाले, खादी चर्खे का विरोध करते ही रहे। पर इन त्रुटियों के रहते हुए भी खादी का प्रचार खूब हुआ। अभी शुद्ध और अशुद्ध खादी का भेद लोग इतना नहीं समझते थे। जो मोटा कपड़ा हाथ-क्रर्षे पर का बुना हुआ होता उसे ही खादी समझकर खरीदते । महात्माजी ने कहा था कि सत्याग्रह के लिए खादी का प्रचार अत्यंत आवश्यक है और प्रचार का सबूत आंखों को ही मिलना चाहिए । अर्थात जब चारों ओर लोगों को खादी पहने हम देखेंगे तो हम समझ लेंगे कि इसका प्रचार हो गया - इसके लिए पुस्तकों और लेखों तथा अखबारों में छपे आंकड़ों में, अथवा किसी से पूछ करके, सबूत ढूंढने की जरूरत नहीं होगी । बिहार के इस दौरे में गांधीजी ने खादी पर काफी जोर दिया । कोकटी का कपड़ा, जो दरभंगा जिले के मधुबनी इलाके में बनता था, काफी महीन और सुंदर तथा मुलायम होता है। उसको देखकर लोग चकित हो जाते थे। इसका व्यापार अभी तक मरा नहीं था । इसका विशेष कारण यह था कि इस कपड़े का खर्च नेपाल-दरबार में और वहां की संभ्रांत जनता में काफी था। वहां के लिए ही यह कपड़ा, विशेष करके उस इलाके में जो नेपाल की सरहद पर ही है, बहुत बना करता था । उस इलाके की बनी हुई कुछ धोतियां भी पेश की गयीं, जिनको देखकर, विशेषकर मुझे याद है कि मौलाना मुहम्मद अली, बहुत ही संतुष्ट हुए थे । बिहारशरीफ जैसे मोमिनों के एक बड़े मुख्य स्थान पर गांधीजी गये और उन लोगों ने मदद करने का वचन भी दिया । बिहार-यात्रा समाप्त करने के पहले गांधीजी अपने साथियों के साथ पटने आये । सदाकत आश्रम में ठहरे। अखिल भारतीय कांग्रेस की नयी बनी हुई कार्यकारिणी की बैठक वहीं हुई । बम्बई की अखिल भारतीय कमिटी में वर्किंग कमिटी का चुनाव हुआ था। मैं भी सदस्य चुना गया था। इसलिए मैं भी उस बैठक में शरीक हुआ। इस बैठक में विशेषकर इसी बात पर जोर दिया गया कि विदेशी वस्त्र बहिष्कार का कार्यक्रम पूरा होना चाहिए और इसके लिए चर्खा-प्रचार आवश्यक है। बिहार से गांधीजी कलकत्ते होते आसाम चले गये। मैं बिहार में खादी संगठन और चर्खा-प्रचार के लिए घूमने लगा। प्रांतीय कमिटी ने इस काम के लिए कुछ लोगों की एक समिति बना दी। सभी जिलों में इस काम के लिए कुछ लोग नियुक्त कर दिये गये । काम खूब जोरों से चलने लगा। सरकार अपनी ओर से चुप नहीं रही । उसको भय हो गया कि विदेशी कपड़ों की दूकानों पर पहरा बैठाया जायेगा । कांग्रेस ने कपड़े के व्यापारियों से अनुरोध किया था कि वे विदेशी कपड़े का व्यापार छोड़ दें और जो विदेशी माल उनके पास मौजूद है उसे विदेशों में ही बेचने का प्रबंध करें - भारतवर्ष में यहीं के बने कपड़े ही बेचें । इसी निश्चय से डरकर बिहार सरकार के नये प्रधानमंत्री मिस्टर सिफ्टन ने एक दूसरी विज्ञप्ति निकाली, जिसमें जिला अफसरों को प्रोत्साहन दिया गया कि वे विदेशी वस्त्र संबंधी प्रचार करें और जनता को यह बतावें कि विदेशी वस्त्र के बिना लोगों को बहुत कष्ट होगा - कपड़ा बहुत महंगा हो जायेगा । और जहां कहीं कांग्रेसी लोग जोर लगावें, गिरफ्तार किये जायें । पहले इस प्रकार की एक विज्ञप्ति चीफ सेक्रेटरी रेनी ने असहयोग के संबंध में निकाली ही थी । अब विदेशी वस्त्र को लेकर और भी जोरदार नीति की घोषणा सरकार ने कर दी । मालूम होने लगा कि एक-न- एक दिन मुठभेड़ हो ही जायेगी। पर हम अपना काम दृढ़ता - किंतु सहिष्णुता के साथ करते गये। काम खूब जोरों से आगे बढ़ता गांधीजी आसाम का दौरा समाप्त करके कलकत्ता वापस आये । वहां फिर वर्किंग कमिटी की बैठक हुई जिसमें शरीक होने के लिए मैं वहां गया ।
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ट्रांसस्टेरिफिकेशन के लिए एक वैकल्पिक, उत्प्रेरक मुक्त विधि उच्च तापमान और निरंतर प्रक्रिया में दबाव पर सुपरक्रिटिकल मेथनॉल का उपयोग करती है। सुपरक्रिटिकल राज्य में, तेल और मेथनॉल एक ही चरण में होते हैं, और प्रतिक्रिया स्वचालित रूप से और तेजी से होती है। प्रक्रिया फीडस्टॉक में पानी को सहन कर सकती है, मुक्त फैटी एसिड साबुन के बजाय मिथाइल एस्टर में परिवर्तित हो जाते हैं, इसलिए फीडस्टॉक्स की एक विस्तृत विविधता का उपयोग किया जा सकता है। उत्प्रेरक हटाने का कदम भी समाप्त हो गया है। उच्च तापमान और दबाव की आवश्यकता होती है, लेकिन उत्पादन की ऊर्जा लागत उत्प्रेरक उत्पादन मार्गों की तुलना में समान या कम होती है।
तेल या वसा और मेथनॉल जैसे अजेय तरल पदार्थ के बूंद आकार को कम करके अल्ट्रा- और उच्च शीयर मिक्सर के उच्च ऊर्जावान कतरनी क्षेत्र में प्रतिक्रिया होती है। इसलिए, छोटी बूंद का आकार सतह क्षेत्र जितना तेज़ होगा उत्प्रेरक प्रतिक्रिया कर सकता है।
अल्ट्रासोनिक रिएक्टर विधि में, अल्ट्रासोनिक तरंगें प्रतिक्रिया मिश्रण को लगातार बुलबुले का उत्पादन और पतन करने का कारण बनती हैं। यह पोकेशन एक साथ ट्रांसस्टेरिफिकेशन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक मिश्रण और हीटिंग प्रदान करता है। इस प्रकार, बायोडीज़ल उत्पादन के लिए एक अल्ट्रासोनिक रिएक्टर का उपयोग प्रतिक्रिया प्रतिक्रिया समय, प्रतिक्रिया तापमान, और ऊर्जा इनपुट को कम कर देता है। इसलिए ट्रांसजेरिएशन की प्रक्रिया समय लेने वाली बैच प्रसंस्करण का उपयोग करने के बजाय इनलाइन चला सकती है। औद्योगिक पैमाने अल्ट्रासोनिक डिवाइस प्रति दिन कई हजार बैरल के औद्योगिक पैमाने पर प्रसंस्करण के लिए अनुमति देते हैं।
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ट्रांसस्टेरिफिकेशन के लिए एक वैकल्पिक, उत्प्रेरक मुक्त विधि उच्च तापमान और निरंतर प्रक्रिया में दबाव पर सुपरक्रिटिकल मेथनॉल का उपयोग करती है। सुपरक्रिटिकल राज्य में, तेल और मेथनॉल एक ही चरण में होते हैं, और प्रतिक्रिया स्वचालित रूप से और तेजी से होती है। प्रक्रिया फीडस्टॉक में पानी को सहन कर सकती है, मुक्त फैटी एसिड साबुन के बजाय मिथाइल एस्टर में परिवर्तित हो जाते हैं, इसलिए फीडस्टॉक्स की एक विस्तृत विविधता का उपयोग किया जा सकता है। उत्प्रेरक हटाने का कदम भी समाप्त हो गया है। उच्च तापमान और दबाव की आवश्यकता होती है, लेकिन उत्पादन की ऊर्जा लागत उत्प्रेरक उत्पादन मार्गों की तुलना में समान या कम होती है। तेल या वसा और मेथनॉल जैसे अजेय तरल पदार्थ के बूंद आकार को कम करके अल्ट्रा- और उच्च शीयर मिक्सर के उच्च ऊर्जावान कतरनी क्षेत्र में प्रतिक्रिया होती है। इसलिए, छोटी बूंद का आकार सतह क्षेत्र जितना तेज़ होगा उत्प्रेरक प्रतिक्रिया कर सकता है। अल्ट्रासोनिक रिएक्टर विधि में, अल्ट्रासोनिक तरंगें प्रतिक्रिया मिश्रण को लगातार बुलबुले का उत्पादन और पतन करने का कारण बनती हैं। यह पोकेशन एक साथ ट्रांसस्टेरिफिकेशन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक मिश्रण और हीटिंग प्रदान करता है। इस प्रकार, बायोडीज़ल उत्पादन के लिए एक अल्ट्रासोनिक रिएक्टर का उपयोग प्रतिक्रिया प्रतिक्रिया समय, प्रतिक्रिया तापमान, और ऊर्जा इनपुट को कम कर देता है। इसलिए ट्रांसजेरिएशन की प्रक्रिया समय लेने वाली बैच प्रसंस्करण का उपयोग करने के बजाय इनलाइन चला सकती है। औद्योगिक पैमाने अल्ट्रासोनिक डिवाइस प्रति दिन कई हजार बैरल के औद्योगिक पैमाने पर प्रसंस्करण के लिए अनुमति देते हैं।
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भुवनेश्वर। चोट के कारण करीब चार साल बाद ट्रैक पर वापसी कर रही हरियाणा की अंजलि देवी ने शुक्रवार को यहां नेशनल अंतर-स्टेट चैंपियनशिप में महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय का रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ ही उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई भी कर लिया।
अंजलि, जिन्होंने आखिरी बार अक्टूबर 2019 में रांची में इंडियन ओपन चैंपियनशिप में 400 मीटर की दौड़ लगाई थी, ने यहां कलिंगा स्टेडियम में 51. 58 सेकेंड का साथ स्वर्ण पदक जीता। दूसरे नंबर पर हरियाणा की हीमाशी मलिक (51. 76 सेकेंड) रहीं। अंजलि, जिनका पहले व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 51. 53 था, ने एशियाई खेलों के क्वालीफाइंग समय को लगभग डेढ़ सेकेंड से पीछे छोड़ दिया।
रजत पदक विजेता हिमांशी, कांस्य पदक विजेता तमिलनाडु की आर विथ्या रामराज (52. 49 सेकेंड) और चौथे स्थान की फिनिशर ऐश्वर्या कैलाश मिश्रा (52. 79 सेकेंड) एशियाई खेलों के क्वालीफाइंग समय से नीचे रहीं।
पुरुषों की 400 मीटर दौड़ में, कलिंग कुमारेज ने 45. 64 सेकेंड के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक केरल के मुहम्मद अनस याहिया ने 45. 76 सेकेंड के समय के साथ रजत पदक जीता। केरल के मोहम्मद अजमल और दिल्ली के अमोज जैकब क्रमशः 45. 90 और 45. 91 के समय के साथ तीसरे और चौथे स्थान पर रहे। इन चारों ने एशियाई खेलों के क्वालीफाइंग समय 46. 17 से बेहतर किया।
तमिलनाडु के बी शिव कुमार 100 मीटर रेस में 10. 37 सेकंड के साथ स्वर्ण पदक जीता। महिला वर्ग में आंध्र प्रदेश की ज्योति याराजी ने 11. 46 सेकेंड के साथ स्वर्ण पर कब्जा किया। इनमें से कोई भी एशियाई खेलों के लिए क्वालीफाई नहीं कर सका।
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भुवनेश्वर। चोट के कारण करीब चार साल बाद ट्रैक पर वापसी कर रही हरियाणा की अंजलि देवी ने शुक्रवार को यहां नेशनल अंतर-स्टेट चैंपियनशिप में महिलाओं की चार सौ मीटर स्पर्धा में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय का रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता। इस जीत के साथ ही उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई भी कर लिया। अंजलि, जिन्होंने आखिरी बार अक्टूबर दो हज़ार उन्नीस में रांची में इंडियन ओपन चैंपियनशिप में चार सौ मीटर की दौड़ लगाई थी, ने यहां कलिंगा स्टेडियम में इक्यावन. अट्ठावन सेकेंड का साथ स्वर्ण पदक जीता। दूसरे नंबर पर हरियाणा की हीमाशी मलिक रहीं। अंजलि, जिनका पहले व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ इक्यावन. तिरेपन था, ने एशियाई खेलों के क्वालीफाइंग समय को लगभग डेढ़ सेकेंड से पीछे छोड़ दिया। रजत पदक विजेता हिमांशी, कांस्य पदक विजेता तमिलनाडु की आर विथ्या रामराज और चौथे स्थान की फिनिशर ऐश्वर्या कैलाश मिश्रा एशियाई खेलों के क्वालीफाइंग समय से नीचे रहीं। पुरुषों की चार सौ मीटर दौड़ में, कलिंग कुमारेज ने पैंतालीस. चौंसठ सेकेंड के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक केरल के मुहम्मद अनस याहिया ने पैंतालीस. छिहत्तर सेकेंड के समय के साथ रजत पदक जीता। केरल के मोहम्मद अजमल और दिल्ली के अमोज जैकब क्रमशः पैंतालीस. नब्बे और पैंतालीस. इक्यानवे के समय के साथ तीसरे और चौथे स्थान पर रहे। इन चारों ने एशियाई खेलों के क्वालीफाइंग समय छियालीस. सत्रह से बेहतर किया। तमिलनाडु के बी शिव कुमार एक सौ मीटर रेस में दस. सैंतीस सेकंड के साथ स्वर्ण पदक जीता। महिला वर्ग में आंध्र प्रदेश की ज्योति याराजी ने ग्यारह. छियालीस सेकेंड के साथ स्वर्ण पर कब्जा किया। इनमें से कोई भी एशियाई खेलों के लिए क्वालीफाई नहीं कर सका।
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Hazaribag : हेमंत सरकार के विश्वासमत पर पक्ष ने कहा कि अच्छी पहल है. वहीं विपक्ष ने कहा कि यह अर्थहीन है. बरही व्यवसायी संघ के अध्यक्ष कपिल केसरी ने हेमंत सरकार के विश्वास मत के लिए बुलाए गए विशेष सत्र को उचित बताया.
कपिल केसरी ने बताया कि जनता के बीच में फैली भ्रांतियों को दूर करना जरूरी था. इससे सरकार को आत्मबल मिलेगा और अब किसी भी चीज पर ठोस निर्णय ले सकेगी. उन्होंने कहा कि व्यवसायियों को स्थिर सरकार चाहिए, ताकि व्यवसाय में उतार चढ़ाव न हो. उन्होंने राज्य सरकार से व्यवसायियों के हित में कोई ठोस योजना लाने की मांग की है.
वहीं बरही के वरिष्ठ भाजपा नेता सह भाजपा जिला उपाध्यक्ष रमेश ठाकुर ने बताया कि जब विपक्ष ने प्रस्ताव लाया ही नहीं, तो ऐसी स्थिति में फ्लोर टेस्ट के लिए विशेष सत्र बुलाना अर्थहीन है. संख्या बल के आधार पर सरकार की मनमानी कहीं से उचित नहीं है. इससे सरकार की छवि जनता के बीच मे खुद गिरी है. अभी तक राज्यपाल ने सरकार को किसी भी प्रकार का नोटिस जारी नहीं किया है. उन्होंने कहा कि भाजपा जनहित के मामले को संवैधानिक तरीकों से उठाता रहा है और आगे भी उठाता रहेगा.
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Hazaribag : हेमंत सरकार के विश्वासमत पर पक्ष ने कहा कि अच्छी पहल है. वहीं विपक्ष ने कहा कि यह अर्थहीन है. बरही व्यवसायी संघ के अध्यक्ष कपिल केसरी ने हेमंत सरकार के विश्वास मत के लिए बुलाए गए विशेष सत्र को उचित बताया. कपिल केसरी ने बताया कि जनता के बीच में फैली भ्रांतियों को दूर करना जरूरी था. इससे सरकार को आत्मबल मिलेगा और अब किसी भी चीज पर ठोस निर्णय ले सकेगी. उन्होंने कहा कि व्यवसायियों को स्थिर सरकार चाहिए, ताकि व्यवसाय में उतार चढ़ाव न हो. उन्होंने राज्य सरकार से व्यवसायियों के हित में कोई ठोस योजना लाने की मांग की है. वहीं बरही के वरिष्ठ भाजपा नेता सह भाजपा जिला उपाध्यक्ष रमेश ठाकुर ने बताया कि जब विपक्ष ने प्रस्ताव लाया ही नहीं, तो ऐसी स्थिति में फ्लोर टेस्ट के लिए विशेष सत्र बुलाना अर्थहीन है. संख्या बल के आधार पर सरकार की मनमानी कहीं से उचित नहीं है. इससे सरकार की छवि जनता के बीच मे खुद गिरी है. अभी तक राज्यपाल ने सरकार को किसी भी प्रकार का नोटिस जारी नहीं किया है. उन्होंने कहा कि भाजपा जनहित के मामले को संवैधानिक तरीकों से उठाता रहा है और आगे भी उठाता रहेगा.
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बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली/पटना. बिहार में महागठबंधन की सरकार बन गई है. इस बीच बिहार के सियासी गलियारों में चर्चा आम है कि नीतीश कुमार जल्दी ही तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप कर राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ा देंगे. चल रही कयासबाजियों में यह भी चर्चा आम है कि सोनिया गांधी ने भी नीतीश कुमार के नाम पर सहमति दे दी है कि वे जल्दी ही दिल्ली पहुंचकर विपक्षी दलों को एकजुट करेंगे. मगर बिहार कांग्रेस के नेताओं ने जो बयान जारी किया है इससे नीतीश कुमार को लेकर ऐसी राजनीतिक चर्चाओं को बड़ा झटका माना जा रहा है. दरअसल, दिल्ली में एक प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार कांग्रेस की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार नहीं होंगे.
दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कन्हैया कुमार, बिहार कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास और बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा ने कई मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त की. इस क्रम में मदन मोहन जा ने स्पष्ट तौर पर कहा, हमने कभी भी नहीं कहा कि नीतीश कुमार हमारे पीएम पद के उम्मीदवार हैं. हमारे पीएम पद के उम्मीदवार राहुल गांधी हैं.
इसी प्रेस वार्ता में बिहार के कानून मंत्री कार्तिक कुमार पर बोलेते हुए कन्हैया कुमार ने उनका बचाव किया. कन्हैया ने कहा, राजनीति में कौन ऐसा नेता है जिस पर मुकदमा नहीं. क्या सारे मुकदमें सही होते हैं कन्हैया कुमार ने बिहार में महागठबंधन की सरकार पर कहा कि सिर्फ सरकार गठन से कुछ नहीं होगा. हमारी ये जिम्मेवारी है कि जो घोषणाएं चुनाव के दौरान की है उन घोषणाओं को लागू करना ही पड़ेगा. ऐसा नहीं चलेगा कि दूसरे पर थू-थू करेंगे और उससे हम साफ हो जाएंगे.
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बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा. नई दिल्ली/पटना. बिहार में महागठबंधन की सरकार बन गई है. इस बीच बिहार के सियासी गलियारों में चर्चा आम है कि नीतीश कुमार जल्दी ही तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप कर राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ा देंगे. चल रही कयासबाजियों में यह भी चर्चा आम है कि सोनिया गांधी ने भी नीतीश कुमार के नाम पर सहमति दे दी है कि वे जल्दी ही दिल्ली पहुंचकर विपक्षी दलों को एकजुट करेंगे. मगर बिहार कांग्रेस के नेताओं ने जो बयान जारी किया है इससे नीतीश कुमार को लेकर ऐसी राजनीतिक चर्चाओं को बड़ा झटका माना जा रहा है. दरअसल, दिल्ली में एक प्रेस वार्ता में कांग्रेस नेताओं ने साफ कर दिया है कि नीतीश कुमार कांग्रेस की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार नहीं होंगे. दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कन्हैया कुमार, बिहार कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास और बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा ने कई मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त की. इस क्रम में मदन मोहन जा ने स्पष्ट तौर पर कहा, हमने कभी भी नहीं कहा कि नीतीश कुमार हमारे पीएम पद के उम्मीदवार हैं. हमारे पीएम पद के उम्मीदवार राहुल गांधी हैं. इसी प्रेस वार्ता में बिहार के कानून मंत्री कार्तिक कुमार पर बोलेते हुए कन्हैया कुमार ने उनका बचाव किया. कन्हैया ने कहा, राजनीति में कौन ऐसा नेता है जिस पर मुकदमा नहीं. क्या सारे मुकदमें सही होते हैं कन्हैया कुमार ने बिहार में महागठबंधन की सरकार पर कहा कि सिर्फ सरकार गठन से कुछ नहीं होगा. हमारी ये जिम्मेवारी है कि जो घोषणाएं चुनाव के दौरान की है उन घोषणाओं को लागू करना ही पड़ेगा. ऐसा नहीं चलेगा कि दूसरे पर थू-थू करेंगे और उससे हम साफ हो जाएंगे. .
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जन्मस्थान- कन्नौज (उ प्र)
शिक्षा- एम ए (हिन्दी), एम. फिल., नेट, पीएच.डी.
छायावादी काव्य की आत्मपरकता (शोध पुस्तक),
समकालीन हिंदी कविता, भाग 2 में कविताएँ संकलित,
'शब्द-शब्द प्रतिरोध' - साझा काव्य संग्रह,
'तो सुनो' काव्य-संग्रह प्रकाशित।
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जन्मस्थान- कन्नौज शिक्षा- एम ए , एम. फिल., नेट, पीएच.डी. छायावादी काव्य की आत्मपरकता , समकालीन हिंदी कविता, भाग दो में कविताएँ संकलित, 'शब्द-शब्द प्रतिरोध' - साझा काव्य संग्रह, 'तो सुनो' काव्य-संग्रह प्रकाशित।
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बांग्लादेश क्रिकेट टीम और इंग्लैंड क्रिकेट टीम के बीच वनडे सीरीज के पहले मुकाबले को इंग्लैंड ने 3 विकेट से जीत लिया है। इसी के साथ सीरीज में उन्होंने 1-0 की बढ़त ले ली है। डेविड मलान ने मैच में शानदार बल्लेबाजी करते हुए अपना चौथा वनडे शतक लगाया। नजमुल हसन शांतो ने मैच में अपने करियर का पहला अर्धशतक लगाया। आईए मैच में बने रिकॉर्ड्स पर एक नजर डालते हैं।
इंग्लैंड ने कैसे जीता मुकाबला?
टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी बांग्लादेश की टीम 47. 2 ओवर में 209 रन बनाकर ऑलआउट हो गई। शांतो (58) ने बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा स्कोर बनाया। लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड के लिए मलान (114) ने शानदार पारी खेली और 7 विकेट आउट होने के बाद भी टीम को जीत दिलाई। इंग्लैंड के लिए जोफ्रा आर्चर, मार्क वुड, मोईन अली और आदिल राशिद ने 2-2 विकेट लिए। बांग्लादेश के तैजुल इस्लाम ने सबसे ज्यादा 3 विकेट लिए।
शांतो ने 82 गेंद का सामना किया और 58 रन बनाए। अपनी इस पारी में उन्होंने 6 चौके लगाए। उन्होंने वनडे क्रिकेट में 1,000 रन पूरे कर लिए हैं। उन्होंने 25. 87 की औसत से 1,009 रन बनाए हैं। ये उनके करियर की तीसरी फिफ्टी है। बांग्लादेश के एक और बल्लेबाज महमुदुल्लाह ने 48 गेंद में 31 रन की पारी खेली। वनडे क्रिकेट में उन्होंने 35. 57 की औसत से 4,910 रन बना लिए हैं।
प्लेयर ऑफ द मैच रहे मलान ने 145 गेंद का सामना किया और 114 रन की पारी खेली। इस शानदार पारी के दौरान उन्होंने 8 चौके और 4 छक्के लगाए। उनका स्ट्राइक रेट 78. 62 का था। ये एशिया में उनका पहला शतक था। उन्होंने अब तक 16 वनडे मैच खेले हैं और 63. 17 की औसत से 758 रन बनाए हैं। इस दौरान उन्होंने 3 अर्धशतक और 4 शतक लगाए हैं। उनका स्ट्राइक रेट 94. 16 का रहा है।
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बांग्लादेश क्रिकेट टीम और इंग्लैंड क्रिकेट टीम के बीच वनडे सीरीज के पहले मुकाबले को इंग्लैंड ने तीन विकेट से जीत लिया है। इसी के साथ सीरीज में उन्होंने एक-शून्य की बढ़त ले ली है। डेविड मलान ने मैच में शानदार बल्लेबाजी करते हुए अपना चौथा वनडे शतक लगाया। नजमुल हसन शांतो ने मैच में अपने करियर का पहला अर्धशतक लगाया। आईए मैच में बने रिकॉर्ड्स पर एक नजर डालते हैं। इंग्लैंड ने कैसे जीता मुकाबला? टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी बांग्लादेश की टीम सैंतालीस. दो ओवर में दो सौ नौ रन बनाकर ऑलआउट हो गई। शांतो ने बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ा स्कोर बनाया। लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड के लिए मलान ने शानदार पारी खेली और सात विकेट आउट होने के बाद भी टीम को जीत दिलाई। इंग्लैंड के लिए जोफ्रा आर्चर, मार्क वुड, मोईन अली और आदिल राशिद ने दो-दो विकेट लिए। बांग्लादेश के तैजुल इस्लाम ने सबसे ज्यादा तीन विकेट लिए। शांतो ने बयासी गेंद का सामना किया और अट्ठावन रन बनाए। अपनी इस पारी में उन्होंने छः चौके लगाए। उन्होंने वनडे क्रिकेट में एक,शून्य रन पूरे कर लिए हैं। उन्होंने पच्चीस. सत्तासी की औसत से एक,नौ रन बनाए हैं। ये उनके करियर की तीसरी फिफ्टी है। बांग्लादेश के एक और बल्लेबाज महमुदुल्लाह ने अड़तालीस गेंद में इकतीस रन की पारी खेली। वनडे क्रिकेट में उन्होंने पैंतीस. सत्तावन की औसत से चार,नौ सौ दस रन बना लिए हैं। प्लेयर ऑफ द मैच रहे मलान ने एक सौ पैंतालीस गेंद का सामना किया और एक सौ चौदह रन की पारी खेली। इस शानदार पारी के दौरान उन्होंने आठ चौके और चार छक्के लगाए। उनका स्ट्राइक रेट अठहत्तर. बासठ का था। ये एशिया में उनका पहला शतक था। उन्होंने अब तक सोलह वनडे मैच खेले हैं और तिरेसठ. सत्रह की औसत से सात सौ अट्ठावन रन बनाए हैं। इस दौरान उन्होंने तीन अर्धशतक और चार शतक लगाए हैं। उनका स्ट्राइक रेट चौरानवे. सोलह का रहा है।
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'भारत जोड़ो यात्रा' कितनी सफल होगी यह 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम से ही तय हो सकेगा, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इससे कांग्रेस के वोटरों और कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद जगी है. इसलिए यह यात्रा असफल नहीं होगी बशर्ते यह जोश और उत्साह आगे भी बना रहे.
30 जनवरी को भारत जोड़ो यात्रा श्रीनगर में ध्वजारोहण के साथ खत्म हो जाएगी. अब कश्मीर से वापस दिल्ली आने के बाद राहुल गांधी क्या करेंगे और कांग्रेस की रणनीति क्या रहेगी, सारा खेल इसी पर निर्भर करेगा.
2024 लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस के लिए परिस्थितियां काफी चुनौती भरी रहने वाली है. इन चुनौतियों को पार करने के बाद ही 2024 का रास्ता कुछ आसान बनेगा. पहली चुनौती है- राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बड़ा फेरबदल कर संगठन को मजबूत बनाने की क्योंकि सिर्फ मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने से 2024 की राह आसान नहीं होने वाली. कांग्रेस को भाजपा की तरह बूथ स्तर पर अपने संगठन को मजबूत करना होगा.
फिर यह तय करना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी कि 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले किसे आगे किया जाए. मेरे हिसाब से कांग्रेस को कोई व्यक्ति के बदले भाजपा बनाम कांग्रेस पार्टी के बीच मुकाबला कराने वाली रणनीति पर काम करना चाहिए. वास्तविकता भी है कि भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी की छवि काफी बेहतर हुई है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से राहुल का सीधा मुकाबला कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
दरअसल भाजपा अभी भी यही चाहती है कि कांग्रेस नरेन्द्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को ही आगे करे ताकि वह परिवारवाद और पप्पू के अपने पुराने नैरेटिव को केंद्र में रखकर चुनाव के दौरान कांग्रेस के खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सके.
हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश का हालिया बयान मुझे अच्छा लगा. उन्होंने कहा कि 'भारत जोड़ो यात्रा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिए नहीं है. अब गांधी परिवार के कुछ चाटुकार नेताओं को यह बात समझाना होगा, जो चाटुकारिता के चक्कर में बार-बार राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बताते रहते हैं.
कांग्रेस के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण काम है- प्रादेशिक नेताओं के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई को खत्म कर इकट्ठे होकर चुनाव लड़ना. यह 2023 में नौ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है. इनमें से छह राज्य छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है.
वहीं भारतीय जनता पार्टी 2014 के बाद से हमेशा चुनावी मोड में ही रहती है. लाजिम है कि वह लोकसभा का सेमीफाइनल कहे जाने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सोमवार को बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमें 2023 और 2024 का एक भी चुनाव नहीं हारना है.
मिजोरम में पिछले चुनाव में कांग्रेस को करीब 30 प्रतिशत वोट मिले थे. वहीं मेघालय में 28. 5 प्रतिशत वोट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन सरकार नहीं बना सकी थी. छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो कांग्रेस की सरकार है, लेकिन दोनों ही राज्यों में आपसी गुटबाजी चरम पर है.
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टी. एस सिंहदेव के बीच 2018 में सरकार बनने के बाद से ही विवाद चल रहा है. चुनाव के बाद तय हुआ कि दोनों ढ़ाई-ढ़ाई साल बाद सीएम रहेंगे, लेकिन ढाई साल बाद भी आलाकमान ने भूपेश बघेल को ही मौका दे दिया. अब चुनाव के समय अगर वह इधर-उधर होते हैं तो कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा.
राजस्थान में तो पिछले दो साल से लगातार राजनितिक ड्रामा चल रहा है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की तनातनी रोज चर्चा में रहती है. चुनाव तक अगर ऐसा ही चलता रहा तो कांग्रेस की सत्ता हाथ से निकल सकती है.
कर्नाटक में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान तो प्रदेश के नेता एक साथ दिखे लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच आपसी खींचतान काफी लंबे समय से चल रहा है. चुनावी विश्लेषकों के अनुसार अगर कर्नाटक में कांग्रेस सही ढंग से चुनाव लड़े तो जीत सकती है क्योंकि यहां बीजेपी में भी आपसी लड़ाई काफी ज्यादा है. बीएस येदुरप्पा मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से काफी नाराज चल रहे हैं. उनकी नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी कर्नाटक से ही आते हैं. इसलिए कर्नाटक कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है.
मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार से लोग काफी नाराज हैं, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा उठाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों वाली करीब 25 सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी, जो 2020 में कांग्रेस छोड़कर सिंधिया के साथ भाजपा में चले गए थे.
छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में लोकसभा की कुल 93 सीटें हैं. कर्नाटक में तीन-चार सीट जेडीएस वाली छोड़कर करीब 90 सीटों पर कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है. 2019 में भाजपा इनमें से 87 सीटों पर जीत हासिल की थी. अगर यहां पर कांग्रेस भाजपा को आधे पर भी रोक देती है तो भाजपा सांसदों की संख्या 302 से घटकर 258 हो जाएगी, जो पूर्ण बहुमत से 14 कम है. इसके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी भाजपा की सीट कम हो सकती है.
(अमरजीत झा पंजाबी यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म के रिसर्च स्कॉलर है. व्यक्त विचार निजी हैं)
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'भारत जोड़ो यात्रा' कितनी सफल होगी यह दो हज़ार चौबीस लोकसभा चुनाव परिणाम से ही तय हो सकेगा, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इससे कांग्रेस के वोटरों और कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद जगी है. इसलिए यह यात्रा असफल नहीं होगी बशर्ते यह जोश और उत्साह आगे भी बना रहे. तीस जनवरी को भारत जोड़ो यात्रा श्रीनगर में ध्वजारोहण के साथ खत्म हो जाएगी. अब कश्मीर से वापस दिल्ली आने के बाद राहुल गांधी क्या करेंगे और कांग्रेस की रणनीति क्या रहेगी, सारा खेल इसी पर निर्भर करेगा. दो हज़ार चौबीस लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस के लिए परिस्थितियां काफी चुनौती भरी रहने वाली है. इन चुनौतियों को पार करने के बाद ही दो हज़ार चौबीस का रास्ता कुछ आसान बनेगा. पहली चुनौती है- राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बड़ा फेरबदल कर संगठन को मजबूत बनाने की क्योंकि सिर्फ मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने से दो हज़ार चौबीस की राह आसान नहीं होने वाली. कांग्रेस को भाजपा की तरह बूथ स्तर पर अपने संगठन को मजबूत करना होगा. फिर यह तय करना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी कि दो हज़ार चौबीस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले किसे आगे किया जाए. मेरे हिसाब से कांग्रेस को कोई व्यक्ति के बदले भाजपा बनाम कांग्रेस पार्टी के बीच मुकाबला कराने वाली रणनीति पर काम करना चाहिए. वास्तविकता भी है कि भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी की छवि काफी बेहतर हुई है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से राहुल का सीधा मुकाबला कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकता है. दरअसल भाजपा अभी भी यही चाहती है कि कांग्रेस नरेन्द्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को ही आगे करे ताकि वह परिवारवाद और पप्पू के अपने पुराने नैरेटिव को केंद्र में रखकर चुनाव के दौरान कांग्रेस के खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सके. हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश का हालिया बयान मुझे अच्छा लगा. उन्होंने कहा कि 'भारत जोड़ो यात्रा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिए नहीं है. अब गांधी परिवार के कुछ चाटुकार नेताओं को यह बात समझाना होगा, जो चाटुकारिता के चक्कर में बार-बार राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बताते रहते हैं. कांग्रेस के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण काम है- प्रादेशिक नेताओं के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई को खत्म कर इकट्ठे होकर चुनाव लड़ना. यह दो हज़ार तेईस में नौ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है. इनमें से छह राज्य छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है. वहीं भारतीय जनता पार्टी दो हज़ार चौदह के बाद से हमेशा चुनावी मोड में ही रहती है. लाजिम है कि वह लोकसभा का सेमीफाइनल कहे जाने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सोमवार को बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमें दो हज़ार तेईस और दो हज़ार चौबीस का एक भी चुनाव नहीं हारना है. मिजोरम में पिछले चुनाव में कांग्रेस को करीब तीस प्रतिशत वोट मिले थे. वहीं मेघालय में अट्ठाईस. पाँच प्रतिशत वोट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन सरकार नहीं बना सकी थी. छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो कांग्रेस की सरकार है, लेकिन दोनों ही राज्यों में आपसी गुटबाजी चरम पर है. छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टी. एस सिंहदेव के बीच दो हज़ार अट्ठारह में सरकार बनने के बाद से ही विवाद चल रहा है. चुनाव के बाद तय हुआ कि दोनों ढ़ाई-ढ़ाई साल बाद सीएम रहेंगे, लेकिन ढाई साल बाद भी आलाकमान ने भूपेश बघेल को ही मौका दे दिया. अब चुनाव के समय अगर वह इधर-उधर होते हैं तो कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा. राजस्थान में तो पिछले दो साल से लगातार राजनितिक ड्रामा चल रहा है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की तनातनी रोज चर्चा में रहती है. चुनाव तक अगर ऐसा ही चलता रहा तो कांग्रेस की सत्ता हाथ से निकल सकती है. कर्नाटक में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान तो प्रदेश के नेता एक साथ दिखे लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के बीच आपसी खींचतान काफी लंबे समय से चल रहा है. चुनावी विश्लेषकों के अनुसार अगर कर्नाटक में कांग्रेस सही ढंग से चुनाव लड़े तो जीत सकती है क्योंकि यहां बीजेपी में भी आपसी लड़ाई काफी ज्यादा है. बीएस येदुरप्पा मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से काफी नाराज चल रहे हैं. उनकी नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी कर्नाटक से ही आते हैं. इसलिए कर्नाटक कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है. मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार से लोग काफी नाराज हैं, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा उठाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों वाली करीब पच्चीस सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी, जो दो हज़ार बीस में कांग्रेस छोड़कर सिंधिया के साथ भाजपा में चले गए थे. छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में लोकसभा की कुल तिरानवे सीटें हैं. कर्नाटक में तीन-चार सीट जेडीएस वाली छोड़कर करीब नब्बे सीटों पर कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है. दो हज़ार उन्नीस में भाजपा इनमें से सत्तासी सीटों पर जीत हासिल की थी. अगर यहां पर कांग्रेस भाजपा को आधे पर भी रोक देती है तो भाजपा सांसदों की संख्या तीन सौ दो से घटकर दो सौ अट्ठावन हो जाएगी, जो पूर्ण बहुमत से चौदह कम है. इसके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी भाजपा की सीट कम हो सकती है.
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केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि संसद के आने वाले मानसून सत्र में सरकार का प्रत्यक्ष कर संहिता पेश करने का इरादा है। वह केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर सलाहकार समिति को सम्बोधित कर रहे थे।
वित्त मंत्री ने कहा कि उन्होंने अनेक पणधारकों द्वारा अभिव्यक्त नौ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को चिन्हित किया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सभी सम्बंधित क्षेत्रों को संहिता के मसौदे के संशोधन के समय ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि संहिता को शीघ्र ही सार्वजनिक कर दिया जायेगा।
वित्त मंत्री ने समिति को सूचित किया कि चालू वर्ष के दौरान दो और केन्द्रीयकृत संसाधन केन्द्रों (सीपीसी) की स्थापना की जायेगी। बंगलुरू में पहला केन्द्र कर वापसी और बेहतर अभिलेख प्रबंधन के तीव्रतर संसाधन से युक्त है।
श्री मुखर्जी ने आगे कहा कि इस साल प्रत्यर्पण बैंक योजना का विस्तार और शहरों में किया जायेगा। यह योजना सीधे करदाता के बैंक खाते में तेजी से प्रत्यर्पणवापसी की सुविधा से युक्त है। यह योजना पिछले वर्ष नौ और शहरों में शुरू की गयी थी। अब यह 15 शहरों में उपलब्ध है।
वित्त मंत्री ने बताया कि अनेक देशों के साथ कर सम्बंधी सूचना और द्विपक्षीय कर सहयोग के आदान-प्रदान में सुधार के लिए कई कदम उठाये गये हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने सूचना के आदान-प्रदान को और अधिक प्रभावी बनाने और सूचना की गोपनीयता समाप्त करने के लिए 65 देशों को पत्र लिखा है।
श्री मुखर्जी ने यह भी बताया कि बातचीत करने और कर सूचना आदान-प्रदान समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कम या बिना कर वाले 20 देशों को चिन्हित किया गया है।
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केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि संसद के आने वाले मानसून सत्र में सरकार का प्रत्यक्ष कर संहिता पेश करने का इरादा है। वह केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर सलाहकार समिति को सम्बोधित कर रहे थे। वित्त मंत्री ने कहा कि उन्होंने अनेक पणधारकों द्वारा अभिव्यक्त नौ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को चिन्हित किया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सभी सम्बंधित क्षेत्रों को संहिता के मसौदे के संशोधन के समय ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि संहिता को शीघ्र ही सार्वजनिक कर दिया जायेगा। वित्त मंत्री ने समिति को सूचित किया कि चालू वर्ष के दौरान दो और केन्द्रीयकृत संसाधन केन्द्रों की स्थापना की जायेगी। बंगलुरू में पहला केन्द्र कर वापसी और बेहतर अभिलेख प्रबंधन के तीव्रतर संसाधन से युक्त है। श्री मुखर्जी ने आगे कहा कि इस साल प्रत्यर्पण बैंक योजना का विस्तार और शहरों में किया जायेगा। यह योजना सीधे करदाता के बैंक खाते में तेजी से प्रत्यर्पणवापसी की सुविधा से युक्त है। यह योजना पिछले वर्ष नौ और शहरों में शुरू की गयी थी। अब यह पंद्रह शहरों में उपलब्ध है। वित्त मंत्री ने बताया कि अनेक देशों के साथ कर सम्बंधी सूचना और द्विपक्षीय कर सहयोग के आदान-प्रदान में सुधार के लिए कई कदम उठाये गये हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने सूचना के आदान-प्रदान को और अधिक प्रभावी बनाने और सूचना की गोपनीयता समाप्त करने के लिए पैंसठ देशों को पत्र लिखा है। श्री मुखर्जी ने यह भी बताया कि बातचीत करने और कर सूचना आदान-प्रदान समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कम या बिना कर वाले बीस देशों को चिन्हित किया गया है।
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नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्रसंघ ने शनिवार को आरोप लगाया कि पुलिस को 5 जनवरी को हिंसा होने से बहुत पहले भीड़ के जमा होने की सूचना दी गई थी जिसकी उसने अनदेखी की।
जेएनयू छात्रसंघ ने दावा किया, उन्होंने दोपहर 3 बजे इसकी सूचना दी और 3 बजकर 7 मिनट पर पुलिस इसे पढ़ चुकी थी, बावजूद इसकी अनदेखी की गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि छात्राओं और छात्रसंघ पदाधिकारियों पर हमले में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के लोग शामिल हैं।
छात्रसंघ ने कहा कि अभाविप सदस्यों ने 4 जनवरी को भी छात्राओं के साथ मारपीट की थी और जब छात्रसंघ महासचिव सतीशचंद्र यादव ने हस्तक्षेप किया तो उनके साथ भी मारपीट की गई।
छात्रसंघ ने कहा, हमलावरों ने साबरमती छात्रावास के चुनिंदा कमरों को निशाना बनाया और यहां तक किछात्राओं को बालकनी से बाहर फेंक दिया, लेकिन उन्होंने अभाविप कार्यकर्ताओं के कमरों को नहीं छुआ।
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नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ ने शनिवार को आरोप लगाया कि पुलिस को पाँच जनवरी को हिंसा होने से बहुत पहले भीड़ के जमा होने की सूचना दी गई थी जिसकी उसने अनदेखी की। जेएनयू छात्रसंघ ने दावा किया, उन्होंने दोपहर तीन बजे इसकी सूचना दी और तीन बजकर सात मिनट पर पुलिस इसे पढ़ चुकी थी, बावजूद इसकी अनदेखी की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्राओं और छात्रसंघ पदाधिकारियों पर हमले में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग शामिल हैं। छात्रसंघ ने कहा कि अभाविप सदस्यों ने चार जनवरी को भी छात्राओं के साथ मारपीट की थी और जब छात्रसंघ महासचिव सतीशचंद्र यादव ने हस्तक्षेप किया तो उनके साथ भी मारपीट की गई। छात्रसंघ ने कहा, हमलावरों ने साबरमती छात्रावास के चुनिंदा कमरों को निशाना बनाया और यहां तक किछात्राओं को बालकनी से बाहर फेंक दिया, लेकिन उन्होंने अभाविप कार्यकर्ताओं के कमरों को नहीं छुआ।
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इंटर एडमिशन के लिए मंगलवार को छात्रों की भीड़ जबर्दस्त हो गई। कॉलेज के सामने सड़क पर जाम लग गया। कुछ देर के लिए आवागम बाधित हो गया। यह हालत मुख्य सड़कों के पास वाले कॉलेजों के सामने हुई। अघोरिया बाजार, हरिसभा चौक से पानी टंकी चौक जाने वाले रास्ते और दीवान रोड में जाम की स्थिति रही। सोशल डिस्टेंसिंग के कारण कॉलेज कैंपस में एक बार में 15 से 20 छात्रों को ही प्रवेश मिल रहा था। अन्य छात्रों व उनके अभिभावकों को बाहर ही रोका जा रहा था। इसके कारण सड़क पर जाम लगा तो उन्हें संभालना मुश्किल हो गया। नीतीश्वर कॉलेज के सामने पानी टंकी चौक से हरिसभा चौक जाने वाली सड़क में कुछ देर के लिए आवागमन बाधित हो गया। फिर लाइन में खड़ाकर एक-एक करके प्रवेश दिया गया। ऐसा ही हाल लोहिया कॉलेज के पास दीवान रोड में हो गया। आरडीएस कॉलेज, एमपीएस साइंस कॉलेज, आरबीबीएम कॉलेज, रामेश्वर कॉलेज सहित संबद्ध कॉलेजों में भी यही हाल रहा। अभिभावक हेमंत कुमार ने कहा कि बोर्ड या कॉलेज की ओर से एक सूची जारी करनी चाहिए। इसमें यह बता दिया जाता कि किस दिन किस छात्र का एडमिशन होगा। ऐसी व्यवस्था होती तो भीड़ भी नहीं जुटती और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता।
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इंटर एडमिशन के लिए मंगलवार को छात्रों की भीड़ जबर्दस्त हो गई। कॉलेज के सामने सड़क पर जाम लग गया। कुछ देर के लिए आवागम बाधित हो गया। यह हालत मुख्य सड़कों के पास वाले कॉलेजों के सामने हुई। अघोरिया बाजार, हरिसभा चौक से पानी टंकी चौक जाने वाले रास्ते और दीवान रोड में जाम की स्थिति रही। सोशल डिस्टेंसिंग के कारण कॉलेज कैंपस में एक बार में पंद्रह से बीस छात्रों को ही प्रवेश मिल रहा था। अन्य छात्रों व उनके अभिभावकों को बाहर ही रोका जा रहा था। इसके कारण सड़क पर जाम लगा तो उन्हें संभालना मुश्किल हो गया। नीतीश्वर कॉलेज के सामने पानी टंकी चौक से हरिसभा चौक जाने वाली सड़क में कुछ देर के लिए आवागमन बाधित हो गया। फिर लाइन में खड़ाकर एक-एक करके प्रवेश दिया गया। ऐसा ही हाल लोहिया कॉलेज के पास दीवान रोड में हो गया। आरडीएस कॉलेज, एमपीएस साइंस कॉलेज, आरबीबीएम कॉलेज, रामेश्वर कॉलेज सहित संबद्ध कॉलेजों में भी यही हाल रहा। अभिभावक हेमंत कुमार ने कहा कि बोर्ड या कॉलेज की ओर से एक सूची जारी करनी चाहिए। इसमें यह बता दिया जाता कि किस दिन किस छात्र का एडमिशन होगा। ऐसी व्यवस्था होती तो भीड़ भी नहीं जुटती और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता।
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शाहरुख खान बहुत जल्द फिल्म जीरो को दर्शकों के सामने लेकर आ रहे हैं।
शाहरुख खान बहुत जल्द फिल्म जीरो को दर्शकों के सामने लेकर आ रहे हैं। यह फिल्म अगले महीने रिलीज होने वाली हैं। इससे पहले इस फिल्म से जुडी कई खबर सामने आ रही हैं। पिछले दिनों हमने ही आपको बताया था की फिल्म जीरो में रानी मुखर्जी, काजोल, जूही चावला, आलिया भट्ट, करिश्मा कपूर और सलमान खान स्पेशल अपीरियंस करते नजर आने हैं। और तो और हमने अपने दर्शकों को इस बात की भी जानकरी दी थी की दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी भी फिल्म में दिखाई देंगी। लेकिन अब मिल रही जानकारी के मुताबिक, फिल्म जीरो में श्रीदेवी शाहरुख खान के साथ एक स्पेशल सॉन्ग करती नजर आने वाली हैं।
आपको यह भी बता दें, शाहरुख खान ने अभी तक यह छुपाए रखा था की श्रीदेवी भी इस फिल्म का हिस्सा हैं और वो फिल्म में एक सॉन्ग में नजर आने वाली हैं। किंग खान यह भी नहीं चलते की फिल्म रिलीज होने से पहले श्रीदेवी का ये गाना रिलीज किया जाए। शाहरुख खान इसको पूरी तरह से सीक्रेट रखना चाहते हैं । वैसे हम आपको बताना चाहते हैं की जीरो के इस गाने में ना सिर्फ श्रीदेवी बल्कि करिश्मा कपूर और आलिया भट्ट नजर आने वाली हैं। साल 2017 में में करिश्मा कपूर ने एक तस्वीर अपने सोशल मीडिया साइट पर शेयर की थी। इस तस्वीर में करिश्मा के साथ शाहरुख खान, श्रीदेवी और आलिया दिखे थे।
Zero Teaser Twitter Reaction: भाईजान और किंग खान को साथ में झूमते देख दीवाने हो उठे फैन्स, फिल्म को अभी से कहा 'सुपरहिट' !!
खैर, बात अगर फिल्म जीरो की करें तो, फिल्म में कटरीना कैफ और अनुष्का शर्मा भी एहम किरदार में नजर आने वाली है। ये बड़े बजट की फिल्म है। शाहरुख ने अपने जन्मदिन के मौके पर फिल्म का ट्रेलर रिलीज किया था। और तो और हाल ही में 'मेरे नाम तू' गाना दर्शकों के लिए रिलीज किया गया हैं। इसमें अनुष्का और शाहरुख की दमदार केमिस्ट्री नजर आ रही थी। बता दें, जीरो 21 दिसंबर को दर्शकों के सामने होगी।
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शाहरुख खान बहुत जल्द फिल्म जीरो को दर्शकों के सामने लेकर आ रहे हैं। शाहरुख खान बहुत जल्द फिल्म जीरो को दर्शकों के सामने लेकर आ रहे हैं। यह फिल्म अगले महीने रिलीज होने वाली हैं। इससे पहले इस फिल्म से जुडी कई खबर सामने आ रही हैं। पिछले दिनों हमने ही आपको बताया था की फिल्म जीरो में रानी मुखर्जी, काजोल, जूही चावला, आलिया भट्ट, करिश्मा कपूर और सलमान खान स्पेशल अपीरियंस करते नजर आने हैं। और तो और हमने अपने दर्शकों को इस बात की भी जानकरी दी थी की दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी भी फिल्म में दिखाई देंगी। लेकिन अब मिल रही जानकारी के मुताबिक, फिल्म जीरो में श्रीदेवी शाहरुख खान के साथ एक स्पेशल सॉन्ग करती नजर आने वाली हैं। आपको यह भी बता दें, शाहरुख खान ने अभी तक यह छुपाए रखा था की श्रीदेवी भी इस फिल्म का हिस्सा हैं और वो फिल्म में एक सॉन्ग में नजर आने वाली हैं। किंग खान यह भी नहीं चलते की फिल्म रिलीज होने से पहले श्रीदेवी का ये गाना रिलीज किया जाए। शाहरुख खान इसको पूरी तरह से सीक्रेट रखना चाहते हैं । वैसे हम आपको बताना चाहते हैं की जीरो के इस गाने में ना सिर्फ श्रीदेवी बल्कि करिश्मा कपूर और आलिया भट्ट नजर आने वाली हैं। साल दो हज़ार सत्रह में में करिश्मा कपूर ने एक तस्वीर अपने सोशल मीडिया साइट पर शेयर की थी। इस तस्वीर में करिश्मा के साथ शाहरुख खान, श्रीदेवी और आलिया दिखे थे। Zero Teaser Twitter Reaction: भाईजान और किंग खान को साथ में झूमते देख दीवाने हो उठे फैन्स, फिल्म को अभी से कहा 'सुपरहिट' !! खैर, बात अगर फिल्म जीरो की करें तो, फिल्म में कटरीना कैफ और अनुष्का शर्मा भी एहम किरदार में नजर आने वाली है। ये बड़े बजट की फिल्म है। शाहरुख ने अपने जन्मदिन के मौके पर फिल्म का ट्रेलर रिलीज किया था। और तो और हाल ही में 'मेरे नाम तू' गाना दर्शकों के लिए रिलीज किया गया हैं। इसमें अनुष्का और शाहरुख की दमदार केमिस्ट्री नजर आ रही थी। बता दें, जीरो इक्कीस दिसंबर को दर्शकों के सामने होगी। बॉलीवुड, हॉलीवुड, साउथ, भोजपुरी और टीवी जगत की ताजा खबरों के लिए यहां क्लिक करें...बॉलीवुड लाइफ हिन्दी के फेसबुक पेज, ट्विटर पेज, ताजा गॉसिप के लिए हमें Facebook Messenger पर फॉलो करें।
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उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में 180 रुपये के बिल पर विवाद के बाद एक होटल मालिक और उसके वेटर द्वारा 25 वर्षीय एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, पुलिस ने गुरुवार 5 सितंबर को कहा।
पुलिस अधीक्षक राम बदन सिंह ने कहा कि सूरज सिंह और विशाल दुबे को बुधवार, 4 सितंबर को गुरमेल सिंह के साथ बहस करने के बाद लाठी-डंडों से पीटा गया। हालांकि दुबे भागने में सफल रहा, लेकिन सूरज सिंह को पकड़ लिया गया और उसकी पिटाई की गई। उन्होंने कहा कि चोटों के कारण दम तोड़ दिया।
एसपी ने कहा कि यह घटना महराजगंज के पास सरदार ढाबा में हुई और विवाद 180 रुपये के बिल पर था। पुलिस ने यह भी कहा कि होटल के मालिक गुरमेल सिंह और उनके बेटे सुरेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि होटल के दो वेटर बड़े हैं।
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उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक सौ अस्सी रुपयापये के बिल पर विवाद के बाद एक होटल मालिक और उसके वेटर द्वारा पच्चीस वर्षीय एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, पुलिस ने गुरुवार पाँच सितंबर को कहा। पुलिस अधीक्षक राम बदन सिंह ने कहा कि सूरज सिंह और विशाल दुबे को बुधवार, चार सितंबर को गुरमेल सिंह के साथ बहस करने के बाद लाठी-डंडों से पीटा गया। हालांकि दुबे भागने में सफल रहा, लेकिन सूरज सिंह को पकड़ लिया गया और उसकी पिटाई की गई। उन्होंने कहा कि चोटों के कारण दम तोड़ दिया। एसपी ने कहा कि यह घटना महराजगंज के पास सरदार ढाबा में हुई और विवाद एक सौ अस्सी रुपयापये के बिल पर था। पुलिस ने यह भी कहा कि होटल के मालिक गुरमेल सिंह और उनके बेटे सुरेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि होटल के दो वेटर बड़े हैं।
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५. वायुपुराण का रचनाकाल
इतना ही नहीं, वायुपुराण की रचना, उल्लेख, विषयसंगति आदि का विवेचन ऐसे स्वतंत्र प्रमाण हैं जिनके द्वारा इसके महापुराण होने के तथ्य की पर्याप्तरूपेण पुष्टि होती है। वायुपुराण निश्चित रूपेण प्राचीन, तात्रिक प्रभाव से विरहित तथा साप्रदायिक संकीर्णता से नितांत विवर्जित पुराण है, जब कि शिवपुराण अर्वाचीन तात्रिकता से मंडित तथा रौद्री साप्रदायिकता से समग्रतया संपुटित एक उपपुराण की कोटि का ग्रंथ है। इस तथ्य की संपुष्टि दोनों पुराणों के यथाविधि समयनिर्देश के पोषक प्रमाण से की जा सकती है । पठ तथा सममशतक में वायुपुराण की लोकप्रियता का पर्याप्त परिचय हमें उपलब्ध होता है शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य द्वारा तथा बाणभट्ट के दोनी ग्रंथी द्वारा । शंकराचार्य ने पुराण का न तो नामनिर्देश किया है और न पुराण का सामान्य उल्लेग्य ही किया है । वे पुराणस्थ बचनों को 'स्मृतिवचन' मानते हैं, परंतु ये किसी भी स्मृति में उपलब्ध न होकर 'पुराण' में ही उपलब्ध होते हैं - विशेषतः 'वायुपुराण' में । उदाहरणार्थ ब्रह्मसूत्र शाकरभाष्य ( १३२८ ) में "नामरूपे च भूताना' पत्र स्मृतिवचन रूप से उद्धृत है। यह वायुपुराण के हवें अध्याय का ६३ वाँ श्लोक है। इसी प्रकार भाष्य ( १ । ३ । ३० ) में दो पद्य उद्धृत किए गए हैं स्मृतिवचन के रूप मे
तेषां ये यानि कर्माणि प्राफ सृष्टयां प्रतिपेदिरे नाम्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः । हिंस्राहित्रे मृदुक रे धर्माधर्मावृतानृते तद् भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत् तम्य रांचते ।।
अध्याय के ३२ तथा ३३ संख्यक पत्र हैं। ये अगले अध्याय में पुनः उद्धृत किए गए हैं ( ६ ० ५७ तथा ५८ श्लोक ) । इसी भाष्य के अंत में स्मृतिवचन के रूप में तीन पद्य उद्धृत किए गए हैं
ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृप्रयः शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवास्य दघाति सः । यथर्तुष्टतु लिङ्गाति नानारूपाणि पर्यये दृश्यन्ते तानि ताभ्येव यथा भावा युगादिषु ॥ यथामिमानिनोऽतीतास्तुल्यास्ते साम्प्रतै रिह देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च ॥
इन तीनों श्लोकों में से आदि के दोनों श्लोक वायुपुराण में ( ६५ श्लोक) उपलब्ध होते हैं। इन उद्धृत श्लोकों के स्थान का निर्देश आचार्य शंकर
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पाँच. वायुपुराण का रचनाकाल इतना ही नहीं, वायुपुराण की रचना, उल्लेख, विषयसंगति आदि का विवेचन ऐसे स्वतंत्र प्रमाण हैं जिनके द्वारा इसके महापुराण होने के तथ्य की पर्याप्तरूपेण पुष्टि होती है। वायुपुराण निश्चित रूपेण प्राचीन, तात्रिक प्रभाव से विरहित तथा साप्रदायिक संकीर्णता से नितांत विवर्जित पुराण है, जब कि शिवपुराण अर्वाचीन तात्रिकता से मंडित तथा रौद्री साप्रदायिकता से समग्रतया संपुटित एक उपपुराण की कोटि का ग्रंथ है। इस तथ्य की संपुष्टि दोनों पुराणों के यथाविधि समयनिर्देश के पोषक प्रमाण से की जा सकती है । पठ तथा सममशतक में वायुपुराण की लोकप्रियता का पर्याप्त परिचय हमें उपलब्ध होता है शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य द्वारा तथा बाणभट्ट के दोनी ग्रंथी द्वारा । शंकराचार्य ने पुराण का न तो नामनिर्देश किया है और न पुराण का सामान्य उल्लेग्य ही किया है । वे पुराणस्थ बचनों को 'स्मृतिवचन' मानते हैं, परंतु ये किसी भी स्मृति में उपलब्ध न होकर 'पुराण' में ही उपलब्ध होते हैं - विशेषतः 'वायुपुराण' में । उदाहरणार्थ ब्रह्मसूत्र शाकरभाष्य में "नामरूपे च भूताना' पत्र स्मृतिवचन रूप से उद्धृत है। यह वायुपुराण के हवें अध्याय का तिरेसठ वाँ श्लोक है। इसी प्रकार भाष्य में दो पद्य उद्धृत किए गए हैं स्मृतिवचन के रूप मे तेषां ये यानि कर्माणि प्राफ सृष्टयां प्रतिपेदिरे नाम्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः । हिंस्राहित्रे मृदुक रे धर्माधर्मावृतानृते तद् भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत् तम्य रांचते ।। अध्याय के बत्तीस तथा तैंतीस संख्यक पत्र हैं। ये अगले अध्याय में पुनः उद्धृत किए गए हैं । इसी भाष्य के अंत में स्मृतिवचन के रूप में तीन पद्य उद्धृत किए गए हैं ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृप्रयः शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवास्य दघाति सः । यथर्तुष्टतु लिङ्गाति नानारूपाणि पर्यये दृश्यन्ते तानि ताभ्येव यथा भावा युगादिषु ॥ यथामिमानिनोऽतीतास्तुल्यास्ते साम्प्रतै रिह देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च ॥ इन तीनों श्लोकों में से आदि के दोनों श्लोक वायुपुराण में उपलब्ध होते हैं। इन उद्धृत श्लोकों के स्थान का निर्देश आचार्य शंकर
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दोस्तों बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने 14 जून के दिन अपने बांद्रा स्थित फ्लैट में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उनकी आत्महत्या के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले में पुलिस की जांच जारी है। सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद से ही हर कोई यह जानना चाहता है कि वो किस तरह की परेशानी से गुजर रहे थे, जिसके चलते उन्होंने ऐसा फैसला किया था। इस मामले की जांच अभी पुलिस कर रही है और जल्द ही सच सामने आने की उम्मीद है।
बता दे की अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पहली बार आधिकारिक तौर पर मीडिया से बात की है और कई खुलासे किए हैं। सुशांत सिंह राजपूत के पिता केके सिंह ने तड़का बॉलीवुड से बात करते हुए बताया है कि जब वो मुंबई गए थे तब केवल कृति सेनॉन ने उनके पास आकर बात की और उनका दुख साझा किया।
केके सिंह के अनुसार, 'मुंबई में केवल कृति सेनॉन ने मुझसे मुलाकात की थी। वो मेरे पास बैठी और उसने मुझे बातें की। मैं कई लोगों को मास्क के कारण पहचान भी नहीं पा रहा था। उसने सुशांत की तारीफ की और कहा कि वो एक अच्छा इंसान था। 'सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने बात करते हुए यह भी बताया कि उन्हें कभी पता ही नहीं चला कि उनके बेटे ने कब एक्टर बनने का सपना देखना शुरू किया था।
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दोस्तों बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने चौदह जून के दिन अपने बांद्रा स्थित फ्लैट में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उनकी आत्महत्या के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले में पुलिस की जांच जारी है। सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद से ही हर कोई यह जानना चाहता है कि वो किस तरह की परेशानी से गुजर रहे थे, जिसके चलते उन्होंने ऐसा फैसला किया था। इस मामले की जांच अभी पुलिस कर रही है और जल्द ही सच सामने आने की उम्मीद है। बता दे की अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पहली बार आधिकारिक तौर पर मीडिया से बात की है और कई खुलासे किए हैं। सुशांत सिंह राजपूत के पिता केके सिंह ने तड़का बॉलीवुड से बात करते हुए बताया है कि जब वो मुंबई गए थे तब केवल कृति सेनॉन ने उनके पास आकर बात की और उनका दुख साझा किया। केके सिंह के अनुसार, 'मुंबई में केवल कृति सेनॉन ने मुझसे मुलाकात की थी। वो मेरे पास बैठी और उसने मुझे बातें की। मैं कई लोगों को मास्क के कारण पहचान भी नहीं पा रहा था। उसने सुशांत की तारीफ की और कहा कि वो एक अच्छा इंसान था। 'सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने बात करते हुए यह भी बताया कि उन्हें कभी पता ही नहीं चला कि उनके बेटे ने कब एक्टर बनने का सपना देखना शुरू किया था।
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (26 अगस्त 2022) को इस मामले की सुनवाई करते हुए योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार दिया है।
दरअसल, इस मामले में परवेज परवाज नामक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि 27 जनवरी, 2007 को गोरखपुर में 'हिंदू युवा वाहिनी' के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिम विरोधी अभद्र टिप्पणी की थी। हालाँकि जाँच हुई तो योगी आदित्यनाथ के खिलाफ केस चलाने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
इससे पहले, राज्य सरकार ने मई, 2017 में हेट स्पीच मामले में योगी आदित्यनाथ पर मुकदमा दर्ज करने की अनुमति देने से मना कर दिया था। इसके बाद, परवेज ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मगर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी फरवरी, 2018 में इस याचिका को खारिज कर दिया था।
इसके बाद, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हेट स्पीच मामले में योगी आदित्यनाथ पर मुकदमा दर्ज करने की अनुमति देने वाली याचिका को आरोपों और पेश किए गए तथ्यों को कमजोर मानते हुए खारिज कर दिया है।
दरअसल, 27 जनवरी 2007 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की थी। इस हिंसा में 2 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य घायल हुए थे। इस दंगे के बाद तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ, विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल, गोरखपुर की मेयर अंजू चौधरी पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाया गया था।
इस मामले में यह कहा गया था कि इन नेताओं के भड़काऊ भाषण के कारण ही गोरखपुर में दंगा भड़का था। इसके बाद, योगी आदित्यनाथ समेत विधायक व मेयर पर धारा 153, 153ए, 153बी, 295, 295बी, 147, 143, 395, 436, 435, 302, 427, 452 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार दिया है। दरअसल, इस मामले में परवेज परवाज नामक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि सत्ताईस जनवरी, दो हज़ार सात को गोरखपुर में 'हिंदू युवा वाहिनी' के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिम विरोधी अभद्र टिप्पणी की थी। हालाँकि जाँच हुई तो योगी आदित्यनाथ के खिलाफ केस चलाने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इससे पहले, राज्य सरकार ने मई, दो हज़ार सत्रह में हेट स्पीच मामले में योगी आदित्यनाथ पर मुकदमा दर्ज करने की अनुमति देने से मना कर दिया था। इसके बाद, परवेज ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मगर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी फरवरी, दो हज़ार अट्ठारह में इस याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हेट स्पीच मामले में योगी आदित्यनाथ पर मुकदमा दर्ज करने की अनुमति देने वाली याचिका को आरोपों और पेश किए गए तथ्यों को कमजोर मानते हुए खारिज कर दिया है। दरअसल, सत्ताईस जनवरी दो हज़ार सात को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की थी। इस हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य घायल हुए थे। इस दंगे के बाद तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ, विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल, गोरखपुर की मेयर अंजू चौधरी पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाया गया था। इस मामले में यह कहा गया था कि इन नेताओं के भड़काऊ भाषण के कारण ही गोरखपुर में दंगा भड़का था। इसके बाद, योगी आदित्यनाथ समेत विधायक व मेयर पर धारा एक सौ तिरेपन, एक सौ तिरेपनए, एक सौ तिरेपनबी, दो सौ पचानवे, दो सौ पचानवेबी, एक सौ सैंतालीस, एक सौ तैंतालीस, तीन सौ पचानवे, चार सौ छत्तीस, चार सौ पैंतीस, तीन सौ दो, चार सौ सत्ताईस, चार सौ बावन आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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बीजू जनता दल के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सदस्य लडू किशोर स्वैन का लंबी बीमारी के बाद यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 71 वर्ष के थे।
पारिवारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। स्वैन के परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी हैं।
सूत्रों ने बताया कि ओडिशा के अस्का लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजद नेता किडनी की बीमारी से पीड़ित थे। मंगलवार रात उनका निधन हो गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और कई अन्य नेताओं ने स्वैन के निधन पर शोक व्यक्त किया है।
पटनायक ने अपने शोक संदेश में स्वैन को एक सक्षम सांसद बताया है जो राज्य विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।
ओडिशा विधानसभा ने स्वैन के निधन पर शोक व्यक्त किया और कुछ पल का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
स्वैन 2014 में अस्का लोकसभा क्षेत्र से बीजद उम्मीदवार के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए थे।
इससे पहले, वह 2004 में गंजाम जिले के कबीसुर्या नगर विधानसभा क्षेत्र से बीजद के टिकट पर राज्य विधानसभा के लिए निर्वाचित हुये थे।
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बीजू जनता दल के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सदस्य लडू किशोर स्वैन का लंबी बीमारी के बाद यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह इकहत्तर वर्ष के थे। पारिवारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। स्वैन के परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी हैं। सूत्रों ने बताया कि ओडिशा के अस्का लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले बीजद नेता किडनी की बीमारी से पीड़ित थे। मंगलवार रात उनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और कई अन्य नेताओं ने स्वैन के निधन पर शोक व्यक्त किया है। पटनायक ने अपने शोक संदेश में स्वैन को एक सक्षम सांसद बताया है जो राज्य विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। ओडिशा विधानसभा ने स्वैन के निधन पर शोक व्यक्त किया और कुछ पल का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। स्वैन दो हज़ार चौदह में अस्का लोकसभा क्षेत्र से बीजद उम्मीदवार के रूप में लोकसभा के लिए चुने गए थे। इससे पहले, वह दो हज़ार चार में गंजाम जिले के कबीसुर्या नगर विधानसभा क्षेत्र से बीजद के टिकट पर राज्य विधानसभा के लिए निर्वाचित हुये थे। हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें। Read the latest and breaking Hindi news on amarujala. com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala. com to get all the latest Hindi news updates as they happen.
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- 5 min ago जब बिग बी के साथ रानी मुखर्जी ने दे दिया था लिप लॉक सीन, बोलीं- 'अमिताभ अंकल के साथ किसिंग सीन देना बहुत...'
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शिल्पा शेट्टी की निकम्मा का ट्रेलर आउट, इंटरनेट पर तूफान आया!
शिल्पा शेट्टी को 70 MM पर देखने के लिए फैंस ने सांस रोककर इंतजार किया है। अब, निकम्मा रिलीज होने में कुछ ही हफ्ते बचे हैं, बड़े पर्दे पर सुपरस्टार की बड़ी वापसी के लिए इंतजार ने उत्साह बड़ा दिया है, उत्साह को डबल करने के लिए, फिल्म के निर्माताओं ने आज ट्रेलर लॉन्च किया, जो इंटरनेट पर धूम मचा रहा है। निकम्मा ट्रेलर शिल्पा शेट्टी को अवनि के रुप में पहले कभी नहीं देखे गए अवतार में दिखाता है।
'सलमान खान चाहते थे कि मेरे बच्चे हों', कृष्णा अभिषेक ने किया बड़ा खुलासा!
एक्शन रोमांटिक कॉमेडी में शिल्पा शेट्टी एक अभिनेत्री के रूप में खुद के विभिन्न पहलुओं की खोज करेंगी और ट्रेलर ने पहले ही सभी की रुचि को बढ़ा दिया है। शिल्पा शेट्टी ने अपने सोशल मीडिया पर निकम्मा का ट्रेलर पोस्ट किया।
उन्होंने लिखा, "निकम्मा होना एक कला है? माय फुट ! अब देखो ये अवनि कैसी लगाती है इसकी वाट! सब्बीर खान निर्देशित निकम्मा में शिल्पा शेट्टी के साथ अभिमन्यु दसानी, शर्ली सेतिया, सुनील ग्रोवर, नरेन कुमार और दीपराज राणा नजर आएंगे।
सोनी पिक्चर्स और शब्बीर खान फिल्म्स द्वारा निर्मित, निकम्मा 17 जून 2022 को रिलीज होने के लिए तैयार है। काफी समय के बाद शिल्पा शेट्टी किसी फिल्म का हिस्सा बनने वाली हैं।
ऐसा कहा जा रहा है कि शिल्पा शेट्टी की ये वापसी काफी कमाल की होने वाली है। अभिनेता अभिमन्यु दसानी के साथ उनको काफी पसंद किया जा रहा है।
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- पाँच मिनट ago जब बिग बी के साथ रानी मुखर्जी ने दे दिया था लिप लॉक सीन, बोलीं- 'अमिताभ अंकल के साथ किसिंग सीन देना बहुत...' Don't Miss! शिल्पा शेट्टी की निकम्मा का ट्रेलर आउट, इंटरनेट पर तूफान आया! शिल्पा शेट्टी को सत्तर MM पर देखने के लिए फैंस ने सांस रोककर इंतजार किया है। अब, निकम्मा रिलीज होने में कुछ ही हफ्ते बचे हैं, बड़े पर्दे पर सुपरस्टार की बड़ी वापसी के लिए इंतजार ने उत्साह बड़ा दिया है, उत्साह को डबल करने के लिए, फिल्म के निर्माताओं ने आज ट्रेलर लॉन्च किया, जो इंटरनेट पर धूम मचा रहा है। निकम्मा ट्रेलर शिल्पा शेट्टी को अवनि के रुप में पहले कभी नहीं देखे गए अवतार में दिखाता है। 'सलमान खान चाहते थे कि मेरे बच्चे हों', कृष्णा अभिषेक ने किया बड़ा खुलासा! एक्शन रोमांटिक कॉमेडी में शिल्पा शेट्टी एक अभिनेत्री के रूप में खुद के विभिन्न पहलुओं की खोज करेंगी और ट्रेलर ने पहले ही सभी की रुचि को बढ़ा दिया है। शिल्पा शेट्टी ने अपने सोशल मीडिया पर निकम्मा का ट्रेलर पोस्ट किया। उन्होंने लिखा, "निकम्मा होना एक कला है? माय फुट ! अब देखो ये अवनि कैसी लगाती है इसकी वाट! सब्बीर खान निर्देशित निकम्मा में शिल्पा शेट्टी के साथ अभिमन्यु दसानी, शर्ली सेतिया, सुनील ग्रोवर, नरेन कुमार और दीपराज राणा नजर आएंगे। सोनी पिक्चर्स और शब्बीर खान फिल्म्स द्वारा निर्मित, निकम्मा सत्रह जून दो हज़ार बाईस को रिलीज होने के लिए तैयार है। काफी समय के बाद शिल्पा शेट्टी किसी फिल्म का हिस्सा बनने वाली हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि शिल्पा शेट्टी की ये वापसी काफी कमाल की होने वाली है। अभिनेता अभिमन्यु दसानी के साथ उनको काफी पसंद किया जा रहा है।
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आगरा। नगर निगम की गाडि़यों में डीजल भरने के नाम पर चल खेल की जांच करने शनिवार सुबह मेयर इन्द्रजीत सिंह आर्य गांधी नगर स्थित पेट्रोल पंप पर पहुंचे। मौके पर मौजूद निगम के ट्रॉला और ट्रैक्टर चालकों से पूछताछ की।
मेयर ने पेट्रोल पंप पर रिकॉर्ड चेक किया। उसके बाद ड्राइवरों से पूछताछ की। पूछताछ में सही जवाब न देने पर मेयर ने कर्मचारी यूनियन के उपाध्यक्ष व ड्राइवर राजीव चौहान को लताड़ लगाई। निर्देशित किया कि डीजल चोरी पर ड्राइवर व पेट्रोल पंप संचालक के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
नोट- फोटो मेघ सिंह भाई से प्राप्त करें।
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आगरा। नगर निगम की गाडि़यों में डीजल भरने के नाम पर चल खेल की जांच करने शनिवार सुबह मेयर इन्द्रजीत सिंह आर्य गांधी नगर स्थित पेट्रोल पंप पर पहुंचे। मौके पर मौजूद निगम के ट्रॉला और ट्रैक्टर चालकों से पूछताछ की। मेयर ने पेट्रोल पंप पर रिकॉर्ड चेक किया। उसके बाद ड्राइवरों से पूछताछ की। पूछताछ में सही जवाब न देने पर मेयर ने कर्मचारी यूनियन के उपाध्यक्ष व ड्राइवर राजीव चौहान को लताड़ लगाई। निर्देशित किया कि डीजल चोरी पर ड्राइवर व पेट्रोल पंप संचालक के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। नोट- फोटो मेघ सिंह भाई से प्राप्त करें।
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अडाणी समूह की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है. सुप्रीम कोर्ट में एक के बाद एक चार जनहित याचिकाएं दायर की जा चुकी है, जिसपर शुक्रवार को सुनवाई होने की उम्मीद है. सीजेआई ने चौथी जनहित याचिका को भी स्वीकार किया है.
अमेरिकी कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा अडाणी समूह की कपंनियों पर धोखाधड़ी और शेयर की कीमतों में फेरबदल करने के लगाए आरोपों की किसी समिति या उच्चतम न्यायालय के रिटायर्ड जजों की देखरेख में बहु केंद्रीय एजेंसियों से जांच कराने के अनुरोध वाली एक और जनहित याचिका गुरुवार को कोर्ट में दायर की गई है. अडाणी समूह के खिलाफ जांच की मांग को लेकर यह चौथी याचिका है. तीन याचिकाओं पर कोर्ट में पहले से ही दायर है, जिसपर सुनवाई होना है.
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच अडाणी समूह के शेयरों की कीमत में कथित तौर पर कृत्रिम तरीके से गिरावट कर निवेशकों का शोषण करने के आरोप संबंधी तीन जनहित याचिकाओं को स्वीकार की थी और उन्हें शुक्रवार को सुनवाई के लिए लिस्ट करने का निर्देश दिया है. केंद्र सरकार ने हिंडनबर्ग द्वारा धोखाधड़ी के लगाए गए आरोपों के बाद अडाणी समूह के शेयरों में आई भारी गिरावट के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के उस सुझाव को स्वीकार किया, जिसमें बाजार नियामक व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने को कहा गया था.
चौथी जनहित याचिका खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाले मुकेश कुमार ने अपने वकीलों रूपेश सिंह भदौरिया और महेश प्रवीर सहाय के जरिये दाखिल कराई है. वकील भदौरिया भारतीय युवा कांग्रेस के विधि प्रकोष्ठ के भी प्रमुख हैं. याचिका में अनुरोध किया गया है कि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ), कंपनी रजिस्ट्रार, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से धन शोधन की पहलू, आयकर विभाग ने टैक्स चोरी के पनाहगाह देशों में ऑफशोर लेनदेन और डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस से उचित ऑडिट (लेनदेन और फॉरेंसिक ऑडिट), जांच का निर्देश जाए.
जांच में केंद्र और एजेंसियों को सहयोग करने का निर्देश देने का अनुरोध करते हुए अदालत से गुजारिश की गई है कि निगरानी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों या समिति की नियुक्ति जांच की जाए. गौरतलब है कि इससे पहले वकील एमएल शर्मा, विशाल तिवारी और कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने भी अडाणी-हिंडनबर्ग विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.
(भाषा इनपुट के साथ)
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अडाणी समूह की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है. सुप्रीम कोर्ट में एक के बाद एक चार जनहित याचिकाएं दायर की जा चुकी है, जिसपर शुक्रवार को सुनवाई होने की उम्मीद है. सीजेआई ने चौथी जनहित याचिका को भी स्वीकार किया है. अमेरिकी कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा अडाणी समूह की कपंनियों पर धोखाधड़ी और शेयर की कीमतों में फेरबदल करने के लगाए आरोपों की किसी समिति या उच्चतम न्यायालय के रिटायर्ड जजों की देखरेख में बहु केंद्रीय एजेंसियों से जांच कराने के अनुरोध वाली एक और जनहित याचिका गुरुवार को कोर्ट में दायर की गई है. अडाणी समूह के खिलाफ जांच की मांग को लेकर यह चौथी याचिका है. तीन याचिकाओं पर कोर्ट में पहले से ही दायर है, जिसपर सुनवाई होना है. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच अडाणी समूह के शेयरों की कीमत में कथित तौर पर कृत्रिम तरीके से गिरावट कर निवेशकों का शोषण करने के आरोप संबंधी तीन जनहित याचिकाओं को स्वीकार की थी और उन्हें शुक्रवार को सुनवाई के लिए लिस्ट करने का निर्देश दिया है. केंद्र सरकार ने हिंडनबर्ग द्वारा धोखाधड़ी के लगाए गए आरोपों के बाद अडाणी समूह के शेयरों में आई भारी गिरावट के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के उस सुझाव को स्वीकार किया, जिसमें बाजार नियामक व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने को कहा गया था. चौथी जनहित याचिका खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाले मुकेश कुमार ने अपने वकीलों रूपेश सिंह भदौरिया और महेश प्रवीर सहाय के जरिये दाखिल कराई है. वकील भदौरिया भारतीय युवा कांग्रेस के विधि प्रकोष्ठ के भी प्रमुख हैं. याचिका में अनुरोध किया गया है कि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय , कंपनी रजिस्ट्रार, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड , प्रवर्तन निदेशालय से धन शोधन की पहलू, आयकर विभाग ने टैक्स चोरी के पनाहगाह देशों में ऑफशोर लेनदेन और डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस से उचित ऑडिट , जांच का निर्देश जाए. जांच में केंद्र और एजेंसियों को सहयोग करने का निर्देश देने का अनुरोध करते हुए अदालत से गुजारिश की गई है कि निगरानी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों या समिति की नियुक्ति जांच की जाए. गौरतलब है कि इससे पहले वकील एमएल शर्मा, विशाल तिवारी और कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने भी अडाणी-हिंडनबर्ग विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.
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मेष राशिफल (Aries Rashifal)
जरूरी नहीं है कि जैसा आप सोचते हैं अन्य लोग भी वहीं राय रखते हों. इसीलिए आज किसी भी रूप में अपने विचार दूसरों पर थोपने की कोशिश ना करें.
वृष राशिफल (Taurus Rashifal)
हो सकता है आज आप अपने काम की गति को लेकर परेशान रहें. लेकिन परेशान होने से कोई फायदा नहीं है. आप बस अपने काम पर ध्यान दें.
मिथुन राशिफल (Gemini Rashifal)
आज आपको भावनात्मक समर्थन की जरूरत पड़ सकती है. आज किसी ऐसे दोस्त से मिलने की कोशिश करें जो आपके बेहद निकट है.
कर्क राशिफल (Cancer Rashifal)
आज आप स्वयं अपने विचारों और आदर्शों को लेकर दुविधा में रह सकते हैं. शांत मन से काम लेना आपके लिए फायदेमंद रहेगा.
सिंह राशिफल (Leo Rashifal)
आज आपको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. मानसिक तौर पर पहले से ही तैयार रहें.
कन्या राशिफल (Virgo Rashifal)
बीते समय से जुड़ी कुछ अच्छी बुरी यादें आज आपको थोड़ा परेशान कर सकती हैं.
तुला राशिफल (Libra Rashifal)
किसी खास व्यक्ति से आज आपकी मुलाकात जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है.
वृश्चिक राशिफल (Scorpio Rashifal)
काम से संबंधित जिन योजनाओं का निर्माण आप कर चुके हैं आज उन पर अमल करने का समय है.
धनु राशिफल (Sagittarius Rashifal)
आज कोई ऐसा व्यक्ति आपके जीवन में दोबारा आ सकता है जिसे आप बहुत पहले ही भुला चुके हैं.
मकर राशिफल (Capricorn Rashifal)
आज बिना पढ़े किसी भी अनुबंध पर साइन ना करें. हो सकता है आज आपको कोई धोखा देने की कोशिश करें.
कुंभ राशिफल (Aquarius Rashifal)
आज कोई आपके काम में मुश्किलें पैदा करने की कोशिश कर सकता है. लेकिन अगर आप अपनी कड़ी मेहनत को कायम रखेंगे तो फिर ऐसी मुश्किलों का सामना करना आसान हो जाएगा.
मीन राशिफल (Pisces Rashifal)
आज आपको अपने परिवार या कार्यक्षेत्र से जुड़ी कोई खुशखबरी मिल सकती है.
Daily Rashifal for 16 January, 2012 on Jagran Horoscope Blog.
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मेष राशिफल जरूरी नहीं है कि जैसा आप सोचते हैं अन्य लोग भी वहीं राय रखते हों. इसीलिए आज किसी भी रूप में अपने विचार दूसरों पर थोपने की कोशिश ना करें. वृष राशिफल हो सकता है आज आप अपने काम की गति को लेकर परेशान रहें. लेकिन परेशान होने से कोई फायदा नहीं है. आप बस अपने काम पर ध्यान दें. मिथुन राशिफल आज आपको भावनात्मक समर्थन की जरूरत पड़ सकती है. आज किसी ऐसे दोस्त से मिलने की कोशिश करें जो आपके बेहद निकट है. कर्क राशिफल आज आप स्वयं अपने विचारों और आदर्शों को लेकर दुविधा में रह सकते हैं. शांत मन से काम लेना आपके लिए फायदेमंद रहेगा. सिंह राशिफल आज आपको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. मानसिक तौर पर पहले से ही तैयार रहें. कन्या राशिफल बीते समय से जुड़ी कुछ अच्छी बुरी यादें आज आपको थोड़ा परेशान कर सकती हैं. तुला राशिफल किसी खास व्यक्ति से आज आपकी मुलाकात जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है. वृश्चिक राशिफल काम से संबंधित जिन योजनाओं का निर्माण आप कर चुके हैं आज उन पर अमल करने का समय है. धनु राशिफल आज कोई ऐसा व्यक्ति आपके जीवन में दोबारा आ सकता है जिसे आप बहुत पहले ही भुला चुके हैं. मकर राशिफल आज बिना पढ़े किसी भी अनुबंध पर साइन ना करें. हो सकता है आज आपको कोई धोखा देने की कोशिश करें. कुंभ राशिफल आज कोई आपके काम में मुश्किलें पैदा करने की कोशिश कर सकता है. लेकिन अगर आप अपनी कड़ी मेहनत को कायम रखेंगे तो फिर ऐसी मुश्किलों का सामना करना आसान हो जाएगा. मीन राशिफल आज आपको अपने परिवार या कार्यक्षेत्र से जुड़ी कोई खुशखबरी मिल सकती है. Daily Rashifal for सोलह जनवरीuary, दो हज़ार बारह on Jagran Horoscope Blog.
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रांची। झारखंड में जल जीवन मिशन और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन (ग्रामीण)जैसी योजनाओं को धरातल पर उतारने में अहम किरदार निभा रही जल सहिया को अब Smart Phone दिया जाएगा। साथ ही इन्हें स्काई ब्लू कलर की दो साड़ी भी दी जाएगी। जिससे इनकी पहचान सुनिश्चित होगी। यह फैसला पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के द्वारा ली गई है और विभाग के सचिव मनीष रंजन की ओर से संकल्प जारी कर दिया गया है।
जारी संकल्प में यह बताया गया है कि जल सहिया को Smart Phone और 2 स्काई ब्लू साड़ी में दी जायेगी। Smart Phone इनके कामों को देखते हुए महत्वपूर्ण हो गया था। क्योंकि जल जीवन मिशन और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन के अनुसार निर्धारित मासिक कार्यों को झार जल मोबाइल एप्स के माध्यम से एंट्री अपलोड करने का कार्य जल सहिया का है। पर इनके पास Smart Phone ना होने की वजह से कार्य में बाधा रही थी। जिसे देखते हुए यह फैसला लिया गया हैं।
जारी सूचना के मुताबिक पेयजल स्वच्छता विभाग की ओर से जल सहिया को 12000 रुपए का Smart Phone दिया जाएगा। यह Smart Phone के डाटा का खर्च सहिया को स्वयं ही वहन करना होगा। इसके अतिरिक्त यदि किसी जल सहिया को निकाला जाता है या स्वयं त्यागपत्र देती है तो Smart Phone विभाग को लौटाना भी होगा। वही, दो साड़ी वर्ष में मिलेगी, जिसकी मूल्य प्रत्येक साड़ी 600 रुपए होगी, यह स्काई ब्लू कलर की होगी। स्मार्टफोन और साड़ी पर कुल 39. 07 करोड रुपए का खर्च होगा।
जल जीवन मिशन और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन को धरातल पर उतारना और पूर्ण करने में जल सहिया की बहुत जरूरी किरदार रहती है। सरकार की तरफ से 2024 तक राज्य के प्रत्येक गांव में नल से जल की सुविधा बहाल करने का लक्ष्य रखा गया है और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन के अनुसार राज्य के 29604 गांव में ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन पर बड़े पैमाने पर कार्य किया जा रहा है। इसके आधार पर ही गांव को ओडीएफ प्लस घोषित किया जाएगा। इसमें झार जल मोबाइल ऐप के माध्यम से इन योजनाओं के कार्यों की प्रगति का मूल्यांकन और देखरेख किया जाएगा। इन ऐप के जरिए एंट्री और डाटा अपलोड करने का काम जल सहिया का होगा।
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रांची। झारखंड में जल जीवन मिशन और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन जैसी योजनाओं को धरातल पर उतारने में अहम किरदार निभा रही जल सहिया को अब Smart Phone दिया जाएगा। साथ ही इन्हें स्काई ब्लू कलर की दो साड़ी भी दी जाएगी। जिससे इनकी पहचान सुनिश्चित होगी। यह फैसला पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के द्वारा ली गई है और विभाग के सचिव मनीष रंजन की ओर से संकल्प जारी कर दिया गया है। जारी संकल्प में यह बताया गया है कि जल सहिया को Smart Phone और दो स्काई ब्लू साड़ी में दी जायेगी। Smart Phone इनके कामों को देखते हुए महत्वपूर्ण हो गया था। क्योंकि जल जीवन मिशन और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन के अनुसार निर्धारित मासिक कार्यों को झार जल मोबाइल एप्स के माध्यम से एंट्री अपलोड करने का कार्य जल सहिया का है। पर इनके पास Smart Phone ना होने की वजह से कार्य में बाधा रही थी। जिसे देखते हुए यह फैसला लिया गया हैं। जारी सूचना के मुताबिक पेयजल स्वच्छता विभाग की ओर से जल सहिया को बारह हज़ार रुपयापए का Smart Phone दिया जाएगा। यह Smart Phone के डाटा का खर्च सहिया को स्वयं ही वहन करना होगा। इसके अतिरिक्त यदि किसी जल सहिया को निकाला जाता है या स्वयं त्यागपत्र देती है तो Smart Phone विभाग को लौटाना भी होगा। वही, दो साड़ी वर्ष में मिलेगी, जिसकी मूल्य प्रत्येक साड़ी छः सौ रुपयापए होगी, यह स्काई ब्लू कलर की होगी। स्मार्टफोन और साड़ी पर कुल उनतालीस. सात करोड रुपए का खर्च होगा। जल जीवन मिशन और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन को धरातल पर उतारना और पूर्ण करने में जल सहिया की बहुत जरूरी किरदार रहती है। सरकार की तरफ से दो हज़ार चौबीस तक राज्य के प्रत्येक गांव में नल से जल की सुविधा बहाल करने का लक्ष्य रखा गया है और स्वच्छ हिंदुस्तान मिशन के अनुसार राज्य के उनतीस हज़ार छः सौ चार गांव में ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन पर बड़े पैमाने पर कार्य किया जा रहा है। इसके आधार पर ही गांव को ओडीएफ प्लस घोषित किया जाएगा। इसमें झार जल मोबाइल ऐप के माध्यम से इन योजनाओं के कार्यों की प्रगति का मूल्यांकन और देखरेख किया जाएगा। इन ऐप के जरिए एंट्री और डाटा अपलोड करने का काम जल सहिया का होगा।
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एलन मस्क (Elon Musk) के कमान संभालने के बाद से ही ट्विटर (Twitter) के कमर्चारियों पर की रेल बननी शुरू हो गई है। जब से वो आये है जैसे मानों लोगों का जीना हराम सा हो गया है। जहां सबसे पहले आते ही ट्विटर के सीईओ पराग अग्रवाल और अन्य अहम पद पर बैठे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। तो इस बीच लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही है कि एलन मस्क अब ट्विटर में काम कर रहे कर्मचारियों में से आधे को बाहर का रास्ता दिखाने की प्लानिंग कर रहे हैं। हालांकि मस्क सार्वजनिक मंच से इन सभी खबरों को नकार रहे थे। लेकिन अब कंपनी के इंटरनल मेल में साफ कह दिया गया है कि आज यानी शुक्रवार से छंटनी शुरू हो जाएगी।
जी हां, आज कंपनी ने अपने सभी कर्मचारियों को ईमेल (Gmail) भेजकर यह बताया है कि उनकी नौकरी रहेगी या नहीं इसकी जानकारी उन्हें मेल के जरिए दी जाएगी। इसके साथ ही कर्मचारियों को शुक्रवार को ऑफिस आने से मना किया गया है। अपने मेल के जरिए ट्विटर ने कर्मचारियों से कहा, 'अगर आप ऑफिस में हैं या ऑफिस के रास्ते में हैं तो घर लौट जाइए।
गौरतलब है, 27 अक्टूबर 2022 को एलन मस्क ने ट्विटर (Twitter) के साथ डील पूरी करते ही सोशल मीडिया कंपनी को टेकओवर कर लिया था। इसके बाद से सबसे पहले कंपनी के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों की छुट्टी की। इसमें कंपनी के पूर्व सीईओ पराग अग्रवाल (Parag Agarwal), सीएफओ रहे नेड सेगल (Ned Segal), और कंपनी की लीगल पॉलिसी, ट्रस्ट और सेफ्टी विभाग की हेड रहीं विजया गड्डे (Vijaya Gadde) का नाम शामिल है। एलन मस्क ने ट्विटर को खरीदने के लिए 44 बिलियन डॉलर की डील की है। अब वह अपने पैसों को वसूलने के लिए कंपनी में बड़ी लेवल पर छंटनी कर रहे हैं, जिससे कंपनी को प्रॉफिटेबल बनाया जा सके।
इस पूरे मामले पर जानकारी देते हुए AFP न्यूज एजेंसी ने बताया कि ट्विटर ने कंपनी के कर्मचारियों को शुक्रवार को ऑफिस आने से साफ मना किया है। इसके साथ ही उन्हें यह जानकारी दी है कि उन्हें नौकरी पर रखा जाएगा या नहीं इसकी जानकारी केवल मेल से दी जाएगी। अगर किसी ट्विटर इंप्लाई की नौकरी सुरक्षित है तो उसे कंपनी के ईमेल पर मैसेज मिलेगी। वहीं जिन लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है उन्हें उनके पर्सनल ईमेल आईडी के जरिए मैसेज भेजा जाएगा। इस मेल के मिलने के बाद से ही कंपनी के कर्मचारियों के बीच बेचैनी और अनिश्चितता का माहौल है।
इस मेल के सामने आने के बाद इस खबर पर मुहर लग रही है कि कंपनी अपने कॉस्ट कटिंग के लिए अपने आधे कर्मचारियों को नौकरी से निकालने जा रही है। गौरतलब है कि पिछले लंबे वक्त से मीडिया में यह दावा किया जा रहा था कि एलन मस्क (Elon Musk) ट्विटर में करीब 50% लोगों की छंटनी कर सकते हैं। कंपनी द्वारा यह कदम कंपनी को नुकसान से फायदे में लाने के लिए उठाया जा रहा है।
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एलन मस्क के कमान संभालने के बाद से ही ट्विटर के कमर्चारियों पर की रेल बननी शुरू हो गई है। जब से वो आये है जैसे मानों लोगों का जीना हराम सा हो गया है। जहां सबसे पहले आते ही ट्विटर के सीईओ पराग अग्रवाल और अन्य अहम पद पर बैठे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। तो इस बीच लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही है कि एलन मस्क अब ट्विटर में काम कर रहे कर्मचारियों में से आधे को बाहर का रास्ता दिखाने की प्लानिंग कर रहे हैं। हालांकि मस्क सार्वजनिक मंच से इन सभी खबरों को नकार रहे थे। लेकिन अब कंपनी के इंटरनल मेल में साफ कह दिया गया है कि आज यानी शुक्रवार से छंटनी शुरू हो जाएगी। जी हां, आज कंपनी ने अपने सभी कर्मचारियों को ईमेल भेजकर यह बताया है कि उनकी नौकरी रहेगी या नहीं इसकी जानकारी उन्हें मेल के जरिए दी जाएगी। इसके साथ ही कर्मचारियों को शुक्रवार को ऑफिस आने से मना किया गया है। अपने मेल के जरिए ट्विटर ने कर्मचारियों से कहा, 'अगर आप ऑफिस में हैं या ऑफिस के रास्ते में हैं तो घर लौट जाइए। गौरतलब है, सत्ताईस अक्टूबर दो हज़ार बाईस को एलन मस्क ने ट्विटर के साथ डील पूरी करते ही सोशल मीडिया कंपनी को टेकओवर कर लिया था। इसके बाद से सबसे पहले कंपनी के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों की छुट्टी की। इसमें कंपनी के पूर्व सीईओ पराग अग्रवाल , सीएफओ रहे नेड सेगल , और कंपनी की लीगल पॉलिसी, ट्रस्ट और सेफ्टी विभाग की हेड रहीं विजया गड्डे का नाम शामिल है। एलन मस्क ने ट्विटर को खरीदने के लिए चौंतालीस बिलियन डॉलर की डील की है। अब वह अपने पैसों को वसूलने के लिए कंपनी में बड़ी लेवल पर छंटनी कर रहे हैं, जिससे कंपनी को प्रॉफिटेबल बनाया जा सके। इस पूरे मामले पर जानकारी देते हुए AFP न्यूज एजेंसी ने बताया कि ट्विटर ने कंपनी के कर्मचारियों को शुक्रवार को ऑफिस आने से साफ मना किया है। इसके साथ ही उन्हें यह जानकारी दी है कि उन्हें नौकरी पर रखा जाएगा या नहीं इसकी जानकारी केवल मेल से दी जाएगी। अगर किसी ट्विटर इंप्लाई की नौकरी सुरक्षित है तो उसे कंपनी के ईमेल पर मैसेज मिलेगी। वहीं जिन लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है उन्हें उनके पर्सनल ईमेल आईडी के जरिए मैसेज भेजा जाएगा। इस मेल के मिलने के बाद से ही कंपनी के कर्मचारियों के बीच बेचैनी और अनिश्चितता का माहौल है। इस मेल के सामने आने के बाद इस खबर पर मुहर लग रही है कि कंपनी अपने कॉस्ट कटिंग के लिए अपने आधे कर्मचारियों को नौकरी से निकालने जा रही है। गौरतलब है कि पिछले लंबे वक्त से मीडिया में यह दावा किया जा रहा था कि एलन मस्क ट्विटर में करीब पचास% लोगों की छंटनी कर सकते हैं। कंपनी द्वारा यह कदम कंपनी को नुकसान से फायदे में लाने के लिए उठाया जा रहा है।
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ध्वज दूसरा होगा, वह न होगा। प्रथम शिखरध्वज जब पोड़श वर्ष का राजकुमार था, तब एक समय शिकार को निकला । वसन्त ऋतु का समय था, राजा अपने बाग में जा ठहरा, जहाँ फूलों के विचित्र कुंजभवन बने हुए थे । कमलिनियाँ मानों स्त्रियाँ और धूलि के कण उनके भूषण थे। उनके समीप पुष्पवृक्ष लगे थे। इसी प्रकार भँवरी और भँवरों की सुन्दर लीला देख राजा को विचार उपजा कि मुझे स्त्री प्राप्त हो तो मैं भी केलि करूँ । निदान उसे अधिक चिन्तना हुई कि कब मुझे स्त्री मिलेगी और कब उसके साथ फूल की शय्या पर शयन करूंगा । जब राजा इस प्रकार भोग का चिन्तन करने लगा, तव मन्त्रियों ने, जो त्रिकाल ज्ञान रखते थे और राजा के शरीर की अवस्था जानते थे, जाना कि हमारे राजा का मन स्त्री पर है. इससे अब राजा का विवाह करना चाहिए निदान एक राजा की कन्या जो बहुत सुन्दरी थी और वर चाहती थी, उससे राजा शिखरध्वज का विवाह शास्त्र की विधि से किया गया और राजा बहुत प्रसन्न होकर अपने घर आया ।
उस स्त्री का नाम चुड़ाला था। वह बहुत सुन्दरी थी। उससे राजा की बहुत प्रीति हुई और उस स्त्री का भी राजा से बहुत स्नेह हुआ । जो कुछ राजा मन में चाहता, वह रानी पहिले ही पूरा कर देती थी। उनकी परस्पर प्रीति ऐसी बढ़ी, जैसे भँवरे और भँवरी में होती है । एक समय राजा मन्त्रियों को राज्य का भार सौंपकर वन को गया और वहाँ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए दोनों ऐसे विचरते रहे, जैसे सदाशिव और पार्वती या विष्णु और लक्ष्मी विचरें। इसके पश्चात् राजा योगकला सीखने लगे। इधर रानी राजा को भोगकला सिखाती थी । इसी प्रकार वे दोनों सम्पूर्ण कलाओं में पारंगत हुए। चुड़ाला की बुद्धि राजा की बुद्धि से तीक्ष्ण थी । वह शीघ्र ही सब बातें जान लेती और राजा को सिखाती थी ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वज चुड़ालोपाख्यानं नाम पटपष्टितमस्सर्गः ॥ ६६ ॥
वशिष्ठजी बोले. हे राम! इसी प्रकार जब राजा और रानी ने अनंत भोग भोगे तो जैसे कुम्भ में छिद्र होने से शनैः शनैः जल निकलता है. वैसे ही शनैः शनैः उनके यौवन के दिन निकल गये। जब वृद्धावस्था आई, तब राजा और रानी को वैराग्य उत्पन्न हुआ। वैराग्य से वे यह विचारने लगे कि यह संसार मिथ्या और विनाशी है. एक सा नहीं रहता और ये भोग भी मिथ्या हैं। इतने काल तक हम इन्हें भोगते रहे, पर तृष्णा पूर्ण न हुई - बढ़ती ही गई। हे राम! इस प्रकार राजा और रानी वैराग्य से विचारते रहे कि ये भोग मिथ्या हैं और हमारी यौवन अवस्था भी व्यतीत हो गई है। जैसे बिजली का चमत्कार क्षणमात्र होकर बीत जाता है, वैसे ही उनकी यौवन अवस्था व्यतीत हो गई और मृत्यु निकट आई है। जैसे नदी का वेग नीचे चला जाता है, वैसे ही आयु व्यतीत हो जाती है और जैसे हाथ पर जल डालने से वह जाता है, वैसे ही यौवन अवस्था निवृत्त हो जाती है। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं. वैसे ही यह शरीर क्षणभंगुर है। जहाँ चित्त जाता है. वहाँ दुःख भी इसके साथ जाते हैं - निवृत्त नहीं होते। जैसे मांग के टुकड़े के पीछे चील दौड़ती है, वैसे ही जहाँ अज्ञान है, वहीं दुःख भी पीछे जाते हैं। यह शरीर भी नष्ट हो जायगा । जैसे पका हुआ आम का फल वृक्ष के साथ नहीं रहता. गिर पड़ता है. जैसे ही शरीर भी नष्ट हो जाता है। जो शरीर अवश्य गिरता है उसका क्या आमरा करना है। जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही यह शरीर गिर पड़ता है। इससे हम ऐसा कुछ करें कि संसाररूपी रोग निवृत्त हो। यह संसाररूपीरोग ब्रह्मविद्या की औषध से निवृत्त होता है; ब्रह्मविद्या से ज्ञान उपजता है और आत्मज्ञान से सब दुःख निवृत्त हो जाते हैं। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं। इसलिए आत्मज्ञान के निमित्त हम सन्तों के पास जायँ ।
ऐसे विचार करके राजा और चुड़ाला आत्मज्ञानियों के पास चले । वे आत्मज्ञान की बातें करते थे और आत्मज्ञान में ही चित्तभावना कर
आपस में उसी का विचार और चर्चा करते थे । निदान वे ऐसे सन्तों के पास पहुँचे, जो संसारसमुद्र से तारनेवाले और आत्मज्ञानी थे उनकी पूजा करके उन्होंने उनसे प्रश्न किया । राजा और रानी उनसे ब्रह्मविद्या सुनने लगे कि आत्मा शुद्ध, आनन्दरूप. चैतन्य और एक है. जिसके पाने से दुःख निवृत्त हो जाते हैं। हे राम! तब रानी चुड़ाला तत्त्व विचार में लग गई। वह राजा की कोई सेवा टहल करती तब भी उसके चित्त की वृत्ति विचार ही में रहती थी। वह यह विचारती कि मैं क्या हूँ ? यह संसार क्या है और संसार की उत्पत्ति किससे है ? ऐसे विचार कर वह जानने लगी कि यह शरीर पञ्चतत्त्व का है अतएव में शरीर नहीं हूँ, शरीर जड़ है और कर्म इन्द्रियाँ भी जड़ हैं। जैसे शरीर है, वैसे ही शरीर के अङ्ग भी हैं। ये चेष्टा ज्ञान-इन्द्रियों से करते हैं। ज्ञान- इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि ये भी जड़ हैं, स्वयं कुछ नहीं कर सकतीं । मन से इन्द्रियों की चेष्टा होती है, सो मन भी जड़ है, इसमें संकल्प विकल्प बुद्धि से होता है। बुद्धि भी जड़ है; क्योंकि उसमें निश्चय की चेतना अहंकार से होती है । और अहंकार भी जड़ है, क्योंकि उसमें अहं चेतना से होती है। वह चेतनता जीव से होती है । वह जीव भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि जीवत्व स्फुरणरूप है और मेरा स्वरूप वासनाहीन, सदा उदय रूप और सन्मात्र है। मेरा बड़ा सौभाग्य है और कल्याण होनेवाला है, इसी से चिरकाल के उपरान्त मैंने अपना स्वरूप पाया है जो अविनाशी, अनन्त और आत्मा है। जैसे शरत् काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही में निर्मल विगतज्वर, राग-द्वेषरूपी ताप रहित, चिन्मात्र और अहं त्वं से रहित हूँ। मुझमं कोई वासना नहींः इसी से शान्तरूप हूँ। जैसे क्षीरसमुद्र मन्दराचल के हटने से शान्तरूप है, वैसे ही मैं चित्त से रहित, निश्चल और अद्भुत हूँ । कभी मेरा स्वरूप परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता । ऐसा जो चिन्मात्रपद है, उसको ब्रह्म ज्ञानियों ने ब्रह्म परमात्मा और चैतन्य संज्ञा दी है । यह आत्मा ही मन, बुद्धि आदिक दृश्य और संसाररूप होकर फैला है। यह स्वरूप में अच्युत है। चित्त के चेतने से इसमें नाना
आकार भामित होते हैं, पर वे सब रूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं । जैसे बड़े पर्वत के जो पत्थर और बट्टे होते हैं. वे पर्वत से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह दृश्य आत्मा से भिन्न नहीं है। ये आकार ऐसे हैं जैसे गन्धर्वनगर नाना आकार का हो भामित होता है, पर ज्ञानवान को एकरस है और अज्ञानी को भेद-भावना है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलोने हाथी घोड़ा, राजा. प्रजा आदि बनाता है और जिसको मृत्तिका का ज्ञान है उसको मृत्तिका ही वे सच भासित होते हैं, भिन्नकुछ नहीं प्रतीत होता, वैसे ही अज्ञान से नानारूप भासित होते हैं । अब मैंने जाना है कि मैं एकरम हूँ ।
हे राम ! इस प्रकार चुड़ाला अपने को जानने लगी कि मैं सन्मात्र, अच्छेद्य, अदाद्य स्वच्छ अक्षर और निर्मल हूँ। मुझम 'अहं' 'त्वं' 'क' और 'द्वैत' शब्द कोई नहीं. और जन्म मरण भी नहीं, यह संसार चित्त से भासित होता है. वास्तव में आत्मस्वरूप है। देवता, यक्ष राक्षस, स्थावर जङ्गम आदि सव आत्मरूप हैं। जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से कोई वस्तु भिन्न नहीं । दृश्य, द्रष्टा, दर्शन ये भी आत्मा की सत्ता से चेतन हैं. इसकी अपने आपसे सत्ता नहीं है। मुझमें अहं का उत्थान कदापि नहीं होगा. क्योंकि में अपने आपमें स्थित हूँ। अब इसी पद का आश्रय करके चिरकाल इस संसार में विचरूंगी ।
इति श्री योगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चुडालाप्रवोधो नाम सप्तपष्टितम सर्गः ॥ ६७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! फिर चुड़ाला, जिसकी तृष्णा निवृत्त हो गई थी और जो दुःख, भय और भोगवासना से निवृत्त होकर केवल शान्तपद को पाकर शोभित हुई थी. पाने योग्य पद पाकर जानने लगी कि इतने काल तक में अपने स्वरूप में गिरी थीः अब मुझे शान्ति मिली है और सब दुःख मिट गये हैं। अब मुझे कुछ ग्रहण और त्याग नहीं करना है अब में अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुई हूँ निदान एकान्त में बैठ उसने समाधि लगाई जैसे वृद्ध गऊ पर्वत की कन्दरा पाकर तृण
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ध्वज दूसरा होगा, वह न होगा। प्रथम शिखरध्वज जब पोड़श वर्ष का राजकुमार था, तब एक समय शिकार को निकला । वसन्त ऋतु का समय था, राजा अपने बाग में जा ठहरा, जहाँ फूलों के विचित्र कुंजभवन बने हुए थे । कमलिनियाँ मानों स्त्रियाँ और धूलि के कण उनके भूषण थे। उनके समीप पुष्पवृक्ष लगे थे। इसी प्रकार भँवरी और भँवरों की सुन्दर लीला देख राजा को विचार उपजा कि मुझे स्त्री प्राप्त हो तो मैं भी केलि करूँ । निदान उसे अधिक चिन्तना हुई कि कब मुझे स्त्री मिलेगी और कब उसके साथ फूल की शय्या पर शयन करूंगा । जब राजा इस प्रकार भोग का चिन्तन करने लगा, तव मन्त्रियों ने, जो त्रिकाल ज्ञान रखते थे और राजा के शरीर की अवस्था जानते थे, जाना कि हमारे राजा का मन स्त्री पर है. इससे अब राजा का विवाह करना चाहिए निदान एक राजा की कन्या जो बहुत सुन्दरी थी और वर चाहती थी, उससे राजा शिखरध्वज का विवाह शास्त्र की विधि से किया गया और राजा बहुत प्रसन्न होकर अपने घर आया । उस स्त्री का नाम चुड़ाला था। वह बहुत सुन्दरी थी। उससे राजा की बहुत प्रीति हुई और उस स्त्री का भी राजा से बहुत स्नेह हुआ । जो कुछ राजा मन में चाहता, वह रानी पहिले ही पूरा कर देती थी। उनकी परस्पर प्रीति ऐसी बढ़ी, जैसे भँवरे और भँवरी में होती है । एक समय राजा मन्त्रियों को राज्य का भार सौंपकर वन को गया और वहाँ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए दोनों ऐसे विचरते रहे, जैसे सदाशिव और पार्वती या विष्णु और लक्ष्मी विचरें। इसके पश्चात् राजा योगकला सीखने लगे। इधर रानी राजा को भोगकला सिखाती थी । इसी प्रकार वे दोनों सम्पूर्ण कलाओं में पारंगत हुए। चुड़ाला की बुद्धि राजा की बुद्धि से तीक्ष्ण थी । वह शीघ्र ही सब बातें जान लेती और राजा को सिखाती थी । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वज चुड़ालोपाख्यानं नाम पटपष्टितमस्सर्गः ॥ छयासठ ॥ वशिष्ठजी बोले. हे राम! इसी प्रकार जब राजा और रानी ने अनंत भोग भोगे तो जैसे कुम्भ में छिद्र होने से शनैः शनैः जल निकलता है. वैसे ही शनैः शनैः उनके यौवन के दिन निकल गये। जब वृद्धावस्था आई, तब राजा और रानी को वैराग्य उत्पन्न हुआ। वैराग्य से वे यह विचारने लगे कि यह संसार मिथ्या और विनाशी है. एक सा नहीं रहता और ये भोग भी मिथ्या हैं। इतने काल तक हम इन्हें भोगते रहे, पर तृष्णा पूर्ण न हुई - बढ़ती ही गई। हे राम! इस प्रकार राजा और रानी वैराग्य से विचारते रहे कि ये भोग मिथ्या हैं और हमारी यौवन अवस्था भी व्यतीत हो गई है। जैसे बिजली का चमत्कार क्षणमात्र होकर बीत जाता है, वैसे ही उनकी यौवन अवस्था व्यतीत हो गई और मृत्यु निकट आई है। जैसे नदी का वेग नीचे चला जाता है, वैसे ही आयु व्यतीत हो जाती है और जैसे हाथ पर जल डालने से वह जाता है, वैसे ही यौवन अवस्था निवृत्त हो जाती है। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं. वैसे ही यह शरीर क्षणभंगुर है। जहाँ चित्त जाता है. वहाँ दुःख भी इसके साथ जाते हैं - निवृत्त नहीं होते। जैसे मांग के टुकड़े के पीछे चील दौड़ती है, वैसे ही जहाँ अज्ञान है, वहीं दुःख भी पीछे जाते हैं। यह शरीर भी नष्ट हो जायगा । जैसे पका हुआ आम का फल वृक्ष के साथ नहीं रहता. गिर पड़ता है. जैसे ही शरीर भी नष्ट हो जाता है। जो शरीर अवश्य गिरता है उसका क्या आमरा करना है। जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही यह शरीर गिर पड़ता है। इससे हम ऐसा कुछ करें कि संसाररूपी रोग निवृत्त हो। यह संसाररूपीरोग ब्रह्मविद्या की औषध से निवृत्त होता है; ब्रह्मविद्या से ज्ञान उपजता है और आत्मज्ञान से सब दुःख निवृत्त हो जाते हैं। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं। इसलिए आत्मज्ञान के निमित्त हम सन्तों के पास जायँ । ऐसे विचार करके राजा और चुड़ाला आत्मज्ञानियों के पास चले । वे आत्मज्ञान की बातें करते थे और आत्मज्ञान में ही चित्तभावना कर आपस में उसी का विचार और चर्चा करते थे । निदान वे ऐसे सन्तों के पास पहुँचे, जो संसारसमुद्र से तारनेवाले और आत्मज्ञानी थे उनकी पूजा करके उन्होंने उनसे प्रश्न किया । राजा और रानी उनसे ब्रह्मविद्या सुनने लगे कि आत्मा शुद्ध, आनन्दरूप. चैतन्य और एक है. जिसके पाने से दुःख निवृत्त हो जाते हैं। हे राम! तब रानी चुड़ाला तत्त्व विचार में लग गई। वह राजा की कोई सेवा टहल करती तब भी उसके चित्त की वृत्ति विचार ही में रहती थी। वह यह विचारती कि मैं क्या हूँ ? यह संसार क्या है और संसार की उत्पत्ति किससे है ? ऐसे विचार कर वह जानने लगी कि यह शरीर पञ्चतत्त्व का है अतएव में शरीर नहीं हूँ, शरीर जड़ है और कर्म इन्द्रियाँ भी जड़ हैं। जैसे शरीर है, वैसे ही शरीर के अङ्ग भी हैं। ये चेष्टा ज्ञान-इन्द्रियों से करते हैं। ज्ञान- इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि ये भी जड़ हैं, स्वयं कुछ नहीं कर सकतीं । मन से इन्द्रियों की चेष्टा होती है, सो मन भी जड़ है, इसमें संकल्प विकल्प बुद्धि से होता है। बुद्धि भी जड़ है; क्योंकि उसमें निश्चय की चेतना अहंकार से होती है । और अहंकार भी जड़ है, क्योंकि उसमें अहं चेतना से होती है। वह चेतनता जीव से होती है । वह जीव भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि जीवत्व स्फुरणरूप है और मेरा स्वरूप वासनाहीन, सदा उदय रूप और सन्मात्र है। मेरा बड़ा सौभाग्य है और कल्याण होनेवाला है, इसी से चिरकाल के उपरान्त मैंने अपना स्वरूप पाया है जो अविनाशी, अनन्त और आत्मा है। जैसे शरत् काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही में निर्मल विगतज्वर, राग-द्वेषरूपी ताप रहित, चिन्मात्र और अहं त्वं से रहित हूँ। मुझमं कोई वासना नहींः इसी से शान्तरूप हूँ। जैसे क्षीरसमुद्र मन्दराचल के हटने से शान्तरूप है, वैसे ही मैं चित्त से रहित, निश्चल और अद्भुत हूँ । कभी मेरा स्वरूप परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता । ऐसा जो चिन्मात्रपद है, उसको ब्रह्म ज्ञानियों ने ब्रह्म परमात्मा और चैतन्य संज्ञा दी है । यह आत्मा ही मन, बुद्धि आदिक दृश्य और संसाररूप होकर फैला है। यह स्वरूप में अच्युत है। चित्त के चेतने से इसमें नाना आकार भामित होते हैं, पर वे सब रूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं । जैसे बड़े पर्वत के जो पत्थर और बट्टे होते हैं. वे पर्वत से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह दृश्य आत्मा से भिन्न नहीं है। ये आकार ऐसे हैं जैसे गन्धर्वनगर नाना आकार का हो भामित होता है, पर ज्ञानवान को एकरस है और अज्ञानी को भेद-भावना है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलोने हाथी घोड़ा, राजा. प्रजा आदि बनाता है और जिसको मृत्तिका का ज्ञान है उसको मृत्तिका ही वे सच भासित होते हैं, भिन्नकुछ नहीं प्रतीत होता, वैसे ही अज्ञान से नानारूप भासित होते हैं । अब मैंने जाना है कि मैं एकरम हूँ । हे राम ! इस प्रकार चुड़ाला अपने को जानने लगी कि मैं सन्मात्र, अच्छेद्य, अदाद्य स्वच्छ अक्षर और निर्मल हूँ। मुझम 'अहं' 'त्वं' 'क' और 'द्वैत' शब्द कोई नहीं. और जन्म मरण भी नहीं, यह संसार चित्त से भासित होता है. वास्तव में आत्मस्वरूप है। देवता, यक्ष राक्षस, स्थावर जङ्गम आदि सव आत्मरूप हैं। जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से कोई वस्तु भिन्न नहीं । दृश्य, द्रष्टा, दर्शन ये भी आत्मा की सत्ता से चेतन हैं. इसकी अपने आपसे सत्ता नहीं है। मुझमें अहं का उत्थान कदापि नहीं होगा. क्योंकि में अपने आपमें स्थित हूँ। अब इसी पद का आश्रय करके चिरकाल इस संसार में विचरूंगी । इति श्री योगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चुडालाप्रवोधो नाम सप्तपष्टितम सर्गः ॥ सरसठ ॥ वशिष्ठजी बोले, हे राम! फिर चुड़ाला, जिसकी तृष्णा निवृत्त हो गई थी और जो दुःख, भय और भोगवासना से निवृत्त होकर केवल शान्तपद को पाकर शोभित हुई थी. पाने योग्य पद पाकर जानने लगी कि इतने काल तक में अपने स्वरूप में गिरी थीः अब मुझे शान्ति मिली है और सब दुःख मिट गये हैं। अब मुझे कुछ ग्रहण और त्याग नहीं करना है अब में अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुई हूँ निदान एकान्त में बैठ उसने समाधि लगाई जैसे वृद्ध गऊ पर्वत की कन्दरा पाकर तृण
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मेने निवेदन किया कि मे सदैव वियोगी रहा हूँ । फिर भी वस्ल शब्दका प्रयोग करता तो कलाममे कृत्रिमता श्रा जाती जो शाइरीके लिए उचित नही । मेरे ओठ प्यारेके कपोलो तक कभी नही पहुँचे । मेरे प्रेमकी उमगे प्यारेकी चौखटपर चुम्वन देनेतक सीमित रही। मेरे यहाॅ 'रकीब' शब्द भी नही है, क्योकि मेरी प्रियतमा केवल मेरी प्रियतमा है । त मेरा कोई रकीब और उर्दू नही । ]
प्रेममें तल्लीनता ---
नजर आते है वोह हर वक्त आगोशे-तसव्वुर में । हमारे दिलमें रहकर हमसे पर्दा हो नहीं सकता ॥ उन्हींका जलवए-रअना' है मंजूरे नजर' ऐ 'दिल' ! कोई उनके सिवा दिलको तमन्ना हो नहीं सकता ॥ दरियाए-मुहब्बतमें पहुँचाये खुदा तह तक । डूबेगी जहाँ किश्ती अपना वही साहिल है । किसीकी स्तु इक मुकाम ऐसा भी आता है। जहाँ मंजिल तो क्या अपना निशॉ ऐ 'दिल' नहीं मिलता ।। तलाशे-दोस्त कुजा, आर्जूए-दीद कुजा । हमें तो उम्र हुई अपनी आर्जू करते ॥ गुम हूँ इस बेखुदीकी मंजिलमे । रहनुमा है न कोई महरमे-राज ॥
इन हदोंसे गुजर चुका है दिल । अब नही शिकवए-नशेबो-फराज ॥
'चिन्तन, ध्यानमे; `कमनीयरूप; आँखोकी स्वीकृति ; खोजमे; "आत्म-लीनताकी स्थितिमे; मार्ग-दर्शक; "भेदोसे परिचित, पतन और उत्थानकी शिकायत ।
जिन्दाँको क़द केली, सहराकी खाक छानी । गुजरा हूँ उन हदोसे, दया जाने अब कहाँ हूँ ? खुढी मिटे तो खुदा मिलेसुद्दआ वर आयेगा, जब खाक हो जायेंगे हम । इसका यह मतलब कि गुम होकर उन्हें पायेंगे हम । इन्तहावे-जुस्तजूमें खो गये होशो-हवास । पूछते है राह हर गुम करदए-मंजिलसे हम ।।
रन्त प्रेमीकी वह स्थिति हो जाती है कि वह अपने प्यारेकी राहमे भटकता फिरे, स्वय उसका प्यारा उसके समीप या जाता है । भिलनीकी झोपडीमे जब 'राम' पहुँच सकते हैं, तव प्रास्तानए-यारके खिचनेकी प्राशा 'दिल' क्यों न करे ?
मुहब्वतके जज्बात समभूं मुकम्मल । खिच आये जबीं तक तेरा आस्ताना ॥
और जब जज्वए-इश्ककी वदोलत प्रास्ताना नसीब हुआ तो फर्तेमसर्रतसेसर अपना है, किसीके आस्ताँ पर । जबीने इज्ज पहुँची आस्माँ पर ।।
[प्यारेके प्रास्ताँपर नत मस्तक होते हुए प्रतीत हो रहा था कि हमारा मस्तक आस्मानकी सरहदोको छू रहा है । ज़र्र-ए-नाचीज आफ़ताब बन रहा है।]
जब प्रेमीके द्वारे तक प्यारा चला आया, तब दुईभाव और पका
काम क्या ?
'जेलखानेकी; जगलकी; मार्ग भटके हुए से ।
उठ गया पर्दए-हाइल फ़कत इतना है खयाल । क्या कहें जलवा गाहे-नाजमें फिर क्या देखा ॥
[ पर्दा उठा, फ़कत इतना खयाल (होश ) है । उसके जलवेमे क्या देखा ? कैसे कहे, क्योकर कहे ? ]
हम क्या बतायें क्या थी, तेरी निगहकी गदिश । इक वज्दकी-सी हालत पहरों रहीं हमारी ॥ हज़रते - 'दिल' बताये भी तो नहीं बता सकते । गुडका स्वाद गूंगा कैसे बताये ? जल्वेके अनुरूप वाणी कहाँसे लाये ? और वाणी हो भी तो वह मुखरित कैसे हो ? उसने तो कुछ देखा नही और जिन नेत्रोने देखा वे वाक्-शक्ति कहांसे लाये ?
एक वार जलवा देखनेपर प्रेमीकी यही इच्छा रहती है, कि जलवा वार-वार देखे । उसका प्यारा उसके सम्मुख सदैव रहे, उसे वह एक टक निहारा करे-हर दम है उसी महवे-तगाफ़ुलका तसव्वुर । इश्क और किसी कामके क़ाबिल नहीं रखता ॥
इश्क खुद बहुत बड़ा काम है । हर वक़्त उसीमे महव रहना होता हे ।' प्यारेके चिन्तनके अतिरिक्त और भी कुछ करने योग्य है, यह प्रेमीको सुध ही कब आती है और यही सुध-बुध तमे वह स्थिति ला देती है कि प्यारा पासमे न होते हुए भी यही आभास होता है कि वह समीप बैठा हुआ है ----
वहम बातिल था, मगर वह मंजरे- ऐशो-निशात । पहलु -ए- आशिकम हँगासे-सहर कोई न था ॥
१ "आठ पहर भीनो रहे प्रेम कहावे सोय" -कबीर
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मेने निवेदन किया कि मे सदैव वियोगी रहा हूँ । फिर भी वस्ल शब्दका प्रयोग करता तो कलाममे कृत्रिमता श्रा जाती जो शाइरीके लिए उचित नही । मेरे ओठ प्यारेके कपोलो तक कभी नही पहुँचे । मेरे प्रेमकी उमगे प्यारेकी चौखटपर चुम्वन देनेतक सीमित रही। मेरे यहाॅ 'रकीब' शब्द भी नही है, क्योकि मेरी प्रियतमा केवल मेरी प्रियतमा है । त मेरा कोई रकीब और उर्दू नही । ] प्रेममें तल्लीनता --- नजर आते है वोह हर वक्त आगोशे-तसव्वुर में । हमारे दिलमें रहकर हमसे पर्दा हो नहीं सकता ॥ उन्हींका जलवए-रअना' है मंजूरे नजर' ऐ 'दिल' ! कोई उनके सिवा दिलको तमन्ना हो नहीं सकता ॥ दरियाए-मुहब्बतमें पहुँचाये खुदा तह तक । डूबेगी जहाँ किश्ती अपना वही साहिल है । किसीकी स्तु इक मुकाम ऐसा भी आता है। जहाँ मंजिल तो क्या अपना निशॉ ऐ 'दिल' नहीं मिलता ।। तलाशे-दोस्त कुजा, आर्जूए-दीद कुजा । हमें तो उम्र हुई अपनी आर्जू करते ॥ गुम हूँ इस बेखुदीकी मंजिलमे । रहनुमा है न कोई महरमे-राज ॥ इन हदोंसे गुजर चुका है दिल । अब नही शिकवए-नशेबो-फराज ॥ 'चिन्तन, ध्यानमे; `कमनीयरूप; आँखोकी स्वीकृति ; खोजमे; "आत्म-लीनताकी स्थितिमे; मार्ग-दर्शक; "भेदोसे परिचित, पतन और उत्थानकी शिकायत । जिन्दाँको क़द केली, सहराकी खाक छानी । गुजरा हूँ उन हदोसे, दया जाने अब कहाँ हूँ ? खुढी मिटे तो खुदा मिलेसुद्दआ वर आयेगा, जब खाक हो जायेंगे हम । इसका यह मतलब कि गुम होकर उन्हें पायेंगे हम । इन्तहावे-जुस्तजूमें खो गये होशो-हवास । पूछते है राह हर गुम करदए-मंजिलसे हम ।। रन्त प्रेमीकी वह स्थिति हो जाती है कि वह अपने प्यारेकी राहमे भटकता फिरे, स्वय उसका प्यारा उसके समीप या जाता है । भिलनीकी झोपडीमे जब 'राम' पहुँच सकते हैं, तव प्रास्तानए-यारके खिचनेकी प्राशा 'दिल' क्यों न करे ? मुहब्वतके जज्बात समभूं मुकम्मल । खिच आये जबीं तक तेरा आस्ताना ॥ और जब जज्वए-इश्ककी वदोलत प्रास्ताना नसीब हुआ तो फर्तेमसर्रतसेसर अपना है, किसीके आस्ताँ पर । जबीने इज्ज पहुँची आस्माँ पर ।। [प्यारेके प्रास्ताँपर नत मस्तक होते हुए प्रतीत हो रहा था कि हमारा मस्तक आस्मानकी सरहदोको छू रहा है । ज़र्र-ए-नाचीज आफ़ताब बन रहा है।] जब प्रेमीके द्वारे तक प्यारा चला आया, तब दुईभाव और पका काम क्या ? 'जेलखानेकी; जगलकी; मार्ग भटके हुए से । उठ गया पर्दए-हाइल फ़कत इतना है खयाल । क्या कहें जलवा गाहे-नाजमें फिर क्या देखा ॥ [ पर्दा उठा, फ़कत इतना खयाल है । उसके जलवेमे क्या देखा ? कैसे कहे, क्योकर कहे ? ] हम क्या बतायें क्या थी, तेरी निगहकी गदिश । इक वज्दकी-सी हालत पहरों रहीं हमारी ॥ हज़रते - 'दिल' बताये भी तो नहीं बता सकते । गुडका स्वाद गूंगा कैसे बताये ? जल्वेके अनुरूप वाणी कहाँसे लाये ? और वाणी हो भी तो वह मुखरित कैसे हो ? उसने तो कुछ देखा नही और जिन नेत्रोने देखा वे वाक्-शक्ति कहांसे लाये ? एक वार जलवा देखनेपर प्रेमीकी यही इच्छा रहती है, कि जलवा वार-वार देखे । उसका प्यारा उसके सम्मुख सदैव रहे, उसे वह एक टक निहारा करे-हर दम है उसी महवे-तगाफ़ुलका तसव्वुर । इश्क और किसी कामके क़ाबिल नहीं रखता ॥ इश्क खुद बहुत बड़ा काम है । हर वक़्त उसीमे महव रहना होता हे ।' प्यारेके चिन्तनके अतिरिक्त और भी कुछ करने योग्य है, यह प्रेमीको सुध ही कब आती है और यही सुध-बुध तमे वह स्थिति ला देती है कि प्यारा पासमे न होते हुए भी यही आभास होता है कि वह समीप बैठा हुआ है ---- वहम बातिल था, मगर वह मंजरे- ऐशो-निशात । पहलु -ए- आशिकम हँगासे-सहर कोई न था ॥ एक "आठ पहर भीनो रहे प्रेम कहावे सोय" -कबीर
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आपकी जानकारी के लिए हम आपको बता दें कि यह मामला बिहार के बेगमपुर बीन टोला का है. जहां एक बाप बेटी के रिश्ते को शर्मसार कर दिया क्या. दरअसल बिहार के एक पिता ने अपने ही बेटे के साथ गद्दारी कर दी और उसकी बहु पर डोरे डाल कर उससे शादी रचा ली. जब बेटों को अपने बाप की इस करतूत का पता चला तो वह गुस्से में पागल हो गया. जिसके बाद उसने पुलिस से मदद मांगी. पुलिस ने मामले की कार्रवाई के चलते उसके पिता को जेल में बंद कर दिया. परंतु हद तब पार हो गई जब उस बेटे के बाप की नई दुल्हन ने जीने मरने की कसम खाते हुए अपने पति को छुड़ाने के लिए मांग रख दी.
जब महिला को उसके नई पति के जेल जाने की खबर मिली तो वह पुलिस थाने पहुंचकर जोर जोर से रोने लग गई. साथ ही मैं पुलिस को कहने लग गई कि "इसको छोड़ दो. हम एक साथ जियेंगे और एक साथ ही मरेंगे". ऐसा सुन कर पूरा थाना चौंक गया. भला प्यार में इतना भी क्या पागलपन कि सभी रिश्ते नातों की शर्म ही भूल जाये. इस औरत का पहला पति था फिर भी इसने उसी के बाप से संबंध बना कर शादी कर ली ऐसा मामला शायद आपने पहले कभी नही देखा या सुना होगा.
शायद इसीलिए कहा जाता है कि ये कलयुग का दौर है. यहां लोगों को अपने रिश्ते नातों की भी परवाह नही रही है. अब लोग बाप समान लोगों से शादी रचा रहे है तो दूसरी और बाप समान युवक भी अपनी ही बहु बेटियों ओर गंदी नज़रें टिकाये रखते हैं. आज की नई पीढ़ी को शशर्म लिहाज़ जैसी चीज़ ही नहीं रही. ऐसे लोग हमारे भारतीय समाज पर एक कलंक हैं जो हमारे भारत को दिनों दिन खोखला कर रहे हैं. माना प्यार गलत नही है मगर, इसके लिए एक हद भी होती है, जिसको पार करना बहुत गलत है.
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आपकी जानकारी के लिए हम आपको बता दें कि यह मामला बिहार के बेगमपुर बीन टोला का है. जहां एक बाप बेटी के रिश्ते को शर्मसार कर दिया क्या. दरअसल बिहार के एक पिता ने अपने ही बेटे के साथ गद्दारी कर दी और उसकी बहु पर डोरे डाल कर उससे शादी रचा ली. जब बेटों को अपने बाप की इस करतूत का पता चला तो वह गुस्से में पागल हो गया. जिसके बाद उसने पुलिस से मदद मांगी. पुलिस ने मामले की कार्रवाई के चलते उसके पिता को जेल में बंद कर दिया. परंतु हद तब पार हो गई जब उस बेटे के बाप की नई दुल्हन ने जीने मरने की कसम खाते हुए अपने पति को छुड़ाने के लिए मांग रख दी. जब महिला को उसके नई पति के जेल जाने की खबर मिली तो वह पुलिस थाने पहुंचकर जोर जोर से रोने लग गई. साथ ही मैं पुलिस को कहने लग गई कि "इसको छोड़ दो. हम एक साथ जियेंगे और एक साथ ही मरेंगे". ऐसा सुन कर पूरा थाना चौंक गया. भला प्यार में इतना भी क्या पागलपन कि सभी रिश्ते नातों की शर्म ही भूल जाये. इस औरत का पहला पति था फिर भी इसने उसी के बाप से संबंध बना कर शादी कर ली ऐसा मामला शायद आपने पहले कभी नही देखा या सुना होगा. शायद इसीलिए कहा जाता है कि ये कलयुग का दौर है. यहां लोगों को अपने रिश्ते नातों की भी परवाह नही रही है. अब लोग बाप समान लोगों से शादी रचा रहे है तो दूसरी और बाप समान युवक भी अपनी ही बहु बेटियों ओर गंदी नज़रें टिकाये रखते हैं. आज की नई पीढ़ी को शशर्म लिहाज़ जैसी चीज़ ही नहीं रही. ऐसे लोग हमारे भारतीय समाज पर एक कलंक हैं जो हमारे भारत को दिनों दिन खोखला कर रहे हैं. माना प्यार गलत नही है मगर, इसके लिए एक हद भी होती है, जिसको पार करना बहुत गलत है.
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शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ।
वेंकटेश्वर (వెంకటేశ్వరుడు, வெங்கடேஸ்வரர், ವೆಂಕಟೇಶ್ವರ, वेंकटेश्वरः) भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उन्हें गोविंदा, श्रीनिवास, बालाजी, वेंकट आदि नामों से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे निवास किया था। यह तालाब तिरुमला के पास स्थित है। तिरुमाला-तिरुपति के चारों ओर स्थित पहाड़ियाँ, शेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिरि' कहलाती हैं। वैकुण्ठ एकादशी के अवसर पर लोग तिरुपति वेन्कटेशवर मन्दिर पर प्रभु के दर्शन के लिए आते हैं, जहाँ पर आने के पश्चात उनके सभी पाप धुल जाते हैं। मान्यता है कि यहाँ आने के पश्चात व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। . फाल्गुन माह के कृष्णपक्ष की एकादशी, बैकुण्ठ एकादशी कहलाती हैं। इसे 'पंकोद्धार एकादशी' या 'विजया एकादशी' भी कहते हैं। विजया एकादशी का व्रत करने वाला मनुष्य शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। पुराण कथा है कि सीता का पता लगाने के लिए रामचन्द्र वानर सेना के साथ समुद्र के उत्तर तट पर खड़े थे तब रावण जैसे बलवान शत्रु और सागर की गम्भीरता को लेकर चिन्तित थे। इसके उपाय के लिए मुनियों ने उन्हें विजया एकादशी का व्रत करने का परामर्श दिया। व्रत के प्रभाव से सागर पार करके उन्होने रावण का वध किया। श्रेणीःहिन्दू धर्म.
वेंकटेश्वर और वैकुण्ठ एकादशी आम में 0 बातें हैं (यूनियनपीडिया में)।
वेंकटेश्वर 13 संबंध है और वैकुण्ठ एकादशी 6 है। वे आम 0 में है, समानता सूचकांक 0.00% है = 0 / (13 + 6)।
यह लेख वेंकटेश्वर और वैकुण्ठ एकादशी के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
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शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ। वेंकटेश्वर भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उन्हें गोविंदा, श्रीनिवास, बालाजी, वेंकट आदि नामों से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि विष्णु ने कुछ समय के लिए स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे निवास किया था। यह तालाब तिरुमला के पास स्थित है। तिरुमाला-तिरुपति के चारों ओर स्थित पहाड़ियाँ, शेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिरि' कहलाती हैं। वैकुण्ठ एकादशी के अवसर पर लोग तिरुपति वेन्कटेशवर मन्दिर पर प्रभु के दर्शन के लिए आते हैं, जहाँ पर आने के पश्चात उनके सभी पाप धुल जाते हैं। मान्यता है कि यहाँ आने के पश्चात व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। . फाल्गुन माह के कृष्णपक्ष की एकादशी, बैकुण्ठ एकादशी कहलाती हैं। इसे 'पंकोद्धार एकादशी' या 'विजया एकादशी' भी कहते हैं। विजया एकादशी का व्रत करने वाला मनुष्य शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। पुराण कथा है कि सीता का पता लगाने के लिए रामचन्द्र वानर सेना के साथ समुद्र के उत्तर तट पर खड़े थे तब रावण जैसे बलवान शत्रु और सागर की गम्भीरता को लेकर चिन्तित थे। इसके उपाय के लिए मुनियों ने उन्हें विजया एकादशी का व्रत करने का परामर्श दिया। व्रत के प्रभाव से सागर पार करके उन्होने रावण का वध किया। श्रेणीःहिन्दू धर्म. वेंकटेश्वर और वैकुण्ठ एकादशी आम में शून्य बातें हैं । वेंकटेश्वर तेरह संबंध है और वैकुण्ठ एकादशी छः है। वे आम शून्य में है, समानता सूचकांक शून्य.शून्य% है = शून्य / । यह लेख वेंकटेश्वर और वैकुण्ठ एकादशी के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
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मुंबई मनपा सडक के काम का घपला और भ्रष्टाचार को लेकर पुलिस की जांच पर लोकआयुक्त और पूर्व जस्टिस मदनलाल तहिलयानी ने संतृष्टि जताई। मुंबई पुलिस ने 26 लोगों को गिरफ्तार किया हैं और मामले से जुड़े अन्य लोगों को गिरफ्तार करने के लिए जांच शुरु होने की जानकारी दी।
आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने जिन ठेकेदारों पर एफआईआर दर्ज हैं उन्हें ही मुंबई के 4 कामों का ठेका देने के खिलाफ लोकआयुक्त और पूर्व जस्टिस न्यायमूर्ति मदनलाल तहिलयानी से शिकायत की थी। इसके पहले लोकआयुक्त के आदेश के बाद मनपा के दोषी अधिकारियों को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। शुक्रवार को हुई सुनवाई में पुलिस की जांच सही दिशा में होने की बात कहते हुए तहिलयानी ने सड़क के काम की साम्रगी का सैंपल पर पुलिस से जबाबतलब किया। जांच अधिकारी विजय वाघमारे ने बताया कि आईआईटी से सैंपल के लिए संपर्क किया गया हैं। जिन्हें आगे गिरफ्तार करना हैं उनकी लिस्ट लोकआयुक्त को बताई गई। लोकआयुक्त तहिलयानी ने जांच सही दिशा में होने पर संतृष्टि जताई। इस सुनवाई में मनपा की ओर से निदेशक लक्ष्मण वटकर, मुख्य अभियंता एस ओ कोरी, संजय दराडे, शिकायतकर्ता अनिल गलगली उपस्थित थे।
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मुंबई मनपा सडक के काम का घपला और भ्रष्टाचार को लेकर पुलिस की जांच पर लोकआयुक्त और पूर्व जस्टिस मदनलाल तहिलयानी ने संतृष्टि जताई। मुंबई पुलिस ने छब्बीस लोगों को गिरफ्तार किया हैं और मामले से जुड़े अन्य लोगों को गिरफ्तार करने के लिए जांच शुरु होने की जानकारी दी। आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने जिन ठेकेदारों पर एफआईआर दर्ज हैं उन्हें ही मुंबई के चार कामों का ठेका देने के खिलाफ लोकआयुक्त और पूर्व जस्टिस न्यायमूर्ति मदनलाल तहिलयानी से शिकायत की थी। इसके पहले लोकआयुक्त के आदेश के बाद मनपा के दोषी अधिकारियों को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। शुक्रवार को हुई सुनवाई में पुलिस की जांच सही दिशा में होने की बात कहते हुए तहिलयानी ने सड़क के काम की साम्रगी का सैंपल पर पुलिस से जबाबतलब किया। जांच अधिकारी विजय वाघमारे ने बताया कि आईआईटी से सैंपल के लिए संपर्क किया गया हैं। जिन्हें आगे गिरफ्तार करना हैं उनकी लिस्ट लोकआयुक्त को बताई गई। लोकआयुक्त तहिलयानी ने जांच सही दिशा में होने पर संतृष्टि जताई। इस सुनवाई में मनपा की ओर से निदेशक लक्ष्मण वटकर, मुख्य अभियंता एस ओ कोरी, संजय दराडे, शिकायतकर्ता अनिल गलगली उपस्थित थे।
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नई दिल्लीः लगभग एक साल तक सामाजिक दुरी का पालन करने और महामारी की अगुवाई वाले लॉकडाउन पर समय खर्च करने के बाद, उपभोक्ता आकांक्षा कम दूरी के गंतव्यों में 'रिवेंज ट्रैवल' का नेतृत्व कर रही है। उत्सव के सीजन के दौरान आतिथ्य उद्योग ने इस यात्रा के शुरुआती संकेतों को महसूस किया, आतिथ्य प्रमुख ऑन योर ओन (ओवाईओ) होटल्स एंड होम्स ने एक बयान में कहा।
OYO ने भारत में पूर्व-कोरोना स्तरों के ऑनलाइन ट्रैफ़िक में 70 प्रतिशत वृद्धि के साथ, वेलेंटाइन-डे सप्ताहांत पर अधिभोग में 20 प्रतिशत की वृद्धि देखी, जो देश के उभरते हुए एसएमई, जोड़े, परिवार से आए मेहमानों के साथ फिर से यात्रा करने के आत्मविश्वास को दर्शाता है। जैसा कि भारत ने वेलेंटाइन डे मनाया, राजस्थान में अन्य अवकाश स्थलों की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत मांग के साथ, जयपुर यात्रियों के बीच शीर्ष विकल्प बना हुआ है। गोवा और कोच्चि सूट के अनुसार, OYO के बयान में कहा गया है।
पिछले सप्ताहांत में, कोच्चि, आगरा, विशाखापत्तनम, मैसूर और उदयपुर शहरों के बीच सड़क यात्राओं पर लगभग 25 प्रतिशत छुट्टियों का नेतृत्व किया। गोवा, पुरी, पांडिचेरी, और दीघा सहित पूरे भारत में समुद्र तट गंतव्य, साथ ही रेगिस्तानी गंतव्य, विशेष रूप से जयपुर, जोधपुर ने क्रमशः वैलेंटाइन-डे की कुल मांग का लगभग 20 प्रतिशत योगदान दिया, 12 प्रतिशत छुट्टियों के बाद जिन्होंने अपने सप्ताहांत को बिताना पसंद किया। भारत में और दक्षिण एशिया के मुख्य विकास अधिकारी, ओयो होटल्स एंड होम्स, यतीश जैन ने बुकिंग में स्पाइक पर टिप्पणी करते हुए कहाः "पोस्ट-लॉकडाउन, हमने कई सप्ताहांत की मांग में तेजी देखी है, जिसमें गांधी जयंती, दिवाली, क्रिसमस शामिल हैं। "
पीएम मोदी का बड़ा बयान, कहा- "डेटा भी अब डेमोक्रेटाइज हुआ. . . "
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नई दिल्लीः लगभग एक साल तक सामाजिक दुरी का पालन करने और महामारी की अगुवाई वाले लॉकडाउन पर समय खर्च करने के बाद, उपभोक्ता आकांक्षा कम दूरी के गंतव्यों में 'रिवेंज ट्रैवल' का नेतृत्व कर रही है। उत्सव के सीजन के दौरान आतिथ्य उद्योग ने इस यात्रा के शुरुआती संकेतों को महसूस किया, आतिथ्य प्रमुख ऑन योर ओन होटल्स एंड होम्स ने एक बयान में कहा। OYO ने भारत में पूर्व-कोरोना स्तरों के ऑनलाइन ट्रैफ़िक में सत्तर प्रतिशत वृद्धि के साथ, वेलेंटाइन-डे सप्ताहांत पर अधिभोग में बीस प्रतिशत की वृद्धि देखी, जो देश के उभरते हुए एसएमई, जोड़े, परिवार से आए मेहमानों के साथ फिर से यात्रा करने के आत्मविश्वास को दर्शाता है। जैसा कि भारत ने वेलेंटाइन डे मनाया, राजस्थान में अन्य अवकाश स्थलों की तुलना में लगभग बीस प्रतिशत मांग के साथ, जयपुर यात्रियों के बीच शीर्ष विकल्प बना हुआ है। गोवा और कोच्चि सूट के अनुसार, OYO के बयान में कहा गया है। पिछले सप्ताहांत में, कोच्चि, आगरा, विशाखापत्तनम, मैसूर और उदयपुर शहरों के बीच सड़क यात्राओं पर लगभग पच्चीस प्रतिशत छुट्टियों का नेतृत्व किया। गोवा, पुरी, पांडिचेरी, और दीघा सहित पूरे भारत में समुद्र तट गंतव्य, साथ ही रेगिस्तानी गंतव्य, विशेष रूप से जयपुर, जोधपुर ने क्रमशः वैलेंटाइन-डे की कुल मांग का लगभग बीस प्रतिशत योगदान दिया, बारह प्रतिशत छुट्टियों के बाद जिन्होंने अपने सप्ताहांत को बिताना पसंद किया। भारत में और दक्षिण एशिया के मुख्य विकास अधिकारी, ओयो होटल्स एंड होम्स, यतीश जैन ने बुकिंग में स्पाइक पर टिप्पणी करते हुए कहाः "पोस्ट-लॉकडाउन, हमने कई सप्ताहांत की मांग में तेजी देखी है, जिसमें गांधी जयंती, दिवाली, क्रिसमस शामिल हैं। " पीएम मोदी का बड़ा बयान, कहा- "डेटा भी अब डेमोक्रेटाइज हुआ. . . "
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कथक नृत्यांगना ऋचा गुप्ता जयपुर घराने की समर्पित कलाकार हैं। वह वर्षों से नृत्य साधना में जुटी हैं। जयपुर घराने के गुरु घनश्याम गंगानी के सानिध्य में ऋचा नृत्य की बारीकियों को ग्रहण करती रही हैं। गुरु-शिष्य का यह गहरा संबंध सराहनीय है। समय के साथ गुरु-शिष्य का संबंध गहरा हुआ है, वहीं ऋचा के नृत्य में परिपक्वता आई है। इसकी झलक पिछले दिनों हुए नृत्य समारोह में दिखी।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कथानक की ओर से नृत्य समारोह आयोजित था। यह समारोह प्रसिद्ध गायक पंडित ज्वाला प्रसाद की स्मृति में आयोजित किया गया था। पंडित ज्वाला प्रसाद ने कथक के कलाकारों के लिए विशेषतौर पर संगीत रचनाएं की हैं। उन्होंने कृष्ण नृत्य रचना के लिए संगीत निर्देशन किया था, जिसे आज भी कलाकार और रसिकजन याद करते हैं। उनकी खुली, दमदार और पुरकशिश आवाज की वजह से उमा शर्मा, शोवना नारायण जैसी गायिकाओं की प्रस्तुतियां जानदार बन पड़तीं थीं।
शायर मिर्जा गालिब की गजल 'आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक. . ' को ज्वाला प्रसादजी ने बहुत ही प्रभावी अंदाज में गाया था। इसी को याद कर और उनकी स्मृति में ऋचा ने इस गजल का चयन अपनी प्रस्तुति के लिए किया। जिसपर कथक नृत्यांगना ऋचा ने बहुत ही मोहक भाव पेश किए। उन्होंने नायिका के एक-एक भाव को अपने नृत्य के जरिए दर्शाया, जो जयपुर घराने के कलाकरों में कम ही देखने को मिलता है। कारण कि जयपुर घराने के कलाकारों का जोर कवित्त और तकनीकी पक्ष को ज्यादा पेश करना होता है।
कथक नृत्यांगना ऋचा ने नृत्य का आरंभ दस मात्रा से किया। उन्होंने उपज में पैर का काम पेश किया। प्राचीन परण 'धा धिंन ना धि धि तक' में हिरण के चलन का अंदाज दिखाया। थाट में नायिका के खड़े होने का अंदाज पेश किया। वहीं परमेलू 'त त तक दिग त धलांग' में राधा-कृष्ण की छेड़छाड़ के अंदाज को दर्शाया। वहीं गज परण में गज के चलन को पेश किया। गौरतलब है कि गज परण अब बहुत कम कलाकार करते हैं। वहीं तकनीकी पक्ष को उन्होंने तराने में और अधिक उभारा। यह तराना राग चारूकेशी और तीन ताल में था। इस प्रस्तुति के दौरान तिहाइयों, चक्कर और चक्करदार तिहाइयों का प्रयोग खासतौर पर किया गया।
बड़े गुलाम अली खां साहब ने ठुमरी 'याद पिया की आए' को रसीले ढंग से गाया है। उनकी इस ठुमरी को पटियाला घराने के कलाकार आज भी बड़े मन से गाते हैं। इसी ठुमरी को ऋचा ने अपने नृत्य में पिरोया। नायिका के विरह भावों को ऋचा ने निभाने की अच्छी कोशिश की। वैसे गायक माधव प्रसाद ने इस ठुमरी को भरसक अपने अंदाज में गाया। इस प्रस्तुति के संगत कलाकार थे-तबले पर फतह सिंह गंगानी, सितार पर खालिद मुस्तफा, सारंगी पर कमाल अहमद और पढंत पर मनोज गंगानी।
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कथक नृत्यांगना ऋचा गुप्ता जयपुर घराने की समर्पित कलाकार हैं। वह वर्षों से नृत्य साधना में जुटी हैं। जयपुर घराने के गुरु घनश्याम गंगानी के सानिध्य में ऋचा नृत्य की बारीकियों को ग्रहण करती रही हैं। गुरु-शिष्य का यह गहरा संबंध सराहनीय है। समय के साथ गुरु-शिष्य का संबंध गहरा हुआ है, वहीं ऋचा के नृत्य में परिपक्वता आई है। इसकी झलक पिछले दिनों हुए नृत्य समारोह में दिखी। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में कथानक की ओर से नृत्य समारोह आयोजित था। यह समारोह प्रसिद्ध गायक पंडित ज्वाला प्रसाद की स्मृति में आयोजित किया गया था। पंडित ज्वाला प्रसाद ने कथक के कलाकारों के लिए विशेषतौर पर संगीत रचनाएं की हैं। उन्होंने कृष्ण नृत्य रचना के लिए संगीत निर्देशन किया था, जिसे आज भी कलाकार और रसिकजन याद करते हैं। उनकी खुली, दमदार और पुरकशिश आवाज की वजह से उमा शर्मा, शोवना नारायण जैसी गायिकाओं की प्रस्तुतियां जानदार बन पड़तीं थीं। शायर मिर्जा गालिब की गजल 'आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक. . ' को ज्वाला प्रसादजी ने बहुत ही प्रभावी अंदाज में गाया था। इसी को याद कर और उनकी स्मृति में ऋचा ने इस गजल का चयन अपनी प्रस्तुति के लिए किया। जिसपर कथक नृत्यांगना ऋचा ने बहुत ही मोहक भाव पेश किए। उन्होंने नायिका के एक-एक भाव को अपने नृत्य के जरिए दर्शाया, जो जयपुर घराने के कलाकरों में कम ही देखने को मिलता है। कारण कि जयपुर घराने के कलाकारों का जोर कवित्त और तकनीकी पक्ष को ज्यादा पेश करना होता है। कथक नृत्यांगना ऋचा ने नृत्य का आरंभ दस मात्रा से किया। उन्होंने उपज में पैर का काम पेश किया। प्राचीन परण 'धा धिंन ना धि धि तक' में हिरण के चलन का अंदाज दिखाया। थाट में नायिका के खड़े होने का अंदाज पेश किया। वहीं परमेलू 'त त तक दिग त धलांग' में राधा-कृष्ण की छेड़छाड़ के अंदाज को दर्शाया। वहीं गज परण में गज के चलन को पेश किया। गौरतलब है कि गज परण अब बहुत कम कलाकार करते हैं। वहीं तकनीकी पक्ष को उन्होंने तराने में और अधिक उभारा। यह तराना राग चारूकेशी और तीन ताल में था। इस प्रस्तुति के दौरान तिहाइयों, चक्कर और चक्करदार तिहाइयों का प्रयोग खासतौर पर किया गया। बड़े गुलाम अली खां साहब ने ठुमरी 'याद पिया की आए' को रसीले ढंग से गाया है। उनकी इस ठुमरी को पटियाला घराने के कलाकार आज भी बड़े मन से गाते हैं। इसी ठुमरी को ऋचा ने अपने नृत्य में पिरोया। नायिका के विरह भावों को ऋचा ने निभाने की अच्छी कोशिश की। वैसे गायक माधव प्रसाद ने इस ठुमरी को भरसक अपने अंदाज में गाया। इस प्रस्तुति के संगत कलाकार थे-तबले पर फतह सिंह गंगानी, सितार पर खालिद मुस्तफा, सारंगी पर कमाल अहमद और पढंत पर मनोज गंगानी।
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पर्यावरण आद्य संस्कृतियाँ
राजस्थान का विशिष्ट भौगोलिक पर्यावरण अति प्राचीन काल मे ही इस प्रदेश में मानव के विकास एवं उसके क्रियाकलापो मे सक्रिय योगदान देता आया है। राजस्थान भारत के उत्तरी पश्चिमी भाग का एक राज्य है। 230 3-300 12' उत्तरी अक्षाश प्रोर 69030-780 17 पूर्वी देशातर के मध्य स्थित 3,42,274 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल 1 वाला राजस्थान प्राप्त समस्त भारत के क्षेत्रफल का दसवा भाग है और मध्यप्रदेश के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा प्रान्त है ।
भौगोलिक दृष्टि से अरावली पर्वतमाला राजस्थान को दो स्पष्ट भागो मे विभाजित करती है। इस विभाजन मे अरावली पर्वतमाला जो कि भारत की एक प्राचीनतम पवतमाला होने के साथ साथ खनिज और प्रस्तर सम्पदा को धनी है, एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। अरावली पवत की एक श्रेणी राजस्थान के दक्षिण पश्चिम से उत्तर-पूर्व को जाती है जो राजस्थान को दो भौगोलिक क्षेत्रो मे बाट देती है- उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र तथा दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र । अरावली पवत की यह श्रेणी गुजरात से प्रारम्भ होकर सिरोही के निकट राजस्थान में प्रवेश करती है । अजमेर तक अरावली पवत की अटूट श्रेणी है, उसके बाद वह अलग अलग पहाडियो मे बट जाती है, जो
से सस भाप इण्डिया, जिल्द 1, खण्ड 2-3 (1961) पू 84 उक्त आवडे सर्वेयर जनरल, भारत के प्रतिवेदन पर माधारित हैं।
सांभर झील का पार करती हुई ऐतडी के निकट सधाना तक पहुँचती है।
उत्तरो पश्चिमी मरुस्थल
राजस्थान का उत्तरी पश्चिमी भाग जो थार मरस्थल के नाम से विश्यात है, का वनमान स्वरूप तो रेगिस्तान अवश्य है परन्तु यहा पापाण युग से ऐतिहासिक युग तक निरंतर विकासशील सभ्यता क दशन होते हैं। इस आधार पर इस क्षेत्र का मरुस्थलीय स्वरूप बहुत कुछ अर्वाचीन ही प्रतीत होता है। इस क्षेत्र में श्राबादी धनी नहीं है । वर्षा बहुत कम होती है। यहाँ की भूमि उपजाऊ नही है । रेगिस्तानी मिट्टी मुख्यतया राजस्थान के बड़े भूभाग पर फनी हुई है। इस प्रकार की मिट्टी मुख्यतया जमलमेर, बीकानेर जोधपुर बाडमेर, गगानगर, सीकर तथा भुभन जिला में पायी जाती है। यह मिट्टी बहुत हो अनुपजाऊ है । इस मिट्टी में 95 प्रतिशत रेत और 5 प्रतिशत farat मिट्टी होती है । इसम मघुलनशील लवणो को मात्रा अधिक है। पानी का तल सतह से करीब 200 फीट नीचे पाया जाता है। इस क्षेत्र के निवासी, जो थोड़ी बहुत वर्षा होती है, उसी पर निर्भर रहते है । यह क्षत्र बहुधा सूखा व अकाल ग्रस्त रहता है । जलाभाव के दिना म किसानों को भोजन व चारे की तलाश में अपने पशुओं के साथ दूर दूर के स्थानों का निमण करना पड़ता है । यहाँ संवार पास ही पशुओ का एक मात्र भोजन है। इस क्षेत्र के निवासी कठिनाई का जीवन यापन करते हुए भी अपना अस्तित्व बनाये हुए है। इस क्षत्र में लगभग 9 महीन रेतीली हवामे चलती रहती है जिससे 90 मीटर तक ऊंचे रेत कटीले बन जाते है। विश्व के बड रेगिस्तान में से यह एक है ।
दक्षिण-पूर्वी पठारी भाग
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान का पठारी भाग उपजाऊ है क्योकि इसमे बहने वाली कई नदिया यथा सूनो, चम्बल, चनास (जो चम्बल नदी की एक सहायक नदी है) कालीसिंध, पावती तथा बागगगा श्रादि भूमि का सिचन करती रहती हैं। राज्य के इस भाग में कई पहाडिया भी है। यहा को घाटियाँ उपजाऊ है तथा मिट्टी उपयुक्त है।
यहाँ प्राप्त होने वाली मिट्टी मे सबसे प्रमुख लाल मिट्टी है । यह मिट्टी उदयपुर और डूगरपुर जिलो में पायी जाती है । काली मिट्टी गीलापन होता है तथा यह उपजाऊ है। 50 से 75 सै० मी० वर्षा मे विभिन्न प्रकार की फसलो को उगाने मे सुविधा होती है। इसके अलावा लाल तथा काली मिश्रित-मिट्टी पीली तथा लाल मिट्टी मिलती है जो बहुत उपजाऊ होती है। राजस्थान के इस क्षत्र मे वर्षा खूब होती है । यहा अनेक किस्म की मूल्यवान लकडी होती है। इस क्षत्र के लोग स्थायी निवास बनाकर रहते हैं। इन्हें भोजन और पानी की तलाश मे भटकना नहीं पड़ता क्योकि यहा पर्याप्त वर्षा होती है ।
इन भौगोलिक भूखण्डो का अपना एक दीघकालिक नैसर्गिक इतिहास है। विभिन्न भूगर्भीय काला मे अनेक महत्त्वपूर्ण परिवतन आये जिनसे विभिन्न क्षेत्रा के धरातल को रचना मे तर प्राया। इस दृष्टि मे राजस्थान का पश्चिमो मरुस्थलीय भाग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । जसलमेर, बीकानेर का मरुस्थलीय भाग जूरासिक ( Jurasste ) क्रोटेशियस (Cretasceous), और इयोसीन (Eocene ) कालो म अधिकाशत समुद्रावृत था। यह सशय का विषय है कि ठीक किस समय इस क्षेत्र मे उभार आया और सागर मस्स्थल के रूप में परिवर्तित हुआ। सभवत तृतीयक ( Tertiary) के उत्तर काल मे ऐसा हुआ होगा ।" भूगर्भीय परिवतनो से जुड़ भौगोलिक और जलवायुगत परिवतनो के साक्ष्य भी राजस्थान में उपलब्ध हुए हैं 12 प्रातिनूतन (Pleistocene ) काल के प्रारम्भ में भी अनेक जलवायुगत परिवतन हुए हैं । यह वह काल है जब विश्व और भारत में भी मानव के
कृष्णन, एम एस इवोल्यूशन ग्राफ डजट पो सिम्पो राज डेजट बु ने साई, जिल्द । (1952) प 19
द्रष्टय वक्शाप प्रान दी प्राब्लम्स ग्राप दी डेजट इन इण्डिया सितम्बर 16-18 1975 जयपुर (अप्रकाशित शोध-पत्र),
वकशाप प्रान पलियोक्लाइमेट एण्ड प्रावियालाजी ग्राफ राजस्थाम एण्ड गुजरात, फिजिकल रिसच लेवोरेटरी ब्रहमदाबाद, 23-26 फरवरी 1976, इकोलाजी एण्ड धार्कियोलाजी ग्राफ वेस्टन इण्डिया (1977) सपा घमपात अग्रवाल एव वी एम पाण्ड ।
प्रथम प्रवशेष प्राप्त होने लगते हैं। भूगर्भीय वालो मे सबसे प्रतिम प्रतिनूतन (Holocene) काल है। इसका प्रारम्भ प्राय 10000 वर्ष पहले हुआ । तब से भाज तक कोई उल्लेखनीय परिवर्तन जलवायु की दृष्टि से नहीं माना जाता तथापि छोट स्तर पर विवा क्षेत्र विशेष मे जलवायु परिवतन और उससे जुड मानव संस्कृति के विकास में अक उथल पुथल दृष्टिगोचर है, famere yfrant राजस्थान म जहाँ होलोसोन युग मे ही सिंधु सभ्यता का उदभव, विकास और विभाग होता है और पुन समयातर से उन्ही क्षत्रा मनई संस्कृतिया विकसित होती है। पुरातात्विक संस्कृतियों का उत्थान पतन बहुत कुछ जलवायुगत परिवर्तन से जुड़ा हुआ है।
प्रागैतिहासिक काल
राजस्थान में प्रागतिहासिक काल के अवशेषों का व्यापक वज्ञानिक शोध सोमित स्तर पर हुआ है। इन अध्ययनो और सर्वेक्षणो स इतना स्पष्ट है कि प्रातिनूतन काल में इस प्रान्त के कतिपय क्षेत्रा ने मानव को शापित किया विशेषकर दक्षिणी पूर्वी राजस्थान ने लूनी बनास, चम्बल और उसको सहायक नदिया के तटवर्ती क्षेत्रा म पाषाण युगोन उपकरणो की उपलब्ध इस प्रमाणित करती है । मरुस्थलीय क्षेत्रो मे भी पाषाणयुगोन कुछ अवशेष मिल हैं। मरभूमि मे सर्वेक्षण काय अत्यन्त कठिन है और सभावना की जाती है कि प्रस्तरयुगीन प्रवशेष बालू की मोटी परतों में दबे है। गहन अध्ययन के बाद इस प्रदेश के पूर्व ऐतिहासिक काल को तीन प्रमुख भागो म बादा जा सकता है ।
1 निम्न पुरापाषाण युग (Lower Palacolithic or Early Stone Age)
निम्न पुरावापाणयुग की खोज का इतिहास करीब 100 साल पुराना है जब सी० ए० हक्स्ट जो भारत सरकार के भूगर्भ विभाग स
मोहापात्रा, जी सी एव अन्य दो डिस्क्वरा ग्राफ ए स्टान एज साईट इन दो इण्डियन डजट रिमच बुलेटिन (यू सोरीज) ऑफ दो पंजाब यूनिवर्सिटी, जिल्ट 14 पाट 3-4 215-223 दिसम्बर 19631
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पर्यावरण आद्य संस्कृतियाँ राजस्थान का विशिष्ट भौगोलिक पर्यावरण अति प्राचीन काल मे ही इस प्रदेश में मानव के विकास एवं उसके क्रियाकलापो मे सक्रिय योगदान देता आया है। राजस्थान भारत के उत्तरी पश्चिमी भाग का एक राज्य है। दो सौ तीस तीन-तीन सौ बारह' उत्तरी अक्षाश प्रोर उनहत्तर हज़ार तीस-सात सौ अस्सी सत्रह पूर्वी देशातर के मध्य स्थित तीन,बयालीस,दो सौ चौहत्तर वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल एक वाला राजस्थान प्राप्त समस्त भारत के क्षेत्रफल का दसवा भाग है और मध्यप्रदेश के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा प्रान्त है । भौगोलिक दृष्टि से अरावली पर्वतमाला राजस्थान को दो स्पष्ट भागो मे विभाजित करती है। इस विभाजन मे अरावली पर्वतमाला जो कि भारत की एक प्राचीनतम पवतमाला होने के साथ साथ खनिज और प्रस्तर सम्पदा को धनी है, एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। अरावली पवत की एक श्रेणी राजस्थान के दक्षिण पश्चिम से उत्तर-पूर्व को जाती है जो राजस्थान को दो भौगोलिक क्षेत्रो मे बाट देती है- उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र तथा दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र । अरावली पवत की यह श्रेणी गुजरात से प्रारम्भ होकर सिरोही के निकट राजस्थान में प्रवेश करती है । अजमेर तक अरावली पवत की अटूट श्रेणी है, उसके बाद वह अलग अलग पहाडियो मे बट जाती है, जो से सस भाप इण्डिया, जिल्द एक, खण्ड दो-तीन पू चौरासी उक्त आवडे सर्वेयर जनरल, भारत के प्रतिवेदन पर माधारित हैं। सांभर झील का पार करती हुई ऐतडी के निकट सधाना तक पहुँचती है। उत्तरो पश्चिमी मरुस्थल राजस्थान का उत्तरी पश्चिमी भाग जो थार मरस्थल के नाम से विश्यात है, का वनमान स्वरूप तो रेगिस्तान अवश्य है परन्तु यहा पापाण युग से ऐतिहासिक युग तक निरंतर विकासशील सभ्यता क दशन होते हैं। इस आधार पर इस क्षेत्र का मरुस्थलीय स्वरूप बहुत कुछ अर्वाचीन ही प्रतीत होता है। इस क्षेत्र में श्राबादी धनी नहीं है । वर्षा बहुत कम होती है। यहाँ की भूमि उपजाऊ नही है । रेगिस्तानी मिट्टी मुख्यतया राजस्थान के बड़े भूभाग पर फनी हुई है। इस प्रकार की मिट्टी मुख्यतया जमलमेर, बीकानेर जोधपुर बाडमेर, गगानगर, सीकर तथा भुभन जिला में पायी जाती है। यह मिट्टी बहुत हो अनुपजाऊ है । इस मिट्टी में पचानवे प्रतिशत रेत और पाँच प्रतिशत farat मिट्टी होती है । इसम मघुलनशील लवणो को मात्रा अधिक है। पानी का तल सतह से करीब दो सौ फीट नीचे पाया जाता है। इस क्षेत्र के निवासी, जो थोड़ी बहुत वर्षा होती है, उसी पर निर्भर रहते है । यह क्षत्र बहुधा सूखा व अकाल ग्रस्त रहता है । जलाभाव के दिना म किसानों को भोजन व चारे की तलाश में अपने पशुओं के साथ दूर दूर के स्थानों का निमण करना पड़ता है । यहाँ संवार पास ही पशुओ का एक मात्र भोजन है। इस क्षेत्र के निवासी कठिनाई का जीवन यापन करते हुए भी अपना अस्तित्व बनाये हुए है। इस क्षत्र में लगभग नौ महीन रेतीली हवामे चलती रहती है जिससे नब्बे मीटर तक ऊंचे रेत कटीले बन जाते है। विश्व के बड रेगिस्तान में से यह एक है । दक्षिण-पूर्वी पठारी भाग दक्षिण-पूर्वी राजस्थान का पठारी भाग उपजाऊ है क्योकि इसमे बहने वाली कई नदिया यथा सूनो, चम्बल, चनास कालीसिंध, पावती तथा बागगगा श्रादि भूमि का सिचन करती रहती हैं। राज्य के इस भाग में कई पहाडिया भी है। यहा को घाटियाँ उपजाऊ है तथा मिट्टी उपयुक्त है। यहाँ प्राप्त होने वाली मिट्टी मे सबसे प्रमुख लाल मिट्टी है । यह मिट्टी उदयपुर और डूगरपुर जिलो में पायी जाती है । काली मिट्टी गीलापन होता है तथा यह उपजाऊ है। पचास से पचहत्तर सैशून्य मीशून्य वर्षा मे विभिन्न प्रकार की फसलो को उगाने मे सुविधा होती है। इसके अलावा लाल तथा काली मिश्रित-मिट्टी पीली तथा लाल मिट्टी मिलती है जो बहुत उपजाऊ होती है। राजस्थान के इस क्षत्र मे वर्षा खूब होती है । यहा अनेक किस्म की मूल्यवान लकडी होती है। इस क्षत्र के लोग स्थायी निवास बनाकर रहते हैं। इन्हें भोजन और पानी की तलाश मे भटकना नहीं पड़ता क्योकि यहा पर्याप्त वर्षा होती है । इन भौगोलिक भूखण्डो का अपना एक दीघकालिक नैसर्गिक इतिहास है। विभिन्न भूगर्भीय काला मे अनेक महत्त्वपूर्ण परिवतन आये जिनसे विभिन्न क्षेत्रा के धरातल को रचना मे तर प्राया। इस दृष्टि मे राजस्थान का पश्चिमो मरुस्थलीय भाग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । जसलमेर, बीकानेर का मरुस्थलीय भाग जूरासिक क्रोटेशियस , और इयोसीन कालो म अधिकाशत समुद्रावृत था। यह सशय का विषय है कि ठीक किस समय इस क्षेत्र मे उभार आया और सागर मस्स्थल के रूप में परिवर्तित हुआ। सभवत तृतीयक के उत्तर काल मे ऐसा हुआ होगा ।" भूगर्भीय परिवतनो से जुड़ भौगोलिक और जलवायुगत परिवतनो के साक्ष्य भी राजस्थान में उपलब्ध हुए हैं बारह प्रातिनूतन काल के प्रारम्भ में भी अनेक जलवायुगत परिवतन हुए हैं । यह वह काल है जब विश्व और भारत में भी मानव के कृष्णन, एम एस इवोल्यूशन ग्राफ डजट पो सिम्पो राज डेजट बु ने साई, जिल्द । प उन्नीस द्रष्टय वक्शाप प्रान दी प्राब्लम्स ग्राप दी डेजट इन इण्डिया सितम्बर सोलह-अट्ठारह एक हज़ार नौ सौ पचहत्तर जयपुर , वकशाप प्रान पलियोक्लाइमेट एण्ड प्रावियालाजी ग्राफ राजस्थाम एण्ड गुजरात, फिजिकल रिसच लेवोरेटरी ब्रहमदाबाद, तेईस-छब्बीस फरवरी एक हज़ार नौ सौ छिहत्तर, इकोलाजी एण्ड धार्कियोलाजी ग्राफ वेस्टन इण्डिया सपा घमपात अग्रवाल एव वी एम पाण्ड । प्रथम प्रवशेष प्राप्त होने लगते हैं। भूगर्भीय वालो मे सबसे प्रतिम प्रतिनूतन काल है। इसका प्रारम्भ प्राय दस हज़ार वर्ष पहले हुआ । तब से भाज तक कोई उल्लेखनीय परिवर्तन जलवायु की दृष्टि से नहीं माना जाता तथापि छोट स्तर पर विवा क्षेत्र विशेष मे जलवायु परिवतन और उससे जुड मानव संस्कृति के विकास में अक उथल पुथल दृष्टिगोचर है, famere yfrant राजस्थान म जहाँ होलोसोन युग मे ही सिंधु सभ्यता का उदभव, विकास और विभाग होता है और पुन समयातर से उन्ही क्षत्रा मनई संस्कृतिया विकसित होती है। पुरातात्विक संस्कृतियों का उत्थान पतन बहुत कुछ जलवायुगत परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। प्रागैतिहासिक काल राजस्थान में प्रागतिहासिक काल के अवशेषों का व्यापक वज्ञानिक शोध सोमित स्तर पर हुआ है। इन अध्ययनो और सर्वेक्षणो स इतना स्पष्ट है कि प्रातिनूतन काल में इस प्रान्त के कतिपय क्षेत्रा ने मानव को शापित किया विशेषकर दक्षिणी पूर्वी राजस्थान ने लूनी बनास, चम्बल और उसको सहायक नदिया के तटवर्ती क्षेत्रा म पाषाण युगोन उपकरणो की उपलब्ध इस प्रमाणित करती है । मरुस्थलीय क्षेत्रो मे भी पाषाणयुगोन कुछ अवशेष मिल हैं। मरभूमि मे सर्वेक्षण काय अत्यन्त कठिन है और सभावना की जाती है कि प्रस्तरयुगीन प्रवशेष बालू की मोटी परतों में दबे है। गहन अध्ययन के बाद इस प्रदेश के पूर्व ऐतिहासिक काल को तीन प्रमुख भागो म बादा जा सकता है । एक निम्न पुरापाषाण युग निम्न पुरावापाणयुग की खोज का इतिहास करीब एक सौ साल पुराना है जब सीशून्य एशून्य हक्स्ट जो भारत सरकार के भूगर्भ विभाग स मोहापात्रा, जी सी एव अन्य दो डिस्क्वरा ग्राफ ए स्टान एज साईट इन दो इण्डियन डजट रिमच बुलेटिन ऑफ दो पंजाब यूनिवर्सिटी, जिल्ट चौदह पाट तीन-चार दो सौ पंद्रह-दो सौ तेईस दिसम्बर उन्नीस हज़ार छः सौ इकतीस
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नथिंग फोन 1 का लॉन्च अब बस एक दिन दूर है, जो वनप्लस के पूर्व को-फाउंडर कार्ल पेई का पहला स्मार्टफोन है। नथिंग फोन 1 को आधिकारिक तौर पर 12 जुलाई को लॉन्च किया जाना है, जो कि मंगलवार (कल) को एक इवेंट में है जिसे कंपनी बुला रही है (ब्रेस यूअरसेल्फ): नथिंग (इवेंट): रिटर्न टू इंस्टिंक्ट बुला रही है। यह इवेंट भारतीय समयानुसार रात 8:30 बजे से शुरू होगा।
हम सभी जानते हैं कि फोन के चारों ओर बहुत प्रचार हुआ है और यह अपनी फैंसी एलईडी लाइट्स और सेमी ट्रांसपेरेंट डिजाइन की वजह से सुर्खियों में है। हाल ही में एक लीक से यह भी पता चलता है कि नथिंग फोन 1 में एक अंडर-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट स्कैनर भी हो सकता है। नथिंग फोन 1 की कीमत 28,000 रुपये से 30,000 रुपये के बीच होने की संभावना है और यह इस प्राइस सेगमेंट में सैमसंग, मोटोरोला, आईक्यू और पोको के स्मार्टफोन्स को टक्कर देगा। हम आपके लिए ऐसे 5 स्मार्टफोन्स की लिस्ट लेकर आए हैं, जो नथिंग फोन 1 को टक्कर देंगेः
पिछले साल का सैमसंग गैलेक्सी M52 एक ऐसा फोन है जिसका मुकाबला नथिंग फोन 1 से होगा। डिवाइस फीचर से भरपूर है और देश में इसकी कीमत लगभग 25,000 रुपये है। यह एक स्नैपड्रैगन 778G चिपसेट से लैस है, जो एक अच्छा चिपसेट है और रिपोर्ट्स बताती हैं कि नथिंग फोन 1 स्नैपड्रैगन 778G+ चिप से लैस होगा।
Poco F4 की भारत में कीमत 28,000 रुपये है और इसमें ग्लास रियर पैनल, स्लीक बॉडी और क्विक 67W फास्ट चार्जिंग की सुविधा है। पोको F4 भी टाइप-सी चार्जिंग पोर्ट और डुअल सिम सपोर्ट के साथ आता है। इसका डिस्प्ले HDR10+ के सपोर्ट के साथ FullHD+ डिस्प्ले ऑफर करता है।
पिछले साल का वीवो V23 5G अभी भी एक अच्छी खरीद है और यह एक फीचर-पैक फोन भी है जिसका मुकाबला नथिंग फोन 1 से होगा। अधिकांश वी सीरीज फोनों की तरह, वीवो वी23 कैमरों के एक अच्छे सेट और एक स्लीक डिजाइन के साथ आता है, लेकिन इसमें पर्याप्त मात्रा में प्री-लोडेड ब्लोटवेयर हैं।
मोटोरोला एज 30 की सबसे बड़ी यूएसपी इसका पोलेड डिस्प्ले और इसका बहुत ही सक्षम ओआईएस-इनेबल्ड प्राइमरी कैमरा सेटअप है। डिवाइस स्नैपड्रैगन 778+ चिपसेट के साथ आता है जिसे नथिंग फोन 1 में फिट किया जाएगा। मोटो एज 30 के डिस्प्ले में 144Hz रिफ्रेश रेट है और यह 33W बंडल चार्जर के साथ आता है।
iQoo Neo 6 एक गेमिंग-फोकस्ड स्मार्टफोन है और यह स्नैपड्रैगन 870 चिप के साथ आता है। स्मार्टफोन एमोलेड डिस्प्ले प्रदान करता है और 80W फास्ट चार्जिंग के साथ आता है।
आधिकारिक लॉन्च से पहले, एक टिपस्टर पर स्मार्टफोन की भारतीय कीमत का खुलासा किया गया है। ट्विटर उपयोगकर्ता @rahulsh66489640 ने भारतीय ई-कॉमर्स वेबसाइट फ्लिपकार्ट पर लिस्टेड नथिंग फोन (1) की एक तस्वीर पोस्ट की, जिसमें 8GB+128GB स्टोरेज मॉडल के लिए नथिंग फोन 1 की कीमत 34,999 है।
अपकमिंग डिवाइस के भारतीय कीमत की डिटेल पहले ही लीक हो चुके हैं। पिछले लीक में कहा गया है था कि भारत में डिवाइस की शुरुआती कीमत लगभग 31,000 रुपये होगी, और 12GB+256GB के लिए 36, 000 रुपये जितनी अधिक होगी। पिछली रिपोर्टों ने यह भी पुष्टि की है कि भारतीय बाजार में कीमत को कम रखने के लिए कंपनी भारत में इसका प्रोडक्शन करेगी।
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नथिंग फोन एक का लॉन्च अब बस एक दिन दूर है, जो वनप्लस के पूर्व को-फाउंडर कार्ल पेई का पहला स्मार्टफोन है। नथिंग फोन एक को आधिकारिक तौर पर बारह जुलाई को लॉन्च किया जाना है, जो कि मंगलवार को एक इवेंट में है जिसे कंपनी बुला रही है : नथिंग : रिटर्न टू इंस्टिंक्ट बुला रही है। यह इवेंट भारतीय समयानुसार रात आठ:तीस बजे से शुरू होगा। हम सभी जानते हैं कि फोन के चारों ओर बहुत प्रचार हुआ है और यह अपनी फैंसी एलईडी लाइट्स और सेमी ट्रांसपेरेंट डिजाइन की वजह से सुर्खियों में है। हाल ही में एक लीक से यह भी पता चलता है कि नथिंग फोन एक में एक अंडर-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट स्कैनर भी हो सकता है। नथिंग फोन एक की कीमत अट्ठाईस,शून्य रुपयापये से तीस,शून्य रुपयापये के बीच होने की संभावना है और यह इस प्राइस सेगमेंट में सैमसंग, मोटोरोला, आईक्यू और पोको के स्मार्टफोन्स को टक्कर देगा। हम आपके लिए ऐसे पाँच स्मार्टफोन्स की लिस्ट लेकर आए हैं, जो नथिंग फोन एक को टक्कर देंगेः पिछले साल का सैमसंग गैलेक्सी Mबावन एक ऐसा फोन है जिसका मुकाबला नथिंग फोन एक से होगा। डिवाइस फीचर से भरपूर है और देश में इसकी कीमत लगभग पच्चीस,शून्य रुपयापये है। यह एक स्नैपड्रैगन सात सौ अठहत्तरG चिपसेट से लैस है, जो एक अच्छा चिपसेट है और रिपोर्ट्स बताती हैं कि नथिंग फोन एक स्नैपड्रैगन सात सौ अठहत्तरG+ चिप से लैस होगा। Poco Fचार की भारत में कीमत अट्ठाईस,शून्य रुपयापये है और इसमें ग्लास रियर पैनल, स्लीक बॉडी और क्विक सरसठ वाट फास्ट चार्जिंग की सुविधा है। पोको Fचार भी टाइप-सी चार्जिंग पोर्ट और डुअल सिम सपोर्ट के साथ आता है। इसका डिस्प्ले HDRदस+ के सपोर्ट के साथ FullHD+ डिस्प्ले ऑफर करता है। पिछले साल का वीवो Vतेईस पाँचG अभी भी एक अच्छी खरीद है और यह एक फीचर-पैक फोन भी है जिसका मुकाबला नथिंग फोन एक से होगा। अधिकांश वी सीरीज फोनों की तरह, वीवो वीतेईस कैमरों के एक अच्छे सेट और एक स्लीक डिजाइन के साथ आता है, लेकिन इसमें पर्याप्त मात्रा में प्री-लोडेड ब्लोटवेयर हैं। मोटोरोला एज तीस की सबसे बड़ी यूएसपी इसका पोलेड डिस्प्ले और इसका बहुत ही सक्षम ओआईएस-इनेबल्ड प्राइमरी कैमरा सेटअप है। डिवाइस स्नैपड्रैगन सात सौ अठहत्तर+ चिपसेट के साथ आता है जिसे नथिंग फोन एक में फिट किया जाएगा। मोटो एज तीस के डिस्प्ले में एक सौ चौंतालीस हर्ट्ज़ रिफ्रेश रेट है और यह तैंतीस वाट बंडल चार्जर के साथ आता है। iQoo Neo छः एक गेमिंग-फोकस्ड स्मार्टफोन है और यह स्नैपड्रैगन आठ सौ सत्तर चिप के साथ आता है। स्मार्टफोन एमोलेड डिस्प्ले प्रदान करता है और अस्सी वाट फास्ट चार्जिंग के साथ आता है। आधिकारिक लॉन्च से पहले, एक टिपस्टर पर स्मार्टफोन की भारतीय कीमत का खुलासा किया गया है। ट्विटर उपयोगकर्ता @rahulshछः करोड़ चौंसठ लाख नवासी हज़ार छः सौ चालीस ने भारतीय ई-कॉमर्स वेबसाइट फ्लिपकार्ट पर लिस्टेड नथिंग फोन की एक तस्वीर पोस्ट की, जिसमें आठGB+एक सौ अट्ठाईसGB स्टोरेज मॉडल के लिए नथिंग फोन एक की कीमत चौंतीस,नौ सौ निन्यानवे है। अपकमिंग डिवाइस के भारतीय कीमत की डिटेल पहले ही लीक हो चुके हैं। पिछले लीक में कहा गया है था कि भारत में डिवाइस की शुरुआती कीमत लगभग इकतीस,शून्य रुपयापये होगी, और बारहGB+दो सौ छप्पनGB के लिए छत्तीस, शून्य रुपयापये जितनी अधिक होगी। पिछली रिपोर्टों ने यह भी पुष्टि की है कि भारतीय बाजार में कीमत को कम रखने के लिए कंपनी भारत में इसका प्रोडक्शन करेगी।
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शाहीद अफरीदी पाकिस्तान एक ऐसे क्रिकेटर है. जिन्हें पूरी दुनिया के प्रशंसकों का प्यार मिलता है. शाहीद अफरीदी पाकिस्तान के साथ-साथ भारत में भी काफी लोकप्रिय है. भारत में भी उनके प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है.
शाहिद अफरीदी के कई भारतीय क्रिकेटरों के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं, लेकिन आपकों बता दें, कि वह सिर्फ एक भारतीय क्रिकेटर को ही ट्विटर पर फॉलो करते हैं.
शाहिद अफरीदी अपने अधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कुल 41 लोगो को फॉलो कर रहे हैं. जिसमे से भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली भी एक है. बता दें, कि शाहीद अफरीदी के ट्विटर पर कुल 1. 15 मिलियन फॉलोवर है.
आपकों यह भी बता दे, कि भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली और शाहिद अफरीदी के बीच ख़ास दोस्ती है. अफरीदी, विराट को अपना छोटा भाई मानते हैं.
जब शाहिद अफरीदी ने क्रिकेट से संन्यास लिया था, तो भारतीय टीम ने अफरीदी के लिए विराट कोहली की टी-शर्ट में सभी खिलाड़ियों के हस्ताक्षर कर शाहिद अफरीदी को टी-शर्ट भेंट की थी.
शाहीद अफरीदी के इस ट्वीट पर विराट कोहली ने उनका शुक्रिया अदा किया था.
Congratulations @imVkohli @AnushkaSharma on your wedding. May God Bless you two and give you happiness and a rewarding married life.
Thanks Shahid Bhai. ?
अगर आपकों हमारा आर्टिकल पसंद आया, तो प्लीज इसे लाइक करें. अपने दोस्तों तक ये खबर सबसे पहले पहुंचाने के लिए शेयर करें. साथ ही अगर आप कोई सुझाव देना चाहते हैं, तो प्लीज कमेंट करें. अगर आपने अब तक हमारा पेज लाइक नहीं किया हैं, तो कृपया अभी लाइक करें, जिससे लेटेस्ट अपडेट हम आपकों जल्दी पहुंचा सकें.
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शाहीद अफरीदी पाकिस्तान एक ऐसे क्रिकेटर है. जिन्हें पूरी दुनिया के प्रशंसकों का प्यार मिलता है. शाहीद अफरीदी पाकिस्तान के साथ-साथ भारत में भी काफी लोकप्रिय है. भारत में भी उनके प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है. शाहिद अफरीदी के कई भारतीय क्रिकेटरों के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं, लेकिन आपकों बता दें, कि वह सिर्फ एक भारतीय क्रिकेटर को ही ट्विटर पर फॉलो करते हैं. शाहिद अफरीदी अपने अधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कुल इकतालीस लोगो को फॉलो कर रहे हैं. जिसमे से भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली भी एक है. बता दें, कि शाहीद अफरीदी के ट्विटर पर कुल एक. पंद्रह मिलियन फॉलोवर है. आपकों यह भी बता दे, कि भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली और शाहिद अफरीदी के बीच ख़ास दोस्ती है. अफरीदी, विराट को अपना छोटा भाई मानते हैं. जब शाहिद अफरीदी ने क्रिकेट से संन्यास लिया था, तो भारतीय टीम ने अफरीदी के लिए विराट कोहली की टी-शर्ट में सभी खिलाड़ियों के हस्ताक्षर कर शाहिद अफरीदी को टी-शर्ट भेंट की थी. शाहीद अफरीदी के इस ट्वीट पर विराट कोहली ने उनका शुक्रिया अदा किया था. Congratulations @imVkohli @AnushkaSharma on your wedding. May God Bless you two and give you happiness and a rewarding married life. Thanks Shahid Bhai. ? अगर आपकों हमारा आर्टिकल पसंद आया, तो प्लीज इसे लाइक करें. अपने दोस्तों तक ये खबर सबसे पहले पहुंचाने के लिए शेयर करें. साथ ही अगर आप कोई सुझाव देना चाहते हैं, तो प्लीज कमेंट करें. अगर आपने अब तक हमारा पेज लाइक नहीं किया हैं, तो कृपया अभी लाइक करें, जिससे लेटेस्ट अपडेट हम आपकों जल्दी पहुंचा सकें.
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पीएम मोदी नए साल पर लखनऊ को सौगात देंगे. पीएम 1040 आवासीय फ्लैट का शिलान्यास करेंगे. अवध विहार योजना के तहत ये फ्लैट बनाए जाएंगे. ये फ्लैट्स आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को अलॉट होंगे. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पीएम मोदी इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे.
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पीएम मोदी नए साल पर लखनऊ को सौगात देंगे. पीएम एक हज़ार चालीस आवासीय फ्लैट का शिलान्यास करेंगे. अवध विहार योजना के तहत ये फ्लैट बनाए जाएंगे. ये फ्लैट्स आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को अलॉट होंगे. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पीएम मोदी इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे.
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नागपुरः एक चरवाहे ने अपनी गाय की मौत का बदला लेने के लिए एक बाघिन और उसके 3 बच्चों को मार दिया। बताया जा रहा है कि आरोपी ने इन सभी को कीटनाशक देकर उनकी जान ले ली। एक वन अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र स्थित उमरेड-पावनी-करहंडला अभयारण्य में एक बाघिन और 3 शावकों की मौत के मामले में शनिवार को एक मवेशी चराने वाले को गिरफ्तार किया गया। बाघिन और उसके दो शावकों के शव शुक्रवार को उमरेड रेंज में करहंडला बीट के कंपार्टमेंट संख्या 1415 में मिले और शनिवार सुबह तीसरे शावक का शव मिला, पास में ही एक गाय का आधा खाया हुआ शव पड़ा था।
पेंच टाइगर रिजर्व के क्षेत्र निदेशक रविकिरण गोवेकर ने कहा, 'परिस्थितिजन्य सबूतों के साथ-साथ स्थानीय खुफिया जानकारी के आधार पर नवेगांव (साधु) गांव निवासी दिवाकर दत्तुजी नागेकर को हिरासत में लिया गया। आरोपी एक अवैध चरवाहा है और उसने बदला लेने के लिए कीटनाशक देने की बात कबूल की है। उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बाघिन करीब 4-5 साल की थी जबकि शावक करीब 5 महीने के थे। शवों से नमूने डीएनए और विषविज्ञान संबंधी परीक्षणों के लिए एकत्र किए गए हैं। ' उन्होंने कहा कि उसने जिस कीटनाशक का इस्तेमाल किया, उसे जब्त कर लिया गया है। गोवेकर ने बताया कि आरोपी को गिरफ्तार कर शनिवार को अदालत में पेश किया गया।
वहीं, महाराष्ट्र के औरंगाबाद में शहरी निकाय द्वारा संचालित चिड़ियाघर में क्रिसमस की सुबह खुशी लेकर आई थी, जब एक बाघिन ने 5 शावकों को जन्म दिया था। औरंगाबाद नगर निगम के अधिकारी ने बताया कि 'समृद्धि' नाम की बाघिन ने 5 शावकों को जन्म दिया है। यह तीसरी बार था जब बाघिन ने बच्चों को जन्म दिया है। चिड़ियाघर के अधीक्षक एसएस नाइकवाडे ने बताया, 'समृद्धि का जन्म सिद्धार्थ चिड़ियाघर में हुआ था। उसने अब तक 12 शावकों को जन्म दिया है जिनमें से 5 शावकों का जन्म शुक्रवार तड़के हुआ और एक बार में जन्म लेने वाले शावकों की यह सबसे बड़ी संख्या है। इन शावकों के पिता का जन्म भी इसी चिड़ियाघर में 8 साल पहले हुआ था। ' उन्होंने बताया कि इन शावकों के साथ चिड़ियाघर में बाघों की संख्या 9 से 14 हो गई है।
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नागपुरः एक चरवाहे ने अपनी गाय की मौत का बदला लेने के लिए एक बाघिन और उसके तीन बच्चों को मार दिया। बताया जा रहा है कि आरोपी ने इन सभी को कीटनाशक देकर उनकी जान ले ली। एक वन अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र स्थित उमरेड-पावनी-करहंडला अभयारण्य में एक बाघिन और तीन शावकों की मौत के मामले में शनिवार को एक मवेशी चराने वाले को गिरफ्तार किया गया। बाघिन और उसके दो शावकों के शव शुक्रवार को उमरेड रेंज में करहंडला बीट के कंपार्टमेंट संख्या एक हज़ार चार सौ पंद्रह में मिले और शनिवार सुबह तीसरे शावक का शव मिला, पास में ही एक गाय का आधा खाया हुआ शव पड़ा था। पेंच टाइगर रिजर्व के क्षेत्र निदेशक रविकिरण गोवेकर ने कहा, 'परिस्थितिजन्य सबूतों के साथ-साथ स्थानीय खुफिया जानकारी के आधार पर नवेगांव गांव निवासी दिवाकर दत्तुजी नागेकर को हिरासत में लिया गया। आरोपी एक अवैध चरवाहा है और उसने बदला लेने के लिए कीटनाशक देने की बात कबूल की है। उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। बाघिन करीब चार-पाँच साल की थी जबकि शावक करीब पाँच महीने के थे। शवों से नमूने डीएनए और विषविज्ञान संबंधी परीक्षणों के लिए एकत्र किए गए हैं। ' उन्होंने कहा कि उसने जिस कीटनाशक का इस्तेमाल किया, उसे जब्त कर लिया गया है। गोवेकर ने बताया कि आरोपी को गिरफ्तार कर शनिवार को अदालत में पेश किया गया। वहीं, महाराष्ट्र के औरंगाबाद में शहरी निकाय द्वारा संचालित चिड़ियाघर में क्रिसमस की सुबह खुशी लेकर आई थी, जब एक बाघिन ने पाँच शावकों को जन्म दिया था। औरंगाबाद नगर निगम के अधिकारी ने बताया कि 'समृद्धि' नाम की बाघिन ने पाँच शावकों को जन्म दिया है। यह तीसरी बार था जब बाघिन ने बच्चों को जन्म दिया है। चिड़ियाघर के अधीक्षक एसएस नाइकवाडे ने बताया, 'समृद्धि का जन्म सिद्धार्थ चिड़ियाघर में हुआ था। उसने अब तक बारह शावकों को जन्म दिया है जिनमें से पाँच शावकों का जन्म शुक्रवार तड़के हुआ और एक बार में जन्म लेने वाले शावकों की यह सबसे बड़ी संख्या है। इन शावकों के पिता का जन्म भी इसी चिड़ियाघर में आठ साल पहले हुआ था। ' उन्होंने बताया कि इन शावकों के साथ चिड़ियाघर में बाघों की संख्या नौ से चौदह हो गई है।
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4 की उप-धारा 1 में निर्धारित 17 मदों (नियमावली) को प्रकाशित करना होगा।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में निम्नलिखित विभाग शामिल हैंः
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय चिकित्सा और जन स्वास्थ्य मामलों को देखता है जिसमें औषध नियंत्रण और खाद्य में मिलावट की रोकथाम शामिल है जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसंख्या स्थिरीकरण करना है।
विभाग में विभिन्न स्तरों पर कार्य का संचालन, कार्य संचालन नियमों और समय-समय पर जारी अन्य सरकारी आदेशों / अनुदेशों के अनुसार किया जाता है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की कार्यालय पद्धति निर्देशिका, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नियमों / विनियमों / अनुदेशों आदि का अनुपालन करता है।
किसी व्यवस्था की विशिष्टियां, जो उसकी नीति की संरचना या उसके कार्यान्वयन के संबंध में जनता के सदस्यों से परामर्श के लिए या उनके द्वारा अभ्यावेदन के लिए विद्यमान हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में एक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद है जिसमें राज्य सरकारों / केन्द्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्री, सांसद, स्वास्थ्य संगठनों और सार्वजनिक निकायों का प्रतिनिधित्व करने वाले गैर-सरकारी अधिकारी और कुछ प्रख्यात व्यक्ति शामिल हैं। यह केन्द्र और राज्यों के लिए नीति की व्यापक रूपरेखा की सिफारिश करने के लिए अपने सभी पहलुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में शीर्ष नीति निर्माण निकाय है।
- ऐसे बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों के, जिनमें दो या अधिक व्यक्ति हैं, जिनका उसके भाग के रूप में या इस बारे में सलाह देने के प्रयोजन के लिए गठन किया गया है और इस बारे में कि क्या उन बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों की बैठकें जनता के लिए खुली होंगी या ऐसी बैठकों के कार्यवृत्त तक जनता की पहुंच होगी। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण में अध्यक्ष के अलावा 22 सदस्य हैं। एफएसएसएआई के कार्यवृत्त को समय-समय पर वेबसाइट अर्थात् Fssai.gov.in पर अपलोड किया जाता है।
- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत नोडल अधिकारी का नामांकन (513.49 KB)
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चार की उप-धारा एक में निर्धारित सत्रह मदों को प्रकाशित करना होगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में निम्नलिखित विभाग शामिल हैंः स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय चिकित्सा और जन स्वास्थ्य मामलों को देखता है जिसमें औषध नियंत्रण और खाद्य में मिलावट की रोकथाम शामिल है जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसंख्या स्थिरीकरण करना है। विभाग में विभिन्न स्तरों पर कार्य का संचालन, कार्य संचालन नियमों और समय-समय पर जारी अन्य सरकारी आदेशों / अनुदेशों के अनुसार किया जाता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की कार्यालय पद्धति निर्देशिका, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नियमों / विनियमों / अनुदेशों आदि का अनुपालन करता है। किसी व्यवस्था की विशिष्टियां, जो उसकी नीति की संरचना या उसके कार्यान्वयन के संबंध में जनता के सदस्यों से परामर्श के लिए या उनके द्वारा अभ्यावेदन के लिए विद्यमान हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में एक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद है जिसमें राज्य सरकारों / केन्द्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्री, सांसद, स्वास्थ्य संगठनों और सार्वजनिक निकायों का प्रतिनिधित्व करने वाले गैर-सरकारी अधिकारी और कुछ प्रख्यात व्यक्ति शामिल हैं। यह केन्द्र और राज्यों के लिए नीति की व्यापक रूपरेखा की सिफारिश करने के लिए अपने सभी पहलुओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में शीर्ष नीति निर्माण निकाय है। - ऐसे बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों के, जिनमें दो या अधिक व्यक्ति हैं, जिनका उसके भाग के रूप में या इस बारे में सलाह देने के प्रयोजन के लिए गठन किया गया है और इस बारे में कि क्या उन बोर्डों, परिषदों, समितियों और अन्य निकायों की बैठकें जनता के लिए खुली होंगी या ऐसी बैठकों के कार्यवृत्त तक जनता की पहुंच होगी। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण में अध्यक्ष के अलावा बाईस सदस्य हैं। एफएसएसएआई के कार्यवृत्त को समय-समय पर वेबसाइट अर्थात् Fssai.gov.in पर अपलोड किया जाता है। - सूचना का अधिकार अधिनियम दो हज़ार पाँच के तहत नोडल अधिकारी का नामांकन
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स्वपोषी वे सजीव हैं जो साधारण अकार्बनिक अणुओं से जटिल कार्बनिक यौगिको का निर्माण कर सकते हैं। इस कार्य के लिए आवश्यक उर्जा के लिए वे प्रकाश या रासायनिक उर्जा का उपयोग करते हैं। स्वपोषी सजीवों को खाद्य श्रृंखला में उत्पादक कहा जाता है। हरे पेड़-पौधें प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण के द्वारा अपना भोजन स्वंय बनाते हैं तथा स्वपोषी कहलाते हैं। कुछ जीवाणु भी यह कार्य कर सकते हैं, इसके लिए वे प्रकाशीय उर्जा के स्थान पर रासायनिक उर्जा का उपयोग करते हैं।
Hindi Dictionary. Devnagari to roman Dictionary. हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा शब्दकोष। देवनागरी और रोमन लिपि में। एक लाख शब्दों का संकलन। स्थानीय और सरल भाषा में व्याख्या।
Swaposhi के पर्यायवाचीः
Swaposhi, Swaposhi meaning in English. Swaposhi in english. Swaposhi in english language. What is meaning of Swaposhi in English dictionary? Swaposhi ka matalab english me kya hai (Swaposhi का अंग्रेजी में मतलब ). Swaposhi अंग्रेजी मे मीनिंग. English definition of Swaposhi. English meaning of Swaposhi. Swaposhi का मतलब (मीनिंग) अंग्रेजी में जाने। Swaposhi kaun hai? Swaposhi kahan hai? Swaposhi kya hai? Swaposhi kaa arth.
Hindi to english dictionary(शब्दकोश).स्वपोषी को अंग्रेजी में क्या कहते हैं.
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ये शब्द भी देखेंः
synonyms of Swaposhi in Hindi Swaposhi ka Samanarthak kya hai? Swaposhi Samanarthak, Swaposhi synonyms in Hindi, Paryay of Swaposhi, Swaposhi ka Paryay, In "gkexams" you will find the word synonym of the Swaposhi And along with the derivation of the word Swaposhi is also given here for your enlightenment. Paryay and Samanarthak both reveal the same expressions. What is the synonym of Swaposhi in Hindi?
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स्वपोषी वे सजीव हैं जो साधारण अकार्बनिक अणुओं से जटिल कार्बनिक यौगिको का निर्माण कर सकते हैं। इस कार्य के लिए आवश्यक उर्जा के लिए वे प्रकाश या रासायनिक उर्जा का उपयोग करते हैं। स्वपोषी सजीवों को खाद्य श्रृंखला में उत्पादक कहा जाता है। हरे पेड़-पौधें प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण के द्वारा अपना भोजन स्वंय बनाते हैं तथा स्वपोषी कहलाते हैं। कुछ जीवाणु भी यह कार्य कर सकते हैं, इसके लिए वे प्रकाशीय उर्जा के स्थान पर रासायनिक उर्जा का उपयोग करते हैं। Hindi Dictionary. Devnagari to roman Dictionary. हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा शब्दकोष। देवनागरी और रोमन लिपि में। एक लाख शब्दों का संकलन। स्थानीय और सरल भाषा में व्याख्या। Swaposhi के पर्यायवाचीः Swaposhi, Swaposhi meaning in English. Swaposhi in english. Swaposhi in english language. What is meaning of Swaposhi in English dictionary? Swaposhi ka matalab english me kya hai . Swaposhi अंग्रेजी मे मीनिंग. English definition of Swaposhi. English meaning of Swaposhi. Swaposhi का मतलब अंग्रेजी में जाने। Swaposhi kaun hai? Swaposhi kahan hai? Swaposhi kya hai? Swaposhi kaa arth. Hindi to english dictionary.स्वपोषी को अंग्रेजी में क्या कहते हैं. इस श्रेणी से मिलते जुलते शब्दः ये शब्द भी देखेंः synonyms of Swaposhi in Hindi Swaposhi ka Samanarthak kya hai? Swaposhi Samanarthak, Swaposhi synonyms in Hindi, Paryay of Swaposhi, Swaposhi ka Paryay, In "gkexams" you will find the word synonym of the Swaposhi And along with the derivation of the word Swaposhi is also given here for your enlightenment. Paryay and Samanarthak both reveal the same expressions. What is the synonym of Swaposhi in Hindi?
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अमेरिका के मियामी बंदरगाह पर निजी व्यवसायिक पानी जहाज चलाने वाली महिला को कानूनों की नजरअंदाजी भारी पड़ी है. महिला को देश के तट रक्षक संबंधी कानूनों का उल्लंघन न करने की बार-बार चेतावनी दी गई थी. इसके बाद भी जब उसने मियामी बंदरगाह के यूएससीजी कैप्टन का आदेश नहीं माना, तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करके, आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार बोका रैटन महिला का नाम कोलीन मैरी किल्नैप (57) है.
महिला को गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश किया गया. उस पर मुकदमा अभी शुरु किया जाना है. अगर महिला देश के तटरक्षक कानून का उल्लंघन करने की दोषी सिद्ध हो गई तो उसे, 6 साल तक की सजा हो सकती है. इन तमाम तथ्यों की पुष्टि अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित, दक्षिणी जिला न्याय विभाग (Department of Justice U.S. Attorney Office Southern District of Florida) की बेवसाइट पर उपलब्ध अधिकृत जानकारी से भी होती है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, हाल ही में आरोपी महिला को कोर्ट में पेश भी किया गया था. आरोपी गिरफ्तार महिला के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उसने, पोर्ट मियामी के यूएस कोर्ट गार्ड (USCG) कैप्टन के एक नहीं वरन् तीन-तीन आदेशों का उल्लंघन किया है.
फ्लोरिडा की कोर्ट में पेश मामले के मुताबिक, 10 फरवरी सन् 2020 को निजी पानी जहाज चलाने का व्यवसाय करने वाली किलनैप को, मियामी तटरक्षक अफसर )(यूएससीजी) कैप्टन ने तट पर निजी पानी जहाज न चलाने का आदेश दिया था. क्योंकि मैरी किल्नैप के पास तब व्यवसायिक पानी जहाज चलाने का यूएससीजी सर्टिफिकेट मौजूद नहीं था. इसके बिना तट पर व्यवयायिक उपयोग के लिए तट पर निजी पानी जहाज चलाने की अनुमित नहीं दी जा सकती थी. इस पाबंदी के बाद भी, अमेरिकी तटरक्षक एजेंसी की टीमों ने मैरी किल्नैप को, लगातार तट पर अपना जहाज चलाते हुए पकड़ा.
लिहाजा चेतावनी स्वरुप मैरी किलनैप को मियामी कोस्ट गार्ड कैप्टन (तट रक्षक अधिकारी) ने उन्हें ऐसा न करने की अंतिम और तीसरी चेतावनी दी. जिद पर अड़ी आरोपी महिला ने तभी भी आदेशों की अवहेलना ही की. इसके बाद भी जब महिला ने अपने व्यवसायिक यात्री जहाज का संचालन समुद्र तट पर बदस्तूर जारी रखा, तो उसे मुकदमा दर्ज करके अमेरिकी एजेंसियों ने गिरफ्तार कर लिया. इन तमाम तथ्यों की पुष्टि फ्लोरिडा के दक्षिणी जिले के यूनाइटेड स्टेट्स अटॉर्नी मार्केजी लैपोइंटे और, यूएससीजी इंवेस्टिगेटिव सर्विस यानी सीजीआईएस (दक्षिण पूर्व क्षेत्र) प्रभारी जिन्निया जेम्स के बयान से भी होती है.
इस मामले में, सीजीआईएस ने यूएससीजी सेक्टर मियामी की सहायता से अपने स्तर पर भी जांच की थी. फिलहाल अब आरोपी महिला की गिरफ्तारी के बाद उसके खिलाफ सहायक अमेरिकी अटॉर्नी मार्क एंटन की कोर्ट में आरोपी महिला के खिलाफ मुकदमा चलाया जा रहा है. कोर्ट में पेश गवाह और सबूतों के आधार पर, आरोपी महिला अगर तटरक्षक कानूनों की धज्जियां उड़ाने की आरोपी सिद्ध हो गई, तो उसे अमेरिका के तटरक्षक कानूनों के तहत 6 साल तक की सजा सुनाई जा सकती है.
गिरफ्तार महिला जिस बोका रैटन (फ्लोरिडा) इलाके की रहने वाली है, उसका भी अपना एक अलग ही और दिलचस्प इतिहास है. बोका रैटन को 2 अगस्त सन् 1924 को अधिकृत रुप से शामिल किया गया था. तब इसका नाम बोकारटोन होता था. सन् 1925 में इसका नाम 'बोका रैटन' हो गया. अमेरिकी जनगणना विभाग के मुताबिक 2019 की जनगणना में इस इलाके की जनसंख्या 99 हजार 805 थी. हालांकि वैसे अगर दूसरी नजर से देखा जाए तो यहां करीब 2 लाख लोग निवास करते हैं. लेकिन यह आबादी इसकी नगर पालिका के बाहर रहती है. बोका रैटन डाउनटाउन मियामी से करीब 45 मील यानी लगभग 72 किलोमीटर दूर स्थित है. यह मियामी मैट्रो सिटी का एक प्रमुख शहर है. मियामी को दक्षिण फ्लोरिडा के बड़े शहरों में गिना जाता है.
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अमेरिका के मियामी बंदरगाह पर निजी व्यवसायिक पानी जहाज चलाने वाली महिला को कानूनों की नजरअंदाजी भारी पड़ी है. महिला को देश के तट रक्षक संबंधी कानूनों का उल्लंघन न करने की बार-बार चेतावनी दी गई थी. इसके बाद भी जब उसने मियामी बंदरगाह के यूएससीजी कैप्टन का आदेश नहीं माना, तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करके, आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार बोका रैटन महिला का नाम कोलीन मैरी किल्नैप है. महिला को गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश किया गया. उस पर मुकदमा अभी शुरु किया जाना है. अगर महिला देश के तटरक्षक कानून का उल्लंघन करने की दोषी सिद्ध हो गई तो उसे, छः साल तक की सजा हो सकती है. इन तमाम तथ्यों की पुष्टि अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित, दक्षिणी जिला न्याय विभाग की बेवसाइट पर उपलब्ध अधिकृत जानकारी से भी होती है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, हाल ही में आरोपी महिला को कोर्ट में पेश भी किया गया था. आरोपी गिरफ्तार महिला के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उसने, पोर्ट मियामी के यूएस कोर्ट गार्ड कैप्टन के एक नहीं वरन् तीन-तीन आदेशों का उल्लंघन किया है. फ्लोरिडा की कोर्ट में पेश मामले के मुताबिक, दस फरवरी सन् दो हज़ार बीस को निजी पानी जहाज चलाने का व्यवसाय करने वाली किलनैप को, मियामी तटरक्षक अफसर ) कैप्टन ने तट पर निजी पानी जहाज न चलाने का आदेश दिया था. क्योंकि मैरी किल्नैप के पास तब व्यवसायिक पानी जहाज चलाने का यूएससीजी सर्टिफिकेट मौजूद नहीं था. इसके बिना तट पर व्यवयायिक उपयोग के लिए तट पर निजी पानी जहाज चलाने की अनुमित नहीं दी जा सकती थी. इस पाबंदी के बाद भी, अमेरिकी तटरक्षक एजेंसी की टीमों ने मैरी किल्नैप को, लगातार तट पर अपना जहाज चलाते हुए पकड़ा. लिहाजा चेतावनी स्वरुप मैरी किलनैप को मियामी कोस्ट गार्ड कैप्टन ने उन्हें ऐसा न करने की अंतिम और तीसरी चेतावनी दी. जिद पर अड़ी आरोपी महिला ने तभी भी आदेशों की अवहेलना ही की. इसके बाद भी जब महिला ने अपने व्यवसायिक यात्री जहाज का संचालन समुद्र तट पर बदस्तूर जारी रखा, तो उसे मुकदमा दर्ज करके अमेरिकी एजेंसियों ने गिरफ्तार कर लिया. इन तमाम तथ्यों की पुष्टि फ्लोरिडा के दक्षिणी जिले के यूनाइटेड स्टेट्स अटॉर्नी मार्केजी लैपोइंटे और, यूएससीजी इंवेस्टिगेटिव सर्विस यानी सीजीआईएस प्रभारी जिन्निया जेम्स के बयान से भी होती है. इस मामले में, सीजीआईएस ने यूएससीजी सेक्टर मियामी की सहायता से अपने स्तर पर भी जांच की थी. फिलहाल अब आरोपी महिला की गिरफ्तारी के बाद उसके खिलाफ सहायक अमेरिकी अटॉर्नी मार्क एंटन की कोर्ट में आरोपी महिला के खिलाफ मुकदमा चलाया जा रहा है. कोर्ट में पेश गवाह और सबूतों के आधार पर, आरोपी महिला अगर तटरक्षक कानूनों की धज्जियां उड़ाने की आरोपी सिद्ध हो गई, तो उसे अमेरिका के तटरक्षक कानूनों के तहत छः साल तक की सजा सुनाई जा सकती है. गिरफ्तार महिला जिस बोका रैटन इलाके की रहने वाली है, उसका भी अपना एक अलग ही और दिलचस्प इतिहास है. बोका रैटन को दो अगस्त सन् एक हज़ार नौ सौ चौबीस को अधिकृत रुप से शामिल किया गया था. तब इसका नाम बोकारटोन होता था. सन् एक हज़ार नौ सौ पच्चीस में इसका नाम 'बोका रैटन' हो गया. अमेरिकी जनगणना विभाग के मुताबिक दो हज़ार उन्नीस की जनगणना में इस इलाके की जनसंख्या निन्यानवे हजार आठ सौ पाँच थी. हालांकि वैसे अगर दूसरी नजर से देखा जाए तो यहां करीब दो लाख लोग निवास करते हैं. लेकिन यह आबादी इसकी नगर पालिका के बाहर रहती है. बोका रैटन डाउनटाउन मियामी से करीब पैंतालीस मील यानी लगभग बहत्तर किलोग्राममीटर दूर स्थित है. यह मियामी मैट्रो सिटी का एक प्रमुख शहर है. मियामी को दक्षिण फ्लोरिडा के बड़े शहरों में गिना जाता है.
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हरियाणा के रेवाड़ी जिले में एक युवक से दोस्ती करके उसे विश्वास में लेकर 5 लाख की धोखाधड़ी करने का मामला सामने आया है। शराब ठेके में हिस्सेदारी का झांसा देकर दोस्त के 4 लाख कैश और 1 लाख का चेक लेकर आरोपी भाग गए। मॉडल टाउन थाना पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।
मिली जानकारी के अनुसार, रेवाड़ी शहर के मोहल्ला कुतुबपुर में रहने वाला अनिल कुमार किसी मुकदमे में पिछले दिनों भोंडसी जेल में बंद था। वहां उसकी मुलाकात गुरुग्राम के दौलताबाद निवासी अरविंद उर्फ फौजी के साथ हो गई। दोनों जेल के अंदर अच्छे दोस्त बन गए। जेल से बाहर आने के बाद भी एक-दूसरे से मुलाकात करते रहे।
अरविंद उर्फ फौजी ने कुछ महीने पहले फोन किया कि पैसे कमाने हैं तो ततारपुर और मसानी में शराब ठेकों में अपना हिस्सा डाल देते हैं, क्योंकि शराब ठेकेदार उसके अच्छे जानकार हैं। इसके लिए बाकायदा दोनों साइट भी अरविंद ने दिखाई और 5-5 लाख रुपए शेयर डालने पर सहमति बन गई। सोमवार को अरविंद ने अनिल को फोन करके 5 लाख रुपए लेकर बीएमजी मॉल के सामने एक होटल में बुलाया।
यहां अरविंद के अलावा सुनारिया निवासी हितेश उर्फ मोनू व 2 अन्य लड़के थे। पांचों ने आपस में बात की और फिर अरविंद की गाड़ी में बैठकर रेवाड़ी तहसील में चले गए। अनिल ने बताया कि वह 4 लाख रुपए कैश और एक लाख का चेक लाया है। पैसा और चेक गाड़ी में रखकर वह तहसील में चले गए। तहसील से बाहर आया तो गाड़ी में कोई नहीं मिला। पैसे, चेक और कागजात गायब थे।
असली कागजात, 4 लाख कैश और 1 लाख रुपए का चेक लेकर चारों आरोपी भाग गए। अनिल कुमार ने इसकी शिकायत तुरंत पुलिस को दी। मॉडल टाउन थाना पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करके कार्रवाई शुरू कर दी है।
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हरियाणा के रेवाड़ी जिले में एक युवक से दोस्ती करके उसे विश्वास में लेकर पाँच लाख की धोखाधड़ी करने का मामला सामने आया है। शराब ठेके में हिस्सेदारी का झांसा देकर दोस्त के चार लाख कैश और एक लाख का चेक लेकर आरोपी भाग गए। मॉडल टाउन थाना पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। मिली जानकारी के अनुसार, रेवाड़ी शहर के मोहल्ला कुतुबपुर में रहने वाला अनिल कुमार किसी मुकदमे में पिछले दिनों भोंडसी जेल में बंद था। वहां उसकी मुलाकात गुरुग्राम के दौलताबाद निवासी अरविंद उर्फ फौजी के साथ हो गई। दोनों जेल के अंदर अच्छे दोस्त बन गए। जेल से बाहर आने के बाद भी एक-दूसरे से मुलाकात करते रहे। अरविंद उर्फ फौजी ने कुछ महीने पहले फोन किया कि पैसे कमाने हैं तो ततारपुर और मसानी में शराब ठेकों में अपना हिस्सा डाल देते हैं, क्योंकि शराब ठेकेदार उसके अच्छे जानकार हैं। इसके लिए बाकायदा दोनों साइट भी अरविंद ने दिखाई और पाँच-पाँच लाख रुपए शेयर डालने पर सहमति बन गई। सोमवार को अरविंद ने अनिल को फोन करके पाँच लाख रुपए लेकर बीएमजी मॉल के सामने एक होटल में बुलाया। यहां अरविंद के अलावा सुनारिया निवासी हितेश उर्फ मोनू व दो अन्य लड़के थे। पांचों ने आपस में बात की और फिर अरविंद की गाड़ी में बैठकर रेवाड़ी तहसील में चले गए। अनिल ने बताया कि वह चार लाख रुपए कैश और एक लाख का चेक लाया है। पैसा और चेक गाड़ी में रखकर वह तहसील में चले गए। तहसील से बाहर आया तो गाड़ी में कोई नहीं मिला। पैसे, चेक और कागजात गायब थे। असली कागजात, चार लाख कैश और एक लाख रुपए का चेक लेकर चारों आरोपी भाग गए। अनिल कुमार ने इसकी शिकायत तुरंत पुलिस को दी। मॉडल टाउन थाना पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज करके कार्रवाई शुरू कर दी है। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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पंच👊नामा-पिरान कलियरः चंद दिनों में ही चुनावी समीकरण बदलने में कामयाब हुए आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल वहीद उर्फ भूरा प्रधान ने चुनाव प्रचार में तेज़ी लाते हुए विधानसभा के विभिन्न गांवों में डोर-टू-डोर जनसंपर्क किया और वोट की अपील की, इस दौरान आसपा प्रत्याशी का ग्रामीणों ने जोरदार स्वागत करते हुए भरपूर समर्थन का आश्वासन दिया।
गौरतलब है कि आजाद समाज पार्टी ने अब्दुल वहीद उर्फ भूरा को अपना प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा है। नामांकन के बाद से भूरा प्रधान ने युद्धस्तर पर प्रचार-प्रसार शुरू करते हुए चुनावी समीकरण बदल दिए है। लगातार जनसंपर्क के जरिए चुनावी जमीन को तैयार किया जा रहा है। चंद दिनों में ही भूरा प्रधान आमने-सामने के मुकाबले में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके है। आज विधानसभा क्षेत्र के शांतरशाह, बहादरपुर सैनी, दौलतपुर, बड़ेढी, भारापुर, घौडेवाला, डरा हल्वेडी, मर्गुबपुर, मुस्तफाबाद सहित दर्जनों गाँव मे डोर-टू-डोर जनसंपर्क किया। इस दौरान भूरा प्रधान को सभी बिरादरियों को अपार जनसमर्थन हासिल हुआ। लोगो ने हाथों-हाथ भूरा प्रधान को खुलेतौर पर समर्थन देते हुए जीत का आश्वासन दिलाया।
पंच👊नामा-पिरान कलियरः चंद दिनों में ही चुनावी समीकरण बदलने में कामयाब हुए आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल वहीद उर्फ भूरा प्रधान ने चुनाव प्रचार में तेज़ी लाते हुए विधानसभा के विभिन्न गांवों में डोर-टू-डोर जनसंपर्क किया और वोट की अपील की, इस दौरान आसपा प्रत्याशी का ग्रामीणों ने जोरदार स्वागत करते हुए भरपूर समर्थन का आश्वासन दिया।
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पंच👊नामा-पिरान कलियरः चंद दिनों में ही चुनावी समीकरण बदलने में कामयाब हुए आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल वहीद उर्फ भूरा प्रधान ने चुनाव प्रचार में तेज़ी लाते हुए विधानसभा के विभिन्न गांवों में डोर-टू-डोर जनसंपर्क किया और वोट की अपील की, इस दौरान आसपा प्रत्याशी का ग्रामीणों ने जोरदार स्वागत करते हुए भरपूर समर्थन का आश्वासन दिया। गौरतलब है कि आजाद समाज पार्टी ने अब्दुल वहीद उर्फ भूरा को अपना प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा है। नामांकन के बाद से भूरा प्रधान ने युद्धस्तर पर प्रचार-प्रसार शुरू करते हुए चुनावी समीकरण बदल दिए है। लगातार जनसंपर्क के जरिए चुनावी जमीन को तैयार किया जा रहा है। चंद दिनों में ही भूरा प्रधान आमने-सामने के मुकाबले में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके है। आज विधानसभा क्षेत्र के शांतरशाह, बहादरपुर सैनी, दौलतपुर, बड़ेढी, भारापुर, घौडेवाला, डरा हल्वेडी, मर्गुबपुर, मुस्तफाबाद सहित दर्जनों गाँव मे डोर-टू-डोर जनसंपर्क किया। इस दौरान भूरा प्रधान को सभी बिरादरियों को अपार जनसमर्थन हासिल हुआ। लोगो ने हाथों-हाथ भूरा प्रधान को खुलेतौर पर समर्थन देते हुए जीत का आश्वासन दिलाया। पंच👊नामा-पिरान कलियरः चंद दिनों में ही चुनावी समीकरण बदलने में कामयाब हुए आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल वहीद उर्फ भूरा प्रधान ने चुनाव प्रचार में तेज़ी लाते हुए विधानसभा के विभिन्न गांवों में डोर-टू-डोर जनसंपर्क किया और वोट की अपील की, इस दौरान आसपा प्रत्याशी का ग्रामीणों ने जोरदार स्वागत करते हुए भरपूर समर्थन का आश्वासन दिया।
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बाराबंकी। उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले के टिकैतनगर में सोमवार को एक युवक पड़ोस में रहने वाली तीन वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार करने के बाद गंभीर हालत में उसे छोड़कर फरार हो गया।
पुलिस के अनुसार टिकैतनगर कस्बे में सरावगी मोहल्ले में तीन वर्षीय बालिका घर के बाहर खेल रही थी। पड़ोस में रहने वाला युवक संजय उसे बहला कर पुराने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के भवन में ले गया और उसके साथ दुराचार किया।
बलात्कार के बाद लहूलुहान हो गई बालिका को वह वहीं छोड़कर फरार हो गया। परिजनों ने बालिका की तलाश की तो वह गंभीर हालत में पुराने स्वास्थ्य केन्द्र परिसर में पड़ी मिली। उपचार के लिए उसे जिला अस्पताल भेज दिया गया है। बालिका के पिता की तहरीर पर संजय को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
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बाराबंकी। उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले के टिकैतनगर में सोमवार को एक युवक पड़ोस में रहने वाली तीन वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार करने के बाद गंभीर हालत में उसे छोड़कर फरार हो गया। पुलिस के अनुसार टिकैतनगर कस्बे में सरावगी मोहल्ले में तीन वर्षीय बालिका घर के बाहर खेल रही थी। पड़ोस में रहने वाला युवक संजय उसे बहला कर पुराने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के भवन में ले गया और उसके साथ दुराचार किया। बलात्कार के बाद लहूलुहान हो गई बालिका को वह वहीं छोड़कर फरार हो गया। परिजनों ने बालिका की तलाश की तो वह गंभीर हालत में पुराने स्वास्थ्य केन्द्र परिसर में पड़ी मिली। उपचार के लिए उसे जिला अस्पताल भेज दिया गया है। बालिका के पिता की तहरीर पर संजय को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
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यूपी में मौसम विभाग ने पांच मई तक धूल भरी तेज हवाओं के साथ छिटपुट बारिश के आसार हैं। सुबह तेज धूप के बाद शहर में अचानक आए बादलों ने रविवार को मौसम पलट दिया। रिमझिम से शुरू हुईं फुहारें दोपहर आते-आते झमाझम में बदल गईं।
लखनऊः उत्तर प्रदेश में मौसम का मिजाज बदल गया है। मौसम विभाग ने पांच मई तक धूल भरी तेज हवाओं के साथ छिटपुट बारिश के आसार हैं। सुबह तेज धूप के बाद शहर में अचानक आए बादलों ने रविवार को मौसम पलट दिया। रिमझिम से शुरू हुईं फुहारें दोपहर आते-आते झमाझम में बदल गईं। शहर का अधिकतम तापमान सामान्य से 12. 7 डिग्री नीचे गिर गया। रविवार को अधिकतम और न्यूनतम तापमान के बीच महज 2 डिग्री का ही फर्क रहा। राजधानी का अधिकतम तापमान 26. 8 डिग्री और न्यूनतम तापमान 24. 4 डिग्री सेल्सियस पर दर्ज हुआ, हालांकि दोपहर में धूप भी खिल उठी।
आंचलिक मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एम़ दानिश के अनुसार, पाकिस्तान और आसपास के क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने से तेज हवा के साथ बारिश के आसार हैं। यह असर अगले कुछ दिनों तक जारी रहेगा। इसकी वजह से इस पूरे सप्ताह में अधिकतम तापमान में चार से छह डिग्री तक की गिरावट दर्ज की जाएगी। वहीं न्यूनतम तापमान में एक से दो डिग्री तक की गिरावट होगी। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, सोमवार को शहर में 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलेंगी। वहीं गरज-चमक के साथ बारिश के लिए अभी पूर्वानुमान है।
इन जिलों में ओलावृष्टि के आसार वरिष्ठ वैज्ञानिक एम़ दानिश के अनुसार, दो मई तक तराई बेल्ट से जुड़े जिलों और उत्तर प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र में आ रहे जिलों में गरज-चमक के साथ तेज बारिश और ओलावृष्टि की आशंका है। चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर, संत रविदास नगर, जौनपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, कौशांबी, चित्रकूट, फतेहपुर, बांदा के अलावा औरैया, कन्नौज, फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर, पीलीभीत, बरेली, बदायूं, कासगंज, संभल, रामपुर, मुरादाबाद, अमरोहा और बिजनौर में ओलावृष्टि के लिए आरेंज अलर्ट जारी किया गया है। इसके तहत भारी बारिश और ओलावृष्टि के प्रति सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
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यूपी में मौसम विभाग ने पांच मई तक धूल भरी तेज हवाओं के साथ छिटपुट बारिश के आसार हैं। सुबह तेज धूप के बाद शहर में अचानक आए बादलों ने रविवार को मौसम पलट दिया। रिमझिम से शुरू हुईं फुहारें दोपहर आते-आते झमाझम में बदल गईं। लखनऊः उत्तर प्रदेश में मौसम का मिजाज बदल गया है। मौसम विभाग ने पांच मई तक धूल भरी तेज हवाओं के साथ छिटपुट बारिश के आसार हैं। सुबह तेज धूप के बाद शहर में अचानक आए बादलों ने रविवार को मौसम पलट दिया। रिमझिम से शुरू हुईं फुहारें दोपहर आते-आते झमाझम में बदल गईं। शहर का अधिकतम तापमान सामान्य से बारह. सात डिग्री नीचे गिर गया। रविवार को अधिकतम और न्यूनतम तापमान के बीच महज दो डिग्री का ही फर्क रहा। राजधानी का अधिकतम तापमान छब्बीस. आठ डिग्री और न्यूनतम तापमान चौबीस. चार डिग्री सेल्सियस पर दर्ज हुआ, हालांकि दोपहर में धूप भी खिल उठी। आंचलिक मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एम़ दानिश के अनुसार, पाकिस्तान और आसपास के क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने से तेज हवा के साथ बारिश के आसार हैं। यह असर अगले कुछ दिनों तक जारी रहेगा। इसकी वजह से इस पूरे सप्ताह में अधिकतम तापमान में चार से छह डिग्री तक की गिरावट दर्ज की जाएगी। वहीं न्यूनतम तापमान में एक से दो डिग्री तक की गिरावट होगी। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, सोमवार को शहर में तीस से चालीस किलोग्राममीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलेंगी। वहीं गरज-चमक के साथ बारिश के लिए अभी पूर्वानुमान है। इन जिलों में ओलावृष्टि के आसार वरिष्ठ वैज्ञानिक एम़ दानिश के अनुसार, दो मई तक तराई बेल्ट से जुड़े जिलों और उत्तर प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र में आ रहे जिलों में गरज-चमक के साथ तेज बारिश और ओलावृष्टि की आशंका है। चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर, संत रविदास नगर, जौनपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, कौशांबी, चित्रकूट, फतेहपुर, बांदा के अलावा औरैया, कन्नौज, फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर, पीलीभीत, बरेली, बदायूं, कासगंज, संभल, रामपुर, मुरादाबाद, अमरोहा और बिजनौर में ओलावृष्टि के लिए आरेंज अलर्ट जारी किया गया है। इसके तहत भारी बारिश और ओलावृष्टि के प्रति सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
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उत्थान करती है, तब पद्मस्थ देवता उनके दर्शन से पुलकित होते है । जगदम्बा शिवजी के अङ्क में बैठकर आलंगित होती है - परस्पराश्लिष्ट होकर, परमशिवामृत वर्षण करती है । आनन्दकी इस चरमसीमा को योगमैथुन कहते है । दिव्य योगी मूलाधार स्थित पराशक्ति कुन्डलिनी को सहस्रार में स्थित शिव से मिलाकर दिव्य मैथुनानन्द की अनुभूति करके जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। अन्य सभी व्यक्ति तो मात्र स्त्री के सेवक हैं । सुषुम्ना को शक्ति तथा जीव को शिव कहते हैं। दिव्य योगी सुषुम्ना तथा प्राणरूपी जीव का संगम कराके वास्तविक सुरत का आनन्द भोगते हैं । हमारा पृथ्वीतत्त्व जलतत्त्व में, जलतत्त्व अग्नितत्त्व में, अग्नितत्त्व वायुतत्त्व में, वायुतत्त्व आकाशतत्त्व में, आकाशतत्त्व अहंकार में, अहंकार महत्तत्त्व में, महत् प्रकृति में प्रकृति पुरुष - विराट् में विलीन होता जाता है ।
हमारे शरीर में वामकुक्षी में एक संकोचशरीरात्मक पापपुरूष की कल्पना करते है, जो विकराल, क्रूर, अधोमुख, अदर्शनीय, दुर्मुख एवं समस्त दुरितों व दुर्मति का उद्गम स्थान है । वैसे भी आपने देखा होगा कि जब हमे पक्षाघात होता है या महाव्याधि आती है, तब हमारे शरीर का वामभाग ही ज्यादा दुष्प्रभावी बनता है ।
खलिल जिब्रान की एक सुन्दर उक्ति है - मैं ही आग हूं, मैं ही कूडा हूं, मेरी आग में, मेरे कूडे को जलाकर, जीवन को सुन्दर बना सकता हूं । जितने भी खराब विचार, पाप, दुरित कर्मों का उद्भव होता है वह शरीर के अन्दर से ही होता है और उनका शमनदमन भी अपने अन्दर ही होता है
कुण्डलीनी के ऊर्ध्वगमन के बाद संकोच शरीरात्मक पापपुरूष का यं बीज से नाभिमें शोषित करते है - खींचके लाते है, रं बीजसे उसका दहन करते है, फिर शिवसंयोग से तृप्त महाशक्ति कुण्डलीनी को हृदय कमल में बिराजित करते है और जले हुए पापपुरूष की भस्म में उस महाशक्ति द्वारा परम शिवामृत की वृष्टि से उस भस्म का पिंड बनाते है। पुनः उस पिण्ड से एक शिवस्वरूप जीवात्मा का प्रागट्य होता है
अपने शरीर में पंचभूतों का आधिपत्य भिन्न-भिन्न भागों में है। सबसे नीचे पृथ्वी तत्त्व, पीतवर्ण के चतुष्कोण यंत्र का बीज लं है, उसके उपर वरूण तत्त्व का स्थान है, श्वेतवर्ण, धनुषाकार बीज वं है, उसके उपर त्रिकोण मण्डल में वन्हि तत्त्व का स्थान हैं, रक्तवर्ण एवं रं बीज है, उसके उपर वर्तुलाकार धुम्रवर्ण वायु मण्डल बीज यं है, उसके उपर अवर्ण नीराकार आकाशमण्डल बीज हं वर्ण है । भूतशुद्धि से पञ्चभूतात्म देह की शुद्धि होती है।
पुनः परिशुद्ध विराट ब्रह्म से सृष्टिक्रम से प्रकृति, महत्, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं जलसे पृथ्व्यादि पंचभौतिक देह की कल्पना करते है । फिर विराट में विलीन विशुद्ध शिवयुक्त जीव हृदय में प्रतिष्ठित करते है और कुण्डलिनी को पुनः सुषुम्णा मार्ग
को प्रकाशित करते हुए, मूलाधार के प्रति प्रयाण कल्पते है । शुद्ध जीवात्मा के उपर गर्भाधानादि षोडश संस्कार की भावना करते है । अपने शरीर को इष्टदेवता का पीठ मानकर उसके विधि अङ्गों पर पीठ देवताओं का इस प्रकार न्यास करना चाहिये ।
समस्त पद्मोचक्रो के पंखडीयों में एकावन वर्णों का स्थान है, जैसे आगे बता चूके है । पूरी वर्णमाला शरीरमें दिव्य कला - चेतना के रूपमें स्थित है, उसका ही उपयोग करके महाशक्तिप्रदा वर्णमाला-अक्षमाला का वर्णन आगम ग्रंथों में मिलता है । यही मन्त्रों का उद्गम एवं प्राण है । अन्तर्मातृका-बहिर्मातृका न्यास इसी वर्णो की अमोघ शक्तिका रसास्वादन कराती है ।
वैसे तो ये पूरी क्रिया भावात्मक एवं श्रद्धात्मक है । यहीं बात एक उदाहरण से समझते है । एक व्यक्ति ऋषिकेष से गंगाजल एक कलश में ले आता है । घर में उसे एक जगह पर स्थापित करता है । दो-तीन पीढी के बाद यह बात विस्मृत हो जाति है । अब घर का नविनीकरण का काम चलता है, बच्चों के हाथ में यह गंगा जलका कलश आता है, में उन्हें मालुम नहीं कि, उसमें क्या है, सब को संशय होने लगता है । कलश में गंगा होने का किसीको भी याद नहीं है । क्या होगा इस कलश में, किसका जल होगा, कुछ अभिमंत्रित करके रक्खा होगा - ऐसे अनेक संशय मन में उठते है । घरका ज्येष्ठ पुत्र समाधान देता है कि, जो भी होगा हमें मालुम नहीं, अच्छा यही है कि, इसे गंगा में विसर्जित कर दे । कोई दोष भी नहीं लगेगा । ऐसा विचार करके उस कलश जल को गंगा में प्रवाहित कर देते है । फिर मनमें आता है कि यहां तक आए हैं तो, गंगाजल लेकर ही जाए । कलश को पुनः शुद्ध करते है । उसमें गंगा जल भरके घर ले आते है । गंगा पूजन करके उसे पुनः देवस्थान में स्थापित करते है । ज्ञान के द्वारा आत्मतत्त्व को जानने की क्रिया कुछ ऐसी ही है ।
आपके शरीर के अंगो को भी चिकित्सक बहार निकालकर, सर्जरि करके पुनः शरीर में प्रस्थापित करते है - ओपन हार्ट सर्जरी करते है, वैसे ही शरीरस्थ अंगो का शोधन होता है । जो जैसी कल्पना करता है, वही उसके समीप आता है । वह वैसा ही बन जाता है. उसे कीटभ्रमर न्याय कहते है । भौरें की अवाज से कीडा भ्रमर बनता है । अविरत श्रद्धा एवं विश्वास से, साध्य समीप आ जाता है । अज़गर ज्यादा चल नहीं सकता, तथापि दौडते पशु स्वयं शिकार बनकर उसके मुंह में आ जाते है । चिपकली दिवाल को चिपककर चलती है, उसका आहार है, उडते जंतु । इसकी धारणा शक्ति उडते जन्तु को, इसके मुंह मे लाकर रख देती है । ध्यान एवं धारणा को अष्टांग योग के अंग माने है। मन की एकाग्रता एवं श्रद्धा से सबकुछ सहज प्राप्य हो जाता है ।
देहो देवालयो प्रोक्त - हृदयरूपी गुहा में आसन बनाकर अन्तःस्थ परमात्मा का पूजन करने के लिए स्वयं के शरीर में देवपीठ बनाते है, इस प्रक्रीया पीठन्यास कहते है ।
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उत्थान करती है, तब पद्मस्थ देवता उनके दर्शन से पुलकित होते है । जगदम्बा शिवजी के अङ्क में बैठकर आलंगित होती है - परस्पराश्लिष्ट होकर, परमशिवामृत वर्षण करती है । आनन्दकी इस चरमसीमा को योगमैथुन कहते है । दिव्य योगी मूलाधार स्थित पराशक्ति कुन्डलिनी को सहस्रार में स्थित शिव से मिलाकर दिव्य मैथुनानन्द की अनुभूति करके जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। अन्य सभी व्यक्ति तो मात्र स्त्री के सेवक हैं । सुषुम्ना को शक्ति तथा जीव को शिव कहते हैं। दिव्य योगी सुषुम्ना तथा प्राणरूपी जीव का संगम कराके वास्तविक सुरत का आनन्द भोगते हैं । हमारा पृथ्वीतत्त्व जलतत्त्व में, जलतत्त्व अग्नितत्त्व में, अग्नितत्त्व वायुतत्त्व में, वायुतत्त्व आकाशतत्त्व में, आकाशतत्त्व अहंकार में, अहंकार महत्तत्त्व में, महत् प्रकृति में प्रकृति पुरुष - विराट् में विलीन होता जाता है । हमारे शरीर में वामकुक्षी में एक संकोचशरीरात्मक पापपुरूष की कल्पना करते है, जो विकराल, क्रूर, अधोमुख, अदर्शनीय, दुर्मुख एवं समस्त दुरितों व दुर्मति का उद्गम स्थान है । वैसे भी आपने देखा होगा कि जब हमे पक्षाघात होता है या महाव्याधि आती है, तब हमारे शरीर का वामभाग ही ज्यादा दुष्प्रभावी बनता है । खलिल जिब्रान की एक सुन्दर उक्ति है - मैं ही आग हूं, मैं ही कूडा हूं, मेरी आग में, मेरे कूडे को जलाकर, जीवन को सुन्दर बना सकता हूं । जितने भी खराब विचार, पाप, दुरित कर्मों का उद्भव होता है वह शरीर के अन्दर से ही होता है और उनका शमनदमन भी अपने अन्दर ही होता है कुण्डलीनी के ऊर्ध्वगमन के बाद संकोच शरीरात्मक पापपुरूष का यं बीज से नाभिमें शोषित करते है - खींचके लाते है, रं बीजसे उसका दहन करते है, फिर शिवसंयोग से तृप्त महाशक्ति कुण्डलीनी को हृदय कमल में बिराजित करते है और जले हुए पापपुरूष की भस्म में उस महाशक्ति द्वारा परम शिवामृत की वृष्टि से उस भस्म का पिंड बनाते है। पुनः उस पिण्ड से एक शिवस्वरूप जीवात्मा का प्रागट्य होता है अपने शरीर में पंचभूतों का आधिपत्य भिन्न-भिन्न भागों में है। सबसे नीचे पृथ्वी तत्त्व, पीतवर्ण के चतुष्कोण यंत्र का बीज लं है, उसके उपर वरूण तत्त्व का स्थान है, श्वेतवर्ण, धनुषाकार बीज वं है, उसके उपर त्रिकोण मण्डल में वन्हि तत्त्व का स्थान हैं, रक्तवर्ण एवं रं बीज है, उसके उपर वर्तुलाकार धुम्रवर्ण वायु मण्डल बीज यं है, उसके उपर अवर्ण नीराकार आकाशमण्डल बीज हं वर्ण है । भूतशुद्धि से पञ्चभूतात्म देह की शुद्धि होती है। पुनः परिशुद्ध विराट ब्रह्म से सृष्टिक्रम से प्रकृति, महत्, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं जलसे पृथ्व्यादि पंचभौतिक देह की कल्पना करते है । फिर विराट में विलीन विशुद्ध शिवयुक्त जीव हृदय में प्रतिष्ठित करते है और कुण्डलिनी को पुनः सुषुम्णा मार्ग को प्रकाशित करते हुए, मूलाधार के प्रति प्रयाण कल्पते है । शुद्ध जीवात्मा के उपर गर्भाधानादि षोडश संस्कार की भावना करते है । अपने शरीर को इष्टदेवता का पीठ मानकर उसके विधि अङ्गों पर पीठ देवताओं का इस प्रकार न्यास करना चाहिये । समस्त पद्मोचक्रो के पंखडीयों में एकावन वर्णों का स्थान है, जैसे आगे बता चूके है । पूरी वर्णमाला शरीरमें दिव्य कला - चेतना के रूपमें स्थित है, उसका ही उपयोग करके महाशक्तिप्रदा वर्णमाला-अक्षमाला का वर्णन आगम ग्रंथों में मिलता है । यही मन्त्रों का उद्गम एवं प्राण है । अन्तर्मातृका-बहिर्मातृका न्यास इसी वर्णो की अमोघ शक्तिका रसास्वादन कराती है । वैसे तो ये पूरी क्रिया भावात्मक एवं श्रद्धात्मक है । यहीं बात एक उदाहरण से समझते है । एक व्यक्ति ऋषिकेष से गंगाजल एक कलश में ले आता है । घर में उसे एक जगह पर स्थापित करता है । दो-तीन पीढी के बाद यह बात विस्मृत हो जाति है । अब घर का नविनीकरण का काम चलता है, बच्चों के हाथ में यह गंगा जलका कलश आता है, में उन्हें मालुम नहीं कि, उसमें क्या है, सब को संशय होने लगता है । कलश में गंगा होने का किसीको भी याद नहीं है । क्या होगा इस कलश में, किसका जल होगा, कुछ अभिमंत्रित करके रक्खा होगा - ऐसे अनेक संशय मन में उठते है । घरका ज्येष्ठ पुत्र समाधान देता है कि, जो भी होगा हमें मालुम नहीं, अच्छा यही है कि, इसे गंगा में विसर्जित कर दे । कोई दोष भी नहीं लगेगा । ऐसा विचार करके उस कलश जल को गंगा में प्रवाहित कर देते है । फिर मनमें आता है कि यहां तक आए हैं तो, गंगाजल लेकर ही जाए । कलश को पुनः शुद्ध करते है । उसमें गंगा जल भरके घर ले आते है । गंगा पूजन करके उसे पुनः देवस्थान में स्थापित करते है । ज्ञान के द्वारा आत्मतत्त्व को जानने की क्रिया कुछ ऐसी ही है । आपके शरीर के अंगो को भी चिकित्सक बहार निकालकर, सर्जरि करके पुनः शरीर में प्रस्थापित करते है - ओपन हार्ट सर्जरी करते है, वैसे ही शरीरस्थ अंगो का शोधन होता है । जो जैसी कल्पना करता है, वही उसके समीप आता है । वह वैसा ही बन जाता है. उसे कीटभ्रमर न्याय कहते है । भौरें की अवाज से कीडा भ्रमर बनता है । अविरत श्रद्धा एवं विश्वास से, साध्य समीप आ जाता है । अज़गर ज्यादा चल नहीं सकता, तथापि दौडते पशु स्वयं शिकार बनकर उसके मुंह में आ जाते है । चिपकली दिवाल को चिपककर चलती है, उसका आहार है, उडते जंतु । इसकी धारणा शक्ति उडते जन्तु को, इसके मुंह मे लाकर रख देती है । ध्यान एवं धारणा को अष्टांग योग के अंग माने है। मन की एकाग्रता एवं श्रद्धा से सबकुछ सहज प्राप्य हो जाता है । देहो देवालयो प्रोक्त - हृदयरूपी गुहा में आसन बनाकर अन्तःस्थ परमात्मा का पूजन करने के लिए स्वयं के शरीर में देवपीठ बनाते है, इस प्रक्रीया पीठन्यास कहते है ।
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भस्मावृत चिनगारी
वह मेरे पड़ोस में रहता था। उसके प्रति मुझे एक प्रकार की श्रद्धा थी। उसका व्यवहार एक रहस्य के कोहरे से घिरा था। रहस्य बनावट का नहीं, जो आशंकित कर देता है; सरलता का रहस्य, जो आकर्षण और सहानुभूति पैदा करता है। वह साधारण से भिन्न था, शायद साधारण से कुछ ऊँचा।
उसके बड़े और छोटे भाइयों ने अपने श्रम से पिता की कमाई सम्पत्ति की बुनियाद पर स्वतन्त्र कारोबार की इमारतें सफलतापूर्वक खड़ी कर ली थीं। वे सफल गृहस्थ और सम्मानित नागरिक बन गए थे। वे पुराने परिवार - वृक्ष की कलमों के रूप में नई भूमि पा, नये परिवारों की लहलहाती शाखाओं के रूप में कल्ला उठे थे। पिता को अपने दोनों पुत्रों की सफलता पर गर्व व सन्तोष था।
और 'वह' सब सुविधा और अवसर होने पर और अपने शैथिल्य के कारण पिता की अधिक करुणा पाकर भी कुछ न बन सका। उसने यत्न ही नहीं किया। उसके पिता को इससे उदासी और निरुत्साह हुआ; परन्तु मैं उसका आदर करता था। उसमें लोभ न था । वह सन्तोष की मूर्ति था। व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा उसमें न थी। वह त्यागी था। यही तो तपस्या है। पिता की मृत्यु के बाद दोनों कर्मठ व्यापारी भाइयों ने हज़ारों की आमदनी होते हुए भी जब उत्तराधिकार की सम्पत्ति के बंटवारे में पाई-पाई का हिसाब कर, उसे केवल दो पुराने मकान देकर ही निबटा दिया; उसने कोई चिन्ता या व्यग्रता प्रकट न की। भाइयों की अपने से दस-बीस गुना अधिक आमदनी के प्रति उसे कभी ईर्ष्या करते नहीं देखा। घर में अर्थ संकट अनुभव करके भी उसे कभी विचलित होते नहीं देखा। उसकी शान्त और सौन्दर्य की वृत्ति सभी जगह शान्ति और सौन्दर्य पा सकती थी। इनका स्त्रोत उसके भीतर था। वह अन्तर्मुख और आत्मरत था। कला के लिए उसका जीवन था और कला ही उसका प्राण थी। कला से किसी प्रकार की स्वार्थ-साधना उसे कला का अपमान जान पड़ता था।
उसके परिचय का क्षेत्र अधिक विस्तृत न था। परिचय से उसे घबड़ाहट होती थी । उसके चित्रों से प्रभावित होकर मैंने स्वयं ही उससे परिचय किया था। वह कुछ सकुचाया और फिर जैसे उसने मुझे सह लिया और आन्तरिकता भी बढ़ती गई। कभी वह सन्ध्या, दोपहर या बिल्कुल तड़के ही आ बैठता; उसका समय कोई निश्चित न था। कभी अकेले ही शहर से चार-पांच मील दूर जाकर बैठा रहता। उसका सब समय प्रायः किर्मिचमढ़ी टिकटी
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भस्मावृत चिनगारी वह मेरे पड़ोस में रहता था। उसके प्रति मुझे एक प्रकार की श्रद्धा थी। उसका व्यवहार एक रहस्य के कोहरे से घिरा था। रहस्य बनावट का नहीं, जो आशंकित कर देता है; सरलता का रहस्य, जो आकर्षण और सहानुभूति पैदा करता है। वह साधारण से भिन्न था, शायद साधारण से कुछ ऊँचा। उसके बड़े और छोटे भाइयों ने अपने श्रम से पिता की कमाई सम्पत्ति की बुनियाद पर स्वतन्त्र कारोबार की इमारतें सफलतापूर्वक खड़ी कर ली थीं। वे सफल गृहस्थ और सम्मानित नागरिक बन गए थे। वे पुराने परिवार - वृक्ष की कलमों के रूप में नई भूमि पा, नये परिवारों की लहलहाती शाखाओं के रूप में कल्ला उठे थे। पिता को अपने दोनों पुत्रों की सफलता पर गर्व व सन्तोष था। और 'वह' सब सुविधा और अवसर होने पर और अपने शैथिल्य के कारण पिता की अधिक करुणा पाकर भी कुछ न बन सका। उसने यत्न ही नहीं किया। उसके पिता को इससे उदासी और निरुत्साह हुआ; परन्तु मैं उसका आदर करता था। उसमें लोभ न था । वह सन्तोष की मूर्ति था। व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा उसमें न थी। वह त्यागी था। यही तो तपस्या है। पिता की मृत्यु के बाद दोनों कर्मठ व्यापारी भाइयों ने हज़ारों की आमदनी होते हुए भी जब उत्तराधिकार की सम्पत्ति के बंटवारे में पाई-पाई का हिसाब कर, उसे केवल दो पुराने मकान देकर ही निबटा दिया; उसने कोई चिन्ता या व्यग्रता प्रकट न की। भाइयों की अपने से दस-बीस गुना अधिक आमदनी के प्रति उसे कभी ईर्ष्या करते नहीं देखा। घर में अर्थ संकट अनुभव करके भी उसे कभी विचलित होते नहीं देखा। उसकी शान्त और सौन्दर्य की वृत्ति सभी जगह शान्ति और सौन्दर्य पा सकती थी। इनका स्त्रोत उसके भीतर था। वह अन्तर्मुख और आत्मरत था। कला के लिए उसका जीवन था और कला ही उसका प्राण थी। कला से किसी प्रकार की स्वार्थ-साधना उसे कला का अपमान जान पड़ता था। उसके परिचय का क्षेत्र अधिक विस्तृत न था। परिचय से उसे घबड़ाहट होती थी । उसके चित्रों से प्रभावित होकर मैंने स्वयं ही उससे परिचय किया था। वह कुछ सकुचाया और फिर जैसे उसने मुझे सह लिया और आन्तरिकता भी बढ़ती गई। कभी वह सन्ध्या, दोपहर या बिल्कुल तड़के ही आ बैठता; उसका समय कोई निश्चित न था। कभी अकेले ही शहर से चार-पांच मील दूर जाकर बैठा रहता। उसका सब समय प्रायः किर्मिचमढ़ी टिकटी
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करनाल (हप्र) : दानवीर कर्ण की नगरी करनाल में कोविड संक्रमित मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए सब कुछ निःशुल्क किया जा रहा है। शहर के बाहर बलड़ी शव दाह गृह में बीते 18 दिनों में करनाल, दिल्ली व अन्य जिलों के 325 शवों का करवाया संस्कार करवाया गया है। समाजसेवी इस कार्य के लिए श्मशान घाट में लकड़ी, सामग्री ,धी ,गंगाजल, चंदन व कपूर के साथ ही तुलसी की लकड़ी का प्रबध भी कर रहे हैं। समाजसेवी बृज गुप्ता ने बताया कि उनके साथ रमेश मिड्ढा, सुनील मदान व पार्षद ईश गुलाटी की टीम सहयोग दे रही है और जिले के दानी सज्जनों के सहयोग से यह टीम कोरोना संक्रमित मृतकों के संस्कार के लिए 18 दिन में 3500 क्विंटल लकड़ी जुटा चुकी है। 3.5 क्विंटल घी अब तक दानी लोग दान कर चुके हैं। यही नहीं 8 क्विंटल सामग्री और 210 पेटी पानी भी बलड़ी गांव के श्मशान घाट अब तक पहुंच चुका है। 25 किलो कपूर और 15 किलो चंदन की लकड़ी भी दानी सज्जन यहां दान कर चुके हैं। दानवीर कर्ण की नगरी में दान का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उन्होंने बताया कि रोजाना सुबह 6 बजे से साढ़े 8 बजे तक अस्थि चयन का समय रखा गया है। कोविड संक्रमितों के संस्कार के लिए अब तक राजकुमार गोयल निसिंग, शिव शक्ति तरावड़ी, अरोमा राइस, अशोक माणिक, फतेह सिंह गुर्जर, पंकज भारती, प्रीतपाल पन्नू, पप्पू खन्ना, बी.आर. मदान, कृष्ण लाल तनेजा, पार्षद मुकेश अरोड़ा, रामचंद्र काला एमसी, कुनाल मदान ठेकेदार, राजीव गिरधर, नीलम विज, मंजीत कालिया, अनुप भारद्वाज व विकास कुंजपुरा आदि समाजसेवी टीम की मदद कर चुके हैं।
दूरदृष्टा, जनचेतना के अग्रदूत, वैचारिक स्वतंत्रता के पुरोधा एवं समाजसेवी सरदार दयालसिंह मजीठिया ने 2 फरवरी, 1881 को लाहौर (अब पाकिस्तान) से 'द ट्रिब्यून' का प्रकाशन शुरू किया। विभाजन के बाद लाहौर से शिमला व अंबाला होते हुए यह समाचार पत्र अब चंडीगढ़ से प्रकाशित हो रहा है।
'द ट्रिब्यून' के सहयोगी प्रकाशनों के रूप में 15 अगस्त, 1978 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दैनिक ट्रिब्यून व पंजाबी ट्रिब्यून की शुरुआत हुई। द ट्रिब्यून प्रकाशन समूह का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।
हमें दूरदर्शी ट्रस्टियों डॉ. तुलसीदास (प्रेसीडेंट), न्यायमूर्ति डी. के. महाजन, लेफ्टिनेंट जनरल पी. एस. ज्ञानी, एच. आर. भाटिया, डॉ. एम. एस. रंधावा तथा तत्कालीन प्रधान संपादक प्रेम भाटिया का भावपूर्ण स्मरण करना जरूरी लगता है, जिनके प्रयासों से दैनिक ट्रिब्यून अस्तित्व में आया।
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करनाल : दानवीर कर्ण की नगरी करनाल में कोविड संक्रमित मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए सब कुछ निःशुल्क किया जा रहा है। शहर के बाहर बलड़ी शव दाह गृह में बीते अट्ठारह दिनों में करनाल, दिल्ली व अन्य जिलों के तीन सौ पच्चीस शवों का करवाया संस्कार करवाया गया है। समाजसेवी इस कार्य के लिए श्मशान घाट में लकड़ी, सामग्री ,धी ,गंगाजल, चंदन व कपूर के साथ ही तुलसी की लकड़ी का प्रबध भी कर रहे हैं। समाजसेवी बृज गुप्ता ने बताया कि उनके साथ रमेश मिड्ढा, सुनील मदान व पार्षद ईश गुलाटी की टीम सहयोग दे रही है और जिले के दानी सज्जनों के सहयोग से यह टीम कोरोना संक्रमित मृतकों के संस्कार के लिए अट्ठारह दिन में तीन हज़ार पाँच सौ क्विंटल लकड़ी जुटा चुकी है। तीन.पाँच क्विंटल घी अब तक दानी लोग दान कर चुके हैं। यही नहीं आठ क्विंटल सामग्री और दो सौ दस पेटी पानी भी बलड़ी गांव के श्मशान घाट अब तक पहुंच चुका है। पच्चीस किलो कपूर और पंद्रह किलो चंदन की लकड़ी भी दानी सज्जन यहां दान कर चुके हैं। दानवीर कर्ण की नगरी में दान का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उन्होंने बताया कि रोजाना सुबह छः बजे से साढ़े आठ बजे तक अस्थि चयन का समय रखा गया है। कोविड संक्रमितों के संस्कार के लिए अब तक राजकुमार गोयल निसिंग, शिव शक्ति तरावड़ी, अरोमा राइस, अशोक माणिक, फतेह सिंह गुर्जर, पंकज भारती, प्रीतपाल पन्नू, पप्पू खन्ना, बी.आर. मदान, कृष्ण लाल तनेजा, पार्षद मुकेश अरोड़ा, रामचंद्र काला एमसी, कुनाल मदान ठेकेदार, राजीव गिरधर, नीलम विज, मंजीत कालिया, अनुप भारद्वाज व विकास कुंजपुरा आदि समाजसेवी टीम की मदद कर चुके हैं। दूरदृष्टा, जनचेतना के अग्रदूत, वैचारिक स्वतंत्रता के पुरोधा एवं समाजसेवी सरदार दयालसिंह मजीठिया ने दो फरवरी, एक हज़ार आठ सौ इक्यासी को लाहौर से 'द ट्रिब्यून' का प्रकाशन शुरू किया। विभाजन के बाद लाहौर से शिमला व अंबाला होते हुए यह समाचार पत्र अब चंडीगढ़ से प्रकाशित हो रहा है। 'द ट्रिब्यून' के सहयोगी प्रकाशनों के रूप में पंद्रह अगस्त, एक हज़ार नौ सौ अठहत्तर को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दैनिक ट्रिब्यून व पंजाबी ट्रिब्यून की शुरुआत हुई। द ट्रिब्यून प्रकाशन समूह का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। हमें दूरदर्शी ट्रस्टियों डॉ. तुलसीदास , न्यायमूर्ति डी. के. महाजन, लेफ्टिनेंट जनरल पी. एस. ज्ञानी, एच. आर. भाटिया, डॉ. एम. एस. रंधावा तथा तत्कालीन प्रधान संपादक प्रेम भाटिया का भावपूर्ण स्मरण करना जरूरी लगता है, जिनके प्रयासों से दैनिक ट्रिब्यून अस्तित्व में आया।
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चौतरफा दबाव के बाद झरखंड के खाद्य आपूर्ति मंत्री ने मामले के दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने लातेहार के डीसी को निर्देश दिया कि परिवार की सहमति से कब्र से रामचरण मुंडा के शव को निकालकर दोबारा पोस्टमॉर्टम कराया जाए।
झारखंड के महुआडांड़ प्रखंड के लुरगुमी कला गांव में रामचरण मुंडा नाम के शख्स की भूख से मौत के बाद राज्य की बीजेपी सरकार बुरी तरह घिर गई है। खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू रॉय ने यह कबूल कर लिया है कि जिस शख्स की मौत हुई है, उसे दो महीने से पीडीएस डीलर के द्वारा सरकारी राशन नहीं दिया गया था। पूरे मामले की रिपोर्ट आ गई है। जांच में लापरवाही के आरोप लगे हैं।
चौतरफा दबाव के बाद खाद्य आपूर्ति मंत्री ने मामले के दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने लातेहार के डीसी को निर्देश दिया कि परिवार की सहमति से कब्र से रामचरण मुंडा के शव को निकालकर दोबारा पोस्टमॉर्टम कराया जाए, ताकि मौत का कारण स्पष्ट हो सके। भूख से हुई मौत का मामला गर्माने के बाद राज्य सरकार हरकत में आई है। दबाव के बाद अब सरकार निष्पक्ष जांच का आश्वासन दे रही है। सरकार ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही है।
गौरतलब है कि लुरगुमी कला गांव में 5 जून को 65 साल के रामचरण मुंडा की मौत हो गई थी। उनकी बेटी ने कहा था कि पिता ने 3 दिनों से कुछ नहीं खाया। जैसे ही यह खबर मीडिया में सुर्खियां बनीं दूसरे दिन ही प्रशासन ने उनके घर 50 किलो चावल भिजवाया दिया था। साथ ही प्रशासन ने अंतिम संस्कार के भी पैसे दिए थे। आनन-फानन में जांच कर एसडीओ ने यह बयान भी दे दिया था कि मौत भूख से नहीं हुई, और अब विपक्ष और मीडिया के दबाव के बाद सरकार ने दोबारा मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
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चौतरफा दबाव के बाद झरखंड के खाद्य आपूर्ति मंत्री ने मामले के दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने लातेहार के डीसी को निर्देश दिया कि परिवार की सहमति से कब्र से रामचरण मुंडा के शव को निकालकर दोबारा पोस्टमॉर्टम कराया जाए। झारखंड के महुआडांड़ प्रखंड के लुरगुमी कला गांव में रामचरण मुंडा नाम के शख्स की भूख से मौत के बाद राज्य की बीजेपी सरकार बुरी तरह घिर गई है। खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू रॉय ने यह कबूल कर लिया है कि जिस शख्स की मौत हुई है, उसे दो महीने से पीडीएस डीलर के द्वारा सरकारी राशन नहीं दिया गया था। पूरे मामले की रिपोर्ट आ गई है। जांच में लापरवाही के आरोप लगे हैं। चौतरफा दबाव के बाद खाद्य आपूर्ति मंत्री ने मामले के दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने लातेहार के डीसी को निर्देश दिया कि परिवार की सहमति से कब्र से रामचरण मुंडा के शव को निकालकर दोबारा पोस्टमॉर्टम कराया जाए, ताकि मौत का कारण स्पष्ट हो सके। भूख से हुई मौत का मामला गर्माने के बाद राज्य सरकार हरकत में आई है। दबाव के बाद अब सरकार निष्पक्ष जांच का आश्वासन दे रही है। सरकार ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही है। गौरतलब है कि लुरगुमी कला गांव में पाँच जून को पैंसठ साल के रामचरण मुंडा की मौत हो गई थी। उनकी बेटी ने कहा था कि पिता ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया। जैसे ही यह खबर मीडिया में सुर्खियां बनीं दूसरे दिन ही प्रशासन ने उनके घर पचास किलो चावल भिजवाया दिया था। साथ ही प्रशासन ने अंतिम संस्कार के भी पैसे दिए थे। आनन-फानन में जांच कर एसडीओ ने यह बयान भी दे दिया था कि मौत भूख से नहीं हुई, और अब विपक्ष और मीडिया के दबाव के बाद सरकार ने दोबारा मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
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शरीर में पहले से ही यूरिक एसिड की कुछ मात्रा होती है, जो 3. 5 से 7. 2 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर तक हो सकती है। अगर इससे ज्यादा यूरिक एसिड की मात्रा पाई गई, तो इसे हाई यूरिक एसिड की समस्या कहा जाता है। यूरिक एसिड शरीर में मौजूद प्यूरीन नामक प्रोटीन के टूटने से बनता है। शरीर में यूरिक एसिड ज्यादा ना बढ़े, इसके लिए उन चीजों के सेवन से बचना चाहिए, जिनमें प्यूरीन की मात्रा अधिक होती है। यूरिक एसिड की मात्रा शरीर में जब बढ़ने लगती है तो इसका असर शरीर के अन्य अंगों पर पड़ने लगता है। इसके बढ़ने से जोड़ों में दर्द, शरीर में सूजन, किडनी की बीमारी और मोटापा जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं। यूरिक एसिड की समस्या को कंट्रोल करने के लिए दवाओं के अलावा खानपान में बदलाव और प्याज के देसी नुस्खे से भी कंट्रोल किया जा सकता है। जानिए प्याज यूरिक एसिड की समस्या को किस तरह से नियंत्रित करता है और इसके सेवन का सही तरीका भी जानिए।
यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने पर कई तरह की बीमारियां शरीर को घेर लेती हैं। ऐसे में प्याज का सेवन करना आपके लिए लाभदायक हो सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक यूरिक एसिड को नियंत्रित करने के लिए शरीर का मेटाबॉलिज्म का ठीक होना बहुत जरूरी है। इससे शरीर का चयापचय बेहतर होगा, उनका वजन काबू में रहेगा और शरीर से विषाक्त पदार्थों को जल्द ही दूर करने का काम करता है। प्याज में ये सारे गुण मौजूद होते हैं जो मेटाबॉलिज्म को बूस्ट कर यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है।
- प्याज यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में असरदार है। ये एक प्यूरीन फूड है। प्याज में मौजूद तत्व शरीर में नॉर्मल प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाते हैं। इससे शरीर में प्यूरीन कम मात्रा में बनता है।
- प्याज में फोलेट, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, विटामिन ए, सी और ई प्रचुर मात्रा में होता है। इसके साथ ही एंटी ऑक्सीडेंट्स और एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों से भी युक्त होता है। ये सभी यूरिक एसिड को कंट्रोल करते हैं।
यूरिक एसिड कंट्रोल करने के लिए कच्चा प्याज असरदार है। इसका इस्तेमाल आप सलाद के रूप में कर सकते हैं। इसके साथ ही प्याज का रस खाली पेट पीने से भी फायदा होगा।
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शरीर में पहले से ही यूरिक एसिड की कुछ मात्रा होती है, जो तीन. पाँच से सात. दो मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर तक हो सकती है। अगर इससे ज्यादा यूरिक एसिड की मात्रा पाई गई, तो इसे हाई यूरिक एसिड की समस्या कहा जाता है। यूरिक एसिड शरीर में मौजूद प्यूरीन नामक प्रोटीन के टूटने से बनता है। शरीर में यूरिक एसिड ज्यादा ना बढ़े, इसके लिए उन चीजों के सेवन से बचना चाहिए, जिनमें प्यूरीन की मात्रा अधिक होती है। यूरिक एसिड की मात्रा शरीर में जब बढ़ने लगती है तो इसका असर शरीर के अन्य अंगों पर पड़ने लगता है। इसके बढ़ने से जोड़ों में दर्द, शरीर में सूजन, किडनी की बीमारी और मोटापा जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं। यूरिक एसिड की समस्या को कंट्रोल करने के लिए दवाओं के अलावा खानपान में बदलाव और प्याज के देसी नुस्खे से भी कंट्रोल किया जा सकता है। जानिए प्याज यूरिक एसिड की समस्या को किस तरह से नियंत्रित करता है और इसके सेवन का सही तरीका भी जानिए। यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने पर कई तरह की बीमारियां शरीर को घेर लेती हैं। ऐसे में प्याज का सेवन करना आपके लिए लाभदायक हो सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक यूरिक एसिड को नियंत्रित करने के लिए शरीर का मेटाबॉलिज्म का ठीक होना बहुत जरूरी है। इससे शरीर का चयापचय बेहतर होगा, उनका वजन काबू में रहेगा और शरीर से विषाक्त पदार्थों को जल्द ही दूर करने का काम करता है। प्याज में ये सारे गुण मौजूद होते हैं जो मेटाबॉलिज्म को बूस्ट कर यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। - प्याज यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में असरदार है। ये एक प्यूरीन फूड है। प्याज में मौजूद तत्व शरीर में नॉर्मल प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाते हैं। इससे शरीर में प्यूरीन कम मात्रा में बनता है। - प्याज में फोलेट, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, विटामिन ए, सी और ई प्रचुर मात्रा में होता है। इसके साथ ही एंटी ऑक्सीडेंट्स और एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों से भी युक्त होता है। ये सभी यूरिक एसिड को कंट्रोल करते हैं। यूरिक एसिड कंट्रोल करने के लिए कच्चा प्याज असरदार है। इसका इस्तेमाल आप सलाद के रूप में कर सकते हैं। इसके साथ ही प्याज का रस खाली पेट पीने से भी फायदा होगा।
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अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच संबंधों में अभी तक भी नरमी नहीं आई है, बल्कि दोनों ही नेताओं के बीच विवाद और भी बढ़ गया है। दोनों में से कोई भी एक दूसरे को बुरा-भला बोलने का एक मौका भी नहीं छोड़ते हैं। ऐसे ही कुछ इस बार भी हुआ। इस बार भी अमेरिका के राष्ट्रपति ने किम जोंग का अपमान किया था जिसके चलते उत्तर कोरिया की मीडिया ने डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना की है। मीडिया ने कहा कि, इसके लिए ट्रंप "मौत की सजा" के हकदार हैं। (काबुलः विवाह स्थल के बाहर आत्मघाती हमला, 7 लोगों की मौत)
इसके साथ ही कोरियाई मीडिया ने ट्रंप को कोरियाई सीमा का दौरा रद्द करने पर "कायर" भी कहा है। एक अंग्रेजी पत्रिका के अनुसार, उत्तर कोरिया की पार्टी के अखबार में एक खबर छपी में जिसमें ट्रंप के दक्षिण कोरिया के दौरे पर उत्तर कोरिया ने गुस्सा जाहिर किया है। गौरतलब है कि ट्रंप ने दक्षिण कोरिय के दौरे के समय उत्तर कोरिया के क्रूर तानाशाह की निंदा की थी। उत्तर कोरिया में छपे एक लेख में कहा गया है कि 'ट्रंप ने सबसे बड़ा अपराध किया है जिसके लिए उन्हें कभी माफ नहीं किया जा सकता है, उन्होंने सर्वोच्च नेतृत्व की गरिमा को बुरी तरह से चोट पहुंचाई। ट्रंप को यह पता होना चाहिए कि इस गंभीर अपराध के लिए कोरियाई लोगों द्वारा वे मौत की सजा पाने के हकदार हैं। '
एशियाई दौरे के अंत में ट्रंप ने किम जोंग का अपमान भी किया था। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था कि आखिर, क्यों किम जोंग-उन मुझे बूढ़ा कहकर अपमानित करते हैं, मैंने तो कभी उन्हें मोटा और नाटा नहीं कहा। '
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अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच संबंधों में अभी तक भी नरमी नहीं आई है, बल्कि दोनों ही नेताओं के बीच विवाद और भी बढ़ गया है। दोनों में से कोई भी एक दूसरे को बुरा-भला बोलने का एक मौका भी नहीं छोड़ते हैं। ऐसे ही कुछ इस बार भी हुआ। इस बार भी अमेरिका के राष्ट्रपति ने किम जोंग का अपमान किया था जिसके चलते उत्तर कोरिया की मीडिया ने डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना की है। मीडिया ने कहा कि, इसके लिए ट्रंप "मौत की सजा" के हकदार हैं। इसके साथ ही कोरियाई मीडिया ने ट्रंप को कोरियाई सीमा का दौरा रद्द करने पर "कायर" भी कहा है। एक अंग्रेजी पत्रिका के अनुसार, उत्तर कोरिया की पार्टी के अखबार में एक खबर छपी में जिसमें ट्रंप के दक्षिण कोरिया के दौरे पर उत्तर कोरिया ने गुस्सा जाहिर किया है। गौरतलब है कि ट्रंप ने दक्षिण कोरिय के दौरे के समय उत्तर कोरिया के क्रूर तानाशाह की निंदा की थी। उत्तर कोरिया में छपे एक लेख में कहा गया है कि 'ट्रंप ने सबसे बड़ा अपराध किया है जिसके लिए उन्हें कभी माफ नहीं किया जा सकता है, उन्होंने सर्वोच्च नेतृत्व की गरिमा को बुरी तरह से चोट पहुंचाई। ट्रंप को यह पता होना चाहिए कि इस गंभीर अपराध के लिए कोरियाई लोगों द्वारा वे मौत की सजा पाने के हकदार हैं। ' एशियाई दौरे के अंत में ट्रंप ने किम जोंग का अपमान भी किया था। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था कि आखिर, क्यों किम जोंग-उन मुझे बूढ़ा कहकर अपमानित करते हैं, मैंने तो कभी उन्हें मोटा और नाटा नहीं कहा। '
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प्रयागराज (ब्यूरो)। नैनी एफसीआई ओवरब्रिज पर गुरुवार देर रात अज्ञात वाहन ने एक बाइक में टक्कर मार दिया। इस हादसे में अनूप कुमार पुत्र जगदीश प्रसाद व अमित कुमार पुत्र रमेशचंद्र की मौत मौके पर ही हो गई। दोनों घूरपुर एरिया के जसेरा खटगिया गांव के निवासी थे। इसी रात कोरांव थाना क्षेत्र के बड़ोखरा के पास अज्ञात वाहन ने बाइक में टक्कर मार दिया। टक्कर लगते ही बाइक सवार प्रियांश द्विवेदी पुत्र राजीव लोचन द्विवेदी की मौत हो गई। वह कोरांव थाना क्षेत्र के छिवली कला गांव का रहने वाला था। हादसे की तीसरी घटना बारा थाना क्षेत्र में हुई। यहां सेहुड़ा गांव के पास ट्रैक्टर और बाइक में भिड़ंत हो गई। बाइक सवार धीरज पुत्र अशर्फी लाल निवासी जिल्लाबंधवा थाना शंकरगढ़ और महेंद्र पाल निवासी पंवर थाना घूरपुर ने दम तोड़ दिया। छठी मौत दो दिन पूर्व कीडगंज एरिया में हुए हादसे में घायल समीर पुत्र मुकेश कुमार निवासी मिंटो पार्क की हुई। समीर का कीडगंज इलाके में स्थित एक प्राइवेट हास्पिटल में इलाज चल रहा था। इस तरह बीते चौबीस घंटे में हुए हादसों में हुई छह लोगों की मौत हो गई। मृतकों के परिजनों पोस्टमार्टम हाउस से लेकर घर तक गम और मातम पसरा रहा।
ठंड के मौसम में बढ़ते एक्सीडेंट को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस ने लोगों को आगाह किया है।
हादसे से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। ठंड के मौसम और कोहरे की वजह से हादसे बढ़ते हैं। इसलिए इंडीकेटर और डिपर के सारे नियमों का पालन सभी करें। एक छोटी सी लापरवाही या जल्दबाजी एक्सीडेंट की वजह बन सकती है।
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प्रयागराज । नैनी एफसीआई ओवरब्रिज पर गुरुवार देर रात अज्ञात वाहन ने एक बाइक में टक्कर मार दिया। इस हादसे में अनूप कुमार पुत्र जगदीश प्रसाद व अमित कुमार पुत्र रमेशचंद्र की मौत मौके पर ही हो गई। दोनों घूरपुर एरिया के जसेरा खटगिया गांव के निवासी थे। इसी रात कोरांव थाना क्षेत्र के बड़ोखरा के पास अज्ञात वाहन ने बाइक में टक्कर मार दिया। टक्कर लगते ही बाइक सवार प्रियांश द्विवेदी पुत्र राजीव लोचन द्विवेदी की मौत हो गई। वह कोरांव थाना क्षेत्र के छिवली कला गांव का रहने वाला था। हादसे की तीसरी घटना बारा थाना क्षेत्र में हुई। यहां सेहुड़ा गांव के पास ट्रैक्टर और बाइक में भिड़ंत हो गई। बाइक सवार धीरज पुत्र अशर्फी लाल निवासी जिल्लाबंधवा थाना शंकरगढ़ और महेंद्र पाल निवासी पंवर थाना घूरपुर ने दम तोड़ दिया। छठी मौत दो दिन पूर्व कीडगंज एरिया में हुए हादसे में घायल समीर पुत्र मुकेश कुमार निवासी मिंटो पार्क की हुई। समीर का कीडगंज इलाके में स्थित एक प्राइवेट हास्पिटल में इलाज चल रहा था। इस तरह बीते चौबीस घंटे में हुए हादसों में हुई छह लोगों की मौत हो गई। मृतकों के परिजनों पोस्टमार्टम हाउस से लेकर घर तक गम और मातम पसरा रहा। ठंड के मौसम में बढ़ते एक्सीडेंट को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस ने लोगों को आगाह किया है। हादसे से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। ठंड के मौसम और कोहरे की वजह से हादसे बढ़ते हैं। इसलिए इंडीकेटर और डिपर के सारे नियमों का पालन सभी करें। एक छोटी सी लापरवाही या जल्दबाजी एक्सीडेंट की वजह बन सकती है।
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अपनी गर्लफ्रेंड के पैरंट्स से मिलना किसी भी लड़के के लिए सबसे तनावपूर्ण लेकिन एक्साइटिंग समय होता है। यह आपकी कई रातों की नींद उड़ा सकता है। एक तरफ उनसे मुलाकात के लिए आप एक्साइटेड होते हैं वहीं अच्छे इंप्रेशन के लिए आप थोड़ा डरे हुए भी होते हैं। आइए, आपको कुछ टिप्स बताते हैं जिससे इस मुलाकात को आप एक यादगार अनुभव बना सकते हैं।
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अपनी गर्लफ्रेंड के पैरंट्स से मिलना किसी भी लड़के के लिए सबसे तनावपूर्ण लेकिन एक्साइटिंग समय होता है। यह आपकी कई रातों की नींद उड़ा सकता है। एक तरफ उनसे मुलाकात के लिए आप एक्साइटेड होते हैं वहीं अच्छे इंप्रेशन के लिए आप थोड़ा डरे हुए भी होते हैं। आइए, आपको कुछ टिप्स बताते हैं जिससे इस मुलाकात को आप एक यादगार अनुभव बना सकते हैं।
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बलवन्तराय मेहता अध्ययन दल के प्रतिवेदन के पश्चात् सम्पूर्ण देश में पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना के साथ आयोजन प्रक्रिया में जिस मात्रा में लोकप्रिय सहभागिता के विचार और गांव के ऊपर स्तर पर लोकतांत्रिक जनप्रिय संस्थाओं के साथ कुछ सीमा तक परस्पर सम्बन्ध का विकास हुआ मालूम होता है, उसी अनुपात में जिला पंचायतों की कार्य पद्धति की सुस्पष्टता एवं तदनुकूल स्पष्ट होती है । 'बलवन्तराय मेहता अध्ययन दल ( जनवरी 1957 ) लोकतांत्रिक आयोजन की जरूरतों के अनुरूप इसे बनाने के लिए जिला प्रशासन के ढांचे के पुर्नगठन का प्रश्न है, सम्बन्धित अपने भौतिक विचारार्थ विषय में कुछ नहीं बात जोड़ी है । यद्यपि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण से सम्बन्धित दल के प्रस्ताव ने भारत की आर्थिक प्रक्रिया में एक बड़े संस्थागत अभाव को पूरा किया लेकिन न तो पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकरण और न ही निम्न स्तरों पर योजनाओं का विकास उसकी तीव्रता, व्यापकता या सफलता में वृद्धि कर पाया है । M
'कुछ अधिनियमों में जिला स्तर के पंचायत के आयोजन कार्य का उल्लेख किया गया । आन्ध्र अधिनियम ने जिला पंचायत को जिले से सम्बन्धित तैयार की गयी नीति एवं योजनाओं का सम्बन्ध समन्वय एंव एकीकरण करने तथा सम्पूर्ण जिले से सम्बन्धित योजनायें तैयार करने का अधिकार दिया है। बिहार जिला परिषद अधिनियम जिला परिषद को जिले के लिए योजनायें तैयार करने का अधिकार प्रदान करती हैं। हिमाचल प्रदेश अधिनियम के अनु जिला परिषद, प्लान परियोजनाओं, स्कीमोंया दो चार अधिक समितियों के लिए सामान्य अन्य कार्यों को तैयार करने के लिए सलाह देती हैं और उससे पंचायत समितियों से सम्बन्धित विकास योजनाओं के सम्बन्ध, समन्वय और समीकरण का अधिकार प्राप्त है। 2 पंजाब, राजस्थान एवं पश्चिम बंगाल के अधिनियमों में समन्वय की बात कही गयी है, अतः जिले की सम्पूर्ण योजना में जिला पंचायत की भूमिका का लम्बे समय से विचार होता रहा है। अतः स्पष्ट होता कि विभिन्न राज्यों के अधिनियमों में इस महत्वपूर्ण तथ्यों का उपयोग किया गया है।
'दांतेवाला कार्यकारी दल ने आयोजन वाले मसले का बड़ी योग्यता से विवेचन किया है। इस दल ने जिला पंचायत द्वारा समुचित रूप से निपटाये जाने वाले कार्यों से सम्बन्धित समस्याओं पर विचार किया है। ये क्षेत्र आयोजन एवं विकास सम्बन्धी कार्यों के कार्यान्वयन
1. बलवन्त राय मेहता अध्ययन दल प्रतिवेदन 1937 2. पंचायती समिति रिपोर्ट 1978 औप. सीट, पृष्ठ 60
दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण होंगे । विकास केन्द्र सम्पूर्ण आर्थिक गति को क्रियाशील बनायेंगे और समीपवर्ती क्षेत्रों के लिए सुख-सुविधाओं में सुधार लाने के कार्य में सहायता करेंगे । 1
राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार आर्थिक तथा सामाजिक स्तर पर अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को सामान्य विकास संरचना के अन्तर्गत गांवों के गरीब लोगों के साथ जोड़ा जा सकता है। अनुसूचित जातियों /जनजातियों के विकास हेतु स्वीकृत नीति के अनुसार- 'नौवीं पंचवर्षीय योजना में विकास पर मुख्य बल सामान्य क्षेत्रों द्वारा दिया जाना था। राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों में योजना कार्यान्वयन विभाग को ऐसी योजनायें बनाने के लिए कहा गया था। जिनके लाभ अनुसूचित जातियों/जनजातियों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों को पहुंच सके । 2
बड़ी मात्रा में जल संसाधनों और सामुदायिक भूमि को कानूनी तौर पर पंचायतों को नियंत्रण में दे दिया जाता है। दुर्भाग्य है कि इनका निर्धन वर्गों के लिए पूर्णतः उपयोग नहीं किया जाता है। अतः पंचायतों को केवल भूमि उपलब्ध करायी जाती है। बल्कि निर्धन वर्गों के विकास से सम्बन्धित ऐसी जमीनों पर आधारित कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए । पंचायतों के कार्य पद्धति के अन्तर्गत इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि पंचायतें उन अतिक्रमित जमीन को उसके मौलिक कमजोर वर्ग के मालिक को सौप दिये जाने का कार्यक्रम अख्तियार करें। जिन जमीनों को गांव के प्रभावशाली लोग सामुदायिक सम्पत्ति के बहुमूल्य भागों का अतिक्रमण करते हैं । 'जिला पंचायतों को अतिक्रमण घटाने सहित इन जमीनों के सम्बन्ध में नियात्मक कार्य विकासात्मक कार्यों के एक भाग के रूप में सम्मिलित किये गये हैं । 3
वन विभाग के पास बड़ी मात्रा में आरक्षित बाग होते हैं जिनमें पेड़ भी नहीं होते हैं । जिनमें उपयोगी लकड़ियां नहीं होती हैं। वन विभाग के संरक्षण में गांवों के इर्द-गिर्द संरक्षित वन भी होते हैं जिनमें उपयोगी लकड़ियां नहीं होती हैं। पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से इन आरक्षित वनों के क्षेत्रों को बंटाने का अभियान कार्य चलाया जा रहा है। अपरिभाषित क्षेत्र की भूमि को भी निर्धन वर्गों को आवंटित करना जिला पंचायतों के कार्य क्षेत्र के अन्तर्गत है। कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं जिन्हें बंजर कहा जाता है। कमजोर वर्ग के लाखों लोगों की ऐसी भूमि आवंटन की व्यवस्था जिला पंचायतों के कार्यक्रम का एक अंग है। भूमिहीन श्रमिक जो
1. पूर्ववत्, पृष्ठ 61
2. द्रष्टव्य नौंवीं पंचवर्षीय योजना, भारत सरकार 20002
3. सर्वेक्षण से प्राप्त सूचनाओंओ के आधर पर
सर्वाशतः आदिवासी, हरिजन और पिछड़ी श्रेणियों की जातियों में आते हैं, को यदि उपर्युक्त प्रकार की भूमि को आवंटित किया जाता है तो कमजोर वर्गों को अधिक आर्थिक सुदृढ़ता प्राप्त करने का अवसर मिल जाता है । कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अनुपयोगी खारा जल भरा रहता है । सहकारी समितियों के द्वारा संसाधनों, ऊर्जा और अपेक्षित टेक्नालॉजी को मुहैया कराकर मछली पालन का कार्य भी करवाने का कार्य अनेक राज्यों में जिला पंचायतों के कार्य का अंग है। कठिनाई यह है कि जिला पंचायतों पर ग्रामीण विकास के लिए जो दायित्व लादे गये हैं उनकी पूर्ति के लिए अप्रचुर राशि इस संस्था को उपलब्ध करायी जाती रही है । फल यह हुआ कि सारे कार्य मात्र नारा बनकर रह गये हैं। कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों को सम्बन्धित स्थानीय स्तरों पर पर्याप्त शक्तियों और कार्यों का मात्र विकेन्द्रीकरण करना तब तक कारगर नहीं होगा जब तक अनुमानित वित्तीय संसाधन जिला पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराया जाता है।
बलवन्त राय मेहता के नेतृत्व में गठित पंचायती राज समिति की सिफारिशें 'पंचायती राज के गठन, आय, कार्यकरण पर विशेष प्रकाश डालती हैं। उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में जो पंचायती चुनाव सम्पन्न हुआ है वह उक्त समिति की अनुशंशाओं और सिफारिशों पर आधारित है। जिला पंचायतों के कार्य पद्धति से सम्बन्धित सिफारिशें निम्नवत् हैं- 1
एक जिले से सम्बन्धित सभी विकास कार्य जो अब राज्य सरकार द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं, जिला परिषदों को सौंपे जायेंगे। कुछ एक कार्यों में जो इस प्रकार के विकेन्द्रित किये जा रहे हैं, ये शामिल हैं कृषि और सम्बद्ध क्षेत्र, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, ग्रामीण उद्योग, विपणन, पिछड़े वर्गों का कल्याण आदि ।
जहां तक शिक्षा का सम्बन्ध है। यह जिला परिषद को इस शर्त पर सौंपी जा सकती है कि 'स्थानान्तरण और नियुक्ति की देखरेख के लिए वह एक विशेष समिति का गठन करेगी। स्थानीय निकायों द्वारा पर्यवेक्षण से न केवल अध्यापकों की उपस्थिति में सुधार होगा वरन् यह आशा की जाती है कि विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने का अनुपात भी कम हो जायेगा । प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम को भी बढ़ावा मिलेगा। '2 पंचायतों के सामूहिक कार्यों को गतिशील बनाने, संगठन बनाने तथा परियोजना तैयार करने के लिए मुख्य भूमिका अदा करनी होगी ।
1. पंचायती राज समिति रिपोर्ट, 1978 औप. सीट 164
2. पूर्ववत्, पृष्ठ 166
जिला पंचायतों के लिए जिस संसाधन की आवश्यकता है वह है कार्यान्वयन के लिए उन्हें सौंपे गये कार्यों के साथ-साथ सोद्देश्य कार्य आवंटन तथा जन वितरण ।
जिला पंचायत की पूर्ण रूपेण स्थापना हो जाने पर जब वे उपलब्ध अथवा उनको सौंपे गये संसाधनों से अपनी योजनाओं को कार्यान्वित कर सकती है तब जिला पंचायतों को नियात्मक कार्य सौंपने के प्रश्न का पुनरीक्षण किया जाय ।
जिला पंचायतों को उत्पादन केन्द्रों के साथ उचित रूप से समन्वित किया जाना चाहिए । इस सम्बन्ध में अन्य संस्थाओं के सहयोग से उन्हें विपणन, निवेश, आपूर्ति, प्रतिक्षण तथा सेवा और कल्याण की जरूरतों से सम्बन्धित आवश्यक निर्णय लेने होंगे ।
'विविध प्रकार के व्यवसायों के विकास कार्यक्रमोंओ की अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के लिए अधिक मात्रा में प्रासंगिकता है। पंचायतों को डेयरी, मुर्गी पालन, सुअर पालन, मछली पालन, जंगल वन आदि जैसे क्षेत्रों में ग्रामीण इलाकों में इन व्यवसायिक धन्धों को शुरू करने में शामिल किया जा सकता है । 1
जिला पंचायतों के जन संस्था के रूप में अनुसूचित जातियों / अनुसूचित जनजातियों के लिए वित्त विकास निगमों (जो कुछ राज्यों में कार्य कर रहे हैं और जहां पर ये विद्यमान नहीं हैं, वहां स्थापित किया जाना चाहिए ) को अनुसूचित जातियों/जनजातियों पर आधारित विभिन्न कार्यक्रमों के लिए वित्तीय तथा तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु क्षेत्र आधार पर सहायता सुलभ कर सकती है ।
जिला पंचायत विकासात्मक, म्यूनिसिपल तथा कल्याणकारी कार्यों को करती रहेगी। अतः यह उनके लिए ही सम्भव होगा कि वे अंशकालिक सहायक के बजाय एक पूर्णकालिक पंचायत अधिकारी रखें। उनका वेतन व भत्ते पर्याप्त रूप से योग्य कार्मिकों को आकृष्ट कस्ने के लिए उपयुक्त होनी चाहिए। जिला स्तर पर विभिन्न विकास विभागों को यथेष्ट रूप से कर्मचारी वर्ग ( अर्थात् कृषि विस्तार अधिकारी, पशु चिकित्सा, स्टॉक मैन, मछली पालन, विस्तार सहायक, वाणिज्यिक फसल कार्यकर्ता, लघु उद्योग प्रोत्साहन कर्मचारी और स्वास्थ्य उपकेन्द्र कर्मचारी वर्ग आदि) को जिला पंचायत स्तर पर कार्य करना चाहिए ।
विकास कार्यों की मात्रा में वृद्धि और उनकी जटिलता के कारण विकासात्मक अपेक्षाओं 1. पूर्ववत्, पृष्ठ 167
का निरन्तर अध्ययन करने और पंचायती राज संस्थाओं की देखभाल करने वाले राज्य स्तर के विभागों के ढांचे तथा कार्यों का निर्माण करने की आवश्यकता है। पंचायती राज विभाग में जिस प्रकार महत्वपूर्ण विभागों के लिए मंत्री आदि की व्यवस्था की जाती है, होनी चाहिए । रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों के लिए सुदृढ़ पंचायती राज निदेशालय और विकास आयुक्त के अधीन एक सचिवालय विभाग अनिवार्य होगा। लेकिन विकास विभागों को पंचायती राज संस्थाओं के सफल कार्यपद्धति की भूमिका निभानी होगी।
राज्य सरकार को स्वतंत्र टीम द्वारा, जिनमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शिक्षा संस्थायें और विश्वविद्यालय भी शामिल हैं - जिला पंचायतों की कार्य पद्धति का समय-समय पर स्वतंत्र मूल्यांकन कराने की व्यवस्था भी करानी चाहिए ।
कार्य पद्धति की सीमायें आय-व्यय के अनुपात में बढ़ती घटती हैं। एक तरह जहां जिला पंचायतों की कार्य पद्धति का उल्लेख आवश्यक है वहीं दूसरी ओर कार्य पद्धति के सफल निर्वाह के लिए जिला पंचायतोंओ की आय उसकी रीढ़ है। 'बलवन्त राय मेहता अध्ययन दल ने अपने प्रतिवेदन में जिला पंचायतों के कार्य पद्धतियों को सुदृढ़ आधार प्रदान करने हेतु वित्त के प्रचुर प्रावधान का भी उल्लेख किया है । 1
जिला पंचायतों को दी गयी कराधान शक्तियाँ सीमित तथा विशिष्ट होनी चाहिए और उन्हें न्यायोचित रूप से सम्पादित किया जाना चाहिए। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए कुछ एक धन्धों तथा व्यवसायों जिनमें कमजोर वर्गों का बाहुल्य है, को साविधिक उपबन्धों के माध्यम से छोड़ दिया जाना चाहिए । करों के अतिरिक्त पंचायती राज संस्थाओं की रोशनी, सफाई, जलापूर्ति आदि ऐसी सेवाओं के लिए शुल्क / कर उगाहना चाहिए । एकरूपता के अभाव व मनमाने पन से बचने के लिए इन शुल्कों को निम्नतम तथा अधिकतम दर को निर्धारित किया जाना चाहिए। चूंकि कर लगाने की शक्ति उनकी वसूली की शक्ति से अलग नहीं की जानी चाहिए। अतः जिला पंचायतों के अधिकारियोंओ को स्वयं कर वसूलना चाहिए।
आय की सुदृढ़ता पर आधारित अतिरिक्त ग्रामीण उत्पादन कार्य के लिए पंचायतों को आत्म निर्भर होने की आवश्यकता है। सभी लोगों में अर्न्तनिहित चेतना को विकसित करने हेतु प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों को महत्व देना चाहिए । इस प्रकार जिला पंचायतों के कार्य पद्धति
1. दृष्टव्य - बलवन्तराय मेहता अध्ययन दल रिपोर्ट 1957
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बलवन्तराय मेहता अध्ययन दल के प्रतिवेदन के पश्चात् सम्पूर्ण देश में पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना के साथ आयोजन प्रक्रिया में जिस मात्रा में लोकप्रिय सहभागिता के विचार और गांव के ऊपर स्तर पर लोकतांत्रिक जनप्रिय संस्थाओं के साथ कुछ सीमा तक परस्पर सम्बन्ध का विकास हुआ मालूम होता है, उसी अनुपात में जिला पंचायतों की कार्य पद्धति की सुस्पष्टता एवं तदनुकूल स्पष्ट होती है । 'बलवन्तराय मेहता अध्ययन दल लोकतांत्रिक आयोजन की जरूरतों के अनुरूप इसे बनाने के लिए जिला प्रशासन के ढांचे के पुर्नगठन का प्रश्न है, सम्बन्धित अपने भौतिक विचारार्थ विषय में कुछ नहीं बात जोड़ी है । यद्यपि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण से सम्बन्धित दल के प्रस्ताव ने भारत की आर्थिक प्रक्रिया में एक बड़े संस्थागत अभाव को पूरा किया लेकिन न तो पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकरण और न ही निम्न स्तरों पर योजनाओं का विकास उसकी तीव्रता, व्यापकता या सफलता में वृद्धि कर पाया है । M 'कुछ अधिनियमों में जिला स्तर के पंचायत के आयोजन कार्य का उल्लेख किया गया । आन्ध्र अधिनियम ने जिला पंचायत को जिले से सम्बन्धित तैयार की गयी नीति एवं योजनाओं का सम्बन्ध समन्वय एंव एकीकरण करने तथा सम्पूर्ण जिले से सम्बन्धित योजनायें तैयार करने का अधिकार दिया है। बिहार जिला परिषद अधिनियम जिला परिषद को जिले के लिए योजनायें तैयार करने का अधिकार प्रदान करती हैं। हिमाचल प्रदेश अधिनियम के अनु जिला परिषद, प्लान परियोजनाओं, स्कीमोंया दो चार अधिक समितियों के लिए सामान्य अन्य कार्यों को तैयार करने के लिए सलाह देती हैं और उससे पंचायत समितियों से सम्बन्धित विकास योजनाओं के सम्बन्ध, समन्वय और समीकरण का अधिकार प्राप्त है। दो पंजाब, राजस्थान एवं पश्चिम बंगाल के अधिनियमों में समन्वय की बात कही गयी है, अतः जिले की सम्पूर्ण योजना में जिला पंचायत की भूमिका का लम्बे समय से विचार होता रहा है। अतः स्पष्ट होता कि विभिन्न राज्यों के अधिनियमों में इस महत्वपूर्ण तथ्यों का उपयोग किया गया है। 'दांतेवाला कार्यकारी दल ने आयोजन वाले मसले का बड़ी योग्यता से विवेचन किया है। इस दल ने जिला पंचायत द्वारा समुचित रूप से निपटाये जाने वाले कार्यों से सम्बन्धित समस्याओं पर विचार किया है। ये क्षेत्र आयोजन एवं विकास सम्बन्धी कार्यों के कार्यान्वयन एक. बलवन्त राय मेहता अध्ययन दल प्रतिवेदन एक हज़ार नौ सौ सैंतीस दो. पंचायती समिति रिपोर्ट एक हज़ार नौ सौ अठहत्तर औप. सीट, पृष्ठ साठ दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण होंगे । विकास केन्द्र सम्पूर्ण आर्थिक गति को क्रियाशील बनायेंगे और समीपवर्ती क्षेत्रों के लिए सुख-सुविधाओं में सुधार लाने के कार्य में सहायता करेंगे । एक राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार आर्थिक तथा सामाजिक स्तर पर अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को सामान्य विकास संरचना के अन्तर्गत गांवों के गरीब लोगों के साथ जोड़ा जा सकता है। अनुसूचित जातियों /जनजातियों के विकास हेतु स्वीकृत नीति के अनुसार- 'नौवीं पंचवर्षीय योजना में विकास पर मुख्य बल सामान्य क्षेत्रों द्वारा दिया जाना था। राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों में योजना कार्यान्वयन विभाग को ऐसी योजनायें बनाने के लिए कहा गया था। जिनके लाभ अनुसूचित जातियों/जनजातियों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों को पहुंच सके । दो बड़ी मात्रा में जल संसाधनों और सामुदायिक भूमि को कानूनी तौर पर पंचायतों को नियंत्रण में दे दिया जाता है। दुर्भाग्य है कि इनका निर्धन वर्गों के लिए पूर्णतः उपयोग नहीं किया जाता है। अतः पंचायतों को केवल भूमि उपलब्ध करायी जाती है। बल्कि निर्धन वर्गों के विकास से सम्बन्धित ऐसी जमीनों पर आधारित कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए । पंचायतों के कार्य पद्धति के अन्तर्गत इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि पंचायतें उन अतिक्रमित जमीन को उसके मौलिक कमजोर वर्ग के मालिक को सौप दिये जाने का कार्यक्रम अख्तियार करें। जिन जमीनों को गांव के प्रभावशाली लोग सामुदायिक सम्पत्ति के बहुमूल्य भागों का अतिक्रमण करते हैं । 'जिला पंचायतों को अतिक्रमण घटाने सहित इन जमीनों के सम्बन्ध में नियात्मक कार्य विकासात्मक कार्यों के एक भाग के रूप में सम्मिलित किये गये हैं । तीन वन विभाग के पास बड़ी मात्रा में आरक्षित बाग होते हैं जिनमें पेड़ भी नहीं होते हैं । जिनमें उपयोगी लकड़ियां नहीं होती हैं। वन विभाग के संरक्षण में गांवों के इर्द-गिर्द संरक्षित वन भी होते हैं जिनमें उपयोगी लकड़ियां नहीं होती हैं। पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से इन आरक्षित वनों के क्षेत्रों को बंटाने का अभियान कार्य चलाया जा रहा है। अपरिभाषित क्षेत्र की भूमि को भी निर्धन वर्गों को आवंटित करना जिला पंचायतों के कार्य क्षेत्र के अन्तर्गत है। कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं जिन्हें बंजर कहा जाता है। कमजोर वर्ग के लाखों लोगों की ऐसी भूमि आवंटन की व्यवस्था जिला पंचायतों के कार्यक्रम का एक अंग है। भूमिहीन श्रमिक जो एक. पूर्ववत्, पृष्ठ इकसठ दो. द्रष्टव्य नौंवीं पंचवर्षीय योजना, भारत सरकार बीस हज़ार दो तीन. सर्वेक्षण से प्राप्त सूचनाओंओ के आधर पर सर्वाशतः आदिवासी, हरिजन और पिछड़ी श्रेणियों की जातियों में आते हैं, को यदि उपर्युक्त प्रकार की भूमि को आवंटित किया जाता है तो कमजोर वर्गों को अधिक आर्थिक सुदृढ़ता प्राप्त करने का अवसर मिल जाता है । कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अनुपयोगी खारा जल भरा रहता है । सहकारी समितियों के द्वारा संसाधनों, ऊर्जा और अपेक्षित टेक्नालॉजी को मुहैया कराकर मछली पालन का कार्य भी करवाने का कार्य अनेक राज्यों में जिला पंचायतों के कार्य का अंग है। कठिनाई यह है कि जिला पंचायतों पर ग्रामीण विकास के लिए जो दायित्व लादे गये हैं उनकी पूर्ति के लिए अप्रचुर राशि इस संस्था को उपलब्ध करायी जाती रही है । फल यह हुआ कि सारे कार्य मात्र नारा बनकर रह गये हैं। कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों को सम्बन्धित स्थानीय स्तरों पर पर्याप्त शक्तियों और कार्यों का मात्र विकेन्द्रीकरण करना तब तक कारगर नहीं होगा जब तक अनुमानित वित्तीय संसाधन जिला पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराया जाता है। बलवन्त राय मेहता के नेतृत्व में गठित पंचायती राज समिति की सिफारिशें 'पंचायती राज के गठन, आय, कार्यकरण पर विशेष प्रकाश डालती हैं। उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में जो पंचायती चुनाव सम्पन्न हुआ है वह उक्त समिति की अनुशंशाओं और सिफारिशों पर आधारित है। जिला पंचायतों के कार्य पद्धति से सम्बन्धित सिफारिशें निम्नवत् हैं- एक एक जिले से सम्बन्धित सभी विकास कार्य जो अब राज्य सरकार द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं, जिला परिषदों को सौंपे जायेंगे। कुछ एक कार्यों में जो इस प्रकार के विकेन्द्रित किये जा रहे हैं, ये शामिल हैं कृषि और सम्बद्ध क्षेत्र, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, ग्रामीण उद्योग, विपणन, पिछड़े वर्गों का कल्याण आदि । जहां तक शिक्षा का सम्बन्ध है। यह जिला परिषद को इस शर्त पर सौंपी जा सकती है कि 'स्थानान्तरण और नियुक्ति की देखरेख के लिए वह एक विशेष समिति का गठन करेगी। स्थानीय निकायों द्वारा पर्यवेक्षण से न केवल अध्यापकों की उपस्थिति में सुधार होगा वरन् यह आशा की जाती है कि विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने का अनुपात भी कम हो जायेगा । प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम को भी बढ़ावा मिलेगा। 'दो पंचायतों के सामूहिक कार्यों को गतिशील बनाने, संगठन बनाने तथा परियोजना तैयार करने के लिए मुख्य भूमिका अदा करनी होगी । एक. पंचायती राज समिति रिपोर्ट, एक हज़ार नौ सौ अठहत्तर औप. सीट एक सौ चौंसठ दो. पूर्ववत्, पृष्ठ एक सौ छयासठ जिला पंचायतों के लिए जिस संसाधन की आवश्यकता है वह है कार्यान्वयन के लिए उन्हें सौंपे गये कार्यों के साथ-साथ सोद्देश्य कार्य आवंटन तथा जन वितरण । जिला पंचायत की पूर्ण रूपेण स्थापना हो जाने पर जब वे उपलब्ध अथवा उनको सौंपे गये संसाधनों से अपनी योजनाओं को कार्यान्वित कर सकती है तब जिला पंचायतों को नियात्मक कार्य सौंपने के प्रश्न का पुनरीक्षण किया जाय । जिला पंचायतों को उत्पादन केन्द्रों के साथ उचित रूप से समन्वित किया जाना चाहिए । इस सम्बन्ध में अन्य संस्थाओं के सहयोग से उन्हें विपणन, निवेश, आपूर्ति, प्रतिक्षण तथा सेवा और कल्याण की जरूरतों से सम्बन्धित आवश्यक निर्णय लेने होंगे । 'विविध प्रकार के व्यवसायों के विकास कार्यक्रमोंओ की अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के लिए अधिक मात्रा में प्रासंगिकता है। पंचायतों को डेयरी, मुर्गी पालन, सुअर पालन, मछली पालन, जंगल वन आदि जैसे क्षेत्रों में ग्रामीण इलाकों में इन व्यवसायिक धन्धों को शुरू करने में शामिल किया जा सकता है । एक जिला पंचायतों के जन संस्था के रूप में अनुसूचित जातियों / अनुसूचित जनजातियों के लिए वित्त विकास निगमों को अनुसूचित जातियों/जनजातियों पर आधारित विभिन्न कार्यक्रमों के लिए वित्तीय तथा तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु क्षेत्र आधार पर सहायता सुलभ कर सकती है । जिला पंचायत विकासात्मक, म्यूनिसिपल तथा कल्याणकारी कार्यों को करती रहेगी। अतः यह उनके लिए ही सम्भव होगा कि वे अंशकालिक सहायक के बजाय एक पूर्णकालिक पंचायत अधिकारी रखें। उनका वेतन व भत्ते पर्याप्त रूप से योग्य कार्मिकों को आकृष्ट कस्ने के लिए उपयुक्त होनी चाहिए। जिला स्तर पर विभिन्न विकास विभागों को यथेष्ट रूप से कर्मचारी वर्ग को जिला पंचायत स्तर पर कार्य करना चाहिए । विकास कार्यों की मात्रा में वृद्धि और उनकी जटिलता के कारण विकासात्मक अपेक्षाओं एक. पूर्ववत्, पृष्ठ एक सौ सरसठ का निरन्तर अध्ययन करने और पंचायती राज संस्थाओं की देखभाल करने वाले राज्य स्तर के विभागों के ढांचे तथा कार्यों का निर्माण करने की आवश्यकता है। पंचायती राज विभाग में जिस प्रकार महत्वपूर्ण विभागों के लिए मंत्री आदि की व्यवस्था की जाती है, होनी चाहिए । रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों के लिए सुदृढ़ पंचायती राज निदेशालय और विकास आयुक्त के अधीन एक सचिवालय विभाग अनिवार्य होगा। लेकिन विकास विभागों को पंचायती राज संस्थाओं के सफल कार्यपद्धति की भूमिका निभानी होगी। राज्य सरकार को स्वतंत्र टीम द्वारा, जिनमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शिक्षा संस्थायें और विश्वविद्यालय भी शामिल हैं - जिला पंचायतों की कार्य पद्धति का समय-समय पर स्वतंत्र मूल्यांकन कराने की व्यवस्था भी करानी चाहिए । कार्य पद्धति की सीमायें आय-व्यय के अनुपात में बढ़ती घटती हैं। एक तरह जहां जिला पंचायतों की कार्य पद्धति का उल्लेख आवश्यक है वहीं दूसरी ओर कार्य पद्धति के सफल निर्वाह के लिए जिला पंचायतोंओ की आय उसकी रीढ़ है। 'बलवन्त राय मेहता अध्ययन दल ने अपने प्रतिवेदन में जिला पंचायतों के कार्य पद्धतियों को सुदृढ़ आधार प्रदान करने हेतु वित्त के प्रचुर प्रावधान का भी उल्लेख किया है । एक जिला पंचायतों को दी गयी कराधान शक्तियाँ सीमित तथा विशिष्ट होनी चाहिए और उन्हें न्यायोचित रूप से सम्पादित किया जाना चाहिए। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए कुछ एक धन्धों तथा व्यवसायों जिनमें कमजोर वर्गों का बाहुल्य है, को साविधिक उपबन्धों के माध्यम से छोड़ दिया जाना चाहिए । करों के अतिरिक्त पंचायती राज संस्थाओं की रोशनी, सफाई, जलापूर्ति आदि ऐसी सेवाओं के लिए शुल्क / कर उगाहना चाहिए । एकरूपता के अभाव व मनमाने पन से बचने के लिए इन शुल्कों को निम्नतम तथा अधिकतम दर को निर्धारित किया जाना चाहिए। चूंकि कर लगाने की शक्ति उनकी वसूली की शक्ति से अलग नहीं की जानी चाहिए। अतः जिला पंचायतों के अधिकारियोंओ को स्वयं कर वसूलना चाहिए। आय की सुदृढ़ता पर आधारित अतिरिक्त ग्रामीण उत्पादन कार्य के लिए पंचायतों को आत्म निर्भर होने की आवश्यकता है। सभी लोगों में अर्न्तनिहित चेतना को विकसित करने हेतु प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों को महत्व देना चाहिए । इस प्रकार जिला पंचायतों के कार्य पद्धति एक. दृष्टव्य - बलवन्तराय मेहता अध्ययन दल रिपोर्ट एक हज़ार नौ सौ सत्तावन
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आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारी बारिश से भयंकर तबाही मची है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगातार बारिश होने की वजह से मरने वालों की संख्या बढ़कर 29 हो गई है। दक्षिणी आंध्र प्रदेश के चित्तूर, कडप्पा, नेल्लोर और अनंतपुर जिलों में भारी बारिश के कारण फँसे 20,000 से अधिक लोगों को निकाला जा चुका है और उन्हें राहत शिविरों में भेज दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि 1,316 से अधिक गाँव जलमग्न हो गए हैं। वहीं, चार जिलों की अलग-अलग घटनाओं में 100 अधिक लोगों के बह जाने का अंदेशा है।
राज्य सरकार के अनुसार, भारतीय वायु सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और दमकल सेवाकर्मियों ने अनंतपुरम, कडप्पा और चित्तूर जिलों में भीषण बाढ़ की चपेट में आए एक पुलिस निरीक्षक सहित कम-से-कम 64 लोगों को बचाया।
मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने शनिवार (20 नवंबर 2021) को प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया और जिला कलेक्टरों के साथ बाढ़ की स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों से बाढ़ का पानी कम होते ही फसल के नुकसान का आंकलन करने लिए भी कहा। राहत के रूप में प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है।
इससे पहले शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में बाढ़ की स्थिति पर मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया था। इसी के साथ उन्होंने सभी के सुरक्षित रहने की प्रार्थना भी की।
बता दें कि बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवात के चलते गुरुवार (18 नवम्बर 2021) की रात से ही आंध्र प्रदेश में भारी बारिश हो रही है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिव मंदिर में पूजा कर रहे श्रद्धालु भी बाढ़ की चपेट में आ गए थे। राज्य की पुलिस, भारतीय वायु सेना, एसडीआरएफ और दमकल सेवा बचाव कार्यों में लगी हुई है।
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आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारी बारिश से भयंकर तबाही मची है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगातार बारिश होने की वजह से मरने वालों की संख्या बढ़कर उनतीस हो गई है। दक्षिणी आंध्र प्रदेश के चित्तूर, कडप्पा, नेल्लोर और अनंतपुर जिलों में भारी बारिश के कारण फँसे बीस,शून्य से अधिक लोगों को निकाला जा चुका है और उन्हें राहत शिविरों में भेज दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि एक,तीन सौ सोलह से अधिक गाँव जलमग्न हो गए हैं। वहीं, चार जिलों की अलग-अलग घटनाओं में एक सौ अधिक लोगों के बह जाने का अंदेशा है। राज्य सरकार के अनुसार, भारतीय वायु सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और दमकल सेवाकर्मियों ने अनंतपुरम, कडप्पा और चित्तूर जिलों में भीषण बाढ़ की चपेट में आए एक पुलिस निरीक्षक सहित कम-से-कम चौंसठ लोगों को बचाया। मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने शनिवार को प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया और जिला कलेक्टरों के साथ बाढ़ की स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने अधिकारियों से बाढ़ का पानी कम होते ही फसल के नुकसान का आंकलन करने लिए भी कहा। राहत के रूप में प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को पाँच-पाँच लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है। इससे पहले शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में बाढ़ की स्थिति पर मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया था। इसी के साथ उन्होंने सभी के सुरक्षित रहने की प्रार्थना भी की। बता दें कि बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवात के चलते गुरुवार की रात से ही आंध्र प्रदेश में भारी बारिश हो रही है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिव मंदिर में पूजा कर रहे श्रद्धालु भी बाढ़ की चपेट में आ गए थे। राज्य की पुलिस, भारतीय वायु सेना, एसडीआरएफ और दमकल सेवा बचाव कार्यों में लगी हुई है।
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एक्सपेंडबल्स अवॉर्ड्स 2018 सीजन 2 एक विशाल हिट साबित हुआ। यह पुरस्कार उस दूसरे वर्ष में है और इसे 'मनोरंजन उद्योग के अनगिनत नायकों को पुरस्कृत करने का एकमात्र उद्देश्यः पत्रकार, कैमरन, फोटोग्राफर, प्रचारक और कई और अधिक' के साथ आयोजित किया जाता है; इस बार मशहूर हस्तियों और मीडिया के लोगों से एक बड़ी प्रतिक्रिया और समर्थन मिला।
टेलीविज़न के चेहरों से बॉलीवुड की बड़ी कंपनियों तक, कई सेलिब्रिटी इस कार्यक्रम की उपस्थिति थीं और यहां तक कि विभिन्न मजेदार गतिविधियों में मीडिया व्यक्तियों के साथ भाग लिया। पंकज त्रिपाठी, अंकिता लोखंडे, दीपिका सिंह, पूजा चोपड़ा, उपेन पटेल, वीआईपी, सुनील संजन और कई अन्य ने इस घटना के लिए उत्साहित किया और मीडिया के प्रति उत्साहपूर्वक काम करने के लिए उनके कृतज्ञता का विस्तार किया और यहां तक कि विभिन्न एक्सपेंडबल्स अवॉर्ड्स ट्राफी के साथ विजेताओं को भी सम्मानित किया।
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एक्सपेंडबल्स अवॉर्ड्स दो हज़ार अट्ठारह सीजन दो एक विशाल हिट साबित हुआ। यह पुरस्कार उस दूसरे वर्ष में है और इसे 'मनोरंजन उद्योग के अनगिनत नायकों को पुरस्कृत करने का एकमात्र उद्देश्यः पत्रकार, कैमरन, फोटोग्राफर, प्रचारक और कई और अधिक' के साथ आयोजित किया जाता है; इस बार मशहूर हस्तियों और मीडिया के लोगों से एक बड़ी प्रतिक्रिया और समर्थन मिला। टेलीविज़न के चेहरों से बॉलीवुड की बड़ी कंपनियों तक, कई सेलिब्रिटी इस कार्यक्रम की उपस्थिति थीं और यहां तक कि विभिन्न मजेदार गतिविधियों में मीडिया व्यक्तियों के साथ भाग लिया। पंकज त्रिपाठी, अंकिता लोखंडे, दीपिका सिंह, पूजा चोपड़ा, उपेन पटेल, वीआईपी, सुनील संजन और कई अन्य ने इस घटना के लिए उत्साहित किया और मीडिया के प्रति उत्साहपूर्वक काम करने के लिए उनके कृतज्ञता का विस्तार किया और यहां तक कि विभिन्न एक्सपेंडबल्स अवॉर्ड्स ट्राफी के साथ विजेताओं को भी सम्मानित किया।
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दसवाँ अध्याय
[ महाजनी हिसाब ]
यदि तुम किसी बनिये, बजाज, सराफ अथवा साहूकार या महाजन की दूकान पर थोड़ी देर बैठकर देखो तो तुम्हे मालूम हो जाएगा कि ज्यों हो माहक कोई चीज खरोद लेता त्यों ही चेचनेवाला स्वय अथवा दूकान में बैठा हुआ उसका मुनीम मट खारुके के पतले पुढेवालो लम्बे लम्बे पन्नों को चनी हुई एक पुस्तक सो खोलकर उसमें कुछ लिखने लगता है। यह पुस्तक रजिस्टर के समान एक बगल में सिलो हुई नहीं होती और न इसके पन्ने हो दाहिनी ओर से बाई ओर को खुलते हैं, बरन यह पुस्तक ऊपर के सिरे पर सूल की मोटो रस्सी से सिलो रहती है और इसके पन्ने नीचे से ऊपर की ओर लम्बे लम्बे खुलते हैं। यदि यह किताब पूरी खोलकर रख दी जाए तो ४-५ हाथ लम्बी और एक बीता चौडी फैलो हुई चीज के समान दिखेगी। दूकान में इस प्रकार की तुम्हें एक हो पुस्तक न दिखेगी वरन इसी के समान बीच से मुडी हुई और सूत की मोटी रस्सी से बँधी हुई इस प्रकार की किताबों का एक लम्बा चौडा और ऊँचा हेर दिखाई देगा। पूछने पर मालूम होगा कि दूकानदार इन पुस्तकों को 'बहियाँ' कहते हैं।
इन चहियों को खोलकर देखने से तुम्हे मालूम हो जाएगा कि इन सभी बहियों में दूकान के आय-व्यय का विवरण लिग्ना है। किसी बही मे खरीदे हुए और बेचे हुए कपडे का हिसाव है, तो किसी में भिन्न भिन्न व्यक्तियों के उधार जमा खर्च के
विवरण का अलग अलग उल्लेख है। इसी प्रकार भिन्न भिन्न बही में भिन्न भिन्न वस्तुविशेष का विवरण तुम देखोगे।
अच्छा, अब आश्रो किसी एक खास बही को और अधिक ध्यान पूर्वक देखें। देखा मुनीम पीले कागजवाली बही को ही प्रायः हर वार लिखता अथवा देखता है, शेष बहियों को वह कभी कभी उठाता है; और उनमें पीले कागजवाली बही की अपेक्षा लिखता भी बहुत कम है। इसलिए आओ सबसे पहले इसी पोली बही का अवलोकन करें।
रस्सी से बँधे हुए सिरे को खोलने पर हम देखते हैं कि अन्य सभी बढ़ियों के समान इस पर भी काली स्याही से इस बद्दी का नाम लिखा है-इसे रोजनामचा अथवा कच्ची रोकड़ रहते हैं। अब तुम्हारी समझ में आ गया होगा कि यह पीले कागज को क्यों बनाई गई है। तुम भी तो अपनो काट कूट को कापी प्रायः पीले हो कागज को बनाते हो । क्यों ?
पुट्टा उलटाते ही तुम देखोगे कि प्रत्येक वही के पन्नों को मोड़ मोड़कर प्रत्येक पन्ने के आठ खाने कर दिए गए हैं, और पढ़ने से तुम्हें मालूम हो जाएगा कि दाहिनी ओर के ४ खानों में एक बात और बाईं ओर के शेष चार खानों में दूसरी बात लिखी है। दाहिनी और बाई ओर के खानों में कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं दिखता। इस प्रकार प्रत्येक पन्ने को दाहिने और यायें दो हिस्सों में विभाजित करनेवाले विशेषतः दो शब्द और उनके ऊपर की दो लकीरें है। पने के बाईं ओर ऊपर सिरे पर जमा और दाहिनी ओर ऊपर सिरे पर नाम लिख हुआ है। इस जमा और नाम के ऊपर तिथि, माह, सवत तथ
दिन, तागेस और सन लिखा हुआ है, एन उसके नीचे बिकारियो मे रुपये और उनका ब्योरा लिखा हुआ है :
श्रो शुभ मितो कुँवार वदी १४ स० १९८३, शनिवार ता० १८ सितम्बर मन १९२६ ३० । ૐ
३०) घी निक्रो
२०५ नरुद १०५ उधार
१८५ रामलाल के १०५ शकर ।।।९ दर ९३ 5) चिरौंजी 35 दर १५ सेर
ऊपर के नमूने में तुम देखते हो कि जमा में बाईं ओर से पहले साने में पूरी रकम लिखा है, इसी प्रकार नाम में भी चार खानों में से बाई' 'ओर से पहले साने में पूरी रकम लिसो हुई
। इस पहले साने को सिरा कहते हैं और प्रत्येक जमा व नाम की मद की पूरी रकम सिरे में लिखी जाती है। इसके पश्चात तुम यह भो देखते हो कि इसो पूरी रकम का अलग अलग निवरण भी लिखा है, पर इस अलग अलग विवरण को रकम सिरे में नहीं लिखा गई वह प्रत्येक मद में बाई आर से दूसरे खाने में लिखी हुई हूँ। इस दूसरे खाने वो पेटा कहते हैं, और इसमें पूरी रकम के अलग अलग विवरण की रकम को लिखते हैं। यदि पूरी रकम के अलग अलग विवरण का और भी धुंद्र विशेष विवरण हो तो उसको रक्म बाईं ओर से तीसरे खाने मे लिखते हैं, और उस खाने को दर पेटा कहते हैं। प्रत्येक खाने के जोड़ को उसके नीचे आगेवाले खाने में रखते हैं अर्थात सिरे का जोड पेटा में और पेटे का जोड दर पेटा में लिखते हैं । उसके आगे साता पना अथवा रोकड-पन्ना लिसते जाते जिसका अर्थ तुम्हें आगे चलकर मालूम होगा ।
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दसवाँ अध्याय [ महाजनी हिसाब ] यदि तुम किसी बनिये, बजाज, सराफ अथवा साहूकार या महाजन की दूकान पर थोड़ी देर बैठकर देखो तो तुम्हे मालूम हो जाएगा कि ज्यों हो माहक कोई चीज खरोद लेता त्यों ही चेचनेवाला स्वय अथवा दूकान में बैठा हुआ उसका मुनीम मट खारुके के पतले पुढेवालो लम्बे लम्बे पन्नों को चनी हुई एक पुस्तक सो खोलकर उसमें कुछ लिखने लगता है। यह पुस्तक रजिस्टर के समान एक बगल में सिलो हुई नहीं होती और न इसके पन्ने हो दाहिनी ओर से बाई ओर को खुलते हैं, बरन यह पुस्तक ऊपर के सिरे पर सूल की मोटो रस्सी से सिलो रहती है और इसके पन्ने नीचे से ऊपर की ओर लम्बे लम्बे खुलते हैं। यदि यह किताब पूरी खोलकर रख दी जाए तो चार-पाँच हाथ लम्बी और एक बीता चौडी फैलो हुई चीज के समान दिखेगी। दूकान में इस प्रकार की तुम्हें एक हो पुस्तक न दिखेगी वरन इसी के समान बीच से मुडी हुई और सूत की मोटी रस्सी से बँधी हुई इस प्रकार की किताबों का एक लम्बा चौडा और ऊँचा हेर दिखाई देगा। पूछने पर मालूम होगा कि दूकानदार इन पुस्तकों को 'बहियाँ' कहते हैं। इन चहियों को खोलकर देखने से तुम्हे मालूम हो जाएगा कि इन सभी बहियों में दूकान के आय-व्यय का विवरण लिग्ना है। किसी बही मे खरीदे हुए और बेचे हुए कपडे का हिसाव है, तो किसी में भिन्न भिन्न व्यक्तियों के उधार जमा खर्च के विवरण का अलग अलग उल्लेख है। इसी प्रकार भिन्न भिन्न बही में भिन्न भिन्न वस्तुविशेष का विवरण तुम देखोगे। अच्छा, अब आश्रो किसी एक खास बही को और अधिक ध्यान पूर्वक देखें। देखा मुनीम पीले कागजवाली बही को ही प्रायः हर वार लिखता अथवा देखता है, शेष बहियों को वह कभी कभी उठाता है; और उनमें पीले कागजवाली बही की अपेक्षा लिखता भी बहुत कम है। इसलिए आओ सबसे पहले इसी पोली बही का अवलोकन करें। रस्सी से बँधे हुए सिरे को खोलने पर हम देखते हैं कि अन्य सभी बढ़ियों के समान इस पर भी काली स्याही से इस बद्दी का नाम लिखा है-इसे रोजनामचा अथवा कच्ची रोकड़ रहते हैं। अब तुम्हारी समझ में आ गया होगा कि यह पीले कागज को क्यों बनाई गई है। तुम भी तो अपनो काट कूट को कापी प्रायः पीले हो कागज को बनाते हो । क्यों ? पुट्टा उलटाते ही तुम देखोगे कि प्रत्येक वही के पन्नों को मोड़ मोड़कर प्रत्येक पन्ने के आठ खाने कर दिए गए हैं, और पढ़ने से तुम्हें मालूम हो जाएगा कि दाहिनी ओर के चार खानों में एक बात और बाईं ओर के शेष चार खानों में दूसरी बात लिखी है। दाहिनी और बाई ओर के खानों में कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं दिखता। इस प्रकार प्रत्येक पन्ने को दाहिने और यायें दो हिस्सों में विभाजित करनेवाले विशेषतः दो शब्द और उनके ऊपर की दो लकीरें है। पने के बाईं ओर ऊपर सिरे पर जमा और दाहिनी ओर ऊपर सिरे पर नाम लिख हुआ है। इस जमा और नाम के ऊपर तिथि, माह, सवत तथ दिन, तागेस और सन लिखा हुआ है, एन उसके नीचे बिकारियो मे रुपये और उनका ब्योरा लिखा हुआ है : श्रो शुभ मितो कुँवार वदी चौदह सशून्य एक हज़ार नौ सौ तिरासी, शनिवार ताशून्य अट्ठारह सितम्बर मन एक हज़ार नौ सौ छब्बीस तीस । ૐ तीस) घी निक्रो दो सौ पाँच नरुद एक सौ पाँच उधार एक सौ पचासी रामलाल के एक सौ पाँच शकर ।।।नौ दर तिरानवे पाँच) चिरौंजी पैंतीस दर पंद्रह सेर ऊपर के नमूने में तुम देखते हो कि जमा में बाईं ओर से पहले साने में पूरी रकम लिखा है, इसी प्रकार नाम में भी चार खानों में से बाई' 'ओर से पहले साने में पूरी रकम लिसो हुई । इस पहले साने को सिरा कहते हैं और प्रत्येक जमा व नाम की मद की पूरी रकम सिरे में लिखी जाती है। इसके पश्चात तुम यह भो देखते हो कि इसो पूरी रकम का अलग अलग निवरण भी लिखा है, पर इस अलग अलग विवरण को रकम सिरे में नहीं लिखा गई वह प्रत्येक मद में बाई आर से दूसरे खाने में लिखी हुई हूँ। इस दूसरे खाने वो पेटा कहते हैं, और इसमें पूरी रकम के अलग अलग विवरण की रकम को लिखते हैं। यदि पूरी रकम के अलग अलग विवरण का और भी धुंद्र विशेष विवरण हो तो उसको रक्म बाईं ओर से तीसरे खाने मे लिखते हैं, और उस खाने को दर पेटा कहते हैं। प्रत्येक खाने के जोड़ को उसके नीचे आगेवाले खाने में रखते हैं अर्थात सिरे का जोड पेटा में और पेटे का जोड दर पेटा में लिखते हैं । उसके आगे साता पना अथवा रोकड-पन्ना लिसते जाते जिसका अर्थ तुम्हें आगे चलकर मालूम होगा ।
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चैत्र नवरात्र और रामनवमी पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पूरे प्रदेश में दुर्गासप्तशती और अखंडरामचरितमानस पाठ करवाने का फैसला लिया है। इसके अलावा कई और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित कराए जाएँगे। इसके लिए जिला अधिकारियों और मंडल कमिश्नरों को निर्देश दे दिए गए हैं।
22 मार्च, 2023 से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्रि को खास बनाने के लिए सरकार की तरफ से पहल किया गया है। नवरात्रि के दौरान प्रदेश भर के दुर्गा मंदिरों व शक्तिपीठों में दुर्गासपत्शती पाठ, जागरण, झाँकियों व रामचरितमानस पाठ का आयोजन किया जाएगा। इसके लिए जिला, तहसील और विकास खंड स्तर पर समितियों का गठन किया जा रहा है। योगी सरकार ने अधिकारियों को 21 मार्च तक तैयारियाँ पूरी कर लेने की हिदायत दी है।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव संस्कृति मुकेश मेश्राम ने जिला अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किया है। इसके अनुसार जिला अधिकारी अपने जिले में चयनित देवी मंदिर व शक्तिपीठों में कार्यक्रम के लिए कलाकारों का चयन करेंगे। आयोजित कार्यक्रमों में अधिक से अधिक महिलाओं और बालिकाओं की सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है। इतना ही नहीं इन कार्यक्रमों के सफल संचालन के लिए सरकार की तरफ से एक लाख रुपए का फंड भी दिया जाएगा।
जिन मंदिरों में कार्यक्रमों का आयोजन होगा, वहाँ की तस्वीर सरकार के पोर्टल (संस्कृति विभाग) पर भी अपलोड की जाएगी। कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियाँ देंगे। इन आयोजनों में जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे। बता दें कि 22 मार्च से लेकर 30 मार्च तक चैत्र नवरात्रि का त्योहार मनाया जाएगा। 30 मार्च, 2023 को रामनवमी का त्योहार है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्म हुआ था।
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चैत्र नवरात्र और रामनवमी पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पूरे प्रदेश में दुर्गासप्तशती और अखंडरामचरितमानस पाठ करवाने का फैसला लिया है। इसके अलावा कई और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित कराए जाएँगे। इसके लिए जिला अधिकारियों और मंडल कमिश्नरों को निर्देश दे दिए गए हैं। बाईस मार्च, दो हज़ार तेईस से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्रि को खास बनाने के लिए सरकार की तरफ से पहल किया गया है। नवरात्रि के दौरान प्रदेश भर के दुर्गा मंदिरों व शक्तिपीठों में दुर्गासपत्शती पाठ, जागरण, झाँकियों व रामचरितमानस पाठ का आयोजन किया जाएगा। इसके लिए जिला, तहसील और विकास खंड स्तर पर समितियों का गठन किया जा रहा है। योगी सरकार ने अधिकारियों को इक्कीस मार्च तक तैयारियाँ पूरी कर लेने की हिदायत दी है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव संस्कृति मुकेश मेश्राम ने जिला अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किया है। इसके अनुसार जिला अधिकारी अपने जिले में चयनित देवी मंदिर व शक्तिपीठों में कार्यक्रम के लिए कलाकारों का चयन करेंगे। आयोजित कार्यक्रमों में अधिक से अधिक महिलाओं और बालिकाओं की सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है। इतना ही नहीं इन कार्यक्रमों के सफल संचालन के लिए सरकार की तरफ से एक लाख रुपए का फंड भी दिया जाएगा। जिन मंदिरों में कार्यक्रमों का आयोजन होगा, वहाँ की तस्वीर सरकार के पोर्टल पर भी अपलोड की जाएगी। कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियाँ देंगे। इन आयोजनों में जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे। बता दें कि बाईस मार्च से लेकर तीस मार्च तक चैत्र नवरात्रि का त्योहार मनाया जाएगा। तीस मार्च, दो हज़ार तेईस को रामनवमी का त्योहार है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्म हुआ था।
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भारत के पूर्व तेज गेंदबाज इरफान पठान का मानना है कि इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच जैविक रूप से सुरक्षित माहौल में खेले गए पहले टेस्ट को अगर सूचक मानें तो दुनिया भर के तेज गेंदबाजों को फिलहाल रिवर्स स्विंग तो भूल ही जानी चाहिये । भारत के एक और पूर्व गेंदबाज आशीष नेहरा का कहना है कि जिम्मी एंडरसन जिस तरह से शार्ट ऑफ लैंग्थ गेंदबाजी कर रहे थे, उससे लगता है कि लार के अभाव में सामान्य स्विंग भी नहीं मिल पा रही ।
मार्क वुड और जोफ्रा आर्चर को पांचवें दिन गेंदबाजी करते देखने वाले पठान का मानना है कि कुछ समय के लिये गेंदबाजों को पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग के बारे में भूल जाना चाहिये ।
उन्होंने कहा ," आप फिर सीम हिट करो, हरकत होती रहेगी या फिर मैच एकतरफा हो जायेंगे । " आस्ट्रेलिया में कूकाबूरा गेंद कैसे खेलेगी , इस बारे में पूर्व विकेटकीपर दीप दासगुप्ता ने कहा कि सभी टीमों के गेंदबाजों को दिक्कतें आयेंगी ।
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भारत के पूर्व तेज गेंदबाज इरफान पठान का मानना है कि इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच जैविक रूप से सुरक्षित माहौल में खेले गए पहले टेस्ट को अगर सूचक मानें तो दुनिया भर के तेज गेंदबाजों को फिलहाल रिवर्स स्विंग तो भूल ही जानी चाहिये । भारत के एक और पूर्व गेंदबाज आशीष नेहरा का कहना है कि जिम्मी एंडरसन जिस तरह से शार्ट ऑफ लैंग्थ गेंदबाजी कर रहे थे, उससे लगता है कि लार के अभाव में सामान्य स्विंग भी नहीं मिल पा रही । मार्क वुड और जोफ्रा आर्चर को पांचवें दिन गेंदबाजी करते देखने वाले पठान का मानना है कि कुछ समय के लिये गेंदबाजों को पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग के बारे में भूल जाना चाहिये । उन्होंने कहा ," आप फिर सीम हिट करो, हरकत होती रहेगी या फिर मैच एकतरफा हो जायेंगे । " आस्ट्रेलिया में कूकाबूरा गेंद कैसे खेलेगी , इस बारे में पूर्व विकेटकीपर दीप दासगुप्ता ने कहा कि सभी टीमों के गेंदबाजों को दिक्कतें आयेंगी ।
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चंडीगढ़, 11 जून (ट्रिन्यू)
अम्बाला कैंट में 22 एकड़ भूमि पर लगभग 300 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे आजादी की पहली लड़ाई के भव्य शहीदी स्मारक का इस वर्ष दिसंबर में उद्घाटन संभव है।
शनिवार को मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव तथा सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के महानिदेशक डॉ अमित अग्रवाल ने इतिहासकारों की समिति के साथ निर्माण स्थल का दौरा किया। इस मौके पर डॉ अमित अग्रवाल ने कहा कि इस भव्य स्मारक का उद्घाटन दिसंबर माह के दूसरे या तीसरे सप्ताह में किया जाएगा। इस स्मारक में प्रदर्शित किए जाने वाले एतिहासिक तथ्यों के सत्यापन व पुष्टि के लिए विशेष तौर पर इतिहासकारों की समिति गठित की गई है, ताकि लोग उस समय की पल-पल की सही जानकारी से अवगत हो सकें। आज की बैठक में स्मारक में 1857 के इतिहास को किस प्रकार प्रदर्शित किया जाएगा, उसके संबंध में विस्तार से विचार-मंथन किया गया।
बैठक में इतिहासकारों की समिति के सभी सदस्य मौजूद रहे, जिनमें भारतीय इतिहास परिषद अनुसंधान के अध्यक्ष डॉ राघवेन्द्र तंवर, प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर कपिल कुमार, राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान, दिल्ली की निदेशक व उप कुलपति प्रोफेसर अनुपा पांडेय, मिलिट्री इतिहास की पुस्तकों के लेखक कर्नल (सेवानिवृत्त) योगेंद्र सिंह, भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय के अभिलेखाधिकारी डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा व सनातन धर्म महाविद्यालय, इतिहास विभाग, अम्बाला के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ उदयवीर शामिल हैं।
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चंडीगढ़, ग्यारह जून अम्बाला कैंट में बाईस एकड़ भूमि पर लगभग तीन सौ करोड़ रुपये की लागत से बन रहे आजादी की पहली लड़ाई के भव्य शहीदी स्मारक का इस वर्ष दिसंबर में उद्घाटन संभव है। शनिवार को मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव तथा सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के महानिदेशक डॉ अमित अग्रवाल ने इतिहासकारों की समिति के साथ निर्माण स्थल का दौरा किया। इस मौके पर डॉ अमित अग्रवाल ने कहा कि इस भव्य स्मारक का उद्घाटन दिसंबर माह के दूसरे या तीसरे सप्ताह में किया जाएगा। इस स्मारक में प्रदर्शित किए जाने वाले एतिहासिक तथ्यों के सत्यापन व पुष्टि के लिए विशेष तौर पर इतिहासकारों की समिति गठित की गई है, ताकि लोग उस समय की पल-पल की सही जानकारी से अवगत हो सकें। आज की बैठक में स्मारक में एक हज़ार आठ सौ सत्तावन के इतिहास को किस प्रकार प्रदर्शित किया जाएगा, उसके संबंध में विस्तार से विचार-मंथन किया गया। बैठक में इतिहासकारों की समिति के सभी सदस्य मौजूद रहे, जिनमें भारतीय इतिहास परिषद अनुसंधान के अध्यक्ष डॉ राघवेन्द्र तंवर, प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर कपिल कुमार, राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान, दिल्ली की निदेशक व उप कुलपति प्रोफेसर अनुपा पांडेय, मिलिट्री इतिहास की पुस्तकों के लेखक कर्नल योगेंद्र सिंह, भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय के अभिलेखाधिकारी डॉ देवेंद्र कुमार शर्मा व सनातन धर्म महाविद्यालय, इतिहास विभाग, अम्बाला के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ उदयवीर शामिल हैं।
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बयान में कहा गया, "इसके अलावा श्रीलंका क्रिकेट कथित अपराध की तुरंत जांच करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। ऑस्ट्रेलिया में उपरोक्त अदालती मामले के निष्कर्ष पर दोषी पाए जाने पर उक्त खिलाड़ी को दंडित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। " उल्लेखनीय है कि गुणथिलाका को सिडनी में कथित यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उसे रविवार के शुरुआती घंटों में ससेक्स स्ट्रीट के एक होटल से गिरफ्तार किया गया।
डेली मिरर के अनुसार, गुणथिलाका आज सिडनी की एक अदालत में हथकड़ी के साथ वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से पेश हुए। श्रीलंकाई क्रिकेटर ने यौन उत्पीड़न के आरोपों में जमानत मांगी थी लेकिन मजिस्ट्रेट ने इसे खारिज कर दिया और उन्हें हिरासत में रहना होगा। यह पहली बार नहीं है जब गुणथिलाका पर अनुशासनात्मक आरोप लगे हैं। इससे पहले उन पर महिलाओं के साथ दुराचार के कम से कम तीन आरोप लगे हैं। इसके अलावा उन्हें दो अन्य खिलाड़ियों के साथ इंग्लैंड दौरे पर बायो बबल को तोड़ने का दोषी भी पाया गया था।
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बयान में कहा गया, "इसके अलावा श्रीलंका क्रिकेट कथित अपराध की तुरंत जांच करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। ऑस्ट्रेलिया में उपरोक्त अदालती मामले के निष्कर्ष पर दोषी पाए जाने पर उक्त खिलाड़ी को दंडित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। " उल्लेखनीय है कि गुणथिलाका को सिडनी में कथित यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उसे रविवार के शुरुआती घंटों में ससेक्स स्ट्रीट के एक होटल से गिरफ्तार किया गया। डेली मिरर के अनुसार, गुणथिलाका आज सिडनी की एक अदालत में हथकड़ी के साथ वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से पेश हुए। श्रीलंकाई क्रिकेटर ने यौन उत्पीड़न के आरोपों में जमानत मांगी थी लेकिन मजिस्ट्रेट ने इसे खारिज कर दिया और उन्हें हिरासत में रहना होगा। यह पहली बार नहीं है जब गुणथिलाका पर अनुशासनात्मक आरोप लगे हैं। इससे पहले उन पर महिलाओं के साथ दुराचार के कम से कम तीन आरोप लगे हैं। इसके अलावा उन्हें दो अन्य खिलाड़ियों के साथ इंग्लैंड दौरे पर बायो बबल को तोड़ने का दोषी भी पाया गया था।
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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद हमीरपुर के जिला संयोजक अनिल ठाकुर ने सोमवार को जारी प्रेस बयान में कहा कि विद्यार्थी परिषद विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन है तथा समय-समय पर विद्यार्थी परिषद ने छात्रों की मांगों को लेकर सकारात्मक रूप से कार्य महाविद्यालय परिसर, विश्वविद्यालय परिसर में किया है। प्रदेश के अंदर शिक्षा क्षेत्र की बात करें, तो बहुत सी ऐसी कुछ अनियमितताएं हैं, जिससे हिमाचल प्रदेश के छात्रों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। चाहे वह महाविद्यालय के अंदर रिक्त पड़े अध्यापकों के पद हो या फिर गैर शिक्षकों के रिक्त पड़े पद, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के द्वारा छात्रों के परिणाम में आ रही देरी हो या उस परिणाम में अनेक प्रकार की खामियां हो इन सभी समस्याओं से छात्रों को वर्तमान समय में शिक्षा क्षेत्र में जूझना पड़ रहा है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एक आंदोलनात्मक रूपरेखा विभिन्न मांगों को ध्यान में रखते हुए तैयार की है। इनमें महाविद्यालय में रिक्त पड़े शिक्षक एवं गैर शिक्षकों के पदों को शीघ्र भरा जाए। यूजी के रि-अपीयर के परीक्षा परिणामों को शीघ्र घोषित किया जाए। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन प्रक्रिया में सुधार किया जाए। छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार छात्र संघ चुनाव को बहाल किया जाए। महाविद्यालय में आधारभूत संरचना को सुदृढ़ किया जाए। तकनीकी विश्वविद्यालय में शिक्षकों तथा गैर शिक्षकों की स्थायी भर्ती की जाए। तकनीकी विश्वविद्यालय में स्थायी कुलपति की नियुक्ति जल्द की जाए और तकनीकी विश्वविद्यालय में छात्रों से लूटी जा रही भारी भरकम फीस को कम किया जाए। इन सभी मांगों के लिए विद्यार्थी परिषद ने एक प्रदेश स्तरीय आंदोलन बनाया है, जिसकी रूपरेखा इस प्रकार रहेगी। प्रदेश स्तरीय आह्वान पर 24 को लेकर कालेज प्राचार्य को ज्ञापन, 25 नवंबर को हस्ताक्षर अभियान, 29 नवंबर को धरना-प्रदर्शन, पहली व दो दिसंबर को सांकेतिक भूख हड़ताल और छह दिसंबर को जिला के केंद्रों पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।
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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद हमीरपुर के जिला संयोजक अनिल ठाकुर ने सोमवार को जारी प्रेस बयान में कहा कि विद्यार्थी परिषद विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन है तथा समय-समय पर विद्यार्थी परिषद ने छात्रों की मांगों को लेकर सकारात्मक रूप से कार्य महाविद्यालय परिसर, विश्वविद्यालय परिसर में किया है। प्रदेश के अंदर शिक्षा क्षेत्र की बात करें, तो बहुत सी ऐसी कुछ अनियमितताएं हैं, जिससे हिमाचल प्रदेश के छात्रों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। चाहे वह महाविद्यालय के अंदर रिक्त पड़े अध्यापकों के पद हो या फिर गैर शिक्षकों के रिक्त पड़े पद, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के द्वारा छात्रों के परिणाम में आ रही देरी हो या उस परिणाम में अनेक प्रकार की खामियां हो इन सभी समस्याओं से छात्रों को वर्तमान समय में शिक्षा क्षेत्र में जूझना पड़ रहा है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एक आंदोलनात्मक रूपरेखा विभिन्न मांगों को ध्यान में रखते हुए तैयार की है। इनमें महाविद्यालय में रिक्त पड़े शिक्षक एवं गैर शिक्षकों के पदों को शीघ्र भरा जाए। यूजी के रि-अपीयर के परीक्षा परिणामों को शीघ्र घोषित किया जाए। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन प्रक्रिया में सुधार किया जाए। छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार छात्र संघ चुनाव को बहाल किया जाए। महाविद्यालय में आधारभूत संरचना को सुदृढ़ किया जाए। तकनीकी विश्वविद्यालय में शिक्षकों तथा गैर शिक्षकों की स्थायी भर्ती की जाए। तकनीकी विश्वविद्यालय में स्थायी कुलपति की नियुक्ति जल्द की जाए और तकनीकी विश्वविद्यालय में छात्रों से लूटी जा रही भारी भरकम फीस को कम किया जाए। इन सभी मांगों के लिए विद्यार्थी परिषद ने एक प्रदेश स्तरीय आंदोलन बनाया है, जिसकी रूपरेखा इस प्रकार रहेगी। प्रदेश स्तरीय आह्वान पर चौबीस को लेकर कालेज प्राचार्य को ज्ञापन, पच्चीस नवंबर को हस्ताक्षर अभियान, उनतीस नवंबर को धरना-प्रदर्शन, पहली व दो दिसंबर को सांकेतिक भूख हड़ताल और छह दिसंबर को जिला के केंद्रों पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।
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राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विपक्ष की बैठक पर साधा निशाना।
नेशनल डेस्कः राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विपक्ष की बैठक पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके पास न नेता है, न नीति और नीयत है तथा न ही निर्णय लेने की ताकत है। नड्डा ने कहा विपक्षी बैठकों का 2024 के चुनावों पर कोई असर नही पडेगा, इस बार भी पीएम मोदी ही देश के प्रधानमंत्री होंगे।
इसी बीच, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी दलों की बैठक से पहले सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रहार करते हुए कहा कि संसद में सभी विपक्षी दलों पर अकेले भारी पड़ने की बात करने के बाद अब प्रधानमंत्री को 30 छोटे-छोटे दलों को गिनने की जरूरत क्यों पड़ गई।
उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी पार्टियों के एकजुट होने से भारतीय जनता पार्टी घबरा गई है। खरगे ने संवाददाताओं से कहा, "मोदी जी ने संसद में कहा था कि "एक अकेला" ही सभी विपक्षी पार्टियों पर काफ़ी है, फ़िर उन्हें 29-30 पार्टियों की ज़रूरत क्यों पड़ी? वह इन छोटे-छोटे दलों को क्यों गिन रहे हैं। " कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, "हमारा जो गठबंधन है, वह तो संसद में एक साथ मिलकर काम करता है।
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राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विपक्ष की बैठक पर साधा निशाना। नेशनल डेस्कः राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विपक्ष की बैठक पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके पास न नेता है, न नीति और नीयत है तथा न ही निर्णय लेने की ताकत है। नड्डा ने कहा विपक्षी बैठकों का दो हज़ार चौबीस के चुनावों पर कोई असर नही पडेगा, इस बार भी पीएम मोदी ही देश के प्रधानमंत्री होंगे। इसी बीच, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी दलों की बैठक से पहले सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रहार करते हुए कहा कि संसद में सभी विपक्षी दलों पर अकेले भारी पड़ने की बात करने के बाद अब प्रधानमंत्री को तीस छोटे-छोटे दलों को गिनने की जरूरत क्यों पड़ गई। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी पार्टियों के एकजुट होने से भारतीय जनता पार्टी घबरा गई है। खरगे ने संवाददाताओं से कहा, "मोदी जी ने संसद में कहा था कि "एक अकेला" ही सभी विपक्षी पार्टियों पर काफ़ी है, फ़िर उन्हें उनतीस-तीस पार्टियों की ज़रूरत क्यों पड़ी? वह इन छोटे-छोटे दलों को क्यों गिन रहे हैं। " कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, "हमारा जो गठबंधन है, वह तो संसद में एक साथ मिलकर काम करता है।
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भारत और श्रीलंका के बीच तीसरा टेस्ट दिल्ली में खेला जा रहा है. जहाँ भारत ने टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया. वही भारत ने आज 536 रन पारी घोषित कर दी है. आज के दिन मैच से फॉग की वजह से काफी ज्यादा ड्रामा देखने को मिला.
कल के स्कोर से आगे खेलते हुए भारत की तरफ से कोहली और रोहित ने अच्छी शुरुआत की. इस दौरान रोहित ने अपना अर्धशतक पूरा किया. वही कोहली ने आज अपना दोहरा शतक पूरा किया. इस दौरान रोहित 63 रन बना के आउट हो गए.
वही कोहली भी 243 रन बना एक आउट हो गए. उनके आउट होने के बाद फ़ॉग की वजह से श्रीलंका के टीम को काफी ज्यादा दिक्कत हो रही थी. जिस वजह से कोहली ने गुस्से में भारत की पारी 536 रन पर ही घोषित कर दी.
दिल्ली में फ़ॉग की वजह से श्रीलंकाई खिलाड़ियों को काफी ज्यादा दिक्कत हो रही थी. जिस वजह से ज्यादा खिलाड़ी मैदान से बाहर चले गए थे. जिस वजह से मैदान पर अंपायर और दोनों टीम के कोचों के बीच काफी ज्यादा देर तक बात करते रहे.
श्रीलंका की शुरुआत इस मैच भी कुछ खास नही रही. टीम के स्टार सलामी बल्लेबाज़ करुनारत्ने बिना खाता खोले वापस लौट गए. वही धनंजय भी कुछ खास नही कर पाए और सिर्फ 1 रन बना के आउट हो गए. इसके बाद परेरा और मैथ्युज ने टीम को संभाला. इस दौरान परेरा 42 रन बना के आउट हो गए.
तीन विकेट गिरने के बाद चंडीमल और मैथ्युज ने टीम को संभाला. दोनों ने मिलकर 56 रन की साझेदारी की. मैच खत्म होने के साथ चंडीमल 25 और मैथ्युज 57 रन बना के नाबाद रहे थे. वही श्रीलंका का स्कोर इस समय 131 रन पर तीन विकेट है.
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भारत और श्रीलंका के बीच तीसरा टेस्ट दिल्ली में खेला जा रहा है. जहाँ भारत ने टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया. वही भारत ने आज पाँच सौ छत्तीस रन पारी घोषित कर दी है. आज के दिन मैच से फॉग की वजह से काफी ज्यादा ड्रामा देखने को मिला. कल के स्कोर से आगे खेलते हुए भारत की तरफ से कोहली और रोहित ने अच्छी शुरुआत की. इस दौरान रोहित ने अपना अर्धशतक पूरा किया. वही कोहली ने आज अपना दोहरा शतक पूरा किया. इस दौरान रोहित तिरेसठ रन बना के आउट हो गए. वही कोहली भी दो सौ तैंतालीस रन बना एक आउट हो गए. उनके आउट होने के बाद फ़ॉग की वजह से श्रीलंका के टीम को काफी ज्यादा दिक्कत हो रही थी. जिस वजह से कोहली ने गुस्से में भारत की पारी पाँच सौ छत्तीस रन पर ही घोषित कर दी. दिल्ली में फ़ॉग की वजह से श्रीलंकाई खिलाड़ियों को काफी ज्यादा दिक्कत हो रही थी. जिस वजह से ज्यादा खिलाड़ी मैदान से बाहर चले गए थे. जिस वजह से मैदान पर अंपायर और दोनों टीम के कोचों के बीच काफी ज्यादा देर तक बात करते रहे. श्रीलंका की शुरुआत इस मैच भी कुछ खास नही रही. टीम के स्टार सलामी बल्लेबाज़ करुनारत्ने बिना खाता खोले वापस लौट गए. वही धनंजय भी कुछ खास नही कर पाए और सिर्फ एक रन बना के आउट हो गए. इसके बाद परेरा और मैथ्युज ने टीम को संभाला. इस दौरान परेरा बयालीस रन बना के आउट हो गए. तीन विकेट गिरने के बाद चंडीमल और मैथ्युज ने टीम को संभाला. दोनों ने मिलकर छप्पन रन की साझेदारी की. मैच खत्म होने के साथ चंडीमल पच्चीस और मैथ्युज सत्तावन रन बना के नाबाद रहे थे. वही श्रीलंका का स्कोर इस समय एक सौ इकतीस रन पर तीन विकेट है.
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हरदोई में एक ट्रैक्टर चालक ने ट्रैक्टर से सड़क किनारे बैठे बकरे का पैर कुचल दिया। इसके बाद जब वह वापस लौट रहा था। तभी बकरे के मालिक ने उसे रोककर उसके साथ झगड़ना शुरू कर दिया। इसके बाद चालक ट्रैक्टर वहीं छोड़कर वहां से निकल गया। बाद में आरोपी के गांव का पूर्व प्रधान व लगभग डेढ़ सौ लोगों ने पीड़ित पक्ष के घर पर हमला कर दिया। घर में खड़ी गाड़ियां व सामान तोड़ डाले। साथ ही घर में लूटपाट भी की। बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंचकर मामला शांत करवाया।
जिले के अतरौली थाना क्षेत्र के गांव शंकरपुर के निवासी मोहम्मद रबील का बकरा गुरुवार को सड़क किनारे बंधा हुआ था। तभी वहां ग्राम रायपुर निवासी राजू जो कि पूर्व प्रधान बृजेंद्र सिंह का ट्रैक्टर चलाता है। वह ट्रैक्टर लेकर गुजर रहा था। उसने ट्रैक्टर से बकरे का पैर कुचल दिया और वहां से निकल गया।
कुछ देर बाद जब राजू ट्रैक्टर लेकर वापस आया तो रबील ने उसे रोक लिया और दोनों में झगड़ा होने लगा। इस पर राजू ट्रैक्टर मौके पर छोड़कर वापस रायपुर चला गया। वहां पहुंचकर पूर्व प्रधान बृजेंद्र सिंह को पूरी घटना की जानकारी दी। इसके बाद लगभग डेढ़ सौ लोगों के साथ बृजेंद्र ने शंकरपुर में रबील के घर पर धावा बोल दिया।
बदमाशों ने मोहम्मद रबील के भाई सबील और आमील के मकानों पर भी हमला किया। उन लोगों ने मकानों में घुसकर तोड़फोड़ शुरू कर दी। आमील के घर के बाहर खड़ी कार तोड़ दी। दो बाइकें भी तोड़ दी गईं। घर के अंदर रखे सामान तोड़े गए। घटना की जानकारी पर पुलिस मौके पर पहुंच गई और स्थिति को संभाला। पुलिस ने बताया कि स्थिति नियंत्रण में है। मोहम्मद रबील ने पूर्व प्रधान बृजेंद्र सिंह समेत कई लोगों को नामजद करते हुए डेढ़ सौ लोगों के खिलाफ तहरीर दी है। तहरीर के आधार पर बलवा आदि की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।
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हरदोई में एक ट्रैक्टर चालक ने ट्रैक्टर से सड़क किनारे बैठे बकरे का पैर कुचल दिया। इसके बाद जब वह वापस लौट रहा था। तभी बकरे के मालिक ने उसे रोककर उसके साथ झगड़ना शुरू कर दिया। इसके बाद चालक ट्रैक्टर वहीं छोड़कर वहां से निकल गया। बाद में आरोपी के गांव का पूर्व प्रधान व लगभग डेढ़ सौ लोगों ने पीड़ित पक्ष के घर पर हमला कर दिया। घर में खड़ी गाड़ियां व सामान तोड़ डाले। साथ ही घर में लूटपाट भी की। बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंचकर मामला शांत करवाया। जिले के अतरौली थाना क्षेत्र के गांव शंकरपुर के निवासी मोहम्मद रबील का बकरा गुरुवार को सड़क किनारे बंधा हुआ था। तभी वहां ग्राम रायपुर निवासी राजू जो कि पूर्व प्रधान बृजेंद्र सिंह का ट्रैक्टर चलाता है। वह ट्रैक्टर लेकर गुजर रहा था। उसने ट्रैक्टर से बकरे का पैर कुचल दिया और वहां से निकल गया। कुछ देर बाद जब राजू ट्रैक्टर लेकर वापस आया तो रबील ने उसे रोक लिया और दोनों में झगड़ा होने लगा। इस पर राजू ट्रैक्टर मौके पर छोड़कर वापस रायपुर चला गया। वहां पहुंचकर पूर्व प्रधान बृजेंद्र सिंह को पूरी घटना की जानकारी दी। इसके बाद लगभग डेढ़ सौ लोगों के साथ बृजेंद्र ने शंकरपुर में रबील के घर पर धावा बोल दिया। बदमाशों ने मोहम्मद रबील के भाई सबील और आमील के मकानों पर भी हमला किया। उन लोगों ने मकानों में घुसकर तोड़फोड़ शुरू कर दी। आमील के घर के बाहर खड़ी कार तोड़ दी। दो बाइकें भी तोड़ दी गईं। घर के अंदर रखे सामान तोड़े गए। घटना की जानकारी पर पुलिस मौके पर पहुंच गई और स्थिति को संभाला। पुलिस ने बताया कि स्थिति नियंत्रण में है। मोहम्मद रबील ने पूर्व प्रधान बृजेंद्र सिंह समेत कई लोगों को नामजद करते हुए डेढ़ सौ लोगों के खिलाफ तहरीर दी है। तहरीर के आधार पर बलवा आदि की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।
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Honda New Smart Activa 2023: भारत की सबसे पॉपुलर और बेस्ट सेलिंग स्कूटर एक्टिवा (scooter Activa) का नया वैरिएंट मार्केट में आ गया है। होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (HMSI) ने भारत में अपनी एक्टिवा एच-स्मार्ट (Activa H-Smart) को 74536 रुपये (एक्स-शोरूम) की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया है। कंपनी की यह लेटेस्ट एक्टिवा 6जी (Activa 6G) की नई पुनरावृत्ति है, जो एच-स्मार्ट तकनीक के साथ आती है। एक्टिवा एच-स्मार्ट को कई एडवांस स्मार्ट फीचर्स के साथ उतारा गया है।
नई Activa H-Smart स्कूटर में 109. 51cc फोर-स्ट्रोक इंजन दिया गया है, जो 7. 84bhp और 8. 90Nm का टार्क पैदा करता है। इसमें टेलिस्कोपिक फ्रंट और 3-स्टेप एडजस्टेबल रियर सस्पेंशन का इस्तेमाल किया गया है। साइलेंट स्टार्ट सिस्टम और कंबाइंड ब्रेकिंग सिस्टम भी पुराने एक्टिवा से लिए गए हैं। दोनों वील्स पर ड्रम ब्रेक से लैस और बेहतर हैंडलिंग के लिए कंबाइंड ब्रेकिंग सिस्टम भी है। कंपनी के मुताबिक, नई Honda Activa H-Smart स्टैंडर्ड, डीलक्स और स्मार्ट तीन ट्रिम्स में उपलब्ध होगी।
होंडा एक्टिवा एच-स्मार्ट की कीमत (एक्स-शोरूम)
होंडा का दावा है कि यह स्कूटर एक स्मार्ट फाइंड फीचर के साथ आएगा, जो चौपहिया वाहनों में मिलने वाली स्मार्ट चाबियों के समान काम करती हैं। इसका मतलब यह भी है कि स्कूटर में फिजिकल की स्टार्ट के बजाय नॉब इग्निशन है। सुविधाओं में कुंजी और एंटी-चोरी फ़ंक्शन को दबाकर स्कूटर का पता लगाना शामिल है। ये फीचर्स एक्टिवा की तुलना में बहुत अधिक कीमत वाले इलेक्ट्रिक स्कूटर में उपलब्ध हैं। नई एक्टिवा एच-स्मार्ट में इंजन स्टार्ट और स्टॉप स्विच भी है।
अन्य फीचर्स की बात करें तो होंडा एक्टिवा एच-स्मार्ट बड़े व्हीलबेस, लंबे फुटबार्ड एरिया, नए पासिंग स्विच और डीसी एलईडी हेडलैंप के साथ आएगी। एक्टिवा 6जी का यह वैरिएंट 12-inch के फ्रंट अलॉय व्हील्स, टेलिस्कोपिक फ्रंट सस्पेंशन और एडजस्टेबल रियर सस्पेंशन के माध्यम से आरामदायक राइडिंग अनुभव प्रदान करेगा।
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Honda New Smart Activa दो हज़ार तेईस: भारत की सबसे पॉपुलर और बेस्ट सेलिंग स्कूटर एक्टिवा का नया वैरिएंट मार्केट में आ गया है। होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया ने भारत में अपनी एक्टिवा एच-स्मार्ट को चौहत्तर हज़ार पाँच सौ छत्तीस रुपयापये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया है। कंपनी की यह लेटेस्ट एक्टिवा छःजी की नई पुनरावृत्ति है, जो एच-स्मार्ट तकनीक के साथ आती है। एक्टिवा एच-स्मार्ट को कई एडवांस स्मार्ट फीचर्स के साथ उतारा गया है। नई Activa H-Smart स्कूटर में एक सौ नौ. इक्यावनcc फोर-स्ट्रोक इंजन दिया गया है, जो सात. चौरासीbhp और आठ. नब्बेNm का टार्क पैदा करता है। इसमें टेलिस्कोपिक फ्रंट और तीन-स्टेप एडजस्टेबल रियर सस्पेंशन का इस्तेमाल किया गया है। साइलेंट स्टार्ट सिस्टम और कंबाइंड ब्रेकिंग सिस्टम भी पुराने एक्टिवा से लिए गए हैं। दोनों वील्स पर ड्रम ब्रेक से लैस और बेहतर हैंडलिंग के लिए कंबाइंड ब्रेकिंग सिस्टम भी है। कंपनी के मुताबिक, नई Honda Activa H-Smart स्टैंडर्ड, डीलक्स और स्मार्ट तीन ट्रिम्स में उपलब्ध होगी। होंडा एक्टिवा एच-स्मार्ट की कीमत होंडा का दावा है कि यह स्कूटर एक स्मार्ट फाइंड फीचर के साथ आएगा, जो चौपहिया वाहनों में मिलने वाली स्मार्ट चाबियों के समान काम करती हैं। इसका मतलब यह भी है कि स्कूटर में फिजिकल की स्टार्ट के बजाय नॉब इग्निशन है। सुविधाओं में कुंजी और एंटी-चोरी फ़ंक्शन को दबाकर स्कूटर का पता लगाना शामिल है। ये फीचर्स एक्टिवा की तुलना में बहुत अधिक कीमत वाले इलेक्ट्रिक स्कूटर में उपलब्ध हैं। नई एक्टिवा एच-स्मार्ट में इंजन स्टार्ट और स्टॉप स्विच भी है। अन्य फीचर्स की बात करें तो होंडा एक्टिवा एच-स्मार्ट बड़े व्हीलबेस, लंबे फुटबार्ड एरिया, नए पासिंग स्विच और डीसी एलईडी हेडलैंप के साथ आएगी। एक्टिवा छःजी का यह वैरिएंट बारह-inch के फ्रंट अलॉय व्हील्स, टेलिस्कोपिक फ्रंट सस्पेंशन और एडजस्टेबल रियर सस्पेंशन के माध्यम से आरामदायक राइडिंग अनुभव प्रदान करेगा।
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संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की जयंती अब किसी त्योहार से कम नहीं होती जिसे मनाने के लिए देशभर में होड़ सी मची रहती है. हैरत की बात यह है कि दलितों के इस मसीहा की जयंती अब वे लोग ज्यादा समारोहपूर्वक मनाते हैं जिन के मुंह का कौर भी अंबेडकर का स्मरण हो आने पर नीचे उतरने से इनकार कर देता है. पर मजबूरी यह है कि इन सवर्णों ने ही अंबेडकरवाद खत्म करने का टैंडर भर रखा है. अंबेडकर जयंती पर थोक में दलित सम्मेलन होते हैं जिन में यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि वे एक देवता थे.
हाथ में नीले झंडे थामे तालियां पीटती और जय भीम, जय भारत का गगनभेदी नारा लगाती भीड़ समझ ही नहीं पाती कि यह श्रद्धा नहीं, बल्कि सनातनी साजिश है. कभी हिंदू धर्म के पाखंडों, कर्मकांडों और जातिगत भेदभाव व प्रताड़ना से दुखी हो कर बुद्ध ने मनुवाद के चिथड़े उड़ा दिए थे, इसलिए उन्हें अवतार घोषित कर दिया गया था और फिर मनुवाद कायम हो गया था. अब भला यों श्रेष्ठ वर्ग अंबेडकर को यों ही तो महान घोषित नहीं कर रहा.
ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.
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संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की जयंती अब किसी त्योहार से कम नहीं होती जिसे मनाने के लिए देशभर में होड़ सी मची रहती है. हैरत की बात यह है कि दलितों के इस मसीहा की जयंती अब वे लोग ज्यादा समारोहपूर्वक मनाते हैं जिन के मुंह का कौर भी अंबेडकर का स्मरण हो आने पर नीचे उतरने से इनकार कर देता है. पर मजबूरी यह है कि इन सवर्णों ने ही अंबेडकरवाद खत्म करने का टैंडर भर रखा है. अंबेडकर जयंती पर थोक में दलित सम्मेलन होते हैं जिन में यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि वे एक देवता थे. हाथ में नीले झंडे थामे तालियां पीटती और जय भीम, जय भारत का गगनभेदी नारा लगाती भीड़ समझ ही नहीं पाती कि यह श्रद्धा नहीं, बल्कि सनातनी साजिश है. कभी हिंदू धर्म के पाखंडों, कर्मकांडों और जातिगत भेदभाव व प्रताड़ना से दुखी हो कर बुद्ध ने मनुवाद के चिथड़े उड़ा दिए थे, इसलिए उन्हें अवतार घोषित कर दिया गया था और फिर मनुवाद कायम हो गया था. अब भला यों श्रेष्ठ वर्ग अंबेडकर को यों ही तो महान घोषित नहीं कर रहा. ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.
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हालांकि, सभी ग्राहक समान नहीं हैं और प्रत्येक में अद्वितीय विशेषताएं और आवश्यकताएं हैं जो किसी अन्य ग्राहक में नहीं मिल सकती हैं।
कुछ कंपनियां बाजार विभाजन को अनदेखा करती हैं और केवल ग्राहकों का इलाज करती हैं। अपने ग्राहकों को विपणन करते समय, ये कंपनियां विशिष्ट समूहों या बाजार खंडों को लक्षित नहीं करती हैं, लेकिन केवल एक संदेश है।
कंपनियों के लिए अपने विपणन को लक्षित करने में सक्षम होने के लिए, उन्हें अद्वितीय सेगमेंट की पहचान करनी होगी। मैं सेगमेंट को दंडित करने के लिए कंपनियों को यह निर्धारित करना होगा कि बाजार खंड क्या बनाता है। ऐसे कई मानदंड हैं जिनका उपयोग अभिगम्यता, समरूप, भिन्न और मापनीय जैसे किया जा सकता है। अच्छे बाजार विभाजन का परिणाम उस सेगमेंट में होगा जहां सेगमेंट के भीतर ग्राहक जितना संभव हो सके, और सेगमेंट के बीच जितना संभव हो उतना अलग हो।
व्यवसाय भूगोल के आधार पर बाजार खंड बना सकते हैं। भौगोलिक विभाजन किसी भी व्यवसाय के लिए बहुत फायदेमंद है।
यह एक कंपनी को भाषा, आबादी, जलवायु और जीवन शैली के आधार पर बाजार को खंडों में पहचानने और अलग करने में मदद करता है।
जनसांख्यिकीय विभाजन में आयु, लिंग परिवार के आकार, आय, व्यवसाय, शिक्षा, धर्म, जाति और राष्ट्रीयता जैसे चर के आधार पर बाजार को समूहों में विभाजित करना शामिल है।
मनोवैज्ञानिक विभाजन बाजार को सामाजिक वर्ग, जीवनशैली और व्यक्तित्व विशेषताओं के आधार पर समूहों में विभाजित करता है। यह इस धारणा पर आधारित है कि उत्पादों और ब्रांडों के प्रकार एक व्यक्तिगत खरीद से दर्शाएंगे कि व्यक्तियों की विशेषताओं और जीवन के पैटर्न। गतिविधियां, रुचियां और राय सर्वेक्षण जीवनशैली को मापने के लिए एक उपकरण हैं।
व्यवहारिक विभाजन विशेष उत्पादों के वास्तविक ग्राहक ज्ञान, उत्पादों के उनके उपयोग, और कुछ उत्पादों के लिए उनके प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। इसका उपयोग उन चर का उपयोग करने का लाभ है जो उत्पाद से निकटता से संबंधित हैं।
खुदरा उपभोक्ताओं के विपरीत, औद्योगिक उपभोक्ताओं को कम विशेषताओं के आधार पर विभाजित किया जा सकता है। औद्योगिक बाजारों को स्थान, कंपनी के प्रकार और खरीद विशेषताओं जैसी विशेषताओं पर विभाजित किया जा सकता है।
औद्योगिक ग्राहकों को विभाजित करते समय, किसी ग्राहक का स्थान किसी सेगमेंट को परिभाषित करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। शिपिंग और डिलीवरी के लिए यह महत्वपूर्ण हो सकता है। एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के भीतर ग्राहकों को समान आवश्यकताएं हो सकती हैं।
ग्राहकों को कंपनी के प्रकार से विभाजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सेगमेंट कंपनी के आकार, उद्योग के प्रकार या खरीद मानदंडों के आधार पर बनाया जा सकता है।
ग्राहकों की खरीद विशेषताओं सेगमेंट परिभाषित किया जा सकता है। खरीद मात्रा या क्रय इतिहास जैसे लक्षण।
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हालांकि, सभी ग्राहक समान नहीं हैं और प्रत्येक में अद्वितीय विशेषताएं और आवश्यकताएं हैं जो किसी अन्य ग्राहक में नहीं मिल सकती हैं। कुछ कंपनियां बाजार विभाजन को अनदेखा करती हैं और केवल ग्राहकों का इलाज करती हैं। अपने ग्राहकों को विपणन करते समय, ये कंपनियां विशिष्ट समूहों या बाजार खंडों को लक्षित नहीं करती हैं, लेकिन केवल एक संदेश है। कंपनियों के लिए अपने विपणन को लक्षित करने में सक्षम होने के लिए, उन्हें अद्वितीय सेगमेंट की पहचान करनी होगी। मैं सेगमेंट को दंडित करने के लिए कंपनियों को यह निर्धारित करना होगा कि बाजार खंड क्या बनाता है। ऐसे कई मानदंड हैं जिनका उपयोग अभिगम्यता, समरूप, भिन्न और मापनीय जैसे किया जा सकता है। अच्छे बाजार विभाजन का परिणाम उस सेगमेंट में होगा जहां सेगमेंट के भीतर ग्राहक जितना संभव हो सके, और सेगमेंट के बीच जितना संभव हो उतना अलग हो। व्यवसाय भूगोल के आधार पर बाजार खंड बना सकते हैं। भौगोलिक विभाजन किसी भी व्यवसाय के लिए बहुत फायदेमंद है। यह एक कंपनी को भाषा, आबादी, जलवायु और जीवन शैली के आधार पर बाजार को खंडों में पहचानने और अलग करने में मदद करता है। जनसांख्यिकीय विभाजन में आयु, लिंग परिवार के आकार, आय, व्यवसाय, शिक्षा, धर्म, जाति और राष्ट्रीयता जैसे चर के आधार पर बाजार को समूहों में विभाजित करना शामिल है। मनोवैज्ञानिक विभाजन बाजार को सामाजिक वर्ग, जीवनशैली और व्यक्तित्व विशेषताओं के आधार पर समूहों में विभाजित करता है। यह इस धारणा पर आधारित है कि उत्पादों और ब्रांडों के प्रकार एक व्यक्तिगत खरीद से दर्शाएंगे कि व्यक्तियों की विशेषताओं और जीवन के पैटर्न। गतिविधियां, रुचियां और राय सर्वेक्षण जीवनशैली को मापने के लिए एक उपकरण हैं। व्यवहारिक विभाजन विशेष उत्पादों के वास्तविक ग्राहक ज्ञान, उत्पादों के उनके उपयोग, और कुछ उत्पादों के लिए उनके प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। इसका उपयोग उन चर का उपयोग करने का लाभ है जो उत्पाद से निकटता से संबंधित हैं। खुदरा उपभोक्ताओं के विपरीत, औद्योगिक उपभोक्ताओं को कम विशेषताओं के आधार पर विभाजित किया जा सकता है। औद्योगिक बाजारों को स्थान, कंपनी के प्रकार और खरीद विशेषताओं जैसी विशेषताओं पर विभाजित किया जा सकता है। औद्योगिक ग्राहकों को विभाजित करते समय, किसी ग्राहक का स्थान किसी सेगमेंट को परिभाषित करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। शिपिंग और डिलीवरी के लिए यह महत्वपूर्ण हो सकता है। एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के भीतर ग्राहकों को समान आवश्यकताएं हो सकती हैं। ग्राहकों को कंपनी के प्रकार से विभाजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सेगमेंट कंपनी के आकार, उद्योग के प्रकार या खरीद मानदंडों के आधार पर बनाया जा सकता है। ग्राहकों की खरीद विशेषताओं सेगमेंट परिभाषित किया जा सकता है। खरीद मात्रा या क्रय इतिहास जैसे लक्षण।
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जिन उम्मीदवारों का चयन इन पदों के लिए किया जाएगा उन्हें 47000/- वेतन दिया जाएगा। उम्मीदवारों को किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से पीएच. डी. (फिजिक्स, मेटेरियल) डिग्री प्राप्त हो और अनुभव हो। चयन प्रक्रिया उम्मीदवार का साक्षात्कार के आधार पर चयन होगा।
रिसर्च सहयोगी - नियमानुसार पद का नाम- रिसर्च सहयोगी कुल पद - 1 अंतिम तिथि- 30-12-2020 स्थान- हैदराबाद उम्मीदवारों की अधिकतम आयु 35 वर्ष मान्य होगी और आरक्षित वर्ग को आयु सीमा में छूट दी जाएगी।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी नैनो मिशन विभाग में रिसर्च सहयोगी के रिक्त पद पर अनुभवी उम्मीदवारों की तलाश कर रहे है।
यदि आपने संबंधित विषय में पी. एच. डी डिग्री पास कर ली हैं और अनुभव है, तो आप इन पदो के लिए अंतिम तिथि से पहले आवेदन कर सकते है। अनुभवी उम्मीदवारों के पास सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा अवसर है। अनुभवी उम्मीदवारों के पास सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा अवसर है।
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जिन उम्मीदवारों का चयन इन पदों के लिए किया जाएगा उन्हें सैंतालीस हज़ार/- वेतन दिया जाएगा। उम्मीदवारों को किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से पीएच. डी. डिग्री प्राप्त हो और अनुभव हो। चयन प्रक्रिया उम्मीदवार का साक्षात्कार के आधार पर चयन होगा। रिसर्च सहयोगी - नियमानुसार पद का नाम- रिसर्च सहयोगी कुल पद - एक अंतिम तिथि- तीस दिसंबर दो हज़ार बीस स्थान- हैदराबाद उम्मीदवारों की अधिकतम आयु पैंतीस वर्ष मान्य होगी और आरक्षित वर्ग को आयु सीमा में छूट दी जाएगी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी नैनो मिशन विभाग में रिसर्च सहयोगी के रिक्त पद पर अनुभवी उम्मीदवारों की तलाश कर रहे है। यदि आपने संबंधित विषय में पी. एच. डी डिग्री पास कर ली हैं और अनुभव है, तो आप इन पदो के लिए अंतिम तिथि से पहले आवेदन कर सकते है। अनुभवी उम्मीदवारों के पास सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा अवसर है। अनुभवी उम्मीदवारों के पास सरकारी नौकरी पाने का सुनहरा अवसर है।
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शिलाई - राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हलाहं में विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया गया। इस अवसर पर विद्यालय के कार्यवाहक प्रधानाचार्य रामभज शर्मा तथा इको क्लब प्रभारी धर्म सिंह शर्मा ने विद्यार्थियों को तंबाकू से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताया। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हलाहं के राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी रामभज शर्मा के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेवा योजना एवं इको क्लब के स्वयंसेवियों की विद्यालय परिसर से गोद लिए हुए भीव गांव तक रैली निकालकर लोगों को नशे के खिलाफ संदेश दिया। इस अवसर पर राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित जगत राम शर्मा शास्त्री, ओम प्रकाश शर्मा एवं अनिल शर्मा ने भी बच्चों को संबोधित किया। इस मौके पर स्कूल में नशा विरोध में भाषण प्रतियोगिता, नारा लेखन व पोस्टर मेकिंग का भी आयोजन किया गया। भाषण प्रतियोगिता में सुमन ठाकुर प्रथम, शीतल पोजटा द्वितीय तथा कमलेश शर्मा तृतीय स्थान पर रही। पेंटिंग प्रतियोगिता में विशाल व देशराज प्रथम, रवीना शर्मा द्वितीय तथा शालू तीसरे स्थान पर रही। उधर नारा लेखन में सुमन व गायत्री प्रथम, अंजलि, पूजा व प्रभा द्वितीय तथा मीनाक्षी व गौतम तृतीय स्थान पर रहे। इस अवसर पर ओम प्रकाश शर्मा, धर्म सिंह शर्मा, दिलीप शर्मा, वीर सिंह चौहान, प्रताप चौहान, आत्मा राम ठाकुर, चतर शर्मा, कपिल देव सरस्वती, कल्याण वर्मा, राजेंद्र सूर्यवंशी, गोपाल ठाकुर, सुनील शर्मा, जगदीश ठाकुर, लिपिक सुनील शर्मा, सेवादार पंचराम शर्मा, दौलत राम शर्मा, रण सिंह पोजटा, सामिया राम, जगपाल ठाकुर तथा कमल देव शर्मा उपस्थित रहे।
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शिलाई - राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हलाहं में विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया गया। इस अवसर पर विद्यालय के कार्यवाहक प्रधानाचार्य रामभज शर्मा तथा इको क्लब प्रभारी धर्म सिंह शर्मा ने विद्यार्थियों को तंबाकू से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताया। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हलाहं के राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी रामभज शर्मा के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेवा योजना एवं इको क्लब के स्वयंसेवियों की विद्यालय परिसर से गोद लिए हुए भीव गांव तक रैली निकालकर लोगों को नशे के खिलाफ संदेश दिया। इस अवसर पर राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित जगत राम शर्मा शास्त्री, ओम प्रकाश शर्मा एवं अनिल शर्मा ने भी बच्चों को संबोधित किया। इस मौके पर स्कूल में नशा विरोध में भाषण प्रतियोगिता, नारा लेखन व पोस्टर मेकिंग का भी आयोजन किया गया। भाषण प्रतियोगिता में सुमन ठाकुर प्रथम, शीतल पोजटा द्वितीय तथा कमलेश शर्मा तृतीय स्थान पर रही। पेंटिंग प्रतियोगिता में विशाल व देशराज प्रथम, रवीना शर्मा द्वितीय तथा शालू तीसरे स्थान पर रही। उधर नारा लेखन में सुमन व गायत्री प्रथम, अंजलि, पूजा व प्रभा द्वितीय तथा मीनाक्षी व गौतम तृतीय स्थान पर रहे। इस अवसर पर ओम प्रकाश शर्मा, धर्म सिंह शर्मा, दिलीप शर्मा, वीर सिंह चौहान, प्रताप चौहान, आत्मा राम ठाकुर, चतर शर्मा, कपिल देव सरस्वती, कल्याण वर्मा, राजेंद्र सूर्यवंशी, गोपाल ठाकुर, सुनील शर्मा, जगदीश ठाकुर, लिपिक सुनील शर्मा, सेवादार पंचराम शर्मा, दौलत राम शर्मा, रण सिंह पोजटा, सामिया राम, जगपाल ठाकुर तथा कमल देव शर्मा उपस्थित रहे।
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