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भारत समेत पूरे विश्व में शिक्षक दिवस छात्रों व शिक्षकों के बीच बेहद अहम माना जाता रहा है।
भारत समेत पूरे विश्व में शिक्षक दिवस छात्रों व शिक्षकों के बीच बेहद अहम माना जाता रहा है।
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को 1962 से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
आरआरबी ने कई पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं।
नेशनल स्कूल ऑफ ओपन स्कूलिंग यानी कि एनआईओएस (NIOS) ने कक्षा 10वीं और 12वीं अक्टूबर एग्जाम के लिए डेट शीट जारी कर दिया है।
आज हम आपके लिए कुछ ऐसे खास शॉर्ट टर्म टेक्निकल कोर्सेज की चर्चा कर रहे हैं जिससे आप अपनी मनचाही टेक्निकल फील्ड में जरूरी स्किल्स हासिल करके तुरंत जॉब ज्वाइन कर लें या फिर किसी टेक्निकल फील्ड में अपना पेशा या कारोबार शुरू कर सकें।
नवोदय विद्यालय समिति (NVS) भर्ती परीक्षा 2019 की तारीख आने का इंतजार कर रहे उमम्मीदवारों के लिए खुशखबरी है।
जेईई मेन 2020 आवेदन प्रक्रिया कल, 3 सितंबर, 2020 से शुरू हुई।
सरकारी नौकरी की तलाश लाखों युवाओं को है।
अगर आप भी सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे हैं तो ये खबर खास आपके लिए ही है।
अगर आप भी नौकरी की तलाश कर रहे हैं तो ये खबर खास आपके लिए ही है।
दिल्ली के गरीब सवर्ण बच्चों को मुफ्त कोचिंग सुविधा का तोहफा दिया है।
भारतीय रेलवे भर्ती बोर्ड आरआरबी पैरामेडिकल परीक्षा का रिजल्ट ऑफिशियल वेबसाइट पर जल्द जारी करेगा।
हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (HSSC) ने ग्रुप सी में क्लर्क के पदों पर होने वाली परीक्षाओं के लिए एडमिट कार्ड की तारीख की घोषणा कर दी है।
चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ ने बीपीएड मेन एग्जाम के लिए एडमिट कार्ड ऑफिशियल वेबसाइट पर जारी कर दिया है।
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भारत समेत पूरे विश्व में शिक्षक दिवस छात्रों व शिक्षकों के बीच बेहद अहम माना जाता रहा है। भारत समेत पूरे विश्व में शिक्षक दिवस छात्रों व शिक्षकों के बीच बेहद अहम माना जाता रहा है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को एक हज़ार नौ सौ बासठ से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। आरआरबी ने कई पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ओपन स्कूलिंग यानी कि एनआईओएस ने कक्षा दसवीं और बारहवीं अक्टूबर एग्जाम के लिए डेट शीट जारी कर दिया है। आज हम आपके लिए कुछ ऐसे खास शॉर्ट टर्म टेक्निकल कोर्सेज की चर्चा कर रहे हैं जिससे आप अपनी मनचाही टेक्निकल फील्ड में जरूरी स्किल्स हासिल करके तुरंत जॉब ज्वाइन कर लें या फिर किसी टेक्निकल फील्ड में अपना पेशा या कारोबार शुरू कर सकें। नवोदय विद्यालय समिति भर्ती परीक्षा दो हज़ार उन्नीस की तारीख आने का इंतजार कर रहे उमम्मीदवारों के लिए खुशखबरी है। जेईई मेन दो हज़ार बीस आवेदन प्रक्रिया कल, तीन सितंबर, दो हज़ार बीस से शुरू हुई। सरकारी नौकरी की तलाश लाखों युवाओं को है। अगर आप भी सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे हैं तो ये खबर खास आपके लिए ही है। अगर आप भी नौकरी की तलाश कर रहे हैं तो ये खबर खास आपके लिए ही है। दिल्ली के गरीब सवर्ण बच्चों को मुफ्त कोचिंग सुविधा का तोहफा दिया है। भारतीय रेलवे भर्ती बोर्ड आरआरबी पैरामेडिकल परीक्षा का रिजल्ट ऑफिशियल वेबसाइट पर जल्द जारी करेगा। हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग ने ग्रुप सी में क्लर्क के पदों पर होने वाली परीक्षाओं के लिए एडमिट कार्ड की तारीख की घोषणा कर दी है। चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ ने बीपीएड मेन एग्जाम के लिए एडमिट कार्ड ऑफिशियल वेबसाइट पर जारी कर दिया है।
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Palamu : पलामू जिले के हुसैनाबाद शहर के शिवपुरी कालोनी में स्थित असबंधना फाइनेंस कंपनी के कार्यालय में ब्रांच मैनेजर से मारपीट व लूट मामले का पुलिस ने उद्भेदन कर लिया है. इस मामले में संलिप्त घटना का मास्टरमाइंड हैदरनगर थाना क्षेत्र के भाई बीघा निवासी मोहित कुमार उर्फ डोमन को पुलिस ने गुरुवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.
घटना के बाद हुसैनाबाद एसडीपीओ पूज्य प्रकाश के नेतृत्व में इस घटना का उद्भेदन करने के लिए टीम गठित की गयी. जिसमें थाना प्रभारी अजय कुमार, एसआई गौतम उरांव, कुणाल कुमार, अजित कुमार, राकेश कुमार, एएसआई शैलेन्द्र कुमार सिंह आदि टीम में शामिल थे.
एसडीपीओ ने बताया कि अनुसंधान के दौरान कई बातें सामने आ रही थी जिसमें मोहित कुमार की भूमिका संदिग्ध नजर आयी. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए गुरुवार की सुबह जपला के दाता नगर के समीप से उसे गिरफ्तार किया.
एसडीपीओ ने बताया कि आरोपी मोहित कुमार सीएसपी एसबीआई केंद्र का संचालक है. इस दौरान उसकी जान पहचान वादी ब्रांच मैनेजर वीरेंद्र कुमार पासवान से हुई थी.
बीते 11 जुलाई को अपने कुछ दोस्तों से मिलकर लूट का प्लान बनाया और पहले कार्यालय पहुंच गया. मैनेजर से बातचीत करने लगा.
अकेला पाकर उसने अपने दोस्तों को कार्यालय में बुलाकर मैनेजर के साथ मारपीट व मोबाईल लूट की घटना को अंजाम दिलवाया. इसने पुलिस के समक्ष अपने अपराध को स्वीकार किया है. साथ ही अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी भी शीघ्र की जाएगी.
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Palamu : पलामू जिले के हुसैनाबाद शहर के शिवपुरी कालोनी में स्थित असबंधना फाइनेंस कंपनी के कार्यालय में ब्रांच मैनेजर से मारपीट व लूट मामले का पुलिस ने उद्भेदन कर लिया है. इस मामले में संलिप्त घटना का मास्टरमाइंड हैदरनगर थाना क्षेत्र के भाई बीघा निवासी मोहित कुमार उर्फ डोमन को पुलिस ने गुरुवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. घटना के बाद हुसैनाबाद एसडीपीओ पूज्य प्रकाश के नेतृत्व में इस घटना का उद्भेदन करने के लिए टीम गठित की गयी. जिसमें थाना प्रभारी अजय कुमार, एसआई गौतम उरांव, कुणाल कुमार, अजित कुमार, राकेश कुमार, एएसआई शैलेन्द्र कुमार सिंह आदि टीम में शामिल थे. एसडीपीओ ने बताया कि अनुसंधान के दौरान कई बातें सामने आ रही थी जिसमें मोहित कुमार की भूमिका संदिग्ध नजर आयी. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए गुरुवार की सुबह जपला के दाता नगर के समीप से उसे गिरफ्तार किया. एसडीपीओ ने बताया कि आरोपी मोहित कुमार सीएसपी एसबीआई केंद्र का संचालक है. इस दौरान उसकी जान पहचान वादी ब्रांच मैनेजर वीरेंद्र कुमार पासवान से हुई थी. बीते ग्यारह जुलाई को अपने कुछ दोस्तों से मिलकर लूट का प्लान बनाया और पहले कार्यालय पहुंच गया. मैनेजर से बातचीत करने लगा. अकेला पाकर उसने अपने दोस्तों को कार्यालय में बुलाकर मैनेजर के साथ मारपीट व मोबाईल लूट की घटना को अंजाम दिलवाया. इसने पुलिस के समक्ष अपने अपराध को स्वीकार किया है. साथ ही अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी भी शीघ्र की जाएगी.
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प्रगतिशील कवियों की रचनाओं में युग-युग से पीड़ित और शोपित नारी के प्रति पर्याप्त सहानुभूति व्यक्त की गयी और साथ ही उसे स्वतंत्र अस्तित्व के विकास के लिए प्रेरित भी किया गया ।
नयी कविता
हिन्दी में 'प्रयोगवाद' नाम के चलने का श्रेय ' तार सप्तक' (सन् १६४३) के सम्पादकीय और कुछ अन्य व्यक्तियों को हैं। उनमें 'प्रयोगवाद' शब्द का प्रयोग तो व नहीं हुआ, किन्तु 'प्रयोग' और 'प्रयोगशीलता' को स्पष्ट शब्दों में अपनी विशेषता कहा गया । पाठकों ने कवियों के 'प्रयोग-प्रयोग' की टेक पकड़ ली और नये प्रयोग के नाम पर प्रयोगवाद का भी नाम चल पड़ा । यद्यपि 'दूसरा सप्तक' ( सन् १६५१ ) की भूमिका में 'अज्ञोय' ने इस नामकरण का विरोध भी किया कि 'प्रयोग का कोई वाद नहीं है । हम वादी नहीं रहे । न प्रयोग अपने में इष्ट या साध्य है । ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं है । कविता भी अपने आप में इष्ट या साध्य नहीं है' २ किन्तु यह कहना व्यर्थ ही रहा और यह नाम उनके मत्थे मढ़ ही दिया गया ।
सन् १६५४ से डा० जगदीश गुप्त और श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादन में प्रयोगवादी कविताओं का एक अर्द्धवार्षिक संग्रह 'नयी कविता' नाम से निकलने लगा. इस कारण भी प्रयोगवादी कविताऐं अव 'नयी कविता' नाम से पुकारी जाने लगीं । डा० नामवरसिंह का मत है कि आजकल प्रयोगवादी काव्य को वाद-विशेष से मुक्त करने के लिए तथा व्यापक काव्य - प्रवृति का स्वरूप देने के लिए इसे 'नयी कविता' के नाम से अभिहित किया जा रहा है । वह प्रयोगवाद, प्रपद्यवाद अथवा नकेनवाद, रूपवाद, प्रतीकवाद तथा नयी कविता आदि को समाज विरोधी अतिशय व्यक्तिवादी मनोवृत्ति का ही विस्तार समझते हैं । ४ तीनों तार सप्तकों में इक्कीस कवियों की रचनाऐं संग्रहीत हैं । साथ ही इस कविता के विकास में अन्य कवियों का भी महत्वपूर्ण योगदान है ।
इन कवियों की रचनाओं में मूल चालक मनोवृत्ति मानवतावादी ही है, क्योंकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि आज का सर्वहारा शोषित प्राणी (जिसमें नारी भी १. 'हिन्दी काव्य की प्रवृत्तियाँ प्रयोगवाद - डा० नामवर सिंह; पृ० ४३ 'दूसरा तार सप्तक' - सम्पा० 'अज्ञेय' - पृ० ६
'आधुनिक हिन्दी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियां' - डा० जगदीशनरायण त्रिपाठी;
४. 'आधुनिक कविता का मूल्यांकन' - डॉ० इन्द्रनाथ मदान; पृ० ६७
सम्मिलित है) शोपण से मुक्त कर दिया जावे तो अवश्य हो उसकी प्रतिभा तथा उसके सद्गुणों का विकास हो । साथ ही ये कवि भी आकृति को खींचने के लिए किसी सहायक उपादान, नियम, बन्धन अथवा रस को आवश्यक नहीं समझते। कुछ कवि वैयक्तिकता का स्वर ऊंचा करके अपने कथ्य और शिल्प में चमत्कार दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं और कुछ कवि समाज-निष्ठा चेतना को अभिव्यक्ति दे रहे हैं । रस की अपेक्षा प्रभाव उत्पन्न करने की चिन्ता अब कवियों को अधिक है। नये उपमान, नये प्रतीक, नयी काव्य-भंगिमाओं की खोज में आज का कवि आकाश पाताल के प्रति आकुल दौड़ लगा रहा है। '
श्री सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' - अति यथार्थवादी अथवा प्रयोगवादी अथवा नयी कविता प्रवर्तक 'अज्ञेय' की कविता के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनमें 'भग्नदूत', 'चिन्ता', 'इत्यलम्', 'हरी घास पर क्षणभर', 'वावरा अहेरी', 'इन्द्रधनु रौंदे हुए ये', 'अरी ओ करुणा प्रभामय' तथा 'आंगन के पार द्वार' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने 'तार सप्पक' तथा 'तीसरी सप्तक' का सम्पादन कर नयी कविता के स्वरूप और सीमाओं को स्पष्ट किया है ।
जैसा हम इससे पूर्व संकेत कर चुके हैं अव साहित्य में फ्रायड की काम-भावना का अच्छा प्रचार एवं प्रसार हो चुका था । नारी मनोविज्ञान (Women Phychology का विश्लेषण करता हुआ कवि कहता है कि 'पुरुप और स्त्री का सम्बन्ध पति और पत्नी का नहीं, चिरन्तन पुरुष और चिरन्तन स्त्री का सम्बन्ध अनिवार्यतः एक गतिशील ( डाइनेमिक ) सम्बन्ध है । पुरुष और स्त्री की परस्पर अवस्थिति एकाकर्षण की अवस्था है । वह शक्ति आकर्षण का रूप ले ले अथवा विकर्णण का, अथवा आकर्षणविकर्णण की विभिन्न प्रवृत्तियों के सन्तुलन द्वारा एक ऐसी अवस्था प्राप्त कर ले जिसमें बाह्य रूप से कोई गति प्रेरणा नहीं है किन्तु किसी-न-किसी प्रकार आन्तरिक खिचाव बना रहना अनिवार्य है । नाटकीय भाषा में हम उसे पुरुष और स्त्री का चिरन्तन संघर्ण कह सकते हैं। इस दृष्टिकोण से स्पष्ट है कि कवि नारी की सहज है प्रवृत्तियों में विश्वास करता है, उनसे युक्त नारी अच्छी है अथवा घृणास्पद, सत् है अथवा असत्, इसे कवि नहीं कहना चाहता । वह केवल पुरुष के सम्बन्ध में नारी के स्वरूप करना को स्पष्ट चाहता है । श्री 'अज्ञेय' की 'चिन्ता' में यह स्पष्टीकरण दो प्रकार
१. 'नयी कविता' - श्री विश्वम्भर 'मानव'; पृ० १६ २. 'चिन्ता' - भूमिका में अज्ञय; पृ० ५.
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प्रगतिशील कवियों की रचनाओं में युग-युग से पीड़ित और शोपित नारी के प्रति पर्याप्त सहानुभूति व्यक्त की गयी और साथ ही उसे स्वतंत्र अस्तित्व के विकास के लिए प्रेरित भी किया गया । नयी कविता हिन्दी में 'प्रयोगवाद' नाम के चलने का श्रेय ' तार सप्तक' के सम्पादकीय और कुछ अन्य व्यक्तियों को हैं। उनमें 'प्रयोगवाद' शब्द का प्रयोग तो व नहीं हुआ, किन्तु 'प्रयोग' और 'प्रयोगशीलता' को स्पष्ट शब्दों में अपनी विशेषता कहा गया । पाठकों ने कवियों के 'प्रयोग-प्रयोग' की टेक पकड़ ली और नये प्रयोग के नाम पर प्रयोगवाद का भी नाम चल पड़ा । यद्यपि 'दूसरा सप्तक' की भूमिका में 'अज्ञोय' ने इस नामकरण का विरोध भी किया कि 'प्रयोग का कोई वाद नहीं है । हम वादी नहीं रहे । न प्रयोग अपने में इष्ट या साध्य है । ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं है । कविता भी अपने आप में इष्ट या साध्य नहीं है' दो किन्तु यह कहना व्यर्थ ही रहा और यह नाम उनके मत्थे मढ़ ही दिया गया । सन् एक हज़ार छः सौ चौवन से डाशून्य जगदीश गुप्त और श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादन में प्रयोगवादी कविताओं का एक अर्द्धवार्षिक संग्रह 'नयी कविता' नाम से निकलने लगा. इस कारण भी प्रयोगवादी कविताऐं अव 'नयी कविता' नाम से पुकारी जाने लगीं । डाशून्य नामवरसिंह का मत है कि आजकल प्रयोगवादी काव्य को वाद-विशेष से मुक्त करने के लिए तथा व्यापक काव्य - प्रवृति का स्वरूप देने के लिए इसे 'नयी कविता' के नाम से अभिहित किया जा रहा है । वह प्रयोगवाद, प्रपद्यवाद अथवा नकेनवाद, रूपवाद, प्रतीकवाद तथा नयी कविता आदि को समाज विरोधी अतिशय व्यक्तिवादी मनोवृत्ति का ही विस्तार समझते हैं । चार तीनों तार सप्तकों में इक्कीस कवियों की रचनाऐं संग्रहीत हैं । साथ ही इस कविता के विकास में अन्य कवियों का भी महत्वपूर्ण योगदान है । इन कवियों की रचनाओं में मूल चालक मनोवृत्ति मानवतावादी ही है, क्योंकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि आज का सर्वहारा शोषित प्राणी शोपण से मुक्त कर दिया जावे तो अवश्य हो उसकी प्रतिभा तथा उसके सद्गुणों का विकास हो । साथ ही ये कवि भी आकृति को खींचने के लिए किसी सहायक उपादान, नियम, बन्धन अथवा रस को आवश्यक नहीं समझते। कुछ कवि वैयक्तिकता का स्वर ऊंचा करके अपने कथ्य और शिल्प में चमत्कार दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं और कुछ कवि समाज-निष्ठा चेतना को अभिव्यक्ति दे रहे हैं । रस की अपेक्षा प्रभाव उत्पन्न करने की चिन्ता अब कवियों को अधिक है। नये उपमान, नये प्रतीक, नयी काव्य-भंगिमाओं की खोज में आज का कवि आकाश पाताल के प्रति आकुल दौड़ लगा रहा है। ' श्री सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' - अति यथार्थवादी अथवा प्रयोगवादी अथवा नयी कविता प्रवर्तक 'अज्ञेय' की कविता के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं जिनमें 'भग्नदूत', 'चिन्ता', 'इत्यलम्', 'हरी घास पर क्षणभर', 'वावरा अहेरी', 'इन्द्रधनु रौंदे हुए ये', 'अरी ओ करुणा प्रभामय' तथा 'आंगन के पार द्वार' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने 'तार सप्पक' तथा 'तीसरी सप्तक' का सम्पादन कर नयी कविता के स्वरूप और सीमाओं को स्पष्ट किया है । जैसा हम इससे पूर्व संकेत कर चुके हैं अव साहित्य में फ्रायड की काम-भावना का अच्छा प्रचार एवं प्रसार हो चुका था । नारी मनोविज्ञान सम्बन्ध है । पुरुष और स्त्री की परस्पर अवस्थिति एकाकर्षण की अवस्था है । वह शक्ति आकर्षण का रूप ले ले अथवा विकर्णण का, अथवा आकर्षणविकर्णण की विभिन्न प्रवृत्तियों के सन्तुलन द्वारा एक ऐसी अवस्था प्राप्त कर ले जिसमें बाह्य रूप से कोई गति प्रेरणा नहीं है किन्तु किसी-न-किसी प्रकार आन्तरिक खिचाव बना रहना अनिवार्य है । नाटकीय भाषा में हम उसे पुरुष और स्त्री का चिरन्तन संघर्ण कह सकते हैं। इस दृष्टिकोण से स्पष्ट है कि कवि नारी की सहज है प्रवृत्तियों में विश्वास करता है, उनसे युक्त नारी अच्छी है अथवा घृणास्पद, सत् है अथवा असत्, इसे कवि नहीं कहना चाहता । वह केवल पुरुष के सम्बन्ध में नारी के स्वरूप करना को स्पष्ट चाहता है । श्री 'अज्ञेय' की 'चिन्ता' में यह स्पष्टीकरण दो प्रकार एक. 'नयी कविता' - श्री विश्वम्भर 'मानव'; पृशून्य सोलह दो. 'चिन्ता' - भूमिका में अज्ञय; पृशून्य पाँच.
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लॉर्ड्स टेस्ट मैच में न्यूजीलैंड ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने का फैसला लिया।
इंग्लैंड बनाम न्यूजीलैंड के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज का पहला मुकाबला 2 जून से शुरू हो गया है। ये मुकाबला लॉर्ड्स के मैदान पर खेला जा रहा है। पहले टेस्ट में टॉस जीतने के बाद न्यूज़ीलैंड ने पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। दिग्गज गेंदबाज जेम्स एंडरसन और स्टुअर्ट ब्रॉड ने इंग्लैंड की ओर से गेंदबाजी का पहला स्पेल फेंका और इस दौरान उन्होंने शानदार गेंदबाजी करते हुए कीवी बल्लेबाज से कुछ कठिन सवाल पूछे।
वेस्टइंडीज के खिलाफ हुई सीरीज में जेम्स एंडरसन को टीम में शामिल नहीं किया गया था, जिसके बाद कई लोगों का मानना था कि उनका टेस्ट करियर अब खत्म हो गया है। लेकिन स्टोक्स के कप्तान बनते ही एंडरसन की भी टीम में वापसी हुई और पहले ही टेस्ट मैच में उन्होंने कमाल की गेंदबाजी की।
एंडरसन ने लॉर्ड्स टेस्ट में धमाकेदार वापसी की और न्यूजीलैंड के दोनों ओपनर टॉम लैथम और विल यंग को 1-1 रन पर आउट कर वापस पवेलियन भेजा। दोनों ही बल्लेबाजों का कैच जॉनी बेयरस्टो ने स्लिप में पकड़ा। यंग मात्र दो ही गेंदें खेल पाए जबकि लैथम ने 17 गेंदों का सामना किया। यही नहीं एंडरसन ने अपने पहले 6 ओवरों में 5 ओवर में मेडन फेंके।
इसके अलावा उनके साथी गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड और युवा गेंदबाज मैथ्यू पॉट्स ने भी बेहतरीन गेंदबाजी की और न्यूजीलैंड टीम के विकेट चटकाते रहे। ब्रॉड ने डेवोन कॉनवे को 3 रन के निजी स्कोर पर आउट किया जबकि पॉट्स ने न्यूजीलैंड टीम के कप्तान केन विलियमसन (2 रन) का विकेट अपने नाम किया। इंग्लैंड के गेंदबाजों के इस प्रदर्शन की वजह से न्यूजीलैंड टीम बैकफुट पर आ गई।
इंग्लैंड टीम शुरुआत से ही न्यूजीलैंड पर हावी रही। टीम के कप्तान बेन स्टोक्स ने आक्रमक फील्ड लगाई जिसकी वजह से न्यूजीलैंड के बल्लेबाज लगातार अपना विकेट गंवाते चले गए। बता दें, हाल ही में बेन स्टोक्स को इंग्लैंड की टेस्ट टीम का कप्तान नियुक्त किया गया था। खबर लिखे जाने तक न्यूजीलैंड की पूरी टीम पहली पारी में 132 रनों पर ऑलआउट हो गई है।
एंडरसन की गेंदबाजी को देखकर फैंस ने दिए कुछ ऐसे रक्शनः
Most Test innings bowled at a ground:
This new young bowler England have plucked out of county cricket, James Anderson, is very good!
James Anderson still a freak with the rock isn't he. Unbelievable bowler.
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लॉर्ड्स टेस्ट मैच में न्यूजीलैंड ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी करने का फैसला लिया। इंग्लैंड बनाम न्यूजीलैंड के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज का पहला मुकाबला दो जून से शुरू हो गया है। ये मुकाबला लॉर्ड्स के मैदान पर खेला जा रहा है। पहले टेस्ट में टॉस जीतने के बाद न्यूज़ीलैंड ने पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। दिग्गज गेंदबाज जेम्स एंडरसन और स्टुअर्ट ब्रॉड ने इंग्लैंड की ओर से गेंदबाजी का पहला स्पेल फेंका और इस दौरान उन्होंने शानदार गेंदबाजी करते हुए कीवी बल्लेबाज से कुछ कठिन सवाल पूछे। वेस्टइंडीज के खिलाफ हुई सीरीज में जेम्स एंडरसन को टीम में शामिल नहीं किया गया था, जिसके बाद कई लोगों का मानना था कि उनका टेस्ट करियर अब खत्म हो गया है। लेकिन स्टोक्स के कप्तान बनते ही एंडरसन की भी टीम में वापसी हुई और पहले ही टेस्ट मैच में उन्होंने कमाल की गेंदबाजी की। एंडरसन ने लॉर्ड्स टेस्ट में धमाकेदार वापसी की और न्यूजीलैंड के दोनों ओपनर टॉम लैथम और विल यंग को एक-एक रन पर आउट कर वापस पवेलियन भेजा। दोनों ही बल्लेबाजों का कैच जॉनी बेयरस्टो ने स्लिप में पकड़ा। यंग मात्र दो ही गेंदें खेल पाए जबकि लैथम ने सत्रह गेंदों का सामना किया। यही नहीं एंडरसन ने अपने पहले छः ओवरों में पाँच ओवर में मेडन फेंके। इसके अलावा उनके साथी गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड और युवा गेंदबाज मैथ्यू पॉट्स ने भी बेहतरीन गेंदबाजी की और न्यूजीलैंड टीम के विकेट चटकाते रहे। ब्रॉड ने डेवोन कॉनवे को तीन रन के निजी स्कोर पर आउट किया जबकि पॉट्स ने न्यूजीलैंड टीम के कप्तान केन विलियमसन का विकेट अपने नाम किया। इंग्लैंड के गेंदबाजों के इस प्रदर्शन की वजह से न्यूजीलैंड टीम बैकफुट पर आ गई। इंग्लैंड टीम शुरुआत से ही न्यूजीलैंड पर हावी रही। टीम के कप्तान बेन स्टोक्स ने आक्रमक फील्ड लगाई जिसकी वजह से न्यूजीलैंड के बल्लेबाज लगातार अपना विकेट गंवाते चले गए। बता दें, हाल ही में बेन स्टोक्स को इंग्लैंड की टेस्ट टीम का कप्तान नियुक्त किया गया था। खबर लिखे जाने तक न्यूजीलैंड की पूरी टीम पहली पारी में एक सौ बत्तीस रनों पर ऑलआउट हो गई है। एंडरसन की गेंदबाजी को देखकर फैंस ने दिए कुछ ऐसे रक्शनः Most Test innings bowled at a ground: This new young bowler England have plucked out of county cricket, James Anderson, is very good! James Anderson still a freak with the rock isn't he. Unbelievable bowler.
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की स्थिति भी वैसी न हो और त्याग कर वैठे तो प्रातध्यान होता है । प्रतिज्ञा के प्रति निरादर भाव न हो, किन्तु बढते रहे - उच्च भाव रहे ऐसी प्रतिज्ञा लेते हैं । ऐसा जैनधर्म का उपदेश है और जैनधर्म को आम्नाय भी ऐसी है । - ऐसे दो प्रकार कहे है ।
प्रश्न - चाडालादिक ने प्रतिज्ञा की थी, उन्हे कहीं इतना विचार होता है ?
उत्तर - "मृत्यु - पर्यंत कष्ट हो तो भले हो, किन्तु प्रतिज्ञा नही छोडेंगे-ऐसे विचार से वे प्रतिज्ञा लेते हैं, किन्तु प्रतिज्ञा के प्रति उनका निरादरभाव नहीं है । श्रात्मा के भान बिना भी कोई प्रतिज्ञा ले तें, तथापि मृत्यु - पर्यंत कष्ट प्राने पर भी उसे नही छोडते, श्रीर उनके प्रतिज्ञा का श्रादर नही छूटता । यह व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि की प्रतिज्ञा की बात कही । कपाय की मन्दतारूप चढते ( उच्च ) परिणाम रहे तदनुसार वह प्रतिज्ञा लेता है, और प्रतिज्ञा भङ्ग नही होने देता । श्रव सम्यग्दृष्टि की बात करते हैं । ज्ञानी जो प्रतिज्ञा लेते हैं वह तत्त्वज्ञान पूर्वक ही करते हैं । अपने परिणाम देखकर प्रतिज्ञा लेते हैं । वे विचार करते हैं कि मेरी पर्याय मे वर्तमान तुच्छता वर्तती है, मेरे परिणामो मे वृद्धि नहीं होती। द्रव्य से प्रभु हैं, किन्तु पर्याय से पामर है उसका अच्छी तरह ज्ञान करते हैं । तत्वज्ञानपूर्वक ही प्रतिज्ञा लेना योग्य है ।
असलीस्वरूप प्रात्म द्रव्य त्रिकाल शुद्ध है । उसके श्राश्रय से सम्यग्दर्शन रूपी शुद्ध पर्याय तो प्रगट हुई है, किन्तु अभी उग्र पुरुषार्थ पूर्वक राग का सर्वथा प्रभाव नही हुआ है अर्थात् निर्बलता है, द्रव्य
का पूर्ण माश्रय नही हुआ है, पर्याय मे पामरता है और उससे निमित्त का सम्बन्ध सर्वथा नही छूटा है । - इसप्रकार पर्याय का ज्ञान करके प्रतिज्ञा लेते हैं । दृष्टि मे से द्रव्य का अवलम्बन छूट जाये तो मिथ्यादृष्टि हो जाये और पर्याय मे से निमित्तका अवलम्बन सर्वथा छूट जाये तो केवलज्ञान हो जाये । साधक को दृष्टि अपेक्षा से द्रव्य का अवलम्बन कभी नही छूटता, और पर्यायमे पामरता है इसलिये सर्वथा निमित्त का श्रवलम्बन भी नही छूटा है । इसलिये ज्ञानी तत्त्वज्ञान पूर्वक ही प्रतिज्ञा लेते है । परद्रव्य मेरा कुछ करती है यह बात तो है ही नहीं, यहाँ तो त्रिकाली द्रव्य और वर्तमान पर्याय दो की बात है । पर्यायमे दया का राग आाये तो उस प्रकारके निमित्त पर लक्ष जाता है । पर का अवलम्बन नही छूटता । इसका अर्थ ऐसा नही है कि पर निमित्त के कारण राग हुआ है जिस-जिस प्रकार का राग होता है । उस उस प्रकार के निमित्तो पर लक्ष जाता है, किन्तु उन निमित्तो के कारण राग हुआ है - ऐसा नहीं है ।
डुगडुगी वजती है, उसकी डोरी एक ही होने पर भी वह दोनो र बजती है । उसीप्रकार ज्ञानीको शुद्ध दृष्टि अपेक्षा से सदैव द्रव्य का अवलम्बन होता है और पर्याय की अपेक्षासे निमित्तका अवलम्बन है । - इसप्रकार साधकदशा मे दो प्रकार होते हैं । द्रव्यपर्यायके ज्ञान बिना व्रत - प्रतिज्ञा ले ले तो वह यथार्थ प्राचरण नही है । कोई ज्ञानी की निन्दा करे तो ज्ञानी उसका भी ज्ञान करते हैं, और जो राग-द्वेष होता है उसे भी ज्ञेय रूप अच्छी तरह जानते हैं । भौर वह ऐसी प्रतिज्ञा लेते हैं जिससे सहज परिणाम हो ।
श्रव कहते हैं कि जिसे अन्तरग विरकता नही हुई और बाह्यसे प्रतिज्ञा धारण करता है, वह प्रतिज्ञा लेने से पूर्व और पश्चात् प्रासक्क रहता है। उपवास की प्रतिज्ञा लेने से पूर्व धारणा मे प्रासक्त होकर आहार लेता है और उपवास पूर्ण होने पर मिष्टान्न उडाता है, खाने मे जल्दी करता है। जिस प्रकार रोके हुए जल को छोड़ने पर वह बड़े वेग पूर्वक बहने लगता है, उसी प्रकार इसने प्रतिज्ञासे विषयवृत्तिको रोका, किन्तु अन्तरग मे प्रासक्ति वढती गई और प्रतिज्ञा पूर्ण होते ही प्रत्यन्त विपयवृत्ति होने लगी । इसलिये वास्तव में उसके प्रतिज्ञा कालमे भी विषय वासना नही छूटी है । तथा नागे-पीछे उलटा अधिक राग करता है, किन्तु फलकी प्राप्ति तो राग भाव मिटने पर ही होती है, इसलिये जितना राग कम हुआ हो उतनी ही प्रतिज्ञा करना चाहिये । महामुनि भी पहले थोडी प्रतिज्ञा लेकर फिर श्राहारादि मे कमी करते हैं, और यदि बडी प्रतिज्ञा लेते हैं तो अपनी शक्ति का विचार करके लेते हैं । इसलिये परिणाम मे चढते भाव रहे और प्राकुलता न हो - ऐसा करना कार्यकारी है ।
पुनश्च, जिसकी धर्म पर दृष्टि नहीं है वह किसी समय तो महान धर्म का आचरण करता है और कभी अधिक स्वच्छन्दी होकर वर्तता है । जैसे- दशलक्षण पर्व मे दस उपवास करता है और अन्य पर्व दिवसों में एक भी नही । श्रव, यदि धर्मबुद्धि हो तो सर्व धर्म पर्वो मे यथायोग्य सयमादि धारण करना चाहिये, किन्तु मिथ्यादृष्टि को उसका विवेक नही होता । उसके व्रत, तप, दान भी सच्चे नहीं होते । यहाँ तो, प्रज्ञानी को कैसा विकल्प आता है उसकी बात करते
हैं । जहाँ बडप्पन मिलता हो वहाँ अधिक रुपये खर्च करता है। मकान मे नाम की तख्ती लगा दो तो अधिक रुपये दे सकता है --- ऐसा कहने वाले जीव को धर्म बुद्धि नहीं है, राग घटाने का उसका प्रयोजन नहीं है ।
और कभी किसी धर्म कार्य मे बहुत-सा धन खर्च कर देता है, तथा किसी समय कोई कार्य ना पडे तो वहाँ थोडा-सा भी नहीं देता । यदि उसके धर्म बुद्धि हो तो सर्व धर्म कार्यो मे यथायोग्य धन खर्च करता रहे । इसी प्रकार अन्य भी जानना । अज्ञानी को धन खर्च करनेका भी विवेक नही होता । कहने सुनने से धन खर्च करता है, किन्तु यदि धर्म बुद्धि हो तो अपनी शक्ति के अनुसार सभी धर्म कार्यों मे यथायोग्य धन दिये बिना न रहे । जैसे - लडकी का विवाह करना हो तो वहीं चन्दा करने नही जाता, किन्तु अपने घर में से पैसा निकालता है, मकान बनाना हो तो चन्दा नहीं करता, - उसी प्रकार जिसे धर्म बुद्धि हो वह धर्म के सभी कार्यों में यथाशक्ति धन खर्च करता है, उसके ऐसे परिणाम होते हैं ।
तत्त्वज्ञान पूर्वक व्रत, तप श्रीर दान होना चाहिये, - यह तीन - बाते कही । इसप्रकार जिस २ काल मे जिस २ प्रकार का राग हो उस २ प्रकार से ज्ञानी को विवेक होता है - ऐसा समझना चाहिये । और जिसे सच्चे धर्म की दृष्टि नही है उसके सच्चा साधन भी नही है । बाह्यसे लक्ष्मीका त्याग कर देता है, किन्तु वस्त्रादिका मोह नहीं छूटता । सुन्दर मखमली जूते और कोट पहिने तो वह त्याग मेल रहित है । बाह्यसे त्याग किया हो और सट्टे का धन्धा करे, स्वय तो
त्यागी हो किन्तु दूसरो को लक्ष्मी प्राप्त कराने के लिये फीचर के प्रक यादि बतलाये, तो वह धर्म मे कलयस्प है, उसने वास्तव में लक्ष्मी का त्याग नहीं किया है, किन्तु लाभान्तराय के कारण लक्ष्मी को प्राप्ति नहीं हुई है । स्वय त्यागी हो जाये और अपने माता-पिता आदि के लिये चन्दा इक्ट्ठा कराये वह भी त्यागी नही है ।
किमी से चन्दे मे प्रमुक रकम देने का प्राग्रह करना प्रथवा कहना भोगी के लिये शोभनीय नहीं है । सच्चा त्याग हो तो अपने परिणामो को देखता है । कोई साधु यहे कि मुझे प्रमुक रुपयो की श्रावश्यकता है, तो इसप्रकार सानु होकर भागना वह धर्म की शोभा नहीं है। निस्पृह रूप से त्याग होना चाहिये। मुनि को याचना नही होती ।
कोई-कोई त्यागी ऐसे होते है कि यात्रा के लिये श्रथवा भोजनादि के लिये पैसो की याचना करते हैं, और कोई न दे तो क्रोधकपाय करते हैं। प्रथम तो त्यागो को याचना करना ही योग्य नही है, और फिर कपाय करना तो महान बुरा है, तथापि अपने को त्यागी और तपस्वी मानता है वह व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि का प्रविवेक है । मुनि नाम धारण करके अपने को तपस्वी मानकर क्रोध मान, माया और लोभ करता है, "मैं तपस्वी हूँ," इमलिये ग्रन्थमाला में मेरा नाम रखा जाये तो ठोक - ऐसा मानकर अभिमान करता है, वह सच्चा मुनि नही किन्तु प्रज्ञानी है ।
[ वीर स० २४७६ धंद्यात कृष्णा १ मगलवार, ता० ३१-३-५३ ] यह व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि का अधिकार चलता है । तत्त्व२३
ज्ञान के विना यथार्थ प्राचरण नही होता । वह जीव कोई प्रत्यन्त नीच क्रिया करता है इसलिये लोकनिद्य होता है, और धर्म की हँसी कराता है । जैसे- कोई पुरुष एक वस्त्र प्रति उत्तम श्रीर एक प्रति हीन पहिने तो वह हास्यपात्र ही होता है, उसीप्रकार यह भी हँसी कराता है। व्यवहाराभासी जीवकी क्रिया हास्यास्पद होती है, क्योकि किसी समय उच्च क्रिया करता है और कभी फिर नीच क्रिया मे लग जाता है, इसलिये लोकनिंद्य होता है। इसलिये सच्चे धर्म की तो यह आम्नाय है कि - जितने अपने रागादिक दूर हुए हो तदनुसार जिस पद मे जो धर्म क्रिया सभव हो वह सव अगीकार करे ।
चौथे और पांचवें गुणस्थान में जिस प्रकार की क्रिया सभव हो उसी प्रकार ज्ञानी वर्तते है ।
किन्तु उच्चपद धारण करके नोची क्रिया नहीं करना चाहिये । सम्यग्दृष्टि की भूमिका मे मासादि का आहार नही होता । सम्यग्दृष्टि को कदाचित् लडाई के परिणाम हो, किन्तु उसके प्रभार नही हो सकता । अभी प्रासक्ति नही छूटी इसलिये स्त्री सेवनादि होता है। पाँचवें गुरणस्थान मे भूमिकानुसार त्याग होता है । पुरुषार्थ सिद्धय पाय मे कहा है कि जिसके मास-मदिरा का त्याग न हो वह उपदेश सुनने को भी पात्र नहीं है ।
प्रश्नः - स्त्री सेवनादि का त्याग ऊपर की प्रतिमान में कहा है, तो निचली दशा वाले को उसका त्याग करना चाहिये या नहीं ?
उत्तर - निचली दशावाला उनका सर्वथा त्याग नही कर सकता, कोई दोष लग जाता है । इसलिये ऊपर की प्रतिमानो मे उनका त्याग होता है, किन्तु निचली दशा मे जिस प्रकार से त्याग
सभव है उतना त्याग उस दशा में भी करना चाहिये । किन्तु निचली दशा में जो सभव न हो, वह त्याग तो कपायभावो से ही होता है । जैसे- कोई सात व्यमन का तो सेवन करे और स्व-स्त्री का त्याग करे - यह कैसे हो सकता है ? यद्यपि स्वस्थी का त्याग करना धर्म है, तथापि पहले जब मप्तव्यमन का त्याग हो जाये तभी स्वस्त्री का त्याग करना योग्य है । चौथे गुणस्थानवाला प्रतिमा की प्रतिज्ञा नहीं करता क्योंकि अतर्वासना अभी सहज छूटी नही है ।
पुनश्च सर्व प्रकार से धर्मके स्वरूपको न जानने वाले कुछ जीव घिमी धमके अगको मुन्य करके ग्रन्य धमको गौरण करते हैं। जैसेकोई जीव दया धर्मको मुल्य करके पूजा-प्रभावनादि कार्योका उत्थापन करता है, वह व्यवहार धर्मको भी नही समझना । ज्ञानीको पूजा, प्रभावनादि के भाव प्राये बिना नहीं रहते । पर जीवकी हिमा, प्रहिंसा कोई नही कर सकता, किन्तु भावो की बात है। पूजा-प्रभावना में शुभभाव होते हैं उनकी उत्थापना नहीं की जा सकती, तथापि उन्हे धर्म नही मानना चाहिये । कोई पूजा - प्रभावनादि धर्मको ( शुभभाव को) मुख्य करके हिमादिका भी भय नहीं रखते। रात्रि के ममय पूजा नहीं करना चाहिये, शुद्ध जल से अभिषेक होना चाहिये ।
यह बात न्याय से समझना चाहिये । भले ही मिथ्यादृष्टि हो किन्तु सत्य बात श्राये तो पहले स्वीकार करना चाहिये । अज्ञानी किमी तपकी मुख्यता मानकर प्रातध्यानादि करके भी उपवासादि करते हैं, अथवा अपने को तपस्वी मानकर नि शकरूपसे क्रोधादि करते हैं । उपवास करके सो जाते हैं, आध्यान करके दिन पूरा करते हैं । तत्त्वज्ञान के विना सच्चा तप नही होता । श्रात्माकी शातिसे
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की स्थिति भी वैसी न हो और त्याग कर वैठे तो प्रातध्यान होता है । प्रतिज्ञा के प्रति निरादर भाव न हो, किन्तु बढते रहे - उच्च भाव रहे ऐसी प्रतिज्ञा लेते हैं । ऐसा जैनधर्म का उपदेश है और जैनधर्म को आम्नाय भी ऐसी है । - ऐसे दो प्रकार कहे है । प्रश्न - चाडालादिक ने प्रतिज्ञा की थी, उन्हे कहीं इतना विचार होता है ? उत्तर - "मृत्यु - पर्यंत कष्ट हो तो भले हो, किन्तु प्रतिज्ञा नही छोडेंगे-ऐसे विचार से वे प्रतिज्ञा लेते हैं, किन्तु प्रतिज्ञा के प्रति उनका निरादरभाव नहीं है । श्रात्मा के भान बिना भी कोई प्रतिज्ञा ले तें, तथापि मृत्यु - पर्यंत कष्ट प्राने पर भी उसे नही छोडते, श्रीर उनके प्रतिज्ञा का श्रादर नही छूटता । यह व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि की प्रतिज्ञा की बात कही । कपाय की मन्दतारूप चढते परिणाम रहे तदनुसार वह प्रतिज्ञा लेता है, और प्रतिज्ञा भङ्ग नही होने देता । श्रव सम्यग्दृष्टि की बात करते हैं । ज्ञानी जो प्रतिज्ञा लेते हैं वह तत्त्वज्ञान पूर्वक ही करते हैं । अपने परिणाम देखकर प्रतिज्ञा लेते हैं । वे विचार करते हैं कि मेरी पर्याय मे वर्तमान तुच्छता वर्तती है, मेरे परिणामो मे वृद्धि नहीं होती। द्रव्य से प्रभु हैं, किन्तु पर्याय से पामर है उसका अच्छी तरह ज्ञान करते हैं । तत्वज्ञानपूर्वक ही प्रतिज्ञा लेना योग्य है । असलीस्वरूप प्रात्म द्रव्य त्रिकाल शुद्ध है । उसके श्राश्रय से सम्यग्दर्शन रूपी शुद्ध पर्याय तो प्रगट हुई है, किन्तु अभी उग्र पुरुषार्थ पूर्वक राग का सर्वथा प्रभाव नही हुआ है अर्थात् निर्बलता है, द्रव्य का पूर्ण माश्रय नही हुआ है, पर्याय मे पामरता है और उससे निमित्त का सम्बन्ध सर्वथा नही छूटा है । - इसप्रकार पर्याय का ज्ञान करके प्रतिज्ञा लेते हैं । दृष्टि मे से द्रव्य का अवलम्बन छूट जाये तो मिथ्यादृष्टि हो जाये और पर्याय मे से निमित्तका अवलम्बन सर्वथा छूट जाये तो केवलज्ञान हो जाये । साधक को दृष्टि अपेक्षा से द्रव्य का अवलम्बन कभी नही छूटता, और पर्यायमे पामरता है इसलिये सर्वथा निमित्त का श्रवलम्बन भी नही छूटा है । इसलिये ज्ञानी तत्त्वज्ञान पूर्वक ही प्रतिज्ञा लेते है । परद्रव्य मेरा कुछ करती है यह बात तो है ही नहीं, यहाँ तो त्रिकाली द्रव्य और वर्तमान पर्याय दो की बात है । पर्यायमे दया का राग आाये तो उस प्रकारके निमित्त पर लक्ष जाता है । पर का अवलम्बन नही छूटता । इसका अर्थ ऐसा नही है कि पर निमित्त के कारण राग हुआ है जिस-जिस प्रकार का राग होता है । उस उस प्रकार के निमित्तो पर लक्ष जाता है, किन्तु उन निमित्तो के कारण राग हुआ है - ऐसा नहीं है । डुगडुगी वजती है, उसकी डोरी एक ही होने पर भी वह दोनो र बजती है । उसीप्रकार ज्ञानीको शुद्ध दृष्टि अपेक्षा से सदैव द्रव्य का अवलम्बन होता है और पर्याय की अपेक्षासे निमित्तका अवलम्बन है । - इसप्रकार साधकदशा मे दो प्रकार होते हैं । द्रव्यपर्यायके ज्ञान बिना व्रत - प्रतिज्ञा ले ले तो वह यथार्थ प्राचरण नही है । कोई ज्ञानी की निन्दा करे तो ज्ञानी उसका भी ज्ञान करते हैं, और जो राग-द्वेष होता है उसे भी ज्ञेय रूप अच्छी तरह जानते हैं । भौर वह ऐसी प्रतिज्ञा लेते हैं जिससे सहज परिणाम हो । श्रव कहते हैं कि जिसे अन्तरग विरकता नही हुई और बाह्यसे प्रतिज्ञा धारण करता है, वह प्रतिज्ञा लेने से पूर्व और पश्चात् प्रासक्क रहता है। उपवास की प्रतिज्ञा लेने से पूर्व धारणा मे प्रासक्त होकर आहार लेता है और उपवास पूर्ण होने पर मिष्टान्न उडाता है, खाने मे जल्दी करता है। जिस प्रकार रोके हुए जल को छोड़ने पर वह बड़े वेग पूर्वक बहने लगता है, उसी प्रकार इसने प्रतिज्ञासे विषयवृत्तिको रोका, किन्तु अन्तरग मे प्रासक्ति वढती गई और प्रतिज्ञा पूर्ण होते ही प्रत्यन्त विपयवृत्ति होने लगी । इसलिये वास्तव में उसके प्रतिज्ञा कालमे भी विषय वासना नही छूटी है । तथा नागे-पीछे उलटा अधिक राग करता है, किन्तु फलकी प्राप्ति तो राग भाव मिटने पर ही होती है, इसलिये जितना राग कम हुआ हो उतनी ही प्रतिज्ञा करना चाहिये । महामुनि भी पहले थोडी प्रतिज्ञा लेकर फिर श्राहारादि मे कमी करते हैं, और यदि बडी प्रतिज्ञा लेते हैं तो अपनी शक्ति का विचार करके लेते हैं । इसलिये परिणाम मे चढते भाव रहे और प्राकुलता न हो - ऐसा करना कार्यकारी है । पुनश्च, जिसकी धर्म पर दृष्टि नहीं है वह किसी समय तो महान धर्म का आचरण करता है और कभी अधिक स्वच्छन्दी होकर वर्तता है । जैसे- दशलक्षण पर्व मे दस उपवास करता है और अन्य पर्व दिवसों में एक भी नही । श्रव, यदि धर्मबुद्धि हो तो सर्व धर्म पर्वो मे यथायोग्य सयमादि धारण करना चाहिये, किन्तु मिथ्यादृष्टि को उसका विवेक नही होता । उसके व्रत, तप, दान भी सच्चे नहीं होते । यहाँ तो, प्रज्ञानी को कैसा विकल्प आता है उसकी बात करते हैं । जहाँ बडप्पन मिलता हो वहाँ अधिक रुपये खर्च करता है। मकान मे नाम की तख्ती लगा दो तो अधिक रुपये दे सकता है --- ऐसा कहने वाले जीव को धर्म बुद्धि नहीं है, राग घटाने का उसका प्रयोजन नहीं है । और कभी किसी धर्म कार्य मे बहुत-सा धन खर्च कर देता है, तथा किसी समय कोई कार्य ना पडे तो वहाँ थोडा-सा भी नहीं देता । यदि उसके धर्म बुद्धि हो तो सर्व धर्म कार्यो मे यथायोग्य धन खर्च करता रहे । इसी प्रकार अन्य भी जानना । अज्ञानी को धन खर्च करनेका भी विवेक नही होता । कहने सुनने से धन खर्च करता है, किन्तु यदि धर्म बुद्धि हो तो अपनी शक्ति के अनुसार सभी धर्म कार्यों मे यथायोग्य धन दिये बिना न रहे । जैसे - लडकी का विवाह करना हो तो वहीं चन्दा करने नही जाता, किन्तु अपने घर में से पैसा निकालता है, मकान बनाना हो तो चन्दा नहीं करता, - उसी प्रकार जिसे धर्म बुद्धि हो वह धर्म के सभी कार्यों में यथाशक्ति धन खर्च करता है, उसके ऐसे परिणाम होते हैं । तत्त्वज्ञान पूर्वक व्रत, तप श्रीर दान होना चाहिये, - यह तीन - बाते कही । इसप्रकार जिस दो काल मे जिस दो प्रकार का राग हो उस दो प्रकार से ज्ञानी को विवेक होता है - ऐसा समझना चाहिये । और जिसे सच्चे धर्म की दृष्टि नही है उसके सच्चा साधन भी नही है । बाह्यसे लक्ष्मीका त्याग कर देता है, किन्तु वस्त्रादिका मोह नहीं छूटता । सुन्दर मखमली जूते और कोट पहिने तो वह त्याग मेल रहित है । बाह्यसे त्याग किया हो और सट्टे का धन्धा करे, स्वय तो त्यागी हो किन्तु दूसरो को लक्ष्मी प्राप्त कराने के लिये फीचर के प्रक यादि बतलाये, तो वह धर्म मे कलयस्प है, उसने वास्तव में लक्ष्मी का त्याग नहीं किया है, किन्तु लाभान्तराय के कारण लक्ष्मी को प्राप्ति नहीं हुई है । स्वय त्यागी हो जाये और अपने माता-पिता आदि के लिये चन्दा इक्ट्ठा कराये वह भी त्यागी नही है । किमी से चन्दे मे प्रमुक रकम देने का प्राग्रह करना प्रथवा कहना भोगी के लिये शोभनीय नहीं है । सच्चा त्याग हो तो अपने परिणामो को देखता है । कोई साधु यहे कि मुझे प्रमुक रुपयो की श्रावश्यकता है, तो इसप्रकार सानु होकर भागना वह धर्म की शोभा नहीं है। निस्पृह रूप से त्याग होना चाहिये। मुनि को याचना नही होती । कोई-कोई त्यागी ऐसे होते है कि यात्रा के लिये श्रथवा भोजनादि के लिये पैसो की याचना करते हैं, और कोई न दे तो क्रोधकपाय करते हैं। प्रथम तो त्यागो को याचना करना ही योग्य नही है, और फिर कपाय करना तो महान बुरा है, तथापि अपने को त्यागी और तपस्वी मानता है वह व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि का प्रविवेक है । मुनि नाम धारण करके अपने को तपस्वी मानकर क्रोध मान, माया और लोभ करता है, "मैं तपस्वी हूँ," इमलिये ग्रन्थमाला में मेरा नाम रखा जाये तो ठोक - ऐसा मानकर अभिमान करता है, वह सच्चा मुनि नही किन्तु प्रज्ञानी है । [ वीर सशून्य दो हज़ार चार सौ छिहत्तर धंद्यात कृष्णा एक मगलवार, ताशून्य इकतीस मार्च तिरेपन ] यह व्यवहाराभासी मिथ्यादृष्टि का अधिकार चलता है । तत्त्वतेईस ज्ञान के विना यथार्थ प्राचरण नही होता । वह जीव कोई प्रत्यन्त नीच क्रिया करता है इसलिये लोकनिद्य होता है, और धर्म की हँसी कराता है । जैसे- कोई पुरुष एक वस्त्र प्रति उत्तम श्रीर एक प्रति हीन पहिने तो वह हास्यपात्र ही होता है, उसीप्रकार यह भी हँसी कराता है। व्यवहाराभासी जीवकी क्रिया हास्यास्पद होती है, क्योकि किसी समय उच्च क्रिया करता है और कभी फिर नीच क्रिया मे लग जाता है, इसलिये लोकनिंद्य होता है। इसलिये सच्चे धर्म की तो यह आम्नाय है कि - जितने अपने रागादिक दूर हुए हो तदनुसार जिस पद मे जो धर्म क्रिया सभव हो वह सव अगीकार करे । चौथे और पांचवें गुणस्थान में जिस प्रकार की क्रिया सभव हो उसी प्रकार ज्ञानी वर्तते है । किन्तु उच्चपद धारण करके नोची क्रिया नहीं करना चाहिये । सम्यग्दृष्टि की भूमिका मे मासादि का आहार नही होता । सम्यग्दृष्टि को कदाचित् लडाई के परिणाम हो, किन्तु उसके प्रभार नही हो सकता । अभी प्रासक्ति नही छूटी इसलिये स्त्री सेवनादि होता है। पाँचवें गुरणस्थान मे भूमिकानुसार त्याग होता है । पुरुषार्थ सिद्धय पाय मे कहा है कि जिसके मास-मदिरा का त्याग न हो वह उपदेश सुनने को भी पात्र नहीं है । प्रश्नः - स्त्री सेवनादि का त्याग ऊपर की प्रतिमान में कहा है, तो निचली दशा वाले को उसका त्याग करना चाहिये या नहीं ? उत्तर - निचली दशावाला उनका सर्वथा त्याग नही कर सकता, कोई दोष लग जाता है । इसलिये ऊपर की प्रतिमानो मे उनका त्याग होता है, किन्तु निचली दशा मे जिस प्रकार से त्याग सभव है उतना त्याग उस दशा में भी करना चाहिये । किन्तु निचली दशा में जो सभव न हो, वह त्याग तो कपायभावो से ही होता है । जैसे- कोई सात व्यमन का तो सेवन करे और स्व-स्त्री का त्याग करे - यह कैसे हो सकता है ? यद्यपि स्वस्थी का त्याग करना धर्म है, तथापि पहले जब मप्तव्यमन का त्याग हो जाये तभी स्वस्त्री का त्याग करना योग्य है । चौथे गुणस्थानवाला प्रतिमा की प्रतिज्ञा नहीं करता क्योंकि अतर्वासना अभी सहज छूटी नही है । पुनश्च सर्व प्रकार से धर्मके स्वरूपको न जानने वाले कुछ जीव घिमी धमके अगको मुन्य करके ग्रन्य धमको गौरण करते हैं। जैसेकोई जीव दया धर्मको मुल्य करके पूजा-प्रभावनादि कार्योका उत्थापन करता है, वह व्यवहार धर्मको भी नही समझना । ज्ञानीको पूजा, प्रभावनादि के भाव प्राये बिना नहीं रहते । पर जीवकी हिमा, प्रहिंसा कोई नही कर सकता, किन्तु भावो की बात है। पूजा-प्रभावना में शुभभाव होते हैं उनकी उत्थापना नहीं की जा सकती, तथापि उन्हे धर्म नही मानना चाहिये । कोई पूजा - प्रभावनादि धर्मको मुख्य करके हिमादिका भी भय नहीं रखते। रात्रि के ममय पूजा नहीं करना चाहिये, शुद्ध जल से अभिषेक होना चाहिये । यह बात न्याय से समझना चाहिये । भले ही मिथ्यादृष्टि हो किन्तु सत्य बात श्राये तो पहले स्वीकार करना चाहिये । अज्ञानी किमी तपकी मुख्यता मानकर प्रातध्यानादि करके भी उपवासादि करते हैं, अथवा अपने को तपस्वी मानकर नि शकरूपसे क्रोधादि करते हैं । उपवास करके सो जाते हैं, आध्यान करके दिन पूरा करते हैं । तत्त्वज्ञान के विना सच्चा तप नही होता । श्रात्माकी शातिसे
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कप्तान अजहर अली (6) के रूप में टीम का पहला विकेट गिरने के बाद शरजील और बाबर ने दूसरे विकेट के लिए 130 रनों की साझेदारी कर टीम का स्कोर 140 तक पहुंचाया। इसी स्कोर पर मिशेल स्टार्क ने शरजील को मैथ्यू वेड के हाथों कैच आउट करा इस साझेदारी को तोड़ा। टीम का पहला विकेट भी स्टार्क ने ही गिराया था। बाबर ने 109 गेंदों में सात चौके और एक छक्का लगाया, वहीं शरजील ने 69 गेंदों में नौ चौके और दो छक्के लगाए।
इसके बाद 181 के कुल योग तक पाकिस्तान की टीम ने मोहम्मद हफीज (3) और शोएब मलिक (10, रिटायर्ड हर्ट) के रूप में अपने दो और विकेट गंवा दिए। शोएब रिटायर्ड हर्ट होकर पवेलियन लौटे। इसके बाद 220 के कुल योग पर पाकिस्तान का पांचवां विकेट बाबर आजम के रूप में गिरा, जिसके बाद टीम को संभलने का मौका नहीं मिला और पाकिस्तान की टीम 312 के कुल योग पर सिमट गई। आस्ट्रेलिया के लिए स्टार्क ने सबसे अधिक चार विकेट चटकाए, जबकि पेट कुमिंस को दो विकेट मिले। इसके अलावा, जोश हैजलवुड, जेम्स फॉकनर और एडम जाम्पा को एक-एक सफलता हासिल हुई।
इसके अलावा और कोई बल्लेबाज छाप नहीं छोड़ सका। पाकिस्तान की ओर से जुनैद खान और हसन अली ने दो-दो विकेट लिए जबकि मोहम्मद आमिर और वहाब रियाज को एक-एक सफलता मिली। हसन खासे महंगे साबित हुए। उन्होंने अपने नौ ओवर में 100 रन दिए। वार्नर और हेड ने एकदिवसीय क्रिकेट में पहले विकेट के लिए दूसरी सबसे बड़ी साझेदारी को अंजाम दिया। यही नहीं, इन दोनों ने आस्ट्रेलिया के लिए पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी को अंजाम दिया। साथ ही वार्नर ने आस्ट्रेलिया के लिए तीसरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी खेली।
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कप्तान अजहर अली के रूप में टीम का पहला विकेट गिरने के बाद शरजील और बाबर ने दूसरे विकेट के लिए एक सौ तीस रनों की साझेदारी कर टीम का स्कोर एक सौ चालीस तक पहुंचाया। इसी स्कोर पर मिशेल स्टार्क ने शरजील को मैथ्यू वेड के हाथों कैच आउट करा इस साझेदारी को तोड़ा। टीम का पहला विकेट भी स्टार्क ने ही गिराया था। बाबर ने एक सौ नौ गेंदों में सात चौके और एक छक्का लगाया, वहीं शरजील ने उनहत्तर गेंदों में नौ चौके और दो छक्के लगाए। इसके बाद एक सौ इक्यासी के कुल योग तक पाकिस्तान की टीम ने मोहम्मद हफीज और शोएब मलिक के रूप में अपने दो और विकेट गंवा दिए। शोएब रिटायर्ड हर्ट होकर पवेलियन लौटे। इसके बाद दो सौ बीस के कुल योग पर पाकिस्तान का पांचवां विकेट बाबर आजम के रूप में गिरा, जिसके बाद टीम को संभलने का मौका नहीं मिला और पाकिस्तान की टीम तीन सौ बारह के कुल योग पर सिमट गई। आस्ट्रेलिया के लिए स्टार्क ने सबसे अधिक चार विकेट चटकाए, जबकि पेट कुमिंस को दो विकेट मिले। इसके अलावा, जोश हैजलवुड, जेम्स फॉकनर और एडम जाम्पा को एक-एक सफलता हासिल हुई। इसके अलावा और कोई बल्लेबाज छाप नहीं छोड़ सका। पाकिस्तान की ओर से जुनैद खान और हसन अली ने दो-दो विकेट लिए जबकि मोहम्मद आमिर और वहाब रियाज को एक-एक सफलता मिली। हसन खासे महंगे साबित हुए। उन्होंने अपने नौ ओवर में एक सौ रन दिए। वार्नर और हेड ने एकदिवसीय क्रिकेट में पहले विकेट के लिए दूसरी सबसे बड़ी साझेदारी को अंजाम दिया। यही नहीं, इन दोनों ने आस्ट्रेलिया के लिए पहले विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी को अंजाम दिया। साथ ही वार्नर ने आस्ट्रेलिया के लिए तीसरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी खेली।
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४ नति ५ मनशुद्धि ६ वचनशुद्धि ७ कायशुद्धि ८ और आहारशुद्धि येह दान देनेको पुण्योत्पादक किया हैं ।
प्रतिग्रह १ -पात्रके दर्शनके पश्चात् प्रतिग्रह किया जाता है। पात्रको अपने मिष्ट वचनोंके द्वारा अपने गृहमें ले जानेकेलिये जो क्रिया करनी होती है व प्रतिग्रह कहलाता है । उसका स्वरूप यह हैनमोस्तु नमोस्तु स्वामिन् तिष्ठ तिष्ठ सुपावन । तं प्रतिग्रहमित्याहुः समुत्थाय नताननः ।।
( दानशासन) भावार्थ - हे भगवन् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु, हे स्वामिन् तिष्ठ तिष्ठ इत्यादिक बचनके द्वारा खड़े होकर मस्तकको भक्तिके साथ विनयपूर्वक नमाकर अपने गृहमें चर्या स्वीकार करनेकेलिये जो पात्रको ठहराना, वह प्रतिग्रह है।
प्रतिग्रह क्रिया में मैं दोपरहित उच्चकुलीन श्रावक हूं, मैं श्रावकको क्रिया तथा भोजनशुद्धिको आगमानुकूल शुद्ध करता हूं। इसलिये हे भगवन ! गृहमें प्रवेश कीजिये । हे भगवन् ! यह क्षेत्र भी शुद्ध है और आहार पानी शुद्रादिकके स्पर्शसे रहित है।
श्रावकको इस क्रियाको देख कर और श्रावकको श्रद्धादि विज्ञानगुणका धारक योग्य दाता समझ कर पात्र उस गुड़ में जानेकेलिये सन्मुख होता है।
उस समय दाताको पात्रके आगे होकर अपने गृहका मार्ग बतलाता हुआ और जिस स्थानमें पात्रको विराजमान करना है उस क्षेत्रकी
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चार नति पाँच मनशुद्धि छः वचनशुद्धि सात कायशुद्धि आठ और आहारशुद्धि येह दान देनेको पुण्योत्पादक किया हैं । प्रतिग्रह एक -पात्रके दर्शनके पश्चात् प्रतिग्रह किया जाता है। पात्रको अपने मिष्ट वचनोंके द्वारा अपने गृहमें ले जानेकेलिये जो क्रिया करनी होती है व प्रतिग्रह कहलाता है । उसका स्वरूप यह हैनमोस्तु नमोस्तु स्वामिन् तिष्ठ तिष्ठ सुपावन । तं प्रतिग्रहमित्याहुः समुत्थाय नताननः ।। भावार्थ - हे भगवन् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु, हे स्वामिन् तिष्ठ तिष्ठ इत्यादिक बचनके द्वारा खड़े होकर मस्तकको भक्तिके साथ विनयपूर्वक नमाकर अपने गृहमें चर्या स्वीकार करनेकेलिये जो पात्रको ठहराना, वह प्रतिग्रह है। प्रतिग्रह क्रिया में मैं दोपरहित उच्चकुलीन श्रावक हूं, मैं श्रावकको क्रिया तथा भोजनशुद्धिको आगमानुकूल शुद्ध करता हूं। इसलिये हे भगवन ! गृहमें प्रवेश कीजिये । हे भगवन् ! यह क्षेत्र भी शुद्ध है और आहार पानी शुद्रादिकके स्पर्शसे रहित है। श्रावकको इस क्रियाको देख कर और श्रावकको श्रद्धादि विज्ञानगुणका धारक योग्य दाता समझ कर पात्र उस गुड़ में जानेकेलिये सन्मुख होता है। उस समय दाताको पात्रके आगे होकर अपने गृहका मार्ग बतलाता हुआ और जिस स्थानमें पात्रको विराजमान करना है उस क्षेत्रकी
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महज़ कंधे से बैग उतरने में देरी हो जाने की वजह से वाइस प्रिंसिपल ने उसे छड़ी से पीट दिया। पिटाई से उसकी आंख में चोट लग गई और खून बहने लगा। उसे नजदीकी हास्पिटल ले जाया गया जहां से लखनऊ रेफर कर दिया गया। आरोप है कि घायल आंख से छात्र को दिखना बंद हो गया है।
इलाहाबादः शहर के नामी कॉन्वेंट स्कूल सेंट जोसेफ कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल पर बारहवीं के छात्र की बेरहमी से पिटाई कर आंख फोड़ने का आरोप लगा है। छात्र का आरोप है कि चार दिन पहले प्रेयर के वक्त वाइस प्रिंसिपल ने छड़ी से मारकर उसे घायल कर दिया था, जिससे उसकी एक आंख की रोशनी चली गयी। छात्र के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। इधर कॉलेज प्रशासन अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार कर रहा है।
इलाहाबाद के मशहूर शिक्षण संस्थान सेंट जोसेफ कॉलेज में पढ़ने वाला 12 वीं का छात्र सेरवेन टेरेंस अब दोनों आंखों से कभी नहीं देख सकेगा।
राज्य स्तर का यह फुटबाल खिलाड़ी अब कभी फुटबाल मैदान पर भी शायद कदम न रख सके।
स्कूल के वाइस प्रिंसिपल फादर लेसली कोटिनो की एक गलती ने उसकी एक आंख हमेशा के लिए छीन ली।
छात्र का कहना है कि महज़ कंधे से बैग उतरने में देरी हो जाने की वजह से वाइस प्रिंसिपल ने उसे छड़ी से पीट दिया।
पिटाई से उसकी आंख में चोट लग गई और खून बहने लगा।
आरोप है पिटाई से उसकी आंख में गंभीर चोट लगी है जिससे उस आंख से दिखना बंद हो गया है।
छात्र का परिवार जब इस मामले में स्कूल प्रशासन से बात करने पहुंचा तो स्कूल के प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल, फादर सभी लोग स्कूल से गायब हो गए।
नौ मई को लगी चोट की शिकायत अब पीड़ित छात्र की मां ने सिविल लाइंस थाने में की है जिस पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने आरोपी शिक्षक के खिलाफ जांच शुरु कर दी है। एफआईआर के बाद स्कूल प्रबंधन का कहना है कि घटना दुखद है, लेकिन यह महज़ एक हादसा है। स्कूल ने छात्र को हर तरह की मदद देने की पेशकश भी की है।
लेकिन पीड़ित छात्र की मां ने बेरहमी से पीटकर बेटे की जिंदगी अंधेरी करने वाले टीचर की गिरफ्तारी और कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
एसपी सिटी सिद्धार्थ कंकड़ मीणा का कहना है कि जांच के बाद दोषी पाये जाने पर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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महज़ कंधे से बैग उतरने में देरी हो जाने की वजह से वाइस प्रिंसिपल ने उसे छड़ी से पीट दिया। पिटाई से उसकी आंख में चोट लग गई और खून बहने लगा। उसे नजदीकी हास्पिटल ले जाया गया जहां से लखनऊ रेफर कर दिया गया। आरोप है कि घायल आंख से छात्र को दिखना बंद हो गया है। इलाहाबादः शहर के नामी कॉन्वेंट स्कूल सेंट जोसेफ कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल पर बारहवीं के छात्र की बेरहमी से पिटाई कर आंख फोड़ने का आरोप लगा है। छात्र का आरोप है कि चार दिन पहले प्रेयर के वक्त वाइस प्रिंसिपल ने छड़ी से मारकर उसे घायल कर दिया था, जिससे उसकी एक आंख की रोशनी चली गयी। छात्र के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। इधर कॉलेज प्रशासन अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार कर रहा है। इलाहाबाद के मशहूर शिक्षण संस्थान सेंट जोसेफ कॉलेज में पढ़ने वाला बारह वीं का छात्र सेरवेन टेरेंस अब दोनों आंखों से कभी नहीं देख सकेगा। राज्य स्तर का यह फुटबाल खिलाड़ी अब कभी फुटबाल मैदान पर भी शायद कदम न रख सके। स्कूल के वाइस प्रिंसिपल फादर लेसली कोटिनो की एक गलती ने उसकी एक आंख हमेशा के लिए छीन ली। छात्र का कहना है कि महज़ कंधे से बैग उतरने में देरी हो जाने की वजह से वाइस प्रिंसिपल ने उसे छड़ी से पीट दिया। पिटाई से उसकी आंख में चोट लग गई और खून बहने लगा। आरोप है पिटाई से उसकी आंख में गंभीर चोट लगी है जिससे उस आंख से दिखना बंद हो गया है। छात्र का परिवार जब इस मामले में स्कूल प्रशासन से बात करने पहुंचा तो स्कूल के प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल, फादर सभी लोग स्कूल से गायब हो गए। नौ मई को लगी चोट की शिकायत अब पीड़ित छात्र की मां ने सिविल लाइंस थाने में की है जिस पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने आरोपी शिक्षक के खिलाफ जांच शुरु कर दी है। एफआईआर के बाद स्कूल प्रबंधन का कहना है कि घटना दुखद है, लेकिन यह महज़ एक हादसा है। स्कूल ने छात्र को हर तरह की मदद देने की पेशकश भी की है। लेकिन पीड़ित छात्र की मां ने बेरहमी से पीटकर बेटे की जिंदगी अंधेरी करने वाले टीचर की गिरफ्तारी और कड़ी कार्रवाई की मांग की है। एसपी सिटी सिद्धार्थ कंकड़ मीणा का कहना है कि जांच के बाद दोषी पाये जाने पर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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इन्हें एथलेटिक फिट बनाया गया है जिससे यह काफी झुकने या खिंचाव होने पर भी कंफर्टेबल रहते है। Amazon पर Hoodies For Men On Amazon किफायती कीमत पर मिल रहे हैं। इन्हें जल्दी से ऑर्डर करें और मौके का फायदा उठाएं।
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Disclaimer : NBT के पत्रकारों ने इस आर्टिकल को नहीं लिखा है।
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निजी छोटे-बड़े अस्पतालों (Hospitals) द्वारा भी अपना कचरा निस्तारण खुद नहीं किया जा सकता, बल्कि इस कार्य को वहां पर भी वहां के लिए तय एजेंसी (agency) ही कर सकती है।
योगेंद्र शर्मा. चंडीगढ़।
हरियाणा में कोविड अस्पतालों से निकलने वाले कचरे के निस्तारण (Disposal) के लिए स्वास्थ्य मंत्री विज की ओर से जहां कचरा निस्तारण करने वाली एजेंसियों को खास दिशा निर्देश देकर उनका पूरी तरह से पालन करने के लिए कहा गया है। वहीं दूसरी तरफ मेडिकल वेस्ट कोरोना संक्रमण मरीजों का हो या फिर अन्य तरह का इससे किसी भी तरह से पर्यावरण पर प्रतिकूल (Unfavorable) प्रभाव नहीं हो इस पर एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के दिशा निर्देशों का पालन कराने के लिए हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी पैनी नजर रखे हुए हैं।
यहां पर उल्लेखनीय है कि पूरे राज्य में मेडिकल वेस्ट उठाने और इसका निस्तारण करने के लिए 11 एजेंसियों को काम दिया गया है। केंद्र की ओर से जारी नियमों के हिसाब से ही मेडिकल वेस्ट के निस्तारण का काम किया जाता है। नियमों के मुताबिक 70 किलोमीटर के दायरे में एक ही एजेंसी काम कर सकती है, इतना ही नहीं एजेंसियों की संख्या में इजाफा करने के लिए भी नियमों में बदलाव करना होगा, यह भी केंद्र की अनुमति से ही किया जाएगा।
इन दिनों कोरोना संक्रमण की चुनौती औऱ मेडिकल वेस्ट भी कोविड अस्पतालों से ज्यादा निकल रहा है। भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि राज्य के कोविड अस्पतालों से प्रतिदिन लगभग एक कुंतल कचरा रोजाना निकल रहा है क्योंकि संक्रमण और संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इसके मेडिकल वेस्ट और दूसरे वेस्ट के निस्तारण के लिए बनाए गए नियमों के हिसाब से ही इसका निस्तारण एजेंसिया कर रही हैं।
इस पर हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिकारी नजर रखते हैं। विभाग की मुखिया एसीएस धीरा खंडेलवाल का कहना है कि इस मामले में विभाग के अधिकारियों द्वारा नजर रखी जा रही हैं, इस संबंध में हमने मीटिंग लेकर दिशा निर्देश भी जारी कर दिए हैं ताकि किसी भी तरह की ढ़ील अथवा लापरवाही नहीं हो।
यहां पर यह भी बता दें कि निजी क्षेत्र के छोटे बड़े अस्पतालों द्वारा भी अपना कचरा निस्तारण खुद नहीं किया जा सकता, बल्कि इस कार्य को वहां पर भी वहां के लिए तय एजेंसी ही कर सकती है। हालांकि निजी क्षेत्र के अस्पताल संचालक इसके निस्तारण के लिए लंबे अर्से से उन्हें अधिकार देने की मांग कर रहे हैं।
हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव धीरा खंडेलवाल का कहना है कि राज्य में सरकारी अस्पताल हों या फिर निजी अस्पताल सभी को मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए जारी किए दिशा निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना होगा। जिन एजेंसियों को फिलहाल कोरोना मेडिकल वेस्ट उठाने का जिम्मा दिया गया है, उन्हें भी बेहद सावधानी के साथ में सही निस्तारण के लिए कहा गया है, जिसको समय-समय पर चेक भी किया जा रहा है। इस संबंध में एचपीसी बोर्ड अधिकारी मानीटरिंग कर रहे हैं। अगर किसी भी तरह की कोई लापरवाही सामने आई, तो कार्रवाई करेंगे।
प्रदेश के गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज का कहना है कि मेडिकल वेस्ट के सही निस्तारण को लेकर हमने पहले से ही दिशा-निर्देश जारी किए हुए हैं। कोविड मेडिकल वेस्ट उठाने का काम जिन ठेकेदारों को दिया गया है, उस काम में कोई भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कुछ जिलों में जहां जहां पर भी शिकायत मिली हमने अधिकारियों को इस तरह के लोगों के विरुद्ध एक्शन के लिए कहा है।
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निजी छोटे-बड़े अस्पतालों द्वारा भी अपना कचरा निस्तारण खुद नहीं किया जा सकता, बल्कि इस कार्य को वहां पर भी वहां के लिए तय एजेंसी ही कर सकती है। योगेंद्र शर्मा. चंडीगढ़। हरियाणा में कोविड अस्पतालों से निकलने वाले कचरे के निस्तारण के लिए स्वास्थ्य मंत्री विज की ओर से जहां कचरा निस्तारण करने वाली एजेंसियों को खास दिशा निर्देश देकर उनका पूरी तरह से पालन करने के लिए कहा गया है। वहीं दूसरी तरफ मेडिकल वेस्ट कोरोना संक्रमण मरीजों का हो या फिर अन्य तरह का इससे किसी भी तरह से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं हो इस पर एनजीटी के दिशा निर्देशों का पालन कराने के लिए हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी पैनी नजर रखे हुए हैं। यहां पर उल्लेखनीय है कि पूरे राज्य में मेडिकल वेस्ट उठाने और इसका निस्तारण करने के लिए ग्यारह एजेंसियों को काम दिया गया है। केंद्र की ओर से जारी नियमों के हिसाब से ही मेडिकल वेस्ट के निस्तारण का काम किया जाता है। नियमों के मुताबिक सत्तर किलोग्राममीटर के दायरे में एक ही एजेंसी काम कर सकती है, इतना ही नहीं एजेंसियों की संख्या में इजाफा करने के लिए भी नियमों में बदलाव करना होगा, यह भी केंद्र की अनुमति से ही किया जाएगा। इन दिनों कोरोना संक्रमण की चुनौती औऱ मेडिकल वेस्ट भी कोविड अस्पतालों से ज्यादा निकल रहा है। भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि राज्य के कोविड अस्पतालों से प्रतिदिन लगभग एक कुंतल कचरा रोजाना निकल रहा है क्योंकि संक्रमण और संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इसके मेडिकल वेस्ट और दूसरे वेस्ट के निस्तारण के लिए बनाए गए नियमों के हिसाब से ही इसका निस्तारण एजेंसिया कर रही हैं। इस पर हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिकारी नजर रखते हैं। विभाग की मुखिया एसीएस धीरा खंडेलवाल का कहना है कि इस मामले में विभाग के अधिकारियों द्वारा नजर रखी जा रही हैं, इस संबंध में हमने मीटिंग लेकर दिशा निर्देश भी जारी कर दिए हैं ताकि किसी भी तरह की ढ़ील अथवा लापरवाही नहीं हो। यहां पर यह भी बता दें कि निजी क्षेत्र के छोटे बड़े अस्पतालों द्वारा भी अपना कचरा निस्तारण खुद नहीं किया जा सकता, बल्कि इस कार्य को वहां पर भी वहां के लिए तय एजेंसी ही कर सकती है। हालांकि निजी क्षेत्र के अस्पताल संचालक इसके निस्तारण के लिए लंबे अर्से से उन्हें अधिकार देने की मांग कर रहे हैं। हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव धीरा खंडेलवाल का कहना है कि राज्य में सरकारी अस्पताल हों या फिर निजी अस्पताल सभी को मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए जारी किए दिशा निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना होगा। जिन एजेंसियों को फिलहाल कोरोना मेडिकल वेस्ट उठाने का जिम्मा दिया गया है, उन्हें भी बेहद सावधानी के साथ में सही निस्तारण के लिए कहा गया है, जिसको समय-समय पर चेक भी किया जा रहा है। इस संबंध में एचपीसी बोर्ड अधिकारी मानीटरिंग कर रहे हैं। अगर किसी भी तरह की कोई लापरवाही सामने आई, तो कार्रवाई करेंगे। प्रदेश के गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज का कहना है कि मेडिकल वेस्ट के सही निस्तारण को लेकर हमने पहले से ही दिशा-निर्देश जारी किए हुए हैं। कोविड मेडिकल वेस्ट उठाने का काम जिन ठेकेदारों को दिया गया है, उस काम में कोई भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कुछ जिलों में जहां जहां पर भी शिकायत मिली हमने अधिकारियों को इस तरह के लोगों के विरुद्ध एक्शन के लिए कहा है।
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दिल्ली हिंसा मामले के ताजा घटनाक्रम में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला की अदालत ने गवाहों के समय, अदालत और सरकारी खजाने के पैसे का कथित रूप से अनादर करने के लिए अभियोजन पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
अदालत एक मामले (राज्य बनाम मोहम्मद शाहनवाज़ @ शानू और अन्य) की सुनवाई कर रही थी, जहां उत्तर पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित मामले में नौ मुस्लिम पुरुष आरोपी हैं।
अपने आदेश में, अदालत ने कहा कि एक "अप्रासंगिक गवाह" को अदालत के समक्ष पेश किया गया था। पेश किया गया व्यक्ति 25 फरवरी, 2020 को शाम 6 बजे हुई एक घटना का गवाह था, जबकि अदालत 24 और 25 फरवरी, 2020 की मध्यरात्रि को हुई एक घटना से संबंधित एक मामले की जांच कर रही थी।
अदालत ने कहा, "यह गवाह इस मामले के लिए बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं था और इसलिए, उसे बरी कर दिया गया और उसका नाम हटाया जा रहा है। दुर्भाग्य से, अप्रासंगिक और अनावश्यक गवाहों को छोड़ने के लिए कई मामलों में अभियोजन पक्ष को निर्देश देने के बावजूद, इस मामले में अभियोजन पक्ष के प्रतिनिधि यानी विशेष पीपी के साथ-साथ आईओ द्वारा ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है। इस तरह के निर्देश DCP, नॉर्थ ईस्ट को भी भेजे गए थे, लेकिन फिर भी इस मामले में कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा।
अभियोजन पक्ष की आलोचना करते हुए, अदालत ने कहा, "गवाह के समय का कोई सम्मान नहीं, इस अदालत का समय और सरकारी खजाने का पैसा, बार-बार निर्देशों के बावजूद अभियोजन पक्ष द्वारा दिखाया जा रहा है।" अदालत ने तब "अभियोजन पर 5000 / - की लागत लगाई," पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) उत्तर पूर्व को "जिम्मेदार व्यक्ति से ऐसी लागत राशि वसूल करने के लिए, जवाबदेही तय करने के लिए आगे जांच करने के लिए" निर्देश दिया।"
मामला 30 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया था। पूरा आदेश यहां पढ़ा जा सकता हैः
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दिल्ली हिंसा मामले के ताजा घटनाक्रम में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला की अदालत ने गवाहों के समय, अदालत और सरकारी खजाने के पैसे का कथित रूप से अनादर करने के लिए अभियोजन पर पाँच,शून्य रुपयापये का जुर्माना लगाया। अदालत एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जहां उत्तर पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित मामले में नौ मुस्लिम पुरुष आरोपी हैं। अपने आदेश में, अदालत ने कहा कि एक "अप्रासंगिक गवाह" को अदालत के समक्ष पेश किया गया था। पेश किया गया व्यक्ति पच्चीस फरवरी, दो हज़ार बीस को शाम छः बजे हुई एक घटना का गवाह था, जबकि अदालत चौबीस और पच्चीस फरवरी, दो हज़ार बीस की मध्यरात्रि को हुई एक घटना से संबंधित एक मामले की जांच कर रही थी। अदालत ने कहा, "यह गवाह इस मामले के लिए बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं था और इसलिए, उसे बरी कर दिया गया और उसका नाम हटाया जा रहा है। दुर्भाग्य से, अप्रासंगिक और अनावश्यक गवाहों को छोड़ने के लिए कई मामलों में अभियोजन पक्ष को निर्देश देने के बावजूद, इस मामले में अभियोजन पक्ष के प्रतिनिधि यानी विशेष पीपी के साथ-साथ आईओ द्वारा ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है। इस तरह के निर्देश DCP, नॉर्थ ईस्ट को भी भेजे गए थे, लेकिन फिर भी इस मामले में कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। अभियोजन पक्ष की आलोचना करते हुए, अदालत ने कहा, "गवाह के समय का कोई सम्मान नहीं, इस अदालत का समय और सरकारी खजाने का पैसा, बार-बार निर्देशों के बावजूद अभियोजन पक्ष द्वारा दिखाया जा रहा है।" अदालत ने तब "अभियोजन पर पाँच हज़ार / - की लागत लगाई," पुलिस उपायुक्त उत्तर पूर्व को "जिम्मेदार व्यक्ति से ऐसी लागत राशि वसूल करने के लिए, जवाबदेही तय करने के लिए आगे जांच करने के लिए" निर्देश दिया।" मामला तीस नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया था। पूरा आदेश यहां पढ़ा जा सकता हैः अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।
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झारखंड में लॉकडाउन के बीच युवती को घर पर अकेला पाकर चचेरा भाई ने अपने पांच दोस्तो के साथ-साथ मिलकर गैंगरेप की किया. जिसके पीड़िता की मौसी ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कराया.
रांचीः झारखंड के चाईबासा इलाके से रिश्ते को शर्मसार कर देने वाली एक खबर आई है, जिसमें लॉकडाउन के बीच नाबालिग युवती को घर पर अकेला पा कर चचेरा भाई ने अपने पांच दोस्तो के साथ-साथ मिलकर गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया है. घटना पश्चिमी सिंहभूम जिले के टोकलो की है, जहां लॉकडाउन में कोलकाता में फंसे मां-बाप की नाबालिग बेटी के साथ इस घटना को अंजाम दिया गया. पुलिस के मुताबिक, इस गैंगरेप को पीड़िता के चचेरे भाई ने अपने पांच दोस्तों के साथ मिलकर अंजाम दिया है.
पुलिस ने बताया है कि वारदात बीते शनिवार की है. बच्ची के बयान पर केस दर्ज कर पुलिस ने सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. सभी आरोपी गांव के ही हैं. पीड़िता के मां-बाप कोलकाता के ईंट-भट्ठे में काम करते हैं. बताया जा रहा है कि थाने में दर्ज मामले के मुताबिक, बच्ची शनिवार शाम को शौच के लिए खेत गई थी, इसी दौरान चचेरे भाई ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर गैंगरेप किया, इस वारदात के बारे में किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी. आरोपियों की धमकी से डरी बच्ची एक दिन तक तो किसी तरह अपने घर में चुप रही. लेकिन, सोमवार सुबह उसने अपनी मौसी को वारदात के बारे में बता दिया, मौसी ने पीड़िता के साथ टोकलो थाना पहुंचकर आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कराया. .
मामला दर्ज कर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सभी छह आरोपियों महेंद्र बांकिरा, विजय बांकिरा, चंदन हांसदा, राजकुमार तांती, रावकन केराई व चुनमुन केराई को गांव से गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस ने पीडिता को मेडिकल जांच कराने के लिए चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल भेज दिया है. लेकिन, चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल में महिला चिकित्सक नहीं होने के कारण उसे सदर अस्पताल चाईबासा रेफर कर दिया गया है, जहां बोर्ड गठन के बाद उसकी मेडिकल जांच होगी. टोकलो पुलिस ने पोस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है. थानाप्रभारी रघुनाथ किस्कू ने बताया कि वारदात में शामिल सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. आरोपियों के खिलाफ 376-डी आईपीसी एवं पोस्को एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है. नाबालिग बच्ची के माता-पिता कोलकाता में लॉकडाउन में फंसे हुए हैं. पीडिता अपने परिजनों के साथ गांव में रहती है.
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झारखंड में लॉकडाउन के बीच युवती को घर पर अकेला पाकर चचेरा भाई ने अपने पांच दोस्तो के साथ-साथ मिलकर गैंगरेप की किया. जिसके पीड़िता की मौसी ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कराया. रांचीः झारखंड के चाईबासा इलाके से रिश्ते को शर्मसार कर देने वाली एक खबर आई है, जिसमें लॉकडाउन के बीच नाबालिग युवती को घर पर अकेला पा कर चचेरा भाई ने अपने पांच दोस्तो के साथ-साथ मिलकर गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया है. घटना पश्चिमी सिंहभूम जिले के टोकलो की है, जहां लॉकडाउन में कोलकाता में फंसे मां-बाप की नाबालिग बेटी के साथ इस घटना को अंजाम दिया गया. पुलिस के मुताबिक, इस गैंगरेप को पीड़िता के चचेरे भाई ने अपने पांच दोस्तों के साथ मिलकर अंजाम दिया है. पुलिस ने बताया है कि वारदात बीते शनिवार की है. बच्ची के बयान पर केस दर्ज कर पुलिस ने सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. सभी आरोपी गांव के ही हैं. पीड़िता के मां-बाप कोलकाता के ईंट-भट्ठे में काम करते हैं. बताया जा रहा है कि थाने में दर्ज मामले के मुताबिक, बच्ची शनिवार शाम को शौच के लिए खेत गई थी, इसी दौरान चचेरे भाई ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर गैंगरेप किया, इस वारदात के बारे में किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी. आरोपियों की धमकी से डरी बच्ची एक दिन तक तो किसी तरह अपने घर में चुप रही. लेकिन, सोमवार सुबह उसने अपनी मौसी को वारदात के बारे में बता दिया, मौसी ने पीड़िता के साथ टोकलो थाना पहुंचकर आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कराया. . मामला दर्ज कर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सभी छह आरोपियों महेंद्र बांकिरा, विजय बांकिरा, चंदन हांसदा, राजकुमार तांती, रावकन केराई व चुनमुन केराई को गांव से गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस ने पीडिता को मेडिकल जांच कराने के लिए चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल भेज दिया है. लेकिन, चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल में महिला चिकित्सक नहीं होने के कारण उसे सदर अस्पताल चाईबासा रेफर कर दिया गया है, जहां बोर्ड गठन के बाद उसकी मेडिकल जांच होगी. टोकलो पुलिस ने पोस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है. थानाप्रभारी रघुनाथ किस्कू ने बताया कि वारदात में शामिल सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. आरोपियों के खिलाफ तीन सौ छिहत्तर-डी आईपीसी एवं पोस्को एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है. नाबालिग बच्ची के माता-पिता कोलकाता में लॉकडाउन में फंसे हुए हैं. पीडिता अपने परिजनों के साथ गांव में रहती है.
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मनोज बनैता, सिरहा,१७ माघ । सिराहा का सखुवानान्कारकट्टी गाउँपालिका आर्थिक वर्ष २०७४ / ७५ के लिए १८ करोड ८४ लाख ३४ हजार ७ सौ ६६ रुपैया ५७ पैसा का बजेट सार्वजनिक किया गया है । चालू खर्च के तरफ दो करोड ९३ लाख ६५ हजार और पूँजीगत तरफ से ६ करोड ९७ लाख २५ हजार ईसीतरह वडा स्तरीय कार्यक्रम के लिए २ करोड ९० हजार बजेट विनियोजन किया गया है । शिक्षा,स्वास्थ्य,पशु और कृषि लगायत के विभिन्न विषय करके जम्मा ६ करोड ३ लाख ४४ हजार विनियोजन किया गया है । पत्रकार सम्मेलन मार्फत सार्वजनिक किए गए बजेटिङ्ग कार्यक्रम मे अध्यक्ष केदार यादव ने विकास निमार्ण के तरफ ठोस योजना के रूपमे २५ किलोमिटर ग्राबेल रिङ्ग रोड विस्तार और २ किलोमिटर सडक पिच करने मे जोड दिया है । शिक्षा के सवाल मे प्रत्येक वडा में एक नमूना विद्यालय और कथित दलित को गाउँपालिका से सिफारिस के लिए लिएजानेवाले दस्तुर मे ५० प्रतिशत छुट का भी घोषणा किया है । उसीतरह स्वास्थ प्रक्रिया को सहज करने के लिए एम्बुलेन्स खरिद प्रक्रिया भी शुरु होनेका घोषणा हुवा है । अध्यक्ष केदार यादव सिरहा का सबसे जुनियर युवा अध्यक्ष है पर उनके बिकास योजना से स्थानीय बहुत प्रभावित दिखरही है ।
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मनोज बनैता, सिरहा,सत्रह माघ । सिराहा का सखुवानान्कारकट्टी गाउँपालिका आर्थिक वर्ष दो हज़ार चौहत्तर / पचहत्तर के लिए अट्ठारह करोड चौरासी लाख चौंतीस हजार सात सौ छयासठ रुपयापैया सत्तावन पैसा का बजेट सार्वजनिक किया गया है । चालू खर्च के तरफ दो करोड तिरानवे लाख पैंसठ हजार और पूँजीगत तरफ से छः करोड सत्तानवे लाख पच्चीस हजार ईसीतरह वडा स्तरीय कार्यक्रम के लिए दो करोड नब्बे हजार बजेट विनियोजन किया गया है । शिक्षा,स्वास्थ्य,पशु और कृषि लगायत के विभिन्न विषय करके जम्मा छः करोड तीन लाख चौंतालीस हजार विनियोजन किया गया है । पत्रकार सम्मेलन मार्फत सार्वजनिक किए गए बजेटिङ्ग कार्यक्रम मे अध्यक्ष केदार यादव ने विकास निमार्ण के तरफ ठोस योजना के रूपमे पच्चीस किलोग्राममिटर ग्राबेल रिङ्ग रोड विस्तार और दो किलोग्राममिटर सडक पिच करने मे जोड दिया है । शिक्षा के सवाल मे प्रत्येक वडा में एक नमूना विद्यालय और कथित दलित को गाउँपालिका से सिफारिस के लिए लिएजानेवाले दस्तुर मे पचास प्रतिशत छुट का भी घोषणा किया है । उसीतरह स्वास्थ प्रक्रिया को सहज करने के लिए एम्बुलेन्स खरिद प्रक्रिया भी शुरु होनेका घोषणा हुवा है । अध्यक्ष केदार यादव सिरहा का सबसे जुनियर युवा अध्यक्ष है पर उनके बिकास योजना से स्थानीय बहुत प्रभावित दिखरही है ।
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कुश अग्रवाल-कसडोल। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में भालू के हमले से एक युवक की मौत का मामला सामने आया है। भालू ने अचानक राकेश नाम के युवक पर हमला कर दिया जिससे राकेश की मौके पर ही मौत हो गई। वन विभाग और पुलिस की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मामला कसडोल थाना क्षेत्र का है।
मिली जानकारी के अनुसार, बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखंड के अंतर्गत वन परिक्षेत्र सोनाखान के झालपानी बीट में भालू के हमले से एक युवक की मौत हो गई है। झालपानी निवासी राकेश पारधी अपने दोस्त दुलरवा पैकरा के साथ भैंस चराने टीटही पठार गया हुआ था। इसी बीच भालू ने अचानक राकेश पर हमला कर दिया।
दुलरवा अपने दोस्त राकेश को बचाने के लिए भालू को डंडे से पीट रहा था। जिसके बाद राकेश को छोड़ भालू दुलरवा पर हमला करने दौड़ा तो दुलरवा अपनी जान बचा कर भागा। इस घटना की सूचना मिलने पर वन परिक्षेत्र अधिकारी और कसडोल पुलिस मौके पर पहुंची। शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। वहीं वन परिक्षेत्र अधिकारी योगेश्वर नादिया ने बताया कि, मृतक के परिवार को दस हजार रुपयों की तत्काल सहायता राशि दी गई है। उल्लेखनीय है कि, भालू के हमले से मृत्यु पर 6 लाख के मुआवजे का प्रावधान है, जो मृतक के परिवार को मिलेंगे।
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कुश अग्रवाल-कसडोल। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में भालू के हमले से एक युवक की मौत का मामला सामने आया है। भालू ने अचानक राकेश नाम के युवक पर हमला कर दिया जिससे राकेश की मौके पर ही मौत हो गई। वन विभाग और पुलिस की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मामला कसडोल थाना क्षेत्र का है। मिली जानकारी के अनुसार, बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखंड के अंतर्गत वन परिक्षेत्र सोनाखान के झालपानी बीट में भालू के हमले से एक युवक की मौत हो गई है। झालपानी निवासी राकेश पारधी अपने दोस्त दुलरवा पैकरा के साथ भैंस चराने टीटही पठार गया हुआ था। इसी बीच भालू ने अचानक राकेश पर हमला कर दिया। दुलरवा अपने दोस्त राकेश को बचाने के लिए भालू को डंडे से पीट रहा था। जिसके बाद राकेश को छोड़ भालू दुलरवा पर हमला करने दौड़ा तो दुलरवा अपनी जान बचा कर भागा। इस घटना की सूचना मिलने पर वन परिक्षेत्र अधिकारी और कसडोल पुलिस मौके पर पहुंची। शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। वहीं वन परिक्षेत्र अधिकारी योगेश्वर नादिया ने बताया कि, मृतक के परिवार को दस हजार रुपयों की तत्काल सहायता राशि दी गई है। उल्लेखनीय है कि, भालू के हमले से मृत्यु पर छः लाख के मुआवजे का प्रावधान है, जो मृतक के परिवार को मिलेंगे।
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आगरा। पिछली बार रिजेक्ट होने के बाद आगरा मास्टर प्लान 2031 का ड्राफ्ट अब आगामी 5 जनवरी को होने वाली आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) की बोर्ड की बैठक में फिर से रखा जाएगा। मंगलवार को प्राधिकरण में बोर्ड बैठक की तैयारियों के लिए एडीए उपाध्यक्ष ने अधिकारियों के साथ बैठक की जिसमें संशोधनों के बाद ड्राफ्ट रखने के लिए कहा गया।
बताते चलें कि 31 मार्च 2021 को मास्टर प्लान 2031 लागू होना था लेकिन ड्राफ्ट तैयार कर रही कंपनी रुद्राभिषेक 1 साल की देरी के बाद इस ड्राफ़्ट को तैयार कर सकी। उसमें भी कई खामियां थी जिसके चलते कंपनी को शासन और प्रशासन से कड़ी फटकार भी लगी। संशोधन के साथ फिर से आगरा मास्टर प्लान ड्राफ्ट को बोर्ड में मंजूरी के लिए रखा जाएगा।
एडीए उपाध्यक्ष डॉ राजेंद्र पेंसिया ने बताया कि 5 दिसंबर को एडीए बोर्ड की बैठक है। इसमें मास्टर प्लान पेश किया जाएगा। स्वीकृत होने के बाद जनता की आपत्तियां और सुझाव मांगे जाएंगे। इसके लिए शहर में नगर निगम, कलेक्ट्रेट आदि जगहों पर मास्टर प्लान का ड्राफ्ट रखा जाएगा।
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आगरा। पिछली बार रिजेक्ट होने के बाद आगरा मास्टर प्लान दो हज़ार इकतीस का ड्राफ्ट अब आगामी पाँच जनवरी को होने वाली आगरा विकास प्राधिकरण की बोर्ड की बैठक में फिर से रखा जाएगा। मंगलवार को प्राधिकरण में बोर्ड बैठक की तैयारियों के लिए एडीए उपाध्यक्ष ने अधिकारियों के साथ बैठक की जिसमें संशोधनों के बाद ड्राफ्ट रखने के लिए कहा गया। बताते चलें कि इकतीस मार्च दो हज़ार इक्कीस को मास्टर प्लान दो हज़ार इकतीस लागू होना था लेकिन ड्राफ्ट तैयार कर रही कंपनी रुद्राभिषेक एक साल की देरी के बाद इस ड्राफ़्ट को तैयार कर सकी। उसमें भी कई खामियां थी जिसके चलते कंपनी को शासन और प्रशासन से कड़ी फटकार भी लगी। संशोधन के साथ फिर से आगरा मास्टर प्लान ड्राफ्ट को बोर्ड में मंजूरी के लिए रखा जाएगा। एडीए उपाध्यक्ष डॉ राजेंद्र पेंसिया ने बताया कि पाँच दिसंबर को एडीए बोर्ड की बैठक है। इसमें मास्टर प्लान पेश किया जाएगा। स्वीकृत होने के बाद जनता की आपत्तियां और सुझाव मांगे जाएंगे। इसके लिए शहर में नगर निगम, कलेक्ट्रेट आदि जगहों पर मास्टर प्लान का ड्राफ्ट रखा जाएगा।
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है । उसके प्रयोग दुरूद्दता और सामाजिकता के दोष से दूषित होते हैं । वह । भाषा और संगीत के पुराने परम्परागत साँचों को तोड़ कर नवीनता के पीछे भटकता है । पाश्चात्य कला और साहित्य में प्रयोगवाद ऐसे ही चिन्तनीय रूपों में प्रकट हुआ है। उसकी दृष्टि सर्वथा नकारात्मक रही है । कलाकार मानों अपनी कला के माध्यम से कुछ भी व्यक्त नहीं करना चाहता । वह बेल-बूटे और शिल्प को ही कला का चरम लक्ष्य मान बैठता है । किसी समाज-विशेष के ह्रास-काल में ही कला ऐसे गुण प्रकट करती है । वह न तो जीवन को आगे बढ़ने में कोई स्फूति दे सकती है, न कोई नया सौन्दर्य ही रच पाती है। पाश्चात्य देशों के यह प्रयोगवादी कलाकार बहुधा मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न हैं, किन्तु प्रयोग और रूप-मात्र की मृग-मरीचिका के पीछे वे निरर्थक भटकते रह जाते हैं, और उत्कृष्ट कला का सृजन नहीं कर पाते ।
पहले 'सप्तक' के कवियों पर अपेक्षाकृत प्रयोगवाद का अधिक प्रभाव था । उनमें से अधिकतर तरुण साहित्यिक थे । वह चाय या सिगरेट के शौक को ही सामाजिक विद्रोह का बड़ा भारी प्रतीक मान बैठे थे । उस काल में कला के परम्परागत रूपों के प्रति विद्रोह प्रगतिशीलता का चिह्न समझा जाता था । किन्तु जबातेधष्टहैं। उसी अनुपात में दूसरे 'सप्तक' के अधिकतर कवियों की दृष्टि भी हम अधिक स्वस्थ और स्वच्छ पाते हैं । कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि दूसरे 'सप्तक' के कवियों में पहले की अपेक्षा अधिक काव्य-प्रतिभा है । दूसरे 'सप्तक' के कवि प्रयोगवाद से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं, और बहुधा अपनी बात को पाठक तक तीर की भाँति पहुँचाना चाहते हैं ।
भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'मंगल-वर्षा' कवि की अनुभूति को सहज स्वाभाविक और मधुर रूप देती है। कवि वर्मा का वर्णन करता है.
"पी के फूटे आज प्यार के पानी बरसा री । हरियाली छा गई, हमारे सावन सरसा री । री ।
धरती फूली री । भूली-भूली री । दादुर बोले री। अन्ध प्राण हो वहां, उड़े पंछी अनमोले री ।
छन-छन उठी हिलोर, मगन मन पागल दरसा री । । पी के फूटे श्राज प्यार के पानी बरसा री ।"
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है । उसके प्रयोग दुरूद्दता और सामाजिकता के दोष से दूषित होते हैं । वह । भाषा और संगीत के पुराने परम्परागत साँचों को तोड़ कर नवीनता के पीछे भटकता है । पाश्चात्य कला और साहित्य में प्रयोगवाद ऐसे ही चिन्तनीय रूपों में प्रकट हुआ है। उसकी दृष्टि सर्वथा नकारात्मक रही है । कलाकार मानों अपनी कला के माध्यम से कुछ भी व्यक्त नहीं करना चाहता । वह बेल-बूटे और शिल्प को ही कला का चरम लक्ष्य मान बैठता है । किसी समाज-विशेष के ह्रास-काल में ही कला ऐसे गुण प्रकट करती है । वह न तो जीवन को आगे बढ़ने में कोई स्फूति दे सकती है, न कोई नया सौन्दर्य ही रच पाती है। पाश्चात्य देशों के यह प्रयोगवादी कलाकार बहुधा मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न हैं, किन्तु प्रयोग और रूप-मात्र की मृग-मरीचिका के पीछे वे निरर्थक भटकते रह जाते हैं, और उत्कृष्ट कला का सृजन नहीं कर पाते । पहले 'सप्तक' के कवियों पर अपेक्षाकृत प्रयोगवाद का अधिक प्रभाव था । उनमें से अधिकतर तरुण साहित्यिक थे । वह चाय या सिगरेट के शौक को ही सामाजिक विद्रोह का बड़ा भारी प्रतीक मान बैठे थे । उस काल में कला के परम्परागत रूपों के प्रति विद्रोह प्रगतिशीलता का चिह्न समझा जाता था । किन्तु जबातेधष्टहैं। उसी अनुपात में दूसरे 'सप्तक' के अधिकतर कवियों की दृष्टि भी हम अधिक स्वस्थ और स्वच्छ पाते हैं । कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि दूसरे 'सप्तक' के कवियों में पहले की अपेक्षा अधिक काव्य-प्रतिभा है । दूसरे 'सप्तक' के कवि प्रयोगवाद से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं, और बहुधा अपनी बात को पाठक तक तीर की भाँति पहुँचाना चाहते हैं । भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'मंगल-वर्षा' कवि की अनुभूति को सहज स्वाभाविक और मधुर रूप देती है। कवि वर्मा का वर्णन करता है. "पी के फूटे आज प्यार के पानी बरसा री । हरियाली छा गई, हमारे सावन सरसा री । री । धरती फूली री । भूली-भूली री । दादुर बोले री। अन्ध प्राण हो वहां, उड़े पंछी अनमोले री । छन-छन उठी हिलोर, मगन मन पागल दरसा री । । पी के फूटे श्राज प्यार के पानी बरसा री ।"
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PLFI के खिलाफ लगातार मुहिम चला रही रांची पुलिस को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। पुलिस PLFI के नक्सली कृष्णा यादव उर्फ तूफान उर्फ सुल्तान को गिरफ्तार कर ली है। इसके खिलाफ लातेहार, लोहरदगा, चतरा और हजारीबाग के विभिन्न थाना क्षेत्रों में 30 से ज्यादा मामले दर्ज हैं।
ये उन इलाके में चल रहे विकास कार्यों को बाधित करता था। वहां के कॉन्ट्रेक्टर, ईंट भट्ठा मालिकों, व्यवसायियों से लेवी वसूलता था। कोलियरी में आगजनी की घटना को अंजाम देकर अपना डर कायम करता था। रांची पुलिस से पूछताछ में ये अभी तक 29 घटना में शामिल होने की बात स्वीकार कर लिया गया है।
रांची SSP एसके झा ने गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी 30 नवंबर को मिली थी कि यह लोहरदगा के सेन्हा थाना के साके गढ़ गांव में छुपा हुआ है। सूचना मिलने के बाद एक विशेष टीम का गठन किया गया। साथ ही वहां की स्थानीय पुलिस की मदद से पूर्व में मिली सूचना के आधार पर छापेमारी की गई और इसे गिरफ्तार किया गया। पुलिस इससे फिलहाल पूछताछ कर रही है।
पुलिस इसके पास देसी कार्बाइन बरामद की है जिसमें मैगजीन लगा हुआ है। इसके अलावा नौ MM की 13 जिंदा गोली, विभिन्न तरह की दवाइयां कैमोफ्लाई की पाउच और प्रतिबंधित PLFI संगठन का लैटर पैड भी उसके यहां से बरामद किया गया है।
इस ऑपरेशन की अगुआई खलारी DSP मनोज कुमार और लोहरदगा हेडक्वार्टर DSP परमेश्वर प्रसाद कर रहे थे। इनके साथ चान्हो, मांडर, सेन्हा, तकनीकी शाखा व अन्य जवान शामिल थे।
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PLFI के खिलाफ लगातार मुहिम चला रही रांची पुलिस को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। पुलिस PLFI के नक्सली कृष्णा यादव उर्फ तूफान उर्फ सुल्तान को गिरफ्तार कर ली है। इसके खिलाफ लातेहार, लोहरदगा, चतरा और हजारीबाग के विभिन्न थाना क्षेत्रों में तीस से ज्यादा मामले दर्ज हैं। ये उन इलाके में चल रहे विकास कार्यों को बाधित करता था। वहां के कॉन्ट्रेक्टर, ईंट भट्ठा मालिकों, व्यवसायियों से लेवी वसूलता था। कोलियरी में आगजनी की घटना को अंजाम देकर अपना डर कायम करता था। रांची पुलिस से पूछताछ में ये अभी तक उनतीस घटना में शामिल होने की बात स्वीकार कर लिया गया है। रांची SSP एसके झा ने गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी तीस नवंबर को मिली थी कि यह लोहरदगा के सेन्हा थाना के साके गढ़ गांव में छुपा हुआ है। सूचना मिलने के बाद एक विशेष टीम का गठन किया गया। साथ ही वहां की स्थानीय पुलिस की मदद से पूर्व में मिली सूचना के आधार पर छापेमारी की गई और इसे गिरफ्तार किया गया। पुलिस इससे फिलहाल पूछताछ कर रही है। पुलिस इसके पास देसी कार्बाइन बरामद की है जिसमें मैगजीन लगा हुआ है। इसके अलावा नौ MM की तेरह जिंदा गोली, विभिन्न तरह की दवाइयां कैमोफ्लाई की पाउच और प्रतिबंधित PLFI संगठन का लैटर पैड भी उसके यहां से बरामद किया गया है। इस ऑपरेशन की अगुआई खलारी DSP मनोज कुमार और लोहरदगा हेडक्वार्टर DSP परमेश्वर प्रसाद कर रहे थे। इनके साथ चान्हो, मांडर, सेन्हा, तकनीकी शाखा व अन्य जवान शामिल थे। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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PATNA : बिहार में कई सालों से मॉनसून की बेरुखी से सूखे की मार झेल रहे किसान अब सरकार की बेदर्दी भी सहने को मजबूर हैं। सूखे से परेशान सूबे के कई जिलों में किसान फसलों को बचाने के लिए अक्सर पंपसेट का इस्तेमाल करते हैं जिनके लिए उन्हें डीजल की जरुरत पड़ती है। डीजल की जरुरत उन सभी व्यावसायिक वाहनों में पड़ती है जिनसे सब्जी, कच्च्चा माल आदि रोजमर्रा की जरुरत की वस्तुएं ढोई जाती हैं। डीजल बिहार में इस वक्त भ्फ्. फ्8 रू प्रति लीटर है। यही डीजल यूपी में भ्ख्. फ्7 रू प्रति लीटर, देहरादून में भ्ख्. म्भ्रू जबकि दिल्ली और गौहाटी में भ्क् रू प्रति लीटर है।
डीजल के रेट का ये अंतर स्थानीय टैक्स के कारण है जो राज्य सरकार लगाती है। ये टैक्स राज्य सरकार अपना रेवेन्यू बढ़ाने के लिए वैट या एक्साइज टैक्स के रुप में लगाती है। अब पहले से ही तबाह किसानों और आम आदमी की परेशानी इस अतिरिक्त रेट के कारण और बढ़ जाती है। सूबे में रोजमर्रा की जरुरत की चीजों के रेट बढ़ने के पीछे भी ये एक बड़ी वजह है। आलू-प्याज से लेकर सब्जियों तक और दाल, तेल के दाम भी कई बार डीजल के रेट से प्रभावित होते हैं। जैसे-जैसे ट्रांसपोर्टेशन चार्ज बढ़ेगा, वस्तुओं के मूल्य भी बढ़ेंगे।
बिहार में नए साल से इनवर्टर, यूपीएस, सौन्दर्य प्रसाधन, पैक्ड नमकीन, रेडिमेड कपड़े और ख्000 रू से ज्यादा की साडि़यों समेत कई अन्य चीजों पर सरकार ने क्फ्. भ् फीसदी तक वैट लगा दिया। यानि एक ओर तो केन्द्र सरकार का सर्विस टैक्स और महंगाई, उसके साथ राज्य सरकार की रेवेन्यू बढ़ाने की कवायद ने किसानों के साथ आम आदमी के घर का बजट बिगाड़ दिया।
क्यों हो रही है ये कवायद?
बिहार में विभिन्न वस्तुओं पर वैट लगाने और पहले से लागू वैट की दर बढ़ाने की कवायद के पीछे भी बड़ी वजह है। दरअसल बिहार के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा शराब की बिक्री से आता था। लेकिन पहले देसी और फिर पूर्ण शराब बिक्री को देखते हुए सरकार को रेवेन्यू जेनरेट करने के लिए ये फैसला लेना पड़ा। जाहिर है इसका भार आम लोगों पर ही पड़ा। यानि शराबबंदी के फायदों के साथ इसके साइड इफेक्ट ने लोगों और खासकर किसानों पर दोहरी मार की है।
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PATNA : बिहार में कई सालों से मॉनसून की बेरुखी से सूखे की मार झेल रहे किसान अब सरकार की बेदर्दी भी सहने को मजबूर हैं। सूखे से परेशान सूबे के कई जिलों में किसान फसलों को बचाने के लिए अक्सर पंपसेट का इस्तेमाल करते हैं जिनके लिए उन्हें डीजल की जरुरत पड़ती है। डीजल की जरुरत उन सभी व्यावसायिक वाहनों में पड़ती है जिनसे सब्जी, कच्च्चा माल आदि रोजमर्रा की जरुरत की वस्तुएं ढोई जाती हैं। डीजल बिहार में इस वक्त भ्फ्. फ्आठ रू प्रति लीटर है। यही डीजल यूपी में भ्ख्. फ्सात रू प्रति लीटर, देहरादून में भ्ख्. म्भ्रू जबकि दिल्ली और गौहाटी में भ्क् रू प्रति लीटर है। डीजल के रेट का ये अंतर स्थानीय टैक्स के कारण है जो राज्य सरकार लगाती है। ये टैक्स राज्य सरकार अपना रेवेन्यू बढ़ाने के लिए वैट या एक्साइज टैक्स के रुप में लगाती है। अब पहले से ही तबाह किसानों और आम आदमी की परेशानी इस अतिरिक्त रेट के कारण और बढ़ जाती है। सूबे में रोजमर्रा की जरुरत की चीजों के रेट बढ़ने के पीछे भी ये एक बड़ी वजह है। आलू-प्याज से लेकर सब्जियों तक और दाल, तेल के दाम भी कई बार डीजल के रेट से प्रभावित होते हैं। जैसे-जैसे ट्रांसपोर्टेशन चार्ज बढ़ेगा, वस्तुओं के मूल्य भी बढ़ेंगे। बिहार में नए साल से इनवर्टर, यूपीएस, सौन्दर्य प्रसाधन, पैक्ड नमकीन, रेडिमेड कपड़े और ख्शून्य रू से ज्यादा की साडि़यों समेत कई अन्य चीजों पर सरकार ने क्फ्. भ् फीसदी तक वैट लगा दिया। यानि एक ओर तो केन्द्र सरकार का सर्विस टैक्स और महंगाई, उसके साथ राज्य सरकार की रेवेन्यू बढ़ाने की कवायद ने किसानों के साथ आम आदमी के घर का बजट बिगाड़ दिया। क्यों हो रही है ये कवायद? बिहार में विभिन्न वस्तुओं पर वैट लगाने और पहले से लागू वैट की दर बढ़ाने की कवायद के पीछे भी बड़ी वजह है। दरअसल बिहार के रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा शराब की बिक्री से आता था। लेकिन पहले देसी और फिर पूर्ण शराब बिक्री को देखते हुए सरकार को रेवेन्यू जेनरेट करने के लिए ये फैसला लेना पड़ा। जाहिर है इसका भार आम लोगों पर ही पड़ा। यानि शराबबंदी के फायदों के साथ इसके साइड इफेक्ट ने लोगों और खासकर किसानों पर दोहरी मार की है।
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स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में कमाल का प्रदर्शन करते हुए दो पदक जीते। इस बीच कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) के ब्रॉन्ज मेडलिस्ट वेटलिफ्टर गुरदीप सिंह ने काफी निराश किया। वह अपनी स्पर्धा में 21वें जगह पर रहे। यह राष्ट्रमंडल खेलों में उनके प्रदर्शन से भी काफी खराब है। हिंदुस्तान को इस प्रतियोगिता में दोनों पदक मीराबाई चानू ने दिलाए।
राष्ट्रमंडल खेलों के कांस्य पदक विजेता भारोत्तोलक गुरदीप सिंह ने बोगोटा में विश्व चैंपियनशिप में निराशाजनक प्रदर्शन करते हुए मर्दों के 109 किग्रा से अधिक के भार वर्ग में 21वां जगह हासिल किया। ग्रुप-सी में प्रतिस्पर्धा पेश करते हुए हिंदुस्तान के इस वेटलिफ्टर ने 350 किग्रा (145 किग्रा और 205 किग्रा) वजन उठाया जो इस वर्ष के प्रारम्भ में राष्ट्रमंडल खेलों में दिखाए गए प्रदर्शन से 40 किग्रा कम है।
भारत ने इस प्रतियोगिता में सिर्फ दो पदक जीते। उसे यह दोनों पदक स्टार भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने दिलाए। चानू ने पिछले हफ्ते स्त्रियों के 49 किग्रा भार वर्ग में दो रजत पदक जीते। इनमें से एक पदक उन्होंने क्लीन एवं जर्क वर्ग में जबकि दूसरा पदक कुल भार में हासिल किया। महाद्वीपीय और विश्व चैंपियनशिप में स्नैच, क्लीन एवं जर्क तथा कुल भार में भिन्न भिन्न पदक दिए जाते हैं। ओलंपिक में सिर्फ कुल भार के लिए पदक दिए जाते हैं।
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स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में कमाल का प्रदर्शन करते हुए दो पदक जीते। इस बीच कॉमनवेल्थ गेम्स के ब्रॉन्ज मेडलिस्ट वेटलिफ्टर गुरदीप सिंह ने काफी निराश किया। वह अपनी स्पर्धा में इक्कीसवें जगह पर रहे। यह राष्ट्रमंडल खेलों में उनके प्रदर्शन से भी काफी खराब है। हिंदुस्तान को इस प्रतियोगिता में दोनों पदक मीराबाई चानू ने दिलाए। राष्ट्रमंडल खेलों के कांस्य पदक विजेता भारोत्तोलक गुरदीप सिंह ने बोगोटा में विश्व चैंपियनशिप में निराशाजनक प्रदर्शन करते हुए मर्दों के एक सौ नौ किग्रा से अधिक के भार वर्ग में इक्कीसवां जगह हासिल किया। ग्रुप-सी में प्रतिस्पर्धा पेश करते हुए हिंदुस्तान के इस वेटलिफ्टर ने तीन सौ पचास किग्रा वजन उठाया जो इस वर्ष के प्रारम्भ में राष्ट्रमंडल खेलों में दिखाए गए प्रदर्शन से चालीस किग्रा कम है। भारत ने इस प्रतियोगिता में सिर्फ दो पदक जीते। उसे यह दोनों पदक स्टार भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने दिलाए। चानू ने पिछले हफ्ते स्त्रियों के उनचास किग्रा भार वर्ग में दो रजत पदक जीते। इनमें से एक पदक उन्होंने क्लीन एवं जर्क वर्ग में जबकि दूसरा पदक कुल भार में हासिल किया। महाद्वीपीय और विश्व चैंपियनशिप में स्नैच, क्लीन एवं जर्क तथा कुल भार में भिन्न भिन्न पदक दिए जाते हैं। ओलंपिक में सिर्फ कुल भार के लिए पदक दिए जाते हैं।
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- Travel आखिर क्यों कोई नहीं कर पाया कैलाश पर्वत की चढ़ाई? क्या है इसका वैज्ञानिक कारण?
चारधाम यात्रा पर जाने वाले 60 से ज्यादा तीर्थयात्रियों की अब तक मौत हो चुकी है। इनमें 66% लोग डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीज थे। केदारनाथ यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं। गौरतलब है कि उत्तराखंड में कोरोना महामारी के चलते पिछले दो साल से चारधाम यात्रा नहीं हो रही थी।
इस बार चारधाम यात्रा शुरू हुई है तो श्रद्धालुओं की भीड़ बड़ी संख्या में यात्रा करने निकली है। केदारनाथ और बद्रीनाथ में श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ पहुंची है कि पिछले सभी रिकॉर्ड टूट गए हैं। उत्तराखंड महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ शैलजा भट्ट ने बताया कि इन मामलों को देखते हुए उत्तराखंड प्रशासन ने चिकित्सकीय रूप से अयोग्य तीर्थयात्रियों को यात्रा न करने की सलाह दी है और सेफ्टी गाइडलाइन जारी की है।
- बुजुर्ग या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति यात्रा करने से बचें।
- यात्रा पर जाने से पहले हार्ट और अस्थमा पेशेंट प्रॉपर मेडिकल चेकअप कराएं।
- डायबिटीज और हाई बीपी के मरीज यात्रा पर जाने से पहले डॉक्टरी सलाह जरुर लें।
- ऊंचाई वाले क्षेत्रों में खास ध्यान रखें।
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के मरीजों के शरीर का तापमान अचानक बदलता है। इससे दिल की नसें सिकुड़ने लगती हैं, ब्लड सर्कुलेशन में भी दिक्कत आती है। ऐसी सिचुएशन में भी लोग पहाड़ों पर चढ़ाई जारी रखते हैं। जिससे उन पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। इस वजह से ज्यादा तबीयत खराब होने से जान से हाथ धोना पड़ता है।
-पहले से बीमार लोग अपने साथ डॉक्टर का प्रिसक्रिप्शन, फोन नंबर और दवाइयां ले जाएं।
- यात्रा पर जाने से पहले कुछ दिन सुबह और शाम टहलें, ताकि यात्रा पर ज्यादा दिक्कत न हो।
- तीर्थयात्रा के लिए चढ़ाई करने से पहले वहां पहुंचकर एक दिन का आराम जरूर करें।
- गर्म और ऊनी कपड़े अपने साथ में रखना बिल्कुल न भूलें।
शराब-सिगरेट, गुटखा जैसी नशीली चीजों से परहेज करें।
- धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन 50 SPF यूज करें।
- अल्ट्रावायलेट किरणों से आंखों को बचाने के लिए सनग्लास लगाएं।
पूरी यात्रा के दौरान पानी पीते रहें।
- स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए 104 और एम्बुलेंस के लिए 108 हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें।
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- Travel आखिर क्यों कोई नहीं कर पाया कैलाश पर्वत की चढ़ाई? क्या है इसका वैज्ञानिक कारण? चारधाम यात्रा पर जाने वाले साठ से ज्यादा तीर्थयात्रियों की अब तक मौत हो चुकी है। इनमें छयासठ% लोग डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीज थे। केदारनाथ यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं। गौरतलब है कि उत्तराखंड में कोरोना महामारी के चलते पिछले दो साल से चारधाम यात्रा नहीं हो रही थी। इस बार चारधाम यात्रा शुरू हुई है तो श्रद्धालुओं की भीड़ बड़ी संख्या में यात्रा करने निकली है। केदारनाथ और बद्रीनाथ में श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ पहुंची है कि पिछले सभी रिकॉर्ड टूट गए हैं। उत्तराखंड महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ शैलजा भट्ट ने बताया कि इन मामलों को देखते हुए उत्तराखंड प्रशासन ने चिकित्सकीय रूप से अयोग्य तीर्थयात्रियों को यात्रा न करने की सलाह दी है और सेफ्टी गाइडलाइन जारी की है। - बुजुर्ग या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति यात्रा करने से बचें। - यात्रा पर जाने से पहले हार्ट और अस्थमा पेशेंट प्रॉपर मेडिकल चेकअप कराएं। - डायबिटीज और हाई बीपी के मरीज यात्रा पर जाने से पहले डॉक्टरी सलाह जरुर लें। - ऊंचाई वाले क्षेत्रों में खास ध्यान रखें। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के मरीजों के शरीर का तापमान अचानक बदलता है। इससे दिल की नसें सिकुड़ने लगती हैं, ब्लड सर्कुलेशन में भी दिक्कत आती है। ऐसी सिचुएशन में भी लोग पहाड़ों पर चढ़ाई जारी रखते हैं। जिससे उन पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। इस वजह से ज्यादा तबीयत खराब होने से जान से हाथ धोना पड़ता है। -पहले से बीमार लोग अपने साथ डॉक्टर का प्रिसक्रिप्शन, फोन नंबर और दवाइयां ले जाएं। - यात्रा पर जाने से पहले कुछ दिन सुबह और शाम टहलें, ताकि यात्रा पर ज्यादा दिक्कत न हो। - तीर्थयात्रा के लिए चढ़ाई करने से पहले वहां पहुंचकर एक दिन का आराम जरूर करें। - गर्म और ऊनी कपड़े अपने साथ में रखना बिल्कुल न भूलें। शराब-सिगरेट, गुटखा जैसी नशीली चीजों से परहेज करें। - धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन पचास SPF यूज करें। - अल्ट्रावायलेट किरणों से आंखों को बचाने के लिए सनग्लास लगाएं। पूरी यात्रा के दौरान पानी पीते रहें। - स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए एक सौ चार और एम्बुलेंस के लिए एक सौ आठ हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें।
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RANCHI: छठ को लेकर ट्रेन में भीड़ बढ़ गई है। पैसेंजर्स की संख्या अधिक होने के कारण ट्रेन में तिल रखने की जगह भी नहीं बची है। ऐसे में लोग किसी तरह अपने घर पहुंच रहे हैं। यही वजह है कि पैसेंजर्स की परेशानी को देखते हुए रांची डिवीजन से खुलने वाली ट्रेनों में एक्सट्रा कोच लगाए जा रहे हैं। शुक्रवार को रांची से खुलने वाली मौर्या एक्सप्रेस और गरीब रथ में दो-दो एक्सट्रा कोच लगाए गए। वहीं शनिवार से चलने वाली छठ स्पेशल ट्रेन का रूट डायवर्ट किया गया है। ट्रेन मुरी, बरकाकाना, हजारीबाग टाउन, कोडरमा, गया जहानाबाद होते हुए पटना जाएगी। ट्रेन के खुलने का समय 23 बजकर 55 मिनट है।
रांची से पटना के लिए एक ट्रिप छठ स्पेशल ट्रेन चलेगी। इस ट्रेन में थर्ड एसी के 10 और सेकेंड एसी के 3 कोच हैं। पैसेंजर्स आज भी इस ट्रेन का टिकट ले सकते हैं। जहां थर्ड एसी में 97 सीटें खाली हैं। वहीं सेकेंड एसी में 50 सीट अवेलेबल है।
पैसेंजर्स की भीड़ को देखते हुए ट्रेनों में एक्सट्रा कोच लगाए जा रहे हैं। शुक्रवार को दो ट्रेनों में एक्सट्रा कोच लगाए गए हैं। स्पेशल ट्रेन चलाई गई है इसलिए जरूरत पड़ेगी तो कोच लगाए जाएंगे। स्पेशल ट्रेन का रूट बदला है। आज भी टिकट की बुकिंग करा सकते हैं।
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RANCHI: छठ को लेकर ट्रेन में भीड़ बढ़ गई है। पैसेंजर्स की संख्या अधिक होने के कारण ट्रेन में तिल रखने की जगह भी नहीं बची है। ऐसे में लोग किसी तरह अपने घर पहुंच रहे हैं। यही वजह है कि पैसेंजर्स की परेशानी को देखते हुए रांची डिवीजन से खुलने वाली ट्रेनों में एक्सट्रा कोच लगाए जा रहे हैं। शुक्रवार को रांची से खुलने वाली मौर्या एक्सप्रेस और गरीब रथ में दो-दो एक्सट्रा कोच लगाए गए। वहीं शनिवार से चलने वाली छठ स्पेशल ट्रेन का रूट डायवर्ट किया गया है। ट्रेन मुरी, बरकाकाना, हजारीबाग टाउन, कोडरमा, गया जहानाबाद होते हुए पटना जाएगी। ट्रेन के खुलने का समय तेईस बजकर पचपन मिनट है। रांची से पटना के लिए एक ट्रिप छठ स्पेशल ट्रेन चलेगी। इस ट्रेन में थर्ड एसी के दस और सेकेंड एसी के तीन कोच हैं। पैसेंजर्स आज भी इस ट्रेन का टिकट ले सकते हैं। जहां थर्ड एसी में सत्तानवे सीटें खाली हैं। वहीं सेकेंड एसी में पचास सीट अवेलेबल है। पैसेंजर्स की भीड़ को देखते हुए ट्रेनों में एक्सट्रा कोच लगाए जा रहे हैं। शुक्रवार को दो ट्रेनों में एक्सट्रा कोच लगाए गए हैं। स्पेशल ट्रेन चलाई गई है इसलिए जरूरत पड़ेगी तो कोच लगाए जाएंगे। स्पेशल ट्रेन का रूट बदला है। आज भी टिकट की बुकिंग करा सकते हैं।
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रिकांगपिओ-सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग द्वारा मंगलवार को किन्नौर जिला के क्षेत्रीय अस्पताल रिकांगपिओ में जिला स्तरीय अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस का आयोजन किया गया । इस दौरान जहां दिव्यांगजनो की समास्याओ पर चर्चा की गई वहीं समाज में व्याप्त नशा खोरी की समास्या पर भी गहन चर्चा की गई । जिसमें उपस्थित लोगोे ने नशे से निपटाने के लिए बहुमुल्य सुझाव दिए। जिला कल्याण अधिकारी गिरधारी लाल शर्मा ने इस अवसर पर बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा दिव्यांगजनो के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं आरंभ की गई है । उन्होने कहा कि सरकार द्वारा दिव्यांगजनों को सरकारी नौकरी में आरक्षण का प्रावधान किया गया है उन्होने कहा कि इसके लिए सरकार द्वारा समय समय पर विशेष अभियान भी चलाया जाता है ताकि लंबे समय से खाली पडे आरक्षित दिव्यांगजनो के पदे को भरा जा सके । उन्होने कहाकि प्रदेश सरकार द्वारा दिव्यांगजनो को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का भी प्रावधान किया गया है और ऐसे दिव्यांगजन जो 70 प्रतिशत से अधिक दिव्यांग है उन्हे 1500 रुपए व 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगजनो को 850 रुपए मासिक सामाजिक सुरक्षा पैन्शन प्रदान की जा रही है । उन्होने बताया कि विभाग द्वारा दिव्यांगजनो को पहली कक्षा से लेकर पीण्एचण्डीण् की पढाई के दौरान 625 रू0 से लेकर 5000 रुपए तक मासिक छात्रवृति प्रदान की जा रही है । दिव्यांगजनो को विभाग द्वारा दिव्यांगजनो से विवाह करने पर एक लाख रुपए तथा सामान्य जन से विवाह पर 50 हजार रुपए की अनुदान राशि प्रदान की जा रही है । उन्होने कहा कि समाज में व्याप्त माद्क द्रव्य व पदार्थो के सेवन की समास्या आज एक सामाजिक समास्या बन कर उभरी है । इस समास्या का निपटारा सामूहिक प्रयासो से ही किया जा सकता है । उन्होने महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों व गैर सरकारी संगठनों के सदस्यो से आग्रह किया कि वें लोगो को नशीलें पदार्थो के सेवन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों से जागरूक करे । उन्होने कहाकि पुलिस विभाग द्वारा नशे के दुष्प्रभावों के बारे मंे जानकारी देने के लिए एक एप्प व हेल्प लाइन भी आरम्भ की गई है जहां पर कोई भी व्यक्ति नशे के दुष्प्रभावो की जानकारी के साथ साथ ऐसे व्यक्तियो की सूचना भी दे सकते है जो नशे के व्यापार में संलिप्त है। उन्होंने कहा कि ऐसे व्याक्तियों की सूचना गुप्त रखी जाती है । इस अवसर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. पदम नेगीए जिला कार्यक्रम अधिकारी अर्जुन नेगी, जिला दिव्यांग संघ के प्रेम देवीए महासचिव बहादुर चंद व आंगनवाडी व अशा कार्यकर्ता भी उपस्थित थे।
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रिकांगपिओ-सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग द्वारा मंगलवार को किन्नौर जिला के क्षेत्रीय अस्पताल रिकांगपिओ में जिला स्तरीय अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस का आयोजन किया गया । इस दौरान जहां दिव्यांगजनो की समास्याओ पर चर्चा की गई वहीं समाज में व्याप्त नशा खोरी की समास्या पर भी गहन चर्चा की गई । जिसमें उपस्थित लोगोे ने नशे से निपटाने के लिए बहुमुल्य सुझाव दिए। जिला कल्याण अधिकारी गिरधारी लाल शर्मा ने इस अवसर पर बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा दिव्यांगजनो के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं आरंभ की गई है । उन्होने कहा कि सरकार द्वारा दिव्यांगजनों को सरकारी नौकरी में आरक्षण का प्रावधान किया गया है उन्होने कहा कि इसके लिए सरकार द्वारा समय समय पर विशेष अभियान भी चलाया जाता है ताकि लंबे समय से खाली पडे आरक्षित दिव्यांगजनो के पदे को भरा जा सके । उन्होने कहाकि प्रदेश सरकार द्वारा दिव्यांगजनो को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का भी प्रावधान किया गया है और ऐसे दिव्यांगजन जो सत्तर प्रतिशत से अधिक दिव्यांग है उन्हे एक हज़ार पाँच सौ रुपयापए व चालीस प्रतिशत से अधिक दिव्यांगजनो को आठ सौ पचास रुपयापए मासिक सामाजिक सुरक्षा पैन्शन प्रदान की जा रही है । उन्होने बताया कि विभाग द्वारा दिव्यांगजनो को पहली कक्षा से लेकर पीण्एचण्डीण् की पढाई के दौरान छः सौ पच्चीस रूशून्य से लेकर पाँच हज़ार रुपयापए तक मासिक छात्रवृति प्रदान की जा रही है । दिव्यांगजनो को विभाग द्वारा दिव्यांगजनो से विवाह करने पर एक लाख रुपए तथा सामान्य जन से विवाह पर पचास हजार रुपए की अनुदान राशि प्रदान की जा रही है । उन्होने कहा कि समाज में व्याप्त माद्क द्रव्य व पदार्थो के सेवन की समास्या आज एक सामाजिक समास्या बन कर उभरी है । इस समास्या का निपटारा सामूहिक प्रयासो से ही किया जा सकता है । उन्होने महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों व गैर सरकारी संगठनों के सदस्यो से आग्रह किया कि वें लोगो को नशीलें पदार्थो के सेवन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों से जागरूक करे । उन्होने कहाकि पुलिस विभाग द्वारा नशे के दुष्प्रभावों के बारे मंे जानकारी देने के लिए एक एप्प व हेल्प लाइन भी आरम्भ की गई है जहां पर कोई भी व्यक्ति नशे के दुष्प्रभावो की जानकारी के साथ साथ ऐसे व्यक्तियो की सूचना भी दे सकते है जो नशे के व्यापार में संलिप्त है। उन्होंने कहा कि ऐसे व्याक्तियों की सूचना गुप्त रखी जाती है । इस अवसर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. पदम नेगीए जिला कार्यक्रम अधिकारी अर्जुन नेगी, जिला दिव्यांग संघ के प्रेम देवीए महासचिव बहादुर चंद व आंगनवाडी व अशा कार्यकर्ता भी उपस्थित थे।
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हॉलीवुड के दो दिग्गज कलाकार हम बात कर रहे जैकी चेन व सिल्वेस्टर स्टेलॉन के बारे में इन दोनों ही मशहूर हस्तियों ने कई सफलतम फिल्मो में अपने एक्शन अभिनय की छाप को छोड़ा है. अब इन दोनों के बारे में हमे एक और नई बात यह पता चली है कि यह दोनों एक साथ में हो लिए है. जी हाँ, बता दे कि पहली बार दोनों एक साथ बड़े परदे पर आने को तैयार हुए हैं. जैकी चेन व सिल्वेस्टर स्टेलॉन कि इस फिल्म का नाम भी बिलकुल हटकर है जी हाँ, फिल्म का नाम है.
'एक्स बगदाद' और इस फिल्म के लिए जैकी चेन और सिल्वेस्टर ने कोलेबरेशन किया है. अब आप को इस फिल्म के लिए थोड़ी बहुत जिज्ञासा तो उत्पन्न हो ही रही होगी तो बता दे कि, फिल्म की कहानी के हिसाब से अभिनेता सिल्वेस्टर और जैकी चेन स्पेशल फोर्स के ऐसे एक्स सोल्जर का किरदार निभा रहे हैं जिनका काम आम लोगों के एक समूह को बगदाद की उस जगह से सुरक्षित निकल कर लाना होता है.
जिसे ' हाइवे ऑफ़ डेथ ' कहा जाता है. अब जब फिल्म की कहानी ही इतनी शानदार व अभिनेता भी दमदार है तो फिल्म को देखना तो बनता ही है. फिल्म का बजट भी आपके होश उड़ा देगा. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक ये फिल्म करीब 80 मिलियन डॉलर यानि 514 करोड़ रूपये की लागत से बनाई जायेगी.
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हॉलीवुड के दो दिग्गज कलाकार हम बात कर रहे जैकी चेन व सिल्वेस्टर स्टेलॉन के बारे में इन दोनों ही मशहूर हस्तियों ने कई सफलतम फिल्मो में अपने एक्शन अभिनय की छाप को छोड़ा है. अब इन दोनों के बारे में हमे एक और नई बात यह पता चली है कि यह दोनों एक साथ में हो लिए है. जी हाँ, बता दे कि पहली बार दोनों एक साथ बड़े परदे पर आने को तैयार हुए हैं. जैकी चेन व सिल्वेस्टर स्टेलॉन कि इस फिल्म का नाम भी बिलकुल हटकर है जी हाँ, फिल्म का नाम है. 'एक्स बगदाद' और इस फिल्म के लिए जैकी चेन और सिल्वेस्टर ने कोलेबरेशन किया है. अब आप को इस फिल्म के लिए थोड़ी बहुत जिज्ञासा तो उत्पन्न हो ही रही होगी तो बता दे कि, फिल्म की कहानी के हिसाब से अभिनेता सिल्वेस्टर और जैकी चेन स्पेशल फोर्स के ऐसे एक्स सोल्जर का किरदार निभा रहे हैं जिनका काम आम लोगों के एक समूह को बगदाद की उस जगह से सुरक्षित निकल कर लाना होता है. जिसे ' हाइवे ऑफ़ डेथ ' कहा जाता है. अब जब फिल्म की कहानी ही इतनी शानदार व अभिनेता भी दमदार है तो फिल्म को देखना तो बनता ही है. फिल्म का बजट भी आपके होश उड़ा देगा. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक ये फिल्म करीब अस्सी मिलियन डॉलर यानि पाँच सौ चौदह करोड़ रूपये की लागत से बनाई जायेगी.
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मलाइका अरोड़ा और अरबाज खान ने साल 2017 में तलाक ले लिया था। मलाइका और अरबाज़ दोनों ने ही इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा। अब मलाइका अरोड़ा ने पहली बार इस बारे में बात की है। मलाइका हाल ही में करीना कपूर के रेडियो शो पहुंची थीं, जहां उन्होंने बताया कि अरबाज खान से तलाक लेने से एक रात पहले क्या हुआ था। मलाइका अरोड़ा ने बताया कि उनकी फ़ैमिली बार-बार यह समझा रही थी कि उन्हें इस बारे में दोबारा सोचना चाहिए।
मलाइका अरोड़ा ने आगे कहाः "जब उन्हें यह समझ आ गया कि मैं अरबाज के साथ अपनी शादी को खत्म करने के अपने फैसले के बारे में दृढ़ हूँ, तो उन्हें दोस्तों से और परिवार से बहुत ताकत मिली। " मलाइका ने कहा कि मेरे परिवार और मेरे दोस्तों ने मेरे फैसले का समर्थन किया। उन्होंने आगे कहाः "तलाक़ लेना कभी भी आसान नहीं है, इससे बड़ा निर्णय शायद आपकी लाइफ़ में नहीं हो सकता। अंत में किसी को दोषी कहना ग़लत है। आपको किसी पर उंगली उठाने की ज़रूरत नहीं है।
बता दें, मलाइका अरोड़ा हमेशा सुर्खियों में रहती हैं। कभी अपने जिम लुक को लेकर तो कभी अर्जुन संग अफ़ेयर को लेकर। मलाइका सोशल मीडिया पर भी काफ़ी ऐक्टिव रहती हैं। वर्क फ्रंट की बात करें तो मलाइका अरोड़ा इन दिनों सोनी टीवी के शो इंडियाज बेस्ट डांसर की जज हैं, इस शो में उनसे साथ टेरेंस लुइस और गीता कपूर भी बतौर जज नजर आते हैं। इसके अलावा मलाइका अरोड़ा MTV पर आने वाले इंडियाज बेस्ट सुपर मॉडल में भी बतौर जज दिखाई दे रही थीं।
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मलाइका अरोड़ा और अरबाज खान ने साल दो हज़ार सत्रह में तलाक ले लिया था। मलाइका और अरबाज़ दोनों ने ही इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा। अब मलाइका अरोड़ा ने पहली बार इस बारे में बात की है। मलाइका हाल ही में करीना कपूर के रेडियो शो पहुंची थीं, जहां उन्होंने बताया कि अरबाज खान से तलाक लेने से एक रात पहले क्या हुआ था। मलाइका अरोड़ा ने बताया कि उनकी फ़ैमिली बार-बार यह समझा रही थी कि उन्हें इस बारे में दोबारा सोचना चाहिए। मलाइका अरोड़ा ने आगे कहाः "जब उन्हें यह समझ आ गया कि मैं अरबाज के साथ अपनी शादी को खत्म करने के अपने फैसले के बारे में दृढ़ हूँ, तो उन्हें दोस्तों से और परिवार से बहुत ताकत मिली। " मलाइका ने कहा कि मेरे परिवार और मेरे दोस्तों ने मेरे फैसले का समर्थन किया। उन्होंने आगे कहाः "तलाक़ लेना कभी भी आसान नहीं है, इससे बड़ा निर्णय शायद आपकी लाइफ़ में नहीं हो सकता। अंत में किसी को दोषी कहना ग़लत है। आपको किसी पर उंगली उठाने की ज़रूरत नहीं है। बता दें, मलाइका अरोड़ा हमेशा सुर्खियों में रहती हैं। कभी अपने जिम लुक को लेकर तो कभी अर्जुन संग अफ़ेयर को लेकर। मलाइका सोशल मीडिया पर भी काफ़ी ऐक्टिव रहती हैं। वर्क फ्रंट की बात करें तो मलाइका अरोड़ा इन दिनों सोनी टीवी के शो इंडियाज बेस्ट डांसर की जज हैं, इस शो में उनसे साथ टेरेंस लुइस और गीता कपूर भी बतौर जज नजर आते हैं। इसके अलावा मलाइका अरोड़ा MTV पर आने वाले इंडियाज बेस्ट सुपर मॉडल में भी बतौर जज दिखाई दे रही थीं।
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है, पर दीर्घसंधि हो जाने से 'की' रूप हो गया है; ऐसे ही 'पिया' से 'पी', 'दिया' से 'दी'। इससे स्पष्ट है कि पूर्व मेँ सवर्ण स्वर होने से 'ई' की संधि हो जाती है । य और व मेँ जब स्वर प्रत्यय मिलता है तो उनका उड़ जाना भी देखा जाता है; जैसे, 'पाया' (पलंग का ) और 'चारपाई', 'तिपाई'; 'ताया' ( बाप का बड़ा भाई, ताता या ताऊ = चाचा ) और 'ताई' ( बड़ी चाची ) ; 'तवा' और 'तई ( थाली के ढंग की छिछली कड़ाही, जिसमेँ जलेबी या मालपुआ बनाते हैं ) ; 'लावा' और 'लाई' । इसलिए आई गई और आए, गए रूप ही ठीक हैं। 'हुआ' मेँ 'आ' है ही, अतः 'हुई' और 'हुए ' लिखना ही ठीक है, 'हुयो' या 'हुये' तो व्याकरण से भी विहित नहीं । 'चाहिए' को 'चाहिये' लिखने मेँ पुंलिंग, स्त्रीलिंग या बहुवचन की दुहाई नहीं दी जा सकती, अतः उसका स्वरवाला ही रूप होना चाहिए । संप्रदान के 'लिए' और क्रिया के 'लिए' में भेद करते हैं । स्वर से क्रिया लिखनेवाले पहले को 'लिये' लिखते हैं । पर इसकी भी आवश्यकता नहीं, दोनोँ के उच्चारण मेँ कोई भेद नहीं है। यहाँ यह कह देना उचित होगा कि संस्कृत के तत्सम शब्दों मेँ 'य' का ही व्यवहार हो । 'स्थायी' या 'उत्तरदायी' को 'स्थाई' या 'उत्तरदाई' नहीं लिखना चाहिए। ऐसे शब्दों के भी तद्भव रूपोँ मेँ 'ई' का ही व्यवहार करना ठीक होगा; जैसे, 'वाजपेयी' का तद्भव 'बाचपेई' (बैसवाड़ी ) । क्रियाओं के कुछ दुहरे रूप विधि और भविष्यकाल मैं और मिलते हैं; जैसे, आएगा (आयेगा), और आवेगा, लाए ( लाये ) और लावे। इनमेँ खड़ी के रूप पहले वाले ही हैं, 'व' श्रुतिवाले रूप कदाचित् पूर्वी के प्रभाव से चल पड़े हैं।
हिंदी में संस्कृत से आए कुछ हलंत शब्दों के रूप दुहरे चलते हैं; जैसे, भगवान् - भगवान, जगत् - जगत, पृथक्-पृथक आदि । हिंदी मैं इन शब्दों के अंतिम व्यंजन का उच्चारण एक सा ही होगा, चाहे 'भगवान्' लिखें चाहे 'भगवान' । इस पर पहले 'स्वराघात' के प्रकरण मेँ विचार हो चुका है ( देखिए पृष्ठ ४३३ ) । सच पूछिए तो हिंदी
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है, पर दीर्घसंधि हो जाने से 'की' रूप हो गया है; ऐसे ही 'पिया' से 'पी', 'दिया' से 'दी'। इससे स्पष्ट है कि पूर्व मेँ सवर्ण स्वर होने से 'ई' की संधि हो जाती है । य और व मेँ जब स्वर प्रत्यय मिलता है तो उनका उड़ जाना भी देखा जाता है; जैसे, 'पाया' और 'चारपाई', 'तिपाई'; 'ताया' और 'ताई' ; 'तवा' और 'तई ; 'लावा' और 'लाई' । इसलिए आई गई और आए, गए रूप ही ठीक हैं। 'हुआ' मेँ 'आ' है ही, अतः 'हुई' और 'हुए ' लिखना ही ठीक है, 'हुयो' या 'हुये' तो व्याकरण से भी विहित नहीं । 'चाहिए' को 'चाहिये' लिखने मेँ पुंलिंग, स्त्रीलिंग या बहुवचन की दुहाई नहीं दी जा सकती, अतः उसका स्वरवाला ही रूप होना चाहिए । संप्रदान के 'लिए' और क्रिया के 'लिए' में भेद करते हैं । स्वर से क्रिया लिखनेवाले पहले को 'लिये' लिखते हैं । पर इसकी भी आवश्यकता नहीं, दोनोँ के उच्चारण मेँ कोई भेद नहीं है। यहाँ यह कह देना उचित होगा कि संस्कृत के तत्सम शब्दों मेँ 'य' का ही व्यवहार हो । 'स्थायी' या 'उत्तरदायी' को 'स्थाई' या 'उत्तरदाई' नहीं लिखना चाहिए। ऐसे शब्दों के भी तद्भव रूपोँ मेँ 'ई' का ही व्यवहार करना ठीक होगा; जैसे, 'वाजपेयी' का तद्भव 'बाचपेई' । क्रियाओं के कुछ दुहरे रूप विधि और भविष्यकाल मैं और मिलते हैं; जैसे, आएगा , और आवेगा, लाए और लावे। इनमेँ खड़ी के रूप पहले वाले ही हैं, 'व' श्रुतिवाले रूप कदाचित् पूर्वी के प्रभाव से चल पड़े हैं। हिंदी में संस्कृत से आए कुछ हलंत शब्दों के रूप दुहरे चलते हैं; जैसे, भगवान् - भगवान, जगत् - जगत, पृथक्-पृथक आदि । हिंदी मैं इन शब्दों के अंतिम व्यंजन का उच्चारण एक सा ही होगा, चाहे 'भगवान्' लिखें चाहे 'भगवान' । इस पर पहले 'स्वराघात' के प्रकरण मेँ विचार हो चुका है । सच पूछिए तो हिंदी
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VARANASI: छात्र युवा संघर्ष समिति के कार्यकर्ताओं ने शनिवार को आईआईटी बीएचयू को बीएचयू से स्वतंत्र करने के फैसले पर कड़ा विरोध जताया। बीएचयू गेट पर विरोध कर रहे स्टूडेंट्स ने कहा कि एचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी का यह फैसला गलत है और महामना की भावना को चोट पहचाने वाला है। विरोध दर्ज कराने वालों में आलोक राय, रजनीश मिश्रा, अनुराग पटेल आदि लोग शामिल थे।
'भाषाओं से बनती है सोच'
VARANASI: आर्य महिला पीजी कॉलेज के सभागार में बंगला विभाग की ओर से शनिवार को इंटरनेशनल लैंग्वेज डे का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि हमारी सोच सभी भाषाओं से बनती है। अध्यक्षता डॉ। चंद्रकांत मिश्र ने तथा स्वागत प्रिंसिपल डॉ। रचना दूबे ने किया। बतौर मुख्य वक्ता प्रो। कुमार ने शिरकत की। संचालन डॉ। झुमुर सेनगुप्ता ने किया।
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VARANASI: छात्र युवा संघर्ष समिति के कार्यकर्ताओं ने शनिवार को आईआईटी बीएचयू को बीएचयू से स्वतंत्र करने के फैसले पर कड़ा विरोध जताया। बीएचयू गेट पर विरोध कर रहे स्टूडेंट्स ने कहा कि एचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी का यह फैसला गलत है और महामना की भावना को चोट पहचाने वाला है। विरोध दर्ज कराने वालों में आलोक राय, रजनीश मिश्रा, अनुराग पटेल आदि लोग शामिल थे। 'भाषाओं से बनती है सोच' VARANASI: आर्य महिला पीजी कॉलेज के सभागार में बंगला विभाग की ओर से शनिवार को इंटरनेशनल लैंग्वेज डे का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि हमारी सोच सभी भाषाओं से बनती है। अध्यक्षता डॉ। चंद्रकांत मिश्र ने तथा स्वागत प्रिंसिपल डॉ। रचना दूबे ने किया। बतौर मुख्य वक्ता प्रो। कुमार ने शिरकत की। संचालन डॉ। झुमुर सेनगुप्ता ने किया।
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कोरोना काल में घर लौटे प्रवासी मजदूरों को सरकार रोजगार देने की बात कही थी लेकिन एक तो यहां कम पैसे में मजदूरी मिल रही है उसका भी समय पर भुगतान नहीं हो रहा है। इन्हें भुगतान नहीं हो रहा है।
जागरण संवाददाता, मुंगेर । कोरोना संकट में दूसरे प्रदेश से अपने घर लौटे प्रवासी मजदूरों के समक्ष दोहरा आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है। सरकार द्वारा मजदूरों को रोजगार देने की बात कही जा रही है, परंतु वास्तविकता कुछ और कहानी बयां कर रही है। महानगरों में ऊंची कीमत पर मजदूरी करने वाले मजदूर अपने राज्य में कम पैसे पर मजदूरी करने को विवश हैं। उन्हें कार्य करने के एवज में समय पर मजदूरी नहीं मिल पाता है। सरकारी फाइल के सरकने में हो रहे विलंब के कारण मजदूरों को समय पर मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है। इस कारण मजदूरों में आक्रोश व्याप्त हो रहा है।
मिली जानकारी के अनुसार पड़वाडा पंचायत में पंचायत सरकार भवन का निर्माण कार्य बीते अगस्त माह में ही शुरू हुआ। पंचायत सरकार भवन के निर्माण पर एक करोड़ 24 लाख 42 हजार 678 रुपये खर्च होना हौ। कार्य कराने का जिम्मा ग्राम पंचायत को सौंपा गया है। ग्राम पंचायत को योजना क्रियांवयन के लिए पूरी राशि जिला से प्राप्त नहीं हुई है । इधर मजदूरों द्वारा किए गए कार्य के विरुद्ध तीन महीने का मजदूरी बकाया है । कार्यकारी एजेंसी द्वारा मजदूरों को मजदूरी भुगतान के एवज में की मजबूरियां बताई जा रही हैं ।
जिससे तंग आकर आखिरकार मजदूरों ने काम करना बंद कर दिया है। इस संबंध में ग्राम पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि चंद्रशेखर चौधरी ने कहा कि किए गए कार्य के विरुद्ध 29 लाख की मापीपुस्त का संधारण कर राशि की मांग की गई है, परंतु राशि नहीं रहने के कारण मजदूरों का भुगतान लंबित है। योजना कार्य प्रारंभ होने के समय 11 लाख 42 हजार रुपये पंचायत के खाता में दिया गया था। कराए गए कार्य का मापीपुस्त भेजे हुए एक माह से अधिक हो गया है । जब तक राशि नहीं मिलेगी, तब तक मजदूरी का भुगतान संभव नहीं है। मुखिया प्रतिनिधि द्वारा यह कहा गया कि राशि का आवंटन सही तरीके से ग्राम पंचायत को नहीं मिलने से निर्धारित समय सीमा के अंदर पंचायत सरकार भवन का निर्माण संभव प्रतीत नहीं होता है।
बीडीओ श्याम कुमार ने कहा कि 29 लाख का मापी पुस्त संधारित कराकर अधियाचना जिला पंचायती राज पदाधिकारी को भेजा जा चुका है । उनके स्तर से आगे की कार्यवाही की जा रही है।
जिला पंचायत राज पदाधिकारी स्नेह स्निग्धा ने कहा कि जांच की जा रही है। जांच के बाद राशि आवंटित कर दी जाएगी।
जिला परिषद सदस्य सह राजद नेता मंटू यादव ने कहा कि मजदूरों की मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं होने से सरकार की मंशा स्पष्ट होती है । एक सप्ताह के अंदर बकाया मजदूरी का भुगतान नहीं होने पर राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता जन आंदोलन खड़ा करने से पीछे नहीं रहेंगे। लोक जनशक्ति पार्टी के नेता मिथिलेश कुमार ङ्क्षसह ने कहा कि कोरोना काल में मजदूरों की मजदूरी का भुगतान समय पर करने की आदत अधिकारी और एजेंसी डालें अन्यथा मजदूरों के हित की लड़ाई लोजपा लडऩे में सक्षम है।
मजदूर राजेश कुमार ङ्क्षसह ने कहा कि तीन महीना से काम कर रहे हैं। हमें मजदूरी नहीं मिल रहा है। हम बहुत गरीब आदमी हैं। सत्तू ,नमक, पानी पी कर हम काम करने आते हैं। एक दिन का 300 रुपये मजदूरी मिलता है। बहुत मेहनत से काम करते हैं। लोगों से मांग कर हर जरूरतों को पूरा करते हैं। मुझे तीन लड़का है। जिसे खूब पढ़ाने की इच्छा है, लेकिन पढ़ाई का खर्च भी नहीं निकल पा रहा है। अब हम काम नहीं कर पाएंगे। पैसा मिलने पर ही काम करेंगे। अमित कुमार ने कहा कि जब तक हम लोगों को बकाया मजदूरी नहीं मिलेगा, हम दूसरे मजदूरों को भी काम करने नहीं देंगे। मुखिया द्वारा कहा जाता है कि जब तक जिला से पैसा हमें नहीं मिलेगा, हम भुगतान नहीं कर पाएंगे।
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कोरोना काल में घर लौटे प्रवासी मजदूरों को सरकार रोजगार देने की बात कही थी लेकिन एक तो यहां कम पैसे में मजदूरी मिल रही है उसका भी समय पर भुगतान नहीं हो रहा है। इन्हें भुगतान नहीं हो रहा है। जागरण संवाददाता, मुंगेर । कोरोना संकट में दूसरे प्रदेश से अपने घर लौटे प्रवासी मजदूरों के समक्ष दोहरा आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है। सरकार द्वारा मजदूरों को रोजगार देने की बात कही जा रही है, परंतु वास्तविकता कुछ और कहानी बयां कर रही है। महानगरों में ऊंची कीमत पर मजदूरी करने वाले मजदूर अपने राज्य में कम पैसे पर मजदूरी करने को विवश हैं। उन्हें कार्य करने के एवज में समय पर मजदूरी नहीं मिल पाता है। सरकारी फाइल के सरकने में हो रहे विलंब के कारण मजदूरों को समय पर मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है। इस कारण मजदूरों में आक्रोश व्याप्त हो रहा है। मिली जानकारी के अनुसार पड़वाडा पंचायत में पंचायत सरकार भवन का निर्माण कार्य बीते अगस्त माह में ही शुरू हुआ। पंचायत सरकार भवन के निर्माण पर एक करोड़ चौबीस लाख बयालीस हजार छः सौ अठहत्तर रुपयापये खर्च होना हौ। कार्य कराने का जिम्मा ग्राम पंचायत को सौंपा गया है। ग्राम पंचायत को योजना क्रियांवयन के लिए पूरी राशि जिला से प्राप्त नहीं हुई है । इधर मजदूरों द्वारा किए गए कार्य के विरुद्ध तीन महीने का मजदूरी बकाया है । कार्यकारी एजेंसी द्वारा मजदूरों को मजदूरी भुगतान के एवज में की मजबूरियां बताई जा रही हैं । जिससे तंग आकर आखिरकार मजदूरों ने काम करना बंद कर दिया है। इस संबंध में ग्राम पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि चंद्रशेखर चौधरी ने कहा कि किए गए कार्य के विरुद्ध उनतीस लाख की मापीपुस्त का संधारण कर राशि की मांग की गई है, परंतु राशि नहीं रहने के कारण मजदूरों का भुगतान लंबित है। योजना कार्य प्रारंभ होने के समय ग्यारह लाख बयालीस हजार रुपये पंचायत के खाता में दिया गया था। कराए गए कार्य का मापीपुस्त भेजे हुए एक माह से अधिक हो गया है । जब तक राशि नहीं मिलेगी, तब तक मजदूरी का भुगतान संभव नहीं है। मुखिया प्रतिनिधि द्वारा यह कहा गया कि राशि का आवंटन सही तरीके से ग्राम पंचायत को नहीं मिलने से निर्धारित समय सीमा के अंदर पंचायत सरकार भवन का निर्माण संभव प्रतीत नहीं होता है। बीडीओ श्याम कुमार ने कहा कि उनतीस लाख का मापी पुस्त संधारित कराकर अधियाचना जिला पंचायती राज पदाधिकारी को भेजा जा चुका है । उनके स्तर से आगे की कार्यवाही की जा रही है। जिला पंचायत राज पदाधिकारी स्नेह स्निग्धा ने कहा कि जांच की जा रही है। जांच के बाद राशि आवंटित कर दी जाएगी। जिला परिषद सदस्य सह राजद नेता मंटू यादव ने कहा कि मजदूरों की मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं होने से सरकार की मंशा स्पष्ट होती है । एक सप्ताह के अंदर बकाया मजदूरी का भुगतान नहीं होने पर राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता जन आंदोलन खड़ा करने से पीछे नहीं रहेंगे। लोक जनशक्ति पार्टी के नेता मिथिलेश कुमार ङ्क्षसह ने कहा कि कोरोना काल में मजदूरों की मजदूरी का भुगतान समय पर करने की आदत अधिकारी और एजेंसी डालें अन्यथा मजदूरों के हित की लड़ाई लोजपा लडऩे में सक्षम है। मजदूर राजेश कुमार ङ्क्षसह ने कहा कि तीन महीना से काम कर रहे हैं। हमें मजदूरी नहीं मिल रहा है। हम बहुत गरीब आदमी हैं। सत्तू ,नमक, पानी पी कर हम काम करने आते हैं। एक दिन का तीन सौ रुपयापये मजदूरी मिलता है। बहुत मेहनत से काम करते हैं। लोगों से मांग कर हर जरूरतों को पूरा करते हैं। मुझे तीन लड़का है। जिसे खूब पढ़ाने की इच्छा है, लेकिन पढ़ाई का खर्च भी नहीं निकल पा रहा है। अब हम काम नहीं कर पाएंगे। पैसा मिलने पर ही काम करेंगे। अमित कुमार ने कहा कि जब तक हम लोगों को बकाया मजदूरी नहीं मिलेगा, हम दूसरे मजदूरों को भी काम करने नहीं देंगे। मुखिया द्वारा कहा जाता है कि जब तक जिला से पैसा हमें नहीं मिलेगा, हम भुगतान नहीं कर पाएंगे।
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जयपुर - - - - मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री अश्विनी भगत ने गुरुवार को निर्वाचन व्यय अनुवीक्षण (इलेक्शन एक्सपेंडीचर) के संबंध में राज्य स्तरीय नोडल अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली।
बैठक में प्रमुख विभागों के अधिकारियों ने हिस्सा लिया और उप चुनाव आयुक्त को दी जाने वाली जानकारी के बारे में विस्तार से चर्चा की।
सचिवालय में हुई इस बैठक में पुलिस, आबकारी, आयकर, वाणिज्य कर, कार्मिक, परिवहन, रोजगार एवं श्रम, गृह, वित्त, सहकारी, सूचना एवं जनसंपर्क, डीओआईटी और निर्वाचन विभाग के उच्चाधिकारियों ने भाग लिया और विभागीय तैयारियों के बारे में मुख्य निर्वाचन अधिकारी को बताया।
ऑन स्पॉट पंजीकरण ****क्लस्टर एप्रोच ****** मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री अश्विनी भगत ने कहा कि दिव्यांगजनों को निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ने के लिए 'क्लस्टर एप्रोच' अपनाते हुए ऑन स्पॉट पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध कराएगा।
उन्होंने कहा कि जिस किसी भी संस्था के साथ अधिक संख्या में पात्र दिव्यांगजन पंजीकृत हैं, वहां विभाग जिला प्रशासन की मदद से तुरंत पंजीकरण की व्यवस्था करवाएगा।
श्री भगत शासन सचिवालय में आयोजित विशेष योग्यजनों की निर्वाचन सहभागिता बढ़ाने के लिए आयोजित एक बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष 2018 को 'सुगम मतदान' वर्ष घोषित किया गया है, ऎसे में आयोग और विभाग का सर्वाधिक प्रयास अधिक से अधिक दिव्यांगजनों की निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ना रहेगा।
उन्होंने कहा कि इस बार के चुनावों में दिव्यांगजनों को व्हील चेयर, वॉलेन्टियर, रैम्प की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। आयोग नेत्रहीन दिव्यांगों के लिए ब्रेलयुक्त मतदाता पहचान पत्र बनाने पर भी काम कर रहा है।
श्री भगत ने कहा कि दिव्यांगजनों को मतदान केंद्र पर स्पेशल टॉयलेट, स्टैंडर्ड वोिंटंग टेबल से लेकर अन्य आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नोडल ऑफिसर्स को चेकलिस्ट दी जाएगी। इसके अलावा प्रदेश भर के दिव्यांगजनों के शत-प्रतिशत पंजीकरण के लिए इलेक्ट्रोनिक, िंप्रंट और सोशल मीडिया के जरिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा, ताकि कोई भी योग्य दिव्यांग मताधिकार से वंचित ना रह सके।
बैठक में अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. जोगाराम, निदेशालय विशेष के अतिरिक्त निदेशक श्री अमिताभ कौशिक, उमंग संस्थान की निदेशक सुश्री दीपक कालरा, फ्रीलांस डिसेबिलिटी एक्टिविस्ट श्री प्रतीक अग्रवाल और विभागीय अधिकारीगण उपस्थिजत रहे।
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जयपुर - - - - मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री अश्विनी भगत ने गुरुवार को निर्वाचन व्यय अनुवीक्षण के संबंध में राज्य स्तरीय नोडल अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली। बैठक में प्रमुख विभागों के अधिकारियों ने हिस्सा लिया और उप चुनाव आयुक्त को दी जाने वाली जानकारी के बारे में विस्तार से चर्चा की। सचिवालय में हुई इस बैठक में पुलिस, आबकारी, आयकर, वाणिज्य कर, कार्मिक, परिवहन, रोजगार एवं श्रम, गृह, वित्त, सहकारी, सूचना एवं जनसंपर्क, डीओआईटी और निर्वाचन विभाग के उच्चाधिकारियों ने भाग लिया और विभागीय तैयारियों के बारे में मुख्य निर्वाचन अधिकारी को बताया। ऑन स्पॉट पंजीकरण ****क्लस्टर एप्रोच ****** मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्री अश्विनी भगत ने कहा कि दिव्यांगजनों को निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ने के लिए 'क्लस्टर एप्रोच' अपनाते हुए ऑन स्पॉट पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध कराएगा। उन्होंने कहा कि जिस किसी भी संस्था के साथ अधिक संख्या में पात्र दिव्यांगजन पंजीकृत हैं, वहां विभाग जिला प्रशासन की मदद से तुरंत पंजीकरण की व्यवस्था करवाएगा। श्री भगत शासन सचिवालय में आयोजित विशेष योग्यजनों की निर्वाचन सहभागिता बढ़ाने के लिए आयोजित एक बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष दो हज़ार अट्ठारह को 'सुगम मतदान' वर्ष घोषित किया गया है, ऎसे में आयोग और विभाग का सर्वाधिक प्रयास अधिक से अधिक दिव्यांगजनों की निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ना रहेगा। उन्होंने कहा कि इस बार के चुनावों में दिव्यांगजनों को व्हील चेयर, वॉलेन्टियर, रैम्प की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। आयोग नेत्रहीन दिव्यांगों के लिए ब्रेलयुक्त मतदाता पहचान पत्र बनाने पर भी काम कर रहा है। श्री भगत ने कहा कि दिव्यांगजनों को मतदान केंद्र पर स्पेशल टॉयलेट, स्टैंडर्ड वोिंटंग टेबल से लेकर अन्य आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नोडल ऑफिसर्स को चेकलिस्ट दी जाएगी। इसके अलावा प्रदेश भर के दिव्यांगजनों के शत-प्रतिशत पंजीकरण के लिए इलेक्ट्रोनिक, िंप्रंट और सोशल मीडिया के जरिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा, ताकि कोई भी योग्य दिव्यांग मताधिकार से वंचित ना रह सके। बैठक में अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. जोगाराम, निदेशालय विशेष के अतिरिक्त निदेशक श्री अमिताभ कौशिक, उमंग संस्थान की निदेशक सुश्री दीपक कालरा, फ्रीलांस डिसेबिलिटी एक्टिविस्ट श्री प्रतीक अग्रवाल और विभागीय अधिकारीगण उपस्थिजत रहे।
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चोपता बना बेस्ट शूटिंग डेस्टिनेशन ! त्यारा सौं वीडियो हुआ रिलीज़।
टिहरी में बन रही कोरोना पर डाक्यूमेंट्री,दिखेगी कोरोना योद्धाओं के संघर्ष की कहानी।
सतपाल महाराज की बहु मोहिना कुमारी जल्द बनने वाली हैं मां, शेयर की तस्वीरें।
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चोपता बना बेस्ट शूटिंग डेस्टिनेशन ! त्यारा सौं वीडियो हुआ रिलीज़। टिहरी में बन रही कोरोना पर डाक्यूमेंट्री,दिखेगी कोरोना योद्धाओं के संघर्ष की कहानी। सतपाल महाराज की बहु मोहिना कुमारी जल्द बनने वाली हैं मां, शेयर की तस्वीरें।
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बताया जा रहा कि राज्यस्तरीय हैंडबॉल टूर्नामेंट 18 सितंबर से 21 सितंबर के बीच कैमूर जिले के भभुआ शहर में आयोजित था। आरा से भी टूर्नामेंट के लिए 24 सदस्यीय टीम भभुआ गई हुई थी। प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद टीम के खिलाड़ी इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन से वापस लौट रहे थे। रास्ते में शुक्रवार की अहले सुबह साढ़े तीन बजे के करीब आरा जंक्शन के समीप दो खिलाड़ियों रीशु कुमार सिंह सन्नी कमल सिंह का दो स्मार्ट फोन चोरी हो गया। इसके बाद रमन कुमार नामक अन्य खिलाड़ी का भी बैग गायब हो गया। जिसके बाद ट्रेन में मौजूद खिलाड़ियों यात्रियों ने स्मॉर्ट चोरी करने के संदेह में कन्हैया सिंह को पकड़ लिया। इसके बाद कन्हैया के साथ मारपीट शुरू कर दी गई। यात्री कन्हैया से चोरी गए फोन सेट के अलावे उसके साथियों के बारे में पूछताछ करने में खुद जुट गए। इसके बाद कन्हैया को एक निजी वाहन में बैठाकर रमना मैदान-रेडक्रॉस भवन के पास ले जाया गया। चोरी गए स्मॉर्ट फोन के बारे में नहीं बताने पर भीड़ ने पकड़ कर रखे गए कन्हैया को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। बाद में सूचना मिलने पर पुलिस के क्रॉस मोबाइल जवान पेट्रोलिंग पार्टी वहां पहुंच गयी।
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बताया जा रहा कि राज्यस्तरीय हैंडबॉल टूर्नामेंट अट्ठारह सितंबर से इक्कीस सितंबर के बीच कैमूर जिले के भभुआ शहर में आयोजित था। आरा से भी टूर्नामेंट के लिए चौबीस सदस्यीय टीम भभुआ गई हुई थी। प्रतियोगिता समाप्त होने के बाद टीम के खिलाड़ी इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन से वापस लौट रहे थे। रास्ते में शुक्रवार की अहले सुबह साढ़े तीन बजे के करीब आरा जंक्शन के समीप दो खिलाड़ियों रीशु कुमार सिंह सन्नी कमल सिंह का दो स्मार्ट फोन चोरी हो गया। इसके बाद रमन कुमार नामक अन्य खिलाड़ी का भी बैग गायब हो गया। जिसके बाद ट्रेन में मौजूद खिलाड़ियों यात्रियों ने स्मॉर्ट चोरी करने के संदेह में कन्हैया सिंह को पकड़ लिया। इसके बाद कन्हैया के साथ मारपीट शुरू कर दी गई। यात्री कन्हैया से चोरी गए फोन सेट के अलावे उसके साथियों के बारे में पूछताछ करने में खुद जुट गए। इसके बाद कन्हैया को एक निजी वाहन में बैठाकर रमना मैदान-रेडक्रॉस भवन के पास ले जाया गया। चोरी गए स्मॉर्ट फोन के बारे में नहीं बताने पर भीड़ ने पकड़ कर रखे गए कन्हैया को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। बाद में सूचना मिलने पर पुलिस के क्रॉस मोबाइल जवान पेट्रोलिंग पार्टी वहां पहुंच गयी।
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सजीली घोड़ी, उस पर सज-धज के साथ बैठा युवक,बैंड पार्टी,लोगों का हुजूम और पकवानों की दावत.
ये किसी बारात और विवाह समारोह का वर्णन नहीं बल्कि एक अनूठे चुनाव-प्रचार की एक झलक है.
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव में लक्सर विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी जगवीर सिंह चौहान इसी अंदाज में अपना प्रचार अभियान चला रहे हैं.
विधायक बनने की ये दीवानगी उन पर कुछ इस क़दर हावी हो गई है या कहें कि विधायक बनने का ऐसा भूत सवार हुआ है कि उन्होंने इस तामझाम और शान-शौकत के लिये अपने खेत-खलिहान और जायदाद तक रहन रख दिये हैं.
हर सुबह जगवीर सिंह किराए पर ली गई घोड़ी और ख़ुद को सजा-सँवार कर, बैंड पार्टी के साथ चुनाव प्रचार के लिये निकल पड़ते हैं.
लक्सर की जिन गलियों से होकर उनका काफिला निकलता है बच्चे-बूढ़े उनके साथ हो लेते हैं और महिलाएँ देहरी की ओट से इस नजारे को देखती हैं.
दिनभर हर नुक्कड़ चौराहे पर और कभी-कभी घर-घर जाकर वो अपने लिये वोट मांगते हैं.
शाम होते ही शामियाना तन जाता है और भांति-भांति के लज़ीज़ व्यंजन से लोगों की आवभगत की जाती है जिसमें तंदूरी रोटी भी पकती है और मुर्ग-मुसल्लम भी.
38 साल के जगवीर सिंह कल तक अपने इलाक़े गंगदासपुर के एक नामालूम से किसान थे लेकिन आज आकर्षण का केंद्र हैं.
कोई कौतूहल से कर रहा है तो कोई मज़ाक से तो कोई मसखरेपन से कर रहा है, लेकिन सच्चाई ये है कि इस अनोखे ढंग के कारण उनके चुनाव प्रचार की चर्चा हर कोई कर रहा है.
लेकिन जगवीर सिंह को पूरा यकीन है कि उनका चुनाव प्रचार रंग लाएगा, और मेहनत बेकार नहीं जाएगी.
अपनी उम्मीदवारी को लेकर वो गंभीर हैं, "लोग अब बड़ी पार्टियों से ऊब चुके हैं क्योंकि इनके नेता एक बार जीतने के बाद कभी मुड़कर दोबारा गांव की ओर रूख नहीं करते. "
वोट उनको ज़रूर मिलेगा इसके समर्थन में उनके अपने तर्क हैं, "आखिर लोग मेरा नमक खा रहे हैं तो उसका सम्मान तो करेंगे ही. "
अपने प्रचार के तरीके पर वो कहते हैं, "कोई जीप से आता है तो कोई हेलीकॉप्टर से भी, फिर घोड़ी तो हमारी परंपरा में भी है और इतिहास में. "
कुछ लोग कहते हैं कि जिस तरह से वो खुलेआम लोगों को दावत दे रहे हैं एक तरह से उनके खिलाफ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बनता है लेकिन चुनाव मैदान के बड़े खिलाड़ियों में से किसी का ध्यान अब तक इस ओर नहीं गया है.
उत्तराखंड चुनाव पर 'निर्दलीय हमला'
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सजीली घोड़ी, उस पर सज-धज के साथ बैठा युवक,बैंड पार्टी,लोगों का हुजूम और पकवानों की दावत. ये किसी बारात और विवाह समारोह का वर्णन नहीं बल्कि एक अनूठे चुनाव-प्रचार की एक झलक है. उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव में लक्सर विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी जगवीर सिंह चौहान इसी अंदाज में अपना प्रचार अभियान चला रहे हैं. विधायक बनने की ये दीवानगी उन पर कुछ इस क़दर हावी हो गई है या कहें कि विधायक बनने का ऐसा भूत सवार हुआ है कि उन्होंने इस तामझाम और शान-शौकत के लिये अपने खेत-खलिहान और जायदाद तक रहन रख दिये हैं. हर सुबह जगवीर सिंह किराए पर ली गई घोड़ी और ख़ुद को सजा-सँवार कर, बैंड पार्टी के साथ चुनाव प्रचार के लिये निकल पड़ते हैं. लक्सर की जिन गलियों से होकर उनका काफिला निकलता है बच्चे-बूढ़े उनके साथ हो लेते हैं और महिलाएँ देहरी की ओट से इस नजारे को देखती हैं. दिनभर हर नुक्कड़ चौराहे पर और कभी-कभी घर-घर जाकर वो अपने लिये वोट मांगते हैं. शाम होते ही शामियाना तन जाता है और भांति-भांति के लज़ीज़ व्यंजन से लोगों की आवभगत की जाती है जिसमें तंदूरी रोटी भी पकती है और मुर्ग-मुसल्लम भी. अड़तीस साल के जगवीर सिंह कल तक अपने इलाक़े गंगदासपुर के एक नामालूम से किसान थे लेकिन आज आकर्षण का केंद्र हैं. कोई कौतूहल से कर रहा है तो कोई मज़ाक से तो कोई मसखरेपन से कर रहा है, लेकिन सच्चाई ये है कि इस अनोखे ढंग के कारण उनके चुनाव प्रचार की चर्चा हर कोई कर रहा है. लेकिन जगवीर सिंह को पूरा यकीन है कि उनका चुनाव प्रचार रंग लाएगा, और मेहनत बेकार नहीं जाएगी. अपनी उम्मीदवारी को लेकर वो गंभीर हैं, "लोग अब बड़ी पार्टियों से ऊब चुके हैं क्योंकि इनके नेता एक बार जीतने के बाद कभी मुड़कर दोबारा गांव की ओर रूख नहीं करते. " वोट उनको ज़रूर मिलेगा इसके समर्थन में उनके अपने तर्क हैं, "आखिर लोग मेरा नमक खा रहे हैं तो उसका सम्मान तो करेंगे ही. " अपने प्रचार के तरीके पर वो कहते हैं, "कोई जीप से आता है तो कोई हेलीकॉप्टर से भी, फिर घोड़ी तो हमारी परंपरा में भी है और इतिहास में. " कुछ लोग कहते हैं कि जिस तरह से वो खुलेआम लोगों को दावत दे रहे हैं एक तरह से उनके खिलाफ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बनता है लेकिन चुनाव मैदान के बड़े खिलाड़ियों में से किसी का ध्यान अब तक इस ओर नहीं गया है. उत्तराखंड चुनाव पर 'निर्दलीय हमला'
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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार को विधानसभा में बजट पेश किया है। विधानसभा में पेश किए गए बजट में कई लोक लुभावनी घोषणाएं की गई हैं। बजट में सिरोही जिले के लिए भी कई घोषणाएं की गई है। मुख्यमंत्री ने पर्यटन स्थल माउंट आबू की पेयजल समस्या के समाधान के लिए सालगांव बांध परियोजना को 250 करोड़ रुपए की स्वीकृति जारी की है। सिरोही में नर्सिंग कॉलेज बनाने और 315 बेड का हॉस्पिटल बनाने की घोषणा की है।
1. साल गांव बांध परियोजना माउंट आबू के लिए 250 करोड़ रुपए की आर्थिक स्वीकृति जारी की गई है।
2. सिरोही में नर्सिंग कॉलेज खोलने की घोषणा की है।
3. सिरोही में 315 बेड के हॉस्पिटल के लिए 105 करोड़ का बजट।
सिरोही विधायक संयम लोढ़ा ने कहा कि कांग्रेस सरकार के बजट से हर वर्ग को भारी राहत एवं सुविधाएं मिलेगी। युवाओं के लिए रोजगार के लाखों अवसर उपलब्ध करवाए गए हैं। इस बजट से लोगों को 1 साल नहीं बल्कि कई सालों तक सीधा लाभ मिलेगा। अन्य राज्यों को भी राजस्थान सरकार के इस बजट से प्रेरणा लेकर आम जनता को राहत देनी चाहिए। पूर्व जिला प्रमुख अनाराम बोराणा ने कहा कि यह बजट पूरी तरह से राज्य की जनता को समर्पित है। आज पहली बार अलग से कृषि बजट पेश हुआ। बजट में चिकित्सा, किसान, शिक्षा, महिला, छात्र, युवा, बुजुर्ग हर वर्ग और हर क्षेत्र का विशेष ध्यान रखा गया है। सब मिलाकर यह बजट राजस्थान के लिए वरदान साबित होगा।
बीजेपी जिलाध्यक्ष नारायण पुरोहित ने कहा कि पिछले तीन बजट की तरह इस बार भी सिरोही जिले को विशेष सौगात नहीं दी गई है। इस बजट में अधिकांश घोषणाएं पिछले बजट की दोहराई गई हैं। इस बार का बजट महज दिखावटी और आम जनता को गुमराह करना और एक चुनावी बजट है। इस बजट में शिक्षा को बढ़ावा देने, बेरोजगारों को राहत देने और गरीबों-किसानों को राहत देने के लिए कुछ नहीं है। गहलोत सरकार ने पहले भी सभी जिले में नंदी गौशाला खोलने की घोषणा की थी, लेकिन वो भी नहीं खोली गई है। बीजेपी जिला उपाध्यक्ष नारायण देवासी ने कहा कि इस बजट में पशु संरक्षण और पशु संवर्धन को लेकर सरकार की कोई योजना नहीं दिखी। गहलोत ने बिजली बिल में प्रति यूनिट सब्सिडी देकर मरहम लगाने की कोशिश की है, लेकिन बढ़े हुए सेवा शुल्क से भारी भरकम बिजली बिलों का बोझ जनता को ही उठाना पड़ेगा।
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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार को विधानसभा में बजट पेश किया है। विधानसभा में पेश किए गए बजट में कई लोक लुभावनी घोषणाएं की गई हैं। बजट में सिरोही जिले के लिए भी कई घोषणाएं की गई है। मुख्यमंत्री ने पर्यटन स्थल माउंट आबू की पेयजल समस्या के समाधान के लिए सालगांव बांध परियोजना को दो सौ पचास करोड़ रुपए की स्वीकृति जारी की है। सिरोही में नर्सिंग कॉलेज बनाने और तीन सौ पंद्रह बेड का हॉस्पिटल बनाने की घोषणा की है। एक. साल गांव बांध परियोजना माउंट आबू के लिए दो सौ पचास करोड़ रुपए की आर्थिक स्वीकृति जारी की गई है। दो. सिरोही में नर्सिंग कॉलेज खोलने की घोषणा की है। तीन. सिरोही में तीन सौ पंद्रह बेड के हॉस्पिटल के लिए एक सौ पाँच करोड़ का बजट। सिरोही विधायक संयम लोढ़ा ने कहा कि कांग्रेस सरकार के बजट से हर वर्ग को भारी राहत एवं सुविधाएं मिलेगी। युवाओं के लिए रोजगार के लाखों अवसर उपलब्ध करवाए गए हैं। इस बजट से लोगों को एक साल नहीं बल्कि कई सालों तक सीधा लाभ मिलेगा। अन्य राज्यों को भी राजस्थान सरकार के इस बजट से प्रेरणा लेकर आम जनता को राहत देनी चाहिए। पूर्व जिला प्रमुख अनाराम बोराणा ने कहा कि यह बजट पूरी तरह से राज्य की जनता को समर्पित है। आज पहली बार अलग से कृषि बजट पेश हुआ। बजट में चिकित्सा, किसान, शिक्षा, महिला, छात्र, युवा, बुजुर्ग हर वर्ग और हर क्षेत्र का विशेष ध्यान रखा गया है। सब मिलाकर यह बजट राजस्थान के लिए वरदान साबित होगा। बीजेपी जिलाध्यक्ष नारायण पुरोहित ने कहा कि पिछले तीन बजट की तरह इस बार भी सिरोही जिले को विशेष सौगात नहीं दी गई है। इस बजट में अधिकांश घोषणाएं पिछले बजट की दोहराई गई हैं। इस बार का बजट महज दिखावटी और आम जनता को गुमराह करना और एक चुनावी बजट है। इस बजट में शिक्षा को बढ़ावा देने, बेरोजगारों को राहत देने और गरीबों-किसानों को राहत देने के लिए कुछ नहीं है। गहलोत सरकार ने पहले भी सभी जिले में नंदी गौशाला खोलने की घोषणा की थी, लेकिन वो भी नहीं खोली गई है। बीजेपी जिला उपाध्यक्ष नारायण देवासी ने कहा कि इस बजट में पशु संरक्षण और पशु संवर्धन को लेकर सरकार की कोई योजना नहीं दिखी। गहलोत ने बिजली बिल में प्रति यूनिट सब्सिडी देकर मरहम लगाने की कोशिश की है, लेकिन बढ़े हुए सेवा शुल्क से भारी भरकम बिजली बिलों का बोझ जनता को ही उठाना पड़ेगा। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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सर्ग १८ ]
अन्याः पानं पपुः पुष्टचर्चिताङ्गशिरः खुरम् । लीलाघुरघुरारावरणदाकाशकोटरे पपुरुदगुरथोचैः सत्वरा जग्गुरूर्जहसुरपुरहौषुः पेतुरुच्चैर्ववल्गुः ।
ननृतुर निशमादुः स्वादु मांस च देव्यत्रिभुवनमपवृत्तं चक्रुरुन्मत्तवृत्ताः ॥ ३६॥
इत्यार्षे श्रीवासिष्ठ महारामायणे वाल्मीकीये मोक्षोपाये निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डोपाख्याने मातृव्यवहारवर्णनं नामाऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
लीलासे जनित घुरघुर शब्दोंसे आकाशके कोने में कुछ देवियाँ मस्तकसे लेकर खुरपर्यन्त अङ्गोंको रक्त, चर्बी, आसव आदिसे पुष्ट करनेके लिए मद्यपान कर रही थीं ॥ ३५ ॥
उनके कुछ उन्मत्त वृत्तान्तोंका कथन करते हुए प्रकृत विषयका उपसंहार करते हैं - 'पपु०' इत्यादिसे ।
कुछ देवियाँ पेय पदार्थ पीने लगीं, कुछ तो उच्च स्वरसे गर्जने लगीं, कुछ जलदीसे जाने लगीं, कुछ बोलने लगीं, कुछ हँसने लगीं, कुछ परस्पर रक्षा करने लगीं, कुछ एक दूसरेके मुखमें या अग्निमें होमने लगीं, कुछ गिरने लगीं, कुछ ऊँचेसे बड़बड़ाने लगीं, कुछ निरन्तर नाचने लगीं, कुछ स्वादु मांस खाने लगीं, यों उन्होंने उन्मत्ताचरण होकर त्रिभुवनको अपने व्यापारसे सद्वर्तनसे रहित कर दिया ॥ ३६ ॥
अठारहवाँ सर्ग समाप्त
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सर्ग अट्ठारह ] अन्याः पानं पपुः पुष्टचर्चिताङ्गशिरः खुरम् । लीलाघुरघुरारावरणदाकाशकोटरे पपुरुदगुरथोचैः सत्वरा जग्गुरूर्जहसुरपुरहौषुः पेतुरुच्चैर्ववल्गुः । ननृतुर निशमादुः स्वादु मांस च देव्यत्रिभुवनमपवृत्तं चक्रुरुन्मत्तवृत्ताः ॥ छत्तीस॥ इत्यार्षे श्रीवासिष्ठ महारामायणे वाल्मीकीये मोक्षोपाये निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डोपाख्याने मातृव्यवहारवर्णनं नामाऽष्टादशः सर्गः ॥ अट्ठारह ॥ लीलासे जनित घुरघुर शब्दोंसे आकाशके कोने में कुछ देवियाँ मस्तकसे लेकर खुरपर्यन्त अङ्गोंको रक्त, चर्बी, आसव आदिसे पुष्ट करनेके लिए मद्यपान कर रही थीं ॥ पैंतीस ॥ उनके कुछ उन्मत्त वृत्तान्तोंका कथन करते हुए प्रकृत विषयका उपसंहार करते हैं - 'पपुशून्य' इत्यादिसे । कुछ देवियाँ पेय पदार्थ पीने लगीं, कुछ तो उच्च स्वरसे गर्जने लगीं, कुछ जलदीसे जाने लगीं, कुछ बोलने लगीं, कुछ हँसने लगीं, कुछ परस्पर रक्षा करने लगीं, कुछ एक दूसरेके मुखमें या अग्निमें होमने लगीं, कुछ गिरने लगीं, कुछ ऊँचेसे बड़बड़ाने लगीं, कुछ निरन्तर नाचने लगीं, कुछ स्वादु मांस खाने लगीं, यों उन्होंने उन्मत्ताचरण होकर त्रिभुवनको अपने व्यापारसे सद्वर्तनसे रहित कर दिया ॥ छत्तीस ॥ अठारहवाँ सर्ग समाप्त
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Assam Agricultural University (AAU) Recruitment 2021: असम कृषि विश्वविद्यालय (AAU) ने ADO, असिस्टेंट एग्रीकल्चर ऑफिसर और जेई के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार असम कृषि विश्वविद्यालय (AAU) में आवेदन करने के लिए निर्धारित आवेदन प्रारूप के माध्यम से या उससे पहले 15 फरवरी, 2021 को आवेदन कर सकते हैं।
पदों का विवरणः असम कृषि विश्वविद्यालय (AAU) द्वारा जारी नोटिफिकेशन के अनुसार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के 109 पद, एग्रीकल्चर इंजीनियर के 9 पद और जूनियर इंजीनियर के 39 पद रिक्त है।
शैक्षिक योग्यताः एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर (ADO) पद पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से कृषि / बागवानी (चार साल की अवधि) में ग्रेजुएशन की डिग्री होनी चाहिए। एग्रीकल्चरल इंजीनियर (AAE) के पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों के पास किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में डिग्री या सिविल / मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री होनी चाहिए। जूनियर इंजीनियर (जेई - एग्रीकल्चर) के पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों के पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान / विश्वविद्यालय से कृषि / सिविल / मैकेनिकल इंजीनियरिंग में 03 वर्ष का डिप्लोमा एवं अन्य निर्धारित योग्यताएं होनी चाहिए।
आवेदन प्रक्रियाः इच्छुक और पात्र उम्मीदवार असम कृषि विश्वविद्यालय (AAU) द्वारा जारी नोटिफिकेशन के लिए निर्धारित आवेदन प्रारूप के माध्यम से 15 फरवरी 2021 को या उससे पहले आवेदन कर सकते हैं। उपरोक्त पदों के लिए निर्धारित योग्यता रखने वाले व्यक्ति http://www. aau. ac. in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष एवं अधिकतम आयु 40 वर्ष निर्धारित हैं। उम्मीदवारों की आयु की गणना 1 जनवरी, 2021 से की जाएगी। वहीं आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियमानुसार छूट प्रदान की जाएगी।
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Assam Agricultural University Recruitment दो हज़ार इक्कीस: असम कृषि विश्वविद्यालय ने ADO, असिस्टेंट एग्रीकल्चर ऑफिसर और जेई के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार असम कृषि विश्वविद्यालय में आवेदन करने के लिए निर्धारित आवेदन प्रारूप के माध्यम से या उससे पहले पंद्रह फरवरी, दो हज़ार इक्कीस को आवेदन कर सकते हैं। पदों का विवरणः असम कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जारी नोटिफिकेशन के अनुसार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के एक सौ नौ पद, एग्रीकल्चर इंजीनियर के नौ पद और जूनियर इंजीनियर के उनतालीस पद रिक्त है। शैक्षिक योग्यताः एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर पद पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से कृषि / बागवानी में ग्रेजुएशन की डिग्री होनी चाहिए। एग्रीकल्चरल इंजीनियर के पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों के पास किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में डिग्री या सिविल / मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री होनी चाहिए। जूनियर इंजीनियर के पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों के पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान / विश्वविद्यालय से कृषि / सिविल / मैकेनिकल इंजीनियरिंग में तीन वर्ष का डिप्लोमा एवं अन्य निर्धारित योग्यताएं होनी चाहिए। आवेदन प्रक्रियाः इच्छुक और पात्र उम्मीदवार असम कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जारी नोटिफिकेशन के लिए निर्धारित आवेदन प्रारूप के माध्यम से पंद्रह फरवरी दो हज़ार इक्कीस को या उससे पहले आवेदन कर सकते हैं। उपरोक्त पदों के लिए निर्धारित योग्यता रखने वाले व्यक्ति http://www. aau. ac. in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु इक्कीस वर्ष एवं अधिकतम आयु चालीस वर्ष निर्धारित हैं। उम्मीदवारों की आयु की गणना एक जनवरी, दो हज़ार इक्कीस से की जाएगी। वहीं आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियमानुसार छूट प्रदान की जाएगी।
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इंदौर में बॉर्डर-गावस्कर श्रृंखला के तीसरे टेस्ट में भारत को नौ विकेट से हराकर ऑस्ट्रेलिया डब्ल्यूटीसी फाइनल में जगह हासिल करने वाली पहली टीम बनीं थी. इसके बाद भारत को अहमदाबाद टेस्ट में जीत या न्यूजीलैंड और श्रीलंका के बीच पहले टेस्ट में अनुकूल परिणाम की जरूरत थी. क्राइस्टचर्च टेस्ट के परिणाम ने बॉर्डर-गावस्कर श्रृंखला के चौथे टेस्ट को समीकरण से बाहर कर दिया. ऑस्ट्रेलिया अहमदाबाद टेस्ट से पहले डब्ल्यूटीसी फाइनल की तालिका में 68. 52 प्रतिशत अंक (पीटीसी) के साथ शीर्ष पर है.
क्राइस्टचर्च टेस्ट से पहले श्रीलंका का प्रतिशत अंक 53. 33 था. न्यूजीलैंड दौरे पर टीम के दोनों मैचों के जीतने पर उसका प्रतिशत अंक 61. 11 हो जाता और अहमदाबाद टेस्ट ड्रॉ पर छूटने पर टीम क्वालीफाई कर लेती. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चौथा टेस्ट ड्रॉ होने पर भारत का पीटीसी 60. 29 अंक रहेगा. न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान केन विलियमसन ने हालांकि नाबाद 121 रन की पारी खेलकर न्यूजीलैंड की रोमांचक जीत सुनिश्चित करने के साथ डब्ल्यूटीसी फाइनल के समीकरण से सभी अगर-मगर को हटा दिया.
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)
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इंदौर में बॉर्डर-गावस्कर श्रृंखला के तीसरे टेस्ट में भारत को नौ विकेट से हराकर ऑस्ट्रेलिया डब्ल्यूटीसी फाइनल में जगह हासिल करने वाली पहली टीम बनीं थी. इसके बाद भारत को अहमदाबाद टेस्ट में जीत या न्यूजीलैंड और श्रीलंका के बीच पहले टेस्ट में अनुकूल परिणाम की जरूरत थी. क्राइस्टचर्च टेस्ट के परिणाम ने बॉर्डर-गावस्कर श्रृंखला के चौथे टेस्ट को समीकरण से बाहर कर दिया. ऑस्ट्रेलिया अहमदाबाद टेस्ट से पहले डब्ल्यूटीसी फाइनल की तालिका में अड़सठ. बावन प्रतिशत अंक के साथ शीर्ष पर है. क्राइस्टचर्च टेस्ट से पहले श्रीलंका का प्रतिशत अंक तिरेपन. तैंतीस था. न्यूजीलैंड दौरे पर टीम के दोनों मैचों के जीतने पर उसका प्रतिशत अंक इकसठ. ग्यारह हो जाता और अहमदाबाद टेस्ट ड्रॉ पर छूटने पर टीम क्वालीफाई कर लेती. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चौथा टेस्ट ड्रॉ होने पर भारत का पीटीसी साठ. उनतीस अंक रहेगा. न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान केन विलियमसन ने हालांकि नाबाद एक सौ इक्कीस रन की पारी खेलकर न्यूजीलैंड की रोमांचक जीत सुनिश्चित करने के साथ डब्ल्यूटीसी फाइनल के समीकरण से सभी अगर-मगर को हटा दिया.
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PUBG New State का नाम बदलकर New State Mobile किया जा रहा है। गेम के पब्लिशर Krafton ने इस गेम को नवंबर 2021 में लॉन्च किया था। यह लोकप्रिय बैटल रोयाल गेम काफी हद तक Battlegrounds Mobile India (PUBG Mobile) की तरह ही है, लेकिन इसमें थीम के साथ-साथ हथियारों व कुछ अन्य एलिमेंट्स में बदलाव किए गए हैं। लॉन्च के बाद से New State Mobile को 4. 5 करोड़ से अधिक डाउनलोड्स मिल चुके हैं।
अकाउंट का नाम बदलकर न्यू स्टेट मोबाइल कर चुका है। Krafton ने ट्वीट में लिखा "न्यू स्टेट हमेशा एक मोबाइल-केंद्रित अनुभव रहा है, और न्यू स्टेट मोबाइल में बदलाव के जरिए हम इसे कोर में ला रहे हैं। " पिछली रिपोर्ट के अनुसार, गेम को पिछले साल नवंबर में जारी किया गया था और तब से इसे 45 मिलियन से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है। इस खबर को लिखते समय तक, गेम Google Play store और Apple App Store में PUBG: New State टाइटल के साथ ही लिस्टेड था।
के अनुसार, BR: Extreme मोड के साथ ही Krafton आने वाले समय में गेम में और भी बहुत सारे बदलाव करने वाला है।
भी की थी, जो 2 फरवरी तक चलेगा। पहला इवेंट उन प्लेयर्स को तीन BP Random बॉक्स देगा, जो कम से कम चार दिनों के लिए गेम में लॉग इन करते हैं। इसके अलावा, चार दिनों तक दिन में कम से कम तीन बार BR: Extreme मोड खेलने वाले प्लेयर्स को Royale Chest Trickets मिलेगी।
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PUBG New State का नाम बदलकर New State Mobile किया जा रहा है। गेम के पब्लिशर Krafton ने इस गेम को नवंबर दो हज़ार इक्कीस में लॉन्च किया था। यह लोकप्रिय बैटल रोयाल गेम काफी हद तक Battlegrounds Mobile India की तरह ही है, लेकिन इसमें थीम के साथ-साथ हथियारों व कुछ अन्य एलिमेंट्स में बदलाव किए गए हैं। लॉन्च के बाद से New State Mobile को चार. पाँच करोड़ से अधिक डाउनलोड्स मिल चुके हैं। अकाउंट का नाम बदलकर न्यू स्टेट मोबाइल कर चुका है। Krafton ने ट्वीट में लिखा "न्यू स्टेट हमेशा एक मोबाइल-केंद्रित अनुभव रहा है, और न्यू स्टेट मोबाइल में बदलाव के जरिए हम इसे कोर में ला रहे हैं। " पिछली रिपोर्ट के अनुसार, गेम को पिछले साल नवंबर में जारी किया गया था और तब से इसे पैंतालीस मिलियन से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है। इस खबर को लिखते समय तक, गेम Google Play store और Apple App Store में PUBG: New State टाइटल के साथ ही लिस्टेड था। के अनुसार, BR: Extreme मोड के साथ ही Krafton आने वाले समय में गेम में और भी बहुत सारे बदलाव करने वाला है। भी की थी, जो दो फरवरी तक चलेगा। पहला इवेंट उन प्लेयर्स को तीन BP Random बॉक्स देगा, जो कम से कम चार दिनों के लिए गेम में लॉग इन करते हैं। इसके अलावा, चार दिनों तक दिन में कम से कम तीन बार BR: Extreme मोड खेलने वाले प्लेयर्स को Royale Chest Trickets मिलेगी।
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मैं सहन शक्ति सिंह का हमराज हूँ। तभी तो वह मुझे यारानावश हेमराज कहता है। कदाचित सभी ने मेरा नाम हेमराज ही रख दिया, इसी नाम से सहन शक्तिसिंह का हनुमान कहलाने लगा। मुझे भी सहन शक्तिसिंह के स्थान पर शक्ति पुकारना अच्छा लगता है।
शक्ति विचलित, बैचेन, जसमंजस व व्याकुल सा महसूस हुआ। मैंने उसे टोंकना चाहा, मगर रूक गया। कुछ देर अन्दरूनी हलचल को विस्तार से परखने लगा। आखिर चल क्या रहा होगा, शक्ति के दिल-दिमाग में? लेकिन कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। कुछ तो है, जिसे वह पचा नहीं पा रहा है। सहन नहीं कर पा रहा है। कोई टीस, कोई घाव कोई नासूर.......या कुछ और......।
--उपन्यास भाग-2 अन्गयारी आँधी ...Read More --आर. एन. सुनगरया,
---उपन्यास भाग - सात अन्गयारी आँधी - 7 ...Read More --आर. एन. सुनगरया, कौन दम्पति नहीं चाहेगा कि दोनों परस्पर एक दूसरे पर आसक्त हों, समर्पित हों। समग्र रूप में! जिन्दगी की आपा-धापी,
-उपन्यास भाग - ग्यारह अन्गयारी आँधी - ११ ...Read More --आर. एन. सुनगरया, शक्ति ध्यान-मग्न ऑंखें मीचे आराम मुद्रा में बैठा था। "सहन शक्ति सिंह।" पूरा नाम! अन्तर्मन पर दस्तक, "सहन शक्ति सिंह।" पुनः पुकारा। "कौन है?" शक्ति अचरज में,
--उपन्यास भाग - चौदह अन्गयारी आँधी - १४ ...Read More --आर. एन. सुनगरया, स्वरूपा भलि-भॉंती अवगत है, किसी खेल में खिलाड़ी का अकुशल, अनाड़ी, आधा-अधूरा ज्ञान, अपरिपक्वता होने के परिणाम स्वरूप खेल का कबाड़ा- काम- बिगाड़ा,
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मैं सहन शक्ति सिंह का हमराज हूँ। तभी तो वह मुझे यारानावश हेमराज कहता है। कदाचित सभी ने मेरा नाम हेमराज ही रख दिया, इसी नाम से सहन शक्तिसिंह का हनुमान कहलाने लगा। मुझे भी सहन शक्तिसिंह के स्थान पर शक्ति पुकारना अच्छा लगता है। शक्ति विचलित, बैचेन, जसमंजस व व्याकुल सा महसूस हुआ। मैंने उसे टोंकना चाहा, मगर रूक गया। कुछ देर अन्दरूनी हलचल को विस्तार से परखने लगा। आखिर चल क्या रहा होगा, शक्ति के दिल-दिमाग में? लेकिन कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। कुछ तो है, जिसे वह पचा नहीं पा रहा है। सहन नहीं कर पा रहा है। कोई टीस, कोई घाव कोई नासूर.......या कुछ और......। --उपन्यास भाग-दो अन्गयारी आँधी ...Read More --आर. एन. सुनगरया, ---उपन्यास भाग - सात अन्गयारी आँधी - सात ...Read More --आर. एन. सुनगरया, कौन दम्पति नहीं चाहेगा कि दोनों परस्पर एक दूसरे पर आसक्त हों, समर्पित हों। समग्र रूप में! जिन्दगी की आपा-धापी, -उपन्यास भाग - ग्यारह अन्गयारी आँधी - ग्यारह ...Read More --आर. एन. सुनगरया, शक्ति ध्यान-मग्न ऑंखें मीचे आराम मुद्रा में बैठा था। "सहन शक्ति सिंह।" पूरा नाम! अन्तर्मन पर दस्तक, "सहन शक्ति सिंह।" पुनः पुकारा। "कौन है?" शक्ति अचरज में, --उपन्यास भाग - चौदह अन्गयारी आँधी - चौदह ...Read More --आर. एन. सुनगरया, स्वरूपा भलि-भॉंती अवगत है, किसी खेल में खिलाड़ी का अकुशल, अनाड़ी, आधा-अधूरा ज्ञान, अपरिपक्वता होने के परिणाम स्वरूप खेल का कबाड़ा- काम- बिगाड़ा,
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भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद श्री राकेश सिंह 1 से 4 जुलाई तक अशोकनगर, गुना एवं शिवपुरी जिलों के प्रवास पर रहेंगे। श्री सिंह 1 जुलाई को अप. 4 बजे भोपाल से अशोकनगर के लिए कार द्वारा प्रस्थान कर सायं 7 बजे अशोकनगर पहुंचेंगे एवं सायं 7.30 बजे कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे। आप अशोकनगर में रात्रि विश्राम करेंगे।
2 जुलाई को अशोक नगर में प्रातः 11 बजे जिला, 2 बजे विधानसभावार प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करेंगे। सायं 6 बजे अशोक नगर से गुना के लिए कार द्वारा प्रस्थान करेंगे। आप सायं 7 बजे गुना पहुंचेंगे एवं सायं 7.30 बजे कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे। गुना में रात्रि विश्राम करेंगे।
3 जुलाई को गुना में प्रातः 11 बजे जिला, 2 बजे विधानसभावार प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करेंगे। सायं 7 बजे गुना से शिवपुरी के लिए कार द्वारा प्रस्थान करेंगे। आप रात्रि 8.30 बजे शिवपुरी पहुंचकर रात्रि 9 बजे कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे। शिवपुरी में रात्रि विश्राम करेंगे।
4 जुलाई को शिवपुरी में प्रातः 11 बजे जिला, 1.30 विधानसभा प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करेंगे। सायं 6.30 बजे शिवपुरी से झांसी के लिए कार द्वारा प्रस्ताव करेंगे। आप रात्रि 8.43 बजे चैन्नई राजधानी एक्सप्रेस द्वारा भोपाल के लिए प्रस्थान करेंगे एवं रात्रि 11.45 बजे भोपाल पहुंचेंगे।
जिला स्तर एवं विधानसभावार प्रमुख बैठकों में जिले में निवासरत पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी, प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, संभागीय संगठन मंत्री, पार्टी के जिला अध्यक्ष, मोर्चाें के प्रदेश पदाधिकारी, प्रकोष्ठों के प्रदेश संयोजक, सह संयोजक, विभाग एवं प्रकल्प के संयोजक-सह संयोजक, जिला कार्यसमिति सदस्य, समस्त मोर्चा के जिला पदाधिकारी, प्रकोष्ठ, विभाग और प्रकल्प के जिला संयोजक, मण्डल अध्यक्ष एवं महामंत्री, जनप्रतिनिधियों में सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, जनपद पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, नगरपालिका के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, नगर पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, कृषि उपज मण्डी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्य शामिल रहेंगे।
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भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद श्री राकेश सिंह एक से चार जुलाई तक अशोकनगर, गुना एवं शिवपुरी जिलों के प्रवास पर रहेंगे। श्री सिंह एक जुलाई को अप. चार बजे भोपाल से अशोकनगर के लिए कार द्वारा प्रस्थान कर सायं सात बजे अशोकनगर पहुंचेंगे एवं सायं सात.तीस बजे कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे। आप अशोकनगर में रात्रि विश्राम करेंगे। दो जुलाई को अशोक नगर में प्रातः ग्यारह बजे जिला, दो बजे विधानसभावार प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करेंगे। सायं छः बजे अशोक नगर से गुना के लिए कार द्वारा प्रस्थान करेंगे। आप सायं सात बजे गुना पहुंचेंगे एवं सायं सात.तीस बजे कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे। गुना में रात्रि विश्राम करेंगे। तीन जुलाई को गुना में प्रातः ग्यारह बजे जिला, दो बजे विधानसभावार प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करेंगे। सायं सात बजे गुना से शिवपुरी के लिए कार द्वारा प्रस्थान करेंगे। आप रात्रि आठ.तीस बजे शिवपुरी पहुंचकर रात्रि नौ बजे कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे। शिवपुरी में रात्रि विश्राम करेंगे। चार जुलाई को शिवपुरी में प्रातः ग्यारह बजे जिला, एक.तीस विधानसभा प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करेंगे। सायं छः.तीस बजे शिवपुरी से झांसी के लिए कार द्वारा प्रस्ताव करेंगे। आप रात्रि आठ.तैंतालीस बजे चैन्नई राजधानी एक्सप्रेस द्वारा भोपाल के लिए प्रस्थान करेंगे एवं रात्रि ग्यारह.पैंतालीस बजे भोपाल पहुंचेंगे। जिला स्तर एवं विधानसभावार प्रमुख बैठकों में जिले में निवासरत पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी, प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, संभागीय संगठन मंत्री, पार्टी के जिला अध्यक्ष, मोर्चाें के प्रदेश पदाधिकारी, प्रकोष्ठों के प्रदेश संयोजक, सह संयोजक, विभाग एवं प्रकल्प के संयोजक-सह संयोजक, जिला कार्यसमिति सदस्य, समस्त मोर्चा के जिला पदाधिकारी, प्रकोष्ठ, विभाग और प्रकल्प के जिला संयोजक, मण्डल अध्यक्ष एवं महामंत्री, जनप्रतिनिधियों में सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, जनपद पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, नगरपालिका के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, नगर पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, कृषि उपज मण्डी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्य शामिल रहेंगे।
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अमरावती/दि. 26 - एसआरपीएफ कैम्प परिसर से शनिवार रात चोरों ने चंदन के दो पेड काटकर ले जाने से एसआरपीएफ परिसर में दिन रात तैनात रहने वाली सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है. फे्रजरपुरा पुलिस ने पुुलिस निरीक्षक राजेंद्र अंबादास राउत की शिकायत पर दो संदिग्धों के खिलाफ अपराध दर्ज किया है. फे्रजरपुरा निवासी कन्हैया सिरसोदे व वडाली निवासी बंडू वामनराव चाचरकर यह अपराध दर्ज हुए दो संदिग्धो के नाम है.
वडाली परिसर के राज्य आरक्षित पुलिस दल गट क्रमांक 9 स्थित गैस गोदाम से पंचवडी परिसर में कुछ पेड लगाए गए है. उसमें दो चंदन के भी पेड थे. हर पेड पर नंबर रहने से चंदन के 111 व 115 नंबर के पेड कल रविवार को सुबह क्यूआरटी दल प्रमुख एन. आर. शर्मा को पेड काटा हुआ दिखाई दिया. उन्होंने सशस्त्र पुलिस निरीक्षक राजेंद्र राउत को इस बाबत जानकारी दी. उन्होंने परिसर में पूछताछ की तब कन्हैया सिरसोदे व बंडू चाचरकर यह लकडियां काटने का काम करते है, ऐसी उन्हें जानकारी मिली. उसके अनुसार उन्होंने रविवार को दोपहर फे्रजरपुरा पुलिस थाने में शिकायत दर्ज की. उस आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ अपराध दर्ज किया है.
एसआरपीएफ परिसर में चौवीसों घंटे एसआरपीएफ जवान तैनात रहते है. बाहर के व्यक्ति को अनुमति के बगैर भीतर प्रवेश नहीं दिया जाता. इतना ही नहीं तो सब्जी विक्रेता अथवा अन्य हॉकर्स को भी मनाई है. इस प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था रहते हुए भी एसआरपीएफ परिसर से चंदन के पेड चोरी गए है. जिससे यहां की सुरक्षा पर अब प्रश्नचिन्ह निर्माण हुआ है.
शहर में दो महिने में 7 से 8 चंदन के पेड चोरी गए है. विशेष यह कि चोरों ने यह पेड सरकारी अधिकारी व सरकारी कार्यालय से चुराये है. जिलाधिकारी के बंगले से और जिलाधिकारी कार्यालय से चंदन के पेड चोरी गए, उसके बाद सरकारी वकील परीक्षित गणोरकर के घर के परिसर से चंदन के पेड चोरों ने काट लिये तथा उपवन संरक्षक कार्यालय के दो चंदन के पेड काटकर चोर ले गए. उसके बाद कांग्रेस नगर से एक और एक न्यायाधीश के बंगले से चंदन के पेड चोरों ने काट लिये जाने की नोंद पुलिस थाने में है. जिससे शहर में चंदन चोरों का गिराह सक्रीय होने की बात दिखाई देती है.
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अमरावती/दि. छब्बीस - एसआरपीएफ कैम्प परिसर से शनिवार रात चोरों ने चंदन के दो पेड काटकर ले जाने से एसआरपीएफ परिसर में दिन रात तैनात रहने वाली सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है. फे्रजरपुरा पुलिस ने पुुलिस निरीक्षक राजेंद्र अंबादास राउत की शिकायत पर दो संदिग्धों के खिलाफ अपराध दर्ज किया है. फे्रजरपुरा निवासी कन्हैया सिरसोदे व वडाली निवासी बंडू वामनराव चाचरकर यह अपराध दर्ज हुए दो संदिग्धो के नाम है. वडाली परिसर के राज्य आरक्षित पुलिस दल गट क्रमांक नौ स्थित गैस गोदाम से पंचवडी परिसर में कुछ पेड लगाए गए है. उसमें दो चंदन के भी पेड थे. हर पेड पर नंबर रहने से चंदन के एक सौ ग्यारह व एक सौ पंद्रह नंबर के पेड कल रविवार को सुबह क्यूआरटी दल प्रमुख एन. आर. शर्मा को पेड काटा हुआ दिखाई दिया. उन्होंने सशस्त्र पुलिस निरीक्षक राजेंद्र राउत को इस बाबत जानकारी दी. उन्होंने परिसर में पूछताछ की तब कन्हैया सिरसोदे व बंडू चाचरकर यह लकडियां काटने का काम करते है, ऐसी उन्हें जानकारी मिली. उसके अनुसार उन्होंने रविवार को दोपहर फे्रजरपुरा पुलिस थाने में शिकायत दर्ज की. उस आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ अपराध दर्ज किया है. एसआरपीएफ परिसर में चौवीसों घंटे एसआरपीएफ जवान तैनात रहते है. बाहर के व्यक्ति को अनुमति के बगैर भीतर प्रवेश नहीं दिया जाता. इतना ही नहीं तो सब्जी विक्रेता अथवा अन्य हॉकर्स को भी मनाई है. इस प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था रहते हुए भी एसआरपीएफ परिसर से चंदन के पेड चोरी गए है. जिससे यहां की सुरक्षा पर अब प्रश्नचिन्ह निर्माण हुआ है. शहर में दो महिने में सात से आठ चंदन के पेड चोरी गए है. विशेष यह कि चोरों ने यह पेड सरकारी अधिकारी व सरकारी कार्यालय से चुराये है. जिलाधिकारी के बंगले से और जिलाधिकारी कार्यालय से चंदन के पेड चोरी गए, उसके बाद सरकारी वकील परीक्षित गणोरकर के घर के परिसर से चंदन के पेड चोरों ने काट लिये तथा उपवन संरक्षक कार्यालय के दो चंदन के पेड काटकर चोर ले गए. उसके बाद कांग्रेस नगर से एक और एक न्यायाधीश के बंगले से चंदन के पेड चोरों ने काट लिये जाने की नोंद पुलिस थाने में है. जिससे शहर में चंदन चोरों का गिराह सक्रीय होने की बात दिखाई देती है.
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५१५९, आशौचदशक, २) एवं समानोदक तीन दिनों का आशौच मनाते हैं। शूद्रों में तीन वर्ष के उपरान्त एव विवाह या १६ वर्षों के पूर्व भरने पर सपिण्डों को तीन दिनो का आशीच करना होता है । १६ वय या विवाह (शूद्रों के विषय मे) के उपरान्त मृत्यु होने पर उस जाति के लिए व्यवस्थित आशौचावधि मनायी जाती है। लड़को के तीन वर्षों के उपरान्त एवं वाग्दान के पूर्व मरने पर माता पिता को तीन दिनो का एवं तीन पीढ़ियों के सपिण्डो को एक दिन का आशौच मनाना चाहिए। यदि वाग्दान के उपरान्त किन्तु विवाह के पूर्व कन्या मर जाय तो पिता ने सपिण्डो एव होनेवाले पति को तीन दिनों का आशौच करना चाहिए। स्त्रियो एव शूद्रों के विषय में यदि मृत्यु विवाहोपरान्त हो जाय या १६ वर्षों के उपरान्त (यदि शूद्र अविवाहित हो) तो सभी सपिण्डों की आद्यौपावधि दस दिनों की होती है। यदि विवाहित स्त्री अपने पिता के यहाँ मर जाय तो माता पिता, विभाता, सहोदर भाइयो विमाता के पुत्रों को तीन दिनों का तथा घाचा आदि को जो एक ही घर में रहते हैं एक दिन का आशीच मनाना पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि यदि विवाहित बन्या अपने पिता के ग्राम के अतिरिक्त कहीं और मरती है तो माता पिता को पक्षिणी (दो रात एव मध्य मे एक दिन या दो दिन एव मध्य मे एक रात) का आशीच मनाना पड़ता है। अन्य मत भी हैं जिन्हें हम छोड़ रहे हैं। उदाहरणाप विष्णुधमसूत्र (२२।३२-३४) का वचन है कि विवाहित स्त्री के लिए माता पिता को आशौच नहीं लगता किन्तु जब वह पिता के घर में बच्चा जनती है या मर जाती है तो क्रम से एक दिन या सीन दिनों का आशौच लगता है। अपने माता पिता या विमाता के मरने पर यदि दस दिन न बीते हो तो विवाहित स्त्री को तीन दिनो का या दस दिनों के शेष दिनो का आशौच मनाना होता है (याश० ३।२१, उत्तर भाग ) । यदि विवाहित स्त्री अपने माता पिता या विमाता की मृत्यु का सन्देश दस दिनों के उपरान्त या वर्ष के भीतर सुन लेती है तो उसे पक्षिणी आशौच करना पड़ता है। यदि उपतयन संस्कृत भाई अपनी विवाहित बहिन के यहाँ या ऐसी बहिन अपने भाई के यहाँ मरती है तो सीन दिनों का आशौच होता है, किन्तु यदि ये एक-दूसरे के घर में मरकर कहीं और मरते हैं तो आशौच पक्षिणी होता है यदि मृत्यु किसी अन्य ग्राम में होती है तो यशौच केवल एक दिन का होता है। यही नियम विमाता के भाइयो एक बहिनो एवं अपनी बहिनो के लिए भी प्रयुक्त होता है। अपने पितामह या चाचा के भरने पर विवाहित नारी केवल स्नान कर शुद्ध हो जाती है। यदि मामा मर जाता है तो मानजा एव मातजी एक पक्षिणी का आशौच निमाहते हैं। यदि मामा भानजे के घर मे मरता हैं ता भानजे के लिए आशीच तीन दिनो का, किन्तु यदि मामा का उपनयन नहीं हुआ हो या वह किसी अन्य ग्राम मे मरता है तो एक दिन का होता है। यही नियम अपनी माता के विमाता माई के विषय में लागू होता है। यदि मामी मर जाय तो मानजे एत्र मानजी को एक पक्षिणी का आशोच करना पड़ता है। यदि उपनयन संस्कृत मानजा मर जाय तो मामा एव मामी को तीन दिन का आशीच होता है। यही नियम मामा की विमाता-बहिन के पुत्र के लिए भी लागू है। यदि बहिन की पुत्री मर जाय तो मामा को केवल स्नान करना पड़ता है। यदि नाना मर जाय तो नाती या नतिनी को तीन दिनों का आशीच लगता है। किन्तु यदि नाना किसी अन्य ग्राम मे मरे तो उहे एक पक्षिणी का आशौच करना पड़ता है। नानी के भरने पर नाती एव नतिनी को एक पक्षिणी का आशौच लगता है। कुछ ग्रन्थ भतीजी एव पोती को छूट देते हैं। उपनयन संस्कृत दौहित्र की मृत्यु पर नाना एवं नानी को तीन दिनो का आशौच किन्तु उपनयन न होने पर केवल एक पक्षिणी का आशौच लगता है। पुत्री की पुत्री के मरने पर नाना और नानी को आशौच नहीं लगता। इन विषयों में सामान्य नियम यही है कि केवल उपनयन संस्कृत पुरुष एव विवाहित स्त्री ही माता पिता के अतिरिक्त किसी अन्य सम्बधी की मृत्यु पर आशौच मनाते हैं (अर्थात् उपनयन सस्कारविहीन पुरुष तथा अविवाहित स्त्री माता या पिता की मृत्यु पर ही आशौच का नियम पालन करते हैं)।
दामाद के घर में श्वशुर या सास के मरने से दामाद को तीन दिनो का तथा अन्यत्र मरने से एक पक्षिणी का आशीय लगता है। दामाद की मृत्यु पर श्वशुर एव सास एक दिन का आशौच करते हैं या केवल स्नान से शुद्ध हो जाते हैं, किन्तु
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पाँच हज़ार एक सौ उनसठ, आशौचदशक, दो) एवं समानोदक तीन दिनों का आशौच मनाते हैं। शूद्रों में तीन वर्ष के उपरान्त एव विवाह या सोलह वर्षों के पूर्व भरने पर सपिण्डों को तीन दिनो का आशीच करना होता है । सोलह वय या विवाह के उपरान्त मृत्यु होने पर उस जाति के लिए व्यवस्थित आशौचावधि मनायी जाती है। लड़को के तीन वर्षों के उपरान्त एवं वाग्दान के पूर्व मरने पर माता पिता को तीन दिनो का एवं तीन पीढ़ियों के सपिण्डो को एक दिन का आशौच मनाना चाहिए। यदि वाग्दान के उपरान्त किन्तु विवाह के पूर्व कन्या मर जाय तो पिता ने सपिण्डो एव होनेवाले पति को तीन दिनों का आशौच करना चाहिए। स्त्रियो एव शूद्रों के विषय में यदि मृत्यु विवाहोपरान्त हो जाय या सोलह वर्षों के उपरान्त तो सभी सपिण्डों की आद्यौपावधि दस दिनों की होती है। यदि विवाहित स्त्री अपने पिता के यहाँ मर जाय तो माता पिता, विभाता, सहोदर भाइयो विमाता के पुत्रों को तीन दिनों का तथा घाचा आदि को जो एक ही घर में रहते हैं एक दिन का आशीच मनाना पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि यदि विवाहित बन्या अपने पिता के ग्राम के अतिरिक्त कहीं और मरती है तो माता पिता को पक्षिणी का आशीच मनाना पड़ता है। अन्य मत भी हैं जिन्हें हम छोड़ रहे हैं। उदाहरणाप विष्णुधमसूत्र का वचन है कि विवाहित स्त्री के लिए माता पिता को आशौच नहीं लगता किन्तु जब वह पिता के घर में बच्चा जनती है या मर जाती है तो क्रम से एक दिन या सीन दिनों का आशौच लगता है। अपने माता पिता या विमाता के मरने पर यदि दस दिन न बीते हो तो विवाहित स्त्री को तीन दिनो का या दस दिनों के शेष दिनो का आशौच मनाना होता है । यदि विवाहित स्त्री अपने माता पिता या विमाता की मृत्यु का सन्देश दस दिनों के उपरान्त या वर्ष के भीतर सुन लेती है तो उसे पक्षिणी आशौच करना पड़ता है। यदि उपतयन संस्कृत भाई अपनी विवाहित बहिन के यहाँ या ऐसी बहिन अपने भाई के यहाँ मरती है तो सीन दिनों का आशौच होता है, किन्तु यदि ये एक-दूसरे के घर में मरकर कहीं और मरते हैं तो आशौच पक्षिणी होता है यदि मृत्यु किसी अन्य ग्राम में होती है तो यशौच केवल एक दिन का होता है। यही नियम विमाता के भाइयो एक बहिनो एवं अपनी बहिनो के लिए भी प्रयुक्त होता है। अपने पितामह या चाचा के भरने पर विवाहित नारी केवल स्नान कर शुद्ध हो जाती है। यदि मामा मर जाता है तो मानजा एव मातजी एक पक्षिणी का आशौच निमाहते हैं। यदि मामा भानजे के घर मे मरता हैं ता भानजे के लिए आशीच तीन दिनो का, किन्तु यदि मामा का उपनयन नहीं हुआ हो या वह किसी अन्य ग्राम मे मरता है तो एक दिन का होता है। यही नियम अपनी माता के विमाता माई के विषय में लागू होता है। यदि मामी मर जाय तो मानजे एत्र मानजी को एक पक्षिणी का आशोच करना पड़ता है। यदि उपनयन संस्कृत मानजा मर जाय तो मामा एव मामी को तीन दिन का आशीच होता है। यही नियम मामा की विमाता-बहिन के पुत्र के लिए भी लागू है। यदि बहिन की पुत्री मर जाय तो मामा को केवल स्नान करना पड़ता है। यदि नाना मर जाय तो नाती या नतिनी को तीन दिनों का आशीच लगता है। किन्तु यदि नाना किसी अन्य ग्राम मे मरे तो उहे एक पक्षिणी का आशौच करना पड़ता है। नानी के भरने पर नाती एव नतिनी को एक पक्षिणी का आशौच लगता है। कुछ ग्रन्थ भतीजी एव पोती को छूट देते हैं। उपनयन संस्कृत दौहित्र की मृत्यु पर नाना एवं नानी को तीन दिनो का आशौच किन्तु उपनयन न होने पर केवल एक पक्षिणी का आशौच लगता है। पुत्री की पुत्री के मरने पर नाना और नानी को आशौच नहीं लगता। इन विषयों में सामान्य नियम यही है कि केवल उपनयन संस्कृत पुरुष एव विवाहित स्त्री ही माता पिता के अतिरिक्त किसी अन्य सम्बधी की मृत्यु पर आशौच मनाते हैं । दामाद के घर में श्वशुर या सास के मरने से दामाद को तीन दिनो का तथा अन्यत्र मरने से एक पक्षिणी का आशीय लगता है। दामाद की मृत्यु पर श्वशुर एव सास एक दिन का आशौच करते हैं या केवल स्नान से शुद्ध हो जाते हैं, किन्तु
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दिल्ली में कोरोना वैक्सीन डोज की भारी मांग , बचा है मात्र दो दिन का स्टॉक....
राजधानी दिल्ली में बीते 24 घंटों में 1. 6 लाख से अधिक कोविड वैक्सीन लगाई गई है। दिल्ली सरकार यहां के निवासियों को अधिक से अधिक संख्या में वैक्सीनेट करना चाह रही है , जिसके लिए लगातार जरुरी कदम उठाए जा रहे हैं। दिल्ली सरकार की ओर से जारी किए गए हेल्थ बुलेटिन में ये बताया गया है कि राजधानी में बहुत अधिक स्टाक नहीं बचा हुआ है। इसके लिए केंद्र सरकार तक सूचना पहुंचा दी गई है।
दिल्ली में जुलाई माह में अब तक 1,30,487 लोगों को पहली डोज और 30,251 लोगों को दूसरी डोज लगाई जा चुकी है। केंद्र सरकार की ओर से अब तक कुल 81,73,310 डोज मिली है जिसे इस्तेमाल किया जा चुका है। अब दो दिनों के लिए दिल्ली के पास मात्र 2,68,000 डोज कोवैक्सीन के और 2,10,000 डोज कोविशील्ड के बचे हुए हैं। इतनी कम संख्या में डोज बचने के बारे में केंद्र सरकार को जानकारी दे दी गई है और उनसे अतिरिक्त डोज जल्द मुहैया कराने के लिए कहा गया है जिससे वैक्सीन के काम में किसी तरह से बाधा न आने पाए।
पिछले कुछ दिनों से लगातार हर रोज डेढ़ लाख से अधिक लोगों को टीका लग रहा है। दिल्ली में कोविशील्ड व कोवैक्सीन के बाद अब चार निजी अस्पतालों में स्पुतनिक टीका भी उपलब्ध कराया गया है, लेकिन कुछ लोंगो को कोवैक्सीन की पहली डोज नहीं मिल पा रही है। अभी कोवैक्सीन की सिर्फ दूसरी डोज लग रही है। इस वजह से कोवैक्सीन लगवाने के इच्छुक लोगों को परेशान होना पड़ रहा है। जबकि निजी अस्पतालों में कोवैक्सीन की दूसरी डोज का स्लाट खाली रह रहा है।
शनिवार को भी फोर्टिस, मैक्स, अपोलो, प्राइमस सुपर स्पेशियलिटी, सर्वोदय मेडिसेंटर, मधुकर रेनबो अस्पताल सहित कई टीकाकरण केंद्रों पर कोवैक्सीन की दूसरी डोज का स्लाट खाली था। वसंत कुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल का कहना है कि काफी लोग बगैर एप्वाइंटमेंट के भी अस्पताल पहुंचकर टीका लगवा रहे हैं। स्लाट खाली होने का यह एक कारण हो सकता है। कोवैक्सीन की पहली डोज के लिए भी लोग पूछ रहे हैं, लेकिन अभी सिर्फ दूसरी डोज देने का प्रविधान होने से पहली डोज लेने के इच्छुक लोगों को मना करना पड़ रहा है।
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दिल्ली में कोरोना वैक्सीन डोज की भारी मांग , बचा है मात्र दो दिन का स्टॉक.... राजधानी दिल्ली में बीते चौबीस घंटाटों में एक. छः लाख से अधिक कोविड वैक्सीन लगाई गई है। दिल्ली सरकार यहां के निवासियों को अधिक से अधिक संख्या में वैक्सीनेट करना चाह रही है , जिसके लिए लगातार जरुरी कदम उठाए जा रहे हैं। दिल्ली सरकार की ओर से जारी किए गए हेल्थ बुलेटिन में ये बताया गया है कि राजधानी में बहुत अधिक स्टाक नहीं बचा हुआ है। इसके लिए केंद्र सरकार तक सूचना पहुंचा दी गई है। दिल्ली में जुलाई माह में अब तक एक,तीस,चार सौ सत्तासी लोगों को पहली डोज और तीस,दो सौ इक्यावन लोगों को दूसरी डोज लगाई जा चुकी है। केंद्र सरकार की ओर से अब तक कुल इक्यासी,तिहत्तर,तीन सौ दस डोज मिली है जिसे इस्तेमाल किया जा चुका है। अब दो दिनों के लिए दिल्ली के पास मात्र दो,अड़सठ,शून्य डोज कोवैक्सीन के और दो,दस,शून्य डोज कोविशील्ड के बचे हुए हैं। इतनी कम संख्या में डोज बचने के बारे में केंद्र सरकार को जानकारी दे दी गई है और उनसे अतिरिक्त डोज जल्द मुहैया कराने के लिए कहा गया है जिससे वैक्सीन के काम में किसी तरह से बाधा न आने पाए। पिछले कुछ दिनों से लगातार हर रोज डेढ़ लाख से अधिक लोगों को टीका लग रहा है। दिल्ली में कोविशील्ड व कोवैक्सीन के बाद अब चार निजी अस्पतालों में स्पुतनिक टीका भी उपलब्ध कराया गया है, लेकिन कुछ लोंगो को कोवैक्सीन की पहली डोज नहीं मिल पा रही है। अभी कोवैक्सीन की सिर्फ दूसरी डोज लग रही है। इस वजह से कोवैक्सीन लगवाने के इच्छुक लोगों को परेशान होना पड़ रहा है। जबकि निजी अस्पतालों में कोवैक्सीन की दूसरी डोज का स्लाट खाली रह रहा है। शनिवार को भी फोर्टिस, मैक्स, अपोलो, प्राइमस सुपर स्पेशियलिटी, सर्वोदय मेडिसेंटर, मधुकर रेनबो अस्पताल सहित कई टीकाकरण केंद्रों पर कोवैक्सीन की दूसरी डोज का स्लाट खाली था। वसंत कुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल का कहना है कि काफी लोग बगैर एप्वाइंटमेंट के भी अस्पताल पहुंचकर टीका लगवा रहे हैं। स्लाट खाली होने का यह एक कारण हो सकता है। कोवैक्सीन की पहली डोज के लिए भी लोग पूछ रहे हैं, लेकिन अभी सिर्फ दूसरी डोज देने का प्रविधान होने से पहली डोज लेने के इच्छुक लोगों को मना करना पड़ रहा है।
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देवरिया, 30 जून . चार अधिकारियों के जून माह के वेतन आहरण पर जिलाधिकारी ने रोक लगा दी है. यह कार्रवाई उनके द्वारा कार्यों में लापरवाही मिलने पर की गई है.
जिलाधिकारी अखण्ड प्रताप सिंह ने बताया कि जनसुनवाई पोर्टल पर प्राप्त Chief Minister संदर्भ, सीएम हेल्पलाइन, ऑनलाइन सन्दर्भ, मंडलायुक्त संदर्भ, पीजी पोर्टल भारत सरकार एवं संपूर्ण समाधान दिवस तथा जिलाधिकारी जन सुनावाई में प्राप्त शिकायतों के निस्तारण समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि उक्त अधिकारियों द्वारा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद जन समस्याओं के निस्तारण में लापरवाही बरती जा रही है.
उन्होंने बताया कि जिला प्रोबेशन अधिकारी देवरिया अनिल सोनकर, जिला पंचायत राज अधिकारी अविनाश कुमार, खण्ड विकास अधिकारी गौरीबाजार विवेकानन्द मिश्र, पशु चिकित्साधिकारी डा0 अरविन्द कुमार वैश्य का एक-एक संदर्भ डिफॉल्टर की श्रेणी में आ चुका है. जिलाधिकारी ने इन सभी के जून माह के वेतन को अग्रिम आदेश तक बाधित कर दिया है.
जिलाधिकारी ने कहा कि जनसुनवाई से जुड़े प्रकरण का निस्तारण संबद्धता एवं गुणवत्ता के साथ करें. इसमें कोताही मिलने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
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देवरिया, तीस जून . चार अधिकारियों के जून माह के वेतन आहरण पर जिलाधिकारी ने रोक लगा दी है. यह कार्रवाई उनके द्वारा कार्यों में लापरवाही मिलने पर की गई है. जिलाधिकारी अखण्ड प्रताप सिंह ने बताया कि जनसुनवाई पोर्टल पर प्राप्त Chief Minister संदर्भ, सीएम हेल्पलाइन, ऑनलाइन सन्दर्भ, मंडलायुक्त संदर्भ, पीजी पोर्टल भारत सरकार एवं संपूर्ण समाधान दिवस तथा जिलाधिकारी जन सुनावाई में प्राप्त शिकायतों के निस्तारण समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि उक्त अधिकारियों द्वारा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद जन समस्याओं के निस्तारण में लापरवाही बरती जा रही है. उन्होंने बताया कि जिला प्रोबेशन अधिकारी देवरिया अनिल सोनकर, जिला पंचायत राज अधिकारी अविनाश कुमार, खण्ड विकास अधिकारी गौरीबाजार विवेकानन्द मिश्र, पशु चिकित्साधिकारी डाशून्य अरविन्द कुमार वैश्य का एक-एक संदर्भ डिफॉल्टर की श्रेणी में आ चुका है. जिलाधिकारी ने इन सभी के जून माह के वेतन को अग्रिम आदेश तक बाधित कर दिया है. जिलाधिकारी ने कहा कि जनसुनवाई से जुड़े प्रकरण का निस्तारण संबद्धता एवं गुणवत्ता के साथ करें. इसमें कोताही मिलने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
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शरजील इमाम के खिलाफ एक और शिकायत दिल्ली के IP स्टेट थाने में दी गई। ये शिकायत दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी वेद भूषण ने दी है। अब तक दिल्ली में कुल तीन शिकायत शरजील के खिलाफ अलग-अलग थानों में दी जा चुकी है।
नई दिल्ली। असम को भारत से काटने की बात कहने वाला जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) का छात्र शरजील इमाम फरार है। मगर इस बीच यूपी पुलिस की दो टीमें दिल्ली पहुंच चुकी हैं। यह टीमें उसकी तलाश में कर रही हैं। इमाम को गिरफ्तार कर यूपी के अलीगढ़ ले जाया जाएगा जहां उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
शरजील इमाम के खिलाफ एक और शिकायत दिल्ली के IP स्टेट थाने में दी गई। ये शिकायत दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी वेद भूषण ने दी है। अब तक दिल्ली में कुल तीन शिकायत शरजील के खिलाफ अलग-अलग थानों में दी जा चुकी है। इस बीच शरजील इमाम का एक और वीडियो वायरल हो रहा है ये वीडियो जामिया यूनिवर्सिटी के बाहर का है।
इस वीडियो में शरजील मुसलमानों की हैसियत की बात करते हुए उत्तर भारत के शहरों को बंद करने की बात कर रहा है। शहरों में चक्का जाम करने की बात कह कर वहां मौजूद लोगों को उकसा रहा है। शरजील इमाम मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसने 13 दिसंबर को भी दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी में इसी तरह का एक भाषण दिया था, जो भड़काऊ और माहौल खराब करने वाला था।
इससे पहले सोशल मीडिया पर शारजील का एक विवादित वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह हिंदुस्तान से असम को अलग करने और भड़काऊ भाषण देता नजर आ रहा है। अब उसकी गिरफ्तारी की कवायद की जा रही है।
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शरजील इमाम के खिलाफ एक और शिकायत दिल्ली के IP स्टेट थाने में दी गई। ये शिकायत दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी वेद भूषण ने दी है। अब तक दिल्ली में कुल तीन शिकायत शरजील के खिलाफ अलग-अलग थानों में दी जा चुकी है। नई दिल्ली। असम को भारत से काटने की बात कहने वाला जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का छात्र शरजील इमाम फरार है। मगर इस बीच यूपी पुलिस की दो टीमें दिल्ली पहुंच चुकी हैं। यह टीमें उसकी तलाश में कर रही हैं। इमाम को गिरफ्तार कर यूपी के अलीगढ़ ले जाया जाएगा जहां उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। शरजील इमाम के खिलाफ एक और शिकायत दिल्ली के IP स्टेट थाने में दी गई। ये शिकायत दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी वेद भूषण ने दी है। अब तक दिल्ली में कुल तीन शिकायत शरजील के खिलाफ अलग-अलग थानों में दी जा चुकी है। इस बीच शरजील इमाम का एक और वीडियो वायरल हो रहा है ये वीडियो जामिया यूनिवर्सिटी के बाहर का है। इस वीडियो में शरजील मुसलमानों की हैसियत की बात करते हुए उत्तर भारत के शहरों को बंद करने की बात कर रहा है। शहरों में चक्का जाम करने की बात कह कर वहां मौजूद लोगों को उकसा रहा है। शरजील इमाम मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसने तेरह दिसंबर को भी दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी में इसी तरह का एक भाषण दिया था, जो भड़काऊ और माहौल खराब करने वाला था। इससे पहले सोशल मीडिया पर शारजील का एक विवादित वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह हिंदुस्तान से असम को अलग करने और भड़काऊ भाषण देता नजर आ रहा है। अब उसकी गिरफ्तारी की कवायद की जा रही है।
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Ghatshila : धालभूमगढ़ प्रखंड के चुकरीपाड़ा पंचायत के स्वर्गछीड़ा गांव में गुरूवार की रात 15 हाथियों के झुंड के आने से ग्रामीण दहशत में हैं. हाथियों के हमले से पोड़ियाशोल गांव निवासी अजीत बेरा व जोमडीह गांव हामीर सोरेन गंभीर रूप से घायल हो गया. हाथियों ने दोनों को पटकने के बाद दोनों किचड़ में गिर गए थे. इस कारण से दोनों की जान बच गई. दोनों घायल युवकों को मुखिया मनसा राम मुंडा एवं ग्रामीणों की मदद से 108 एंबुलेंस बुलाकर धालभूमगढ़ पीएससी लाया गया. प्राथमिक उपचार के बाद दोनो को चिकित्सक ने बेहतर इलाज के लिए एमजीएम रेफर कर दिया.
मनसा राम मुंडा एवं ग्रामीणों ने बताया कि बीते तीन दिनों से इस क्षेत्र में हाथियों का झुंड मौदाशोली च चुकरीपड़ा पंचायत के जंगलों में विचरण कर रहा था. हाथियों को भगाने के लिए वन विभाग की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है. ग्रामीण अपने स्तर से भगाने का प्रयास कर रहे थे. इसी बीच चुकरीपाड़ा से बाइक पर सवार तीन लोग पोडियाशोल जा रहा था. इसी क्रम में पुलिया के पास हाथियों के झुंड में फंस गया. हाथी के हमले से अजीत बेरा को पेट एवं सीने में गंभीर चोटें आई है. हमीद सोरेन का दाहीना पैर टूट गया है. ग्रामीणों ने बताया कि हाथी के हमले से घायल दोनों युवक स्वर्गछीड़ा पुलिया के नीचे छिपकर अपनी जान बचाई. रात भर हाथी के हमले से दोनों युवक जंगल में ही तड़पते रहे. सुबह ग्रामीणों व मुखिया को सूचना मिली तो दोनों को अस्पताल पहुंचाया गया. युवा शक्ति संगठन अध्यक्ष हेमंत मुंडा जुगीशोल पंचायत के मुखिया सुकरा मुंडा एवं मुखिया मनसा मुंडा ने विधायक को इसकी सूचना देते हुए वन विभाग से त्वरित कार्रवाई कराते हुए घायलों को वित्त सुविधा दिलाते हुए बेहतर इलाज करने की मांग की है.
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Ghatshila : धालभूमगढ़ प्रखंड के चुकरीपाड़ा पंचायत के स्वर्गछीड़ा गांव में गुरूवार की रात पंद्रह हाथियों के झुंड के आने से ग्रामीण दहशत में हैं. हाथियों के हमले से पोड़ियाशोल गांव निवासी अजीत बेरा व जोमडीह गांव हामीर सोरेन गंभीर रूप से घायल हो गया. हाथियों ने दोनों को पटकने के बाद दोनों किचड़ में गिर गए थे. इस कारण से दोनों की जान बच गई. दोनों घायल युवकों को मुखिया मनसा राम मुंडा एवं ग्रामीणों की मदद से एक सौ आठ एंबुलेंस बुलाकर धालभूमगढ़ पीएससी लाया गया. प्राथमिक उपचार के बाद दोनो को चिकित्सक ने बेहतर इलाज के लिए एमजीएम रेफर कर दिया. मनसा राम मुंडा एवं ग्रामीणों ने बताया कि बीते तीन दिनों से इस क्षेत्र में हाथियों का झुंड मौदाशोली च चुकरीपड़ा पंचायत के जंगलों में विचरण कर रहा था. हाथियों को भगाने के लिए वन विभाग की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है. ग्रामीण अपने स्तर से भगाने का प्रयास कर रहे थे. इसी बीच चुकरीपाड़ा से बाइक पर सवार तीन लोग पोडियाशोल जा रहा था. इसी क्रम में पुलिया के पास हाथियों के झुंड में फंस गया. हाथी के हमले से अजीत बेरा को पेट एवं सीने में गंभीर चोटें आई है. हमीद सोरेन का दाहीना पैर टूट गया है. ग्रामीणों ने बताया कि हाथी के हमले से घायल दोनों युवक स्वर्गछीड़ा पुलिया के नीचे छिपकर अपनी जान बचाई. रात भर हाथी के हमले से दोनों युवक जंगल में ही तड़पते रहे. सुबह ग्रामीणों व मुखिया को सूचना मिली तो दोनों को अस्पताल पहुंचाया गया. युवा शक्ति संगठन अध्यक्ष हेमंत मुंडा जुगीशोल पंचायत के मुखिया सुकरा मुंडा एवं मुखिया मनसा मुंडा ने विधायक को इसकी सूचना देते हुए वन विभाग से त्वरित कार्रवाई कराते हुए घायलों को वित्त सुविधा दिलाते हुए बेहतर इलाज करने की मांग की है.
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द्वार सोल दिये। परन्तु रोम-निवासी यूरोप को मुख्य कानून-सम्बन्धी ज्ञान देने में हो व्यस्त रहे, अतः वे बानून के अतिरिक्त समाज के गैर-कानूनी पक्षों की ओर अधिक ध्यान नहीं दे पाये । यहाँ तक कि वे राज्य और समाज के बीच अन्तर भी स्पष्ट नहीं कर पाये। उन्होंने किसी मूल सामाजिक दर्शन की रचना नहीं की।
वितण्डायादी ( The Scholastics ) -- इसके पश्चात् का काल वितण्डावादी ( विचारधारा से प्रभावित और अनुप्राणित था। वितण्डावादियों ने विकल (biblical) मान्यता को स्थापित किया कि मानव भगवान् को विशिष्ट रचना है । यह ईश्वर के नियमों के अतिरिक्त अन्य किन्ही नियमों से आवद्ध नहीं है। पादरी लोग उस ईश्वर के पार्थिव प्रतिनिधि हैं, जिन्हें उस ईश्वर ने अपने कानून की व्याख्या करने और अपनी इच्छा को क्रियान्वित करने का अधिकार दे रखा है। उस समय का सामाजिक विधान ईश्वर स्वीकृत विधान था जो उसे परिवर्तित करने की सोचता था, उसे काफिर माना जाता था। ज्ञानवादी दर्शन रूढ़िवादी दर्शन था और इसने सामाजिक मान्यताओं को धार्मिक व्यवस्था प्रदान की थी। वितण्डावांदियों को यह मान्यता कि मनुष्य समाज को परिवर्तित नही कर सकता, झूठी सिद्ध कर दी गई है, क्योंकि मानव निरन्तर अपने समाज को परिवर्तित करते रहे हैं।
आधुनिक (The Moderns) सोलहवीं शताब्दी में राज्य तथा समाज का अन्तर स्पष्ट किया गया। लेखकों ने जीवन की समस्याओं को अधिक यथार्थ स्तर पर समझा। इनमें सबसे प्रसिद्ध हान्स (Hobbes) और मैकियावेली (Machiavelli) थे । मैकियावेली की पुस्तक 'दी प्रिंस' (The Prince ) राज्य तथा राज्य मर्मशता का एक यथातथ्य अध्ययन है और उसमे मुख्यतः राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के सिद्धान्तों का वर्णन है। इन सिद्धान्तों को उसने ऐतिहासिक आँकड़ों के आधार पर निर्मित किया था। सर थामस पूर (Sir Thomas More ) इस युग का एक अन्य प्रसिद्ध लेखक था, जिसने सन् १५१५ में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'यूटोपिया' (Utopia) में, एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था का चित्रण और दैनिक जीवन की सामाजिक समस्याओं का वर्णन किया है। वास्तविक जीवन कैसा होना चाहिए, इस बात को बताने के लिए मूर ने जिस शैली में आदर्श जीवन का चित्रण किया है, उस शैली का अनुकरण अन्य लेखकों ने भी अपनी पुस्तकों में किया, जैसे थामस कैम्पेवेला ( Thomas Campavella ) ने अपनी पुस्तक 'सिटी आफ दी सन' ( City of the Sua), सर फ्रंसिस बेकन (Francis Bacon ) ने अपनी पुस्तक 'न्यू एटलाण्टिस' ( New Atlantis ) और जेम्स हेरिटन ( James Harrington) ने अपनी पुस्तक 'दो कामनवेल्थ आफ नेशन्स' ( The Commonwealth of Nations) में
सामाजिक घटना-वस्तु की वैज्ञानिक खोज की दिशा में अपनी महत्वपूर्ण देन के लिए इटली के लेखक faet (Vico) और फ्रांसीसी लेखक मांटेस्क्यू विशेष उल्लेखनीय है । विको ने अपनी पुस्तक 'दि न्यू साइन्स' (The New Science ) में कहा है कि समाज कुछ निश्चित कानूनों या नियमों के अधीन होता है। इन कानूनों को यथातथ्य निरीक्षण तथा परीक्षण द्वारा ही समझा जा सकता है। मांटेस्क्यू ने अपनी विख्यात पुस्तक 'दि स्पिरिट आफ लाज' (The Spirit of Laws ) में इस
बात का विश्लेषण किया है कि बाह्य तत्व, विशेषतया जलवायु, मानव-समाज के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। मान्टेस्क्यू के अनुसार, "कानून राष्ट्रीय चरित्र का प्रतीक है और उनसे जिस भावना का पता लगता है, उसकी व्याख्या उन सामाजिक तथा भौगोलिक अवस्थाओं को ध्यान में रखकर को जानी चाहिए, जिनमें लोग रह रहे हों।" जलवायु सामाजिक जीवन का मुख्य निर्णायक है। मान्टेस्क्यू के निष्कर्ष कल्पनात्मक दार्शनिकों की अपेक्षा कुछ अच्छे थे, परन्तु उसका दोप यह था कि उसने सामाजिक जीवन से सम्बन्धित समग्र सत्यता को एक ही आधार पर समझाने का प्रयत्न किया । अरस्तू के समान वह भी इसी रूढ़िवादी परिणाम पर पहुॅचा कि 'जो है', वह अवश्य 'रहना चाहिए' ।
आगस्त काम्टे (Auguste Counte ) -- तत्पश्चात् आगस्त काम्टे का युग आया । उसे समाजशास्त्र का जन्मदाता कहना ठीक ही है, क्योंकि उसने एक ऐसे विज्ञान की स्थापना का प्रयत्न किया, जिसके अन्तर्गत समग्र मानव-जोवन व मानवीय गतिविधियों सम्मिलित थी । वह आधुनिक युग का पहला विचारक था, जिसने स्पष्ट शब्दों में इस तथ्य को प्रतिपादित किया कि सामाजिक जीवन की दिशाएँ एकता के सूत्र में बंधी हुई है और यह भी बताया कि यह एकता विकासोन्मुख है। उसके अनुसार मानव सामाजिक विकास को तोन अवस्थाओं धार्मिक, आदिभौतिक और वैज्ञानिक के द्वारा आगे बढ़ता जाता है। जहाँ तक प्राकृतिक घटमा वस्तु के चिन्तन का प्रश्न है, मानव अब वैज्ञानिक अवस्था को प्राप्त कर चुका है, परन्तु उसका समाज सम्बन्धी चिन्तन अभी तक आधिभौतिक अवस्था में ही है। सौभाग्य से आधिभौतिक अवस्था लगभग पूर्ण हो चुकी है और मानवता वैज्ञानिक अवस्था को दहलीज पर है। हाँ, काम्टे पर्याप्त आशावादी था ।
जीववैज्ञानिक ( The Biologists ) - डाविन की पुस्तक 'ओरिजन आफ स्पेशीज' ( Origin of Species ) के प्रकाशित होने के उपरान्त समाजशास्त्र के विकास की दिशा में पर्याप्त अध्ययन किया गया। डाविन का सिद्धान्त कि 'बलिष्ठः अतिजीवित' (survival of the fittest ) । इसी के आधार पर जीवन के सम्पूर्ण रूप विकसित हुए हैं। आधुनिक युग के सर्वाधिक प्रतिभाशाली अंग्रेज विद्वान् हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer) ने 'बलिष्ठः अतिजीवितः' तथा प्राकृतिक चयन के सिद्धान्तों को समाजशास्त्र के क्षेत्र में प्रयुक्त किया । यह कहा जा सकता कि उसको समाजशास्त्र सम्बन्धी रचनाओं ने समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र विषय का स्थान प्रदान किया। स्पेन्सर ने तमाम विज्ञानों को एक प्ररूप में समन्वित करने और एक मूल नियम जिसके द्वारा प्राकृतिक और सामाजिक सम्बन्धों की व्याख्या हो सके, को खोजने का प्रयत्न किया। उसके प्रमुख सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त यह है कि जीवों के समान ही सामाजिक घटना-वस्तु भी सरल तथा समरूप से जटिल तथा विषम रूप की ओर धीरे-धीरे विकसित होती है । आदिम मानव उसके लिए साधारण मानव प्रकार था जिससे सभ्य मानव विकसित हुआ। उसकी दूसरी महत्वपूर्ण देन तथाकथित जैविक सिद्धान्त ( organic analogy ) है जिसमे उसने समाज की समानता मानवीय शरीर से दिखलाई है। ऐसी देनों के कारण स्पेन्सर
समाजशास्त्र की जीवविज्ञान विचारधारा में अग्रिम स्थान रखता है। उसने समाज की प्राकृतिक घटना-वस्तु के रूप में व्याख्या करके सामाजिक तथ्यों के वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए भूमिका तैयार कर दी ।
मनोवैज्ञानिक ( The Psychologists ) -- हरबर्ट स्पेन्सर के अनुयायियों की संख्या बहुत थी और जीवविकास सम्बन्धी उनका सिद्धान्त १९ वी शताब्दी के अन्त तक प्रचलित रहा, परन्तु २०वीं शताब्दी के आरम्भ में सामाजिक घटना-वस्तु के सम्बन्ध में उसकी जैविक व्याख्या के स्थान पर मनोवैज्ञानिक व्याख्या की स्थापना हुई । यह दिखाने के प्रयत्न किये गये कि समाज का विकास किस प्रकार मानवमन के विकास पर निर्भर है । इङ्गलैंड में ग्राहम वैलेस (Graham Wallace), मैक्डूगल (McDougal) और हाबहाउस (Hobhouse) ने और अमरीका में वार्ड (Ward), गिडिंग्स ( Giddings ), कूले (Cooley), मीड (Meed) और डीवी (Dewey) ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सामाजिक विकास की व्याख्या अपने-अपने ढङ्ग तथा अपने-अपने क्षेत्रों में की।
दुर्खीम ( Durkheim ) समाज की वास्तविकता पर बल देने वाला प्रथम आधुनिक लेखक था। उसने सामाजिक वास्तविकताओं पर बल दिया तथा समाजशास्त्र को मनोविज्ञान से अलग पृष्ठभूमि प्रदान की। उसके अनुसार, सामाजिक तथ्य बाह्य होते हैं जो मानव व्यवहार को सीमित करते हैं। उसने समाजशास्त्र के अध्ययन को नवीन दिशा प्रदान की।
जर्मन समाजशास्त्री (German Sociologists) --जर्मन समाजशास्त्रियों, यथा वान वीजे (Von Weise ), टानी ( Tonnie ), वीर कान्ट ( Vier Kandt), सिमल (Simmel) एवं मैक्स वंबर (Max Weber) ने भी समाजशास्त्र के विकास को काफी प्रभावित किया है । सिमल ने समाजशास्त्र की स्वरूपात्मक (formal) विचारधारा का विकास किया है ।
समाजशास्त्र : एक पृथक् विज्ञान (Sociology: a distinct science) -समाजशास्त्र अब एक पृथक् विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है, जिसका विषय सामाजिक घटना वस्तु का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करना है। इसने सामाजिक जीवन से सम्बन्धित निश्चित ज्ञान संग्रहीत कर लिया है । समाजशास्त्र का परम उद्देश्य सामाजिक जीवन का सुधार है। यह आशा की जाती है कि सामाजिक जीवन के अन्तनिहित नियमों एवं प्रक्रियाओं के ज्ञान से विभूषित व्यक्ति अपने समाज का अपनी इच्छानुसार निर्माण करने में अधिक योग्य सिद्ध हो सकेंगे । ऐसा ज्ञान मानवीय कार्यों को प्रभावित करने में भी सहायक सिद्ध होगा। समाजशास्त्र का कालान्तर में अन्य सामा जिक विज्ञानों की भांति विकसित एवं उन्नत होना निश्चित है ।
३. समाजशास्त्र एक विज्ञान है, जिसको पृथक् विषय सामग्री है
( Sociology a Science with its own Subject-matter )
समाजशास्त्र पृथक विषय-सामग्री वाला विज्ञान ही नहीं है, बल्कि सब सामाजिक विज्ञानों को जननी है (Sociology is not only a science with its own subjectmatter but the mother of all social sciences ) -- आश्चर्य की बात है कि कुछ
आलोचकों का कथन है कि समाजशास्त्र की अपनी कोई अलग विषय-वस्तु नहीं है, अपितु यह विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का पिटारा है। यह तर्क दिया जाता है कि अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र आदि सामाजिक विज्ञान विशिष्ट विज्ञान है तथा समाजशास्त्र इन विज्ञानों के विशेषज्ञों द्वारा दी गयी बातों तथा मूल कल्पनाओं का संग्रह मात है। यह कहा जा सकता है कि यह विचार नितान्त भ्रामक है, क्योंकि आज समाजशास्व पृथक् विषय-सामग्री वाला एक विज्ञान ही नहीं है, अपितु इसने वह उच्च पद प्राप्त कर लिया है जो इसे सभी सामाजिक विज्ञानों की जननी बना देता है। अन्य सामाजिक विज्ञानों में समाजशास्त्र के स्थान की व्याख्या करते हुए मैकाइवर ( Maclver) ने ठीक ही कहा है कि "समाजशास्त्र में अन्य सामाजिक शास्त्रों का वैसा ही स्थान है जैसा किसी समुदाय (community ) में समिति ( association) का होता है। विशिष्ट सामाजिक विज्ञान जीवन के समितीय (associational) स्वरूपों के विज्ञान हैं, अतएव वे उस सिंहासन पर आरूढ़ नही हो सकते जो समाजशास्त्र के लिये सुरक्षित है।"
समाजशास्त्र का एक पृथक विषय है, इसके विरुद्ध आलोचना (Criticism against sociology having subject-matter of its own ) -- तीन आधारों पर इस बात की आलोचना की गई है कि समाजशास्त्र पृथक् विषय-सामग्री वाला शास्त्र है(1) समाजशास्त्र सामाजिक तत्व-सम्बन्धी विविध अध्ययनों का संकलन मात्र (Sociology is merely an assemblage of miscellaneous studies having social content ) -- पहला तर्क यह दिया जाता है कि समाजशास्त्र सामाजिक तत्व लिये हुए विविध अध्ययनों का संकलन मात्र है। इसका उत्तर यह है कि समाजशास्त्र में जिन विविध अध्ययनों का संकलन किया जाता है, यदि उनका अध्ययन अन्य शास्त्रों में नहीं किया गया है तो समाजशास्त्र निश्चय ही उनका अध्ययन करके उपयोगी कार्य करता है। इस बात से इन्कार करना सम्भव नही है कि सामाजिक सस्थाओं, यथा परिवार, सम्पत्ति, धर्म एवं राज्य, सामाजिक रीति-रिवाजों, सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक वर्गों तथा राष्ट्रीय व प्रजातीय समूहो, सामाजिक आदतों, फैशन, गरीबी, अपराध, आत्महत्या तथा सामाजिक नियंत्रण के तत्वों आदि के बारे मे समाजशास्त्र ने अत्यन्त उपयोगी सामग्री इकट्ठी की है। इनमें से किसी भी विषय का पर्याप्त विवेचन किसी अन्य शास्त्र में नहीं किया जाता । समाजशास्त्र का यह दावा है कि इसकी विषय-वस्तु अन्य शास्त्रों से पृथक् है, इस तथ्य से यह और भी दृढ़ हो जाता है कि समाजशास्त्र मनुष्य के इतिहास, उसकी सफलताओं तथा उसके जीवविज्ञान का अध्ययन उनके विशुद्ध रूप में नहीं करता, बल्कि उस घटना-वस्तु के रूप में करता है, जहाँ तक वे मनुष्य के अन्त सम्बन्धो पर प्रभाव डालते हैं या उनसे प्रभावित होते हैं ।
(ii) समाजशास्त्र की विषय-सामग्री अनेक सामाजिक विज्ञानों में विभाजित (The subject-matter of sociology is parcelled out to a number of social sciences ) समाजशास्त्र की अपनी कोई पृथक् विषय-सामग्री नहीं है, इस सम्बन्ध में दूसरा आक्षेप यह है कि समाजशास्त्र का कोई विशिष्ट क्षेत्र नही है,
समाजशास्त्र की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र
क्योंकि इसकी विषय-सामग्री अनेक सामाजिक विज्ञानों, यथा अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, मानवविज्ञान, इतिहास, विधिशास्त्र आदि में विभाजित है। जहाँ तक उपर्युक्त विषयो का सम्बन्ध है, यह आक्षेप उचित नहीं है। परन्तु यदि यह आक्षेप ठीक भी हो तो इन अलग-अलग शास्त्रो का होना इस बात की मनाही नहीं करता कि कोई ऐसा सामान्य शास्त्र नही होना चाहिये, जिसका कार्य इन शास्त्रों के अलग-अलग निष्कर्षो को सम्बद्ध करना एवं सामाजिक जीवन की अधिक सामान्य स्थितियों का वर्णन करना हो। जिस प्रकार वनस्पतिविज्ञान, शरीरविज्ञान एवं जन्तुविज्ञान का अस्तित्व एक सामान्य विज्ञान जीवविज्ञान (biology) की उपयोगिता को निर्मूल नहीं करता, उसी प्रकार अलग-अलग सामाजिक विज्ञानों का होना समाजशास्त्र जैसे सामान्य विज्ञान के अस्तित्व को अनुपयोगी सिद्ध नहीं करता । समाजशास्त्र का उद्देश्य मानवीय सम्बन्धों तथा सामाजिक जीवन का समग्र रूप में अध्ययन करना है। वस्तुतः सामाजिक विज्ञान आज संख्या में इतने अधिक तथा अपनी-अपनी विषय-वस्तु की व्याख्या मे इतने विस्तृत है कि एक सामान्य सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता को बेकार नहीं कहा जा सकता, बल्कि अधिकाधिक महत्वपूर्ण ही कहा जायगा ।
(iii) समाजशास्त्र अन्य शास्त्रों से उधार लेता है (Sociology borrows from other social sciences) समाजशास्त्र को अपनी विषय-सामग्री न होने के संबंध में तीसरा आक्षेप यह है कि यह दूसरे शास्त्रों से विषय उधार लेता है और बिना परिश्रम के हर बात का ज्ञान प्राप्त करने का यह सरल उपाय है। परन्तु यह आक्षेप तर्कसंगत नहीं है । विज्ञान का अनिवार्य स्वभाव यह है कि यह केवल उधार लेने से ही विकसित होता है। हम जानते हैं कि जीवविज्ञान का विकास रसायनशास्त्र तथा भौतिकशास्त्र के निष्कर्थों पर ही होता है। यही बात समाजशास्त्र पर लागू होती है जीवविज्ञान तथा समाजशास्त्र जिन शास्त्रों से उधार लेते हैं, उन्हें नयी संकल्पपरन्तु नाओ तथा नियमो से समृद्ध बना देते हैं जिससे तथ्यों का संकलन उपयोगी तथा अर्थपूर्ण बन जाता है ।
निःसंदेह समाजशास्त्र अपनी विषय-सामग्री दूसरे सामाजिक शास्त्रो से उधार लेता है, परन्तु यह इसमें कुछ जोड़कर इस विषय-सामग्री को पूर्णतया नया आकार प्रदान करता है। इस भवन का निर्माण करने के लिए हम एक निश्चित स्थान पर ईंटें, सीमेंट, लोहा, चूना, लकड़ी, रेत आदि इकट्ठा करते हैं, परन्तु इन सब सामग्रियों के एक स्थान पर इकट्ठा कर देने से भवन का निर्माण नहीं हो जाता। निर्माण हेतु एक प्रविधि (technique) की आवश्यकता होती है और सामग्री को एक निश्चित एवं स्थिर रूप दिया जाता है। इस प्रविधि को प्रयुक्त करने के बाद इसे भवन कहा जाता है और यह केवल ईटों, चूना, सीमेंट आदि का ढेर नहीं रहता। इसी प्रकार, समाजशास्त्र सामग्री उधार लेकर एक प्रविधि (technique) को प्रयुक्त करता है, जिससे 'समाज' का निर्माण होता है। इस समाज की संरचना एवं प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए एक पृथक् अनुशागन की आवश्यकता होती है । मोटवानी ( Motwani) के शब्दो मे, "समाजशास्त्र एक भवन की भाँति सामाजिक जीवन के तथ्यों का एक जैविक सम्पूर्ण के रूप में संयोजीकरण का सिद्धान्त तथा ऐसे समन्वय की परिणति के रूप में एक स्वतन्त्र विज्ञान, दोनों है।" ज्ञान का विभागीकरण अध्ययन
की सुविधा के लिए किया जाता है । वस्तुतः ज्ञान को नपे-सुले भागों में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।
पुनः समाजशास्त्र अन्य किसी विज्ञान की अपेक्षा दूसरे विशानों पर अधिक आश्रित इसलिए भी है कि यह एक जटिल एवं विशाल शास्त्र है । समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र, सम्पूर्ण मानव-सम्बन्ध, इतना व्यापक है कि कोई भी अकेला व्यक्ति इसका स्वयं पूरी तरह से अध्ययन नहीं कर सकता। उसे दूसरों की सहायता अवश्य लेनी पड़ती है। उदाहरण के लिये, किसी विशिष्ट समाज को समझने के लिये समाजशास्त्री को उस समाज के व्यक्तियों, उनको स्वाभाविक तथा अर्जित आदतों, भौगोलिक पर्यावरण, सामाजिक संस्थाओ, भाषा, धर्म, नैतिकता, कानून, आर्थिक ढांचे और अन्य लोगों के साथ उनके सम्बन्ध तथा संसार के लोगों के साथ उनके पारस्परिक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होता है। इस काम को सफलतापूर्वक सम्पन्न. करने के लिए समाजशास्त्र को अन्य अनेक शास्त्रों का सहयोग लेना पड़ता है जो समाजशास्त्र के निष्कपों एवं आंकड़ों पर उतने ही आश्रित होते हैं. जितना समाजशास्त्र उन पर । बार्नसं एवं बंकर (Barners and Backer ) के शब्दों में, "समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों को न तो स्वामिनी और न ही दासी, अपितु उनको बहन है । "1
समाजशास्त्र का विषय सम्पूर्ण सामाजिक जीवन है (The subject-matter of sociology is social life as a whole ) -अतः यह बात निस्सदेह सिद्ध हो गई है कि समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसकी अपनी अलग विषय-वस्तु सम्पूर्ण सामाजिक जीवन है। यह सभी सामाजिक घटना वस्तु के पीछे निहित सामान्य नियमों का वर्णन करता है । सामाजिक जीवन का अध्ययन करते समय यह अन्तःकार्यो का अध्ययन मनोवैज्ञानिक आचरण के रूप में नहीं, अपितु सामाजिक रचना के रूप में करता है । सामाजिक जीवन इतना जटिल है कि इसका अध्ययन करने के लिए श्रम का विभाजन आवश्यक है । इसीलिए हमारे पास अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, कानून आदि विषय हैं । पुनरावृत्ति का भय न करते हुए इस बात को पुनः दोहराया जा सकता है कि समाजशास्त्र अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र आदि द्वारा किये गये अध्ययनों का योग मात्र नहीं है, अपितु जैसा कि स्पॉट (Sprott ) 2 ने कहा है कि ---
(i) यह एक अनुशासन है जो समाजों को जैविक एकता (organic unity ) के रूप में समझने तथा समाजों में व्याप्त विभिन्न संस्थाओं ( आर्थिक, राजनीतिक तथा सैद्धान्तिक) के परस्पर सम्बन्धो को जानने का प्रयत्न करता है ।
(ii) यही वहु शास्त्र है जो मानव के सामाजिक समूहों का वर्णन करता है। यह उनका वर्गीकरण तथा उनकी संरचना के रूप को जानने का प्रयत्न करता है ।
1 ""Sociology is regarded neither as the mistress nor as the handmaid of the social sciences but, as their sister." -Barnes and Backer, Solid Thought from Lore to Science - Vol. I. p. X.
Sprott, W. G. H., Sociology, p. 30.
(iii) कुछ ऐसे विषय है, जैसे सामाजिक स्तरीकरण (श्रेणी, जाति आदि), जनसंख्यान्दर में परिवर्तन, परिवार के कार्यों में परिवर्तन, जो किसी अन्य विज्ञान की विषय-सामग्री नहीं हैं। समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है और अनेक विभिन्न सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन करता है। एक सामान्य विज्ञान के रूप में यह सभी समूहों एवं समाजों की समान विशेषताओं का अध्ययन करने के लिये नितान्त उपयुक्त है। मात्र वर्णन करना ही इसका ध्येय नहीं है, वल्कि कारणों एवं व्याख्यानो की योज करना अधिक है। मनुष्य किसी प्रकार का आचरण क्यों करते हैं, यही समाजशास्त का सामान्य प्रश्न है ।
४. समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र (Scope of Sociology )
(Two different views ) - समाजशास्त्र के विषयक्षेत्र के बारे में विद्वान् एकमत नहीं हैं। वी० एफ० काल्बर्टन (V. F. Calberton ) का कथन है, "क्योंकि समाजशास्त्र एक ऐसा सचीला विज्ञान है कि यह निर्णय करना कठिन है कि इसकी सीमा कहाँ आरम्भ होती है और कहाँ समाप्त; समाजशास्त्र कहीं सामाजिक मनोविज्ञान बन जाता है और सामाजिक मनोविज्ञान कहाँ समाजशास्त्र या कहाँ अर्थशास्त्र का सिद्धान्त था जीवशास्त्रीय सिद्धान्त समाजशास्त्रीय सिद्धान्त बन जाता है - यह एक ऐसी जटिल संरचना है जिसका निर्णय करना असंभव है ।" कुछ लोगों का कहना है कि समाजशास्त्र संसार की सभी वस्तुओं का अध्ययन करता है, परन्तु यह विचार समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के बारे में बहुत अस्पष्ट है। वास्तव में, समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र अत्यन्त सीमित है और यह केवल उन्ही समस्याओं से संबंधित है जिनका अध्ययन अन्य सामाजिक शास्त्रों में नहीं किया जाता ।
मोटे तौर पर, समाजशास्त्र मानवीय अन्तःक्रियाओं और परस्पर-सम्बन्धों, उनकी अवस्थाओं तथा उनके परिणामों का अध्ययम करता है। इस प्रकार तथ्य तो यह है कि समाज में मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र बन जाता है। जिन गतिविधियों द्वारा मनुष्य अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये संघर्ष का सामना करता है, मनुष्यों के अन्तःसम्बन्धों की व्याख्या करने वाले नियम एवं विनियम, ज्ञान एवं विश्वास की प्रणाली, और समाज में अपनी गतिविधियों द्वारा मनुष्य जिस कला, नैतिकता या अन्य योग्यता या आदतें विकसित अथवा अजित करता है, इन सबका अध्ययन समाजशास्त्र में आ जाता है। परन्तु यह इतना विशाल क्षेत्र है कि कोई भी शास्त्र समुचित रूप से इनका अध्ययन नहीं कर सकता। अतः समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र को सीमित एवं निश्चित बनाने का प्रयत्न किया गया । इस प्रश्न को लेकर समाजशास्त्रियों में दो सम्प्रदाय प्रचलित हैं।
१. विशिष्टीकृत अथवा स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Specialistic or formalistic School)
सिमल का मत (Simmel's view ) - सिमल के अनुसार, समाजशास्त्र
1. Calberton, V. F. The Making of Society p. 8.
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द्वार सोल दिये। परन्तु रोम-निवासी यूरोप को मुख्य कानून-सम्बन्धी ज्ञान देने में हो व्यस्त रहे, अतः वे बानून के अतिरिक्त समाज के गैर-कानूनी पक्षों की ओर अधिक ध्यान नहीं दे पाये । यहाँ तक कि वे राज्य और समाज के बीच अन्तर भी स्पष्ट नहीं कर पाये। उन्होंने किसी मूल सामाजिक दर्शन की रचना नहीं की। वितण्डायादी -- इसके पश्चात् का काल वितण्डावादी मान्यता को स्थापित किया कि मानव भगवान् को विशिष्ट रचना है । यह ईश्वर के नियमों के अतिरिक्त अन्य किन्ही नियमों से आवद्ध नहीं है। पादरी लोग उस ईश्वर के पार्थिव प्रतिनिधि हैं, जिन्हें उस ईश्वर ने अपने कानून की व्याख्या करने और अपनी इच्छा को क्रियान्वित करने का अधिकार दे रखा है। उस समय का सामाजिक विधान ईश्वर स्वीकृत विधान था जो उसे परिवर्तित करने की सोचता था, उसे काफिर माना जाता था। ज्ञानवादी दर्शन रूढ़िवादी दर्शन था और इसने सामाजिक मान्यताओं को धार्मिक व्यवस्था प्रदान की थी। वितण्डावांदियों को यह मान्यता कि मनुष्य समाज को परिवर्तित नही कर सकता, झूठी सिद्ध कर दी गई है, क्योंकि मानव निरन्तर अपने समाज को परिवर्तित करते रहे हैं। आधुनिक सोलहवीं शताब्दी में राज्य तथा समाज का अन्तर स्पष्ट किया गया। लेखकों ने जीवन की समस्याओं को अधिक यथार्थ स्तर पर समझा। इनमें सबसे प्रसिद्ध हान्स और मैकियावेली थे । मैकियावेली की पुस्तक 'दी प्रिंस' राज्य तथा राज्य मर्मशता का एक यथातथ्य अध्ययन है और उसमे मुख्यतः राज्य को सफलतापूर्वक चलाने के सिद्धान्तों का वर्णन है। इन सिद्धान्तों को उसने ऐतिहासिक आँकड़ों के आधार पर निर्मित किया था। सर थामस पूर इस युग का एक अन्य प्रसिद्ध लेखक था, जिसने सन् एक हज़ार पाँच सौ पंद्रह में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'यूटोपिया' में, एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था का चित्रण और दैनिक जीवन की सामाजिक समस्याओं का वर्णन किया है। वास्तविक जीवन कैसा होना चाहिए, इस बात को बताने के लिए मूर ने जिस शैली में आदर्श जीवन का चित्रण किया है, उस शैली का अनुकरण अन्य लेखकों ने भी अपनी पुस्तकों में किया, जैसे थामस कैम्पेवेला ने अपनी पुस्तक 'सिटी आफ दी सन' , सर फ्रंसिस बेकन ने अपनी पुस्तक 'न्यू एटलाण्टिस' और जेम्स हेरिटन ने अपनी पुस्तक 'दो कामनवेल्थ आफ नेशन्स' में सामाजिक घटना-वस्तु की वैज्ञानिक खोज की दिशा में अपनी महत्वपूर्ण देन के लिए इटली के लेखक faet और फ्रांसीसी लेखक मांटेस्क्यू विशेष उल्लेखनीय है । विको ने अपनी पुस्तक 'दि न्यू साइन्स' में कहा है कि समाज कुछ निश्चित कानूनों या नियमों के अधीन होता है। इन कानूनों को यथातथ्य निरीक्षण तथा परीक्षण द्वारा ही समझा जा सकता है। मांटेस्क्यू ने अपनी विख्यात पुस्तक 'दि स्पिरिट आफ लाज' में इस बात का विश्लेषण किया है कि बाह्य तत्व, विशेषतया जलवायु, मानव-समाज के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। मान्टेस्क्यू के अनुसार, "कानून राष्ट्रीय चरित्र का प्रतीक है और उनसे जिस भावना का पता लगता है, उसकी व्याख्या उन सामाजिक तथा भौगोलिक अवस्थाओं को ध्यान में रखकर को जानी चाहिए, जिनमें लोग रह रहे हों।" जलवायु सामाजिक जीवन का मुख्य निर्णायक है। मान्टेस्क्यू के निष्कर्ष कल्पनात्मक दार्शनिकों की अपेक्षा कुछ अच्छे थे, परन्तु उसका दोप यह था कि उसने सामाजिक जीवन से सम्बन्धित समग्र सत्यता को एक ही आधार पर समझाने का प्रयत्न किया । अरस्तू के समान वह भी इसी रूढ़िवादी परिणाम पर पहुॅचा कि 'जो है', वह अवश्य 'रहना चाहिए' । आगस्त काम्टे -- तत्पश्चात् आगस्त काम्टे का युग आया । उसे समाजशास्त्र का जन्मदाता कहना ठीक ही है, क्योंकि उसने एक ऐसे विज्ञान की स्थापना का प्रयत्न किया, जिसके अन्तर्गत समग्र मानव-जोवन व मानवीय गतिविधियों सम्मिलित थी । वह आधुनिक युग का पहला विचारक था, जिसने स्पष्ट शब्दों में इस तथ्य को प्रतिपादित किया कि सामाजिक जीवन की दिशाएँ एकता के सूत्र में बंधी हुई है और यह भी बताया कि यह एकता विकासोन्मुख है। उसके अनुसार मानव सामाजिक विकास को तोन अवस्थाओं धार्मिक, आदिभौतिक और वैज्ञानिक के द्वारा आगे बढ़ता जाता है। जहाँ तक प्राकृतिक घटमा वस्तु के चिन्तन का प्रश्न है, मानव अब वैज्ञानिक अवस्था को प्राप्त कर चुका है, परन्तु उसका समाज सम्बन्धी चिन्तन अभी तक आधिभौतिक अवस्था में ही है। सौभाग्य से आधिभौतिक अवस्था लगभग पूर्ण हो चुकी है और मानवता वैज्ञानिक अवस्था को दहलीज पर है। हाँ, काम्टे पर्याप्त आशावादी था । जीववैज्ञानिक - डाविन की पुस्तक 'ओरिजन आफ स्पेशीज' के प्रकाशित होने के उपरान्त समाजशास्त्र के विकास की दिशा में पर्याप्त अध्ययन किया गया। डाविन का सिद्धान्त कि 'बलिष्ठः अतिजीवित' । इसी के आधार पर जीवन के सम्पूर्ण रूप विकसित हुए हैं। आधुनिक युग के सर्वाधिक प्रतिभाशाली अंग्रेज विद्वान् हरबर्ट स्पेन्सर ने 'बलिष्ठः अतिजीवितः' तथा प्राकृतिक चयन के सिद्धान्तों को समाजशास्त्र के क्षेत्र में प्रयुक्त किया । यह कहा जा सकता कि उसको समाजशास्त्र सम्बन्धी रचनाओं ने समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र विषय का स्थान प्रदान किया। स्पेन्सर ने तमाम विज्ञानों को एक प्ररूप में समन्वित करने और एक मूल नियम जिसके द्वारा प्राकृतिक और सामाजिक सम्बन्धों की व्याख्या हो सके, को खोजने का प्रयत्न किया। उसके प्रमुख सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त यह है कि जीवों के समान ही सामाजिक घटना-वस्तु भी सरल तथा समरूप से जटिल तथा विषम रूप की ओर धीरे-धीरे विकसित होती है । आदिम मानव उसके लिए साधारण मानव प्रकार था जिससे सभ्य मानव विकसित हुआ। उसकी दूसरी महत्वपूर्ण देन तथाकथित जैविक सिद्धान्त है जिसमे उसने समाज की समानता मानवीय शरीर से दिखलाई है। ऐसी देनों के कारण स्पेन्सर समाजशास्त्र की जीवविज्ञान विचारधारा में अग्रिम स्थान रखता है। उसने समाज की प्राकृतिक घटना-वस्तु के रूप में व्याख्या करके सामाजिक तथ्यों के वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए भूमिका तैयार कर दी । मनोवैज्ञानिक -- हरबर्ट स्पेन्सर के अनुयायियों की संख्या बहुत थी और जीवविकास सम्बन्धी उनका सिद्धान्त उन्नीस वी शताब्दी के अन्त तक प्रचलित रहा, परन्तु बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सामाजिक घटना-वस्तु के सम्बन्ध में उसकी जैविक व्याख्या के स्थान पर मनोवैज्ञानिक व्याख्या की स्थापना हुई । यह दिखाने के प्रयत्न किये गये कि समाज का विकास किस प्रकार मानवमन के विकास पर निर्भर है । इङ्गलैंड में ग्राहम वैलेस , मैक्डूगल और हाबहाउस ने और अमरीका में वार्ड , गिडिंग्स , कूले , मीड और डीवी ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सामाजिक विकास की व्याख्या अपने-अपने ढङ्ग तथा अपने-अपने क्षेत्रों में की। दुर्खीम समाज की वास्तविकता पर बल देने वाला प्रथम आधुनिक लेखक था। उसने सामाजिक वास्तविकताओं पर बल दिया तथा समाजशास्त्र को मनोविज्ञान से अलग पृष्ठभूमि प्रदान की। उसके अनुसार, सामाजिक तथ्य बाह्य होते हैं जो मानव व्यवहार को सीमित करते हैं। उसने समाजशास्त्र के अध्ययन को नवीन दिशा प्रदान की। जर्मन समाजशास्त्री --जर्मन समाजशास्त्रियों, यथा वान वीजे , टानी , वीर कान्ट , सिमल एवं मैक्स वंबर ने भी समाजशास्त्र के विकास को काफी प्रभावित किया है । सिमल ने समाजशास्त्र की स्वरूपात्मक विचारधारा का विकास किया है । समाजशास्त्र : एक पृथक् विज्ञान -समाजशास्त्र अब एक पृथक् विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है, जिसका विषय सामाजिक घटना वस्तु का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करना है। इसने सामाजिक जीवन से सम्बन्धित निश्चित ज्ञान संग्रहीत कर लिया है । समाजशास्त्र का परम उद्देश्य सामाजिक जीवन का सुधार है। यह आशा की जाती है कि सामाजिक जीवन के अन्तनिहित नियमों एवं प्रक्रियाओं के ज्ञान से विभूषित व्यक्ति अपने समाज का अपनी इच्छानुसार निर्माण करने में अधिक योग्य सिद्ध हो सकेंगे । ऐसा ज्ञान मानवीय कार्यों को प्रभावित करने में भी सहायक सिद्ध होगा। समाजशास्त्र का कालान्तर में अन्य सामा जिक विज्ञानों की भांति विकसित एवं उन्नत होना निश्चित है । तीन. समाजशास्त्र एक विज्ञान है, जिसको पृथक् विषय सामग्री है समाजशास्त्र पृथक विषय-सामग्री वाला विज्ञान ही नहीं है, बल्कि सब सामाजिक विज्ञानों को जननी है -- आश्चर्य की बात है कि कुछ आलोचकों का कथन है कि समाजशास्त्र की अपनी कोई अलग विषय-वस्तु नहीं है, अपितु यह विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का पिटारा है। यह तर्क दिया जाता है कि अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र आदि सामाजिक विज्ञान विशिष्ट विज्ञान है तथा समाजशास्त्र इन विज्ञानों के विशेषज्ञों द्वारा दी गयी बातों तथा मूल कल्पनाओं का संग्रह मात है। यह कहा जा सकता है कि यह विचार नितान्त भ्रामक है, क्योंकि आज समाजशास्व पृथक् विषय-सामग्री वाला एक विज्ञान ही नहीं है, अपितु इसने वह उच्च पद प्राप्त कर लिया है जो इसे सभी सामाजिक विज्ञानों की जननी बना देता है। अन्य सामाजिक विज्ञानों में समाजशास्त्र के स्थान की व्याख्या करते हुए मैकाइवर ने ठीक ही कहा है कि "समाजशास्त्र में अन्य सामाजिक शास्त्रों का वैसा ही स्थान है जैसा किसी समुदाय में समिति का होता है। विशिष्ट सामाजिक विज्ञान जीवन के समितीय स्वरूपों के विज्ञान हैं, अतएव वे उस सिंहासन पर आरूढ़ नही हो सकते जो समाजशास्त्र के लिये सुरक्षित है।" समाजशास्त्र का एक पृथक विषय है, इसके विरुद्ध आलोचना -- तीन आधारों पर इस बात की आलोचना की गई है कि समाजशास्त्र पृथक् विषय-सामग्री वाला शास्त्र है समाजशास्त्र सामाजिक तत्व-सम्बन्धी विविध अध्ययनों का संकलन मात्र -- पहला तर्क यह दिया जाता है कि समाजशास्त्र सामाजिक तत्व लिये हुए विविध अध्ययनों का संकलन मात्र है। इसका उत्तर यह है कि समाजशास्त्र में जिन विविध अध्ययनों का संकलन किया जाता है, यदि उनका अध्ययन अन्य शास्त्रों में नहीं किया गया है तो समाजशास्त्र निश्चय ही उनका अध्ययन करके उपयोगी कार्य करता है। इस बात से इन्कार करना सम्भव नही है कि सामाजिक सस्थाओं, यथा परिवार, सम्पत्ति, धर्म एवं राज्य, सामाजिक रीति-रिवाजों, सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक वर्गों तथा राष्ट्रीय व प्रजातीय समूहो, सामाजिक आदतों, फैशन, गरीबी, अपराध, आत्महत्या तथा सामाजिक नियंत्रण के तत्वों आदि के बारे मे समाजशास्त्र ने अत्यन्त उपयोगी सामग्री इकट्ठी की है। इनमें से किसी भी विषय का पर्याप्त विवेचन किसी अन्य शास्त्र में नहीं किया जाता । समाजशास्त्र का यह दावा है कि इसकी विषय-वस्तु अन्य शास्त्रों से पृथक् है, इस तथ्य से यह और भी दृढ़ हो जाता है कि समाजशास्त्र मनुष्य के इतिहास, उसकी सफलताओं तथा उसके जीवविज्ञान का अध्ययन उनके विशुद्ध रूप में नहीं करता, बल्कि उस घटना-वस्तु के रूप में करता है, जहाँ तक वे मनुष्य के अन्त सम्बन्धो पर प्रभाव डालते हैं या उनसे प्रभावित होते हैं । समाजशास्त्र की विषय-सामग्री अनेक सामाजिक विज्ञानों में विभाजित समाजशास्त्र की अपनी कोई पृथक् विषय-सामग्री नहीं है, इस सम्बन्ध में दूसरा आक्षेप यह है कि समाजशास्त्र का कोई विशिष्ट क्षेत्र नही है, समाजशास्त्र की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र क्योंकि इसकी विषय-सामग्री अनेक सामाजिक विज्ञानों, यथा अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, मानवविज्ञान, इतिहास, विधिशास्त्र आदि में विभाजित है। जहाँ तक उपर्युक्त विषयो का सम्बन्ध है, यह आक्षेप उचित नहीं है। परन्तु यदि यह आक्षेप ठीक भी हो तो इन अलग-अलग शास्त्रो का होना इस बात की मनाही नहीं करता कि कोई ऐसा सामान्य शास्त्र नही होना चाहिये, जिसका कार्य इन शास्त्रों के अलग-अलग निष्कर्षो को सम्बद्ध करना एवं सामाजिक जीवन की अधिक सामान्य स्थितियों का वर्णन करना हो। जिस प्रकार वनस्पतिविज्ञान, शरीरविज्ञान एवं जन्तुविज्ञान का अस्तित्व एक सामान्य विज्ञान जीवविज्ञान की उपयोगिता को निर्मूल नहीं करता, उसी प्रकार अलग-अलग सामाजिक विज्ञानों का होना समाजशास्त्र जैसे सामान्य विज्ञान के अस्तित्व को अनुपयोगी सिद्ध नहीं करता । समाजशास्त्र का उद्देश्य मानवीय सम्बन्धों तथा सामाजिक जीवन का समग्र रूप में अध्ययन करना है। वस्तुतः सामाजिक विज्ञान आज संख्या में इतने अधिक तथा अपनी-अपनी विषय-वस्तु की व्याख्या मे इतने विस्तृत है कि एक सामान्य सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता को बेकार नहीं कहा जा सकता, बल्कि अधिकाधिक महत्वपूर्ण ही कहा जायगा । समाजशास्त्र अन्य शास्त्रों से उधार लेता है समाजशास्त्र को अपनी विषय-सामग्री न होने के संबंध में तीसरा आक्षेप यह है कि यह दूसरे शास्त्रों से विषय उधार लेता है और बिना परिश्रम के हर बात का ज्ञान प्राप्त करने का यह सरल उपाय है। परन्तु यह आक्षेप तर्कसंगत नहीं है । विज्ञान का अनिवार्य स्वभाव यह है कि यह केवल उधार लेने से ही विकसित होता है। हम जानते हैं कि जीवविज्ञान का विकास रसायनशास्त्र तथा भौतिकशास्त्र के निष्कर्थों पर ही होता है। यही बात समाजशास्त्र पर लागू होती है जीवविज्ञान तथा समाजशास्त्र जिन शास्त्रों से उधार लेते हैं, उन्हें नयी संकल्पपरन्तु नाओ तथा नियमो से समृद्ध बना देते हैं जिससे तथ्यों का संकलन उपयोगी तथा अर्थपूर्ण बन जाता है । निःसंदेह समाजशास्त्र अपनी विषय-सामग्री दूसरे सामाजिक शास्त्रो से उधार लेता है, परन्तु यह इसमें कुछ जोड़कर इस विषय-सामग्री को पूर्णतया नया आकार प्रदान करता है। इस भवन का निर्माण करने के लिए हम एक निश्चित स्थान पर ईंटें, सीमेंट, लोहा, चूना, लकड़ी, रेत आदि इकट्ठा करते हैं, परन्तु इन सब सामग्रियों के एक स्थान पर इकट्ठा कर देने से भवन का निर्माण नहीं हो जाता। निर्माण हेतु एक प्रविधि की आवश्यकता होती है और सामग्री को एक निश्चित एवं स्थिर रूप दिया जाता है। इस प्रविधि को प्रयुक्त करने के बाद इसे भवन कहा जाता है और यह केवल ईटों, चूना, सीमेंट आदि का ढेर नहीं रहता। इसी प्रकार, समाजशास्त्र सामग्री उधार लेकर एक प्रविधि को प्रयुक्त करता है, जिससे 'समाज' का निर्माण होता है। इस समाज की संरचना एवं प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए एक पृथक् अनुशागन की आवश्यकता होती है । मोटवानी के शब्दो मे, "समाजशास्त्र एक भवन की भाँति सामाजिक जीवन के तथ्यों का एक जैविक सम्पूर्ण के रूप में संयोजीकरण का सिद्धान्त तथा ऐसे समन्वय की परिणति के रूप में एक स्वतन्त्र विज्ञान, दोनों है।" ज्ञान का विभागीकरण अध्ययन की सुविधा के लिए किया जाता है । वस्तुतः ज्ञान को नपे-सुले भागों में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। पुनः समाजशास्त्र अन्य किसी विज्ञान की अपेक्षा दूसरे विशानों पर अधिक आश्रित इसलिए भी है कि यह एक जटिल एवं विशाल शास्त्र है । समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र, सम्पूर्ण मानव-सम्बन्ध, इतना व्यापक है कि कोई भी अकेला व्यक्ति इसका स्वयं पूरी तरह से अध्ययन नहीं कर सकता। उसे दूसरों की सहायता अवश्य लेनी पड़ती है। उदाहरण के लिये, किसी विशिष्ट समाज को समझने के लिये समाजशास्त्री को उस समाज के व्यक्तियों, उनको स्वाभाविक तथा अर्जित आदतों, भौगोलिक पर्यावरण, सामाजिक संस्थाओ, भाषा, धर्म, नैतिकता, कानून, आर्थिक ढांचे और अन्य लोगों के साथ उनके सम्बन्ध तथा संसार के लोगों के साथ उनके पारस्परिक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होता है। इस काम को सफलतापूर्वक सम्पन्न. करने के लिए समाजशास्त्र को अन्य अनेक शास्त्रों का सहयोग लेना पड़ता है जो समाजशास्त्र के निष्कपों एवं आंकड़ों पर उतने ही आश्रित होते हैं. जितना समाजशास्त्र उन पर । बार्नसं एवं बंकर के शब्दों में, "समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों को न तो स्वामिनी और न ही दासी, अपितु उनको बहन है । "एक समाजशास्त्र का विषय सम्पूर्ण सामाजिक जीवन है -अतः यह बात निस्सदेह सिद्ध हो गई है कि समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसकी अपनी अलग विषय-वस्तु सम्पूर्ण सामाजिक जीवन है। यह सभी सामाजिक घटना वस्तु के पीछे निहित सामान्य नियमों का वर्णन करता है । सामाजिक जीवन का अध्ययन करते समय यह अन्तःकार्यो का अध्ययन मनोवैज्ञानिक आचरण के रूप में नहीं, अपितु सामाजिक रचना के रूप में करता है । सामाजिक जीवन इतना जटिल है कि इसका अध्ययन करने के लिए श्रम का विभाजन आवश्यक है । इसीलिए हमारे पास अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, कानून आदि विषय हैं । पुनरावृत्ति का भय न करते हुए इस बात को पुनः दोहराया जा सकता है कि समाजशास्त्र अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र आदि द्वारा किये गये अध्ययनों का योग मात्र नहीं है, अपितु जैसा कि स्पॉट दो ने कहा है कि --- यह एक अनुशासन है जो समाजों को जैविक एकता के रूप में समझने तथा समाजों में व्याप्त विभिन्न संस्थाओं के परस्पर सम्बन्धो को जानने का प्रयत्न करता है । यही वहु शास्त्र है जो मानव के सामाजिक समूहों का वर्णन करता है। यह उनका वर्गीकरण तथा उनकी संरचना के रूप को जानने का प्रयत्न करता है । एक ""Sociology is regarded neither as the mistress nor as the handmaid of the social sciences but, as their sister." -Barnes and Backer, Solid Thought from Lore to Science - Vol. I. p. X. Sprott, W. G. H., Sociology, p. तीस. कुछ ऐसे विषय है, जैसे सामाजिक स्तरीकरण , जनसंख्यान्दर में परिवर्तन, परिवार के कार्यों में परिवर्तन, जो किसी अन्य विज्ञान की विषय-सामग्री नहीं हैं। समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है और अनेक विभिन्न सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन करता है। एक सामान्य विज्ञान के रूप में यह सभी समूहों एवं समाजों की समान विशेषताओं का अध्ययन करने के लिये नितान्त उपयुक्त है। मात्र वर्णन करना ही इसका ध्येय नहीं है, वल्कि कारणों एवं व्याख्यानो की योज करना अधिक है। मनुष्य किसी प्रकार का आचरण क्यों करते हैं, यही समाजशास्त का सामान्य प्रश्न है । चार. समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र - समाजशास्त्र के विषयक्षेत्र के बारे में विद्वान् एकमत नहीं हैं। वीशून्य एफशून्य काल्बर्टन का कथन है, "क्योंकि समाजशास्त्र एक ऐसा सचीला विज्ञान है कि यह निर्णय करना कठिन है कि इसकी सीमा कहाँ आरम्भ होती है और कहाँ समाप्त; समाजशास्त्र कहीं सामाजिक मनोविज्ञान बन जाता है और सामाजिक मनोविज्ञान कहाँ समाजशास्त्र या कहाँ अर्थशास्त्र का सिद्धान्त था जीवशास्त्रीय सिद्धान्त समाजशास्त्रीय सिद्धान्त बन जाता है - यह एक ऐसी जटिल संरचना है जिसका निर्णय करना असंभव है ।" कुछ लोगों का कहना है कि समाजशास्त्र संसार की सभी वस्तुओं का अध्ययन करता है, परन्तु यह विचार समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के बारे में बहुत अस्पष्ट है। वास्तव में, समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र अत्यन्त सीमित है और यह केवल उन्ही समस्याओं से संबंधित है जिनका अध्ययन अन्य सामाजिक शास्त्रों में नहीं किया जाता । मोटे तौर पर, समाजशास्त्र मानवीय अन्तःक्रियाओं और परस्पर-सम्बन्धों, उनकी अवस्थाओं तथा उनके परिणामों का अध्ययम करता है। इस प्रकार तथ्य तो यह है कि समाज में मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र बन जाता है। जिन गतिविधियों द्वारा मनुष्य अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये संघर्ष का सामना करता है, मनुष्यों के अन्तःसम्बन्धों की व्याख्या करने वाले नियम एवं विनियम, ज्ञान एवं विश्वास की प्रणाली, और समाज में अपनी गतिविधियों द्वारा मनुष्य जिस कला, नैतिकता या अन्य योग्यता या आदतें विकसित अथवा अजित करता है, इन सबका अध्ययन समाजशास्त्र में आ जाता है। परन्तु यह इतना विशाल क्षेत्र है कि कोई भी शास्त्र समुचित रूप से इनका अध्ययन नहीं कर सकता। अतः समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र को सीमित एवं निश्चित बनाने का प्रयत्न किया गया । इस प्रश्न को लेकर समाजशास्त्रियों में दो सम्प्रदाय प्रचलित हैं। एक. विशिष्टीकृत अथवा स्वरूपात्मक सम्प्रदाय सिमल का मत - सिमल के अनुसार, समाजशास्त्र एक. Calberton, V. F. The Making of Society p. आठ.
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गंगोली राज्य तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी तक वर्तमान उत्तराखण्ड राज्य में एक ऐतिहासिक राज्य था। राज्य की राजधानी मनकोट में थी, और इस कारण यहाँ के राजाओं को मनकोटी राजा कहा जाता था। सरयू गंगा तथा राम गंगा नदियों के मध्य स्थित होने के कारण इस क्षेत्र को पूर्वकाल में गंगावली कहा जाता था, जो धीरे धीरे बदलकर गंगोली हो गया। तेरहवीं शताब्दी में मनकोटी राज शुरू होने से पहले इस क्षेत्र पर कत्यूरी राजवंश का शासन था। गंगोलीहाट इस क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। सोलहवीं शताब्दी में कुमाऊँ के राजा बालो कल्याण चन्द ने मनकोट पर आक्रमण कर गंगोली क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। .
3 संबंधोंः चन्द राजवंश, बागेश्वर जिला, कुमाऊँ राज्य।
कलि कुमाऊँ का किला और और राजधानी, चम्पावत, १८१५ चन्द राजवंश भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ मण्डल का एक मध्यकालीन रघुवंशी राजपूत राजवंश था, जिन्होंने इस क्षेत्र पर ११वीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के ह्रास के बाद से और १८वीं शताब्दी में अंगेज़ो के आगमन तक शासन किया। .
बागेश्वर भारत के उत्तराखण्ड राज्य का एक जिला है, जिसके मुख्यालय बागेश्वर नगर में स्थित हैं। इस जिले के उत्तर तथा पूर्व में पिथौरागढ़ जिला, पश्चिम में चमोली जिला, तथा दक्षिण में अल्मोड़ा जिला है। बागेश्वर जिले की स्थापना १५ सितंबर १९९७ को अल्मोड़ा के उत्तरी क्षेत्रों से की गयी थी। २०११ की जनगणना के अनुसार रुद्रप्रयाग तथा चम्पावत के बाद यह उत्तराखण्ड का तीसरा सबसे कम जनसंख्या वाला जिला है। यह जिला धार्मिक गाथाओं, पर्व आयोजनों और अत्याकर्षक प्राकृतिक दृश्यों के कारण प्रसिद्ध है। प्राचीन प्रमाणों के आधार पर बागेश्वर शब्द को ब्याघ्रेश्वर से विकसित माना गया है। यह शब्द प्राचीन भारतीय साहित्य में अधिक प्रसिद्ध है। बागनाथ मंदिर, कौसानी, बैजनाथ, विजयपुर आदि जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। जिले में ही स्थित पिण्डारी, काफनी, सुन्दरढूंगा इत्यादि हिमनदों से पिण्डर तथा सरयू नदियों का उद्गम होता है। .
कुमाऊँ राज्य, जिसे कूर्मांचल भी कहा जाता था, चन्द राजवंश द्वारा शासित एक पर्वतीय राज्य था, जिसका विस्तार वर्तमान भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में था। राज्य की स्थापना ७०० में सोम चन्द ने की थी। प्रारम्भ में यह केवल वर्तमान चम्पावत जनपद तक ही सीमित था। उसके बाद सोम चन्द ने सुई पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया। सर्वप्रथम राजा त्रिलोक चन्द ने छखाता पर आक्रमण कर पश्चिम की ओर राज्य का विस्तार किया। उसके बाद गरुड़ ज्ञान चन्द ने तराई-भाभर, उद्यान चन्द ने चौगरखा, रत्न चन्द ने सोर और कीर्ति चन्द ने बारहमण्डल, पाली तथा फल्दाकोट क्षेत्रों को राज्य में मिला लिया। १५६३ में बालो कल्याण चन्द ने राजधानी चम्पावत से आलमनगर स्थानांतरित कर नगर का नाम अल्मोड़ा रखा, और गंगोली तथा दानपुर पर अधिकार स्थापित किया। उनके बाद उनके पुत्र रुद्र चन्द ने अस्कोट और सिरा को पराजित कर राज्य को उसके चरम पर पहुंचा दिया। सत्रहवीं शताब्दी में कुमाऊँ में चन्द शासन का स्वर्ण काल चला, परन्तु अट्ठारवीं शताब्दी आते आते उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। १७४४ में रोहिल्लों के तथा १७७९ में गढ़वाल के हाथों पराजित होने के बाद चन्द राजाओं की शक्ति पूरी तरह बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन् १७९० ई. में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। .
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गंगोली राज्य तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी तक वर्तमान उत्तराखण्ड राज्य में एक ऐतिहासिक राज्य था। राज्य की राजधानी मनकोट में थी, और इस कारण यहाँ के राजाओं को मनकोटी राजा कहा जाता था। सरयू गंगा तथा राम गंगा नदियों के मध्य स्थित होने के कारण इस क्षेत्र को पूर्वकाल में गंगावली कहा जाता था, जो धीरे धीरे बदलकर गंगोली हो गया। तेरहवीं शताब्दी में मनकोटी राज शुरू होने से पहले इस क्षेत्र पर कत्यूरी राजवंश का शासन था। गंगोलीहाट इस क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। सोलहवीं शताब्दी में कुमाऊँ के राजा बालो कल्याण चन्द ने मनकोट पर आक्रमण कर गंगोली क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। . तीन संबंधोंः चन्द राजवंश, बागेश्वर जिला, कुमाऊँ राज्य। कलि कुमाऊँ का किला और और राजधानी, चम्पावत, एक हज़ार आठ सौ पंद्रह चन्द राजवंश भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ मण्डल का एक मध्यकालीन रघुवंशी राजपूत राजवंश था, जिन्होंने इस क्षेत्र पर ग्यारहवीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के ह्रास के बाद से और अट्ठारहवीं शताब्दी में अंगेज़ो के आगमन तक शासन किया। . बागेश्वर भारत के उत्तराखण्ड राज्य का एक जिला है, जिसके मुख्यालय बागेश्वर नगर में स्थित हैं। इस जिले के उत्तर तथा पूर्व में पिथौरागढ़ जिला, पश्चिम में चमोली जिला, तथा दक्षिण में अल्मोड़ा जिला है। बागेश्वर जिले की स्थापना पंद्रह सितंबर एक हज़ार नौ सौ सत्तानवे को अल्मोड़ा के उत्तरी क्षेत्रों से की गयी थी। दो हज़ार ग्यारह की जनगणना के अनुसार रुद्रप्रयाग तथा चम्पावत के बाद यह उत्तराखण्ड का तीसरा सबसे कम जनसंख्या वाला जिला है। यह जिला धार्मिक गाथाओं, पर्व आयोजनों और अत्याकर्षक प्राकृतिक दृश्यों के कारण प्रसिद्ध है। प्राचीन प्रमाणों के आधार पर बागेश्वर शब्द को ब्याघ्रेश्वर से विकसित माना गया है। यह शब्द प्राचीन भारतीय साहित्य में अधिक प्रसिद्ध है। बागनाथ मंदिर, कौसानी, बैजनाथ, विजयपुर आदि जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। जिले में ही स्थित पिण्डारी, काफनी, सुन्दरढूंगा इत्यादि हिमनदों से पिण्डर तथा सरयू नदियों का उद्गम होता है। . कुमाऊँ राज्य, जिसे कूर्मांचल भी कहा जाता था, चन्द राजवंश द्वारा शासित एक पर्वतीय राज्य था, जिसका विस्तार वर्तमान भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में था। राज्य की स्थापना सात सौ में सोम चन्द ने की थी। प्रारम्भ में यह केवल वर्तमान चम्पावत जनपद तक ही सीमित था। उसके बाद सोम चन्द ने सुई पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया। सर्वप्रथम राजा त्रिलोक चन्द ने छखाता पर आक्रमण कर पश्चिम की ओर राज्य का विस्तार किया। उसके बाद गरुड़ ज्ञान चन्द ने तराई-भाभर, उद्यान चन्द ने चौगरखा, रत्न चन्द ने सोर और कीर्ति चन्द ने बारहमण्डल, पाली तथा फल्दाकोट क्षेत्रों को राज्य में मिला लिया। एक हज़ार पाँच सौ तिरेसठ में बालो कल्याण चन्द ने राजधानी चम्पावत से आलमनगर स्थानांतरित कर नगर का नाम अल्मोड़ा रखा, और गंगोली तथा दानपुर पर अधिकार स्थापित किया। उनके बाद उनके पुत्र रुद्र चन्द ने अस्कोट और सिरा को पराजित कर राज्य को उसके चरम पर पहुंचा दिया। सत्रहवीं शताब्दी में कुमाऊँ में चन्द शासन का स्वर्ण काल चला, परन्तु अट्ठारवीं शताब्दी आते आते उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। एक हज़ार सात सौ चौंतालीस में रोहिल्लों के तथा एक हज़ार सात सौ उन्यासी में गढ़वाल के हाथों पराजित होने के बाद चन्द राजाओं की शक्ति पूरी तरह बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन् एक हज़ार सात सौ नब्बे ई. में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। .
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नई दिल्लीः देश में कोरोना का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है वहीं इस दौर में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10वीं और 12वीं क्लास की कंपार्टमेंट परीक्षा करवाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह सितंबर अंत तक 10वीं और 12वीं की कम्पार्टमेंट परीक्षा आयोजित करा सकता है। बोर्ड का कहना है कि इसकी पूरी संभावना है कि इस दौरान परीक्षा ली जा सके। इसके लिए बोर्ड ने आवश्यक तैयारियां भी करनी शुरू कर दी हैं।
सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उन छात्रों के लिए भी एग्जाम होंगे, जो अपने मार्क्स में सुधार करना चाहते हैं। सीबीएसई ने बताया कि इस साल एग्जाम सेंटर्स की संख्या में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी की गई है। परीक्षा केंद्रों को बढ़ाकर 1,278 कर दिया गया है। दरअसल, JEE-NEET परीक्षा की तरह अब सीबीएसई की कंपार्टमेंट परीक्षा का भी विरोध हो रहा है। छात्रों ने कोर्ट में परीक्षा स्थगित करने की मांग को लेकर याचिका डाली थी।
छात्रों ने दायर याचिका में कहा है कि कोरोना वायरस के इस संकट के दौर में या तो परीक्षा रद्द कर दी जाए या छात्रों का पिछले प्रदर्शनों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को हलफनामा दाखिल करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को CBSE को 10वीं और 12वीं क्लास के छात्रों द्वारा याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने सात सितंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट मामले में अगली सुनवाई 10 सितंबर को करेगा। बता दें कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कंपार्टमेंट परीक्षाओं में 10वीं क्लास के करीब डेढ़ लाख छात्र और 12वीं क्लास के 87 हजार छात्र हिस्सा लेंगे।
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नई दिल्लीः देश में कोरोना का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है वहीं इस दौर में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं और बारहवीं क्लास की कंपार्टमेंट परीक्षा करवाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह सितंबर अंत तक दसवीं और बारहवीं की कम्पार्टमेंट परीक्षा आयोजित करा सकता है। बोर्ड का कहना है कि इसकी पूरी संभावना है कि इस दौरान परीक्षा ली जा सके। इसके लिए बोर्ड ने आवश्यक तैयारियां भी करनी शुरू कर दी हैं। सीबीएसई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उन छात्रों के लिए भी एग्जाम होंगे, जो अपने मार्क्स में सुधार करना चाहते हैं। सीबीएसई ने बताया कि इस साल एग्जाम सेंटर्स की संख्या में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी की गई है। परीक्षा केंद्रों को बढ़ाकर एक,दो सौ अठहत्तर कर दिया गया है। दरअसल, JEE-NEET परीक्षा की तरह अब सीबीएसई की कंपार्टमेंट परीक्षा का भी विरोध हो रहा है। छात्रों ने कोर्ट में परीक्षा स्थगित करने की मांग को लेकर याचिका डाली थी। छात्रों ने दायर याचिका में कहा है कि कोरोना वायरस के इस संकट के दौर में या तो परीक्षा रद्द कर दी जाए या छात्रों का पिछले प्रदर्शनों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को हलफनामा दाखिल करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को CBSE को दसवीं और बारहवीं क्लास के छात्रों द्वारा याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सात सितंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट मामले में अगली सुनवाई दस सितंबर को करेगा। बता दें कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कंपार्टमेंट परीक्षाओं में दसवीं क्लास के करीब डेढ़ लाख छात्र और बारहवीं क्लास के सत्तासी हजार छात्र हिस्सा लेंगे।
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भोपाल, 13 नवंबर (आईएएनएस/आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी बुधवार से मध्यप्रदेश के दो दिवसीय दौरे पर आ रही हैं।
इस प्रवास के दौरान वे कटनी, जबलपुर सीहोर, होशंगाबाद, भोपाल में जनसभाओं को संबोधित करेंगी।
भाजपा प्रदेश कार्यालय से मंगलवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, स्मृति ईरानी बुधवार की सुबह दिल्ली से नियमित विमान द्वारा राजा भोज एयरपोर्ट पहुंचेंगी। भोपाल से हेलीकॉप्टर द्वारा कटनी जिले के बहोरीबंद विधानसभा क्षेत्र के बिलहरी पहुंचकर जनसभा को संबोधित करेंगी। शाम पांच बजे जबलपुर उत्तर में जनसभा एवं रात में जबलपुर कैंट में जनसभा को संबोधित करेंगी। वे रात्रि विश्राम जबलपुर में ही करेंगी।
ईरानी अपने प्रवास के दूसरे दिन गुरुवार को जबलपुर से सीहोर पहुंचकर आमसभा को संबोधित करेंगी। इसी दिन उनकी होशंगाबाद, भोपाल दक्षिण-पश्चिम, नरेला में जनसभा होगी। इसके बाद शाम में भोपाल से नियमित विमान द्वारा दिल्ली के लिए रवाना हो जाएंगी।
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भोपाल, तेरह नवंबर । भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी बुधवार से मध्यप्रदेश के दो दिवसीय दौरे पर आ रही हैं। इस प्रवास के दौरान वे कटनी, जबलपुर सीहोर, होशंगाबाद, भोपाल में जनसभाओं को संबोधित करेंगी। भाजपा प्रदेश कार्यालय से मंगलवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, स्मृति ईरानी बुधवार की सुबह दिल्ली से नियमित विमान द्वारा राजा भोज एयरपोर्ट पहुंचेंगी। भोपाल से हेलीकॉप्टर द्वारा कटनी जिले के बहोरीबंद विधानसभा क्षेत्र के बिलहरी पहुंचकर जनसभा को संबोधित करेंगी। शाम पांच बजे जबलपुर उत्तर में जनसभा एवं रात में जबलपुर कैंट में जनसभा को संबोधित करेंगी। वे रात्रि विश्राम जबलपुर में ही करेंगी। ईरानी अपने प्रवास के दूसरे दिन गुरुवार को जबलपुर से सीहोर पहुंचकर आमसभा को संबोधित करेंगी। इसी दिन उनकी होशंगाबाद, भोपाल दक्षिण-पश्चिम, नरेला में जनसभा होगी। इसके बाद शाम में भोपाल से नियमित विमान द्वारा दिल्ली के लिए रवाना हो जाएंगी।
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फतेहाबाद। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से लोगों की मौतें हो रही हैं लेकिन सरकार हर मामले में हठधर्मी दिखा रही है। प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी ही नहीं बल्कि एक तरह से एमरजेंसी लगी हुई है। रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बुधवार को फतेहाबाद में नर सेवा ही नारायण सेवा के संकल्प के साथ सेवा समर्पण अभियान की शुरूआत की। उन्होंने उपस्थित कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भी हरियाणा में कोरोना पॉजिटिव केसों की संख्या सात लाख पार कर 7,02,766 हो गई है व सरकारी आंकड़ों की भी मानें तो कल तक लगभग 7,000 लोगों की जान जा चुकी है। प्रदेश में न कहीं सरकार है और न ही शासन।
भाजपा-जजपा सरकार के हुक्मरान प्रदेश में और मोदी सरकार देश में अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़वाकर पीठ दिखाते भाग खड़े हुए हैं। कभी स्वयं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बड़बोले बयान देकर यह कहते हैं कि कोरोना की बदइंतजामी के खिलाफ शोर मचाने से न कोई जिंदा हो पाएगा और न ही कोरोना खत्म हो पाएगा और कभी कोरोना की मार से जूझ रहे मरीज और उनके परिवार के लोग घंटों तक वीआईपी दौरे के कारण तड़पते रहते हैं, जैसा कि हाल में ही जींद ने मुख्यमंत्री के दौरे में देखने को मिला। उपमुख्यमंत्री, श्री दुष्यंत चौटाला का तो अता-पता ही नहीं। यही हाल भाजपा-जजपा के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों का भी है।
इस अभियान के एक और चरण में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने फतेहाबाद जिले में जरूरतमंद एमरजेंसी मरीजों को निःशुल्क व मुफ्त ऑक्सीजन सेवा की भी शुरुआत की है।
आज सेवा और समर्पण अभियान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया सचिव डॉ. विनीत पूनिया, पूर्व विधायक बलवान सिंह दौलतपुरिया, ज़िला महिला कांग्रेस की प्रधान श्रीमती कृष्णा पूनिया, कांग्रेस नेता जग्गु मिस्त्री, ज़िला युवा प्रधान चन्द्र मोहन पोटलिया, बलजीत बैनिवाल खाबड़ा, निहाल सिंह मताना, पूनम रति, नरेंद्र मग्गर, विनय शर्मा, एडवोकेट रामेश्वर गजरोइया, ग्रेट सोहल, इन्दरोस गुज्जर, सुतबीर कडवासरा, रमेश दुल्ट, राज नारंग, परमानंद पीली मंदोरी, सतपाल सिवाच, बलदेव गिल, बलराज माचरा, पूर्व ज़िला पार्षद रणधीर बोदीवाली, सतबीर बडोपल, डिंपल, आलोक भादू, पीयूष नारंग, शमशेर जांडली, अनिल गुज्जर, विजय कड़वासरा, राज कुमार के अलावा अनेक कांग्रेस नेता व कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर फतेहाबाद जिले में सभी सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों, प्राइवेट अस्पतालों व प्राइवेट क्लिनिक चलाने वाले हर डॉक्टर तक पीपीई किट, हैंड सैनिटाइजऱ की बोतलें व सोडियम हाईपोक्लोराईट का सफाई सॉल्यूशन पहुंचाने की शुरुआत की है।
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फतेहाबाद। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से लोगों की मौतें हो रही हैं लेकिन सरकार हर मामले में हठधर्मी दिखा रही है। प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी ही नहीं बल्कि एक तरह से एमरजेंसी लगी हुई है। रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बुधवार को फतेहाबाद में नर सेवा ही नारायण सेवा के संकल्प के साथ सेवा समर्पण अभियान की शुरूआत की। उन्होंने उपस्थित कांग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भी हरियाणा में कोरोना पॉजिटिव केसों की संख्या सात लाख पार कर सात,दो,सात सौ छयासठ हो गई है व सरकारी आंकड़ों की भी मानें तो कल तक लगभग सात,शून्य लोगों की जान जा चुकी है। प्रदेश में न कहीं सरकार है और न ही शासन। भाजपा-जजपा सरकार के हुक्मरान प्रदेश में और मोदी सरकार देश में अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़वाकर पीठ दिखाते भाग खड़े हुए हैं। कभी स्वयं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बड़बोले बयान देकर यह कहते हैं कि कोरोना की बदइंतजामी के खिलाफ शोर मचाने से न कोई जिंदा हो पाएगा और न ही कोरोना खत्म हो पाएगा और कभी कोरोना की मार से जूझ रहे मरीज और उनके परिवार के लोग घंटों तक वीआईपी दौरे के कारण तड़पते रहते हैं, जैसा कि हाल में ही जींद ने मुख्यमंत्री के दौरे में देखने को मिला। उपमुख्यमंत्री, श्री दुष्यंत चौटाला का तो अता-पता ही नहीं। यही हाल भाजपा-जजपा के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों का भी है। इस अभियान के एक और चरण में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने फतेहाबाद जिले में जरूरतमंद एमरजेंसी मरीजों को निःशुल्क व मुफ्त ऑक्सीजन सेवा की भी शुरुआत की है। आज सेवा और समर्पण अभियान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया सचिव डॉ. विनीत पूनिया, पूर्व विधायक बलवान सिंह दौलतपुरिया, ज़िला महिला कांग्रेस की प्रधान श्रीमती कृष्णा पूनिया, कांग्रेस नेता जग्गु मिस्त्री, ज़िला युवा प्रधान चन्द्र मोहन पोटलिया, बलजीत बैनिवाल खाबड़ा, निहाल सिंह मताना, पूनम रति, नरेंद्र मग्गर, विनय शर्मा, एडवोकेट रामेश्वर गजरोइया, ग्रेट सोहल, इन्दरोस गुज्जर, सुतबीर कडवासरा, रमेश दुल्ट, राज नारंग, परमानंद पीली मंदोरी, सतपाल सिवाच, बलदेव गिल, बलराज माचरा, पूर्व ज़िला पार्षद रणधीर बोदीवाली, सतबीर बडोपल, डिंपल, आलोक भादू, पीयूष नारंग, शमशेर जांडली, अनिल गुज्जर, विजय कड़वासरा, राज कुमार के अलावा अनेक कांग्रेस नेता व कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर फतेहाबाद जिले में सभी सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों, प्राइवेट अस्पतालों व प्राइवेट क्लिनिक चलाने वाले हर डॉक्टर तक पीपीई किट, हैंड सैनिटाइजऱ की बोतलें व सोडियम हाईपोक्लोराईट का सफाई सॉल्यूशन पहुंचाने की शुरुआत की है।
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उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश के औरैया में एक मां अपने बेटे से किसी बात पर नाराज होकर खुदकुशी के इरादे से रेलवे ट्रैक पर जाकर लेट गई। देर शाम का वक्त था, लोगों का ध्यान महिला की ओर तब गया जब एक पेट्रोल वैगन ट्रेन बिल्कुल करीब आ पहुंची। लोग शोर मचाने लगे लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। ट्रेन धड़धड़ाते हुए महिला के ऊपर से निकल गई और महिला का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस नजारे को जिसने भी देखा उसकी जुबां पर बरबस ही निकल पड़ा...जाको राखे साइयां मार सके न कोय...।
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उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश के औरैया में एक मां अपने बेटे से किसी बात पर नाराज होकर खुदकुशी के इरादे से रेलवे ट्रैक पर जाकर लेट गई। देर शाम का वक्त था, लोगों का ध्यान महिला की ओर तब गया जब एक पेट्रोल वैगन ट्रेन बिल्कुल करीब आ पहुंची। लोग शोर मचाने लगे लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। ट्रेन धड़धड़ाते हुए महिला के ऊपर से निकल गई और महिला का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस नजारे को जिसने भी देखा उसकी जुबां पर बरबस ही निकल पड़ा...जाको राखे साइयां मार सके न कोय...।
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नई दिल्लीः आरोन फिंच के वनडे क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद ऑस्ट्रेलिया में वनडे टीम के नए कप्तान को लेकर चर्चा जोरों पर है। पूर्व खिलाड़ी इस विषय पर अपनी राय रख रहे हैं और नए कप्तान के नाम को लेकर सुझाव दे रहे हैं। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व धाकड़ तेज गेंदबाज मिचेल जॉनसन ने भी इस विषय पर अपनी राय रखी है और उन्होंने डेविड वॉर्नर और स्टीव स्मिथ दोनों में से किसी के भी हाथ में वनडे टीम की कमान नहीं सौंपे जाने की बात कही है।
जॉनसन ने किसी युवा खिलाड़ी को टीम का नया कप्तान बनाने की वकालत की है। गेंद से छेड़छाड़ मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद प्रतिबंध झेल चुके स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर ने टीम का नेतृत्व करने की इच्छा जतायी है लेकिन जॉनसन ने कहा कि दोनों खिलाड़ी अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर हैं ऐसे में किसी युवा खिलाड़ी के हाथों में टीम की कमान सौंपी जानी चाहिये।
उन्होंने कहा, 'पैट कमिंस (टेस्ट कप्तान) को सभी प्रारूपों की जिम्मेदारी देने से उनके काम का बोझ काफी बढ़ जायेगा। चयनकर्ताओं के मन में ग्लेन मैक्सवेल का नाम हो सकता है। अगर आप भविष्य को देखे तो कैमरून ग्रीन भी एक अच्छा विकल्प होंगे। एक ऑलराउंडर के रूप में हालांकि उनके लिए पहले से काम का ज्यादा बोझ है। एक और विकल्प ट्रेविस हेड के प्रदर्शन में निरंतरता की कमी है। '
जॉनसन ने स्टीव स्मिथ और वॉर्नर को कप्तान नहीं बनाए जाने के बारे में कहा, 'वॉर्नर और स्मिथ दोनों को कप्तान नहीं होना चाहिए। वह पहले की तरह अब भी टीम का मार्गदर्शन करना जारी रख सकते हैं। उनके कप्तान बनने से फिर से पुरानी चीजों (गेंद से छेड़छाड़ मुद्दा) पर चर्चा शुरू हो जायेगी। '
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नई दिल्लीः आरोन फिंच के वनडे क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद ऑस्ट्रेलिया में वनडे टीम के नए कप्तान को लेकर चर्चा जोरों पर है। पूर्व खिलाड़ी इस विषय पर अपनी राय रख रहे हैं और नए कप्तान के नाम को लेकर सुझाव दे रहे हैं। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व धाकड़ तेज गेंदबाज मिचेल जॉनसन ने भी इस विषय पर अपनी राय रखी है और उन्होंने डेविड वॉर्नर और स्टीव स्मिथ दोनों में से किसी के भी हाथ में वनडे टीम की कमान नहीं सौंपे जाने की बात कही है। जॉनसन ने किसी युवा खिलाड़ी को टीम का नया कप्तान बनाने की वकालत की है। गेंद से छेड़छाड़ मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद प्रतिबंध झेल चुके स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर ने टीम का नेतृत्व करने की इच्छा जतायी है लेकिन जॉनसन ने कहा कि दोनों खिलाड़ी अपने करियर के आखिरी पड़ाव पर हैं ऐसे में किसी युवा खिलाड़ी के हाथों में टीम की कमान सौंपी जानी चाहिये। उन्होंने कहा, 'पैट कमिंस को सभी प्रारूपों की जिम्मेदारी देने से उनके काम का बोझ काफी बढ़ जायेगा। चयनकर्ताओं के मन में ग्लेन मैक्सवेल का नाम हो सकता है। अगर आप भविष्य को देखे तो कैमरून ग्रीन भी एक अच्छा विकल्प होंगे। एक ऑलराउंडर के रूप में हालांकि उनके लिए पहले से काम का ज्यादा बोझ है। एक और विकल्प ट्रेविस हेड के प्रदर्शन में निरंतरता की कमी है। ' जॉनसन ने स्टीव स्मिथ और वॉर्नर को कप्तान नहीं बनाए जाने के बारे में कहा, 'वॉर्नर और स्मिथ दोनों को कप्तान नहीं होना चाहिए। वह पहले की तरह अब भी टीम का मार्गदर्शन करना जारी रख सकते हैं। उनके कप्तान बनने से फिर से पुरानी चीजों पर चर्चा शुरू हो जायेगी। '
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सुशांत सिंह राजपूत केस में नया मोड़ आ गया है. रिया की शिकायत के बाद ब्रांदा पुलिस स्टेशन ने दिवंगत अभिनेता की दो बहनों प्रियंका सिंह और मीतू सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
मामले में आरोपी रिया चक्रवर्ती जिनके ऊपर खुद गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, उन्होंने सोमवार देर रात बांद्रा पुलिस थाने में FIR दर्ज करवाई है।
रिया से सोमवार को NCB ने ड्रग्स मामले 8 घंटे पूछताछ की, शाम 6 बजे NCB दफ़्तर से निकलने के बाद रिया चक्रवर्ती अपने घर ना जाकर सीधे बान्द्रा पुलिस थाने पहुंच गई।
ब्रांदा पुलिस स्टेशन में इंस्पेटर प्रमोद कुंभार ने दोनों बहनों और एक डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।
डॉ. तरुण कुमार दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कार्डियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफ्रेसर हैं और उन पर सुशांत के लिए दवाइयां उपलब्ध करवाने का आरोप है।
रिया का आरोप है कि सुशांत की बहन प्रियंका सिंह ने दिल्ली के सरकारी अस्पताल राम मनोहर लोहिया के डॉक्टर तरुण कुमार से मिली भगत कर सुशांत के लिए फर्जी प्रिस्क्रिप्शन लिखवाया।
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सुशांत सिंह राजपूत केस में नया मोड़ आ गया है. रिया की शिकायत के बाद ब्रांदा पुलिस स्टेशन ने दिवंगत अभिनेता की दो बहनों प्रियंका सिंह और मीतू सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। मामले में आरोपी रिया चक्रवर्ती जिनके ऊपर खुद गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, उन्होंने सोमवार देर रात बांद्रा पुलिस थाने में FIR दर्ज करवाई है। रिया से सोमवार को NCB ने ड्रग्स मामले आठ घंटाटे पूछताछ की, शाम छः बजे NCB दफ़्तर से निकलने के बाद रिया चक्रवर्ती अपने घर ना जाकर सीधे बान्द्रा पुलिस थाने पहुंच गई। ब्रांदा पुलिस स्टेशन में इंस्पेटर प्रमोद कुंभार ने दोनों बहनों और एक डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। डॉ. तरुण कुमार दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कार्डियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफ्रेसर हैं और उन पर सुशांत के लिए दवाइयां उपलब्ध करवाने का आरोप है। रिया का आरोप है कि सुशांत की बहन प्रियंका सिंह ने दिल्ली के सरकारी अस्पताल राम मनोहर लोहिया के डॉक्टर तरुण कुमार से मिली भगत कर सुशांत के लिए फर्जी प्रिस्क्रिप्शन लिखवाया।
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उझानी (बदायूं)। कोतवाली क्षेत्र के गांव बेनीनगला निवासी पिकअप ड्राइवर अजयवीर की संदिग्ध हालात मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर मैंथा के दो व्यापारियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या की नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली है। दोनों नामजद सगे भाई हैं। आरोप है कि नामजदों ने अजयवीर के शव को भी गायब कर दिया था।
करीब पांच महीना पुरानी घटना को लेकर मृतक अजयवीर (18) के पिता राजपाल सिंह ने बताया कि उसका बेटा मोहल्ला किलाखेड़ा निवासी मैंथा व्यापारी संजीव साहू और सुशील साहू की पिकअप पर ड्राइवर था। पिकअप से वह मैंथा ऑयल के ड्रम लोड कर बाहर पहुंचाता था। आरोप है कि 20 जून को उसने मैंथा व्यापारी के गोदाम में पिकअप खड़ी की, तभी व्यापारी दोनों भाइयों ने अजयवीर से मैंथा ऑयल के ड्रम अनलोड कराए। उसी दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज के दौरान 26 जून को अजयवीर की मौत हो गई। कोर्ट के आदेश पर दर्ज गैर इरादतन हत्या की रिपोर्ट में मृतक के पिता का कहना है कि आरोपी संजीव और सुशील साहू ने अजयवीर के शव को भी गायब कर दिया। कोर्ट में शरण लेने से पहले राजपाल ने एसएसपी से भी कार्रवाई की गुहार लगाई थी। कार्रवाई नहीं होने पर उसे कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। इधर, पुलिस ने मामले की विवेचना शुरू कर दी है।
उझानी। कोर्ट के आदेश पर ड्राइवर अजयवीर की गैर इरादतन हत्या में सगे भाई मैंथा व्यापारियों में से संजीव साहू ने घटना की हकीकत पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने बताया कि अजय उनके यहां काम करता था। पिकअप चलाते समय ही वह बेहोश हो गया था। अजय की मौत के बाद शव का अंतिम संस्कार भी राजपाल ने किया था। ऐसे में लाश गायब कर देने का भी सवाल नहीं उठता। उसकी मौत कैसे हुई, यह सभी जानते हैं लेकिन मुझे और मेरे भाई को झूठा फंसाया गया है।
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उझानी । कोतवाली क्षेत्र के गांव बेनीनगला निवासी पिकअप ड्राइवर अजयवीर की संदिग्ध हालात मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर मैंथा के दो व्यापारियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या की नामजद रिपोर्ट दर्ज कर ली है। दोनों नामजद सगे भाई हैं। आरोप है कि नामजदों ने अजयवीर के शव को भी गायब कर दिया था। करीब पांच महीना पुरानी घटना को लेकर मृतक अजयवीर के पिता राजपाल सिंह ने बताया कि उसका बेटा मोहल्ला किलाखेड़ा निवासी मैंथा व्यापारी संजीव साहू और सुशील साहू की पिकअप पर ड्राइवर था। पिकअप से वह मैंथा ऑयल के ड्रम लोड कर बाहर पहुंचाता था। आरोप है कि बीस जून को उसने मैंथा व्यापारी के गोदाम में पिकअप खड़ी की, तभी व्यापारी दोनों भाइयों ने अजयवीर से मैंथा ऑयल के ड्रम अनलोड कराए। उसी दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज के दौरान छब्बीस जून को अजयवीर की मौत हो गई। कोर्ट के आदेश पर दर्ज गैर इरादतन हत्या की रिपोर्ट में मृतक के पिता का कहना है कि आरोपी संजीव और सुशील साहू ने अजयवीर के शव को भी गायब कर दिया। कोर्ट में शरण लेने से पहले राजपाल ने एसएसपी से भी कार्रवाई की गुहार लगाई थी। कार्रवाई नहीं होने पर उसे कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। इधर, पुलिस ने मामले की विवेचना शुरू कर दी है। उझानी। कोर्ट के आदेश पर ड्राइवर अजयवीर की गैर इरादतन हत्या में सगे भाई मैंथा व्यापारियों में से संजीव साहू ने घटना की हकीकत पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने बताया कि अजय उनके यहां काम करता था। पिकअप चलाते समय ही वह बेहोश हो गया था। अजय की मौत के बाद शव का अंतिम संस्कार भी राजपाल ने किया था। ऐसे में लाश गायब कर देने का भी सवाल नहीं उठता। उसकी मौत कैसे हुई, यह सभी जानते हैं लेकिन मुझे और मेरे भाई को झूठा फंसाया गया है।
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भदोही पुलिस ने 20 लाख 50 हजार रुपए की कीमत के गुमशुदा 126 मोबाइल बरामद कर मोबाइल स्वामियों को वितरित किए हैं। अपने खोए मोबाइल पाकर लोगों के चेहरे पर खुशी नजर आई। पुलिस अधीक्षक ने पुलिस लाइन में मोबाइल मालिकों उनको मोबाइल वितरित किए हैं।
भदोही जिले के विभिन्न इलाकों के रहने वाले 126 लोगों के मोबाइल बीते कुछ महीनों में खो गए थे। लोगों ने पुलिस से इस बाबत शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद साइबर सेल टीम ने इन मोबाइलों के विभिन्न क्षेत्रों से बरामद किया है। गुरु पूर्णिमा के मौके पर पुलिस अधीक्षक ने पुलिस लाइन में सभी मोबाइल स्वामियों को बुलाकर उनके खोए हुए मोबाइल उनको वितरित किए।
पुलिस अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि जो मोबाइल विभिन्न क्षेत्रों से बरामद किए हैं उनकी 20 लाख 50 हजार रुपये है। वहीं, उन्होंने लोगों से अपील की है कि अगर किसी के मोबाइल कही गिर जाते हैं या चोरी हो जाते हैं तो वह पुलिस से इस बाबत शिकायत जरूर दर्ज कराएं जिससे पुलिस उनके मोबाइल में को खोज कर उन तक पहुंचा सके।
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भदोही पुलिस ने बीस लाख पचास हजार रुपए की कीमत के गुमशुदा एक सौ छब्बीस मोबाइल बरामद कर मोबाइल स्वामियों को वितरित किए हैं। अपने खोए मोबाइल पाकर लोगों के चेहरे पर खुशी नजर आई। पुलिस अधीक्षक ने पुलिस लाइन में मोबाइल मालिकों उनको मोबाइल वितरित किए हैं। भदोही जिले के विभिन्न इलाकों के रहने वाले एक सौ छब्बीस लोगों के मोबाइल बीते कुछ महीनों में खो गए थे। लोगों ने पुलिस से इस बाबत शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद साइबर सेल टीम ने इन मोबाइलों के विभिन्न क्षेत्रों से बरामद किया है। गुरु पूर्णिमा के मौके पर पुलिस अधीक्षक ने पुलिस लाइन में सभी मोबाइल स्वामियों को बुलाकर उनके खोए हुए मोबाइल उनको वितरित किए। पुलिस अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि जो मोबाइल विभिन्न क्षेत्रों से बरामद किए हैं उनकी बीस लाख पचास हजार रुपये है। वहीं, उन्होंने लोगों से अपील की है कि अगर किसी के मोबाइल कही गिर जाते हैं या चोरी हो जाते हैं तो वह पुलिस से इस बाबत शिकायत जरूर दर्ज कराएं जिससे पुलिस उनके मोबाइल में को खोज कर उन तक पहुंचा सके। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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नई दिल्ली (New Delhi)। नामीबिया (Namibia) और दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park - केएनपी) लाए गए चीतों (Cheetahs) का नामकरण किया गया है। चीतों को लोकप्रिय बनाने और आम लोगों के बीच इन जीवों के प्रति संवेदनशीलता की भावना पैदा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने मन की बात के दौरान इनके नामकरण के लिए लोगों से सुझाव देने के लिए कहा था। नामीबिया से लाई मादा चीता अशा का नाम आशा, सवाना का नभा, तिबलिसी का धात्री और चार शावकों को जन्म देने वाली सियाया का ज्वाला रखा गया है।
नर ओबान का नाम पवन, एल्टन का गौरव और फ्रेडी का शौर्य नाम रखा गया है। इसी तरह अफ्रीका के फिंडा गेम रिजर्व से लाई गई वयस्क मादा का नाम दक्षा, वयस्क नर में से एक का वायु व दूसरे का अग्नि नाम रखा है। मापेसु रिजर्व से लाई गई मादा को नीर्वा नाम दिया गया है। कालाहारी के स्वालू रिजर्व से लाई गई वयस्क मादा को गामिनी, अल्प वयस्क को वीरा, वयस्क नर को तेजस, अल्प वयस्क नर को सूरज नाम दिया गया है।
केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को बताया कि नाम सुझाने के लिए हुई प्रतिस्पर्धा में 11,565 लोगों ने भाग लिया। एक चयन समिति ने सुझाए गए नामों में से महत्व और प्रासंगिकता के आधार पर नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों के लिए नामों का चयन किया है। वाटरबर्ग रिजर्व से लाई गई वयस्क मादा का नाम धीरा, वयस्क नर एक का उदय, दूसरे का प्रभास व तीसरे का पावक नाम रखा गया है।
फरवरी में दक्षिण अफ्रीका से मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान लाए गए 12 चीतों को दो महीने तक क्वारंटीन बाड़ों में रखने के बाद 17 से 19 अप्रैल के दौरान कूनो के अनुकूलन बाड़ों में छोड़ा गया। दक्षिण अफ्रीका से 18 फरवरी को 7 नर और 5 मादा चीतों को लाया गया था। अनुकूलन बाड़ों में ये चीते खुद शिकार करेंगे। प्रधान मुख्य वन संरक्षक जेएस चौहान ने बताया, पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) से मंजूरी मिलने के बाद बारह चीतों को अनुकूलन बाड़ों में छोड़ दिया गया है। एक महीने तक चीतों के व्यवहार का अध्ययन किया जाएगा, इसके बाद चरणबद्ध तरीके से इन्हें खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
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नई दिल्ली । नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान लाए गए चीतों का नामकरण किया गया है। चीतों को लोकप्रिय बनाने और आम लोगों के बीच इन जीवों के प्रति संवेदनशीलता की भावना पैदा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के दौरान इनके नामकरण के लिए लोगों से सुझाव देने के लिए कहा था। नामीबिया से लाई मादा चीता अशा का नाम आशा, सवाना का नभा, तिबलिसी का धात्री और चार शावकों को जन्म देने वाली सियाया का ज्वाला रखा गया है। नर ओबान का नाम पवन, एल्टन का गौरव और फ्रेडी का शौर्य नाम रखा गया है। इसी तरह अफ्रीका के फिंडा गेम रिजर्व से लाई गई वयस्क मादा का नाम दक्षा, वयस्क नर में से एक का वायु व दूसरे का अग्नि नाम रखा है। मापेसु रिजर्व से लाई गई मादा को नीर्वा नाम दिया गया है। कालाहारी के स्वालू रिजर्व से लाई गई वयस्क मादा को गामिनी, अल्प वयस्क को वीरा, वयस्क नर को तेजस, अल्प वयस्क नर को सूरज नाम दिया गया है। केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को बताया कि नाम सुझाने के लिए हुई प्रतिस्पर्धा में ग्यारह,पाँच सौ पैंसठ लोगों ने भाग लिया। एक चयन समिति ने सुझाए गए नामों में से महत्व और प्रासंगिकता के आधार पर नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों के लिए नामों का चयन किया है। वाटरबर्ग रिजर्व से लाई गई वयस्क मादा का नाम धीरा, वयस्क नर एक का उदय, दूसरे का प्रभास व तीसरे का पावक नाम रखा गया है। फरवरी में दक्षिण अफ्रीका से मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान लाए गए बारह चीतों को दो महीने तक क्वारंटीन बाड़ों में रखने के बाद सत्रह से उन्नीस अप्रैल के दौरान कूनो के अनुकूलन बाड़ों में छोड़ा गया। दक्षिण अफ्रीका से अट्ठारह फरवरी को सात नर और पाँच मादा चीतों को लाया गया था। अनुकूलन बाड़ों में ये चीते खुद शिकार करेंगे। प्रधान मुख्य वन संरक्षक जेएस चौहान ने बताया, पशुपालन एवं डेयरी विभाग से मंजूरी मिलने के बाद बारह चीतों को अनुकूलन बाड़ों में छोड़ दिया गया है। एक महीने तक चीतों के व्यवहार का अध्ययन किया जाएगा, इसके बाद चरणबद्ध तरीके से इन्हें खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
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भारतीय रेल ने स्पष्ट कर दिया है कि 14 अप्रैल को लॉकडाउन खत्म होने के बाद ट्रेन टिकट बुकिंग को कभी स्थगित नहीं किया गया है। साथ ही रेलवे ने यह भी साफ कर दिया है कि रियायती टिकटों का लाभ फिलहाल मरीजों, छात्रों और दिव्यांगों को ही मिलेगा।
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
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भारतीय रेल ने स्पष्ट कर दिया है कि चौदह अप्रैल को लॉकडाउन खत्म होने के बाद ट्रेन टिकट बुकिंग को कभी स्थगित नहीं किया गया है। साथ ही रेलवे ने यह भी साफ कर दिया है कि रियायती टिकटों का लाभ फिलहाल मरीजों, छात्रों और दिव्यांगों को ही मिलेगा। Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
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आज के समय जहां एक ओर आदमी, आदमी पर विश्वास नहीं कर रहा है, वहीं कुत्ते की वफादारी के कई किस्से आज भी पढ़े और सुनाए जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया बिहार के भागलपुर में देखने को मिला, जहां पालतू कुत्तों ने मालिक और उनके परिवार को विषधर (कोबरा) से बचाने में अपनी जान गंवा दी। यह पूरा वाकया सीसीटीवी में कैद हो गया।
भागलपुर के साहेबगंज कॉलोनी निवासी चिकित्सक डॉ. पूनम मोसेस अपने घर में चार कुत्ते पाल रखी थीं।
सांप द्वारा कुत्ते को काट देने से चारों कुत्तों की मौत हो गई। यह सारा वाकया घर के सामने लगे एक सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गया।
डॉ़ पूनम के भाई बॉबी ने बताया कि सभी कुत्ते बचपन से ही घर में पले-बढ़े हुए थे। कुत्तों के शवों को घर की चारदीवारी में ही दफना दिया गया है।
इन कुत्तों की मौत पर पूरा घर सदमे में है, परंतु कुत्ते की वफादारी और बहादुरी की चर्चा आसपास के लोग खूब कर रहे हैं।
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आज के समय जहां एक ओर आदमी, आदमी पर विश्वास नहीं कर रहा है, वहीं कुत्ते की वफादारी के कई किस्से आज भी पढ़े और सुनाए जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया बिहार के भागलपुर में देखने को मिला, जहां पालतू कुत्तों ने मालिक और उनके परिवार को विषधर से बचाने में अपनी जान गंवा दी। यह पूरा वाकया सीसीटीवी में कैद हो गया। भागलपुर के साहेबगंज कॉलोनी निवासी चिकित्सक डॉ. पूनम मोसेस अपने घर में चार कुत्ते पाल रखी थीं। सांप द्वारा कुत्ते को काट देने से चारों कुत्तों की मौत हो गई। यह सारा वाकया घर के सामने लगे एक सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गया। डॉ़ पूनम के भाई बॉबी ने बताया कि सभी कुत्ते बचपन से ही घर में पले-बढ़े हुए थे। कुत्तों के शवों को घर की चारदीवारी में ही दफना दिया गया है। इन कुत्तों की मौत पर पूरा घर सदमे में है, परंतु कुत्ते की वफादारी और बहादुरी की चर्चा आसपास के लोग खूब कर रहे हैं।
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वैशेषिक दर्शनसे प्राप्तव्य शिक्षा
(द्रव्य) ज्ञात होते हैं एक तो भौतिक जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु अन्तर्गत हैं क्योंकि पृथ्वी ग्रग्नि बन जाती है, वायु जल बन जाता है इत्यादि परस्पर परिवर्तन देखे जाते है। इसी कारण इन चारोंमें रूप, रस, गंध, स्पर्श चारों गुरण रहते है । पर्यायभेदसे किसोमें कोई गुण व्यक्त है, कोई गुणा भव्यक्त है; किसीमें कोई गुण व्यक्त है, किसीमें कोई गुण अव्यक्त है । पदार्थ आत्मा व तीसरा प्रकाश व चौया काल। दिशा प्राकाश प्रदेशोंको संकल्पना है । मन मूर्त हैं वह भी भौतिक है। ह्रीं विशेष दृष्टिसे अनन्त गुण कर्म आदि का ज्ञान बिलकुल ठोक है।)
वैशेषिक दर्शन में द्रव्य गुण कर्म आदिके भिन्न भिन माननेकी मान्यता है । वह इस शिक्षा के लिये है कि गुण कर्म आदि भेद दृष्टि हटकर नित्य, उपादान कारणभूत मूल, तत्त्वमय द्रष्यका परिचय हो जाय, जिस परिचयके फलमें सत्य मानन्दके, साधकतम निर्विकल्पसमाधिकी प्राप्ति होती है।
प्रत्येक द्रव्य स्वतः सद् है (१), वह मनन्तशक्तिमय है (२), प्रतिसमय परिणमनशोल है ( ३ ), शक्ति, व परिणमनोंके स्वस्वलक्षणरूप भेद न करके अभेदष्टि से भी समझनेमे पाता है, (४), शक्ति व परिणमनोंके स्वस्वलक्षणरूप भेद करके भी समझने में आता है ( ५ ), वह द्रव्य शक्तियोंसे तो विकाल, तन्मय है और पर्यायकाल में पर्यायसे तन्मय है (६), एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यमें भाव ( सत्व) नहीं है तथा द्रव्यमें विवक्षित परिणमनका पूर्व व उत्तरकालमें भाव नहीं है (७) । इस तरह प्रत्येक द्रव्यमें ये सातों तत्त्व पाये जाते हैं जिन्हें क्रमशः - द्रव्य ( १ ), गुण ( २ ) , कर्म ( ३ ), सामान्य (५), विशेष, (५), समवाय, (६),
र प्रभाव (७), इन गब्दों से कहा जाता है। इनमें केवल स्वस्वलक्षण मात्र भेद है वस्तुतः भेद नही। फिर भी भेदको प्रधानता करके, इन्हें स्वतन्त्र स्वतन्त्र दिखानेका प्रयोजन बुद्धिको बाह्य पदार्थ में किसी में भी न टिकने देना है, जिससे
कि राग, द्वेष, दूर हों, किन्तु साथ ही वह ध्रुव स्वरूप भो प्रतीत होना चाहिये
जो निजसे कभी बिछुडता नहीं है, ताकि उसमें उपयोग टिक जाम । अन्यथा
न टिकने से तो उपयोग इतस्ततः भटकता हो रहेगा। यह ध्रुव निज स्वरूप
है प्रभेद चैतन्यस्वभाव ।
विशेषवाद और अद्वैतवाद दोनों परस्पर सप्प्रतिपक्ष है। फिर भी इनका समन्वय उपाय उपेय तस्वमें हो सकता है। विशेषवाद द्वारा सूक्ष्मसे सूक्ष्म तत्त्व की जानकारी करना और फिर समवायो निराश्रय द्रव्यके सव विलास जानकर अभेद द्वारसे श्रद्धं तस्वरूपकी भोर उन्मुख होना। यह शिशा इस समन्वय में प्राप्त होती है। स्माद्वादपद्धतिसे विशेषवादका उपयोग भी आत्महितसाधके है ।
१७ सांख्यदर्शन से प्राप्तव्य शिक्षायें
सांख्यदर्शन में आत्माको सर्वथा अविकारी माना है। यह सारा जो कुछ प्रन्तरङ्ग बहिरङ्ग जाल है वह सब प्रकृतिका विकार है। प्रकृति सत्त्व, रज व तम 'गुंगवाली है। प्रकृतिसे सब जाल उठता है और प्रलयकालमें सब जान्न क्रमसे एक दूसरेमे विलीन हो जाता है और अन्त में प्रकृति ही रह जाती है। प्रकृतिसे महान ( बुद्धि), उत्पन्न होता है, महानसे ग्रहंकार उत्पन्न होता है, महङ्कारसे पाँच बुद्धीन्द्रियां, गंच कर्मेन्द्रियां, पाँच तन्मात्रा अर्थात् गन्ध रस वर्णा स्पर्श शब्द तथा एक मन - इस प्रकार यह षोडशक उत्पन्न होता है और पांच तन्मात्राओंसे पाँचभूत अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व प्रकाश होता है । जब जगत्का प्रलयकाल भातां है तब पृथ्वी गन्धादिमें, जल रसादिमें, अग्नि वर्णादिमें, वायु स्पर्शादिमें, प्रकाश शब्दमें अनुप्रविष्ट हो जाता है। फिर ये पाँच तत्मात्रा, पाँच बुद्धोन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ, एक मन - इस तरह यह पोडशक महङ्कार में अन्तर्भूत होता है । अहङ्ककार महान में मन्तभूत होता है, महान् प्रकृतिमें अन्तर्भूत हो जाता है। इस प्रकार प्रलय होनेपर प्रकृति व पुरुष (प्रात्मा ) ये दो तत्त्व रह जाते हैं। फिर संमय पाकर रचना- विकार होने लगता है। यहां विशेष यह कहा गया है कि प्रकृति तो इन जालोंको करती है और इन जालोंका फल अथवा विषय पुरुष (आत्मा) के द्वारा भोगा जाता है। इस भोग के मिटा देनेका नाम मुक्ति है । पुरुष तो मात्र चैतन्य स्वरूप है और वह चैतन्य ज्ञानसे रहित है ।
उक्त दर्शन में तथ्य क्या है ? यह बात तो इष्टियोंको विशेष विशदता करके
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वैशेषिक दर्शनसे प्राप्तव्य शिक्षा ज्ञात होते हैं एक तो भौतिक जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु अन्तर्गत हैं क्योंकि पृथ्वी ग्रग्नि बन जाती है, वायु जल बन जाता है इत्यादि परस्पर परिवर्तन देखे जाते है। इसी कारण इन चारोंमें रूप, रस, गंध, स्पर्श चारों गुरण रहते है । पर्यायभेदसे किसोमें कोई गुण व्यक्त है, कोई गुणा भव्यक्त है; किसीमें कोई गुण व्यक्त है, किसीमें कोई गुण अव्यक्त है । पदार्थ आत्मा व तीसरा प्रकाश व चौया काल। दिशा प्राकाश प्रदेशोंको संकल्पना है । मन मूर्त हैं वह भी भौतिक है। ह्रीं विशेष दृष्टिसे अनन्त गुण कर्म आदि का ज्ञान बिलकुल ठोक है।) वैशेषिक दर्शन में द्रव्य गुण कर्म आदिके भिन्न भिन माननेकी मान्यता है । वह इस शिक्षा के लिये है कि गुण कर्म आदि भेद दृष्टि हटकर नित्य, उपादान कारणभूत मूल, तत्त्वमय द्रष्यका परिचय हो जाय, जिस परिचयके फलमें सत्य मानन्दके, साधकतम निर्विकल्पसमाधिकी प्राप्ति होती है। प्रत्येक द्रव्य स्वतः सद् है , वह मनन्तशक्तिमय है , प्रतिसमय परिणमनशोल है , शक्ति, व परिणमनोंके स्वस्वलक्षणरूप भेद न करके अभेदष्टि से भी समझनेमे पाता है, , शक्ति व परिणमनोंके स्वस्वलक्षणरूप भेद करके भी समझने में आता है , वह द्रव्य शक्तियोंसे तो विकाल, तन्मय है और पर्यायकाल में पर्यायसे तन्मय है , एक द्रव्यका दूसरे द्रव्यमें भाव नहीं है तथा द्रव्यमें विवक्षित परिणमनका पूर्व व उत्तरकालमें भाव नहीं है । इस तरह प्रत्येक द्रव्यमें ये सातों तत्त्व पाये जाते हैं जिन्हें क्रमशः - द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य , विशेष, , समवाय, , र प्रभाव , इन गब्दों से कहा जाता है। इनमें केवल स्वस्वलक्षण मात्र भेद है वस्तुतः भेद नही। फिर भी भेदको प्रधानता करके, इन्हें स्वतन्त्र स्वतन्त्र दिखानेका प्रयोजन बुद्धिको बाह्य पदार्थ में किसी में भी न टिकने देना है, जिससे कि राग, द्वेष, दूर हों, किन्तु साथ ही वह ध्रुव स्वरूप भो प्रतीत होना चाहिये जो निजसे कभी बिछुडता नहीं है, ताकि उसमें उपयोग टिक जाम । अन्यथा न टिकने से तो उपयोग इतस्ततः भटकता हो रहेगा। यह ध्रुव निज स्वरूप है प्रभेद चैतन्यस्वभाव । विशेषवाद और अद्वैतवाद दोनों परस्पर सप्प्रतिपक्ष है। फिर भी इनका समन्वय उपाय उपेय तस्वमें हो सकता है। विशेषवाद द्वारा सूक्ष्मसे सूक्ष्म तत्त्व की जानकारी करना और फिर समवायो निराश्रय द्रव्यके सव विलास जानकर अभेद द्वारसे श्रद्धं तस्वरूपकी भोर उन्मुख होना। यह शिशा इस समन्वय में प्राप्त होती है। स्माद्वादपद्धतिसे विशेषवादका उपयोग भी आत्महितसाधके है । सत्रह सांख्यदर्शन से प्राप्तव्य शिक्षायें सांख्यदर्शन में आत्माको सर्वथा अविकारी माना है। यह सारा जो कुछ प्रन्तरङ्ग बहिरङ्ग जाल है वह सब प्रकृतिका विकार है। प्रकृति सत्त्व, रज व तम 'गुंगवाली है। प्रकृतिसे सब जाल उठता है और प्रलयकालमें सब जान्न क्रमसे एक दूसरेमे विलीन हो जाता है और अन्त में प्रकृति ही रह जाती है। प्रकृतिसे महान , उत्पन्न होता है, महानसे ग्रहंकार उत्पन्न होता है, महङ्कारसे पाँच बुद्धीन्द्रियां, गंच कर्मेन्द्रियां, पाँच तन्मात्रा अर्थात् गन्ध रस वर्णा स्पर्श शब्द तथा एक मन - इस प्रकार यह षोडशक उत्पन्न होता है और पांच तन्मात्राओंसे पाँचभूत अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व प्रकाश होता है । जब जगत्का प्रलयकाल भातां है तब पृथ्वी गन्धादिमें, जल रसादिमें, अग्नि वर्णादिमें, वायु स्पर्शादिमें, प्रकाश शब्दमें अनुप्रविष्ट हो जाता है। फिर ये पाँच तत्मात्रा, पाँच बुद्धोन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ, एक मन - इस तरह यह पोडशक महङ्कार में अन्तर्भूत होता है । अहङ्ककार महान में मन्तभूत होता है, महान् प्रकृतिमें अन्तर्भूत हो जाता है। इस प्रकार प्रलय होनेपर प्रकृति व पुरुष ये दो तत्त्व रह जाते हैं। फिर संमय पाकर रचना- विकार होने लगता है। यहां विशेष यह कहा गया है कि प्रकृति तो इन जालोंको करती है और इन जालोंका फल अथवा विषय पुरुष के द्वारा भोगा जाता है। इस भोग के मिटा देनेका नाम मुक्ति है । पुरुष तो मात्र चैतन्य स्वरूप है और वह चैतन्य ज्ञानसे रहित है । उक्त दर्शन में तथ्य क्या है ? यह बात तो इष्टियोंको विशेष विशदता करके
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आज हम आपको बताने जा रहे हैं दुनिया के कुछ ऐसे बाजार के बारे में जो तैरने के लिए जाने जाते है। जी हाँ,ये सच है ऐसे भी बाजार हैं जो पानी पर तैरते हैं। इन्हें फ्लोटिंग मार्केट भी कहा जाता है। जिन्हें 'सोम बाजार' भी कहा जाता है। दरअसल, ये बाजार नावो में लगाए जाते हैं। नाव पर ही दुकानदार और कस्टमर सवार होते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही बाज़ारों के बारे में बताने जा रहे है। हम बताएँगे एशिया के 5 ऐसे ही बाजार जो पानी पर तैरते हैं जिनमे में एक बाजार भारत में भी है।
1. Damnoen Saduak Floating Market - थाईलैंड में ऐसे कई मार्केट हैं ,जिनमे से सबसे ख़ास है ये।
2. Can Thao City, Vietnam - Can Thao City से 3 मील की दूरी पर मेकोंग डेल्टा पर एक बहुत बड़ा फ़्लोटिंग मार्केट लगता है।
3. Banjarmasin Floating Market, Indonesia - ये बाज़ार बरितो नदी पर लगता है। जो कि इंडोनेशिया का बहुत ही फेमस मार्किट है।
4. Aberdeen Floating Village, Hong Kong - यहाँ नाव पर बाजार तो लगते ही है साथ में यहाँ नाव पर बहुत से निवास भी करते हैं।
5. Srinagar Floating Market, India - भारत का ये बाजार लगता है श्री नगर की डल झील के ऊपर।
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आज हम आपको बताने जा रहे हैं दुनिया के कुछ ऐसे बाजार के बारे में जो तैरने के लिए जाने जाते है। जी हाँ,ये सच है ऐसे भी बाजार हैं जो पानी पर तैरते हैं। इन्हें फ्लोटिंग मार्केट भी कहा जाता है। जिन्हें 'सोम बाजार' भी कहा जाता है। दरअसल, ये बाजार नावो में लगाए जाते हैं। नाव पर ही दुकानदार और कस्टमर सवार होते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही बाज़ारों के बारे में बताने जा रहे है। हम बताएँगे एशिया के पाँच ऐसे ही बाजार जो पानी पर तैरते हैं जिनमे में एक बाजार भारत में भी है। एक. Damnoen Saduak Floating Market - थाईलैंड में ऐसे कई मार्केट हैं ,जिनमे से सबसे ख़ास है ये। दो. Can Thao City, Vietnam - Can Thao City से तीन मील की दूरी पर मेकोंग डेल्टा पर एक बहुत बड़ा फ़्लोटिंग मार्केट लगता है। तीन. Banjarmasin Floating Market, Indonesia - ये बाज़ार बरितो नदी पर लगता है। जो कि इंडोनेशिया का बहुत ही फेमस मार्किट है। चार. Aberdeen Floating Village, Hong Kong - यहाँ नाव पर बाजार तो लगते ही है साथ में यहाँ नाव पर बहुत से निवास भी करते हैं। पाँच. Srinagar Floating Market, India - भारत का ये बाजार लगता है श्री नगर की डल झील के ऊपर।
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Astro Tips : हिंदू धर्म में किसी भी देवी, देवता की पूजा करने के लिए कुछ नियम बताए गए हैं। ये नियम ईश्वर की साधना को सफल बनाने और हर मनोकामना को पूरी करने का आशीर्वाद पाने के लिए जरूरी माना गया है। जो भी इन नियमों को नहीं मानता है, उन्हें सालों साल पूजा करने के बाद भी फल नहीं प्राप्त होता है। पूजा से जुड़े नियमों को अनदेखा करने पर न सिर्फ मनोकामनाएं अधूरी रह जाती है बल्कि गलत तरीके से पूजा करने का दोष भी लगता है। यदि आपको भी ऐसा लगता है कि आपके द्वारा की जाने वाली पूजा का पूरा फल नहीं मिल रहा है तो आपको भी कुछ खास नियमों का पालन करना चाहिए।
- वास्तु के अनुसार किसी भी देवी-देवता की पूजा करते समय भूलकर भी दीपक और जल का कलश एक साथ या फिर आस-पास नहीं रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार पूजा के प्रयोग में लाए जाने वाले जल के कलश या पात्र को हमेशा उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण की ओर और देवी देवताओं के लिए जलाए जाने वाले दीपक को हमेशा दक्षिण यानी आग्नेय कोण की ओर रखना चाहिए।
- ईश्वर की पूजा करते समय कभी भी प्रयोग में लाए गए या फिर बासी फूल नहीं चढ़ाना चाहिए। देवी-देवताओं को हमेशा खिले हुए फूल चढ़ाने चाहिए। इसी प्रकार कभी भी किसी देवता की पूजा में उन पुष्पों को बिल्कुल भी नहीं चढ़ाना चाहिए जो निषेध माने गए हों।
- हिंदू धर्म में किसी भी देवी-देवता के लिए की जाने वाली पूजा में आसन का भी काफी महत्व होता है। ईश्वर की पूजा में हमेशा देवी-देवता या नवग्रह विशेष से जुड़े रंग का आसन प्रयोग में लाना चाहिए। माना जाता है कि बगैर आसन के जमीन पर बैठकर पूजा करने वालो को पूजा का फल नहीं मिलता है। इसी प्रकार नंगे सिर भी पूजा नहीं करनी चाहिए।
- भगवान के लिए की जाने वाली पूजा का कभी भी अभिमान या यशोगान नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि देवी-देवताओं की पूजा में प्रयोग की जाने वाली चीजों का अभिमान और उसका प्रदर्शन करने पर उसका फल नहीं मिलता है। ईश्वर की साधना हमेशा एकांत में और शुद्ध मन के साथ करना चाहिए।
- भगवान की साधना का सबसे जरूरी नियम है कि हमेशा शांत और शुद्ध मन के साथ पूजा करना चाहिए। ईश्वर की पूजा करते समय न तो इधर-उधर की बातों की ओर मन ले जाना चाहिए न ही किसी पर क्रोध करना चाहिए। माना जाता है कि ईश्वर की पूजा करते समय मन में गलत भाव लाने पर उसका फल नहीं मिलता है।
'इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी। '
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Astro Tips : हिंदू धर्म में किसी भी देवी, देवता की पूजा करने के लिए कुछ नियम बताए गए हैं। ये नियम ईश्वर की साधना को सफल बनाने और हर मनोकामना को पूरी करने का आशीर्वाद पाने के लिए जरूरी माना गया है। जो भी इन नियमों को नहीं मानता है, उन्हें सालों साल पूजा करने के बाद भी फल नहीं प्राप्त होता है। पूजा से जुड़े नियमों को अनदेखा करने पर न सिर्फ मनोकामनाएं अधूरी रह जाती है बल्कि गलत तरीके से पूजा करने का दोष भी लगता है। यदि आपको भी ऐसा लगता है कि आपके द्वारा की जाने वाली पूजा का पूरा फल नहीं मिल रहा है तो आपको भी कुछ खास नियमों का पालन करना चाहिए। - वास्तु के अनुसार किसी भी देवी-देवता की पूजा करते समय भूलकर भी दीपक और जल का कलश एक साथ या फिर आस-पास नहीं रखना चाहिए। वास्तु के अनुसार पूजा के प्रयोग में लाए जाने वाले जल के कलश या पात्र को हमेशा उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण की ओर और देवी देवताओं के लिए जलाए जाने वाले दीपक को हमेशा दक्षिण यानी आग्नेय कोण की ओर रखना चाहिए। - ईश्वर की पूजा करते समय कभी भी प्रयोग में लाए गए या फिर बासी फूल नहीं चढ़ाना चाहिए। देवी-देवताओं को हमेशा खिले हुए फूल चढ़ाने चाहिए। इसी प्रकार कभी भी किसी देवता की पूजा में उन पुष्पों को बिल्कुल भी नहीं चढ़ाना चाहिए जो निषेध माने गए हों। - हिंदू धर्म में किसी भी देवी-देवता के लिए की जाने वाली पूजा में आसन का भी काफी महत्व होता है। ईश्वर की पूजा में हमेशा देवी-देवता या नवग्रह विशेष से जुड़े रंग का आसन प्रयोग में लाना चाहिए। माना जाता है कि बगैर आसन के जमीन पर बैठकर पूजा करने वालो को पूजा का फल नहीं मिलता है। इसी प्रकार नंगे सिर भी पूजा नहीं करनी चाहिए। - भगवान के लिए की जाने वाली पूजा का कभी भी अभिमान या यशोगान नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि देवी-देवताओं की पूजा में प्रयोग की जाने वाली चीजों का अभिमान और उसका प्रदर्शन करने पर उसका फल नहीं मिलता है। ईश्वर की साधना हमेशा एकांत में और शुद्ध मन के साथ करना चाहिए। - भगवान की साधना का सबसे जरूरी नियम है कि हमेशा शांत और शुद्ध मन के साथ पूजा करना चाहिए। ईश्वर की पूजा करते समय न तो इधर-उधर की बातों की ओर मन ले जाना चाहिए न ही किसी पर क्रोध करना चाहिए। माना जाता है कि ईश्वर की पूजा करते समय मन में गलत भाव लाने पर उसका फल नहीं मिलता है। 'इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी। '
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हो किसी को डराता है। कभी कृतघ्न्न नहीं होता। सत्य चानता है। लोभ से दूर रह कर सन्तोष को धारण करता धर्य का अभिमान नहीं करता और न हो निर्धनता से वा है। उसका हृदय साहस और लग्न से सुशोभित होता है। से मुँह नहीं मोड़ता। सांसारिक सुख से घृणा करता है - संयम की शरण लेता है।
इस प्रकार सचा मनुष्य वही बन सकता है जो धर्म के इस्य को समझ ले । धर्म वही है जो जैन श्रावक के १२ तो में दर्ज है। निस्सन्देह ये १२ प्रत एक जैन धर्मानुयायी के लिये नियत किये गए हैं, परन्तु सत्य यह है कि ये व्रत प्रत्येक मनुष्य को सघा मनुष्य बनाने वाले हैं। जो इन्हें धारण करेगा, वह मनुष्यत्व के गुणों से भरपूर हो जावेगा।
स्वर्गीय श्री खज्ञान चन्द जी महाराज लगातार पूरे ४२ " वर्ष तक इसी प्रयत्न में लगे रहे कि जैन धर्म के अनुपायो सचे जैन अर्थात् सखे मनुष्य बन जावें । वे अपने कर्तव्य " को समझें और उसे पालन करने का पूर्ण प्रयत्न करें। जिस के फलस्वरूप इन के जीवन में प्रकाश और सौन्दर्य का सम्मिश्रण
जिस से वे अपने धर्म और पूर्वजों के नाम को रोशन करें। । हाराज श्री को इस पवित्र उद्देश्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई जिस का विवरण मागे किया जावेगा । क्या हो अच्छा हो कि हम भी उपरोक्त बारह प्रतों को धारण करके अपने जीवन को सफल बना सकें ताकि अन्तिम समय पश्चाताप न करना पड़े।
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हो किसी को डराता है। कभी कृतघ्न्न नहीं होता। सत्य चानता है। लोभ से दूर रह कर सन्तोष को धारण करता धर्य का अभिमान नहीं करता और न हो निर्धनता से वा है। उसका हृदय साहस और लग्न से सुशोभित होता है। से मुँह नहीं मोड़ता। सांसारिक सुख से घृणा करता है - संयम की शरण लेता है। इस प्रकार सचा मनुष्य वही बन सकता है जो धर्म के इस्य को समझ ले । धर्म वही है जो जैन श्रावक के बारह तो में दर्ज है। निस्सन्देह ये बारह प्रत एक जैन धर्मानुयायी के लिये नियत किये गए हैं, परन्तु सत्य यह है कि ये व्रत प्रत्येक मनुष्य को सघा मनुष्य बनाने वाले हैं। जो इन्हें धारण करेगा, वह मनुष्यत्व के गुणों से भरपूर हो जावेगा। स्वर्गीय श्री खज्ञान चन्द जी महाराज लगातार पूरे बयालीस " वर्ष तक इसी प्रयत्न में लगे रहे कि जैन धर्म के अनुपायो सचे जैन अर्थात् सखे मनुष्य बन जावें । वे अपने कर्तव्य " को समझें और उसे पालन करने का पूर्ण प्रयत्न करें। जिस के फलस्वरूप इन के जीवन में प्रकाश और सौन्दर्य का सम्मिश्रण जिस से वे अपने धर्म और पूर्वजों के नाम को रोशन करें। । हाराज श्री को इस पवित्र उद्देश्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई जिस का विवरण मागे किया जावेगा । क्या हो अच्छा हो कि हम भी उपरोक्त बारह प्रतों को धारण करके अपने जीवन को सफल बना सकें ताकि अन्तिम समय पश्चाताप न करना पड़े।
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द्वितीय अंक में भी इस प्रकार के सहसा की कमी नहीं है । अवन्ती के दुर्ग में बन्धुवमा, के भीमवर्मा और जयमाला के बीच देवसेना सहसा ही आ जाती है और आते ही बकने लगती है, मानो किसी कोने में छिपी हुई वह बात सुन रही हो और उत्तर देने को प्रस्तुत हो । अगले दृश्य में मातृगुप्त, मुद्गल और गोविन्दगुप्त का पथ में सहसा ही आगमन होता है । इस प्रकार के अन्य अनेक सहसा की चर्चा अनपेक्षित है ।
चमत्कार का दूसरा उदाहरण इस नाटक में हम उस स्थल पर पाते हैं, जहाँ विजया के शव के लिए भूमि खोदते हुए भटार्क को रत्नगृह मिलता है ।
प्रसाद जी का स्वगत के प्रति भी कम मोह नहीं है, यद्यपि स्वगत के दोषो से वे अपरिचित नहीं हैं। स्वयं उन्होंने विशाख में उसका मजाक भी उड़ाया है। इस नाटक में अपेक्षाकृत स्वगत कम है तथापि विजया, देवसेना, भटार्क, मुद्गल आदि से अनेक स्थलों पर स्वगत वचन कहलाये हैं । थोड़े ही श्रम से इन स्वगतों से मुक्ति मिल सकती थी । इनमें कोई भी ऐसा स्वगत नहीं है जो मानसिक संघर्ष को व्यक्त करता हो और जिसके अव्यक्त रहने पर कथावस्तु के विकास में बाधा पड़ती हो । ये स्वगत कहीं-कहीं काफी लम्बे और भाषण के समान हैं ।
गीतों के प्रति भी प्रसाद जी ने समय का ध्यान नहीं रखा है। अनेक गीत काफी लम्बे हैं । रणक्षेत्र के प्रयाण गीत प्रायः अत्यन्त छोटे हुआ करते हैं, किन्तु रणक्षेत्र में मातृगुप्त का गान बहुत ही लम्बा-चौड़ा है और खटकनेवाला है। इसी प्रकार पंचम अंक के द्वितीय दृश्य का विजया का गीत भी खटकता है ।
की दृष्टि से नाटक तीन स्वतन्त्र समस्याओं को लेकर खड़ा किया गया है । ये समस्याएँ स्कन्दगुप्त के सम्मुख विदेशी आक्रमण, गृह कलह और प्रेम के अन्तर्द्वन्द्व की हैं । इनमें प्रथम दो समस्याएं ऐतिहासिक हैं और तीसरी नाटककार की कल्पना प्रसूत । नाटककारों और कथाकारों की यह धारणा रही है कि बिना रोमांस (प्रेम-चर्चा) के कथा सजीव नहीं हो सकती व रोमांसविहीन कथानक का कोई महत्त्व नहीं है । सम्भवतः इसीलिए नाटककार ने यह आवश्यक समझा कि स्कन्दगुप्त के जीवन को लेकर इसकी भी चर्चा की जाय । इस कार्य में वे कितने सफल हुए हैं इसका विवेचन हम आगे चल कर करेंगे । यहाँ इतना ही कहा जा सकता है कि यदि रोमांस के इस अंश को नाटक से अलग कर दिया जाय तो भी नाटक के मूल कथानक पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता और न स्कन्दगुप्त के चरित्र के निखार में ही किसी प्रकार की कमी आती है, वरन् स्कन्दगुप्त के अस्त यस्त जीवन में इस प्रकार की चर्चा, एक प्रकार से उसके जीवन का उपहास करती सी जान पड़ती है ।
नाटक में उपस्थित की गयी इन तीन समस्याओं की दृष्टि से यदि कथावस्तु का विश्लेषण किया जाय तो उसे हम अलग-अलग इस प्रकार रख सकते हैं ।
विदेशी आक्रमण
गुप्त साम्राज्य के विरुद्ध पुष्यमित्रों के आक्रमण को रोकने में प्रयत्नशील स्कन्दगुप्त नाटक में हमारे सामने आता है और उनके पराजित करने में वह सफल होता है । पुष्यमित्र विजय का अन्तिम प्रयत्न करते हुए आगे बढ़ते हैं और नासीर के सेनानायक की ओर से सहायता की माँग आती है । दशपुर से भी आता है और सूचना मिलती है कि महाराज विश्ववर्मा का निधन हो गया । शक - राष्ट्रमंडल चंचल हो रहा है । नवागत म्लेच्छवाहिनी से सौराष्ट्र पदाक्रान्त हो चुका है और पश्चिमी मालव भी अब सुरक्षित नहीं हैं । बर्बर हूणों से वलभी का बचना भी कठिन है। इन समस्याओं के बीच घिरा हुआ स्कन्दगुप्त मालव की रक्षा का निश्चय करता है और चक्रपालित को आदेश देता है 'पुष्यमित्र युद्ध में विजयी होने के बाद मालव में प्राकर मिलो' । मालव पर शक और हूणों की सेना आक्रमण करती है और स्कन्दगुप्त समय पर पहुँच कर शत्रुओं को पराजित कर देता है । आगे, गान्धार की घाटी के रणक्षेत्र में स्कन्दगुप्त हूणों को पराजित करने के लिए प्रस्तुत है । चर कर उसे सूचना देता है कि 'हूण शीघ्र ही नदी के पार होकर प्रतीक्षा कर रहे हैं और यदि आक्रमण न हुआ तो वे स्वयं प्राक्रमण करेंगे। कुभा के रणक्षेत्र में मगध की सेना का हूणों से सन्धि होने के कारण परिस्थिति कुछ कठिन-सी है । गान्धार के क्षेत्र में हूणों का आक्रमण होता है और महाराज बन्धुवर्मा मारे जाते हैं । कुभा के रणक्षेत्र में स्कन्दगुप्त भटार्क को आदेश देता है और विश्वास के प्रमाणस्वरूप कहता है कि -- 'यदि शत्रु की दूसरी सेना कुभा को पार करना चाहे तो उसे काट देना ।' युद्ध में हूण पराजित होते हैं और कुभा के उस पार उतर जाना चाहते हैं और मगध सेना कुछ नहीं करती । भटार्क बांध तोड़ देता है और कुभा में अकस्मात् जल बढ़ जाता है और सब लोग बहते दिखाई देते हैं । युद्ध की इस असफलता के बाद तक्षशिला में कनिष्क स्तूप के आस-पास स्कन्दगुप्त विचित्र अवस्था में घूमता हुआ दिखाई देता है । यहीं परिस्थितिवश बिखरे हुए साथी एकत्र होते हैं और हूण सेना के साथ युद्ध होता है और वे पराजित होते हैं । बस इतना ही ।
विदेशी आक्रमण द्वारा गुप्त साम्राज्य पर आयी हुई विपत्ति का चित्रण कुल मिला कर छः दृश्यों में किया गया है । ये दृश्य हैं : प्रथम अंक में प्रथम और सप्तम दृश्य, तृतीय अंक में पाँचवाँ और छठा दृश्य, चतुर्थ अंक में दृश्य सात और पंचम अंक में दृश्य पाँच ।
कथावस्तु के इस भाग की सारी घटनाएँ स्कन्दगुप्त में केन्द्रित हैं, किन्तु नाटक में कहीं भी स्कन्दगुप्त में वह सक्रियता नहीं दिखाई पड़ती, जो विदेशियों को देश से बाहर करने के लिए अपेक्षित है । पुष्यमित्रों से युद्ध का हमें संकेतमात्र मिलता है। उसमें स्कन्दगुप्त का क्या हाथ रहा, यह हमें ज्ञात नहीं होता । उनके साथ हुए अन्तिम युद्ध को वह स्वयं नहीं करता वरन् चऋपालित पर छोड़ कर मालव चला जाता है । वहाँ उसे हम युद्ध में निस्सन्देह विजयी होते देखते हैं, किन्तु उसके पश्चात् गान्धार और कुभा के युद्ध में हम स्कन्दगुप्त को निष्क्रिय ही पाते हैं। गान्धार के रणक्षेत्र में बन्धुवर्मा की प्रधानता है । कुभा के रणक्षेत्र में स्कन्दगुप्त कुछ दिखाई पड़ता है पर वहाँ भी वह भेंटार्क पर निर्भर करता है और उसके विश्वासघात के फलस्वरूप उसकी विजय पराजय का रूप ले लेती है । इस पराजय के बाद भी स्कन्दगुप्त का अकर्मण्य रूप ही सामने आता है । वह स्वयं सेना संगठन
का प्रयत्न नहीं करता, देवसेना द्वारा दी गयी ललकार ही उसे चेतन बनाती है । देवसेना ही उसके सब साथियों को एकत्र करती है और तब स्कन्दगुप्त हूणों से युद्ध करता है । इस प्रकार नाटक में स्कन्दगुप्त के सम्मुख प्रस्तुत तीन समस्याओं में प्रथम समस्या के निराकरण में स्कन्दगुप्त निष्क्रिय है । यदि चेतना कुछ हो भी तो वह दिखाई नहीं देती । गृह कलह
अब यदि कथावस्तु के दूसरे भाग को देखें तो यह अंश उसके साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखता हुआ भी उसके निकट नहीं जान पड़ता । ऐसा लगता है कि वह एकदम स्वतन्त्र हो । कम से कम स्कन्दगुप्त तो उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने में सहायक नहीं है । कथावस्तु के इस भाग में स्कन्दगुप्त वस्तुतः बहुत कम ही आया है, जहाँ आया भी है वहाँ उसकी उपस्थिति दोनों घटनाओं को एक सूत्र में आबद्ध करने में सहायक नहीं होती। दोनों को बाँधने वाला पात्र वस्तुतः भटार्क है ।
कथावस्तु की दूसरी समस्या का सम्बन्ध अनन्तदेवी के उस कुचक्र से है जो वह अपने बेटे पुरगुप्त को, स्कन्दगुप्त के विरुद्ध, राज्य दिलाने के निमित्त करती है । इसका आभास यद्यपि प्रथम दृश्य में मिलता है किन्तु वह प्रकट जाकर चतुर्थ दृश्य में होता है । जया और अनन्तदेवी की बातचीत से प्रभास मिलता है कि अनन्तदेवी कुछ ऐसा कार्य करने जा रही है जो साधारण है। वह अपने नियति के पथ पर अपने प्राप चलना चाहती है । वह अपनी पत्नी देवकीके प्रभाव को उग्रता के साथ बढ़ते हुए देख कर अपने पुत्र पुरगुप्त के प्रति सशंक हो उठती है । वह समझती है कि सम्राट् की मति एक-सी नहीं रहती, वे अव्यवस्थित और चंचल हैं । वह भटार्क को भावी का संकेत इस प्रकार देती है'राजधानी में प्रानन्द विलास हो रहा है औौर पारसीक मदिरा की धारा बह रही है । इनके स्थान पर रक्त की धारा बहेगी। आज तुम कालागुरु के गन्धधूम्र से सन्तुष्ट हो रहे हो, कल इन उच्च शौर्य मन्दिरोंमें महापिशाची की विप्लव ज्वाला धधकेगी । उस चिर्याधंध की उत्कट गन्ध असह्य होगी ।
अनन्तदेवी का सहायक प्रपंचबुद्धि है और वह उसकी सहायता से भाद्र की अमावस्या को कुछ कार्य करने का निश्चय करती है और भटार्क भी उसमें सहायक होने को प्रतिश्रुत होता है। अगले दृश्य में प्रकट होता है कि महादेवी देवकी के प्राण संकट में हैं और परमभट्टारक महाराज कुमारगुप्त का निधन हो गया है, किन्तु भटार्क आदि इस बात को प्रकट होने देना नहीं चाहते । कुमारामात्य पृथ्वीसेन, महादंडनायक और महाप्रतिहार कुमारगुप्त को देखने भीतर जाना चाहते हैं किन्तु भटार्क द्वारा नियुक्त नायक उन्हें जाने से रोकता है । वे तीनों नायक के विरुद्ध खड्गहस्त होते हैं । इतने में पुरगुप्त और भटार्क आते हैं। भटार्क अभिवादन करता हुआ कहता है-- 'परमभट्टारक महाराजाधिराज पुरगुप्त की जय हो ! माननीय कुमारामात्य, महादंडनायक और महाप्रतिहार साम्राज्यके नियमानुसार शस्त्र अर्पण करके परमभट्टारक का अभिनन्दन कीजिए।' तीनों वाक् हो जाते हैं । जब उन्हें पता लगता है कि महाराज कुमारगुप्त गत हो गये, तो वे उत्तराधिकारी स्कन्दगुप्त की बात करते हैं । इस पर पुरगुप्त उन्हें डाँट देता है --- 'तुम लोगों को बैठ कर व्यवस्था नहीं देनी होगी। उत्तराधिकार का निर्णय स्वयं स्वर्गीय
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द्वितीय अंक में भी इस प्रकार के सहसा की कमी नहीं है । अवन्ती के दुर्ग में बन्धुवमा, के भीमवर्मा और जयमाला के बीच देवसेना सहसा ही आ जाती है और आते ही बकने लगती है, मानो किसी कोने में छिपी हुई वह बात सुन रही हो और उत्तर देने को प्रस्तुत हो । अगले दृश्य में मातृगुप्त, मुद्गल और गोविन्दगुप्त का पथ में सहसा ही आगमन होता है । इस प्रकार के अन्य अनेक सहसा की चर्चा अनपेक्षित है । चमत्कार का दूसरा उदाहरण इस नाटक में हम उस स्थल पर पाते हैं, जहाँ विजया के शव के लिए भूमि खोदते हुए भटार्क को रत्नगृह मिलता है । प्रसाद जी का स्वगत के प्रति भी कम मोह नहीं है, यद्यपि स्वगत के दोषो से वे अपरिचित नहीं हैं। स्वयं उन्होंने विशाख में उसका मजाक भी उड़ाया है। इस नाटक में अपेक्षाकृत स्वगत कम है तथापि विजया, देवसेना, भटार्क, मुद्गल आदि से अनेक स्थलों पर स्वगत वचन कहलाये हैं । थोड़े ही श्रम से इन स्वगतों से मुक्ति मिल सकती थी । इनमें कोई भी ऐसा स्वगत नहीं है जो मानसिक संघर्ष को व्यक्त करता हो और जिसके अव्यक्त रहने पर कथावस्तु के विकास में बाधा पड़ती हो । ये स्वगत कहीं-कहीं काफी लम्बे और भाषण के समान हैं । गीतों के प्रति भी प्रसाद जी ने समय का ध्यान नहीं रखा है। अनेक गीत काफी लम्बे हैं । रणक्षेत्र के प्रयाण गीत प्रायः अत्यन्त छोटे हुआ करते हैं, किन्तु रणक्षेत्र में मातृगुप्त का गान बहुत ही लम्बा-चौड़ा है और खटकनेवाला है। इसी प्रकार पंचम अंक के द्वितीय दृश्य का विजया का गीत भी खटकता है । की दृष्टि से नाटक तीन स्वतन्त्र समस्याओं को लेकर खड़ा किया गया है । ये समस्याएँ स्कन्दगुप्त के सम्मुख विदेशी आक्रमण, गृह कलह और प्रेम के अन्तर्द्वन्द्व की हैं । इनमें प्रथम दो समस्याएं ऐतिहासिक हैं और तीसरी नाटककार की कल्पना प्रसूत । नाटककारों और कथाकारों की यह धारणा रही है कि बिना रोमांस के कथा सजीव नहीं हो सकती व रोमांसविहीन कथानक का कोई महत्त्व नहीं है । सम्भवतः इसीलिए नाटककार ने यह आवश्यक समझा कि स्कन्दगुप्त के जीवन को लेकर इसकी भी चर्चा की जाय । इस कार्य में वे कितने सफल हुए हैं इसका विवेचन हम आगे चल कर करेंगे । यहाँ इतना ही कहा जा सकता है कि यदि रोमांस के इस अंश को नाटक से अलग कर दिया जाय तो भी नाटक के मूल कथानक पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता और न स्कन्दगुप्त के चरित्र के निखार में ही किसी प्रकार की कमी आती है, वरन् स्कन्दगुप्त के अस्त यस्त जीवन में इस प्रकार की चर्चा, एक प्रकार से उसके जीवन का उपहास करती सी जान पड़ती है । नाटक में उपस्थित की गयी इन तीन समस्याओं की दृष्टि से यदि कथावस्तु का विश्लेषण किया जाय तो उसे हम अलग-अलग इस प्रकार रख सकते हैं । विदेशी आक्रमण गुप्त साम्राज्य के विरुद्ध पुष्यमित्रों के आक्रमण को रोकने में प्रयत्नशील स्कन्दगुप्त नाटक में हमारे सामने आता है और उनके पराजित करने में वह सफल होता है । पुष्यमित्र विजय का अन्तिम प्रयत्न करते हुए आगे बढ़ते हैं और नासीर के सेनानायक की ओर से सहायता की माँग आती है । दशपुर से भी आता है और सूचना मिलती है कि महाराज विश्ववर्मा का निधन हो गया । शक - राष्ट्रमंडल चंचल हो रहा है । नवागत म्लेच्छवाहिनी से सौराष्ट्र पदाक्रान्त हो चुका है और पश्चिमी मालव भी अब सुरक्षित नहीं हैं । बर्बर हूणों से वलभी का बचना भी कठिन है। इन समस्याओं के बीच घिरा हुआ स्कन्दगुप्त मालव की रक्षा का निश्चय करता है और चक्रपालित को आदेश देता है 'पुष्यमित्र युद्ध में विजयी होने के बाद मालव में प्राकर मिलो' । मालव पर शक और हूणों की सेना आक्रमण करती है और स्कन्दगुप्त समय पर पहुँच कर शत्रुओं को पराजित कर देता है । आगे, गान्धार की घाटी के रणक्षेत्र में स्कन्दगुप्त हूणों को पराजित करने के लिए प्रस्तुत है । चर कर उसे सूचना देता है कि 'हूण शीघ्र ही नदी के पार होकर प्रतीक्षा कर रहे हैं और यदि आक्रमण न हुआ तो वे स्वयं प्राक्रमण करेंगे। कुभा के रणक्षेत्र में मगध की सेना का हूणों से सन्धि होने के कारण परिस्थिति कुछ कठिन-सी है । गान्धार के क्षेत्र में हूणों का आक्रमण होता है और महाराज बन्धुवर्मा मारे जाते हैं । कुभा के रणक्षेत्र में स्कन्दगुप्त भटार्क को आदेश देता है और विश्वास के प्रमाणस्वरूप कहता है कि -- 'यदि शत्रु की दूसरी सेना कुभा को पार करना चाहे तो उसे काट देना ।' युद्ध में हूण पराजित होते हैं और कुभा के उस पार उतर जाना चाहते हैं और मगध सेना कुछ नहीं करती । भटार्क बांध तोड़ देता है और कुभा में अकस्मात् जल बढ़ जाता है और सब लोग बहते दिखाई देते हैं । युद्ध की इस असफलता के बाद तक्षशिला में कनिष्क स्तूप के आस-पास स्कन्दगुप्त विचित्र अवस्था में घूमता हुआ दिखाई देता है । यहीं परिस्थितिवश बिखरे हुए साथी एकत्र होते हैं और हूण सेना के साथ युद्ध होता है और वे पराजित होते हैं । बस इतना ही । विदेशी आक्रमण द्वारा गुप्त साम्राज्य पर आयी हुई विपत्ति का चित्रण कुल मिला कर छः दृश्यों में किया गया है । ये दृश्य हैं : प्रथम अंक में प्रथम और सप्तम दृश्य, तृतीय अंक में पाँचवाँ और छठा दृश्य, चतुर्थ अंक में दृश्य सात और पंचम अंक में दृश्य पाँच । कथावस्तु के इस भाग की सारी घटनाएँ स्कन्दगुप्त में केन्द्रित हैं, किन्तु नाटक में कहीं भी स्कन्दगुप्त में वह सक्रियता नहीं दिखाई पड़ती, जो विदेशियों को देश से बाहर करने के लिए अपेक्षित है । पुष्यमित्रों से युद्ध का हमें संकेतमात्र मिलता है। उसमें स्कन्दगुप्त का क्या हाथ रहा, यह हमें ज्ञात नहीं होता । उनके साथ हुए अन्तिम युद्ध को वह स्वयं नहीं करता वरन् चऋपालित पर छोड़ कर मालव चला जाता है । वहाँ उसे हम युद्ध में निस्सन्देह विजयी होते देखते हैं, किन्तु उसके पश्चात् गान्धार और कुभा के युद्ध में हम स्कन्दगुप्त को निष्क्रिय ही पाते हैं। गान्धार के रणक्षेत्र में बन्धुवर्मा की प्रधानता है । कुभा के रणक्षेत्र में स्कन्दगुप्त कुछ दिखाई पड़ता है पर वहाँ भी वह भेंटार्क पर निर्भर करता है और उसके विश्वासघात के फलस्वरूप उसकी विजय पराजय का रूप ले लेती है । इस पराजय के बाद भी स्कन्दगुप्त का अकर्मण्य रूप ही सामने आता है । वह स्वयं सेना संगठन का प्रयत्न नहीं करता, देवसेना द्वारा दी गयी ललकार ही उसे चेतन बनाती है । देवसेना ही उसके सब साथियों को एकत्र करती है और तब स्कन्दगुप्त हूणों से युद्ध करता है । इस प्रकार नाटक में स्कन्दगुप्त के सम्मुख प्रस्तुत तीन समस्याओं में प्रथम समस्या के निराकरण में स्कन्दगुप्त निष्क्रिय है । यदि चेतना कुछ हो भी तो वह दिखाई नहीं देती । गृह कलह अब यदि कथावस्तु के दूसरे भाग को देखें तो यह अंश उसके साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखता हुआ भी उसके निकट नहीं जान पड़ता । ऐसा लगता है कि वह एकदम स्वतन्त्र हो । कम से कम स्कन्दगुप्त तो उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने में सहायक नहीं है । कथावस्तु के इस भाग में स्कन्दगुप्त वस्तुतः बहुत कम ही आया है, जहाँ आया भी है वहाँ उसकी उपस्थिति दोनों घटनाओं को एक सूत्र में आबद्ध करने में सहायक नहीं होती। दोनों को बाँधने वाला पात्र वस्तुतः भटार्क है । कथावस्तु की दूसरी समस्या का सम्बन्ध अनन्तदेवी के उस कुचक्र से है जो वह अपने बेटे पुरगुप्त को, स्कन्दगुप्त के विरुद्ध, राज्य दिलाने के निमित्त करती है । इसका आभास यद्यपि प्रथम दृश्य में मिलता है किन्तु वह प्रकट जाकर चतुर्थ दृश्य में होता है । जया और अनन्तदेवी की बातचीत से प्रभास मिलता है कि अनन्तदेवी कुछ ऐसा कार्य करने जा रही है जो साधारण है। वह अपने नियति के पथ पर अपने प्राप चलना चाहती है । वह अपनी पत्नी देवकीके प्रभाव को उग्रता के साथ बढ़ते हुए देख कर अपने पुत्र पुरगुप्त के प्रति सशंक हो उठती है । वह समझती है कि सम्राट् की मति एक-सी नहीं रहती, वे अव्यवस्थित और चंचल हैं । वह भटार्क को भावी का संकेत इस प्रकार देती है'राजधानी में प्रानन्द विलास हो रहा है औौर पारसीक मदिरा की धारा बह रही है । इनके स्थान पर रक्त की धारा बहेगी। आज तुम कालागुरु के गन्धधूम्र से सन्तुष्ट हो रहे हो, कल इन उच्च शौर्य मन्दिरोंमें महापिशाची की विप्लव ज्वाला धधकेगी । उस चिर्याधंध की उत्कट गन्ध असह्य होगी । अनन्तदेवी का सहायक प्रपंचबुद्धि है और वह उसकी सहायता से भाद्र की अमावस्या को कुछ कार्य करने का निश्चय करती है और भटार्क भी उसमें सहायक होने को प्रतिश्रुत होता है। अगले दृश्य में प्रकट होता है कि महादेवी देवकी के प्राण संकट में हैं और परमभट्टारक महाराज कुमारगुप्त का निधन हो गया है, किन्तु भटार्क आदि इस बात को प्रकट होने देना नहीं चाहते । कुमारामात्य पृथ्वीसेन, महादंडनायक और महाप्रतिहार कुमारगुप्त को देखने भीतर जाना चाहते हैं किन्तु भटार्क द्वारा नियुक्त नायक उन्हें जाने से रोकता है । वे तीनों नायक के विरुद्ध खड्गहस्त होते हैं । इतने में पुरगुप्त और भटार्क आते हैं। भटार्क अभिवादन करता हुआ कहता है-- 'परमभट्टारक महाराजाधिराज पुरगुप्त की जय हो ! माननीय कुमारामात्य, महादंडनायक और महाप्रतिहार साम्राज्यके नियमानुसार शस्त्र अर्पण करके परमभट्टारक का अभिनन्दन कीजिए।' तीनों वाक् हो जाते हैं । जब उन्हें पता लगता है कि महाराज कुमारगुप्त गत हो गये, तो वे उत्तराधिकारी स्कन्दगुप्त की बात करते हैं । इस पर पुरगुप्त उन्हें डाँट देता है --- 'तुम लोगों को बैठ कर व्यवस्था नहीं देनी होगी। उत्तराधिकार का निर्णय स्वयं स्वर्गीय
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गत 30 वर्षों के दौरान वरिष्ठ नेता का मार्गदर्शन।
वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करने वाली परिषद ने जिस संवेदनशील समय में आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को वरिष्ठ नेता के रूप में चुना था उस समय को अब तीस वर्ष हो रहे हैं।
11 फरवरी 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हुई थी। क्रांति की सफलता के आरंभ से ही दुश्मन, जनता को एकजुट करने और उसके मार्गदर्शन में स्वर्गीय इमाम खुमैनी की भूमिका व क्षमता से अवगत थे और इसी बात के दृष्टिगत वे इमाम खुमैनी के देहान्त की प्रतीक्षा में थे क्योंकि वे सोच रहे थे कि इमाम खुमैनी के देहान्त के बाद सब कुछ खत्म हो जायेगा और इस संबंध में वे अफवाहें भी फैलाते रहते थे परंतु उन्हें 10 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी और इस अवधि के दौरान स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने न केवल ईरान की इस्लामी व्यवस्था के स्तंभों को मज़बूत किया बल्कि सद्दाम और उसके समर्थकों ने ईरान पर जो आठ वर्षीय युद्ध थोप रखा था उसमें भी ईरान का सिर ऊंचा किया किन्तु चार जून वर्ष 1989 में इमाम खुमैनी का स्वर्गवास हो गया और ईरानी राष्ट्र के शत्रु इस कटु व हृदयविदारक घटना से खुश हो गये और वे ईरान की इस्लामी व्यवस्था के खत्म होने की प्रतीक्षा में थे। उस समय अमेरिकी रेडियो ने खुशी से कहा था कि निश्चित रूप से आयतुल्लाह खुमैनी का निधन ईरान में बड़ी अस्थिरता का कारण बनेगा और कुछ तो यहां तक कह रहे थे कि इस घटना से ईरान में गृहयुद्ध की आग भड़क सकती है परंतु दुश्मनों की यह शैतानी खुशी कुछ घंटों से अधिक न चल सकी।
वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करने वाली परिषद ने इमाम खुमैनी के स्वर्गवास के तुरंत बाद बैठक की और काफी लंबी और गहन चर्चा के बाद आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को बहुमत से वरिष्ठ नेतृत्व के लिए चुना। इस प्रकार जहां दुश्मनों के षडयंत्रों व अपेक्षाओं पर पानी फिर गया वहीं ईरानी इतिहास में नया अध्याय आरंभ हो गया।
अलबत्ता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई स्वर्गीय इमाम खुमैनी के अच्छे, निष्ठावान और उनके अनुसरणकर्ता सच्चे शिष्यों में से हैं और उनके अंदर मार्गदर्शन की जो क्षमता व योग्यता है उसकी पुष्टि स्वर्गीय इमाम खुमैनी भी करते थे। यद्यपि स्वर्गीय इमाम खुमैनी अपने इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से बयान नहीं करते थे परंतु उनके निकटवर्ती लोग इस बात को जानते थे। जिस समय दिवंगत आयतुल्लाह हाशेमी रफसन्जानी संसद सभापति और वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करने वाली परिषद के सदस्य थे उस वक्त उन्होंने स्वर्गीय इमाम खुमैनी के उस कथन को बयान किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि जनाब ख़ामनेई इस्लामी क्रांति के मार्गदर्शन के लिए बेहतरीन व्यक्ति हैं। स्वर्गीय इमाम खुमैनी के छोटे बेटे अहमद खुमैनी भी अपने स्वर्गीय पिता के हवाले से कहते हैं" सच में यह यानी आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामनेई मार्गदर्शन की योग्यता रखते हैं। इन सबके बावजूद ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों ने आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के स्थान को महत्वहीन व कमज़ोर करने का प्रयास किया ताकि उनको हटा दिया जाये। दुश्मन यह सोचते थे कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को न तो जनसमर्थन प्राप्त है और न ही उनके अंदर स्वर्गीय इमाम खुमैनी के मार्ग को जारी रखने की क्षमता है परंतु जैसे ही आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को स्वर्गीय इमाम खुमैनी का उत्तराधिकारी बनाया गया और कांति के मार्गदर्शन की बागडोर इनके हाथों में सौंपी गयी उसी वक्त लोगों, विद्वानों, और उच्चाधिकारियों आदि ने उनके आदेशों के प्रति वचनबद्धता और उनके प्रति अपने पूर्ण समर्थन की घोषणा की। अलबत्ता इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के अंदर नेतृत्व व मार्गदर्शन की जो क्षमता है वह इनके नेतृत्व को सदृढ़ व मज़बूत बनाने में मुख्य कारक रही है।
दुश्मनों की एक अपेक्षा यह थी कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ईश्वरीय व जन आकांक्षाओं, अन्याय से मुकाबला करने और लोगों को एकजुट करने में स्वर्गीय इमाम खुमैनी की भूमिका नहीं निभा पायेंगे और इस्लामी क्रांति अपने मुख्य मार्ग से हट जायेगी परंतु ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने आरंभ से बल देकर कहा है कि स्वर्गीय इमाम खुमैनी का रास्ता ही हमारा रास्ता है और उन्होंने अपने आरंभिक भाषण में बल देकर कहा था कि हम ईश्वर से प्रतिबद्ध हुए हैं कि हम स्वर्गीय इमाम खुमैनी के मार्ग को जारी रखेंगे कि जो इस्लाम, कुरआन और मुसलमानों की इज्ज़त का रास्ता है और जो इमाम खुमैनी की आकांक्षाएं थीं उनमें से किसी एक आकांक्षा की अनदेखी भी नहीं करेंगे और आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने अपने अमल व व्यवहार से सिद्ध कर दिया है कि वह स्वर्गीय इमाम खुमैनी के रास्ते पर चल रहे हैं और इस रास्ते में वह पूरी तरह सफल भी रहे हैं। इस प्रकार ईरान की इस्लामी क्रांति के विरोधियों की जो अपेक्षा थी कि क्रांति अपने मुख्य मार्ग से हट जायेगी या कम से कम दुश्मनों से सांठ- गांठ हो जायेगी इससे वे निराश हो गये। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई इस बारे में कहते हैं" इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के पहले ही दिन कह रहे थे कि सभी चीज़ें खत्म हो गयीं, हमारे दुश्मनों को अपेक्षा थी कि ईरान के अंदर की किसी बात या बयान को लेकर उसे मुद्दा बनायेंगे और कहेंगे कि क्रांति ने अपने मार्ग को बदल लिया है। ईश्वर की कृपा से जो आशा लगा रखी थी उससे दुश्मन निराश हो गये। " गत 30 वर्षां का इतिहास इस बात का सूचक है कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने न केवल स्वर्गीय इमाम खुमैनी के मार्ग को जारी रखा बल्कि कठिनाइयों व समस्याओं के बावजूद उन्होंने स्वर्गीय इमाम खुमैनी की बहुत सी आकांक्षाओं को प्राप्त भी कर लिया है।
इस उतार- चढाव भरे काल में ईरान और इस्लामी व्यवस्था की शक्ति दिन- प्रतिदिन मज़बूत हुई है। यह शक्ति आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, व सैन्य क्षेत्रों में प्राप्त होने वाली उपलब्धियों के कारण है और यह शक्ति विशेषकर जनता की एकता व एकजुटता और उसके प्रयासों का परिणाम है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने गत तीन दशकों के दौरान जनता को इस्लामी क्रांति के मूल्यों व लक्ष्यों के प्रति एकजुट बनाये रखा। इसी प्रकार वरिष्ठ नेता ने विभिन्न दृष्टिकोणों के साथ अधिकारियों व ज़िम्मेदारों का समर्थन किया परंतु वरिष्ठ नेता ने विभिन्न तरीकों व शैलियों से अधिकारियों व ज़िम्मेदारों को उनकी गलतियों को बताया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता जिस चीज़ पर सदैव बल देते हैं उनमें से एक देश की अर्थ व्यवस्था और उसके ढांचे में सुधार है। वरिष्ठ नेता बल देकर कहते हैं कि आर्थिक ढांचे में एसा सुधार होना चाहिये कि अर्थ व्यवस्था तेल से होने वाली आय पर निर्भर न रहे। वरिष्ठ नेता ने इस संबंध में प्रतिरोधक अर्थ व्यवस्था का सुझाव दिया और ज्ञान, तकनीक, न्याय, मज़बूती और विकास को प्रतिरोधक अर्थ व्यवस्था का आधार बताया है। अगर प्रतिरोध अर्थ व्यवस्था के उद्देश्य प्राप्त हो जायेंगे तो आर्थिक प्रतिबंधों के कारण जो नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं वे या तो निष्प्रभावी या कम से कम हो जायेंगे। अलबत्ता गत 30 वर्षों के दौरान इस्लामी गणतंत्र ईरान ने राजनीतिक दबावों और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में ध्यान योग्य प्रगति की है परंतु वरिष्ठ नेता का मानना है कि इस विकास को और गति प्रदान की जानी चाहिये।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता द्वारा ज्ञान और तकनीक पर बल दिया जाना इस बात का कारण बना है कि उनके मार्गदर्शन के काल में ज्ञान, विज्ञान और छात्रों को विशेष महत्व व स्थान प्राप्त हो गया है और ईरान ने चिकित्सा, नैनो ओर , परमाणुप्रौद योगि की, स्टेम सेल, और स्पेस सहित बहुत से क्षेत्रों में ध्यान योग्य प्रगति कर ली है। रोचक बात यह है कि इनमें से अधिकांश सफलताएं वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के प्रोत्साहन और समर्थन के कारण प्राप्त हुई हैं।
साथ ही गत 30 वर्षों के दौरान ईरान को विभिन्न कठिनाइयों व समस्याओं का सामना रहा है और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने अपनी दूरदर्शिता से इन समस्याओं का समाधान किया। इस संबंध में वर्ष 2009 में ईरान में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों और उसके दौरान होने वाले राजनीतिक मतभेदों व विवादों की ओर संकेत किया जा सकता है। वर्ष 2009 में ईरान में राष्ट्रपति के जो चुनाव हुए थे उसमें मतदान के दौरान धांधली होने के दावे कर दिये गये और इसी निराधार दावे को पश्चिमी सरकारों ने बहाना बनाकर ईरान की इस्लामी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया। इसके लिए पश्चिमी सरकारों ने राजनीतिक, प्रचारिक और आर्थिक आदि संसाधनों का प्रयोग किया पंरतु इसके बावजूद वे अपने लक्ष्य न साध सकीं। इसका मुख्य कारण इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई का दूरदर्शी व विवेकपूर्ण मार्गदर्शन था जिसने दुश्मनों के खतरनाक षडयंत्र को विफल बना दिया।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने सशस्त्र सेना के सर्वोच्च कमांडर के रूप में गत 30 वर्षों के दौरान अपने मार्गदर्शन से ईरान की सेना को विश्व की शक्तिशाली सेना बना दिया। इस समय ईरान विभिन्न प्रकार की मिसाइलों, ड्रोन विमानों, पनडुब्बियों, टैंकों और विमानों आदि का निर्माण कर रहा है और रोचक बात यह है कि इन चीज़ों का निर्माण ईरानी विशेषज्ञ कर रहे हैं। इसके अलावा ईरान ने लाखों सैनिकों का प्रशिक्षण कर रखा है जिसके कारण दुश्मन ईरान पर हमला करने का दुस्साहस नहीं कर पा रहा है।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने कुछ चीज़ों जैसे इज्ज़त और तत्वदर्शिता को ईरान की विदेशी नीति का आधार करार दिया है और ईरानी अधिकारी इन बातों को ध्यान में रखते हैं। इसी प्रकार ईरान की एक नीति अत्याचार से संघर्ष और पीड़ित लोगों का समर्थन है। इसी नीति के परिप्रेक्ष्य में ईरान, फिलिस्तीन, यमन, लेबनान, इराक, सीरिया, अफ़गानिस्तान और बहरैन सहित विश्व के दूसरे क्षेत्रों की जनता का समर्थन करता है।
इस प्रकार इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई गत 30 वर्षों से ईरान और ईरानी राष्ट्र का मार्गदर्शन उसी मार्ग में कर रहे हैं जिसका निर्धारण स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने किया था और इस्लामी क्रांति ने अपनी सफलता की 40वीं वर्षगांठ एसी स्थिति में मनाई है जब ईरान क्षेत्र और विश्व की बड़ी व प्रभावी शक्ति बन चुका है।
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गत तीस वर्षों के दौरान वरिष्ठ नेता का मार्गदर्शन। वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करने वाली परिषद ने जिस संवेदनशील समय में आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को वरिष्ठ नेता के रूप में चुना था उस समय को अब तीस वर्ष हो रहे हैं। ग्यारह फरवरी एक हज़ार नौ सौ उन्यासी में ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हुई थी। क्रांति की सफलता के आरंभ से ही दुश्मन, जनता को एकजुट करने और उसके मार्गदर्शन में स्वर्गीय इमाम खुमैनी की भूमिका व क्षमता से अवगत थे और इसी बात के दृष्टिगत वे इमाम खुमैनी के देहान्त की प्रतीक्षा में थे क्योंकि वे सोच रहे थे कि इमाम खुमैनी के देहान्त के बाद सब कुछ खत्म हो जायेगा और इस संबंध में वे अफवाहें भी फैलाते रहते थे परंतु उन्हें दस वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी और इस अवधि के दौरान स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने न केवल ईरान की इस्लामी व्यवस्था के स्तंभों को मज़बूत किया बल्कि सद्दाम और उसके समर्थकों ने ईरान पर जो आठ वर्षीय युद्ध थोप रखा था उसमें भी ईरान का सिर ऊंचा किया किन्तु चार जून वर्ष एक हज़ार नौ सौ नवासी में इमाम खुमैनी का स्वर्गवास हो गया और ईरानी राष्ट्र के शत्रु इस कटु व हृदयविदारक घटना से खुश हो गये और वे ईरान की इस्लामी व्यवस्था के खत्म होने की प्रतीक्षा में थे। उस समय अमेरिकी रेडियो ने खुशी से कहा था कि निश्चित रूप से आयतुल्लाह खुमैनी का निधन ईरान में बड़ी अस्थिरता का कारण बनेगा और कुछ तो यहां तक कह रहे थे कि इस घटना से ईरान में गृहयुद्ध की आग भड़क सकती है परंतु दुश्मनों की यह शैतानी खुशी कुछ घंटों से अधिक न चल सकी। वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करने वाली परिषद ने इमाम खुमैनी के स्वर्गवास के तुरंत बाद बैठक की और काफी लंबी और गहन चर्चा के बाद आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को बहुमत से वरिष्ठ नेतृत्व के लिए चुना। इस प्रकार जहां दुश्मनों के षडयंत्रों व अपेक्षाओं पर पानी फिर गया वहीं ईरानी इतिहास में नया अध्याय आरंभ हो गया। अलबत्ता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई स्वर्गीय इमाम खुमैनी के अच्छे, निष्ठावान और उनके अनुसरणकर्ता सच्चे शिष्यों में से हैं और उनके अंदर मार्गदर्शन की जो क्षमता व योग्यता है उसकी पुष्टि स्वर्गीय इमाम खुमैनी भी करते थे। यद्यपि स्वर्गीय इमाम खुमैनी अपने इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से बयान नहीं करते थे परंतु उनके निकटवर्ती लोग इस बात को जानते थे। जिस समय दिवंगत आयतुल्लाह हाशेमी रफसन्जानी संसद सभापति और वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करने वाली परिषद के सदस्य थे उस वक्त उन्होंने स्वर्गीय इमाम खुमैनी के उस कथन को बयान किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि जनाब ख़ामनेई इस्लामी क्रांति के मार्गदर्शन के लिए बेहतरीन व्यक्ति हैं। स्वर्गीय इमाम खुमैनी के छोटे बेटे अहमद खुमैनी भी अपने स्वर्गीय पिता के हवाले से कहते हैं" सच में यह यानी आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामनेई मार्गदर्शन की योग्यता रखते हैं। इन सबके बावजूद ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों ने आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के स्थान को महत्वहीन व कमज़ोर करने का प्रयास किया ताकि उनको हटा दिया जाये। दुश्मन यह सोचते थे कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को न तो जनसमर्थन प्राप्त है और न ही उनके अंदर स्वर्गीय इमाम खुमैनी के मार्ग को जारी रखने की क्षमता है परंतु जैसे ही आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई को स्वर्गीय इमाम खुमैनी का उत्तराधिकारी बनाया गया और कांति के मार्गदर्शन की बागडोर इनके हाथों में सौंपी गयी उसी वक्त लोगों, विद्वानों, और उच्चाधिकारियों आदि ने उनके आदेशों के प्रति वचनबद्धता और उनके प्रति अपने पूर्ण समर्थन की घोषणा की। अलबत्ता इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के अंदर नेतृत्व व मार्गदर्शन की जो क्षमता है वह इनके नेतृत्व को सदृढ़ व मज़बूत बनाने में मुख्य कारक रही है। दुश्मनों की एक अपेक्षा यह थी कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ईश्वरीय व जन आकांक्षाओं, अन्याय से मुकाबला करने और लोगों को एकजुट करने में स्वर्गीय इमाम खुमैनी की भूमिका नहीं निभा पायेंगे और इस्लामी क्रांति अपने मुख्य मार्ग से हट जायेगी परंतु ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने आरंभ से बल देकर कहा है कि स्वर्गीय इमाम खुमैनी का रास्ता ही हमारा रास्ता है और उन्होंने अपने आरंभिक भाषण में बल देकर कहा था कि हम ईश्वर से प्रतिबद्ध हुए हैं कि हम स्वर्गीय इमाम खुमैनी के मार्ग को जारी रखेंगे कि जो इस्लाम, कुरआन और मुसलमानों की इज्ज़त का रास्ता है और जो इमाम खुमैनी की आकांक्षाएं थीं उनमें से किसी एक आकांक्षा की अनदेखी भी नहीं करेंगे और आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने अपने अमल व व्यवहार से सिद्ध कर दिया है कि वह स्वर्गीय इमाम खुमैनी के रास्ते पर चल रहे हैं और इस रास्ते में वह पूरी तरह सफल भी रहे हैं। इस प्रकार ईरान की इस्लामी क्रांति के विरोधियों की जो अपेक्षा थी कि क्रांति अपने मुख्य मार्ग से हट जायेगी या कम से कम दुश्मनों से सांठ- गांठ हो जायेगी इससे वे निराश हो गये। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई इस बारे में कहते हैं" इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के पहले ही दिन कह रहे थे कि सभी चीज़ें खत्म हो गयीं, हमारे दुश्मनों को अपेक्षा थी कि ईरान के अंदर की किसी बात या बयान को लेकर उसे मुद्दा बनायेंगे और कहेंगे कि क्रांति ने अपने मार्ग को बदल लिया है। ईश्वर की कृपा से जो आशा लगा रखी थी उससे दुश्मन निराश हो गये। " गत तीस वर्षां का इतिहास इस बात का सूचक है कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने न केवल स्वर्गीय इमाम खुमैनी के मार्ग को जारी रखा बल्कि कठिनाइयों व समस्याओं के बावजूद उन्होंने स्वर्गीय इमाम खुमैनी की बहुत सी आकांक्षाओं को प्राप्त भी कर लिया है। इस उतार- चढाव भरे काल में ईरान और इस्लामी व्यवस्था की शक्ति दिन- प्रतिदिन मज़बूत हुई है। यह शक्ति आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, व सैन्य क्षेत्रों में प्राप्त होने वाली उपलब्धियों के कारण है और यह शक्ति विशेषकर जनता की एकता व एकजुटता और उसके प्रयासों का परिणाम है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने गत तीन दशकों के दौरान जनता को इस्लामी क्रांति के मूल्यों व लक्ष्यों के प्रति एकजुट बनाये रखा। इसी प्रकार वरिष्ठ नेता ने विभिन्न दृष्टिकोणों के साथ अधिकारियों व ज़िम्मेदारों का समर्थन किया परंतु वरिष्ठ नेता ने विभिन्न तरीकों व शैलियों से अधिकारियों व ज़िम्मेदारों को उनकी गलतियों को बताया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता जिस चीज़ पर सदैव बल देते हैं उनमें से एक देश की अर्थ व्यवस्था और उसके ढांचे में सुधार है। वरिष्ठ नेता बल देकर कहते हैं कि आर्थिक ढांचे में एसा सुधार होना चाहिये कि अर्थ व्यवस्था तेल से होने वाली आय पर निर्भर न रहे। वरिष्ठ नेता ने इस संबंध में प्रतिरोधक अर्थ व्यवस्था का सुझाव दिया और ज्ञान, तकनीक, न्याय, मज़बूती और विकास को प्रतिरोधक अर्थ व्यवस्था का आधार बताया है। अगर प्रतिरोध अर्थ व्यवस्था के उद्देश्य प्राप्त हो जायेंगे तो आर्थिक प्रतिबंधों के कारण जो नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं वे या तो निष्प्रभावी या कम से कम हो जायेंगे। अलबत्ता गत तीस वर्षों के दौरान इस्लामी गणतंत्र ईरान ने राजनीतिक दबावों और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में ध्यान योग्य प्रगति की है परंतु वरिष्ठ नेता का मानना है कि इस विकास को और गति प्रदान की जानी चाहिये। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता द्वारा ज्ञान और तकनीक पर बल दिया जाना इस बात का कारण बना है कि उनके मार्गदर्शन के काल में ज्ञान, विज्ञान और छात्रों को विशेष महत्व व स्थान प्राप्त हो गया है और ईरान ने चिकित्सा, नैनो ओर , परमाणुप्रौद योगि की, स्टेम सेल, और स्पेस सहित बहुत से क्षेत्रों में ध्यान योग्य प्रगति कर ली है। रोचक बात यह है कि इनमें से अधिकांश सफलताएं वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के प्रोत्साहन और समर्थन के कारण प्राप्त हुई हैं। साथ ही गत तीस वर्षों के दौरान ईरान को विभिन्न कठिनाइयों व समस्याओं का सामना रहा है और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने अपनी दूरदर्शिता से इन समस्याओं का समाधान किया। इस संबंध में वर्ष दो हज़ार नौ में ईरान में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों और उसके दौरान होने वाले राजनीतिक मतभेदों व विवादों की ओर संकेत किया जा सकता है। वर्ष दो हज़ार नौ में ईरान में राष्ट्रपति के जो चुनाव हुए थे उसमें मतदान के दौरान धांधली होने के दावे कर दिये गये और इसी निराधार दावे को पश्चिमी सरकारों ने बहाना बनाकर ईरान की इस्लामी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया। इसके लिए पश्चिमी सरकारों ने राजनीतिक, प्रचारिक और आर्थिक आदि संसाधनों का प्रयोग किया पंरतु इसके बावजूद वे अपने लक्ष्य न साध सकीं। इसका मुख्य कारण इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई का दूरदर्शी व विवेकपूर्ण मार्गदर्शन था जिसने दुश्मनों के खतरनाक षडयंत्र को विफल बना दिया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने सशस्त्र सेना के सर्वोच्च कमांडर के रूप में गत तीस वर्षों के दौरान अपने मार्गदर्शन से ईरान की सेना को विश्व की शक्तिशाली सेना बना दिया। इस समय ईरान विभिन्न प्रकार की मिसाइलों, ड्रोन विमानों, पनडुब्बियों, टैंकों और विमानों आदि का निर्माण कर रहा है और रोचक बात यह है कि इन चीज़ों का निर्माण ईरानी विशेषज्ञ कर रहे हैं। इसके अलावा ईरान ने लाखों सैनिकों का प्रशिक्षण कर रखा है जिसके कारण दुश्मन ईरान पर हमला करने का दुस्साहस नहीं कर पा रहा है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने कुछ चीज़ों जैसे इज्ज़त और तत्वदर्शिता को ईरान की विदेशी नीति का आधार करार दिया है और ईरानी अधिकारी इन बातों को ध्यान में रखते हैं। इसी प्रकार ईरान की एक नीति अत्याचार से संघर्ष और पीड़ित लोगों का समर्थन है। इसी नीति के परिप्रेक्ष्य में ईरान, फिलिस्तीन, यमन, लेबनान, इराक, सीरिया, अफ़गानिस्तान और बहरैन सहित विश्व के दूसरे क्षेत्रों की जनता का समर्थन करता है। इस प्रकार इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई गत तीस वर्षों से ईरान और ईरानी राष्ट्र का मार्गदर्शन उसी मार्ग में कर रहे हैं जिसका निर्धारण स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने किया था और इस्लामी क्रांति ने अपनी सफलता की चालीसवीं वर्षगांठ एसी स्थिति में मनाई है जब ईरान क्षेत्र और विश्व की बड़ी व प्रभावी शक्ति बन चुका है।
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साउथ के सुपरस्टार अदिवी शेष की तेलुगू फिल्म 'हिट 2' 30 दिसंबर को हिंदी में रिलीज होने के लिए पूरी तरह से तैयार है। शैलेश कोलानू द्वारा निर्देशित इस फिल्म का वितरण ग्रैंडमास्टर और बी4यू द्वारा पूरे देश में किया जाएगा। फिल्म में अदिवी शेष एक पुलिस वाले की भूमिका निभाते हैं जो एक हत्या की जांच करता है।
तेलुगु फिल्म 2 दिसंबर को स्क्रीन पर आई और हैदराबाद में हाउसफुल शो के साथ बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की अफवाह है कि 'हिट 2' की कहानी कुख्यात श्रद्धा वाकर हत्याकांड से मिलती-जुलती है, जिसने भारत को झकझोर करके रख दिया है।
फिल्म 'मेजर' के बाद इस साल सुपरस्टार अदिवी शेष की यह दूसरी रिलीज है, जो इस साल की शुरूआत में अलग-अलग भाषाओं में रिलीज हुई थी। अदिवी शेष की फिल्म 'मेजर' ने अच्छा प्र्दशन किया था।
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साउथ के सुपरस्टार अदिवी शेष की तेलुगू फिल्म 'हिट दो' तीस दिसंबर को हिंदी में रिलीज होने के लिए पूरी तरह से तैयार है। शैलेश कोलानू द्वारा निर्देशित इस फिल्म का वितरण ग्रैंडमास्टर और बीचारयू द्वारा पूरे देश में किया जाएगा। फिल्म में अदिवी शेष एक पुलिस वाले की भूमिका निभाते हैं जो एक हत्या की जांच करता है। तेलुगु फिल्म दो दिसंबर को स्क्रीन पर आई और हैदराबाद में हाउसफुल शो के साथ बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की अफवाह है कि 'हिट दो' की कहानी कुख्यात श्रद्धा वाकर हत्याकांड से मिलती-जुलती है, जिसने भारत को झकझोर करके रख दिया है। फिल्म 'मेजर' के बाद इस साल सुपरस्टार अदिवी शेष की यह दूसरी रिलीज है, जो इस साल की शुरूआत में अलग-अलग भाषाओं में रिलीज हुई थी। अदिवी शेष की फिल्म 'मेजर' ने अच्छा प्र्दशन किया था।
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गौरव सिंह/भोजपुर. बिहार के भोजपुर जिला स्थित वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय (वीकेएसयू) में लैंगिक भेदभाव दूर करने के लिए तैयारी कर ली गई है. वीकेएसयू से संबद्ध भोजपुर, रोहतास, बक्सर और कैमूर जिले के कॉलेजों में महिला शिक्षिका एवं छात्राओं के साथ लैंगिक भेदभाव रोकने के लिए आंतरिक शिकायत कमेटी गठित होगी. इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव प्रो. मनीष जोशी ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भेजा है जिसमें कहा गया है कि शैक्षणिक संस्थानों, छात्रों एवं कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने और उनका निवारण करने के लिए हर आंतरिक शिकायत कमेटी का गठन किया जाए.
कमेटियां यौन उत्पीड़न संबंधित शिकायत प्राप्त करेंगी और उनका कानूनी तरीके से निवारण भी करवाएंगी, ताकि महिलाओं और लड़कियों को उनके कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल दिया जा सके. वीकेएसयू के कुलपति प्रो. शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि आंतरिक शिकायत कमेटी का गठन कर उसके पदाधिकारियों का नाम और मोबाइल नंबर स्थल के दीवारों पर लिखने को कहा गया है. कमेटी गठन कार्यस्थल पर वरिष्ठ स्तर पर नियोजित महिला की अध्यक्षता में होगी जिसमें दो सदस्य संबंधित कार्यालय से व एक सदस्य गैर सरकारी संगठन से नियोजक के द्वारा चयनित किया जाएगा.
कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 के अंतर्गत जिस महिला के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ है, वो खुद शिकायत कर सकती है. यदि पीड़िता की शारीरिक या मानसिक स्थिति ठीक नहीं है तो उसके रिश्तेदार, मित्र, सहकर्मी, उसके विशेष शिक्षक, मनोचिकित्सक अथवा मनोवैज्ञानिक, संरक्षक या ऐसा कोई भी व्यक्ति जो उसकी देखभाल कर रहा हो अथवा ऐसा कोई भी व्यक्ति जो घटना के बारे में जानता है और जिसने पीड़िता से सहमति ली है वो राष्ट्रीय व राज्य महिला आयोग के अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं.
अधिनियम के तहत लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत घटना के 90 दिन के अंदर आंतरिक शिकायत समिति या स्थानीय शिकायत समिति में दर्ज करानी चाहिए. शिकायत लिखित रूप में दी जानी चाहिए. यदि किसी कारणवश पीड़िता लिखित रूप में शिकायत करने में सक्षम नहीं है तो समिति के सदस्यों को उसकी मदद करनी चाहिए. यदि शिकायत नियोजक के विरुद्ध है तो वो भी स्थानीय समिति में दर्ज कराई जाएगी. अधिनियम के अनुसार पीड़ित की पहचान गोपनीय रखना अनिवार्य है.
क्या होता है लैंगिक उत्पीड़न?
कार्यस्थल पर किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विपरीत छूना या छूने की कोशिश करना, जो महिला के लिए असहज स्थिति पैदा करने वाली हो, उसे लैंगिक उत्पीड़न के दायरे में माना जाता है. शारीरिक या लैंगिक संबंध बनाने की मांग करना या उम्मीद करना भी लैंगिक उत्पीड़न है.
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गौरव सिंह/भोजपुर. बिहार के भोजपुर जिला स्थित वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में लैंगिक भेदभाव दूर करने के लिए तैयारी कर ली गई है. वीकेएसयू से संबद्ध भोजपुर, रोहतास, बक्सर और कैमूर जिले के कॉलेजों में महिला शिक्षिका एवं छात्राओं के साथ लैंगिक भेदभाव रोकने के लिए आंतरिक शिकायत कमेटी गठित होगी. इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव प्रो. मनीष जोशी ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भेजा है जिसमें कहा गया है कि शैक्षणिक संस्थानों, छात्रों एवं कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने और उनका निवारण करने के लिए हर आंतरिक शिकायत कमेटी का गठन किया जाए. कमेटियां यौन उत्पीड़न संबंधित शिकायत प्राप्त करेंगी और उनका कानूनी तरीके से निवारण भी करवाएंगी, ताकि महिलाओं और लड़कियों को उनके कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल दिया जा सके. वीकेएसयू के कुलपति प्रो. शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि आंतरिक शिकायत कमेटी का गठन कर उसके पदाधिकारियों का नाम और मोबाइल नंबर स्थल के दीवारों पर लिखने को कहा गया है. कमेटी गठन कार्यस्थल पर वरिष्ठ स्तर पर नियोजित महिला की अध्यक्षता में होगी जिसमें दो सदस्य संबंधित कार्यालय से व एक सदस्य गैर सरकारी संगठन से नियोजक के द्वारा चयनित किया जाएगा. कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम दो हज़ार तेरह के अंतर्गत जिस महिला के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ है, वो खुद शिकायत कर सकती है. यदि पीड़िता की शारीरिक या मानसिक स्थिति ठीक नहीं है तो उसके रिश्तेदार, मित्र, सहकर्मी, उसके विशेष शिक्षक, मनोचिकित्सक अथवा मनोवैज्ञानिक, संरक्षक या ऐसा कोई भी व्यक्ति जो उसकी देखभाल कर रहा हो अथवा ऐसा कोई भी व्यक्ति जो घटना के बारे में जानता है और जिसने पीड़िता से सहमति ली है वो राष्ट्रीय व राज्य महिला आयोग के अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं. अधिनियम के तहत लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत घटना के नब्बे दिन के अंदर आंतरिक शिकायत समिति या स्थानीय शिकायत समिति में दर्ज करानी चाहिए. शिकायत लिखित रूप में दी जानी चाहिए. यदि किसी कारणवश पीड़िता लिखित रूप में शिकायत करने में सक्षम नहीं है तो समिति के सदस्यों को उसकी मदद करनी चाहिए. यदि शिकायत नियोजक के विरुद्ध है तो वो भी स्थानीय समिति में दर्ज कराई जाएगी. अधिनियम के अनुसार पीड़ित की पहचान गोपनीय रखना अनिवार्य है. क्या होता है लैंगिक उत्पीड़न? कार्यस्थल पर किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विपरीत छूना या छूने की कोशिश करना, जो महिला के लिए असहज स्थिति पैदा करने वाली हो, उसे लैंगिक उत्पीड़न के दायरे में माना जाता है. शारीरिक या लैंगिक संबंध बनाने की मांग करना या उम्मीद करना भी लैंगिक उत्पीड़न है. .
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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को एक दिवसीय गुजरात दौरे पर हैं. इस दौरान पीएम मोदी नवसारी जिले के वडनगर के अपने पूर्व स्कूल टीचर से मिलने पहुंचे. अपने शिष्य नरेंद्र मोदी को देखकर गुरू ने प्यार से प्रधानमंत्री के सिर पर हाथ फेरा और गले लगाया.
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) एक दिवसीय गुजरात दौरे पर हैं. पीएम मोदी ने शुक्रवार को गुजरात के नवसारी के वडनगर के अपने पूर्व स्कूल टीचर से मुलाकात की. यहां उन्होंने नवसारी जिले में 3,050 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया. इनमें क्षेत्र में जल आपूर्ति में सुधार लाने और जीवनयापन आसान बनाने पर केंद्रित परियोजनाएं शामिल हैं. इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद में इसरो के नए भवन का उद्घाटन किया. इस मौके पर उनके साथ गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे. इसमें सात परियोजनाओं का उद्घाटन, 12 परियोजनाओं का शिलान्यास समारोह और 14 परियोजनाओं का भूमि पूजन शामिल है.
इन परियोजनाओं से क्षेत्र में पानी की आपूर्ति में सुधार के साथ-साथ कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने और जीवन में आसानी को बढ़ाने में मदद मिलेगी. प्रधानमंत्री तापी, नवसारी और सूरत जिलों के निवासियों के लिए 961 करोड़ रुपए की 13 जलापूर्ति परियोजनाओं के लिए भूमि पूजन किया. नवसारी जिले के एक मेडिकल कॉलेज का भी भूमि पूजन किया, जिसे लगभग 542 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाएगा. इसके बाद उन्होंने करीब 586 करोड़ रुपए की लागत से बने मधुबन बांध आधारित एस्टोल क्षेत्रीय जल आपूर्ति परियोजना का उद्घाटन किया. इन परियोजनाओं से सूरत, नवसारी, वलसाड और तापी जिलों के निवासियों को सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध होगा.
पीएम तापी जिले के निवासियों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए 85 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से बने वीरपुर व्यारा सबस्टेशन का उद्घाटन किया. वह वलसाड जिले के वापी शहर के लिए 20 करोड़ रुपए के 14 एमएलडी की क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और 21 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से नवसारी में बने सरकारी क्वार्टर्स का उद्घाटन किया. पीएम ने सूरत, नवसारी, वलसाड और तापी जिलों के निवासियों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 549 करोड़ रुपए की 8 जलापूर्ति परियोजनाओं की आधारशिला रखी. नवसारी जिले में 33 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली खेरगाम और पीपलखेड़ को जोड़ने वाली चौड़ी सड़क का भी शिलान्यास किया.
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देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को एक दिवसीय गुजरात दौरे पर हैं. इस दौरान पीएम मोदी नवसारी जिले के वडनगर के अपने पूर्व स्कूल टीचर से मिलने पहुंचे. अपने शिष्य नरेंद्र मोदी को देखकर गुरू ने प्यार से प्रधानमंत्री के सिर पर हाथ फेरा और गले लगाया. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दिवसीय गुजरात दौरे पर हैं. पीएम मोदी ने शुक्रवार को गुजरात के नवसारी के वडनगर के अपने पूर्व स्कूल टीचर से मुलाकात की. यहां उन्होंने नवसारी जिले में तीन,पचास करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया. इनमें क्षेत्र में जल आपूर्ति में सुधार लाने और जीवनयापन आसान बनाने पर केंद्रित परियोजनाएं शामिल हैं. इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद में इसरो के नए भवन का उद्घाटन किया. इस मौके पर उनके साथ गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे. इसमें सात परियोजनाओं का उद्घाटन, बारह परियोजनाओं का शिलान्यास समारोह और चौदह परियोजनाओं का भूमि पूजन शामिल है. इन परियोजनाओं से क्षेत्र में पानी की आपूर्ति में सुधार के साथ-साथ कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने और जीवन में आसानी को बढ़ाने में मदद मिलेगी. प्रधानमंत्री तापी, नवसारी और सूरत जिलों के निवासियों के लिए नौ सौ इकसठ करोड़ रुपए की तेरह जलापूर्ति परियोजनाओं के लिए भूमि पूजन किया. नवसारी जिले के एक मेडिकल कॉलेज का भी भूमि पूजन किया, जिसे लगभग पाँच सौ बयालीस करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाएगा. इसके बाद उन्होंने करीब पाँच सौ छियासी करोड़ रुपए की लागत से बने मधुबन बांध आधारित एस्टोल क्षेत्रीय जल आपूर्ति परियोजना का उद्घाटन किया. इन परियोजनाओं से सूरत, नवसारी, वलसाड और तापी जिलों के निवासियों को सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध होगा. पीएम तापी जिले के निवासियों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए पचासी करोड़ रुपए से अधिक की लागत से बने वीरपुर व्यारा सबस्टेशन का उद्घाटन किया. वह वलसाड जिले के वापी शहर के लिए बीस करोड़ रुपए के चौदह एमएलडी की क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और इक्कीस करोड़ रुपए से अधिक की लागत से नवसारी में बने सरकारी क्वार्टर्स का उद्घाटन किया. पीएम ने सूरत, नवसारी, वलसाड और तापी जिलों के निवासियों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए पाँच सौ उनचास करोड़ रुपए की आठ जलापूर्ति परियोजनाओं की आधारशिला रखी. नवसारी जिले में तैंतीस करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली खेरगाम और पीपलखेड़ को जोड़ने वाली चौड़ी सड़क का भी शिलान्यास किया.
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New Parliament Building: नई संसद भवन के उद्घाटन समारोह का आमंत्रण बसपा अध्यक्ष मायावती ने क्यों स्वीकार किया? बसपा के सांसद भी बीजेपी के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं और नई संसद भवन के उद्घाटन को ऐतिहासिक क्षण बता रहे हैं।
तहजीब की नगरी लखनऊ से संवेदनाओं को झकझोर देने वाला एक वीडियो सामने आया है। उसमें एक शख्स कुत्ते की लाश को रस्सी से बांधकर घसीटता हुआ नजर आ रहा है। बताया जा रहा है कि उसी शख्स ने पहले स्ट्रीट डॉग को पीट-पीटकर मार डाला।
यूपी में अपराधियों के खिलाफ हो रही ताबड़तोड़ कार्रवाईयों से अपराधी दहशत मे हैं। इसका एक उदाहरण भी गुरुवार को बिजनौर जिले में देखने को मिला। एक 50 हजार का इनामी बदमाश सरेंडर करने के लिए सीओ आफिस आया।
कानपुर के चकेरी हवाई अड्डे से अब 10 प्रमुख शहरों के लिए उड़ान की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी। आने वाले 6 महीने में शहरवासियों का यह सपना पूरा हो सकेगा। नया टर्मिनल भवन मौजूदा टर्मिनल भवन से 16 गुना बड़ा है। एयरपोर्ट पर अब तीन जहाजों की पार्किंग हो सकेगी।
नोएडा के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में चार सेंटीमीटर लंबे ब्रेन ट्यूमर को निकालने के लिए एक चुनौतीपूर्ण 'रीडो सर्जरी-redo surgery' के बाद एक उज्बेकी लड़के को नया जीवन मिला है। 5 घंटे तक चली सर्जरी के चार दिन बाद 7 साल के बच्चे को छुट्टी दे दी गई।
योगी सरकार ने कुख्यात गैंगस्टर बदन सिंह बद्दो की गिरफ्तारी पर घोषित इनामी राशि में इजाफा कर दिया है। पहले बद्दो की गिरफ्तारी पर 2. 5 लाख का इनाम था। अब उसी धनराशि को बढ़ाकर 5 लाख कर दिया गया है। जानिए कौन है गैंगस्टर बदन सिंह बद्दो?
लखनऊ। यूपी की राजधानी लखनऊ में गुरुवार की शाम को खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स की शुरुआत हुई। पीएम मोदी ने वर्चुअली इनॉग्रेशन करते हुए गेम्स में शामिल होने वाले सभी लोगों को बधाई दी और कहा कि यूपी आज खेलो इंडिया का संगम बना है।
आजमगढ़ में ब्रेन वॉश कर बड़े पैमाने पर हिंदू से मुस्लिम बनाने की कोशिश का मामला सामने आया है। देवगांव कोतवाली इलाके में मुस्लिम धर्म गुरु द्वारा लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था।
पहले शादी का झांसा देकर युवक से डेढ़ लाख रुपये वसूले। शादी भी हुई और दुल्हन की विदाई भी। दूल्हन को लेकर दूल्हा अपने घर के लिए रवाना हुआ। रास्ते में ही दूल्हे को कॉल आती है और फिर उसे रोककर देह व्यापार में फंसाने की धमकी देकर 2 लाख रंगदारी की डिमांड।
कानपुर के कल्याणपुर थाना अंतर्गत क्षेत्र से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां 100 साल की बुजुर्ग महिला पर रंगदारी मांगने का केस दर्ज किया गया। मामले के सुर्खियों में आने के बाद महिला का नाम केस से हटाया गया।
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Coimbatore Election Result 2021: 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस सीट से एआईएडीएमके के अम्मान के अर्जुनन को जीत मिली थी. उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मयूरा एस जयकुमार को हराया था.
कोयंबरटूर जिले की कोयंबटूर साउथ विधानसभा सीट पर बीजेपी की वनाथी श्रीनिवासन ने कड़े मुकाबले में एमएनएम के कमल हासन को हरा दिया है. इस सीट को कांग्रेस की मयूरा एस जयकुमार ने त्रिकोणात्मक बना दिया था. कमल हासन भारतीय सिनेमा के जाने माने नाम हैं.
कोयबंटूर साउथ विधानसभा क्षेत्र कोयंबटूर लोकसभा के अंतर्गत आता है. यहां से सीपीएम के पीआर नटराजन सांसद हैं. 2019 के चुनाव में नटराजन ने बीजेपी के सीपी राधाकृष्णन को 1 लाख 79 हजार 143 वोट से हराया था.
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2021 में कोयंबटूर साउथ सीट पर सबकी नजरें थीं. इस सीट से कई हाई प्रोफाइल उम्मीदवार मैदान में थे. भारतीय जनता पार्टी ने बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वनाथी श्रीनिवासन को अपना उम्मीदवार बनाया था तो सिनेमा के बाद राजनीति में किस्मत आजमा रहे मक्कल निधि मय्यम के संस्थापक अध्यक्ष कमल हासन यहां से दांव ठोक रहे थे. वहीं कांग्रेस ने मयूरा एस जयकुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था.
2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस सीट से एआईएडीएमके के अम्मान के अर्जुनन को जीत मिली थी. उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मयूरा एस जयकुमार को हराया था. एआईएडीएमके उम्मीदवार अर्जुनन को कुल 59 हजार 788 वोट मिले थे. वहीं मयूरा एस जयकुमार को 42 हजार 369 मत मिले थे. 2016 में वनाथी श्रीनिवासन को कुल 33 हजार 133 वोट मिले थे और वे तीसरे नंबर पर रही थीं. इस बार एआईएडीएमके और बीजेपी गठबंधन में चुनाव लड़ रही हैं.
वनाथी श्रीनिवासन का जन्म 06 जून 1970 को कोयंबटूर जिले में हुआ था. वे 1993 से ही मद्रास हाई कोर्ट में वकालत कर रही हैं. वनाथी श्रीनिवासन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की विचारक हैं और आरएसएस से लंबे समय से जुड़ी हुई हैं. वनाथी श्रीनिवास ने 2016 में बीजेपी की टिकट पर कोयंबटूर साउथ विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था. हालांकि वो तीसरे नंबर रही थीं.
वनाथी श्रीनिवासन भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की राष्टरीय अध्यक्ष हैं. वे करीब 30 साल से बीजेपी से जुड़ी हुई हैं और पार्टी में अलग-अलग पदों पर रह चुकी हैं. 2013 में पार्टी ने उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का सचिव बनाया था. अगले ही साल यानी 2014 में उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का महासचिव नियुक्त कर दिया गया. वनाथी श्रीनिवासन इस पद जून 2020 तक बनी रहीं. इसके बाद पार्टी ने उन्हें तमिलनाडु बीजेपी उपाध्यक्ष बना दिया. जेपी नड्डा के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद वनाथी श्रीनिवासन को बड़ी जिम्मेदारी दी गई और 20 अक्टूबर 2020 को उन्हें बीजेपी महिला मोर्चा का अध्यक्ष नियुक्त कर दिय गया.
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Coimbatore Election Result दो हज़ार इक्कीस: दो हज़ार इक्कीस के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस सीट से एआईएडीएमके के अम्मान के अर्जुनन को जीत मिली थी. उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मयूरा एस जयकुमार को हराया था. कोयंबरटूर जिले की कोयंबटूर साउथ विधानसभा सीट पर बीजेपी की वनाथी श्रीनिवासन ने कड़े मुकाबले में एमएनएम के कमल हासन को हरा दिया है. इस सीट को कांग्रेस की मयूरा एस जयकुमार ने त्रिकोणात्मक बना दिया था. कमल हासन भारतीय सिनेमा के जाने माने नाम हैं. कोयबंटूर साउथ विधानसभा क्षेत्र कोयंबटूर लोकसभा के अंतर्गत आता है. यहां से सीपीएम के पीआर नटराजन सांसद हैं. दो हज़ार उन्नीस के चुनाव में नटराजन ने बीजेपी के सीपी राधाकृष्णन को एक लाख उन्यासी हजार एक सौ तैंतालीस वोट से हराया था. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव दो हज़ार इक्कीस में कोयंबटूर साउथ सीट पर सबकी नजरें थीं. इस सीट से कई हाई प्रोफाइल उम्मीदवार मैदान में थे. भारतीय जनता पार्टी ने बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वनाथी श्रीनिवासन को अपना उम्मीदवार बनाया था तो सिनेमा के बाद राजनीति में किस्मत आजमा रहे मक्कल निधि मय्यम के संस्थापक अध्यक्ष कमल हासन यहां से दांव ठोक रहे थे. वहीं कांग्रेस ने मयूरा एस जयकुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था. दो हज़ार इक्कीस के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस सीट से एआईएडीएमके के अम्मान के अर्जुनन को जीत मिली थी. उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मयूरा एस जयकुमार को हराया था. एआईएडीएमके उम्मीदवार अर्जुनन को कुल उनसठ हजार सात सौ अठासी वोट मिले थे. वहीं मयूरा एस जयकुमार को बयालीस हजार तीन सौ उनहत्तर मत मिले थे. दो हज़ार सोलह में वनाथी श्रीनिवासन को कुल तैंतीस हजार एक सौ तैंतीस वोट मिले थे और वे तीसरे नंबर पर रही थीं. इस बार एआईएडीएमके और बीजेपी गठबंधन में चुनाव लड़ रही हैं. वनाथी श्रीनिवासन का जन्म छः जून एक हज़ार नौ सौ सत्तर को कोयंबटूर जिले में हुआ था. वे एक हज़ार नौ सौ तिरानवे से ही मद्रास हाई कोर्ट में वकालत कर रही हैं. वनाथी श्रीनिवासन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की विचारक हैं और आरएसएस से लंबे समय से जुड़ी हुई हैं. वनाथी श्रीनिवास ने दो हज़ार सोलह में बीजेपी की टिकट पर कोयंबटूर साउथ विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था. हालांकि वो तीसरे नंबर रही थीं. वनाथी श्रीनिवासन भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की राष्टरीय अध्यक्ष हैं. वे करीब तीस साल से बीजेपी से जुड़ी हुई हैं और पार्टी में अलग-अलग पदों पर रह चुकी हैं. दो हज़ार तेरह में पार्टी ने उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का सचिव बनाया था. अगले ही साल यानी दो हज़ार चौदह में उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का महासचिव नियुक्त कर दिया गया. वनाथी श्रीनिवासन इस पद जून दो हज़ार बीस तक बनी रहीं. इसके बाद पार्टी ने उन्हें तमिलनाडु बीजेपी उपाध्यक्ष बना दिया. जेपी नड्डा के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद वनाथी श्रीनिवासन को बड़ी जिम्मेदारी दी गई और बीस अक्टूबर दो हज़ार बीस को उन्हें बीजेपी महिला मोर्चा का अध्यक्ष नियुक्त कर दिय गया.
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अध्याय ६९
प्रथ मेर्वादि षोडश-प्रासाद-लक्षण
अब ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ सोलह प्रामादों का विशेष लक्षणों के साथ वर्णन करता हूं। जिस तरह इनका विभाग होता है, और जिस प्रकार से नीचे और ऊपर सन्निवेश होता है अर्थात् जगती पीठ आदि प्रधश्छन्द तथा मण्डोवर एवं शिखर श्रादि उर्ध्वच्छन्द का विन्यास प्रकल्पित किया जाता है, और जिस का जो प्रमाण होता है उन सब का वर्णन किया जाता है ॥ १-२ ।।
प्रासाद - राज मेरू, हर- प्रिय कैलाश, सर्वतो- भद्रक, विमानच्छन्द, नन्दन, स्वस्तिक, मुक्त - कोण, श्रीवल्स, हंस, रूचक, वर्धमान, गरुड, गज, मृगराज, पद्म, और बलभी- ये सोलह प्रासाद कहे गये हैं ।। ३ - ५३३ ।।
मेहः - पुराविदों का कथन है नि ३३ मे नीचे और ५० मे ऊपर मेरू के हस्तों की संख्या नहीं होती है। अर्थात् इस से कम श्रीर इस से अधिक प्रमाण प्रशस्त नहीं माना गया है। क्षेत्र का दश भागों में विभाजन कर दो भाग से शृंग का निर्माण करना चाहिये । और छे भागों से मध्य का निर्माण कर वहां पर निकास किया जाता है। और भाग के षोडशांश से सलिलान्तर का निर्माण करना चाहिये । सोलह पदों से गर्भ में इस का अर्थात् प्रासाद- राज मेरू का विस्तार करना चाहिये । प्रासाद की दीवाल एक पद से निर्मेय है । उसी प्रकार बाहर की दीवाल भी बनानी चाहिये । इस प्रकार से जो विहित है वैसा कहा गया है । दो पदों से वेदिका - बन्ध और पांच पदों से जंघा तथा प्राधे २ पद से मेखला और प्रन्तर पत्रक विनिवेदय बताये गये हैं। श्रृंग की ऊंचाई तीन भागों से और शिखरों की नौ ( ६ ) भागों से विहित है। इस के शिखर की शिखर विज्ञों को सोलह भूमिकायें बनानी चाहियें । ॐ भ्रंशों से विस्तृत स्कन्ध कहा गया है तथा एक अंश से उठा हुआ भंडक बताया गया है। वंश मे उठी ग्रीवा शिखर को प्रथम भूमिका के विस्तार में बनानी चाहिये । षड्गुण सूत्र से ही वेण कोष को खींचना चाहिये । भद्र के विस्तार को भी द्विगुण ( दुगुनी ) ऊंचाई करनी चाहिये और सभी प्रासादों में एक भाग से कुम्भ का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार चार शृंग वाला, बार द्वारों से सुशोभित, मेरु की उपमा वाला, इस मेरु प्रासाद का निर्माण, अपना
मेर्वादि चोडश-प्रासाद
इस प्रकार सर्वतो भद्र प्रासाद के निर्माण से जय, लक्ष्मी, कीति, यश, सब इष्ट फल और सब प्रकार के कव्याण प्राप्त होते हैं ।। २३३ -३१३ ।।
विमान :-~-चौकोर क्षेत्र को सौ भागों में विभाजित कर प्राज्ञ स्थपति को कल्याण, पुष्टि भौर सुख को देने वाले इस विमान का विन्यास करना चाहिये । उसको चारों भद्रों से तथा कर्ण-प्राग्रीवों से बनाना चाहिये । यह पांच भूमियों वाला होता है, भौर ज्येष्ठ मध्य-कनिष्ठ भेद से तीन प्रकार का होता है। तीस हाथों से ज्येष्ठ, पच्चीस से मध्यम ओर इक्कीस से अथवा सोलह हाथों से कनिष्ठ - इन विमानों की तीन संख्या कही गई है - पहिली जाति शुद्ध, दूसरी मञ्जरी युत, तीसरी मिश्रक । उनमें से मिश्रक निर्माण वाला प्रामाद ज्येष्ठ कहलाता है भोर वह कैलाश प्रासाद के समान शुभ होता है। मध्यम प्रामाद जाति-शुद्ध होता है और अघम मञ्जरी युत कहलाता। इसका पांच भाग के विस्तार से युक्त भद्र होता है । कर्ण-प्राग्रीव वा विस्तार एक भाग के मान से करना चाहिये इसी प्रकार भाषे २ भाग से अन्य प्रासादावयव जैसे क्षोभण, तलिप तथा सलिलान्तर निर्मेय हैं । इच्छावश गुप्त-कर्ण भी बनाये जा सकते हैं और उनका विधान लक्षणान्वित हो । उससे भद्र का निकास एक भाग से बनाना चाहिये । मिश्रकविमान के भद्र का निर्माण बुद्धिमान् स्थपति को चार भागों से करना चाहिये । खुर-पिंडिका के साथ जंघा की ऊंचाई पांच भागों से विहित है। रथिका दो भागों से और चार अंशो से पहिली भूमि, दूसरी प्राधे मंग से हीन और तीसरी भूमि इसी प्रकार की इष्ट बताई गई है। चौथी भूमि तीन भागों से बनाई जाती है, और पांचवीं तो प्राधे से हीन हो । भूमिका का जो उदय होता है उसके आधे से कूट का निर्माण करना चाहिये । उच्छालक समन्वित कुम्भिका को प्राधे से बनायें । पांचवीं भूमि की वेदिका एक भाग से उठो हुई बनानी चाहिये। छे भागों के विस्तार वाली घंटा दो भाग से उठी हुई बनानी चाहिये । घंटा का उत्सेध तदनन्तर तीन भागों से विभाजित करना चाहिये तथा कंठ, ग्रीवा और अंडकों का निर्माण एक २ भाग से करना चाहिये भौर दंडिका की ऊंचाई एक भाग से करनी चाहिये। घंटा के माघे से दो भाग वाली कलश की ऊंचाई बनानी चाहिये तथा पहिले के समान शूरसेनादिक सब बनाने चाहियें। यहां १८ इस प्रासाद में मनोरम सिंह-कर्णो से भद्र को विभूषित करना चाहिये । पांच व्यास वाले सूत्र से पद्म कोष खींचना चाहिये, और इनकी जो वल्लरियां होती हैं उनको लताओंों से प्रकल्पित करना चाहिये । मिश्रक - विमान मिश्रित मंगों से तथा शुद्ध भूमिकान्वित होने चाहियें ॥ ३१३-४७२।।
कल्याण चाहने वाला व्यक्ति बनवावे । सर्वस्वर्ग मेरु पर्वत को देकर जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य इस मेरु-प्रासाद को ईंटों के पहाड़ से बना कर अर्थात् ईंटों की ऊंचाई से बना कर अधिक प्राप्त होता है ।। ५३ १५ ।।
कैलाशः - क्षेत्र के चौर बनाने पर उस का मान सत्ताइस (२७) हाथों का विहित है। पुनः उसके दश विभाग करे तो वह पुण्य वर्धन कैलाश प्रासाद होता है। ब्रह्म-कोष्ठ में इस का गर्भ होता है और शेष से दीवाल के भीतर अन्ध-कारिका अर्थात् गर्भ गृह के चारों ओर जाने वाली प्रदक्षिणा दीवाल होनी है। बार भागों से भद्र तथा दोनों मूल-कर्ण तीन २ भागों से बनाने चाहियें । सात भागों से उठी हुई जंधा और मेखला आधे भाग से बताई गयी है। एक भाग से अन्तरपत्र और झंडक उन्नत होता है। ग्रीवा का अग्र भाग बाला सिखर उत्सेध से दग अंशों से ऊंचा होता है। कैलाश-संज्ञा वाले प्रासाद में स्कन्ध का विस्तार तीन अंशों का ऊंचा होता है । इस अत्तर-पत्र में तो सुताडित सूत्र देकर उस त्रिगुण सूत्र से मनोरम वेणुकोष का आलेखन करें । यह प्रासाद आठ भूमियों की ऊंचाई वाला होता है तथा मञ्जरी मे सुशोभित शोभा वाला कहा गया है और इसकी ऊंचाई वल्याण चाहने वाले को दुगुनी बनवानी चाहिये । आधे भाग में निकला हुआ इसका कै भूमियों वाला भद्र होना चाहिये । सिंह- कर्ण आदि अन्य विच्छित्तियां भी विवेश्य हैं। इस प्रकार से भगवान् शंकर को प्रिय लगने वाला यह प्रासाद कैलाश नाम से विख्यात होता है ।। १६ --२३३ ।।
सर्वतोभद्र :- अब सर्वतो- भद्र- प्रामद का वर्णन करता हूं । यह सर्वतोभद्र २६ हाथो के परम परिमाण से बनाया जाता है । इस का गर्भ, बाहर की सीमा, दीवालें और अंधकारिकायें, जंघा उत्सेध और दोनों कर्ण जिस प्रकार से मेरू के हैं, वैसे ही वहां पर भी बताये गये हैं। उसी प्रकार से भद्रों के विस्तारों से इसका निकास भी बनाना चाहिये । पहिली रथिका चार भागों से और उस के बाद दूसरी ढ़ाई भागों से निर्मेय हैं। उन सबका परस्पर अन्तर एक २ भाग का बताया गया है। शिखर का विस्तार छै भागो से बनाना चाहिये तथा इसकी ऊंचाई सात भागों से होनी चाहिये । छै भागों से और दश भागों से मूलज अर्थात् पहले स्कन्ध का विस्तार बताया गया है। उत्सेध से ग्रीवा आधे भाग वाली और अण्डक एक भाग की ऊंचाई वाला विहित है । अतः मूल सूत्रानुसार छेद की संयोजना होती है। इसकी रेखा वैसी बनानी चाहिये जो सब कल्याणों का सम्पादन करे । मेरू और इसके अर्थात् सर्वतो-भद्र के श्रृंगों को सिंह-कर्णौ से विभूषित करना चाहिये । सब जगह पद्म-कोषाग्र-तुल्य मंजरी बनानी चाहिये ।
नम्बन :- नन्दन - प्रासाद की सीमा ३२ हाथों से निर्मित होती है। पाठ २ के विभाग से वह ६४ पद बाला होता है। चार भागों से इसका गर्भ और शेष से भित्यन्धकारिका बनानी चाहिये । गर्भ के समान ही भद्र बनाना चाहिये और उसका निर्गम उसके ऊपर भाग से होता है। फिर सब भोर से कर्ण -सूत्र से बगल में दो रथों का निर्माण करना चाहिये । पांच भागों से उठी हुई गंधा और एक भाग के प्रमाण से मेखला। छं भूमि वाला यह प्रासाद गोल है और ये प्रत्येक भूमियां बारह २ अंश वाली होती हैं। इसकी रेखा, स्कन्ध, अण्डक आदि का भाकार कैलाश प्रासाद के समान होता है। यह नन्दन श्रानन्द देने वाला भौर सव भापत्तियों को नष्ट करने वाला होता है ।। ४७१-५२३ ॥
स्वस्तिक : - पच्चीस हाथ वाले क्षेत्र को चौकोर बना लेने पर फिर दिङ्-सामुख्यानुरूप सूत्रपात करना चाहिये । तदनन्तर सीमा के आधे सूत्र से ठीक तरह से वृत्त खींचना चाहिये । उसके बाद अठ्ठाईस भागों से उसको यथा-पद विभाजित करना चाहिये । उसके माधे से दिग्सूत्र-संश्रित शालाओं का निर्माण करना चाहिये। उनके बीच में एक २ के तीन रथ बनवाने चाहियें । और अन्य शालाकर्णसमश्रित अर्ध-रथों का भी निर्माण करना चाहिये । जंघा के भागों से उठी होनी चाहिये और आधे भाग से तो मेखला कही गयी है। एक भाग से अन्तरपत्र तथा मण्डक (गोलाकार ) भी एक भाग से होता चाहिये । भाधे भाग से उठी हुई ग्रीवा होनी चाहिये और उसका विष्कम्भ चार पदों का होता है । शिखर की ऊंचाई ११ भागों से कही गई है। सभी शिखरों की रचना में लताकल्पन विहित है। स्कम्बादि के विस्तार में द्विमुण-सूत्र का प्रमाण होता है। षड्गुण सूत्र भी यहां अभीष्ट है। खूब तान कर पर्यात् खींच कर षड्गुण-सूत्र से पप कोष का आलेखन करना चाहिये । वह ज्येष्ठ अर्थात् उत्तम पच्चीस हाय वाला, मध्यम सोलह हाथ वाला, अषम बारह हाथ वाला प्रशस्त होता है। ज्येष्ठ की भाग संख्या के प्राधे से मध्यम और मध्यम के भाषे से प्रथम की भागसंख्या कही गयी है । छे भाग की प्रमाण वाली, उत्तम की बंधा बताई गई है - तथा मध्यम और निकृष्ट में वह बंधा सात भागों से ऊंची होती है। सब लतियों का क्षेत्र के द्वारा यह विधान बताया गया है। इस प्रकार मनुष्यों का कल्याण और मंगल करने वाला स्वस्तिक नाम से यह समाख्यात होता है।। ५२-१३॥
मुक्त कोण :- भब मुक्त कोण नामक आसाद का लक्षण कहता हूं। वह - तीन तरह का होता है - सोलह, बारह तथा माठ भागों से क्रमशः ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ-भेद से मुक्त कोण नाम का प्रासाद होता है। -मुक्त-कोण और स्वस्तिक
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अध्याय उनहत्तर प्रथ मेर्वादि षोडश-प्रासाद-लक्षण अब ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ सोलह प्रामादों का विशेष लक्षणों के साथ वर्णन करता हूं। जिस तरह इनका विभाग होता है, और जिस प्रकार से नीचे और ऊपर सन्निवेश होता है अर्थात् जगती पीठ आदि प्रधश्छन्द तथा मण्डोवर एवं शिखर श्रादि उर्ध्वच्छन्द का विन्यास प्रकल्पित किया जाता है, और जिस का जो प्रमाण होता है उन सब का वर्णन किया जाता है ॥ एक-दो ।। प्रासाद - राज मेरू, हर- प्रिय कैलाश, सर्वतो- भद्रक, विमानच्छन्द, नन्दन, स्वस्तिक, मुक्त - कोण, श्रीवल्स, हंस, रूचक, वर्धमान, गरुड, गज, मृगराज, पद्म, और बलभी- ये सोलह प्रासाद कहे गये हैं ।। तीन - पाँच सौ तैंतीस ।। मेहः - पुराविदों का कथन है नि तैंतीस मे नीचे और पचास मे ऊपर मेरू के हस्तों की संख्या नहीं होती है। अर्थात् इस से कम श्रीर इस से अधिक प्रमाण प्रशस्त नहीं माना गया है। क्षेत्र का दश भागों में विभाजन कर दो भाग से शृंग का निर्माण करना चाहिये । और छे भागों से मध्य का निर्माण कर वहां पर निकास किया जाता है। और भाग के षोडशांश से सलिलान्तर का निर्माण करना चाहिये । सोलह पदों से गर्भ में इस का अर्थात् प्रासाद- राज मेरू का विस्तार करना चाहिये । प्रासाद की दीवाल एक पद से निर्मेय है । उसी प्रकार बाहर की दीवाल भी बनानी चाहिये । इस प्रकार से जो विहित है वैसा कहा गया है । दो पदों से वेदिका - बन्ध और पांच पदों से जंघा तथा प्राधे दो पद से मेखला और प्रन्तर पत्रक विनिवेदय बताये गये हैं। श्रृंग की ऊंचाई तीन भागों से और शिखरों की नौ भागों से विहित है। इस के शिखर की शिखर विज्ञों को सोलह भूमिकायें बनानी चाहियें । ॐ भ्रंशों से विस्तृत स्कन्ध कहा गया है तथा एक अंश से उठा हुआ भंडक बताया गया है। वंश मे उठी ग्रीवा शिखर को प्रथम भूमिका के विस्तार में बनानी चाहिये । षड्गुण सूत्र से ही वेण कोष को खींचना चाहिये । भद्र के विस्तार को भी द्विगुण ऊंचाई करनी चाहिये और सभी प्रासादों में एक भाग से कुम्भ का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार चार शृंग वाला, बार द्वारों से सुशोभित, मेरु की उपमा वाला, इस मेरु प्रासाद का निर्माण, अपना मेर्वादि चोडश-प्रासाद इस प्रकार सर्वतो भद्र प्रासाद के निर्माण से जय, लक्ष्मी, कीति, यश, सब इष्ट फल और सब प्रकार के कव्याण प्राप्त होते हैं ।। दो सौ तैंतीस -तीन सौ तेरह ।। विमान :-~-चौकोर क्षेत्र को सौ भागों में विभाजित कर प्राज्ञ स्थपति को कल्याण, पुष्टि भौर सुख को देने वाले इस विमान का विन्यास करना चाहिये । उसको चारों भद्रों से तथा कर्ण-प्राग्रीवों से बनाना चाहिये । यह पांच भूमियों वाला होता है, भौर ज्येष्ठ मध्य-कनिष्ठ भेद से तीन प्रकार का होता है। तीस हाथों से ज्येष्ठ, पच्चीस से मध्यम ओर इक्कीस से अथवा सोलह हाथों से कनिष्ठ - इन विमानों की तीन संख्या कही गई है - पहिली जाति शुद्ध, दूसरी मञ्जरी युत, तीसरी मिश्रक । उनमें से मिश्रक निर्माण वाला प्रामाद ज्येष्ठ कहलाता है भोर वह कैलाश प्रासाद के समान शुभ होता है। मध्यम प्रामाद जाति-शुद्ध होता है और अघम मञ्जरी युत कहलाता। इसका पांच भाग के विस्तार से युक्त भद्र होता है । कर्ण-प्राग्रीव वा विस्तार एक भाग के मान से करना चाहिये इसी प्रकार भाषे दो भाग से अन्य प्रासादावयव जैसे क्षोभण, तलिप तथा सलिलान्तर निर्मेय हैं । इच्छावश गुप्त-कर्ण भी बनाये जा सकते हैं और उनका विधान लक्षणान्वित हो । उससे भद्र का निकास एक भाग से बनाना चाहिये । मिश्रकविमान के भद्र का निर्माण बुद्धिमान् स्थपति को चार भागों से करना चाहिये । खुर-पिंडिका के साथ जंघा की ऊंचाई पांच भागों से विहित है। रथिका दो भागों से और चार अंशो से पहिली भूमि, दूसरी प्राधे मंग से हीन और तीसरी भूमि इसी प्रकार की इष्ट बताई गई है। चौथी भूमि तीन भागों से बनाई जाती है, और पांचवीं तो प्राधे से हीन हो । भूमिका का जो उदय होता है उसके आधे से कूट का निर्माण करना चाहिये । उच्छालक समन्वित कुम्भिका को प्राधे से बनायें । पांचवीं भूमि की वेदिका एक भाग से उठो हुई बनानी चाहिये। छे भागों के विस्तार वाली घंटा दो भाग से उठी हुई बनानी चाहिये । घंटा का उत्सेध तदनन्तर तीन भागों से विभाजित करना चाहिये तथा कंठ, ग्रीवा और अंडकों का निर्माण एक दो भाग से करना चाहिये भौर दंडिका की ऊंचाई एक भाग से करनी चाहिये। घंटा के माघे से दो भाग वाली कलश की ऊंचाई बनानी चाहिये तथा पहिले के समान शूरसेनादिक सब बनाने चाहियें। यहां अट्ठारह इस प्रासाद में मनोरम सिंह-कर्णो से भद्र को विभूषित करना चाहिये । पांच व्यास वाले सूत्र से पद्म कोष खींचना चाहिये, और इनकी जो वल्लरियां होती हैं उनको लताओंों से प्रकल्पित करना चाहिये । मिश्रक - विमान मिश्रित मंगों से तथा शुद्ध भूमिकान्वित होने चाहियें ॥ तीन सौ तेरह-चार सौ बहत्तर।। कल्याण चाहने वाला व्यक्ति बनवावे । सर्वस्वर्ग मेरु पर्वत को देकर जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य इस मेरु-प्रासाद को ईंटों के पहाड़ से बना कर अर्थात् ईंटों की ऊंचाई से बना कर अधिक प्राप्त होता है ।। तिरेपन पंद्रह ।। कैलाशः - क्षेत्र के चौर बनाने पर उस का मान सत्ताइस हाथों का विहित है। पुनः उसके दश विभाग करे तो वह पुण्य वर्धन कैलाश प्रासाद होता है। ब्रह्म-कोष्ठ में इस का गर्भ होता है और शेष से दीवाल के भीतर अन्ध-कारिका अर्थात् गर्भ गृह के चारों ओर जाने वाली प्रदक्षिणा दीवाल होनी है। बार भागों से भद्र तथा दोनों मूल-कर्ण तीन दो भागों से बनाने चाहियें । सात भागों से उठी हुई जंधा और मेखला आधे भाग से बताई गयी है। एक भाग से अन्तरपत्र और झंडक उन्नत होता है। ग्रीवा का अग्र भाग बाला सिखर उत्सेध से दग अंशों से ऊंचा होता है। कैलाश-संज्ञा वाले प्रासाद में स्कन्ध का विस्तार तीन अंशों का ऊंचा होता है । इस अत्तर-पत्र में तो सुताडित सूत्र देकर उस त्रिगुण सूत्र से मनोरम वेणुकोष का आलेखन करें । यह प्रासाद आठ भूमियों की ऊंचाई वाला होता है तथा मञ्जरी मे सुशोभित शोभा वाला कहा गया है और इसकी ऊंचाई वल्याण चाहने वाले को दुगुनी बनवानी चाहिये । आधे भाग में निकला हुआ इसका कै भूमियों वाला भद्र होना चाहिये । सिंह- कर्ण आदि अन्य विच्छित्तियां भी विवेश्य हैं। इस प्रकार से भगवान् शंकर को प्रिय लगने वाला यह प्रासाद कैलाश नाम से विख्यात होता है ।। सोलह --दो सौ तैंतीस ।। सर्वतोभद्र :- अब सर्वतो- भद्र- प्रामद का वर्णन करता हूं । यह सर्वतोभद्र छब्बीस हाथो के परम परिमाण से बनाया जाता है । इस का गर्भ, बाहर की सीमा, दीवालें और अंधकारिकायें, जंघा उत्सेध और दोनों कर्ण जिस प्रकार से मेरू के हैं, वैसे ही वहां पर भी बताये गये हैं। उसी प्रकार से भद्रों के विस्तारों से इसका निकास भी बनाना चाहिये । पहिली रथिका चार भागों से और उस के बाद दूसरी ढ़ाई भागों से निर्मेय हैं। उन सबका परस्पर अन्तर एक दो भाग का बताया गया है। शिखर का विस्तार छै भागो से बनाना चाहिये तथा इसकी ऊंचाई सात भागों से होनी चाहिये । छै भागों से और दश भागों से मूलज अर्थात् पहले स्कन्ध का विस्तार बताया गया है। उत्सेध से ग्रीवा आधे भाग वाली और अण्डक एक भाग की ऊंचाई वाला विहित है । अतः मूल सूत्रानुसार छेद की संयोजना होती है। इसकी रेखा वैसी बनानी चाहिये जो सब कल्याणों का सम्पादन करे । मेरू और इसके अर्थात् सर्वतो-भद्र के श्रृंगों को सिंह-कर्णौ से विभूषित करना चाहिये । सब जगह पद्म-कोषाग्र-तुल्य मंजरी बनानी चाहिये । नम्बन :- नन्दन - प्रासाद की सीमा बत्तीस हाथों से निर्मित होती है। पाठ दो के विभाग से वह चौंसठ पद बाला होता है। चार भागों से इसका गर्भ और शेष से भित्यन्धकारिका बनानी चाहिये । गर्भ के समान ही भद्र बनाना चाहिये और उसका निर्गम उसके ऊपर भाग से होता है। फिर सब भोर से कर्ण -सूत्र से बगल में दो रथों का निर्माण करना चाहिये । पांच भागों से उठी हुई गंधा और एक भाग के प्रमाण से मेखला। छं भूमि वाला यह प्रासाद गोल है और ये प्रत्येक भूमियां बारह दो अंश वाली होती हैं। इसकी रेखा, स्कन्ध, अण्डक आदि का भाकार कैलाश प्रासाद के समान होता है। यह नन्दन श्रानन्द देने वाला भौर सव भापत्तियों को नष्ट करने वाला होता है ।। चार सौ इकहत्तर-पाँच सौ तेईस ॥ स्वस्तिक : - पच्चीस हाथ वाले क्षेत्र को चौकोर बना लेने पर फिर दिङ्-सामुख्यानुरूप सूत्रपात करना चाहिये । तदनन्तर सीमा के आधे सूत्र से ठीक तरह से वृत्त खींचना चाहिये । उसके बाद अठ्ठाईस भागों से उसको यथा-पद विभाजित करना चाहिये । उसके माधे से दिग्सूत्र-संश्रित शालाओं का निर्माण करना चाहिये। उनके बीच में एक दो के तीन रथ बनवाने चाहियें । और अन्य शालाकर्णसमश्रित अर्ध-रथों का भी निर्माण करना चाहिये । जंघा के भागों से उठी होनी चाहिये और आधे भाग से तो मेखला कही गयी है। एक भाग से अन्तरपत्र तथा मण्डक भी एक भाग से होता चाहिये । भाधे भाग से उठी हुई ग्रीवा होनी चाहिये और उसका विष्कम्भ चार पदों का होता है । शिखर की ऊंचाई ग्यारह भागों से कही गई है। सभी शिखरों की रचना में लताकल्पन विहित है। स्कम्बादि के विस्तार में द्विमुण-सूत्र का प्रमाण होता है। षड्गुण सूत्र भी यहां अभीष्ट है। खूब तान कर पर्यात् खींच कर षड्गुण-सूत्र से पप कोष का आलेखन करना चाहिये । वह ज्येष्ठ अर्थात् उत्तम पच्चीस हाय वाला, मध्यम सोलह हाथ वाला, अषम बारह हाथ वाला प्रशस्त होता है। ज्येष्ठ की भाग संख्या के प्राधे से मध्यम और मध्यम के भाषे से प्रथम की भागसंख्या कही गयी है । छे भाग की प्रमाण वाली, उत्तम की बंधा बताई गई है - तथा मध्यम और निकृष्ट में वह बंधा सात भागों से ऊंची होती है। सब लतियों का क्षेत्र के द्वारा यह विधान बताया गया है। इस प्रकार मनुष्यों का कल्याण और मंगल करने वाला स्वस्तिक नाम से यह समाख्यात होता है।। बावन-तेरह॥ मुक्त कोण :- भब मुक्त कोण नामक आसाद का लक्षण कहता हूं। वह - तीन तरह का होता है - सोलह, बारह तथा माठ भागों से क्रमशः ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ-भेद से मुक्त कोण नाम का प्रासाद होता है। -मुक्त-कोण और स्वस्तिक
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Fact Check: डिजिटल इंडिया के तहत मोबाइल Wi-fi नेटवर्क टावर लगा रही सरकार, जानिए वायरल लेटर का सच?
नई दिल्ली, 30 जुलाईः सोशल मीडिया के इस दौर में सूचनाओं के साथ-साथ अफवाहों की भी भरमार है। लोग भी ऐसी फेक न्यूज के चक्कर में आकर फंस जाते हैं। अब ऐसी ही एक खबर इंटरनेट पर जमकर वायरल हो रही है। जिसमें दावा किया जा रहा है कि डिजिटल इंडिया के तहत केंद्र सरकार वाई-फाई टावर लगवा रही है। आखिर क्या है इस वायरल पोस्टर की सच्चाई, जानिए हकीकत?
जानिए वायरल लेटर में क्या लिखा है?
सोशल मीडिया पर हाईटेक मोबाइल के नाम से एक एग्रीमेंट लेटर वायरल हो रहा है, जिसमें दावा करते हुए लिखा है कि "यह पत्र आपके (मोबाइल वाई-फाई) नेटवर्क डिजिटल इंडिया की तरफ से भेजा गया है। आपको सूचित किया जाता है कि आपके ग्राम सभा में आपके जगह को (वाई-फाई डिजिटल इंडिया) के तहत नेटवर्क द्वारा सर्वे टीम उस जगह की जांच पड़ताल करके (फ्रीक्वेंसी) चेककर लिया गया है, जगह आपके नाम पर पास है। ऐसा सुरक्षा कि दृष्टि एवं दूसरी कंपनियों के नेटवर्क को ध्यान में रखते हुए किया गया है। "
एक पत्र में दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार @_DigitalIndia मोबाईल वाई-फाई नेटवर्क के तहत टॉवर लगा रही है, जिसके आवेदन शुल्क के रूप में ₹ 740 जमा करने होंगे#PIBFactCheck:
लेटर में आगे बताया गया है कि आपको सूचित किया जाता है कि जिस जगह पर (वाई-फाई नेटवर्क) लगेगा उस जगह पर किराए के रूप में प्रतिमाह 25000/- रुपए जगह के एडवांस के रुपए में कम्पनी 30 लाख रुपए और 20 वर्षों का कोर्ट एग्रीमेंट व एक व्यक्ति को स्थाई कर्मचारी के रुप में नौकरी दी जाती है, जिन्हें प्रति महीने 25000 रुपए दिए जाएंगे। उनकी योग्यता 10वीं पास होना अनिवार्य है। किराया प्रतिवर्ष 10 फीसदी तक बढ़ाया जाएगा। "
वायरल लेटर में टावर लगवाने के नाम पर नौकरी और किराया देने की बात कही जा रही है। वहीं योजना के नाम पर लोगों से पैसे मांगे जा रहे हैं। इस वायरल मैसेज पर पीआईबी फैक्ट चेक ने ट्ववीट करते हुए इसकी असलियत लोगों को बताई है। पीआईबी फैक्ट चेक ने ट्वीट करते हुए बताया कि "एक पत्र में दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार डिजिटल इंडिया मोबाइल वाई-फाई नेटवर्क के तहत टॉवर लगा रही है, जिसके आवेदन शुल्क के रूप में ₹ 740 जमा करने होंगे। " यह दावा फर्जी है। यह पत्र भारत सरकार द्वारा जारी नहीं किया गया है। यह धोखाधड़ी का एक प्रयास है। इसी के साथ लोगों से ऐसी अफवाहों से बचने की भी अपील की है।
डिजिटल इंडिया वाईफाई मोबाइल टावर इंस्टालेशन के लिए एक लेटर वायरल हो रहा है, जिसमें नौकरी और किराया देने की बात कही गई है।
पीआईबी फैक्ट चेक ने ट्वीट करते हुए बताया कि यह लेटर पूरी तरह से फेक है।
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Fact Check: डिजिटल इंडिया के तहत मोबाइल Wi-fi नेटवर्क टावर लगा रही सरकार, जानिए वायरल लेटर का सच? नई दिल्ली, तीस जुलाईः सोशल मीडिया के इस दौर में सूचनाओं के साथ-साथ अफवाहों की भी भरमार है। लोग भी ऐसी फेक न्यूज के चक्कर में आकर फंस जाते हैं। अब ऐसी ही एक खबर इंटरनेट पर जमकर वायरल हो रही है। जिसमें दावा किया जा रहा है कि डिजिटल इंडिया के तहत केंद्र सरकार वाई-फाई टावर लगवा रही है। आखिर क्या है इस वायरल पोस्टर की सच्चाई, जानिए हकीकत? जानिए वायरल लेटर में क्या लिखा है? सोशल मीडिया पर हाईटेक मोबाइल के नाम से एक एग्रीमेंट लेटर वायरल हो रहा है, जिसमें दावा करते हुए लिखा है कि "यह पत्र आपके नेटवर्क डिजिटल इंडिया की तरफ से भेजा गया है। आपको सूचित किया जाता है कि आपके ग्राम सभा में आपके जगह को के तहत नेटवर्क द्वारा सर्वे टीम उस जगह की जांच पड़ताल करके चेककर लिया गया है, जगह आपके नाम पर पास है। ऐसा सुरक्षा कि दृष्टि एवं दूसरी कंपनियों के नेटवर्क को ध्यान में रखते हुए किया गया है। " एक पत्र में दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार @_DigitalIndia मोबाईल वाई-फाई नेटवर्क के तहत टॉवर लगा रही है, जिसके आवेदन शुल्क के रूप में सात सौ चालीस रुपया जमा करने होंगे#PIBFactCheck: लेटर में आगे बताया गया है कि आपको सूचित किया जाता है कि जिस जगह पर लगेगा उस जगह पर किराए के रूप में प्रतिमाह पच्चीस हज़ार/- रुपए जगह के एडवांस के रुपए में कम्पनी तीस लाख रुपए और बीस वर्षों का कोर्ट एग्रीमेंट व एक व्यक्ति को स्थाई कर्मचारी के रुप में नौकरी दी जाती है, जिन्हें प्रति महीने पच्चीस हज़ार रुपयापए दिए जाएंगे। उनकी योग्यता दसवीं पास होना अनिवार्य है। किराया प्रतिवर्ष दस फीसदी तक बढ़ाया जाएगा। " वायरल लेटर में टावर लगवाने के नाम पर नौकरी और किराया देने की बात कही जा रही है। वहीं योजना के नाम पर लोगों से पैसे मांगे जा रहे हैं। इस वायरल मैसेज पर पीआईबी फैक्ट चेक ने ट्ववीट करते हुए इसकी असलियत लोगों को बताई है। पीआईबी फैक्ट चेक ने ट्वीट करते हुए बताया कि "एक पत्र में दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार डिजिटल इंडिया मोबाइल वाई-फाई नेटवर्क के तहत टॉवर लगा रही है, जिसके आवेदन शुल्क के रूप में सात सौ चालीस रुपया जमा करने होंगे। " यह दावा फर्जी है। यह पत्र भारत सरकार द्वारा जारी नहीं किया गया है। यह धोखाधड़ी का एक प्रयास है। इसी के साथ लोगों से ऐसी अफवाहों से बचने की भी अपील की है। डिजिटल इंडिया वाईफाई मोबाइल टावर इंस्टालेशन के लिए एक लेटर वायरल हो रहा है, जिसमें नौकरी और किराया देने की बात कही गई है। पीआईबी फैक्ट चेक ने ट्वीट करते हुए बताया कि यह लेटर पूरी तरह से फेक है।
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कई बार हमार पास ऐसे लोगों के फोन आते हैं जिनसे हम बात नहीं करना चाहते हैं। इनमें कस्टमर केयर का नाम सबसे ऊपर आता है। या फिर किसी ऐसे व्यक्ति का फोन आता है जो जान-बूझकर आपको परेशान करने के लिए फोन करते हैं। इस परेशानी से निजात पाने के लिए आप अपने स्मार्टफोन में ऐसे नंबर्स को ब्लॉक कर सकते हैं। इसे एक्टिव करने का तरीका काफी आसान है। एक बार ब्लॉक करने के बाद इसे अनब्लॉक भी किया जा सकता है। इस पोस्ट में हम आपको कॉल को ब्लॉक और अनब्लॉक करने का तरीका बता रहे हैं।
कॉल लिस्ट से कैसे करें ब्लॉकः
- सबसे पहले फोन ऐप को ओपन करें। अब जिस नंबर को ब्लॉक करना है उसे सेलेक्ट करें।
- अब जो स्क्रीन ओपन होगी उसमें उस नंबर की जानकारी दी गई होगी। यहां सबसे ऊपर तीन डॉट्स दिए गए होंगे इसमें ब्लॉक का विकल्प मिलेगा। यहां आपको ब्लॉक पर टैप करना होगा। इससे वो नंबर ब्लॉक हो जाएगा।
सेव नंबर को कैसे करें ब्लॉकः
- इसके लिए आपको कॉन्टेक्ट लिस्ट में जाना होगा। इसका तरीका बिल्कुल ऊपर वाले तरीके जैसा है।
- जिस नंबर को ब्लॉक करना है उसे सेलेक्ट करें। यहां सबसे ऊपर तीन डॉट्स दिए गए होंगे इसमें ब्लॉक का विकल्प मिलेगा। यहां आपको ब्लॉक पर टैप करना होगा। इससे वो नंबर ब्लॉक हो जाएगा।
जानें कैसे करें अनब्लॉकः
- सबसे पहले फोनबुक ओपन करें। राइट साइड में सबसे ऊपर तीन डॉट दिए गए होंगे इन्हें टैप करें।
- अब सेटिंग्स पर क्लिक करें। यहां आपको ब्लॉक नंबर्स की लिस्ट का विकल्प मिलेगा। इसे ओपन करें।
- अब आप जिसे अनब्लॉक करना चाहते हैं उसे यहां से अनब्लॉक कर सकते हैं।
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कई बार हमार पास ऐसे लोगों के फोन आते हैं जिनसे हम बात नहीं करना चाहते हैं। इनमें कस्टमर केयर का नाम सबसे ऊपर आता है। या फिर किसी ऐसे व्यक्ति का फोन आता है जो जान-बूझकर आपको परेशान करने के लिए फोन करते हैं। इस परेशानी से निजात पाने के लिए आप अपने स्मार्टफोन में ऐसे नंबर्स को ब्लॉक कर सकते हैं। इसे एक्टिव करने का तरीका काफी आसान है। एक बार ब्लॉक करने के बाद इसे अनब्लॉक भी किया जा सकता है। इस पोस्ट में हम आपको कॉल को ब्लॉक और अनब्लॉक करने का तरीका बता रहे हैं। कॉल लिस्ट से कैसे करें ब्लॉकः - सबसे पहले फोन ऐप को ओपन करें। अब जिस नंबर को ब्लॉक करना है उसे सेलेक्ट करें। - अब जो स्क्रीन ओपन होगी उसमें उस नंबर की जानकारी दी गई होगी। यहां सबसे ऊपर तीन डॉट्स दिए गए होंगे इसमें ब्लॉक का विकल्प मिलेगा। यहां आपको ब्लॉक पर टैप करना होगा। इससे वो नंबर ब्लॉक हो जाएगा। सेव नंबर को कैसे करें ब्लॉकः - इसके लिए आपको कॉन्टेक्ट लिस्ट में जाना होगा। इसका तरीका बिल्कुल ऊपर वाले तरीके जैसा है। - जिस नंबर को ब्लॉक करना है उसे सेलेक्ट करें। यहां सबसे ऊपर तीन डॉट्स दिए गए होंगे इसमें ब्लॉक का विकल्प मिलेगा। यहां आपको ब्लॉक पर टैप करना होगा। इससे वो नंबर ब्लॉक हो जाएगा। जानें कैसे करें अनब्लॉकः - सबसे पहले फोनबुक ओपन करें। राइट साइड में सबसे ऊपर तीन डॉट दिए गए होंगे इन्हें टैप करें। - अब सेटिंग्स पर क्लिक करें। यहां आपको ब्लॉक नंबर्स की लिस्ट का विकल्प मिलेगा। इसे ओपन करें। - अब आप जिसे अनब्लॉक करना चाहते हैं उसे यहां से अनब्लॉक कर सकते हैं।
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पाली जिले के नेशनल हाईवे 162 पर ब्यावर-पाली के बीच बसे एक छोटे से गांव रायपुर आज साफ-सफाई के मामले में मिशाल बन गया हैं। छह हजार के घरों की आबादी वाले इस गांव में अब सड़क पर कचरा नजर नहीं आता। सड़कें साफ धुली हुई नजर आती हैं। यह सब संभव हुआ सरपंच प्रेमीदेवी की सराहनीय पहल पर।
रायपुर गांव के लोगों ने अपनी सहभागिता से अब कचरा सड़कों पर डालने वाले पर अंकुश लगाने की कवायद भी शुरू की गई है। अब सड़क पर कचरा डालने वालों पर पहली बार 500 रुपए का जुर्माना और फिर से उल्लंघन करने पर 5000 हजार रुपए जुर्माना लगाना तय किया है। इसके लिए गांव के सभी ग्रामीण सहभागिता निभा रहे हैं। जिससे अब रायपुर भी शहरों की तर्ज पर साफ-सुथरा नजर आने लगा हैं।
(फोटो-वीडियो - आनंदसिंह, रायपुर-मारवाड़)
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पाली जिले के नेशनल हाईवे एक सौ बासठ पर ब्यावर-पाली के बीच बसे एक छोटे से गांव रायपुर आज साफ-सफाई के मामले में मिशाल बन गया हैं। छह हजार के घरों की आबादी वाले इस गांव में अब सड़क पर कचरा नजर नहीं आता। सड़कें साफ धुली हुई नजर आती हैं। यह सब संभव हुआ सरपंच प्रेमीदेवी की सराहनीय पहल पर। रायपुर गांव के लोगों ने अपनी सहभागिता से अब कचरा सड़कों पर डालने वाले पर अंकुश लगाने की कवायद भी शुरू की गई है। अब सड़क पर कचरा डालने वालों पर पहली बार पाँच सौ रुपयापए का जुर्माना और फिर से उल्लंघन करने पर पाँच हज़ार हजार रुपए जुर्माना लगाना तय किया है। इसके लिए गांव के सभी ग्रामीण सहभागिता निभा रहे हैं। जिससे अब रायपुर भी शहरों की तर्ज पर साफ-सुथरा नजर आने लगा हैं। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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बॉलीवुड और हॉलीवुड में अपने अभिनय का झंडा गाड़ने वाली दीपिका को लव, एक्शन करते जरूर देखा होगा पर पुलिस के किरदार में दीपिका पहली बार दिखी हैं.
पीपिंग मून के सूत्र ने ये खुलासा किया कि दीपिका जिसकी शूटिंग कर रही थी वो कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं है. 'पद्मावत' की रानी पद्मिनी शनिवार को मुंबई की फिल्म में स्थित आर्य कॉलोनी में ऐड फिल्म का शूट कर रही थी, वहीं कैमरे में उन्हें कैद कर लिया गया. ऐसा बताया जा रहा है कि ये ऐड फेमस वेबसाइट Goibibo के लिए किया जा रहा है. इसमें दीपिका एक ट्रैफिक कॉस्टेबल के किरदार में नजर आ रही हैं. दीपिका एक टपोरी स्टाइल में दिख रहीं हैं, हाथ पर लाल रंग का रुमाल बांधा हुआ है.
मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस अमितेश कुमार ने कहा कि पुलिस जीप पर ऐसे पुलिस कर्मचारी को आराम करते देख किसी को भी खुशी नहीं होगी पर ये विज्ञापन का हिस्सा है जिसमें दीपिका को आराम करने वाला कॉन्स्टेबल का रोल करते दिखाया गया है जो कि स्क्रिप्ट की मांग है.
अब सबको दीपिका के इस ऐड का बेसब्री से इंतजार है. देखना घूमर करने वाली 'मस्तानी' पुलिस का डंडा घूमाती हुए कैसी लगेंगी.
आपको बता दें कि दीपिका की फिल्म 'पद्मावत' को लेकर बीते कुछ महीने से विवाद चल रहा था. इसके चलते फिल्म की रिलीज डेट को भी टालना पड़ा. अब सेंसर बोर्ड की ओर से फिल्म में कुछ कट लगाकर और नाम में संशोधन करके रविवार को अधिकारिक तौर पर फिल्म के रिलीज के तारीख की घोषणा कर दी गई है. ये फिल्म 25 जनवरी 2018 को रिलीज होगी.
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बॉलीवुड और हॉलीवुड में अपने अभिनय का झंडा गाड़ने वाली दीपिका को लव, एक्शन करते जरूर देखा होगा पर पुलिस के किरदार में दीपिका पहली बार दिखी हैं. पीपिंग मून के सूत्र ने ये खुलासा किया कि दीपिका जिसकी शूटिंग कर रही थी वो कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं है. 'पद्मावत' की रानी पद्मिनी शनिवार को मुंबई की फिल्म में स्थित आर्य कॉलोनी में ऐड फिल्म का शूट कर रही थी, वहीं कैमरे में उन्हें कैद कर लिया गया. ऐसा बताया जा रहा है कि ये ऐड फेमस वेबसाइट Goibibo के लिए किया जा रहा है. इसमें दीपिका एक ट्रैफिक कॉस्टेबल के किरदार में नजर आ रही हैं. दीपिका एक टपोरी स्टाइल में दिख रहीं हैं, हाथ पर लाल रंग का रुमाल बांधा हुआ है. मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस अमितेश कुमार ने कहा कि पुलिस जीप पर ऐसे पुलिस कर्मचारी को आराम करते देख किसी को भी खुशी नहीं होगी पर ये विज्ञापन का हिस्सा है जिसमें दीपिका को आराम करने वाला कॉन्स्टेबल का रोल करते दिखाया गया है जो कि स्क्रिप्ट की मांग है. अब सबको दीपिका के इस ऐड का बेसब्री से इंतजार है. देखना घूमर करने वाली 'मस्तानी' पुलिस का डंडा घूमाती हुए कैसी लगेंगी. आपको बता दें कि दीपिका की फिल्म 'पद्मावत' को लेकर बीते कुछ महीने से विवाद चल रहा था. इसके चलते फिल्म की रिलीज डेट को भी टालना पड़ा. अब सेंसर बोर्ड की ओर से फिल्म में कुछ कट लगाकर और नाम में संशोधन करके रविवार को अधिकारिक तौर पर फिल्म के रिलीज के तारीख की घोषणा कर दी गई है. ये फिल्म पच्चीस जनवरी दो हज़ार अट्ठारह को रिलीज होगी.
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माइक्रोसॉफ्ट विंडोज सुरक्षा दल ने गूगल क्रोम में एक रिमोट सुरक्षा चूक की पहचान की है, जिसका इस्तेमाल हैकर्स द्वारा किया जा सकता है.
माइक्रोसॉफ्ट के आक्रामक सुरक्षा अनुसंधान दल के सदस्य जॉर्डन रबेट ने गुरुवार देर रात एक ब्लॉग पोस्ट में कहा, "हमारे द्वारा खोजे गए 'सीवीई-2017-5121' से पता चलता है कि आधुनिक ब्राउसरों में भी दूर से हैक किए जाने लायक सुरक्षा खामियां (सेंधमारी के रास्ते) व्याप्त है. क्रोम में भी ऐसे ही बग का पता चला है. "
एनगैजेट की शुक्रवार को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक गूगल ने तुरंत गिटहब पर इसे सुधारने का तरीका साझा किया.
रिपोर्ट में कहा गया, "माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, गूगल द्वारा सुझाया तरीका लागू करने के बावजूद यह सुरक्षा चूक पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ है. माइक्रोसॉफ्ट का मानना है कि इसे लोगों की जानकारी में आने से पहले ही ठीक कर देना चाहिए था. "
माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के बीच एक दूसरे के उत्पादों के सुरक्षा चूक को सामने लाने की घटना नई नहीं है.
पिछले साल गूगल ने माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज में इसी प्रकार की एक बड़ी चूक का खुलासा किया था, जिसका समाधान कंपनी करने ही वाली थी.
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माइक्रोसॉफ्ट विंडोज सुरक्षा दल ने गूगल क्रोम में एक रिमोट सुरक्षा चूक की पहचान की है, जिसका इस्तेमाल हैकर्स द्वारा किया जा सकता है. माइक्रोसॉफ्ट के आक्रामक सुरक्षा अनुसंधान दल के सदस्य जॉर्डन रबेट ने गुरुवार देर रात एक ब्लॉग पोस्ट में कहा, "हमारे द्वारा खोजे गए 'सीवीई-दो हज़ार सत्रह-पाँच हज़ार एक सौ इक्कीस' से पता चलता है कि आधुनिक ब्राउसरों में भी दूर से हैक किए जाने लायक सुरक्षा खामियां व्याप्त है. क्रोम में भी ऐसे ही बग का पता चला है. " एनगैजेट की शुक्रवार को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक गूगल ने तुरंत गिटहब पर इसे सुधारने का तरीका साझा किया. रिपोर्ट में कहा गया, "माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, गूगल द्वारा सुझाया तरीका लागू करने के बावजूद यह सुरक्षा चूक पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ है. माइक्रोसॉफ्ट का मानना है कि इसे लोगों की जानकारी में आने से पहले ही ठीक कर देना चाहिए था. " माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के बीच एक दूसरे के उत्पादों के सुरक्षा चूक को सामने लाने की घटना नई नहीं है. पिछले साल गूगल ने माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज में इसी प्रकार की एक बड़ी चूक का खुलासा किया था, जिसका समाधान कंपनी करने ही वाली थी.
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अमरावती/दि. 4- मेडिकल व्यवसायी उमेश कोल्हे हत्याकांड को लेकर अब सामने आ रही जानकारियों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व जिला पालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने कहा कि, इस हत्याकांड में कहीं न कहीं नुपुर शर्मावाला मामला जुडा हुआ है. यह संदेह पहले दिन से ही व्यक्त किया जा रहा था. जिसे लेकर हमने स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपनी ओर से अवगत भी कराया था. लेकिन पुलिस शुरूआत से उसे लूटपाट के चलते हुई घटना बता रही थी. परंतू गनिमत है कि, इस मामले की जांच एनआईए को सौंप दी गई है. जिसके चलते यह मामला सबके सामने उजागर हुआ है.
पूर्व ेपालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने कहा कि, अमरावती में उमेश कोल्हे को 21 जून की रात बडी बेरहमी के साथ गला काटकर मौत के घाट उतारा गया. जिसके बाद हत्याकांड की वजह को लेकर शहर पुलिस ने रहस्यमय चुप्पी साध ली थी. साथ ही साथ अन्य लोगों को भी इस पर कोई बात नहीं करने की सख्त हिदायत दी थी. लेकिन इसके बाद उदयपुर में इसी तरह की घटना घटित हुई. जिसके चलते केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अमरावती की घटना को भी गंभीरतापूर्वक लेते हुए मामले की जांच करने हेतु एनआईए की टीम को अमरावती भेजा और एनआईए की टीम के अमरावती आते ही स्थानीय पुलिस कहीं अधिक सक्रिय हुई. जिसके बाद एक ही दिन में हत्या की मुख्य वजह सामने आ गई. ऐसे में अब इस मामले की भी जांच होनी चाहिए कि, आखिर अमरावती पुलिस इतने दिनों से इस हत्याकांड की वजहों को क्यों दबाने या छिपाने का प्रयास कर रही थी.
पूर्व पालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने यह भी कहा कि, किसी भी धर्म अथवा धर्मगुरू का अपमान निश्चित तौर पर समर्थनीय नहीं है, लेकिन इस वजह को लेकर किसी की निर्मम हत्या किये जाने का भी समर्थन नहीं किया जा सकता. ऐसे में इस तरह की कट्टरवादी ताकतों को समय रहते रोका जाना चाहिए.
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अमरावती/दि. चार- मेडिकल व्यवसायी उमेश कोल्हे हत्याकांड को लेकर अब सामने आ रही जानकारियों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व जिला पालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने कहा कि, इस हत्याकांड में कहीं न कहीं नुपुर शर्मावाला मामला जुडा हुआ है. यह संदेह पहले दिन से ही व्यक्त किया जा रहा था. जिसे लेकर हमने स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपनी ओर से अवगत भी कराया था. लेकिन पुलिस शुरूआत से उसे लूटपाट के चलते हुई घटना बता रही थी. परंतू गनिमत है कि, इस मामले की जांच एनआईए को सौंप दी गई है. जिसके चलते यह मामला सबके सामने उजागर हुआ है. पूर्व ेपालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने कहा कि, अमरावती में उमेश कोल्हे को इक्कीस जून की रात बडी बेरहमी के साथ गला काटकर मौत के घाट उतारा गया. जिसके बाद हत्याकांड की वजह को लेकर शहर पुलिस ने रहस्यमय चुप्पी साध ली थी. साथ ही साथ अन्य लोगों को भी इस पर कोई बात नहीं करने की सख्त हिदायत दी थी. लेकिन इसके बाद उदयपुर में इसी तरह की घटना घटित हुई. जिसके चलते केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अमरावती की घटना को भी गंभीरतापूर्वक लेते हुए मामले की जांच करने हेतु एनआईए की टीम को अमरावती भेजा और एनआईए की टीम के अमरावती आते ही स्थानीय पुलिस कहीं अधिक सक्रिय हुई. जिसके बाद एक ही दिन में हत्या की मुख्य वजह सामने आ गई. ऐसे में अब इस मामले की भी जांच होनी चाहिए कि, आखिर अमरावती पुलिस इतने दिनों से इस हत्याकांड की वजहों को क्यों दबाने या छिपाने का प्रयास कर रही थी. पूर्व पालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटील ने यह भी कहा कि, किसी भी धर्म अथवा धर्मगुरू का अपमान निश्चित तौर पर समर्थनीय नहीं है, लेकिन इस वजह को लेकर किसी की निर्मम हत्या किये जाने का भी समर्थन नहीं किया जा सकता. ऐसे में इस तरह की कट्टरवादी ताकतों को समय रहते रोका जाना चाहिए.
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Phulparas Vidhan Sabha Election Result 2020, News Updates: बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में मधुबनी जिला के विधानसभा क्रम संख्या 39 फुलपरास सीट पर जदयू की शीला मंडल ने जीत दर्ज कर ली है. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के कृपानाथ पाठक को हरा दिया है. शीला मंडल को कुल 74919 मत प्राप्त हुए हैं, जबकि दूसरे स्थान पर रहे कृपानाथ पाठक को 63721 मत मिले.
फुलपरास विधानसभा सीट पर जदयू ने शीला मंडल को टिकट दिया था. वहीं, कांग्रेस ने कृपानाथ पाठक को, लोजपा ने विनोद कुमार सिंह को प्रत्याशी बनाया था. वहीं, जदयू कोटे से निवर्तमान विधायक गुलजार देवी ने पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय लड़ने का फैसला किया था.
पिछले चुनावों की बात करें, तो 2015 में जदयू के टिकट पर लड़ी गुलजार देवी ने 64368 वोटों के साथ जीत दर्ज की थी. वहीं, दूसरे स्थान पर रहे भाजपा के राम सुंदर को 50953 वोट मिले थे.
2010 के चुनाव में भी इस सीट से जदयू की गुलजार देवी विधायक चुनी गई थीं. उन्होंने राजद के वीरेंद्र कुमार को हराया था. गुलजार देवी को 36113 मत मिले थे. वहीं, वीरेंद्र कुमार ने 23769 वोट हासिल किये थे.
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Phulparas Vidhan Sabha Election Result दो हज़ार बीस, News Updates: बिहार विधानसभा चुनाव दो हज़ार बीस में मधुबनी जिला के विधानसभा क्रम संख्या उनतालीस फुलपरास सीट पर जदयू की शीला मंडल ने जीत दर्ज कर ली है. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के कृपानाथ पाठक को हरा दिया है. शीला मंडल को कुल चौहत्तर हज़ार नौ सौ उन्नीस मत प्राप्त हुए हैं, जबकि दूसरे स्थान पर रहे कृपानाथ पाठक को तिरेसठ हज़ार सात सौ इक्कीस मत मिले. फुलपरास विधानसभा सीट पर जदयू ने शीला मंडल को टिकट दिया था. वहीं, कांग्रेस ने कृपानाथ पाठक को, लोजपा ने विनोद कुमार सिंह को प्रत्याशी बनाया था. वहीं, जदयू कोटे से निवर्तमान विधायक गुलजार देवी ने पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय लड़ने का फैसला किया था. पिछले चुनावों की बात करें, तो दो हज़ार पंद्रह में जदयू के टिकट पर लड़ी गुलजार देवी ने चौंसठ हज़ार तीन सौ अड़सठ वोटों के साथ जीत दर्ज की थी. वहीं, दूसरे स्थान पर रहे भाजपा के राम सुंदर को पचास हज़ार नौ सौ तिरेपन वोट मिले थे. दो हज़ार दस के चुनाव में भी इस सीट से जदयू की गुलजार देवी विधायक चुनी गई थीं. उन्होंने राजद के वीरेंद्र कुमार को हराया था. गुलजार देवी को छत्तीस हज़ार एक सौ तेरह मत मिले थे. वहीं, वीरेंद्र कुमार ने तेईस हज़ार सात सौ उनहत्तर वोट हासिल किये थे.
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नीपर का प्रक्षेपण रात में सामरिक मिसाइल बलों की लड़ाकू गणना द्वारा किया गया था। लॉन्च के बाद 16 में सभी अंतरिक्ष यान कैरियर से अलग हो गए।
दूसरों के बीच, स्पुतनिक द्वारा निर्मित पहला निजी रूसी उपग्रह, टेबलेट्सैट-अरोरा को कक्षा में लॉन्च किया गया था। इसका वजन 26,2 किलो है, अनुमानित (न्यूनतम) सेवा जीवन 1 वर्ष है। डिवाइस का उपयोग निजी कंपनी के हितों में पृथ्वी की सतह के रिमोट सेंसिंग के लिए किया जाएगा। डिजाइनरों ने इसे रूसी प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके बनाया, आयातित घटकों को यथासंभव प्रतिस्थापित किया। उपग्रह की लागत लगभग $ 1 मिलियन थी।
यूनाइटेड रॉकेट एंड स्पेस कॉर्पोरेशन के प्रमुख इगोर कोमारोव ने इस संबंध में कहाः
"पहले रूसी निजी उपग्रह का प्रक्षेपण अंतरिक्ष अन्वेषण में सार्वजनिक-निजी भागीदारी का एक सफल उदाहरण है, और यह स्पष्ट है कि निजी कंपनियां राज्य की भागीदारी के बिना रणनीतिक कार्यों का एहसास नहीं कर सकती हैं। "
"मुझे यकीन है कि उच्च तकनीकी वाहनों के विकास और निर्माण में राज्य और निजी एयरोस्पेस संरचनाओं का सहयोग रूसी प्रतिस्पर्धी प्रौद्योगिकियों के आगे के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन होगा"सिर जोड़ दिया।
स्पुतनिक्स के प्रमुख, आंद्रेई पोटापोव के अनुसार, कंपनी की योजना 6 वर्षों में उपकरण के साथ छोटे उपग्रहों की एक कक्षा बनाने की है जो कि पिक्सेल के साथ 1 मीटर के रिज़ॉल्यूशन के साथ अल्ट्रा-हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग की अनुमति देगा।
Dnepr रूपांतरण कार्यक्रम 1990 में वापस विकसित किया गया था। इसके निर्माण के सर्जक रूस और यूक्रेन के राष्ट्रपति थे। कार्यक्रम ड्यूटी से ली गई वोयेवोडा लड़ाकू मिसाइलों के उपयोग पर आधारित है, जो पूरा होने के बाद अंतरिक्ष यान को कक्षा में पहुंचाती है। लॉन्च रॉकेट का डेवलपर और ऑपरेटर कोस्मोट्रास कंसोर्टियम है, जो रूस, कजाकिस्तान और यूक्रेन का संयुक्त दिमाग है।
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नीपर का प्रक्षेपण रात में सामरिक मिसाइल बलों की लड़ाकू गणना द्वारा किया गया था। लॉन्च के बाद सोलह में सभी अंतरिक्ष यान कैरियर से अलग हो गए। दूसरों के बीच, स्पुतनिक द्वारा निर्मित पहला निजी रूसी उपग्रह, टेबलेट्सैट-अरोरा को कक्षा में लॉन्च किया गया था। इसका वजन छब्बीस,दो किलो है, अनुमानित सेवा जीवन एक वर्ष है। डिवाइस का उपयोग निजी कंपनी के हितों में पृथ्वी की सतह के रिमोट सेंसिंग के लिए किया जाएगा। डिजाइनरों ने इसे रूसी प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके बनाया, आयातित घटकों को यथासंभव प्रतिस्थापित किया। उपग्रह की लागत लगभग एक डॉलर मिलियन थी। यूनाइटेड रॉकेट एंड स्पेस कॉर्पोरेशन के प्रमुख इगोर कोमारोव ने इस संबंध में कहाः "पहले रूसी निजी उपग्रह का प्रक्षेपण अंतरिक्ष अन्वेषण में सार्वजनिक-निजी भागीदारी का एक सफल उदाहरण है, और यह स्पष्ट है कि निजी कंपनियां राज्य की भागीदारी के बिना रणनीतिक कार्यों का एहसास नहीं कर सकती हैं। " "मुझे यकीन है कि उच्च तकनीकी वाहनों के विकास और निर्माण में राज्य और निजी एयरोस्पेस संरचनाओं का सहयोग रूसी प्रतिस्पर्धी प्रौद्योगिकियों के आगे के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन होगा"सिर जोड़ दिया। स्पुतनिक्स के प्रमुख, आंद्रेई पोटापोव के अनुसार, कंपनी की योजना छः वर्षों में उपकरण के साथ छोटे उपग्रहों की एक कक्षा बनाने की है जो कि पिक्सेल के साथ एक मीटर के रिज़ॉल्यूशन के साथ अल्ट्रा-हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग की अनुमति देगा। Dnepr रूपांतरण कार्यक्रम एक हज़ार नौ सौ नब्बे में वापस विकसित किया गया था। इसके निर्माण के सर्जक रूस और यूक्रेन के राष्ट्रपति थे। कार्यक्रम ड्यूटी से ली गई वोयेवोडा लड़ाकू मिसाइलों के उपयोग पर आधारित है, जो पूरा होने के बाद अंतरिक्ष यान को कक्षा में पहुंचाती है। लॉन्च रॉकेट का डेवलपर और ऑपरेटर कोस्मोट्रास कंसोर्टियम है, जो रूस, कजाकिस्तान और यूक्रेन का संयुक्त दिमाग है।
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एक पूर्ण वाक्यांश शब्दों का एक समूह है जो पूरी तरह से एक स्वतंत्र खंड को संशोधित करता है।
एक पूर्ण संज्ञा और उसके संशोधक (जो अक्सर, लेकिन हमेशा नहीं, एक प्रतिभागी या भाग लेने वाले वाक्यांश शामिल होते हैं ) से बना है। मुख्य खंड मुख्य खंड से पहले, अनुसरण या बाधित हो सकता हैः
- नारंगी आकाश के खिलाफ उनके पतले शरीर चिकना और काला, हमारे ऊपर से ऊपर घिरे हुए स्टॉर्क।
- हमारे ऊपर से ऊपर घिरे स्टॉर्क, उनके पतले शरीर नारंगी आकाश के खिलाफ चिकना और काला।
- स्टॉर्क, उनके पतले शरीर नारंगी आकाश के खिलाफ चिकना और काला , हमारे ऊपर से ऊपर घूमते हैं।
एक पूर्ण हमें पूरे व्यक्ति, स्थान या चीज़ के विवरण को एक पहलू या भाग में स्थानांतरित करने की अनुमति देता है। (उदाहरणों और अवलोकनों में मार्था जे। कोल्न की "निरपेक्ष वाक्यांशों के दो शैलियों" देखें। )
ध्यान दें कि पारंपरिक व्याकरण में , पूर्ण (या नामांकित पूर्ण ) अक्सर " संज्ञा वाक्यांशों " के साथ संयुक्त रूप से परिभाषित किए जाते हैं "( मैकमिलन स्वयं को व्याकरण और शैली चौबीस घंटे , 2000 में सिखाएं )। पूर्ण शब्द (लैटिन व्याकरण से उधार लिया जाता है) का प्रयोग शायद ही कभी समकालीन भाषाविदों द्वारा किया जाता है।
लैटिन से, "मुक्त, ढीला, अप्रतिबंधित।
"एक पूर्ण वाक्यांश जो एक फोकसिंग विवरण जोड़ता है, विशेष रूप से कथा लेखन में आम है, जो एक्सपोजिटरी लेखन से कहीं अधिक आम है . . . . . निम्नलिखित अनुच्छेदों में, सभी कथाओं के कार्यों से, कुछ के बाद पोस्ट-संज्ञा संशोधक के रूप में भाग लिया जाता है।
। । ; हालांकि, आप कुछ वाक्यांश वाक्यांशों के साथ कुछ भी देखेंगे, अन्य प्रीपेशनल वाक्यांशों के साथ।
दृष्टि और जूलियन में कोई बस नहीं थी, उसके हाथ अभी भी अपने जेब में जाम कर रहे थे और उसका सिर आगे बढ़ गया, खाली सड़क पर घूम गया।
(फ्लैनेरी ओ'कोनोर, "सबकुछ जो उगता है उसे अभिसरण करना चाहिए")
चुपचाप वे दसवीं स्ट्रीट पर उतर गए जब तक वे एक पत्थर की बेंच तक नहीं पहुंचे जो कि कब्र के पास फुटपाथ से निकल गया। वे वहां रुक गए और बैठे, सफेद पीठ में दो पुरुषों की आंखों पर उनकी पीठ जो उन्हें देख रहे थे ।
(टोनी मॉरिसन, सोलोमन का गीत )
आदमी हंस रहा था, उसके हथियारों पर उसके हथियार ।
(स्टीफन क्रेन, "दुल्हन पीले आकाश के लिए आता है")
अपने दाहिनी ओर घाटी अपनी नींद की सुंदरता में जारी रही, मूक और कम हो गई, इसकी जंगली शरद ऋतु के रंग दूरी से घिरे हुए थे , जो एक कलाकार द्वारा पानी के रंग के रूप में चमकीले थे, जिन्होंने अपने सभी रंग भूरे रंग के साथ मिश्रित किया था।
(जॉयस कैरल ओट्स, "गुप्त विवाह")
"एक विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, पूर्ण वाक्यांश की दूसरी शैली, एक कारण या शर्त बताती हैः
हमारी कार ने इंजन की परेशानी विकसित की है , हम सड़क के किनारे आराम क्षेत्र में रात के लिए रुक गए।
हमने अपनी पिकनिक, मौसम गर्म और स्पष्ट होने का फैसला किया।
पहला उदाहरण एक के रूप में फिर से लिखा जा सकता है क्योंकि- या जब- खंडः
जब हमारी कार ने इंजन की परेशानी विकसित की , तो हमने रोका। । ।
क्योंकि हमारी कार ने इंजन की परेशानी विकसित की , हम रुक गए। । ।
पूर्ण लेखक को पूरी धारा के स्पष्टीकरण के बिना जानकारी शामिल करने की अनुमति देता है; पूर्ण, तब, दोनों अर्थों के साथ, जब और क्योंकि दोनों के रूप में सोचा जा सकता है। दूसरे उदाहरण में मौसम के बारे में पूर्ण कारण किसी कारण की बजाय एक परिचर की स्थिति का सुझाव देता है। "
(मार्था कोल्न, रेटोरिकल व्याकरणः ग्रामैटिकल चॉइस, रेटोरिकल इफेक्ट्स , 5 वां संस्करण। पियरसन, 2007)
"निरपेक्ष परंपराओं को नाममात्र कहा जाता है क्योंकि पूर्ण निर्माण एक संज्ञा वाक्यांश के साथ अपने हेडवर्ड के रूप में शुरू होता है।
फिर भी, वे वाक्य संशोधक के रूप में adverbially काम करते हैं। कुछ [पूर्ण] मुख्य खंड में वर्णित कार्रवाई के कारणों या शर्तों की व्याख्या करते हैं; अन्य । । जिस तरीके से मुख्य खंड की कार्रवाई की जाती है उसका वर्णन करें। "
(थॉमस पी। क्लेमर, मुरियल आर। शूलज़, और एंजेला डेला वोल्पे, अंग्रेजी व्याकरण का विश्लेषण , 5 वां संस्करण। लोंगमैन, 2007)
- "रॉय एक मिसिसिपी स्टीमबोट की तरह बेस, रोशनी जलाया, झटके झुकाव , सीटी बजती है , मोड़ के चारों ओर आती है। "
(बर्नार्ड मालमुड, द नेचुरल , 1 9 52)
- "हैरी जम गई, उसकी काट उंगली फिर से दर्पण के किनारे किनारे पर फिसल गई । "
(जेके रोउलिंग, हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोज़ । स्कॉलास्टिक, 2007)
- "बोलेनसीक्वाज़ अब फर्श पर घूर रहा था, सोचने की कोशिश कर रहा था, उसका बड़ा झुका हुआ था , उसके विशाल हाथ एक साथ रगड़ रहे थे, उसका चेहरा लाल था । "
(जेम्स थर्बर, "विश्वविद्यालय दिवस")
- "मकड़ी की खाल उनके पक्षों, पारदर्शी और घबराहट, उनके पैरों को नट्स में सूखने पर झूठ बोलती है। "
(एनी डिलार्ड, होली द फर्म , 1 9 77)
- " उनके नंगे पैर स्पिंकलर, पंख और रसीला घास पर उनके नंगे पैर, और उनके मोबाइल फोन उनके हाथ में ठंडा हो गए थे (वह लियोनेल के सम्मन की प्रतीक्षा कर रहे थे), देस ने मैदान के चारों ओर एक मोड़ लिया। "
(मार्टिन अमीस, लियोनेल असबोः इंग्लैंड राज्य । अल्फ्रेड ए। कोंफ, 2012)
- "जब जॉनसन मीचम अपने बैंगनी डबल-चौड़े ट्रेलर के तीन कदम उठाए और सामने वाले दरवाजे को खोला, तो उनकी पत्नी, माबेल, उनके लिए इंतज़ार कर रही थीं, उसके पतले हाथ उसके कूल्हों पर गिर गए थे , उसके रंग के बाल एक छोटे से अपने खोपड़ी से खड़े थे नीला बादल । "
(हैरी क्रूज़, उत्सव । साइमन एंड शूस्टर, 1 99 8)
- "छह लड़के उस दोपहर के शुरू में आधा घंटे पहाड़ी पर आए, कड़ी मेहनत कर रहे थे, उनके सिर नीचे थे, उनके अग्रभाग काम कर रहे थे, उनकी सांस सीटी थी । "
(जॉन स्टीनबेक, द रेड टट्टू )
- "जब भी आपने शहर में कहीं भी दूर संगीत सुना, तो शायद आपको लगता है कि आपने कल्पना की है, इतनी पतली है कि आपने स्ट्रीटकार तारों की सीटी को दोषी ठहराया है, तो आप ध्वनि को ट्रैक कर सकते हैं और कालेब को अपने छोटे velocipede straddling, खुशी के साथ भाषणहीन, उसकी एप्पल की आंखों नृत्य । "
(ऐनी टायलर, कैलेब के लिए खोज रहे हैं । अल्फ्रेड ए। कोंफ, 1 9 75)
- "फिर भी वह कंधे पर शिकार कर रहा था, मुंह से मुकाबला कर रहा था , अपने हाथों को झुका रहा था, एक पैदल सेना के सैनिक सैनिक की तुलना में एक बूढ़े औरत की तरह दिख रहा था। "
(जेम्स जोन्स, द थिन रेड लाइन , 1 9 62)
- "एक लंबा आदमी, उसका शॉटगन अपनी पीठ के पीछे हल लाइन की लंबाई के साथ गिर गया, विघटित हो गया और उसकी रीन्स गिरा दी और देवदार बोल्ट के लिए थोड़ा रास्ता पार कर गया। "
(हॉवर्ड बह्र, जुबिलो का वर्षः गृह युद्ध का एक उपन्यास । पिकाडोर, 2001)
- "पुरुष पेन के किनारे पर बैठते हैं, उनके घुटने के बीच बड़ी सफेद और चांदी की मछली, चाकू के साथ फिसलते हुए और हाथों से फाड़ते हुए, अलग-अलग निकायों को एक केंद्रीय टोकरी में लपेटते हैं। "
(विलियम जी विंग, "क्रिसमस पहले बैंकों पर आता है")
- "सैकड़ों और सैकड़ों मेंढक उस पाइप पर बैठे थे, और वे सभी मजाक कर रहे थे, उन सभी में, एकजुट नहीं, लेकिन लगातार, उनके छोटे गले चल रहे थे, उनके मुंह खुले थे, उनकी आंखें करेल और फ्रांसिस में जिज्ञासा के साथ घूम रही थीं और उनकी बड़ी मानव छाया । "
(मार्गरेट ड्रेबल, द रियम्स ऑफ गोल्ड , 1 9 75)
- "अभियुक्त आदमी, कबाब मियामोतो, एक कठोर अनुग्रह के साथ गर्व से सीधे बैठे थे, उनके हथेलियों ने प्रतिवादी की मेज पर धीरे-धीरे रखा - एक ऐसे व्यक्ति की मुद्रा जिसने खुद को अलग कर दिया है क्योंकि यह अपने परीक्षण में संभव है। "
(डेविड गटरसन, स्नो फॉलिंग ऑन सीडर , 1 99 4)
- "अधीक्षक, उसकी छाती पर उसका सिर धीरे-धीरे अपनी छड़ी के साथ जमीन पोक कर रहा था। "
(जॉर्ज ऑरवेल, "ए हैंगिंग," 1 9 31)
- "आप एक लिफ्ट शाफ्ट के खतरों की उचित समझ प्राप्त कर सकते हैं, जो एक लिफ्ट को ऊपर और नीचे चलाकर देखता है, इसकी गलती उड़ती है, जैसे कि गिलोटिन पर ब्लेड । "
(निक पामगार्टन, "अप एंड डाउन डाउन। " द न्यू यॉर्कर , 21 अप्रैल, 2008)
- "जॉगिंग बीमारी के साथ दो मध्यम आयु वर्ग के पुरुष मेरे पीछे, उनके चेहरे बैंगनी, उनकी घंटी फिसल रही है, उनके चलने वाले जूते बड़े और महंगी हैं । "
(जो बेनेट, मस्त नहीं होना चाहिए । साइमन एंड शूस्टर, 2006)
- "स्कूल के दाहिने कोण पर चर्च का पिछला भाग था, इसकी ईंटें सूखे खून के रंग को चित्रित करती थीं। "
(पीट हैमिल, ए पीने का जीवन , 1 99 4)
- "रॉस टेबल से कई फीट दूर एक कुर्सी के किनारे पर बैठा था, आगे झुक रहा था, उसके बाएं हाथ की उंगलियां उसकी छाती पर फैली थीं , उसका दाहिना हाथ एक सफेद बुनाई सुई रखता था जिसे उसने एक सूचक के लिए इस्तेमाल किया था । "
(जेम्स थर्बर, द इयर्स विद रॉस , 1 9 58)
- "एक-एक करके, पहाड़ी के नीचे पड़ोस की मां आती हैं, उनके बच्चे उनके बगल में दौड़ते हैं । "
(रोजर रोसेनब्लैट, "मेकिंग टोस्ट। " द न्यू यॉर्कर , 15 दिसंबर, 2008)
- "मैं देख सकता था, यहां तक कि धुंध में भी, मेरे सिर में उदासीनता से आगे बढ़ने वाला सिर, इसकी रीढ़ मस्तिष्क घास और धुंध में ढंका हुआ था, इसके शिंगल झुकाव असफल ब्रेकवाटर के घूमने वाले स्पैरों के साथ भाले गए थे । "
(स्वयं स्वयं, "एक असली क्लिफ हैंगर। " स्वतंत्र , अगस्त 30, 2008)
- "लंबे समय तक वे अस्थिर हो गए, एन्ड ने अपने क्षतिग्रस्त कूल्हे के पक्ष में, अल्फ्रेड हवा में ढीले हाथों से पैदल चलने और खराब नियंत्रित पैर के साथ हवाई अड्डे कालीन बनाने के लिए पैडलिंग किया, दोनों नॉर्डिक Pleasurelines कंधे बैग ले जा रहे हैं और सामने फर्श पर ध्यान केंद्रित उनमें से, एक समय में खतरनाक दूरी तीन पैसों को मापना। "
(जोनाथन फ्रांजन, द सुधार । फरार स्ट्रॉस एंड गिरौक्स, 2001)
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एक पूर्ण वाक्यांश शब्दों का एक समूह है जो पूरी तरह से एक स्वतंत्र खंड को संशोधित करता है। एक पूर्ण संज्ञा और उसके संशोधक से बना है। मुख्य खंड मुख्य खंड से पहले, अनुसरण या बाधित हो सकता हैः - नारंगी आकाश के खिलाफ उनके पतले शरीर चिकना और काला, हमारे ऊपर से ऊपर घिरे हुए स्टॉर्क। - हमारे ऊपर से ऊपर घिरे स्टॉर्क, उनके पतले शरीर नारंगी आकाश के खिलाफ चिकना और काला। - स्टॉर्क, उनके पतले शरीर नारंगी आकाश के खिलाफ चिकना और काला , हमारे ऊपर से ऊपर घूमते हैं। एक पूर्ण हमें पूरे व्यक्ति, स्थान या चीज़ के विवरण को एक पहलू या भाग में स्थानांतरित करने की अनुमति देता है। ध्यान दें कि पारंपरिक व्याकरण में , पूर्ण अक्सर " संज्ञा वाक्यांशों " के साथ संयुक्त रूप से परिभाषित किए जाते हैं "। पूर्ण शब्द का प्रयोग शायद ही कभी समकालीन भाषाविदों द्वारा किया जाता है। लैटिन से, "मुक्त, ढीला, अप्रतिबंधित। "एक पूर्ण वाक्यांश जो एक फोकसिंग विवरण जोड़ता है, विशेष रूप से कथा लेखन में आम है, जो एक्सपोजिटरी लेखन से कहीं अधिक आम है . . . . . निम्नलिखित अनुच्छेदों में, सभी कथाओं के कार्यों से, कुछ के बाद पोस्ट-संज्ञा संशोधक के रूप में भाग लिया जाता है। । । ; हालांकि, आप कुछ वाक्यांश वाक्यांशों के साथ कुछ भी देखेंगे, अन्य प्रीपेशनल वाक्यांशों के साथ। दृष्टि और जूलियन में कोई बस नहीं थी, उसके हाथ अभी भी अपने जेब में जाम कर रहे थे और उसका सिर आगे बढ़ गया, खाली सड़क पर घूम गया। चुपचाप वे दसवीं स्ट्रीट पर उतर गए जब तक वे एक पत्थर की बेंच तक नहीं पहुंचे जो कि कब्र के पास फुटपाथ से निकल गया। वे वहां रुक गए और बैठे, सफेद पीठ में दो पुरुषों की आंखों पर उनकी पीठ जो उन्हें देख रहे थे । आदमी हंस रहा था, उसके हथियारों पर उसके हथियार । अपने दाहिनी ओर घाटी अपनी नींद की सुंदरता में जारी रही, मूक और कम हो गई, इसकी जंगली शरद ऋतु के रंग दूरी से घिरे हुए थे , जो एक कलाकार द्वारा पानी के रंग के रूप में चमकीले थे, जिन्होंने अपने सभी रंग भूरे रंग के साथ मिश्रित किया था। "एक विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, पूर्ण वाक्यांश की दूसरी शैली, एक कारण या शर्त बताती हैः हमारी कार ने इंजन की परेशानी विकसित की है , हम सड़क के किनारे आराम क्षेत्र में रात के लिए रुक गए। हमने अपनी पिकनिक, मौसम गर्म और स्पष्ट होने का फैसला किया। पहला उदाहरण एक के रूप में फिर से लिखा जा सकता है क्योंकि- या जब- खंडः जब हमारी कार ने इंजन की परेशानी विकसित की , तो हमने रोका। । । क्योंकि हमारी कार ने इंजन की परेशानी विकसित की , हम रुक गए। । । पूर्ण लेखक को पूरी धारा के स्पष्टीकरण के बिना जानकारी शामिल करने की अनुमति देता है; पूर्ण, तब, दोनों अर्थों के साथ, जब और क्योंकि दोनों के रूप में सोचा जा सकता है। दूसरे उदाहरण में मौसम के बारे में पूर्ण कारण किसी कारण की बजाय एक परिचर की स्थिति का सुझाव देता है। " "निरपेक्ष परंपराओं को नाममात्र कहा जाता है क्योंकि पूर्ण निर्माण एक संज्ञा वाक्यांश के साथ अपने हेडवर्ड के रूप में शुरू होता है। फिर भी, वे वाक्य संशोधक के रूप में adverbially काम करते हैं। कुछ [पूर्ण] मुख्य खंड में वर्णित कार्रवाई के कारणों या शर्तों की व्याख्या करते हैं; अन्य । । जिस तरीके से मुख्य खंड की कार्रवाई की जाती है उसका वर्णन करें। " - "रॉय एक मिसिसिपी स्टीमबोट की तरह बेस, रोशनी जलाया, झटके झुकाव , सीटी बजती है , मोड़ के चारों ओर आती है। " - "हैरी जम गई, उसकी काट उंगली फिर से दर्पण के किनारे किनारे पर फिसल गई । " - "बोलेनसीक्वाज़ अब फर्श पर घूर रहा था, सोचने की कोशिश कर रहा था, उसका बड़ा झुका हुआ था , उसके विशाल हाथ एक साथ रगड़ रहे थे, उसका चेहरा लाल था । " - "मकड़ी की खाल उनके पक्षों, पारदर्शी और घबराहट, उनके पैरों को नट्स में सूखने पर झूठ बोलती है। " - " उनके नंगे पैर स्पिंकलर, पंख और रसीला घास पर उनके नंगे पैर, और उनके मोबाइल फोन उनके हाथ में ठंडा हो गए थे , देस ने मैदान के चारों ओर एक मोड़ लिया। " - "जब जॉनसन मीचम अपने बैंगनी डबल-चौड़े ट्रेलर के तीन कदम उठाए और सामने वाले दरवाजे को खोला, तो उनकी पत्नी, माबेल, उनके लिए इंतज़ार कर रही थीं, उसके पतले हाथ उसके कूल्हों पर गिर गए थे , उसके रंग के बाल एक छोटे से अपने खोपड़ी से खड़े थे नीला बादल । " - "छह लड़के उस दोपहर के शुरू में आधा घंटे पहाड़ी पर आए, कड़ी मेहनत कर रहे थे, उनके सिर नीचे थे, उनके अग्रभाग काम कर रहे थे, उनकी सांस सीटी थी । " - "जब भी आपने शहर में कहीं भी दूर संगीत सुना, तो शायद आपको लगता है कि आपने कल्पना की है, इतनी पतली है कि आपने स्ट्रीटकार तारों की सीटी को दोषी ठहराया है, तो आप ध्वनि को ट्रैक कर सकते हैं और कालेब को अपने छोटे velocipede straddling, खुशी के साथ भाषणहीन, उसकी एप्पल की आंखों नृत्य । " - "फिर भी वह कंधे पर शिकार कर रहा था, मुंह से मुकाबला कर रहा था , अपने हाथों को झुका रहा था, एक पैदल सेना के सैनिक सैनिक की तुलना में एक बूढ़े औरत की तरह दिख रहा था। " - "एक लंबा आदमी, उसका शॉटगन अपनी पीठ के पीछे हल लाइन की लंबाई के साथ गिर गया, विघटित हो गया और उसकी रीन्स गिरा दी और देवदार बोल्ट के लिए थोड़ा रास्ता पार कर गया। " - "पुरुष पेन के किनारे पर बैठते हैं, उनके घुटने के बीच बड़ी सफेद और चांदी की मछली, चाकू के साथ फिसलते हुए और हाथों से फाड़ते हुए, अलग-अलग निकायों को एक केंद्रीय टोकरी में लपेटते हैं। " - "सैकड़ों और सैकड़ों मेंढक उस पाइप पर बैठे थे, और वे सभी मजाक कर रहे थे, उन सभी में, एकजुट नहीं, लेकिन लगातार, उनके छोटे गले चल रहे थे, उनके मुंह खुले थे, उनकी आंखें करेल और फ्रांसिस में जिज्ञासा के साथ घूम रही थीं और उनकी बड़ी मानव छाया । " - "अभियुक्त आदमी, कबाब मियामोतो, एक कठोर अनुग्रह के साथ गर्व से सीधे बैठे थे, उनके हथेलियों ने प्रतिवादी की मेज पर धीरे-धीरे रखा - एक ऐसे व्यक्ति की मुद्रा जिसने खुद को अलग कर दिया है क्योंकि यह अपने परीक्षण में संभव है। " - "अधीक्षक, उसकी छाती पर उसका सिर धीरे-धीरे अपनी छड़ी के साथ जमीन पोक कर रहा था। " - "आप एक लिफ्ट शाफ्ट के खतरों की उचित समझ प्राप्त कर सकते हैं, जो एक लिफ्ट को ऊपर और नीचे चलाकर देखता है, इसकी गलती उड़ती है, जैसे कि गिलोटिन पर ब्लेड । " - "जॉगिंग बीमारी के साथ दो मध्यम आयु वर्ग के पुरुष मेरे पीछे, उनके चेहरे बैंगनी, उनकी घंटी फिसल रही है, उनके चलने वाले जूते बड़े और महंगी हैं । " - "स्कूल के दाहिने कोण पर चर्च का पिछला भाग था, इसकी ईंटें सूखे खून के रंग को चित्रित करती थीं। " - "रॉस टेबल से कई फीट दूर एक कुर्सी के किनारे पर बैठा था, आगे झुक रहा था, उसके बाएं हाथ की उंगलियां उसकी छाती पर फैली थीं , उसका दाहिना हाथ एक सफेद बुनाई सुई रखता था जिसे उसने एक सूचक के लिए इस्तेमाल किया था । " - "एक-एक करके, पहाड़ी के नीचे पड़ोस की मां आती हैं, उनके बच्चे उनके बगल में दौड़ते हैं । " - "मैं देख सकता था, यहां तक कि धुंध में भी, मेरे सिर में उदासीनता से आगे बढ़ने वाला सिर, इसकी रीढ़ मस्तिष्क घास और धुंध में ढंका हुआ था, इसके शिंगल झुकाव असफल ब्रेकवाटर के घूमने वाले स्पैरों के साथ भाले गए थे । " - "लंबे समय तक वे अस्थिर हो गए, एन्ड ने अपने क्षतिग्रस्त कूल्हे के पक्ष में, अल्फ्रेड हवा में ढीले हाथों से पैदल चलने और खराब नियंत्रित पैर के साथ हवाई अड्डे कालीन बनाने के लिए पैडलिंग किया, दोनों नॉर्डिक Pleasurelines कंधे बैग ले जा रहे हैं और सामने फर्श पर ध्यान केंद्रित उनमें से, एक समय में खतरनाक दूरी तीन पैसों को मापना। "
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शाली व्यवस्थाओका संचालन राज्य ही करे। इसीको हम युद्धकी प्रचलित भापामे यूं कह सकते है कि राज्य व्यक्तिकी बुद्धि, योग्यता, उसके विचार, भाव, जीवन और उस सबको जो वह है या उसके पास है, सर्वहितके लिये "प्रचालित" (मोबिलाइज ) करे । इसको यदि अतिम परिणामतक पहुँचाया जाय तो वह होगा समाजवादी आदर्शका पूरा जोर होना और इसी परिणामकी ओर मनुष्यजाति एक अपूर्व वेगसे बढ़ती हुई प्रतीत हो रही है। राज्य-सिद्धात आज अत्यंत वेग और बलके साथ अधिकार प्राप्त करनेका यत्न कर रहा है, वह अपने पैरो तले उस सबको कुचलनेके लिये तैयार है जो उसके प्रवाहके आगे आते है या मानवकी अन्य प्रवृत्तियोके अधिकारकी स्थापना करनेका प्रयत्न करते है । पर जिन दो विचारोपर वह आधारित है वे सत्य और असत्यके उस विनाशकारी मिश्रणसे भरे हुए है जो हमारे समस्त मानवी अधिकारो और सिद्धातोके साथ जुड़ा रहता है। यदि हमे असहाय होकर प्रकृतिके गभीर और गहन सत्यकी ओर आने से पहले भ्रमका एक और चक्कर न काटना हो तो हमे एक ऐसे जिज्ञासापूर्ण और निष्पक्ष विचारकी शोधन क्रिया द्वारा इन अधिकारी तथा सिद्धातोको देखना होगा जो शब्द-जालके धोखेमे आनेसे इन्कार कर दे । वास्तवमे प्रकृतिका गभीर और गहन सत्य ही हमारा प्रकाश और मार्गदर्शक होना चाहिये ।
चौथा अध्याय
राज्य-सिद्धांतकी अपर्याप्तता
आखिर यह राज्य सिद्धात, यह संगठित समाजका विचार जिसके लिये व्यक्तिकी बलि देनी होगी, है क्या ? आदर्शरूपमे यह व्यक्तिसे इस बातकी माँग करता है कि वह अपने आपको सर्वहितके अधीन कर दे; व्यावहारिक रूपमें वह सामूहिक अहके अधीन हो जाता है जिस अहंका स्वरूप राजनीतिक, सैनिक तथा आर्थिक होता है । यह उन सामूहिक उद्देश्यों और महत्त्वाकाक्षाओको पूरा करनेकी चेष्टा करता है जो शासकोके छोटे या वडे दल द्वारा -- ये किसी रूपमे समाजके प्रतिनिधि माने जाते है - कल्पित होते है तथा व्यक्तियोके वृहत् समूहपर आरोपित किये जाते है । इस बातसे कुछ फर्क नही पड़ता कि ये किसी शासक वर्गके हो, या जैसा कि आधुनिक राज्योमें होता है, अंशतः अपने चरित्र वलसे पर अधिकतर परिस्थितिकी सहायतासे जनसाधारणमेसे निकले होते है । इसमे इस वातसे भी कुछ विशेष अंतर नही आता कि उनके उद्देश्य और आदर्श आजकल स्पष्ट और साक्षात् वल- प्रयोग द्वारा नहीं, बल्कि शब्दोंकी समोहन क्रिया द्वारा जनतापर लादे जाते है। दोनोमेसे किसी भी अवस्थामे भरोसेके साथ नहीं कहा जा सकता कि ये शासक-वर्ग या शासक-दल राष्ट्रकी सर्वश्रेष्ठ बुद्धि या उसके सर्वोत्तम उद्देश्यो या उच्चतम प्रेरणाओके प्रतीक है।
संसारके किसी भागके आधुनिक राजनीतिज्ञके बारेमे ऐसा नहीं कहा जा सकता; वह जातिकी आत्मा या उसकी उच्च आकाक्षाओका प्रतीक नही होता । साधारणतया वह अपने चारो ओरकी आम तुच्छता, स्वार्थ - परता, अहवुद्धि और आत्म-प्रवचनाका ही प्रतिनिधि होता है। इनका प्रतिनिधित्व तो वह भलीभाँति करता ही है, साथ ही अत्यधिक मानसिक अयोग्यता, नैतिक-रूढ़िता, भीरुता, क्षुद्रता तथा पाखडका प्रतिनिधित्व भी करता है । निर्णयके लिये उसके सामने महान् प्रश्न प्रायः आते है, पर उनके समाधानका उसका ढंग महान् नही होता । उच्च शब्द और उत्तम विचार उसके मुखपर होते है, पर वे शीघ्र ही पार्टीके विज्ञापनकी चीज बन जाते है । वर्तमान राजनीतिक जीवनमे असत्याचरणका यह रोग संसारके प्रत्येक देशमे दृष्टिगोचर हो रहा है और सब लोग, यहॉतक कि बुद्धिजीवी वर्ग भी मत्रमुग्ध होकर
●राज्य-सिद्धान्तकी अपर्याप्तता
उस वड़े संगठित स्वांगमे सहमत और सहयोगी हो जाते है और इससे रोग ढक जाता तथा लवे समयतक चलता है, यह सहमति उसी प्रकारकी है जो मनुष्य नित्य अभ्यासकी चीजो को देता है तथा जिससे उसके जीवनका वर्तमान वातावरण बनता है। तो भी ऐसे मनुष्योद्वारा ही सबकी भलाईका निर्णय करना होता है, ऐसे हाथोमे ही यह कार्य सौपना पडता है, राज्य कहलानेवाली ऐसी एजेसीको ही अपने कार्य व्यवहारका निर्देशन और नियंत्रण सौपनेके लिये आज व्यक्तिसे अधिकाधिक अनुरोध किया जा रहा है । इससे वस्तुतः सर्वका अधिकतम हित किसी तरह भी सिद्ध नही होता, इसके बदले हम अत्यधिक संगठित भूले और दोष देखते हैं जिनमे कुछ हित भी होता है उससे वास्तविक उन्नति की ओर प्रगति होती है। प्रकृति सदा सर्व प्रकारकी भूल-चूकके बीचसे आगे वढती है और अतमे -- अधिकतर मनुष्यकी अपूर्ण बुद्धिकी बाधाके होते हुए भी, न कि उसकी सहायतासे -- अपने उद्देश्योको पूरा करती है ।
परतु यदि शासन - यत्र अधिक अच्छा भी बना हो और उसका मानसिक और नैतिक चरित्र अधिक ऊँचा भी हो, यदि, जैसा कि प्राचीन सभ्यताओने अपने शासक-वर्गमे कुछ ऊँचे आदर्श तथा अनुशासन लानेका यत्न किया था, वैसा करनेका रास्ता आज भी निकाल लिया जाय तो भी राज्य वह वस्तु नही वन सकेगा जिसका कि राज्य-सिद्धातकी ओरसे दावा किया जाता है । आदर्शरूपमे राज्य समाजकी वह सामूहिक वल-बुद्धि है जो सर्वहितके लिये सुलभ और संगठित कर दी जाती है । पर व्यावहारिक रूपमे जो इजिनपर नियत्रण रखती है और गाड़ीको चलाती है वह समाजकी केवल उतनी-सी वलबुद्धि होती है जितनीको राज्य संगठनकी विशेष मशीनरी ऊपरी तलपर आने देती है; बल्कि यह भी मशीनरीकी लपेटमे आ जाती है तथा उसके कारण इसके कार्यमे रुकावट तो पडती ही है साथ ही इसे उस अत्यधिक मूर्खता और स्वार्थपूर्ण दुर्बलताके कारण भी रुकना पडता है जो इसके साथ-साथ ऊपर उठ आती है । नि. सदेह, इन परिस्थितियोमे अधिक-से-अधिक यही हो सकता है, और प्रकृति सदा की भाँति इसका अधिकतम उपयोग करती है। परतु स्थिति और भी अधिक खराब होती यदि वैयक्तिक प्रयत्नके लिये एक ऐसा क्षेत्र न छोड दिया जाता जिसमे कि वह अपेक्षाकृत स्वतत्ररूपसे उस कार्यको करे जिसे राज्य नही कर सकता, जिसमे वह सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियोकी सच्चाई, शक्ति और आदर्श - भावनाको प्रकट करके तथा उन्हे प्रयोगमे लाकर उस कार्यको करे जिसे करनेके लिये राज्यके पास बुद्धि या साहस नही है और साथ ही उस कार्यको पूरा करवाये जिसे सामूहिक
मानव एकताका आदर्श.
रूढिता और निर्बलता या तो बिना किये छोड देती या सक्रिय रूपमें उसका दमन तथा विरोध करती । व्यक्तिकी यही शक्ति सामूहिक उन्नतिके लिये यथार्थ रूपमे उपयोगी कार्य करती है । राज्य कभी-कभी इसकी सहायता के लिये आगे बढ़ता है और तव, यदि उसकी सहायताका अर्थ अनुचित नियंत्रण न हो तो, उसका परिणाम निश्चित ही हितकर होता है । पर अधिकतर तो यह रास्तेमे रोड़ा ही अटकाता है, फिर या तो वह उन्नतिपर रोक लगानेवाला बन जाता है या आवश्यक मात्रामे उस संगठित विरोध और सघर्पको जुटाता है जो निर्माणकी क्रियामेसे गुजरती हुई नयी वस्तु को और अधिक बल तथा अधिक पूर्ण आकार देनेके लिये सदैव आवश्यक होता है । पर जिसकी ओर हम आज वढ रहे है वह संगठित राज्य शक्तिका इतना विस्तार, इतना विशाल, अदम्य और जटिल राजकीय कार्य-कलाप है जो स्वतत्र वैयक्तिक प्रयत्नको या तो बिल्कुल मिटा देगा या उसे क्षुद्र, दीन तथा असहाय बनाकर छोड़ देगा। इस प्रकार राज्यरूपी मशीनके इन दोषो, उसकी दुर्बलताओ तथा अयोग्यताको सुधारनेका एक आवश्यक साधन नष्ट हो जायगा ।
सगठित राज्य न तो राष्ट्रकी सर्वश्रेष्ठ बुद्धि है और न ही सामाजिक शक्तियोका कुल-जोड । वह अपने सगठित कार्य क्षेत्रमेसे महत्त्वपूर्ण अल्पसंख्यक वर्गीकी कार्यशक्ति तथा उनके विचारशील मनको बहिष्कृत कर देता है, उन्हें दबाता या अनुचित रूपसे निरुत्साहित करता है । अधिकतर ये उसके प्रतीक होते है जो वर्तमानमे सर्वश्रेष्ठ है तथा भविष्यके लिये विकसित हो रहा है। यह एक सामूहिक अहभाव है जो समाजके ऊँचे-सेऊँचे अहंभावसे बहुत निम्न कोटिका है । यह अहभाव अन्य सामूहिक अहभावोकी तुलनामे क्या है यह हम जानते है, और हालमे इसकी कुरूपता मनुष्यजातिकी दृष्टि और विवेक बुद्धिके सामने प्रकट हो चुकी है। साधारणतया व्यक्ति के पास कम-से-कम आत्मा जैसी वस्तु तो होती ही है और हर हालतमे वह आत्माकी कमियोको नैतिकता और सदाचारकी पद्धतिसे पूरी करता है, फिर इनकी कमियोको लोकमतके भयसे और, इसमे भी असफल होनेपर, सामाजिक कानूनके भयसे दूर करता है। इस कानूनका उसे साधारणतया या तो पालन करना होता है या फिर कम-से-कम वह इसे टाल तो सकता ही है, टालनेके इस कार्यमे जो कठिनाई आती है वह अत्यत उद्दड या बहुत चालाक लोगोको छोड़कर बाकीपर एक प्रतिबंध होती है । राज्य एक ऐसी सत्ता है जो, बहुत अधिक शक्ति होनेके कारण, आतरिक दुविधाओं या बाह्य प्रतिबधो द्वारा कम-से-कम पीडित होती है ।
इसकी आत्मा या तो होती ही नहीं या फिर केवल प्रारंभिक अवस्थामे होती है। यह एक सैनिक, राजनीतिक और आर्थिक शक्ति है; यदि यह एक बौद्धिक और नैतिक सत्ता हो भी तो वह केवल एक थोडे और अविकसित अशमे ही होगी। दुर्भाग्यवश अपनी अल्पविकसित नैतिक भावना को काल्पनिक धारणाओ, मोहक शब्दो और फिर हालमे राज्यदर्शन ( राज्यवाद ) के द्वारा निस्तेज कर देना ही इसकी अविकसित बुद्धिका मुख्य उपयोग है। समाजके अदर मनुष्य आज कम-से-कम एक अर्ध-सभ्य प्राणी तो है, पर उसका अतर्राष्ट्रीय जीवन अभीतक असस्कृत है । अभी कुछ दिन पहलेतक सगठितराष्ट्र दूसरे राष्ट्रोके साथ अपने सबधोमे केवल एक दीर्घकाय हिंसक जन्तु था, इसकी तृष्णाएँ घटना चक्र द्वारा कभी-कभी नष्ट या निरुत्साहित होकर दब भले ही जाती हो, पर इसके अस्तित्वका मुख्य आधार सदा वे ही रहती थी । दूसरोको हडपकर अपनी रक्षा और अपना विस्तार करना ही इसका धर्म था । आजकल भी इसमें कोई वास्तविक सुधार नही हुआ; केवल हडपनेका कार्य अब अधिक कठिन हो गया है । एक 'पवित्र अहभाव' अभी भी राष्ट्रोका आदर्श है; इसी लिये किसी आक्रमणकारी राज्यपर प्रतिबंध लगानेवाली न तो कोई लोकमतकी सच्ची और निर्मल चेतना है और न ही कोई प्रभावशाली अतर्राष्ट्रीय कानून । यदि कोई भय है तो वह पराजयका है; हालमे अनिष्टकारी आर्थिक विघटनका भय भी हो गया है। परंतु अनुभवोसे पता चलता है कि ये सब प्रतिबंध व्यर्थ है ।
राज्यका यह अत्यधिक अहभाव किसी समय अपने आतरिक जीवनमें बाह्य सवधोकी अपेक्षा कुछ अच्छा था । * यह क्रूर, लोभी, लुटेरा, धूर्त्त तथा अत्याचारी था और स्वतंत्र कर्म, स्वतत्र वाणी और मतके प्रति ही नही, बल्कि धार्मिक विश्वासकी स्वतंत्रता के प्रति भी असहनशील था । इसने अपने अंतर्गत व्यक्तियो और वर्गीको तथा बाहरके अधिक निर्वल राष्ट्रोको खूब सताया । जिस समाजपर यह निर्भर करता था उसको मामूली तौरपर जीवित, धनी और समर्थ रखनेकी आवश्यकताने ही इसके कार्यको आशिक तथा स्थूल रूपमे उपयोगी बना दिया। कुछ दिशाओमे अवनति होनेपर
* मैं प्राचीन और श्राधुनिक युगके बीचके समयकी बात कर रहा हूँ । प्राचीन कालमें राज्य - कम-से-कम कुछ देशोंमें - प्रपनी जनताके प्रति कुछ आदर्श और न्याय-भावना रखता था । पर अन्य राज्यों के साथ वर्तावमें यह बात बहुत ही कम पायी जाती थी ।
भी आधुनिक समयमे इसमें काफी सुधार हुआ । राज्य अव यह अनुभव करता है कि उसके अस्तित्वका औचित्य सिद्ध करनेके लिये यह आवश्यक है कि वह समाजके तथा सभी व्यक्तियोके भी सामान्य आर्थिक और स्थूलशारीरिक (Animal) हितोकी व्यवस्था करे। उसने यह देखना आरंभ कर दिया है कि उसे सपूर्ण समाजके वौद्धिक और परोक्षरूपमे नैतिक विकासके लिये निश्चित प्रवध करना है । राज्यका एक बौद्धिक और नैतिक सत्तामे विकसित होनेका यह प्रयत्न आधुनिक सभ्यताकी अत्यंत रोचक घटनाओमेसे एक है । यूरोपके संकटने मनुष्यजातिके अत करणको यह स्वीकार करनेके लिये विवश कर दिया है कि राज्यको उसके वाह्य संबंधोंमे भी वौद्धिक तथा नैतिक रूप देना आवश्यक है । पर समस्त स्वतंत्र वैयक्तिक कार्योको हस्तगत कर लेनेका राज्यका दावा त्यो त्यो वढता जाता है ज्यों-ज्यो वह अपने नये आदर्शों और सभावनाओके प्रति अधिक स्पष्ट रूपमे सचेतन होता जाता है। इसके विषय में हम इतना तो कह ही सकते है कि यह दावा असामयिक है। यदि इसे पूरा कर दिया जाय तो इसके परि णामस्वरूप मनुष्यकी उन्नतिपर एक अवरोध, एक ऐसा सहज संगठित प्रतिबंध लग जायगा जिसने रोम-साम्राज्यकी स्थापनाके बाद ग्रीक-रोमन जगत्को अपने वशमे कर लिया था ।
अतएव राज्यकी व्यक्तिसे यह मांग, कि वह उसकी वेदी पर अपनी बलि चढा दे और अपने स्वतंत्र कार्योको संगठित सामूहिक कार्यमें विलीन कर दे, हमारे उच्चतम आदर्शोकी माँगसे बिल्कुल भिन्न है। इसका अर्थ है वर्तमान वैयक्तिक अभावको एक अन्य अर्थात् सामूहिक अहंभावमे विलीन कर देना । यह सामूहिक अहंभाव वडा अवश्य है पर श्रेष्ठ नही, वल्कि सर्वश्रेष्ठ वैयक्तिक अहंभावसे कई बातोंमे हीन है । परोपकारका आदर्श, आत्मत्यागकी साधना, सहजीवियोंके साथ अधिकाधिक घनिष्ठ संबंधको आवश्यकता तथा मानवजातिमे एक विकसनशील सामूहिक आत्मा, -- इनके विषयमे हमे कुछ आपत्ति नही पर व्यक्तिका राज्यमे विलीन हो जाना इन उच्च आदर्शोका अर्थ नहीं है, न ही इनकी पूर्ति के लिये यह साधन है। मनुष्यको ओत्म- दमन तथा आत्म-उच्छेद करना नहीं बल्कि मनुष्यजातिकी पूर्णताके अदर अपनी पूर्णता प्राप्त करना सीखना चाहिये । इसी प्रकार उसे यह भी सीखना चाहिये कि वह अपने अहंका उच्छेद या नाश न करे, वल्कि उसे उसकी सीमाओसे वाहर लाकर पूर्ण बनाये तथा एक ऐसी महत्तर वस्तुमे विलीन कर दे जिसका आज वह प्रतीक वननेका यत्न कर रहा है । पर राज्यकी विशाल मशीन द्वारा स्वतंत्र व्यक्तिका लोल (निगल) लिया जाना
एक बिल्कुल ही और प्रकारकी परिणति है । लिये एक सुविधाजनक पर वेढगा साधन है । नही बनाना चाहिये ।
राज्य हमारे सामान्य विकासके इसे अपने आपमें साध्य कभी
राज्य-सिद्धांतका दूसरा दावा कि राज्यकी संगठित मशीनका यह अधिकार और व्यापक कार्य मानव विकासका सर्वोत्तम साधन है अतिशयोक्तिपूर्ण तथा मनगढंत है। मनुष्य समाजपर निर्भर करता है; उसे अपनी वैयक्तिक तथा साथ ही सामूहिक उन्नति करने के लिये भी इसकी आवश्यकता है। क्या यह सत्य है कि राज्य द्वारा संचालित कार्य व्यक्तिकी पूर्ण रूपसे उन्नति करने और साथ ही समाजके साझे हितोको भी प्राप्त करानेमे सबसे अधिक समर्थ है ? न, यह सत्य नही है । सत्य वास्तवमे यह है कि यह समाज मे व्यक्तियोके सम्मिलित कार्यके लिये सब आवश्यक सुविधाएं जुटाने तथा उसके मार्गसे उन सब दुर्वलताओ और बाधाओको दूर करने में समर्थ है जो अन्यथा उसकी प्रक्रियामे रुकावट डालती । यही राज्यकी वास्तविक उपयोगिता समाप्त हो जाती है। मानव सहयोगकी शक्यताओसे इन्कार की सभाव्यता अंग्रेजी व्यक्तिवादकी दुर्बलता थी; सम्मिलित कार्यकी उपयोगिताके बहाने राज्य द्वारा कठोर नियंत्रण स्थापित करना समूहवादके ट्यूटौनिक विचारकी कमजोरी है । जब राज्य समाजके सम्मिलित कार्यका नियत्रण अपने हाथमे लेनेका प्रयत्न करता है, तो उसे एक ऐसे दानवी यंत्रके निर्माण करने का अपराधी वनना पडता है जो अतमे मनुष्यकी स्वतंत्रता, प्रेरक शक्ति और वास्तविक उन्नतिको कुचल डालेगा ।
राज्य वेढंगे तरीकेसे तथा समूहमे ही काम करनेके लिये मजबूर है । वह उन स्वतत्र, समस्वर तथा ज्ञानपूर्ण या सहजप्रेरित विविध कार्योंके करनेमे असमर्थ है जिनकी आतरिक विकासके लिये आवश्यकता होती है । कोई प्राणिक सत्ता नहीं है, यह एक मशीन है और मशीनकी ही भाँति कार्य करता है । निपुणता, सुरुचित, वैविध्यता, सूक्ष्मता या अतर्ज्ञान इसमे नही होता । इसकी शैली कारखानेकी तरह गढनेकी होती है जब कि मनुष्यजातिका उद्देश्य विकसित होना तथा सृजन करना है। राज्य द्वारा संचालित शिक्षामे हम यही दोप देखते है । यह ठीक है और आवश्यक भी कि शिक्षा सबको उपलब्ध होनी चाहिये । इसे उपलब्ध कराने के लिये राज्य अत्यधिक उपयोगी है, पर जब वह शिक्षापर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है तो
वह इसे एक सामान्य ढर्रेकी तथा यात्रिक ढगकी शिक्षा बना देता है जिसमे इससे भिन्न वस्तुएँ - वैयक्तिक प्रेरणा, वैयक्तिक उन्नति और सच्ची प्रगति - असभव हो जाती है । राज्य की प्रवृत्ति सदा एकरूपताकी ओर होती है,
कारण, एकरूपता उसके लिये आसान है और स्वाभाविक विविधता लाना उसकी मूलतः यात्रिक प्रकृति के नितांत विरुद्ध है; पर एक रूपता मृत्यु है, जीवन नही । राष्ट्रीय संस्कृति, राष्ट्रीय धर्म, राष्ट्रीय शिक्षा उपयोगी वस्तुएँ हो तो सकती है पर केवल तभी जब वे एक ओर मानव ऐक्य की वृद्धिमे तथा दूसरी ओर विचार, अतःकरण और विकास की वैयक्तिक स्वतन्त्रतामे बाधा न डाले; कारण, ये समाजकी आत्माको मूर्त रूप देती है तथा इसे मानव उन्नतिके कुल योगमे अपना हिस्सा जोडनेमे सहायता पहुँचाती है, किंतु राज्य की शिक्षा राज्यका धर्म और राज्यकी संस्कृति सव अस्वाभाविक अत्याचार है। यही नियम हमारे सामाजिक जीवन तथा उसके कार्योंकी अन्य दिशाओंमे, विभिन्न प्रकारसे तथा विभिन्न अंगोंमे, लागू होता है ।
जब तक राज्य मनुष्यके जीवन और विकासका एक आवश्यक तत्त्व बना रहता है तबतक उसका यह कर्तव्य हो जाता है कि वह सम्मिलित कार्यकी सव प्राप्य सुविधाएँ जुटाए, वाधाएँ दूर करे, सब प्रकारके वस्तुतः हानिकारक अपव्यय और सघर्षको रोके, - थोड़ा बहुत अपव्यय और संघर्प तो प्रकृतिके सब कार्योमे आवश्यक तथा उपयोगी होता ही है, और व्यर्थ के अन्यायको - दूर करके प्रत्येक व्यक्तिको उसकी क्षमताओं के अनुसार तथा उसके स्वभावके अनुकूल उसकी उन्नति और तुष्टिका एक उचित और समान अवसर प्रदान करे । यहाँ तक तो वर्तमान समयके समाजवादका उद्देश्य ठीक है और अच्छा भी है, पर मानव विकासकी स्वतंत्रतामे किसी प्रकारका भी अनावश्यक हस्तक्षेप हानिकारक होता है या हो सकता है । सम्मिलित कार्य भी हानि है पहुँचा सकता है यदि वैयक्तिक विकास की आवश्यकताओको ध्यानमे रखकर सबके हितके लिये प्रयत्न करनेके स्थानपर, पर, क्योंकि विना वैयक्तिक विकासके किसी प्रकारका वास्तविक और स्थायी सर्वहित होना सभव नही है - वह समाजके अहंभावपर व्यक्ति की बलि चढ़ा दे तथा अधिक पूर्ण रूपसे उन्नत मानव जातिके विकासके लिये जितने स्वतंत्र अवकाश और मौलिक शक्तिकी आवश्यकता हो उसको रोक दे । जब तक मानवजाति पूर्ण रूपसे विकसित नही हो जाती, जब तक उसे विकास करनेकी आवश्यकता रहती है और जब तक वह अधिक महान् पूर्णता प्राप्त करनेमे समर्थ है तब तक समष्टि अपने अंगभूत व्यक्तियोंके विकासकी उपेक्षा करके अपना स्थिर हित नही कर सकती । जो समूहवादी आदर्श व्यक्तिको अनुचित रूपसे अधीन बनाये रखना चाहते हैं वे वास्तवमे एक गतिहीन अवस्थाकी कल्पना करते है चाहे वह आजकल जैसी स्थिति हो या ऐसी स्थिति हो जिसे वह अवस्था शीघ्र स्थापित करनेकी आशा करती है । इस स्थितिके वाद सच्चे परिवर्तन
राज्य-सिद्धान्तको अपर्याप्तता
का हर एक प्रयत्न सुप्रतिष्ठित सामाजिक व्यवस्थाकी शाति, उचित कार्यक्रम तथा सुरक्षाके विरुद्ध अधीर व्यक्तिवादका अपराध समझा जायगा । यह तो सदा व्यक्ति ही होता है जो स्वयं उन्नति करता है और बाकियोको उन्नत होनेके लिये वाध्य करता है; समुदायकी सहज प्रवृत्ति अपनी स्थापित व्यवस्थामे जमे रहनेकी होती है । उन्नति, विकास और विस्तृत सत्ताकी प्राप्तिसे व्यक्तिको तथा स्थिरता और निश्चित विश्रामकी प्राप्तिसे समुदायको अतिशय सुखकी अनुभूति होती है । जब तक समुदाय एक सजग सामूहिक आत्माकी अपेक्षा एक भौतिक और आर्थिक सत्ता अधिक है तव तक स्थिति ऐसी ही रहेगी ।
इसलिये मनुष्यजातिकी वर्तमान अवस्थाओमे राज्यकी मशीनरी द्वारा एक स्वस्थ एकता लानी बहुत कठिन है, चाहे यह एकता शक्तिशाली और सगठित राज्योको एकत्रित करने से प्राप्त हो - - ऐसे राज्योको जो परस्पर सुव्यवस्थित तथा न्यायसगत संवधोका उपभोग करते हैं, या फिर यह वर्तमानकी कुछ अव्यवस्थित और कुछ व्यवस्थित राष्ट्र मंडलीके स्थानपर एक ही विश्वराज्यकी स्थापनासे प्राप्त हो, भले ही इस विश्व - राज्यका रूप रोम-साम्राज्यकी भाँति एक अकेले साम्राज्य का हो या सघबद्ध एकता का । मनुष्यजातिके निकट भविष्यमे ऐसी बाह्य या प्रशासनीय एकता प्राप्त करना हमारा उद्देश्य हो सकता है जिससे कि जाति सर्वसामान्य जीवनके विचार, उसकी आदत तथा सभावनाकी अभ्यस्त हो जाय, परन्तु मनुष्यकी भवितव्यताकी सच्ची विकास-धारामे यह वास्तवमे स्वस्थ, स्थायी या लाभदायक नही हो सकती जब तक कोई ऐसी चीज विकसित न कर ली जाय जो अधिक गहनी, अंतरीय तथा वास्तविक हो । नही तो प्राचीन जगत्के अनुभवकी एक वडे परिमाण तथा भिन्न अवस्थाओमे फिरसे आवृत्ति होगी, परीक्षण असफल हो जायगा और उसके स्थानपर अव्यवस्था तथा अराजकताका एक नया युग आयेगा जिसमे पुननिर्माणकी आवश्यकता होगी । शायद यह अनुभव प्राप्त करना भी मनुष्यजातिके लिये आवश्यक है; चाहे अव हम इस अनुभव को टाल भी सकते है, पर इसके लिये हमे यात्रिक साधनोको अपने सच्चे विकासके अधीन करना होगा । ऐसा विकास तभी हो सकता है जब कि । नैतिकता, यहाँ तक कि आध्यात्मिकतासे युक्त मनुष्यजाति अपने वाह्य जीवन तथा शरीरमे ही नहीं वरन अंतरात्मामें भी एक हो जाय ।
पाँचवाँ अध्याय
राष्ट्र और साम्राज्य : वास्तविक एकता और राजनीतिक एकता
मनुष्यजातिके एकीकरणकी समस्या दो विशिष्ट कठिनाइयोमे विभक्त हो जाती है । एक इस आशंकाका रूप धारण करती है कि जो सामूहिक अहं - भाव मानवजातिके स्वाभाविक विकासमे उत्पन्न हो चुके है क्या वे अव यथेष्ट रूपमे सुधारे या मिटाये जा सकते है और क्या किसी प्रकारकी प्रभावशाली बाह्य एकता सुरक्षितरूपसे स्थापितकी जा सकती है। दूसरी कठिनाई इस आशकाके रूपमे प्रकट होती है कि यदि कोई ऐसी बाह्य एकता स्थापितकी भी जा सके तो उसका परिणाम कही व्यक्तिके स्वतंत्र जीवनको तथा उन अनेक सामूहिक इकाइयोकी स्वच्छंद क्रीड़ाको, जो अबतक बन चुकी है और जिनका जीवन सच्चा तथा सक्रिय है, क्या कुचल देना नही होगा तथा इनके स्थानपर एक ऐसा राज्य संगठन स्थापित नही हो जायगा जो मानव जीवनको यत्नवत् वना देगा । इन दो आशंकाओके अतिरिक्त एक तीसरी और भी है कि क्या यथार्थ जीवत एकता केवल आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनीय एकीकरण द्वारा ही साधितकी जा सकती है, तथा क्या इससे पहले कम-से-कम एक नैतिक और आध्यात्मिक एकताका ठोस उपक्रम नही होना चाहिये । इन प्रश्नोके क्रमिक सबधकी दृष्टिसे हमे पहले प्रश्नको पहले लेना होगा ।
मानव विकासकी वर्तमान अवस्थामे राष्ट्र मानवजातिकी जीवंत सामूहिक इकाई है । साम्राज्य है तो सही पर वे अभी तक केवल राजनीतिक इकाइयाँ है, वास्तविक इकाइयाँ नहीं; उनमे निजी आतरिक जीवन नही है । वे या तो एक ऐसी शक्तिके आधारपर चल रहे है जो उनके निर्माणकारी अंगोपर लादी गयी है या ऐसी राजनीतिक सुविधाके आधारपर जिसे इन अगोने अनुभव या स्वीकार कर लिया है और जिसे बाहरके ससारका भी समर्थन प्राप्त हुआ है । आस्ट्रिया बहुत समय तक इस प्रकारके साम्राज्यका एक स्थायी उदाहरण रहा है, यह एक राजनीतिक सुविधा थी जिसे ससार भरका अनुमोदन प्राप्त था । अभी कुछ दिन पहले तक इसके निर्माणकारी
अग भी इससे सहमत थे । हैप्सबर्ग वंशके रूपमे प्रकट केंद्रीय जर्मनिक* तत्त्वकी शक्ति तथा अभी हालमे इसके मगियार ( Magyar ) साझीदार की सक्रिय सहायतासे इसका पोपण हुआ । यदि इस प्रकारके साम्राज्यकी राजनीतिक सुविधाका अत हो जाय, यदि उसके निर्माणकारी अग अब इसका और समर्थन न करें और वे एक केंद्रविरोधी शक्तिके द्वारा बलपूर्वक परे हटा दिये जायँ और साथ ही यदि संसार भी इस सगठनके पक्षमे न हो तो अकेला भौतिक बल ही कृत्रिम एकताका एकमात्र साधन रह जाता है । वास्तवमे तभी एक नवी राजनीतिक सुविधाका जन्म हुआ जिसे आस्ट्रियाके जीवनने विघटनकी उपर्युक्त प्रवृत्तिसे कष्ट उठानेके बाद भी सहायता पहुँचायी । पर यह सुविधा उस जर्मनिक भावना द्वारा प्रेरित थी जिसने इसको शेप यूरोपके लिये असुविधामे परिणत कर दिया और इसको उन प्रधान निर्माण - कारी अगोकी स्वीकृतिसे वंचित कर दिया जो आस्ट्रियन सिद्धातसे बाहर जाकर अन्य संगठनोकी ओर आकृष्ट हो गये । उस समयसे आस्ट्रियन साम्राज्यका अस्तित्व खतरेमे पड गया; और वह किसी आतरिक आवश्यकतापर नही बल्कि पहले तो अपने अंतर्गत स्लाव ( Slav) राष्ट्रोको कुचल देनेकी आस्ट्रियन-मगियारकी सम्मिलित शक्ति पर और पीछे यूरोपमे जर्मनी तथा जर्मनिक विचारकी अनवरत शक्ति और प्रभुता अर्थात् अकेले भौतिक वलपर निर्भर रहा । यद्यपि आस्ट्रियामे साम्राज्यीय एकताकी दुर्बलता विशेष रूपसे प्रत्यक्ष थी तथा उसकी शर्तें बहुत वढी चढी थी, तथापि ये शर्ते उन सब साम्राज्योके लिये, जो उस समय राष्ट्रीय इकाइयाँ नही थी, समान थी। अधिक दिनकी बात नहीं है, बहुतसे राजनीतिक विचारकोने देखा कि कम-से-कम इस बातकी प्रवल सभावना है कि जाति, भाषा और उद्गमके ऐसे निकट सबधोके होते हुए भी जिनसे कि ब्रिटिश उपनिवेशोको अपनी मातृभूमिसे जुड़े रहना चाहिये था, वे अपनेको ब्रिटिश साम्राज्यसे अलग कर लेगे और इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य स्वयमेव भग हो जायगा । इसका कारण यह था कि उपनिवेश साम्राज्यीय एकताकी राजनीतिक सुविधाका उपभोग तो करते थे पर वे उसको यथेष्ट महत्त्व नही देते थे, असलमे राष्ट्रीय ऐक्यका कोई सजीव सिद्धात था ही नही । आस्ट्रेलिया और कनाडाके निवासियोने अपने आपको विस्तृत ब्रिटिश राष्ट्रीयताके अंग नही बल्कि नये पृथक् राष्ट्र समझना शुरू कर दिया था । अब दोनो दृष्टियोसे स्थिति वदल गयी है, एक अधिक व्यापक सूत्र का पता लग गया है, और इस समय ब्रिटिश साम्राज्य यथोचित मात्रामे पहलेसे अधिक शक्तिशाली है । * ट्यटन - जातीय - अनुवादिका
फिर भी यह पूछा जा सकता है कि जब नाम रूप और प्रकार एक ही है तो इन राजनीतिक और वास्तविक इकाइयोमे इस प्रकारका भेद करना ही क्यों चाहिये ? पर भेद करना आवश्यक है क्योकि यह सच्चे और गंभीर राजनीतिक विज्ञानके लिये अत्यधिक उपयोगी है; इसके परिणाम भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जब आस्ट्रिया जैसा अराष्ट्रीय साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो जाता है तो वह सदाके लिये नष्ट हो जाता है; क्योंकि उसमे कोई यथार्थ आंतरिक एकता नही होती, बाह्य एकताको पुनः प्राप्त करनेकी कोई सहज प्रवृत्ति भी नहीं होती, वह केवल एक राजनीतिक ढंगसे गढा हुआ समुदाय ही होता है। दूसरी ओर परिस्थितियों द्वारा खडित एक वास्तविक राष्ट्रीय एकता अपने एकत्वको पुन प्राप्त करने तथा सुदृढ करनेकी प्रवृत्ति को सदा सुरक्षित रखेगी। ग्रीक साम्राज्यका भी वही हाल हुआ जो और सब साम्राज्योंका होता है। परंतु ग्रीक राष्ट्रने अनेक सदियों तक राजनीतिक दृष्टिसे सत्ताहीन रहनेके बाद भी अपना पृथक् अस्तित्व पुनः प्राप्त कर लिया है, कारण, इसने अपना पृथक् अहंभाव सुरक्षित रखा और इसलिये तुर्की- शासनके आवरणके नीचे भी, वास्तवमे, अपना अस्तित्व बनाये रखा। तुर्की-शासनके जुएके नीचे सब जातियोकी यही दशा हुई है, क्योकि इस शक्तिशाली आधिराज्यने, कई बातोमे काफी कठोर होते हुए भी, उनकी राष्ट्रीय विशेषताएँ मिटाने या उनके स्थानपर उस्मानी (Ottoman ) राष्ट्रीयता स्थापित करनेका कभी प्रयत्न नही किया । ये राष्ट्र पुनः जीवित हो गये है और अपने आपको फिरसे उस हद तक खड़ा कर चुके या करने का प्रयत्न करे रहे है जहाँ तक कि इन्होने अपना यथार्थ राष्ट्रीय भाव सुरक्षित रखा है । सर्व लोगो (Serbs) ने अपने राष्ट्रीय भावके अधीन वह सारा प्रदेश पुनः प्राप्त करनेका प्रयत्न किया था और प्राप्त कर भी लिया है जिसमे कि वे रहते हैं या उनकी प्रधानता है । ग्रीस अपने मुख्य प्रदेश, द्वीपों तथा एशियाई उपनिवेशो में अपने पुनर्निर्माणके लिये यत्नशील है, किंतु वह प्राचीन ग्रीसको अब वापिस नही ला सकता, क्योकि थ्रेस ( Thrace ) भी ग्रीककी अपेक्षा बलगर ( Bulgar) अधिक है । कितनी शताब्दियोके बाद इटली भी वाह्य रूप में फिर एक हो गया है । कारण, पहले की भाँति एक राज्य न रहनेपर भी इसने अपनी एकजातीयता कभी नहीं छोड़ी थी ।
वास्तविक एकताका यह सत्य इतना बलशाली है कि जिन राष्ट्रोने पहले समयमे कभी भी उस बाह्य एकत्वको नही प्राप्त किया - जिनके दैव, परिस्थिति और उनका अपना स्वभाव सब प्रतिकूल थे -- जो राष्ट्र-विकेंद्रीय शक्तियोसे भरपूर थे तथा विदेशी आक्रमणो द्वारा अनायास ही दबा दिये
गये थे, उन्होने भी केद्रमुखी शक्तिको ही सदा विकसित किया और फलत. संगठित एकता प्राप्त कर ली । प्राचीन ग्रीस अपनी पार्थक्य - पूर्ण प्रवृत्तियो, अपने स्वय-सपूर्ण नगर या प्रादेशिक राज्यों, अपने छोटे, परस्परविरोधी स्वायत्तशासनोसे ही चिपटा रहा; पर केंद्रमुखी शक्ति सदा ही सघो, राज्य-सगठनो और स्पार्टा तथा एथेन्स जैसे आधिराज्योमे मुर्त रूपमे विद्यमान रही । अंतमे इसने अपने आपको मकदूनियाके शासनसे कुछ अधूरे और अस्थायी रूपमे तथा पीछे एक काफी आश्चर्यजनक विकास गतिसे पूर्वी रोमन जगत्के एक ग्रीक और बिजेनटाइन ( Byzantine ) साम्राज्यमे विकसित हो जानेके द्वारा चरितार्थ कर लिया । यह शक्ति वर्तमान ग्रीसमे पुन जाग्रत् हो गयी है । और हमने अपने समयमे जर्मनीको, जो प्राचीन कालसे सदा ही असंगठित रहा है, अतमे एकत्वकी अपनी सहज भावनाको अनिष्टकारी रूपमे उन्नत करते देखा है। यह भावना होहैनस्टोलर्न्स (Hohenzallerms) के साम्राज्यमे उग्ररूपसे प्रकट हुई और उसके पतनके बाद भी सधीय गणराज्य में दृढ बनी रही । जो लोग केवल बाह्य घटनाओके रुख का ही नही वल्कि शक्तियोंकी क्रियाका भी अध्ययन करते है उनको इस बातसे जरा भी आश्चर्य नही होगा यदि युद्धका एक सुदूर परिणाम यह हो कि एक जर्मनिक तत्त्व, आस्ट्रियन-जर्मन तत्त्व, जो अभी तक पृथक् है जर्मनिक समग्रतामे और संभवतः प्रशियन प्रभावक्षेत्र या होहैनस्टोलर्न साम्राज्यसे भिन्न किसी अन्य रूपमें सम्मिलित हो जाय । 1 इन दो ऐतिहासिक दृष्टातोमें तथा और बहुतसोमे जैसे सैक्सन ( Saxon ) इग्लैंड और मध्यकालीन फासके एकीकरण तथा अमरीकाके सयुक्त राज्यके निर्माणमे यह वास्तविक एकता या मनोवैज्ञानिक रूपसे विशिष्ट इकाई ही पहले तो अज्ञानपूर्वक अपनी सत्ताकी अवचेतन आवश्यकताके द्वारा तथा वादमे राजनीतिक एकताकी भावनाके प्रति एकाएक या धीरे-धीरे सचेतन होकर एक अनिवार्य बाह्य एकीकरण की ओर प्रवृत्त हुई । यह एक विशिष्ट प्रकारकी समुदाय आत्मा है जो आतरिक आवश्यकताके द्वारा चालित होती है और वाह्य परिस्थितियोका उपयोग अपने लिये संगठित शरीर बनानेमे करती है ।
पर इतिहासमे सबसे अधिक आश्चर्यजनक दृष्टान्त भारतवर्षके विकासका है। और कही भी केंद्रविरोधी शक्तियाँ इतनी प्रवल, इतनी अधिक जटिल
*यह संभावना कुछ समयके लिये पूर्ण तो हो गयो पर उन साधनोंके द्वारा और उन परिस्थितियों के बीच जिन्होने श्रास्ट्रियन राष्ट्रीय भावना तथा पृथक् राष्ट्रीय अस्तित्वका पुनर्जीवन अनिवार्य कर दिया ।
बनानेकी आवश्यकता तथा विवेकपूर्ण स्वार्थ भावसे प्रेरित होकर यह जान सकते है कि राष्ट्रीय स्वायत्तताकी स्वीकृति राष्ट्रीयताकी अभीतक जीवंत सहजप्रेरणाके लिये एक विचारपूर्ण और आवश्यक रियायत है एवं उनकी साम्राज्यीय शक्ति तथा एकताको निर्बल करनेके स्थानपर उसे सवल करनेके लिये प्रयुक्त की जा सकती है । इस प्रकार जव कि स्वतंत्र राष्ट्रोका संघ बनाना अभी असंभव है, ऐसे सघबद्ध साम्राज्यों और स्वतंत्र राष्ट्रोकी कोई प्रणाली बनाना, जिनमे इतना निकट साहचर्य हो गया हो जैसा कि पहले कभी देखनेमे नही आया, बिल्कुल ही असभव नही है । इस उपायसे या किन्ही अन्य उपायोसे मनुष्यजातिके लिये किसी-न-किसी प्रकारकी राजनीतिक एकता निकट या दूर भविष्यमे प्राप्त की जा सकती है ।*
इस प्रकारके निकटतर साहचर्यको लानेके लिये युद्धने कई सुझाव उपस्थित किये, पर सामान्यतया ये सब यूरोपके अंतर्राष्ट्रीय संवधोमे सुव्यवस्था स्थापित करनेतक ही सीमित रहे । इनमेसे एक सुझाव यह था कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा निर्मित और सब राष्ट्रो द्वारा स्वीकृत एक अधिक कठोर अंतर्राष्ट्रीय विधानके द्वारा युद्धको विल्कुल रोक दिया जाय, इस विधानका सब राष्ट्रोके द्वारा किसी भी अपराधीके विरुद्ध प्रयोग किया जायगा । परतु जबतक इससे अगले प्रभावपूर्ण कदम न उठाये जायेंगे यह हल एक स्वप्नमात्र ही रहेगा; क्योकि न्यायालय द्वारा निर्देशित विधान या तो कुछ प्रवलतर मित्रशक्तियो द्वारा, उदाहरणार्थ, शेष यूरोपपर प्रभुत्व रखनेवाले विजयी मित्र राष्ट्रोकी गुटबंदी द्वारा, या समस्त यूरोपीय शक्तियोके एक मडल अथवा यूरोपके राज्य या यूरोपीय संघके किसी और रूप द्वारा लागू करना पडेगा । महान् शक्तियोकी प्रभुतापूर्ण मैत्री केवल मैटरनिच (Metternich) प्रणालीकी, सिद्धात रूपमे, नकल होगी और कुछ समय बीतने के बाद वह अनिवार्य रूपसे समाप्त भी हो जायगी, परन्तु, जैसा अनुभवसे हमे ज्ञात हो चुका है, यूरोपके मंडलका यह अर्थ होना चाहिये कि विरोधी समुदाय एक अनिश्चित समझौतेको बनाये रखनेके लिये आतुर भावमे प्रयत्न करे । यह प्रयत्न नये सघर्षो और नये विरोधोको
* हिटलरके प्रकट होने तथा जर्मनी द्वारा विश्व - प्रभुत्वके विशाल प्रयलने अपनी सफलता द्वारा जो कि विरोधाभास है - इसमें सहायता पहुंचाई है और उसके विरुद्ध प्रतिक्रियाने संसारकी अवस्थाको पूर्णतया वदल दिया है। यूरोपके संयुक्त राज्यका निर्माण प्रक्रियात्मक संभावना वन गया है और इसने प्रात्म-चरितार्थताकी ओर अग्रसर होना आरंभ कर दिया है।
स्थगित तो कर सकता है, पर अतिम रूपसे उन्हें रोक नहीं सकता । ऐसी अधूरी प्रणालियोमे विधानका पालन केवल तभीतक होगा जबतक उसकी आवश्यकता रहेगी, जबतक वे शक्तियाँ जो दूसरों द्वारा अस्वीकृत नये परिवर्तन और पुनर्व्यवस्थाएँ अपनेमे लाना चाहती है इस समयको प्रतिरोधके लिये उपयुक्त ही नही समझ लेगी । राष्ट्रके अंदर विधान केवल इसलिये सुरक्षित रहता है कि वहाँ एक ऐसी स्वीकृत सत्ता होती है जो उसे निर्धारित करने तथा उसमें आवश्यक परिवर्तन करनेकी शक्ति रखती है; उसे इतना अधिकार प्राप्त होता है कि वह अपने कानूनके भग करनेवालोको ढड दे सके । अंतर्राष्ट्रीय या अतर्यूरोपीय विधान यदि शुद्ध नैतिक शक्तिसे किसी और वडी शक्तिका प्रयोग करना चाहता है तो उसे ये सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिये, क्योकि यह नैतिक शक्ति उन लोगो द्वारा व्यर्थ की जा सकती है जो इसकी अवज्ञा करनेमे काफी समर्थ है तथा जो इसे भग करनेमे अपना लाभ समझते हैं । अतएव यदि नयी व्यवस्थाके इन प्रस्तावोके मूल-विचारको क्रियात्मक रूपमे सफल बनाना हो तो किसी-न-किसी प्रकारके यूरोपीय संघका निर्माण चाहे वह कितना ही ढीला ढाला क्यो न हो आवश्यक हो जाता है और यदि यह एक वार बनना आरंभ हो जाय तो ऐसे संघको आवश्यक रूपसे उत्तरोत्तर दृढ होते जाना चाहिये तथा एक यूरोपीय संयुक्त राज्यकी प्रणालीका अधिकाधिक स्वरूप बनना चाहिये ।
यह तो केवल अनुभव बता सकता है कि ऐसी यूरोपीय एकता चरितार्थ की जा सकती है या नहीं और यदि यह चरितार्थ हो भी जाय तो विघटनकी उन अनेक शक्तियो और कलहके उन अनेक कारणोके विरोधमे भी जो इसे नष्ट करनेतक इसकी परीक्षा लेते रहेगे इसे स्थिर तथा पूर्ण बनाया जा सकता है या नही । पर यह प्रत्यक्ष है कि मानवी अहंभावकी वर्तमान अवस्थामे यदि यह चरितार्थ कर ली जाय तो यह एक ऐसा महान् शक्तिशाली यंत्र वन जायगी जिसके द्वारा वे राष्ट्र, जो आजकल मानवी प्रगतिमे सबसे आगे है, संसारके शेष राष्ट्रोपर अपना प्रभुत्व जमा लेगे तथा उनसे अनुचित लाभ उठाना चाहेगे । साथ ही इसके विरोधमे एशियाई एकता और अमरीकन एकताके विचार भी अनिवार्य रूपसे उठ खडे होगे और जहाँ इस प्रकारके महाद्वीपीय समुदाय आजकी अपेक्षाकृत छोटी राष्ट्रीय एकताओका स्थान लेकर समस्त मानवजातिके अंतिम एकीकरणकी ओर अग्रसर हो रहे होगे, वहाँ इनके निर्माणके परिणामस्वरूप ऐसी और इतनी विस्तृत कातियाँ भी आयँगी जिनके आगे आजकलकी विपत्ति नगण्य प्रतीत होने लगेगी तथा
जिनके कारण मानवजातिकी आशाएँ पूरी होनेके स्थानपर छिन्न-भिन्न हो
जायेंगी और अंतगे बिकुल ही नष्ट हो जायेंगी पतु रोगी संगण राज्यके सिद्धानपर मुख्य आप यह है कि सामान्य दिने
अब महाहीरीय विदों पर जाने और उन्हें भावनाओं कानर भानना अधीन करने का प्रयत्न आरंभ कर दिया है दिपीय जागर किया हुआ विभाजन इस दृष्टिकोण एक अत्यधिक गंभीर प्रकार श्रीक्रियात्मक प्रयत्न होगा जिसके परिणाम मानव-प्रगति लिये अपनी हो सकते हैं ।
यूरोप वास्तव कुछ ऐसी विवि-निकिका सर्वतेय विचारके लिये परिव भी हो गया है और न ही उसे कर आने
बढ़ने की आवश्यकता भी का अनुमा करना है। अभी बहुत दिन नी हुए, पिछले यूरोपीय सपके विराट विये गये कुछ विभागनेन दो प्रवृत्तियोके विरोधका विनित है। एक मिनार
यह उपस्थित किया गया था कि इस सदमे मनोरे आगराधान्य राष्ट्रते अहंमूलक विचारकी अति और पूर्वपके उस बुहतर विवा अवहेलना था जिसकी अधीनता अब राष्ट्रविनाली व्योहार करती चाहिये । यूरोपके गंपूर्ण जीवनको जन एक ऐसी एक्ला आवद हो जाना चाहिये जो सबको अपने अंदर समेट के उसके हिलो मरि ज्यान मिले एवं राष्ट्रका अहंभाव इस अपेक्षाकृत बडे अगाके सुगठित अंगरे ही रूपमें अपना अस्तित्व रखे। क्रियात्मक स्वर्गे यह कादियाँके बाद नीट्शे (Nietzsche) के विचार का ही समर्थन है; वह वातपर बल देना था कि राष्ट्रीयता तथा युद्धके विचारोग अजमाना नही रहा और विचारी मनुष्योका जादां अब बदेशभक्त बनना नहीं, बल्कि अच्छे यूरोपियन बनना होना नाहिये । पर तुरंत ही यह प्रश्न उठा कि विश्व राजनीतिमे तब अमेरिकाके बढ़ने उप महत्त्वका गया होगा ? जापान और नीनका तथा एमियाके जीवन में जो नयी जागृति हो रही है उसका क्या अर्थ रह जायगा ? उनपर को अपना पहला विचार छोडना पड़ा तथा उसे यह समझना पड़ा कि युरोपने उसका आशय गुरोष नहीं, वरन् वे सब राष्ट्र है जिन्होंने यूरोपीय सभ्यताके सिद्धांतको अपनी राज्य-पद्धति और सामाजिक संगठनके आधार-रूप मान लिया है । अपेक्षाकृत अधिक दार्शनिक विचारका एक प्रत्यक्ष या कम गे राम प्रतीयमान लाभ अवश्य है कि वह इसमें अमेरिका और जापानका भी समावेश कर लेता है तथा इस प्रकार इस प्रस्तावित ऐक्के घेरे में उन सब राष्ट्रोको स्वीकार कर लेता है जो वस्तुत. स्वतंत्र या प्रबल है, साथ ही वह यह
आशा भी दिलाता है कि अन्य राष्ट्र भी जब जापानके उत्साही ढगसे या किसी और प्रकारसे यह प्रमाणित कर दे कि वे यूरोपीय स्तरतक पहुँच गये है तो वे भी इस दायरेमे आ सकेगे ।
वास्तवमे यूरोप अपने विचारोमे अभीतक शेष जगत्से बहुत अधिक भिन्न है, जैसा कि यूरोपमे टर्कीके बरावर बने रहने के प्रति बार-बारके रोषसे तथा यूरोपीय लोगोपर एशियाके लोगोकी इस प्रभुताको समाप्त कर देनेकी इच्छासे प्रदर्शित होता है। फिर भी यह सत्य है कि यूरोप अमेरिका और एशियाके साथ बुरी तरहसे उलझा हुआ है । कुछ यूरोपीय राष्ट्रोंके अमेरिकामे उपनिवेश है, साथ ही एशियामे जहाँ केवल जापान यूरोपके प्रभावक्षेत्रसे बाहर है अथवा उत्तरी अफ्रीकामे जो सास्कृतिक रूपमे एशियाके साथ एक है सभी राष्ट्रोके अपने-अपने स्वत्व तथा महत्त्वाकाक्षाएँ है। यूरोपके सयुक्तराज्यका अर्थ तब स्वतत्र यूरोपीय राष्ट्रीका एक ऐसा संघ होगा जो अर्ध-अधीन एशियाके ऊपर अपना प्रभुत्व रखता है तथा अमेरिकाके कुछ भागोपर जिसका अधिकार है; पर वहाँ उसे वे पडोसी राष्ट्र चैन नही लेने देगे जो अभीतक स्वतन्त्र है, जो उसके इस प्रकारके उग्र अनधिकार - प्रवेशसे निश्चय ही पीडित, त्रस्त और आच्छादित हो रहे है । अमेरिकामे इसका अनिवार्य परिणाम यह होगा कि लॅटिन केंद्र तथा दक्षिणी भाग और अंग्रेजी बोलनेवाला उत्तरी भाग एक-दूसरेके अधिक निकट आ जायेंगे तथा मनरो (Munro ) सिद्धातपर बहुत अधिक बल दिया जायगा; इसके जो परिणाम होगे उनके बारेमे पहलेसे कुछ कहना कठिन है । उधर एशियामें इस स्थितिका अत इस प्रकार हो सकता है कि या तो बचे हुए स्वतत्र एशियाई राज्य लुप्त हो जायँ अथवा एशिया इतना जाग्रत् हो जाय कि यूरोप उसे छोड़कर चला जाय । ये सब बातें मानव-विकासकी पुरानी पद्धतिको और अधिक लवा तथा विश्व-बधुत्वकी उन नई अवस्थाओको व्यर्थ कर देगी जो आधुनिक संस्कृति और विज्ञानने उत्पन्न की है, पर यदि पश्चिममे राष्ट्र सिद्धातको सामान्य मानवताकी अधिक व्यापक चेतनाके स्थानपर यूरोप सिद्धात अर्थात् महाद्वीपीय-सिद्धातमे विलीन होना है तो ऐसी घटनाएँ होना अनिवार्य है।
इसलिये यदि वर्तमान उथल-पुथलके परिणामस्वरूप किसी नयी अतिराष्ट्रीय व्यवस्थाको अभी या वादमे विकसित होना है तो उसका रूप निश्चित ही एक ऐसे संघका होगा जो एशिया, अफ्रीका और अमेरिका तथा साथ ही यूरोपको अपनेमे मिलायगा; वह स्वभावत अतर्राष्ट्रीय जीवनका एक ऐसा सगठन होगा जो स्वीडन, नार्वे, डैनमार्क, सयुक्तराज्य,
लैटिन गण-राज्य जैसे स्वतंत्र राष्ट्रो तथा साथ ही कई ऐसे साम्राज्यीय और उपनिवेश बनानेवाले राष्ट्रो द्वारा निर्मित होगा जैसे कि यूरोप में अधिकतर राष्ट्र है। ये पिछले प्रकारके राष्ट्र - जैसे कि वे आज है- -- या तो अपने आपमे स्वतंत्र पर उन अधीनस्थ राष्ट्रोके प्रभु रहेंगे जो, समयकी प्रगति के साथ-साथ, अपने ऊपर रखे हुए जुएके प्रति अधिकाधिक असहिष्णु होते चले जायंगे और या फिर नैतिक प्रगति द्वारा, जिसका चरितार्थ होना अभी बहुत दूर की बात है, कुछ अशमे स्वतत्न सघीय साम्राज्योके केंद्र और कुछ ऐसे राष्ट्र वन जायेंगे जो उन पिछड़ी हुई और असंस्कृत जातियोका तवतक संरक्षण-भार उठायेगे जवतक वे स्वशासनके योग्य नही हो जाती । संयुक्तराज्यका कहना भी कुछ इसी ढंगका है कि है फिलीपाइनपर उसका अधिकार कुछ समयके लिये है और इसी प्रकारका है। पहली अवस्थामे एकता, व्यवस्था और प्रचलित सामान्य विधान जीवित रहेगे, तथा आशिक रूपमे वे अन्यायकी विशाल पद्धतिपर आधारित होगे; उन्हें प्रकृतिके उन विद्रोहो, विप्लवो तथा महान् प्रतिगोधोंका सामना करना पडेगा जिनके द्वारा वह अतमें अन्यायोके विरोधमें मानवी भावनाको अतिम रूपसे उचित ठहराती है; इन अन्यायोंको वह मानव-विकासके मार्गमें अनिवार्य रूपसे आनेवाली घटनाएँ समझकर ही कुछ समयके लिये सहन करती है। दूसरी अवस्थामे यह संभावना अवश्य है कि यह नयी व्यवस्था, चाहे वह अपने प्रारंभिक रूपमें स्वतंत्र मानव समुदायोके स्वतंत्र संघके अंतिम आदर्शसे कितनी भी दूर क्यो न हो, शांतिपूर्वक और जातिकी आध्यात्मिक और नैतिक उन्नतिके स्वाभाविक विकसनके द्वारा एक ऐसे सुरक्षित, न्याययुक्त और स्वस्थ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आधारकी ओर ले जा सकती है जो मनुष्यजातिको संभवतः इस योग्य वना देगा कि वह तुच्छ चिताओमें व्यस्त न रहकर अपनी उच्चतर सत्ताका विकास आरंभ कर दे क्योकि यह उच्च सत्ता ही उसकी गुप्त भवितव्यताका श्रेष्ठतर भाग है अथवा यदि ऐसा न हो तो कौन जानता है कि मानवजातिमे प्रकृतिका यह लंबा प्रयोग सफल होगा या असफल; फिर भी यह कम-से-कम हमारे भविष्यकी वह उच्चतम संभावना तो है जिसकी मानवमन कल्पना कर सकता है ।
ग्यारहवाँ अध्याय
छोटी स्वतंत्र इकाई और बृहत्तर केन्द्रित इकाई
यदि हम राजनीतिक, प्रशासनीय और आर्थिक प्रणालीके आधारपर मनुष्यजातिके एकीकरणकी संभावनाओपर विचार करे तो हम देखेंगे कि एक विशेष प्रकारकी एकता या उसकी ओर उठाया हुआ पहला कदम केवल सभव ही नही प्रतीत होता, वरन् जातिकी आवश्यकता और उसकी आधारभूत भावना थोडे- वहुत अनिवार्य रूपमे उस एकताकी मांग भी करती है । यह भावना अधिकांश रूपमे पारस्परिक ज्ञान तथा संचार - साधनोकी वृद्धिके कारण परंतु आंशिक रूपमे जातिके प्रगतिशील मनमे अधिक व्यापक और स्वतंत्र बौद्धिक आदर्शो तथा भावप्रधान समवेदनाओके उन्नत होनेके कारण उत्पन्न हुई है । इस आवश्यकताका अनुभव भी कुछ तो इन आदर्शो और समवेदनाओको पूरा करनेकी इच्छाके कारण तथा कुछ उन आर्थिक और अन्य भौतिक परिवर्तनोके कारण होता है जो विभाजित राष्ट्रीय जीवन, युद्ध, व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धाके और इनके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाली अरक्षा तथा जटिल और सुभेद्य आधुनिक सामाजिक सगठनपर आनेवाली विपत्तिके परिणामोको आर्थिक और राजनीतिक मानवप्राणी और आदर्शवादी विचारक दोनोके लिये अधिकाधिक दुखदायी बना देते है । कुछ अशमे यह नयी प्रवृत्ति सफल राष्ट्रोकी शेप जगत्को निर्विघ्न रूपसे हस्तगत करने, उसका उपभोग करने तथा उससे अनुचित लाभ उठानेकी इच्छासे भी उत्पन्न हुई है और इस इच्छाको वे अपनी प्रतिद्वंद्विताओ तथा प्रतियोगिताओसे उत्पन्न खतरेको उठाये बिना किसी पारस्परिक सुखद सद्भाव और समझौतेके द्वारा पूर्ण करना चाहते है; इस प्रवृत्तिकी वास्तविक शक्ति उसके बौद्धिक, भावुक और आदर्शवादी अगोमें है। इसके आर्थिक कारण कुछ अंशमे स्थायी है और इसलिये शक्ति और निश्चित सफलताके तत्त्व है, और जिस अंशमे वे कृत्रिम तथा अस्थायी है उस अंशमे अरक्षा और दुर्बलताको उत्पन्न करते है । राजनीतिक आशय इस मिश्रणके निम्नतर भाग है, यहाँतक कि इनकी उपस्थिति सारे परिणामको बिगाड सकती है तथा अतमे उस एकताको जो प्रारंभिक रूपमे प्राप्त की जा चुकी है निश्चित रूपसे उलट-पलट या नष्ट-भ्रष्ट कर सकती है ।
फिर भी अपेक्षाकृत निकट या अधिक सुदूर भविष्य में कोई न कोई परिणाम निकल सकता है। अब हम देख सकते है कि इसे यदि चरितार्थ होना है तो किन अवस्थाओमें होना है - - शुरू-शुरूमे यह अत्यन्त प्रवल सामान्य आवश्यकताओ अर्थात् व्यापार, शाति और युद्धकी व्यवस्थाओं तथा झगडोके सामान्य निर्णय और संसारको सुरक्षित रखनेकी व्यवस्थाओके लिये एक प्रकारके समझौते और प्रारंभिक मेल-मिलापद्वारा चरितार्थ हो सकती है । ये सव स्थूल प्रारंभिक व्यवस्थाएँ यदि एक बार स्वीकार कर ली जायं तो स्वभावतः ही वे प्रधान विचार और सहज आवश्यकताके दवावसे एक अधिक प्रगाढ़ एकताका रूप धारण कर लेगी; यह भी हो सकता है कि अतमे जाकर वे एक ऐसे सर्व सामान्य सर्वोच्च राज्यके रूप में विकसित हो जायँ जो तबतक टिक सकता है जबतक स्थापित प्रणालीके दोषो और इसके अस्तित्वके विरोधी अन्य आदर्शो और प्रवृत्तियोके उदयके परिणामस्वरूप इसमे एक नया आमूल परिवर्तन ही नही आ जाता या यह पूरी तरहसे अपने स्वाभाविक तत्त्वो और अगोमे खंडित ही नहीं हो जाता । हमने यह भी देख लिया है कि इस प्रकारकी एकता वर्तमान जगत्की ऐसी अवस्थाओके आधारपर प्राप्त की जा सकती है जो कुछ अंशतक अवश्यंभावी परिवर्तनोसे बदल दी गयी है - उन अंतर्राष्ट्रीय परिवर्तनोसे, जो एक नया मौलिक सिद्धात चलानेके स्थानपर केवल पुनर्व्यवस्थामात करते प्रतीत होते है और राष्ट्रोके भीतर होनेवाले उन सामाजिक परिवर्तनोसे, जिनका प्रभाव दूरतक पहुँचता है । अर्थात्, यह एकता उसी प्रकारकी होगी जैसी वर्तमान समयके स्वतंत्र राष्ट्रो और उपनिवेश बनानेवाले साम्राज्योके बीचमे होती है पर इसके साथ समाजकी एक ऐसी आतरिक व्यवस्था तथा प्रशासनीय योजना होगी जो वेगसे राज्यके कठोर समाजवाद और समानताकी ओर बढ़ेगी; इनसे स्त्री जाति और श्रमिकोका विशेष हित होगा क्योकि ये इस समयकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ है । निश्चय ही यह कोई भी विश्वासपूर्वक पहलेसे नहीं कह सकता कि इस समयकी प्रवृत्ति संपूर्ण भविष्यपर सफलतापूर्वक अपना अधिकार जमा लेगी । हम नहीं जानते कि इस महान् मानवी नाटकके कौन-कौन-से आश्चर्य, पुराने राष्ट्र-विचारकी कौनसी उद्दाम तरग, क्या-क्या संघर्ष, कौन-कौन-सी असफलताएँ, नयी समाजिक प्रवृत्तियोके कार्यान्वित होनेमे कौन-कौन से अप्रत्याशित परिणाम, बोझिल और यात्रिक राज्य-समष्टिवादके विरोधमे मानवी भावनाका कौनसा विद्रोह, दार्शनिक अराजकतावादके ऐसे सिद्धांतकी कौनसी प्रगति और शक्ति जिसका कार्य ही मनुष्यकी वैयक्तिक स्वाधीनता और स्वतंत्र आत्म-परिपूर्णतासंबंधी सुदृढ आकांक्षाकी परिपुष्टि करना है, कौन-कौन से धार्मिक और आध्या82
त्मिक महान् परिवर्तन मनुष्यजातिकी इस वर्तमान गतिविधिमे हस्तक्षेप नही करेगे और इसे एक और प्रकारकी घटनामे नही बदल देगे । मानव मन अभी प्रकाश या उस निश्चित विज्ञानतक नहीं पहुँचा है जिसके द्वारा वह अगले दिनके विषयमे भी कुछ ठीक-ठीक बता सके ।
फिर भी, हम यह मान लेते हैं कि इस प्रकारकी कोई भी अप्रत्याशित बात नही होगी और तव मनुष्यजातिकी किसी-न-किसी प्रकारको राजनीतिक एकता चरितार्थ की जा सकेगी । पर एक प्रश्न फिर भी बाकी रह जाता है कि क्या यह वाछनीय है कि यह एकता इस प्रकारसे और अभी प्राप्त की जानी चाहिये और ऐसा हो तो किन परिस्थितियोमे तथा किन आवश्यक शर्तों के साथ इसे प्राप्त किया जा सकता है, क्योकि इनके बिना जिस एकताकी प्राप्ति होगी वह मानवजातिके पुराने और अपूर्ण ऐक्यो ही के समान अस्थायी होगी। पहले हमे यह स्मरण रखना चाहिये कि जिन वृहत्तर एकताओको मनुष्यजाति पूर्वकालमे प्राप्त कर चुकी है उन्हें उसने किस मूल्यपर प्राप्त किया था । निकट भूतकालने वस्तुतः हमारे लिये राष्ट्र बनाया, फिर राष्ट्रोके एक स्वाभाविक समजातीय साम्राज्यका निर्माण किया जो जाति और संस्कृतिमे समान थे अथवा जो भौगोलिक आवश्यकता और पारस्परिक आकर्षणद्वारा एक हो गये थे; उसने एक ऐसे कृत्रिम विषमजातीय साम्राज्यकी भी स्थापना की जो विजयद्वारा प्राप्त किया गया था तथा जिसे वल-प्रयोग, कानूनके जुए तथा व्यापारिक और सैनिक उपनिवेशीकरणद्वारा सुरक्षित रखा गया था, किंतु ये सव अभीतक सच्ची मनोवैज्ञानिक एकताओपर आधारित नही थे । समष्टिकरणके इन सिद्धान्तोमेसे प्रत्येकने ही समूची मानवजातिको कोई-न-कोई वास्तविक लाभ या उन्नतिकी सभावना प्रदान की है पर प्रत्येकके ही साथ उसके अपने अस्थायी या स्वभावगत दोष रहे है और प्रत्येकने मानवताके पूर्ण आदर्शको किसी-न-किसी प्रकारकी चोट पहुँचायी है ।
एक नमी एकताका निर्माण जब बाह्य और यात्रिक प्रक्रियाओके द्वारा आगे वढता है, तो इससे पहले कि इकाई अपने आतरिक जीवनके नये और स्वतंत्र विस्तारका फिरसे उपभोग करे, उसे, वास्तवमे, साधारणतया और प्रायः ही किसी क्रियात्मक आवश्यकताके कारण आंतरिक संकोचकी प्रक्रियामेसे गुजरना पडता है, क्योकि उसकी पहली आवश्यकता और सहजप्रेरणा उसके अपने अस्तित्वको बनाने तथा सुरक्षित रखनेकी होती है । अपनी एकताको क्रियान्वित करना उसकी सबसे प्रवल प्रेरणा है और उस उच्चतम आवश्यकताके आगे उसे विभिन्नता, सामंजस्यपूर्ण जटिलता, विविध
साधनोंकी समृद्धि तथा आतरिक संबंधोकी स्वतंत्रताका बलिदान करना पडता है, क्योंकि ऐसा किये बिना जीवनकी सच्ची पूर्णता प्राप्त करना असभव है। शक्तिशाली और दृढ एकता लाने के लिये उसे एक अति प्रवल केंद्र या केंद्रित राज्य सत्ताकी स्थापना करनी पडेगी, चाहे वह सत्ता राजाकी हो या सैनिक कुलीन-तंत्र अथवा धनिक-वर्गकी या फिर किसी और शासनपद्धतिकी हो । व्यक्ति, जनपद, नगर, प्रदेश या किसी अन्य छोटी इकाईको स्वाधीनता और स्वतंत्र जीवनको इस केंद्र या सत्ताके अधीन होना पडेगा तथा इसपर अपने आपको बलिदान कर देना होगा । इसके साथ ही समाजको एक दृढ रूपमे यंत्रीकृत तथा कठोर अवस्थाके निर्माणकी प्रवृत्ति भी पायी जाती है; यह अवस्था कभी-कभी भिन्न-भिन्न वर्गों या श्रेणियोकी ऐसी ऋमिक व्यवस्था होगी जिसमें निम्न वर्गको हीन स्थान और कर्तव्य दिया जायगा जिसके फलस्वरूप उसे उच्च वर्गसे अधिक सकुचित जीवन विताना पडेगा । यूरोपमे राजा, पुरोहित, कुलीनतंत्र, मध्यवर्ग, किसान तथा सेवकवर्गकी ऐसी क्रमिक वर्गव्यवस्था और भारतवर्ष में कठोर वर्णव्यवस्था इसके उदाहरण है। पहलीने यूरोपमे नगर और उपजातिके समृद्ध और स्वतंत्र जीवनका तथा दूसरीने भारतवर्षमे उत्साही आर्य -वशोंके स्वच्छद और स्वाभाविक जीवनका स्थान ले लिया था। इसके अतिरिक्त, जैसा कि हम पहले देख भी चुके हैं, पूर्ण ओजस्वी सामान्य जीवनमे सवका या अधिक लोगोका उत्साहपूर्ण और सक्रिय भाग लेना -- जिससे पहले समयकी छोटी परतु स्वतंत्र जातियोने अत्यधिक लाभ उठाया था - अपेक्षाकृत बड़े समुदायमे कही अधिक कठिन है, पहले तो यह असभव ही है । इसके स्थानपर अब किसी एक प्रवल केंद्र या अधिक-से-अधिक एक शासक और सचालक वर्ग या वर्गोमे जीवनशक्ति केंद्रित हो गयी है, जब कि समाजका एक वडा भाग एक प्रकारकी जडतामे पडा हुआ है और वह केवल उस जीवन-शक्तिके न्यूनतम और अप्रत्यक्ष अंशका उतना ही उपभोग करता है जितना कि वह ऊपरसे छनकर आ सकती है तथा नीचेके स्थूलतर और अधिक दीन और संकीर्ण जीवनको अप्रत्यक्ष रूपमे प्रभावित कर सकती है । यह कम-से-कम वह तथ्य है जिसे हम मानव-प्रगतिके उस ऐतिहासिक कालमे देखते है जो आधुनिक जगत्से पहलेका काल था तथा जिसने इसका निर्माण किया था । जो नवीन राजनीतिक और सामाजिक रूप इसका स्थान ले रहे है या ले लेगे उनके ठोस निर्माण तथा एकतीकरणके लिये केंद्रीकारक और रचनात्मक कठोरताकी आवश्यकता भी भविष्यमे अनुभव हो सकती है ।
ऐसे छोटे मानव-समुदाय, जिनमे सव लोग सरलतापूर्वक सक्रिय भाग ले
सकते हैं, जिनमे विचारो और चेष्टाओको शीघ्रता और स्पष्टतासे अनुभव, कार्यान्वित तथा किसी बृहत् और जटिल सगठनकी आवश्यकताके बिना ही रूप प्रदान किया जा सकता है, स्वाभाविक रूपमे, आत्मरक्षाकी सर्व प्रमुख आवश्यकतासे मुक्त होते ही, स्वतत्रताकी ओर झुक जाते है । इस प्रकारके वातावरणमे स्वेच्छाचारी राजतंत्र या निरंकुश कुलीनतत्र, अचूक पोपशासन या धर्मान्ध पुरोहित शासन जैसी प्रणालियाँ सरलतापूर्वक नही पनप सकती । जनसाधारणसे तथा व्यक्तियोकी नित्यप्रतिकी आलोचनाके क्षेत्रसे दूर रहनेका वह लाभ उन्हे नही प्राप्त होता जिसपर उनकी प्रतिष्ठा निर्भर करती है। विशाल समुदायो तथा विस्तृत प्रदेशोमे एकरूपताकी जिस अनिवार्य आवश्यकताको वे अन्यत्र उचित ठहराते है उसकी जरूरत यहाँ नही पडती । अत रोममे हम देखते है कि राजतनीय शासन पद्धति अपनेआपको सुरक्षित नही रख सकी और ग्रीसमें यह एक ऐसी अस्वाभाविक पद्धति मानी गयी जिसने कुछ कालके लिये जवर्दस्ती अपना अधिकार जमा लिया था, उधर शासनका कुलीनतत्त्रीय रूप, यद्यपि वह अधिक शक्तिशाली था, स्पार्टा जैसे शुद्ध सैनिक जन समुदायको छोडकर, और कही न तो उच्च और अनन्य सर्वोच्चता प्राप्त कर सका और न ही स्थायी रूपमे टिक सका । एक ऐसी जनतत्रीय स्वतत्रताकी प्रवृत्ति, जिसमे प्रत्येक व्यक्ति राज्यकी सास्कृतिक संस्थाओं तथा नागरिक जीवनमे स्वाभाविक रूपसे भाग लेता हो, विधान और नीति निर्धारणमे समान रूपसे अपना मत दे सकता हो तथा उनकी कार्यान्वितिमे उतना भाग तो ले ही सकता हो जितना कि उसके नागरिकताके अधिकार तथा उसकी वैयक्तिक योग्यताद्वारा उसे मिल सकता है, नगर- राज्यकी भावना तथा उसके रूपमे प्रारंभसे ही विद्यमान थी । रोममे भी यह प्रवृत्ति उपस्थित थी पर वह ग्रीसकी भाति न तो इतने वेगसे उन्नत हो सकी और न ही पूर्ण रूपसे चरितार्थ हुई; कारण, वहाँके सैनिक तथा विजयी राज्यको अपनी विदेशी नीति और सैनिक कार्य व्यवहारके संचालनके लिये स्वेच्छाचारी शासक अथवा एक छोटे कुलीनतत्रीय वर्गकी आवश्यकता थी; परंतु उस अवस्थामे भी जनतत्त्रीय तत्त्व सदा विद्यमान रहा और जनतवीय प्रवृत्ति इतनी प्रबल रही कि रोमकी आत्मरक्षा और उसके विस्तारके सतत संघर्ष के बीचमे भी वह पूर्व - ऐतिहासिक कालसे कार्य करती तथा बढ़ती रही । इसकी गति तभी रुकी जब रोमको भूमध्यसागरके साम्राज्य के लिये कारथाजके साथ युद्ध तथा ऐसे ही कई और महान् सघर्ष करने पडे । भारतवर्षमे प्रारंभिक जन समुदाय स्वतंत्र समाज थे, इनमे राजा केवल सेनाका प्रधान या नगरका मुखिया होता था; बुद्धके समयमें
भी जनतंत्रीय तत्त्व पूरी तरहसे विद्यमान था, चंद्रगुप्त और मेगस्थनीजके समय में यह छोटे राज्योमे उन दिनो भी जीवित रहा जब कि नीकरशाही ढंगसे शासित राजतन और साम्राज्य अंतिम रूपसे पुरानी स्वतंत्र राज्यपद्धतिका स्थान ले रहे थे । जिस अशमें सारे प्रायद्वीपमें या काम-से-कम उसके उत्तरी भागमे भारतीय जीवनके विशाल संगठनकी आवश्यकता अधिकाधिक अनुभव होने लगी उसी अंशमे स्वच्छद राजतंत्रकी प्रणालीने समस्त देशपर अपना अधिकार जमा लिया और पंडित एवं पुरोहित वर्गने समाजकी मन-बुद्धिपर अपने धर्मतत्त्रीय राज्यको तथा उस कठोर शास्त्रको लाद दिया जो सामाजिक एकता और राष्ट्रीय संस्कृतिकी शृंखला और कड़ी प्रदान करनेवाला समझा जाता था ।
जो वात राजनीतिक और नागरिक जीवन में थी वही बात सामाजिक जीवनमे भी थी । जन-समुदायमे एक प्रकारकी जनतंत्रीय समानता तो प्रायः अनिवार्य होती ही है; वर्गगत प्रवल विभेदों और विशिष्टताओका विरोधी तथ्य किसी जाति या वंशके सैनिक कालमे तो स्थापित हो सकता है पर वह एक सुप्रतिष्ठित नगर- राज्यके निकट सान्निध्य में चिरकालतक नहीं टिक सकता, हाँ, कुछ ऐसे कृत्रिम साधनोद्वारा जिनका कि स्पार्टा और वेनिसने प्रयोग किया था ऐसा हो सकता है । यह विभेद रहे भी, तो भी इसका एकातभाव कुंद पड़ जाता है और वह अपने आपको इतना सघन तथा शक्तिशाली नही बना सकता कि वह एक दृढ़ वर्ण-परंपराका रूप धारण कर ले। छोटे जन समुदायका स्वाभाविक सामाजिक रूप हम एथेन्समे देख सकते हैं जहाँ एक गरीब चर्मकार भी उतना ही प्रवल राजनीतिक अधिकार रखता था जितना कि एक कुलीन और धनी व्यक्ति, जहाँ सर्वोच्च पद और नागरिक कार्य सव वर्गोंके व्यक्तियोके लिये सुलभ थे । थे। साथ ही सामाजिक कार्यो और संवधोमे भी उन्हें स्वतंत्र सहचारिता और समानता प्राप्त थी । भारतीय सभ्यताके प्राचीनतर अभिलेखोमें हम इसीसे मिलतीजुलती पर भिन्न प्रकारकी जनतंत्रीय समानता देखते हैं, वर्ण-भावनाके दंभ और अहंकारसे युक्त कठोर वर्ण-परंपरा पीछेकी बात है; पूर्वकालके अपेक्षाकृत सरल जीवनमे कार्यकी विभिन्नता यहाँतक कि श्रेष्ठता के साथ भी वैयक्तिक या वर्गीय श्रेष्ठताका भाव नही जुड़ा हुआ था । ऐसा मालूम होता है कि आरंभमे सबसे अधिक पवित्र धार्मिक और सामाजिक कार्य अर्थात् ऋषि और पुरोहितका कार्य सव वर्गोंके व्यक्तियो तथा सव प्रकारके व्यवसायियोके लिये खुला हुआ था। धर्मतत्त्र, वर्ण-व्यवस्था और निरंकुश राजतंत्रकी शक्ति उसी प्रकार साथ-ही-साथ वढ़ी जिस प्रकार मध्यकालीन यूरोपमें
पादरीवर्ग और राजतंत्रीय आधिपत्यकी शक्ति वढी थी । इस शक्ति वृद्धिका कारण उन नयी परिस्थितियोका दवाव था जो वृहत् सामाजिक और राजनीतिक समुदायोके विकाससे उत्पन्न हुई थी ।
प्राचीन ग्रीस, रोम और भारतवर्ष के नगर- राज्योकी इन परिस्थितियों में जिन समाजोने सास्कृतिक प्रगति की उन्हें जीवनकी एक ऐसी सामान्य स्फूर्ति तथा संस्कृति और निर्माणकी एक ऐसी गतिशील शक्तिका विकास करना पडा जिससे आगे आनेवाले समुदाय वंचित रह गये तथा जिसे वे केवल स्वनिर्माणके लंबे समयके वाद ही प्राप्त कर सके; इस समयमे उन्हें एक नये संगठनके विकासमे आनेवाली कठिनाइयोका सामना तथा निराकरण करना पडा । ग्रीक नगरके सास्कृतिक और नागरिक जीवनने - जिसकी सर्वोच्च प्राप्ति एथेन्समे हुई थी - ऐसे जीवनने जिसमें जीवन यापन अपनेआपमे एक शिक्षा थी, जहाँ गरीवसे गरीव और धनीसे धनी नाटकघरमे साथ-साथ बैठकर सोफोक्लीस ( Sophocles ) और युरीपिडीज (Eurepides ) के नाटक देखा करते तथा उनके बारेमे अपना मत देते थे, जहाँ एथिनियन व्यापारी और दूकानदार सुकरातके सूक्ष्म दार्शनिक वार्तालापमे भाग लेते थे - यूरोपके लिये उसके आधारभूत राजनीतिक सूत्रो और आदर्शोका ही निर्माण नही किया वरन् उसकी बौद्धिक, दार्शनिक, साहित्यिक और कलात्मक संस्कृतिके सभी मूल स्वरूपोका भी निर्माण किया था । अकेले रोम नगरके समान रूपसे सजीव, गजनीतिक, वैध और सैनिक जीवनने यूरोपके लिये उसके राजनीतिक कार्य, सैनिक अनुशासन, विज्ञान, विधान और साम्यके व्यवहार शास्त्रके नमूनोंका यहाँतक कि साम्राज्य और उपनिवेशीकरणके आदर्शोका भी निर्माण किया है। भारतवर्षमे आध्यात्मिक जीवनकी प्राचीन सजीवताने ही - जिसकी झलक हमे वेदो, उपनिषदो तथा चौद्ध ग्रंथोमे मिलती है - उन धर्मो, दर्शनो तथा आध्यात्मिक नियमोंको उत्पन्न किया था जिन्होने तबसे प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभावद्वारा एशिया या यूरोपमे अपनी भावना और ज्ञानके एक अशका प्रसार करना शुरू कर दिया है । इस स्वतंत्र, सामान्यीकृत, व्यापक रूपसे स्पदनशील, जीवंत और गतिशील शक्तिकी जड जिसे आधुनिक जगत् केवल अब किसी अशमे पुनः प्राप्त कर रहा है सर्वत्र, सव भेद होते हुए भी, एक ही थी; समाजके बहुमुखी जीवनमें वह एक सीमित वर्गका नही वरन् व्यक्तिमात्रका पूर्ण सहयोग था । प्रत्येक यह समझता था कि उसमे सवकी शक्ति है, साथ ही उसे वैश्व शक्तिके उद्दाम प्रवाहमे अपनी उन्नति करने, अपना निज स्वरूप प्राप्त करने, सफलता लाभ करने, सोचने तथा निर्माण करनेकी एक प्रकारकी स्वतंत्रता भी है ।
वह यही स्थिति अर्थात् व्यक्ति और समुदायका संबंध है जिसकी पुनः - स्थापनाके लिये आधुनिक जीवनने वोझिल, बेढगे और अपूर्ण ढगसे किसी हदतक चेप्टा की है, यद्यपि उसके पास प्राचीन मानवजातिकी अपेक्षा कही अधिक विशाल जीवन शक्ति और विचार-शक्ति है ।
यह संभव है कि यदि पुराने नगर-राज्य गण - राष्ट्र बने रहते और अपनेआपको बदलकर और नये जनसमुदायमे अपने जीवनको विलीन किये विना ही, वृहत्तर समुदायोका निर्माण कर लेते तो बहुत-सी समस्याओका अधिक सरलतासे प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टिद्वारा तथा प्रकृतिके अनुकूल रहते हुए समाधान हो जाता, जब कि अब हमे वडे जटिल और दुःखदायी तरीकेसे तथा वडे भारी संकटो और व्यापक विप्लवोसे डरते हुए इन समस्याओका हल करना पड़ रहा है । पर ऐसा होना संभव नहीं था । उस पुराने जीवनमे भारी दोप थे जिन्हें वह दूर नहीं कर सकता था । भूमध्यप्रदेशके राष्ट्रोमे हम देखते हैं कि समाजके पूर्ण नागरिक और सास्कृतिक जीवनमे सव व्यक्तियोके समान भाग लेनेके सवधमे दो अत्यधिक महत्वपूर्ण अपवाद किये गये थे। दास-वर्ग तो उसमे भाग ले ही नहीं सकता था और स्त्रियाँ भी, जिनकी जीवन-परिधि अत्यंत संकुचित थी, इस अधिकारसे प्रायः वंचित ही रखी गयी थी । उधर भारतवर्षमे दास प्रथा नहीके वरावर थी और स्त्रियोको भी शुरू-शुरूमे यहाँ ग्रीस और रोमकी स्त्रियोसे अधिक स्वतंत्र और सम्मानयुक्त पद प्राप्त था; किन्तु शीघ्र ही दासका स्थान सबसे निम्न जाति शूद्रने ले लिया। शूद्रों और स्त्रियोको सामान्य जीवन और संस्कृतिके उच्चतम लाभोंसे वंचित रखनेकी यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ती गयी कि भारतीय समाजको भी यह उसके पश्चिमी साथियोके स्तरतक ले आयी । यह संभव है कि प्राचीन समाजमे -- यदि वह अधिक समयतक जीवित रहता तो - आर्थिक दासता और स्त्रियोकी पराधीनताकी दो वड़ी समस्याओपर विचार करके उसी प्रकार उनका समाधान किया जाता जिस प्रकार आधुनिक राज्यमे इनपर विचार करके इन्हें सुलझानेकी चेप्टा की जा रही है, पर यह वात संशयपूर्ण है। केवल रोममे ही हम कुछ ऐसी प्रारंभिक प्रवृत्तियाँ देखते है जो इस दिशामे कुछ कार्य कर सकती थीं पर वे भी भविष्यकी संभावनाके अस्पष्ट संकेतोके अतिरिक्त और कुछ नही दे सकी ।
इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मानव समाजके इस प्राचीन रूपको समुदायो पारस्परिक संबधोका प्रश्न सुलझानेमे जरा भी सफलता प्राप्त नही हुई युद्ध ही उनके सामान्य संबंधका आधार रहा । स्वतंत्र संघ वनानेके उनके सव प्रयत्न निष्फल हुए और एकीकरणका एकमात्र
साधन सैनिक विजय ही रह गया । उस छोटे समुदायके मोहने, जिसमें प्रत्येक मनुष्य अपने आपको अत्यधिक सजीव समझता था, एक प्रकारकी मानसिक और प्राणिक संकीर्णता उत्पन्न कर दी, यह सकीर्णता अपनेआपको उन नये और अधिक व्यापक विचारोके अनुकूल नही बना सकी जिन्हें दर्शन और राजनीतिक विचार अधिक व्यापक आवश्यकताओं और प्रवृत्तियोद्वारा प्रेरित होकर जीवन क्षेत्रमे लाये थे । इसीलिये इन पुराने राज्योको भंग होना पड़ा, भारतवर्षमे ये गुप्त और मौर्य राजाओके विशाल नौकरशाही साम्राज्योमे विलीन हो गये जिनके वाद पठान, मुगल और अंग्रेज आये और पश्चिममे ये उन विशाल सैनिक और व्यापारिक विजित प्रदेशोमे मिल गये जो सिकन्दर, कारथेजिनियन, कुलीनतत्र तथा रोमके गणतत और साम्राज्यद्वारा प्राप्त हुए थे । इन पिछले राज्योकी एकता राष्ट्रीय नही, वल्कि अति-राष्ट्रीय थी । मनुष्यजातिमे अतिव्यापक एकता लानेके लिये ये ऐसे असामयिक प्रयत्न थे जो वास्तवमे तवतक पूर्णतया सफल नही हो सकते थे जबतक बीचकी राष्ट्र इकाई पूर्ण और स्वस्थ ढंगसे विकसित ही न हो जाती ।
अतएव राष्ट्रीय समुदायका निर्माण उस सहस्राब्दीमे होना था जो रोम-साम्राज्यके छिन्न-भिन्न होनेके वाद आयी । अपनी इस समस्याको सुलझाने के लिये ससारको उस समय उन अनेको, वास्तवमे, अधिकतर लाभोको छोड़ना पड़ा जिन्हे नगर- राज्योने मानवजातिके लिये प्राप्त किया था । इस समस्याको सुलझानेके बाद ही एक सुसगठित, उन्नतिशील और अधिकाधिक पूर्णताप्राप्त समाज तथा सामाजिक जीवनके शक्तिशाली साँचेको और साथ ही उस साँचेके अंदर जीवनके स्वतन अभ्युदय और उसकी पूर्णताको विकसित करनेका कोई सच्चा प्रयत्न किया जा सकता था। पहले हमे जरा इस विकास-क्रमका थोड़ा-सा अध्ययन करना होगा । उसके वाद हम इस विपयपर विचार कर सकते है कि वृहत्तर समुदायके निर्माणका नया प्रयत्न पुन पीछे हटनेके खतरेसे खाली हो सकता है या नही । इस पीछे हटनेमे जातिकी आंतरिक उन्नतिका कम-से-कम कुछ समयके लिये तो वलिदान करना ही पडेगा जिससे विशाल वाह्य एकताके विकास और उसकी स्थापना के लिये पूरा प्रयत्न किया जा सके ।
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शाली व्यवस्थाओका संचालन राज्य ही करे। इसीको हम युद्धकी प्रचलित भापामे यूं कह सकते है कि राज्य व्यक्तिकी बुद्धि, योग्यता, उसके विचार, भाव, जीवन और उस सबको जो वह है या उसके पास है, सर्वहितके लिये "प्रचालित" करे । इसको यदि अतिम परिणामतक पहुँचाया जाय तो वह होगा समाजवादी आदर्शका पूरा जोर होना और इसी परिणामकी ओर मनुष्यजाति एक अपूर्व वेगसे बढ़ती हुई प्रतीत हो रही है। राज्य-सिद्धात आज अत्यंत वेग और बलके साथ अधिकार प्राप्त करनेका यत्न कर रहा है, वह अपने पैरो तले उस सबको कुचलनेके लिये तैयार है जो उसके प्रवाहके आगे आते है या मानवकी अन्य प्रवृत्तियोके अधिकारकी स्थापना करनेका प्रयत्न करते है । पर जिन दो विचारोपर वह आधारित है वे सत्य और असत्यके उस विनाशकारी मिश्रणसे भरे हुए है जो हमारे समस्त मानवी अधिकारो और सिद्धातोके साथ जुड़ा रहता है। यदि हमे असहाय होकर प्रकृतिके गभीर और गहन सत्यकी ओर आने से पहले भ्रमका एक और चक्कर न काटना हो तो हमे एक ऐसे जिज्ञासापूर्ण और निष्पक्ष विचारकी शोधन क्रिया द्वारा इन अधिकारी तथा सिद्धातोको देखना होगा जो शब्द-जालके धोखेमे आनेसे इन्कार कर दे । वास्तवमे प्रकृतिका गभीर और गहन सत्य ही हमारा प्रकाश और मार्गदर्शक होना चाहिये । चौथा अध्याय राज्य-सिद्धांतकी अपर्याप्तता आखिर यह राज्य सिद्धात, यह संगठित समाजका विचार जिसके लिये व्यक्तिकी बलि देनी होगी, है क्या ? आदर्शरूपमे यह व्यक्तिसे इस बातकी माँग करता है कि वह अपने आपको सर्वहितके अधीन कर दे; व्यावहारिक रूपमें वह सामूहिक अहके अधीन हो जाता है जिस अहंका स्वरूप राजनीतिक, सैनिक तथा आर्थिक होता है । यह उन सामूहिक उद्देश्यों और महत्त्वाकाक्षाओको पूरा करनेकी चेष्टा करता है जो शासकोके छोटे या वडे दल द्वारा -- ये किसी रूपमे समाजके प्रतिनिधि माने जाते है - कल्पित होते है तथा व्यक्तियोके वृहत् समूहपर आरोपित किये जाते है । इस बातसे कुछ फर्क नही पड़ता कि ये किसी शासक वर्गके हो, या जैसा कि आधुनिक राज्योमें होता है, अंशतः अपने चरित्र वलसे पर अधिकतर परिस्थितिकी सहायतासे जनसाधारणमेसे निकले होते है । इसमे इस वातसे भी कुछ विशेष अंतर नही आता कि उनके उद्देश्य और आदर्श आजकल स्पष्ट और साक्षात् वल- प्रयोग द्वारा नहीं, बल्कि शब्दोंकी समोहन क्रिया द्वारा जनतापर लादे जाते है। दोनोमेसे किसी भी अवस्थामे भरोसेके साथ नहीं कहा जा सकता कि ये शासक-वर्ग या शासक-दल राष्ट्रकी सर्वश्रेष्ठ बुद्धि या उसके सर्वोत्तम उद्देश्यो या उच्चतम प्रेरणाओके प्रतीक है। संसारके किसी भागके आधुनिक राजनीतिज्ञके बारेमे ऐसा नहीं कहा जा सकता; वह जातिकी आत्मा या उसकी उच्च आकाक्षाओका प्रतीक नही होता । साधारणतया वह अपने चारो ओरकी आम तुच्छता, स्वार्थ - परता, अहवुद्धि और आत्म-प्रवचनाका ही प्रतिनिधि होता है। इनका प्रतिनिधित्व तो वह भलीभाँति करता ही है, साथ ही अत्यधिक मानसिक अयोग्यता, नैतिक-रूढ़िता, भीरुता, क्षुद्रता तथा पाखडका प्रतिनिधित्व भी करता है । निर्णयके लिये उसके सामने महान् प्रश्न प्रायः आते है, पर उनके समाधानका उसका ढंग महान् नही होता । उच्च शब्द और उत्तम विचार उसके मुखपर होते है, पर वे शीघ्र ही पार्टीके विज्ञापनकी चीज बन जाते है । वर्तमान राजनीतिक जीवनमे असत्याचरणका यह रोग संसारके प्रत्येक देशमे दृष्टिगोचर हो रहा है और सब लोग, यहॉतक कि बुद्धिजीवी वर्ग भी मत्रमुग्ध होकर ●राज्य-सिद्धान्तकी अपर्याप्तता उस वड़े संगठित स्वांगमे सहमत और सहयोगी हो जाते है और इससे रोग ढक जाता तथा लवे समयतक चलता है, यह सहमति उसी प्रकारकी है जो मनुष्य नित्य अभ्यासकी चीजो को देता है तथा जिससे उसके जीवनका वर्तमान वातावरण बनता है। तो भी ऐसे मनुष्योद्वारा ही सबकी भलाईका निर्णय करना होता है, ऐसे हाथोमे ही यह कार्य सौपना पडता है, राज्य कहलानेवाली ऐसी एजेसीको ही अपने कार्य व्यवहारका निर्देशन और नियंत्रण सौपनेके लिये आज व्यक्तिसे अधिकाधिक अनुरोध किया जा रहा है । इससे वस्तुतः सर्वका अधिकतम हित किसी तरह भी सिद्ध नही होता, इसके बदले हम अत्यधिक संगठित भूले और दोष देखते हैं जिनमे कुछ हित भी होता है उससे वास्तविक उन्नति की ओर प्रगति होती है। प्रकृति सदा सर्व प्रकारकी भूल-चूकके बीचसे आगे वढती है और अतमे -- अधिकतर मनुष्यकी अपूर्ण बुद्धिकी बाधाके होते हुए भी, न कि उसकी सहायतासे -- अपने उद्देश्योको पूरा करती है । परतु यदि शासन - यत्र अधिक अच्छा भी बना हो और उसका मानसिक और नैतिक चरित्र अधिक ऊँचा भी हो, यदि, जैसा कि प्राचीन सभ्यताओने अपने शासक-वर्गमे कुछ ऊँचे आदर्श तथा अनुशासन लानेका यत्न किया था, वैसा करनेका रास्ता आज भी निकाल लिया जाय तो भी राज्य वह वस्तु नही वन सकेगा जिसका कि राज्य-सिद्धातकी ओरसे दावा किया जाता है । आदर्शरूपमे राज्य समाजकी वह सामूहिक वल-बुद्धि है जो सर्वहितके लिये सुलभ और संगठित कर दी जाती है । पर व्यावहारिक रूपमे जो इजिनपर नियत्रण रखती है और गाड़ीको चलाती है वह समाजकी केवल उतनी-सी वलबुद्धि होती है जितनीको राज्य संगठनकी विशेष मशीनरी ऊपरी तलपर आने देती है; बल्कि यह भी मशीनरीकी लपेटमे आ जाती है तथा उसके कारण इसके कार्यमे रुकावट तो पडती ही है साथ ही इसे उस अत्यधिक मूर्खता और स्वार्थपूर्ण दुर्बलताके कारण भी रुकना पडता है जो इसके साथ-साथ ऊपर उठ आती है । नि. सदेह, इन परिस्थितियोमे अधिक-से-अधिक यही हो सकता है, और प्रकृति सदा की भाँति इसका अधिकतम उपयोग करती है। परतु स्थिति और भी अधिक खराब होती यदि वैयक्तिक प्रयत्नके लिये एक ऐसा क्षेत्र न छोड दिया जाता जिसमे कि वह अपेक्षाकृत स्वतत्ररूपसे उस कार्यको करे जिसे राज्य नही कर सकता, जिसमे वह सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियोकी सच्चाई, शक्ति और आदर्श - भावनाको प्रकट करके तथा उन्हे प्रयोगमे लाकर उस कार्यको करे जिसे करनेके लिये राज्यके पास बुद्धि या साहस नही है और साथ ही उस कार्यको पूरा करवाये जिसे सामूहिक मानव एकताका आदर्श. रूढिता और निर्बलता या तो बिना किये छोड देती या सक्रिय रूपमें उसका दमन तथा विरोध करती । व्यक्तिकी यही शक्ति सामूहिक उन्नतिके लिये यथार्थ रूपमे उपयोगी कार्य करती है । राज्य कभी-कभी इसकी सहायता के लिये आगे बढ़ता है और तव, यदि उसकी सहायताका अर्थ अनुचित नियंत्रण न हो तो, उसका परिणाम निश्चित ही हितकर होता है । पर अधिकतर तो यह रास्तेमे रोड़ा ही अटकाता है, फिर या तो वह उन्नतिपर रोक लगानेवाला बन जाता है या आवश्यक मात्रामे उस संगठित विरोध और सघर्पको जुटाता है जो निर्माणकी क्रियामेसे गुजरती हुई नयी वस्तु को और अधिक बल तथा अधिक पूर्ण आकार देनेके लिये सदैव आवश्यक होता है । पर जिसकी ओर हम आज वढ रहे है वह संगठित राज्य शक्तिका इतना विस्तार, इतना विशाल, अदम्य और जटिल राजकीय कार्य-कलाप है जो स्वतत्र वैयक्तिक प्रयत्नको या तो बिल्कुल मिटा देगा या उसे क्षुद्र, दीन तथा असहाय बनाकर छोड़ देगा। इस प्रकार राज्यरूपी मशीनके इन दोषो, उसकी दुर्बलताओ तथा अयोग्यताको सुधारनेका एक आवश्यक साधन नष्ट हो जायगा । सगठित राज्य न तो राष्ट्रकी सर्वश्रेष्ठ बुद्धि है और न ही सामाजिक शक्तियोका कुल-जोड । वह अपने सगठित कार्य क्षेत्रमेसे महत्त्वपूर्ण अल्पसंख्यक वर्गीकी कार्यशक्ति तथा उनके विचारशील मनको बहिष्कृत कर देता है, उन्हें दबाता या अनुचित रूपसे निरुत्साहित करता है । अधिकतर ये उसके प्रतीक होते है जो वर्तमानमे सर्वश्रेष्ठ है तथा भविष्यके लिये विकसित हो रहा है। यह एक सामूहिक अहभाव है जो समाजके ऊँचे-सेऊँचे अहंभावसे बहुत निम्न कोटिका है । यह अहभाव अन्य सामूहिक अहभावोकी तुलनामे क्या है यह हम जानते है, और हालमे इसकी कुरूपता मनुष्यजातिकी दृष्टि और विवेक बुद्धिके सामने प्रकट हो चुकी है। साधारणतया व्यक्ति के पास कम-से-कम आत्मा जैसी वस्तु तो होती ही है और हर हालतमे वह आत्माकी कमियोको नैतिकता और सदाचारकी पद्धतिसे पूरी करता है, फिर इनकी कमियोको लोकमतके भयसे और, इसमे भी असफल होनेपर, सामाजिक कानूनके भयसे दूर करता है। इस कानूनका उसे साधारणतया या तो पालन करना होता है या फिर कम-से-कम वह इसे टाल तो सकता ही है, टालनेके इस कार्यमे जो कठिनाई आती है वह अत्यत उद्दड या बहुत चालाक लोगोको छोड़कर बाकीपर एक प्रतिबंध होती है । राज्य एक ऐसी सत्ता है जो, बहुत अधिक शक्ति होनेके कारण, आतरिक दुविधाओं या बाह्य प्रतिबधो द्वारा कम-से-कम पीडित होती है । इसकी आत्मा या तो होती ही नहीं या फिर केवल प्रारंभिक अवस्थामे होती है। यह एक सैनिक, राजनीतिक और आर्थिक शक्ति है; यदि यह एक बौद्धिक और नैतिक सत्ता हो भी तो वह केवल एक थोडे और अविकसित अशमे ही होगी। दुर्भाग्यवश अपनी अल्पविकसित नैतिक भावना को काल्पनिक धारणाओ, मोहक शब्दो और फिर हालमे राज्यदर्शन के द्वारा निस्तेज कर देना ही इसकी अविकसित बुद्धिका मुख्य उपयोग है। समाजके अदर मनुष्य आज कम-से-कम एक अर्ध-सभ्य प्राणी तो है, पर उसका अतर्राष्ट्रीय जीवन अभीतक असस्कृत है । अभी कुछ दिन पहलेतक सगठितराष्ट्र दूसरे राष्ट्रोके साथ अपने सबधोमे केवल एक दीर्घकाय हिंसक जन्तु था, इसकी तृष्णाएँ घटना चक्र द्वारा कभी-कभी नष्ट या निरुत्साहित होकर दब भले ही जाती हो, पर इसके अस्तित्वका मुख्य आधार सदा वे ही रहती थी । दूसरोको हडपकर अपनी रक्षा और अपना विस्तार करना ही इसका धर्म था । आजकल भी इसमें कोई वास्तविक सुधार नही हुआ; केवल हडपनेका कार्य अब अधिक कठिन हो गया है । एक 'पवित्र अहभाव' अभी भी राष्ट्रोका आदर्श है; इसी लिये किसी आक्रमणकारी राज्यपर प्रतिबंध लगानेवाली न तो कोई लोकमतकी सच्ची और निर्मल चेतना है और न ही कोई प्रभावशाली अतर्राष्ट्रीय कानून । यदि कोई भय है तो वह पराजयका है; हालमे अनिष्टकारी आर्थिक विघटनका भय भी हो गया है। परंतु अनुभवोसे पता चलता है कि ये सब प्रतिबंध व्यर्थ है । राज्यका यह अत्यधिक अहभाव किसी समय अपने आतरिक जीवनमें बाह्य सवधोकी अपेक्षा कुछ अच्छा था । * यह क्रूर, लोभी, लुटेरा, धूर्त्त तथा अत्याचारी था और स्वतंत्र कर्म, स्वतत्र वाणी और मतके प्रति ही नही, बल्कि धार्मिक विश्वासकी स्वतंत्रता के प्रति भी असहनशील था । इसने अपने अंतर्गत व्यक्तियो और वर्गीको तथा बाहरके अधिक निर्वल राष्ट्रोको खूब सताया । जिस समाजपर यह निर्भर करता था उसको मामूली तौरपर जीवित, धनी और समर्थ रखनेकी आवश्यकताने ही इसके कार्यको आशिक तथा स्थूल रूपमे उपयोगी बना दिया। कुछ दिशाओमे अवनति होनेपर * मैं प्राचीन और श्राधुनिक युगके बीचके समयकी बात कर रहा हूँ । प्राचीन कालमें राज्य - कम-से-कम कुछ देशोंमें - प्रपनी जनताके प्रति कुछ आदर्श और न्याय-भावना रखता था । पर अन्य राज्यों के साथ वर्तावमें यह बात बहुत ही कम पायी जाती थी । भी आधुनिक समयमे इसमें काफी सुधार हुआ । राज्य अव यह अनुभव करता है कि उसके अस्तित्वका औचित्य सिद्ध करनेके लिये यह आवश्यक है कि वह समाजके तथा सभी व्यक्तियोके भी सामान्य आर्थिक और स्थूलशारीरिक हितोकी व्यवस्था करे। उसने यह देखना आरंभ कर दिया है कि उसे सपूर्ण समाजके वौद्धिक और परोक्षरूपमे नैतिक विकासके लिये निश्चित प्रवध करना है । राज्यका एक बौद्धिक और नैतिक सत्तामे विकसित होनेका यह प्रयत्न आधुनिक सभ्यताकी अत्यंत रोचक घटनाओमेसे एक है । यूरोपके संकटने मनुष्यजातिके अत करणको यह स्वीकार करनेके लिये विवश कर दिया है कि राज्यको उसके वाह्य संबंधोंमे भी वौद्धिक तथा नैतिक रूप देना आवश्यक है । पर समस्त स्वतंत्र वैयक्तिक कार्योको हस्तगत कर लेनेका राज्यका दावा त्यो त्यो वढता जाता है ज्यों-ज्यो वह अपने नये आदर्शों और सभावनाओके प्रति अधिक स्पष्ट रूपमे सचेतन होता जाता है। इसके विषय में हम इतना तो कह ही सकते है कि यह दावा असामयिक है। यदि इसे पूरा कर दिया जाय तो इसके परि णामस्वरूप मनुष्यकी उन्नतिपर एक अवरोध, एक ऐसा सहज संगठित प्रतिबंध लग जायगा जिसने रोम-साम्राज्यकी स्थापनाके बाद ग्रीक-रोमन जगत्को अपने वशमे कर लिया था । अतएव राज्यकी व्यक्तिसे यह मांग, कि वह उसकी वेदी पर अपनी बलि चढा दे और अपने स्वतंत्र कार्योको संगठित सामूहिक कार्यमें विलीन कर दे, हमारे उच्चतम आदर्शोकी माँगसे बिल्कुल भिन्न है। इसका अर्थ है वर्तमान वैयक्तिक अभावको एक अन्य अर्थात् सामूहिक अहंभावमे विलीन कर देना । यह सामूहिक अहंभाव वडा अवश्य है पर श्रेष्ठ नही, वल्कि सर्वश्रेष्ठ वैयक्तिक अहंभावसे कई बातोंमे हीन है । परोपकारका आदर्श, आत्मत्यागकी साधना, सहजीवियोंके साथ अधिकाधिक घनिष्ठ संबंधको आवश्यकता तथा मानवजातिमे एक विकसनशील सामूहिक आत्मा, -- इनके विषयमे हमे कुछ आपत्ति नही पर व्यक्तिका राज्यमे विलीन हो जाना इन उच्च आदर्शोका अर्थ नहीं है, न ही इनकी पूर्ति के लिये यह साधन है। मनुष्यको ओत्म- दमन तथा आत्म-उच्छेद करना नहीं बल्कि मनुष्यजातिकी पूर्णताके अदर अपनी पूर्णता प्राप्त करना सीखना चाहिये । इसी प्रकार उसे यह भी सीखना चाहिये कि वह अपने अहंका उच्छेद या नाश न करे, वल्कि उसे उसकी सीमाओसे वाहर लाकर पूर्ण बनाये तथा एक ऐसी महत्तर वस्तुमे विलीन कर दे जिसका आज वह प्रतीक वननेका यत्न कर रहा है । पर राज्यकी विशाल मशीन द्वारा स्वतंत्र व्यक्तिका लोल लिया जाना एक बिल्कुल ही और प्रकारकी परिणति है । लिये एक सुविधाजनक पर वेढगा साधन है । नही बनाना चाहिये । राज्य हमारे सामान्य विकासके इसे अपने आपमें साध्य कभी राज्य-सिद्धांतका दूसरा दावा कि राज्यकी संगठित मशीनका यह अधिकार और व्यापक कार्य मानव विकासका सर्वोत्तम साधन है अतिशयोक्तिपूर्ण तथा मनगढंत है। मनुष्य समाजपर निर्भर करता है; उसे अपनी वैयक्तिक तथा साथ ही सामूहिक उन्नति करने के लिये भी इसकी आवश्यकता है। क्या यह सत्य है कि राज्य द्वारा संचालित कार्य व्यक्तिकी पूर्ण रूपसे उन्नति करने और साथ ही समाजके साझे हितोको भी प्राप्त करानेमे सबसे अधिक समर्थ है ? न, यह सत्य नही है । सत्य वास्तवमे यह है कि यह समाज मे व्यक्तियोके सम्मिलित कार्यके लिये सब आवश्यक सुविधाएं जुटाने तथा उसके मार्गसे उन सब दुर्वलताओ और बाधाओको दूर करने में समर्थ है जो अन्यथा उसकी प्रक्रियामे रुकावट डालती । यही राज्यकी वास्तविक उपयोगिता समाप्त हो जाती है। मानव सहयोगकी शक्यताओसे इन्कार की सभाव्यता अंग्रेजी व्यक्तिवादकी दुर्बलता थी; सम्मिलित कार्यकी उपयोगिताके बहाने राज्य द्वारा कठोर नियंत्रण स्थापित करना समूहवादके ट्यूटौनिक विचारकी कमजोरी है । जब राज्य समाजके सम्मिलित कार्यका नियत्रण अपने हाथमे लेनेका प्रयत्न करता है, तो उसे एक ऐसे दानवी यंत्रके निर्माण करने का अपराधी वनना पडता है जो अतमे मनुष्यकी स्वतंत्रता, प्रेरक शक्ति और वास्तविक उन्नतिको कुचल डालेगा । राज्य वेढंगे तरीकेसे तथा समूहमे ही काम करनेके लिये मजबूर है । वह उन स्वतत्र, समस्वर तथा ज्ञानपूर्ण या सहजप्रेरित विविध कार्योंके करनेमे असमर्थ है जिनकी आतरिक विकासके लिये आवश्यकता होती है । कोई प्राणिक सत्ता नहीं है, यह एक मशीन है और मशीनकी ही भाँति कार्य करता है । निपुणता, सुरुचित, वैविध्यता, सूक्ष्मता या अतर्ज्ञान इसमे नही होता । इसकी शैली कारखानेकी तरह गढनेकी होती है जब कि मनुष्यजातिका उद्देश्य विकसित होना तथा सृजन करना है। राज्य द्वारा संचालित शिक्षामे हम यही दोप देखते है । यह ठीक है और आवश्यक भी कि शिक्षा सबको उपलब्ध होनी चाहिये । इसे उपलब्ध कराने के लिये राज्य अत्यधिक उपयोगी है, पर जब वह शिक्षापर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है तो वह इसे एक सामान्य ढर्रेकी तथा यात्रिक ढगकी शिक्षा बना देता है जिसमे इससे भिन्न वस्तुएँ - वैयक्तिक प्रेरणा, वैयक्तिक उन्नति और सच्ची प्रगति - असभव हो जाती है । राज्य की प्रवृत्ति सदा एकरूपताकी ओर होती है, कारण, एकरूपता उसके लिये आसान है और स्वाभाविक विविधता लाना उसकी मूलतः यात्रिक प्रकृति के नितांत विरुद्ध है; पर एक रूपता मृत्यु है, जीवन नही । राष्ट्रीय संस्कृति, राष्ट्रीय धर्म, राष्ट्रीय शिक्षा उपयोगी वस्तुएँ हो तो सकती है पर केवल तभी जब वे एक ओर मानव ऐक्य की वृद्धिमे तथा दूसरी ओर विचार, अतःकरण और विकास की वैयक्तिक स्वतन्त्रतामे बाधा न डाले; कारण, ये समाजकी आत्माको मूर्त रूप देती है तथा इसे मानव उन्नतिके कुल योगमे अपना हिस्सा जोडनेमे सहायता पहुँचाती है, किंतु राज्य की शिक्षा राज्यका धर्म और राज्यकी संस्कृति सव अस्वाभाविक अत्याचार है। यही नियम हमारे सामाजिक जीवन तथा उसके कार्योंकी अन्य दिशाओंमे, विभिन्न प्रकारसे तथा विभिन्न अंगोंमे, लागू होता है । जब तक राज्य मनुष्यके जीवन और विकासका एक आवश्यक तत्त्व बना रहता है तबतक उसका यह कर्तव्य हो जाता है कि वह सम्मिलित कार्यकी सव प्राप्य सुविधाएँ जुटाए, वाधाएँ दूर करे, सब प्रकारके वस्तुतः हानिकारक अपव्यय और सघर्षको रोके, - थोड़ा बहुत अपव्यय और संघर्प तो प्रकृतिके सब कार्योमे आवश्यक तथा उपयोगी होता ही है, और व्यर्थ के अन्यायको - दूर करके प्रत्येक व्यक्तिको उसकी क्षमताओं के अनुसार तथा उसके स्वभावके अनुकूल उसकी उन्नति और तुष्टिका एक उचित और समान अवसर प्रदान करे । यहाँ तक तो वर्तमान समयके समाजवादका उद्देश्य ठीक है और अच्छा भी है, पर मानव विकासकी स्वतंत्रतामे किसी प्रकारका भी अनावश्यक हस्तक्षेप हानिकारक होता है या हो सकता है । सम्मिलित कार्य भी हानि है पहुँचा सकता है यदि वैयक्तिक विकास की आवश्यकताओको ध्यानमे रखकर सबके हितके लिये प्रयत्न करनेके स्थानपर, पर, क्योंकि विना वैयक्तिक विकासके किसी प्रकारका वास्तविक और स्थायी सर्वहित होना सभव नही है - वह समाजके अहंभावपर व्यक्ति की बलि चढ़ा दे तथा अधिक पूर्ण रूपसे उन्नत मानव जातिके विकासके लिये जितने स्वतंत्र अवकाश और मौलिक शक्तिकी आवश्यकता हो उसको रोक दे । जब तक मानवजाति पूर्ण रूपसे विकसित नही हो जाती, जब तक उसे विकास करनेकी आवश्यकता रहती है और जब तक वह अधिक महान् पूर्णता प्राप्त करनेमे समर्थ है तब तक समष्टि अपने अंगभूत व्यक्तियोंके विकासकी उपेक्षा करके अपना स्थिर हित नही कर सकती । जो समूहवादी आदर्श व्यक्तिको अनुचित रूपसे अधीन बनाये रखना चाहते हैं वे वास्तवमे एक गतिहीन अवस्थाकी कल्पना करते है चाहे वह आजकल जैसी स्थिति हो या ऐसी स्थिति हो जिसे वह अवस्था शीघ्र स्थापित करनेकी आशा करती है । इस स्थितिके वाद सच्चे परिवर्तन राज्य-सिद्धान्तको अपर्याप्तता का हर एक प्रयत्न सुप्रतिष्ठित सामाजिक व्यवस्थाकी शाति, उचित कार्यक्रम तथा सुरक्षाके विरुद्ध अधीर व्यक्तिवादका अपराध समझा जायगा । यह तो सदा व्यक्ति ही होता है जो स्वयं उन्नति करता है और बाकियोको उन्नत होनेके लिये वाध्य करता है; समुदायकी सहज प्रवृत्ति अपनी स्थापित व्यवस्थामे जमे रहनेकी होती है । उन्नति, विकास और विस्तृत सत्ताकी प्राप्तिसे व्यक्तिको तथा स्थिरता और निश्चित विश्रामकी प्राप्तिसे समुदायको अतिशय सुखकी अनुभूति होती है । जब तक समुदाय एक सजग सामूहिक आत्माकी अपेक्षा एक भौतिक और आर्थिक सत्ता अधिक है तव तक स्थिति ऐसी ही रहेगी । इसलिये मनुष्यजातिकी वर्तमान अवस्थाओमे राज्यकी मशीनरी द्वारा एक स्वस्थ एकता लानी बहुत कठिन है, चाहे यह एकता शक्तिशाली और सगठित राज्योको एकत्रित करने से प्राप्त हो - - ऐसे राज्योको जो परस्पर सुव्यवस्थित तथा न्यायसगत संवधोका उपभोग करते हैं, या फिर यह वर्तमानकी कुछ अव्यवस्थित और कुछ व्यवस्थित राष्ट्र मंडलीके स्थानपर एक ही विश्वराज्यकी स्थापनासे प्राप्त हो, भले ही इस विश्व - राज्यका रूप रोम-साम्राज्यकी भाँति एक अकेले साम्राज्य का हो या सघबद्ध एकता का । मनुष्यजातिके निकट भविष्यमे ऐसी बाह्य या प्रशासनीय एकता प्राप्त करना हमारा उद्देश्य हो सकता है जिससे कि जाति सर्वसामान्य जीवनके विचार, उसकी आदत तथा सभावनाकी अभ्यस्त हो जाय, परन्तु मनुष्यकी भवितव्यताकी सच्ची विकास-धारामे यह वास्तवमे स्वस्थ, स्थायी या लाभदायक नही हो सकती जब तक कोई ऐसी चीज विकसित न कर ली जाय जो अधिक गहनी, अंतरीय तथा वास्तविक हो । नही तो प्राचीन जगत्के अनुभवकी एक वडे परिमाण तथा भिन्न अवस्थाओमे फिरसे आवृत्ति होगी, परीक्षण असफल हो जायगा और उसके स्थानपर अव्यवस्था तथा अराजकताका एक नया युग आयेगा जिसमे पुननिर्माणकी आवश्यकता होगी । शायद यह अनुभव प्राप्त करना भी मनुष्यजातिके लिये आवश्यक है; चाहे अव हम इस अनुभव को टाल भी सकते है, पर इसके लिये हमे यात्रिक साधनोको अपने सच्चे विकासके अधीन करना होगा । ऐसा विकास तभी हो सकता है जब कि । नैतिकता, यहाँ तक कि आध्यात्मिकतासे युक्त मनुष्यजाति अपने वाह्य जीवन तथा शरीरमे ही नहीं वरन अंतरात्मामें भी एक हो जाय । पाँचवाँ अध्याय राष्ट्र और साम्राज्य : वास्तविक एकता और राजनीतिक एकता मनुष्यजातिके एकीकरणकी समस्या दो विशिष्ट कठिनाइयोमे विभक्त हो जाती है । एक इस आशंकाका रूप धारण करती है कि जो सामूहिक अहं - भाव मानवजातिके स्वाभाविक विकासमे उत्पन्न हो चुके है क्या वे अव यथेष्ट रूपमे सुधारे या मिटाये जा सकते है और क्या किसी प्रकारकी प्रभावशाली बाह्य एकता सुरक्षितरूपसे स्थापितकी जा सकती है। दूसरी कठिनाई इस आशकाके रूपमे प्रकट होती है कि यदि कोई ऐसी बाह्य एकता स्थापितकी भी जा सके तो उसका परिणाम कही व्यक्तिके स्वतंत्र जीवनको तथा उन अनेक सामूहिक इकाइयोकी स्वच्छंद क्रीड़ाको, जो अबतक बन चुकी है और जिनका जीवन सच्चा तथा सक्रिय है, क्या कुचल देना नही होगा तथा इनके स्थानपर एक ऐसा राज्य संगठन स्थापित नही हो जायगा जो मानव जीवनको यत्नवत् वना देगा । इन दो आशंकाओके अतिरिक्त एक तीसरी और भी है कि क्या यथार्थ जीवत एकता केवल आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनीय एकीकरण द्वारा ही साधितकी जा सकती है, तथा क्या इससे पहले कम-से-कम एक नैतिक और आध्यात्मिक एकताका ठोस उपक्रम नही होना चाहिये । इन प्रश्नोके क्रमिक सबधकी दृष्टिसे हमे पहले प्रश्नको पहले लेना होगा । मानव विकासकी वर्तमान अवस्थामे राष्ट्र मानवजातिकी जीवंत सामूहिक इकाई है । साम्राज्य है तो सही पर वे अभी तक केवल राजनीतिक इकाइयाँ है, वास्तविक इकाइयाँ नहीं; उनमे निजी आतरिक जीवन नही है । वे या तो एक ऐसी शक्तिके आधारपर चल रहे है जो उनके निर्माणकारी अंगोपर लादी गयी है या ऐसी राजनीतिक सुविधाके आधारपर जिसे इन अगोने अनुभव या स्वीकार कर लिया है और जिसे बाहरके ससारका भी समर्थन प्राप्त हुआ है । आस्ट्रिया बहुत समय तक इस प्रकारके साम्राज्यका एक स्थायी उदाहरण रहा है, यह एक राजनीतिक सुविधा थी जिसे ससार भरका अनुमोदन प्राप्त था । अभी कुछ दिन पहले तक इसके निर्माणकारी अग भी इससे सहमत थे । हैप्सबर्ग वंशके रूपमे प्रकट केंद्रीय जर्मनिक* तत्त्वकी शक्ति तथा अभी हालमे इसके मगियार साझीदार की सक्रिय सहायतासे इसका पोपण हुआ । यदि इस प्रकारके साम्राज्यकी राजनीतिक सुविधाका अत हो जाय, यदि उसके निर्माणकारी अग अब इसका और समर्थन न करें और वे एक केंद्रविरोधी शक्तिके द्वारा बलपूर्वक परे हटा दिये जायँ और साथ ही यदि संसार भी इस सगठनके पक्षमे न हो तो अकेला भौतिक बल ही कृत्रिम एकताका एकमात्र साधन रह जाता है । वास्तवमे तभी एक नवी राजनीतिक सुविधाका जन्म हुआ जिसे आस्ट्रियाके जीवनने विघटनकी उपर्युक्त प्रवृत्तिसे कष्ट उठानेके बाद भी सहायता पहुँचायी । पर यह सुविधा उस जर्मनिक भावना द्वारा प्रेरित थी जिसने इसको शेप यूरोपके लिये असुविधामे परिणत कर दिया और इसको उन प्रधान निर्माण - कारी अगोकी स्वीकृतिसे वंचित कर दिया जो आस्ट्रियन सिद्धातसे बाहर जाकर अन्य संगठनोकी ओर आकृष्ट हो गये । उस समयसे आस्ट्रियन साम्राज्यका अस्तित्व खतरेमे पड गया; और वह किसी आतरिक आवश्यकतापर नही बल्कि पहले तो अपने अंतर्गत स्लाव राष्ट्रोको कुचल देनेकी आस्ट्रियन-मगियारकी सम्मिलित शक्ति पर और पीछे यूरोपमे जर्मनी तथा जर्मनिक विचारकी अनवरत शक्ति और प्रभुता अर्थात् अकेले भौतिक वलपर निर्भर रहा । यद्यपि आस्ट्रियामे साम्राज्यीय एकताकी दुर्बलता विशेष रूपसे प्रत्यक्ष थी तथा उसकी शर्तें बहुत वढी चढी थी, तथापि ये शर्ते उन सब साम्राज्योके लिये, जो उस समय राष्ट्रीय इकाइयाँ नही थी, समान थी। अधिक दिनकी बात नहीं है, बहुतसे राजनीतिक विचारकोने देखा कि कम-से-कम इस बातकी प्रवल सभावना है कि जाति, भाषा और उद्गमके ऐसे निकट सबधोके होते हुए भी जिनसे कि ब्रिटिश उपनिवेशोको अपनी मातृभूमिसे जुड़े रहना चाहिये था, वे अपनेको ब्रिटिश साम्राज्यसे अलग कर लेगे और इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य स्वयमेव भग हो जायगा । इसका कारण यह था कि उपनिवेश साम्राज्यीय एकताकी राजनीतिक सुविधाका उपभोग तो करते थे पर वे उसको यथेष्ट महत्त्व नही देते थे, असलमे राष्ट्रीय ऐक्यका कोई सजीव सिद्धात था ही नही । आस्ट्रेलिया और कनाडाके निवासियोने अपने आपको विस्तृत ब्रिटिश राष्ट्रीयताके अंग नही बल्कि नये पृथक् राष्ट्र समझना शुरू कर दिया था । अब दोनो दृष्टियोसे स्थिति वदल गयी है, एक अधिक व्यापक सूत्र का पता लग गया है, और इस समय ब्रिटिश साम्राज्य यथोचित मात्रामे पहलेसे अधिक शक्तिशाली है । * ट्यटन - जातीय - अनुवादिका फिर भी यह पूछा जा सकता है कि जब नाम रूप और प्रकार एक ही है तो इन राजनीतिक और वास्तविक इकाइयोमे इस प्रकारका भेद करना ही क्यों चाहिये ? पर भेद करना आवश्यक है क्योकि यह सच्चे और गंभीर राजनीतिक विज्ञानके लिये अत्यधिक उपयोगी है; इसके परिणाम भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जब आस्ट्रिया जैसा अराष्ट्रीय साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो जाता है तो वह सदाके लिये नष्ट हो जाता है; क्योंकि उसमे कोई यथार्थ आंतरिक एकता नही होती, बाह्य एकताको पुनः प्राप्त करनेकी कोई सहज प्रवृत्ति भी नहीं होती, वह केवल एक राजनीतिक ढंगसे गढा हुआ समुदाय ही होता है। दूसरी ओर परिस्थितियों द्वारा खडित एक वास्तविक राष्ट्रीय एकता अपने एकत्वको पुन प्राप्त करने तथा सुदृढ करनेकी प्रवृत्ति को सदा सुरक्षित रखेगी। ग्रीक साम्राज्यका भी वही हाल हुआ जो और सब साम्राज्योंका होता है। परंतु ग्रीक राष्ट्रने अनेक सदियों तक राजनीतिक दृष्टिसे सत्ताहीन रहनेके बाद भी अपना पृथक् अस्तित्व पुनः प्राप्त कर लिया है, कारण, इसने अपना पृथक् अहंभाव सुरक्षित रखा और इसलिये तुर्की- शासनके आवरणके नीचे भी, वास्तवमे, अपना अस्तित्व बनाये रखा। तुर्की-शासनके जुएके नीचे सब जातियोकी यही दशा हुई है, क्योकि इस शक्तिशाली आधिराज्यने, कई बातोमे काफी कठोर होते हुए भी, उनकी राष्ट्रीय विशेषताएँ मिटाने या उनके स्थानपर उस्मानी राष्ट्रीयता स्थापित करनेका कभी प्रयत्न नही किया । ये राष्ट्र पुनः जीवित हो गये है और अपने आपको फिरसे उस हद तक खड़ा कर चुके या करने का प्रयत्न करे रहे है जहाँ तक कि इन्होने अपना यथार्थ राष्ट्रीय भाव सुरक्षित रखा है । सर्व लोगो ने अपने राष्ट्रीय भावके अधीन वह सारा प्रदेश पुनः प्राप्त करनेका प्रयत्न किया था और प्राप्त कर भी लिया है जिसमे कि वे रहते हैं या उनकी प्रधानता है । ग्रीस अपने मुख्य प्रदेश, द्वीपों तथा एशियाई उपनिवेशो में अपने पुनर्निर्माणके लिये यत्नशील है, किंतु वह प्राचीन ग्रीसको अब वापिस नही ला सकता, क्योकि थ्रेस भी ग्रीककी अपेक्षा बलगर अधिक है । कितनी शताब्दियोके बाद इटली भी वाह्य रूप में फिर एक हो गया है । कारण, पहले की भाँति एक राज्य न रहनेपर भी इसने अपनी एकजातीयता कभी नहीं छोड़ी थी । वास्तविक एकताका यह सत्य इतना बलशाली है कि जिन राष्ट्रोने पहले समयमे कभी भी उस बाह्य एकत्वको नही प्राप्त किया - जिनके दैव, परिस्थिति और उनका अपना स्वभाव सब प्रतिकूल थे -- जो राष्ट्र-विकेंद्रीय शक्तियोसे भरपूर थे तथा विदेशी आक्रमणो द्वारा अनायास ही दबा दिये गये थे, उन्होने भी केद्रमुखी शक्तिको ही सदा विकसित किया और फलत. संगठित एकता प्राप्त कर ली । प्राचीन ग्रीस अपनी पार्थक्य - पूर्ण प्रवृत्तियो, अपने स्वय-सपूर्ण नगर या प्रादेशिक राज्यों, अपने छोटे, परस्परविरोधी स्वायत्तशासनोसे ही चिपटा रहा; पर केंद्रमुखी शक्ति सदा ही सघो, राज्य-सगठनो और स्पार्टा तथा एथेन्स जैसे आधिराज्योमे मुर्त रूपमे विद्यमान रही । अंतमे इसने अपने आपको मकदूनियाके शासनसे कुछ अधूरे और अस्थायी रूपमे तथा पीछे एक काफी आश्चर्यजनक विकास गतिसे पूर्वी रोमन जगत्के एक ग्रीक और बिजेनटाइन साम्राज्यमे विकसित हो जानेके द्वारा चरितार्थ कर लिया । यह शक्ति वर्तमान ग्रीसमे पुन जाग्रत् हो गयी है । और हमने अपने समयमे जर्मनीको, जो प्राचीन कालसे सदा ही असंगठित रहा है, अतमे एकत्वकी अपनी सहज भावनाको अनिष्टकारी रूपमे उन्नत करते देखा है। यह भावना होहैनस्टोलर्न्स के साम्राज्यमे उग्ररूपसे प्रकट हुई और उसके पतनके बाद भी सधीय गणराज्य में दृढ बनी रही । जो लोग केवल बाह्य घटनाओके रुख का ही नही वल्कि शक्तियोंकी क्रियाका भी अध्ययन करते है उनको इस बातसे जरा भी आश्चर्य नही होगा यदि युद्धका एक सुदूर परिणाम यह हो कि एक जर्मनिक तत्त्व, आस्ट्रियन-जर्मन तत्त्व, जो अभी तक पृथक् है जर्मनिक समग्रतामे और संभवतः प्रशियन प्रभावक्षेत्र या होहैनस्टोलर्न साम्राज्यसे भिन्न किसी अन्य रूपमें सम्मिलित हो जाय । एक इन दो ऐतिहासिक दृष्टातोमें तथा और बहुतसोमे जैसे सैक्सन इग्लैंड और मध्यकालीन फासके एकीकरण तथा अमरीकाके सयुक्त राज्यके निर्माणमे यह वास्तविक एकता या मनोवैज्ञानिक रूपसे विशिष्ट इकाई ही पहले तो अज्ञानपूर्वक अपनी सत्ताकी अवचेतन आवश्यकताके द्वारा तथा वादमे राजनीतिक एकताकी भावनाके प्रति एकाएक या धीरे-धीरे सचेतन होकर एक अनिवार्य बाह्य एकीकरण की ओर प्रवृत्त हुई । यह एक विशिष्ट प्रकारकी समुदाय आत्मा है जो आतरिक आवश्यकताके द्वारा चालित होती है और वाह्य परिस्थितियोका उपयोग अपने लिये संगठित शरीर बनानेमे करती है । पर इतिहासमे सबसे अधिक आश्चर्यजनक दृष्टान्त भारतवर्षके विकासका है। और कही भी केंद्रविरोधी शक्तियाँ इतनी प्रवल, इतनी अधिक जटिल *यह संभावना कुछ समयके लिये पूर्ण तो हो गयो पर उन साधनोंके द्वारा और उन परिस्थितियों के बीच जिन्होने श्रास्ट्रियन राष्ट्रीय भावना तथा पृथक् राष्ट्रीय अस्तित्वका पुनर्जीवन अनिवार्य कर दिया । बनानेकी आवश्यकता तथा विवेकपूर्ण स्वार्थ भावसे प्रेरित होकर यह जान सकते है कि राष्ट्रीय स्वायत्तताकी स्वीकृति राष्ट्रीयताकी अभीतक जीवंत सहजप्रेरणाके लिये एक विचारपूर्ण और आवश्यक रियायत है एवं उनकी साम्राज्यीय शक्ति तथा एकताको निर्बल करनेके स्थानपर उसे सवल करनेके लिये प्रयुक्त की जा सकती है । इस प्रकार जव कि स्वतंत्र राष्ट्रोका संघ बनाना अभी असंभव है, ऐसे सघबद्ध साम्राज्यों और स्वतंत्र राष्ट्रोकी कोई प्रणाली बनाना, जिनमे इतना निकट साहचर्य हो गया हो जैसा कि पहले कभी देखनेमे नही आया, बिल्कुल ही असभव नही है । इस उपायसे या किन्ही अन्य उपायोसे मनुष्यजातिके लिये किसी-न-किसी प्रकारकी राजनीतिक एकता निकट या दूर भविष्यमे प्राप्त की जा सकती है ।* इस प्रकारके निकटतर साहचर्यको लानेके लिये युद्धने कई सुझाव उपस्थित किये, पर सामान्यतया ये सब यूरोपके अंतर्राष्ट्रीय संवधोमे सुव्यवस्था स्थापित करनेतक ही सीमित रहे । इनमेसे एक सुझाव यह था कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा निर्मित और सब राष्ट्रो द्वारा स्वीकृत एक अधिक कठोर अंतर्राष्ट्रीय विधानके द्वारा युद्धको विल्कुल रोक दिया जाय, इस विधानका सब राष्ट्रोके द्वारा किसी भी अपराधीके विरुद्ध प्रयोग किया जायगा । परतु जबतक इससे अगले प्रभावपूर्ण कदम न उठाये जायेंगे यह हल एक स्वप्नमात्र ही रहेगा; क्योकि न्यायालय द्वारा निर्देशित विधान या तो कुछ प्रवलतर मित्रशक्तियो द्वारा, उदाहरणार्थ, शेष यूरोपपर प्रभुत्व रखनेवाले विजयी मित्र राष्ट्रोकी गुटबंदी द्वारा, या समस्त यूरोपीय शक्तियोके एक मडल अथवा यूरोपके राज्य या यूरोपीय संघके किसी और रूप द्वारा लागू करना पडेगा । महान् शक्तियोकी प्रभुतापूर्ण मैत्री केवल मैटरनिच प्रणालीकी, सिद्धात रूपमे, नकल होगी और कुछ समय बीतने के बाद वह अनिवार्य रूपसे समाप्त भी हो जायगी, परन्तु, जैसा अनुभवसे हमे ज्ञात हो चुका है, यूरोपके मंडलका यह अर्थ होना चाहिये कि विरोधी समुदाय एक अनिश्चित समझौतेको बनाये रखनेके लिये आतुर भावमे प्रयत्न करे । यह प्रयत्न नये सघर्षो और नये विरोधोको * हिटलरके प्रकट होने तथा जर्मनी द्वारा विश्व - प्रभुत्वके विशाल प्रयलने अपनी सफलता द्वारा जो कि विरोधाभास है - इसमें सहायता पहुंचाई है और उसके विरुद्ध प्रतिक्रियाने संसारकी अवस्थाको पूर्णतया वदल दिया है। यूरोपके संयुक्त राज्यका निर्माण प्रक्रियात्मक संभावना वन गया है और इसने प्रात्म-चरितार्थताकी ओर अग्रसर होना आरंभ कर दिया है। स्थगित तो कर सकता है, पर अतिम रूपसे उन्हें रोक नहीं सकता । ऐसी अधूरी प्रणालियोमे विधानका पालन केवल तभीतक होगा जबतक उसकी आवश्यकता रहेगी, जबतक वे शक्तियाँ जो दूसरों द्वारा अस्वीकृत नये परिवर्तन और पुनर्व्यवस्थाएँ अपनेमे लाना चाहती है इस समयको प्रतिरोधके लिये उपयुक्त ही नही समझ लेगी । राष्ट्रके अंदर विधान केवल इसलिये सुरक्षित रहता है कि वहाँ एक ऐसी स्वीकृत सत्ता होती है जो उसे निर्धारित करने तथा उसमें आवश्यक परिवर्तन करनेकी शक्ति रखती है; उसे इतना अधिकार प्राप्त होता है कि वह अपने कानूनके भग करनेवालोको ढड दे सके । अंतर्राष्ट्रीय या अतर्यूरोपीय विधान यदि शुद्ध नैतिक शक्तिसे किसी और वडी शक्तिका प्रयोग करना चाहता है तो उसे ये सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिये, क्योकि यह नैतिक शक्ति उन लोगो द्वारा व्यर्थ की जा सकती है जो इसकी अवज्ञा करनेमे काफी समर्थ है तथा जो इसे भग करनेमे अपना लाभ समझते हैं । अतएव यदि नयी व्यवस्थाके इन प्रस्तावोके मूल-विचारको क्रियात्मक रूपमे सफल बनाना हो तो किसी-न-किसी प्रकारके यूरोपीय संघका निर्माण चाहे वह कितना ही ढीला ढाला क्यो न हो आवश्यक हो जाता है और यदि यह एक वार बनना आरंभ हो जाय तो ऐसे संघको आवश्यक रूपसे उत्तरोत्तर दृढ होते जाना चाहिये तथा एक यूरोपीय संयुक्त राज्यकी प्रणालीका अधिकाधिक स्वरूप बनना चाहिये । यह तो केवल अनुभव बता सकता है कि ऐसी यूरोपीय एकता चरितार्थ की जा सकती है या नहीं और यदि यह चरितार्थ हो भी जाय तो विघटनकी उन अनेक शक्तियो और कलहके उन अनेक कारणोके विरोधमे भी जो इसे नष्ट करनेतक इसकी परीक्षा लेते रहेगे इसे स्थिर तथा पूर्ण बनाया जा सकता है या नही । पर यह प्रत्यक्ष है कि मानवी अहंभावकी वर्तमान अवस्थामे यदि यह चरितार्थ कर ली जाय तो यह एक ऐसा महान् शक्तिशाली यंत्र वन जायगी जिसके द्वारा वे राष्ट्र, जो आजकल मानवी प्रगतिमे सबसे आगे है, संसारके शेष राष्ट्रोपर अपना प्रभुत्व जमा लेगे तथा उनसे अनुचित लाभ उठाना चाहेगे । साथ ही इसके विरोधमे एशियाई एकता और अमरीकन एकताके विचार भी अनिवार्य रूपसे उठ खडे होगे और जहाँ इस प्रकारके महाद्वीपीय समुदाय आजकी अपेक्षाकृत छोटी राष्ट्रीय एकताओका स्थान लेकर समस्त मानवजातिके अंतिम एकीकरणकी ओर अग्रसर हो रहे होगे, वहाँ इनके निर्माणके परिणामस्वरूप ऐसी और इतनी विस्तृत कातियाँ भी आयँगी जिनके आगे आजकलकी विपत्ति नगण्य प्रतीत होने लगेगी तथा जिनके कारण मानवजातिकी आशाएँ पूरी होनेके स्थानपर छिन्न-भिन्न हो जायेंगी और अंतगे बिकुल ही नष्ट हो जायेंगी पतु रोगी संगण राज्यके सिद्धानपर मुख्य आप यह है कि सामान्य दिने अब महाहीरीय विदों पर जाने और उन्हें भावनाओं कानर भानना अधीन करने का प्रयत्न आरंभ कर दिया है दिपीय जागर किया हुआ विभाजन इस दृष्टिकोण एक अत्यधिक गंभीर प्रकार श्रीक्रियात्मक प्रयत्न होगा जिसके परिणाम मानव-प्रगति लिये अपनी हो सकते हैं । यूरोप वास्तव कुछ ऐसी विवि-निकिका सर्वतेय विचारके लिये परिव भी हो गया है और न ही उसे कर आने बढ़ने की आवश्यकता भी का अनुमा करना है। अभी बहुत दिन नी हुए, पिछले यूरोपीय सपके विराट विये गये कुछ विभागनेन दो प्रवृत्तियोके विरोधका विनित है। एक मिनार यह उपस्थित किया गया था कि इस सदमे मनोरे आगराधान्य राष्ट्रते अहंमूलक विचारकी अति और पूर्वपके उस बुहतर विवा अवहेलना था जिसकी अधीनता अब राष्ट्रविनाली व्योहार करती चाहिये । यूरोपके गंपूर्ण जीवनको जन एक ऐसी एक्ला आवद हो जाना चाहिये जो सबको अपने अंदर समेट के उसके हिलो मरि ज्यान मिले एवं राष्ट्रका अहंभाव इस अपेक्षाकृत बडे अगाके सुगठित अंगरे ही रूपमें अपना अस्तित्व रखे। क्रियात्मक स्वर्गे यह कादियाँके बाद नीट्शे के विचार का ही समर्थन है; वह वातपर बल देना था कि राष्ट्रीयता तथा युद्धके विचारोग अजमाना नही रहा और विचारी मनुष्योका जादां अब बदेशभक्त बनना नहीं, बल्कि अच्छे यूरोपियन बनना होना नाहिये । पर तुरंत ही यह प्रश्न उठा कि विश्व राजनीतिमे तब अमेरिकाके बढ़ने उप महत्त्वका गया होगा ? जापान और नीनका तथा एमियाके जीवन में जो नयी जागृति हो रही है उसका क्या अर्थ रह जायगा ? उनपर को अपना पहला विचार छोडना पड़ा तथा उसे यह समझना पड़ा कि युरोपने उसका आशय गुरोष नहीं, वरन् वे सब राष्ट्र है जिन्होंने यूरोपीय सभ्यताके सिद्धांतको अपनी राज्य-पद्धति और सामाजिक संगठनके आधार-रूप मान लिया है । अपेक्षाकृत अधिक दार्शनिक विचारका एक प्रत्यक्ष या कम गे राम प्रतीयमान लाभ अवश्य है कि वह इसमें अमेरिका और जापानका भी समावेश कर लेता है तथा इस प्रकार इस प्रस्तावित ऐक्के घेरे में उन सब राष्ट्रोको स्वीकार कर लेता है जो वस्तुत. स्वतंत्र या प्रबल है, साथ ही वह यह आशा भी दिलाता है कि अन्य राष्ट्र भी जब जापानके उत्साही ढगसे या किसी और प्रकारसे यह प्रमाणित कर दे कि वे यूरोपीय स्तरतक पहुँच गये है तो वे भी इस दायरेमे आ सकेगे । वास्तवमे यूरोप अपने विचारोमे अभीतक शेष जगत्से बहुत अधिक भिन्न है, जैसा कि यूरोपमे टर्कीके बरावर बने रहने के प्रति बार-बारके रोषसे तथा यूरोपीय लोगोपर एशियाके लोगोकी इस प्रभुताको समाप्त कर देनेकी इच्छासे प्रदर्शित होता है। फिर भी यह सत्य है कि यूरोप अमेरिका और एशियाके साथ बुरी तरहसे उलझा हुआ है । कुछ यूरोपीय राष्ट्रोंके अमेरिकामे उपनिवेश है, साथ ही एशियामे जहाँ केवल जापान यूरोपके प्रभावक्षेत्रसे बाहर है अथवा उत्तरी अफ्रीकामे जो सास्कृतिक रूपमे एशियाके साथ एक है सभी राष्ट्रोके अपने-अपने स्वत्व तथा महत्त्वाकाक्षाएँ है। यूरोपके सयुक्तराज्यका अर्थ तब स्वतत्र यूरोपीय राष्ट्रीका एक ऐसा संघ होगा जो अर्ध-अधीन एशियाके ऊपर अपना प्रभुत्व रखता है तथा अमेरिकाके कुछ भागोपर जिसका अधिकार है; पर वहाँ उसे वे पडोसी राष्ट्र चैन नही लेने देगे जो अभीतक स्वतन्त्र है, जो उसके इस प्रकारके उग्र अनधिकार - प्रवेशसे निश्चय ही पीडित, त्रस्त और आच्छादित हो रहे है । अमेरिकामे इसका अनिवार्य परिणाम यह होगा कि लॅटिन केंद्र तथा दक्षिणी भाग और अंग्रेजी बोलनेवाला उत्तरी भाग एक-दूसरेके अधिक निकट आ जायेंगे तथा मनरो सिद्धातपर बहुत अधिक बल दिया जायगा; इसके जो परिणाम होगे उनके बारेमे पहलेसे कुछ कहना कठिन है । उधर एशियामें इस स्थितिका अत इस प्रकार हो सकता है कि या तो बचे हुए स्वतत्र एशियाई राज्य लुप्त हो जायँ अथवा एशिया इतना जाग्रत् हो जाय कि यूरोप उसे छोड़कर चला जाय । ये सब बातें मानव-विकासकी पुरानी पद्धतिको और अधिक लवा तथा विश्व-बधुत्वकी उन नई अवस्थाओको व्यर्थ कर देगी जो आधुनिक संस्कृति और विज्ञानने उत्पन्न की है, पर यदि पश्चिममे राष्ट्र सिद्धातको सामान्य मानवताकी अधिक व्यापक चेतनाके स्थानपर यूरोप सिद्धात अर्थात् महाद्वीपीय-सिद्धातमे विलीन होना है तो ऐसी घटनाएँ होना अनिवार्य है। इसलिये यदि वर्तमान उथल-पुथलके परिणामस्वरूप किसी नयी अतिराष्ट्रीय व्यवस्थाको अभी या वादमे विकसित होना है तो उसका रूप निश्चित ही एक ऐसे संघका होगा जो एशिया, अफ्रीका और अमेरिका तथा साथ ही यूरोपको अपनेमे मिलायगा; वह स्वभावत अतर्राष्ट्रीय जीवनका एक ऐसा सगठन होगा जो स्वीडन, नार्वे, डैनमार्क, सयुक्तराज्य, लैटिन गण-राज्य जैसे स्वतंत्र राष्ट्रो तथा साथ ही कई ऐसे साम्राज्यीय और उपनिवेश बनानेवाले राष्ट्रो द्वारा निर्मित होगा जैसे कि यूरोप में अधिकतर राष्ट्र है। ये पिछले प्रकारके राष्ट्र - जैसे कि वे आज है- -- या तो अपने आपमे स्वतंत्र पर उन अधीनस्थ राष्ट्रोके प्रभु रहेंगे जो, समयकी प्रगति के साथ-साथ, अपने ऊपर रखे हुए जुएके प्रति अधिकाधिक असहिष्णु होते चले जायंगे और या फिर नैतिक प्रगति द्वारा, जिसका चरितार्थ होना अभी बहुत दूर की बात है, कुछ अशमे स्वतत्न सघीय साम्राज्योके केंद्र और कुछ ऐसे राष्ट्र वन जायेंगे जो उन पिछड़ी हुई और असंस्कृत जातियोका तवतक संरक्षण-भार उठायेगे जवतक वे स्वशासनके योग्य नही हो जाती । संयुक्तराज्यका कहना भी कुछ इसी ढंगका है कि है फिलीपाइनपर उसका अधिकार कुछ समयके लिये है और इसी प्रकारका है। पहली अवस्थामे एकता, व्यवस्था और प्रचलित सामान्य विधान जीवित रहेगे, तथा आशिक रूपमे वे अन्यायकी विशाल पद्धतिपर आधारित होगे; उन्हें प्रकृतिके उन विद्रोहो, विप्लवो तथा महान् प्रतिगोधोंका सामना करना पडेगा जिनके द्वारा वह अतमें अन्यायोके विरोधमें मानवी भावनाको अतिम रूपसे उचित ठहराती है; इन अन्यायोंको वह मानव-विकासके मार्गमें अनिवार्य रूपसे आनेवाली घटनाएँ समझकर ही कुछ समयके लिये सहन करती है। दूसरी अवस्थामे यह संभावना अवश्य है कि यह नयी व्यवस्था, चाहे वह अपने प्रारंभिक रूपमें स्वतंत्र मानव समुदायोके स्वतंत्र संघके अंतिम आदर्शसे कितनी भी दूर क्यो न हो, शांतिपूर्वक और जातिकी आध्यात्मिक और नैतिक उन्नतिके स्वाभाविक विकसनके द्वारा एक ऐसे सुरक्षित, न्याययुक्त और स्वस्थ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आधारकी ओर ले जा सकती है जो मनुष्यजातिको संभवतः इस योग्य वना देगा कि वह तुच्छ चिताओमें व्यस्त न रहकर अपनी उच्चतर सत्ताका विकास आरंभ कर दे क्योकि यह उच्च सत्ता ही उसकी गुप्त भवितव्यताका श्रेष्ठतर भाग है अथवा यदि ऐसा न हो तो कौन जानता है कि मानवजातिमे प्रकृतिका यह लंबा प्रयोग सफल होगा या असफल; फिर भी यह कम-से-कम हमारे भविष्यकी वह उच्चतम संभावना तो है जिसकी मानवमन कल्पना कर सकता है । ग्यारहवाँ अध्याय छोटी स्वतंत्र इकाई और बृहत्तर केन्द्रित इकाई यदि हम राजनीतिक, प्रशासनीय और आर्थिक प्रणालीके आधारपर मनुष्यजातिके एकीकरणकी संभावनाओपर विचार करे तो हम देखेंगे कि एक विशेष प्रकारकी एकता या उसकी ओर उठाया हुआ पहला कदम केवल सभव ही नही प्रतीत होता, वरन् जातिकी आवश्यकता और उसकी आधारभूत भावना थोडे- वहुत अनिवार्य रूपमे उस एकताकी मांग भी करती है । यह भावना अधिकांश रूपमे पारस्परिक ज्ञान तथा संचार - साधनोकी वृद्धिके कारण परंतु आंशिक रूपमे जातिके प्रगतिशील मनमे अधिक व्यापक और स्वतंत्र बौद्धिक आदर्शो तथा भावप्रधान समवेदनाओके उन्नत होनेके कारण उत्पन्न हुई है । इस आवश्यकताका अनुभव भी कुछ तो इन आदर्शो और समवेदनाओको पूरा करनेकी इच्छाके कारण तथा कुछ उन आर्थिक और अन्य भौतिक परिवर्तनोके कारण होता है जो विभाजित राष्ट्रीय जीवन, युद्ध, व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धाके और इनके फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाली अरक्षा तथा जटिल और सुभेद्य आधुनिक सामाजिक सगठनपर आनेवाली विपत्तिके परिणामोको आर्थिक और राजनीतिक मानवप्राणी और आदर्शवादी विचारक दोनोके लिये अधिकाधिक दुखदायी बना देते है । कुछ अशमे यह नयी प्रवृत्ति सफल राष्ट्रोकी शेप जगत्को निर्विघ्न रूपसे हस्तगत करने, उसका उपभोग करने तथा उससे अनुचित लाभ उठानेकी इच्छासे भी उत्पन्न हुई है और इस इच्छाको वे अपनी प्रतिद्वंद्विताओ तथा प्रतियोगिताओसे उत्पन्न खतरेको उठाये बिना किसी पारस्परिक सुखद सद्भाव और समझौतेके द्वारा पूर्ण करना चाहते है; इस प्रवृत्तिकी वास्तविक शक्ति उसके बौद्धिक, भावुक और आदर्शवादी अगोमें है। इसके आर्थिक कारण कुछ अंशमे स्थायी है और इसलिये शक्ति और निश्चित सफलताके तत्त्व है, और जिस अंशमे वे कृत्रिम तथा अस्थायी है उस अंशमे अरक्षा और दुर्बलताको उत्पन्न करते है । राजनीतिक आशय इस मिश्रणके निम्नतर भाग है, यहाँतक कि इनकी उपस्थिति सारे परिणामको बिगाड सकती है तथा अतमे उस एकताको जो प्रारंभिक रूपमे प्राप्त की जा चुकी है निश्चित रूपसे उलट-पलट या नष्ट-भ्रष्ट कर सकती है । फिर भी अपेक्षाकृत निकट या अधिक सुदूर भविष्य में कोई न कोई परिणाम निकल सकता है। अब हम देख सकते है कि इसे यदि चरितार्थ होना है तो किन अवस्थाओमें होना है - - शुरू-शुरूमे यह अत्यन्त प्रवल सामान्य आवश्यकताओ अर्थात् व्यापार, शाति और युद्धकी व्यवस्थाओं तथा झगडोके सामान्य निर्णय और संसारको सुरक्षित रखनेकी व्यवस्थाओके लिये एक प्रकारके समझौते और प्रारंभिक मेल-मिलापद्वारा चरितार्थ हो सकती है । ये सव स्थूल प्रारंभिक व्यवस्थाएँ यदि एक बार स्वीकार कर ली जायं तो स्वभावतः ही वे प्रधान विचार और सहज आवश्यकताके दवावसे एक अधिक प्रगाढ़ एकताका रूप धारण कर लेगी; यह भी हो सकता है कि अतमे जाकर वे एक ऐसे सर्व सामान्य सर्वोच्च राज्यके रूप में विकसित हो जायँ जो तबतक टिक सकता है जबतक स्थापित प्रणालीके दोषो और इसके अस्तित्वके विरोधी अन्य आदर्शो और प्रवृत्तियोके उदयके परिणामस्वरूप इसमे एक नया आमूल परिवर्तन ही नही आ जाता या यह पूरी तरहसे अपने स्वाभाविक तत्त्वो और अगोमे खंडित ही नहीं हो जाता । हमने यह भी देख लिया है कि इस प्रकारकी एकता वर्तमान जगत्की ऐसी अवस्थाओके आधारपर प्राप्त की जा सकती है जो कुछ अंशतक अवश्यंभावी परिवर्तनोसे बदल दी गयी है - उन अंतर्राष्ट्रीय परिवर्तनोसे, जो एक नया मौलिक सिद्धात चलानेके स्थानपर केवल पुनर्व्यवस्थामात करते प्रतीत होते है और राष्ट्रोके भीतर होनेवाले उन सामाजिक परिवर्तनोसे, जिनका प्रभाव दूरतक पहुँचता है । अर्थात्, यह एकता उसी प्रकारकी होगी जैसी वर्तमान समयके स्वतंत्र राष्ट्रो और उपनिवेश बनानेवाले साम्राज्योके बीचमे होती है पर इसके साथ समाजकी एक ऐसी आतरिक व्यवस्था तथा प्रशासनीय योजना होगी जो वेगसे राज्यके कठोर समाजवाद और समानताकी ओर बढ़ेगी; इनसे स्त्री जाति और श्रमिकोका विशेष हित होगा क्योकि ये इस समयकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ है । निश्चय ही यह कोई भी विश्वासपूर्वक पहलेसे नहीं कह सकता कि इस समयकी प्रवृत्ति संपूर्ण भविष्यपर सफलतापूर्वक अपना अधिकार जमा लेगी । हम नहीं जानते कि इस महान् मानवी नाटकके कौन-कौन-से आश्चर्य, पुराने राष्ट्र-विचारकी कौनसी उद्दाम तरग, क्या-क्या संघर्ष, कौन-कौन-सी असफलताएँ, नयी समाजिक प्रवृत्तियोके कार्यान्वित होनेमे कौन-कौन से अप्रत्याशित परिणाम, बोझिल और यात्रिक राज्य-समष्टिवादके विरोधमे मानवी भावनाका कौनसा विद्रोह, दार्शनिक अराजकतावादके ऐसे सिद्धांतकी कौनसी प्रगति और शक्ति जिसका कार्य ही मनुष्यकी वैयक्तिक स्वाधीनता और स्वतंत्र आत्म-परिपूर्णतासंबंधी सुदृढ आकांक्षाकी परिपुष्टि करना है, कौन-कौन से धार्मिक और आध्याबयासी त्मिक महान् परिवर्तन मनुष्यजातिकी इस वर्तमान गतिविधिमे हस्तक्षेप नही करेगे और इसे एक और प्रकारकी घटनामे नही बदल देगे । मानव मन अभी प्रकाश या उस निश्चित विज्ञानतक नहीं पहुँचा है जिसके द्वारा वह अगले दिनके विषयमे भी कुछ ठीक-ठीक बता सके । फिर भी, हम यह मान लेते हैं कि इस प्रकारकी कोई भी अप्रत्याशित बात नही होगी और तव मनुष्यजातिकी किसी-न-किसी प्रकारको राजनीतिक एकता चरितार्थ की जा सकेगी । पर एक प्रश्न फिर भी बाकी रह जाता है कि क्या यह वाछनीय है कि यह एकता इस प्रकारसे और अभी प्राप्त की जानी चाहिये और ऐसा हो तो किन परिस्थितियोमे तथा किन आवश्यक शर्तों के साथ इसे प्राप्त किया जा सकता है, क्योकि इनके बिना जिस एकताकी प्राप्ति होगी वह मानवजातिके पुराने और अपूर्ण ऐक्यो ही के समान अस्थायी होगी। पहले हमे यह स्मरण रखना चाहिये कि जिन वृहत्तर एकताओको मनुष्यजाति पूर्वकालमे प्राप्त कर चुकी है उन्हें उसने किस मूल्यपर प्राप्त किया था । निकट भूतकालने वस्तुतः हमारे लिये राष्ट्र बनाया, फिर राष्ट्रोके एक स्वाभाविक समजातीय साम्राज्यका निर्माण किया जो जाति और संस्कृतिमे समान थे अथवा जो भौगोलिक आवश्यकता और पारस्परिक आकर्षणद्वारा एक हो गये थे; उसने एक ऐसे कृत्रिम विषमजातीय साम्राज्यकी भी स्थापना की जो विजयद्वारा प्राप्त किया गया था तथा जिसे वल-प्रयोग, कानूनके जुए तथा व्यापारिक और सैनिक उपनिवेशीकरणद्वारा सुरक्षित रखा गया था, किंतु ये सव अभीतक सच्ची मनोवैज्ञानिक एकताओपर आधारित नही थे । समष्टिकरणके इन सिद्धान्तोमेसे प्रत्येकने ही समूची मानवजातिको कोई-न-कोई वास्तविक लाभ या उन्नतिकी सभावना प्रदान की है पर प्रत्येकके ही साथ उसके अपने अस्थायी या स्वभावगत दोष रहे है और प्रत्येकने मानवताके पूर्ण आदर्शको किसी-न-किसी प्रकारकी चोट पहुँचायी है । एक नमी एकताका निर्माण जब बाह्य और यात्रिक प्रक्रियाओके द्वारा आगे वढता है, तो इससे पहले कि इकाई अपने आतरिक जीवनके नये और स्वतंत्र विस्तारका फिरसे उपभोग करे, उसे, वास्तवमे, साधारणतया और प्रायः ही किसी क्रियात्मक आवश्यकताके कारण आंतरिक संकोचकी प्रक्रियामेसे गुजरना पडता है, क्योकि उसकी पहली आवश्यकता और सहजप्रेरणा उसके अपने अस्तित्वको बनाने तथा सुरक्षित रखनेकी होती है । अपनी एकताको क्रियान्वित करना उसकी सबसे प्रवल प्रेरणा है और उस उच्चतम आवश्यकताके आगे उसे विभिन्नता, सामंजस्यपूर्ण जटिलता, विविध साधनोंकी समृद्धि तथा आतरिक संबंधोकी स्वतंत्रताका बलिदान करना पडता है, क्योंकि ऐसा किये बिना जीवनकी सच्ची पूर्णता प्राप्त करना असभव है। शक्तिशाली और दृढ एकता लाने के लिये उसे एक अति प्रवल केंद्र या केंद्रित राज्य सत्ताकी स्थापना करनी पडेगी, चाहे वह सत्ता राजाकी हो या सैनिक कुलीन-तंत्र अथवा धनिक-वर्गकी या फिर किसी और शासनपद्धतिकी हो । व्यक्ति, जनपद, नगर, प्रदेश या किसी अन्य छोटी इकाईको स्वाधीनता और स्वतंत्र जीवनको इस केंद्र या सत्ताके अधीन होना पडेगा तथा इसपर अपने आपको बलिदान कर देना होगा । इसके साथ ही समाजको एक दृढ रूपमे यंत्रीकृत तथा कठोर अवस्थाके निर्माणकी प्रवृत्ति भी पायी जाती है; यह अवस्था कभी-कभी भिन्न-भिन्न वर्गों या श्रेणियोकी ऐसी ऋमिक व्यवस्था होगी जिसमें निम्न वर्गको हीन स्थान और कर्तव्य दिया जायगा जिसके फलस्वरूप उसे उच्च वर्गसे अधिक सकुचित जीवन विताना पडेगा । यूरोपमे राजा, पुरोहित, कुलीनतंत्र, मध्यवर्ग, किसान तथा सेवकवर्गकी ऐसी क्रमिक वर्गव्यवस्था और भारतवर्ष में कठोर वर्णव्यवस्था इसके उदाहरण है। पहलीने यूरोपमे नगर और उपजातिके समृद्ध और स्वतंत्र जीवनका तथा दूसरीने भारतवर्षमे उत्साही आर्य -वशोंके स्वच्छद और स्वाभाविक जीवनका स्थान ले लिया था। इसके अतिरिक्त, जैसा कि हम पहले देख भी चुके हैं, पूर्ण ओजस्वी सामान्य जीवनमे सवका या अधिक लोगोका उत्साहपूर्ण और सक्रिय भाग लेना -- जिससे पहले समयकी छोटी परतु स्वतंत्र जातियोने अत्यधिक लाभ उठाया था - अपेक्षाकृत बड़े समुदायमे कही अधिक कठिन है, पहले तो यह असभव ही है । इसके स्थानपर अब किसी एक प्रवल केंद्र या अधिक-से-अधिक एक शासक और सचालक वर्ग या वर्गोमे जीवनशक्ति केंद्रित हो गयी है, जब कि समाजका एक वडा भाग एक प्रकारकी जडतामे पडा हुआ है और वह केवल उस जीवन-शक्तिके न्यूनतम और अप्रत्यक्ष अंशका उतना ही उपभोग करता है जितना कि वह ऊपरसे छनकर आ सकती है तथा नीचेके स्थूलतर और अधिक दीन और संकीर्ण जीवनको अप्रत्यक्ष रूपमे प्रभावित कर सकती है । यह कम-से-कम वह तथ्य है जिसे हम मानव-प्रगतिके उस ऐतिहासिक कालमे देखते है जो आधुनिक जगत्से पहलेका काल था तथा जिसने इसका निर्माण किया था । जो नवीन राजनीतिक और सामाजिक रूप इसका स्थान ले रहे है या ले लेगे उनके ठोस निर्माण तथा एकतीकरणके लिये केंद्रीकारक और रचनात्मक कठोरताकी आवश्यकता भी भविष्यमे अनुभव हो सकती है । ऐसे छोटे मानव-समुदाय, जिनमे सव लोग सरलतापूर्वक सक्रिय भाग ले सकते हैं, जिनमे विचारो और चेष्टाओको शीघ्रता और स्पष्टतासे अनुभव, कार्यान्वित तथा किसी बृहत् और जटिल सगठनकी आवश्यकताके बिना ही रूप प्रदान किया जा सकता है, स्वाभाविक रूपमे, आत्मरक्षाकी सर्व प्रमुख आवश्यकतासे मुक्त होते ही, स्वतत्रताकी ओर झुक जाते है । इस प्रकारके वातावरणमे स्वेच्छाचारी राजतंत्र या निरंकुश कुलीनतत्र, अचूक पोपशासन या धर्मान्ध पुरोहित शासन जैसी प्रणालियाँ सरलतापूर्वक नही पनप सकती । जनसाधारणसे तथा व्यक्तियोकी नित्यप्रतिकी आलोचनाके क्षेत्रसे दूर रहनेका वह लाभ उन्हे नही प्राप्त होता जिसपर उनकी प्रतिष्ठा निर्भर करती है। विशाल समुदायो तथा विस्तृत प्रदेशोमे एकरूपताकी जिस अनिवार्य आवश्यकताको वे अन्यत्र उचित ठहराते है उसकी जरूरत यहाँ नही पडती । अत रोममे हम देखते है कि राजतनीय शासन पद्धति अपनेआपको सुरक्षित नही रख सकी और ग्रीसमें यह एक ऐसी अस्वाभाविक पद्धति मानी गयी जिसने कुछ कालके लिये जवर्दस्ती अपना अधिकार जमा लिया था, उधर शासनका कुलीनतत्त्रीय रूप, यद्यपि वह अधिक शक्तिशाली था, स्पार्टा जैसे शुद्ध सैनिक जन समुदायको छोडकर, और कही न तो उच्च और अनन्य सर्वोच्चता प्राप्त कर सका और न ही स्थायी रूपमे टिक सका । एक ऐसी जनतत्रीय स्वतत्रताकी प्रवृत्ति, जिसमे प्रत्येक व्यक्ति राज्यकी सास्कृतिक संस्थाओं तथा नागरिक जीवनमे स्वाभाविक रूपसे भाग लेता हो, विधान और नीति निर्धारणमे समान रूपसे अपना मत दे सकता हो तथा उनकी कार्यान्वितिमे उतना भाग तो ले ही सकता हो जितना कि उसके नागरिकताके अधिकार तथा उसकी वैयक्तिक योग्यताद्वारा उसे मिल सकता है, नगर- राज्यकी भावना तथा उसके रूपमे प्रारंभसे ही विद्यमान थी । रोममे भी यह प्रवृत्ति उपस्थित थी पर वह ग्रीसकी भाति न तो इतने वेगसे उन्नत हो सकी और न ही पूर्ण रूपसे चरितार्थ हुई; कारण, वहाँके सैनिक तथा विजयी राज्यको अपनी विदेशी नीति और सैनिक कार्य व्यवहारके संचालनके लिये स्वेच्छाचारी शासक अथवा एक छोटे कुलीनतत्रीय वर्गकी आवश्यकता थी; परंतु उस अवस्थामे भी जनतत्त्रीय तत्त्व सदा विद्यमान रहा और जनतवीय प्रवृत्ति इतनी प्रबल रही कि रोमकी आत्मरक्षा और उसके विस्तारके सतत संघर्ष के बीचमे भी वह पूर्व - ऐतिहासिक कालसे कार्य करती तथा बढ़ती रही । इसकी गति तभी रुकी जब रोमको भूमध्यसागरके साम्राज्य के लिये कारथाजके साथ युद्ध तथा ऐसे ही कई और महान् सघर्ष करने पडे । भारतवर्षमे प्रारंभिक जन समुदाय स्वतंत्र समाज थे, इनमे राजा केवल सेनाका प्रधान या नगरका मुखिया होता था; बुद्धके समयमें भी जनतंत्रीय तत्त्व पूरी तरहसे विद्यमान था, चंद्रगुप्त और मेगस्थनीजके समय में यह छोटे राज्योमे उन दिनो भी जीवित रहा जब कि नीकरशाही ढंगसे शासित राजतन और साम्राज्य अंतिम रूपसे पुरानी स्वतंत्र राज्यपद्धतिका स्थान ले रहे थे । जिस अशमें सारे प्रायद्वीपमें या काम-से-कम उसके उत्तरी भागमे भारतीय जीवनके विशाल संगठनकी आवश्यकता अधिकाधिक अनुभव होने लगी उसी अंशमे स्वच्छद राजतंत्रकी प्रणालीने समस्त देशपर अपना अधिकार जमा लिया और पंडित एवं पुरोहित वर्गने समाजकी मन-बुद्धिपर अपने धर्मतत्त्रीय राज्यको तथा उस कठोर शास्त्रको लाद दिया जो सामाजिक एकता और राष्ट्रीय संस्कृतिकी शृंखला और कड़ी प्रदान करनेवाला समझा जाता था । जो वात राजनीतिक और नागरिक जीवन में थी वही बात सामाजिक जीवनमे भी थी । जन-समुदायमे एक प्रकारकी जनतंत्रीय समानता तो प्रायः अनिवार्य होती ही है; वर्गगत प्रवल विभेदों और विशिष्टताओका विरोधी तथ्य किसी जाति या वंशके सैनिक कालमे तो स्थापित हो सकता है पर वह एक सुप्रतिष्ठित नगर- राज्यके निकट सान्निध्य में चिरकालतक नहीं टिक सकता, हाँ, कुछ ऐसे कृत्रिम साधनोद्वारा जिनका कि स्पार्टा और वेनिसने प्रयोग किया था ऐसा हो सकता है । यह विभेद रहे भी, तो भी इसका एकातभाव कुंद पड़ जाता है और वह अपने आपको इतना सघन तथा शक्तिशाली नही बना सकता कि वह एक दृढ़ वर्ण-परंपराका रूप धारण कर ले। छोटे जन समुदायका स्वाभाविक सामाजिक रूप हम एथेन्समे देख सकते हैं जहाँ एक गरीब चर्मकार भी उतना ही प्रवल राजनीतिक अधिकार रखता था जितना कि एक कुलीन और धनी व्यक्ति, जहाँ सर्वोच्च पद और नागरिक कार्य सव वर्गोंके व्यक्तियोके लिये सुलभ थे । थे। साथ ही सामाजिक कार्यो और संवधोमे भी उन्हें स्वतंत्र सहचारिता और समानता प्राप्त थी । भारतीय सभ्यताके प्राचीनतर अभिलेखोमें हम इसीसे मिलतीजुलती पर भिन्न प्रकारकी जनतंत्रीय समानता देखते हैं, वर्ण-भावनाके दंभ और अहंकारसे युक्त कठोर वर्ण-परंपरा पीछेकी बात है; पूर्वकालके अपेक्षाकृत सरल जीवनमे कार्यकी विभिन्नता यहाँतक कि श्रेष्ठता के साथ भी वैयक्तिक या वर्गीय श्रेष्ठताका भाव नही जुड़ा हुआ था । ऐसा मालूम होता है कि आरंभमे सबसे अधिक पवित्र धार्मिक और सामाजिक कार्य अर्थात् ऋषि और पुरोहितका कार्य सव वर्गोंके व्यक्तियो तथा सव प्रकारके व्यवसायियोके लिये खुला हुआ था। धर्मतत्त्र, वर्ण-व्यवस्था और निरंकुश राजतंत्रकी शक्ति उसी प्रकार साथ-ही-साथ वढ़ी जिस प्रकार मध्यकालीन यूरोपमें पादरीवर्ग और राजतंत्रीय आधिपत्यकी शक्ति वढी थी । इस शक्ति वृद्धिका कारण उन नयी परिस्थितियोका दवाव था जो वृहत् सामाजिक और राजनीतिक समुदायोके विकाससे उत्पन्न हुई थी । प्राचीन ग्रीस, रोम और भारतवर्ष के नगर- राज्योकी इन परिस्थितियों में जिन समाजोने सास्कृतिक प्रगति की उन्हें जीवनकी एक ऐसी सामान्य स्फूर्ति तथा संस्कृति और निर्माणकी एक ऐसी गतिशील शक्तिका विकास करना पडा जिससे आगे आनेवाले समुदाय वंचित रह गये तथा जिसे वे केवल स्वनिर्माणके लंबे समयके वाद ही प्राप्त कर सके; इस समयमे उन्हें एक नये संगठनके विकासमे आनेवाली कठिनाइयोका सामना तथा निराकरण करना पडा । ग्रीक नगरके सास्कृतिक और नागरिक जीवनने - जिसकी सर्वोच्च प्राप्ति एथेन्समे हुई थी - ऐसे जीवनने जिसमें जीवन यापन अपनेआपमे एक शिक्षा थी, जहाँ गरीवसे गरीव और धनीसे धनी नाटकघरमे साथ-साथ बैठकर सोफोक्लीस और युरीपिडीज के नाटक देखा करते तथा उनके बारेमे अपना मत देते थे, जहाँ एथिनियन व्यापारी और दूकानदार सुकरातके सूक्ष्म दार्शनिक वार्तालापमे भाग लेते थे - यूरोपके लिये उसके आधारभूत राजनीतिक सूत्रो और आदर्शोका ही निर्माण नही किया वरन् उसकी बौद्धिक, दार्शनिक, साहित्यिक और कलात्मक संस्कृतिके सभी मूल स्वरूपोका भी निर्माण किया था । अकेले रोम नगरके समान रूपसे सजीव, गजनीतिक, वैध और सैनिक जीवनने यूरोपके लिये उसके राजनीतिक कार्य, सैनिक अनुशासन, विज्ञान, विधान और साम्यके व्यवहार शास्त्रके नमूनोंका यहाँतक कि साम्राज्य और उपनिवेशीकरणके आदर्शोका भी निर्माण किया है। भारतवर्षमे आध्यात्मिक जीवनकी प्राचीन सजीवताने ही - जिसकी झलक हमे वेदो, उपनिषदो तथा चौद्ध ग्रंथोमे मिलती है - उन धर्मो, दर्शनो तथा आध्यात्मिक नियमोंको उत्पन्न किया था जिन्होने तबसे प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभावद्वारा एशिया या यूरोपमे अपनी भावना और ज्ञानके एक अशका प्रसार करना शुरू कर दिया है । इस स्वतंत्र, सामान्यीकृत, व्यापक रूपसे स्पदनशील, जीवंत और गतिशील शक्तिकी जड जिसे आधुनिक जगत् केवल अब किसी अशमे पुनः प्राप्त कर रहा है सर्वत्र, सव भेद होते हुए भी, एक ही थी; समाजके बहुमुखी जीवनमें वह एक सीमित वर्गका नही वरन् व्यक्तिमात्रका पूर्ण सहयोग था । प्रत्येक यह समझता था कि उसमे सवकी शक्ति है, साथ ही उसे वैश्व शक्तिके उद्दाम प्रवाहमे अपनी उन्नति करने, अपना निज स्वरूप प्राप्त करने, सफलता लाभ करने, सोचने तथा निर्माण करनेकी एक प्रकारकी स्वतंत्रता भी है । वह यही स्थिति अर्थात् व्यक्ति और समुदायका संबंध है जिसकी पुनः - स्थापनाके लिये आधुनिक जीवनने वोझिल, बेढगे और अपूर्ण ढगसे किसी हदतक चेप्टा की है, यद्यपि उसके पास प्राचीन मानवजातिकी अपेक्षा कही अधिक विशाल जीवन शक्ति और विचार-शक्ति है । यह संभव है कि यदि पुराने नगर-राज्य गण - राष्ट्र बने रहते और अपनेआपको बदलकर और नये जनसमुदायमे अपने जीवनको विलीन किये विना ही, वृहत्तर समुदायोका निर्माण कर लेते तो बहुत-सी समस्याओका अधिक सरलतासे प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टिद्वारा तथा प्रकृतिके अनुकूल रहते हुए समाधान हो जाता, जब कि अब हमे वडे जटिल और दुःखदायी तरीकेसे तथा वडे भारी संकटो और व्यापक विप्लवोसे डरते हुए इन समस्याओका हल करना पड़ रहा है । पर ऐसा होना संभव नहीं था । उस पुराने जीवनमे भारी दोप थे जिन्हें वह दूर नहीं कर सकता था । भूमध्यप्रदेशके राष्ट्रोमे हम देखते हैं कि समाजके पूर्ण नागरिक और सास्कृतिक जीवनमे सव व्यक्तियोके समान भाग लेनेके सवधमे दो अत्यधिक महत्वपूर्ण अपवाद किये गये थे। दास-वर्ग तो उसमे भाग ले ही नहीं सकता था और स्त्रियाँ भी, जिनकी जीवन-परिधि अत्यंत संकुचित थी, इस अधिकारसे प्रायः वंचित ही रखी गयी थी । उधर भारतवर्षमे दास प्रथा नहीके वरावर थी और स्त्रियोको भी शुरू-शुरूमे यहाँ ग्रीस और रोमकी स्त्रियोसे अधिक स्वतंत्र और सम्मानयुक्त पद प्राप्त था; किन्तु शीघ्र ही दासका स्थान सबसे निम्न जाति शूद्रने ले लिया। शूद्रों और स्त्रियोको सामान्य जीवन और संस्कृतिके उच्चतम लाभोंसे वंचित रखनेकी यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ती गयी कि भारतीय समाजको भी यह उसके पश्चिमी साथियोके स्तरतक ले आयी । यह संभव है कि प्राचीन समाजमे -- यदि वह अधिक समयतक जीवित रहता तो - आर्थिक दासता और स्त्रियोकी पराधीनताकी दो वड़ी समस्याओपर विचार करके उसी प्रकार उनका समाधान किया जाता जिस प्रकार आधुनिक राज्यमे इनपर विचार करके इन्हें सुलझानेकी चेप्टा की जा रही है, पर यह वात संशयपूर्ण है। केवल रोममे ही हम कुछ ऐसी प्रारंभिक प्रवृत्तियाँ देखते है जो इस दिशामे कुछ कार्य कर सकती थीं पर वे भी भविष्यकी संभावनाके अस्पष्ट संकेतोके अतिरिक्त और कुछ नही दे सकी । इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मानव समाजके इस प्राचीन रूपको समुदायो पारस्परिक संबधोका प्रश्न सुलझानेमे जरा भी सफलता प्राप्त नही हुई युद्ध ही उनके सामान्य संबंधका आधार रहा । स्वतंत्र संघ वनानेके उनके सव प्रयत्न निष्फल हुए और एकीकरणका एकमात्र साधन सैनिक विजय ही रह गया । उस छोटे समुदायके मोहने, जिसमें प्रत्येक मनुष्य अपने आपको अत्यधिक सजीव समझता था, एक प्रकारकी मानसिक और प्राणिक संकीर्णता उत्पन्न कर दी, यह सकीर्णता अपनेआपको उन नये और अधिक व्यापक विचारोके अनुकूल नही बना सकी जिन्हें दर्शन और राजनीतिक विचार अधिक व्यापक आवश्यकताओं और प्रवृत्तियोद्वारा प्रेरित होकर जीवन क्षेत्रमे लाये थे । इसीलिये इन पुराने राज्योको भंग होना पड़ा, भारतवर्षमे ये गुप्त और मौर्य राजाओके विशाल नौकरशाही साम्राज्योमे विलीन हो गये जिनके वाद पठान, मुगल और अंग्रेज आये और पश्चिममे ये उन विशाल सैनिक और व्यापारिक विजित प्रदेशोमे मिल गये जो सिकन्दर, कारथेजिनियन, कुलीनतत्र तथा रोमके गणतत और साम्राज्यद्वारा प्राप्त हुए थे । इन पिछले राज्योकी एकता राष्ट्रीय नही, वल्कि अति-राष्ट्रीय थी । मनुष्यजातिमे अतिव्यापक एकता लानेके लिये ये ऐसे असामयिक प्रयत्न थे जो वास्तवमे तवतक पूर्णतया सफल नही हो सकते थे जबतक बीचकी राष्ट्र इकाई पूर्ण और स्वस्थ ढंगसे विकसित ही न हो जाती । अतएव राष्ट्रीय समुदायका निर्माण उस सहस्राब्दीमे होना था जो रोम-साम्राज्यके छिन्न-भिन्न होनेके वाद आयी । अपनी इस समस्याको सुलझाने के लिये ससारको उस समय उन अनेको, वास्तवमे, अधिकतर लाभोको छोड़ना पड़ा जिन्हे नगर- राज्योने मानवजातिके लिये प्राप्त किया था । इस समस्याको सुलझानेके बाद ही एक सुसगठित, उन्नतिशील और अधिकाधिक पूर्णताप्राप्त समाज तथा सामाजिक जीवनके शक्तिशाली साँचेको और साथ ही उस साँचेके अंदर जीवनके स्वतन अभ्युदय और उसकी पूर्णताको विकसित करनेका कोई सच्चा प्रयत्न किया जा सकता था। पहले हमे जरा इस विकास-क्रमका थोड़ा-सा अध्ययन करना होगा । उसके वाद हम इस विपयपर विचार कर सकते है कि वृहत्तर समुदायके निर्माणका नया प्रयत्न पुन पीछे हटनेके खतरेसे खाली हो सकता है या नही । इस पीछे हटनेमे जातिकी आंतरिक उन्नतिका कम-से-कम कुछ समयके लिये तो वलिदान करना ही पडेगा जिससे विशाल वाह्य एकताके विकास और उसकी स्थापना के लिये पूरा प्रयत्न किया जा सके ।
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जिसके कारण पैसों की तंगी मानी जा रही है. इनमें अधिकांश हेल्थ वर्कर्स के रूप में कार्य करने वाली महिलाएं हैं. कोविड-19 संक्रमण से निपटने में भी ये कर्मचारी अग्रिम पंक्ति के योद्धा थे.
नेशनल इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर के समन्वयक राणा मुहम्मद सफदर ने बताया कि हेल्थ वर्कर्स का आंकड़ा कम करने का फैसला बीते वर्ष लिया जा चुका है. पीएम के विशेष स्वास्थ्य सलाहकार जफर मिर्जा ने पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम में परिवर्तन के भी संकेत दिए थे.
जंहा पाक सेना ने शनिवार को कहा कि माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स और सेना प्रमुख ने कोरोना वायरस महामारी के माहौल में पोलियो उन्मूलन अभियान के लिए जरुरी कोशिशों को लेकर चर्चा की.
अरबपति समाजसेवी बिल गेट्स ने पाक में पोलियो उन्मूलन के लिए अभियान चलाने पर पाक सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से वार्ता किया है.
जंहा यह भी कहा जा रहा है कि गेट्स ने पाक सेना प्रमुख के साथ कोविड-19 महामारी के मध्य पोलियो के विरुद्ध अभियान की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए जरुरी समर्थन को लेकर वार्ता की गई.
पाक ने पोलियो के विरुद्ध अभियान को मार्च में रोक दिया था और संक्रमण के केसों में कमी दर्ज होने के उपरांत बीते महीने इसे फिर से शुरू किया गया.
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जिसके कारण पैसों की तंगी मानी जा रही है. इनमें अधिकांश हेल्थ वर्कर्स के रूप में कार्य करने वाली महिलाएं हैं. कोविड-उन्नीस संक्रमण से निपटने में भी ये कर्मचारी अग्रिम पंक्ति के योद्धा थे. नेशनल इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर के समन्वयक राणा मुहम्मद सफदर ने बताया कि हेल्थ वर्कर्स का आंकड़ा कम करने का फैसला बीते वर्ष लिया जा चुका है. पीएम के विशेष स्वास्थ्य सलाहकार जफर मिर्जा ने पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम में परिवर्तन के भी संकेत दिए थे. जंहा पाक सेना ने शनिवार को कहा कि माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स और सेना प्रमुख ने कोरोना वायरस महामारी के माहौल में पोलियो उन्मूलन अभियान के लिए जरुरी कोशिशों को लेकर चर्चा की. अरबपति समाजसेवी बिल गेट्स ने पाक में पोलियो उन्मूलन के लिए अभियान चलाने पर पाक सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से वार्ता किया है. जंहा यह भी कहा जा रहा है कि गेट्स ने पाक सेना प्रमुख के साथ कोविड-उन्नीस महामारी के मध्य पोलियो के विरुद्ध अभियान की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए जरुरी समर्थन को लेकर वार्ता की गई. पाक ने पोलियो के विरुद्ध अभियान को मार्च में रोक दिया था और संक्रमण के केसों में कमी दर्ज होने के उपरांत बीते महीने इसे फिर से शुरू किया गया.
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उत्प्लव और लंगर (सिख धर्म)
शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ।
उत्प्लव vs. लंगर (सिख धर्म)
मौसम से संबन्धित आंकड़े जुटाने वाला एक उत्प्लव उत्प्लव (बॉय / buoy) उन पिंडों का नाम है जो समुद्रतल से बँधे रहते हैं और समुद्रपृष्ठ पर उतराते रहकर जहाजों को मार्ग की विपत्तियों या सुविधाओं की सूचना देते रहते हैं। उदाहरण के लिए, उत्प्लव संकीर्ण समुद्रों को नौपरिवहन योग्य सीमा सूचित करते हैं, या यह बताते हैं कि मार्ग उपयुक्त है, या यह कि उसके अवरोध कहाँ हैं, जैसे पानी के भीतर डूबी हुई विपत्तियाँ या बिखरे हुए चट्टान, सुरंग या टारपीडो के स्थल, तार भेजने के समुद्री तार, या लंगर छोड़कर चले गए जहाजों के छूटे हुए लंगर। कुछ उत्प्लवों से यह भी काम निकलता है कि लंगर डालने के बदले जहाज को उनसे बाँध दिया जा सकता है। इनको नौबंध उत्प्लव (मूरिंग बॉय) कहते हैं। उद्देश्य के अनुसार उत्प्लवों के आकार और रंग में अंतर होता है। ये काठ के कुंदे से लेकर इस्पात की बड़ी बड़ी संरचनाएँ हो सकती हैं, जिनमें जहाज बाँधे जाते हैं। उत्प्लव को अंग्रेजी में 'बॉय' कहते हैं और लश्करी हिंदी मे इसे 'बोया' कहा जाता है। अंग्रेजी शब्द बॉय उस प्राचीन अंग्रेजी शब्द से व्युत्पन्न है जिससे आधुनिक अंग्रेजी शब्द बीकन (beacon, आकाशदीप) की भी उत्पत्ति हुई है। परंतु अब बॉय का अर्थ हो गया है उतराना और उत्प्लव शब्द का भी अर्थ है वह जो उतराता रहे। . लंगर का दृष्य लंगर (पंजाबीः ਲੰਗਰ) सिखों के गुरुद्वारों में प्रदान किए जाने वाले निःशुल्क, शाकाहारी भोजन को कहते हैं। लंगर, सभी लोगों के लिये खुला होता है चाहे वे सिख हो या नहीं। लंगर शब्द सिख धर्म में दो दृष्टिकोणों से इस्तेमाल होता है। सिखों के धर्म ग्रंथ में "लंगर" शब्द को निराकारी दृष्टिकोण से लिया गया है, पर आम तौर पर "रसोई" को लंगर कहा जाता है जहाँ कोई भी आदमी किसी भी जाति का, किसी भी धर्म का, किसी भी पद का हो इकट्ठे बैठ कर अपने शरीर की भूख अथवा पानी की प्यास मिटा सकता है। इसी शब्द को निराकारी दृष्टिकोण में लिया जाता है, जिसके अनुसार कोई भी जीव आत्मा या मनुष्य अपनी आत्मा की ज्ञान की भूख, अपनी आत्मा को समझने और हुकम को बूझने की भूख गुरु घर में आकर किसी गुरमुख से गुरमत की विचारधारा को सुनकर/समझकर मिटा सकता है। सिखों के धर्म ग्रंथ में लंगर शब्द श्री सत्ता डूम जी और श्री बलवंड राइ जी ने अपनी वाणी में इस्तेमाल किया है। सिख धर्म की एक प्रमुख सिखावन है- "वंड छको" (हिंदी अनुवाद- मिल बांट कर खाओ)। लंगर की प्रथा इसी का व्यवहारिक स्वरूप है। .
उत्प्लव और लंगर (सिख धर्म) आम में 0 बातें हैं (यूनियनपीडिया में)।
उत्प्लव 7 संबंध है और लंगर (सिख धर्म) 13 है। वे आम 0 में है, समानता सूचकांक 0.00% है = 0 / (7 + 13)।
यह लेख उत्प्लव और लंगर (सिख धर्म) के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
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उत्प्लव और लंगर शॉर्टकटः मतभेद, समानता, समानता गुणांक, संदर्भ। उत्प्लव vs. लंगर मौसम से संबन्धित आंकड़े जुटाने वाला एक उत्प्लव उत्प्लव उन पिंडों का नाम है जो समुद्रतल से बँधे रहते हैं और समुद्रपृष्ठ पर उतराते रहकर जहाजों को मार्ग की विपत्तियों या सुविधाओं की सूचना देते रहते हैं। उदाहरण के लिए, उत्प्लव संकीर्ण समुद्रों को नौपरिवहन योग्य सीमा सूचित करते हैं, या यह बताते हैं कि मार्ग उपयुक्त है, या यह कि उसके अवरोध कहाँ हैं, जैसे पानी के भीतर डूबी हुई विपत्तियाँ या बिखरे हुए चट्टान, सुरंग या टारपीडो के स्थल, तार भेजने के समुद्री तार, या लंगर छोड़कर चले गए जहाजों के छूटे हुए लंगर। कुछ उत्प्लवों से यह भी काम निकलता है कि लंगर डालने के बदले जहाज को उनसे बाँध दिया जा सकता है। इनको नौबंध उत्प्लव कहते हैं। उद्देश्य के अनुसार उत्प्लवों के आकार और रंग में अंतर होता है। ये काठ के कुंदे से लेकर इस्पात की बड़ी बड़ी संरचनाएँ हो सकती हैं, जिनमें जहाज बाँधे जाते हैं। उत्प्लव को अंग्रेजी में 'बॉय' कहते हैं और लश्करी हिंदी मे इसे 'बोया' कहा जाता है। अंग्रेजी शब्द बॉय उस प्राचीन अंग्रेजी शब्द से व्युत्पन्न है जिससे आधुनिक अंग्रेजी शब्द बीकन की भी उत्पत्ति हुई है। परंतु अब बॉय का अर्थ हो गया है उतराना और उत्प्लव शब्द का भी अर्थ है वह जो उतराता रहे। . लंगर का दृष्य लंगर सिखों के गुरुद्वारों में प्रदान किए जाने वाले निःशुल्क, शाकाहारी भोजन को कहते हैं। लंगर, सभी लोगों के लिये खुला होता है चाहे वे सिख हो या नहीं। लंगर शब्द सिख धर्म में दो दृष्टिकोणों से इस्तेमाल होता है। सिखों के धर्म ग्रंथ में "लंगर" शब्द को निराकारी दृष्टिकोण से लिया गया है, पर आम तौर पर "रसोई" को लंगर कहा जाता है जहाँ कोई भी आदमी किसी भी जाति का, किसी भी धर्म का, किसी भी पद का हो इकट्ठे बैठ कर अपने शरीर की भूख अथवा पानी की प्यास मिटा सकता है। इसी शब्द को निराकारी दृष्टिकोण में लिया जाता है, जिसके अनुसार कोई भी जीव आत्मा या मनुष्य अपनी आत्मा की ज्ञान की भूख, अपनी आत्मा को समझने और हुकम को बूझने की भूख गुरु घर में आकर किसी गुरमुख से गुरमत की विचारधारा को सुनकर/समझकर मिटा सकता है। सिखों के धर्म ग्रंथ में लंगर शब्द श्री सत्ता डूम जी और श्री बलवंड राइ जी ने अपनी वाणी में इस्तेमाल किया है। सिख धर्म की एक प्रमुख सिखावन है- "वंड छको" । लंगर की प्रथा इसी का व्यवहारिक स्वरूप है। . उत्प्लव और लंगर आम में शून्य बातें हैं । उत्प्लव सात संबंध है और लंगर तेरह है। वे आम शून्य में है, समानता सूचकांक शून्य.शून्य% है = शून्य / । यह लेख उत्प्लव और लंगर के बीच संबंध को दर्शाता है। जानकारी निकाला गया था, जिसमें से एक लेख का उपयोग करने के लिए, कृपया देखेंः
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पालमपुर - सुलाह विधानसभा के अंतर्गत धौलाधार कालोनी मारंडा के निकट पालमपुर विधानसभा की खलेट पंचायत द्वारा कूड़ा-कचरा संयंत्र स्थापित कर देने के उपरांत उठे विवाद को लेकर स्वास्थ्य मंत्री के निर्देशानुसार गठित निर्णायक कमेटी ने शनिवार को पालमपुर उपमंडल अधिकारी पंकज शर्मा की अगवाई में अधिशाषी अभियंता, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड आरके नड्डा, वनमंडल अधिकारी संजय सेन और बीडीओ भवारना इत्यादि अधिकारियों ने कूड़ा संयंत्र में विजिट करके इस विवाद में उलझे दोनों पक्षों को बुलाकर उनकी राय जानी। धौलाधार कालोनी सुधार सभा अध्यक्ष रामस्वरूप तथा वनघियार पंचायत प्रधान त्रिलोक राणा ने कमेटी के समक्ष भारी विरोध जताया और मांग रखी कि इस कूड़ा संयंत्र पूरे मानकों पर खरा नहीं उतरता है, को यहां से अन्यंत्र शिफ्ट किया जाए। उन्होंने कहा कि संयंत्र के इस क्षेत्र के लगने के उपरांत उन्हें दुर्गंध का सामना करना पड़ता है। धौलाधार कालोनी सुधार सभा ने कहा कि अगर इस संयंत्र प्लांट को यहां से शीघ्र शिफ्ट नहीं किया गया, तो वह कोर्ट का रास्ता अपनाएंगे। दूसरी ओर खलेट पंचायत की प्रधान हेमलता ठाकुर, कूड़ा संयंत्र कमेटी के अध्यक्ष डीआर अवस्थी तथा आदर्श नगर रेजिडेंट वेलफेयर एसोशिएसन के प्रधान कर्नल हरीश गुलेरिया, रमाकांत तथा अन्य प्रतिष्ठित सदस्यों ने कहा कि स्वच्छता अभियान के तहत 60 लाख रुपए की लागत से इस संयंत्र को पूरे मानकों के साथ स्थापित किया गया है तथा पूरे वैज्ञानिक तरीके से कूड़े का निष्पादन किया जा रहा है तथा किसी प्रकार की भी गैस उत्सर्जन नहीं हो रहा है। दोनों पक्षों की राय को जानकर प्रशासनिक कमेटी ने कहा कि उनकी कमेटी बैठकर सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर अपना फैसला सुनाएगी कि यहां पर कूड़ा संयंत्र स्थापित रहेगा या नहीं।
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पालमपुर - सुलाह विधानसभा के अंतर्गत धौलाधार कालोनी मारंडा के निकट पालमपुर विधानसभा की खलेट पंचायत द्वारा कूड़ा-कचरा संयंत्र स्थापित कर देने के उपरांत उठे विवाद को लेकर स्वास्थ्य मंत्री के निर्देशानुसार गठित निर्णायक कमेटी ने शनिवार को पालमपुर उपमंडल अधिकारी पंकज शर्मा की अगवाई में अधिशाषी अभियंता, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड आरके नड्डा, वनमंडल अधिकारी संजय सेन और बीडीओ भवारना इत्यादि अधिकारियों ने कूड़ा संयंत्र में विजिट करके इस विवाद में उलझे दोनों पक्षों को बुलाकर उनकी राय जानी। धौलाधार कालोनी सुधार सभा अध्यक्ष रामस्वरूप तथा वनघियार पंचायत प्रधान त्रिलोक राणा ने कमेटी के समक्ष भारी विरोध जताया और मांग रखी कि इस कूड़ा संयंत्र पूरे मानकों पर खरा नहीं उतरता है, को यहां से अन्यंत्र शिफ्ट किया जाए। उन्होंने कहा कि संयंत्र के इस क्षेत्र के लगने के उपरांत उन्हें दुर्गंध का सामना करना पड़ता है। धौलाधार कालोनी सुधार सभा ने कहा कि अगर इस संयंत्र प्लांट को यहां से शीघ्र शिफ्ट नहीं किया गया, तो वह कोर्ट का रास्ता अपनाएंगे। दूसरी ओर खलेट पंचायत की प्रधान हेमलता ठाकुर, कूड़ा संयंत्र कमेटी के अध्यक्ष डीआर अवस्थी तथा आदर्श नगर रेजिडेंट वेलफेयर एसोशिएसन के प्रधान कर्नल हरीश गुलेरिया, रमाकांत तथा अन्य प्रतिष्ठित सदस्यों ने कहा कि स्वच्छता अभियान के तहत साठ लाख रुपए की लागत से इस संयंत्र को पूरे मानकों के साथ स्थापित किया गया है तथा पूरे वैज्ञानिक तरीके से कूड़े का निष्पादन किया जा रहा है तथा किसी प्रकार की भी गैस उत्सर्जन नहीं हो रहा है। दोनों पक्षों की राय को जानकर प्रशासनिक कमेटी ने कहा कि उनकी कमेटी बैठकर सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर अपना फैसला सुनाएगी कि यहां पर कूड़ा संयंत्र स्थापित रहेगा या नहीं।
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Alert. . इसे कहते हैं तूफानी ब्लाॅकबस्टर. . सलमान खान. . अक्षय कुमार. . तगड़ा झटका. .
सलमान खान के शो बिग बॅास 11 के लांच से पहले यह खबर चौंकाने वाली है। लगातार चार हफ्ते से अमिताभ बच्चन का शो कौन बनेगा करोड़पति नंबर 1 पर चल रहा है।
इस वीक भी केबीसी ने टीआरपी के सारे रिकॅार्ड तोड़ दिए हैं। टॅाप के डेली शो को टक्कर देते हुए केबीसी ने फिर से अपनी जगह बना ली है। इसके बाद टॅाप 5 शो के अंदर कई ऐसे चौंकाने वाले बदलाव हुए हैं।
इस शो की जान अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता है। वैसे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इस शो को नंबर 1 की पोजिशन पर पहुंचाता दिया है।
एक बार भी दर्शकों ने साबित कर दिया है कि सास बहू के ड्रामा से हटकर दर्शक रियलिटी शो में अभी भी सामान्य ज्ञान को तरजीह दे रह हैं। वहीं खतरों के खिलाड़ी,जो लगातार टीआरपी में टॅाप कर रहा है।
यहां देखें पूरी लिस्ट. .
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मुंबईःबॉलीवुड एक्ट्रेस नुसरत भरुचा वर्तमान में अपकमिंग थ्रिलर ड्रामा फिल्म अकेली की शूटिंग कर रही हैं। उन्होंने सेट से एक फोटो शेयर की है, जिसमें शूटिंग के दौरान लगी चोट नजर आ रही है।
अपने माथे पर घाव और खून के धब्बे के साथ, नुसरत ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक फोटो साझा की और कैप्शन में लिखाः अकेली।
यह बहुप्रतीक्षित फिल्म प्रणय मेश्राम द्वारा निर्देशित है जो इस फील्ड में एक नए कलाकार भी हैं। इससे पहले वह क्वीन और कमांडो 3 जैसी फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर चुके हैं।
अकेली के अलावा, नुसरत के पास छोरी 2 भी है।
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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मुंबईःबॉलीवुड एक्ट्रेस नुसरत भरुचा वर्तमान में अपकमिंग थ्रिलर ड्रामा फिल्म अकेली की शूटिंग कर रही हैं। उन्होंने सेट से एक फोटो शेयर की है, जिसमें शूटिंग के दौरान लगी चोट नजर आ रही है। अपने माथे पर घाव और खून के धब्बे के साथ, नुसरत ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक फोटो साझा की और कैप्शन में लिखाः अकेली। यह बहुप्रतीक्षित फिल्म प्रणय मेश्राम द्वारा निर्देशित है जो इस फील्ड में एक नए कलाकार भी हैं। इससे पहले वह क्वीन और कमांडो तीन जैसी फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर चुके हैं। अकेली के अलावा, नुसरत के पास छोरी दो भी है। डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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सोचा कि अपनी प्रेयसी की यादगार में, भारत के ही नहीं, संसार के उस चाँद की उन शुष्क हड्डियों पर एक ऐसी कब्र बनावे कि वह संसार के मकबरों का ताज हो । शाहजहाँ को सूझी कि अपनी प्रेयसी की स्मृति को तथा उसके प्रति अपने अगाध शुद्ध प्रेम को स्वच्छ, श्वेत स्फटिक के सुचारु स्वरूप में व्यक्त करे ।
धीरे-धीरे भारत की उस पवित्र महानदी यमुना के तट पर एक मकबरा बनने लगा। पहले लाल पत्थर का एक चबूतरा बनाया गया, उस पर सफेद सङ्गमरमर का ऊँचा चबूतरा निर्माण किया गया, जिसके चारों कोनों पर चार मीनार बनाए गए जो बेतार के तार से, चारों दिशाओं में उस सम्राज्ञी की मृत्यु का समाचार सुना रहे हैं तथा उसका यशोदान करते हैं । मध्य में शनैः शनैः मकबरा उठा । यह मकबरा भी उस श्वेत वर्णवाली सम्राज्ञी के समान श्वेत तथा उसी के समान सौंदर्य में अनुपम तथा अद्वितीय था । अन्त में उस मकबरे को एक अतीव सुन्दर किन्तु
महान गुम्बज का ताज पहनाया गया ।
पाठको ! उस सुन्दर मकबरे का वर्णन पार्थिव जिह्वा नहीं कर सकती, फिर बेचारी जड़ लेखनी का क्या कहना ? अनेक शताब्दियाँ बीत गईं, भारत में अनेकानेक साम्राज्यों का उत्थान और पतन हुआ। भारत की वह सुन्दर कला तथा महान समाधि के निर्माणकर्ता भी समय के इस अनन्त गर्भ में न जाने कहाँ विलीन हो गये; परन्तु आज भी वह मकबरा खड़ा हुआ, अपने सौन्दर्य से संसार को लुभा रहा है। वह शाहजहाँ की उस महान् साधना
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सोचा कि अपनी प्रेयसी की यादगार में, भारत के ही नहीं, संसार के उस चाँद की उन शुष्क हड्डियों पर एक ऐसी कब्र बनावे कि वह संसार के मकबरों का ताज हो । शाहजहाँ को सूझी कि अपनी प्रेयसी की स्मृति को तथा उसके प्रति अपने अगाध शुद्ध प्रेम को स्वच्छ, श्वेत स्फटिक के सुचारु स्वरूप में व्यक्त करे । धीरे-धीरे भारत की उस पवित्र महानदी यमुना के तट पर एक मकबरा बनने लगा। पहले लाल पत्थर का एक चबूतरा बनाया गया, उस पर सफेद सङ्गमरमर का ऊँचा चबूतरा निर्माण किया गया, जिसके चारों कोनों पर चार मीनार बनाए गए जो बेतार के तार से, चारों दिशाओं में उस सम्राज्ञी की मृत्यु का समाचार सुना रहे हैं तथा उसका यशोदान करते हैं । मध्य में शनैः शनैः मकबरा उठा । यह मकबरा भी उस श्वेत वर्णवाली सम्राज्ञी के समान श्वेत तथा उसी के समान सौंदर्य में अनुपम तथा अद्वितीय था । अन्त में उस मकबरे को एक अतीव सुन्दर किन्तु महान गुम्बज का ताज पहनाया गया । पाठको ! उस सुन्दर मकबरे का वर्णन पार्थिव जिह्वा नहीं कर सकती, फिर बेचारी जड़ लेखनी का क्या कहना ? अनेक शताब्दियाँ बीत गईं, भारत में अनेकानेक साम्राज्यों का उत्थान और पतन हुआ। भारत की वह सुन्दर कला तथा महान समाधि के निर्माणकर्ता भी समय के इस अनन्त गर्भ में न जाने कहाँ विलीन हो गये; परन्तु आज भी वह मकबरा खड़ा हुआ, अपने सौन्दर्य से संसार को लुभा रहा है। वह शाहजहाँ की उस महान् साधना
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Deoghar: रविवार को झारखंड चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ देवघर शाखा की बैठक कुष्ठ आश्रम रोड कार्यालय में संपन्न हुई. जिसमें नियमित, अनुबंध तथा आउटसोर्सिंग कर्मचारियों ने भाग लिया. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष मनोज कुमार मिश्र ने की. बैठक में झारखंड चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के राज्य उपाध्यक्ष अरूण कापरी, संघर्ष मंत्री सौरभ कुमार, चन्द्रमोहन कुमार, बबीता कुमारी, झारखंड एएनएम, जीएनएम अनुबंध कर्मचारी संघ की जिला अध्यक्ष अलका कुमारी, जिला सचिव संगीता राजहंस, उपाध्यक्ष आरती कुमारी तथा स्वास्थ आउटसोर्सिंग कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष दिव्यांशु कुमार, जिला सचिव सुनील कुमार दास, संघर्ष मंत्री विक्रम कुमार दुबे, संयुक्त सचिव सुधांशु पांडेय ने अपना पक्ष रखा. बैठक में नियमित कर्मचारियों के संबंध में बाकी बचे कर्मचारियों के एसीपी, एमएसीपी भुगतान की मांग सहित बाकी बचे कर्मचारियों का प्रोत्साहन राशि का भुगतान करने की मांग करने का निर्णय लिया गया.
अनुबंध कर्मचारियों के अप्रेजल के संबंध में विभागीय दिशा निर्देश का विरोध करने का निर्णय लिया गया तथा 15 प्रतिशत बढ़ोतरी के अविलंब भुगतान का मांग करने का निर्णय लिया गया. आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के समस्याओं पर विचार विमर्श में यह बात सामने आई कि 20 मई को आउटसोर्सिंग कर्मचारियों द्वारा आयोजित धरना कार्यक्रम में कंपनी के प्रतिनिधियों के द्वारा लिखित रूप से 30 मई तक मानदेय भुगतान का आश्वासन दिया गया था. लेकिन अभी तक मानदेय भुगतान नहीं किया गया है. वही जिला प्रतिनिधियों से बैठक के दौरान फोन पर वार्ता करने पर उन लोगों द्वारा वेतन भुगतान में असमर्थता जताई की गई. ज्ञात हो कि आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त कर्मचारियों को 5 महीने से पारिश्रमिक का भुगतान नहीं किया गया है. इससे सभी कर्मचारियों में रोष है तथा कंपनी के वादाखिलाफी से सभी क्षुब्ध हैं. उन्हें परिवार के भरण-पोषण पर संकट आ गई है. ऐसी स्थिति में सभी आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के द्वारा सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि 6 जून से सभी मांगों के पूरे होने तक जिले के आउटसोर्सिंग कर्मी काम बंद कर जिला मुख्यालय में कंपनी कार्यालय के समक्ष बेमियादी धरना प्रदर्शन पर बैठ जाएंगे. इस दौरान अस्पताल में होने वाली परेशानियों की जिम्मेवारी प्रशासन की होगी. न्यूनतम पारिश्रमिक भुगतान के लिए आउटसोर्सिंग कर्मचारी संघ के अध्यक्ष एवं सचिव द्वारा उपायुक्त को पत्र लिखकर पारिश्रमिक भुगतान में हस्तक्षेप करने की मांग करने का निर्णय लिया गया. उपायुक्त को देने वाले पत्र में कंपनी द्वारा सरकार के आदेश के बावजूद न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम पारिश्रमिक भुगतान का साक्ष्य संलग्न करने का निर्णय लिया गया है. जिसमें स्वास्थ्य सचिव द्वारा न्युनतम पारिश्रमिक भुगतान का आदेश सहित उपायुक्त के पत्र में स्वास्थ्य विभाग के आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त गार्ड को 594 रुपये प्रति कार्य दिवस भुगतान की बात रहने के बावजूद मात्र 8500 रुपये प्रतिमाह मिलने की बात लिखी गई है. इसके अलावा कोविड-19 काल में अनुबंध पर रखे गए वैक्सीनेटर सहित अन्य कर्मचारियों को हटाए जाने पर बातचीत हुई. उन लोगों के 7 महीने के बकाए मानदेय भुगतान हेतु सिविल सर्जन देवघर से पत्राचार का निर्णय लिया गया.
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Deoghar: रविवार को झारखंड चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ देवघर शाखा की बैठक कुष्ठ आश्रम रोड कार्यालय में संपन्न हुई. जिसमें नियमित, अनुबंध तथा आउटसोर्सिंग कर्मचारियों ने भाग लिया. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष मनोज कुमार मिश्र ने की. बैठक में झारखंड चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के राज्य उपाध्यक्ष अरूण कापरी, संघर्ष मंत्री सौरभ कुमार, चन्द्रमोहन कुमार, बबीता कुमारी, झारखंड एएनएम, जीएनएम अनुबंध कर्मचारी संघ की जिला अध्यक्ष अलका कुमारी, जिला सचिव संगीता राजहंस, उपाध्यक्ष आरती कुमारी तथा स्वास्थ आउटसोर्सिंग कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष दिव्यांशु कुमार, जिला सचिव सुनील कुमार दास, संघर्ष मंत्री विक्रम कुमार दुबे, संयुक्त सचिव सुधांशु पांडेय ने अपना पक्ष रखा. बैठक में नियमित कर्मचारियों के संबंध में बाकी बचे कर्मचारियों के एसीपी, एमएसीपी भुगतान की मांग सहित बाकी बचे कर्मचारियों का प्रोत्साहन राशि का भुगतान करने की मांग करने का निर्णय लिया गया. अनुबंध कर्मचारियों के अप्रेजल के संबंध में विभागीय दिशा निर्देश का विरोध करने का निर्णय लिया गया तथा पंद्रह प्रतिशत बढ़ोतरी के अविलंब भुगतान का मांग करने का निर्णय लिया गया. आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के समस्याओं पर विचार विमर्श में यह बात सामने आई कि बीस मई को आउटसोर्सिंग कर्मचारियों द्वारा आयोजित धरना कार्यक्रम में कंपनी के प्रतिनिधियों के द्वारा लिखित रूप से तीस मई तक मानदेय भुगतान का आश्वासन दिया गया था. लेकिन अभी तक मानदेय भुगतान नहीं किया गया है. वही जिला प्रतिनिधियों से बैठक के दौरान फोन पर वार्ता करने पर उन लोगों द्वारा वेतन भुगतान में असमर्थता जताई की गई. ज्ञात हो कि आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त कर्मचारियों को पाँच महीने से पारिश्रमिक का भुगतान नहीं किया गया है. इससे सभी कर्मचारियों में रोष है तथा कंपनी के वादाखिलाफी से सभी क्षुब्ध हैं. उन्हें परिवार के भरण-पोषण पर संकट आ गई है. ऐसी स्थिति में सभी आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के द्वारा सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि छः जून से सभी मांगों के पूरे होने तक जिले के आउटसोर्सिंग कर्मी काम बंद कर जिला मुख्यालय में कंपनी कार्यालय के समक्ष बेमियादी धरना प्रदर्शन पर बैठ जाएंगे. इस दौरान अस्पताल में होने वाली परेशानियों की जिम्मेवारी प्रशासन की होगी. न्यूनतम पारिश्रमिक भुगतान के लिए आउटसोर्सिंग कर्मचारी संघ के अध्यक्ष एवं सचिव द्वारा उपायुक्त को पत्र लिखकर पारिश्रमिक भुगतान में हस्तक्षेप करने की मांग करने का निर्णय लिया गया. उपायुक्त को देने वाले पत्र में कंपनी द्वारा सरकार के आदेश के बावजूद न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम पारिश्रमिक भुगतान का साक्ष्य संलग्न करने का निर्णय लिया गया है. जिसमें स्वास्थ्य सचिव द्वारा न्युनतम पारिश्रमिक भुगतान का आदेश सहित उपायुक्त के पत्र में स्वास्थ्य विभाग के आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त गार्ड को पाँच सौ चौरानवे रुपयापये प्रति कार्य दिवस भुगतान की बात रहने के बावजूद मात्र आठ हज़ार पाँच सौ रुपयापये प्रतिमाह मिलने की बात लिखी गई है. इसके अलावा कोविड-उन्नीस काल में अनुबंध पर रखे गए वैक्सीनेटर सहित अन्य कर्मचारियों को हटाए जाने पर बातचीत हुई. उन लोगों के सात महीने के बकाए मानदेय भुगतान हेतु सिविल सर्जन देवघर से पत्राचार का निर्णय लिया गया.
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गुरुवार की रात कुंडली बॉर्डर का तापमान 4 डिग्री था। कड़ाके की ठंड में बुजुर्ग किसान बीमार हो रहे हैं। यहां अब तक हार्ट अटैक से 5 किसानों की मौत हो चुकी है। लगातार किसानों की मौत व बीमार होने का ग्राफ बढ़ने से अब रक्तदान शिविर लग गए हैं। युनाइटेड सिख संगठन की तरफ से यहां रक्तदान शिविर लगाए गए हैं। जहां युवा किसान बढ़-चढ़कर रक्तदान कर रहे हैं। इसके पीछे बीमार हो रहे बुजुर्ग किसानों के लिए खून एकत्र करना है। ताकि कोई खून की कमी की वजह से दम न तोड़े। इसके अलावा शुक्रवार सुबह पंजाब के लुधियाना से 48 देशी हकीमों की एक टीम यहां पहुंची। देशी हकीम पहाड़ी जड़ी बूटी से कमर दर्द व सिर दर्द व जकड़न का इलाज कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि पंजाब में देशी हकीमों से इलाज कराया जाता है।
पहले दिन 125 यूनिट रक्तदान एकत्र हुआ, महिलाओं ने कहा किसान भाइयों के लिए किया खून का दान रक्तदान शिविर लगाने वाली संस्था यूनाटेड सिख के सदस्य गुरजिंद्र सिंह ने बताया कि किसान संगठन अपने- अपने स्तर पर सेवा कर रहे हैं। किसानों का आंदोलन अब चरम पर पहुंच गया है। सरकार के साथ- साथ किसानों के अब ठंड से लड़ना पड़ रहा है।
रोजाना बुजुर्ग किसान बीमार हो रहे हैं। इसी वजह से यूनाटेड सिख संगठन ने यहां रक्तदान शिविर लगाया है। शिविर में युवा किसान, महिलाएं बढ़ चढ़कर रक्तदान कर रही हैं। पहले दिन उनकी टीम ने यहां 125 यूनिट रक्तदान एकत्रित किया है। रक्तदान प्रीतमपूरा ब्लड सेंटर की टीम कर रही है। महिला रक्तदाता प्रीतमकौर ने कहा कि उनका खून से किसी किसान भाई की जान बच जाए तो उनका आंदोलन में रक्तदान करना सार्थक हो जाएगा।
पंजाब की खिलाड़ी परनीत कौर ने कहा कि उनकी कबड्डी टीम की लड़कियों ने भी रक्तदान किया है। खून का एक- एक कतरा किसान भाइयों के लिए है। उनके पिता, भाई यहां ठंड में आंदोलन कर रहे हैं। वे उनकी जिस तरीके से सेवा कर पाएंगी, हर हालत में करेंगी। सरकार के साथ इस लड़ाई में महिलाएं हर क्षेत्र में अपने भाइयों के साथ खड़ी हैं।
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गुरुवार की रात कुंडली बॉर्डर का तापमान चार डिग्री था। कड़ाके की ठंड में बुजुर्ग किसान बीमार हो रहे हैं। यहां अब तक हार्ट अटैक से पाँच किसानों की मौत हो चुकी है। लगातार किसानों की मौत व बीमार होने का ग्राफ बढ़ने से अब रक्तदान शिविर लग गए हैं। युनाइटेड सिख संगठन की तरफ से यहां रक्तदान शिविर लगाए गए हैं। जहां युवा किसान बढ़-चढ़कर रक्तदान कर रहे हैं। इसके पीछे बीमार हो रहे बुजुर्ग किसानों के लिए खून एकत्र करना है। ताकि कोई खून की कमी की वजह से दम न तोड़े। इसके अलावा शुक्रवार सुबह पंजाब के लुधियाना से अड़तालीस देशी हकीमों की एक टीम यहां पहुंची। देशी हकीम पहाड़ी जड़ी बूटी से कमर दर्द व सिर दर्द व जकड़न का इलाज कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि पंजाब में देशी हकीमों से इलाज कराया जाता है। पहले दिन एक सौ पच्चीस यूनिट रक्तदान एकत्र हुआ, महिलाओं ने कहा किसान भाइयों के लिए किया खून का दान रक्तदान शिविर लगाने वाली संस्था यूनाटेड सिख के सदस्य गुरजिंद्र सिंह ने बताया कि किसान संगठन अपने- अपने स्तर पर सेवा कर रहे हैं। किसानों का आंदोलन अब चरम पर पहुंच गया है। सरकार के साथ- साथ किसानों के अब ठंड से लड़ना पड़ रहा है। रोजाना बुजुर्ग किसान बीमार हो रहे हैं। इसी वजह से यूनाटेड सिख संगठन ने यहां रक्तदान शिविर लगाया है। शिविर में युवा किसान, महिलाएं बढ़ चढ़कर रक्तदान कर रही हैं। पहले दिन उनकी टीम ने यहां एक सौ पच्चीस यूनिट रक्तदान एकत्रित किया है। रक्तदान प्रीतमपूरा ब्लड सेंटर की टीम कर रही है। महिला रक्तदाता प्रीतमकौर ने कहा कि उनका खून से किसी किसान भाई की जान बच जाए तो उनका आंदोलन में रक्तदान करना सार्थक हो जाएगा। पंजाब की खिलाड़ी परनीत कौर ने कहा कि उनकी कबड्डी टीम की लड़कियों ने भी रक्तदान किया है। खून का एक- एक कतरा किसान भाइयों के लिए है। उनके पिता, भाई यहां ठंड में आंदोलन कर रहे हैं। वे उनकी जिस तरीके से सेवा कर पाएंगी, हर हालत में करेंगी। सरकार के साथ इस लड़ाई में महिलाएं हर क्षेत्र में अपने भाइयों के साथ खड़ी हैं। This website follows the DNPA Code of Ethics.
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश(Click to expand)
21 चान हैं और हमारा पान मात्र उड़ें प्रकाशित करता है। यह मत अ्रचलित वाल्तववाद का है जो यह मानता है कि वस्तु का जँसा ज्ञान हमे होता है, मघायत वस्तु वैसी ही है। इस प्रकार के प्रतिबद्ध वास्तववादी दशन में भ्रम का वाई स्थान नही रह जाता, फलत आ्रामाकर भ्रम की व्याख्या ख्यातिवाद से करते हुए भ्रम वो भी यथाथ कहते हैं।?० प्रामाकर के अनुसार अनधिग्रतत्व के लक्षण के कारण प्रमा की परिभाषा में अव्याप्ति दोष हो जाता है। वे असदिग्धता के उल्लेख को भी अवाबश्यक बहते हैं और उनके अनुसार यथायत्व को स्वीकार १रने से ख्यातिवाद का खण्डन होता है। भत प्रामाकरो ने प्रमा को मात्र अनुभूति के द्वारा परिभाषित किया है। उसके अनुसार स्मति इस दष्टि से देध ज्ञान नही है क्योजि स्मृति मे जो ज्ञान उत्पन होता है वह किसी साक्षातत चस्तु के द्वारा नही होता है बरन् पूव सस्कार के कारण होता है।7/ इस प्रकार प्रामाकर मीमांसको वे अनुसार देध ज्ञान अनुमूति है। यहा अनुभूति का अथ मात्र दतद्धियाय सानिकप जय ज्ञान नही है। यहा 'अनुमूति" का प्रयोग व्यापक है। वे अनुमान, उपमानादि जय ज्ञान को भी अनुमूति कहते हैं। परतु वंध शञान को मात्र अनुभूति से परिभाषित करने मे मीमासको के समक्ष कठिनाई है। उनसे यहू प्रश्न दिया जा सकता है कि अनुमूति वे' अ-तगत वे मात्र साभात अनुमूति को रखते हैं या असाक्षात अनुमूति को भी रखते हैं ? विश्चय ही जब प्रामाकर अनुपानादि को प्रमाण की श्रेणी मे रखते हैं तो वे अक्षाक्षात अनुभूति को भी श्रमा मानते हैं। परातु असालात अनुभूति की प्रमा मान लेने से स्मति को भी वैध ज्ञान मानना पडेगा । अयोकि स्मति में अनुमूति ता हमे होती हो है, अंतर इतना है कि साक्षात प्रत्यक्ष में अनु- भूति साक्षात वस्तु की होती है? और स्मृति मं अनुमूति वस्तु के सस्कार की होती है। वस्तु का सस््कार भी वस्तु द्वारा ही उत्पन होता है, अत स्मृति भी अताक्षात प्रत्यक्ष की श्रेणी म भा जाती है। ऐसी स्थिति मे प्रमा की श्रेणी से उत्तका बहिष्कार उचित नही प्रतीत हाता है। अगर असाक्षात अनुमूति को प्रामाकर अनुमूति की श्रेणी से हटाते हैं. तो अनु- मान की प्रमाण कहना उचित नही होगा। क्योकि अनुमान व्याप्ति पर आधारित होता है ओर व्याप्ति असाक्षात अनुभूति पर आधारित होता है 7 नादक्शोर दर्मा ने पायमारथी द्वारा की गई इस आलोचना को निराधार कहा है।४ उनके अनुसार स्मृति की उपस्थिति मात्र से कोई अनुभूति अभ्रमा नहीं होती। मे छत है गिगति उपस्थित मात्र रहती है कि तु इत अवस्थाओ मे इंद्य वस्तु से सम्पक 1 इस मत के परीक्षण वे लिए अनुमान और व्याप्ति का विश्लेषण करता पडेगा। एक उदाहरण लें--पवत पर घूमज्र दखकर अग्नि का अनुमान करते हैं। इसमे कितनी बातें हैं ? (क) पवत पर धूजम्र का प्रत्यक्ष--अर्थात् झीद्रय से वस्तु का सम्पक, (ख) व्याप्ति--जहा जहा घुआ है वहा-वहा आग है, और (य) इस आधार पर अनुमान--- परत पर अग्नि है अर्थात् अग्नि से ईर््रिय के साक्षात सम्पक के अभाव मे ही निणय । अब इस आपत्ति के विरुद्ध आपत्ति का अवसर यही से प्रारम्भ होता है । (क)
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लेखक : पुस्तक का साइज़ : कुल पृष्ठ : श्रेणी : लेखक के बारे में अधिक जानकारी : पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश इक्कीस चान हैं और हमारा पान मात्र उड़ें प्रकाशित करता है। यह मत अ्रचलित वाल्तववाद का है जो यह मानता है कि वस्तु का जँसा ज्ञान हमे होता है, मघायत वस्तु वैसी ही है। इस प्रकार के प्रतिबद्ध वास्तववादी दशन में भ्रम का वाई स्थान नही रह जाता, फलत आ्रामाकर भ्रम की व्याख्या ख्यातिवाद से करते हुए भ्रम वो भी यथाथ कहते हैं।?शून्य प्रामाकर के अनुसार अनधिग्रतत्व के लक्षण के कारण प्रमा की परिभाषा में अव्याप्ति दोष हो जाता है। वे असदिग्धता के उल्लेख को भी अवाबश्यक बहते हैं और उनके अनुसार यथायत्व को स्वीकार एकरने से ख्यातिवाद का खण्डन होता है। भत प्रामाकरो ने प्रमा को मात्र अनुभूति के द्वारा परिभाषित किया है। उसके अनुसार स्मति इस दष्टि से देध ज्ञान नही है क्योजि स्मृति मे जो ज्ञान उत्पन होता है वह किसी साक्षातत चस्तु के द्वारा नही होता है बरन् पूव सस्कार के कारण होता है।सात/ इस प्रकार प्रामाकर मीमांसको वे अनुसार देध ज्ञान अनुमूति है। यहा अनुभूति का अथ मात्र दतद्धियाय सानिकप जय ज्ञान नही है। यहा 'अनुमूति" का प्रयोग व्यापक है। वे अनुमान, उपमानादि जय ज्ञान को भी अनुमूति कहते हैं। परतु वंध शञान को मात्र अनुभूति से परिभाषित करने मे मीमासको के समक्ष कठिनाई है। उनसे यहू प्रश्न दिया जा सकता है कि अनुमूति वे' अ-तगत वे मात्र साभात अनुमूति को रखते हैं या असाक्षात अनुमूति को भी रखते हैं ? विश्चय ही जब प्रामाकर अनुपानादि को प्रमाण की श्रेणी मे रखते हैं तो वे अक्षाक्षात अनुभूति को भी श्रमा मानते हैं। परातु असालात अनुभूति की प्रमा मान लेने से स्मति को भी वैध ज्ञान मानना पडेगा । अयोकि स्मति में अनुमूति ता हमे होती हो है, अंतर इतना है कि साक्षात प्रत्यक्ष में अनु- भूति साक्षात वस्तु की होती है? और स्मृति मं अनुमूति वस्तु के सस्कार की होती है। वस्तु का सस््कार भी वस्तु द्वारा ही उत्पन होता है, अत स्मृति भी अताक्षात प्रत्यक्ष की श्रेणी म भा जाती है। ऐसी स्थिति मे प्रमा की श्रेणी से उत्तका बहिष्कार उचित नही प्रतीत हाता है। अगर असाक्षात अनुमूति को प्रामाकर अनुमूति की श्रेणी से हटाते हैं. तो अनु- मान की प्रमाण कहना उचित नही होगा। क्योकि अनुमान व्याप्ति पर आधारित होता है ओर व्याप्ति असाक्षात अनुभूति पर आधारित होता है सात नादक्शोर दर्मा ने पायमारथी द्वारा की गई इस आलोचना को निराधार कहा है।चार उनके अनुसार स्मृति की उपस्थिति मात्र से कोई अनुभूति अभ्रमा नहीं होती। मे छत है गिगति उपस्थित मात्र रहती है कि तु इत अवस्थाओ मे इंद्य वस्तु से सम्पक एक इस मत के परीक्षण वे लिए अनुमान और व्याप्ति का विश्लेषण करता पडेगा। एक उदाहरण लें--पवत पर घूमज्र दखकर अग्नि का अनुमान करते हैं। इसमे कितनी बातें हैं ? पवत पर धूजम्र का प्रत्यक्ष--अर्थात् झीद्रय से वस्तु का सम्पक, व्याप्ति--जहा जहा घुआ है वहा-वहा आग है, और इस आधार पर अनुमान--- परत पर अग्नि है अर्थात् अग्नि से ईर््रिय के साक्षात सम्पक के अभाव मे ही निणय । अब इस आपत्ति के विरुद्ध आपत्ति का अवसर यही से प्रारम्भ होता है ।
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जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्म कालीन राजधानी श्रीनगर के छानापोरा इलाके में तैनात सुरक्षाबलों को निशाना बनाकर आतंकियों ने ग्रेनेड हमला किया है. इस हमले में एक जवान घायल हो गया है. जिसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उधर, हमलावरों की तलाश में इलाके की घेराबंदी कर अभियान शुरू किया गया है.
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जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्म कालीन राजधानी श्रीनगर के छानापोरा इलाके में तैनात सुरक्षाबलों को निशाना बनाकर आतंकियों ने ग्रेनेड हमला किया है. इस हमले में एक जवान घायल हो गया है. जिसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उधर, हमलावरों की तलाश में इलाके की घेराबंदी कर अभियान शुरू किया गया है.
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नई दिल्ली। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चार मैचों की बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी खेली जा रही है। इस सीरीज के में टीम इंडिया 2-1 से बढ़त बनाई हुई है। वहीं श्रृंखला का चौथा और महत्वपूर्ण मुकाबला अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम में खेला जा रहा है। अब इसी बीच भारतीय टीम के लिए एक बुरी खबर सामने आ रही है।
भारतीय टीम के स्टार बल्लेबाज श्रेयस अय्यर चोटिल हो गए हैं। दरअसल मैच के तीसर दिन इन्होंने अपनी पीठ के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत की थी। फिलहाल भारत की मेडिकल टीम उनपर नजर बनाए हुए हैं। गौरतलब है कि तीसरे टेस्ट में भारत की पहली पारी में वो अभी तक बल्लेबाजी के लिए नहीं आए हैं।
बता दें कि सीरीज का शुरुआती तीन मुकाबला खेला जा चुका है, जिसमें भारत 2 मैच जीत कर 2-1 की बढ़त बनाए हुआ है। अब श्रृंखला का चौथा और आखिरी मुकाबला अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम में खेला जा रहा है। मुकाबले के तीसरे दिन भारतीय टीम अपने पहले बल्लेबाजी पारी में 289 रनों से आगे खेलना शुरु करेगी।
बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी के चौथे टेस्ट मैच में टीम इंडिया के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली ने नाबाद 59 रनों की पारी खेली है। इस पारी के साथ ही उन्होंने भारतीय सरजमीं पर 4000 रन पूरे कर लिए हैं। बता दें कि विराट कोहली भारतीय सरजमीं पर 4000 रन पूरे करने वाले भारत के कुल पाचंवे बल्लेबाज बन गए हैं। उनसे पहले ये उपलब्धि सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीरेंद्र सहवाग ऐसा कर चुके हैं।
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नई दिल्ली। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चार मैचों की बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी खेली जा रही है। इस सीरीज के में टीम इंडिया दो-एक से बढ़त बनाई हुई है। वहीं श्रृंखला का चौथा और महत्वपूर्ण मुकाबला अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम में खेला जा रहा है। अब इसी बीच भारतीय टीम के लिए एक बुरी खबर सामने आ रही है। भारतीय टीम के स्टार बल्लेबाज श्रेयस अय्यर चोटिल हो गए हैं। दरअसल मैच के तीसर दिन इन्होंने अपनी पीठ के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत की थी। फिलहाल भारत की मेडिकल टीम उनपर नजर बनाए हुए हैं। गौरतलब है कि तीसरे टेस्ट में भारत की पहली पारी में वो अभी तक बल्लेबाजी के लिए नहीं आए हैं। बता दें कि सीरीज का शुरुआती तीन मुकाबला खेला जा चुका है, जिसमें भारत दो मैच जीत कर दो-एक की बढ़त बनाए हुआ है। अब श्रृंखला का चौथा और आखिरी मुकाबला अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम में खेला जा रहा है। मुकाबले के तीसरे दिन भारतीय टीम अपने पहले बल्लेबाजी पारी में दो सौ नवासी रनों से आगे खेलना शुरु करेगी। बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी के चौथे टेस्ट मैच में टीम इंडिया के स्टार बल्लेबाज विराट कोहली ने नाबाद उनसठ रनों की पारी खेली है। इस पारी के साथ ही उन्होंने भारतीय सरजमीं पर चार हज़ार रन पूरे कर लिए हैं। बता दें कि विराट कोहली भारतीय सरजमीं पर चार हज़ार रन पूरे करने वाले भारत के कुल पाचंवे बल्लेबाज बन गए हैं। उनसे पहले ये उपलब्धि सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीरेंद्र सहवाग ऐसा कर चुके हैं।
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(महिमा और लक्ष्मण वीर को सवालिया नजरो से देखते हैं )
(और इतना कहकर दोनो ठहाका मार कर हंसने लगते हैं, महिमा शर्मा जाती है)
(और फिर तीनो हंसने लगते हैं और पुरानी यादों मे खो जाते हैं)
लक्ष्मणः- अरे वीर उस लडकी को पहले कहीं तो देखा है, कया तुमने कहीं देखा है?
(और मुह ढक के अपनी सीट पे लेट जाता है)
लक्ष्मण सोचने लगता है, कि जो लडकी इतने समय से शांत बैठी थी, एक दम से अलादीन के जिन्न की तरह सामने आके बैठ गई, आखिर कौन है ये लडकी, फिर उसे अपने टीम की आरूहि याद आती है, बो भी हमेशा बोलती ही रहती थी, चेहरा भी ठीक बैसा ही है, लेकिन बो नहीं हो सकती, उसने तो आत्महत्या कर ली थी, बो तो मर चुकी है..
(लक्ष्मण भूतो की फिल्मे ज्यादा देखता था तो बो सोचने लगता है कि कहीं ये भी भूतनी..........)
लेकिन लक्ष्मण किसी जड की तरह खडा रहता है, तभी महिमा को अपनी छोटी बहन आरूहि की बताई बात याद आती है, कि जब किसी को कौलेज मे मदद की जरूरत होती थी, तो जोर से आवाज लगाता था 'रुद्रा', और रुद्रा टीम का कोई भी व्यक्ति आके मदद जरूर करता था, यही सोचकर, कि अगर ये या फिर कोई और उस कौलेज का, और रुद्रा टीम का कोई व्यक्ति हो, तो शायद उसकी मदद कर सके, महिमा जोर से चिल्लाके कहती है 'रुद्रा', वो इतनी जोर से चिल्लाती है, कि बोगी के सारे लोगो को आवाज सुनाई देती है, तभी वीर हडबडा के उठ बैठता है, उसे ऐसा लगता है जैसे कोई उसके कान पे आके चिल्लाया हो, और सोचने लगता है, कि ये तो उसकी टीम का नाम था, और जब किसी को मदद की जरूरत होने पर ही ये नाम पुकारा जाता था, लेकिन यहाँ कौन हो सकता है ???
तभी बो देखता है उन लोगो को, और उठ के खडा हो जाता है, और लडकी को देखता है, तो उसे आरूहि याद आ जाती है, वही चहरा वही आवाज, लेकिन तभी पीछे से आने बाली आवाज से उसका ध्यान उस ओर जाता है, वीर उन लोगो को नहीं जांनता, क्योंकी ये लोग टीम के नही थे, शायद साथ मे पडने बाले थे, आते ही जोर से किसी को मदद चाहिए ???
वीरः- सभी को धन्यवाद वोलता है।
और पुलिस बाले वापस आकर उंनसे पूंछ्ते हैं, तो दोनो चुप ही रहते हैं, पुलिस बाले उन दोनो को रेल्वे पुलिस थाने मे ले आते है, और एक पंडित को बुलाकर दोनो की शादी करवा देते हैं, वीर और उन लड्को को जब पता चलता है, कि दोनो को पुलिस थाने मे ले गई है, तो वो लोग भागते हुए वहाँ पर जाते हैं, तो देखते हैं, कि दोनो कि शादी थाने मे ही हो रही है, तो चुप चाप खडे होकर देखते हैं, उसके बाद पुलिस बाले उन लोगो को उसी ट्रेन से बापस घर भेज देते हैं।
(और तीनो ही बहुत जोर जोर से हंसते हैं)
महिमाः- वीर तुम्हारी शादी के लिए लड्की मैं देखुंगी।
वीरः- मुझे किसी चुडैल से शादी नहीं करनी।
(दोस्तो आपको हमारी कहाँनी कैसी लगी हमें अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें हम कोशिस करेंगे की आपके लिए और भी अच्छी कहाँनी लेकर आऐ)
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लक्ष्मणः- अरे वीर उस लडकी को पहले कहीं तो देखा है, कया तुमने कहीं देखा है? लक्ष्मण सोचने लगता है, कि जो लडकी इतने समय से शांत बैठी थी, एक दम से अलादीन के जिन्न की तरह सामने आके बैठ गई, आखिर कौन है ये लडकी, फिर उसे अपने टीम की आरूहि याद आती है, बो भी हमेशा बोलती ही रहती थी, चेहरा भी ठीक बैसा ही है, लेकिन बो नहीं हो सकती, उसने तो आत्महत्या कर ली थी, बो तो मर चुकी है.. लेकिन लक्ष्मण किसी जड की तरह खडा रहता है, तभी महिमा को अपनी छोटी बहन आरूहि की बताई बात याद आती है, कि जब किसी को कौलेज मे मदद की जरूरत होती थी, तो जोर से आवाज लगाता था 'रुद्रा', और रुद्रा टीम का कोई भी व्यक्ति आके मदद जरूर करता था, यही सोचकर, कि अगर ये या फिर कोई और उस कौलेज का, और रुद्रा टीम का कोई व्यक्ति हो, तो शायद उसकी मदद कर सके, महिमा जोर से चिल्लाके कहती है 'रुद्रा', वो इतनी जोर से चिल्लाती है, कि बोगी के सारे लोगो को आवाज सुनाई देती है, तभी वीर हडबडा के उठ बैठता है, उसे ऐसा लगता है जैसे कोई उसके कान पे आके चिल्लाया हो, और सोचने लगता है, कि ये तो उसकी टीम का नाम था, और जब किसी को मदद की जरूरत होने पर ही ये नाम पुकारा जाता था, लेकिन यहाँ कौन हो सकता है ??? तभी बो देखता है उन लोगो को, और उठ के खडा हो जाता है, और लडकी को देखता है, तो उसे आरूहि याद आ जाती है, वही चहरा वही आवाज, लेकिन तभी पीछे से आने बाली आवाज से उसका ध्यान उस ओर जाता है, वीर उन लोगो को नहीं जांनता, क्योंकी ये लोग टीम के नही थे, शायद साथ मे पडने बाले थे, आते ही जोर से किसी को मदद चाहिए ??? वीरः- सभी को धन्यवाद वोलता है। और पुलिस बाले वापस आकर उंनसे पूंछ्ते हैं, तो दोनो चुप ही रहते हैं, पुलिस बाले उन दोनो को रेल्वे पुलिस थाने मे ले आते है, और एक पंडित को बुलाकर दोनो की शादी करवा देते हैं, वीर और उन लड्को को जब पता चलता है, कि दोनो को पुलिस थाने मे ले गई है, तो वो लोग भागते हुए वहाँ पर जाते हैं, तो देखते हैं, कि दोनो कि शादी थाने मे ही हो रही है, तो चुप चाप खडे होकर देखते हैं, उसके बाद पुलिस बाले उन लोगो को उसी ट्रेन से बापस घर भेज देते हैं। महिमाः- वीर तुम्हारी शादी के लिए लड्की मैं देखुंगी। वीरः- मुझे किसी चुडैल से शादी नहीं करनी।
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जीवन मे प्रत्येक व्यक्ति विशेषकर के प्रत्येक महान् व्यक्ति नित्यप्रति अपने परिचित और अपरिचित मित्रो, सम्वन्धियो और उपासको के अनेक पत्र प्राप्त करता है। उनमें से बहुत से पत्रो का वह उत्तर भी देता है। अपने उत्तर के बीच मे वह पत्र लेखको के द्वारा उठायी गयी समस्याओं के सुलझाव आदि पर भो अपने विचार प्रकट करता है। कभी-कभी वह पथो के उत्तरो मे अपने अनुभवो, विचारो और दृष्टिकोणो को भी निस्सकोच भाव से व्यक्त कर देता है । इसके अतिरिक्त व्यक्ति का अपना अन्तरग जीवन भी रहता है । महान् व्यक्ति भी इसका अपवाद नहीं होते। मानव शरीर धारण करके वे भी भनेक दुर्बलताओ का शिकार बनते हैं । वे दुर्वलताएं प्राय श्रद्धातिरेक के कारण उपेक्षा अथवा विस्मरण के गर्त मे लुप्त हो जाती है। किन्तु उसके साहित्य को उन दुर्बलताओं को समझे बिना सरलता से नहीं समझा जा सकता । प्रत्येक मनुष्य की प्रात्मगत दुर्बलताएं यदि कही अधिक से अधिक निस्सकोच भाव से अभिव्यक्त मिलती हैं, तो वह मित्रो, स्नेहियो और घनिष्ठ परिचितो को लिखे गए पत्रों में ही मिलती हैं। प्रतएव अनुसन्धान कर्ताओ को इन पत्रो को प्रकाश में लाना चाहिए । और इस साहित्य को न्यायो साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिए । साहित्य क्षेत्र मे पत्रो का क्या महत्त्व है, इस पर पाश्चात्य विचारको ने भी बहुत कुछ लिखा है - इस सम्बन्ध मे डाक्टर जान्सन के शब्द उद्धरणीय है। उन्होने अपनी शिप्या मिसेज धूल को एक चार लिखा था- पत्र पत्र लेखक के हृदय का दर्पण होते हैं। उसके हृदय मे जो कुछ भो होता है वह अपने वास्तविक रूप में पयो मे स्पष्ट रूप से प्रतिविम्वित हो जाता है । इसी प्रकार रिचार्डसन ने भी लिखा था कि पत्र पत्र लेखक के जीवन का प्रध्ययन करने में एक मात्र प्रामाणिक प्राधार होते है । खेद है कि जिन साहित्य का इतना अधिक महत्त्व है, उस नाहित्य के प्रति हमारे हिन्दी के विद्वान् प्रत्यधिक उदासीन है। इस दिशा में हिन्दी में जो कुछ प्रयास किया गया है वह एक प्रकार से नहीं के बराबर है। इस क्षेत्र में केवल दो- एक प्रधान हो उन्नेसनीय हैं। इनमे वैजनाथसिंह विनोद का प्रयास अग्रगण्य है । इन्होने द्विवेदी नाम से द्विवेदीजी के कुछ पत्रों का संग्रह प्रकाशित किया है। इसके अतिरिक्त हरिशकर दार्मा द्वारा सम्पादित पर शर्मा के पत्र भी है। इन दिशा मे अनुसन्धान को बडी भाव है। अनुसनकर्ताश्री को चाहिए कि वे एक-एक बाल को लेकर उन कान के लेपको केपीको योज करके उनका सम्पादन और प्रकाशन के रचनात्मक साहित्य के प्रध्ययन में बटी महायजा मिलेगी ।
पद्यात्मक शैली में लिखा हुआा काल्पनिक पत्र - साहित्य - पत्र - साहित्य का यह एक दूसरा पक्ष है । सफल कलाकार कल्पित पत्रो की सर्जना करके सरस साहित्य की श्रीवृद्धि कर सकते हैं । भारतेन्दुकालीन लेखक वालमुकुन्द गुप्त ने 'शिवशम्भू का चिट्ठा' तथा विशम्भर शर्मा ने 'कौशिक', 'दुवेजी की चिट्ठियाँ', जवाहरलाल नेहरू ने 'पिता के पत्र पुत्री के नाम आदि रचनाएँ लिखकर इस कोटि के साहित्य की श्रीवृद्धि की है । किन्तु यह प्रयास बहुत कम है । योग्य लेखको को इस दिशा में अवश्य प्रवृत्त होना चाहिए । इस साहित्य के लिए भाज के व्यस्त युग मे अच्छा अवकाश है ।
संलाप साहित्य
नरम साहित्य का एक स्वरूप सलापात्मक भी होता है । यह सलाप स्वतन्त्र रूप से लिखे जा सकते है । स्वतन्त्र सलापो मे वडी-वडी गूढ वातो का सरल से सरल ढंग से विश्लेपण किया जा सकता है। हमारे प्राचीन साहित्य में नलाप साहित्य के सृजन की अच्छी परम्परा थी। इस माहित्य का बीजारोपण हमे ऋग्वेद मे मिलता है। वहाँ पर यम यमी सवाद, पुरुरवा - उर्वशी सवाद आदि अनेक स्वतन्त्र सलाप उपलव्य होते हैं । वे वैदिक साहित्य की सरस निधि है । वैदिक काल के वाद नलाप साहित्य की परम्परा का पोषण हमे तन्त्र साहित्य मे मिलता है । श्रधिकतर तन्त्र ग्रन्थ, विशेष करके शैव शाक्त तन्त्र ग्रन्थो मे हमे शिव मौर पार्वती के सलापो के सहारे ही गूढ दार्शनिक विपयो का विश्लेषण मिलता है । यह सवाद परम्परा यदि साहित्य मे अपनायी गई होती तो एक सरस माहित्यिक विधा का स्वतन्त्र विकास हो सकता था । तन्न साहित्य के बाद सत्कृत साहित्य में भी यह परम्परा लुप्त हो गई ।
हिन्दी साहित्य मे स्वतन्त्र सलाप बहुत कम मिलते हैं । इस दिशा मे सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास श्री व्यौहार राजेन्द्रसिंह का है । इन्होने अपनी एक रचना 'सलाप' के नाम से प्रकाशित की है । इसमे १५ स्वतन्त्र नलाप दिए हुए है जिनमें रोचक घटनाओ, गम्भीर वातो का सरम और सरल शैली में भावपूर्ण ढंग से वर्णन किया गया है। इस दिशा में और भी लेखको को प्रवृत्त होना चाहिए और नाहित्य को इस विधा के विकान मे योग देना चाहिए ।
वार्षिकी साहित्य
अग्रेजी मे वापिकी साहित्य का अच्छा प्रचलन है । यद्यपि वार्षिकी नामक रचनाएँ शुद्ध साहित्य के अन्तर्गत नही प्राती । वे इतिहास के समीप अधिक हैं और इतिहास के कम । किन्तु सस्मरणात्मक साहित्य की वह श्रीवृद्धि करती है । हिन्दी लेखको ने इस योर बिलकुल ध्यान नहीं दिया है। यदि यह शुष्क ऐतिहासिक विघा सरस कलाप्रिय साहित्यिको के हाथ मे पड जाय तो हो सकता है कि यह एक स्वतन्त्र साहित्यिक विधा के रूप में पनप सके । हिन्दी में अभी तक इस दिशा मे सबसे अधिक उल्लेखनीय प्रयास डॉ० महादेवशाह का है। इन्होने सन् ५२ की वार्षिकी लिखी थी । इसमे ३५० विषयो का सकलन है ।
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जीवन मे प्रत्येक व्यक्ति विशेषकर के प्रत्येक महान् व्यक्ति नित्यप्रति अपने परिचित और अपरिचित मित्रो, सम्वन्धियो और उपासको के अनेक पत्र प्राप्त करता है। उनमें से बहुत से पत्रो का वह उत्तर भी देता है। अपने उत्तर के बीच मे वह पत्र लेखको के द्वारा उठायी गयी समस्याओं के सुलझाव आदि पर भो अपने विचार प्रकट करता है। कभी-कभी वह पथो के उत्तरो मे अपने अनुभवो, विचारो और दृष्टिकोणो को भी निस्सकोच भाव से व्यक्त कर देता है । इसके अतिरिक्त व्यक्ति का अपना अन्तरग जीवन भी रहता है । महान् व्यक्ति भी इसका अपवाद नहीं होते। मानव शरीर धारण करके वे भी भनेक दुर्बलताओ का शिकार बनते हैं । वे दुर्वलताएं प्राय श्रद्धातिरेक के कारण उपेक्षा अथवा विस्मरण के गर्त मे लुप्त हो जाती है। किन्तु उसके साहित्य को उन दुर्बलताओं को समझे बिना सरलता से नहीं समझा जा सकता । प्रत्येक मनुष्य की प्रात्मगत दुर्बलताएं यदि कही अधिक से अधिक निस्सकोच भाव से अभिव्यक्त मिलती हैं, तो वह मित्रो, स्नेहियो और घनिष्ठ परिचितो को लिखे गए पत्रों में ही मिलती हैं। प्रतएव अनुसन्धान कर्ताओ को इन पत्रो को प्रकाश में लाना चाहिए । और इस साहित्य को न्यायो साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिए । साहित्य क्षेत्र मे पत्रो का क्या महत्त्व है, इस पर पाश्चात्य विचारको ने भी बहुत कुछ लिखा है - इस सम्बन्ध मे डाक्टर जान्सन के शब्द उद्धरणीय है। उन्होने अपनी शिप्या मिसेज धूल को एक चार लिखा था- पत्र पत्र लेखक के हृदय का दर्पण होते हैं। उसके हृदय मे जो कुछ भो होता है वह अपने वास्तविक रूप में पयो मे स्पष्ट रूप से प्रतिविम्वित हो जाता है । इसी प्रकार रिचार्डसन ने भी लिखा था कि पत्र पत्र लेखक के जीवन का प्रध्ययन करने में एक मात्र प्रामाणिक प्राधार होते है । खेद है कि जिन साहित्य का इतना अधिक महत्त्व है, उस नाहित्य के प्रति हमारे हिन्दी के विद्वान् प्रत्यधिक उदासीन है। इस दिशा में हिन्दी में जो कुछ प्रयास किया गया है वह एक प्रकार से नहीं के बराबर है। इस क्षेत्र में केवल दो- एक प्रधान हो उन्नेसनीय हैं। इनमे वैजनाथसिंह विनोद का प्रयास अग्रगण्य है । इन्होने द्विवेदी नाम से द्विवेदीजी के कुछ पत्रों का संग्रह प्रकाशित किया है। इसके अतिरिक्त हरिशकर दार्मा द्वारा सम्पादित पर शर्मा के पत्र भी है। इन दिशा मे अनुसन्धान को बडी भाव है। अनुसनकर्ताश्री को चाहिए कि वे एक-एक बाल को लेकर उन कान के लेपको केपीको योज करके उनका सम्पादन और प्रकाशन के रचनात्मक साहित्य के प्रध्ययन में बटी महायजा मिलेगी । पद्यात्मक शैली में लिखा हुआा काल्पनिक पत्र - साहित्य - पत्र - साहित्य का यह एक दूसरा पक्ष है । सफल कलाकार कल्पित पत्रो की सर्जना करके सरस साहित्य की श्रीवृद्धि कर सकते हैं । भारतेन्दुकालीन लेखक वालमुकुन्द गुप्त ने 'शिवशम्भू का चिट्ठा' तथा विशम्भर शर्मा ने 'कौशिक', 'दुवेजी की चिट्ठियाँ', जवाहरलाल नेहरू ने 'पिता के पत्र पुत्री के नाम आदि रचनाएँ लिखकर इस कोटि के साहित्य की श्रीवृद्धि की है । किन्तु यह प्रयास बहुत कम है । योग्य लेखको को इस दिशा में अवश्य प्रवृत्त होना चाहिए । इस साहित्य के लिए भाज के व्यस्त युग मे अच्छा अवकाश है । संलाप साहित्य नरम साहित्य का एक स्वरूप सलापात्मक भी होता है । यह सलाप स्वतन्त्र रूप से लिखे जा सकते है । स्वतन्त्र सलापो मे वडी-वडी गूढ वातो का सरल से सरल ढंग से विश्लेपण किया जा सकता है। हमारे प्राचीन साहित्य में नलाप साहित्य के सृजन की अच्छी परम्परा थी। इस माहित्य का बीजारोपण हमे ऋग्वेद मे मिलता है। वहाँ पर यम यमी सवाद, पुरुरवा - उर्वशी सवाद आदि अनेक स्वतन्त्र सलाप उपलव्य होते हैं । वे वैदिक साहित्य की सरस निधि है । वैदिक काल के वाद नलाप साहित्य की परम्परा का पोषण हमे तन्त्र साहित्य मे मिलता है । श्रधिकतर तन्त्र ग्रन्थ, विशेष करके शैव शाक्त तन्त्र ग्रन्थो मे हमे शिव मौर पार्वती के सलापो के सहारे ही गूढ दार्शनिक विपयो का विश्लेषण मिलता है । यह सवाद परम्परा यदि साहित्य मे अपनायी गई होती तो एक सरस माहित्यिक विधा का स्वतन्त्र विकास हो सकता था । तन्न साहित्य के बाद सत्कृत साहित्य में भी यह परम्परा लुप्त हो गई । हिन्दी साहित्य मे स्वतन्त्र सलाप बहुत कम मिलते हैं । इस दिशा मे सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास श्री व्यौहार राजेन्द्रसिंह का है । इन्होने अपनी एक रचना 'सलाप' के नाम से प्रकाशित की है । इसमे पंद्रह स्वतन्त्र नलाप दिए हुए है जिनमें रोचक घटनाओ, गम्भीर वातो का सरम और सरल शैली में भावपूर्ण ढंग से वर्णन किया गया है। इस दिशा में और भी लेखको को प्रवृत्त होना चाहिए और नाहित्य को इस विधा के विकान मे योग देना चाहिए । वार्षिकी साहित्य अग्रेजी मे वापिकी साहित्य का अच्छा प्रचलन है । यद्यपि वार्षिकी नामक रचनाएँ शुद्ध साहित्य के अन्तर्गत नही प्राती । वे इतिहास के समीप अधिक हैं और इतिहास के कम । किन्तु सस्मरणात्मक साहित्य की वह श्रीवृद्धि करती है । हिन्दी लेखको ने इस योर बिलकुल ध्यान नहीं दिया है। यदि यह शुष्क ऐतिहासिक विघा सरस कलाप्रिय साहित्यिको के हाथ मे पड जाय तो हो सकता है कि यह एक स्वतन्त्र साहित्यिक विधा के रूप में पनप सके । हिन्दी में अभी तक इस दिशा मे सबसे अधिक उल्लेखनीय प्रयास डॉशून्य महादेवशाह का है। इन्होने सन् बावन की वार्षिकी लिखी थी । इसमे तीन सौ पचास विषयो का सकलन है ।
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लोकगीत जगदम्बा राणी बन रहा है लाखों दर्शकों की पसंद, आप भी देखें।
राधा प्यारी भजन बना दर्शकों की पंसद,वीडियो की जमकर हो रही है तारीफ।
Munmun Dutta के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज,पढ़ें रिपोर्ट।
अब का छोरा गीत रिलीज होते ही बन रहा श्रोताओं का पसंद,आप भी सुनें।
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लोकगीत जगदम्बा राणी बन रहा है लाखों दर्शकों की पसंद, आप भी देखें। राधा प्यारी भजन बना दर्शकों की पंसद,वीडियो की जमकर हो रही है तारीफ। Munmun Dutta के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज,पढ़ें रिपोर्ट। अब का छोरा गीत रिलीज होते ही बन रहा श्रोताओं का पसंद,आप भी सुनें।
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दिल्ली से कानपुर के बीच नए ट्रैक पर अगले महीने से ट्रेनें दौड़ना शुरू होंगी.
नई दिल्ली. भारतीय रेलवे (Indian Railways) कोरोना वायरस के कारण लगाए गए लॉकडाउन में लगातार बढ़ाई जा रही ढील के बाद भी अभी सीमित ट्रेनें (Limited Trains) ही चला रहा है. रेलवे जरूरत के मुताबिक नई स्पेशल ट्रेनें (Special Trains) शुरू कर रहा है ताकि यात्रियों की मांग भी पूरी की जा सके और बेवजह की परिचालन लागत (Operation Cost) से भी बचा जा सके. इस दौरान ट्रैक पर कम ट्रेनें दौड़ने का फायदा उठाते हुए रेलवे ने लंबे समय से अधर में लटकी कई परियोजनाएं (Pending Projects) पूरी कर ली हैं. इसी कड़ी में पूरे किए गए दिल्ली से कानपुर (Delhi-Kanpur) के बीच नए ट्रैक पर अगले महीने से ट्रेनें दौड़नी शुरू हो जाएंगी. वहीं, इससे पुराने ट्रैक पर ट्रेनों की रफ्तार भी बढ़ जाएगी.
इंडियन रेलवे के मुताबिक, दिल्ली से कानपुर के बीच तैयार किया गया नया डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) अगले महीने से शुरू हो जाएगा यानी अब गुड्स ट्रेनें इस नए ट्रैक पर रफ्तार भरेंगी. इससे दिल्ली से बिहार के पटना और पश्चिम बंगाल के हावड़ा पहुंचने में किसी भी मालगाड़ी को अब से 2 घंटे कम लगेंगे. यही नहीं, मौजूदा ट्रैक से मालगाड़ी के हटने के कारण यात्री ट्रेनों की रफ्तार में भी इजाफा होगा. साथ ही रेलवे नई ट्रेनें भी चला सकेगा. माना जा रहा है कि नए डीएफसी के शुरू होने के बाद रेलवे की आमदनी में बड़ा मुनाफा होगा. वहीं, पैसेंजर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने के कारण सफर में कम समय लगने से यात्रियों को भी फायदा होगा. रेलवे के मुताबिक, अगले महीने कानपुर से खुर्जा के बीच डीएफसी पर गुड्स ट्रेनें शुरू हो जाएंगी.
ये भी पढ़ें- सिक्योरिटी देकर लिया गया लोन क्या है? क्या आपको ये Loan लेना चाहिए या नहीं?
रेलवे ने बताया कि डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का 350 किमी सेक्शन दिसंबर 2020 में शुरू होने वाला है. यह कानपुर के पास भावपुर से खुर्जा के बीच का सेक्शन है. यह सेक्शन डीएफसीसी के ईस्टर्न कॉरिडोर पर मौजूद है. इस सेक्शन पर फिलहाल 40 मालगाड़ियां और 40 पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं यानी 80-80 ट्रेनों का लोड अप व डाउन दोनों लाइनों पर है. इस सेक्शन के शुरू होते ही मालगाड़ियों को पुरानी लाइन से हटाकर नए ट्रैक पर शिफ्ट कर दिया जाएगा. इस तरह से रेलवे की पुरानी लाइन पर ट्रैफिक का लोड कम हो जाएगा और ट्रेनें भी समय पर चलना शुरू हो जाएंगी. साथ ही उनकी स्पीड बढ़ाना आसान हो जाएगा. यह दोनों कॉरिडोर साल 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा.
डीएफसीसी को भारतीय रेल में बदलाव के लिहाज से बहुत बड़ा काम माना जाता है. रेलवे फिलहाल मालगाड़ियों के लिए डेडिकेटेड दो कॉरिडार का निर्माण कर रहा है. इसका ईस्टर्न कॉरिडोर लुधियाना से कोलकाता के पास दानकुनी तक 1856 किमी लंबा है. वेस्टर्न कॉरिडोर दिल्ली के पास दादरी से मुंबई के जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट तक जाता है. यह कॉरिडोर 1506 किमी लंबा है. नया डीएफसी न केवल माल यातायात को रफ्तार देगा बल्कि मुसाफिरों को भी राहत मिलने वाली है. भारत में माल यातायात के लिए कुल 6 गलियारे बनने हैं. डीएफसी का इस्टर्न कॉरिडोर पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब को जोड़ेगा. वहीं, वेस्टर्न कॉरिडोर से पूरे एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र को फायदा मिलेगा.
यह भी पढ़ेंः RCEP: क्या है दुनिया के इस सबसे बड़े व्यापार समझौते का मतलब, किसे मिलेगा फायदा?
डीएफसी ट्रैक पर फिलहाल 100 किमी की अधिकतम रफ्तार से मालगाड़ियां दौड़ सकेंगीं. इसकी औसत रफ्तार 70 किमी प्रति घंटा होगी. मौजूदा समय में यह महज 26 किमी प्रति घंटे की औसत रफ्तार से चल पाती हैं. अभी दिल्ली से कोलकाता या मुंबई जाने में 2-3 दिन लग जाता है, जबकि डीएफसी पर 24 घंटे में यह दूरी तय कर ली जाएगी. ईस्टर्न कॉरिडोर के लिए वर्ल्ड बैंक मदद कर रहा है, वहीं वेस्टर्न कॉरिडोर के लिए जापान ने कर्ज दिया है. दोनो कॉरिडोर करीब 90 हजार करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए जा रहे हैं. डीएफसी से न केवल माल यातायात और मुसाफिरों को फायदा होगा बल्कि एक मालगाड़ी के चलने पर सड़क से 1300 ट्रक का लोड कम होगा. इससे हर साल 560 मिलियन टन कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन कम होगा.
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दिल्ली से कानपुर के बीच नए ट्रैक पर अगले महीने से ट्रेनें दौड़ना शुरू होंगी. नई दिल्ली. भारतीय रेलवे कोरोना वायरस के कारण लगाए गए लॉकडाउन में लगातार बढ़ाई जा रही ढील के बाद भी अभी सीमित ट्रेनें ही चला रहा है. रेलवे जरूरत के मुताबिक नई स्पेशल ट्रेनें शुरू कर रहा है ताकि यात्रियों की मांग भी पूरी की जा सके और बेवजह की परिचालन लागत से भी बचा जा सके. इस दौरान ट्रैक पर कम ट्रेनें दौड़ने का फायदा उठाते हुए रेलवे ने लंबे समय से अधर में लटकी कई परियोजनाएं पूरी कर ली हैं. इसी कड़ी में पूरे किए गए दिल्ली से कानपुर के बीच नए ट्रैक पर अगले महीने से ट्रेनें दौड़नी शुरू हो जाएंगी. वहीं, इससे पुराने ट्रैक पर ट्रेनों की रफ्तार भी बढ़ जाएगी. इंडियन रेलवे के मुताबिक, दिल्ली से कानपुर के बीच तैयार किया गया नया डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर अगले महीने से शुरू हो जाएगा यानी अब गुड्स ट्रेनें इस नए ट्रैक पर रफ्तार भरेंगी. इससे दिल्ली से बिहार के पटना और पश्चिम बंगाल के हावड़ा पहुंचने में किसी भी मालगाड़ी को अब से दो घंटाटे कम लगेंगे. यही नहीं, मौजूदा ट्रैक से मालगाड़ी के हटने के कारण यात्री ट्रेनों की रफ्तार में भी इजाफा होगा. साथ ही रेलवे नई ट्रेनें भी चला सकेगा. माना जा रहा है कि नए डीएफसी के शुरू होने के बाद रेलवे की आमदनी में बड़ा मुनाफा होगा. वहीं, पैसेंजर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने के कारण सफर में कम समय लगने से यात्रियों को भी फायदा होगा. रेलवे के मुताबिक, अगले महीने कानपुर से खुर्जा के बीच डीएफसी पर गुड्स ट्रेनें शुरू हो जाएंगी. ये भी पढ़ें- सिक्योरिटी देकर लिया गया लोन क्या है? क्या आपको ये Loan लेना चाहिए या नहीं? रेलवे ने बताया कि डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का तीन सौ पचास किमी सेक्शन दिसंबर दो हज़ार बीस में शुरू होने वाला है. यह कानपुर के पास भावपुर से खुर्जा के बीच का सेक्शन है. यह सेक्शन डीएफसीसी के ईस्टर्न कॉरिडोर पर मौजूद है. इस सेक्शन पर फिलहाल चालीस मालगाड़ियां और चालीस पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं यानी अस्सी-अस्सी ट्रेनों का लोड अप व डाउन दोनों लाइनों पर है. इस सेक्शन के शुरू होते ही मालगाड़ियों को पुरानी लाइन से हटाकर नए ट्रैक पर शिफ्ट कर दिया जाएगा. इस तरह से रेलवे की पुरानी लाइन पर ट्रैफिक का लोड कम हो जाएगा और ट्रेनें भी समय पर चलना शुरू हो जाएंगी. साथ ही उनकी स्पीड बढ़ाना आसान हो जाएगा. यह दोनों कॉरिडोर साल दो हज़ार बाईस तक पूरा कर लिया जाएगा. डीएफसीसी को भारतीय रेल में बदलाव के लिहाज से बहुत बड़ा काम माना जाता है. रेलवे फिलहाल मालगाड़ियों के लिए डेडिकेटेड दो कॉरिडार का निर्माण कर रहा है. इसका ईस्टर्न कॉरिडोर लुधियाना से कोलकाता के पास दानकुनी तक एक हज़ार आठ सौ छप्पन किमी लंबा है. वेस्टर्न कॉरिडोर दिल्ली के पास दादरी से मुंबई के जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट तक जाता है. यह कॉरिडोर एक हज़ार पाँच सौ छः किमी लंबा है. नया डीएफसी न केवल माल यातायात को रफ्तार देगा बल्कि मुसाफिरों को भी राहत मिलने वाली है. भारत में माल यातायात के लिए कुल छः गलियारे बनने हैं. डीएफसी का इस्टर्न कॉरिडोर पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब को जोड़ेगा. वहीं, वेस्टर्न कॉरिडोर से पूरे एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र को फायदा मिलेगा. यह भी पढ़ेंः RCEP: क्या है दुनिया के इस सबसे बड़े व्यापार समझौते का मतलब, किसे मिलेगा फायदा? डीएफसी ट्रैक पर फिलहाल एक सौ किमी की अधिकतम रफ्तार से मालगाड़ियां दौड़ सकेंगीं. इसकी औसत रफ्तार सत्तर किमी प्रति घंटा होगी. मौजूदा समय में यह महज छब्बीस किमी प्रति घंटे की औसत रफ्तार से चल पाती हैं. अभी दिल्ली से कोलकाता या मुंबई जाने में दो-तीन दिन लग जाता है, जबकि डीएफसी पर चौबीस घंटाटे में यह दूरी तय कर ली जाएगी. ईस्टर्न कॉरिडोर के लिए वर्ल्ड बैंक मदद कर रहा है, वहीं वेस्टर्न कॉरिडोर के लिए जापान ने कर्ज दिया है. दोनो कॉरिडोर करीब नब्बे हजार करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए जा रहे हैं. डीएफसी से न केवल माल यातायात और मुसाफिरों को फायदा होगा बल्कि एक मालगाड़ी के चलने पर सड़क से एक हज़ार तीन सौ ट्रक का लोड कम होगा. इससे हर साल पाँच सौ साठ मिलियन टन कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन कम होगा. .
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नई दिल्ली. गुजरात सरकार (Gujarat Government) ने बिलकिस बानो मामले (Bilkis Bono Case) में 11 दोषियों को छूट देने के अपने फैसले का बचाव किया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें कहा गया कि उन्हें (दोषियों) जेल में 14 साल की सजा पूरी करने के बाद छूट दी गई थी और उनका व्यवहार अच्छा पाया गया था। गौरतलब है कि इस मामले में दोषी ठहराए गए 11 लोगों को 15 अगस्त को गोधरा उप-जेल से रिहा कर दिया गया था। गुजरात सरकार ने अपनी छूट नीति के तहत उनकी रिहाई की अनुमति दी थी। इन्होंने जेल में 15 साल से अधिक समय पूरा किया था।
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नई दिल्ली. गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो मामले में ग्यारह दोषियों को छूट देने के अपने फैसले का बचाव किया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें कहा गया कि उन्हें जेल में चौदह साल की सजा पूरी करने के बाद छूट दी गई थी और उनका व्यवहार अच्छा पाया गया था। गौरतलब है कि इस मामले में दोषी ठहराए गए ग्यारह लोगों को पंद्रह अगस्त को गोधरा उप-जेल से रिहा कर दिया गया था। गुजरात सरकार ने अपनी छूट नीति के तहत उनकी रिहाई की अनुमति दी थी। इन्होंने जेल में पंद्रह साल से अधिक समय पूरा किया था।
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की आने वाली Mi Pad 5 रेंज में कई तरह के मॉडल्स देखने को मिल सकते हैं जैसे- Mi Pad 5 Lite, Mi Pad 5 Pro, और Mi Pad 5 Plus आदि। Mi Pad 5 Pro के बारे में कहा जा रहा है कि यह K81 मॉडल नम्बर के साथ होगा। Mi Pad 5 Plus को 'elish' कोड दे दिया गया है और इसका मॉडल नम्बर K81A हो सकता है। पिछले समय में आए लीक्स में दावा किया गया है कि Mi Pad 5 Pro और Mi Pad 5 Plus में Qualcomm Snapdragon 870 SoC हो सकता है। Mi Pad 5 Plus में 12 मेगापिक्सल का कैमरा भी हो सकता है।
Mi Pad 5 Lite यानि कि 'nabu' में Snapdragon 860 SoC चिपसेट देखने को मिल सकता है और इसमें 12 मेगापिक्सल का मेन कैमरा हो सकता है। तीनों ही टेबलेट क्वाड रियर कैमरा के साथ आ सकती हैं। साथ ही इनमें NFC और वायरलेस चार्जिंग सपोर्ट भी देखने को मिल सकता है।
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की आने वाली Mi Pad पाँच रेंज में कई तरह के मॉडल्स देखने को मिल सकते हैं जैसे- Mi Pad पाँच Lite, Mi Pad पाँच Pro, और Mi Pad पाँच Plus आदि। Mi Pad पाँच Pro के बारे में कहा जा रहा है कि यह Kइक्यासी मॉडल नम्बर के साथ होगा। Mi Pad पाँच Plus को 'elish' कोड दे दिया गया है और इसका मॉडल नम्बर Kइक्यासी एम्पीयर हो सकता है। पिछले समय में आए लीक्स में दावा किया गया है कि Mi Pad पाँच Pro और Mi Pad पाँच Plus में Qualcomm Snapdragon आठ सौ सत्तर SoC हो सकता है। Mi Pad पाँच Plus में बारह मेगापिक्सल का कैमरा भी हो सकता है। Mi Pad पाँच Lite यानि कि 'nabu' में Snapdragon आठ सौ साठ SoC चिपसेट देखने को मिल सकता है और इसमें बारह मेगापिक्सल का मेन कैमरा हो सकता है। तीनों ही टेबलेट क्वाड रियर कैमरा के साथ आ सकती हैं। साथ ही इनमें NFC और वायरलेस चार्जिंग सपोर्ट भी देखने को मिल सकता है।
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पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के सरगना मुल्ला फजलुल्ला पर 50 लाख डॉलर यानी 32. 5 करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया है। बता दें कि यह आतंकी संगठन साल 2014 में पेशावर के सैन्य स्कूल समेत कई बड़े हमलों को अंजाम दे चुका है।
इसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान के आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार के सरगना अब्दुल वली का पता बताने वाले के लिए 30 लाख डॉलर यानी 20 करोड़ का इनाम घोषित किया है। बता दें कि वली कई आतंकी हमलों का आरोपी है और उसने पाकिस्तान में हुए कई आतंकी हमलों की जिम्मेदारी भी ली है।
इसके अलावा अमेरिका ने पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-इस्लाम के आतंकी मंगल बाग की जानकारी देने वाले के लिए 30 लाख डॉलर यानी 20 करोड़ के इनाम की घोषणा की है। बता दें कि आतंकी मंगल बाग भी कई आतंकी हमलों का आरोपी है। बताया जाता है कि ये तस्करी, अपहरण, पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा पार लगने वाले टैक्स के जरिये कमाई करता है।
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पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के सरगना मुल्ला फजलुल्ला पर पचास लाख डॉलर यानी बत्तीस. पाँच करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया है। बता दें कि यह आतंकी संगठन साल दो हज़ार चौदह में पेशावर के सैन्य स्कूल समेत कई बड़े हमलों को अंजाम दे चुका है। इसके बाद अमेरिका ने पाकिस्तान के आतंकी संगठन जमात-उल-अहरार के सरगना अब्दुल वली का पता बताने वाले के लिए तीस लाख डॉलर यानी बीस करोड़ का इनाम घोषित किया है। बता दें कि वली कई आतंकी हमलों का आरोपी है और उसने पाकिस्तान में हुए कई आतंकी हमलों की जिम्मेदारी भी ली है। इसके अलावा अमेरिका ने पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-इस्लाम के आतंकी मंगल बाग की जानकारी देने वाले के लिए तीस लाख डॉलर यानी बीस करोड़ के इनाम की घोषणा की है। बता दें कि आतंकी मंगल बाग भी कई आतंकी हमलों का आरोपी है। बताया जाता है कि ये तस्करी, अपहरण, पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा पार लगने वाले टैक्स के जरिये कमाई करता है।
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शैक्षिक अवसरों की असमानता
HANN KETED MATEN SEURES DEMES
QUAD-CZNANE) OPAquam med
शैक्षिक अवसरों की समानता का प्रश्न :
STERKETA BORD ( ARD-K wwwNI WA SPER KETA Kano creag dres) FEND DAN GAM MANG ĐING CHANG GEEN dwe ikons danes gEVAD
एक विश्व व्यापी चुनौती
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति उपरांत जब अनेक देशों ने उपनिवेशवाद से मुक्ति प्राप्त कर ली, वहां के सामान्य जनों के छात्रों में आकांक्षा परिकाष्ठा को छू गई । ច្ច HT आकांक्षा ने विश्व भर में एक नाटकीय प्रसार का रूप धारण किया । शिक्षा की उपदेयता को सर्वसाधारण रूप से मान्यता प्राप्त हुई । शिक्षा की इस अवधारणा का द्रुतगति से प्रसार का एक कारण यह भी था कि शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों तथा राष्ट्र नेताओं को यह विश्वास हो चला था कि किसी राष्ट्र में सामाजिक परिवर्तन की गति तभी तीव्रता धारण कर सकती है, जब देश में शिक्षा का तेजी से प्रसाद हो । इसी संदर्भ में समाज सुधारकों का ध्यान देश में विद्यमान शैक्षिक अवसरों की असमानताओं की ओर आकर्षित हुआ ।
साठवें दशक के अंतिम चरण तक विश्व भर में यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि शैक्षिक समानता के आदर्श और उसके व्यावहारीकरण के मध्य एक बड़ी खाई विद्यमान है । इस समस्या पर भी गहन चिंतन प्रारंभ हो गया, कि समाज में व्याप्त शैक्षिक अवसरों की असमानता, यहां तक कि शैक्षिक व्यवस्था के अंतर्गत विद्यमान विषमताओं को दूर करना एक जटिल समस्या है । इस संदर्भ में फिलिप कोम्ब्स का विचार है - संकीर्ण दृष्टिकोण रखने वाला उच्च वर्ग, जो जातिवाद से सम्पूर्ण समाज को प्रशासित करता है, शब्दों द्वारा शिक्षा में प्रजातांत्रिक सिद्धान्तों का सम्मान अवश्य करता है, किन्तु अपने कृत्यों
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शैक्षिक अवसरों की असमानता HANN KETED MATEN SEURES DEMES QUAD-CZNANE) OPAquam med शैक्षिक अवसरों की समानता का प्रश्न : STERKETA BORD FEND DAN GAM MANG ĐING CHANG GEEN dwe ikons danes gEVAD एक विश्व व्यापी चुनौती द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति उपरांत जब अनेक देशों ने उपनिवेशवाद से मुक्ति प्राप्त कर ली, वहां के सामान्य जनों के छात्रों में आकांक्षा परिकाष्ठा को छू गई । ច្ច HT आकांक्षा ने विश्व भर में एक नाटकीय प्रसार का रूप धारण किया । शिक्षा की उपदेयता को सर्वसाधारण रूप से मान्यता प्राप्त हुई । शिक्षा की इस अवधारणा का द्रुतगति से प्रसार का एक कारण यह भी था कि शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों तथा राष्ट्र नेताओं को यह विश्वास हो चला था कि किसी राष्ट्र में सामाजिक परिवर्तन की गति तभी तीव्रता धारण कर सकती है, जब देश में शिक्षा का तेजी से प्रसाद हो । इसी संदर्भ में समाज सुधारकों का ध्यान देश में विद्यमान शैक्षिक अवसरों की असमानताओं की ओर आकर्षित हुआ । साठवें दशक के अंतिम चरण तक विश्व भर में यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि शैक्षिक समानता के आदर्श और उसके व्यावहारीकरण के मध्य एक बड़ी खाई विद्यमान है । इस समस्या पर भी गहन चिंतन प्रारंभ हो गया, कि समाज में व्याप्त शैक्षिक अवसरों की असमानता, यहां तक कि शैक्षिक व्यवस्था के अंतर्गत विद्यमान विषमताओं को दूर करना एक जटिल समस्या है । इस संदर्भ में फिलिप कोम्ब्स का विचार है - संकीर्ण दृष्टिकोण रखने वाला उच्च वर्ग, जो जातिवाद से सम्पूर्ण समाज को प्रशासित करता है, शब्दों द्वारा शिक्षा में प्रजातांत्रिक सिद्धान्तों का सम्मान अवश्य करता है, किन्तु अपने कृत्यों
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