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मुझे अपने साथ क्यों घसीटती है?
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मेघों के उमड़ आने से पहले ही वे हवा में उसकी सजल आहट पा लेते थे और तब उनकी मन्द्र केका की गूँज-अनुगूँज तीव्र से तीव्र- तर होती हुई मानो बूँदों के उतरने के लिए सोपान-पंक्ति बनने लगती थी।
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दरवाजा खुला था।
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उस दिन से मैं प्राय: चमकीले तारे के आस-पास फैले छोटे तारों में बिंदा को ढूँढ़ती रहती; पर इतनी दूर से पहचानना क्या संभव था?
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फिर तत्‍काल विवाह। आप तीन हजार रुपए भी दीजिए। पर उन्‍हें नहीं।
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इसी से उसे बाज, चील आदि की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जिनका जीवन ही क्रूरकर्म है।
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रंग-रहित पैरों को गर्वीली गति ने एक नयी गरिमा से रंजित कर दिया।
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कभी कभी चरस का एक लंबा कश लगाते हुए पूछ लेते।
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अब वो जवान औरत के रूप, उस के निखार, उस के अज़ीज़ तरीन राज़ों, उस के तेंदूलों की शारा-ए-आम में नुमाइश करने लगे।
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सवेरे से घर बवंडर बना हुआ है।
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हर सतह से उस की दिलजोई की मगर वो राज़ी न हुई इस पर फ़र्ख़ंदा ने ज़ारो क़तार रोना शुरू कर दिया और नसीमा से कहा कि “ अगर वो इसी तरह नाराज़ रही तो वो कुछ खा कर मर जाएगी। ”
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चाय का क्या पीना! साली अन्दर जाकर नाडिय़ों को जलाती है। ”
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लेकिन, उनके बैल बाघगाड़ी से दस हाथ दूर ही डर से डिकरने लगे- बाँ-आँ! रस्सी तुड़ा कर भागे।
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रानी साहिबा ने हिरनी को पास पकड़ लाने के लिए स्याही से कहा।
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मंदिर के बाहर पीपल के एक पेड़ के इर्द-गिर्द सीमेंट के थड़े पर कई श्रद्धालू बैठे थे और रामायण की कथा हो रही थी।
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चाट वाले के घड़े के गिर्द मोगरे के फूलों का हार भी लिपटा हुआ था और एक छोटा हार चाट वाले ने अपनी कलाई पर भी बांध रखा था और जब वो मसालेदार पानी में गोलगप्पे डुबोकर प्लेट में रखकर गाहक के हाथों की तरफ़ सरकाता तो चाट की कर्रारी ख़ुशबू के साथ गाहक के नथनों में मोगरे की महक भी शामिल हो जाती और गाहक मुस्कुरा कर नए चाट वाले से गोया किसी तमगे की तरह उस प्लेट को हासिल कर लेता।
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उस परिस्थिति पर मुझे भी निराशा हुई।
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इस बार मेले में पालचट्टी खूब जमी है।
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देखने की क्या बात! सो मेला टूटने के पंद्रह दिन पहले आधी रात की बेला में काली ओढ़नी में लिपटी औरत को देख कर उसके मन में खटका अवश्य लगा था।
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कानों पर विश्वास न हुआ।
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उसने कोशिश भी की लेकिन उस की आँखें फट कर बाहर आने लगीं।
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कहां से आ गई नदी?
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बच्चे के रोने की आवाज़ उस के कानों में अक्सर टपकती रही ....... ..... .
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वो जब भी फ़िर्दोस का ज़िक्र करती तो दोज़ख़ का ज़िक्र ज़रूर आता।
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मेरे लिए क्या संसार में जगह नहीं है
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बोले--यहॉँ तक हो गया, इस छोकरे का यह साहस! आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी; क्योंकि ऑंसू उनकी पलकों पर रहते हैं।
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शरीर के ऊपर का भाग चौड़ा, पर नीचे का पतले पेट के कारण हल्का और तीव्र गति का सहायक था।
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खाने-पीने के बाद लालमोहर के दल ने अपना बासा तोड़ दिया।
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अब बाबू लोग हाक़िम हैं और हाक़िमों का कहा मानना पड़ता है, वरना..."" अरे बाबा, शान्ति से काम ले। यहाँ मिन्नत चलती है, पैसा चलता है, धौंस नहीं चलती,"
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मगर दो साल से अर्ज़ी यहाँ के दो कमरे ही पार नहीं कर पायी!"
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लक्षमण जवानी में हब्स-ए-बेजा और इग़वा की सज़ाएँ काट चुका था, इसलिए वो ख़ामोशी से दो तीन बार रधिया की बेटी का नाम लेता, और ज़हन में सैंकड़ों बार... .
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गैस के दो हण्डे थे। जिनसे ये ठेला बुक़ा-ए-नूर बन गया था।
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भेंट होती है, वही स्वर सुनता हूं, जब अवसर मिलता है उसका काम कर देता हूं- और मन कहता है- यही तो जगह मिली है, ओ री अपरिचिता! तुम्हारा परिचय पूरा नहीं हुआ, पूरा होगा भी नहीं, किंतु मेरा भाग्य अच्छा है, मुझे जगह मिल चुकी है।
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बादाम की डालियां फूलों से लद गई थीं और हवा में बर्फ़ीली ख़ुनकी के बावजूद बिहार की लताफ़त आ गई थी।
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वह इतिहास आकार में छोटा है, उसे छोटा करके ही लिखूंगा।
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लाठी चार्ज बिना करवाए भी तो काम चल सकता था।
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ले, धान की पँचसीस रख दे।
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यहां बुद्ध का नग़मा-ए-इरफ़ाँ गूँजा था, यहां भिक्षुओं ने अमन-ओ-सुलह-ओ-आश्ती का दर्स-ए-हयात दिया था।
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कंट्रेक्टर द्वारा निर्मित यह मकान निश्चय ही ढह जाएगा।
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पुल पार करते ही वह खिड़की के शीशे से उस ओर देखने लगा था।
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...उंहूं, अभी वह कुछ नहीं सोचेगा।
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एक नामालूम, ना-क़ाबिल-ए-उबूर, नाक़ाबिल-ए-पैमाइश समुंद्र में ले जाती है .... .
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खुशबू उसकी देह में समा गई।
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हथ लायाँ कुमलान नी लाजवन्ती दे बूटे।' ( ए सखि ये लाजवंती के पौधे हैं, हाथ लगाते ही कुम्हला जाते हैं .
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अभी तक गाड़ी ...
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व्यक्तिगत रूप में तुम्हें इससे कोई लाभ न होगा और यह केवल इसलिए कि तुमने प्रेम का अपमान किया, प्रेम का मूल्य नहीं समझा।
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योग्य वर के अभाव से उसका विवाह अब तक रोक रक्खा है।
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ताल पर तालियाँ देकर मैंने भी सहयोग किया।
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ऐसी पाकीज़ा मुहब्बत मैंने आज तक नहीं की होगी।
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पास हीं केठानी खड़ा-खड़ा धुले हुए कपड़ों की तह लगा रहा था।
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किस हाल में हैं वे! शाम को एक बार पड़ोस में जाकर टेलिफोन करने के लिए चोंगा उठाया –
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लडक़ा एक तरफ़ खड़ा होकर रोने लगा।
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हीराबाई ने हिरामन के जैसा निश्छल आदमी बहुत कम देखा है।
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तब खलील ने अहीर से कहा- क्यों बे, तू भी थाने जा रहा है?
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मुझे अपनी बहुज्ञता को प्रदर्शित करने का न कभी ऐसा अवसर ही मिला था और न प्रलोभन ही।
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उससे इस नियम में कभी व्यतिक्रम नहीं पड़ा।
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अपीलहीन फैसला हुआ कि चाहे उन दोनों में एक सच्चा हो चाहें दोनों झूठे; पर जब वे एक कोठरी से निकले, तब उनका पति-पत्नी के रूप में रहना ही कलियुग के दोष का परिमार्जन कर सकता है।
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रग्घू की शिकायतों की जरा परवाह न करता।
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तो क्या वही उन बागों के अवशेष हैं ?. .
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लड़के ने और भी बेरुखी के साथ कहा, और जेब से एक सीपी निकालकर उसे हवा में उछाला और दबोच लिया।
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मुंशी करीम बख़्श उन्हें छोटे जज साहब कहा करता था।
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मैं जर वालो खाता रहा और इस की तरफ़ देखता रहा।
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मगर वो तबअन कंजूस थी।
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यदि यही बात है तो उसका विस्मृत हो जाना ही अच्छा है।
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खरगोश धरती के भीतर सुरंग-जैसे लम्बे और दोनों ओर द्वारवाले बिल खोद लेते हैं।
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एक कबूतर पंख फडफ़ड़ाता हुआ कहवाख़ाने के अन्दर आया और कुछ लोग मिलकर उसे बाहर निकालने की कोशिश करने लगे।
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हमारे गांव की लछमी है बड़ी बहुरिया।
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सलीम को भी इजाज़त मिल गई कि वो उस कमरे में जा सकता है लड़कियों की छेड़छाड़ और रस्म-ओ-रसूम सब ख़त्म होगई थीं वो कमरे के अंदर दाख़िल हुआ।
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खाट पकड़ ली है।
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ऐसी औरत को घर में लाकर वह अपनी शांति में बाधा नहीं डालना चाहता था।
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उसने कहा, ‘क्या मैं जान-बूझकर हँसता था? ’
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इन बातों के उत्तर में लड़के के गले से सिर्फ़ ख़ुश्क-सी हँसी का स्वर सुनाई दिया।
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पास जाकर देखा वह केठानी था।
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साथ में दो-तीन छोटी-छोटी लड़कियां थीं, उनके साथ उसकी हंसी और बातचीत का अंत न था।
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एकाध दिन रहकर मेहमानी कर लो। ’’ ‘‘नहीं, मायजी, इस बार आज्ञा दीजिए।
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तुम्हारी अक़ल को मालूम नहीं क्या हो गया है ......... . .... .
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नहीं-नहीं, खेला शुरू होने पर नहीं, हिरिया जब स्टेज पर उतरे, हमको जगा देना।' हिरामन के कलेजे में जरा आँच लगी।
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उसका कफारा ( प्रायश्चित्त ) मैंने यह अदा किया कि अपनी सवारी का घोड़ा बेच कर 300 फकीरों को खाना खिलाया और तब से कसाइयों को गायें लिये जाते देखता हूँ तो कीमत दे कर खरीद लेता हूँ।
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जै भगवती! आज हिरामन अपने मन को खलास कर लेगा।
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उसका मुँह भी तमतमाया हुआ था।
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उसने नजर बचा कर देखा, बिरजू का बप्पा उसकी ओर एकटक निहार रहा है।
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पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में न रहेगी।
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" आदमी-आदमी जितने बड़े है" पर उसका मन इन बातों में नहीं था।
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पहल बल्लोची सिपाहियों ने की।
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डाक्टर बुलाने के लिए तीन चार आदमी दौड़ाए गए थे लेकिन इस से पहले कि इन में से कोई वापिस आए मुंशी करीम बख़्श ज़िंदगी के आख़िरी सांस लेने लगा।
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फिर वो मुझे एक क़हबा ख़ाने ले गया।
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मगर इस आमदन की ज़्यादती से ज़ुबेदा को कोई ख़ुशी हासिल नहीं हुई थी।
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साथ ही यह न पहचानना- मात्र कोहरा है, माया है, उसके छिन्न होते ही फिर परिचय का अंत नहीं होता। ओ
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‘बलवाही’ नाच हो रहा था।
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सभी की लाज रख ली हिरामन के बैलों ने।
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हिरामन अपनी गाड़ी को तिरपाल से घेर रहा है, गाड़ीवान-पट्टी में।
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आपको लाठियाँ चलवाने की नौवत ही क्‍यों आएगी।
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इस बीच उस विचित्र जगत की अद्भुत रात में कोई बोल उठा, जल्दी आ जाओ, इस डिब्बे में जगह है।
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जब गौरी उनकी तवाज़ो करती तो लक्षमण के दिल में ख़लिश सी महसूस होती।
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विवाह करना है कर दें, किसी के भी साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी।
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सभी जानते हैं कि स्नेह जितना ही गुप्त और जितना ही एकान्त का होता, उतना ही तेज हुआ करता है।
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इस पर चन्द्रु ने कभी हैरत का इज़हार नहीं किया।
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मुस्लिम ख़िदमत गारों ने एक दायरा बना रखा था और छुरे हाथ में थे और दायरे में बारी बारी एक मुहाजिर उनके छुरे की ज़द में आता था और बड़ी चाबुकदस्ती और मश्शाक़ी से हलाक कर दिया जाता था।
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रहमत मिनी से कहता," तुम ससुराल कभी नहीं जाना, अच्छा?" हमारे देश की लड़कियाँ जन्म से ही ‘ससुराल’ शब्द से परिचित रहती हैं;
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