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लोग बड़ी संख्‍या में शायर को देखने के लिए आने लगे।
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तब तक दूसरा नौकर रामेश्वरजी का भेजा हुआ पद्मा की माता के पास आया।
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वो जादू वो कुछ और था।
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पेड़ो में आम और लीचियॉँ लगी हुई हैं।
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काठ गोदाम एक छोटा सा गाँव था।
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पन्ना समझ गयी कि जब तक वह खाना बनाकर लड़कों को न खिलायेगी और खुद न खायेगी रग्घू न खायेगा।
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अब वह खुद यहाँ का बादशाह है .
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उसके बाद दोनों ओर सड़क से लगे हुए ईंटों के कुछ बने-अधबने मकान थे और कच्चे गारे से जुड़ी ऊबड़-खाबड़ दीवारों वाली चीकट-सी दुकानें जिनके शटर अभी बंद थे।
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.उसके भीतर लगातार कुछ ऐंठता रहा।
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किन्तु इस नए मिलन में जयगोपाल बाबू के मन की दशा कुछ और ही हो गई।
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जहां कहीं भी हमारा कोई संबंध हो पर्वत ही बुध्दि की लड़ाई में जीतेंगे, यह बिल्कुल पक्की बात थी।
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क़रीब आकर उस ने फ़र्ख़ंदा से पूछा “किसे बुला रही हैं
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क्या तुम यह कह सकते हो कि मुझे पुष्प भेंट करने के लिए तुमने कभी अपनी पुस्तक को नहीं छोड़ा?
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कौन मानता है सरधा-कानून?
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हा हा, ही-ही करता हुआ वह शिशु जब अपनी दीदी के ऊपर जा पड़ता और अपने बिना दांत के छोटे से मुख में उसका मुंह, नाक, कान सब कुछ ले जाना चाहता, अपनी छोटी-सी मुट्ठी में उसका जूड़ा पकड़कर जब खींचता और किसी कीमत पर भी हाथों में आई वस्तु को छोड़ने के लिए तैयार न होता, दिवाकर के उदय होने से पहले ही उठकर जब वह गिरता-पड़ता हुआ अपनी दीदी को कोमल स्पर्श से पुलकित करता, किलकारियां मार-मारकर शोर मचाना आरम्भ कर देता, और जब वह क्रमश: दी ...दी...दीदी पुकार-पुकारकर बारम्बार उसका ध्यान बंटाने लगा और जब उसने काम-काज और फुर्सत के समय, उस पर उपद्रव करने आरम्भ कर दिए, तब शशि से स्थिर नहीं रहा गया।
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अपने हर भाड़ेदार से वह पहले ही पूछ लेता है-' चोरी- चमारीवाली चीज तो नहीं?
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मैगजीन खोल उसी तरह पन्नों में नजर गड़ा दी।
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वह तो पटना शहर में 1967 में ही हुआ, जब अट्ठारह घंटे की अविराम वृष्टि के कारण पुनपुन का पानी राजेन्द्रनगर, कंकड़बाग तथा अन्य निचले हिस्सों में घुस आया था।
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...खोई हुई सूरत कैसी भोली लगती है!
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छोकरा-नाच के मनुवाँ नटुवा का मुँह हीराबाई-जैसा ही था।
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मैंने एक दिन पूछा, आखिर यह बौड़म है कौन? कोई पागल है क्या?
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बहुत बार वह सड़क भूल कर भटक चुका है।
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एक दिन उसने रग्घू से कहा — तुम्हें इस तरह गुलामी करनी हो, तो करो, मुझसे न होगी।
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भैया तक पहुँचने में उसे दो महीने की देर होगी।
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.वह कभी इस छोटी-सी भीड़ को देखता, कभी दूर सरकती नाव को तो कभी कगार के ऊपर फैले बीहड़ के विस्तार को।
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अब “गपती” का रूमाल भी हट चुका था और सामने सौदे हो रहे थे और लोग तिजारत के आदाब भी भूल गए थे।
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मेरी समझ में अब उनके बेकाबू होने के पहले हमारे पास केवल इतना समय ही था कि हम ट्रक में बैठ कर निकल जायें।
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जगह है, है, जल्दी बुलाया था, जल्दी ही आया हूं, क्षण-भर भी देर नहीं की है।
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वही छोकरा है, वही ठेले वाला है।
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उदाहरणत: कहा जा सकता है कि परदेश जाकर पहले-पहल वह भारी मुसीबत का शिकार हो गये।
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हिरामन को सबकुछ रहस्यमय- अजगुत-अजगुत- लग रहा है।
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मेघों की साँवली छाया में अपने इन्द्रधनुष के गुच्छे जैसे पंखों को मण्डलाकार बनाकर जब वह नाचता था, तब उस नृत्य में एक सहजात लय-ताल रहता था।
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सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ-पगहियावाली है।'' अरी फुआ!' बिरजू की माँ ने हँस कर जवाब दिया,' उस समय बुरा मान गई थी क्या?
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जब मैं मर जाऊँ तो जो चाहे करना, अभी तो जीती हूँ, अलग हो जाने से बच्चे तो नहीं अलग हो गये।
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बेटे की मौत ने उम्मीद को यास में तब्दील कर के कमर तोड़ दी थी।
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कलेजे की धड़कन ठीक हो गई।
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गांव में एक बाग कलमी लंगड़े का है।
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फिर दूर किसी गहरे कुवें से मुझे एक लड़की की चीख़ें सुनाई देने लगीं।
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शाम के वक़्त वहाँ पर सब तरह के लोग जमा होते हैं—वे जो वहाँ तफ़रीह के लिए आते हैं, और वे जो वहाँ आनेवालों के लिए तफ़रीह का सामान प्रस्तुत करते हैं, और वे जो दूसरों को तफ़रीह करते देखकर लुत्फ़ ले लेते हैं।
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उस के ज़रा से इशारे पर तहसील चला जाता।
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शादी हुए क़रीब क़रीब दो बरस हो चुके थे, मगर बच्चे की पैदाइश के आसार ही नज़र नहीं आते थे।
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इसकी बड़ी कुँवारी बहन आज भी पाकिस्तान में है।
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बिरजू के बाप ने बैलों को जोर से डाँटा-' हाँ-हाँ! आ गए घर! घर आने के लिए छाती फटी जाती थी!' बिरजू की माँ ताड़ गई, जरुर मलदहियाटोली में गाँजे की चिलम चढ़ रही थी, आवाज तो बड़ी खनखनाती हुई निकल रही है।
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तुम लखपती होगे तो अपने घर के होगे।
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हलाल ख़ोरी की अकड़ ज़बान-ए-ज़द-अवाम है।
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इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था।
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आज शाम को उस की शादी होगी।
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और फिर वे बच्चे बेचारे- उन्हें कौन देखेगा।
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परिणाम यह देखने में आता है कि शशि नीलमणि को जितना ही अधिक चाहती, जयगोपाल बाबू उतना ही उस पर जलते-भुनते रहते और वह जितना ही नीलमणि से घृणा करते, गुस्सा करते शशि उतना ही उसे अधिक प्यार करती।
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" मगर एक आदमी की जान का सवाल है" एक क्‍लर्क गुस्‍से से चिल्‍लाया।
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किस्सा कैसे याद रहे! हिरामन को लगता था, हीराबाई शुरू से ही उसी की ओर टकटकी लगा कर देख रही है, गा रही है, नाच रही है।
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जब उस की भुजिया बनती है तो मज़ा ही आ जाता है...
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उसके नाम पर कलंक लगाएँ?
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सारांश यह की सात रुपये देकर मैं उसे अगली सीट पर रखवा कर घर ले आयी और एक बार फिर मेरे पढ़ने-लिखने का कमरा अस्पताल बना।
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परंतु प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया .
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खुन्नू— दादा जो बैठे हैं?
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एलान सुनने के बाद उसने लालमोहर से कहा,' जरूर देखना चाहिए, क्यों लालमोहर?' दोनों आपस में सलाह करके रौता कंपनी की ओर चले।
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आस-पास खड़े सब लोगों के चेहरे खिल गये।
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में इस साल फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया है।'''' हूँ'' पद्मा ने सिर उठाया।
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“ख़ाला में घास लेने के लिए आया हूँ।
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कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, पल्टूदास आदि ज्ञात-अज्ञात अनेकानेक संतों के भजन होने लगे।
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मिस्त्री, मजदूर, सुनार, नक़लनवीस, देख-भाल करने वाले और उन सभी के ममेरे, फुफेरे, चचेरे, मौसेरे भाई जय-जयकार करने लगे।
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मैं यह सौदा बेचने नहीं आता।" कहते हुए उसने ढीले-ढाले कुर्ते के अन्दर हाथ डालकर छाती के पास से एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकाला, और बड़े जतन से उसकी चारों तहें खोलकर दोनों हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया।
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बाबू ने भी अपनी गर्दन को फुलाया और घूँ घूँ की सी आवाज़ पैदा करता हुआ चारपाई पर वापस जा लेटा।
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सब उसे काजू दे आते, परंतु अस्पताल से लौटकर जब मैंने उसके झूले की सफ़ाई की तो उसमें काजू भरे मिले, जिनसे ज्ञात होता था कि वह उन दिनों अपना प्रिय खाद्य कितना कम खाता रहा .
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" जी हाँ ये उसी का घर है।"" उसने मेरे बारे में आपको कोई चिट्ठी नहीं लिखी थी?"" हाँ उसने लिखा था कि आप हमारे पास आओगे।" और बूढा उठ के आँगन की तरफ चला गया।
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एक दिन चुनांचे उस ने उकता कर अपनी माँ से कह दिया “छोड़ो इस क़िस्से को ........... .
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बारह सौ छब्बीस बटा सात को मार-मारकर परमात्मा के हुजूर में भेज दिया जाएगा...।"" यह बकवास बन्द करो ओर मेरे साथ अन्दर आओ।" और कमिश्नर साहब अपने कमरे में वापस चले गये।
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बिटिया रानी का जल्‍द से ब्‍याह कर देना चाहिए।
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मोटे मोटे नक़्शों वाली थी, जैसे कोई जवान लड़का है।
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पड़ोसन की दहलीज़ तक नहीं फाँदती थीं।
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दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा।
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शाम ज़रा जल्दी लौटा।
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मैंने फिर जीनियस की तरफ़ देखा।
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कहता— औरतों से कौन सुख?
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उसे वहां वह प्रेम न दिखा, वह जिसका भक्त था, कहा-' लेकिन मैं कहां ले चलूं?'' जहां रहते हो।'' वहां तो पिताजी हैं।'' तो और कहीं।'' खाएंगे क्‍या?' खाना पड़ता है, यह सुपर्णा को याद न था।
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उस के सामने सब चीज़ें खिचड़ी देख कर बाबू न रह सका।
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यह जरूर है कि चतुरी के जूते जिला बाँदा के जूतों से वजन में हल्के बैठते हैं;
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...चेहरा-मोहरा और बोली-बानी देख-सुन कर, पलटदास का कलेजा काँपने लगा, न जाने क्यों।
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सम्भवतः ऐसी घड़ी में वातावरण में ऑक्सिजन की कमी हो जाती है।
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उनका बेटा वही खान है।
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घर के दरवाजे पर पहुंचे।
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‘‘हरगोबिन भाई, आ गए?’ ’ बड़ी बहुरिया की बोली या कटिहार स्टेशन का भोंपा बोल रहा है?
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यहां किश्ती आप ही आप खड़ी हो गई।
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उसका मोहन के घर जाना बंद था।
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उस वक़्त के अश्नान से सब मर्द औरतों के गुनाहों का कफ़्फ़ारा हो जाता है।
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तब फिर मां से न रहा गया।
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कोई कहता है, वह रत्नजड़ित पिंजड़ा स्वर्ग को चला गया, कोई कहता, वह ‘सत्त गुरुदत्त’ कहता हुआ अंतर्धान हो गया, पर यथार्थ यह है कि उस पक्षी-रूपी चंद्र को किसी बिल्ली-रूपी राहु ने ग्रस लिया।
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इसलिए कि वो रावण के पास रह आई है— —
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कुब्जा नाम के अनुरूप स्वभाव से भी वह कुब्जा प्रमाणित हुई।
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फिर उसने इस तरह विस्मय के साथ आँखें खोलीं जैसे वह यह निश्चय न कर पा रहा हो कि अपने आसपास बैठे हुए लोगों के साथ उसका क्या सम्बन्ध हो सकता है।
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बूढ़ी माता ने कहा, ‘‘क्यों बबुआ, खाते क्यों नहीं ?’’
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उस बार जब पुनपुन का पानी आया था तो सबसे अधिक इन कुत्तों की दुर्दशा हुई थी। ’ ’
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सलीम हिट धर्म था जवाब में ये कहा “आप का फ़ैसला कोई हाईकोर्ट का फ़ैसला नहीं फिर मैंने क्या जुर्म किया है जिस का आप फ़ैसला सुना रहे हैं। ”
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ऊपर से कौओं ने काँव-काँव की रट लगायी?
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लक्षमण बुरी से बुरी गाली बर्दाश्त करने की क़ुव्वत रखता था, मगर बाबा का लफ़्ज़ उस के दिमाग़ी तवाज़ुन को मुख़्तल कर देता।
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होंठ काटकर मैंने कहा, ‘ पंडितजी, रास्ते में दो नाले और एक नदी पड़ती है।
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पिकेटिंग के लिए देवियों की आवश्‍यकता हुई- पुरुषों का साथ देने के लिए भी।
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बूढ़ी माता ने अपने अपने हाथ हरगोबिन को जलपान लाकर दिया, ‘‘पहले थोड़ा जलपान कर लो, बबुआ। ’’ जलपान करते समय हरगोबिन को लगा, बड़ी बहुरिया दालान पर बैठी उसकी राह देख रही है- भूखी, प्यासी ...! रात में भोजन करते समय भी बड़ी बहुरिया मानों सामने आकर बैठ गई .
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