Question
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While Mentioningthe objectives of the Fiscal Responsibility and Budget Management Act (FRBMA), 2003 in brief, Also discussthe recommendations of the Committee constituted to review the FRBMA in 2017. (150-200 words, Marks-10) राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम(FRBMA), 2003 के उद्देश्यों का संक्षेप मेंउल्लेख करते हुए, वर्ष 2017मेंFRBMAकी समीक्षा हेतु गठितसमिति की सिफारिशों की भी चर्चाकीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंराजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम(FRBMA), 2003 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंFRBMA, 2003 के उद्देश्यों का संक्षेप में उल्लेख करते हुए, वर्ष 2017 में FRBMA की समीक्षा हेतु गठित समिति की सिफारिशों की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन कानून को भारतीय संसद ने वर्ष 2003 में पास किया था। 2003 में इसके गठन के बाद से ही भारत सरकार इस अधिनियम का पालन कर रही है। वित्त वर्ष 2004 से लेकर वित्त वर्ष 2008 तक इसका कड़ाई से पालन किया गया। उस समय, राजकोषीय घाटे में तेजी से कमी हुई थी और राजस्व घाटे में सकल घरेलू उत्पाद की 2% की कमी आई थी। वर्ष 2009 में वैश्विक आर्थिक संकट की वजह से इस अधिनियम का काफी उल्लंघन किया गया जिससे राजकोषीय स्थिति काफी बिगड़ गई। फिर 2017 में FRBMA की समीक्षा हेतु एन के सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। FRBM,2003 केउद्देश्य:- मीडियम टर्म फिस्कल पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करना। फिस्कल पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करना। मैक्रो इकोनॉमिक फ्रेमवर्क स्टेटमेंट जारी करना। राजकोषीय अनुशासन/उत्तरदायित्व बनाये रखना। लोक वित्त में अंतरपीढ़ी समता सुनिश्चित करना। राजकोषीय नीति का, मध्यकालिक ढांचे में संचालन करना। मौद्रिक नीति के संचालन में राजकोषीय गतिरोधों को समाप्त करना। FRBM की समीक्षा हेतुगठित समिति कीसिफारिशें:- FRBMA के स्थान पर सरकार को ऋण प्रबंधन एवं राजकोषीय उत्तरदायित्व विधेयक(डेब्ट मैनेजमेंट एन्ड फिस्कल रेस्पोंसिबिलिटी बिल) पारित करना चाहिए। राजकोषीय अनुशासन का प्रमुख लक्ष्य बजटीय घाटों को कम करने के स्थान पर सार्वजनिक ऋण को कम करके एक उचित सीमा के अंतर्गत रखना होना चाहिए। बजट घाटों की तुलना में सार्वजनिक ऋण का स्तर सरकार की राजकोषीय स्थिति का अधिक सटीक सूचक होता है। यह अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार भी है। ऋण की सीमा केंद्र हेतु 40 प्रतिशत एवं राज्यों हेतु 20 प्रतिशत निर्धारित करनी चाहिए। अर्थात सयुंक्त सरकार हेतु यह जीडीपी के 60 प्रतिशत तक होना चाहिए। यह स्तर2022-23 तक प्राप्त करनाचाहिए। केंद्र सरकार द्वारा 2022-23 तक अपना राजकोषीय घाटा जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक एवं राजस्व घाटा जीडीपी के 0.8 प्रतिशत करना चाहिए। देश की आर्थिक स्थिति के अनुसार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 0.5 प्रतिशत घटाने एवं बढ़ाने का विकल्प रखना चाहिए। एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद् की स्थापना करनी चाहिए जो इस अधिनियम के कार्यान्वयन की समीक्षा करेगी एवं कुछ परिस्थितियों में अधिनियम के लक्ष्यों का उल्लंघन करने की सिफारिस करेगी। इस अधिनियम के लक्ष्यों के उल्लंघन हेतु स्पष्ट परिस्थितियां होनी चाहिए अर्थात इसमें कोई ओपन एंडेड की शर्तें जैसे कि "सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य परिस्थितिया" नहीं होनी चाहिए। इस प्रकारFRBMA की समीक्षा हेतु एन के सिंह की अध्यक्षता में गठितसमिति ने व्यापक राजकोषीय सुधार हेतु सिफारिशें सुझाई हैं।
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##Question:While Mentioningthe objectives of the Fiscal Responsibility and Budget Management Act (FRBMA), 2003 in brief, Also discussthe recommendations of the Committee constituted to review the FRBMA in 2017. (150-200 words, Marks-10) राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम(FRBMA), 2003 के उद्देश्यों का संक्षेप मेंउल्लेख करते हुए, वर्ष 2017मेंFRBMAकी समीक्षा हेतु गठितसमिति की सिफारिशों की भी चर्चाकीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंराजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम(FRBMA), 2003 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंFRBMA, 2003 के उद्देश्यों का संक्षेप में उल्लेख करते हुए, वर्ष 2017 में FRBMA की समीक्षा हेतु गठित समिति की सिफारिशों की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन कानून को भारतीय संसद ने वर्ष 2003 में पास किया था। 2003 में इसके गठन के बाद से ही भारत सरकार इस अधिनियम का पालन कर रही है। वित्त वर्ष 2004 से लेकर वित्त वर्ष 2008 तक इसका कड़ाई से पालन किया गया। उस समय, राजकोषीय घाटे में तेजी से कमी हुई थी और राजस्व घाटे में सकल घरेलू उत्पाद की 2% की कमी आई थी। वर्ष 2009 में वैश्विक आर्थिक संकट की वजह से इस अधिनियम का काफी उल्लंघन किया गया जिससे राजकोषीय स्थिति काफी बिगड़ गई। फिर 2017 में FRBMA की समीक्षा हेतु एन के सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। FRBM,2003 केउद्देश्य:- मीडियम टर्म फिस्कल पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करना। फिस्कल पॉलिसी स्टेटमेंट जारी करना। मैक्रो इकोनॉमिक फ्रेमवर्क स्टेटमेंट जारी करना। राजकोषीय अनुशासन/उत्तरदायित्व बनाये रखना। लोक वित्त में अंतरपीढ़ी समता सुनिश्चित करना। राजकोषीय नीति का, मध्यकालिक ढांचे में संचालन करना। मौद्रिक नीति के संचालन में राजकोषीय गतिरोधों को समाप्त करना। FRBM की समीक्षा हेतुगठित समिति कीसिफारिशें:- FRBMA के स्थान पर सरकार को ऋण प्रबंधन एवं राजकोषीय उत्तरदायित्व विधेयक(डेब्ट मैनेजमेंट एन्ड फिस्कल रेस्पोंसिबिलिटी बिल) पारित करना चाहिए। राजकोषीय अनुशासन का प्रमुख लक्ष्य बजटीय घाटों को कम करने के स्थान पर सार्वजनिक ऋण को कम करके एक उचित सीमा के अंतर्गत रखना होना चाहिए। बजट घाटों की तुलना में सार्वजनिक ऋण का स्तर सरकार की राजकोषीय स्थिति का अधिक सटीक सूचक होता है। यह अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार भी है। ऋण की सीमा केंद्र हेतु 40 प्रतिशत एवं राज्यों हेतु 20 प्रतिशत निर्धारित करनी चाहिए। अर्थात सयुंक्त सरकार हेतु यह जीडीपी के 60 प्रतिशत तक होना चाहिए। यह स्तर2022-23 तक प्राप्त करनाचाहिए। केंद्र सरकार द्वारा 2022-23 तक अपना राजकोषीय घाटा जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक एवं राजस्व घाटा जीडीपी के 0.8 प्रतिशत करना चाहिए। देश की आर्थिक स्थिति के अनुसार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 0.5 प्रतिशत घटाने एवं बढ़ाने का विकल्प रखना चाहिए। एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद् की स्थापना करनी चाहिए जो इस अधिनियम के कार्यान्वयन की समीक्षा करेगी एवं कुछ परिस्थितियों में अधिनियम के लक्ष्यों का उल्लंघन करने की सिफारिस करेगी। इस अधिनियम के लक्ष्यों के उल्लंघन हेतु स्पष्ट परिस्थितियां होनी चाहिए अर्थात इसमें कोई ओपन एंडेड की शर्तें जैसे कि "सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य परिस्थितिया" नहीं होनी चाहिए। इस प्रकारFRBMA की समीक्षा हेतु एन के सिंह की अध्यक्षता में गठितसमिति ने व्यापक राजकोषीय सुधार हेतु सिफारिशें सुझाई हैं।
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पूंजी व मुद्रा बाजार में अंतर स्पष्ट करते हुए अर्थव्यवस्था की संवृद्धि को बढ़ावा देने और इसे निरंतरता प्रदान करने में पूंजी बाजार की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Explaining the difference in capital and money market, discuss the role of capital market in promoting the growth of the economy and providing continuity. (150-200 words/10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पूंजी और मुद्रा बाजार को परिभाषित कीजिये। दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिए। इसके पश्चात पूंजी बाजार की भूमिका पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष पूंजी बाजार वित्तीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह दीर्घकालिक फंड का बाजार है जिसमें अंशपत्रों तथा ऋण के माध्यम से पूंजी की उगाही सम्मिलित है। पूंजी बाजार का मुख्य कार्य उन क्षेत्रों से है जहां बचत आधिक्य है, इस बचत को उन क्षेत्रों तक पहुंचाना जहां मांग अधिक है। दूसरी ओर मुद्रा बाजार में अल्पकालिक स्वभाव की मौद्रिक सम्पत्तियों या प्रतिभूतियों में व्यवहार होता है। इसे संगठित और असंगठित दो भागों में बांटा जाता है। मुद्रा एवं पूंजी बाजार में अंतर: मुद्रा बाजार पूंजी बाजार मुद्रा बाजार एक ऐसा स्थल है जहां बैंकों द्वारा वाणिज्यिक पूंजी बाजार में डिबेंचर, शेयर एवं लोक जमाओं के रूप में दीर्घावधिक ऋण तथा इक्विटि कैपिटल का लेन-देन किया जाता है। बिलों एवं ट्रेजरी बिलों के रूप में लघु अवधि के ऋणों का लें देन किया जाता है। मुद्रा बाजार में पुनर्भुगतान की अवधि 1 घंटे से लेकर 1 वर्ष तक की हो सकती है। पूंजी बाजार के अंतर्गत ऋण की अवधि 5 से 20 वर्ष तक की हो सकती है और यदि शेयर कंपनी द्वारा प्रत्यक्ष रूप से जारी किए जाते हैं। मुद्रा बाजार में ब्याज दर को भारतीय रिजर्व बैंक या देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा नियंत्रित किया जाता है। ब्याज की दर प्रतिभूतियों की मांग एवं आपूर्ति पर निर्भर करती है। वाणिज्यिक बैंक जैसे- एसबीआई, आईसीआईसीआई, एलआईसी आदि मुद्रा बाजार के अभिकर्ता हैं। इसके प्रमुख अभिकर्ताओं में सभी सार्वजनिक एवं प्राइवेट लिमिटेड कंपनियाँ और 30 मिलियन से अधिक निवेशक शामिल हैं। पूंजी बाजार की भूमिका: गौरतलब है कि किसी अर्थव्यवस्था की संवृद्धि को बढ़ावा देने और उसे निरंतरता प्रदान करने में पूंजी बाजार एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं: यह उद्यमों के लिए वित्त जुटाने एवं उसके प्रवाह को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावी माध्यम है। अर्थव्यवस्था में निवेश को का एक प्रभावी स्रोत प्रदान करता है। वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावी, नवाचारी एवं प्रतिस्पर्द्धी बाजार में परिवर्तित करने हेतु एक प्रमुख उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है। सुव्यवस्थित रूप से संचालित एक पूंजी बाजार सूचना गुणवत्ता में सुधार के माध्यम से ईमानदारी पूर्वक स्थापित एक व्यापार अनुकूल परिवेश का समर्थन करता है। पूंजी बाजार विभिन्न कार्यों के अतिरिक्त तरलता बाजार दीर्घावधिक पूंजी-गहन परियोजना हेतु वित्त-पोषण की प्राप्ति को संभव बनाता है। पूंजी बाजार अर्थव्यवस्था में जोखिमों के विविधिकरण को संभव बनाकर जोखिम प्रबंधन हेतु एक माध्यम प्रदान करता है। इस प्रकार भारत की संवृद्धि को प्रोत्साहित करने हेतु गहन एवं व्यापक पूंजी बाजार की उपस्थिति अति महत्वपूर्ण और आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए निवेशकों द्वारा की जाने वाली बचत को अधिक प्रभावी रूप से संग्रहित करना चाहिए।
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##Question:पूंजी व मुद्रा बाजार में अंतर स्पष्ट करते हुए अर्थव्यवस्था की संवृद्धि को बढ़ावा देने और इसे निरंतरता प्रदान करने में पूंजी बाजार की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Explaining the difference in capital and money market, discuss the role of capital market in promoting the growth of the economy and providing continuity. (150-200 words/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पूंजी और मुद्रा बाजार को परिभाषित कीजिये। दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिए। इसके पश्चात पूंजी बाजार की भूमिका पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष पूंजी बाजार वित्तीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह दीर्घकालिक फंड का बाजार है जिसमें अंशपत्रों तथा ऋण के माध्यम से पूंजी की उगाही सम्मिलित है। पूंजी बाजार का मुख्य कार्य उन क्षेत्रों से है जहां बचत आधिक्य है, इस बचत को उन क्षेत्रों तक पहुंचाना जहां मांग अधिक है। दूसरी ओर मुद्रा बाजार में अल्पकालिक स्वभाव की मौद्रिक सम्पत्तियों या प्रतिभूतियों में व्यवहार होता है। इसे संगठित और असंगठित दो भागों में बांटा जाता है। मुद्रा एवं पूंजी बाजार में अंतर: मुद्रा बाजार पूंजी बाजार मुद्रा बाजार एक ऐसा स्थल है जहां बैंकों द्वारा वाणिज्यिक पूंजी बाजार में डिबेंचर, शेयर एवं लोक जमाओं के रूप में दीर्घावधिक ऋण तथा इक्विटि कैपिटल का लेन-देन किया जाता है। बिलों एवं ट्रेजरी बिलों के रूप में लघु अवधि के ऋणों का लें देन किया जाता है। मुद्रा बाजार में पुनर्भुगतान की अवधि 1 घंटे से लेकर 1 वर्ष तक की हो सकती है। पूंजी बाजार के अंतर्गत ऋण की अवधि 5 से 20 वर्ष तक की हो सकती है और यदि शेयर कंपनी द्वारा प्रत्यक्ष रूप से जारी किए जाते हैं। मुद्रा बाजार में ब्याज दर को भारतीय रिजर्व बैंक या देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा नियंत्रित किया जाता है। ब्याज की दर प्रतिभूतियों की मांग एवं आपूर्ति पर निर्भर करती है। वाणिज्यिक बैंक जैसे- एसबीआई, आईसीआईसीआई, एलआईसी आदि मुद्रा बाजार के अभिकर्ता हैं। इसके प्रमुख अभिकर्ताओं में सभी सार्वजनिक एवं प्राइवेट लिमिटेड कंपनियाँ और 30 मिलियन से अधिक निवेशक शामिल हैं। पूंजी बाजार की भूमिका: गौरतलब है कि किसी अर्थव्यवस्था की संवृद्धि को बढ़ावा देने और उसे निरंतरता प्रदान करने में पूंजी बाजार एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं: यह उद्यमों के लिए वित्त जुटाने एवं उसके प्रवाह को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावी माध्यम है। अर्थव्यवस्था में निवेश को का एक प्रभावी स्रोत प्रदान करता है। वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावी, नवाचारी एवं प्रतिस्पर्द्धी बाजार में परिवर्तित करने हेतु एक प्रमुख उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है। सुव्यवस्थित रूप से संचालित एक पूंजी बाजार सूचना गुणवत्ता में सुधार के माध्यम से ईमानदारी पूर्वक स्थापित एक व्यापार अनुकूल परिवेश का समर्थन करता है। पूंजी बाजार विभिन्न कार्यों के अतिरिक्त तरलता बाजार दीर्घावधिक पूंजी-गहन परियोजना हेतु वित्त-पोषण की प्राप्ति को संभव बनाता है। पूंजी बाजार अर्थव्यवस्था में जोखिमों के विविधिकरण को संभव बनाकर जोखिम प्रबंधन हेतु एक माध्यम प्रदान करता है। इस प्रकार भारत की संवृद्धि को प्रोत्साहित करने हेतु गहन एवं व्यापक पूंजी बाजार की उपस्थिति अति महत्वपूर्ण और आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए निवेशकों द्वारा की जाने वाली बचत को अधिक प्रभावी रूप से संग्रहित करना चाहिए।
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"USSR के गठन मे ही विघटन के बीज निहित थे, जिन्हें गोर्वाचेब की नीतियों ने बढ़ावा दिया " । इस कथन के संदर्भ मे यूएसएसआर के विघटन के कारकों का विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) "The formation of the USSR contained seeds of disintegration, which were promoted by the policies of Gorbachev". Analyze the factors of the disintegration of the USSR in the context of this statement. (150-200 words/10 Marks)
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अप्रोच :- सोवियत संघ पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। सोवियत संघ के गठन की कमियों को लिखिए । गोर्वाचेव की नीतियाँ को बताएं जिन्होने सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया को तीव्र किया। गोर्वाचेव की भूमिका पर संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- 1917 की क्रांति के पश्चात सोवियत संघ मे मार्क्स के सैद्धांतिक विचारों से आगे बढ़ते हुए साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई , इसका प्रभाव तात्कालिक विश्व पर पड़ा तथा पूंजीवादी व साम्यवादी देशों के मध्य वैचारिक मतभेद ने शीतयुद्ध को जन्म दिया। इस शीतयुद्ध की समाप्ति 1991 मे सोवियत संघ के विघटन के साथ हुई । सोवियत संघ के गठन की कमियाँ :- आर्थिक कारण:-सोवियत रूस के आर्थिक विकास के मॉडलमें पूँजीगत एवं भारी उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया था। अतः इसके अंतर्गत उपभोक्ता सामग्रियों की कमी पड गयी। इसके साथ ही शीतयुद्ध के कारण हथियारों की प्रतिस्पर्धा के कारण भी गैर योजनागत व्यय में वृद्धि हुई।सोवियत रूस को एक बड़ी राशि अनुदान तथा निवेश के रूप में तृतीय विश्व के देशों को देनी होती थी, जिसके कारण सोवियत रूस की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक दबाव बहुत अधिक था। कठोर राजनैतिक नियंत्रण :- लेनिन के अंतर्गत सोवियत रूस में "एक दल का तानाशाह " स्थापित किया गया था। स्टालिन के अंतर्गत वह "एक व्यक्ति की तानाशाही" के रूप में तब्दील हो गया ।व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया गया था। कलाकारों और लेखकों पर पाबंदी लगा दी गयी। जाहिर है कि इस कठोर नीति के कारण सोवियत रूस के लोगों में असंतोष था। सोवियत रूस का बहुराष्ट्रीय एवं नस्लवादी चरित्र :-बोल्शेविक क्रांति के मध्य भी लेनिन को रूसी अल्पसंख्यकों की समस्या का सामना करना पड़ रहा था।लेनिन ने एक व्यावहारिक नीति का सहारा लेकर अल्पसंख्यकों के असंतोष को दूर करने का प्रयास किया था। उसने सोवियत रूस को गणतंत्रों के संघ के रूप में तब्दील काट दिया। स्टालिन के कठोर शासन के अंतर्गत नस्लवादी विभाजन दबा रहा, किन्तु गोर्बाचेव की उदार नीतियों ने अल्पसंख्यकों की आकांक्षा को बढ़ाया। गोर्वाचेव की नीतियाँ :- गोर्वाचेव ने खुलेपन एवं सुधारों का दृष्टिकोण और संस्थागत सुधारों की दिशा मे कार्य शुरू किया । इन नीतियों ने सोवियत रूस के विघटन का मार्ग प्रशस्त किया । किसी बंद समाज को अचानक से खोलना सोवियत रूस के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ। गोर्वाचेव नेपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ), , जिसके तहत औद्योगिक क्षेत्रों और व्यवसाय पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण की स्थिति मे भी कमी लायी गयी , केंद्रीकृत नियोजन को भी समाप्त करने का प्रयास किया गया । यह नीति सम्भवता लेनिन की नई आर्थिक नीति से परिचालित थी। इसके साथ हीग्लासनोस्त( वैचारिक खुलापन ) की नीतिपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ) की नीति से अधिक घातक सिद्ध हुई । इसकेतहत सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र के नियंत्रण को भी समाप्त कर प्रेस को स्वतन्त्रता दी गयी अगर हम सोवियत संघ की तुलना समकालीन चीन से करते है तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि चीन ने आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू की किन्तु राजनीतिक नियंत्रण को ढीला नहीं किया। इस प्रकार चीन ,पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में क्रमिक रूप से संक्रमित हो गया, वहीं सोवियत संघ में ग्लासनोस्त की नीति घातक सिद्ध हुई।इस प्रकार सोवियत संघ के विघटन में विविध कारको की भूमिका रही थी , किन्तु गोर्बाचेव की नीतियों के कारण श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया आरंभ हो गयी थी।
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##Question:"USSR के गठन मे ही विघटन के बीज निहित थे, जिन्हें गोर्वाचेब की नीतियों ने बढ़ावा दिया " । इस कथन के संदर्भ मे यूएसएसआर के विघटन के कारकों का विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) "The formation of the USSR contained seeds of disintegration, which were promoted by the policies of Gorbachev". Analyze the factors of the disintegration of the USSR in the context of this statement. (150-200 words/10 Marks)##Answer:अप्रोच :- सोवियत संघ पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। सोवियत संघ के गठन की कमियों को लिखिए । गोर्वाचेव की नीतियाँ को बताएं जिन्होने सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया को तीव्र किया। गोर्वाचेव की भूमिका पर संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- 1917 की क्रांति के पश्चात सोवियत संघ मे मार्क्स के सैद्धांतिक विचारों से आगे बढ़ते हुए साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई , इसका प्रभाव तात्कालिक विश्व पर पड़ा तथा पूंजीवादी व साम्यवादी देशों के मध्य वैचारिक मतभेद ने शीतयुद्ध को जन्म दिया। इस शीतयुद्ध की समाप्ति 1991 मे सोवियत संघ के विघटन के साथ हुई । सोवियत संघ के गठन की कमियाँ :- आर्थिक कारण:-सोवियत रूस के आर्थिक विकास के मॉडलमें पूँजीगत एवं भारी उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया था। अतः इसके अंतर्गत उपभोक्ता सामग्रियों की कमी पड गयी। इसके साथ ही शीतयुद्ध के कारण हथियारों की प्रतिस्पर्धा के कारण भी गैर योजनागत व्यय में वृद्धि हुई।सोवियत रूस को एक बड़ी राशि अनुदान तथा निवेश के रूप में तृतीय विश्व के देशों को देनी होती थी, जिसके कारण सोवियत रूस की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक दबाव बहुत अधिक था। कठोर राजनैतिक नियंत्रण :- लेनिन के अंतर्गत सोवियत रूस में "एक दल का तानाशाह " स्थापित किया गया था। स्टालिन के अंतर्गत वह "एक व्यक्ति की तानाशाही" के रूप में तब्दील हो गया ।व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया गया था। कलाकारों और लेखकों पर पाबंदी लगा दी गयी। जाहिर है कि इस कठोर नीति के कारण सोवियत रूस के लोगों में असंतोष था। सोवियत रूस का बहुराष्ट्रीय एवं नस्लवादी चरित्र :-बोल्शेविक क्रांति के मध्य भी लेनिन को रूसी अल्पसंख्यकों की समस्या का सामना करना पड़ रहा था।लेनिन ने एक व्यावहारिक नीति का सहारा लेकर अल्पसंख्यकों के असंतोष को दूर करने का प्रयास किया था। उसने सोवियत रूस को गणतंत्रों के संघ के रूप में तब्दील काट दिया। स्टालिन के कठोर शासन के अंतर्गत नस्लवादी विभाजन दबा रहा, किन्तु गोर्बाचेव की उदार नीतियों ने अल्पसंख्यकों की आकांक्षा को बढ़ाया। गोर्वाचेव की नीतियाँ :- गोर्वाचेव ने खुलेपन एवं सुधारों का दृष्टिकोण और संस्थागत सुधारों की दिशा मे कार्य शुरू किया । इन नीतियों ने सोवियत रूस के विघटन का मार्ग प्रशस्त किया । किसी बंद समाज को अचानक से खोलना सोवियत रूस के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ। गोर्वाचेव नेपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ), , जिसके तहत औद्योगिक क्षेत्रों और व्यवसाय पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण की स्थिति मे भी कमी लायी गयी , केंद्रीकृत नियोजन को भी समाप्त करने का प्रयास किया गया । यह नीति सम्भवता लेनिन की नई आर्थिक नीति से परिचालित थी। इसके साथ हीग्लासनोस्त( वैचारिक खुलापन ) की नीतिपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ) की नीति से अधिक घातक सिद्ध हुई । इसकेतहत सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र के नियंत्रण को भी समाप्त कर प्रेस को स्वतन्त्रता दी गयी अगर हम सोवियत संघ की तुलना समकालीन चीन से करते है तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि चीन ने आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू की किन्तु राजनीतिक नियंत्रण को ढीला नहीं किया। इस प्रकार चीन ,पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में क्रमिक रूप से संक्रमित हो गया, वहीं सोवियत संघ में ग्लासनोस्त की नीति घातक सिद्ध हुई।इस प्रकार सोवियत संघ के विघटन में विविध कारको की भूमिका रही थी , किन्तु गोर्बाचेव की नीतियों के कारण श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया आरंभ हो गयी थी।
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Explain the paradox where on one hand sex ratio is increasing where as child sex ratio is declining ? (150 words/10 marks)
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Approach: Introduce by providing the context in which such a trend has been observed. Explain the reasons for the declining child sex ratio. Explain the reasons for the improvement of the sex ratio. Conclude with a way forward Answer: As per the provisional data of Census 2011, while the overall sex ratio had gone up by seven points to touch 940, against 933 in Census 2001, the child sex ratio plummeted to 914 from 927. Reasons for the Declining Child Sex Ratio Girl Child is considered an economic liability because of the practice of dowry. Existence of patrilineal and patrilocal practices in Indian society where the lineage is traced from the male side and after marriage women is shifted to the husband house. It creates fear of the fragmentation of the property. Male preference of male child due to ritual practices such as last rite, etc. Failure of government schemes such as the Beti Bachao Beti Padhao scheme. Son meta preference shows the behavioural pattern of Indian parents who prefer to have children until the desired number of sons are born. It results in unwanted girls and results in child mortality. Cultural Lags: Urban educated middle class is getting access to technology for sex selection and abortion. They are educated thus going for the family planning and prefer nuclear family within in that they prefer the male child. Lack of the proper implementation of the Pre-Conception & Pre-Natal Diagnostic Technique (PCPNDT) Act and Misuse of the Medical Termination of the Pregnancy Act is another reason. There is a lack of safety and security with respect to the girls and at the same time, the girl is associated with the prestige of the family. Reasons for the improvement in the Sex ratio There is better access to health infrastructure and a delay in marriage age that helps in reducing maternity-related death. Now people are preferring for family planning. There are many government schemes with respect to prenatal care (Pradhanmantri SUrakshit Matritva Abhiyaan), perinatal care (Janani Suraksha Yojana), and postnatal care (Janani Shishu Suraksha Karykram). Thus it also has resulted in the decline of the maternal mortality rate. There is awareness among the women with respect to their rights and entitlements. Various women"s movements have resulted and created the ground for women"s empowerment. Women have a higher life expectancy. Way Forward There can be better or strict enforcement of the Act There should be attitudinal change to improve the status of women in society. Women need to be introduced as the agency of the change. The education system should be such that it should be gender inclusive. The gender sensitization of society can be done. Law determines the direction in which society should move, however, it is the culture that determines the direction in which society actually moves.
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##Question:Explain the paradox where on one hand sex ratio is increasing where as child sex ratio is declining ? (150 words/10 marks)##Answer:Approach: Introduce by providing the context in which such a trend has been observed. Explain the reasons for the declining child sex ratio. Explain the reasons for the improvement of the sex ratio. Conclude with a way forward Answer: As per the provisional data of Census 2011, while the overall sex ratio had gone up by seven points to touch 940, against 933 in Census 2001, the child sex ratio plummeted to 914 from 927. Reasons for the Declining Child Sex Ratio Girl Child is considered an economic liability because of the practice of dowry. Existence of patrilineal and patrilocal practices in Indian society where the lineage is traced from the male side and after marriage women is shifted to the husband house. It creates fear of the fragmentation of the property. Male preference of male child due to ritual practices such as last rite, etc. Failure of government schemes such as the Beti Bachao Beti Padhao scheme. Son meta preference shows the behavioural pattern of Indian parents who prefer to have children until the desired number of sons are born. It results in unwanted girls and results in child mortality. Cultural Lags: Urban educated middle class is getting access to technology for sex selection and abortion. They are educated thus going for the family planning and prefer nuclear family within in that they prefer the male child. Lack of the proper implementation of the Pre-Conception & Pre-Natal Diagnostic Technique (PCPNDT) Act and Misuse of the Medical Termination of the Pregnancy Act is another reason. There is a lack of safety and security with respect to the girls and at the same time, the girl is associated with the prestige of the family. Reasons for the improvement in the Sex ratio There is better access to health infrastructure and a delay in marriage age that helps in reducing maternity-related death. Now people are preferring for family planning. There are many government schemes with respect to prenatal care (Pradhanmantri SUrakshit Matritva Abhiyaan), perinatal care (Janani Suraksha Yojana), and postnatal care (Janani Shishu Suraksha Karykram). Thus it also has resulted in the decline of the maternal mortality rate. There is awareness among the women with respect to their rights and entitlements. Various women"s movements have resulted and created the ground for women"s empowerment. Women have a higher life expectancy. Way Forward There can be better or strict enforcement of the Act There should be attitudinal change to improve the status of women in society. Women need to be introduced as the agency of the change. The education system should be such that it should be gender inclusive. The gender sensitization of society can be done. Law determines the direction in which society should move, however, it is the culture that determines the direction in which society actually moves.
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14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु विभिन्न मानदंड अपनाए गए तथा अनेक सिफारिशें की गयी हैं जिनका भारत परमहत्वपूर्ण प्रभाव पडेगा| टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10) Various criteria have been adopted for the division of divisible taxes by the 14th Finance Commission and many recommendations have been made which will have a significant impact on India. Make a comment (150-200 words, Marks-10)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वित्त आयोग एवं 14 वें वित्त आयोग के बारे में सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में 14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु अपनाए गये मानदंड बताइये 3- दूसरे भाग में 14वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें बताइये 4- तीसरे भाग में सिफारिशों के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में महत्वपूर्ण बदलाव के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये केंद्र एवं राज्यों के मध्य वित्त के बंटवारे पर अपनी सिफारिशें देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन किया जाता है| संविधान के अनुच्छेद 280(1) के अंतर्गत स्पष्ट रूप से वर्णित है कि, संविधान के लागू होने के दो वर्ष के अंदर और तत्पश्चात प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर या इस समय से पूर्व यदि राष्ट्रपति आवश्यक समझे, तो वह अपने आदेश द्वारा वित्त आयोग का गठन करेगा| भारत के 14वें वित्त आयोग का गठन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता में जनवरी, 2013 को किया गया था| इस आयोग की सिफारिशें 2015 से पांच वर्ष (वित्तीय वर्ष 2019-20)की अवधि के लिए लागू हैं| विभाज्य करों में राज्यों के हिस्से को विभिन्न राज्यों में विभाजित करने हेतु मानदंड · आयोग ने विभाज्य करों के विभाजन के लिए विभिन्न मानदंडों का प्रयोग किया गया है| इनमें से कुछ मानदंड पूर्ववर्ती वित्त आयोगों के अनुरूप हैं जबकि कुछ मानदंड नवीन हैं| · आयोग द्वारा पूर्ववर्ती आयोगों की तरह ही आय अंतराल को भी एक मानदंड बनाया है| इसमें प्रतिव्यक्ति आय के आधार पर आय अंतराल की गणना की गयी है और इसका भारांक सर्वाधिक 50%रखा है| · दूसरे मानदंड के रूप में आयोग द्वारा जनसंख्या को महत्त्व दिया गया है| इसमें 1971 एवं 2001 की जनगणना को शामिल किया गया है| 1971 की जनसंख्या को 17.5% भारांक दिया गया है एवं 2001 की जनसंख्या को 10 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा क्षेत्रफल को भी एक मानदंड माना गया है और इसे 15 % भारांक दिया गया है| · एक नवीन मानदंड के रूप में आयोग द्वारा वनावरण को भी शामिल किया गया है और वनावरण को 7.5 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा करों के विभाजन से सर्वाधिक लाभ उत्तर प्रदेश को और दूसरे स्थान पर बिहार और सबसे अंतिम स्थान पर सिक्किम को मिला है 14वें वित्त आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशें · केन्द्रीय विभाज्य करों में राज्यों का हिस्सा 32 % से बढ़ा कर 42 % कर दिया जाए| · केंद्र इस अधिक कर स्थानान्तरण की क्षतिपूर्ति करने हेतु अन्य स्थानान्तरण जैसे कि अनुदान एवं योजनागत स्थानान्तरण(केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं) को कम कर दे| · केंद्र द्वारा सभी राज्यों के स्थान केवल 11 राज्यों को लगभग 2 लाख करोड़ तक का अनुदान देना चाहिए| · यह अनुदान किसी भी क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित न हो अर्थात व्यय निर्धारण में स्वायत्तता हो सिफारिशों का प्रभाव & महत्त्व · कोष के प्रयोग में राज्यों की स्वायत्तता बढ़ाएगा, इससे केंद्र पर राज्यों की निर्भरता में कमी आएगी| · विभाज्य पूल के आकार को बढाने से कोष स्थानान्तरण में वृद्धि होगी · राज्यों की कार्य कुशलता बढ़ेगी · केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) में कमी से वन साइज़ फिट आल दृष्टिकोण का समापन होगा · इससे सहकारी संघवाद का विकास होगा, · कोष में वृद्धि होने, कोष व्यय करने में स्वायत्तता बढ़ने से विकासात्मक कार्यक्रमों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी|इससे राज्यों का उत्तरदायित्व बढेगा और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद का विकास होगा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 14 वें वित्त आयोग ने भारतीय व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली अनुशंसाएं की हैं|राज्यों की स्वायत्तता, प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद एवं सहयोगी संघवाद भारतीय संघ में बहुप्रतीक्षित लक्ष्य रहें हैं| आयोग की संस्तुतियों को सरकार द्वारा मान लिया गया है और सहकारी संघवाद के विकास की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी है|
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##Question:14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु विभिन्न मानदंड अपनाए गए तथा अनेक सिफारिशें की गयी हैं जिनका भारत परमहत्वपूर्ण प्रभाव पडेगा| टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10) Various criteria have been adopted for the division of divisible taxes by the 14th Finance Commission and many recommendations have been made which will have a significant impact on India. Make a comment (150-200 words, Marks-10)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वित्त आयोग एवं 14 वें वित्त आयोग के बारे में सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में 14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु अपनाए गये मानदंड बताइये 3- दूसरे भाग में 14वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें बताइये 4- तीसरे भाग में सिफारिशों के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में महत्वपूर्ण बदलाव के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये केंद्र एवं राज्यों के मध्य वित्त के बंटवारे पर अपनी सिफारिशें देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन किया जाता है| संविधान के अनुच्छेद 280(1) के अंतर्गत स्पष्ट रूप से वर्णित है कि, संविधान के लागू होने के दो वर्ष के अंदर और तत्पश्चात प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर या इस समय से पूर्व यदि राष्ट्रपति आवश्यक समझे, तो वह अपने आदेश द्वारा वित्त आयोग का गठन करेगा| भारत के 14वें वित्त आयोग का गठन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता में जनवरी, 2013 को किया गया था| इस आयोग की सिफारिशें 2015 से पांच वर्ष (वित्तीय वर्ष 2019-20)की अवधि के लिए लागू हैं| विभाज्य करों में राज्यों के हिस्से को विभिन्न राज्यों में विभाजित करने हेतु मानदंड · आयोग ने विभाज्य करों के विभाजन के लिए विभिन्न मानदंडों का प्रयोग किया गया है| इनमें से कुछ मानदंड पूर्ववर्ती वित्त आयोगों के अनुरूप हैं जबकि कुछ मानदंड नवीन हैं| · आयोग द्वारा पूर्ववर्ती आयोगों की तरह ही आय अंतराल को भी एक मानदंड बनाया है| इसमें प्रतिव्यक्ति आय के आधार पर आय अंतराल की गणना की गयी है और इसका भारांक सर्वाधिक 50%रखा है| · दूसरे मानदंड के रूप में आयोग द्वारा जनसंख्या को महत्त्व दिया गया है| इसमें 1971 एवं 2001 की जनगणना को शामिल किया गया है| 1971 की जनसंख्या को 17.5% भारांक दिया गया है एवं 2001 की जनसंख्या को 10 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा क्षेत्रफल को भी एक मानदंड माना गया है और इसे 15 % भारांक दिया गया है| · एक नवीन मानदंड के रूप में आयोग द्वारा वनावरण को भी शामिल किया गया है और वनावरण को 7.5 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा करों के विभाजन से सर्वाधिक लाभ उत्तर प्रदेश को और दूसरे स्थान पर बिहार और सबसे अंतिम स्थान पर सिक्किम को मिला है 14वें वित्त आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशें · केन्द्रीय विभाज्य करों में राज्यों का हिस्सा 32 % से बढ़ा कर 42 % कर दिया जाए| · केंद्र इस अधिक कर स्थानान्तरण की क्षतिपूर्ति करने हेतु अन्य स्थानान्तरण जैसे कि अनुदान एवं योजनागत स्थानान्तरण(केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं) को कम कर दे| · केंद्र द्वारा सभी राज्यों के स्थान केवल 11 राज्यों को लगभग 2 लाख करोड़ तक का अनुदान देना चाहिए| · यह अनुदान किसी भी क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित न हो अर्थात व्यय निर्धारण में स्वायत्तता हो सिफारिशों का प्रभाव & महत्त्व · कोष के प्रयोग में राज्यों की स्वायत्तता बढ़ाएगा, इससे केंद्र पर राज्यों की निर्भरता में कमी आएगी| · विभाज्य पूल के आकार को बढाने से कोष स्थानान्तरण में वृद्धि होगी · राज्यों की कार्य कुशलता बढ़ेगी · केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) में कमी से वन साइज़ फिट आल दृष्टिकोण का समापन होगा · इससे सहकारी संघवाद का विकास होगा, · कोष में वृद्धि होने, कोष व्यय करने में स्वायत्तता बढ़ने से विकासात्मक कार्यक्रमों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी|इससे राज्यों का उत्तरदायित्व बढेगा और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद का विकास होगा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 14 वें वित्त आयोग ने भारतीय व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली अनुशंसाएं की हैं|राज्यों की स्वायत्तता, प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद एवं सहयोगी संघवाद भारतीय संघ में बहुप्रतीक्षित लक्ष्य रहें हैं| आयोग की संस्तुतियों को सरकार द्वारा मान लिया गया है और सहकारी संघवाद के विकास की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी है|
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14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु विभिन्न मानदंड अपनाए गए तथा अनेक सिफारिशें की गयी हैं जिनका भारत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पडेगा| टिप्पणी कीजिये| (200 शब्द) Various criteria have been adopted for the division of divisible taxes by the 14th Finance Commission and many recommendations have been made which will have a significant impact on India. Make a comment (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वित्त आयोग एवं 14 वें वित्त आयोग के बारे में सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में 14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु अपनाए गये मानदंड बताइये 3- दूसरे भाग में 14वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें बताइये 4- तीसरे भाग में सिफारिशों के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में महत्वपूर्ण बदलाव के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये केंद्र एवं राज्यों के मध्य वित्त के बंटवारे पर अपनी सिफारिशें देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन किया जाता है| संविधान के अनुच्छेद 280(1) के अंतर्गत स्पष्ट रूप से वर्णित है कि, संविधान के लागू होने के दो वर्ष के अंदर और तत्पश्चात प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर या इस समय से पूर्व यदि राष्ट्रपति आवश्यक समझे, तो वह अपने आदेश द्वारा वित्त आयोग का गठन करेगा| भारत के 14वें वित्त आयोग का गठन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता में जनवरी, 2013 को किया गया था| इस आयोग की सिफारिशें 2015 से पांच वर्ष (वित्तीय वर्ष 2019-20)की अवधि के लिए लागू हैं| विभाज्य करों में राज्यों के हिस्से को विभिन्न राज्यों में विभाजित करने हेतु मानदंड · आयोग ने विभाज्य करों के विभाजन के लिए विभिन्न मानदंडों का प्रयोग किया गया है| इनमें से कुछ मानदंड पूर्ववर्ती वित्त आयोगों के अनुरूप हैं जबकि कुछ मानदंड नवीन हैं| · आयोग द्वारा पूर्ववर्ती आयोगों की तरह ही आय अंतराल को भी एक मानदंड बनाया है| इसमें प्रतिव्यक्ति आय के आधार पर आय अंतराल की गणना की गयी है और इसका भारांक सर्वाधिक 50%रखा है| · दूसरे मानदंड के रूप में आयोग द्वारा जनसंख्या को महत्त्व दिया गया है| इसमें 1971 एवं 2001 की जनगणना को शामिल किया गया है| 1971 की जनसंख्या को 17.5% भारांक दिया गया है एवं 2001 की जनसंख्या को 10 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा क्षेत्रफल को भी एक मानदंड माना गया है और इसे 15 % भारांक दिया गया है| · एक नवीन मानदंड के रूप में आयोग द्वारा वनावरण को भी शामिल किया गया है और वनावरण को 7.5 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा करों के विभाजन से सर्वाधिक लाभ उत्तर प्रदेश को और दूसरे स्थान पर बिहार और सबसे अंतिम स्थान पर सिक्किम को मिला है 14वें वित्त आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशें · केन्द्रीय विभाज्य करों में राज्यों का हिस्सा 32 % से बढ़ा कर 42 % कर दिया जाए| · केंद्र इस अधिक कर स्थानान्तरण की क्षतिपूर्ति करने हेतु अन्य स्थानान्तरण जैसे कि अनुदान एवं योजनागत स्थानान्तरण(केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं) को कम कर दे| · केंद्र द्वारा सभी राज्यों के स्थान केवल 11 राज्यों को लगभग 2 लाख करोड़ तक का अनुदान देना चाहिए| · यह अनुदान किसी भी क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित न हो अर्थात व्यय निर्धारण में स्वायत्तता हो सिफारिशों का प्रभाव & महत्त्व · कोष के प्रयोग में राज्यों की स्वायत्तता बढ़ाएगा, इससे केंद्र पर राज्यों की निर्भरता में कमी आएगी| · विभाज्य पूल के आकार को बढाने से कोष स्थानान्तरण में वृद्धि होगी · राज्यों की कार्य कुशलता बढ़ेगी · केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) में कमी से वन साइज़ फिट आल दृष्टिकोण का समापन होगा · इससे सहकारी संघवाद का विकास होगा, · कोष में वृद्धि होने, कोष व्यय करने में स्वायत्तता बढ़ने से विकासात्मक कार्यक्रमों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी|इससे राज्यों का उत्तरदायित्व बढेगा और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद का विकास होगा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 14 वें वित्त आयोग ने भारतीय व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली अनुशंसाएं की हैं|राज्यों की स्वायत्तता, प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद एवं सहयोगी संघवाद भारतीय संघ में बहुप्रतीक्षित लक्ष्य रहें हैं| आयोग की संस्तुतियों को सरकार द्वारा मान लिया गया है और सहकारी संघवाद के विकास की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी है|
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##Question:14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु विभिन्न मानदंड अपनाए गए तथा अनेक सिफारिशें की गयी हैं जिनका भारत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पडेगा| टिप्पणी कीजिये| (200 शब्द) Various criteria have been adopted for the division of divisible taxes by the 14th Finance Commission and many recommendations have been made which will have a significant impact on India. Make a comment (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वित्त आयोग एवं 14 वें वित्त आयोग के बारे में सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में 14वें वित्त आयोग द्वारा विभाज्य करों के विभाजन हेतु अपनाए गये मानदंड बताइये 3- दूसरे भाग में 14वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें बताइये 4- तीसरे भाग में सिफारिशों के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में महत्वपूर्ण बदलाव के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये केंद्र एवं राज्यों के मध्य वित्त के बंटवारे पर अपनी सिफारिशें देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन किया जाता है| संविधान के अनुच्छेद 280(1) के अंतर्गत स्पष्ट रूप से वर्णित है कि, संविधान के लागू होने के दो वर्ष के अंदर और तत्पश्चात प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर या इस समय से पूर्व यदि राष्ट्रपति आवश्यक समझे, तो वह अपने आदेश द्वारा वित्त आयोग का गठन करेगा| भारत के 14वें वित्त आयोग का गठन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता में जनवरी, 2013 को किया गया था| इस आयोग की सिफारिशें 2015 से पांच वर्ष (वित्तीय वर्ष 2019-20)की अवधि के लिए लागू हैं| विभाज्य करों में राज्यों के हिस्से को विभिन्न राज्यों में विभाजित करने हेतु मानदंड · आयोग ने विभाज्य करों के विभाजन के लिए विभिन्न मानदंडों का प्रयोग किया गया है| इनमें से कुछ मानदंड पूर्ववर्ती वित्त आयोगों के अनुरूप हैं जबकि कुछ मानदंड नवीन हैं| · आयोग द्वारा पूर्ववर्ती आयोगों की तरह ही आय अंतराल को भी एक मानदंड बनाया है| इसमें प्रतिव्यक्ति आय के आधार पर आय अंतराल की गणना की गयी है और इसका भारांक सर्वाधिक 50%रखा है| · दूसरे मानदंड के रूप में आयोग द्वारा जनसंख्या को महत्त्व दिया गया है| इसमें 1971 एवं 2001 की जनगणना को शामिल किया गया है| 1971 की जनसंख्या को 17.5% भारांक दिया गया है एवं 2001 की जनसंख्या को 10 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा क्षेत्रफल को भी एक मानदंड माना गया है और इसे 15 % भारांक दिया गया है| · एक नवीन मानदंड के रूप में आयोग द्वारा वनावरण को भी शामिल किया गया है और वनावरण को 7.5 % भारांक दिया गया है| · आयोग द्वारा करों के विभाजन से सर्वाधिक लाभ उत्तर प्रदेश को और दूसरे स्थान पर बिहार और सबसे अंतिम स्थान पर सिक्किम को मिला है 14वें वित्त आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशें · केन्द्रीय विभाज्य करों में राज्यों का हिस्सा 32 % से बढ़ा कर 42 % कर दिया जाए| · केंद्र इस अधिक कर स्थानान्तरण की क्षतिपूर्ति करने हेतु अन्य स्थानान्तरण जैसे कि अनुदान एवं योजनागत स्थानान्तरण(केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं) को कम कर दे| · केंद्र द्वारा सभी राज्यों के स्थान केवल 11 राज्यों को लगभग 2 लाख करोड़ तक का अनुदान देना चाहिए| · यह अनुदान किसी भी क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित न हो अर्थात व्यय निर्धारण में स्वायत्तता हो सिफारिशों का प्रभाव & महत्त्व · कोष के प्रयोग में राज्यों की स्वायत्तता बढ़ाएगा, इससे केंद्र पर राज्यों की निर्भरता में कमी आएगी| · विभाज्य पूल के आकार को बढाने से कोष स्थानान्तरण में वृद्धि होगी · राज्यों की कार्य कुशलता बढ़ेगी · केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) में कमी से वन साइज़ फिट आल दृष्टिकोण का समापन होगा · इससे सहकारी संघवाद का विकास होगा, · कोष में वृद्धि होने, कोष व्यय करने में स्वायत्तता बढ़ने से विकासात्मक कार्यक्रमों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी|इससे राज्यों का उत्तरदायित्व बढेगा और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद का विकास होगा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 14 वें वित्त आयोग ने भारतीय व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली अनुशंसाएं की हैं|राज्यों की स्वायत्तता, प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद एवं सहयोगी संघवाद भारतीय संघ में बहुप्रतीक्षित लक्ष्य रहें हैं| आयोग की संस्तुतियों को सरकार द्वारा मान लिया गया है और सहकारी संघवाद के विकास की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी है|
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विनिमय दर प्रणाली और इसके प्रकारोंको परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के पड़ने वालेप्रभाव का आकलन कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10) Define exchange rate system and its types. Along with this, assess the impact of depreciation on an economy. (150-200 words, Marks-10)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिमय दर को परिभाषित करते हुए विनिमय दर प्रणालियों की सूचना दीजिये 2- प्रथम खंड में विनिमय दर प्रणाली के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे खंड में मूल्यह्रास को परिभाषित करते हुए अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में मूल्यह्रास पर नियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाजार विनिमय दर का सम्बन्ध मुद्रा विनिमय से है| किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष किसी मुद्रा का मूल्य बाजार विनिमय दर कहलाता है| दूसरे शब्दों में, किसी मुद्रा की कीमत को अन्य मुद्रा के रूप में व्यक्त करना बाजार विनिमय दर कहलाता है।अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्रायें प्रचलित रहती हैं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व यह समस्या होती है कि मुद्राओं के बीच विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाए| इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो विनिमय दर प्रणालियाँ प्रचलित हैं यथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली एवं परिवर्तनीय विनिमय दर प्रणाली| इन दोनों प्रणालियों में कुछ मूलभूत अंतर हैं| स्थिर विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा की विनिमय दर केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है · चूँकि देश का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर के निर्धारण में हस्तक्षेप करता है इसीलिए इसे प्रबंधित विनिमय दर भी कहते हैं| · केन्द्रीय बैंक जब विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में घरेलू मुद्रा का मान को स्वयं कम करता है या घटाता है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं |भारत में अब तक 1949, 1966 एवं 1991 में तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है · केन्द्रीय बैंक द्वारा घरेलू मुद्रा के विनिमय दर को बढ़ाना अधिमूल्यन कहलाता है, इसे भारत में अभी तक नही किया गया है| · उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के निरंतर विस्तार से विश्व स्तर पर स्थिर विनिमय प्रणाली का उपयोग लगभग बंद हो चुका है तिरती/नम्य विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है · किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| · विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| · इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि(अप्रिसियेशन) होती है| · 1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है · विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| अवमूल्यन या मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव · इससे निर्यात प्रोत्साहित होता है क्योंकि विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में निर्यातक वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं, · इससे आयात हतोत्साहित होता है क्योंकि घरेलू मुद्रा के संदर्भ में आयातक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, · उपरोक्त दोनों प्रभावों के चलते मूल्यह्रास से व्यापार घाटे एवं चालू खाते के घाटे में गिरावट आती है, · विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में सेवायें सस्ती हो जाने के कारण इससे विदेशी पर्यटन एवं अंतरण अंतर्प्रवाह प्रोत्साहित होता है, · मूलुह्रास की स्थिति में आयात घटने एवं निर्यात के बढ़ने से विदेशी पूँजी भंडार में वृद्धि होती है एवं भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार आता है| यह भुगतान संतुलन की स्थिति में स्वयं सुधार करने में सहायक है अवमूल्यन या मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव · इससे मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है क्योंकि इससे विदेशी पूँजी भण्डार बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति एवं समग्र मांग में वृद्धि होती है| · इसके कारण लागतजन्य मुद्रास्फीति भी उत्पन्न होती है क्योंकि इससे आयातक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है| · इससे घरेलू मुद्रा के सन्दर्भ में बाह्य ऋण का भार बढ़ जाता है क्योंकि इससे रूपये के मान में गिरावट आती है · इससे व्यापार शर्तों पर दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक देश की निर्यातक वस्तुओं का मान, आयातक वस्तुओं की मात्रा के सन्दर्भ में दर्शाता है| इससे संसाधनों का निकास भी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मूल्यह्रास के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं किन्तु दीर्घकाल में इसका प्रभाव प्रायः नकारात्मक होता है| इससे देश की क्रेडिट रेटिंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है|इसके अतिरिक्त मूल्यह्रास देश के संसाधनों के बहिर्प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है| इसलिए मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति के माध्यम से मूल्यह्रास पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है|
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##Question:विनिमय दर प्रणाली और इसके प्रकारोंको परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के पड़ने वालेप्रभाव का आकलन कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10) Define exchange rate system and its types. Along with this, assess the impact of depreciation on an economy. (150-200 words, Marks-10)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिमय दर को परिभाषित करते हुए विनिमय दर प्रणालियों की सूचना दीजिये 2- प्रथम खंड में विनिमय दर प्रणाली के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे खंड में मूल्यह्रास को परिभाषित करते हुए अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में मूल्यह्रास पर नियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाजार विनिमय दर का सम्बन्ध मुद्रा विनिमय से है| किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष किसी मुद्रा का मूल्य बाजार विनिमय दर कहलाता है| दूसरे शब्दों में, किसी मुद्रा की कीमत को अन्य मुद्रा के रूप में व्यक्त करना बाजार विनिमय दर कहलाता है।अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्रायें प्रचलित रहती हैं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व यह समस्या होती है कि मुद्राओं के बीच विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाए| इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो विनिमय दर प्रणालियाँ प्रचलित हैं यथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली एवं परिवर्तनीय विनिमय दर प्रणाली| इन दोनों प्रणालियों में कुछ मूलभूत अंतर हैं| स्थिर विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा की विनिमय दर केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है · चूँकि देश का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर के निर्धारण में हस्तक्षेप करता है इसीलिए इसे प्रबंधित विनिमय दर भी कहते हैं| · केन्द्रीय बैंक जब विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में घरेलू मुद्रा का मान को स्वयं कम करता है या घटाता है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं |भारत में अब तक 1949, 1966 एवं 1991 में तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है · केन्द्रीय बैंक द्वारा घरेलू मुद्रा के विनिमय दर को बढ़ाना अधिमूल्यन कहलाता है, इसे भारत में अभी तक नही किया गया है| · उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के निरंतर विस्तार से विश्व स्तर पर स्थिर विनिमय प्रणाली का उपयोग लगभग बंद हो चुका है तिरती/नम्य विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है · किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| · विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| · इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि(अप्रिसियेशन) होती है| · 1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है · विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| अवमूल्यन या मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव · इससे निर्यात प्रोत्साहित होता है क्योंकि विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में निर्यातक वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं, · इससे आयात हतोत्साहित होता है क्योंकि घरेलू मुद्रा के संदर्भ में आयातक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, · उपरोक्त दोनों प्रभावों के चलते मूल्यह्रास से व्यापार घाटे एवं चालू खाते के घाटे में गिरावट आती है, · विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में सेवायें सस्ती हो जाने के कारण इससे विदेशी पर्यटन एवं अंतरण अंतर्प्रवाह प्रोत्साहित होता है, · मूलुह्रास की स्थिति में आयात घटने एवं निर्यात के बढ़ने से विदेशी पूँजी भंडार में वृद्धि होती है एवं भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार आता है| यह भुगतान संतुलन की स्थिति में स्वयं सुधार करने में सहायक है अवमूल्यन या मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव · इससे मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है क्योंकि इससे विदेशी पूँजी भण्डार बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति एवं समग्र मांग में वृद्धि होती है| · इसके कारण लागतजन्य मुद्रास्फीति भी उत्पन्न होती है क्योंकि इससे आयातक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है| · इससे घरेलू मुद्रा के सन्दर्भ में बाह्य ऋण का भार बढ़ जाता है क्योंकि इससे रूपये के मान में गिरावट आती है · इससे व्यापार शर्तों पर दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक देश की निर्यातक वस्तुओं का मान, आयातक वस्तुओं की मात्रा के सन्दर्भ में दर्शाता है| इससे संसाधनों का निकास भी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मूल्यह्रास के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं किन्तु दीर्घकाल में इसका प्रभाव प्रायः नकारात्मक होता है| इससे देश की क्रेडिट रेटिंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है|इसके अतिरिक्त मूल्यह्रास देश के संसाधनों के बहिर्प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है| इसलिए मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति के माध्यम से मूल्यह्रास पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है|
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संसदीय एवं राष्ट्रपति मूलक या अध्यक्षात्मक प्रणाली में अंतर स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही संसदीय प्रणाली के गुण व दोषों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Differenciate between parliamentary and presidential system. Also, discuss the merits and demerits of the parliamentary system. (150-200 words, Marks-10 )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसदीय एवं राष्ट्रपति मूलक प्रणाली को स्पष्ट करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिये। दोनों व्यवस्था में अंतर स्पष्ट कीजिए। संसदीय प्रणाली के गुणों व दोषों पर चर्चा कीजिए। आधुनिक लोकतान्त्रिक सरकारें, सरकार के कार्यपालिका और विधायिका अंगों के मध्य संबंधो की प्रकृति के आधार पर कार्यपालिका और विधायिका अंगों के मध्य सम्बन्धों की प्रकृति के आधार पर संसदीय और राष्ट्रपति मूलक प्रणाली में वर्गीकृत होती हैं। सरकार की संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका अपने नीतियों और कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती हैं। दूसरी ओर सरकार की राष्ट्रपति शासन व्यवस्था में कार्यपालिका अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और यह संवैधानिक रूप से अपने कार्यकाल के मामले में विधायिका से स्वतंत्र होती है। संसदीय सरकार को कैबिनेट सरकार या उत्तरदायी सरकार भी कहा जाता है दूसरी ओर राष्ट्रपति सरकार को गैर-उत्तरदायी व्यवस्था भी कहा जाता है। संसदीय प्रणाली के गुण: उत्तरदायी सरकार: मंत्रिपरिषद पाने कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।संसद मंत्रियों पर प्रश्न काल, चर्चा, स्थगन प्रस्ताव आदि के माध्यम से नियंत्रण रखती है। यह सरकार के कार्यकारी एवं विधायी अंगों के मध्य सहयोग एवं सहकारी सम्बन्धों को सुनिश्चित करता है। व्यापक प्रतिनिधित्व: संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका लोगों के समूह से गठित होती है। इस प्रकार यह संभव है कि सरकार के सभी वर्गों एवं क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो। निरंकुशता का प्रतिषेध: इस व्यवस्था के तहत कार्यकारी एक समूह में निहित रहती है न कि व्यक्ति में। यह व्यवस्था कार्यपालिका की निरंकुश प्रकृति पर प्रतिबंध लगाती है। संसदीय व्यवस्था के दोष: अस्थिर सरकार: संसदीय व्यवस्था स्थायी सरकार की व्यवस्था नहीं करती है। एक अविश्वास प्रस्ताव या राजनीतिक दल परिवर्तन बहुमत की सरकार को अस्थिर कर सकता है। नीतियों की निश्चितता का अभाव : संसदीय व्यवस्था में दीर्घकालिक नीतियाँ लागू नहीं हो पाती , क्योंकि सरकार के कार्यकाल की अनिश्चितता बनी रहती है। सत्तारूढ़ दल में परिवर्तन से सरकार की नीतियाँ परिवर्तित हो जाती हैं। शक्ति पृथक्करण के विरुद्ध: संसदीय व्यवस्था में विधायिका एवं कार्यपालिका एक साथ और अविभाज्य होते हैं। कैबिनेट कार्यपालिका एवं विधायिका दोनों के मध्य कड़ी की तरह कार्य करता है। संसदीय व्यवस्था प्रशासनिक कुशलता से परिचालित नहीं होती क्योंकि मंत्री अपने क्षेत्र में निपुण नहीं होते। मंत्रियों के चयन सीमित विकल्प होते हैं। इस प्रकार संसदीय एवं राष्ट्रपति मूलक प्रणाली विभिन्न आधारों पर स्वीकार्य है। भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया। इसके लिए इस व्यवस्था से निकटता, उत्तरदायित्व को अधिक वरीयता, भारतीय समाज की प्रकृति आदि को आधार बनाया गया।
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##Question:संसदीय एवं राष्ट्रपति मूलक या अध्यक्षात्मक प्रणाली में अंतर स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही संसदीय प्रणाली के गुण व दोषों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Differenciate between parliamentary and presidential system. Also, discuss the merits and demerits of the parliamentary system. (150-200 words, Marks-10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसदीय एवं राष्ट्रपति मूलक प्रणाली को स्पष्ट करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिये। दोनों व्यवस्था में अंतर स्पष्ट कीजिए। संसदीय प्रणाली के गुणों व दोषों पर चर्चा कीजिए। आधुनिक लोकतान्त्रिक सरकारें, सरकार के कार्यपालिका और विधायिका अंगों के मध्य संबंधो की प्रकृति के आधार पर कार्यपालिका और विधायिका अंगों के मध्य सम्बन्धों की प्रकृति के आधार पर संसदीय और राष्ट्रपति मूलक प्रणाली में वर्गीकृत होती हैं। सरकार की संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका अपने नीतियों और कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती हैं। दूसरी ओर सरकार की राष्ट्रपति शासन व्यवस्था में कार्यपालिका अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और यह संवैधानिक रूप से अपने कार्यकाल के मामले में विधायिका से स्वतंत्र होती है। संसदीय सरकार को कैबिनेट सरकार या उत्तरदायी सरकार भी कहा जाता है दूसरी ओर राष्ट्रपति सरकार को गैर-उत्तरदायी व्यवस्था भी कहा जाता है। संसदीय प्रणाली के गुण: उत्तरदायी सरकार: मंत्रिपरिषद पाने कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।संसद मंत्रियों पर प्रश्न काल, चर्चा, स्थगन प्रस्ताव आदि के माध्यम से नियंत्रण रखती है। यह सरकार के कार्यकारी एवं विधायी अंगों के मध्य सहयोग एवं सहकारी सम्बन्धों को सुनिश्चित करता है। व्यापक प्रतिनिधित्व: संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका लोगों के समूह से गठित होती है। इस प्रकार यह संभव है कि सरकार के सभी वर्गों एवं क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो। निरंकुशता का प्रतिषेध: इस व्यवस्था के तहत कार्यकारी एक समूह में निहित रहती है न कि व्यक्ति में। यह व्यवस्था कार्यपालिका की निरंकुश प्रकृति पर प्रतिबंध लगाती है। संसदीय व्यवस्था के दोष: अस्थिर सरकार: संसदीय व्यवस्था स्थायी सरकार की व्यवस्था नहीं करती है। एक अविश्वास प्रस्ताव या राजनीतिक दल परिवर्तन बहुमत की सरकार को अस्थिर कर सकता है। नीतियों की निश्चितता का अभाव : संसदीय व्यवस्था में दीर्घकालिक नीतियाँ लागू नहीं हो पाती , क्योंकि सरकार के कार्यकाल की अनिश्चितता बनी रहती है। सत्तारूढ़ दल में परिवर्तन से सरकार की नीतियाँ परिवर्तित हो जाती हैं। शक्ति पृथक्करण के विरुद्ध: संसदीय व्यवस्था में विधायिका एवं कार्यपालिका एक साथ और अविभाज्य होते हैं। कैबिनेट कार्यपालिका एवं विधायिका दोनों के मध्य कड़ी की तरह कार्य करता है। संसदीय व्यवस्था प्रशासनिक कुशलता से परिचालित नहीं होती क्योंकि मंत्री अपने क्षेत्र में निपुण नहीं होते। मंत्रियों के चयन सीमित विकल्प होते हैं। इस प्रकार संसदीय एवं राष्ट्रपति मूलक प्रणाली विभिन्न आधारों पर स्वीकार्य है। भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया। इसके लिए इस व्यवस्था से निकटता, उत्तरदायित्व को अधिक वरीयता, भारतीय समाज की प्रकृति आदि को आधार बनाया गया।
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विनिमय दर प्रणाली और इसके प्रकारोंको परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के पड़ने वालेप्रभाव का आकलन कीजिये| (200 शब्द) Define exchange rate system and its types. Along with this, assess the impact of depreciation on an economy. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिमय दर को परिभाषित करते हुए विनिमय दर प्रणालियों की सूचना दीजिये 2- प्रथम खंड में विनिमय दर प्रणाली के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे खंड में मूल्यह्रास को परिभाषित करते हुए अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में मूल्यह्रास पर नियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाजार विनिमय दर का सम्बन्ध मुद्रा विनिमय से है| किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष किसी मुद्रा का मूल्य बाजार विनिमय दर कहलाता है| दूसरे शब्दों में, किसी मुद्रा की कीमत को अन्य मुद्रा के रूप में व्यक्त करना बाजार विनिमय दर कहलाता है।अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्रायें प्रचलित रहती हैं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व यह समस्या होती है कि मुद्राओं के बीच विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाए| इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो विनिमय दर प्रणालियाँ प्रचलित हैं यथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली एवं परिवर्तनीय विनिमय दर प्रणाली| इन दोनों प्रणालियों में कुछ मूलभूत अंतर हैं| स्थिर विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा की विनिमय दर केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है · चूँकि देश का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर के निर्धारण में हस्तक्षेप करता है इसीलिए इसे प्रबंधित विनिमय दर भी कहते हैं| · केन्द्रीय बैंक जब विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में घरेलू मुद्रा का मान को स्वयं कम करता है या घटाता है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं |भारत में अब तक 1949, 1966 एवं 1991 में तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है · केन्द्रीय बैंक द्वारा घरेलू मुद्रा के विनिमय दर को बढ़ाना अधिमूल्यन कहलाता है, इसे भारत में अभी तक नही किया गया है| · उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के निरंतर विस्तार से विश्व स्तर पर स्थिर विनिमय प्रणाली का उपयोग लगभग बंद हो चुका है तिरती/नम्य विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है · किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| · विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| · इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि(अप्रिसियेशन) होती है| · 1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है · विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| अवमूल्यन या मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव · इससे निर्यात प्रोत्साहित होता है क्योंकि विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में निर्यातक वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं, · इससे आयात हतोत्साहित होता है क्योंकि घरेलू मुद्रा के संदर्भ में आयातक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, · उपरोक्त दोनों प्रभावों के चलते मूल्यह्रास से व्यापार घाटे एवं चालू खाते के घाटे में गिरावट आती है, · विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में सेवायें सस्ती हो जाने के कारण इससे विदेशी पर्यटन एवं अंतरण अंतर्प्रवाह प्रोत्साहित होता है, · मूलुह्रास की स्थिति में आयात घटने एवं निर्यात के बढ़ने से विदेशी पूँजी भंडार में वृद्धि होती है एवं भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार आता है| यह भुगतान संतुलन की स्थिति में स्वयं सुधार करने में सहायक है अवमूल्यन या मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव · इससे मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है क्योंकि इससे विदेशी पूँजी भण्डार बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति एवं समग्र मांग में वृद्धि होती है| · इसके कारण लागतजन्य मुद्रास्फीति भी उत्पन्न होती है क्योंकि इससे आयातक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है| · इससे घरेलू मुद्रा के सन्दर्भ में बाह्य ऋण का भार बढ़ जाता है क्योंकि इससे रूपये के मान में गिरावट आती है · इससे व्यापार शर्तों पर दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक देश की निर्यातक वस्तुओं का मान, आयातक वस्तुओं की मात्रा के सन्दर्भ में दर्शाता है| इससे संसाधनों का निकास भी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मूल्यह्रास के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं किन्तु दीर्घकाल में इसका प्रभाव प्रायः नकारात्मक होता है| इससे देश की क्रेडिट रेटिंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है|इसके अतिरिक्त मूल्यह्रास देश के संसाधनों के बहिर्प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है| इसलिए मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति के माध्यम से मूल्यह्रास पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है|
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##Question:विनिमय दर प्रणाली और इसके प्रकारोंको परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के पड़ने वालेप्रभाव का आकलन कीजिये| (200 शब्द) Define exchange rate system and its types. Along with this, assess the impact of depreciation on an economy. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिमय दर को परिभाषित करते हुए विनिमय दर प्रणालियों की सूचना दीजिये 2- प्रथम खंड में विनिमय दर प्रणाली के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे खंड में मूल्यह्रास को परिभाषित करते हुए अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में मूल्यह्रास पर नियंत्रण की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाजार विनिमय दर का सम्बन्ध मुद्रा विनिमय से है| किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष किसी मुद्रा का मूल्य बाजार विनिमय दर कहलाता है| दूसरे शब्दों में, किसी मुद्रा की कीमत को अन्य मुद्रा के रूप में व्यक्त करना बाजार विनिमय दर कहलाता है।अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्रायें प्रचलित रहती हैं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व यह समस्या होती है कि मुद्राओं के बीच विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाए| इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो विनिमय दर प्रणालियाँ प्रचलित हैं यथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली एवं परिवर्तनीय विनिमय दर प्रणाली| इन दोनों प्रणालियों में कुछ मूलभूत अंतर हैं| स्थिर विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा की विनिमय दर केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है · चूँकि देश का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर के निर्धारण में हस्तक्षेप करता है इसीलिए इसे प्रबंधित विनिमय दर भी कहते हैं| · केन्द्रीय बैंक जब विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में घरेलू मुद्रा का मान को स्वयं कम करता है या घटाता है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं |भारत में अब तक 1949, 1966 एवं 1991 में तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है · केन्द्रीय बैंक द्वारा घरेलू मुद्रा के विनिमय दर को बढ़ाना अधिमूल्यन कहलाता है, इसे भारत में अभी तक नही किया गया है| · उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के निरंतर विस्तार से विश्व स्तर पर स्थिर विनिमय प्रणाली का उपयोग लगभग बंद हो चुका है तिरती/नम्य विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है · किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| · विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| · इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि(अप्रिसियेशन) होती है| · 1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है · विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| अवमूल्यन या मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव · इससे निर्यात प्रोत्साहित होता है क्योंकि विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में निर्यातक वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं, · इससे आयात हतोत्साहित होता है क्योंकि घरेलू मुद्रा के संदर्भ में आयातक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, · उपरोक्त दोनों प्रभावों के चलते मूल्यह्रास से व्यापार घाटे एवं चालू खाते के घाटे में गिरावट आती है, · विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में सेवायें सस्ती हो जाने के कारण इससे विदेशी पर्यटन एवं अंतरण अंतर्प्रवाह प्रोत्साहित होता है, · मूलुह्रास की स्थिति में आयात घटने एवं निर्यात के बढ़ने से विदेशी पूँजी भंडार में वृद्धि होती है एवं भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार आता है| यह भुगतान संतुलन की स्थिति में स्वयं सुधार करने में सहायक है अवमूल्यन या मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव · इससे मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है क्योंकि इससे विदेशी पूँजी भण्डार बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति एवं समग्र मांग में वृद्धि होती है| · इसके कारण लागतजन्य मुद्रास्फीति भी उत्पन्न होती है क्योंकि इससे आयातक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है| · इससे घरेलू मुद्रा के सन्दर्भ में बाह्य ऋण का भार बढ़ जाता है क्योंकि इससे रूपये के मान में गिरावट आती है · इससे व्यापार शर्तों पर दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक देश की निर्यातक वस्तुओं का मान, आयातक वस्तुओं की मात्रा के सन्दर्भ में दर्शाता है| इससे संसाधनों का निकास भी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मूल्यह्रास के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं किन्तु दीर्घकाल में इसका प्रभाव प्रायः नकारात्मक होता है| इससे देश की क्रेडिट रेटिंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है|इसके अतिरिक्त मूल्यह्रास देश के संसाधनों के बहिर्प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है| इसलिए मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति के माध्यम से मूल्यह्रास पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है|
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Comment upon the "Right to Die" as a part of the Right to Life under Article 21. (150 words/10 Marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The content of Article 21 -THE IMPORTANT DEVELOPMENTS RELATED TO WHETHER THE RIGHT TO DIE IS A PART OF RIGHT TO LIFE OR NOT -CONCLUSION A comparison with USA and that it still remains an open question for the courts today Answer:- Article 21 states that no person can be deprived of his life and personal liberty, except for by procedure established by law. The fact that whether Right to Life, includes within its scope the right to die or not, was decided through a few cases. -THE IMPORTANT DEVELOPMENTS RELATED TO WHETHER THE RIGHT TO DIE IS A PART OF RIGHT TO LIFE OR NOT 1) THE GYANKAUR CASE In this the Supreme Court stated that Section 309 was valid and not ultra-vires of the constitution, since the Right to Life under Article 21 does include the Right to die. 2) ARUNA SHANBAUG CASE, 2015 Aruna Shanbaug was a nurse in KEM hospital, Mumbai, who had been sexually assaulted and left in a vegetative state in 1973. She was cared for by the hospital and its staff for the next several years. In the year 2010, a petition for euthanasia was moved by NGO for Common Cause in the Bombay High Court, which was later referred to the Supreme Court and argued there. 2.1) There are two types of euthanasia- active and passive. In active euthanasia, the person is deliberately killed. In passive euthanasia, only the life support system is removed so that the person dies. 2.2) In this judgement, the Supreme Court though principally accepted the use of Passive Euthanasia in exceptional circumstances, it refrained from giving a blanket legal status to mercy killing or Active Euthanasia in the absence of any existing strict guidelines or Procedure by any legislative authority in India, since it could lead to the misuse of the same. 3) THE MENTAL HEALTHCARE ACT, 2017 It has effectively decriminalised suicide by stating that such persons committing acts of suicide be treated as mental healthcare patients and therefore not be liable for punishment under Section 309. The above have been the important developments related to right to die as a part of Article 21. In the US, Euthanasia has legal sanction. But in India, as has been noted in the Aruna Shanbaug case, it is yet an open question, that whether the Right to Life in Article 21 includes the Right to Die or not.
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##Question:Comment upon the "Right to Die" as a part of the Right to Life under Article 21. (150 words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The content of Article 21 -THE IMPORTANT DEVELOPMENTS RELATED TO WHETHER THE RIGHT TO DIE IS A PART OF RIGHT TO LIFE OR NOT -CONCLUSION A comparison with USA and that it still remains an open question for the courts today Answer:- Article 21 states that no person can be deprived of his life and personal liberty, except for by procedure established by law. The fact that whether Right to Life, includes within its scope the right to die or not, was decided through a few cases. -THE IMPORTANT DEVELOPMENTS RELATED TO WHETHER THE RIGHT TO DIE IS A PART OF RIGHT TO LIFE OR NOT 1) THE GYANKAUR CASE In this the Supreme Court stated that Section 309 was valid and not ultra-vires of the constitution, since the Right to Life under Article 21 does include the Right to die. 2) ARUNA SHANBAUG CASE, 2015 Aruna Shanbaug was a nurse in KEM hospital, Mumbai, who had been sexually assaulted and left in a vegetative state in 1973. She was cared for by the hospital and its staff for the next several years. In the year 2010, a petition for euthanasia was moved by NGO for Common Cause in the Bombay High Court, which was later referred to the Supreme Court and argued there. 2.1) There are two types of euthanasia- active and passive. In active euthanasia, the person is deliberately killed. In passive euthanasia, only the life support system is removed so that the person dies. 2.2) In this judgement, the Supreme Court though principally accepted the use of Passive Euthanasia in exceptional circumstances, it refrained from giving a blanket legal status to mercy killing or Active Euthanasia in the absence of any existing strict guidelines or Procedure by any legislative authority in India, since it could lead to the misuse of the same. 3) THE MENTAL HEALTHCARE ACT, 2017 It has effectively decriminalised suicide by stating that such persons committing acts of suicide be treated as mental healthcare patients and therefore not be liable for punishment under Section 309. The above have been the important developments related to right to die as a part of Article 21. In the US, Euthanasia has legal sanction. But in India, as has been noted in the Aruna Shanbaug case, it is yet an open question, that whether the Right to Life in Article 21 includes the Right to Die or not.
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भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए विदेशी पूंजी अंतर्प्रवाह महत्वपूर्ण है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के संदर्भ में इस कथन पर आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) Foreign capital inflows are important for the growth of Indian economy. Discuss critically this statement in the context of foreign direct statement. (150-200 words, Marks-10)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पहले कथन को स्पष्ट करते हुए एफ़डीआई का संदर्भ दीजिए। एफ़डीआई के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए इसके बाद एफ़डीआई के नकारात्मक प्रभावों को लिखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। भारत जैसे विकासशील देश में घरेलू बचत एवं पूंजी कम है तथा प्रद्योगिकी इतनी विकसित नहीं है कि संसाधनों का सदुपयोग हो सके अतः अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए अवश्यक है कि बहुत अधिक मात्रा में पूंजी निवेश किया जाए तथा विदेशी पूंजी के अंतर्प्रवाह को प्रोत्साहित किया जाए। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित करता है: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से घरेलू देश में भौतिक पूंजी निर्माण होगा जिसका अनुकूल प्रभाव उत्पादन, आय तथा रोजगार पर होगा। विदेशी कम्पनियाँ पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधकीय एवं उद्यमिता दक्षताएं विपणन रणनीतियां आदि मेजबान देशों में आती हैं यह घरेलू कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करके प्रतिस्पर्द्धा बढाती है जो घरेलू कंपनियों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ने हेतु विवश कर देती है यह उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रकार की विस्तृत वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर उपलब्ध करती है। हालांकि किसी भी अर्थव्यवस्था में एफ़डीआई के अनेक लाभ हैं परंतु सामान्य रूप से देखा जाता है की विदेशी संस्थान व निवेशक अपने निजी हित को अधिक महत्व देते हैं जिसके कारण अनेक प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ते हैं: एफ़डीआई से घरेलू उद्योगों विशेषकर घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह आय की असमानता व क्षेत्रीय विषमता को बढ़ावा देता है। व्यापार में अनियमितता जैसे मामले भी सामने आए हैं जैसे- कर परिहार, डीडीटीए के संबंध में यह बड़ी मात्रा में विभिन्न स्रोतों जैसे कि लाभांश, रॉयलिटी, व्याज आदि के रूप में विदेशी पूंजी का निकास करता है। उपभोक्तावादी प्रकृति को बढ़ावा देता है। विज्ञापनों पर अधिक व्यय, कृत्रिम वस्तु विभेद आदि के कारण बचत एवं पूंजी निर्माण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि भारत जैसे देश में विदेशी पूंजी की प्राप्ति के लिए एफ़डीआई का सर्वाधिक महत्व है। विगत कुछ वर्षों से एफ़डीआई में व्यापक वृद्धि हुई है। जिसका सकारात्मक प्रभाव आर्थिक संवृद्धि के उच्च स्तर के रूप में दिखाई दे रहा है। हालांकि देश में एफ़डीआई के प्रतिकूल प्रभाव भी पड़े हैं जिसमें वैश्विक कारकों पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके साथ आय असमानता को दूर करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में एफ़डीआई की अनुमति को और सुगम बनाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जिसमें एफ़डीआई प्राप्ति की संभावना अधिक है उसमें ऊपरी सीमा को और लचीला बनाना चाहिए जैसे- रक्षा क्षेत्र, रियल स्टेट आदि।
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##Question:भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए विदेशी पूंजी अंतर्प्रवाह महत्वपूर्ण है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के संदर्भ में इस कथन पर आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) Foreign capital inflows are important for the growth of Indian economy. Discuss critically this statement in the context of foreign direct statement. (150-200 words, Marks-10)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पहले कथन को स्पष्ट करते हुए एफ़डीआई का संदर्भ दीजिए। एफ़डीआई के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए इसके बाद एफ़डीआई के नकारात्मक प्रभावों को लिखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। भारत जैसे विकासशील देश में घरेलू बचत एवं पूंजी कम है तथा प्रद्योगिकी इतनी विकसित नहीं है कि संसाधनों का सदुपयोग हो सके अतः अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए अवश्यक है कि बहुत अधिक मात्रा में पूंजी निवेश किया जाए तथा विदेशी पूंजी के अंतर्प्रवाह को प्रोत्साहित किया जाए। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित करता है: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से घरेलू देश में भौतिक पूंजी निर्माण होगा जिसका अनुकूल प्रभाव उत्पादन, आय तथा रोजगार पर होगा। विदेशी कम्पनियाँ पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधकीय एवं उद्यमिता दक्षताएं विपणन रणनीतियां आदि मेजबान देशों में आती हैं यह घरेलू कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करके प्रतिस्पर्द्धा बढाती है जो घरेलू कंपनियों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ने हेतु विवश कर देती है यह उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रकार की विस्तृत वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर उपलब्ध करती है। हालांकि किसी भी अर्थव्यवस्था में एफ़डीआई के अनेक लाभ हैं परंतु सामान्य रूप से देखा जाता है की विदेशी संस्थान व निवेशक अपने निजी हित को अधिक महत्व देते हैं जिसके कारण अनेक प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ते हैं: एफ़डीआई से घरेलू उद्योगों विशेषकर घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह आय की असमानता व क्षेत्रीय विषमता को बढ़ावा देता है। व्यापार में अनियमितता जैसे मामले भी सामने आए हैं जैसे- कर परिहार, डीडीटीए के संबंध में यह बड़ी मात्रा में विभिन्न स्रोतों जैसे कि लाभांश, रॉयलिटी, व्याज आदि के रूप में विदेशी पूंजी का निकास करता है। उपभोक्तावादी प्रकृति को बढ़ावा देता है। विज्ञापनों पर अधिक व्यय, कृत्रिम वस्तु विभेद आदि के कारण बचत एवं पूंजी निर्माण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि भारत जैसे देश में विदेशी पूंजी की प्राप्ति के लिए एफ़डीआई का सर्वाधिक महत्व है। विगत कुछ वर्षों से एफ़डीआई में व्यापक वृद्धि हुई है। जिसका सकारात्मक प्रभाव आर्थिक संवृद्धि के उच्च स्तर के रूप में दिखाई दे रहा है। हालांकि देश में एफ़डीआई के प्रतिकूल प्रभाव भी पड़े हैं जिसमें वैश्विक कारकों पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके साथ आय असमानता को दूर करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में एफ़डीआई की अनुमति को और सुगम बनाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जिसमें एफ़डीआई प्राप्ति की संभावना अधिक है उसमें ऊपरी सीमा को और लचीला बनाना चाहिए जैसे- रक्षा क्षेत्र, रियल स्टेट आदि।
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भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए विदेशी पूंजी अंतर्प्रवाह महत्वपूर्ण है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के संदर्भ में इस कथन पर आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Foreign capital inflows are important for the growth of Indian economy. Discuss critically this statement in the context of foreign direct statement. (200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पहले कथन को स्पष्ट करते हुए एफ़डीआई का संदर्भ दीजिए। एफ़डीआई के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए इसके बाद एफ़डीआई के नकारात्मक प्रभावों को लिखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। भारत जैसे विकासशील देश में घरेलू बचत एवं पूंजी कम है तथा प्रद्योगिकी इतनी विकसित नहीं है कि संसाधनों का सदुपयोग हो सके अतः अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए अवश्यक है कि बहुत अधिक मात्रा में पूंजी निवेश किया जाए तथा विदेशी पूंजी के अंतर्प्रवाह को प्रोत्साहित किया जाए। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित करता है: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से घरेलू देश में भौतिक पूंजी निर्माण होगा जिसका अनुकूल प्रभाव उत्पादन, आय तथा रोजगार पर होगा। विदेशी कम्पनियाँ पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधकीय एवं उद्यमिता दक्षताएं विपणन रणनीतियां आदि मेजबान देशों में आती हैं यह घरेलू कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करके प्रतिस्पर्द्धा बढाती है जो घरेलू कंपनियों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ने हेतु विवश कर देती है यह उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रकार की विस्तृत वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर उपलब्ध करती है। हालांकि किसी भी अर्थव्यवस्था में एफ़डीआई के अनेक लाभ हैं परंतु सामान्य रूप से देखा जाता है की विदेशी संस्थान व निवेशक अपने निजी हित को अधिक महत्व देते हैं जिसके कारण अनेक प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ते हैं: एफ़डीआई से घरेलू उद्योगों विशेषकर घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह आय की असमानता व क्षेत्रीय विषमता को बढ़ावा देता है। व्यापार में अनियमितता जैसे मामले भी सामने आए हैं जैसे- कर परिहार, डीडीटीए के संबंध में यह बड़ी मात्रा में विभिन्न स्रोतों जैसे कि लाभांश, रॉयलिटी, व्याज आदि के रूप में विदेशी पूंजी का निकास करता है। उपभोक्तावादी प्रकृति को बढ़ावा देता है। विज्ञापनों पर अधिक व्यय, कृत्रिम वस्तु विभेद आदि के कारण बचत एवं पूंजी निर्माण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि भारत जैसे देश में विदेशी पूंजी की प्राप्ति के लिए एफ़डीआई का सर्वाधिक महत्व है। विगत कुछ वर्षों से एफ़डीआई में व्यापक वृद्धि हुई है। जिसका सकारात्मक प्रभाव आर्थिक संवृद्धि के उच्च स्तर के रूप में दिखाई दे रहा है। हालांकि देश में एफ़डीआई के प्रतिकूल प्रभाव भी पड़े हैं जिसमें वैश्विक कारकों पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके साथ आय असमानता को दूर करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में एफ़डीआई की अनुमति को और सुगम बनाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जिसमें एफ़डीआई प्राप्ति की संभावना अधिक है उसमें ऊपरी सीमा को और लचीला बनाना चाहिए जैसे- रक्षा क्षेत्र, रियल स्टेट आदि।
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##Question:भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए विदेशी पूंजी अंतर्प्रवाह महत्वपूर्ण है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के संदर्भ में इस कथन पर आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Foreign capital inflows are important for the growth of Indian economy. Discuss critically this statement in the context of foreign direct statement. (200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पहले कथन को स्पष्ट करते हुए एफ़डीआई का संदर्भ दीजिए। एफ़डीआई के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर चर्चा कीजिए इसके बाद एफ़डीआई के नकारात्मक प्रभावों को लिखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। भारत जैसे विकासशील देश में घरेलू बचत एवं पूंजी कम है तथा प्रद्योगिकी इतनी विकसित नहीं है कि संसाधनों का सदुपयोग हो सके अतः अर्थव्यवस्था की संवृद्धि के लिए अवश्यक है कि बहुत अधिक मात्रा में पूंजी निवेश किया जाए तथा विदेशी पूंजी के अंतर्प्रवाह को प्रोत्साहित किया जाए। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है।प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित करता है: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से घरेलू देश में भौतिक पूंजी निर्माण होगा जिसका अनुकूल प्रभाव उत्पादन, आय तथा रोजगार पर होगा। विदेशी कम्पनियाँ पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधकीय एवं उद्यमिता दक्षताएं विपणन रणनीतियां आदि मेजबान देशों में आती हैं यह घरेलू कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करके प्रतिस्पर्द्धा बढाती है जो घरेलू कंपनियों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ने हेतु विवश कर देती है यह उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रकार की विस्तृत वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर उपलब्ध करती है। हालांकि किसी भी अर्थव्यवस्था में एफ़डीआई के अनेक लाभ हैं परंतु सामान्य रूप से देखा जाता है की विदेशी संस्थान व निवेशक अपने निजी हित को अधिक महत्व देते हैं जिसके कारण अनेक प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ते हैं: एफ़डीआई से घरेलू उद्योगों विशेषकर घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह आय की असमानता व क्षेत्रीय विषमता को बढ़ावा देता है। व्यापार में अनियमितता जैसे मामले भी सामने आए हैं जैसे- कर परिहार, डीडीटीए के संबंध में यह बड़ी मात्रा में विभिन्न स्रोतों जैसे कि लाभांश, रॉयलिटी, व्याज आदि के रूप में विदेशी पूंजी का निकास करता है। उपभोक्तावादी प्रकृति को बढ़ावा देता है। विज्ञापनों पर अधिक व्यय, कृत्रिम वस्तु विभेद आदि के कारण बचत एवं पूंजी निर्माण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि भारत जैसे देश में विदेशी पूंजी की प्राप्ति के लिए एफ़डीआई का सर्वाधिक महत्व है। विगत कुछ वर्षों से एफ़डीआई में व्यापक वृद्धि हुई है। जिसका सकारात्मक प्रभाव आर्थिक संवृद्धि के उच्च स्तर के रूप में दिखाई दे रहा है। हालांकि देश में एफ़डीआई के प्रतिकूल प्रभाव भी पड़े हैं जिसमें वैश्विक कारकों पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके साथ आय असमानता को दूर करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में एफ़डीआई की अनुमति को और सुगम बनाना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जिसमें एफ़डीआई प्राप्ति की संभावना अधिक है उसमें ऊपरी सीमा को और लचीला बनाना चाहिए जैसे- रक्षा क्षेत्र, रियल स्टेट आदि।
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भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कथन को स्पष्ट कीजिए।(150-200 शब्द/10 अंक) The cabinet plays an important role in the parliamentary democratic system of India. Elucidate the statement. (150-200 words/10 अंक)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में केबिनेट प्रणाली का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट कीभूमिका का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर कासमापन कीजिए। उत्तर:- केंद्रीय मंत्रिमंडल एक छोटी कार्यकारी निकाय है। यहभारत में सर्वोच्च निर्णय लेने की संस्था हैं। यह मंत्रिपरिषद का एक छोटा रूप होता है। नीति निर्माण, विधान निर्माण, परामर्श इत्यादि विषयों में केबिनेट की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट की भूमिका:- विधायन हेतु प्रस्ताव:- संसदीय मूलक प्रणाली की एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सरकारऔर विधानमंडल के बीच अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट विभाजन नहीं होता जिससे सरकार ही कानून बनाने की पहल करती है। इसके विपरीत राष्ट्रपति मूलक प्रणाली में सत्ता का स्पष्ट विभाजन होने के कारण विधानमंडल कानून बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत करती है। भारत एक संसदीय मूलक प्रणाली है जिसमें केबिनेट ही विधि निर्माण के लिए उत्तरदायी होती है। जब भी किसी विषय पर क़ानून बनाना होता है तो सबसे पहले इसका प्रस्ताव केबिनेट के सामने रखा जाता है। कैबिनेट की स्वीकृति के बाद ही इससे संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किया जाता है। अतः केबिनेट को ही मुख्य विद्यानकर्ता मानाजाता है। प्रमुख परामर्शदायी संस्था:- मंत्रिपरिषद एक बड़ी संस्था है। इसके सदस्य हमेशा राजधानी में उपलब्ध नहीं रहते। पुनः सरकार के प्रायः सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम से संपन्न होते है किन्तु राष्ट्रपति वही करता है जो मंत्रिपरिषद सुझाव देती है। मंत्रिपरिषद में केबिनेट स्तर के मंत्रिओं से बनी संस्था केबिनेट कहलाती है। कैबिनेट के निर्णय ही मंत्री परिषद केनिर्णय मानेजाते है। अतः राष्ट्रपति को वास्तव में केबिनेट ही परामर्श देती है। प्रमुख समन्यक के रूप में:- केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों के बीच तालमेल बनाये रखने के लिए तथा इसी प्रकार राज्य के विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल बनाये रखने के लिए समन्वय की आवश्यकता होती है जो केबिनेट के सहयोग के बिना संभव नहीं है। मुख्य कार्यपालक की भूमिका:- केबिनेट को ही सरकार मानाजाता है अतः देश के संचालनमें जो भी नीतिगत निर्णय लेने होने हैं और उनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करना होता है उसमें केबिनेट की प्रमुख भूमिका होती है उदाहरणके लिए राजनितिक मामलों की केबिनेट समिति जिसकी अध्यक्षता प्रायः प्रधानमंत्री करता है, वह देश के प्रशासन के सम्बंधित सभी महत्वपूर्ण फैसले लेती है इसीलिए इसे सबसे शक्तिशाली केबिनेट समिति माना जाता है। संकट मोचन की भूमिका:- जब भी देश के ऊपर कोई संकट आता है तो केबिनेट ही उसका निवारण करता है। उदाहरण के लिए किसी राष्ट्रीयआपदा, युद्ध, आंतरिक अस्थिरता आदि की स्थिति में इनसे निपटने के लिए केबिनेट को ही उत्तरदायी मानाजाता है जैसे किसी शत्रु देश द्वारा भारत पर युद्ध थोपें जाने की स्थिति में केबिनेट की सिफारिश पर राष्ट्रपति देश में राष्ट्रीय आपात लागू करने की घोषणा करता है। इस प्रकारभारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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##Question:भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कथन को स्पष्ट कीजिए।(150-200 शब्द/10 अंक) The cabinet plays an important role in the parliamentary democratic system of India. Elucidate the statement. (150-200 words/10 अंक)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में केबिनेट प्रणाली का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट कीभूमिका का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर कासमापन कीजिए। उत्तर:- केंद्रीय मंत्रिमंडल एक छोटी कार्यकारी निकाय है। यहभारत में सर्वोच्च निर्णय लेने की संस्था हैं। यह मंत्रिपरिषद का एक छोटा रूप होता है। नीति निर्माण, विधान निर्माण, परामर्श इत्यादि विषयों में केबिनेट की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट की भूमिका:- विधायन हेतु प्रस्ताव:- संसदीय मूलक प्रणाली की एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सरकारऔर विधानमंडल के बीच अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट विभाजन नहीं होता जिससे सरकार ही कानून बनाने की पहल करती है। इसके विपरीत राष्ट्रपति मूलक प्रणाली में सत्ता का स्पष्ट विभाजन होने के कारण विधानमंडल कानून बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत करती है। भारत एक संसदीय मूलक प्रणाली है जिसमें केबिनेट ही विधि निर्माण के लिए उत्तरदायी होती है। जब भी किसी विषय पर क़ानून बनाना होता है तो सबसे पहले इसका प्रस्ताव केबिनेट के सामने रखा जाता है। कैबिनेट की स्वीकृति के बाद ही इससे संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किया जाता है। अतः केबिनेट को ही मुख्य विद्यानकर्ता मानाजाता है। प्रमुख परामर्शदायी संस्था:- मंत्रिपरिषद एक बड़ी संस्था है। इसके सदस्य हमेशा राजधानी में उपलब्ध नहीं रहते। पुनः सरकार के प्रायः सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम से संपन्न होते है किन्तु राष्ट्रपति वही करता है जो मंत्रिपरिषद सुझाव देती है। मंत्रिपरिषद में केबिनेट स्तर के मंत्रिओं से बनी संस्था केबिनेट कहलाती है। कैबिनेट के निर्णय ही मंत्री परिषद केनिर्णय मानेजाते है। अतः राष्ट्रपति को वास्तव में केबिनेट ही परामर्श देती है। प्रमुख समन्यक के रूप में:- केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों के बीच तालमेल बनाये रखने के लिए तथा इसी प्रकार राज्य के विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल बनाये रखने के लिए समन्वय की आवश्यकता होती है जो केबिनेट के सहयोग के बिना संभव नहीं है। मुख्य कार्यपालक की भूमिका:- केबिनेट को ही सरकार मानाजाता है अतः देश के संचालनमें जो भी नीतिगत निर्णय लेने होने हैं और उनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करना होता है उसमें केबिनेट की प्रमुख भूमिका होती है उदाहरणके लिए राजनितिक मामलों की केबिनेट समिति जिसकी अध्यक्षता प्रायः प्रधानमंत्री करता है, वह देश के प्रशासन के सम्बंधित सभी महत्वपूर्ण फैसले लेती है इसीलिए इसे सबसे शक्तिशाली केबिनेट समिति माना जाता है। संकट मोचन की भूमिका:- जब भी देश के ऊपर कोई संकट आता है तो केबिनेट ही उसका निवारण करता है। उदाहरण के लिए किसी राष्ट्रीयआपदा, युद्ध, आंतरिक अस्थिरता आदि की स्थिति में इनसे निपटने के लिए केबिनेट को ही उत्तरदायी मानाजाता है जैसे किसी शत्रु देश द्वारा भारत पर युद्ध थोपें जाने की स्थिति में केबिनेट की सिफारिश पर राष्ट्रपति देश में राष्ट्रीय आपात लागू करने की घोषणा करता है। इस प्रकारभारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में केबिनेट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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Discuss Article 1 of the constitution. Also, state the difference between Article 2 and Article 3 of the constitution of India. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The content of Article 1 - THE VARIOUS NUANCES ASSOCIATED WITH ARTICLE 1 -CONLUSION A concluding remark based upon the preceding analysis along with a comparison with USA Answer:- Article 1 states that India i.e. Bharat is a union of states. Though it is a one line article, there is great depth and meaning to this one lined Article of our constitution. THE VARIOUS NUANCES ASSOCIATED WITH ARTICLE 1 1) FOCUS OF THE ARTICLE AND THE INDIAN UNION The focus is on the union and not on states. 2) DESTRUCTIBLE STATES The states have no security or independence. 3) NO RIGHTS OF SECESSION The term, ‘union of states’, means that the states do not have the right to breakaway or secede from the union. This means that the union is indestructible. 4) STATES FOR ADMINISTRATIVE CONVENIENCE In India, power has been given to the states, solely for administrative convenience and efficiency. However, in USA, power has been given to the states both for administrative convenience, as well as for protecting the identity of the states. 5) THE IMPLICATION AND MEANING OF UNION OF STATES The term only includes the 29 states of the country and excludes the union territories. The term ‘union of states’ also means that only the states take power in the distribution of power with the centre. The union territories are not included in the said expression, because they are not given distribution of power with the centre. 5.1) Rather, the UTs come under the expression ‘territory of India" , which as of now includes the 29 states and the 7 UTs. It may also include any other territory, which may be acquired by the government of India, at any time. THE DIFFERENCES BETWEEN ARTICLE 2 AND ARTICLE 3 OF THE INDIAN CONSTITUTION Article 2- It states that Parliament may by law admit into the union, or establish a state, on such terms as it thinks fit. Article 3- It confers the power on the Parliament to form a new state, by means of separating the territory of any state/ states, or by merging the territories of two or more states, and to change the name, area and boundaries of a state by means of law. Both Articles 2 and 3 deal with the establishment of new states. However, they differ on account of the means used to establish the new states. For example, there is an area outside India, which has been captured by the latter and made a part of India. The Parliament needs to pass a law, as per Article 2, in order to admit it into the territory of India. Chandernagore , for instance, was a French territory. In 1954, it was made a part of India, via a law, under Article 2. On the other hand, via Article 3, an area which is already a territory belonging to India is converted into a state. The source of such territory cannot be foreign land. The laws made by Parliament using Article 2 and Article 3 are not to be considered as constitutional amendments. Due to the above analysis, it can be concluded that India is an indestructible union of destructible states. The US, on the other hand, is an indestructible union of indestructible states.
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##Question:Discuss Article 1 of the constitution. Also, state the difference between Article 2 and Article 3 of the constitution of India. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The content of Article 1 - THE VARIOUS NUANCES ASSOCIATED WITH ARTICLE 1 -CONLUSION A concluding remark based upon the preceding analysis along with a comparison with USA Answer:- Article 1 states that India i.e. Bharat is a union of states. Though it is a one line article, there is great depth and meaning to this one lined Article of our constitution. THE VARIOUS NUANCES ASSOCIATED WITH ARTICLE 1 1) FOCUS OF THE ARTICLE AND THE INDIAN UNION The focus is on the union and not on states. 2) DESTRUCTIBLE STATES The states have no security or independence. 3) NO RIGHTS OF SECESSION The term, ‘union of states’, means that the states do not have the right to breakaway or secede from the union. This means that the union is indestructible. 4) STATES FOR ADMINISTRATIVE CONVENIENCE In India, power has been given to the states, solely for administrative convenience and efficiency. However, in USA, power has been given to the states both for administrative convenience, as well as for protecting the identity of the states. 5) THE IMPLICATION AND MEANING OF UNION OF STATES The term only includes the 29 states of the country and excludes the union territories. The term ‘union of states’ also means that only the states take power in the distribution of power with the centre. The union territories are not included in the said expression, because they are not given distribution of power with the centre. 5.1) Rather, the UTs come under the expression ‘territory of India" , which as of now includes the 29 states and the 7 UTs. It may also include any other territory, which may be acquired by the government of India, at any time. THE DIFFERENCES BETWEEN ARTICLE 2 AND ARTICLE 3 OF THE INDIAN CONSTITUTION Article 2- It states that Parliament may by law admit into the union, or establish a state, on such terms as it thinks fit. Article 3- It confers the power on the Parliament to form a new state, by means of separating the territory of any state/ states, or by merging the territories of two or more states, and to change the name, area and boundaries of a state by means of law. Both Articles 2 and 3 deal with the establishment of new states. However, they differ on account of the means used to establish the new states. For example, there is an area outside India, which has been captured by the latter and made a part of India. The Parliament needs to pass a law, as per Article 2, in order to admit it into the territory of India. Chandernagore , for instance, was a French territory. In 1954, it was made a part of India, via a law, under Article 2. On the other hand, via Article 3, an area which is already a territory belonging to India is converted into a state. The source of such territory cannot be foreign land. The laws made by Parliament using Article 2 and Article 3 are not to be considered as constitutional amendments. Due to the above analysis, it can be concluded that India is an indestructible union of destructible states. The US, on the other hand, is an indestructible union of indestructible states.
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पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये| पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियों को देखते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनो की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10) Explain the major sources of portfolio investment. Considering the challenges of portfolio investment, discuss the significant corrective changes made by SEBI over the years. (150-200 words, Marks-10)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में पोर्टफोलियो निवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये 3- दूसरे भाग में पोर्टफोलियो निवेश की कुछ चुनौतियों की चर्चा करते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गए महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पोर्टफोलियो निवेश ऐसे निवेश हैं जिसमें एक निवेशक बांड एवं प्रतिभूतियों में निवेश करता है| पोर्टफोलियो निवेश, NRI जमायें, अल्पकालिक ऋण वह विदेशी पूँजी होती है जिसका अल्पकाल में निकास हो सकता है इसीलिए इनको हॉट मनी भी कहा जाता है|अल्पकालिक प्रवाह पोर्टफोलियो निवेश की प्रमुख विशेषता मानी जाती है क्योंकि ये किसी टिकाऊ व्यवसाय में निवेशित नहीं किये गए होते है| भारत का अधिकाँश विदेशी निवेश पोर्टफोलियो निवेश के रूप में ही आता है| पोर्टफोलियो निवेश के आगमन के अनेक स्रोत होते हैं|पोर्टफोलियो निवेश के स्रोतों को मुख्यतः दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है यथा; पोर्टफोलियो निवेश योजना एवं यूरो इश्यूज| पोर्टफोलियो निवेश योजना विदेशी संस्थागत निवेशक(FII) ये कुछ संस्थान होते है जो विदेशी वित्तीय बाजारों में प्रतिभूतियां क्रय-विक्रय करते हैं जैसे कि वित्तीय संस्थान,अर्धसरकारी संस्थान,अन्तराष्ट्रीय संगठन आदि, भारत में अधिकाँश विदेशी निवेश FII के माध्यम से आता है पार्टिसिपेटरी नोट्स, व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं जो एक FII द्वारा घरेलू कम्पनियों की प्रतिभूतियों के आधार पर विदेशी व्यक्तिगत निवेशकों को जारी की जाती है, क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) यह उन देशों के निवासी होते हैं जो देश फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) के नियमों का पालन करता हो एवं IOSCO के बहुपक्षीय समझौते का हस्ताक्षरकर्ता हो क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) भारत में सीधे निवेश कर सकते हैं, अनिवासी भारतीय (NRI) अनिवासी भारतीय पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं NRI के साथ ही OCI, PIO भी पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं यूरो इशू, एक कम्पनी द्वारा अपनी प्रतिभूतियां विदेश में जारी करने की प्रक्रिया को यूरो निर्गमन कहते हैं| यूरो निर्गमन GDR, ADR एवं FCCB के रूप में होते हैं ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट(GDR) यह एक व्युत्पन्न प्रतिभूति होती है, पार्टिसिपेटरी नोट्स के विपरीत यह पूर्णतः औपचारिक व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं इसे किसी भारतीय/घरेलू कम्पनी की प्रतिभूति/अंश के बदले एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक द्वारा विदेशी निवेशकों के लिए जारी की जाती है ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीटका स्टॉक एक्सचेंज में क्रय-विक्रय किया जा सकता है अमेरिकनडिपोजिटरी रिसीट(ADR) यहडिपोजिटरी रिसीट होती है जो USA में जारी की जाती है इनका क्रय-विक्रय केवल अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में ही हो सकता है विदेशी करेंसी परिवर्तनीय बांड(FCCB) यह परिवर्तनीय ऋणपत्र होते हैं जो एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक के माध्यम से विदेश में जारी किये जाते हैं यह भी पोर्टफोलियो निवेश का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियां पार्टिसिपेटरी नोट्स में निवेशकर्ता की पहचान नही हो पाती, पोर्टफोलियो निवेश कालेधन के निवेश का माध्यम बन सकता है, ये अर्थव्यवस्था में वित्तीय अस्थिरता उत्पन्न करने में योगदान दे सकते हैं, ये स्टॉक एक्सचेंज में त्वरित उतार चढ़ाव लाने के लिए उत्तरदायी होते हैं जिसका अर्थव्यवस्था की रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| इन्ही जोखिमों को देखते हुए निकट वर्षों में SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन किये गए हैं| SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशें (2013) रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें SEBI द्वारा 2014 से लागू की गयीं FII, पार्टिसिपेटरी नोट्स एवं QFI का विलय करके एक निवेशक श्रेणी "विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI)" के रूप में वर्गीकृत करना चाहिए,इससे तीनों श्रेणियों के लिए मानदंडों में समानता आएगी FPI को जोखिम के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करना चाहिए यथा कम जोखिम(सरकारी जैसे SWF), मध्य जोखिम(म्यूच्यूअल फंड, बीमा) एवं अधिक जोखिम(हेज फंड) इनके लिए नो योर क्लाइंट(KYC) मानदंड जोखिम पर आधारित होंगे, अर्थात श्रेणी FPI हेतु सरल एवं श्रेणी 3 के FPI हेतु जटिल एक FPI किसी एक कंपनी का अधिकतम 10 % शेयर खरीद सकता है सेबी दिशा निर्देश अप्रैल 2018 NRI, PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR), FPI के माध्यम से निवेश नहीं कर सकते हैं क्योंकि इनको सीधे निवेश की अनुमति है दिशा निर्देशों में KYC नियमों को जटिल/अधिक स्पष्ट किया गया अर्थात FPI द्वारा उनके बेनेफिसिअल/लाभान्वित स्वामी की सूचना जैसे उनकी नागरिकता, कर प्राधिकरण, परिसंपत्ति/निवेश, पहचान संख्या आदि की सूचना देनी होगी इन निर्देशों का 6 महीने के भीतर अनुपालन करना अनिवार्य होगा अन्यथा निवेशक को अपने निवेश का आहरण करना होगा KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशों और सेबी के इन दिशा निर्देशों के प्रभाव स्वरुप बड़ी मात्रा में पोर्टफोलियो निवेश भारत से बाहर जाने लगा और इसी समय भारतीय रुपया मूल्यह्रास का सामना कर रहा था अतः नियमों को उदार बनाने के लिए HR खान समिति गठित की गयी|HR खान समिति ने पोर्टफोलियो निवेश के लिए मानदंडों को उदारीकृत करने वाली संस्तुतियां प्रस्तुत की हैं जैसे NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) एक FPI के कुल निवेश का 25 % तक निवेश कर सकता हैं| NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) के द्वारा FPI का प्रबंधन नही होना चाहिए| समिति द्वारा KYC मानदंडों की जटिलता को कुछ कम किया गया है| समिति के अनुसार सेबी के दिशा निर्देशों के अनुपालन हेतु समयावधि को दिसम्बर 2018 से 6 महीने और बढ़ाकर जून 2019 कर देना चाहिए| जो FPI अनुपालन नही कर पाते उनके द्वारा निवेश निकासी की समयावधि दिसम्बर 2019 तक बढ़ा देनी चाहिए| पोर्टफोलियो निवेश के सन्दर्भ में अभी इन्ही संस्तुतियों को सेबी द्वारा लागू किया गया है|
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##Question:पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये| पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियों को देखते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनो की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10) Explain the major sources of portfolio investment. Considering the challenges of portfolio investment, discuss the significant corrective changes made by SEBI over the years. (150-200 words, Marks-10)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पोर्टफोलियो निवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये 3- दूसरे भाग में पोर्टफोलियो निवेश की कुछ चुनौतियों की चर्चा करते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गए महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पोर्टफोलियो निवेश ऐसे निवेश हैं जिसमें एक निवेशक बांड एवं प्रतिभूतियों में निवेश करता है| पोर्टफोलियो निवेश, NRI जमायें, अल्पकालिक ऋण वह विदेशी पूँजी होती है जिसका अल्पकाल में निकास हो सकता है इसीलिए इनको हॉट मनी भी कहा जाता है|अल्पकालिक प्रवाह पोर्टफोलियो निवेश की प्रमुख विशेषता मानी जाती है क्योंकि ये किसी टिकाऊ व्यवसाय में निवेशित नहीं किये गए होते है| भारत का अधिकाँश विदेशी निवेश पोर्टफोलियो निवेश के रूप में ही आता है| पोर्टफोलियो निवेश के आगमन के अनेक स्रोत होते हैं|पोर्टफोलियो निवेश के स्रोतों को मुख्यतः दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है यथा; पोर्टफोलियो निवेश योजना एवं यूरो इश्यूज| पोर्टफोलियो निवेश योजना विदेशी संस्थागत निवेशक(FII) ये कुछ संस्थान होते है जो विदेशी वित्तीय बाजारों में प्रतिभूतियां क्रय-विक्रय करते हैं जैसे कि वित्तीय संस्थान,अर्धसरकारी संस्थान,अन्तराष्ट्रीय संगठन आदि, भारत में अधिकाँश विदेशी निवेश FII के माध्यम से आता है पार्टिसिपेटरी नोट्स, व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं जो एक FII द्वारा घरेलू कम्पनियों की प्रतिभूतियों के आधार पर विदेशी व्यक्तिगत निवेशकों को जारी की जाती है, क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) यह उन देशों के निवासी होते हैं जो देश फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) के नियमों का पालन करता हो एवं IOSCO के बहुपक्षीय समझौते का हस्ताक्षरकर्ता हो क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) भारत में सीधे निवेश कर सकते हैं, अनिवासी भारतीय (NRI) अनिवासी भारतीय पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं NRI के साथ ही OCI, PIO भी पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं यूरो इशू, एक कम्पनी द्वारा अपनी प्रतिभूतियां विदेश में जारी करने की प्रक्रिया को यूरो निर्गमन कहते हैं| यूरो निर्गमन GDR, ADR एवं FCCB के रूप में होते हैं ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट(GDR) यह एक व्युत्पन्न प्रतिभूति होती है, पार्टिसिपेटरी नोट्स के विपरीत यह पूर्णतः औपचारिक व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं इसे किसी भारतीय/घरेलू कम्पनी की प्रतिभूति/अंश के बदले एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक द्वारा विदेशी निवेशकों के लिए जारी की जाती है ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीटका स्टॉक एक्सचेंज में क्रय-विक्रय किया जा सकता है अमेरिकनडिपोजिटरी रिसीट(ADR) यहडिपोजिटरी रिसीट होती है जो USA में जारी की जाती है इनका क्रय-विक्रय केवल अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में ही हो सकता है विदेशी करेंसी परिवर्तनीय बांड(FCCB) यह परिवर्तनीय ऋणपत्र होते हैं जो एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक के माध्यम से विदेश में जारी किये जाते हैं यह भी पोर्टफोलियो निवेश का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियां पार्टिसिपेटरी नोट्स में निवेशकर्ता की पहचान नही हो पाती, पोर्टफोलियो निवेश कालेधन के निवेश का माध्यम बन सकता है, ये अर्थव्यवस्था में वित्तीय अस्थिरता उत्पन्न करने में योगदान दे सकते हैं, ये स्टॉक एक्सचेंज में त्वरित उतार चढ़ाव लाने के लिए उत्तरदायी होते हैं जिसका अर्थव्यवस्था की रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| इन्ही जोखिमों को देखते हुए निकट वर्षों में SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन किये गए हैं| SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशें (2013) रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें SEBI द्वारा 2014 से लागू की गयीं FII, पार्टिसिपेटरी नोट्स एवं QFI का विलय करके एक निवेशक श्रेणी "विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI)" के रूप में वर्गीकृत करना चाहिए,इससे तीनों श्रेणियों के लिए मानदंडों में समानता आएगी FPI को जोखिम के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करना चाहिए यथा कम जोखिम(सरकारी जैसे SWF), मध्य जोखिम(म्यूच्यूअल फंड, बीमा) एवं अधिक जोखिम(हेज फंड) इनके लिए नो योर क्लाइंट(KYC) मानदंड जोखिम पर आधारित होंगे, अर्थात श्रेणी FPI हेतु सरल एवं श्रेणी 3 के FPI हेतु जटिल एक FPI किसी एक कंपनी का अधिकतम 10 % शेयर खरीद सकता है सेबी दिशा निर्देश अप्रैल 2018 NRI, PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR), FPI के माध्यम से निवेश नहीं कर सकते हैं क्योंकि इनको सीधे निवेश की अनुमति है दिशा निर्देशों में KYC नियमों को जटिल/अधिक स्पष्ट किया गया अर्थात FPI द्वारा उनके बेनेफिसिअल/लाभान्वित स्वामी की सूचना जैसे उनकी नागरिकता, कर प्राधिकरण, परिसंपत्ति/निवेश, पहचान संख्या आदि की सूचना देनी होगी इन निर्देशों का 6 महीने के भीतर अनुपालन करना अनिवार्य होगा अन्यथा निवेशक को अपने निवेश का आहरण करना होगा KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशों और सेबी के इन दिशा निर्देशों के प्रभाव स्वरुप बड़ी मात्रा में पोर्टफोलियो निवेश भारत से बाहर जाने लगा और इसी समय भारतीय रुपया मूल्यह्रास का सामना कर रहा था अतः नियमों को उदार बनाने के लिए HR खान समिति गठित की गयी|HR खान समिति ने पोर्टफोलियो निवेश के लिए मानदंडों को उदारीकृत करने वाली संस्तुतियां प्रस्तुत की हैं जैसे NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) एक FPI के कुल निवेश का 25 % तक निवेश कर सकता हैं| NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) के द्वारा FPI का प्रबंधन नही होना चाहिए| समिति द्वारा KYC मानदंडों की जटिलता को कुछ कम किया गया है| समिति के अनुसार सेबी के दिशा निर्देशों के अनुपालन हेतु समयावधि को दिसम्बर 2018 से 6 महीने और बढ़ाकर जून 2019 कर देना चाहिए| जो FPI अनुपालन नही कर पाते उनके द्वारा निवेश निकासी की समयावधि दिसम्बर 2019 तक बढ़ा देनी चाहिए| पोर्टफोलियो निवेश के सन्दर्भ में अभी इन्ही संस्तुतियों को सेबी द्वारा लागू किया गया है|
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पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये| पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियों को देखते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनो की चर्चा कीजिये| (200 शब्द) Explain the major sources of portfolio investment. Considering the challenges of portfolio investment, discuss the significant corrective changes made by SEBI over the years. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में पोर्टफोलियो निवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये 3- दूसरे भाग में पोर्टफोलियो निवेश की कुछ चुनौतियों की चर्चा करते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गए महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पोर्टफोलियो निवेश ऐसे निवेश हैं जिसमें एक निवेशक बांड एवं प्रतिभूतियों में निवेश करता है| पोर्टफोलियो निवेश, NRI जमायें, अल्पकालिक ऋण वह विदेशी पूँजी होती है जिसका अल्पकाल में निकास हो सकता है इसीलिए इनको हॉट मनी भी कहा जाता है|अल्पकालिक प्रवाह पोर्टफोलियो निवेश की प्रमुख विशेषता मानी जाती है क्योंकि ये किसी टिकाऊ व्यवसाय में निवेशित नहीं किये गए होते है| भारत का अधिकाँश विदेशी निवेश पोर्टफोलियो निवेश के रूप में ही आता है| पोर्टफोलियो निवेश के आगमन के अनेक स्रोत होते हैं|पोर्टफोलियो निवेश के स्रोतों को मुख्यतः दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है यथा; पोर्टफोलियो निवेश योजना एवं यूरो इश्यूज| पोर्टफोलियो निवेश योजना विदेशी संस्थागत निवेशक(FII) ये कुछ संस्थान होते है जो विदेशी वित्तीय बाजारों में प्रतिभूतियां क्रय-विक्रय करते हैं जैसे कि वितीय संस्थान,अर्धसरकारी संस्थान,अन्तराष्ट्रीय संगठन आदि, भारत में अधिकाँश विदेशी निवेश FII के माध्यम से आता है पार्टिसिपेटरी नोट्स, व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं जो एक FII द्वारा घरेलू कम्पनियों की प्रतिभूतियों के आधार पर विदेशी व्यक्तिगत निवेशकों को जारी की जाती है, क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) यह उन देशों के निवासी होते हैं जो देश फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) के नियमों का पालन करता हो एवं IOSCO के बहुपक्षीय समझौते का हस्ताक्षरकर्ता हो क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) भारत में सीधे निवेश कर सकते हैं, अनिवासी भारतीय (NRI) अनिवासी भारतीय पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं NRI के साथ ही OCI, PIO भी पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं यूरो इशू, एक कम्पनी द्वारा अपनी प्रतिभूतियां विदेश में जारी करने की प्रक्रिया को यूरो निर्गमन कहते हैं| यूरो निर्गमन GDR, ADR एवं FCCB के रूप में होते हैं ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट(GDR) यह एक व्युत्पन्न प्रतिभूति होती है, पार्टिसिपेटरी नोट्स के विपरीत यह पूर्णतः औपचारिक व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं इसे किसी भारतीय/घरेलू कम्पनी की प्रतिभूति/अंश के बदले एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक द्वारा विदेशी निवेशकों के लिए जारी की जाती है ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीटका स्टॉक एक्सचेंज में क्रय-विक्रय किया जा सकता है अमेरिकनडिपोजिटरी रिसीट(ADR) यहडिपोजिटरी रिसीट होती है जो USA में जारी की जाती है इनका क्रय-विक्रय केवल अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में ही हो सकता है विदेशी करेंसी परिवर्तनीय बांड(FCCB) यह परिवर्तनीय ऋणपत्र होते हैं जो एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक के माध्यम से विदेश में जारी किये जाते हैं यह भी पोर्टफोलियो निवेश का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियां पार्टिसिपेटरी नोट्स में निवेशकर्ता की पहचान नही हो पाती, पोर्टफोलियो निवेश कालेधन के निवेश का माध्यम बन सकता है, ये अर्थव्यवस्था में वित्तीय अस्थिरता उत्पन्न करने में योगदान दे सकते हैं, ये स्टॉक एक्सचेंज में त्वरित उतार चढ़ाव लाने के लिए उत्तरदायी होते हैं जिसका अर्थव्यवस्था की रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| इन्ही जोखिमों को देखते हुए निकट वर्षों में SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन किये गए हैं| SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशें (2013) रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें SEBI द्वारा 2014 से लागू की गयीं FII, पार्टिसिपेटरी नोट्स एवं QFI का विलय करके एक निवेशक श्रेणी "विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI)" के रूप में वर्गीकृत करना चाहिए,इससे तीनों श्रेणियों के लिए मानदंडों में समानता आएगी FPI को जोखिम के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करना चाहिए यथा कम जोखिम(सरकारी जैसे SWF), मध्य जोखिम(म्यूच्यूअल फंड, बीमा) एवं अधिक जोखिम(हेज फंड) इनके लिए नो योर क्लाइंट(KYC) मानदंड जोखिम पर आधारित होंगे, अर्थात श्रेणी FPI हेतु सरल एवं श्रेणी 3 के FPI हेतु जटिल एक FPI किसी एक कंपनी का अधिकतम 10 % शेयर खरीद सकता है सेबी दिशा निर्देश अप्रैल 2018 NRI, PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR), FPI के माध्यम से निवेश नहीं कर सकते हैं क्योंकि इनको सीधे निवेश की अनुमति है दिशा निर्देशों में KYC नियमों को जटिल/अधिक स्पष्ट किया गया अर्थात FPI द्वारा उनके बेनेफिसिअल/लाभान्वित स्वामी की सूचना जैसे उनकी नागरिकता, कर प्राधिकरण, परिसंपत्ति/निवेश, पहचान संख्या आदि की सूचना देनी होगी इन निर्देशों का 6 महीने के भीतर अनुपालन करना अनिवार्य होगा अन्यथा निवेशक को अपने निवेश का आहरण करना होगा KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशों और सेबी के इन दिशा निर्देशों के प्रभाव स्वरुप बड़ी मात्रा में पोर्टफोलियो निवेश भारत से बाहर जाने लगा और इसी समय भारतीय रुपया मूल्यह्रास का सामना कर रहा था अतः नियमों को उदार बनाने के लिए HR खान समिति गठित की गयी|HR खान समिति ने पोर्टफोलियो निवेश के लिए मानदंडों को उदारीकृत करने वाली संस्तुतियां प्रस्तुत की हैं जैसे NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) एक FPI के कुल निवेश का 25 % तक निवेश कर सकता हैं| NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) के द्वारा FPI का प्रबंधन नही होना चाहिए| समिति द्वारा KYC मानदंडों की जटिलता को कुछ कम किया गया है| समिति के अनुसार सेबी के दिशा निर्देशों के अनुपालन हेतु समयावधि को दिसम्बर 2018 से 6 महीने और बढ़ाकर जून 2019 कर देना चाहिए| जो FPI अनुपालन नही कर पाते उनके द्वारा निवेश निकासी की समयावधि दिसम्बर 2019 तक बढ़ा देनी चाहिए| पोर्टफोलियो निवेश के सन्दर्भ में अभी इन्ही संस्तुतियों को सेबी द्वारा लागू किया गया है|
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##Question:पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये| पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियों को देखते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनो की चर्चा कीजिये| (200 शब्द) Explain the major sources of portfolio investment. Considering the challenges of portfolio investment, discuss the significant corrective changes made by SEBI over the years. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पोर्टफोलियो निवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पोर्टफोलियो निवेश के प्रमुख स्रोतों की व्याख्या कीजिये 3- दूसरे भाग में पोर्टफोलियो निवेश की कुछ चुनौतियों की चर्चा करते हुए निकट वर्षों में सेबी द्वारा किये गए महत्वपूर्ण सुधारात्मक परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पोर्टफोलियो निवेश ऐसे निवेश हैं जिसमें एक निवेशक बांड एवं प्रतिभूतियों में निवेश करता है| पोर्टफोलियो निवेश, NRI जमायें, अल्पकालिक ऋण वह विदेशी पूँजी होती है जिसका अल्पकाल में निकास हो सकता है इसीलिए इनको हॉट मनी भी कहा जाता है|अल्पकालिक प्रवाह पोर्टफोलियो निवेश की प्रमुख विशेषता मानी जाती है क्योंकि ये किसी टिकाऊ व्यवसाय में निवेशित नहीं किये गए होते है| भारत का अधिकाँश विदेशी निवेश पोर्टफोलियो निवेश के रूप में ही आता है| पोर्टफोलियो निवेश के आगमन के अनेक स्रोत होते हैं|पोर्टफोलियो निवेश के स्रोतों को मुख्यतः दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है यथा; पोर्टफोलियो निवेश योजना एवं यूरो इश्यूज| पोर्टफोलियो निवेश योजना विदेशी संस्थागत निवेशक(FII) ये कुछ संस्थान होते है जो विदेशी वित्तीय बाजारों में प्रतिभूतियां क्रय-विक्रय करते हैं जैसे कि वितीय संस्थान,अर्धसरकारी संस्थान,अन्तराष्ट्रीय संगठन आदि, भारत में अधिकाँश विदेशी निवेश FII के माध्यम से आता है पार्टिसिपेटरी नोट्स, व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं जो एक FII द्वारा घरेलू कम्पनियों की प्रतिभूतियों के आधार पर विदेशी व्यक्तिगत निवेशकों को जारी की जाती है, क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) यह उन देशों के निवासी होते हैं जो देश फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) के नियमों का पालन करता हो एवं IOSCO के बहुपक्षीय समझौते का हस्ताक्षरकर्ता हो क्वालिफाइड विदेशी निवेशक(QFI) भारत में सीधे निवेश कर सकते हैं, अनिवासी भारतीय (NRI) अनिवासी भारतीय पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं NRI के साथ ही OCI, PIO भी पोर्टफोलियो निवेश योजना में पोर्टफोलियो निवेश कर सकते हैं यूरो इशू, एक कम्पनी द्वारा अपनी प्रतिभूतियां विदेश में जारी करने की प्रक्रिया को यूरो निर्गमन कहते हैं| यूरो निर्गमन GDR, ADR एवं FCCB के रूप में होते हैं ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट(GDR) यह एक व्युत्पन्न प्रतिभूति होती है, पार्टिसिपेटरी नोट्स के विपरीत यह पूर्णतः औपचारिक व्युत्पन्न प्रतिभूतियां होती हैं इसे किसी भारतीय/घरेलू कम्पनी की प्रतिभूति/अंश के बदले एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक द्वारा विदेशी निवेशकों के लिए जारी की जाती है ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीटका स्टॉक एक्सचेंज में क्रय-विक्रय किया जा सकता है अमेरिकनडिपोजिटरी रिसीट(ADR) यहडिपोजिटरी रिसीट होती है जो USA में जारी की जाती है इनका क्रय-विक्रय केवल अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में ही हो सकता है विदेशी करेंसी परिवर्तनीय बांड(FCCB) यह परिवर्तनीय ऋणपत्र होते हैं जो एक विदेशीडिपोजिटरी बैंक के माध्यम से विदेश में जारी किये जाते हैं यह भी पोर्टफोलियो निवेश का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं पोर्टफोलियो निवेश की चुनौतियां पार्टिसिपेटरी नोट्स में निवेशकर्ता की पहचान नही हो पाती, पोर्टफोलियो निवेश कालेधन के निवेश का माध्यम बन सकता है, ये अर्थव्यवस्था में वित्तीय अस्थिरता उत्पन्न करने में योगदान दे सकते हैं, ये स्टॉक एक्सचेंज में त्वरित उतार चढ़ाव लाने के लिए उत्तरदायी होते हैं जिसका अर्थव्यवस्था की रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| इन्ही जोखिमों को देखते हुए निकट वर्षों में SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन किये गए हैं| SEBI द्वारा कुछ सुधारात्मक परिवर्तन KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशें (2013) रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें SEBI द्वारा 2014 से लागू की गयीं FII, पार्टिसिपेटरी नोट्स एवं QFI का विलय करके एक निवेशक श्रेणी "विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI)" के रूप में वर्गीकृत करना चाहिए,इससे तीनों श्रेणियों के लिए मानदंडों में समानता आएगी FPI को जोखिम के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करना चाहिए यथा कम जोखिम(सरकारी जैसे SWF), मध्य जोखिम(म्यूच्यूअल फंड, बीमा) एवं अधिक जोखिम(हेज फंड) इनके लिए नो योर क्लाइंट(KYC) मानदंड जोखिम पर आधारित होंगे, अर्थात श्रेणी FPI हेतु सरल एवं श्रेणी 3 के FPI हेतु जटिल एक FPI किसी एक कंपनी का अधिकतम 10 % शेयर खरीद सकता है सेबी दिशा निर्देश अप्रैल 2018 NRI, PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR), FPI के माध्यम से निवेश नहीं कर सकते हैं क्योंकि इनको सीधे निवेश की अनुमति है दिशा निर्देशों में KYC नियमों को जटिल/अधिक स्पष्ट किया गया अर्थात FPI द्वारा उनके बेनेफिसिअल/लाभान्वित स्वामी की सूचना जैसे उनकी नागरिकता, कर प्राधिकरण, परिसंपत्ति/निवेश, पहचान संख्या आदि की सूचना देनी होगी इन निर्देशों का 6 महीने के भीतर अनुपालन करना अनिवार्य होगा अन्यथा निवेशक को अपने निवेश का आहरण करना होगा KM चन्द्रशेखर समिति की सिफारिशों और सेबी के इन दिशा निर्देशों के प्रभाव स्वरुप बड़ी मात्रा में पोर्टफोलियो निवेश भारत से बाहर जाने लगा और इसी समय भारतीय रुपया मूल्यह्रास का सामना कर रहा था अतः नियमों को उदार बनाने के लिए HR खान समिति गठित की गयी|HR खान समिति ने पोर्टफोलियो निवेश के लिए मानदंडों को उदारीकृत करने वाली संस्तुतियां प्रस्तुत की हैं जैसे NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) एक FPI के कुल निवेश का 25 % तक निवेश कर सकता हैं| NRI,PIO,OCI और भारतीय निवासी(IR) के द्वारा FPI का प्रबंधन नही होना चाहिए| समिति द्वारा KYC मानदंडों की जटिलता को कुछ कम किया गया है| समिति के अनुसार सेबी के दिशा निर्देशों के अनुपालन हेतु समयावधि को दिसम्बर 2018 से 6 महीने और बढ़ाकर जून 2019 कर देना चाहिए| जो FPI अनुपालन नही कर पाते उनके द्वारा निवेश निकासी की समयावधि दिसम्बर 2019 तक बढ़ा देनी चाहिए| पोर्टफोलियो निवेश के सन्दर्भ में अभी इन्ही संस्तुतियों को सेबी द्वारा लागू किया गया है|
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Discuss the reasons behind the decline of the mughal empire in the 18th century. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION The meaning of the question has been explained in the introduction- i.e. the decline of the Mughals - THE DECLINE OF THE MUGHALS - CONCLUSION A concluding remark Answer:-When the transfer of title was made to Queen Elizabeth of London, it was only a nominal transfer of power from the Mughals to the British rather than any real one. This is because the decline of the Mughals in favour of the British had already started in the 18th century, along with their complete gradual decline by the time of the Revolt of 1857. By 1857, only nominal powers were left in the hands of the Mughals, like coins issued in their name, royal titles etc. However, effectively their powers had declined significantly THE DECLINE OF THE MUGHALS 1) THE FAULTY POLICIES OF AURANGZEB For example, Aurangzeb followed an anti-Rajput policy. Also, there were many peasant and zamindar revolts during his time. 1.1) He followed expansionist campaigns against Ahmadnagar, Bijapur and Golconda. He also followed expansionist campaigns against the Marathas. 2) WEAK CENTRE There were constant wars of succession along with a weak centre. This led to vested interests and the oppressed factions in the Empire to take advantage of the situation. 3) LACK OF MODERNIZATION In the technology field as well as the military field, there were no new modern weapons made. This field was ignored in terms of modernisation of forces. This resulted in even more peasant rebellions. 4) MARATHA PLUNDER In 1738, for instance, the Marathas plundered Delhi. Such plundering and wars led to the further weakening of the Empire. 5) EXTERNAL INVASIONS Ahmad Shah Abdali, Nadir Shah plundered the country and looted the Empire. This led to a huge decrease in prestige for the Mughal Empire. For example, in the first Battle of Panipat fought in 1761, Ahmad Shah Abdali won. 6) CRISIS OF PERSONALITY It is not correct to say that there was a crisis of personality because there was no dearth of talent. There were quite strong administrators. It is true that there were weak emperors, but other factors are always responsible for such cases. 6.1) For example, Nizam-ul-Mulk and Sayyid Ali Khan were quite able leaders and administrators. However, they were focussing upon self-aggrandizement, rather than consolidating the Mughal administration. 7) FACTORS INHERENT IN THE MUGHAL ADMINISTRATION 7.1) THE MUGHAL EMPIRE WAS A WAR STATE It depended upon war. This led to more centralization, with an Emperor on top, rather than a democracy. More centralization meant the dependence upon military strength i.e. nobles who were also the aristocracy. Also, the bureaucracy was a unified bureaucracy, where the military bureaucracy and the civil bureaucracies were one and the same. 7.2) MANSABDARI SYSTEM The strength of the Emperor depended upon his relationship with the mansabdars (military bureaucracy). The main feature of the mansabdari system was the personal loyalty of the mansabdars to the king. It was a quid-pro-quo establishment, based on giving and take. Therefore, when the king became weak, the mansabsars started detaching themselves from the king. 7.3) THE JAGIRDARI CRISIS After Aurangzeb died, territorial conquests stopped. Territorial conquests were necessary because the strength of the Mughal Empire depended upon the relationship between the mansabdars and the Emperor. This relationship depended upon the constant expansion of resources so that the Emperor would have more to give to the mansabdars. Stopping of territorial conquests led to the mansabdars being jagir less for years. This led to jealousy, group politics etc. among the Mansabdars. By the 18th century, very few had huge jagirs, while most others had a dearth of jagirs. There were very poor jagir mansabdars on one side along with highly powerful jagirdars on the other. This led to a huge amount of group politics, as the transfer of jagirs was possible. This meant no attachment with property along with huge levels of insecurity. This led to huge demands on the poor peasants along with no interest/ focus upon replenishment or improving the productivity of the soil. This led to peasant revolts in the countryside. Also, after the reign of Aurangzeb, mansabdari titles were given indiscriminately. They were to be paid in cash. However, there was no money for paying them, since territorial conquests were not taking place. Thus, a vicious cycle set in. As a result, the Rajputs rebelled (since they were jagirdars). Also, many autonomous kingdoms were created. The issue was that the mansabdars were unable to maintain their royal standards of living. 7.4) CONSTANT PRICE RISE DURING THE 18TH CENTURY A new era of capitalism emerged in Europe. Luxurious goods were imported from the East, while led to a shortage if supply here in India and the resultant increases in prices. 7.5) POLITICAL TURMOIL The Deccan war etc. resulting in political turmoil made revenue collection tough. 7.6) ROLE OF KHALISA LAND The fortunes of the Golconda and Bijapur capture went to the Mughal treasury at the centre. The new land was not distributed. A land bank was created to pay for the soldiers fighting in the South, as Aurangzeb wanted to continue the expansionist policy in the South. This decision of not distributing the land was a huge mistake as if done, could have solved the problem. Nizam-ul-Mulk tried, but could not do the land distribution. THE RESULTS OF THE ABOVE ISSUES 1) There was weakened loyalty of the mansabdars towards the king. 2) The military remained weak. 3) Corruption in the army- The required number of horses was not maintained. Effective supervision was not done. This was a huge problem since strength was based upon military strength in the Mughal Empire. 4) Virtual fragmentation of the Empire took place. Rebel kingdoms such as the Jats and Rajputs (who refused to pay Peshkash) as well as autonomous kingdoms got created. 5) Smaller jagirs led to politics. 6) The jagirdars refused to vacate/ transfer their property. 7) There was huge pressure on the peasants: The land revenue was increasing over time. Large peasants were able to pay but the poor peasants were unable to bear the burdens. This created economic pressure on the peasants. Plus, the rotation of mansabdars created further pressure on the peasants. There was huge pressure on the primary zamindars, as well, who combined with the peasants to revolt against the Mughal Empire. 8) EXCESSIVE OPPRESSION BY THE JAGIRDARS The primary zamindars took revenue and transferred the rest upwards. The jagirdars kept 80% of the revenue, and the rest went to the Mughal Empire. The landless labourers and agriculturists were heavily oppressed by the jagirdars. 9) WITHELD REVENUE PAYMENT The combination of peasants and zamindars withheld the payment of revenue and the Mughal Empire could not win against this combination. 10) IJARADARI CRISIS The auction of land to the highest bidder also created further stress on the peasants. All the above factors led to a significant decline in the power and prestige of the Mughal Empire. The regional kingdoms, as well as dissatisfied factions within the Empire, were not slow in taking advantage of this decline of power to carve out and raise to prominence their own autonomous kingdoms. The situation further deteriorated for the Mughals with the coming of foreign powers like the British, Dutch, the French etc. who not only fought among themselves but also against the regional kingdoms and the Mughal Empire. However, the farce of the Mughal sovereignty was maintained until 1858, when the Act of Good Governance, transferred all the powers, including the nominal powers, to the Queen of England.
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##Question:Discuss the reasons behind the decline of the mughal empire in the 18th century. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION The meaning of the question has been explained in the introduction- i.e. the decline of the Mughals - THE DECLINE OF THE MUGHALS - CONCLUSION A concluding remark Answer:-When the transfer of title was made to Queen Elizabeth of London, it was only a nominal transfer of power from the Mughals to the British rather than any real one. This is because the decline of the Mughals in favour of the British had already started in the 18th century, along with their complete gradual decline by the time of the Revolt of 1857. By 1857, only nominal powers were left in the hands of the Mughals, like coins issued in their name, royal titles etc. However, effectively their powers had declined significantly THE DECLINE OF THE MUGHALS 1) THE FAULTY POLICIES OF AURANGZEB For example, Aurangzeb followed an anti-Rajput policy. Also, there were many peasant and zamindar revolts during his time. 1.1) He followed expansionist campaigns against Ahmadnagar, Bijapur and Golconda. He also followed expansionist campaigns against the Marathas. 2) WEAK CENTRE There were constant wars of succession along with a weak centre. This led to vested interests and the oppressed factions in the Empire to take advantage of the situation. 3) LACK OF MODERNIZATION In the technology field as well as the military field, there were no new modern weapons made. This field was ignored in terms of modernisation of forces. This resulted in even more peasant rebellions. 4) MARATHA PLUNDER In 1738, for instance, the Marathas plundered Delhi. Such plundering and wars led to the further weakening of the Empire. 5) EXTERNAL INVASIONS Ahmad Shah Abdali, Nadir Shah plundered the country and looted the Empire. This led to a huge decrease in prestige for the Mughal Empire. For example, in the first Battle of Panipat fought in 1761, Ahmad Shah Abdali won. 6) CRISIS OF PERSONALITY It is not correct to say that there was a crisis of personality because there was no dearth of talent. There were quite strong administrators. It is true that there were weak emperors, but other factors are always responsible for such cases. 6.1) For example, Nizam-ul-Mulk and Sayyid Ali Khan were quite able leaders and administrators. However, they were focussing upon self-aggrandizement, rather than consolidating the Mughal administration. 7) FACTORS INHERENT IN THE MUGHAL ADMINISTRATION 7.1) THE MUGHAL EMPIRE WAS A WAR STATE It depended upon war. This led to more centralization, with an Emperor on top, rather than a democracy. More centralization meant the dependence upon military strength i.e. nobles who were also the aristocracy. Also, the bureaucracy was a unified bureaucracy, where the military bureaucracy and the civil bureaucracies were one and the same. 7.2) MANSABDARI SYSTEM The strength of the Emperor depended upon his relationship with the mansabdars (military bureaucracy). The main feature of the mansabdari system was the personal loyalty of the mansabdars to the king. It was a quid-pro-quo establishment, based on giving and take. Therefore, when the king became weak, the mansabsars started detaching themselves from the king. 7.3) THE JAGIRDARI CRISIS After Aurangzeb died, territorial conquests stopped. Territorial conquests were necessary because the strength of the Mughal Empire depended upon the relationship between the mansabdars and the Emperor. This relationship depended upon the constant expansion of resources so that the Emperor would have more to give to the mansabdars. Stopping of territorial conquests led to the mansabdars being jagir less for years. This led to jealousy, group politics etc. among the Mansabdars. By the 18th century, very few had huge jagirs, while most others had a dearth of jagirs. There were very poor jagir mansabdars on one side along with highly powerful jagirdars on the other. This led to a huge amount of group politics, as the transfer of jagirs was possible. This meant no attachment with property along with huge levels of insecurity. This led to huge demands on the poor peasants along with no interest/ focus upon replenishment or improving the productivity of the soil. This led to peasant revolts in the countryside. Also, after the reign of Aurangzeb, mansabdari titles were given indiscriminately. They were to be paid in cash. However, there was no money for paying them, since territorial conquests were not taking place. Thus, a vicious cycle set in. As a result, the Rajputs rebelled (since they were jagirdars). Also, many autonomous kingdoms were created. The issue was that the mansabdars were unable to maintain their royal standards of living. 7.4) CONSTANT PRICE RISE DURING THE 18TH CENTURY A new era of capitalism emerged in Europe. Luxurious goods were imported from the East, while led to a shortage if supply here in India and the resultant increases in prices. 7.5) POLITICAL TURMOIL The Deccan war etc. resulting in political turmoil made revenue collection tough. 7.6) ROLE OF KHALISA LAND The fortunes of the Golconda and Bijapur capture went to the Mughal treasury at the centre. The new land was not distributed. A land bank was created to pay for the soldiers fighting in the South, as Aurangzeb wanted to continue the expansionist policy in the South. This decision of not distributing the land was a huge mistake as if done, could have solved the problem. Nizam-ul-Mulk tried, but could not do the land distribution. THE RESULTS OF THE ABOVE ISSUES 1) There was weakened loyalty of the mansabdars towards the king. 2) The military remained weak. 3) Corruption in the army- The required number of horses was not maintained. Effective supervision was not done. This was a huge problem since strength was based upon military strength in the Mughal Empire. 4) Virtual fragmentation of the Empire took place. Rebel kingdoms such as the Jats and Rajputs (who refused to pay Peshkash) as well as autonomous kingdoms got created. 5) Smaller jagirs led to politics. 6) The jagirdars refused to vacate/ transfer their property. 7) There was huge pressure on the peasants: The land revenue was increasing over time. Large peasants were able to pay but the poor peasants were unable to bear the burdens. This created economic pressure on the peasants. Plus, the rotation of mansabdars created further pressure on the peasants. There was huge pressure on the primary zamindars, as well, who combined with the peasants to revolt against the Mughal Empire. 8) EXCESSIVE OPPRESSION BY THE JAGIRDARS The primary zamindars took revenue and transferred the rest upwards. The jagirdars kept 80% of the revenue, and the rest went to the Mughal Empire. The landless labourers and agriculturists were heavily oppressed by the jagirdars. 9) WITHELD REVENUE PAYMENT The combination of peasants and zamindars withheld the payment of revenue and the Mughal Empire could not win against this combination. 10) IJARADARI CRISIS The auction of land to the highest bidder also created further stress on the peasants. All the above factors led to a significant decline in the power and prestige of the Mughal Empire. The regional kingdoms, as well as dissatisfied factions within the Empire, were not slow in taking advantage of this decline of power to carve out and raise to prominence their own autonomous kingdoms. The situation further deteriorated for the Mughals with the coming of foreign powers like the British, Dutch, the French etc. who not only fought among themselves but also against the regional kingdoms and the Mughal Empire. However, the farce of the Mughal sovereignty was maintained until 1858, when the Act of Good Governance, transferred all the powers, including the nominal powers, to the Queen of England.
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The rise of autonomous states was a major factor in the decline of the Mughal Empire. Discuss (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE -CONCLUSION A concluding remark on the growth of the autonomous states at the cost of the Mughal Empire and how the British used this to their advantage. Answer:- There was no single emperor to replace the Mughal Empire. Numerous autonomous states rose in the 18th century. The Britishers used this opportunity and ultimately emerged victorious in India. HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE 1) THE RISE OF PROMINENT RULERS IN THE AUTONOMOUS STATES The autonomous kingdoms were carved out as a result of factionalism in the Mughal court (apart from other reasons). This led to the dissatisfied and powerful ones to break away, accept nominal sovereignty of the Mughal Empire and maintain real powers in their kingdoms. 1.1) For example, Hyderabad was carved out by Nizam-ul-Mulk Asaf Jah. The Nizam had even killed the Sayyid Brothers, who were actually the king makers at the Mughal court. The Nizam, who was dissatisfied with the Mughals (he was primarily frustrated with the court politics- Mohammad Shah Rangeela was succumbing to flattery rather than listening to real genuine advice), left the court and carved out his Empire in Hyderabad. 1.2) In Bengal, the power of Murshid Quli Khan was increasing during the reign of Farrukhsiyar. (This was done to check the Sayyid Brothers). 1.3) Hyder Ali did a coup d’état and gradually carved out an autonomous principality in Mysore. (Mysore was carved out of the Vijayanagar Empire as a separate dynasty by the Wodeyar dynasty). 2) THE RISE OF LOCAL MAGNETS Local sections were made powerful in order to maintain the loyalty base of the autonomous rulers. For example, the zamindars, bankers, traders and merchants emerged powerful in Bengal. These sections and their heads were loyal to the autonomous rulers rather than to the Mughal king at the centre. 2.1) Jagat Seth did a coup d’état and removed Sarfaraz Khan, who was the ruler or Bengal. Such were their powers. 2.5) In Punjab, the powerful Sikh chiefs supported Maharaja Ranjit Singh. 2.6) The autonomous states like Mysore, Bengal etc. developed their own intermediaries who were very loyal to them. 2.7) In Travancore, an autonomous kingdom was carved out by Martanda Verma and Rama Verma, which was independent from the Mughals. 3) DEFIANCE OF THE AUTHORITY OF THE MUGHALS 3.1) Alivardi Khan, who ruled Bengal between 1740 and 1756, stopped paying revenue to the Mughal Empire. Appointments were not made in approval/ the name of the Mughal Emperor. 3.2) In Hyderabad, the Nizam started signing his own treaties and granted jagirs as per his own wish. This shifted power to the local authorities and the local elites, who were loyal to the Nizam. 3.3) In Awadh, dynastic rule was brought in by Safdar Jung (the son-in-law of Sadat Khan). Sadat Khan made the office of the Diwan completely independent of the Mughal Empire. He wouldn’t even share the accounts, briefs, analysis with the Mughal Empire and would only pay the revenue due. Therefore, Mughal supervision was removed. 3.4) In Mysore, Tipu Sultan defied the Mughal authority by issuing his own coins and ensuring his own name in the Friday prayers (Khutba). He also tried to get an order from the Khalifa that he was the rightful owner of Mysore (as agaist Mughal ownership). 4) FACTION AT THE MUGHAL COURT Sadat Khan was not given the post of Mir Bakshi (imperial treasurer) in 1739. He, therefore, supported Nadir Shah against the Mughals. Safdar Jung (Awadh) misused his post of wazir by taking over Farrukhabad. 5) SIDING WITH FOREIGN INVASIONS For example, the Nawab of Awadh sided with Abdali in the Battle of Panipat in 1761, in order to defeat the Marathas. Such foreign invasions significantly weakened the Mughal Empire with all their plunder and loot. 6) PORTS IN THE AUTONOMOUS STATES Ports such as Hooghly were thriving in trade and commerce. These ports brought in a lot of revenue. Such revenue brought in income and strengthened the autonomous ruler rather than the centre. 6.1) THE RISE IN SEA TRADE The law and security system of the time was not good. This led to a rise in the level of sea trade at the cost of land trade. Since land routes based trade decreased it led to a decline in power of the Mughal Empire in an indirect manner, as a result of the loss of trade based revenue. On the other hand, the trade revenue increased for the autonomous states like Bengal and Gujarat. Thus, it can be said that the autonomous states grew at the cost of the Mughal Empire. 6.2) BENEFIT OUT OF SEA TRADE FOR THE EUROPEANS The shifting of trade to the seas benefitted the European company, private officials and ships. This happened as the Europeans ships were well developed as a result of the industrial revolution there. 7) POLITICAL TURMOIL The Marathas kept raiding the Empire creating political turmoil for an already crumbling Empire. They were opportunistic and regularly changed sides between the Marathas and the Mughals. The Marathas raided the Rajputs, the Konkan area and Khandesh areas under the Nizam. 7.1) During the time of Aurangzeb, a political rift came in 1675 between the Mughals and the Sikhs. Aurangzeb assassinated Guru Teg Bahadur. In 1699, the Khalsa was established under Guru Gobind Singh. This was a military organisation for armed resistance (to protect the Sikh community). The Jat peasantry which rose within the Sikhs were violent and used arms. The regional pillars (Misls) of the Sikh Empire looted northern India at the cost of the Mughal Empire. 8) INABILITY TO OVERCOME THE AUTONOMOUS KINGDOMS/ STRONG AUTONOMOUS STATES The Mughals were not able to capture the Maratha Empire or eliminate it. They could only hurt it. An independent status of Maharashtra was created under Peshwa Balaji Vishwanath. In 1728, the Marathas got 60% share of Gujarat revenue from the Mughals. In 1739, a huge military army, under the military leadership of the Nizam, lost again from the Marathas. After the war, by the Treaty of Bhopal, the Marathas got Malwa and all the land between Narmada and Chambal. 8.1) The Sikhs were so strong that even Ahmad Shah Abdali and the Marathas were not able to destroy the Sikhs. Banda Bahadur set up his own administration between the Yamuna and Ravi. He even had the courage to challenge the Mughals as well. He minted his own coins and appointed his own diwan for revenue management, in that area. Bahadur Shah attacked Punjab but failed. By 1760s, they covered the area from the Satluj to the Indus. They, under Ranjit Singh, were even able to defeat the third Afghan invasion in 1799. By the Treaty of Amritsar in 1809, Maharaja Ranjeet Singh was declared as the sovereign ruler of Punjab by the English. 8.2) The state of Mysore was a warfare state, with a highly advanced military and high degree of modernisation. The army under Hyder Ali and Tipu Sultan was trained by French experts in European style. It was much more advanced than the Mughal state. It also had the best agricultural productivity. Sericulture technique was introduced in the state of Mysore first. Since these states became so powerful, the English East India Company did not have one single united formidable power to fight with. They entered these autonomous kingdoms like Bengal, as traders, and gradually gained political power. Gradually they become so powerful that they ultimately defeated the French as well. With the rise in the power of the autonomous kingdoms, the power of the Mughals gradually declined. By 1858, the British only had to make a nominal transfer of power from the Mughals to the British government, since the real power of the Mughals had almost ended by the end of the 18th century and mid-19th century.
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##Question:The rise of autonomous states was a major factor in the decline of the Mughal Empire. Discuss (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE -CONCLUSION A concluding remark on the growth of the autonomous states at the cost of the Mughal Empire and how the British used this to their advantage. Answer:- There was no single emperor to replace the Mughal Empire. Numerous autonomous states rose in the 18th century. The Britishers used this opportunity and ultimately emerged victorious in India. HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE 1) THE RISE OF PROMINENT RULERS IN THE AUTONOMOUS STATES The autonomous kingdoms were carved out as a result of factionalism in the Mughal court (apart from other reasons). This led to the dissatisfied and powerful ones to break away, accept nominal sovereignty of the Mughal Empire and maintain real powers in their kingdoms. 1.1) For example, Hyderabad was carved out by Nizam-ul-Mulk Asaf Jah. The Nizam had even killed the Sayyid Brothers, who were actually the king makers at the Mughal court. The Nizam, who was dissatisfied with the Mughals (he was primarily frustrated with the court politics- Mohammad Shah Rangeela was succumbing to flattery rather than listening to real genuine advice), left the court and carved out his Empire in Hyderabad. 1.2) In Bengal, the power of Murshid Quli Khan was increasing during the reign of Farrukhsiyar. (This was done to check the Sayyid Brothers). 1.3) Hyder Ali did a coup d’état and gradually carved out an autonomous principality in Mysore. (Mysore was carved out of the Vijayanagar Empire as a separate dynasty by the Wodeyar dynasty). 2) THE RISE OF LOCAL MAGNETS Local sections were made powerful in order to maintain the loyalty base of the autonomous rulers. For example, the zamindars, bankers, traders and merchants emerged powerful in Bengal. These sections and their heads were loyal to the autonomous rulers rather than to the Mughal king at the centre. 2.1) Jagat Seth did a coup d’état and removed Sarfaraz Khan, who was the ruler or Bengal. Such were their powers. 2.5) In Punjab, the powerful Sikh chiefs supported Maharaja Ranjit Singh. 2.6) The autonomous states like Mysore, Bengal etc. developed their own intermediaries who were very loyal to them. 2.7) In Travancore, an autonomous kingdom was carved out by Martanda Verma and Rama Verma, which was independent from the Mughals. 3) DEFIANCE OF THE AUTHORITY OF THE MUGHALS 3.1) Alivardi Khan, who ruled Bengal between 1740 and 1756, stopped paying revenue to the Mughal Empire. Appointments were not made in approval/ the name of the Mughal Emperor. 3.2) In Hyderabad, the Nizam started signing his own treaties and granted jagirs as per his own wish. This shifted power to the local authorities and the local elites, who were loyal to the Nizam. 3.3) In Awadh, dynastic rule was brought in by Safdar Jung (the son-in-law of Sadat Khan). Sadat Khan made the office of the Diwan completely independent of the Mughal Empire. He wouldn’t even share the accounts, briefs, analysis with the Mughal Empire and would only pay the revenue due. Therefore, Mughal supervision was removed. 3.4) In Mysore, Tipu Sultan defied the Mughal authority by issuing his own coins and ensuring his own name in the Friday prayers (Khutba). He also tried to get an order from the Khalifa that he was the rightful owner of Mysore (as agaist Mughal ownership). 4) FACTION AT THE MUGHAL COURT Sadat Khan was not given the post of Mir Bakshi (imperial treasurer) in 1739. He, therefore, supported Nadir Shah against the Mughals. Safdar Jung (Awadh) misused his post of wazir by taking over Farrukhabad. 5) SIDING WITH FOREIGN INVASIONS For example, the Nawab of Awadh sided with Abdali in the Battle of Panipat in 1761, in order to defeat the Marathas. Such foreign invasions significantly weakened the Mughal Empire with all their plunder and loot. 6) PORTS IN THE AUTONOMOUS STATES Ports such as Hooghly were thriving in trade and commerce. These ports brought in a lot of revenue. Such revenue brought in income and strengthened the autonomous ruler rather than the centre. 6.1) THE RISE IN SEA TRADE The law and security system of the time was not good. This led to a rise in the level of sea trade at the cost of land trade. Since land routes based trade decreased it led to a decline in power of the Mughal Empire in an indirect manner, as a result of the loss of trade based revenue. On the other hand, the trade revenue increased for the autonomous states like Bengal and Gujarat. Thus, it can be said that the autonomous states grew at the cost of the Mughal Empire. 6.2) BENEFIT OUT OF SEA TRADE FOR THE EUROPEANS The shifting of trade to the seas benefitted the European company, private officials and ships. This happened as the Europeans ships were well developed as a result of the industrial revolution there. 7) POLITICAL TURMOIL The Marathas kept raiding the Empire creating political turmoil for an already crumbling Empire. They were opportunistic and regularly changed sides between the Marathas and the Mughals. The Marathas raided the Rajputs, the Konkan area and Khandesh areas under the Nizam. 7.1) During the time of Aurangzeb, a political rift came in 1675 between the Mughals and the Sikhs. Aurangzeb assassinated Guru Teg Bahadur. In 1699, the Khalsa was established under Guru Gobind Singh. This was a military organisation for armed resistance (to protect the Sikh community). The Jat peasantry which rose within the Sikhs were violent and used arms. The regional pillars (Misls) of the Sikh Empire looted northern India at the cost of the Mughal Empire. 8) INABILITY TO OVERCOME THE AUTONOMOUS KINGDOMS/ STRONG AUTONOMOUS STATES The Mughals were not able to capture the Maratha Empire or eliminate it. They could only hurt it. An independent status of Maharashtra was created under Peshwa Balaji Vishwanath. In 1728, the Marathas got 60% share of Gujarat revenue from the Mughals. In 1739, a huge military army, under the military leadership of the Nizam, lost again from the Marathas. After the war, by the Treaty of Bhopal, the Marathas got Malwa and all the land between Narmada and Chambal. 8.1) The Sikhs were so strong that even Ahmad Shah Abdali and the Marathas were not able to destroy the Sikhs. Banda Bahadur set up his own administration between the Yamuna and Ravi. He even had the courage to challenge the Mughals as well. He minted his own coins and appointed his own diwan for revenue management, in that area. Bahadur Shah attacked Punjab but failed. By 1760s, they covered the area from the Satluj to the Indus. They, under Ranjit Singh, were even able to defeat the third Afghan invasion in 1799. By the Treaty of Amritsar in 1809, Maharaja Ranjeet Singh was declared as the sovereign ruler of Punjab by the English. 8.2) The state of Mysore was a warfare state, with a highly advanced military and high degree of modernisation. The army under Hyder Ali and Tipu Sultan was trained by French experts in European style. It was much more advanced than the Mughal state. It also had the best agricultural productivity. Sericulture technique was introduced in the state of Mysore first. Since these states became so powerful, the English East India Company did not have one single united formidable power to fight with. They entered these autonomous kingdoms like Bengal, as traders, and gradually gained political power. Gradually they become so powerful that they ultimately defeated the French as well. With the rise in the power of the autonomous kingdoms, the power of the Mughals gradually declined. By 1858, the British only had to make a nominal transfer of power from the Mughals to the British government, since the real power of the Mughals had almost ended by the end of the 18th century and mid-19th century.
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While mentioninga brief background of India"scontemporary foreign trade policy, alsodiscuss its objectives and characteristics. (150-200 words, Marks-10) भारत की वर्तमानविदेश व्यापार नीति की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,भारत की वर्तमान विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत सरकार की पांच साल (2015 से 2020) की विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) 2015-20 के लिए1 अप्रैल 2015 को जारी की गई एवं वर्ष 2017 में इस नीति की मध्यवर्ती समीक्षा भी की गई। विदेश व्यापार नीति केउद्देश्य:- इसका उद्देश्य देश का निर्यात बढ़ाना और व्यापार विस्तार को आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर जुटाने का प्रभावी साधन बनाना है। एफटीपी का एक प्रमुख उद्देश्य सप्ताह के सातों दिन 24 घंटे "कागज रहित कामकाज" की तरफ कदम बढ़ाना है। नीति में सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के तहत सेवाओं के निर्यात को और विनिर्माण क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जायेगा। मर्चेन्डाइज और सेवा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार करने के लिए स्थायी और दीर्घकालीन नीतिगत ढांचे को प्रोत्साहन देना है। विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र दोनों को बढ़ावा देना इत्यादि। विशेषताएं:- विदेश व्यापार नीति में देश से वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात वर्ष 2013-14 के 465.9 अरब डालर से बढ़ाकर 2019-20 तक 900 अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है और निर्यातकों तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) को कई तरह के प्रोत्साहन देने की घोषणा की गई। विदेश व्यापार नीति में कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए उच्चस्तरीय प्रोत्साहन दिया जाएगा। विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए ‘भारत वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस) और ‘भारत सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस)’ शुरू करने की घोषणा की गई है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने अब एसईजेड में स्थित इकाइयों को दोनों इनाम योजनाओं (एमईआईएस और एसईआईएस) का लाभ देने का निर्णय लिया है। इस कदम से देश में एसईजेड के विकास को नई गति मिलेगी। वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में पहले से लागू कई योजनाओं के स्थान पर दो नई योजनाओं की शुरुआत की गई है- 1. भारत से वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस)/MEIS- Merchindise exports from India scheme 2. भारत से सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस/SEIS- Service exports from India scheme एमईआईएस का उद्देश्य विशेष बाजारों को विशेष वस्तुओं का निर्यात करना है, जबकि एसईआईएस का उद्देश्य अधिसूचित सेवाओं का निर्यात बढ़ाना है। इसके तहत पात्रता और उपयोग के लिए अलग-अलग शर्तें रखी गई हैं। व्यापार सुगमता(Trade facilatation) को बढ़ाना। कस्टम प्रक्रिया को सुगम बनाना। अधिकारीयों कीविवेकाधीन शक्तियों को समाप्त करना। पारदर्शिता प्रक्रिया अपनाना जैसेऑनलाइन दस्तावेज उपलब्धता इत्यादि। समानीकरण (TFA के सामान) कस्टम क्लीरेंस सम्बंधित आधारिक सरंचना कोबढ़ाना। निर्यातक बंधू स्कीम शुरुआत इत्यादि। अतःविदेश व्यापार नीति आने वाले वर्षो में भारत के व्यापार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगी।
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##Question:While mentioninga brief background of India"scontemporary foreign trade policy, alsodiscuss its objectives and characteristics. (150-200 words, Marks-10) भारत की वर्तमानविदेश व्यापार नीति की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,भारत की वर्तमान विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत सरकार की पांच साल (2015 से 2020) की विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) 2015-20 के लिए1 अप्रैल 2015 को जारी की गई एवं वर्ष 2017 में इस नीति की मध्यवर्ती समीक्षा भी की गई। विदेश व्यापार नीति केउद्देश्य:- इसका उद्देश्य देश का निर्यात बढ़ाना और व्यापार विस्तार को आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर जुटाने का प्रभावी साधन बनाना है। एफटीपी का एक प्रमुख उद्देश्य सप्ताह के सातों दिन 24 घंटे "कागज रहित कामकाज" की तरफ कदम बढ़ाना है। नीति में सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के तहत सेवाओं के निर्यात को और विनिर्माण क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जायेगा। मर्चेन्डाइज और सेवा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार करने के लिए स्थायी और दीर्घकालीन नीतिगत ढांचे को प्रोत्साहन देना है। विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र दोनों को बढ़ावा देना इत्यादि। विशेषताएं:- विदेश व्यापार नीति में देश से वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात वर्ष 2013-14 के 465.9 अरब डालर से बढ़ाकर 2019-20 तक 900 अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है और निर्यातकों तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) को कई तरह के प्रोत्साहन देने की घोषणा की गई। विदेश व्यापार नीति में कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए उच्चस्तरीय प्रोत्साहन दिया जाएगा। विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए ‘भारत वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस) और ‘भारत सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस)’ शुरू करने की घोषणा की गई है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने अब एसईजेड में स्थित इकाइयों को दोनों इनाम योजनाओं (एमईआईएस और एसईआईएस) का लाभ देने का निर्णय लिया है। इस कदम से देश में एसईजेड के विकास को नई गति मिलेगी। वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में पहले से लागू कई योजनाओं के स्थान पर दो नई योजनाओं की शुरुआत की गई है- 1. भारत से वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस)/MEIS- Merchindise exports from India scheme 2. भारत से सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस/SEIS- Service exports from India scheme एमईआईएस का उद्देश्य विशेष बाजारों को विशेष वस्तुओं का निर्यात करना है, जबकि एसईआईएस का उद्देश्य अधिसूचित सेवाओं का निर्यात बढ़ाना है। इसके तहत पात्रता और उपयोग के लिए अलग-अलग शर्तें रखी गई हैं। व्यापार सुगमता(Trade facilatation) को बढ़ाना। कस्टम प्रक्रिया को सुगम बनाना। अधिकारीयों कीविवेकाधीन शक्तियों को समाप्त करना। पारदर्शिता प्रक्रिया अपनाना जैसेऑनलाइन दस्तावेज उपलब्धता इत्यादि। समानीकरण (TFA के सामान) कस्टम क्लीरेंस सम्बंधित आधारिक सरंचना कोबढ़ाना। निर्यातक बंधू स्कीम शुरुआत इत्यादि। अतःविदेश व्यापार नीति आने वाले वर्षो में भारत के व्यापार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगी।
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While mentioninga brief background of India"scontemporary foreign trade policy, alsodiscuss its objectives and characteristics. (200 words) भारत की वर्तमानविदेश व्यापार नीति की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। (200 शब्द)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,भारत की वर्तमान विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत सरकार की पांच साल (2015 से 2020) की विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) 2015-20 के लिए1 अप्रैल 2015 को जारी की गई एवं वर्ष 2017 में इस नीति की मध्यवर्ती समीक्षा भी की गई। विदेश व्यापार नीति के उद्देश्य:- इसका उद्देश्य देश का निर्यात बढ़ाना और व्यापार विस्तार को आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर जुटाने का प्रभावी साधन बनाना है। एफटीपी का एक प्रमुख उद्देश्य सप्ताह के सातों दिन 24 घंटे "कागज रहित कामकाज" की तरफ कदम बढ़ाना है। नीति में सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के तहत सेवाओं के निर्यात को और विनिर्माण क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जायेगा। मर्चेन्डाइज और सेवा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार करने के लिए स्थायी और दीर्घकालीन नीतिगत ढांचे को प्रोत्साहन देना है। विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र दोनों को बढ़ावा देना इत्यादि। विशेषताएं:- विदेश व्यापार नीति में देश से वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात वर्ष 2013-14 के 465.9 अरब डालर से बढ़ाकर 2019-20 तक 900 अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है और निर्यातकों तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) को कई तरह के प्रोत्साहन देने की घोषणा की गई। विदेश व्यापार नीति में कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए उच्चस्तरीय प्रोत्साहन दिया जाएगा। विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए ‘भारत वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस) और ‘भारत सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस)’ शुरू करने की घोषणा की गई है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने अब एसईजेड में स्थित इकाइयों को दोनों इनाम योजनाओं (एमईआईएस और एसईआईएस) का लाभ देने का निर्णय लिया है। इस कदम से देश में एसईजेड के विकास को नई गति मिलेगी। वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में पहले से लागू कई योजनाओं के स्थान पर दो नई योजनाओं की शुरुआत की गई है- 1. भारत से वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस)/MEIS- Merchindise exports from India scheme 2. भारत से सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस/SEIS- Service exports from India scheme एमईआईएस का उद्देश्य विशेष बाजारों को विशेष वस्तुओं का निर्यात करना है, जबकि एसईआईएस का उद्देश्य अधिसूचित सेवाओं का निर्यात बढ़ाना है। इसके तहत पात्रता और उपयोग के लिए अलग-अलग शर्तें रखी गई हैं। व्यापार सुगमता(Trade facilatation) को बढ़ाना। कस्टम प्रक्रिया को सुगम बनाना। अधिकारीयों की विवेकाधीन शक्तियों को समाप्त करना। पारदर्शिता प्रक्रिया अपनाना जैसेऑनलाइन दस्तावेज उपलब्धता इत्यादि। समानीकरण (TFA के सामान) कस्टम क्लीरेंस सम्बंधित आधारिक सरंचना को बढ़ाना। निर्यातक बंधू स्कीम शुरुआत इत्यादि। अतःविदेश व्यापार नीति आने वाले वर्षो में भारत के व्यापार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगी।
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##Question:While mentioninga brief background of India"scontemporary foreign trade policy, alsodiscuss its objectives and characteristics. (200 words) भारत की वर्तमानविदेश व्यापार नीति की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। (200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,भारत की वर्तमान विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,इसके उद्देश्यों एवं विशेषताओं पर भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत सरकार की पांच साल (2015 से 2020) की विदेश व्यापार नीति(एफटीपी) 2015-20 के लिए1 अप्रैल 2015 को जारी की गई एवं वर्ष 2017 में इस नीति की मध्यवर्ती समीक्षा भी की गई। विदेश व्यापार नीति के उद्देश्य:- इसका उद्देश्य देश का निर्यात बढ़ाना और व्यापार विस्तार को आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर जुटाने का प्रभावी साधन बनाना है। एफटीपी का एक प्रमुख उद्देश्य सप्ताह के सातों दिन 24 घंटे "कागज रहित कामकाज" की तरफ कदम बढ़ाना है। नीति में सरकार के मेक इन इंडिया अभियान के तहत सेवाओं के निर्यात को और विनिर्माण क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जायेगा। मर्चेन्डाइज और सेवा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार करने के लिए स्थायी और दीर्घकालीन नीतिगत ढांचे को प्रोत्साहन देना है। विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र दोनों को बढ़ावा देना इत्यादि। विशेषताएं:- विदेश व्यापार नीति में देश से वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात वर्ष 2013-14 के 465.9 अरब डालर से बढ़ाकर 2019-20 तक 900 अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है और निर्यातकों तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) को कई तरह के प्रोत्साहन देने की घोषणा की गई। विदेश व्यापार नीति में कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए उच्चस्तरीय प्रोत्साहन दिया जाएगा। विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए ‘भारत वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस) और ‘भारत सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस)’ शुरू करने की घोषणा की गई है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने अब एसईजेड में स्थित इकाइयों को दोनों इनाम योजनाओं (एमईआईएस और एसईआईएस) का लाभ देने का निर्णय लिया है। इस कदम से देश में एसईजेड के विकास को नई गति मिलेगी। वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार बढ़ाने के लिए विदेश व्यापार नीति 2015-2020 में पहले से लागू कई योजनाओं के स्थान पर दो नई योजनाओं की शुरुआत की गई है- 1. भारत से वस्तु निर्यात योजना (एमईआईएस)/MEIS- Merchindise exports from India scheme 2. भारत से सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस/SEIS- Service exports from India scheme एमईआईएस का उद्देश्य विशेष बाजारों को विशेष वस्तुओं का निर्यात करना है, जबकि एसईआईएस का उद्देश्य अधिसूचित सेवाओं का निर्यात बढ़ाना है। इसके तहत पात्रता और उपयोग के लिए अलग-अलग शर्तें रखी गई हैं। व्यापार सुगमता(Trade facilatation) को बढ़ाना। कस्टम प्रक्रिया को सुगम बनाना। अधिकारीयों की विवेकाधीन शक्तियों को समाप्त करना। पारदर्शिता प्रक्रिया अपनाना जैसेऑनलाइन दस्तावेज उपलब्धता इत्यादि। समानीकरण (TFA के सामान) कस्टम क्लीरेंस सम्बंधित आधारिक सरंचना को बढ़ाना। निर्यातक बंधू स्कीम शुरुआत इत्यादि। अतःविदेश व्यापार नीति आने वाले वर्षो में भारत के व्यापार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगी।
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अर्थव्यवस्था में भुगतान संतुलन घाटे को कम करने, उदारीकरण व विकासात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (IMF, WTO, विश्व बैंक) की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इसके साथ इन संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explain the role of international organizations (IMF, WTO, World Bank) working to reduce the balance of payment dificit, promote liberalization and developmental activities in the economy. Also discuss the need of reform in these organizations. (150-200 words, Marks-10)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण इन संस्थाओं की पृष्टभूमि लिखिए। इसके बाद प्रत्येक संस्था की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इन संस्थाओं में सुधार के प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चा कीजिए निष्कर्ष गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध से ध्वस्त अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण की समस्या पर विचार करने तथा इसका व्यावहारिक हल निकालने के लिए ब्रेटनवुड्स सम्मेलन आयोजित हुआ इसके परिणाम स्वरूप आईएमएफ़ एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की स्थापना की गयी। इसी क्रम में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सरल और उदार बनाने के लिए अपनाए गए विभिन्न नीतियों का परिणाम विश्व व्यापार संगठन के रूप में हुआ। प्रारम्भ में इन संस्थाओं की स्थापना का उद्देश्य आर्थिक समस्याओं का हल निकालना था जैसे- अंतर्राष्ट्रीय तरलता तथा मौद्रिक स्थिरता की समस्या जो राष्ट्रीय भुगतान संतुलन में घाटे को दूर करना, राष्ट्रों का विकास और पुनर्गठन आदि। इन संस्थाओं ने अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने में व्यापक भूमिका निभाई है: विश्व बैंक ने तत्कालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए यूरोपीय देशों को ऋण प्रदान किया। विकासशील देशों को विभिन्न सामाजिक, आर्थिक परियोजनाओं को पूर्ण करने के लिए सहायता राशि प्रदान कर रहा है। विश्व बैंक समूह के में शामिल अंतर्राष्ट्रीय विकास परिषद तीन प्रमुख पक्षों पर कार्य कर रहा है जैसे- गरीबी, वरीयता एवं परियोजना। भुगतान संतुलन के घाटे के कारण आर्थिक संकट को दूर करने में आईएमएफ़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत इसका एक उदाहरण है। किसी राष्ट्र की आर्थिक संवृद्धि एवं मुद्रा की क्षमता का सही आकलन करते हुए आईएमएफ़ के निर्देश उपयोगी होते हैं। विश्व व्यापार संगठन के अपने गठन के बाद से ही आर्थिक उदारीकरण के प्रयास कर रहा है। वैश्विक व्यापार में आयात-निर्यात नियमों को तार्किक बनाया गया है। अल्प विकसित व विकासशील देशों के व्यापार को सुगम बनाने के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इन संस्थानों ने अपने कार्यों का निर्वहन सार्थक ढंग से किया है। हालांकि बदलते परिदृश्य में अनेक ऐसी चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं जिसके संदर्भ में यह मांग हो रही है कि संस्थाओं के संरचना, कार्यों आदि में आवश्यक सुधार किया जाए: आईएमएफ़ और विश्व बैंक में सुधार: संस्थानों के प्रमुख का चयन पारदर्शी एवं योग्यता आधारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। मानव संसाधनों के रूप में वैश्विक भागीदारी को बढ़ावा देना। विभिन्न देशों के कोटा और अंश को उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखकर निर्धारित करना चाहिए। विश्व के कुछ प्रमुख देशों जैसे- अमेरिका, चीन, ब्रिटेन आदि का अधिक प्रभाव है। एशिया, अफ्रीका के अधिकांश विकासशील देश अभी भी विश्व व्यापार संगठन में सुधार: डबल्यूटीओ की स्थापना के बाद से ही अनेक मुद्दे उभर के सामने आ रहे हैं जिसमें सुधार की आवश्यकता है: बौद्धिक सम्पदा अधिकार के नियमों का विभिन्न देशों द्वारा पूर्णतः अनुपालन नहीं किया जा रहा है। व्यापार सुधार समझौता: कृषि सब्सिडी के संबंध में विकासशील देशों की आपत्तियों को विकसित देशों द्वारा प्रायः अस्वीकार किया जाता रहा है। हालांकि विगत कुछ वर्षों में इसमें सुधार हो रहा है। सेवा क्षेत्रक के संबंध में: विकासशील देश चाहते हैं की सेवा क्षेत्र में भी व्यापारिक नियमों को अनुकूल बनाया जाए क्योंकि यह क्षेत्र उद्योग व कृषि से भिन्न है। भारत जैसे देशों को प्रतिस्पर्द्धी बनाने के लिए इसमें सुधार आवश्यक है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनुकूल, प्रतिस्पर्द्धी, मजबूत बनाने के लिए इन सस्थाओं ने अच्छा कार्य किया है। बदलते परिदृश्य में अनेक क्षेत्रीय व्यापार भागीदार विकसित हो रहे हैं जिससे इन संस्थाओं का महत्व कम होता जा रहा है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है कि विकसित देश विकासशील देशों की आवश्यकता को समझें। अंतर्राष्ट्रीय मंच के माध्यम से मुद्दों पर चरणबद्ध तरीके से चर्चा करनी चाहिए।
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##Question:अर्थव्यवस्था में भुगतान संतुलन घाटे को कम करने, उदारीकरण व विकासात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (IMF, WTO, विश्व बैंक) की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इसके साथ इन संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explain the role of international organizations (IMF, WTO, World Bank) working to reduce the balance of payment dificit, promote liberalization and developmental activities in the economy. Also discuss the need of reform in these organizations. (150-200 words, Marks-10)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण इन संस्थाओं की पृष्टभूमि लिखिए। इसके बाद प्रत्येक संस्था की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इन संस्थाओं में सुधार के प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चा कीजिए निष्कर्ष गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध से ध्वस्त अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण की समस्या पर विचार करने तथा इसका व्यावहारिक हल निकालने के लिए ब्रेटनवुड्स सम्मेलन आयोजित हुआ इसके परिणाम स्वरूप आईएमएफ़ एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की स्थापना की गयी। इसी क्रम में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सरल और उदार बनाने के लिए अपनाए गए विभिन्न नीतियों का परिणाम विश्व व्यापार संगठन के रूप में हुआ। प्रारम्भ में इन संस्थाओं की स्थापना का उद्देश्य आर्थिक समस्याओं का हल निकालना था जैसे- अंतर्राष्ट्रीय तरलता तथा मौद्रिक स्थिरता की समस्या जो राष्ट्रीय भुगतान संतुलन में घाटे को दूर करना, राष्ट्रों का विकास और पुनर्गठन आदि। इन संस्थाओं ने अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने में व्यापक भूमिका निभाई है: विश्व बैंक ने तत्कालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए यूरोपीय देशों को ऋण प्रदान किया। विकासशील देशों को विभिन्न सामाजिक, आर्थिक परियोजनाओं को पूर्ण करने के लिए सहायता राशि प्रदान कर रहा है। विश्व बैंक समूह के में शामिल अंतर्राष्ट्रीय विकास परिषद तीन प्रमुख पक्षों पर कार्य कर रहा है जैसे- गरीबी, वरीयता एवं परियोजना। भुगतान संतुलन के घाटे के कारण आर्थिक संकट को दूर करने में आईएमएफ़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत इसका एक उदाहरण है। किसी राष्ट्र की आर्थिक संवृद्धि एवं मुद्रा की क्षमता का सही आकलन करते हुए आईएमएफ़ के निर्देश उपयोगी होते हैं। विश्व व्यापार संगठन के अपने गठन के बाद से ही आर्थिक उदारीकरण के प्रयास कर रहा है। वैश्विक व्यापार में आयात-निर्यात नियमों को तार्किक बनाया गया है। अल्प विकसित व विकासशील देशों के व्यापार को सुगम बनाने के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इन संस्थानों ने अपने कार्यों का निर्वहन सार्थक ढंग से किया है। हालांकि बदलते परिदृश्य में अनेक ऐसी चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं जिसके संदर्भ में यह मांग हो रही है कि संस्थाओं के संरचना, कार्यों आदि में आवश्यक सुधार किया जाए: आईएमएफ़ और विश्व बैंक में सुधार: संस्थानों के प्रमुख का चयन पारदर्शी एवं योग्यता आधारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। मानव संसाधनों के रूप में वैश्विक भागीदारी को बढ़ावा देना। विभिन्न देशों के कोटा और अंश को उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखकर निर्धारित करना चाहिए। विश्व के कुछ प्रमुख देशों जैसे- अमेरिका, चीन, ब्रिटेन आदि का अधिक प्रभाव है। एशिया, अफ्रीका के अधिकांश विकासशील देश अभी भी विश्व व्यापार संगठन में सुधार: डबल्यूटीओ की स्थापना के बाद से ही अनेक मुद्दे उभर के सामने आ रहे हैं जिसमें सुधार की आवश्यकता है: बौद्धिक सम्पदा अधिकार के नियमों का विभिन्न देशों द्वारा पूर्णतः अनुपालन नहीं किया जा रहा है। व्यापार सुधार समझौता: कृषि सब्सिडी के संबंध में विकासशील देशों की आपत्तियों को विकसित देशों द्वारा प्रायः अस्वीकार किया जाता रहा है। हालांकि विगत कुछ वर्षों में इसमें सुधार हो रहा है। सेवा क्षेत्रक के संबंध में: विकासशील देश चाहते हैं की सेवा क्षेत्र में भी व्यापारिक नियमों को अनुकूल बनाया जाए क्योंकि यह क्षेत्र उद्योग व कृषि से भिन्न है। भारत जैसे देशों को प्रतिस्पर्द्धी बनाने के लिए इसमें सुधार आवश्यक है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनुकूल, प्रतिस्पर्द्धी, मजबूत बनाने के लिए इन सस्थाओं ने अच्छा कार्य किया है। बदलते परिदृश्य में अनेक क्षेत्रीय व्यापार भागीदार विकसित हो रहे हैं जिससे इन संस्थाओं का महत्व कम होता जा रहा है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है कि विकसित देश विकासशील देशों की आवश्यकता को समझें। अंतर्राष्ट्रीय मंच के माध्यम से मुद्दों पर चरणबद्ध तरीके से चर्चा करनी चाहिए।
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What do you understand by the First Past the Post (FPTP) system and compare it with the Proportional Representation system of elections? Also, examine if it’s time for India to shift from a First Past the Post system to a system of Proportional Representation. (150 words/10 marks)
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Brief Approach Introduction: try to explainFPTPin simple words Body: Give a short comparison with the proportional system of voting Examine the need to shift it to another system Mention other alternative and merits Conclusion -mostly in favour of FPTP or you can mention another system as a solution Answer FPTP works on "winner takes all" principle. it is based on the plurality of votes .it takes place in the single member countries, example three candidate stand in the election if total cast votes are 30 A got 9 votes B got 8 votes and c got 13 votes then c will be declared a winner. Whereas PR distributes seats according to the percentage of votes secured in total, list system and Single Transferable Vote (STV) are variants of PR. Merits of FPTP 1. Simple and uncomplicated, illiterate persons could easily understand. 2. It ensures a stable government. 3. Voting based on the merit of the candidates. 4. Candidates are linked with constituencies. 5. Candidates have to reach to all the communities. Demerits of FPTP 1. Small parties have a broad base, does not strongholds in constituencies per se. 2. Votes are wasted, For example, in 1984 INC got 49.8% vote share but secured around 405 seats. Practically it doesn’t provide majoritarian government.even after winning less than 33% of total votes BJP currently has more than 50% seats(2014). 3. FPTP is not solely responsible for stable government, India has seen mixed results. 4. Slight changes in vote share can cause a dramatic change in the vote share. 5. Election expenditure is higher. Merits of PR 1. Election expenditure per constituency would be minimized. 2. Small parties with broad base, minorities, women parties could get ample representation in the parliament. 3. People can approach any candidates from the list for their problems. 4. ‘Vote wasting’ feeling wouldn’t be there among voters, they can freely vote to ideologies. Demerits of PR 1. Candidates can simply focus on select groups. 2. Stability would be compromised, coalitions becomes inevitable. 3. Breaks the candidate — people relation. 4. Chances of party power to be concentrated with the few. India should not shift to a PR system. The FPTP system is simple to understand and provides accountability. Since a large population of India is still uneducatedly introducing a complex system as PR may cause problems for people in exercising their right to vote. For a large country like India, the PR system may not be feasible. we can introduce Mixed system: mixed system combine the positives of both plurality and proportional system. If a party wins a certain share of votes nationally, but no seats, then it can be awarded proportional seats or few seats can be given to the proportional system rest can be elected through FPTP.
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##Question:What do you understand by the First Past the Post (FPTP) system and compare it with the Proportional Representation system of elections? Also, examine if it’s time for India to shift from a First Past the Post system to a system of Proportional Representation. (150 words/10 marks)##Answer:Brief Approach Introduction: try to explainFPTPin simple words Body: Give a short comparison with the proportional system of voting Examine the need to shift it to another system Mention other alternative and merits Conclusion -mostly in favour of FPTP or you can mention another system as a solution Answer FPTP works on "winner takes all" principle. it is based on the plurality of votes .it takes place in the single member countries, example three candidate stand in the election if total cast votes are 30 A got 9 votes B got 8 votes and c got 13 votes then c will be declared a winner. Whereas PR distributes seats according to the percentage of votes secured in total, list system and Single Transferable Vote (STV) are variants of PR. Merits of FPTP 1. Simple and uncomplicated, illiterate persons could easily understand. 2. It ensures a stable government. 3. Voting based on the merit of the candidates. 4. Candidates are linked with constituencies. 5. Candidates have to reach to all the communities. Demerits of FPTP 1. Small parties have a broad base, does not strongholds in constituencies per se. 2. Votes are wasted, For example, in 1984 INC got 49.8% vote share but secured around 405 seats. Practically it doesn’t provide majoritarian government.even after winning less than 33% of total votes BJP currently has more than 50% seats(2014). 3. FPTP is not solely responsible for stable government, India has seen mixed results. 4. Slight changes in vote share can cause a dramatic change in the vote share. 5. Election expenditure is higher. Merits of PR 1. Election expenditure per constituency would be minimized. 2. Small parties with broad base, minorities, women parties could get ample representation in the parliament. 3. People can approach any candidates from the list for their problems. 4. ‘Vote wasting’ feeling wouldn’t be there among voters, they can freely vote to ideologies. Demerits of PR 1. Candidates can simply focus on select groups. 2. Stability would be compromised, coalitions becomes inevitable. 3. Breaks the candidate — people relation. 4. Chances of party power to be concentrated with the few. India should not shift to a PR system. The FPTP system is simple to understand and provides accountability. Since a large population of India is still uneducatedly introducing a complex system as PR may cause problems for people in exercising their right to vote. For a large country like India, the PR system may not be feasible. we can introduce Mixed system: mixed system combine the positives of both plurality and proportional system. If a party wins a certain share of votes nationally, but no seats, then it can be awarded proportional seats or few seats can be given to the proportional system rest can be elected through FPTP.
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सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से आप क्या समझते हैं?सार्वजनिक निजी भागीदारी की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा करते हुए अर्थव्यस्था के सन्दर्भ में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(200 शब्द) What do you think of public-private partnership investment model ? Explaining the key features of public-private partnership, clarify its significance in terms of economy. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में अर्थव्यस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- सार्वजनिक निजी भागीदारी की कुछ सीमाएं एवं उपायों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/रख-रखाव/परिचालन हेतु सरकार/वैधानिक निकाय एवं निजी क्षेत्र की इकाई के मध्य निर्मित हुए संयुक्त उपक्रम/अनुबंध को सार्वजनिक-निजी भागीदारी(PPP) कहते हैं|योजना आयोग के अनुसार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) एक ऐसा निवेश मॉडल है जिसमें सेवा प्रदान करने का कार्य निजी क्षेत्र (अलाभकारी/लाभार्थ संगठन) द्वारा किया जाता है जबकि सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में सरकार या तो निजी भागीदार के साथ अनुबंध में शामिल रहती है या निजी क्षेत्र को सेवा प्रदान करने की प्रतिपूर्ति करती है। जब सेवा प्रदान करने के लिए न तो निजी क्षेत्र और न ही सार्वजनिक उपक्रम उपस्थित होता है तब इस प्रकार के अनुबंध नई गतिविधियों को तत्परता प्रदान करता है| सार्वजनिक निजी भागीदारी की अनेक विशेषताएं होती हैं एवं अनेक संदर्भों में यह अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण निवेश मॉडल होता है| PPP की विशेषताएं · यह सरकार एवं निजी इकाई के मध्य संयुक्त उपक्रम होता है, · यह लोक सेवाओं/परिसंपत्ति का प्रावधान करता है, ये वह सेवायें/परिसंपत्तियां होती हैं जो सामान्य/परम्परागत रूप से सरकार द्वारा प्रदान की जाती है, · इसमें निजी क्षेत्र के साथ जोखिम की भागीदारी होती है, · मात्र आउटसोर्सिंग से सम्बन्धित गतिविधियों को PPP में सम्मिलित नही किया जाता है, · PPP सम्बन्धी अनुबंध/संचालन एक पूर्व निर्धारित समयावधि के लिए होता है, · PPP में निजी इकाई द्वारा परियोजना में निवेश एवं/या प्रबंधन किया जाता है, · PPP में निजी इकाई को, परियोजना के निष्पादन पर आधारित भुगतान किये जाते हैं अर्थात निष्पादन बेहतर होने पर बेहतर भुगतान किया जाता है, · इसमें परियोजना के विलम्ब के लिए दंड की व्यवस्था होती है, · प्रत्येक परियोजना के सन्दर्भ में कुछ पूर्वनिर्धारित तकनीकी मानदंड होते हैं जैसे पुल निर्माण में तकनीकी मानदंड सरकार द्वारा निर्धारित किये जायेंगे| मानदंडों की पूर्ति न होने पर भुगतान रोका जा सकता है| अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी का महत्व · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल सेनिजी क्षेत्र को आधारिक संरचना में निवेश हेतु प्रोत्साहन मिलता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल अपनाने से निजी क्षेत्र की वित्त तक सहज पहुच स्थापित हो जाती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल के माध्यम से आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/प्रबंधन में कार्यकुशलता बढ़ेगी क्योकि इससे निजी क्षेत्र का स्वयं स्वार्थ(लाभ प्रेरित उत्पादन) सम्मिलित होता है एवं निजी क्षेत्र का तकनीकी ज्ञान और पेशेवर ज्ञान, विशेषज्ञता आदि सम्मिलित होते हैं, · इससे सरकार पर वित्तीय भार में कमी आती है जिससे अन्य विकासात्मक व्यय में वृद्धि होती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से सतत आधार पर अच्छी गुणवत्ता की आधारिक संरचना सम्बन्धी सेवायें, उचित उपभोक्ता शुल्क पर जनता/उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो सकेंगी, · इससे आधारिक संरचना की परियोजनाओं के नियोजन,निर्माण एवं रख-रखाव में जीवन चक्र दृष्टिकोण समायोजित होता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल आधारित संरचना की परियोजनाओं में सकारात्मक/धनात्मक बाह्यताओं के कारण बाजार तंत्र की विफलता का समाधान करता है, · आधारित संरचना सामान्यतः नैसर्गिक एकाधिकार(जहाँ प्रतिस्पर्धा नही होनी चाहिए) होती है जिसके कारण बाजार तंत्र विफल हो जाता है| इसलिए सरकार का संलग्न होना आवश्यक होता है, · इसमें उपभोक्ताओं को उपभोग के बाद शुल्क देने पड़ते हैं आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनेक विशेषताओं से युक्त सार्वजनिक-निजी भागीदारी निवेश मॉडल विभिन्न रूपों में महत्वपूर्ण होता है|तथापि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं जैसे हर सार्वजनिक निजी भागीदारी में निजी भागीदार के लिए जोखिम शामिल होता है, जो उन जोखिमों को स्वीकार करने के लिए उचित रूप से मुआवजे की अपेक्षा करता है,इससे सरकारी लागतें बढ़ सकती हैं| इसी प्रकार जब किसी विशिष्ट परियोजना के लिए केवल एक सीमित संख्या में निजी संस्थाएं होती हैं, ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है|अतः जोखिमों का उचित मूल्यांकन एवं प्रतिस्पर्धी माहौल में इस तरह की भागीदारी करना अर्थव्यवस्था को अनेक लाभ पहुचायेगा|
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##Question:सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से आप क्या समझते हैं?सार्वजनिक निजी भागीदारी की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा करते हुए अर्थव्यस्था के सन्दर्भ में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(200 शब्द) What do you think of public-private partnership investment model ? Explaining the key features of public-private partnership, clarify its significance in terms of economy. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में अर्थव्यस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- सार्वजनिक निजी भागीदारी की कुछ सीमाएं एवं उपायों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/रख-रखाव/परिचालन हेतु सरकार/वैधानिक निकाय एवं निजी क्षेत्र की इकाई के मध्य निर्मित हुए संयुक्त उपक्रम/अनुबंध को सार्वजनिक-निजी भागीदारी(PPP) कहते हैं|योजना आयोग के अनुसार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) एक ऐसा निवेश मॉडल है जिसमें सेवा प्रदान करने का कार्य निजी क्षेत्र (अलाभकारी/लाभार्थ संगठन) द्वारा किया जाता है जबकि सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में सरकार या तो निजी भागीदार के साथ अनुबंध में शामिल रहती है या निजी क्षेत्र को सेवा प्रदान करने की प्रतिपूर्ति करती है। जब सेवा प्रदान करने के लिए न तो निजी क्षेत्र और न ही सार्वजनिक उपक्रम उपस्थित होता है तब इस प्रकार के अनुबंध नई गतिविधियों को तत्परता प्रदान करता है| सार्वजनिक निजी भागीदारी की अनेक विशेषताएं होती हैं एवं अनेक संदर्भों में यह अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण निवेश मॉडल होता है| PPP की विशेषताएं · यह सरकार एवं निजी इकाई के मध्य संयुक्त उपक्रम होता है, · यह लोक सेवाओं/परिसंपत्ति का प्रावधान करता है, ये वह सेवायें/परिसंपत्तियां होती हैं जो सामान्य/परम्परागत रूप से सरकार द्वारा प्रदान की जाती है, · इसमें निजी क्षेत्र के साथ जोखिम की भागीदारी होती है, · मात्र आउटसोर्सिंग से सम्बन्धित गतिविधियों को PPP में सम्मिलित नही किया जाता है, · PPP सम्बन्धी अनुबंध/संचालन एक पूर्व निर्धारित समयावधि के लिए होता है, · PPP में निजी इकाई द्वारा परियोजना में निवेश एवं/या प्रबंधन किया जाता है, · PPP में निजी इकाई को, परियोजना के निष्पादन पर आधारित भुगतान किये जाते हैं अर्थात निष्पादन बेहतर होने पर बेहतर भुगतान किया जाता है, · इसमें परियोजना के विलम्ब के लिए दंड की व्यवस्था होती है, · प्रत्येक परियोजना के सन्दर्भ में कुछ पूर्वनिर्धारित तकनीकी मानदंड होते हैं जैसे पुल निर्माण में तकनीकी मानदंड सरकार द्वारा निर्धारित किये जायेंगे| मानदंडों की पूर्ति न होने पर भुगतान रोका जा सकता है| अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी का महत्व · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल सेनिजी क्षेत्र को आधारिक संरचना में निवेश हेतु प्रोत्साहन मिलता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल अपनाने से निजी क्षेत्र की वित्त तक सहज पहुच स्थापित हो जाती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल के माध्यम से आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/प्रबंधन में कार्यकुशलता बढ़ेगी क्योकि इससे निजी क्षेत्र का स्वयं स्वार्थ(लाभ प्रेरित उत्पादन) सम्मिलित होता है एवं निजी क्षेत्र का तकनीकी ज्ञान और पेशेवर ज्ञान, विशेषज्ञता आदि सम्मिलित होते हैं, · इससे सरकार पर वित्तीय भार में कमी आती है जिससे अन्य विकासात्मक व्यय में वृद्धि होती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से सतत आधार पर अच्छी गुणवत्ता की आधारिक संरचना सम्बन्धी सेवायें, उचित उपभोक्ता शुल्क पर जनता/उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो सकेंगी, · इससे आधारिक संरचना की परियोजनाओं के नियोजन,निर्माण एवं रख-रखाव में जीवन चक्र दृष्टिकोण समायोजित होता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल आधारित संरचना की परियोजनाओं में सकारात्मक/धनात्मक बाह्यताओं के कारण बाजार तंत्र की विफलता का समाधान करता है, · आधारित संरचना सामान्यतः नैसर्गिक एकाधिकार(जहाँ प्रतिस्पर्धा नही होनी चाहिए) होती है जिसके कारण बाजार तंत्र विफल हो जाता है| इसलिए सरकार का संलग्न होना आवश्यक होता है, · इसमें उपभोक्ताओं को उपभोग के बाद शुल्क देने पड़ते हैं आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनेक विशेषताओं से युक्त सार्वजनिक-निजी भागीदारी निवेश मॉडल विभिन्न रूपों में महत्वपूर्ण होता है|तथापि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं जैसे हर सार्वजनिक निजी भागीदारी में निजी भागीदार के लिए जोखिम शामिल होता है, जो उन जोखिमों को स्वीकार करने के लिए उचित रूप से मुआवजे की अपेक्षा करता है,इससे सरकारी लागतें बढ़ सकती हैं| इसी प्रकार जब किसी विशिष्ट परियोजना के लिए केवल एक सीमित संख्या में निजी संस्थाएं होती हैं, ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है|अतः जोखिमों का उचित मूल्यांकन एवं प्रतिस्पर्धी माहौल में इस तरह की भागीदारी करना अर्थव्यवस्था को अनेक लाभ पहुचायेगा|
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सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से आप क्या समझते हैं? सार्वजनिक निजी भागीदारी की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा करते हुए अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you think of the public-private partnership investment model? Explaining the key features of public-private partnership, clarify its significance in terms of economy. (150-200 words, Marks-10)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में अर्थव्यस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- सार्वजनिक निजी भागीदारी की कुछ सीमाएं एवं उपायों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/रख-रखाव/परिचालन हेतु सरकार/वैधानिक निकाय एवं निजी क्षेत्र की इकाई के मध्य निर्मित हुए संयुक्त उपक्रम/अनुबंध को सार्वजनिक-निजी भागीदारी(PPP) कहते हैं|योजना आयोग के अनुसार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) एक ऐसा निवेश मॉडल है जिसमें सेवा प्रदान करने का कार्य निजी क्षेत्र (अलाभकारी/लाभार्थ संगठन) द्वारा किया जाता है जबकि सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में सरकार या तो निजी भागीदार के साथ अनुबंध में शामिल रहती है या निजी क्षेत्र को सेवा प्रदान करने की प्रतिपूर्ति करती है। जब सेवा प्रदान करने के लिए न तो निजी क्षेत्र और न ही सार्वजनिक उपक्रम उपस्थित होता है तब इस प्रकार के अनुबंध नई गतिविधियों को तत्परता प्रदान करता है| सार्वजनिक निजी भागीदारी की अनेक विशेषताएं होती हैं एवं अनेक संदर्भों में यह अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण निवेश मॉडल होता है| PPP की विशेषताएं · यह सरकार एवं निजी इकाई के मध्य संयुक्त उपक्रम होता है, · यह लोक सेवाओं/परिसंपत्ति का प्रावधान करता है, ये वह सेवायें/परिसंपत्तियां होती हैं जो सामान्य/परम्परागत रूप से सरकार द्वारा प्रदान की जाती है, · इसमें निजी क्षेत्र के साथ जोखिम की भागीदारी होती है, · मात्र आउटसोर्सिंग से सम्बन्धित गतिविधियों को PPP में सम्मिलित नही किया जाता है, · PPP सम्बन्धी अनुबंध/संचालन एक पूर्व निर्धारित समयावधि के लिए होता है, · PPP में निजी इकाई द्वारा परियोजना में निवेश एवं/या प्रबंधन किया जाता है, · PPP में निजी इकाई को, परियोजना के निष्पादन पर आधारित भुगतान किये जाते हैं अर्थात निष्पादन बेहतर होने पर बेहतर भुगतान किया जाता है, · इसमें परियोजना के विलम्ब के लिए दंड की व्यवस्था होती है, · प्रत्येक परियोजना के सन्दर्भ में कुछ पूर्वनिर्धारित तकनीकी मानदंड होते हैं जैसे पुल निर्माण में तकनीकी मानदंड सरकार द्वारा निर्धारित किये जायेंगे| मानदंडों की पूर्ति न होने पर भुगतान रोका जा सकता है| अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी का महत्व · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल सेनिजी क्षेत्र को आधारिक संरचना में निवेश हेतु प्रोत्साहन मिलता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल अपनाने से निजी क्षेत्र की वित्त तक सहज पहुच स्थापित हो जाती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल के माध्यम से आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/प्रबंधन में कार्यकुशलता बढ़ेगी क्योकि इससे निजी क्षेत्र का स्वयं स्वार्थ(लाभ प्रेरित उत्पादन) सम्मिलित होता है एवं निजी क्षेत्र का तकनीकी ज्ञान और पेशेवर ज्ञान, विशेषज्ञता आदि सम्मिलित होते हैं, · इससे सरकार पर वित्तीय भार में कमी आती है जिससे अन्य विकासात्मक व्यय में वृद्धि होती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से सतत आधार पर अच्छी गुणवत्ता की आधारिक संरचना सम्बन्धी सेवायें, उचित उपभोक्ता शुल्क पर जनता/उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो सकेंगी, · इससे आधारिक संरचना की परियोजनाओं के नियोजन,निर्माण एवं रख-रखाव में जीवन चक्र दृष्टिकोण समायोजित होता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल आधारित संरचना की परियोजनाओं में सकारात्मक/धनात्मक बाह्यताओं के कारण बाजार तंत्र की विफलता का समाधान करता है, · आधारित संरचना सामान्यतः नैसर्गिक एकाधिकार(जहाँ प्रतिस्पर्धा नही होनी चाहिए) होती है जिसके कारण बाजार तंत्र विफल हो जाता है| इसलिए सरकार का संलग्न होना आवश्यक होता है, · इसमें उपभोक्ताओं को उपभोग के बाद शुल्क देने पड़ते हैं आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनेक विशेषताओं से युक्त सार्वजनिक-निजी भागीदारी निवेश मॉडल विभिन्न रूपों में महत्वपूर्ण होता है|तथापि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं जैसे हर सार्वजनिक निजी भागीदारी में निजी भागीदार के लिए जोखिम शामिल होता है, जो उन जोखिमों को स्वीकार करने के लिए उचित रूप से मुआवजे की अपेक्षा करता है,इससे सरकारी लागतें बढ़ सकती हैं| इसी प्रकार जब किसी विशिष्ट परियोजना के लिए केवल एक सीमित संख्या में निजी संस्थाएं होती हैं, ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है|अतः जोखिमों का उचित मूल्यांकन एवं प्रतिस्पर्धी माहौल में इस तरह की भागीदारी करना अर्थव्यवस्था को अनेक लाभ पहुचायेगा|
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##Question:सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से आप क्या समझते हैं? सार्वजनिक निजी भागीदारी की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा करते हुए अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you think of the public-private partnership investment model? Explaining the key features of public-private partnership, clarify its significance in terms of economy. (150-200 words, Marks-10)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में अर्थव्यस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- सार्वजनिक निजी भागीदारी की कुछ सीमाएं एवं उपायों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/रख-रखाव/परिचालन हेतु सरकार/वैधानिक निकाय एवं निजी क्षेत्र की इकाई के मध्य निर्मित हुए संयुक्त उपक्रम/अनुबंध को सार्वजनिक-निजी भागीदारी(PPP) कहते हैं|योजना आयोग के अनुसार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) एक ऐसा निवेश मॉडल है जिसमें सेवा प्रदान करने का कार्य निजी क्षेत्र (अलाभकारी/लाभार्थ संगठन) द्वारा किया जाता है जबकि सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में सरकार या तो निजी भागीदार के साथ अनुबंध में शामिल रहती है या निजी क्षेत्र को सेवा प्रदान करने की प्रतिपूर्ति करती है। जब सेवा प्रदान करने के लिए न तो निजी क्षेत्र और न ही सार्वजनिक उपक्रम उपस्थित होता है तब इस प्रकार के अनुबंध नई गतिविधियों को तत्परता प्रदान करता है| सार्वजनिक निजी भागीदारी की अनेक विशेषताएं होती हैं एवं अनेक संदर्भों में यह अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण निवेश मॉडल होता है| PPP की विशेषताएं · यह सरकार एवं निजी इकाई के मध्य संयुक्त उपक्रम होता है, · यह लोक सेवाओं/परिसंपत्ति का प्रावधान करता है, ये वह सेवायें/परिसंपत्तियां होती हैं जो सामान्य/परम्परागत रूप से सरकार द्वारा प्रदान की जाती है, · इसमें निजी क्षेत्र के साथ जोखिम की भागीदारी होती है, · मात्र आउटसोर्सिंग से सम्बन्धित गतिविधियों को PPP में सम्मिलित नही किया जाता है, · PPP सम्बन्धी अनुबंध/संचालन एक पूर्व निर्धारित समयावधि के लिए होता है, · PPP में निजी इकाई द्वारा परियोजना में निवेश एवं/या प्रबंधन किया जाता है, · PPP में निजी इकाई को, परियोजना के निष्पादन पर आधारित भुगतान किये जाते हैं अर्थात निष्पादन बेहतर होने पर बेहतर भुगतान किया जाता है, · इसमें परियोजना के विलम्ब के लिए दंड की व्यवस्था होती है, · प्रत्येक परियोजना के सन्दर्भ में कुछ पूर्वनिर्धारित तकनीकी मानदंड होते हैं जैसे पुल निर्माण में तकनीकी मानदंड सरकार द्वारा निर्धारित किये जायेंगे| मानदंडों की पूर्ति न होने पर भुगतान रोका जा सकता है| अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में सार्वजनिक निजी भागीदारी का महत्व · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल सेनिजी क्षेत्र को आधारिक संरचना में निवेश हेतु प्रोत्साहन मिलता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल अपनाने से निजी क्षेत्र की वित्त तक सहज पहुच स्थापित हो जाती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल के माध्यम से आधारिक संरचना की परियोजनाओं के निर्माण/प्रबंधन में कार्यकुशलता बढ़ेगी क्योकि इससे निजी क्षेत्र का स्वयं स्वार्थ(लाभ प्रेरित उत्पादन) सम्मिलित होता है एवं निजी क्षेत्र का तकनीकी ज्ञान और पेशेवर ज्ञान, विशेषज्ञता आदि सम्मिलित होते हैं, · इससे सरकार पर वित्तीय भार में कमी आती है जिससे अन्य विकासात्मक व्यय में वृद्धि होती है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी निवेश मॉडल से सतत आधार पर अच्छी गुणवत्ता की आधारिक संरचना सम्बन्धी सेवायें, उचित उपभोक्ता शुल्क पर जनता/उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो सकेंगी, · इससे आधारिक संरचना की परियोजनाओं के नियोजन,निर्माण एवं रख-रखाव में जीवन चक्र दृष्टिकोण समायोजित होता है, · सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल आधारित संरचना की परियोजनाओं में सकारात्मक/धनात्मक बाह्यताओं के कारण बाजार तंत्र की विफलता का समाधान करता है, · आधारित संरचना सामान्यतः नैसर्गिक एकाधिकार(जहाँ प्रतिस्पर्धा नही होनी चाहिए) होती है जिसके कारण बाजार तंत्र विफल हो जाता है| इसलिए सरकार का संलग्न होना आवश्यक होता है, · इसमें उपभोक्ताओं को उपभोग के बाद शुल्क देने पड़ते हैं आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनेक विशेषताओं से युक्त सार्वजनिक-निजी भागीदारी निवेश मॉडल विभिन्न रूपों में महत्वपूर्ण होता है|तथापि इसकी कुछ सीमाएं भी हैं जैसे हर सार्वजनिक निजी भागीदारी में निजी भागीदार के लिए जोखिम शामिल होता है, जो उन जोखिमों को स्वीकार करने के लिए उचित रूप से मुआवजे की अपेक्षा करता है,इससे सरकारी लागतें बढ़ सकती हैं| इसी प्रकार जब किसी विशिष्ट परियोजना के लिए केवल एक सीमित संख्या में निजी संस्थाएं होती हैं, ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है|अतः जोखिमों का उचित मूल्यांकन एवं प्रतिस्पर्धी माहौल में इस तरह की भागीदारी करना अर्थव्यवस्था को अनेक लाभ पहुचायेगा|
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Model Code of Conduct is cardinal in ensuring free and fair elections. Do you agree that there is a need to give legal backing to the Model Code of Conduct? Examine. (150 Words | 10 marks )
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Approach: (a) Define the Model Code of Conduct (b) It"s purpose (c) Discrepancies in its implementation-Including issues and challenges (d) Need for putting a legal backup. Ans: Article 324 provides for an Election commission to take care of the election to the parliament and the state legislative assembly. To ensure free and fair elections, Election commission issues a set of guidelines, called as Model Code Of Conduct, to regulate the political parties and candidates prior to the election. Evolution: (a) A form of MCC was first implemented in Kerala assembly election in 1960 (b) 1962- Largely followed by all the political parties. (c) In 1979, the Election Commission added a section to regulate the ‘party in power’ and prevent it from gaining an unfair advantage at the time of elections. (d) 2013- guidelines regarding manifestos were included, on the direction of SC, by the EC. General Provisions: (a) General Conduct: (b)Party in Power: (c)Meetings and Polling Booths: (d)Processions : Issues associated with MCC: Premise: Based on the premise, that political parties and candidates would accord importance to issue of propriety, ethics and morality. Neglects self-interest and biases. Unbridled powers of social media: Anonymity and Leaky transparency norms. For example
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##Question:Model Code of Conduct is cardinal in ensuring free and fair elections. Do you agree that there is a need to give legal backing to the Model Code of Conduct? Examine. (150 Words | 10 marks )##Answer:Approach: (a) Define the Model Code of Conduct (b) It"s purpose (c) Discrepancies in its implementation-Including issues and challenges (d) Need for putting a legal backup. Ans: Article 324 provides for an Election commission to take care of the election to the parliament and the state legislative assembly. To ensure free and fair elections, Election commission issues a set of guidelines, called as Model Code Of Conduct, to regulate the political parties and candidates prior to the election. Evolution: (a) A form of MCC was first implemented in Kerala assembly election in 1960 (b) 1962- Largely followed by all the political parties. (c) In 1979, the Election Commission added a section to regulate the ‘party in power’ and prevent it from gaining an unfair advantage at the time of elections. (d) 2013- guidelines regarding manifestos were included, on the direction of SC, by the EC. General Provisions: (a) General Conduct: (b)Party in Power: (c)Meetings and Polling Booths: (d)Processions : Issues associated with MCC: Premise: Based on the premise, that political parties and candidates would accord importance to issue of propriety, ethics and morality. Neglects self-interest and biases. Unbridled powers of social media: Anonymity and Leaky transparency norms. For example
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1773 में लाये गए रेग्युलेटिंग एक्ट के प्रावधानों को सूचीबद्ध करते हुए इसके सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये | (200 शब्द) Listing to the provisions of the Regulating Act brought in 1773, clarify its positive-negative aspects. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में रेग्युलेटिंग एक्ट को लाने की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में अधिनियम के प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में प्रावधानों के सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सीमाओं में सुधार के दृष्टिकोण से पिट्स इंडिया एक्ट के महत्त्व को संक्षेप में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1773 में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक शक्ति के साथ साथ पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में भी स्थापित हो चुकी थीअतः ब्रिटिश सरकार एवं कम्पनी के सम्बन्धों को पुनः परिभाषित किये जाने की मांग की जा रही थी| विभिन्न कारणों से कम्पनी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही थी और ब्रिटिश सरकार से संकट से निकलने के लिए ऋण की मांग की| ब्रिटिश समाज भी संक्रमण की प्रक्रिया से गुजर रहा था, उद्योगपतियों के द्वारा कम्पनी पर नियंत्रण एवं एकाधिकार समाप्त करने की मांग की जा रही थी| ब्रिटिश समाज में नैतिक आधारों पर तथा ईर्ष्यावश भी कम्पनी पर नियंत्रण की मांग की जा रही थी| उपरोक्त पृष्ठभूमि में 1773 का रेग्युलेटिंग अधिनियम पारित किया गया प्रमुख प्रावधान · कम्पनी समय-समय पर भारतीय मामलों के सन्दर्भ में वित्त मंत्री एवं विदेश मंत्री को रिपोर्ट करेगी · भारत में व्यापार एवं नियुक्ति पर कम्पनी का एकाधिकार होगा · भारतीय प्रशासन के संचालन के लिए एक बंगाल का गवर्नर जनरल एवं चार सदस्यीय परिषद् होगी · गवर्नर जनरल परिषद् बहुमत के आधार पर कार्य करेगी तथा गवर्नर जनरल को निर्णायक मत का अधिकार दिया गया · बॉम्बे एवं मद्रास के अधीक्षण की जिम्मेदारी बंगाल के गवर्नर जनरल को दे दी गयी · कम्पनी के अधिकारी रिश्वत एवं उपहार नहीं लेंगे · कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय के गठन का प्रावधान किया गया था जो अंतिम अपीलीय न्यायालय नहीं था, इसका गठन 1774 में किया गया और एलिजा इम्पे इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश बनाए गए सकारात्मक पहलू · ब्रिटिश संसदीय अधिनियम के द्वारा भारत पर शासन का यह पहला प्रयास था · संवैधानिक विकास की प्रक्रिया यहीं से प्रारम्भ होती है जैसे कार्यपालिका का पुनर्गठन, केंद्र राज्य सम्बन्धों को दिशा देने का प्रयास किया गया, उच्चतम न्यायालय का प्रवाधान किया गया आदि · कानून के द्वारा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया था नकारात्मक पहलू · इस अधिनियम का एक प्रमुख उद्देश्य था कम्पनी पर सरकारी नियंत्रण को स्थापित करना इसमें आंशिक सफलता ही प्राप्त हो पायी · भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में भी जो प्रावधान किये गए वह प्रभावी नहीं था जैसे गवर्नर जनरल परिषद् के मध्य टकराव की स्थिति थी, · प्रावधानों में अस्पष्टता के कारण गवर्नर जनरल तथा प्रान्तों के मध्य तनावपूर्ण सम्बन्ध थे , · न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र एवं कानूनों को लेकर अस्पष्टता और इसके कारण उत्पन्न विवाद · कानूनी प्रावधान के बावजूद भ्रष्टाचार जारी रहा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट भारत में कम्पनी के शासन को विनियमित करने का प्रस्थान बिंदु था किन्तु यह अनेक सीमाओं से युक्त था| फिर भी इस अधिनियम का महत्त्व इस बात में है कि यह भारत में संवैधानिक विकास का प्रस्थान बिंदु था| इस एक्ट की कमियों में सुधार के लिए पिट्स इंडिया एक्ट के माध्यम से प्रयास किये गए और शासन-प्रशासन का केन्द्रीकरण किया गया| ब्रिटेन में 6 सदस्यीय बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल का गठन किया गया, भारतीय प्रशासन के संचालन के लिए बंगाल के गवर्नर जनरल के साथ 3 सदस्यीय परिषद् का प्रावधान किया गया|बॉम्बे एवं मद्रास को युद्ध, कूटनीति एवं राजस्व के मामले में बंगाल केगवर्नर जनरल के अधीन किया गया| इन प्रावधानों के माध्यम से रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों में सुधार किये गए|
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##Question:1773 में लाये गए रेग्युलेटिंग एक्ट के प्रावधानों को सूचीबद्ध करते हुए इसके सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये | (200 शब्द) Listing to the provisions of the Regulating Act brought in 1773, clarify its positive-negative aspects. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में रेग्युलेटिंग एक्ट को लाने की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में अधिनियम के प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में प्रावधानों के सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में सीमाओं में सुधार के दृष्टिकोण से पिट्स इंडिया एक्ट के महत्त्व को संक्षेप में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1773 में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक शक्ति के साथ साथ पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में भी स्थापित हो चुकी थीअतः ब्रिटिश सरकार एवं कम्पनी के सम्बन्धों को पुनः परिभाषित किये जाने की मांग की जा रही थी| विभिन्न कारणों से कम्पनी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही थी और ब्रिटिश सरकार से संकट से निकलने के लिए ऋण की मांग की| ब्रिटिश समाज भी संक्रमण की प्रक्रिया से गुजर रहा था, उद्योगपतियों के द्वारा कम्पनी पर नियंत्रण एवं एकाधिकार समाप्त करने की मांग की जा रही थी| ब्रिटिश समाज में नैतिक आधारों पर तथा ईर्ष्यावश भी कम्पनी पर नियंत्रण की मांग की जा रही थी| उपरोक्त पृष्ठभूमि में 1773 का रेग्युलेटिंग अधिनियम पारित किया गया प्रमुख प्रावधान · कम्पनी समय-समय पर भारतीय मामलों के सन्दर्भ में वित्त मंत्री एवं विदेश मंत्री को रिपोर्ट करेगी · भारत में व्यापार एवं नियुक्ति पर कम्पनी का एकाधिकार होगा · भारतीय प्रशासन के संचालन के लिए एक बंगाल का गवर्नर जनरल एवं चार सदस्यीय परिषद् होगी · गवर्नर जनरल परिषद् बहुमत के आधार पर कार्य करेगी तथा गवर्नर जनरल को निर्णायक मत का अधिकार दिया गया · बॉम्बे एवं मद्रास के अधीक्षण की जिम्मेदारी बंगाल के गवर्नर जनरल को दे दी गयी · कम्पनी के अधिकारी रिश्वत एवं उपहार नहीं लेंगे · कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय के गठन का प्रावधान किया गया था जो अंतिम अपीलीय न्यायालय नहीं था, इसका गठन 1774 में किया गया और एलिजा इम्पे इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश बनाए गए सकारात्मक पहलू · ब्रिटिश संसदीय अधिनियम के द्वारा भारत पर शासन का यह पहला प्रयास था · संवैधानिक विकास की प्रक्रिया यहीं से प्रारम्भ होती है जैसे कार्यपालिका का पुनर्गठन, केंद्र राज्य सम्बन्धों को दिशा देने का प्रयास किया गया, उच्चतम न्यायालय का प्रवाधान किया गया आदि · कानून के द्वारा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया था नकारात्मक पहलू · इस अधिनियम का एक प्रमुख उद्देश्य था कम्पनी पर सरकारी नियंत्रण को स्थापित करना इसमें आंशिक सफलता ही प्राप्त हो पायी · भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में भी जो प्रावधान किये गए वह प्रभावी नहीं था जैसे गवर्नर जनरल परिषद् के मध्य टकराव की स्थिति थी, · प्रावधानों में अस्पष्टता के कारण गवर्नर जनरल तथा प्रान्तों के मध्य तनावपूर्ण सम्बन्ध थे , · न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र एवं कानूनों को लेकर अस्पष्टता और इसके कारण उत्पन्न विवाद · कानूनी प्रावधान के बावजूद भ्रष्टाचार जारी रहा इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट भारत में कम्पनी के शासन को विनियमित करने का प्रस्थान बिंदु था किन्तु यह अनेक सीमाओं से युक्त था| फिर भी इस अधिनियम का महत्त्व इस बात में है कि यह भारत में संवैधानिक विकास का प्रस्थान बिंदु था| इस एक्ट की कमियों में सुधार के लिए पिट्स इंडिया एक्ट के माध्यम से प्रयास किये गए और शासन-प्रशासन का केन्द्रीकरण किया गया| ब्रिटेन में 6 सदस्यीय बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल का गठन किया गया, भारतीय प्रशासन के संचालन के लिए बंगाल के गवर्नर जनरल के साथ 3 सदस्यीय परिषद् का प्रावधान किया गया|बॉम्बे एवं मद्रास को युद्ध, कूटनीति एवं राजस्व के मामले में बंगाल केगवर्नर जनरल के अधीन किया गया| इन प्रावधानों के माध्यम से रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों में सुधार किये गए|
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भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्यों एवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए।(150 -200 शब्द, 10 marks) Mentioning the brief background of industrial policies in India, discuss the objectives and characteristics of the new industrial policy, 1991. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंनई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्यों एवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पहली औधोगिक नीति यानि इंडस्ट्रियल पॉलिसी रेजोलुशन(आईपीआर),1948 मेंसार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सह अस्तित्व को स्वीकार किया गया। यह नीति नियंत्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखती है।दूसरी, आईपीआर,1956 में लायी गयी। इसे भारत का आर्थिक सविंधान बोला जाता था। इसमेंसार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी थी तथालाइसेंस व्यवस्था की शुरुआत की गई। MNCs को हतोत्साहित किया गया तथाMSMEsको बढ़ावा। दिसंबर 1977 में घोषित औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में बिना बदलाव किए हुए इसमें 1956 की नीति के अनुसार ही बनाए रखा गया।इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योग के विकास पर विशेष बल दिया गया।वर्ष 1980 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक उद्यमों के कुशल प्रबंधन पर बल दिया गया। इस नीति में आर्थिक संघवाद की धारणा पर बल देते हुए प्रत्येक चिन्हित पिछड़े जिलों में लघु एवं कुटीर उद्योग इकाइयों की स्थापना पर बल दिया गया। न्यू इंडस्ट्रियल पॉलिसी,1991 के उद्देश्य एवं विशेषताएं:- बाजार रुझान को बढ़ावा देना तथाकॉम्पिटिटिव स्टूमुलुस देना।इस नीति के अंतर्गत उद्योग की शक्ति और परिपक्वता की पहचान की गयी और उसे उच्च गति के विकास के लिए प्रतिस्पर्धात्मक रूप में प्रेरित किया गया। इन कदमों में व्यापार व्यवस्थाओं के व्यापक उपयोग तथा विदेशी निवेशकर्ताओं और तकनीकी के आपूर्तिकर्ता के साथ गतिशील सम्बन्ध बनाने के जरिए घरेलू और विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया गया। विभिन्न नियंत्रणों को समाप्त करना। ज्यादातर वस्तुओं के लिए औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी। वर्तमान में सुरक्षा, सामरिक और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील पांच उद्योग हीअनिवार्य लाइसेंस के तहत आते हैं। नयी औद्योगिक नीति में उच्च तकनीक एवं उच्च निवेश से संबद्ध प्राथमिकता वाले उद्योगों की सूची बनाई गई, जिसमें 51 प्रतिशत तक के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्वतः अनुमति दी गई।इसके लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड का गठन किया गया। डीरिजर्वेशन नीति अपनाई गई। सार्वजनिक क्षेत्र के उधमों(PSU) के 17 उद्योगों का डीरिजर्वेशन किया गया। अभी केवल दो उधोगोंऑटोमिक एनर्जी एंड रेलवे का रिजर्वेशन जारी है। MRTP अधिनियम में उदारीकरण करना और अंतिम रूप से इसे समाप्त कर दिया गया अब प्रतिस्पृधी कानून ,2002 लागू है। इस प्रकार इस नीति द्वारा उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण की दिशा में व्यापक कदम उठाये गए।
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##Question:भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्यों एवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए।(150 -200 शब्द, 10 marks) Mentioning the brief background of industrial policies in India, discuss the objectives and characteristics of the new industrial policy, 1991. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंनई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्यों एवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पहली औधोगिक नीति यानि इंडस्ट्रियल पॉलिसी रेजोलुशन(आईपीआर),1948 मेंसार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सह अस्तित्व को स्वीकार किया गया। यह नीति नियंत्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखती है।दूसरी, आईपीआर,1956 में लायी गयी। इसे भारत का आर्थिक सविंधान बोला जाता था। इसमेंसार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी थी तथालाइसेंस व्यवस्था की शुरुआत की गई। MNCs को हतोत्साहित किया गया तथाMSMEsको बढ़ावा। दिसंबर 1977 में घोषित औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में बिना बदलाव किए हुए इसमें 1956 की नीति के अनुसार ही बनाए रखा गया।इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योग के विकास पर विशेष बल दिया गया।वर्ष 1980 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक उद्यमों के कुशल प्रबंधन पर बल दिया गया। इस नीति में आर्थिक संघवाद की धारणा पर बल देते हुए प्रत्येक चिन्हित पिछड़े जिलों में लघु एवं कुटीर उद्योग इकाइयों की स्थापना पर बल दिया गया। न्यू इंडस्ट्रियल पॉलिसी,1991 के उद्देश्य एवं विशेषताएं:- बाजार रुझान को बढ़ावा देना तथाकॉम्पिटिटिव स्टूमुलुस देना।इस नीति के अंतर्गत उद्योग की शक्ति और परिपक्वता की पहचान की गयी और उसे उच्च गति के विकास के लिए प्रतिस्पर्धात्मक रूप में प्रेरित किया गया। इन कदमों में व्यापार व्यवस्थाओं के व्यापक उपयोग तथा विदेशी निवेशकर्ताओं और तकनीकी के आपूर्तिकर्ता के साथ गतिशील सम्बन्ध बनाने के जरिए घरेलू और विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया गया। विभिन्न नियंत्रणों को समाप्त करना। ज्यादातर वस्तुओं के लिए औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी। वर्तमान में सुरक्षा, सामरिक और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील पांच उद्योग हीअनिवार्य लाइसेंस के तहत आते हैं। नयी औद्योगिक नीति में उच्च तकनीक एवं उच्च निवेश से संबद्ध प्राथमिकता वाले उद्योगों की सूची बनाई गई, जिसमें 51 प्रतिशत तक के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्वतः अनुमति दी गई।इसके लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड का गठन किया गया। डीरिजर्वेशन नीति अपनाई गई। सार्वजनिक क्षेत्र के उधमों(PSU) के 17 उद्योगों का डीरिजर्वेशन किया गया। अभी केवल दो उधोगोंऑटोमिक एनर्जी एंड रेलवे का रिजर्वेशन जारी है। MRTP अधिनियम में उदारीकरण करना और अंतिम रूप से इसे समाप्त कर दिया गया अब प्रतिस्पृधी कानून ,2002 लागू है। इस प्रकार इस नीति द्वारा उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण की दिशा में व्यापक कदम उठाये गए।
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Mentioning the brief background of industrial policies in India, discuss the objectives and characteristics of the new industrial policy, 1991. (200 words) भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्योंएवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए।(200 शब्द)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंनई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्यों एवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पहली औधोगिक नीति यानिइंडस्ट्रियल पॉलिसी रेजोलुशन(आईपीआर),1948 मेंसार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सह अस्तित्व को स्वीकार किया गया। यह नीति नियंत्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखती है।दूसरी, आईपीआर,1956 में लायी गयी।इसे भारत का आर्थिक सविंधान बोला जाता था। इसमेंसार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी थी तथालाइसेंस व्यवस्था की शुरुआत की गई।MNCs को हतोत्साहित किया गया तथाMSMEsको बढ़ावा दिया गया। दिसंबर 1977 में घोषित औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में बिना बदलाव किए हुए इसमें 1956 की नीति के अनुसार ही बनाए रखा गया।इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योग के विकास पर विशेष बल दिया गया।वर्ष 1980 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक उद्यमों के कुशल प्रबंधन पर बल दिया गया।इस नीति में आर्थिक संघवाद की धारणा पर बल देते हुए प्रत्येक चिन्हित पिछड़े जिलों में लघु एवं कुटीर उद्योग इकाइयों की स्थापना पर बल दिया गया। न्यू इंडस्ट्रियल पॉलिसी,1991 के उद्देश्य एवं विशेषताएं:- बाजार रुझान को बढ़ावा देना तथाकॉम्पिटिटिव स्टूमुलुस देना।इस नीति के अंतर्गत उद्योग की शक्ति और परिपक्वता की पहचान की गयी और उसे उच्च गति के विकास के लिए प्रतिस्पर्धात्मक रूप में प्रेरित किया गया। इन कदमों में व्यापार व्यवस्थाओं के व्यापक उपयोग तथा विदेशी निवेशकर्ताओं और तकनीकी के आपूर्तिकर्ता के साथ गतिशील सम्बन्ध बनाने के जरिए घरेलू और विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया गया। विभिन्न नियंत्रणों को समाप्त करना। ज्यादातर वस्तुओं के लिए औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी। वर्तमान में सुरक्षा, सामरिक और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील पांच उद्योग हीअनिवार्य लाइसेंस के तहत आते हैं। नयी औद्योगिक नीति में उच्च तकनीक एवं उच्च निवेश से संबद्ध प्राथमिकता वाले उद्योगों की सूची बनाई गई, जिसमें 51 प्रतिशत तक के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्वतः अनुमति दी गई।इसके लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड का गठन किया गया। डीरिजर्वेशन नीति अपनाई गई। सार्वजनिक क्षेत्र के उधमों(PSU) के 17 उद्योगों का डीरिजर्वेशन किया गया। अभी केवल दो उधोगोंऑटोमिक एनर्जी एंड रेलवे का रिजर्वेशन जारी है। MRTP अधिनियम में उदारीकरण करनाऔर अंतिम रूप से इसे समाप्त कर दिया गया अब प्रतिस्पृधी कानून ,2002 लागू है। इस प्रकार इस नीति द्वारा उदारीकरण,निजीकरण एवं वैश्वीकरण की दिशा में व्यापक कदम उठाये गए।
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##Question:Mentioning the brief background of industrial policies in India, discuss the objectives and characteristics of the new industrial policy, 1991. (200 words) भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्योंएवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए।(200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,भारत में औद्योगिक नीतियों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंनई औद्योगिक नीति,1991 के उद्देश्यों एवं विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पहली औधोगिक नीति यानिइंडस्ट्रियल पॉलिसी रेजोलुशन(आईपीआर),1948 मेंसार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सह अस्तित्व को स्वीकार किया गया। यह नीति नियंत्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखती है।दूसरी, आईपीआर,1956 में लायी गयी।इसे भारत का आर्थिक सविंधान बोला जाता था। इसमेंसार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी थी तथालाइसेंस व्यवस्था की शुरुआत की गई।MNCs को हतोत्साहित किया गया तथाMSMEsको बढ़ावा दिया गया। दिसंबर 1977 में घोषित औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में बिना बदलाव किए हुए इसमें 1956 की नीति के अनुसार ही बनाए रखा गया।इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योग के विकास पर विशेष बल दिया गया।वर्ष 1980 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक उद्यमों के कुशल प्रबंधन पर बल दिया गया।इस नीति में आर्थिक संघवाद की धारणा पर बल देते हुए प्रत्येक चिन्हित पिछड़े जिलों में लघु एवं कुटीर उद्योग इकाइयों की स्थापना पर बल दिया गया। न्यू इंडस्ट्रियल पॉलिसी,1991 के उद्देश्य एवं विशेषताएं:- बाजार रुझान को बढ़ावा देना तथाकॉम्पिटिटिव स्टूमुलुस देना।इस नीति के अंतर्गत उद्योग की शक्ति और परिपक्वता की पहचान की गयी और उसे उच्च गति के विकास के लिए प्रतिस्पर्धात्मक रूप में प्रेरित किया गया। इन कदमों में व्यापार व्यवस्थाओं के व्यापक उपयोग तथा विदेशी निवेशकर्ताओं और तकनीकी के आपूर्तिकर्ता के साथ गतिशील सम्बन्ध बनाने के जरिए घरेलू और विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया गया। विभिन्न नियंत्रणों को समाप्त करना। ज्यादातर वस्तुओं के लिए औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी। वर्तमान में सुरक्षा, सामरिक और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील पांच उद्योग हीअनिवार्य लाइसेंस के तहत आते हैं। नयी औद्योगिक नीति में उच्च तकनीक एवं उच्च निवेश से संबद्ध प्राथमिकता वाले उद्योगों की सूची बनाई गई, जिसमें 51 प्रतिशत तक के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्वतः अनुमति दी गई।इसके लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड का गठन किया गया। डीरिजर्वेशन नीति अपनाई गई। सार्वजनिक क्षेत्र के उधमों(PSU) के 17 उद्योगों का डीरिजर्वेशन किया गया। अभी केवल दो उधोगोंऑटोमिक एनर्जी एंड रेलवे का रिजर्वेशन जारी है। MRTP अधिनियम में उदारीकरण करनाऔर अंतिम रूप से इसे समाप्त कर दिया गया अब प्रतिस्पृधी कानून ,2002 लागू है। इस प्रकार इस नीति द्वारा उदारीकरण,निजीकरण एवं वैश्वीकरण की दिशा में व्यापक कदम उठाये गए।
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The rise of autonomous states was a major factor in the decline of the Mughal Empire. Discuss (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE -CONCLUSION A concluding remark on the growth of the autonomous states at the cost of the Mughal Empire and how the British used this to their advantage. Answer:- There was no single emperor to replace the Mughal Empire. Numerous autonomous states rose in the 18th century. The Britishers used this opportunity and ultimately emerged victorious in India. HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE 1) THE RISE OF PROMINENT RULERS IN THE AUTONOMOUS STATES The autonomous kingdoms were carved out as a result of factionalism in the Mughal court (apart from other reasons). This led to the dissatisfied and powerful ones to break away, accept nominal sovereignty of the Mughal Empire and maintain real powers in their kingdoms. 1.1) For example, Hyderabad was carved out by Nizam-ul-Mulk Asaf Jah. The Nizam had even killed the Sayyid Brothers, who were actually the king makers at the Mughal court. The Nizam, who was dissatisfied with the Mughals (he was primarily frustrated with the court politics- Mohammad Shah Rangeela was succumbing to flattery rather than listening to real genuine advice), left the court and carved out his Empire in Hyderabad. 1.2) In Bengal, the power of Murshid Quli Khan was increasing during the reign of Farrukhsiyar. (This was done to check the Sayyid Brothers). 1.3) Hyder Ali did a coup d’état and gradually carved out an autonomous principality in Mysore. (Mysore was carved out of the Vijayanagar Empire as a separate dynasty by the Wodeyar dynasty). 2) THE RISE OF LOCAL MAGNETS Local sections were made powerful in order to maintain the loyalty base of the autonomous rulers. For example, the zamindars, bankers, traders and merchants emerged powerful in Bengal. These sections and their heads were loyal to the autonomous rulers rather than to the Mughal king at the centre. 2.1) Jagat Seth did a coup d’état and removed Sarfaraz Khan, who was the ruler or Bengal. Such were their powers. 2.2) In Punjab, the powerful Sikh chiefs supported Maharaja Ranjit Singh. 2.3) The autonomous states like Mysore, Bengal etc. developed their own intermediaries who were very loyal to them. 2.4) In Travancore, an autonomous kingdom was carved out by Martanda Verma and Rama Verma, which was independent from the Mughals. 3) DEFIANCE OF THE AUTHORITY OF THE MUGHALS 3.1) Alivardi Khan, who ruled Bengal between 1740 and 1756, stopped paying revenue to the Mughal Empire. Appointments were not made in approval/ the name of the Mughal Emperor. 3.2) In Hyderabad, the Nizam started signing his own treaties and granted jagirs as per his own wish. This shifted power to the local authorities and the local elites, who were loyal to the Nizam. 3.3) In Awadh, dynastic rule was brought in by Safdar Jung (the son-in-law of Sadat Khan). Sadat Khan made the office of the Diwan completely independent of the Mughal Empire. He wouldn’t even share the accounts, briefs, analysis with the Mughal Empire and would only pay the revenue due. Therefore, Mughal supervision was removed. 3.4) In Mysore, Tipu Sultan defied the Mughal authority by issuing his own coins and ensuring his own name in the Friday prayers (Khutba). He also tried to get an order from the Khalifa that he was the rightful owner of Mysore (as agaist Mughal ownership). 4) FACTION AT THE MUGHAL COURT Sadat Khan was not given the post of Mir Bakshi (imperial treasurer) in 1739. He, therefore, supported Nadir Shah against the Mughals. Safdar Jung (Awadh) misused his post of wazir by taking over Farrukhabad. 5) SIDING WITH FOREIGN INVASIONS For example, the Nawab of Awadh sided with Abdali in the Battle of Panipat in 1761, in order to defeat the Marathas. Such foreign invasions significantly weakened the Mughal Empire with all their plunder and loot. 6) PORTS IN THE AUTONOMOUS STATES Ports such as Hooghly were thriving in trade and commerce. These ports brought in a lot of revenue. Such revenue brought in income and strengthened the autonomous ruler rather than the centre. 6.1) THE RISE IN SEA TRADE The law and security system of the time was not good. This led to a rise in the level of sea trade at the cost of land trade. Since land routes based trade decreased it led to a decline in power of the Mughal Empire in an indirect manner, as a result of the loss of trade based revenue. On the other hand, the trade revenue increased for the autonomous states like Bengal and Gujarat. Thus, it can be said that the autonomous states grew at the cost of the Mughal Empire. 6.2) BENEFIT OUT OF SEA TRADE FOR THE EUROPEANS The shifting of trade to the seas benefitted the European company, private officials and ships. This happened as the Europeans ships were well developed as a result of the industrial revolution there. 7) POLITICAL TURMOIL The Marathas kept raiding the Empire creating political turmoil for an already crumbling Empire. They were opportunistic and regularly changed sides between the Marathas and the Mughals. The Marathas raided the Rajputs, the Konkan area and Khandesh areas under the Nizam. 7.1) During the time of Aurangzeb, a political rift came in 1675 between the Mughals and the Sikhs. Aurangzeb assassinated Guru Teg Bahadur. In 1699, the Khalsa was established under Guru Gobind Singh. This was a military organisation for armed resistance (to protect the Sikh community). The Jat peasantry which rose within the Sikhs were violent and used arms. The regional pillars (Misls) of the Sikh Empire looted northern India at the cost of the Mughal Empire. 8) INABILITY TO OVERCOME THE AUTONOMOUS KINGDOMS/ STRONG AUTONOMOUS STATES The Mughals were not able to capture the Maratha Empire or eliminate it. They could only hurt it. An independent status of Maharashtra was created under Peshwa Balaji Vishwanath. In 1728, the Marathas got 60% share of Gujarat revenue from the Mughals. In 1739, a huge military army, under the military leadership of the Nizam, lost again from the Marathas. After the war, by the Treaty of Bhopal, the Marathas got Malwa and all the land between Narmada and Chambal. 8.1) The Sikhs were so strong that even Ahmad Shah Abdali and the Marathas were not able to destroy the Sikhs. Banda Bahadur set up his own administration between the Yamuna and Ravi. He even had the courage to challenge the Mughals as well. He minted his own coins and appointed his own diwan for revenue management, in that area. Bahadur Shah attacked Punjab but failed. By 1760s, they covered the area from the Satluj to the Indus. They, under Ranjit Singh, were even able to defeat the third Afghan invasion in 1799. By the Treaty of Amritsar in 1809, Maharaja Ranjeet Singh was declared as the sovereign ruler of Punjab by the English. 8.2) The state of Mysore was a warfare state, with a highly advanced military and high degree of modernisation. The army under Hyder Ali and Tipu Sultan was trained by French experts in European style. It was much more advanced than the Mughal state. It also had the best agricultural productivity. Sericulture technique was introduced in the state of Mysore first. Since these states became so powerful, the English East India Company did not have one single united formidable power to fight with. They entered these autonomous kingdoms like Bengal, as traders, and gradually gained political power. Gradually they become so powerful that they ultimately defeated the French as well. With the rise in the power of the autonomous kingdoms, the power of the Mughals gradually declined. By 1858, the British only had to make a nominal transfer of power from the Mughals to the British government, since the real power of the Mughals had almost ended by the end of the 18th century and mid-19th century.
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##Question:The rise of autonomous states was a major factor in the decline of the Mughal Empire. Discuss (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE -CONCLUSION A concluding remark on the growth of the autonomous states at the cost of the Mughal Empire and how the British used this to their advantage. Answer:- There was no single emperor to replace the Mughal Empire. Numerous autonomous states rose in the 18th century. The Britishers used this opportunity and ultimately emerged victorious in India. HOW THE AUTONOMOUS STATES WERE THE MAJOR FACTORS FOR THE DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE 1) THE RISE OF PROMINENT RULERS IN THE AUTONOMOUS STATES The autonomous kingdoms were carved out as a result of factionalism in the Mughal court (apart from other reasons). This led to the dissatisfied and powerful ones to break away, accept nominal sovereignty of the Mughal Empire and maintain real powers in their kingdoms. 1.1) For example, Hyderabad was carved out by Nizam-ul-Mulk Asaf Jah. The Nizam had even killed the Sayyid Brothers, who were actually the king makers at the Mughal court. The Nizam, who was dissatisfied with the Mughals (he was primarily frustrated with the court politics- Mohammad Shah Rangeela was succumbing to flattery rather than listening to real genuine advice), left the court and carved out his Empire in Hyderabad. 1.2) In Bengal, the power of Murshid Quli Khan was increasing during the reign of Farrukhsiyar. (This was done to check the Sayyid Brothers). 1.3) Hyder Ali did a coup d’état and gradually carved out an autonomous principality in Mysore. (Mysore was carved out of the Vijayanagar Empire as a separate dynasty by the Wodeyar dynasty). 2) THE RISE OF LOCAL MAGNETS Local sections were made powerful in order to maintain the loyalty base of the autonomous rulers. For example, the zamindars, bankers, traders and merchants emerged powerful in Bengal. These sections and their heads were loyal to the autonomous rulers rather than to the Mughal king at the centre. 2.1) Jagat Seth did a coup d’état and removed Sarfaraz Khan, who was the ruler or Bengal. Such were their powers. 2.2) In Punjab, the powerful Sikh chiefs supported Maharaja Ranjit Singh. 2.3) The autonomous states like Mysore, Bengal etc. developed their own intermediaries who were very loyal to them. 2.4) In Travancore, an autonomous kingdom was carved out by Martanda Verma and Rama Verma, which was independent from the Mughals. 3) DEFIANCE OF THE AUTHORITY OF THE MUGHALS 3.1) Alivardi Khan, who ruled Bengal between 1740 and 1756, stopped paying revenue to the Mughal Empire. Appointments were not made in approval/ the name of the Mughal Emperor. 3.2) In Hyderabad, the Nizam started signing his own treaties and granted jagirs as per his own wish. This shifted power to the local authorities and the local elites, who were loyal to the Nizam. 3.3) In Awadh, dynastic rule was brought in by Safdar Jung (the son-in-law of Sadat Khan). Sadat Khan made the office of the Diwan completely independent of the Mughal Empire. He wouldn’t even share the accounts, briefs, analysis with the Mughal Empire and would only pay the revenue due. Therefore, Mughal supervision was removed. 3.4) In Mysore, Tipu Sultan defied the Mughal authority by issuing his own coins and ensuring his own name in the Friday prayers (Khutba). He also tried to get an order from the Khalifa that he was the rightful owner of Mysore (as agaist Mughal ownership). 4) FACTION AT THE MUGHAL COURT Sadat Khan was not given the post of Mir Bakshi (imperial treasurer) in 1739. He, therefore, supported Nadir Shah against the Mughals. Safdar Jung (Awadh) misused his post of wazir by taking over Farrukhabad. 5) SIDING WITH FOREIGN INVASIONS For example, the Nawab of Awadh sided with Abdali in the Battle of Panipat in 1761, in order to defeat the Marathas. Such foreign invasions significantly weakened the Mughal Empire with all their plunder and loot. 6) PORTS IN THE AUTONOMOUS STATES Ports such as Hooghly were thriving in trade and commerce. These ports brought in a lot of revenue. Such revenue brought in income and strengthened the autonomous ruler rather than the centre. 6.1) THE RISE IN SEA TRADE The law and security system of the time was not good. This led to a rise in the level of sea trade at the cost of land trade. Since land routes based trade decreased it led to a decline in power of the Mughal Empire in an indirect manner, as a result of the loss of trade based revenue. On the other hand, the trade revenue increased for the autonomous states like Bengal and Gujarat. Thus, it can be said that the autonomous states grew at the cost of the Mughal Empire. 6.2) BENEFIT OUT OF SEA TRADE FOR THE EUROPEANS The shifting of trade to the seas benefitted the European company, private officials and ships. This happened as the Europeans ships were well developed as a result of the industrial revolution there. 7) POLITICAL TURMOIL The Marathas kept raiding the Empire creating political turmoil for an already crumbling Empire. They were opportunistic and regularly changed sides between the Marathas and the Mughals. The Marathas raided the Rajputs, the Konkan area and Khandesh areas under the Nizam. 7.1) During the time of Aurangzeb, a political rift came in 1675 between the Mughals and the Sikhs. Aurangzeb assassinated Guru Teg Bahadur. In 1699, the Khalsa was established under Guru Gobind Singh. This was a military organisation for armed resistance (to protect the Sikh community). The Jat peasantry which rose within the Sikhs were violent and used arms. The regional pillars (Misls) of the Sikh Empire looted northern India at the cost of the Mughal Empire. 8) INABILITY TO OVERCOME THE AUTONOMOUS KINGDOMS/ STRONG AUTONOMOUS STATES The Mughals were not able to capture the Maratha Empire or eliminate it. They could only hurt it. An independent status of Maharashtra was created under Peshwa Balaji Vishwanath. In 1728, the Marathas got 60% share of Gujarat revenue from the Mughals. In 1739, a huge military army, under the military leadership of the Nizam, lost again from the Marathas. After the war, by the Treaty of Bhopal, the Marathas got Malwa and all the land between Narmada and Chambal. 8.1) The Sikhs were so strong that even Ahmad Shah Abdali and the Marathas were not able to destroy the Sikhs. Banda Bahadur set up his own administration between the Yamuna and Ravi. He even had the courage to challenge the Mughals as well. He minted his own coins and appointed his own diwan for revenue management, in that area. Bahadur Shah attacked Punjab but failed. By 1760s, they covered the area from the Satluj to the Indus. They, under Ranjit Singh, were even able to defeat the third Afghan invasion in 1799. By the Treaty of Amritsar in 1809, Maharaja Ranjeet Singh was declared as the sovereign ruler of Punjab by the English. 8.2) The state of Mysore was a warfare state, with a highly advanced military and high degree of modernisation. The army under Hyder Ali and Tipu Sultan was trained by French experts in European style. It was much more advanced than the Mughal state. It also had the best agricultural productivity. Sericulture technique was introduced in the state of Mysore first. Since these states became so powerful, the English East India Company did not have one single united formidable power to fight with. They entered these autonomous kingdoms like Bengal, as traders, and gradually gained political power. Gradually they become so powerful that they ultimately defeated the French as well. With the rise in the power of the autonomous kingdoms, the power of the Mughals gradually declined. By 1858, the British only had to make a nominal transfer of power from the Mughals to the British government, since the real power of the Mughals had almost ended by the end of the 18th century and mid-19th century.
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सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियों की चर्चा कीजिये| इसके साथ हीसार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के सन्दर्भ मेंराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 marks) Discuss the shortcomings of the public distribution system. Along with this, clarify the importance of the National Food Security Act (2013) in relation to improvement in the public distribution system. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में PDS के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में PDS की कमियों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में PDS में सुधार के सन्दर्भ में NFSA(2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण सुधार का सन्दर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आवश्यक वस्तुओं की उचित मूल्य की दुकानों(FPS) के माध्यम से सहायिकी युक्त मूल्यों पर विक्रय की योजना है| यह 100 % केंद्र प्रायोजित योजना है|इसके लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) MSP/PP के आधार पर खरीद करता है और केन्द्रीय निर्गमन मूल्य(CIP) पर राज्यों को बेचता है| राज्य सरकार FPS के माध्यम से निर्गमन मूल्य(IP) पर उपभोक्ताओं को बेचती है| उपभोक्ताओं की श्रेणी के आधार पर निर्गमन मूल्य अलग-अलग हो सकता है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य वहनीय कीमतों पर नागरिकों को खाद्य अनाजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है| भारत में भुखमरी एवं कुपोषण को नियंत्रित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु वर्तमान में यह योजना विभिन्न कमियों से ग्रस्त है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियाँ · सार्वजनिक वितरण प्रणाली रिसाव की समस्या का सामना कर रही है| शांताकुमार समिति के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 40 से 50 % तक रिसाव हो जाता है, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लक्ष्यों में अस्पष्टता की उपस्थिति है| कुछ योग्य नागरिक इसका लाभ नहीं ले पा रहे है जबकि कुछ अयोग्य नागरिक इसका लाभ उठा रहे हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में उचित मूल्य की दुकानों द्वारा मिलावट एवं घटतौली की जाती है जिससे लाभार्थियों के हित प्रभावित होते हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रायः विलंबित अनाज आपूर्ति होती है जो लाभार्थियों की खाद्य सुरक्षा को बाधित करता है, इसके अतिरक्त FPS का केवल कभी-कभी खुलना सरकार के उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक है, · जिन राज्यों में आधारिक संरचना बेहतर है वहां आपूर्ति सुचारू रूप से होती है लेकिन जहाँ आधारिक संरचना में कमजोर राज्यों में वितरण में क्षेत्रीय असमानता देखने को मिलती है, · इसके अतिरिक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली FCI की प्रशासनिक अकुशलता जैसे अनाजों का उचित भंडारण न कर पाना, अनाजों का नष्ट होना आदि कमियों का सामना भी कर रही है| · इन कमियों को देखते हुए PDS में सुधार के लिए सर्वप्रथम प्रयास 1997 में किया गया| वर्ष 1997 में लक्षितसार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू की गयी| इसमें जनसंख्या को दो वर्गों यथा APL एवं BPL में वर्गीकृत कर दिया गया| इसमें निर्गमन मूल्य को APL, BPL एवं अन्त्योदय के आधार पर अलग-अलग किया गया| किन्तु यह प्रणाली PDS की समस्याओं का पूर्णतः समाधान नही कर सकी| अतः PDS में सुधार के एक बड़े प्रयास के रूप में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) लाया गया| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) द्वारा PDS में सुधार · इसके माध्यम से PDS प्रणाली को वैधानिक स्तर दिया गया है| · PDS को और व्यापक बनाते हुए यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों में 75% एवं नगरीय जनसंख्या के 50 % को कवर करता है अर्थात देश की कुल जनसंख्या का 67% जनसंख्या लाभान्वित होगी| राज्यों की जनसंख्या के कवरेज का निर्धारण नीति आयोग द्वारा किया जाएगा, जबकि लाभान्वित व्यक्तियों का चयन राज्य सरकारें सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आधार पर करेंगी| · अधिनियम में सम्पूर्ण जनसंख्या को मुख्यतः लाभान्वित एवं गैर लाभान्वित में वर्गीकृत किया गया है और लाभान्वित व्यक्तियों को 2 वर्गों में बांटा गया है यथा प्राथमिकता परिवार(25 किलो राशन) एवं अन्त्योदय परिवार जो 2.5 करोड़ सर्वाधिक गरीब परिवार हैं जिन्हें 35 किलो राशन प्रदान करने का प्रावधान किया गया है दोनों वर्गों के लिए मूल्य समान रखे गए हैं, · PDS को और व्यापक बनाते हुए अधिनियम में गर्भवती महिलाओं को मुफ्त पोषक आहार एवं 6000 रूपये रूपये देने का प्रावधान किया गया है और 6 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त पोषक आहार प्रदान किया जाएगा, इसमें 18 वर्ष से उपर की महिला को परिवार की मुखिया के रूप में मान्यता दी गयी है| · PDS के क्रियान्वयन में सुधार करते हुए अधिनियम सम्पूर्ण प्रणाली के आरम्भ से अंत तक कम्प्यूटराइजेशन का प्रावधान कर्ता है, · अधिनियम पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है, इसमें लाभार्थी की पहचान आधार के माध्यम सेकिये जाने का प्रावधान है,और लाभार्थियों की सूची को पब्लिक डोमेन में रखने के निर्देश दिए गए हैं, · असक्षमता की स्थिति में खाद्यानो की लाभार्थियों के घर तक आपूर्ति का प्रावधान किया गया है, · इसके अतिरिक्त PDS की सतत निगरानी एवं क्रियान्वयन के ग्रामीण क्षेत्रों में विजिलेंस कमेटी, जिले में एक शिकायत निपटान अधिकारी की नियुक्तिऔर प्रत्येक राज्य में राज्य खाद्य आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है,अर्थात विकेंद्रीकरण का विस्तार किया गया है| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम द्वारा प्रस्तुत उपाय PDS प्रणाली के स्वरुप, उद्देश्य एवं इसके क्रियान्वयन में व्यापक परिवर्तनों की सूचना देते हैं|इस अधिनियम के माध्यम से PDS के अधिदेश में व्यापक परिवर्तन किया गया है| वर्तमान अधिदेश सहायता से आगे बढ़ते हुए सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है| खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के बाद PDS प्रणाली में अनेक सुधार देखने को मिलते हैं| नीति आयोग के अनुसार विगत 4 वर्षों में PDS से होने वाले रिसाव पर नियंत्रण स्थापित हुआ है| आधार से लिंक होने के कारण योग्य लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित हो पा रही है| इस तरह के परिवर्तन सुधार की ओर संकेत करते हैं|
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##Question:सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियों की चर्चा कीजिये| इसके साथ हीसार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के सन्दर्भ मेंराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 marks) Discuss the shortcomings of the public distribution system. Along with this, clarify the importance of the National Food Security Act (2013) in relation to improvement in the public distribution system. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में PDS के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में PDS की कमियों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में PDS में सुधार के सन्दर्भ में NFSA(2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण सुधार का सन्दर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आवश्यक वस्तुओं की उचित मूल्य की दुकानों(FPS) के माध्यम से सहायिकी युक्त मूल्यों पर विक्रय की योजना है| यह 100 % केंद्र प्रायोजित योजना है|इसके लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) MSP/PP के आधार पर खरीद करता है और केन्द्रीय निर्गमन मूल्य(CIP) पर राज्यों को बेचता है| राज्य सरकार FPS के माध्यम से निर्गमन मूल्य(IP) पर उपभोक्ताओं को बेचती है| उपभोक्ताओं की श्रेणी के आधार पर निर्गमन मूल्य अलग-अलग हो सकता है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य वहनीय कीमतों पर नागरिकों को खाद्य अनाजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है| भारत में भुखमरी एवं कुपोषण को नियंत्रित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु वर्तमान में यह योजना विभिन्न कमियों से ग्रस्त है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियाँ · सार्वजनिक वितरण प्रणाली रिसाव की समस्या का सामना कर रही है| शांताकुमार समिति के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 40 से 50 % तक रिसाव हो जाता है, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लक्ष्यों में अस्पष्टता की उपस्थिति है| कुछ योग्य नागरिक इसका लाभ नहीं ले पा रहे है जबकि कुछ अयोग्य नागरिक इसका लाभ उठा रहे हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में उचित मूल्य की दुकानों द्वारा मिलावट एवं घटतौली की जाती है जिससे लाभार्थियों के हित प्रभावित होते हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रायः विलंबित अनाज आपूर्ति होती है जो लाभार्थियों की खाद्य सुरक्षा को बाधित करता है, इसके अतिरक्त FPS का केवल कभी-कभी खुलना सरकार के उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक है, · जिन राज्यों में आधारिक संरचना बेहतर है वहां आपूर्ति सुचारू रूप से होती है लेकिन जहाँ आधारिक संरचना में कमजोर राज्यों में वितरण में क्षेत्रीय असमानता देखने को मिलती है, · इसके अतिरिक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली FCI की प्रशासनिक अकुशलता जैसे अनाजों का उचित भंडारण न कर पाना, अनाजों का नष्ट होना आदि कमियों का सामना भी कर रही है| · इन कमियों को देखते हुए PDS में सुधार के लिए सर्वप्रथम प्रयास 1997 में किया गया| वर्ष 1997 में लक्षितसार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू की गयी| इसमें जनसंख्या को दो वर्गों यथा APL एवं BPL में वर्गीकृत कर दिया गया| इसमें निर्गमन मूल्य को APL, BPL एवं अन्त्योदय के आधार पर अलग-अलग किया गया| किन्तु यह प्रणाली PDS की समस्याओं का पूर्णतः समाधान नही कर सकी| अतः PDS में सुधार के एक बड़े प्रयास के रूप में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) लाया गया| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) द्वारा PDS में सुधार · इसके माध्यम से PDS प्रणाली को वैधानिक स्तर दिया गया है| · PDS को और व्यापक बनाते हुए यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों में 75% एवं नगरीय जनसंख्या के 50 % को कवर करता है अर्थात देश की कुल जनसंख्या का 67% जनसंख्या लाभान्वित होगी| राज्यों की जनसंख्या के कवरेज का निर्धारण नीति आयोग द्वारा किया जाएगा, जबकि लाभान्वित व्यक्तियों का चयन राज्य सरकारें सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आधार पर करेंगी| · अधिनियम में सम्पूर्ण जनसंख्या को मुख्यतः लाभान्वित एवं गैर लाभान्वित में वर्गीकृत किया गया है और लाभान्वित व्यक्तियों को 2 वर्गों में बांटा गया है यथा प्राथमिकता परिवार(25 किलो राशन) एवं अन्त्योदय परिवार जो 2.5 करोड़ सर्वाधिक गरीब परिवार हैं जिन्हें 35 किलो राशन प्रदान करने का प्रावधान किया गया है दोनों वर्गों के लिए मूल्य समान रखे गए हैं, · PDS को और व्यापक बनाते हुए अधिनियम में गर्भवती महिलाओं को मुफ्त पोषक आहार एवं 6000 रूपये रूपये देने का प्रावधान किया गया है और 6 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त पोषक आहार प्रदान किया जाएगा, इसमें 18 वर्ष से उपर की महिला को परिवार की मुखिया के रूप में मान्यता दी गयी है| · PDS के क्रियान्वयन में सुधार करते हुए अधिनियम सम्पूर्ण प्रणाली के आरम्भ से अंत तक कम्प्यूटराइजेशन का प्रावधान कर्ता है, · अधिनियम पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है, इसमें लाभार्थी की पहचान आधार के माध्यम सेकिये जाने का प्रावधान है,और लाभार्थियों की सूची को पब्लिक डोमेन में रखने के निर्देश दिए गए हैं, · असक्षमता की स्थिति में खाद्यानो की लाभार्थियों के घर तक आपूर्ति का प्रावधान किया गया है, · इसके अतिरिक्त PDS की सतत निगरानी एवं क्रियान्वयन के ग्रामीण क्षेत्रों में विजिलेंस कमेटी, जिले में एक शिकायत निपटान अधिकारी की नियुक्तिऔर प्रत्येक राज्य में राज्य खाद्य आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है,अर्थात विकेंद्रीकरण का विस्तार किया गया है| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम द्वारा प्रस्तुत उपाय PDS प्रणाली के स्वरुप, उद्देश्य एवं इसके क्रियान्वयन में व्यापक परिवर्तनों की सूचना देते हैं|इस अधिनियम के माध्यम से PDS के अधिदेश में व्यापक परिवर्तन किया गया है| वर्तमान अधिदेश सहायता से आगे बढ़ते हुए सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है| खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के बाद PDS प्रणाली में अनेक सुधार देखने को मिलते हैं| नीति आयोग के अनुसार विगत 4 वर्षों में PDS से होने वाले रिसाव पर नियंत्रण स्थापित हुआ है| आधार से लिंक होने के कारण योग्य लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित हो पा रही है| इस तरह के परिवर्तन सुधार की ओर संकेत करते हैं|
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सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के सन्दर्भ में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Discuss the shortcomings of the public distribution system. Along with this, clarify the importance of the National Food Security Act (2013) in relation to improvement in public distribution system. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में PDS के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में PDS की कमियों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में PDS में सुधार के सन्दर्भ में NFSA(2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण सुधार का सन्दर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आवश्यक वस्तुओं की उचित मूल्य की दुकानों(FPS) के माध्यम से सहायिकी युक्त मूल्यों पर विक्रय की योजना है| यह 100 % केंद्र प्रायोजित योजना है|इसके लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) MSP/PP के आधार पर खरीद करता है और केन्द्रीय निर्गमन मूल्य(CIP) पर राज्यों को बेचता है| राज्य सरकार FPS के माध्यम से निर्गमन मूल्य(IP) पर उपभोक्ताओं को बेचती है| उपभोक्ताओं की श्रेणी के आधार पर निर्गमन मूल्य अलग-अलग हो सकता है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य वहनीय कीमतों पर नागरिकों को खाद्य अनाजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है| भारत में भुखमरी एवं कुपोषण को नियंत्रित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु वर्तमान में यह योजना विभिन्न कमियों से ग्रस्त है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियाँ · सार्वजनिक वितरण प्रणाली रिसाव की समस्या का सामना कर रही है| शांताकुमार समिति के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 40 से 50 % तक रिसाव हो जाता है, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लक्ष्यों में अस्पष्टता की उपस्थिति है| कुछ योग्य नागरिक इसका लाभ नहीं ले पा रहे है जबकि कुछ अयोग्य नागरिक इसका लाभ उठा रहे हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में उचित मूल्य की दुकानों द्वारा मिलावट एवं घटतौली की जाती है जिससे लाभार्थियों के हित प्रभावित होते हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रायः विलंबित अनाज आपूर्ति होती है जो लाभार्थियों की खाद्य सुरक्षा को बाधित करता है, इसके अतिरक्त FPS का केवल कभी-कभी खुलना सरकार के उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक है, · जिन राज्यों में आधारिक संरचना बेहतर है वहां आपूर्ति सुचारू रूप से होती है लेकिन जहाँ आधारिक संरचना में कमजोर राज्यों में वितरण में क्षेत्रीय असमानता देखने को मिलती है, · इसके अतिरिक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली FCI की प्रशासनिक अकुशलता जैसे अनाजों का उचित भंडारण न कर पाना, अनाजों का नष्ट होना आदि कमियों का सामना भी कर रही है| · इन कमियों को देखते हुए PDS में सुधार के लिए सर्वप्रथम प्रयास 1997 में किया गया| वर्ष 1997 में लक्षितसार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू की गयी| इसमें जनसंख्या को दो वर्गों यथा APL एवं BPL में वर्गीकृत कर दिया गया| इसमें निर्गमन मूल्य को APL, BPL एवं अन्त्योदय के आधार पर अलग-अलग किया गया| किन्तु यह प्रणाली PDS की समस्याओं का पूर्णतः समाधान नही कर सकी| अतः PDS में सुधार के एक बड़े प्रयास के रूप में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) लाया गया| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) द्वारा PDS में सुधार · इसके माध्यम से PDS प्रणाली को वैधानिक स्तर दिया गया है| · PDS को और व्यापक बनाते हुए यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों में 75% एवं नगरीय जनसंख्या के 50 % को कवर करता है अर्थात देश की कुल जनसंख्या का 67% जनसंख्या लाभान्वित होगी| राज्यों की जनसंख्या के कवरेज का निर्धारण नीति आयोग द्वारा किया जाएगा, जबकि लाभान्वित व्यक्तियों का चयन राज्य सरकारें सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आधार पर करेंगी| · अधिनियम में सम्पूर्ण जनसंख्या को मुख्यतः लाभान्वित एवं गैर लाभान्वित में वर्गीकृत किया गया है और लाभान्वित व्यक्तियों को 2 वर्गों में बांटा गया है यथा प्राथमिकता परिवार(25 किलो राशन) एवं अन्त्योदय परिवार जो 2.5 करोड़ सर्वाधिक गरीब परिवार हैं जिन्हें 35 किलो राशन प्रदान करने का प्रावधान किया गया है दोनों वर्गों के लिए मूल्य समान रखे गए हैं, · PDS को और व्यापक बनाते हुए अधिनियम में गर्भवती महिलाओं को मुफ्त पोषक आहार एवं 6000 रूपये रूपये देने का प्रावधान किया गया है और 6 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त पोषक आहार प्रदान किया जाएगा, इसमें 18 वर्ष से उपर की महिला को परिवार की मुखिया के रूप में मान्यता दी गयी है| · PDS के क्रियान्वयन में सुधार करते हुए अधिनियम सम्पूर्ण प्रणाली के आरम्भ से अंत तक कम्प्यूटराइजेशन का प्रावधान कर्ता है, · अधिनियम पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है, इसमें लाभार्थी की पहचान आधार के माध्यम सेकिये जाने का प्रावधान है,और लाभार्थियों की सूची को पब्लिक डोमेन में रखने के निर्देश दिए गए हैं, · असक्षमता की स्थिति में खाद्यानो की लाभार्थियों के घर तक आपूर्ति का प्रावधान किया गया है, · इसके अतिरिक्त PDS की सतत निगरानी एवं क्रियान्वयन के ग्रामीण क्षेत्रों में विजिलेंस कमेटी, जिले में एक शिकायत निपटान अधिकारी की नियुक्तिऔर प्रत्येक राज्य में राज्य खाद्य आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है,अर्थात विकेंद्रीकरण का विस्तार किया गया है| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम द्वारा प्रस्तुत उपाय PDS प्रणाली के स्वरुप, उद्देश्य एवं इसके क्रियान्वयन में व्यापक परिवर्तनों की सूचना देते हैं|इस अधिनियम के माध्यम से PDS के अधिदेश में व्यापक परिवर्तन किया गया है| वर्तमान अधिदेश सहायता से आगे बढ़ते हुए सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है| खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के बाद PDS प्रणाली में अनेक सुधार देखने को मिलते हैं| नीति आयोग के अनुसार विगत 4 वर्षों में PDS से होने वाले रिसाव पर नियंत्रण स्थापित हुआ है| आधार से लिंक होने के कारण योग्य लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित हो पा रही है| इस तरह के परिवर्तन सुधार की ओर संकेत करते हैं|
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##Question:सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के सन्दर्भ में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Discuss the shortcomings of the public distribution system. Along with this, clarify the importance of the National Food Security Act (2013) in relation to improvement in public distribution system. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में PDS के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में PDS की कमियों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में PDS में सुधार के सन्दर्भ में NFSA(2013) के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण सुधार का सन्दर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आवश्यक वस्तुओं की उचित मूल्य की दुकानों(FPS) के माध्यम से सहायिकी युक्त मूल्यों पर विक्रय की योजना है| यह 100 % केंद्र प्रायोजित योजना है|इसके लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) MSP/PP के आधार पर खरीद करता है और केन्द्रीय निर्गमन मूल्य(CIP) पर राज्यों को बेचता है| राज्य सरकार FPS के माध्यम से निर्गमन मूल्य(IP) पर उपभोक्ताओं को बेचती है| उपभोक्ताओं की श्रेणी के आधार पर निर्गमन मूल्य अलग-अलग हो सकता है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य वहनीय कीमतों पर नागरिकों को खाद्य अनाजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है| भारत में भुखमरी एवं कुपोषण को नियंत्रित करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु वर्तमान में यह योजना विभिन्न कमियों से ग्रस्त है| सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कमियाँ · सार्वजनिक वितरण प्रणाली रिसाव की समस्या का सामना कर रही है| शांताकुमार समिति के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 40 से 50 % तक रिसाव हो जाता है, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लक्ष्यों में अस्पष्टता की उपस्थिति है| कुछ योग्य नागरिक इसका लाभ नहीं ले पा रहे है जबकि कुछ अयोग्य नागरिक इसका लाभ उठा रहे हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में उचित मूल्य की दुकानों द्वारा मिलावट एवं घटतौली की जाती है जिससे लाभार्थियों के हित प्रभावित होते हैं, · सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रायः विलंबित अनाज आपूर्ति होती है जो लाभार्थियों की खाद्य सुरक्षा को बाधित करता है, इसके अतिरक्त FPS का केवल कभी-कभी खुलना सरकार के उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक है, · जिन राज्यों में आधारिक संरचना बेहतर है वहां आपूर्ति सुचारू रूप से होती है लेकिन जहाँ आधारिक संरचना में कमजोर राज्यों में वितरण में क्षेत्रीय असमानता देखने को मिलती है, · इसके अतिरिक्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली FCI की प्रशासनिक अकुशलता जैसे अनाजों का उचित भंडारण न कर पाना, अनाजों का नष्ट होना आदि कमियों का सामना भी कर रही है| · इन कमियों को देखते हुए PDS में सुधार के लिए सर्वप्रथम प्रयास 1997 में किया गया| वर्ष 1997 में लक्षितसार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू की गयी| इसमें जनसंख्या को दो वर्गों यथा APL एवं BPL में वर्गीकृत कर दिया गया| इसमें निर्गमन मूल्य को APL, BPL एवं अन्त्योदय के आधार पर अलग-अलग किया गया| किन्तु यह प्रणाली PDS की समस्याओं का पूर्णतः समाधान नही कर सकी| अतः PDS में सुधार के एक बड़े प्रयास के रूप में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) लाया गया| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) द्वारा PDS में सुधार · इसके माध्यम से PDS प्रणाली को वैधानिक स्तर दिया गया है| · PDS को और व्यापक बनाते हुए यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों में 75% एवं नगरीय जनसंख्या के 50 % को कवर करता है अर्थात देश की कुल जनसंख्या का 67% जनसंख्या लाभान्वित होगी| राज्यों की जनसंख्या के कवरेज का निर्धारण नीति आयोग द्वारा किया जाएगा, जबकि लाभान्वित व्यक्तियों का चयन राज्य सरकारें सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आधार पर करेंगी| · अधिनियम में सम्पूर्ण जनसंख्या को मुख्यतः लाभान्वित एवं गैर लाभान्वित में वर्गीकृत किया गया है और लाभान्वित व्यक्तियों को 2 वर्गों में बांटा गया है यथा प्राथमिकता परिवार(25 किलो राशन) एवं अन्त्योदय परिवार जो 2.5 करोड़ सर्वाधिक गरीब परिवार हैं जिन्हें 35 किलो राशन प्रदान करने का प्रावधान किया गया है दोनों वर्गों के लिए मूल्य समान रखे गए हैं, · PDS को और व्यापक बनाते हुए अधिनियम में गर्भवती महिलाओं को मुफ्त पोषक आहार एवं 6000 रूपये रूपये देने का प्रावधान किया गया है और 6 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त पोषक आहार प्रदान किया जाएगा, इसमें 18 वर्ष से उपर की महिला को परिवार की मुखिया के रूप में मान्यता दी गयी है| · PDS के क्रियान्वयन में सुधार करते हुए अधिनियम सम्पूर्ण प्रणाली के आरम्भ से अंत तक कम्प्यूटराइजेशन का प्रावधान कर्ता है, · अधिनियम पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है, इसमें लाभार्थी की पहचान आधार के माध्यम सेकिये जाने का प्रावधान है,और लाभार्थियों की सूची को पब्लिक डोमेन में रखने के निर्देश दिए गए हैं, · असक्षमता की स्थिति में खाद्यानो की लाभार्थियों के घर तक आपूर्ति का प्रावधान किया गया है, · इसके अतिरिक्त PDS की सतत निगरानी एवं क्रियान्वयन के ग्रामीण क्षेत्रों में विजिलेंस कमेटी, जिले में एक शिकायत निपटान अधिकारी की नियुक्तिऔर प्रत्येक राज्य में राज्य खाद्य आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है,अर्थात विकेंद्रीकरण का विस्तार किया गया है| राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम द्वारा प्रस्तुत उपाय PDS प्रणाली के स्वरुप, उद्देश्य एवं इसके क्रियान्वयन में व्यापक परिवर्तनों की सूचना देते हैं|इस अधिनियम के माध्यम से PDS के अधिदेश में व्यापक परिवर्तन किया गया है| वर्तमान अधिदेश सहायता से आगे बढ़ते हुए सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है| खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के बाद PDS प्रणाली में अनेक सुधार देखने को मिलते हैं| नीति आयोग के अनुसार विगत 4 वर्षों में PDS से होने वाले रिसाव पर नियंत्रण स्थापित हुआ है| आधार से लिंक होने के कारण योग्य लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित हो पा रही है| इस तरह के परिवर्तन सुधार की ओर संकेत करते हैं|
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भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की तुलना कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the role of the post of President and Governor in Indian democracy. Also, compare the discretionary powers of the President and the Governor. (150-200 words/ 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद का संदर्भ दीजिए। इन पदों की भूमिका स्पष्ट कीजिये। अंत में विवेकाधीन शक्तियों की तुलना करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। संविधान के भाग V के अनुच्छेद 52 से 78 तक में संघ की कार्यपालिका का वर्णन है। कार्यपालिका में राष्ट्रपति शामिल होता है। वह भारत का राज्य प्रमुख, प्रथम नागरिक होता है। इसी प्रकार राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल को शामिल किया जाता है, वह राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति की भूमिका : संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। वह संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है। मृत्युदंड के संबंध में क्षमादान करने की शक्ति राष्ट्रपति को विशेष स्थान प्रदान करती है। धनविधेयक को प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। राज्यपाल की भूमिका : राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होती हैं। संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राज्यपाल मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश राज्यपाल ही करता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ: राष्ट्रपति के पास कोई संवैधानिक विवेक स्वतंत्रता नहीं है परंतु उसके पास कुछ परिस्थिति जन्य विवेक स्वतन्त्रता हैं जैसे: लोकसभा में किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत न होने पर वह प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। विश्वास मत सिद्ध न कर पाने पर मंत्रिमंडल को विघटित कर सकता है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति के विपरीत राज्यपाल को संवैधानिक और परिस्थितिजन्य शक्तियाँ प्राप्त हैं: राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करना। राष्ट्रपति के विचारार्थ किसी विधेयक को आरक्षित करना राज्य के विधानपरिषद एवं प्रशासनिक मामलों में मुख्यमंत्री से जानकारी से प्राप्त करना विधानसभा चुनाव में किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति के मामले में मंत्रिपरिषद के अल्पमत में आने पर राज्य विधानसभा को विघटित करना। इस प्रकार भारतीय लोकतन्त्र में संसदीय व्यवस्था के बावजूद भी राष्ट्रपति व राज्यपाल का पद महत्वपूर्ण है। दोनों प्रमुखों की कार्यकारी, न्यायिक आदि शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं परंतु राज्यपाल को इस मामले में अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त है।
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##Question:भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की तुलना कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the role of the post of President and Governor in Indian democracy. Also, compare the discretionary powers of the President and the Governor. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद का संदर्भ दीजिए। इन पदों की भूमिका स्पष्ट कीजिये। अंत में विवेकाधीन शक्तियों की तुलना करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। संविधान के भाग V के अनुच्छेद 52 से 78 तक में संघ की कार्यपालिका का वर्णन है। कार्यपालिका में राष्ट्रपति शामिल होता है। वह भारत का राज्य प्रमुख, प्रथम नागरिक होता है। इसी प्रकार राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल को शामिल किया जाता है, वह राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति की भूमिका : संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। वह संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है। मृत्युदंड के संबंध में क्षमादान करने की शक्ति राष्ट्रपति को विशेष स्थान प्रदान करती है। धनविधेयक को प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। राज्यपाल की भूमिका : राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होती हैं। संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राज्यपाल मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश राज्यपाल ही करता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ: राष्ट्रपति के पास कोई संवैधानिक विवेक स्वतंत्रता नहीं है परंतु उसके पास कुछ परिस्थिति जन्य विवेक स्वतन्त्रता हैं जैसे: लोकसभा में किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत न होने पर वह प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। विश्वास मत सिद्ध न कर पाने पर मंत्रिमंडल को विघटित कर सकता है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति के विपरीत राज्यपाल को संवैधानिक और परिस्थितिजन्य शक्तियाँ प्राप्त हैं: राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करना। राष्ट्रपति के विचारार्थ किसी विधेयक को आरक्षित करना राज्य के विधानपरिषद एवं प्रशासनिक मामलों में मुख्यमंत्री से जानकारी से प्राप्त करना विधानसभा चुनाव में किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति के मामले में मंत्रिपरिषद के अल्पमत में आने पर राज्य विधानसभा को विघटित करना। इस प्रकार भारतीय लोकतन्त्र में संसदीय व्यवस्था के बावजूद भी राष्ट्रपति व राज्यपाल का पद महत्वपूर्ण है। दोनों प्रमुखों की कार्यकारी, न्यायिक आदि शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं परंतु राज्यपाल को इस मामले में अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त है।
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Explain the Right to Freedom of Religion under Articles 25 and 26 of the constitution and the applications of the law with respect to the Sabrimala issue. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -ABOUT ARTICLE 25 -ABOUT ARTICLE 26 -SABARIMALA ISSUE -CONCLUSION Answer:- Article 25 provides the freedom of conscience to persons while Article 26 is related to the freedoms given to religious denominations. ABOUT ARTICLE 25 THE FREEDOM GUARANTEED BY THIS ARTICLE - Article 25 grants the right to practice, profess and propagate one’s own religion. INDIVIDUAL RIGHT - Article 25 is a right provided to individuals. It is not just provided to the citizens but to all the people in the country, whether citizens or not. EXCEPTIONS TO ARTICLE 25 - Public order, morality, health and restrictions as per any other law and Article in Part III of the constitution, act as exceptions/ restrictions to Article 25. ABOUT ARTICLE 26 HIS FREEDOM IS GUARANTEED BY THIS ARTICLE - It is the freedom to manage religious affairs. 2)APPLICABILITY - This freedom under Article 26 is provided to religious denominations. 2.1) A religious denomination is one with a unique faith, a common name and common practices 2.2) Essential religious practices have been covered under Article 26 3) EXCEPTIONS TO ARTICLE 26 - Public order, morality and health are the restrictions of Article 26. THE SABARIMALA ISSUE The essential question that was considered in this case was that, whether it was a religious denomination, or not. If it were a religious denomination, then it would not be subject to any other of the acts/ laws provided in Part III of the constitution. This is because “subject to any other law and Article in Part III of the constitution” is not mentioned in Article 26 (as has been mentioned under Article 25). The Supreme Court held that it is not a religious denomination, therefore, it did not get immunity from any other act/law mentioned in Part III of the constitution such as the prohibition of discrimination on the grounds of race, religion, gender, caste or place of birth. Articles 25-28 deal with religious freedom and are essential in upholding the democratic norms and values in the country. These articles are also linked to the Right to Choice, which emanates from Article 21- The Right to Life and Personal Liberty (except by procedure established by law).
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##Question:Explain the Right to Freedom of Religion under Articles 25 and 26 of the constitution and the applications of the law with respect to the Sabrimala issue. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -ABOUT ARTICLE 25 -ABOUT ARTICLE 26 -SABARIMALA ISSUE -CONCLUSION Answer:- Article 25 provides the freedom of conscience to persons while Article 26 is related to the freedoms given to religious denominations. ABOUT ARTICLE 25 THE FREEDOM GUARANTEED BY THIS ARTICLE - Article 25 grants the right to practice, profess and propagate one’s own religion. INDIVIDUAL RIGHT - Article 25 is a right provided to individuals. It is not just provided to the citizens but to all the people in the country, whether citizens or not. EXCEPTIONS TO ARTICLE 25 - Public order, morality, health and restrictions as per any other law and Article in Part III of the constitution, act as exceptions/ restrictions to Article 25. ABOUT ARTICLE 26 HIS FREEDOM IS GUARANTEED BY THIS ARTICLE - It is the freedom to manage religious affairs. 2)APPLICABILITY - This freedom under Article 26 is provided to religious denominations. 2.1) A religious denomination is one with a unique faith, a common name and common practices 2.2) Essential religious practices have been covered under Article 26 3) EXCEPTIONS TO ARTICLE 26 - Public order, morality and health are the restrictions of Article 26. THE SABARIMALA ISSUE The essential question that was considered in this case was that, whether it was a religious denomination, or not. If it were a religious denomination, then it would not be subject to any other of the acts/ laws provided in Part III of the constitution. This is because “subject to any other law and Article in Part III of the constitution” is not mentioned in Article 26 (as has been mentioned under Article 25). The Supreme Court held that it is not a religious denomination, therefore, it did not get immunity from any other act/law mentioned in Part III of the constitution such as the prohibition of discrimination on the grounds of race, religion, gender, caste or place of birth. Articles 25-28 deal with religious freedom and are essential in upholding the democratic norms and values in the country. These articles are also linked to the Right to Choice, which emanates from Article 21- The Right to Life and Personal Liberty (except by procedure established by law).
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सुशासन से आप क्या समझते है ? इसके प्रमुख अभिलक्षणों की व्याख्या कीजिये । (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by good governance? Explain its key features. (150-200 words/ 10 marks)
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एप्रोच :- सुशासन को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये। इसके प्रमुख अभिलक्षणों पर बिंदुवार चर्चा कीजिये। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- सुशासन से तात्पर्य संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु सामाजिक , आर्थिक ,राजनीतिक इकाइयों को इस तरह निगमित करना कि उनसे वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। सुशासन के द्वारा प्रशासनिक क्रियाकलापों के द्वारा सामाजिक , आर्थिक, व राजनीतिक न्याय को प्राप्त किया जा सकता है तथा प्रशासन को भ्रष्टाचार व लालफीताशाही से मुक्त करता है। सुशासन के प्रमुख अभिलक्षण : - जबावदेहिता व अनुक्रियाशीलता - प्रशासन का अपने कार्यों के प्रति वस्तुनिष्ठ आधारों पर जबावदेह होना चाहिये तथा तय सीमा में नियमानुसार कार्यों को सम्पन्न करना चाहिए । जिससे जनता तक आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके । पारदर्शिता - सभी सार्वजनिक क्रियाकलापों को जनता के सामने रखना तथा गोपनियता का अभाव होना , पारदर्शिता कहलाता है । जन सहभागिता - शासन के लक्ष्यों की पूर्ति मे जनता को शामिल करते हुएजनता व प्रशासन के मध्य की दूरी को कम करना एक महत्वपूर्ण अंग है । जन सहभागिता बढ्ने से विभिन्न समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है जैसे स्वच्छता के लक्ष्य की पूर्ति मे । कार्यकुशलता - किसी भी राष्ट्र कोअपने सर्वोत्तम विकास हेतु सीमित संसाधनों का कुशल उपयोग करना आवश्यक होता है । जिससे बढ़ती जनसंख्या व अन्य चुनौतियों को समाधान किया जा सके। विधि का शासन - अराजकता की स्थिति से बचने तथा सभी नागरिकों को उनके अधिकारों के स्वतन्त्रता पूर्वक पालन हेतु आवश्यक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराने मे विधि का शासन एक अनिवार्य शर्त है समतामूलक विकास - समाज के विभिन्न वर्गों ,क्षेत्रों व जाति समूहों के लोगों तक विकास हेतु समान अवसरों की पहुँच सुनिश्चित करना एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण करता है । आम सहमति पर आधारित निर्णय - लोकतन्त्र मे सभी लोगोंको समस्याओं के समाधान हेतु सरकार तक पहुँच होनी चाहिए । इसके साथ ही एकतरफा निर्णयों से बचते हुए विभिन्न हितधारकों को नीति निर्माण प्रक्रिया मे शामिल किया जाना चाहिए । समावेशी विकास - राष्ट्र के विकास व समृद्धिके लाभों का वितरण राष्ट्र के सभी निवासियों तक होना समावेशी विकास कहलाता है । वर्तमान मे भारतीय समाज मे असमानता , गरीबी आदि चुनौतियों के समाधान मे सुशासन का महत्व बढ़ा है जिससे राष्ट्र को विकास के तीव्र पथ पर अग्रसर किया जा सके।
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##Question:सुशासन से आप क्या समझते है ? इसके प्रमुख अभिलक्षणों की व्याख्या कीजिये । (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by good governance? Explain its key features. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच :- सुशासन को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये। इसके प्रमुख अभिलक्षणों पर बिंदुवार चर्चा कीजिये। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- सुशासन से तात्पर्य संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु सामाजिक , आर्थिक ,राजनीतिक इकाइयों को इस तरह निगमित करना कि उनसे वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। सुशासन के द्वारा प्रशासनिक क्रियाकलापों के द्वारा सामाजिक , आर्थिक, व राजनीतिक न्याय को प्राप्त किया जा सकता है तथा प्रशासन को भ्रष्टाचार व लालफीताशाही से मुक्त करता है। सुशासन के प्रमुख अभिलक्षण : - जबावदेहिता व अनुक्रियाशीलता - प्रशासन का अपने कार्यों के प्रति वस्तुनिष्ठ आधारों पर जबावदेह होना चाहिये तथा तय सीमा में नियमानुसार कार्यों को सम्पन्न करना चाहिए । जिससे जनता तक आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके । पारदर्शिता - सभी सार्वजनिक क्रियाकलापों को जनता के सामने रखना तथा गोपनियता का अभाव होना , पारदर्शिता कहलाता है । जन सहभागिता - शासन के लक्ष्यों की पूर्ति मे जनता को शामिल करते हुएजनता व प्रशासन के मध्य की दूरी को कम करना एक महत्वपूर्ण अंग है । जन सहभागिता बढ्ने से विभिन्न समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकता है जैसे स्वच्छता के लक्ष्य की पूर्ति मे । कार्यकुशलता - किसी भी राष्ट्र कोअपने सर्वोत्तम विकास हेतु सीमित संसाधनों का कुशल उपयोग करना आवश्यक होता है । जिससे बढ़ती जनसंख्या व अन्य चुनौतियों को समाधान किया जा सके। विधि का शासन - अराजकता की स्थिति से बचने तथा सभी नागरिकों को उनके अधिकारों के स्वतन्त्रता पूर्वक पालन हेतु आवश्यक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराने मे विधि का शासन एक अनिवार्य शर्त है समतामूलक विकास - समाज के विभिन्न वर्गों ,क्षेत्रों व जाति समूहों के लोगों तक विकास हेतु समान अवसरों की पहुँच सुनिश्चित करना एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण करता है । आम सहमति पर आधारित निर्णय - लोकतन्त्र मे सभी लोगोंको समस्याओं के समाधान हेतु सरकार तक पहुँच होनी चाहिए । इसके साथ ही एकतरफा निर्णयों से बचते हुए विभिन्न हितधारकों को नीति निर्माण प्रक्रिया मे शामिल किया जाना चाहिए । समावेशी विकास - राष्ट्र के विकास व समृद्धिके लाभों का वितरण राष्ट्र के सभी निवासियों तक होना समावेशी विकास कहलाता है । वर्तमान मे भारतीय समाज मे असमानता , गरीबी आदि चुनौतियों के समाधान मे सुशासन का महत्व बढ़ा है जिससे राष्ट्र को विकास के तीव्र पथ पर अग्रसर किया जा सके।
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GDP as a concept is a very good indicator to provide growth in the economy. But, it failed in terms of providing the development picture of the economy. Justify the statement. (10 Marks/150 words)
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APPROACH: Introduction- Briefly explain GDP, growth and development Body- Explain why GDP fails to provide development picture of an economy. ANSWER Economic Growth refers to the rise in the value of everything produced in the economy. It implies the yearly increase in the country’s GDP. Development is the increase in the economic wealth of a country or a particular area, for the welfare of its residents, advancement of technology, improvement in living standards and so on. As an aggregate measure of total economic production for a country, GDP represents the market value of all goods and services produced by the economy during the period measured, including personal consumption, government purchases, private inventories, paid-in construction costs and the foreign trade balance. GDP is not sufficient to provide a development picture in the economy as: GDP is not a measure of overall standard of living and well-being of the country. GDP counts ‘bads’ as well as goods. When an earthquake hits and requires rebuilding GDP increases. When someone gets sick and money is spent on their care, it is counted as a part of GDP. But nobody would argue that we are better off because of destructive earthquake or people getting sick. GDP is not adjusted for pollution cost. If two economies have same GDP per capita but one has polluted air and water while other doesn’t, well-being will be different. Thus GDP per capita doesn’t capture pollution factor, environmental degradation and resource depletion. It is not describing the conditions of the citizens in terms of income distribution. Eg. As per !% of India GDP fails to disclose the improvement in the life expectancy rate, infant mortality rate, literacy rate and poverty rates which form the basis of development in a society. It does not talk about sustainability or the fact that would it be possible to maintain this level of growth. The quality of life may also depend on the distribution of GDP among the residents of the country, not just the overall level. Despite the fact that GDP is not a sufficient condition but it still one of the most basic economic indicators providing the overall health of the economy and facilitating comparison between different countries.
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##Question:GDP as a concept is a very good indicator to provide growth in the economy. But, it failed in terms of providing the development picture of the economy. Justify the statement. (10 Marks/150 words)##Answer:APPROACH: Introduction- Briefly explain GDP, growth and development Body- Explain why GDP fails to provide development picture of an economy. ANSWER Economic Growth refers to the rise in the value of everything produced in the economy. It implies the yearly increase in the country’s GDP. Development is the increase in the economic wealth of a country or a particular area, for the welfare of its residents, advancement of technology, improvement in living standards and so on. As an aggregate measure of total economic production for a country, GDP represents the market value of all goods and services produced by the economy during the period measured, including personal consumption, government purchases, private inventories, paid-in construction costs and the foreign trade balance. GDP is not sufficient to provide a development picture in the economy as: GDP is not a measure of overall standard of living and well-being of the country. GDP counts ‘bads’ as well as goods. When an earthquake hits and requires rebuilding GDP increases. When someone gets sick and money is spent on their care, it is counted as a part of GDP. But nobody would argue that we are better off because of destructive earthquake or people getting sick. GDP is not adjusted for pollution cost. If two economies have same GDP per capita but one has polluted air and water while other doesn’t, well-being will be different. Thus GDP per capita doesn’t capture pollution factor, environmental degradation and resource depletion. It is not describing the conditions of the citizens in terms of income distribution. Eg. As per !% of India GDP fails to disclose the improvement in the life expectancy rate, infant mortality rate, literacy rate and poverty rates which form the basis of development in a society. It does not talk about sustainability or the fact that would it be possible to maintain this level of growth. The quality of life may also depend on the distribution of GDP among the residents of the country, not just the overall level. Despite the fact that GDP is not a sufficient condition but it still one of the most basic economic indicators providing the overall health of the economy and facilitating comparison between different countries.
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Explain the writ of Habeas Corpus. Explain the importance of Habeas Corpus in upholding Article 21 (10 marks/150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - ABOUT HABEAS COURPUS - THE IMPORTANCE OF THE WRIT OF HABEAS CORPUS IN UPHOLDING ARTICLE 21 -ABOUT THE WRIT OF MANDAMUS -CONCLUSION Answer: - Habeas Corpus means “We have to have the body”. It is a very important writ, since it aims at protecting Article 21, which is considered as one of the most important Fundamental Rights in India. The term Mandamus has been derived from the term ‘Man’ and means “We command”. ABOUT HABEAS COURPUS 1) MEANING It means to have the body of a person who has been arrested, in order to ensure that arrest is legal and as per the legally established rules and procedures. 2) ENFORCEABILITY It can be enforced against the entire state, as well as against the individual. 3) APPLICABILITY It is always applicable/ available for the citizens. It cannot even be suspended during Martial Law. 4) LOCUS STANDI It literally means “what is your standing in the case?”. As per this principle, only those, whose rights or liabilities are concerned, shall approach the court of law and strangers must not approach the court. The writ of Habeas Corpus is an exception to the principle of Locus Standi . In Habeas Corpus, locus standi is not a ground to deny legal proceedings. THE IMPORTANCE OF THE WRIT OF HABEAS CORPUS IN UPHOLDING ARTICLE 21 1) The writ of Habeas Corpus is to be applied if the personal liberty of a person is taken away, as against the procedure established by law. In this manner, the writ of Habeas Corpus helps uphold Article 21, which states that no person can be denied of their life and personal liberty, except by procedure established by law 2) SUPREME COURT’S VERDICT The Supreme Court has emphasized the importance of Habeas Corpus, providing that it is such a vital component of enforcing Article 21, that it cannot even be suspended during martial law. (Implying that it cannot even be suspended during the less grave instances like during a national emergency). 3) EXAMPLE- CASE STUDY: HUSAINARA KHATOON CASE OF 1968 In this case, several prison inmates were kept in custody without establishing the procedure established by law, in violation of Article 21. The Husainara case was initiated by Kapila Hingorani, who has been recognized as the mother of PIL revolution in India. The Husainara Khatoon case was amongst the most popular beginnings of PIL in India. ABOUT THE WRIT OF MANDAMUS 1) MEANING It means to direct/ command an Executive body to perform the constitutionally mandated duty. 2) ENFORCEABILITY It is enforceable against the Executive. 3) EXAMPLE(S) 3.1) The constitutionally mandated duty of the Delhi Jal Board is to provide clean drinking water. 3.2) The constitutionally mandated duty of the Delhi police is to ensure law and order. 3.3) GANGA POLLUTION CONTROL BOARD- Cleaning of the River Ganga was its constitutionally mandated duty. Both the writs of Habeas Corpus and Mandamus are important. The importance of Habeas Corpus has been upheld by the Supreme Court. The importance of the writ of Mandamus can be gauged from the fact that around 90% of the cases in the High Court are usually of Mandamus.
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##Question:Explain the writ of Habeas Corpus. Explain the importance of Habeas Corpus in upholding Article 21 (10 marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - ABOUT HABEAS COURPUS - THE IMPORTANCE OF THE WRIT OF HABEAS CORPUS IN UPHOLDING ARTICLE 21 -ABOUT THE WRIT OF MANDAMUS -CONCLUSION Answer: - Habeas Corpus means “We have to have the body”. It is a very important writ, since it aims at protecting Article 21, which is considered as one of the most important Fundamental Rights in India. The term Mandamus has been derived from the term ‘Man’ and means “We command”. ABOUT HABEAS COURPUS 1) MEANING It means to have the body of a person who has been arrested, in order to ensure that arrest is legal and as per the legally established rules and procedures. 2) ENFORCEABILITY It can be enforced against the entire state, as well as against the individual. 3) APPLICABILITY It is always applicable/ available for the citizens. It cannot even be suspended during Martial Law. 4) LOCUS STANDI It literally means “what is your standing in the case?”. As per this principle, only those, whose rights or liabilities are concerned, shall approach the court of law and strangers must not approach the court. The writ of Habeas Corpus is an exception to the principle of Locus Standi . In Habeas Corpus, locus standi is not a ground to deny legal proceedings. THE IMPORTANCE OF THE WRIT OF HABEAS CORPUS IN UPHOLDING ARTICLE 21 1) The writ of Habeas Corpus is to be applied if the personal liberty of a person is taken away, as against the procedure established by law. In this manner, the writ of Habeas Corpus helps uphold Article 21, which states that no person can be denied of their life and personal liberty, except by procedure established by law 2) SUPREME COURT’S VERDICT The Supreme Court has emphasized the importance of Habeas Corpus, providing that it is such a vital component of enforcing Article 21, that it cannot even be suspended during martial law. (Implying that it cannot even be suspended during the less grave instances like during a national emergency). 3) EXAMPLE- CASE STUDY: HUSAINARA KHATOON CASE OF 1968 In this case, several prison inmates were kept in custody without establishing the procedure established by law, in violation of Article 21. The Husainara case was initiated by Kapila Hingorani, who has been recognized as the mother of PIL revolution in India. The Husainara Khatoon case was amongst the most popular beginnings of PIL in India. ABOUT THE WRIT OF MANDAMUS 1) MEANING It means to direct/ command an Executive body to perform the constitutionally mandated duty. 2) ENFORCEABILITY It is enforceable against the Executive. 3) EXAMPLE(S) 3.1) The constitutionally mandated duty of the Delhi Jal Board is to provide clean drinking water. 3.2) The constitutionally mandated duty of the Delhi police is to ensure law and order. 3.3) GANGA POLLUTION CONTROL BOARD- Cleaning of the River Ganga was its constitutionally mandated duty. Both the writs of Habeas Corpus and Mandamus are important. The importance of Habeas Corpus has been upheld by the Supreme Court. The importance of the writ of Mandamus can be gauged from the fact that around 90% of the cases in the High Court are usually of Mandamus.
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1858 के भारत शासन अधिनियम से ब्रिटिश भारतीय शासन व्यवस्था मे हुए परिवर्तनों की चर्चा कीजिये । इसके साथ हीसाम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा पत्र के प्रमुख बिन्दु भी प्रस्तुत कीजिये ।(200 शब्द ) Discuss changes in the British Indian governance system from the Indian Government Act of 1858. Simultaneously also present the key point of Queen Victoria"s Proclamation.(200 words )
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अप्रोच :- 1858 से पूर्व की परिस्थितियों(जैसे 1857 की क्रांति ) को बताते हुए भूमिका दीजिये । 1858 के भारत शासन अधिनियम के द्वारा शासन व्यवस्था मे लाये गए परिवर्तनों को लिखिए । साम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा पत्र के प्रमुख बिन्दु बताइये । निष्कर्ष देते हुए समाप्त कीजिये । उत्तर प्रारूप :- 1857 की क्रांति ने भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की । इसके साथ ही 1853 के चार्टर अधिनियम से भारतीय शासन व्यवस्था मे कोई विशेष परिवर्तन भी नहीं आया था । ऐसे मे 1858 के भारत शासन द्वारा इन कमियों को दूर कर भारत मे अपने शासन को मजबूत करने का प्रयास किया गया । 1858 का भारत शासन अधिनियम भारत राज्य सचिव नामक एक नया पद सृजित किया जाना था ,भारतीय शासन के संदर्भ मे सर्वोच्च पदाधिकारी । ब्रिटिश कैबिनेट का एक सदस्य जिसके पास गृह मामलों के मंत्रालय का प्रभार भी होना था । भारतीय शासन एवं प्रशासन के लिए उसे राज्य सचिव के नाम से जाने जाना था । भारत मे ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च पदाधिकारी यद्यपि गवर्नर जनरल होना था जो भारत राज्य सचिव के प्रति उत्तरदायी । जबकि भारत राज्य सचिव ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी । भारत मे नियुक्त सिविल सेवा के सदस्यों को अब भारत राज्य सचिव के पसंद पर ही अपनी सेवा देनी थी , अर्थात भारत मे सिविल सेवकों की नियुक्ति अब भारत राज्य सचिव के नाम से ही होनी थी और उन्हे उसी की इच्छा तक अपने पद पर सेवा करनी थी । (भारत मे अनुच्छेद 310 के अंतर्गत अखिल भारतीय सेवा व केन्द्रीय सेवा के सदस्य आज भी राष्ट्रपति की इच्छा तक अपनी सेवा देते है , इसे प्रसाद पर्यान्त सेवा के नाम से ) भारत मे ब्रिटिश गवर्नर जनरल की दोहरी भूमिका - शासन के मामले मे गवर्नर जनरल तथा ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के मामले मे वायसराय ।ब्रिटिश क्राउन तथा भारतीय रियासतों के मध्य संबंध को पैरमाउंटसी कहा गया । भारत मे गवर्नर जनरल को प्रांतीय प्रशासन मे भी हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार दिया गया , सैद्धांतिक रूप से सभी विषय गवर्नर जनरल के अधीन रखे गए , प्रान्तों का अपना कोई भी स्वतंत्र रूप से विषय नही होना था लंदन मे बैठे हुए भारत राज्य सचिव को भारतीय शासन के मालों मे परामर्श देने के लिए एक 15 सदस्यीय परिषद का गठन किया जाना था , इनमे से 8 सदस्यों को क्राउन द्वारा मनोनीत किया जाना , जबकि 7 को ईस्ट इंडिया कंपनी के पूर्व निर्देशकों द्वारा निर्वाचित किया जाना था साम्राज्ञी विक्टोरिया का घोषणा पत्र ब्रिटिश भारत की सीमा मे निवास करने वाले भर्तियों व अन्य को अपनी प्रजा घोषित करने और उनके साथ कोई भेदभाव ना करने के संदर्भ मे एक घोषणा किया । सिविल सेवा मे बिना भेदभाव के भारतीयों को भी आने का अवसर । सरकारी नौकरियों मे ब्रिटिश व भारतीयों के मध्य प्रोन्नति आदि मे कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा धार्मिक मामलों मे कोई दखल नहीं किया जाएगा (सार्वजनिक कानून सभी के लिए एकसमान लागू ) ब्रिटिश सरकार उद्योग , निर्माण क्षेत्र आदि के उत्थान आदि के लिए कार्य करेगी । ब्रिटिश सरकार अपने क्षेत्र का विस्तार नहीं करेगी । - विधायिका के संदर्भ मे इस अधिनियम मे भी 1853 के अधिनियम की भांति ढांचा बना रहा । अर्थात ब्रिटिश गवर्नर जनरल की परिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या 10 ही रहनी थी । 1858 के अधिनियम द्वारा तात्कालिक रूप से असंतोष को अवश्य कम किया गया, किन्तु भारतीय समाज मे बढ़ती जागरूकता ने धीरे धीरे राजनीतिक संगठनो के द्वारा ब्रिटिश शासन की नीतियों के वास्तविक उद्देश्य को उजागर करना प्रारम्भ किया जाने लगा ।
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##Question:1858 के भारत शासन अधिनियम से ब्रिटिश भारतीय शासन व्यवस्था मे हुए परिवर्तनों की चर्चा कीजिये । इसके साथ हीसाम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा पत्र के प्रमुख बिन्दु भी प्रस्तुत कीजिये ।(200 शब्द ) Discuss changes in the British Indian governance system from the Indian Government Act of 1858. Simultaneously also present the key point of Queen Victoria"s Proclamation.(200 words )##Answer:अप्रोच :- 1858 से पूर्व की परिस्थितियों(जैसे 1857 की क्रांति ) को बताते हुए भूमिका दीजिये । 1858 के भारत शासन अधिनियम के द्वारा शासन व्यवस्था मे लाये गए परिवर्तनों को लिखिए । साम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा पत्र के प्रमुख बिन्दु बताइये । निष्कर्ष देते हुए समाप्त कीजिये । उत्तर प्रारूप :- 1857 की क्रांति ने भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की । इसके साथ ही 1853 के चार्टर अधिनियम से भारतीय शासन व्यवस्था मे कोई विशेष परिवर्तन भी नहीं आया था । ऐसे मे 1858 के भारत शासन द्वारा इन कमियों को दूर कर भारत मे अपने शासन को मजबूत करने का प्रयास किया गया । 1858 का भारत शासन अधिनियम भारत राज्य सचिव नामक एक नया पद सृजित किया जाना था ,भारतीय शासन के संदर्भ मे सर्वोच्च पदाधिकारी । ब्रिटिश कैबिनेट का एक सदस्य जिसके पास गृह मामलों के मंत्रालय का प्रभार भी होना था । भारतीय शासन एवं प्रशासन के लिए उसे राज्य सचिव के नाम से जाने जाना था । भारत मे ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च पदाधिकारी यद्यपि गवर्नर जनरल होना था जो भारत राज्य सचिव के प्रति उत्तरदायी । जबकि भारत राज्य सचिव ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी । भारत मे नियुक्त सिविल सेवा के सदस्यों को अब भारत राज्य सचिव के पसंद पर ही अपनी सेवा देनी थी , अर्थात भारत मे सिविल सेवकों की नियुक्ति अब भारत राज्य सचिव के नाम से ही होनी थी और उन्हे उसी की इच्छा तक अपने पद पर सेवा करनी थी । (भारत मे अनुच्छेद 310 के अंतर्गत अखिल भारतीय सेवा व केन्द्रीय सेवा के सदस्य आज भी राष्ट्रपति की इच्छा तक अपनी सेवा देते है , इसे प्रसाद पर्यान्त सेवा के नाम से ) भारत मे ब्रिटिश गवर्नर जनरल की दोहरी भूमिका - शासन के मामले मे गवर्नर जनरल तथा ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के मामले मे वायसराय ।ब्रिटिश क्राउन तथा भारतीय रियासतों के मध्य संबंध को पैरमाउंटसी कहा गया । भारत मे गवर्नर जनरल को प्रांतीय प्रशासन मे भी हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार दिया गया , सैद्धांतिक रूप से सभी विषय गवर्नर जनरल के अधीन रखे गए , प्रान्तों का अपना कोई भी स्वतंत्र रूप से विषय नही होना था लंदन मे बैठे हुए भारत राज्य सचिव को भारतीय शासन के मालों मे परामर्श देने के लिए एक 15 सदस्यीय परिषद का गठन किया जाना था , इनमे से 8 सदस्यों को क्राउन द्वारा मनोनीत किया जाना , जबकि 7 को ईस्ट इंडिया कंपनी के पूर्व निर्देशकों द्वारा निर्वाचित किया जाना था साम्राज्ञी विक्टोरिया का घोषणा पत्र ब्रिटिश भारत की सीमा मे निवास करने वाले भर्तियों व अन्य को अपनी प्रजा घोषित करने और उनके साथ कोई भेदभाव ना करने के संदर्भ मे एक घोषणा किया । सिविल सेवा मे बिना भेदभाव के भारतीयों को भी आने का अवसर । सरकारी नौकरियों मे ब्रिटिश व भारतीयों के मध्य प्रोन्नति आदि मे कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा धार्मिक मामलों मे कोई दखल नहीं किया जाएगा (सार्वजनिक कानून सभी के लिए एकसमान लागू ) ब्रिटिश सरकार उद्योग , निर्माण क्षेत्र आदि के उत्थान आदि के लिए कार्य करेगी । ब्रिटिश सरकार अपने क्षेत्र का विस्तार नहीं करेगी । - विधायिका के संदर्भ मे इस अधिनियम मे भी 1853 के अधिनियम की भांति ढांचा बना रहा । अर्थात ब्रिटिश गवर्नर जनरल की परिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या 10 ही रहनी थी । 1858 के अधिनियम द्वारा तात्कालिक रूप से असंतोष को अवश्य कम किया गया, किन्तु भारतीय समाज मे बढ़ती जागरूकता ने धीरे धीरे राजनीतिक संगठनो के द्वारा ब्रिटिश शासन की नीतियों के वास्तविक उद्देश्य को उजागर करना प्रारम्भ किया जाने लगा ।
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डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने जिसे संविधान का मृत-पत्र माना था, वही राज्य में केन्द्रीय हस्तक्षेप का एक साधन बन गया है। अनुच्छेद 356 के संदर्भ में इस कथन पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What was considered the death letter of the constitution by Dr. B. R. Ambedkar, has become a means of central intervention in the state. Discuss this statement in the context of article 356. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका अनुच्छेद 356 का संक्षिप्त परिचय दीजिये विस्तार करते हुए इससे संबन्धित अनुच्छेद 355 व 365 का विवरण दीजिए। स्पष्ट कीजिये कि इसे मृत-पत्र क्यों कहा गया था। इसके बाद इसका दुरुपयोग होने के कारणों पर चर्चा कीजिए। अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को कुछ विशिष्ट आधारों पर राज्य के शासन को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार प्रदान करता है। इसे राज्य आपातकाल कहते हैं। यह राष्ट्रपति को राज्य कि विधायी और कार्यकारी शक्तियों को नियंत्रित करने हेतु अधिकृत करता है। इसके अधिरोपण का अधिकार इस प्रकार है: अनुच्छेद 355: संघ का कर्तव्य होगा कि वह प्रत्येक राज्य की वाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से रक्षा करे और यह भी सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संचालित हो रहा है। अनुच्छेद 365: जब राज्य केंद्र द्वारा दिये गए निर्देशों के पालन में विफल रहता है। गौरतलब है कि संविधान सभा में बहस के दौरान डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि इस अनुच्छेद का प्रयोग कभी नहीं किया जाएगा और यह मृत-पत्र कि भांति होगा क्योंकि: यह संविधान की संघीय विशेषता को परिवर्तित करता है और साथ ही इसका उल्लंघन भी करता है। यह राज्य के निर्वाचित सरकार को हटा देता है जिससे लोकतन्त्र की भावना प्रभावित होती है। यह केंद्र को संविधान की रक्षा के लिए प्रदान किया गया था न कि राजनीतिक हित को पूरा करने के लिए। संविधान निर्माताओं की उपरोक्त अपेक्षा कुछ वर्षों के भीतर ही समाप्त हो गयी। उल्लेखनीय है कि अब तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग 120 से अधिक बार किया जा चुका है। यदि इसे केन्द्रीय हस्तक्षेप पर विचार किया जाये तो निम्नलिखित आयाम सामने आएंगे: संविधान में संवैधानिक तंत्र ई विफलता को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया। जिसके कारण केन्द्रीय सरकार अपने हितों के अनुसार प्रयोग करती है। अनुच्छेद 365 में उल्लेखित केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश स्पष्ट नहीं हैं। राज्यपाल द्वारा केंद्र को भेजे जाने वाली रिपोर्ट विवेकाधीन शक्तियों पर आधारित होती है जिसमें राजनीतिक पक्षपात हो सकता है। केंद्र और राज्य में अलग-अलग सत्ता होने से इसका व्यापक दुरुपयोग हो रहा है। अतः उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि अनुच्छेद 356 जिसे मृत-पत्र माना गया था राजनीतिक स्वार्थ, प्रावधानों में अस्पष्टता आदि के कारण केंद्र सरकार द्वारा राज्य में हस्तक्षेप का साधन हो गया है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने बोम्मई वाद में इस प्रावधान की सरल व्याख्या करने का प्रयास किया और इसके प्रयोग पर विभिन्न तार्किक प्रतिबंध भी आरोपित किए फिर भी इसका दुरुपयोग हो रहा है। अतः यह आवश्यक है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए केंद्र सरकार व राज्यपाल को संवैधानिक रूप से कार्य करना चाहिए।
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##Question:डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने जिसे संविधान का मृत-पत्र माना था, वही राज्य में केन्द्रीय हस्तक्षेप का एक साधन बन गया है। अनुच्छेद 356 के संदर्भ में इस कथन पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What was considered the death letter of the constitution by Dr. B. R. Ambedkar, has become a means of central intervention in the state. Discuss this statement in the context of article 356. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका अनुच्छेद 356 का संक्षिप्त परिचय दीजिये विस्तार करते हुए इससे संबन्धित अनुच्छेद 355 व 365 का विवरण दीजिए। स्पष्ट कीजिये कि इसे मृत-पत्र क्यों कहा गया था। इसके बाद इसका दुरुपयोग होने के कारणों पर चर्चा कीजिए। अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को कुछ विशिष्ट आधारों पर राज्य के शासन को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार प्रदान करता है। इसे राज्य आपातकाल कहते हैं। यह राष्ट्रपति को राज्य कि विधायी और कार्यकारी शक्तियों को नियंत्रित करने हेतु अधिकृत करता है। इसके अधिरोपण का अधिकार इस प्रकार है: अनुच्छेद 355: संघ का कर्तव्य होगा कि वह प्रत्येक राज्य की वाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से रक्षा करे और यह भी सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संचालित हो रहा है। अनुच्छेद 365: जब राज्य केंद्र द्वारा दिये गए निर्देशों के पालन में विफल रहता है। गौरतलब है कि संविधान सभा में बहस के दौरान डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि इस अनुच्छेद का प्रयोग कभी नहीं किया जाएगा और यह मृत-पत्र कि भांति होगा क्योंकि: यह संविधान की संघीय विशेषता को परिवर्तित करता है और साथ ही इसका उल्लंघन भी करता है। यह राज्य के निर्वाचित सरकार को हटा देता है जिससे लोकतन्त्र की भावना प्रभावित होती है। यह केंद्र को संविधान की रक्षा के लिए प्रदान किया गया था न कि राजनीतिक हित को पूरा करने के लिए। संविधान निर्माताओं की उपरोक्त अपेक्षा कुछ वर्षों के भीतर ही समाप्त हो गयी। उल्लेखनीय है कि अब तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग 120 से अधिक बार किया जा चुका है। यदि इसे केन्द्रीय हस्तक्षेप पर विचार किया जाये तो निम्नलिखित आयाम सामने आएंगे: संविधान में संवैधानिक तंत्र ई विफलता को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया। जिसके कारण केन्द्रीय सरकार अपने हितों के अनुसार प्रयोग करती है। अनुच्छेद 365 में उल्लेखित केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश स्पष्ट नहीं हैं। राज्यपाल द्वारा केंद्र को भेजे जाने वाली रिपोर्ट विवेकाधीन शक्तियों पर आधारित होती है जिसमें राजनीतिक पक्षपात हो सकता है। केंद्र और राज्य में अलग-अलग सत्ता होने से इसका व्यापक दुरुपयोग हो रहा है। अतः उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि अनुच्छेद 356 जिसे मृत-पत्र माना गया था राजनीतिक स्वार्थ, प्रावधानों में अस्पष्टता आदि के कारण केंद्र सरकार द्वारा राज्य में हस्तक्षेप का साधन हो गया है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने बोम्मई वाद में इस प्रावधान की सरल व्याख्या करने का प्रयास किया और इसके प्रयोग पर विभिन्न तार्किक प्रतिबंध भी आरोपित किए फिर भी इसका दुरुपयोग हो रहा है। अतः यह आवश्यक है कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए केंद्र सरकार व राज्यपाल को संवैधानिक रूप से कार्य करना चाहिए।
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राष्ट्रपति के पद की योग्यता और महाभियोग की प्रक्रिया का विवरण दीजिए। इसके साथ ही, राष्ट्रपति की कार्यकारी और विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। (150-200शब्द/ 10 अंक) Describe the eligibility of the post of president and impeachment process. Also mention the president"s executive and legislative powers. (150-200 words)/10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में राष्ट्रपति के पद का परिचय दीजिए। पद की योग्यता और महाभियोग की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। इसके पश्चात कार्यकरी व विधायी शक्तियाँ लिखिए। राष्ट्रपति भारत का राज्य प्रमुख होता है। वह भारत का प्रथम नागरिक है तथा कार्यपालिका में शामिल होता है। अनुच्छेद 52 राष्ट्रपति के पद का उल्लेख है। राष्ट्रपति के पद हेतु अर्हता: वह भारत का नागरिक हो। वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो। लोकसभा में सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित हो। सार्वजनिक प्राधिकरण में लाभ के पद पर न हो। महाभियोग की प्रक्रिया: राष्ट्रपति पर संविधान का उल्लंघन करने पर महाभियोग चलाया जा सकता है। यह संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ किया जा सकता है। आरोपों पर सदन के एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए और राष्ट्रपति को 14 दिन का नोटिस देना चाहिए। महाभियोग का प्रस्ताव सदन की कुल संख्या का दो-तिहाई बहुमत से पारित होने पाश्चात यह दूसरे सदन में भेजा जाता है। आरोपों की जांच करने के पश्चात यदि दूसरा सदन भी इसेसदन की कुल संख्या का दो तिहाई बहुमत से पारित कर देता है तो पारित होने की तिथि से उसके पद से हटना होगा। इस महाभियोग की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य भाग लेते हैं। राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियाँ: प्रधानमंत्री व अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करना। महान्यावादी, महालेखा एवं नियंत्रक परीक्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष आदि की नियुक्ति अकर्ता है। वह किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकता है। प्रशासन की शक्तियाँ प्राप्त हैं। वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासकों के द्वारा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन संभालता है। वित्त आयोग का गठन करता है। विधायी शक्तियाँ: जब के विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो: वह विधेयक को अपनी स्वीकृत दे देता है। अपनी स्वीकृति सुरक्षित रखता है। विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। राज्य विधेयक के संबंध में भी पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है। वह लोकसभा में दो आंग्ल-भारतीय समुदाय के व्यक्तियों को मनोनीत करता है। संसद के सत्रावसान की अवधि में अध्यादेश जारी कर सकता है। साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा से जुड़े 12 सदस्यों को राज्यसभा में मनोनीत करता है। वित्त आयोग, यूपीएससी, CAG की रिपोर्ट संसद के समक्ष रखता है।
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##Question:राष्ट्रपति के पद की योग्यता और महाभियोग की प्रक्रिया का विवरण दीजिए। इसके साथ ही, राष्ट्रपति की कार्यकारी और विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। (150-200शब्द/ 10 अंक) Describe the eligibility of the post of president and impeachment process. Also mention the president"s executive and legislative powers. (150-200 words)/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में राष्ट्रपति के पद का परिचय दीजिए। पद की योग्यता और महाभियोग की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। इसके पश्चात कार्यकरी व विधायी शक्तियाँ लिखिए। राष्ट्रपति भारत का राज्य प्रमुख होता है। वह भारत का प्रथम नागरिक है तथा कार्यपालिका में शामिल होता है। अनुच्छेद 52 राष्ट्रपति के पद का उल्लेख है। राष्ट्रपति के पद हेतु अर्हता: वह भारत का नागरिक हो। वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो। लोकसभा में सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित हो। सार्वजनिक प्राधिकरण में लाभ के पद पर न हो। महाभियोग की प्रक्रिया: राष्ट्रपति पर संविधान का उल्लंघन करने पर महाभियोग चलाया जा सकता है। यह संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ किया जा सकता है। आरोपों पर सदन के एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए और राष्ट्रपति को 14 दिन का नोटिस देना चाहिए। महाभियोग का प्रस्ताव सदन की कुल संख्या का दो-तिहाई बहुमत से पारित होने पाश्चात यह दूसरे सदन में भेजा जाता है। आरोपों की जांच करने के पश्चात यदि दूसरा सदन भी इसेसदन की कुल संख्या का दो तिहाई बहुमत से पारित कर देता है तो पारित होने की तिथि से उसके पद से हटना होगा। इस महाभियोग की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य भाग लेते हैं। राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियाँ: प्रधानमंत्री व अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करना। महान्यावादी, महालेखा एवं नियंत्रक परीक्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष आदि की नियुक्ति अकर्ता है। वह किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकता है। प्रशासन की शक्तियाँ प्राप्त हैं। वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासकों के द्वारा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन संभालता है। वित्त आयोग का गठन करता है। विधायी शक्तियाँ: जब के विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो: वह विधेयक को अपनी स्वीकृत दे देता है। अपनी स्वीकृति सुरक्षित रखता है। विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। राज्य विधेयक के संबंध में भी पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है। वह लोकसभा में दो आंग्ल-भारतीय समुदाय के व्यक्तियों को मनोनीत करता है। संसद के सत्रावसान की अवधि में अध्यादेश जारी कर सकता है। साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा से जुड़े 12 सदस्यों को राज्यसभा में मनोनीत करता है। वित्त आयोग, यूपीएससी, CAG की रिपोर्ट संसद के समक्ष रखता है।
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To what extent, justice has been done to the goals and objectives of Part IV of the Constitution? (200 words)
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Approach 1. Introduce with DPSP. 2. Highlight steps taken for the implementation of DPSP. 3. Highlight lacunas faced in the implementation of DPSP. 4. Conclude briefly. Answer Directive principles of state policy (Part 4) are in the nature of general instructions or direction to the state. It shall be the duty of the state to follow these principles in the matter of administration and as well as in the making of laws. As for the implementation of specific Directive Principles, some progress has been made. Some of the steps taken by the Indian government for implementing these DPSP are as follows: 1. For raising the standard of living (Article 47), particularly of the rural population, the Government of India launched its Community Development Project in 1952. 2. Various measures have been taken to promote the welfare of Scheduled Tribes and Scheduled Castes and to advance the educational and economic interests of weaker and backward sections of the people under Article 46. 3. Legislation to abolish intermediaries and Zamindari systems and land reforms were enacted in the early years of 1950 to reduce inequalities in income, status under Article 38. 4 For separation of the executive from the judiciary (Article 50), Government enacted Criminal Procedure Code, 1973. 5. A large number of laws have been enacted to implement the Directive in Article 40 to organise village panchayat and endow them with powers of self-government. 73 rd Constitutional amendment provides Constitutional status to Panchayats. 6. The Maternity Benefit Act (1961) and the Equal Remuneration Act (1976) have been made to protect the interests of women workers. Lacunas in implementation of DPSP: 1. Low Learning levels in schools as reported by ASER report. 2. Panchayats face a problem of proxy representation which means women have only representation in these panchayats but in real terms, their husbands, father, brother get all the powers and responsibilities. Also, these panchayats face the problem of lack of funds, functionaries. 3. Agriculture is also facing problems which are reflected in the recent issue of farmer suicides. 4. Right to work has been made a legal right but the unemployment levels are still very high in India. 5. Though free legal aid has been provided, more than 67% of the prisoners are undertrials and most of them belong to the SC, ST or economically weaker sections of society. 6. Till date, there is no uniform civil code. Debates are going on regarding the implementation of the uniform civil code. Hence it can be concluded that partial justice is done to the goals and objectives of DPSP. Efforts should be made on a continuous basis towards the implementation of DPSP and taking Indian society on the path of welfare.
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##Question:To what extent, justice has been done to the goals and objectives of Part IV of the Constitution? (200 words)##Answer:Approach 1. Introduce with DPSP. 2. Highlight steps taken for the implementation of DPSP. 3. Highlight lacunas faced in the implementation of DPSP. 4. Conclude briefly. Answer Directive principles of state policy (Part 4) are in the nature of general instructions or direction to the state. It shall be the duty of the state to follow these principles in the matter of administration and as well as in the making of laws. As for the implementation of specific Directive Principles, some progress has been made. Some of the steps taken by the Indian government for implementing these DPSP are as follows: 1. For raising the standard of living (Article 47), particularly of the rural population, the Government of India launched its Community Development Project in 1952. 2. Various measures have been taken to promote the welfare of Scheduled Tribes and Scheduled Castes and to advance the educational and economic interests of weaker and backward sections of the people under Article 46. 3. Legislation to abolish intermediaries and Zamindari systems and land reforms were enacted in the early years of 1950 to reduce inequalities in income, status under Article 38. 4 For separation of the executive from the judiciary (Article 50), Government enacted Criminal Procedure Code, 1973. 5. A large number of laws have been enacted to implement the Directive in Article 40 to organise village panchayat and endow them with powers of self-government. 73 rd Constitutional amendment provides Constitutional status to Panchayats. 6. The Maternity Benefit Act (1961) and the Equal Remuneration Act (1976) have been made to protect the interests of women workers. Lacunas in implementation of DPSP: 1. Low Learning levels in schools as reported by ASER report. 2. Panchayats face a problem of proxy representation which means women have only representation in these panchayats but in real terms, their husbands, father, brother get all the powers and responsibilities. Also, these panchayats face the problem of lack of funds, functionaries. 3. Agriculture is also facing problems which are reflected in the recent issue of farmer suicides. 4. Right to work has been made a legal right but the unemployment levels are still very high in India. 5. Though free legal aid has been provided, more than 67% of the prisoners are undertrials and most of them belong to the SC, ST or economically weaker sections of society. 6. Till date, there is no uniform civil code. Debates are going on regarding the implementation of the uniform civil code. Hence it can be concluded that partial justice is done to the goals and objectives of DPSP. Efforts should be made on a continuous basis towards the implementation of DPSP and taking Indian society on the path of welfare.
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प्रस्तावना को संविधान का दर्शन और मार्गदर्शक माना जाता है। स्पष्ट कीजिए।(200 शब्द) The preamble is considered as a philosophy and guide to the Constitution. Explain (200 words)
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एप्रोच :- प्रस्तावना पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। प्रस्तावना को संविधान के दर्शन व मार्गदर्शक के रूप में तर्कों सहित स्पष्ट कीजिये। उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान की प्रस्तावना , संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को पारित हुए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है।भारतीय प्रस्तावना का संबंध उसके उद्देश्यों, लक्ष्यों , आदर्शों और उसके आधारभूत सिद्धान्तों से है। संविधान सभा के सदस्य पंडित ठाकुरदास भार्गव ने प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा है। संविधान के दर्शन व मार्गदर्शक के रूप में : प्रस्तावना में समाजवादी शब्द का प्रयोग , भारत में सामाजिक असामनता दूर करते हुए विभिन्न वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाना है। इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(b) व 39(c) में देख सकते है। पंथनिरपेक्षता को मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद 25 से 28 में अंतर्निहित धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में देखजा सकता है। लोकतांत्रिक राज्य की संकल्पना को साकार करने हेतु संविधान की शक्ति का स्रोत भारत के लोगों से शक्ति अधिग्रहित करता है। गणराज्य की स्थापना करते हुए भारतीय संविधान , राष्ट्राध्यक्ष के रूप में राष्ट्रपति को भी चुनाव की प्रक्रिया द्वारा चयनित किया जाता है। सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक न्याय को मूल अधिकारों तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के विभिन्न अनुच्छेदों में परिलक्षित किया गया है। सामाजिक न्याय से तात्पर्य जाति, लिंग, मूलवंश आदि आधारों पर भेदभाव को समाप्त करने से है जिन्हें अनुच्छेद 14,17,18 व 46 में देखा जा सकता है। आर्थिक न्याय को लागू करने हेतु तथा असमानता को कम करने के प्रयास अनुच्छेद 15, 16व 39 के प्रावधानों में अंतर्निहित है। राजनीतिक न्याय को स्थापित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 ,19 तथा 41 में विशेष परिलक्षित किया गया है। उपरोक्त तर्कों द्वारा यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान की विभिन्न संकल्पनाओं को प्रस्तावना में अंतर्निहित किया गया है।यद्यपि बेरुबारी वाद 1960 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना , किंतु आगे चलकर 1973 के केशवानंद भारती वाद में प्रस्तावना को संविधान के मूल भाग में शामिल कर लिया गया।
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##Question:प्रस्तावना को संविधान का दर्शन और मार्गदर्शक माना जाता है। स्पष्ट कीजिए।(200 शब्द) The preamble is considered as a philosophy and guide to the Constitution. Explain (200 words)##Answer:एप्रोच :- प्रस्तावना पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। प्रस्तावना को संविधान के दर्शन व मार्गदर्शक के रूप में तर्कों सहित स्पष्ट कीजिये। उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान की प्रस्तावना , संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को पारित हुए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है।भारतीय प्रस्तावना का संबंध उसके उद्देश्यों, लक्ष्यों , आदर्शों और उसके आधारभूत सिद्धान्तों से है। संविधान सभा के सदस्य पंडित ठाकुरदास भार्गव ने प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा है। संविधान के दर्शन व मार्गदर्शक के रूप में : प्रस्तावना में समाजवादी शब्द का प्रयोग , भारत में सामाजिक असामनता दूर करते हुए विभिन्न वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाना है। इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(b) व 39(c) में देख सकते है। पंथनिरपेक्षता को मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद 25 से 28 में अंतर्निहित धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में देखजा सकता है। लोकतांत्रिक राज्य की संकल्पना को साकार करने हेतु संविधान की शक्ति का स्रोत भारत के लोगों से शक्ति अधिग्रहित करता है। गणराज्य की स्थापना करते हुए भारतीय संविधान , राष्ट्राध्यक्ष के रूप में राष्ट्रपति को भी चुनाव की प्रक्रिया द्वारा चयनित किया जाता है। सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक न्याय को मूल अधिकारों तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के विभिन्न अनुच्छेदों में परिलक्षित किया गया है। सामाजिक न्याय से तात्पर्य जाति, लिंग, मूलवंश आदि आधारों पर भेदभाव को समाप्त करने से है जिन्हें अनुच्छेद 14,17,18 व 46 में देखा जा सकता है। आर्थिक न्याय को लागू करने हेतु तथा असमानता को कम करने के प्रयास अनुच्छेद 15, 16व 39 के प्रावधानों में अंतर्निहित है। राजनीतिक न्याय को स्थापित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 ,19 तथा 41 में विशेष परिलक्षित किया गया है। उपरोक्त तर्कों द्वारा यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान की विभिन्न संकल्पनाओं को प्रस्तावना में अंतर्निहित किया गया है।यद्यपि बेरुबारी वाद 1960 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान का भाग नहीं माना , किंतु आगे चलकर 1973 के केशवानंद भारती वाद में प्रस्तावना को संविधान के मूल भाग में शामिल कर लिया गया।
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संसदीय विशेषाधिकार का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही सामूहिक एवं व्यक्तिगत विशेषाधिकारों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द/10 अंक) Explain the meaning of parliamentary privilege. Also, discuss the collective and individual privileges in detail. (150-200 words/ 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में संसदीय विशेषाधिकार का अर्थ स्पष्ट कीजिए। समूहिक विशेषाधिकार के बारे में लिखिए व्यक्तिगत विशेषाधिकार समझाईए। निष्कर्ष संसदीय विशेषाधिकार विशेष अधिकार उन्मुक्ति और छूटे हैं जो संसद के दोनों सदनों इनकी समितियों और इनके सदस्यों को प्राप्त होते हैं। यह इनके कार्यों की स्वतन्त्रता और प्रभाविता के लिए आवश्यक हैं। इन अधिकारों के बिना सदन न तो अपनी स्वायत्तता तथा सम्मान को सभाल सकता है और न ही अपने सदस्यों को किसी भी उत्तरदायित्व के निर्वहन से सुरक्षा प्रदान कर सकता है। संसदीय विशेषाधिकारों को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है: समूहिक विशेषाधिकार: ऐसे अधिकार जिसे संसद के दोनों सदनों के सदस्य समूहिक रूप से प्राप्त करते हैं: इसके अंतर्गत अपनी रिपोर्ट, वाद-विवाद और कार्यवाही को प्रकाशित करने तथा अन्यों को इसे प्रकाशित न करने देने का अधिकार है। यह अपनी कार्यवाही से अतिथियों को बाहर कर सकती है। संसद अपनी कार्यवाही के संचालन कार्य के प्रबंधन और इन मामलों के निर्णयन हेतु नियम बना सकती है। विशेषाधिकारों के हनन या सदन की अवमानना करने पर निंदित, कारावास दंड दे सकती है। पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना कोई व्यक्ति बंदी नहीं बनाया जा सकता है और ना ही कोई कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। व्यक्तिगत विशेषाधिकार: संसद की कार्यवाही के दौरान कार्यवाही चलने से 40 दिन और बंद होने के 40 दिन बाद तक बंदी नहीं बनाया जा सकता है। यह सिविल मामलों में उपलब्द्ध है। कोई सदस्य संसद या इसकी समिति में दिये गए मत या वक्तव्य के लिए किसी भी न्यायालय के किसी भी कार्यवाही के लिए जिम्मेदार नहीं है। संसद के सत्र के दौरान किसी भी न्यायालय में लंबित मुकदमे में प्रमाण प्रस्तुत करने या उपस्थित होने के लिए मना कर सकते हैं। इस प्रकार संसदीय सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए इन विशेषाधिकारों को लाया गया है। गौरतलब है कि विशेषाधिकार अभी तक संहिताबद्ध नहीं हैं। ये दोनों सदनों के नियमों, संसदीय परंपरा, न्यायिक व्याख्या आदि स्रोतों पर आधारित हैं।
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##Question:संसदीय विशेषाधिकार का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही सामूहिक एवं व्यक्तिगत विशेषाधिकारों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द/10 अंक) Explain the meaning of parliamentary privilege. Also, discuss the collective and individual privileges in detail. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में संसदीय विशेषाधिकार का अर्थ स्पष्ट कीजिए। समूहिक विशेषाधिकार के बारे में लिखिए व्यक्तिगत विशेषाधिकार समझाईए। निष्कर्ष संसदीय विशेषाधिकार विशेष अधिकार उन्मुक्ति और छूटे हैं जो संसद के दोनों सदनों इनकी समितियों और इनके सदस्यों को प्राप्त होते हैं। यह इनके कार्यों की स्वतन्त्रता और प्रभाविता के लिए आवश्यक हैं। इन अधिकारों के बिना सदन न तो अपनी स्वायत्तता तथा सम्मान को सभाल सकता है और न ही अपने सदस्यों को किसी भी उत्तरदायित्व के निर्वहन से सुरक्षा प्रदान कर सकता है। संसदीय विशेषाधिकारों को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है: समूहिक विशेषाधिकार: ऐसे अधिकार जिसे संसद के दोनों सदनों के सदस्य समूहिक रूप से प्राप्त करते हैं: इसके अंतर्गत अपनी रिपोर्ट, वाद-विवाद और कार्यवाही को प्रकाशित करने तथा अन्यों को इसे प्रकाशित न करने देने का अधिकार है। यह अपनी कार्यवाही से अतिथियों को बाहर कर सकती है। संसद अपनी कार्यवाही के संचालन कार्य के प्रबंधन और इन मामलों के निर्णयन हेतु नियम बना सकती है। विशेषाधिकारों के हनन या सदन की अवमानना करने पर निंदित, कारावास दंड दे सकती है। पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना कोई व्यक्ति बंदी नहीं बनाया जा सकता है और ना ही कोई कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। व्यक्तिगत विशेषाधिकार: संसद की कार्यवाही के दौरान कार्यवाही चलने से 40 दिन और बंद होने के 40 दिन बाद तक बंदी नहीं बनाया जा सकता है। यह सिविल मामलों में उपलब्द्ध है। कोई सदस्य संसद या इसकी समिति में दिये गए मत या वक्तव्य के लिए किसी भी न्यायालय के किसी भी कार्यवाही के लिए जिम्मेदार नहीं है। संसद के सत्र के दौरान किसी भी न्यायालय में लंबित मुकदमे में प्रमाण प्रस्तुत करने या उपस्थित होने के लिए मना कर सकते हैं। इस प्रकार संसदीय सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए इन विशेषाधिकारों को लाया गया है। गौरतलब है कि विशेषाधिकार अभी तक संहिताबद्ध नहीं हैं। ये दोनों सदनों के नियमों, संसदीय परंपरा, न्यायिक व्याख्या आदि स्रोतों पर आधारित हैं।
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Define federalism. Along with this also clarify the key features of federalism. (150 words/10 marks)
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Approach: 1. Introduce with types of polity 2. Define Federalism in Part 1 3. Write features of federalism 4. Conclude by highlighting the benefits of Federalism Answer: On the basis of relationship between the centre and the units, the governments may be classified as unitary and federal. The USA has federalism and the UK has a Unitary system Federalism is a form of government in which the power is divided between a central authority and various constituent units of the country. In a federation there is a clear division of powers between centre and states. Countries like USA, Canada, Australia,Switzerland have federal form of government. The salient features of federalism are existence of dual government at centre and state level, seperation of powers, rigid and written, constitutional supermacy of constitution, independence of judiciary etc. Federalism is a system of government in which the same territory is controlled by two levels of government. Both the national government and the smaller political subdivisions have the power to make laws and both have a certain level of autonomy from each other. Features of federalism: 1. Dual govt: The most essential feature of the federal constitution is that it has a dual government that means a dual polity consisting of the union at the centre and the states at the periphery. Each is endowed with sovereign powers to be exercised in the field assigned to them respectively by the Indian Constitution. 2. Distribution of powers (Article 246): The jurisdictions of the respective levels or tiers of government are specified in the constitution. These are mentione din 3 lists under seventh schedule. Sources of revenue for each level of government are clearly specified to ensure its financial autonomy. The Union government deals with the matters of national importance like defence, foreign affairs & so on. The state government look after the matters of the regional & local importance like health, agriculture & so on. 3. Written constitution and supremacy of the constitution: The basic structure of the constitution is indestructible as laid out by the judiciary. The constitution is the supreme law in India. A federal constitution is almost necessary for a written constitution. The Indian Constitution is not only a written document but also the lengthiest constitution of the world. The Indian Constitution is the supreme law of the land which means all the authorities of the Union & the State are subject to the authority of the Indian Constitution. 4. The rigidity of the constitution: The fundamental provisions of the constitution cannot be unilaterally changed by one level of government. Such changes require the consent of both the levels of government. 5. Authority of courts/Independent judiciary: The constitution provides for an independent and integrated judiciary. The lower and district courts are at the bottom levels, the high courts are at the state levels and at the topmost position is the Supreme Court of India. All courts are subordinate to the Supreme Court. The Indian Constitution establishes an independent judiciary headed by the Supreme Court for two purposes i.e. One, to protect the supremacy of the Constitution by exercising the power of judicial review & Two, to settle disputes between the centre & the states or between the two states. The federal system thus has dual objectives: to safeguard and promote unity of the country, while at the sametime accommodate regional diversity.
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##Question:Define federalism. Along with this also clarify the key features of federalism. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: 1. Introduce with types of polity 2. Define Federalism in Part 1 3. Write features of federalism 4. Conclude by highlighting the benefits of Federalism Answer: On the basis of relationship between the centre and the units, the governments may be classified as unitary and federal. The USA has federalism and the UK has a Unitary system Federalism is a form of government in which the power is divided between a central authority and various constituent units of the country. In a federation there is a clear division of powers between centre and states. Countries like USA, Canada, Australia,Switzerland have federal form of government. The salient features of federalism are existence of dual government at centre and state level, seperation of powers, rigid and written, constitutional supermacy of constitution, independence of judiciary etc. Federalism is a system of government in which the same territory is controlled by two levels of government. Both the national government and the smaller political subdivisions have the power to make laws and both have a certain level of autonomy from each other. Features of federalism: 1. Dual govt: The most essential feature of the federal constitution is that it has a dual government that means a dual polity consisting of the union at the centre and the states at the periphery. Each is endowed with sovereign powers to be exercised in the field assigned to them respectively by the Indian Constitution. 2. Distribution of powers (Article 246): The jurisdictions of the respective levels or tiers of government are specified in the constitution. These are mentione din 3 lists under seventh schedule. Sources of revenue for each level of government are clearly specified to ensure its financial autonomy. The Union government deals with the matters of national importance like defence, foreign affairs & so on. The state government look after the matters of the regional & local importance like health, agriculture & so on. 3. Written constitution and supremacy of the constitution: The basic structure of the constitution is indestructible as laid out by the judiciary. The constitution is the supreme law in India. A federal constitution is almost necessary for a written constitution. The Indian Constitution is not only a written document but also the lengthiest constitution of the world. The Indian Constitution is the supreme law of the land which means all the authorities of the Union & the State are subject to the authority of the Indian Constitution. 4. The rigidity of the constitution: The fundamental provisions of the constitution cannot be unilaterally changed by one level of government. Such changes require the consent of both the levels of government. 5. Authority of courts/Independent judiciary: The constitution provides for an independent and integrated judiciary. The lower and district courts are at the bottom levels, the high courts are at the state levels and at the topmost position is the Supreme Court of India. All courts are subordinate to the Supreme Court. The Indian Constitution establishes an independent judiciary headed by the Supreme Court for two purposes i.e. One, to protect the supremacy of the Constitution by exercising the power of judicial review & Two, to settle disputes between the centre & the states or between the two states. The federal system thus has dual objectives: to safeguard and promote unity of the country, while at the sametime accommodate regional diversity.
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संघवाद को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही संघवाद की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Define federalism. Along with this also clarify the key features of federalism. (150 to 200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में संघवाद को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में संघवाद की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में भारतीय संघ की कुछ विशेषताओं और स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सरकार की वह प्रणाली जिसमें सत्ता एवं प्राधिकार, केन्द्रीय सरकार एवं उसकी विभिन्न आनुषांगिक इकाइयों में विभाजित हो जाती है| संघीय प्रणाली में दो स्तरों पर सरकारें होती हैं| इसमें एक सरकार पूरे देश के लिए होती जो राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों का प्रशासन करती है| दूसरे स्तर पर प्रांत स्तरों अथवा राज्य की सरकारें होती हैं जो क्षेत्रीय/ स्थानीय महत्त्व के मुद्दों का विधायन एवं उनका क्रियान्वयन करती है| संघीय व्यवस्था में संविधान के द्वारा दोनों स्तर की सरकारों के लिए प्रशासनिक, विधायी एवं वितीय अधिकारों का बटवारा कर दिया जाता है ताकि दोनों स्तरों की सरकारें प्राधिकार सहित अपने अपने स्तर पर स्वंतत्रता पूर्वक काम कर सकें| संघवाद की अनेक विशेषताएं होती हैं| संघवाद की विशेषताएं दोहरी सरकार · इसके अंतर्गत केंद्र एवं राज्य में दो स्तर पर सरकारें काम करती हैं, · दोनों सरकारों के अपने अधिकार क्षेत्र निर्धारित होते है जिससे कि सामान्य स्थिति में दोनों एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप न करें| भारत में भी यह स्थिति पायी जाती है शक्तियों का विभाजन · संघीय व्यवस्था में संविधान के द्वारा दोनों स्तर की सरकारों के लिए प्रशासनिक, विधायी एवं वितीय अधिकारों का बटवारा कर दिया जाता है ताकि दोनों स्तरों की सरकारें प्राधिकार सहित अपने अपने स्तर पर स्वंतत्रता पूर्वक काम कर सकें| · भारत सरकार अधिनियम 1935 से प्रेरित होकर भारतीय संविधान निर्माताओं ने केंद्र एवं राज्य के बीच विभिन्न विषयों के बटवारे हेतु केंद्र, राज्य एवं समवर्ती सूचियों की व्यवस्था की है न्यायपालिका की दोहरी प्रणाली · संघीय शासन में न्यायपालिका की दोहरी प्रणाली होती है अर्थात राज्यों का अपना अलग न्यायालय जिनके निर्णयों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील नही की जा सकती · यह व्यवस्था अमेरिका में है किन्तु भारत में नही है सेवाओं का विभाजन · संघीय व्यवस्था में केंद्र एवं राज्य के अंतर्गत सेवाओं का दो स्तरों पर वर्गीकरण किया गया होता है| इसमें अहस्तक्षेप के सिद्धांत का पालन किया जाता है जैसे अमेरिका में राज्य सेवा का कोई भी व्यक्ति केंद्र में नही जा सकता| · इसके विपरीत भारत में अखिल भारतीय सेवायें, जिसके सदस्य राज्य एवं केंद्र दोनों के अंतर्गत अपनी सेवायें देते हैं| संघीय इकाइयों पर नियंत्रण · एक संघीय प्रणाली में केन्द्रीय सरकार एवं प्रांतीय सरकारें पारस्परिक रूप से अधिकार संपन्न होती हैं| अमेरिका में आपातकाल के नाम पर राज्य सरकारों के अधिकार कम नही किये जा सकते · भारतीय संघीय प्रणाली में आपातकाल की स्थिति में राज्य सरकारों को बर्खास्त भी किया जा सकता है दोहरी नागरिकता · संघीय प्रणालियों में नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है| इसमें एक नागरिकता किसी राज्य के निवासी होने के कारण उस राज्य की होती है जबकि एक नागरिकता उस संघीय प्रणाली के अंतर्गत होने के नाते संघीय नागरिकता होती है · भारत में जहाँ इकहरी/एकल नागरिकता की व्यवस्था हैं वहीँ अमेरिका में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है| सदनों में सामान प्रतिनिधित्व · संघीय विधायिकाओं में प्रायः द्विसदनीय प्रणाली अपनाई जाती है| इसमें से निम्न सदन संघ के नागरिकों का जबकि उच्च सदन संघ के अंतर्गत राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है| इसमें प्रतिनिधित्व का आधार समानता होती है, · अमेरिकी उच्च सदन में प्रत्येक राज्य को समान महत्त्व दिया गया है जबकि भारत में जनसंख्या के आकार के आधार पर राज्यों के प्रतिनिधित्व में अंतर है · इसके अतिरिक्त एक संघीय प्रणाली में संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की सर्वोच्चता, संविधान संशोधन की जटिलता आदि अन्य विशेषताएं भी होती हैं| उपरोक्त विशेषताओं के परिप्रेक्ष्य में, चूँकि संघीय प्रणाली कुछ विशेषताएं भारत में नही पायी जाती हैं इसी आधार पर कुछ विद्वान भारत को संघ नही मानते हैं बल्कि केवल अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रेलिया को संघ मानते हैं| किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने गंगाराम मूलचंदानी बनाम राजस्थान राज्य 2001 के मुक़दमे में इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया किया कि भारत एक संघ नही है और निर्णय दिया की संघ की वास्तव में चार प्रमुख विशेषताएं होती हैं यथा केन्द्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर दो सरकारों की उपस्थिति, सत्ता का विभाजन, संविधान की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता| ये सभी विशेषताएं भारत में पायी जाती हैं अतः भारत एक संघ है|
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##Question:संघवाद को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही संघवाद की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Define federalism. Along with this also clarify the key features of federalism. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संघवाद को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में संघवाद की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में भारतीय संघ की कुछ विशेषताओं और स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सरकार की वह प्रणाली जिसमें सत्ता एवं प्राधिकार, केन्द्रीय सरकार एवं उसकी विभिन्न आनुषांगिक इकाइयों में विभाजित हो जाती है| संघीय प्रणाली में दो स्तरों पर सरकारें होती हैं| इसमें एक सरकार पूरे देश के लिए होती जो राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों का प्रशासन करती है| दूसरे स्तर पर प्रांत स्तरों अथवा राज्य की सरकारें होती हैं जो क्षेत्रीय/ स्थानीय महत्त्व के मुद्दों का विधायन एवं उनका क्रियान्वयन करती है| संघीय व्यवस्था में संविधान के द्वारा दोनों स्तर की सरकारों के लिए प्रशासनिक, विधायी एवं वितीय अधिकारों का बटवारा कर दिया जाता है ताकि दोनों स्तरों की सरकारें प्राधिकार सहित अपने अपने स्तर पर स्वंतत्रता पूर्वक काम कर सकें| संघवाद की अनेक विशेषताएं होती हैं| संघवाद की विशेषताएं दोहरी सरकार · इसके अंतर्गत केंद्र एवं राज्य में दो स्तर पर सरकारें काम करती हैं, · दोनों सरकारों के अपने अधिकार क्षेत्र निर्धारित होते है जिससे कि सामान्य स्थिति में दोनों एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप न करें| भारत में भी यह स्थिति पायी जाती है शक्तियों का विभाजन · संघीय व्यवस्था में संविधान के द्वारा दोनों स्तर की सरकारों के लिए प्रशासनिक, विधायी एवं वितीय अधिकारों का बटवारा कर दिया जाता है ताकि दोनों स्तरों की सरकारें प्राधिकार सहित अपने अपने स्तर पर स्वंतत्रता पूर्वक काम कर सकें| · भारत सरकार अधिनियम 1935 से प्रेरित होकर भारतीय संविधान निर्माताओं ने केंद्र एवं राज्य के बीच विभिन्न विषयों के बटवारे हेतु केंद्र, राज्य एवं समवर्ती सूचियों की व्यवस्था की है न्यायपालिका की दोहरी प्रणाली · संघीय शासन में न्यायपालिका की दोहरी प्रणाली होती है अर्थात राज्यों का अपना अलग न्यायालय जिनके निर्णयों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील नही की जा सकती · यह व्यवस्था अमेरिका में है किन्तु भारत में नही है सेवाओं का विभाजन · संघीय व्यवस्था में केंद्र एवं राज्य के अंतर्गत सेवाओं का दो स्तरों पर वर्गीकरण किया गया होता है| इसमें अहस्तक्षेप के सिद्धांत का पालन किया जाता है जैसे अमेरिका में राज्य सेवा का कोई भी व्यक्ति केंद्र में नही जा सकता| · इसके विपरीत भारत में अखिल भारतीय सेवायें, जिसके सदस्य राज्य एवं केंद्र दोनों के अंतर्गत अपनी सेवायें देते हैं| संघीय इकाइयों पर नियंत्रण · एक संघीय प्रणाली में केन्द्रीय सरकार एवं प्रांतीय सरकारें पारस्परिक रूप से अधिकार संपन्न होती हैं| अमेरिका में आपातकाल के नाम पर राज्य सरकारों के अधिकार कम नही किये जा सकते · भारतीय संघीय प्रणाली में आपातकाल की स्थिति में राज्य सरकारों को बर्खास्त भी किया जा सकता है दोहरी नागरिकता · संघीय प्रणालियों में नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है| इसमें एक नागरिकता किसी राज्य के निवासी होने के कारण उस राज्य की होती है जबकि एक नागरिकता उस संघीय प्रणाली के अंतर्गत होने के नाते संघीय नागरिकता होती है · भारत में जहाँ इकहरी/एकल नागरिकता की व्यवस्था हैं वहीँ अमेरिका में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है| सदनों में सामान प्रतिनिधित्व · संघीय विधायिकाओं में प्रायः द्विसदनीय प्रणाली अपनाई जाती है| इसमें से निम्न सदन संघ के नागरिकों का जबकि उच्च सदन संघ के अंतर्गत राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है| इसमें प्रतिनिधित्व का आधार समानता होती है, · अमेरिकी उच्च सदन में प्रत्येक राज्य को समान महत्त्व दिया गया है जबकि भारत में जनसंख्या के आकार के आधार पर राज्यों के प्रतिनिधित्व में अंतर है · इसके अतिरिक्त एक संघीय प्रणाली में संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की सर्वोच्चता, संविधान संशोधन की जटिलता आदि अन्य विशेषताएं भी होती हैं| उपरोक्त विशेषताओं के परिप्रेक्ष्य में, चूँकि संघीय प्रणाली कुछ विशेषताएं भारत में नही पायी जाती हैं इसी आधार पर कुछ विद्वान भारत को संघ नही मानते हैं बल्कि केवल अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रेलिया को संघ मानते हैं| किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने गंगाराम मूलचंदानी बनाम राजस्थान राज्य 2001 के मुक़दमे में इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया किया कि भारत एक संघ नही है और निर्णय दिया की संघ की वास्तव में चार प्रमुख विशेषताएं होती हैं यथा केन्द्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर दो सरकारों की उपस्थिति, सत्ता का विभाजन, संविधान की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता| ये सभी विशेषताएं भारत में पायी जाती हैं अतः भारत एक संघ है|
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Briefly address how did the British gradually took over the autonomous kingdoms in India. (150 words) 10 marks
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -HOW THE BRITISH GRADUALLY TOOK OVER THE AUTONOMOUS KINGDOMS IN INDIA -CONCLUSION Answer The British were able to take control over the autonomous kingdoms deploying various methods like military might, treachery and interference in personal matters of the kingdoms. The story was different, yet quite the same in all the various autonomous kingdoms in India at the time of the 18th century. 1) INTERFERENCE IN THE INTERNAL AFFAIRS The British did this in Carnatic and Mysore. They did this to install their own puppet, via whom they could control the Empire. In the Maratha Empire as well after Nana Sabeb, there were succession disputes among the Maratha sardars. The British interfered here. Mysore was weakened and defeated in 1799 and crushed in the coming two years via the 2nd Anglo Maratha War (1803-05). 2) POLICY OF SUBSIDIARY ALLIANCE They used policies of interference such as the policy of stationing an intermediary, then imposing a policy of subsidiary alliance. Under this policy, a resident officer was stationed. The resident officer gradually gained power and started to control the Nawab. This was imposed in states like Mysore, Punjab etc. 3) WARS Many wars were fought by the British. For example, in Mysore wars were fought by the British, against Hyder Ali and Tipu Sultan. The British even used wars to eliminate their foreign counterparts. The French might was defeated by the British East India Company in the Battle of Wandiwash. 4) COLONIALISM AND MERCANTILE CAPITALISM The British tried to gain in economic strength in order to gain military and political strength. For this they followed colonialism whereby they spread their culture in order to promote their markets. They also followed mercantile capitalism, whereby they tried to become the strongest naval power in the world. Due to this, they came into conflict with other upcoming naval powers, like that of Tipu Sultan, and were able to defeat the native kingdoms. The British came in as traders. As per what is widely accepted, they did not initially have a desire for political control. Gradually, with growth in economic power, they even came to control political power, which only helped them trade better (in their favour). This section of historians believes that the British government at home had not given them any directions for political control of the country. Another section of historians believes that it was a quid-pro-quo arrangement with the home government being completely aware of its political and imperial motives. It is only in 1858 that the government in Britain formally took over the rule and affairs of the Indian sub-continent. Since the East India Company had already taken over the real power of the various autonomous kingdoms in the Indian sub-continent, it was only a fiction of the Mughal Empire which was deposed in 1858.
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##Question:Briefly address how did the British gradually took over the autonomous kingdoms in India. (150 words) 10 marks##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -HOW THE BRITISH GRADUALLY TOOK OVER THE AUTONOMOUS KINGDOMS IN INDIA -CONCLUSION Answer The British were able to take control over the autonomous kingdoms deploying various methods like military might, treachery and interference in personal matters of the kingdoms. The story was different, yet quite the same in all the various autonomous kingdoms in India at the time of the 18th century. 1) INTERFERENCE IN THE INTERNAL AFFAIRS The British did this in Carnatic and Mysore. They did this to install their own puppet, via whom they could control the Empire. In the Maratha Empire as well after Nana Sabeb, there were succession disputes among the Maratha sardars. The British interfered here. Mysore was weakened and defeated in 1799 and crushed in the coming two years via the 2nd Anglo Maratha War (1803-05). 2) POLICY OF SUBSIDIARY ALLIANCE They used policies of interference such as the policy of stationing an intermediary, then imposing a policy of subsidiary alliance. Under this policy, a resident officer was stationed. The resident officer gradually gained power and started to control the Nawab. This was imposed in states like Mysore, Punjab etc. 3) WARS Many wars were fought by the British. For example, in Mysore wars were fought by the British, against Hyder Ali and Tipu Sultan. The British even used wars to eliminate their foreign counterparts. The French might was defeated by the British East India Company in the Battle of Wandiwash. 4) COLONIALISM AND MERCANTILE CAPITALISM The British tried to gain in economic strength in order to gain military and political strength. For this they followed colonialism whereby they spread their culture in order to promote their markets. They also followed mercantile capitalism, whereby they tried to become the strongest naval power in the world. Due to this, they came into conflict with other upcoming naval powers, like that of Tipu Sultan, and were able to defeat the native kingdoms. The British came in as traders. As per what is widely accepted, they did not initially have a desire for political control. Gradually, with growth in economic power, they even came to control political power, which only helped them trade better (in their favour). This section of historians believes that the British government at home had not given them any directions for political control of the country. Another section of historians believes that it was a quid-pro-quo arrangement with the home government being completely aware of its political and imperial motives. It is only in 1858 that the government in Britain formally took over the rule and affairs of the Indian sub-continent. Since the East India Company had already taken over the real power of the various autonomous kingdoms in the Indian sub-continent, it was only a fiction of the Mughal Empire which was deposed in 1858.
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What kind of landforms are found under the ocean? Explain with the help of a diagram. (10 marks/150 words)
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Approach Introduction: In introduction briefly define the ocean and its releif Body: Explain diffferent landforms under the ocean Answer: The oceans are confined to the great depressions of the earth’s outer layer. he oceans, unlike the continents, merge so naturally into one another that it is hard to demarcate them. Divisions of the Ocean Floors The ocean floors can be divided into four major divisions: Types of Landforms under Ocean : Continental Shelf The continental shelf is the extended margin of each continent occupied by relatively shallow seas and gulfs. It is the shallowest part of the ocean showing an average gradient of 1° or even less. The shelf typically ends at a very steep slope, called the shelf break. Continental Slope The continental slope connects the continental shelf and the ocean basins. It begins where the bottom of the continental shelf sharply drops off into a steep slope. The gradient of the slope region varies between 2-5°. The depth of the slope region varies between 200 and 3,000 m. The slope boundary indicates the end of the continents. Deep Sea Plain Deep sea plains are gently sloping areas of the ocean basins. These are the flattest and smoothest regions of the world. The depths vary between 3,000 and 6,000m. These plains are covered with fine-grained sediments like clay and silt. Oceanic Deeps or Trenches These areas are the deepest parts of the oceans. The trenches are relatively steep sided, narrow basins. They are some 3-5 km deeper than the surrounding ocean floor. They occur at the bases of continental slopes and along island arcs and are associated with active volcanoes and strong earthquakes. Minor Relief Features Apart from the above mentioned major relief features of the ocean floor, some minor but significant features predominate in different parts of the oceans. Mid-Oceanic Ridges A mid-oceanic ridge is composed of two chains of mountains separated by a large depression. The mountain ranges can have peaks as high as 2,500 m and some even reach above the ocean’s surface. Iceland, a part of the mid Atlantic Ridge, is an example. Seamount It is a mountain with pointed summits, rising from the seafloor that does not reach the surface of the ocean. Seamounts are volcanic in origin. These can be 3,000-4,500 m tall. The Emperor seamount, an extension of the Hawaiian Islands in the Pacific Ocean, is a good example. Submarine Canyons These are deep valleys, some comparable to the Grand Canyon of the Colorado river. They are sometimes found cutting across the continental shelves and slopes, often extending from the mouths of large rivers. The Hudson Canyon is the best known submarine canyon in the world. Guyots It is a flat topped seamount. They show evidences of gradual subsidence through stages to become flat topped submerged mountains. It is estimated that more than 10,000 seamounts and guyots exist in the Pacific Ocean alone. Note: Students are supposed to draw a diagram depicting these landforms.
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##Question:What kind of landforms are found under the ocean? Explain with the help of a diagram. (10 marks/150 words)##Answer:Approach Introduction: In introduction briefly define the ocean and its releif Body: Explain diffferent landforms under the ocean Answer: The oceans are confined to the great depressions of the earth’s outer layer. he oceans, unlike the continents, merge so naturally into one another that it is hard to demarcate them. Divisions of the Ocean Floors The ocean floors can be divided into four major divisions: Types of Landforms under Ocean : Continental Shelf The continental shelf is the extended margin of each continent occupied by relatively shallow seas and gulfs. It is the shallowest part of the ocean showing an average gradient of 1° or even less. The shelf typically ends at a very steep slope, called the shelf break. Continental Slope The continental slope connects the continental shelf and the ocean basins. It begins where the bottom of the continental shelf sharply drops off into a steep slope. The gradient of the slope region varies between 2-5°. The depth of the slope region varies between 200 and 3,000 m. The slope boundary indicates the end of the continents. Deep Sea Plain Deep sea plains are gently sloping areas of the ocean basins. These are the flattest and smoothest regions of the world. The depths vary between 3,000 and 6,000m. These plains are covered with fine-grained sediments like clay and silt. Oceanic Deeps or Trenches These areas are the deepest parts of the oceans. The trenches are relatively steep sided, narrow basins. They are some 3-5 km deeper than the surrounding ocean floor. They occur at the bases of continental slopes and along island arcs and are associated with active volcanoes and strong earthquakes. Minor Relief Features Apart from the above mentioned major relief features of the ocean floor, some minor but significant features predominate in different parts of the oceans. Mid-Oceanic Ridges A mid-oceanic ridge is composed of two chains of mountains separated by a large depression. The mountain ranges can have peaks as high as 2,500 m and some even reach above the ocean’s surface. Iceland, a part of the mid Atlantic Ridge, is an example. Seamount It is a mountain with pointed summits, rising from the seafloor that does not reach the surface of the ocean. Seamounts are volcanic in origin. These can be 3,000-4,500 m tall. The Emperor seamount, an extension of the Hawaiian Islands in the Pacific Ocean, is a good example. Submarine Canyons These are deep valleys, some comparable to the Grand Canyon of the Colorado river. They are sometimes found cutting across the continental shelves and slopes, often extending from the mouths of large rivers. The Hudson Canyon is the best known submarine canyon in the world. Guyots It is a flat topped seamount. They show evidences of gradual subsidence through stages to become flat topped submerged mountains. It is estimated that more than 10,000 seamounts and guyots exist in the Pacific Ocean alone. Note: Students are supposed to draw a diagram depicting these landforms.
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विशेष श्रेणी के राज्यों के निर्धारण की विभिन्न शर्तों का उल्लेख करते हुए इन राज्यों को प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभों पर चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Mentioning conditions to determine the special category states, discussthe different benefits received by these states. (200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विशेष श्रेणी के राज्यों का परिचय दीजिए। निर्धारण की विभिन्न शर्तों का उल्लेख कीजिए। विशेष श्रेणी के राज्यों को प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभों पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष विशेष श्रेणी के राज्य की अवधारणा पहली बार 1969 में गाडगिल फार्मूले के आधार पर 5वें वित्त आयोग द्वारा लागू की गयी थी। वर्तमान में इसमें कुल 11 राज्य शामिल हैं जिसमे उत्तर भारत के 8 राज्य व अन्य 3 राज्यों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड शामिल हैं। विशेष श्रेणी के राज्यों के निर्धारण की शर्तें: ऐसे राज्य जो पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में हैं जिससे बुनियादी सुविधाओं की पहुँच में कठिनाई उत्पन्न होती है। बहुत कम जनसंख्या घनत्व आदिवासी जनसंख्या की बहुलता अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास की अवस्थिति। आर्थिक और अवसंरचनात्मक पिछड़ापन। राज्यों के पास स्वयं के वित्तीय स्रोतों की कमी विशेष श्रेणी के राज्यों को प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभ: विशेष श्रेणी के अंतर्गत आने वाले राज्यों को केन्द्रीय सहायता में प्राथमिकता दी जाती है जैसे कि केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं में 90% व्यय का वहन केंद्र करता है। करों के भुगतान में छूट वित्तीय अनुदान में अन्य राज्यों के मुक़ाबले अत्यधिक धन प्रदान किया जाना आदि। राजस्व अनुदान में वृद्धि हो जाती है। निवेश करने वाली निजी कंपनियों को केंद्र व राज्य के विभिन्न करों से राहत तथा छूट प्रदान किया जाता है। केन्द्रीय बजट के नियोजित व्यय का 30% इन राज्यों को प्रदान किया जाता है। इन राज्यों के पास एक विशेष अधिकार होता है कि यदि किसी वित्तीय वर्ष में उपलब्ध धन का उपयोग न कर पाये तो वह समाप्त नहीं होता है। इस प्रकार विशेष श्रेणी के राज्यों की व्यवस्था आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक स्थिति के आधार पर की जाती है जिसका उद्देश्य अन्य राज्यों के समान विकास की धारा में लाना है।
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##Question:विशेष श्रेणी के राज्यों के निर्धारण की विभिन्न शर्तों का उल्लेख करते हुए इन राज्यों को प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभों पर चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Mentioning conditions to determine the special category states, discussthe different benefits received by these states. (200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विशेष श्रेणी के राज्यों का परिचय दीजिए। निर्धारण की विभिन्न शर्तों का उल्लेख कीजिए। विशेष श्रेणी के राज्यों को प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभों पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष विशेष श्रेणी के राज्य की अवधारणा पहली बार 1969 में गाडगिल फार्मूले के आधार पर 5वें वित्त आयोग द्वारा लागू की गयी थी। वर्तमान में इसमें कुल 11 राज्य शामिल हैं जिसमे उत्तर भारत के 8 राज्य व अन्य 3 राज्यों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड शामिल हैं। विशेष श्रेणी के राज्यों के निर्धारण की शर्तें: ऐसे राज्य जो पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में हैं जिससे बुनियादी सुविधाओं की पहुँच में कठिनाई उत्पन्न होती है। बहुत कम जनसंख्या घनत्व आदिवासी जनसंख्या की बहुलता अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास की अवस्थिति। आर्थिक और अवसंरचनात्मक पिछड़ापन। राज्यों के पास स्वयं के वित्तीय स्रोतों की कमी विशेष श्रेणी के राज्यों को प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभ: विशेष श्रेणी के अंतर्गत आने वाले राज्यों को केन्द्रीय सहायता में प्राथमिकता दी जाती है जैसे कि केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं में 90% व्यय का वहन केंद्र करता है। करों के भुगतान में छूट वित्तीय अनुदान में अन्य राज्यों के मुक़ाबले अत्यधिक धन प्रदान किया जाना आदि। राजस्व अनुदान में वृद्धि हो जाती है। निवेश करने वाली निजी कंपनियों को केंद्र व राज्य के विभिन्न करों से राहत तथा छूट प्रदान किया जाता है। केन्द्रीय बजट के नियोजित व्यय का 30% इन राज्यों को प्रदान किया जाता है। इन राज्यों के पास एक विशेष अधिकार होता है कि यदि किसी वित्तीय वर्ष में उपलब्ध धन का उपयोग न कर पाये तो वह समाप्त नहीं होता है। इस प्रकार विशेष श्रेणी के राज्यों की व्यवस्था आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक स्थिति के आधार पर की जाती है जिसका उद्देश्य अन्य राज्यों के समान विकास की धारा में लाना है।
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To what extent does gender stereotyping impacts the social position of women in the society? Discuss. (150 words/10 marks)
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Approach: . Define Gender Stereotype . How it impacts women both in positive and negative way . Conclude accordingly Answer: A gender stereotype is a generalized view or preconception about attributes or characteristics that are or ought to be possessed by women and men or the roles that are or should be performed by men and women. Gender stereotypes can be both positive and negative for example, “women are nurturing” or “women are weak”. How it impacts the social position of women in society: Positive Influence: 1. Gender stereotypes can influence men and women’s behaviour to be more competitive or empathic. 2. Some gender-specific tasks come across as being biologically coded. Like the role of a mother can be best performed by a female and thus this stereotyping helps in the growth of families through a division of labour, though this has an adverse impact for women as well. Negative Influence: 1. Gender roles influence the careers that people select. Since some jobs require “caring, comforting, and serving behaviours” they are labelled as a woman’s job and stereotypically do not have high male employment. For eg. Pink Collor jobs, that of nurses etc. 2. It eclipses the talents in the children from the very childhood, for eg boys are preferred to play sports over females. 3. Glass ceiling effect keeps the females out of top positions in jobs. Women in many cases earn lesser than men. 4. It can lead to a psychological breakdown in some women who cannot handle the pressure due to stereotyping. 5. This can also result in a loss of efficiency of human capital. 6. It has also led to objectification and thus exploitation of women. Thus it can be clearly seen that the negative influences of gender stereotyping surpass that of positive ones. The need of the hour is to clearly identify the strength and weakness of a human as an individual and not as a gender.
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##Question:To what extent does gender stereotyping impacts the social position of women in the society? Discuss. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: . Define Gender Stereotype . How it impacts women both in positive and negative way . Conclude accordingly Answer: A gender stereotype is a generalized view or preconception about attributes or characteristics that are or ought to be possessed by women and men or the roles that are or should be performed by men and women. Gender stereotypes can be both positive and negative for example, “women are nurturing” or “women are weak”. How it impacts the social position of women in society: Positive Influence: 1. Gender stereotypes can influence men and women’s behaviour to be more competitive or empathic. 2. Some gender-specific tasks come across as being biologically coded. Like the role of a mother can be best performed by a female and thus this stereotyping helps in the growth of families through a division of labour, though this has an adverse impact for women as well. Negative Influence: 1. Gender roles influence the careers that people select. Since some jobs require “caring, comforting, and serving behaviours” they are labelled as a woman’s job and stereotypically do not have high male employment. For eg. Pink Collor jobs, that of nurses etc. 2. It eclipses the talents in the children from the very childhood, for eg boys are preferred to play sports over females. 3. Glass ceiling effect keeps the females out of top positions in jobs. Women in many cases earn lesser than men. 4. It can lead to a psychological breakdown in some women who cannot handle the pressure due to stereotyping. 5. This can also result in a loss of efficiency of human capital. 6. It has also led to objectification and thus exploitation of women. Thus it can be clearly seen that the negative influences of gender stereotyping surpass that of positive ones. The need of the hour is to clearly identify the strength and weakness of a human as an individual and not as a gender.
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Define Poverty. What is the difference between absolute and relative poverty? ( 150 words/10 Marks)
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What is the difference between absolute and relative poverty? Discuss the recommendations of Dandekar and K. Alag committee to measure poverty in India( 150 words) Approach :- 1.Introduction-About definition of poverty 2.Differentiate between absolute and relative poverty 3.Bring out the Recommendations given by Dandekar and K.Alag Committee 4.Conclusion Answer :- Poverty has no universal definition because it is termed as a very subjective term.According to the Oxford Dictionary of Sociology, ‘poverty is a state in which resources, usually material but sometimes cultural, are lacking’ Difference between Absolute and relative poverty:- Absolute poverty is the lack of basic needs over a period of time which is long enough so that it endangers the life of an individual or can cause harm.It is a condition of actual physical wants—state of starvation, malnutrition, disease, and want of clothing, shelter and medical care. Relative Poverty ispoverty when income is less than the average income by a certain amount.When poverty is measured in relative terms, such as income or consumption of other people, it is calledrelative poverty.Relative poverty is a condition when a person or family is unable to reach the minimum average living standard. As contrary to absolute poverty, relative poverty changes over time. Recommendations are given by Dandekar and K.Alag Committees:- Dandekar:- 1.Dandekar and Rath committeein 1971 suggested a measure of poverty rate that was based on the number of calories consumed 2. The committeesuggested that criteria suggested by the Planning Commission which is Rs. 20 per month for both urban and rural arenot desirable. There is a need for the separate criteria for rural and urban areas 3. The committee suggested a limit of Rs. 180 rupees per annum for rural areas and minimum Rs. 270 per annum for Urban areas at 1960-61 prices. Y K Alag Committee:- 1.Y K Alg committee for the first time declared poverty line on the basis of nutritional requirement i.e. how much people eat. 2.On the basis of the above-mentioned criterion, the people consuming less than 2100 calories in the urban areas or less than 2400 calories in rural areas are poor. 3.The purpose of setting up this criterion wasthat the states would take care of the health and education of the people. RecentlyGovernment had constituted a 14-member task force under NITI Aayog’s vice-chairman Arvind Panagariya to come out with recommendations for a realisticvalue of poverty line but this committee couldn’t reach on a conclusion about the poverty line criteria. This committee supported the criteria of the Tendulkar committee i.e uniform poverty basket for urban and rural areas. Though poverty has been reduced to a great extent since the independence, and especially after economic reforms of the 90s, still, a lot needs to be done. All stakeholders need to come together and work together to do away with this menace and provide basic needs.
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##Question:Define Poverty. What is the difference between absolute and relative poverty? ( 150 words/10 Marks)##Answer:What is the difference between absolute and relative poverty? Discuss the recommendations of Dandekar and K. Alag committee to measure poverty in India( 150 words) Approach :- 1.Introduction-About definition of poverty 2.Differentiate between absolute and relative poverty 3.Bring out the Recommendations given by Dandekar and K.Alag Committee 4.Conclusion Answer :- Poverty has no universal definition because it is termed as a very subjective term.According to the Oxford Dictionary of Sociology, ‘poverty is a state in which resources, usually material but sometimes cultural, are lacking’ Difference between Absolute and relative poverty:- Absolute poverty is the lack of basic needs over a period of time which is long enough so that it endangers the life of an individual or can cause harm.It is a condition of actual physical wants—state of starvation, malnutrition, disease, and want of clothing, shelter and medical care. Relative Poverty ispoverty when income is less than the average income by a certain amount.When poverty is measured in relative terms, such as income or consumption of other people, it is calledrelative poverty.Relative poverty is a condition when a person or family is unable to reach the minimum average living standard. As contrary to absolute poverty, relative poverty changes over time. Recommendations are given by Dandekar and K.Alag Committees:- Dandekar:- 1.Dandekar and Rath committeein 1971 suggested a measure of poverty rate that was based on the number of calories consumed 2. The committeesuggested that criteria suggested by the Planning Commission which is Rs. 20 per month for both urban and rural arenot desirable. There is a need for the separate criteria for rural and urban areas 3. The committee suggested a limit of Rs. 180 rupees per annum for rural areas and minimum Rs. 270 per annum for Urban areas at 1960-61 prices. Y K Alag Committee:- 1.Y K Alg committee for the first time declared poverty line on the basis of nutritional requirement i.e. how much people eat. 2.On the basis of the above-mentioned criterion, the people consuming less than 2100 calories in the urban areas or less than 2400 calories in rural areas are poor. 3.The purpose of setting up this criterion wasthat the states would take care of the health and education of the people. RecentlyGovernment had constituted a 14-member task force under NITI Aayog’s vice-chairman Arvind Panagariya to come out with recommendations for a realisticvalue of poverty line but this committee couldn’t reach on a conclusion about the poverty line criteria. This committee supported the criteria of the Tendulkar committee i.e uniform poverty basket for urban and rural areas. Though poverty has been reduced to a great extent since the independence, and especially after economic reforms of the 90s, still, a lot needs to be done. All stakeholders need to come together and work together to do away with this menace and provide basic needs.
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भुगतान संतुलन की अवधारणा स्पष्ट करते हुए इसके विभिन्न घटकों की व्याख्या कीजिए। (10 अंक /150- 200 शब्द) Explain the concept of Balance of Payment (BoP) and describe its various components. (10 Marks/150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भुगतान संतुलन को परिभाषित कीजिए। भुगतान संतुलन के घटक के रूप में चालू खाता और पूंजी खाता लेन-देन को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष किसी देश का भुगतान संतुलन उस देश के निवासियों द्वारा तथा अन्य देशों के निवासियों के मध्य एक निश्चित कालावधि में हुए सभी आर्थिक लेन-देन का एक व्यवस्थित अभिलेख है। यहाँ आर्थिक लेन देन वस्तुओं, सेवाओं और परिसंपत्तियों के प्रवाह से संबन्धित है। भुगतान संतुलन खाते में अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन की प्रविष्टियों के लिए यह आवश्यक होता है कि प्रत्येक व्यवहार भुगतान संतुलन के क्रेडिट और डेबिट पक्ष में सम्मिलित हो क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में किसी न किसी संपत्ति का परस्पर विनिमय होता है। इसी विनिमय को प्रदर्शित करने के लिए भुगतान संतुलन घाटे को घटकों में बांटा जाता है। भुगतान संतुलन के घटक: चालू खाता लेन-देन: वस्तुओं और सेवाओं का आयात निर्यात: इसमें सभी प्रकार की भौतिक वस्तुओं का निर्यात और आयात सम्मिलित है। इसमें दृश्य व्यापार भी सम्मिलित है। अदृश्य मदें: सेवाएँ: निवासियों द्वारा क्रय/विक्रय की गयी गैर-कारक सेवाएँ अंतर्निहित हैं जैसे- यात्रा, यातायात, सॉफ्टवेयर, प्रबंध की सेवाएँ आदि। एकपक्षीय हस्तांतरण: अन्य देशों में निवास कर रहे लोगों द्वारा अपने परिवारों के लिए किए जाने वाले नकद धन-प्रेषण को भी हस्तांतरण प्राप्तियों के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है। निवेश आय: देश के निवासियों द्वारा विदेशों में किए गए उनके निवेश प्राप्त होती है। पूंजी खाता लेन-देन: पूंजी खाता परिसंपत्तियों के वित्तीय और भौतिक रूप में परिवर्तन से संबन्धित सभी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक लेन-देन को अभिलेखित करती है। आरबीआई ने पूंजी खाते की विभिन्न मदों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया है: विदेशी निवेश: इसमें प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश शामिल है विदेशी सहायता और वाणिज्यिक ऋण गैर निवासियों द्वारा भारत के विदेशी बैंक शाखाओं में जमा धन मौद्रिक संचलन: आरबीआई मौद्रिक संचलन द्वारा BoP में हुए असंतुलन को पूरा करने का प्रयास करता है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं: आईएमएफ़ से भारतीय रुपये देकर विदेशी मुद्रा का क्रय। विदेशी मुद्रा भंडार जो स्वर्ण और एसडीआर के रूप में होता है। उल्लेखनीय है कि चालू खाते और पूंजी खाते में होने वाले सभी व्यवहार मिलकर भुगतान संतुलन व्यवहार प्रदर्शित करेंगे। जब विदेशों से प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य हमारे देश के निर्यात से अधिक होता है तो असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती है। इसे कम करने के लिए आयात-निर्यात नीतियों में सुधार किया जाता है। निर्यात को बढ़ावा देकर तथा को कम करने से इसमें संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
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##Question:भुगतान संतुलन की अवधारणा स्पष्ट करते हुए इसके विभिन्न घटकों की व्याख्या कीजिए। (10 अंक /150- 200 शब्द) Explain the concept of Balance of Payment (BoP) and describe its various components. (10 Marks/150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भुगतान संतुलन को परिभाषित कीजिए। भुगतान संतुलन के घटक के रूप में चालू खाता और पूंजी खाता लेन-देन को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष किसी देश का भुगतान संतुलन उस देश के निवासियों द्वारा तथा अन्य देशों के निवासियों के मध्य एक निश्चित कालावधि में हुए सभी आर्थिक लेन-देन का एक व्यवस्थित अभिलेख है। यहाँ आर्थिक लेन देन वस्तुओं, सेवाओं और परिसंपत्तियों के प्रवाह से संबन्धित है। भुगतान संतुलन खाते में अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन की प्रविष्टियों के लिए यह आवश्यक होता है कि प्रत्येक व्यवहार भुगतान संतुलन के क्रेडिट और डेबिट पक्ष में सम्मिलित हो क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में किसी न किसी संपत्ति का परस्पर विनिमय होता है। इसी विनिमय को प्रदर्शित करने के लिए भुगतान संतुलन घाटे को घटकों में बांटा जाता है। भुगतान संतुलन के घटक: चालू खाता लेन-देन: वस्तुओं और सेवाओं का आयात निर्यात: इसमें सभी प्रकार की भौतिक वस्तुओं का निर्यात और आयात सम्मिलित है। इसमें दृश्य व्यापार भी सम्मिलित है। अदृश्य मदें: सेवाएँ: निवासियों द्वारा क्रय/विक्रय की गयी गैर-कारक सेवाएँ अंतर्निहित हैं जैसे- यात्रा, यातायात, सॉफ्टवेयर, प्रबंध की सेवाएँ आदि। एकपक्षीय हस्तांतरण: अन्य देशों में निवास कर रहे लोगों द्वारा अपने परिवारों के लिए किए जाने वाले नकद धन-प्रेषण को भी हस्तांतरण प्राप्तियों के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है। निवेश आय: देश के निवासियों द्वारा विदेशों में किए गए उनके निवेश प्राप्त होती है। पूंजी खाता लेन-देन: पूंजी खाता परिसंपत्तियों के वित्तीय और भौतिक रूप में परिवर्तन से संबन्धित सभी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक लेन-देन को अभिलेखित करती है। आरबीआई ने पूंजी खाते की विभिन्न मदों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया है: विदेशी निवेश: इसमें प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश शामिल है विदेशी सहायता और वाणिज्यिक ऋण गैर निवासियों द्वारा भारत के विदेशी बैंक शाखाओं में जमा धन मौद्रिक संचलन: आरबीआई मौद्रिक संचलन द्वारा BoP में हुए असंतुलन को पूरा करने का प्रयास करता है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं: आईएमएफ़ से भारतीय रुपये देकर विदेशी मुद्रा का क्रय। विदेशी मुद्रा भंडार जो स्वर्ण और एसडीआर के रूप में होता है। उल्लेखनीय है कि चालू खाते और पूंजी खाते में होने वाले सभी व्यवहार मिलकर भुगतान संतुलन व्यवहार प्रदर्शित करेंगे। जब विदेशों से प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य हमारे देश के निर्यात से अधिक होता है तो असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती है। इसे कम करने के लिए आयात-निर्यात नीतियों में सुधार किया जाता है। निर्यात को बढ़ावा देकर तथा को कम करने से इसमें संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
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Discuss the concept and importance of Fundamental duties under Part IV A of the constitution. (150 words/10 marks)
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The 42nd amendment of 1976 added Article 51A to the constitution, which contained 10 Fundamental duties from Articles 51A(a) to 51A(j). These were added to the recommendations of the Swaran Singh committee , appointed by the then Indira Gandhi government. The 11th Fundamental Duty was added by the 86th constitutional amendment act of 2002. THE CONCEPT OF FUNDAMENTAL DUTIES BALANCE THE RIGHTS - The government introduced these duties during the time of the 1st internal emergency that India underwent (beginning on 25th June 1975), in order to make the citizens realise that they must also remember their duties towards the nation while demanding their rights. The idea was that rights and duties go hand-in-hand. NON-JUSTICIABLE - The Fundamental Duties are not enforceable through the courts. HAVE COERCIVE VALUE - Though the Fundamental Duties are not justiciable, this does not mean that they are not binding on the citizens. They have coercive value. They might be having compulsive and coercive values, ensuring compliance. They cannot be taken lightly. For example, respecting the flag is enforceable and binding through the Flag Code and the National Honours Act, which makes the violation of the former a punishable offence. [The 1st, 3rd, 5th, 7th and 9th Fundamental Duties have coercive value] BIJOY EMANUEL VERSUS STATE OF KERALA CASE - The national flags and anthem are not merely words/ symbols. They are crucial to the identity of India. In some cases like the Emanuel versus State of Kerala, 1973, the Supreme Court clarified that merely not remembering the national anthem cannot be construed as an insult to the national anthem. However, in other cases like the stopping of the singing of the national anthem or the stopping of the flag from being unfurled may be construed as an act of sedition. THE IMPORTANCE OF THE FUNDAMENTAL DUTIES THEY INSTILL IN US THE NATIONAL VALUES - Article 51A(a) states that citizens must respect and abide by their constitution, national flag and national anthem. 1.1) THE NAVEEN JINDAL CASE - The Supreme Court clarified that the national flag can be hoisted even by individuals, subject to following the rules and procedures, as provided by the flag code- which clearly states the method, the restrictions and the punishment for any violation.- as it is not only the government which has the right over a national flag or symbol. 1.2) Similarly, with respect to the national anthem, a fixed set of rules exist wrt the time duration, the place and the position of the person singing the national anthem (i.e. attention position). 1.3) Article 51A(b) stipulates that the citizens must cherish the noble ideals which inspired our freedom struggle. 2) PROMOTION OF THE SOVEREIGNTY, UNITY AND INTEGRITY OF INDIA In order to promote the sovereignty, unity and integrity of India, the citizens are expected not to do anything derogatory or against the sovereignty, unity and integrity of India. This is also promoted by Article 51A(c). 3) SERVICE OF THE NATION IN CONSONANCE WITH THE FUNDAMENTAL RIGHTS Article 51A(d) calls for defending the country and providing national services when called for. This is in consonance with Article 23 of the Fundamental Rights. As per our fundamental duty, every citizen must be ready for performing services towards the nation, whether in times of war or peace. 4) PROMOTES PEACE AND RESPECT FOR WOMEN The Fundamental duty given in Article 51A(e) compels the citizens to promote brotherhood and harmony, regardless of religious, linguistic and regional influences and not to do anything derogatory to women. 5) PROMOTES GROWTH Article 51A(e) motivates citizens to work hard and strive for excellence. Article 51A(k) also places a moral duty on parents/ guardians to send their children (between 6 and 14 years of age) to school. Therefore, the Fundamental Duties promote the overall growth of the citizens and the nations
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##Question:Discuss the concept and importance of Fundamental duties under Part IV A of the constitution. (150 words/10 marks)##Answer:The 42nd amendment of 1976 added Article 51A to the constitution, which contained 10 Fundamental duties from Articles 51A(a) to 51A(j). These were added to the recommendations of the Swaran Singh committee , appointed by the then Indira Gandhi government. The 11th Fundamental Duty was added by the 86th constitutional amendment act of 2002. THE CONCEPT OF FUNDAMENTAL DUTIES BALANCE THE RIGHTS - The government introduced these duties during the time of the 1st internal emergency that India underwent (beginning on 25th June 1975), in order to make the citizens realise that they must also remember their duties towards the nation while demanding their rights. The idea was that rights and duties go hand-in-hand. NON-JUSTICIABLE - The Fundamental Duties are not enforceable through the courts. HAVE COERCIVE VALUE - Though the Fundamental Duties are not justiciable, this does not mean that they are not binding on the citizens. They have coercive value. They might be having compulsive and coercive values, ensuring compliance. They cannot be taken lightly. For example, respecting the flag is enforceable and binding through the Flag Code and the National Honours Act, which makes the violation of the former a punishable offence. [The 1st, 3rd, 5th, 7th and 9th Fundamental Duties have coercive value] BIJOY EMANUEL VERSUS STATE OF KERALA CASE - The national flags and anthem are not merely words/ symbols. They are crucial to the identity of India. In some cases like the Emanuel versus State of Kerala, 1973, the Supreme Court clarified that merely not remembering the national anthem cannot be construed as an insult to the national anthem. However, in other cases like the stopping of the singing of the national anthem or the stopping of the flag from being unfurled may be construed as an act of sedition. THE IMPORTANCE OF THE FUNDAMENTAL DUTIES THEY INSTILL IN US THE NATIONAL VALUES - Article 51A(a) states that citizens must respect and abide by their constitution, national flag and national anthem. 1.1) THE NAVEEN JINDAL CASE - The Supreme Court clarified that the national flag can be hoisted even by individuals, subject to following the rules and procedures, as provided by the flag code- which clearly states the method, the restrictions and the punishment for any violation.- as it is not only the government which has the right over a national flag or symbol. 1.2) Similarly, with respect to the national anthem, a fixed set of rules exist wrt the time duration, the place and the position of the person singing the national anthem (i.e. attention position). 1.3) Article 51A(b) stipulates that the citizens must cherish the noble ideals which inspired our freedom struggle. 2) PROMOTION OF THE SOVEREIGNTY, UNITY AND INTEGRITY OF INDIA In order to promote the sovereignty, unity and integrity of India, the citizens are expected not to do anything derogatory or against the sovereignty, unity and integrity of India. This is also promoted by Article 51A(c). 3) SERVICE OF THE NATION IN CONSONANCE WITH THE FUNDAMENTAL RIGHTS Article 51A(d) calls for defending the country and providing national services when called for. This is in consonance with Article 23 of the Fundamental Rights. As per our fundamental duty, every citizen must be ready for performing services towards the nation, whether in times of war or peace. 4) PROMOTES PEACE AND RESPECT FOR WOMEN The Fundamental duty given in Article 51A(e) compels the citizens to promote brotherhood and harmony, regardless of religious, linguistic and regional influences and not to do anything derogatory to women. 5) PROMOTES GROWTH Article 51A(e) motivates citizens to work hard and strive for excellence. Article 51A(k) also places a moral duty on parents/ guardians to send their children (between 6 and 14 years of age) to school. Therefore, the Fundamental Duties promote the overall growth of the citizens and the nations
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भारतीय संदर्भ मे कृषि अर्थव्यवस्था का सामाजिक प्रणाली पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को स्पष्ट कीजिये । (150 -200 शब्द) In the Indian context, explain the various effects of the agricultural economy on the social system. (150 -200 words)
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अप्रोच :- कृषि अर्थव्यवस्था पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये । कृषि अर्थव्यवस्था का सामाजिक प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए । सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर प्रारूप :- भारत की लगभग आधी जनसंख्या कृषि क्षेत्र पर रोजगार के लिए निर्भर है तथा यह ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की आधारशिला है । ऐसे मे कृषि का महत्व स्वयं ही बढ़ जाता है । कृषि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कृषि व संबंधित क्षेत्रों को शामिल किया जाता है तथा उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्ठा का सबसे बड़ा घटक होता है तथा उद्योग व सेवा क्षेत्र का कुल मौद्रिक प्रतिशत कम होता है । कृषि अर्थव्यवस्था का सामाजिक प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभाव :- पृत्तसत्तात्त्मक व्यवस्था का विकास होना निम्न लिंगानुपात , कृषि क्षेत्रों की एक सामान्य परिणाम है , क्यूंकी कृषि कार्यों के लिए पुरुषों कोप्रधानता दी जाती है ,ऐसे मे कन्या भ्रूण हत्या , दहेज प्रथा आदि का व्यापक प्रभाव दिखता है जाति व्यवस्था का कठोर होना , क्यूंकी कृषि क्षेत्ररोजगार के सीमित अवसरों के कारण निम्न जाति के लोगों को अपने पारंपरिक रोजगार से अलग नए रोजगार की संभावना कम हो जाति है सं युक्त परिवारों की प्रधानता ,किन्तु वर्तमान मे भूमि के विखंडन के कारण इसका स्वरूप परिवारित हुआ है हरित क्रांति के बाद वृद्धों की तुलना मे युवाओं को प्रधानता मिली ,क्यूंकी हरित क्रांति के पश्चात कृषि मे नयी प्रौद्योगिकियों का प्रयोग बढ़ा है प्रवासन भीवर्तमान मे कृषि क्षेत्रों मे एक सामान्य विशेषता है जिससे ग्रामों से पुरुषों के पलायन से महिलाओं की कृषि कार्यों मे भूमिका बढ़ी है । कृषि क्षेत्र , किसी देश की अर्थव्यवस्था का आधार होता है तथा खाद्य सुरक्षा मे सहायक होता है । वर्तमान मे औद्योगिकीकरण के प्रभावों को संतुलित करते हुए कृषि क्षेत्र के समुचित विकास के प्रयास आवश्यक है । इसके साथ ही विकास के लाभों को ग्रामीण क्षेत्र तक पहुँचाते हुए सामाजिक समता स्थापित करने के प्रयास किए जाने चाइए ।
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##Question:भारतीय संदर्भ मे कृषि अर्थव्यवस्था का सामाजिक प्रणाली पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को स्पष्ट कीजिये । (150 -200 शब्द) In the Indian context, explain the various effects of the agricultural economy on the social system. (150 -200 words)##Answer:अप्रोच :- कृषि अर्थव्यवस्था पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये । कृषि अर्थव्यवस्था का सामाजिक प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए । सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर प्रारूप :- भारत की लगभग आधी जनसंख्या कृषि क्षेत्र पर रोजगार के लिए निर्भर है तथा यह ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की आधारशिला है । ऐसे मे कृषि का महत्व स्वयं ही बढ़ जाता है । कृषि अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कृषि व संबंधित क्षेत्रों को शामिल किया जाता है तथा उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्ठा का सबसे बड़ा घटक होता है तथा उद्योग व सेवा क्षेत्र का कुल मौद्रिक प्रतिशत कम होता है । कृषि अर्थव्यवस्था का सामाजिक प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभाव :- पृत्तसत्तात्त्मक व्यवस्था का विकास होना निम्न लिंगानुपात , कृषि क्षेत्रों की एक सामान्य परिणाम है , क्यूंकी कृषि कार्यों के लिए पुरुषों कोप्रधानता दी जाती है ,ऐसे मे कन्या भ्रूण हत्या , दहेज प्रथा आदि का व्यापक प्रभाव दिखता है जाति व्यवस्था का कठोर होना , क्यूंकी कृषि क्षेत्ररोजगार के सीमित अवसरों के कारण निम्न जाति के लोगों को अपने पारंपरिक रोजगार से अलग नए रोजगार की संभावना कम हो जाति है सं युक्त परिवारों की प्रधानता ,किन्तु वर्तमान मे भूमि के विखंडन के कारण इसका स्वरूप परिवारित हुआ है हरित क्रांति के बाद वृद्धों की तुलना मे युवाओं को प्रधानता मिली ,क्यूंकी हरित क्रांति के पश्चात कृषि मे नयी प्रौद्योगिकियों का प्रयोग बढ़ा है प्रवासन भीवर्तमान मे कृषि क्षेत्रों मे एक सामान्य विशेषता है जिससे ग्रामों से पुरुषों के पलायन से महिलाओं की कृषि कार्यों मे भूमिका बढ़ी है । कृषि क्षेत्र , किसी देश की अर्थव्यवस्था का आधार होता है तथा खाद्य सुरक्षा मे सहायक होता है । वर्तमान मे औद्योगिकीकरण के प्रभावों को संतुलित करते हुए कृषि क्षेत्र के समुचित विकास के प्रयास आवश्यक है । इसके साथ ही विकास के लाभों को ग्रामीण क्षेत्र तक पहुँचाते हुए सामाजिक समता स्थापित करने के प्रयास किए जाने चाइए ।
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विदेशी निवेश के विभिन्न मार्गों को स्पष्ट कीजिए तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लाभों और हानियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10) Explain the different routes of foreign investment and discuss the advantages and disadvantages of foreign direct investment. (150-200 words , marks -10 )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विदेशी निवेश की आवश्यकता बताते हुए एफ़डीआई को स्पष्ट कीजिए। विदेशी निवेश के विभिन्न मार्गों को स्पष्ट कीजिए। विदेशी निवेश के लाभ और हानियों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। भारत जैसे देश में संसाधनों के कुशल उपयोग हेतु विदेशी निवेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल हमारे आयात से उत्पन्न असंतुलन को संतुलित करता है बल्कि आंतरिक रूप से पूंजी निर्माण के लिए आधार प्रदान करता है। भारत जैसे देश में आर्थिक संवृद्धि के लिए वस्तुओं और सेवाओं का वैश्विक विनिमय अति आवश्यक है। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है। विदेशी निवेश के विभिन्न मार्ग: स्वचालित मार्ग: इसके माध्यम से जो विदेशी निवेश प्राप्त होता है उसके लिए सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है। विदेशी निवेशक को शेयर निर्गत होने के 30 दिन के भीतर आरबीआई की क्षेत्रीय शाखा को सूचित करना पड़ता है। सरकारी मार्ग: इस मार्ग से किए जाने वाले निवेश के अंतर्गत वित्त मंत्रालय द्वारा अनुमोदन के पश्चात एफ़डीआई प्रस्तावों पर विचार किया जाता है। वर्तमान में सुविधा पोर्टल बनाया गया है जिस पर निवेशक आवेदन आकर सकते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लाभ: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से घरेलू देश में भौतिक पूंजी निर्माण होगा जिसका अनुकूल प्रभाव उत्पादन, आय तथा रोजगार पर होगा। कर राजस्व में वृद्धि करता है। भुगतान संतुलन में सुधार के लिए आवश्यक है। विदेशी कम्पनियाँ पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधकीय एवं उद्यमिता दक्षताएं विपणन रणनीतियां आदि मेजबान देशों में आती हैं यह घरेलू कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करके प्रतिस्पर्द्धा बढाती है जो घरेलू कंपनियों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ने हेतु विवश कर देती है यह उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रकार की विस्तृत वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर उपलब्ध करती प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से हानियाँ: एफ़डीआई से घरेलू उद्योगों विशेषकर घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक संप्रभुता को चुनौती दे सकता है। भूमि की कीमतों में वृद्धि। यह आय की असमानता व क्षेत्रीय विषमता को बढ़ावा देता है। व्यापार में अनियमितता जैसे मामले भी सामने आए हैं जैसे- कर परिहार, डीडीटीए के संबंध में यह बड़ी मात्रा में विभिन्न स्रोतों जैसे कि लाभांश, रॉयलिटी, व्याज आदि के रूप में विदेशी पूंजी का निकास करता है। उपभोक्तावादी प्रकृति को बढ़ावा देता है। विज्ञापनों पर अधिक व्यय, कृत्रिम वस्तु विभेद आदि के कारण बचत एवं पूंजी निर्माण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार भारत जैसे देश में विदेशी पूंजी की प्राप्ति के लिए एफ़डीआई का सर्वाधिक महत्व है। विदेशी निवेश की प्रकृति के आधार पर स्वचालित और सरकारी मार्ग अपनाया जाता है। इसके माध्यम से प्राप्त एफ़डीआई से तकनीकी विकास, रोजगार में वृद्धि, पूंजी निर्माण जैसे लाभ प्राप्त हुए हैं हालांकि असमानता, घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव, उपभोक्तावादी संस्कृति जैसी हानियाँ भी हुई हैं।
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##Question:विदेशी निवेश के विभिन्न मार्गों को स्पष्ट कीजिए तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लाभों और हानियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10) Explain the different routes of foreign investment and discuss the advantages and disadvantages of foreign direct investment. (150-200 words , marks -10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विदेशी निवेश की आवश्यकता बताते हुए एफ़डीआई को स्पष्ट कीजिए। विदेशी निवेश के विभिन्न मार्गों को स्पष्ट कीजिए। विदेशी निवेश के लाभ और हानियों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। भारत जैसे देश में संसाधनों के कुशल उपयोग हेतु विदेशी निवेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल हमारे आयात से उत्पन्न असंतुलन को संतुलित करता है बल्कि आंतरिक रूप से पूंजी निर्माण के लिए आधार प्रदान करता है। भारत जैसे देश में आर्थिक संवृद्धि के लिए वस्तुओं और सेवाओं का वैश्विक विनिमय अति आवश्यक है। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है। विदेशी निवेश के विभिन्न मार्ग: स्वचालित मार्ग: इसके माध्यम से जो विदेशी निवेश प्राप्त होता है उसके लिए सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है। विदेशी निवेशक को शेयर निर्गत होने के 30 दिन के भीतर आरबीआई की क्षेत्रीय शाखा को सूचित करना पड़ता है। सरकारी मार्ग: इस मार्ग से किए जाने वाले निवेश के अंतर्गत वित्त मंत्रालय द्वारा अनुमोदन के पश्चात एफ़डीआई प्रस्तावों पर विचार किया जाता है। वर्तमान में सुविधा पोर्टल बनाया गया है जिस पर निवेशक आवेदन आकर सकते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लाभ: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से घरेलू देश में भौतिक पूंजी निर्माण होगा जिसका अनुकूल प्रभाव उत्पादन, आय तथा रोजगार पर होगा। कर राजस्व में वृद्धि करता है। भुगतान संतुलन में सुधार के लिए आवश्यक है। विदेशी कम्पनियाँ पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधकीय एवं उद्यमिता दक्षताएं विपणन रणनीतियां आदि मेजबान देशों में आती हैं यह घरेलू कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त करके प्रतिस्पर्द्धा बढाती है जो घरेलू कंपनियों को अपनी कार्यकुशलता बढ़ने हेतु विवश कर देती है यह उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रकार की विस्तृत वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रतिस्पर्द्धी मूल्य पर उपलब्ध करती प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से हानियाँ: एफ़डीआई से घरेलू उद्योगों विशेषकर घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक संप्रभुता को चुनौती दे सकता है। भूमि की कीमतों में वृद्धि। यह आय की असमानता व क्षेत्रीय विषमता को बढ़ावा देता है। व्यापार में अनियमितता जैसे मामले भी सामने आए हैं जैसे- कर परिहार, डीडीटीए के संबंध में यह बड़ी मात्रा में विभिन्न स्रोतों जैसे कि लाभांश, रॉयलिटी, व्याज आदि के रूप में विदेशी पूंजी का निकास करता है। उपभोक्तावादी प्रकृति को बढ़ावा देता है। विज्ञापनों पर अधिक व्यय, कृत्रिम वस्तु विभेद आदि के कारण बचत एवं पूंजी निर्माण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार भारत जैसे देश में विदेशी पूंजी की प्राप्ति के लिए एफ़डीआई का सर्वाधिक महत्व है। विदेशी निवेश की प्रकृति के आधार पर स्वचालित और सरकारी मार्ग अपनाया जाता है। इसके माध्यम से प्राप्त एफ़डीआई से तकनीकी विकास, रोजगार में वृद्धि, पूंजी निर्माण जैसे लाभ प्राप्त हुए हैं हालांकि असमानता, घरेलू उद्योगों पर दुष्प्रभाव, उपभोक्तावादी संस्कृति जैसी हानियाँ भी हुई हैं।
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भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन विविध कारक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अंतर्प्रवाह को बाधित करते हैं। टिप्पणी कीजिए। (150- 200 शब्द) Foreign direct investment (FDI) can play an important role in the socio-economic development of India but various factors hinders the direct foreign investment inflow. Comment. (150- 200 words)
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दृष्टिकोण- 1- भूमिका में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सामाजिक-आर्थिक विकास में FDI की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में FDI अंतर्प्रवाह को बाधित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में निष्कर्ष के रूप में बाधाओं का समाधान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेशप्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI) कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की जिस कम्पनी में निवेश किया गया है उसके प्रबंधन में कुछ हिस्सा प्राप्त हो जाता है| किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10प्रतिशत शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है| किसी भी अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश दो प्रकार से किया जा सकता है यथा; दूसरे देश में एक नई कम्पनी की स्थापना करके प्रायः इसे ही FDI के रूप में जाना जाता है और किसी विदेशी कंपनी के शेयर/प्रतिभूति क्रय करके या उसके स्वामित्व वाले विदेशी कंपनी का अधिग्रहण करके| प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है| सामाजिक-आर्थिक विकास में भूमिका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI) वांछित निवेश और घरेलू स्तर पर एकत्रित बचत के बीच के अंतराल को भर सकता है अर्थात प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माध्यम से किसी अर्थव्यवस्था का पूँजी अंतराल समाप्त होता है| इससे अर्थव्यवस्था में पूँजी निर्माण बढ़ता है| प्रायः FDI अपने साथ नई और आधुनिक तकनीकी/प्रौद्योगिकी भी लाते हैं| FDI का यह गुण अर्थव्यवस्था के तकनीकी उन्नयन में सहायक होता है जिससे अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होती है| FDI का उन क्षेत्रों में निवेश होता है जो अन्य उद्योगों को आवश्यक समर्थन प्रदान करते हैं, इससे देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है| अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होने से FDI प्राप्त करने वाले देशों की निर्यात क्षमता बढती है| और इस प्रकार देशों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में भी वृद्धि होती है| किसी अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त पूँजी के रूप में FDI का निवेश आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाता है जिससे विनिर्माण आदि क्षेत्रकों का विकास होता है और इसके परिणामस्वरुप अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन होता है| अर्थव्यवस्था में पर्याप्त एवं वांछित मात्रा में रोजगार सृजन से गरीबी एवं क्षेत्रीय असमानताओं में कमी आती है और सामान्य जीवन स्तर में सुधार आता है| इस तरह से स्पष्ट होता है की किसी भी अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है किन्तु विविध कारक FDI अंतर्प्रवाह को बाधित करते हैं| FDI अंतर्प्रवाह के बाधक का भारत में कठोर श्रम बाजार/कानून FDI को हतोत्साहित करते हैं| कठोर श्रम कानून निवेशकों पर विभिन्न प्रतिबद्धताएं आरोपित करते हैं जिससे निवेशकों का हतोत्साहन होता है और FDI अंतर्प्रवाह बाधित होता है| भारत में विविध नौकरशाही बाधाएं FDI अंतर्प्रवाह को बाधित करती हैं| नौकरशाही का औपनिवेशिक चरित्र, विशेषज्ञता का अभाव, लालफीताशाही, प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी आदि सीमाएं FDI निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं और FDI अंतर्प्रवाह बाधित होता है| भारत जैसे देशों में FDI के माध्यम से स्थापित होते वाली परियोजना की स्वीकृति में विलम्ब होता है| इससे निवेशक की कारक लागत बढती जाती है और उसको हानि हो सकती है| इससे निवेशक निवेश के सन्दर्भ में हतोत्साहित होता है और FDI अंतर्प्रवाह बाधित होता है| उपरोक्त बाधाओं के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था का कमजोर बुनियादी ढांचा भी FDI अंतर्प्रवाह बाधित करता है|कमजोर बुनियादी ढांचा निवेशकों की कारक लागत में वृद्धि करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि किसी भी अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक विकास लिए FDI एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन विविध कारणों से अर्थव्यवस्था में FDI का अंतर्प्रवाह बाधित होता है| अर्थव्यवस्था के सुचारू संचालन एवं सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए FDI अंतर्प्रवाह को बढाने की आवश्यकता है| इस संदर्भ में श्रम कानून सुधार, प्रशासन का डिजिटलीकरण, विभागीय समन्वय, एकल खिड़की व्यवस्था और अवसंरचना विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है|
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##Question:भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन विविध कारक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अंतर्प्रवाह को बाधित करते हैं। टिप्पणी कीजिए। (150- 200 शब्द) Foreign direct investment (FDI) can play an important role in the socio-economic development of India but various factors hinders the direct foreign investment inflow. Comment. (150- 200 words)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सामाजिक-आर्थिक विकास में FDI की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में FDI अंतर्प्रवाह को बाधित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में निष्कर्ष के रूप में बाधाओं का समाधान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेशप्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI) कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की जिस कम्पनी में निवेश किया गया है उसके प्रबंधन में कुछ हिस्सा प्राप्त हो जाता है| किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10प्रतिशत शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है| किसी भी अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश दो प्रकार से किया जा सकता है यथा; दूसरे देश में एक नई कम्पनी की स्थापना करके प्रायः इसे ही FDI के रूप में जाना जाता है और किसी विदेशी कंपनी के शेयर/प्रतिभूति क्रय करके या उसके स्वामित्व वाले विदेशी कंपनी का अधिग्रहण करके| प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है| सामाजिक-आर्थिक विकास में भूमिका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI) वांछित निवेश और घरेलू स्तर पर एकत्रित बचत के बीच के अंतराल को भर सकता है अर्थात प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माध्यम से किसी अर्थव्यवस्था का पूँजी अंतराल समाप्त होता है| इससे अर्थव्यवस्था में पूँजी निर्माण बढ़ता है| प्रायः FDI अपने साथ नई और आधुनिक तकनीकी/प्रौद्योगिकी भी लाते हैं| FDI का यह गुण अर्थव्यवस्था के तकनीकी उन्नयन में सहायक होता है जिससे अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होती है| FDI का उन क्षेत्रों में निवेश होता है जो अन्य उद्योगों को आवश्यक समर्थन प्रदान करते हैं, इससे देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है| अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होने से FDI प्राप्त करने वाले देशों की निर्यात क्षमता बढती है| और इस प्रकार देशों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में भी वृद्धि होती है| किसी अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त पूँजी के रूप में FDI का निवेश आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाता है जिससे विनिर्माण आदि क्षेत्रकों का विकास होता है और इसके परिणामस्वरुप अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन होता है| अर्थव्यवस्था में पर्याप्त एवं वांछित मात्रा में रोजगार सृजन से गरीबी एवं क्षेत्रीय असमानताओं में कमी आती है और सामान्य जीवन स्तर में सुधार आता है| इस तरह से स्पष्ट होता है की किसी भी अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है किन्तु विविध कारक FDI अंतर्प्रवाह को बाधित करते हैं| FDI अंतर्प्रवाह के बाधक का भारत में कठोर श्रम बाजार/कानून FDI को हतोत्साहित करते हैं| कठोर श्रम कानून निवेशकों पर विभिन्न प्रतिबद्धताएं आरोपित करते हैं जिससे निवेशकों का हतोत्साहन होता है और FDI अंतर्प्रवाह बाधित होता है| भारत में विविध नौकरशाही बाधाएं FDI अंतर्प्रवाह को बाधित करती हैं| नौकरशाही का औपनिवेशिक चरित्र, विशेषज्ञता का अभाव, लालफीताशाही, प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी आदि सीमाएं FDI निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं और FDI अंतर्प्रवाह बाधित होता है| भारत जैसे देशों में FDI के माध्यम से स्थापित होते वाली परियोजना की स्वीकृति में विलम्ब होता है| इससे निवेशक की कारक लागत बढती जाती है और उसको हानि हो सकती है| इससे निवेशक निवेश के सन्दर्भ में हतोत्साहित होता है और FDI अंतर्प्रवाह बाधित होता है| उपरोक्त बाधाओं के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था का कमजोर बुनियादी ढांचा भी FDI अंतर्प्रवाह बाधित करता है|कमजोर बुनियादी ढांचा निवेशकों की कारक लागत में वृद्धि करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि किसी भी अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक विकास लिए FDI एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन विविध कारणों से अर्थव्यवस्था में FDI का अंतर्प्रवाह बाधित होता है| अर्थव्यवस्था के सुचारू संचालन एवं सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए FDI अंतर्प्रवाह को बढाने की आवश्यकता है| इस संदर्भ में श्रम कानून सुधार, प्रशासन का डिजिटलीकरण, विभागीय समन्वय, एकल खिड़की व्यवस्था और अवसंरचना विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है|
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Explain theclemency powersof the President. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE FEATURES OF THE CLEMEMCY POWERS OF THE PRESIDENT -THE TYPES OF CLEMENCY POWERS WITH THE PRESIDENT -CONCLUSION Answer Article 72 deals with the clemency powers of the President. A mercy petition can be filled to the President for granting pardon for an allegedly committed crime. THE FEATURES OF SUCH CLEMENCY POWERS 1) AT ANY STAGE OF JUDICIAL PROCEEDINGS The President can be appealed for clemency at any stage of the on-going judicial process. 2) UNREASONED MERCY The clemency powers of the President are understood under the judicial powers of the President. However, the term ‘judicial powers’ is a misnomer here, as the powers in this light run parallel to the judicial power of the courts. This is to say that, as judicial pronouncements are to be reasoned, the clemency powers of the President do not require the specifications of any reason(s) by the President. Therefore, it is an extra-judicial process. 3) RELATION WITH RESPECT TO THE ORDER OF THE COURT The decision of the President is independent from that of the order (conviction and sentence) of the court. It is not understood as mercy/ appeal against the order of the court. 4) SOURCE These powers have been derived from the royal orders of pardon (in England). 5) POWERS WITH THE PRESIDENT The President has the power to call for judicial records, be informed about the type of case that is being dealt with. However, he is not required to examine the records judicially or via the court processes. 5.1) The President can use his powers of clemency even in the case of court martial. 6) SUDHAKAR VERSUS STATE OF ANDHRA PRADESH, 2006 In this case, it was provided that Article 72 (as well as Article 161) is not violative of the Rule of Law. 7) KEHAR SINGH VERSUS UNION OF INDIA, 1989 The Supreme Court stated that Article 21 (life with choice and dignity) will be ensured until the last breath of one’s life. Certain guidelines were given- a minimum of 45 days from the date of the sentence till the actual date of execution (hanging), so that he can say his goodbyes. 8) SHATRUGAN CHAUHAN VERSUS UNION OF INDIA, 2014 The Supreme Court observed and analysed the Kehar Singh case and decided that although no time limit has been prescribed within which the President (or Governor) must decide the mercy petition under Article 72 (and 161), however, a reasonable time line must be followed in keeping with the spirit of Article 21 i.e. living with choice and dignity. Therefore, the courts can review and analyse the reasonableness of the procedure, the transparency of the process and any violation of the constitution, if at all, under Article 71 (and 161) THE TYPES OF CLEMENCY POWERS WITH THE PRESIDENT 1) REPRIEVE The execution of the sentence is delayed here. It is delayed for giving time for filing for mercy petitions on the other grounds, or on humanitarian grounds. 2) REMIT The sentence is reduced by a fixed number of years, without changing the character of the punishment. 3) RESPITE This is for special circumstances like old age and good conduct, pregnancy etc. 4) COMMUTATE Here the character of the punishment is changed. It is mostly from death sentence to life imprisonment. 5) PARDON In this, complete pardon/ forgiveness is given to the accused and he is set free. It is in the interest of the state that the pardoning powers be granted to the Executive to be exercised in exceptional circumstances. Due to the above mentioned Supreme Court cases and intervention, a fine balance has been ensured between Article 71 (and 161) and Article 21.
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##Question:Explain theclemency powersof the President. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE FEATURES OF THE CLEMEMCY POWERS OF THE PRESIDENT -THE TYPES OF CLEMENCY POWERS WITH THE PRESIDENT -CONCLUSION Answer Article 72 deals with the clemency powers of the President. A mercy petition can be filled to the President for granting pardon for an allegedly committed crime. THE FEATURES OF SUCH CLEMENCY POWERS 1) AT ANY STAGE OF JUDICIAL PROCEEDINGS The President can be appealed for clemency at any stage of the on-going judicial process. 2) UNREASONED MERCY The clemency powers of the President are understood under the judicial powers of the President. However, the term ‘judicial powers’ is a misnomer here, as the powers in this light run parallel to the judicial power of the courts. This is to say that, as judicial pronouncements are to be reasoned, the clemency powers of the President do not require the specifications of any reason(s) by the President. Therefore, it is an extra-judicial process. 3) RELATION WITH RESPECT TO THE ORDER OF THE COURT The decision of the President is independent from that of the order (conviction and sentence) of the court. It is not understood as mercy/ appeal against the order of the court. 4) SOURCE These powers have been derived from the royal orders of pardon (in England). 5) POWERS WITH THE PRESIDENT The President has the power to call for judicial records, be informed about the type of case that is being dealt with. However, he is not required to examine the records judicially or via the court processes. 5.1) The President can use his powers of clemency even in the case of court martial. 6) SUDHAKAR VERSUS STATE OF ANDHRA PRADESH, 2006 In this case, it was provided that Article 72 (as well as Article 161) is not violative of the Rule of Law. 7) KEHAR SINGH VERSUS UNION OF INDIA, 1989 The Supreme Court stated that Article 21 (life with choice and dignity) will be ensured until the last breath of one’s life. Certain guidelines were given- a minimum of 45 days from the date of the sentence till the actual date of execution (hanging), so that he can say his goodbyes. 8) SHATRUGAN CHAUHAN VERSUS UNION OF INDIA, 2014 The Supreme Court observed and analysed the Kehar Singh case and decided that although no time limit has been prescribed within which the President (or Governor) must decide the mercy petition under Article 72 (and 161), however, a reasonable time line must be followed in keeping with the spirit of Article 21 i.e. living with choice and dignity. Therefore, the courts can review and analyse the reasonableness of the procedure, the transparency of the process and any violation of the constitution, if at all, under Article 71 (and 161) THE TYPES OF CLEMENCY POWERS WITH THE PRESIDENT 1) REPRIEVE The execution of the sentence is delayed here. It is delayed for giving time for filing for mercy petitions on the other grounds, or on humanitarian grounds. 2) REMIT The sentence is reduced by a fixed number of years, without changing the character of the punishment. 3) RESPITE This is for special circumstances like old age and good conduct, pregnancy etc. 4) COMMUTATE Here the character of the punishment is changed. It is mostly from death sentence to life imprisonment. 5) PARDON In this, complete pardon/ forgiveness is given to the accused and he is set free. It is in the interest of the state that the pardoning powers be granted to the Executive to be exercised in exceptional circumstances. Due to the above mentioned Supreme Court cases and intervention, a fine balance has been ensured between Article 71 (and 161) and Article 21.
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कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में संसदीय वितीय समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| इस सन्दर्भ में लोक लेखा समिति के कार्यों का मूल्यांकन कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Parliamentary Financial Committees play an important role in establishing parliamentary control over the executive. Evaluate the work of the Public Accounts Committee in this context. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण की जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में लोक लेखा समिति(PAC) की संक्षिप्त सूचना दीजिये| 3- दूसरे भाग में समिति के कार्य बताते हुए कार्यों का मूल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये| कार्यों की अधिकता और समयाभाव के कारण विधायिका प्रदत्त विधायन के द्वारा कार्यपालिका के माध्यम से सामान्य प्रशासन का संचालन करती है| कार्यपालिका निर्धारित अनुबंधों के अनुरूप कार्य करती रहे इसके लिए कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण आवश्यक होता है| भारतीय संसद द्वारा कार्यपालिका पर वित्तीय नियन्त्रण स्थापित करने के लिए बजटीय प्रक्रिया तथा संसदीय समितियों का उपयोग करती है| संसदीय समिति से तात्पर्य उस समिति से है, जो संसद के सदनों द्वारा नियुक्त या निर्वाचित की जाती है| संसदीय समितियों में संसद की वितीय समितियां कार्यपालिका पर संसद के वित्तीय नियंत्रण को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान करती हैं| वित्तीय समितियों में लोकलेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजानिक उपक्रम समिति विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं| भारत में लोक लेखा समिति की स्थापना सर्वप्रथम 1921 में 1919 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत हुई थी और तब से ही अस्तित्व में है| वर्तमान में इसके 22 सदस्य हैं (15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा से)| इन सदस्यों का चुनाव प्रत्येक वर्ष एकल हस्तांतरणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार सांसदों में से किया जाता है| इन सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष होता है । कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता| इसके निम्नलिखित कार्य होते हैं- · सरकार ने विभिन्न मदों पर जो खर्च किया है अथवा लोक सभा के द्वारा प्रदत्त अधिकार के आधार पर भारत की समेकिन/संचित निधि पर जो विनियोग किया है उसका परीक्षण करना(यह कैग की रिपोर्ट पर आधारित होता है) · यह समिति इस बात का भी परिक्षण करती है कि विधिक रूप से जो धन जिस मद के लिए आवंटित किया गया था, उसी पर खर्च किया गया है या नहीं · पुनःविनियोजन का परीक्षण करना इसके साथ ही लेखा कथन जिसमें सरकार की आय और व्यय दोनों का ब्योरा रहता है(सरकारी निगमों, व्यापार इत्यादि) का परीक्षण करना · यह सरकार के लेखा कथन जिसमें स्वायत्त तथा अर्ध-स्वायत्त निकायों के आय व्यय के ब्योरे का परीक्षण करना(स्वायत्त निकाय अथवा अर्ध-स्वायत्त निकाय में प्रायः विनियामक संस्थाएं आती हैं जैसे TRAI,IRDA आदि) · यह राष्ट्रपति के निर्देशानुसार सरकार के स्टॉक तथा स्टोर की प्राप्तियों एवं व्यय के लेखा परीक्षण पर भी विचार करती है| और इस प्रकार लोक लेखा समिति कार्यपालिका पर विधायिका के वित्तीय नियंत्रण को सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाती है किन्तु समिति की कुछ सीमाएं भी हैं जो निम्नलिखित हैं- · यह समिति कैग की रिपोर्ट का परीक्षण करती है जिसे पोस्ट मार्टम लेखा कहते हैं · इस समिति की अधिकाँश बैठकें अकेले में होती हैं अर्थात जनता और प्रेस को इससे दूर रखा जाता है · यह मंत्रालयों अथवा विभागों के आंतरिक प्रशासन से सम्बन्धित कोई मामले नही देख सकती| लोक लेखा समिति की ये सीमाएं इसकी प्रभाविता को कमजोर करती हैं| फिर भी लोकलेखा समिति करदाताओं और सरकार के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाती है| यदि इस समिति को सरकार के किसी लेन-देन पर कोई शक है तो वहकिसी भी मंत्रीको समिति के समक्ष बुला कर उससे प्रश्न पूछ सकती है,यह समिति सरकारी फाइलों को मंगा कर उनका परीक्षण कर सकती है| समिति आवश्यकता के अनुसार गवाहों को बुला सकती है और उनसे प्रश्न पूछ सकती है| इस प्रकार संसद की यही एक मात्र ऐसी समिति है जिसे अर्द्ध-न्यायिक निकाय का दर्जा प्राप्त है|इस तरह PAC को व्यापक अधिदेश प्राप्त हैं जिनके माध्यम से यह कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
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##Question:कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में संसदीय वितीय समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| इस सन्दर्भ में लोक लेखा समिति के कार्यों का मूल्यांकन कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Parliamentary Financial Committees play an important role in establishing parliamentary control over the executive. Evaluate the work of the Public Accounts Committee in this context. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण की जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में लोक लेखा समिति(PAC) की संक्षिप्त सूचना दीजिये| 3- दूसरे भाग में समिति के कार्य बताते हुए कार्यों का मूल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये| कार्यों की अधिकता और समयाभाव के कारण विधायिका प्रदत्त विधायन के द्वारा कार्यपालिका के माध्यम से सामान्य प्रशासन का संचालन करती है| कार्यपालिका निर्धारित अनुबंधों के अनुरूप कार्य करती रहे इसके लिए कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण आवश्यक होता है| भारतीय संसद द्वारा कार्यपालिका पर वित्तीय नियन्त्रण स्थापित करने के लिए बजटीय प्रक्रिया तथा संसदीय समितियों का उपयोग करती है| संसदीय समिति से तात्पर्य उस समिति से है, जो संसद के सदनों द्वारा नियुक्त या निर्वाचित की जाती है| संसदीय समितियों में संसद की वितीय समितियां कार्यपालिका पर संसद के वित्तीय नियंत्रण को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान करती हैं| वित्तीय समितियों में लोकलेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजानिक उपक्रम समिति विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं| भारत में लोक लेखा समिति की स्थापना सर्वप्रथम 1921 में 1919 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत हुई थी और तब से ही अस्तित्व में है| वर्तमान में इसके 22 सदस्य हैं (15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा से)| इन सदस्यों का चुनाव प्रत्येक वर्ष एकल हस्तांतरणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार सांसदों में से किया जाता है| इन सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष होता है । कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता| इसके निम्नलिखित कार्य होते हैं- · सरकार ने विभिन्न मदों पर जो खर्च किया है अथवा लोक सभा के द्वारा प्रदत्त अधिकार के आधार पर भारत की समेकिन/संचित निधि पर जो विनियोग किया है उसका परीक्षण करना(यह कैग की रिपोर्ट पर आधारित होता है) · यह समिति इस बात का भी परिक्षण करती है कि विधिक रूप से जो धन जिस मद के लिए आवंटित किया गया था, उसी पर खर्च किया गया है या नहीं · पुनःविनियोजन का परीक्षण करना इसके साथ ही लेखा कथन जिसमें सरकार की आय और व्यय दोनों का ब्योरा रहता है(सरकारी निगमों, व्यापार इत्यादि) का परीक्षण करना · यह सरकार के लेखा कथन जिसमें स्वायत्त तथा अर्ध-स्वायत्त निकायों के आय व्यय के ब्योरे का परीक्षण करना(स्वायत्त निकाय अथवा अर्ध-स्वायत्त निकाय में प्रायः विनियामक संस्थाएं आती हैं जैसे TRAI,IRDA आदि) · यह राष्ट्रपति के निर्देशानुसार सरकार के स्टॉक तथा स्टोर की प्राप्तियों एवं व्यय के लेखा परीक्षण पर भी विचार करती है| और इस प्रकार लोक लेखा समिति कार्यपालिका पर विधायिका के वित्तीय नियंत्रण को सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाती है किन्तु समिति की कुछ सीमाएं भी हैं जो निम्नलिखित हैं- · यह समिति कैग की रिपोर्ट का परीक्षण करती है जिसे पोस्ट मार्टम लेखा कहते हैं · इस समिति की अधिकाँश बैठकें अकेले में होती हैं अर्थात जनता और प्रेस को इससे दूर रखा जाता है · यह मंत्रालयों अथवा विभागों के आंतरिक प्रशासन से सम्बन्धित कोई मामले नही देख सकती| लोक लेखा समिति की ये सीमाएं इसकी प्रभाविता को कमजोर करती हैं| फिर भी लोकलेखा समिति करदाताओं और सरकार के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाती है| यदि इस समिति को सरकार के किसी लेन-देन पर कोई शक है तो वहकिसी भी मंत्रीको समिति के समक्ष बुला कर उससे प्रश्न पूछ सकती है,यह समिति सरकारी फाइलों को मंगा कर उनका परीक्षण कर सकती है| समिति आवश्यकता के अनुसार गवाहों को बुला सकती है और उनसे प्रश्न पूछ सकती है| इस प्रकार संसद की यही एक मात्र ऐसी समिति है जिसे अर्द्ध-न्यायिक निकाय का दर्जा प्राप्त है|इस तरह PAC को व्यापक अधिदेश प्राप्त हैं जिनके माध्यम से यह कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
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पृथ्वी की आंतरिक संरचना को परिभाषित कीजिये। इसके साथ ही पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों का सविस्तार वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Define the internal structure of the earth. Simultaneously, describe the sources of study of the internal structure of the Earth. (150 -200 words/ 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृथ्वी की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों का सविस्तार वर्णन कीजिये 3- अंतिम में आंतरिक संरचना के अध्ययन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाह्य रूप से पृथ्वी गोलाभ की आकृति में हैं किन्तु आंतरिक रूप से यह कई स्तरों में विभाजित है| पृथ्वी की आंतरिक संरचना के तीन मुख्य स्तर हैं| सबसे ऊपरी सतह को भूपर्पटी (Crust) कहा जाता है , मध्य स्तर को मैंटल (mantle) कहते हैं और आंतरिक स्तर धात्विक क्रोड (Core) कहलाता है| भूपर्पटी अथवा क्रस्ट की मोटाई 8 से 40 किमी मानी जाती है| पृथ्वी पर महासागर और महाद्वीप केवल इसी भाग में स्थित हैं| इसके बाद मैंटल की मोटाई लगभग 2895 किमी. है। यह अर्धगलित अवस्था में है| इसके बाद क्रोड़ का क्षेत्र है जो आंतरिक तौर पर ठोस एवं बाह्य तौर पर द्रवित अवस्था में है| इन परतों के मध्य संक्रमण क्षेत्र के रूप में मोहोरोविक या गुटेनबर्ग जैसी असंबद्धतायें उपस्थित हैं| पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी आंतरिक ऊर्जा के स्रोत तथा उससे होने वाले परिणाम की समझ देता है, परन्तु इसकी जानकारी के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण नही हैं| इससे जानकारी अपेक्षाकृत अधूरी है और इसके होने वाले परिणाम जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प, प्लेट विवर्तनिकी आदि को आज भी बेहतर रूप से समझा नही जा सका है| इस अधूरी जानकारी का सबसे बड़ा कारण यह है कि मानव तथा उसके द्वारा निर्मित मशीनों की प्रत्यक्ष पहुच पृथ्वी के आंतरिक भाग में नही हो पाती है| सबसे गहरी खान भी 20 किमी से कम है जबकि पृथ्वी की त्रिज्या 6400 किमी के लगभग है| परिणाम स्वरुप इसकी जानकारी के लिए हमे अप्रत्यक्ष स्रोतों पर निभर होना पड़ता है जो निम्नलिखित हैं- आंतरिक संरचना को जानने के स्रोत पृथ्वी के भौतिक स्थिति एवं गुणों का अध्ययन · इसमें मुख्य रूप से तापमान, दाब तथा घनत्व का अध्ययन किया जाता है, · पृथ्वी में 32 मीटर की गहराई में जाने पर 1 डिग्री तापमान बढ़ता है इससे अनुमान लगाया जाता है की आंतरिक भाग का तापमान 6 हजार डिग्री के लगभग होगा · पृथ्वी के आंतरिक भाग में 100 से 200 किमी की गहराई पर तापमान बहुत अधिक होता है जिसकी व्याख्या दाब एवं तापमान के सम्बन्ध से नही की जा सकती है अर्थात इसका कोई अन्य कारण होगा|इस क्षेत्र में अत्यधिक तापमान की उपस्थिति की व्याख्या के लिये वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र में रेडियो सक्रिय तत्वों की प्रचुरता होगी जिससे ऊर्जा उत्सर्जन के कारण इस क्षेत्र का तापमान इतना अधिक होगा अर्थात यह रेडियो जनित उष्मा है न की दाब का प्रभाव| इसे ही ज्वालामुखी के उत्पन्न होने का कारण माना जाता है| ज्वालामुखी से आने वाले लावे से स्पष्ट होता है की पर्पटी के नीचे का भाग अर्धगलित अवस्था में है| · प्लेट विवर्तनिकी के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उपरी परत के नीचे का भाग तरल रूप में · पृथ्वी के आंतरिक भाग में घनत्व बढ़ता जाता है| वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि पृथ्वी के आंतरिक भाग में इतना अधिक घनत्व केवल दाब के कारण संभव नही है अर्थात यहाँ पर इस प्रकार के अधिक घनत्व वाले तत्वों का जमाव होगा जो इस स्तर(क्रोड़ में 17 तक) तक बढ़ा देता है| पृथ्वी में पायी जाने वाली अत्यधिक घनत्व वाले तत्वों में सबसे अधिक मात्रा में निकिल तथा लोहा पाया जाता है|इसके अतिरिक्त उल्काश्म के अध्ययन से भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ पर निकिल तथा लोहे की प्रचुरता होगी उल्काश्मों का(meteors) अध्ययन · पृथ्वी के वायुमंडल तंत्र में प्रवेश करने वाले किसी भी ठोस पदार्थ को उल्कापिंड कहा जाता है| ऐसा माना जाता है की उल्काश्म की संरचना पृथ्वी के सामान है| · उल्काश्म के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है की उसके आंतरिक भाग अर्थात क्रोड़ में निकिल तथा लोहे की प्रचुरता पायी जाती है जो यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी का आंतरिक भाग भी ऐसा ही होगा| · उल्काश्म केवल पृथ्वी के आंतरिक भाग जानकारी दे पाते हैं क्योंकि उसका उपरी भाग वायुमंडल में विस्फोट के द्वारा विखंडित अथवा जल जाता है| भूकम्प विज्ञान · भूकंपीय तरंगों के वैज्ञानिक अध्ययन से जो साक्ष्य मिले हैं वो अब तक के सबसे मान्य साक्ष्य माने जाते हैं क्योंकि ये धरातल से लेकर पृथ्वी के आंतरिक भाग तक के संभावित संघटन की वैज्ञानिक व्याख्या करता है| भूकम्पीय तरंगे मुख्यतः 3 प्रकार की होती है यथा P, S एवं L, · P एवं S पृथ्वी के आंतरिक भाग में प्रवेश करती हैं अर्थात केंद्र से चारों ओर जाती हैं इसीलिए इन दोनों को शारीरिक तरंगे भी कहते हैं तथा पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी मुख्यतः इन्ही दोनों तरंगों से मिलती है| · P तरंग तीनों माध्यमों ठोस, तरल एवं गैस से पार कर जाती है परन्तु माध्यम बदलने से इसकी गति में परिवर्तन होता है| गति में इसी परिवर्तन को देखते हुए वैज्ञानिक पृथ्वी के आंतरिक भाग की अवस्था जान पाते हैं · S तरंग केवल कठोर माध्यम में ही संचलन कर सकती हैं| यही कारण है की यह तरल तथा गैस माध्यमों को पार नही करती है| केवल ठोस अवस्था ही इसका माध्यम हो सकती है| इसके पथ के अध्ययन से आंतरिक संरचना की अवस्थिति का पता चलता है| · L तरंग केंद्र से केवल धरातल की ओर अर्थात अधिकेन्द्र की ओर ही आती हैं| इसीलिए इसका महत्त्व आंतरिक संरचना के अध्ययन में लगभग नही है| इसे धरातलीय तरंग भी कहते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी आंतरिक ऊर्जा के स्रोत तथा उससे होने वाले परिणाम की समझ देता है, परन्तु इसकी जानकारी के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण नही हैं| इस सन्दर्भ में अध्ययन के अप्रत्यक्ष स्रोतों से पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं|
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##Question:पृथ्वी की आंतरिक संरचना को परिभाषित कीजिये। इसके साथ ही पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों का सविस्तार वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Define the internal structure of the earth. Simultaneously, describe the sources of study of the internal structure of the Earth. (150 -200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृथ्वी की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों का सविस्तार वर्णन कीजिये 3- अंतिम में आंतरिक संरचना के अध्ययन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाह्य रूप से पृथ्वी गोलाभ की आकृति में हैं किन्तु आंतरिक रूप से यह कई स्तरों में विभाजित है| पृथ्वी की आंतरिक संरचना के तीन मुख्य स्तर हैं| सबसे ऊपरी सतह को भूपर्पटी (Crust) कहा जाता है , मध्य स्तर को मैंटल (mantle) कहते हैं और आंतरिक स्तर धात्विक क्रोड (Core) कहलाता है| भूपर्पटी अथवा क्रस्ट की मोटाई 8 से 40 किमी मानी जाती है| पृथ्वी पर महासागर और महाद्वीप केवल इसी भाग में स्थित हैं| इसके बाद मैंटल की मोटाई लगभग 2895 किमी. है। यह अर्धगलित अवस्था में है| इसके बाद क्रोड़ का क्षेत्र है जो आंतरिक तौर पर ठोस एवं बाह्य तौर पर द्रवित अवस्था में है| इन परतों के मध्य संक्रमण क्षेत्र के रूप में मोहोरोविक या गुटेनबर्ग जैसी असंबद्धतायें उपस्थित हैं| पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी आंतरिक ऊर्जा के स्रोत तथा उससे होने वाले परिणाम की समझ देता है, परन्तु इसकी जानकारी के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण नही हैं| इससे जानकारी अपेक्षाकृत अधूरी है और इसके होने वाले परिणाम जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प, प्लेट विवर्तनिकी आदि को आज भी बेहतर रूप से समझा नही जा सका है| इस अधूरी जानकारी का सबसे बड़ा कारण यह है कि मानव तथा उसके द्वारा निर्मित मशीनों की प्रत्यक्ष पहुच पृथ्वी के आंतरिक भाग में नही हो पाती है| सबसे गहरी खान भी 20 किमी से कम है जबकि पृथ्वी की त्रिज्या 6400 किमी के लगभग है| परिणाम स्वरुप इसकी जानकारी के लिए हमे अप्रत्यक्ष स्रोतों पर निभर होना पड़ता है जो निम्नलिखित हैं- आंतरिक संरचना को जानने के स्रोत पृथ्वी के भौतिक स्थिति एवं गुणों का अध्ययन · इसमें मुख्य रूप से तापमान, दाब तथा घनत्व का अध्ययन किया जाता है, · पृथ्वी में 32 मीटर की गहराई में जाने पर 1 डिग्री तापमान बढ़ता है इससे अनुमान लगाया जाता है की आंतरिक भाग का तापमान 6 हजार डिग्री के लगभग होगा · पृथ्वी के आंतरिक भाग में 100 से 200 किमी की गहराई पर तापमान बहुत अधिक होता है जिसकी व्याख्या दाब एवं तापमान के सम्बन्ध से नही की जा सकती है अर्थात इसका कोई अन्य कारण होगा|इस क्षेत्र में अत्यधिक तापमान की उपस्थिति की व्याख्या के लिये वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र में रेडियो सक्रिय तत्वों की प्रचुरता होगी जिससे ऊर्जा उत्सर्जन के कारण इस क्षेत्र का तापमान इतना अधिक होगा अर्थात यह रेडियो जनित उष्मा है न की दाब का प्रभाव| इसे ही ज्वालामुखी के उत्पन्न होने का कारण माना जाता है| ज्वालामुखी से आने वाले लावे से स्पष्ट होता है की पर्पटी के नीचे का भाग अर्धगलित अवस्था में है| · प्लेट विवर्तनिकी के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उपरी परत के नीचे का भाग तरल रूप में · पृथ्वी के आंतरिक भाग में घनत्व बढ़ता जाता है| वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि पृथ्वी के आंतरिक भाग में इतना अधिक घनत्व केवल दाब के कारण संभव नही है अर्थात यहाँ पर इस प्रकार के अधिक घनत्व वाले तत्वों का जमाव होगा जो इस स्तर(क्रोड़ में 17 तक) तक बढ़ा देता है| पृथ्वी में पायी जाने वाली अत्यधिक घनत्व वाले तत्वों में सबसे अधिक मात्रा में निकिल तथा लोहा पाया जाता है|इसके अतिरिक्त उल्काश्म के अध्ययन से भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ पर निकिल तथा लोहे की प्रचुरता होगी उल्काश्मों का(meteors) अध्ययन · पृथ्वी के वायुमंडल तंत्र में प्रवेश करने वाले किसी भी ठोस पदार्थ को उल्कापिंड कहा जाता है| ऐसा माना जाता है की उल्काश्म की संरचना पृथ्वी के सामान है| · उल्काश्म के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है की उसके आंतरिक भाग अर्थात क्रोड़ में निकिल तथा लोहे की प्रचुरता पायी जाती है जो यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी का आंतरिक भाग भी ऐसा ही होगा| · उल्काश्म केवल पृथ्वी के आंतरिक भाग जानकारी दे पाते हैं क्योंकि उसका उपरी भाग वायुमंडल में विस्फोट के द्वारा विखंडित अथवा जल जाता है| भूकम्प विज्ञान · भूकंपीय तरंगों के वैज्ञानिक अध्ययन से जो साक्ष्य मिले हैं वो अब तक के सबसे मान्य साक्ष्य माने जाते हैं क्योंकि ये धरातल से लेकर पृथ्वी के आंतरिक भाग तक के संभावित संघटन की वैज्ञानिक व्याख्या करता है| भूकम्पीय तरंगे मुख्यतः 3 प्रकार की होती है यथा P, S एवं L, · P एवं S पृथ्वी के आंतरिक भाग में प्रवेश करती हैं अर्थात केंद्र से चारों ओर जाती हैं इसीलिए इन दोनों को शारीरिक तरंगे भी कहते हैं तथा पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी मुख्यतः इन्ही दोनों तरंगों से मिलती है| · P तरंग तीनों माध्यमों ठोस, तरल एवं गैस से पार कर जाती है परन्तु माध्यम बदलने से इसकी गति में परिवर्तन होता है| गति में इसी परिवर्तन को देखते हुए वैज्ञानिक पृथ्वी के आंतरिक भाग की अवस्था जान पाते हैं · S तरंग केवल कठोर माध्यम में ही संचलन कर सकती हैं| यही कारण है की यह तरल तथा गैस माध्यमों को पार नही करती है| केवल ठोस अवस्था ही इसका माध्यम हो सकती है| इसके पथ के अध्ययन से आंतरिक संरचना की अवस्थिति का पता चलता है| · L तरंग केंद्र से केवल धरातल की ओर अर्थात अधिकेन्द्र की ओर ही आती हैं| इसीलिए इसका महत्त्व आंतरिक संरचना के अध्ययन में लगभग नही है| इसे धरातलीय तरंग भी कहते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी आंतरिक ऊर्जा के स्रोत तथा उससे होने वाले परिणाम की समझ देता है, परन्तु इसकी जानकारी के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण नही हैं| इस सन्दर्भ में अध्ययन के अप्रत्यक्ष स्रोतों से पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं|
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चुनाव क्षेत्र परिसीमन से आप क्या समझते हैं ? इस सन्दर्भ में परिसीमन आयोग को प्राप्त अधिदेश एवं उसके कार्यों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, अंक ) What do you understand by electorate delimitation ? In this reference, clarify the functions and mandates received by delimitation commission. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में चुनाव क्षेत्र परिसीमन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में परिसीमन आयोग के अधिदेश को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में परिसीमन आयोग के कार्यों की जानकारी दीजिये 4- परिसीमन की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये परिसीमन का अर्थ किसी निर्वाचन क्षेत्र का सीमांकन करना होता है इसका प्रमुख उद्देश्य जनसंख्या के सापेक्ष प्रतिनिधित्व में समरूपता बनाए रखनी होती है| इस प्रकार परिसीमन आयोग एक प्रकार से राजनीतिक समानता प्रदान करने का कार्य करता है| परिसीमन के अंतर्गत जनसंख्या की उपलब्धता के आधार पर परिसीमन आयोग किसी चुनाव क्षेत्र के क्षेत्र को घटा सकता है, बढ़ा सकता है या पूर्ववत ही रख सकता है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के अंतर्गत संसद को कानून के माध्यम से एक परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार है|किन्तु यह आयोग उसी क्षेत्र के लिए गठित किया जा सकता है जहाँ कोई विधान मंडल स्थित हो या जिसमें लोगों का प्रतिनिधित्व हो| भारत में अभी तक 1952, 1963, 1973 एवं 2002 में केवल 4 बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया है परिसीमन आयोग संविधानिक संस्था न हो कर एक सांविधिक संस्था है अर्थात इसका उल्लेख संविधान में नही है बल्कि संसद इसका गठन करती है| राज्य विधान मंडलों के पास परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार नही हैं फिर भी यह आयोग राज्य विधान सभा के निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करता है| परिसीमन आयोग के अधिदेश · परिसीमन आयोग की सिफारिशों को अस्वीकार नही किया जा सकता और न ही उसे किसी अदालत में चुनौती दी जा सकती है · आयोग की रिपोर्ट को संसद के ऊपरी सदन/राज्यसभा और राज्यों की विधान सभा के पटल पर रखवाना होता है किन्तु ये सदन इसमें कोई बदलाव नही कर सकते, केवल उस पर चर्चा कर सकते हैं · परिसीमन आयोग द्वारा जनसंख्या को निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन का आधार बनाया जाता है · आयोग की सिफारिशें असम, नागालैंड,अरुणाचल एवं मणिपुर पर लागू नही होगी| इनके सीमांकन सम्बन्धी मुकदमें सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं · केन्द्रीय परिसीमन आयोग की सिफारिशें जम्मू कश्मीर में लागू नही होंगी; वहां राज्य द्वारा गठित परिसीमन आयोग की सिफारिशें लागू होती हैं परिसीमन आयोग के कार्य · इस आयोग का प्रधान कार्य जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करना है · यह अपनी रिपोर्ट संसद को प्रस्तुत करता है · इस आयोग को जनसंख्या के अनुपात में इन क्षेत्रों का निर्धारण करना होता है जिससे की राज्य में अथवा पूरे देश में जन प्रतिनिधित्व में समरूपता बनी रहे| · कुल सीटों की संख्या प्रभावित किये बिना यह पुराने निर्वाचन क्षेत्रों का विलय कर नए निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण कर सकता है 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा 1971 की जनसंख्या को आधार बना कर वर्ष 2000 तक लोकसभा की सीटें अपरिवर्तित रखने की व्यवस्था की गयी किन्तु 84वें संविधान संशोधन अधिनियम 2001 के द्वाराइस अवधि को बढ़ाकर 2026 कर दिया गया| और यह व्यवस्था की गयी कि उसके बाद जो पहली जनगणना होगी उसके आधार पर लोक सभा में सीटों की संख्या बढाई जायेगी वर्ष 2002 में इस आयोग की सिफारिश के अनुसार लोक सभा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 78 से बढ़ा कर 84 कर दी गयी है|
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##Question:चुनाव क्षेत्र परिसीमन से आप क्या समझते हैं ? इस सन्दर्भ में परिसीमन आयोग को प्राप्त अधिदेश एवं उसके कार्यों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, अंक ) What do you understand by electorate delimitation ? In this reference, clarify the functions and mandates received by delimitation commission. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में चुनाव क्षेत्र परिसीमन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में परिसीमन आयोग के अधिदेश को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में परिसीमन आयोग के कार्यों की जानकारी दीजिये 4- परिसीमन की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये परिसीमन का अर्थ किसी निर्वाचन क्षेत्र का सीमांकन करना होता है इसका प्रमुख उद्देश्य जनसंख्या के सापेक्ष प्रतिनिधित्व में समरूपता बनाए रखनी होती है| इस प्रकार परिसीमन आयोग एक प्रकार से राजनीतिक समानता प्रदान करने का कार्य करता है| परिसीमन के अंतर्गत जनसंख्या की उपलब्धता के आधार पर परिसीमन आयोग किसी चुनाव क्षेत्र के क्षेत्र को घटा सकता है, बढ़ा सकता है या पूर्ववत ही रख सकता है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के अंतर्गत संसद को कानून के माध्यम से एक परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार है|किन्तु यह आयोग उसी क्षेत्र के लिए गठित किया जा सकता है जहाँ कोई विधान मंडल स्थित हो या जिसमें लोगों का प्रतिनिधित्व हो| भारत में अभी तक 1952, 1963, 1973 एवं 2002 में केवल 4 बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया है परिसीमन आयोग संविधानिक संस्था न हो कर एक सांविधिक संस्था है अर्थात इसका उल्लेख संविधान में नही है बल्कि संसद इसका गठन करती है| राज्य विधान मंडलों के पास परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार नही हैं फिर भी यह आयोग राज्य विधान सभा के निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करता है| परिसीमन आयोग के अधिदेश · परिसीमन आयोग की सिफारिशों को अस्वीकार नही किया जा सकता और न ही उसे किसी अदालत में चुनौती दी जा सकती है · आयोग की रिपोर्ट को संसद के ऊपरी सदन/राज्यसभा और राज्यों की विधान सभा के पटल पर रखवाना होता है किन्तु ये सदन इसमें कोई बदलाव नही कर सकते, केवल उस पर चर्चा कर सकते हैं · परिसीमन आयोग द्वारा जनसंख्या को निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन का आधार बनाया जाता है · आयोग की सिफारिशें असम, नागालैंड,अरुणाचल एवं मणिपुर पर लागू नही होगी| इनके सीमांकन सम्बन्धी मुकदमें सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं · केन्द्रीय परिसीमन आयोग की सिफारिशें जम्मू कश्मीर में लागू नही होंगी; वहां राज्य द्वारा गठित परिसीमन आयोग की सिफारिशें लागू होती हैं परिसीमन आयोग के कार्य · इस आयोग का प्रधान कार्य जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करना है · यह अपनी रिपोर्ट संसद को प्रस्तुत करता है · इस आयोग को जनसंख्या के अनुपात में इन क्षेत्रों का निर्धारण करना होता है जिससे की राज्य में अथवा पूरे देश में जन प्रतिनिधित्व में समरूपता बनी रहे| · कुल सीटों की संख्या प्रभावित किये बिना यह पुराने निर्वाचन क्षेत्रों का विलय कर नए निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण कर सकता है 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा 1971 की जनसंख्या को आधार बना कर वर्ष 2000 तक लोकसभा की सीटें अपरिवर्तित रखने की व्यवस्था की गयी किन्तु 84वें संविधान संशोधन अधिनियम 2001 के द्वाराइस अवधि को बढ़ाकर 2026 कर दिया गया| और यह व्यवस्था की गयी कि उसके बाद जो पहली जनगणना होगी उसके आधार पर लोक सभा में सीटों की संख्या बढाई जायेगी वर्ष 2002 में इस आयोग की सिफारिश के अनुसार लोक सभा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 78 से बढ़ा कर 84 कर दी गयी है|
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Explain the various provisions of Regulating Act of 1773 and the reasons for its failure? (10 marks/150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE FEATURES OF THE REGULATING ACT OF 1773 -CONCLUSION Answer:- The Regulating Act of 1773 aimed to bring the East India Company (EIC) under the Parliamentary control of the British. It led to a kind of centralisation, which was carried forward by the subsequent acts. THE FEATURES OF THIS ACT WERE 1) PARLIAMENTARY CONTROL For the first time it recognized that the control/ right over the Indian affairs was with the state/ Parliament. Therefore, it carried out some form of centralization. 2) CENTRALISATION This was attempted through the governor general. The Governor of Bengal was made the Governor General of Bengal. He was to be the first among equals. He was to be assisted by a council. Some powers with respect to starting a war or making peace with the Indian state without permission of the Governor General of Bengal. 3) THE STRUCTURE The supervision over the Board of Control (BoC) and the Court of Directors (CoD) was tightened. Supervision over the EIC by the government was effected by making it compulsory to submit all the important communication related to civil, military and revenue affairs to the government. Therefore, information on a regular basis was tried. The Governor General and Council came under the Court of Directors and were to compulsorily send them information regularly. 4) SEPARATION OF POWERS The Governor General was to make laws. The Supreme Court was established at Calcutta to adjudicate. THE REASONS WHY THE ACT FAILED 1) INEFFECTIVE SUPERVISION Supervision was ineffective due to communication issues. 2) ADMINISTRATION IN INDIA WAS INEFFECTIVE This was ineffective due to the bickering between the Governor General and the Council, and also within the Council. This happened because the Governor General could not override the council. 3) AMBIGUITY IN THE JURISDICTION OF THE SUPREME COURT The Nawab also had some jurisdiction. He was an appointee/ puppet of the Council itself. This led to conflict between the Council and the Supreme Court. [The amending Act resolved this but not the other issues] 4) VAGUE WORDING Vague wording of the act allowed the Governors of Bombay and Madras to continue to function as they desired. The main importance of the Regulating Act of 1773 was the Parliamentary control over the affairs of the EIC, which was brought about by the supervision of government over the EIC, and also by the Regulating Act itself, as it was a symbol of Parliamentary Right.
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##Question:Explain the various provisions of Regulating Act of 1773 and the reasons for its failure? (10 marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE FEATURES OF THE REGULATING ACT OF 1773 -CONCLUSION Answer:- The Regulating Act of 1773 aimed to bring the East India Company (EIC) under the Parliamentary control of the British. It led to a kind of centralisation, which was carried forward by the subsequent acts. THE FEATURES OF THIS ACT WERE 1) PARLIAMENTARY CONTROL For the first time it recognized that the control/ right over the Indian affairs was with the state/ Parliament. Therefore, it carried out some form of centralization. 2) CENTRALISATION This was attempted through the governor general. The Governor of Bengal was made the Governor General of Bengal. He was to be the first among equals. He was to be assisted by a council. Some powers with respect to starting a war or making peace with the Indian state without permission of the Governor General of Bengal. 3) THE STRUCTURE The supervision over the Board of Control (BoC) and the Court of Directors (CoD) was tightened. Supervision over the EIC by the government was effected by making it compulsory to submit all the important communication related to civil, military and revenue affairs to the government. Therefore, information on a regular basis was tried. The Governor General and Council came under the Court of Directors and were to compulsorily send them information regularly. 4) SEPARATION OF POWERS The Governor General was to make laws. The Supreme Court was established at Calcutta to adjudicate. THE REASONS WHY THE ACT FAILED 1) INEFFECTIVE SUPERVISION Supervision was ineffective due to communication issues. 2) ADMINISTRATION IN INDIA WAS INEFFECTIVE This was ineffective due to the bickering between the Governor General and the Council, and also within the Council. This happened because the Governor General could not override the council. 3) AMBIGUITY IN THE JURISDICTION OF THE SUPREME COURT The Nawab also had some jurisdiction. He was an appointee/ puppet of the Council itself. This led to conflict between the Council and the Supreme Court. [The amending Act resolved this but not the other issues] 4) VAGUE WORDING Vague wording of the act allowed the Governors of Bombay and Madras to continue to function as they desired. The main importance of the Regulating Act of 1773 was the Parliamentary control over the affairs of the EIC, which was brought about by the supervision of government over the EIC, and also by the Regulating Act itself, as it was a symbol of Parliamentary Right.
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भूकम्पीय तरंगों को परिभाषित कीजिये| भूकम्पीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कीजिये |(150-200 शब्द; 10 अंक) Define the seismic waves. Based on the speed of seismic waves, clarify the internal structure of the earth. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भूकम्पीय तरंगों को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भूकम्पीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आंतरिक संरचना को समझने में अप्रत्यक्ष स्रोतों के महत्त्व के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| पृथ्वी के आंतरिक भाग में चट्टानों के खिसकने से जो तरंगे निकलती हैं उनके द्वारा होने वाले धरातलीय कम्पन्न को भूकम्प कहते हैं|भूकम्पीय तरंगे मुख्यतः 3 प्रकार की होती है यथा P, S एवं L तरंग| प्रत्येक प्रकार की तरंग की गति माध्यम के घनत्व के समानुपाती होता है, अर्थात ठोस माध्यम में अधिकतम तथा तरल माध्यम में न्यूनतम गति होती है| P तरंग तीनों माध्यमों ठोस, तरल एवं गैस से पार कर जाती है परन्तु माध्यम बदलने से इसकी गति में परिवर्तन होता है| S तरंगों के संचलन के लिए माध्यम की कठोरता आवश्यक होती है अर्थात S तरंग केवल कठोर माध्यम में ही संचलन कर सकती हैं| P एवं S पृथ्वी के आंतरिक भाग में प्रवेश करती हैं अर्थात केंद्र से चारों ओर जाती हैं इसीलिए आंतरिक संरचना की जानकारी मुख्यतः इन्ही दोनों तरंगों से मिलती है| L तरंग केंद्र से केवल धरातल की ओर अर्थात अधिकेन्द्र की ओर ही आती हैं| इसीलिए इसका महत्त्व आंतरिक संरचना के अध्ययन में लगभग नही है| भूकंपीय तरंगों के वैज्ञानिक अध्ययन से जो साक्ष्य मिले हैं वो अब तक के सबसे मान्य साक्ष्य माने जाते हैं क्योंकि ये धरातल से लेकर पृथ्वी के आंतरिक भाग तक के संभावित संघटन की वैज्ञानिक व्याख्या करता है| भूकम्पीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना · पृथ्वी के आंतरिक भाग में पहुचने पर भूकम्पीय तरंगों के पथ, दिशा या अन्य विशेषताओं में परिवर्तन होता है|भूकम्पीय तरंगों की विशेषताओं के अध्ययन के साथ जब पृथ्वी के आंतरिक भाग की प्रतिक्रया को जोड़ कर देखते हैं तब वैज्ञानिक उसकी भौतिक अवस्था तथा रासायनिक संघटन का अनुमान लगा पाते हैं|यह अनुमान निम्नलिखित रूप में होते हैं स्थल मंडल · प्रथम 100 किमी में P और S तरंगे अपेक्षाकृत गहराई के साथ तेज होती जाती हैं,गति में इस वृद्धि को माध्यम के घनत्व से जोड़ा जाता है अर्थात धरातल से 100 किमी तक घनत्व में निरंतर वृद्धि होती है परन्तु महाद्वीपीय खंड में महासागरीय खंड की अपेक्षा गति धीमी होती है जो यह सिद्ध करता है कि महाद्वीपीय भाग कम घनत्व वाले तत्वों से निर्मित है जिसमें सिलिका तथा अल्युमिनियम की प्रचुरता पायी जाती है,इसी लिए इस भाग को SIAL भी कहते हैं|जबकि महासागरीय भाग में सिलिका तथा मैग्नीशियम की अधिकता के कारण इसका घनत्व अधिक होता है इसीलिए SIMA कहते हैं|धरातल से 100 किमी तक के भाग को स्थल मंडल कहा जाता है जो भंगुर चट्टानों से निर्मित है| दुर्बल मंडल · 100 किमी के नीचे लगभग 400 किमी तक P और S तरंगों की गति में कमी आती है जो उस क्षेत्र में घनत्व कम होने का सूचक है| वैज्ञानिक यहाँ की अवस्था में परिवर्तन को इसका कारण मानते हैं| वैज्ञानिकों के अनुसार इस क्षेत्र में रेडियो जनित ऊष्मा के कारण तापमान अधिक होता है जो मैग्मा का निर्माण करता है| इसी आंशिक पिघलन के कारण इस क्षेत्र की अवस्था में परिवर्तन होता है जिसके परिणामस्वरुप तरंगों की गति में कमी आ जाती है|चूँकि S तरंगे प्रवेश कर जाती हैं इसीलिए इस अर्धतरलीय अवस्था में माना जाता है|इस क्षेत्र को दुर्बल मंडल कहा जाता है| मध्य मंडल · 400 किमी से लगभग 2700 किमी तक के बीच में तरंगों की गति में निरंतर वृद्धि होती है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह क्षेत्र पूर्णतः ठोस अवस्था में है तथा गहराई में वृद्धि के साथ घनत्व में भी वृद्धि होती जाती है| वैज्ञानिक इसका कारण दबाव में निरंतर वृद्धि को मानते हैं| इस 400 से 2700 किमी के क्षेत्र को मध्य मंडल कहा जाता है|2700 किमी की गहराई पर दोनों तरंगे अपनी अधिकतम गति को प्राप्त करती हैं| मध्य मंडल · 2700 किमी के नीचे तरंगों की गति में फिर से कमी आने लगती है जो उसकी अर्धगलित अवस्था का सूचक है और लगभग 2900 किमी की गहराई के नीचे S तरंगे प्रवेश नही कर पाती हैं| 2700 से 2900 किमी के क्षेत्र को संक्रमण क्षेत्र माना जाता है जो मध्यमंडल तथा क्रोड़ को पृथक करती है| क्रोड़ · 2900 से लेकर 6400 किमी के बीच के क्षेत्र को क्रोड़ कहा जाता है| यह लगभग प्रमाणित हो चुका है कि इस क्षेत्र में निकिल तथा लोहे की प्रचुरता पायी जाती है|परन्तु इसकी अवस्था का प्रमाण भूकंपीय तरंगों से मिलता है| बाह्य क्रोड़ · 2900 किमी से लगभग 5100 किमी तक P तरंग की गति में कमी होती है तथा S तरंगें नही पायी जाती हैं जो इसकी तरलीय अवस्था का प्रमाण है|इस क्षेत्र को बाह्य क्रोड़ कहा जाता है| वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि इस क्षेत्र में तापमान की अधिकता के कारण चट्टान पूर्णतः पिघल जाते हैं|तरल अवस्था में होने के कारण पृथ्वी के घूर्णन का इस पर सीधा प्रभाव देखने को मिलता है| पदार्थों में संचलन के कारण पृथ्वी को चुम्बकत्व की शक्ति मिलती है जो एक चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण करता है|जो एक डाईनेमो के रूप में कार्य करता है| आंतरिक क्रोड़ · लगभग 5100 किमी के नीचे थोड़े से संक्रमण क्षेत्र के बाद P तरंग की गति फिर से बढ़ने लगती है जिससे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का यह भाग ठोस अवस्था में है जिसे हम आंतरिक क्रोड़ कहते हैं| इसमें निकिल एवं आयरन ठोस अवस्था में पाए जाते हैं| वैज्ञानिक इस अवस्था का कारण अत्यधिक दबाव को मानते हैं| पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी आंतरिक ऊर्जा के स्रोत तथा उससे होने वाले परिणाम की समझ देता है, परन्तु इसकी जानकारी के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण नही हैं| इससे जानकारी अपेक्षाकृत अधूरी है और इसके होने वाले परिणाम जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प, प्लेट विवर्तनिकी आदि को आज भी बेहतर रूप से समझा नही जा सका है| इस अधूरी जानकारी का सबसे बड़ा कारण यह है कि मानव तथा उसके द्वारा निर्मित मशीनों की प्रत्यक्ष पहुच पृथ्वी के आंतरिक भाग में नही हो पाती है|परिणाम स्वरुप इसकी जानकारी के लिए हमे अप्रत्यक्ष स्रोतों पर निभर होना पड़ता है| इस प्रकार पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रमाणिक स्पष्टीकरण में भूकम्पीय तरंगों के अध्ययन का महत्वपूर्ण योगदान है|
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##Question:भूकम्पीय तरंगों को परिभाषित कीजिये| भूकम्पीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कीजिये |(150-200 शब्द; 10 अंक) Define the seismic waves. Based on the speed of seismic waves, clarify the internal structure of the earth. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भूकम्पीय तरंगों को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भूकम्पीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आंतरिक संरचना को समझने में अप्रत्यक्ष स्रोतों के महत्त्व के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| पृथ्वी के आंतरिक भाग में चट्टानों के खिसकने से जो तरंगे निकलती हैं उनके द्वारा होने वाले धरातलीय कम्पन्न को भूकम्प कहते हैं|भूकम्पीय तरंगे मुख्यतः 3 प्रकार की होती है यथा P, S एवं L तरंग| प्रत्येक प्रकार की तरंग की गति माध्यम के घनत्व के समानुपाती होता है, अर्थात ठोस माध्यम में अधिकतम तथा तरल माध्यम में न्यूनतम गति होती है| P तरंग तीनों माध्यमों ठोस, तरल एवं गैस से पार कर जाती है परन्तु माध्यम बदलने से इसकी गति में परिवर्तन होता है| S तरंगों के संचलन के लिए माध्यम की कठोरता आवश्यक होती है अर्थात S तरंग केवल कठोर माध्यम में ही संचलन कर सकती हैं| P एवं S पृथ्वी के आंतरिक भाग में प्रवेश करती हैं अर्थात केंद्र से चारों ओर जाती हैं इसीलिए आंतरिक संरचना की जानकारी मुख्यतः इन्ही दोनों तरंगों से मिलती है| L तरंग केंद्र से केवल धरातल की ओर अर्थात अधिकेन्द्र की ओर ही आती हैं| इसीलिए इसका महत्त्व आंतरिक संरचना के अध्ययन में लगभग नही है| भूकंपीय तरंगों के वैज्ञानिक अध्ययन से जो साक्ष्य मिले हैं वो अब तक के सबसे मान्य साक्ष्य माने जाते हैं क्योंकि ये धरातल से लेकर पृथ्वी के आंतरिक भाग तक के संभावित संघटन की वैज्ञानिक व्याख्या करता है| भूकम्पीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना · पृथ्वी के आंतरिक भाग में पहुचने पर भूकम्पीय तरंगों के पथ, दिशा या अन्य विशेषताओं में परिवर्तन होता है|भूकम्पीय तरंगों की विशेषताओं के अध्ययन के साथ जब पृथ्वी के आंतरिक भाग की प्रतिक्रया को जोड़ कर देखते हैं तब वैज्ञानिक उसकी भौतिक अवस्था तथा रासायनिक संघटन का अनुमान लगा पाते हैं|यह अनुमान निम्नलिखित रूप में होते हैं स्थल मंडल · प्रथम 100 किमी में P और S तरंगे अपेक्षाकृत गहराई के साथ तेज होती जाती हैं,गति में इस वृद्धि को माध्यम के घनत्व से जोड़ा जाता है अर्थात धरातल से 100 किमी तक घनत्व में निरंतर वृद्धि होती है परन्तु महाद्वीपीय खंड में महासागरीय खंड की अपेक्षा गति धीमी होती है जो यह सिद्ध करता है कि महाद्वीपीय भाग कम घनत्व वाले तत्वों से निर्मित है जिसमें सिलिका तथा अल्युमिनियम की प्रचुरता पायी जाती है,इसी लिए इस भाग को SIAL भी कहते हैं|जबकि महासागरीय भाग में सिलिका तथा मैग्नीशियम की अधिकता के कारण इसका घनत्व अधिक होता है इसीलिए SIMA कहते हैं|धरातल से 100 किमी तक के भाग को स्थल मंडल कहा जाता है जो भंगुर चट्टानों से निर्मित है| दुर्बल मंडल · 100 किमी के नीचे लगभग 400 किमी तक P और S तरंगों की गति में कमी आती है जो उस क्षेत्र में घनत्व कम होने का सूचक है| वैज्ञानिक यहाँ की अवस्था में परिवर्तन को इसका कारण मानते हैं| वैज्ञानिकों के अनुसार इस क्षेत्र में रेडियो जनित ऊष्मा के कारण तापमान अधिक होता है जो मैग्मा का निर्माण करता है| इसी आंशिक पिघलन के कारण इस क्षेत्र की अवस्था में परिवर्तन होता है जिसके परिणामस्वरुप तरंगों की गति में कमी आ जाती है|चूँकि S तरंगे प्रवेश कर जाती हैं इसीलिए इस अर्धतरलीय अवस्था में माना जाता है|इस क्षेत्र को दुर्बल मंडल कहा जाता है| मध्य मंडल · 400 किमी से लगभग 2700 किमी तक के बीच में तरंगों की गति में निरंतर वृद्धि होती है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह क्षेत्र पूर्णतः ठोस अवस्था में है तथा गहराई में वृद्धि के साथ घनत्व में भी वृद्धि होती जाती है| वैज्ञानिक इसका कारण दबाव में निरंतर वृद्धि को मानते हैं| इस 400 से 2700 किमी के क्षेत्र को मध्य मंडल कहा जाता है|2700 किमी की गहराई पर दोनों तरंगे अपनी अधिकतम गति को प्राप्त करती हैं| मध्य मंडल · 2700 किमी के नीचे तरंगों की गति में फिर से कमी आने लगती है जो उसकी अर्धगलित अवस्था का सूचक है और लगभग 2900 किमी की गहराई के नीचे S तरंगे प्रवेश नही कर पाती हैं| 2700 से 2900 किमी के क्षेत्र को संक्रमण क्षेत्र माना जाता है जो मध्यमंडल तथा क्रोड़ को पृथक करती है| क्रोड़ · 2900 से लेकर 6400 किमी के बीच के क्षेत्र को क्रोड़ कहा जाता है| यह लगभग प्रमाणित हो चुका है कि इस क्षेत्र में निकिल तथा लोहे की प्रचुरता पायी जाती है|परन्तु इसकी अवस्था का प्रमाण भूकंपीय तरंगों से मिलता है| बाह्य क्रोड़ · 2900 किमी से लगभग 5100 किमी तक P तरंग की गति में कमी होती है तथा S तरंगें नही पायी जाती हैं जो इसकी तरलीय अवस्था का प्रमाण है|इस क्षेत्र को बाह्य क्रोड़ कहा जाता है| वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि इस क्षेत्र में तापमान की अधिकता के कारण चट्टान पूर्णतः पिघल जाते हैं|तरल अवस्था में होने के कारण पृथ्वी के घूर्णन का इस पर सीधा प्रभाव देखने को मिलता है| पदार्थों में संचलन के कारण पृथ्वी को चुम्बकत्व की शक्ति मिलती है जो एक चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण करता है|जो एक डाईनेमो के रूप में कार्य करता है| आंतरिक क्रोड़ · लगभग 5100 किमी के नीचे थोड़े से संक्रमण क्षेत्र के बाद P तरंग की गति फिर से बढ़ने लगती है जिससे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का यह भाग ठोस अवस्था में है जिसे हम आंतरिक क्रोड़ कहते हैं| इसमें निकिल एवं आयरन ठोस अवस्था में पाए जाते हैं| वैज्ञानिक इस अवस्था का कारण अत्यधिक दबाव को मानते हैं| पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी आंतरिक ऊर्जा के स्रोत तथा उससे होने वाले परिणाम की समझ देता है, परन्तु इसकी जानकारी के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण नही हैं| इससे जानकारी अपेक्षाकृत अधूरी है और इसके होने वाले परिणाम जैसे ज्वालामुखी, भूकम्प, प्लेट विवर्तनिकी आदि को आज भी बेहतर रूप से समझा नही जा सका है| इस अधूरी जानकारी का सबसे बड़ा कारण यह है कि मानव तथा उसके द्वारा निर्मित मशीनों की प्रत्यक्ष पहुच पृथ्वी के आंतरिक भाग में नही हो पाती है|परिणाम स्वरुप इसकी जानकारी के लिए हमे अप्रत्यक्ष स्रोतों पर निभर होना पड़ता है| इस प्रकार पृथ्वी की आंतरिक संरचना के प्रमाणिक स्पष्टीकरण में भूकम्पीय तरंगों के अध्ययन का महत्वपूर्ण योगदान है|
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Why was the permanent setllement system introduced by Cornwallis? (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE REASONS BEHIND INTRODUCING THE PERMANENT SETTLEMENT SYSTEM -CONCLUSION Answer The permanent settlement system was introduced in 1793 by Cornwallis in Bengal, Bihar and then Orissa. As per this settlement system, the revenue rent was fixed in perpetuity, at 10/11th of the produce. The amount to be paid was further never to be increased in future. Therefore, whatever increase in production would take place, would accrue to the farmers. THE REASONS BEHIND INTRODUCING THE PERMANENT SETTLEMENT SYSTEM 1) EXPECTED INVESTMENT IN THE LAND Since the revenue rate to be paid was fixed in perpetuity, any increase in production would benefit the farmers. Therefore, it was expected that there will be more investments done in the land in order to raise the productivity of the land. 2) FALL IN AGRICULTURAL PRODUCTION BETWEEN 1773-1793 This was the result of the farming system introduced by Governor General Warren Hastings in 1773. As a result of the failure of this system, production had fallen. Also, the production of handicrafts was falling. There were no goods left for exports. All this was leading to a decline in the company’s profit. Therefore, they wanted to maximise revenue. 3) INSTABILITY OF REVENUE The revenue was not large and it was irregular. Therefore, they wanted to stabilise their income. 4) SETTLEMENT WITH THE ZAMINDAR This was done as it was easier to collect revenue from fewer people . Also, Cornwallis believed in the British landlord system and its importance in the growth of the economy. An additional and important factor was that by giving power to the zamindar, they could secure their loyalty, as this class would owe their powers and existence to the British. However, the main motive of the British government, i.e. investment in the land failed, because the ownership of land was a conditional one (i.e. till the payment of revenue). The zamindars and peasants found it more profitable (greater return on investment) to lease out the land on high rates, rather than invest in the land. The net result was cumulative and too much burden on the ultimate tiller of the land. It led to impoverishment of the rural folk and a system of sub-infeudation. Even the zamindars lost out. Around 50% of the zamindars’ land was auctioned away in 20 years. Therefore, the system ultimately failed. It was only the jyotedars who could be said to be have benefitted from the system.
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##Question:Why was the permanent setllement system introduced by Cornwallis? (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE REASONS BEHIND INTRODUCING THE PERMANENT SETTLEMENT SYSTEM -CONCLUSION Answer The permanent settlement system was introduced in 1793 by Cornwallis in Bengal, Bihar and then Orissa. As per this settlement system, the revenue rent was fixed in perpetuity, at 10/11th of the produce. The amount to be paid was further never to be increased in future. Therefore, whatever increase in production would take place, would accrue to the farmers. THE REASONS BEHIND INTRODUCING THE PERMANENT SETTLEMENT SYSTEM 1) EXPECTED INVESTMENT IN THE LAND Since the revenue rate to be paid was fixed in perpetuity, any increase in production would benefit the farmers. Therefore, it was expected that there will be more investments done in the land in order to raise the productivity of the land. 2) FALL IN AGRICULTURAL PRODUCTION BETWEEN 1773-1793 This was the result of the farming system introduced by Governor General Warren Hastings in 1773. As a result of the failure of this system, production had fallen. Also, the production of handicrafts was falling. There were no goods left for exports. All this was leading to a decline in the company’s profit. Therefore, they wanted to maximise revenue. 3) INSTABILITY OF REVENUE The revenue was not large and it was irregular. Therefore, they wanted to stabilise their income. 4) SETTLEMENT WITH THE ZAMINDAR This was done as it was easier to collect revenue from fewer people . Also, Cornwallis believed in the British landlord system and its importance in the growth of the economy. An additional and important factor was that by giving power to the zamindar, they could secure their loyalty, as this class would owe their powers and existence to the British. However, the main motive of the British government, i.e. investment in the land failed, because the ownership of land was a conditional one (i.e. till the payment of revenue). The zamindars and peasants found it more profitable (greater return on investment) to lease out the land on high rates, rather than invest in the land. The net result was cumulative and too much burden on the ultimate tiller of the land. It led to impoverishment of the rural folk and a system of sub-infeudation. Even the zamindars lost out. Around 50% of the zamindars’ land was auctioned away in 20 years. Therefore, the system ultimately failed. It was only the jyotedars who could be said to be have benefitted from the system.
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वैश्विक मौद्रिक अंतःक्रिया में विनिमय दर की अवधारणा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इस संदर्भ में विनिमय दर के विभिन्न रूपों की चर्चा करते हुए रुपया या डालर के सम्बंध में मूल्यह्रास और अधिमूल्यन की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) The concept of exchange rate plays an important role in global monetary interaction, in this context discuss the depreciation and appreciation in relation to rupee or dollar by discussing different forms of exchange rate. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिमय दर को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में विदेशी मुद्रा विनिमय दर के प्रमुख प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में भारत में प्रणालियों की स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाजार विनिमय दर का सम्बन्ध मुद्रा विनिमय से है| किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष किसी मुद्रा का मूल्य बाजार विनिमय दर कहलाता है| दूसरे शब्दों में, किसी मुद्रा की कीमत को अन्य मुद्रा के रूप में व्यक्त करना बाजार विनिमय दर कहलाता है।अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्रायें प्रचलित रहती हैं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व यह समस्या होती है कि मुद्राओं के बीच विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाए| इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो विनिमय दर प्रणालियाँ प्रचलित हैं यथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली एवं परिवर्तनीय विनिमय दर प्रणाली| इन दोनों प्रणालियों में कुछ मूलभूत अंतर हैं| स्थिर विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा की विनिमय दर केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है · चूँकि देश का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर के निर्धारण में हस्तक्षेप करता है इसीलिए इसे प्रबंधित विनिमय दर भी कहते हैं| · केन्द्रीय बैंक जब विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में घरेलू मुद्रा का मान को स्वयं कम करता है या घटाता है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं |भारत में अब तक 1949, 1966 एवं 1991 में तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है · केन्द्रीय बैंक द्वारा घरेलू मुद्रा के विनिमय दर को बढ़ाना अधिमूल्यन कहलाता है, इसे भारत में अभी तक नही किया गया है| · उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के निरंतर विस्तार से विश्व स्तर पर स्थिर विनिमय प्रणाली का उपयोग लगभग बंद हो चुका है तिरती/नम्य विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है|1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है| · किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| · विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| · इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि(अप्रिसियेशन) होती है| · 1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है · विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| भारत में 1991 में शुरू किये गए आर्थिक सुधारों के एक भाग के रूप में मार्च 1992-93 में उदारीकृत विनिमय दर प्रबंधन स्कीम के अंतर्गत आंशिक रूप से रूपये को परिवर्तनीय बनाया गया और तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है अर्थात चालू खाते पर रुपये की आंशिक परिवर्तनीयता(बाजार आधारित विनिमय दर प्रणाली) अपनाई गयी थी ताकि विभिन्न आवश्यक वस्तुओं कम दाम पर आयात किया जा सके और यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि उनकी कीमतें बाजार में अधिक न बढ़ें|बाद में चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता कर दी गयी है लेकिन पूँजी खाते पर अभी तक परिवर्तनीयता लागू नही की गयी है| इस प्रकार इस समय भारत में दोहरी विनिमय दर प्रणाली प्रचलित है|
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##Question:वैश्विक मौद्रिक अंतःक्रिया में विनिमय दर की अवधारणा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इस संदर्भ में विनिमय दर के विभिन्न रूपों की चर्चा करते हुए रुपया या डालर के सम्बंध में मूल्यह्रास और अधिमूल्यन की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) The concept of exchange rate plays an important role in global monetary interaction, in this context discuss the depreciation and appreciation in relation to rupee or dollar by discussing different forms of exchange rate. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विनिमय दर को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में विदेशी मुद्रा विनिमय दर के प्रमुख प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में भारत में प्रणालियों की स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बाजार विनिमय दर का सम्बन्ध मुद्रा विनिमय से है| किसी अन्य मुद्रा के सापेक्ष किसी मुद्रा का मूल्य बाजार विनिमय दर कहलाता है| दूसरे शब्दों में, किसी मुद्रा की कीमत को अन्य मुद्रा के रूप में व्यक्त करना बाजार विनिमय दर कहलाता है।अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्तर्गत अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्रायें प्रचलित रहती हैं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व यह समस्या होती है कि मुद्राओं के बीच विनिमय दर का निर्धारण कैसे किया जाए| इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दो विनिमय दर प्रणालियाँ प्रचलित हैं यथा स्थिर विनिमय दर प्रणाली एवं परिवर्तनीय विनिमय दर प्रणाली| इन दोनों प्रणालियों में कुछ मूलभूत अंतर हैं| स्थिर विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा की विनिमय दर केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है · चूँकि देश का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर के निर्धारण में हस्तक्षेप करता है इसीलिए इसे प्रबंधित विनिमय दर भी कहते हैं| · केन्द्रीय बैंक जब विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में घरेलू मुद्रा का मान को स्वयं कम करता है या घटाता है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं |भारत में अब तक 1949, 1966 एवं 1991 में तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है · केन्द्रीय बैंक द्वारा घरेलू मुद्रा के विनिमय दर को बढ़ाना अधिमूल्यन कहलाता है, इसे भारत में अभी तक नही किया गया है| · उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के निरंतर विस्तार से विश्व स्तर पर स्थिर विनिमय प्रणाली का उपयोग लगभग बंद हो चुका है तिरती/नम्य विनिमय दर प्रणाली · इसके अंतर्गत घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है|1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है| · किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| · विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| · इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि(अप्रिसियेशन) होती है| · 1993 में भारत में तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है · विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| भारत में 1991 में शुरू किये गए आर्थिक सुधारों के एक भाग के रूप में मार्च 1992-93 में उदारीकृत विनिमय दर प्रबंधन स्कीम के अंतर्गत आंशिक रूप से रूपये को परिवर्तनीय बनाया गया और तिरती विनिमय दर प्रणाली अपनाई गयी है अर्थात चालू खाते पर रुपये की आंशिक परिवर्तनीयता(बाजार आधारित विनिमय दर प्रणाली) अपनाई गयी थी ताकि विभिन्न आवश्यक वस्तुओं कम दाम पर आयात किया जा सके और यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि उनकी कीमतें बाजार में अधिक न बढ़ें|बाद में चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता कर दी गयी है लेकिन पूँजी खाते पर अभी तक परिवर्तनीयता लागू नही की गयी है| इस प्रकार इस समय भारत में दोहरी विनिमय दर प्रणाली प्रचलित है|
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How is it ensured in Parliament that the government is enjoing majority on the floor of the house? (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE MEANS TO ENSURE THAT THE GOVERNMENT IS ENJOYING MAJORITY ON THE FLOOR OF THE HOUSE -CONCLUSION Answer:- Direct and indirect sources are deployed to ensure that the government in power is enjoying a majority in the house. The first No-confidence motion was moved by Acharya Kriplani against the Nehru government, after the 1962 war, which was defeated. Since then, many governments have faced no-confidence motions, thus emphasising the importance of majority rule in Parliament and the issue of collective responsibility. THE MEANS TO ENSURE THAT THE GOVERNMENT IS ENJOYING MAJORITY ON THE FLOOR OF THE HOUSE 1) MOTION OF THANKS Under Article 86 of the constitution, it is the privilege of the President to address the joint sitting of both the houses of Parliament. This usually happens on the first day of the new session of the Lok Sabha or on the first day of the session of the New Year. After Presidential address to the joint sitting of Parliament, in both the houses separately, a motion of vote of thanks is introduced by one member of that house and seconded by another member. If the motion of vote of thanks is passed, it indicates that the government enjoys a majority in that house. This is because the Presidential address deals with the aims and policies of the government. If the motion does not carry i.e. it is defeated, then it indicates that the government does not enjoy the confidence of the house. 2) NO-CONFIDENCE MOTION Article 75(3) deals with the same. It states that the Union Council of Ministers is collectively responsible to the Lok Sabha. A no-confidence motion is a formal test of the strength of the house. It is done in accordance with Rule 198 of the Rules of Procedure of Lok Sabha. It is to be moved only in the Lok Sabha. It is moved on the grounds that the House is in want of the Union of Council of Ministers. After debate and discussion, if the NCM carries (i.e. is successful), then the government (the Union Council of Ministers, headed by the Prime Minister) must resign. The motion of vote of thanks is just an indirect way of ascertaining whether the government enjoys the confidence of the House or not. If the motion is not passed, then the government does not have to resign. However, generally, a No-confidence motion is passed after the motion of vote of thanks. If the no-confidence motion is passed, then the government must resign.
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##Question:How is it ensured in Parliament that the government is enjoing majority on the floor of the house? (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE MEANS TO ENSURE THAT THE GOVERNMENT IS ENJOYING MAJORITY ON THE FLOOR OF THE HOUSE -CONCLUSION Answer:- Direct and indirect sources are deployed to ensure that the government in power is enjoying a majority in the house. The first No-confidence motion was moved by Acharya Kriplani against the Nehru government, after the 1962 war, which was defeated. Since then, many governments have faced no-confidence motions, thus emphasising the importance of majority rule in Parliament and the issue of collective responsibility. THE MEANS TO ENSURE THAT THE GOVERNMENT IS ENJOYING MAJORITY ON THE FLOOR OF THE HOUSE 1) MOTION OF THANKS Under Article 86 of the constitution, it is the privilege of the President to address the joint sitting of both the houses of Parliament. This usually happens on the first day of the new session of the Lok Sabha or on the first day of the session of the New Year. After Presidential address to the joint sitting of Parliament, in both the houses separately, a motion of vote of thanks is introduced by one member of that house and seconded by another member. If the motion of vote of thanks is passed, it indicates that the government enjoys a majority in that house. This is because the Presidential address deals with the aims and policies of the government. If the motion does not carry i.e. it is defeated, then it indicates that the government does not enjoy the confidence of the house. 2) NO-CONFIDENCE MOTION Article 75(3) deals with the same. It states that the Union Council of Ministers is collectively responsible to the Lok Sabha. A no-confidence motion is a formal test of the strength of the house. It is done in accordance with Rule 198 of the Rules of Procedure of Lok Sabha. It is to be moved only in the Lok Sabha. It is moved on the grounds that the House is in want of the Union of Council of Ministers. After debate and discussion, if the NCM carries (i.e. is successful), then the government (the Union Council of Ministers, headed by the Prime Minister) must resign. The motion of vote of thanks is just an indirect way of ascertaining whether the government enjoys the confidence of the House or not. If the motion is not passed, then the government does not have to resign. However, generally, a No-confidence motion is passed after the motion of vote of thanks. If the no-confidence motion is passed, then the government must resign.
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मूल्यह्रास से आप क्या समझते हैं?किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के पड़ने वाले प्रभाव का आकलन कीजिये| (200 शब्द) What do you think of depreciation? Measure the impact of depreciation on an economy. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में मूल्यह्रास को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| जब किसी अर्थव्यवस्था की घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है अर्थात विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि होती है| इसी प्रकार विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के मिले जुले प्रभाव होते हैं| मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव · इससे निर्यात प्रोत्साहित होता है क्योंकि विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में निर्यातक वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं, · इससे आयात हतोत्साहित होता है क्योंकि घरेलू मुद्रा के संदर्भ में आयातक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, · उपरोक्त दोनों प्रभावों के चलते मूल्यह्रास से व्यापार घाटे एवं चालू खाते के घाटे में गिरावट आती है, · विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में सेवायें सस्ती हो जाने के कारण इससे विदेशी पर्यटन एवं अंतरण अंतर्प्रवाह प्रोत्साहित होता है, · मूल्यह्रास की स्थिति में आयात घटने एवं निर्यात के बढ़ने से विदेशी पूँजी भंडार में वृद्धि होती है एवं भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार आता है| यह भुगतान संतुलन की स्थिति में स्वयं सुधार करने में सहायक है अवमूल्यन या मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव · इससे मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है क्योंकि इससे विदेशी पूँजी भण्डार बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति एवं समग्र मांग में वृद्धि होती है| · इसके कारण लागतजन्य मुद्रास्फीति भी उत्पन्न होती है क्योंकि इससे आयातक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है| · इससे घरेलू मुद्रा के सन्दर्भ में बाह्य ऋण का भार बढ़ जाता है क्योंकि इससे रूपये के मान में गिरावट आती है · इससे व्यापार शर्तों पर दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक देश की निर्यातक वस्तुओं का मान, आयातक वस्तुओं की मात्रा के सन्दर्भ में दर्शाता है| इससे संसाधनों का निकास भी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मूल्यह्रास के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं किन्तु दीर्घकाल में इसका प्रभाव प्रायः नकारात्मक होता है| इससे देश की क्रेडिट रेटिंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है|इसके अतिरिक्त मूल्यह्रास देश के संसाधनों के बहिर्प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है| इसलिए मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति के माध्यम से मूल्यह्रास पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है|
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##Question:मूल्यह्रास से आप क्या समझते हैं?किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के पड़ने वाले प्रभाव का आकलन कीजिये| (200 शब्द) What do you think of depreciation? Measure the impact of depreciation on an economy. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मूल्यह्रास को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में नियंत्रण की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की मांग आयातक, विदेश जाने वाले पर्यटक, स्वदेशी निवेशक, विदेशी निवेशकों द्वारा अपने निवेश के आहरण से भी विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है| जबकि विदेशी मुद्रा की आपूर्ति निर्यातक, विदेशी पर्यटक, विदेशी निवेशक एवं विदेशी अंतरण के माध्यम से होती है| जब किसी अर्थव्यवस्था की घरेलू मुद्रा का विनिमय दर, विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग एवं पूर्ति के आधार पर निर्धारित होता है अर्थात विनिमय दर भी मांग पूर्ति सिद्धांत से चालित होती है| किसी देश में विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होगी तो उसी के अनुरूप स्वदेशी मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है| इसमें सापेक्षिक मुद्रा जैसे डॉलर की मांग बढ़ने पर उसके मूल्य में वृद्धि होती है| इसी प्रकार विदेशी मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति में परिवर्तन होने के कारण उसके विनिमय दर में आने वाली गिरावट को मूल्यह्रास कहते हैं| किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास के मिले जुले प्रभाव होते हैं| मूल्यह्रास के सकारात्मक प्रभाव · इससे निर्यात प्रोत्साहित होता है क्योंकि विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में निर्यातक वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं, · इससे आयात हतोत्साहित होता है क्योंकि घरेलू मुद्रा के संदर्भ में आयातक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, · उपरोक्त दोनों प्रभावों के चलते मूल्यह्रास से व्यापार घाटे एवं चालू खाते के घाटे में गिरावट आती है, · विदेशी मुद्रा के सन्दर्भ में सेवायें सस्ती हो जाने के कारण इससे विदेशी पर्यटन एवं अंतरण अंतर्प्रवाह प्रोत्साहित होता है, · मूल्यह्रास की स्थिति में आयात घटने एवं निर्यात के बढ़ने से विदेशी पूँजी भंडार में वृद्धि होती है एवं भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार आता है| यह भुगतान संतुलन की स्थिति में स्वयं सुधार करने में सहायक है अवमूल्यन या मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभाव · इससे मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है क्योंकि इससे विदेशी पूँजी भण्डार बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति एवं समग्र मांग में वृद्धि होती है| · इसके कारण लागतजन्य मुद्रास्फीति भी उत्पन्न होती है क्योंकि इससे आयातक वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है| · इससे घरेलू मुद्रा के सन्दर्भ में बाह्य ऋण का भार बढ़ जाता है क्योंकि इससे रूपये के मान में गिरावट आती है · इससे व्यापार शर्तों पर दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह एक देश की निर्यातक वस्तुओं का मान, आयातक वस्तुओं की मात्रा के सन्दर्भ में दर्शाता है| इससे संसाधनों का निकास भी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मूल्यह्रास के नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं किन्तु दीर्घकाल में इसका प्रभाव प्रायः नकारात्मक होता है| इससे देश की क्रेडिट रेटिंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है|इसके अतिरिक्त मूल्यह्रास देश के संसाधनों के बहिर्प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है| इसलिए मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति के माध्यम से मूल्यह्रास पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होता है|
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Explain various stages related to the passage of bills in the Indian Parliament. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE PROCESS OF PASSAGE OF BILLS IN PARLIAMENT -CONCLUSION Answer:- A bill is a formal proposal for legislation, which if successful becomes an act or law. For example, the Transgender Equality Bill of 2014 was a private member bill. Bills can be of four types mainly- ordinary, constitutional amendment, money and financial bills. THE PASSAGE OF BILLS IN PARLIAMENT Ordinary bills can be introduced both in the Lok Sabha (LS) as well as Rajya Sabha (RS). These bills do not require the prior recommendation of the President either for introduction or for consideration. It requires the Rajya Sabha to mandatorily pass the bill. An ordinary bill is passed via the following procedure in Parliament: 1) FIRST READING- INTRODUCTION STAGE The introducer/ pioneer prepares the bill as per the prescribed format and submits it to the presiding officer with a minimum of 14 days advanced notice to scrutinize the bill. This bill may be allowed to be introduced. (A private member shall have to take a leave before introducing the bill). 1.1) GENERAL INTRODUCTION As per convention, the introducer makes a general introduction of the Bill in the House. No detailed debate or discussion is allowed at this stage. Therefore, no bill is rejected at this stage. However, a full discussion on the bill can be allowed if objections are raised on the legislative competence of the House to discuss such a bill. 1.2) REFERENCE TO A STANDING COMMITTEE The bill can be referred to a Parliamentary Standing Committee for its consideration before any further steps. 1.3) CIRCULATION OF THE COPY OF THE BILL A copy of the bill with explanatory notes may be circulated among the members and the bill shall be sent to the publication department to be published in the Gazette of India. 2) SECOND READING Two methods can be adapted to pass such a bill a) The bill can be passed by guillotine. or b) The Bill could be referred to a Parliamentary standing committee for its opinion, which gives the opinion of the House. 3 months is given for obtaining such opinion (starting from the 14th Ls). This opinion is not binding. 2.2) CLAUSE BY CLAUSE READING Every word or clause may be debated and discussed at this stage. Amendments to the bill are also introduced, debated, discussed and voted upon. 2.3) VOTING At the end of this stage, voting is done in accordance with Article 110 of the constitution and Rule 367 of the Procedure and Conduct of Business of the House. Voting may happen by voice votes or as per division. If at the end of the voting, there are more Ayes than No’s, then the bill shall be deemed to be passed at this stage 3) THIRD READING This is usually a formality stage. Only verbal or technical amendments are made at this stage. Usually, no bill is rejected at this stage. Once the third reading is crossed, the bill is deemed to have passed the introducing house. The bill is then transmitted to the other house and subject to similar proceedings there. After this, the bill is sent to the President. He can use his veto powers. This is the procedure for passing ordinary bills, which changes slightly while passing the other types of bill.
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##Question:Explain various stages related to the passage of bills in the Indian Parliament. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE PROCESS OF PASSAGE OF BILLS IN PARLIAMENT -CONCLUSION Answer:- A bill is a formal proposal for legislation, which if successful becomes an act or law. For example, the Transgender Equality Bill of 2014 was a private member bill. Bills can be of four types mainly- ordinary, constitutional amendment, money and financial bills. THE PASSAGE OF BILLS IN PARLIAMENT Ordinary bills can be introduced both in the Lok Sabha (LS) as well as Rajya Sabha (RS). These bills do not require the prior recommendation of the President either for introduction or for consideration. It requires the Rajya Sabha to mandatorily pass the bill. An ordinary bill is passed via the following procedure in Parliament: 1) FIRST READING- INTRODUCTION STAGE The introducer/ pioneer prepares the bill as per the prescribed format and submits it to the presiding officer with a minimum of 14 days advanced notice to scrutinize the bill. This bill may be allowed to be introduced. (A private member shall have to take a leave before introducing the bill). 1.1) GENERAL INTRODUCTION As per convention, the introducer makes a general introduction of the Bill in the House. No detailed debate or discussion is allowed at this stage. Therefore, no bill is rejected at this stage. However, a full discussion on the bill can be allowed if objections are raised on the legislative competence of the House to discuss such a bill. 1.2) REFERENCE TO A STANDING COMMITTEE The bill can be referred to a Parliamentary Standing Committee for its consideration before any further steps. 1.3) CIRCULATION OF THE COPY OF THE BILL A copy of the bill with explanatory notes may be circulated among the members and the bill shall be sent to the publication department to be published in the Gazette of India. 2) SECOND READING Two methods can be adapted to pass such a bill a) The bill can be passed by guillotine. or b) The Bill could be referred to a Parliamentary standing committee for its opinion, which gives the opinion of the House. 3 months is given for obtaining such opinion (starting from the 14th Ls). This opinion is not binding. 2.2) CLAUSE BY CLAUSE READING Every word or clause may be debated and discussed at this stage. Amendments to the bill are also introduced, debated, discussed and voted upon. 2.3) VOTING At the end of this stage, voting is done in accordance with Article 110 of the constitution and Rule 367 of the Procedure and Conduct of Business of the House. Voting may happen by voice votes or as per division. If at the end of the voting, there are more Ayes than No’s, then the bill shall be deemed to be passed at this stage 3) THIRD READING This is usually a formality stage. Only verbal or technical amendments are made at this stage. Usually, no bill is rejected at this stage. Once the third reading is crossed, the bill is deemed to have passed the introducing house. The bill is then transmitted to the other house and subject to similar proceedings there. After this, the bill is sent to the President. He can use his veto powers. This is the procedure for passing ordinary bills, which changes slightly while passing the other types of bill.
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दोहरा कराधान परिहार समझौते(DTAA) से आप क्या समझते हैं? DTAA के लाभों को स्पष्ट करते हुये हाल ही में साइप्रस, सिंगापुर और मारीशस के साथ संपन्न DTAA मे भारत सरकार द्वारा किये गये परिवर्तनों को रखांकित कीजिये| (200 शब्द) What Do You understand by Double Taxation Avoidance Agreement (DTAA)? Recognize the benefits of the DTAA. Also point out Recent changes made by the Government of India in DTAA endowed with Cyprus, Singapore and Mauritius. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में DTAA को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में DTAA के लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे खंड में साइप्रस, सिंगापुर और मारीशस के साथ संपन्न DTAA मे भारत सरकार द्वारा किये गये परिवर्तनों को रखांकित कीजिये 4- अंतिम में DTAA के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये दोहरा कराधान परिहार समझौते(DTAA) दो या दो से अधिक देशों के बीच हस्ताक्षरित एक कर संधि है|इसका प्रमुख उद्देश्य करदाताओं को एक ही आय पर दो बार कर लगाने से बचाना होता है| कर देने वालाएक देश में रहता है तथा दूसरे देश में आय अर्जित करता है तो DTAA की प्रभावी भूमिका होती है|DTAA का लक्ष्य दोहरे कराधान पर राहत प्रधान करके देश को एक आकर्षक निवेश गंतव्य बनाना है|इस तरह की राहत निवासी देश में कर से विदेश में अर्जित आय को छूट दे कर प्रदान की जाती है , या विदेशों में पहले से ही जितने कर का भुगतान किया गया है उतनी छूट दे कर बाकी कर वसूल लिया जाता है| DTAA के लाभ · DTAA निवेशकों का दोहरे कराधान से अनुरक्षण करता है · इस तरह के समझौते द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय निवेश को प्रोत्साहित करते हैं · यह निवेश रिजीम में अधिकाधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करता है · DTAA से निवेश की राउंड ट्रिपिंग जैसी समस्याओं का प्रभाव कम हो जाता है, और · DTAA विश्व व्यापार के प्रोत्साहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है आदि| भारत और DTAA · भारत के आयकर अधिनियम 1961 के तहत दो प्रावधान सेक्शन 90 एवं 91 करदाताओं को दोहरे कराधान से बचाने के लिए विशिष्ट राहत प्रदान करते हैं| · जहाँ धारा 90 उन करदाताओं के लिए है जिन्होंने उन देशों को कर का भुगतान किया है जिसके साथ भारत ने DTAA पर हस्ताक्षर किये हैं · वहीं धारा 91 उन कर दाताओं को राहत देती है जिन्होंने उस देश को कर का भुगतान किया है जिसके साथ भारत ने DTAA पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं| · इस प्रकार भारत दोनों प्रकार के करदाताओं को राहत देता है| · DTAA कुछ मामलों में कर की रियायती दरों के लिए भी प्रावधान करते हैं जैसे कि NRI बैंक जमा पर ब्याज द्वारा अर्जित आय पर 30 % टैक्स लगाया गया है(TDS)लेकिन भारत द्वारा हस्ताक्षर कुछ DTAA के अंतर्गत कर की दरों में भी राहत प्रदान की गयी है जैसे कि 30% के स्थान पर 10 से 15 % कर की दर आरोपित करना आदि| · आयकर अधिनियम 1961 के प्रावधानों के अनुरूप भारत द्वारा 80 से ज्यादा देशों के साथ यह DTAA समझौते/संधि की गयी है जैसे ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि| अभी हाल ही में भारत द्वारा मारीशस, सायप्रस और सिंगापुर के साथ की गयी DTAA संधि में कुछ परिवर्तन किये गए हैं जो निम्नलिखित हैं- मॉरिशस का मामला एक मॉरिशस आधारित कंपनी को अप्रैल 2017 से भारत में एक कंपनी के शेयर बेचते समय यहाँ पूंजीगत लाभ कर का भुगतान करना होता था इसके अतिरिक्त यदि वह कंपनी लाभ की सीमा(LOB) की शर्तों को पूरा करती है तो 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2019 तक 50 % पूंजीगत लाभ कर की दर पर छुट प्रदानकी गयी है साइप्रस का मामला सायप्रस के सन्दर्भ में संशोधित DTAA संधि में लाभ की सीमा(LOB) नामक क्लॉज़ अनुपस्थित है | क्योंकि सायप्रस के माध्यम से भारत में निवेश पर और भारत से निवेश बाहर जाने पर कर लगाया जा सकता है, 1 अप्रैल 2017 से पहले किये गये निवेशों के लिए ग्रैंडफादर क्लॉज़ प्रदान किया गया है | इसमें पूंजीगत लाभ पर कर वहां लगाया जायेगा जहाँ का करदाता निवासी है, सिंगापुर का मामला सिंगापुर के साथ किये गए DTAA में 30 दिसम्बर 2016 को संशोधन किया गया जिसके अंतर्गत 1 अप्रैल 2017 से शुरू होने वाले प्रचलित घरेलू कर की 50 % राशि पर पूंजीगत लाभ कर लगाया जायेगा और 1 अप्रैल 2019 से 100 % पर पूंजीगत लाभ कर लगाया जायेगा, निवेशकों में विश्वास वृद्धि के लिए 1 अप्रैल 2017 से पहले किये गये शेयरों में निवेश 2005 के प्रोटोकॉल के अनुसार लाभ की सीमा(LOB) क्लॉज़ में यदि शर्तों को पूरा किया जाता है तो निवेश को ग्रैंडफादरिंग(पूर्वगामी नियमों के आधार पर संचालन) कर दिया जायेगा| इस तरह स्पष्ट होता है कि भारत द्वारा प्रमुख निवेशक देशों के साथ अपने दोहरे कराधान परिहार समझौतों को अद्यतन कर राष्ट्रीय आर्थिक हितों के अनुरूप बनाया गया है| यहाँ भारत का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में निवेश के अंतर्प्रवाह को बढाने के साथ ही साथ कर योग्य निवेश के माध्यम से राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि करना है| ध्यातव्य है कि उपरोक्त देश भारत में विदेशी निवेश के प्रमुख स्रोत राष्ट्र है|
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##Question:दोहरा कराधान परिहार समझौते(DTAA) से आप क्या समझते हैं? DTAA के लाभों को स्पष्ट करते हुये हाल ही में साइप्रस, सिंगापुर और मारीशस के साथ संपन्न DTAA मे भारत सरकार द्वारा किये गये परिवर्तनों को रखांकित कीजिये| (200 शब्द) What Do You understand by Double Taxation Avoidance Agreement (DTAA)? Recognize the benefits of the DTAA. Also point out Recent changes made by the Government of India in DTAA endowed with Cyprus, Singapore and Mauritius. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में DTAA को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में DTAA के लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे खंड में साइप्रस, सिंगापुर और मारीशस के साथ संपन्न DTAA मे भारत सरकार द्वारा किये गये परिवर्तनों को रखांकित कीजिये 4- अंतिम में DTAA के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये दोहरा कराधान परिहार समझौते(DTAA) दो या दो से अधिक देशों के बीच हस्ताक्षरित एक कर संधि है|इसका प्रमुख उद्देश्य करदाताओं को एक ही आय पर दो बार कर लगाने से बचाना होता है| कर देने वालाएक देश में रहता है तथा दूसरे देश में आय अर्जित करता है तो DTAA की प्रभावी भूमिका होती है|DTAA का लक्ष्य दोहरे कराधान पर राहत प्रधान करके देश को एक आकर्षक निवेश गंतव्य बनाना है|इस तरह की राहत निवासी देश में कर से विदेश में अर्जित आय को छूट दे कर प्रदान की जाती है , या विदेशों में पहले से ही जितने कर का भुगतान किया गया है उतनी छूट दे कर बाकी कर वसूल लिया जाता है| DTAA के लाभ · DTAA निवेशकों का दोहरे कराधान से अनुरक्षण करता है · इस तरह के समझौते द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय निवेश को प्रोत्साहित करते हैं · यह निवेश रिजीम में अधिकाधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करता है · DTAA से निवेश की राउंड ट्रिपिंग जैसी समस्याओं का प्रभाव कम हो जाता है, और · DTAA विश्व व्यापार के प्रोत्साहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है आदि| भारत और DTAA · भारत के आयकर अधिनियम 1961 के तहत दो प्रावधान सेक्शन 90 एवं 91 करदाताओं को दोहरे कराधान से बचाने के लिए विशिष्ट राहत प्रदान करते हैं| · जहाँ धारा 90 उन करदाताओं के लिए है जिन्होंने उन देशों को कर का भुगतान किया है जिसके साथ भारत ने DTAA पर हस्ताक्षर किये हैं · वहीं धारा 91 उन कर दाताओं को राहत देती है जिन्होंने उस देश को कर का भुगतान किया है जिसके साथ भारत ने DTAA पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं| · इस प्रकार भारत दोनों प्रकार के करदाताओं को राहत देता है| · DTAA कुछ मामलों में कर की रियायती दरों के लिए भी प्रावधान करते हैं जैसे कि NRI बैंक जमा पर ब्याज द्वारा अर्जित आय पर 30 % टैक्स लगाया गया है(TDS)लेकिन भारत द्वारा हस्ताक्षर कुछ DTAA के अंतर्गत कर की दरों में भी राहत प्रदान की गयी है जैसे कि 30% के स्थान पर 10 से 15 % कर की दर आरोपित करना आदि| · आयकर अधिनियम 1961 के प्रावधानों के अनुरूप भारत द्वारा 80 से ज्यादा देशों के साथ यह DTAA समझौते/संधि की गयी है जैसे ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि| अभी हाल ही में भारत द्वारा मारीशस, सायप्रस और सिंगापुर के साथ की गयी DTAA संधि में कुछ परिवर्तन किये गए हैं जो निम्नलिखित हैं- मॉरिशस का मामला एक मॉरिशस आधारित कंपनी को अप्रैल 2017 से भारत में एक कंपनी के शेयर बेचते समय यहाँ पूंजीगत लाभ कर का भुगतान करना होता था इसके अतिरिक्त यदि वह कंपनी लाभ की सीमा(LOB) की शर्तों को पूरा करती है तो 1 अप्रैल 2017 से 31 मार्च 2019 तक 50 % पूंजीगत लाभ कर की दर पर छुट प्रदानकी गयी है साइप्रस का मामला सायप्रस के सन्दर्भ में संशोधित DTAA संधि में लाभ की सीमा(LOB) नामक क्लॉज़ अनुपस्थित है | क्योंकि सायप्रस के माध्यम से भारत में निवेश पर और भारत से निवेश बाहर जाने पर कर लगाया जा सकता है, 1 अप्रैल 2017 से पहले किये गये निवेशों के लिए ग्रैंडफादर क्लॉज़ प्रदान किया गया है | इसमें पूंजीगत लाभ पर कर वहां लगाया जायेगा जहाँ का करदाता निवासी है, सिंगापुर का मामला सिंगापुर के साथ किये गए DTAA में 30 दिसम्बर 2016 को संशोधन किया गया जिसके अंतर्गत 1 अप्रैल 2017 से शुरू होने वाले प्रचलित घरेलू कर की 50 % राशि पर पूंजीगत लाभ कर लगाया जायेगा और 1 अप्रैल 2019 से 100 % पर पूंजीगत लाभ कर लगाया जायेगा, निवेशकों में विश्वास वृद्धि के लिए 1 अप्रैल 2017 से पहले किये गये शेयरों में निवेश 2005 के प्रोटोकॉल के अनुसार लाभ की सीमा(LOB) क्लॉज़ में यदि शर्तों को पूरा किया जाता है तो निवेश को ग्रैंडफादरिंग(पूर्वगामी नियमों के आधार पर संचालन) कर दिया जायेगा| इस तरह स्पष्ट होता है कि भारत द्वारा प्रमुख निवेशक देशों के साथ अपने दोहरे कराधान परिहार समझौतों को अद्यतन कर राष्ट्रीय आर्थिक हितों के अनुरूप बनाया गया है| यहाँ भारत का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में निवेश के अंतर्प्रवाह को बढाने के साथ ही साथ कर योग्य निवेश के माध्यम से राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि करना है| ध्यातव्य है कि उपरोक्त देश भारत में विदेशी निवेश के प्रमुख स्रोत राष्ट्र है|
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महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत भूगोल के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, किन्तु यह सिद्धांत सीमाओं से मुक्त नही है| टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द, अंक - 10 ) The theory of continental drift is an important principle in the study of geography, but this theory is not free of limitations. Make a comment (150-200 words, Marks - 10 )
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन जर्मन भूगोलवेत्ता अल्फ्रेड वेगनर द्वारा किया गया था| वेगनर द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार कार्बनिफेरस युग में पृथ्वी का समस्त भूभाग आपस में एक पिंड के रूप में जुड़ा हुआ था| वेगेनर ने इस एकत्रित भूभाग को पैंजिया नाम दिया| इस पैंजिया के चारों ओर एक विशाल जल भाग था, जिसका नामकरण वेगनर द्वारा पैंथालासा के रूप में किया| पैंजिया के उत्तरी भाग को लारेशिया अथवा अंगारालैंड तथा दक्षिणी भाग गोण्डवानालैंड की संज्ञा दी गयी| महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार कालान्तर में पैंजिया का विखंडन हो गया तथा स्थल भाग जो अब तक एक दूसरे से जुड़ा हुआ था, अलग-अलग टुकड़ों में टूट गया और यह विभाजन दो दिशाओं में प्रवाह के रूप में हुआ। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार उत्तर की ओर या भूमध्यरेखा की ओर प्रवाह गुरुत्व बल तथा प्लवनबल द्वारा हुआ, जबकि पश्चिम की ओर प्रवाह का कारण सूर्य तथा चंद्रमा के ज्वारीय बल को माना गया है। परिणामस्वरूप महासागरों तथा महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ| इस सन्दर्भ में वेगेनर द्वारा विभिन्न प्रमाण दिए गए हैं| महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का महत्त्व · महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का मूल आधार है, · भूगोल विषय के अंतर्गत प्लेट विवर्तनिकी के माध्यम से प्रमुख भूआकृतियों जैसे पर्वत,पठार आदि उत्पत्ति की व्याख्या की जा सकती है, · प्लेट विवर्तनिकी के आधार पर कुछ भूगार्भिक घटनाओं जैसे ज्वालामुखी और भूकम्प की घटनाओं और उनके प्रभाव की व्याख्या की जा सकती है, · इस सिद्धांत के माध्यम से पृथ्वी की आंतरिक हलचलों का धरातलीय प्रभाव समझने में सहायता मिलती है, · इस दृष्टिकोण से एक विषय के रूप में भूगोल के विकास में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है| वेगनर के सिद्धांत की सीमाएं वेगनर ने अपनी व्याख्या के दौरान पैंजिया से पूर्व की स्थिति पर कोई चर्चा नहीं किया है| इसके अतिरिक्त पैंजिया के विघटन का काल कार्बनीफेरस ही क्यों रहा इस पर वेगनर द्वारा कोई टिप्पणी नही की गयी है सबसे बड़ी आलोचना विघटन के लिए जो वेगनर ने जो बल(विषुवतीय क्षेत्र का गुरुत्व बल और चन्द्रमा का बल) को लिया उसकी हुई है क्योंकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण बल अधिक नही होता है| परवर्ती भूगोलवेत्ताओं ने यह माना कि यदि बल होता भी तो तो वह महाद्वीपीय विस्थापन के लिए अपर्याप्त होता इसके अतिरिक्त, वेगनर की व्याख्या में एक और बहुत बड़ी कमी है| यदि यह मान भी लिया जाए की विषुवतीय क्षेत्र संचलन का कारण था तो फिर अफ्रीका जैसे महाद्वीप अथवा प्रायद्वीपीय भारत विषुवत रेखा को पार करके उत्तरी गोलार्ध में कैसे पहुच गए| महाद्वीपों के पश्चिम की ओर संचलन की व्याख्या करते हुए वेगनर ने चन्द्रमा द्वारा गुरुत्वाकर्षण बल के अंतर की सहायता ली है| वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महाद्वीप जैसे बड़े निकाय/क्षेत्र के विस्थापन के लिए गुरुत्वाकर्षण बल कभी पर्याप्त नही हो सकता है| बाद के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि विस्थापन के लिए आवश्यक बल यदि चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण हो तो वह पृथ्वी के घूर्णन को ही रोक देगा| इसके अतिरिक्त महाद्वीप तथा महासागर के बीच की दुरी का अंतर स्पष्ट गुरुत्वाकर्षण बल में अंतर के लिए पर्याप्त नही है| यदि इस बल को मान भी लिया जाए तो वेगनर की व्याख्या में अनेक त्रुटियाँ प्राप्त होती हैं यथा, सभी महाद्वीप पश्चिम की ओर विस्थापित क्यों नही हुए, दोनों अमेरिका अफ्रीका तथा यूरोप से कैसे अलग हुए, प्राय्दीपीय भारत तथा ऑस्ट्रेलिया का पूर्व की ओर संचलन इत्यादि यह दर्शाता है कि वेगनर की व्याख्या का आधार तार्किक नही बल्कि काल्पनिक था| वेगनर द्वारा दिए गए अधिकतर साक्ष्यों को एक संयोग माना जा सकता है जैसे अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों की आकृति पूर्ण रूप से कटे हुए भाग का हिस्सा नही लगती है, भूगार्भिक समानताओं में भी स्पष्टता नहीं है, इसकेअतिरिक्त जीवाश्मों का पाया जाना भी एक संयोग हो सकता है क्योंकि वेगनर के समय तक मानव विज्ञान की जानकारी बहुत कम थी तथा पृथ्वी के इतिहास में जलवायु परिवर्तन और उससे सम्बन्धित परिणाम कोई असाधारण बात नही थी| इस प्रकार हम देखते हैं कि महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के सन्दर्भ में वेगेनर महोदय द्वारा दिए गए तर्क कमजोर प्रतीत होते हैं और सिद्धांत के सन्दर्भ में दिए गए प्रमाणों की एक सीमा है| इन कारणों से महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की समग्रता प्रभावित होती है| फिर भी इस सिद्धांत का महत्त्व इस तथ्य में है कि इस सिद्धांत ने भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है|
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##Question:महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत भूगोल के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, किन्तु यह सिद्धांत सीमाओं से मुक्त नही है| टिप्पणी कीजिये| (150-200 शब्द, अंक - 10 ) The theory of continental drift is an important principle in the study of geography, but this theory is not free of limitations. Make a comment (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन जर्मन भूगोलवेत्ता अल्फ्रेड वेगनर द्वारा किया गया था| वेगनर द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार कार्बनिफेरस युग में पृथ्वी का समस्त भूभाग आपस में एक पिंड के रूप में जुड़ा हुआ था| वेगेनर ने इस एकत्रित भूभाग को पैंजिया नाम दिया| इस पैंजिया के चारों ओर एक विशाल जल भाग था, जिसका नामकरण वेगनर द्वारा पैंथालासा के रूप में किया| पैंजिया के उत्तरी भाग को लारेशिया अथवा अंगारालैंड तथा दक्षिणी भाग गोण्डवानालैंड की संज्ञा दी गयी| महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार कालान्तर में पैंजिया का विखंडन हो गया तथा स्थल भाग जो अब तक एक दूसरे से जुड़ा हुआ था, अलग-अलग टुकड़ों में टूट गया और यह विभाजन दो दिशाओं में प्रवाह के रूप में हुआ। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुसार उत्तर की ओर या भूमध्यरेखा की ओर प्रवाह गुरुत्व बल तथा प्लवनबल द्वारा हुआ, जबकि पश्चिम की ओर प्रवाह का कारण सूर्य तथा चंद्रमा के ज्वारीय बल को माना गया है। परिणामस्वरूप महासागरों तथा महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ| इस सन्दर्भ में वेगेनर द्वारा विभिन्न प्रमाण दिए गए हैं| महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत का महत्त्व · महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का मूल आधार है, · भूगोल विषय के अंतर्गत प्लेट विवर्तनिकी के माध्यम से प्रमुख भूआकृतियों जैसे पर्वत,पठार आदि उत्पत्ति की व्याख्या की जा सकती है, · प्लेट विवर्तनिकी के आधार पर कुछ भूगार्भिक घटनाओं जैसे ज्वालामुखी और भूकम्प की घटनाओं और उनके प्रभाव की व्याख्या की जा सकती है, · इस सिद्धांत के माध्यम से पृथ्वी की आंतरिक हलचलों का धरातलीय प्रभाव समझने में सहायता मिलती है, · इस दृष्टिकोण से एक विषय के रूप में भूगोल के विकास में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है| वेगनर के सिद्धांत की सीमाएं वेगनर ने अपनी व्याख्या के दौरान पैंजिया से पूर्व की स्थिति पर कोई चर्चा नहीं किया है| इसके अतिरिक्त पैंजिया के विघटन का काल कार्बनीफेरस ही क्यों रहा इस पर वेगनर द्वारा कोई टिप्पणी नही की गयी है सबसे बड़ी आलोचना विघटन के लिए जो वेगनर ने जो बल(विषुवतीय क्षेत्र का गुरुत्व बल और चन्द्रमा का बल) को लिया उसकी हुई है क्योंकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण बल अधिक नही होता है| परवर्ती भूगोलवेत्ताओं ने यह माना कि यदि बल होता भी तो तो वह महाद्वीपीय विस्थापन के लिए अपर्याप्त होता इसके अतिरिक्त, वेगनर की व्याख्या में एक और बहुत बड़ी कमी है| यदि यह मान भी लिया जाए की विषुवतीय क्षेत्र संचलन का कारण था तो फिर अफ्रीका जैसे महाद्वीप अथवा प्रायद्वीपीय भारत विषुवत रेखा को पार करके उत्तरी गोलार्ध में कैसे पहुच गए| महाद्वीपों के पश्चिम की ओर संचलन की व्याख्या करते हुए वेगनर ने चन्द्रमा द्वारा गुरुत्वाकर्षण बल के अंतर की सहायता ली है| वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महाद्वीप जैसे बड़े निकाय/क्षेत्र के विस्थापन के लिए गुरुत्वाकर्षण बल कभी पर्याप्त नही हो सकता है| बाद के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि विस्थापन के लिए आवश्यक बल यदि चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण हो तो वह पृथ्वी के घूर्णन को ही रोक देगा| इसके अतिरिक्त महाद्वीप तथा महासागर के बीच की दुरी का अंतर स्पष्ट गुरुत्वाकर्षण बल में अंतर के लिए पर्याप्त नही है| यदि इस बल को मान भी लिया जाए तो वेगनर की व्याख्या में अनेक त्रुटियाँ प्राप्त होती हैं यथा, सभी महाद्वीप पश्चिम की ओर विस्थापित क्यों नही हुए, दोनों अमेरिका अफ्रीका तथा यूरोप से कैसे अलग हुए, प्राय्दीपीय भारत तथा ऑस्ट्रेलिया का पूर्व की ओर संचलन इत्यादि यह दर्शाता है कि वेगनर की व्याख्या का आधार तार्किक नही बल्कि काल्पनिक था| वेगनर द्वारा दिए गए अधिकतर साक्ष्यों को एक संयोग माना जा सकता है जैसे अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों की आकृति पूर्ण रूप से कटे हुए भाग का हिस्सा नही लगती है, भूगार्भिक समानताओं में भी स्पष्टता नहीं है, इसकेअतिरिक्त जीवाश्मों का पाया जाना भी एक संयोग हो सकता है क्योंकि वेगनर के समय तक मानव विज्ञान की जानकारी बहुत कम थी तथा पृथ्वी के इतिहास में जलवायु परिवर्तन और उससे सम्बन्धित परिणाम कोई असाधारण बात नही थी| इस प्रकार हम देखते हैं कि महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के सन्दर्भ में वेगेनर महोदय द्वारा दिए गए तर्क कमजोर प्रतीत होते हैं और सिद्धांत के सन्दर्भ में दिए गए प्रमाणों की एक सीमा है| इन कारणों से महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की समग्रता प्रभावित होती है| फिर भी इस सिद्धांत का महत्त्व इस तथ्य में है कि इस सिद्धांत ने भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है|
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स्वतंत्रन्यायपालिका की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में किये गए प्रावधानों चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the need for an independent judiciary. Discuss the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the judiciary. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में स्वतंत्र न्यायपालिका को परिभाषित करते हुए आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में न्यायिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में संवैधानिक उपबन्धों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में न्यापालिका की स्वतंत्रता का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हर समाज के सुचारू संचालन में न्यायपालिका की महत्वूर्ण भूमिका होती है क्योंकि न्यायपालिका समाज में विधि का शासन सुनिश्चित करती है| विधि के शासन का अर्थ यह है कि समाज के सभी वर्गों पर एक समान विधियां लागू हों| न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यायपालिका जहाँ एक ओर व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करती है वहीँ उपलब्ध विधियों के आधार पर विवादों का समाधान करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इसके लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है| न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है की न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय अथवा भेदभाव के न्याय कर सकें| भारत में सर्वोच्च न्यायालय(SC) एवं उच्च न्यायालय(HC) को निर्भीक रूप से कानून की रक्षा करने और सम्बन्धित दायित्व का निर्वहन करने के लिए उन्हें कार्यपालिका एवं विधायिका की अनावश्यक दखल से मुक्त रखने की व्यवस्था की गयी है| इनमें कुछ संवैधानिक उपबन्ध हैं तो कुछ न्यायपालिका की व्याख्या पर आधारित हैं| संविधान में किये गए प्रावधान · SC एवं HC के जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती है जिससे इस नियुक्ति में राजनीतिक दखल न हो · जजों द्वारा दिए गए निर्णय में यदि कोई दोष है तो भी इसे कदाचार नहीं माना जाएगा अर्थात इसके आधार पर जजों को दंडित नही किया जा सकता|अनुच्छेद 137 के अंतर्गत अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है और उसे पलट सकता है| वर्ष 2001 में हुर्रा बनाम हुर्रा मामलें में SC ने निदानकारी याचिका की व्यवस्था की अर्थात यदि SC की किसी पीठ ने अपने किसी निर्णय में कोई गलती कर दी है तो इस याचिका के माध्यम से इस न्यायालय की दूसरी पीठ इस गलती को सुधार सकती है| · SC और HC के जज अपने पर पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नही रहते बल्कि वे संविधान के अंतर्गत प्राप्त उन्मुक्तियों के आधार पर अपने पद बने रहते हैं| · इस सम्बन्ध में जज जांच अधिनियम 1968 को आधार बनाया जाता है जिसके अनुसार SC व HC के जज को अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत केवल 2 ही आरोप लगने की स्थिति में हटाया जा सकता है यथा सिद्ध कदाचार एवं शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता| · जब किसी जज पर आरोप लगाया जाएगा तो उसे हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव को पहले संसद किसी सदन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा| यदि यह प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार होगा और यदि इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार किया जाएगा| · एक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने के बाद जब यह अपने दूसरे सदन में प्रेषित किया जाएगा तो उस सदन में विचारार्थ स्वीकार किये जाने के पहले एक तीन सदस्यीय समिति इन आरोपों की जांच करेगी| · इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज, किसी HC के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश और एक विधि वेत्ता होंगे| 2:1 के बहुमत से यदि यह समिति उपरोक्त आरोपों को सही पाती है तो उसके आधार पर दूसरे सदन में भी उपरोक्त प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित किया जाएगा| इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा| राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही उसी क्षण उक्त जज अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा| स्पष्ट है की जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और इसका उद्देश्य जजों को स्वतंत्रता प्रदान करना है| · SC एवं HC के जजों के वेतन एवं भत्ते में वित्तीय आपात के अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में कटौती नही की जा सकती|पुनः इन जजों के वेतन और भत्ते तथा इनके कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन और भत्ते अनुच्छेद 112(3) के अंतर्गत भारित व्यय में रखे गए हैं अर्थात संसद इन पर मतदान नहीं कर सकती| · अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार SC एवं HC के जजों के आचरण पर संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर कोई बहस नहीं की जा सकती है| · जजों की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए SC का सेवा निवृत्त जज भारत की किसी भी अदालत में प्रैक्टिस नही कर सकता है| इसी प्रकार HC के जज केवल उसी HC में प्रैक्टिस कर सकते हैं जहाँ वे जज नही रहे हैं अथवा SC में प्रैक्टिस कर सकते हैं · SC को अनुच्छेद 129. 141 और 142 के अंतर्गत तथा HC के जज को अनुच्छेद 215 के अंतर्गत अपने फैसले की अवमानना करने वाले किसी भी भारतीय या भारतीय पदाधिकारी को दंडित करने का आधिकार है · पश्चिम बंगाल बनाम भारत संघ 1963 में न्यायपालिका का निर्णय था कि न्यायालय किसी भी विवाद पर फैसला देने के लिए बाध्य नहीं होते| वे चाहें तो केवल उन्ही मामलों में फैसला दें जिसमें कोई कानूनी अधिकार सन्निहित हो| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया गया है| भारत में सरकार के अंगों में स्थापित संतुलन न्यापालिका की अक्षुण्ण स्वतंत्रता के कारण है|इस तरह न्यायपालिका भारत में विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इस प्रकार स्वतंत्र भारतीय न्यायपालिका अपने औचित्य को सिद्ध करती है |
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##Question:स्वतंत्रन्यायपालिका की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में किये गए प्रावधानों चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the need for an independent judiciary. Discuss the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the judiciary. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में स्वतंत्र न्यायपालिका को परिभाषित करते हुए आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में न्यायिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में संवैधानिक उपबन्धों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में न्यापालिका की स्वतंत्रता का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हर समाज के सुचारू संचालन में न्यायपालिका की महत्वूर्ण भूमिका होती है क्योंकि न्यायपालिका समाज में विधि का शासन सुनिश्चित करती है| विधि के शासन का अर्थ यह है कि समाज के सभी वर्गों पर एक समान विधियां लागू हों| न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यायपालिका जहाँ एक ओर व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करती है वहीँ उपलब्ध विधियों के आधार पर विवादों का समाधान करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इसके लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है| न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है की न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय अथवा भेदभाव के न्याय कर सकें| भारत में सर्वोच्च न्यायालय(SC) एवं उच्च न्यायालय(HC) को निर्भीक रूप से कानून की रक्षा करने और सम्बन्धित दायित्व का निर्वहन करने के लिए उन्हें कार्यपालिका एवं विधायिका की अनावश्यक दखल से मुक्त रखने की व्यवस्था की गयी है| इनमें कुछ संवैधानिक उपबन्ध हैं तो कुछ न्यायपालिका की व्याख्या पर आधारित हैं| संविधान में किये गए प्रावधान · SC एवं HC के जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती है जिससे इस नियुक्ति में राजनीतिक दखल न हो · जजों द्वारा दिए गए निर्णय में यदि कोई दोष है तो भी इसे कदाचार नहीं माना जाएगा अर्थात इसके आधार पर जजों को दंडित नही किया जा सकता|अनुच्छेद 137 के अंतर्गत अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है और उसे पलट सकता है| वर्ष 2001 में हुर्रा बनाम हुर्रा मामलें में SC ने निदानकारी याचिका की व्यवस्था की अर्थात यदि SC की किसी पीठ ने अपने किसी निर्णय में कोई गलती कर दी है तो इस याचिका के माध्यम से इस न्यायालय की दूसरी पीठ इस गलती को सुधार सकती है| · SC और HC के जज अपने पर पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नही रहते बल्कि वे संविधान के अंतर्गत प्राप्त उन्मुक्तियों के आधार पर अपने पद बने रहते हैं| · इस सम्बन्ध में जज जांच अधिनियम 1968 को आधार बनाया जाता है जिसके अनुसार SC व HC के जज को अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत केवल 2 ही आरोप लगने की स्थिति में हटाया जा सकता है यथा सिद्ध कदाचार एवं शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता| · जब किसी जज पर आरोप लगाया जाएगा तो उसे हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव को पहले संसद किसी सदन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा| यदि यह प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार होगा और यदि इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार किया जाएगा| · एक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने के बाद जब यह अपने दूसरे सदन में प्रेषित किया जाएगा तो उस सदन में विचारार्थ स्वीकार किये जाने के पहले एक तीन सदस्यीय समिति इन आरोपों की जांच करेगी| · इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज, किसी HC के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश और एक विधि वेत्ता होंगे| 2:1 के बहुमत से यदि यह समिति उपरोक्त आरोपों को सही पाती है तो उसके आधार पर दूसरे सदन में भी उपरोक्त प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित किया जाएगा| इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा| राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही उसी क्षण उक्त जज अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा| स्पष्ट है की जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और इसका उद्देश्य जजों को स्वतंत्रता प्रदान करना है| · SC एवं HC के जजों के वेतन एवं भत्ते में वित्तीय आपात के अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में कटौती नही की जा सकती|पुनः इन जजों के वेतन और भत्ते तथा इनके कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन और भत्ते अनुच्छेद 112(3) के अंतर्गत भारित व्यय में रखे गए हैं अर्थात संसद इन पर मतदान नहीं कर सकती| · अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार SC एवं HC के जजों के आचरण पर संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर कोई बहस नहीं की जा सकती है| · जजों की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए SC का सेवा निवृत्त जज भारत की किसी भी अदालत में प्रैक्टिस नही कर सकता है| इसी प्रकार HC के जज केवल उसी HC में प्रैक्टिस कर सकते हैं जहाँ वे जज नही रहे हैं अथवा SC में प्रैक्टिस कर सकते हैं · SC को अनुच्छेद 129. 141 और 142 के अंतर्गत तथा HC के जज को अनुच्छेद 215 के अंतर्गत अपने फैसले की अवमानना करने वाले किसी भी भारतीय या भारतीय पदाधिकारी को दंडित करने का आधिकार है · पश्चिम बंगाल बनाम भारत संघ 1963 में न्यायपालिका का निर्णय था कि न्यायालय किसी भी विवाद पर फैसला देने के लिए बाध्य नहीं होते| वे चाहें तो केवल उन्ही मामलों में फैसला दें जिसमें कोई कानूनी अधिकार सन्निहित हो| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया गया है| भारत में सरकार के अंगों में स्थापित संतुलन न्यापालिका की अक्षुण्ण स्वतंत्रता के कारण है|इस तरह न्यायपालिका भारत में विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इस प्रकार स्वतंत्र भारतीय न्यायपालिका अपने औचित्य को सिद्ध करती है |
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हेस द्वारा दिए गए सागरीय नितल के फैलाव के सिद्धांत का वर्णन कीजिये| इसने किस प्रकार महासागरों के नितल के अपेक्षाकृत कम आयु होने की व्याख्या प्रदान की ?(150-200 शब्द; 10 अंक) Describe Hess"s theory of seafloor spreading. How did it provide an interpretation of the relatively young age of oceans? (150-200 words; 10 marks)
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Q. हेस द्वारा दिए गए सागरीय नितल के फैलाव के सिद्धांत का वर्णन कीजिये| इसने किस प्रकार महासागरों के नितल के अपेक्षाकृत कम आयु होने की व्याख्या प्रदान की ?(200 शब्द) Describe Hess"s theory of seafloor spreading. How did it provide an interpretation of the relatively young age of oceans? (200 words) एप्रोच- · हेस के सागरीय अधःस्थल सिद्धांत की व्याख्या कीजिये|(चित्र के साथ )| · इस सिद्धांत की मदद से किस प्रकार महासागरीय नितल की महाद्वीपों से कम आयु की व्याख्या की जा सकती है| उत्तर- वेगनर द्वारा दिए गये महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के बाद महाद्वीपों के प्रवाह के सम्बन्ध में नई जानकारियां सामने आयीं| महासागरीय नितल के मानचित्रण तथा चट्टानों के पूरा-चुम्बकीय अध्ययन के द्वारा हेस ने सागरीय अधःस्थल विस्तार की परिकल्पना को प्रस्तुत किया| हेस ने इस सम्बन्ध में होम्स द्वारा प्रतिपादित संवहनीय धारा के सिद्धांत का प्रयोग किया था| जहाँ मैग्मा का उठता हुआ स्तम्भ है वहां मैग्मा के जमाव के कारण कटक का निर्माण होता है | हेस के अनुसार महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखीय क्रिया से महासागरीय पर्पटी में विभेदन हुआ| नया लावा इस दरार को भरकर महासागरीय पर्पटी को दोनों ओर धकेल रहा है तथा महासागरीय नितल का विस्तार हो रहा है| निरंतर मैग्मा के बाहर निकलने से पुराना लावा ठंडा होकर कटक से दूर जाता रहता है तथा जहाँ पर मैग्मा का गिरता हुआ स्तम्भ होता है वहाँ पर गर्त का निर्माण होता है| एक तरफ जहाँ कटकों के पास नयी पर्पटी का निर्माण होता है वहीँ महासागरीय गर्तों में पर्पटी का विनाश भी होता है| महासागरों के नितल महाद्वीपों की अपेक्षा कम आयु के क्यों? हेस के अनुसार नयी पर्पटी का निर्माण महासागरीय कटकों के दोनों तरफ होता है| साथ ही कुछ समय उपरांत महासागरीय गर्तों के द्वारा इनका विनाश भी होते रहता है | कटकों के पास चट्टानों की आयु नवीनतम है तथा इनसे दूर जाने पर चट्टानों की आयु बढती चली जाती है| लगातार निर्माण तथा विनाश होते रहने के फलस्वरूप चट्टानों नवीन बनी रहती है जिसके कारण ये चट्टानें महाद्वीपीय चट्टानों से नयी है| महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कहीं भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं|
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##Question:हेस द्वारा दिए गए सागरीय नितल के फैलाव के सिद्धांत का वर्णन कीजिये| इसने किस प्रकार महासागरों के नितल के अपेक्षाकृत कम आयु होने की व्याख्या प्रदान की ?(150-200 शब्द; 10 अंक) Describe Hess"s theory of seafloor spreading. How did it provide an interpretation of the relatively young age of oceans? (150-200 words; 10 marks)##Answer:Q. हेस द्वारा दिए गए सागरीय नितल के फैलाव के सिद्धांत का वर्णन कीजिये| इसने किस प्रकार महासागरों के नितल के अपेक्षाकृत कम आयु होने की व्याख्या प्रदान की ?(200 शब्द) Describe Hess"s theory of seafloor spreading. How did it provide an interpretation of the relatively young age of oceans? (200 words) एप्रोच- · हेस के सागरीय अधःस्थल सिद्धांत की व्याख्या कीजिये|(चित्र के साथ )| · इस सिद्धांत की मदद से किस प्रकार महासागरीय नितल की महाद्वीपों से कम आयु की व्याख्या की जा सकती है| उत्तर- वेगनर द्वारा दिए गये महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के बाद महाद्वीपों के प्रवाह के सम्बन्ध में नई जानकारियां सामने आयीं| महासागरीय नितल के मानचित्रण तथा चट्टानों के पूरा-चुम्बकीय अध्ययन के द्वारा हेस ने सागरीय अधःस्थल विस्तार की परिकल्पना को प्रस्तुत किया| हेस ने इस सम्बन्ध में होम्स द्वारा प्रतिपादित संवहनीय धारा के सिद्धांत का प्रयोग किया था| जहाँ मैग्मा का उठता हुआ स्तम्भ है वहां मैग्मा के जमाव के कारण कटक का निर्माण होता है | हेस के अनुसार महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखीय क्रिया से महासागरीय पर्पटी में विभेदन हुआ| नया लावा इस दरार को भरकर महासागरीय पर्पटी को दोनों ओर धकेल रहा है तथा महासागरीय नितल का विस्तार हो रहा है| निरंतर मैग्मा के बाहर निकलने से पुराना लावा ठंडा होकर कटक से दूर जाता रहता है तथा जहाँ पर मैग्मा का गिरता हुआ स्तम्भ होता है वहाँ पर गर्त का निर्माण होता है| एक तरफ जहाँ कटकों के पास नयी पर्पटी का निर्माण होता है वहीँ महासागरीय गर्तों में पर्पटी का विनाश भी होता है| महासागरों के नितल महाद्वीपों की अपेक्षा कम आयु के क्यों? हेस के अनुसार नयी पर्पटी का निर्माण महासागरीय कटकों के दोनों तरफ होता है| साथ ही कुछ समय उपरांत महासागरीय गर्तों के द्वारा इनका विनाश भी होते रहता है | कटकों के पास चट्टानों की आयु नवीनतम है तथा इनसे दूर जाने पर चट्टानों की आयु बढती चली जाती है| लगातार निर्माण तथा विनाश होते रहने के फलस्वरूप चट्टानों नवीन बनी रहती है जिसके कारण ये चट्टानें महाद्वीपीय चट्टानों से नयी है| महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कहीं भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं|
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वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से आप क्या समझते हैं? इस सन्दर्भ में लोक अदालत, परिवार अदालत और ग्राम न्यायालयों के महत्व को स्पष्ट कीजिये| (150- 200 शब्द , अंक-10 ) What do you understandby Alternative Dispute Resolution system? In this context, explain the importance of Lok adalat, family courts and village courts. (150-200 words, marks - 10 )
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में लोक अदालत, परिवार अदालत और ग्राम न्यायालयों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र केअन्तर्गत विवाद समाधान की वे प्रक्रियाएँ और तकनीकें आती हैं जो विवाद में उलझे पक्षों को बिनाप्रक्रियात्मक मुकदमें के ही विवाद का समाधान खोजने में सहायता करतीं हैं| इसके अंतर्गत वर्गीय कार्यवाई, संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुलह और मध्यस्थता आदि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं | वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं सामान्य तौर पर कम खर्चीली और त्वरित स्वरुप की होती हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं इस रूप में विशिष्ट होती हैं कि ये वाद-प्रतिवादी की परिस्थिति को एक दूसरे को समझने का मौक़ा देती हैं| भारत में विभिन्न न्यायालयी इकाइयां वैकल्पिक विवाद निपटान तन्त्र के रूप में कार्य कर रही हैं| इनमें परिवार अदालत, लोक अदालत और ग्राम न्यायालय प्रमुख हैं| राष्ट्रीय लोक अदालत/स्थायी लोक अदालत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(NALSA)अधिनियम 1987 के अंतर्गत लोक अदालतों का गठन किया जाता है वर्ष 2002 में इसे संशोधित कर स्थायी लोक अदालत गठित करने की व्यवस्था की गयी| यह दिल्ली में स्थित है, यह उपभोग आधारित सेवाओं के क्षेत्र में उन मुकदमों को निपटाती है जो या तो अभी न्यायालय में लाये नहीं गए हैं या फिर निचली अदालतों में लंबित हैं यथा; परिवहन सेवाओं के मामले डाक-तार अथवा टेलीफोन सेवा के क्षेत्र में गठित अदालतें जल एवं विद्युत् आपूर्ति आदि के क्षेत्र गठित अदालतें साफ़-सफाई से सम्बन्धित मामले अस्पताल, औषधि वितरण केंद्र के मामले बीमा सम्बन्धी सेवाओं से उत्पन्न विवाद के मामले ग्राम न्यायालय ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के अंतर्गत पंचायतों के मध्यवर्ती स्तर जैसे क्षेत्र समितियां या ब्लाक स्तर पर ग्राम न्यायालय गठित करने की व्यवस्था की गई वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड और गोवा जैसे राज्यों में ये पंचायतें कार्य कर रही हैं इनका उद्देश्य ग्राम वासियों को घर बैठे ही उनके छोटे मोटे विवाद का निवारण कर उन्हें सरल एवं सुलभ न्याय दिलाना है ग्राम न्यायालयों को सिविल कोर्ट के अधिकार प्राप्त होते हैं अर्थात वह साक्ष्यों का परीक्षण कर सकता है, गवाहों से पूछताछ कर सकता है, अर्थ दंड लगा सकता है और पीड़ित व्यक्ति के पक्ष में फैसला भी दे सकता है प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ग्राम न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश होता है| यह न्यायिक मजिस्ट्रेट होता है जो राज्य सरकार द्वारा सम्बन्धित HC से परामर्श के बाद नियुक्त किया जाता है, इसके वेतन और भत्ते वही होते हैं जो उस राज्य में HC के अधीन किसी प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को दिए जाते हैं इसमें गाँव के स्तर पर उपजे विवाद जो जमीन-जायदाद, पारिवारिक झगडे तथा गाँव की सीमा को लेकर उपजे झगडे लाये जाते हैं और कम महत्त्व के आपराधिक मुकदमें भी ग्राम न्यायालयों में लाये जाते हैं ये विवाद आपसी बात चीत तथा मान-मनौवल के आधार पर हल किये जाते हैं इस न्यायालय का काउन्सिल/सलाहकार जो की प्रायः कोई वकील या सामाजिक कार्यकर्ता होता है घर-घर जा कर विवाद से जुड़े व्यक्तियों व परिवारों से बात कर उनकी राय लेता है और उन्हें समझा-बुझा कर न्यायालय तक लाता है ताकि विवाद को हल किया जा सके ऐसा करते हुए यह कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की शर्तों से बंधा नही होता जैसे बिना गवाही के किसी मुकदमें को हल किया जा सकता है परिवार अदालत परिवार अदालतों की अवधारणा का जन्म अमेरिका में पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ जबकि भारत में परिवार अदालत अधिनियम 1984 के अंतर्गत इन अदालतों का गठन शुरू हुआ प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट इन अदालतों के प्रमुख होते हैं| सम्बन्धित HC से परमर्श के बाद राज्य सरकार द्वारा इनकी नियुक्ति की जाती है, इसमें मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त दो अन्य लोग भी रहते हैं जिसमें प्रायः एक वकील और एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता/कार्यकर्त्री जो पारिवारिक झगड़ों को निपटाने की कला से भिज्ञ हो, मजिस्ट्रेट के सहायक होते हैं इसमें परिवार सम्बन्धी मामले जैसे विवाह सम्बन्धी विवाद, संपत्ति में उत्तराधिकार और भरण-पोषण सम्बन्धी विवाद, विवाह विच्छेद विवाद, विधिक रूप से पति-पत्नी का एक दूसरे से पृथक सम्बन्धी विवाद तथा नाबालिग बच्चे के अभिरक्षा सम्बन्धी विवाद इत्यादि इस न्यायालय में विचारार्थ लाये जाते हैं परिवार अदालतों में नियमित अदालतों जैसा बोझिल वातावरण नही होता यहाँ सरल वातावरण में आपसी बातचीत के आधार पर विवाद हल किये जाते हैं| इस प्रकार देखते हैं कि उपरोक्त प्रणालियाँ सहज एवं सर्वसुलभ आधार पर न्याय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाईया हैं| कानून और कानूनी मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अदालतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। अदालती समय की बढ़ती मांग को देखते हुए यह प्रयास किया जाना चाहिए कि अदालत में पहुंचने से पहले ही कुछ मामलों को वैकल्पिक तरीकों से सुलझा लिया जाए| इनकी कुछ सीमाएं जैसे घरेलू हिंसा से निपटने के सन्दर्भ में पर्याप्त शक्तियों से संपन्न न होना, कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता में कमी आदि का समाधान किया जाना चाहिए|ताकि भारत जैसे देश में जहाँ न्यायालय पर अतिरिक्त वादों का भार बढ़ता जा रहा है, वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र अपने औचित्य का सिद्ध कर सकें|
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##Question:वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से आप क्या समझते हैं? इस सन्दर्भ में लोक अदालत, परिवार अदालत और ग्राम न्यायालयों के महत्व को स्पष्ट कीजिये| (150- 200 शब्द , अंक-10 ) What do you understandby Alternative Dispute Resolution system? In this context, explain the importance of Lok adalat, family courts and village courts. (150-200 words, marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में लोक अदालत, परिवार अदालत और ग्राम न्यायालयों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र केअन्तर्गत विवाद समाधान की वे प्रक्रियाएँ और तकनीकें आती हैं जो विवाद में उलझे पक्षों को बिनाप्रक्रियात्मक मुकदमें के ही विवाद का समाधान खोजने में सहायता करतीं हैं| इसके अंतर्गत वर्गीय कार्यवाई, संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुलह और मध्यस्थता आदि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं | वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं सामान्य तौर पर कम खर्चीली और त्वरित स्वरुप की होती हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं इस रूप में विशिष्ट होती हैं कि ये वाद-प्रतिवादी की परिस्थिति को एक दूसरे को समझने का मौक़ा देती हैं| भारत में विभिन्न न्यायालयी इकाइयां वैकल्पिक विवाद निपटान तन्त्र के रूप में कार्य कर रही हैं| इनमें परिवार अदालत, लोक अदालत और ग्राम न्यायालय प्रमुख हैं| राष्ट्रीय लोक अदालत/स्थायी लोक अदालत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(NALSA)अधिनियम 1987 के अंतर्गत लोक अदालतों का गठन किया जाता है वर्ष 2002 में इसे संशोधित कर स्थायी लोक अदालत गठित करने की व्यवस्था की गयी| यह दिल्ली में स्थित है, यह उपभोग आधारित सेवाओं के क्षेत्र में उन मुकदमों को निपटाती है जो या तो अभी न्यायालय में लाये नहीं गए हैं या फिर निचली अदालतों में लंबित हैं यथा; परिवहन सेवाओं के मामले डाक-तार अथवा टेलीफोन सेवा के क्षेत्र में गठित अदालतें जल एवं विद्युत् आपूर्ति आदि के क्षेत्र गठित अदालतें साफ़-सफाई से सम्बन्धित मामले अस्पताल, औषधि वितरण केंद्र के मामले बीमा सम्बन्धी सेवाओं से उत्पन्न विवाद के मामले ग्राम न्यायालय ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के अंतर्गत पंचायतों के मध्यवर्ती स्तर जैसे क्षेत्र समितियां या ब्लाक स्तर पर ग्राम न्यायालय गठित करने की व्यवस्था की गई वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड और गोवा जैसे राज्यों में ये पंचायतें कार्य कर रही हैं इनका उद्देश्य ग्राम वासियों को घर बैठे ही उनके छोटे मोटे विवाद का निवारण कर उन्हें सरल एवं सुलभ न्याय दिलाना है ग्राम न्यायालयों को सिविल कोर्ट के अधिकार प्राप्त होते हैं अर्थात वह साक्ष्यों का परीक्षण कर सकता है, गवाहों से पूछताछ कर सकता है, अर्थ दंड लगा सकता है और पीड़ित व्यक्ति के पक्ष में फैसला भी दे सकता है प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ग्राम न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश होता है| यह न्यायिक मजिस्ट्रेट होता है जो राज्य सरकार द्वारा सम्बन्धित HC से परामर्श के बाद नियुक्त किया जाता है, इसके वेतन और भत्ते वही होते हैं जो उस राज्य में HC के अधीन किसी प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को दिए जाते हैं इसमें गाँव के स्तर पर उपजे विवाद जो जमीन-जायदाद, पारिवारिक झगडे तथा गाँव की सीमा को लेकर उपजे झगडे लाये जाते हैं और कम महत्त्व के आपराधिक मुकदमें भी ग्राम न्यायालयों में लाये जाते हैं ये विवाद आपसी बात चीत तथा मान-मनौवल के आधार पर हल किये जाते हैं इस न्यायालय का काउन्सिल/सलाहकार जो की प्रायः कोई वकील या सामाजिक कार्यकर्ता होता है घर-घर जा कर विवाद से जुड़े व्यक्तियों व परिवारों से बात कर उनकी राय लेता है और उन्हें समझा-बुझा कर न्यायालय तक लाता है ताकि विवाद को हल किया जा सके ऐसा करते हुए यह कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की शर्तों से बंधा नही होता जैसे बिना गवाही के किसी मुकदमें को हल किया जा सकता है परिवार अदालत परिवार अदालतों की अवधारणा का जन्म अमेरिका में पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ जबकि भारत में परिवार अदालत अधिनियम 1984 के अंतर्गत इन अदालतों का गठन शुरू हुआ प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट इन अदालतों के प्रमुख होते हैं| सम्बन्धित HC से परमर्श के बाद राज्य सरकार द्वारा इनकी नियुक्ति की जाती है, इसमें मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त दो अन्य लोग भी रहते हैं जिसमें प्रायः एक वकील और एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता/कार्यकर्त्री जो पारिवारिक झगड़ों को निपटाने की कला से भिज्ञ हो, मजिस्ट्रेट के सहायक होते हैं इसमें परिवार सम्बन्धी मामले जैसे विवाह सम्बन्धी विवाद, संपत्ति में उत्तराधिकार और भरण-पोषण सम्बन्धी विवाद, विवाह विच्छेद विवाद, विधिक रूप से पति-पत्नी का एक दूसरे से पृथक सम्बन्धी विवाद तथा नाबालिग बच्चे के अभिरक्षा सम्बन्धी विवाद इत्यादि इस न्यायालय में विचारार्थ लाये जाते हैं परिवार अदालतों में नियमित अदालतों जैसा बोझिल वातावरण नही होता यहाँ सरल वातावरण में आपसी बातचीत के आधार पर विवाद हल किये जाते हैं| इस प्रकार देखते हैं कि उपरोक्त प्रणालियाँ सहज एवं सर्वसुलभ आधार पर न्याय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाईया हैं| कानून और कानूनी मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अदालतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। अदालती समय की बढ़ती मांग को देखते हुए यह प्रयास किया जाना चाहिए कि अदालत में पहुंचने से पहले ही कुछ मामलों को वैकल्पिक तरीकों से सुलझा लिया जाए| इनकी कुछ सीमाएं जैसे घरेलू हिंसा से निपटने के सन्दर्भ में पर्याप्त शक्तियों से संपन्न न होना, कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता में कमी आदि का समाधान किया जाना चाहिए|ताकि भारत जैसे देश में जहाँ न्यायालय पर अतिरिक्त वादों का भार बढ़ता जा रहा है, वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र अपने औचित्य का सिद्ध कर सकें|
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Explain the paradox that on one hand increased violence against women justifies strong laws whereas on the other these laws have been misused by women. (200 words)
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Approach:- 1. Brief introduction about violence against women 2. Mention how strong laws are addressing the issue 3. Explain how and why these Laws are misused by women. 4. Suggest steps to be taken Answer:- Violence against women has become a norm as part of patriarchy institution itself in our society. It makes India one of the most dangerous country for women as per Thomson Reuters Foundation survey. Strong laws and violence against women:- Women in our traditional society face violence at workplace and home as well. Legislatures have made many laws to protect women from the violence of any type. For example- the Criminal Law (Amendment) Act, 2013, Protection of Women from Domestic Violence Act 2005. Increasing rape cases in recent years and involving males under adult age has made the Parliament make stringent laws. It shows the seriousness and commitment of the state to protect women. Strong laws against the violence of women have improved the situation of women. Many women are coming in light against the violence and stringent provisions of the laws provide them with justice. More and more educated women are being aware of their rights Though strong laws are made against violence, these laws are in many cases are misused against males. For example- Anti Dowry laws. Reasons for the misuse of Laws:- • In many cases, it is found that these laws are used to settle a personal score against male members. This problem is found more in urban areas where women are more aware of their rights. • There is no provision of counteraction if the complaint is false • One of the most prominent reason is materialism, the culture of consumerism. Many women use these laws for material gains in lieu of getting compensation to settle the cases. • Corruption of value systems. Women in many cases are found ignorant of the ill impact of these cases on their families. • The declining status of an institution of marriage- Marriage is not considered to be a sacrosanct institute anymore by many women. Steps to be taken: • Gender neutral laws should be their women cannot take unnecessary advantages of the laws which are biased in their favour. Laws should be such that it is equal for both men and women. • The mindset needs to be changed where personal issues between male and female can be effectively used by involving family members first. • Community policing can be an alternative where neighbours and domestic workers can be an effective source of information f0r police. • Fast track courts can be of great help because it may end the plight of males in case of any false complaints. Though in most of the cases, women are on the weaker side, but gender-neutral laws and consideration of all stakeholders can make these laws more effective. We need to adopt a holistic approach to look into these matters with the help of all section of society.
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##Question:Explain the paradox that on one hand increased violence against women justifies strong laws whereas on the other these laws have been misused by women. (200 words)##Answer:Approach:- 1. Brief introduction about violence against women 2. Mention how strong laws are addressing the issue 3. Explain how and why these Laws are misused by women. 4. Suggest steps to be taken Answer:- Violence against women has become a norm as part of patriarchy institution itself in our society. It makes India one of the most dangerous country for women as per Thomson Reuters Foundation survey. Strong laws and violence against women:- Women in our traditional society face violence at workplace and home as well. Legislatures have made many laws to protect women from the violence of any type. For example- the Criminal Law (Amendment) Act, 2013, Protection of Women from Domestic Violence Act 2005. Increasing rape cases in recent years and involving males under adult age has made the Parliament make stringent laws. It shows the seriousness and commitment of the state to protect women. Strong laws against the violence of women have improved the situation of women. Many women are coming in light against the violence and stringent provisions of the laws provide them with justice. More and more educated women are being aware of their rights Though strong laws are made against violence, these laws are in many cases are misused against males. For example- Anti Dowry laws. Reasons for the misuse of Laws:- • In many cases, it is found that these laws are used to settle a personal score against male members. This problem is found more in urban areas where women are more aware of their rights. • There is no provision of counteraction if the complaint is false • One of the most prominent reason is materialism, the culture of consumerism. Many women use these laws for material gains in lieu of getting compensation to settle the cases. • Corruption of value systems. Women in many cases are found ignorant of the ill impact of these cases on their families. • The declining status of an institution of marriage- Marriage is not considered to be a sacrosanct institute anymore by many women. Steps to be taken: • Gender neutral laws should be their women cannot take unnecessary advantages of the laws which are biased in their favour. Laws should be such that it is equal for both men and women. • The mindset needs to be changed where personal issues between male and female can be effectively used by involving family members first. • Community policing can be an alternative where neighbours and domestic workers can be an effective source of information f0r police. • Fast track courts can be of great help because it may end the plight of males in case of any false complaints. Though in most of the cases, women are on the weaker side, but gender-neutral laws and consideration of all stakeholders can make these laws more effective. We need to adopt a holistic approach to look into these matters with the help of all section of society.
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भारतीय संविधान के भाग 3 के आधार पर "राज्य" को परिभाषित कीजिये| इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Define "state" on the basis of Part 3 of the Indian Constitution. Also explain the viewpoint of the Supreme Court in this context. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्य को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारतीय संविधान के भाग 3 के आधार पर राज्य को परिभाषित कीजिये, 3- दूसरे भाग में भाग 3 में राज्य के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| राज्यउस संगठित राजनीतिक इकाई को कहते हैं जो एक सरकार के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। इसके अलावा किसी शासकीय इकाई या उसके किसी प्रभाग को भी "राज्य" कहते हैं, जैसेभारतके प्रान्तोंको भी "राज्य" कहते हैं| यूरोपीय राजनीतिक दर्शन में राज्य की चार प्रमुख विशेषताएं मानी जाती हैं यथा निश्चित भूभाग , जनसँख्या , सरकार और संप्रभुता| कौटिल्य ने राज्य के सात अंग बताये हैं और ये उनका सप्तांग सिद्धांतकहलाता है| भारतीय संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 12 में ‘राज्य’ को समग्रता में परिभाषित किया है| अनुच्छेद के अनुसार ‘राज्य’ शब्द निम्नलिखित को निरुपित करता है- · केंद्र सरकार अथवा सरकार, संसद, · राज्य सरकारऔर राज्य विधायिकाएं, · स्थानीय स्वशासन जिसके अंतर्गत नगरपालिकाएं, पंचायत, जिला बोर्ड सुधार न्यास एवं · राज्य के अधीन कोई अन्य प्राधिकारी या संस्था इस तरह अनुच्छेद 12 में राज्य को विस्तृत रूप में परिभाषित किया गया है| किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में ‘राज्य’ के उपरोक्त रूपों को न्यायपालिका में प्रश्नगत किया जा सकता है| अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य को परिभाषित करते हुए अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब सुहरावर्दी मामला 1981,मुकदमें में सर्वोच्च न्यायालय ने किसी संस्था,एजेंसी, संगठन अथवा प्राधिकारी को राज्य की श्रेणी में रखने के लिए निम्नलिखित को आधार बनाने का सुझाव दिया है- · यदि किसी निगम या संस्था की कुल अंशपूंजी सरकार ने लगाई हो · किसी निगम या संस्था को यदि सरकार वित्तीय सहायता देती है और यह सहायता इतनी अधिक है कि उसी से उस निगम/संस्था का मुख्य खर्च चलता है, तो इसे भी राज्य माना जाएगा · क्या किसी निगम/संस्था पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है · यदि किसी निगम/संस्था पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण न भी हो बावजूद इसके उसके द्वारा लिए जाने वाले निर्णय को यदि सरकार प्रभावित करें की स्थिति में हो तो उसे भी राज्य माना जाएगा| उदाहरणार्थ; दिल्ली विश्वविद्यालय एक स्वायत्त(आंतरिक मामलों में स्वतंत्र)संस्था है किन्तु विश्वविद्यालय में उपकुलपति की नियुक्ति शिक्षकों की नियुक्ति, उनके वेतन भत्ते के निर्धारण आदि में केंद्र सरकार की दखल है और यह निर्णय केंद्र सरकार प्रभावित कर सकती है अतः दिल्ली विश्विद्यालय राज्य है| · यदि उस निगम या संस्था में कर्मचारियों की भर्ती, उनको पद से हटाना उस संस्था के काम-काज का निर्धारण आदि को यदि केंद्र अथवा राज्य सरकार तय करती है तो वह निगम/संस्था भी राज्य कहलायेगा · यदि निगम अपने आंतरिक कार्यप्रणाली में स्वतंत्र है और उसका पूर्ण वित्त पोषण सरकार नहीं करती है साथ ही वह अपने निर्णय खुद लेता है तो ऐसी स्थिति में उसे राज्य नहीं माना जाएगा| · यदि किसी निगम की पहचान स्वतंत्र है(उसकी पहचान सरकार से जुड़ने के कारण नही है) तो उस दशा में वह भी राज्य नहीं माना जाएगा| ऐसे निगम के विरुद्ध मुकदमा किया जा सकता है(जैसे कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध करता है) साथ ही वह निगम भी किसी व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा कर सकता है| यही स्थिति निजी क्षेत्रों पर भी लागू होती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 12 में परिभाषित राज्य की अवधारणा को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने और व्यापक और सुस्पष्टकर दिया है| यह विस्तार मौलिक अधिकारों के वास्तविक क्रियान्वयन में सहायक है| सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्य की अवधारणा के विस्तार ने मौलिक अधिकारों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
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##Question:भारतीय संविधान के भाग 3 के आधार पर "राज्य" को परिभाषित कीजिये| इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Define "state" on the basis of Part 3 of the Indian Constitution. Also explain the viewpoint of the Supreme Court in this context. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राज्य को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारतीय संविधान के भाग 3 के आधार पर राज्य को परिभाषित कीजिये, 3- दूसरे भाग में भाग 3 में राज्य के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| राज्यउस संगठित राजनीतिक इकाई को कहते हैं जो एक सरकार के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। इसके अलावा किसी शासकीय इकाई या उसके किसी प्रभाग को भी "राज्य" कहते हैं, जैसेभारतके प्रान्तोंको भी "राज्य" कहते हैं| यूरोपीय राजनीतिक दर्शन में राज्य की चार प्रमुख विशेषताएं मानी जाती हैं यथा निश्चित भूभाग , जनसँख्या , सरकार और संप्रभुता| कौटिल्य ने राज्य के सात अंग बताये हैं और ये उनका सप्तांग सिद्धांतकहलाता है| भारतीय संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 12 में ‘राज्य’ को समग्रता में परिभाषित किया है| अनुच्छेद के अनुसार ‘राज्य’ शब्द निम्नलिखित को निरुपित करता है- · केंद्र सरकार अथवा सरकार, संसद, · राज्य सरकारऔर राज्य विधायिकाएं, · स्थानीय स्वशासन जिसके अंतर्गत नगरपालिकाएं, पंचायत, जिला बोर्ड सुधार न्यास एवं · राज्य के अधीन कोई अन्य प्राधिकारी या संस्था इस तरह अनुच्छेद 12 में राज्य को विस्तृत रूप में परिभाषित किया गया है| किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में ‘राज्य’ के उपरोक्त रूपों को न्यायपालिका में प्रश्नगत किया जा सकता है| अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य को परिभाषित करते हुए अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब सुहरावर्दी मामला 1981,मुकदमें में सर्वोच्च न्यायालय ने किसी संस्था,एजेंसी, संगठन अथवा प्राधिकारी को राज्य की श्रेणी में रखने के लिए निम्नलिखित को आधार बनाने का सुझाव दिया है- · यदि किसी निगम या संस्था की कुल अंशपूंजी सरकार ने लगाई हो · किसी निगम या संस्था को यदि सरकार वित्तीय सहायता देती है और यह सहायता इतनी अधिक है कि उसी से उस निगम/संस्था का मुख्य खर्च चलता है, तो इसे भी राज्य माना जाएगा · क्या किसी निगम/संस्था पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है · यदि किसी निगम/संस्था पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण न भी हो बावजूद इसके उसके द्वारा लिए जाने वाले निर्णय को यदि सरकार प्रभावित करें की स्थिति में हो तो उसे भी राज्य माना जाएगा| उदाहरणार्थ; दिल्ली विश्वविद्यालय एक स्वायत्त(आंतरिक मामलों में स्वतंत्र)संस्था है किन्तु विश्वविद्यालय में उपकुलपति की नियुक्ति शिक्षकों की नियुक्ति, उनके वेतन भत्ते के निर्धारण आदि में केंद्र सरकार की दखल है और यह निर्णय केंद्र सरकार प्रभावित कर सकती है अतः दिल्ली विश्विद्यालय राज्य है| · यदि उस निगम या संस्था में कर्मचारियों की भर्ती, उनको पद से हटाना उस संस्था के काम-काज का निर्धारण आदि को यदि केंद्र अथवा राज्य सरकार तय करती है तो वह निगम/संस्था भी राज्य कहलायेगा · यदि निगम अपने आंतरिक कार्यप्रणाली में स्वतंत्र है और उसका पूर्ण वित्त पोषण सरकार नहीं करती है साथ ही वह अपने निर्णय खुद लेता है तो ऐसी स्थिति में उसे राज्य नहीं माना जाएगा| · यदि किसी निगम की पहचान स्वतंत्र है(उसकी पहचान सरकार से जुड़ने के कारण नही है) तो उस दशा में वह भी राज्य नहीं माना जाएगा| ऐसे निगम के विरुद्ध मुकदमा किया जा सकता है(जैसे कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध करता है) साथ ही वह निगम भी किसी व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा कर सकता है| यही स्थिति निजी क्षेत्रों पर भी लागू होती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 12 में परिभाषित राज्य की अवधारणा को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने और व्यापक और सुस्पष्टकर दिया है| यह विस्तार मौलिक अधिकारों के वास्तविक क्रियान्वयन में सहायक है| सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्य की अवधारणा के विस्तार ने मौलिक अधिकारों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
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विश्व व्यापार संगठन के व्यापार संबंधित विभिन्न सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये |इस सन्दर्भ में मोस्ट-फेवर्ड नेशन तथा राष्ट्रीय उपचार नीति सिद्धांत पर चर्चा कीजिये | (200 शब्द) Mention the different principles related to WTO. In this context, discuss the principle of the Most-Favored Nation and National Treatment Policy.(200 Words)
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एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में विश्व व्यापार संगठन से सम्बंधित विभिन्न सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये| ·दुसरे भाग में मोस्ट-फेवर्ड सिद्धांत तथा राष्ट्रीय उपचार नीति सिद्धांत के बारे चर्चा कीजिये| ·वर्तमान सन्दर्भ से जोड़ते हुए 15-20 शब्दों में निष्कर्ष लिखिए| उत्तर- विश्व व्यापार संगठन द्वारा वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु कुछ सिद्धांतों को अपनाया गया है जो नियम आधारित,पारदर्शी तथा सुनिश्चित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली पर आधारित हैं| इन सिद्धांतों के द्वारा डब्लूटीओ ने वैश्विक व्यापार को भेदभाव रहित बनाने का प्रयास किया है| डब्लूटीओ के व्यापार सम्बंधित विभिन्न सिद्धांत - 1. मोस्ट-फेवर्ड नेशन(MFN) तथा राष्ट्रीय उपचार नीति(NTP) 2. पारदर्शिता का सिद्धांत 3. तालमेल का सिद्धांत(Principle of Reciprocity) 4. बाध्यकारी और लागू करने योग्य प्रतिबद्धता( Binding and enforceable commitments) 5. सेफ्टी वाल्व सिद्धांत मोस्ट-फेवर्ड नेशन का सिद्धांत- MFN सिद्धांत के तहत देशों के द्वारा किसी खास देश के प्रति व्यापार सम्बंधित वैसी छूटें/रियायतें नहीं लागू की जा सकती है जिससे उस देश के अन्य व्यापार साझेदारों के साथ भेदभावपूर्ण व्यापार व्यवहार लागू हो| इसका महत्त्व इस तथ्य में दिखाई देता है कि यह GATT समझौते का पहला खंड है| WTO के नियमों के अंतर्गत एक सदस्य देश अपने व्यापार भागीदारों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता है| यदि किसी व्यापार भागीदार को एक विशेष दर्जा दिया जाता है तो वह दर्जा WTO के सभी सदस्य देश को दिया जाना चाहिए| हाल ही में भारत ने पाकिस्तान को दिया गया MFN दर्जा वापस ले लिया है| राष्ट्रीय उपचार नीति सिद्धांत(NTP)- यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि किसी देश में आयातित वस्तुओं के साथ वैसा ही व्यापार व्यवहार किया जाये जैसा उसी देश में घरेलू रूप से उत्पादित वस्तुओं के साथ किया जाता है| यह देशों के निर्यात को बढ़ावा देने में एक कारगर सिद्धांत के रूप में देखा जाता है| भारतीय सन्दर्भ में देखा जाये तो यह नीति यह सुनिश्चित करती है कि अगर भारत के उत्पाद विश्व व्यापार संगठन के अन्य सदस्य देश के यहाँ आयात हो गयें तो उस देश के उत्पादों की तुलना में उससे भेदभाव ना हो|साथ ही,भारत को अपने घरेलू बाजार में यह सुनिश्चित करना होता है कि डब्लूटीओ के किसी अन्य सदस्य देश से आयातित वस्तुएं भारत में बिना भेदभाव के बाजार तक पहुँच बना पाए| वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद तथा देशों के बीच ट्रेड-वॉर के इस दौर में डब्लूटीओ के उपरोक्त सिद्धांत काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं|
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##Question:विश्व व्यापार संगठन के व्यापार संबंधित विभिन्न सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये |इस सन्दर्भ में मोस्ट-फेवर्ड नेशन तथा राष्ट्रीय उपचार नीति सिद्धांत पर चर्चा कीजिये | (200 शब्द) Mention the different principles related to WTO. In this context, discuss the principle of the Most-Favored Nation and National Treatment Policy.(200 Words)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में विश्व व्यापार संगठन से सम्बंधित विभिन्न सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये| ·दुसरे भाग में मोस्ट-फेवर्ड सिद्धांत तथा राष्ट्रीय उपचार नीति सिद्धांत के बारे चर्चा कीजिये| ·वर्तमान सन्दर्भ से जोड़ते हुए 15-20 शब्दों में निष्कर्ष लिखिए| उत्तर- विश्व व्यापार संगठन द्वारा वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु कुछ सिद्धांतों को अपनाया गया है जो नियम आधारित,पारदर्शी तथा सुनिश्चित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली पर आधारित हैं| इन सिद्धांतों के द्वारा डब्लूटीओ ने वैश्विक व्यापार को भेदभाव रहित बनाने का प्रयास किया है| डब्लूटीओ के व्यापार सम्बंधित विभिन्न सिद्धांत - 1. मोस्ट-फेवर्ड नेशन(MFN) तथा राष्ट्रीय उपचार नीति(NTP) 2. पारदर्शिता का सिद्धांत 3. तालमेल का सिद्धांत(Principle of Reciprocity) 4. बाध्यकारी और लागू करने योग्य प्रतिबद्धता( Binding and enforceable commitments) 5. सेफ्टी वाल्व सिद्धांत मोस्ट-फेवर्ड नेशन का सिद्धांत- MFN सिद्धांत के तहत देशों के द्वारा किसी खास देश के प्रति व्यापार सम्बंधित वैसी छूटें/रियायतें नहीं लागू की जा सकती है जिससे उस देश के अन्य व्यापार साझेदारों के साथ भेदभावपूर्ण व्यापार व्यवहार लागू हो| इसका महत्त्व इस तथ्य में दिखाई देता है कि यह GATT समझौते का पहला खंड है| WTO के नियमों के अंतर्गत एक सदस्य देश अपने व्यापार भागीदारों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता है| यदि किसी व्यापार भागीदार को एक विशेष दर्जा दिया जाता है तो वह दर्जा WTO के सभी सदस्य देश को दिया जाना चाहिए| हाल ही में भारत ने पाकिस्तान को दिया गया MFN दर्जा वापस ले लिया है| राष्ट्रीय उपचार नीति सिद्धांत(NTP)- यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि किसी देश में आयातित वस्तुओं के साथ वैसा ही व्यापार व्यवहार किया जाये जैसा उसी देश में घरेलू रूप से उत्पादित वस्तुओं के साथ किया जाता है| यह देशों के निर्यात को बढ़ावा देने में एक कारगर सिद्धांत के रूप में देखा जाता है| भारतीय सन्दर्भ में देखा जाये तो यह नीति यह सुनिश्चित करती है कि अगर भारत के उत्पाद विश्व व्यापार संगठन के अन्य सदस्य देश के यहाँ आयात हो गयें तो उस देश के उत्पादों की तुलना में उससे भेदभाव ना हो|साथ ही,भारत को अपने घरेलू बाजार में यह सुनिश्चित करना होता है कि डब्लूटीओ के किसी अन्य सदस्य देश से आयातित वस्तुएं भारत में बिना भेदभाव के बाजार तक पहुँच बना पाए| वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद तथा देशों के बीच ट्रेड-वॉर के इस दौर में डब्लूटीओ के उपरोक्त सिद्धांत काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं|
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अवसर की समानता को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही इस सन्दर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के प्रावधानों का वर्णन कीजिये। (150 - 200 शब्द/ 10 अंक) Define the equality of opportunity. Along with this, in this context describe the provisions of Article 16 of the Indian Constitution. (150 - 200 words/ 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में समानता और अवसर की समानता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में अनुच्छेद 16 के प्रावधानों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में अवसर की समानता की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ‘समानता’ एक राजनीतिक आदर्श है| समानता का तात्पर्य उन परिस्थितियों की उपस्थिति है जिसमें व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव हो सके| यह विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति को भी प्रदर्शित करता है| अवसर की समानता; पद, प्रतिष्ठा, रोजगार, सरकारी नौकरियों की प्राप्ति में बाधाओं की अनुपस्थिति को निर्देशित करने वाली अवधारणा है| यह अवसरों तक सभी की सामान रूप से पहुच को प्रदर्शित करती है| चूँकि सभी व्यक्तियों का जन्म, शिक्षा, रहन-सहन अलग-अलग स्तरों पर होता है इसलिए परिस्थिति के अनुरूप सभी की अवसरों तक समान पहुच नहीं हो पाती है| अतः अवसरों तक सभी की समान पहुच स्थापित करने के लिए सकारात्मक कारवाई का अनुक्रम किया जाता है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 में अवसर की समानता के सन्दर्भ में विभिन्न प्रावधान किये गए हैं| अनुच्छेद 16 अनुच्छेद 16(1)राज्य के अधीन सेवाओं में सभी नागरिकों को सामान अवसर की गारंटी होगी अनुच्छेद 16(2) राज्य के अधीन सेवाओं में धर्म, मूलवंश, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान और निवासस्थान अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर राज्य कोई भेदभाव नहीं करेगा| दूसरे शब्दों में सरकारी नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा| अपवाद अनुच्छेद 16(3) के अनुसार, आवास सम्बन्धी अथवा निवास सम्बन्धी योग्यता का निर्धारण केवल संसद द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत ही की जा सकती है| इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि यदि संसद इस सम्बन्ध में कोई कानून बनाती है तो वह पूरे देश में एक सामान लागू होगा| इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने 1957 में कुछ पिछड़े राज्यों के लिए अपने निवासियों को वहां की सरकारी नौकरियों में प्रधानता देने के लिए निवास सम्बन्धी कानून बनाया था जो 1977 में समाप्त हो गया| उसके बाद संसद ने इस कानून का नवीनीकरण नहीं किया| वर्तमान में अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजातियों की बहुलता वाले राज्यों को अपने यहाँ सरकारी नौकरियों में वहां के जनजातियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित करने का अधिकार है| किन्तु यह संसद के द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत न होकर अनुसूची 5 और अनुसूची 6 के अंतर्गत आता है| अनुच्छेद 16(4) के अनुसार ऐसे लोग(नागरिक) जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं उनको सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जा सकता है( इस उपबन्ध में केवल पिछड़ेपन शब्द का उपयोग किया गया है| इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि यह सामाजिक और शैक्षणिक पिछडापन ही हो| साथ ही यह कहा गया है कि ऐसे सभी पिछड़े वर्ग के नागरिक जो राज्य की दृष्टि में सरकारी नौकरियों में पर्याप्त अवसर नहीं प्राप्त कर सकें हैं उनको आरक्षण दिया जाएगा) अनुच्छेद 16(4A) 77वें संविधान संशोधन अधिनियम 1995 के द्वारा जोड़ा गया| इसमें यह व्यवस्था की गयी कि अनुसूचित जाति व जनजाति के सदस्यों को सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाएगा| इस संशोधन की आवश्यकता इस लिए स्पष्ट हुई कि इंदिरा साहनी वाद 1993 में SC के 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत(6:3) से यह फैसला दिया था कि आरक्षण का उद्देश्य प्रवेश स्तर पर बराबरी दिलाना है न की प्रोन्नति में, अतः प्रोन्नति में आरक्षण नही हो सकता| उपरोक्त संशोधन के द्वारा इस फैसले को पलट दिया गया था| 85वें संविधान संशोधन अधिनियम 2001 के द्वारा अनुच्छेद 16 (4A) परिणामिक ज्येष्ठता का उपवाक्य जोड़ा गया जिसका अर्थ होता है कि SC और ST के सदस्यों को सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण केवल इस वर्ग के होने के कारण मिलेगा न कि परम्परागत वरिष्ठता के आधार पर यह प्रोन्नति दी जायेगी| ध्यातव्य है कि प्रोन्नति में आरक्षण केवल SC और ST के सदस्यों के लिए ही प्रभावी है यह OBC के लिए लागू नहीं है और न ही यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सदस्यों के लिए लागू होगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनुच्छेद 16 में अवसर की समानता की स्थापना के सन्दर्भ में विविध उपबन्ध किये गए हैं| इससे आगे बढ़ते हुए अनुच्छेद 16 प्रोन्नति में समानता स्थापित करने का भी प्रयास करता है| अवसर की समानता समाज के समावेशी समान विकास के लिए आवश्यक होती है| समता पूर्ण समाज वास्तविक लोकतांत्रिक विकास की पूर्वापेक्षा है|
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##Question:अवसर की समानता को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही इस सन्दर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के प्रावधानों का वर्णन कीजिये। (150 - 200 शब्द/ 10 अंक) Define the equality of opportunity. Along with this, in this context describe the provisions of Article 16 of the Indian Constitution. (150 - 200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में समानता और अवसर की समानता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में अनुच्छेद 16 के प्रावधानों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में अवसर की समानता की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ‘समानता’ एक राजनीतिक आदर्श है| समानता का तात्पर्य उन परिस्थितियों की उपस्थिति है जिसमें व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव हो सके| यह विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति को भी प्रदर्शित करता है| अवसर की समानता; पद, प्रतिष्ठा, रोजगार, सरकारी नौकरियों की प्राप्ति में बाधाओं की अनुपस्थिति को निर्देशित करने वाली अवधारणा है| यह अवसरों तक सभी की सामान रूप से पहुच को प्रदर्शित करती है| चूँकि सभी व्यक्तियों का जन्म, शिक्षा, रहन-सहन अलग-अलग स्तरों पर होता है इसलिए परिस्थिति के अनुरूप सभी की अवसरों तक समान पहुच नहीं हो पाती है| अतः अवसरों तक सभी की समान पहुच स्थापित करने के लिए सकारात्मक कारवाई का अनुक्रम किया जाता है| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 में अवसर की समानता के सन्दर्भ में विभिन्न प्रावधान किये गए हैं| अनुच्छेद 16 अनुच्छेद 16(1)राज्य के अधीन सेवाओं में सभी नागरिकों को सामान अवसर की गारंटी होगी अनुच्छेद 16(2) राज्य के अधीन सेवाओं में धर्म, मूलवंश, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान और निवासस्थान अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर राज्य कोई भेदभाव नहीं करेगा| दूसरे शब्दों में सरकारी नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा| अपवाद अनुच्छेद 16(3) के अनुसार, आवास सम्बन्धी अथवा निवास सम्बन्धी योग्यता का निर्धारण केवल संसद द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत ही की जा सकती है| इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि यदि संसद इस सम्बन्ध में कोई कानून बनाती है तो वह पूरे देश में एक सामान लागू होगा| इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने 1957 में कुछ पिछड़े राज्यों के लिए अपने निवासियों को वहां की सरकारी नौकरियों में प्रधानता देने के लिए निवास सम्बन्धी कानून बनाया था जो 1977 में समाप्त हो गया| उसके बाद संसद ने इस कानून का नवीनीकरण नहीं किया| वर्तमान में अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजातियों की बहुलता वाले राज्यों को अपने यहाँ सरकारी नौकरियों में वहां के जनजातियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित करने का अधिकार है| किन्तु यह संसद के द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत न होकर अनुसूची 5 और अनुसूची 6 के अंतर्गत आता है| अनुच्छेद 16(4) के अनुसार ऐसे लोग(नागरिक) जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं उनको सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जा सकता है( इस उपबन्ध में केवल पिछड़ेपन शब्द का उपयोग किया गया है| इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि यह सामाजिक और शैक्षणिक पिछडापन ही हो| साथ ही यह कहा गया है कि ऐसे सभी पिछड़े वर्ग के नागरिक जो राज्य की दृष्टि में सरकारी नौकरियों में पर्याप्त अवसर नहीं प्राप्त कर सकें हैं उनको आरक्षण दिया जाएगा) अनुच्छेद 16(4A) 77वें संविधान संशोधन अधिनियम 1995 के द्वारा जोड़ा गया| इसमें यह व्यवस्था की गयी कि अनुसूचित जाति व जनजाति के सदस्यों को सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाएगा| इस संशोधन की आवश्यकता इस लिए स्पष्ट हुई कि इंदिरा साहनी वाद 1993 में SC के 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत(6:3) से यह फैसला दिया था कि आरक्षण का उद्देश्य प्रवेश स्तर पर बराबरी दिलाना है न की प्रोन्नति में, अतः प्रोन्नति में आरक्षण नही हो सकता| उपरोक्त संशोधन के द्वारा इस फैसले को पलट दिया गया था| 85वें संविधान संशोधन अधिनियम 2001 के द्वारा अनुच्छेद 16 (4A) परिणामिक ज्येष्ठता का उपवाक्य जोड़ा गया जिसका अर्थ होता है कि SC और ST के सदस्यों को सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण केवल इस वर्ग के होने के कारण मिलेगा न कि परम्परागत वरिष्ठता के आधार पर यह प्रोन्नति दी जायेगी| ध्यातव्य है कि प्रोन्नति में आरक्षण केवल SC और ST के सदस्यों के लिए ही प्रभावी है यह OBC के लिए लागू नहीं है और न ही यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सदस्यों के लिए लागू होगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनुच्छेद 16 में अवसर की समानता की स्थापना के सन्दर्भ में विविध उपबन्ध किये गए हैं| इससे आगे बढ़ते हुए अनुच्छेद 16 प्रोन्नति में समानता स्थापित करने का भी प्रयास करता है| अवसर की समानता समाज के समावेशी समान विकास के लिए आवश्यक होती है| समता पूर्ण समाज वास्तविक लोकतांत्रिक विकास की पूर्वापेक्षा है|
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मंत्री परिषद की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए इसकी नियुक्ति प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिये I ( 200 शब्द ) Explaining the concept of the Council of Ministers, clarify its appointment process.
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एप्रोच - भूमिका में मंत्रिपरिषद का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | पुनः अनुच्छेद 74 और 75 का विस्तार से वर्णन करते हुए मंत्रिपरिषद की नियुक्ति प्रक्रिया को भी बताइए | उत्तर - यद्यपि सैद्धातिक रूप से संविधान द्वारा प्रदान की गयी समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है तथापि यथार्थ में कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है | वास्तव में शासन की सभी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद ही करती है | संविधान के अनुच्छेद 74 में यह उल्लिखित है कि राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी , जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा | राष्ट्रपति , मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा तथापि राष्ट्रपति चाहे तो वह एक बार मंत्रिपरिषद से पुनर्विचार के लिए कह सकता है लेकिन मंत्रिपरिषद द्वारा दोबारा सलाह भेजने पर राष्ट्रपति उसकी सलाह एवं अनुसार ही कार्य करेगा एवं मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी गयी सलाह की जांच किसी न्यायलय द्वारा नहीं की जा सकती | अनुच्छेद 75 में मंत्रियों की नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में विस्तार से उपबंध हैं - प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री का परामर्श लेगा | प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या , लोकसभा की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी | इस उपबंध का समावेश 91वें संविधान संशोधन विधेयक , 2003 द्वारा किया गया है | संसद के किसी भी सदन का तथा किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य , यदि दल बदल के अधर पर संसद की सदस्यता के योग्य घोषित कर दिया जायेगा तो ऐसा सदस्य मंत्री पद के लिए अयोग्य होगा | मंत्री , राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद धारण करेंगे | मंत्रिपरिषद , लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी | (अनुच्छेद 75 (3) ) राष्ट्रपति , मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएगा | कोई मंत्री जो निरंतर छः मास की किसी अवधि तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है | उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा | मंत्रियों के वेतन भत्ते , संसद द्वारा निर्धारित किये जायेंगे |
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##Question:मंत्री परिषद की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए इसकी नियुक्ति प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिये I ( 200 शब्द ) Explaining the concept of the Council of Ministers, clarify its appointment process.##Answer:एप्रोच - भूमिका में मंत्रिपरिषद का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | पुनः अनुच्छेद 74 और 75 का विस्तार से वर्णन करते हुए मंत्रिपरिषद की नियुक्ति प्रक्रिया को भी बताइए | उत्तर - यद्यपि सैद्धातिक रूप से संविधान द्वारा प्रदान की गयी समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है तथापि यथार्थ में कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है | वास्तव में शासन की सभी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद ही करती है | संविधान के अनुच्छेद 74 में यह उल्लिखित है कि राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी , जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा | राष्ट्रपति , मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा तथापि राष्ट्रपति चाहे तो वह एक बार मंत्रिपरिषद से पुनर्विचार के लिए कह सकता है लेकिन मंत्रिपरिषद द्वारा दोबारा सलाह भेजने पर राष्ट्रपति उसकी सलाह एवं अनुसार ही कार्य करेगा एवं मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी गयी सलाह की जांच किसी न्यायलय द्वारा नहीं की जा सकती | अनुच्छेद 75 में मंत्रियों की नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में विस्तार से उपबंध हैं - प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री का परामर्श लेगा | प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या , लोकसभा की कुल संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी | इस उपबंध का समावेश 91वें संविधान संशोधन विधेयक , 2003 द्वारा किया गया है | संसद के किसी भी सदन का तथा किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य , यदि दल बदल के अधर पर संसद की सदस्यता के योग्य घोषित कर दिया जायेगा तो ऐसा सदस्य मंत्री पद के लिए अयोग्य होगा | मंत्री , राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद धारण करेंगे | मंत्रिपरिषद , लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी | (अनुच्छेद 75 (3) ) राष्ट्रपति , मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएगा | कोई मंत्री जो निरंतर छः मास की किसी अवधि तक संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है | उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा | मंत्रियों के वेतन भत्ते , संसद द्वारा निर्धारित किये जायेंगे |
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List the major recommendations of the Financial Sector Legal Reforms Commission (FSLRC) formed by the Government of India in 2011. Also, explain the importance of these recommendations in terms of improving the Indian financial system. (15 Marks/ 250 words)
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Approach : Introduce with the formation of FSLRC. Mention its various recommendations. Explain the importance of these recommendations. Conclude accordingly. Answer: The Financial Sector Legislative Reforms Commission (FSLRC) is a body set up by the Government to review and rewrite the legal-institutional architecture of the Indian financial sector. Following were the major recommendations proposed by the body: 1. Consumer protection: Regulators should ensure that financial firms are doing enough for consumer protection. The body proposed certain basic rights for all financial consumers and create a single unified Financial Redressal Agency (FRA) to serve any aggrieved consumer across sectors. 2. Resolution: In cases of financial failure, firms should be swiftly and sufficiently wound up with the interests of small customers. 3. Systemic risk: Regulators should undertake interventions to reduce the systemic risk for the entire financial system. The FSLRC envisages establishing the Financial Stability and Development Council (FSDC) as a statutory agency taking a leadership role in minimizing systemic risk. 4. Public debt management: The body proposed a specialised framework for public debt management with a strategy for long run low-cost financing. The FSLRC proposes a single agency to manage government debt. 5. Monetary policy: The law should establish accountability mechanisms for monetary policy. The Ministry of Finance would define a quantitative target that can be monitored while the RBI will be empowered with various tools to pursue this target. An executive Monetary Policy Committee (MPC) would be established to decide on how to exercise the RBI’s powers. 6. Public debt management: The body proposed to establish a specialised framework for public debt management with a strategy for long run low-cost financing. The FSLRC proposes a single agency to manage government debt. 7. Regulator: The body proposedto move away from the current sector-wise regulation to a system where the RBI regulates the banking and payments system and a Unified Financial Agency subsumes existing regulators like SEBI, IRDA, PFRDA and FMC, to regulate the rest of the financial markets. 8. Indian Financial Code: To subsume all laws related to the financial sector. Importance of these recommendations: 1. The intermingling of financial functions and the gap created due to similar regulatory powers can be avoided with the establishment of the Unified Financial Agency. 2. Different laws create different regulatory hurdles and hence with one UFA, the Ease of Doing Business can be achieved where the regulatory clearance can be smoothly approved. 3. The recommendations are in consonance with the unity of command i.e. principle of management. 4. With streamlined consumer protection and speedy financial resolution in case of any financial failure, it will help the consumers and investors have enhanced trust and will improve the investment scenario in the economy. 5. The formation of MPC has helped in targeting and keeping the rising inflation in check which to a certain level plays a facilitative role in ensuring economic growth and development. 6. The formation of PDMA has helped inresolving issues relating to conflict of interest on part of RBI as the apex financial regulator decides on the key interest rates as well as undertakes to buy and selling of government bonds. The FSLRC recommendations relate to re-writing the laws using a principle-based approach , restructuring existing regulatory agencies and creating new agencies . However, the implementation of all of these recommendations would require wider consultations with stakeholders which will result in improved financial stability and instil economic growth in the country.
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##Question:List the major recommendations of the Financial Sector Legal Reforms Commission (FSLRC) formed by the Government of India in 2011. Also, explain the importance of these recommendations in terms of improving the Indian financial system. (15 Marks/ 250 words)##Answer:Approach : Introduce with the formation of FSLRC. Mention its various recommendations. Explain the importance of these recommendations. Conclude accordingly. Answer: The Financial Sector Legislative Reforms Commission (FSLRC) is a body set up by the Government to review and rewrite the legal-institutional architecture of the Indian financial sector. Following were the major recommendations proposed by the body: 1. Consumer protection: Regulators should ensure that financial firms are doing enough for consumer protection. The body proposed certain basic rights for all financial consumers and create a single unified Financial Redressal Agency (FRA) to serve any aggrieved consumer across sectors. 2. Resolution: In cases of financial failure, firms should be swiftly and sufficiently wound up with the interests of small customers. 3. Systemic risk: Regulators should undertake interventions to reduce the systemic risk for the entire financial system. The FSLRC envisages establishing the Financial Stability and Development Council (FSDC) as a statutory agency taking a leadership role in minimizing systemic risk. 4. Public debt management: The body proposed a specialised framework for public debt management with a strategy for long run low-cost financing. The FSLRC proposes a single agency to manage government debt. 5. Monetary policy: The law should establish accountability mechanisms for monetary policy. The Ministry of Finance would define a quantitative target that can be monitored while the RBI will be empowered with various tools to pursue this target. An executive Monetary Policy Committee (MPC) would be established to decide on how to exercise the RBI’s powers. 6. Public debt management: The body proposed to establish a specialised framework for public debt management with a strategy for long run low-cost financing. The FSLRC proposes a single agency to manage government debt. 7. Regulator: The body proposedto move away from the current sector-wise regulation to a system where the RBI regulates the banking and payments system and a Unified Financial Agency subsumes existing regulators like SEBI, IRDA, PFRDA and FMC, to regulate the rest of the financial markets. 8. Indian Financial Code: To subsume all laws related to the financial sector. Importance of these recommendations: 1. The intermingling of financial functions and the gap created due to similar regulatory powers can be avoided with the establishment of the Unified Financial Agency. 2. Different laws create different regulatory hurdles and hence with one UFA, the Ease of Doing Business can be achieved where the regulatory clearance can be smoothly approved. 3. The recommendations are in consonance with the unity of command i.e. principle of management. 4. With streamlined consumer protection and speedy financial resolution in case of any financial failure, it will help the consumers and investors have enhanced trust and will improve the investment scenario in the economy. 5. The formation of MPC has helped in targeting and keeping the rising inflation in check which to a certain level plays a facilitative role in ensuring economic growth and development. 6. The formation of PDMA has helped inresolving issues relating to conflict of interest on part of RBI as the apex financial regulator decides on the key interest rates as well as undertakes to buy and selling of government bonds. The FSLRC recommendations relate to re-writing the laws using a principle-based approach , restructuring existing regulatory agencies and creating new agencies . However, the implementation of all of these recommendations would require wider consultations with stakeholders which will result in improved financial stability and instil economic growth in the country.
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डब्लूटीओ से सम्बंधित गैर-कृषि बाजार पहुँच(NAMA) तथा व्यापार सुविधा समझौता(TFA) के बारे में चर्चा कीजिये| व्यापार सुविधा समझौता से भारत के वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Discuss Non-agricultural market access(NAMA) and Trade Facilitation Agreement (TFA) related to WTO. Explain the effects ofTrade Facilitation Agreement on India"s Global Trade. (200 words)
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एप्रोच उत्तर के पहले भाग में डब्लूटीओ के गैर-कृषि व्यापार पहुँच प्रावधान को स्पष्ट कीजिये| दुसरे भाग में व्यापार सुविधा समझौता के सन्दर्भ में चर्चा कीजिये| अगले भाग में व्यापार सुविधा समझौता से भारत के वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों को बताईये| उत्तर- डब्लूटीओ में वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न समझौतें किए गए हैं-कृषि पर समझौता, ट्रिप्स , बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़ा समझौता आदि| इन्हीं में गैर कृषि व्यापार समझौता(NAMA) तथा व्यापार सुविधा समझौता(TFA) का भी नाम आता है| गैर कृषि व्यापार पहुँच(NAMA) इसका प्रमुख उद्देश्य सदस्य राष्ट्रों द्वारा गैर कृषि उत्पादों के लिए बाजार का निर्माण करना है| इन्हें कभी-कभी औद्योगिक उत्पादों/निर्मित वस्तुओं के व्यापार के सन्दर्भ में भी जाना जाता है| इनमें निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं- विनिर्माण उत्पाद, ईंधन और खनन उत्पाद, मछली-उत्पाद, वानिकी उत्पाद, फूटवियर आदि| उरुग्वे दौर के तहत, विकसित देशों ने NAMA उत्पादों पर अपने टैरिफ को 6.3% से घटाकर 3.8% कर दिया। विकासशील देशों ने NAMA के तहत आने वाले संपूर्ण उत्पादों के लिए टैरिफ बाईंडिंग 23% से बढाकर 71% तक कर दिया। इस प्रावधान के चलते विकासशील देशों के व्यापार को काफी बढ़ावा मिला| विकसित तथा विकासशील देशों में टैरिफ बाईंडिंग के स्तर को लेकर व्यापक असहमति मौजूद है| व्यापार सुविधा समझौता(TFA) · 1. टीएफए डब्ल्यूटीओ का ऐसा बहुपक्षीय समझौता है जिसका उद्देश्य वस्तुओं की सीमा पार आवाजाही के लिए सीमा शुल्क नियमों को आसान बनाना है| इसमें वस्तुओं के आवागमन सहित वस्तुओं की आवाजाही/निकासी में तेजी लाने के प्रावधान शामिल हैं| · 2.इसमें तकनीकी सहायता तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से व्यापार सुगमता के उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है|इसके माध्यम से विकसित तथा विकासशील देशों के सीमा-शुल्क प्रक्रियाओं तथा सम्बंधित प्रशासन में सामंजस्य बैठाया जाता है| · 3.डब्लूटीओ की नौवीं मंत्रिस्तरीय बैठक-2013 से इसे औपचारिक स्वरुप प्रदान किया गया| · 4.भारत द्वारा इसपर 2016 में हस्ताक्षर किए गए थें| TFA से भारत के वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभाव · 1.भारतीय निर्यात को प्रोत्साहन जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति · 2.बंदरगाहों/एयरपोर्ट जैसे सीमापारीय व्यापार केन्द्रों पर सीमा-शुल्क पद्धतियों की बेहतर पारदर्शिता तथा सरलीकरण जिससे आयात-निर्यात में तेजी तथा ईज ऑफ डूईंग बिजनेस में सुधार · 3.विदेशी व्यापार के क्षेत्र में भारत की अहम् भूमिका को प्रोत्साहन · 4.बंदरगाहों जैसे सीमापारीय व्यापार केन्द्रों के आधुनिकीकरण को बढ़ावा हालांकि TFA वार्ताओं के प्रारंभिक दौर में भारत द्वारा इसपर कुछ चिंताएं व्यक्त की गई थी परन्तु सीमापारीय अवसंरचना में सुधार के साथ ही भारत द्वारा 2016 में इसे अनुमोदित कर दिया गया था|
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##Question:डब्लूटीओ से सम्बंधित गैर-कृषि बाजार पहुँच(NAMA) तथा व्यापार सुविधा समझौता(TFA) के बारे में चर्चा कीजिये| व्यापार सुविधा समझौता से भारत के वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Discuss Non-agricultural market access(NAMA) and Trade Facilitation Agreement (TFA) related to WTO. Explain the effects ofTrade Facilitation Agreement on India"s Global Trade. (200 words)##Answer:एप्रोच उत्तर के पहले भाग में डब्लूटीओ के गैर-कृषि व्यापार पहुँच प्रावधान को स्पष्ट कीजिये| दुसरे भाग में व्यापार सुविधा समझौता के सन्दर्भ में चर्चा कीजिये| अगले भाग में व्यापार सुविधा समझौता से भारत के वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों को बताईये| उत्तर- डब्लूटीओ में वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न समझौतें किए गए हैं-कृषि पर समझौता, ट्रिप्स , बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़ा समझौता आदि| इन्हीं में गैर कृषि व्यापार समझौता(NAMA) तथा व्यापार सुविधा समझौता(TFA) का भी नाम आता है| गैर कृषि व्यापार पहुँच(NAMA) इसका प्रमुख उद्देश्य सदस्य राष्ट्रों द्वारा गैर कृषि उत्पादों के लिए बाजार का निर्माण करना है| इन्हें कभी-कभी औद्योगिक उत्पादों/निर्मित वस्तुओं के व्यापार के सन्दर्भ में भी जाना जाता है| इनमें निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं- विनिर्माण उत्पाद, ईंधन और खनन उत्पाद, मछली-उत्पाद, वानिकी उत्पाद, फूटवियर आदि| उरुग्वे दौर के तहत, विकसित देशों ने NAMA उत्पादों पर अपने टैरिफ को 6.3% से घटाकर 3.8% कर दिया। विकासशील देशों ने NAMA के तहत आने वाले संपूर्ण उत्पादों के लिए टैरिफ बाईंडिंग 23% से बढाकर 71% तक कर दिया। इस प्रावधान के चलते विकासशील देशों के व्यापार को काफी बढ़ावा मिला| विकसित तथा विकासशील देशों में टैरिफ बाईंडिंग के स्तर को लेकर व्यापक असहमति मौजूद है| व्यापार सुविधा समझौता(TFA) · 1. टीएफए डब्ल्यूटीओ का ऐसा बहुपक्षीय समझौता है जिसका उद्देश्य वस्तुओं की सीमा पार आवाजाही के लिए सीमा शुल्क नियमों को आसान बनाना है| इसमें वस्तुओं के आवागमन सहित वस्तुओं की आवाजाही/निकासी में तेजी लाने के प्रावधान शामिल हैं| · 2.इसमें तकनीकी सहायता तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से व्यापार सुगमता के उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है|इसके माध्यम से विकसित तथा विकासशील देशों के सीमा-शुल्क प्रक्रियाओं तथा सम्बंधित प्रशासन में सामंजस्य बैठाया जाता है| · 3.डब्लूटीओ की नौवीं मंत्रिस्तरीय बैठक-2013 से इसे औपचारिक स्वरुप प्रदान किया गया| · 4.भारत द्वारा इसपर 2016 में हस्ताक्षर किए गए थें| TFA से भारत के वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाले प्रभाव · 1.भारतीय निर्यात को प्रोत्साहन जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति · 2.बंदरगाहों/एयरपोर्ट जैसे सीमापारीय व्यापार केन्द्रों पर सीमा-शुल्क पद्धतियों की बेहतर पारदर्शिता तथा सरलीकरण जिससे आयात-निर्यात में तेजी तथा ईज ऑफ डूईंग बिजनेस में सुधार · 3.विदेशी व्यापार के क्षेत्र में भारत की अहम् भूमिका को प्रोत्साहन · 4.बंदरगाहों जैसे सीमापारीय व्यापार केन्द्रों के आधुनिकीकरण को बढ़ावा हालांकि TFA वार्ताओं के प्रारंभिक दौर में भारत द्वारा इसपर कुछ चिंताएं व्यक्त की गई थी परन्तु सीमापारीय अवसंरचना में सुधार के साथ ही भारत द्वारा 2016 में इसे अनुमोदित कर दिया गया था|
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राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने की शक्ति का विवरणात्मक वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describe in detail the President"s ordinance issuing power. (150-200 words, Marks - 10)
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एप्रोच - भूमिका में राष्ट्रपति का सामान्य परिचय देते हुए उसके अध्यादेश जारी करने की शक्ति का भी परिचय दीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने की शक्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | उत्तर - राष्ट्रपति , भारत का राज्य प्रमुख होता है | वह भारत का प्रथम नागरिक तथा राष्ट्र की एकता , अखंडता एवं सुदृढ़ता का प्रतीक है | भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को कई तरह की शक्तियां , कार्य , कर्तव्य एवं दायित्व प्रदान किये गए हैं | इनमे राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को प्रमुख शक्ति के रूप में देखा जा सकता है | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की चर्चा मिलती है | इसके अनुसार जब संसद का सत्र न चल रहा हो , यदि राष्ट्रपति को यह लगे कि तत्काल कार्यवाही करना आवश्यक है , तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है और इन अध्यादेशों का वाही जोर तथा प्रभाव होगा जो संसद द्वारा पारित विधियों का होता है | राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश अंतरिम तथा अस्थायी विधान के रूप में होते हैं क्योंकि उन्हें जारी रखने के लिए जरुरी है कि उन पर संसद का अनुमोदन प्राप्त किया जाये और अध्यादेशों के स्थान पर विधियाँ बनायी जाएँ | राष्ट्रपति केवल उन्हीं मामलों पर अध्यादेश जरी कर सकता है जिनके बारे में संसद विधियाँ बना सकती है | जब दोनों सदन सत्र में होते हैं तब राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति उपलब्ध नहीं होती | उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कर सकता है | अतः इसके दुरूपयोग की भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है | अतः इनके दुरूपयोग को रोकने के उपाय भी संविधान के अनुच्छेद 123 (2) (a) में किये गए हैं - संसद को यह शक्ति है कि वह प्रस्ताव पारित कर कभी भी अध्यादेशों को रद्द कर दे | अध्यादेश का अगले सत्र के प्रारंभ होने के बाद छः सप्ताह में स्वतः समाप्त हो जाने का प्रावधान है , यदि संसद उसे पारित न कर दे |
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##Question:राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने की शक्ति का विवरणात्मक वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describe in detail the President"s ordinance issuing power. (150-200 words, Marks - 10)##Answer:एप्रोच - भूमिका में राष्ट्रपति का सामान्य परिचय देते हुए उसके अध्यादेश जारी करने की शक्ति का भी परिचय दीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने की शक्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | उत्तर - राष्ट्रपति , भारत का राज्य प्रमुख होता है | वह भारत का प्रथम नागरिक तथा राष्ट्र की एकता , अखंडता एवं सुदृढ़ता का प्रतीक है | भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को कई तरह की शक्तियां , कार्य , कर्तव्य एवं दायित्व प्रदान किये गए हैं | इनमे राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को प्रमुख शक्ति के रूप में देखा जा सकता है | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति की चर्चा मिलती है | इसके अनुसार जब संसद का सत्र न चल रहा हो , यदि राष्ट्रपति को यह लगे कि तत्काल कार्यवाही करना आवश्यक है , तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है और इन अध्यादेशों का वाही जोर तथा प्रभाव होगा जो संसद द्वारा पारित विधियों का होता है | राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश अंतरिम तथा अस्थायी विधान के रूप में होते हैं क्योंकि उन्हें जारी रखने के लिए जरुरी है कि उन पर संसद का अनुमोदन प्राप्त किया जाये और अध्यादेशों के स्थान पर विधियाँ बनायी जाएँ | राष्ट्रपति केवल उन्हीं मामलों पर अध्यादेश जरी कर सकता है जिनके बारे में संसद विधियाँ बना सकती है | जब दोनों सदन सत्र में होते हैं तब राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति उपलब्ध नहीं होती | उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कर सकता है | अतः इसके दुरूपयोग की भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है | अतः इनके दुरूपयोग को रोकने के उपाय भी संविधान के अनुच्छेद 123 (2) (a) में किये गए हैं - संसद को यह शक्ति है कि वह प्रस्ताव पारित कर कभी भी अध्यादेशों को रद्द कर दे | अध्यादेश का अगले सत्र के प्रारंभ होने के बाद छः सप्ताह में स्वतः समाप्त हो जाने का प्रावधान है , यदि संसद उसे पारित न कर दे |
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भारतीय संसद द्वारा अस्पृश्यता के उन्मूलन की दिशा में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही अस्पृश्यता अधिनियम सम्बन्धी हालिया विवाद को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, अंक 10) Discuss the efforts made by the Indian Parliament towards the abolition of untouchability. Along with this, clarify the recent controversy regarding the untouchability act. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में अस्पृश्यता को परिभाषित कीजिये 2- संविधान और विधायिका द्वारा अस्पृश्यता के सन्दर्भ में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में हालिया विवाद और उस पर विधायिका की प्रतिक्रिया बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| समानता का अधिकार, भारतीय संविधान की प्रमुख गारंटी है| भारतीय संविधान में सामूहिक रूप से सामाजिक समानता के दर्शन को प्रस्तुत करता है| इसी सन्दर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन की घोषणा की गयी है| इस उपबन्ध के अंतर्गत अस्पृश्यता का किसी भी रूप में पालन दंडनीय अपराध बनाया गया है| अस्पृश्यता या छूआछूत एक सामान्य शब्द है, अस्पृश्यता का तात्पर्य एक विशेष जाति या वर्ग के व्यक्ति को निम्न जाति में जन्म लेने या उस निचली जाति समूह से संबंध रखने के कारण भेदभाव किया जाता है या उसको अस्पृश्य माना जाता है| यह मानवीय गरिमा का हनन करने वाली प्रक्रिया है| अतः इसके उन्मूलन और सामाजिक समानता के लिए भारतीय संविधान और भारतीय संसद ने विभिन्न प्रयास किये हैं|इस सन्दर्भ में संसद द्वारा निम्नलिखित कानून बनाए गए हैं- अस्पृश्यता (अपराध निषेध)अधिनियम · इसे भारतीय संसद ने अनुच्छेद 17 के क्रियान्वयन के लिए 1955 में पारित किया था · इसके अंतर्गत निम्नलिखित कृत्य को दंडनीय अपराध घोषित किया गया · किसी व्यक्ति को पूजास्थल पर प्रवेश करने से रोकना · किसी व्यक्ति को अस्पृश्य कह कर उसे अपमानित करना · किसी दूकान, पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों पर जाने से रोकना · किसी व्यक्ति को अस्पृश्य होने के नाम पर कोई सामग्री बेचने से अस्वीकार करना नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976 · 1976 मेंसंसद द्वारा अस्पृश्यता (अपराध निषेध)अधिनियम का नाम बदल कर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया · इस संशोधित कानून में यह भी व्यवस्था की गयी कि यदि उपरोक्त अधिनियम के अंतर्गत किसी व्यक्ति को सजा होती है तो वह आगे चुनाव नहीं लड़ पायेगा · इसमें निम्नलिखित 3 प्रमुख कृत्यों को दंडनीय अपराध बना दिया गया · जातिसूचक शब्द का प्रयोग इसलिए करना कि कुछ लोगों के सामने किसी को अपमानित किया जा सके · अस्पृश्यता का प्रचार-प्रसार करना और · तर्क देकर अस्पृश्यताके औचित्य को सही ठहराना अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 · इसके माध्यम से संसद ने अस्पृश्यता विरोधी कानूनों और कड़ा बनाया गया और व्यवस्था की गयी कि · तथाकथित अस्पृश्य व्यक्ति के साथ कोई भी ऐसा बर्ताव जो उसकी गरिमा को ठेस पहुचाये, दंडनीय अपराध होगा · पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पर तुरंत FIR दर्ज की जायेगी, अर्थात पीड़ित व्यक्ति की बात को प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाएगा · इसमें दोषी व्यक्ति को अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी और इसमें दोषी व्यक्ति की तुरंत गिरफ्तारी होगी · इसमें दोषी व्यक्ति के मामले की सुनवाई विशेष अदालत में करने की व्यवस्था की गयी है और · पीड़ित व्यक्ति के आर्थिक नुकसान की भरपाई राज्य द्वारा की जायेगी| राज्य पुनर्वास व पुनर्स्थापन की व्यवस्था अपने खर्चे पर करेगा अभी हाल ही में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989, काशीनाथ महाजन बनाम गायकवाड़ 2018 अथवा काशीनाथ महाजन बनाम संघ राज्य के मामले में विधायिका एवं न्यायपालिका के मध्य गतिरोध का विषय बन गया था| ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 141 के अंतर्गत SC द्वारा दिए गए आदेश या दिशा निर्देश भी कानून माने जाते हैं जिनका पालन नहीं करने वाले न्यायालय या पदाधिकारी को न्यायालय की अवमानना का दोषी माना जाता है और SC उन्हें दण्डित कर सकता है| काशीनाथ महाजन बनाम संघ राज्य के मामले में SC ने उपरोक्त अधिनियम की कठोर धाराओं को सरल बनाने हेतु कुछ दिशा-निर्देश दिए थे यथा; यदि कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी में है और यदि उपरोक्त अधिनियम के अंतर्गत उस पर कोई आरोप लगाता है तो उस के विरुद्ध FIR तभी दर्ज होगा जब उस सरकारी कर्मचारी या पदाधिकारी का विभागाध्यक्ष अथवा वरिष्ठ अधिकारी इस सम्बन्ध में अनुमति प्रदान करेगा|इस अधिनियम के अंतर्गत दोषी व्यक्ति को अग्रिम जमानत दी जा सकेगी| यदि दोषी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नही है तो ऐसी स्थिति में उपरोक्त अधिनियम के अंतर्गत उसके विरुद्ध तभी FIR किया जाएगा जब कि वरिष्ट पुलिस अधीक्षक रैंक का कोई पुलिस अधिकारी इस सम्बन्ध में आदेश देगा, औरदोषी व्यक्ति की गिरफ्तारी तभी की जायेगी जब उपाधीक्षक रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जांच में यह आरोप सही पाए जायेंगे| लेकिन जनमत को देखते हुए और सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखते हुए अगस्त 2018 में वर्तमान सरकार ने उपरोक्त अधिनियम को संशोधित कर उसके मूल स्वरुप को पुनः स्थापित कर दिया और इस प्रकार SC के उपरोक्त दिशा निर्देश को पलट दिया|
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##Question:भारतीय संसद द्वारा अस्पृश्यता के उन्मूलन की दिशा में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही अस्पृश्यता अधिनियम सम्बन्धी हालिया विवाद को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, अंक 10) Discuss the efforts made by the Indian Parliament towards the abolition of untouchability. Along with this, clarify the recent controversy regarding the untouchability act. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अस्पृश्यता को परिभाषित कीजिये 2- संविधान और विधायिका द्वारा अस्पृश्यता के सन्दर्भ में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में हालिया विवाद और उस पर विधायिका की प्रतिक्रिया बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| समानता का अधिकार, भारतीय संविधान की प्रमुख गारंटी है| भारतीय संविधान में सामूहिक रूप से सामाजिक समानता के दर्शन को प्रस्तुत करता है| इसी सन्दर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन की घोषणा की गयी है| इस उपबन्ध के अंतर्गत अस्पृश्यता का किसी भी रूप में पालन दंडनीय अपराध बनाया गया है| अस्पृश्यता या छूआछूत एक सामान्य शब्द है, अस्पृश्यता का तात्पर्य एक विशेष जाति या वर्ग के व्यक्ति को निम्न जाति में जन्म लेने या उस निचली जाति समूह से संबंध रखने के कारण भेदभाव किया जाता है या उसको अस्पृश्य माना जाता है| यह मानवीय गरिमा का हनन करने वाली प्रक्रिया है| अतः इसके उन्मूलन और सामाजिक समानता के लिए भारतीय संविधान और भारतीय संसद ने विभिन्न प्रयास किये हैं|इस सन्दर्भ में संसद द्वारा निम्नलिखित कानून बनाए गए हैं- अस्पृश्यता (अपराध निषेध)अधिनियम · इसे भारतीय संसद ने अनुच्छेद 17 के क्रियान्वयन के लिए 1955 में पारित किया था · इसके अंतर्गत निम्नलिखित कृत्य को दंडनीय अपराध घोषित किया गया · किसी व्यक्ति को पूजास्थल पर प्रवेश करने से रोकना · किसी व्यक्ति को अस्पृश्य कह कर उसे अपमानित करना · किसी दूकान, पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों पर जाने से रोकना · किसी व्यक्ति को अस्पृश्य होने के नाम पर कोई सामग्री बेचने से अस्वीकार करना नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976 · 1976 मेंसंसद द्वारा अस्पृश्यता (अपराध निषेध)अधिनियम का नाम बदल कर नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कर दिया गया · इस संशोधित कानून में यह भी व्यवस्था की गयी कि यदि उपरोक्त अधिनियम के अंतर्गत किसी व्यक्ति को सजा होती है तो वह आगे चुनाव नहीं लड़ पायेगा · इसमें निम्नलिखित 3 प्रमुख कृत्यों को दंडनीय अपराध बना दिया गया · जातिसूचक शब्द का प्रयोग इसलिए करना कि कुछ लोगों के सामने किसी को अपमानित किया जा सके · अस्पृश्यता का प्रचार-प्रसार करना और · तर्क देकर अस्पृश्यताके औचित्य को सही ठहराना अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 · इसके माध्यम से संसद ने अस्पृश्यता विरोधी कानूनों और कड़ा बनाया गया और व्यवस्था की गयी कि · तथाकथित अस्पृश्य व्यक्ति के साथ कोई भी ऐसा बर्ताव जो उसकी गरिमा को ठेस पहुचाये, दंडनीय अपराध होगा · पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पर तुरंत FIR दर्ज की जायेगी, अर्थात पीड़ित व्यक्ति की बात को प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाएगा · इसमें दोषी व्यक्ति को अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी और इसमें दोषी व्यक्ति की तुरंत गिरफ्तारी होगी · इसमें दोषी व्यक्ति के मामले की सुनवाई विशेष अदालत में करने की व्यवस्था की गयी है और · पीड़ित व्यक्ति के आर्थिक नुकसान की भरपाई राज्य द्वारा की जायेगी| राज्य पुनर्वास व पुनर्स्थापन की व्यवस्था अपने खर्चे पर करेगा अभी हाल ही में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989, काशीनाथ महाजन बनाम गायकवाड़ 2018 अथवा काशीनाथ महाजन बनाम संघ राज्य के मामले में विधायिका एवं न्यायपालिका के मध्य गतिरोध का विषय बन गया था| ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 141 के अंतर्गत SC द्वारा दिए गए आदेश या दिशा निर्देश भी कानून माने जाते हैं जिनका पालन नहीं करने वाले न्यायालय या पदाधिकारी को न्यायालय की अवमानना का दोषी माना जाता है और SC उन्हें दण्डित कर सकता है| काशीनाथ महाजन बनाम संघ राज्य के मामले में SC ने उपरोक्त अधिनियम की कठोर धाराओं को सरल बनाने हेतु कुछ दिशा-निर्देश दिए थे यथा; यदि कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी में है और यदि उपरोक्त अधिनियम के अंतर्गत उस पर कोई आरोप लगाता है तो उस के विरुद्ध FIR तभी दर्ज होगा जब उस सरकारी कर्मचारी या पदाधिकारी का विभागाध्यक्ष अथवा वरिष्ठ अधिकारी इस सम्बन्ध में अनुमति प्रदान करेगा|इस अधिनियम के अंतर्गत दोषी व्यक्ति को अग्रिम जमानत दी जा सकेगी| यदि दोषी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नही है तो ऐसी स्थिति में उपरोक्त अधिनियम के अंतर्गत उसके विरुद्ध तभी FIR किया जाएगा जब कि वरिष्ट पुलिस अधीक्षक रैंक का कोई पुलिस अधिकारी इस सम्बन्ध में आदेश देगा, औरदोषी व्यक्ति की गिरफ्तारी तभी की जायेगी जब उपाधीक्षक रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जांच में यह आरोप सही पाए जायेंगे| लेकिन जनमत को देखते हुए और सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखते हुए अगस्त 2018 में वर्तमान सरकार ने उपरोक्त अधिनियम को संशोधित कर उसके मूल स्वरुप को पुनः स्थापित कर दिया और इस प्रकार SC के उपरोक्त दिशा निर्देश को पलट दिया|
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प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों को बताते हुए ,गठबंधन सरकार में इसकी भूमिका एवं स्थिति की विवेचना कीजिये |(150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describing the Prime Minister"s special powers, discuss his role and position in coalition government. ( 150-200 Words , Marks- 10 )
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दृष्टिकोण - प्रधानमंत्री की संवैधानिक स्थिति बताइए | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार क्या-क्या हैं , इसका चर्चा करना है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों पर गठबंधन का क्या प्रभाव पड़ेगा , इसका वर्णन करना है | उत्तर - भारत में सरकार एवं शासन की वेस्टमिन्स्टर प्रणाली अथवा ब्रिटेन के प्रारूप का अनुगमन किया गया है | प्रधानमंत्री के अधिकांश कार्य ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर की भाँति संसदीय परम्पराओं पर ही आधारित हैं |प्रधानमंत्री "समकक्षों में प्रथम" "सरकार का प्रमुख" "मंत्रिपरिषद के निर्माण ,जीवन और मृत्यु का केंद्रबिंदु" है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों में निम्न प्रमुख हैं- - मंत्रियों की नियुक्ति, मंत्रालय का आबंटन,बैठकों की अध्यक्षता ,समन्वय एवं मंत्रियों को पदच्युत करना | - राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद के मध्य संवाद की प्रमुख कड़ी के रूप में | - महान्यायवादी, संघ लोक सेवा आयोग ,चुनाव आयोग जैसे कई अन्य संस्थाओं में नियुक्ति हरतु राष्ट्रपति को सलाह देना | - संसद के सत्र आहूत करने एवं सत्रावसान करने ,संसद के पटल पर नीतियों की घोषणा करना | - जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हुए जनकल्याण हेतु नीति निर्माण करना | - देश की आतंरिक शासन नीतियों का निर्माण | - देश की विदेश नीति का संचालन करना | - केंद्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता | इस प्रकार प्रधानमंत्री केन्द्रीय मंत्री परिषद का केंद्रबिंदु है और जनता की इच्छाओं को प्रतिबिंबित करने वाला स्तम्भ है , किन्तु गठबंधन सरकार में कुछ कारणों से उसकी शक्तियां व्यावहारिक रूप से सीमित हो जाती हैं | इसके प्रमुख कारण निम्न हैं - 1. गठबंधन से पूर्व ही पद प्राप्त करने का समझौता करने से अपनी इच्छा से मंत्री नियुक्त करने की शक्ति सीमित हो जाती है | 2. गठबंधन पूर्व साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय करने से नीति निर्माण में प्रधानमंत्री की स्वतंत्रता नहीं रह पाती | 3. स्पष्ट बहुमत प्राप्त प्रधनामंत्री लोकसभा को नियंत्रित करता है किन्तु गठबंधन सरकार का प्रधानमंत्री लोकसभा द्वारा नियंत्रित होता है| इस प्रकार गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका नीति निर्माता और निर्णायक की नहीं रहती अपितु उसकी स्थिति एक प्रबंधक के समान हो जाती है | फिर भी प्रधानमंत्री अपने कृत्रित्व और व्यक्तित्व से गठबन्धन सरकार में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है |
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##Question:प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों को बताते हुए ,गठबंधन सरकार में इसकी भूमिका एवं स्थिति की विवेचना कीजिये |(150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describing the Prime Minister"s special powers, discuss his role and position in coalition government. ( 150-200 Words , Marks- 10 )##Answer:दृष्टिकोण - प्रधानमंत्री की संवैधानिक स्थिति बताइए | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार क्या-क्या हैं , इसका चर्चा करना है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों पर गठबंधन का क्या प्रभाव पड़ेगा , इसका वर्णन करना है | उत्तर - भारत में सरकार एवं शासन की वेस्टमिन्स्टर प्रणाली अथवा ब्रिटेन के प्रारूप का अनुगमन किया गया है | प्रधानमंत्री के अधिकांश कार्य ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर की भाँति संसदीय परम्पराओं पर ही आधारित हैं |प्रधानमंत्री "समकक्षों में प्रथम" "सरकार का प्रमुख" "मंत्रिपरिषद के निर्माण ,जीवन और मृत्यु का केंद्रबिंदु" है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों में निम्न प्रमुख हैं- - मंत्रियों की नियुक्ति, मंत्रालय का आबंटन,बैठकों की अध्यक्षता ,समन्वय एवं मंत्रियों को पदच्युत करना | - राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद के मध्य संवाद की प्रमुख कड़ी के रूप में | - महान्यायवादी, संघ लोक सेवा आयोग ,चुनाव आयोग जैसे कई अन्य संस्थाओं में नियुक्ति हरतु राष्ट्रपति को सलाह देना | - संसद के सत्र आहूत करने एवं सत्रावसान करने ,संसद के पटल पर नीतियों की घोषणा करना | - जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हुए जनकल्याण हेतु नीति निर्माण करना | - देश की आतंरिक शासन नीतियों का निर्माण | - देश की विदेश नीति का संचालन करना | - केंद्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता | इस प्रकार प्रधानमंत्री केन्द्रीय मंत्री परिषद का केंद्रबिंदु है और जनता की इच्छाओं को प्रतिबिंबित करने वाला स्तम्भ है , किन्तु गठबंधन सरकार में कुछ कारणों से उसकी शक्तियां व्यावहारिक रूप से सीमित हो जाती हैं | इसके प्रमुख कारण निम्न हैं - 1. गठबंधन से पूर्व ही पद प्राप्त करने का समझौता करने से अपनी इच्छा से मंत्री नियुक्त करने की शक्ति सीमित हो जाती है | 2. गठबंधन पूर्व साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय करने से नीति निर्माण में प्रधानमंत्री की स्वतंत्रता नहीं रह पाती | 3. स्पष्ट बहुमत प्राप्त प्रधनामंत्री लोकसभा को नियंत्रित करता है किन्तु गठबंधन सरकार का प्रधानमंत्री लोकसभा द्वारा नियंत्रित होता है| इस प्रकार गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका नीति निर्माता और निर्णायक की नहीं रहती अपितु उसकी स्थिति एक प्रबंधक के समान हो जाती है | फिर भी प्रधानमंत्री अपने कृत्रित्व और व्यक्तित्व से गठबन्धन सरकार में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है |
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अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता से आप क्या समझते हैं? उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णयों के आधार पर अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त प्राण व दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर चर्चा कीजिए।( 150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by the life and personalliberty provided by Article 21?On the basis of the decisions given by the Supreme Court, discuss thefundamentalright to life and personal liberty conferred under Article 21. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में अनुच्छेद 21 के प्रावधान को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में अनुच्छेद की व्याख्या से सम्बन्धित वादों और उनके निर्णयों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का कठोरता से और श्रद्धा पूर्वक पालन किया गया हो। ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 21 विधान मण्डल कि शक्तियों पर परिसीमा के रूप में नहीं है।यह व्यक्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध मनमाने एवं अवैध कार्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए अपने विभिन्न निर्णयों ने इस अनुच्छेद में विस्तार किया गया है। इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है- ए.के. गोपालन मामला · इसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था दी गयी कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध ही सुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के। अर्थात राज्य राज्य इस स्वतन्त्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है। मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामला 1978 · उच्चतम न्यायालय ने गोपालन मामले में दिये गए अपने निर्णय को बदल दिया। अतः न्यायालय ने व्यवस्था दी कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता को उचित एवं न्यायपूर्ण मामले के आधार पर रोका जा सकता है।इस मुकदमें में SC ने पिछले 28 वर्षों से भारत में स्थापित आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा और दशा दोनों बदल दी जो आज भी अनवरत चल रही है| इसमें SC ने निम्नलिखित व्यवस्था की · अनुच्छेद 19 और 21 जल अवरोधी विभाजन नहीं हैं, इन्हें समय समय पर एक साथ पढ़ा जा सकता है अथवा इनको एक साथ मिलाया जा सकता है अर्थात इनमें से किसी एक उपबन्ध का राज्य द्वारा उल्लंघन किया जाता है तो संभव है कि दूसरे का भी उल्लंघन हो जाए|(इसी मुकदमें सर्वोच्च न्यायालय ने विदेश यात्रा को भी अनुच्छेद 19 का अंग माना था) · नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत, आधारहीन सिद्धांत नहीं है| इसका अर्थ यह होता है कि पीड़ित व्यक्ति को वे सभी अवसर और मंच उपलब्ध कराये जाएँ जिनका प्रयोग कर वह खुद को निर्दोष साबित कर सके|साथ ही उसके विरुद्ध राज्य द्वारा की जाने वाली कार्यवाई का आधार उसे पता होना चाहिए · विधानमंडल द्वारा स्थापित किसी भी कानूनी प्रक्रिया को उचित नही माना जा सकता, यह प्रक्रिया मूल रूप से तथा प्रक्रियात्मक रूप से उचित होनी चाहिए ताकि पीड़ित व्यक्ति को यह भरोसा हो कि कानून उसे न्याय देने के लिए बना है न की उसके अधिकारों का हनन करने के लिए| · भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त सिद्धांतों को आगे चल कर कई मुकदमों में लागू किया जैसे- · बच्चनसिंह वाद एवं मच्छीसिंह वाद बनाम पंजाब राज्य- में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कहा कि केवल दुर्लभ आपराधिक मामलों में ही मृत्युदंड की सजा दी जायेगी उदाहरणार्थ ऐसे अपराध जिनसे समाज की सामूहिक चेतना छिन्न-भिन्न हो जाए, किसी समाज या समुदाय में भय व्याप्त हो जाए, जिससे आपराधिक मनोवृत्ति को बढ़ावा मिले और जिससे सभ्य समाज के चरित्र पर गंभीर दाग लगे, उन्ही मामलों में मृत्यदंड दिया जाय| · राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण वाद 2013 में SC ने किन्नर समुदाय को तृतीय लिंग की श्रेणी में रखने का आदेश दिया जिसे मतदाता सूची में भी अंकित जाना था · लिली थामस वाद 2014 में SC ने यह आदेश दिया कि जिस प्रकार एक आम आदमी को दो वर्ष अथवा उससे अधिक की सजा होने पर उसे चुनाव लड़ने के योग्य नहीं माना जाता वही नियम पदासीन सांसदों, विधायकों और विधान परिषद् के सदस्यों पर भी लागू होगा · कॉमनकॉज की एक याचिका पर SC ने अपने द्वारा पूर्व में इस मुकदमें में दिए गए फैसले को स्पष्ट करते हुए वर्ष 2018 में लिविंग विल पर आधारित पैसिव यूथेनेसिया को मान्यता प्रदान कर दी, यह प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा जिला कलेक्टर की निगरानी में ही किया जा सकेगा · KS पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 का भाग माना, और यह व्यवस्था दी कि आयकर दाखिले(ITR), सब्सिडी की दावेदारी और पासपोर्ट को छोड़कर किसी अन्य मामलें में आधार कार्ड की अनिवार्यता नहीं होगी उदाहरणार्थ किसी संचार ओपरेटर सर सिम कार्ड लेने और बैंक में खाता खोलने के लिए आधार अनिवार्य नहीं होगा · शायराबानो तथा अन्य बनाम भारत संघ 2017 के एक मुकदमें में SC ने ट्रिपल तलाक को गैर-जरुरी बताया| 3:2 के बहुमत से SC की संविधान पीठ ने इसे कुरआन का हिस्सा नहीं माना और सरकार को निर्देश दिया कि वह संसद से इस कुप्रथा को रोकने के लिए कानून बनवाये · नवजोत सिंह जौहर बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन 2013 में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को पलटते हुए LGBTQI को स्वतंत्रता दे दी किन्तु यह स्वतंत्रता स्वेच्छा से किये गए लैंगिक पसंद तक सीमित होगी साथ ही यह केवल वयस्कों पर लागू होगी अन्यथा इसे अप्राकृतिक यौनाचार माना जाएगा जो कि अपराध की श्रेणी में आयेगा उपरोक्त चर्चा स्पष्ट है कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने अनेक नए अधिकारों को शामिल किया। इसमें प्रमुख रूप से निजता के अधिकार, चयन की स्वतन्त्रता का व्यापक महत्व है।हालांकि निजता के अधिकार के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय कई संभावनाओं को उत्पन्न करता है जैसे- सूचना के अधिकार और निजता के बीच असंतुलन, सरकारी योजनाओं जैसे आधार संबंधी मामले आदि।इस प्रकार संविधान के व्याख्याता के रूप में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णय अनुच्छेद 21 को अत्यधिक प्रभावी रूप देते हैं।
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##Question:अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता से आप क्या समझते हैं? उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णयों के आधार पर अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त प्राण व दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर चर्चा कीजिए।( 150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by the life and personalliberty provided by Article 21?On the basis of the decisions given by the Supreme Court, discuss thefundamentalright to life and personal liberty conferred under Article 21. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अनुच्छेद 21 के प्रावधान को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में अनुच्छेद की व्याख्या से सम्बन्धित वादों और उनके निर्णयों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का कठोरता से और श्रद्धा पूर्वक पालन किया गया हो। ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 21 विधान मण्डल कि शक्तियों पर परिसीमा के रूप में नहीं है।यह व्यक्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध मनमाने एवं अवैध कार्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए अपने विभिन्न निर्णयों ने इस अनुच्छेद में विस्तार किया गया है। इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है- ए.के. गोपालन मामला · इसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था दी गयी कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध ही सुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के। अर्थात राज्य राज्य इस स्वतन्त्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है। मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामला 1978 · उच्चतम न्यायालय ने गोपालन मामले में दिये गए अपने निर्णय को बदल दिया। अतः न्यायालय ने व्यवस्था दी कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता को उचित एवं न्यायपूर्ण मामले के आधार पर रोका जा सकता है।इस मुकदमें में SC ने पिछले 28 वर्षों से भारत में स्थापित आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा और दशा दोनों बदल दी जो आज भी अनवरत चल रही है| इसमें SC ने निम्नलिखित व्यवस्था की · अनुच्छेद 19 और 21 जल अवरोधी विभाजन नहीं हैं, इन्हें समय समय पर एक साथ पढ़ा जा सकता है अथवा इनको एक साथ मिलाया जा सकता है अर्थात इनमें से किसी एक उपबन्ध का राज्य द्वारा उल्लंघन किया जाता है तो संभव है कि दूसरे का भी उल्लंघन हो जाए|(इसी मुकदमें सर्वोच्च न्यायालय ने विदेश यात्रा को भी अनुच्छेद 19 का अंग माना था) · नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत, आधारहीन सिद्धांत नहीं है| इसका अर्थ यह होता है कि पीड़ित व्यक्ति को वे सभी अवसर और मंच उपलब्ध कराये जाएँ जिनका प्रयोग कर वह खुद को निर्दोष साबित कर सके|साथ ही उसके विरुद्ध राज्य द्वारा की जाने वाली कार्यवाई का आधार उसे पता होना चाहिए · विधानमंडल द्वारा स्थापित किसी भी कानूनी प्रक्रिया को उचित नही माना जा सकता, यह प्रक्रिया मूल रूप से तथा प्रक्रियात्मक रूप से उचित होनी चाहिए ताकि पीड़ित व्यक्ति को यह भरोसा हो कि कानून उसे न्याय देने के लिए बना है न की उसके अधिकारों का हनन करने के लिए| · भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त सिद्धांतों को आगे चल कर कई मुकदमों में लागू किया जैसे- · बच्चनसिंह वाद एवं मच्छीसिंह वाद बनाम पंजाब राज्य- में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कहा कि केवल दुर्लभ आपराधिक मामलों में ही मृत्युदंड की सजा दी जायेगी उदाहरणार्थ ऐसे अपराध जिनसे समाज की सामूहिक चेतना छिन्न-भिन्न हो जाए, किसी समाज या समुदाय में भय व्याप्त हो जाए, जिससे आपराधिक मनोवृत्ति को बढ़ावा मिले और जिससे सभ्य समाज के चरित्र पर गंभीर दाग लगे, उन्ही मामलों में मृत्यदंड दिया जाय| · राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण वाद 2013 में SC ने किन्नर समुदाय को तृतीय लिंग की श्रेणी में रखने का आदेश दिया जिसे मतदाता सूची में भी अंकित जाना था · लिली थामस वाद 2014 में SC ने यह आदेश दिया कि जिस प्रकार एक आम आदमी को दो वर्ष अथवा उससे अधिक की सजा होने पर उसे चुनाव लड़ने के योग्य नहीं माना जाता वही नियम पदासीन सांसदों, विधायकों और विधान परिषद् के सदस्यों पर भी लागू होगा · कॉमनकॉज की एक याचिका पर SC ने अपने द्वारा पूर्व में इस मुकदमें में दिए गए फैसले को स्पष्ट करते हुए वर्ष 2018 में लिविंग विल पर आधारित पैसिव यूथेनेसिया को मान्यता प्रदान कर दी, यह प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा जिला कलेक्टर की निगरानी में ही किया जा सकेगा · KS पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 का भाग माना, और यह व्यवस्था दी कि आयकर दाखिले(ITR), सब्सिडी की दावेदारी और पासपोर्ट को छोड़कर किसी अन्य मामलें में आधार कार्ड की अनिवार्यता नहीं होगी उदाहरणार्थ किसी संचार ओपरेटर सर सिम कार्ड लेने और बैंक में खाता खोलने के लिए आधार अनिवार्य नहीं होगा · शायराबानो तथा अन्य बनाम भारत संघ 2017 के एक मुकदमें में SC ने ट्रिपल तलाक को गैर-जरुरी बताया| 3:2 के बहुमत से SC की संविधान पीठ ने इसे कुरआन का हिस्सा नहीं माना और सरकार को निर्देश दिया कि वह संसद से इस कुप्रथा को रोकने के लिए कानून बनवाये · नवजोत सिंह जौहर बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन 2013 में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को पलटते हुए LGBTQI को स्वतंत्रता दे दी किन्तु यह स्वतंत्रता स्वेच्छा से किये गए लैंगिक पसंद तक सीमित होगी साथ ही यह केवल वयस्कों पर लागू होगी अन्यथा इसे अप्राकृतिक यौनाचार माना जाएगा जो कि अपराध की श्रेणी में आयेगा उपरोक्त चर्चा स्पष्ट है कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने अनेक नए अधिकारों को शामिल किया। इसमें प्रमुख रूप से निजता के अधिकार, चयन की स्वतन्त्रता का व्यापक महत्व है।हालांकि निजता के अधिकार के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय कई संभावनाओं को उत्पन्न करता है जैसे- सूचना के अधिकार और निजता के बीच असंतुलन, सरकारी योजनाओं जैसे आधार संबंधी मामले आदि।इस प्रकार संविधान के व्याख्याता के रूप में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णय अनुच्छेद 21 को अत्यधिक प्रभावी रूप देते हैं।
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दबाव समूह से आप क्या समझते हैं| दबाव समूह तथा हित समूह में अंतर को बताते हुए दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों को बताईये| साथ ही, भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तरीकों के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये|| (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by Pressure groups? Write down the different types of pressure groups. How do the pressure groups differ from the interest group? Also, briefly discuss how different pressure groups work in India. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- उत्तर के प्रारंभ में दबाव समूह को परिभाषित कीजिये(20-25 शब्द)| अगले भाग में दबाव समूह तथा हित-समूह के मध्य अंतर बताईये(30-35 शब्द)| दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताईये(60-70 शब्द)| भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तौर-तरीकों के बारे में बताईये(80-90 शब्द)| उत्तर- दबाव समूह सिविल समाज का एक घटक होता है तथा अपने वर्गीय हितों के लिए सरकार पर संगठित तरीके से दबाब बनाकर राज्य की नीतियाँ अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है| दबाव समूह एवं हित समूह में अंतर- दबाव समूह- सत्ता के नजदीक रहकर या उसमे शामिल होकर अपने समूह के हितों की पूर्ति करने का प्रयास| हित समूह- सत्ता से दूर रहकर अपने हितों की पूर्ति के लिए सरकार पर दबाब बनाने का प्रयास | दबाव समूह के प्रकार - सामुदायिक अथवा वर्गीय -ऐसे दबाव समूह जो अपने जाति/धर्म आदि के लिए कार्य करते हैं और इनके हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं; जैसे- बामसेफ,विभिन्न जातियों के संगठन,क्षत्रिय महासभा,आरएसएस आदि | संस्थागत दबाव समूह - ये प्रायः राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करतें हैं;जैसे- पोलित ब्यूरो आदि | यदि इनका दल सत्ता में आता है तो ये अपने विभिन्न उद्देश्यों जैसे अपने नजदीकी लोगों को विभिन्न सरकारी पदों पर पदासीन कराने के लिए अपने दल पर दबाव डालते हैं| संघात्मक दबाव समूह - इसमें अपने-अपने क्षेत्र विशेष के हितों के उत्थान के लिए उस क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसमे शामिल होते हैं; जैसे - कर्मचारी संघ, AITUC, भारतीय किसान यूनियन, फिक्की, CII आदि विचार आधारित दबाव समूह - समाज और परिवेश को लेकर किसी विशेष सोच को उन्नत करने के उद्देश्य से साथ आये लोगों के समूह ;जैसे- चिपको आन्दोलन,नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि| विघटनकारी समूह- सरकार के विरुद्ध अपने किसी विशेष विचारधारा/हित को बढ़ावा देने तथा उस हेतु हिंसात्मक मार्ग अपनाने को भी तैयार समूह; जैसे - उल्फा, सिमी,जेकेएलएफ आदि| भारत में दबाव समूह के कार्य करने का तरीका- लॉबिंग - भारत में अधिकांश दबाव समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और लॉबिंग के माध्यम से वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल रहते हैं| परम्परागत तरीका - प्रायः जातिगत और धार्मिक समूह अपने जाति और धर्म की संख्याबल के आधार पर सताधारी दल को यह समझाने में सफल रहते हैं कि यदि सरकार ने उनके हितों की अनदेखी की तो चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा भारत में ऐसे दबाव समूह भी कार्य करते हैं जो विभिन्न पेशों से जुड़े हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते है तथा स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभावी होते हैं| जैसे- मछुआरों का संघ, बुनकरों का संघ आदि | कर्मचारियों के संघ - विभिन्न ट्रेड यूनियन सरकार से अपने हित में नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं| अखिल भारतीय स्तर पर अपने वर्गीय हितों के लिए कार्य करने वाले समूह भी सरकार पर दबाब बनाकर अपने हित में निर्णय करवाने में सफल हो जाते हैं| राज्यीय अथवा अन्तर्राज्यीय मुद्दों को लेकर बने दबाव समूह | जैसे - कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में गठित दबाव समूह | प्रजातीय दबाव समूह - इसके अंतर्गत प्रायः जनजातीय दबाव समूह आतें हैं| सामान्य हित के मुद्दों पर आधारित मिश्रित दबाव समूह ; जैसे- ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन |
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##Question:दबाव समूह से आप क्या समझते हैं| दबाव समूह तथा हित समूह में अंतर को बताते हुए दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों को बताईये| साथ ही, भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तरीकों के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये|| (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by Pressure groups? Write down the different types of pressure groups. How do the pressure groups differ from the interest group? Also, briefly discuss how different pressure groups work in India. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर के प्रारंभ में दबाव समूह को परिभाषित कीजिये(20-25 शब्द)| अगले भाग में दबाव समूह तथा हित-समूह के मध्य अंतर बताईये(30-35 शब्द)| दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताईये(60-70 शब्द)| भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तौर-तरीकों के बारे में बताईये(80-90 शब्द)| उत्तर- दबाव समूह सिविल समाज का एक घटक होता है तथा अपने वर्गीय हितों के लिए सरकार पर संगठित तरीके से दबाब बनाकर राज्य की नीतियाँ अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है| दबाव समूह एवं हित समूह में अंतर- दबाव समूह- सत्ता के नजदीक रहकर या उसमे शामिल होकर अपने समूह के हितों की पूर्ति करने का प्रयास| हित समूह- सत्ता से दूर रहकर अपने हितों की पूर्ति के लिए सरकार पर दबाब बनाने का प्रयास | दबाव समूह के प्रकार - सामुदायिक अथवा वर्गीय -ऐसे दबाव समूह जो अपने जाति/धर्म आदि के लिए कार्य करते हैं और इनके हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं; जैसे- बामसेफ,विभिन्न जातियों के संगठन,क्षत्रिय महासभा,आरएसएस आदि | संस्थागत दबाव समूह - ये प्रायः राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करतें हैं;जैसे- पोलित ब्यूरो आदि | यदि इनका दल सत्ता में आता है तो ये अपने विभिन्न उद्देश्यों जैसे अपने नजदीकी लोगों को विभिन्न सरकारी पदों पर पदासीन कराने के लिए अपने दल पर दबाव डालते हैं| संघात्मक दबाव समूह - इसमें अपने-अपने क्षेत्र विशेष के हितों के उत्थान के लिए उस क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसमे शामिल होते हैं; जैसे - कर्मचारी संघ, AITUC, भारतीय किसान यूनियन, फिक्की, CII आदि विचार आधारित दबाव समूह - समाज और परिवेश को लेकर किसी विशेष सोच को उन्नत करने के उद्देश्य से साथ आये लोगों के समूह ;जैसे- चिपको आन्दोलन,नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि| विघटनकारी समूह- सरकार के विरुद्ध अपने किसी विशेष विचारधारा/हित को बढ़ावा देने तथा उस हेतु हिंसात्मक मार्ग अपनाने को भी तैयार समूह; जैसे - उल्फा, सिमी,जेकेएलएफ आदि| भारत में दबाव समूह के कार्य करने का तरीका- लॉबिंग - भारत में अधिकांश दबाव समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और लॉबिंग के माध्यम से वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल रहते हैं| परम्परागत तरीका - प्रायः जातिगत और धार्मिक समूह अपने जाति और धर्म की संख्याबल के आधार पर सताधारी दल को यह समझाने में सफल रहते हैं कि यदि सरकार ने उनके हितों की अनदेखी की तो चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा भारत में ऐसे दबाव समूह भी कार्य करते हैं जो विभिन्न पेशों से जुड़े हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते है तथा स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभावी होते हैं| जैसे- मछुआरों का संघ, बुनकरों का संघ आदि | कर्मचारियों के संघ - विभिन्न ट्रेड यूनियन सरकार से अपने हित में नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं| अखिल भारतीय स्तर पर अपने वर्गीय हितों के लिए कार्य करने वाले समूह भी सरकार पर दबाब बनाकर अपने हित में निर्णय करवाने में सफल हो जाते हैं| राज्यीय अथवा अन्तर्राज्यीय मुद्दों को लेकर बने दबाव समूह | जैसे - कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में गठित दबाव समूह | प्रजातीय दबाव समूह - इसके अंतर्गत प्रायः जनजातीय दबाव समूह आतें हैं| सामान्य हित के मुद्दों पर आधारित मिश्रित दबाव समूह ; जैसे- ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन |
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मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता काफी हद तक मंत्रिमंडल समितियों की भूमिका एवं योगदान पर निर्भर करती है | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) To a great extent, the efficiency of cabinet depends upon the role and contributions of cabinet committees. Comment. (150-200 Words/10 Marks)
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दृष्टिकोण- भूमिका में मंत्रिमंडल समितियों का उद्भव के बारे में वर्णन कीजिये मुख्य भाग में मंत्रिमंडल समितियों का उद्देश्य के बारे में बताइए फिर इसके बाद मंत्रिमंडल समितियों का मंत्रिमंडल के कार्य से सम्बन्ध की चर्चा कीजिये निष्कर्ष में मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता के बारे में बताते हुए समापन कीजिये | उत्तर - नीति निर्माण , विधायी और वित्तीय शक्तियों के प्रयोग के अतिरिक्त अन्यान्य बहुत से कार्य मंत्रिमंडल को संपन्न करने होते हैं | ऐसी स्थित में प्रत्येक मंत्री (मंत्रिमंडल के सदस्य) के समक्ष प्रत्येक मामले रखना , विचारण करवाना तथा सुझाव एवं सहमति प्राप्त करना न उचित है , न ही तार्किक और न ही औचित्यपूर्ण | इससे विषयों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल , श्रमसाध्य और समय का अपव्यय करने वाली हो जाती है | इस प्रकार की समस्या का हल निकालते हुए 1949 में ही एन. गोपालस्वामी आयंगर समिति ने मंत्रिमंडलीय समितियों के निर्माण की अनुशंसा की | इन समितियों के नाम और संख्या सदैव बदलते रहते हैं , किन्तु चार ऐसी समितियां हैं जिनका अस्तित्व प्रथम लोकसभा से ही हो रहा है | 1. राजनैतिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति 2 . आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति 3. संसदीय कार्य समिति 4 . नियुक्ति सम्बन्धी मंत्रिमंडलीय समिति इनके अतिरिक्त विशेष समस्याओं के समाधान के लिए तदर्थ समितियों का गठन भी होता रहता है |ये मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता को सुनिश्चित करती है क्योंकि - 1. सम्बंधित विषयों के मंत्री इसमें सम्मिलित होते हैं अतः विचारण प्रक्रिया सम्यक रूप से पूर्ण हो जाती है | 2.यह अनावश्यक विलम्ब नहीं करती क्योंकि जिन मंत्रियों से विषय सम्बंधित नहीं होता वे इसमें भाग नहीं लेते | 3. इन समितियों का अपना एक विशेषीकृत सचिवालय होता है जिससे विशेषज्ञों की सलाह सहजता से प्राप्त हो जाती है | 4. ये कामकाज के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों को समाहित करती हैं | उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता मंत्रिमंडलीय समितियों के सफल कार्य निष्पादन पर निर्भर है |
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##Question:मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता काफी हद तक मंत्रिमंडल समितियों की भूमिका एवं योगदान पर निर्भर करती है | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) To a great extent, the efficiency of cabinet depends upon the role and contributions of cabinet committees. Comment. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में मंत्रिमंडल समितियों का उद्भव के बारे में वर्णन कीजिये मुख्य भाग में मंत्रिमंडल समितियों का उद्देश्य के बारे में बताइए फिर इसके बाद मंत्रिमंडल समितियों का मंत्रिमंडल के कार्य से सम्बन्ध की चर्चा कीजिये निष्कर्ष में मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता के बारे में बताते हुए समापन कीजिये | उत्तर - नीति निर्माण , विधायी और वित्तीय शक्तियों के प्रयोग के अतिरिक्त अन्यान्य बहुत से कार्य मंत्रिमंडल को संपन्न करने होते हैं | ऐसी स्थित में प्रत्येक मंत्री (मंत्रिमंडल के सदस्य) के समक्ष प्रत्येक मामले रखना , विचारण करवाना तथा सुझाव एवं सहमति प्राप्त करना न उचित है , न ही तार्किक और न ही औचित्यपूर्ण | इससे विषयों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल , श्रमसाध्य और समय का अपव्यय करने वाली हो जाती है | इस प्रकार की समस्या का हल निकालते हुए 1949 में ही एन. गोपालस्वामी आयंगर समिति ने मंत्रिमंडलीय समितियों के निर्माण की अनुशंसा की | इन समितियों के नाम और संख्या सदैव बदलते रहते हैं , किन्तु चार ऐसी समितियां हैं जिनका अस्तित्व प्रथम लोकसभा से ही हो रहा है | 1. राजनैतिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति 2 . आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति 3. संसदीय कार्य समिति 4 . नियुक्ति सम्बन्धी मंत्रिमंडलीय समिति इनके अतिरिक्त विशेष समस्याओं के समाधान के लिए तदर्थ समितियों का गठन भी होता रहता है |ये मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता को सुनिश्चित करती है क्योंकि - 1. सम्बंधित विषयों के मंत्री इसमें सम्मिलित होते हैं अतः विचारण प्रक्रिया सम्यक रूप से पूर्ण हो जाती है | 2.यह अनावश्यक विलम्ब नहीं करती क्योंकि जिन मंत्रियों से विषय सम्बंधित नहीं होता वे इसमें भाग नहीं लेते | 3. इन समितियों का अपना एक विशेषीकृत सचिवालय होता है जिससे विशेषज्ञों की सलाह सहजता से प्राप्त हो जाती है | 4. ये कामकाज के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों को समाहित करती हैं | उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मंत्रिमंडल की कार्यकुशलता मंत्रिमंडलीय समितियों के सफल कार्य निष्पादन पर निर्भर है |
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भारतीय संविधान के अनुसार अल्पसंख्यकों को दिए गए विभिन्न सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| इसके साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से सम्बन्धित विभिन्न मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 शब्द) According to the Indian Constitution, briefly describe the various cultural and educational rights given to the minorities. Along with this, clarify the views of the Supreme Court on various issues related to minority educational institutions. (150 -200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में संविधान में दिए गए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में इन अधिकारों स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारतीय सांस्कृतिक विविधता और अपने पंथनिरपेक्ष चरित्र के अनुरूप भारतीय संविधान में विभिन्न वर्गों के लिए मौलिक अधिकारों की घोषणा की गयी है| ये अधिकार इन वर्गों को इनके सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं| इस क्रम में भारतीय संविधान भारतीय अल्पसंख्यक वर्ग शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा भी करता है ताकि इन अल्पसंख्यक वर्गों की विशिष्टताओं को संरक्षित रखा जा सके और भारतीय सांस्कृतिक विविधता का अनुरक्षण किया जा सके| भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा करते हैं| अनुच्छेद 29 द्वारा प्रदत्त अधिकार अनुच्छेद 29(1) के अनुसार भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी पृथक भाषा, लिपि तथा संस्कृति को परिरक्षित रखने अथवा मूल रूप में बचा कर रखने का अधिकार होगा अनुच्छेद 29(2) के अनुसार यदि कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान राज्य से वित्तीय सहायता लेता है तो वह दूसरे सम्प्रदाय के विद्यार्थियों को भी अपने यहाँ प्रवेश देने से मना नही कर सकता| अनुच्छेद 29 का स्पष्टीकरण यद्यपि कि स्पष्ट रूप से इस अनुच्छेद में अल्पसंख्यकों के वर्ग का उल्लेख नहीं है किन्तु TMA पाई बनाम कर्नाटक राज्य 2002 व PA इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य 2005 के मुकदमों में SC ने दो ही प्रकार अल्पसंख्यक माने हैं यथा धार्मिक अल्पसंख्यक और भाषाई अल्पसंख्यक | अनुच्छेद 29(1) में धार्मिक अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है किन्तु सर्वोच्च न्यायालय (SC) का मानना है कि संस्कृति एक व्यापक शब्द है जिसमें धर्म निहित है अतः धार्मिक अल्पसंख्यक को पृथक संस्कृति वाले वर्ग में रखा गया है| अनुच्छेद 29(1) न केवल राज्य के विरुद्ध भारतीय अल्पसंख्यकों अर्थात भारतीय नागरिकों को उपलब्ध है बल्कि यह समाज किसी निजी संगठन, किसी व्यक्ति के विरुद्ध भी उनको उपलब्ध है| दूसरे शब्दों में यह नागरिक हितों को केवल राज्य के विरुद्ध ही सुरक्षित नहीं करता बल्कि यह राज्य के अतिरिक्तकिसी अन्य संस्था या व्यक्ति सेभी इन हितों की रक्षा करता है, दूसरी ओर अनुच्छेद 15(1)केवल राज्य के विरुद्धनागरिकों को अपनी पृथक धार्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार देता है| अनुच्छेद 29(1) में जिन अल्पसंख्यकों को अपने पृथक भाषा और संस्कृति को बनाए रखे की छूट दी गयी है उसमें साम्प्रदायिक भावना से प्रेरित होकर कोई उपदेश नहीं दिया जा सकता|हालांकि वे अपने धर्म के महापुरुषों के दर्शन को पाठ्यक्रम में शामिल कर सकते हैं साथ ही वे उनके दर्शन पर अनुसंधान भी करा सकते हैं| प्रतिबन्ध केवल किसी पंथ के कर्मकांड एवं रीति-रिवाज पर है| अनुच्छेद 29(2) का उद्देश्य राज्य के धर्म निरपेक्ष चरित्र को बनाए रखना है अनुच्छेद 29(2) में जन्मस्थान और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव करने से मनाही नही की गयी है|दूसरे शब्दों में राज्य से सहायता प्राप्त कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान काल धर्म, मूलवंश, जाति और भाषा अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर संस्थान में प्रवेश देने में कोई भेदभाव नहीं कर सकता| इसका अर्थ यह हुआ कि वह शेष अन्य आधार पर अपने यहाँ दाखिला देने में भेदभाव कर सकता है| अनुच्छेद 30 द्वारा प्रदत्त अधिकार अनुच्छेद 30(1) भारत में निवास करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने पसंद की शिक्षा संस्था स्थापित करने और उसके प्रशासन का अधिकार होगा| अनुच्छेद 30(2) राज्य उपरोक्त संस्था को अनुदान देने में इस आधार पर पर कोई भेदभाव नहीं कर सकेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक के नियंत्रण में है| अनुच्छेद 30 का स्पष्टीकरण हालांकि यह मुख्यतः अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए ही बनाया गया है| किन्तु अनुच्छेद 30(1) केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है इसे बहुसंख्यक द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान पर भी लागू किया जा सकता है| अनुच्छेद 30(1) की भाषा स्पष्ट है कि जो अल्पसंख्यक किसी शिक्षण संस्थान करेगा वही उसका प्रबंध भी करेगा| हालांकि बहुसंख्यकों के द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थान पर भी अनुच्छेद 26(1) के अंतर्गत यह उपबंध लागू होता है| यदि कसी शिक्षण संस्थान की स्थापना अल्पसंख्यक ने किया है तो वह अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान ही माना जाता रहेगा भले ही राज्य उसे वित्तीय सहायता क्यों न दे रहा हो अनुच्छेद 30(1) में कहीं भी यह नही कहा गया है की यह केवल नागरिकों तक सीमित है|यह भारत में निवास करने वाले किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय को भी उपलब्ध रहेगा| अनुच्छेद 30(2) केवल राज्य के विरुद्ध अल्पसंख्यकों को प्राप्त एक अधिकार है| अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचार सेंट स्टीफेन बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय 1992 में SC ने फैसला दिया(TMA पाई वाद 2002 के साथ)कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान न केवल अपने समुदाय के विद्यार्थियों के लिए सीटें आरक्षित कर सकते हैं बल्कि उनके चयन के मानक भी कम कर सकते हैं TMA पाई वाद 2002 में SC ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय का निर्धारण राज्य के आधार पर किया जाना चाहिए न की सम्पूर्ण भारत के आधार पर| SC के अनुसार यदि धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक किसी राज्य कि कुल जनसंख्या के 50%से कम हैं तो उन्हें उस राज्य में अल्पसंख्यक माना जा सकता है| PA इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद 2005 तथा TMA पाई वाद 2002 में SC ने अल्पसंख्यकों को दो श्रेणी में रखा यथा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक| सर्वोच्च न्यायालय ने TMA पाई वाद 2002 में यह स्पष्ट कर दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भले ही वे अल्प संख्यक के नियंत्रण में क्यों न हों, प्रतिभा को शिक्षण कार्यों में महत्त्व दिया जाए| न्यायालय के अनुसार अल्प संख्यक प्रबंध या कार्यकारी बोर्ड सुशासन के लिए उत्तरदाई है न की कुशासन के लिए स्वतंत्र है| अतः यदि इन शिक्षण संस्थानों के कैंपस में पढाई लिखाई का परिवेश बिगड़ रहा हो तो राज्य इसमें हस्तक्षेप कर सकता है उपरोक्त मुकदमों में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों और शिक्षनेत्तर कर्मियों की भर्ती में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का कार्यकारी बोर्ड चयन की शर्तें तय कर सकता है| UGC इसमें दखल नहीं दे सकता| हालांकि यदि कार्यकारी बोर्ड शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा की अनदेखी करता है तो ऐसी स्थिति में UGC हस्तक्षेप कर सकता है| मलंकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज बनाम टी जोस 2007 के मुकदमें में SC ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यकों को कर सम्बन्धी कानून या आपराधिक कानूनों से कोई छूट नहीं मिली हुई है| ये कानून जिस प्रकार दूसरे समुदाय पर लागू होते हैं उसी प्रकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर भी लागू होंगे| सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त विचारों को देखते हुए स्पष्ट होता है कि अल्पसंख्यकों को उपरोक्त संरक्षण उन्हें बहुसंख्यकों के बराबर लाने के लिए दिया गया है न कि उन्हें बहुसंख्यकों पर प्राथमिकता देने के लिए दिया गया है| इन अधिकारों के माध्यम से उन्हें बहुसंख्यक प्रभाव से संरक्षित रखने का प्रयास किया गया है ताकि भारतीय संस्कृति की विविधता अक्षुण्ण बनी रहे| इन्हें विशिष्ट अधिकार के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिए|
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##Question:भारतीय संविधान के अनुसार अल्पसंख्यकों को दिए गए विभिन्न सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| इसके साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से सम्बन्धित विभिन्न मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 शब्द) According to the Indian Constitution, briefly describe the various cultural and educational rights given to the minorities. Along with this, clarify the views of the Supreme Court on various issues related to minority educational institutions. (150 -200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में संविधान में दिए गए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में इन अधिकारों स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारतीय सांस्कृतिक विविधता और अपने पंथनिरपेक्ष चरित्र के अनुरूप भारतीय संविधान में विभिन्न वर्गों के लिए मौलिक अधिकारों की घोषणा की गयी है| ये अधिकार इन वर्गों को इनके सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं| इस क्रम में भारतीय संविधान भारतीय अल्पसंख्यक वर्ग शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा भी करता है ताकि इन अल्पसंख्यक वर्गों की विशिष्टताओं को संरक्षित रखा जा सके और भारतीय सांस्कृतिक विविधता का अनुरक्षण किया जा सके| भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा करते हैं| अनुच्छेद 29 द्वारा प्रदत्त अधिकार अनुच्छेद 29(1) के अनुसार भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी पृथक भाषा, लिपि तथा संस्कृति को परिरक्षित रखने अथवा मूल रूप में बचा कर रखने का अधिकार होगा अनुच्छेद 29(2) के अनुसार यदि कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान राज्य से वित्तीय सहायता लेता है तो वह दूसरे सम्प्रदाय के विद्यार्थियों को भी अपने यहाँ प्रवेश देने से मना नही कर सकता| अनुच्छेद 29 का स्पष्टीकरण यद्यपि कि स्पष्ट रूप से इस अनुच्छेद में अल्पसंख्यकों के वर्ग का उल्लेख नहीं है किन्तु TMA पाई बनाम कर्नाटक राज्य 2002 व PA इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य 2005 के मुकदमों में SC ने दो ही प्रकार अल्पसंख्यक माने हैं यथा धार्मिक अल्पसंख्यक और भाषाई अल्पसंख्यक | अनुच्छेद 29(1) में धार्मिक अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है किन्तु सर्वोच्च न्यायालय (SC) का मानना है कि संस्कृति एक व्यापक शब्द है जिसमें धर्म निहित है अतः धार्मिक अल्पसंख्यक को पृथक संस्कृति वाले वर्ग में रखा गया है| अनुच्छेद 29(1) न केवल राज्य के विरुद्ध भारतीय अल्पसंख्यकों अर्थात भारतीय नागरिकों को उपलब्ध है बल्कि यह समाज किसी निजी संगठन, किसी व्यक्ति के विरुद्ध भी उनको उपलब्ध है| दूसरे शब्दों में यह नागरिक हितों को केवल राज्य के विरुद्ध ही सुरक्षित नहीं करता बल्कि यह राज्य के अतिरिक्तकिसी अन्य संस्था या व्यक्ति सेभी इन हितों की रक्षा करता है, दूसरी ओर अनुच्छेद 15(1)केवल राज्य के विरुद्धनागरिकों को अपनी पृथक धार्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार देता है| अनुच्छेद 29(1) में जिन अल्पसंख्यकों को अपने पृथक भाषा और संस्कृति को बनाए रखे की छूट दी गयी है उसमें साम्प्रदायिक भावना से प्रेरित होकर कोई उपदेश नहीं दिया जा सकता|हालांकि वे अपने धर्म के महापुरुषों के दर्शन को पाठ्यक्रम में शामिल कर सकते हैं साथ ही वे उनके दर्शन पर अनुसंधान भी करा सकते हैं| प्रतिबन्ध केवल किसी पंथ के कर्मकांड एवं रीति-रिवाज पर है| अनुच्छेद 29(2) का उद्देश्य राज्य के धर्म निरपेक्ष चरित्र को बनाए रखना है अनुच्छेद 29(2) में जन्मस्थान और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव करने से मनाही नही की गयी है|दूसरे शब्दों में राज्य से सहायता प्राप्त कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान काल धर्म, मूलवंश, जाति और भाषा अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर संस्थान में प्रवेश देने में कोई भेदभाव नहीं कर सकता| इसका अर्थ यह हुआ कि वह शेष अन्य आधार पर अपने यहाँ दाखिला देने में भेदभाव कर सकता है| अनुच्छेद 30 द्वारा प्रदत्त अधिकार अनुच्छेद 30(1) भारत में निवास करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने पसंद की शिक्षा संस्था स्थापित करने और उसके प्रशासन का अधिकार होगा| अनुच्छेद 30(2) राज्य उपरोक्त संस्था को अनुदान देने में इस आधार पर पर कोई भेदभाव नहीं कर सकेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक के नियंत्रण में है| अनुच्छेद 30 का स्पष्टीकरण हालांकि यह मुख्यतः अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए ही बनाया गया है| किन्तु अनुच्छेद 30(1) केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है इसे बहुसंख्यक द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान पर भी लागू किया जा सकता है| अनुच्छेद 30(1) की भाषा स्पष्ट है कि जो अल्पसंख्यक किसी शिक्षण संस्थान करेगा वही उसका प्रबंध भी करेगा| हालांकि बहुसंख्यकों के द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थान पर भी अनुच्छेद 26(1) के अंतर्गत यह उपबंध लागू होता है| यदि कसी शिक्षण संस्थान की स्थापना अल्पसंख्यक ने किया है तो वह अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान ही माना जाता रहेगा भले ही राज्य उसे वित्तीय सहायता क्यों न दे रहा हो अनुच्छेद 30(1) में कहीं भी यह नही कहा गया है की यह केवल नागरिकों तक सीमित है|यह भारत में निवास करने वाले किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय को भी उपलब्ध रहेगा| अनुच्छेद 30(2) केवल राज्य के विरुद्ध अल्पसंख्यकों को प्राप्त एक अधिकार है| अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचार सेंट स्टीफेन बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय 1992 में SC ने फैसला दिया(TMA पाई वाद 2002 के साथ)कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान न केवल अपने समुदाय के विद्यार्थियों के लिए सीटें आरक्षित कर सकते हैं बल्कि उनके चयन के मानक भी कम कर सकते हैं TMA पाई वाद 2002 में SC ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय का निर्धारण राज्य के आधार पर किया जाना चाहिए न की सम्पूर्ण भारत के आधार पर| SC के अनुसार यदि धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक किसी राज्य कि कुल जनसंख्या के 50%से कम हैं तो उन्हें उस राज्य में अल्पसंख्यक माना जा सकता है| PA इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद 2005 तथा TMA पाई वाद 2002 में SC ने अल्पसंख्यकों को दो श्रेणी में रखा यथा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक| सर्वोच्च न्यायालय ने TMA पाई वाद 2002 में यह स्पष्ट कर दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भले ही वे अल्प संख्यक के नियंत्रण में क्यों न हों, प्रतिभा को शिक्षण कार्यों में महत्त्व दिया जाए| न्यायालय के अनुसार अल्प संख्यक प्रबंध या कार्यकारी बोर्ड सुशासन के लिए उत्तरदाई है न की कुशासन के लिए स्वतंत्र है| अतः यदि इन शिक्षण संस्थानों के कैंपस में पढाई लिखाई का परिवेश बिगड़ रहा हो तो राज्य इसमें हस्तक्षेप कर सकता है उपरोक्त मुकदमों में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों और शिक्षनेत्तर कर्मियों की भर्ती में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का कार्यकारी बोर्ड चयन की शर्तें तय कर सकता है| UGC इसमें दखल नहीं दे सकता| हालांकि यदि कार्यकारी बोर्ड शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा की अनदेखी करता है तो ऐसी स्थिति में UGC हस्तक्षेप कर सकता है| मलंकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज बनाम टी जोस 2007 के मुकदमें में SC ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यकों को कर सम्बन्धी कानून या आपराधिक कानूनों से कोई छूट नहीं मिली हुई है| ये कानून जिस प्रकार दूसरे समुदाय पर लागू होते हैं उसी प्रकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर भी लागू होंगे| सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त विचारों को देखते हुए स्पष्ट होता है कि अल्पसंख्यकों को उपरोक्त संरक्षण उन्हें बहुसंख्यकों के बराबर लाने के लिए दिया गया है न कि उन्हें बहुसंख्यकों पर प्राथमिकता देने के लिए दिया गया है| इन अधिकारों के माध्यम से उन्हें बहुसंख्यक प्रभाव से संरक्षित रखने का प्रयास किया गया है ताकि भारतीय संस्कृति की विविधता अक्षुण्ण बनी रहे| इन्हें विशिष्ट अधिकार के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिए|
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Explain the salient features of the Constitutional 101st Amendment Act 2016. Do you think its effective enough to remove cascading effect of taxes and provide for common national market for goods and services? (250 words/15 marks)
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Approach:- - Brief introduction about Constitutional 101st Amendment Act 2016 - Features of GST - Merits of GST for Indian Economy - Conclusion Answer:- Constitutional 101st Amendment Act 2016 is about Goods and Services Tax (GST). It is a comprehensive indirect tax on manufacture, sale, and consumption of goods and services throughout India. Goods and Services would replace many indirect taxes levied by the central and state governments. Key featurs of GST:- GST has two dimensions : Central GST and State GST Inter-State Transactions and the IGST Mechanism: The Centre would levy and collect the Integrated Goods and Services Tax (IGST) on all inter-State supply of goods and services. It has been designed to ensure seamless flow of input tax credit from one State to another. The inter-State seller would pay IGST on the sale of his goods to the Central Government after adjusting credit of IGST, CGST and SGST on his purchases (in that order). The Centre will transfer to the importing State the credit of IGST used in payment of SGST. Destination-Based Consumption Tax: GST will be a destination-based tax. This implies that all SGST collected will ordinarily accrue to the State where the consumer of the goods or services sold resides. Computation of GST on the basis of invoice credit method Payment of GST: The CGST and SGST are to be paid to the accounts of the central and states respectively. Goods and Services Tax Network (GSTN): A not-for-profit, Non-Government Company called Goods and Services Tax Network (GSTN), jointly set up by the Central and State Governments will provide shared IT infrastructure and services to the Central and State Governments, tax payers and other stakeholders. Input Tax Credit (ITC) Set Off : ITC for CGST & SGST will be taken for taxes allowed against central and state respectively. Centre will levy IGST on inter-State supply of goods and services. Import of goods will be subject to basic customs duty and IGST. Maintenance of Records: A taxpayer or exporter would have to maintain separate details in books of account for a ailment, utilization or refund of Input Tax Credit of CGST, SGST and IGST. Administration of GST : Administration of GST will be the responsibility of the GST Council , which will be the apex policy making body of the GST. Members of GST Council comprised of the Central and State ministers in charge of the finance portfolio. Goods and Service Tax Council: The GST Council will be a joint forum of the Centre and the States. The Council will make recommendations to the Union and the States on important issues like tax rates, exemption list, threshold limits, etc. One-half of the total number of Members of the Council will constitute the quorum of GST council. Effectivenessof the GST:- GST will facilitate seamless credit across the entire supply chain and across all States under a common tax base.Harmonization of laws, procedures and rates of tax will make compliance easier and simple. There would be common definitions, common forms/formats, common interface through GST portal, resulting in efficiencies and synergies across the board. This will also remove multiple taxation of same transactions and inter-State disputes like the ones on entry tax and e-commerce taxation existing today. Elimination of Cascading effect: Goods & Service Tax would eliminate the cascading effects of taxes on production and distribution cost of goods and services. The exclusion of cascading effects i.e. tax on tax will significantly improve the competitiveness of original goods and services in market will lead to beneficial impact to the GDP growth of the country. It is felt that GST would serve a superior reason to achieve the objective of streamlining indirect tax regime in India which can remove cascading effects in supply chain till the level of final consumers. Other Benefits of GST 1. Revenue Gain: Revenue will increase under GST regime because of widening of the dealer base by capturing value addition in the distributive trade and increased compliance. 2. GST regime shall enhance transparency in the indirect tax framework and is expected to bring down the rate of inflation. 3. Zero rated Exports: Under the GST regime, exports will be zero rated in entirety unlike the present system where refund of some taxes is not allowed due to fragmented nature of indirect taxes between the Centre and the States. All taxes paid on the goods or services exported or on the inputs or input services used in the supply of such export goods or services shall be refunded. 4. GST will boost Indian exports, thereby improving the balance of payments position. Exporters will be facilitated by grant of provisional refund of 90% of their claims within seven days of issue of acknowledgement of their application, thereby resulting in the easing of position with respect to cash flows. 5. Increased Uniformity: Uniform GST rates will reduce the incentive for evasion by eliminating rate arbitrage between neighboring States and that between intra and inter-State sales. 6. Increased Certainty: Common procedures for registration of taxpayers, refund of taxes, uniform formats of tax return, common tax base, common system of classification of goods or services along with timelines for every activity will lend greater certainty to taxation system. 7. Increased Digitalization: GST is largely technology driven. The interface of the taxpayer with the tax authorities will be through the common portal (GSTN). There will be simplified and automated procedures for various processes such as registration, returns, refunds, tax payments, etc. Though GST is not untouched with drawbacks but merits overweight the drawbacks, It was a very sought after reform which can be said the biggest tax reform after independence. Its long term impact will help integrate economy and boost for the GDP of India in time when global economy is connected and Indian economy is in the take off position.
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##Question:Explain the salient features of the Constitutional 101st Amendment Act 2016. Do you think its effective enough to remove cascading effect of taxes and provide for common national market for goods and services? (250 words/15 marks)##Answer:Approach:- - Brief introduction about Constitutional 101st Amendment Act 2016 - Features of GST - Merits of GST for Indian Economy - Conclusion Answer:- Constitutional 101st Amendment Act 2016 is about Goods and Services Tax (GST). It is a comprehensive indirect tax on manufacture, sale, and consumption of goods and services throughout India. Goods and Services would replace many indirect taxes levied by the central and state governments. Key featurs of GST:- GST has two dimensions : Central GST and State GST Inter-State Transactions and the IGST Mechanism: The Centre would levy and collect the Integrated Goods and Services Tax (IGST) on all inter-State supply of goods and services. It has been designed to ensure seamless flow of input tax credit from one State to another. The inter-State seller would pay IGST on the sale of his goods to the Central Government after adjusting credit of IGST, CGST and SGST on his purchases (in that order). The Centre will transfer to the importing State the credit of IGST used in payment of SGST. Destination-Based Consumption Tax: GST will be a destination-based tax. This implies that all SGST collected will ordinarily accrue to the State where the consumer of the goods or services sold resides. Computation of GST on the basis of invoice credit method Payment of GST: The CGST and SGST are to be paid to the accounts of the central and states respectively. Goods and Services Tax Network (GSTN): A not-for-profit, Non-Government Company called Goods and Services Tax Network (GSTN), jointly set up by the Central and State Governments will provide shared IT infrastructure and services to the Central and State Governments, tax payers and other stakeholders. Input Tax Credit (ITC) Set Off : ITC for CGST & SGST will be taken for taxes allowed against central and state respectively. Centre will levy IGST on inter-State supply of goods and services. Import of goods will be subject to basic customs duty and IGST. Maintenance of Records: A taxpayer or exporter would have to maintain separate details in books of account for a ailment, utilization or refund of Input Tax Credit of CGST, SGST and IGST. Administration of GST : Administration of GST will be the responsibility of the GST Council , which will be the apex policy making body of the GST. Members of GST Council comprised of the Central and State ministers in charge of the finance portfolio. Goods and Service Tax Council: The GST Council will be a joint forum of the Centre and the States. The Council will make recommendations to the Union and the States on important issues like tax rates, exemption list, threshold limits, etc. One-half of the total number of Members of the Council will constitute the quorum of GST council. Effectivenessof the GST:- GST will facilitate seamless credit across the entire supply chain and across all States under a common tax base.Harmonization of laws, procedures and rates of tax will make compliance easier and simple. There would be common definitions, common forms/formats, common interface through GST portal, resulting in efficiencies and synergies across the board. This will also remove multiple taxation of same transactions and inter-State disputes like the ones on entry tax and e-commerce taxation existing today. Elimination of Cascading effect: Goods & Service Tax would eliminate the cascading effects of taxes on production and distribution cost of goods and services. The exclusion of cascading effects i.e. tax on tax will significantly improve the competitiveness of original goods and services in market will lead to beneficial impact to the GDP growth of the country. It is felt that GST would serve a superior reason to achieve the objective of streamlining indirect tax regime in India which can remove cascading effects in supply chain till the level of final consumers. Other Benefits of GST 1. Revenue Gain: Revenue will increase under GST regime because of widening of the dealer base by capturing value addition in the distributive trade and increased compliance. 2. GST regime shall enhance transparency in the indirect tax framework and is expected to bring down the rate of inflation. 3. Zero rated Exports: Under the GST regime, exports will be zero rated in entirety unlike the present system where refund of some taxes is not allowed due to fragmented nature of indirect taxes between the Centre and the States. All taxes paid on the goods or services exported or on the inputs or input services used in the supply of such export goods or services shall be refunded. 4. GST will boost Indian exports, thereby improving the balance of payments position. Exporters will be facilitated by grant of provisional refund of 90% of their claims within seven days of issue of acknowledgement of their application, thereby resulting in the easing of position with respect to cash flows. 5. Increased Uniformity: Uniform GST rates will reduce the incentive for evasion by eliminating rate arbitrage between neighboring States and that between intra and inter-State sales. 6. Increased Certainty: Common procedures for registration of taxpayers, refund of taxes, uniform formats of tax return, common tax base, common system of classification of goods or services along with timelines for every activity will lend greater certainty to taxation system. 7. Increased Digitalization: GST is largely technology driven. The interface of the taxpayer with the tax authorities will be through the common portal (GSTN). There will be simplified and automated procedures for various processes such as registration, returns, refunds, tax payments, etc. Though GST is not untouched with drawbacks but merits overweight the drawbacks, It was a very sought after reform which can be said the biggest tax reform after independence. Its long term impact will help integrate economy and boost for the GDP of India in time when global economy is connected and Indian economy is in the take off position.
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निर्वाचन सुधार से आप क्या समझते हैं?साथ ही, भारत में राजनीति के अपराधीकरण तथा चुनावों में धन के दुरूपयोग को रोकने के सन्दर्भ में किये गये मुख्य प्रयास और संभावित उपायों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by election reform? Also, discuss the main efforts and potential measures taken in regards to the criminalization of politics in India and the prevention of misuse of funds in elections. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में संक्षिप्त तरीके से निर्वाचन सुधार की व्याख्या कीजिये| अगले भाग में भारत में राजनीति के अपराधीकरण तथा चुनावों में धन के दुरूपयोग को दर्शाते हुए इसे रोकने हेतु किये गये विभिन्न प्रयासों का जिक्र कीजिये| अंतिम भाग में ,भारत में चुनावों में धनबल तथा बाहुबल रोकने हेतु किये जा सकने वाले विभिन्न सुझावों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- भारत जैसे विशाल देश में चुनाव स्वच्छ एवं निष्पक्ष तरीके से कराना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है| राजनीति से अपराधिक तत्वों को दूर करना तथा चुनावी प्रक्रिया में कालेधन के इस्तेमाल को रोकना चुनावी निष्पक्षता के प्रमुख आयाम हैं| इस संदर्भ में किये गए विभिन्न प्रावधान/सिफारिशें/रिपोर्ट तथा चुनाव आयोग के द्वारा अपनाये गये तरीके/प्रयास को निर्वाचन सुधार के अंतर्गत रखा जाता है| राजनीति के अपराधीकरण को रोकने हेतु किये गये विभिन्न प्रावधान/प्रयास - संविधान के अनुच्छेद 102(1) तथा 191(1) के अंतर्गत प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 के अंतर्गत किये गए विभिन्न प्रावधानों के द्वारा किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराने संबंधी उपाय- यदि किसी आपराधिक मामलें में उसे न्यायालय द्वारा 2 वर्ष अथवा उससे ज्यादा अवधि की सजा दी गयी हो साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने में यदि वह लिप्त हो; वर्ष 2002 में ADR बनाम भारत संघ वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये निर्देश; वर्ष 2013 में लिली थॉमस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी की यदि किसी पदासीन जनप्रतिनिधि को किस आपराधिक मामलों में 2 वर्ष या उससे अधिक जेल की सजा हो तो सजा सुनाते ही वह अपने पद के अयोग्य हो जायेगा| राजनेताओं के विरूद्ध आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई हेतु फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन निम्नलिखित आयोगों द्वारा दिए गये सुझाव/रिपोर्ट- चुनाव सुधार पर गोस्वामी समिति ,1990 वोरा पैनल की रिपोर्ट, 1993 चुनावीं खर्चों को राजकोष से प्रदान करने पर गठित इन्द्रजीत गुप्ता समिति , 1998 विधि आयोग द्वारा अपराधी तत्व के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने पर दी गयी रिपोर्ट, 1999 संविधान के कामकाज की समीक्षा करने लिए राष्ट्रीय आयोग के सुझाव(वेंकटचलैया आयोग ), 2001 निर्वाचन आयोग के द्वारा आयोग को किसी प्रत्याशी के विरूद्ध आपराधिक मामलों में कार्रवाई सम्बन्धी रिपोर्ट, 2004 द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा दिए गए सुझाव ईवीएम तथा वीवीपैट जैसे कदम के द्वारा बूथ-कब्ज़ा जैसी घटनाओं में कमी लाने का प्रयास चुनावों में धन के दुरूपयोग को रोकने हेतु किये गये उपाय- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29 C के अनुसार कोई भी राजनीतिक दल यदि 20 हजार रूपये से अधिक की धनराशि किसी स्रोत से प्राप्त करता है तो उसे आयकर अधिकारियों को इस स्रोत की जानकारी देनी होगी| आयकर अधिनियम 1961 में संशोधन करते हुए यह सीमा 2000 रूपये कर दी गयी है| इलेक्टोरल बांड के माध्यम से चुनावी दान देने की व्यवस्था ; चुनावी शपथपत्र में आय तथा सम्पति का प्रकटीकरण ; चुनावी प्रक्रिया में यदि धन बाँटने का आरोप सिद्ध होता है तो निर्वाचन अवैध घोषित किया जा सकता है; भारत में चुनावों में धनबल तथा बाहुबल रोकने हेतु किये जा सकने वाले विभिन्न सुझाव- निर्वाचन आयोग को और सशक्त बनाना जागरूकता फैलाकर स्वच्छ छवि के उम्मीदवारों को ही चुनने हेतु जनता को प्रोत्साहित करना चुनावी खर्चों पर नजर रखने हेतु अलग तदर्थ एजेंसी का गठन राजनीतिक दलों को RTI के अंतर्गत लाना राजनीतिक दलों के अन्दर पारदर्शिता तथा आतंरिक लोकतन्त्र बहाली के उपाय करना राज्य द्वारा चुनावी वितपोषण चुनावी आचार संहिता को और प्रभावी बनाना तथा इस सन्दर्भ में EC को ज्यादा शक्ति प्रदान करना| चुनावों की स्वच्छता लोकतंत्र को मजबूत करने हेतु बेहद आवश्यक कदम है अतः चुनावी प्रक्रिया से अपराधिक तत्वों एवं काले धन को दूर करने हेतु गंभीर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है|
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##Question:निर्वाचन सुधार से आप क्या समझते हैं?साथ ही, भारत में राजनीति के अपराधीकरण तथा चुनावों में धन के दुरूपयोग को रोकने के सन्दर्भ में किये गये मुख्य प्रयास और संभावित उपायों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by election reform? Also, discuss the main efforts and potential measures taken in regards to the criminalization of politics in India and the prevention of misuse of funds in elections. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में संक्षिप्त तरीके से निर्वाचन सुधार की व्याख्या कीजिये| अगले भाग में भारत में राजनीति के अपराधीकरण तथा चुनावों में धन के दुरूपयोग को दर्शाते हुए इसे रोकने हेतु किये गये विभिन्न प्रयासों का जिक्र कीजिये| अंतिम भाग में ,भारत में चुनावों में धनबल तथा बाहुबल रोकने हेतु किये जा सकने वाले विभिन्न सुझावों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- भारत जैसे विशाल देश में चुनाव स्वच्छ एवं निष्पक्ष तरीके से कराना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है| राजनीति से अपराधिक तत्वों को दूर करना तथा चुनावी प्रक्रिया में कालेधन के इस्तेमाल को रोकना चुनावी निष्पक्षता के प्रमुख आयाम हैं| इस संदर्भ में किये गए विभिन्न प्रावधान/सिफारिशें/रिपोर्ट तथा चुनाव आयोग के द्वारा अपनाये गये तरीके/प्रयास को निर्वाचन सुधार के अंतर्गत रखा जाता है| राजनीति के अपराधीकरण को रोकने हेतु किये गये विभिन्न प्रावधान/प्रयास - संविधान के अनुच्छेद 102(1) तथा 191(1) के अंतर्गत प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 के अंतर्गत किये गए विभिन्न प्रावधानों के द्वारा किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराने संबंधी उपाय- यदि किसी आपराधिक मामलें में उसे न्यायालय द्वारा 2 वर्ष अथवा उससे ज्यादा अवधि की सजा दी गयी हो साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने में यदि वह लिप्त हो; वर्ष 2002 में ADR बनाम भारत संघ वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये निर्देश; वर्ष 2013 में लिली थॉमस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी की यदि किसी पदासीन जनप्रतिनिधि को किस आपराधिक मामलों में 2 वर्ष या उससे अधिक जेल की सजा हो तो सजा सुनाते ही वह अपने पद के अयोग्य हो जायेगा| राजनेताओं के विरूद्ध आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई हेतु फ़ास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन निम्नलिखित आयोगों द्वारा दिए गये सुझाव/रिपोर्ट- चुनाव सुधार पर गोस्वामी समिति ,1990 वोरा पैनल की रिपोर्ट, 1993 चुनावीं खर्चों को राजकोष से प्रदान करने पर गठित इन्द्रजीत गुप्ता समिति , 1998 विधि आयोग द्वारा अपराधी तत्व के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने पर दी गयी रिपोर्ट, 1999 संविधान के कामकाज की समीक्षा करने लिए राष्ट्रीय आयोग के सुझाव(वेंकटचलैया आयोग ), 2001 निर्वाचन आयोग के द्वारा आयोग को किसी प्रत्याशी के विरूद्ध आपराधिक मामलों में कार्रवाई सम्बन्धी रिपोर्ट, 2004 द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा दिए गए सुझाव ईवीएम तथा वीवीपैट जैसे कदम के द्वारा बूथ-कब्ज़ा जैसी घटनाओं में कमी लाने का प्रयास चुनावों में धन के दुरूपयोग को रोकने हेतु किये गये उपाय- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29 C के अनुसार कोई भी राजनीतिक दल यदि 20 हजार रूपये से अधिक की धनराशि किसी स्रोत से प्राप्त करता है तो उसे आयकर अधिकारियों को इस स्रोत की जानकारी देनी होगी| आयकर अधिनियम 1961 में संशोधन करते हुए यह सीमा 2000 रूपये कर दी गयी है| इलेक्टोरल बांड के माध्यम से चुनावी दान देने की व्यवस्था ; चुनावी शपथपत्र में आय तथा सम्पति का प्रकटीकरण ; चुनावी प्रक्रिया में यदि धन बाँटने का आरोप सिद्ध होता है तो निर्वाचन अवैध घोषित किया जा सकता है; भारत में चुनावों में धनबल तथा बाहुबल रोकने हेतु किये जा सकने वाले विभिन्न सुझाव- निर्वाचन आयोग को और सशक्त बनाना जागरूकता फैलाकर स्वच्छ छवि के उम्मीदवारों को ही चुनने हेतु जनता को प्रोत्साहित करना चुनावी खर्चों पर नजर रखने हेतु अलग तदर्थ एजेंसी का गठन राजनीतिक दलों को RTI के अंतर्गत लाना राजनीतिक दलों के अन्दर पारदर्शिता तथा आतंरिक लोकतन्त्र बहाली के उपाय करना राज्य द्वारा चुनावी वितपोषण चुनावी आचार संहिता को और प्रभावी बनाना तथा इस सन्दर्भ में EC को ज्यादा शक्ति प्रदान करना| चुनावों की स्वच्छता लोकतंत्र को मजबूत करने हेतु बेहद आवश्यक कदम है अतः चुनावी प्रक्रिया से अपराधिक तत्वों एवं काले धन को दूर करने हेतु गंभीर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है|
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Explain the concept of volcanism and the different types of eruptions(magma) with examples. (150 words /10 marks)
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BRIEF APPROACH:- -INTRODUCTION - THE CONCEPT OF VOLCANISM - THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES Answer:- The magma of the Earth oozes to the surface and becomes lava. This results in various landforms. This is the broad concept of volcanism. THE CONCEPT OF VOLCANISM 1) MELTING OF ROCKS For every 32 m of descent in the interior of the Earth, the temperature increases by 1 degree Celsius. At a depth of 1000 kms, where the temperature is in 1000s of degrees, rocks melt. They turn into molten form. This molten rocky material is otherwise known as magma. 2) ERUPTION Where the crust is weak, the magma tries to come up. This process of oozing out from the deep inner layers is called eruption. 3) FORMATION OF LANDFORMS On reaching the surface, the temperature is lesser, which results in the rocks taking their original form. Great structures like mountains, plateaus etc. are formed. THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES 1) FELSIC/ ACIDIC ERUPTIONS These have high silica content. They are stickier with less mobility. It leads to the central type of eruption with big volcanic mountains. For example, Hawaii mountains, Mount Stromboli in the island of Sicily, Mt. Vesuvius in Italy, Mt. Krakatoa of Indonesia, Mt. Fujiyama of Japan etc. 2) MAFIC/ BASIC MAGMA These are less viscous, due to the low silica content, and run 100s of kms. They result in fissure type eruptions. Such eruptions create plateaus. For example, Deccan plateau, Colombian plateaus of North America, Patagonia (Argentina).
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##Question:Explain the concept of volcanism and the different types of eruptions(magma) with examples. (150 words /10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH:- -INTRODUCTION - THE CONCEPT OF VOLCANISM - THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES Answer:- The magma of the Earth oozes to the surface and becomes lava. This results in various landforms. This is the broad concept of volcanism. THE CONCEPT OF VOLCANISM 1) MELTING OF ROCKS For every 32 m of descent in the interior of the Earth, the temperature increases by 1 degree Celsius. At a depth of 1000 kms, where the temperature is in 1000s of degrees, rocks melt. They turn into molten form. This molten rocky material is otherwise known as magma. 2) ERUPTION Where the crust is weak, the magma tries to come up. This process of oozing out from the deep inner layers is called eruption. 3) FORMATION OF LANDFORMS On reaching the surface, the temperature is lesser, which results in the rocks taking their original form. Great structures like mountains, plateaus etc. are formed. THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES 1) FELSIC/ ACIDIC ERUPTIONS These have high silica content. They are stickier with less mobility. It leads to the central type of eruption with big volcanic mountains. For example, Hawaii mountains, Mount Stromboli in the island of Sicily, Mt. Vesuvius in Italy, Mt. Krakatoa of Indonesia, Mt. Fujiyama of Japan etc. 2) MAFIC/ BASIC MAGMA These are less viscous, due to the low silica content, and run 100s of kms. They result in fissure type eruptions. Such eruptions create plateaus. For example, Deccan plateau, Colombian plateaus of North America, Patagonia (Argentina).
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संसदीय कार्यवाही में दल - बदल कानून के प्रभाव की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) Critically assess the effect of anti defection law on parliamentary proceedings. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच - भूमिका में दल- बदल कानून के बारे में वर्णन कीजिये | इसके बाद दल-बदल कानून के उपबंधो की चर्चा कीजिये | दल-बदल कानून के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये | दल- बदल कानून के दोषों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इसके कमियों को बताते हुए समाधान भी बताइए | उत्तर - भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से "दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा लाया गया है| इसके अनुसार सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल- परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में प्रावधान किया गया है| 10 वीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों तथा विधायकों की निरहर्ताओं से सम्बंधित उपबंध अग्रलिखित है- राजनीतिक दलों के सदस्य- किसी राजनीतिक दल का सदस्य निम्न परिस्थितियों में सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य माना जाएगा यदि - - वह स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दे | - यदि व्यक्ति अपने राजनीतिक दल के विपक्ष में मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा उसे 15 दिन के भीतर क्षमादान न मिला हो| निर्दलीय सदस्य- निर्दलीयसदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | मनोनीत सदस्य - मनोनीत सदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता निम्न दो परिस्थितियों में लागू नहीं होती - 1- दल-विभाजन की स्थिति में 2- यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी चुना जाता है संविधान की 10वीं अनुसूची की रूपरेखा राजनीतिक दल-परिवर्तन के दोषों तथा दुष्प्रभावों , जो कि पद के प्रलोभन तथा भौतिक पदार्थों के प्रलोभन अथवा इसी प्रकार के अन्य प्रलोभनों से प्रेरित होती है, पर रोक लगाने के लिए की गयी है | इसका उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना तथा असैद्धान्तिक और अनैतिक दल-परिवर्तन पर रोक लगाना है | यद्यपि दल-विरोधी कानून ने देश के राजनीतिक जीवन में एक नए युग का सूत्रपात किया फिर भी इसके क्रियाकलापों में कुछ कमियां रह गयी और यह दल-परिवर्तन को बहुत प्रभावी तरीके से रोक नहीं पाया | इसमें कुछ दोषों को देखा जा सकता है - - यह कानून असहमति तथा दल-परिवर्तन के बीच अंतर को नहीं बता पाया | - इसने छिटपुट दल-परिवर्तन पर रोक लगाई किन्तु बड़े पैमाने पर होने वाले दल-परिवर्तन को कानूनी रूप दिया | - यह किसी विधायक द्वारा विधानमंडल के बाहर किये गए उसके क्रियाकलापों हेतु उसके निष्कासन की व्यवस्था नहीं करता है | - इसका निर्दलीय व निर्देशित सदस्यों में भेदभाव अतार्किक ही है | उपर्युक्त कमियों के बावजूद भी दल-बदल विरोधी कानून अपने आप में प्रमुख स्थान रखती है , जरूरत इसके सही क्रियान्वयन की और नियमों के अनुपालन की | दल-बदल विरोधी कानून को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक उपबंधों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवाना अनिवार्य है |
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##Question:संसदीय कार्यवाही में दल - बदल कानून के प्रभाव की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) Critically assess the effect of anti defection law on parliamentary proceedings. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में दल- बदल कानून के बारे में वर्णन कीजिये | इसके बाद दल-बदल कानून के उपबंधो की चर्चा कीजिये | दल-बदल कानून के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये | दल- बदल कानून के दोषों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इसके कमियों को बताते हुए समाधान भी बताइए | उत्तर - भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से "दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा लाया गया है| इसके अनुसार सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल- परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में प्रावधान किया गया है| 10 वीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों तथा विधायकों की निरहर्ताओं से सम्बंधित उपबंध अग्रलिखित है- राजनीतिक दलों के सदस्य- किसी राजनीतिक दल का सदस्य निम्न परिस्थितियों में सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य माना जाएगा यदि - - वह स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दे | - यदि व्यक्ति अपने राजनीतिक दल के विपक्ष में मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा उसे 15 दिन के भीतर क्षमादान न मिला हो| निर्दलीय सदस्य- निर्दलीयसदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | मनोनीत सदस्य - मनोनीत सदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता निम्न दो परिस्थितियों में लागू नहीं होती - 1- दल-विभाजन की स्थिति में 2- यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी चुना जाता है संविधान की 10वीं अनुसूची की रूपरेखा राजनीतिक दल-परिवर्तन के दोषों तथा दुष्प्रभावों , जो कि पद के प्रलोभन तथा भौतिक पदार्थों के प्रलोभन अथवा इसी प्रकार के अन्य प्रलोभनों से प्रेरित होती है, पर रोक लगाने के लिए की गयी है | इसका उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना तथा असैद्धान्तिक और अनैतिक दल-परिवर्तन पर रोक लगाना है | यद्यपि दल-विरोधी कानून ने देश के राजनीतिक जीवन में एक नए युग का सूत्रपात किया फिर भी इसके क्रियाकलापों में कुछ कमियां रह गयी और यह दल-परिवर्तन को बहुत प्रभावी तरीके से रोक नहीं पाया | इसमें कुछ दोषों को देखा जा सकता है - - यह कानून असहमति तथा दल-परिवर्तन के बीच अंतर को नहीं बता पाया | - इसने छिटपुट दल-परिवर्तन पर रोक लगाई किन्तु बड़े पैमाने पर होने वाले दल-परिवर्तन को कानूनी रूप दिया | - यह किसी विधायक द्वारा विधानमंडल के बाहर किये गए उसके क्रियाकलापों हेतु उसके निष्कासन की व्यवस्था नहीं करता है | - इसका निर्दलीय व निर्देशित सदस्यों में भेदभाव अतार्किक ही है | उपर्युक्त कमियों के बावजूद भी दल-बदल विरोधी कानून अपने आप में प्रमुख स्थान रखती है , जरूरत इसके सही क्रियान्वयन की और नियमों के अनुपालन की | दल-बदल विरोधी कानून को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक उपबंधों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवाना अनिवार्य है |
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प्रलेख (Writ) से आप क्या समझते हैं? अनुच्छेद 32 के अंतर्गत परमादेश प्रलेख के जारी होने या जारी न होने की शर्तों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand from Writ? Under Article 32, explain the terms of release or non-release of the Mandamus writ. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में रिट को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में परमादेश प्रलेख के जारी होने या न जारी होने की शर्तों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में परमादेश के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रलेख(Writ), सामान्य विधि के सन्दर्भ में जारी होने वाला एक समादेश या आदेश होता है|यह स्वरूपतः प्रशासनिक या न्यायिक अधिकार से युक्त किसी सक्षम संस्था द्वारा जारी किया गया औपचारिक आदेश होता है|प्रायः यह संस्था न्यायालय होती है| न्यायालय जब सरकार को अथवा विधायिका को जब किसी पहलू पर अमल करने के लिए कहता है तब उसे आदेश कहते हैं| जब न्यायालय सरकार या विधायिका से भविष्य में किसी पहलु पर विचार करने के लिए कहता है तो उसे निर्देश कहते हैं| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32(2) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय(SC) पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए ऐसे आदेश, निर्देश अथवा निदेशन दे सकता है जो इस सम्बन्ध में पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए उचित है अथवा ऐसे प्रलेख जारी कर सकता है जो इसके लिए आवश्यक है| साथ ही बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, और अधिकार पृच्छा में से जो आवश्यक प्रलेख(writ) है वह राज्य के विरुद्ध जारी कर सकता है| परमादेश प्रलेख को निम्नलिखित विधि से समझ सकते हैं| परमादेश(Mandamus) परमादेश के अंतर्गत किसी सरकारी पदाधिकारी से उसका कर्तव्य पालन कराने के लिए न्यायालय जाया जा सकता है| यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि याचिकाकर्ता का आवेदन उचित है तो ऐसी दशा में न्यायालय उक्त पदाधिकारी को निर्धारित समय के भीतर उसके कर्तव्य पालन का आदेश देता है परमादेश का प्रलेख निम्नलिखित स्थितियों में ही जारी किया जा सकता है · याचिकाकर्ता कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत किसी पदाधिकारी से कोई कार्य कराने का हकदार हो · सम्बन्धित पदाधिकारी कानूनी रूप से उस कार्य को करने के लिए अधिकृत किया गया हो · कानून के अंतर्गत उपरोक्त कार्य एक सार्वजनिक दायित्व के रूप में तय किया गया हो · याचिकाकर्ता उक्त पदाधिकारी के कर्तव्य पालन करने से मना करने के बाद ही न्यायालय आया हो · याचिकाकर्ता ने किसी गैर-कानूनी या असंवैधानिक कार्य की मांग न की हो निम्नलिखित मामलों/स्थितियों में परमादेश के प्रलेख का प्रयोग नहीं किया जा सकता · जब किसी पदाधिकारी के पास किसी कार्य को करने अथवा न करने का विवेकीय अधिकार हो · किसी निजी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध इसे जारी नहीं किया जा सकता · किसी ऐसी कंपनी के विरुद्ध जिसमें सरकार की हिस्सेदारी या तो नाममात्र की है या वह वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए बनायी गयी है · राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के विरुद्ध इसे जारी नहीं किया जा सकता · किसी कार्यपालिका के विरुद्ध इस आधार पर कि उसके अधीनस्थ विधायन के अधिकार को सीमित किया जाय · उच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध परमादेश जारी नहीं हो सकता| · उसके कर लगाने के अधिकार को सीमित करने के लिए सरकार के विरुद्ध परमादेश जारी नहीं हो सकता · किसी निजी स्कूल के विरुद्ध जो सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं लेता है · किसी विधानमंडल को कानून बनाने के लिए परमादेश नहीं जारी नहीं किया जा सकता है| पिछले कुछ वर्षों में इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय याचिकाकर्ता को सम्बन्धित उच्च न्यायालय जाने का निर्देश देता रहा है| न्यायालय के अनुसार इस सम्बन्ध में यदि याचिकाकर्ता को वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध कराई गयी है तो उन्हें इसका प्रयोग करना चाहिए| इस सम्बन्ध में SC नेपूर्व निर्धारित न्याय सिद्धांतको लागू कर रखा है | सर्वोच्च न्यायालय ने जगन्नाथबख्स सिंह बनाम उत्तर प्रदेश वाद (1962) में यह फैसला दिया की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत जारी किये जाने वाले प्रलेखों के मामले में यदि न्यायालय ने पहले कोई फैसला दे रखा है तो वह इस पर दोबारा विचार नहीं करेगा| फिर भी परमादेश कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों की पूर्ति के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रलेख है|इससे प्रशासं में गतिशीलता आती है और प्रशासनिक सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित होती है|
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##Question:प्रलेख (Writ) से आप क्या समझते हैं? अनुच्छेद 32 के अंतर्गत परमादेश प्रलेख के जारी होने या जारी न होने की शर्तों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand from Writ? Under Article 32, explain the terms of release or non-release of the Mandamus writ. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में रिट को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में परमादेश प्रलेख के जारी होने या न जारी होने की शर्तों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में परमादेश के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रलेख(Writ), सामान्य विधि के सन्दर्भ में जारी होने वाला एक समादेश या आदेश होता है|यह स्वरूपतः प्रशासनिक या न्यायिक अधिकार से युक्त किसी सक्षम संस्था द्वारा जारी किया गया औपचारिक आदेश होता है|प्रायः यह संस्था न्यायालय होती है| न्यायालय जब सरकार को अथवा विधायिका को जब किसी पहलू पर अमल करने के लिए कहता है तब उसे आदेश कहते हैं| जब न्यायालय सरकार या विधायिका से भविष्य में किसी पहलु पर विचार करने के लिए कहता है तो उसे निर्देश कहते हैं| भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32(2) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय(SC) पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए ऐसे आदेश, निर्देश अथवा निदेशन दे सकता है जो इस सम्बन्ध में पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए उचित है अथवा ऐसे प्रलेख जारी कर सकता है जो इसके लिए आवश्यक है| साथ ही बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, और अधिकार पृच्छा में से जो आवश्यक प्रलेख(writ) है वह राज्य के विरुद्ध जारी कर सकता है| परमादेश प्रलेख को निम्नलिखित विधि से समझ सकते हैं| परमादेश(Mandamus) परमादेश के अंतर्गत किसी सरकारी पदाधिकारी से उसका कर्तव्य पालन कराने के लिए न्यायालय जाया जा सकता है| यदि न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि याचिकाकर्ता का आवेदन उचित है तो ऐसी दशा में न्यायालय उक्त पदाधिकारी को निर्धारित समय के भीतर उसके कर्तव्य पालन का आदेश देता है परमादेश का प्रलेख निम्नलिखित स्थितियों में ही जारी किया जा सकता है · याचिकाकर्ता कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत किसी पदाधिकारी से कोई कार्य कराने का हकदार हो · सम्बन्धित पदाधिकारी कानूनी रूप से उस कार्य को करने के लिए अधिकृत किया गया हो · कानून के अंतर्गत उपरोक्त कार्य एक सार्वजनिक दायित्व के रूप में तय किया गया हो · याचिकाकर्ता उक्त पदाधिकारी के कर्तव्य पालन करने से मना करने के बाद ही न्यायालय आया हो · याचिकाकर्ता ने किसी गैर-कानूनी या असंवैधानिक कार्य की मांग न की हो निम्नलिखित मामलों/स्थितियों में परमादेश के प्रलेख का प्रयोग नहीं किया जा सकता · जब किसी पदाधिकारी के पास किसी कार्य को करने अथवा न करने का विवेकीय अधिकार हो · किसी निजी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध इसे जारी नहीं किया जा सकता · किसी ऐसी कंपनी के विरुद्ध जिसमें सरकार की हिस्सेदारी या तो नाममात्र की है या वह वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए बनायी गयी है · राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के विरुद्ध इसे जारी नहीं किया जा सकता · किसी कार्यपालिका के विरुद्ध इस आधार पर कि उसके अधीनस्थ विधायन के अधिकार को सीमित किया जाय · उच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध परमादेश जारी नहीं हो सकता| · उसके कर लगाने के अधिकार को सीमित करने के लिए सरकार के विरुद्ध परमादेश जारी नहीं हो सकता · किसी निजी स्कूल के विरुद्ध जो सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं लेता है · किसी विधानमंडल को कानून बनाने के लिए परमादेश नहीं जारी नहीं किया जा सकता है| पिछले कुछ वर्षों में इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय याचिकाकर्ता को सम्बन्धित उच्च न्यायालय जाने का निर्देश देता रहा है| न्यायालय के अनुसार इस सम्बन्ध में यदि याचिकाकर्ता को वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध कराई गयी है तो उन्हें इसका प्रयोग करना चाहिए| इस सम्बन्ध में SC नेपूर्व निर्धारित न्याय सिद्धांतको लागू कर रखा है | सर्वोच्च न्यायालय ने जगन्नाथबख्स सिंह बनाम उत्तर प्रदेश वाद (1962) में यह फैसला दिया की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत जारी किये जाने वाले प्रलेखों के मामले में यदि न्यायालय ने पहले कोई फैसला दे रखा है तो वह इस पर दोबारा विचार नहीं करेगा| फिर भी परमादेश कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों की पूर्ति के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रलेख है|इससे प्रशासं में गतिशीलता आती है और प्रशासनिक सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित होती है|
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What do you understand by a Uniform Civil Code (UCC)? State the factors obstructing the UCC from becoming a reality in India. (150 words/10 marks)
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Approach : Introduction: Try to define what does uniform civil code means and what is constitutional stand or stand of our founding fathers Body of the Answer : Address the main part by writing the factor that inhibits enactment of the uniform civil code, one can also write about the importance of uniform civil code for India in brief. Conclusion : Try to give a way forward Answer What is a uniform civil code A uniform civil code administers the same set of secular civil laws to govern all people irrespective of their religion, caste, and tribe. The need for such a code takes in to account the constitutional mandate of securing justice and equality for all citizens. A uniform criminal code is applicable to all citizens irrespective of religion, caste, gender, and domicile in our country . But a similar code pertaining to marriage, divorce, succession and other family matters has not been brought in to effect. The personal laws vary widely in their sources, philosophy, and application. Therefore, there is an inherent difficulty and resistance in bringing people together and unifying them when different religions and personal laws govern them. Why we need Uniform civil code a)A uniform civil code is of an absolute necessity for individuals belonging to different religions and denominations and it is imperative for the promotion of national unity and solidarity b)The idea and principle of having a uniform civil code, governing personal laws is to treat every person equally and also so that just, fair and predictable laws protect everyone. c)A uniform civil code would put in place a set of laws that would govern personal matters of all citizens irrespective of religion, which is the cornerstone of secularism. It would enable to put an end to gender discrimination on religious grounds, strengthen the secular fabric and also promote unity. Factors that inhibit India from enacting Uniform civil code The possible factors that are inhibiting India from enacting for its citizen a Uniform Civil Codeas provided for in the DPSP are: a) Vote Bank and Appeasement Politics : The minorities are always treated as vote bank by politicalparties and become a hurdle in implementing the Uniform Civil Code. For example, In the Shah Banocase, when SC allowed Muslim women to get benefit after divorce as per Hindu Marriage Act then ruling Congress party government enacts a new law to nullify the SC judgment. b) Communal Leaders and Unaware Masses : Communal leader gets support from unaware massesby mending the reality of Uniform Civil Code. For example, Muslim Leaders says Uniform CivilCode is a threat to their religious freedom and it is an initiative to make India a Hindu country. On another side, Hindu communal leaders argued that why Muslim personal law based on Sharia isin place in the country of Ram and Krishna. c) The vast diversity of the personal laws , along with the devotion with which they are adhered to, makes uniformity of any sort very difficult to achieve. Even under the Hindu Marriage Act, 1955, marriages may be solemnized in accordance with the rites and ceremonies of a variety of peopleho come under the definition of a Hindu. In the Muslim law too, though there are no elaboraterites or ceremonies, there exist some differences between the Sunni and Shia marriages. Somepeople also argue that it would lead to a loss of the culture and the identity of the minorities in theIndian society. All these different perspectives on Uniform Civil Code make this issue a communal one which itselfhas the power of making India a secular country. The better course would be to bring about smallreforms, correcting some inherent irrationality in some of the personal laws, and make them suitablefor modern times. The focus should also be on removing disparities between different religions. Thismight lay the foundation of implementing a UCC at a later date.
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##Question:What do you understand by a Uniform Civil Code (UCC)? State the factors obstructing the UCC from becoming a reality in India. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduction: Try to define what does uniform civil code means and what is constitutional stand or stand of our founding fathers Body of the Answer : Address the main part by writing the factor that inhibits enactment of the uniform civil code, one can also write about the importance of uniform civil code for India in brief. Conclusion : Try to give a way forward Answer What is a uniform civil code A uniform civil code administers the same set of secular civil laws to govern all people irrespective of their religion, caste, and tribe. The need for such a code takes in to account the constitutional mandate of securing justice and equality for all citizens. A uniform criminal code is applicable to all citizens irrespective of religion, caste, gender, and domicile in our country . But a similar code pertaining to marriage, divorce, succession and other family matters has not been brought in to effect. The personal laws vary widely in their sources, philosophy, and application. Therefore, there is an inherent difficulty and resistance in bringing people together and unifying them when different religions and personal laws govern them. Why we need Uniform civil code a)A uniform civil code is of an absolute necessity for individuals belonging to different religions and denominations and it is imperative for the promotion of national unity and solidarity b)The idea and principle of having a uniform civil code, governing personal laws is to treat every person equally and also so that just, fair and predictable laws protect everyone. c)A uniform civil code would put in place a set of laws that would govern personal matters of all citizens irrespective of religion, which is the cornerstone of secularism. It would enable to put an end to gender discrimination on religious grounds, strengthen the secular fabric and also promote unity. Factors that inhibit India from enacting Uniform civil code The possible factors that are inhibiting India from enacting for its citizen a Uniform Civil Codeas provided for in the DPSP are: a) Vote Bank and Appeasement Politics : The minorities are always treated as vote bank by politicalparties and become a hurdle in implementing the Uniform Civil Code. For example, In the Shah Banocase, when SC allowed Muslim women to get benefit after divorce as per Hindu Marriage Act then ruling Congress party government enacts a new law to nullify the SC judgment. b) Communal Leaders and Unaware Masses : Communal leader gets support from unaware massesby mending the reality of Uniform Civil Code. For example, Muslim Leaders says Uniform CivilCode is a threat to their religious freedom and it is an initiative to make India a Hindu country. On another side, Hindu communal leaders argued that why Muslim personal law based on Sharia isin place in the country of Ram and Krishna. c) The vast diversity of the personal laws , along with the devotion with which they are adhered to, makes uniformity of any sort very difficult to achieve. Even under the Hindu Marriage Act, 1955, marriages may be solemnized in accordance with the rites and ceremonies of a variety of peopleho come under the definition of a Hindu. In the Muslim law too, though there are no elaboraterites or ceremonies, there exist some differences between the Sunni and Shia marriages. Somepeople also argue that it would lead to a loss of the culture and the identity of the minorities in theIndian society. All these different perspectives on Uniform Civil Code make this issue a communal one which itselfhas the power of making India a secular country. The better course would be to bring about smallreforms, correcting some inherent irrationality in some of the personal laws, and make them suitablefor modern times. The focus should also be on removing disparities between different religions. Thismight lay the foundation of implementing a UCC at a later date.
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बौद्धिक सम्पदा के अधिकार के अंतर्गत कौन-कौन से क्षेत्र समाहित हैं? बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा क्यों की जानी चाहिए? साथ ही, इस सन्दर्भ में भारत में विद्यमान कानूनों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What are the areas covered under intellectual property rights? Why intellectual property rights should be protected? In this context, discuss the existing laws in India. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच- भूमिका के अंतर्गत संक्षिप्त तरीके से बौद्धिक संपदा अधिकारों को परिभाषित कीजिये| अगले भाग में बौद्धिक संपदा अधिकारों के अंतर्गत आने वाले विभिन्न क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने के पीछे तर्कों को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने हेतु भारत में विद्यमान कानूनों का जिक्र कीजिये| उत्तर- किसी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सृजित कोई रचना, संगीत, साहित्यिक कृति, कला, खोज, नाम अथवा डिजाइन आदि, उस व्यक्ति अथवा संस्था की ‘बौद्धिक संपदा’ कहलाती है। व्यक्ति अथवा संस्था को अपनी इन कृतियों पर प्राप्त अधिकार को बौद्धिक संपदा अधिकार कहा जाता है। बौद्धिक संपदा अधिकार, मानसिक रचनाएं, कलात्मक और वाणिज्यिक, दोनों के संदर्भ में विशेष अधिकारों के समूह हैं|बौद्धिक संपदा अधिकार वह अधिकार है जो मस्तिष्क की सृजनात्मकता और एक निश्चित समयावधि तक इसके विशिष्ट दोहन के लिए महत्वपूर्ण है|यह उन अधिकारों का एक समूह है जो ट्रेडमार्क, पेटेंट और औद्योगिक डिजाइन पर विशिष्टता की गारंटी देते हैं। बौद्धिक संपदा अधिकार के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र- कॉपीराइट ट्रेडमार्क औद्योगिक डिज़ाइन भौगोलिक सूचकांक/संकेतक पेटेंट अर्धचालक एकीकृत परिपथ अभिन्यास डिज़ाइन पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने के पीछे तर्क बहुपक्षीय व्यापार और वाणिज्य बढ़ाने के आज के वैश्विक परिदृश्य में किसी भी देश के लिए रचनाकारों और आविष्कारकों को सांविधिक अधिकार प्रदान करके अपनी बौद्धिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना आवश्यक हो गया है ताकि उन्हें विश्व के बाजार में अपने प्रयासों का उचित वाणिज्यिक मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सके| इसके संरक्षण के द्वारा नए आविष्कारों के लिए रचनाकारों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है ताकि उनके द्वारा दिए गये बहुमूल्य समय/संसाधन का उचित वाणिज्यिक मूल्य प्रदान किया जा सके| किसी ख़ास विशेषताओं से युक्त कोई उत्पाद की गुणवता बनाये रखने हेतु विशिष्ट खोजों के खोजकर्ताओं को उचित सम्मान प्रदान करना महत्वपूर्ण डिजाईनों की गुणवता तथा मानक को बनाये रखने हेतु नवाचार तथा अभिनव खोजों को प्रोत्साहित करने हेतु बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने हेतु भारत में विद्यमान कानून- मजबूत और संतुलित आईपी व्यवस्था के महत्व को समझते हुए भारत में प्रौद्योगिकी तथा व्यापार के विकास के लिए सहायक वातावरण निर्मित करने हेतु विभिन्न कानूनों का प्रवर्तन किया गया है- कॉपीराइट एक्ट,1957 ; इसको 2012 में संशोधित किया गया था| ट्रेडमार्क एक्ट,1999; औद्योगिक डिज़ाइन हेतु डिज़ाइन एक्ट, 2000; भौगोलिक संकेतक(पंजीकरण और संरक्षण)अधिनियम 1999 ;जो 2003 से प्रभावी हो गया है| पेटेंट के लिए भारत में भारतीय पेटेंट एक्ट,1970 है|यह उत्पाद और प्रक्रिया आधारित पेटेंट दोनों ही प्रदान करता है और पेटेंट की अवधि 20 वर्ष है| यह पूर्व अनुदान और अनुदान के पश्चात दोनों ही तरह के विरोध की अनुमति देता है| अर्धचालक एकीकृत परिपथ अभिन्यास डिज़ाइन अधिनियम, 2000 पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम,2001 इनके अलावा प्रतिस्पर्धा अधिनियम,2002 तथा जैव-विविधता अधिनियम,2002 के अंतर्गत भी बौद्धिक संपदा अधिकारों का संरक्षण किया जाता है|इन कानूनों के प्रवर्तन हेतुऔद्योगिक संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग(DPIIT);उच्चतर शिक्षा विभाग;सूचना-प्रौद्योगिकी विभाग तथा कृषि एवं सहकारिता विभाग जिम्मेदार है|
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##Question:बौद्धिक सम्पदा के अधिकार के अंतर्गत कौन-कौन से क्षेत्र समाहित हैं? बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा क्यों की जानी चाहिए? साथ ही, इस सन्दर्भ में भारत में विद्यमान कानूनों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What are the areas covered under intellectual property rights? Why intellectual property rights should be protected? In this context, discuss the existing laws in India. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- भूमिका के अंतर्गत संक्षिप्त तरीके से बौद्धिक संपदा अधिकारों को परिभाषित कीजिये| अगले भाग में बौद्धिक संपदा अधिकारों के अंतर्गत आने वाले विभिन्न क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने के पीछे तर्कों को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने हेतु भारत में विद्यमान कानूनों का जिक्र कीजिये| उत्तर- किसी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सृजित कोई रचना, संगीत, साहित्यिक कृति, कला, खोज, नाम अथवा डिजाइन आदि, उस व्यक्ति अथवा संस्था की ‘बौद्धिक संपदा’ कहलाती है। व्यक्ति अथवा संस्था को अपनी इन कृतियों पर प्राप्त अधिकार को बौद्धिक संपदा अधिकार कहा जाता है। बौद्धिक संपदा अधिकार, मानसिक रचनाएं, कलात्मक और वाणिज्यिक, दोनों के संदर्भ में विशेष अधिकारों के समूह हैं|बौद्धिक संपदा अधिकार वह अधिकार है जो मस्तिष्क की सृजनात्मकता और एक निश्चित समयावधि तक इसके विशिष्ट दोहन के लिए महत्वपूर्ण है|यह उन अधिकारों का एक समूह है जो ट्रेडमार्क, पेटेंट और औद्योगिक डिजाइन पर विशिष्टता की गारंटी देते हैं। बौद्धिक संपदा अधिकार के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र- कॉपीराइट ट्रेडमार्क औद्योगिक डिज़ाइन भौगोलिक सूचकांक/संकेतक पेटेंट अर्धचालक एकीकृत परिपथ अभिन्यास डिज़ाइन पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने के पीछे तर्क बहुपक्षीय व्यापार और वाणिज्य बढ़ाने के आज के वैश्विक परिदृश्य में किसी भी देश के लिए रचनाकारों और आविष्कारकों को सांविधिक अधिकार प्रदान करके अपनी बौद्धिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना आवश्यक हो गया है ताकि उन्हें विश्व के बाजार में अपने प्रयासों का उचित वाणिज्यिक मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सके| इसके संरक्षण के द्वारा नए आविष्कारों के लिए रचनाकारों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है ताकि उनके द्वारा दिए गये बहुमूल्य समय/संसाधन का उचित वाणिज्यिक मूल्य प्रदान किया जा सके| किसी ख़ास विशेषताओं से युक्त कोई उत्पाद की गुणवता बनाये रखने हेतु विशिष्ट खोजों के खोजकर्ताओं को उचित सम्मान प्रदान करना महत्वपूर्ण डिजाईनों की गुणवता तथा मानक को बनाये रखने हेतु नवाचार तथा अभिनव खोजों को प्रोत्साहित करने हेतु बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने हेतु भारत में विद्यमान कानून- मजबूत और संतुलित आईपी व्यवस्था के महत्व को समझते हुए भारत में प्रौद्योगिकी तथा व्यापार के विकास के लिए सहायक वातावरण निर्मित करने हेतु विभिन्न कानूनों का प्रवर्तन किया गया है- कॉपीराइट एक्ट,1957 ; इसको 2012 में संशोधित किया गया था| ट्रेडमार्क एक्ट,1999; औद्योगिक डिज़ाइन हेतु डिज़ाइन एक्ट, 2000; भौगोलिक संकेतक(पंजीकरण और संरक्षण)अधिनियम 1999 ;जो 2003 से प्रभावी हो गया है| पेटेंट के लिए भारत में भारतीय पेटेंट एक्ट,1970 है|यह उत्पाद और प्रक्रिया आधारित पेटेंट दोनों ही प्रदान करता है और पेटेंट की अवधि 20 वर्ष है| यह पूर्व अनुदान और अनुदान के पश्चात दोनों ही तरह के विरोध की अनुमति देता है| अर्धचालक एकीकृत परिपथ अभिन्यास डिज़ाइन अधिनियम, 2000 पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम,2001 इनके अलावा प्रतिस्पर्धा अधिनियम,2002 तथा जैव-विविधता अधिनियम,2002 के अंतर्गत भी बौद्धिक संपदा अधिकारों का संरक्षण किया जाता है|इन कानूनों के प्रवर्तन हेतुऔद्योगिक संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग(DPIIT);उच्चतर शिक्षा विभाग;सूचना-प्रौद्योगिकी विभाग तथा कृषि एवं सहकारिता विभाग जिम्मेदार है|
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What do you understand by denudation? What is meant by weathering? Explain the different types of weathering. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTODUCTION Meaning/ definition of weathering. -THE TYPES OF WEATHERING PHYSICAL WEATHERING CHEMICAL WEATHERING Answer:- Weathering refers to the process of disintegration of rocky material. It is the first step in the process of gradation. There can be both block disintegration as well as granular disintegration. Weathering can further be classified into physical and mechanical weathering. PHYSICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to physical processes. 1) THERMAL EXPANSION AND CONTRACTION The rock is a combination of minerals, and each mineral has its own melting point. Also, summer means expansion of the rock and in winters, the rock contracts. Over say a 1000 years, the rock loses its elastic capacity and breaks. Tors are an example of this. 2) FROST WEAHERING/ CONGELIFACTION The rock breaks due to the pressure of the frost and the cleavage goes on deepening. Ultimately, the rock breaks into two halves. 3) SALT WEATHERING This is similar to frost weathering. The water evaporates, leaving behind the salt. The residual salt keeps accumulating and generates pressure upon the rock, which ultimately breakd. 4) EXFOLIATION 4.1) FLAKING This can happen in two ways. One is onion weathering. In this, due to the differential heating of the outer and inner layers, the outer layer gets heated rapidly and the inner layers are relatively cooler. Also, at night, the outer layer is cooled, but the inner layers are still warm. This differential heating causes the entire layer to get peeled off, known as flaking In the second method, the ice over the rock generates great pressure. When the ice begins to thaw, the rock starts getting exposed to agents of natural weathering. This leads to exfoliation. The material is called the super-incumbent material. 4.2) SPALING The rocks in the inner layers of the Earth are subject to great pressures. When the top layers are removed due to weathering etc., the pressure on the rocks decrease. They are then subject to onion weathering. Such exfoliation is called spaling. CHEMICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to chemical processes. 1) SOLUTION Rocks like calcium carbonate and magnesium carbonate (common names- limestone, dolomite etc.), which can readily dissolve in water- do so within minutes. For example in limestone covered areas, caves develop. 2) OXIDATION Rocks made of iron, for instance, get wet and meet oxygen. They turn into ferrous oxide i.e. rust. The entire rusted part of the rock is removed. This is known as weathering due to oxidation. 3) HYDRATION Minerals absorb water, swell in size and therefore need more space to occupy. They, therefore, secede from the parent material. 4) HYDROLYSIS Rocks like magnesium chloride, sodium chloride, calcium chloride etc. meet with water and experience chemical changes. For example, sodium chloride on meeting with water turns into sodium hydroxide. This bond is stronger than the older bond. Therefore, it separates and forms a new material 5) CHELATION It is an organic process by which the metallic cations are incorporated into hydrocarbon molecules. 6) BIOLOGICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks through biological agents like men, animals, rodents, earthworms etc. For example, the roots of plants penetrate through the rocks and result in crevices, which expand and then disintegrate the rock. (At some places (read books), biological weathering is mentioned under physical weathering, and at some places it is a new classification. This is the classification, as given by Sir in class- Jaykrishna Sir.)
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##Question:What do you understand by denudation? What is meant by weathering? Explain the different types of weathering. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTODUCTION Meaning/ definition of weathering. -THE TYPES OF WEATHERING PHYSICAL WEATHERING CHEMICAL WEATHERING Answer:- Weathering refers to the process of disintegration of rocky material. It is the first step in the process of gradation. There can be both block disintegration as well as granular disintegration. Weathering can further be classified into physical and mechanical weathering. PHYSICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to physical processes. 1) THERMAL EXPANSION AND CONTRACTION The rock is a combination of minerals, and each mineral has its own melting point. Also, summer means expansion of the rock and in winters, the rock contracts. Over say a 1000 years, the rock loses its elastic capacity and breaks. Tors are an example of this. 2) FROST WEAHERING/ CONGELIFACTION The rock breaks due to the pressure of the frost and the cleavage goes on deepening. Ultimately, the rock breaks into two halves. 3) SALT WEATHERING This is similar to frost weathering. The water evaporates, leaving behind the salt. The residual salt keeps accumulating and generates pressure upon the rock, which ultimately breakd. 4) EXFOLIATION 4.1) FLAKING This can happen in two ways. One is onion weathering. In this, due to the differential heating of the outer and inner layers, the outer layer gets heated rapidly and the inner layers are relatively cooler. Also, at night, the outer layer is cooled, but the inner layers are still warm. This differential heating causes the entire layer to get peeled off, known as flaking In the second method, the ice over the rock generates great pressure. When the ice begins to thaw, the rock starts getting exposed to agents of natural weathering. This leads to exfoliation. The material is called the super-incumbent material. 4.2) SPALING The rocks in the inner layers of the Earth are subject to great pressures. When the top layers are removed due to weathering etc., the pressure on the rocks decrease. They are then subject to onion weathering. Such exfoliation is called spaling. CHEMICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks due to chemical processes. 1) SOLUTION Rocks like calcium carbonate and magnesium carbonate (common names- limestone, dolomite etc.), which can readily dissolve in water- do so within minutes. For example in limestone covered areas, caves develop. 2) OXIDATION Rocks made of iron, for instance, get wet and meet oxygen. They turn into ferrous oxide i.e. rust. The entire rusted part of the rock is removed. This is known as weathering due to oxidation. 3) HYDRATION Minerals absorb water, swell in size and therefore need more space to occupy. They, therefore, secede from the parent material. 4) HYDROLYSIS Rocks like magnesium chloride, sodium chloride, calcium chloride etc. meet with water and experience chemical changes. For example, sodium chloride on meeting with water turns into sodium hydroxide. This bond is stronger than the older bond. Therefore, it separates and forms a new material 5) CHELATION It is an organic process by which the metallic cations are incorporated into hydrocarbon molecules. 6) BIOLOGICAL WEATHERING It refers to the disintegration of rocks through biological agents like men, animals, rodents, earthworms etc. For example, the roots of plants penetrate through the rocks and result in crevices, which expand and then disintegrate the rock. (At some places (read books), biological weathering is mentioned under physical weathering, and at some places it is a new classification. This is the classification, as given by Sir in class- Jaykrishna Sir.)
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Mention characteristics of seismic waves. How they help in understanding the interior structure of the Earth. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE BEHAVIOUR OF SEISMIC WAVES - HOW THEY HELP IN UNDERSTANDING THE INTERIOR OF THE EARTH THE PROPERTIES OF P-WAVES THE PROPERTIES OF S-WAVES SHADOW ZONES -CONCLUSION Answer:- Seismic waves refer to the energy released from earthquakes, which travel the globe in the form of waves. The behavior of seismic waves is understood by scientists with the help of graphs. THE BEHAVIOUR OF SEISMIC WAVES (The graph taught by sir must be inserted here) 1) 0- 100 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH Both P- waves’ and S-waves’ velocities increase in this zone. 2) 100- 400 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH/ LOW VELOCITY ZONE Both P-waves’ and S-waves’ velocities decrease in this zone. 3) 400- 2700 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH Both P-waves’ and S-waves’ velocities increase. 4) 2700- 4900 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH S-waves are not recorded here. The velocity of P-waves’ decrease in this zone. 5) 4900km- 6400 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH S- waves are not recorded here. The velocity of P-waves increase in this zone. HOW THEY HELP IN UNDERSTANDING THE INTERIOR OF THE EARTH For this one must know and understand the properties of waves, and how they behave in different mediums. THE PROPERTIES OF P-WAVES 1) VELOCITY It has a velocity of 7 km/ second. 2) MEDIUMS THROUGH WHICH THEY TRAVEL They travel through all the mediums like solid, liquid and gases . Therefore, they are similar to longitudinal waves. THE PROPERTIES OF S-WAVES 3) VELOCITY It has a velocity of 3.5 km/ second. 4) MEDIUMS THROUGH WHICH THEY TRAVEL They travel only through solids . They are similar to transverse waves. COMMON PROPERTIES OF WAVES 1) CHANGE IN DENSITY This leads to reflection and refraction. Therefore, if waves are experiencing refraction, it implies that there are changes in the material of the Earth. SHADOW ZONES 1) SHADOW ZONES OF P-WAVES P-waves are not recorded from 105 degrees East to 135 degrees East and also from 105 degrees west to 135 degrees west. 2) SHADOW ZONES OF S-WAVES S-waves are not recorded beyond 105 degrees. The analysis given above informs us that the lithosphere is solid. The lithosphere comprises not only the crust, but also a part of the upper mantle, as the crust only forms the 1st 30 km from the surface of the Earth, whereas the solid material called the lithosphere forms the 1st 100 km from the surface of the Earth. After that, there is a liquid portion called the asthenosphere (i.e. the low velocity zone described above). Thereafter, there is a liquid outer core and then a solid inner core.
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##Question:Mention characteristics of seismic waves. How they help in understanding the interior structure of the Earth. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE BEHAVIOUR OF SEISMIC WAVES - HOW THEY HELP IN UNDERSTANDING THE INTERIOR OF THE EARTH THE PROPERTIES OF P-WAVES THE PROPERTIES OF S-WAVES SHADOW ZONES -CONCLUSION Answer:- Seismic waves refer to the energy released from earthquakes, which travel the globe in the form of waves. The behavior of seismic waves is understood by scientists with the help of graphs. THE BEHAVIOUR OF SEISMIC WAVES (The graph taught by sir must be inserted here) 1) 0- 100 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH Both P- waves’ and S-waves’ velocities increase in this zone. 2) 100- 400 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH/ LOW VELOCITY ZONE Both P-waves’ and S-waves’ velocities decrease in this zone. 3) 400- 2700 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH Both P-waves’ and S-waves’ velocities increase. 4) 2700- 4900 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH S-waves are not recorded here. The velocity of P-waves’ decrease in this zone. 5) 4900km- 6400 km FROM THE SURFACE OF THE EARTH S- waves are not recorded here. The velocity of P-waves increase in this zone. HOW THEY HELP IN UNDERSTANDING THE INTERIOR OF THE EARTH For this one must know and understand the properties of waves, and how they behave in different mediums. THE PROPERTIES OF P-WAVES 1) VELOCITY It has a velocity of 7 km/ second. 2) MEDIUMS THROUGH WHICH THEY TRAVEL They travel through all the mediums like solid, liquid and gases . Therefore, they are similar to longitudinal waves. THE PROPERTIES OF S-WAVES 3) VELOCITY It has a velocity of 3.5 km/ second. 4) MEDIUMS THROUGH WHICH THEY TRAVEL They travel only through solids . They are similar to transverse waves. COMMON PROPERTIES OF WAVES 1) CHANGE IN DENSITY This leads to reflection and refraction. Therefore, if waves are experiencing refraction, it implies that there are changes in the material of the Earth. SHADOW ZONES 1) SHADOW ZONES OF P-WAVES P-waves are not recorded from 105 degrees East to 135 degrees East and also from 105 degrees west to 135 degrees west. 2) SHADOW ZONES OF S-WAVES S-waves are not recorded beyond 105 degrees. The analysis given above informs us that the lithosphere is solid. The lithosphere comprises not only the crust, but also a part of the upper mantle, as the crust only forms the 1st 30 km from the surface of the Earth, whereas the solid material called the lithosphere forms the 1st 100 km from the surface of the Earth. After that, there is a liquid portion called the asthenosphere (i.e. the low velocity zone described above). Thereafter, there is a liquid outer core and then a solid inner core.
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पारिस्थितिकी तंत्र को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना और प्रकार्यों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Define the ecosystem. Along with this, discuss the structure and functions of the ecosystem. (150-200 words/ 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में पारितंत्र को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में पारितंत्र की संरचना को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय खंड में पारितंत्र के प्रकार्यों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में पारितंत्र का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पारिस्थितिकी तंत्र अथवा पारितंत्र अमेरिकी वैज्ञानिक आर्थर जॉर्ज टैंसले द्वारा प्रतिपादित अवधारणा है| पारिस्थितिकी तंत्र का तात्पर्यसजीवों के भौतिक पर्यावास से है| पारितंत्र, प्राकृतिक या मानव निर्मित के रूप में वर्गीकृत किये जा सकते हैं | प्राकृतिक पारितंत्र में स्थलीय/पार्थिव पारितंत्र जैसे चारागाह/घासस्थल, वन, मरुस्थल और प्राकृतिक जलीय पारितंत्र में मीठे जल का झरना, झील तथा खारे जल का ज्वारनद मुख, लैगून आदि आते हैं|इसके अतिरिक्त लवणीय जल के पारितंत्र में सागर, महासागर, खुला सागर आते हैं| दूसरी ओर मानव निर्मित पारितंत्रों में स्थलीय पारितंत्र जैसे पार्क/उद्यान, बागवानी/बगीचा, खेत/खलिहान/कृषि भूमि आते हैं|जबकि मानव निर्मित जलीय पारितंत्र में मीठे जल के जल कृषि तालाब, जलाशय और खारे जल में झींगा पालन के लिए निर्मित जलाशय तथा लवणीय जल के कृत्रिम पारितंत्रों में नमक के उत्पादन में निर्मित साल्ट पैन आदि प्रमुख उदाहरण हैं| पारितंत्र के दो स्तर होते हैं प्रथम पर्यावास एवं दूसरा निकेत(niche) होता है| पारितंत्र की संरचना · इसमें जैविक और अजैविक घटक आते हैं · जैविक घटक के अंतर्गत जंतु(फौना वर्ग), पादप(फ्लोरा वर्ग) और सूक्ष्म जीव आते हैं · अजैविक घटक के अंतर्गत भौतिक कारक( तापमान, प्रकाश, वर्षण), रासायनिक कारक( कार्बनिक और अकार्बनिक कारक), और भौगोलिक कारक( मृदा, जल एवं वायु) आदि आते हैं| पारितंत्र के प्रकार्य पारितंत्र के मुख्यतः चार कार्य होते हैं; · प्रथम, ऊर्जा का प्रवाह जिसका अध्ययन खाद्य श्रृंखला, खाद्य जल एवं पिरामिड के माध्यम से किया जाता है| · दूसरा,पोषक तत्वों का चक्रण, यह दो प्रकार का होता है अवसादी(सल्फर एवं फोस्फोरस चक्र) एवं गैसीय (जल, कार्बन, नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन चक्र)| · तीसरा,जैव विविधता का रख-रखाव, इसके अंतर्गत जैव विविधता का वितरण एवं समृद्धि सुनिश्चित करना तथानए पारितंत्र के विकास में योगदान देना (पारिस्थितिकी अनुक्रमण)और · चौथा,साम्यावस्था बनाए रखना आदि | पारितंत्र से हमें अनेक प्रकार की सेवायें प्राप्त होती हैं|प्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं के रूप में पारितंत्र से हमें खाद्य सामग्री/भोजन, औषधियां, लकड़ी, इंधन, ऑक्सीजन, एवं जल प्राप्त होता है| अप्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं में विनियामक सेवायें जैसे मौसम अनुकूलन,अवशिष्टों का चक्रण, पारितंत्रीय नियंत्रण सेवायें जैसे मृदा क्षरण की रोकथाम, बाढ़-सूखा नियंत्रण, पारितंत्रीय सहायक सेवायें जैसे जैव विविधता का पर्यावास उपलब्ध कराना, पोषक तत्वों का चक्रण और सांस्कृतिक सेवायें जैसे पवित्र वन, इको-पर्यटन आदि सेवायें आती हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पारितंत्र जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है|
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##Question:पारिस्थितिकी तंत्र को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना और प्रकार्यों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Define the ecosystem. Along with this, discuss the structure and functions of the ecosystem. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पारितंत्र को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में पारितंत्र की संरचना को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय खंड में पारितंत्र के प्रकार्यों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में पारितंत्र का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पारिस्थितिकी तंत्र अथवा पारितंत्र अमेरिकी वैज्ञानिक आर्थर जॉर्ज टैंसले द्वारा प्रतिपादित अवधारणा है| पारिस्थितिकी तंत्र का तात्पर्यसजीवों के भौतिक पर्यावास से है| पारितंत्र, प्राकृतिक या मानव निर्मित के रूप में वर्गीकृत किये जा सकते हैं | प्राकृतिक पारितंत्र में स्थलीय/पार्थिव पारितंत्र जैसे चारागाह/घासस्थल, वन, मरुस्थल और प्राकृतिक जलीय पारितंत्र में मीठे जल का झरना, झील तथा खारे जल का ज्वारनद मुख, लैगून आदि आते हैं|इसके अतिरिक्त लवणीय जल के पारितंत्र में सागर, महासागर, खुला सागर आते हैं| दूसरी ओर मानव निर्मित पारितंत्रों में स्थलीय पारितंत्र जैसे पार्क/उद्यान, बागवानी/बगीचा, खेत/खलिहान/कृषि भूमि आते हैं|जबकि मानव निर्मित जलीय पारितंत्र में मीठे जल के जल कृषि तालाब, जलाशय और खारे जल में झींगा पालन के लिए निर्मित जलाशय तथा लवणीय जल के कृत्रिम पारितंत्रों में नमक के उत्पादन में निर्मित साल्ट पैन आदि प्रमुख उदाहरण हैं| पारितंत्र के दो स्तर होते हैं प्रथम पर्यावास एवं दूसरा निकेत(niche) होता है| पारितंत्र की संरचना · इसमें जैविक और अजैविक घटक आते हैं · जैविक घटक के अंतर्गत जंतु(फौना वर्ग), पादप(फ्लोरा वर्ग) और सूक्ष्म जीव आते हैं · अजैविक घटक के अंतर्गत भौतिक कारक( तापमान, प्रकाश, वर्षण), रासायनिक कारक( कार्बनिक और अकार्बनिक कारक), और भौगोलिक कारक( मृदा, जल एवं वायु) आदि आते हैं| पारितंत्र के प्रकार्य पारितंत्र के मुख्यतः चार कार्य होते हैं; · प्रथम, ऊर्जा का प्रवाह जिसका अध्ययन खाद्य श्रृंखला, खाद्य जल एवं पिरामिड के माध्यम से किया जाता है| · दूसरा,पोषक तत्वों का चक्रण, यह दो प्रकार का होता है अवसादी(सल्फर एवं फोस्फोरस चक्र) एवं गैसीय (जल, कार्बन, नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन चक्र)| · तीसरा,जैव विविधता का रख-रखाव, इसके अंतर्गत जैव विविधता का वितरण एवं समृद्धि सुनिश्चित करना तथानए पारितंत्र के विकास में योगदान देना (पारिस्थितिकी अनुक्रमण)और · चौथा,साम्यावस्था बनाए रखना आदि | पारितंत्र से हमें अनेक प्रकार की सेवायें प्राप्त होती हैं|प्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं के रूप में पारितंत्र से हमें खाद्य सामग्री/भोजन, औषधियां, लकड़ी, इंधन, ऑक्सीजन, एवं जल प्राप्त होता है| अप्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं में विनियामक सेवायें जैसे मौसम अनुकूलन,अवशिष्टों का चक्रण, पारितंत्रीय नियंत्रण सेवायें जैसे मृदा क्षरण की रोकथाम, बाढ़-सूखा नियंत्रण, पारितंत्रीय सहायक सेवायें जैसे जैव विविधता का पर्यावास उपलब्ध कराना, पोषक तत्वों का चक्रण और सांस्कृतिक सेवायें जैसे पवित्र वन, इको-पर्यटन आदि सेवायें आती हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पारितंत्र जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है|
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संसद में विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया में लोक सभा और राज्य सभा की भूमिका का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Describe the role of Lok sabha and Rajya sabha in the process of passage of the bill in parliament .(150-200 words/10 marks)
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एप्रोच :- संसद में विधायी प्रक्रिया पर संक्षिप्त भूमिका देते हुए प्रारंभ कीजिए। विधेयक को पारित करने में लोकसभा की भूमिका लिखिये। विधेयक को पारित करने में राजसभा की भूमिका का वर्णन कीजिए संतुलित निष्कर्ष दीजिए उत्तर प्रारूप :- भारत में शासन की संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है जिसके तहत संपूर्ण देश के लिए कानूनों का निर्माण संसद द्वारा किया जाता है। विधायी प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में संपन्न होती है प्रत्येक सदन में हर विधेयक समान चरणों के माध्यम से पारित होता है। संसद में प्रस्तुत विधेयकों को साधारण विधेयक ,धन विधेयक ,वित्त विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। लोकसभा की भूमिका :- ● लोकसभा संसद का निम्न सदन होता है इसमें जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं सभी प्रकार के विधेयकों को लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। ● धन विधेयक के संबंध में लोकसभा को विशेष अधिकार प्राप्त है। इसे केवल लोकसभा में केवल राष्ट्रपति की सिफारिश से ही प्रस्तुत किया जा सकता है लोकसभा में पारित होने के उपरांत ही इसे राजसभा के विचार आज भेजा जाता है। ● इसके साथ ही किसी गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक का प्रावधान किया गया है इसमें लोकसभा को अपने संख्या बल के कारण विशेष स्थिति प्राप्त है। साथ ही इसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है। राज्यसभा की भूमिका :- ● राज्यसभा को साधारण विधेयक व संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में लोकसभा के समान शक्ति प्राप्त है किंतु धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा की शक्ति केवल इसे विलंब करने तक सीमित है। यदि राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिन तक वापस नहीं करती तो वह दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है। ● इसके साथ ही संयुक्त बैठक की स्थिति में कम सदस्य संख्या के कारण स्थिति कमजोर रह जाती है। इस तरह दोनों सदनों के द्वारा विधेयकों के निर्माण की प्रक्रिया को निभाया जाता है। यद्यपि कुछ मामलों में राज्यसभा की शक्ति कम रखी हुई है, किन्तु यह विचार विमर्श की प्रक्रिया द्वारा जनसाधारण के हितों को साधने में सहायक हुई है।
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##Question:संसद में विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया में लोक सभा और राज्य सभा की भूमिका का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Describe the role of Lok sabha and Rajya sabha in the process of passage of the bill in parliament .(150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच :- संसद में विधायी प्रक्रिया पर संक्षिप्त भूमिका देते हुए प्रारंभ कीजिए। विधेयक को पारित करने में लोकसभा की भूमिका लिखिये। विधेयक को पारित करने में राजसभा की भूमिका का वर्णन कीजिए संतुलित निष्कर्ष दीजिए उत्तर प्रारूप :- भारत में शासन की संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है जिसके तहत संपूर्ण देश के लिए कानूनों का निर्माण संसद द्वारा किया जाता है। विधायी प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में संपन्न होती है प्रत्येक सदन में हर विधेयक समान चरणों के माध्यम से पारित होता है। संसद में प्रस्तुत विधेयकों को साधारण विधेयक ,धन विधेयक ,वित्त विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। लोकसभा की भूमिका :- ● लोकसभा संसद का निम्न सदन होता है इसमें जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं सभी प्रकार के विधेयकों को लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। ● धन विधेयक के संबंध में लोकसभा को विशेष अधिकार प्राप्त है। इसे केवल लोकसभा में केवल राष्ट्रपति की सिफारिश से ही प्रस्तुत किया जा सकता है लोकसभा में पारित होने के उपरांत ही इसे राजसभा के विचार आज भेजा जाता है। ● इसके साथ ही किसी गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक का प्रावधान किया गया है इसमें लोकसभा को अपने संख्या बल के कारण विशेष स्थिति प्राप्त है। साथ ही इसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है। राज्यसभा की भूमिका :- ● राज्यसभा को साधारण विधेयक व संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में लोकसभा के समान शक्ति प्राप्त है किंतु धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा की शक्ति केवल इसे विलंब करने तक सीमित है। यदि राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिन तक वापस नहीं करती तो वह दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है। ● इसके साथ ही संयुक्त बैठक की स्थिति में कम सदस्य संख्या के कारण स्थिति कमजोर रह जाती है। इस तरह दोनों सदनों के द्वारा विधेयकों के निर्माण की प्रक्रिया को निभाया जाता है। यद्यपि कुछ मामलों में राज्यसभा की शक्ति कम रखी हुई है, किन्तु यह विचार विमर्श की प्रक्रिया द्वारा जनसाधारण के हितों को साधने में सहायक हुई है।
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"पर्यावरण" को परिभाषित कीजिये | साथ ही, पर्यावरण के विभिन्न घटकों के बारे में विस्तार से चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define the term "Environment"? Also, discuss the different components of the environment. (150-200 Word; 10 Marks)
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एप्रोच- पर्यावरण को परिभाषित करते हुए उतर का प्रारम्भ कीजिये| उतर के दूसरे भाग में पर्यावरण के विभिन्न घटकों का उल्लेख करते हुए उनके बारे में विस्तार से चर्चा कीजिये| उतर- पर्यावरण किसी जीव के चारो तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाओं तथा उनके साथ अंतःक्रिया को सम्मिलित करता है|दूसरे शब्दों में, किसी जीव के चारों तरफ आवृत जैविक एवं अजैविक घटकों के एकीकृत स्वरुप को पर्यावरण कहा जाता है| यह एक प्राकृतिक परिवेश है जो पृथ्वी पर जीवन को विकसित, पोषित तथा समाप्त होने में मदद करता है| पर्यावरण के विभिन्न अवयव परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए एवं आश्रित रहते हैं| पर्यावरण के घटक- जैविक घटक- पादप -ये सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं क्योंकि ये ही जैविक पदार्थों का निर्माण करते हैं|मानव के साथ-साथ जंतु तथा सूक्ष्मजीव भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पादपों पर ही निर्भर रहते हैं| पादप स्वपोषित होतें हैं अर्थात वे अपना आहार स्वंय तैयार करते हैं| इनके द्वारा पर्यावरण के विभिन्न संघटकों में जैविक पदार्थों तथा पोषक तत्वों का परिवहन संभव हो पाता है| जीव - ये स्वंयपोषित(साइनोबैक्टीरिया आदि) तथा परपोषित दोनों होते हैं| परपोषित जीव अपने आहार हेतु अन्य साधनों पर निर्भर होते हैं| जैविक पदार्थों की सुलभता के आधार पर परपोषित जीवोंको भी मृतजीवी, परजीवी तथा प्राणीसमभोजी के अंतर्गत रखा जाता है| सूक्ष्मजीव- ये मुख्यतः विघटक/वियोजक होते हैं जो मृत पादपों तथा जंतुओं के जैविक पदार्थों को सड़ा-गलाकर उसे विघटित करते हैं|विघटन प्रक्रिया के द्वारा ये अपना आहार भी ग्रहण करते हैं एवं सरल रूप में रूपांतरित क्र पादपों को भी उपलब्ध करवाते हैं|इसके अंतर्गत सूक्ष्म बैक्टीरिया, कवक आदि शामिल हैं| 2.अजैविक या भौतिक घटक- वायुमंडल- इसका सन्दर्भ पृथ्वी के चारों ओर विस्तृत गैसीय आवरण से है|यह विभिन्न गैसों,जलवाष्प तथा धुलकणों का सम्मिलित स्वरुप होता है जो जीवों एवं पादपों की विभिन्न क्रियाओं(प्रकाश-संश्लेषण,ग्रीनहाउस प्रभाव,श्वसन आदि) को प्रभावित करता है| जलमंडल- यह सभी पादपों तथा जीवों के लिए काफी महत्वपूर्ण है|यह पर्यावरण में संसाधन, पारिस्थितिकी तथा आवास के रूप में कार्य करता है तथा जीवों की विभिन्न प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है| स्थलमण्डल/मृदा संघटक - यह भूपर्पटी की ऊपरी सतह है जो खनिज तथा आंशिक रूप से अपघटित कार्बनिक पदार्थों से निर्मित होताहै| मृदा में ही विभिन्न पादपों/फसलों/वनों की वृद्धि होती है जिसपर मानव तथा विभिन्न जीव-जंतु अपने आवास,भोजन तथा अन्य क्रियाकलापों हेतु निर्भर होते हैं| स्थलमण्डल को पर्वतों/मैदानों/झीलों/हिमनदों/मरुस्थलों आदि में वर्गीकृत किया जाता है| ऊर्जा संघटक- इसके अंतर्गत प्रकाश,तापमान आदि शामिल होते हैं जो पृथ्वी के सभी जीवों एवं पादपों के क्रियाकलापों को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं| पर्यावरण के उपरोक्त जैविक एवं अजैविक संघटक एक साथ मिलकर जीवमंडल की रचना करते हैं जिसके अंतर्गत विभिन्न बायोमों की रचना होती है|
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##Question:"पर्यावरण" को परिभाषित कीजिये | साथ ही, पर्यावरण के विभिन्न घटकों के बारे में विस्तार से चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define the term "Environment"? Also, discuss the different components of the environment. (150-200 Word; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पर्यावरण को परिभाषित करते हुए उतर का प्रारम्भ कीजिये| उतर के दूसरे भाग में पर्यावरण के विभिन्न घटकों का उल्लेख करते हुए उनके बारे में विस्तार से चर्चा कीजिये| उतर- पर्यावरण किसी जीव के चारो तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाओं तथा उनके साथ अंतःक्रिया को सम्मिलित करता है|दूसरे शब्दों में, किसी जीव के चारों तरफ आवृत जैविक एवं अजैविक घटकों के एकीकृत स्वरुप को पर्यावरण कहा जाता है| यह एक प्राकृतिक परिवेश है जो पृथ्वी पर जीवन को विकसित, पोषित तथा समाप्त होने में मदद करता है| पर्यावरण के विभिन्न अवयव परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए एवं आश्रित रहते हैं| पर्यावरण के घटक- जैविक घटक- पादप -ये सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं क्योंकि ये ही जैविक पदार्थों का निर्माण करते हैं|मानव के साथ-साथ जंतु तथा सूक्ष्मजीव भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पादपों पर ही निर्भर रहते हैं| पादप स्वपोषित होतें हैं अर्थात वे अपना आहार स्वंय तैयार करते हैं| इनके द्वारा पर्यावरण के विभिन्न संघटकों में जैविक पदार्थों तथा पोषक तत्वों का परिवहन संभव हो पाता है| जीव - ये स्वंयपोषित(साइनोबैक्टीरिया आदि) तथा परपोषित दोनों होते हैं| परपोषित जीव अपने आहार हेतु अन्य साधनों पर निर्भर होते हैं| जैविक पदार्थों की सुलभता के आधार पर परपोषित जीवोंको भी मृतजीवी, परजीवी तथा प्राणीसमभोजी के अंतर्गत रखा जाता है| सूक्ष्मजीव- ये मुख्यतः विघटक/वियोजक होते हैं जो मृत पादपों तथा जंतुओं के जैविक पदार्थों को सड़ा-गलाकर उसे विघटित करते हैं|विघटन प्रक्रिया के द्वारा ये अपना आहार भी ग्रहण करते हैं एवं सरल रूप में रूपांतरित क्र पादपों को भी उपलब्ध करवाते हैं|इसके अंतर्गत सूक्ष्म बैक्टीरिया, कवक आदि शामिल हैं| 2.अजैविक या भौतिक घटक- वायुमंडल- इसका सन्दर्भ पृथ्वी के चारों ओर विस्तृत गैसीय आवरण से है|यह विभिन्न गैसों,जलवाष्प तथा धुलकणों का सम्मिलित स्वरुप होता है जो जीवों एवं पादपों की विभिन्न क्रियाओं(प्रकाश-संश्लेषण,ग्रीनहाउस प्रभाव,श्वसन आदि) को प्रभावित करता है| जलमंडल- यह सभी पादपों तथा जीवों के लिए काफी महत्वपूर्ण है|यह पर्यावरण में संसाधन, पारिस्थितिकी तथा आवास के रूप में कार्य करता है तथा जीवों की विभिन्न प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है| स्थलमण्डल/मृदा संघटक - यह भूपर्पटी की ऊपरी सतह है जो खनिज तथा आंशिक रूप से अपघटित कार्बनिक पदार्थों से निर्मित होताहै| मृदा में ही विभिन्न पादपों/फसलों/वनों की वृद्धि होती है जिसपर मानव तथा विभिन्न जीव-जंतु अपने आवास,भोजन तथा अन्य क्रियाकलापों हेतु निर्भर होते हैं| स्थलमण्डल को पर्वतों/मैदानों/झीलों/हिमनदों/मरुस्थलों आदि में वर्गीकृत किया जाता है| ऊर्जा संघटक- इसके अंतर्गत प्रकाश,तापमान आदि शामिल होते हैं जो पृथ्वी के सभी जीवों एवं पादपों के क्रियाकलापों को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं| पर्यावरण के उपरोक्त जैविक एवं अजैविक संघटक एक साथ मिलकर जीवमंडल की रचना करते हैं जिसके अंतर्गत विभिन्न बायोमों की रचना होती है|
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Explain the concept of Office of Profit in India. (10 Marks/150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE CONCEPT OF OFFICE OF PROFIT - CASES RELATED TO OFFICE OF PROFIT IN INDIA -CONCLUSION Significance of the concept of office of profit Answer:- No member of the State Legislatures or Parliament should come under such a situation that he comes under the undue influence of the Executive or can profit himself from office. Therefore, in 1959 an act was passed (Prohibition of disqualification of MPs Act, 1959) in order to disqualify an MP/ MLA (Minister of Parliament/ Minister of State Legislative Assembly) due to the holding of an office of profit (OOP). THE CONCEPT OF OFFICE OF PROFIT 1) ARTICLES 191(1)(a) AND 102(1)(a) These articles deal with the disqualification of MPs on the grounds of holding an office of profit. 2) HISTORICAL PERSPECTIVE The concept of OOP has emerged from the English Act of Settlement of 1701 . The act states that “No person who has an office or place of profit under the king, either in terms of salary, incentive or influence, shall be a member of the House of Commons”. 3) NO DEFINITION IN CONSTITUTION The word OOP has not been defined anywhere in the constitution of India, and therefore must be understood from the English law. 4) 5 OBJECTIVE INDICATORS The Supreme Court identified 5 objective indicators to determine whether a particular office may be defined as an OOP or not: 4.1) The government has the appointment power 4.2) The government has the power of removal from this office 4.3) Government pays remuneration 4.4) The functions of this office are primarily governmental in nature 4.5) The government exercises control over the functions of this office. 5) THE LAWS WHICH DEAL WITH OFFICE OF PROFIT IN INDIA The constitution under the before said articles, Representation of People’s Act, 1951 and the Prohibition of disqualification of MPs Act, 1959 are the 3 laws and provisions which do not allow any person occupying OOP to be an MP or an MLA. CASES RELATED TO OFFICE OF PROFIT IN INDIA 1) SHIBU SOREN CASE OF 2001 The Supreme Court dismissed the appeal of Shibu Soren (the CM of Jharkhand who was disqualified on grounds of Article 191(1)(a), as he was also the member of Jharkhand Autonomous Council, considered as an OOP. 2) JAYA BACHCHAN CASE President APJ Abdul Kalam disqualified Mrs Jayabachhan, who was the then Chairman of the Uttar Pradesh Film Development Council, which was considered to be an office of profit. 3) SONIA GANDHI CASE An allegation was made against Mrs Sonia Gandhi, who was the then Chairman of National Advisory Council believed to be an OOP. However, the UPA government preempted this action and any allegation by passing the Prohibition of Disqualification of MPs Amendment Act in 2006. 56 offices were exempted from the list OOP. President Kalam even used his power of suspensive veto under Article 111, but the bill was passed anyway, by sending it back for his assent. 4) AAM ADMI PARTY CASE- DELHI 21 AAP MLAs were appointed as Parliamentary Secretaries. Since this was considered to be an OOP, the Delhi government passed an amending act of Delhi MLAs Removal of Disqualifications Act in 1997 . This exempted the position of Parliamentary secretaries from being deemed as OOP. However, President Pranab Mukherjee declined to give assent to this bill/ act. On 19th January 2018, the ECI (Election Commission of India) recommended to the President to disqualify these 21 AAP MLAs and the newly elected President, Shri Ramnath Kovind passed the orders for such disqualification. The concept of OOP is crucial in order to ensure that the Legislature is fearless in holding the Executive accountable. It prevents any conflict of interests by ensuring that the MP/ MLA is not obligated to the Executive in any way. This is a crucial component of the separation of powers. Thus, any violation of OOP will be a violation of the parliamentary principles.
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##Question:Explain the concept of Office of Profit in India. (10 Marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE CONCEPT OF OFFICE OF PROFIT - CASES RELATED TO OFFICE OF PROFIT IN INDIA -CONCLUSION Significance of the concept of office of profit Answer:- No member of the State Legislatures or Parliament should come under such a situation that he comes under the undue influence of the Executive or can profit himself from office. Therefore, in 1959 an act was passed (Prohibition of disqualification of MPs Act, 1959) in order to disqualify an MP/ MLA (Minister of Parliament/ Minister of State Legislative Assembly) due to the holding of an office of profit (OOP). THE CONCEPT OF OFFICE OF PROFIT 1) ARTICLES 191(1)(a) AND 102(1)(a) These articles deal with the disqualification of MPs on the grounds of holding an office of profit. 2) HISTORICAL PERSPECTIVE The concept of OOP has emerged from the English Act of Settlement of 1701 . The act states that “No person who has an office or place of profit under the king, either in terms of salary, incentive or influence, shall be a member of the House of Commons”. 3) NO DEFINITION IN CONSTITUTION The word OOP has not been defined anywhere in the constitution of India, and therefore must be understood from the English law. 4) 5 OBJECTIVE INDICATORS The Supreme Court identified 5 objective indicators to determine whether a particular office may be defined as an OOP or not: 4.1) The government has the appointment power 4.2) The government has the power of removal from this office 4.3) Government pays remuneration 4.4) The functions of this office are primarily governmental in nature 4.5) The government exercises control over the functions of this office. 5) THE LAWS WHICH DEAL WITH OFFICE OF PROFIT IN INDIA The constitution under the before said articles, Representation of People’s Act, 1951 and the Prohibition of disqualification of MPs Act, 1959 are the 3 laws and provisions which do not allow any person occupying OOP to be an MP or an MLA. CASES RELATED TO OFFICE OF PROFIT IN INDIA 1) SHIBU SOREN CASE OF 2001 The Supreme Court dismissed the appeal of Shibu Soren (the CM of Jharkhand who was disqualified on grounds of Article 191(1)(a), as he was also the member of Jharkhand Autonomous Council, considered as an OOP. 2) JAYA BACHCHAN CASE President APJ Abdul Kalam disqualified Mrs Jayabachhan, who was the then Chairman of the Uttar Pradesh Film Development Council, which was considered to be an office of profit. 3) SONIA GANDHI CASE An allegation was made against Mrs Sonia Gandhi, who was the then Chairman of National Advisory Council believed to be an OOP. However, the UPA government preempted this action and any allegation by passing the Prohibition of Disqualification of MPs Amendment Act in 2006. 56 offices were exempted from the list OOP. President Kalam even used his power of suspensive veto under Article 111, but the bill was passed anyway, by sending it back for his assent. 4) AAM ADMI PARTY CASE- DELHI 21 AAP MLAs were appointed as Parliamentary Secretaries. Since this was considered to be an OOP, the Delhi government passed an amending act of Delhi MLAs Removal of Disqualifications Act in 1997 . This exempted the position of Parliamentary secretaries from being deemed as OOP. However, President Pranab Mukherjee declined to give assent to this bill/ act. On 19th January 2018, the ECI (Election Commission of India) recommended to the President to disqualify these 21 AAP MLAs and the newly elected President, Shri Ramnath Kovind passed the orders for such disqualification. The concept of OOP is crucial in order to ensure that the Legislature is fearless in holding the Executive accountable. It prevents any conflict of interests by ensuring that the MP/ MLA is not obligated to the Executive in any way. This is a crucial component of the separation of powers. Thus, any violation of OOP will be a violation of the parliamentary principles.
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बजट के विभिन्न चरणों को स्पष्ट कीजिये , साथ ही बजटीय प्रक्रिया के अंतर्गत शामिल विनियोजन विधेयक की चर्चा कीजिये | (150-200शब्द; 10 अंक) Explain the different phases of the budget , as well as discuss the appropriation bill included under the budgetary process. (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच :- बजट को स्पष्ट करते हुए भूमिका दीजिए। बजट के विभिन्न चरणों को लिखिए। विनियोजन विधेयक को बताइए संगत निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप:- संविधान के अनुच्छेद 112 में वार्षिक वित्तीय विवरण के नाम से बजट का उल्लेख है। इसमें वित्तीय वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्त किया और खर्च का विवरण होता है। बजट के विभिन्न चरण :- बजट का प्रस्तुतीकरण - आम बजट पेश करते समय वित्त मंत्री सदन में जो भाषण देता है उसे बजट भाषण देते हैं लोकसभा में भाषण के अंत में मंत्री बजट प्रस्तुत करता है इसे बाद में राज्यसभा में पेश किया जाता है। आम बहस :- बजट पर दोनों सदन 3 से 4 दिन तक बहस करते हैं इस चरण में लोकसभा इसके पूरे या आंशिक भाग पर चर्चा कर सकती है इससे संबंधित प्रश्नों को उठाया जा सकता है।इसके अंत में वित्त मंत्री को अधिकार है कि उसका जवाब दे। विभागीय समितियों द्वारा जांच : - बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन 3 या 4 हफ़्तों के लिए स्थगित हो जाता है इस अंतराल के दौरान संसद की स्थाई समिति अनुदान की मांग आदि की विस्तार से पड़ताल करती है और एक रिपोर्ट तैयार करती है इन रिपोर्टों को दोनों सदनों में विचारार्थ जाता है। अनुदान की मांग पर मतदान :- विभागीय स्थाई समितियों के आलोक में लोकसभा में अनुदान की मांगों के लिए मतदान होता है मांगे मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती हैं पूर्ण मतदान के उपरांत एक मांग अनुदान बन जाती है। विनियोग विधेयक का पारित होना : - भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के जरिए धन की निकासी हेतु विनियोग विधेयक पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक का पारित होना :- यह भारत सरकार के उस वर्ष के लिए वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं। विनियोजन विधेयक :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के सिवा धन की निकासी नहीं होगी अर्थात भारत की विधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक को पुरः स्थापित किया जाता है जिससे कि लोकसभा में मत द्वारा दिए गए अनुदान और भारत की संचित निधि पर भारित व्यय के लिए धन की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। विनियोजन विधेयक के लागू होने तक सरकार ,भारत की संचित निधि से कोई दान आहरित नहीं कर सकती है। इस प्रकार बजट की यह प्रक्रिया, नीतिगत कार्यों हेतु धन के निकास को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करती है।
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##Question:बजट के विभिन्न चरणों को स्पष्ट कीजिये , साथ ही बजटीय प्रक्रिया के अंतर्गत शामिल विनियोजन विधेयक की चर्चा कीजिये | (150-200शब्द; 10 अंक) Explain the different phases of the budget , as well as discuss the appropriation bill included under the budgetary process. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच :- बजट को स्पष्ट करते हुए भूमिका दीजिए। बजट के विभिन्न चरणों को लिखिए। विनियोजन विधेयक को बताइए संगत निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप:- संविधान के अनुच्छेद 112 में वार्षिक वित्तीय विवरण के नाम से बजट का उल्लेख है। इसमें वित्तीय वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्त किया और खर्च का विवरण होता है। बजट के विभिन्न चरण :- बजट का प्रस्तुतीकरण - आम बजट पेश करते समय वित्त मंत्री सदन में जो भाषण देता है उसे बजट भाषण देते हैं लोकसभा में भाषण के अंत में मंत्री बजट प्रस्तुत करता है इसे बाद में राज्यसभा में पेश किया जाता है। आम बहस :- बजट पर दोनों सदन 3 से 4 दिन तक बहस करते हैं इस चरण में लोकसभा इसके पूरे या आंशिक भाग पर चर्चा कर सकती है इससे संबंधित प्रश्नों को उठाया जा सकता है।इसके अंत में वित्त मंत्री को अधिकार है कि उसका जवाब दे। विभागीय समितियों द्वारा जांच : - बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन 3 या 4 हफ़्तों के लिए स्थगित हो जाता है इस अंतराल के दौरान संसद की स्थाई समिति अनुदान की मांग आदि की विस्तार से पड़ताल करती है और एक रिपोर्ट तैयार करती है इन रिपोर्टों को दोनों सदनों में विचारार्थ जाता है। अनुदान की मांग पर मतदान :- विभागीय स्थाई समितियों के आलोक में लोकसभा में अनुदान की मांगों के लिए मतदान होता है मांगे मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती हैं पूर्ण मतदान के उपरांत एक मांग अनुदान बन जाती है। विनियोग विधेयक का पारित होना : - भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के जरिए धन की निकासी हेतु विनियोग विधेयक पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक का पारित होना :- यह भारत सरकार के उस वर्ष के लिए वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं। विनियोजन विधेयक :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के सिवा धन की निकासी नहीं होगी अर्थात भारत की विधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक को पुरः स्थापित किया जाता है जिससे कि लोकसभा में मत द्वारा दिए गए अनुदान और भारत की संचित निधि पर भारित व्यय के लिए धन की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। विनियोजन विधेयक के लागू होने तक सरकार ,भारत की संचित निधि से कोई दान आहरित नहीं कर सकती है। इस प्रकार बजट की यह प्रक्रिया, नीतिगत कार्यों हेतु धन के निकास को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करती है।
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पारितंत्र से आप क्या समझते हैं? पारितंत्र द्वारा प्रस्तुत सेवाओं का उल्लेख करते हुए इन सेवाओं के संदर्भ में "पारितंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र" पहल (TEEB )का महत्त्व स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What is ecosystem? Point out the services offered by ecosystem and explain the importance of "Economics of Environment and Biodiversity" Initiative (TEEB) in reference to these services. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में पारितंत्र को विस्तार से परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पारितंत्र द्वारा प्रस्तुत सेवाओं का उल्लेख कीजिये 3- पारितंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र" पहल (TEEB ) को स्पष्ट कीजिये 4- सेवाओं के संदर्भ में TEEB का महत्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सजीवों का पर्यावास पारितंत्र कहलाता है| पारितंत्र की संरचना में जैविक एवं अजैविक दोनों घटक शामिल होते हैं| जहाँ जैविक में फ्लोरा वर्ग, फौना वर्ग , सूक्ष्म जीव वर्ग आते हैं वहीं अजैविक में भौतिक, रासायनिक एवं भौगोलिक कारक आते हैं| पारितंत्र के मुख्यतः चार कार्य होते हैं; प्रथम, ऊर्जा का प्रवाह जिसका अध्ययन खाद्य श्रृंखला, खाद्य जल एवं पिरामिड के माध्यम से किया जाता है|दूसरा,पोषक तत्वों का चक्रण, यह दो प्रकार का होता है अवसादी(सल्फर एवं फोस्फोरस चक्र) एवं गैसीय (जल, कार्बन, नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन चक्र)| तीसरा,जैव विविधता का रख-रखाव, इसके अंतर्गत जैव विविधता का वितरण एवं समृद्धि सुनिश्चित करना तथानए पारितंत्र के विकास में योगदान देना (पारिस्थितिकी अनुक्रमण) और चौथा,साम्यावस्था बनाए रखना आदि | पारितंत्र, प्राकृतिक या मानव निर्मित के रूप में वर्गीकृत किये जा सकते हैं | प्राकृतिक पारितंत्र में स्थलीय/पार्थिव पारितंत्र जैसे चारागाह/घासस्थल, वन, मरुस्थल और जलीय पारितंत्र में मीठे जल का झरना, झील तथा खारे जल का ज्वारनद मुख, लैगून आदि आते हैं|इसके अतिरिक्त लवणीय जल के पारितंत्र में सागर, महासागर, खुला सागर आते हैं| दूसरी ओर मानव निर्मित पारितंत्रों में स्थलीय पारितंत्र जैसे पार्क/उद्यान, बागवानी/बगीचा, खेत/खलिहान/कृषि भूमि आते हैं|जबकि मानव निर्मित जलीय पारितंत्र में मीठे जल के जल कृषि तालाब, जलाशय और खारे जल में झींगा पालन के लिए निर्मित जलाशय तथा लवणीय जल के कृत्रिम पारितंत्रों में नमक के उत्पादन में निर्मित साल्ट पैन आदि प्रमुख उदाहरण हैं| पारितंत्र के दो स्तर होते हैं प्रथम पर्यावास एवं दूसरा निकेत(niche) होता है पारितन्त्रीय सेवायें · पारितंत्र हमें विभिन्न प्रकार की सेवायें उपलब्ध करता है| संयुक्त राष्ट्र पारितंत्र आकलन रिपोर्ट के अनुसारपारितन्त्रीय सेवायें दो प्रकार से वर्गीकृत हो सकती हैं यथा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष| · प्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं के रूप में पारितंत्र से हमें खाद्य सामग्री/भोजन, औषधियां, लकड़ी, इंधन, ऑक्सीजन, एवं जल प्राप्त होता है| · अप्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवायें ऐसी सेवायें हैं जिनको प्रत्यक्षतः उपयोग नहीं किया जा सकता लेकिन इन सेवाओं के माध्यम से पारितंत्र हमारे जीवन को सहज बनाता है| · अप्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं में विनियामक सेवायें जैसे मौसम अनुकूलन,अवशिष्टों का चक्रण, पारितंत्रीय नियंत्रण सेवायें जैसे मृदा क्षरण की रोकथाम, बाढ़-सूखा नियंत्रण, पारितंत्रीय सहायक सेवायें जैसे जैव विविधता का पर्यावास उपलब्ध कराना, पोषक तत्वों का चक्रण और सांस्कृतिक सेवायें जैसे पवित्र वन, इको-पर्यटन आदि सेवायें आती हैं पारितंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र पहल (TEEB) · यह G-8 तथा विकासशील देशों के पर्यावरण मंत्रालयों द्वारा स्थापित पारितंत्र और जैव विविधता के अर्थशास्त्र और विकास का अध्ययन है| यह एक अंतरसरकारी परियोजना है| जिसकी अवधारणा भारतीय विद्वान् डॉक्टर पवन सुखदेव द्वारा प्रस्तुत की गयी है · इस पहल का प्रमुख उद्देश्य नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और पर्यावरण वैज्ञानिकों को एक मंच पर लाना है ताकि विभिन्न परिदृश्य में पारितंत्रीय सेवाओं का मूल्यांकन किया जा सके| · सेवाओं के मूल्यांकन के माध्यम से जैव विविधता ह्रास का आर्थिक मूल्य ज्ञात करना तथा इस ह्रास को कम करने की लागत-लाभ का विश्लेषण करना है| · इस लागत-लाभ विश्लेषण को नीति निर्माताओं को उपलब्ध कराना ताकि इस दिशा में नीतिगत प्रयास किये जा सकें और जैव विविधता को समृद्ध बनाए रखा जा सके तथा पारितंत्रीय सेवाओं को धारणीय रूप से प्राप्त किया जा सके| इस प्रकार यह पहल आर्थिक विकास के संदर्भ में पारितंत्रीय अवनयन और जैव-विविधता के ह्रास के बढ़ते मूल्य को प्रदर्शित करती है| इस पहल के माध्यम से पर्यावरणीय क्षरण का समाधान करने हेतु नीति निर्माण पर बल दिया गया है| TEEB के आधार पर पर्यावरण संरक्षण एवं व्यापारिक लाभ को आपस में जोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर इस प्रकार की नीतियों का निर्माण करना है जो पारितंत्रीय सेवाओं को निरंतर प्राप्त करने में सहायक हो और जो धारणीय विकास को सुनिश्चित कर सकें|
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##Question:पारितंत्र से आप क्या समझते हैं? पारितंत्र द्वारा प्रस्तुत सेवाओं का उल्लेख करते हुए इन सेवाओं के संदर्भ में "पारितंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र" पहल (TEEB )का महत्त्व स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What is ecosystem? Point out the services offered by ecosystem and explain the importance of "Economics of Environment and Biodiversity" Initiative (TEEB) in reference to these services. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पारितंत्र को विस्तार से परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पारितंत्र द्वारा प्रस्तुत सेवाओं का उल्लेख कीजिये 3- पारितंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र" पहल (TEEB ) को स्पष्ट कीजिये 4- सेवाओं के संदर्भ में TEEB का महत्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सजीवों का पर्यावास पारितंत्र कहलाता है| पारितंत्र की संरचना में जैविक एवं अजैविक दोनों घटक शामिल होते हैं| जहाँ जैविक में फ्लोरा वर्ग, फौना वर्ग , सूक्ष्म जीव वर्ग आते हैं वहीं अजैविक में भौतिक, रासायनिक एवं भौगोलिक कारक आते हैं| पारितंत्र के मुख्यतः चार कार्य होते हैं; प्रथम, ऊर्जा का प्रवाह जिसका अध्ययन खाद्य श्रृंखला, खाद्य जल एवं पिरामिड के माध्यम से किया जाता है|दूसरा,पोषक तत्वों का चक्रण, यह दो प्रकार का होता है अवसादी(सल्फर एवं फोस्फोरस चक्र) एवं गैसीय (जल, कार्बन, नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन चक्र)| तीसरा,जैव विविधता का रख-रखाव, इसके अंतर्गत जैव विविधता का वितरण एवं समृद्धि सुनिश्चित करना तथानए पारितंत्र के विकास में योगदान देना (पारिस्थितिकी अनुक्रमण) और चौथा,साम्यावस्था बनाए रखना आदि | पारितंत्र, प्राकृतिक या मानव निर्मित के रूप में वर्गीकृत किये जा सकते हैं | प्राकृतिक पारितंत्र में स्थलीय/पार्थिव पारितंत्र जैसे चारागाह/घासस्थल, वन, मरुस्थल और जलीय पारितंत्र में मीठे जल का झरना, झील तथा खारे जल का ज्वारनद मुख, लैगून आदि आते हैं|इसके अतिरिक्त लवणीय जल के पारितंत्र में सागर, महासागर, खुला सागर आते हैं| दूसरी ओर मानव निर्मित पारितंत्रों में स्थलीय पारितंत्र जैसे पार्क/उद्यान, बागवानी/बगीचा, खेत/खलिहान/कृषि भूमि आते हैं|जबकि मानव निर्मित जलीय पारितंत्र में मीठे जल के जल कृषि तालाब, जलाशय और खारे जल में झींगा पालन के लिए निर्मित जलाशय तथा लवणीय जल के कृत्रिम पारितंत्रों में नमक के उत्पादन में निर्मित साल्ट पैन आदि प्रमुख उदाहरण हैं| पारितंत्र के दो स्तर होते हैं प्रथम पर्यावास एवं दूसरा निकेत(niche) होता है पारितन्त्रीय सेवायें · पारितंत्र हमें विभिन्न प्रकार की सेवायें उपलब्ध करता है| संयुक्त राष्ट्र पारितंत्र आकलन रिपोर्ट के अनुसारपारितन्त्रीय सेवायें दो प्रकार से वर्गीकृत हो सकती हैं यथा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष| · प्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं के रूप में पारितंत्र से हमें खाद्य सामग्री/भोजन, औषधियां, लकड़ी, इंधन, ऑक्सीजन, एवं जल प्राप्त होता है| · अप्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवायें ऐसी सेवायें हैं जिनको प्रत्यक्षतः उपयोग नहीं किया जा सकता लेकिन इन सेवाओं के माध्यम से पारितंत्र हमारे जीवन को सहज बनाता है| · अप्रत्यक्ष पारितन्त्रीय सेवाओं में विनियामक सेवायें जैसे मौसम अनुकूलन,अवशिष्टों का चक्रण, पारितंत्रीय नियंत्रण सेवायें जैसे मृदा क्षरण की रोकथाम, बाढ़-सूखा नियंत्रण, पारितंत्रीय सहायक सेवायें जैसे जैव विविधता का पर्यावास उपलब्ध कराना, पोषक तत्वों का चक्रण और सांस्कृतिक सेवायें जैसे पवित्र वन, इको-पर्यटन आदि सेवायें आती हैं पारितंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र पहल (TEEB) · यह G-8 तथा विकासशील देशों के पर्यावरण मंत्रालयों द्वारा स्थापित पारितंत्र और जैव विविधता के अर्थशास्त्र और विकास का अध्ययन है| यह एक अंतरसरकारी परियोजना है| जिसकी अवधारणा भारतीय विद्वान् डॉक्टर पवन सुखदेव द्वारा प्रस्तुत की गयी है · इस पहल का प्रमुख उद्देश्य नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और पर्यावरण वैज्ञानिकों को एक मंच पर लाना है ताकि विभिन्न परिदृश्य में पारितंत्रीय सेवाओं का मूल्यांकन किया जा सके| · सेवाओं के मूल्यांकन के माध्यम से जैव विविधता ह्रास का आर्थिक मूल्य ज्ञात करना तथा इस ह्रास को कम करने की लागत-लाभ का विश्लेषण करना है| · इस लागत-लाभ विश्लेषण को नीति निर्माताओं को उपलब्ध कराना ताकि इस दिशा में नीतिगत प्रयास किये जा सकें और जैव विविधता को समृद्ध बनाए रखा जा सके तथा पारितंत्रीय सेवाओं को धारणीय रूप से प्राप्त किया जा सके| इस प्रकार यह पहल आर्थिक विकास के संदर्भ में पारितंत्रीय अवनयन और जैव-विविधता के ह्रास के बढ़ते मूल्य को प्रदर्शित करती है| इस पहल के माध्यम से पर्यावरणीय क्षरण का समाधान करने हेतु नीति निर्माण पर बल दिया गया है| TEEB के आधार पर पर्यावरण संरक्षण एवं व्यापारिक लाभ को आपस में जोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर इस प्रकार की नीतियों का निर्माण करना है जो पारितंत्रीय सेवाओं को निरंतर प्राप्त करने में सहायक हो और जो धारणीय विकास को सुनिश्चित कर सकें|
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खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल को परिभाषित कीजिये| इस संदर्भ में, विभिन्न पारिस्थितिकीय पिरामिडों का चित्र सहित वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define food chain and food web. In this context, describe the various ecological pyramids with pictures. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य जाल को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय पिरामिड को परिभाषित करते हुए विभिन्न प्रकार के पिरामिडों का चित्र सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- खाद्य-श्रृंखला- पारितंत्र के भीतर उत्पादक से उपभोक्ता तक उर्जा प्रवाह के स्वरूप को खाद्य श्रृंखला कहते हैं| पारितंत्र के भीतर विभिन्न जीवो में पोषण स्तर के माध्यम से एक संबंध होता है तथा इनमें ऊर्जा का प्रवाह एक दिशीय(रैखिक) होता है|यह 2 प्रकार के होते हैं- चराई खाद्य श्रृंखला(घास-हिरन-बाघ) तथा अपरद खाद्य श्रृंखला(कचरा-कीट-छोटी-मछलियाँ)|(चित्र बनाईये)| खाद्य जाल- विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के नेटवर्क को खाद्य जाल कहते हैं| यहां ऊर्जा का प्रवाह बहु पथगामी होता है | एक जंतु विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के सदस्य हो सकते हैं तथा पारितंत्र के भीतर परस्पर संबंधित अनेक खाद्य श्रृंखलाएं हो सकती है और इसी से खाद्य जाल का निर्माण होता है| पारिस्थितिकीय पिरामिड - खाद्य श्रृंखला में क्रमिक उच्च पोषण स्तरों में प्रजातियों की संख्या, सकल बायोमास तथा ऊर्जा की सुलभता एवं प्राप्यता में इस तरह से ह्रास होता है कि उनका आकार पिरामिड जैसा हो जाता है, जिसे पारिस्थितिकी पिरामिड कहा जाता है| यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- संख्या पिरामिड - इसमें प्राथमिक उत्पादकों तथा विभिन्न स्तर के उपभोक्ताओं की संख्याओं के बीच के संबंध को दिखाया जाता है| संख्या पिरामिड सीधा एवं उल्टा दोनों प्रकार का होता है- सीधा संख्या पिरामिड- इसमें बढ़ते पोषण स्तरों के साथ जीवो की संख्या में कमी होती जाती है| इसका आधार अत्यधिक चौड़ा तथा शीर्ष अत्यधिक नुकीला होता है| उदाहरण- घास के मैदान एवं तालाब|(चित्र बनाईये)| उल्टा संख्या पिरामिड- इसमें प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की संख्या में वृद्धि होती जाती है| यह आधार पर नुकीला तथा शीर्ष पर अत्यधिक चौड़ा होता है| उदाहरण- वनों के अन्दर जहाँ वृक्षों का आकार बड़ा होने पर उन पर निर्भर जंतुओं की संख्या अधिक होती है|(चित्र बनाईये)| जैवभार पिरामिड- जैवभार पिरामिड को निर्धारित करने के लिए प्रत्येक पोषण स्तर पर मौजूद समस्त जीवों को एकत्रित करके उनके शुष्क कार्बनिक भार का मापन किया जाता है| इस प्रकार के पिरामिड के अंतर्गत पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल के सभी पोषण स्तरों पर भंडारित समस्त जीवों के सकल भार का प्रदर्शन तथा उनका अध्ययन किया जाता है|यह भी उल्टा एवं सीधा दोनों प्रकार का होता है| सीधा जैवभार पिरामिड- इसका आधार प्राथमिक उत्पादकों से बनता है तथा शीर्ष पर एक लघु पोषण स्तर होता है|(चित्र बनाईये)| उल्टा जैवभार पिरामिड- इसमें बायोमास पिरामिड का आधार छोटा होता है तथा किसी भी समय उपभोक्ता का जैवभार प्राथमिक उत्पादक के जैवभार से अधिक होता है| उदाहरण -जलीय पारिस्थितिकी तंत्र|(चित्र बनाईये)| ऊर्जा पिरामिड- किसी पारितंत्र के विभिन्न पोषक स्तरों की कार्यात्मक भूमिका की तुलना करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है| ऊर्जा पिरामिड थर्मोडायनेमिक्स के नियमों का पालन करता है जिसमें एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा को दिखाया जाता है| ऊर्जा पिरामिड हमेशा सीधा होता है|(चित्र बनाईये)| ऊर्जा पिरामिड के अंतर्गत ऊर्जा के स्थानांतरण हेतु 10% का नियम दिया गया है- एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में मात्र 10% ऊर्जा ही स्थानान्तरित होती है|
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##Question:खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल को परिभाषित कीजिये| इस संदर्भ में, विभिन्न पारिस्थितिकीय पिरामिडों का चित्र सहित वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define food chain and food web. In this context, describe the various ecological pyramids with pictures. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य जाल को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय पिरामिड को परिभाषित करते हुए विभिन्न प्रकार के पिरामिडों का चित्र सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- खाद्य-श्रृंखला- पारितंत्र के भीतर उत्पादक से उपभोक्ता तक उर्जा प्रवाह के स्वरूप को खाद्य श्रृंखला कहते हैं| पारितंत्र के भीतर विभिन्न जीवो में पोषण स्तर के माध्यम से एक संबंध होता है तथा इनमें ऊर्जा का प्रवाह एक दिशीय(रैखिक) होता है|यह 2 प्रकार के होते हैं- चराई खाद्य श्रृंखला(घास-हिरन-बाघ) तथा अपरद खाद्य श्रृंखला(कचरा-कीट-छोटी-मछलियाँ)|(चित्र बनाईये)| खाद्य जाल- विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के नेटवर्क को खाद्य जाल कहते हैं| यहां ऊर्जा का प्रवाह बहु पथगामी होता है | एक जंतु विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के सदस्य हो सकते हैं तथा पारितंत्र के भीतर परस्पर संबंधित अनेक खाद्य श्रृंखलाएं हो सकती है और इसी से खाद्य जाल का निर्माण होता है| पारिस्थितिकीय पिरामिड - खाद्य श्रृंखला में क्रमिक उच्च पोषण स्तरों में प्रजातियों की संख्या, सकल बायोमास तथा ऊर्जा की सुलभता एवं प्राप्यता में इस तरह से ह्रास होता है कि उनका आकार पिरामिड जैसा हो जाता है, जिसे पारिस्थितिकी पिरामिड कहा जाता है| यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- संख्या पिरामिड - इसमें प्राथमिक उत्पादकों तथा विभिन्न स्तर के उपभोक्ताओं की संख्याओं के बीच के संबंध को दिखाया जाता है| संख्या पिरामिड सीधा एवं उल्टा दोनों प्रकार का होता है- सीधा संख्या पिरामिड- इसमें बढ़ते पोषण स्तरों के साथ जीवो की संख्या में कमी होती जाती है| इसका आधार अत्यधिक चौड़ा तथा शीर्ष अत्यधिक नुकीला होता है| उदाहरण- घास के मैदान एवं तालाब|(चित्र बनाईये)| उल्टा संख्या पिरामिड- इसमें प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की संख्या में वृद्धि होती जाती है| यह आधार पर नुकीला तथा शीर्ष पर अत्यधिक चौड़ा होता है| उदाहरण- वनों के अन्दर जहाँ वृक्षों का आकार बड़ा होने पर उन पर निर्भर जंतुओं की संख्या अधिक होती है|(चित्र बनाईये)| जैवभार पिरामिड- जैवभार पिरामिड को निर्धारित करने के लिए प्रत्येक पोषण स्तर पर मौजूद समस्त जीवों को एकत्रित करके उनके शुष्क कार्बनिक भार का मापन किया जाता है| इस प्रकार के पिरामिड के अंतर्गत पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल के सभी पोषण स्तरों पर भंडारित समस्त जीवों के सकल भार का प्रदर्शन तथा उनका अध्ययन किया जाता है|यह भी उल्टा एवं सीधा दोनों प्रकार का होता है| सीधा जैवभार पिरामिड- इसका आधार प्राथमिक उत्पादकों से बनता है तथा शीर्ष पर एक लघु पोषण स्तर होता है|(चित्र बनाईये)| उल्टा जैवभार पिरामिड- इसमें बायोमास पिरामिड का आधार छोटा होता है तथा किसी भी समय उपभोक्ता का जैवभार प्राथमिक उत्पादक के जैवभार से अधिक होता है| उदाहरण -जलीय पारिस्थितिकी तंत्र|(चित्र बनाईये)| ऊर्जा पिरामिड- किसी पारितंत्र के विभिन्न पोषक स्तरों की कार्यात्मक भूमिका की तुलना करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है| ऊर्जा पिरामिड थर्मोडायनेमिक्स के नियमों का पालन करता है जिसमें एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा को दिखाया जाता है| ऊर्जा पिरामिड हमेशा सीधा होता है|(चित्र बनाईये)| ऊर्जा पिरामिड के अंतर्गत ऊर्जा के स्थानांतरण हेतु 10% का नियम दिया गया है- एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में मात्र 10% ऊर्जा ही स्थानान्तरित होती है|
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