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Explain the administrative and executive relations between the centre and the state. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE ADMINISTRATIVE AND EXECUTIVE RELATIONS BETWEEN THE CENTRE AND THE STATE -CONCLUSION Answer:- India is defined as a federation (read quasi-federation). However, the word federation is a paradox, as the very concept of federation is based upon the desire for a union and not unity. In India, the concept of federation is quasi-federal with a unitary tilt. This relationship defines the relation that Centre and states share in the Indian system of governance. THE ADMINISTRATIVE AND EXECUTIVE RELATIONS BETWEEN THE CENTRE AND THE STATE The executive powers co-exist and are co-extensive with the legislative powers -(Legislative powers are dealt with by the 7th schedule, where the legislative competence of the union and state are properly defined, and also by Article 245, which deals with the legislative territorial jurisdiction of both the union and the state). However, there are certain cases where the Union exceeds the range of its own legislative powers with respect to (wrt) the Executive powers. 1) ARTICLE 256 The executive powers of the state must be exercised such that the union laws are complied with. For this purpose, the union executive may also give directions to the state. 2) ARTICLE 257 The state executive must not perform any executive action, which is prejudicial to the existing union laws or union executive. This is especially true wrt the maintenance of telecommunications, railways, highways, water-ways etc. 3) ARTICLE 365 When the states fail to comply with the executive’s directions, Article 365 may be invoked, which may provide the ground for proclamation under Article 356. 4) ARTICLE 312 Executive’s control over states is also done by Article 312. It effectively reads that any addition/ alteration of All India Services can be done by the Union Parliament. This leads to the executive’s control over the state. 5) GOVERNOR The governor is an appointee of the Union, who is the head executive of the state. Therefore, the administrative and executive relations between the Centre and state are seen as a federal one, with a unitary tilt.
##Question:Explain the administrative and executive relations between the centre and the state. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE ADMINISTRATIVE AND EXECUTIVE RELATIONS BETWEEN THE CENTRE AND THE STATE -CONCLUSION Answer:- India is defined as a federation (read quasi-federation). However, the word federation is a paradox, as the very concept of federation is based upon the desire for a union and not unity. In India, the concept of federation is quasi-federal with a unitary tilt. This relationship defines the relation that Centre and states share in the Indian system of governance. THE ADMINISTRATIVE AND EXECUTIVE RELATIONS BETWEEN THE CENTRE AND THE STATE The executive powers co-exist and are co-extensive with the legislative powers -(Legislative powers are dealt with by the 7th schedule, where the legislative competence of the union and state are properly defined, and also by Article 245, which deals with the legislative territorial jurisdiction of both the union and the state). However, there are certain cases where the Union exceeds the range of its own legislative powers with respect to (wrt) the Executive powers. 1) ARTICLE 256 The executive powers of the state must be exercised such that the union laws are complied with. For this purpose, the union executive may also give directions to the state. 2) ARTICLE 257 The state executive must not perform any executive action, which is prejudicial to the existing union laws or union executive. This is especially true wrt the maintenance of telecommunications, railways, highways, water-ways etc. 3) ARTICLE 365 When the states fail to comply with the executive’s directions, Article 365 may be invoked, which may provide the ground for proclamation under Article 356. 4) ARTICLE 312 Executive’s control over states is also done by Article 312. It effectively reads that any addition/ alteration of All India Services can be done by the Union Parliament. This leads to the executive’s control over the state. 5) GOVERNOR The governor is an appointee of the Union, who is the head executive of the state. Therefore, the administrative and executive relations between the Centre and state are seen as a federal one, with a unitary tilt.
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कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में संसदीय वित्तीय समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं | चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/ 10 अंक) Parliamentary financial committees play an important role in establishing parliamentary control over the executive. Discuss. (150-200 Words/10 Marks)
संसदीय वित्तीय समितियों के बारे में बताते हुए भूमिका का वर्णन कीजिये किस प्रकार ये समितियां संसदीय नियंत्रण स्थापित करती हैं , इसका वर्णन मुख्य भाग में कीजिये निष्कर्ष में इसके प्रभाव का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- संसदीय वित्तीय समितियां ऐसे स्थायी या अस्थायी निकाय हैं जो लोकव्यय की प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था विकसित करने के लिए स्वयं व्यवस्थापिका की ओर से अपने ही सदस्यों में से विशेषज्ञता के आधार पर गठित किये जाते हैं| ये समितियां अधिक गहराई से सरकार के आर्थिक क्रियाकलापों से जुड़े व्यय के औचित्य की जांच करने के साथ-साथ प्रशासन तंत्र को मितव्ययिता बरतने के लिए संभावित क्षेत्रों से अवगत कराती हैं | संसदीय प्रणाली में वित्तीय मामलों में संसद, जोकि जनता का प्रतिनिधित्व करती है, का पूर्ण नियंत्रण होता है | वार्षिक वित्तीय विवरण अर्थात बजट (अनुच्छेद 112) संसद द्वारा पारित किया जाता है | इसके पश्चात् विनियोग विधेयक पारित हो जाने पर ही सरकार भारत की संचित निधि में से धन निकाल सकती है | संसद ही कर लगाने की शक्ति देती है | इस मामले में नियंत्रण रखने के लिए मुख्यतः दो समितियां बनायीं गयी हैं - लोक लेखा समिति- इस समिति में 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा तथा 7 राज्य सभा से) | प्रतिवर्ष संसद द्वारा इसके सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार एकल हस्तान्तरणीय मत के माध्यम से सदस्यों का चुनाव किया जाता है | यह समिति भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट पर विचार कर संसद को अपनी रिपोर्ट देती है अर्थात महालेखाकार की रिपोर्ट जो कि जनता के वित्त के व्यय का व्योरा होती है , उसकी लोकलेखा समिति कड़ी जांच करती है | लोकलेखा समिति जनता के धन के व्यय पर नजर रखकर लोकतान्त्रिक मूल्यों को बनाये रखती है | आकलन समिति- इस समिति में 30 सदस्यहोते हैं | (केवल लोकसभा से) इसके चुनाव की प्रक्रिया भी लोकलेखा समिति की तरह होती है | आकलन समिति का कार्य बजट में सम्मिलित आकलनों की जांच करना तथा सार्वजनिक व्यय में किफ़ायत के लिए सुझाव देती है , इसलिए इसे "सतत किफ़ायत समिति" भी कहा जाता है | चूंकि संसदीय वित्तीय समितियों में सामान्यतः विषय के विशेषज्ञ होते हैं अतः यह विधेयक की विस्तृत छानबीन कर सदन के सदस्यों के सामने आसान रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित हो पाती है | इस प्रकार संसदीय वित्तीय समितियों के माध्यम से संसदीय नियंत्रण का क्षेत्र और विस्तृत होता तथा सांसदों को बजट की मांगों पर विस्तार से चर्चा करने का अवसर मिलता है , इससे प्रत्येक मंत्रालय का उसकी रिपोर्ट के आधार पर मूल्यांकन किया जा सकता है |
##Question:कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में संसदीय वित्तीय समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं | चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/ 10 अंक) Parliamentary financial committees play an important role in establishing parliamentary control over the executive. Discuss. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:संसदीय वित्तीय समितियों के बारे में बताते हुए भूमिका का वर्णन कीजिये किस प्रकार ये समितियां संसदीय नियंत्रण स्थापित करती हैं , इसका वर्णन मुख्य भाग में कीजिये निष्कर्ष में इसके प्रभाव का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- संसदीय वित्तीय समितियां ऐसे स्थायी या अस्थायी निकाय हैं जो लोकव्यय की प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था विकसित करने के लिए स्वयं व्यवस्थापिका की ओर से अपने ही सदस्यों में से विशेषज्ञता के आधार पर गठित किये जाते हैं| ये समितियां अधिक गहराई से सरकार के आर्थिक क्रियाकलापों से जुड़े व्यय के औचित्य की जांच करने के साथ-साथ प्रशासन तंत्र को मितव्ययिता बरतने के लिए संभावित क्षेत्रों से अवगत कराती हैं | संसदीय प्रणाली में वित्तीय मामलों में संसद, जोकि जनता का प्रतिनिधित्व करती है, का पूर्ण नियंत्रण होता है | वार्षिक वित्तीय विवरण अर्थात बजट (अनुच्छेद 112) संसद द्वारा पारित किया जाता है | इसके पश्चात् विनियोग विधेयक पारित हो जाने पर ही सरकार भारत की संचित निधि में से धन निकाल सकती है | संसद ही कर लगाने की शक्ति देती है | इस मामले में नियंत्रण रखने के लिए मुख्यतः दो समितियां बनायीं गयी हैं - लोक लेखा समिति- इस समिति में 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा तथा 7 राज्य सभा से) | प्रतिवर्ष संसद द्वारा इसके सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार एकल हस्तान्तरणीय मत के माध्यम से सदस्यों का चुनाव किया जाता है | यह समिति भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट पर विचार कर संसद को अपनी रिपोर्ट देती है अर्थात महालेखाकार की रिपोर्ट जो कि जनता के वित्त के व्यय का व्योरा होती है , उसकी लोकलेखा समिति कड़ी जांच करती है | लोकलेखा समिति जनता के धन के व्यय पर नजर रखकर लोकतान्त्रिक मूल्यों को बनाये रखती है | आकलन समिति- इस समिति में 30 सदस्यहोते हैं | (केवल लोकसभा से) इसके चुनाव की प्रक्रिया भी लोकलेखा समिति की तरह होती है | आकलन समिति का कार्य बजट में सम्मिलित आकलनों की जांच करना तथा सार्वजनिक व्यय में किफ़ायत के लिए सुझाव देती है , इसलिए इसे "सतत किफ़ायत समिति" भी कहा जाता है | चूंकि संसदीय वित्तीय समितियों में सामान्यतः विषय के विशेषज्ञ होते हैं अतः यह विधेयक की विस्तृत छानबीन कर सदन के सदस्यों के सामने आसान रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित हो पाती है | इस प्रकार संसदीय वित्तीय समितियों के माध्यम से संसदीय नियंत्रण का क्षेत्र और विस्तृत होता तथा सांसदों को बजट की मांगों पर विस्तार से चर्चा करने का अवसर मिलता है , इससे प्रत्येक मंत्रालय का उसकी रिपोर्ट के आधार पर मूल्यांकन किया जा सकता है |
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Growing feelings of regionalism is a necessary condition for demand of separate states. Discuss. (200 words)
Introduce with the definition of Regionalism
##Question:Growing feelings of regionalism is a necessary condition for demand of separate states. Discuss. (200 words)##Answer:Introduce with the definition of Regionalism
42,192
पारिस्थितिकीय अनुक्रमण को परिभाषित कीजिये| इसके साथ हीपारिस्थितिकीय अनुक्रमण के प्रकारों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Define ecologicalsuccession . Along with this, explain the types of ecologicalsuccession with examples. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में पारिस्थितिकीय अनुक्रमण को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पारिस्थितिकीय अनुक्रमण के प्रकारों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में पारिस्थितिकीय अनुक्रमण का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पारिस्थितिकीय अनुक्रमण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी भौगोलिक स्थान में जैविक समुदायों में परिवर्तन होता है, इस सिद्धांत का प्रतिपादन क्लीमेंट ने किया था लेकिन इसका विकास विल्सन ने किया है|अनुक्रमण भौगोलिक क्षेत्र के जलवायु कारकों पर निर्भर करता है| यह प्राकृतिक एवं मानवीय क्रियाकलापों द्वारा हो सकता है| अनुक्रमण प्रक्रिया नवीन समुदाय से प्रारम्भ हो कर क्रमिक समुदाय की अवस्था से होते हुए चरम समुदाय में जाकर स्थिर हो जाता है| अनुक्रमण दो प्रकार से होते हैं प्राथमिक अनुक्रमण · इस प्रक्रिया में प्रथम बार मृदा का बनना होता है और वनस्पतियों का क्रमिक विकास होता है · यह अपेक्षाकृत धीमी प्रक्रिया होती है जो सैकड़ों वर्षों तक चलता है · प्राथमिक अनुक्रमण के चरण(बंजर भूमि, मृदा निर्माण(नवीन समुदाय), घास क्षेत्र(क्रमिक समुदाय) अंतिम में वन का विकास(चरम समुदाय) होता है · उदाहरणार्थ बंजर भूमि, ज्वालामुखी विस्फोट, हिमनद का पिघलना आदि के आधार पर प्राथमिक अनुक्रमण होता है · प्राथमिक अनुक्रमण प्रारम्भ करने वाले अभिकर्ताओं को पॉयनियर कहा जाता है| इनमें मोस, लाइकेन आदि आते हैं| फ्रेडरिक क्लीमेंट के अनुसार प्राथमिक अनुक्रमण के चरण · न्यूडेशन- अनुक्रमण प्रक्रिया की शुरुआत रिक्त स्थान में होती है जहाँ पहली बार मृदा का बनना होता है · आक्रमण- इस चरण में नवीन समुदाय का आगमन होता है · स्पर्धा- प्रजातियों के मध्य प्रकाश, पोषक तत्व, जल इत्यादि के लिए प्रतिस्पर्धा होती है · प्रतिक्रिया- इस चरण में स्पर्धा के कारण प्रजातियों का विस्थापन होता है| यह प्रक्रिया क्रमिक समुदाय में संपन्न होती है · स्थिरीकरण- चरम समुदाय का बनना जहाँ अनुक्रमण प्रक्रिया धीमी हो जाती है| द्वितीयक अनुक्रमण · इस प्रक्रिया में मृदा एवं वनस्पति पहले से उपस्थित होता है, · प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से क्षतिग्रस्त होने के बाद पुनः वानस्पतिक विकास होता है · द्वितीयक अनुक्रमण की यह प्रक्रिया प्राथमिक अनुक्रमण की अपेक्षा तीव्र गति से होता है · दावानल, वनोंमूलन, वानिकी, झूमकृषि आदि के कारण द्वितीयक अनुक्रमण प्रारम्भ होता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनुक्रमण विशाल वानस्पतिक जैव विविधता का आधार होता है| इसी प्रक्रिया के माध्यम से जैव विविधता को पर्यावास प्राप्त होता है| इसके आधार पर ही पारितंत्र स्वयं को पुनर्विकसित करने में सक्षम हो पाते हैं| अतः पारिस्थितिकीय अनुक्रमण उद्विकास के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रघटना होती है|
##Question:पारिस्थितिकीय अनुक्रमण को परिभाषित कीजिये| इसके साथ हीपारिस्थितिकीय अनुक्रमण के प्रकारों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Define ecologicalsuccession . Along with this, explain the types of ecologicalsuccession with examples. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में पारिस्थितिकीय अनुक्रमण को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पारिस्थितिकीय अनुक्रमण के प्रकारों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में पारिस्थितिकीय अनुक्रमण का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पारिस्थितिकीय अनुक्रमण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी भौगोलिक स्थान में जैविक समुदायों में परिवर्तन होता है, इस सिद्धांत का प्रतिपादन क्लीमेंट ने किया था लेकिन इसका विकास विल्सन ने किया है|अनुक्रमण भौगोलिक क्षेत्र के जलवायु कारकों पर निर्भर करता है| यह प्राकृतिक एवं मानवीय क्रियाकलापों द्वारा हो सकता है| अनुक्रमण प्रक्रिया नवीन समुदाय से प्रारम्भ हो कर क्रमिक समुदाय की अवस्था से होते हुए चरम समुदाय में जाकर स्थिर हो जाता है| अनुक्रमण दो प्रकार से होते हैं प्राथमिक अनुक्रमण · इस प्रक्रिया में प्रथम बार मृदा का बनना होता है और वनस्पतियों का क्रमिक विकास होता है · यह अपेक्षाकृत धीमी प्रक्रिया होती है जो सैकड़ों वर्षों तक चलता है · प्राथमिक अनुक्रमण के चरण(बंजर भूमि, मृदा निर्माण(नवीन समुदाय), घास क्षेत्र(क्रमिक समुदाय) अंतिम में वन का विकास(चरम समुदाय) होता है · उदाहरणार्थ बंजर भूमि, ज्वालामुखी विस्फोट, हिमनद का पिघलना आदि के आधार पर प्राथमिक अनुक्रमण होता है · प्राथमिक अनुक्रमण प्रारम्भ करने वाले अभिकर्ताओं को पॉयनियर कहा जाता है| इनमें मोस, लाइकेन आदि आते हैं| फ्रेडरिक क्लीमेंट के अनुसार प्राथमिक अनुक्रमण के चरण · न्यूडेशन- अनुक्रमण प्रक्रिया की शुरुआत रिक्त स्थान में होती है जहाँ पहली बार मृदा का बनना होता है · आक्रमण- इस चरण में नवीन समुदाय का आगमन होता है · स्पर्धा- प्रजातियों के मध्य प्रकाश, पोषक तत्व, जल इत्यादि के लिए प्रतिस्पर्धा होती है · प्रतिक्रिया- इस चरण में स्पर्धा के कारण प्रजातियों का विस्थापन होता है| यह प्रक्रिया क्रमिक समुदाय में संपन्न होती है · स्थिरीकरण- चरम समुदाय का बनना जहाँ अनुक्रमण प्रक्रिया धीमी हो जाती है| द्वितीयक अनुक्रमण · इस प्रक्रिया में मृदा एवं वनस्पति पहले से उपस्थित होता है, · प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से क्षतिग्रस्त होने के बाद पुनः वानस्पतिक विकास होता है · द्वितीयक अनुक्रमण की यह प्रक्रिया प्राथमिक अनुक्रमण की अपेक्षा तीव्र गति से होता है · दावानल, वनोंमूलन, वानिकी, झूमकृषि आदि के कारण द्वितीयक अनुक्रमण प्रारम्भ होता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अनुक्रमण विशाल वानस्पतिक जैव विविधता का आधार होता है| इसी प्रक्रिया के माध्यम से जैव विविधता को पर्यावास प्राप्त होता है| इसके आधार पर ही पारितंत्र स्वयं को पुनर्विकसित करने में सक्षम हो पाते हैं| अतः पारिस्थितिकीय अनुक्रमण उद्विकास के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रघटना होती है|
42,195
पारिस्थितिकीय उत्पादकता को परिभाषित कीजिये| पारिस्थितिकीय उत्पादकता के मापन करने के तरीकों का उल्लेख करते हुए विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेशों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define ecological productivity. Mention the methods of measuring ecological productivity and describe ,in detail, the various ecological productive regions. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- पहले भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता के मापन करने के तरीकों के बारे में बताईये| अंतिम भाग में विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेशों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- किसी भी पारितंत्र में संचित ऊर्जा अथवा जैव-भार का प्रति वर्ग मीटर प्रति ईकाई समय बनना पारिस्थितिकीय उत्पादकता कहलाता है| इसका आकलन सामान्यतः किलोकैलोरी या किलोजुल प्रति वर्ग मीटरप्रति वर्षके रूप में किया जाता है|यह 2 प्रकार की होती है- प्राथमिक उत्पादकता - किसी पारितंत्र में सभी स्वपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा द्वितीयक उत्पादकता - सभी परपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा पारिस्थितिकीय तंत्र की उत्पादकता दो कारकों पर निर्भर करती है- प्राथमिक उत्पादक को सुलभ होने वाली सौर-ऊर्जा की मात्रा हरे पेड़-पौधों द्वारा सौर-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करने की क्षमता पारिस्थितिकीय उत्पादकता का मापन 2 प्रकार से किया जाता है- सकल उत्पादकता- कुल ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा शुद्ध उत्पादकता- श्वसन क्रिया के बाद शेष ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा अर्थात, शुद्ध उत्पादकता = सकल उत्पादकता - श्वसन द्वारा नष्ट ऊर्जा की मात्रा प्राथमिक उत्पादकता(स्वपोषी) के संदर्भ में,शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता(NPP)=सकल प्राथमिक उत्पादकता(GPP) - श्वसन क्रिया ; द्वितीयक उत्पादकता(परपोषी) के संदर्भ में, शुद्ध द्वितीयक उत्पादकता (NSP)=सकल द्वितीयक उत्पादकता(GSP) - श्वसन क्रिया ; विभिन्न स्थानों पर उत्पादकता- निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर जाने पर उत्पादकता कम होती है| निम्न ऊँचाई से उच्च ऊँचाई पर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों की अपेक्षा महाद्वीपों की उत्पादकता ज्यादा होती है| तट से दूर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों में गहराई में जाने पर उत्पादकता कम होते जाती है| विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेश- अधिक उत्पादकता वाले प्रदेश - वर्षावन, मैंग्रोव वन, नमभूमियां, ज्वारनदमुख, प्रवाल-भितियाँआदि| मध्यम उत्पादकता वाले प्रदेश - कृषिभूमि, घास का मैदान(सवाना>स्टेपी), शीतोष्ण/पर्णपाती वन, झीलें आदि| निम्न उत्पादकता वाले प्रदेश - टुंड्रा वन, हिमाच्छादित बंजर भूमि(पर्माफ्रॉस्ट), पर्वत चोटी, मरुस्थल आदि| विश्व की औसत शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 320 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्ष है जबकि उष्णकटिबंधीय वर्षावनों तथा दलदली एवं ज्वारनदमुख क्षेत्रों में शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 2000 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्षहोती है|
##Question:पारिस्थितिकीय उत्पादकता को परिभाषित कीजिये| पारिस्थितिकीय उत्पादकता के मापन करने के तरीकों का उल्लेख करते हुए विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेशों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define ecological productivity. Mention the methods of measuring ecological productivity and describe ,in detail, the various ecological productive regions. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता के मापन करने के तरीकों के बारे में बताईये| अंतिम भाग में विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेशों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- किसी भी पारितंत्र में संचित ऊर्जा अथवा जैव-भार का प्रति वर्ग मीटर प्रति ईकाई समय बनना पारिस्थितिकीय उत्पादकता कहलाता है| इसका आकलन सामान्यतः किलोकैलोरी या किलोजुल प्रति वर्ग मीटरप्रति वर्षके रूप में किया जाता है|यह 2 प्रकार की होती है- प्राथमिक उत्पादकता - किसी पारितंत्र में सभी स्वपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा द्वितीयक उत्पादकता - सभी परपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा पारिस्थितिकीय तंत्र की उत्पादकता दो कारकों पर निर्भर करती है- प्राथमिक उत्पादक को सुलभ होने वाली सौर-ऊर्जा की मात्रा हरे पेड़-पौधों द्वारा सौर-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करने की क्षमता पारिस्थितिकीय उत्पादकता का मापन 2 प्रकार से किया जाता है- सकल उत्पादकता- कुल ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा शुद्ध उत्पादकता- श्वसन क्रिया के बाद शेष ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा अर्थात, शुद्ध उत्पादकता = सकल उत्पादकता - श्वसन द्वारा नष्ट ऊर्जा की मात्रा प्राथमिक उत्पादकता(स्वपोषी) के संदर्भ में,शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता(NPP)=सकल प्राथमिक उत्पादकता(GPP) - श्वसन क्रिया ; द्वितीयक उत्पादकता(परपोषी) के संदर्भ में, शुद्ध द्वितीयक उत्पादकता (NSP)=सकल द्वितीयक उत्पादकता(GSP) - श्वसन क्रिया ; विभिन्न स्थानों पर उत्पादकता- निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर जाने पर उत्पादकता कम होती है| निम्न ऊँचाई से उच्च ऊँचाई पर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों की अपेक्षा महाद्वीपों की उत्पादकता ज्यादा होती है| तट से दूर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों में गहराई में जाने पर उत्पादकता कम होते जाती है| विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेश- अधिक उत्पादकता वाले प्रदेश - वर्षावन, मैंग्रोव वन, नमभूमियां, ज्वारनदमुख, प्रवाल-भितियाँआदि| मध्यम उत्पादकता वाले प्रदेश - कृषिभूमि, घास का मैदान(सवाना>स्टेपी), शीतोष्ण/पर्णपाती वन, झीलें आदि| निम्न उत्पादकता वाले प्रदेश - टुंड्रा वन, हिमाच्छादित बंजर भूमि(पर्माफ्रॉस्ट), पर्वत चोटी, मरुस्थल आदि| विश्व की औसत शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 320 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्ष है जबकि उष्णकटिबंधीय वर्षावनों तथा दलदली एवं ज्वारनदमुख क्षेत्रों में शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 2000 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्षहोती है|
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How can both the judiciary and the executive cooperate with each other to deal with the unacceptably high number of pending cases? Have they taken any steps together in this regard? Discuss. (150 Words/10 marks)
Approach: Introduce the type of Judiciary in India and a brief account of issues faced by it Body: Explain why cooperation between the judiciary and executive is needed. Then elaborate on the steps taken in this direction Conclusion: Highlight the need to reform the judiciary. ANSWER: India has a parliamentary system of government with an integrated independent judicial system that forms a common framework for state and central government. The judicial system of the country is grappled with many problems and the pendency of cases is the obvious result of existing inefficiencies in the overall working of the judiciary. Justice – state responsibility: 1. Article 39A of the Constitution of India provides that State shall secure that the operation of the legal system promotes justice on a basis of equal opportunity, and shall in particular, provide free legal aid, by suitable legislation or schemes or in any other way, to ensure that opportunities for securing justice are not denied to any citizen by reason of economic or other disability. 2. Articles 14 and 22(1) also make it obligatory for the State to ensure equality before the law and a legal system that promotes justice on a basis of equal opportunity for all. Legal aid strives to ensure that the constitutional pledge is fulfilled in its letter and spirit and that equal justice is made available to the poor, downtrodden, and weaker sections of society. The cooperation between the Indian executive and judiciary is need time due to the following reasons: 1. Infrastructure development: The infrastructural development of lower courts can be done only by means of funding from the government. The percent of GDP spent on the judicial system is far less than the actual requirement and existing necessities of the judicial system to function to its fullest potential. 2. Recruitment-related concerns: The truce between the judiciary and government over appointment is hampering the recruitment process in the Indian judicial system. Supreme Court has struck down the National Judicial Commission and the further process has not advanced in the earliest manner. Official figures show there are as many as 437 vacancies in the High Courts alone as of March 1, 2017. 3. Pending cases: Pendency of cases can be dealt in a cooperative manner as vacancies in courts is leading to a burden on existing human resource and infrastructure. 4. Improving functions of Gram Nyalayas: Central and state government has to pull their efforts to make Gram Nyayalay and Lok Adalat function in order to reduce the number of case pendency. National Legal Services Authority (NALSA) has been constituted under the Legal Services Authorities Act, 1987 to provide free Legal Services to the weaker sections of society and to organize Lok Adalats for amicable settlement of disputes. This provision should be explored to enhance the working efficiency of courts. 5. Reducing the burden of litigation of govt cases: Government is the largest litigant in Supreme Court and high court. The executives and government officials need enough courage and technical knowledge to take the right decision at a particular situation rather than moving to court unnecessarily. Steps taken for judicial reforms are: 1. In accordance with the National Policy and Action Plan prepared by the e-Committee, a five-year National Programme for Computerization of the Indian judiciary was launched in 2005 to be carried out in three phases. 2. Establishment of Lok Adalat and Gram Nyayalays has reduced the burden of case pendency. 3. The specialization of courts has been carried out through the establishment of family courts and administrative tribunals. 4. National judicial academies have been established by the government to provide in-service training to judicial officers. These academies impart required training and skill to officers to provide litigant-friendly justice. 5. Establishment of the Fast track courts An independent and impartial judiciary and a speedy and efficient system are the very essences of civilization. However, our judiciary, by its very nature, has become ponderous, excruciatingly slow and inefficient. Our laws and their interpretation and adjudication led to enormous misery for the litigants and forced people to look for extra-legal alternatives.
##Question:How can both the judiciary and the executive cooperate with each other to deal with the unacceptably high number of pending cases? Have they taken any steps together in this regard? Discuss. (150 Words/10 marks)##Answer:Approach: Introduce the type of Judiciary in India and a brief account of issues faced by it Body: Explain why cooperation between the judiciary and executive is needed. Then elaborate on the steps taken in this direction Conclusion: Highlight the need to reform the judiciary. ANSWER: India has a parliamentary system of government with an integrated independent judicial system that forms a common framework for state and central government. The judicial system of the country is grappled with many problems and the pendency of cases is the obvious result of existing inefficiencies in the overall working of the judiciary. Justice – state responsibility: 1. Article 39A of the Constitution of India provides that State shall secure that the operation of the legal system promotes justice on a basis of equal opportunity, and shall in particular, provide free legal aid, by suitable legislation or schemes or in any other way, to ensure that opportunities for securing justice are not denied to any citizen by reason of economic or other disability. 2. Articles 14 and 22(1) also make it obligatory for the State to ensure equality before the law and a legal system that promotes justice on a basis of equal opportunity for all. Legal aid strives to ensure that the constitutional pledge is fulfilled in its letter and spirit and that equal justice is made available to the poor, downtrodden, and weaker sections of society. The cooperation between the Indian executive and judiciary is need time due to the following reasons: 1. Infrastructure development: The infrastructural development of lower courts can be done only by means of funding from the government. The percent of GDP spent on the judicial system is far less than the actual requirement and existing necessities of the judicial system to function to its fullest potential. 2. Recruitment-related concerns: The truce between the judiciary and government over appointment is hampering the recruitment process in the Indian judicial system. Supreme Court has struck down the National Judicial Commission and the further process has not advanced in the earliest manner. Official figures show there are as many as 437 vacancies in the High Courts alone as of March 1, 2017. 3. Pending cases: Pendency of cases can be dealt in a cooperative manner as vacancies in courts is leading to a burden on existing human resource and infrastructure. 4. Improving functions of Gram Nyalayas: Central and state government has to pull their efforts to make Gram Nyayalay and Lok Adalat function in order to reduce the number of case pendency. National Legal Services Authority (NALSA) has been constituted under the Legal Services Authorities Act, 1987 to provide free Legal Services to the weaker sections of society and to organize Lok Adalats for amicable settlement of disputes. This provision should be explored to enhance the working efficiency of courts. 5. Reducing the burden of litigation of govt cases: Government is the largest litigant in Supreme Court and high court. The executives and government officials need enough courage and technical knowledge to take the right decision at a particular situation rather than moving to court unnecessarily. Steps taken for judicial reforms are: 1. In accordance with the National Policy and Action Plan prepared by the e-Committee, a five-year National Programme for Computerization of the Indian judiciary was launched in 2005 to be carried out in three phases. 2. Establishment of Lok Adalat and Gram Nyayalays has reduced the burden of case pendency. 3. The specialization of courts has been carried out through the establishment of family courts and administrative tribunals. 4. National judicial academies have been established by the government to provide in-service training to judicial officers. These academies impart required training and skill to officers to provide litigant-friendly justice. 5. Establishment of the Fast track courts An independent and impartial judiciary and a speedy and efficient system are the very essences of civilization. However, our judiciary, by its very nature, has become ponderous, excruciatingly slow and inefficient. Our laws and their interpretation and adjudication led to enormous misery for the litigants and forced people to look for extra-legal alternatives.
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भारतीय संविधान में उल्लिखित केंद्र-राज्य विधायी संबंधों पर प्रकाश डालते हुए, केंद्र सरकार की विशेष शक्तियों का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Highlight the center-state legislative relations mentioned in the Indian Constitution and describe the special powers of the Central Government in this context. (150–200 words; 10 Marks)
एप्रोच :- केंद्र राज्य विधायी संबंधों पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। केंद्र राज्य विधायी संबंधों में केंद्र सरकार की विशेष शक्तियों को स्पष्ट कीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत का संविधान अपने स्वरूप में संघीय है तथा समस्त शक्तियां( विधायी , कार्यपालक और वित्तीय) केंद्र एवं राज्यों के मध्य विभाजित है। संविधान की 7वीं अनुसूची में केंद्र व राज्य के मध्य विषयों का बंटवारा किया गया है। केंद्र राज्य विधायी संबंधों में केंद्र सरकार की विशेष शक्तियां :- संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र राज्य संबंधों की चर्चा की गयी है। इन अनुच्छेदों में केंद्र सरकार की विशेष शक्तियों को निम्नलिखित बिंदुओं में देख सकते है। ● अवशिष्ट सूची से संबद्ध विषयों पर विधान बनाने का अधिकार संसद को है। ● राज्यसभा में उपस्थित सदस्यों के 2 तिहाई बहुमत द्वारा प्रस्ताव पारित करने पर राष्ट्र हित में संसद को राज्य सूची के मामले में कानून बनाने में सक्षम हो जाता है। ● राष्ट्रीय आपातकाल में संसद ,राज्य सूची के मामलों की शक्तियॉ अधिग्रहित कर लेती है। ● जब दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमंडल प्रस्ताव पारित कर दे कि राज्य सूची के मसले पर कानून बनाया जाए , तब संसद उस मामले के संबंध में कानून बना सकती है। इस तरह के कानून का संशोधन या इस पर पुनर्विचार संसद ही कर सकती है। ● संसद राज्य सूची के किसी मामले में अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते के लिए कानून बना सकती है। ● राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद को संबंधित राज्य के लिए राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। इसके साथ ही राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है तथा राज्यपाल कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति की संस्तुति के लिए सुरक्षित रख सकता है। यद्यपि इन प्रावधानों के द्वारा केंद्र सरकार की स्थिति , राज्यों की तुलना में प्रभावी होती है किन्तु राष्ट्रीय विकास परिषद, नीति आयोग आदि संस्थाओं के द्वारा सहकारी संघवाद की नीति को बल मिला है।
##Question:भारतीय संविधान में उल्लिखित केंद्र-राज्य विधायी संबंधों पर प्रकाश डालते हुए, केंद्र सरकार की विशेष शक्तियों का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Highlight the center-state legislative relations mentioned in the Indian Constitution and describe the special powers of the Central Government in this context. (150–200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच :- केंद्र राज्य विधायी संबंधों पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। केंद्र राज्य विधायी संबंधों में केंद्र सरकार की विशेष शक्तियों को स्पष्ट कीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत का संविधान अपने स्वरूप में संघीय है तथा समस्त शक्तियां( विधायी , कार्यपालक और वित्तीय) केंद्र एवं राज्यों के मध्य विभाजित है। संविधान की 7वीं अनुसूची में केंद्र व राज्य के मध्य विषयों का बंटवारा किया गया है। केंद्र राज्य विधायी संबंधों में केंद्र सरकार की विशेष शक्तियां :- संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र राज्य संबंधों की चर्चा की गयी है। इन अनुच्छेदों में केंद्र सरकार की विशेष शक्तियों को निम्नलिखित बिंदुओं में देख सकते है। ● अवशिष्ट सूची से संबद्ध विषयों पर विधान बनाने का अधिकार संसद को है। ● राज्यसभा में उपस्थित सदस्यों के 2 तिहाई बहुमत द्वारा प्रस्ताव पारित करने पर राष्ट्र हित में संसद को राज्य सूची के मामले में कानून बनाने में सक्षम हो जाता है। ● राष्ट्रीय आपातकाल में संसद ,राज्य सूची के मामलों की शक्तियॉ अधिग्रहित कर लेती है। ● जब दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमंडल प्रस्ताव पारित कर दे कि राज्य सूची के मसले पर कानून बनाया जाए , तब संसद उस मामले के संबंध में कानून बना सकती है। इस तरह के कानून का संशोधन या इस पर पुनर्विचार संसद ही कर सकती है। ● संसद राज्य सूची के किसी मामले में अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते के लिए कानून बना सकती है। ● राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद को संबंधित राज्य के लिए राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। इसके साथ ही राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है तथा राज्यपाल कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति की संस्तुति के लिए सुरक्षित रख सकता है। यद्यपि इन प्रावधानों के द्वारा केंद्र सरकार की स्थिति , राज्यों की तुलना में प्रभावी होती है किन्तु राष्ट्रीय विकास परिषद, नीति आयोग आदि संस्थाओं के द्वारा सहकारी संघवाद की नीति को बल मिला है।
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संविधान संशोधन के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही संविधान के उन उपबन्धों की चर्चा कीजिये जिनमें संसद साधारण बहुमत से संशोधन कर सकती है| (200 शब्द) Explain different types of constitutional amendment. Along with this, discuss the provisions of the Constitution where Parliament can amend by simple majority. (200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में संविधान की जीवन्तता को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में संविधान संशोधन के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में साधारण बहुमत से संशोधनीय उपबन्धों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में उपरोक्त संशोधनों का स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारतीय संविधान विशेषज्ञ भारतीय संविधान को एक जीवंत दस्तावेज मानते हैं| भारतीय संविधान को जीवंत कहने का आधार भारतीय संविधान की संशोधनीयता है| भारतीय संविधान सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप अद्यतन किया जा सकता है इसी सन्दर्भ में भारतीय संविधान को एक जीवंत दस्तावेज माना जाता है| संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार भारतीय संसद, भारतीय संविधान में तीन प्रकारों से संशोधन कर सकती है| संसद के विशेष बहुमत और राज्य के विधान-मंडलों की स्वीकृति से संशोधन · संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन के लिए विधेयक को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत तथा राज्यों के कुल विधान मंडलों में से कम से कम आधे विधानमंडलों द्वारा स्वीकृति आवश्यक है| · सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं संघीय महत्त्व के विषयों के संशोधन में इसी प्रक्रिया को अपनाया जाता है| विशेष बहुमत द्वारा संशोधन · यदि संसद के प्रत्येक सदन द्वारा कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान में भाग लेनेवाले सदस्यों के 2/3 मतों से विधेयक पारित हो जाएं तो राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही वह संशोधन संविधान का अंग बन जाता है| · न्यायपालिका तथा राज्यों के अधिकारों तथा शक्तियों जैसी कुछ विशिष्ट बातों को छोड़कर संविधान की अन्य सभी व्यवस्थाओं में इसी प्रक्रिया के द्वारा संशोधन किया जाता है. साधारण बहुमत द्वारा संशोधन · संसद के साधारण बहुमत द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून बन जाता है. · इसके अंतर्गत राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति मिलने पर संविधान के निम्नलिखित उपबंधों में संशोधन किया जा सकता है साधारण बहुमत से होने वाले संविधान संशोधन · अनुच्छेद 2 के अंतर्गत, संसद द्वारा किसी नए राज्य की स्थापना अथवा संघ में किसी राज्य को दाखिल करना · अनुच्छेद 11 के अंतर्गत, नागरिकता देने या समाप्त करने के सम्बन्ध में कोई उपबन्ध करना · अनुच्छेद 73(2) के अंतर्गत, संसद यदि चाहे तो वह राज्यों को कुछ ऐसे कार्यपालक शक्तियां सौंप सकती है जो पहले संघ के पास थीं · अनुच्छेद 59(3) के अंतर्गत, राष्ट्रपति के वेतन भत्ते आदि में संशोधन · अनुच्छेद 75(6)के अंतर्गत, केन्द्रीय मंत्रियों के वेतन भत्ते आदि में संशोधन · अनुच्छेद 97 के अंतर्गत, राज्य सभा के सभापति तथा उपसभापति एवं लोकसभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के वेतन भत्ते आदि में संशोधन · अनुच्छेद 125(2) के अंतर्गत SC के न्यायाधीशों के वेतन भत्ते इत्यादि जैसे विशेषाधिकार में संशोधन · अनुच्छेद 148(3) के अंतर्गत, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के वेतन भत्ते, सेवा शर्तों आदि में संशोधन · अनुच्छेद 158(3) के अंतर्गत, राज्यों के राज्यपाल की सेवा शर्तों में परिवर्तन · अनुच्छेद 221(2) HC के न्यायाधीशों के पेंशन आदि में संशोधन · अनुच्छेद 124(1) SC में जजों की संख्या निर्धारित करना · अनुच्छेद 133(3) के अंतर्गत, यदि किसी HC की एक जज की पीठ ने कोई निर्णय दिया है तो संसद चाहे तो उस निर्णय के विरुद्ध सीधे SC में अपील करने पर रोक लगा सकती है| वह यह व्यवस्था कर सकती है(जैसा की वर्तमान में है) कि पहले उसी HC की डिविजन बेंच के सामने अपील की जाए| · अनुच्छेद 135 के अंतर्गत, 26 जनवरी 1950 के पहले तक फ़ेडरल कोर्ट जिन शक्तियों का उपभोग करता था, संसद ने उन शक्तियों को वर्तमान SC को सौंप दिया| · अनुच्छेद 137 के अंतर्गत, सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार देना कि वह संसद द्वारा बनाए गए कानून के दायरे में अपने ही फैसले की समीक्षा कर सकता है · अनुच्छेद 169 के अंतर्गत, यदि संसद चाहे तो साधारण बहुमत से किसी राज्य में ऊपरी सदन अर्थात विधान परिषद् की रचना कर सकती है और उसे समाप्त भी कर सकती है · अनुच्छेद 171(2)के अंतर्गत, किसी राज्य के विधान पार्षदों की संख्या कितनी होगी इसका निर्धारण संसद द्वारा किया जाएगा · अनुच्छेद 343(3) के अंतर्गत, जब संविधान लागू हुआ था तो उस समय यह व्यवस्था की गयी थी कि इसके 15 वर्षों के बाद भी यदि संसद चाहे तो अपने सदन में अंग्रेजी भाषा में सदस्यों को अपनी बात रखने और सदन की कार्यवाही को अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित करने के लिए प्रावधान कर सकती है, और · अनुच्छेद 348(1) के अंतर्गत, यदि संसद चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में अंग्रेजी में कामकाज करने की व्यवस्था आगे भी जारी करने का प्रावधान कर सकती है| इसके लिए संशोधन साधारण बहुमत से किया जाएगा उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान सामान्य महत्त्व के उपबन्धों के संशोधन के लिए साधारण बहुमत से होने वाले संशोधन को मान्यता देता है| इनके अंतर्गत सामान्य प्रशासन से सम्बन्धित उपबन्ध शामिल हैं किन्तु संघीय महत्त्व के विषयों और व्यवस्था में बड़े परिवर्तन लाने वाले संशोधन को विशेष बहुमत अथवा विशेष बहुमत के साथ आधे विधानमंडलों की स्वीकृति के साथ ही किया जा सकता है|
##Question:संविधान संशोधन के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही संविधान के उन उपबन्धों की चर्चा कीजिये जिनमें संसद साधारण बहुमत से संशोधन कर सकती है| (200 शब्द) Explain different types of constitutional amendment. Along with this, discuss the provisions of the Constitution where Parliament can amend by simple majority. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संविधान की जीवन्तता को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में संविधान संशोधन के प्रकारों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में साधारण बहुमत से संशोधनीय उपबन्धों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में उपरोक्त संशोधनों का स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारतीय संविधान विशेषज्ञ भारतीय संविधान को एक जीवंत दस्तावेज मानते हैं| भारतीय संविधान को जीवंत कहने का आधार भारतीय संविधान की संशोधनीयता है| भारतीय संविधान सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप अद्यतन किया जा सकता है इसी सन्दर्भ में भारतीय संविधान को एक जीवंत दस्तावेज माना जाता है| संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार भारतीय संसद, भारतीय संविधान में तीन प्रकारों से संशोधन कर सकती है| संसद के विशेष बहुमत और राज्य के विधान-मंडलों की स्वीकृति से संशोधन · संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन के लिए विधेयक को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत तथा राज्यों के कुल विधान मंडलों में से कम से कम आधे विधानमंडलों द्वारा स्वीकृति आवश्यक है| · सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं संघीय महत्त्व के विषयों के संशोधन में इसी प्रक्रिया को अपनाया जाता है| विशेष बहुमत द्वारा संशोधन · यदि संसद के प्रत्येक सदन द्वारा कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान में भाग लेनेवाले सदस्यों के 2/3 मतों से विधेयक पारित हो जाएं तो राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही वह संशोधन संविधान का अंग बन जाता है| · न्यायपालिका तथा राज्यों के अधिकारों तथा शक्तियों जैसी कुछ विशिष्ट बातों को छोड़कर संविधान की अन्य सभी व्यवस्थाओं में इसी प्रक्रिया के द्वारा संशोधन किया जाता है. साधारण बहुमत द्वारा संशोधन · संसद के साधारण बहुमत द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून बन जाता है. · इसके अंतर्गत राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति मिलने पर संविधान के निम्नलिखित उपबंधों में संशोधन किया जा सकता है साधारण बहुमत से होने वाले संविधान संशोधन · अनुच्छेद 2 के अंतर्गत, संसद द्वारा किसी नए राज्य की स्थापना अथवा संघ में किसी राज्य को दाखिल करना · अनुच्छेद 11 के अंतर्गत, नागरिकता देने या समाप्त करने के सम्बन्ध में कोई उपबन्ध करना · अनुच्छेद 73(2) के अंतर्गत, संसद यदि चाहे तो वह राज्यों को कुछ ऐसे कार्यपालक शक्तियां सौंप सकती है जो पहले संघ के पास थीं · अनुच्छेद 59(3) के अंतर्गत, राष्ट्रपति के वेतन भत्ते आदि में संशोधन · अनुच्छेद 75(6)के अंतर्गत, केन्द्रीय मंत्रियों के वेतन भत्ते आदि में संशोधन · अनुच्छेद 97 के अंतर्गत, राज्य सभा के सभापति तथा उपसभापति एवं लोकसभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के वेतन भत्ते आदि में संशोधन · अनुच्छेद 125(2) के अंतर्गत SC के न्यायाधीशों के वेतन भत्ते इत्यादि जैसे विशेषाधिकार में संशोधन · अनुच्छेद 148(3) के अंतर्गत, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के वेतन भत्ते, सेवा शर्तों आदि में संशोधन · अनुच्छेद 158(3) के अंतर्गत, राज्यों के राज्यपाल की सेवा शर्तों में परिवर्तन · अनुच्छेद 221(2) HC के न्यायाधीशों के पेंशन आदि में संशोधन · अनुच्छेद 124(1) SC में जजों की संख्या निर्धारित करना · अनुच्छेद 133(3) के अंतर्गत, यदि किसी HC की एक जज की पीठ ने कोई निर्णय दिया है तो संसद चाहे तो उस निर्णय के विरुद्ध सीधे SC में अपील करने पर रोक लगा सकती है| वह यह व्यवस्था कर सकती है(जैसा की वर्तमान में है) कि पहले उसी HC की डिविजन बेंच के सामने अपील की जाए| · अनुच्छेद 135 के अंतर्गत, 26 जनवरी 1950 के पहले तक फ़ेडरल कोर्ट जिन शक्तियों का उपभोग करता था, संसद ने उन शक्तियों को वर्तमान SC को सौंप दिया| · अनुच्छेद 137 के अंतर्गत, सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार देना कि वह संसद द्वारा बनाए गए कानून के दायरे में अपने ही फैसले की समीक्षा कर सकता है · अनुच्छेद 169 के अंतर्गत, यदि संसद चाहे तो साधारण बहुमत से किसी राज्य में ऊपरी सदन अर्थात विधान परिषद् की रचना कर सकती है और उसे समाप्त भी कर सकती है · अनुच्छेद 171(2)के अंतर्गत, किसी राज्य के विधान पार्षदों की संख्या कितनी होगी इसका निर्धारण संसद द्वारा किया जाएगा · अनुच्छेद 343(3) के अंतर्गत, जब संविधान लागू हुआ था तो उस समय यह व्यवस्था की गयी थी कि इसके 15 वर्षों के बाद भी यदि संसद चाहे तो अपने सदन में अंग्रेजी भाषा में सदस्यों को अपनी बात रखने और सदन की कार्यवाही को अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित करने के लिए प्रावधान कर सकती है, और · अनुच्छेद 348(1) के अंतर्गत, यदि संसद चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में अंग्रेजी में कामकाज करने की व्यवस्था आगे भी जारी करने का प्रावधान कर सकती है| इसके लिए संशोधन साधारण बहुमत से किया जाएगा उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान सामान्य महत्त्व के उपबन्धों के संशोधन के लिए साधारण बहुमत से होने वाले संशोधन को मान्यता देता है| इनके अंतर्गत सामान्य प्रशासन से सम्बन्धित उपबन्ध शामिल हैं किन्तु संघीय महत्त्व के विषयों और व्यवस्था में बड़े परिवर्तन लाने वाले संशोधन को विशेष बहुमत अथवा विशेष बहुमत के साथ आधे विधानमंडलों की स्वीकृति के साथ ही किया जा सकता है|
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विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत कृषि पर समझौते का वर्णन कीजिये| साथ ही, कृषि पर समझौते के संदर्भ में भारतीय चिंताओं को स्पष्ट कीजिये? (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describe the Agreement on Agriculture under the World Trade Organization. Also, Explain Indian concerns regarding the Agreement on Agriculture? (150-200 words, Marks - 10)
एप्रोच- पहले भाग में डब्लूटीओ के अंतर्गत कृषि पर समझौते का वर्णन कीजिये| दुसरे भाग में इस समझौते के सन्दर्भ में भारतीय चिंताओं को स्पष्ट कीजिये| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उतर का समापन कीजिये| उत्तर- टैरिफ एवं व्यापार पर सामान्य समझौते के अंतर्गत उरुग्वे दौर की बातचीत के बाद विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के साथ ही कृषि पर समझौते का प्रादुर्भाव हुआ था| इस समझौते का उद्देश्य कृषि के व्यापार में सुधार लाना है जिसके द्वारा निष्पक्ष एवं बाजारोन्मुख प्रणाली की स्थापना करने का प्रयास किया गया है| कृषि पर समझौता बुनियादी कृषि उत्पादों(चावल,गेंहू, आदि) के साथ-साथ इनसे प्राप्त उत्पादों(आटा,मांस आदि) तथा प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों(सॉस, चॉकलेट आदि) पर भी लागू होता है| हालांकि इस समझौते के दायरे से मछली तथा मत्स्य उत्पाद, वानिकी उत्पाद आदि बाहर रखे गये हैं| कृषि पर समझौते के 3 मुख्य पक्ष हैं- बाजारी पहुँच - इसके अंतर्गत सभी गैर-टैरिफउपायों को या तो हटा देना चाहिए या टैरिफ के अंतर्गत लाना चाहिए| टैरिफिकेशन का अर्थ है कि सभी गैर-शुल्क बाधाएं जैसे-कोटा, न्यूनतम आयत मूल्य , विवेकाधीन लाईसेंसिंग आदि को समाप्त करके इसे शुल्क में बदला जाये| इसके अंतर्गत विकसित तथा विकासशील देशों के लिए अलग-अलग प्रतिबद्धताओं को लागू किया गया| विकसित देशों को 6 वर्ष के अन्दर औसतन 36% शुल्क में कमी लानी होगी और विकासशील देशों को 24% कमी लानी होगी जिनको 10 वर्ष के भीतर कम करना होगा| आतंरिक सहायता- यह सदस्य राष्ट्रों द्वारा कृषि क्षेत्र को प्रदान की जाने वाली रियायतों/सब्सिडी में कमी से संबन्धित है| कृषि क्षेत्र में सब्सिडी का कम होना भी बाजारी पहुँच का एक भाग है| WTO के ढांचे के अनुसार विकासशील और विकसित देशों को घरेलू सब्सिडी में कमी करनी होगी | उनके कृषि आधारित जीडीपी के अनुसार विकसित देशों के लिए यह सीमा 5% तथा विकासशील देशों के सन्दर्भ में यह 10% है| घरेलू सहायता के अंतर्गत 3 तरह के बॉक्सेस का जिक्र है- ग्रीन बॉक्स - यह विकसित तथा विकासशील दोनों देशों पर लागू होता है| हालांकि, विकासशील देशों के मामले में खाद्य सुरक्षा उद्देश्यों और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोगों के लिए सब्सिडी वाले खाद्य मूल्यों के लिए सरकारी कार्यक्रमों के संबंध में विशेष उपचार प्रदान किया जाता है| जैसे - अनुसंधान, कीट और रोग नियंत्रण कार्यक्रम, कृषि प्रशिक्षण सेवाएँ, विपणन तथा संवर्धन सेवाएँ आदि ब्लू-बॉक्स - यह केवल उत्पादन सीमित कार्यक्रमों के लिए विकसित देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी है| इस तरह की सब्सिडी कोएक सीमा तक WTO में छूट दी गयी है| एम्बर बॉक्स - उत्पादन तथा व्यापार को विकृत करने के लिए माने जाने वाले सभी घरेलू समर्थन उपायों को इसके अंतर्गत रखा गया है| यह कटौती की प्रतिबद्धता के अधीन है(विकसित देश- 5% तथा विकासशील देश- 10%)| इसके अंतर्गत 2 तरह की सब्सिडी- उत्पाद विशिष्ट तथा गैर-उत्पाद विशिष्ट आती हैं| निर्यात संबंधी सहायता - कृषि पर समझौता कृषि उत्पादों के लिए निर्यात सब्सिडी के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है(कुछ शर्तों के साथ)|यह विकसित देशों के लिए 36% कमी 6 वर्ष के अन्दर तथा विकासशील देशों के लिए औसतन 24% की कमी 10 वर्षों के अंदर है| कृषि पर समझौते के संदर्भ में भारतीय चिंताएँ- विकसित देशों द्वारा कृषि निर्यातकों को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दी जाने वाली रियायतें जिससे वैश्विक बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धा पर प्रभाव | गैर-टैरिफ प्रावधानों( श्रम कानून, स्वच्छता, फाइटोसैनिटरी आदि) के द्वारा हमारे उत्पादों की विकसित देशों के बाजार में पहुँच से रोक संबंधी प्रयास | विशेष सुरक्षा प्रावधान(SSM) के अंतर्गत आयत-प्रतिबंध संबंधी प्रावधान | विकसित देशों के पास आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी(बीज अनुसंधान, कीटनाशक आदि) हैं जिसके माध्यम से उत्पादन की लागत तथा कीमतों पर प्रभाव डाला जा सकता है | आंतरिक सहायता के अंतर्गत भारत के खाद्य-सुरक्षा कानूनों की ओर उठते सवाल | विकसित देशों के द्वारा भारत के खाद्य-सुरक्षा उपायों को भी आंतरिक सहायता के अंतर्गत लाने पर जोर दिया जा रहा है| खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु भारत के न्यूनतम घरेलू समर्थन प्रणाली पर विकसित देशों द्वारा उठाये गये सवाल| ग्रीन और ब्लू बॉक्सों के अंतर्गत उनके डिज़ाइन संबंधी मुद्दें भारत कुछ टैक्स छूटों के अलावा कृषि उत्पादों के निर्यात पर विकसित देशों की तरह कोई सब्सिडी प्रदान नहीं करता है| साथ ही, भारतीय संदर्भ में कृषि एक व्यवसाय ना होकर बहुसंख्य आबादी हेतु जीवन-निर्वाह का साधन है| अतः गरीब किसानों की सहायता तथा भारतीय जनता हेतु खाद्य-सुरक्षा के संदर्भ में भारत को कृषि पर समझौते के अंतर्गत अपनी चिंताओं तथा उठाए जा रहे सवालों पर व्यापक एवं बहुद्देशीय रवैया अपनाना होगा|
##Question:विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत कृषि पर समझौते का वर्णन कीजिये| साथ ही, कृषि पर समझौते के संदर्भ में भारतीय चिंताओं को स्पष्ट कीजिये? (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describe the Agreement on Agriculture under the World Trade Organization. Also, Explain Indian concerns regarding the Agreement on Agriculture? (150-200 words, Marks - 10)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में डब्लूटीओ के अंतर्गत कृषि पर समझौते का वर्णन कीजिये| दुसरे भाग में इस समझौते के सन्दर्भ में भारतीय चिंताओं को स्पष्ट कीजिये| इस संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उतर का समापन कीजिये| उत्तर- टैरिफ एवं व्यापार पर सामान्य समझौते के अंतर्गत उरुग्वे दौर की बातचीत के बाद विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के साथ ही कृषि पर समझौते का प्रादुर्भाव हुआ था| इस समझौते का उद्देश्य कृषि के व्यापार में सुधार लाना है जिसके द्वारा निष्पक्ष एवं बाजारोन्मुख प्रणाली की स्थापना करने का प्रयास किया गया है| कृषि पर समझौता बुनियादी कृषि उत्पादों(चावल,गेंहू, आदि) के साथ-साथ इनसे प्राप्त उत्पादों(आटा,मांस आदि) तथा प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों(सॉस, चॉकलेट आदि) पर भी लागू होता है| हालांकि इस समझौते के दायरे से मछली तथा मत्स्य उत्पाद, वानिकी उत्पाद आदि बाहर रखे गये हैं| कृषि पर समझौते के 3 मुख्य पक्ष हैं- बाजारी पहुँच - इसके अंतर्गत सभी गैर-टैरिफउपायों को या तो हटा देना चाहिए या टैरिफ के अंतर्गत लाना चाहिए| टैरिफिकेशन का अर्थ है कि सभी गैर-शुल्क बाधाएं जैसे-कोटा, न्यूनतम आयत मूल्य , विवेकाधीन लाईसेंसिंग आदि को समाप्त करके इसे शुल्क में बदला जाये| इसके अंतर्गत विकसित तथा विकासशील देशों के लिए अलग-अलग प्रतिबद्धताओं को लागू किया गया| विकसित देशों को 6 वर्ष के अन्दर औसतन 36% शुल्क में कमी लानी होगी और विकासशील देशों को 24% कमी लानी होगी जिनको 10 वर्ष के भीतर कम करना होगा| आतंरिक सहायता- यह सदस्य राष्ट्रों द्वारा कृषि क्षेत्र को प्रदान की जाने वाली रियायतों/सब्सिडी में कमी से संबन्धित है| कृषि क्षेत्र में सब्सिडी का कम होना भी बाजारी पहुँच का एक भाग है| WTO के ढांचे के अनुसार विकासशील और विकसित देशों को घरेलू सब्सिडी में कमी करनी होगी | उनके कृषि आधारित जीडीपी के अनुसार विकसित देशों के लिए यह सीमा 5% तथा विकासशील देशों के सन्दर्भ में यह 10% है| घरेलू सहायता के अंतर्गत 3 तरह के बॉक्सेस का जिक्र है- ग्रीन बॉक्स - यह विकसित तथा विकासशील दोनों देशों पर लागू होता है| हालांकि, विकासशील देशों के मामले में खाद्य सुरक्षा उद्देश्यों और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब लोगों के लिए सब्सिडी वाले खाद्य मूल्यों के लिए सरकारी कार्यक्रमों के संबंध में विशेष उपचार प्रदान किया जाता है| जैसे - अनुसंधान, कीट और रोग नियंत्रण कार्यक्रम, कृषि प्रशिक्षण सेवाएँ, विपणन तथा संवर्धन सेवाएँ आदि ब्लू-बॉक्स - यह केवल उत्पादन सीमित कार्यक्रमों के लिए विकसित देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी है| इस तरह की सब्सिडी कोएक सीमा तक WTO में छूट दी गयी है| एम्बर बॉक्स - उत्पादन तथा व्यापार को विकृत करने के लिए माने जाने वाले सभी घरेलू समर्थन उपायों को इसके अंतर्गत रखा गया है| यह कटौती की प्रतिबद्धता के अधीन है(विकसित देश- 5% तथा विकासशील देश- 10%)| इसके अंतर्गत 2 तरह की सब्सिडी- उत्पाद विशिष्ट तथा गैर-उत्पाद विशिष्ट आती हैं| निर्यात संबंधी सहायता - कृषि पर समझौता कृषि उत्पादों के लिए निर्यात सब्सिडी के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है(कुछ शर्तों के साथ)|यह विकसित देशों के लिए 36% कमी 6 वर्ष के अन्दर तथा विकासशील देशों के लिए औसतन 24% की कमी 10 वर्षों के अंदर है| कृषि पर समझौते के संदर्भ में भारतीय चिंताएँ- विकसित देशों द्वारा कृषि निर्यातकों को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दी जाने वाली रियायतें जिससे वैश्विक बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धा पर प्रभाव | गैर-टैरिफ प्रावधानों( श्रम कानून, स्वच्छता, फाइटोसैनिटरी आदि) के द्वारा हमारे उत्पादों की विकसित देशों के बाजार में पहुँच से रोक संबंधी प्रयास | विशेष सुरक्षा प्रावधान(SSM) के अंतर्गत आयत-प्रतिबंध संबंधी प्रावधान | विकसित देशों के पास आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी(बीज अनुसंधान, कीटनाशक आदि) हैं जिसके माध्यम से उत्पादन की लागत तथा कीमतों पर प्रभाव डाला जा सकता है | आंतरिक सहायता के अंतर्गत भारत के खाद्य-सुरक्षा कानूनों की ओर उठते सवाल | विकसित देशों के द्वारा भारत के खाद्य-सुरक्षा उपायों को भी आंतरिक सहायता के अंतर्गत लाने पर जोर दिया जा रहा है| खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु भारत के न्यूनतम घरेलू समर्थन प्रणाली पर विकसित देशों द्वारा उठाये गये सवाल| ग्रीन और ब्लू बॉक्सों के अंतर्गत उनके डिज़ाइन संबंधी मुद्दें भारत कुछ टैक्स छूटों के अलावा कृषि उत्पादों के निर्यात पर विकसित देशों की तरह कोई सब्सिडी प्रदान नहीं करता है| साथ ही, भारतीय संदर्भ में कृषि एक व्यवसाय ना होकर बहुसंख्य आबादी हेतु जीवन-निर्वाह का साधन है| अतः गरीब किसानों की सहायता तथा भारतीय जनता हेतु खाद्य-सुरक्षा के संदर्भ में भारत को कृषि पर समझौते के अंतर्गत अपनी चिंताओं तथा उठाए जा रहे सवालों पर व्यापक एवं बहुद्देशीय रवैया अपनाना होगा|
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What are the different types of plate boundaries? Explain the convergent plate boundary movements. (10 Marks/150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES - CONVERGENT PLATE BOUNDARY MOVEMENTS -CONCLUSION Answer:- The lithosphere is made up of the crust and upper mantle. It extends from the surface of the Earth till a depth of about a 100 km. Plates refer to the broken pieces of the Lithosphere and their movement is called tectonics. As the broken lithospheric pieces i.e. plates cannot stay firm over a liquid (read semi-liquid/ plastic like) material, they move just like boats do over the waters, on the asthenosphere. The plates while so moving to interact with the other plates and the activity that takes place at the boundaries is of great interest for the geologists. THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES There are 3 types of plate boundaries 1) CONVERGENT PLATE BOUNDARIES The plates move towards each other (or one plate moves towards the other plate) and destruction of material takes place. 2) DIVERGENT PLATE BOUNDARIES The plates move away from each other. Magma erupts to fill in the void and new rocks are formed. 3) TRANSFORM PLATE BOUNDARIES The plates simply slide against each other, without much construction or destruction. CONVERGENT PLATE BOUNDARY MOVEMENTS These can be further classified into 3 cases. 1) BETWEEN OCEANIC AND OCEANIC PLATES 1.1) There can be a convergence of such plates. 1.2) The denser or the fast moving plate (in case the densities are equal) subducts beneath the lesser dense plate. 1.3) For example, the Pacific plate converges with the Japanese plate. The Pacific plate being denser subducts beneath the Japanese plate. 1.4) The frictional force between the 2 plates creates heat, which causes the rocky material of the denser oceanic crust to melt and form magma. The magma thus plumes up and forms volcanic mountains. 1.5) If the peaks of these mountains become visible above the water level then islands are formed- Almost all volcanic islands are formed due to such ocean-ocean plate convergence. 1.6) If there is more volcanism, then more islands are formed, creating a chain of islands known as island archipelagoes. Example of this is Ryuku islands. 2) BETWEEN OCEANIC AND CONTINENTAL PLATES 2.1) The example for this is the convergence of North America and South America on 1 side with the Pacific plate on the other side. 2.2) Density is inversely proportional to volume. 2.3) The oceanic plate being denser subducts beneath the continental plate. 2.4) This deforms the continent to form fold mountains. 2.5) Also, due to frictional force, the crust melts (both oceanic and continental crust melts) and forms magma, which plumes up to form volcanic mountains. 2.6) For example, fold mountains like the Rockies in North America and Andes in South America. Volcanic mountains there are Mount Cotopaxi of Ecuador and Mount Aconcagua of Chile. 3) BETWEEN CONTINENTAL AND CONTINENTAL PLATES 3.1) The example for this is Asia on one side and peninsular India on the other side. 3.2) Such convergence leads to the folding of continents to form the fold mountains. 3.3) Since there are no rocks to subduct, there is no melting of rocks and hence no volcanism. But there are volcanism associated features like geysers hot springs and fumaroles due to some amount of friction taking place The Volume of the Earth remains constant because if convergence is witnessed at one boundary of the plate( with the neighbouring plate), then divergence is witnessed at the other side of the plate boundary with respect to the neighbouring plate. Therefore, the destruction of material is almost equal to the construction of material at both the boundary ends of the plate.
##Question:What are the different types of plate boundaries? Explain the convergent plate boundary movements. (10 Marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES - CONVERGENT PLATE BOUNDARY MOVEMENTS -CONCLUSION Answer:- The lithosphere is made up of the crust and upper mantle. It extends from the surface of the Earth till a depth of about a 100 km. Plates refer to the broken pieces of the Lithosphere and their movement is called tectonics. As the broken lithospheric pieces i.e. plates cannot stay firm over a liquid (read semi-liquid/ plastic like) material, they move just like boats do over the waters, on the asthenosphere. The plates while so moving to interact with the other plates and the activity that takes place at the boundaries is of great interest for the geologists. THE TYPES OF PLATE BOUNDARIES There are 3 types of plate boundaries 1) CONVERGENT PLATE BOUNDARIES The plates move towards each other (or one plate moves towards the other plate) and destruction of material takes place. 2) DIVERGENT PLATE BOUNDARIES The plates move away from each other. Magma erupts to fill in the void and new rocks are formed. 3) TRANSFORM PLATE BOUNDARIES The plates simply slide against each other, without much construction or destruction. CONVERGENT PLATE BOUNDARY MOVEMENTS These can be further classified into 3 cases. 1) BETWEEN OCEANIC AND OCEANIC PLATES 1.1) There can be a convergence of such plates. 1.2) The denser or the fast moving plate (in case the densities are equal) subducts beneath the lesser dense plate. 1.3) For example, the Pacific plate converges with the Japanese plate. The Pacific plate being denser subducts beneath the Japanese plate. 1.4) The frictional force between the 2 plates creates heat, which causes the rocky material of the denser oceanic crust to melt and form magma. The magma thus plumes up and forms volcanic mountains. 1.5) If the peaks of these mountains become visible above the water level then islands are formed- Almost all volcanic islands are formed due to such ocean-ocean plate convergence. 1.6) If there is more volcanism, then more islands are formed, creating a chain of islands known as island archipelagoes. Example of this is Ryuku islands. 2) BETWEEN OCEANIC AND CONTINENTAL PLATES 2.1) The example for this is the convergence of North America and South America on 1 side with the Pacific plate on the other side. 2.2) Density is inversely proportional to volume. 2.3) The oceanic plate being denser subducts beneath the continental plate. 2.4) This deforms the continent to form fold mountains. 2.5) Also, due to frictional force, the crust melts (both oceanic and continental crust melts) and forms magma, which plumes up to form volcanic mountains. 2.6) For example, fold mountains like the Rockies in North America and Andes in South America. Volcanic mountains there are Mount Cotopaxi of Ecuador and Mount Aconcagua of Chile. 3) BETWEEN CONTINENTAL AND CONTINENTAL PLATES 3.1) The example for this is Asia on one side and peninsular India on the other side. 3.2) Such convergence leads to the folding of continents to form the fold mountains. 3.3) Since there are no rocks to subduct, there is no melting of rocks and hence no volcanism. But there are volcanism associated features like geysers hot springs and fumaroles due to some amount of friction taking place The Volume of the Earth remains constant because if convergence is witnessed at one boundary of the plate( with the neighbouring plate), then divergence is witnessed at the other side of the plate boundary with respect to the neighbouring plate. Therefore, the destruction of material is almost equal to the construction of material at both the boundary ends of the plate.
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अंतर्राज्यीय परिषद की संरचना एवं उद्देश्यों को बताइये। क्या आपको लगता है कि भारत में एक स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद की आवश्यकता है? (150- 200 शब्द, 10 अंक) Discuss about the structure and objective of inte-state council. Do you think there is need for a permanent inter-state council? (150-250 words, 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: · भूमिका में अंतरराज्यीय परिषद के बारे में लिखिए। · इसके बाद क्रमशः संरचना और उद्देश्यों को लिखिए। · इसके बाद तर्क दीजिये क्या इसे स्थायी रूप देना चाहिए। · निष्कर्ष अनुच्छेद 263 राज्यों के मध्य तथा केंद्र एवं राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद के गठन की व्यवस्था करता है। गौरतलब है कि केंद्र एवं राज्यों के मध्य विवादित मुद्दों के समाधान के लिए सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर इस परिषद का गठन किया गया। राष्ट्रपति ऐसी परिषदों के कर्तव्यों, इसके संगठन और प्रक्रिया को निर्धारित कर सकता है। संरचना: · प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष) · सभी राज्यों के मुख्यमंत्री · विधानसभा वाले संघराज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा गैर विधान सभा वाले संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक · राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल · गृहमंत्री सहित प्रधानमंत्री द्वारा नामित छः केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री उद्देश्य: · केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों के समाधान के लिए सुझाव देना · केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के साझे हितों की पहचान तथा उनकी संवृद्धि हेतु चर्चा करना। · समन्वयात्मक तथा सहयोगात्मक वातावरण के निर्माण के लिए सुझाव देना · नीतियों तथा कार्यवाहियों में समन्वय स्थापित करने के प्रयास करना गौरतलब है कि अंतरराज्यीय परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय नहीं है परंतु यदि राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत होता है कि इस परिषद की स्थापना लोकहित के लिए आवश्यक है तब इसे किसी भी समय स्थापित किया जा सकता है। स्थायी परिषद न होने से इसकी बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं होती जैसे कि हाल ही में इसकी बैठक 12 वर्ष के अंतराल के पश्चात हुई थी। इसे केवल वार्ता मंच के रूप में देखा जाता है। इसकी अनुशंसाएं बाध्यकारी भी नहीं होती हैं। यदि परिषद को स्थायी रूप दे दिया जाए तो यह केंद्र राज्य सम्बन्धों को सुदृढ़ करने में निम्नप्रकार से महत्वपूर्ण होगा: · चूंकि पहले ही इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है अतः स्थायी रूप प्रदान करने से इसके सिफ़ारिशों का महत्व बढ़ जाएगा। कुछ प्रमुख बिन्दुओं के बाध्यकारी भी बनाया जा सकता है। · अस्थायी होने के कारण विभिन्न बैठकों में निर्णय तो ले लिए जाते हैं परंतु उनके क्रियान्वयन आदि की नियमित देखरेख नहीं हो पाती है। · केंद्र में बहुमत से एक दलीय सरकार की वापसी हुई है। इस संदर्भ में संघीय ढांचे को और समंजस्य पूर्ण तरीके से कार्य करने हेतु आईएससी के माध्यम से अंतर-सरकारी तंत्र को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। · पुंछी आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि परिषद की एक वर्ष में कम से कम तीन बैठकें हों। इसे वास्तविक रूप देने के लिए स्थायी रूप देते हुए इसके अधिदेश को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। हालांकि यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि अंतरराज्यीय परिषद का स्थायी रूप नीति आयोग के कार्य क्षेत्र में बाधा उत्पन्न न करे। इसके साथ ही वर्तमान में परिषद की जो स्थायी समिति कार्यरत है उसके बैठकों को नियमित रूप से आयोजित किया जाना चाहिए।
##Question:अंतर्राज्यीय परिषद की संरचना एवं उद्देश्यों को बताइये। क्या आपको लगता है कि भारत में एक स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद की आवश्यकता है? (150- 200 शब्द, 10 अंक) Discuss about the structure and objective of inte-state council. Do you think there is need for a permanent inter-state council? (150-250 words, 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: · भूमिका में अंतरराज्यीय परिषद के बारे में लिखिए। · इसके बाद क्रमशः संरचना और उद्देश्यों को लिखिए। · इसके बाद तर्क दीजिये क्या इसे स्थायी रूप देना चाहिए। · निष्कर्ष अनुच्छेद 263 राज्यों के मध्य तथा केंद्र एवं राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद के गठन की व्यवस्था करता है। गौरतलब है कि केंद्र एवं राज्यों के मध्य विवादित मुद्दों के समाधान के लिए सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर इस परिषद का गठन किया गया। राष्ट्रपति ऐसी परिषदों के कर्तव्यों, इसके संगठन और प्रक्रिया को निर्धारित कर सकता है। संरचना: · प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष) · सभी राज्यों के मुख्यमंत्री · विधानसभा वाले संघराज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा गैर विधान सभा वाले संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक · राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल · गृहमंत्री सहित प्रधानमंत्री द्वारा नामित छः केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री उद्देश्य: · केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों के समाधान के लिए सुझाव देना · केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के साझे हितों की पहचान तथा उनकी संवृद्धि हेतु चर्चा करना। · समन्वयात्मक तथा सहयोगात्मक वातावरण के निर्माण के लिए सुझाव देना · नीतियों तथा कार्यवाहियों में समन्वय स्थापित करने के प्रयास करना गौरतलब है कि अंतरराज्यीय परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय नहीं है परंतु यदि राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत होता है कि इस परिषद की स्थापना लोकहित के लिए आवश्यक है तब इसे किसी भी समय स्थापित किया जा सकता है। स्थायी परिषद न होने से इसकी बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं होती जैसे कि हाल ही में इसकी बैठक 12 वर्ष के अंतराल के पश्चात हुई थी। इसे केवल वार्ता मंच के रूप में देखा जाता है। इसकी अनुशंसाएं बाध्यकारी भी नहीं होती हैं। यदि परिषद को स्थायी रूप दे दिया जाए तो यह केंद्र राज्य सम्बन्धों को सुदृढ़ करने में निम्नप्रकार से महत्वपूर्ण होगा: · चूंकि पहले ही इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है अतः स्थायी रूप प्रदान करने से इसके सिफ़ारिशों का महत्व बढ़ जाएगा। कुछ प्रमुख बिन्दुओं के बाध्यकारी भी बनाया जा सकता है। · अस्थायी होने के कारण विभिन्न बैठकों में निर्णय तो ले लिए जाते हैं परंतु उनके क्रियान्वयन आदि की नियमित देखरेख नहीं हो पाती है। · केंद्र में बहुमत से एक दलीय सरकार की वापसी हुई है। इस संदर्भ में संघीय ढांचे को और समंजस्य पूर्ण तरीके से कार्य करने हेतु आईएससी के माध्यम से अंतर-सरकारी तंत्र को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। · पुंछी आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि परिषद की एक वर्ष में कम से कम तीन बैठकें हों। इसे वास्तविक रूप देने के लिए स्थायी रूप देते हुए इसके अधिदेश को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। हालांकि यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि अंतरराज्यीय परिषद का स्थायी रूप नीति आयोग के कार्य क्षेत्र में बाधा उत्पन्न न करे। इसके साथ ही वर्तमान में परिषद की जो स्थायी समिति कार्यरत है उसके बैठकों को नियमित रूप से आयोजित किया जाना चाहिए।
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1967 के बाद से न्यायपालिका के दृष्टिकोण में आये बदलाव ने विधायिका बनाम न्यापालिका संघर्ष को बढ़ा दिया था जिसकी परिणति आधारभूत ढांचे की अवधारणा के रूप में हुई| कथन के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संविधान की आधारभूत संरचना के सिद्धांत के क्रमिक विकास पर चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द, अंक 10) The change in the approach of the judiciary since 1967 increased the legislature versus judiciary conflict, which culminated in the concept of basic structure. Discuss the evolution of the doctrine of the basic structure of the Indian Constitution in the context of the statement. (150 to 200 words, Marks 10)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में आधारभूत संरचना के सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में सिद्धांत के क्रमिक विकास को विस्तार से समझाइये 3- अंतिम में वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आधारभूत संरचना के सिद्धांत, भारतीय संविधान में संशोधन करने के सन्दर्भ में संसद की अधिकारिता से सम्बन्धित है| भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के कुछ तत्व, की व्यवस्था एवं संवैधानिक स्थिति के सन्दर्भ में इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनमें संशोधन नहीं किया जा सकता है| न्यायालय का मानना है कि संविधान एवं राजव्यवस्था के आधारभूत तत्वों के यदि संशोधन किया जाएगा तो यह व्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा| आधारभूत संरचना के सिद्धांत, भारतीय विधायिका एवं न्यायपालिका के संघर्ष के मध्य विकसित सिद्धांत है| आधारभूत संरचना का सिद्धांत लम्बे संवैधानिक विकास का परिणाम है| आधारभूत संरचना के सिद्धांत के विकास को अग्रलिखित विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है| ध्यातव्य है कि 1964 में सज्जन सिंह वाद की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मुधोलकर ने पहली बार आधारभूत लक्षण का उल्लेख किया था संसद के समविधायी अधिकार की अवधारणा · संविधान में जिन उपबन्धों में संसद द्वारा संशोधन संभव है उसका उल्लेख उस उपबन्ध में ही कर दिया गया है| जैसे "संसद द्वारा विधि के दायरे में" "संसद द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुरूप" आदि · सर्वोच्च न्यायालय उस अधिकार को समविधायी नहीं मानता जिसके विषय में निर्धारित उपबन्ध में संसद की शक्तियों का उल्लेख नहीं है · ऐसे अधिकार को आत्यंतिक(outside/accidental/incidental) अधिकार(बाहर से प्राप्त किया गया अधिकार)माना गया है| गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 · इस मामले में SC की संविधानपीठ ने 6:5 के बहुमत से संविधान के भाग 3 में वर्णित मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया का प्रयोग कर संशोधन करने पर रोक लगा दी और निम्नलिखित व्यवस्था दी · मौलिक अधिकारों में किसी भी तरह से संशोधन संभव नहीं है · उपरोक्त संशोधन के उपरान्त जिस अधिनियम का निर्माण होता है वह अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत उस विधि की परिभाषा में शामिल किया जाएगा जिससे यदि भाग 3 के किसी भी उपबन्ध का उल्लंघन होता है तो उक्त विधि को आंशिक रूप से या सम्पूर्ण रूप से रद्द कर दिया जाएगा| दूसरे शब्दों में संसोधन के उपरान्त बनने वाला अधिनियम अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत "विधि" माना जाएगा| · हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में भाग 3 को यह सोच कर शामिल नहीं किया है कि उसे संसद जब चाहे संशोधित कर दे, यदि ऐसा हुआ तो संविधान का शेष भाग निर्जीव दस्तावेज बन कर रह जाएगा| अतः भाग 3 में संशोधन काअधिकार एक नयी तथा निर्वाचित संविधान सभा को होगान कि वर्तमान संसद को| निर्णय दिया गया कि भाग 3 में संविधान संशोधन,संसद का समविधायी(अंतर्भूत/अंतर्निहित/constituent)अधिकार नहींहै 24वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971 · इस संशोधन के माध्यम से श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने गोलकनाथ मुकदमें में SC की सम्विधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले को पलट दिया · इसमें यह व्यवस्था की गयी कि अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर संविधान के किसी भी भाग में संसद को संशोधन का अधिकार होगा जिसमें भाग 3 भी शामिल है · इसी संशोधन के द्वारा यह भी व्यवस्था की गयी कि भाग 3 में किये गए संशोधन के उपरान्त जिस अधिनियम का निर्माण होगा उसे अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत "विधि" नही माना जाएगा बल्कि इसे एक सामान्य विधान माना जाएगा| अतः इस प्रकार इसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी 25वां संविधान संशोधन अधिनियम 1975 · इस में यह व्यवस्था की गयी कि यदि सरकार भाग 4 में वर्णित किसी भी नीति निदेशक तत्व को कानून बना कर लागू करती है, और यदि इस प्रक्रिया में भाग 3 में वर्णित किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो भी भाग 4 ही प्रभावी होगा · इसके लिए इस संशोधन में अनुच्छेद 31(C) के रूप में एक नया उपबन्ध जोड़ा गया, मिनर्वामिल्स वाद 1980 · हालांकि मिनर्वामिल्स वाद 1980 में SC ने उक्त संसोधन के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करते हुए केवल 39(B) और 39(C) तक ही प्रभावी रखा| अर्थात यदि 39(B) और 39(C) में वर्णित उपबन्ध को लागू करने के लिए विधानमंडल कोई कानून बनाता है और यदि इस प्रक्रिया में कोई मौलिक अधिकार प्रभावित होता है या किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो भी 39(B) और 39(C)ही प्रभावी होंगे, किन्तु भाग 4 के शेष उपबन्ध लागू करते समय यदि भाग 3 के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो मौलिक अधिकार ही प्रभावी होगा केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 · इस मुकदमें में SC ने आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया था| 1973 में केशवानंद भारती वाद के प्रमुख लेखक न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना ने जस्टिस मुधोलकर की बात को दुहराते हुए बहुमत के फैसले को आधार बना कर आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया| · इस फैसले में SC ने 24 वें संविधान सशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को उचित बताया था अर्थात अनुच्छेद 368 में वर्णित प्रक्रिया का प्रयोग कर संसद संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकती है और यह उसका समविधायी अधिकार है · इस प्रकार इस मुकदमें में SC ने 1967 में गोलकनाथ वाद में दिए गए अपने ही फैसले को पलट दिया, · किन्तु श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा 24 वें संविधान संशोधन अधिनियम को संसद द्वारा पारित कराये जाने की अधिकारिता को तो उचित ठहरायाकिन्तु उसकी सीमा तय कर दी · SC ने कहा कि संविधान के कुछ ऐसे आधार भूत लक्षण हैं जो अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर या किसी भी अन्य प्रकार से संशोधित नहीं किये जा सकते| आधारभूत लक्षण सिद्धांत का विस्तार · हालांकि 1973 में केशवानंद भारती वाद के प्रमुख लेखक न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना ने आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया|किन्तु उस समय यह नहीं बताया गया कि इसमें संविधान के कौन-कौन लक्षण शामिल होंगे, किन्तु आगे के अपने अलग अलग फैसले में SC ने बारी बारी से इसे बताया जैसे; · मिनर्वामिल्स वाद 1980 में SC ने न्यायिक समीक्षा को आधारभूत लक्षण बताया · मारूराम वाद 1980 एवं वामनराव वाद 1981 में SC ने पुनः इसी बात को दुहराया · किहोटो होलो हान बनाम जचील्हू तथा अन्य वाद 1991 एवं एल चंदर कुमार वाद 1997 में SC ने पुनः एक बार न्यायिक समीक्षा को आधारभूत लक्षण बताया · द्वितीय जज वाद 1993, तृतीय जज वाद 1998 एवं एडवोकेट्स ओन रिकार्ड्स वाद 2017 में SC ने न्यायापालिका को कार्यपालिका से अलग रखने को आधारभूत लक्षण बताया · इस प्रकार एस आर बोम्मई वाद 1993 में SC ने जनतंत्र को आधारभूत लक्षण बताया इस प्रकार देखते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने ने अपने अलग अलग फैसलों में विभिन्न तत्वों को आधारभूत लक्षण घोषित किया है| वर्तमान में न्यायपालिका के द्वारा पंथनिरपेक्षता, विधि का शासन, विधि की उचित प्रक्रिया, गणतांत्रिक व्यवस्था, संघीय ढांचा, लोक संप्रभुता, निर्वाचन प्रणाली, देश की एकता और अखंडता तथा संप्रभुता, साम्प्रदायिक सौहार्द तथा सामाजिक न्याय, संसदीय प्रणाली औरजनतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से नीति निर्धारणआदि को आधारभूत लक्षण घोषित कर यह व्यवस्था दी है कि इनमें कोई भी संशोधन संभव नहीं है| इसे संविधान विशेषज्ञ, संविधान का अक्षुण्ण अंग या सिल्वर लाइनिंग कह कर संबोधित करते हैं|
##Question:1967 के बाद से न्यायपालिका के दृष्टिकोण में आये बदलाव ने विधायिका बनाम न्यापालिका संघर्ष को बढ़ा दिया था जिसकी परिणति आधारभूत ढांचे की अवधारणा के रूप में हुई| कथन के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संविधान की आधारभूत संरचना के सिद्धांत के क्रमिक विकास पर चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द, अंक 10) The change in the approach of the judiciary since 1967 increased the legislature versus judiciary conflict, which culminated in the concept of basic structure. Discuss the evolution of the doctrine of the basic structure of the Indian Constitution in the context of the statement. (150 to 200 words, Marks 10)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आधारभूत संरचना के सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में सिद्धांत के क्रमिक विकास को विस्तार से समझाइये 3- अंतिम में वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आधारभूत संरचना के सिद्धांत, भारतीय संविधान में संशोधन करने के सन्दर्भ में संसद की अधिकारिता से सम्बन्धित है| भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के कुछ तत्व, की व्यवस्था एवं संवैधानिक स्थिति के सन्दर्भ में इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनमें संशोधन नहीं किया जा सकता है| न्यायालय का मानना है कि संविधान एवं राजव्यवस्था के आधारभूत तत्वों के यदि संशोधन किया जाएगा तो यह व्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा| आधारभूत संरचना के सिद्धांत, भारतीय विधायिका एवं न्यायपालिका के संघर्ष के मध्य विकसित सिद्धांत है| आधारभूत संरचना का सिद्धांत लम्बे संवैधानिक विकास का परिणाम है| आधारभूत संरचना के सिद्धांत के विकास को अग्रलिखित विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है| ध्यातव्य है कि 1964 में सज्जन सिंह वाद की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मुधोलकर ने पहली बार आधारभूत लक्षण का उल्लेख किया था संसद के समविधायी अधिकार की अवधारणा · संविधान में जिन उपबन्धों में संसद द्वारा संशोधन संभव है उसका उल्लेख उस उपबन्ध में ही कर दिया गया है| जैसे "संसद द्वारा विधि के दायरे में" "संसद द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुरूप" आदि · सर्वोच्च न्यायालय उस अधिकार को समविधायी नहीं मानता जिसके विषय में निर्धारित उपबन्ध में संसद की शक्तियों का उल्लेख नहीं है · ऐसे अधिकार को आत्यंतिक(outside/accidental/incidental) अधिकार(बाहर से प्राप्त किया गया अधिकार)माना गया है| गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 · इस मामले में SC की संविधानपीठ ने 6:5 के बहुमत से संविधान के भाग 3 में वर्णित मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया का प्रयोग कर संशोधन करने पर रोक लगा दी और निम्नलिखित व्यवस्था दी · मौलिक अधिकारों में किसी भी तरह से संशोधन संभव नहीं है · उपरोक्त संशोधन के उपरान्त जिस अधिनियम का निर्माण होता है वह अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत उस विधि की परिभाषा में शामिल किया जाएगा जिससे यदि भाग 3 के किसी भी उपबन्ध का उल्लंघन होता है तो उक्त विधि को आंशिक रूप से या सम्पूर्ण रूप से रद्द कर दिया जाएगा| दूसरे शब्दों में संसोधन के उपरान्त बनने वाला अधिनियम अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत "विधि" माना जाएगा| · हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में भाग 3 को यह सोच कर शामिल नहीं किया है कि उसे संसद जब चाहे संशोधित कर दे, यदि ऐसा हुआ तो संविधान का शेष भाग निर्जीव दस्तावेज बन कर रह जाएगा| अतः भाग 3 में संशोधन काअधिकार एक नयी तथा निर्वाचित संविधान सभा को होगान कि वर्तमान संसद को| निर्णय दिया गया कि भाग 3 में संविधान संशोधन,संसद का समविधायी(अंतर्भूत/अंतर्निहित/constituent)अधिकार नहींहै 24वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971 · इस संशोधन के माध्यम से श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने गोलकनाथ मुकदमें में SC की सम्विधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले को पलट दिया · इसमें यह व्यवस्था की गयी कि अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर संविधान के किसी भी भाग में संसद को संशोधन का अधिकार होगा जिसमें भाग 3 भी शामिल है · इसी संशोधन के द्वारा यह भी व्यवस्था की गयी कि भाग 3 में किये गए संशोधन के उपरान्त जिस अधिनियम का निर्माण होगा उसे अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत "विधि" नही माना जाएगा बल्कि इसे एक सामान्य विधान माना जाएगा| अतः इस प्रकार इसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी 25वां संविधान संशोधन अधिनियम 1975 · इस में यह व्यवस्था की गयी कि यदि सरकार भाग 4 में वर्णित किसी भी नीति निदेशक तत्व को कानून बना कर लागू करती है, और यदि इस प्रक्रिया में भाग 3 में वर्णित किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो भी भाग 4 ही प्रभावी होगा · इसके लिए इस संशोधन में अनुच्छेद 31(C) के रूप में एक नया उपबन्ध जोड़ा गया, मिनर्वामिल्स वाद 1980 · हालांकि मिनर्वामिल्स वाद 1980 में SC ने उक्त संसोधन के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करते हुए केवल 39(B) और 39(C) तक ही प्रभावी रखा| अर्थात यदि 39(B) और 39(C) में वर्णित उपबन्ध को लागू करने के लिए विधानमंडल कोई कानून बनाता है और यदि इस प्रक्रिया में कोई मौलिक अधिकार प्रभावित होता है या किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो भी 39(B) और 39(C)ही प्रभावी होंगे, किन्तु भाग 4 के शेष उपबन्ध लागू करते समय यदि भाग 3 के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो मौलिक अधिकार ही प्रभावी होगा केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 · इस मुकदमें में SC ने आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया था| 1973 में केशवानंद भारती वाद के प्रमुख लेखक न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना ने जस्टिस मुधोलकर की बात को दुहराते हुए बहुमत के फैसले को आधार बना कर आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया| · इस फैसले में SC ने 24 वें संविधान सशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को उचित बताया था अर्थात अनुच्छेद 368 में वर्णित प्रक्रिया का प्रयोग कर संसद संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकती है और यह उसका समविधायी अधिकार है · इस प्रकार इस मुकदमें में SC ने 1967 में गोलकनाथ वाद में दिए गए अपने ही फैसले को पलट दिया, · किन्तु श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा 24 वें संविधान संशोधन अधिनियम को संसद द्वारा पारित कराये जाने की अधिकारिता को तो उचित ठहरायाकिन्तु उसकी सीमा तय कर दी · SC ने कहा कि संविधान के कुछ ऐसे आधार भूत लक्षण हैं जो अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर या किसी भी अन्य प्रकार से संशोधित नहीं किये जा सकते| आधारभूत लक्षण सिद्धांत का विस्तार · हालांकि 1973 में केशवानंद भारती वाद के प्रमुख लेखक न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना ने आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया|किन्तु उस समय यह नहीं बताया गया कि इसमें संविधान के कौन-कौन लक्षण शामिल होंगे, किन्तु आगे के अपने अलग अलग फैसले में SC ने बारी बारी से इसे बताया जैसे; · मिनर्वामिल्स वाद 1980 में SC ने न्यायिक समीक्षा को आधारभूत लक्षण बताया · मारूराम वाद 1980 एवं वामनराव वाद 1981 में SC ने पुनः इसी बात को दुहराया · किहोटो होलो हान बनाम जचील्हू तथा अन्य वाद 1991 एवं एल चंदर कुमार वाद 1997 में SC ने पुनः एक बार न्यायिक समीक्षा को आधारभूत लक्षण बताया · द्वितीय जज वाद 1993, तृतीय जज वाद 1998 एवं एडवोकेट्स ओन रिकार्ड्स वाद 2017 में SC ने न्यायापालिका को कार्यपालिका से अलग रखने को आधारभूत लक्षण बताया · इस प्रकार एस आर बोम्मई वाद 1993 में SC ने जनतंत्र को आधारभूत लक्षण बताया इस प्रकार देखते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने ने अपने अलग अलग फैसलों में विभिन्न तत्वों को आधारभूत लक्षण घोषित किया है| वर्तमान में न्यायपालिका के द्वारा पंथनिरपेक्षता, विधि का शासन, विधि की उचित प्रक्रिया, गणतांत्रिक व्यवस्था, संघीय ढांचा, लोक संप्रभुता, निर्वाचन प्रणाली, देश की एकता और अखंडता तथा संप्रभुता, साम्प्रदायिक सौहार्द तथा सामाजिक न्याय, संसदीय प्रणाली औरजनतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से नीति निर्धारणआदि को आधारभूत लक्षण घोषित कर यह व्यवस्था दी है कि इनमें कोई भी संशोधन संभव नहीं है| इसे संविधान विशेषज्ञ, संविधान का अक्षुण्ण अंग या सिल्वर लाइनिंग कह कर संबोधित करते हैं|
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भारत के संदर्भ में, बेरोजगारी के कारणों के बारे में विस्तार से चर्चा कीजिये? साथ ही, भारत में बेरोजगारी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) In the context of India, Discuss, in detail, the reasons for unemployment? Also, Mention the measures that can be taken to reduce unemployment in India. (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच- बेरोजगारी को परिभाषित करते हुए, बेरोजगारी के प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारम्भ कीजिये| पहले भाग में, भारत में बेरोजगारी के कारणों के बारे में चर्चा कीजिये| दूसरे भाग में, बेरोजगारी दूर करने की महता बताते हुए, भारत में बेरोजगारी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों को बताईये| निष्कर्षतः, सरकारी प्रयासों का संक्षिप्तता से जिक्र कीजिये| उत्तर- बेरोजगारी वह अवस्था है जिसमे व्यक्ति वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार है, परन्तु काम के अभाव में वह बिना काम के रह जाता है| बेरोजगारी की गणना करते समय केवल उन्ही व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जो काम करने योग्य हैं ,काम करने को इच्छुक हैं तथा वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं| विभिन्न कारकों के अनुसार बेरोजगारी को ऐच्छिक, अनैच्छिक, संरचनात्मक, प्रच्छन्न, मौसमी, चक्रीय आदि प्रकारों में बाँटा जाता है| भारत में बेरोजगारी तथा उसके कारण- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन तथा रोजगार कार्यालयों के हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी बढ़ी है| हमारी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी रोजगार से वंचित है तथा इस वजह से गरीबी के दुष्चक्र में फंसा हुआ है| इस संदर्भ में, भारत में बेरोजगारी के निम्न कारण गिनाए जा सकते हैं - भारत में गरीबी का सबसे बड़ा कारण भारत की विशाल जनसँख्या है| अधिक जनदबाव के कारण सभी लोगों को रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता है| हमारी जनसँख्या का बड़ा हिस्सा आज भी कृषि पर निर्भर है| कृषि जीवन निर्वाह कासाधन तो हैपरन्तु इसपर निर्भर जनसँख्या के बड़े हिस्से के कारण यह प्रच्छन्न बेरोजगारी को जन्म देता है| सीमित भूमि तथा भूमीके विखंडन के कारण उत्पन प्रछन्न बेरोजगारी| कृषि के पिछड़े तरीके की वजह से उत्पादन के सापेक्ष श्रमबल की उपलब्धता ज्यादा है जिससे कृषि से बेहतर आय का सृजन नहीं हो पाता है| आधुनिक तकनीक के प्रभाव के चलते कुटीर उद्योगों में गिरावट आई है जिससे उसपर निर्भर जनसँख्या बेरोजगारी के दुष्चक्र में फंसती जा रही है| दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली से हम उद्योगों हेतु कुशल तथा प्रशिक्षित श्रमबल तैयार नहीं कर पा रहे हैं|भारत के शिक्षित युवा वर्ग में बढती बेरोजगारी हेतु यह प्रमुख उतरदायी कारक है| भारत में अधिकांश स्नातक कोई भीआधुनिक रोजगार प्राप्त करने हेतु आवश्यक व्यावहारिक योग्यता नहीं रखते हैं| अपर्याप्त रोजगार योजनाओं की वजह से भी शिक्षित वर्ग रोजगार प्राप्ति से वंचित हो जाता है| विनिर्माण क्षेत्र में अपर्याप्त विकास और कम निवेश द्वितीयक क्षेत्र की रोजगार क्षमता को सीमित करता है। आवश्यक शिक्षा/कौशल की कमी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा विशाल कार्यबल; छोटे/कुटीर उद्योगों या छोटे व्यवसायों के लिए अपर्याप्त राज्य समर्थन, कानूनी जटिलताएं और कम अवसंरचनात्मक एवं वितीय प्रोत्साहन; लैंगिक भेदभाव तथा प्रतिगामी सामाजिक मानदंड जो महिलाओं को रोजगार लेने/जारी रखने से रोकते हैं। सरकारी योजनाओं/प्रयासों/नीतियों के उचित कार्यान्वयन का अभाव भारत में बेरोजगारी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपाय- बेरोजगारी की वजह से गरीबी तथा सामजिक असमानता में बढ़ोतरी होती है| अवैध तथा असामाजिक गतिविधियों में बेरोजगार जनसंख्या के लिप्त होने की संभावना बढ़ जाती है जिससे कानून एवं व्यवस्था पर गंभीर खतरे उत्पन हो सकते हैं| साथ ही, संभावित श्रमबल के अनुत्पादक होने की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है| अतः, सामाजिक तथा आर्थिक सशक्तिकरण एवं संधारणीय विकास हेतु बेरोजगारी कम करना अतिआवश्यक है| इस संदर्भ में, भारत में बेरोजगारी दूर करने हेतु निम्न प्रयास किये जा सकते हैं- श्रम गहन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान; संरचनात्मक बेरोजगारी की समस्या से निपटने हेतु शिक्षा प्रणाली में सुधार ; जनसंख्या नियंत्रण ; दूरदराज के क्षेत्रों तक सामाजिक सेवाओं का विस्तार ताकि पिछड़े क्षेत्रों में भी विकास प्रक्रिया शुरू हो सके ; स्वरोजगार प्रोत्साहन ; लघु तथा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा ; ग्रामीण विकास तथा रोजगार सृजन योजनाओं का सही क्रियान्वयन ; विनिर्माण क्षेत्र में निवेश प्रोत्साहन के उपाय ; खाद्य-प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों पर ज्यादा जोर ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान हो ; सरकार द्वारा इस संदर्भ में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में अनेको नीतियाँ लायी गयी हैं| मनरेगा, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसे कार्यक्रमों के द्वारा बेरोजगारी के मूल कारणों को पहचानकर उसे दूर करने हेतु प्रयास किये जा रहे हैं|
##Question:भारत के संदर्भ में, बेरोजगारी के कारणों के बारे में विस्तार से चर्चा कीजिये? साथ ही, भारत में बेरोजगारी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) In the context of India, Discuss, in detail, the reasons for unemployment? Also, Mention the measures that can be taken to reduce unemployment in India. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- बेरोजगारी को परिभाषित करते हुए, बेरोजगारी के प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारम्भ कीजिये| पहले भाग में, भारत में बेरोजगारी के कारणों के बारे में चर्चा कीजिये| दूसरे भाग में, बेरोजगारी दूर करने की महता बताते हुए, भारत में बेरोजगारी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों को बताईये| निष्कर्षतः, सरकारी प्रयासों का संक्षिप्तता से जिक्र कीजिये| उत्तर- बेरोजगारी वह अवस्था है जिसमे व्यक्ति वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार है, परन्तु काम के अभाव में वह बिना काम के रह जाता है| बेरोजगारी की गणना करते समय केवल उन्ही व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जो काम करने योग्य हैं ,काम करने को इच्छुक हैं तथा वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं| विभिन्न कारकों के अनुसार बेरोजगारी को ऐच्छिक, अनैच्छिक, संरचनात्मक, प्रच्छन्न, मौसमी, चक्रीय आदि प्रकारों में बाँटा जाता है| भारत में बेरोजगारी तथा उसके कारण- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन तथा रोजगार कार्यालयों के हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी बढ़ी है| हमारी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी रोजगार से वंचित है तथा इस वजह से गरीबी के दुष्चक्र में फंसा हुआ है| इस संदर्भ में, भारत में बेरोजगारी के निम्न कारण गिनाए जा सकते हैं - भारत में गरीबी का सबसे बड़ा कारण भारत की विशाल जनसँख्या है| अधिक जनदबाव के कारण सभी लोगों को रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता है| हमारी जनसँख्या का बड़ा हिस्सा आज भी कृषि पर निर्भर है| कृषि जीवन निर्वाह कासाधन तो हैपरन्तु इसपर निर्भर जनसँख्या के बड़े हिस्से के कारण यह प्रच्छन्न बेरोजगारी को जन्म देता है| सीमित भूमि तथा भूमीके विखंडन के कारण उत्पन प्रछन्न बेरोजगारी| कृषि के पिछड़े तरीके की वजह से उत्पादन के सापेक्ष श्रमबल की उपलब्धता ज्यादा है जिससे कृषि से बेहतर आय का सृजन नहीं हो पाता है| आधुनिक तकनीक के प्रभाव के चलते कुटीर उद्योगों में गिरावट आई है जिससे उसपर निर्भर जनसँख्या बेरोजगारी के दुष्चक्र में फंसती जा रही है| दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली से हम उद्योगों हेतु कुशल तथा प्रशिक्षित श्रमबल तैयार नहीं कर पा रहे हैं|भारत के शिक्षित युवा वर्ग में बढती बेरोजगारी हेतु यह प्रमुख उतरदायी कारक है| भारत में अधिकांश स्नातक कोई भीआधुनिक रोजगार प्राप्त करने हेतु आवश्यक व्यावहारिक योग्यता नहीं रखते हैं| अपर्याप्त रोजगार योजनाओं की वजह से भी शिक्षित वर्ग रोजगार प्राप्ति से वंचित हो जाता है| विनिर्माण क्षेत्र में अपर्याप्त विकास और कम निवेश द्वितीयक क्षेत्र की रोजगार क्षमता को सीमित करता है। आवश्यक शिक्षा/कौशल की कमी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा विशाल कार्यबल; छोटे/कुटीर उद्योगों या छोटे व्यवसायों के लिए अपर्याप्त राज्य समर्थन, कानूनी जटिलताएं और कम अवसंरचनात्मक एवं वितीय प्रोत्साहन; लैंगिक भेदभाव तथा प्रतिगामी सामाजिक मानदंड जो महिलाओं को रोजगार लेने/जारी रखने से रोकते हैं। सरकारी योजनाओं/प्रयासों/नीतियों के उचित कार्यान्वयन का अभाव भारत में बेरोजगारी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपाय- बेरोजगारी की वजह से गरीबी तथा सामजिक असमानता में बढ़ोतरी होती है| अवैध तथा असामाजिक गतिविधियों में बेरोजगार जनसंख्या के लिप्त होने की संभावना बढ़ जाती है जिससे कानून एवं व्यवस्था पर गंभीर खतरे उत्पन हो सकते हैं| साथ ही, संभावित श्रमबल के अनुत्पादक होने की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है| अतः, सामाजिक तथा आर्थिक सशक्तिकरण एवं संधारणीय विकास हेतु बेरोजगारी कम करना अतिआवश्यक है| इस संदर्भ में, भारत में बेरोजगारी दूर करने हेतु निम्न प्रयास किये जा सकते हैं- श्रम गहन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान; संरचनात्मक बेरोजगारी की समस्या से निपटने हेतु शिक्षा प्रणाली में सुधार ; जनसंख्या नियंत्रण ; दूरदराज के क्षेत्रों तक सामाजिक सेवाओं का विस्तार ताकि पिछड़े क्षेत्रों में भी विकास प्रक्रिया शुरू हो सके ; स्वरोजगार प्रोत्साहन ; लघु तथा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा ; ग्रामीण विकास तथा रोजगार सृजन योजनाओं का सही क्रियान्वयन ; विनिर्माण क्षेत्र में निवेश प्रोत्साहन के उपाय ; खाद्य-प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों पर ज्यादा जोर ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान हो ; सरकार द्वारा इस संदर्भ में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में अनेको नीतियाँ लायी गयी हैं| मनरेगा, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसे कार्यक्रमों के द्वारा बेरोजगारी के मूल कारणों को पहचानकर उसे दूर करने हेतु प्रयास किये जा रहे हैं|
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How are deltas formed? Classify the deltas according to their shape and give examples. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Definition of deltas - HOW DELTAS ARE FORMED - CLASSIFICATION OF DELTAS BASED ON THEIR SHAPE Answer:- Delta is the triangulardepositionat the mouthofa river debouching ina lake or a sea. HOW DELTAS ARE FORMED The low velocity of water, during the old age stage of the river, leads to the sediments getting deposited and settled over the land. The resultant triangular structure at the mouth of the River is called the delta. THE CONDITIONS FOR THE FORMATION OF DELTAS 1) ENOUGH LOAD - There must be enough load for obstructing the flow of the river in order to significantly reduce its velocity. 2) GRADUAL SLOPE - The slope should be less to ensure that the velocity of the river is less. 3) ABSENCE OF STRONG TIDES - There should not be strong tides and currents 4) SHALLOW SEAS - The sea should be shallow. CLASSIFICATION OF DELTAS BASED ON THEIR SHAPE 1) ARCUATE DELTA - Such deltas are in the form of arcs. For example, deltas formed by the Rivers Nile, Indus, Ganga-Brahmaputra etc. 2) DIGITATE/BIRD FOOT DELTA - The delta appears just like the foot of a bird. An example of this is the delta formed by River Mississippi. 3) ESTUARINE DELTA - The sediment layers are deposited in the ocean and not over the land. When the water gushes into the ocean, there is no question of deposition on the land. For example, the deltas formed by Rivers Narmada, River Ob etc. 4) CUSPATE DELTA - This is a tooth-shaped delta. An example of this is the delta formed by River Ebro of Spain.
##Question:How are deltas formed? Classify the deltas according to their shape and give examples. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Definition of deltas - HOW DELTAS ARE FORMED - CLASSIFICATION OF DELTAS BASED ON THEIR SHAPE Answer:- Delta is the triangulardepositionat the mouthofa river debouching ina lake or a sea. HOW DELTAS ARE FORMED The low velocity of water, during the old age stage of the river, leads to the sediments getting deposited and settled over the land. The resultant triangular structure at the mouth of the River is called the delta. THE CONDITIONS FOR THE FORMATION OF DELTAS 1) ENOUGH LOAD - There must be enough load for obstructing the flow of the river in order to significantly reduce its velocity. 2) GRADUAL SLOPE - The slope should be less to ensure that the velocity of the river is less. 3) ABSENCE OF STRONG TIDES - There should not be strong tides and currents 4) SHALLOW SEAS - The sea should be shallow. CLASSIFICATION OF DELTAS BASED ON THEIR SHAPE 1) ARCUATE DELTA - Such deltas are in the form of arcs. For example, deltas formed by the Rivers Nile, Indus, Ganga-Brahmaputra etc. 2) DIGITATE/BIRD FOOT DELTA - The delta appears just like the foot of a bird. An example of this is the delta formed by River Mississippi. 3) ESTUARINE DELTA - The sediment layers are deposited in the ocean and not over the land. When the water gushes into the ocean, there is no question of deposition on the land. For example, the deltas formed by Rivers Narmada, River Ob etc. 4) CUSPATE DELTA - This is a tooth-shaped delta. An example of this is the delta formed by River Ebro of Spain.
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वित्त आयोग के गठन, संरचना एवं कार्यों की चर्चा कीजिये | क्या आप इस बात से सहमत हैं कि वित्त आयोग ने सहकारी संघवाद की अवधारणा को मजबूत किया है ? (150-200शब्द/ अंक - 10 ) Discuss about the formation, structure and functions of the finance commission. Do you agree with the notion that finance commission has strengthened the concept of co-operative federalism? ( 150-200 Words/ Marks - 10 )
संक्षिप्त दृष्टिकोण: · भूमिका में वित्त आयोग का परिचय दीजिए। · इसके पश्चात संरचना और कार्यों को लिखिए। · इसके बाद स्पष्ट कीजिये कि वित्त आयोग ने किस प्रकार से संघवाद को बढ़ावा दिया है। · निष्कर्ष उत्तर - भारत के संविधान में अनुच्छेद 280 के अंतर्गत अर्द्ध न्यायिक निकाय के रूप में वित्त आयोग की व्यवस्था की गयी है। इयसका गठन राष्ट्रपति द्वारा हर पांचवें वर्ष या आवश्यकतानुसार उससे पहले किया जाता है। संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिए और अन्य चार सदस्यों को इस प्रकार से चुना जाना चाहिए: · किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इसके पद के लिए योग्य व्यक्ति · ऐसा व्यक्ति जिसे भारत के लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो। · ऐसा व्यक्ति जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो · ऐसा व्यक्ति, जो अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो। वित्त आयोग के कार्य: · संघ एवं राज्यों के बीच कारों के शुद्ध अगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन · भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धान्त · राज्य वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों के आधार पर राज्यों में नगरपालिकाओं और पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए राज्य के संचित निधि के संवर्धन के लिए आवश्यक उपाय। · राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय गौरतलब है कि भारत के संविधान में इस बात की परिकल्पना की गयी है कि वित्त आयोग राजकोषीय संघवाद के संतुलक की भूमिका निभाएगा। जैसा कि इस आयोग के कार्यों से भी स्पष्ट है। भारत में कर राजस्व वितरण संबंधी नियमों को निर्धारित करने का अधिकार केंद्र के पास ही है। इसके कारण राज्यों के मध्य भेदभाव की आशंका रहती है। हालांकि विगत वर्षों में वित्त आयोग ने अपने कार्यों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। वर्तमान में 15वां वित्त आयोग गठित किया गया है। इसके पूर्व आयोग की सिफ़ारिशों ने केंद्र-राज्य के मध्य राजस्व वितरण को स्वीकार्य बनाने के साथ-साथ संघवाद को भी मजबूत किया है। उत्तरोत्तर वित्त आयोगों ने कर राजस्व में राज्यों के अनुपात में निरंतर वृद्धि की है। यह प्रत्यक्ष करों के बढ़ते महत्व के साथ साथ स्थानीय सार्वजनिक कल्याण के कार्यों में राज्य सरकारों के व्यय में वृद्धि को देखते हुए आवश्यक परिवर्तन है। 14 वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों के हिस्से को 32% से बढ़ाकर 42% कर दिया गया है। जो निश्चित रूप से ही राज्यों की वित्तीय आत्मनिर्भरता में सहायक है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में गठित 15वें वित्त आयोग को लेकर कुछ मुद्दे भी उत्पन्न हुए हैं। जिसका विरोध कई राज्य कर रहे हैं। इसमें 14वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों पर पुनर्विचार, 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग आदि मुद्दे हैं। अतः आयोग की यह जवाबदेही होनी चाहिए कि राज्यों के विरोधों का समाधान करे। इसके साथ ही केंद्र को भी संघीय स्वरूप में अपने समन्वयकारी, सुधारात्मक और नेतृत्व संबंधी कार्यों का निर्वहन करना होगा।
##Question:वित्त आयोग के गठन, संरचना एवं कार्यों की चर्चा कीजिये | क्या आप इस बात से सहमत हैं कि वित्त आयोग ने सहकारी संघवाद की अवधारणा को मजबूत किया है ? (150-200शब्द/ अंक - 10 ) Discuss about the formation, structure and functions of the finance commission. Do you agree with the notion that finance commission has strengthened the concept of co-operative federalism? ( 150-200 Words/ Marks - 10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: · भूमिका में वित्त आयोग का परिचय दीजिए। · इसके पश्चात संरचना और कार्यों को लिखिए। · इसके बाद स्पष्ट कीजिये कि वित्त आयोग ने किस प्रकार से संघवाद को बढ़ावा दिया है। · निष्कर्ष उत्तर - भारत के संविधान में अनुच्छेद 280 के अंतर्गत अर्द्ध न्यायिक निकाय के रूप में वित्त आयोग की व्यवस्था की गयी है। इयसका गठन राष्ट्रपति द्वारा हर पांचवें वर्ष या आवश्यकतानुसार उससे पहले किया जाता है। संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिए और अन्य चार सदस्यों को इस प्रकार से चुना जाना चाहिए: · किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इसके पद के लिए योग्य व्यक्ति · ऐसा व्यक्ति जिसे भारत के लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो। · ऐसा व्यक्ति जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो · ऐसा व्यक्ति, जो अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो। वित्त आयोग के कार्य: · संघ एवं राज्यों के बीच कारों के शुद्ध अगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन · भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धान्त · राज्य वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों के आधार पर राज्यों में नगरपालिकाओं और पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए राज्य के संचित निधि के संवर्धन के लिए आवश्यक उपाय। · राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय गौरतलब है कि भारत के संविधान में इस बात की परिकल्पना की गयी है कि वित्त आयोग राजकोषीय संघवाद के संतुलक की भूमिका निभाएगा। जैसा कि इस आयोग के कार्यों से भी स्पष्ट है। भारत में कर राजस्व वितरण संबंधी नियमों को निर्धारित करने का अधिकार केंद्र के पास ही है। इसके कारण राज्यों के मध्य भेदभाव की आशंका रहती है। हालांकि विगत वर्षों में वित्त आयोग ने अपने कार्यों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। वर्तमान में 15वां वित्त आयोग गठित किया गया है। इसके पूर्व आयोग की सिफ़ारिशों ने केंद्र-राज्य के मध्य राजस्व वितरण को स्वीकार्य बनाने के साथ-साथ संघवाद को भी मजबूत किया है। उत्तरोत्तर वित्त आयोगों ने कर राजस्व में राज्यों के अनुपात में निरंतर वृद्धि की है। यह प्रत्यक्ष करों के बढ़ते महत्व के साथ साथ स्थानीय सार्वजनिक कल्याण के कार्यों में राज्य सरकारों के व्यय में वृद्धि को देखते हुए आवश्यक परिवर्तन है। 14 वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों के हिस्से को 32% से बढ़ाकर 42% कर दिया गया है। जो निश्चित रूप से ही राज्यों की वित्तीय आत्मनिर्भरता में सहायक है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में गठित 15वें वित्त आयोग को लेकर कुछ मुद्दे भी उत्पन्न हुए हैं। जिसका विरोध कई राज्य कर रहे हैं। इसमें 14वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों पर पुनर्विचार, 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग आदि मुद्दे हैं। अतः आयोग की यह जवाबदेही होनी चाहिए कि राज्यों के विरोधों का समाधान करे। इसके साथ ही केंद्र को भी संघीय स्वरूप में अपने समन्वयकारी, सुधारात्मक और नेतृत्व संबंधी कार्यों का निर्वहन करना होगा।
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राज्य के नीति निदेशक तत्वों का स्वरुप और उद्देश्य को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही, राज्य के नीति निदेशक तत्वों एवं मौलिक अधिकारों के मध्य अंतरों की चर्चा कीजिये| (200 शब्द) (200 शब्द) Explain the nature and objectives of Directive Principles ofState Policy. Along with this, Discuss the differences betweenDirective Principles of State Policy and fundamental rights. (200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में निति निदेशक सिद्धांतों के स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में नीति निदेशक ततावों के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मौलिक अधिकार एवं DPSP के मध्य अंतरों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में DPSP का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये स्वतंत्रता के समय जब कि भारत में संविधान निर्माण कार्य चल रहा था तब भारत के सामने तीन गंभीर चुनौतियां थीं यथा खाद्यान्न संकट, गरीबी तथा बेरोजगारी, वित्तीय पूँजी का अभाव और उन्नत प्रौद्योगिकी का अभाव|समग्रता में भारत आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में था| अतः राज्य की स्थिति को देखते हुए संविधान में दो प्रकार के अधिकारों को शामिल किया गया और नीति निदेशक तत्वों के रूप में भाग 4 को शामिल किया गया| यह मूलरूप से 1936 के आयरलैंड गणराज्य से लिया गया है| नीति निदेशक तत्व, संविधान द्वारा राज्य को दिए गए ऐसे निर्देश हैं जो नीति निर्माण के लिए आधारभूत हैं| इनका उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है| सर बी एन राव के अनुसार "हम सभी अधिकारों को मौलिक अधिकार नहीं बना सकते" इससे एक ओर तो राज्य पर अनावश्यक दबाव बढेगा तो दूसरी ओर न्यायालयों में मुकदमों की बाढ़ आ जायेगी| अतः कुछ अधिकारों को नीति निदेशक तत्व के अंतर्गत रखा जाना चाहिए ताकि राज्य संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर इन अधिकारों को प्रभावी बना सके| इस तरह नीति निदेशक तत्व ऐसे गैर वाद योग्य अधिकार हैं जिन्हें लागू करना राज्य की सक्षमता पर निर्भर करता है| राज्य के नीति निदेशक तत्व(DPSP) विभिन्न सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं किन्तु मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों में अनेक अंतर हैं| DPSP के प्रमुख सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य · सामान्य लोगों का कल्याण · सामान्य लोगों को सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाना · समाज के कमजोर वर्गों का जीवन स्तर उंचा उठाना · देश के भौतिक संपदा अथवा संसाधन का न्यायोचित वितरण करना · अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सद्भाव को बढ़ावा देना DPSP एवं मौलिक अधिकारों में अंतर · मौलिक अधिकारों में एक व्यक्ति एवं दूसरे व्यक्ति के बीच यदि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो वर्गीकरण नहीं किया जा सकता जबकि DPSP में वर्गीकरण किया जा सकता है · उदाहरणार्थ, अनुच्छेद 41 के अनुपालन में वर्ष 2005 में MNREGA अधिनियम पारित कर ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार लोगों को वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गयी| किन्तु MNREGA के अंतर्गत केवल उन्ही लोगों को उक्त रोजगार देने की व्यवस्था की गयी जिनको पंचायतों द्वारा जॉब कार्ड जारी किये गए हैं और जो अकुशल कामगार थे| यदि इसे मौलिक अधिकार बना दिया गया होता तो जिनको जॉब कार्ड नहीं भी जारी किये जाते और जो अकुशल कामगार नहीं होते वे भी इस गारंटी की दावेदारी करते और इसके लिए न्यायालय चले जाते| · अनुच्छेद 13(2) के अनुसारमौलिक अधिकार वाद-योग्य हैं, जबकि अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP वाद योग्य नहीं हैं| · कुछ मौलिक अधिकारों को छोड़ कर अधिकाँश मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए संसद या राज्य विधानमंडल को अलग से कानून बनाने की आवश्यकता नहीं होती किन्तु DPSP तभी प्रभावी होंगे जब संसद या राज्य विधानमंडल कानून बना कर इन्हें लागू करे अथवा सरकारी आदेश के द्वारा इसे लागू किया जाए| उदाहरण के लिए अनुच्छेद 42 के अंतर्गत मातृत्व लाभ और कल्याण का निर्देश राज्य को दिया गया है, इसे हाल ही में केंद्र सरकार ने लागू किया है| · मौलिक अधिकार और DPSP के मध्य सामंजस्य बनाए रखने का दायित्व राज्य सरकारों पर होता है| उदाहरण के लिए नागालैंड में पशुवधशाला चलाना,पोर्क और बीफ खाना प्रतिबंधित नहीं और न ही मद्यपान पर ही कोई रोक है| अतः इन कारोबारों में लगे लोग अनुच्छेद 19(1G) के अंतर्गत अपने मौलिक अधिकारों का उपभोग कर रहे हैं| किन्तु जिन राज्यों ने उपरोक्त पेशों पर प्रतिबन्ध लगा रखा है वहां भाग 4 के अनुच्छेद 47 एवं 48 प्रभावी हैं न कि अनुच्छेद 19(1G) · मौलिक अधिकारों के अनेक अपवाद हैं जो इन अधिकारों को सीमित करते हैं किन्तु नीति निदेशक तत्वों के कोई अपवाद नहीं हैं| · मौलिक अधिकार मुख्यतः राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं जबकि DPSP आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं · मौलिक अधिकार का प्रभावी होना राज्य के संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर नहीं है जबकि DPSP राज्य द्वारा तभी लागू किये जाते हैं जब राज्य के पास उचित संसाधन हों| · मौलिक अधिकार नागरिक तथा गैर नागरिक दोनों को उपलब्ध हैं और जहाँ तक नागरिकों का प्रश्न है SC की अधिकारिता देश की सीमा के बाहर भी उन पर लागू होती है|जबकि DPSP प्रायः भारत के नागरिकों पर ही प्रभावी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नीति निदेशक तत्वों और मौलिक अधिकारों के स्वरुप में अंतर है| गैर वाद योग्य होने और संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भरता के कारण नीति निदेशक तत्वों की आलोचना की जाती है| इसीलिए प्रसिद्द कानूनवेत्ता एवं संविधान विशेषज्ञ के.सी व्हीयर इसे 19वीं सदी के फेबियन समाजवाद पर आधारित 20 वीं सदी की एक कपोल कल्पना मानते हैं| किन्तु यह आलोचना पर्याप्त नहीं है| भारत में स्वतंत्रता के बाद विभिन्न नीति निदेशक तत्वों को भारत सरकार ने मौलिक अधिकार में परिवर्तित किया है| इसके साथ ही नीति निर्देशक तत्व राजकीय नीतियों के पथ प्रदर्शन एवं उनके कल्याणकारी स्वरुप के निर्धारण के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|
##Question:राज्य के नीति निदेशक तत्वों का स्वरुप और उद्देश्य को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही, राज्य के नीति निदेशक तत्वों एवं मौलिक अधिकारों के मध्य अंतरों की चर्चा कीजिये| (200 शब्द) (200 शब्द) Explain the nature and objectives of Directive Principles ofState Policy. Along with this, Discuss the differences betweenDirective Principles of State Policy and fundamental rights. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में निति निदेशक सिद्धांतों के स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में नीति निदेशक ततावों के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मौलिक अधिकार एवं DPSP के मध्य अंतरों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में DPSP का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये स्वतंत्रता के समय जब कि भारत में संविधान निर्माण कार्य चल रहा था तब भारत के सामने तीन गंभीर चुनौतियां थीं यथा खाद्यान्न संकट, गरीबी तथा बेरोजगारी, वित्तीय पूँजी का अभाव और उन्नत प्रौद्योगिकी का अभाव|समग्रता में भारत आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में था| अतः राज्य की स्थिति को देखते हुए संविधान में दो प्रकार के अधिकारों को शामिल किया गया और नीति निदेशक तत्वों के रूप में भाग 4 को शामिल किया गया| यह मूलरूप से 1936 के आयरलैंड गणराज्य से लिया गया है| नीति निदेशक तत्व, संविधान द्वारा राज्य को दिए गए ऐसे निर्देश हैं जो नीति निर्माण के लिए आधारभूत हैं| इनका उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है| सर बी एन राव के अनुसार "हम सभी अधिकारों को मौलिक अधिकार नहीं बना सकते" इससे एक ओर तो राज्य पर अनावश्यक दबाव बढेगा तो दूसरी ओर न्यायालयों में मुकदमों की बाढ़ आ जायेगी| अतः कुछ अधिकारों को नीति निदेशक तत्व के अंतर्गत रखा जाना चाहिए ताकि राज्य संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर इन अधिकारों को प्रभावी बना सके| इस तरह नीति निदेशक तत्व ऐसे गैर वाद योग्य अधिकार हैं जिन्हें लागू करना राज्य की सक्षमता पर निर्भर करता है| राज्य के नीति निदेशक तत्व(DPSP) विभिन्न सामाजिक आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं किन्तु मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्वों में अनेक अंतर हैं| DPSP के प्रमुख सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य · सामान्य लोगों का कल्याण · सामान्य लोगों को सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाना · समाज के कमजोर वर्गों का जीवन स्तर उंचा उठाना · देश के भौतिक संपदा अथवा संसाधन का न्यायोचित वितरण करना · अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सद्भाव को बढ़ावा देना DPSP एवं मौलिक अधिकारों में अंतर · मौलिक अधिकारों में एक व्यक्ति एवं दूसरे व्यक्ति के बीच यदि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो वर्गीकरण नहीं किया जा सकता जबकि DPSP में वर्गीकरण किया जा सकता है · उदाहरणार्थ, अनुच्छेद 41 के अनुपालन में वर्ष 2005 में MNREGA अधिनियम पारित कर ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार लोगों को वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गयी| किन्तु MNREGA के अंतर्गत केवल उन्ही लोगों को उक्त रोजगार देने की व्यवस्था की गयी जिनको पंचायतों द्वारा जॉब कार्ड जारी किये गए हैं और जो अकुशल कामगार थे| यदि इसे मौलिक अधिकार बना दिया गया होता तो जिनको जॉब कार्ड नहीं भी जारी किये जाते और जो अकुशल कामगार नहीं होते वे भी इस गारंटी की दावेदारी करते और इसके लिए न्यायालय चले जाते| · अनुच्छेद 13(2) के अनुसारमौलिक अधिकार वाद-योग्य हैं, जबकि अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP वाद योग्य नहीं हैं| · कुछ मौलिक अधिकारों को छोड़ कर अधिकाँश मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए संसद या राज्य विधानमंडल को अलग से कानून बनाने की आवश्यकता नहीं होती किन्तु DPSP तभी प्रभावी होंगे जब संसद या राज्य विधानमंडल कानून बना कर इन्हें लागू करे अथवा सरकारी आदेश के द्वारा इसे लागू किया जाए| उदाहरण के लिए अनुच्छेद 42 के अंतर्गत मातृत्व लाभ और कल्याण का निर्देश राज्य को दिया गया है, इसे हाल ही में केंद्र सरकार ने लागू किया है| · मौलिक अधिकार और DPSP के मध्य सामंजस्य बनाए रखने का दायित्व राज्य सरकारों पर होता है| उदाहरण के लिए नागालैंड में पशुवधशाला चलाना,पोर्क और बीफ खाना प्रतिबंधित नहीं और न ही मद्यपान पर ही कोई रोक है| अतः इन कारोबारों में लगे लोग अनुच्छेद 19(1G) के अंतर्गत अपने मौलिक अधिकारों का उपभोग कर रहे हैं| किन्तु जिन राज्यों ने उपरोक्त पेशों पर प्रतिबन्ध लगा रखा है वहां भाग 4 के अनुच्छेद 47 एवं 48 प्रभावी हैं न कि अनुच्छेद 19(1G) · मौलिक अधिकारों के अनेक अपवाद हैं जो इन अधिकारों को सीमित करते हैं किन्तु नीति निदेशक तत्वों के कोई अपवाद नहीं हैं| · मौलिक अधिकार मुख्यतः राजनीतिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं जबकि DPSP आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं · मौलिक अधिकार का प्रभावी होना राज्य के संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर नहीं है जबकि DPSP राज्य द्वारा तभी लागू किये जाते हैं जब राज्य के पास उचित संसाधन हों| · मौलिक अधिकार नागरिक तथा गैर नागरिक दोनों को उपलब्ध हैं और जहाँ तक नागरिकों का प्रश्न है SC की अधिकारिता देश की सीमा के बाहर भी उन पर लागू होती है|जबकि DPSP प्रायः भारत के नागरिकों पर ही प्रभावी होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नीति निदेशक तत्वों और मौलिक अधिकारों के स्वरुप में अंतर है| गैर वाद योग्य होने और संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भरता के कारण नीति निदेशक तत्वों की आलोचना की जाती है| इसीलिए प्रसिद्द कानूनवेत्ता एवं संविधान विशेषज्ञ के.सी व्हीयर इसे 19वीं सदी के फेबियन समाजवाद पर आधारित 20 वीं सदी की एक कपोल कल्पना मानते हैं| किन्तु यह आलोचना पर्याप्त नहीं है| भारत में स्वतंत्रता के बाद विभिन्न नीति निदेशक तत्वों को भारत सरकार ने मौलिक अधिकार में परिवर्तित किया है| इसके साथ ही नीति निर्देशक तत्व राजकीय नीतियों के पथ प्रदर्शन एवं उनके कल्याणकारी स्वरुप के निर्धारण के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|
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बेरोजगारी को परिभाषित करते हुए, बेरोजगारी मापन हेतु राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रयुक्त विभिन्न धारणाओं का उल्लेख कीजिये। क्या बेरोजगारी को कम करने हेतु भारत को ऑटोमेशन तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नवीन तकनीकों का उपयोग प्रतिबंधित कर देना चाहिए ? (150-200 शब्द) Defining unemployment, write down the differentmeasures used by National Sample Survey Office for unemployment measurement . To reduce unemployment, should India restrict the use of new technologies like automation and cloud computing? (150- 200 words)
एप्रोच- बेरोजगारी को परिभाषित करते हुए उतर का प्रारम्भ कीजिये| पहले भाग में,बेरोजगारी मापन हेतु राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रयुक्त विभिन्न धारणाओं के बारे में बताईये| दूसरे भाग का प्रारंभ, ऑटोमेशन तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नवीन तकनीकों के उपयोग से भारत में रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों को दिखाते हुए कीजिये| ऑटोमेशन तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नवीन तकनीकों के उपयोग से भारत में रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में, इनके उपयोग को जारी या ना जारी रखने के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत कीजिये| निष्कर्षतः, अपने विचार के संदर्भ में, आगे की राह संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- बेरोजगारी वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तो तैयार है परंतु काम के अभाव में वह बिना काम के रह जाता है| बेरोजगारी की गणना करते समय केवल उन्हीं व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जो काम करने योग्य हैं, काम करने को इच्छुक हैं तथा वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं| भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष के पश्चात बेरोजगारी संबंधित आंकड़ों को एकत्र किया जाता है| इन आंकड़ों के द्वारा, बेरोजगारी की माप के लिए, एनएसएसओ द्वारा तीन धारणाओं का उपयोग किया जाता है- सामान्य स्टेटस(स्थिति)- यदि समीक्षा वर्ष के पूर्व के 365 दिनों में से कोई व्यक्ति छः या छः से ज्यादा महीनों तक बेरोजगार हैं तो उन्हें सामान्य बेरोजगार स्टेटस के अंतर्गत रखा जाता है| चालू साप्ताहिक स्टेटस- यदि किसी व्यक्ति ने समीक्षा सप्ताह में 1 घंटे भी कार्य नहीं किया है तो उसे चालू सप्ताहिक स्टेटस का बेरोजगार कहेंगे| अगर व्यक्ति ने किसी दिन कम से कम एक घंटा भी काम किया हो तो वह रोजगार में कहा जाएगा| चालू दैनिक स्टेटस- यह किसी व्यक्ति के समीक्षा दिन के पूर्व के 7 दिनों में प्रत्येक दिन की कार्य स्थिति प्रदर्शित करता है| यदि कोई व्यक्ति एक दिन में 4 घंटे या इससे अधिक कार्य करता है तो उसे पूर्ण रोजगार में कहेंगे| यदि उसने 1 घंटे से अधिक पर 4 घंटे से कम काम किया हो तो उसे आधा दिन कार्यरत माना जाता है| तथा, यदि किसी व्यक्ति ने किसी दिन एक घंटा भी काम नहीं किया हो तो उसे चालू दैनिक स्टेटस पर बेरोजगार करते हैं| उपरोक्त तीनों धारणाओं में चालू दैनिक स्थिति वाली अवधारणा बेरोजगारी की मापन हेतु ज्यादा व्यापक अवधारणा है| ऑटोमेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग आदि नवीन तकनीकें तथा रोजगार पर इसके प्रभाव तकनीक एवं प्रौद्योगिकी के बढ़ते दौर में ऑटोमेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग,ई-कॉमर्स जैसी नई अवधारणाओं का उद्भव हुआ है| इन तकनीकों के उपयोग से रोजगार पर कुछ सकारात्मक तथा कुछ नकारात्मक प्रभाव भी पड़े हैं| सकारात्मक प्रभाव - प्रशिक्षित एवं कुशल श्रम बल की मांग बढ़ी है| इस श्रम बल की मांग को पूरा करने हेतु शिक्षण संस्थानों, रिसर्च हाउसों में रोजगार बढ़े हैं| प्रशिक्षित कार्यबल को काम का एक नया जरिया प्राप्त हुआ है| नई तकनीकों के प्रयोग से कार्यकुशलता में वृद्धि हुई है तथा जोखिम भरे कार्य से मनुष्य को दूर रखना संभव हो पाया है| ज्यादा जटिल कार्यों को अधिक क्षमता से किया जाना संभव हो सका है| नकारात्मक प्रभाव विनिर्माण क्षेत्र में स्वचालित प्रौद्योगिकी के चलते श्रमबल की छंटनी ; श्रमगहन क्षेत्रों में ऑटोमेशन के प्रयोग से उसमें काम करने वाले लोग बेरोजगार हो रहे हैं| कॉल सेंटर, बीपीओ, कस्टमर सर्विस जैसे क्षेत्रों में नौकरियां कम हो रही है| भारतीय सॉफ्टवेर उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव से इंजीनियरिंग ग्रेजुएटों में बेरोजगारी; भारत की विशाल जनसंख्या(खासकरयुवाओं की बढ़ती संख्या) को उचित रोजगार प्रदान करने हेतु ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ऑटोमेशन एवं क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्र नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं ;परंतु तकनीक के साथ कदमताल ना करने से हम दुनिया में पीछे छूट सकते हैं| साथ ही, यह अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक रूप से ज्यादा नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा| अतः,नवीन तकनीकों पर रोक की बजाय, इस संदर्भ में सरकार को संबंधित क्षेत्रों हेतु एक व्यापक एवं संतुलित नीति बनाने की आवश्यकता है ताकि एक क्षेत्र में रोजगार कम होने का प्रभाव , दूसरे क्षेत्र में रोजगार ज्यादा निकलने के रूप में दृष्टिगोचर हो| कौशल विकास, उद्योग-अकादमिक लिंकेज, एमएसएमई उद्योग को प्रोत्साहन जैसे उपायों को अपनाकर दूसरे क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि उपरोक्त नवीन तकनीकों से प्रभावित कार्यबल को अन्य क्षेत्र में रोजगार प्राप्ति हो सके|
##Question:बेरोजगारी को परिभाषित करते हुए, बेरोजगारी मापन हेतु राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रयुक्त विभिन्न धारणाओं का उल्लेख कीजिये। क्या बेरोजगारी को कम करने हेतु भारत को ऑटोमेशन तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नवीन तकनीकों का उपयोग प्रतिबंधित कर देना चाहिए ? (150-200 शब्द) Defining unemployment, write down the differentmeasures used by National Sample Survey Office for unemployment measurement . To reduce unemployment, should India restrict the use of new technologies like automation and cloud computing? (150- 200 words)##Answer:एप्रोच- बेरोजगारी को परिभाषित करते हुए उतर का प्रारम्भ कीजिये| पहले भाग में,बेरोजगारी मापन हेतु राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रयुक्त विभिन्न धारणाओं के बारे में बताईये| दूसरे भाग का प्रारंभ, ऑटोमेशन तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नवीन तकनीकों के उपयोग से भारत में रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों को दिखाते हुए कीजिये| ऑटोमेशन तथा क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नवीन तकनीकों के उपयोग से भारत में रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में, इनके उपयोग को जारी या ना जारी रखने के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत कीजिये| निष्कर्षतः, अपने विचार के संदर्भ में, आगे की राह संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- बेरोजगारी वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तो तैयार है परंतु काम के अभाव में वह बिना काम के रह जाता है| बेरोजगारी की गणना करते समय केवल उन्हीं व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जो काम करने योग्य हैं, काम करने को इच्छुक हैं तथा वर्तमान मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं| भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष के पश्चात बेरोजगारी संबंधित आंकड़ों को एकत्र किया जाता है| इन आंकड़ों के द्वारा, बेरोजगारी की माप के लिए, एनएसएसओ द्वारा तीन धारणाओं का उपयोग किया जाता है- सामान्य स्टेटस(स्थिति)- यदि समीक्षा वर्ष के पूर्व के 365 दिनों में से कोई व्यक्ति छः या छः से ज्यादा महीनों तक बेरोजगार हैं तो उन्हें सामान्य बेरोजगार स्टेटस के अंतर्गत रखा जाता है| चालू साप्ताहिक स्टेटस- यदि किसी व्यक्ति ने समीक्षा सप्ताह में 1 घंटे भी कार्य नहीं किया है तो उसे चालू सप्ताहिक स्टेटस का बेरोजगार कहेंगे| अगर व्यक्ति ने किसी दिन कम से कम एक घंटा भी काम किया हो तो वह रोजगार में कहा जाएगा| चालू दैनिक स्टेटस- यह किसी व्यक्ति के समीक्षा दिन के पूर्व के 7 दिनों में प्रत्येक दिन की कार्य स्थिति प्रदर्शित करता है| यदि कोई व्यक्ति एक दिन में 4 घंटे या इससे अधिक कार्य करता है तो उसे पूर्ण रोजगार में कहेंगे| यदि उसने 1 घंटे से अधिक पर 4 घंटे से कम काम किया हो तो उसे आधा दिन कार्यरत माना जाता है| तथा, यदि किसी व्यक्ति ने किसी दिन एक घंटा भी काम नहीं किया हो तो उसे चालू दैनिक स्टेटस पर बेरोजगार करते हैं| उपरोक्त तीनों धारणाओं में चालू दैनिक स्थिति वाली अवधारणा बेरोजगारी की मापन हेतु ज्यादा व्यापक अवधारणा है| ऑटोमेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग आदि नवीन तकनीकें तथा रोजगार पर इसके प्रभाव तकनीक एवं प्रौद्योगिकी के बढ़ते दौर में ऑटोमेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग,ई-कॉमर्स जैसी नई अवधारणाओं का उद्भव हुआ है| इन तकनीकों के उपयोग से रोजगार पर कुछ सकारात्मक तथा कुछ नकारात्मक प्रभाव भी पड़े हैं| सकारात्मक प्रभाव - प्रशिक्षित एवं कुशल श्रम बल की मांग बढ़ी है| इस श्रम बल की मांग को पूरा करने हेतु शिक्षण संस्थानों, रिसर्च हाउसों में रोजगार बढ़े हैं| प्रशिक्षित कार्यबल को काम का एक नया जरिया प्राप्त हुआ है| नई तकनीकों के प्रयोग से कार्यकुशलता में वृद्धि हुई है तथा जोखिम भरे कार्य से मनुष्य को दूर रखना संभव हो पाया है| ज्यादा जटिल कार्यों को अधिक क्षमता से किया जाना संभव हो सका है| नकारात्मक प्रभाव विनिर्माण क्षेत्र में स्वचालित प्रौद्योगिकी के चलते श्रमबल की छंटनी ; श्रमगहन क्षेत्रों में ऑटोमेशन के प्रयोग से उसमें काम करने वाले लोग बेरोजगार हो रहे हैं| कॉल सेंटर, बीपीओ, कस्टमर सर्विस जैसे क्षेत्रों में नौकरियां कम हो रही है| भारतीय सॉफ्टवेर उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव से इंजीनियरिंग ग्रेजुएटों में बेरोजगारी; भारत की विशाल जनसंख्या(खासकरयुवाओं की बढ़ती संख्या) को उचित रोजगार प्रदान करने हेतु ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ऑटोमेशन एवं क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्र नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं ;परंतु तकनीक के साथ कदमताल ना करने से हम दुनिया में पीछे छूट सकते हैं| साथ ही, यह अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक रूप से ज्यादा नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा| अतः,नवीन तकनीकों पर रोक की बजाय, इस संदर्भ में सरकार को संबंधित क्षेत्रों हेतु एक व्यापक एवं संतुलित नीति बनाने की आवश्यकता है ताकि एक क्षेत्र में रोजगार कम होने का प्रभाव , दूसरे क्षेत्र में रोजगार ज्यादा निकलने के रूप में दृष्टिगोचर हो| कौशल विकास, उद्योग-अकादमिक लिंकेज, एमएसएमई उद्योग को प्रोत्साहन जैसे उपायों को अपनाकर दूसरे क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि उपरोक्त नवीन तकनीकों से प्रभावित कार्यबल को अन्य क्षेत्र में रोजगार प्राप्ति हो सके|
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What do you mean by Denudation? What are the various process of Denudation? (150 words)
Introduction -Try to define Denudation Body of the answer -Explain the various process of Denudation ANSWER All the exogenic geomorphic processes arecovered under a general term, denudation. Theword ‘denude’ means to strip off or to uncover. Weathering, mass wasting/movements, erosion, and transportation are included in Denudation Various Process Weathering Weathering is defined as mechanicaldisintegration and chemical composition of rocks through the actions ofvarious elements of weather and climate. There are three major groups of weatheringprocesses : (i) chemical; (ii) physical ormechanical; (iii) biological weathering processes. Very rarely does any one of these processes everoperate completely by itself, but quite often a dominance of one process can be seen. MASS MOVEMENT These movements transfer the mass of rockdebris down the slopes under the directinfluence of gravity. The movementsof mass may range from slow to rapid, affecting shallow to deep columns of materialsand include creep, flow, slide, and fall.weathering isnot a pre-requisite for mass movement thoughit aids mass movements. Mass movements arevery active over weathered slopes rather thanover unweathered materials. Mass movements do not come under erosionthough there is a shift (aided by gravity) ofmaterials from one place to another Mass movements can be grouped undertwo major classes: (i) slow movements;(ii) rapid movements. Erosion and Deposition Erosion involves the acquisition and transportationof rock debris. When massive rocks break intosmaller fragments through weathering and anyother process, erosional geomorphicagents like running water, groundwater, glaciers, wind and waves remove and transportit to other places depending uponthe dynamics of each of these agents. Abrasionby rock debris carried by these geomorphicagents also aids greatly in erosion. By erosion, relief degrades, i.e., the landscape is worndown. It iserosion that is largely responsible forcontinuous changes that the earth’s surface isundergoing. The deposition is a consequence of erosion. Theerosional agents lose their velocity and hence energyon gentler slopes and the materials carriedby them start to settle themselves. Inother words, deposition is not actually the workof any agent
##Question:What do you mean by Denudation? What are the various process of Denudation? (150 words)##Answer:Introduction -Try to define Denudation Body of the answer -Explain the various process of Denudation ANSWER All the exogenic geomorphic processes arecovered under a general term, denudation. Theword ‘denude’ means to strip off or to uncover. Weathering, mass wasting/movements, erosion, and transportation are included in Denudation Various Process Weathering Weathering is defined as mechanicaldisintegration and chemical composition of rocks through the actions ofvarious elements of weather and climate. There are three major groups of weatheringprocesses : (i) chemical; (ii) physical ormechanical; (iii) biological weathering processes. Very rarely does any one of these processes everoperate completely by itself, but quite often a dominance of one process can be seen. MASS MOVEMENT These movements transfer the mass of rockdebris down the slopes under the directinfluence of gravity. The movementsof mass may range from slow to rapid, affecting shallow to deep columns of materialsand include creep, flow, slide, and fall.weathering isnot a pre-requisite for mass movement thoughit aids mass movements. Mass movements arevery active over weathered slopes rather thanover unweathered materials. Mass movements do not come under erosionthough there is a shift (aided by gravity) ofmaterials from one place to another Mass movements can be grouped undertwo major classes: (i) slow movements;(ii) rapid movements. Erosion and Deposition Erosion involves the acquisition and transportationof rock debris. When massive rocks break intosmaller fragments through weathering and anyother process, erosional geomorphicagents like running water, groundwater, glaciers, wind and waves remove and transportit to other places depending uponthe dynamics of each of these agents. Abrasionby rock debris carried by these geomorphicagents also aids greatly in erosion. By erosion, relief degrades, i.e., the landscape is worndown. It iserosion that is largely responsible forcontinuous changes that the earth’s surface isundergoing. The deposition is a consequence of erosion. Theerosional agents lose their velocity and hence energyon gentler slopes and the materials carriedby them start to settle themselves. Inother words, deposition is not actually the workof any agent
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जैव विविधता से आप क्या समझते हैं| जैव विविधता के मापन एवं मानचित्रीकरण की विधियों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Biodiversity? Clarify the methods of measurement and mapping of biodiversity. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जैव विविधता के मापन की विधियों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मानचित्रीकरण की विविधियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में जैव विविधता का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्र विविधता| प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता के मापन की विधियां प्रजातीय प्रचुरता/समृद्धता/बहुलता(Richness) · किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के जैव विविधता के अध्ययन के लिए उसकीसमृद्धता/बाहुल्यता और समरूपता का मानचित्रीकरण किया जाता है · किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र में अलग-अलग प्रकार की प्रजातियों की संख्या को प्रचुरता कहते हैं · यहाँ जनसंख्या नहीं बल्कि प्रजातियों की उपस्थिति के आधार पर प्रचुरता का मापन किया जाता है · किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है प्रजातीय समता/समरूपता(स्पीशीज इवेननेस) · इसमें भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवासस्थल में पाई जाने वाली प्रजातियों के वितरण का मापन किया जाता है · किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है लेकिन समरूपता अलग अलग हो सकती है · जिस पारितंत्र में प्रचुरता और समता दोनों अधिक होगी उसे अधिक जैव विविधतापूर्ण पारितंत्र माना जाएगा जैव विविधता मानचित्रिकरण · जैव विविधता मानचित्रीकरण के लिए सिम्पसंस सूचकांक का प्रयोग किया जाता है · सिम्पसंस सूचकांक में विविधता(D), किसी एक प्रजाति की संख्या(n) एवं सभी प्रजातियों की कुल संख्या(N) चरों का प्रयोग किया जाता है अल्फा विविधता · किसी आवासस्थल में पायी जाने वाली प्रजातियों की विविधता अल्फा विविधता कहलाती है, · किसी आवासस्थल की अल्फा विविधता का आकलन सिम्प्संस सूचकांक से किया जाता है, बीटा विविधता · बीटा विविधता में किन्ही दो आवास्स्थालों के मध्य प्रजातियों की विविधता अर्थात समानता एवं विषमता का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है गामा विविधता · समस्त आवासस्थलों की कुल विविधता को गामा विविधता कहते हैं| · दूसरे शब्दों में भौगोलिक क्षेत्र की कुल जैव विविधता जो कि अल्फा-बीटा दोनों विविधता का योग होता है उसे गामा विविधता कहते हैं चूँकि जैव विविधता, जीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है| जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| अतः जैव विविधता के मापन के माध्यम से उसकी विविधता के स्तर को जाना जाता है| यदि विविधता में कमी स्पष्ट होती है तो उसके संरक्षण एवं संवर्धन के प्रयास किये जाते हैं|
##Question:जैव विविधता से आप क्या समझते हैं| जैव विविधता के मापन एवं मानचित्रीकरण की विधियों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Biodiversity? Clarify the methods of measurement and mapping of biodiversity. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जैव विविधता के मापन की विधियों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मानचित्रीकरण की विविधियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में जैव विविधता का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्र विविधता| प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता के मापन की विधियां प्रजातीय प्रचुरता/समृद्धता/बहुलता(Richness) · किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के जैव विविधता के अध्ययन के लिए उसकीसमृद्धता/बाहुल्यता और समरूपता का मानचित्रीकरण किया जाता है · किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र में अलग-अलग प्रकार की प्रजातियों की संख्या को प्रचुरता कहते हैं · यहाँ जनसंख्या नहीं बल्कि प्रजातियों की उपस्थिति के आधार पर प्रचुरता का मापन किया जाता है · किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है प्रजातीय समता/समरूपता(स्पीशीज इवेननेस) · इसमें भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवासस्थल में पाई जाने वाली प्रजातियों के वितरण का मापन किया जाता है · किन्ही दो पारितंत्र में प्रचुरता समान हो सकती है लेकिन समरूपता अलग अलग हो सकती है · जिस पारितंत्र में प्रचुरता और समता दोनों अधिक होगी उसे अधिक जैव विविधतापूर्ण पारितंत्र माना जाएगा जैव विविधता मानचित्रिकरण · जैव विविधता मानचित्रीकरण के लिए सिम्पसंस सूचकांक का प्रयोग किया जाता है · सिम्पसंस सूचकांक में विविधता(D), किसी एक प्रजाति की संख्या(n) एवं सभी प्रजातियों की कुल संख्या(N) चरों का प्रयोग किया जाता है अल्फा विविधता · किसी आवासस्थल में पायी जाने वाली प्रजातियों की विविधता अल्फा विविधता कहलाती है, · किसी आवासस्थल की अल्फा विविधता का आकलन सिम्प्संस सूचकांक से किया जाता है, बीटा विविधता · बीटा विविधता में किन्ही दो आवास्स्थालों के मध्य प्रजातियों की विविधता अर्थात समानता एवं विषमता का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है गामा विविधता · समस्त आवासस्थलों की कुल विविधता को गामा विविधता कहते हैं| · दूसरे शब्दों में भौगोलिक क्षेत्र की कुल जैव विविधता जो कि अल्फा-बीटा दोनों विविधता का योग होता है उसे गामा विविधता कहते हैं चूँकि जैव विविधता, जीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है| जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| अतः जैव विविधता के मापन के माध्यम से उसकी विविधता के स्तर को जाना जाता है| यदि विविधता में कमी स्पष्ट होती है तो उसके संरक्षण एवं संवर्धन के प्रयास किये जाते हैं|
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जैव विविधता से आप क्या समझते हैं? जैव विविधता मापन के विभिन्न विधियों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, जैव विविधता के मूल्य/महत्व का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by biodiversity? Give a brief description of different types of biodiversity measurements. Also, describes the values/importance ofbiodiversity. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- जैव विविधता को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, जैव विविधता मापन के विभिन्न विधियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, जैव विविधता के मूल्यों/महत्वों का वर्णन कीजिये| उतर- जैव विविधता के अंतर्गत जीवो के अंदर तथा उनके मध्य विविधताओं को ध्यान में रखा जाता है|1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता की निम्न परिभाषा दी गई थी- जैव विविधता समस्त स्रोतों जैसे- अंतरक्षेत्रीय, स्थलीय, सागरीय एवं अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों के जीवो के मध्य अंतर और साथ ही उन सभी पारिस्थितिक समूह जिनके ये भाग हैं, में पाई जाने वाली विविधताएँ हैं| इसमें एक प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधता, विभिन्न जातियों के मध्य विविधता तथा पारिस्थितिकीय विविधता शामिल है| जैव विविधता को आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्रीय विविधता के रूप में वर्गीकृत किया जाता है| जैव विविधता का मापन इसका तात्पर्य प्रजातियों की संख्या तथा उसकी समृद्धि के आकलन से है| प्रजातीय समृद्धता/प्रबलता/प्रचुरता का तात्पर्य किसी भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवास में पाए जाने वाली अलग-अलग प्रकार के प्रजातियों की संख्या होती है| प्रजातीय समता का तात्पर्य किसी भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवास में पाए जाने वाली प्रजातियों का वितरण होता है| इसके साथ हीजैव विविधता का मापन निम्नलिखित तीन विधियों से किया जाता है- अल्फा विविधता- यह किसी एक समुदाय या पारितंत्र में प्रजातियों की कुल संख्या को दर्शाती है| बीटा विविधता- इसके अंतर्गत किसी समुदाय या आवास की विशिष्ट प्रजातियों की तुलना किसी दूसरे समुदाय/आवास की प्रजातियों से की जाती है| अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त करने के लिए एक आवास से दूसरे आवास की ओर प्रजातियों का प्रतिस्थापन का मापन इस विविधता इसके अंतर्गत किया जाता है| गामा विविधता- यह किसी भौगोलिक क्षेत्र के सभी आवासों के कुल प्रजातियों की संख्या को दर्शाता है| इसमें अल्फा तथा बीटा विविधता का योग शामिल होता है| जैव विविधता का मूल्य या महत्व आर्थिक महत्व- जैवविविधता की वजह से मनुष्य को जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों से भोजन, आवास आदि के लिए जरूरी संसाधन, कपड़े, औषधियां, रबड़, इमारती लकड़ी आदि की प्राप्ति होती है| जैविक खाद; फसलों के बीजों के संकरण की विधि द्वारा नई उन्नत प्रजातियों की प्राप्ति ; विभिन्न पादपों से भोजन की प्राप्ति औषधीय महत्व - विभिन्न वनस्पतियों से औषधियों एवं जड़ी बूटियों की प्राप्ति जिनसे अनेक रोगों का उपचार; कई पादपों से प्राप्त पदार्थों से दर्द निवारक, मलेरिया के उपचार से संबंधित तथा कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार की दवाएं बनाई जाती है|दर्द निवारक दवा मॉर्फीन, कैंसर के लिए टैक्सोल दवा तथा कई एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण इन्ही पादपों से किया जाता है| विषुवतरेखीय प्रदेश तथा उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में, जहां सबसे ज्यादा जैव विविधता होती है, से औषधीय पौधे एवं पादप प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जिनसे इन क्षेत्रों में संबंधित उद्योगों का विकास| सौंदर्यपरक महत्व/मनोरंजन मूल्य - पारिस्थितिकी पर्यटन को बढ़ावा; फिल्मों, साहित्य आदि में योगदान; आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा पारंपरिक मूल्य - पवित्र वन विभिन्न पर्व/त्योहार जैसे- वटवृक्ष पूजा आदि; पीपल के वृक्षों का सांस्कृतिक महत्व मनुष्य को फूल एवं फल की प्राप्ति जिससे उसका सांस्कृतिक महत्व; ज्ञान मूल्य- पारंपरिक चिकित्सा(आयुष) सोवा रिग्पा पारंपरिक खेती वैश्विक महत्व के कृषि हेरिटेज सिस्टम (GIAHS)- कुट्टानाड, कोरापुट मिश्रित खेती आदि; परितंत्रीय मूल्य- जलवायु संतुलन खाद्य जाल पोषक चक्र सामाजिक तथा नैतिक मूल्य - पारितंत्र प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है| संरक्षण हेतु विभिन्न आंदोलन(चिपको आंदोलन, साइलेंट वैली आंदोलन आदि) उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैव विविधता ही पृथ्वी पर जीवन का आधार है| अतः पारितंत्र को समृद्ध तथा स्वस्थ बनाये रखने हेतु जैव विवधता का समृद्ध होना अतिआवश्यक है|
##Question:जैव विविधता से आप क्या समझते हैं? जैव विविधता मापन के विभिन्न विधियों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, जैव विविधता के मूल्य/महत्व का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by biodiversity? Give a brief description of different types of biodiversity measurements. Also, describes the values/importance ofbiodiversity. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- जैव विविधता को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, जैव विविधता मापन के विभिन्न विधियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, जैव विविधता के मूल्यों/महत्वों का वर्णन कीजिये| उतर- जैव विविधता के अंतर्गत जीवो के अंदर तथा उनके मध्य विविधताओं को ध्यान में रखा जाता है|1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता की निम्न परिभाषा दी गई थी- जैव विविधता समस्त स्रोतों जैसे- अंतरक्षेत्रीय, स्थलीय, सागरीय एवं अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों के जीवो के मध्य अंतर और साथ ही उन सभी पारिस्थितिक समूह जिनके ये भाग हैं, में पाई जाने वाली विविधताएँ हैं| इसमें एक प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधता, विभिन्न जातियों के मध्य विविधता तथा पारिस्थितिकीय विविधता शामिल है| जैव विविधता को आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्रीय विविधता के रूप में वर्गीकृत किया जाता है| जैव विविधता का मापन इसका तात्पर्य प्रजातियों की संख्या तथा उसकी समृद्धि के आकलन से है| प्रजातीय समृद्धता/प्रबलता/प्रचुरता का तात्पर्य किसी भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवास में पाए जाने वाली अलग-अलग प्रकार के प्रजातियों की संख्या होती है| प्रजातीय समता का तात्पर्य किसी भौगोलिक क्षेत्र/पारितंत्र/आवास में पाए जाने वाली प्रजातियों का वितरण होता है| इसके साथ हीजैव विविधता का मापन निम्नलिखित तीन विधियों से किया जाता है- अल्फा विविधता- यह किसी एक समुदाय या पारितंत्र में प्रजातियों की कुल संख्या को दर्शाती है| बीटा विविधता- इसके अंतर्गत किसी समुदाय या आवास की विशिष्ट प्रजातियों की तुलना किसी दूसरे समुदाय/आवास की प्रजातियों से की जाती है| अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त करने के लिए एक आवास से दूसरे आवास की ओर प्रजातियों का प्रतिस्थापन का मापन इस विविधता इसके अंतर्गत किया जाता है| गामा विविधता- यह किसी भौगोलिक क्षेत्र के सभी आवासों के कुल प्रजातियों की संख्या को दर्शाता है| इसमें अल्फा तथा बीटा विविधता का योग शामिल होता है| जैव विविधता का मूल्य या महत्व आर्थिक महत्व- जैवविविधता की वजह से मनुष्य को जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों से भोजन, आवास आदि के लिए जरूरी संसाधन, कपड़े, औषधियां, रबड़, इमारती लकड़ी आदि की प्राप्ति होती है| जैविक खाद; फसलों के बीजों के संकरण की विधि द्वारा नई उन्नत प्रजातियों की प्राप्ति ; विभिन्न पादपों से भोजन की प्राप्ति औषधीय महत्व - विभिन्न वनस्पतियों से औषधियों एवं जड़ी बूटियों की प्राप्ति जिनसे अनेक रोगों का उपचार; कई पादपों से प्राप्त पदार्थों से दर्द निवारक, मलेरिया के उपचार से संबंधित तथा कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार की दवाएं बनाई जाती है|दर्द निवारक दवा मॉर्फीन, कैंसर के लिए टैक्सोल दवा तथा कई एंटीबायोटिक दवाओं का निर्माण इन्ही पादपों से किया जाता है| विषुवतरेखीय प्रदेश तथा उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में, जहां सबसे ज्यादा जैव विविधता होती है, से औषधीय पौधे एवं पादप प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जिनसे इन क्षेत्रों में संबंधित उद्योगों का विकास| सौंदर्यपरक महत्व/मनोरंजन मूल्य - पारिस्थितिकी पर्यटन को बढ़ावा; फिल्मों, साहित्य आदि में योगदान; आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा पारंपरिक मूल्य - पवित्र वन विभिन्न पर्व/त्योहार जैसे- वटवृक्ष पूजा आदि; पीपल के वृक्षों का सांस्कृतिक महत्व मनुष्य को फूल एवं फल की प्राप्ति जिससे उसका सांस्कृतिक महत्व; ज्ञान मूल्य- पारंपरिक चिकित्सा(आयुष) सोवा रिग्पा पारंपरिक खेती वैश्विक महत्व के कृषि हेरिटेज सिस्टम (GIAHS)- कुट्टानाड, कोरापुट मिश्रित खेती आदि; परितंत्रीय मूल्य- जलवायु संतुलन खाद्य जाल पोषक चक्र सामाजिक तथा नैतिक मूल्य - पारितंत्र प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है| संरक्षण हेतु विभिन्न आंदोलन(चिपको आंदोलन, साइलेंट वैली आंदोलन आदि) उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैव विविधता ही पृथ्वी पर जीवन का आधार है| अतः पारितंत्र को समृद्ध तथा स्वस्थ बनाये रखने हेतु जैव विवधता का समृद्ध होना अतिआवश्यक है|
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भारतीय समाज मुख्यतः ग्रामीण समाज है , विवेचना कीजिये । ( 200 शब्द ) Indian society is primarily a rural society, critically analyse. (200 words)
भूमिका में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को बताइए मुख्य भाग में भारतीय समाज में भौतिकवादिता और आध्यात्म पर लिखिए निष्कर्ष में दोनों में सामंजस्य दिखाते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारतीय समाज बहु- सांस्कृतिक,
##Question:भारतीय समाज मुख्यतः ग्रामीण समाज है , विवेचना कीजिये । ( 200 शब्द ) Indian society is primarily a rural society, critically analyse. (200 words) ##Answer:भूमिका में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को बताइए मुख्य भाग में भारतीय समाज में भौतिकवादिता और आध्यात्म पर लिखिए निष्कर्ष में दोनों में सामंजस्य दिखाते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारतीय समाज बहु- सांस्कृतिक,
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जैव विविधता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही जैव विविधता के संरक्षण के सन्दर्भ में मेगाडाइवर्सिटी स्थल, हॉटस्पॉट एवं हॉपस्पॉट पहलों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Clarify the importance of biodiversity. Along with this, discuss the megadiversity area, hotspot and hopspot initiatives in the context of conservation of biodiversity. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जैव विविधता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मेगाडाइवर्सिटी स्थल, हॉटस्पॉट एवं हॉपस्पॉट पहलों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में संरक्षण का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्र विविधता| प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता का महत्व · जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| · जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| · वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| · जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| · जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| · जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| · वानस्पतिक जैव-विविधता, भूमि में जल रिसाव को बढ़ावा देती है जिससे भूमिगत जलस्तर बना रहता है| · जैव-विविधता पारितंत्र को स्थिरता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखती है| · मृदा की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों के मृत भाग तथा मृत जन्तुओं को विघटित कर पोषक तत्वों को मृदा में मुक्त कर देती है जिससे यह पोषक तत्व पुनः पौधों को प्राप्त होते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जैव-विविधता का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है| जैव-विविधता के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है| · आर्थिक मूल्य/महत्त्व, एवं पारितंत्रीय मूल्य के अतिरिक्त जैव विविधता का सौन्दर्य एवं मनोरंजन मूल्य, ज्ञान मूल्य, आध्यात्मिक-सांस्कृतिक मूल्यऔर नैतिक महत्त्व भी है जैव विविधता का संरक्षण अति विविधता/विशाल जैव विविधता(Megadiversity) · यह अवधारणा UNEP के विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र द्वारा द्वारा प्रतिपादित की गयी है| · विशाल जैव विविधता स्थलों को दो शर्तों के आधार पर चिन्हित किया जाता है · यहाँ पौधों की न्यूनतम 5 हजार स्थानिकप्रजातियाँ होनी चाहिए · यह क्षेत्र सागरीय पारितंत्र से लगा होना चाहिए · विशाल जैव विविधता वाले क्षेत्र विश्व के 17 देशों तक विस्तृत हैं जैव विविधता प्रखर/तप्तस्थल(Hotspot) · यह अवधारणा ब्रिटिश पर्यावरणविद डॉक्टर नार्मन मेयर्स द्वारा 1988 में प्रतिपादित की गयी · वर्ष 1989 में स्थापित अंतरसरकारी निकाय कंजर्वेशन इंटरनेशनल द्वारा हॉटस्पॉट का संरक्षण एवं प्रबंधन किया जाता है · इसका वित्त पोषण करने के लिए क्रिटिकल इकोसिस्टम पार्टनरशिप फण्ड (CEPF) की स्थापना की गयी है · तप्तस्थलों का चयन दो शर्तों के आधार पर किया जाता है यथा · कम से कम 1500 संवहनीय(जड़, तने, जाइलम, फ्लोएम युक्त) पौधों की प्रजाति स्थानिक होनी चाहिए, और · प्राथमिक वनस्पति का 70% विनष्ट हो चुकी हो| · विश्व में कुल 36 हॉटस्पॉट हैं, पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई वन क्षेत्र, हाल ही में निर्धारित 35वां हॉटस्पॉट है · भारत में 4 हॉटस्पॉट हैं यथा; पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका, हिमालय, इंडो-बर्मा क्षेत्र, सुंडालैंड(निकोबार) · अधिकाँश हॉटस्पॉट उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में है · इन हॉटस्पॉट स्थलों में विश्व की 60% जैव विविधता पायी जाती है · हॉटेस्ट हॉटस्पॉट ये हॉटस्पॉट क्षेत्रों में ही अधिक विविधता वाले क्षेत्र होते हैं · विश्व में कुल 8हॉटेस्ट हॉटस्पॉट हैं,यें मेडागास्कर, फिलिपीन, सुंडालैंड, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट, ब्राजील, कैरिबियन, केन्या-तंजानिया में विस्तारित हैं होपस्पॉट की अवधारणा · इसे IUCN की समुद्र वैज्ञानिक सिल्विया अर्ल द्वारा वर्ष 2009 में प्रतिपादित किया गया है · IUCN और मिशन ब्लू द्वारा हॉपस्पॉट की पहचान, संरक्षण एवं प्रबंधन कार्य किया जाता है · इसका उद्देश्य महासागरीय/समुद्री जैव विविधता का संरक्षण करना है · भारत में दो हॉपस्पॉट हैं यथा अंडमान द्वीप समूह, लक्षद्वीप जैव विविधता के अत्यधिक महत्त्व को देखते हुए उपरोक्त पहलों के माध्यम से जैव विविधता का संरक्षण करने के प्रयास किये जा रहें हैं| जैव विविधता का बहुआयामी महत्त्व इन पहलों को आवश्यक बनाता है|
##Question:जैव विविधता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही जैव विविधता के संरक्षण के सन्दर्भ में मेगाडाइवर्सिटी स्थल, हॉटस्पॉट एवं हॉपस्पॉट पहलों की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Clarify the importance of biodiversity. Along with this, discuss the megadiversity area, hotspot and hopspot initiatives in the context of conservation of biodiversity. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जैव विविधता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में मेगाडाइवर्सिटी स्थल, हॉटस्पॉट एवं हॉपस्पॉट पहलों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में संरक्षण का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्र विविधता| प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता का महत्व · जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| · जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| · वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| · जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| · जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| · जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| · वानस्पतिक जैव-विविधता, भूमि में जल रिसाव को बढ़ावा देती है जिससे भूमिगत जलस्तर बना रहता है| · जैव-विविधता पारितंत्र को स्थिरता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखती है| · मृदा की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों के मृत भाग तथा मृत जन्तुओं को विघटित कर पोषक तत्वों को मृदा में मुक्त कर देती है जिससे यह पोषक तत्व पुनः पौधों को प्राप्त होते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जैव-विविधता का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है| जैव-विविधता के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है| · आर्थिक मूल्य/महत्त्व, एवं पारितंत्रीय मूल्य के अतिरिक्त जैव विविधता का सौन्दर्य एवं मनोरंजन मूल्य, ज्ञान मूल्य, आध्यात्मिक-सांस्कृतिक मूल्यऔर नैतिक महत्त्व भी है जैव विविधता का संरक्षण अति विविधता/विशाल जैव विविधता(Megadiversity) · यह अवधारणा UNEP के विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र द्वारा द्वारा प्रतिपादित की गयी है| · विशाल जैव विविधता स्थलों को दो शर्तों के आधार पर चिन्हित किया जाता है · यहाँ पौधों की न्यूनतम 5 हजार स्थानिकप्रजातियाँ होनी चाहिए · यह क्षेत्र सागरीय पारितंत्र से लगा होना चाहिए · विशाल जैव विविधता वाले क्षेत्र विश्व के 17 देशों तक विस्तृत हैं जैव विविधता प्रखर/तप्तस्थल(Hotspot) · यह अवधारणा ब्रिटिश पर्यावरणविद डॉक्टर नार्मन मेयर्स द्वारा 1988 में प्रतिपादित की गयी · वर्ष 1989 में स्थापित अंतरसरकारी निकाय कंजर्वेशन इंटरनेशनल द्वारा हॉटस्पॉट का संरक्षण एवं प्रबंधन किया जाता है · इसका वित्त पोषण करने के लिए क्रिटिकल इकोसिस्टम पार्टनरशिप फण्ड (CEPF) की स्थापना की गयी है · तप्तस्थलों का चयन दो शर्तों के आधार पर किया जाता है यथा · कम से कम 1500 संवहनीय(जड़, तने, जाइलम, फ्लोएम युक्त) पौधों की प्रजाति स्थानिक होनी चाहिए, और · प्राथमिक वनस्पति का 70% विनष्ट हो चुकी हो| · विश्व में कुल 36 हॉटस्पॉट हैं, पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई वन क्षेत्र, हाल ही में निर्धारित 35वां हॉटस्पॉट है · भारत में 4 हॉटस्पॉट हैं यथा; पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका, हिमालय, इंडो-बर्मा क्षेत्र, सुंडालैंड(निकोबार) · अधिकाँश हॉटस्पॉट उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में है · इन हॉटस्पॉट स्थलों में विश्व की 60% जैव विविधता पायी जाती है · हॉटेस्ट हॉटस्पॉट ये हॉटस्पॉट क्षेत्रों में ही अधिक विविधता वाले क्षेत्र होते हैं · विश्व में कुल 8हॉटेस्ट हॉटस्पॉट हैं,यें मेडागास्कर, फिलिपीन, सुंडालैंड, इंडो-बर्मा, पश्चिमी घाट, ब्राजील, कैरिबियन, केन्या-तंजानिया में विस्तारित हैं होपस्पॉट की अवधारणा · इसे IUCN की समुद्र वैज्ञानिक सिल्विया अर्ल द्वारा वर्ष 2009 में प्रतिपादित किया गया है · IUCN और मिशन ब्लू द्वारा हॉपस्पॉट की पहचान, संरक्षण एवं प्रबंधन कार्य किया जाता है · इसका उद्देश्य महासागरीय/समुद्री जैव विविधता का संरक्षण करना है · भारत में दो हॉपस्पॉट हैं यथा अंडमान द्वीप समूह, लक्षद्वीप जैव विविधता के अत्यधिक महत्त्व को देखते हुए उपरोक्त पहलों के माध्यम से जैव विविधता का संरक्षण करने के प्रयास किये जा रहें हैं| जैव विविधता का बहुआयामी महत्त्व इन पहलों को आवश्यक बनाता है|
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की-स्टोन प्रजाति, सांकेतिक प्रजाति, फ्लैगशिप प्रजाति तथा आक्रामक प्रजाति का वर्णन कीजिये| पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में, इन प्रजातियों के महत्व को स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Describe the Key-Stone species,Indicator species, Flagship species andInvasive species. In the context of Ecosystem, Clarify the importance of these species. (200 words)
एप्रोच- पहले भाग में, की-स्टोन प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में, सांकेतिक प्रजातिका वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| तीसरे भाग में, फ्लैगशिप प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, आक्रामक प्रजाति का वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- की-स्टोन प्रजाति - ऐसी प्रजाति जिनकी संख्या कम होने के बावजूद उसके अपने पारितंत्र में उसका प्रभाव अधिक होता है| की स्टोन प्रजातियाँ खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है| ऐसे प्रजातियों के कार्य द्वारा पारितंत्र संतुलित रहता है|जैसे- स्टारफिश द्वारा मसल्स को खाना; बाघ द्वारा हिरन को खाना आदि| ये प्रजातियां पारिस्थितिक समुदाय की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| साथ ही, सहवर्ती जीवों की संख्या निर्धारण में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है| यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई अन्य जीवों को प्रभावित करता है और समुदाय में विभिन्न अन्य प्रजातियों के प्रकार और संख्या को निर्धारित करने में मदद करता है। यदि कीस्टोन प्रजाति को हटा दिया जाता है तो पारिस्थितिकी तंत्र में नाटकीय बदलाव आ सकता है| सांकेतक प्रजाति(Indicator Species)- वैसी प्रजातियाँ जो अपने पारितंत्र में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, सांकेतिक प्रजाति कही जाती है| इनका महत्व निम्नलिखित है- ये पूर्व चेतावनी प्रणाली का कार्य करती हैं| सांकेतिक प्रजाति के जानवर या पौधे विशेष पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए प्रहरी या लुकआउट के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे- लाईकेन वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की जानकारी देता है; घड़ियालों की संख्या में कमी प्रदूषित जल की ओर हमारा ध्यान दर्शाती है| उसी प्रकार, प्रवाल विरंजन से वैश्विक तापन तथा सागरीय जल में अम्लीयता का पता चलता है| उनकी उपस्थितिसेपर्यावरण के चरित्र या गुणवत्ता के कुछ विशिष्ट पहलू को समझा जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां धातु से समृद्ध खनिज मिट्टी की सतह पर पाए जा सकते हैं, पौधों की संकेतक प्रजातियां उन खनिजों की बड़ी सांद्रता को अपने ऊतकों में जमा करती हैं। संकेतक प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता मापन के उपायों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे- कुछ प्रकार के जलीय अकशेरुकी और मछली का सर्वेक्षण पानी की गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में किया गया है।जैसे-"सीवेज वर्म्स" (ट्यूबिसिड्स) की उपस्थिति | संकेतक प्रजातियों के उपयोग के माध्यम से,संभावित पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान की जा सकती है ताकि अपूरणीय क्षति से पहले ही उसका पता चल सके तथा संबंधित समस्या का समाधान ढूंढा जा सके| प्रमुख प्रजाति/फ्लैगशिप प्रजाति- वैसी प्रजातियाँ जो, सामाजिक संदर्भ में, जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु चुनी जाती हैं उन्हें फ्लैगशिप प्रजाति कहा जाता है| इनके संरक्षण द्वारा सरकार व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण हेतु जनजागरूकता को प्रोत्साहित करती है| ये लोक जागरूकता अभियान के लिए उपयोगी होते हैं| ब्रांड-एम्बेसडर/आइकॉन के रूप में संरक्षण प्रयासों को दिखाने हेतु| ये जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रमुख होता है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती है| बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से इनका संरक्षण जिससे अन्य प्रजातियों के संरक्षण को भी प्रोत्साहन |जैसे- पांडा, बाघ, एशियाई शेर आदि के संरक्षण हेतु व्यापक स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाएँ | यदि प्रमुख प्रजाति का विनाश हो जाता है, तो हितधारक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आक्रामक प्रजाति वैसी प्रजातियाँ जो स्थानिक पर्यावास के बाहर का प्रजाति हो उसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है| इन्हें विदेशी या एलियन प्रजाति की भी संज्ञा दी जाती है|जैसे- लैंटाना, कांग्रेस घास, जूलीफ्लोरा , मांगुर ,तिलापिया आदि | ऐसी प्रजातियाँ प्रजनन अधिक होने के कारण नये पर्यावास में अप्रवासन के द्वारा बहुलता स्थापित कर लेती है जिससे स्थानिक प्रजातियों के मध्य संकट की स्थिति उत्पन हो जाती है| ये स्थानिक जैव विविधता के लिए खतरा होती हैं| इनके बढ़ते संख्या को देखते हुए सरकार/संगठनों द्वारा स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु योजनाओं/नीतियों का निर्माण किया जाता है|अतः इनके अध्ययन से स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रयासों के लिए प्रोत्साहन मिलता है|
##Question:की-स्टोन प्रजाति, सांकेतिक प्रजाति, फ्लैगशिप प्रजाति तथा आक्रामक प्रजाति का वर्णन कीजिये| पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में, इन प्रजातियों के महत्व को स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) Describe the Key-Stone species,Indicator species, Flagship species andInvasive species. In the context of Ecosystem, Clarify the importance of these species. (200 words)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, की-स्टोन प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में, सांकेतिक प्रजातिका वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| तीसरे भाग में, फ्लैगशिप प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, आक्रामक प्रजाति का वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- की-स्टोन प्रजाति - ऐसी प्रजाति जिनकी संख्या कम होने के बावजूद उसके अपने पारितंत्र में उसका प्रभाव अधिक होता है| की स्टोन प्रजातियाँ खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है| ऐसे प्रजातियों के कार्य द्वारा पारितंत्र संतुलित रहता है|जैसे- स्टारफिश द्वारा मसल्स को खाना; बाघ द्वारा हिरन को खाना आदि| ये प्रजातियां पारिस्थितिक समुदाय की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| साथ ही, सहवर्ती जीवों की संख्या निर्धारण में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है| यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई अन्य जीवों को प्रभावित करता है और समुदाय में विभिन्न अन्य प्रजातियों के प्रकार और संख्या को निर्धारित करने में मदद करता है। यदि कीस्टोन प्रजाति को हटा दिया जाता है तो पारिस्थितिकी तंत्र में नाटकीय बदलाव आ सकता है| सांकेतक प्रजाति(Indicator Species)- वैसी प्रजातियाँ जो अपने पारितंत्र में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, सांकेतिक प्रजाति कही जाती है| इनका महत्व निम्नलिखित है- ये पूर्व चेतावनी प्रणाली का कार्य करती हैं| सांकेतिक प्रजाति के जानवर या पौधे विशेष पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए प्रहरी या लुकआउट के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे- लाईकेन वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की जानकारी देता है; घड़ियालों की संख्या में कमी प्रदूषित जल की ओर हमारा ध्यान दर्शाती है| उसी प्रकार, प्रवाल विरंजन से वैश्विक तापन तथा सागरीय जल में अम्लीयता का पता चलता है| उनकी उपस्थितिसेपर्यावरण के चरित्र या गुणवत्ता के कुछ विशिष्ट पहलू को समझा जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां धातु से समृद्ध खनिज मिट्टी की सतह पर पाए जा सकते हैं, पौधों की संकेतक प्रजातियां उन खनिजों की बड़ी सांद्रता को अपने ऊतकों में जमा करती हैं। संकेतक प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता मापन के उपायों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे- कुछ प्रकार के जलीय अकशेरुकी और मछली का सर्वेक्षण पानी की गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में किया गया है।जैसे-"सीवेज वर्म्स" (ट्यूबिसिड्स) की उपस्थिति | संकेतक प्रजातियों के उपयोग के माध्यम से,संभावित पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान की जा सकती है ताकि अपूरणीय क्षति से पहले ही उसका पता चल सके तथा संबंधित समस्या का समाधान ढूंढा जा सके| प्रमुख प्रजाति/फ्लैगशिप प्रजाति- वैसी प्रजातियाँ जो, सामाजिक संदर्भ में, जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु चुनी जाती हैं उन्हें फ्लैगशिप प्रजाति कहा जाता है| इनके संरक्षण द्वारा सरकार व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण हेतु जनजागरूकता को प्रोत्साहित करती है| ये लोक जागरूकता अभियान के लिए उपयोगी होते हैं| ब्रांड-एम्बेसडर/आइकॉन के रूप में संरक्षण प्रयासों को दिखाने हेतु| ये जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रमुख होता है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती है| बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से इनका संरक्षण जिससे अन्य प्रजातियों के संरक्षण को भी प्रोत्साहन |जैसे- पांडा, बाघ, एशियाई शेर आदि के संरक्षण हेतु व्यापक स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाएँ | यदि प्रमुख प्रजाति का विनाश हो जाता है, तो हितधारक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आक्रामक प्रजाति वैसी प्रजातियाँ जो स्थानिक पर्यावास के बाहर का प्रजाति हो उसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है| इन्हें विदेशी या एलियन प्रजाति की भी संज्ञा दी जाती है|जैसे- लैंटाना, कांग्रेस घास, जूलीफ्लोरा , मांगुर ,तिलापिया आदि | ऐसी प्रजातियाँ प्रजनन अधिक होने के कारण नये पर्यावास में अप्रवासन के द्वारा बहुलता स्थापित कर लेती है जिससे स्थानिक प्रजातियों के मध्य संकट की स्थिति उत्पन हो जाती है| ये स्थानिक जैव विविधता के लिए खतरा होती हैं| इनके बढ़ते संख्या को देखते हुए सरकार/संगठनों द्वारा स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु योजनाओं/नीतियों का निर्माण किया जाता है|अतः इनके अध्ययन से स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रयासों के लिए प्रोत्साहन मिलता है|
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Explain the formation of the universe, stars with respect to the Big Bang Theory. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The importance of studying the formation of the universe - THE FORMATION OF THE UNIVERSE AS PER THE BIG BANG THEORY -CONCLUSION A concluding remark Answer:- The Big Bang Theory is the most widely accepted theory of the formation of the universe among the scientific community. It is important to study the formation of the universe because such understanding gives us the base for the foundation of geography and geology. It is the basic foundation underlying our understanding of the other geological phenomena of the Earth, as well as of the universe THE FORMATION OF THE UNIVERSE AS PER THE BIG BANG THEORY As per the Big Bang Theory, the evolution of the universe happened, as follows: 1) SINGULARITY Before the Big Bang explosion, singularity existed. This means that all the space, time, matter and energy were contained within a single point. 2) THE EXPLOSION The explosion called the Big Bang happened 13.7 billion years ago. 3) BEGINNING OF DIMENSIONS The dimensions of Space and Time came into existence. Space meant the beginning of mathematics, geometry, equations, which is the language of nature 4) THE FUNDAMENTAL FORCES OF PHYSICS The fundamental forces of physics also started. Strong nuclear force, electromagnetic force, weak nuclear force and gravitational force- the 4 fundamental forces of the universe- came into being. 5) FORMATION OF SUB-ATOMIC PARTICLES This gave birth to quantum physics and quantum mechanics. 6) ATOMS The strong nuclear forces gave us atoms. The strong nuclear forces held the atoms together (i.e. the protons, neutrons and electrons). The simplest atom is Hydrogen. It was formed within three minutes of the Big Bang. Therefore, chemistry also started. 7) HYDROGEN Among the known mass, most of it was Hydrogen. Hydrogen first existed in the plasma state. It was opaque, and therefore, since the universe mostly consisted of Hydrogen, the universe was opaque. One could not see through the universe. This plasma state was due to the extremely hot temperature. 8) CREATION OF ELECTRO-MAGNETIC RADIATION The interaction of electricity and magnetism led to the creation of these electromagnetic radiations. Radio waves, infra-red radiation, light energy, gamma rays and beta rays were formed. 9) COOLING DOWN OF THE UNIVERSE After 3.8 lakh years, the plasma and gases (Hydrogen) began to cool down. Therefore, the plasma was turned into gas. The universe, therefore, turned transparent and began to cool down. We had a dark universe. 10) NEBULA- GRAVITY DRIVEN CONCENTRATION These are clouds of Hydrogen. Hydrogen accumulated due to gravitational forces. The nebula further concentrated under their own gravity. This led to an increase in temperature to 10 to the power 6 i.e. 1 million degree Celsius. The average temperature of the universe is -273 degrees Celsius. Inside the nebula, it is -173 degrees Celsius. 11) NUCLEAR FUSION- THE BIRTH OF STARS This temperature is conducive for nuclear fusion for Hydrogen. Therefore, Hydrogen fused to form Helium. This nuclear fusion led to a huge amount of energy radiation including heat and light. In this way, the stars were born. A star is Hydrogen fusing into Helium and emitting light, heat and other energy. 12) THE FORMATION OF GALAXIES A star is formed in the Hydrogen forming nebula. A nebula could have many stars. The biggest nebula is called a galaxy (the biggest set of Hydrogen cloud). Numerous galaxy nebulae also exist. All of them are Hydrogen concentrated gases. In this way, we have a universe with galaxies and stars. Galaxies are held together by gravity. Numerous stars exist inside a galaxy. The stars are also held by the gravity of the Hydrogen, which forms the star. 13) DYING STAR The first stars were formed within the first billion years along with the first galaxies. The star explodes in its last stage. The star dies and forms the next generation. Once the star has exploded, the higher/ heavier elements go away and the other elements concentrate at the centre. Thus, the next star is formed. 14) PLANETARY STARS If the mass of the dying star is less than equal to 1.44 times the mass of the Sun (Chandrasekhar Limit), then it grows into a planetary star. The higher elements (Carbon, Silica etc.) form revolving planets. Hydrogen and Helium form the star. Such planets in the universe are called exo-planets, which can either be in gaseous or solid states. For example, our solar system consists of such planets. 15) EXPANSION OF THE UNIVERSE AND DARK ENERGY AND DARK MATTER The concentration of gasses/ nebula should imply the contraction of the universe. But the universe is expanding- such that the size of galaxies remains constant. But every galaxy is moving apart from every other galaxy. The reason behind this is dark energy, which has an anti-gravitational character. This dark energy was created at the time of the Big Bang. At the time of the Big Bang, a major part of the matter formed was also turned into dark matter. The characteristics of dark matter and dark energy are not known much. 16) BLACKHOLES These are objects which have an enormous amount of density. This implies enormous gravity such that even light cannot escape its gravity Black holes tend to squeeze the matter into infinitely decimally small parts. It also squeezes and distorts time and space. It also squeezes and distorts time and space. Therefore, matter, space and energy get squeezed. Therefore, singularity exists at the centre of black holes. When the mass of the dying star is 3 times more than the mass of the sun, then a black hole forms. Black holes are celestial bodies. They are infinite density objects, which attract everything. Even light cannot escape. A phenomenon similar to singularity exists at the centre of the black hole. 16.1) EVENT HORIZON It is a region after crossing which, the return is not possible. Hence, events on the two sides are separated from each other. The study and endeavours to study and understand the universe still continue. Until now we have hardly been able to understand one to four per cent of the universe. The rest percentage of the universe is still unknown to us.
##Question:Explain the formation of the universe, stars with respect to the Big Bang Theory. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The importance of studying the formation of the universe - THE FORMATION OF THE UNIVERSE AS PER THE BIG BANG THEORY -CONCLUSION A concluding remark Answer:- The Big Bang Theory is the most widely accepted theory of the formation of the universe among the scientific community. It is important to study the formation of the universe because such understanding gives us the base for the foundation of geography and geology. It is the basic foundation underlying our understanding of the other geological phenomena of the Earth, as well as of the universe THE FORMATION OF THE UNIVERSE AS PER THE BIG BANG THEORY As per the Big Bang Theory, the evolution of the universe happened, as follows: 1) SINGULARITY Before the Big Bang explosion, singularity existed. This means that all the space, time, matter and energy were contained within a single point. 2) THE EXPLOSION The explosion called the Big Bang happened 13.7 billion years ago. 3) BEGINNING OF DIMENSIONS The dimensions of Space and Time came into existence. Space meant the beginning of mathematics, geometry, equations, which is the language of nature 4) THE FUNDAMENTAL FORCES OF PHYSICS The fundamental forces of physics also started. Strong nuclear force, electromagnetic force, weak nuclear force and gravitational force- the 4 fundamental forces of the universe- came into being. 5) FORMATION OF SUB-ATOMIC PARTICLES This gave birth to quantum physics and quantum mechanics. 6) ATOMS The strong nuclear forces gave us atoms. The strong nuclear forces held the atoms together (i.e. the protons, neutrons and electrons). The simplest atom is Hydrogen. It was formed within three minutes of the Big Bang. Therefore, chemistry also started. 7) HYDROGEN Among the known mass, most of it was Hydrogen. Hydrogen first existed in the plasma state. It was opaque, and therefore, since the universe mostly consisted of Hydrogen, the universe was opaque. One could not see through the universe. This plasma state was due to the extremely hot temperature. 8) CREATION OF ELECTRO-MAGNETIC RADIATION The interaction of electricity and magnetism led to the creation of these electromagnetic radiations. Radio waves, infra-red radiation, light energy, gamma rays and beta rays were formed. 9) COOLING DOWN OF THE UNIVERSE After 3.8 lakh years, the plasma and gases (Hydrogen) began to cool down. Therefore, the plasma was turned into gas. The universe, therefore, turned transparent and began to cool down. We had a dark universe. 10) NEBULA- GRAVITY DRIVEN CONCENTRATION These are clouds of Hydrogen. Hydrogen accumulated due to gravitational forces. The nebula further concentrated under their own gravity. This led to an increase in temperature to 10 to the power 6 i.e. 1 million degree Celsius. The average temperature of the universe is -273 degrees Celsius. Inside the nebula, it is -173 degrees Celsius. 11) NUCLEAR FUSION- THE BIRTH OF STARS This temperature is conducive for nuclear fusion for Hydrogen. Therefore, Hydrogen fused to form Helium. This nuclear fusion led to a huge amount of energy radiation including heat and light. In this way, the stars were born. A star is Hydrogen fusing into Helium and emitting light, heat and other energy. 12) THE FORMATION OF GALAXIES A star is formed in the Hydrogen forming nebula. A nebula could have many stars. The biggest nebula is called a galaxy (the biggest set of Hydrogen cloud). Numerous galaxy nebulae also exist. All of them are Hydrogen concentrated gases. In this way, we have a universe with galaxies and stars. Galaxies are held together by gravity. Numerous stars exist inside a galaxy. The stars are also held by the gravity of the Hydrogen, which forms the star. 13) DYING STAR The first stars were formed within the first billion years along with the first galaxies. The star explodes in its last stage. The star dies and forms the next generation. Once the star has exploded, the higher/ heavier elements go away and the other elements concentrate at the centre. Thus, the next star is formed. 14) PLANETARY STARS If the mass of the dying star is less than equal to 1.44 times the mass of the Sun (Chandrasekhar Limit), then it grows into a planetary star. The higher elements (Carbon, Silica etc.) form revolving planets. Hydrogen and Helium form the star. Such planets in the universe are called exo-planets, which can either be in gaseous or solid states. For example, our solar system consists of such planets. 15) EXPANSION OF THE UNIVERSE AND DARK ENERGY AND DARK MATTER The concentration of gasses/ nebula should imply the contraction of the universe. But the universe is expanding- such that the size of galaxies remains constant. But every galaxy is moving apart from every other galaxy. The reason behind this is dark energy, which has an anti-gravitational character. This dark energy was created at the time of the Big Bang. At the time of the Big Bang, a major part of the matter formed was also turned into dark matter. The characteristics of dark matter and dark energy are not known much. 16) BLACKHOLES These are objects which have an enormous amount of density. This implies enormous gravity such that even light cannot escape its gravity Black holes tend to squeeze the matter into infinitely decimally small parts. It also squeezes and distorts time and space. It also squeezes and distorts time and space. Therefore, matter, space and energy get squeezed. Therefore, singularity exists at the centre of black holes. When the mass of the dying star is 3 times more than the mass of the sun, then a black hole forms. Black holes are celestial bodies. They are infinite density objects, which attract everything. Even light cannot escape. A phenomenon similar to singularity exists at the centre of the black hole. 16.1) EVENT HORIZON It is a region after crossing which, the return is not possible. Hence, events on the two sides are separated from each other. The study and endeavours to study and understand the universe still continue. Until now we have hardly been able to understand one to four per cent of the universe. The rest percentage of the universe is still unknown to us.
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संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण में अंतर स्पष्ट कीजिये | साथ ही यह स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया ? (200शब्द) Differentiate between Sanskritization and Westernization. Also elucidate that how Sanskritization and Westernization impacted the Caste System in contemporary Indian society?
एप्रोच:- · सर्वप्रथम संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण में अंतर स्पष्ट कीजिये। · तत्पश्चात, विभिन्न तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । · अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मेंनिचली यामध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षेत्रीय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ जबकि पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- · संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्न जातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। · ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। · इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। · एम एन श्रीनिवास के अनुसार पश्च्मिकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। · औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। · ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । · शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्च्मिकरण विभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
##Question:संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण में अंतर स्पष्ट कीजिये | साथ ही यह स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया ? (200शब्द) Differentiate between Sanskritization and Westernization. Also elucidate that how Sanskritization and Westernization impacted the Caste System in contemporary Indian society?##Answer:एप्रोच:- · सर्वप्रथम संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण में अंतर स्पष्ट कीजिये। · तत्पश्चात, विभिन्न तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । · अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मेंनिचली यामध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षेत्रीय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ जबकि पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- · संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्न जातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। · ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। · इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। · एम एन श्रीनिवास के अनुसार पश्च्मिकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। · औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। · ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । · शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्च्मिकरण विभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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जैव विविधता के संरक्षण में कीस्टोन, संकेतक, आक्रामक, अम्ब्रेला और फ्लैगशिप प्रजातियों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of Keystone, Indicator, Aggressive, umbrella and Flagship species in the conservation of biodiversity.(150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता संरक्षण को परिभाषित करते हुए इसके उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये| 2- मुख्य भाग में कीस्टोन, संकेतक, आक्रामक, अम्ब्रेला और फ्लैगशिप प्रजातियों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध प्रबंधन है ताकि प्राकृतिक संतुलन एवं जैव विविधता को बनाये रखा जा सके। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग भी शामिल है जिसके अन्तर्गत संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाए कि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त हो। जैव विविधता का संरक्षण का उद्देश्य प्रजातियों की आनुवांशिक विविधता को नष्ट होने से रोकना, स्पीशीजों को विलुप्त होने से बचाना, तथा पारितंत्र को नष्ट तथा अवकृमित होने से बचाना होता है| विभिन्न पारितंत्रों में पायी जाने वाली कुछ प्रजातियाँ जैव विविधता संरक्षण के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण होती हैं| की-स्टोन प्रजाति · ऐसी प्रजाति जिनकी संख्या कम होने के बावजूद उसके अपने पारितंत्र में उसका प्रभाव अधिक होता है| कीस्टोन प्रजातियाँ खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है| · यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई अन्य जीवों को प्रभावित करता है और समुदाय में विभिन्न अन्य प्रजातियों के प्रकार और संख्या को निर्धारित करने में मदद करता है| ऐसे प्रजातियों के कार्य द्वारा पारितंत्र संतुलित रहता है|जैसे- स्टारफिश द्वारा मसल्स को खाना; बाघ द्वारा हिरन को खाना आदि| इसी प्रकार बाघ, हाथी, ड्युगोंग, स्टार फिश, बरगद का पेड़ आदि भी कीस्टोन प्रजातियाँ हैं| · ये प्रजातियां पारिस्थितिक समुदाय की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| साथ ही, सहवर्ती जीवों की संख्या निर्धारण में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है| · यदि कीस्टोन प्रजाति को हटा दिया जाता है तो पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक बदलाव आ सकता है| सांकेतक प्रजाति(Indicator Species) · वैसी प्रजातियाँ जो अपने पारितंत्र में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, सांकेतिक प्रजाति कही जाती है| · ये पूर्व चेतावनी प्रणाली का कार्य करती हैं| सांकेतिक प्रजाति के जानवर या पौधे विशेष पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए प्रहरी या लुकआउट के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे- लाईकेन वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की जानकारी देता है; घड़ियालों की संख्या में कमी प्रदूषित जल की ओर हमारा ध्यान दर्शाती है| उसी प्रकार, प्रवाल विरंजन से वैश्विक तापन तथा सागरीय जल में अम्लीयता का पता चलता है| · उनकी उपस्थितिसेपर्यावरण के चरित्र या गुणवत्ता के कुछ विशिष्ट पहलू को समझा जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां धातु से समृद्ध खनिज मिट्टी की सतह पर पाए जा सकते हैं, पौधों की संकेतक प्रजातियां उन खनिजों की बड़ी सांद्रता को अपने ऊतकों में जमा करती हैं| · संकेतक प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता मापन के उपायों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है| · संकेतक प्रजातियों के उपयोग के माध्यम से,संभावित पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान की जा सकती है ताकि अपूरणीय क्षति से पहले ही उसका पता चल सके तथा संबंधित समस्या का समाधान ढूंढा जा सके| प्रमुख प्रजाति/फ्लैगशिप प्रजातियां · वैसी प्रजातियाँ जो, सामाजिक संदर्भ में, जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु चुनी जाती हैं उन्हें फ्लैगशिप प्रजाति कहा जाता है| · इनके संरक्षण द्वारा सरकार व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण हेतु जनजागरूकता को प्रोत्साहित करती है| ये लोक जागरूकता अभियान के लिए उपयोगी होते हैं| · इन्हें संरक्षण प्रयासों को दिखाने हेतु ब्रांड-एम्बेसडर/आइकॉन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है| · ये जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रमुख होता है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती है| · बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से इनका संरक्षण जिससे अन्य प्रजातियों के संरक्षण को भी प्रोत्साहन |जैसे- पांडा, बाघ, एशियाई शेर आदि के संरक्षण हेतु व्यापक स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाएँ | · यदि प्रमुख प्रजाति का विनाश हो जाता है, तो हितधारक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आक्रामक प्रजाति · वैसी प्रजातियाँ जो स्थानिक पर्यावास के बाहर का प्रजाति हो उसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है| इन्हें विदेशी या एलियन प्रजाति की भी संज्ञा दी जाती है|जैसे- लैंटाना, कांग्रेस घास, जूलीफ्लोरा , मांगुर ,तिलापिया, घरेलू कबूतर, बर्मीज पाइथन आदि | · ऐसी प्रजातियाँ प्रजनन अधिक होने के कारण नये पर्यावास में अप्रवासन के द्वारा बहुलता स्थापित कर लेती है जिससे स्थानिक प्रजातियों के मध्य संकट की स्थिति उत्पन हो जाती है| · ये स्थानिक जैव विविधता के लिए खतरा होती हैं| इनके बढ़ते संख्या को देखते हुए सरकार/संगठनों द्वारा स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु योजनाओं/नीतियों का निर्माण किया जाता है|अतः इनके अध्ययन से स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रयासों के लिए प्रोत्साहन मिलता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि उपरोक्त प्रजातियाँ जैव विविधता संरक्षण के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं|
##Question:जैव विविधता के संरक्षण में कीस्टोन, संकेतक, आक्रामक, अम्ब्रेला और फ्लैगशिप प्रजातियों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of Keystone, Indicator, Aggressive, umbrella and Flagship species in the conservation of biodiversity.(150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता संरक्षण को परिभाषित करते हुए इसके उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये| 2- मुख्य भाग में कीस्टोन, संकेतक, आक्रामक, अम्ब्रेला और फ्लैगशिप प्रजातियों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध प्रबंधन है ताकि प्राकृतिक संतुलन एवं जैव विविधता को बनाये रखा जा सके। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग भी शामिल है जिसके अन्तर्गत संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाए कि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त हो। जैव विविधता का संरक्षण का उद्देश्य प्रजातियों की आनुवांशिक विविधता को नष्ट होने से रोकना, स्पीशीजों को विलुप्त होने से बचाना, तथा पारितंत्र को नष्ट तथा अवकृमित होने से बचाना होता है| विभिन्न पारितंत्रों में पायी जाने वाली कुछ प्रजातियाँ जैव विविधता संरक्षण के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण होती हैं| की-स्टोन प्रजाति · ऐसी प्रजाति जिनकी संख्या कम होने के बावजूद उसके अपने पारितंत्र में उसका प्रभाव अधिक होता है| कीस्टोन प्रजातियाँ खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है| · यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई अन्य जीवों को प्रभावित करता है और समुदाय में विभिन्न अन्य प्रजातियों के प्रकार और संख्या को निर्धारित करने में मदद करता है| ऐसे प्रजातियों के कार्य द्वारा पारितंत्र संतुलित रहता है|जैसे- स्टारफिश द्वारा मसल्स को खाना; बाघ द्वारा हिरन को खाना आदि| इसी प्रकार बाघ, हाथी, ड्युगोंग, स्टार फिश, बरगद का पेड़ आदि भी कीस्टोन प्रजातियाँ हैं| · ये प्रजातियां पारिस्थितिक समुदाय की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| साथ ही, सहवर्ती जीवों की संख्या निर्धारण में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है| · यदि कीस्टोन प्रजाति को हटा दिया जाता है तो पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक बदलाव आ सकता है| सांकेतक प्रजाति(Indicator Species) · वैसी प्रजातियाँ जो अपने पारितंत्र में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, सांकेतिक प्रजाति कही जाती है| · ये पूर्व चेतावनी प्रणाली का कार्य करती हैं| सांकेतिक प्रजाति के जानवर या पौधे विशेष पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए प्रहरी या लुकआउट के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे- लाईकेन वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की जानकारी देता है; घड़ियालों की संख्या में कमी प्रदूषित जल की ओर हमारा ध्यान दर्शाती है| उसी प्रकार, प्रवाल विरंजन से वैश्विक तापन तथा सागरीय जल में अम्लीयता का पता चलता है| · उनकी उपस्थितिसेपर्यावरण के चरित्र या गुणवत्ता के कुछ विशिष्ट पहलू को समझा जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां धातु से समृद्ध खनिज मिट्टी की सतह पर पाए जा सकते हैं, पौधों की संकेतक प्रजातियां उन खनिजों की बड़ी सांद्रता को अपने ऊतकों में जमा करती हैं| · संकेतक प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता मापन के उपायों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है| · संकेतक प्रजातियों के उपयोग के माध्यम से,संभावित पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान की जा सकती है ताकि अपूरणीय क्षति से पहले ही उसका पता चल सके तथा संबंधित समस्या का समाधान ढूंढा जा सके| प्रमुख प्रजाति/फ्लैगशिप प्रजातियां · वैसी प्रजातियाँ जो, सामाजिक संदर्भ में, जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु चुनी जाती हैं उन्हें फ्लैगशिप प्रजाति कहा जाता है| · इनके संरक्षण द्वारा सरकार व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण हेतु जनजागरूकता को प्रोत्साहित करती है| ये लोक जागरूकता अभियान के लिए उपयोगी होते हैं| · इन्हें संरक्षण प्रयासों को दिखाने हेतु ब्रांड-एम्बेसडर/आइकॉन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है| · ये जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रमुख होता है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती है| · बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से इनका संरक्षण जिससे अन्य प्रजातियों के संरक्षण को भी प्रोत्साहन |जैसे- पांडा, बाघ, एशियाई शेर आदि के संरक्षण हेतु व्यापक स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाएँ | · यदि प्रमुख प्रजाति का विनाश हो जाता है, तो हितधारक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आक्रामक प्रजाति · वैसी प्रजातियाँ जो स्थानिक पर्यावास के बाहर का प्रजाति हो उसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है| इन्हें विदेशी या एलियन प्रजाति की भी संज्ञा दी जाती है|जैसे- लैंटाना, कांग्रेस घास, जूलीफ्लोरा , मांगुर ,तिलापिया, घरेलू कबूतर, बर्मीज पाइथन आदि | · ऐसी प्रजातियाँ प्रजनन अधिक होने के कारण नये पर्यावास में अप्रवासन के द्वारा बहुलता स्थापित कर लेती है जिससे स्थानिक प्रजातियों के मध्य संकट की स्थिति उत्पन हो जाती है| · ये स्थानिक जैव विविधता के लिए खतरा होती हैं| इनके बढ़ते संख्या को देखते हुए सरकार/संगठनों द्वारा स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु योजनाओं/नीतियों का निर्माण किया जाता है|अतः इनके अध्ययन से स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रयासों के लिए प्रोत्साहन मिलता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि उपरोक्त प्रजातियाँ जैव विविधता संरक्षण के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं|
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जैव विविधता में ह्रास के कारणों का वर्णन कीजिए। इस संदर्भ में जैव-विविधता संरक्षण हेतु किये जाने वाले प्रयासों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; अंक-10 ) Describe the causes of biodiversity degradation. In this context, discuss the efforts for biodiversity conservation. (150-200 words; Marks -10 )
एप्रोच- जैव-विविधता को परिभाषित करते हुए, वर्तमान में इसपर मंडराते संकट की पृष्ठभूमि के साथ संक्षिप्त भूमिका लिखिए| पहले भाग में, जैव विविधता में ह्रास के कारणों का वर्णन कीजिये| दूसरे भाग में, जैव विविधता संरक्षण हेतु किये जाने वाले प्रयासों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः जैव-विविधता संरक्षण के महत्व को संक्षिप्त रूप में दर्शाते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- जैव विविधता के अंतर्गत जीवो के अंदर तथा उनके मध्य विविधताओं को ध्यान में रखा जाता है|1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता की निम्न परिभाषा दी गई थी- जैव विविधता समस्त स्रोतों जैसे- अंतरक्षेत्रीय, स्थलीय, सागरीय एवं अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों के जीवो के मध्य अंतर और साथ ही उन सभी पारिस्थितिक समूह जिनके ये भाग हैं, में पाई जाने वाली विविधताएँ हैं| इसमें एक प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधता, विभिन्न जातियों के मध्य विविधता तथा पारिस्थितिकीय विविधता शामिल है| वर्तमान समय में, विविध कारणों की वजह से जैव विविधता के समक्ष गंभीर संकट उत्पन हो रहा है तथा छठी सामूहिक प्रजाति विलुप्तता की संभावना व्यक्त की जा रही है| जैव विविधता में ह्रास के कारण- वन-उन्मूलन, जल विद्युत् परियोजना, कृषि क्षेत्रों के विस्तार, खनन आदि के फलस्वरूप जीवों/वनस्पतियों के आवास स्थल का विखंडन/विनाश; आक्रामक विदेशी प्रजातियों के नए आवासों में जाने से वहां के स्थानिक प्रजातियों पर संकट| जैसे- पार्थिनियम घास का भारत में आयातित गेंहू के साथ प्रवेश; जलकुम्भी से जलीय पारितंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव; जूलीफ्लोरा आदि| ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि की वजह से वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन आदि का प्रभाव; पर्यावरणीय प्रदूषण की वजह से जीव अपने स्थानिक आवास से विलुप्त हो रहे हैं| जल ,वायु,मृदा आदि पर्यावरणीय घटकों में प्रदूषण का जैव विविधता पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| प्रदूषित वायु, अम्लीय वर्षा, समुद्री जल का बढ़ता तापमान आदि की वजह से संवेदनशील प्रजातियाँ काफी खतरे में हैं| जैसे- गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल आदि का अपने आवासों से खात्मा| नाभिकीय प्रदूषण का प्रभाव; आनुवांशिक प्रदूषण जैसे- जी.एम. फसलों की वजह से अन्य उस फसल के अन्य प्रकारों का नुकसान| साथ ही, इससे कुछ सहायक प्रजातियों को भी नुकसान| संसाधनों का अतिदोहन; बाढ़, भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, वनाग्नि, बीमारियों आदि प्राकृतिक कारणों का प्रभाव; जानवरों का अवैध शिकार तथा उनकी तस्करी; जैव विविधता संरक्षण हेतु किये जाने वाले प्रयास- जैव विविधता संरक्षण हेतु निम्न दो विधियों का प्रयोग किया जाता है- स्व-स्थाने संरक्षण - इसके अंतर्गत जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है| इसके लिए संबंधित प्रजाति के प्राकृतिक आवास में उनके रहने योग्य अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर स्वस्थ पारितंत्र का विकास किया जाता है| इसके अंतर्गत निम्नलिखित पक्षों के निर्माण/विकास को ध्यान में रखा जाता है- वन्यजीव अभयारण्य राष्ट्रीय उद्यान जैवमंडल आगार/रिजर्व(यूनेस्को के मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम द्वारा); सामुदायिक रिजर्व एवं संरक्षित रिजर्व सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन पवित्र वन पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों(ESZ) का निर्माण बाह्य-स्थाने संरक्षण - इसके अंतर्गत पौधे एवं जीव-जंतुओं का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवास के बाहर के किसी विशेष क्षेत्र/स्थान में किया जाता है| संबंधित प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को आपदाओं, प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियों के प्रवेश आदि की वजह से खतरा उत्पन हो जाता है जिससे प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षित करना आवश्यक हो जाता है| बाह्य-स्थाने संरक्षण के अंतर्गत निम्नलिखित पक्षों के निर्माण/विकास को ध्यान में रखा जाता है- हर्बेरियम का विकास वानस्पतिक उद्यान बीज बैंक प्रजनन केंद्र प्राणी उद्यान जीन बैंक चिड़ियाघर निम्नतापीय संरक्षण केंद्र(क्रायो-प्रिजर्वेशन) पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों और उनमें उपस्थित विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण द्वारा ही सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है| जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन का मूल आधार है तथा यही पक्ष हमारी धरती को अन्य से अलग करता है| जैव विविधता का संरक्षण मनुष्य के हित में भी है क्योंकि इसके द्वारा ही जीवन को प्रभावित करने वाले व्यापक आयामों में संतुलन लाया जाता है|
##Question:जैव विविधता में ह्रास के कारणों का वर्णन कीजिए। इस संदर्भ में जैव-विविधता संरक्षण हेतु किये जाने वाले प्रयासों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; अंक-10 ) Describe the causes of biodiversity degradation. In this context, discuss the efforts for biodiversity conservation. (150-200 words; Marks -10 )##Answer:एप्रोच- जैव-विविधता को परिभाषित करते हुए, वर्तमान में इसपर मंडराते संकट की पृष्ठभूमि के साथ संक्षिप्त भूमिका लिखिए| पहले भाग में, जैव विविधता में ह्रास के कारणों का वर्णन कीजिये| दूसरे भाग में, जैव विविधता संरक्षण हेतु किये जाने वाले प्रयासों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः जैव-विविधता संरक्षण के महत्व को संक्षिप्त रूप में दर्शाते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- जैव विविधता के अंतर्गत जीवो के अंदर तथा उनके मध्य विविधताओं को ध्यान में रखा जाता है|1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता की निम्न परिभाषा दी गई थी- जैव विविधता समस्त स्रोतों जैसे- अंतरक्षेत्रीय, स्थलीय, सागरीय एवं अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों के जीवो के मध्य अंतर और साथ ही उन सभी पारिस्थितिक समूह जिनके ये भाग हैं, में पाई जाने वाली विविधताएँ हैं| इसमें एक प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधता, विभिन्न जातियों के मध्य विविधता तथा पारिस्थितिकीय विविधता शामिल है| वर्तमान समय में, विविध कारणों की वजह से जैव विविधता के समक्ष गंभीर संकट उत्पन हो रहा है तथा छठी सामूहिक प्रजाति विलुप्तता की संभावना व्यक्त की जा रही है| जैव विविधता में ह्रास के कारण- वन-उन्मूलन, जल विद्युत् परियोजना, कृषि क्षेत्रों के विस्तार, खनन आदि के फलस्वरूप जीवों/वनस्पतियों के आवास स्थल का विखंडन/विनाश; आक्रामक विदेशी प्रजातियों के नए आवासों में जाने से वहां के स्थानिक प्रजातियों पर संकट| जैसे- पार्थिनियम घास का भारत में आयातित गेंहू के साथ प्रवेश; जलकुम्भी से जलीय पारितंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव; जूलीफ्लोरा आदि| ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि की वजह से वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन आदि का प्रभाव; पर्यावरणीय प्रदूषण की वजह से जीव अपने स्थानिक आवास से विलुप्त हो रहे हैं| जल ,वायु,मृदा आदि पर्यावरणीय घटकों में प्रदूषण का जैव विविधता पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| प्रदूषित वायु, अम्लीय वर्षा, समुद्री जल का बढ़ता तापमान आदि की वजह से संवेदनशील प्रजातियाँ काफी खतरे में हैं| जैसे- गंगा डॉल्फिन, घड़ियाल आदि का अपने आवासों से खात्मा| नाभिकीय प्रदूषण का प्रभाव; आनुवांशिक प्रदूषण जैसे- जी.एम. फसलों की वजह से अन्य उस फसल के अन्य प्रकारों का नुकसान| साथ ही, इससे कुछ सहायक प्रजातियों को भी नुकसान| संसाधनों का अतिदोहन; बाढ़, भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, वनाग्नि, बीमारियों आदि प्राकृतिक कारणों का प्रभाव; जानवरों का अवैध शिकार तथा उनकी तस्करी; जैव विविधता संरक्षण हेतु किये जाने वाले प्रयास- जैव विविधता संरक्षण हेतु निम्न दो विधियों का प्रयोग किया जाता है- स्व-स्थाने संरक्षण - इसके अंतर्गत जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है| इसके लिए संबंधित प्रजाति के प्राकृतिक आवास में उनके रहने योग्य अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर स्वस्थ पारितंत्र का विकास किया जाता है| इसके अंतर्गत निम्नलिखित पक्षों के निर्माण/विकास को ध्यान में रखा जाता है- वन्यजीव अभयारण्य राष्ट्रीय उद्यान जैवमंडल आगार/रिजर्व(यूनेस्को के मानव एवं जीवमंडल कार्यक्रम द्वारा); सामुदायिक रिजर्व एवं संरक्षित रिजर्व सुरक्षित वन एवं आरक्षित वन पवित्र वन पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों(ESZ) का निर्माण बाह्य-स्थाने संरक्षण - इसके अंतर्गत पौधे एवं जीव-जंतुओं का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवास के बाहर के किसी विशेष क्षेत्र/स्थान में किया जाता है| संबंधित प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को आपदाओं, प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियों के प्रवेश आदि की वजह से खतरा उत्पन हो जाता है जिससे प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षित करना आवश्यक हो जाता है| बाह्य-स्थाने संरक्षण के अंतर्गत निम्नलिखित पक्षों के निर्माण/विकास को ध्यान में रखा जाता है- हर्बेरियम का विकास वानस्पतिक उद्यान बीज बैंक प्रजनन केंद्र प्राणी उद्यान जीन बैंक चिड़ियाघर निम्नतापीय संरक्षण केंद्र(क्रायो-प्रिजर्वेशन) पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों और उनमें उपस्थित विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण द्वारा ही सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है| जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन का मूल आधार है तथा यही पक्ष हमारी धरती को अन्य से अलग करता है| जैव विविधता का संरक्षण मनुष्य के हित में भी है क्योंकि इसके द्वारा ही जीवन को प्रभावित करने वाले व्यापक आयामों में संतुलन लाया जाता है|
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समान नागरिक संहिता, भारत में एक समतामूलक समाज की स्थापना करेगी हालांकि इसको लागू करने में अनेक चुनौतियां भी हैं| स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) The uniform civil code will establish an equitable society in India, although there are many challenges to implementing it. Clarify (150-200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में समान नागरिक संहिता के बारे में चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में स्पष्ट कीजिये कीजिये कि किस प्रकार समान नागरिक संहिता भारत में समतामूलक समाज की स्थापना करेगी| 3- दूसरे भाग में लागू करने की चुनौतियां स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधान युक्त निष्कर्ष दीजिये समान नागरिक सहिंता का अर्थ है ,सिविल मामलों जेसे -शादी , तलाक ,सम्पति आदि में एक समान कानूनों का लागू होना | समान नागरिक सहिंता की चर्चा भारतीय संविधान के अनुच्छेद -44 (DPSP )के तहत चर्चा की गयी हैं | भारत में गोवा एक मात्र राज्य है जहाँ समान नागरिक सहिंता लागू हैं| निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इसे लागू करने की वकालत की जाती हैं – · समान नागरिक सहिंता, अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सभी नागरिकों के समानता के अधिकार को सुनिश्चित करेगा · धार्मिक संहिताओं से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु समान नागरिक सहिंता आवश्यक है| क्योंकि समान नागरिक सहिंता की अनुपस्थिति में अल्पसंख्यक वर्गों की महिलाओं के विभिन्न अधिकारों का हनन होता है| · समान नागरिक संहिता से संहितागत बहुलता का समापन होगा जिससे यह राष्ट्रीय एकीकरण में सहायक होगा · समान नागरिक संहिता, अधिकारों को सुनिश्चित कर समाज का सशक्तिकरण करेगी| · इससे भेदभावमूलक व्यक्तिगत कानूनों की समाप्ति होगी और मानवाधिकारों को बढ़ावामिलेगा · किसी भी सम्प्रदाय के प्रायः 4 निजी संहिताएँ होती हैं| विवाह, संपत्ति में उत्तराधिकार, गोद लेने की प्रथा और विवाह विच्छेद अर्थात तलाक संहिता| यह लम्बे समय से चर्चा का एक मुद्दा रहा है कि क्या निजी संहितायें समुदाय विशेष के धर्म से प्रेरित होती हैं ? यदि ऐसा है तो किसी पंथनिरपेक्ष देश में उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए| किन्तु भारतीय सर्वोच्च न्यायालय(SC) इसे नहीं मानता है| · सरला मुद्गल बनाम भारत संघ 1995 में SC ने कहा कि किसी धर्म और उसके निजी संहिता के मध्य सीधा सम्बन्ध नहीं होता| · स्वतंत्र भारत में बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश MC चागला ने अपनी पुस्तक " प्ली फॉर अ यूनिफार्म सिविल कोर्ट" में लिखा है कि अनुच्छेद 44 को लागू करना सरकार की मजबूरी है| ताकि समाज में गैर बराबरी समाप्त की जा सके| · भारतीय संविधान पूरे देश के लिए एक जैसा है जिसे सभी भारत वासियों को मानना होगा चाहे उसका धर्म/मजहब कुछ भी हो| · यहाँ यह बताना आवश्यक है कि विश्व के अनेक इस्लामी राष्ट्रों जैसे इरान, मिस्र, मोरक्को, जोर्डन, सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान एवं ट्यूनीशिया जैसे देशों ने बहु विवाह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है| यदि ऐसा है तो भारत में इसे क्यों नही लागू किया जा सकता| · मुस्लिम महिलायें(तलाक के समय अधिकार संरक्षण)अधिनियम 1986 में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा निर्धारित मेहर की शर्त को SC के निर्णयों पर प्राथमिकता दिया गया|| यह समान नागरिक संहिता की भावना के विरुद्ध था अतः SC ने शाहबानों वाद में दिए गए फैसले को पलटने सम्बन्धी संसद के निर्णय को बाद के कई अन्य फैसलों में उचित नहीं बताया है|जैसे डेनियल लतीफ़ वाद 2001 में SC ने शाहबानो वाद में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को उचित बताया और समान नागरिक संहिता के पक्ष में निर्णय दिया| · इसी प्रकार गोद लेने के अधिकार के सन्दर्भ में शबनम हाशमी बनाम भारत संघ वाद 2014 में SC ने किशोर न्याय अधिनियम 2000 को एक पंथनिरपेक्ष कानून घोषित करते हुए बताया कि यह हिन्दू-मुस्लिम या अन्य सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होगा| · अतः उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में यह कहा जा सकता है कि भारत में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए| समान नागरिक सहिंता को लागू करने की चुनौतियां · विविधता में एकता के कारणभारत में एक समान विधि का निर्माण एवं क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है| · समान नागरिक संहिता के माध्यम से बहुसंख्यकों के रीति रिवाज अल्पसंख्यकों पर आरोपित करने का तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है · तर्क दिया जाता है कि समान नागरिक संहिता के माध्यम से राज्यों द्वारा व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संविधान द्वारा प्रदत्त स्वत्रंतता के अधिकार की भावना के विपरीत होगा · समान नागरिक संहिता एक संवेदनशील मुद्दा है इसके आरोपण से देश की एकता अखंडता के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत हो सकती हैं| अतः स्पष्ट होता है कि समान नागरिक संहिता समतामूलक समाज की स्थापना के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण होगा किन्तु इसका आरोपण भारत के समक्ष विभिन्न चुनौतियों को उत्पन्न कर सकता है| विधि आयोग की सिफारिश के अनुसार अभी देश में समान नागरिक सहिंता का समय नहीं आया हैं | अतः समाज को स्वयं इसकी पहल करनी चाहिए तथा सरकार को पहले उन प्रावधानों को हटाने के प्रयास करने चाहिए जो सीधे मूल व मानवाधिकार की विरुद्ध हों|
##Question:समान नागरिक संहिता, भारत में एक समतामूलक समाज की स्थापना करेगी हालांकि इसको लागू करने में अनेक चुनौतियां भी हैं| स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) The uniform civil code will establish an equitable society in India, although there are many challenges to implementing it. Clarify (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में समान नागरिक संहिता के बारे में चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में स्पष्ट कीजिये कीजिये कि किस प्रकार समान नागरिक संहिता भारत में समतामूलक समाज की स्थापना करेगी| 3- दूसरे भाग में लागू करने की चुनौतियां स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधान युक्त निष्कर्ष दीजिये समान नागरिक सहिंता का अर्थ है ,सिविल मामलों जेसे -शादी , तलाक ,सम्पति आदि में एक समान कानूनों का लागू होना | समान नागरिक सहिंता की चर्चा भारतीय संविधान के अनुच्छेद -44 (DPSP )के तहत चर्चा की गयी हैं | भारत में गोवा एक मात्र राज्य है जहाँ समान नागरिक सहिंता लागू हैं| निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इसे लागू करने की वकालत की जाती हैं – · समान नागरिक सहिंता, अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सभी नागरिकों के समानता के अधिकार को सुनिश्चित करेगा · धार्मिक संहिताओं से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु समान नागरिक सहिंता आवश्यक है| क्योंकि समान नागरिक सहिंता की अनुपस्थिति में अल्पसंख्यक वर्गों की महिलाओं के विभिन्न अधिकारों का हनन होता है| · समान नागरिक संहिता से संहितागत बहुलता का समापन होगा जिससे यह राष्ट्रीय एकीकरण में सहायक होगा · समान नागरिक संहिता, अधिकारों को सुनिश्चित कर समाज का सशक्तिकरण करेगी| · इससे भेदभावमूलक व्यक्तिगत कानूनों की समाप्ति होगी और मानवाधिकारों को बढ़ावामिलेगा · किसी भी सम्प्रदाय के प्रायः 4 निजी संहिताएँ होती हैं| विवाह, संपत्ति में उत्तराधिकार, गोद लेने की प्रथा और विवाह विच्छेद अर्थात तलाक संहिता| यह लम्बे समय से चर्चा का एक मुद्दा रहा है कि क्या निजी संहितायें समुदाय विशेष के धर्म से प्रेरित होती हैं ? यदि ऐसा है तो किसी पंथनिरपेक्ष देश में उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए| किन्तु भारतीय सर्वोच्च न्यायालय(SC) इसे नहीं मानता है| · सरला मुद्गल बनाम भारत संघ 1995 में SC ने कहा कि किसी धर्म और उसके निजी संहिता के मध्य सीधा सम्बन्ध नहीं होता| · स्वतंत्र भारत में बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश MC चागला ने अपनी पुस्तक " प्ली फॉर अ यूनिफार्म सिविल कोर्ट" में लिखा है कि अनुच्छेद 44 को लागू करना सरकार की मजबूरी है| ताकि समाज में गैर बराबरी समाप्त की जा सके| · भारतीय संविधान पूरे देश के लिए एक जैसा है जिसे सभी भारत वासियों को मानना होगा चाहे उसका धर्म/मजहब कुछ भी हो| · यहाँ यह बताना आवश्यक है कि विश्व के अनेक इस्लामी राष्ट्रों जैसे इरान, मिस्र, मोरक्को, जोर्डन, सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान एवं ट्यूनीशिया जैसे देशों ने बहु विवाह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है| यदि ऐसा है तो भारत में इसे क्यों नही लागू किया जा सकता| · मुस्लिम महिलायें(तलाक के समय अधिकार संरक्षण)अधिनियम 1986 में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा निर्धारित मेहर की शर्त को SC के निर्णयों पर प्राथमिकता दिया गया|| यह समान नागरिक संहिता की भावना के विरुद्ध था अतः SC ने शाहबानों वाद में दिए गए फैसले को पलटने सम्बन्धी संसद के निर्णय को बाद के कई अन्य फैसलों में उचित नहीं बताया है|जैसे डेनियल लतीफ़ वाद 2001 में SC ने शाहबानो वाद में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को उचित बताया और समान नागरिक संहिता के पक्ष में निर्णय दिया| · इसी प्रकार गोद लेने के अधिकार के सन्दर्भ में शबनम हाशमी बनाम भारत संघ वाद 2014 में SC ने किशोर न्याय अधिनियम 2000 को एक पंथनिरपेक्ष कानून घोषित करते हुए बताया कि यह हिन्दू-मुस्लिम या अन्य सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होगा| · अतः उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में यह कहा जा सकता है कि भारत में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए| समान नागरिक सहिंता को लागू करने की चुनौतियां · विविधता में एकता के कारणभारत में एक समान विधि का निर्माण एवं क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है| · समान नागरिक संहिता के माध्यम से बहुसंख्यकों के रीति रिवाज अल्पसंख्यकों पर आरोपित करने का तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है · तर्क दिया जाता है कि समान नागरिक संहिता के माध्यम से राज्यों द्वारा व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संविधान द्वारा प्रदत्त स्वत्रंतता के अधिकार की भावना के विपरीत होगा · समान नागरिक संहिता एक संवेदनशील मुद्दा है इसके आरोपण से देश की एकता अखंडता के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत हो सकती हैं| अतः स्पष्ट होता है कि समान नागरिक संहिता समतामूलक समाज की स्थापना के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण होगा किन्तु इसका आरोपण भारत के समक्ष विभिन्न चुनौतियों को उत्पन्न कर सकता है| विधि आयोग की सिफारिश के अनुसार अभी देश में समान नागरिक सहिंता का समय नहीं आया हैं | अतः समाज को स्वयं इसकी पहल करनी चाहिए तथा सरकार को पहले उन प्रावधानों को हटाने के प्रयास करने चाहिए जो सीधे मूल व मानवाधिकार की विरुद्ध हों|
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अनुसूचित जनजाति की विशेषताओं का वर्णन कीजिये | साथ ही भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तिकरण हेतु किये गए प्रयासों की समीक्षा कीजिये | (150-200शब्द; 10 अंक) Describe the charactristics of scheduled tribe. Also review the initiatives of Indian government for their empowerment. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच:- · सर्वप्रथम, भूमिका में अनुसूचित जनजाति का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। · तत्पश्चात, अनुसूचित जनजाति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। · इसके बाद भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की समीक्षा कीजिये। · अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- अनुसूचित जनजाति" शब्द पहली बार भारत के संविधान में दिखाई दिया। अनुच्छेद 366 (25) ने अनुसूचित जनजातियों को "ऐसे जनजातियों या जनजातीय समुदायों के रूप में परिभाषित किया है, जिन्हें अनुच्छेद 342 के तहत इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुसूचित जनजाति माना जाता है। अनुसूचित जनजाति की विशेषताएं:- जनजातियाँ वह मानव समुदाय हैं जो एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, अलग रीति-रिवाज, अलग भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं: आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़े हैं · कुछ अनुसूचित जनजातियाँ हैं, जिनमें 75 को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) के रूप में जाना जाता है, जिनकी विशेषतायें हैं- कृषि पूर्व की प्रौद्योगिकी स्थिर या घटती जनसंख्या बेहद कम साक्षरता · अर्थव्यवस्था का निर्वाह स्तर भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास:- · सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। · इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। · 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं। · अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। · अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिये लाभकारी सिद्ध होगी। हालाँकि सरकार अपने स्तर पर जनजातियों की स्थिति को सुधारने की दिशा में बेहतर प्रयास कर रही है लेकिन शासन के कार्यों में और ज़्यादा तब्दीली की ज़रुरत है।
##Question:अनुसूचित जनजाति की विशेषताओं का वर्णन कीजिये | साथ ही भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तिकरण हेतु किये गए प्रयासों की समीक्षा कीजिये | (150-200शब्द; 10 अंक) Describe the charactristics of scheduled tribe. Also review the initiatives of Indian government for their empowerment. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- · सर्वप्रथम, भूमिका में अनुसूचित जनजाति का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। · तत्पश्चात, अनुसूचित जनजाति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। · इसके बाद भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की समीक्षा कीजिये। · अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- अनुसूचित जनजाति" शब्द पहली बार भारत के संविधान में दिखाई दिया। अनुच्छेद 366 (25) ने अनुसूचित जनजातियों को "ऐसे जनजातियों या जनजातीय समुदायों के रूप में परिभाषित किया है, जिन्हें अनुच्छेद 342 के तहत इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुसूचित जनजाति माना जाता है। अनुसूचित जनजाति की विशेषताएं:- जनजातियाँ वह मानव समुदाय हैं जो एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, अलग रीति-रिवाज, अलग भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं: आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़े हैं · कुछ अनुसूचित जनजातियाँ हैं, जिनमें 75 को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) के रूप में जाना जाता है, जिनकी विशेषतायें हैं- कृषि पूर्व की प्रौद्योगिकी स्थिर या घटती जनसंख्या बेहद कम साक्षरता · अर्थव्यवस्था का निर्वाह स्तर भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास:- · सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। · इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। · 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं। · अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। · अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिये लाभकारी सिद्ध होगी। हालाँकि सरकार अपने स्तर पर जनजातियों की स्थिति को सुधारने की दिशा में बेहतर प्रयास कर रही है लेकिन शासन के कार्यों में और ज़्यादा तब्दीली की ज़रुरत है।
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भारत में जीडीपी की वृद्धि दर विश्व के कई विकसित देशों से आगे है, फिर भी भारत में गरीबों की एक विशाल आबादी निवास करती है। इस कथन के संदर्भ में, भारत में गरीबी की समस्या के पीछे उत्तरदायी कारणों का उल्लेख कीजिये। साथ ही, भारत से गरीबी को कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों पर चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) India"s GDP growth rate is ahead of many developed countries of the world yet India has large number of poor population. In context of this statement, write down the responsible causes behind the problem of poverty in India. Also, Discuss the measures that can be taken to reduce poverty. (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच- भारत की तीव्र जीडीपी वृद्धि दर की अन्य विकसित देशों के साथ तुलना करते हुए, भारत में व्याप्त गरीबी से उसे जोड़ते हुए संक्षिप्त प्रस्तावना/भूमिका लिखिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में व्याप्त गरीबी के कारणों को बताईये| अगले भाग में, भारत से गरीबी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः इस संदर्भ में सरकारी प्रयासों को दिखाते हुए गरीबी कम करने की जरुरत को संक्षिप्तता से लिखिए| उत्तर- भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी वृद्धि दर 2017-18 में 6.7% थी वहीँ 2018-19 में इसे 7.3% रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है| वैश्विक मांग के घटते दौर, देशों के बीच ट्रेड-वॉर, वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद आदि कारणों से अधिकांश विकसित एवं औद्योगिक राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर कम होते जा रही है, वहीँ भारतीय अर्थव्यवस्था को आने वाले सालों में और तीव्र गति से बढ़ने का अनुमान विभिन्न रिपोर्टों(वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक रिपोर्ट आदि) में व्यक्त किया जा चूका है| हालाँकि इसका भारत में गरीबी की समस्या को दूर करने में योगदान सीमित दिखाई पड़ता हैं क्योंकि भारत की लगभग एक-तिहाई जनसँख्या अभी भी गरीबी के दुष्चक्र में फँसी हुयी है| भारत में गरीबी की समस्या के पीछे उत्तरदायी कारण- जीडीपी की वृद्धि दर में विश्वास परन्तु जीडीपी में बढ़ोतरी का फायदा समाज के सभी हिस्सों तक पहुँचाने की अवधारणा के प्रति दृढ इच्छाशक्ति का अभाव; तेजी से बढ़ती जनसँख्या- वस्तुतः भारत में गरीबी हेतु यह सबसे प्रमुख कारण माना जा सकता है| खासकर समाज के पिछड़े,वंचित तथा निम्न आय वाले वर्गों में जनसँख्या की वृद्धि और भी तेज़ है जो समस्या की जटिलता और बढ़ा देता है| भारत में व्याप्त अशिक्षा; बेरोजगारी की वजह से जनसँख्या के बड़े हिस्सों को गरीबी के जाल में फंसने हेतु मजबूर होना पड़ता है| सामाजिक कारकों(जैसे- जाति व्यवस्था, रूढ़िवादी रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि) का प्रभाव; पारंपरिक लघु एवं कुटीर उद्योगों का खात्मा जिससे ग्रामीण आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव; निम्न कृषि उत्पादकता से कृषि का आय का जरिया बनने की बजाय जीवन-निर्वाह बनना; भूमि और अन्य परिसंपत्तियों का असमान वितरण; जलवायु संबंधित कारक जैसे- मानसूनी वर्षा का अनियमित वितरण आदि| भारत से गरीबी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपाय- भूमि सुधार कार्यक्रमों को व्यापक रूप से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि भूमि का असमान वितरण ग्रामीण भारत में गरीबी का एक प्रमुख कारण है| शिक्षा व्यवस्था तथा शिक्षा प्रणाली में सुधार ताकि एक ओर तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को शिक्षित बनाया जा सके वहीँ दूसरी ओर, उस शिक्षित जनसँख्या को कौशलयुक्त बनाकर रोजगार प्रदान किया जा सके| रोजगार का सृजन- भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का फायदा समाज के सभी हिस्सों तक समावेशी रूप से पहुंचाने हेतु अधिकाधिक रोजगारों का सृजन किया जाना अतिआवश्यक है| स्वास्थ्य सुधार- स्वास्थ्य सुविधाओं पर भारतीय लोगों द्वारा आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय काफी मात्रा में किया जाता है| गरीबी कम करने हेतु वहनीय एवं गुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं की सार्वभौमिक पहुँच होना जरुरी है| मानव विकास की पहल; सामजिक बुनियादी ढांचे का निर्माण; समावेशी जीडीपी वृद्धि की उच्च दर प्राप्त करना; विभिन्न गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों और विशेष क्षेत्रों के विकास कार्यक्रमों के माध्यम से गरीबी की समस्या का निवारण; इस संदर्भ में सरकार द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों/नीतियों/योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन तथा इनकी व्यापक निगरानी सुनिश्चित करना; समावेशी विकास के लिए गरीबी-उन्मूलन एक अनिवार्य एवं आवश्यक शर्त है| भारतीय अर्थव्यवस्था तभी लम्बे समय तक तीव्र वृद्धि करती रहेगी अगर जनसँख्या के सभी हिस्सों तक इस वृद्धि का परिणाम पहुँचाया जा सके| सरकार द्वारा इस संबंध में मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, स्टैंड अप इंडिया आदि अनेकों कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं| आवश्यकता इस बात की है कि इन योजनाओं का सही ढंग से उचित क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाये|
##Question:भारत में जीडीपी की वृद्धि दर विश्व के कई विकसित देशों से आगे है, फिर भी भारत में गरीबों की एक विशाल आबादी निवास करती है। इस कथन के संदर्भ में, भारत में गरीबी की समस्या के पीछे उत्तरदायी कारणों का उल्लेख कीजिये। साथ ही, भारत से गरीबी को कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों पर चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) India"s GDP growth rate is ahead of many developed countries of the world yet India has large number of poor population. In context of this statement, write down the responsible causes behind the problem of poverty in India. Also, Discuss the measures that can be taken to reduce poverty. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- भारत की तीव्र जीडीपी वृद्धि दर की अन्य विकसित देशों के साथ तुलना करते हुए, भारत में व्याप्त गरीबी से उसे जोड़ते हुए संक्षिप्त प्रस्तावना/भूमिका लिखिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में व्याप्त गरीबी के कारणों को बताईये| अगले भाग में, भारत से गरीबी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः इस संदर्भ में सरकारी प्रयासों को दिखाते हुए गरीबी कम करने की जरुरत को संक्षिप्तता से लिखिए| उत्तर- भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी वृद्धि दर 2017-18 में 6.7% थी वहीँ 2018-19 में इसे 7.3% रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है| वैश्विक मांग के घटते दौर, देशों के बीच ट्रेड-वॉर, वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद आदि कारणों से अधिकांश विकसित एवं औद्योगिक राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर कम होते जा रही है, वहीँ भारतीय अर्थव्यवस्था को आने वाले सालों में और तीव्र गति से बढ़ने का अनुमान विभिन्न रिपोर्टों(वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक रिपोर्ट आदि) में व्यक्त किया जा चूका है| हालाँकि इसका भारत में गरीबी की समस्या को दूर करने में योगदान सीमित दिखाई पड़ता हैं क्योंकि भारत की लगभग एक-तिहाई जनसँख्या अभी भी गरीबी के दुष्चक्र में फँसी हुयी है| भारत में गरीबी की समस्या के पीछे उत्तरदायी कारण- जीडीपी की वृद्धि दर में विश्वास परन्तु जीडीपी में बढ़ोतरी का फायदा समाज के सभी हिस्सों तक पहुँचाने की अवधारणा के प्रति दृढ इच्छाशक्ति का अभाव; तेजी से बढ़ती जनसँख्या- वस्तुतः भारत में गरीबी हेतु यह सबसे प्रमुख कारण माना जा सकता है| खासकर समाज के पिछड़े,वंचित तथा निम्न आय वाले वर्गों में जनसँख्या की वृद्धि और भी तेज़ है जो समस्या की जटिलता और बढ़ा देता है| भारत में व्याप्त अशिक्षा; बेरोजगारी की वजह से जनसँख्या के बड़े हिस्सों को गरीबी के जाल में फंसने हेतु मजबूर होना पड़ता है| सामाजिक कारकों(जैसे- जाति व्यवस्था, रूढ़िवादी रीति-रिवाज, परम्पराएँ आदि) का प्रभाव; पारंपरिक लघु एवं कुटीर उद्योगों का खात्मा जिससे ग्रामीण आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव; निम्न कृषि उत्पादकता से कृषि का आय का जरिया बनने की बजाय जीवन-निर्वाह बनना; भूमि और अन्य परिसंपत्तियों का असमान वितरण; जलवायु संबंधित कारक जैसे- मानसूनी वर्षा का अनियमित वितरण आदि| भारत से गरीबी कम करने हेतु किये जा सकने वाले उपाय- भूमि सुधार कार्यक्रमों को व्यापक रूप से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि भूमि का असमान वितरण ग्रामीण भारत में गरीबी का एक प्रमुख कारण है| शिक्षा व्यवस्था तथा शिक्षा प्रणाली में सुधार ताकि एक ओर तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को शिक्षित बनाया जा सके वहीँ दूसरी ओर, उस शिक्षित जनसँख्या को कौशलयुक्त बनाकर रोजगार प्रदान किया जा सके| रोजगार का सृजन- भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का फायदा समाज के सभी हिस्सों तक समावेशी रूप से पहुंचाने हेतु अधिकाधिक रोजगारों का सृजन किया जाना अतिआवश्यक है| स्वास्थ्य सुधार- स्वास्थ्य सुविधाओं पर भारतीय लोगों द्वारा आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय काफी मात्रा में किया जाता है| गरीबी कम करने हेतु वहनीय एवं गुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं की सार्वभौमिक पहुँच होना जरुरी है| मानव विकास की पहल; सामजिक बुनियादी ढांचे का निर्माण; समावेशी जीडीपी वृद्धि की उच्च दर प्राप्त करना; विभिन्न गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों और विशेष क्षेत्रों के विकास कार्यक्रमों के माध्यम से गरीबी की समस्या का निवारण; इस संदर्भ में सरकार द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों/नीतियों/योजनाओं का समुचित क्रियान्वयन तथा इनकी व्यापक निगरानी सुनिश्चित करना; समावेशी विकास के लिए गरीबी-उन्मूलन एक अनिवार्य एवं आवश्यक शर्त है| भारतीय अर्थव्यवस्था तभी लम्बे समय तक तीव्र वृद्धि करती रहेगी अगर जनसँख्या के सभी हिस्सों तक इस वृद्धि का परिणाम पहुँचाया जा सके| सरकार द्वारा इस संबंध में मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, स्टैंड अप इंडिया आदि अनेकों कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं| आवश्यकता इस बात की है कि इन योजनाओं का सही ढंग से उचित क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाये|
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यद्यपि कुछ स्थितियों मेंउपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति की भूमिका निभा सकता है किन्तु संविधान में दोनों पदों की सापेक्षिक स्थिति पर्याप्त रूप से भिन्न है| स्पष्ट कीजिये| (150-200शब्द/10 अंक) Although in some cases the vice-president can play the role of the president, but the position of both posts in the constitution is relatively quite different. Clarify (150-200 words/ 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में उपराष्ट्रपति पद के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति की भूमिका ग्रहण करने की स्थितियों को स्पष्ट कीजिये 3- संविधान में दोनों की सापेक्षिक स्थिति को स्पष्ट कीजिये और इसी के अनुरूप निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारतमेंराष्ट्रपतिके बादउपराष्ट्रपतिका पदकार्यकारिणीमें दूसरा सबसे बड़ा पद होता है। भारत का उपराष्ट्रपतिराज्यसभाके अध्यक्ष के तौर पर विधायी कार्यों में भी हिस्सा लेता है| अर्थात उपराष्ट्रपति, भारत का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है| भारतीय संविधान में उपराष्ट्रपति का पद संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है| उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा। परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनुच्छेद 65 के अधीन राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस अवधि के दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा| इससे स्पष्ट होता है की कुछ परिस्थितियों में उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति की भूमिका निभा सकता है| उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति की भूमिका ग्रहण करने की स्थिति · अनुच्छेद 65(1) के अनुसार मृत्यु, पदमुक्ति, त्यागपत्र अथवा कोई अन्य कारण से यदि राष्ट्रपति का पद मुक्त हो जाए · अनुच्छेद 65(2) के अनुसार, अनुपस्थिति, बीमारी अथवा कोई अन्य कारण से यदि राष्ट्रपति अनुपस्थिति रहता है · अनुच्छेद 65(3) के अनुसार उपराष्ट्रपति जितने समय तक राष्ट्रपति के पद पर आसीन रहेगा, उसके वेतन भत्ते तथा विशेषाधिकार वैसे ही रहेंगे जैसे कि राष्ट्रपति के होते हैं| हालांकि संसद यदि चाहे तो इसमें बदलाव कर सकती है|(संसद ने अभी तक ऐसा किया नहीं है) · जब तक उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति का पदभार सम्हालेगा तब तक राज्यसभा के पदेन सभापति का पद रिक्त रहेगा और राज्यसभा का उपसभापति सभापति की भूमिका निभाएगा| वास्तव में राज्यसभा का उपसभापति,राज्यसभा का सदस्यहोता है और वही राज्यसभा कावास्तविक पीठासीन अधिकारीहोता है राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति की स्थिति अनुच्छेद 54 के अनुसार,राष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों केनिर्वाचित प्रतिनिधिभाग लेंगे और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित प्रतिनिधि भाग लेंगे 70वें संविधान संशोधन अधिनियम 1991 के अनुसार दिल्ली तथा पुद्दुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भी राष्ट्रपति निर्वाचित करने के लिए गठित निर्वाचक मंडल के सदस्य होंगे उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य(निर्वाचित या मनोनीत) भाग लेंगे, उपराष्ट्रपति के चुनाव में राज्यों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता| उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक मेंसाधारण बहुमत से किया जाता है भारतीय संविधान उपराष्ट्रपति के लिए कोई विशेष कार्य निर्धारित नहीं करता अनुच्छेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है और इसी के सन्दर्भ में वह वेतन भत्ते आदि प्राप्त करता है अनुच्छेद 58 के अनुसार,राष्ट्रपति बनने के लिए अन्य योग्यताओं में एक योग्यता यह भी है कि वह लोकसभा का सदस्य बनने की अर्हता रखता हो| दूसरी ओर अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति बनने के लिए अन्य योग्यताओं में एक योग्यता यह भी है कि वह राज्यसभा के सदस्य बनने की अर्हता रखता हो| अनुच्छेद 56(1B) तथा 61 के अनुसार केवल महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा ही हटाया जा सकता है|जबकि अनुच्छेद 67B के अनुसार उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए ऐसी किसी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती| उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्य सभा को विशेष बहुमत से एक संकल्प पारित करना होता है और लोकसभा साधारण बहुमत से इस पर अपनी सहमति प्रकट करती है| अनुच्छेद 62 के अनुसार राष्ट्रपति का पद रिक्त होने की दशा में 6 माह पूर्ण होने के पहले भर लिया जाना चाहिए किन्तु उपराष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 66 तथा 68 के अनुसार इसकी कोई समय सीमा तय नहीं है| इसमें केवल इतना कहा गया है कि जीतनी जल्दी हो सके उपराष्ट्रपति के रिक्त पद को भरने के लिए चुनाव करा लिया जाए| अनुच्छेद 56(1A) के अनुसार, राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देता है जबकि अनुच्छेद 67A के अनुसार उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संविधान में दोनों पदों की स्थिति सापेक्षिक रूप से भिन्न है| दोनों पदों के स्वरुप, महत्त्व, कार्य, चुनाव, पदमुक्ति आदि के सन्दर्भ में किये गए प्रावधान पर्याप्त रूप से भिन्न व्यवस्था करते हैं|
##Question:यद्यपि कुछ स्थितियों मेंउपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति की भूमिका निभा सकता है किन्तु संविधान में दोनों पदों की सापेक्षिक स्थिति पर्याप्त रूप से भिन्न है| स्पष्ट कीजिये| (150-200शब्द/10 अंक) Although in some cases the vice-president can play the role of the president, but the position of both posts in the constitution is relatively quite different. Clarify (150-200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में उपराष्ट्रपति पद के बारे में सामान्य जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति की भूमिका ग्रहण करने की स्थितियों को स्पष्ट कीजिये 3- संविधान में दोनों की सापेक्षिक स्थिति को स्पष्ट कीजिये और इसी के अनुरूप निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारतमेंराष्ट्रपतिके बादउपराष्ट्रपतिका पदकार्यकारिणीमें दूसरा सबसे बड़ा पद होता है। भारत का उपराष्ट्रपतिराज्यसभाके अध्यक्ष के तौर पर विधायी कार्यों में भी हिस्सा लेता है| अर्थात उपराष्ट्रपति, भारत का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है| भारतीय संविधान में उपराष्ट्रपति का पद संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है| उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा। परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनुच्छेद 65 के अधीन राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस अवधि के दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा| इससे स्पष्ट होता है की कुछ परिस्थितियों में उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति की भूमिका निभा सकता है| उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति की भूमिका ग्रहण करने की स्थिति · अनुच्छेद 65(1) के अनुसार मृत्यु, पदमुक्ति, त्यागपत्र अथवा कोई अन्य कारण से यदि राष्ट्रपति का पद मुक्त हो जाए · अनुच्छेद 65(2) के अनुसार, अनुपस्थिति, बीमारी अथवा कोई अन्य कारण से यदि राष्ट्रपति अनुपस्थिति रहता है · अनुच्छेद 65(3) के अनुसार उपराष्ट्रपति जितने समय तक राष्ट्रपति के पद पर आसीन रहेगा, उसके वेतन भत्ते तथा विशेषाधिकार वैसे ही रहेंगे जैसे कि राष्ट्रपति के होते हैं| हालांकि संसद यदि चाहे तो इसमें बदलाव कर सकती है|(संसद ने अभी तक ऐसा किया नहीं है) · जब तक उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति का पदभार सम्हालेगा तब तक राज्यसभा के पदेन सभापति का पद रिक्त रहेगा और राज्यसभा का उपसभापति सभापति की भूमिका निभाएगा| वास्तव में राज्यसभा का उपसभापति,राज्यसभा का सदस्यहोता है और वही राज्यसभा कावास्तविक पीठासीन अधिकारीहोता है राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति की स्थिति अनुच्छेद 54 के अनुसार,राष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों केनिर्वाचित प्रतिनिधिभाग लेंगे और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित प्रतिनिधि भाग लेंगे 70वें संविधान संशोधन अधिनियम 1991 के अनुसार दिल्ली तथा पुद्दुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भी राष्ट्रपति निर्वाचित करने के लिए गठित निर्वाचक मंडल के सदस्य होंगे उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य(निर्वाचित या मनोनीत) भाग लेंगे, उपराष्ट्रपति के चुनाव में राज्यों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता| उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक मेंसाधारण बहुमत से किया जाता है भारतीय संविधान उपराष्ट्रपति के लिए कोई विशेष कार्य निर्धारित नहीं करता अनुच्छेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है और इसी के सन्दर्भ में वह वेतन भत्ते आदि प्राप्त करता है अनुच्छेद 58 के अनुसार,राष्ट्रपति बनने के लिए अन्य योग्यताओं में एक योग्यता यह भी है कि वह लोकसभा का सदस्य बनने की अर्हता रखता हो| दूसरी ओर अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति बनने के लिए अन्य योग्यताओं में एक योग्यता यह भी है कि वह राज्यसभा के सदस्य बनने की अर्हता रखता हो| अनुच्छेद 56(1B) तथा 61 के अनुसार केवल महाभियोग की प्रक्रिया के द्वारा ही हटाया जा सकता है|जबकि अनुच्छेद 67B के अनुसार उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए ऐसी किसी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती| उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्य सभा को विशेष बहुमत से एक संकल्प पारित करना होता है और लोकसभा साधारण बहुमत से इस पर अपनी सहमति प्रकट करती है| अनुच्छेद 62 के अनुसार राष्ट्रपति का पद रिक्त होने की दशा में 6 माह पूर्ण होने के पहले भर लिया जाना चाहिए किन्तु उपराष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 66 तथा 68 के अनुसार इसकी कोई समय सीमा तय नहीं है| इसमें केवल इतना कहा गया है कि जीतनी जल्दी हो सके उपराष्ट्रपति के रिक्त पद को भरने के लिए चुनाव करा लिया जाए| अनुच्छेद 56(1A) के अनुसार, राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देता है जबकि अनुच्छेद 67A के अनुसार उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संविधान में दोनों पदों की स्थिति सापेक्षिक रूप से भिन्न है| दोनों पदों के स्वरुप, महत्त्व, कार्य, चुनाव, पदमुक्ति आदि के सन्दर्भ में किये गए प्रावधान पर्याप्त रूप से भिन्न व्यवस्था करते हैं|
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पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये | साथ ही यह भी बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? ( 200शब्द) Define the patriarchal society . Also explain that how it determines the status of women in Indian society?
एप्रोच:- सर्वप्रथम पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। तत्पश्चात, बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है| वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है| साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोसिस जारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
##Question:पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये | साथ ही यह भी बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? ( 200शब्द) Define the patriarchal society . Also explain that how it determines the status of women in Indian society?##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। तत्पश्चात, बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है| वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है| साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोसिस जारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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All India Services play a crucial unifying role in the whole administrative system of the country. Examine? (10 marks/150 words)
Approach : Introduce an answer by describing the importance of All India Services in brief. Explain the role of All India Services in unifying India. "The All-India Services of Government of India is part of the Civil Services which makes the permanent bureaucracy of the country. Often considered to be the backbone of Indian administrative setup, the All India Services includes three components i.e., IAS (Indian Administrative Service), IPS (Indian Police Service) and IFoS (Indian Forest Service). All India Services play a crucial unifying role in the whole administrative system of the country in the following manner : 1. Uniform Appointment - The officers in AIS are appointed by a competitive exam at the National level, thus, leading to uniformity across India. 2. Rotation between Centre and States - The All-India Services are jointly controlled and managed by the Centre and the States. A system of rotation enables the civil servants to work successively in the state of their allotment and at the central level in New Delhi. Thus, developing a link between the Centre and States, this, in turn, strengthens our cooperative federalism 3. Appointed at various levels - All India Services like IAS, IPS and IFS are all deployed along the administrative chain, from the basic district level administration to the highest levels like cabinet secretaries and departmental heads. This ensures that any issues faced by the country are understood at the level of its origin with all facets, issues and problems being evaluated by taking into account the concerns of all parts and parties involved. 4. Efficient Administration - Dr Ambedkar emphasised the contribution such a Service could make in bringing about greater efficiency in the administration of the Union as well as the States 5. Uniformity in administration and implementation of government programmes - The AIS provides the platform for the central government to plan and implement its programmes n pan-India basis. As the AIS officers are the lynchpin of the administration in the states, the centre can implement its policies uniformly. 6. Representative character - The candidates from all over India belonging to various castes, religions, races etc. have equal opportunity to compete in the exam. Also, there is a reservation for the various backward communities, thus, making it representative of the diversity of India. Criticism of the All India Services 1) Disproportionate Representation There are several structural problems that have crept up in the administrative services, such as disproportionate representation. R K Barik’s 2004article, studied recruitment patterns to reveal a distinct upper class, urban bias. 2) The administrative machinery has grown defunct over the years - The bureaucratic machinery was no longer serving its purpose because of a severe lapse in discipline and ethics. 3) Severely limited personal liberties of civil service officers Under the Central Civil Services (CCS) (Conduct) Rules, 1964, fundamental rights available to citizens of the country are sometimes denied to officers serving in the cadre. For instance, Rule 9 prohibits any public servant to publish “in his own name or anonymously or pseudonymously or in the name of any other person” any “statement of fact or opinion which has the effect of an adverse criticism of any current or recent policy or action of the Central Government or a State Government.” 4)In the Indian context of a highly heterogeneous and divided society, where the social, religious or regional sense of belonging is sometimes extremely strong and exclusive, ‘active representativeness’ of the bureaucracy might be a threat to rather than a tool of national unity. The summing up of the multitude of special interests seeking effective representation in the bureaucracy does not constitute the general interest. The different private interest groups within the administration are often conflicting and their strengths vastly unequal. The effectiveness of the IAS as a binding force of the nation is thus not only related to its representativeness, but also to its inner cohesion. IAS officers like to portray themselves as a ‘new caste’ characterised by a strong esprit de corps and horizontal solidarity, but how far is this claim upheld in practice B.R. Ambedkar, the Chairman of the Constitution - Drafting Committee, said: “It is recognised that in every country there are certain- posts in its administrative getup which might be called strategic from the point of view of maintaining the standard of administration. There can be no doubt that the standard of administration depends upon the calibre of the civil servants who are appointed to these posts . . . The Constitution provides that, there shall be All India Services, the members of which alone could be appointed to these strategic posts throughout the Union."
##Question:All India Services play a crucial unifying role in the whole administrative system of the country. Examine? (10 marks/150 words)##Answer:Approach : Introduce an answer by describing the importance of All India Services in brief. Explain the role of All India Services in unifying India. "The All-India Services of Government of India is part of the Civil Services which makes the permanent bureaucracy of the country. Often considered to be the backbone of Indian administrative setup, the All India Services includes three components i.e., IAS (Indian Administrative Service), IPS (Indian Police Service) and IFoS (Indian Forest Service). All India Services play a crucial unifying role in the whole administrative system of the country in the following manner : 1. Uniform Appointment - The officers in AIS are appointed by a competitive exam at the National level, thus, leading to uniformity across India. 2. Rotation between Centre and States - The All-India Services are jointly controlled and managed by the Centre and the States. A system of rotation enables the civil servants to work successively in the state of their allotment and at the central level in New Delhi. Thus, developing a link between the Centre and States, this, in turn, strengthens our cooperative federalism 3. Appointed at various levels - All India Services like IAS, IPS and IFS are all deployed along the administrative chain, from the basic district level administration to the highest levels like cabinet secretaries and departmental heads. This ensures that any issues faced by the country are understood at the level of its origin with all facets, issues and problems being evaluated by taking into account the concerns of all parts and parties involved. 4. Efficient Administration - Dr Ambedkar emphasised the contribution such a Service could make in bringing about greater efficiency in the administration of the Union as well as the States 5. Uniformity in administration and implementation of government programmes - The AIS provides the platform for the central government to plan and implement its programmes n pan-India basis. As the AIS officers are the lynchpin of the administration in the states, the centre can implement its policies uniformly. 6. Representative character - The candidates from all over India belonging to various castes, religions, races etc. have equal opportunity to compete in the exam. Also, there is a reservation for the various backward communities, thus, making it representative of the diversity of India. Criticism of the All India Services 1) Disproportionate Representation There are several structural problems that have crept up in the administrative services, such as disproportionate representation. R K Barik’s 2004article, studied recruitment patterns to reveal a distinct upper class, urban bias. 2) The administrative machinery has grown defunct over the years - The bureaucratic machinery was no longer serving its purpose because of a severe lapse in discipline and ethics. 3) Severely limited personal liberties of civil service officers Under the Central Civil Services (CCS) (Conduct) Rules, 1964, fundamental rights available to citizens of the country are sometimes denied to officers serving in the cadre. For instance, Rule 9 prohibits any public servant to publish “in his own name or anonymously or pseudonymously or in the name of any other person” any “statement of fact or opinion which has the effect of an adverse criticism of any current or recent policy or action of the Central Government or a State Government.” 4)In the Indian context of a highly heterogeneous and divided society, where the social, religious or regional sense of belonging is sometimes extremely strong and exclusive, ‘active representativeness’ of the bureaucracy might be a threat to rather than a tool of national unity. The summing up of the multitude of special interests seeking effective representation in the bureaucracy does not constitute the general interest. The different private interest groups within the administration are often conflicting and their strengths vastly unequal. The effectiveness of the IAS as a binding force of the nation is thus not only related to its representativeness, but also to its inner cohesion. IAS officers like to portray themselves as a ‘new caste’ characterised by a strong esprit de corps and horizontal solidarity, but how far is this claim upheld in practice B.R. Ambedkar, the Chairman of the Constitution - Drafting Committee, said: “It is recognised that in every country there are certain- posts in its administrative getup which might be called strategic from the point of view of maintaining the standard of administration. There can be no doubt that the standard of administration depends upon the calibre of the civil servants who are appointed to these posts . . . The Constitution provides that, there shall be All India Services, the members of which alone could be appointed to these strategic posts throughout the Union."
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सब्सिडी से आप क्या समझते हैं? भारत में सब्सिडी की आवश्यकता को समझाते हुए सब्सिडी के हानियों/दुष्प्रभावों को भी स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) What do youunderstand by Subsidy? Explain the necessity of subsidy in India and also describethe losses/side effects of subsidies. (200 words)
एप्रोच- सब्सिडी का अर्थ समझाईये| अगले भाग में, भारत में सब्सिडी की आवश्यकता को बताईये| अगले भाग में, सब्सिडी के हानियों/दुष्प्रभावों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः इस संबंध में आगे की राह/अपने सुझाव देते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये| उत्तर- जब सरकार रियायती मूल्य पर कोई भी वस्तु/सेवा प्रदान करती है यानि उस वस्तु/सेवा का मूल्य, बाजार मूल्य से कम होता है तो उसे सब्सिडी/सहायिकी कहा जाता है| सरकार द्वारा यह कार्य लोगों की भलाई के लिए किया जाता है| सब्सिडी तब अच्छी होती है जब यह पारदर्शी, अच्छी तरह से लक्षित, व्यावहारिक तौर पर क्रियान्वित की जाए| भारत में सब्सिडी की आवश्यकता सब्सिडी किसी भी कल्याणकारी राज्य की सर्वोत्कृष्ट विशेषताओं में से एक है। आजादी के बाद भारत द्वारा सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के प्रयास चालू किये गये। उस समय भारत की अधिकांश जनता गरीबी और अशिक्षा के चंगुल में फंसी हुयी थी| हम अपनी जनसँख्या के एक बड़े हिस्से को पर्याप्त खाना दे पाने में भी सक्षम नहीं थें| भारत में जीवन प्रत्याशा सिर्फ 32 साल थी| कुल मिलाकर देखा जाये तो कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य या शिक्षा आदि हर जगह संकट विद्यमान था। ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए, भारतीय राज्य की परिकल्पना को कल्याणकारी राज्य के रूप में मान्यता देते हुए विभिन्न क्षेत्रों में सब्सिडी व्यवस्था को अपनाया गया। हालाँकि,आज़ादी के 71 सालों के बाद भी जहाँ कुछ समस्याओं को समाप्त कर दिया है वहीँ कई क्षेत्रों में सब्सिडी की जरुरत अभी भी महसूस की जा रही है| वर्तमान समय में भारत में सब्सिडी की आवश्यकता के पीछे निम्न तर्क दिए जाते हैं- भारत में पिछड़े एवं वंचित तबकों की एक बड़ी आबादी आज भी अपने खाद्य एवं अन्य जरूरतों हेतु सरकारी मदद पर निर्भर रहती है| जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा गरीब एवं निम्न आय वर्ग का है जो अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संघर्षरत रहता है| इन आवश्यकताओं को बाजार मूल्य पर प्राप्त करने में उन्हें कठिनाई महसूस हो सकती है, अतः इन वर्गों को सरकार द्वारा सब्सिडी प्रदान की जाती है| खाद्यानों की कीमतों को वहनीय बनाने के साथ सार्वभौमिक खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करने हेतु पेट्रोलियम प्रोडक्टों की बाजार मूल्य पर ऊँची कीमत जिससे परिवहन, माल-ढूलाई आदि महंगा होने का खतरा किसानों को कृषि आगतों(खासकर उर्वरकों, कीटनाशकों, बिजली आदि) के ऊँचे मूल्य से बचाने हेतु सभी को वहनीय आवास प्रदान करने हेतु जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने हेतू एलपीजी सब्सिडी सूक्ष्म,लघु तथा मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु सब्सिडी के दुष्प्रभाव खाद्यान सब्सिडी की वजह से दालों, सब्जीयों, मोटे अनाजों आदि की जगह गेंहू, चावल पर ही अधिक जोर जिससे पोषण सुरक्षा प्रभावित विभिन्न सब्सिडियों से मुद्रास्फीति बढ़ने की संभावना क्योंकि भारत में सब्सिडी से उत्पादन की जगह उपभोग को ज्यादा प्रोत्साहन मिलता है| बिजली,तेल,एलपीजी आदि सब्सिडी का फायदा गरीबों एवं लक्षित वर्गों की जगह अमीरों को अधिक होना खाद्यानों पर सब्सिडी की वजह से उनकी बाजार कीमत भी कम रहती है जिससे किसानों/उत्पादकों को उचित मूल्य मिलने में परेशानी विभिन्न सब्सिडियों की वजह से सरकार के राजकोषीय स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव उर्वरक सब्सिडी की वजह से उर्वरकों/कीटनाशकों का अंधाधुंध एवं असंधारणीय उपयोग जिससे मृदा की गुणवता एवं पोषकता पर प्रतिकूल प्रभाव साथ ही मृदा एवं जल प्रदूषण पेट्रोलियम सब्सिडी की वजह से चालू खाते घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव क्योंकि हमारी ज्यादातर जरूरतें आयात से पूरी होती है| भ्रष्टाचार एवं अनैतिक व्यवहार को प्रोत्साहन सरकार द्वारा सब्सिडी प्रदान किये जाने से जनता की उत्पादकता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की आशंका क्योंकि वे कम मूल्य पर सेवाओं/वस्तुओं की प्राप्ति के आदि हो जाते हैं| हालांकि सब्सिडी के तमाम दुष्प्रभावों के बावजूद भारत में बहुत सारे क्षेत्रों(खाद्यान, उर्वरक, बिजली आदि) से इसे फिलहाल ख़त्म नहीं किया जा सकता परंतु सरकार द्वारा कुछ क्षेत्रों(जैसे-पेट्रोलियम) से इसे ख़त्म करने हेतु कदम बढ़ाये जा रहे हैं|सरकार को सब्सिडी की जगह संबंधित क्षेत्रों/वर्गों के उत्थान पर ज्यादा फोकस करना होगा| साथ ही, आवश्यकता इस बात की भी है कि सब्सिडी को किस प्रकार लक्षित वर्गों तक सही तरीके से पहुँचाया जाये| इस संबंध में डीबीटी तथा जैम(JAM) जैसे पहल सराहनीय हैं|
##Question:सब्सिडी से आप क्या समझते हैं? भारत में सब्सिडी की आवश्यकता को समझाते हुए सब्सिडी के हानियों/दुष्प्रभावों को भी स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) What do youunderstand by Subsidy? Explain the necessity of subsidy in India and also describethe losses/side effects of subsidies. (200 words)##Answer:एप्रोच- सब्सिडी का अर्थ समझाईये| अगले भाग में, भारत में सब्सिडी की आवश्यकता को बताईये| अगले भाग में, सब्सिडी के हानियों/दुष्प्रभावों पर चर्चा कीजिये| निष्कर्षतः इस संबंध में आगे की राह/अपने सुझाव देते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये| उत्तर- जब सरकार रियायती मूल्य पर कोई भी वस्तु/सेवा प्रदान करती है यानि उस वस्तु/सेवा का मूल्य, बाजार मूल्य से कम होता है तो उसे सब्सिडी/सहायिकी कहा जाता है| सरकार द्वारा यह कार्य लोगों की भलाई के लिए किया जाता है| सब्सिडी तब अच्छी होती है जब यह पारदर्शी, अच्छी तरह से लक्षित, व्यावहारिक तौर पर क्रियान्वित की जाए| भारत में सब्सिडी की आवश्यकता सब्सिडी किसी भी कल्याणकारी राज्य की सर्वोत्कृष्ट विशेषताओं में से एक है। आजादी के बाद भारत द्वारा सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के प्रयास चालू किये गये। उस समय भारत की अधिकांश जनता गरीबी और अशिक्षा के चंगुल में फंसी हुयी थी| हम अपनी जनसँख्या के एक बड़े हिस्से को पर्याप्त खाना दे पाने में भी सक्षम नहीं थें| भारत में जीवन प्रत्याशा सिर्फ 32 साल थी| कुल मिलाकर देखा जाये तो कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य या शिक्षा आदि हर जगह संकट विद्यमान था। ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए, भारतीय राज्य की परिकल्पना को कल्याणकारी राज्य के रूप में मान्यता देते हुए विभिन्न क्षेत्रों में सब्सिडी व्यवस्था को अपनाया गया। हालाँकि,आज़ादी के 71 सालों के बाद भी जहाँ कुछ समस्याओं को समाप्त कर दिया है वहीँ कई क्षेत्रों में सब्सिडी की जरुरत अभी भी महसूस की जा रही है| वर्तमान समय में भारत में सब्सिडी की आवश्यकता के पीछे निम्न तर्क दिए जाते हैं- भारत में पिछड़े एवं वंचित तबकों की एक बड़ी आबादी आज भी अपने खाद्य एवं अन्य जरूरतों हेतु सरकारी मदद पर निर्भर रहती है| जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा गरीब एवं निम्न आय वर्ग का है जो अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संघर्षरत रहता है| इन आवश्यकताओं को बाजार मूल्य पर प्राप्त करने में उन्हें कठिनाई महसूस हो सकती है, अतः इन वर्गों को सरकार द्वारा सब्सिडी प्रदान की जाती है| खाद्यानों की कीमतों को वहनीय बनाने के साथ सार्वभौमिक खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करने हेतु पेट्रोलियम प्रोडक्टों की बाजार मूल्य पर ऊँची कीमत जिससे परिवहन, माल-ढूलाई आदि महंगा होने का खतरा किसानों को कृषि आगतों(खासकर उर्वरकों, कीटनाशकों, बिजली आदि) के ऊँचे मूल्य से बचाने हेतु सभी को वहनीय आवास प्रदान करने हेतु जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने हेतू एलपीजी सब्सिडी सूक्ष्म,लघु तथा मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु सब्सिडी के दुष्प्रभाव खाद्यान सब्सिडी की वजह से दालों, सब्जीयों, मोटे अनाजों आदि की जगह गेंहू, चावल पर ही अधिक जोर जिससे पोषण सुरक्षा प्रभावित विभिन्न सब्सिडियों से मुद्रास्फीति बढ़ने की संभावना क्योंकि भारत में सब्सिडी से उत्पादन की जगह उपभोग को ज्यादा प्रोत्साहन मिलता है| बिजली,तेल,एलपीजी आदि सब्सिडी का फायदा गरीबों एवं लक्षित वर्गों की जगह अमीरों को अधिक होना खाद्यानों पर सब्सिडी की वजह से उनकी बाजार कीमत भी कम रहती है जिससे किसानों/उत्पादकों को उचित मूल्य मिलने में परेशानी विभिन्न सब्सिडियों की वजह से सरकार के राजकोषीय स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव उर्वरक सब्सिडी की वजह से उर्वरकों/कीटनाशकों का अंधाधुंध एवं असंधारणीय उपयोग जिससे मृदा की गुणवता एवं पोषकता पर प्रतिकूल प्रभाव साथ ही मृदा एवं जल प्रदूषण पेट्रोलियम सब्सिडी की वजह से चालू खाते घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव क्योंकि हमारी ज्यादातर जरूरतें आयात से पूरी होती है| भ्रष्टाचार एवं अनैतिक व्यवहार को प्रोत्साहन सरकार द्वारा सब्सिडी प्रदान किये जाने से जनता की उत्पादकता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की आशंका क्योंकि वे कम मूल्य पर सेवाओं/वस्तुओं की प्राप्ति के आदि हो जाते हैं| हालांकि सब्सिडी के तमाम दुष्प्रभावों के बावजूद भारत में बहुत सारे क्षेत्रों(खाद्यान, उर्वरक, बिजली आदि) से इसे फिलहाल ख़त्म नहीं किया जा सकता परंतु सरकार द्वारा कुछ क्षेत्रों(जैसे-पेट्रोलियम) से इसे ख़त्म करने हेतु कदम बढ़ाये जा रहे हैं|सरकार को सब्सिडी की जगह संबंधित क्षेत्रों/वर्गों के उत्थान पर ज्यादा फोकस करना होगा| साथ ही, आवश्यकता इस बात की भी है कि सब्सिडी को किस प्रकार लक्षित वर्गों तक सही तरीके से पहुँचाया जाये| इस संबंध में डीबीटी तथा जैम(JAM) जैसे पहल सराहनीय हैं|
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Write a short note on the NGT in terms of its composition androle (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE COMPOSITION OF THE NGT - THE ROLE OF THE NGT -CONCLUSION Answer:- NGT or the National Green Tribunal has been constituted under the provisions of the NGT Act of 2010. It was established on 18th October of 2010, as a tribunal to deal with environmental matters. The body uses the principles of “ sustainable development, precautionary principle and polluter pays principle for its functioning ”. THE COMPOSITION OF THE NGT 1) CHAIRPERSON He must be an ex-judge of the High Court or Supreme Court. He is appointed by the central government in consultation with the CJI. 2) JUDICIAL MEMBERS These must be a minimum of 10 members and less than 20 members. 3) EXPERT MEMBERS These must be a minimum of 10 members and less than 20 members. There is a requirement for high qualification (MSC in physical or life sciences or a doctorate or a Master of Engineering or Technology). They must also have vast experience in their field of study (15 years), and also experience in matters related to environmental protection. THE ROLE OF THE NGT It deals with matters related to environmental protection, compensation or relief or legal rights related to the environment. Further, the important role of the NGT can be gauged by the following cases: 1) AL MITRA H PATEL VERSUS UNION OF INDIA, 2012 The NGT passed an order for the complete ban on open burning of waste including in the landfills 2) 2012- POSCO CASE In 2012, in the POCSO versus the state of Odisha case, indiscriminate use of natural resources was stopped by NGT on the basis of the sustainable development principle. 3) 2013- UTTARAKHAND FLOODS CASE Alaknanda hydro-electric power limited was made to pay compensation on the basis of polluter pays principle. 4) 2015- DIESEL VEHICLES IN DELHI ISSUE The NGT passed an order banning all diesel vehicles older than 10 years from the roads of Delhi. Following this order, a similar order was passed by the circuit benches at Kochi . The order was enforced at Kerala. 5) 2017- ART OF LIVING CASE The NGT found the Art of Living foundation to be causing damage to the Yamuna flood plains and hence asked it to pay a hefty fine. In a 2 judges bench, it was decided that NGT was only a tribunal and therefore cannot be immune from the powers of judicial review.
##Question:Write a short note on the NGT in terms of its composition androle (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE COMPOSITION OF THE NGT - THE ROLE OF THE NGT -CONCLUSION Answer:- NGT or the National Green Tribunal has been constituted under the provisions of the NGT Act of 2010. It was established on 18th October of 2010, as a tribunal to deal with environmental matters. The body uses the principles of “ sustainable development, precautionary principle and polluter pays principle for its functioning ”. THE COMPOSITION OF THE NGT 1) CHAIRPERSON He must be an ex-judge of the High Court or Supreme Court. He is appointed by the central government in consultation with the CJI. 2) JUDICIAL MEMBERS These must be a minimum of 10 members and less than 20 members. 3) EXPERT MEMBERS These must be a minimum of 10 members and less than 20 members. There is a requirement for high qualification (MSC in physical or life sciences or a doctorate or a Master of Engineering or Technology). They must also have vast experience in their field of study (15 years), and also experience in matters related to environmental protection. THE ROLE OF THE NGT It deals with matters related to environmental protection, compensation or relief or legal rights related to the environment. Further, the important role of the NGT can be gauged by the following cases: 1) AL MITRA H PATEL VERSUS UNION OF INDIA, 2012 The NGT passed an order for the complete ban on open burning of waste including in the landfills 2) 2012- POSCO CASE In 2012, in the POCSO versus the state of Odisha case, indiscriminate use of natural resources was stopped by NGT on the basis of the sustainable development principle. 3) 2013- UTTARAKHAND FLOODS CASE Alaknanda hydro-electric power limited was made to pay compensation on the basis of polluter pays principle. 4) 2015- DIESEL VEHICLES IN DELHI ISSUE The NGT passed an order banning all diesel vehicles older than 10 years from the roads of Delhi. Following this order, a similar order was passed by the circuit benches at Kochi . The order was enforced at Kerala. 5) 2017- ART OF LIVING CASE The NGT found the Art of Living foundation to be causing damage to the Yamuna flood plains and hence asked it to pay a hefty fine. In a 2 judges bench, it was decided that NGT was only a tribunal and therefore cannot be immune from the powers of judicial review.
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विभिन्न विद्वानों के अनुसार कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री के मध्य सम्बन्ध के स्वरुप को स्पष्ट कीजिए| इसके साथ ही शासन में प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट के महत्त्व की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द , अंक - 10 ) According to various scholars, clarify the nature of the relationship between the Cabinet and the Prime Minister. Along with this, discuss the importance of the prime minister and the cabinet in governance. (150-200 words, Marks - 10 )
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मंत्रिपरिषद के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में, विभिन्न विद्वानों के अनुसार कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री के मध्य सम्बन्ध के स्वरुप को स्पष्ट कीजिए 3- दूसरे भाग में, शासन में प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट के महत्त्व की चर्चा कीजिये| 4- अंतिम में महत्त्व के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में संसदीय प्रणाली को ब्रिटिश संविधान से लिया गया है| मंत्रिपरिषद,भारतीय राजनीतिक प्रणाली की वास्तविक कार्यकारी संस्था है जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री के हाथों में होता है| मंत्रिपरिषद का गठन राष्ट्रपति की मदद करने एवं सलाह देने के लिए किया गया है जो मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तुत सूचना के आधार पर काम करता है|भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 में मंत्रिपरिषद के गठन के बारे में उल्लेख किया गया है जबकि अनुच्छेद 75 मंत्रियों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल, जिम्मेदारी, शपथ, योग्यता और मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते से संबंधित है| 1952 के मंत्रियों के वेतन भत्ते नियम के अनुसार प्रधानमंत्री को यह तय करना है कि मंत्रिपरिषद में कितने रैंक तक के मंत्री होंगे|इसके अनुसार मंत्रिपरिषद में कैबिनेट रैंक, राज्य मंत्री रैंक(अधीनस्थ या स्वतंत्र प्रभार) और उपमंत्री रैंक होते हैं| किन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार मंत्रिपरिषद में संसदीय सचिव को भी शामिल किया जाना चाहिए| प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट के मध्य अंतर्संबंध · ब्रिटेन में 1700 ईस्वी के बाद कैबिनेट सबसे सशक्त शासकीय इकाई बन कर उभरी| जैसे जैसे कैबिनेट की शक्ति बढती गयी उसी क्रम में क्राउन की शक्ति कम होती गयी और प्रधानमंत्री की शक्ति अपेक्षाकृत मजबूत होती गयी| · क्रिकेट में एक कहावत है कि टीम का कप्तान उतना ही मजबूत होता है जीतनी कि उसकी टीम|प्रधानमंत्री भी इसी प्रकार अपनी टीम का कप्तान होता है| · प्रधानमंत्री की भी रैंक कैबिनेट मंत्री की ही होती है, किन्तु मारले के अनुसार वह सामान रैंक वाले मंत्रियों में सर्वश्रेष्ठ होता है| · ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ग्लेडस्टोन के अनुसार कैबिनेट,प्रधानमंत्री की एक अभिव्यक्ति है|वास्तव में कैबिनेट प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द ही घूमती है| · पंडित नेहरु के अनुसार, प्रधानमंत्री, न केवल देश का नेतृत्व करता है बल्कि वह अपने कैबिनेट का भी नेतृत्व करता है| · विलियम वर्नर हरकोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री, टिमटिमाते छोटे तारों के मध्य सबसे तेज चमकने वाला चन्द्रमा है| · हेराल्ड जे. लास्की के अनुसार, प्रधानमंत्री से ही कैबिनेट का जन्म होता है, उसका जीवन चलता है और प्रधानमंत्री की इच्छानुसार उसकी मृत्यु भी होती है| · HRG ग्रीव्स के अनुसार, सरकार देश की मास्टर है जबकि प्रधानमंत्री सरकार का मास्टर है| · मुनरो के अनुसार, वह जलयान का कप्तान है और जिस प्रकार जलयान को उसके लक्ष्य तक पहुचाना कप्तान का दायित्व होता है उसी प्रकार देश को उसके लक्ष्य तक पहुचाने का दायित्व प्रधानमंत्री का होता है| · अतः उपरोक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि भले ही प्रधानमंत्री की रैंक एक कैबिनेट मंत्री की हो किन्तु वह अपनी कैबिनेट का कर्णधार होता है; कैबिनेट का अस्तित्व में बनाए रखना भी उसी की मर्जी पर निर्भर है प्रधानमंत्री का महत्त्व · वह देश के मुख्य कार्यपालक अधिकारी(CEO) के रूप में वह देश का संचालन करने के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी होता है| · आइवर जेनिंग्स के अनुसार, वह मंत्रिपरिषद का मुखिया होता है और मंत्रिपरिषद को उसी के निर्देशानुसार कार्य करना होता है · वह संसद का एक अभिन्न अंग होता है; यदि प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य है तो उसे सदन का नेता कहा जाता है, सदन में उसकी उपस्थिति को बहुत महत्त्व दिया जाता है| · वह अपने दल का भी नेतृत्व करता है; अर्थात उसका दल उसी प्रकार से सरकार और जनता के बीच सम्बन्ध बनाता है जिस प्रकार प्रधानमंत्री चाहता है| · वह देश के आर्थिक और वित्तीय प्रबंध के लिए भी सीधे उत्तरदायी होता है;दूसरे शब्दों में बजट में वित्तमंत्री उसी दृष्टिकोण को शामिल करता है जो प्रधानमंत्री चाहता है| · प्रधानमंत्री ही अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का कर्णधार होता है| · आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री की स्थिति एक एकात्मक शासक की हो जाती है| कैबिनेट का महत्त्व · कैबिनेट देश के लिए शासन, प्रशासन, कल्याण, वैदेशिक सम्बन्ध, पर्यावरण संरक्षण, अंतर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा आदि से सम्बन्धित प्रधान नीति निर्धारक संस्था होती है · कैबिनेट विधायन की प्रधान संस्था होती है| किसी भी विषय पर कानून बनाने के लिए पहले विधेयक का मसौदा कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है| कैबिनेट की स्वीकृति के पश्चात ही उसे संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किया जाता है| · कैबिनेट एक सलाहकारी निकाय के रूप में भी कार्य करती है| राष्ट्रपति वास्तव में कैबिनेट के परामर्श के अनुसार ही कार्य करता है| कैबिनेट के प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद का प्रस्ताव एवं परामर्श मान लिया जाता है| · कबिनेट एक समन्वयक एजेंसी की भूमिका भी निभाती है| सरकार की विभिन्न एजेंसियों के बीच यदि कोई मतभेद होता है तो उस दशा मेंकेन्द्रीय कैबिनेट उनके मध्य तालमेल बनाने और उन्हें सामूहिक लक्ष्य की ओर प्रेरित करने की भूमिका भी निभाती है| · केन्द्रीय कैबिनेट सचिव राज्यों के मुख्य सचिवों की समिति और केन्द्रीय सचिवों की समिति का अध्यक्ष होता है| इसका मुख्य कार्य इन सभी सचिवों के मध्य समन्वय स्थापित करना होता है| · कैबिनेट, सरकार का मुख्य कार्यपालक अंग होती है| कैबिनेट मंत्री अपने अपने मंत्रालयों एवं विभागों के प्रधान कार्यपालक होते हैं| उनके दिशा निर्देश के अनुसार ही उनसे सम्बन्धित मंत्रालय एवं विभाग अपना सरकारी काम-काज निपटाते हैं| · कैबिनेट, विदेश और रक्षा नीति के बीच समन्वयक की भूमिका भी निभाती है| · इसी तरह कैबिनेट एक संकटमोचक की भूमिका भी निभाती है| जब देश किसी विपदा या अन्य किसी आपदा का सामना करता है तो देश को उस संकट से बाहर निकालने का दायित्व कैबिनेट का होता है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि शासन-प्रशासन में मंत्रिपरिषद, प्रधानमन्त्री और कैबिनेट की स्थिति महत्वपूर्ण होती है| ये सरकार के प्रचालन के प्रमुख आधार एवं धुरी होते हैं|
##Question:विभिन्न विद्वानों के अनुसार कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री के मध्य सम्बन्ध के स्वरुप को स्पष्ट कीजिए| इसके साथ ही शासन में प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट के महत्त्व की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द , अंक - 10 ) According to various scholars, clarify the nature of the relationship between the Cabinet and the Prime Minister. Along with this, discuss the importance of the prime minister and the cabinet in governance. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मंत्रिपरिषद के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में, विभिन्न विद्वानों के अनुसार कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री के मध्य सम्बन्ध के स्वरुप को स्पष्ट कीजिए 3- दूसरे भाग में, शासन में प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट के महत्त्व की चर्चा कीजिये| 4- अंतिम में महत्त्व के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में संसदीय प्रणाली को ब्रिटिश संविधान से लिया गया है| मंत्रिपरिषद,भारतीय राजनीतिक प्रणाली की वास्तविक कार्यकारी संस्था है जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री के हाथों में होता है| मंत्रिपरिषद का गठन राष्ट्रपति की मदद करने एवं सलाह देने के लिए किया गया है जो मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तुत सूचना के आधार पर काम करता है|भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 में मंत्रिपरिषद के गठन के बारे में उल्लेख किया गया है जबकि अनुच्छेद 75 मंत्रियों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल, जिम्मेदारी, शपथ, योग्यता और मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते से संबंधित है| 1952 के मंत्रियों के वेतन भत्ते नियम के अनुसार प्रधानमंत्री को यह तय करना है कि मंत्रिपरिषद में कितने रैंक तक के मंत्री होंगे|इसके अनुसार मंत्रिपरिषद में कैबिनेट रैंक, राज्य मंत्री रैंक(अधीनस्थ या स्वतंत्र प्रभार) और उपमंत्री रैंक होते हैं| किन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार मंत्रिपरिषद में संसदीय सचिव को भी शामिल किया जाना चाहिए| प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट के मध्य अंतर्संबंध · ब्रिटेन में 1700 ईस्वी के बाद कैबिनेट सबसे सशक्त शासकीय इकाई बन कर उभरी| जैसे जैसे कैबिनेट की शक्ति बढती गयी उसी क्रम में क्राउन की शक्ति कम होती गयी और प्रधानमंत्री की शक्ति अपेक्षाकृत मजबूत होती गयी| · क्रिकेट में एक कहावत है कि टीम का कप्तान उतना ही मजबूत होता है जीतनी कि उसकी टीम|प्रधानमंत्री भी इसी प्रकार अपनी टीम का कप्तान होता है| · प्रधानमंत्री की भी रैंक कैबिनेट मंत्री की ही होती है, किन्तु मारले के अनुसार वह सामान रैंक वाले मंत्रियों में सर्वश्रेष्ठ होता है| · ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ग्लेडस्टोन के अनुसार कैबिनेट,प्रधानमंत्री की एक अभिव्यक्ति है|वास्तव में कैबिनेट प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द ही घूमती है| · पंडित नेहरु के अनुसार, प्रधानमंत्री, न केवल देश का नेतृत्व करता है बल्कि वह अपने कैबिनेट का भी नेतृत्व करता है| · विलियम वर्नर हरकोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री, टिमटिमाते छोटे तारों के मध्य सबसे तेज चमकने वाला चन्द्रमा है| · हेराल्ड जे. लास्की के अनुसार, प्रधानमंत्री से ही कैबिनेट का जन्म होता है, उसका जीवन चलता है और प्रधानमंत्री की इच्छानुसार उसकी मृत्यु भी होती है| · HRG ग्रीव्स के अनुसार, सरकार देश की मास्टर है जबकि प्रधानमंत्री सरकार का मास्टर है| · मुनरो के अनुसार, वह जलयान का कप्तान है और जिस प्रकार जलयान को उसके लक्ष्य तक पहुचाना कप्तान का दायित्व होता है उसी प्रकार देश को उसके लक्ष्य तक पहुचाने का दायित्व प्रधानमंत्री का होता है| · अतः उपरोक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि भले ही प्रधानमंत्री की रैंक एक कैबिनेट मंत्री की हो किन्तु वह अपनी कैबिनेट का कर्णधार होता है; कैबिनेट का अस्तित्व में बनाए रखना भी उसी की मर्जी पर निर्भर है प्रधानमंत्री का महत्त्व · वह देश के मुख्य कार्यपालक अधिकारी(CEO) के रूप में वह देश का संचालन करने के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी होता है| · आइवर जेनिंग्स के अनुसार, वह मंत्रिपरिषद का मुखिया होता है और मंत्रिपरिषद को उसी के निर्देशानुसार कार्य करना होता है · वह संसद का एक अभिन्न अंग होता है; यदि प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य है तो उसे सदन का नेता कहा जाता है, सदन में उसकी उपस्थिति को बहुत महत्त्व दिया जाता है| · वह अपने दल का भी नेतृत्व करता है; अर्थात उसका दल उसी प्रकार से सरकार और जनता के बीच सम्बन्ध बनाता है जिस प्रकार प्रधानमंत्री चाहता है| · वह देश के आर्थिक और वित्तीय प्रबंध के लिए भी सीधे उत्तरदायी होता है;दूसरे शब्दों में बजट में वित्तमंत्री उसी दृष्टिकोण को शामिल करता है जो प्रधानमंत्री चाहता है| · प्रधानमंत्री ही अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का कर्णधार होता है| · आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री की स्थिति एक एकात्मक शासक की हो जाती है| कैबिनेट का महत्त्व · कैबिनेट देश के लिए शासन, प्रशासन, कल्याण, वैदेशिक सम्बन्ध, पर्यावरण संरक्षण, अंतर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा आदि से सम्बन्धित प्रधान नीति निर्धारक संस्था होती है · कैबिनेट विधायन की प्रधान संस्था होती है| किसी भी विषय पर कानून बनाने के लिए पहले विधेयक का मसौदा कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है| कैबिनेट की स्वीकृति के पश्चात ही उसे संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किया जाता है| · कैबिनेट एक सलाहकारी निकाय के रूप में भी कार्य करती है| राष्ट्रपति वास्तव में कैबिनेट के परामर्श के अनुसार ही कार्य करता है| कैबिनेट के प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद का प्रस्ताव एवं परामर्श मान लिया जाता है| · कबिनेट एक समन्वयक एजेंसी की भूमिका भी निभाती है| सरकार की विभिन्न एजेंसियों के बीच यदि कोई मतभेद होता है तो उस दशा मेंकेन्द्रीय कैबिनेट उनके मध्य तालमेल बनाने और उन्हें सामूहिक लक्ष्य की ओर प्रेरित करने की भूमिका भी निभाती है| · केन्द्रीय कैबिनेट सचिव राज्यों के मुख्य सचिवों की समिति और केन्द्रीय सचिवों की समिति का अध्यक्ष होता है| इसका मुख्य कार्य इन सभी सचिवों के मध्य समन्वय स्थापित करना होता है| · कैबिनेट, सरकार का मुख्य कार्यपालक अंग होती है| कैबिनेट मंत्री अपने अपने मंत्रालयों एवं विभागों के प्रधान कार्यपालक होते हैं| उनके दिशा निर्देश के अनुसार ही उनसे सम्बन्धित मंत्रालय एवं विभाग अपना सरकारी काम-काज निपटाते हैं| · कैबिनेट, विदेश और रक्षा नीति के बीच समन्वयक की भूमिका भी निभाती है| · इसी तरह कैबिनेट एक संकटमोचक की भूमिका भी निभाती है| जब देश किसी विपदा या अन्य किसी आपदा का सामना करता है तो देश को उस संकट से बाहर निकालने का दायित्व कैबिनेट का होता है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि शासन-प्रशासन में मंत्रिपरिषद, प्रधानमन्त्री और कैबिनेट की स्थिति महत्वपूर्ण होती है| ये सरकार के प्रचालन के प्रमुख आधार एवं धुरी होते हैं|
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लिंग और जेंडर में विभेद को स्पष्ट कीजिये | साथ ही भारतीय समाज में लैंगिक असमानता और महिलाओं के शोषण के पीछे मुख्य कारणों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Differentiate between sex and gender. Also critically examine the main reasons behind gender inequality and exploitation of women in Indian society.
एप्रोच:- सर्वप्रथम,लिंग और जेंडर में विभेद को स्पष्ट कीजिए। तत्पश्चात,भारतीय समाज में लैंगिक असमानता और महिलाओं के शोषण के पीछे मुख्य कारणों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। अंत में आगे की राह लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- लिंग एक जैविक शब्दावली है ,जो स्त्री और पुरुष में जैविक भेद को प्रदर्शित करती है, वहीं जेन्डर शब्द स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक भेदभाव को दिखाता है। जेन्डर शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि जैविक भेद के अतिरिक्त जितने भी भेद दिखते हैं,वे प्राकृतिक न होकर समाज द्वारा बनाये गये हैं और इसी में यह बात भी सम्मिलित है कि अगर यह भेद बनाया हुआ है तो दूर भी किया जा सकता है। समाज में स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के पीछे पूरी सामाजीकरण की प्रक्रिया है,जिसके तहत बचपन से ही बालक-बालिका का अलग-अलग ढंग से पालन-पोषण किया जाता है और यह फ़र्क कोई भी अपने आसपास देख सकता है। लड़कियों को घर के अन्दर का कामकाज अच्छी तरह सिखाया जाता है,जबकि लड़कों को बाहर का। लड़्कियों को दयालु, कोमल, सेवाभाव रखने वाली और घरेलू समझा जाता है और लड़कों को मजबूत,ताकतवर, सख्त और वीर समझा जाता है। भारतीय समाज में लैंगिक असमानता और महिलाओं के शोषण के पीछे मुख्य कारण:- लैंगिक असमानता का तात्पर्य लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव से है। परम्परागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। वे घर और समाज दोनों जगहों पर शोषण, अपमान और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं। विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसर, शैक्षिक उपलब्धियों, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा तथा राजनीतिक सशक्तीकरण के सूचकांकों के मिले-जुले आकलन में विश्व में भारत का स्थान 87वाँ है। देश के श्रमबल में महिलाओं की घटती भागीदारी और संसद में महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व चिंतनीय है। भारतीय समाज में लिंग असमानता का मूल कारण इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित है।पितृसत्ता सामाजिक संरचना की ऐसी व्यवस्था हैं, जिसमें पुरुष, महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और उसका शोषण करता है। महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परिघटना है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, सबसे प्राप्त की है। समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति होने के कुछ कारणों में अत्यधिक गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएँ कम वेतन पर घरेलू कार्य करने, वैश्यावृत्ति करने या प्रवासी मज़दूरों के रूप में कार्य करने के लिये मजबूर हो जाती हैं। महिलाओं को न केवल असमान वेतन दिया जाता हैं, बल्कि उनके लिये कम कौशल की नौकरियाँ पेश की जाती हैं जिनका वेतनमान बहुत कम होता हैं। यह लिंग के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है। लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा। इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में अधिकांश महिलाएँ वर्तमान में नौकरी के लिये आवश्यक कौशल की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं। महिलाओं को खाने के लिये वही मिलता है जो परिवार के पुरुषों के खाने के बाद बच जाता है। अतः समुचित और पौष्टिक भोजन के अभाव में महिलाएँ कई तरह के रोगों का शिकार हो जाती हैं। आगे की राह:- अतः उपरोक्त स्थिति से निपटने हेतु लैंगिक समानता आवश्यक है। लैंगिक समानता का सूत्र श्रम सुधारों और सामाजिक सुरक्षा कानूनों से भी जुड़ा है, फिर चाहे कामकाजी महिलाओं के लिये समान वेतन सुनिश्चित करना हो या सुरक्षित नौकरी की गारंटी देना। मातृत्व अवकाश के जो कानून सरकारी क्षेत्र में लागू हैं, उन्हें निजी और असंगठित क्षेत्र में भी सख्ती से लागू करना होगा। जेंडर बजटिंग और समाजिक सुधारों के एकीकृत प्रयास लैंगिक असमानता को पाटने की दिशा में सकारात्मक कदम होंगे।
##Question:लिंग और जेंडर में विभेद को स्पष्ट कीजिये | साथ ही भारतीय समाज में लैंगिक असमानता और महिलाओं के शोषण के पीछे मुख्य कारणों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Differentiate between sex and gender. Also critically examine the main reasons behind gender inequality and exploitation of women in Indian society.##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,लिंग और जेंडर में विभेद को स्पष्ट कीजिए। तत्पश्चात,भारतीय समाज में लैंगिक असमानता और महिलाओं के शोषण के पीछे मुख्य कारणों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। अंत में आगे की राह लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- लिंग एक जैविक शब्दावली है ,जो स्त्री और पुरुष में जैविक भेद को प्रदर्शित करती है, वहीं जेन्डर शब्द स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक भेदभाव को दिखाता है। जेन्डर शब्द इस बात की ओर इशारा करता है कि जैविक भेद के अतिरिक्त जितने भी भेद दिखते हैं,वे प्राकृतिक न होकर समाज द्वारा बनाये गये हैं और इसी में यह बात भी सम्मिलित है कि अगर यह भेद बनाया हुआ है तो दूर भी किया जा सकता है। समाज में स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के पीछे पूरी सामाजीकरण की प्रक्रिया है,जिसके तहत बचपन से ही बालक-बालिका का अलग-अलग ढंग से पालन-पोषण किया जाता है और यह फ़र्क कोई भी अपने आसपास देख सकता है। लड़कियों को घर के अन्दर का कामकाज अच्छी तरह सिखाया जाता है,जबकि लड़कों को बाहर का। लड़्कियों को दयालु, कोमल, सेवाभाव रखने वाली और घरेलू समझा जाता है और लड़कों को मजबूत,ताकतवर, सख्त और वीर समझा जाता है। भारतीय समाज में लैंगिक असमानता और महिलाओं के शोषण के पीछे मुख्य कारण:- लैंगिक असमानता का तात्पर्य लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव से है। परम्परागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। वे घर और समाज दोनों जगहों पर शोषण, अपमान और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं। विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसर, शैक्षिक उपलब्धियों, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा तथा राजनीतिक सशक्तीकरण के सूचकांकों के मिले-जुले आकलन में विश्व में भारत का स्थान 87वाँ है। देश के श्रमबल में महिलाओं की घटती भागीदारी और संसद में महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व चिंतनीय है। भारतीय समाज में लिंग असमानता का मूल कारण इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित है।पितृसत्ता सामाजिक संरचना की ऐसी व्यवस्था हैं, जिसमें पुरुष, महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और उसका शोषण करता है। महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परिघटना है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, सबसे प्राप्त की है। समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति होने के कुछ कारणों में अत्यधिक गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएँ कम वेतन पर घरेलू कार्य करने, वैश्यावृत्ति करने या प्रवासी मज़दूरों के रूप में कार्य करने के लिये मजबूर हो जाती हैं। महिलाओं को न केवल असमान वेतन दिया जाता हैं, बल्कि उनके लिये कम कौशल की नौकरियाँ पेश की जाती हैं जिनका वेतनमान बहुत कम होता हैं। यह लिंग के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है। लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा। इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में अधिकांश महिलाएँ वर्तमान में नौकरी के लिये आवश्यक कौशल की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं। महिलाओं को खाने के लिये वही मिलता है जो परिवार के पुरुषों के खाने के बाद बच जाता है। अतः समुचित और पौष्टिक भोजन के अभाव में महिलाएँ कई तरह के रोगों का शिकार हो जाती हैं। आगे की राह:- अतः उपरोक्त स्थिति से निपटने हेतु लैंगिक समानता आवश्यक है। लैंगिक समानता का सूत्र श्रम सुधारों और सामाजिक सुरक्षा कानूनों से भी जुड़ा है, फिर चाहे कामकाजी महिलाओं के लिये समान वेतन सुनिश्चित करना हो या सुरक्षित नौकरी की गारंटी देना। मातृत्व अवकाश के जो कानून सरकारी क्षेत्र में लागू हैं, उन्हें निजी और असंगठित क्षेत्र में भी सख्ती से लागू करना होगा। जेंडर बजटिंग और समाजिक सुधारों के एकीकृत प्रयास लैंगिक असमानता को पाटने की दिशा में सकारात्मक कदम होंगे।
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भारत अपनी जरूरतों से ज्यादा खाद्यानों का उत्पादन करता है फिर भी हमारे देश में भुखमरी एक गंभीर समस्या है| इस कथन के संदर्भ में, भारत में भुखमरी की समस्या के पीछे उत्तरदायी कारणों को रेखांकित कीजिये| भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु किये गये प्रयासों के साथ इसे दूर करने हेतु अपने कुछ सुझाव दीजिये| (200 शब्द) India produces more food-grains than its needs, yet starvation is a serious problem in our country. In reference to this statement, Underline the responsible causes behind starvation problem in India. Mentioningsome efforts to deal with problem of starvation, give somesteps to overcome it. (200 words)
एप्रोच- खाद्यान उत्पादन में भारत की आत्मनिर्भरता को दर्शाते हुए भारत में भुखमरी की समस्या को पहले भाग में संक्षिप्त रूप से रेखांकित कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में भुखमरी की समस्या के पीछे उतरदायी कारणों को बताईये| अगले भाग में, भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु किये गये प्रयासों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु अपने कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान उत्पादन के मामले में ना सिर्फ आत्मनिर्भर हो गया बल्कि अब वह अपनी जरुरत से ज्यादा खाद्यानों का उत्पादन भी करने लगा है| हालांकि उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद हमारी जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी भुखमरी से ग्रस्त है| ग्लोबल हंगर इंडेक्स,2018 के अनुसार कुल 119 देशों में से भारत 103वें स्थान पर है| साथ ही, FAO द्वारा जारी खाद्य सुरक्षा और पोषण पर विश्व रिपोर्ट में भारतीय जनसँख्या के एक बड़े हिस्से को भूखा एवं कुपोषित दर्शाया गया है| भारत में भुखमरी की समस्या के पीछे उतरदायी कारक- गरीबी -भारत में जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा गरीब एवं वंचित वर्गों का है| इसकी वजह से गरीब/कमजोर आबादी के लिए पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता प्रभावित होती है| वहनीय दरों पर खाद्यानों की पहुँच इन वर्गों को नहीं हो पाती है| खाद्यान्नों की कीमतों का ऊंचा होना तथा उनमें क्षेत्रीय विविधता के चलते खासकर पिछड़े एवं पहाड़ी क्षेत्रों में उनकी कीमत ऊंची होती है जिससे सुभेद्यवर्गों तक इनकी पहुंच प्रभावित होती है| भुखमरी से संबंधित बहुआयामी विचारों के प्रति नीति निर्माताओं की सोच में अभाव| भूखमरी सिर्फ एक समस्या नहीं है बल्कि यह पौष्टिक भोजन तक पहुँच के साथ साथ बहुत सारे कारकों पर निर्भर होता है जिसमें स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, खाद्य पदार्थों तक पहुंच आदि मुद्दे शामिल है| भुखमरी को कुपोषण से अलग नहीं किया जा सकता है जबकि भारत में इन्हे एक साथ देखने के दृष्टिकोण का अभाव है| भोजन तक पहुंच का प्रभावित होना- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा नहीं होने के पीछे खाद्यान्नों की कमी से ज्यादा उस तक पिछड़ों एवं वंचित वर्गों की पहुंचना होना ज्यादा जिम्मेदार कारक है| सस्ते एवं वहनीय कीमतों पर बाजारों में खाद्यान्नों की पहुंच इन वर्गों हेतु नहीं हो पाती है खाद्य सुरक्षा योजनाओं की पहुंच सभी वर्गों तक ना हो पाना - राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत आबादी के दो तिहाई हिस्से को खाद्यान्नों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है परंतु योजना के उद्देश्यों को प्राप्त करने में समस्या| लक्षित वर्गों/लाभार्थियों की पहचान का मुद्दा- इसमें जहां लाभार्थियों को खुद ही पीडीएस दुकानों पर जाकर खाद्यान्नों को प्राप्त करना होता है साथ ही, राशन कार्ड, आधार जैसे पहचान के दस्तावेजों तक उनकी पहुंच होना भी बहुत जरूरी है| बहुत सारे वर्गों के व्यक्तियों तक इन दस्तावेजों की पहुंच अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाई है| सरकारी योजनाओं/नीतियों में गरीबी एवं भुखमरी को अलग अलग देखने का दृष्टिकोण जबकि गरीबी एवं भुखमरी एक दूसरे से बहुत ही नजदीकी रूप से जुड़े हुए हैं| उचित एवं पौष्टिक भोजन के अभाव में व्यक्ति भले ही भूख से ना मरता हो लेकिनवह कुपोषण का शिकार हो जाता है और कुपोषण का अंतिम परिणाम भुखमरी के रूप में दिखता है| जलवायु संबंधी कारक - भारत में मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता की वजह से सूखे एवं शुष्क क्षेत्रों में कृषि उत्पादन कम होता है जिसके वजह से कुछ वंचित एवं पिछड़े वर्गों की भोजन की उपलब्धता प्रभावित होती है|जैसे- उड़ीसा का कालाहांडी क्षेत्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र| पीडीएस दुकानों में फैला भ्रष्टाचार मौसमी प्रवास की वजह से संबंधित वर्गों तक वहनीय कीमतों पर खाद्यान्नों की पहुंच प्रभावित होना जो कि पौष्टिक भोजन तक पहुंच को प्रभावित करता है| योजनाओं/नीतियों को सही ढंग से क्रियान्वित ना कर पाना तथा उनके निगरानी पर ध्यान ना देना राज्यों तथा केंद्र के मध्य समस्या से निपटने में सहयोग का अभाव भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु किये गये प्रयास- सार्वजनिक वितरण प्रणाली - इसके द्वारा उचित दर दुकानों के माध्यम से पात्र लाभार्थियों को सस्ती दरों पर खाद्यानों को उपलब्ध करवाया जाता है| पीडीएस में पंचायती राज संस्थाओं को शामिल करना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से भारतीय जनसँख्या के दो-तिहाई हिस्से तक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना |इस अधिनियम के माध्यम से खाद्य सुरक्षा कल्याण आधारित ना होकर अधिकार आधारित हो गयी है| अन्त्योदय अन्न योजना के द्वारा वंचित वर्गों के भी अति सुभेद्य हिस्सों तक खाद्यानों की पहुँच सुनिश्चित करना अन्नपूर्णा योजना राष्ट्रीय पोषण अभियान मिड-डे मिल तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से पौष्टिक भोजन उपलब्ध करवाना खाद्यान की कमी वाले क्षेत्रों में अनाज बैंकों की स्थापना मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के द्वारा पिछड़े एवं वंचित वर्गों की क्रय-शक्ति बढ़ाना भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु सुझाव- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत लाभार्थियों को उचित दर दुकानों तक पहुंचने की व्यवस्था की जगह सरकारी तंत्र को लक्षित लाभार्थियों तक पहुंच खुद करने की व्यवस्था को बढ़ावा पौष्टिक भोजन तक सबकी आसान पहुंच सुनिश्चित करने हेतु मोटे अनाजों, सब्जियों, फलों, डेयरी उत्पादों आदि के उपभोग को प्रोत्साहित करना पीडीएस दुकानों को तकनीक की मदद से ज्यादा बेहतर बनाना । इस संदर्भ में पीडीएस के छत्तीसगढ़ मॉडल का अनुकरण करना प्रभावी कदम सिध्द हो सकता है। वहनीय कीमतों पर खाद्यान्नों की पहुंच सुनिश्चित करने हेतु योजनाओं के क्रियान्वयन में कठोर मानदंडों को लागू करना । इसके साथ ही, निगरानी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण करना| पोषण सुरक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु नीतियों का निर्माण भुखमरी की समस्या हेतु विभिन्न क्षेत्रों से डाटा का एकत्रीकरण तथा उनका व्यापक विश्लेषण कर योजनाओं का निर्माण सामाजिक तौर पर लोगों को इस ओर ज्यादा बेहतर तरीके से ध्यान देने हेतु जनजागरूकता को बढ़ावा देना ताकि भूखे एवं कुपोषित लोगों के संदर्भ में संबंधित अधिकारियों/एजेंसियों तक जानकारी का पहुंचना भंडारण एजेन्सियों की क्षमता को बढ़ाना भिखारियों तथा बेघरों को भोजन तक पहुँच को बढ़ावा देने वाले उपायों को अपनाना
##Question:भारत अपनी जरूरतों से ज्यादा खाद्यानों का उत्पादन करता है फिर भी हमारे देश में भुखमरी एक गंभीर समस्या है| इस कथन के संदर्भ में, भारत में भुखमरी की समस्या के पीछे उत्तरदायी कारणों को रेखांकित कीजिये| भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु किये गये प्रयासों के साथ इसे दूर करने हेतु अपने कुछ सुझाव दीजिये| (200 शब्द) India produces more food-grains than its needs, yet starvation is a serious problem in our country. In reference to this statement, Underline the responsible causes behind starvation problem in India. Mentioningsome efforts to deal with problem of starvation, give somesteps to overcome it. (200 words)##Answer:एप्रोच- खाद्यान उत्पादन में भारत की आत्मनिर्भरता को दर्शाते हुए भारत में भुखमरी की समस्या को पहले भाग में संक्षिप्त रूप से रेखांकित कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में भुखमरी की समस्या के पीछे उतरदायी कारणों को बताईये| अगले भाग में, भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु किये गये प्रयासों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु अपने कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान उत्पादन के मामले में ना सिर्फ आत्मनिर्भर हो गया बल्कि अब वह अपनी जरुरत से ज्यादा खाद्यानों का उत्पादन भी करने लगा है| हालांकि उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद हमारी जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी भुखमरी से ग्रस्त है| ग्लोबल हंगर इंडेक्स,2018 के अनुसार कुल 119 देशों में से भारत 103वें स्थान पर है| साथ ही, FAO द्वारा जारी खाद्य सुरक्षा और पोषण पर विश्व रिपोर्ट में भारतीय जनसँख्या के एक बड़े हिस्से को भूखा एवं कुपोषित दर्शाया गया है| भारत में भुखमरी की समस्या के पीछे उतरदायी कारक- गरीबी -भारत में जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा गरीब एवं वंचित वर्गों का है| इसकी वजह से गरीब/कमजोर आबादी के लिए पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता प्रभावित होती है| वहनीय दरों पर खाद्यानों की पहुँच इन वर्गों को नहीं हो पाती है| खाद्यान्नों की कीमतों का ऊंचा होना तथा उनमें क्षेत्रीय विविधता के चलते खासकर पिछड़े एवं पहाड़ी क्षेत्रों में उनकी कीमत ऊंची होती है जिससे सुभेद्यवर्गों तक इनकी पहुंच प्रभावित होती है| भुखमरी से संबंधित बहुआयामी विचारों के प्रति नीति निर्माताओं की सोच में अभाव| भूखमरी सिर्फ एक समस्या नहीं है बल्कि यह पौष्टिक भोजन तक पहुँच के साथ साथ बहुत सारे कारकों पर निर्भर होता है जिसमें स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, खाद्य पदार्थों तक पहुंच आदि मुद्दे शामिल है| भुखमरी को कुपोषण से अलग नहीं किया जा सकता है जबकि भारत में इन्हे एक साथ देखने के दृष्टिकोण का अभाव है| भोजन तक पहुंच का प्रभावित होना- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा नहीं होने के पीछे खाद्यान्नों की कमी से ज्यादा उस तक पिछड़ों एवं वंचित वर्गों की पहुंचना होना ज्यादा जिम्मेदार कारक है| सस्ते एवं वहनीय कीमतों पर बाजारों में खाद्यान्नों की पहुंच इन वर्गों हेतु नहीं हो पाती है खाद्य सुरक्षा योजनाओं की पहुंच सभी वर्गों तक ना हो पाना - राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत आबादी के दो तिहाई हिस्से को खाद्यान्नों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है परंतु योजना के उद्देश्यों को प्राप्त करने में समस्या| लक्षित वर्गों/लाभार्थियों की पहचान का मुद्दा- इसमें जहां लाभार्थियों को खुद ही पीडीएस दुकानों पर जाकर खाद्यान्नों को प्राप्त करना होता है साथ ही, राशन कार्ड, आधार जैसे पहचान के दस्तावेजों तक उनकी पहुंच होना भी बहुत जरूरी है| बहुत सारे वर्गों के व्यक्तियों तक इन दस्तावेजों की पहुंच अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाई है| सरकारी योजनाओं/नीतियों में गरीबी एवं भुखमरी को अलग अलग देखने का दृष्टिकोण जबकि गरीबी एवं भुखमरी एक दूसरे से बहुत ही नजदीकी रूप से जुड़े हुए हैं| उचित एवं पौष्टिक भोजन के अभाव में व्यक्ति भले ही भूख से ना मरता हो लेकिनवह कुपोषण का शिकार हो जाता है और कुपोषण का अंतिम परिणाम भुखमरी के रूप में दिखता है| जलवायु संबंधी कारक - भारत में मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता की वजह से सूखे एवं शुष्क क्षेत्रों में कृषि उत्पादन कम होता है जिसके वजह से कुछ वंचित एवं पिछड़े वर्गों की भोजन की उपलब्धता प्रभावित होती है|जैसे- उड़ीसा का कालाहांडी क्षेत्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र| पीडीएस दुकानों में फैला भ्रष्टाचार मौसमी प्रवास की वजह से संबंधित वर्गों तक वहनीय कीमतों पर खाद्यान्नों की पहुंच प्रभावित होना जो कि पौष्टिक भोजन तक पहुंच को प्रभावित करता है| योजनाओं/नीतियों को सही ढंग से क्रियान्वित ना कर पाना तथा उनके निगरानी पर ध्यान ना देना राज्यों तथा केंद्र के मध्य समस्या से निपटने में सहयोग का अभाव भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु किये गये प्रयास- सार्वजनिक वितरण प्रणाली - इसके द्वारा उचित दर दुकानों के माध्यम से पात्र लाभार्थियों को सस्ती दरों पर खाद्यानों को उपलब्ध करवाया जाता है| पीडीएस में पंचायती राज संस्थाओं को शामिल करना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से भारतीय जनसँख्या के दो-तिहाई हिस्से तक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना |इस अधिनियम के माध्यम से खाद्य सुरक्षा कल्याण आधारित ना होकर अधिकार आधारित हो गयी है| अन्त्योदय अन्न योजना के द्वारा वंचित वर्गों के भी अति सुभेद्य हिस्सों तक खाद्यानों की पहुँच सुनिश्चित करना अन्नपूर्णा योजना राष्ट्रीय पोषण अभियान मिड-डे मिल तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से पौष्टिक भोजन उपलब्ध करवाना खाद्यान की कमी वाले क्षेत्रों में अनाज बैंकों की स्थापना मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के द्वारा पिछड़े एवं वंचित वर्गों की क्रय-शक्ति बढ़ाना भुखमरी की समस्या से निपटने हेतु सुझाव- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत लाभार्थियों को उचित दर दुकानों तक पहुंचने की व्यवस्था की जगह सरकारी तंत्र को लक्षित लाभार्थियों तक पहुंच खुद करने की व्यवस्था को बढ़ावा पौष्टिक भोजन तक सबकी आसान पहुंच सुनिश्चित करने हेतु मोटे अनाजों, सब्जियों, फलों, डेयरी उत्पादों आदि के उपभोग को प्रोत्साहित करना पीडीएस दुकानों को तकनीक की मदद से ज्यादा बेहतर बनाना । इस संदर्भ में पीडीएस के छत्तीसगढ़ मॉडल का अनुकरण करना प्रभावी कदम सिध्द हो सकता है। वहनीय कीमतों पर खाद्यान्नों की पहुंच सुनिश्चित करने हेतु योजनाओं के क्रियान्वयन में कठोर मानदंडों को लागू करना । इसके साथ ही, निगरानी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण करना| पोषण सुरक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु नीतियों का निर्माण भुखमरी की समस्या हेतु विभिन्न क्षेत्रों से डाटा का एकत्रीकरण तथा उनका व्यापक विश्लेषण कर योजनाओं का निर्माण सामाजिक तौर पर लोगों को इस ओर ज्यादा बेहतर तरीके से ध्यान देने हेतु जनजागरूकता को बढ़ावा देना ताकि भूखे एवं कुपोषित लोगों के संदर्भ में संबंधित अधिकारियों/एजेंसियों तक जानकारी का पहुंचना भंडारण एजेन्सियों की क्षमता को बढ़ाना भिखारियों तथा बेघरों को भोजन तक पहुँच को बढ़ावा देने वाले उपायों को अपनाना
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What do you mean by parliamentary privileges? Discuss Individual and collective privileges in detail? (150 words/10 marks)
Q- What do you mean by parliamentary privileges? Discuss Individual and collective privileges in detail? (150 words/10 marks) Approach: Introduction: Definition of parliamentary privileges can be given. Main Body: Individual and collective privileges should be discussed in separate subheadings. Conclusion: A suitable conclusion can be given. Answer: Feature of parliamentary privileges in the Indian Constitution is borrowed from the British Constitution. As per Article 105 (for the Parliament) and Article 194 (for the state legislature), the members are provided with certain privileges and immunities. The main aim is to make the members work without fear and favor. Parliamentary privileges are divided into the following subheads- 1) Individual privileges Freedom of Speech: According to the Indian Constitution, the members of Parliament enjoy the freedom of speech and expression. No member can be taken to task anywhere outside the four walls of the House (e.g. court of law) or cannot be discriminated against for expressing his/her views in the House and its Committees. Freedom from Arrest: It is understood that no member shall be arrested in a civil case 40 days before and after the adjournment of the House (Lok Sabha or Rajya Sabha) and also when the House is in session. It also means that no member can be arrested within the precincts of the Parliament without the permission of the House to which he/she belongs. Exemption from attendance as witnesses: The members of Parliament also enjoy freedom from attendance as witnesses 2) Collective Privileges The ability to publish reports, debates, and proceedings, as well as the ability to prevent others from doing so. It can publish truthful reports of Parliamentary proceedings without the House"s authorization under the freedom of the press. However, in the case of a House meeting held in secret, this right of the press does not apply. Keep strangers out of the gathering and organize covert sessions to address vital issues. Make rules to govern its own procedure and commercial activity, as well as to adjudicate on such issues. Right to immediate notification of a member"s arrest, custody, conviction, imprisonment, and release. Initiate inquiries and compel a person"s attendance. The courts are not allowed to investigate a House"s or its committees" proceedings. Without the consent of the Presiding officer, no one (whether a member or an outsider) can be arrested, and no legal process (civil or criminal) can be served within the House"s boundaries. Till now Parliament has not attempted to codify its privileges. Thus, there is a stringent need to codify the privileges, powers, and immunities of the House. It will provide proper guidelines to be followed and remove uncertainties that currently prevail. In a democracy, free speech and rule of law should be the norm, not the exception.
##Question:What do you mean by parliamentary privileges? Discuss Individual and collective privileges in detail? (150 words/10 marks)##Answer:Q- What do you mean by parliamentary privileges? Discuss Individual and collective privileges in detail? (150 words/10 marks) Approach: Introduction: Definition of parliamentary privileges can be given. Main Body: Individual and collective privileges should be discussed in separate subheadings. Conclusion: A suitable conclusion can be given. Answer: Feature of parliamentary privileges in the Indian Constitution is borrowed from the British Constitution. As per Article 105 (for the Parliament) and Article 194 (for the state legislature), the members are provided with certain privileges and immunities. The main aim is to make the members work without fear and favor. Parliamentary privileges are divided into the following subheads- 1) Individual privileges Freedom of Speech: According to the Indian Constitution, the members of Parliament enjoy the freedom of speech and expression. No member can be taken to task anywhere outside the four walls of the House (e.g. court of law) or cannot be discriminated against for expressing his/her views in the House and its Committees. Freedom from Arrest: It is understood that no member shall be arrested in a civil case 40 days before and after the adjournment of the House (Lok Sabha or Rajya Sabha) and also when the House is in session. It also means that no member can be arrested within the precincts of the Parliament without the permission of the House to which he/she belongs. Exemption from attendance as witnesses: The members of Parliament also enjoy freedom from attendance as witnesses 2) Collective Privileges The ability to publish reports, debates, and proceedings, as well as the ability to prevent others from doing so. It can publish truthful reports of Parliamentary proceedings without the House"s authorization under the freedom of the press. However, in the case of a House meeting held in secret, this right of the press does not apply. Keep strangers out of the gathering and organize covert sessions to address vital issues. Make rules to govern its own procedure and commercial activity, as well as to adjudicate on such issues. Right to immediate notification of a member"s arrest, custody, conviction, imprisonment, and release. Initiate inquiries and compel a person"s attendance. The courts are not allowed to investigate a House"s or its committees" proceedings. Without the consent of the Presiding officer, no one (whether a member or an outsider) can be arrested, and no legal process (civil or criminal) can be served within the House"s boundaries. Till now Parliament has not attempted to codify its privileges. Thus, there is a stringent need to codify the privileges, powers, and immunities of the House. It will provide proper guidelines to be followed and remove uncertainties that currently prevail. In a democracy, free speech and rule of law should be the norm, not the exception.
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Briefly discuss the structure of the atmosphere and the main characteristics of each layer. (150 words/10 marks)
APPROACH Introduction -Try to give a brief on the atmosphere and set the tone of the Answer. Body -Briefly Discuss the structure of the atmosphere and the main characteristics. ANSWER The atmosphere consists of different layers withvarying density and temperature. Density ishighest near the surface of the earth and decreases with increasing altitude. The columnof Atmosphere is divided into five differentlayers depending upon the temperature condition. They are- troposphere, stratosphere, mesosphere, thermosphere, and exosphere. Troposphere The troposphere is the lowermost layer ofthe atmosphere. Its average height is 13 km and extends roughly to a height of 8 km nearthe poles and about 18 km at the equator. The thicknessof the troposphere is greatest at the equator because heat is transported to greatheights by strong convectional currents. Thislayer contains dust particles and water vapor. All changes in climate and weather take placein this layer. The temperature in this layerdecreases at the rate of 1° C for every 165m ofheight. This is the most important layer for allbiological activity . The zone separating the troposphere fromthe stratosphere is known as the tropopause. Theair temperature at the tropopause is aboutminus 800C over the equator and about minus45oC over the poles. The temperature here isnearly constant, and hence, it is called the tropopause Stratosphere The stratosphere is found abovethe tropopause and extends up to a height of 50 km. One important feature of thestratosphere is that it contains the ozone layer. This layer absorbs ultra-violet radiation andshields life on the earth from an intense, Harmfulform of energy. This layer is almost free from clouds and associated weather phenomenon, making conditions most ideal for flying airplanes . So aeroplanes fly in lower stratosphere, sometimes in upper troposphere where weather is calm. Sometimes, cirrus clouds are present at lower levels in this layer. Mesosphere The mesosphere lies above the stratosphere, which extends up to a height of 80 km. In thislayer, once again, the temperature startsdecreasing with the increase in altitude andreaches up to minus 100°C at the height of 80km. The upper limit of Mesosphere is knownas the Mesopause. The temperature here starts increasing with height. Thermosphere In the thermosphere, the temperature rises very rapidly with increasing height. The ionosphereis a part of this layer. The ionosphere is located between 80 and 400 km above the Mesopause. It contains electrically charged particles known as ions, and hence, it is known as Ionosphere. The ionosphere is locatedbetween 80 and 400 km above the Mesopause. It contains electrically charged particles knownas ions, and hence, it is known as Ionosphere. Radio waves transmitted from the earth arereflected back to the earth by this laye r. The International Space Station and satellites orbit in this layer. (Though the temperature is high, the atmosphere is extremely rarified – gas molecules are spaced hundreds of kilometers apart. Hence a person or an object in this layer doesn’t feel the heat). Aurora’s are observed in lower parts of this layer. Exosphere The uppermost layer of the atmosphere abovethe thermosphere is known as the exosphere. This is the highest layer but very little is knownabout it. Whatever contents are there, these areextremely rarefied in this layer, and it graduallymerges with the outer space. Although alllayers of the atmosphere must be exercisinginfluence on us, geographers are concernedwith the first two layers of the atmosphere.
##Question:Briefly discuss the structure of the atmosphere and the main characteristics of each layer. (150 words/10 marks) ##Answer:APPROACH Introduction -Try to give a brief on the atmosphere and set the tone of the Answer. Body -Briefly Discuss the structure of the atmosphere and the main characteristics. ANSWER The atmosphere consists of different layers withvarying density and temperature. Density ishighest near the surface of the earth and decreases with increasing altitude. The columnof Atmosphere is divided into five differentlayers depending upon the temperature condition. They are- troposphere, stratosphere, mesosphere, thermosphere, and exosphere. Troposphere The troposphere is the lowermost layer ofthe atmosphere. Its average height is 13 km and extends roughly to a height of 8 km nearthe poles and about 18 km at the equator. The thicknessof the troposphere is greatest at the equator because heat is transported to greatheights by strong convectional currents. Thislayer contains dust particles and water vapor. All changes in climate and weather take placein this layer. The temperature in this layerdecreases at the rate of 1° C for every 165m ofheight. This is the most important layer for allbiological activity . The zone separating the troposphere fromthe stratosphere is known as the tropopause. Theair temperature at the tropopause is aboutminus 800C over the equator and about minus45oC over the poles. The temperature here isnearly constant, and hence, it is called the tropopause Stratosphere The stratosphere is found abovethe tropopause and extends up to a height of 50 km. One important feature of thestratosphere is that it contains the ozone layer. This layer absorbs ultra-violet radiation andshields life on the earth from an intense, Harmfulform of energy. This layer is almost free from clouds and associated weather phenomenon, making conditions most ideal for flying airplanes . So aeroplanes fly in lower stratosphere, sometimes in upper troposphere where weather is calm. Sometimes, cirrus clouds are present at lower levels in this layer. Mesosphere The mesosphere lies above the stratosphere, which extends up to a height of 80 km. In thislayer, once again, the temperature startsdecreasing with the increase in altitude andreaches up to minus 100°C at the height of 80km. The upper limit of Mesosphere is knownas the Mesopause. The temperature here starts increasing with height. Thermosphere In the thermosphere, the temperature rises very rapidly with increasing height. The ionosphereis a part of this layer. The ionosphere is located between 80 and 400 km above the Mesopause. It contains electrically charged particles known as ions, and hence, it is known as Ionosphere. The ionosphere is locatedbetween 80 and 400 km above the Mesopause. It contains electrically charged particles knownas ions, and hence, it is known as Ionosphere. Radio waves transmitted from the earth arereflected back to the earth by this laye r. The International Space Station and satellites orbit in this layer. (Though the temperature is high, the atmosphere is extremely rarified – gas molecules are spaced hundreds of kilometers apart. Hence a person or an object in this layer doesn’t feel the heat). Aurora’s are observed in lower parts of this layer. Exosphere The uppermost layer of the atmosphere abovethe thermosphere is known as the exosphere. This is the highest layer but very little is knownabout it. Whatever contents are there, these areextremely rarefied in this layer, and it graduallymerges with the outer space. Although alllayers of the atmosphere must be exercisinginfluence on us, geographers are concernedwith the first two layers of the atmosphere.
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जैव-विविधता के महत्त्व को बताते हुए, अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क एवं जैव मंडल रिजर्व के मध्य अंतर को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक ) Discussing the importance of biodiversity, explain the difference between the Sanctuary, National Park and the Biosphere Reserves.(150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जैव विविधता के महत्व को बताइये 3- दूसरे भाग में अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और जैव मंडल रिजर्व के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में जैव विविधता के संरक्षण के महत्त्व को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्र विविधता| प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता का महत्व · जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| · जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| · वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| · जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| · जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| · जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| · वानस्पतिक जैव-विविधता, भूमि में जल रिसाव को बढ़ावा देती है जिससे भूमिगत जलस्तर बना रहता है| · जैव-विविधता पारितंत्र को स्थिरता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखती है| · मृदा की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों के मृत भाग तथा मृत जन्तुओं को विघटित कर पोषक तत्वों को मृदा में मुक्त कर देती है जिससे यह पोषक तत्व पुनः पौधों को प्राप्त होते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जैव-विविधता का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है| जैव-विविधता के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है| अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और जैव मंडल रिजर्व के मध्य अंतर अभ्यारण्य विशेष प्रजाति के संरक्षण के लिए स्थापित किये जाते हैं,जैसे केवलादेव(साइबेरियन क्रेन के लिए), विक्रमशिला( गांगेय डालफिन के लिए), गहिरमाथा( ओलिव रिडले कछुए के संरक्षण के लिए) अभ्यारण्यों में स्थानीय निवासियों के लिए सीमित मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति होती है, सामान्य तौर पर अभ्यारण्यों में पर्यटन की अनुमति होती है इनको स्थापित करने की अधिसूचना राज्य और केंद्र सरकारदोनों द्वारा की जा सकती है| ध्यातव्य है कि संघ शासित प्रदेशों में स्थापित होने वाले अभ्यारण्यों की अधिसूचना केंद्र सरकार द्वारा जारी की जाती है| राष्ट्रीय पार्क राष्ट्रीय पार्क( राष्ट्रीय उद्यान) किसी संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण के लिए स्थापित किये जाते हैं, यह एक प्रकार से सर्वाधिक संरक्षित क्षेत्र होते हैं, तथापि पर्यटन की अनुमति यहाँ भी होती है राष्ट्रीय पार्कों में आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध होता है, राष्ट्रीय पार्कों में कोर एवं बफर क्षेत्र बनाए जाते हैं| कोर छेत्र में सामान्यतः उस प्रजाति का वास होता है जिसके लिए राष्ट्रीय पार्क स्थापित किये जाते हैं, राष्ट्रीय उद्यानों के कोर क्षेत्र में मानवीय आबादी की अनुमति नहीं लेकिन संक्रमण क्षेत्र में आबादी की अनुमति होती है, राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की अधिसूचना मुख्यतः केंद्र सरकार द्वारा की जाती है तथापि राज्य सरकारें भी अधिसूचना जारी कर सकती हैं| जीव मंडल रिजर्व · जीव मंडल रिजर्व स्थलीय एवं सागरीय पारितंत्र एवं विशेष जीनपूल के संरक्षण के लिए स्थापित किये जाते हैं, यूनेस्को द्वारा MAB कार्यक्रम जो 1971 से प्रारम्भकिया गया था, जीव मंडल रिजर्व की स्थापना इसी कार्यक्रम के अंतर्गत की जाती है, जीव मंडल रिजर्व में कोर क्षेत्र, बफर क्षेत्र और संक्रमण क्षेत्र होते हैं| कोर क्षेत्र में वैज्ञानिक अध्ययन, संरक्षण एवं जैव विविधता का प्रबंधन किया जाता है जबकि बफर क्षेत्र में प्रशिक्षण, शिक्षा, अनुसंधान,निगरानी एवं जन जागरूकताकार्यक्रम चलाये जाते हैं, कोर क्षेत्र में जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है तथापि यह अनुमति जीव मंडल रिजर्व के केवल राष्ट्रीय पार्क एवं अभ्यारण क्षेत्र में ही होती है, जीव मंडल रिजर्व की स्थापना की अधिसूचना केवल केंद्र सरकार द्वारा की जा सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और जैव मंडल रिजर्व के मध्य अनेक अंतर होते हैं| तथापि इन सभी प्रयासों का उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण होता है| जलवायु परिवर्तन की स्थिति में जैव-विवधता के ह्रास की दर बढती जा रही है| अतः इस तरह के संरक्षण उपायों की आवश्यकता है| भारत सरकार ने अनेकों अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और जैव मंडल निचयों की स्थापना कर इस संदर्भ में अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट की है|
##Question:जैव-विविधता के महत्त्व को बताते हुए, अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क एवं जैव मंडल रिजर्व के मध्य अंतर को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, 10 अंक ) Discussing the importance of biodiversity, explain the difference between the Sanctuary, National Park and the Biosphere Reserves.(150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जैव विविधता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जैव विविधता के महत्व को बताइये 3- दूसरे भाग में अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और जैव मंडल रिजर्व के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में जैव विविधता के संरक्षण के महत्त्व को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जैव-विविधता, जीवों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नता है जो कि किसी प्रजाति विशेष के अंतर्गत, विभिन्न प्रजातियों के बीच और उनकी पारितंत्रों की विविधता को भी समाहित करती है| जैव-विविधता तीन प्रकार की होती है यथा; आनुवांशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारितंत्र विविधता| प्रजातियों में पायी जाने वाली आनुवांशिक (जीन आधारित) विभिन्नता को आनुवांशिक विविधता के नाम से जाना जाता है। यह आनुवांशिक विविधता जीवों के विभिन्न आवासों में विभिन्न प्रकार के अनुकूलन का परिणाम होती है| प्रजातियों में पायी जाने वाली विभिन्नता को प्रजातीय विविधता के नाम से जाना जाता है| पारितंत्र विविधता पृथ्वी पर पायी जाने वाली पारितंत्रों में उस विभिन्नता को कहते हैं जिसमें प्रजातियों का निवास होता है| पारितंत्र विविधता विविध जैव-भौगोलिक क्षेत्रों जैसे- झील, मरुस्थल, ज्वारनद्मुख आदि में प्रतिबिम्बित होती है| किसी भी विशेष समुदाय अथवा पारितंत्र के उचित रूप से कार्य के लिये प्रजातीय विविधता का होना अनिवार्य होता है| जैव विविधता का महत्व · जैव-विविधता भोजन, कपड़ा, लकड़ी, ईंधन तथा चारा की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है| · जैव-विविधता कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में सहायक होती हैं| · वानस्पतिक जैव-विविधता औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है| · जैव-विविधता पर्यावरण प्रदूषण के निस्तारण में सहायक होती है। प्रदूषकों का विघटन तथा उनका अवशोषण कुछ पौधों की विशेषता होती है| · जैव-विविधता में संपन्न वन पारितंत्र कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख अवशोषक होते है| · जैव-विविधत मृदा निर्माण के साथ-साथ उसके संरक्षण में भी सहायक होती है। जैव-विविधता मृदा संरचना को सुधारती है, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाती है| · वानस्पतिक जैव-विविधता, भूमि में जल रिसाव को बढ़ावा देती है जिससे भूमिगत जलस्तर बना रहता है| · जैव-विविधता पारितंत्र को स्थिरता प्रदान कर पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखती है| · मृदा की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों के मृत भाग तथा मृत जन्तुओं को विघटित कर पोषक तत्वों को मृदा में मुक्त कर देती है जिससे यह पोषक तत्व पुनः पौधों को प्राप्त होते हैं| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जैव-विविधता का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है| जैव-विविधता के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है| अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और जैव मंडल रिजर्व के मध्य अंतर अभ्यारण्य विशेष प्रजाति के संरक्षण के लिए स्थापित किये जाते हैं,जैसे केवलादेव(साइबेरियन क्रेन के लिए), विक्रमशिला( गांगेय डालफिन के लिए), गहिरमाथा( ओलिव रिडले कछुए के संरक्षण के लिए) अभ्यारण्यों में स्थानीय निवासियों के लिए सीमित मानवीय हस्तक्षेप की अनुमति होती है, सामान्य तौर पर अभ्यारण्यों में पर्यटन की अनुमति होती है इनको स्थापित करने की अधिसूचना राज्य और केंद्र सरकारदोनों द्वारा की जा सकती है| ध्यातव्य है कि संघ शासित प्रदेशों में स्थापित होने वाले अभ्यारण्यों की अधिसूचना केंद्र सरकार द्वारा जारी की जाती है| राष्ट्रीय पार्क राष्ट्रीय पार्क( राष्ट्रीय उद्यान) किसी संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण के लिए स्थापित किये जाते हैं, यह एक प्रकार से सर्वाधिक संरक्षित क्षेत्र होते हैं, तथापि पर्यटन की अनुमति यहाँ भी होती है राष्ट्रीय पार्कों में आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध होता है, राष्ट्रीय पार्कों में कोर एवं बफर क्षेत्र बनाए जाते हैं| कोर छेत्र में सामान्यतः उस प्रजाति का वास होता है जिसके लिए राष्ट्रीय पार्क स्थापित किये जाते हैं, राष्ट्रीय उद्यानों के कोर क्षेत्र में मानवीय आबादी की अनुमति नहीं लेकिन संक्रमण क्षेत्र में आबादी की अनुमति होती है, राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की अधिसूचना मुख्यतः केंद्र सरकार द्वारा की जाती है तथापि राज्य सरकारें भी अधिसूचना जारी कर सकती हैं| जीव मंडल रिजर्व · जीव मंडल रिजर्व स्थलीय एवं सागरीय पारितंत्र एवं विशेष जीनपूल के संरक्षण के लिए स्थापित किये जाते हैं, यूनेस्को द्वारा MAB कार्यक्रम जो 1971 से प्रारम्भकिया गया था, जीव मंडल रिजर्व की स्थापना इसी कार्यक्रम के अंतर्गत की जाती है, जीव मंडल रिजर्व में कोर क्षेत्र, बफर क्षेत्र और संक्रमण क्षेत्र होते हैं| कोर क्षेत्र में वैज्ञानिक अध्ययन, संरक्षण एवं जैव विविधता का प्रबंधन किया जाता है जबकि बफर क्षेत्र में प्रशिक्षण, शिक्षा, अनुसंधान,निगरानी एवं जन जागरूकताकार्यक्रम चलाये जाते हैं, कोर क्षेत्र में जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है तथापि यह अनुमति जीव मंडल रिजर्व के केवल राष्ट्रीय पार्क एवं अभ्यारण क्षेत्र में ही होती है, जीव मंडल रिजर्व की स्थापना की अधिसूचना केवल केंद्र सरकार द्वारा की जा सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और जैव मंडल रिजर्व के मध्य अनेक अंतर होते हैं| तथापि इन सभी प्रयासों का उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण होता है| जलवायु परिवर्तन की स्थिति में जैव-विवधता के ह्रास की दर बढती जा रही है| अतः इस तरह के संरक्षण उपायों की आवश्यकता है| भारत सरकार ने अनेकों अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और जैव मंडल निचयों की स्थापना कर इस संदर्भ में अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट की है|
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राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण मिशन की मुख्य विशेषताएं बताइए | साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा हाल में उठाये गए कदमों का परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Describe the main features of National Women Empowerment Mission. Along with this, examine the recent steps taken by the Government of India in the reference to women"s health.
अप्रोच – · भूमिका में राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन के बारे में बताइये । · उत्तर के दूसरे भाग में उसकी विशेषताओं को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा चलाई जा रही महिला स्वास्थ्य परक योजनाओं का विवरण दीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में उपरोक्त योजनाओ के वावजूद कुछ चुनौतियों का जिक्र करते हुए निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये । उत्तर:- राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन, महिलाओं को सभी रुपों में सशक्त बनाने की सरकार की एक महत्वकांक्षी परियोजना है जिसमें सरकार महिलाओं को सभी रुपों में यथा सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए तथा सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न क्षेत्रों की योजनाओं को एकीकृत करने के उद्देश्य से चला रही है । राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण की विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है :- · इसमें सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण कार्यक्रमों को एक साझा प्लेटफार्म उपलब्ध करा कर, उनको एकीकृत करना जिससे कि योजनाओं में ओवरलैपिंग को रोका जा सके । · महिलाओं में सरकारी योजनाओं और नीतियों की बेहतर समझ विकसित करना ताकि नीतियों में होने वाले परस्पर विरोधाभास को खत्म किया जा सके । · महिलाओं के विकास के लिए सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक नीतियां तैयार करना व उनके पूर्ण विकास के अनुकूल वातावरण प्रदान करना। ताकि वे अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सकें। · महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, संस्कृतिक सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ साम्यता के आधार पर महिलाओं के मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों की रक्षा को सुनिश्चित करना। · स्वास्थ्य देखभाल, सभी स्तरों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कैरियर और व्यवसाय मार्गदर्शन, रोजगार, बराबर पारिश्रमिक आदि की सुरक्षा प्रदान करना। · महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्ति व विधिक प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण। · विकास की प्रक्रिया में जेंडर परिपेक्ष्य को शामिल करना । उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सरकार महिला स्वास्थ्य से संबन्धित निम्नलिखित योजनाओं का क्रियान्वयन कर रही है - · जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम:- यह कार्यक्रम महिलाओं में प्रसव के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उन्हें सरकारी संस्थागत सुविधाओं के माध्यम से प्रसव को संपन्न कराने के लिए चला जा रहा है। इसमें महिला के साथ-साथ बच्चे के स्वास्थ्य की भी देखभाल का प्रावधान है। साथ ही महिला को इसके लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाती है। · शिशु हत्या रोकने के लिए सरकार द्वारा पीसीपीएनडीटी एक्ट लाया गया है, जिसके तहत भ्रूण हत्या कराना एक कानूनी अपराध है तथा भ्रूण की जांच करवाए जाने पर भी आर्थिक दंड तथा जेल का प्रावधान है।पीसीपीएनडीटी एक्ट शिशु लिंगानुपात को संतुलित करने में सहायता प्रदान करता है। · भारत में कुपोषित महिलाओं के लिए और 0-6 वर्ष के बच्चों के लिए सरकार द्वारा पोषण अभियान शुरू किया गया। जिसमें 0 - 6 साल के बच्चे के साथ साथ, गर्भधारण करने वाली माताओं को भी पोषण युक्त खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की बात कही गई है। · 11-18 साल की बच्चियों के लिए सबला कार्यक्रम की शुरुआत की गई है, जिसमें उन्हें आयरन की गोली तथा पोषण युक्त खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। · सरकार द्वारा हाल ही में पारित मातृत्व अवकाश योजना जिसमें प्रसव के दौरान गर्भावस्था के दौरान छुट्टियों को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह तक कर दिया गया है, ताकि महिला गर्भावस्था के दौरान अपने स्वास्थ्य देखभाल बेहतर देखभाल कर सकें। · इसके साथ ही सरकार द्वारा इन डोर प्रदूषण को देखते हुए तथा महिलाओं में इससे होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को (सांस से संबंधित समस्याओं को) रोकने के लिए उज्जवला नामक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। जिसके तहत गरीब महिलाओं को मुफ्त में गैस कनेक्शन देने का प्रावधान है। उपरोक्त योजनाओं को महिला स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए संचालित किया जा रहा है ताकि महिलाओं के स्वास्थ्य में सकारात्मक सुधार किया जा सके। हालांकि वर्तमान में भारत में महिला स्वास्थ्य की स्थिति को बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अन्य विकसित देशों की अपेक्षा यह अभी भी काफी पिछड़ा हुआ है। वर्तमान में भारत में शिशु मृत्यु दर 34 है और मातृ मृत्यु दर 93 है, जोकि प्रति एक हजार की संख्या पर आंकलित किया गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि सरकार द्वारा चलाई जा रही महिला स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं के बावजूद भी महिलाओं में शिक्षा की कमी, जागरूकता का अभाव व स्वच्छता को लेकर अंधविश्वास जैसे कारकों ने महिलाओं को बीमारियों के प्रति और सुभेद्य बना दिया है। सरकार को इस दिशा में योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का प्रचार-प्रसार और ज्यादा से ज्यादा सिविल सोसायटी को शामिल किए जाने की आवश्यकता है। ताकि राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य सुरक्षा नीति और राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन के लक्ष्यों को को बेहतर के लक्षणों को बेहतर तरीके से प्राप्त किया जा सके।
##Question:राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण मिशन की मुख्य विशेषताएं बताइए | साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य के सन्दर्भ में भारत सरकार द्वारा हाल में उठाये गए कदमों का परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Describe the main features of National Women Empowerment Mission. Along with this, examine the recent steps taken by the Government of India in the reference to women"s health.##Answer:अप्रोच – · भूमिका में राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन के बारे में बताइये । · उत्तर के दूसरे भाग में उसकी विशेषताओं को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा चलाई जा रही महिला स्वास्थ्य परक योजनाओं का विवरण दीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में उपरोक्त योजनाओ के वावजूद कुछ चुनौतियों का जिक्र करते हुए निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये । उत्तर:- राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन, महिलाओं को सभी रुपों में सशक्त बनाने की सरकार की एक महत्वकांक्षी परियोजना है जिसमें सरकार महिलाओं को सभी रुपों में यथा सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए तथा सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न क्षेत्रों की योजनाओं को एकीकृत करने के उद्देश्य से चला रही है । राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण की विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है :- · इसमें सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण कार्यक्रमों को एक साझा प्लेटफार्म उपलब्ध करा कर, उनको एकीकृत करना जिससे कि योजनाओं में ओवरलैपिंग को रोका जा सके । · महिलाओं में सरकारी योजनाओं और नीतियों की बेहतर समझ विकसित करना ताकि नीतियों में होने वाले परस्पर विरोधाभास को खत्म किया जा सके । · महिलाओं के विकास के लिए सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक नीतियां तैयार करना व उनके पूर्ण विकास के अनुकूल वातावरण प्रदान करना। ताकि वे अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सकें। · महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, संस्कृतिक सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ साम्यता के आधार पर महिलाओं के मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों की रक्षा को सुनिश्चित करना। · स्वास्थ्य देखभाल, सभी स्तरों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कैरियर और व्यवसाय मार्गदर्शन, रोजगार, बराबर पारिश्रमिक आदि की सुरक्षा प्रदान करना। · महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्ति व विधिक प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण। · विकास की प्रक्रिया में जेंडर परिपेक्ष्य को शामिल करना । उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सरकार महिला स्वास्थ्य से संबन्धित निम्नलिखित योजनाओं का क्रियान्वयन कर रही है - · जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम:- यह कार्यक्रम महिलाओं में प्रसव के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उन्हें सरकारी संस्थागत सुविधाओं के माध्यम से प्रसव को संपन्न कराने के लिए चला जा रहा है। इसमें महिला के साथ-साथ बच्चे के स्वास्थ्य की भी देखभाल का प्रावधान है। साथ ही महिला को इसके लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाती है। · शिशु हत्या रोकने के लिए सरकार द्वारा पीसीपीएनडीटी एक्ट लाया गया है, जिसके तहत भ्रूण हत्या कराना एक कानूनी अपराध है तथा भ्रूण की जांच करवाए जाने पर भी आर्थिक दंड तथा जेल का प्रावधान है।पीसीपीएनडीटी एक्ट शिशु लिंगानुपात को संतुलित करने में सहायता प्रदान करता है। · भारत में कुपोषित महिलाओं के लिए और 0-6 वर्ष के बच्चों के लिए सरकार द्वारा पोषण अभियान शुरू किया गया। जिसमें 0 - 6 साल के बच्चे के साथ साथ, गर्भधारण करने वाली माताओं को भी पोषण युक्त खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की बात कही गई है। · 11-18 साल की बच्चियों के लिए सबला कार्यक्रम की शुरुआत की गई है, जिसमें उन्हें आयरन की गोली तथा पोषण युक्त खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। · सरकार द्वारा हाल ही में पारित मातृत्व अवकाश योजना जिसमें प्रसव के दौरान गर्भावस्था के दौरान छुट्टियों को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह तक कर दिया गया है, ताकि महिला गर्भावस्था के दौरान अपने स्वास्थ्य देखभाल बेहतर देखभाल कर सकें। · इसके साथ ही सरकार द्वारा इन डोर प्रदूषण को देखते हुए तथा महिलाओं में इससे होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को (सांस से संबंधित समस्याओं को) रोकने के लिए उज्जवला नामक कार्यक्रम की शुरुआत की गई। जिसके तहत गरीब महिलाओं को मुफ्त में गैस कनेक्शन देने का प्रावधान है। उपरोक्त योजनाओं को महिला स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए संचालित किया जा रहा है ताकि महिलाओं के स्वास्थ्य में सकारात्मक सुधार किया जा सके। हालांकि वर्तमान में भारत में महिला स्वास्थ्य की स्थिति को बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अन्य विकसित देशों की अपेक्षा यह अभी भी काफी पिछड़ा हुआ है। वर्तमान में भारत में शिशु मृत्यु दर 34 है और मातृ मृत्यु दर 93 है, जोकि प्रति एक हजार की संख्या पर आंकलित किया गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि सरकार द्वारा चलाई जा रही महिला स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं के बावजूद भी महिलाओं में शिक्षा की कमी, जागरूकता का अभाव व स्वच्छता को लेकर अंधविश्वास जैसे कारकों ने महिलाओं को बीमारियों के प्रति और सुभेद्य बना दिया है। सरकार को इस दिशा में योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का प्रचार-प्रसार और ज्यादा से ज्यादा सिविल सोसायटी को शामिल किए जाने की आवश्यकता है। ताकि राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य सुरक्षा नीति और राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन के लक्ष्यों को को बेहतर के लक्षणों को बेहतर तरीके से प्राप्त किया जा सके।
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जैव विविधता के संरक्षण के लिए यूनेस्को द्वारा चालू किये गये "मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम" का वर्णन दीजिये| इस संदर्भ में, जैवमंडल आगार की संरचना तथा कार्यों के बारे में चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe "The Man and Biosphere Programme"(MAB) launched by UNESCO for biodiversity conservation. In this context, discuss the structure and functions of the biosphere reserve. (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच- पहले भाग में जैव विविधता के संरक्षण हेतु यूनेस्को के "मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम" का वर्णन कीजिये| दूसरे भाग में जैवमंडल आगार क्षेत्र को बताते हुए उसकी संरचना को समझाईये| साथ ही, भारत के जैवमंडल आगारों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में जैवमंडल आगार के कार्यों के बारे में चर्चा कीजिये| उत्तर- प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग तथा प्राकृतिक आपदाओं के कारण जैव विविधता में तेजी से ह्रास हो रहा है| पर्यावरण के स्वरूप एवं संतुलन को बनाए रखने के लिए जैव विविधता का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है| मानव को पर्यावरण के महत्व के प्रति जागरूक करने तथा मानव एवं पर्यावरण के बीच स्वस्थ संबंधों का निर्माण करने के लिए यूनेस्को द्वारा 1971 में मानव एवं जैव मंडल कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी| यह एक अंतर सरकारी वैज्ञानिक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधों में सुधार के लिए एक वैज्ञानिक आधार स्थापित करना है| इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक शिक्षा के एकीकरण द्वारा मानव जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाकर प्रकृति एवं पर्यावरण पारितंत्र को सुरक्षित करना है जिससे विश्व भर में आर्थिक विकास को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण की दृष्टि से दीर्घकालिक बनाया जा सके| मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम के कार्य ये मानव एवं प्रकृति द्वारा संबंधित क्षेत्र में परिवर्तन के कारण मानव एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करता है| यह पर्यावरण संकट एवं सतत विकास के लिए पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देता है| प्राकृतिक तथा मानव जनित कारकों का पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन तथा बढ़ती पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए जैव विविधता संरक्षण हेतु तकनीकी अध्ययन को प्रोत्साहित करता है| जैवमंडल आगार क्षेत्र इसकी अवधारणा को यूनेस्को के मानव एवं जैव मंडल कार्यक्रम(MAB) के अंतर्गत विकसित किया गया था| इसका उद्देश्य प्राकृतिक आवासों तथा उसमें पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की प्रजातियां एवं वनस्पतियों की प्रजातियों की रक्षा एवं उनका संरक्षण करना है| इसके अंतर्गत किसी भी पारितंत्र एवं प्राकृतिक आवास के अजैविक संघटक तथा जैविक घटकों की जैव विविधता को संरक्षित करने का प्रयास किया जाता है| जैवमंडल आगार क्षेत्र का नामकरण उस देश की सरकार द्वारा किया जाता है जिस देश में ये क्षेत्र अवस्थित है| वर्तमान में विश्व में कुल 686 बायोस्फीयर रिजर्व है जिनमें से भारत के 11 जैव मंडल आगार इस लिस्ट में शामिल है(हालाँकि भारत में कुल 18 जैवमंडल रिजर्व है) जो कि निम्न है- नीलगिरी, मन्नार की खाड़ी, सुंदरवन, नंदा देवी, नोकरेक, पंचमढ़ी, सिमलीपाल, अचानकमार-अमरकंटक, अगस्त्यमाला, कंचनजंगा | जैवमंडल आगार की संरचना- इसे पारंपरिक रूप से तीन क्षेत्रों में बांटा जाता है - क्रोड जोन - यह सबसे अधिक संरक्षित क्षेत्र है जो कि राष्ट्रीय उद्यान भी हो सकता है| इसमें अधिकारियों/कर्मचारियों को छोड़कर सभी का प्रवेश वर्जित होता है| इस क्षेत्र के अंदर स्थानिक एवं जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पौधों एवं जीव-जंतुओं की प्रजातियां रहती है| बफर जोन- यहक्रोड क्षेत्र के चारों ओर का क्षेत्र हैं| इस क्षेत्र का प्रयोग नियंत्रित एवं विध्वंसक कार्यों के लिए किया जा सकता है जिसमें शोध एवंअनुसंधान, परंपरागत उपयोग, पुनर्वास, मत्स्य-पालन, आदि शामिल है| साथ ही, इस क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण, पर्यटन, मनोरंजन आदि क्रियाकलाप भी किए जा सकते हैं| संक्रमण क्षेत्र- यह बफर जोन के चारों ओर का भाग होता है जिसका कार्य शोधकर्ताओं/प्रबंधकों को स्थानीय लोगों के मध्य परस्पर सहयोग के द्वारा संसाधनों का विकास एवं नियोजन कर पर्यावरण एवं विकास के बीच संबंधों को बढ़ावा देना है| जैवमंडल आगार के कार्य- जैवमंडल आगार क्षेत्र पारितंत्रीय प्रजातीय एवं अनुवांशिक संरक्षण को सुनिश्चित करता है| यह परंपरागत संसाधनों के प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ ही पारितंत्र की कार्यप्रणाली और प्रारूप को समझने में मदद करता है| इनके द्वारा मुख्यतः निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं- जैव विविधता एवं पारितंत्रों का संरक्षण- जैवमंडल आगार क्षेत्र निर्माण का मुख्य उद्देश्य पारितंत्र एवं उनमें रहने वाली जैव विविधता का संरक्षण करना है| इसके अंतर्गत प्रजातीय एवं अनुवांशिक संरक्षण को शामिल किया जाता है |यह मानव गतिविधियों के कारण संबंधित क्षेत्र में में होने वाले परिवर्तन की निगरानी करता है| विकास- इसके अंतर्गत पर्यावरण और विकास के बीच संबंध को विनियमित किया जाता है| स्थानिक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण एवं भूमि संरक्षण विकास कार्यक्रमों के मध्य इस तरह संबंधों को बढ़ावा दिया जाता है ताकि पोषणीय पर्यावरण एवं पोषणीय विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके| लॉजिस्टिक - जैवमंडल आगार का कार्य शोध एवं अध्ययन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध क्षेत्रों की स्थापना करके उनके मध्य सूचनाओं का आदान-प्रदान करना भी है| इसके द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों को मॉनिटर किया जाता है तथा संरक्षण से संबंधित प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है| जैवमंडल आगार अनुसंधान द्वारा प्राप्त जानकारी को विश्व स्तर पर साझा करते हैं ताकि लोगों को पर्याप्त प्रशिक्षण एवं शिक्षा दिया जा सके| ये समुदायों में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन हेतु जागरूकता एवं प्रेरणा को बढ़ावा देते हैं|
##Question:जैव विविधता के संरक्षण के लिए यूनेस्को द्वारा चालू किये गये "मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम" का वर्णन दीजिये| इस संदर्भ में, जैवमंडल आगार की संरचना तथा कार्यों के बारे में चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe "The Man and Biosphere Programme"(MAB) launched by UNESCO for biodiversity conservation. In this context, discuss the structure and functions of the biosphere reserve. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में जैव विविधता के संरक्षण हेतु यूनेस्को के "मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम" का वर्णन कीजिये| दूसरे भाग में जैवमंडल आगार क्षेत्र को बताते हुए उसकी संरचना को समझाईये| साथ ही, भारत के जैवमंडल आगारों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में जैवमंडल आगार के कार्यों के बारे में चर्चा कीजिये| उत्तर- प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग तथा प्राकृतिक आपदाओं के कारण जैव विविधता में तेजी से ह्रास हो रहा है| पर्यावरण के स्वरूप एवं संतुलन को बनाए रखने के लिए जैव विविधता का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है| मानव को पर्यावरण के महत्व के प्रति जागरूक करने तथा मानव एवं पर्यावरण के बीच स्वस्थ संबंधों का निर्माण करने के लिए यूनेस्को द्वारा 1971 में मानव एवं जैव मंडल कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी| यह एक अंतर सरकारी वैज्ञानिक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधों में सुधार के लिए एक वैज्ञानिक आधार स्थापित करना है| इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक शिक्षा के एकीकरण द्वारा मानव जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाकर प्रकृति एवं पर्यावरण पारितंत्र को सुरक्षित करना है जिससे विश्व भर में आर्थिक विकास को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण की दृष्टि से दीर्घकालिक बनाया जा सके| मानव एवं जैवमंडल कार्यक्रम के कार्य ये मानव एवं प्रकृति द्वारा संबंधित क्षेत्र में परिवर्तन के कारण मानव एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करता है| यह पर्यावरण संकट एवं सतत विकास के लिए पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देता है| प्राकृतिक तथा मानव जनित कारकों का पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन तथा बढ़ती पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए जैव विविधता संरक्षण हेतु तकनीकी अध्ययन को प्रोत्साहित करता है| जैवमंडल आगार क्षेत्र इसकी अवधारणा को यूनेस्को के मानव एवं जैव मंडल कार्यक्रम(MAB) के अंतर्गत विकसित किया गया था| इसका उद्देश्य प्राकृतिक आवासों तथा उसमें पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की प्रजातियां एवं वनस्पतियों की प्रजातियों की रक्षा एवं उनका संरक्षण करना है| इसके अंतर्गत किसी भी पारितंत्र एवं प्राकृतिक आवास के अजैविक संघटक तथा जैविक घटकों की जैव विविधता को संरक्षित करने का प्रयास किया जाता है| जैवमंडल आगार क्षेत्र का नामकरण उस देश की सरकार द्वारा किया जाता है जिस देश में ये क्षेत्र अवस्थित है| वर्तमान में विश्व में कुल 686 बायोस्फीयर रिजर्व है जिनमें से भारत के 11 जैव मंडल आगार इस लिस्ट में शामिल है(हालाँकि भारत में कुल 18 जैवमंडल रिजर्व है) जो कि निम्न है- नीलगिरी, मन्नार की खाड़ी, सुंदरवन, नंदा देवी, नोकरेक, पंचमढ़ी, सिमलीपाल, अचानकमार-अमरकंटक, अगस्त्यमाला, कंचनजंगा | जैवमंडल आगार की संरचना- इसे पारंपरिक रूप से तीन क्षेत्रों में बांटा जाता है - क्रोड जोन - यह सबसे अधिक संरक्षित क्षेत्र है जो कि राष्ट्रीय उद्यान भी हो सकता है| इसमें अधिकारियों/कर्मचारियों को छोड़कर सभी का प्रवेश वर्जित होता है| इस क्षेत्र के अंदर स्थानिक एवं जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पौधों एवं जीव-जंतुओं की प्रजातियां रहती है| बफर जोन- यहक्रोड क्षेत्र के चारों ओर का क्षेत्र हैं| इस क्षेत्र का प्रयोग नियंत्रित एवं विध्वंसक कार्यों के लिए किया जा सकता है जिसमें शोध एवंअनुसंधान, परंपरागत उपयोग, पुनर्वास, मत्स्य-पालन, आदि शामिल है| साथ ही, इस क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण, पर्यटन, मनोरंजन आदि क्रियाकलाप भी किए जा सकते हैं| संक्रमण क्षेत्र- यह बफर जोन के चारों ओर का भाग होता है जिसका कार्य शोधकर्ताओं/प्रबंधकों को स्थानीय लोगों के मध्य परस्पर सहयोग के द्वारा संसाधनों का विकास एवं नियोजन कर पर्यावरण एवं विकास के बीच संबंधों को बढ़ावा देना है| जैवमंडल आगार के कार्य- जैवमंडल आगार क्षेत्र पारितंत्रीय प्रजातीय एवं अनुवांशिक संरक्षण को सुनिश्चित करता है| यह परंपरागत संसाधनों के प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ ही पारितंत्र की कार्यप्रणाली और प्रारूप को समझने में मदद करता है| इनके द्वारा मुख्यतः निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं- जैव विविधता एवं पारितंत्रों का संरक्षण- जैवमंडल आगार क्षेत्र निर्माण का मुख्य उद्देश्य पारितंत्र एवं उनमें रहने वाली जैव विविधता का संरक्षण करना है| इसके अंतर्गत प्रजातीय एवं अनुवांशिक संरक्षण को शामिल किया जाता है |यह मानव गतिविधियों के कारण संबंधित क्षेत्र में में होने वाले परिवर्तन की निगरानी करता है| विकास- इसके अंतर्गत पर्यावरण और विकास के बीच संबंध को विनियमित किया जाता है| स्थानिक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण एवं भूमि संरक्षण विकास कार्यक्रमों के मध्य इस तरह संबंधों को बढ़ावा दिया जाता है ताकि पोषणीय पर्यावरण एवं पोषणीय विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके| लॉजिस्टिक - जैवमंडल आगार का कार्य शोध एवं अध्ययन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध क्षेत्रों की स्थापना करके उनके मध्य सूचनाओं का आदान-प्रदान करना भी है| इसके द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों को मॉनिटर किया जाता है तथा संरक्षण से संबंधित प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है| जैवमंडल आगार अनुसंधान द्वारा प्राप्त जानकारी को विश्व स्तर पर साझा करते हैं ताकि लोगों को पर्याप्त प्रशिक्षण एवं शिक्षा दिया जा सके| ये समुदायों में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन हेतु जागरूकता एवं प्रेरणा को बढ़ावा देते हैं|
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Briefly discuss the health issues related to women. Also critically evaluate the government schemes in this regard. (200)
Approach - 1. Briefly highlight the health issues related to women. 2. Provide some government schemes related to women health and critically comment on them. 3. Provide solutions related to the women health problems 4. conclude with a forward-looking positive view. Answer - Women in India face various issues like malnutrition, lack of maternal health, high Infant mortality rate, high maternal mortality rate, diseases like AIDS, breast cancer, domestic violence and many more. HEALTH ISSUES RELATED TO WOMEN – 1. High IMR and MMR – India’s IMR have fallen from 42 in 2012 to 33 in 2017. However, the pace has slowed down. Even after improvement, India’s IMR is worse than those of South Asian neighbours SRI LANKA, BANGLADESH and NEPAL. latest Sample Registration System (SRS) data indicating the Maternal Mortality Ratio (MMR) reduced from 167 (in 2011-2013, the last SRS period) to 130 for the country.But it is still higher than the global average. 2. Malnutrition - Malnutrition poses a variety of threats to women. It weakens women’s ability to survive childbirth, makes them more susceptible to infections, and leaves them with fewer reserves to recover from illness. Sociocultural traditions and disparities in household work patterns can also increase women’s chances of being malnourished. According to the State of Food Security and Nutrition in the World 2017 report, 51.4% of women in reproductive ages are anaemic. This inter-generational cycle of undernutrition transmitted from mothers to children greatly impacts on India’s present and future. 3. Lack of Maternal Health- In India mothers do not get the expected care pre and post birth, the situation is worse for a newborn girl child. Also, There is still a prevalence of high non- institutional delivery. 4. Non-communicable diseases, such as cardiovascular disease, stroke, kidney disease, respiratory diseases and trauma are the leading causes of death for women in India. India has one of the highest rate of prevalence of cervical cancer and breast cancer in women. 5. Domestic violence is one of the major issues in India. As per reports of India National Family Health Survey III (2005-2006), 31 per cent of all women reported having been the victims of physical violence in the last 12 months. 6. MENTAL HEALTH - Due to societal stigma and ignorance, mental illness suffered by women failed to get identified. About 5,650 farmers had committed suicide in 2014. In the same year, more than 20,000 housewives committed suicide. Despite four times the number of tragedies, suicides by housewives have not caught the attention of policymakers. Their are various govt. schemes working for the betterment of women health BBBP programme has been successful in establishing improvement in child sex ratio as a National Agenda. Government is implementing Scheme for Adolescent Girls to improve the nutritional and health status of out of school adolescent girls of age 11-14 years and to upgrade their skills. POSHAN Abhiyaanaims to reduce malnutrition from the Country in a phased manner, through the life cycle concept, by adopting a synergised and result oriented approach. PM matru vandana yojana Pan-India implementation of Maternity Benefit Programme to eligible pregnant women and lactating mothers. But despite all the efforts India had earlier missed its MDG target related to IMR and MMR India has to achieve IMR of 29/1000 by 2015 but still it is around 33, to achieve MDG India had to reduce MMR to 140 by 2015 but India had missed its targets. The situation of these parameters is not satisfactory even now. Various schemes are not functioning well at the ground level like rampant and non-essential hysterectomies of poor women under RSBY, low penetration of ICDS, PM matru vandana yojana etc. According to National health policy targets we need to reduceMMR from current levels to 100 by 2020, Reduce infant mortality rate to 28 by 2019, but with the current performance, it seems distant. SOLUTIONS – 1. Governments, inter-governmental agencies, nongovernment, organizations, donor organizations and corporate bodies need to broaden their focus on women’s health to include NCDs. 2. Empower and educate women to take charge of their own and their families’ health. 3. Corporate organizations to recognize the importance of an integrated women’s health agenda as an important Corporate Social Responsibility, especially in light of the SDG No 3, and allocate funds to support gendered analyses of health data and improved understanding of care pathways for women. 4. Benefits of health insurance need to be provided to every household. 5. Provide quality ante-natal care, maternity benefits and ensure proper implementation of govt. schemes related to maternal health. Currently, women in India has to face numerous health issues, which ultimately affect the aggregate economy’s output. Addressing the gender, class or ethnic disparities that exist in healthcare and improving the health outcomes can ensure economic gain and completion of SDG goals through the creation of quality human capital and increased levels of savings and investment.
##Question:Briefly discuss the health issues related to women. Also critically evaluate the government schemes in this regard. (200)##Answer:Approach - 1. Briefly highlight the health issues related to women. 2. Provide some government schemes related to women health and critically comment on them. 3. Provide solutions related to the women health problems 4. conclude with a forward-looking positive view. Answer - Women in India face various issues like malnutrition, lack of maternal health, high Infant mortality rate, high maternal mortality rate, diseases like AIDS, breast cancer, domestic violence and many more. HEALTH ISSUES RELATED TO WOMEN – 1. High IMR and MMR – India’s IMR have fallen from 42 in 2012 to 33 in 2017. However, the pace has slowed down. Even after improvement, India’s IMR is worse than those of South Asian neighbours SRI LANKA, BANGLADESH and NEPAL. latest Sample Registration System (SRS) data indicating the Maternal Mortality Ratio (MMR) reduced from 167 (in 2011-2013, the last SRS period) to 130 for the country.But it is still higher than the global average. 2. Malnutrition - Malnutrition poses a variety of threats to women. It weakens women’s ability to survive childbirth, makes them more susceptible to infections, and leaves them with fewer reserves to recover from illness. Sociocultural traditions and disparities in household work patterns can also increase women’s chances of being malnourished. According to the State of Food Security and Nutrition in the World 2017 report, 51.4% of women in reproductive ages are anaemic. This inter-generational cycle of undernutrition transmitted from mothers to children greatly impacts on India’s present and future. 3. Lack of Maternal Health- In India mothers do not get the expected care pre and post birth, the situation is worse for a newborn girl child. Also, There is still a prevalence of high non- institutional delivery. 4. Non-communicable diseases, such as cardiovascular disease, stroke, kidney disease, respiratory diseases and trauma are the leading causes of death for women in India. India has one of the highest rate of prevalence of cervical cancer and breast cancer in women. 5. Domestic violence is one of the major issues in India. As per reports of India National Family Health Survey III (2005-2006), 31 per cent of all women reported having been the victims of physical violence in the last 12 months. 6. MENTAL HEALTH - Due to societal stigma and ignorance, mental illness suffered by women failed to get identified. About 5,650 farmers had committed suicide in 2014. In the same year, more than 20,000 housewives committed suicide. Despite four times the number of tragedies, suicides by housewives have not caught the attention of policymakers. Their are various govt. schemes working for the betterment of women health BBBP programme has been successful in establishing improvement in child sex ratio as a National Agenda. Government is implementing Scheme for Adolescent Girls to improve the nutritional and health status of out of school adolescent girls of age 11-14 years and to upgrade their skills. POSHAN Abhiyaanaims to reduce malnutrition from the Country in a phased manner, through the life cycle concept, by adopting a synergised and result oriented approach. PM matru vandana yojana Pan-India implementation of Maternity Benefit Programme to eligible pregnant women and lactating mothers. But despite all the efforts India had earlier missed its MDG target related to IMR and MMR India has to achieve IMR of 29/1000 by 2015 but still it is around 33, to achieve MDG India had to reduce MMR to 140 by 2015 but India had missed its targets. The situation of these parameters is not satisfactory even now. Various schemes are not functioning well at the ground level like rampant and non-essential hysterectomies of poor women under RSBY, low penetration of ICDS, PM matru vandana yojana etc. According to National health policy targets we need to reduceMMR from current levels to 100 by 2020, Reduce infant mortality rate to 28 by 2019, but with the current performance, it seems distant. SOLUTIONS – 1. Governments, inter-governmental agencies, nongovernment, organizations, donor organizations and corporate bodies need to broaden their focus on women’s health to include NCDs. 2. Empower and educate women to take charge of their own and their families’ health. 3. Corporate organizations to recognize the importance of an integrated women’s health agenda as an important Corporate Social Responsibility, especially in light of the SDG No 3, and allocate funds to support gendered analyses of health data and improved understanding of care pathways for women. 4. Benefits of health insurance need to be provided to every household. 5. Provide quality ante-natal care, maternity benefits and ensure proper implementation of govt. schemes related to maternal health. Currently, women in India has to face numerous health issues, which ultimately affect the aggregate economy’s output. Addressing the gender, class or ethnic disparities that exist in healthcare and improving the health outcomes can ensure economic gain and completion of SDG goals through the creation of quality human capital and increased levels of savings and investment.
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बिस्मार्क की लौह एवं रक्त की नीति, किस सीमा तक जर्मनी के एकीकरण के लिए उत्तरदायी थी। विश्लेषित कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) To what extent bismarck"s iron and blood policy was responsible for Germany"s integration. Analyze. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच :- बिस्मार्क के सन्दर्भ में संक्षिप्त भूमिकादेते हुए प्रारम्भ कीजिये। बिस्मार्क की लौह एवं रक्त की नीति को स्पष्ट कीजिये बिस्मार्क के द्वारा जर्मनी के एकीकरण हेतु घटनाक्रम बताइये। जर्मनी के एकीकरण के लिए उत्तरदायी अन्य कारणभी लिखिए संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- बिस्मार्क प्रशा का रहने वाला अभिजात वर्गीय पृष्ठ्भूमि से थातथा राजदूत के रूप में रूस एवं फ्रांस में कार्यरत एवं सेवा दे चुकाथा। यह जर्मनी केएकीकरण का समर्थक , राजतन्त्र का समर्थक था तथाएकीकरण के लिए लौहएवं रक्त की नीति पर बल देता था। बिस्मार्क की लौह एवं रक्त की नीति :- इस नीति के द्वारा राज्यों को बल प्रयोग एकजुट किया। यह नीति द्रुत गति से और महान रणनीतिक विशेषज्ञता के साथ कार्यान्वित की गयी। इस नीति का उद्देश्य प्रशा की राजशाही के अधीन जर्मनी का एकीकरण करना था और इसके लिए जर्मन परिसंघ को नष्ट करना आवश्यक था। बिस्मार्क के नेतृत्व मेंजर्मनी का एकीकरण :- जर्मन परिसंघ के अधिकांश प्रदेशों पर कब्ज़ाके लिए बिस्मार्क के नेतृत्व में प्रशा ने सर्वप्रथम 1864 में डेनमार्क के विरुद्ध ऑस्ट्रिया के साथ गठजोड़ बनाकर युद्ध किया। ऑस्ट्रिया को हारने के लिए1866 में इटली के साथ गठजोड़ किया सेडोवा का युद्ध (1866 ईस्वी ) - होलस्टीन के मुद्दे पर ऑस्ट्रिया एवं प्रशा के बीच विवाद प्रमुख कारण ऑस्ट्रिया को जर्मन राजनीति से निकालना बिस्मार्क ने फ्रांस के शासक से मुलाकात की और उसे अलग रखने में कामयाब रहा क्रीमिया के युद्ध से रूस , ऑस्ट्रिया से नाराज था , बिस्मार्क ने इस मुद्दे को हवा दी और रूस को भी अलग रखने में सफल रहा। इटली को वेनेशिया चाहिए था और इटली ने भी बिस्मार्क का साथ दिया इसका परिणाम ऑस्ट्रिया की पराजय , प्रतिष्ठा गिरी , प्रशा के नेतृत्व में उत्तरी जर्मन राज्यों का एकीकरण , इससे प्रशा की प्रतिष्ठा बढ़ी। 1866 में बिस्मार्क ने उत्तरी जर्मन परिसंघ का गठन किया। 1870 में फ्रांसीसी प्रशियाई युद्ध में जर्मन विजय में एकीकरण किया। सेडान का युद्ध (1870 ईस्वी तात्कालिक कारण - फ्रांस एवं प्रशा के मध्य स्पेन के उत्तराधिकार को लेकर विवाद दीर्घकालिक कारण - फ्रांस का प्रशा विरोधी दृष्टिकोण तथा बिस्मार्क के द्वारा नेपोलियन के अभियानों का प्रतिशोध लेना बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया की तरह फ्रांस को भी अलग थलग रखने की योजना बनाई यहाँ तक कि पराजय के पश्चात ऑस्ट्रिया को अपमानित नहीं किया गया ताकि वो फ्रांस का साथ ना दे फ्रांस के द्वारा बेल्जियम पर दावे सम्बन्धी मांग से ब्रिटेन नाखुश था लक्जमबर्ग तथा दक्षिण जर्मन राज्यों कीफ्रांसीसी मांग से दक्षिणी राज्यों में फ्रांस विरोधी मांग उठी बिस्मार्क ने रूस को काला सागर में नौसैनिक गतिविधियों का आश्वासन दिया साथ ही इटली की नजर रोम पर थी इसका परिणाम - सेडान के युद्ध में फ्रांस की पराजय , फ्रांस की प्रतिष्ठा , जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ और जर्मनी की प्रतिष्ठा बढ़ी। जर्मनी ने अल्सास लॉरेन के क्षेत्र के साथ साथ एक बड़ी राशि मुआवजे में ली। यह आगे भी फ्रांस एवं जर्मनी में तनाव का कारण बना. जर्मन एकीकरण के लिए अन्य उत्तरदायी कारण :- पुनर्जागरण , प्रबोधन आदि ने राष्ट्र राज्य की अवधारणा को मजबूत किया। सर्वप्रथम जर्मनी को एक करने का श्रेय नेपोलियन को जाता है , नेपोलियन ने पवित्र रोमन साम्राज्य को समाप्त किया , जर्मन राज्यों का पुनर्गठन किया , ऑस्ट्रिया को जर्मन राजनीति से अलग रखा तथा आधुनिक व्यवस्था लागू की। लेकिन शीघ्र ही नेपोलियन से लोगों का मोह भंग हुआ और नेपोलियन के विरोध के क्रम में जर्मन लोगों ने एकजुटता दिखाई वियना सम्मलेन , मूलत राष्ट्रवाद विरोधी तथा इसने जर्मन राजनीति में पुन ऑस्ट्रिया को स्थापित किया हालाँकि फ्रांस पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से प्रशा को राइन नदी तक का क्षेत्र दिया गया और आगे चलकर इसी के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण हुआ इटली की तरह जर्मनी में भी 1830 एवं 1848 की यूरोपीय क्रांति के दौरान ,राष्ट्रवाद एवं उदारवाद की एक लहर चली और 1848 में एक असफल कोशिश भी हुई इटली के विपरीत 19 वीं सदी के पूर्वार्ध में जर्मनी का तेजी से एकीकरण हुआ। इसमें जोलवरिन( सीमा शुल्क संगठन ), लौह एवं इस्पात उद्योग का विकास , 3000 मील लम्बी रेलवे लाइन बिछाई गयी। जर्मन एकीकरण को वैचारिक आधार प्रदान करने में हर्डर , हेगेल , फ्रेडरिक लिस्ट , फिक्टे आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। फ्रेडरिक लिस्ट ने ही संरक्षण वादी नीति की पुरजोर वकालत की। इस प्रकार जहाँ बिस्मार्क ने जर्मन एकीकरण को अपनी लौहएवं रक्त की नीति से अंतिम परिणति तक पहुंचाया ,वहीँ इसके बीज बिस्मार्क से पूर्व ही जर्मन समाज में पल चुके थे। जिससे एकीकरण की प्रक्रिया को बिस्मार्क के द्वारा तीव्र की गयी।
##Question:बिस्मार्क की लौह एवं रक्त की नीति, किस सीमा तक जर्मनी के एकीकरण के लिए उत्तरदायी थी। विश्लेषित कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) To what extent bismarck"s iron and blood policy was responsible for Germany"s integration. Analyze. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच :- बिस्मार्क के सन्दर्भ में संक्षिप्त भूमिकादेते हुए प्रारम्भ कीजिये। बिस्मार्क की लौह एवं रक्त की नीति को स्पष्ट कीजिये बिस्मार्क के द्वारा जर्मनी के एकीकरण हेतु घटनाक्रम बताइये। जर्मनी के एकीकरण के लिए उत्तरदायी अन्य कारणभी लिखिए संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- बिस्मार्क प्रशा का रहने वाला अभिजात वर्गीय पृष्ठ्भूमि से थातथा राजदूत के रूप में रूस एवं फ्रांस में कार्यरत एवं सेवा दे चुकाथा। यह जर्मनी केएकीकरण का समर्थक , राजतन्त्र का समर्थक था तथाएकीकरण के लिए लौहएवं रक्त की नीति पर बल देता था। बिस्मार्क की लौह एवं रक्त की नीति :- इस नीति के द्वारा राज्यों को बल प्रयोग एकजुट किया। यह नीति द्रुत गति से और महान रणनीतिक विशेषज्ञता के साथ कार्यान्वित की गयी। इस नीति का उद्देश्य प्रशा की राजशाही के अधीन जर्मनी का एकीकरण करना था और इसके लिए जर्मन परिसंघ को नष्ट करना आवश्यक था। बिस्मार्क के नेतृत्व मेंजर्मनी का एकीकरण :- जर्मन परिसंघ के अधिकांश प्रदेशों पर कब्ज़ाके लिए बिस्मार्क के नेतृत्व में प्रशा ने सर्वप्रथम 1864 में डेनमार्क के विरुद्ध ऑस्ट्रिया के साथ गठजोड़ बनाकर युद्ध किया। ऑस्ट्रिया को हारने के लिए1866 में इटली के साथ गठजोड़ किया सेडोवा का युद्ध (1866 ईस्वी ) - होलस्टीन के मुद्दे पर ऑस्ट्रिया एवं प्रशा के बीच विवाद प्रमुख कारण ऑस्ट्रिया को जर्मन राजनीति से निकालना बिस्मार्क ने फ्रांस के शासक से मुलाकात की और उसे अलग रखने में कामयाब रहा क्रीमिया के युद्ध से रूस , ऑस्ट्रिया से नाराज था , बिस्मार्क ने इस मुद्दे को हवा दी और रूस को भी अलग रखने में सफल रहा। इटली को वेनेशिया चाहिए था और इटली ने भी बिस्मार्क का साथ दिया इसका परिणाम ऑस्ट्रिया की पराजय , प्रतिष्ठा गिरी , प्रशा के नेतृत्व में उत्तरी जर्मन राज्यों का एकीकरण , इससे प्रशा की प्रतिष्ठा बढ़ी। 1866 में बिस्मार्क ने उत्तरी जर्मन परिसंघ का गठन किया। 1870 में फ्रांसीसी प्रशियाई युद्ध में जर्मन विजय में एकीकरण किया। सेडान का युद्ध (1870 ईस्वी तात्कालिक कारण - फ्रांस एवं प्रशा के मध्य स्पेन के उत्तराधिकार को लेकर विवाद दीर्घकालिक कारण - फ्रांस का प्रशा विरोधी दृष्टिकोण तथा बिस्मार्क के द्वारा नेपोलियन के अभियानों का प्रतिशोध लेना बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया की तरह फ्रांस को भी अलग थलग रखने की योजना बनाई यहाँ तक कि पराजय के पश्चात ऑस्ट्रिया को अपमानित नहीं किया गया ताकि वो फ्रांस का साथ ना दे फ्रांस के द्वारा बेल्जियम पर दावे सम्बन्धी मांग से ब्रिटेन नाखुश था लक्जमबर्ग तथा दक्षिण जर्मन राज्यों कीफ्रांसीसी मांग से दक्षिणी राज्यों में फ्रांस विरोधी मांग उठी बिस्मार्क ने रूस को काला सागर में नौसैनिक गतिविधियों का आश्वासन दिया साथ ही इटली की नजर रोम पर थी इसका परिणाम - सेडान के युद्ध में फ्रांस की पराजय , फ्रांस की प्रतिष्ठा , जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ और जर्मनी की प्रतिष्ठा बढ़ी। जर्मनी ने अल्सास लॉरेन के क्षेत्र के साथ साथ एक बड़ी राशि मुआवजे में ली। यह आगे भी फ्रांस एवं जर्मनी में तनाव का कारण बना. जर्मन एकीकरण के लिए अन्य उत्तरदायी कारण :- पुनर्जागरण , प्रबोधन आदि ने राष्ट्र राज्य की अवधारणा को मजबूत किया। सर्वप्रथम जर्मनी को एक करने का श्रेय नेपोलियन को जाता है , नेपोलियन ने पवित्र रोमन साम्राज्य को समाप्त किया , जर्मन राज्यों का पुनर्गठन किया , ऑस्ट्रिया को जर्मन राजनीति से अलग रखा तथा आधुनिक व्यवस्था लागू की। लेकिन शीघ्र ही नेपोलियन से लोगों का मोह भंग हुआ और नेपोलियन के विरोध के क्रम में जर्मन लोगों ने एकजुटता दिखाई वियना सम्मलेन , मूलत राष्ट्रवाद विरोधी तथा इसने जर्मन राजनीति में पुन ऑस्ट्रिया को स्थापित किया हालाँकि फ्रांस पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से प्रशा को राइन नदी तक का क्षेत्र दिया गया और आगे चलकर इसी के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण हुआ इटली की तरह जर्मनी में भी 1830 एवं 1848 की यूरोपीय क्रांति के दौरान ,राष्ट्रवाद एवं उदारवाद की एक लहर चली और 1848 में एक असफल कोशिश भी हुई इटली के विपरीत 19 वीं सदी के पूर्वार्ध में जर्मनी का तेजी से एकीकरण हुआ। इसमें जोलवरिन( सीमा शुल्क संगठन ), लौह एवं इस्पात उद्योग का विकास , 3000 मील लम्बी रेलवे लाइन बिछाई गयी। जर्मन एकीकरण को वैचारिक आधार प्रदान करने में हर्डर , हेगेल , फ्रेडरिक लिस्ट , फिक्टे आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। फ्रेडरिक लिस्ट ने ही संरक्षण वादी नीति की पुरजोर वकालत की। इस प्रकार जहाँ बिस्मार्क ने जर्मन एकीकरण को अपनी लौहएवं रक्त की नीति से अंतिम परिणति तक पहुंचाया ,वहीँ इसके बीज बिस्मार्क से पूर्व ही जर्मन समाज में पल चुके थे। जिससे एकीकरण की प्रक्रिया को बिस्मार्क के द्वारा तीव्र की गयी।
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What do you understand by a Model Code of Conduct? Discuss various guidelines related to general conduct, polling day protocols, etc. (10 marks/150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The meaning of a Model Code of Conduct along with a few facts. - THE CATEGORIES THAT THE MODEL CODE OF CONDUCT IS DIVIDED INTO -CONCLUSION Answer:- The Model Code of Conduct (MCC) is a set of guidelines, which have been decided by consensus to regulate the political parties during elections. The first MCC was enforced in 1960 in Kerala- where by and large, it was successful. In 1962, it was utilized for the first time in the general elections all over India. THE CATEGORIES THAT THE MODEL CODE OF CONDUCT IS DIVIDED INTO 1) GENERAL CONDUCT Criticisms on another person contesting for elections:- 1.1) Should not be on personal grounds 1.2) Should not be on the basis of caste, religion etc. 1.3) Should only be centred on policies and programs. 2) MEETINGS Venues of public meetings are announced to the police and the public in advance. In these meetings, no caste, religion or anti-national sentiments should be provoked. 3) PROCESSIONS No religious symbols, brandishing of arms shall be done in these processions. As far as possible, these processions should be organized such that if more than 1 procession is occurring in a local area, then they must not clash with one another. 4) POLLING DAY Usually, 48 hours before polling day, official campaigning must not be allowed. (This can be imposed for even before48 hours, as was done in Bengal this time, in the 2019 general elections). On the day of polling, all authorized party representatives must be given an identification batch with name, serial number etc. Only the voters who are duly verified must be allowed to enter the polling booth. 5) POLLING BOOTH No campaigning is allowed within a 100m radius of the polling booth. Section 144 of CrPC can be imposed around a polling booth. 6) OBSERVER An election commission of India (ECI) appointed observer must keep an eagle’s eye view over the functioning of the electoral process. 7) PARTY IN POWER This clause was added in 1979 to deal with the disproportionately high influence, which the ruling party may exert over the outcome of the electoral process. In order to keep a level playing field, it is advised that: 7.1) No financial grant: must be announced from the date of enforcement of MCC. 7.2) No sanction of major roads, highways, infrastructure must be announced after the enforcement of the MCC. 7.3) Election advertisements should not be funded by the public exchequer. 7.4) Ministers must not mix official visits with visits for election campaigning. 8) ELECTION MANIFESTO This was added in 2013. The aim is to remove an undue influence. Thus, any misleading, impractical or impossible promise as a part of the election manifesto is covered under this category. Any promise must be associated with the “means to deliver the promise”. Otherwise, it shall be considered as inserting undue influence over the voters. Thus, the aim is to give all the parties, even which are not in power, equal opportunities to argue and reach out to their voters and to enforce free and fair elections in the country.
##Question:What do you understand by a Model Code of Conduct? Discuss various guidelines related to general conduct, polling day protocols, etc. (10 marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION The meaning of a Model Code of Conduct along with a few facts. - THE CATEGORIES THAT THE MODEL CODE OF CONDUCT IS DIVIDED INTO -CONCLUSION Answer:- The Model Code of Conduct (MCC) is a set of guidelines, which have been decided by consensus to regulate the political parties during elections. The first MCC was enforced in 1960 in Kerala- where by and large, it was successful. In 1962, it was utilized for the first time in the general elections all over India. THE CATEGORIES THAT THE MODEL CODE OF CONDUCT IS DIVIDED INTO 1) GENERAL CONDUCT Criticisms on another person contesting for elections:- 1.1) Should not be on personal grounds 1.2) Should not be on the basis of caste, religion etc. 1.3) Should only be centred on policies and programs. 2) MEETINGS Venues of public meetings are announced to the police and the public in advance. In these meetings, no caste, religion or anti-national sentiments should be provoked. 3) PROCESSIONS No religious symbols, brandishing of arms shall be done in these processions. As far as possible, these processions should be organized such that if more than 1 procession is occurring in a local area, then they must not clash with one another. 4) POLLING DAY Usually, 48 hours before polling day, official campaigning must not be allowed. (This can be imposed for even before48 hours, as was done in Bengal this time, in the 2019 general elections). On the day of polling, all authorized party representatives must be given an identification batch with name, serial number etc. Only the voters who are duly verified must be allowed to enter the polling booth. 5) POLLING BOOTH No campaigning is allowed within a 100m radius of the polling booth. Section 144 of CrPC can be imposed around a polling booth. 6) OBSERVER An election commission of India (ECI) appointed observer must keep an eagle’s eye view over the functioning of the electoral process. 7) PARTY IN POWER This clause was added in 1979 to deal with the disproportionately high influence, which the ruling party may exert over the outcome of the electoral process. In order to keep a level playing field, it is advised that: 7.1) No financial grant: must be announced from the date of enforcement of MCC. 7.2) No sanction of major roads, highways, infrastructure must be announced after the enforcement of the MCC. 7.3) Election advertisements should not be funded by the public exchequer. 7.4) Ministers must not mix official visits with visits for election campaigning. 8) ELECTION MANIFESTO This was added in 2013. The aim is to remove an undue influence. Thus, any misleading, impractical or impossible promise as a part of the election manifesto is covered under this category. Any promise must be associated with the “means to deliver the promise”. Otherwise, it shall be considered as inserting undue influence over the voters. Thus, the aim is to give all the parties, even which are not in power, equal opportunities to argue and reach out to their voters and to enforce free and fair elections in the country.
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What do you understand by the term patriarchy? State the impact of patriarchy on women (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - ABOUT PATRIARCHY - THE IMPACT OF PATRIARCHY ON WOMEN - SOLUTIONS OF THE ABOVE STATED ISSUES Answer:- Sex is a biological reality. Gender is a socially created reality. In due process, males have got masculinized and females feminized, while trans-genders stigmatized. ABOUT PATRIARCHY 1) AGRICULTURE It used to be considered male"s work. Therefore, males came to be considered as assets and females as liabilities. Thus, the cultural subjugation of femalesbegan. 2) INSTITUTIONALISATION OF PATRIARCHY This took place over the years 3) MEANING OF PATRIARCHY Irrespective of merit, males are considered superior over females in all walks of social life. Females are treated asymmetrically. THE IMPACT OF PATRIARCHY ON WOMEN 1) INFERIOR QUALITY OF LIFE CHANCES This is the result of patriarchy in the domains of health, education and employment. 1.1) As per the Pratham Report, the GER is around 96% at the primary level. From class VI onwards, girls" students attendance has witnessed a drop of 63%. 1.2) The reasons behind this are insecurity & lack of infrastructure/ amenities in school. 1.3) Only 4% of women are in the formal sector. 1.4) 83% of females are working as skilled or semi-skilled labour in India. 1.5) As per SECC, only 12.08% of families have female heads. 1.6) Every 3rd girl in India is suffering from hysterical symptoms, mainly due to the deficiency of calcium and iron. 1.7) During pregnancy, we do not have adequate nutrition and inadequate institutional deliveries. This is resulting in high MMRs. 1.8) In India, only 18,000 district hospitals have institutional facilities. On average, 22 deliveries take place per day. This means that there is not even a gap of one hour between surgeries. 1.9) 18% of the mothers suffer from gastrointestinal diseases because they lactate with an empty stomach 2) EMPTY CELL MARRIAGES Dowry and the stigmatization of divorce are resulting in empty cell marriages. Empty cell marriages mean the marriages for name’s sake, as divorce is stigmatized. They only reside as husband and wife. This is not a good sign. 2.1) Domestic violence on women is a serious issue. Of 10, 6 men have accepted that they have exercised (physical) domestic violence on their wives. 2.2) Dowry is also resulting in the aversion towards girl children. The sex ratio was 972 in 1901. It decreased to 933 in 2001. However, it increased to 943 in 2011. 2.3) In the 0-6 age group, the sex ratio decreased from 927 to 914 (2001-2011). This is mainly due to the misuse of technology and laws 3) ADULT PERSONALITY STABILIZATION Identity crisis, adult personality stabilization, middle age crisis are a few of the 8 stages in a person’s life. The Adult personality stabilization stage has not been observed in the case of females. Public patriarchyis on the surgewhile private patriarchy has reduced. SOLUTIONS OF THE ABOVE STATED ISSUES 1) The constitution of India [Articles 14, 15, DPSPs etc. also strive to address gender equality and gender empowerment]. 2) The issues stated above are also being resolved through schemes and laws. 3) A separate ministry has been established from 2006 onwards [Ministry of Women, Child and Development]. 4) The Beijing declaration- 4th conference on women empowerment of the UN in 1995 provided a roadmap for women empowerment in the Asian-African countries. India showed commitment towards Beijing declaration. 5) The Gender Parity Index, the Gender Gap Index, Gender Empowerment Measure address these issues related to gender discrimination. 6) Kofi Annan in his book, ‘We the People: Role of UN in the 21st Century’ , stated that all the G-8 countries should come together to create a fund for the basic development of the entire world. This resulted in the evolution of the MDGs , which consist of 8 goals, of which 1 goal was gender empowerment. 7) TheNational Mission for Gender Empowerment is being implemented, which has the advantage of having time-bound goals. It has comprehensive components of health, nutrition, education, employment, security & special care for distressed women. Media sensitization &gender budgeting is a new component of this scheme. We need to move from a ‘need-based welfare system’ towards a ‘right based empowerment’ system.
##Question:What do you understand by the term patriarchy? State the impact of patriarchy on women (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - ABOUT PATRIARCHY - THE IMPACT OF PATRIARCHY ON WOMEN - SOLUTIONS OF THE ABOVE STATED ISSUES Answer:- Sex is a biological reality. Gender is a socially created reality. In due process, males have got masculinized and females feminized, while trans-genders stigmatized. ABOUT PATRIARCHY 1) AGRICULTURE It used to be considered male"s work. Therefore, males came to be considered as assets and females as liabilities. Thus, the cultural subjugation of femalesbegan. 2) INSTITUTIONALISATION OF PATRIARCHY This took place over the years 3) MEANING OF PATRIARCHY Irrespective of merit, males are considered superior over females in all walks of social life. Females are treated asymmetrically. THE IMPACT OF PATRIARCHY ON WOMEN 1) INFERIOR QUALITY OF LIFE CHANCES This is the result of patriarchy in the domains of health, education and employment. 1.1) As per the Pratham Report, the GER is around 96% at the primary level. From class VI onwards, girls" students attendance has witnessed a drop of 63%. 1.2) The reasons behind this are insecurity & lack of infrastructure/ amenities in school. 1.3) Only 4% of women are in the formal sector. 1.4) 83% of females are working as skilled or semi-skilled labour in India. 1.5) As per SECC, only 12.08% of families have female heads. 1.6) Every 3rd girl in India is suffering from hysterical symptoms, mainly due to the deficiency of calcium and iron. 1.7) During pregnancy, we do not have adequate nutrition and inadequate institutional deliveries. This is resulting in high MMRs. 1.8) In India, only 18,000 district hospitals have institutional facilities. On average, 22 deliveries take place per day. This means that there is not even a gap of one hour between surgeries. 1.9) 18% of the mothers suffer from gastrointestinal diseases because they lactate with an empty stomach 2) EMPTY CELL MARRIAGES Dowry and the stigmatization of divorce are resulting in empty cell marriages. Empty cell marriages mean the marriages for name’s sake, as divorce is stigmatized. They only reside as husband and wife. This is not a good sign. 2.1) Domestic violence on women is a serious issue. Of 10, 6 men have accepted that they have exercised (physical) domestic violence on their wives. 2.2) Dowry is also resulting in the aversion towards girl children. The sex ratio was 972 in 1901. It decreased to 933 in 2001. However, it increased to 943 in 2011. 2.3) In the 0-6 age group, the sex ratio decreased from 927 to 914 (2001-2011). This is mainly due to the misuse of technology and laws 3) ADULT PERSONALITY STABILIZATION Identity crisis, adult personality stabilization, middle age crisis are a few of the 8 stages in a person’s life. The Adult personality stabilization stage has not been observed in the case of females. Public patriarchyis on the surgewhile private patriarchy has reduced. SOLUTIONS OF THE ABOVE STATED ISSUES 1) The constitution of India [Articles 14, 15, DPSPs etc. also strive to address gender equality and gender empowerment]. 2) The issues stated above are also being resolved through schemes and laws. 3) A separate ministry has been established from 2006 onwards [Ministry of Women, Child and Development]. 4) The Beijing declaration- 4th conference on women empowerment of the UN in 1995 provided a roadmap for women empowerment in the Asian-African countries. India showed commitment towards Beijing declaration. 5) The Gender Parity Index, the Gender Gap Index, Gender Empowerment Measure address these issues related to gender discrimination. 6) Kofi Annan in his book, ‘We the People: Role of UN in the 21st Century’ , stated that all the G-8 countries should come together to create a fund for the basic development of the entire world. This resulted in the evolution of the MDGs , which consist of 8 goals, of which 1 goal was gender empowerment. 7) TheNational Mission for Gender Empowerment is being implemented, which has the advantage of having time-bound goals. It has comprehensive components of health, nutrition, education, employment, security & special care for distressed women. Media sensitization &gender budgeting is a new component of this scheme. We need to move from a ‘need-based welfare system’ towards a ‘right based empowerment’ system.
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अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) जैव विविधता संरक्षण के बहुआयामी उपागम को अपनाता है| इस सन्दर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के कार्यक्षेत्र को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही जैव विविधता के संरक्षण में रेड डाटा बुक, ग्रीन और ब्लू बुक के महत्त्व की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) The International Union forConservation of Nature (IUCN) adopts a multi-dimensional approach to biodiversity conservation. In this context, clarify the scope of the International Union for Conservation of Nature (IUCN). Along with this, discuss the importance of the Red Data Book, Green and Blue Book in the conservation of biodiversity. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में IUCN के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये 2- प्रथम भाग में IUCN बहुआयामी उपागम को स्पष्ट करते हुए कार्यक्षेत्र को स्पष्ट कीजिये| 3- दूसरे भाग में रेड डाटा बुक, ग्रीन और ब्लू बुक के महत्त्व की चर्चा कीजिये| 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संस्था के रूप में निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रकृतिसंरक्षणके लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ(आईयूसीएन) तौरपरप्रकृतिऔरप्राकृतिकसंसाधनों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघहै| यहप्राकृतिक संसाधनों,प्रकृति के संरक्षण और टिकाऊ उपयोग के क्षेत्र में काम कर रहाएकअंतरराष्ट्रीयसंगठनहै। यह डेटा एकत्रण और विश्लेषण, अनुसंधान, क्षेत्र परियोजनाओं, वकालत, और शिक्षा में शामिल है। आईयूसीएन का लक्ष्य प्रकृति को बचाने के लिए वैश्विक समाज को प्रभावित, प्रोत्साहित और सहायता करना है और यह सुनिश्चित करना है कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई भी उपयोग न्यायसंगत और पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ हो| IUCN की स्थापना फाउंटेन ब्लू(फ्रांस) में वर्ष 1948 में की गयी थी| इसका मुख्यालय ग्लैंड (स्विट्ज़रलैंड)में है| यह स्वरूपतः एक अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी पर्यावरणीय संगठन है| इसमें 1200 से अधिक सरकारी/गैर सरकारी संगठन इसके साथ मिल कर कार्य करते हैं| IUCN को संयुक्त राष्ट्र महासभा को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है| IUCN प्रकृति के संरक्षण का बहुआयामी उपागम अपनाता है| IUCN का बहुआयामी कार्यक्षेत्र · जैव विविधता संरक्षण, · नवीकरणीय ऊर्जा का संवर्धन में सहयोग, · जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी अनुसंधान, · हरित अर्थव्यवस्था का विकास, · और मानव कल्याण/आजीविका सुनिश्चित करना · IUCN के अंतर्गत 6 आयोग कार्य करते हैं इनके अंतर्गत क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञ होते हैं| · इनमें शिक्षा एवं संचार आयोग, पर्यावरणीय सामाजिक-आर्थिक नीति आयोग, विश्व पर्यावरण कानून आयोग · पारितंत्र प्रबंधन आयोग, प्रजातीय उत्तरजीविता आयोग, यही आयोग रेड डाटा बुक तैयार करता है, संरक्षित क्षेत्र आयोग- यही आयोग ग्रीन बुक तैयार करता है| · उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि IUCN प्रकृति के संरक्षण के लिए बहुविध एवं व्यापक उपागम अपनाता है| रेड डाटा बुक और श्रेणियां · इसे IUCN के प्रजातीय उत्तरजीविता आयोग द्वारा तैयार किया जाता है इसके अंतर्गत अनाकलित(Not evaluated) एवं आकलित(Evaluated) दो मुख्य श्रेणियां दी जाती हैं| · आकलित(Evaluated) मेंदो श्रेणियां होती है यथा अपर्याप्त आंकड़े की श्रेणी और जानकारी युक्त श्रेणी| · जिनके बारे में जानकारी है उसमें 7 श्रेणियां हैं जो निम्नलिखित हैं · विलुप्त-E, वन में विलुप्त-EW (प्राकृतिक आवास से विलुप्त), अत्यंत संकटग्रस्त-CE (पिछले 10 वर्षों में या उनकी तीन पीढ़ियों में 90% की कमी), संकटग्रस्त-E (पिछले 10 वर्षों में 70 से 90 % की कमी), सुभेद्य-V ( 50 से 70 % की कमी) संकट के निकट-NT ( लुप्त होने के संकट का प्रारम्भ होना), और चिंतामुक्त-LC| IUCN की संकटापन्न(threatened) सूची में- अत्यंत संकटग्रस्त, संकटग्रस्त एवं सुभेद्य श्रेणी शामिल है| · इस प्रकार रेड डाटा बुक जीवों पर जोखिम के अनुरूप उनका वर्गीकरण करता है| इस तरह से जीवों के स्तरीय संरक्षण को सुनिश्चित किया जाता है| ग्रीन बुक की अवधारणा · इसमें संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क जैसे राष्ट्रीय उद्यान, धरोहर स्थल आदि को शामिल किया जाता है · यह संरक्षित क्षेत्रों के प्रमाणीकरण का कार्यक्रम है · अभी भारत का कोई भी क्षेत्र ग्रीन बुक में शामिल नहीं हो पाया है ब्लू बुक की अवधारणा · इसमें सागरीय संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क को शामिल किया जाता है · सागरीय क्षेत्र के अंतर्गत ऐसे क्षेत्र जो जैव विविधता से संपन्न हैं और इसी कारण इनका संरक्षण आवश्यक है, को ब्लू लिस्ट में शामिल किया जाता है| · यह ग्रीनबुक के अंतर्गत एक उपश्रेणी है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि IUCN प्रकृति संरक्षण के सन्दर्भ में व्यापक दृष्टिकोण को अपनाते हुए बहुविध दृष्टिकोण के साथ प्रकृति का संरक्षण सुनिश्चित करता है| इस सन्दर्भ में IUCN की रेड, ग्रीन एवं ब्लू बुक संरक्षण के स्तरों, तीव्रता और वर्गीकरण के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है|
##Question:अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) जैव विविधता संरक्षण के बहुआयामी उपागम को अपनाता है| इस सन्दर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के कार्यक्षेत्र को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही जैव विविधता के संरक्षण में रेड डाटा बुक, ग्रीन और ब्लू बुक के महत्त्व की चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) The International Union forConservation of Nature (IUCN) adopts a multi-dimensional approach to biodiversity conservation. In this context, clarify the scope of the International Union for Conservation of Nature (IUCN). Along with this, discuss the importance of the Red Data Book, Green and Blue Book in the conservation of biodiversity. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में IUCN के बारे में सामान्य जानकारियाँ दीजिये 2- प्रथम भाग में IUCN बहुआयामी उपागम को स्पष्ट करते हुए कार्यक्षेत्र को स्पष्ट कीजिये| 3- दूसरे भाग में रेड डाटा बुक, ग्रीन और ब्लू बुक के महत्त्व की चर्चा कीजिये| 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संस्था के रूप में निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रकृतिसंरक्षणके लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ(आईयूसीएन) तौरपरप्रकृतिऔरप्राकृतिकसंसाधनों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघहै| यहप्राकृतिक संसाधनों,प्रकृति के संरक्षण और टिकाऊ उपयोग के क्षेत्र में काम कर रहाएकअंतरराष्ट्रीयसंगठनहै। यह डेटा एकत्रण और विश्लेषण, अनुसंधान, क्षेत्र परियोजनाओं, वकालत, और शिक्षा में शामिल है। आईयूसीएन का लक्ष्य प्रकृति को बचाने के लिए वैश्विक समाज को प्रभावित, प्रोत्साहित और सहायता करना है और यह सुनिश्चित करना है कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई भी उपयोग न्यायसंगत और पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ हो| IUCN की स्थापना फाउंटेन ब्लू(फ्रांस) में वर्ष 1948 में की गयी थी| इसका मुख्यालय ग्लैंड (स्विट्ज़रलैंड)में है| यह स्वरूपतः एक अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी पर्यावरणीय संगठन है| इसमें 1200 से अधिक सरकारी/गैर सरकारी संगठन इसके साथ मिल कर कार्य करते हैं| IUCN को संयुक्त राष्ट्र महासभा को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है| IUCN प्रकृति के संरक्षण का बहुआयामी उपागम अपनाता है| IUCN का बहुआयामी कार्यक्षेत्र · जैव विविधता संरक्षण, · नवीकरणीय ऊर्जा का संवर्धन में सहयोग, · जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी अनुसंधान, · हरित अर्थव्यवस्था का विकास, · और मानव कल्याण/आजीविका सुनिश्चित करना · IUCN के अंतर्गत 6 आयोग कार्य करते हैं इनके अंतर्गत क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञ होते हैं| · इनमें शिक्षा एवं संचार आयोग, पर्यावरणीय सामाजिक-आर्थिक नीति आयोग, विश्व पर्यावरण कानून आयोग · पारितंत्र प्रबंधन आयोग, प्रजातीय उत्तरजीविता आयोग, यही आयोग रेड डाटा बुक तैयार करता है, संरक्षित क्षेत्र आयोग- यही आयोग ग्रीन बुक तैयार करता है| · उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि IUCN प्रकृति के संरक्षण के लिए बहुविध एवं व्यापक उपागम अपनाता है| रेड डाटा बुक और श्रेणियां · इसे IUCN के प्रजातीय उत्तरजीविता आयोग द्वारा तैयार किया जाता है इसके अंतर्गत अनाकलित(Not evaluated) एवं आकलित(Evaluated) दो मुख्य श्रेणियां दी जाती हैं| · आकलित(Evaluated) मेंदो श्रेणियां होती है यथा अपर्याप्त आंकड़े की श्रेणी और जानकारी युक्त श्रेणी| · जिनके बारे में जानकारी है उसमें 7 श्रेणियां हैं जो निम्नलिखित हैं · विलुप्त-E, वन में विलुप्त-EW (प्राकृतिक आवास से विलुप्त), अत्यंत संकटग्रस्त-CE (पिछले 10 वर्षों में या उनकी तीन पीढ़ियों में 90% की कमी), संकटग्रस्त-E (पिछले 10 वर्षों में 70 से 90 % की कमी), सुभेद्य-V ( 50 से 70 % की कमी) संकट के निकट-NT ( लुप्त होने के संकट का प्रारम्भ होना), और चिंतामुक्त-LC| IUCN की संकटापन्न(threatened) सूची में- अत्यंत संकटग्रस्त, संकटग्रस्त एवं सुभेद्य श्रेणी शामिल है| · इस प्रकार रेड डाटा बुक जीवों पर जोखिम के अनुरूप उनका वर्गीकरण करता है| इस तरह से जीवों के स्तरीय संरक्षण को सुनिश्चित किया जाता है| ग्रीन बुक की अवधारणा · इसमें संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क जैसे राष्ट्रीय उद्यान, धरोहर स्थल आदि को शामिल किया जाता है · यह संरक्षित क्षेत्रों के प्रमाणीकरण का कार्यक्रम है · अभी भारत का कोई भी क्षेत्र ग्रीन बुक में शामिल नहीं हो पाया है ब्लू बुक की अवधारणा · इसमें सागरीय संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क को शामिल किया जाता है · सागरीय क्षेत्र के अंतर्गत ऐसे क्षेत्र जो जैव विविधता से संपन्न हैं और इसी कारण इनका संरक्षण आवश्यक है, को ब्लू लिस्ट में शामिल किया जाता है| · यह ग्रीनबुक के अंतर्गत एक उपश्रेणी है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि IUCN प्रकृति संरक्षण के सन्दर्भ में व्यापक दृष्टिकोण को अपनाते हुए बहुविध दृष्टिकोण के साथ प्रकृति का संरक्षण सुनिश्चित करता है| इस सन्दर्भ में IUCN की रेड, ग्रीन एवं ब्लू बुक संरक्षण के स्तरों, तीव्रता और वर्गीकरण के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है|
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संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा से आप क्या समझते है ? इसके विविध प्रकारों को संक्षिप्त मे बताते हुए, भारत मे इसके सफल प्रयासों को भी उदाहरण सहित उल्लेखित कीजिये । ( 200 शब्द ) What do you think of the concept of protected areas? Describe its various types in brief, also mention its successful efforts in India with an example. (200 words)
एप्रोच :- संरक्षित क्षेत्रों को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये। संरक्षित क्षेत्रों के प्रकारों को लिखिये। भारत में इसके सफल उदाहरणों को शामिल कीजिये। उत्तर प्रारूप :- किसी क्षेत्र में उपलब्ध जैव विविधता के संरक्षण हेतु तथा उस समूचे पारितंत्र को यथा स्थिति में बनाये रखने के लिए उन गतिविधियों पर रोक लगाना आवश्यक है जो उस पारितंत्र में निवास करने वाले जीवों की किसी या सभी प्रजाति को हानि पहुंचा रही है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को अपनाया गया है। संरक्षित क्षेत्र के प्रकार :- इसके अंतर्गत नेशनल पार्क, अभयारण्य तथा बायोस्फीयर रिजर्व जैसे क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है। यह विलुप्त पौधों या पशुओं की प्रजातियों के प्राकृतिक पर्यावास के संरक्षण का दृष्टिकोण है। वन्यजीव अभयारण्य :- यह वे अधिसूचित क्षेत्र है जहां जीवों की प्रजाति आधारित विविधता के संरक्षण हेतु उपाय किये जाते है। भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अनुसार यदि राज्य किसी क्षेत्र को जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हो तो उसे वन्य जीव अभ्यारण्य घोषित किया जा सकता है। इसके प्रमुख उदाहरण गिर अभ्यारण्य (एशियाई शेर), विक्रमशिला अभ्यारण्य (गंगा डॉल्फिन) ,भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य (साइबेरियन सारस) आदि है। भारत में लगभग 532 वन्य जीव अभ्यारण्य हैं। नेशनल पार्क :- यह केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित ऐसे क्षेत्र होते है जहां वानस्पतिक तथा जंतु विविधता के संरक्षण की आवश्यकता होती है। यह मुख्यतः किसी प्राणी विशेष के संरक्षण हेतु स्थापित किये जाते है। जैसे बाघ , हाथी, एक श्रृंगी गैंडा आदि। यहां वन्यजीवों का शिकार प्रतिबंधित होता है तथा वन्यजीवों के अतिरिक्त अन्य जीव - जंतुओं की चराई पर निषेध होता है।जैसे कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान , जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान आदि बायोस्फीयर रिजर्व/ जैव मंडल आगार :- यह प्राकृतिक व सांस्कृतिक भू दृश्यों के घोतक होते है। तथा स्थलीय या तटीय/ समुद्री परिस्थितिकी प्रणालियों के विशाल क्षेत्र या इनके मिश्रित रूप में विस्तृत होते है। इनका प्राथमिक उद्देश्य पारितंत्रों एवं इनके आनुवंशिक पदार्थ का संरक्षण करना है। जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र में कोर, बफर एवं ट्रांजिशन क्षेत्र सम्मिलित है। यूनेस्कों के मैन एवं बायोस्फीयर(MAB) रिजर्व कार्यक्रम के अंतर्गत बायोस्फीयर रिजर्व के विश्व नेटवर्क में समायोजन की शर्तों के एक न्यूनतम समुच्चयों का पालन करते है। भारत के 18 में से 10 बायोस्फीयर रिजर्व MAB के अंतर्गत शामिल है। जैसे पचमढ़ी बायोस्फियर रिजर्व , अचानकमार- अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व आदि। भारत में इसके सफल उदाहरण :- संरक्षित क्षेत्र कार्यक्रम के माध्यम से भारत में विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण में मदद मिली है जिससे लुप्त होते प्रजातियों की संख्या में वृद्धि की गयी तथा अनुकूल वातावरण प्रदान किया गया। इसके प्रमुख उदाहरणों में एक श्रृंगी गैंडा जिसकी संख्या 1905 में 75 से बढ़कर 2012 में 2700 से ऊपर दर्ज की गयी। वहीं बाघ के मामले में जिनकी संख्या 1973 में लगभग 1200 थी जिसे संरक्षित कर 3000 से ज्यादा करने में सफल हुए है। इसमे प्रोजेक्ट टाइगर का विशेष योगदान रहा है।
##Question:संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा से आप क्या समझते है ? इसके विविध प्रकारों को संक्षिप्त मे बताते हुए, भारत मे इसके सफल प्रयासों को भी उदाहरण सहित उल्लेखित कीजिये । ( 200 शब्द ) What do you think of the concept of protected areas? Describe its various types in brief, also mention its successful efforts in India with an example. (200 words)##Answer:एप्रोच :- संरक्षित क्षेत्रों को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये। संरक्षित क्षेत्रों के प्रकारों को लिखिये। भारत में इसके सफल उदाहरणों को शामिल कीजिये। उत्तर प्रारूप :- किसी क्षेत्र में उपलब्ध जैव विविधता के संरक्षण हेतु तथा उस समूचे पारितंत्र को यथा स्थिति में बनाये रखने के लिए उन गतिविधियों पर रोक लगाना आवश्यक है जो उस पारितंत्र में निवास करने वाले जीवों की किसी या सभी प्रजाति को हानि पहुंचा रही है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को अपनाया गया है। संरक्षित क्षेत्र के प्रकार :- इसके अंतर्गत नेशनल पार्क, अभयारण्य तथा बायोस्फीयर रिजर्व जैसे क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है। यह विलुप्त पौधों या पशुओं की प्रजातियों के प्राकृतिक पर्यावास के संरक्षण का दृष्टिकोण है। वन्यजीव अभयारण्य :- यह वे अधिसूचित क्षेत्र है जहां जीवों की प्रजाति आधारित विविधता के संरक्षण हेतु उपाय किये जाते है। भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अनुसार यदि राज्य किसी क्षेत्र को जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हो तो उसे वन्य जीव अभ्यारण्य घोषित किया जा सकता है। इसके प्रमुख उदाहरण गिर अभ्यारण्य (एशियाई शेर), विक्रमशिला अभ्यारण्य (गंगा डॉल्फिन) ,भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य (साइबेरियन सारस) आदि है। भारत में लगभग 532 वन्य जीव अभ्यारण्य हैं। नेशनल पार्क :- यह केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित ऐसे क्षेत्र होते है जहां वानस्पतिक तथा जंतु विविधता के संरक्षण की आवश्यकता होती है। यह मुख्यतः किसी प्राणी विशेष के संरक्षण हेतु स्थापित किये जाते है। जैसे बाघ , हाथी, एक श्रृंगी गैंडा आदि। यहां वन्यजीवों का शिकार प्रतिबंधित होता है तथा वन्यजीवों के अतिरिक्त अन्य जीव - जंतुओं की चराई पर निषेध होता है।जैसे कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान , जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान आदि बायोस्फीयर रिजर्व/ जैव मंडल आगार :- यह प्राकृतिक व सांस्कृतिक भू दृश्यों के घोतक होते है। तथा स्थलीय या तटीय/ समुद्री परिस्थितिकी प्रणालियों के विशाल क्षेत्र या इनके मिश्रित रूप में विस्तृत होते है। इनका प्राथमिक उद्देश्य पारितंत्रों एवं इनके आनुवंशिक पदार्थ का संरक्षण करना है। जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र में कोर, बफर एवं ट्रांजिशन क्षेत्र सम्मिलित है। यूनेस्कों के मैन एवं बायोस्फीयर(MAB) रिजर्व कार्यक्रम के अंतर्गत बायोस्फीयर रिजर्व के विश्व नेटवर्क में समायोजन की शर्तों के एक न्यूनतम समुच्चयों का पालन करते है। भारत के 18 में से 10 बायोस्फीयर रिजर्व MAB के अंतर्गत शामिल है। जैसे पचमढ़ी बायोस्फियर रिजर्व , अचानकमार- अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व आदि। भारत में इसके सफल उदाहरण :- संरक्षित क्षेत्र कार्यक्रम के माध्यम से भारत में विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण में मदद मिली है जिससे लुप्त होते प्रजातियों की संख्या में वृद्धि की गयी तथा अनुकूल वातावरण प्रदान किया गया। इसके प्रमुख उदाहरणों में एक श्रृंगी गैंडा जिसकी संख्या 1905 में 75 से बढ़कर 2012 में 2700 से ऊपर दर्ज की गयी। वहीं बाघ के मामले में जिनकी संख्या 1973 में लगभग 1200 थी जिसे संरक्षित कर 3000 से ज्यादा करने में सफल हुए है। इसमे प्रोजेक्ट टाइगर का विशेष योगदान रहा है।
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State the means of maintaining free and fair elections with special emphasis on state funding of elections. (150 words/10marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Importance of ensuring free and fair elections along with Article 324 has been stated. - SOME OF THE MEANS OF MAINTAINING FREE AND FAIR ELECTIONS AS ADVOCATED BY THE ECI - STATE FUNDING OF ELECTIONS -CONCLUSION Model code of conduct mentioned additionally Answer:- Free and fair elections are necessary to ensure the smooth functioning of democracy. In order to maintain free and fair elections, several mechanisms have been kept and maintained by the Election Commission of India (ECI). Article 324 states the ECI is responsible for the superintendence, direction and control over the electoral process in India- the main aim of this provision is to ensure free and fair elections in the country. SOME OF THE MEANS OF MAINTAINING FREE AND FAIR ELECTIONS AS ADVOCATED BY THE ECI ARE 1) USE OF TOTALISER MACHINES This helps in preventing any pre-poll and post-poll harassment of voters, by combining the votes of 14 electronic voting machines (EVMs) from various constituencies together. This ensures the secret ballot. 2) STATE FUNDING OF ELECTIONS The use of money power needs to be minimized in order to ensure that the electoral process remains fair. Here, in state funding of elections (SFE), the entire elections expenditure is borne by the state in order to free the elections of corrupt practices. 3) SECTION 77 OF THE REPRESENTATION OF PEOPLES ACT, 1951 [RoPA] Every contesting candidate shall herself or through his election agent maintain a separate account of all his election expenditure and submit it to the district election officer. 4) SECTION 75A OF RoPA, 1951 It is mandatory for every elected candidate to reveal her assets and liabilities in the form and manner as suggested by the presiding officer within 90 days of him taking an oath or solemn affirmation. This information must reveal all her income, assets, details of moveable and immovable properties owned either by her or her spouse or the children. (S)he should also reveal any loans or liabilities that he has from any public bank or central government or state government etc. The failure to furnish this information or providing false/ incomplete information shall be considered the grounds for breach of privilege. STATE FUNDING OF ELECTIONS 1) DINESH GOSWAMI AND INDRAJEET GUPTA REPORT They proposed the setting up of SFE, calling it legally justified and in public interest. SFE was planned on the basis of: 1.1) 50:50 contribution by the central government and state government. 1.2) Creating an election corpus. 1.3) All political parties to compulsorily submit their audited accounts. 1.4) Funds to be utilized only by parties registered and recognized by the ECI. 1.5) Every donation to a political party above Rs. 10,000 to be made only via cheque against a receipt. 1.6) An upper limit of Rs. 70 lakh for Lok Sabha elections and Rs. 54 lakh for the North East/ hilly areas and Rs. 28 lakh for the State Legislative Assembly elections and Rs. 20 lakh for the North East/ hilly areas has been recommended. Apart from these measures, the Model Code of Conduct which is generally imposed one month before the elections are to take place, also ensures that elections are conducted in a free and fair atmosphere. The model code of conduct is a set of guidelines, which have been decided by consensus to regulate political parties during elections in India.
##Question:State the means of maintaining free and fair elections with special emphasis on state funding of elections. (150 words/10marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Importance of ensuring free and fair elections along with Article 324 has been stated. - SOME OF THE MEANS OF MAINTAINING FREE AND FAIR ELECTIONS AS ADVOCATED BY THE ECI - STATE FUNDING OF ELECTIONS -CONCLUSION Model code of conduct mentioned additionally Answer:- Free and fair elections are necessary to ensure the smooth functioning of democracy. In order to maintain free and fair elections, several mechanisms have been kept and maintained by the Election Commission of India (ECI). Article 324 states the ECI is responsible for the superintendence, direction and control over the electoral process in India- the main aim of this provision is to ensure free and fair elections in the country. SOME OF THE MEANS OF MAINTAINING FREE AND FAIR ELECTIONS AS ADVOCATED BY THE ECI ARE 1) USE OF TOTALISER MACHINES This helps in preventing any pre-poll and post-poll harassment of voters, by combining the votes of 14 electronic voting machines (EVMs) from various constituencies together. This ensures the secret ballot. 2) STATE FUNDING OF ELECTIONS The use of money power needs to be minimized in order to ensure that the electoral process remains fair. Here, in state funding of elections (SFE), the entire elections expenditure is borne by the state in order to free the elections of corrupt practices. 3) SECTION 77 OF THE REPRESENTATION OF PEOPLES ACT, 1951 [RoPA] Every contesting candidate shall herself or through his election agent maintain a separate account of all his election expenditure and submit it to the district election officer. 4) SECTION 75A OF RoPA, 1951 It is mandatory for every elected candidate to reveal her assets and liabilities in the form and manner as suggested by the presiding officer within 90 days of him taking an oath or solemn affirmation. This information must reveal all her income, assets, details of moveable and immovable properties owned either by her or her spouse or the children. (S)he should also reveal any loans or liabilities that he has from any public bank or central government or state government etc. The failure to furnish this information or providing false/ incomplete information shall be considered the grounds for breach of privilege. STATE FUNDING OF ELECTIONS 1) DINESH GOSWAMI AND INDRAJEET GUPTA REPORT They proposed the setting up of SFE, calling it legally justified and in public interest. SFE was planned on the basis of: 1.1) 50:50 contribution by the central government and state government. 1.2) Creating an election corpus. 1.3) All political parties to compulsorily submit their audited accounts. 1.4) Funds to be utilized only by parties registered and recognized by the ECI. 1.5) Every donation to a political party above Rs. 10,000 to be made only via cheque against a receipt. 1.6) An upper limit of Rs. 70 lakh for Lok Sabha elections and Rs. 54 lakh for the North East/ hilly areas and Rs. 28 lakh for the State Legislative Assembly elections and Rs. 20 lakh for the North East/ hilly areas has been recommended. Apart from these measures, the Model Code of Conduct which is generally imposed one month before the elections are to take place, also ensures that elections are conducted in a free and fair atmosphere. The model code of conduct is a set of guidelines, which have been decided by consensus to regulate political parties during elections in India.
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मानव एवं प्रकृति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में आर्द्रभूमियों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। इसके साथ ही नम भूमियों के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध करते हुए इनके संरक्षण में रामसर संधि का महत्त्व स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of wetlands in ensuring survival of human and nature. Along with this, listing the causes of depletion of wetlands, clarify the significance of Ramsar Treaty in their preservation. (150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्द्र भूमि को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मानव एवं प्रकृति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में आर्द्र भूमियों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में नम भूमियों के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये 4- तीसरे भाग में नम भूमियों के संरक्षण में रामसर संधि का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में महत्वपूर्ण योगदान का संदर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| आर्द्र भूमि या नम भूमि, जल भराव/जमाव वाले क्षेत्र हैं अथवा जल संतृप्त भूमि को आर्द्र भूमि कहते हैं| यहाँ जल की स्थायी अथवा अस्थायी उपस्थिति बनी रहती है| आर्द्र भूमियों में हाइड्रिक मृदा पायी जाती है इसकी उपरी परत में अत्यधिक आर्द्रता होती है जिसके कारण यहाँ अनाक्सीकृत दशा होती है| नम भूमि में जलीय वनस्पति/पौधे पाए जाते हैं| नम भूमियाँ जैव विविधता समृद्ध जलीय पारितंत्र की प्रतिनिधि होती हैं यहाँ पक्षी, उभयचर, सरीसृप एवं डॉलफिन जैसे स्तनधारी पाए जाते हैं| आर्द्र भूमियों का तीन प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है यथा; प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित नम भूमियाँ, तटवर्ती अथवा आन्तरिक/अंदरूनी नम भूमियाँ और मीठे जल की अथवा लवणीय/खारे जल की नम भूमियाँ| झील, दलदली मैदान, नदीय बाढ़ का मैदान आदि प्राकृतिक अंदरूनी मीठे जल की नम भूमियों के उदाहरण हैं जबकि सांभर झील जैसी लवणीय झीलें प्राकृतिक अंदरूनी खारे जल की नम भूमियों का प्रतिनिधित्व करती हैं| लैगून, मैन्ग्रोव प्राकृतिक तटीय खारे जल की नम भूमियां हैं| मानव निर्मित/कृत्रिम अंदरूनी नम भूमियों में धान का खेत, जल कृषि तालाब, जलाशय आदि आते हैं, नमक उत्पादन के लिए निर्मित साल्ट पैन आदि मानव निर्मित/कृत्रिम तटीय नम भूमियों के उदाहरण हैं| आर्द्रभूमियां पारितंत्रीय एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं अतः ये मानव एवं प्रकृति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं| आर्द्र भूमियों का पारितंत्रीय एवं आर्थिक महत्त्व आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं, आर्द्र भूमि जल चक्र को बनाए रखने का काम करती हैं, आर्द्र भूमि पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायक होती हैं, नम भूमियों में पाए जाने वाले तत्व एवं वनस्पतियाँ अवशिष्टों के निपटान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, ये जैव विविधता से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र होते हैं तथा कुछ प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल होते हैं, नम भूमियाँ; बाढ़, तूफ़ान, चक्रवात एवं सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा जैसे मैन्ग्रोव द्वारा सुनामी/चक्रवात से सुरक्षा आदि आर्द्र भूमियों के अनेक आर्थिक महत्त्व भी होते हैं जैसे ये कृषि सिंचाई में सहायक होती हैं, इसी प्रकार इनका उपयोग करके मत्स्य पालन किया जा सकता है, आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं इसके अतिरिक्त ये जल चक्र को बनाए रखने में सहायक होती हैं अतः आर्द्र भूमियों से पेय जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है नम भूमियों से मछली, झींगा आदि खाद्य विकल्पों की आपूर्ति होती है साथ ही कुछ आर्थिक महत्त्व के पौधों की आपूर्ति भी की जाती है, आर्द्र भूमियाँ पारिस्थितिकी पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होती है इसके अतिरिक्त इनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व भी होता है| इतने व्यापक महत्त्व के बाद भी वर्तमान में आर्द्र भूमियाँ ह्रासमान हैं| आर्द्र भूमियों के ह्रास के अनेक उत्तरदायी कारण हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से देख सकते हैं नमभूमियों के ह्रास के कारण नम भूमि क्षेत्र में मानवीय अतिक्रमण यथा; नगरीकरण, क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र के रूप में बदलना उस क्षेत्र में आवासीय बस्तियों की स्थापना से नम भूमियों के अस्तित्व पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है, बढ़ते जल प्रदूषण के कारण नम भूमियों में नाइट्रेट एवं फास्फेट की अतिरिक्त आपूर्ति हो रही है जिसके कारण नम भूमियों में होने वाले सुपोषण से शैवाल प्रस्फुटन होता है जिससे वहां का BOD बढ़ जाता है इससे जलीय जीवों की मौत होने लगती है और डेडजोन का निर्माण होता है| बाह्य कारकों एवं नदियों के द्वारा गाद अथवा अवसाद का जमा होना नम भूमियों के ह्रास का एक प्रमुख कारण है| विदेशी आक्रामक प्रजातियों का आगमन जैसे जलकुम्भी द्वारा जल की सतह पर फ़ैल जाने से ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी आना, जलवायु परिवर्तन; तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्र स्तर के बढने के कारण, तापमान बढ़ने से होने वाले अधिक वाष्पन से जल की मात्रा का कम होना, बाढ़-सूखा आदि नम भूमियों के ह्रास के प्रमुख कारण हैं| आर्द्र भूमियों के बढ़ते ह्रास को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनके प्रयास किये गए हैं| इनमे रामसर संधि सर्वप्रमुख है| रामसर संधि एवं इसके उद्देश्य ईरान के रामसर शहर में 2 फरवरी 1971 को आयोजित सम्मलेन के दौरान इस संधि को प्रस्तावित किया गया, यह एक अंतरसरकारी संधि है| यह एक बाध्यकारी संधि है| वर्तमान में इसके 189 पक्षकार राष्ट्र हैं| नम भूमियों का सतत एवं विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना, रामसर स्थल(अन्तर्रष्ट्रीय महत्त्व की नम भूमियाँ) का पक्षकार राष्ट्रों द्वारा अधिसूचित करना और एक से अधिक राष्ट्रों से सम्बन्धित अंतर्देशीय नम भूमियों का संरक्षण एवं प्रबंधन रामसर संधि के प्रमुख उद्देश्य हैं, आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए रामसर संधि में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड के माध्यम से प्रयास किये जाते हैं मोंट्रेक्स रिकॉर्ड यह संकटग्रस्त रामसर स्थलों की सूची है, मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में ऐसी नम भूमियाँ जिसमें मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पारिस्थितिकीय परिवर्तन हो चुका हो अथवा हो रहा है या फिर होने की आशंका है को शामिल किया जाता है, यदि किसी रामसर स्थल को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल किया जाता है तो उसके अध्ययन के लिए एक रामसर एडवाइजरी मिशन (विशेषज्ञ समूह) गठन किया जाता है, संकटग्रस्त रामसर स्थल(मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल) के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाता है, इस व्यवस्था के माध्यम से रामसर संधि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नमभूमियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| वर्तमान में भारत के राजस्थान में केवलादेव एवं मणिपुर की लोकटक झील को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड को रखा गया| पूर्व में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में उड़ीसा की चिल्का झील भी शामिल थी जिसमे सुधार होने पर उसे सूची से हटा दिया गया है| इसी प्रकार विश्व के अनेक भागों में नम भूमियों के संरक्षण एवं उनके अन्तराष्ट्रीय प्रबंधन में रामसर संधि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है|
##Question:मानव एवं प्रकृति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में आर्द्रभूमियों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। इसके साथ ही नम भूमियों के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध करते हुए इनके संरक्षण में रामसर संधि का महत्त्व स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of wetlands in ensuring survival of human and nature. Along with this, listing the causes of depletion of wetlands, clarify the significance of Ramsar Treaty in their preservation. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आर्द्र भूमि को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मानव एवं प्रकृति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में आर्द्र भूमियों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में नम भूमियों के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये 4- तीसरे भाग में नम भूमियों के संरक्षण में रामसर संधि का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में महत्वपूर्ण योगदान का संदर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| आर्द्र भूमि या नम भूमि, जल भराव/जमाव वाले क्षेत्र हैं अथवा जल संतृप्त भूमि को आर्द्र भूमि कहते हैं| यहाँ जल की स्थायी अथवा अस्थायी उपस्थिति बनी रहती है| आर्द्र भूमियों में हाइड्रिक मृदा पायी जाती है इसकी उपरी परत में अत्यधिक आर्द्रता होती है जिसके कारण यहाँ अनाक्सीकृत दशा होती है| नम भूमि में जलीय वनस्पति/पौधे पाए जाते हैं| नम भूमियाँ जैव विविधता समृद्ध जलीय पारितंत्र की प्रतिनिधि होती हैं यहाँ पक्षी, उभयचर, सरीसृप एवं डॉलफिन जैसे स्तनधारी पाए जाते हैं| आर्द्र भूमियों का तीन प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है यथा; प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित नम भूमियाँ, तटवर्ती अथवा आन्तरिक/अंदरूनी नम भूमियाँ और मीठे जल की अथवा लवणीय/खारे जल की नम भूमियाँ| झील, दलदली मैदान, नदीय बाढ़ का मैदान आदि प्राकृतिक अंदरूनी मीठे जल की नम भूमियों के उदाहरण हैं जबकि सांभर झील जैसी लवणीय झीलें प्राकृतिक अंदरूनी खारे जल की नम भूमियों का प्रतिनिधित्व करती हैं| लैगून, मैन्ग्रोव प्राकृतिक तटीय खारे जल की नम भूमियां हैं| मानव निर्मित/कृत्रिम अंदरूनी नम भूमियों में धान का खेत, जल कृषि तालाब, जलाशय आदि आते हैं, नमक उत्पादन के लिए निर्मित साल्ट पैन आदि मानव निर्मित/कृत्रिम तटीय नम भूमियों के उदाहरण हैं| आर्द्रभूमियां पारितंत्रीय एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं अतः ये मानव एवं प्रकृति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं| आर्द्र भूमियों का पारितंत्रीय एवं आर्थिक महत्त्व आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं, आर्द्र भूमि जल चक्र को बनाए रखने का काम करती हैं, आर्द्र भूमि पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायक होती हैं, नम भूमियों में पाए जाने वाले तत्व एवं वनस्पतियाँ अवशिष्टों के निपटान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, ये जैव विविधता से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र होते हैं तथा कुछ प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल होते हैं, नम भूमियाँ; बाढ़, तूफ़ान, चक्रवात एवं सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा जैसे मैन्ग्रोव द्वारा सुनामी/चक्रवात से सुरक्षा आदि आर्द्र भूमियों के अनेक आर्थिक महत्त्व भी होते हैं जैसे ये कृषि सिंचाई में सहायक होती हैं, इसी प्रकार इनका उपयोग करके मत्स्य पालन किया जा सकता है, आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं इसके अतिरिक्त ये जल चक्र को बनाए रखने में सहायक होती हैं अतः आर्द्र भूमियों से पेय जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है नम भूमियों से मछली, झींगा आदि खाद्य विकल्पों की आपूर्ति होती है साथ ही कुछ आर्थिक महत्त्व के पौधों की आपूर्ति भी की जाती है, आर्द्र भूमियाँ पारिस्थितिकी पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होती है इसके अतिरिक्त इनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व भी होता है| इतने व्यापक महत्त्व के बाद भी वर्तमान में आर्द्र भूमियाँ ह्रासमान हैं| आर्द्र भूमियों के ह्रास के अनेक उत्तरदायी कारण हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से देख सकते हैं नमभूमियों के ह्रास के कारण नम भूमि क्षेत्र में मानवीय अतिक्रमण यथा; नगरीकरण, क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र के रूप में बदलना उस क्षेत्र में आवासीय बस्तियों की स्थापना से नम भूमियों के अस्तित्व पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है, बढ़ते जल प्रदूषण के कारण नम भूमियों में नाइट्रेट एवं फास्फेट की अतिरिक्त आपूर्ति हो रही है जिसके कारण नम भूमियों में होने वाले सुपोषण से शैवाल प्रस्फुटन होता है जिससे वहां का BOD बढ़ जाता है इससे जलीय जीवों की मौत होने लगती है और डेडजोन का निर्माण होता है| बाह्य कारकों एवं नदियों के द्वारा गाद अथवा अवसाद का जमा होना नम भूमियों के ह्रास का एक प्रमुख कारण है| विदेशी आक्रामक प्रजातियों का आगमन जैसे जलकुम्भी द्वारा जल की सतह पर फ़ैल जाने से ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी आना, जलवायु परिवर्तन; तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्र स्तर के बढने के कारण, तापमान बढ़ने से होने वाले अधिक वाष्पन से जल की मात्रा का कम होना, बाढ़-सूखा आदि नम भूमियों के ह्रास के प्रमुख कारण हैं| आर्द्र भूमियों के बढ़ते ह्रास को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनके प्रयास किये गए हैं| इनमे रामसर संधि सर्वप्रमुख है| रामसर संधि एवं इसके उद्देश्य ईरान के रामसर शहर में 2 फरवरी 1971 को आयोजित सम्मलेन के दौरान इस संधि को प्रस्तावित किया गया, यह एक अंतरसरकारी संधि है| यह एक बाध्यकारी संधि है| वर्तमान में इसके 189 पक्षकार राष्ट्र हैं| नम भूमियों का सतत एवं विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना, रामसर स्थल(अन्तर्रष्ट्रीय महत्त्व की नम भूमियाँ) का पक्षकार राष्ट्रों द्वारा अधिसूचित करना और एक से अधिक राष्ट्रों से सम्बन्धित अंतर्देशीय नम भूमियों का संरक्षण एवं प्रबंधन रामसर संधि के प्रमुख उद्देश्य हैं, आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए रामसर संधि में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड के माध्यम से प्रयास किये जाते हैं मोंट्रेक्स रिकॉर्ड यह संकटग्रस्त रामसर स्थलों की सूची है, मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में ऐसी नम भूमियाँ जिसमें मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पारिस्थितिकीय परिवर्तन हो चुका हो अथवा हो रहा है या फिर होने की आशंका है को शामिल किया जाता है, यदि किसी रामसर स्थल को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल किया जाता है तो उसके अध्ययन के लिए एक रामसर एडवाइजरी मिशन (विशेषज्ञ समूह) गठन किया जाता है, संकटग्रस्त रामसर स्थल(मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल) के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाता है, इस व्यवस्था के माध्यम से रामसर संधि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नमभूमियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| वर्तमान में भारत के राजस्थान में केवलादेव एवं मणिपुर की लोकटक झील को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड को रखा गया| पूर्व में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में उड़ीसा की चिल्का झील भी शामिल थी जिसमे सुधार होने पर उसे सूची से हटा दिया गया है| इसी प्रकार विश्व के अनेक भागों में नम भूमियों के संरक्षण एवं उनके अन्तराष्ट्रीय प्रबंधन में रामसर संधि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है|
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शिशु लिंगानुपात (0-6) को परिभाषित कीजिये | भारत सरकार के अनेक प्रयासों के बावजूद इसमें गिरावट के प्रमुख कारणों को बताइए | साथ ही इसमें सुधार लाने हेतु उपाय भी सुझाइए | (200 शब्द) Define the child sex ratio(0-6). Explain the main reasons for decline in child sex ratio in spite of the efforts of the Indian Government. Along with this, suggest the ways to improve it.
दृष्टिकोण- शिशु लिंगानुपात की परिभाषा देते हुए भूमिका की शुरुआत करना है | इसके बाद शिशु लिंगानुपात घटने के संभावित कारणों की चर्चा करनी है | तदोपरांत शिशु लिंगानुपात कम होने के प्रभाव या परिणाम की भी चर्चा करनी है | अंत में इसमें सुधार लाने तेतु उपायों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन करना है | उत्तर - शिशु लिंगानुपात से तात्पर्य किसी विशेष क्षेत्र में लड़कों एवं लड़कियों (0-6वर्ष) की संख्या में अनुपात से है | किसी भौगोलिक क्षेत्र में प्रति हजार लडको के अनुपात में लड़कियों की संख्या को इसका मानक माना जाता है | शिशु लिंगानुपात में बहुत तेजी से गिरावट हुई है जो कि अत्यंत ही चिंताजनक स्थिति है | 2011 की जनगणना के अनुसार , शिशु लिंगानुपात जो कि, 2001 में 927 था , घटकर 919 पर आ गया है | शिशु लिंगानुपात घटने के संभावित कारण - शिशु लिंग पहचान में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक चिकित्सा उपकरण और चयनात्मक तरीके से कन्या भ्रूण का गर्भपात | बेटे की चाहत तथा उसे प्राथमिकता देना | लिंग विशिष्ट गर्भपात एवं कन्या भ्रूण हत्या | निम्नतम शिशु लिंगानुपात भारत के समृद्ध राज्यों में पाया जाता है | इसलिए चयनात्मक गर्भपात की समस्या गरीबी या अज्ञानता अथवा संसाधनों की कमी के कारण नहीं है | ऐसा प्रतीत होता है कि आर्थिक रूप से समृद्ध परिवारों में कम बच्चे पैदा करने की चाह होती है और संभव है कि वे अपने बच्चों के लिंग का चयन करने की इच्छा भी रखते हों | इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत कारण हैं | प्रभाव या परिणाम - शिशु लिंगानुपात कम होने से समाज के सामाजिक , सांस्कृतिक और आर्थिक मानदंड में बदलाव आ सकता है | जैसे - अंतर्जातीय विवाह का प्रचलन बढ़ सकता है | अपराध दर में वृद्धि हो सकती है क्योंकि अध्ययन बताते हैं कि हिंसक अपराध के दोषियों में युवा एवं अविवाहित पुरुषों का प्रतिशत ज्यादा है | एक ऐसा समय आ सकता है जब अधिकांश पुरुष अविवाहित रह जायेंगे | इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम हो सकते हैं | यह शादी विवाह के मामले में महिलाओं की सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ा सकता है , और इससे महिलाओं के पक्ष में संसाधनों और पारिवारिक संरचना में परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं | सुधार लाने हेतु उपाय - लोगों के सोंच में बदलाव की अधिक आवश्यकता है | शिक्षित वर्ग को इसके लिए आगे आना होगा | कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा को हतोत्साहित करने के लिए सरकार एक कन्या शिशु के जन्म के बाद माताओं हेतु प्रथम 6 वर्षों के लिए ममता भत्ता प्रदान करने पर विचार कर सकती है | सरकार को विधवा पुनर्विवाह को लोकप्रिय बनाना चाहिए और साथ ही मॉस मीडिया तथा सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं की भागीदारी के माध्यम से दहेज़ के अभिशाप को ख़त्म करना चाहिए | एक सामान पुत्री वाले युगल (माता-पिता) सामान्य सार्वभौमिक वृद्धावस्था पेंशन की तुलना में अधिक राशि प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकते हैं | इस प्रकार इन उपायों को अपनाकर हम आगे बढ़ सकते है तथा शिशु लिंगानुपात को बढ़ाते हुए समता मूलक समाज की स्थापना कर सकते हैं |
##Question:शिशु लिंगानुपात (0-6) को परिभाषित कीजिये | भारत सरकार के अनेक प्रयासों के बावजूद इसमें गिरावट के प्रमुख कारणों को बताइए | साथ ही इसमें सुधार लाने हेतु उपाय भी सुझाइए | (200 शब्द) Define the child sex ratio(0-6). Explain the main reasons for decline in child sex ratio in spite of the efforts of the Indian Government. Along with this, suggest the ways to improve it.##Answer:दृष्टिकोण- शिशु लिंगानुपात की परिभाषा देते हुए भूमिका की शुरुआत करना है | इसके बाद शिशु लिंगानुपात घटने के संभावित कारणों की चर्चा करनी है | तदोपरांत शिशु लिंगानुपात कम होने के प्रभाव या परिणाम की भी चर्चा करनी है | अंत में इसमें सुधार लाने तेतु उपायों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन करना है | उत्तर - शिशु लिंगानुपात से तात्पर्य किसी विशेष क्षेत्र में लड़कों एवं लड़कियों (0-6वर्ष) की संख्या में अनुपात से है | किसी भौगोलिक क्षेत्र में प्रति हजार लडको के अनुपात में लड़कियों की संख्या को इसका मानक माना जाता है | शिशु लिंगानुपात में बहुत तेजी से गिरावट हुई है जो कि अत्यंत ही चिंताजनक स्थिति है | 2011 की जनगणना के अनुसार , शिशु लिंगानुपात जो कि, 2001 में 927 था , घटकर 919 पर आ गया है | शिशु लिंगानुपात घटने के संभावित कारण - शिशु लिंग पहचान में प्रयुक्त होने वाले आधुनिक चिकित्सा उपकरण और चयनात्मक तरीके से कन्या भ्रूण का गर्भपात | बेटे की चाहत तथा उसे प्राथमिकता देना | लिंग विशिष्ट गर्भपात एवं कन्या भ्रूण हत्या | निम्नतम शिशु लिंगानुपात भारत के समृद्ध राज्यों में पाया जाता है | इसलिए चयनात्मक गर्भपात की समस्या गरीबी या अज्ञानता अथवा संसाधनों की कमी के कारण नहीं है | ऐसा प्रतीत होता है कि आर्थिक रूप से समृद्ध परिवारों में कम बच्चे पैदा करने की चाह होती है और संभव है कि वे अपने बच्चों के लिंग का चयन करने की इच्छा भी रखते हों | इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत कारण हैं | प्रभाव या परिणाम - शिशु लिंगानुपात कम होने से समाज के सामाजिक , सांस्कृतिक और आर्थिक मानदंड में बदलाव आ सकता है | जैसे - अंतर्जातीय विवाह का प्रचलन बढ़ सकता है | अपराध दर में वृद्धि हो सकती है क्योंकि अध्ययन बताते हैं कि हिंसक अपराध के दोषियों में युवा एवं अविवाहित पुरुषों का प्रतिशत ज्यादा है | एक ऐसा समय आ सकता है जब अधिकांश पुरुष अविवाहित रह जायेंगे | इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम हो सकते हैं | यह शादी विवाह के मामले में महिलाओं की सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ा सकता है , और इससे महिलाओं के पक्ष में संसाधनों और पारिवारिक संरचना में परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं | सुधार लाने हेतु उपाय - लोगों के सोंच में बदलाव की अधिक आवश्यकता है | शिक्षित वर्ग को इसके लिए आगे आना होगा | कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा को हतोत्साहित करने के लिए सरकार एक कन्या शिशु के जन्म के बाद माताओं हेतु प्रथम 6 वर्षों के लिए ममता भत्ता प्रदान करने पर विचार कर सकती है | सरकार को विधवा पुनर्विवाह को लोकप्रिय बनाना चाहिए और साथ ही मॉस मीडिया तथा सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं की भागीदारी के माध्यम से दहेज़ के अभिशाप को ख़त्म करना चाहिए | एक सामान पुत्री वाले युगल (माता-पिता) सामान्य सार्वभौमिक वृद्धावस्था पेंशन की तुलना में अधिक राशि प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकते हैं | इस प्रकार इन उपायों को अपनाकर हम आगे बढ़ सकते है तथा शिशु लिंगानुपात को बढ़ाते हुए समता मूलक समाज की स्थापना कर सकते हैं |
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Define the concept of gender budgeting. Also, discuss what role it can play in women empowerment and highlight the problems associated? (150 words/10 marks)
Approach – ­ 1. Define gender budgeting. 2. Discuss the role of gender budgeting 3. Highlight the problems associated with gender budgeting 4. Conclusion Answer – Gender Budgeting is concerned with the gender-sensitive formulation of legislation, policies, plans, programmes and schemes; allocation and collection of resources; implementation and execution; monitoring, review, audit and impact assessment. Clearly then, it is not only about the Budget and it is not just a one-time activity. It is a continuous process that must be applied to all levels and stages of the policy process. However, it recognises that a Budget is a powerful tool that can reduce the vulnerability of women and girls and transform their situation. The Economic Survey 2017-18 reports that India’s performance has improved on 14 of 17 indicators of women’s agency, attitudes, and outcomes, over the past 10-15 years. However, women continue to lag behind men in terms of key indicators such as education, economic opportunities, and health, and a large proportion faces violence, discrimination and harassment, Gender budgeting can be crucial in this regard. 1. Most governments have expressed a commitment to gender equality objectives and to gender mainstreaming, but often there is a gap between policy statements and the ways in which governments raise and spend money. Gender-responsive budget initiatives can help to close these gaps, ensuring that public money is raised and spent more effectively. 2. There is a wide gap existing between the goals enunciated in the Constitution, legislation, policies, plans, programmes, and related mechanisms on the one hand and the situational reality of women and girls, on the other. Gender budgeting can fill this gap. 3. Gender Budgeting can act as a tool to monitor the achievement of the goals of the National Policy for Empowerment of Women 2001 and other policy goals in a gender-aware manner. 4. Valuing Unpaid Work – The traditional concept of an economy does not take unpaid work like child care, household work like cooking, cleaning, fetching water, caring for the elderly and voluntary work for civil society into account. It is to be noted that the work of the unpaid sector plus the work of the monetary economic sector result in the total economic output of a society. Therefore Gender budgeting can act as a method of supporting the women who contribute to the nation through unpaid work. Still having immense potential there are many problems faced by Gender budgeting in Indian scenario- 1. The share of women-specific programmes constitute a fraction of the total fund allotted to the DWCD, over-riding priority given to the programmes of child development and the resultant intra-budgetary imbalances that exist today within the budget of the nodal Department of Women and Child Development and suggests to rectify the same through a much more balanced distribution of resources. 2. Allocation of funds for schemes for women empowerment is not enough in itself, as often, actual expenditure falls far short of allocated funds. 3. One weakness of the gender budgeting is that it treats women as one homogenous group but, in reality, we know that there are layers and layers of discrimination even within women, thus a Dalit woman will be doubly discriminated and a differently-abled Dalit woman will be even more vulnerable. Thus policies need to factor in this intersectionality-framework while addressing issues of women. 4. Most of the Central Ministries/Departments have not been collecting and reporting the gender-disaggregated information on their programmes/schemes which is essential for undertaking Gender Budget analysis. 5. Gender Budgeting exercise is based on numerous assumptions relating to the proportion of allocations under a scheme that directly benefits women. On one hand, some of these assumptions are clearly wrong, for instance, putting 100 % allocations for ‘All India Institute of Medical Sciences’ and ‘Safdarjung Hospital’ under Ministry of Health & Family Welfare in the Gender Budget 6. Some of the assumptions are also patriarchal, for instance, the assumption that anything that has to do with children, anything that has to do with contraception and family planning is for the exclusive benefit of women. Unless such assumptions are rectified, the relevance of Gender Budgeting attempted by the Government will be diluted. Gender Budgeting cannot be seen in isolation from the overall economic-political scenario. Identifying and listing resource allocations for women is only a part of the whole approach of Gender Budgeting. The crux of the issue is gender is a cross-cutting issue, Gender Budgeting should not be confined to ‘social’ sectors such as education, health and welfare.
##Question:Define the concept of gender budgeting. Also, discuss what role it can play in women empowerment and highlight the problems associated? (150 words/10 marks)##Answer:Approach – ­ 1. Define gender budgeting. 2. Discuss the role of gender budgeting 3. Highlight the problems associated with gender budgeting 4. Conclusion Answer – Gender Budgeting is concerned with the gender-sensitive formulation of legislation, policies, plans, programmes and schemes; allocation and collection of resources; implementation and execution; monitoring, review, audit and impact assessment. Clearly then, it is not only about the Budget and it is not just a one-time activity. It is a continuous process that must be applied to all levels and stages of the policy process. However, it recognises that a Budget is a powerful tool that can reduce the vulnerability of women and girls and transform their situation. The Economic Survey 2017-18 reports that India’s performance has improved on 14 of 17 indicators of women’s agency, attitudes, and outcomes, over the past 10-15 years. However, women continue to lag behind men in terms of key indicators such as education, economic opportunities, and health, and a large proportion faces violence, discrimination and harassment, Gender budgeting can be crucial in this regard. 1. Most governments have expressed a commitment to gender equality objectives and to gender mainstreaming, but often there is a gap between policy statements and the ways in which governments raise and spend money. Gender-responsive budget initiatives can help to close these gaps, ensuring that public money is raised and spent more effectively. 2. There is a wide gap existing between the goals enunciated in the Constitution, legislation, policies, plans, programmes, and related mechanisms on the one hand and the situational reality of women and girls, on the other. Gender budgeting can fill this gap. 3. Gender Budgeting can act as a tool to monitor the achievement of the goals of the National Policy for Empowerment of Women 2001 and other policy goals in a gender-aware manner. 4. Valuing Unpaid Work – The traditional concept of an economy does not take unpaid work like child care, household work like cooking, cleaning, fetching water, caring for the elderly and voluntary work for civil society into account. It is to be noted that the work of the unpaid sector plus the work of the monetary economic sector result in the total economic output of a society. Therefore Gender budgeting can act as a method of supporting the women who contribute to the nation through unpaid work. Still having immense potential there are many problems faced by Gender budgeting in Indian scenario- 1. The share of women-specific programmes constitute a fraction of the total fund allotted to the DWCD, over-riding priority given to the programmes of child development and the resultant intra-budgetary imbalances that exist today within the budget of the nodal Department of Women and Child Development and suggests to rectify the same through a much more balanced distribution of resources. 2. Allocation of funds for schemes for women empowerment is not enough in itself, as often, actual expenditure falls far short of allocated funds. 3. One weakness of the gender budgeting is that it treats women as one homogenous group but, in reality, we know that there are layers and layers of discrimination even within women, thus a Dalit woman will be doubly discriminated and a differently-abled Dalit woman will be even more vulnerable. Thus policies need to factor in this intersectionality-framework while addressing issues of women. 4. Most of the Central Ministries/Departments have not been collecting and reporting the gender-disaggregated information on their programmes/schemes which is essential for undertaking Gender Budget analysis. 5. Gender Budgeting exercise is based on numerous assumptions relating to the proportion of allocations under a scheme that directly benefits women. On one hand, some of these assumptions are clearly wrong, for instance, putting 100 % allocations for ‘All India Institute of Medical Sciences’ and ‘Safdarjung Hospital’ under Ministry of Health & Family Welfare in the Gender Budget 6. Some of the assumptions are also patriarchal, for instance, the assumption that anything that has to do with children, anything that has to do with contraception and family planning is for the exclusive benefit of women. Unless such assumptions are rectified, the relevance of Gender Budgeting attempted by the Government will be diluted. Gender Budgeting cannot be seen in isolation from the overall economic-political scenario. Identifying and listing resource allocations for women is only a part of the whole approach of Gender Budgeting. The crux of the issue is gender is a cross-cutting issue, Gender Budgeting should not be confined to ‘social’ sectors such as education, health and welfare.
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सतत विकास लक्ष्य(SDGs) क्या हैं? भारत में सतत विकास लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या प्रयास किया जा रहा है? उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What are Sustainable Development Goals (SDGs)? What efforts are being made to fulfill the sustainable development goals in India? Illustrate with examples. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- पहले भाग में सतत विकास लक्ष्य की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए लक्ष्यों एवं उसके उद्देश्यों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताईये| दूसरे भाग में, भारत में इन लक्ष्यों को पूरा करने हेतु किये जा रहे प्रयासों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- सतत विकास एक ऐसा विकास है जो आने वाली पीढ़ियों के हितों से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है|सतत विकास की संकल्पना पर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोग के द्वारा दी गयी थी| 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में सतत विकास की प्राप्ति हेतु एजेंडा 21 नामक कार्ययोजना अपनाई गई थी| उसके बाद रियो+10(जोहांसबर्ग सम्मेलन)- 2002 में सहस्राब्दी विकास लक्ष्य(एमडीजी) को लागू करने का लक्ष्य रखा गया| सतत विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन(रियो+20) 7 क्षेत्रों को चिन्हित किया गया था जिनपर प्राथमिकता देकर सतत विकास की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है| इस दस्तावेज में सतत विकास लक्ष्यों(एसडीजी) को विकसित करने हेतु समर्थन प्रदान किया गया था| सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों(जो कि 2015 में समाप्त हो गया था) के स्थान पर आगे का विकास एजेंडा अंगीकृत करने के लिए 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सहस्राब्दी सतत विकास लक्ष्य 2030 को अंगीकृत किया| इसका उद्देश्य 2015 से 2030 तक गरीबी और भुखमरी को समाप्त करके तथा लैंगिक समानता सुनिश्चित करके समावेशी विकास को बढ़ावा देना है| इसमें अगले 15 साल के लिए(2015-2030) 17 लक्ष्य तथा 169 प्रयोजन तय किए गए| सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने हेतु भारत द्वारा किए गए प्रयास भारत ने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के दिशा में जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय(UNFCCC) तथा जैव विविधता संबंधी अभिसमय(सीबीडी) पर हस्ताक्षर किया है| राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के द्वारा स्वच्छ पर्यावरण तथा पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन; पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने हेतु राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010 के माध्यम से एनजीटी का गठन; भारत में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं| जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत 8 उप मिशन के द्वारा बहुआयामी एवंव्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है| राष्ट्रीय सौर मिशन- 2022 तक 100 गीगावॉट नवीकरणीय सौर ऊर्जा उत्पादन;अल्ट्रा मेगा सौर ऊर्जा परियोजनाएं;ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर;अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन आदि| राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा दक्षता मिशन- 2022 तक 10000 मेगावाट ऊर्जा बचत का लक्ष्य; राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन - नगरीय परिवहन,ऊर्जा दक्षता,ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि पर ध्यान;ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता; अमृत; स्मार्ट सिटी आदि; राष्ट्रीय जल मिशन - जल उपयोग की दक्षता बढ़ाना, बेसिन प्रबंधन आदि; हिमालय पारितंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय अभियान राष्ट्रीय हरित भारत मिशन- वनारोपण; राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीतिक ज्ञान मिशन इसके अलावा सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए और अभियान/कार्यक्रम चलाए गए हैं- मनरेगा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान राष्ट्रीय कृषि विकास योजना इंटीग्रेटेड वॉटरशड मैनेजमेंट प्रोग्राम परफॉर्म अचीवट्रेड योजना सोलर रूफटॉप इन्वेस्टमेंट कार्यक्रम प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम आयुष्मान भारत स्वच्छ भारत अभियान
##Question:सतत विकास लक्ष्य(SDGs) क्या हैं? भारत में सतत विकास लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या प्रयास किया जा रहा है? उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What are Sustainable Development Goals (SDGs)? What efforts are being made to fulfill the sustainable development goals in India? Illustrate with examples. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में सतत विकास लक्ष्य की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए लक्ष्यों एवं उसके उद्देश्यों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताईये| दूसरे भाग में, भारत में इन लक्ष्यों को पूरा करने हेतु किये जा रहे प्रयासों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- सतत विकास एक ऐसा विकास है जो आने वाली पीढ़ियों के हितों से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है|सतत विकास की संकल्पना पर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोग के द्वारा दी गयी थी| 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में सतत विकास की प्राप्ति हेतु एजेंडा 21 नामक कार्ययोजना अपनाई गई थी| उसके बाद रियो+10(जोहांसबर्ग सम्मेलन)- 2002 में सहस्राब्दी विकास लक्ष्य(एमडीजी) को लागू करने का लक्ष्य रखा गया| सतत विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन(रियो+20) 7 क्षेत्रों को चिन्हित किया गया था जिनपर प्राथमिकता देकर सतत विकास की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है| इस दस्तावेज में सतत विकास लक्ष्यों(एसडीजी) को विकसित करने हेतु समर्थन प्रदान किया गया था| सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों(जो कि 2015 में समाप्त हो गया था) के स्थान पर आगे का विकास एजेंडा अंगीकृत करने के लिए 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सहस्राब्दी सतत विकास लक्ष्य 2030 को अंगीकृत किया| इसका उद्देश्य 2015 से 2030 तक गरीबी और भुखमरी को समाप्त करके तथा लैंगिक समानता सुनिश्चित करके समावेशी विकास को बढ़ावा देना है| इसमें अगले 15 साल के लिए(2015-2030) 17 लक्ष्य तथा 169 प्रयोजन तय किए गए| सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने हेतु भारत द्वारा किए गए प्रयास भारत ने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के दिशा में जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय(UNFCCC) तथा जैव विविधता संबंधी अभिसमय(सीबीडी) पर हस्ताक्षर किया है| राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के द्वारा स्वच्छ पर्यावरण तथा पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन; पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने हेतु राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010 के माध्यम से एनजीटी का गठन; भारत में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं| जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत 8 उप मिशन के द्वारा बहुआयामी एवंव्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है| राष्ट्रीय सौर मिशन- 2022 तक 100 गीगावॉट नवीकरणीय सौर ऊर्जा उत्पादन;अल्ट्रा मेगा सौर ऊर्जा परियोजनाएं;ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर;अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन आदि| राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा दक्षता मिशन- 2022 तक 10000 मेगावाट ऊर्जा बचत का लक्ष्य; राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन - नगरीय परिवहन,ऊर्जा दक्षता,ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि पर ध्यान;ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता; अमृत; स्मार्ट सिटी आदि; राष्ट्रीय जल मिशन - जल उपयोग की दक्षता बढ़ाना, बेसिन प्रबंधन आदि; हिमालय पारितंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय अभियान राष्ट्रीय हरित भारत मिशन- वनारोपण; राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीतिक ज्ञान मिशन इसके अलावा सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए और अभियान/कार्यक्रम चलाए गए हैं- मनरेगा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान राष्ट्रीय कृषि विकास योजना इंटीग्रेटेड वॉटरशड मैनेजमेंट प्रोग्राम परफॉर्म अचीवट्रेड योजना सोलर रूफटॉप इन्वेस्टमेंट कार्यक्रम प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम आयुष्मान भारत स्वच्छ भारत अभियान
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What is meant by a drainage pattern? Explain the drainage patterns of the river systems. (150 words/ 10 marks)
BRIEF APPROACH:- -INTRODUCTION Definition of drainage pattern - UNDERSTANDING DRAINAGE PATTERN - THE CHIEF TYPES OF DRAINAGE PATTERNS Answer:- Drainage pattern refers to the mutual relationship between the streams. UNDERSTANDING DRAINAGE PATTERN Drainage pattern is the arrangement and distribution of stream within a drainage system. The drainage pattern depends upon a number of factors like: 1) Slope of the region 2) Lithology 3) Structural attributes 4) Climate of the region 5) Geology of the region i.e. tectonic adjustments like volcanism, earthquakes THE FOLLOWING ARE THE CHIEF TYPES OF DRAINAGE PATTERNS 1) DENDRITIC DRAINAGE PATTERN The subsequent streams branches irregularly just like the branches of the tree and are therefore called as tree-like drainage pattern. This pattern develops on rocks of uniform lithology i.e. uniform resistance to erosion. For example, Rivers Ganga, Godavari, Krishna etc. 2) TRELLIS DRAINAGE PATTERN The streams constitute a network of parallel streams which meet the consequent stream at right angles. This is because the lithology is not uniform. It is made up of alternate layers of hard and soft rocks. Therefore, the subsequent streams tend to follow the pattern of the rock structures. For example, Bhagirathi River in the upper reaches of the Himalayas, Chota Nagpur Plateau especially in the Singhbhum plateau region. 3) ANNULAR DRAINAGE PATTERN The stream course displays a ring like plan as viewed from the top. The subsequent streams meet the consequent streams in an arc shapes structure. The subsequent streams flow around a dome mountain. For example, the streams that flow through the Nilgiris. 4) RADIAL DRAINAGE PATTERN The streams radiate out from the center, just like spokes of a wheel. For example, Amarkantak region of Maikala plateau, Mansarover of Kailash etc. 5) RECTANGULAR DRAINAGE PATTERN The subsequent streams meet the consequent streams at almost right angles to each other. It differs from Trellis in terms of topography, which exhibits cracks, fissures, faults and rifts. The subsequent streams are neither long nor parallel as in the case of trellis. For example, Vindhyan mountain region, parts of Mahanadi etc. 6) PARALLEL DRAINAGE PATTERN All streams flow parallel to each other. This type of drainage pattern is most common in the western parts of the Western Ghats. For example, Mandovi river, River Zuari, Idukki River and River Pamba.
##Question:What is meant by a drainage pattern? Explain the drainage patterns of the river systems. (150 words/ 10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH:- -INTRODUCTION Definition of drainage pattern - UNDERSTANDING DRAINAGE PATTERN - THE CHIEF TYPES OF DRAINAGE PATTERNS Answer:- Drainage pattern refers to the mutual relationship between the streams. UNDERSTANDING DRAINAGE PATTERN Drainage pattern is the arrangement and distribution of stream within a drainage system. The drainage pattern depends upon a number of factors like: 1) Slope of the region 2) Lithology 3) Structural attributes 4) Climate of the region 5) Geology of the region i.e. tectonic adjustments like volcanism, earthquakes THE FOLLOWING ARE THE CHIEF TYPES OF DRAINAGE PATTERNS 1) DENDRITIC DRAINAGE PATTERN The subsequent streams branches irregularly just like the branches of the tree and are therefore called as tree-like drainage pattern. This pattern develops on rocks of uniform lithology i.e. uniform resistance to erosion. For example, Rivers Ganga, Godavari, Krishna etc. 2) TRELLIS DRAINAGE PATTERN The streams constitute a network of parallel streams which meet the consequent stream at right angles. This is because the lithology is not uniform. It is made up of alternate layers of hard and soft rocks. Therefore, the subsequent streams tend to follow the pattern of the rock structures. For example, Bhagirathi River in the upper reaches of the Himalayas, Chota Nagpur Plateau especially in the Singhbhum plateau region. 3) ANNULAR DRAINAGE PATTERN The stream course displays a ring like plan as viewed from the top. The subsequent streams meet the consequent streams in an arc shapes structure. The subsequent streams flow around a dome mountain. For example, the streams that flow through the Nilgiris. 4) RADIAL DRAINAGE PATTERN The streams radiate out from the center, just like spokes of a wheel. For example, Amarkantak region of Maikala plateau, Mansarover of Kailash etc. 5) RECTANGULAR DRAINAGE PATTERN The subsequent streams meet the consequent streams at almost right angles to each other. It differs from Trellis in terms of topography, which exhibits cracks, fissures, faults and rifts. The subsequent streams are neither long nor parallel as in the case of trellis. For example, Vindhyan mountain region, parts of Mahanadi etc. 6) PARALLEL DRAINAGE PATTERN All streams flow parallel to each other. This type of drainage pattern is most common in the western parts of the Western Ghats. For example, Mandovi river, River Zuari, Idukki River and River Pamba.
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वर्ष 1992 में रियो में संपन्न पृथ्वी सम्मलेन पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुविध उपाय प्रस्तुत करता है| टिप्पणी कीजिये |(150-200 शब्द, 10 अंक) In 1992, The Earth Convention concludes in Rio, offers multiple solutions for environmental protection. Make a comment. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में रियो पृथ्वी सम्मलेन के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- मुख्य भाग में रियो पृथ्वी सम्मलेन में प्रस्तुत उपायों की विस्तार से चर्चा कीजिये 3- अंतिम में सम्मलेन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी देशों और नव स्वतंत्र अथवा विउपनिवेशीकृत देशों में तीव्र औद्योगिक विकास का माडल अपनाया गया| इससे जहाँ एक ओर संसाधनों का अतिदोहन शुरू हुआ तो दूसरी ओर प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन की समस्या ने विश्व का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर आकर्षित किया| पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रथम प्रयास वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में हुआ था| इसके 20 वर्षों के बाद वर्ष 1992 में पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन "पृथ्वी सम्मेलन" के नाम से जाना जाता है।पृथ्वी सम्मेलन ब्राजील की राजधानी रिओ डि जेनेरियों में3 जून1992से14 जून1992 तक चला इसीलिए यह सम्मेलन रिओ सम्मेलन के रूप में प्रसिद्ध हैं | इस सम्मलेन में विश्व के 182 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।| पृथ्वी सम्मेलन में विश्व को प्रदूषण से बचाने के लिए वित्तीय प्रबन्ध, प्रदूषण एवं पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में तकनीक अन्तरण, वनों का धारणीय प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में संस्थागत प्रबन्ध, जैव विविधता का संरक्षण एवं सतत् विकास आदि विषयों पर विचार किया गया था| इस सम्मलेन द्वारा पर्यावरण के समग्र संरक्षण के संदर्भ में विभिन्न प्रयास किये गए| पृथ्वी सम्मलेन में प्रस्तुत किये गए उपाय रिओ घोषणा · रिओ घोषणा या पृथ्वी चार्टर को अपनाया जाना पृथ्वी सम्मेलन की महान उपलब्धि हैं। इस घोषणा पर 182 देशों द्वारा हस्ताक्षर किये गये। इस घोषणा में 27 सिद्धान्त हैं। · यह घोषणा भविष्य में विश्व के धारणीय विकास के लिए निर्देशक सिद्धांतों और निर्देशों का समुच्चय है| · यह घोषणा औद्योगिक देशों के उत्तरदायित्वों और विकासशील देशों की विकासात्मक आवश्यकताओं के मध्य एक समझौता थी। इस घोषणा में प्रदूषक द्वारा भुगतान की संकल्पना प्रस्तुत की गयी है| एजेण्डा 21 · रिओ सम्मलेन में अपनाया गया एजेण्डा 21 एक अन्तर्राष्ट्रीय दस्तावेज है| इसे 21वीं सदी में धारणीय विकास के लिए होने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की रणनीति के सन्दर्भ में अपनाया गया है| इसे सम्मेलन के 182 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया है| · यह एजेण्डा गरीबी उन्मूलन, संसाधन का धारणीय उपभोग , स्वास्थ्य, वित्तीय संसाधनों का एकत्रण एवं वितरण, पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी तकनीकों का विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आदि विषयों पर बल दिया गया है| · यद्यपि यह एजेण्डा बाध्यकारी नहीं है, तथापि देशों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रमों को एजेण्डा 21 को ध्यान में रखकर बनाने का प्रयास करेंगे| संस्थागत उपलब्धियां · रिओ सम्मलेन में निरंतर होते जलवायु परिवर्तन की समस्या को ध्यान में रखते हुये संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) नामक संधि की गयी| यह संधि ग्रीन हाउस गैसों के निष्कासन और गहनता को धारणीय स्तर पर बनाये रखने और उस पर नियंत्रण के संदर्भ में की गयी थी| · इसी सम्मलेन में जैव विविधता संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता अभिसमय(CBD) को स्थापित किया गया| यह एक बहुपक्षीय संधि है| इस अभिसमय का उद्देश्य जैव-विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का धारणीय उपयोग और जैविक संसाधनों से प्राप्त लाभों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना है| · इनके अतिरिक्त निरंतर होते वन ह्रास को देखते हुए रिओ सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र वन घोषणापत्र को जारी किया गया था| इसका उद्देश्य न केवल वन ह्रास को रोकना था बल्कि वनों की पुनर्स्थापना और वनों का धारणीय उपयोग सुनिश्चित करना है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 1992 में संपन्न रिओ पृथ्वी सम्मलेन ने जलवायु, पर्यावरण, जैव-विविधता, और धारणीय विकास के संदर्भ में बहुविध उपाय प्रस्तुत किये थे| इसी सम्मलेन द्वारा प्रस्तुत आधार पर क्योटो प्रोटोकाल, नागोया प्रोटोकाल, धारणीय विकास लक्ष्य आदि बाध्यकारी समझौतों और संकल्पनाओं का विकास हुआ है|
##Question:वर्ष 1992 में रियो में संपन्न पृथ्वी सम्मलेन पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुविध उपाय प्रस्तुत करता है| टिप्पणी कीजिये |(150-200 शब्द, 10 अंक) In 1992, The Earth Convention concludes in Rio, offers multiple solutions for environmental protection. Make a comment. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में रियो पृथ्वी सम्मलेन के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- मुख्य भाग में रियो पृथ्वी सम्मलेन में प्रस्तुत उपायों की विस्तार से चर्चा कीजिये 3- अंतिम में सम्मलेन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्वयुद्धों के बाद पश्चिमी देशों और नव स्वतंत्र अथवा विउपनिवेशीकृत देशों में तीव्र औद्योगिक विकास का माडल अपनाया गया| इससे जहाँ एक ओर संसाधनों का अतिदोहन शुरू हुआ तो दूसरी ओर प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन की समस्या ने विश्व का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर आकर्षित किया| पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रथम प्रयास वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में हुआ था| इसके 20 वर्षों के बाद वर्ष 1992 में पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन "पृथ्वी सम्मेलन" के नाम से जाना जाता है।पृथ्वी सम्मेलन ब्राजील की राजधानी रिओ डि जेनेरियों में3 जून1992से14 जून1992 तक चला इसीलिए यह सम्मेलन रिओ सम्मेलन के रूप में प्रसिद्ध हैं | इस सम्मलेन में विश्व के 182 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।| पृथ्वी सम्मेलन में विश्व को प्रदूषण से बचाने के लिए वित्तीय प्रबन्ध, प्रदूषण एवं पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में तकनीक अन्तरण, वनों का धारणीय प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में संस्थागत प्रबन्ध, जैव विविधता का संरक्षण एवं सतत् विकास आदि विषयों पर विचार किया गया था| इस सम्मलेन द्वारा पर्यावरण के समग्र संरक्षण के संदर्भ में विभिन्न प्रयास किये गए| पृथ्वी सम्मलेन में प्रस्तुत किये गए उपाय रिओ घोषणा · रिओ घोषणा या पृथ्वी चार्टर को अपनाया जाना पृथ्वी सम्मेलन की महान उपलब्धि हैं। इस घोषणा पर 182 देशों द्वारा हस्ताक्षर किये गये। इस घोषणा में 27 सिद्धान्त हैं। · यह घोषणा भविष्य में विश्व के धारणीय विकास के लिए निर्देशक सिद्धांतों और निर्देशों का समुच्चय है| · यह घोषणा औद्योगिक देशों के उत्तरदायित्वों और विकासशील देशों की विकासात्मक आवश्यकताओं के मध्य एक समझौता थी। इस घोषणा में प्रदूषक द्वारा भुगतान की संकल्पना प्रस्तुत की गयी है| एजेण्डा 21 · रिओ सम्मलेन में अपनाया गया एजेण्डा 21 एक अन्तर्राष्ट्रीय दस्तावेज है| इसे 21वीं सदी में धारणीय विकास के लिए होने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की रणनीति के सन्दर्भ में अपनाया गया है| इसे सम्मेलन के 182 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया है| · यह एजेण्डा गरीबी उन्मूलन, संसाधन का धारणीय उपभोग , स्वास्थ्य, वित्तीय संसाधनों का एकत्रण एवं वितरण, पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी तकनीकों का विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आदि विषयों पर बल दिया गया है| · यद्यपि यह एजेण्डा बाध्यकारी नहीं है, तथापि देशों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपनी नीतियाँ एवं कार्यक्रमों को एजेण्डा 21 को ध्यान में रखकर बनाने का प्रयास करेंगे| संस्थागत उपलब्धियां · रिओ सम्मलेन में निरंतर होते जलवायु परिवर्तन की समस्या को ध्यान में रखते हुये संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) नामक संधि की गयी| यह संधि ग्रीन हाउस गैसों के निष्कासन और गहनता को धारणीय स्तर पर बनाये रखने और उस पर नियंत्रण के संदर्भ में की गयी थी| · इसी सम्मलेन में जैव विविधता संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता अभिसमय(CBD) को स्थापित किया गया| यह एक बहुपक्षीय संधि है| इस अभिसमय का उद्देश्य जैव-विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का धारणीय उपयोग और जैविक संसाधनों से प्राप्त लाभों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना है| · इनके अतिरिक्त निरंतर होते वन ह्रास को देखते हुए रिओ सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र वन घोषणापत्र को जारी किया गया था| इसका उद्देश्य न केवल वन ह्रास को रोकना था बल्कि वनों की पुनर्स्थापना और वनों का धारणीय उपयोग सुनिश्चित करना है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 1992 में संपन्न रिओ पृथ्वी सम्मलेन ने जलवायु, पर्यावरण, जैव-विविधता, और धारणीय विकास के संदर्भ में बहुविध उपाय प्रस्तुत किये थे| इसी सम्मलेन द्वारा प्रस्तुत आधार पर क्योटो प्रोटोकाल, नागोया प्रोटोकाल, धारणीय विकास लक्ष्य आदि बाध्यकारी समझौतों और संकल्पनाओं का विकास हुआ है|
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"भूख का भूगोल " की अवधारणा की व्याख्या कीजिये | क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि गरीबी, जनसँख्या वृद्धि का कारण भी है और परिणाम भी ? (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of "Geography of Hunger". Do you agree with the argument that poverty is also the cause of the increasing population and its consequences? (150-200 Words /10 Marks)
भूमिका में "भूख का भूगोल" का सामान्य परिचय देते हुए इसके प्रतिपादक का उल्लेख करना है | इसके बाद गरीबी,जनसँख्या वृद्धि के कारण के रूप में है , इसको दर्शाना है | पुनः जनसँख्या वृद्धि का परिणाम -गरीबी है इसे बताना है | अंत में दोनों एक दूसरे के समानुपाती हैं , यह दिखाते हुए उत्तर का समापन करना है | उत्तर - प्रायः ऐसा माना जाता रहा है कि निम्न आय वर्ग के लोगो में प्रजनन दर अधिक पायी जाती है | एक सामान्य सोंच के अंतर्गत ऐसा होना जागरूकता के आभाव की वजह से माना जाता रहा है | "भूख के भूगोल "संकल्पना के प्रतिपादक गोसोव डे कैस्त्रो को माना जाता है , गोसोव ने सामान्य सोंच को गलत सिद्ध करते हुए यह बताया कि यह सही है कि निम्न आय वर्ग के लोगो में प्रजनन दर अधिक होती है , परन्तु इसके अन्य प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - 1- पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी कारण- कैस्त्रो के अनुसार निम्न आय वर्ग के लोगों में निम्न पोषण का कारण - पौष्टिक भोजन की कमी , टीकाकरण की अनुपलब्धता , प्रोटीन की कमी आदि रही है | इससे शिशु एवं बाल मृत्यु दर अधिक होती है , जो इस आय समूह में एक भय पैदा करता है , जिसके फलस्वरूप प्रजनन दर अधिक होती है | 2- आर्थिक कारण - कैस्त्रो के अनुसार निम्न आय वर्ग के लोगों में कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण भी प्रजनन दर अधिक होता है | 3- सामाजिक-सांस्कृतिक कारण - गरीबी की जनसँख्या में वृद्धि का विवेचन इस आधार पर किया जा सकता है कि अनियंत्रित जनसँख्या वृद्धि का कारण गर्भनिरोधकों प्रयोग न करना , परिवार नियोजन के सन्दर्भ में जानकारी का आभाव , पुरुष प्रधान समाज , पुत्र -मोह आदि के अतिरिक्त अधिक सहवास अवस्था , जल्दी विवाह तथा कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का होना आदि है| 4- धार्मिक कारण - समाज में अभी भी ऐसी मान्यता है कि प्रजनन या बच्चे का पैदा होना ईश्वरीय कृपा से ही संभव हो पाता है, अतः इस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए | ऐसी मान्यतायें भी जनसँख्या वृद्धि का कारण है और गरीबी को बढ़ावा देते हैं | इन प्रमुख कारणों को कैस्त्रो भूख के भूगोल के अंतर्गत रखते है तथा यह भी मानते हैं कि गरीबी एवं जनसँख्या एक दुष्चक्र बनाते हैं , जिसे गरीबी को दूर कर समाप्त किया जा सकता है | कैस्त्रो की बात का समर्थन करते हुए 1994 में एम् एस स्वामीनाथनटास्क फोर्स नेभी गरीबी और जनसँख्या के दुष्चक्र को तोड़ने बात की | सामान्य सन्दर्भों में जनसँख्या वृद्धि और गरीबी को एक दूसरे का कारण भी माना जाता है और परिणाम भी | अर्थात जब भी जनसँख्या में वृद्धि होती है , तो उससे गरीबी में वृद्धि की आम प्रवृति दिखाई देती है | साथ ही चिकित्सा सुविधाओं के आभाव में अत्यधिक मृत्यु दर और उसे संतुलित करने हेतु अत्यधिक जन्म दर के पीछे भी गरीबी ही मूल कारण है | गरीबी के कारण ही धनार्जन हेतु अधिक सदस्यों का परिवार इच्छा करते हैं | गरीबी ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बाधक बनती है| जनसँख्या वृद्धि से गरीबी की अवधारणा के पीछे नव माल्थसवादी सिद्धांत कार्य करता है , जिसके अनुसार पृथ्वी पर संसाधन सीमित है और बढ़ती जनसँख्या के कारण प्रत्येक सीमित भाग ही प्राप्त कर सकता है | अधिक जनसँख्या का एक और नकारात्मक पहलू यह भी है कि जनाधिक्य प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करता है | प्रतिस्पर्धा से मजदूरी की दर भी कम स्तर पर बनी रहती है और कर्मकारों की आय भी कम होती है -इस कारण से भी निर्धनता बनी रहती है | अंततः गरीबी को एक दुष्चक्र मानना अधिक उपयुक्त है | गरीबी और जनसँख्या वृद्धि में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है , गरीबी को नियंत्रित कर जनसँख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जा सकता है |
##Question:"भूख का भूगोल " की अवधारणा की व्याख्या कीजिये | क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि गरीबी, जनसँख्या वृद्धि का कारण भी है और परिणाम भी ? (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of "Geography of Hunger". Do you agree with the argument that poverty is also the cause of the increasing population and its consequences? (150-200 Words /10 Marks)##Answer:भूमिका में "भूख का भूगोल" का सामान्य परिचय देते हुए इसके प्रतिपादक का उल्लेख करना है | इसके बाद गरीबी,जनसँख्या वृद्धि के कारण के रूप में है , इसको दर्शाना है | पुनः जनसँख्या वृद्धि का परिणाम -गरीबी है इसे बताना है | अंत में दोनों एक दूसरे के समानुपाती हैं , यह दिखाते हुए उत्तर का समापन करना है | उत्तर - प्रायः ऐसा माना जाता रहा है कि निम्न आय वर्ग के लोगो में प्रजनन दर अधिक पायी जाती है | एक सामान्य सोंच के अंतर्गत ऐसा होना जागरूकता के आभाव की वजह से माना जाता रहा है | "भूख के भूगोल "संकल्पना के प्रतिपादक गोसोव डे कैस्त्रो को माना जाता है , गोसोव ने सामान्य सोंच को गलत सिद्ध करते हुए यह बताया कि यह सही है कि निम्न आय वर्ग के लोगो में प्रजनन दर अधिक होती है , परन्तु इसके अन्य प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - 1- पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी कारण- कैस्त्रो के अनुसार निम्न आय वर्ग के लोगों में निम्न पोषण का कारण - पौष्टिक भोजन की कमी , टीकाकरण की अनुपलब्धता , प्रोटीन की कमी आदि रही है | इससे शिशु एवं बाल मृत्यु दर अधिक होती है , जो इस आय समूह में एक भय पैदा करता है , जिसके फलस्वरूप प्रजनन दर अधिक होती है | 2- आर्थिक कारण - कैस्त्रो के अनुसार निम्न आय वर्ग के लोगों में कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण भी प्रजनन दर अधिक होता है | 3- सामाजिक-सांस्कृतिक कारण - गरीबी की जनसँख्या में वृद्धि का विवेचन इस आधार पर किया जा सकता है कि अनियंत्रित जनसँख्या वृद्धि का कारण गर्भनिरोधकों प्रयोग न करना , परिवार नियोजन के सन्दर्भ में जानकारी का आभाव , पुरुष प्रधान समाज , पुत्र -मोह आदि के अतिरिक्त अधिक सहवास अवस्था , जल्दी विवाह तथा कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का होना आदि है| 4- धार्मिक कारण - समाज में अभी भी ऐसी मान्यता है कि प्रजनन या बच्चे का पैदा होना ईश्वरीय कृपा से ही संभव हो पाता है, अतः इस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए | ऐसी मान्यतायें भी जनसँख्या वृद्धि का कारण है और गरीबी को बढ़ावा देते हैं | इन प्रमुख कारणों को कैस्त्रो भूख के भूगोल के अंतर्गत रखते है तथा यह भी मानते हैं कि गरीबी एवं जनसँख्या एक दुष्चक्र बनाते हैं , जिसे गरीबी को दूर कर समाप्त किया जा सकता है | कैस्त्रो की बात का समर्थन करते हुए 1994 में एम् एस स्वामीनाथनटास्क फोर्स नेभी गरीबी और जनसँख्या के दुष्चक्र को तोड़ने बात की | सामान्य सन्दर्भों में जनसँख्या वृद्धि और गरीबी को एक दूसरे का कारण भी माना जाता है और परिणाम भी | अर्थात जब भी जनसँख्या में वृद्धि होती है , तो उससे गरीबी में वृद्धि की आम प्रवृति दिखाई देती है | साथ ही चिकित्सा सुविधाओं के आभाव में अत्यधिक मृत्यु दर और उसे संतुलित करने हेतु अत्यधिक जन्म दर के पीछे भी गरीबी ही मूल कारण है | गरीबी के कारण ही धनार्जन हेतु अधिक सदस्यों का परिवार इच्छा करते हैं | गरीबी ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बाधक बनती है| जनसँख्या वृद्धि से गरीबी की अवधारणा के पीछे नव माल्थसवादी सिद्धांत कार्य करता है , जिसके अनुसार पृथ्वी पर संसाधन सीमित है और बढ़ती जनसँख्या के कारण प्रत्येक सीमित भाग ही प्राप्त कर सकता है | अधिक जनसँख्या का एक और नकारात्मक पहलू यह भी है कि जनाधिक्य प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करता है | प्रतिस्पर्धा से मजदूरी की दर भी कम स्तर पर बनी रहती है और कर्मकारों की आय भी कम होती है -इस कारण से भी निर्धनता बनी रहती है | अंततः गरीबी को एक दुष्चक्र मानना अधिक उपयुक्त है | गरीबी और जनसँख्या वृद्धि में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है , गरीबी को नियंत्रित कर जनसँख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जा सकता है |
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What do you understand by Renaissance?Whydid it start in Italy (200 words/10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पुनर्जागरण को परिभाषित कीजिए पुनर्जागरण के कारणों को लिखिए इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि पुनर्जागरण ने किस सीमा तक प्रगतिशील विचारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित किया निष्कर्ष पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है फिर से जागना। इसका सीमित अर्थ में प्रयोग यूनान एवं रोमन सभ्यता के संदर्भ में किया जाता है। व्यापक रूप से इसका प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में चेतना, विकास, मानववाद से लिया जाता है। यह वह अवधि है जब विभिन्न यूरोपीय देशों ने एक लंबी अवधि के उपरांत मध्यकाल के अंधकार युग को त्याग कर आधुनिक युग में दस्तक दी। यूरोप में पुनर्जागरण के कारण: व्यापार एवं वाणिज्य के कारण मुद्रा अर्थव्यवस्था, व्यापारी वर्ग एवं शहरों का उदय हुआ। इसने सामंतवादी व्यवस्था पर प्रहार किया। व्यापारिक वर्गों ने रूढ़िवादिता एवं संकीर्ण मानसिकता पर प्रहार किया। धार्मिक अभियानों के कारण प्राचीन ग्रीक एवं रोमन ज्ञान विज्ञान से यूरोप वासी परिचित हुए। इससे यह विचार प्रचलित हुआ कि ईसाई धर्म से ही सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। धर्म युद्ध में चर्च एवं पोप की प्रतिष्ठा को धक्का लगा। यूरोपवासियों का पूर्वी देशों के साथ संपर्क स्थापित हुआ। पुनर्जागरण में कुस्तुनतुनिया के पतन का भी योगदान है। तुर्कों द्वारा इस पर आधिपत्य स्थापित कर लेने के पश्चात इटली में नए विचारों का प्रसार हुआ। यूरोप में यह पुनर्जागरण केवल गौरवपूर्ण अतीत की खोज एवं विश्लेषण तक ही सीमित नहीं था। इसने तत्कालीन धर्म, राजनीति, साहित्य, समाज, कला, विज्ञान, सांस्कृतिक क्षेत्रों में चिंतन को जन्म दिया। इस समय मानववादी दृष्टिकोण प्रबल रूप से सामने आया। इसके अंतर्गत मानव को ईश्वर की कृति माना गया और सम्पूर्ण गतिविधियों मानवहितों पर केन्द्रित हो गयी। मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति के कारण यह स्वीकार किया गया कि इसकी क्षमताओं को किसी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता है।पुनर्जागरण काल में धार्मिक अंधविश्वास तथा रूढ़िवादी पक्ष की आलोचना प्रारम्भ हुआ। तर्कवाद का प्रसार होने से धर्म एवं पोप के नियमों, सिद्धांतों को तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। प्रति धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म की आंतरिक कमियों को उजागर किया। कैथोलिक धर्म की सत्ता को चुनौती दी गयी। पुनर्जागरण काल में प्रगतिशील विचारों के प्रसार में साहित्य, कला का व्यापक प्रभाव पड़ा। साहित्य के माध्यम से यह प्रसारित किया गया कि मनुष्य के अधिकार और स्वतन्त्रता कितने महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर धर्म, पोप प्रतिबंध नहीं लगा सकते। इसके पूर्व लैटिन भाषा में साहित्य की रचना होती थी जिससे जो जन सामान्य की भाषा में नहीं होती थी। अब देशी भाषा में साहित्य की रचना हुई इससे अधिकतम लोग ज्ञान के वास्तविक रूप से अवगत हुए एवं स्वतंत्र तर्क बुद्धि का विकास हुआ। इसके साथ ही चित्रकला में मानवीय भाव एवं समवेदनाओं की अभिव्यक्ति की गयी। जैसे लियोनार्डो दा विंची की मोनालिसा की चित्रकला विश्व प्रसिद्ध हुई। इसी क्रम में सामाजिक, राजनीतिक तथा अर्थीक परिप्रेक्ष्य में भी व्यापक बदलाव हुए जिसने प्रगतिशील विचारों के प्रसार को और तीव्र कर दिया। जीवन स्तर में सुधार हुआ। जैसे पुनर्जागरण के कारण राष्ट्र राज्य की अवधारणा उत्पन्न हुई। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित हुए। कापरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से पोप की सत्ता को चुनौती दी। आधुनिक विज्ञान के इस युग ने न केवल मानव ज्ञान में वृद्धि की बल्कि अन्वेषण की ऐसी विधि भी प्रस्तुत की जिसका उपयोग दूसरे विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया गया। पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं में तार्किकता, मानवतावादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रगति आदि का विशेष महत्व है। इससे समस्त यूरोप में सामंतवाद के खंडहरों पर आधुनिकता का आविर्भाव हुआ। जिसने प्रगतिशील विचारों का प्रसार किया तथा मनवातावादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ।
##Question:What do you understand by Renaissance?Whydid it start in Italy (200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पुनर्जागरण को परिभाषित कीजिए पुनर्जागरण के कारणों को लिखिए इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि पुनर्जागरण ने किस सीमा तक प्रगतिशील विचारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित किया निष्कर्ष पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है फिर से जागना। इसका सीमित अर्थ में प्रयोग यूनान एवं रोमन सभ्यता के संदर्भ में किया जाता है। व्यापक रूप से इसका प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में चेतना, विकास, मानववाद से लिया जाता है। यह वह अवधि है जब विभिन्न यूरोपीय देशों ने एक लंबी अवधि के उपरांत मध्यकाल के अंधकार युग को त्याग कर आधुनिक युग में दस्तक दी। यूरोप में पुनर्जागरण के कारण: व्यापार एवं वाणिज्य के कारण मुद्रा अर्थव्यवस्था, व्यापारी वर्ग एवं शहरों का उदय हुआ। इसने सामंतवादी व्यवस्था पर प्रहार किया। व्यापारिक वर्गों ने रूढ़िवादिता एवं संकीर्ण मानसिकता पर प्रहार किया। धार्मिक अभियानों के कारण प्राचीन ग्रीक एवं रोमन ज्ञान विज्ञान से यूरोप वासी परिचित हुए। इससे यह विचार प्रचलित हुआ कि ईसाई धर्म से ही सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। धर्म युद्ध में चर्च एवं पोप की प्रतिष्ठा को धक्का लगा। यूरोपवासियों का पूर्वी देशों के साथ संपर्क स्थापित हुआ। पुनर्जागरण में कुस्तुनतुनिया के पतन का भी योगदान है। तुर्कों द्वारा इस पर आधिपत्य स्थापित कर लेने के पश्चात इटली में नए विचारों का प्रसार हुआ। यूरोप में यह पुनर्जागरण केवल गौरवपूर्ण अतीत की खोज एवं विश्लेषण तक ही सीमित नहीं था। इसने तत्कालीन धर्म, राजनीति, साहित्य, समाज, कला, विज्ञान, सांस्कृतिक क्षेत्रों में चिंतन को जन्म दिया। इस समय मानववादी दृष्टिकोण प्रबल रूप से सामने आया। इसके अंतर्गत मानव को ईश्वर की कृति माना गया और सम्पूर्ण गतिविधियों मानवहितों पर केन्द्रित हो गयी। मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति के कारण यह स्वीकार किया गया कि इसकी क्षमताओं को किसी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता है।पुनर्जागरण काल में धार्मिक अंधविश्वास तथा रूढ़िवादी पक्ष की आलोचना प्रारम्भ हुआ। तर्कवाद का प्रसार होने से धर्म एवं पोप के नियमों, सिद्धांतों को तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। प्रति धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म की आंतरिक कमियों को उजागर किया। कैथोलिक धर्म की सत्ता को चुनौती दी गयी। पुनर्जागरण काल में प्रगतिशील विचारों के प्रसार में साहित्य, कला का व्यापक प्रभाव पड़ा। साहित्य के माध्यम से यह प्रसारित किया गया कि मनुष्य के अधिकार और स्वतन्त्रता कितने महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर धर्म, पोप प्रतिबंध नहीं लगा सकते। इसके पूर्व लैटिन भाषा में साहित्य की रचना होती थी जिससे जो जन सामान्य की भाषा में नहीं होती थी। अब देशी भाषा में साहित्य की रचना हुई इससे अधिकतम लोग ज्ञान के वास्तविक रूप से अवगत हुए एवं स्वतंत्र तर्क बुद्धि का विकास हुआ। इसके साथ ही चित्रकला में मानवीय भाव एवं समवेदनाओं की अभिव्यक्ति की गयी। जैसे लियोनार्डो दा विंची की मोनालिसा की चित्रकला विश्व प्रसिद्ध हुई। इसी क्रम में सामाजिक, राजनीतिक तथा अर्थीक परिप्रेक्ष्य में भी व्यापक बदलाव हुए जिसने प्रगतिशील विचारों के प्रसार को और तीव्र कर दिया। जीवन स्तर में सुधार हुआ। जैसे पुनर्जागरण के कारण राष्ट्र राज्य की अवधारणा उत्पन्न हुई। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित हुए। कापरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से पोप की सत्ता को चुनौती दी। आधुनिक विज्ञान के इस युग ने न केवल मानव ज्ञान में वृद्धि की बल्कि अन्वेषण की ऐसी विधि भी प्रस्तुत की जिसका उपयोग दूसरे विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया गया। पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं में तार्किकता, मानवतावादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रगति आदि का विशेष महत्व है। इससे समस्त यूरोप में सामंतवाद के खंडहरों पर आधुनिकता का आविर्भाव हुआ। जिसने प्रगतिशील विचारों का प्रसार किया तथा मनवातावादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ।
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आर्द्रभूमियों के महत्व को रेखांकित करते हुए उन पर मँडराते संकट के कारणों का उल्लेख कीजिये| साथ ही, आर्द्रभूमियों के संरक्षण हेतु किये गये प्रयासों का भी उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the importance of wetlands and mention the reasons for the crisis hovering over it. Also, mention the efforts made for the protection of wetland areas. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- पहले भाग में आर्द्रभूमि को परिभाषित करते हुए उसके विभिन्न प्रकारों को संक्षिप्तता से उल्लेखित कीजिये| दूसरे भाग में, आर्द्रभूमियों के महत्व को रेखांकित कीजिये| अगले भाग में, आर्द्रभूमियों के ह्रास के कारणों को बताईये| अंतिम भाग में, आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु उठाये गए अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय प्रयासों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- आर्द्रभूमि उन क्षेत्रों को कहा जाता है जहाँ, स्थाई या अस्थाई रूप से, स्थिर या गतिमान जल दलदल, पंकभूमि, पिटभूमि आदि के रूप में पाए जाते हैं| इसके अंतर्गत प्राकृतिक या मानवनिर्मित अंदरूनी या तटीय क्षेत्र आते हैं जिसमें ताजा जल/खारा जल/लवणीय जल विद्यमान होते हैं| सागरीय क्षेत्र जहाँ निम्न ज्वार के समय भी जल की गहराई 6 मीटर से अधिक नहीं हो, वो भी इसके अंतर्गत शामिल किये जाते हैं| आर्द्रभूमियों में जलीय वनस्पतियों की उपस्थिति होती है तथा यह जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र होता है| आर्द्रभूमि के कुछ उदाहरण- झील/तालाब, डेल्टा, स्ट्रीम/क्रीक, अनूप/कच्छ, सिंचित कृषिभूमि, नहर, मैंग्रोव, लैगून, कोरल रीफ, स्वच्छ पानी स्प्रिंग्स आदि| आर्द्रभूमियों का महत्व आर्द्रभूमियों से विभिन्न उत्पादों की प्राप्ति जैसे- भोजन, स्वच्छ पानी, ईंधन एवं फाईबर आदि| आनुवांशिक संसाधन एवं बायोकेमिकल उत्पादों की प्राप्ति; जलवायु परिवर्तन को रोकने में सहायक(कार्बनडाइऑक्साइड का अवशोषण); प्रदूषण नियंत्रण; प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा; मृदा अपरदन रोकने में सहायक; अपशिष्टों का शुद्धिकरण मत्स्यपालन , झींगा पालन, सिंचाई आदि; भूजल रिजार्ज पोषण चक्र का संतुलन सांस्कृतिक सेवाएँ जैसे- पर्यटन, मनोरंजन, सौंदर्य, परंपरागत जीवन निर्वाह एवं ज्ञान आदि जैव विविधता संरक्षण में सहायक आद्रभूमियों में ह्रास के कारण- प्राकृतिक कारण- समुद्र-स्तर का बढ़ना बाढ़ एवं सुखा तटीय इलाकों में आने वाले तूफानों का प्रभाव विभिन्न प्रकार के अपरदन जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक तापन की वजह से अत्यधिक वाष्पन, अम्लीकरण जैसी समस्याएं मानवीय कारक- आर्द्रभूमियों में अतिक्रमण(नगरीकरण, औद्योगीकरण का प्रभाव) संसाधनों का अतिदोहन ठोस अपशिष्ट निपटान भूजल का अतिदोहन कृषि, वानिकी आदि के लिए अत्यधिक जल निकासी बाढ़ नियंत्रण के लिए अति मत्स्यन तथा असंधारणीय पर्यटन अन्य कारण- अवसाद/ गाद का निक्षेपण आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रभाव जैसे - जलकुम्भी का तेज़ी से फैलना सुपोषणका प्रभाव जिससे जैविक ऑक्सीजन मांग बढ़ना आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु किये गए अंतर्राष्ट्रीय/राष्ट्रीय प्रयास- आर्द्रभूमियों के संरक्षण हेतु रामसर अभिसमय जिसके द्वारानमभूमियों का बुद्धिमतापूर्ण तथा सतत उपयोग को प्रोत्साहन दिया जाता है| इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्व के नमभूमि को रामसर स्थल घोषितकरके उन आर्द्रभूमियोंका संरक्षण एवं प्रबंधन किया जाता है| मौंट्रेक्स रिकॉर्ड के माध्यम से संकटग्रस्त नमभूमियों की सूची बनायी जाती है तथा रामसर सलाहकार मिशन द्वारा संकटग्रस्त नमभूमियों की समीक्षा की जाती है ताकि वैज्ञानिक, तकनीकी तथा वितीय सहायता प्रदान की जा सके| भारत सरकार के द्वारा राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण एवं प्रबंधन कार्यक्रम(NWCMP) के माध्यम से व्यापक कार्ययोजनाओं का निर्माण| इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र(SAC) द्वारा राष्ट्रीय नमभूमि एटलस बनाया जाना ताकि संबंधित क्षेत्रों की पहचान कर उचित योजना/नीति निर्माण को बढ़ावा देना|
##Question:आर्द्रभूमियों के महत्व को रेखांकित करते हुए उन पर मँडराते संकट के कारणों का उल्लेख कीजिये| साथ ही, आर्द्रभूमियों के संरक्षण हेतु किये गये प्रयासों का भी उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the importance of wetlands and mention the reasons for the crisis hovering over it. Also, mention the efforts made for the protection of wetland areas. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में आर्द्रभूमि को परिभाषित करते हुए उसके विभिन्न प्रकारों को संक्षिप्तता से उल्लेखित कीजिये| दूसरे भाग में, आर्द्रभूमियों के महत्व को रेखांकित कीजिये| अगले भाग में, आर्द्रभूमियों के ह्रास के कारणों को बताईये| अंतिम भाग में, आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु उठाये गए अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय प्रयासों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- आर्द्रभूमि उन क्षेत्रों को कहा जाता है जहाँ, स्थाई या अस्थाई रूप से, स्थिर या गतिमान जल दलदल, पंकभूमि, पिटभूमि आदि के रूप में पाए जाते हैं| इसके अंतर्गत प्राकृतिक या मानवनिर्मित अंदरूनी या तटीय क्षेत्र आते हैं जिसमें ताजा जल/खारा जल/लवणीय जल विद्यमान होते हैं| सागरीय क्षेत्र जहाँ निम्न ज्वार के समय भी जल की गहराई 6 मीटर से अधिक नहीं हो, वो भी इसके अंतर्गत शामिल किये जाते हैं| आर्द्रभूमियों में जलीय वनस्पतियों की उपस्थिति होती है तथा यह जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र होता है| आर्द्रभूमि के कुछ उदाहरण- झील/तालाब, डेल्टा, स्ट्रीम/क्रीक, अनूप/कच्छ, सिंचित कृषिभूमि, नहर, मैंग्रोव, लैगून, कोरल रीफ, स्वच्छ पानी स्प्रिंग्स आदि| आर्द्रभूमियों का महत्व आर्द्रभूमियों से विभिन्न उत्पादों की प्राप्ति जैसे- भोजन, स्वच्छ पानी, ईंधन एवं फाईबर आदि| आनुवांशिक संसाधन एवं बायोकेमिकल उत्पादों की प्राप्ति; जलवायु परिवर्तन को रोकने में सहायक(कार्बनडाइऑक्साइड का अवशोषण); प्रदूषण नियंत्रण; प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा; मृदा अपरदन रोकने में सहायक; अपशिष्टों का शुद्धिकरण मत्स्यपालन , झींगा पालन, सिंचाई आदि; भूजल रिजार्ज पोषण चक्र का संतुलन सांस्कृतिक सेवाएँ जैसे- पर्यटन, मनोरंजन, सौंदर्य, परंपरागत जीवन निर्वाह एवं ज्ञान आदि जैव विविधता संरक्षण में सहायक आद्रभूमियों में ह्रास के कारण- प्राकृतिक कारण- समुद्र-स्तर का बढ़ना बाढ़ एवं सुखा तटीय इलाकों में आने वाले तूफानों का प्रभाव विभिन्न प्रकार के अपरदन जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक तापन की वजह से अत्यधिक वाष्पन, अम्लीकरण जैसी समस्याएं मानवीय कारक- आर्द्रभूमियों में अतिक्रमण(नगरीकरण, औद्योगीकरण का प्रभाव) संसाधनों का अतिदोहन ठोस अपशिष्ट निपटान भूजल का अतिदोहन कृषि, वानिकी आदि के लिए अत्यधिक जल निकासी बाढ़ नियंत्रण के लिए अति मत्स्यन तथा असंधारणीय पर्यटन अन्य कारण- अवसाद/ गाद का निक्षेपण आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रभाव जैसे - जलकुम्भी का तेज़ी से फैलना सुपोषणका प्रभाव जिससे जैविक ऑक्सीजन मांग बढ़ना आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु किये गए अंतर्राष्ट्रीय/राष्ट्रीय प्रयास- आर्द्रभूमियों के संरक्षण हेतु रामसर अभिसमय जिसके द्वारानमभूमियों का बुद्धिमतापूर्ण तथा सतत उपयोग को प्रोत्साहन दिया जाता है| इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्व के नमभूमि को रामसर स्थल घोषितकरके उन आर्द्रभूमियोंका संरक्षण एवं प्रबंधन किया जाता है| मौंट्रेक्स रिकॉर्ड के माध्यम से संकटग्रस्त नमभूमियों की सूची बनायी जाती है तथा रामसर सलाहकार मिशन द्वारा संकटग्रस्त नमभूमियों की समीक्षा की जाती है ताकि वैज्ञानिक, तकनीकी तथा वितीय सहायता प्रदान की जा सके| भारत सरकार के द्वारा राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण एवं प्रबंधन कार्यक्रम(NWCMP) के माध्यम से व्यापक कार्ययोजनाओं का निर्माण| इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र(SAC) द्वारा राष्ट्रीय नमभूमि एटलस बनाया जाना ताकि संबंधित क्षेत्रों की पहचान कर उचित योजना/नीति निर्माण को बढ़ावा देना|
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What are aeolian landforms? Explain the different aeolian erosional landforms. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION What Aeolian landforms are - AEOLIAN EROSIONAL LANDFORMS · Processes involved in the formation of such landforms · The various types of Aeolian landforms Answer:- The action of the wind is the main reason behind the features produced either by erosion or by deposition in the arid regions. These are known as Aeolian landforms. AEOLIAN EROSIONAL LANDFORMS These are formed due to certain processes: 1) DEFLATION The wind blows and lifts away the loose material from the ground. The unconsolidated sand particles may be carried in the air or rolled along the ground, depending upon the size of the rocky material. 2) ATTRITION The wind-borne particles collide against one another and wear and tear to reduce their size. 3) ABRASION The sandblasting of rock surfaces by winds, when they hurl sand particles against them is called abrasion. The impact of such blasting is the scratching, polishing and wearing out of the rock surface. The 3 processes of Aeolian erosion mentioned above sculptures the landforms as follows 1) DEFLATED HALLOWS Continuous deflation i.e. lifting and carrying away of the rock sediments leads to the creation of hollows and depressions. 1.1) Sometimes, the action of oncoming winds will wear off the weaker rocks until the water table is reached. Thus, water seeps out forming oasis in the deflated hallows. For example, the Fayum Hallow of Egypt, which is more than 150 feet below sea level 2) PEDESTAL ROCKS The abrasion activity on the weaker rock strata sculptures the rock pedestal. Such rock pillars are further eroded near the base, where friction is greater. This process of undercutting produces mushroom-shaped structures called mushroom rocks in Sahara, known as gaur rocks. 3) ZEUGENS These are tabular masses which have alternative bands of hard and soft rocks. The sculpting effect of wind abrasion wears them into ridge and furrow landscape. Wind erosion further undercuts the lower soft rock so that deep furrows are developed. The hard rocks which stand above the furrows as ridges are called zeugens. They may be as high as 30m. 4) YARDANGS When bands of hard and weak rocks lie parallel to the prevailing winds, the abrasion activity produces ridge and furrow landscape. The belts of resistant rocks stand up as sloping ridges with an average height of 10-15 m but have lengths up to 1 km. These ridges are called Yardangs. For example, the Great Sphinx of Giza. 5) MESAS AND BUTTE Mesa is a Spanish word which means table. It is a flat table like landmass with a very resistant horizontal top layer and has very steep sides. The hard top layer protects the underlying layers from being eroded. Mesas are found in canyons. Prolonged denudation of mesas leads to a decrease in the area that it occupies. It, therefore, becomes isolated flat-topped hills, which are much lesser than the size of mesas, called buttes. 6) INSELBERGS In German, inselberg means an island mountain. Inselbergs are isolated residual hills rising abruptly from the level ground. They are characterized by steep slopes and rounded tops.
##Question:What are aeolian landforms? Explain the different aeolian erosional landforms. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION What Aeolian landforms are - AEOLIAN EROSIONAL LANDFORMS · Processes involved in the formation of such landforms · The various types of Aeolian landforms Answer:- The action of the wind is the main reason behind the features produced either by erosion or by deposition in the arid regions. These are known as Aeolian landforms. AEOLIAN EROSIONAL LANDFORMS These are formed due to certain processes: 1) DEFLATION The wind blows and lifts away the loose material from the ground. The unconsolidated sand particles may be carried in the air or rolled along the ground, depending upon the size of the rocky material. 2) ATTRITION The wind-borne particles collide against one another and wear and tear to reduce their size. 3) ABRASION The sandblasting of rock surfaces by winds, when they hurl sand particles against them is called abrasion. The impact of such blasting is the scratching, polishing and wearing out of the rock surface. The 3 processes of Aeolian erosion mentioned above sculptures the landforms as follows 1) DEFLATED HALLOWS Continuous deflation i.e. lifting and carrying away of the rock sediments leads to the creation of hollows and depressions. 1.1) Sometimes, the action of oncoming winds will wear off the weaker rocks until the water table is reached. Thus, water seeps out forming oasis in the deflated hallows. For example, the Fayum Hallow of Egypt, which is more than 150 feet below sea level 2) PEDESTAL ROCKS The abrasion activity on the weaker rock strata sculptures the rock pedestal. Such rock pillars are further eroded near the base, where friction is greater. This process of undercutting produces mushroom-shaped structures called mushroom rocks in Sahara, known as gaur rocks. 3) ZEUGENS These are tabular masses which have alternative bands of hard and soft rocks. The sculpting effect of wind abrasion wears them into ridge and furrow landscape. Wind erosion further undercuts the lower soft rock so that deep furrows are developed. The hard rocks which stand above the furrows as ridges are called zeugens. They may be as high as 30m. 4) YARDANGS When bands of hard and weak rocks lie parallel to the prevailing winds, the abrasion activity produces ridge and furrow landscape. The belts of resistant rocks stand up as sloping ridges with an average height of 10-15 m but have lengths up to 1 km. These ridges are called Yardangs. For example, the Great Sphinx of Giza. 5) MESAS AND BUTTE Mesa is a Spanish word which means table. It is a flat table like landmass with a very resistant horizontal top layer and has very steep sides. The hard top layer protects the underlying layers from being eroded. Mesas are found in canyons. Prolonged denudation of mesas leads to a decrease in the area that it occupies. It, therefore, becomes isolated flat-topped hills, which are much lesser than the size of mesas, called buttes. 6) INSELBERGS In German, inselberg means an island mountain. Inselbergs are isolated residual hills rising abruptly from the level ground. They are characterized by steep slopes and rounded tops.
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आधुनिक यूरोप के निर्माण में पुर्नजागरण की भूमिका व्यापक व विविध थी, चर्चा कीजिये।( 150-200 शब्द/10 अंक) In the formation of modern Europe, the role of the renaissance was broad and diverse, discuss. (150 -200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण भूमिका में पुनर्जागरण को समझाये । उत्तर के दूसरे भाग में पुर्नजागरण की प्रकृति पर चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में पुर्नजागरण के विविध प्रभावों की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष में इसके प्रभाव स्वरुप उत्पन्न महत्वपूर्ण क्रांतियों को लिखिए । उत्तर :- 14 - 17 वीं शताब्दी के यूरोप में सांस्कृतिक स्तर पर विभिन्न परिवर्तन देखे गए जिसे इतिहासकारों के द्वारा रेनेसाँ या पुनर्जागरण से संबोधित किया गया | पुनर्जागरण के केंद्र में मानवतावाद व वैज्ञानिक चिंतन पद्धति का विकास मुख्य तत्व के रूप में शामिल थे| कालक्रम में इन्हीं परिवर्तनों ने भौगोलिक खोजों, ईसाई धर्म में सुधार और प्रबोधन के लिए आधार का कार्य किया जिसने आधुनिक विश्व के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| इसका शाब्दिक अर्थ पुनर्जन्म या फिर से जन्म लेनाहै। व्यापक अर्थ में इसका संबंध चेतना या बौद्धिक हलचल से है| इसके केंद्र में मानवतावाद, व्यक्तिवाद,साहसिक प्रवृत्ति तथा वैज्ञानिक चिंतन आदि है | पुनर्जागरण की प्रकृति :- मानववादी चिंतन की परम्परा की शुरुवात । धर्म युद्ध जिसमे ईसाई धर्म को इस्लाम के बढ़ते प्रभाव के साथ साथ स्वंय का दो भागो में बटवारा जैसे कैथोलिक और प्रोटोस्टंट में विभाजन को झेलना पड़ा। प्रिंटिंग प्रेस के अविष्कार ने विचारकों के विचारों को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने का काम किया और साथ ही लोगो को आपस में जोड़ने का भी काम किया। नगरों का उन्मुक्त वातावरण जैसे कारकों ने इस चेतना के उदय और विकास को और बढ़ा दिया। स्थापत्य कला का विकास तथा वहां मानवीय सुविधाओं को ध्यान में रखा जाने लगा | मूर्तिकला में मानवीय भावों को महत्त्व दिया जाने लगा। चित्रकला में मानवीय संवेदना का चित्रण आदि शुरू हुआ । इससे पूर्व इन सभी क्षेत्रों पर धर्म का प्रभावथा । उपरोक्त प्रकृति के कारण यूरोप में पुर्नजागरण एक नवीन शुरुवात थी, जिसमे यूरोप के मध्यवर्ग के साथ वहाँ का राजतंत्र और आधुनिक विचारको की पूरी फौज तैयार खड़ी थी । जिसका व्यापक प्रभाव अनेक क्षेत्रों में देखा जा सकता है, जो निम्नवत हैं :- धार्मिक क्षेत्र पर प्रभाव :- कैथोलिक धर्म में व्याप्त बुराईयों के विरुद्ध प्रोटोस्टेंट आन्दोलन,जो की प्रकृति में सुधारवादी था। धार्मिक सुधार के कारण सामाजिक क्षेत्र में वैज्ञानिक चिंतन और वैज्ञानिक शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिला । भौगोलिक खोजो को प्रोत्साहन :- पुर्न जागरण ने पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत बनाया, जिसके कारण ज्यादा लाभ कमाने के लिए उपनिवेशीकरण को बढ़ावा मिला । जिसको प्रभावी बनाने के लिए भौगोलिक खोजो की शुरुवात हुई ।15 वीं सदी के अंतिम दशक के दौरान यूरोपीय के द्वारा अफ्रीका, जापान , चीन और अमेरिका के विभिन क्षेत्रों से संपर्क स्थापित किये गए। एक तरफ पुनर्जागरण चेतना ने भौगोलिक खोजों का आधार तैयार किया। वहीँ दूसरी तरफ भौगोलिक खोजों ने पुनर्जागरण चेतना एवं वैज्ञानिक चिंतन को मजबूती प्रदान की | यूरोपीय राष्ट्र राज्यों के द्वारा व्यापारियों को समर्थन दिया गया और व्यापारियों ने शासकों को समर्थन दिया | इससे शासकों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई तथा निरंकुश राजतन्त्र का दौर प्रारंभ हुआ | वैज्ञानिक क्रांति :- विभिन्न वैज्ञानिक उपलब्द्धियों ने समाज के चेतना को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया । जैसे- केप्लर,कोपरनिकस के द्वारा किये गए अविष्कारों आदि ने । वैज्ञानिक क्रांति ने वैज्ञानिक शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया और उभरते हुए पूंजीवाद ने भी इसका समर्थन किया । राजनीतिक प्रभाव ;- सामंतवादी व्यवस्था कमजोर हुई , राजतंत्र की स्थापना जिसमे राजा की स्थिति मजबूत हुई व्यापारिक फायदे के लिए उपनिवेशों की स्थापना की जाने लगी । राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्र राज्य की अवधारणा को मजबूत किया और इससे शासकों की शक्ति भी बढ़ी। पुनर्जागरण से उपजी चेतना ने समाज और संस्कृति के साथ-साथ जीवन के प्रत्येक पहलुओं को प्रभावित किया। जिसमे मध्ययुगीन धार्मिक चिंतन से मुक्ति और आधुनिक उदार चिंतन परम्परा का विकास मुख्य लक्ष्य के रूप में विद्यमान थी| इसी आधार पर वैज्ञानिक चिंतन परंपरा का विकास हुआ। जहाँ धर्म और राज्य सत्ता पर प्रश्न खड़े करने के अधिकार की बात की गयी, जिसने मानवीय संवेदना ,अधिकार और व्यक्तिकता को बल प्रदान किया | लगभग 400 वर्ष तक चली इस प्रक्रिया ने आधुनिक सोच को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी क्रांति ,फ्रेंच क्रांति आदि जैसी महान क्रांतियाँ घटित हुईं ।
##Question:आधुनिक यूरोप के निर्माण में पुर्नजागरण की भूमिका व्यापक व विविध थी, चर्चा कीजिये।( 150-200 शब्द/10 अंक) In the formation of modern Europe, the role of the renaissance was broad and diverse, discuss. (150 -200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में पुनर्जागरण को समझाये । उत्तर के दूसरे भाग में पुर्नजागरण की प्रकृति पर चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में पुर्नजागरण के विविध प्रभावों की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष में इसके प्रभाव स्वरुप उत्पन्न महत्वपूर्ण क्रांतियों को लिखिए । उत्तर :- 14 - 17 वीं शताब्दी के यूरोप में सांस्कृतिक स्तर पर विभिन्न परिवर्तन देखे गए जिसे इतिहासकारों के द्वारा रेनेसाँ या पुनर्जागरण से संबोधित किया गया | पुनर्जागरण के केंद्र में मानवतावाद व वैज्ञानिक चिंतन पद्धति का विकास मुख्य तत्व के रूप में शामिल थे| कालक्रम में इन्हीं परिवर्तनों ने भौगोलिक खोजों, ईसाई धर्म में सुधार और प्रबोधन के लिए आधार का कार्य किया जिसने आधुनिक विश्व के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| इसका शाब्दिक अर्थ पुनर्जन्म या फिर से जन्म लेनाहै। व्यापक अर्थ में इसका संबंध चेतना या बौद्धिक हलचल से है| इसके केंद्र में मानवतावाद, व्यक्तिवाद,साहसिक प्रवृत्ति तथा वैज्ञानिक चिंतन आदि है | पुनर्जागरण की प्रकृति :- मानववादी चिंतन की परम्परा की शुरुवात । धर्म युद्ध जिसमे ईसाई धर्म को इस्लाम के बढ़ते प्रभाव के साथ साथ स्वंय का दो भागो में बटवारा जैसे कैथोलिक और प्रोटोस्टंट में विभाजन को झेलना पड़ा। प्रिंटिंग प्रेस के अविष्कार ने विचारकों के विचारों को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने का काम किया और साथ ही लोगो को आपस में जोड़ने का भी काम किया। नगरों का उन्मुक्त वातावरण जैसे कारकों ने इस चेतना के उदय और विकास को और बढ़ा दिया। स्थापत्य कला का विकास तथा वहां मानवीय सुविधाओं को ध्यान में रखा जाने लगा | मूर्तिकला में मानवीय भावों को महत्त्व दिया जाने लगा। चित्रकला में मानवीय संवेदना का चित्रण आदि शुरू हुआ । इससे पूर्व इन सभी क्षेत्रों पर धर्म का प्रभावथा । उपरोक्त प्रकृति के कारण यूरोप में पुर्नजागरण एक नवीन शुरुवात थी, जिसमे यूरोप के मध्यवर्ग के साथ वहाँ का राजतंत्र और आधुनिक विचारको की पूरी फौज तैयार खड़ी थी । जिसका व्यापक प्रभाव अनेक क्षेत्रों में देखा जा सकता है, जो निम्नवत हैं :- धार्मिक क्षेत्र पर प्रभाव :- कैथोलिक धर्म में व्याप्त बुराईयों के विरुद्ध प्रोटोस्टेंट आन्दोलन,जो की प्रकृति में सुधारवादी था। धार्मिक सुधार के कारण सामाजिक क्षेत्र में वैज्ञानिक चिंतन और वैज्ञानिक शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिला । भौगोलिक खोजो को प्रोत्साहन :- पुर्न जागरण ने पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत बनाया, जिसके कारण ज्यादा लाभ कमाने के लिए उपनिवेशीकरण को बढ़ावा मिला । जिसको प्रभावी बनाने के लिए भौगोलिक खोजो की शुरुवात हुई ।15 वीं सदी के अंतिम दशक के दौरान यूरोपीय के द्वारा अफ्रीका, जापान , चीन और अमेरिका के विभिन क्षेत्रों से संपर्क स्थापित किये गए। एक तरफ पुनर्जागरण चेतना ने भौगोलिक खोजों का आधार तैयार किया। वहीँ दूसरी तरफ भौगोलिक खोजों ने पुनर्जागरण चेतना एवं वैज्ञानिक चिंतन को मजबूती प्रदान की | यूरोपीय राष्ट्र राज्यों के द्वारा व्यापारियों को समर्थन दिया गया और व्यापारियों ने शासकों को समर्थन दिया | इससे शासकों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई तथा निरंकुश राजतन्त्र का दौर प्रारंभ हुआ | वैज्ञानिक क्रांति :- विभिन्न वैज्ञानिक उपलब्द्धियों ने समाज के चेतना को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया । जैसे- केप्लर,कोपरनिकस के द्वारा किये गए अविष्कारों आदि ने । वैज्ञानिक क्रांति ने वैज्ञानिक शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया और उभरते हुए पूंजीवाद ने भी इसका समर्थन किया । राजनीतिक प्रभाव ;- सामंतवादी व्यवस्था कमजोर हुई , राजतंत्र की स्थापना जिसमे राजा की स्थिति मजबूत हुई व्यापारिक फायदे के लिए उपनिवेशों की स्थापना की जाने लगी । राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्र राज्य की अवधारणा को मजबूत किया और इससे शासकों की शक्ति भी बढ़ी। पुनर्जागरण से उपजी चेतना ने समाज और संस्कृति के साथ-साथ जीवन के प्रत्येक पहलुओं को प्रभावित किया। जिसमे मध्ययुगीन धार्मिक चिंतन से मुक्ति और आधुनिक उदार चिंतन परम्परा का विकास मुख्य लक्ष्य के रूप में विद्यमान थी| इसी आधार पर वैज्ञानिक चिंतन परंपरा का विकास हुआ। जहाँ धर्म और राज्य सत्ता पर प्रश्न खड़े करने के अधिकार की बात की गयी, जिसने मानवीय संवेदना ,अधिकार और व्यक्तिकता को बल प्रदान किया | लगभग 400 वर्ष तक चली इस प्रक्रिया ने आधुनिक सोच को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकी क्रांति ,फ्रेंच क्रांति आदि जैसी महान क्रांतियाँ घटित हुईं ।
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How can India use its demographic dividend for its development and also examine the challenges involved? (150 words) 10 marks
Brief approach- define demographic dividend give a brief about India"s demographic dividend comparing with other countries mention the steps taken to reap the benefits of demographic dividend give challenges involved along with possible solutions Answer- Demographic dividend refers to the growth in an economy that is the resultant effect of a change in the age structure of a country’s population. The change in age structure is typically brought on by a decline in fertility and mortality rates. Demographic dividend and India India is presently in the early part of its demographic dividend. However, unless lessons are learnt from other parts of the world, and adequate measures are taken both at the ground and policy levels, it is possible that India will be unable to reap its demographic dividend, and may, in fact, jeopardize its future as a result of inadequate action. The “demographic dividend” accounts for India having the world’s youngest workforce with a median age way below that of China and OECD Countries. Alongside this window of opportunity for India, the global economy is expected to witness a skilled manpower shortage to the extent of around 56 million by 2020. Thus, the “demographic dividend” in India needs to be exploited not only to expand the production possibility frontier but also to meet the skilled manpower requirements of in India and abroad. To reap the benefits of “demographic dividend” , the Eleventh Five Year Plan had favoured the creation of a comprehensive National Skill Development Mission. As a result, a “Coordinated Action on Skill Development” with three-tier institutional structure consisting of (i) Prime Minister’s National Council on Skill Development has spelt out policy advice, and direction in the form of “Core Principles” and has given a Vision to create 500 million skilled people by 2022 through skill systems (which must have high degree of inclusivity), (ii) National Skill Development Coordination Board (NSDCB)has taken upon itself the task of coordinating the skill development efforts of a large number of Central Ministries/Departments and States. (iii) National Skill Development Corporation (NSDC)has geared itself for preparing comprehensive action plans and activities which would promote PPP models of financing skill development. The three-tier structure has laid the institutional foundations for a more proactive role of public (Centre plus States) and private and third sector interactions and interfaces for harnessing the benefits of demographic dividend. It has also been able to focus on skill development through the creation of a coordinating mechanism. It has also made the issue of skill development as an important agenda for the Governments at Centre as well as States. It has articulated the importance of State Governments in the delivery of skill development. Challenges In this regard, various challenges on skill development that merit attention in the remaining years of the current Plan and the Twelfth Five Year Plan are presented below: 1) Government’s preoccupation with providing and financing training has led to overlooking its role in one key area ie. disseminating information about the availability and effectiveness of training programs. 2) Whilst industry associations and individual employers are beginning to show interest involving themselves in the development and management of the ITIs, their involvement in the vocational training system is still at a nascent stage. 3) The management of the Vocational Education and Training System is fragmented and shared between various institutions, especially the NCVT, DGET and the SCVTs. There is a lot of scopes to improve coordination between them and improve their effectiveness through more functional partnerships. 4) There is a need to identify institutions to carry out impact evaluation studies/ tracer studies/ surveys of graduates from vocational institutes on a regular basis. 5) Since funding is largely restricted to publicly provided training, little attention is paid to financing as an innovative means to encourage good quality public/private/ in-service training. 6) Vocational training institutes should be given greater freedom in terms of resource generation (sale of production or service activities, consultancy) and in utilizing the proceeds for not only cost recovery but also incentivizing those who generate revenues. way forward Proper dissemination of information about the benefits of training is required for this government need to popularise schemes like skill India mission, ustad scheme, etc Industrial associations and trade unions need to focus on providing vocational training to students pursuing diploma and degree courses so that their skills and industrial requirements can be matched. Coordination between vocational training institutes at the centre, state and district level needs to be established. Corporate funding to institutes would make them more independent and hence more efficient.
##Question:How can India use its demographic dividend for its development and also examine the challenges involved? (150 words) 10 marks##Answer:Brief approach- define demographic dividend give a brief about India"s demographic dividend comparing with other countries mention the steps taken to reap the benefits of demographic dividend give challenges involved along with possible solutions Answer- Demographic dividend refers to the growth in an economy that is the resultant effect of a change in the age structure of a country’s population. The change in age structure is typically brought on by a decline in fertility and mortality rates. Demographic dividend and India India is presently in the early part of its demographic dividend. However, unless lessons are learnt from other parts of the world, and adequate measures are taken both at the ground and policy levels, it is possible that India will be unable to reap its demographic dividend, and may, in fact, jeopardize its future as a result of inadequate action. The “demographic dividend” accounts for India having the world’s youngest workforce with a median age way below that of China and OECD Countries. Alongside this window of opportunity for India, the global economy is expected to witness a skilled manpower shortage to the extent of around 56 million by 2020. Thus, the “demographic dividend” in India needs to be exploited not only to expand the production possibility frontier but also to meet the skilled manpower requirements of in India and abroad. To reap the benefits of “demographic dividend” , the Eleventh Five Year Plan had favoured the creation of a comprehensive National Skill Development Mission. As a result, a “Coordinated Action on Skill Development” with three-tier institutional structure consisting of (i) Prime Minister’s National Council on Skill Development has spelt out policy advice, and direction in the form of “Core Principles” and has given a Vision to create 500 million skilled people by 2022 through skill systems (which must have high degree of inclusivity), (ii) National Skill Development Coordination Board (NSDCB)has taken upon itself the task of coordinating the skill development efforts of a large number of Central Ministries/Departments and States. (iii) National Skill Development Corporation (NSDC)has geared itself for preparing comprehensive action plans and activities which would promote PPP models of financing skill development. The three-tier structure has laid the institutional foundations for a more proactive role of public (Centre plus States) and private and third sector interactions and interfaces for harnessing the benefits of demographic dividend. It has also been able to focus on skill development through the creation of a coordinating mechanism. It has also made the issue of skill development as an important agenda for the Governments at Centre as well as States. It has articulated the importance of State Governments in the delivery of skill development. Challenges In this regard, various challenges on skill development that merit attention in the remaining years of the current Plan and the Twelfth Five Year Plan are presented below: 1) Government’s preoccupation with providing and financing training has led to overlooking its role in one key area ie. disseminating information about the availability and effectiveness of training programs. 2) Whilst industry associations and individual employers are beginning to show interest involving themselves in the development and management of the ITIs, their involvement in the vocational training system is still at a nascent stage. 3) The management of the Vocational Education and Training System is fragmented and shared between various institutions, especially the NCVT, DGET and the SCVTs. There is a lot of scopes to improve coordination between them and improve their effectiveness through more functional partnerships. 4) There is a need to identify institutions to carry out impact evaluation studies/ tracer studies/ surveys of graduates from vocational institutes on a regular basis. 5) Since funding is largely restricted to publicly provided training, little attention is paid to financing as an innovative means to encourage good quality public/private/ in-service training. 6) Vocational training institutes should be given greater freedom in terms of resource generation (sale of production or service activities, consultancy) and in utilizing the proceeds for not only cost recovery but also incentivizing those who generate revenues. way forward Proper dissemination of information about the benefits of training is required for this government need to popularise schemes like skill India mission, ustad scheme, etc Industrial associations and trade unions need to focus on providing vocational training to students pursuing diploma and degree courses so that their skills and industrial requirements can be matched. Coordination between vocational training institutes at the centre, state and district level needs to be established. Corporate funding to institutes would make them more independent and hence more efficient.
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What do you understand by the concept of demand and supply in microeconomics? Discuss the determinants of demand and supply. [150 words, 10 marks]
Approach: In the brief talk about the conceptof supply and demand. Talk about various factors that are determining the demand and supply. Conclude suitably. The law of supply and demand is a theory that explains the interaction between the sellers of a resource and the buyers of that resource. The theory defines what affects the relationship between the price of the product the willingness people to either buy or sell the product. The law of demand talks about, as the price of a good increase, the quantity demanded decreases. Conversely, as the price of a good decreases, the quantity demanded increases. There are various factors that determine demand: Price of the good. Prices or related goods available. Disposable income of individuals. Season. Tastes, preferences, expectations of consumers. Population, etc. On the other hand, the Law of supply talks about the relationship between the price of a good and the quantity that the producers are willing to produce. As the price of a good increase, the quantity that the producers are willing to produce increases. Conversely, as the price of good decreases, the quantity that the producers are willing to produce also decreases.Thus direct relationship is there. Similar to the demand, there are various factors determining Supply: Price of the good in the market. Prices or related goods such as intermediates, raw materials. Availability of resources. The technology that is available. Expectation of consumers Regulations, etc Even apart from this, there can be several independent factors that can affect the shape of market supply and demand, influencing both the prices and quantities that we observe in markets.
##Question:What do you understand by the concept of demand and supply in microeconomics? Discuss the determinants of demand and supply. [150 words, 10 marks]##Answer:Approach: In the brief talk about the conceptof supply and demand. Talk about various factors that are determining the demand and supply. Conclude suitably. The law of supply and demand is a theory that explains the interaction between the sellers of a resource and the buyers of that resource. The theory defines what affects the relationship between the price of the product the willingness people to either buy or sell the product. The law of demand talks about, as the price of a good increase, the quantity demanded decreases. Conversely, as the price of a good decreases, the quantity demanded increases. There are various factors that determine demand: Price of the good. Prices or related goods available. Disposable income of individuals. Season. Tastes, preferences, expectations of consumers. Population, etc. On the other hand, the Law of supply talks about the relationship between the price of a good and the quantity that the producers are willing to produce. As the price of a good increase, the quantity that the producers are willing to produce increases. Conversely, as the price of good decreases, the quantity that the producers are willing to produce also decreases.Thus direct relationship is there. Similar to the demand, there are various factors determining Supply: Price of the good in the market. Prices or related goods such as intermediates, raw materials. Availability of resources. The technology that is available. Expectation of consumers Regulations, etc Even apart from this, there can be several independent factors that can affect the shape of market supply and demand, influencing both the prices and quantities that we observe in markets.
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क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि " भारत में उत्तरदायित्व का अभाव सुशासन के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है|" चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Do you agree with the argument that "Lack of accountability in India is the biggest hurdle in building good governance". Discuss. (150-200 words / 10 marks)
दृष्टिकोण: भूमिका में सुशासन का अर्थ स्पष्ट कीजिए| मुख्य भाग मे उत्तरदायित्व का सुशासन की स्थापना मे योगदान स्पष्ट कीजिए| "उत्तरदायित्व का अभाव किस प्रकार सुशासन को प्रभावित करता है" की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष मे कुछ सुझाव प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: सुशासन से तात्पर्य संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु सामाजिक , आर्थिक ,राजनीतिक इकाइयों को इस तरह निगमित करना कि उनसे वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। सुशासन के द्वारा प्रशासनिक क्रियाकलापों के द्वारा सामाजिक , आर्थिक, व राजनीतिक न्याय को प्राप्त किया जा सकता है तथा प्रशासन को भ्रष्टाचार व लालफीताशाही से मुक्त करता है। उत्तरदायित्व सुशासन की वह मूल विशेषता है जो सार्वजनिक निजी और स्वैच्छिक क्षेत्र के अधिकारियों को अपने कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाता है| उत्तरदायित्व का निर्धारण चार चरणों में किया जाता है, यथा- मानकों का निर्धारण - उत्तरदायी व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपेक्षित व्यवहार की जांच करने के लिए कुछ मानदंडों को निर्धारित करे| मानकों की उचित जांच - इसके लिए कुछ ऐसे संगठनों या अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है जो यह पता लगा सकें कि उत्तरदायी व्यक्ति ने अपेक्षित मानकों को पूरा किया है या नहीं| जवाबदेहिता सुनिश्चित करना- ऐसी प्रक्रिया जिसमे उत्तरदायी व्यक्ति को अपने कार्यों का बचाव करने, उलझे हुए प्रश्नों का सामना करने और स्वयं को सही साबित करने की आवश्यकता होती है| स्वीकृति अथवा अस्वीकृति- इस प्रक्रिया के द्वारा उत्तरदायी व्यक्ति यदि अपेक्षित मानकों का पालन नहीं करता है तो उसे दंडित किया जाता है और यदि वह अपेक्षित मानकों के अनुकूल आचरण करता है तो उसे पुरस्कृत किया जाता है| उत्तरदायित्व के माध्यम से- उत्तरदायित्व मे राज्य के भीतर भी औपचारिक संबंध होते हैं| जिसके तहत राज्य का एक कर्ता दूसरे से स्पष्टीकरण मांगने या उसके ऊपर जुर्माना लगाने का औपचारिक अधिकार रखता है| इसके तहत सामान्य नागरिक या समुदाय सरकार के संगठनों एवं संस्थाओं के उत्तरदायित्व को जाँचती है| उत्तरदायित्व के तहत एक नागरिक आंदोलनों, मास मीडिया आदि के माध्यम से नागरिक अधिकारियों के ऊपर मानकों के अनुकूल काम करने के लिए दवाब डाल सकता है| सामान्य नागरिकों या समुदायों की बात को सरकार तक पहुंचाता है| इसके माध्यम से राज्य के कार्यों की बेहतर निगरानी की जाती है| यह नीति निर्माण, बजट निर्माण और व्यय पर नजर रखने तथा इसी प्रकार की अन्य गतिविधियों मे जनता की ओर से सरकार पर दवाब बनती है| उत्तरदायित्व के माध्यम से सामुदायिक अधिवक्ताओं को सरकारी एजेंसियों के बारे मे जानकारी प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है| उत्तरदायित्व ऊर्ध्वाधर उत्तरदायी नेताओं को बाध्य करती है अर्थात सरकारियों को उत्तर देने के लिए दवाब बनाती है| उत्तरदायित्व का अभाव एवं सुशासन: हालांकि उत्तरदायित्व सामाजिक जवाबदेहिता के रूप मे काम करता है किन्तु अनेकों बार यह अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन भी उचित मानदंडों के अनुकूल नहीं करता| उदाहरण के लिए-भारत मे कुछ मीडिया चैनल सरकार के मुखपत्र का रूप धारण कर रहे हैं तो कुछ विपक्षी दलों के मुखपत्र बन चुके हैं| हाल ही में trp घोटाले ने इसके विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए हैं| विकर्णीय उत्तरदायित्व से जुड़े अनेक माध्यम पूंजीपतियों द्वारा निर्मित उत्पादों को प्रचारित करने का माध्यम बन गए हैं| सुशासन के लिए उत्तरदायित्व की अनिवार्यता:उत्तरदायित्व के बिना शासन की प्रभावशीलता और दक्षता का मूल्यांकन करना जटिल हो जाता है| उत्तरदायित्व के बिना संस्थाओं एवं संगठनों की विश्वसनीयता का विस्तार जटिल हो जाता है| उत्तरदायित्व शासन का वह आधार है जिसके माध्यम से विधि के शासन और पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जाता है एवं इस प्रकार यह सुशासन की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें लागू की जानी चाहिए|
##Question:क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि " भारत में उत्तरदायित्व का अभाव सुशासन के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है|" चर्चा कीजिए|(150-200 शब्द/10 अंक) Do you agree with the argument that "Lack of accountability in India is the biggest hurdle in building good governance". Discuss. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में सुशासन का अर्थ स्पष्ट कीजिए| मुख्य भाग मे उत्तरदायित्व का सुशासन की स्थापना मे योगदान स्पष्ट कीजिए| "उत्तरदायित्व का अभाव किस प्रकार सुशासन को प्रभावित करता है" की चर्चा कीजिए| निष्कर्ष मे कुछ सुझाव प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर: सुशासन से तात्पर्य संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु सामाजिक , आर्थिक ,राजनीतिक इकाइयों को इस तरह निगमित करना कि उनसे वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। सुशासन के द्वारा प्रशासनिक क्रियाकलापों के द्वारा सामाजिक , आर्थिक, व राजनीतिक न्याय को प्राप्त किया जा सकता है तथा प्रशासन को भ्रष्टाचार व लालफीताशाही से मुक्त करता है। उत्तरदायित्व सुशासन की वह मूल विशेषता है जो सार्वजनिक निजी और स्वैच्छिक क्षेत्र के अधिकारियों को अपने कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाता है| उत्तरदायित्व का निर्धारण चार चरणों में किया जाता है, यथा- मानकों का निर्धारण - उत्तरदायी व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपेक्षित व्यवहार की जांच करने के लिए कुछ मानदंडों को निर्धारित करे| मानकों की उचित जांच - इसके लिए कुछ ऐसे संगठनों या अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है जो यह पता लगा सकें कि उत्तरदायी व्यक्ति ने अपेक्षित मानकों को पूरा किया है या नहीं| जवाबदेहिता सुनिश्चित करना- ऐसी प्रक्रिया जिसमे उत्तरदायी व्यक्ति को अपने कार्यों का बचाव करने, उलझे हुए प्रश्नों का सामना करने और स्वयं को सही साबित करने की आवश्यकता होती है| स्वीकृति अथवा अस्वीकृति- इस प्रक्रिया के द्वारा उत्तरदायी व्यक्ति यदि अपेक्षित मानकों का पालन नहीं करता है तो उसे दंडित किया जाता है और यदि वह अपेक्षित मानकों के अनुकूल आचरण करता है तो उसे पुरस्कृत किया जाता है| उत्तरदायित्व के माध्यम से- उत्तरदायित्व मे राज्य के भीतर भी औपचारिक संबंध होते हैं| जिसके तहत राज्य का एक कर्ता दूसरे से स्पष्टीकरण मांगने या उसके ऊपर जुर्माना लगाने का औपचारिक अधिकार रखता है| इसके तहत सामान्य नागरिक या समुदाय सरकार के संगठनों एवं संस्थाओं के उत्तरदायित्व को जाँचती है| उत्तरदायित्व के तहत एक नागरिक आंदोलनों, मास मीडिया आदि के माध्यम से नागरिक अधिकारियों के ऊपर मानकों के अनुकूल काम करने के लिए दवाब डाल सकता है| सामान्य नागरिकों या समुदायों की बात को सरकार तक पहुंचाता है| इसके माध्यम से राज्य के कार्यों की बेहतर निगरानी की जाती है| यह नीति निर्माण, बजट निर्माण और व्यय पर नजर रखने तथा इसी प्रकार की अन्य गतिविधियों मे जनता की ओर से सरकार पर दवाब बनती है| उत्तरदायित्व के माध्यम से सामुदायिक अधिवक्ताओं को सरकारी एजेंसियों के बारे मे जानकारी प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है| उत्तरदायित्व ऊर्ध्वाधर उत्तरदायी नेताओं को बाध्य करती है अर्थात सरकारियों को उत्तर देने के लिए दवाब बनाती है| उत्तरदायित्व का अभाव एवं सुशासन: हालांकि उत्तरदायित्व सामाजिक जवाबदेहिता के रूप मे काम करता है किन्तु अनेकों बार यह अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन भी उचित मानदंडों के अनुकूल नहीं करता| उदाहरण के लिए-भारत मे कुछ मीडिया चैनल सरकार के मुखपत्र का रूप धारण कर रहे हैं तो कुछ विपक्षी दलों के मुखपत्र बन चुके हैं| हाल ही में trp घोटाले ने इसके विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए हैं| विकर्णीय उत्तरदायित्व से जुड़े अनेक माध्यम पूंजीपतियों द्वारा निर्मित उत्पादों को प्रचारित करने का माध्यम बन गए हैं| सुशासन के लिए उत्तरदायित्व की अनिवार्यता:उत्तरदायित्व के बिना शासन की प्रभावशीलता और दक्षता का मूल्यांकन करना जटिल हो जाता है| उत्तरदायित्व के बिना संस्थाओं एवं संगठनों की विश्वसनीयता का विस्तार जटिल हो जाता है| उत्तरदायित्व शासन का वह आधार है जिसके माध्यम से विधि के शासन और पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जाता है एवं इस प्रकार यह सुशासन की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें लागू की जानी चाहिए|
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अमेरिकी क्रांति के कारणों को स्पष्ट कीजिए। ऐसा माना जाता है कि इसके परिणामस्वरूप न केवल एक नए राष्ट्र का उदय हुआ बल्कि मानव जाति की दृष्टि से नए युग का भी आरंभ हुआ। विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द) Explain the causes of the American Revolution. It is believed that as a result of this not only did the emergence of a new nation, but the new era also started from the perspective of mankind. Analyse. (200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में अमेरिकी क्रांति के उद्भव को लिखिए। इसके पश्चात कारणों को स्पष्ट कीजिए। इस क्रांति का अमेरिका तथा विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए जिससे स्पष्ट हो कि अमेरिका एक नए राष्ट्र के रूप में उदय हुआ तथा इसका प्रभाव मानव हितों पर पड़ा। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण: आर्थिक कारण: अमेरिकी से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण। कपास ,तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा, हालाँकि उपरोक्त कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू न किये जाने के कारण अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा था | राजनीतिक कारण: ब्रिटिश संसद द्वारा निर्मित क़ानूनों को अमेरिकी लोगों पर थोपा गया। निवासियों को सीमित अधिकार प्राप्त थे। सामाजिक कारण: अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ कुछ वैसे वर्गों का उदय जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे- शिक्षित वर्ग,व्यापारी वर्ग ,भूमि माफियाओं का वर्ग ,तस्कर आदि। यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, वाल्टेयर जैसे का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया| सप्त वर्षीय युद्ध एवं ब्रिटिश सरकार से टकराव: सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया| कुछ नए कानून को भी लागू किये गए जैसे-स्टाम्प एक्ट, सुगर एक्ट,करेंसी एक्ट आदि तत्कालिक कारण: बोस्टन चाय पार्टी की घटना ने अमेरिका में क्रांति की शुरुआत कर दी। क्योंकि अमेरिकियों को कंपनी का एकाधिकार पसंद नहीं था। अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका के नाम से एक शक्ति अस्तित्व में आया। 1781 में युद्ध की समाप्ति के पश्चात 13 स्वतंत्र राज्यों ने संघीय संविधान को स्वीकार किया। यह उपनिवेशवाद के खिलाफ पहली सफल लड़ाई थी। इसके बाद अमेरिकी की सम्पूर्ण राजनीतिक संरचना बादल जाती है। अमेरिका में लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष संसदीय सरकार की व्यवस्था प्रारम्भ हुई। क्रांति ने पूंजीवाद के मार्ग की सभी बाधाओं को समाप्त कर इसके विकास को प्रोत्साहन दिया। आर्थिक प्रतिबंध समाप्त होने के कारण व्यापार एवं उद्योगों का विकास होता है। सामाजिक क्षेत्र में भी शिक्षा का व्यापक प्रभाव पड़ता है। नस्लवाद के विरुद्ध व्यापक विरोध हुआ। मानवीय भावनाओं को सम्मान मिलना प्रारम्भ हुआ। क्रांति के कारण अमेरिका ने अपने बन्दरगाहों को विश्व व्यापार के लिए खोल दिया। नौपरिवहन का व्यापक विकास हुआ। आधुनिक मानव की प्रगति में अमेरिकी क्रांति एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इसके परिणामस्वरूप न केवल नए राष्ट्र का उदय हुआ बल्कि मानव जाति की दृष्टि से एक नए युग का भी आरंभ हुआ। इस क्रांति के पश्चात अमेरिका ने दुनिया के सामने चार आदर्श प्रस्तुत किए- गणतंत्रवाद, संविधानवाद, संघवाद, जनतंत्र। न केवल ये आदर्श प्रस्तुत किए गए बल्कि इनको जीवंतता प्रदान की गयी। इस क्रांति ने दुनिया को इस धारणा कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र एवं समान है। उसे अपनी स्वंतंत्रता एवं अधिकार कि रक्षा के लिए संघर्ष करने के अधिकार है, धरातल पर प्रयोगिक स्वरूप देने का प्रथम प्रयास किया। यह प्रयास पूरे विश्व में आज भी जारी है। इस क्रांति के परिणाम स्वरूप जिस जनतांत्रिक व्यवस्था का जन्म हुआ उसमें पहली बार सर्वसाधारण को मताधिकार प्राप्त हुआ। इस क्रांति के पश्चात विश्व का प्रथम लिखित संविधान अस्तित्व में आया तथा यह परंपरा के रूप में प्रचलित हो गया। अतः यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अमेरिकी क्रांति विश्व इतिहास की एक अतुलनीय घटना थी। जिसने विश्व के सामने नए आदर्श व सिद्धान्त प्रस्तुत किए। दीर्घकाल मे अमेरिका विश्व की महाशक्ति बन गया। इस क्रांति के आदर्शों ने विश्व की अन्य क्रांतियों का भी मार्ग प्रशस्त किया।
##Question:अमेरिकी क्रांति के कारणों को स्पष्ट कीजिए। ऐसा माना जाता है कि इसके परिणामस्वरूप न केवल एक नए राष्ट्र का उदय हुआ बल्कि मानव जाति की दृष्टि से नए युग का भी आरंभ हुआ। विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द) Explain the causes of the American Revolution. It is believed that as a result of this not only did the emergence of a new nation, but the new era also started from the perspective of mankind. Analyse. (200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में अमेरिकी क्रांति के उद्भव को लिखिए। इसके पश्चात कारणों को स्पष्ट कीजिए। इस क्रांति का अमेरिका तथा विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए जिससे स्पष्ट हो कि अमेरिका एक नए राष्ट्र के रूप में उदय हुआ तथा इसका प्रभाव मानव हितों पर पड़ा। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। अमेरिकी क्रांति आधुनिक विश्व इतिहास की महान घटनाओं में से एक थी। यह न तो घोर गरीबी के कारण उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और ना ही सामंती व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होने का परिणाम बल्कि यह संघर्ष अमेरिका में स्थित 13 ब्रिटिश उपनिवेशों द्वारा इंग्लैंड की इच्छा के विरुद्ध स्वतन्त्रता कायम रखने व गलत औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह था। इस क्रांति के परिणामस्वरूप 1776 में अमेरिका स्वतंत्र हुआ। अमेरिकी क्रांति के कारण: आर्थिक कारण: अमेरिकी से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण। कपास ,तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा, हालाँकि उपरोक्त कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू न किये जाने के कारण अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा था | राजनीतिक कारण: ब्रिटिश संसद द्वारा निर्मित क़ानूनों को अमेरिकी लोगों पर थोपा गया। निवासियों को सीमित अधिकार प्राप्त थे। सामाजिक कारण: अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। समय के साथ कुछ वैसे वर्गों का उदय जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे- शिक्षित वर्ग,व्यापारी वर्ग ,भूमि माफियाओं का वर्ग ,तस्कर आदि। यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, वाल्टेयर जैसे का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया| सप्त वर्षीय युद्ध एवं ब्रिटिश सरकार से टकराव: सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया| कुछ नए कानून को भी लागू किये गए जैसे-स्टाम्प एक्ट, सुगर एक्ट,करेंसी एक्ट आदि तत्कालिक कारण: बोस्टन चाय पार्टी की घटना ने अमेरिका में क्रांति की शुरुआत कर दी। क्योंकि अमेरिकियों को कंपनी का एकाधिकार पसंद नहीं था। अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका के नाम से एक शक्ति अस्तित्व में आया। 1781 में युद्ध की समाप्ति के पश्चात 13 स्वतंत्र राज्यों ने संघीय संविधान को स्वीकार किया। यह उपनिवेशवाद के खिलाफ पहली सफल लड़ाई थी। इसके बाद अमेरिकी की सम्पूर्ण राजनीतिक संरचना बादल जाती है। अमेरिका में लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष संसदीय सरकार की व्यवस्था प्रारम्भ हुई। क्रांति ने पूंजीवाद के मार्ग की सभी बाधाओं को समाप्त कर इसके विकास को प्रोत्साहन दिया। आर्थिक प्रतिबंध समाप्त होने के कारण व्यापार एवं उद्योगों का विकास होता है। सामाजिक क्षेत्र में भी शिक्षा का व्यापक प्रभाव पड़ता है। नस्लवाद के विरुद्ध व्यापक विरोध हुआ। मानवीय भावनाओं को सम्मान मिलना प्रारम्भ हुआ। क्रांति के कारण अमेरिका ने अपने बन्दरगाहों को विश्व व्यापार के लिए खोल दिया। नौपरिवहन का व्यापक विकास हुआ। आधुनिक मानव की प्रगति में अमेरिकी क्रांति एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इसके परिणामस्वरूप न केवल नए राष्ट्र का उदय हुआ बल्कि मानव जाति की दृष्टि से एक नए युग का भी आरंभ हुआ। इस क्रांति के पश्चात अमेरिका ने दुनिया के सामने चार आदर्श प्रस्तुत किए- गणतंत्रवाद, संविधानवाद, संघवाद, जनतंत्र। न केवल ये आदर्श प्रस्तुत किए गए बल्कि इनको जीवंतता प्रदान की गयी। इस क्रांति ने दुनिया को इस धारणा कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र एवं समान है। उसे अपनी स्वंतंत्रता एवं अधिकार कि रक्षा के लिए संघर्ष करने के अधिकार है, धरातल पर प्रयोगिक स्वरूप देने का प्रथम प्रयास किया। यह प्रयास पूरे विश्व में आज भी जारी है। इस क्रांति के परिणाम स्वरूप जिस जनतांत्रिक व्यवस्था का जन्म हुआ उसमें पहली बार सर्वसाधारण को मताधिकार प्राप्त हुआ। इस क्रांति के पश्चात विश्व का प्रथम लिखित संविधान अस्तित्व में आया तथा यह परंपरा के रूप में प्रचलित हो गया। अतः यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अमेरिकी क्रांति विश्व इतिहास की एक अतुलनीय घटना थी। जिसने विश्व के सामने नए आदर्श व सिद्धान्त प्रस्तुत किए। दीर्घकाल मे अमेरिका विश्व की महाशक्ति बन गया। इस क्रांति के आदर्शों ने विश्व की अन्य क्रांतियों का भी मार्ग प्रशस्त किया।
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यद्यपि राज्यों के मुख्य सचिव की अपेक्षा कैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त हैं तथापि कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। टिप्पणी कीजिये। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Although Cabinet Secretaries get fewer powers than the chief secretary of the states, However the cabinet secretariat plays an important role in increasing the effectiveness of the executive. Make a comment (150-200 words, Marks - 10 )
दृष्टिकोण 1- भूमिका में कैबिनेट सचिवालय के सन्दर्भ में सुचना दीजिये 2- प्रथम भाग में राज्यों के मुख्य सचिव एवं कैबिनेट सचिव की स्थिति को तुलनात्मक रूप से स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका को स्पष्ट कीजिये| 4- अंतिम महत्वपूर्ण निकाय के रूप में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है जिसमें मंत्रिमंडल को कार्यपालक का दर्जा प्राप्त है| प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल भारत सरकार के पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी लेता है| इस कार्य में मंत्रिमंडल के सहायतार्थ मंत्रिमंडल(कैबिनेट) सचिवालय होता है |इस प्रकार कैबिनेट सचिवालय केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्टाफ एजेंसी है| यह भारत के प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशन और नेतृत्व में कार्य करता है| केंद्र सरकार में उच्च स्तरीय नीति-निर्धारण प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है| इसका राजनीतिक प्रमुख प्रधानमंत्री और प्रशासनिक प्रमुख मंत्रिमंडल सचिव होता है| ध्यातव्य है कि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुकार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| इसे निम्नलिखित विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है| कैबिनेट सचिव बनाम राज्य का मुख्य सचिव · कैबिनेट सचिव यद्यपि कि देश का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है किन्तु वह सबसे शक्तिशाली नौकरशाह नहीं होता है क्योंकि सीधे उसके अधीन कोई विभाग या मंत्रालय नहीं होते हैं| · दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव न केवल राज्य का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है बल्कि वह राज्य सिविल सेवा का प्रधान भी होता है| साथ ही उसके अधीन चार विभाग होते हैं यथा; कार्मिक, पेंशन और लोक शिकायत विभाग, सूचना विभाग, नियोजन विभाग तथा सामान्य प्रशासन विभाग| · कैबिनेट सचिव की शक्तियां बहुत सीमा तक प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा सीमित कर दी जाती हैं किन्तु राज्य में मुख सचिव न केवल कैबिनेट सचिव की भूमिका निभाता है बल्कि वह मुख्यमंत्री के निजी सचिवालय का भी प्रधान होता है|यही कारण है कि मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री द्वारा अपने सबसे विश्वसनीय नौकरशाहों में से की जाती है| · कैबिनेट सचिव सीधे किसी विभाग या मंत्रालय को किसी सरकारी काम के लिए आदेश नहीं दे सकता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव राज्य के अधीन आने वाले सभी विभाग, मंत्रालय आदि के पदाधिकारियों को उपरोक्त निर्देश दे सकता है| · कैबिनेट सचिव किसी मंत्रालय या विभाग के सिविल सेवक के विरुद्ध सीधे कोई अनुशासनात्मक कार्यवाई नहीं कर सकता जबकि राज्य का मुख्य सचिव यह कार्य कर सकता है| और · केंद्र का कैबिनेट सचिव अपने सचिवालय के बाहर मीडिया, जनप्रतिनिधि, आम नागरिक, पत्रकार और उनके शिष्टमंडल, प्रशासनिक सचिव, पुलिस विभाग के प्रमुख आदि के साथ सीढ़ी अंतर्क्रिया नहीं कर पाता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव इनसे निरंतर अंतर्क्रिया करता रहता है| इनकी समस्याएं सुनता है और अपने स्तर से उन्हें हल भी करता है| · इस प्रकार स्पष्ट होता है कि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुअपनी बहुविध एवं महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से कैबिनेट सचिवालय कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में एक सहायक निकाय के रूप में कार्य करता है| इसे निम्नलिखित विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है- कैबिनेट सचिवालय की भूमिका · कैबिनेट सचिवालय का प्रमुख कार्य, कैबिनेट के बैठकों की कार्यसूची तैयार करना है| कैबिनेट में चर्चा के दौरान आवश्यक सूचना और साक्ष्य उपलब्ध कराना , कैबिनेट में होने वाली चर्चा और लिए जाने वाले निर्णय का रिकॉर्ड रखना कैबिनेट सचिवालय का प्रमुख कार्य होता है| · पहले जिन विषयों पर चर्चा हो चुकी है और जिन पर सम्बन्धित विभाग एवं मंत्रालय अमल नहीं किये हैं उन पर दुबारा कैबिनेट की स्वीकृति लेना ताकि उन विभागों एवं मंत्रालयों को सर्कुलर जारी किया जा सके| · कैबिनेट में लिए गए निर्णयों को सम्बन्धित मंत्रालयों एवं विभागों को सूचित करना, कैबिनेट द्वारा लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखना, विभिन्न मंत्रालयों, विभागों एवं एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए समन्वय स्थापित करना, सरकारी काम काज के निपटारे के लिए नियम बनाने आदि का कार्य कैबिनेट सचिवालय द्वारा किया जाता है · कैबिनेट सचिवालय देश में उत्पन्न किसी आपदा से निपटने के लिए आवश्यक प्रबंध एवं उपाय करती है तथा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विभिन्न मंत्रालय एवं विभाग तथा संसद के सामने आने वाली चुनौतियों पर उनको उचित परामर्श देना बशर्ते कि ये मुद्दे उसके समक्ष लाये गए हों| · अध्यादेश जारी करने से सम्बन्धित मुद्दे, राष्ट्रपति द्वारा संसद को किया जाने वाला संबोधन, संसद का सत्र बुलाना, सत्रावसान करने से सम्बन्धित मुद्दे, किसी विदेशी सरकार के साथ होने वाली संधि, समझौते आदि की रूपरेखा तैयार करना, विदेशों में शिष्टमंडल भेजने का प्रस्ताव तैयार करना, सरकार द्वारा शुरू किये गए किसी आपराधिक मुकदमें को बंद करने सम्बन्धी प्रस्ताव तैयार करना, यदि किसी मंत्रालय या विभाग के सामने कोई चुनौती है और यदि उसे कैबिनेट सचिवालय के समक्ष लाया जाता है तो उस पर उचित परामर्श देने आदि दैनिक एवं विशिष्ट चुनौतियों का समाधान कैबिनेट सचिवालय द्वारा प्रस्तुत किया जाता है| · वित्तीय मामलों में सरकार को उचित सुझाव देना जिससे की संसाधनों का अपव्यय रोका जा सके, प्रधानमंत्री द्वारा संदर्भित किसी विषय पर राय देना कैबिनेट सचिवालय के महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है| इसके अतिरिक्त, · रासायनिक हथियारों की होड़ को रोकने सम्बन्धी कन्वेंशन एक्ट 2002 लागू कराना भी कैबिनेट सचिवालय का उत्तरदायित्व होता है| कैबिनेट सचिवालय के कार्यों एवं भूमिका के उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यद्यपि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुकार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है|
##Question:यद्यपि राज्यों के मुख्य सचिव की अपेक्षा कैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त हैं तथापि कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। टिप्पणी कीजिये। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Although Cabinet Secretaries get fewer powers than the chief secretary of the states, However the cabinet secretariat plays an important role in increasing the effectiveness of the executive. Make a comment (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कैबिनेट सचिवालय के सन्दर्भ में सुचना दीजिये 2- प्रथम भाग में राज्यों के मुख्य सचिव एवं कैबिनेट सचिव की स्थिति को तुलनात्मक रूप से स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका को स्पष्ट कीजिये| 4- अंतिम महत्वपूर्ण निकाय के रूप में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है जिसमें मंत्रिमंडल को कार्यपालक का दर्जा प्राप्त है| प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल भारत सरकार के पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी लेता है| इस कार्य में मंत्रिमंडल के सहायतार्थ मंत्रिमंडल(कैबिनेट) सचिवालय होता है |इस प्रकार कैबिनेट सचिवालय केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्टाफ एजेंसी है| यह भारत के प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशन और नेतृत्व में कार्य करता है| केंद्र सरकार में उच्च स्तरीय नीति-निर्धारण प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है| इसका राजनीतिक प्रमुख प्रधानमंत्री और प्रशासनिक प्रमुख मंत्रिमंडल सचिव होता है| ध्यातव्य है कि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुकार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| इसे निम्नलिखित विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है| कैबिनेट सचिव बनाम राज्य का मुख्य सचिव · कैबिनेट सचिव यद्यपि कि देश का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है किन्तु वह सबसे शक्तिशाली नौकरशाह नहीं होता है क्योंकि सीधे उसके अधीन कोई विभाग या मंत्रालय नहीं होते हैं| · दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव न केवल राज्य का सबसे वरिष्ठ नौकरशाह होता है बल्कि वह राज्य सिविल सेवा का प्रधान भी होता है| साथ ही उसके अधीन चार विभाग होते हैं यथा; कार्मिक, पेंशन और लोक शिकायत विभाग, सूचना विभाग, नियोजन विभाग तथा सामान्य प्रशासन विभाग| · कैबिनेट सचिव की शक्तियां बहुत सीमा तक प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा सीमित कर दी जाती हैं किन्तु राज्य में मुख सचिव न केवल कैबिनेट सचिव की भूमिका निभाता है बल्कि वह मुख्यमंत्री के निजी सचिवालय का भी प्रधान होता है|यही कारण है कि मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री द्वारा अपने सबसे विश्वसनीय नौकरशाहों में से की जाती है| · कैबिनेट सचिव सीधे किसी विभाग या मंत्रालय को किसी सरकारी काम के लिए आदेश नहीं दे सकता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव राज्य के अधीन आने वाले सभी विभाग, मंत्रालय आदि के पदाधिकारियों को उपरोक्त निर्देश दे सकता है| · कैबिनेट सचिव किसी मंत्रालय या विभाग के सिविल सेवक के विरुद्ध सीधे कोई अनुशासनात्मक कार्यवाई नहीं कर सकता जबकि राज्य का मुख्य सचिव यह कार्य कर सकता है| और · केंद्र का कैबिनेट सचिव अपने सचिवालय के बाहर मीडिया, जनप्रतिनिधि, आम नागरिक, पत्रकार और उनके शिष्टमंडल, प्रशासनिक सचिव, पुलिस विभाग के प्रमुख आदि के साथ सीढ़ी अंतर्क्रिया नहीं कर पाता| दूसरी ओर राज्य का मुख्य सचिव इनसे निरंतर अंतर्क्रिया करता रहता है| इनकी समस्याएं सुनता है और अपने स्तर से उन्हें हल भी करता है| · इस प्रकार स्पष्ट होता है कि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुअपनी बहुविध एवं महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से कैबिनेट सचिवालय कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में एक सहायक निकाय के रूप में कार्य करता है| इसे निम्नलिखित विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है- कैबिनेट सचिवालय की भूमिका · कैबिनेट सचिवालय का प्रमुख कार्य, कैबिनेट के बैठकों की कार्यसूची तैयार करना है| कैबिनेट में चर्चा के दौरान आवश्यक सूचना और साक्ष्य उपलब्ध कराना , कैबिनेट में होने वाली चर्चा और लिए जाने वाले निर्णय का रिकॉर्ड रखना कैबिनेट सचिवालय का प्रमुख कार्य होता है| · पहले जिन विषयों पर चर्चा हो चुकी है और जिन पर सम्बन्धित विभाग एवं मंत्रालय अमल नहीं किये हैं उन पर दुबारा कैबिनेट की स्वीकृति लेना ताकि उन विभागों एवं मंत्रालयों को सर्कुलर जारी किया जा सके| · कैबिनेट में लिए गए निर्णयों को सम्बन्धित मंत्रालयों एवं विभागों को सूचित करना, कैबिनेट द्वारा लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखना, विभिन्न मंत्रालयों, विभागों एवं एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए समन्वय स्थापित करना, सरकारी काम काज के निपटारे के लिए नियम बनाने आदि का कार्य कैबिनेट सचिवालय द्वारा किया जाता है · कैबिनेट सचिवालय देश में उत्पन्न किसी आपदा से निपटने के लिए आवश्यक प्रबंध एवं उपाय करती है तथा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विभिन्न मंत्रालय एवं विभाग तथा संसद के सामने आने वाली चुनौतियों पर उनको उचित परामर्श देना बशर्ते कि ये मुद्दे उसके समक्ष लाये गए हों| · अध्यादेश जारी करने से सम्बन्धित मुद्दे, राष्ट्रपति द्वारा संसद को किया जाने वाला संबोधन, संसद का सत्र बुलाना, सत्रावसान करने से सम्बन्धित मुद्दे, किसी विदेशी सरकार के साथ होने वाली संधि, समझौते आदि की रूपरेखा तैयार करना, विदेशों में शिष्टमंडल भेजने का प्रस्ताव तैयार करना, सरकार द्वारा शुरू किये गए किसी आपराधिक मुकदमें को बंद करने सम्बन्धी प्रस्ताव तैयार करना, यदि किसी मंत्रालय या विभाग के सामने कोई चुनौती है और यदि उसे कैबिनेट सचिवालय के समक्ष लाया जाता है तो उस पर उचित परामर्श देने आदि दैनिक एवं विशिष्ट चुनौतियों का समाधान कैबिनेट सचिवालय द्वारा प्रस्तुत किया जाता है| · वित्तीय मामलों में सरकार को उचित सुझाव देना जिससे की संसाधनों का अपव्यय रोका जा सके, प्रधानमंत्री द्वारा संदर्भित किसी विषय पर राय देना कैबिनेट सचिवालय के महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है| इसके अतिरिक्त, · रासायनिक हथियारों की होड़ को रोकने सम्बन्धी कन्वेंशन एक्ट 2002 लागू कराना भी कैबिनेट सचिवालय का उत्तरदायित्व होता है| कैबिनेट सचिवालय के कार्यों एवं भूमिका के उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यद्यपि राज्यों केमुख्य सचिव की अपेक्षाकैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तुकार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिवालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है|
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What do you understand by moral policing . Discuss the different ethical issues related to moral policing.( 150 words)
What do you understand by moral policing? Discuss the different ethical issues related to moral policing.( 150 words) Structure:- 1. Definition of Moral Policing 2. Discuss various Ethical issues with Moral Policing 3. Way Forward Answer:- Moral Policing, a form of Vigilantism, is a term which is used to describe vigilante groups which act to enforce a code of morality without any legal authority. In recent time there have been several incidents of moral policing in the various parts of the country, though not new, the malaise has become severe in the recent past. Some of the ethical issues associated with it are as follows; Ethical Issues related to Moral policing:- 1. Violation of rights and dignity of Individuals :- Vigilante groups try to enforce their set of values on others which clear violence of an individual’s independent choice, freedom and dignity. For instance- Adult couples sitting peacefully in a park are threatened by “anti-Romeo Squads”. 2. Attack on modern values :- Using moral policing, many a time vigilant groups try to impose the conservative ideas which are not synced with the modern liberal values. 3. A threat to the safety of women : - Moral policing makes it unsafe for women to step out with men of their choice, inhibit families and foist retrograde notions about the sexes meet. 4. Intolerance : - Few vigilante groups which have religiously fundamental attitudes are intolerable for any mingling of people belonging to different religions. For instance- In the name of “ Love Jihad”, moral policing is used to threaten and sometimes physical damage the people belonging to the other religions. 5. Against the concept of minimum government: - Minimum government means that in the lives of citizens, there would be minimum involvement of governance including policing. In the name of moral policing, vigilant groups interfere in the public and private matters of individuals. 6. Patriarchal Mindset: - People with a patriarchal mindset views the security of women as their duty, for they are perceived as weaker sex and gullible. So, they would impose restrictions on women in terms of speech, attitude, clothing, public behaviour etc. 7. Lack of faith in judiciary :- Judicial process being costly, favours only rich and affluent, hence poor people resort to moral policing to avoid perceived dishonour leading to blaming of victims especially against women. 8. Conflict of values: - People who hold traditional or orthodox values are not able to cope up with modern values such as- women working outside the home. So, they take the route of moral policing in order to teach women a lesson. Way Forward:- 1. Archaic laws should be revoked or reformed to curb moral police who use loopholes of various laws to attack the freedom of others. 2. There should be adequate patrolling, especially on particular occasions and in public places. 3. Sensitivity training should be provided to police as a part of police reforms. 4. Value-based education with modern outlook and awareness generation 5. People need to be educated about constitutional values.
##Question:What do you understand by moral policing . Discuss the different ethical issues related to moral policing.( 150 words)##Answer:What do you understand by moral policing? Discuss the different ethical issues related to moral policing.( 150 words) Structure:- 1. Definition of Moral Policing 2. Discuss various Ethical issues with Moral Policing 3. Way Forward Answer:- Moral Policing, a form of Vigilantism, is a term which is used to describe vigilante groups which act to enforce a code of morality without any legal authority. In recent time there have been several incidents of moral policing in the various parts of the country, though not new, the malaise has become severe in the recent past. Some of the ethical issues associated with it are as follows; Ethical Issues related to Moral policing:- 1. Violation of rights and dignity of Individuals :- Vigilante groups try to enforce their set of values on others which clear violence of an individual’s independent choice, freedom and dignity. For instance- Adult couples sitting peacefully in a park are threatened by “anti-Romeo Squads”. 2. Attack on modern values :- Using moral policing, many a time vigilant groups try to impose the conservative ideas which are not synced with the modern liberal values. 3. A threat to the safety of women : - Moral policing makes it unsafe for women to step out with men of their choice, inhibit families and foist retrograde notions about the sexes meet. 4. Intolerance : - Few vigilante groups which have religiously fundamental attitudes are intolerable for any mingling of people belonging to different religions. For instance- In the name of “ Love Jihad”, moral policing is used to threaten and sometimes physical damage the people belonging to the other religions. 5. Against the concept of minimum government: - Minimum government means that in the lives of citizens, there would be minimum involvement of governance including policing. In the name of moral policing, vigilant groups interfere in the public and private matters of individuals. 6. Patriarchal Mindset: - People with a patriarchal mindset views the security of women as their duty, for they are perceived as weaker sex and gullible. So, they would impose restrictions on women in terms of speech, attitude, clothing, public behaviour etc. 7. Lack of faith in judiciary :- Judicial process being costly, favours only rich and affluent, hence poor people resort to moral policing to avoid perceived dishonour leading to blaming of victims especially against women. 8. Conflict of values: - People who hold traditional or orthodox values are not able to cope up with modern values such as- women working outside the home. So, they take the route of moral policing in order to teach women a lesson. Way Forward:- 1. Archaic laws should be revoked or reformed to curb moral police who use loopholes of various laws to attack the freedom of others. 2. There should be adequate patrolling, especially on particular occasions and in public places. 3. Sensitivity training should be provided to police as a part of police reforms. 4. Value-based education with modern outlook and awareness generation 5. People need to be educated about constitutional values.
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भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने एवं ग्रामीण विकास में खाद्य-प्रसंस्करण उद्योगों के महत्व को रेखांकित कीजिये| भारत में खाद्य-प्रसंस्करण उद्योगों के धीमी गति से बढ़ने के कारणों को बताते हुए इस संबंध में सरकार द्वारा इसे बढ़ावा देने हेतु किये गये उपायों का उल्लेख कीजिये (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the importance of food processing industries to promote Indian economy and rural development. Describe the reasons for slow growing of food processing industries in India and mention the measures taken by the government to promote this sector. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को परिभाषित करते हुए उदाहरण सहित संक्षिप्त रूप से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में, भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण विकास में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के महत्व को बताइए| अगले भाग में, भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के धीमी गति से बढ़ने के कारणों का उल्लेख कीजिए| अंतिम भाग में, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने हेतु सरकार द्वारा किए गए उपायों का उल्लेख कीजिए| उत्तर जब प्राथमिक कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण करके उनका मूल्यवर्धन किया जाता है तो इस प्रक्रिया में शामिल गतिविधियां खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अंतर्गत आती है| जैसे- दूध से डेयरी उत्पादों का निर्माण, फलों तथा सब्जियों के प्रसंस्करण से जूस, कैचप, अचार, डिब्बाबंद भोजन आदि का निर्माण| भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण विकास में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का महत्व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग जीडीपी के विनिर्माण तथा कृषि क्षेत्रों में क्रमशः 9% तथा 11% का योगदान देता है| इस क्षेत्र का विकास अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में काफी कारगर सिद्ध होगा| खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों द्वारा कुल रोजगार में से लगभग 13% रोजगार प्रदान किया जाता है| इसके साथ ही भारत के कुल निर्यात में 13% तथा औद्योगिक निवेश में 6% का हिस्सा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का है| साथ ही, यह क्षेत्र 13वां सबसे बड़ा विदेशी निवेश का स्रोत है| किसानों को अतिरिक्त लाभ तथा उनकी आय को बढ़ाने में इस क्षेत्र का योगदान ; नई आर्थिक क्रियाओं को बढ़ावा देकर रोजगार के नए अवसर सृजित करना ; पोषण स्तर में सुधार करके खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना ; कृषि में विविधता को बढ़ावा देना तथा निर्यात के माध्यम से आय को बढ़ावा ; संपूर्ण खाद्य मूल्य श्रृंखला में रोजगार एवं निवेश के व्यापक अवसर उपलब्ध करवाना जैसे- फसल कटाई के बाद भंडारण एवं छंटाई सुविधाएं, लॉजिस्टिक एवं कोल्ड स्टोरेज चेन श्रृंखला का विकास आदि ; ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना करके महिलाओं तथा कमजोर वर्गो के विकास को बढ़ावा ; भारत में प्राचीन काल से ही घरेलू स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण तकनीकी मौजूद रही है जिसके माध्यम से हम विश्वप्रसिद्ध अचार, पापड़, चटनी, मुरब्बा जैसे प्रसंस्कृत उत्पाद सदियों से तैयार करते आए हैं| इन क्षेत्रों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर हम ग्रामीण विकास को बढ़ावा दे सकते हैं| भारत दूध, केला, आम, अमरूद, पपीता, अदरक जैसे उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक है वहीं गेहूं, चावल, फल, सब्जियां, चाय, गन्ना, काजू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है| खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देकर इन कृषि उत्पादों का मूल्यवर्धन किया जा सकता है| भारत में फलों एवं सब्जियों का एक बड़ा हिस्सा खराब हो जाता है| खाद्य उत्पादों की सेल्फ लाइफ बढाकर शीघ्र खराब होने वाली कृषि उपज की बर्बादी को कम करना संभव है जिससे कृषि उपज का मूल्यवर्धन सुनिश्चित होगा तथा कृषि के विविधीकरण एवं वाणिज्यीकरण के माध्यम से किसानों की आय में वृद्धि होगी तथा रोजगार सृजन होगा| कृषि खाद्य उपज के भंडारण, परिवहन तथा प्रसंस्करण हेतु अवसंरचना एवं आपूर्ति श्रृंखला तंत्र के निर्माण के माध्यम से रोजगार सृजन तथा निवेश को बढ़ावा ; खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में आधुनिक प्रौद्योगिकी, नवाचार इत्यादि को प्रोत्साहन के माध्यम से संबंधित क्षेत्रों में निवेश तथा नवाचार को प्रोत्साहन ; इस क्षेत्र में अनुसंधान तथा विकास को प्रोत्साहित करके उद्योग-अकादमी लिंकेज के माध्यम से ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास ; भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के धीमी गति से बढ़ने के कारण बुनियादी अवसंरचनाओं का अभाव जैसे - ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों की खराब स्थिति जिससे फल एवं सब्जियां नजदीकी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों तक तीव्र गति से नहीं पहुंच पाते हैं| इसके साथ ही अतिरिक्त उत्पादन की तुलना में देश में कोल्ड स्टोरेज तथा वेयरहाउसों की संख्या एवं क्षमता अपर्याप्त है | खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय कानूनों में एकरूपता का अभाव जिससे उपभोक्ताओं, किसानों एवं अन्य हितधारको में भ्रम की स्थिति| प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो की जांच हेतु आधुनिक तकनीक से सुसज्जित प्रयोगशालाओं का अभाव | साथ ही, जांच मानकों में एकरूपता का अभाव जिससे इस उद्योग को बढ़ावा देने में गतिरोध| खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अनुसंधान एवं शोध का अभाव जिससे नवाचार एवं जागरूकता हतोत्साहित होती है| इस क्षेत्र में कम सार्वजनिक निवेश तथा अपर्याप्त श्रमबल उपलब्धता ; लागत प्रभावी प्रौद्योगिकी एवं लागत प्रभावी संयंत्रों की कमी | मशीनरी तथा पैकेजिंग में लागत प्रभावी उपायों का अभाव| दोषपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन ; उदार खाद्य सुरक्षा कानून; भारतीय जनता की खानपान आदतें अभी भी परंपरागत रूप से ताजे खाद्य पदार्थों को प्रोत्साहित करती है जिससे प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ी है| भारत सरकार द्वारा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने हेतु किए गए उपाय प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के माध्यम से खेत से लेकर खुदरा बिक्री केंद्रों तक आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन तथा आधुनिक अवसंरचना सृजन को प्रोत्साहन | इसके अंतर्गत निम्नलिखित को कार्यान्वित किया जाएगा -मेगा खाद्य पार्क, कोल्ड चेन, खाद्य प्रसंस्करण एवं परिरक्षण क्षमताओं का सृजन/विस्तार, कृषि प्रसंस्करण क्‍लस्‍टर अवसंरचना, बैकवर्ड और फारवर्ड लिंकेजों का सृजन, खाद्य संरक्षा एवं गुणवत्ता आश्वासन अवसंरचना, मानव संसाधन एवं संस्थान | मेगा फूड पार्क - 42 मेगा फूड पार्क को मंजूरी जिसमें से 9 मेगा फूड पार्क ऑपरेशनल; निवेशकों के प्रोत्साहन हेतु वन स्टॉप प्लेटफॉर्म निवेश बंधु ; राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति के माध्यम से राष्ट्रीय खाद्य ग्रिड तथा राष्ट्रीय कोल्ड चेन ग्रिड के निर्माण हेतु बढ़ावा.; राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण विकास परिषद का गठन जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, उद्योग संघ तथा अन्य संबंधित विभाग शामिल हैं| FSSAI द्वारा फूड रेगुलेटरी पोर्टल ; खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में ऑटोमेटिक रूट के तहत 100% एफडीआई की अनुमति ; नई विनिर्माण पॉलिसी 2011 के अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को प्रायोरिटी सेक्टर का दर्जा ; भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा खाद्य प्रसंस्करण, एग्रो प्रोसेसिंग यूनिट तथा कोल्ड चेन को कृषि गतिविधियों के प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करना| नाबार्ड के अंतर्गत फूड प्रोसेसिंग फंड नामक विशेष कोष का गठन; डेयरी प्रोसेसिंग एवं अवसंरचना विकास फंड का निर्माण ; खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को आयकर एवं जीएसटी के तहत रियायतें ; प्रोजेक्ट इंपोर्ट स्कीम के तहत इस क्षेत्र में प्रयुक्त मशीनरी एवं अन्य अवसंरचना के आयात पर कस्टम ड्यूटी में छूट; बजट 2018-19 में आलू,प्याज,टमाटर के मूल्यों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने हेतु ऑपरेशन ग्रीन्स ; एग्रो प्रोसेसिंग वित्तीय संस्थानों का निर्माण
##Question:भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने एवं ग्रामीण विकास में खाद्य-प्रसंस्करण उद्योगों के महत्व को रेखांकित कीजिये| भारत में खाद्य-प्रसंस्करण उद्योगों के धीमी गति से बढ़ने के कारणों को बताते हुए इस संबंध में सरकार द्वारा इसे बढ़ावा देने हेतु किये गये उपायों का उल्लेख कीजिये (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the importance of food processing industries to promote Indian economy and rural development. Describe the reasons for slow growing of food processing industries in India and mention the measures taken by the government to promote this sector. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को परिभाषित करते हुए उदाहरण सहित संक्षिप्त रूप से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में, भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण विकास में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के महत्व को बताइए| अगले भाग में, भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के धीमी गति से बढ़ने के कारणों का उल्लेख कीजिए| अंतिम भाग में, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने हेतु सरकार द्वारा किए गए उपायों का उल्लेख कीजिए| उत्तर जब प्राथमिक कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण करके उनका मूल्यवर्धन किया जाता है तो इस प्रक्रिया में शामिल गतिविधियां खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अंतर्गत आती है| जैसे- दूध से डेयरी उत्पादों का निर्माण, फलों तथा सब्जियों के प्रसंस्करण से जूस, कैचप, अचार, डिब्बाबंद भोजन आदि का निर्माण| भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण विकास में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों का महत्व खाद्य प्रसंस्करण उद्योग जीडीपी के विनिर्माण तथा कृषि क्षेत्रों में क्रमशः 9% तथा 11% का योगदान देता है| इस क्षेत्र का विकास अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में काफी कारगर सिद्ध होगा| खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों द्वारा कुल रोजगार में से लगभग 13% रोजगार प्रदान किया जाता है| इसके साथ ही भारत के कुल निर्यात में 13% तथा औद्योगिक निवेश में 6% का हिस्सा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का है| साथ ही, यह क्षेत्र 13वां सबसे बड़ा विदेशी निवेश का स्रोत है| किसानों को अतिरिक्त लाभ तथा उनकी आय को बढ़ाने में इस क्षेत्र का योगदान ; नई आर्थिक क्रियाओं को बढ़ावा देकर रोजगार के नए अवसर सृजित करना ; पोषण स्तर में सुधार करके खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना ; कृषि में विविधता को बढ़ावा देना तथा निर्यात के माध्यम से आय को बढ़ावा ; संपूर्ण खाद्य मूल्य श्रृंखला में रोजगार एवं निवेश के व्यापक अवसर उपलब्ध करवाना जैसे- फसल कटाई के बाद भंडारण एवं छंटाई सुविधाएं, लॉजिस्टिक एवं कोल्ड स्टोरेज चेन श्रृंखला का विकास आदि ; ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना करके महिलाओं तथा कमजोर वर्गो के विकास को बढ़ावा ; भारत में प्राचीन काल से ही घरेलू स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण तकनीकी मौजूद रही है जिसके माध्यम से हम विश्वप्रसिद्ध अचार, पापड़, चटनी, मुरब्बा जैसे प्रसंस्कृत उत्पाद सदियों से तैयार करते आए हैं| इन क्षेत्रों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर हम ग्रामीण विकास को बढ़ावा दे सकते हैं| भारत दूध, केला, आम, अमरूद, पपीता, अदरक जैसे उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक है वहीं गेहूं, चावल, फल, सब्जियां, चाय, गन्ना, काजू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है| खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देकर इन कृषि उत्पादों का मूल्यवर्धन किया जा सकता है| भारत में फलों एवं सब्जियों का एक बड़ा हिस्सा खराब हो जाता है| खाद्य उत्पादों की सेल्फ लाइफ बढाकर शीघ्र खराब होने वाली कृषि उपज की बर्बादी को कम करना संभव है जिससे कृषि उपज का मूल्यवर्धन सुनिश्चित होगा तथा कृषि के विविधीकरण एवं वाणिज्यीकरण के माध्यम से किसानों की आय में वृद्धि होगी तथा रोजगार सृजन होगा| कृषि खाद्य उपज के भंडारण, परिवहन तथा प्रसंस्करण हेतु अवसंरचना एवं आपूर्ति श्रृंखला तंत्र के निर्माण के माध्यम से रोजगार सृजन तथा निवेश को बढ़ावा ; खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में आधुनिक प्रौद्योगिकी, नवाचार इत्यादि को प्रोत्साहन के माध्यम से संबंधित क्षेत्रों में निवेश तथा नवाचार को प्रोत्साहन ; इस क्षेत्र में अनुसंधान तथा विकास को प्रोत्साहित करके उद्योग-अकादमी लिंकेज के माध्यम से ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास ; भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के धीमी गति से बढ़ने के कारण बुनियादी अवसंरचनाओं का अभाव जैसे - ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों की खराब स्थिति जिससे फल एवं सब्जियां नजदीकी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों तक तीव्र गति से नहीं पहुंच पाते हैं| इसके साथ ही अतिरिक्त उत्पादन की तुलना में देश में कोल्ड स्टोरेज तथा वेयरहाउसों की संख्या एवं क्षमता अपर्याप्त है | खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय कानूनों में एकरूपता का अभाव जिससे उपभोक्ताओं, किसानों एवं अन्य हितधारको में भ्रम की स्थिति| प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो की जांच हेतु आधुनिक तकनीक से सुसज्जित प्रयोगशालाओं का अभाव | साथ ही, जांच मानकों में एकरूपता का अभाव जिससे इस उद्योग को बढ़ावा देने में गतिरोध| खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अनुसंधान एवं शोध का अभाव जिससे नवाचार एवं जागरूकता हतोत्साहित होती है| इस क्षेत्र में कम सार्वजनिक निवेश तथा अपर्याप्त श्रमबल उपलब्धता ; लागत प्रभावी प्रौद्योगिकी एवं लागत प्रभावी संयंत्रों की कमी | मशीनरी तथा पैकेजिंग में लागत प्रभावी उपायों का अभाव| दोषपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन ; उदार खाद्य सुरक्षा कानून; भारतीय जनता की खानपान आदतें अभी भी परंपरागत रूप से ताजे खाद्य पदार्थों को प्रोत्साहित करती है जिससे प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ी है| भारत सरकार द्वारा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने हेतु किए गए उपाय प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के माध्यम से खेत से लेकर खुदरा बिक्री केंद्रों तक आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन तथा आधुनिक अवसंरचना सृजन को प्रोत्साहन | इसके अंतर्गत निम्नलिखित को कार्यान्वित किया जाएगा -मेगा खाद्य पार्क, कोल्ड चेन, खाद्य प्रसंस्करण एवं परिरक्षण क्षमताओं का सृजन/विस्तार, कृषि प्रसंस्करण क्‍लस्‍टर अवसंरचना, बैकवर्ड और फारवर्ड लिंकेजों का सृजन, खाद्य संरक्षा एवं गुणवत्ता आश्वासन अवसंरचना, मानव संसाधन एवं संस्थान | मेगा फूड पार्क - 42 मेगा फूड पार्क को मंजूरी जिसमें से 9 मेगा फूड पार्क ऑपरेशनल; निवेशकों के प्रोत्साहन हेतु वन स्टॉप प्लेटफॉर्म निवेश बंधु ; राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण नीति के माध्यम से राष्ट्रीय खाद्य ग्रिड तथा राष्ट्रीय कोल्ड चेन ग्रिड के निर्माण हेतु बढ़ावा.; राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण विकास परिषद का गठन जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, उद्योग संघ तथा अन्य संबंधित विभाग शामिल हैं| FSSAI द्वारा फूड रेगुलेटरी पोर्टल ; खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में ऑटोमेटिक रूट के तहत 100% एफडीआई की अनुमति ; नई विनिर्माण पॉलिसी 2011 के अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को प्रायोरिटी सेक्टर का दर्जा ; भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा खाद्य प्रसंस्करण, एग्रो प्रोसेसिंग यूनिट तथा कोल्ड चेन को कृषि गतिविधियों के प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करना| नाबार्ड के अंतर्गत फूड प्रोसेसिंग फंड नामक विशेष कोष का गठन; डेयरी प्रोसेसिंग एवं अवसंरचना विकास फंड का निर्माण ; खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को आयकर एवं जीएसटी के तहत रियायतें ; प्रोजेक्ट इंपोर्ट स्कीम के तहत इस क्षेत्र में प्रयुक्त मशीनरी एवं अन्य अवसंरचना के आयात पर कस्टम ड्यूटी में छूट; बजट 2018-19 में आलू,प्याज,टमाटर के मूल्यों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने हेतु ऑपरेशन ग्रीन्स ; एग्रो प्रोसेसिंग वित्तीय संस्थानों का निर्माण
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अमेरिकी क्रांति के कारणों की चर्चा करते हुए बताइये कि कैसे इसने उपनिवेशवाद के खिलाफ आधुनिक राष्ट्र निर्माण में मार्गदर्शक का काम किया । ( 200 शब्द ) Discussing the causes of the American Revolution, explain how it worked as a guide for the creation of the modern nation against colonialism .( 200 words )
अप्रोच :- भूमिका में पहले अमेरिकी क्रांति के बारे में समझाइए । उत्तर के दूसरे भाग में अमेरिकी क्रांति के कारणो पर चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में अमेरिकी क्रांति के महत्व को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में एक छोटा निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध , अमेरिकी लोगो का विरोध अमेरिकी क्रांति के रूप में फलित हुआ , जिसकी शुरुवात 1783 से पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1783 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया ।जो आधुनिक विश्व निर्माण के एक युगांतकारी घटना थी । जिसने विश्व के अन्य देशो को आधुनिक राष्ट्र निर्माण और लोकतन्त्र के मूल्यों से परिचित करवाया । हालांकि इस क्रांति के पीछे अनेक कारणो का योगदान है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- आर्थिक कारण :- 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । अमेरिका से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण तथा कपास, तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा । अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | राजनीतिक कारण:- :- 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण:- :- अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। कुछ वैसे वर्गों का उदय जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे- शिक्षित वर्ग,व्यापारी वर्ग ,भूमि माफियाओं का वर्ग, तस्कर आदि। 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण:- अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, वाल्टेयर आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध एवं ब्रिटिश सरकार से टकराव :- सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया | कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट, शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। 1765 में मेसाचुसेट में 13 बस्तियों (उपनिवेशी राज्य ) की एक सभा जिसमे मांग की गई कि " प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। अमेरिकी क्रांति और उसके पश्चात नए आधुनिक राष्ट्र के रूप में अमेरिका का उदय न सिर्फ अमेरिका के लिए बल्कि विश्व के अन्य उपनिवेशों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी । अमेरिकी क्रांति के महत्व को हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं :- राष्ट्रवाद, लोकतन्त्र और आधुनिक विकास की दृष्टि से विश्व इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। अमेरिकी स्वतंत्रा संग्राम उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रथम सफल संघर्ष था। इसने भारत सहित विश्व के सभी राजनीतिक आंदोलनो को किसी न किसी रूप में प्रेरित किया। अमेरिकी स्वतंत्रा संघर्ष का तात्कालिक प्रभाव यूरोप में भी दिखा, ब्रिटेन में सुधारों की मांग की जाने लगी। अमेरिकी क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति को प्रभावित किया। आगे चलकर 19 वी सदी में जर्मनी और इटली के एकीकरण पर भी इसका प्रभाव दिखा। अमेरिकी स्वतंत्रा के पश्चात दक्षिणी अमेरिका में भी स्वतंत्रा आंदोलन तीव्र हुआ और 1830 में अधिकांश उपनिवेशों को स्वतंत्रा मिली। अमेरिकी स्वतंत्रा संघर्ष में यह घोषण की गई की संप्रभुता जनता में निहित है , इसका क्रांतिकारी महत्व था और विश्व राजनीति में एक नए युग की शुरुवात का सूचक भी। अमेरिका में व्यवस्था के संचालन के लिए जन प्रतिनिधियों ने संविधान का निर्माण किया और अमेरिका का संविधान पहला लिखित संविधान बना । इसने भी आधुनिक राजनीति को नई दिशा दी। लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्षेत्र में भी कई नए प्रयोग किए गए जैस गंतत्रात्मक सरकार , शक्ति पृथकरण पर आधारित सरकार , संघात्मक सरकार ,मूल अधिकारों का प्रावधान, पंथ निरपेक्ष व्यवस्था, निर्वाचन आदि। इन प्रावधानों का प्रभाव दुनिया के अधिकांशतः संविधानों पर देखा गया । उपरोक्त बिन्दुओ से स्पष्ट है कि अमेरिकी क्रांति ने न केवल अमेरिका की स्वतन्त्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया बल्कि विश्व के अन्य देशो के लिए भी मार्गदर्शक का कार्य किया ।इसने उपनिवेशों में नई चेतना और नई ऊर्जा का संचार करके आधुनिक विश्व निर्माण की नीव रखी।
##Question:अमेरिकी क्रांति के कारणों की चर्चा करते हुए बताइये कि कैसे इसने उपनिवेशवाद के खिलाफ आधुनिक राष्ट्र निर्माण में मार्गदर्शक का काम किया । ( 200 शब्द ) Discussing the causes of the American Revolution, explain how it worked as a guide for the creation of the modern nation against colonialism .( 200 words )##Answer:अप्रोच :- भूमिका में पहले अमेरिकी क्रांति के बारे में समझाइए । उत्तर के दूसरे भाग में अमेरिकी क्रांति के कारणो पर चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में अमेरिकी क्रांति के महत्व को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में एक छोटा निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध , अमेरिकी लोगो का विरोध अमेरिकी क्रांति के रूप में फलित हुआ , जिसकी शुरुवात 1783 से पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1783 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया ।जो आधुनिक विश्व निर्माण के एक युगांतकारी घटना थी । जिसने विश्व के अन्य देशो को आधुनिक राष्ट्र निर्माण और लोकतन्त्र के मूल्यों से परिचित करवाया । हालांकि इस क्रांति के पीछे अनेक कारणो का योगदान है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- आर्थिक कारण :- 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । अमेरिका से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण तथा कपास, तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा । अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | राजनीतिक कारण:- :- 13 उपनिवेशी बस्तियां जिनके पास सीमित कानूनी अधिकार थे । अमेरिका में एक विकसित उपनिवेशिक ढांचा था , प्रत्येक राज्य में विधायिका थी और इसमे स्थानीय लोगों के भागीदारी भी । लेकिन गवर्नर के विशेषाधिकार के कारण इन्हे विधायी कार्यों में कठिनाई होती थी । इससे स्थानीय नेताओं में असंतोष रहता था । ब्रिटिश संसद के द्वार कानून का निर्माण और उसमे अमेरिकी प्रतिनिधित्व का अभाव । सामाजिक कारण:- :- अमेरिकी सामाजिक संरचना में यूरोपीय विशेषकर ब्रिटेन से आने वाले आप्रवासियों का दबदबा अधिक था। कुछ वैसे वर्गों का उदय जिनके हित ब्रिटिश हितों से टकराते थे जैसे- शिक्षित वर्ग,व्यापारी वर्ग ,भूमि माफियाओं का वर्ग, तस्कर आदि। 18 वीं सदी के मध्य तक शिक्षा का भी अपेक्षाकृत विकास हुआ जैसे- हावर्ड, प्रिंसटन, येल आदि लोकप्रिय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई | आधुनिक विचारों वाले लोगों ने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। वैचारिक कारण:- अमेरिकन समाज का यूरोपीय समाज से निकटतम सम्बन्ध। यूरोपीय विचारकों जैसे -लॉक, रूसो, वाल्टेयर आदि का प्रभाव अमेरिकी बुद्धिजीवियों पर देखा गया। बुद्धिजीवियों के विचारों ने विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया तथा लोगों को विकल्प भी उपलब्द्ध कराया | सप्त वर्षीय युद्ध एवं ब्रिटिश सरकार से टकराव :- सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया | कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट, शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। 1765 में मेसाचुसेट में 13 बस्तियों (उपनिवेशी राज्य ) की एक सभा जिसमे मांग की गई कि " प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। अमेरिकी क्रांति और उसके पश्चात नए आधुनिक राष्ट्र के रूप में अमेरिका का उदय न सिर्फ अमेरिका के लिए बल्कि विश्व के अन्य उपनिवेशों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी । अमेरिकी क्रांति के महत्व को हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं :- राष्ट्रवाद, लोकतन्त्र और आधुनिक विकास की दृष्टि से विश्व इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। अमेरिकी स्वतंत्रा संग्राम उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रथम सफल संघर्ष था। इसने भारत सहित विश्व के सभी राजनीतिक आंदोलनो को किसी न किसी रूप में प्रेरित किया। अमेरिकी स्वतंत्रा संघर्ष का तात्कालिक प्रभाव यूरोप में भी दिखा, ब्रिटेन में सुधारों की मांग की जाने लगी। अमेरिकी क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति को प्रभावित किया। आगे चलकर 19 वी सदी में जर्मनी और इटली के एकीकरण पर भी इसका प्रभाव दिखा। अमेरिकी स्वतंत्रा के पश्चात दक्षिणी अमेरिका में भी स्वतंत्रा आंदोलन तीव्र हुआ और 1830 में अधिकांश उपनिवेशों को स्वतंत्रा मिली। अमेरिकी स्वतंत्रा संघर्ष में यह घोषण की गई की संप्रभुता जनता में निहित है , इसका क्रांतिकारी महत्व था और विश्व राजनीति में एक नए युग की शुरुवात का सूचक भी। अमेरिका में व्यवस्था के संचालन के लिए जन प्रतिनिधियों ने संविधान का निर्माण किया और अमेरिका का संविधान पहला लिखित संविधान बना । इसने भी आधुनिक राजनीति को नई दिशा दी। लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्षेत्र में भी कई नए प्रयोग किए गए जैस गंतत्रात्मक सरकार , शक्ति पृथकरण पर आधारित सरकार , संघात्मक सरकार ,मूल अधिकारों का प्रावधान, पंथ निरपेक्ष व्यवस्था, निर्वाचन आदि। इन प्रावधानों का प्रभाव दुनिया के अधिकांशतः संविधानों पर देखा गया । उपरोक्त बिन्दुओ से स्पष्ट है कि अमेरिकी क्रांति ने न केवल अमेरिका की स्वतन्त्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया बल्कि विश्व के अन्य देशो के लिए भी मार्गदर्शक का कार्य किया ।इसने उपनिवेशों में नई चेतना और नई ऊर्जा का संचार करके आधुनिक विश्व निर्माण की नीव रखी।
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Explain the various process involved in marine erosion. Also, describe the various erosional marine landforms with examples. (150 Words/10 Marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE PROCESS OF MARINE EROSION - THE VARIOUS MARINE EROSIONAL LANDFORMS Answer:- Marine landforms are formed due to the carving of marine waves. THE PROCESS OF MARINE EROSION 1) SOLUTION If the coast consists of rocks like limestone or chalk, then the solvent action of seawater sets up chemical changes in the rocks and disintegrates and dissolves them. Such a process is called a solution. 2) HYDRAULIC ACTION In the forward movement of the wave, the wave splashes against the coast and may enter joints or crevices and compress the air. The compressed air enlarges the joints and when the water recedes, the air is released from the joints. Repeated action causes the rocks to fragment. 3) ATTRITION Wave water, which consists of a load i.e. fragmented rocky pieces hurl one against the other and break them into smaller pieces. This process is called attrition. 4) ABRASION Waves armed with rock debris of all sizes charge against the base of the cliff and wear them back. Such a process is called abrasion. THE VARIOUS MARINE EROSIONAL LANDFORMS 1) CAPES AND BAYS The coastline is seldom a straight line due to varying resistant rocks. If hard rock and soft rock are arranged in alteration, then a series of capes and bays are formed. The soft rocks are worn back into inlets and capes and bays (when the inlets widen). The harder ones persist as capes. For example, the Bay of Bengal, Hudson Bay, and Bay of Biscay in Europe etc. 2) CAVES AND ARCH The waves attack the side of the cape. This sometimes leads to the formation of caves. When waves on both sides of the cape approach close, they unite to form an arch. 3) STACKS The erosion by waves ultimately tends to collapse the arch. The seaward portion of the cape remains as a pillar of rock, single and isolated, known as a stack. 4) CLIFF Marine erosion begins to cut a notch in the land, where the sea meets at the High Tide Line (HTL). As erosion proceeds, the notch further develops and the 1st sign of a cliff appears. The further landward recession of the notch results in the further development of the cliff. 5) WAVE-CUT PLATFORM The cliff"s base is polished due to abrasion action. While this is going on, the cliff"s face above the HTL is attacked by weathering and mass wasting. The rubble material rolls over and further polishes the foot of the cliff up to the sea and makes this a platform called a wave-cut platform.
##Question:Explain the various process involved in marine erosion. Also, describe the various erosional marine landforms with examples. (150 Words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE PROCESS OF MARINE EROSION - THE VARIOUS MARINE EROSIONAL LANDFORMS Answer:- Marine landforms are formed due to the carving of marine waves. THE PROCESS OF MARINE EROSION 1) SOLUTION If the coast consists of rocks like limestone or chalk, then the solvent action of seawater sets up chemical changes in the rocks and disintegrates and dissolves them. Such a process is called a solution. 2) HYDRAULIC ACTION In the forward movement of the wave, the wave splashes against the coast and may enter joints or crevices and compress the air. The compressed air enlarges the joints and when the water recedes, the air is released from the joints. Repeated action causes the rocks to fragment. 3) ATTRITION Wave water, which consists of a load i.e. fragmented rocky pieces hurl one against the other and break them into smaller pieces. This process is called attrition. 4) ABRASION Waves armed with rock debris of all sizes charge against the base of the cliff and wear them back. Such a process is called abrasion. THE VARIOUS MARINE EROSIONAL LANDFORMS 1) CAPES AND BAYS The coastline is seldom a straight line due to varying resistant rocks. If hard rock and soft rock are arranged in alteration, then a series of capes and bays are formed. The soft rocks are worn back into inlets and capes and bays (when the inlets widen). The harder ones persist as capes. For example, the Bay of Bengal, Hudson Bay, and Bay of Biscay in Europe etc. 2) CAVES AND ARCH The waves attack the side of the cape. This sometimes leads to the formation of caves. When waves on both sides of the cape approach close, they unite to form an arch. 3) STACKS The erosion by waves ultimately tends to collapse the arch. The seaward portion of the cape remains as a pillar of rock, single and isolated, known as a stack. 4) CLIFF Marine erosion begins to cut a notch in the land, where the sea meets at the High Tide Line (HTL). As erosion proceeds, the notch further develops and the 1st sign of a cliff appears. The further landward recession of the notch results in the further development of the cliff. 5) WAVE-CUT PLATFORM The cliff"s base is polished due to abrasion action. While this is going on, the cliff"s face above the HTL is attacked by weathering and mass wasting. The rubble material rolls over and further polishes the foot of the cliff up to the sea and makes this a platform called a wave-cut platform.
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While mentioning the brief background of rise of the Napoleon, also discussthe work and reformsdone by the Napoleon in the various fields. (200 words) नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों मेंकिये गए कार्यों एवं सुधारोंकी भीचर्चा कीजिए।(200 शब्द)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यों एवं सुधारों के साथ साथ इन सुधारों एवं कार्यों कीसीमाओं कीभी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- समकालीन परिस्थितियों तथा नेपोलियन की व्यक्तिगत योग्यता कीनेपोलियन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फ़्रांसिसी क्रांति के कारण नेपोलियन को सैन्य शिक्षा एवं सैन्य सेवा में आगे बढ़ने का अवसर मिला। डायरेक्टरी के शासन से असंतोष, भ्रष्टाचारतथा पडोसी राष्ट्रों के साथ युद्धों में नेपोलियन को प्रतिभा दिखानेका अवसर मिला। नेपोलियन मेंसेनापति के गुण, निर्णय लेंने की क्षमता, प्रशासनिक योग्यता जैसे गुणों के कारण भी उसका तेजी से उदय हुआ। 1799 में प्रथम पार्षद, 1802 में आजीवन प्रथम पार्षद रहने इत्यादिका प्रावधान तथा 1804 में फ़्रांसिसी गणतंत्र के सम्राट की उपाधि धारण की। नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यएवं सुधार:- साम्राज्य विस्तार एवं आधुनिक विचार: शीघ्र ही नेपोलियनने एक बड़े साम्राज्यका विस्तार किया जैसे उसके साम्राज्य में इटली, जर्मनी, स्पेन, जर्मनी इत्यादि एक विस्तृत भूभाग शामिल था। अप्रत्यक्ष प्रभाव इससे भी अधिक व्यापक था। जिन क्षेत्रों पर नेपोलियन का प्रत्यक्ष शासन रहा उन क्षेत्रों में क्रांतिकारी विचारों का बीजारोपण हुआ जैसे सविंधान का शासन, समानता, स्वतंत्रता, पंथनिरपेक्षता जैसे विचारइत्यादि। इतना ही नहीं इटली जर्मनी जैसे क्षेत्रों का पुनसीमांकन भी किया। हालाँकि विजित क्षेत्रों के साथ उपनिवेशों जैसा ही व्यवहार किया और यह नेपोलियन के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण रहा। प्रशासन के क्षेत्र में : नेपोलियन ने क्रांतिकालीन कई विशेषताओं को जारी रखा जैसे प्रशासनिक विभाजन, सविंधान का शासन, निर्वाचन की परम्परा इत्यादि। हालाँकि कुछ महत्वपूर्ण संशोधन भी देखे जा सकते हैं जैसे स्थानीय प्रशासन में निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन की परम्परा,महत्वपूर्ण पदों पर सम्बन्धियों की नियुक्ति, सम्राट की उपाधि धारण करना इत्यादि। कानून के क्षेत्र में: नेपोलियन का एक महत्वपूर्ण कार्य मानाजाता है आधुनिक कानूनों का संकलन जैसे सिविल कॉड, कमर्शियल कॉड इत्यादि कानूनों के संकलन में नेपोलियन ने व्यक्तिगत रूचि भी दिखाई। इससे कानून के शासन की धारणा मज़बूत हुई और फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों पर आज भी इसका प्रभाव देख सकते हैं। हालाँकि कानून के क्षेत्र में भी कई सीमाएं देखी जा सकती है जैसे उत्तराधिर में महिलाओं को अधिकार न देना, पूंजीपतियों के साथ विवाद में मज़दूरों का साथ न देना इत्यादि। धर्म के क्षेत्र में: नेपोलियन ने पॉप से एक समझौता किया और पॉप ने क्रांतिकाल में हुए परिवर्तनों को मान्यता प्रदान की। जैसे चर्च की सम्पति वापस नहीं होगी, पादरियों को राष्ट्र के प्रति निष्ठा, राज्य में धर्म का हस्तक्षेप नहीं होगा इत्यादि। शिक्षा के क्षेत्र में : शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ परिवर्तनों के साथ नेपोलियन ने क्रन्तिकारी शिक्षा को जारी रखा जैसे फ्रांसीसीभाषा में शिक्षा, शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नार्मन स्कूल, प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा की श्रेणीबद्ध व्यवस्था इत्यादि। हालॉंकि शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सैन्य शिक्षा एवं नेपोलियन का महिमांडन किया गया। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में: अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी नेपोलियन ने आर्थिक विकास को गति देने की कोसिस की जैसे आधारभूत ढांचे पर बल, बैंक ऑफ़ फ्रांस की स्थापना, स्वदेशी उद्योगों के लिए प्रदर्शनी का आयोजन, शहरों का सौंदर्यकरण इत्यादि। हालाँकि इसकी आर्थिक नीति की सबसे बड़ी सीमा यह थी किइसने औद्योगीकरण की उपेक्षा की। इस प्रकार नेपालियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न कार्य एवं सुधार किये गए हालाँकि इन सुधारों की कई सीमाएं भी थीं।
##Question:While mentioning the brief background of rise of the Napoleon, also discussthe work and reformsdone by the Napoleon in the various fields. (200 words) नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों मेंकिये गए कार्यों एवं सुधारोंकी भीचर्चा कीजिए।(200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यों एवं सुधारों के साथ साथ इन सुधारों एवं कार्यों कीसीमाओं कीभी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- समकालीन परिस्थितियों तथा नेपोलियन की व्यक्तिगत योग्यता कीनेपोलियन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फ़्रांसिसी क्रांति के कारण नेपोलियन को सैन्य शिक्षा एवं सैन्य सेवा में आगे बढ़ने का अवसर मिला। डायरेक्टरी के शासन से असंतोष, भ्रष्टाचारतथा पडोसी राष्ट्रों के साथ युद्धों में नेपोलियन को प्रतिभा दिखानेका अवसर मिला। नेपोलियन मेंसेनापति के गुण, निर्णय लेंने की क्षमता, प्रशासनिक योग्यता जैसे गुणों के कारण भी उसका तेजी से उदय हुआ। 1799 में प्रथम पार्षद, 1802 में आजीवन प्रथम पार्षद रहने इत्यादिका प्रावधान तथा 1804 में फ़्रांसिसी गणतंत्र के सम्राट की उपाधि धारण की। नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यएवं सुधार:- साम्राज्य विस्तार एवं आधुनिक विचार: शीघ्र ही नेपोलियनने एक बड़े साम्राज्यका विस्तार किया जैसे उसके साम्राज्य में इटली, जर्मनी, स्पेन, जर्मनी इत्यादि एक विस्तृत भूभाग शामिल था। अप्रत्यक्ष प्रभाव इससे भी अधिक व्यापक था। जिन क्षेत्रों पर नेपोलियन का प्रत्यक्ष शासन रहा उन क्षेत्रों में क्रांतिकारी विचारों का बीजारोपण हुआ जैसे सविंधान का शासन, समानता, स्वतंत्रता, पंथनिरपेक्षता जैसे विचारइत्यादि। इतना ही नहीं इटली जर्मनी जैसे क्षेत्रों का पुनसीमांकन भी किया। हालाँकि विजित क्षेत्रों के साथ उपनिवेशों जैसा ही व्यवहार किया और यह नेपोलियन के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण रहा। प्रशासन के क्षेत्र में : नेपोलियन ने क्रांतिकालीन कई विशेषताओं को जारी रखा जैसे प्रशासनिक विभाजन, सविंधान का शासन, निर्वाचन की परम्परा इत्यादि। हालाँकि कुछ महत्वपूर्ण संशोधन भी देखे जा सकते हैं जैसे स्थानीय प्रशासन में निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन की परम्परा,महत्वपूर्ण पदों पर सम्बन्धियों की नियुक्ति, सम्राट की उपाधि धारण करना इत्यादि। कानून के क्षेत्र में: नेपोलियन का एक महत्वपूर्ण कार्य मानाजाता है आधुनिक कानूनों का संकलन जैसे सिविल कॉड, कमर्शियल कॉड इत्यादि कानूनों के संकलन में नेपोलियन ने व्यक्तिगत रूचि भी दिखाई। इससे कानून के शासन की धारणा मज़बूत हुई और फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों पर आज भी इसका प्रभाव देख सकते हैं। हालाँकि कानून के क्षेत्र में भी कई सीमाएं देखी जा सकती है जैसे उत्तराधिर में महिलाओं को अधिकार न देना, पूंजीपतियों के साथ विवाद में मज़दूरों का साथ न देना इत्यादि। धर्म के क्षेत्र में: नेपोलियन ने पॉप से एक समझौता किया और पॉप ने क्रांतिकाल में हुए परिवर्तनों को मान्यता प्रदान की। जैसे चर्च की सम्पति वापस नहीं होगी, पादरियों को राष्ट्र के प्रति निष्ठा, राज्य में धर्म का हस्तक्षेप नहीं होगा इत्यादि। शिक्षा के क्षेत्र में : शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ परिवर्तनों के साथ नेपोलियन ने क्रन्तिकारी शिक्षा को जारी रखा जैसे फ्रांसीसीभाषा में शिक्षा, शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नार्मन स्कूल, प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा की श्रेणीबद्ध व्यवस्था इत्यादि। हालॉंकि शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सैन्य शिक्षा एवं नेपोलियन का महिमांडन किया गया। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में: अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी नेपोलियन ने आर्थिक विकास को गति देने की कोसिस की जैसे आधारभूत ढांचे पर बल, बैंक ऑफ़ फ्रांस की स्थापना, स्वदेशी उद्योगों के लिए प्रदर्शनी का आयोजन, शहरों का सौंदर्यकरण इत्यादि। हालाँकि इसकी आर्थिक नीति की सबसे बड़ी सीमा यह थी किइसने औद्योगीकरण की उपेक्षा की। इस प्रकार नेपालियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न कार्य एवं सुधार किये गए हालाँकि इन सुधारों की कई सीमाएं भी थीं।
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भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त वीटो की शक्तियोंका वास्तविक उपयोग प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है| कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये |(200 शब्द) The actual use of the veto power of thePresident of India is done by the Prime Minister and the Council of Ministers. Critically evaluate the statement. (200 words)
एप्रोच :- राष्ट्रपति की वीटो शक्तियों का उल्लेख करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए राष्ट्रपति द्वारा वीटो शक्ति का प्रयोग करने की विभिन्न परिस्थितियों का विवरण दीजिये। इसके पश्चात तर्क दीजिये कि किसी प्रकार प्रधानमंत्री एवंमंत्रिपरिषद हस्तक्षेप करता है। इसके पश्चात उन पक्षों को भी लिखिए जब वीटो शक्ति का प्रयोग करने में राष्ट्रपति स्वतंत्र है। संतुलित निष्कर्ष दीजिये उत्तर प्रारूप :- किसी विधान को अनुमति न देने या अनुमति देने से इंकार करने की कार्यपालिका की शक्ति को वीटो कहा जाता है। भारत के राष्ट्रपति के पास अत्यान्तिक, निलंबनकारी तथा पॉकेट वीटो प्राप्त हैं। जब को विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित होता है और राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है तो विधेयक को अनुमति दे सकता है, अपनी स्वीकृति सुरक्षित रख सकता है तथा पुनर्विचार हेतु वापस लौटा सकता है। जब संसद द्वारा पारित किसी विधेयक को अपने पास सुरक्षित रखता है तो अत्यान्तिक वीटो का प्रयोग करता है, इसी प्रकार पुनर्विचार हेतु लौटाने में निलंबनकारी तथा पॉकेट वीटो के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए विधेयक को लबित कर सकता है। राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ वास्तविकता में प्रधानमंत्री एवंमंत्रिपरिषद द्वारा प्रयोग की जाती हैं : पक्ष में तर्क : अत्यान्तिक वीटो निजी सदस्यों के विधेयक के लिए किया जाता है। साथ में जब विधेयक पारित हो जाने के बाद मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को उस विधेयक के विरुद्ध वीटो के प्रयोग की सलाह देता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को वीटो का प्रयोग करना अनिवार्य होगा। जब निलंबनकारी वीटो का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति कोई विधेयक पुनर्विचार हेतु लौटाता है तो सामान्य बहुमत से विधेयक को पुनः पारित कर देने पर राष्ट्रपति को अपनी अनुमति देने के लिए विवश होना पड़ता है। यह वीटो शक्ति वास्तव में अत्यंत ही कम प्रभावी है। गौरतलब है कि अनुच्छेद 74 के माध्यम से राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया गया है। इसी कारण से राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ सीमित हो जाती हैं। विपक्ष में तर्क: हालांकि यह तार्किक है कि मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करने वाले राष्ट्रपति की वीटो प्रयोग की शक्तियाँ सीमित हैं परंतु यह ध्यान देने योग्य बात है कि किसी विधेयक के संबंध में कोई समय सीमा निर्धारित न होने के कारण राष्ट्रपति मंत्रिमंडल के सलाह से स्वतंत्र राष्ट्रपति पॉकेट वीटो का प्रयोग करते हुए विधेयक पर न तो कोई सहमति देता है, न अस्वीकृत करता है, न ही लौटाता है परंतु एक अनिश्चित काल के लिए विधेयक को लंबित कर देता है। ध्यातव्य है कि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा भारतीय डाक अधिनियम के संदर्भ में इस वीटो का प्रयोग किया गया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के पास वीटो शक्ति जैसा महत्वपूर्ण अधिकार है। जिसमें पॉकेट वीटो का प्रयोग करने में उसे व्यापक स्वतन्त्रता प्राप्त है जिसमें मंतिपरिषद के हस्तक्षेप के बिना प्रयोग कर सकता है। परंतु अत्यान्तिक और निलंबन कारी वीटो के संबंध में उसकी यही शक्तियाँ सीमित हो जाती है और वह मंत्रिपरिषद के निर्णय मानने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हो जाता है।
##Question:भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त वीटो की शक्तियोंका वास्तविक उपयोग प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है| कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये |(200 शब्द) The actual use of the veto power of thePresident of India is done by the Prime Minister and the Council of Ministers. Critically evaluate the statement. (200 words)##Answer:एप्रोच :- राष्ट्रपति की वीटो शक्तियों का उल्लेख करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए राष्ट्रपति द्वारा वीटो शक्ति का प्रयोग करने की विभिन्न परिस्थितियों का विवरण दीजिये। इसके पश्चात तर्क दीजिये कि किसी प्रकार प्रधानमंत्री एवंमंत्रिपरिषद हस्तक्षेप करता है। इसके पश्चात उन पक्षों को भी लिखिए जब वीटो शक्ति का प्रयोग करने में राष्ट्रपति स्वतंत्र है। संतुलित निष्कर्ष दीजिये उत्तर प्रारूप :- किसी विधान को अनुमति न देने या अनुमति देने से इंकार करने की कार्यपालिका की शक्ति को वीटो कहा जाता है। भारत के राष्ट्रपति के पास अत्यान्तिक, निलंबनकारी तथा पॉकेट वीटो प्राप्त हैं। जब को विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित होता है और राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है तो विधेयक को अनुमति दे सकता है, अपनी स्वीकृति सुरक्षित रख सकता है तथा पुनर्विचार हेतु वापस लौटा सकता है। जब संसद द्वारा पारित किसी विधेयक को अपने पास सुरक्षित रखता है तो अत्यान्तिक वीटो का प्रयोग करता है, इसी प्रकार पुनर्विचार हेतु लौटाने में निलंबनकारी तथा पॉकेट वीटो के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए विधेयक को लबित कर सकता है। राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ वास्तविकता में प्रधानमंत्री एवंमंत्रिपरिषद द्वारा प्रयोग की जाती हैं : पक्ष में तर्क : अत्यान्तिक वीटो निजी सदस्यों के विधेयक के लिए किया जाता है। साथ में जब विधेयक पारित हो जाने के बाद मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को उस विधेयक के विरुद्ध वीटो के प्रयोग की सलाह देता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को वीटो का प्रयोग करना अनिवार्य होगा। जब निलंबनकारी वीटो का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति कोई विधेयक पुनर्विचार हेतु लौटाता है तो सामान्य बहुमत से विधेयक को पुनः पारित कर देने पर राष्ट्रपति को अपनी अनुमति देने के लिए विवश होना पड़ता है। यह वीटो शक्ति वास्तव में अत्यंत ही कम प्रभावी है। गौरतलब है कि अनुच्छेद 74 के माध्यम से राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया गया है। इसी कारण से राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ सीमित हो जाती हैं। विपक्ष में तर्क: हालांकि यह तार्किक है कि मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करने वाले राष्ट्रपति की वीटो प्रयोग की शक्तियाँ सीमित हैं परंतु यह ध्यान देने योग्य बात है कि किसी विधेयक के संबंध में कोई समय सीमा निर्धारित न होने के कारण राष्ट्रपति मंत्रिमंडल के सलाह से स्वतंत्र राष्ट्रपति पॉकेट वीटो का प्रयोग करते हुए विधेयक पर न तो कोई सहमति देता है, न अस्वीकृत करता है, न ही लौटाता है परंतु एक अनिश्चित काल के लिए विधेयक को लंबित कर देता है। ध्यातव्य है कि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा भारतीय डाक अधिनियम के संदर्भ में इस वीटो का प्रयोग किया गया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के पास वीटो शक्ति जैसा महत्वपूर्ण अधिकार है। जिसमें पॉकेट वीटो का प्रयोग करने में उसे व्यापक स्वतन्त्रता प्राप्त है जिसमें मंतिपरिषद के हस्तक्षेप के बिना प्रयोग कर सकता है। परंतु अत्यान्तिक और निलंबन कारी वीटो के संबंध में उसकी यही शक्तियाँ सीमित हो जाती है और वह मंत्रिपरिषद के निर्णय मानने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हो जाता है।
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नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों मेंकिये गए कार्यों एवं सुधारोंकी भीचर्चा कीजिए।(150 -200 शब्द/10 अंक) While mentioning the brief background of the rise of Napoleon, also discuss the work and reforms done by Napoleon in the various fields. (150 -200 words/10 Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यों एवं सुधारों के साथ साथ इन सुधारों एवं कार्यों कीसीमाओं कीभी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- समकालीन परिस्थितियों तथा नेपोलियन की व्यक्तिगत योग्यता कीनेपोलियन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फ़्रांसिसी क्रांति के कारण नेपोलियन को सैन्य शिक्षा एवं सैन्य सेवा में आगे बढ़ने का अवसर मिला। डायरेक्टरी के शासन से असंतोष, भ्रष्टाचारतथा पडोसी राष्ट्रों के साथ युद्धों में नेपोलियन को प्रतिभा दिखानेका अवसर मिला। नेपोलियन मेंसेनापति के गुण, निर्णय लेंने की क्षमता, प्रशासनिक योग्यता जैसे गुणों के कारण भी उसका तेजी से उदय हुआ। 1799 में प्रथम पार्षद, 1802 में आजीवन प्रथम पार्षद रहने इत्यादिका प्रावधान तथा 1804 में फ़्रांसिसी गणतंत्र के सम्राट की उपाधि धारण की। नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यएवं सुधार:- साम्राज्य विस्तार एवं आधुनिक विचार: शीघ्र ही नेपोलियनने एक बड़े साम्राज्यका विस्तार किया जैसे उसके साम्राज्य में इटली, जर्मनी, स्पेन, जर्मनी इत्यादि एक विस्तृत भूभाग शामिल था। अप्रत्यक्ष प्रभाव इससे भी अधिक व्यापक था। जिन क्षेत्रों पर नेपोलियन का प्रत्यक्ष शासन रहा उन क्षेत्रों में क्रांतिकारी विचारों का बीजारोपण हुआ जैसे सविंधान का शासन, समानता, स्वतंत्रता, पंथनिरपेक्षता जैसे विचारइत्यादि। इतना ही नहीं इटली जर्मनी जैसे क्षेत्रों का पुनसीमांकन भी किया। हालाँकि विजित क्षेत्रों के साथ उपनिवेशों जैसा ही व्यवहार किया और यह नेपोलियन के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण रहा। प्रशासन के क्षेत्र में : नेपोलियन ने क्रांतिकालीन कई विशेषताओं को जारी रखा जैसे प्रशासनिक विभाजन, सविंधान का शासन, निर्वाचन की परम्परा इत्यादि। हालाँकि कुछ महत्वपूर्ण संशोधन भी देखे जा सकते हैं जैसे स्थानीय प्रशासन में निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन की परम्परा,महत्वपूर्ण पदों पर सम्बन्धियों की नियुक्ति, सम्राट की उपाधि धारण करना इत्यादि। कानून के क्षेत्र में: नेपोलियन का एक महत्वपूर्ण कार्य मानाजाता है आधुनिक कानूनों का संकलन जैसे सिविल कॉड, कमर्शियल कॉड इत्यादि कानूनों के संकलन में नेपोलियन ने व्यक्तिगत रूचि भी दिखाई। इससे कानून के शासन की धारणा मज़बूत हुई और फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों पर आज भी इसका प्रभाव देख सकते हैं। हालाँकि कानून के क्षेत्र में भी कई सीमाएं देखी जा सकती है जैसे उत्तराधिर में महिलाओं को अधिकार न देना, पूंजीपतियों के साथ विवाद में मज़दूरों का साथ न देना इत्यादि। धर्म के क्षेत्र में: नेपोलियन ने पॉप से एक समझौता किया और पॉप ने क्रांतिकाल में हुए परिवर्तनों को मान्यता प्रदान की। जैसे चर्च की सम्पति वापस नहीं होगी, पादरियों को राष्ट्र के प्रति निष्ठा, राज्य में धर्म का हस्तक्षेप नहीं होगा इत्यादि। शिक्षा के क्षेत्र में : शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ परिवर्तनों के साथ नेपोलियन ने क्रन्तिकारी शिक्षा को जारी रखा जैसे फ्रांसीसीभाषा में शिक्षा, शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नार्मन स्कूल, प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा की श्रेणीबद्ध व्यवस्था इत्यादि। हालॉंकि शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सैन्य शिक्षा एवं नेपोलियन का महिमांडन किया गया। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में: अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी नेपोलियन ने आर्थिक विकास को गति देने की कोसिस की जैसे आधारभूत ढांचे पर बल, बैंक ऑफ़ फ्रांस की स्थापना, स्वदेशी उद्योगों के लिए प्रदर्शनी का आयोजन, शहरों का सौंदर्यकरण इत्यादि। हालाँकि इसकी आर्थिक नीति की सबसे बड़ी सीमा यह थी किइसने औद्योगीकरण की उपेक्षा की। इस प्रकार नेपालियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न कार्य एवं सुधार किये गए हालाँकि इन सुधारों की कई सीमाएं भी थीं।
##Question:नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों मेंकिये गए कार्यों एवं सुधारोंकी भीचर्चा कीजिए।(150 -200 शब्द/10 अंक) While mentioning the brief background of the rise of Napoleon, also discuss the work and reforms done by Napoleon in the various fields. (150 -200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, नेपोलियन के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यों एवं सुधारों के साथ साथ इन सुधारों एवं कार्यों कीसीमाओं कीभी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- समकालीन परिस्थितियों तथा नेपोलियन की व्यक्तिगत योग्यता कीनेपोलियन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फ़्रांसिसी क्रांति के कारण नेपोलियन को सैन्य शिक्षा एवं सैन्य सेवा में आगे बढ़ने का अवसर मिला। डायरेक्टरी के शासन से असंतोष, भ्रष्टाचारतथा पडोसी राष्ट्रों के साथ युद्धों में नेपोलियन को प्रतिभा दिखानेका अवसर मिला। नेपोलियन मेंसेनापति के गुण, निर्णय लेंने की क्षमता, प्रशासनिक योग्यता जैसे गुणों के कारण भी उसका तेजी से उदय हुआ। 1799 में प्रथम पार्षद, 1802 में आजीवन प्रथम पार्षद रहने इत्यादिका प्रावधान तथा 1804 में फ़्रांसिसी गणतंत्र के सम्राट की उपाधि धारण की। नेपोलियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये गए कार्यएवं सुधार:- साम्राज्य विस्तार एवं आधुनिक विचार: शीघ्र ही नेपोलियनने एक बड़े साम्राज्यका विस्तार किया जैसे उसके साम्राज्य में इटली, जर्मनी, स्पेन, जर्मनी इत्यादि एक विस्तृत भूभाग शामिल था। अप्रत्यक्ष प्रभाव इससे भी अधिक व्यापक था। जिन क्षेत्रों पर नेपोलियन का प्रत्यक्ष शासन रहा उन क्षेत्रों में क्रांतिकारी विचारों का बीजारोपण हुआ जैसे सविंधान का शासन, समानता, स्वतंत्रता, पंथनिरपेक्षता जैसे विचारइत्यादि। इतना ही नहीं इटली जर्मनी जैसे क्षेत्रों का पुनसीमांकन भी किया। हालाँकि विजित क्षेत्रों के साथ उपनिवेशों जैसा ही व्यवहार किया और यह नेपोलियन के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण रहा। प्रशासन के क्षेत्र में : नेपोलियन ने क्रांतिकालीन कई विशेषताओं को जारी रखा जैसे प्रशासनिक विभाजन, सविंधान का शासन, निर्वाचन की परम्परा इत्यादि। हालाँकि कुछ महत्वपूर्ण संशोधन भी देखे जा सकते हैं जैसे स्थानीय प्रशासन में निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन की परम्परा,महत्वपूर्ण पदों पर सम्बन्धियों की नियुक्ति, सम्राट की उपाधि धारण करना इत्यादि। कानून के क्षेत्र में: नेपोलियन का एक महत्वपूर्ण कार्य मानाजाता है आधुनिक कानूनों का संकलन जैसे सिविल कॉड, कमर्शियल कॉड इत्यादि कानूनों के संकलन में नेपोलियन ने व्यक्तिगत रूचि भी दिखाई। इससे कानून के शासन की धारणा मज़बूत हुई और फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों पर आज भी इसका प्रभाव देख सकते हैं। हालाँकि कानून के क्षेत्र में भी कई सीमाएं देखी जा सकती है जैसे उत्तराधिर में महिलाओं को अधिकार न देना, पूंजीपतियों के साथ विवाद में मज़दूरों का साथ न देना इत्यादि। धर्म के क्षेत्र में: नेपोलियन ने पॉप से एक समझौता किया और पॉप ने क्रांतिकाल में हुए परिवर्तनों को मान्यता प्रदान की। जैसे चर्च की सम्पति वापस नहीं होगी, पादरियों को राष्ट्र के प्रति निष्ठा, राज्य में धर्म का हस्तक्षेप नहीं होगा इत्यादि। शिक्षा के क्षेत्र में : शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ परिवर्तनों के साथ नेपोलियन ने क्रन्तिकारी शिक्षा को जारी रखा जैसे फ्रांसीसीभाषा में शिक्षा, शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए नार्मन स्कूल, प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा की श्रेणीबद्ध व्यवस्था इत्यादि। हालॉंकि शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सैन्य शिक्षा एवं नेपोलियन का महिमांडन किया गया। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में: अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी नेपोलियन ने आर्थिक विकास को गति देने की कोसिस की जैसे आधारभूत ढांचे पर बल, बैंक ऑफ़ फ्रांस की स्थापना, स्वदेशी उद्योगों के लिए प्रदर्शनी का आयोजन, शहरों का सौंदर्यकरण इत्यादि। हालाँकि इसकी आर्थिक नीति की सबसे बड़ी सीमा यह थी किइसने औद्योगीकरण की उपेक्षा की। इस प्रकार नेपालियन द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न कार्य एवं सुधार किये गए हालाँकि इन सुधारों की कई सीमाएं भी थीं।
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इटली के एकीकरण के समक्ष आने वाली बाधाओं का उल्लेख करते हुए, कावूर तथा गैरीबाल्डी की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) While mentioning the obstacles before Italian unification, discuss the role ofCavour and Garibaldi. (150-200 words/10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में इटली की तत्कालीन स्थिति का विवरण दीजिए। बाधाओं का उल्लेख कीजिये। इन बाधाओं को दूर करने, इटली के सफल एकीकरण में कावुर तथा गरीबाल्डी की भूमिका पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। 19 वीं शताब्दी में इटली एक विखंडित क्षेत्र था, जो लगभग एक दर्जन स्वतंत्र राज्यों में विभाजित था। इनमें से प्रत्येक राज्यों के शासकों के हित परस्पर टकराते रहते थे। ये सभी शासक इटली की राजनीतिक एकता के प्रबल विरोधी थे क्योंकि इटली की एकता के फलस्वरूप उन्हे अपनी गद्दी से हाथ धोने की आशंका थी। इन्ही शासकों की निरंकुशता के कारण इटली में राष्ट्रवाद का उदय हो सका। जिसके फलस्वरूप अंततः 1870 ईस्वी में एक राष्ट्र के रूप में इटली का उदय हुआ। एकीकरण में बाधाएं : देश की बहुसंख्यक जनसंख्या अशिक्षित एवं गरीब थी जिन्हे राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। अनेक छोटे-छोटे राजाओं को यह दर था कि एकता के लिए चलाये जाने वाले आंदोलन उनकी राजगद्दी के लिए खतरा उत्पन्न कर देंगे। वे अखंड राष्ट्र का निर्माण नहीं चाहते थे। आर्थिक रूप से विद्यमान असमानता ने भी इसमें बाधा उत्पन्न की इटली में आस्ट्रिया का स्वार्थ था। इसके कारण किसी भी प्रकार के विद्रोह को दबाने में सदैव तत्पर रहते थे। पोप को भाय था कि इटली के एकीकरण से अनेक छोटे छोटे राज्य में उनके हस्तक्षेप समाप्त हो जाएंगे। राष्ट्रियता कि भावना से युक्त नए इटली का निर्माण पोप की धार्मिक सत्ता को भी चुनौती दे सकती थी। कावुर का भूमिका: कावुर उस समय का बहुत ही दूरदर्शी व्यक्तित्व था। एकीकरण की प्रक्रिया को ठोस आधार प्रदान करने का श्रेय उसे ही दिया जाता है। 1852 में वह सार्डीनिया का प्रधानमंत्री बना। आर्थिक व्यवस्था में सुधार के लिए उसने कृषि एवं वाणिज्य विभाग को विशेष महत्व दिया। उसे पता था कि इटली के एकीकरण में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है आस्ट्रिया। अतः आस्ट्रिया को बाहर करना अतिआवश्यक था इसके लिए वाह्य सहायता की आवश्यकता थी। ध्यातव्य है कि इसी समय रूस और तुर्की के मध्य युद्ध छिड़ गया। इसमें कावुर ने इंग्लैंड और फ्रांस के साथ तुर्की कि सहायता की। युद्ध में विजय के पश्चात कावुर की पहचान वैश्विक स्तर पर हुई। फ्रांस और इंग्लैंड ने आस्ट्रिया को इटली की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराया। इसी क्रम में इटली की मदद के लिए फ्रांस की तरफ से नेपोलियन तृतीय तैयार हो गया और पिडमौंट-सरडीनिया के साथ प्लाम्बियर्स का समझौता हुआ। अंततः आस्ट्रिया द्वारा इस संधि के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया गया। हालांकि आस्ट्रिया ने अपनी पूर्ववत स्थिति बनाए रखने में सफल हुआ परंतु इससे आने वाले समय में इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई। गैरीबाल्डी की भूमिका: कावुर के बाद एकीकरण में सबसे महत्वपूर्ण योगदान गैरीबाल्डी का रहा। वह दूरदर्शिता, जोश व त्याग का अत्यंत धनी था। वह मुख्य रूप से मेजिनी के विचारों का दृढ़ समर्थक था तथा यंग इटली का सदस्य था। उसकी गोरिल्ला तथा छापामार युद्ध पद्धति इटली के एकीकरण में विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि कावुर की कूटनीति तथा गैरीबाल्डी की तलवार ने एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गैरीबाल्डी ने सिसली और नेपल्स दो इतालवी राज्य का एकीकरण पोड्मोंट-सार्डीनिया के साथ किया। इसके लिए उसने एक हजार स्वयं सैनिकों वाले लाल कुर्ती नामक संगठन का निर्माण किया। इसके पश्चात उसने इटली के अन्य क्षेत्र वेनेशिया पर आक्रमण करने की योजना बनाई। जो अंततः सफल हुआ। निष्कर्षतः इटली के एकीकरण की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक बाधाओं को दूर करने में कावुर ने पहला प्रयास किया जिसे गैरीबाल्डी ने आगे बढ़ाया। कावुर की कूटनीतिक शक्ति तथा गैरीबाल्डी की युद्ध में निपुणता ने एकीकरण को लगभग पूरा करने का प्रयास किया। इसके बाद शेष बचे भाग को विक्टर इमानुएल द्वितीय ने पूरा किया।
##Question:इटली के एकीकरण के समक्ष आने वाली बाधाओं का उल्लेख करते हुए, कावूर तथा गैरीबाल्डी की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) While mentioning the obstacles before Italian unification, discuss the role ofCavour and Garibaldi. (150-200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में इटली की तत्कालीन स्थिति का विवरण दीजिए। बाधाओं का उल्लेख कीजिये। इन बाधाओं को दूर करने, इटली के सफल एकीकरण में कावुर तथा गरीबाल्डी की भूमिका पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। 19 वीं शताब्दी में इटली एक विखंडित क्षेत्र था, जो लगभग एक दर्जन स्वतंत्र राज्यों में विभाजित था। इनमें से प्रत्येक राज्यों के शासकों के हित परस्पर टकराते रहते थे। ये सभी शासक इटली की राजनीतिक एकता के प्रबल विरोधी थे क्योंकि इटली की एकता के फलस्वरूप उन्हे अपनी गद्दी से हाथ धोने की आशंका थी। इन्ही शासकों की निरंकुशता के कारण इटली में राष्ट्रवाद का उदय हो सका। जिसके फलस्वरूप अंततः 1870 ईस्वी में एक राष्ट्र के रूप में इटली का उदय हुआ। एकीकरण में बाधाएं : देश की बहुसंख्यक जनसंख्या अशिक्षित एवं गरीब थी जिन्हे राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। अनेक छोटे-छोटे राजाओं को यह दर था कि एकता के लिए चलाये जाने वाले आंदोलन उनकी राजगद्दी के लिए खतरा उत्पन्न कर देंगे। वे अखंड राष्ट्र का निर्माण नहीं चाहते थे। आर्थिक रूप से विद्यमान असमानता ने भी इसमें बाधा उत्पन्न की इटली में आस्ट्रिया का स्वार्थ था। इसके कारण किसी भी प्रकार के विद्रोह को दबाने में सदैव तत्पर रहते थे। पोप को भाय था कि इटली के एकीकरण से अनेक छोटे छोटे राज्य में उनके हस्तक्षेप समाप्त हो जाएंगे। राष्ट्रियता कि भावना से युक्त नए इटली का निर्माण पोप की धार्मिक सत्ता को भी चुनौती दे सकती थी। कावुर का भूमिका: कावुर उस समय का बहुत ही दूरदर्शी व्यक्तित्व था। एकीकरण की प्रक्रिया को ठोस आधार प्रदान करने का श्रेय उसे ही दिया जाता है। 1852 में वह सार्डीनिया का प्रधानमंत्री बना। आर्थिक व्यवस्था में सुधार के लिए उसने कृषि एवं वाणिज्य विभाग को विशेष महत्व दिया। उसे पता था कि इटली के एकीकरण में जो सबसे बड़ी बाधा है वह है आस्ट्रिया। अतः आस्ट्रिया को बाहर करना अतिआवश्यक था इसके लिए वाह्य सहायता की आवश्यकता थी। ध्यातव्य है कि इसी समय रूस और तुर्की के मध्य युद्ध छिड़ गया। इसमें कावुर ने इंग्लैंड और फ्रांस के साथ तुर्की कि सहायता की। युद्ध में विजय के पश्चात कावुर की पहचान वैश्विक स्तर पर हुई। फ्रांस और इंग्लैंड ने आस्ट्रिया को इटली की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराया। इसी क्रम में इटली की मदद के लिए फ्रांस की तरफ से नेपोलियन तृतीय तैयार हो गया और पिडमौंट-सरडीनिया के साथ प्लाम्बियर्स का समझौता हुआ। अंततः आस्ट्रिया द्वारा इस संधि के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया गया। हालांकि आस्ट्रिया ने अपनी पूर्ववत स्थिति बनाए रखने में सफल हुआ परंतु इससे आने वाले समय में इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई। गैरीबाल्डी की भूमिका: कावुर के बाद एकीकरण में सबसे महत्वपूर्ण योगदान गैरीबाल्डी का रहा। वह दूरदर्शिता, जोश व त्याग का अत्यंत धनी था। वह मुख्य रूप से मेजिनी के विचारों का दृढ़ समर्थक था तथा यंग इटली का सदस्य था। उसकी गोरिल्ला तथा छापामार युद्ध पद्धति इटली के एकीकरण में विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि कावुर की कूटनीति तथा गैरीबाल्डी की तलवार ने एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गैरीबाल्डी ने सिसली और नेपल्स दो इतालवी राज्य का एकीकरण पोड्मोंट-सार्डीनिया के साथ किया। इसके लिए उसने एक हजार स्वयं सैनिकों वाले लाल कुर्ती नामक संगठन का निर्माण किया। इसके पश्चात उसने इटली के अन्य क्षेत्र वेनेशिया पर आक्रमण करने की योजना बनाई। जो अंततः सफल हुआ। निष्कर्षतः इटली के एकीकरण की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक बाधाओं को दूर करने में कावुर ने पहला प्रयास किया जिसे गैरीबाल्डी ने आगे बढ़ाया। कावुर की कूटनीतिक शक्ति तथा गैरीबाल्डी की युद्ध में निपुणता ने एकीकरण को लगभग पूरा करने का प्रयास किया। इसके बाद शेष बचे भाग को विक्टर इमानुएल द्वितीय ने पूरा किया।
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दयायाचिका से आप क्या समझते हैं? संविधान में दिए गए क्षमादान के रूपों को परिभाषित करते हुए इस सन्दर्भ में न्यायपालिका के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by mercy petition? Defining the forms of pardoning given in the Constitution, Clarifythe views of the judiciary in this context. (150-200 words/10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में दयायाचिका को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में संविधान में दिए गए क्षमादान के रूपों को परिभाषित कीजिये 3- दूसरे भाग में इस सन्दर्भ में न्यायपालिका के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| क्षमादान की शक्ति राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 और राज्यपाल को अनुच्छेद 161 के अंतर्गत प्राप्त होती है| यह क्षमादान सजा प्राप्त व्यक्ति द्वारा राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल को प्रेषित अपनी दया याचिका के बदले प्राप्त होता है| न्यायालय से फाँसी की सजा मिलने के बाद कोई भी व्यक्ति, भारतीय अथवा विदेशी नागरिक अपराध के बदले न्यायपालिका द्वारा दिए गए दंड में माफ़ी या छूट पाने के संबंध में राष्ट्रपति कार्यालय या गृह मंत्रालय को दया याचिका भेज सकता है|इसी तरह संबंधित राज्य केराज्यपालको भी दया याचिका भेजी जा सकती है| राज्यपाल मृत्युदंड, संघीय मामलों के अपराध और कोर्ट मार्शल के सन्दर्भ में दयायाचिका को स्वीकार नहीं कर सकते हैं| दोषी व्यक्ति अधिकारियों, वकीलों या परिवार के लोगों के जरिये दया याचिकाएं भेज सकते हैं| दयायाचिका के प्रतिउत्तर मने भारत के राष्ट्रपति उस पर निम्नलिखित रूप में कोई प्रतिक्रया दे सकते हैं| आम माफ़ी(general amnesty/pardon) · इसमें केवल सजा(sentence) ही नहीं बल्कि दोष(conviction) को भी माफ़ कर दिया जाता है| इसमें अपराध का दाग समाप्त कर दिया जाता है| · आम माफ़ी मिलने के बाद उस व्यक्ति को समस्त नागरिक अधिकार प्राप्त हो सकेंगे| · शेष अन्य माफियों में दोष नहीं माफ़ होता है अर्थात दोषसिद्धि बनी रहती है केवल सजा माफ़ होती है| विराम(Respite) · इसमें सजा को कुछ समय के लिए स्थगित किया जाता है| · कुछ स्थितियों में सजा माफ़ भी हो सकती है| जैसे नवजात बच्चे के लालन-पालन के लिए उसकी माँ को| परिहार(Remission) · इसमें सजा की प्रकृति बदले बिना सजा की अवधि कम की जाती है · अर्थात इसका प्रयोग मृत्युदंड में नही हो सकता प्रतिलंबन (Reprieve) · दयायाचिका करने की अवस्था में राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा दयायाचिका के निस्तारण तक सजा को रोके रखना| लघुकरण(commutation) · इसमें सजा की प्रकृति एवं अवधि दोनों बदल दी जाती है| भारत के अलग-अलग राष्ट्रपतियों ने दया याचिकाओं का अलग-अलग तरह से निपटारा किया है| चूँकि इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं है| अतः राष्ट्रपति और गृह मंत्रालय दोनों के पास कई दयायाचिकाएं अनेकों बार कई साल तक लंबित रही हैं| इस के साथ ही इस मामले का स्वरुप न्यायिक है जबकि संविधान की व्याख्या का अधिकार न्यायालय के पास है अतः भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न वादों में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है| जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं- केहरसिंह बनाम भारत संघ(1989)मामला · इस वाद में SC ने राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित दिशा-निर्देश/सिद्धांत स्थापित किये · दोषी व्यक्ति राष्ट्रपति से निजी रूप से मिलने या भौतिक साक्षात्कार करने की जिद नहीं कर सकता है, यह उसका मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि उसको मिला हुआ एक अवसर है · राष्ट्रपति अपने क्षमादान की शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करे, इस सम्बन्ध न्यायालय कोई तौर-तरीका/नियम तय नहीं कर सकता है| इसके लिए राष्ट्रपति को स्वयं ही इसकी प्रक्रिया तय करनी होगी| · जिस प्रक्रिया को न्यायालय ने अपना कर याची को दोषी सिद्ध किया है, राष्ट्रपति उससे बिलकुल भिन्न प्रक्रिया अपना सकते हैं और वह न्यायालय के निर्णय को इसके आधार पर पलट सकते हैं| · राष्ट्रपति, केंद्र सरकार के सुझाव के अनुसार इस शक्ति का प्रयोग करेंगे| · सामान्यतः राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी किन्तु यदि क्षमादान की इस शक्ति में राष्ट्रपति ने कोई बदनीयती या पक्षपात का प्रदर्शन किया है तो न्यायालय इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है जैसे की मारूराम वाद 1980 में न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है| · राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति के मामले में न्यायालय को प्राप्त न्यायिक समीक्षा की शक्ति सीमित होगी अर्थात हर मामले में न्यायालय जाना संभव नहीं होगा| शत्रुघ्न सिंह चौहान तथा अन्य बनाम भारत संघ(2013) मामला · इस वाद में SC ने दयायाचिकाओं के निस्तारण में हो रही देरी पर गंभीर चिंता प्रकट की| और निम्नलिखित निर्णय दिए- · SC के अनुसार न्यायालय के द्वारा दोषसिद्ध कोई व्यक्ति यदि राष्ट्रपति के पास न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध राहत पाने के लिए याचना करता है तो एक निश्चित समय के भीतर उसका निस्तारण कर दिया जाना चाहिए · यदि सरकार इसके निस्तारण में अकारण या अनावश्यक कोई देरी करती है तो याची पुनः न्यायालय की शरण सकता है और न्यायालय उसकी मृत्युदंड सजा को आजीवन कारावास में बदल सकता है| इस आधार पर उक्त मुकदमें में 15 दोषियों की मृत्युदंड की सजा को न्यायालय ने आजीवन कारावास में बदल दिया था| चूँकि विलंबित न्याय को अन्याय माना जाता है अतः दयायाचिकाओं के निस्तारण में तीव्रता, न्याय भावना के अनुरूप होगी| क्षमादान के सन्दर्भ में शीघ्रता के साथ ही निष्पक्षता एवं वस्तुनिष्ठता का अनुपालन न्याय की स्थापना में सहायक होगा|
##Question:दयायाचिका से आप क्या समझते हैं? संविधान में दिए गए क्षमादान के रूपों को परिभाषित करते हुए इस सन्दर्भ में न्यायपालिका के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by mercy petition? Defining the forms of pardoning given in the Constitution, Clarifythe views of the judiciary in this context. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में दयायाचिका को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में संविधान में दिए गए क्षमादान के रूपों को परिभाषित कीजिये 3- दूसरे भाग में इस सन्दर्भ में न्यायपालिका के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| क्षमादान की शक्ति राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 और राज्यपाल को अनुच्छेद 161 के अंतर्गत प्राप्त होती है| यह क्षमादान सजा प्राप्त व्यक्ति द्वारा राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल को प्रेषित अपनी दया याचिका के बदले प्राप्त होता है| न्यायालय से फाँसी की सजा मिलने के बाद कोई भी व्यक्ति, भारतीय अथवा विदेशी नागरिक अपराध के बदले न्यायपालिका द्वारा दिए गए दंड में माफ़ी या छूट पाने के संबंध में राष्ट्रपति कार्यालय या गृह मंत्रालय को दया याचिका भेज सकता है|इसी तरह संबंधित राज्य केराज्यपालको भी दया याचिका भेजी जा सकती है| राज्यपाल मृत्युदंड, संघीय मामलों के अपराध और कोर्ट मार्शल के सन्दर्भ में दयायाचिका को स्वीकार नहीं कर सकते हैं| दोषी व्यक्ति अधिकारियों, वकीलों या परिवार के लोगों के जरिये दया याचिकाएं भेज सकते हैं| दयायाचिका के प्रतिउत्तर मने भारत के राष्ट्रपति उस पर निम्नलिखित रूप में कोई प्रतिक्रया दे सकते हैं| आम माफ़ी(general amnesty/pardon) · इसमें केवल सजा(sentence) ही नहीं बल्कि दोष(conviction) को भी माफ़ कर दिया जाता है| इसमें अपराध का दाग समाप्त कर दिया जाता है| · आम माफ़ी मिलने के बाद उस व्यक्ति को समस्त नागरिक अधिकार प्राप्त हो सकेंगे| · शेष अन्य माफियों में दोष नहीं माफ़ होता है अर्थात दोषसिद्धि बनी रहती है केवल सजा माफ़ होती है| विराम(Respite) · इसमें सजा को कुछ समय के लिए स्थगित किया जाता है| · कुछ स्थितियों में सजा माफ़ भी हो सकती है| जैसे नवजात बच्चे के लालन-पालन के लिए उसकी माँ को| परिहार(Remission) · इसमें सजा की प्रकृति बदले बिना सजा की अवधि कम की जाती है · अर्थात इसका प्रयोग मृत्युदंड में नही हो सकता प्रतिलंबन (Reprieve) · दयायाचिका करने की अवस्था में राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा दयायाचिका के निस्तारण तक सजा को रोके रखना| लघुकरण(commutation) · इसमें सजा की प्रकृति एवं अवधि दोनों बदल दी जाती है| भारत के अलग-अलग राष्ट्रपतियों ने दया याचिकाओं का अलग-अलग तरह से निपटारा किया है| चूँकि इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं है| अतः राष्ट्रपति और गृह मंत्रालय दोनों के पास कई दयायाचिकाएं अनेकों बार कई साल तक लंबित रही हैं| इस के साथ ही इस मामले का स्वरुप न्यायिक है जबकि संविधान की व्याख्या का अधिकार न्यायालय के पास है अतः भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न वादों में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है| जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं- केहरसिंह बनाम भारत संघ(1989)मामला · इस वाद में SC ने राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित दिशा-निर्देश/सिद्धांत स्थापित किये · दोषी व्यक्ति राष्ट्रपति से निजी रूप से मिलने या भौतिक साक्षात्कार करने की जिद नहीं कर सकता है, यह उसका मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि उसको मिला हुआ एक अवसर है · राष्ट्रपति अपने क्षमादान की शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करे, इस सम्बन्ध न्यायालय कोई तौर-तरीका/नियम तय नहीं कर सकता है| इसके लिए राष्ट्रपति को स्वयं ही इसकी प्रक्रिया तय करनी होगी| · जिस प्रक्रिया को न्यायालय ने अपना कर याची को दोषी सिद्ध किया है, राष्ट्रपति उससे बिलकुल भिन्न प्रक्रिया अपना सकते हैं और वह न्यायालय के निर्णय को इसके आधार पर पलट सकते हैं| · राष्ट्रपति, केंद्र सरकार के सुझाव के अनुसार इस शक्ति का प्रयोग करेंगे| · सामान्यतः राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी किन्तु यदि क्षमादान की इस शक्ति में राष्ट्रपति ने कोई बदनीयती या पक्षपात का प्रदर्शन किया है तो न्यायालय इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है जैसे की मारूराम वाद 1980 में न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है| · राष्ट्रपति के क्षमादान की शक्ति के मामले में न्यायालय को प्राप्त न्यायिक समीक्षा की शक्ति सीमित होगी अर्थात हर मामले में न्यायालय जाना संभव नहीं होगा| शत्रुघ्न सिंह चौहान तथा अन्य बनाम भारत संघ(2013) मामला · इस वाद में SC ने दयायाचिकाओं के निस्तारण में हो रही देरी पर गंभीर चिंता प्रकट की| और निम्नलिखित निर्णय दिए- · SC के अनुसार न्यायालय के द्वारा दोषसिद्ध कोई व्यक्ति यदि राष्ट्रपति के पास न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध राहत पाने के लिए याचना करता है तो एक निश्चित समय के भीतर उसका निस्तारण कर दिया जाना चाहिए · यदि सरकार इसके निस्तारण में अकारण या अनावश्यक कोई देरी करती है तो याची पुनः न्यायालय की शरण सकता है और न्यायालय उसकी मृत्युदंड सजा को आजीवन कारावास में बदल सकता है| इस आधार पर उक्त मुकदमें में 15 दोषियों की मृत्युदंड की सजा को न्यायालय ने आजीवन कारावास में बदल दिया था| चूँकि विलंबित न्याय को अन्याय माना जाता है अतः दयायाचिकाओं के निस्तारण में तीव्रता, न्याय भावना के अनुरूप होगी| क्षमादान के सन्दर्भ में शीघ्रता के साथ ही निष्पक्षता एवं वस्तुनिष्ठता का अनुपालन न्याय की स्थापना में सहायक होगा|
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कॉर्पोरेट गवर्नेंस से आप क्या समझते हैं? हालिया कुछ उदाहरणों का संदर्भ लेते हुए, कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जरुरत तथा महत्ता को स्पष्ट कीजिये| भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को सुनिश्चित करने हेतु कुछ प्रावधानों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you mean by Corporate Governance? Citing some recent examples, Clarify the Need and Importance of Corporate Governance. Mention Some provisions to ensure Corporate Governance in India. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच- कॉर्पोरेट गवर्नेंस को समझाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, हालिया कुछ उदाहरणों का संदर्भ लेते हुए कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जरुरत एवं महता को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, भारत मेंकॉर्पोरेट गवर्नेंस को सुनिश्चित करने हेतु कुछ प्रावधानों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- किसी भी कंपनी को चलाने की प्रणालियों, सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के मिले-जुले रूप को कॉरपोरेट गवर्नेंस कहते हैं। इनसे कंपनी के संचालन और उस पर नियंत्रण संबंधित दिशानिर्देश मिलते है ताकि कंपनी की गुणवत्ता बढ़ाने और इससे संबंधित लोगों को दीर्घकालिक तौर पर लाभ होने की संभावना को बल मिले। यहां संबंधित लोगों के दायरे में कंपनी का निदेशक मंडल, कर्मचारी, ग्राहक और पूरा समाज शामिल है। इस तरह से कंपनी का प्रबंधन अन्य सभी लोगों के लिए ट्रस्टी की भूमिका में आ जाता है।इन नियमों/प्रथाओं के द्वारा बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स अपने सभी हितधारकों के साथ कंपनी के संबंधों में जवाबदेही, निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करता है| इसमें लेनदेन की गतिविधियों में ईमानदारी बरतना, कंपनी के परिणामों और फैसलों को सार्वजनिक करना, देश के कायदे-कानून का पालन करना और लोगों के भरोसे को बनाए रखना शामिल है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस में गड़बड़ी से जुड़े उदाहरण - सत्यम कंप्यूटर्स, गीतांजलि(नीरव मोदी)-पीएनबी मामला , फोर्टिस विवाद, किंगफ़िशर मामला, जेट एयरवेज, आम्रपाली तथा अन्य रियल एस्टेट से जुड़े मामले आदि| कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जरुरत के पीछे तर्क तथा इसकी महता - भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद व्यापक रूप से निजी क्षेत्र का विकास हुआ तथा कंपनियों की संख्या एवं प्रचालन क्षेत्रों में बढ़ोतरी हुयी| इससे कंपनियों के संचालन तथा उनसे उत्पन विषयों से जुड़े विवादों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुयी| उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के फलस्वरूप कंपनियों/फर्मों के समक्ष एक ओर तो आंतरिक संचालन में मानकों के अनुपालन से जुड़ेआयाम थें वहीँ दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर कंपनियों के ख़राब गवर्नेंस के उदाहरणों से सीखलेने की चुनौती थी| साथ ही, यह निजी कंपनियों में निवेश हेतु जनता के मन में विश्वास को बढ़ावा देता है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस की निम्न महताओंको देखते हुए इसकी जरुरत को समझा जा सकता है- यह कंपनियों और उनके पूंजी के बाहरी प्रदाताओं के बीच दीर्घकालिक विश्वास बनाने के लिए रूपरेखा तैयार करता है। यह स्वतंत्र निदेशकों को शामिल करके कंपनी के उच्च स्तर पर रणनीतिक सोच को बेहतर बनाता है जो अनुभव, पारदर्शिता, नवाचार आदि को प्रोत्साहन प्रदान करता है| यह प्रबंधन, निगरानी और जोखिम को तर्कसंगत बनाता है ताकि फर्म वैश्विक स्तर पर चुनौतियों का सामना कर पाए| यह निर्णय लेने की प्रक्रिया को सावधानीपूर्वक निगरानी करते हुए शीर्ष प्रबंधन और निदशकों की देयता को सीमित करता है| यह कंपनी से जुड़े महत्वपूर्ण हितधारकों के बीच आंतरिक(कर्मचारी) और बाह्य(ग्राहकों,नियामकों आदि) रूप से सामंजस्य को बढ़ावा देता है| कॉरपोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता उत्पन्न हुई है क्योंकि निदेशकों के बोर्ड द्वारा वित्तीय रिपोर्टिंग और जवाबदेही के मानकों का पालन न करने की बढ़ती चिंता और कॉरपोरेट्स का प्रबंधन निवेशकों पर भारी नुकसान पहुंचा रहा है। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को सुनिश्चित करने हेतु कुछ प्रावधान भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा 1998 में कॉरपोरेट गवर्नेंस पर भारत का पहला व्यापक कोड प्रकाशित किया गया| इसके बाद सेबी द्वारा कॉरपोरेट गवर्नेंस पर कुमार मंगलम बिड़ला समिति की सिफारिशों को लागू किया गया| सेबी द्वारा श्री एन. आर. नारायण मूर्ति की अध्यक्षता में एक अन्य समिति नियुक्त की गई, जिसने कॉर्पोरेट- प्रशासन में वृद्धि की सिफारिश की। सेबी ने लिस्टिंग समझौते के क्लॉज 49 में नारायण मूर्ति समिति द्वारा कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर की गई सिफारिशों को शामिल किया है। भारत सरकार के कंपनी मामलों के विभाग द्वारा विभिन्न कॉरपोरेट गवर्नेंस मुद्दों की जांच हेतु न रेश चंद्रा की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति का गठन किया गया था| कंपनी एक्ट 2013 के अंतर्गत प्रावधान- प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स और कुछ अन्य प्रकार की कंपनी(चुकता पूंजी-10 करोड़ या अधिक, टर्नओवर-100 करोड़ से अधिक, लोन-50 करोड़ या अधिक) को एक ऑडिट कमिटी की नियुक्ति करनी होगी जिसमें कम से कम 3 सदस्य होंगे और स्वतंत्र निदेशक बहुमत में होंगे(अध्यक्ष भी स्वतंत्र निदेशक होंगे); एक तिहाई निदेशक स्वतंत्र निदेशक; ऑडिटर्स का रोटेशन - व्यक्तिगत ऑडिटर्स को हर 5 वर्ष में बदलने की आवश्यकता है और एक ऑडिटर फर्म को हर 10 वर्ष में; कंपनी के संचालन का पूर्ण प्रकटीकरण/पारदर्शी बनाना जिसके तहत शेयरधारकों को सूचनाएं देना; सूचीबद्ध कंपनियों के सीईओ एवं सीएफओ कोप्रमाणित करना होगा की वितीय विवरण निष्पक्ष हैतथा आतंरिक नियंत्रण के लिए जिम्मेदारी लेनी होगी| सूचीबद्ध कंपनियों की वार्षिक रिपोर्ट में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानदंडों के अनुपालनका रिपोर्ट देना अनिवार्य है| सेबी द्वारा इस संबंध में उठाये गये कदम-लिस्टिंग सूचियों और प्रकटीकरण आवश्यकताएं विनियम,2015 रेगुलेशन 20 -हितधारक संबंध समितिका गठन करना; विनियमन 26(1) -एक निदेशक 10 से अधिक समितियों में सदस्य नहीं होगा और 5 से अधिक समितियों के अध्यक्ष के रूप में काम नहीं कर सकेंगे; रेगुलेशन 24(1) -सूचीबद्ध कंपनी के कम से कम एक स्वतंत्र निदेशक को असूचीबद्ध सहायक कंपनी के निदेशक-मंडल में निदेशक के रूप में रखा जाना अनिवार्य है| विनियमन 24(4) -एक असूचीबद्ध सहायक कंपनी का प्रबंधन समय-समय पर सूचीबद्ध कंपनी के निदेशक-मंडल के संज्ञान में लायेगा कि दोनों कंपनियों के बीच में क्या-क्या लेनदेन हुआ है| विनियमन 23(4) -सूचीबद्ध कंपनी को संबंधित पार्टी लेनदेन के लिए शेयरधारकों से अनुमति प्राप्त करनी होगी( रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन)|
##Question:कॉर्पोरेट गवर्नेंस से आप क्या समझते हैं? हालिया कुछ उदाहरणों का संदर्भ लेते हुए, कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जरुरत तथा महत्ता को स्पष्ट कीजिये| भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को सुनिश्चित करने हेतु कुछ प्रावधानों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you mean by Corporate Governance? Citing some recent examples, Clarify the Need and Importance of Corporate Governance. Mention Some provisions to ensure Corporate Governance in India. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच- कॉर्पोरेट गवर्नेंस को समझाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, हालिया कुछ उदाहरणों का संदर्भ लेते हुए कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जरुरत एवं महता को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, भारत मेंकॉर्पोरेट गवर्नेंस को सुनिश्चित करने हेतु कुछ प्रावधानों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- किसी भी कंपनी को चलाने की प्रणालियों, सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के मिले-जुले रूप को कॉरपोरेट गवर्नेंस कहते हैं। इनसे कंपनी के संचालन और उस पर नियंत्रण संबंधित दिशानिर्देश मिलते है ताकि कंपनी की गुणवत्ता बढ़ाने और इससे संबंधित लोगों को दीर्घकालिक तौर पर लाभ होने की संभावना को बल मिले। यहां संबंधित लोगों के दायरे में कंपनी का निदेशक मंडल, कर्मचारी, ग्राहक और पूरा समाज शामिल है। इस तरह से कंपनी का प्रबंधन अन्य सभी लोगों के लिए ट्रस्टी की भूमिका में आ जाता है।इन नियमों/प्रथाओं के द्वारा बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स अपने सभी हितधारकों के साथ कंपनी के संबंधों में जवाबदेही, निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करता है| इसमें लेनदेन की गतिविधियों में ईमानदारी बरतना, कंपनी के परिणामों और फैसलों को सार्वजनिक करना, देश के कायदे-कानून का पालन करना और लोगों के भरोसे को बनाए रखना शामिल है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस में गड़बड़ी से जुड़े उदाहरण - सत्यम कंप्यूटर्स, गीतांजलि(नीरव मोदी)-पीएनबी मामला , फोर्टिस विवाद, किंगफ़िशर मामला, जेट एयरवेज, आम्रपाली तथा अन्य रियल एस्टेट से जुड़े मामले आदि| कॉर्पोरेट गवर्नेंस की जरुरत के पीछे तर्क तथा इसकी महता - भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद व्यापक रूप से निजी क्षेत्र का विकास हुआ तथा कंपनियों की संख्या एवं प्रचालन क्षेत्रों में बढ़ोतरी हुयी| इससे कंपनियों के संचालन तथा उनसे उत्पन विषयों से जुड़े विवादों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुयी| उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के फलस्वरूप कंपनियों/फर्मों के समक्ष एक ओर तो आंतरिक संचालन में मानकों के अनुपालन से जुड़ेआयाम थें वहीँ दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर कंपनियों के ख़राब गवर्नेंस के उदाहरणों से सीखलेने की चुनौती थी| साथ ही, यह निजी कंपनियों में निवेश हेतु जनता के मन में विश्वास को बढ़ावा देता है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस की निम्न महताओंको देखते हुए इसकी जरुरत को समझा जा सकता है- यह कंपनियों और उनके पूंजी के बाहरी प्रदाताओं के बीच दीर्घकालिक विश्वास बनाने के लिए रूपरेखा तैयार करता है। यह स्वतंत्र निदेशकों को शामिल करके कंपनी के उच्च स्तर पर रणनीतिक सोच को बेहतर बनाता है जो अनुभव, पारदर्शिता, नवाचार आदि को प्रोत्साहन प्रदान करता है| यह प्रबंधन, निगरानी और जोखिम को तर्कसंगत बनाता है ताकि फर्म वैश्विक स्तर पर चुनौतियों का सामना कर पाए| यह निर्णय लेने की प्रक्रिया को सावधानीपूर्वक निगरानी करते हुए शीर्ष प्रबंधन और निदशकों की देयता को सीमित करता है| यह कंपनी से जुड़े महत्वपूर्ण हितधारकों के बीच आंतरिक(कर्मचारी) और बाह्य(ग्राहकों,नियामकों आदि) रूप से सामंजस्य को बढ़ावा देता है| कॉरपोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता उत्पन्न हुई है क्योंकि निदेशकों के बोर्ड द्वारा वित्तीय रिपोर्टिंग और जवाबदेही के मानकों का पालन न करने की बढ़ती चिंता और कॉरपोरेट्स का प्रबंधन निवेशकों पर भारी नुकसान पहुंचा रहा है। भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को सुनिश्चित करने हेतु कुछ प्रावधान भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा 1998 में कॉरपोरेट गवर्नेंस पर भारत का पहला व्यापक कोड प्रकाशित किया गया| इसके बाद सेबी द्वारा कॉरपोरेट गवर्नेंस पर कुमार मंगलम बिड़ला समिति की सिफारिशों को लागू किया गया| सेबी द्वारा श्री एन. आर. नारायण मूर्ति की अध्यक्षता में एक अन्य समिति नियुक्त की गई, जिसने कॉर्पोरेट- प्रशासन में वृद्धि की सिफारिश की। सेबी ने लिस्टिंग समझौते के क्लॉज 49 में नारायण मूर्ति समिति द्वारा कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर की गई सिफारिशों को शामिल किया है। भारत सरकार के कंपनी मामलों के विभाग द्वारा विभिन्न कॉरपोरेट गवर्नेंस मुद्दों की जांच हेतु न रेश चंद्रा की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति का गठन किया गया था| कंपनी एक्ट 2013 के अंतर्गत प्रावधान- प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स और कुछ अन्य प्रकार की कंपनी(चुकता पूंजी-10 करोड़ या अधिक, टर्नओवर-100 करोड़ से अधिक, लोन-50 करोड़ या अधिक) को एक ऑडिट कमिटी की नियुक्ति करनी होगी जिसमें कम से कम 3 सदस्य होंगे और स्वतंत्र निदेशक बहुमत में होंगे(अध्यक्ष भी स्वतंत्र निदेशक होंगे); एक तिहाई निदेशक स्वतंत्र निदेशक; ऑडिटर्स का रोटेशन - व्यक्तिगत ऑडिटर्स को हर 5 वर्ष में बदलने की आवश्यकता है और एक ऑडिटर फर्म को हर 10 वर्ष में; कंपनी के संचालन का पूर्ण प्रकटीकरण/पारदर्शी बनाना जिसके तहत शेयरधारकों को सूचनाएं देना; सूचीबद्ध कंपनियों के सीईओ एवं सीएफओ कोप्रमाणित करना होगा की वितीय विवरण निष्पक्ष हैतथा आतंरिक नियंत्रण के लिए जिम्मेदारी लेनी होगी| सूचीबद्ध कंपनियों की वार्षिक रिपोर्ट में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानदंडों के अनुपालनका रिपोर्ट देना अनिवार्य है| सेबी द्वारा इस संबंध में उठाये गये कदम-लिस्टिंग सूचियों और प्रकटीकरण आवश्यकताएं विनियम,2015 रेगुलेशन 20 -हितधारक संबंध समितिका गठन करना; विनियमन 26(1) -एक निदेशक 10 से अधिक समितियों में सदस्य नहीं होगा और 5 से अधिक समितियों के अध्यक्ष के रूप में काम नहीं कर सकेंगे; रेगुलेशन 24(1) -सूचीबद्ध कंपनी के कम से कम एक स्वतंत्र निदेशक को असूचीबद्ध सहायक कंपनी के निदेशक-मंडल में निदेशक के रूप में रखा जाना अनिवार्य है| विनियमन 24(4) -एक असूचीबद्ध सहायक कंपनी का प्रबंधन समय-समय पर सूचीबद्ध कंपनी के निदेशक-मंडल के संज्ञान में लायेगा कि दोनों कंपनियों के बीच में क्या-क्या लेनदेन हुआ है| विनियमन 23(4) -सूचीबद्ध कंपनी को संबंधित पार्टी लेनदेन के लिए शेयरधारकों से अनुमति प्राप्त करनी होगी( रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन)|
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प्लेट विवर्तनिकी से आप क्या समझते हैं? तर्कों और उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये कि प्लेटों का अभिसारी संचलन भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण होता है| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you think of plate tectonics? Explain with arguments and examples that converging movement of plates is important in the study of geomorphology. (150-200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में अभिसारी संचलन को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में अभिसारी संचलन के प्रकारों को बताते हुए इनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में इनका महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्लेट, पृथ्वी की पर्पटी या स्थल मंडल का एक भाग होती है|विवर्तनिक शब्द का सम्बन्ध इन प्लेटों के संचलन से है|यह सिद्धांत WJ मॉर्गन ने दिया था| इस सिद्धांत के अनुसार बाह्य मंडल (आउटर कोर)से आने वाले मैग्मा को मेंटल प्लम कहा जाता है| ज्वालामुखी क्रिया मेंमैग्मा के दरारी उदगार से प्लेटों का निर्माण होता है| इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है इसका उदगार ही प्लेटों के निर्माण के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी है| प्लेट की चौडाई दरार की लम्बाई पर निर्भर करता है जबकि प्लेट का क्षेत्रफल नीचे मैग्मा की संचलन दूरी पर निर्भर करता है, अर्थात प्लेटों का सीमांकन, पृथ्वी के आंतरिक भाग में मैग्मा से निर्मित संवहनीय धारा के आधार पर होता है| मैग्मा के उदगार स्थल पर दरार का निर्माण होता है| इसी समय दरार के पास दरार पूर्व उभार उत्पन्न होगा जिससे गुरुत्वाकर्षण बल में अंतर आयेगा और एक ढाल का निर्माण होगा| जब दरार का निर्माण होता है तब मैग्मा के ताप के कारण प्लेट के किनारों के तापमान में भी परिवर्तन होता है इसी के साथ घनत्व में भी परिवर्तन होता है| तापमान बढ़ने से किनारों के घनत्व में कमी आती है अर्थात भार में कमी आती है | इसके साथ ही मेंटल प्लम का तीव्रता से उदगार होता है और प्लेटों का संचलन प्रारम्भ होता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को रिज पुश या कटक धक्के के नाम से जाना जाता है| संचलन तीन प्रकार के होते हैं यथा; अभिसारी, अपसारी एवं संरक्षी संचलन| भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में अभिसारी संचलन महत्वपूर्ण है| अभिसारी सीमाएं अथवा निर्माणकारी किनारा · जब 2 प्लेटों का संचलन एक दूसरे की ओर होता है तो उसे अभिसरण कहा जाता है · प्लेटों के आपस में टकराने के कारण अभिसरण क्षेत्र में अत्यधिक दबाव होता है जो अधिक मात्रा में संपीडन बल उत्पन्न करता है| · इस टक्कर के दौरान अवसादों का निर्माण होता है और संपीडन की अधिकता के कारण किसी एक प्लेट का निक्षेपण होता है जो पृथ्वी के आंतरिक भाग में प्रवेश करता है · जबकि दूसरी प्लेट के ऊपर अवसादों में वलन का निर्माण होता है जिससे विश्व के सभी वलित पर्वत की उत्पत्ति तथा उत्थान हुआ है · निक्षेपित प्लेट आंतरिक भाग में प्रवेश करते हुए तापमान में वृद्धि तथा प्रतिरोध के कारण चट्टानों के पिघलने का आभास करती है| · पिघली हुई चट्टानें मैग्मा का निर्माण करती हैं और अपेक्षाकृत हल्का होने कारण वह ऊपर की ओर संचलित होता है जो अपने उपरी भाग के स्थल मंडल को ढकेलते हुए उसकी ऊँचाई में वृद्धि कारण बनता है · इस प्रकार, सभी प्रकार के अभिसरण में तीन सामान्य परिणाम देखने को मिलते हैं यथा; यहाँ प्लेटों का निक्षेपण होता है तथा महासागरीय गर्त का निर्माण होता है, यहाँ उत्पन्न संपीडन बल के कारण अवसाद में वलन की क्रिया होती हैऔर पर्वत का निर्माण तथा उसके पार पठार का निर्माण होता है · किनारों की प्रकृति के अनुसार अभिसरण तीन प्रकार के होते हैं यथा महासागरीय-महाद्वीपीय प्लेट का अभिसरण · इस प्रकार के अभिसरण में महासागरीय प्लेट अधिक भारी होने के कारण निक्षेपित होती है · महाद्वीपीय प्लेट के ऊपर तटीय वलित पर्वत का निर्माण होता है जैसेजैसे एंडीज तथा रॉकी पर्वत · यहाँ महासागर की ओर गर्त का निर्माण होता है · महाद्वीप की ओर पठार का निर्माण होता है जैसे पेटागोनिया का पठार, बोलिविया का पठार आदि · इस टक्कर में अनिक्षेपित प्लेट अर्थात महाद्वीपीय प्लेट हल्का होने के कारण प्रतिरोध बल कम उत्पन्न करता है जिससे निक्षेपण कोण कम होता है और निर्मित गर्त गहराई कम होती है जबकि महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट की टक्कर में गर्त मैदान में परिवर्तित हो जाता है| महासागरीय-महासागरीय प्लेट का अभिसरण · इस प्रकार के अभिसरण सागर नितल पर होते हैं| जहाँ पर निक्षेपण अपेक्षाकृत जटिल होता है क्योंकि अभिसरित प्लेटों का घनत्व लगभग समान होता परिणाम स्वरुप जो प्लेट बड़ा होता है उसका निक्षेपण होता है · यहाँ अवसाद की मात्रा न्यूनतम होती है जिससे वलन की क्रिया पूर्ण नही होती परन्तु निक्षेपण कोण तीव्र होने के कारण यहाँ गर्त की गहराई अधिकतम होती है जैसे जापान तथा फिलीपींस द्वीप · विश्व के सभी विवर्तनिक द्वीपों का निर्माण, सागर तल के नीचे महासागरीय पर्वत तथा पहाड़ी का निर्माण इसी टक्कर के फलस्वरुप होता है · यदि अभिसरण क्षेत्र उत्तर दक्षिण की दिशा में विस्तृत हो तो पृथ्वी के घूर्णन के कारण ये चाप की आकृति का होता है इससे द्वीपीय चापों का निर्माण होता है · अपूर्ण वलन की क्रिया तथा ज्वालामुखी की अधिकता के कारण विवर्तनिक द्वीपों को ज्वालामुखीय चाप भी कहते हैं जो पश्चिम की ओर वक्र बनाते हुए अवतलाकृति का निर्माण करते हैं| · निक्षेपण कोण महासागरीय-महासागरीय प्लेट की टक्कर में अधिकतम होता है क्योंकि अभिसरित प्लेटों का घनत्व केवल बराबर ही नहीं होता बल्कि अधिक भी होता है · इसके परिणामस्वरुप अनिक्षेपित प्लेट का प्रतिरोध बल बहुत अधिक होता है जिससे गर्त गहराई अधिकतम हो जाती है महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट का अभिसरण · जब दो महाद्वीप आपस में टकराते हैं तो उससे पूर्व महासागर तथा महाद्वीपों का टक्कर होती है · जिसके सामान्य परिणाम गर्त का निर्माण, तटीय पर्वत का निर्माण तथा पठार का निर्माण होता है · दोनों महाद्वीपों के मध्य अवस्थित महासागरीय भाग जब पूर्ण रूप से निक्षेपित हो जाता है, तब महाद्वीपों की आपस में टक्कर होती है जो इस प्रकार की टक्कर को सबसे जटिल बना देता है · निक्षेपण की क्रिया का आधार महासागरीय प्लेट से सम्बन्धित है अर्थात वे महाद्वीप निक्षेपित होते हैं जो महासागरीय प्लेट से संलग्न होते हैं| · नीचे प्रवेश करते हुए पूर्व निर्मित गर्त को भर देते हैं जिससे गिरीपद पर मैदानी क्षेत्र का निर्माण होता है जैसे सिन्धु-गंगा का मैदान · हलका होने के कारण पूर्ण निक्षेपण नहीं हो पाता परिणामस्वरूप विश्व के सबसे ऊँचे पर्वतों का निर्माण होता है| · इस प्रकार के टक्कर में निक्षेपित प्लेटों की मात्रा अधिक होने के कारण गिरीपद पठार भी बहुत उंचा होता है जैसे तिब्बत का पठार · विश्व में अंतःमहाद्वीपीय क्षेत्र में अवस्थित सभी नवीन मोड़दार पर्वतों की व्याख्या इसी प्रकार के अभिसरण के माध्यम से की जाती है| इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है प्लेट टेक्टोनिक के अंतर्गत अभिसारी संचलन द्वितीय चरण के भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
##Question:प्लेट विवर्तनिकी से आप क्या समझते हैं? तर्कों और उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये कि प्लेटों का अभिसारी संचलन भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण होता है| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you think of plate tectonics? Explain with arguments and examples that converging movement of plates is important in the study of geomorphology. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में अभिसारी संचलन को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में अभिसारी संचलन के प्रकारों को बताते हुए इनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में इनका महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्लेट, पृथ्वी की पर्पटी या स्थल मंडल का एक भाग होती है|विवर्तनिक शब्द का सम्बन्ध इन प्लेटों के संचलन से है|यह सिद्धांत WJ मॉर्गन ने दिया था| इस सिद्धांत के अनुसार बाह्य मंडल (आउटर कोर)से आने वाले मैग्मा को मेंटल प्लम कहा जाता है| ज्वालामुखी क्रिया मेंमैग्मा के दरारी उदगार से प्लेटों का निर्माण होता है| इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है इसका उदगार ही प्लेटों के निर्माण के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी है| प्लेट की चौडाई दरार की लम्बाई पर निर्भर करता है जबकि प्लेट का क्षेत्रफल नीचे मैग्मा की संचलन दूरी पर निर्भर करता है, अर्थात प्लेटों का सीमांकन, पृथ्वी के आंतरिक भाग में मैग्मा से निर्मित संवहनीय धारा के आधार पर होता है| मैग्मा के उदगार स्थल पर दरार का निर्माण होता है| इसी समय दरार के पास दरार पूर्व उभार उत्पन्न होगा जिससे गुरुत्वाकर्षण बल में अंतर आयेगा और एक ढाल का निर्माण होगा| जब दरार का निर्माण होता है तब मैग्मा के ताप के कारण प्लेट के किनारों के तापमान में भी परिवर्तन होता है इसी के साथ घनत्व में भी परिवर्तन होता है| तापमान बढ़ने से किनारों के घनत्व में कमी आती है अर्थात भार में कमी आती है | इसके साथ ही मेंटल प्लम का तीव्रता से उदगार होता है और प्लेटों का संचलन प्रारम्भ होता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को रिज पुश या कटक धक्के के नाम से जाना जाता है| संचलन तीन प्रकार के होते हैं यथा; अभिसारी, अपसारी एवं संरक्षी संचलन| भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में अभिसारी संचलन महत्वपूर्ण है| अभिसारी सीमाएं अथवा निर्माणकारी किनारा · जब 2 प्लेटों का संचलन एक दूसरे की ओर होता है तो उसे अभिसरण कहा जाता है · प्लेटों के आपस में टकराने के कारण अभिसरण क्षेत्र में अत्यधिक दबाव होता है जो अधिक मात्रा में संपीडन बल उत्पन्न करता है| · इस टक्कर के दौरान अवसादों का निर्माण होता है और संपीडन की अधिकता के कारण किसी एक प्लेट का निक्षेपण होता है जो पृथ्वी के आंतरिक भाग में प्रवेश करता है · जबकि दूसरी प्लेट के ऊपर अवसादों में वलन का निर्माण होता है जिससे विश्व के सभी वलित पर्वत की उत्पत्ति तथा उत्थान हुआ है · निक्षेपित प्लेट आंतरिक भाग में प्रवेश करते हुए तापमान में वृद्धि तथा प्रतिरोध के कारण चट्टानों के पिघलने का आभास करती है| · पिघली हुई चट्टानें मैग्मा का निर्माण करती हैं और अपेक्षाकृत हल्का होने कारण वह ऊपर की ओर संचलित होता है जो अपने उपरी भाग के स्थल मंडल को ढकेलते हुए उसकी ऊँचाई में वृद्धि कारण बनता है · इस प्रकार, सभी प्रकार के अभिसरण में तीन सामान्य परिणाम देखने को मिलते हैं यथा; यहाँ प्लेटों का निक्षेपण होता है तथा महासागरीय गर्त का निर्माण होता है, यहाँ उत्पन्न संपीडन बल के कारण अवसाद में वलन की क्रिया होती हैऔर पर्वत का निर्माण तथा उसके पार पठार का निर्माण होता है · किनारों की प्रकृति के अनुसार अभिसरण तीन प्रकार के होते हैं यथा महासागरीय-महाद्वीपीय प्लेट का अभिसरण · इस प्रकार के अभिसरण में महासागरीय प्लेट अधिक भारी होने के कारण निक्षेपित होती है · महाद्वीपीय प्लेट के ऊपर तटीय वलित पर्वत का निर्माण होता है जैसेजैसे एंडीज तथा रॉकी पर्वत · यहाँ महासागर की ओर गर्त का निर्माण होता है · महाद्वीप की ओर पठार का निर्माण होता है जैसे पेटागोनिया का पठार, बोलिविया का पठार आदि · इस टक्कर में अनिक्षेपित प्लेट अर्थात महाद्वीपीय प्लेट हल्का होने के कारण प्रतिरोध बल कम उत्पन्न करता है जिससे निक्षेपण कोण कम होता है और निर्मित गर्त गहराई कम होती है जबकि महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट की टक्कर में गर्त मैदान में परिवर्तित हो जाता है| महासागरीय-महासागरीय प्लेट का अभिसरण · इस प्रकार के अभिसरण सागर नितल पर होते हैं| जहाँ पर निक्षेपण अपेक्षाकृत जटिल होता है क्योंकि अभिसरित प्लेटों का घनत्व लगभग समान होता परिणाम स्वरुप जो प्लेट बड़ा होता है उसका निक्षेपण होता है · यहाँ अवसाद की मात्रा न्यूनतम होती है जिससे वलन की क्रिया पूर्ण नही होती परन्तु निक्षेपण कोण तीव्र होने के कारण यहाँ गर्त की गहराई अधिकतम होती है जैसे जापान तथा फिलीपींस द्वीप · विश्व के सभी विवर्तनिक द्वीपों का निर्माण, सागर तल के नीचे महासागरीय पर्वत तथा पहाड़ी का निर्माण इसी टक्कर के फलस्वरुप होता है · यदि अभिसरण क्षेत्र उत्तर दक्षिण की दिशा में विस्तृत हो तो पृथ्वी के घूर्णन के कारण ये चाप की आकृति का होता है इससे द्वीपीय चापों का निर्माण होता है · अपूर्ण वलन की क्रिया तथा ज्वालामुखी की अधिकता के कारण विवर्तनिक द्वीपों को ज्वालामुखीय चाप भी कहते हैं जो पश्चिम की ओर वक्र बनाते हुए अवतलाकृति का निर्माण करते हैं| · निक्षेपण कोण महासागरीय-महासागरीय प्लेट की टक्कर में अधिकतम होता है क्योंकि अभिसरित प्लेटों का घनत्व केवल बराबर ही नहीं होता बल्कि अधिक भी होता है · इसके परिणामस्वरुप अनिक्षेपित प्लेट का प्रतिरोध बल बहुत अधिक होता है जिससे गर्त गहराई अधिकतम हो जाती है महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट का अभिसरण · जब दो महाद्वीप आपस में टकराते हैं तो उससे पूर्व महासागर तथा महाद्वीपों का टक्कर होती है · जिसके सामान्य परिणाम गर्त का निर्माण, तटीय पर्वत का निर्माण तथा पठार का निर्माण होता है · दोनों महाद्वीपों के मध्य अवस्थित महासागरीय भाग जब पूर्ण रूप से निक्षेपित हो जाता है, तब महाद्वीपों की आपस में टक्कर होती है जो इस प्रकार की टक्कर को सबसे जटिल बना देता है · निक्षेपण की क्रिया का आधार महासागरीय प्लेट से सम्बन्धित है अर्थात वे महाद्वीप निक्षेपित होते हैं जो महासागरीय प्लेट से संलग्न होते हैं| · नीचे प्रवेश करते हुए पूर्व निर्मित गर्त को भर देते हैं जिससे गिरीपद पर मैदानी क्षेत्र का निर्माण होता है जैसे सिन्धु-गंगा का मैदान · हलका होने के कारण पूर्ण निक्षेपण नहीं हो पाता परिणामस्वरूप विश्व के सबसे ऊँचे पर्वतों का निर्माण होता है| · इस प्रकार के टक्कर में निक्षेपित प्लेटों की मात्रा अधिक होने के कारण गिरीपद पठार भी बहुत उंचा होता है जैसे तिब्बत का पठार · विश्व में अंतःमहाद्वीपीय क्षेत्र में अवस्थित सभी नवीन मोड़दार पर्वतों की व्याख्या इसी प्रकार के अभिसरण के माध्यम से की जाती है| इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है प्लेट टेक्टोनिक के अंतर्गत अभिसारी संचलन द्वितीय चरण के भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है|
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सतत विकास की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | सतत विकास लक्ष्यों की व्याख्या भी कीजिये | साथ ही इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में भारत के समक्ष चुनौतियाँ की चर्चा कीजिये| (150-200शब्द/ 10 अंक) Explain the concept of sustainable development. Also explain the sustainable development goals. Along with this discuss the challanges India facing in achieving these goals. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच - सतत विकास के बारे में विस्तार से बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद सतत विकास लक्ष्यो को बताते हुए इसके समक्ष चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये | अंत में इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत द्वारा उठाये गए कदमों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सतत विकास एक ऐसी प्रक्रिया है , जिसमें वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं में भी कोई कटौती न हो | सतत विकास का सर्वप्रथम उल्लेख ब्रटलैंड रिपोर्ट ""हमारा साझा भविष्य"" में मिलता है ,जिसमें चार बिन्दुओं पर सतत विकास की अवधारणा को समझाया गया है | प्रथम तो वहन क्षमता की बात ,दूसरा संसाधनों का प्रयोग एक पीढ़ी के अंतर्गत समानता ,तीसरा दो पीढ़ियों के बीच समानता व संसाधनों की पहुँच एवं उपयोग में लैंगिक समानता हो | सतत विकास के लक्ष्य - कोई गरीबी नहीं (NO POVERTY )- गरीबी के सभी रूपों की पूरे विश्व से 2030 तक समाप्ति | भुखमरी नहीं ( NO HUNGER )- भूख की समाप्ति , खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण व टिकाऊ विकास कृषि को बढ़ावा | अच्छा स्वास्थ्य - सभी आयु के लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा व स्वस्थ जीवन प्रदान करना | गुणवत्तापूर्ण शिक्षा - समावेशी , न्याय संगत ,गुणवत्तायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना - ""सभी पढ़ें सभी बढ़ें ""| लैंगिक समानता - महिलाओं व बालिकाओं को सशक्त करना | सस्ती, विश्वसनीय ,टिकाऊ ,और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करना | सभी के लिए स्वच्छता और पानी के सतत प्रबंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना | देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना | सतत विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्त कार्यान्वयन के साधनों को मजबूत बनाना | सतत विकास के समक्ष चुनौतियां -सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ,जो निम्नलिखित हैं - जनसँख्या में लगातार वृद्धि | शिक्षा प्रणाली का दोषपूर्ण होना | प्रौद्योगिकी में उचित विकास का अभाव | प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन | बिजली व ऊर्जा के एनी संसाधनों का दुरुपयोग करना | भारत द्वारा उठाये गए कदम - ऑक्सफ़ोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव द्वारा वैश्विक गरीबी सूचकांक 2019 रिपोर्ट में सबसे अधिक प्रगति करने वाला देश भारत है | 2006 से 2016 के बिच 27.10 करोड़ लोग गरीबी से बहार निकले जो सराहनीय है | कृषि की मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए विभिन्न प्रकार की सिंचाई जैसे ड्रिप सिंचाई एवं उन्नत बीज व तकनीकी का विकास किया जा रहा है | लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए अनेक प्रकार की योजनायें जैसे ""बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना "" चलायी जा रही है | स्वास्थ्य में सुधर हेतु आयुष्मान भारत जैसी प्रगतिशील योजनाओं को लाया जा रहा है जो की सराहनीय कदम है | शिक्षा के क्षेत्र में IIT,IIM,IMS जैसे संस्थानों की लगातार स्थापना की जा रही है | निष्कर्षतः यह कह सकते हैं कि SDGs के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सरकार लगातार कार्यरत है और कुछ समय से इसके बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं चाहे वह स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी , भुखमरी या कोई भी क्षेत्र हो | सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों में यदि जनता की भी जागरूकता बढ़ जाए तो हम सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त कर लेंगे |
##Question:सतत विकास की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | सतत विकास लक्ष्यों की व्याख्या भी कीजिये | साथ ही इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में भारत के समक्ष चुनौतियाँ की चर्चा कीजिये| (150-200शब्द/ 10 अंक) Explain the concept of sustainable development. Also explain the sustainable development goals. Along with this discuss the challanges India facing in achieving these goals. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - सतत विकास के बारे में विस्तार से बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद सतत विकास लक्ष्यो को बताते हुए इसके समक्ष चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये | अंत में इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत द्वारा उठाये गए कदमों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सतत विकास एक ऐसी प्रक्रिया है , जिसमें वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं में भी कोई कटौती न हो | सतत विकास का सर्वप्रथम उल्लेख ब्रटलैंड रिपोर्ट ""हमारा साझा भविष्य"" में मिलता है ,जिसमें चार बिन्दुओं पर सतत विकास की अवधारणा को समझाया गया है | प्रथम तो वहन क्षमता की बात ,दूसरा संसाधनों का प्रयोग एक पीढ़ी के अंतर्गत समानता ,तीसरा दो पीढ़ियों के बीच समानता व संसाधनों की पहुँच एवं उपयोग में लैंगिक समानता हो | सतत विकास के लक्ष्य - कोई गरीबी नहीं (NO POVERTY )- गरीबी के सभी रूपों की पूरे विश्व से 2030 तक समाप्ति | भुखमरी नहीं ( NO HUNGER )- भूख की समाप्ति , खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण व टिकाऊ विकास कृषि को बढ़ावा | अच्छा स्वास्थ्य - सभी आयु के लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा व स्वस्थ जीवन प्रदान करना | गुणवत्तापूर्ण शिक्षा - समावेशी , न्याय संगत ,गुणवत्तायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना - ""सभी पढ़ें सभी बढ़ें ""| लैंगिक समानता - महिलाओं व बालिकाओं को सशक्त करना | सस्ती, विश्वसनीय ,टिकाऊ ,और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करना | सभी के लिए स्वच्छता और पानी के सतत प्रबंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना | देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना | सतत विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्त कार्यान्वयन के साधनों को मजबूत बनाना | सतत विकास के समक्ष चुनौतियां -सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ,जो निम्नलिखित हैं - जनसँख्या में लगातार वृद्धि | शिक्षा प्रणाली का दोषपूर्ण होना | प्रौद्योगिकी में उचित विकास का अभाव | प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन | बिजली व ऊर्जा के एनी संसाधनों का दुरुपयोग करना | भारत द्वारा उठाये गए कदम - ऑक्सफ़ोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव द्वारा वैश्विक गरीबी सूचकांक 2019 रिपोर्ट में सबसे अधिक प्रगति करने वाला देश भारत है | 2006 से 2016 के बिच 27.10 करोड़ लोग गरीबी से बहार निकले जो सराहनीय है | कृषि की मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए विभिन्न प्रकार की सिंचाई जैसे ड्रिप सिंचाई एवं उन्नत बीज व तकनीकी का विकास किया जा रहा है | लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए अनेक प्रकार की योजनायें जैसे ""बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना "" चलायी जा रही है | स्वास्थ्य में सुधर हेतु आयुष्मान भारत जैसी प्रगतिशील योजनाओं को लाया जा रहा है जो की सराहनीय कदम है | शिक्षा के क्षेत्र में IIT,IIM,IMS जैसे संस्थानों की लगातार स्थापना की जा रही है | निष्कर्षतः यह कह सकते हैं कि SDGs के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सरकार लगातार कार्यरत है और कुछ समय से इसके बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं चाहे वह स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी , भुखमरी या कोई भी क्षेत्र हो | सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों में यदि जनता की भी जागरूकता बढ़ जाए तो हम सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त कर लेंगे |
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Discuss Bismarck"s contribution in Germany"s integration. (200 words) जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क के योगदान की चर्चा कीजिए। (200 शब्द)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में बिस्मार्क से सम्बंधित एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क के योगदान की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- बिस्मार्क का सम्बन्ध प्रशा के अभिजात्य वर्ग से था।बिस्मार्क रूस एवं फ्रांस में राजनयिक भी रह चूका था। 1862 में प्रशा का प्रधानमंत्री बनाया गया। बिस्मार्क राजतन्त्र का समर्थक था और संसदीय राजनीती के स्थान पर शक्ति की राजनीती यालौह एवं रक्त की राजनीती को अत्यधिक महत्व देता था। जर्मनी केएकीकरण में बिस्मार्क का योगदान:- बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए तीन युद्धों की योजना बनाई। डेनमार्क से युद्ध(1863):- कारण:- युद्ध का तात्कालिक कारण था डेनमार्क के द्वारा पर श्लेष विग एवं होलस्टीन परपूर्ण नियंत्रण तथा अंतराष्ट्रीय समझौते का उलंघन करना । इसका एक महत्वपूर्ण कारण था ऑस्ट्रिया के मुद्दे को उलझाना जिससे उसकी सैन्य तयारी का बिस्मार्क आंकलन कर सके तथा इसी मुद्दे को लेकर ऑस्ट्रिया से युद्ध का आधार तैयार कर सके। घटनाक्रम:- युद्ध में डेनमार्क की पराजय हुई। ऑस्ट्रिया और प्रशा के बीच यह सहमति बनी कि ऑस्ट्रिया होलस्टिन की देखरेख करेगा तथा प्रशा श्लेष विग की। इससे सम्बंधित कोई भी विवाद द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाए जायेंगे। ऑस्ट्रिया से युद्ध(1868)/सैडोबा का युद्ध:- कारण:- जर्मन एकीकरण में ऑस्ट्रिया काबाधक होना। युद्ध का तात्कालिक कारण था होल्स्टीन के मुद्दे को ऑस्ट्रिया के द्वारा जर्मन शासकों के विरुद्ध उठाना। युद्ध पूर्व बिस्मार्क की रणनीति:- युद्ध से पहले बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया को यूरोपीय राजनीती में अलग थलग करने की रणनीति बनाई जैसे फ्रांस के शासक से व्यक्तिगत मुलाकात की और वह युद्ध के दौरान तटस्थ रहा। क्रीमिया के युद्ध में रूस ऑस्ट्रिया से नाराज था फलतः रूस भी तटस्थ रहा। वेनेसिया पर ऑस्ट्रिया का नियंत्रण था। अतः यह स्वाभाविक था कि इटली प्रशा का साथ देगा। परिणाम:- युद्ध में ऑस्ट्रिया की पराजय हुई और उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। प्रशा की जीत के साथ इसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उत्तरी जर्मन राज्यों का एकीकरण भी हुआ। फ्रांस से युद्ध(1870-71)/सेदान का युद्ध :- कारण:- फ्रांस से युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण था बिस्मार्क के द्वारा प्रतिशोध की राजनीती को महत्व देना वनेपोलियन के अभियानों का बदला लेना चाहता था। बिस्मार्क यह जनता था की फ्रांस जर्मन एकीकरण को स्वीकार नहीं करेगा। युद्ध का तात्कालिक कारण था फ्रांस एवं प्रशा के बीच स्पेन के उत्तराधिकार को लेकर विवाद होना । युद्ध पूर्व बिस्मार्क की रणनीति:- बिस्मार्क ने युद्ध से पूर्व यूरोपीय राजनीती में फ्रांस को भी मित्रविहीन बनाये रखने में सफल रहा। फ्रांस ने कुछ क्षेत्रों दावा किया और प्रशा से सहयोग माँगा जैसे बेल्जियम, पेलिटनेट ने प्रशा ने इन क्षेत्रों को सार्वजनिक कर क्रमशः दक्षिण जर्मन राज्यों को पराजित किया। बिस्मार्क ने सेडोबा के युद्ध पश्चात ऑस्ट्रिया को अपमानित नहीं किया था फलतः ऑस्ट्रिया को भी तटस्थ रखने में सफल रहा। क्रीमिया के युद्ध से रूस फ्रांस से भी नाराज़ था। रूस को अलग रखना बिस्मार्क के लिया बड़ी बात नहीं थी। इटली का एकीकरण रोम के बिना अधूरा था। अतः यह तय था कि इटली बिस्मार्क का साथ देगा। परिणाम:- फ्रांस की पराजय हुई, हर्जाने के रूप में राशि जर्मनी को दी गई तथा अल्सास एवं लॉरेन का क्षेत्र भी जर्मनी को मिला। इसी के साथ जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ। इस प्रकार बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण को उपरोक्त तीन युद्धों द्वारा सम्भव बनाया।
##Question:Discuss Bismarck"s contribution in Germany"s integration. (200 words) जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क के योगदान की चर्चा कीजिए। (200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में बिस्मार्क से सम्बंधित एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क के योगदान की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- बिस्मार्क का सम्बन्ध प्रशा के अभिजात्य वर्ग से था।बिस्मार्क रूस एवं फ्रांस में राजनयिक भी रह चूका था। 1862 में प्रशा का प्रधानमंत्री बनाया गया। बिस्मार्क राजतन्त्र का समर्थक था और संसदीय राजनीती के स्थान पर शक्ति की राजनीती यालौह एवं रक्त की राजनीती को अत्यधिक महत्व देता था। जर्मनी केएकीकरण में बिस्मार्क का योगदान:- बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए तीन युद्धों की योजना बनाई। डेनमार्क से युद्ध(1863):- कारण:- युद्ध का तात्कालिक कारण था डेनमार्क के द्वारा पर श्लेष विग एवं होलस्टीन परपूर्ण नियंत्रण तथा अंतराष्ट्रीय समझौते का उलंघन करना । इसका एक महत्वपूर्ण कारण था ऑस्ट्रिया के मुद्दे को उलझाना जिससे उसकी सैन्य तयारी का बिस्मार्क आंकलन कर सके तथा इसी मुद्दे को लेकर ऑस्ट्रिया से युद्ध का आधार तैयार कर सके। घटनाक्रम:- युद्ध में डेनमार्क की पराजय हुई। ऑस्ट्रिया और प्रशा के बीच यह सहमति बनी कि ऑस्ट्रिया होलस्टिन की देखरेख करेगा तथा प्रशा श्लेष विग की। इससे सम्बंधित कोई भी विवाद द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाए जायेंगे। ऑस्ट्रिया से युद्ध(1868)/सैडोबा का युद्ध:- कारण:- जर्मन एकीकरण में ऑस्ट्रिया काबाधक होना। युद्ध का तात्कालिक कारण था होल्स्टीन के मुद्दे को ऑस्ट्रिया के द्वारा जर्मन शासकों के विरुद्ध उठाना। युद्ध पूर्व बिस्मार्क की रणनीति:- युद्ध से पहले बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया को यूरोपीय राजनीती में अलग थलग करने की रणनीति बनाई जैसे फ्रांस के शासक से व्यक्तिगत मुलाकात की और वह युद्ध के दौरान तटस्थ रहा। क्रीमिया के युद्ध में रूस ऑस्ट्रिया से नाराज था फलतः रूस भी तटस्थ रहा। वेनेसिया पर ऑस्ट्रिया का नियंत्रण था। अतः यह स्वाभाविक था कि इटली प्रशा का साथ देगा। परिणाम:- युद्ध में ऑस्ट्रिया की पराजय हुई और उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। प्रशा की जीत के साथ इसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उत्तरी जर्मन राज्यों का एकीकरण भी हुआ। फ्रांस से युद्ध(1870-71)/सेदान का युद्ध :- कारण:- फ्रांस से युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण था बिस्मार्क के द्वारा प्रतिशोध की राजनीती को महत्व देना वनेपोलियन के अभियानों का बदला लेना चाहता था। बिस्मार्क यह जनता था की फ्रांस जर्मन एकीकरण को स्वीकार नहीं करेगा। युद्ध का तात्कालिक कारण था फ्रांस एवं प्रशा के बीच स्पेन के उत्तराधिकार को लेकर विवाद होना । युद्ध पूर्व बिस्मार्क की रणनीति:- बिस्मार्क ने युद्ध से पूर्व यूरोपीय राजनीती में फ्रांस को भी मित्रविहीन बनाये रखने में सफल रहा। फ्रांस ने कुछ क्षेत्रों दावा किया और प्रशा से सहयोग माँगा जैसे बेल्जियम, पेलिटनेट ने प्रशा ने इन क्षेत्रों को सार्वजनिक कर क्रमशः दक्षिण जर्मन राज्यों को पराजित किया। बिस्मार्क ने सेडोबा के युद्ध पश्चात ऑस्ट्रिया को अपमानित नहीं किया था फलतः ऑस्ट्रिया को भी तटस्थ रखने में सफल रहा। क्रीमिया के युद्ध से रूस फ्रांस से भी नाराज़ था। रूस को अलग रखना बिस्मार्क के लिया बड़ी बात नहीं थी। इटली का एकीकरण रोम के बिना अधूरा था। अतः यह तय था कि इटली बिस्मार्क का साथ देगा। परिणाम:- फ्रांस की पराजय हुई, हर्जाने के रूप में राशि जर्मनी को दी गई तथा अल्सास एवं लॉरेन का क्षेत्र भी जर्मनी को मिला। इसी के साथ जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ। इस प्रकार बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण को उपरोक्त तीन युद्धों द्वारा सम्भव बनाया।
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State the provisions and evolution of the 8th schedule of the constitution along with the current related developments (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE EVOLUTION OF THE VIIIth SCHEDULE OF THE CONSTITUTION OF INDIA - PROVISIONS OF THE VIIIth SCHEDULE - CURRENT DEVELOPMENTS- THE NATIONAL EDUCATION POLICY- CONTROVERSY RELATED TO THE 3rd LANGUAGE -CONCLUSION Answer:- Schedule-VIII of the constitution deals with the constitutionally recognized languages. THE EVOLUTION OF THE VIIIth SCHEDULE OF THE CONSTITUTION OF INDIA 1) ORIGINAL CONSTITUTION The original constitution contained 14 languages in the VIIIth schedule 2) 21ST CONSTITUTIONAL AMENDMENT ACT, 1967 Sindhi was added in 1967 by the 21st constitutional amendment 3) 71st CONSTITUTIONAL AMENDMENT ACT, 1992 Konkani, Manipuri and Nepali languages were added by the 71st constitutional amendment act of 1992 4) 92nd CONSTITUTIONAL AMENDMENT ACT, 2003 Bodo, Maithilli, Dogiri and Santhalli were added by the 92nd amendment act of 2003 PROVISIONS OF THE VIIIth SCHEDULE 1) NO NATIONAL LANGUAGE There is no national language in India. This has been clarified by constitutional provisions as well as several judgments of the Supreme Court of India. 2) HINDI AND ENGLISH- OFFICIAL LANGUAGES As per Article 342 , Hindi in Devanagiri script is the official language and English is the language of business/ communication. This was to continue for the 1st 15 years from the commencement of the constitution of India. After the end of 15 years, it was left to Parliament to decide the language of communication by law. 3) LINGUISTIC MINORITIES Article 350 B deals with theappointment of a special officer for linguistic minorities. 4) PROVISION FOR AN AUTHORIZED LANGUAGE As per Article 346 , for thecommunication between 2 states, an authorized language can be utilized. CURRENT DEVELOPMENTS- THE NATIONAL EDUCATION POLICY- CONTROVERSY RELATED TO THE 3rd LANGUAGE There has been opposition to the 3 language formula especially in Tamil Nadu beginning from 1937. The National Education Policy, released on 30th May 2019, proposed a 3 language rule for primary education. This was severely opposed by several political groups in Tamil Nadu as an imposition of Hindi language by a backdoor. The government has clarified that these proposals are merely advisory (recommendations). This controversy has highlighted the importance and the need for a uniform policy and an objective basis of defining official languages in India. 38 more languages are waiting in their demand for being added in the 8th schedule of the constitution of India. We have so far not been able to find a socio-economic reason, representative reason or fixed criteria for defining official languages in India. This is despite the Pahwa Committee of 1996 and Sita Kant committee recommendations of 2003 , as well as the statutory provisions in the form of the Official Languages Act of 1963.
##Question:State the provisions and evolution of the 8th schedule of the constitution along with the current related developments (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE EVOLUTION OF THE VIIIth SCHEDULE OF THE CONSTITUTION OF INDIA - PROVISIONS OF THE VIIIth SCHEDULE - CURRENT DEVELOPMENTS- THE NATIONAL EDUCATION POLICY- CONTROVERSY RELATED TO THE 3rd LANGUAGE -CONCLUSION Answer:- Schedule-VIII of the constitution deals with the constitutionally recognized languages. THE EVOLUTION OF THE VIIIth SCHEDULE OF THE CONSTITUTION OF INDIA 1) ORIGINAL CONSTITUTION The original constitution contained 14 languages in the VIIIth schedule 2) 21ST CONSTITUTIONAL AMENDMENT ACT, 1967 Sindhi was added in 1967 by the 21st constitutional amendment 3) 71st CONSTITUTIONAL AMENDMENT ACT, 1992 Konkani, Manipuri and Nepali languages were added by the 71st constitutional amendment act of 1992 4) 92nd CONSTITUTIONAL AMENDMENT ACT, 2003 Bodo, Maithilli, Dogiri and Santhalli were added by the 92nd amendment act of 2003 PROVISIONS OF THE VIIIth SCHEDULE 1) NO NATIONAL LANGUAGE There is no national language in India. This has been clarified by constitutional provisions as well as several judgments of the Supreme Court of India. 2) HINDI AND ENGLISH- OFFICIAL LANGUAGES As per Article 342 , Hindi in Devanagiri script is the official language and English is the language of business/ communication. This was to continue for the 1st 15 years from the commencement of the constitution of India. After the end of 15 years, it was left to Parliament to decide the language of communication by law. 3) LINGUISTIC MINORITIES Article 350 B deals with theappointment of a special officer for linguistic minorities. 4) PROVISION FOR AN AUTHORIZED LANGUAGE As per Article 346 , for thecommunication between 2 states, an authorized language can be utilized. CURRENT DEVELOPMENTS- THE NATIONAL EDUCATION POLICY- CONTROVERSY RELATED TO THE 3rd LANGUAGE There has been opposition to the 3 language formula especially in Tamil Nadu beginning from 1937. The National Education Policy, released on 30th May 2019, proposed a 3 language rule for primary education. This was severely opposed by several political groups in Tamil Nadu as an imposition of Hindi language by a backdoor. The government has clarified that these proposals are merely advisory (recommendations). This controversy has highlighted the importance and the need for a uniform policy and an objective basis of defining official languages in India. 38 more languages are waiting in their demand for being added in the 8th schedule of the constitution of India. We have so far not been able to find a socio-economic reason, representative reason or fixed criteria for defining official languages in India. This is despite the Pahwa Committee of 1996 and Sita Kant committee recommendations of 2003 , as well as the statutory provisions in the form of the Official Languages Act of 1963.
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प्लेटों के संचलन में भिन्नता उसके परिणामों में अंतर स्थापित करती है| इस सन्दर्भ में पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी के वितरण को स्पष्टकीजिये| (200 शब्द) The difference in the movement of the plates sets the difference in its results. In this context, explain the distribution of earthquake and volcano on earth. (200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्लेट विवर्तनिकी की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में प्लेटों के संचलन में भिन्नता उसके परिणामों में अंतर को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी के वितरण को स्पष्टकीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्लेट, पृथ्वी की पर्पटी या स्थल मंडल का एक भाग होती है|विवर्तनिक शब्द का सम्बन्ध इन प्लेटों के संचलन से है|यह सिद्धांत W.J. मॉर्गन ने दिया था| इस सिद्धांत के अनुसार भूपर्पटी पर विविध कारणों से निर्मित प्लेटें गुरुत्वाकर्षण बल में अंतर, ढाल के निर्माण होगा, प्लेटों के किनारों के तापमान में परिवर्तन और घनत्व में परिवर्तन होता है आदि कारकों से संचलित होती हैं | तापमान बढ़ने से किनारों के घनत्व में कमी आती है अर्थात भार में कमी आती है | इसके साथ ही मेंटल प्लम का तीव्रता से उदगार होता है और प्लेटों का संचलन प्रारम्भ होता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को रिज पुश या कटक धक्के के नाम से जाना जाता है| संचलन तीन प्रकार के होते हैं यथा; अभिसारी, अपसारी एवं संरक्षी संचलन| प्लेटों के संचलन में भिन्नता होती है और इस कारण उनके परिणामों में भी भिन्नता दिखाई देती है| ध्यातव्य है कि अपसारी क्षेत्र में दरारी उदगार होता है अतः अपसारी क्षेत्र में ज्वालामुखी घटनाओं की संभावना अपेक्षाकृत रूप से अधिक होती है| इसी प्रकार अभिसरण क्षेत्र में भूकम्प की संभावना अपेक्षाकृत रूप से अधिक होती है, क्योंकि यहाँ केन्द्रीय उदगार होता है| प्लेटों का संचलन होने परभूकम्प आएंगे एवंपर्वतों की ऊँचाई में वृध्दि होगी| यदि किसी क्षेत्र में भूकम्प का आना बंद हो गया तो इसका अर्थ है की वहां प्लेटों का संचलन रुक गया है|इस आधार पर पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी के वितरण में काफी विविधता दिखाई देती है| पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी का वितरण प्रशांत अग्निवलय · प्रशांत महासागर के चारों ओर प्लेटों का अभिसरण हो रहा है अतः यहाँ प्रशांत महासागर के लगभग चारों ओर ज्वालामुखी एवं भूकम्प का क्षेत्र हैं जिसे प्रशांत अग्नि वलय कहा जाता है| · अभिसरण क्षेत्र में निक्षेपण के दौरान प्लेट पृथ्वी के आंतरिक भाग में चट्टानों को विस्थापित करते हुए भूकम्प का कारण बनते हैं · प्लेटों के पिघलने से जो मैग्मा का निर्माण होता है वह ज्वालामुखी क्रियाओं के लिए भी अभिसरण क्षेत्र को सक्रिय बना देता है अतः इस क्षेत्र मेंभूकंप की संभावना अधिक रहती है, इस क्षेत्र में विवर्तनिक भूकम्प आते हैं| · प्रशांत महासागर के चारों ओर ज्वालामुखी पाए जाते हैं इसीलिए इसको आग्नेय पट्टी कहा जाता है| पूर्वी एशियाई क्षेत्र में ज्वालामुखी अधिक आते हैं क्योंकि यहाँ महासागरीय-महासागरीय प्लेटों की टक्कर हो रही| जबकि पूर्वी प्रशांत मेंमहासागरीय-महाद्वीपीय प्लेटों की टक्कर हो रही है अतः यहाँ ज्वालामुखी की घटनाएं अपेक्षाकृत कम आते हैं| मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र · इस क्षेत्र का विस्तार हिमालय से आरम्भ हो कर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इरान, तुर्की होते हुए आल्प्स पर्वत तक जाता है · यह भी एक अभिसरण क्षेत्र है · परन्तु इसके पूर्वी भाग में महाद्वीप-महाद्वीप प्लेटों की टक्कर के कारण ज्वालामुखी की उपस्थिति लगभग नहीं के बराबर है · जैसे हिमालय, सुलेमान तथा किरथर श्रेणी(पाकिस्तान), जबकि पश्चिमी भाग में जैसे अल्बुर्ज़, पोंटिक टोरस तथा आल्प्स के आस-पास ज्वालामुखी क्रियाओं की प्रचुरता देखने को मिलती है पूर्वी अफ्रीका की भ्रंश घाटी · यह अपसरण का प्रारम्भिक चरण है · इसमें ज्वालामुखी क्रियाओं द्वारा भ्रंशन होता है · इससे भूकम्प की संभावना बनी रहती है · अनेक खारे पानी की झीलें ज्वालामुखी अथवा मैग्मा की उपस्थिति को सिद्ध करती हैं · ये मलावी झील से आरम्भ हो कर लाल सागर होते हुए मृत सागर तक जाता है मध्य सागरीय कटक क्षेत्र · यहाँ पर दरारी उदगार से मैग्मा का आगमन निरंतर रूप से होता रहता है · जो कि ज्वालामुखी सबसे महत्वपूर्ण एवं सबसे बड़ा क्षेत्र माना जाता है · हालांकि यह क्षेत्र भूकम्प की सम्भावनाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता · इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में मानव की आबादी नहीं होने के कारण इसे विषय वस्तु में उतना महत्त्व प्राप्त नहीं है · परन्तु कई बार ये क्षेत्र विनाशकारी सुनामी का कारण बन सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि प्लेटों के संचलन की प्रकृति में अंतर इससे उत्पन्न परिणामों में भी भिन्नता उत्पन्न करता है| इसी आधार पर विश्व में वितरित भूकम्प क्षेत्रों और ज्वालामुखी क्षेत्रों की व्याख्या की जाती है|
##Question:प्लेटों के संचलन में भिन्नता उसके परिणामों में अंतर स्थापित करती है| इस सन्दर्भ में पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी के वितरण को स्पष्टकीजिये| (200 शब्द) The difference in the movement of the plates sets the difference in its results. In this context, explain the distribution of earthquake and volcano on earth. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्लेट विवर्तनिकी की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में प्लेटों के संचलन में भिन्नता उसके परिणामों में अंतर को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी के वितरण को स्पष्टकीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्लेट, पृथ्वी की पर्पटी या स्थल मंडल का एक भाग होती है|विवर्तनिक शब्द का सम्बन्ध इन प्लेटों के संचलन से है|यह सिद्धांत W.J. मॉर्गन ने दिया था| इस सिद्धांत के अनुसार भूपर्पटी पर विविध कारणों से निर्मित प्लेटें गुरुत्वाकर्षण बल में अंतर, ढाल के निर्माण होगा, प्लेटों के किनारों के तापमान में परिवर्तन और घनत्व में परिवर्तन होता है आदि कारकों से संचलित होती हैं | तापमान बढ़ने से किनारों के घनत्व में कमी आती है अर्थात भार में कमी आती है | इसके साथ ही मेंटल प्लम का तीव्रता से उदगार होता है और प्लेटों का संचलन प्रारम्भ होता है| इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को रिज पुश या कटक धक्के के नाम से जाना जाता है| संचलन तीन प्रकार के होते हैं यथा; अभिसारी, अपसारी एवं संरक्षी संचलन| प्लेटों के संचलन में भिन्नता होती है और इस कारण उनके परिणामों में भी भिन्नता दिखाई देती है| ध्यातव्य है कि अपसारी क्षेत्र में दरारी उदगार होता है अतः अपसारी क्षेत्र में ज्वालामुखी घटनाओं की संभावना अपेक्षाकृत रूप से अधिक होती है| इसी प्रकार अभिसरण क्षेत्र में भूकम्प की संभावना अपेक्षाकृत रूप से अधिक होती है, क्योंकि यहाँ केन्द्रीय उदगार होता है| प्लेटों का संचलन होने परभूकम्प आएंगे एवंपर्वतों की ऊँचाई में वृध्दि होगी| यदि किसी क्षेत्र में भूकम्प का आना बंद हो गया तो इसका अर्थ है की वहां प्लेटों का संचलन रुक गया है|इस आधार पर पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी के वितरण में काफी विविधता दिखाई देती है| पृथ्वी पर भूकंप एवं ज्वालामुखी का वितरण प्रशांत अग्निवलय · प्रशांत महासागर के चारों ओर प्लेटों का अभिसरण हो रहा है अतः यहाँ प्रशांत महासागर के लगभग चारों ओर ज्वालामुखी एवं भूकम्प का क्षेत्र हैं जिसे प्रशांत अग्नि वलय कहा जाता है| · अभिसरण क्षेत्र में निक्षेपण के दौरान प्लेट पृथ्वी के आंतरिक भाग में चट्टानों को विस्थापित करते हुए भूकम्प का कारण बनते हैं · प्लेटों के पिघलने से जो मैग्मा का निर्माण होता है वह ज्वालामुखी क्रियाओं के लिए भी अभिसरण क्षेत्र को सक्रिय बना देता है अतः इस क्षेत्र मेंभूकंप की संभावना अधिक रहती है, इस क्षेत्र में विवर्तनिक भूकम्प आते हैं| · प्रशांत महासागर के चारों ओर ज्वालामुखी पाए जाते हैं इसीलिए इसको आग्नेय पट्टी कहा जाता है| पूर्वी एशियाई क्षेत्र में ज्वालामुखी अधिक आते हैं क्योंकि यहाँ महासागरीय-महासागरीय प्लेटों की टक्कर हो रही| जबकि पूर्वी प्रशांत मेंमहासागरीय-महाद्वीपीय प्लेटों की टक्कर हो रही है अतः यहाँ ज्वालामुखी की घटनाएं अपेक्षाकृत कम आते हैं| मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र · इस क्षेत्र का विस्तार हिमालय से आरम्भ हो कर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इरान, तुर्की होते हुए आल्प्स पर्वत तक जाता है · यह भी एक अभिसरण क्षेत्र है · परन्तु इसके पूर्वी भाग में महाद्वीप-महाद्वीप प्लेटों की टक्कर के कारण ज्वालामुखी की उपस्थिति लगभग नहीं के बराबर है · जैसे हिमालय, सुलेमान तथा किरथर श्रेणी(पाकिस्तान), जबकि पश्चिमी भाग में जैसे अल्बुर्ज़, पोंटिक टोरस तथा आल्प्स के आस-पास ज्वालामुखी क्रियाओं की प्रचुरता देखने को मिलती है पूर्वी अफ्रीका की भ्रंश घाटी · यह अपसरण का प्रारम्भिक चरण है · इसमें ज्वालामुखी क्रियाओं द्वारा भ्रंशन होता है · इससे भूकम्प की संभावना बनी रहती है · अनेक खारे पानी की झीलें ज्वालामुखी अथवा मैग्मा की उपस्थिति को सिद्ध करती हैं · ये मलावी झील से आरम्भ हो कर लाल सागर होते हुए मृत सागर तक जाता है मध्य सागरीय कटक क्षेत्र · यहाँ पर दरारी उदगार से मैग्मा का आगमन निरंतर रूप से होता रहता है · जो कि ज्वालामुखी सबसे महत्वपूर्ण एवं सबसे बड़ा क्षेत्र माना जाता है · हालांकि यह क्षेत्र भूकम्प की सम्भावनाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता · इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में मानव की आबादी नहीं होने के कारण इसे विषय वस्तु में उतना महत्त्व प्राप्त नहीं है · परन्तु कई बार ये क्षेत्र विनाशकारी सुनामी का कारण बन सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि प्लेटों के संचलन की प्रकृति में अंतर इससे उत्पन्न परिणामों में भी भिन्नता उत्पन्न करता है| इसी आधार पर विश्व में वितरित भूकम्प क्षेत्रों और ज्वालामुखी क्षेत्रों की व्याख्या की जाती है|
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भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण आन्दोलनों की चर्चा कीजिये, साथ ही इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भारतीयों के योगदान का संछिप्त में वर्णन कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) Discuss the important movement for the conservation of the environment in India, Also mention the contribution of the significant Indians in this context in brief. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच - भूमिका में पर्यावरण आन्दोलन का परिचय देते हुए, पर्यावरण संरक्षण के बारे में भी संक्षेप में बताइए | इसके बाद प्रमुख पर्यावरण आन्दोलन और उनसे जुड़े भारतीयों की विस्तार से चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को बताते हुए सामान्य दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में पर्यावरण आन्दोलन मूल रूप से लोगों के जल जंगल और जमीन से जुड़े परंपरागत अधिकारों को पुनः स्थापित करने के संघर्ष से जुड़े हैं | ये आन्दोलन आधुनिक विकास के मॉडल की आलोचना ही नहीं करते बल्कि विकल्प भी पेश करते हैं |ऐसा विकल्प जो विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी प्रदान करता है,लोगों के परंपरागत अधिकारों की रक्षा करता है तथा आम लोगों की विकास प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करता है | पर्यावरण के लिए कुछ महत्वपूर्ण आन्दोलन - चिपको आन्दोलन - यह आन्दोलन उत्तराखंड के चमोली जिले में सन 1973 में प्रारंभ हुआ | सुन्दरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट इस आन्दोलन के नेता थे | इस आन्दोलन में गौरा देवी के नेतृत्व में रेणी गाँव की 27 महिलाओं ने प्राण की बाज़ी लगाकर आन्दोलन को विफल कर दिया | एपिको आन्दोलन- यह आन्दोलन अगस्त 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में शुरू हुआ | अहिंसा के इस आन्दोलन ने अन्य स्थान के लोगों को भी आकर्षित किया | केन्द्रीय पर्यावरण तथा वन मंत्रालय ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अनेक दिशा निर्देश लागू करने को कहा | शांत घाटी बचाओ आन्दोलन - यह 1847 में केरल के पलक्कड़ जिले से शुरू हुआ | 1980 में यहाँ कुन्तिपुन्झ नदी पर कुद्रेमुख परियोजना के अंतर्गत 200 मेगावाट बिजली निर्माण हेतु बाँध का प्रस्ताव रखा गया | अंग्रेजों ने इसे शान्तघाटी नाम दिया था | चिल्का बचाओ आन्दोलन - यह आन्दोलन उड़ीसा में 1978 में हुआ था | झींगा मछली के व्यवसाय से जुड़ा हुआ आन्दोलन था | अंततः मछुआरों को सफलता प्राप्त हुई | इस आन्दोलन ने विकास के उस प्रतिमान को विकसित के विरुद्ध संघर्ष किया जिससे क्षेत्रीय पर्यावरण ,विकास तथा लोगो की आजीविका को खतरा था | नर्मदा बचाओ आन्दोलन - यह आन्दोलन नर्मदा नदी पर विशाल बाँध के खिलाफ 1985 में शुरू हुआ | यह देश के सबसे शक्तिशाली आन्दोलनों में से एक था | इसके मुख्य कार्यकर्ताओं में मेधा पाटेकर के अलावा अनिल पटेल ,अरुंधती रॉय ,बाबा आमटे आदि शामिल थे | पर्यावरण आन्दोलनों का उदय का मुख्य कारण पर्यावरण को होने वाली क्षति है | भारत में पिछले 200 वर्षों से प्राकृतिक दोहन करते हुए अपनाई गयी विकास प्रक्रिया का परिणाम है कि आज हमारी वायु ज़हरीली हो चुकी है,वनों का अंधाधुंध कटाव हो रहा है जिसका परिणाम हम वैश्विक तापन के रूप में देखते हैं ,जो भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक है |
##Question:भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण आन्दोलनों की चर्चा कीजिये, साथ ही इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भारतीयों के योगदान का संछिप्त में वर्णन कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) Discuss the important movement for the conservation of the environment in India, Also mention the contribution of the significant Indians in this context in brief. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में पर्यावरण आन्दोलन का परिचय देते हुए, पर्यावरण संरक्षण के बारे में भी संक्षेप में बताइए | इसके बाद प्रमुख पर्यावरण आन्दोलन और उनसे जुड़े भारतीयों की विस्तार से चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को बताते हुए सामान्य दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में पर्यावरण आन्दोलन मूल रूप से लोगों के जल जंगल और जमीन से जुड़े परंपरागत अधिकारों को पुनः स्थापित करने के संघर्ष से जुड़े हैं | ये आन्दोलन आधुनिक विकास के मॉडल की आलोचना ही नहीं करते बल्कि विकल्प भी पेश करते हैं |ऐसा विकल्प जो विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी प्रदान करता है,लोगों के परंपरागत अधिकारों की रक्षा करता है तथा आम लोगों की विकास प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करता है | पर्यावरण के लिए कुछ महत्वपूर्ण आन्दोलन - चिपको आन्दोलन - यह आन्दोलन उत्तराखंड के चमोली जिले में सन 1973 में प्रारंभ हुआ | सुन्दरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट इस आन्दोलन के नेता थे | इस आन्दोलन में गौरा देवी के नेतृत्व में रेणी गाँव की 27 महिलाओं ने प्राण की बाज़ी लगाकर आन्दोलन को विफल कर दिया | एपिको आन्दोलन- यह आन्दोलन अगस्त 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में शुरू हुआ | अहिंसा के इस आन्दोलन ने अन्य स्थान के लोगों को भी आकर्षित किया | केन्द्रीय पर्यावरण तथा वन मंत्रालय ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अनेक दिशा निर्देश लागू करने को कहा | शांत घाटी बचाओ आन्दोलन - यह 1847 में केरल के पलक्कड़ जिले से शुरू हुआ | 1980 में यहाँ कुन्तिपुन्झ नदी पर कुद्रेमुख परियोजना के अंतर्गत 200 मेगावाट बिजली निर्माण हेतु बाँध का प्रस्ताव रखा गया | अंग्रेजों ने इसे शान्तघाटी नाम दिया था | चिल्का बचाओ आन्दोलन - यह आन्दोलन उड़ीसा में 1978 में हुआ था | झींगा मछली के व्यवसाय से जुड़ा हुआ आन्दोलन था | अंततः मछुआरों को सफलता प्राप्त हुई | इस आन्दोलन ने विकास के उस प्रतिमान को विकसित के विरुद्ध संघर्ष किया जिससे क्षेत्रीय पर्यावरण ,विकास तथा लोगो की आजीविका को खतरा था | नर्मदा बचाओ आन्दोलन - यह आन्दोलन नर्मदा नदी पर विशाल बाँध के खिलाफ 1985 में शुरू हुआ | यह देश के सबसे शक्तिशाली आन्दोलनों में से एक था | इसके मुख्य कार्यकर्ताओं में मेधा पाटेकर के अलावा अनिल पटेल ,अरुंधती रॉय ,बाबा आमटे आदि शामिल थे | पर्यावरण आन्दोलनों का उदय का मुख्य कारण पर्यावरण को होने वाली क्षति है | भारत में पिछले 200 वर्षों से प्राकृतिक दोहन करते हुए अपनाई गयी विकास प्रक्रिया का परिणाम है कि आज हमारी वायु ज़हरीली हो चुकी है,वनों का अंधाधुंध कटाव हो रहा है जिसका परिणाम हम वैश्विक तापन के रूप में देखते हैं ,जो भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक है |
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अक्षांश और देशांतर को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही पृथ्वी की घूर्णन का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define latitude and longitude. Along with this, explain the importance of rotation of the Earth. (150-200 words; 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृथ्वी की आकृति को स्पष्ट करते हुए अक्षांश एवं देशांतर को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी की घूर्णन की विशेषताएं स्पष्ट कीजिये| 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पृथ्वी पर किसी वस्तु की अवस्थिति के निर्धारण के लिए अक्षांश एवं देशांतर का प्रयोग करते हैं| पृथ्वी के केंद्र से धरातल तक की कोणीय दूरी को अक्षांश कहते हैं| ग्लोब पर इनकी कुल संख्या 181 है| दो अक्षांशों के बीच की दुरी सदैव समान होगी जो 111 किमी होती है इसी लिए अक्षांश को समानांतर रेखाएं भी कहते हैं| विषुवत रेखा एकमात्र अक्षांश है जो वृहद् रेखा का कार्य करती है|देशांतर ध्रुव से ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाएं हैं| ग्रीनविच से गुजरने वाली देशांतर रेखा को जीरो डिग्री देशांतर को प्रधान देशांतर माना गया है| ग्लोब पर कुल 360 देशांतर रेखाएं हैं| देशान्तरों के बीच की दूरी विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर घटती जाती है| दो देशान्तरों के मध्य की दूरी किसी अक्षांश विशेष पर सदैव समान होती है| सभी देशांतर रेखाएं वृहद रेखा के रूप में कार्य करती हैं क्योंकि ये सभी रेखाएं पृथ्वी को दो बराबर भाग में विभाजित करती हैं| पृथ्वी की घूर्णन गति (Rotation) · वह आभासी रेखा जो पृथ्वी के केंद्र से गुजरते हुए दोनों ध्रुवों को मिलाती है उसे पृथ्वी का अक्ष कहा जाता है| पृथ्वी का अपने अक्ष पर संचलन घूर्णन कहलाता है · पृथ्वी के अक्ष पर अक्षीय झुकाव पाया जाता है जो 22 से 24 डिग्री के बीच में बदलता रहता है · अक्षीय झुकाव जितना अधिक होगा पृथ्वी का औसत तापमान उतना ही अधिक होगा क्योंकि सौर प्रकाश की मात्रा में वृद्धि होगी · अक्षीय झुकाव में बदलाव का सीधा प्रभाव पृथ्वी के औसत तापमान पर पड़ता है| झुकाव बढ़ने से तापमान में वृद्धि की सम्भावना होती है जबकि झुकाव घटने से तापमान में कमी आती है · वैश्विक तापन का एक प्राकृतिक कारण पृथ्वी के अक्षीय झुकाव में बदलाव को माना जाता है · पृथ्वी की समानांतरता- पृथ्वी का अक्ष परिक्रमण काल में अपने पहले की अवस्थिति के सदैव समानांतर होता है और ब्रह्माण्ड में किसी विशेष तारे की ओर केन्द्रित रहता है| उस तारे को ध्रुव तारा कहा जाता है| · घूर्णन की दिशा- पृथ्वी के घूर्णन की दिशा पश्चिम से पूर्व है| इसी कारण विश्व में अधिकतर उपग्रह लांच स्टेशन महाद्वीपों के पूर्वी तट/भागों में स्थित हैं| · पृथ्वी के सभी भाग में घूर्णन की गति अलग-अलग होती है| परिधि में अंतर होने के कारण दूरी में अंतर होता है| जबकि गति दूरी के समानुपाती होती है · घूर्णन की गति विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ने पर निरन्तर घटती जाती है क्योंकि अक्षांशीय परिधि में कमी आती जाती है| 60 डिग्री अक्षांश पर यह गति आधी हो जाती है| 75 डिग्री अक्षांश पर यह एक चौथाई हो जाती है और ध्रुव पर यह गति लगभग शून्य हो जाती है| · घूर्णन के परिणाम- दिन और रात का होना, किसी भी स्थान विशेष पर समय में परिवर्तन, सौर ताप की मात्रा में दैनिक अंतर, सौर ताप का पृथ्वी के अलग-अलग भागों में वितरण, कोरियालिस बल की उत्पत्ति| · पृथ्वी के घूर्णन के कारण एक आभासीय बल उत्पन्न होता है जिसे कोरियोलिस बल कहा जाता है|कोरियोलिस बल गतिमान तरल पदार्थ तथा गैस की दिशा को प्रभावित करता है अर्थात संचलित पवन अथवा समुद्री धारा उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर जबकि दक्षिणी गोलार्ध में बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है इसे फेरेल का नियम कहा जाता है| · कोरियोलिस बल का मान दो बातों पर निर्भर करता है यथा अक्षांश तथा संचलित पवन की गति| कोरियोलिस बल इन दोनों के समानुपाती होता है|यह विषुवत रेखा पर शून्य और ध्रुवों पर अधिकतम होता है| · कोरियोलिस बल वायुमंडलीय परिसंचरण, वायुदाब पेटियों का निर्माण, समुद्री धाराओं के संचलन, चक्रवात का निर्माण, वाताग्र का निर्माण तथा जेटधारा के निर्माण, ज्वार-भाटा में भूमिका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| · प्रथ्वी की आकृति को जियोआयड कहते हैं| अर्थात यह पृथ्व्याकार है| यह मध्य भाग में उभरी हुई है जबकि किनारों पर चपटी है| इसका कारण भी पृथ्वी का घूर्णन है| वस्तुतः घूर्णन से दो बल लगते हैं अभिकेन्द्रीय बल (चपटी होने का कारण) एवं अपकेन्द्रीय बल (उभार का कारण)| इससे केंद्र से दुरी में परिवर्तन और परिधि में भी अंतर आता है(ध्रुव से ध्रुव की परिधि छोटी है)| गुरुत्वाकर्षण बल में परिवर्तन आता है(ध्रुव पर अधिकतम, विषुवत पर न्यूनतम) उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है की पृथ्वी की घूर्णन गति विभिन्न भौतिक प्रभाव उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
##Question:अक्षांश और देशांतर को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही पृथ्वी की घूर्णन का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Define latitude and longitude. Along with this, explain the importance of rotation of the Earth. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृथ्वी की आकृति को स्पष्ट करते हुए अक्षांश एवं देशांतर को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी की घूर्णन की विशेषताएं स्पष्ट कीजिये| 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पृथ्वी पर किसी वस्तु की अवस्थिति के निर्धारण के लिए अक्षांश एवं देशांतर का प्रयोग करते हैं| पृथ्वी के केंद्र से धरातल तक की कोणीय दूरी को अक्षांश कहते हैं| ग्लोब पर इनकी कुल संख्या 181 है| दो अक्षांशों के बीच की दुरी सदैव समान होगी जो 111 किमी होती है इसी लिए अक्षांश को समानांतर रेखाएं भी कहते हैं| विषुवत रेखा एकमात्र अक्षांश है जो वृहद् रेखा का कार्य करती है|देशांतर ध्रुव से ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाएं हैं| ग्रीनविच से गुजरने वाली देशांतर रेखा को जीरो डिग्री देशांतर को प्रधान देशांतर माना गया है| ग्लोब पर कुल 360 देशांतर रेखाएं हैं| देशान्तरों के बीच की दूरी विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर घटती जाती है| दो देशान्तरों के मध्य की दूरी किसी अक्षांश विशेष पर सदैव समान होती है| सभी देशांतर रेखाएं वृहद रेखा के रूप में कार्य करती हैं क्योंकि ये सभी रेखाएं पृथ्वी को दो बराबर भाग में विभाजित करती हैं| पृथ्वी की घूर्णन गति (Rotation) · वह आभासी रेखा जो पृथ्वी के केंद्र से गुजरते हुए दोनों ध्रुवों को मिलाती है उसे पृथ्वी का अक्ष कहा जाता है| पृथ्वी का अपने अक्ष पर संचलन घूर्णन कहलाता है · पृथ्वी के अक्ष पर अक्षीय झुकाव पाया जाता है जो 22 से 24 डिग्री के बीच में बदलता रहता है · अक्षीय झुकाव जितना अधिक होगा पृथ्वी का औसत तापमान उतना ही अधिक होगा क्योंकि सौर प्रकाश की मात्रा में वृद्धि होगी · अक्षीय झुकाव में बदलाव का सीधा प्रभाव पृथ्वी के औसत तापमान पर पड़ता है| झुकाव बढ़ने से तापमान में वृद्धि की सम्भावना होती है जबकि झुकाव घटने से तापमान में कमी आती है · वैश्विक तापन का एक प्राकृतिक कारण पृथ्वी के अक्षीय झुकाव में बदलाव को माना जाता है · पृथ्वी की समानांतरता- पृथ्वी का अक्ष परिक्रमण काल में अपने पहले की अवस्थिति के सदैव समानांतर होता है और ब्रह्माण्ड में किसी विशेष तारे की ओर केन्द्रित रहता है| उस तारे को ध्रुव तारा कहा जाता है| · घूर्णन की दिशा- पृथ्वी के घूर्णन की दिशा पश्चिम से पूर्व है| इसी कारण विश्व में अधिकतर उपग्रह लांच स्टेशन महाद्वीपों के पूर्वी तट/भागों में स्थित हैं| · पृथ्वी के सभी भाग में घूर्णन की गति अलग-अलग होती है| परिधि में अंतर होने के कारण दूरी में अंतर होता है| जबकि गति दूरी के समानुपाती होती है · घूर्णन की गति विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ने पर निरन्तर घटती जाती है क्योंकि अक्षांशीय परिधि में कमी आती जाती है| 60 डिग्री अक्षांश पर यह गति आधी हो जाती है| 75 डिग्री अक्षांश पर यह एक चौथाई हो जाती है और ध्रुव पर यह गति लगभग शून्य हो जाती है| · घूर्णन के परिणाम- दिन और रात का होना, किसी भी स्थान विशेष पर समय में परिवर्तन, सौर ताप की मात्रा में दैनिक अंतर, सौर ताप का पृथ्वी के अलग-अलग भागों में वितरण, कोरियालिस बल की उत्पत्ति| · पृथ्वी के घूर्णन के कारण एक आभासीय बल उत्पन्न होता है जिसे कोरियोलिस बल कहा जाता है|कोरियोलिस बल गतिमान तरल पदार्थ तथा गैस की दिशा को प्रभावित करता है अर्थात संचलित पवन अथवा समुद्री धारा उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर जबकि दक्षिणी गोलार्ध में बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है इसे फेरेल का नियम कहा जाता है| · कोरियोलिस बल का मान दो बातों पर निर्भर करता है यथा अक्षांश तथा संचलित पवन की गति| कोरियोलिस बल इन दोनों के समानुपाती होता है|यह विषुवत रेखा पर शून्य और ध्रुवों पर अधिकतम होता है| · कोरियोलिस बल वायुमंडलीय परिसंचरण, वायुदाब पेटियों का निर्माण, समुद्री धाराओं के संचलन, चक्रवात का निर्माण, वाताग्र का निर्माण तथा जेटधारा के निर्माण, ज्वार-भाटा में भूमिका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| · प्रथ्वी की आकृति को जियोआयड कहते हैं| अर्थात यह पृथ्व्याकार है| यह मध्य भाग में उभरी हुई है जबकि किनारों पर चपटी है| इसका कारण भी पृथ्वी का घूर्णन है| वस्तुतः घूर्णन से दो बल लगते हैं अभिकेन्द्रीय बल (चपटी होने का कारण) एवं अपकेन्द्रीय बल (उभार का कारण)| इससे केंद्र से दुरी में परिवर्तन और परिधि में भी अंतर आता है(ध्रुव से ध्रुव की परिधि छोटी है)| गुरुत्वाकर्षण बल में परिवर्तन आता है(ध्रुव पर अधिकतम, विषुवत पर न्यूनतम) उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है की पृथ्वी की घूर्णन गति विभिन्न भौतिक प्रभाव उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
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Briefly explain the process of colonisation (centralisation) under the British government with respect to the East India Company. (150 words/10 Marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE REGULATING ACT OF 1773 - THE PITTS INDIA ACT, 1774 - THE REGULATING ACT OF 1793 - THE CHARTER ACT OF 1813 - THECHARTER ACT OF 1833 -CONCLUSION Answer:- In 1600, the East India Company (EIC) came under a charter i.e. a license to trade in India. This was given as a monopoly to the EIC. In 1764, in the Battle of Buxar, the EIC won. The Mughal Emperor Shah Alam II was reduced to a mere pensioner and the diwani rights of Bengal, Bihar and Orissa went tothe EIC. A huge amount of corruption followed and the Company incurred a debt of 1 million pounds. This was a quid pro quo arrangement where the British government assumed the power to regulate EIC via laws. REGULATING ACT OF 1773 1) CENTRALIZATION OF GOVERNANCE At that time the method of governance in India was decentralized (before the Regulating Act). The Regulating Act of 1773 was the 1st step in the direction of centralization of governance in India. By this act, certain legislative powersof the Governors of Bombay and Madras were given to the Governor of Bengal. The Governor of Bengal was called the Governor General (GG) of Bengal and Warren Hastings was the 1st Governor General of Bengal. 2) EXECUTIVE SUPREMACY Assisted by a 4 member council, the Calcutta Council was the executive council also performing legislative functions. 3) SUPREME COURT Through this act, the 1st Supreme Court of India was set up, with minimal powers, at Fort Williams, with 4 judges, and Ilijah Impey as the Chief Justice. 4) ANSWERABILITY TheEIC"s accounts were brought under compulsory audit of Court of Directors. 5) CHECKS AND BALANCES The private trade of officials not allowed. The Regulating Act, 1773 failed due to lack of cooperation from the EIC. PITTS INDIA ACT, 1774 This Act was introduced by the Pitts the younger (the then PM of England) 1) CONTROL OVER POSSESSIONS From now on, all property of the EIC was to be held in trust of the British government. 2) DUAL GOVERNMENT The Court of directors was to be only responsible for commercial decisions while the Board of Control (BoC) for political, administrative and military decisions. The BoC was appointed by the British government. THE REGULATING ACT OF 1793 It increased the level of centralization of governance in India by reducing the scope of the decision making power of the EIC even further. THE CHARTER ACT OF 1813 The Act was passed in the background of the Napoleonic wars. French Napolean Bonaparte passed the Parish Decree and the Milan decree in 1805 and 1806 respectively imposing sanctions and restrictions on trade with England. In order to compensate for the loss of revenue from this decision, the Charter Act of 1813 act was passed. It ended the monopoly of the EIC THE CHARTERACT OF 1833 1) LAST AND FINAL STEP IN THE BID OF CENTRALIZATION This act brought about the maximum level of centralization of governance in India and was the last and final step in this regards. All legislative powers were vested in the Governor of Bengal (taken from the Governors of Bombay and Madras). The powers of the EIC were further reduced and converted into an administered unit. 2) PROPOSITION TO THROW OPEN THE HIGHER CIVIL SERVICES FOR COMPETITION It proposed to open the higher civil services exam for direct examination (which became a reality only in 1853, due to opposition from the CoD). Centralization is synonymous with colonization and not in the interest of the people. Therefore, after the Regulating Act of 1833 and after the Great Revolt of 1857 from the natives, the British started to reverse the process of centralization by beginning to successively decentralize governance in India, from the Act of Good Governance in 1858.
##Question:Briefly explain the process of colonisation (centralisation) under the British government with respect to the East India Company. (150 words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE REGULATING ACT OF 1773 - THE PITTS INDIA ACT, 1774 - THE REGULATING ACT OF 1793 - THE CHARTER ACT OF 1813 - THECHARTER ACT OF 1833 -CONCLUSION Answer:- In 1600, the East India Company (EIC) came under a charter i.e. a license to trade in India. This was given as a monopoly to the EIC. In 1764, in the Battle of Buxar, the EIC won. The Mughal Emperor Shah Alam II was reduced to a mere pensioner and the diwani rights of Bengal, Bihar and Orissa went tothe EIC. A huge amount of corruption followed and the Company incurred a debt of 1 million pounds. This was a quid pro quo arrangement where the British government assumed the power to regulate EIC via laws. REGULATING ACT OF 1773 1) CENTRALIZATION OF GOVERNANCE At that time the method of governance in India was decentralized (before the Regulating Act). The Regulating Act of 1773 was the 1st step in the direction of centralization of governance in India. By this act, certain legislative powersof the Governors of Bombay and Madras were given to the Governor of Bengal. The Governor of Bengal was called the Governor General (GG) of Bengal and Warren Hastings was the 1st Governor General of Bengal. 2) EXECUTIVE SUPREMACY Assisted by a 4 member council, the Calcutta Council was the executive council also performing legislative functions. 3) SUPREME COURT Through this act, the 1st Supreme Court of India was set up, with minimal powers, at Fort Williams, with 4 judges, and Ilijah Impey as the Chief Justice. 4) ANSWERABILITY TheEIC"s accounts were brought under compulsory audit of Court of Directors. 5) CHECKS AND BALANCES The private trade of officials not allowed. The Regulating Act, 1773 failed due to lack of cooperation from the EIC. PITTS INDIA ACT, 1774 This Act was introduced by the Pitts the younger (the then PM of England) 1) CONTROL OVER POSSESSIONS From now on, all property of the EIC was to be held in trust of the British government. 2) DUAL GOVERNMENT The Court of directors was to be only responsible for commercial decisions while the Board of Control (BoC) for political, administrative and military decisions. The BoC was appointed by the British government. THE REGULATING ACT OF 1793 It increased the level of centralization of governance in India by reducing the scope of the decision making power of the EIC even further. THE CHARTER ACT OF 1813 The Act was passed in the background of the Napoleonic wars. French Napolean Bonaparte passed the Parish Decree and the Milan decree in 1805 and 1806 respectively imposing sanctions and restrictions on trade with England. In order to compensate for the loss of revenue from this decision, the Charter Act of 1813 act was passed. It ended the monopoly of the EIC THE CHARTERACT OF 1833 1) LAST AND FINAL STEP IN THE BID OF CENTRALIZATION This act brought about the maximum level of centralization of governance in India and was the last and final step in this regards. All legislative powers were vested in the Governor of Bengal (taken from the Governors of Bombay and Madras). The powers of the EIC were further reduced and converted into an administered unit. 2) PROPOSITION TO THROW OPEN THE HIGHER CIVIL SERVICES FOR COMPETITION It proposed to open the higher civil services exam for direct examination (which became a reality only in 1853, due to opposition from the CoD). Centralization is synonymous with colonization and not in the interest of the people. Therefore, after the Regulating Act of 1833 and after the Great Revolt of 1857 from the natives, the British started to reverse the process of centralization by beginning to successively decentralize governance in India, from the Act of Good Governance in 1858.
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19 वीं शताब्दी में यूरोप में उत्पन्न “पूर्वी प्रश्न या बाल्कन समस्या” राष्ट्रवाद की लहर के साथ-साथ रूस और अन्य यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता का परिणाम थी।" चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) The “eastern question or balcan problem” originated in 19th century europe was the result of the wave of nationalism as well as the rivalry between russia and other european powers. Discuss. (150-200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण भूमिका में बाल्कन क्षेत्र का सीमित परिचय और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की चर्चा कीजिये। उत्तर के दूसरे भाग में बाल्कन क्षेत्र में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता और उसके मुख्य पक्षकारों की भूमिका कीचर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में बाल्कन समस्या के कारकों की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष में इसके प्रभावों की चर्चा कीजिये । दक्षिण पूर्वी यूरोप के राष्ट्रों को भौगोलिक तौर पर बाल्कन राष्ट्र के रूप में संबोधित किया जाता है, जिसमे मुख्य रूप से रोमानिया , सर्बिआ , बुल्गारिया, स्लोवानिया तथा मेसिडोनिया जैसे राष्ट्र शामिल थे| 19 वीं सदी में इस क्षेत्र में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के सन्दर्भ में ही “पूर्वी प्रश्न या बाल्कन समस्या” का प्रयोग किया जाता है| बाल्कन समस्या या पूर्वी प्रश्न ये राष्ट्र ( बाल्कन राष्ट्र ) तुर्की के नियंत्रण में थे। परन्तु फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावस्वरूप यहाँ भी राष्ट्रवाद की लहर प्रारंभ हो गयी| फलतः तुर्की के प्रभाव से निकलने हेतु बाल्कन राष्ट्रों में राष्ट्रवादी प्रयास प्रारंभ हुएतथा इस अवसर का लाभ उठाते हुए रूस व अन्य यूरोपीय शक्तियां दक्षिण –पूर्वी राजनीति में सम्मिलित हो गयी| इसके परिणामस्वरुप 19 वीं सदी में दक्षिण पूर्वी यूरोप में एक राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण उत्पन्न हुआ। जिसे “पूर्वी प्रश्न” या बाल्कन समस्या के रूप में जानते हैं| बाल्कन समस्या के प्रमुख कारकों को निम्नलिखित बिन्दुओ के माध्यम से समझा जा सकता है :- राष्ट्रवाद की लहर सबसे पहले यूनान से राष्ट्रवाद की लहर प्रारंभ हुई जो तुर्की के शासन से मुक्ति चाहता था। तुर्की के द्वारा राष्ट्रवाद का दमन करने के कारण निरंतर उसकी स्थिति कमजोर होती गई । रुसी सहयोग से 1832 में यूनान की स्वतंत्रता को मान्यता मिली तथा काला सागर एवं भूमध्य सागर को जोड़ने वाली जल संधियों में रूस को नौसैनिक गतिविधियों का अधिकार भी दिया गया। अंततः 1841 में ब्रिटिश दवाब में लन्दन में एक सम्मलेन का आयोजन हुआ| एक तरफ यूनान की स्वतंत्रता को मान्यता मिली तो दूसरी तरफ रूस की गतिविधियों पर अंकुश भी लगाने का प्रयास किया गया । यूनान की स्वतंत्रता के बाद सर्बिया, रोमानिया और बोसनिया आदि क्षेत्रों में भी आज़ादी की मांग तीव्र हुई तो दूसरी तरफ तुर्की के द्वारा इन सबका दमन जारी रहा । रुसी महत्वाकांक्षा और अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्धा बाल्कन राष्ट्रों में स्लाव भाषी जनसँख्या का बोलबाला और रूस में भी इनकी जनसँख्या अधिक थी । इसलिए रूस के द्वारा भाषाई निकटता का लाभ उठाकर राष्ट्रवाद की लहर को सहयोग किया गया। परन्तु रूस की मुख्य हित भूमध्य सागर/लाल सागर तक अपनी पहुँच में वृद्धि करना था। रूस के द्वारा ग्रीक ऑर्थोडॉक्स संप्रदाय को भी सहयोग प्रदान किया गया । अंततः रूस को रोकने के लिए, 1841 में लन्दन में हुए सम्मलेन से असंतुष्ट होकर रूस काला सागर में नौसैनिक क्षमता का विस्तार करना शुरू कर दिया । साथ ही बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन को समर्थन देना भी जारी रखा । एक तरफ रूस के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटेन चिंतित था तो दूसरी तरफ फ्रांस में नेपोलियन तृतीय यूरोपियन राजनीति में फ्रांस के प्रभाव को पुनर्स्थापित करना चाहता था । इसके साथ ही रूस ने बाल्कन क्षेत्रों में ग्रीक भिक्षुओं का संरक्षक होने का दावा किया जो तुर्की की संप्रभुता को चुनौती थी और इन्हीं घटनाक्रमों के परिप्र्येक्ष्य में क्रीमिया का युद्ध हुआ और रूस की पराजय हुई | निर्णायक चरण इस चरण में यूरोपीय राजनीति में महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुआ। जैसे- जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया में ऑस्ट्रिया एवं फ्रांस की पराजय| | इन अवसरों का लाभ उठाकर रूस ने काला सागर तक अपनी स्थिति मजबूत किया तथा तुर्की को पराजित कर निम्नलिखित रियायतें प्राप्त की। जैसे- सर्बिया, रोमानिया, मोंटेनेग्रो की स्वतंत्रता को मान्यता तथा मेसिडोनिया को शामिल कर बृहत्तर बुल्गारिया का निर्माण | बोस्निया में तुर्की के द्वारा सुधारों का आश्वासन । रूस को काला सागर और भूमध्य सागर में जोड़ने वाले जल संधियों में नौसैनिक स्वतंत्रता। अंततः 1878 का बर्लिन कांग्रेस जो ब्रिटेन के दवाब में और बिस्मार्क के प्रयासों से आयोजित किया गया। जहाँ बाल्कन क्षेत्र के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए । इसके अंतर्गत सर्बिआ, रोमानिया, मोंटेनेग्रो की स्वतंत्रता तथा मेसिडोनिया को बुल्गारिया से अलग करने का निर्णय शामिल था। जबकि इन दोनों पर तुर्की का नाममात्र का नियंत्रण बना रहा| बोस्निया में तुर्की ने सुधारों केआश्वासन दिये तथा रूस की नौसैनिक गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया| इस प्रकार बाल्कन क्षेत्र का छोटे छोटे राष्ट्रों में विभाजन और यूरोपीय शक्तियों की निजी हितों ने आपसी प्रतिस्पर्धा और अविश्वास में वृद्धि की। जिसके परिणामस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि निर्मित हुई|
##Question:19 वीं शताब्दी में यूरोप में उत्पन्न “पूर्वी प्रश्न या बाल्कन समस्या” राष्ट्रवाद की लहर के साथ-साथ रूस और अन्य यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता का परिणाम थी।" चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) The “eastern question or balcan problem” originated in 19th century europe was the result of the wave of nationalism as well as the rivalry between russia and other european powers. Discuss. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में बाल्कन क्षेत्र का सीमित परिचय और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की चर्चा कीजिये। उत्तर के दूसरे भाग में बाल्कन क्षेत्र में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता और उसके मुख्य पक्षकारों की भूमिका कीचर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में बाल्कन समस्या के कारकों की चर्चा कीजिये । निष्कर्ष में इसके प्रभावों की चर्चा कीजिये । दक्षिण पूर्वी यूरोप के राष्ट्रों को भौगोलिक तौर पर बाल्कन राष्ट्र के रूप में संबोधित किया जाता है, जिसमे मुख्य रूप से रोमानिया , सर्बिआ , बुल्गारिया, स्लोवानिया तथा मेसिडोनिया जैसे राष्ट्र शामिल थे| 19 वीं सदी में इस क्षेत्र में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के सन्दर्भ में ही “पूर्वी प्रश्न या बाल्कन समस्या” का प्रयोग किया जाता है| बाल्कन समस्या या पूर्वी प्रश्न ये राष्ट्र ( बाल्कन राष्ट्र ) तुर्की के नियंत्रण में थे। परन्तु फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावस्वरूप यहाँ भी राष्ट्रवाद की लहर प्रारंभ हो गयी| फलतः तुर्की के प्रभाव से निकलने हेतु बाल्कन राष्ट्रों में राष्ट्रवादी प्रयास प्रारंभ हुएतथा इस अवसर का लाभ उठाते हुए रूस व अन्य यूरोपीय शक्तियां दक्षिण –पूर्वी राजनीति में सम्मिलित हो गयी| इसके परिणामस्वरुप 19 वीं सदी में दक्षिण पूर्वी यूरोप में एक राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण उत्पन्न हुआ। जिसे “पूर्वी प्रश्न” या बाल्कन समस्या के रूप में जानते हैं| बाल्कन समस्या के प्रमुख कारकों को निम्नलिखित बिन्दुओ के माध्यम से समझा जा सकता है :- राष्ट्रवाद की लहर सबसे पहले यूनान से राष्ट्रवाद की लहर प्रारंभ हुई जो तुर्की के शासन से मुक्ति चाहता था। तुर्की के द्वारा राष्ट्रवाद का दमन करने के कारण निरंतर उसकी स्थिति कमजोर होती गई । रुसी सहयोग से 1832 में यूनान की स्वतंत्रता को मान्यता मिली तथा काला सागर एवं भूमध्य सागर को जोड़ने वाली जल संधियों में रूस को नौसैनिक गतिविधियों का अधिकार भी दिया गया। अंततः 1841 में ब्रिटिश दवाब में लन्दन में एक सम्मलेन का आयोजन हुआ| एक तरफ यूनान की स्वतंत्रता को मान्यता मिली तो दूसरी तरफ रूस की गतिविधियों पर अंकुश भी लगाने का प्रयास किया गया । यूनान की स्वतंत्रता के बाद सर्बिया, रोमानिया और बोसनिया आदि क्षेत्रों में भी आज़ादी की मांग तीव्र हुई तो दूसरी तरफ तुर्की के द्वारा इन सबका दमन जारी रहा । रुसी महत्वाकांक्षा और अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्धा बाल्कन राष्ट्रों में स्लाव भाषी जनसँख्या का बोलबाला और रूस में भी इनकी जनसँख्या अधिक थी । इसलिए रूस के द्वारा भाषाई निकटता का लाभ उठाकर राष्ट्रवाद की लहर को सहयोग किया गया। परन्तु रूस की मुख्य हित भूमध्य सागर/लाल सागर तक अपनी पहुँच में वृद्धि करना था। रूस के द्वारा ग्रीक ऑर्थोडॉक्स संप्रदाय को भी सहयोग प्रदान किया गया । अंततः रूस को रोकने के लिए, 1841 में लन्दन में हुए सम्मलेन से असंतुष्ट होकर रूस काला सागर में नौसैनिक क्षमता का विस्तार करना शुरू कर दिया । साथ ही बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन को समर्थन देना भी जारी रखा । एक तरफ रूस के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटेन चिंतित था तो दूसरी तरफ फ्रांस में नेपोलियन तृतीय यूरोपियन राजनीति में फ्रांस के प्रभाव को पुनर्स्थापित करना चाहता था । इसके साथ ही रूस ने बाल्कन क्षेत्रों में ग्रीक भिक्षुओं का संरक्षक होने का दावा किया जो तुर्की की संप्रभुता को चुनौती थी और इन्हीं घटनाक्रमों के परिप्र्येक्ष्य में क्रीमिया का युद्ध हुआ और रूस की पराजय हुई | निर्णायक चरण इस चरण में यूरोपीय राजनीति में महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुआ। जैसे- जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया में ऑस्ट्रिया एवं फ्रांस की पराजय| | इन अवसरों का लाभ उठाकर रूस ने काला सागर तक अपनी स्थिति मजबूत किया तथा तुर्की को पराजित कर निम्नलिखित रियायतें प्राप्त की। जैसे- सर्बिया, रोमानिया, मोंटेनेग्रो की स्वतंत्रता को मान्यता तथा मेसिडोनिया को शामिल कर बृहत्तर बुल्गारिया का निर्माण | बोस्निया में तुर्की के द्वारा सुधारों का आश्वासन । रूस को काला सागर और भूमध्य सागर में जोड़ने वाले जल संधियों में नौसैनिक स्वतंत्रता। अंततः 1878 का बर्लिन कांग्रेस जो ब्रिटेन के दवाब में और बिस्मार्क के प्रयासों से आयोजित किया गया। जहाँ बाल्कन क्षेत्र के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए । इसके अंतर्गत सर्बिआ, रोमानिया, मोंटेनेग्रो की स्वतंत्रता तथा मेसिडोनिया को बुल्गारिया से अलग करने का निर्णय शामिल था। जबकि इन दोनों पर तुर्की का नाममात्र का नियंत्रण बना रहा| बोस्निया में तुर्की ने सुधारों केआश्वासन दिये तथा रूस की नौसैनिक गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया| इस प्रकार बाल्कन क्षेत्र का छोटे छोटे राष्ट्रों में विभाजन और यूरोपीय शक्तियों की निजी हितों ने आपसी प्रतिस्पर्धा और अविश्वास में वृद्धि की। जिसके परिणामस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि निर्मित हुई|
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खाद्य श्रंखला तथा खाद्य जाल की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इस सन्दर्भ में विभिन्न पारिस्थितिकीय पिरामिडों का वर्णन कीजिये | (150-200शब्द/ 10 अंक) Explaining the concept of food chain and food web, describe the various ecological pyramids in this context. (150-200 words/10 marks)
पहले भाग में खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य जाल को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय पिरामिड को परिभाषित करते हुए विभिन्न प्रकार के पिरामिडों वर्णन कीजिये| उत्तर- खाद्य-श्रृंखला -पारितंत्र के भीतर उत्पादक से उपभोक्ता तक उर्जा प्रवाह के स्वरूप को खाद्य श्रृंखला कहते हैं| पारितंत्र के भीतर विभिन्न जीवो में पोषण स्तर के माध्यम से एक संबंध होता है तथा इनमें ऊर्जा का प्रवाह एक दिशीय(रैखिक) होता है|यह 2 प्रकार के होते हैं- चराई खाद्य श्रृंखला(घास-हिरन-बाघ) तथा अपरद खाद्य श्रृंखला(कचरा-कीट-छोटी-मछलियाँ)|(चित्र बनाईये)| खाद्य जाल- विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के नेटवर्क को खाद्य जाल कहते हैं| यहां ऊर्जा का प्रवाह बहु पथगामी होता है | एक जंतु विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के सदस्य हो सकते हैं तथा पारितंत्र के भीतर परस्पर संबंधित अनेक खाद्य श्रृंखलाएं हो सकती है और इसी से खाद्य जाल का निर्माण होता है| पारिस्थितिकीय पिरामिड - खाद्य श्रृंखला में क्रमिक उच्च पोषण स्तरों में प्रजातियों की संख्या, सकल बायोमास तथा ऊर्जा की सुलभता एवं प्राप्यता में इस तरह से ह्रास होता है कि उनका आकार पिरामिड जैसा हो जाता है, जिसे पारिस्थितिकी पिरामिड कहा जाता है| यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- संख्या पिरामिड - इसमें प्राथमिक उत्पादकों तथा विभिन्न स्तर के उपभोक्ताओं की संख्याओं के बीच के संबंध को दिखाया जाता है| संख्या पिरामिड सीधा एवं उल्टा दोनों प्रकार का होता है-सीधा संख्या पिरामिड-इसमें बढ़ते पोषण स्तरों के साथ जीवो की संख्या में कमी होती जाती है| इसका आधार अत्यधिक चौड़ा तथा शीर्ष अत्यधिक नुकीला होता है| उदाहरण- घास के मैदान एवं तालाब| उल्टा संख्या पिरामिड -इसमें प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की संख्या में वृद्धि होती जाती है| यह आधार पर नुकीला तथा शीर्ष पर अत्यधिक चौड़ा होता है| उदाहरण- वनों के अन्दर जहाँ वृक्षों का आकार बड़ा होने पर उन पर निर्भर जंतुओं की संख्या अधिक होती है|(चित्र बनाईये)| जैवभार पिरामिड -जैवभार पिरामिड को निर्धारित करने के लिए प्रत्येक पोषण स्तर पर मौजूद समस्त जीवों को एकत्रित करके उनके शुष्क कार्बनिक भार का मापन किया जाता है| इस प्रकार के पिरामिड के अंतर्गत पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल के सभी पोषण स्तरों पर भंडारित समस्त जीवों के सकल भार का प्रदर्शन तथा उनका अध्ययन किया जाता है|यह भी उल्टा एवं सीधा दोनों प्रकार का होता है|सीधा जैवभार पिरामिड-इसका आधार प्राथमिक उत्पादकों से बनता है तथा शीर्ष पर एक लघु पोषण स्तर होता है|(चित्र बनाईये)| उल्टा जैवभार पिरामिड -इसमें बायोमास पिरामिड का आधार छोटा होता है तथा किसी भी समय उपभोक्ता का जैवभार प्राथमिक उत्पादक के जैवभार से अधिक होता है| उदाहरण -जलीय पारिस्थितिकी तंत्र|(चित्र बनाईये)| ऊर्जा पिरामिड- किसी पारितंत्र के विभिन्न पोषक स्तरों की कार्यात्मक भूमिका की तुलना करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है| ऊर्जा पिरामिड थर्मोडायनेमिक्स के नियमों का पालन करता है जिसमें एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा को दिखाया जाता है|ऊर्जा पिरामिड हमेशा सीधाहोता है|(चित्र बनाईये)|ऊर्जा पिरामिड के अंतर्गत ऊर्जा के स्थानांतरण हेतु10% का नियमदिया गया है- एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में मात्र 10% ऊर्जा ही स्थानान्तरित होती है|
##Question:खाद्य श्रंखला तथा खाद्य जाल की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इस सन्दर्भ में विभिन्न पारिस्थितिकीय पिरामिडों का वर्णन कीजिये | (150-200शब्द/ 10 अंक) Explaining the concept of food chain and food web, describe the various ecological pyramids in this context. (150-200 words/10 marks)##Answer:पहले भाग में खाद्य-श्रृंखला तथा खाद्य जाल को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय पिरामिड को परिभाषित करते हुए विभिन्न प्रकार के पिरामिडों वर्णन कीजिये| उत्तर- खाद्य-श्रृंखला -पारितंत्र के भीतर उत्पादक से उपभोक्ता तक उर्जा प्रवाह के स्वरूप को खाद्य श्रृंखला कहते हैं| पारितंत्र के भीतर विभिन्न जीवो में पोषण स्तर के माध्यम से एक संबंध होता है तथा इनमें ऊर्जा का प्रवाह एक दिशीय(रैखिक) होता है|यह 2 प्रकार के होते हैं- चराई खाद्य श्रृंखला(घास-हिरन-बाघ) तथा अपरद खाद्य श्रृंखला(कचरा-कीट-छोटी-मछलियाँ)|(चित्र बनाईये)| खाद्य जाल- विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के नेटवर्क को खाद्य जाल कहते हैं| यहां ऊर्जा का प्रवाह बहु पथगामी होता है | एक जंतु विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं के सदस्य हो सकते हैं तथा पारितंत्र के भीतर परस्पर संबंधित अनेक खाद्य श्रृंखलाएं हो सकती है और इसी से खाद्य जाल का निर्माण होता है| पारिस्थितिकीय पिरामिड - खाद्य श्रृंखला में क्रमिक उच्च पोषण स्तरों में प्रजातियों की संख्या, सकल बायोमास तथा ऊर्जा की सुलभता एवं प्राप्यता में इस तरह से ह्रास होता है कि उनका आकार पिरामिड जैसा हो जाता है, जिसे पारिस्थितिकी पिरामिड कहा जाता है| यह मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- संख्या पिरामिड - इसमें प्राथमिक उत्पादकों तथा विभिन्न स्तर के उपभोक्ताओं की संख्याओं के बीच के संबंध को दिखाया जाता है| संख्या पिरामिड सीधा एवं उल्टा दोनों प्रकार का होता है-सीधा संख्या पिरामिड-इसमें बढ़ते पोषण स्तरों के साथ जीवो की संख्या में कमी होती जाती है| इसका आधार अत्यधिक चौड़ा तथा शीर्ष अत्यधिक नुकीला होता है| उदाहरण- घास के मैदान एवं तालाब| उल्टा संख्या पिरामिड -इसमें प्रत्येक पोषण स्तर पर जीवों की संख्या में वृद्धि होती जाती है| यह आधार पर नुकीला तथा शीर्ष पर अत्यधिक चौड़ा होता है| उदाहरण- वनों के अन्दर जहाँ वृक्षों का आकार बड़ा होने पर उन पर निर्भर जंतुओं की संख्या अधिक होती है|(चित्र बनाईये)| जैवभार पिरामिड -जैवभार पिरामिड को निर्धारित करने के लिए प्रत्येक पोषण स्तर पर मौजूद समस्त जीवों को एकत्रित करके उनके शुष्क कार्बनिक भार का मापन किया जाता है| इस प्रकार के पिरामिड के अंतर्गत पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल के सभी पोषण स्तरों पर भंडारित समस्त जीवों के सकल भार का प्रदर्शन तथा उनका अध्ययन किया जाता है|यह भी उल्टा एवं सीधा दोनों प्रकार का होता है|सीधा जैवभार पिरामिड-इसका आधार प्राथमिक उत्पादकों से बनता है तथा शीर्ष पर एक लघु पोषण स्तर होता है|(चित्र बनाईये)| उल्टा जैवभार पिरामिड -इसमें बायोमास पिरामिड का आधार छोटा होता है तथा किसी भी समय उपभोक्ता का जैवभार प्राथमिक उत्पादक के जैवभार से अधिक होता है| उदाहरण -जलीय पारिस्थितिकी तंत्र|(चित्र बनाईये)| ऊर्जा पिरामिड- किसी पारितंत्र के विभिन्न पोषक स्तरों की कार्यात्मक भूमिका की तुलना करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है| ऊर्जा पिरामिड थर्मोडायनेमिक्स के नियमों का पालन करता है जिसमें एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा को दिखाया जाता है|ऊर्जा पिरामिड हमेशा सीधाहोता है|(चित्र बनाईये)|ऊर्जा पिरामिड के अंतर्गत ऊर्जा के स्थानांतरण हेतु10% का नियमदिया गया है- एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में मात्र 10% ऊर्जा ही स्थानान्तरित होती है|
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तापीय विलोमता को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Define thermal anomaly. Along with this, describe the various factors affecting the distribution of temperature. (150-200 words/10 marks)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में तापीय विलोमता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए 3- अंतिम में तापमान में अंतर होने के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| किसी अक्षांश पर अवस्थित स्थानों का तापमान यदि उस अक्षांश के औसत तापमान से अलग हो तो उसे तापीय विलोमता कहते हैं|तापमान को प्रभावित करने वाले अक्षांश को छोड़ कर बाकी सभी कारक तापीय विलोमता का कारण होते हैं| यदि किसी स्थान विशेष का तापमान अपने अक्षांश के औसत तापमान से अधिक हो तो इसे धनात्मक विलोमता कहते हैंयदि कम हो तो उसे ऋणात्मक विलोमता कहते हैं| ग्रीष्मकाल में महाद्वीपीय क्षेत्र पर धनात्मक विलोमता पायी जाती है जबकि महासागरीय क्षेत्र पर ऋणात्मक विलोमता पायी जाती हैजबकि शीतकाल में स्थिति इसके विपरीत होती है| तापीय विलोमता का सीधा प्रभाव समताप रेखाओं के विचलन पर पड़ता है| धनात्मक विलोमता की स्थिति में समताप रेखाएं ध्रुवों की ओर ऋणात्मक विलोमता की स्थिति में समताप रेखाएं विषुवत रेखा की ओर मुड़ जाती हैं| समताप रेखाओं का अध्ययन मौसम विभाग के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है जो मौसम पूर्वानुमान में सहायता करता है| तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक अक्षांश · अक्षांश किसी स्थान पर सौर किरण के आपतन कोण का निर्धारण करता है · लम्बवत किरण होगी तो अधिकतम तीव्रता होगी अतः तापमान अधिकतम होगा न्यूनतम कोण होगा तो न्यूनतम तीव्रता होगी · एक अक्षांश पर अवस्थित सभी स्थानों पर दैनिक स्तर पर सौर ताप की मात्रा तथा आपतन कोण सदैव बराबर होगा · यदि अक्षांश या सौरताप तापमान का एकमात्र निर्धारक हों तो समताप रेखाएं अक्षांश के समानांतर होंगी स्थल और जल का वितरण · स्थल और जलके तापमान में अंतर पाया जाता है जिसका मुख्य कारण विशिष्ट उष्मा होती है · किसी भी वस्तु के तापमान को 1 डिग्री C तक बढाने के लिए आवश्यक उष्मा की मात्रा को उस वस्तु की विशिष्ट उष्मा कहते हैं · तापीय प्रवणता जितनी तीव्र होगी उष्मा का स्थानान्तरण उतनी ही तीव्रता से होगा · समताप रेखा के विचलन का सबसे बड़ा कारण स्थल और जल का वितरण होता है · समताप रेखाएं गर्मी के दिनों में महाद्वीपीय क्षेत्र से गुजरते हुए ध्रुव की ओर जबकि महासागरीय क्षेत्र से गुजरते हुए विषुवत रेखा की ओर मुडती हैं शीत काल में स्थिति इसके विपरीत होती है| गर्मी के समय महाद्वीप का तापमान समुद्र की अपेक्षा अधिक होगा समुद्र तल से ऊँचाई · वायुमंडल की प्रथम परत अर्थात क्षोभमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आती है| · ऊपर जाने पर 1 डिग्री C प्रति 165 मीटर अथवा 6.5 डिग्री C प्रति किमी तापमान में कमी आती है इसे सामान्य पतन दर कहते हैं · वायुमंडलीय ऊर्जा का प्रमुख स्रोत पार्थिव विकिरण है|वायुमंडल को 65 % ऊर्जा पृथ्वी से प्राप्त होती है क्योंकि पार्थिव विकिरण में तरंग दैर्ध्य लम्बी होती है| जिसका अवशोषण आसान होता है|परिणाम स्वरुप स्रोत से दूर होते हुए तापमान में कमी आती है| · ऊँचाई बढ़ने से वायुमंडलीय सघनता घटती है अर्थात कणों की मात्रा में कमी के कारण अवशोषित ऊर्जा की मात्रा भी घटती जाती है जिससे तापमान घटता जाता है| · धरातल से ऊपर उठने पर वायुमंडल का आयतन बढ़ता जाता है परिणामस्वरुप प्रति इकाई क्षेत्रफल में ऊर्जा की मात्रा घटती है और तापमान में कमी आती जाती है| समुद्री धाराएं तथा प्रचलित पवनें · गर्म धाराएँ, जहाँ समुद्र तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती हैं, वहीं ठण्डी धाराएँ उसे कम कर देती हैं । जैसे उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट, जो यूरोप के पश्चिम-उत्तर भाग की जलवायु को स्पष्ट रूप से प्रभावित करती है| · समुद्र के तट पर स्थित स्थान गर्मी में इसलिए अपेक्षाकृत ठण्डा होते हैं, क्योंकि समुद्र पर से आने वाली ठण्डी हवाएँ स्थल की गर्मी को कम कर देती हैं । जबकि समुद्र तटीय स्थानों पर जाड़े का मौसम कम ठण्ड वाला होता है । भारत के मुम्बई और मद्रास का वार्षिक तापान्तर इसीलिए कम है । जबकि समुद्र तट से काफी दूर होने के कारण दिल्ली में यह तापान्तर बहुत ज्यादा है ढाल की प्रवृत्ति · पूर्व से पश्चिम अवस्थित पर्वतों की दोनों ढाल पर सामान ऊँचाई के बाद भी तापमान में अन्तर पाया जाता है · उत्तरी गोलार्ध में पर्वतों की दक्षिणी ढाल का तापमान उत्तरी ढाल की अपेक्षा अधिक होता है · जबकि दक्षिणी गोलार्ध में उत्तरी ढाल का तापमान दक्षिणी ढाल की अपेक्षा अधिक होता है अर्थात विषुवत रेखा की ओर वाली ढाल ध्रुव की ओर वाली ढाल से अधिक गरम होती है जैसे कुल्लू मनाली, लाहुल स्पिति गुलमर्ग आदि हिमालय की उत्तरी ढाल पर हैं| कम ऊँचाई के बाद भी इनका तापमान काफी कम होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विभिन्न कारक तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं| तापमान के वितरण में भिन्नता जैविक विविधता को प्रभावित करती है तथा किस प्रकार के जीव जंतु एवं वनस्पतियां होंगी इसका प्रमुख निर्धारक तापमान में भिन्नता ही होती है|
##Question:तापीय विलोमता को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Define thermal anomaly. Along with this, describe the various factors affecting the distribution of temperature. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में तापीय विलोमता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए 3- अंतिम में तापमान में अंतर होने के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| किसी अक्षांश पर अवस्थित स्थानों का तापमान यदि उस अक्षांश के औसत तापमान से अलग हो तो उसे तापीय विलोमता कहते हैं|तापमान को प्रभावित करने वाले अक्षांश को छोड़ कर बाकी सभी कारक तापीय विलोमता का कारण होते हैं| यदि किसी स्थान विशेष का तापमान अपने अक्षांश के औसत तापमान से अधिक हो तो इसे धनात्मक विलोमता कहते हैंयदि कम हो तो उसे ऋणात्मक विलोमता कहते हैं| ग्रीष्मकाल में महाद्वीपीय क्षेत्र पर धनात्मक विलोमता पायी जाती है जबकि महासागरीय क्षेत्र पर ऋणात्मक विलोमता पायी जाती हैजबकि शीतकाल में स्थिति इसके विपरीत होती है| तापीय विलोमता का सीधा प्रभाव समताप रेखाओं के विचलन पर पड़ता है| धनात्मक विलोमता की स्थिति में समताप रेखाएं ध्रुवों की ओर ऋणात्मक विलोमता की स्थिति में समताप रेखाएं विषुवत रेखा की ओर मुड़ जाती हैं| समताप रेखाओं का अध्ययन मौसम विभाग के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है जो मौसम पूर्वानुमान में सहायता करता है| तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक अक्षांश · अक्षांश किसी स्थान पर सौर किरण के आपतन कोण का निर्धारण करता है · लम्बवत किरण होगी तो अधिकतम तीव्रता होगी अतः तापमान अधिकतम होगा न्यूनतम कोण होगा तो न्यूनतम तीव्रता होगी · एक अक्षांश पर अवस्थित सभी स्थानों पर दैनिक स्तर पर सौर ताप की मात्रा तथा आपतन कोण सदैव बराबर होगा · यदि अक्षांश या सौरताप तापमान का एकमात्र निर्धारक हों तो समताप रेखाएं अक्षांश के समानांतर होंगी स्थल और जल का वितरण · स्थल और जलके तापमान में अंतर पाया जाता है जिसका मुख्य कारण विशिष्ट उष्मा होती है · किसी भी वस्तु के तापमान को 1 डिग्री C तक बढाने के लिए आवश्यक उष्मा की मात्रा को उस वस्तु की विशिष्ट उष्मा कहते हैं · तापीय प्रवणता जितनी तीव्र होगी उष्मा का स्थानान्तरण उतनी ही तीव्रता से होगा · समताप रेखा के विचलन का सबसे बड़ा कारण स्थल और जल का वितरण होता है · समताप रेखाएं गर्मी के दिनों में महाद्वीपीय क्षेत्र से गुजरते हुए ध्रुव की ओर जबकि महासागरीय क्षेत्र से गुजरते हुए विषुवत रेखा की ओर मुडती हैं शीत काल में स्थिति इसके विपरीत होती है| गर्मी के समय महाद्वीप का तापमान समुद्र की अपेक्षा अधिक होगा समुद्र तल से ऊँचाई · वायुमंडल की प्रथम परत अर्थात क्षोभमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आती है| · ऊपर जाने पर 1 डिग्री C प्रति 165 मीटर अथवा 6.5 डिग्री C प्रति किमी तापमान में कमी आती है इसे सामान्य पतन दर कहते हैं · वायुमंडलीय ऊर्जा का प्रमुख स्रोत पार्थिव विकिरण है|वायुमंडल को 65 % ऊर्जा पृथ्वी से प्राप्त होती है क्योंकि पार्थिव विकिरण में तरंग दैर्ध्य लम्बी होती है| जिसका अवशोषण आसान होता है|परिणाम स्वरुप स्रोत से दूर होते हुए तापमान में कमी आती है| · ऊँचाई बढ़ने से वायुमंडलीय सघनता घटती है अर्थात कणों की मात्रा में कमी के कारण अवशोषित ऊर्जा की मात्रा भी घटती जाती है जिससे तापमान घटता जाता है| · धरातल से ऊपर उठने पर वायुमंडल का आयतन बढ़ता जाता है परिणामस्वरुप प्रति इकाई क्षेत्रफल में ऊर्जा की मात्रा घटती है और तापमान में कमी आती जाती है| समुद्री धाराएं तथा प्रचलित पवनें · गर्म धाराएँ, जहाँ समुद्र तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती हैं, वहीं ठण्डी धाराएँ उसे कम कर देती हैं । जैसे उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट, जो यूरोप के पश्चिम-उत्तर भाग की जलवायु को स्पष्ट रूप से प्रभावित करती है| · समुद्र के तट पर स्थित स्थान गर्मी में इसलिए अपेक्षाकृत ठण्डा होते हैं, क्योंकि समुद्र पर से आने वाली ठण्डी हवाएँ स्थल की गर्मी को कम कर देती हैं । जबकि समुद्र तटीय स्थानों पर जाड़े का मौसम कम ठण्ड वाला होता है । भारत के मुम्बई और मद्रास का वार्षिक तापान्तर इसीलिए कम है । जबकि समुद्र तट से काफी दूर होने के कारण दिल्ली में यह तापान्तर बहुत ज्यादा है ढाल की प्रवृत्ति · पूर्व से पश्चिम अवस्थित पर्वतों की दोनों ढाल पर सामान ऊँचाई के बाद भी तापमान में अन्तर पाया जाता है · उत्तरी गोलार्ध में पर्वतों की दक्षिणी ढाल का तापमान उत्तरी ढाल की अपेक्षा अधिक होता है · जबकि दक्षिणी गोलार्ध में उत्तरी ढाल का तापमान दक्षिणी ढाल की अपेक्षा अधिक होता है अर्थात विषुवत रेखा की ओर वाली ढाल ध्रुव की ओर वाली ढाल से अधिक गरम होती है जैसे कुल्लू मनाली, लाहुल स्पिति गुलमर्ग आदि हिमालय की उत्तरी ढाल पर हैं| कम ऊँचाई के बाद भी इनका तापमान काफी कम होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विभिन्न कारक तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं| तापमान के वितरण में भिन्नता जैविक विविधता को प्रभावित करती है तथा किस प्रकार के जीव जंतु एवं वनस्पतियां होंगी इसका प्रमुख निर्धारक तापमान में भिन्नता ही होती है|
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संविधान व संविधानवाद क्या है ? इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के संविधानों की विशेषताओं की तुलना कीजिये। (200 शब्द ) What is constitution and Constitutionalism? Simultaneously, compare the characteristics of different types of constitution. (200 words)
एप्रोच :- संविधान को स्पष्ट करते हुए भूमिका दीजिये संविधानवाद को लिखिए। विभिन्न प्रकार के संविधानों की विशेषताओं की तुलना कीजिये उत्तर प्रारूप :- संविधान विशिष्ट क़ानूनी वैधता वाला एक विधिक दस्तावेज है। इसमें राज्य के मूलभूत संस्थानों की स्थापना का ढांचा निहित होता है। यह विभिन्न संस्थानों की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने वाले मूल सिद्धांतों को निर्दिष्ट करता है साथ ही उनकी संरचना , संघटन ,अधिकार क्षेत्र एवं उनके प्रमुख जनादेश को भी निर्धारित करता है। संविधान की सीमाओं , निर्बंधनों , नियंत्रण और नियमों के तहत राजनीतिक शक्ति का प्रयोग संविधानवाद कहा जाता है। संविधानवाद की अवधारणा में शक्ति के मनमाने एवं अधिनायकवादी निर्वहन के विरुद्ध " सीमित सरकार " और "विधि के शासन " के सिद्धांतों को सम्मिलित किया गया है। संवैधानिक विशेषताओं की तुलना :- लिखित संविधान: जैसे भारत, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों का संविधान। विशेषताएँ: इसका निर्माण संविधान सभा, प्रमुख उद्घोषणा आदि के माध्यम से होता है। प्रायः लिखित संविधान में अंतिम वैधानिक शक्ति न्यायपालिका में निहित होती है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख होता है। जैसे- भारत के संविधान में मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। राज्य तार्किक कारणों के आधार पर ही प्रतिबंध लगा सकती है। लिखित संविधान में सरकारी नीतियों की प्रासंगिकता अधिक होती है। इसका कारण है कि ये नीतियाँ संवैधानिक दायरे के अंतर्गत आती हैं तथा किसी भी प्रकार के उल्लंघन में न्यायपालिका इनकी पृथक रूप से जांच भी करती है। अलिखित संविधान: ब्रिटेन का संविधान विशेषताएँ: अलिखित संविधान एक स्पष्ट रूप से निर्मित ग्रंथ नहीं होता बल्कि विभिन्न समय काल में राष्ट्र द्वारा अपनाए गए नियमों, नीतियों, रीति-रिवाजों आदि का संग्रह होता है। इसमें अंतिम संवैधानिक सत्ता संसद/ विधायिका में निहित होती है। संसद की सर्वोच्चता इसकी एक प्रमुख विशेषता है। जनता को प्राप्त होने वाले अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता है। किसी भी कानून के संशोधन के लिए संसद के साधारण बहुमत की आवश्यकता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकार स्वयं भी बदलाव कर सकती है। सरकारी नीतियों की कम प्रासंगिकता होती है क्योंकि संविधान, न्यायपालिका द्वारा कोई स्पष्ट सीमा आरोपित नहीं किया जाता है। सरकार अपने हितों के अनुरूप नीतियाँ बना सकती है। इस प्रकार संविधान शक्तियों, कार्यों आदि उल्लेख करता है। यह लिखित तथा अलिखित दोनों रूपों में हो सकता है। लिखित संविधान में जहां न्यायपालिका की भूमिका, नागरिकों के अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं तो दूसरी ओर अलिखित संविधान में संसद को अधिक शक्ति प्राप्त होती है।
##Question:संविधान व संविधानवाद क्या है ? इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के संविधानों की विशेषताओं की तुलना कीजिये। (200 शब्द ) What is constitution and Constitutionalism? Simultaneously, compare the characteristics of different types of constitution. (200 words)##Answer:एप्रोच :- संविधान को स्पष्ट करते हुए भूमिका दीजिये संविधानवाद को लिखिए। विभिन्न प्रकार के संविधानों की विशेषताओं की तुलना कीजिये उत्तर प्रारूप :- संविधान विशिष्ट क़ानूनी वैधता वाला एक विधिक दस्तावेज है। इसमें राज्य के मूलभूत संस्थानों की स्थापना का ढांचा निहित होता है। यह विभिन्न संस्थानों की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने वाले मूल सिद्धांतों को निर्दिष्ट करता है साथ ही उनकी संरचना , संघटन ,अधिकार क्षेत्र एवं उनके प्रमुख जनादेश को भी निर्धारित करता है। संविधान की सीमाओं , निर्बंधनों , नियंत्रण और नियमों के तहत राजनीतिक शक्ति का प्रयोग संविधानवाद कहा जाता है। संविधानवाद की अवधारणा में शक्ति के मनमाने एवं अधिनायकवादी निर्वहन के विरुद्ध " सीमित सरकार " और "विधि के शासन " के सिद्धांतों को सम्मिलित किया गया है। संवैधानिक विशेषताओं की तुलना :- लिखित संविधान: जैसे भारत, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों का संविधान। विशेषताएँ: इसका निर्माण संविधान सभा, प्रमुख उद्घोषणा आदि के माध्यम से होता है। प्रायः लिखित संविधान में अंतिम वैधानिक शक्ति न्यायपालिका में निहित होती है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख होता है। जैसे- भारत के संविधान में मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। राज्य तार्किक कारणों के आधार पर ही प्रतिबंध लगा सकती है। लिखित संविधान में सरकारी नीतियों की प्रासंगिकता अधिक होती है। इसका कारण है कि ये नीतियाँ संवैधानिक दायरे के अंतर्गत आती हैं तथा किसी भी प्रकार के उल्लंघन में न्यायपालिका इनकी पृथक रूप से जांच भी करती है। अलिखित संविधान: ब्रिटेन का संविधान विशेषताएँ: अलिखित संविधान एक स्पष्ट रूप से निर्मित ग्रंथ नहीं होता बल्कि विभिन्न समय काल में राष्ट्र द्वारा अपनाए गए नियमों, नीतियों, रीति-रिवाजों आदि का संग्रह होता है। इसमें अंतिम संवैधानिक सत्ता संसद/ विधायिका में निहित होती है। संसद की सर्वोच्चता इसकी एक प्रमुख विशेषता है। जनता को प्राप्त होने वाले अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता है। किसी भी कानून के संशोधन के लिए संसद के साधारण बहुमत की आवश्यकता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकार स्वयं भी बदलाव कर सकती है। सरकारी नीतियों की कम प्रासंगिकता होती है क्योंकि संविधान, न्यायपालिका द्वारा कोई स्पष्ट सीमा आरोपित नहीं किया जाता है। सरकार अपने हितों के अनुरूप नीतियाँ बना सकती है। इस प्रकार संविधान शक्तियों, कार्यों आदि उल्लेख करता है। यह लिखित तथा अलिखित दोनों रूपों में हो सकता है। लिखित संविधान में जहां न्यायपालिका की भूमिका, नागरिकों के अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं तो दूसरी ओर अलिखित संविधान में संसद को अधिक शक्ति प्राप्त होती है।
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पृथ्वी की गतियों तथा अक्ष पर झुकाव को स्पष्ट करते हुए इनके परिणामों की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Clarify the movement and tilting of earth and explain its result. (150- 200 words; 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: सौरमंडल में पृथ्वी का संदर्भ देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। पृथ्वी की दोनों गतियों तथा अक्षीय झुकाव का विवरण दीजिए। पृथ्वी की गतियों व झुकाव के कारण प्रभाव की व्यख्या कीजिए। सौरमंडल में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा के साथ एक विशेष संबंध है। पृथ्वी एक विशिष्ट ग्रह है क्योंकि वहाँ जीवन विद्यमान है।पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है तथा अपनी धूरी पर भी घूर्णन करती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन और रात, मौसम परिवर्तन, ज्वार, ग्रहण आदि घटनाएँ घटित होती हैं। पृथ्वी की गतियाँ: पृथ्वी का परिभ्रमण:: पृथ्वी के अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमने को पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण कहते हैं। इसे दैनिक गति भी कहते हैं। एक समय पर पृथ्वी का केवल एक ही भाग सूर्य की किरणों के सम्मुख होता है और वहाँ दिन का अनुभव होता है। पृथ्वी का परिक्रमण: जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हुए एक सम्पूर्ण परिक्रमा में 1 वर्ष का समय लेती है। अक्ष पर झुकाव: पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी की गतियों तथा अक्षीय झुकाव के परिणाम इस प्रकार हैं- दिन और रात का छोटा व बड़ा होना: यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न हुई होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते। इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें और बड़ी और दिन छोटे होते। विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात बराबर होते हैं इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है। 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है। इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है। ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है जिसे परिक्रमण कहते हैं इसके कारण ऋतु परिवर्तनहोता है जिसमें निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं: 21 जून की स्थिति: इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ता है। इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात 23 सितंबर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है। 22 दिसम्बर : इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को शीत अयनांत कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लंबी तथा रात छोटी होती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है। 21 मार्च व 23 सितंबर की स्थिति : इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु के समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव कहते हैं। 21 मार्च को बसंत विषुव एवं 23 सितंबर की स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
##Question:पृथ्वी की गतियों तथा अक्ष पर झुकाव को स्पष्ट करते हुए इनके परिणामों की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Clarify the movement and tilting of earth and explain its result. (150- 200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: सौरमंडल में पृथ्वी का संदर्भ देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। पृथ्वी की दोनों गतियों तथा अक्षीय झुकाव का विवरण दीजिए। पृथ्वी की गतियों व झुकाव के कारण प्रभाव की व्यख्या कीजिए। सौरमंडल में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा के साथ एक विशेष संबंध है। पृथ्वी एक विशिष्ट ग्रह है क्योंकि वहाँ जीवन विद्यमान है।पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है तथा अपनी धूरी पर भी घूर्णन करती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन और रात, मौसम परिवर्तन, ज्वार, ग्रहण आदि घटनाएँ घटित होती हैं। पृथ्वी की गतियाँ: पृथ्वी का परिभ्रमण:: पृथ्वी के अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमने को पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण कहते हैं। इसे दैनिक गति भी कहते हैं। एक समय पर पृथ्वी का केवल एक ही भाग सूर्य की किरणों के सम्मुख होता है और वहाँ दिन का अनुभव होता है। पृथ्वी का परिक्रमण: जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हुए एक सम्पूर्ण परिक्रमा में 1 वर्ष का समय लेती है। अक्ष पर झुकाव: पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी की गतियों तथा अक्षीय झुकाव के परिणाम इस प्रकार हैं- दिन और रात का छोटा व बड़ा होना: यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न हुई होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते। इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें और बड़ी और दिन छोटे होते। विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात बराबर होते हैं इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है। 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है। इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है। ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है जिसे परिक्रमण कहते हैं इसके कारण ऋतु परिवर्तनहोता है जिसमें निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं: 21 जून की स्थिति: इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ता है। इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात 23 सितंबर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है। 22 दिसम्बर : इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को शीत अयनांत कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लंबी तथा रात छोटी होती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है। 21 मार्च व 23 सितंबर की स्थिति : इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु के समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव कहते हैं। 21 मार्च को बसंत विषुव एवं 23 सितंबर की स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
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Why was the industrial revolution firsthappened in theBritain? This revolution hada great impact on Britain"s socio-economic life. Elucidate.(200 words) ब्रिटेन में ही सर्वप्रथम औधोगिक क्रांति क्यों हुई? इस क्रांति का ब्रिटेन के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर व्यापक प्रभाव दिखाई दिया। स्पष्ट कीजिए। (200 शब्द)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में औद्योगिक क्रांति का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंऔद्योगिक क्रांति के कारणों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद इस क्रांति द्वाराब्रिटेन के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर पड़ेप्रभावों एवं परिणामोंका उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- औद्योगिक क्रांति केअंतर्गत कारखानों में उत्पादन, ऊर्जा के द्वारा कारखानों का संचालन, बड़ी संख्या में श्रमिकों की भूमिका जैसी विशेषताएं दिखाई पड़ती है। ब्रिटेन में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रांति हुई जिसके निम्नलिखित कारण हैं:- कृषि:- 18वीं सदी में ब्रिटेन यूरोपीय राष्ट्रों में कृषि के क्षेत्र में परिवर्तित होने वाला अग्रणी राष्ट्र था। ब्रिटेन में बाराबंदी आंदोलन, शस्यावर्तन, बड़े बड़े फार्मो काविकास, यंत्रों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाया। इससे गैर कृषि कार्यों में सलंग्न लोगों को खाद्यान उपलब्ध हो पाया तथा उद्योगों के लिए मज़दूरों की आपूर्ति हो पायी। जनसँख्या वृद्धि:- खाद्यान की उपलब्धता तथा चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार के कारण आबादी में तीव्र वृद्धि हुई। अठारवी सदी के उत्तरार्ध में पश्चमी यूरोप के 20 शहरों की आबादी दोगुनी हुई, जिनमें 11 शहर ब्रिटेन के थे। इससे मांग में वृद्धि हुई तथा श्रमिकों की आपूर्ति भी सुनिश्चित हुई। व्यापार:- व्यापारिक क्रांति ने भी ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति को प्रभावित किया। 18 वीं सदी तक इसका सर्वाधिक लाभ ब्रिटेन को हुआ। बड़ी मात्रा में पूंजी उपलब्ध हो पायी तथा उपनिवेशों के रूप में बाज़ार व कच्चे माल का स्रोत भी। परिवहन:- परिवहन के क्षेत्र में क्रांतिकारी उत्प्रेरकों का कार्य किया। सभी प्रमुख नहरों को शहरों से जोड़ा गया। नहरों की सीमाओं को धयान में रखते हुए वैकल्पिक परिवहन प्रणाली पर अनुसन्धान किये गए हैं। पक्की सड़कों की शुरुआत हुई। 1820 के दशक में रेलवे का व्यवसायिक संचालन प्रारम्भ हुआ। लिवरपूल व मेनचेस्टर के बीच रेल। 1850 में हज़ारों मील रेलवे लाइन बिछाई गयी। इन परिवर्तनों ने आधारभूत उद्योगों को गति प्रदान की। राष्ट्रीय बाजार का निर्माण हुआ तथा आयात निर्यात को भी गति मिली। अन्य कारक:- ब्रिटेन में यूरोपीय राष्ट्रों के तुलना में अपेक्षाकृत एक विकसित बैंक का ढांचा था। 1800 ईस्वी तक लगभग 300 क्षेत्रीय बैंक ब्रिटेन में सक्रिय थे। उच्च गुणवत्ता युक्त लौहे एवं कोयले की उपलब्धता ने भी औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को सुलभ बनाया। सामाजिक कारण:- यूरोपीय समाज के परिपेक्ष्य में ब्रिटिश समाज कई मामलों में अधिक प्रगतिशील व दूरदर्शी था जैसे 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में औद्योगिक क्षेत्र के अनुसंधान में सर्वाधिक निवेश ब्रिटेन में किये गए। यहाँ तक कि जमीदारों ने भी मुनाफे के लिए निवेश किया। ब्रिटेन का लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में संक्रमण भी अपेक्षकृत शांतिपूर्ण रहा। राजनीतिक कारण:- ब्रिटिश राजनीती ने भी औद्योगीकरण की प्रक्रिया में सहयोगी भूमिका निभाई।1688 के पश्चात ब्रिटेन राजनीतिक रूप से अधिक स्थिर राष्ट्र था। राजनीतिक स्थिरता के वातावरण में निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। एक राष्ट्र राज्य के रूप में ब्रिटेन के उदय से औद्योगीकरण को बल मिला जैसे एक प्रकार की मुद्रा, एक भाषा, एक कानून इत्यादि। ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने भी औद्योगीकरण को आगे बढ़ाया जैसे उपनिवेशों की स्थापना, उपनिवेशों के लिए निरंतर युद्ध। उद्योगों को ध्यान में रखकर आर्थिक नीति। तकनीकी कारण: -तकनीकी विकास एक प्रकार से औद्योगिकीकरण का पर्याय है। 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में विभिन्न तकनीकों का विकास तथा अलग अलग क्षेत्रों में औद्योगीकरण को यथार्त में परिवर्तित किया जैसे जेम्स वाट ने इंजन का आविष्कार किया। डर्बी परिवार ने लौह इस्पात के क्षेत्र में योगदान दिया, इसी प्रकार कपड़ों के क्षेत्र में स्पिनिंग जेनी, पावरलूम इत्यादि मशीनों ने क्रांतिकारी परिवर्तन किया। ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति केब्रिटेन के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर निम्नलिखितव्यापक प्रभाव/परिणामदिखाई दिए :- सामाजिक क्षेत्र:- ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति में ब्रिटिश समाज को गहरे तौर पर प्रभावित किया। समाज में दो नए वर्गों का उदय हुआ। उधोगपति एवं श्रमिक वर्ग। उद्योगपतियों की आर्थिक स्थिति बेहतर थी और इसका प्रभाव इनके जीवन स्तर पर भी देखा जा सकता है जैसे बेहतर आवास, खानपान, शिक्षा, मनोरंजन इत्यादि के अवसर आसानी से उपलब्ध हुए। उद्योगपतियों के विपरीत श्रमिकों की दशा बहुत ही दयनीय थी जैसी रोजगार की असुरक्षा, कम वेतन, महिलाओं एवं बच्चों का विशेषतौर पर शोषण, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, विपरीत आवासीय सुविधाएँ इत्यादि। औद्योगीकरण ने ब्रिटिश पारिवारिक व्यवस्था को भी प्रभावित किया। सयुंक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार को महत्व मिलने लगा। संबंधों के निर्धारण एवं भावनाओं के स्थान पर व्यवसायिक हितों को महत्व दिया जाने लगा। रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रो की तरफ बड़ी संख्या में पलायन हुआ। इससे ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही सामाजिक सरंचनाएं प्रभावित हुई। रोजगार सम्बन्धी असुरक्षा व अन्य कारणों से भी शहरों में अपराध, मद्यपान जैसी प्रवृतियों में वृद्धि हुई । आर्थिक क्षेत्र:- उत्पादक पद्धति में व्यापक बदलाव आया, मशीनों का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ, कृषि का भी मशीनीकरण हुआ। परिवहन के लिए उन्नत साधन। शहरों में रोजगार के अवसर लेकिन कुटीर उद्योगों के पतन से बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ी। इस प्रकार ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति से सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में व्यापक प्रभाव दिखाई देते हैं।
##Question:Why was the industrial revolution firsthappened in theBritain? This revolution hada great impact on Britain"s socio-economic life. Elucidate.(200 words) ब्रिटेन में ही सर्वप्रथम औधोगिक क्रांति क्यों हुई? इस क्रांति का ब्रिटेन के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर व्यापक प्रभाव दिखाई दिया। स्पष्ट कीजिए। (200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में औद्योगिक क्रांति का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंऔद्योगिक क्रांति के कारणों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद इस क्रांति द्वाराब्रिटेन के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर पड़ेप्रभावों एवं परिणामोंका उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- औद्योगिक क्रांति केअंतर्गत कारखानों में उत्पादन, ऊर्जा के द्वारा कारखानों का संचालन, बड़ी संख्या में श्रमिकों की भूमिका जैसी विशेषताएं दिखाई पड़ती है। ब्रिटेन में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रांति हुई जिसके निम्नलिखित कारण हैं:- कृषि:- 18वीं सदी में ब्रिटेन यूरोपीय राष्ट्रों में कृषि के क्षेत्र में परिवर्तित होने वाला अग्रणी राष्ट्र था। ब्रिटेन में बाराबंदी आंदोलन, शस्यावर्तन, बड़े बड़े फार्मो काविकास, यंत्रों ने कृषि उत्पादन को बढ़ाया। इससे गैर कृषि कार्यों में सलंग्न लोगों को खाद्यान उपलब्ध हो पाया तथा उद्योगों के लिए मज़दूरों की आपूर्ति हो पायी। जनसँख्या वृद्धि:- खाद्यान की उपलब्धता तथा चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार के कारण आबादी में तीव्र वृद्धि हुई। अठारवी सदी के उत्तरार्ध में पश्चमी यूरोप के 20 शहरों की आबादी दोगुनी हुई, जिनमें 11 शहर ब्रिटेन के थे। इससे मांग में वृद्धि हुई तथा श्रमिकों की आपूर्ति भी सुनिश्चित हुई। व्यापार:- व्यापारिक क्रांति ने भी ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति को प्रभावित किया। 18 वीं सदी तक इसका सर्वाधिक लाभ ब्रिटेन को हुआ। बड़ी मात्रा में पूंजी उपलब्ध हो पायी तथा उपनिवेशों के रूप में बाज़ार व कच्चे माल का स्रोत भी। परिवहन:- परिवहन के क्षेत्र में क्रांतिकारी उत्प्रेरकों का कार्य किया। सभी प्रमुख नहरों को शहरों से जोड़ा गया। नहरों की सीमाओं को धयान में रखते हुए वैकल्पिक परिवहन प्रणाली पर अनुसन्धान किये गए हैं। पक्की सड़कों की शुरुआत हुई। 1820 के दशक में रेलवे का व्यवसायिक संचालन प्रारम्भ हुआ। लिवरपूल व मेनचेस्टर के बीच रेल। 1850 में हज़ारों मील रेलवे लाइन बिछाई गयी। इन परिवर्तनों ने आधारभूत उद्योगों को गति प्रदान की। राष्ट्रीय बाजार का निर्माण हुआ तथा आयात निर्यात को भी गति मिली। अन्य कारक:- ब्रिटेन में यूरोपीय राष्ट्रों के तुलना में अपेक्षाकृत एक विकसित बैंक का ढांचा था। 1800 ईस्वी तक लगभग 300 क्षेत्रीय बैंक ब्रिटेन में सक्रिय थे। उच्च गुणवत्ता युक्त लौहे एवं कोयले की उपलब्धता ने भी औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को सुलभ बनाया। सामाजिक कारण:- यूरोपीय समाज के परिपेक्ष्य में ब्रिटिश समाज कई मामलों में अधिक प्रगतिशील व दूरदर्शी था जैसे 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में औद्योगिक क्षेत्र के अनुसंधान में सर्वाधिक निवेश ब्रिटेन में किये गए। यहाँ तक कि जमीदारों ने भी मुनाफे के लिए निवेश किया। ब्रिटेन का लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में संक्रमण भी अपेक्षकृत शांतिपूर्ण रहा। राजनीतिक कारण:- ब्रिटिश राजनीती ने भी औद्योगीकरण की प्रक्रिया में सहयोगी भूमिका निभाई।1688 के पश्चात ब्रिटेन राजनीतिक रूप से अधिक स्थिर राष्ट्र था। राजनीतिक स्थिरता के वातावरण में निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। एक राष्ट्र राज्य के रूप में ब्रिटेन के उदय से औद्योगीकरण को बल मिला जैसे एक प्रकार की मुद्रा, एक भाषा, एक कानून इत्यादि। ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने भी औद्योगीकरण को आगे बढ़ाया जैसे उपनिवेशों की स्थापना, उपनिवेशों के लिए निरंतर युद्ध। उद्योगों को ध्यान में रखकर आर्थिक नीति। तकनीकी कारण: -तकनीकी विकास एक प्रकार से औद्योगिकीकरण का पर्याय है। 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में विभिन्न तकनीकों का विकास तथा अलग अलग क्षेत्रों में औद्योगीकरण को यथार्त में परिवर्तित किया जैसे जेम्स वाट ने इंजन का आविष्कार किया। डर्बी परिवार ने लौह इस्पात के क्षेत्र में योगदान दिया, इसी प्रकार कपड़ों के क्षेत्र में स्पिनिंग जेनी, पावरलूम इत्यादि मशीनों ने क्रांतिकारी परिवर्तन किया। ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति केब्रिटेन के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर निम्नलिखितव्यापक प्रभाव/परिणामदिखाई दिए :- सामाजिक क्षेत्र:- ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति में ब्रिटिश समाज को गहरे तौर पर प्रभावित किया। समाज में दो नए वर्गों का उदय हुआ। उधोगपति एवं श्रमिक वर्ग। उद्योगपतियों की आर्थिक स्थिति बेहतर थी और इसका प्रभाव इनके जीवन स्तर पर भी देखा जा सकता है जैसे बेहतर आवास, खानपान, शिक्षा, मनोरंजन इत्यादि के अवसर आसानी से उपलब्ध हुए। उद्योगपतियों के विपरीत श्रमिकों की दशा बहुत ही दयनीय थी जैसी रोजगार की असुरक्षा, कम वेतन, महिलाओं एवं बच्चों का विशेषतौर पर शोषण, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, विपरीत आवासीय सुविधाएँ इत्यादि। औद्योगीकरण ने ब्रिटिश पारिवारिक व्यवस्था को भी प्रभावित किया। सयुंक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार को महत्व मिलने लगा। संबंधों के निर्धारण एवं भावनाओं के स्थान पर व्यवसायिक हितों को महत्व दिया जाने लगा। रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रो की तरफ बड़ी संख्या में पलायन हुआ। इससे ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही सामाजिक सरंचनाएं प्रभावित हुई। रोजगार सम्बन्धी असुरक्षा व अन्य कारणों से भी शहरों में अपराध, मद्यपान जैसी प्रवृतियों में वृद्धि हुई । आर्थिक क्षेत्र:- उत्पादक पद्धति में व्यापक बदलाव आया, मशीनों का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ, कृषि का भी मशीनीकरण हुआ। परिवहन के लिए उन्नत साधन। शहरों में रोजगार के अवसर लेकिन कुटीर उद्योगों के पतन से बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ी। इस प्रकार ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति से सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में व्यापक प्रभाव दिखाई देते हैं।
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Explain the formation of Erosional landforms of Glaciers with the help of suitable diagrams. (10 marks/150 words)
Approach: Write Definition of Glacier in the introduction Body- Enlist different types of erosional landforms of glaciers Draw suitable diagrams wherever required Answer: Introduction: Masses of ice moving as sheets over the land (continental glacier or piedmont glacier if a vast sheet of ice is spread over the plains at the foot of mountains) or as linear flows down the slopes of mountains in broad trough-like valleys (mountain and valley glaciers) are called glaciers. Glaciation generally gives rise to erosional features in the highlands and depositional features on the low lands. Process of erosion: The two dominant process of erosion are- Plucking - The glaciers freeze the joints and bed off the underlying rocks, tears out large resistant rocks. It is considered to be a far more important factor of erosion than abrasion. Plucking gives a shattered and broken appearance to a landscape. Abrasion - It involves erosion at the ice-rock interface with the removal of only small parts of the parent rock. Erosional Landforms: The imp landforms of the glacier are: Cirque - Cirque is a semi-circular steep-sided basin cut into the side of the mountain, such a feature is called a corrie in Scotland and Cirque in France and elsewhere.it may also be defined as the accumulation of the snow in a depression on a mountainside or in a valley gradually tends to form a glacier. Arete: A steep-sided knife-edged ridge separating two cirques are called arêtes. Otherwise called as serrated ridges Horns/Pyramidal Peaks - Horns form through headward erosion of the cirque walks. When two or more radiating glaciers cut headward living behind steep, high and sharp pointed peaks are called pyramidal peaks. Mount Everest of Himalayas and matter horn of Alps are examples of Horns. When such narrow, tall peaks get collapsed and create a pass in the mountain ranges such passages are called cols Glacial valleys/Troughs : These are U shaped valleys with broad floor formed by joining several cirques just like tributaries to the main river, to wear away the sites and floor of the valley. Bergschrund - The deep crevasses formed on the glaciers are called Bergschrund. Tarn Lakes - a lake of water can be seen quite often within the Cirque after the glacier disappears. Such lakes are called as tarn lakes Note: Draw the appropriate diagram to depict these landforms.
##Question:Explain the formation of Erosional landforms of Glaciers with the help of suitable diagrams. (10 marks/150 words)##Answer:Approach: Write Definition of Glacier in the introduction Body- Enlist different types of erosional landforms of glaciers Draw suitable diagrams wherever required Answer: Introduction: Masses of ice moving as sheets over the land (continental glacier or piedmont glacier if a vast sheet of ice is spread over the plains at the foot of mountains) or as linear flows down the slopes of mountains in broad trough-like valleys (mountain and valley glaciers) are called glaciers. Glaciation generally gives rise to erosional features in the highlands and depositional features on the low lands. Process of erosion: The two dominant process of erosion are- Plucking - The glaciers freeze the joints and bed off the underlying rocks, tears out large resistant rocks. It is considered to be a far more important factor of erosion than abrasion. Plucking gives a shattered and broken appearance to a landscape. Abrasion - It involves erosion at the ice-rock interface with the removal of only small parts of the parent rock. Erosional Landforms: The imp landforms of the glacier are: Cirque - Cirque is a semi-circular steep-sided basin cut into the side of the mountain, such a feature is called a corrie in Scotland and Cirque in France and elsewhere.it may also be defined as the accumulation of the snow in a depression on a mountainside or in a valley gradually tends to form a glacier. Arete: A steep-sided knife-edged ridge separating two cirques are called arêtes. Otherwise called as serrated ridges Horns/Pyramidal Peaks - Horns form through headward erosion of the cirque walks. When two or more radiating glaciers cut headward living behind steep, high and sharp pointed peaks are called pyramidal peaks. Mount Everest of Himalayas and matter horn of Alps are examples of Horns. When such narrow, tall peaks get collapsed and create a pass in the mountain ranges such passages are called cols Glacial valleys/Troughs : These are U shaped valleys with broad floor formed by joining several cirques just like tributaries to the main river, to wear away the sites and floor of the valley. Bergschrund - The deep crevasses formed on the glaciers are called Bergschrund. Tarn Lakes - a lake of water can be seen quite often within the Cirque after the glacier disappears. Such lakes are called as tarn lakes Note: Draw the appropriate diagram to depict these landforms.
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तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिये| इसके साथ हीतापीय व्युत्क्रम के प्रभावों को स्पष्ट कीजिये(200 शब्द) Analyze the factors that generate the situation of Thermal Inversion. Along with this, clarify the effect of thermal inversion (200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में तापीय व्युत्क्रम(Temperature inversion) को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिये 3- दूसरे भाग में तापीय व्युत्क्रम के परिणामों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सामान्य तौर तापमान ऊँचाई के साथ साथ कम होता जाता है इसे सामान्य पतन दर कहते हैं, जबकि वायुमंडल में वह विशेष स्थिति जिसमें ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है उसे तापीय व्युत्क्रम कहते हैं| यदि पार्थिव विकिरण(धरातलीय ऊर्जा का ह्रास) की दर सामान्य से काफी अधिक हो अथवा पार्थिव विकिरणकी अवधि लम्बी हो तो यह तापीय व्युत्क्रम की अनुकूल स्थिति उत्पन्न करता है| ध्यातव्य है कि तापीय प्रवणता तापमान में अंतर पर आधारित होती है और पार्थिव विकिरण तापीय प्रवणता पर निर्भर करता है| तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाले कारक धरातलीय प्रकृति जो क्षेत्र जितनी तेजी से गर्म होगा वहां पर उर्ध्वाधर तापीय प्रवणता उतनी ही तीव्र होगी परिणामस्वरूप पार्थिव विकिरण की दर अधिक होने के कारण तापीय व्युत्क्रम की अनुकूल स्थिति उत्पन्न होती है जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र, नगरीय क्षेत्र इत्यादि वायुमंडलीय पारगम्यता यदि रात्रि में आकाश में बादल छाये हों तो प्रति-विकिरण की दर बढ़ जाती है जिससे धरातलीय तापमान में वृद्धि होती है अर्थात खुले आसमान(स्वच्छ आकाश) तापीय व्युत्क्रम के लिए अधिक अनुकूल होते हैं| सर्दी की ठंडी एवं लम्बी रातें ऋतुवत तापीय प्रवणता में कोई विशेष अंतर नहीं होता परिणामस्वरुप सर्दी की रातें लम्बी होने के कारण विकिरित ऊर्जा की मात्रा को बढ़ा देती हैं इससे धरातल अधिक ठंडा हो जाता है और वायुमंडल को ऊर्जा की अधिक आपूर्ति होती है इससे तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है एल्बिडो की दर यदि किसी क्षेत्र में एल्बिडो अधिक हो तो तापीय व्युत्क्रम की संभावना बढ़ जाती है यही कारण है कि ध्रुवीय क्षेत्र में स्थायी व्युत्क्रम की स्थिति बनी रहती है इसी तरह महाद्वीपीय क्षेत्र, महासागरों की अपेक्षा अधिक सुभेद्य होता है प्रचलित पवन तथा शांत क्षेत्र पवने ऊर्जा का स्थानान्तरण क्षैतिज दिशा में करती हैं अतःशांत क्षेत्र व्युत्क्रम के लिए अधिक अनुकूल होता है क्योंकि शांत क्षेत्र में ऊर्जा का उर्ध्वाधर स्थानान्तरण संभव हो पाता है अतः शांत क्षेत्र में तापीय व्युत्क्रम की संभावना बढ़ जाती है दो अलग अलग भौतिक गुणों वाली वायुराशियों का अभिसरण क्षेत्र जब ठंडी और गर्म वायु राशि किसी क्षेत्र विशेष में अभिसरण करती है तो वे आपास में बहुत आसानी से नहीं मिल पाती हैं अर्थात यहाँ वाताग्र का निर्माण हो जाता है|इस क्षेत्र गर्म वायुराशि हलकी होने के कारण ठंडी वायु राशि के ऊपर संचलित होने लगती है इसके परिणामस्वरूप तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न होती है| तापीय व्युत्क्रम के परिणाम तापीय व्युत्क्रम सेधरातलीय तापमान में कमी हो जायेगी जिसके निम्नलिखित परिणाम होंगे - धुंध, कोहरे इत्यादि का निर्माण यातायात, दूरसंचार में बाधा दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जायेगी अर्थव्यवस्था की गति में कमी श्रम की उत्पादकता में कमी आदि वायुमंडलीय स्थिरता सामान्य स्थिति में धरातल के पास की वायु गर्म होती है जबकि वायुमंडलीय वायु गर्म होती है(ठंडी वायु भारी होती है जबकि गर्म वायु हल्की होती है) हलकी वायु पर भारी वायु होने से अस्थिरता उत्पन्न होती है, इसके उलटी स्थिति में वायुमंडलीय स्थिरता उत्पन्न होगी जिसके निम्नलिखित परिणाम होंगे वायु संचलन रुक जाएगा, इससे प्रदूषण बढ़ जाएगा इस स्थिति में श्वास सम्बन्धी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जायेंगी इससे श्रम उत्पादकता में कमी आएगी इससे स्वास्थ्य सम्बन्धी गैर-उत्पादक व्यय बढ़ जायेंगे, इस के कारण निवेश में कमी आएगी और उत्पादन में कमी आती है वायु संचलन बंद हो जाने से बादल का निर्माण रुक जाएगा जिसके कारण वर्षा नहीं होगी इसका अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडेगा| जैसे वर्षा न होने से प्रदुषण भी बढ़ता जायेगा शीतोष्णकटिबंधीय कृषि को लाभइसका एक सकारात्मक प्रभाव होता है क्योंकि तापीय व्युत्क्रम से कम ऊँचाई पर भी फसल के लिए अनुकूल कृषि जलवायविक स्थिति उत्पन्न होती है और तापीय व्युत्क्रम की स्थिति में कम ऊँचाई पर पाला पड़ सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि तापीय व्युत्क्रम के व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव होते हैं|
##Question:तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिये| इसके साथ हीतापीय व्युत्क्रम के प्रभावों को स्पष्ट कीजिये(200 शब्द) Analyze the factors that generate the situation of Thermal Inversion. Along with this, clarify the effect of thermal inversion (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में तापीय व्युत्क्रम(Temperature inversion) को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिये 3- दूसरे भाग में तापीय व्युत्क्रम के परिणामों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सामान्य तौर तापमान ऊँचाई के साथ साथ कम होता जाता है इसे सामान्य पतन दर कहते हैं, जबकि वायुमंडल में वह विशेष स्थिति जिसमें ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है उसे तापीय व्युत्क्रम कहते हैं| यदि पार्थिव विकिरण(धरातलीय ऊर्जा का ह्रास) की दर सामान्य से काफी अधिक हो अथवा पार्थिव विकिरणकी अवधि लम्बी हो तो यह तापीय व्युत्क्रम की अनुकूल स्थिति उत्पन्न करता है| ध्यातव्य है कि तापीय प्रवणता तापमान में अंतर पर आधारित होती है और पार्थिव विकिरण तापीय प्रवणता पर निर्भर करता है| तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाले कारक धरातलीय प्रकृति जो क्षेत्र जितनी तेजी से गर्म होगा वहां पर उर्ध्वाधर तापीय प्रवणता उतनी ही तीव्र होगी परिणामस्वरूप पार्थिव विकिरण की दर अधिक होने के कारण तापीय व्युत्क्रम की अनुकूल स्थिति उत्पन्न होती है जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र, नगरीय क्षेत्र इत्यादि वायुमंडलीय पारगम्यता यदि रात्रि में आकाश में बादल छाये हों तो प्रति-विकिरण की दर बढ़ जाती है जिससे धरातलीय तापमान में वृद्धि होती है अर्थात खुले आसमान(स्वच्छ आकाश) तापीय व्युत्क्रम के लिए अधिक अनुकूल होते हैं| सर्दी की ठंडी एवं लम्बी रातें ऋतुवत तापीय प्रवणता में कोई विशेष अंतर नहीं होता परिणामस्वरुप सर्दी की रातें लम्बी होने के कारण विकिरित ऊर्जा की मात्रा को बढ़ा देती हैं इससे धरातल अधिक ठंडा हो जाता है और वायुमंडल को ऊर्जा की अधिक आपूर्ति होती है इससे तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है एल्बिडो की दर यदि किसी क्षेत्र में एल्बिडो अधिक हो तो तापीय व्युत्क्रम की संभावना बढ़ जाती है यही कारण है कि ध्रुवीय क्षेत्र में स्थायी व्युत्क्रम की स्थिति बनी रहती है इसी तरह महाद्वीपीय क्षेत्र, महासागरों की अपेक्षा अधिक सुभेद्य होता है प्रचलित पवन तथा शांत क्षेत्र पवने ऊर्जा का स्थानान्तरण क्षैतिज दिशा में करती हैं अतःशांत क्षेत्र व्युत्क्रम के लिए अधिक अनुकूल होता है क्योंकि शांत क्षेत्र में ऊर्जा का उर्ध्वाधर स्थानान्तरण संभव हो पाता है अतः शांत क्षेत्र में तापीय व्युत्क्रम की संभावना बढ़ जाती है दो अलग अलग भौतिक गुणों वाली वायुराशियों का अभिसरण क्षेत्र जब ठंडी और गर्म वायु राशि किसी क्षेत्र विशेष में अभिसरण करती है तो वे आपास में बहुत आसानी से नहीं मिल पाती हैं अर्थात यहाँ वाताग्र का निर्माण हो जाता है|इस क्षेत्र गर्म वायुराशि हलकी होने के कारण ठंडी वायु राशि के ऊपर संचलित होने लगती है इसके परिणामस्वरूप तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न होती है| तापीय व्युत्क्रम के परिणाम तापीय व्युत्क्रम सेधरातलीय तापमान में कमी हो जायेगी जिसके निम्नलिखित परिणाम होंगे - धुंध, कोहरे इत्यादि का निर्माण यातायात, दूरसंचार में बाधा दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जायेगी अर्थव्यवस्था की गति में कमी श्रम की उत्पादकता में कमी आदि वायुमंडलीय स्थिरता सामान्य स्थिति में धरातल के पास की वायु गर्म होती है जबकि वायुमंडलीय वायु गर्म होती है(ठंडी वायु भारी होती है जबकि गर्म वायु हल्की होती है) हलकी वायु पर भारी वायु होने से अस्थिरता उत्पन्न होती है, इसके उलटी स्थिति में वायुमंडलीय स्थिरता उत्पन्न होगी जिसके निम्नलिखित परिणाम होंगे वायु संचलन रुक जाएगा, इससे प्रदूषण बढ़ जाएगा इस स्थिति में श्वास सम्बन्धी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जायेंगी इससे श्रम उत्पादकता में कमी आएगी इससे स्वास्थ्य सम्बन्धी गैर-उत्पादक व्यय बढ़ जायेंगे, इस के कारण निवेश में कमी आएगी और उत्पादन में कमी आती है वायु संचलन बंद हो जाने से बादल का निर्माण रुक जाएगा जिसके कारण वर्षा नहीं होगी इसका अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडेगा| जैसे वर्षा न होने से प्रदुषण भी बढ़ता जायेगा शीतोष्णकटिबंधीय कृषि को लाभइसका एक सकारात्मक प्रभाव होता है क्योंकि तापीय व्युत्क्रम से कम ऊँचाई पर भी फसल के लिए अनुकूल कृषि जलवायविक स्थिति उत्पन्न होती है और तापीय व्युत्क्रम की स्थिति में कम ऊँचाई पर पाला पड़ सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि तापीय व्युत्क्रम के व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव होते हैं|
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"एक ओर जहाँ औद्योगिक क्रांति के द्वारा ब्रिटेन में आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन लाया गया वहीँ इससे ब्रिटेन के सामाजिक संरचना पर प्रतिकूलतः प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए|" कथन की समीक्षा कीजिये| (200 शब्द) "Where, there has been a widespread changes in the economic, political, ideological areas in the Britain through the Industrial Revolution, It has also adversely affected the British social structure." Examine the statement. (200 words)
एप्रोच- ब्रिटेन में हुयी औद्योगिक क्रांति के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, औद्योगिक क्रांति के द्वारा ब्रिटेन के आर्थिक, राजनीतिक तथा वैचारिक क्षेत्र में आये परिवर्तनों को रेखांकित कीजिये| अगले भाग में, औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप ब्रिटेन के सामाजिक क्षेत्र पर पड़े प्रभावों को बताईये| निष्कर्षतः क्रांति के समग्र प्रभावों को दर्शाते हुए एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये| उत्तर- 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्पादन प्रणाली में हुए आधारभूत परिवर्तनों को औद्योगिक क्रांति की संज्ञा दी जाती है| इसके फलस्वरूप श्रम के क्षेत्र में मानव श्रम का स्थान मशीनों ने ले लिया तथा उत्पादों की मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि हुई| इससे औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का भी विस्तार हुआ तथा श्रमिक एवं मिल मालिक जैसे नए वर्गों का उदय हुआ| औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में संपन्न हुई तथा उसका विस्तार अन्य देशों में उसके बाद हुआ |इंग्लैंड की भौगोलिक स्थिति, प्रचूर प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, जनसंख्या में बढ़ोतरी, सुदृढ़ नौसेना तथा वैज्ञानिक एवं प्रगति विकास के फलस्वरूप इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ जिसके बृहद परिणाम सामने आए- आर्थिक परिणाम औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन पद्धति में क्रांतिकारी परिवर्तन; एक तरफ रोजगार के अवसर उपलब्ध हुयें तो दूसरी तरफ कुछ कुटीर उद्योगों को नुकसान हुआ और बेरोजगारों की भी संख्या बढ़ी ; कृषि क्षेत्र में भी क्रमशः मशीनीकरण बढ़ता गया ; आर्थिक आवश्यकताओं के कारण परिवहन के द्रुतगामी साधनों का विकास; शहरों का आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में उभरना तथा तेजी से शहरीकरण ; बैंकिंग एवं मुद्रा प्रणाली का विकास; मुक्त व्यापार की नीति ; ब्रिटिश अर्थव्यवस्था अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के साथ गहराई से जुड़ती गयी और एक दूसरे पर निर्भर भी होती गयी; ब्रिटिश आर्थिक नीतियों को ध्यान में रखकर उपनिवेशों की आर्थिक नीतियाँ जैसे- महालवाड़ी व्यवस्था, मुक्त अर्थव्यवस्था आदि; समाज में आर्थिक असमानता में वृद्धि; राजनीतिक परिणाम उद्योगपतियों के उदय के साथ ब्रिटिश मध्यवर्ग की स्थिति और मजबूत हुयी तथा मध्यवर्ग के द्वारा राजनीतिक सुधारों की मांग की गयी| 1832 के संसदीय अधिनियम के द्वारा मध्यवर्ग को ब्रिटिश राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया| शहरी मजदूरों के द्वारा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन चलाया गया| 19 वीं सदी के उतरार्ध में मजदूरों को ट्रेड यूनियन तथा मत देने का अधिकार दिए गये| शोषण से रक्षा के लिए कानूनों का भी निर्माण किया गया| 19वीं सदी में ही वंचित तबकों की दशा में सुधार के लिए कानून बनाये गये| अन्य देशों में औद्योगीकरण के साथ उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्धा; अंतर्राष्ट्रीय राजनीति गुटों के उदय से तनाव में वृद्धि जिससे क्षेत्रीय युद्ध अंततः विश्वयुद्ध; उपनिवेशों की राजनीति में भी परिवर्तन जैसे- भारत में; विचारधारा के स्तर पर परिणाम उदारवादी विचारधारा के अंतर्गत राजनीतिक क्षेत्र में अधिक लोकतांत्रीकरण तथा आर्थिक क्षेत्र में अहस्तक्षेप की नीति को महत्व; उपयोगितावादियों नें अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को आधार बनाते हुए राजनीतिक-आर्थिक नीतियों में पुनर्गठन की मांग की; मजदूरों को सामजिक, आर्थिक न्याय दिलाने के लिए समाजवादी विचारधारा का उदय साम्राज्यवादी विचारधारा को भी न्यायोचित ठहराने का प्रयास- उपनिवेशों के प्रति पितृसतावादी दृष्टिकोण, श्वेत व्यक्तियों पर भार का विचार आदि| सामाजिक परिणाम ब्रिटिश समाज में दो नए वर्गों का उदय - उद्योगपति एवं श्रमिक; आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण के कारण उद्योगपतियों का जीवन-स्तर बेहतर जैसे- बेहतर आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ; उपभोक्ता वस्तुओं तक पहुँच, रोजगार, मनोरंजन इत्यादि| उद्योगपतियों के विपरीत श्र मिकों की दशा दयनीय जैसे- न्यूनतम आय, रोजगार की असुरक्षा, महिलाओं एवं बच्चों का बड़े पैमाने पर शोषण, आवास की प्रतिकूल स्थिति, पेयजल,स्वास्थ्य इत्यादि की भी प्रतिकूल परिस्थितियां; शोषण के विरुद्ध प्रतिक्रिया जैसे- मालिकों पर हमलें, मशीनों को तोड़ने की घटना, काम छोड़कर भागना आदि; शहरों में अपराध, मद्यपान इत्यादि प्रवृतियों में वृद्धि; उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता से उपभोक्तावाद को बढ़ावा एवं नैतिकता का अवमूल्यन; ब्रिटेन के ग्रामीण एवं शहरी सामाजिक संरचना में परिवर्तन; बड़ी संख्या में रोजगार के लिए लोगों नें शहरी क्षेत्र की ओर पलायन किया; परिवार संस्था भी प्रभावित ; संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार को महत्व; सामाजिक संबंधों में व्यावसायिक हितों को महत्व तथा मानवीय संबंधों में गिरावट ; इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एक ओर जहाँ औद्योगिक क्रांति ने ब्रिटेन को आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति बनने में व्यापक समर्थन दिया वहीँ दूसरी ओर इससे ब्रिटेन के सामाजिक ढांचे पर व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने ब्रिटेन के समाज को प्रतिकूलतः प्रभावित किया| हालाँकि इसके परिणामस्वरूप नए विचारकों का उदय हुआ तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों के रूप में ब्रिटिश समाज में सकारात्मक सुधारों को भी आगे प्रोत्साहन मिलना शुरू हुआ|
##Question:"एक ओर जहाँ औद्योगिक क्रांति के द्वारा ब्रिटेन में आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन लाया गया वहीँ इससे ब्रिटेन के सामाजिक संरचना पर प्रतिकूलतः प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए|" कथन की समीक्षा कीजिये| (200 शब्द) "Where, there has been a widespread changes in the economic, political, ideological areas in the Britain through the Industrial Revolution, It has also adversely affected the British social structure." Examine the statement. (200 words)##Answer:एप्रोच- ब्रिटेन में हुयी औद्योगिक क्रांति के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, औद्योगिक क्रांति के द्वारा ब्रिटेन के आर्थिक, राजनीतिक तथा वैचारिक क्षेत्र में आये परिवर्तनों को रेखांकित कीजिये| अगले भाग में, औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप ब्रिटेन के सामाजिक क्षेत्र पर पड़े प्रभावों को बताईये| निष्कर्षतः क्रांति के समग्र प्रभावों को दर्शाते हुए एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये| उत्तर- 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्पादन प्रणाली में हुए आधारभूत परिवर्तनों को औद्योगिक क्रांति की संज्ञा दी जाती है| इसके फलस्वरूप श्रम के क्षेत्र में मानव श्रम का स्थान मशीनों ने ले लिया तथा उत्पादों की मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि हुई| इससे औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का भी विस्तार हुआ तथा श्रमिक एवं मिल मालिक जैसे नए वर्गों का उदय हुआ| औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में संपन्न हुई तथा उसका विस्तार अन्य देशों में उसके बाद हुआ |इंग्लैंड की भौगोलिक स्थिति, प्रचूर प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, जनसंख्या में बढ़ोतरी, सुदृढ़ नौसेना तथा वैज्ञानिक एवं प्रगति विकास के फलस्वरूप इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ जिसके बृहद परिणाम सामने आए- आर्थिक परिणाम औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन पद्धति में क्रांतिकारी परिवर्तन; एक तरफ रोजगार के अवसर उपलब्ध हुयें तो दूसरी तरफ कुछ कुटीर उद्योगों को नुकसान हुआ और बेरोजगारों की भी संख्या बढ़ी ; कृषि क्षेत्र में भी क्रमशः मशीनीकरण बढ़ता गया ; आर्थिक आवश्यकताओं के कारण परिवहन के द्रुतगामी साधनों का विकास; शहरों का आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में उभरना तथा तेजी से शहरीकरण ; बैंकिंग एवं मुद्रा प्रणाली का विकास; मुक्त व्यापार की नीति ; ब्रिटिश अर्थव्यवस्था अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के साथ गहराई से जुड़ती गयी और एक दूसरे पर निर्भर भी होती गयी; ब्रिटिश आर्थिक नीतियों को ध्यान में रखकर उपनिवेशों की आर्थिक नीतियाँ जैसे- महालवाड़ी व्यवस्था, मुक्त अर्थव्यवस्था आदि; समाज में आर्थिक असमानता में वृद्धि; राजनीतिक परिणाम उद्योगपतियों के उदय के साथ ब्रिटिश मध्यवर्ग की स्थिति और मजबूत हुयी तथा मध्यवर्ग के द्वारा राजनीतिक सुधारों की मांग की गयी| 1832 के संसदीय अधिनियम के द्वारा मध्यवर्ग को ब्रिटिश राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया| शहरी मजदूरों के द्वारा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन चलाया गया| 19 वीं सदी के उतरार्ध में मजदूरों को ट्रेड यूनियन तथा मत देने का अधिकार दिए गये| शोषण से रक्षा के लिए कानूनों का भी निर्माण किया गया| 19वीं सदी में ही वंचित तबकों की दशा में सुधार के लिए कानून बनाये गये| अन्य देशों में औद्योगीकरण के साथ उपनिवेशों को लेकर प्रतिस्पर्धा; अंतर्राष्ट्रीय राजनीति गुटों के उदय से तनाव में वृद्धि जिससे क्षेत्रीय युद्ध अंततः विश्वयुद्ध; उपनिवेशों की राजनीति में भी परिवर्तन जैसे- भारत में; विचारधारा के स्तर पर परिणाम उदारवादी विचारधारा के अंतर्गत राजनीतिक क्षेत्र में अधिक लोकतांत्रीकरण तथा आर्थिक क्षेत्र में अहस्तक्षेप की नीति को महत्व; उपयोगितावादियों नें अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख को आधार बनाते हुए राजनीतिक-आर्थिक नीतियों में पुनर्गठन की मांग की; मजदूरों को सामजिक, आर्थिक न्याय दिलाने के लिए समाजवादी विचारधारा का उदय साम्राज्यवादी विचारधारा को भी न्यायोचित ठहराने का प्रयास- उपनिवेशों के प्रति पितृसतावादी दृष्टिकोण, श्वेत व्यक्तियों पर भार का विचार आदि| सामाजिक परिणाम ब्रिटिश समाज में दो नए वर्गों का उदय - उद्योगपति एवं श्रमिक; आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण के कारण उद्योगपतियों का जीवन-स्तर बेहतर जैसे- बेहतर आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ; उपभोक्ता वस्तुओं तक पहुँच, रोजगार, मनोरंजन इत्यादि| उद्योगपतियों के विपरीत श्र मिकों की दशा दयनीय जैसे- न्यूनतम आय, रोजगार की असुरक्षा, महिलाओं एवं बच्चों का बड़े पैमाने पर शोषण, आवास की प्रतिकूल स्थिति, पेयजल,स्वास्थ्य इत्यादि की भी प्रतिकूल परिस्थितियां; शोषण के विरुद्ध प्रतिक्रिया जैसे- मालिकों पर हमलें, मशीनों को तोड़ने की घटना, काम छोड़कर भागना आदि; शहरों में अपराध, मद्यपान इत्यादि प्रवृतियों में वृद्धि; उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता से उपभोक्तावाद को बढ़ावा एवं नैतिकता का अवमूल्यन; ब्रिटेन के ग्रामीण एवं शहरी सामाजिक संरचना में परिवर्तन; बड़ी संख्या में रोजगार के लिए लोगों नें शहरी क्षेत्र की ओर पलायन किया; परिवार संस्था भी प्रभावित ; संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार को महत्व; सामाजिक संबंधों में व्यावसायिक हितों को महत्व तथा मानवीय संबंधों में गिरावट ; इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एक ओर जहाँ औद्योगिक क्रांति ने ब्रिटेन को आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति बनने में व्यापक समर्थन दिया वहीँ दूसरी ओर इससे ब्रिटेन के सामाजिक ढांचे पर व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने ब्रिटेन के समाज को प्रतिकूलतः प्रभावित किया| हालाँकि इसके परिणामस्वरूप नए विचारकों का उदय हुआ तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों के रूप में ब्रिटिश समाज में सकारात्मक सुधारों को भी आगे प्रोत्साहन मिलना शुरू हुआ|
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मैन्ग्रोव वन के पारिस्थितिकीय व भौगोलिक महत्व को बताते हुए इसके जैविक एवं आर्थिक लाभों की भी चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) While explaining the ecological and geographical importance of the Mangrove forest, also discuss its biological and economic benefits. (150-200 words/ 10 marks)
एप्रोच - भूमिका में मैन्ग्रोव वन का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद मैन्ग्रोव वन के पारिस्थितिकीय महत्व एवं भौगोलिक महत्व को बताइए | पुनः मैन्ग्रोव वन के जैविक एवं आर्थिक महत्व को बताइए | अंत में मैन्ग्रोव वन का मानव जीवन के लिए महत्व को बताते हुए उत्तर का संपन कीजिये | उत्तर - मनुष्य द्वारा मैन्ग्रोव वनों का उपयोग अनेक रूपों में किया जाता है |पारंपरिक रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा इनका प्रयोग भोजन, औषधि ,ईंधन तथा इमारती लकड़ी के लिए किया जाता रहा है तटीय इलाके में रहने वाले लाखों लोगों के लिए जीवनयापन का साधन इन वनों से प्राप्त होता है तथा ये उनकी पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखते हैं |मैन्ग्रोव वन धरती तथा समुद्र के बिच एक बफर क्षेत्र का काम करते हैं तथा समुद्री प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा करते हैं |ये तटीय क्षेत्रों में तलछट के कारण होने वाले नुकसान को रोकते हैं | पारिस्थितिकीय महत्त्व एवं भौगोलिक महत्त्व - मैन्ग्रोव वनों की जड़ों का प्रयोग अनेक प्रकार के शैवालों तथा मछलियों द्वारा अपने आश्रय के लिए किया जाता है | पेड़ की शाखाएं सूर्य की तीव्र किरणों से छाया प्रदान करती हैं | छोटी-छोटी दरारें कीटों तथा अन्य सूक्ष्म जीवों के लिए आश्रय प्रदान करती हैं | पेड़ पर चढ़ने वाले कीट ज्वार के समय परभक्षियों से बचने के लिए वायवीय जड़ों पर चढ़ जाते हैं | संकटग्रस्त जंगली गधे कच्छ के मैन्ग्रोव क्षेत्रों में अक्सर देखे जाते हैं | मैन्ग्रोव वन ज्वारीय लहरों ,भारी वर्षा तथा तूफानों के साथ आने वाली बाढ़ से भी तटों की रक्षा करते हैं | तटों पर जितनी अधिक वनस्पति की सघनता होगी उतनी ही अधिक प्रभावी ढंग से लहरों की तीव्रता को रोका जा सकेगा | मैन्ग्रोव वृक्षों की जड़ें ज्वार तथा तीव्र जलधाराओं द्वारा होने वाले मिटटी के कटाव को कम करती हैं | मैन्ग्रोव वन अपनी जड़ों के द्वारा मिटटी को बांधे रखते हैं जिससे तूफ़ान व चक्रवात के समय कम हानि होती है | मैन्ग्रोव वन प्रकाश संश्लेषण द्वारा वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड को घटाते हैं | मैन्ग्रोव वन का जैविक एवं आर्थिक महत्त्व - मैन्ग्रोव वन जीवों के भोजन के अच्छे स्त्रोत हैं |इस प्रकार ये वन बहुत सारे जीव-जंतुओं के लिए प्रकृति के वरदान की तरह हैं | मैन्ग्रोव वनों में , भारी धातु तत्वों को पानी से सोखकर रखने की उच्च क्षमता होती है | इसमें पूरे तंत्र का 90% मैंगनीज तथा कॉपर तथा 100 % लोहा, जस्ता ,सीसा तथा कैडमियम पाया जाता है | तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग जिनका इन वनों से घनिष्ठ सम्बन्ध है, उन्हें इन पौधों की औषधीय विशेषताओं का ज्ञान है | मैन्ग्रोव वन सर्पदंश , चर्मरोग,पेंचिश आदि रोगों के उपचार में प्रयोग किये जाते हैं | एविसिनिया के पेड़ से निकलने वाले गोंद का उपयोग गर्भ निरोधक के रूप में किया जाता है | इन वनों की पत्तियों का उपयोग मछुआरों द्वारा पेट सम्बन्धी रोगों के उपचार में भी किया जाता है | तटीय क्षेत्रों में सामान्यतः उगने वाली समुद्री गुडहल की पत्तियां ठंडक पहुंचती हैं तथा इनका प्रयोग बुखार के समय किया जाता है | इसके अलावा दन्त रोग भी इसके द्वारा ठीक किये जाते हैं | उपरोक्त महत्त्व को देखते हुए यह कहा जा सकता है की मैन्ग्रोव वन हमारी प्रकृति एवं हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है |अतः हमें इसे बचाने का हर संभव प्रयास करना चाहिये | दुर्भाग्यवश ,मैन्ग्रोव वन जो सदियों से समुद्री तूफानों और तेज हवाओं का सामना सफलतापूर्वक कर रहे हैं आज मनुष्य के क्रियाकलापों के कारण खतरे में है|लेकिन हाल के वर्षों में घटित घटनाओं ने मनुष्य को इन वनों के प्रति अपने रवैये के बारे में सोचने पर विवश किया है | सन 2004 में तटीय क्षेत्रों में सुनामी से हुई भयंकर तबाही से वे क्षेत्र बच गए जहाँ मैन्ग्रोव वन इन लहरों के रास्ते में ढाल की तरह खड़े थे | इस घटना के बाद मैन्ग्रोव वनों के संरक्षण हेतु विभिन्न प्रकार के सरकारी प्रयास किये जा रहे हैं एवं मानव को भी इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है |
##Question:मैन्ग्रोव वन के पारिस्थितिकीय व भौगोलिक महत्व को बताते हुए इसके जैविक एवं आर्थिक लाभों की भी चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) While explaining the ecological and geographical importance of the Mangrove forest, also discuss its biological and economic benefits. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में मैन्ग्रोव वन का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद मैन्ग्रोव वन के पारिस्थितिकीय महत्व एवं भौगोलिक महत्व को बताइए | पुनः मैन्ग्रोव वन के जैविक एवं आर्थिक महत्व को बताइए | अंत में मैन्ग्रोव वन का मानव जीवन के लिए महत्व को बताते हुए उत्तर का संपन कीजिये | उत्तर - मनुष्य द्वारा मैन्ग्रोव वनों का उपयोग अनेक रूपों में किया जाता है |पारंपरिक रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा इनका प्रयोग भोजन, औषधि ,ईंधन तथा इमारती लकड़ी के लिए किया जाता रहा है तटीय इलाके में रहने वाले लाखों लोगों के लिए जीवनयापन का साधन इन वनों से प्राप्त होता है तथा ये उनकी पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखते हैं |मैन्ग्रोव वन धरती तथा समुद्र के बिच एक बफर क्षेत्र का काम करते हैं तथा समुद्री प्राकृतिक आपदाओं से तटों की रक्षा करते हैं |ये तटीय क्षेत्रों में तलछट के कारण होने वाले नुकसान को रोकते हैं | पारिस्थितिकीय महत्त्व एवं भौगोलिक महत्त्व - मैन्ग्रोव वनों की जड़ों का प्रयोग अनेक प्रकार के शैवालों तथा मछलियों द्वारा अपने आश्रय के लिए किया जाता है | पेड़ की शाखाएं सूर्य की तीव्र किरणों से छाया प्रदान करती हैं | छोटी-छोटी दरारें कीटों तथा अन्य सूक्ष्म जीवों के लिए आश्रय प्रदान करती हैं | पेड़ पर चढ़ने वाले कीट ज्वार के समय परभक्षियों से बचने के लिए वायवीय जड़ों पर चढ़ जाते हैं | संकटग्रस्त जंगली गधे कच्छ के मैन्ग्रोव क्षेत्रों में अक्सर देखे जाते हैं | मैन्ग्रोव वन ज्वारीय लहरों ,भारी वर्षा तथा तूफानों के साथ आने वाली बाढ़ से भी तटों की रक्षा करते हैं | तटों पर जितनी अधिक वनस्पति की सघनता होगी उतनी ही अधिक प्रभावी ढंग से लहरों की तीव्रता को रोका जा सकेगा | मैन्ग्रोव वृक्षों की जड़ें ज्वार तथा तीव्र जलधाराओं द्वारा होने वाले मिटटी के कटाव को कम करती हैं | मैन्ग्रोव वन अपनी जड़ों के द्वारा मिटटी को बांधे रखते हैं जिससे तूफ़ान व चक्रवात के समय कम हानि होती है | मैन्ग्रोव वन प्रकाश संश्लेषण द्वारा वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड को घटाते हैं | मैन्ग्रोव वन का जैविक एवं आर्थिक महत्त्व - मैन्ग्रोव वन जीवों के भोजन के अच्छे स्त्रोत हैं |इस प्रकार ये वन बहुत सारे जीव-जंतुओं के लिए प्रकृति के वरदान की तरह हैं | मैन्ग्रोव वनों में , भारी धातु तत्वों को पानी से सोखकर रखने की उच्च क्षमता होती है | इसमें पूरे तंत्र का 90% मैंगनीज तथा कॉपर तथा 100 % लोहा, जस्ता ,सीसा तथा कैडमियम पाया जाता है | तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग जिनका इन वनों से घनिष्ठ सम्बन्ध है, उन्हें इन पौधों की औषधीय विशेषताओं का ज्ञान है | मैन्ग्रोव वन सर्पदंश , चर्मरोग,पेंचिश आदि रोगों के उपचार में प्रयोग किये जाते हैं | एविसिनिया के पेड़ से निकलने वाले गोंद का उपयोग गर्भ निरोधक के रूप में किया जाता है | इन वनों की पत्तियों का उपयोग मछुआरों द्वारा पेट सम्बन्धी रोगों के उपचार में भी किया जाता है | तटीय क्षेत्रों में सामान्यतः उगने वाली समुद्री गुडहल की पत्तियां ठंडक पहुंचती हैं तथा इनका प्रयोग बुखार के समय किया जाता है | इसके अलावा दन्त रोग भी इसके द्वारा ठीक किये जाते हैं | उपरोक्त महत्त्व को देखते हुए यह कहा जा सकता है की मैन्ग्रोव वन हमारी प्रकृति एवं हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है |अतः हमें इसे बचाने का हर संभव प्रयास करना चाहिये | दुर्भाग्यवश ,मैन्ग्रोव वन जो सदियों से समुद्री तूफानों और तेज हवाओं का सामना सफलतापूर्वक कर रहे हैं आज मनुष्य के क्रियाकलापों के कारण खतरे में है|लेकिन हाल के वर्षों में घटित घटनाओं ने मनुष्य को इन वनों के प्रति अपने रवैये के बारे में सोचने पर विवश किया है | सन 2004 में तटीय क्षेत्रों में सुनामी से हुई भयंकर तबाही से वे क्षेत्र बच गए जहाँ मैन्ग्रोव वन इन लहरों के रास्ते में ढाल की तरह खड़े थे | इस घटना के बाद मैन्ग्रोव वनों के संरक्षण हेतु विभिन्न प्रकार के सरकारी प्रयास किये जा रहे हैं एवं मानव को भी इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है |
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पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोत के रूप में भूकंपीय तरंगो का व्यापक महत्व है। इस संदर्भ में भूकंपीय तरंगों की विशेषताओं तथा इनके द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र का वर्णन कीजिए । (150- 200 शब्द, 10 अंक) Seismic waves are of widespread significance as the source of the study of the internal structure of the Earth. In this context, describe the features of seismic waves and the shadow area created by them. (150-200 words, 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों का संदर्भ देते हुए प्रश्न के पहले कथन को स्पष्ट कीजिए इसके बाद भूकंपीय तरंगों की विशेषताओं को लिखिए P तथा S तरंगों द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र का वर्णन कीजिए। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में जानकारी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों स्रोतों से प्राप्त होती है। प्रत्यक्ष स्रोत के अंतर्गत ज्वालामुखी उद्गार, खनन आदि सम्मिलित हैं जबकि अप्रत्यक्ष स्रोत में तापमान, उल्कापिंड, भूकंपीय तरंगें आते हैं।भूकंपीय तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है कम घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग कम होता है।इन तरंगों के व्यवहार के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है किपृथ्वी के आंतरिक भागों में अलग-अलग घनत्व की एक बहुस्तरीय संरचना पायी जाती है। भूकंपीय तरंगों की मदद से परतों की सटीक अवस्थिति, उनकी गहराई, मोटाई और अन्य भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। भूकंपीय तरंगों की विशेषताएँ: P तरंगें : इसे प्राथमिक अथवा अनुदैर्ध्य तरंग कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के समांतर होता है। ये सबसे तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं। ये तरंगें ठोस, द्रव और गैस तीनों प्रकार के पदर्र्थोन से संचलित हो सकती हैं। S तरंगें: इन्हें अनुप्रस्थ तरंगें कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के लम्बवत होता है। इनकी गति प्राथमिक तरंगों की अपेक्षा कम होती है। ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही संचालित हो पाती हैं। धरातलीय तरंगें: इनकी गति तीनों तरंगों में सबसे कम होती है। ये पृथ्वी के धरातलीय भाग में ही संचालित होती हैं। भूकंपीय तरंगों द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र: पृथ्वी के भूपटल पर स्थित वह स्थान जहां कोई तरंग नहीं पहुँचती भूकंपीय छाया क्षेत्र कहलाता है। यदि पृथ्वी सम्पूर्ण रूप से समजातीय होती या एक जैसे पदार्थों से मिलकर बनी होती तो भूकंपीय तरंगें सीधी रेखा में एक समान गति से गमन करतीं। लेकिन वास्तव में अंतरतम की ओर जाने पर इन तरंगों का परावर्तन और अपवर्तन भी दृष्टिगोचर होता है। इसी कारण से छाया क्षेत्र का निर्माण होता है। S तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 103 डिग्री कोणीय दूरी के बाद नहीं होता है। इससे पता चलता है कि पृथ्वी का वाह्य कोर तरल या अर्द्ध तरल अवस्था में है। P तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 143 डिग्री और 103 डिग्री की कोणीय दूरी के बीच नहीं किया जाता है, जो यह इंगित करता है कि पृथ्वी के कोर की भौतिक अवस्था घनत्व और संरचना भिन्न है। S तरंगों का छाया क्षेत्र P तरंगों की तुलना में अधिक होता है।
##Question:पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोत के रूप में भूकंपीय तरंगो का व्यापक महत्व है। इस संदर्भ में भूकंपीय तरंगों की विशेषताओं तथा इनके द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र का वर्णन कीजिए । (150- 200 शब्द, 10 अंक) Seismic waves are of widespread significance as the source of the study of the internal structure of the Earth. In this context, describe the features of seismic waves and the shadow area created by them. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के स्रोतों का संदर्भ देते हुए प्रश्न के पहले कथन को स्पष्ट कीजिए इसके बाद भूकंपीय तरंगों की विशेषताओं को लिखिए P तथा S तरंगों द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र का वर्णन कीजिए। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में जानकारी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों स्रोतों से प्राप्त होती है। प्रत्यक्ष स्रोत के अंतर्गत ज्वालामुखी उद्गार, खनन आदि सम्मिलित हैं जबकि अप्रत्यक्ष स्रोत में तापमान, उल्कापिंड, भूकंपीय तरंगें आते हैं।भूकंपीय तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है कम घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग कम होता है।इन तरंगों के व्यवहार के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है किपृथ्वी के आंतरिक भागों में अलग-अलग घनत्व की एक बहुस्तरीय संरचना पायी जाती है। भूकंपीय तरंगों की मदद से परतों की सटीक अवस्थिति, उनकी गहराई, मोटाई और अन्य भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। भूकंपीय तरंगों की विशेषताएँ: P तरंगें : इसे प्राथमिक अथवा अनुदैर्ध्य तरंग कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के समांतर होता है। ये सबसे तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं। ये तरंगें ठोस, द्रव और गैस तीनों प्रकार के पदर्र्थोन से संचलित हो सकती हैं। S तरंगें: इन्हें अनुप्रस्थ तरंगें कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के लम्बवत होता है। इनकी गति प्राथमिक तरंगों की अपेक्षा कम होती है। ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही संचालित हो पाती हैं। धरातलीय तरंगें: इनकी गति तीनों तरंगों में सबसे कम होती है। ये पृथ्वी के धरातलीय भाग में ही संचालित होती हैं। भूकंपीय तरंगों द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र: पृथ्वी के भूपटल पर स्थित वह स्थान जहां कोई तरंग नहीं पहुँचती भूकंपीय छाया क्षेत्र कहलाता है। यदि पृथ्वी सम्पूर्ण रूप से समजातीय होती या एक जैसे पदार्थों से मिलकर बनी होती तो भूकंपीय तरंगें सीधी रेखा में एक समान गति से गमन करतीं। लेकिन वास्तव में अंतरतम की ओर जाने पर इन तरंगों का परावर्तन और अपवर्तन भी दृष्टिगोचर होता है। इसी कारण से छाया क्षेत्र का निर्माण होता है। S तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 103 डिग्री कोणीय दूरी के बाद नहीं होता है। इससे पता चलता है कि पृथ्वी का वाह्य कोर तरल या अर्द्ध तरल अवस्था में है। P तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 143 डिग्री और 103 डिग्री की कोणीय दूरी के बीच नहीं किया जाता है, जो यह इंगित करता है कि पृथ्वी के कोर की भौतिक अवस्था घनत्व और संरचना भिन्न है। S तरंगों का छाया क्षेत्र P तरंगों की तुलना में अधिक होता है।
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रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए इसमेंदोषों को भी स्पष्ट कीजिये। (200शब्द ) While explaining the provisions of the Regulating Act 1773, also clarify the drawback s in it. (200 words)
एप्रोच :- रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 पर संक्षिप्तभूमिका दीजिये। इस एक्ट केप्रावधानों को लिखिए। इसके कार्यपालन में दोषों को स्पष्ट कीजिये। 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट की चर्चा करते हुए संतुलित निष्कर्ष लिखिये उत्तर प्रारूप :- 1773 के रेगुलटिंग एक्ट संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित किया। इसके साथ ही कंपनी के कार्यों को ब्रिटिश सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता दी गयी। प्रमुख प्रावधान :- पहली बार ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत में किसी भी प्रकार के शासकीय कार्य ,व्यापार तथा वाणिज्य को संसद की निगरानी में लाया गया. कम्पनी के निदेशक मंडल पर संसदीय नियंत्रण स्थापित हुआ। भारत में कम्पनी के प्रशासन में आयी त्रुटियों को दूर करने के लिए निम्नलिखित 5 उपाय अपनाने के निर्देश दिए गए एक सपरिषद गवर्नर जनरल के गठन का प्रस्ताव किया गया। परिषद् के 4 सदस्यों से परामर्श करके बहुमत के आधार पर यह फैसला लेना होगा। कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय का गठन। इसमें 4 न्यायाधीश। बंगाल प्रेसीडेंसी के गवर्नर का पद बढाकर गवर्नर जनरल कर दिया गया और इसे बॉम्बे तथा मद्रास प्रेसीडेन्सी के शासन के ऊपर पर्यवेक्षण का अधिकार। सिविल सेवा में सुधार का प्रस्ताव तथा सेवा शर्तों में सुधार कर स्थायी सेवा में शामिल। नियम बनाने के लिए कुछ प्रक्रिया निर्धारित की गयी जैसे युद्ध व् शांति सम्बन्धी मामलों में निदेशक मंडल के साथ 2 संसद की सहमति भी आवश्यक कर दी गयी। व्यापार एवं वाणिज्य के मामलों में निदेशक मंडल को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार दिया गया। दोष :- गवर्नर जनरल कोई भी प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए अपनी परिषद् की कृपा पर निर्भर रहने लगा और 4 सदस्यों में से 3 सदस्य एक तरफ होकर गवर्नर जनरल के विरोध में खड़े हो जाते थे सपरिषद गवर्नर जनरल और कलकत्ते स्थित सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं थे सुप्रीम कोर्ट व् अधिनस्थ न्यायालयों के मध्य क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं। भारत व ब्रिटेन के मध्य दूरी के कारण व्यवहार में नियंत्रण लागू नहीं हो सका. इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने भारत में साम्राज्य विस्तार व आर्थिक लाभ को अधिक करने के लिए इस एक्ट का निर्माण किया। किन्तु इसके दोषों के कारण इसकी आलोचना भी होती रही। जिन्हे 1784 के पिट्सइंडिया एक्ट में दूर करने का प्रयास किया गया।
##Question:रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए इसमेंदोषों को भी स्पष्ट कीजिये। (200शब्द ) While explaining the provisions of the Regulating Act 1773, also clarify the drawback s in it. (200 words)##Answer:एप्रोच :- रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 पर संक्षिप्तभूमिका दीजिये। इस एक्ट केप्रावधानों को लिखिए। इसके कार्यपालन में दोषों को स्पष्ट कीजिये। 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट की चर्चा करते हुए संतुलित निष्कर्ष लिखिये उत्तर प्रारूप :- 1773 के रेगुलटिंग एक्ट संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित किया। इसके साथ ही कंपनी के कार्यों को ब्रिटिश सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता दी गयी। प्रमुख प्रावधान :- पहली बार ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत में किसी भी प्रकार के शासकीय कार्य ,व्यापार तथा वाणिज्य को संसद की निगरानी में लाया गया. कम्पनी के निदेशक मंडल पर संसदीय नियंत्रण स्थापित हुआ। भारत में कम्पनी के प्रशासन में आयी त्रुटियों को दूर करने के लिए निम्नलिखित 5 उपाय अपनाने के निर्देश दिए गए एक सपरिषद गवर्नर जनरल के गठन का प्रस्ताव किया गया। परिषद् के 4 सदस्यों से परामर्श करके बहुमत के आधार पर यह फैसला लेना होगा। कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय का गठन। इसमें 4 न्यायाधीश। बंगाल प्रेसीडेंसी के गवर्नर का पद बढाकर गवर्नर जनरल कर दिया गया और इसे बॉम्बे तथा मद्रास प्रेसीडेन्सी के शासन के ऊपर पर्यवेक्षण का अधिकार। सिविल सेवा में सुधार का प्रस्ताव तथा सेवा शर्तों में सुधार कर स्थायी सेवा में शामिल। नियम बनाने के लिए कुछ प्रक्रिया निर्धारित की गयी जैसे युद्ध व् शांति सम्बन्धी मामलों में निदेशक मंडल के साथ 2 संसद की सहमति भी आवश्यक कर दी गयी। व्यापार एवं वाणिज्य के मामलों में निदेशक मंडल को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार दिया गया। दोष :- गवर्नर जनरल कोई भी प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए अपनी परिषद् की कृपा पर निर्भर रहने लगा और 4 सदस्यों में से 3 सदस्य एक तरफ होकर गवर्नर जनरल के विरोध में खड़े हो जाते थे सपरिषद गवर्नर जनरल और कलकत्ते स्थित सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं थे सुप्रीम कोर्ट व् अधिनस्थ न्यायालयों के मध्य क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं। भारत व ब्रिटेन के मध्य दूरी के कारण व्यवहार में नियंत्रण लागू नहीं हो सका. इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने भारत में साम्राज्य विस्तार व आर्थिक लाभ को अधिक करने के लिए इस एक्ट का निर्माण किया। किन्तु इसके दोषों के कारण इसकी आलोचना भी होती रही। जिन्हे 1784 के पिट्सइंडिया एक्ट में दूर करने का प्रयास किया गया।
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नव साम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं? नव साम्राज्यवाद के कारणों का उल्लेख करते हुए समझाइए कि यह पुराने साम्राज्यवाद से किस प्रकार भिन्न था? (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the new imperialism? Mentioning the causes of new imperialism, explain how it was different from old imperialism. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, नव साम्राज्यवाद कासंक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात,नव साम्राज्यवाद के कारणों का उल्लेख करते हुए समझाइए कि यह पुराने साम्राज्यवाद से किस प्रकार भिन्न था। उत्तर:- औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात पुराने साम्राज्यवादीशक्तियों के साथ साथ अमेरिका, जापान, इटली, जर्मनी इत्यादि शक्तियां भी उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा में शामिल हुई। इस चरण में उपनिवेशों की स्थापना के मुख्य कारण थे बाज़ार, कच्चे माल व निवेश के स्रोत के रूप में । द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात विशेषकर 1870 से 1914 के बीच यह प्रतिस्पर्धा बड़े पैमाने पर देखी गई। कभी कभार 1945 के पश्चात साम्राज्यवादी शक्तियों की आक्रामकशक्तियों के संदर्भ में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। हालाँकि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात नव स्वतंत्र देशों की आर्थिक नीतियों पर साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभाव के रूप में नव उपनिवेशवाद शब्द का अधिक प्रयोग होता है। नव साम्राज्यवाद के कारण: औद्योगिक क्रांति के कारण बाज़ार एवं कच्चे माल की आवश्यकता। निवेश को ध्यान में रखकर भी साम्राज्यवादी शक्तियों ने भी उपनिवेशों की स्थापना की। जैसे भारत में रेलवे में निवेश इत्यादि। विभिन्न कारणों से साम्राज्यवादी शक्तियों ने उपनिवेशों में निवेश किये जैसे पूंजी का संचय, बाज़ार का विस्तार, कच्चे माल की उपलब्धता इत्यादि। (1850 के पश्चात ब्रिटेन के द्वारा निवेश) मुख्य उपनिवेशों सुरक्षा आधार बनाकर भी साम्राज्य विस्तार किये गए। जैसे अल्जीरिया को केंद्र में रखकर फ्रांस ने ट्यूनीसिया,मोरक्को इत्यादि क्षेत्रो पर विस्तार। भारत पर नियंत्रण को आधार बनाकर अंग्रेजों ने साइप्रस, मिश्र, यमन इत्यादि क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया। नव साम्राज्यवादी चरण में साम्राज्यवादी गतिविधियों को न्यायोचित ठहराने के लिए विभिन्न सिद्धांत गढ़े गए जैसे ब्रिटेन में श्वेत व्यक्तियों पर भार , फ्रांस में मिशन सविलाइजेनसन वहीं जर्मनी में संस्कृति का प्रसार। इन विचारों को पाठयपुस्तकों में महत्व दिया गया और इससे प्रभावित होकर भी प्रशासनिक अधिकारियों ने साम्राज्य का विस्तार किया। उग्र राष्ट्रवाद:- 19 वीं सदी के अंतिम दशकों में राष्टवादी घटनाओं साम्राज्यवादी गतिविधियों को प्रभावित करना प्रारम्भ किया। साम्राज्य की स्थापना को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा गया , जैसे ब्रिटेन में यह मुहावरा प्रचलित हुआ कि ब्रिटेन का सूर्य कभी अस्त नहीं होता। इतना ही नहीं बाल्कन क्षेत्रों में नवोदित राष्ट्रों ने भी साम्राज्यवादी नीति अपनाई जैसे सर्बिया, बुल्गारिया इत्यादि। ईसाई मिशनरियों की भूमिका:- ईसाई मिशनरियों ने भी साम्राज्य विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म प्रचार के उद्देश्य से दूर दर्ज के क्षेत्रों में जाया करती थी और इनके पीछे पीछे व्यापारी भी। स्थानीय लोगों के साथ मिशनरियों का टकराव को भी साम्राज्य विस्तार का आधार बनाया गया। एशिया एवं अफ्रीका की परिस्थितियां:- इन दोनों ही महादेशों के राजनीतिक आर्थिक परिस्थियों ने भी साम्राज्य विस्तार को सुगम बनाया जैसे राजनीतिक एकता की कमी, राष्ट्रीय चेतना का अभाव, तकनीकी पिछड़ापन इत्यादि। नव साम्राज्यवाद की पुराने साम्राज्यवाद से भिन्नता: पूराने साम्राज्यवाद के अंतर्गत 16 वीं से 18 वीं सदी के बीच कुछ पश्चमी यूरोपीय देशों ने जैसे की पुर्तगाल, स्पेन, हॉलैंड, ब्रिटेन इत्यादि ने व्यापारिक उद्देश्यों से एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिकी महदेशों के सीमावर्ती इलाकों में व्यापारिक केंद्रों व उपनिवेशों की स्थापना की। इसे साम्राज्यवाद का प्रथम चरण भी कहते हैं। जबकि नव साम्राज्यवाद,औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात हुआ। इसमें पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ साथ अमेरिका, जापान, इटली, जर्मनी इत्यादि शक्तियां भी उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा में शामिल थीं।कभी कभार 1945 के पश्चात साम्राज्यवादी शक्तियों की आक्रमक शक्तियों के संदर्भ में भी नव साम्राज्यवाद शब्द का प्रयोग किया जाता है।
##Question:नव साम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं? नव साम्राज्यवाद के कारणों का उल्लेख करते हुए समझाइए कि यह पुराने साम्राज्यवाद से किस प्रकार भिन्न था? (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the new imperialism? Mentioning the causes of new imperialism, explain how it was different from old imperialism. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, नव साम्राज्यवाद कासंक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात,नव साम्राज्यवाद के कारणों का उल्लेख करते हुए समझाइए कि यह पुराने साम्राज्यवाद से किस प्रकार भिन्न था। उत्तर:- औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात पुराने साम्राज्यवादीशक्तियों के साथ साथ अमेरिका, जापान, इटली, जर्मनी इत्यादि शक्तियां भी उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा में शामिल हुई। इस चरण में उपनिवेशों की स्थापना के मुख्य कारण थे बाज़ार, कच्चे माल व निवेश के स्रोत के रूप में । द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात विशेषकर 1870 से 1914 के बीच यह प्रतिस्पर्धा बड़े पैमाने पर देखी गई। कभी कभार 1945 के पश्चात साम्राज्यवादी शक्तियों की आक्रामकशक्तियों के संदर्भ में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। हालाँकि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात नव स्वतंत्र देशों की आर्थिक नीतियों पर साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभाव के रूप में नव उपनिवेशवाद शब्द का अधिक प्रयोग होता है। नव साम्राज्यवाद के कारण: औद्योगिक क्रांति के कारण बाज़ार एवं कच्चे माल की आवश्यकता। निवेश को ध्यान में रखकर भी साम्राज्यवादी शक्तियों ने भी उपनिवेशों की स्थापना की। जैसे भारत में रेलवे में निवेश इत्यादि। विभिन्न कारणों से साम्राज्यवादी शक्तियों ने उपनिवेशों में निवेश किये जैसे पूंजी का संचय, बाज़ार का विस्तार, कच्चे माल की उपलब्धता इत्यादि। (1850 के पश्चात ब्रिटेन के द्वारा निवेश) मुख्य उपनिवेशों सुरक्षा आधार बनाकर भी साम्राज्य विस्तार किये गए। जैसे अल्जीरिया को केंद्र में रखकर फ्रांस ने ट्यूनीसिया,मोरक्को इत्यादि क्षेत्रो पर विस्तार। भारत पर नियंत्रण को आधार बनाकर अंग्रेजों ने साइप्रस, मिश्र, यमन इत्यादि क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया। नव साम्राज्यवादी चरण में साम्राज्यवादी गतिविधियों को न्यायोचित ठहराने के लिए विभिन्न सिद्धांत गढ़े गए जैसे ब्रिटेन में श्वेत व्यक्तियों पर भार , फ्रांस में मिशन सविलाइजेनसन वहीं जर्मनी में संस्कृति का प्रसार। इन विचारों को पाठयपुस्तकों में महत्व दिया गया और इससे प्रभावित होकर भी प्रशासनिक अधिकारियों ने साम्राज्य का विस्तार किया। उग्र राष्ट्रवाद:- 19 वीं सदी के अंतिम दशकों में राष्टवादी घटनाओं साम्राज्यवादी गतिविधियों को प्रभावित करना प्रारम्भ किया। साम्राज्य की स्थापना को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा गया , जैसे ब्रिटेन में यह मुहावरा प्रचलित हुआ कि ब्रिटेन का सूर्य कभी अस्त नहीं होता। इतना ही नहीं बाल्कन क्षेत्रों में नवोदित राष्ट्रों ने भी साम्राज्यवादी नीति अपनाई जैसे सर्बिया, बुल्गारिया इत्यादि। ईसाई मिशनरियों की भूमिका:- ईसाई मिशनरियों ने भी साम्राज्य विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म प्रचार के उद्देश्य से दूर दर्ज के क्षेत्रों में जाया करती थी और इनके पीछे पीछे व्यापारी भी। स्थानीय लोगों के साथ मिशनरियों का टकराव को भी साम्राज्य विस्तार का आधार बनाया गया। एशिया एवं अफ्रीका की परिस्थितियां:- इन दोनों ही महादेशों के राजनीतिक आर्थिक परिस्थियों ने भी साम्राज्य विस्तार को सुगम बनाया जैसे राजनीतिक एकता की कमी, राष्ट्रीय चेतना का अभाव, तकनीकी पिछड़ापन इत्यादि। नव साम्राज्यवाद की पुराने साम्राज्यवाद से भिन्नता: पूराने साम्राज्यवाद के अंतर्गत 16 वीं से 18 वीं सदी के बीच कुछ पश्चमी यूरोपीय देशों ने जैसे की पुर्तगाल, स्पेन, हॉलैंड, ब्रिटेन इत्यादि ने व्यापारिक उद्देश्यों से एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिकी महदेशों के सीमावर्ती इलाकों में व्यापारिक केंद्रों व उपनिवेशों की स्थापना की। इसे साम्राज्यवाद का प्रथम चरण भी कहते हैं। जबकि नव साम्राज्यवाद,औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात हुआ। इसमें पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ साथ अमेरिका, जापान, इटली, जर्मनी इत्यादि शक्तियां भी उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा में शामिल थीं।कभी कभार 1945 के पश्चात साम्राज्यवादी शक्तियों की आक्रमक शक्तियों के संदर्भ में भी नव साम्राज्यवाद शब्द का प्रयोग किया जाता है।
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What do you mean by "Karst Landforms"? Discuss various types of Karst landforms with examples of each. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: INTRODUCTION- Definition and meaning of karst landforms Then try to highlight EROSIONAL LANDFORMS Try to highlight DEPOSITIONAL LANDFORMS Answer:- KARST LANDFORMS consist of both erosional as well as depositional landforms. These are formed where limestone or dolomite is present on a large scale , which can get soluble in rainwater and turn into a solution. On meeting with water, such rocks can weather easily through the chemical process of solution and develop varieties of landforms. Any limestone or dolomite regions showing typical landforms produced by the action of groundwater through the process of solution and deposition is called karst topography. Such types of landforms can be found in Meghalaya, Mexico- Yucatan peninsula in Mexico etc. THE EROSIONAL LANDFORMS The solution is the most dominant erosional process in karst type of landforms. LOPEZ- These are narrow, deep, thin needle-like pinnacles roughly parallel to each other. The solution action of water tends to enlarge the rock joints downwards. This results in the formation of rough topography, where the surface is cut into narrow, deep, thin needle-like pinnacles. SINKHOLES- When rainwater percolates into limestone, it enters the rock joints and removes the soluble elements by solution. The joints, thus, increase in size and provide easy passage for more water. Prolonged solution results in the formation of holes along the joints known as sinkholes. BLIND VALLEYS/ STEEP HEAD VALLEYS- These are deep, narrow and flat-bottomed valleys with an abrupt ending. DOLINES- Funnel-shaped sinkholes formed by solution enlarge downwards due to the repeated action of the solution. In Yugoslavia, these enlarged funnel-shaped sinkholes are called dolines. UVALAS- These are large depressions or compound sinkholes/ dolines formed due to collapsed roofs between the dolines. Such coalesced dolines are called uvulas. They may have a diameter of up to 1 km. POLJE- Depressions even larger in size than uvulas which owe their origin to the solution or even down-faulting roofs are called poljes. The largest polje in Croatia is Livno Polje, which is 70 km long. DEPOSITIONAL LANDFORMS These are formed due to precipitation i.e. the turning of solution into a paste-like material- When the water evaporates, the solution turns into precipitates. STALACTITE- When underground water drips from cavern ceilings, it contains carbonates of limes. When water droplets hang from the ceiling, some portion of the carbonates of lime is deposited on the ceiling. This process is repeated with every fresh droplet of water and the deposition of lime goes on extending from the ceiling downwards. In the course of time, this results in the formation of a long and thin column of carbonate of lime hanging downwards from the ceiling of caverns called stalactites. STALAGMITE- The drops of water, which fall from the ceiling down to the floor, also contain carbonates of lime, and with every drop of water falling on the floor, there is some deposition of carbonates of lime. Thus, a pillar-like column of deposition of carbonate of lime also rises from the floor, called stalagmite. PILLARS- The stalactites, growing downwards, and the stalagmites, growing upwards, meet to form a continuous column, from the floor to the ceiling. Such a column is called a cave pillar.
##Question:What do you mean by "Karst Landforms"? Discuss various types of Karst landforms with examples of each. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: INTRODUCTION- Definition and meaning of karst landforms Then try to highlight EROSIONAL LANDFORMS Try to highlight DEPOSITIONAL LANDFORMS Answer:- KARST LANDFORMS consist of both erosional as well as depositional landforms. These are formed where limestone or dolomite is present on a large scale , which can get soluble in rainwater and turn into a solution. On meeting with water, such rocks can weather easily through the chemical process of solution and develop varieties of landforms. Any limestone or dolomite regions showing typical landforms produced by the action of groundwater through the process of solution and deposition is called karst topography. Such types of landforms can be found in Meghalaya, Mexico- Yucatan peninsula in Mexico etc. THE EROSIONAL LANDFORMS The solution is the most dominant erosional process in karst type of landforms. LOPEZ- These are narrow, deep, thin needle-like pinnacles roughly parallel to each other. The solution action of water tends to enlarge the rock joints downwards. This results in the formation of rough topography, where the surface is cut into narrow, deep, thin needle-like pinnacles. SINKHOLES- When rainwater percolates into limestone, it enters the rock joints and removes the soluble elements by solution. The joints, thus, increase in size and provide easy passage for more water. Prolonged solution results in the formation of holes along the joints known as sinkholes. BLIND VALLEYS/ STEEP HEAD VALLEYS- These are deep, narrow and flat-bottomed valleys with an abrupt ending. DOLINES- Funnel-shaped sinkholes formed by solution enlarge downwards due to the repeated action of the solution. In Yugoslavia, these enlarged funnel-shaped sinkholes are called dolines. UVALAS- These are large depressions or compound sinkholes/ dolines formed due to collapsed roofs between the dolines. Such coalesced dolines are called uvulas. They may have a diameter of up to 1 km. POLJE- Depressions even larger in size than uvulas which owe their origin to the solution or even down-faulting roofs are called poljes. The largest polje in Croatia is Livno Polje, which is 70 km long. DEPOSITIONAL LANDFORMS These are formed due to precipitation i.e. the turning of solution into a paste-like material- When the water evaporates, the solution turns into precipitates. STALACTITE- When underground water drips from cavern ceilings, it contains carbonates of limes. When water droplets hang from the ceiling, some portion of the carbonates of lime is deposited on the ceiling. This process is repeated with every fresh droplet of water and the deposition of lime goes on extending from the ceiling downwards. In the course of time, this results in the formation of a long and thin column of carbonate of lime hanging downwards from the ceiling of caverns called stalactites. STALAGMITE- The drops of water, which fall from the ceiling down to the floor, also contain carbonates of lime, and with every drop of water falling on the floor, there is some deposition of carbonates of lime. Thus, a pillar-like column of deposition of carbonate of lime also rises from the floor, called stalagmite. PILLARS- The stalactites, growing downwards, and the stalagmites, growing upwards, meet to form a continuous column, from the floor to the ceiling. Such a column is called a cave pillar.
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पारितंत्रीय उत्पादकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | इसके मापन के तरीकों का उल्लेख करते हुए विभिन्न पारितंत्रीय उत्पादक क्षेत्रो/ प्रदेशों की चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) Explain the concept of ecological productivity. Describing the method of its measuring, discuss the various ecological productive regions. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच- पहले भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता के मापन करने के तरीकों के बारे में बताईये| अंतिम भाग में विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेशों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- किसी भी पारितंत्र में संचित ऊर्जा अथवा जैव-भार का प्रति वर्ग मीटर प्रति ईकाई समय बनना पारिस्थितिकीय उत्पादकता कहलाता है| इसका आकलन सामान्यतः किलोकैलोरी या किलोजुल प्रति वर्ग मीटरप्रति वर्षके रूप में किया जाता है|यह 2 प्रकार की होती है | प्राथमिक उत्पादकता- किसी पारितंत्र में सभी स्वपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | द्वितीयक उत्पादकता- सभी परपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | पारिस्थितिकीय तंत्र की उत्पादकतादो कारकों पर निर्भरकरती है- प्राथमिक उत्पादक को सुलभ होने वाली सौर-ऊर्जा की मात्रा हरे पेड़-पौधों द्वारा सौर-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करने की क्षमता पारिस्थितिकीय उत्पादकता का मापन2 प्रकार से किया जाता है- सकल उत्पादकता - कुल ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | शुद्ध उत्पादकता- श्वसन क्रिया के बाद शेष ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | अर्थात,शुद्ध उत्पादकता = सकल उत्पादकता - श्वसन द्वारा नष्ट ऊर्जा की मात्रा | प्राथमिक उत्पादकता(स्वपोषी) के संदर्भ में,शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता(NPP)=सकल प्राथमिक उत्पादकता(GPP) - श्वसन क्रिया द्वितीयक उत्पादकता(परपोषी) के संदर्भ में, शुद्ध द्वितीयक उत्पादकता (NSP)=सकल द्वितीयक उत्पादकता(GSP) - श्वसन क्रिया विभिन्न स्थानों पर उत्पादकता- निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर जाने पर उत्पादकता कम होती है| निम्न ऊँचाई से उच्च ऊँचाई पर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों की अपेक्षा महाद्वीपों की उत्पादकता ज्यादा होती है| तट से दूर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों में गहराई में जाने पर उत्पादकता कम होते जाती है| विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेश- अधिक उत्पादकता वाले प्रदेश- वर्षावन, मैंग्रोव वन, नमभूमियां, ज्वारनदमुख, प्रवाल-भितियाँआदि| मध्यम उत्पादकता वाले प्रदेश- कृषिभूमि, घास का मैदान(सवाना>स्टेपी), शीतोष्ण/पर्णपाती वन, झीलें आदि| निम्न उत्पादकता वाले प्रदेश- टुंड्रा वन, हिमाच्छादित बंजर भूमि(पर्माफ्रॉस्ट), पर्वत चोटी, मरुस्थल आदि| विश्व की औसत शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 320 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्ष है जबकि उष्णकटिबंधीय वर्षावनों तथा दलदली एवं ज्वारनदमुख क्षेत्रों में शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 2000 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्षहोती है|
##Question:पारितंत्रीय उत्पादकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | इसके मापन के तरीकों का उल्लेख करते हुए विभिन्न पारितंत्रीय उत्पादक क्षेत्रो/ प्रदेशों की चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) Explain the concept of ecological productivity. Describing the method of its measuring, discuss the various ecological productive regions. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता को परिभाषित कीजिये| दूसरे भाग में पारिस्थितिकीय उत्पादकता के मापन करने के तरीकों के बारे में बताईये| अंतिम भाग में विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेशों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- किसी भी पारितंत्र में संचित ऊर्जा अथवा जैव-भार का प्रति वर्ग मीटर प्रति ईकाई समय बनना पारिस्थितिकीय उत्पादकता कहलाता है| इसका आकलन सामान्यतः किलोकैलोरी या किलोजुल प्रति वर्ग मीटरप्रति वर्षके रूप में किया जाता है|यह 2 प्रकार की होती है | प्राथमिक उत्पादकता- किसी पारितंत्र में सभी स्वपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | द्वितीयक उत्पादकता- सभी परपोषियों द्वारा ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | पारिस्थितिकीय तंत्र की उत्पादकतादो कारकों पर निर्भरकरती है- प्राथमिक उत्पादक को सुलभ होने वाली सौर-ऊर्जा की मात्रा हरे पेड़-पौधों द्वारा सौर-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करने की क्षमता पारिस्थितिकीय उत्पादकता का मापन2 प्रकार से किया जाता है- सकल उत्पादकता - कुल ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | शुद्ध उत्पादकता- श्वसन क्रिया के बाद शेष ऊर्जा अथवा जैवभार की मात्रा | अर्थात,शुद्ध उत्पादकता = सकल उत्पादकता - श्वसन द्वारा नष्ट ऊर्जा की मात्रा | प्राथमिक उत्पादकता(स्वपोषी) के संदर्भ में,शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता(NPP)=सकल प्राथमिक उत्पादकता(GPP) - श्वसन क्रिया द्वितीयक उत्पादकता(परपोषी) के संदर्भ में, शुद्ध द्वितीयक उत्पादकता (NSP)=सकल द्वितीयक उत्पादकता(GSP) - श्वसन क्रिया विभिन्न स्थानों पर उत्पादकता- निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर जाने पर उत्पादकता कम होती है| निम्न ऊँचाई से उच्च ऊँचाई पर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों की अपेक्षा महाद्वीपों की उत्पादकता ज्यादा होती है| तट से दूर जाने पर उत्पादकता कम होती है| महासागरों में गहराई में जाने पर उत्पादकता कम होते जाती है| विभिन्न पारिस्थितिकीय उत्पादक प्रदेश- अधिक उत्पादकता वाले प्रदेश- वर्षावन, मैंग्रोव वन, नमभूमियां, ज्वारनदमुख, प्रवाल-भितियाँआदि| मध्यम उत्पादकता वाले प्रदेश- कृषिभूमि, घास का मैदान(सवाना>स्टेपी), शीतोष्ण/पर्णपाती वन, झीलें आदि| निम्न उत्पादकता वाले प्रदेश- टुंड्रा वन, हिमाच्छादित बंजर भूमि(पर्माफ्रॉस्ट), पर्वत चोटी, मरुस्थल आदि| विश्व की औसत शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 320 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्ष है जबकि उष्णकटिबंधीय वर्षावनों तथा दलदली एवं ज्वारनदमुख क्षेत्रों में शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता 2000 ग्राम प्रति वर्गमीटर प्रतिवर्षहोती है|
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समदाब रेखा एवं दाब प्रवणता बल के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिये। इसके साथ ही पवन के संचलन को प्रभावित करने वाले कारकों का विवरण दीजिए। (150- 200 शब्द) Explain the relationship between the Isobar and pressure gradient force. Along with this, describe the factors affecting the movement of the wind. (150- 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में समदाब रेखा एवं दाब प्रवणता बल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में समदाब रेखा एवं दाब प्रवणता बल के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में पवन के संचलन को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पृथ्वी पर समान दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं| दाब में अंतर को दाब प्रवणता कहते हैं इससे उत्पन्न बल जो वायु को उच्च दाबसे निम्न वायुदाब की ओर ढकेलता है उसे दाब प्रवणता बल कहते हैं| दाब प्रवणता बल वायु के संचलन का सबसे बड़ा कारण होता है| दाब प्रवणता बल की दिशा समदाब रेखा के सदैव लम्बवत होती है| चूँकि यह बल पवन की दिशा का मुख्य निर्धारक है अतः पवन, समदाब रेखा की लम्बवत दिशा में आरम्भ होती है| जब वायु का संचलन क्षैतिज दिशा में हो तो उसे पवन कहते हैं जबकि लम्बवत दिशा में प्रवाहमान वायु को वायुधारा कहते हैं यह दो प्रकार की होती है यथा संवहनीय धारा(ऊपर की ओर ) एवं नीचे के ओर चलने वाली अवतलित धारा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पवन के संचलन के प्रारम्भ होने में दाब प्रवणता बल एवं समदाब रेखा के मध्य का सम्बन्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| जहाँ संचलन को आरम्भ करने में उपरोक्त सम्बन्ध का महत्त्व है वहीँ वायु के संचलन के लिए अन्य कारक उत्तरदायी होते हैं जो निम्नलिखित हैं- पवन के संचलन को प्रभावित करने वाले कारक दाब प्रवणता बल दाब प्रवणता बल जितना अधिक होगा पवन की गति उतनी ही तीव्र होगी(समानुपाती) पवन की दिशा सामान्य तौर पर दाब प्रवणता बल का अनुसरण करती है| दाब प्रवणता बल निम्न वायुदाब की तीव्रता का निर्धारण करता है, परिणामस्वरुप निम्न वायुदाब में आने वाली पवन की मात्रा दाब प्रवणता बल के समानुपाती होती है| दाब प्रवणता बल निम्न वायुदाब के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण करता है| कोरियोलिस बल यह एक आभासी बल है जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होता है, पवन सामान्य तौर पर समदाब रेखा को समकोण पर काटती है लेकिन कोरियोलिस बल पवन की दिशा को बदल देता है कोरियोलिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में पवन अपने दाहिनी ओर जबकि दक्षिणी गोलार्ध में अपने बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है कोरियोलिस बल की दिशा पवन के लम्बवत होती है पवन की गति के कारण कोरियोलिस बल एवं दाब प्रवणता बल में समानुपाती सम्बन्ध होता है सामान्य तौर पर कोरियोलिस बल का मान दाब प्रवणता बल से अधिक नहीं हो सकता परन्तु यह उसके बराबर हो सकता है जब कोरियोलिस बल दाब प्रवणता बल के बराबर हो जाता है तब उसकी दिशा दाब प्रवणता बल की दिशा के विपरीत हो जाती है| ऐसी स्थिति में पवन समदाब रेखा के सामानांतर चलने लगती है| इस पवन को भू-विक्षेपी पवन कहते हैं| पवन की दिशा, दाब प्रवणता बल एवं कोरियोलिस बल का सामूहिक परिणाम होती है, पवन विक्षेपित होते होते एक समय पर समदाब रेखा के समानांतर संचालित होने लगती है दाब प्रवणता बल की दिशा सदैव लम्बवत होती है किन्तु कोरियोलिस बल की दिशा बदलती रहती है| घर्षण बल धरातल पर उच्चावच(relief) जैसे स्थालाकृतियों की उपस्थिति के कारण जो प्रतिरोध उत्पन्न होता है उसे घर्षण बल कहते हैं| ये बल विशेष रूप से महाद्वीपीय क्षेत्र में अधिक पाया जाता है इस बल की उपस्थिति की औसत उचाई 800 मीटर मानी जाती है घर्षण बल की उपस्थिति में पवन की गति घट जाती है अर्थात ये कोरिओलिस बल के लिए ऋणात्मक स्थिति उत्पन्न करता है या प्रतिकूल होता है यही कारण है कि धरातल पर कोरियोलिस बल अपने आधिक्य की प्राप्ति नहीं कर पाता है अर्थात दाब प्रवणता बल की बराबरी नहीं कर पाता है इसके परिणाम स्वरुप भू-विक्षेपी पवनें सतह/धरातल के पास निर्मित नहीं हो पाती हैं, अर्थात यह एक वायुमंडलीय परिघटना है पवनों का विक्षेपण महासागर के ऊपर अपेक्षाकृत अधिक होता है क्योंकि महासागर क्षेत्र में घर्षण बल कम होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जहाँ पवन के संचलन का आरम्भ होने में दाब प्रवणता बल एवं समदाब रेखा के मध्य का सम्बन्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है वहीँ कुछ अन्य कारक संचलन की दशा और दिशा को प्रभावित करते हैं|
##Question:समदाब रेखा एवं दाब प्रवणता बल के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिये। इसके साथ ही पवन के संचलन को प्रभावित करने वाले कारकों का विवरण दीजिए। (150- 200 शब्द) Explain the relationship between the Isobar and pressure gradient force. Along with this, describe the factors affecting the movement of the wind. (150- 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में समदाब रेखा एवं दाब प्रवणता बल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में समदाब रेखा एवं दाब प्रवणता बल के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में पवन के संचलन को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पृथ्वी पर समान दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं| दाब में अंतर को दाब प्रवणता कहते हैं इससे उत्पन्न बल जो वायु को उच्च दाबसे निम्न वायुदाब की ओर ढकेलता है उसे दाब प्रवणता बल कहते हैं| दाब प्रवणता बल वायु के संचलन का सबसे बड़ा कारण होता है| दाब प्रवणता बल की दिशा समदाब रेखा के सदैव लम्बवत होती है| चूँकि यह बल पवन की दिशा का मुख्य निर्धारक है अतः पवन, समदाब रेखा की लम्बवत दिशा में आरम्भ होती है| जब वायु का संचलन क्षैतिज दिशा में हो तो उसे पवन कहते हैं जबकि लम्बवत दिशा में प्रवाहमान वायु को वायुधारा कहते हैं यह दो प्रकार की होती है यथा संवहनीय धारा(ऊपर की ओर ) एवं नीचे के ओर चलने वाली अवतलित धारा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पवन के संचलन के प्रारम्भ होने में दाब प्रवणता बल एवं समदाब रेखा के मध्य का सम्बन्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| जहाँ संचलन को आरम्भ करने में उपरोक्त सम्बन्ध का महत्त्व है वहीँ वायु के संचलन के लिए अन्य कारक उत्तरदायी होते हैं जो निम्नलिखित हैं- पवन के संचलन को प्रभावित करने वाले कारक दाब प्रवणता बल दाब प्रवणता बल जितना अधिक होगा पवन की गति उतनी ही तीव्र होगी(समानुपाती) पवन की दिशा सामान्य तौर पर दाब प्रवणता बल का अनुसरण करती है| दाब प्रवणता बल निम्न वायुदाब की तीव्रता का निर्धारण करता है, परिणामस्वरुप निम्न वायुदाब में आने वाली पवन की मात्रा दाब प्रवणता बल के समानुपाती होती है| दाब प्रवणता बल निम्न वायुदाब के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण करता है| कोरियोलिस बल यह एक आभासी बल है जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होता है, पवन सामान्य तौर पर समदाब रेखा को समकोण पर काटती है लेकिन कोरियोलिस बल पवन की दिशा को बदल देता है कोरियोलिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में पवन अपने दाहिनी ओर जबकि दक्षिणी गोलार्ध में अपने बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है कोरियोलिस बल की दिशा पवन के लम्बवत होती है पवन की गति के कारण कोरियोलिस बल एवं दाब प्रवणता बल में समानुपाती सम्बन्ध होता है सामान्य तौर पर कोरियोलिस बल का मान दाब प्रवणता बल से अधिक नहीं हो सकता परन्तु यह उसके बराबर हो सकता है जब कोरियोलिस बल दाब प्रवणता बल के बराबर हो जाता है तब उसकी दिशा दाब प्रवणता बल की दिशा के विपरीत हो जाती है| ऐसी स्थिति में पवन समदाब रेखा के सामानांतर चलने लगती है| इस पवन को भू-विक्षेपी पवन कहते हैं| पवन की दिशा, दाब प्रवणता बल एवं कोरियोलिस बल का सामूहिक परिणाम होती है, पवन विक्षेपित होते होते एक समय पर समदाब रेखा के समानांतर संचालित होने लगती है दाब प्रवणता बल की दिशा सदैव लम्बवत होती है किन्तु कोरियोलिस बल की दिशा बदलती रहती है| घर्षण बल धरातल पर उच्चावच(relief) जैसे स्थालाकृतियों की उपस्थिति के कारण जो प्रतिरोध उत्पन्न होता है उसे घर्षण बल कहते हैं| ये बल विशेष रूप से महाद्वीपीय क्षेत्र में अधिक पाया जाता है इस बल की उपस्थिति की औसत उचाई 800 मीटर मानी जाती है घर्षण बल की उपस्थिति में पवन की गति घट जाती है अर्थात ये कोरिओलिस बल के लिए ऋणात्मक स्थिति उत्पन्न करता है या प्रतिकूल होता है यही कारण है कि धरातल पर कोरियोलिस बल अपने आधिक्य की प्राप्ति नहीं कर पाता है अर्थात दाब प्रवणता बल की बराबरी नहीं कर पाता है इसके परिणाम स्वरुप भू-विक्षेपी पवनें सतह/धरातल के पास निर्मित नहीं हो पाती हैं, अर्थात यह एक वायुमंडलीय परिघटना है पवनों का विक्षेपण महासागर के ऊपर अपेक्षाकृत अधिक होता है क्योंकि महासागर क्षेत्र में घर्षण बल कम होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जहाँ पवन के संचलन का आरम्भ होने में दाब प्रवणता बल एवं समदाब रेखा के मध्य का सम्बन्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है वहीँ कुछ अन्य कारक संचलन की दशा और दिशा को प्रभावित करते हैं|
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