Question
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यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का विभाजन एक "कागजी विभाजन" था, जो नव साम्राज्यवाद का ही परिणाम था| विश्लेषण कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Partition of Africa by European powers was a “Paper Partition” which was the result of Neo imperialism. Analyze. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण;- भूमिका में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका के विभाजन को संक्षेप में समझाइए। उत्तर के पहले भाग में नव साम्राज्यवाद को समझाते हुए उसकी साम्राज्यवाद से संक्षिप्त तुलना कीजिये। उत्तर के दूसरे भाग में अफ्रीका विभाजन के पीछे निहित कारणो को बताते हुए तात्कालिक घटनाक्रमो को भी बताइये। उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष में अफ्रीका के विभाजन के कागजी विभाजन होने के तथ्य की पुष्टि कीजिये। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका महाद्वीप का विभाजनमहज एककागजी विभाजन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यूरोपीय शक्तियों ने अपने आर्थिक हितों की दृष्टि से अफ्रीका के विभिन्न देशों को कागजों पर ज्यामितीय रूप में बांट दिया। जबकि बंटवारे में वहां कीनतो भौगोलिक स्थिति को और न ही नृजातीयविविधताको ध्यान में रखा गया। यूरोपीय शक्तियों द्वारा असभ्य और अश्वेत लोगों को सभ्य बनाने जैसी विचारधारा का सहयोग लिया गया और अपनी साम्राज्यवादी नीति को सैद्धांतिक आवरण में छुपाने का प्रयास किया गया। साथ ही साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा इसे राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा गया और धार्मिक रंग भी दे दिया गया। यूरोपीय शक्तियों द्वारा जैसे कि ब्रिटेन में इसे वाइट मैन बर्डन और फ्रांस में कल्चरल मिशन का नाम दिया गया,तो वहीं अमेरिका में इसको एंगलो अमेरिकन छत्रछाया के रूप में देखा गया। अफ्रीका में यूरोपियों शक्ति के प्रचार प्रसार में ईसाई मिशनरियों नेभीप्रमुख भूमिका अदाकिया।जिन्होंने ईसाई धर्म के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से अफ्रीका के आंतरिक भागों का भ्रमण किया और वहां की भौगोलिक औरनृजातीयविविधतासेयूरोपियों को अवगत कराया।साथ ही तत्कालिक अफ्रीकी परिस्थितियों ने भी साम्राज्यवादी यूरोपीय शक्तियों के मार्ग को सुगम बनाया जैसे अफ्रीकी महाद्वीप में राष्ट्रीय एकता और शक्तिशाली राज्यों काआभाव,विभिन्न जातीय समूहों में आपसी फूट,कमजोर सैन्य शक्ति और तकनीकी पिछड़ापन इसके प्रमुख कारण थे। साम्राज्यवाद जहां एक शोषणकारी अवधारणा है और मुख्यतः16वी-19वीशताब्दी के मध्य अस्तित्व में आई थी । वहीनवसाम्राज्यवादी अवधारणा,साम्राज्यवाद से कहीं अधिकशोषणकारीऔर आक्रामक स्वरूप वाली थी, जो19वीं शताब्दी केमध्य मेंविकसित हुई। पुरानी साम्राज्यवादी व्यवस्था जहां व्यापार के अनुकूल दशाओं को ध्यान में रखते हुए सीमित उद्देश्य के लिए कार्यान्वित की जाती थी,वहींनवसाम्राज्यवादी अवधारणा चरित्र व उद्देश्य में पूर्णरूप से अलग थी और औद्योगिकराष्ट्रोंकी जरूरत और प्रतिस्पर्धा का परिणाम थी। यह राजनीतिवअर्थव्यवस्था पर सीधे नियंत्रण के माध्यम से उपनिवेशोंका अधिकतम शोषण करने के उद्देश्य से संचालित थी।नवउपनिवेशवादी व्यवस्था में निवेश की सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष व्यापक नियंत्रण पर बल दिया गया और इसके परिणाम स्वरूप अफ्रीकी महाद्वीप में राजनीतिक हस्तक्षेप और वर्चस्व के लिए युद्ध की शुरुआत हुई। व्यापार और युद्ध में विजय के लिए प्रशासनिक और सैन्य मशीनरी की भी स्थापना की गई । अफ्रीका का विभाजन नवसाम्राज्यवादीचरणमें कुछ ही दशकों के भीतर संपूर्ण अफ्रीका का विभाजन साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा पूर्ण कर लिया गया। जहां1870के समय अफ्रीका के10%भूभाग पर साम्राज्यवादी शक्तियों का अधिकार था,वहीं1900ई0तक आते-आते अफ्रीका के लगभग90%भूभाग पर साम्राज्यवादी शक्तियों का विस्तार हो गया। बर्लिन सम्मेलन और बिस्मार्क द्वारा अफ्रीकी महाद्वीप में जर्मनी के हिस्से की मांग इस प्रतिस्पर्धा को और ज्यादा बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई । बिस्मार्क द्वारा यह कहा जाना कि हमें भी अफ्रीका में हिस्सा चाहिए और बर्लिन सम्मेलन में अफ्रीका पर नियंत्रण के उद्देश्य से नियम निर्माण जैसे कारक यूरोपीय शक्तियों के अफ्रीकी प्रसार में सहायक थे । अफ्रीकी विभाजन एक प्रकार का कागजी विभाजन इसलिए भी था,क्योंकि इसमें किसी भी अफ्रीकी देश का प्रतिनिधित्व नहीं था और जहां आपसी नियंत्रण के लिएयूरोपीयसाम्राज्यवादी शक्तियों में संघर्ष और तनाव की शुरुआत हुई।मोरक्को पर अधिकार के लिए जहां फ्रांस और जर्मनी में तनाव उत्पन्न हुआ। वहीं सूडान पर नियंत्रण के लिए ब्रिटेन और फ्रांस में तनाव उत्पन्न हुआ। बोअर युद्ध को लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में उत्पन्न तनाव आपसीवर्चस्व को दिखाता है। हालांकि अधिकतरतनाव का शांतिपूर्ण समाधान हुआ,फिर भी इस प्रक्रिया में किसी न किसी शक्ति को अपमानित होना पड़ा । अफ्रीका पर नियंत्रण में पुरानी शक्तियों में ब्रिटेन और फ्रांस की स्थिति सर्वाधिक मजबूत रही। ब्रिटेन ने मिस्र,नाइजीरिया,दक्षिण अफ्रीका,जिंबॉब्वे,केन्या और सूडान पर कब्जा किया तो फ्रांस ने अल्जीरिया,मेडागास्कर,ट्यूनीशिया और मोरक्को पर कब्जा किया।इसके अतिरिक्त अन्य पुरानी शक्तियों में पुर्तगाल और स्पेन की स्थिति कमजोर रही। हालांकि पुर्तगाल ने भी अंगोला व मोजांबिक पर कब्जा किया।नई शक्तियों में जर्मनी ने तंजानिया और कैमरून पर नियंत्रण कायम किया तो इटली ने लीबियावसोमालिया तथा बेल्जियम ने कांगो पर नियंत्रण स्थापित किया। अफ्रीका पर नियंत्रण की मुख्य प्रेरणा आर्थिक थी,हालांकि यूरोपीय शक्तियों के मध्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने भी इसे प्रभावित किया। जैसे फ्रांस और इटली के मध्यप्रतिस्पर्धा।अफ्रीकी बंटवारे में यूरोपीय शक्तियों का वर्चस्व देखा गया। हालांकि जापान और अमेरिका जैसेनवसाम्राज्यवादी शक्तियां प्रशांत महासागर में ही अधिक सक्रियरहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का विभाजन एक भौगोलिक औरनृजातीय आधार पर विभाजन न होकर महज एक कागज़ी विभाजन था,जो कि उनके आर्थिक हितों से संचालित था और निवेश कों बचाने के लिए अफ्रीकी देशों के आंतरिक भागों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के माध्यम से उन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए और अपने हितों की रक्षा केउदेश्य सेसंचालित था।
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##Question:यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का विभाजन एक "कागजी विभाजन" था, जो नव साम्राज्यवाद का ही परिणाम था| विश्लेषण कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Partition of Africa by European powers was a “Paper Partition” which was the result of Neo imperialism. Analyze. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण;- भूमिका में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका के विभाजन को संक्षेप में समझाइए। उत्तर के पहले भाग में नव साम्राज्यवाद को समझाते हुए उसकी साम्राज्यवाद से संक्षिप्त तुलना कीजिये। उत्तर के दूसरे भाग में अफ्रीका विभाजन के पीछे निहित कारणो को बताते हुए तात्कालिक घटनाक्रमो को भी बताइये। उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष में अफ्रीका के विभाजन के कागजी विभाजन होने के तथ्य की पुष्टि कीजिये। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका महाद्वीप का विभाजनमहज एककागजी विभाजन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यूरोपीय शक्तियों ने अपने आर्थिक हितों की दृष्टि से अफ्रीका के विभिन्न देशों को कागजों पर ज्यामितीय रूप में बांट दिया। जबकि बंटवारे में वहां कीनतो भौगोलिक स्थिति को और न ही नृजातीयविविधताको ध्यान में रखा गया। यूरोपीय शक्तियों द्वारा असभ्य और अश्वेत लोगों को सभ्य बनाने जैसी विचारधारा का सहयोग लिया गया और अपनी साम्राज्यवादी नीति को सैद्धांतिक आवरण में छुपाने का प्रयास किया गया। साथ ही साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा इसे राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा गया और धार्मिक रंग भी दे दिया गया। यूरोपीय शक्तियों द्वारा जैसे कि ब्रिटेन में इसे वाइट मैन बर्डन और फ्रांस में कल्चरल मिशन का नाम दिया गया,तो वहीं अमेरिका में इसको एंगलो अमेरिकन छत्रछाया के रूप में देखा गया। अफ्रीका में यूरोपियों शक्ति के प्रचार प्रसार में ईसाई मिशनरियों नेभीप्रमुख भूमिका अदाकिया।जिन्होंने ईसाई धर्म के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से अफ्रीका के आंतरिक भागों का भ्रमण किया और वहां की भौगोलिक औरनृजातीयविविधतासेयूरोपियों को अवगत कराया।साथ ही तत्कालिक अफ्रीकी परिस्थितियों ने भी साम्राज्यवादी यूरोपीय शक्तियों के मार्ग को सुगम बनाया जैसे अफ्रीकी महाद्वीप में राष्ट्रीय एकता और शक्तिशाली राज्यों काआभाव,विभिन्न जातीय समूहों में आपसी फूट,कमजोर सैन्य शक्ति और तकनीकी पिछड़ापन इसके प्रमुख कारण थे। साम्राज्यवाद जहां एक शोषणकारी अवधारणा है और मुख्यतः16वी-19वीशताब्दी के मध्य अस्तित्व में आई थी । वहीनवसाम्राज्यवादी अवधारणा,साम्राज्यवाद से कहीं अधिकशोषणकारीऔर आक्रामक स्वरूप वाली थी, जो19वीं शताब्दी केमध्य मेंविकसित हुई। पुरानी साम्राज्यवादी व्यवस्था जहां व्यापार के अनुकूल दशाओं को ध्यान में रखते हुए सीमित उद्देश्य के लिए कार्यान्वित की जाती थी,वहींनवसाम्राज्यवादी अवधारणा चरित्र व उद्देश्य में पूर्णरूप से अलग थी और औद्योगिकराष्ट्रोंकी जरूरत और प्रतिस्पर्धा का परिणाम थी। यह राजनीतिवअर्थव्यवस्था पर सीधे नियंत्रण के माध्यम से उपनिवेशोंका अधिकतम शोषण करने के उद्देश्य से संचालित थी।नवउपनिवेशवादी व्यवस्था में निवेश की सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष व्यापक नियंत्रण पर बल दिया गया और इसके परिणाम स्वरूप अफ्रीकी महाद्वीप में राजनीतिक हस्तक्षेप और वर्चस्व के लिए युद्ध की शुरुआत हुई। व्यापार और युद्ध में विजय के लिए प्रशासनिक और सैन्य मशीनरी की भी स्थापना की गई । अफ्रीका का विभाजन नवसाम्राज्यवादीचरणमें कुछ ही दशकों के भीतर संपूर्ण अफ्रीका का विभाजन साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा पूर्ण कर लिया गया। जहां1870के समय अफ्रीका के10%भूभाग पर साम्राज्यवादी शक्तियों का अधिकार था,वहीं1900ई0तक आते-आते अफ्रीका के लगभग90%भूभाग पर साम्राज्यवादी शक्तियों का विस्तार हो गया। बर्लिन सम्मेलन और बिस्मार्क द्वारा अफ्रीकी महाद्वीप में जर्मनी के हिस्से की मांग इस प्रतिस्पर्धा को और ज्यादा बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई । बिस्मार्क द्वारा यह कहा जाना कि हमें भी अफ्रीका में हिस्सा चाहिए और बर्लिन सम्मेलन में अफ्रीका पर नियंत्रण के उद्देश्य से नियम निर्माण जैसे कारक यूरोपीय शक्तियों के अफ्रीकी प्रसार में सहायक थे । अफ्रीकी विभाजन एक प्रकार का कागजी विभाजन इसलिए भी था,क्योंकि इसमें किसी भी अफ्रीकी देश का प्रतिनिधित्व नहीं था और जहां आपसी नियंत्रण के लिएयूरोपीयसाम्राज्यवादी शक्तियों में संघर्ष और तनाव की शुरुआत हुई।मोरक्को पर अधिकार के लिए जहां फ्रांस और जर्मनी में तनाव उत्पन्न हुआ। वहीं सूडान पर नियंत्रण के लिए ब्रिटेन और फ्रांस में तनाव उत्पन्न हुआ। बोअर युद्ध को लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में उत्पन्न तनाव आपसीवर्चस्व को दिखाता है। हालांकि अधिकतरतनाव का शांतिपूर्ण समाधान हुआ,फिर भी इस प्रक्रिया में किसी न किसी शक्ति को अपमानित होना पड़ा । अफ्रीका पर नियंत्रण में पुरानी शक्तियों में ब्रिटेन और फ्रांस की स्थिति सर्वाधिक मजबूत रही। ब्रिटेन ने मिस्र,नाइजीरिया,दक्षिण अफ्रीका,जिंबॉब्वे,केन्या और सूडान पर कब्जा किया तो फ्रांस ने अल्जीरिया,मेडागास्कर,ट्यूनीशिया और मोरक्को पर कब्जा किया।इसके अतिरिक्त अन्य पुरानी शक्तियों में पुर्तगाल और स्पेन की स्थिति कमजोर रही। हालांकि पुर्तगाल ने भी अंगोला व मोजांबिक पर कब्जा किया।नई शक्तियों में जर्मनी ने तंजानिया और कैमरून पर नियंत्रण कायम किया तो इटली ने लीबियावसोमालिया तथा बेल्जियम ने कांगो पर नियंत्रण स्थापित किया। अफ्रीका पर नियंत्रण की मुख्य प्रेरणा आर्थिक थी,हालांकि यूरोपीय शक्तियों के मध्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने भी इसे प्रभावित किया। जैसे फ्रांस और इटली के मध्यप्रतिस्पर्धा।अफ्रीकी बंटवारे में यूरोपीय शक्तियों का वर्चस्व देखा गया। हालांकि जापान और अमेरिका जैसेनवसाम्राज्यवादी शक्तियां प्रशांत महासागर में ही अधिक सक्रियरहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का विभाजन एक भौगोलिक औरनृजातीय आधार पर विभाजन न होकर महज एक कागज़ी विभाजन था,जो कि उनके आर्थिक हितों से संचालित था और निवेश कों बचाने के लिए अफ्रीकी देशों के आंतरिक भागों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के माध्यम से उन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए और अपने हितों की रक्षा केउदेश्य सेसंचालित था।
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Is the President of India merely a rubber stamp. Critically analyze. (10 Marks/150 words)
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Ans. Approach 1.Brief introduction with quoting the statement of Dr Ambedkar relating to the position of president 2. Highlighting the arguments supporting the president is a rubber stamp. 3. Give arguments with examples supporting president not being a rubber stamp. 4. Conclude the answer with the opinion. In Indian constitutional structure, the President occupies a unique position. Dr B.R. Ambedkar specified that the position of President is similar to that of the king under the English Constitution. He represents the nation but does not rule the nation. Similar to the position of British Queen, the Indian president is also considered a rubber stamp because: 1. President is the head of the State, not of the Government. The real power vests in the Council of Ministers. 2. India does not have the Presidential form of Government. The parliamentary system in India ensures that the government is responsible to Lok Sabha. 3. British tradition still prevails in the Indian constitution 4. The Constitution 42nd Amendment Act, 1976: provided that “there shall be a Council of Ministers with the Prime Minister at the head to aid and advise the President who shall, in the exercise of his functions, act in accordance with such advice.” 5. Supreme Court Judgements as given in cases like Shamsher Singhv. the State of Punjab and Ram Jawaya Kapurv.State of Punjab that the President in practice has no powers at all. However, many experts believe that he is not merely a rubber stamp as: 1. Presidential Oath: While ministers and members of parliament bear true faith and allegiance to the Constitution, the President takes the oath to “protect and defend the Constitution and the law”. 2. Veto powers: By postponing his assent to the Post Office Amendment Bill, PresidentZail Singhprevented a law from coming into force which would have violated the privacy of personal correspondence. Also, President Kalam refused to sign an office of profit bill. President Sharma sent the draft ordinances back to the government 3. Article 74(1) of the Constitution : Gives elbow room to the President to act. For example; the Narasimha Rao government placed two ordinances before President Shankar Dayal Sharma for promulgation. President Sharma sent the draft ordinances back to the government which was widely circulated by the media and the government had to drop those ordinances. 4. Public Speeches: They also make public speeches which indicate, at least subtly, "some differences of view with the government, and which may swing public opinion".President Pranab Mukherjee has repeatedly called for preserving pluralism and promoting tolerance in the country. 5.They also have some freedom to decide whether to accept a prime minister"s request for dissolving the parliament to enable a general election. Hence, it can be concluded that the constitution has given the president of India powers to protect and defend the former. The status of the position of the Indian President is somewhere in between the British Crown and that of the American President.
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##Question:Is the President of India merely a rubber stamp. Critically analyze. (10 Marks/150 words)##Answer:Ans. Approach 1.Brief introduction with quoting the statement of Dr Ambedkar relating to the position of president 2. Highlighting the arguments supporting the president is a rubber stamp. 3. Give arguments with examples supporting president not being a rubber stamp. 4. Conclude the answer with the opinion. In Indian constitutional structure, the President occupies a unique position. Dr B.R. Ambedkar specified that the position of President is similar to that of the king under the English Constitution. He represents the nation but does not rule the nation. Similar to the position of British Queen, the Indian president is also considered a rubber stamp because: 1. President is the head of the State, not of the Government. The real power vests in the Council of Ministers. 2. India does not have the Presidential form of Government. The parliamentary system in India ensures that the government is responsible to Lok Sabha. 3. British tradition still prevails in the Indian constitution 4. The Constitution 42nd Amendment Act, 1976: provided that “there shall be a Council of Ministers with the Prime Minister at the head to aid and advise the President who shall, in the exercise of his functions, act in accordance with such advice.” 5. Supreme Court Judgements as given in cases like Shamsher Singhv. the State of Punjab and Ram Jawaya Kapurv.State of Punjab that the President in practice has no powers at all. However, many experts believe that he is not merely a rubber stamp as: 1. Presidential Oath: While ministers and members of parliament bear true faith and allegiance to the Constitution, the President takes the oath to “protect and defend the Constitution and the law”. 2. Veto powers: By postponing his assent to the Post Office Amendment Bill, PresidentZail Singhprevented a law from coming into force which would have violated the privacy of personal correspondence. Also, President Kalam refused to sign an office of profit bill. President Sharma sent the draft ordinances back to the government 3. Article 74(1) of the Constitution : Gives elbow room to the President to act. For example; the Narasimha Rao government placed two ordinances before President Shankar Dayal Sharma for promulgation. President Sharma sent the draft ordinances back to the government which was widely circulated by the media and the government had to drop those ordinances. 4. Public Speeches: They also make public speeches which indicate, at least subtly, "some differences of view with the government, and which may swing public opinion".President Pranab Mukherjee has repeatedly called for preserving pluralism and promoting tolerance in the country. 5.They also have some freedom to decide whether to accept a prime minister"s request for dissolving the parliament to enable a general election. Hence, it can be concluded that the constitution has given the president of India powers to protect and defend the former. The status of the position of the Indian President is somewhere in between the British Crown and that of the American President.
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"हालांकि यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, गुटबंदी तथा सैन्यवाद प्रथम विश्वयुद्ध के मुख्य कारण माने जाते हैं लेकिन जर्मनी की उग्र नीतियाँ तथा एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव भी उतने ही प्रमुख रूप से युद्ध हेतु उतरदायी थें|" कथन का विश्लेषण कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) "Although Imperialist Competition,Grouping and Militarismbetween European nations are considered the main causes of First World War, But Germany"s fiery policies and the lack of an international institution were equally responsible for the war". Analyze the statement. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, प्रथम विश्वयुद्ध के मुख्य कारणों के रूप मेंयूरोपीय राष्ट्रों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, गुटबंदी तथा सैन्यवाद की भूमिका को दर्शाईये| साथ ही, विश्वयुद्ध के अन्य कारणों के रूप मेंजर्मनी की उग्र नीतियाँ तथा एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव जैसे आयामों की भूमिका का भी उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः इस संदर्भ में अपनी राय को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- 28 जुलाई 1914 से प्रारंभ होकर 11 नवंबर 1918 तक चलने वाले प्रथम विश्व युद्ध के मूल में साम्राज्यवादी शक्तियों के मध्य उपनिवेशों को प्राप्त करने की होड़ थी| यूरोपीय राष्ट्रों में राष्ट्रीयता की भावना का तेजी से विकास, इटली एवं जर्मनी का एकीकरण आदि कारणों से यूरोपीय राजनीति में एक परिवर्तन आया जिससे राष्ट्रीयता एवं सैन्यवाद की भावना को बल मिला तथा राष्ट्रों के मध्य अविश्वास की वजह से यूरोपीय राजनीतिक वातावरण तनावग्रस्त हो गया| इस तनाव की चरम परिणति प्रथम विश्व युद्ध के रूप में सामने आई| प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारण यूरोपीय देशों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा - जर्मनी तथा इटली के एकीकरण से पहले ही अधिकतर यूरोपीय राष्ट्रों ने एशिया एवं अफ्रीका में अपने-अपनेउपनिवेश स्थापित कर लिए थे| 1890 में बिस्मार्क के त्यागपत्र के बाद जर्मन सम्राट बिलियन कैसर के नेतृत्व में जर्मनी ने साम्राज्यवादी नीति अख्तियार की| अधिकतर एशिया तथा अफ्रीका में यूरोपीय राष्ट्रों के पहले से ही उपनिवेश थे तथा जर्मनी एवं इटली उन देशों से उनके उपनिवेश छिनना चाहते थे| इस परिस्थिति में दूसरे देश यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे जिसके फलस्वरूप हितों की टकराहट हुई तथा संघर्ष अवश्यंभावी हो गया| गुटबंदी- युद्ध से पूर्व यूरोपीय राष्ट्रों के बीच गुटबंदी ने भी तनाव को बढ़ाने में योगदान दिया| जर्मनी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बिस्मार्क ने इसकी पहल की थी| 1882 तक ट्रिपल एलायंस(जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इटली) नामक गुट का निर्माण हो चूका था| 1890 के दशक में यूरोपीय राष्ट्रों को इस गुटबंदी की जानकारी हुई तो अविश्वास एवं संदेह का वातावरण निर्मित होने लगा| शीघ्र ही प्रति-गुट की दिशा में प्रयास चालू होने लगा | 1894 में फ़्रांस-रूस के बीच समझौता; 1904 में ब्रिटेन-फ़्रांस तथा 1907 में ब्रिटेन-रूस के बीच समझौते हुयें| सामान्य परिस्थितियों में ब्रिटेन-फ़्रांस-रूस के बीच समझौता संभव नहीं था परन्तु जर्मन गुट के दबाव ने कुछ हद तक इसे संभव बनाया| हालाँकि यह समझौता व्यापारिक एवं क्षेत्रीय सहयोग को लेकर था लेकिन इनके बीच बढ़ते परस्पर सहयोग को जर्मनी ने घेरेबंदी के रूप में देखा जैसे- मोरक्को संकट के दौरान| हथियारों को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी रही और इसने भी राजनीतिक वातावरण को विकृत किया| सैन्यवाद - 1870-1914 के काल को सशस्त्र शांति का काल कहा जाता है| गुटबंदी, उपनिवेशों की स्थापना, राष्ट्रीय सम्मान जैसे मुद्दों को ध्यान में रखकर जोर-शोर से युद्ध की तैयारियां जारी रहीं| इन्हीं मुद्दों पर कुछ एक अवसरों पर बड़ी शक्तियों को पीछे भी हटना पड़ा जैसे- मोरक्को में जर्मनी को तो बोस्निया संकट के दौरान रूस को| पुनः ऐसी स्थिति उत्पन ना हो इसलिए भी सशस्त्र तैयारियां जारी रहीं| साथ ही, ब्रिटेन एवं जर्मनी के बीच नौसैनिक प्रतिद्वंद्विता ने भी तनाव को नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया और किसी भी संकट के दौरान सैन्य अधिकारियों के बढ़ते हस्तक्षेप ने युद्ध का वातावरण निर्मित किया| हालाँकि उपरोक्त कारणों के अलावा निम्नलिखित कारणों ने भी प्रथम विश्वयुद्ध को प्रारंभ करने में प्रमुख भूमिका निभाया- जर्मनी की उग्रता - जर्मन शासकबिलियम कैसर अत्यंत महत्वाकांक्षी तथा उग्र व्यक्ति था| वह स्वभाव से साम्राज्यवादी था तथा पूरी दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता था| अपनी नौसेना को मजबूत करने के क्रम में उसने इंग्लैंड की शत्रुता मोल ले ली| इंग्लैंड व्यापारिक देश होने के नाते युद्ध नहीं चाहता था जिसे कैसर इंग्लैंड की कायरता समझता था| उसके स्वेच्छाचारी व्यक्तित्व ने हीयूरोप को युद्ध में ढकेल दिया| अंतरराष्ट्रीय संस्था का अभाव - हालांकि वियना सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय संस्था स्थापित करने का प्रयास किया गया था परंतु यह व्यवस्था टिक नहीं सकी| इसके पश्चात कोई ऐसी सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं बन पाई जो राष्ट्रों के बीच विवादों का निपटारा कर सके| देशों का एक दूसरे के विरुद्ध युद्धों में उलझना जैसे- रूस जापान,जर्मनी फ्रांस,ऑस्ट्रिया-बोस्निया-हर्जेगोविना आदि| इनसे अंतरराष्ट्रीय वातावरण तनावग्रस्त हो गया तथा इन राष्ट्रों के बीच विवादों को चरम अवस्था से पहुंचने से रोकने हेतु अंतरराष्ट्रीय संस्था के अभाव के कारण यह राष्ट्र आगे भी युद्धों की ओर फंसते चले गए| विकृत राष्ट्रवाद -1870 के पश्चात यूरोप में विकृत एवं राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार होता गया| प्रत्येक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए अनेक उपाय अपनाने लगे जिससे उनके बीच प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया गया| प्रतिष्ठा का प्रश्न - प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व यूरोप में कई ऐसी परिस्थितियां थी जो बड़ी शक्तियों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न बना हुआ था जैसे- अल्सास-लॉरेन को लेकर फ़्रांस-जर्मनी तनाव; जर्मनी-ब्रिटेन के बीच युद्ध से पूर्व नौसैनिक प्रतिद्वंद्विता ; दक्षिण-पूर्वी यूरोप में रूस-ऑस्ट्रिया के बीच टकराव इत्यादि| इन मुद्दों को लेकर किसी भी समय क्षेत्रीय या यूरोपीय युद्ध छिड़ने की संभावना थी| यह यूरोपीय राजनीति में स्थायी तनाव के कारण थें| अख़बारों की भूमिका - उपरोक्त विवादों को भावनात्मक रूप देने तथा राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने में अख़बारों की भी प्रमुख भूमिका रही है| इसका राजनेताओं तथा सैन्य-अधिकारियों पर दबाव भी देखा गया| तात्कालिक कारण(सेराजेवो हत्याकांड) - युद्ध का तात्कालिक कारण बना बोस्निया के सेराजेवो शहर में ऑस्ट्रियाई युवराज की स्थानीय क्रांतिकारी प्रिंसेप के द्वारा हत्या| इस मुद्दे को लेकर ऑस्ट्रिया ने सर्बिया को अल्टीमेटम दिया कि दोषी व्यक्तियों एवं संगठनों पर कार्रवाई हो तथा जाँच के लिए ऑस्ट्रियाई अधिकारियों को सर्बिया की सीमा में प्रवेश की अनुमति दी जाये| जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को समर्थन का आश्वासन दिया तो रूस ने सर्बिया को| ऑस्ट्रिया के अंतिम मांग को सर्बिया ने स्वीकार नहीं किया और जुलाई 1914 में ऑस्ट्रिया ने सर्बिया पर आक्रमण किया| रूस ने सेना को तैयार होने का आदेश दिया तो जर्मनी ने रूस को सैनिक लामबंदी रोकने को कहा| फ्रांस ने रूस का समर्थन किया तो जर्मनी ने बेल्जियम पर आक्रमण किया| बेल्जियम के मुद्दे को लेकर ब्रिटेन भी युद्ध में शामिल हुआ|1915 में लंदन में एक संधि के द्वारा इटली ब्रिटिश गुट में शामिल हुआ| जर्मनी ने 1917 में अमेरिकी जहाजों पर बमबारी की तो अमेरिका भी युद्ध में शामिल हुआ| अतः प्रथम विश्वयुद्ध के कारणों के रूप में किसी एक को मानने की जगह उपरोक्त सभी का सम्मिलित प्रभाव नजर आता है|
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##Question:"हालांकि यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, गुटबंदी तथा सैन्यवाद प्रथम विश्वयुद्ध के मुख्य कारण माने जाते हैं लेकिन जर्मनी की उग्र नीतियाँ तथा एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव भी उतने ही प्रमुख रूप से युद्ध हेतु उतरदायी थें|" कथन का विश्लेषण कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) "Although Imperialist Competition,Grouping and Militarismbetween European nations are considered the main causes of First World War, But Germany"s fiery policies and the lack of an international institution were equally responsible for the war". Analyze the statement. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, प्रथम विश्वयुद्ध के मुख्य कारणों के रूप मेंयूरोपीय राष्ट्रों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, गुटबंदी तथा सैन्यवाद की भूमिका को दर्शाईये| साथ ही, विश्वयुद्ध के अन्य कारणों के रूप मेंजर्मनी की उग्र नीतियाँ तथा एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव जैसे आयामों की भूमिका का भी उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः इस संदर्भ में अपनी राय को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- 28 जुलाई 1914 से प्रारंभ होकर 11 नवंबर 1918 तक चलने वाले प्रथम विश्व युद्ध के मूल में साम्राज्यवादी शक्तियों के मध्य उपनिवेशों को प्राप्त करने की होड़ थी| यूरोपीय राष्ट्रों में राष्ट्रीयता की भावना का तेजी से विकास, इटली एवं जर्मनी का एकीकरण आदि कारणों से यूरोपीय राजनीति में एक परिवर्तन आया जिससे राष्ट्रीयता एवं सैन्यवाद की भावना को बल मिला तथा राष्ट्रों के मध्य अविश्वास की वजह से यूरोपीय राजनीतिक वातावरण तनावग्रस्त हो गया| इस तनाव की चरम परिणति प्रथम विश्व युद्ध के रूप में सामने आई| प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारण यूरोपीय देशों के मध्य साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा - जर्मनी तथा इटली के एकीकरण से पहले ही अधिकतर यूरोपीय राष्ट्रों ने एशिया एवं अफ्रीका में अपने-अपनेउपनिवेश स्थापित कर लिए थे| 1890 में बिस्मार्क के त्यागपत्र के बाद जर्मन सम्राट बिलियन कैसर के नेतृत्व में जर्मनी ने साम्राज्यवादी नीति अख्तियार की| अधिकतर एशिया तथा अफ्रीका में यूरोपीय राष्ट्रों के पहले से ही उपनिवेश थे तथा जर्मनी एवं इटली उन देशों से उनके उपनिवेश छिनना चाहते थे| इस परिस्थिति में दूसरे देश यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे जिसके फलस्वरूप हितों की टकराहट हुई तथा संघर्ष अवश्यंभावी हो गया| गुटबंदी- युद्ध से पूर्व यूरोपीय राष्ट्रों के बीच गुटबंदी ने भी तनाव को बढ़ाने में योगदान दिया| जर्मनी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बिस्मार्क ने इसकी पहल की थी| 1882 तक ट्रिपल एलायंस(जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इटली) नामक गुट का निर्माण हो चूका था| 1890 के दशक में यूरोपीय राष्ट्रों को इस गुटबंदी की जानकारी हुई तो अविश्वास एवं संदेह का वातावरण निर्मित होने लगा| शीघ्र ही प्रति-गुट की दिशा में प्रयास चालू होने लगा | 1894 में फ़्रांस-रूस के बीच समझौता; 1904 में ब्रिटेन-फ़्रांस तथा 1907 में ब्रिटेन-रूस के बीच समझौते हुयें| सामान्य परिस्थितियों में ब्रिटेन-फ़्रांस-रूस के बीच समझौता संभव नहीं था परन्तु जर्मन गुट के दबाव ने कुछ हद तक इसे संभव बनाया| हालाँकि यह समझौता व्यापारिक एवं क्षेत्रीय सहयोग को लेकर था लेकिन इनके बीच बढ़ते परस्पर सहयोग को जर्मनी ने घेरेबंदी के रूप में देखा जैसे- मोरक्को संकट के दौरान| हथियारों को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी रही और इसने भी राजनीतिक वातावरण को विकृत किया| सैन्यवाद - 1870-1914 के काल को सशस्त्र शांति का काल कहा जाता है| गुटबंदी, उपनिवेशों की स्थापना, राष्ट्रीय सम्मान जैसे मुद्दों को ध्यान में रखकर जोर-शोर से युद्ध की तैयारियां जारी रहीं| इन्हीं मुद्दों पर कुछ एक अवसरों पर बड़ी शक्तियों को पीछे भी हटना पड़ा जैसे- मोरक्को में जर्मनी को तो बोस्निया संकट के दौरान रूस को| पुनः ऐसी स्थिति उत्पन ना हो इसलिए भी सशस्त्र तैयारियां जारी रहीं| साथ ही, ब्रिटेन एवं जर्मनी के बीच नौसैनिक प्रतिद्वंद्विता ने भी तनाव को नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया और किसी भी संकट के दौरान सैन्य अधिकारियों के बढ़ते हस्तक्षेप ने युद्ध का वातावरण निर्मित किया| हालाँकि उपरोक्त कारणों के अलावा निम्नलिखित कारणों ने भी प्रथम विश्वयुद्ध को प्रारंभ करने में प्रमुख भूमिका निभाया- जर्मनी की उग्रता - जर्मन शासकबिलियम कैसर अत्यंत महत्वाकांक्षी तथा उग्र व्यक्ति था| वह स्वभाव से साम्राज्यवादी था तथा पूरी दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता था| अपनी नौसेना को मजबूत करने के क्रम में उसने इंग्लैंड की शत्रुता मोल ले ली| इंग्लैंड व्यापारिक देश होने के नाते युद्ध नहीं चाहता था जिसे कैसर इंग्लैंड की कायरता समझता था| उसके स्वेच्छाचारी व्यक्तित्व ने हीयूरोप को युद्ध में ढकेल दिया| अंतरराष्ट्रीय संस्था का अभाव - हालांकि वियना सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय संस्था स्थापित करने का प्रयास किया गया था परंतु यह व्यवस्था टिक नहीं सकी| इसके पश्चात कोई ऐसी सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं बन पाई जो राष्ट्रों के बीच विवादों का निपटारा कर सके| देशों का एक दूसरे के विरुद्ध युद्धों में उलझना जैसे- रूस जापान,जर्मनी फ्रांस,ऑस्ट्रिया-बोस्निया-हर्जेगोविना आदि| इनसे अंतरराष्ट्रीय वातावरण तनावग्रस्त हो गया तथा इन राष्ट्रों के बीच विवादों को चरम अवस्था से पहुंचने से रोकने हेतु अंतरराष्ट्रीय संस्था के अभाव के कारण यह राष्ट्र आगे भी युद्धों की ओर फंसते चले गए| विकृत राष्ट्रवाद -1870 के पश्चात यूरोप में विकृत एवं राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार होता गया| प्रत्येक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए अनेक उपाय अपनाने लगे जिससे उनके बीच प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया गया| प्रतिष्ठा का प्रश्न - प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व यूरोप में कई ऐसी परिस्थितियां थी जो बड़ी शक्तियों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न बना हुआ था जैसे- अल्सास-लॉरेन को लेकर फ़्रांस-जर्मनी तनाव; जर्मनी-ब्रिटेन के बीच युद्ध से पूर्व नौसैनिक प्रतिद्वंद्विता ; दक्षिण-पूर्वी यूरोप में रूस-ऑस्ट्रिया के बीच टकराव इत्यादि| इन मुद्दों को लेकर किसी भी समय क्षेत्रीय या यूरोपीय युद्ध छिड़ने की संभावना थी| यह यूरोपीय राजनीति में स्थायी तनाव के कारण थें| अख़बारों की भूमिका - उपरोक्त विवादों को भावनात्मक रूप देने तथा राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने में अख़बारों की भी प्रमुख भूमिका रही है| इसका राजनेताओं तथा सैन्य-अधिकारियों पर दबाव भी देखा गया| तात्कालिक कारण(सेराजेवो हत्याकांड) - युद्ध का तात्कालिक कारण बना बोस्निया के सेराजेवो शहर में ऑस्ट्रियाई युवराज की स्थानीय क्रांतिकारी प्रिंसेप के द्वारा हत्या| इस मुद्दे को लेकर ऑस्ट्रिया ने सर्बिया को अल्टीमेटम दिया कि दोषी व्यक्तियों एवं संगठनों पर कार्रवाई हो तथा जाँच के लिए ऑस्ट्रियाई अधिकारियों को सर्बिया की सीमा में प्रवेश की अनुमति दी जाये| जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को समर्थन का आश्वासन दिया तो रूस ने सर्बिया को| ऑस्ट्रिया के अंतिम मांग को सर्बिया ने स्वीकार नहीं किया और जुलाई 1914 में ऑस्ट्रिया ने सर्बिया पर आक्रमण किया| रूस ने सेना को तैयार होने का आदेश दिया तो जर्मनी ने रूस को सैनिक लामबंदी रोकने को कहा| फ्रांस ने रूस का समर्थन किया तो जर्मनी ने बेल्जियम पर आक्रमण किया| बेल्जियम के मुद्दे को लेकर ब्रिटेन भी युद्ध में शामिल हुआ|1915 में लंदन में एक संधि के द्वारा इटली ब्रिटिश गुट में शामिल हुआ| जर्मनी ने 1917 में अमेरिकी जहाजों पर बमबारी की तो अमेरिका भी युद्ध में शामिल हुआ| अतः प्रथम विश्वयुद्ध के कारणों के रूप में किसी एक को मानने की जगह उपरोक्त सभी का सम्मिलित प्रभाव नजर आता है|
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पवनों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये| इसके साथ ही ग्लोब पर स्थित वायुदाब पेटियों के मध्य पवन संचलन का सचित्र विश्लेषण कीजिये| (200 शब्द) Introduce the classification of the winds. Along with this analyze the wind movement between the pressure belts located on the globe. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में पवन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पवनों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये 3- दूसरे भाग में ग्लोब पर स्थित वायुदाब पेटियों के मध्य पवन संचरण का विश्लेषण करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जब वायु का संचलन क्षैतिज दिशा में हो तो उसे पवन कहते हैं| लम्बवत दिशा में प्रवाहमान वायु को वायुधारा कहते हैं यह दो प्रकार की होती है यथा संवहनीय धारा एवं अवतलित धारा| पवनों को गति और स्वरुप के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है| सबसे कम गति की पवन को समीर कहते हैं जबकि मध्यम गति को पवनहैं| तीव्र गति वाली पवनों को धारा कहा जाता है| स्वरुप के आधार पर पवन को 3 रूपों में वर्गीकृत किया जाता है| प्राथमिक पवन को प्रचलित पवन / स्थायी पवन/ग्रहीय पवन/सनातनी पवन भी कहते हैं| यह साल भर चलती है, यह प्राथमिक वायुदाब पेटियों का परिणाम होती हैं और इनकी दिशा स्थायी होती है,समस्त ग्लोब को कवर करती है| इसके अंतर्गत व्यापारिक पवन, पछुआ एवं ध्रुवीय पूर्वा पवनें आती हैं| इसके अतिरिक्त द्वितीयक पवनों को कालिक पवन भी कहते हैं| इनमे समय के साथ दिशा में परिवर्तन होता है, ये द्वितीयक पेटियों का परिणाम होती हैं| इनके अतिरिक्त तीसरी श्रेणी तृतीयक पवनों की होती है जिनको स्थानीय पवन भी कहते हैं| ग्लोब पर पवन संचरण विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी और उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी के मध्य का क्षेत्र उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटीअपसरण का क्षेत्र है, इसमें चलने वाली पवनों को व्यापारिक पवन(उष्णकटिबंधीय पूर्वा) कहते हैं उत्तरी गोलार्ध में इनकी दिशाविषुवतीय निम्न वायुदाब पेटीकी ओर उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में स्थिति इसके विपरीत होती है व्यापारिक पवनों का विक्षेपण, सभीपवनों /प्रचलित पवनों में न्यूनतम होता है क्योंकि वो विषुवत रेखा की ओर आ रही होती है जहाँ पर कोरियोलिस बल न्यूनतम होता जाता है दोनों ओर से आती हवाओं का विषुवत रेखा के निकट अभिसरण होता है अतः इस क्षेत्र को अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) कहते हैं विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी को शांत क्षेत्र भी कहा जाता है क्योंकि अभिसरण क्षेत्र के मध्य भाग में पवने अनुपस्थित होती हैं| दोनों व्यापारिक पवनें अभिसरण क्षेत्र के बाहरी किनारे से ही ऊपर उठना आरम्भ हो जाती हैं इसके परिणामस्वरूप ये व्यापारिक पवनें मध्य भाग में नहीं पहुच पाती हैं| पवन रहित क्षेत्र होने के कारण इसे डोलड्रम या शांत क्षेत्र कहा जाता है | हालांकि नवीन खोज में कुछ जगहों पर पश्चिम से पूर्व चलने वाली विषुवतीय पछुआ पवन की जानकारी मिलती है जो महासागर के ऊपर पश्चिमी किनारे से पूरब की ओर संचलित होती है| यदि महासागर के पश्चिमी तट पर महाद्वीप इस प्रकार से उपस्थित हो कि वह अभिसरण के क्षेत्र में वायु के जमाव के लिए अनुकूल स्थित उत्पन्न करता हो तो शांत क्षेत्र में पश्चिम से पूरब की ओर दाब प्रवणता बल का निर्माण होता है| जिससे विषुवतीय पछुआ पवन की उत्पत्ति होती है| विषुवतीय पछुआ पवन अटलांटिक महासागर में अधिक विकसित है| यह अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में चलती है उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटीको अश्व अक्षांश भी कहते हैं उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी औरउपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटीके मध्य का क्षेत्र इस क्षेत्र में जो पवन प्रवाहित होती है उसे पछुआ पवन कहते हैं वे पवन जो उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है उसे पछुआ पवन कहते हैं मध्य अक्षांश में अवस्थित होने के कारण इसमें विक्षेपण की दर व्यापारिक पवनों से अधिक होती है इसीलिए धीरे धीरे यह लगभग पश्चिम से पूर्व की दिशा में संचलन करने लगती है परन्तु पूर्णतः पश्चिम से पूर्व की दिशा नहीं प्राप्त होती है दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ पवनें अधिक सशक्त तथा विक्षेपित होती हैं क्योंकि महासागर पर चलने के कारण घर्षण बल कम होता है जबकि नमी अधिक होती है| घर्षण बल कम होने से गति अधिक होती है जिसके कारण विक्षेपण अधिक होता है| वायु में नमी/जलवाष्प की उपस्थिति उसे और हल्का कर देती है जो इसकी गति को और बढ़ा देता है अर्थात दक्षिणी गोलार्ध की पवनें उत्तरी गोलार्ध से बहुत अधिक शक्तिशाली होती हैं|इसीलिए इसे दहाड़ता चालीसा, प्रचंड पचासा और चीखता साठा कहते हैं| ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी औरउपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटीके मध्य का क्षेत्र यह ध्रुवीय पूर्वा पवन का क्षेत्र है इसमें अधिकतम विक्षेपण होता है, क्योंकि यह अधिकतम कोरियोलिस बल वाले क्षेत्र से निकलती है उपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटी एक विशेष प्रकार का अभिसरण क्षेत्र है जहाँ पर दो अलग-अलग भौतिक गुणों वाली वायुराशियों का अभिसरण होता है| इस के परिणामस्वरुप ये वायुराशियाँ आपस में आसानी से नही मिल पाती हैं और एक संक्रमण क्षेत्र का निर्माण करती हैं जहाँ ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है|इसी संक्रमण क्षेत्र को वाताग्र कहा जाता है जहाँ पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण होता है|
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##Question:पवनों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये| इसके साथ ही ग्लोब पर स्थित वायुदाब पेटियों के मध्य पवन संचलन का सचित्र विश्लेषण कीजिये| (200 शब्द) Introduce the classification of the winds. Along with this analyze the wind movement between the pressure belts located on the globe. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पवन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में पवनों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये 3- दूसरे भाग में ग्लोब पर स्थित वायुदाब पेटियों के मध्य पवन संचरण का विश्लेषण करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जब वायु का संचलन क्षैतिज दिशा में हो तो उसे पवन कहते हैं| लम्बवत दिशा में प्रवाहमान वायु को वायुधारा कहते हैं यह दो प्रकार की होती है यथा संवहनीय धारा एवं अवतलित धारा| पवनों को गति और स्वरुप के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है| सबसे कम गति की पवन को समीर कहते हैं जबकि मध्यम गति को पवनहैं| तीव्र गति वाली पवनों को धारा कहा जाता है| स्वरुप के आधार पर पवन को 3 रूपों में वर्गीकृत किया जाता है| प्राथमिक पवन को प्रचलित पवन / स्थायी पवन/ग्रहीय पवन/सनातनी पवन भी कहते हैं| यह साल भर चलती है, यह प्राथमिक वायुदाब पेटियों का परिणाम होती हैं और इनकी दिशा स्थायी होती है,समस्त ग्लोब को कवर करती है| इसके अंतर्गत व्यापारिक पवन, पछुआ एवं ध्रुवीय पूर्वा पवनें आती हैं| इसके अतिरिक्त द्वितीयक पवनों को कालिक पवन भी कहते हैं| इनमे समय के साथ दिशा में परिवर्तन होता है, ये द्वितीयक पेटियों का परिणाम होती हैं| इनके अतिरिक्त तीसरी श्रेणी तृतीयक पवनों की होती है जिनको स्थानीय पवन भी कहते हैं| ग्लोब पर पवन संचरण विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी और उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी के मध्य का क्षेत्र उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटीअपसरण का क्षेत्र है, इसमें चलने वाली पवनों को व्यापारिक पवन(उष्णकटिबंधीय पूर्वा) कहते हैं उत्तरी गोलार्ध में इनकी दिशाविषुवतीय निम्न वायुदाब पेटीकी ओर उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में स्थिति इसके विपरीत होती है व्यापारिक पवनों का विक्षेपण, सभीपवनों /प्रचलित पवनों में न्यूनतम होता है क्योंकि वो विषुवत रेखा की ओर आ रही होती है जहाँ पर कोरियोलिस बल न्यूनतम होता जाता है दोनों ओर से आती हवाओं का विषुवत रेखा के निकट अभिसरण होता है अतः इस क्षेत्र को अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) कहते हैं विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी को शांत क्षेत्र भी कहा जाता है क्योंकि अभिसरण क्षेत्र के मध्य भाग में पवने अनुपस्थित होती हैं| दोनों व्यापारिक पवनें अभिसरण क्षेत्र के बाहरी किनारे से ही ऊपर उठना आरम्भ हो जाती हैं इसके परिणामस्वरूप ये व्यापारिक पवनें मध्य भाग में नहीं पहुच पाती हैं| पवन रहित क्षेत्र होने के कारण इसे डोलड्रम या शांत क्षेत्र कहा जाता है | हालांकि नवीन खोज में कुछ जगहों पर पश्चिम से पूर्व चलने वाली विषुवतीय पछुआ पवन की जानकारी मिलती है जो महासागर के ऊपर पश्चिमी किनारे से पूरब की ओर संचलित होती है| यदि महासागर के पश्चिमी तट पर महाद्वीप इस प्रकार से उपस्थित हो कि वह अभिसरण के क्षेत्र में वायु के जमाव के लिए अनुकूल स्थित उत्पन्न करता हो तो शांत क्षेत्र में पश्चिम से पूरब की ओर दाब प्रवणता बल का निर्माण होता है| जिससे विषुवतीय पछुआ पवन की उत्पत्ति होती है| विषुवतीय पछुआ पवन अटलांटिक महासागर में अधिक विकसित है| यह अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में चलती है उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटीको अश्व अक्षांश भी कहते हैं उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी औरउपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटीके मध्य का क्षेत्र इस क्षेत्र में जो पवन प्रवाहित होती है उसे पछुआ पवन कहते हैं वे पवन जो उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है उसे पछुआ पवन कहते हैं मध्य अक्षांश में अवस्थित होने के कारण इसमें विक्षेपण की दर व्यापारिक पवनों से अधिक होती है इसीलिए धीरे धीरे यह लगभग पश्चिम से पूर्व की दिशा में संचलन करने लगती है परन्तु पूर्णतः पश्चिम से पूर्व की दिशा नहीं प्राप्त होती है दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ पवनें अधिक सशक्त तथा विक्षेपित होती हैं क्योंकि महासागर पर चलने के कारण घर्षण बल कम होता है जबकि नमी अधिक होती है| घर्षण बल कम होने से गति अधिक होती है जिसके कारण विक्षेपण अधिक होता है| वायु में नमी/जलवाष्प की उपस्थिति उसे और हल्का कर देती है जो इसकी गति को और बढ़ा देता है अर्थात दक्षिणी गोलार्ध की पवनें उत्तरी गोलार्ध से बहुत अधिक शक्तिशाली होती हैं|इसीलिए इसे दहाड़ता चालीसा, प्रचंड पचासा और चीखता साठा कहते हैं| ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी औरउपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटीके मध्य का क्षेत्र यह ध्रुवीय पूर्वा पवन का क्षेत्र है इसमें अधिकतम विक्षेपण होता है, क्योंकि यह अधिकतम कोरियोलिस बल वाले क्षेत्र से निकलती है उपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटी एक विशेष प्रकार का अभिसरण क्षेत्र है जहाँ पर दो अलग-अलग भौतिक गुणों वाली वायुराशियों का अभिसरण होता है| इस के परिणामस्वरुप ये वायुराशियाँ आपस में आसानी से नही मिल पाती हैं और एक संक्रमण क्षेत्र का निर्माण करती हैं जहाँ ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है|इसी संक्रमण क्षेत्र को वाताग्र कहा जाता है जहाँ पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण होता है|
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जैव-विविधता हॉट-स्पॉट (तप्त स्थल) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | भारत के प्रमुख जैव-विविधता हॉट-स्पॉट स्थलों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक ) Explain the concept of bio-diversity hot-spot. Briefly describe the main bio-diversity hot-spot sites of India. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच भुमिका में जैव -विविधता हॉट स्पॉट होता है ? इसके बारे में विस्तार से वर्णन कीजिये | इसके बाद पूर्वी हिमालय के जैव -विविधता हॉट स्पॉट के बारे में वर्णन कीजिये | तदोपरांत पश्चिमी हिमालय के हॉट स्पॉट स्थलों का वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ इनके महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- जैव-विविधता हॉट स्पॉट की संकल्पना ब्रिटिश वैज्ञानिक नार्मन मायर द्वारा प्रदान की गयी | इसके अनुसार यदि कोई क्षेत्र निम्नलिखित शर्तों को पूरा करता है तो उसे जैव-विविधता हॉट स्पॉट (तप्त स्थल) के रूप में घोषित किया जा सकता है - किसी क्षेत्र विशेष में संवहनीय पौधों की कम से कम 1500 प्रजातियाँ पायी जाती हों | प्रजातियाँ स्थानिक होनी चाहिए | प्रजातियों के 70 प्रतिशत या इससे अधिक आवास नष्ट हो गए हों | उपरोक्त मानदंडों के अनुसार विश्व में कुल 35 जैव -विविधता हॉट स्पॉट स्थलों की पहचान की गयी है , जिनमे से 4 भारत में हैं, जो निम्नलिखित है - हिमालयी क्षेत्र (पूर्वी) पश्चिमी घाट इंडो वर्मा क्षेत्र जिसके अंतर्गत उत्तर पूर्वी राज्य शामिल हैं | निकोबार द्वीप समूह जो सुंडा लैंड का भाग है | पूर्वी हिमालय - पूर्वी हिमालय का क्षेत्रफल लगभग 7,60000 वर्ग किलोमीटर है | इसमें भूटान, नेपाल, भारत के पूर्वी तथा पूर्वोत्तर राज्य और चीन के यूनान प्रान्त के कुछ भाग शामिल हैं | कम से कम 56 फूल वाले पौधे इस क्षेत्र में स्थानिक हैं , जो दुर्लभ हैं जैसे- पिचर प्लांट | राष्ट्रीय जलीय जीव डाल्फिन भी इस क्षेत्र में पाया जाता है | इस क्षेत्र में कुल क्षेत्रफल का लगभग 10 प्रतिशत IUCN द्वारा संरक्षित क्षेत्र के रूप में चुना गया है | यहाँ लगभग 5926 प्रजातियाँ पायी जाती हैं | यहां आर्किड की बहुत सी प्रजातियाँ पायी जाती है | पश्चिमी घाट पश्चिमी घाट का क्षेत्रफल लगभग 1,60000 वर्ग किलोमीटर है | इसमें पश्चिमी घाट तथा श्रीलंका जैव-विविधता हॉट स्पॉट (तप्त स्थल) का हिस्सा आता है | यह क्षेत्र वर्षा-वनों के समान है , जिससे यहाँ जैव-विविधता की प्रचुरता मिलती है | इसके अंतर्गत महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल के क्षेत्र आते हैं | निम्न ऊंचाई औसत समुद्री सतह से 500-1500 मीटर ऊंचाई पर सदाबहार वन पाए जाते हैं | अगस्त्यमलाई पर्वत श्रंखला एवं शांत घाटी जैव-विविधता के दो प्रमुख केंद्र यहाँ पाए जाते हैं | उपरोक्त विवरणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि जैव-विविधता हॉट स्पॉट एक महत्वपूर्ण संकल्पना है, जिसके आधार पर हम इनका समुचित संरक्षण करके जैव- विविधता को बचा सकते है क्योंकि जैव-विविधता का आर्थिक,पारिस्थितिकीय, जैविकीय और भौगोलिक महत्व है | जैव-विविधता के बिना मानव जीवन बहुत दुष्कर है |
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##Question:जैव-विविधता हॉट-स्पॉट (तप्त स्थल) की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | भारत के प्रमुख जैव-विविधता हॉट-स्पॉट स्थलों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक ) Explain the concept of bio-diversity hot-spot. Briefly describe the main bio-diversity hot-spot sites of India. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच भुमिका में जैव -विविधता हॉट स्पॉट होता है ? इसके बारे में विस्तार से वर्णन कीजिये | इसके बाद पूर्वी हिमालय के जैव -विविधता हॉट स्पॉट के बारे में वर्णन कीजिये | तदोपरांत पश्चिमी हिमालय के हॉट स्पॉट स्थलों का वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ इनके महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- जैव-विविधता हॉट स्पॉट की संकल्पना ब्रिटिश वैज्ञानिक नार्मन मायर द्वारा प्रदान की गयी | इसके अनुसार यदि कोई क्षेत्र निम्नलिखित शर्तों को पूरा करता है तो उसे जैव-विविधता हॉट स्पॉट (तप्त स्थल) के रूप में घोषित किया जा सकता है - किसी क्षेत्र विशेष में संवहनीय पौधों की कम से कम 1500 प्रजातियाँ पायी जाती हों | प्रजातियाँ स्थानिक होनी चाहिए | प्रजातियों के 70 प्रतिशत या इससे अधिक आवास नष्ट हो गए हों | उपरोक्त मानदंडों के अनुसार विश्व में कुल 35 जैव -विविधता हॉट स्पॉट स्थलों की पहचान की गयी है , जिनमे से 4 भारत में हैं, जो निम्नलिखित है - हिमालयी क्षेत्र (पूर्वी) पश्चिमी घाट इंडो वर्मा क्षेत्र जिसके अंतर्गत उत्तर पूर्वी राज्य शामिल हैं | निकोबार द्वीप समूह जो सुंडा लैंड का भाग है | पूर्वी हिमालय - पूर्वी हिमालय का क्षेत्रफल लगभग 7,60000 वर्ग किलोमीटर है | इसमें भूटान, नेपाल, भारत के पूर्वी तथा पूर्वोत्तर राज्य और चीन के यूनान प्रान्त के कुछ भाग शामिल हैं | कम से कम 56 फूल वाले पौधे इस क्षेत्र में स्थानिक हैं , जो दुर्लभ हैं जैसे- पिचर प्लांट | राष्ट्रीय जलीय जीव डाल्फिन भी इस क्षेत्र में पाया जाता है | इस क्षेत्र में कुल क्षेत्रफल का लगभग 10 प्रतिशत IUCN द्वारा संरक्षित क्षेत्र के रूप में चुना गया है | यहाँ लगभग 5926 प्रजातियाँ पायी जाती हैं | यहां आर्किड की बहुत सी प्रजातियाँ पायी जाती है | पश्चिमी घाट पश्चिमी घाट का क्षेत्रफल लगभग 1,60000 वर्ग किलोमीटर है | इसमें पश्चिमी घाट तथा श्रीलंका जैव-विविधता हॉट स्पॉट (तप्त स्थल) का हिस्सा आता है | यह क्षेत्र वर्षा-वनों के समान है , जिससे यहाँ जैव-विविधता की प्रचुरता मिलती है | इसके अंतर्गत महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल के क्षेत्र आते हैं | निम्न ऊंचाई औसत समुद्री सतह से 500-1500 मीटर ऊंचाई पर सदाबहार वन पाए जाते हैं | अगस्त्यमलाई पर्वत श्रंखला एवं शांत घाटी जैव-विविधता के दो प्रमुख केंद्र यहाँ पाए जाते हैं | उपरोक्त विवरणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि जैव-विविधता हॉट स्पॉट एक महत्वपूर्ण संकल्पना है, जिसके आधार पर हम इनका समुचित संरक्षण करके जैव- विविधता को बचा सकते है क्योंकि जैव-विविधता का आर्थिक,पारिस्थितिकीय, जैविकीय और भौगोलिक महत्व है | जैव-विविधता के बिना मानव जीवन बहुत दुष्कर है |
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महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत से आप क्या समझते हैं? इसके समर्थन में साक्ष्यों पर चर्चा कीजिए और इस सिद्धांत की आलोचना पर भी प्रकाश डालिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by continental flow theory? Discuss the evidence in support of it and also throw light on the criticism of this theory. (150-200 words/10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय दीजिए। इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन कीजिए। इस संबंध में दिये गए प्रमाणों का विवरण दीजिए सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। लौरेंसिया और अंगारालैंड को टेथिस सागर कहा जाता था। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। प्रमाण: जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति: गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं: ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षेप: घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म: ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है। यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
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##Question:महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत से आप क्या समझते हैं? इसके समर्थन में साक्ष्यों पर चर्चा कीजिए और इस सिद्धांत की आलोचना पर भी प्रकाश डालिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by continental flow theory? Discuss the evidence in support of it and also throw light on the criticism of this theory. (150-200 words/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय दीजिए। इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन कीजिए। इस संबंध में दिये गए प्रमाणों का विवरण दीजिए सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। लौरेंसिया और अंगारालैंड को टेथिस सागर कहा जाता था। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। प्रमाण: जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति: गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं: ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षेप: घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म: ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है। यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
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प्रथम विश्व युद्ध के कारणों को बताते हुए , इस युद्ध के पश्चात शांति स्थापित करने के लिए उठाए गए कदमों पर चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Describing the causes of the First World War, discuss the steps taken to establish peace after this war. (200 words)
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दृष्टिकोण भूमिका में प्रथम विश्व युद्ध का परिचय दीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इसके प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए। उत्तर के तीसरे भाग में युद्ध के बाद शांति के प्रयासों को लिखिए। उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध का प्रारम्भ 1914 में हुआ जो 1918 तक चला। इस युद्ध में एक तरफ मित्र राष्ट्र जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, रूस और अमेरिका शामिल थे तो दूसरी तरफ जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की शामिल थे । जिसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए। प्रथम विश्व युद्ध के कारण उपनिवेशों में प्रतिस्पर्द्धा: एकीकरण के पश्चात जर्मनी व इटली एक महान शक्ति के रूप में उभरे एवं इन्हे उपनिवेशों की आवश्यकता पड़ी। नए गुटों के निर्माण से रूसी साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता आई। प्रतिष्ठा का प्रश्न: जर्मनी ने फ्रांस से अल्सास-लॉरेन का क्षेत्र लेकर क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित किया। फ्रांस अपने आप को कमजोर साबित नहीं होने देना चाहता था। इसके अतिरिक्त रूस और आस्ट्रिया ने के बीच प्रतिष्ठा को लेकर मतभेद जारी रहे। गुटबंदी: आस्ट्रिया, जर्मनी और इटली ने आपस में मिलकर एक गुप्त संधि की। इसके माध्यम से वे फ्रांस को अलग-थलग रखना चाहते थे। इसके जवाब में एक प्रतिगुट का निर्माण हुआ जिसका नेतृत्व इंग्लैंड, फ्रांस व रूस ने किया। सैन्यवाद: प्रत्यक्ष रूप से सैन्यवाद विभिन्न यूरोपीय गुटों से जुड़ा था। इन गुप्त संधियों ने एक दूसरे के प्रति शंका व अविश्वास में और वृद्धि की। फ्रांस की क्रांति, जर्मनी-इटली के एकीकरण के पश्चात सैन्य प्रसार की आवश्यकता हुई। अखबारों की भूमिका: लेखों के माध्यम से विभिन्न देशों के बारे में दुष्प्रचार को प्रसारित कर दिया। इसके पूर्वा विभिन्न क्रांतियों में भी इन समाचार पत्रों की भूमिका अतिव्यापक थी जिसके कारण लोगों ने इनके द्वारा प्रसारित संदेशों पर विश्वास किया। तात्कालिक कारण : बोस्निया की राजधानी सेराजेवो में आस्ट्रिया के राजकुमार फर्डीनेन्ड की हत्या ने प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत कर दी। युद्ध पश्चात शांति के प्रयास: इस युद्ध में जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी एवं तुर्की आदि गुटों की पराजय हुई। विजयी देशों ने युद्धोत्तर काल की व्यवस्था स्थापित करने के लिए 1919 में पेरिस में शांति-सम्मेलन का आयोजन किया। इसके अंतर्गत कई प्रकार की संधियां की गयी :- वर्साय की संधि: - यह संधि जर्मनी के साथ की गयी। इसके तहत प्रादेशिक, सैन्य व आर्थिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव किया गया। इसका उद्देश्य मित्र देशों द्वारा अपने हितों को साधना था। इसी के तहत अल्सास लॉरेन क्षेत्र को जर्मनी से छीनकर पुनः फ्रांस को दे दिया गया। सैनिक क्षमता को भी सीमित किया गया। अधिकतम सैनिकों पर सीमा आरोपित कर दी गयी। नौसैनिक जहाज जब्त कर लिए गए। आर्थिक रूप से जर्मनी को युद्ध क्षति की भरपाई का जिम्मेदार ठहराया गया। यह संधि अनेक भेदभावों से युक्त थी जिसका परिणाम दूसरे विश्व युद्ध के रूप में हुआ। अन्य संधियां: - आस्ट्रिया के साथ मित्र राष्ट्रों ने सेंट जर्मेन की संधि की जिसका उद्देश्य साम्राज्य को विखंडित करना था। इसके पश्चात हंगरी, पोलैंड आदि देशों को स्वतन्त्रता प्राप्त हो गयी।इसके अतिरिक्त हंगरी के साथ त्रियानो, बुल्गारिया के साथ निउली की संधि और तुर्की के साथ सेवर्स की संधि की गई। लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना: युद्ध के पश्चात अंतराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की आवश्यकता को महसूस करते हुए एक संगठन के रूप में इसे स्थापित किया गया। इस प्रकार कुछ राष्ट्रों के साम्राज्यवादी हितों, सैन्यवाद, गुटबंदी आदि कारणों से एक यूरोपीय युद्ध प्रथम विश्व युद्ध में बादल गया। जिसका परिणाम अत्यंत ही व्यापक रहा जिसने आर्थिक, भौगोलिक, राजनीतिक क्षेत्रों पर प्रभाव डाले। इस युद्ध के पश्चात शांति के प्रयास हुए परंतु पूर्णतः सफल नहीं हो सके जिसका परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में देखने को मिला।
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##Question:प्रथम विश्व युद्ध के कारणों को बताते हुए , इस युद्ध के पश्चात शांति स्थापित करने के लिए उठाए गए कदमों पर चर्चा कीजिए। (200 शब्द) Describing the causes of the First World War, discuss the steps taken to establish peace after this war. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में प्रथम विश्व युद्ध का परिचय दीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इसके प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए। उत्तर के तीसरे भाग में युद्ध के बाद शांति के प्रयासों को लिखिए। उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध का प्रारम्भ 1914 में हुआ जो 1918 तक चला। इस युद्ध में एक तरफ मित्र राष्ट्र जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, रूस और अमेरिका शामिल थे तो दूसरी तरफ जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया और तुर्की शामिल थे । जिसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए। प्रथम विश्व युद्ध के कारण उपनिवेशों में प्रतिस्पर्द्धा: एकीकरण के पश्चात जर्मनी व इटली एक महान शक्ति के रूप में उभरे एवं इन्हे उपनिवेशों की आवश्यकता पड़ी। नए गुटों के निर्माण से रूसी साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता आई। प्रतिष्ठा का प्रश्न: जर्मनी ने फ्रांस से अल्सास-लॉरेन का क्षेत्र लेकर क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित किया। फ्रांस अपने आप को कमजोर साबित नहीं होने देना चाहता था। इसके अतिरिक्त रूस और आस्ट्रिया ने के बीच प्रतिष्ठा को लेकर मतभेद जारी रहे। गुटबंदी: आस्ट्रिया, जर्मनी और इटली ने आपस में मिलकर एक गुप्त संधि की। इसके माध्यम से वे फ्रांस को अलग-थलग रखना चाहते थे। इसके जवाब में एक प्रतिगुट का निर्माण हुआ जिसका नेतृत्व इंग्लैंड, फ्रांस व रूस ने किया। सैन्यवाद: प्रत्यक्ष रूप से सैन्यवाद विभिन्न यूरोपीय गुटों से जुड़ा था। इन गुप्त संधियों ने एक दूसरे के प्रति शंका व अविश्वास में और वृद्धि की। फ्रांस की क्रांति, जर्मनी-इटली के एकीकरण के पश्चात सैन्य प्रसार की आवश्यकता हुई। अखबारों की भूमिका: लेखों के माध्यम से विभिन्न देशों के बारे में दुष्प्रचार को प्रसारित कर दिया। इसके पूर्वा विभिन्न क्रांतियों में भी इन समाचार पत्रों की भूमिका अतिव्यापक थी जिसके कारण लोगों ने इनके द्वारा प्रसारित संदेशों पर विश्वास किया। तात्कालिक कारण : बोस्निया की राजधानी सेराजेवो में आस्ट्रिया के राजकुमार फर्डीनेन्ड की हत्या ने प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत कर दी। युद्ध पश्चात शांति के प्रयास: इस युद्ध में जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी एवं तुर्की आदि गुटों की पराजय हुई। विजयी देशों ने युद्धोत्तर काल की व्यवस्था स्थापित करने के लिए 1919 में पेरिस में शांति-सम्मेलन का आयोजन किया। इसके अंतर्गत कई प्रकार की संधियां की गयी :- वर्साय की संधि: - यह संधि जर्मनी के साथ की गयी। इसके तहत प्रादेशिक, सैन्य व आर्थिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव किया गया। इसका उद्देश्य मित्र देशों द्वारा अपने हितों को साधना था। इसी के तहत अल्सास लॉरेन क्षेत्र को जर्मनी से छीनकर पुनः फ्रांस को दे दिया गया। सैनिक क्षमता को भी सीमित किया गया। अधिकतम सैनिकों पर सीमा आरोपित कर दी गयी। नौसैनिक जहाज जब्त कर लिए गए। आर्थिक रूप से जर्मनी को युद्ध क्षति की भरपाई का जिम्मेदार ठहराया गया। यह संधि अनेक भेदभावों से युक्त थी जिसका परिणाम दूसरे विश्व युद्ध के रूप में हुआ। अन्य संधियां: - आस्ट्रिया के साथ मित्र राष्ट्रों ने सेंट जर्मेन की संधि की जिसका उद्देश्य साम्राज्य को विखंडित करना था। इसके पश्चात हंगरी, पोलैंड आदि देशों को स्वतन्त्रता प्राप्त हो गयी।इसके अतिरिक्त हंगरी के साथ त्रियानो, बुल्गारिया के साथ निउली की संधि और तुर्की के साथ सेवर्स की संधि की गई। लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना: युद्ध के पश्चात अंतराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की आवश्यकता को महसूस करते हुए एक संगठन के रूप में इसे स्थापित किया गया। इस प्रकार कुछ राष्ट्रों के साम्राज्यवादी हितों, सैन्यवाद, गुटबंदी आदि कारणों से एक यूरोपीय युद्ध प्रथम विश्व युद्ध में बादल गया। जिसका परिणाम अत्यंत ही व्यापक रहा जिसने आर्थिक, भौगोलिक, राजनीतिक क्षेत्रों पर प्रभाव डाले। इस युद्ध के पश्चात शांति के प्रयास हुए परंतु पूर्णतः सफल नहीं हो सके जिसका परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में देखने को मिला।
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की-स्टोन प्रजाति, सांकेतिक प्रजाति, फ्लैगशिप प्रजाति तथा आक्रामक प्रजाति की चर्चा कीजिये| पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में, इन प्रजातियों के महत्व को बताइए | (150-200 शब्द/ 10अंक) Discuss the Key-Stone species,Indicator species, Flagship species andInvasive species. Explain the importance of these species,In the context of Ecosystem.(150-200 words/10 marks)
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एप्रोच- पहले भाग में, की-स्टोन प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में, सांकेतिक प्रजातिका वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| तीसरे भाग में, फ्लैगशिप प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, आक्रामक प्रजाति का वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- की-स्टोन प्रजाति- ऐसी प्रजाति जिनकी संख्या कम होने के बावजूद उसके अपने पारितंत्र में उसका प्रभाव अधिक होता है| की स्टोन प्रजातियाँ खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है| ऐसे प्रजातियों के कार्य द्वारा पारितंत्र संतुलित रहता है|जैसे- स्टारफिश द्वारा मसल्स को खाना; बाघ द्वारा हिरन को खाना आदि| ये प्रजातियां पारिस्थितिक समुदाय की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| साथ ही, सहवर्ती जीवों की संख्या निर्धारण में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है| यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई अन्य जीवों को प्रभावित करता है और समुदाय में विभिन्न अन्य प्रजातियों के प्रकार और संख्या को निर्धारित करने में मदद करता है। यदि कीस्टोन प्रजाति को हटा दिया जाता है तो पारिस्थितिकी तंत्र में नाटकीय बदलाव आ सकता है| सांकेतक प्रजाति(Indicator Species)- वैसी प्रजातियाँ जो अपने पारितंत्र में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, सांकेतिक प्रजाति कही जाती है| इनका महत्व निम्नलिखित है- ये पूर्व चेतावनी प्रणाली का कार्य करती हैं| सांकेतिक प्रजाति के जानवर या पौधे विशेष पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए प्रहरी या लुकआउट के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे- लाईकेन वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की जानकारी देता है; घड़ियालों की संख्या में कमी प्रदूषित जल की ओर हमारा ध्यान दर्शाती है| उसी प्रकार, प्रवाल विरंजन से वैश्विक तापन तथा सागरीय जल में अम्लीयता का पता चलता है| उनकी उपस्थितिसेपर्यावरण के चरित्र या गुणवत्ता के कुछ विशिष्ट पहलू को समझा जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां धातु से समृद्ध खनिज मिट्टी की सतह पर पाए जा सकते हैं, पौधों की संकेतक प्रजातियां उन खनिजों की बड़ी सांद्रता को अपने ऊतकों में जमा करती हैं। संकेतक प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता मापन के उपायों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे- कुछ प्रकार के जलीय अकशेरुकी और मछली का सर्वेक्षण पानी की गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में किया गया है।जैसे-"सीवेज वर्म्स" (ट्यूबिसिड्स) की उपस्थिति | संकेतक प्रजातियों के उपयोग के माध्यम से,संभावित पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान की जा सकती है ताकि अपूरणीय क्षति से पहले ही उसका पता चल सके तथा संबंधित समस्या का समाधान ढूंढा जा सके| प्रमुख प्रजाति/फ्लैगशिप प्रजाति- वैसी प्रजातियाँ जो, सामाजिक संदर्भ में, जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु चुनी जाती हैं उन्हें फ्लैगशिप प्रजाति कहा जाता है| इनके संरक्षण द्वारा सरकार व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण हेतु जन जागरूकता को प्रोत्साहित करती है| ये लोक जागरूकता अभियान के लिए उपयोगी होते हैं| ब्रांड-एम्बेसडर/आइकॉन के रूप में संरक्षण प्रयासों को दिखाने हेतु| ये जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रमुख होता है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती है| बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से इनका संरक्षण जिससे अन्य प्रजातियों के संरक्षण को भी प्रोत्साहन |जैसे- पांडा, बाघ, एशियाई शेर आदि के संरक्षण हेतु व्यापक स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाएँ | यदि प्रमुख प्रजाति का विनाश हो जाता है, तो हितधारक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आक्रामक प्रजाति वैसी प्रजातियाँ जो स्थानिक पर्यावास के बाहर का प्रजाति हो उसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है| इन्हें विदेशी या एलियन प्रजाति की भी संज्ञा दी जाती है|जैसे- लैंटाना, कांग्रेस घास, जूलीफ्लोरा , मांगुर ,तिलापिया आदि | ऐसी प्रजातियाँ प्रजनन अधिक होने के कारण नये पर्यावास में अप्रवासन के द्वारा बहुलता स्थापित कर लेती है जिससे स्थानिक प्रजातियों के मध्य संकट की स्थिति उत्पन हो जाती है| ये स्थानिक जैव विविधता के लिए खतरा होती हैं| इनके बढ़ते संख्या को देखते हुए सरकार/संगठनों द्वारा स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु योजनाओं/नीतियों का निर्माण किया जाता है|अतः इनके अध्ययन से स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रयासों के लिए प्रोत्साहन मिलता है|
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##Question:की-स्टोन प्रजाति, सांकेतिक प्रजाति, फ्लैगशिप प्रजाति तथा आक्रामक प्रजाति की चर्चा कीजिये| पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में, इन प्रजातियों के महत्व को बताइए | (150-200 शब्द/ 10अंक) Discuss the Key-Stone species,Indicator species, Flagship species andInvasive species. Explain the importance of these species,In the context of Ecosystem.(150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, की-स्टोन प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में, सांकेतिक प्रजातिका वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| तीसरे भाग में, फ्लैगशिप प्रजाति का वर्णन करते हुएपारिस्थितिकी तंत्र में उसकी महता को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, आक्रामक प्रजाति का वर्णन करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- की-स्टोन प्रजाति- ऐसी प्रजाति जिनकी संख्या कम होने के बावजूद उसके अपने पारितंत्र में उसका प्रभाव अधिक होता है| की स्टोन प्रजातियाँ खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है| ऐसे प्रजातियों के कार्य द्वारा पारितंत्र संतुलित रहता है|जैसे- स्टारफिश द्वारा मसल्स को खाना; बाघ द्वारा हिरन को खाना आदि| ये प्रजातियां पारिस्थितिक समुदाय की संरचना को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| साथ ही, सहवर्ती जीवों की संख्या निर्धारण में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है| यह एक पारिस्थितिकी तंत्र में कई अन्य जीवों को प्रभावित करता है और समुदाय में विभिन्न अन्य प्रजातियों के प्रकार और संख्या को निर्धारित करने में मदद करता है। यदि कीस्टोन प्रजाति को हटा दिया जाता है तो पारिस्थितिकी तंत्र में नाटकीय बदलाव आ सकता है| सांकेतक प्रजाति(Indicator Species)- वैसी प्रजातियाँ जो अपने पारितंत्र में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, सांकेतिक प्रजाति कही जाती है| इनका महत्व निम्नलिखित है- ये पूर्व चेतावनी प्रणाली का कार्य करती हैं| सांकेतिक प्रजाति के जानवर या पौधे विशेष पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए प्रहरी या लुकआउट के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे- लाईकेन वायु में सल्फर डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने की जानकारी देता है; घड़ियालों की संख्या में कमी प्रदूषित जल की ओर हमारा ध्यान दर्शाती है| उसी प्रकार, प्रवाल विरंजन से वैश्विक तापन तथा सागरीय जल में अम्लीयता का पता चलता है| उनकी उपस्थितिसेपर्यावरण के चरित्र या गुणवत्ता के कुछ विशिष्ट पहलू को समझा जाता है। उदाहरण के लिए, उन क्षेत्रों में जहां धातु से समृद्ध खनिज मिट्टी की सतह पर पाए जा सकते हैं, पौधों की संकेतक प्रजातियां उन खनिजों की बड़ी सांद्रता को अपने ऊतकों में जमा करती हैं। संकेतक प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता मापन के उपायों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जैसे- कुछ प्रकार के जलीय अकशेरुकी और मछली का सर्वेक्षण पानी की गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में किया गया है।जैसे-"सीवेज वर्म्स" (ट्यूबिसिड्स) की उपस्थिति | संकेतक प्रजातियों के उपयोग के माध्यम से,संभावित पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान की जा सकती है ताकि अपूरणीय क्षति से पहले ही उसका पता चल सके तथा संबंधित समस्या का समाधान ढूंढा जा सके| प्रमुख प्रजाति/फ्लैगशिप प्रजाति- वैसी प्रजातियाँ जो, सामाजिक संदर्भ में, जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने हेतु चुनी जाती हैं उन्हें फ्लैगशिप प्रजाति कहा जाता है| इनके संरक्षण द्वारा सरकार व्यापक स्तर पर जैव विविधता संरक्षण हेतु जन जागरूकता को प्रोत्साहित करती है| ये लोक जागरूकता अभियान के लिए उपयोगी होते हैं| ब्रांड-एम्बेसडर/आइकॉन के रूप में संरक्षण प्रयासों को दिखाने हेतु| ये जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रमुख होता है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र में इनकी प्रमुख हिस्सेदारी होती है| बड़े प्रोजेक्टों के माध्यम से इनका संरक्षण जिससे अन्य प्रजातियों के संरक्षण को भी प्रोत्साहन |जैसे- पांडा, बाघ, एशियाई शेर आदि के संरक्षण हेतु व्यापक स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाएँ | यदि प्रमुख प्रजाति का विनाश हो जाता है, तो हितधारक नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आक्रामक प्रजाति वैसी प्रजातियाँ जो स्थानिक पर्यावास के बाहर का प्रजाति हो उसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है| इन्हें विदेशी या एलियन प्रजाति की भी संज्ञा दी जाती है|जैसे- लैंटाना, कांग्रेस घास, जूलीफ्लोरा , मांगुर ,तिलापिया आदि | ऐसी प्रजातियाँ प्रजनन अधिक होने के कारण नये पर्यावास में अप्रवासन के द्वारा बहुलता स्थापित कर लेती है जिससे स्थानिक प्रजातियों के मध्य संकट की स्थिति उत्पन हो जाती है| ये स्थानिक जैव विविधता के लिए खतरा होती हैं| इनके बढ़ते संख्या को देखते हुए सरकार/संगठनों द्वारा स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु योजनाओं/नीतियों का निर्माण किया जाता है|अतः इनके अध्ययन से स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रयासों के लिए प्रोत्साहन मिलता है|
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“समाजवाद और साम्यवाद समाज के गरीब और मजदूरों के न्याय पर आधारित संकल्पना है परन्तु फिर भी इनमे कुछ मूलभूत अंतर विद्यमान हैं|” उक्त सन्दर्भ का वर्णन कीजिये और आधुनिक विश्व इतिहास में समाजवाद के उदय की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द/10 अंक) Socialism and communism are concepts based on the justice of the poor and the workers of the society, but there are some fundamental differences between them.” Describe the above context and highlight the background of the rise of socialism in modern world history. (150- 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में साम्यवाद और समाजवाद के बारे में संक्षिप्त वर्णन कीजिये । उत्तर के पहले भाग में साम्यवाद और समाजवाद के अंतर को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में समाजवाद के उदय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में समाजवाद के उदभव के कारणो को संक्षिप्त में बताते हुए निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- समाजवाद और साम्यवाद चुकि दोनों अवधारणाओं के मूल में गरीब और शोषित वर्गों का उद्धार ही शामिल है, फिर भी समाजवाद और साम्यवाद में कुछ मूलभूत अंतर है। समाजवाद समाज के मजदूर और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित लोगों के सामाजिक और आर्थिक न्याय की बात करता है।जबकि साम्यवाद मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित है जिसमें मजदूर और वंचित तबकों के प्रति न्याय की स्थापना के लिए तथा वर्ग व राज्य विहीन समाज की स्थापना के लिए हिंसा पर जोर दिया गया है। साम्यवाद और समाजवाद को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- राज्य की अवधारणा के संदर्भ में - साम्यवाद राज्य विहीन समाज की स्थापना का समर्थक है, जबकि समाजवाद राज्य को आधार बनाकर कल्याणकारी कार्यों का समर्थनकरता है । सामाजिक वर्ग के संदर्भ में - साम्यवाद वर्ग विहीन समाज का समर्थन करता है, जबकि समाजवाद में वर्ग समन्व्यय तथा भेदभाव को समाप्त करने पर बलदिया जाता है । धर्म के संदर्भ में - साम्यवाद धर्म विहीन समाज का समर्थन करता है और धर्म को अफीम के समान मानता है, जबकि समाजवाद धर्म के कल्याणकारी स्वरुप पर बलदेता है । समाजवाद विभिन्न धर्मो के आदर के साथ आपसी सौहार्द की बात करता है । पूँजीवादके संदर्भ में - साम्यवाद में पूँजीवाद के उन्मूलन अर्थात आर्थिक गतिविधियों पर राज्य या समाज के नियंत्रण की बात की गयी,जबकि समाजवाद में पूंजीवाद में सुधार और आर्थिक गतिविधियों पर राज्य का नियंत्रणके साथ साथ निजी स्वामित्व की भूमिका को भी स्वीकार्यताप्रदान की गई है । समतापूर्ण समाज स्थापित करने के तरीके के संदर्भ में -साम्यवाद में हिंसात्मक तरीके से सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करने के बात की गई है । जबकि समाजवादी, लोकतान्त्रिक तरीके से सत्ता के नियंत्रण के पक्षधर हैं। यूरोप में समाजवाद के उदय के कारणो और उसकी पृष्ठभूमि को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- औद्योगिक क्रांति के साथ समाज में दो नए वर्गों का उदय हुआ– उद्योगपति और श्रमिक| एक तरफ संसाधनों पर नियंत्रण के कारण उद्योगपतियों का जीवन स्तर बेहतर तो दूसरी तरफ श्रमिकों की दशा दयनीय हो गई थी| जिन भी राष्ट्रों में औद्योगीकरण हुए वहां श्रमिकों की दयनीय दशा को देखा जा सकता था| औद्योगीकरण के साथ ही मुक्त बाज़ार ( अहस्तक्षेप) की विचारधारा लोकप्रिय हुई और राज्य के द्वारा श्रमिकों की दशा में सुधार के लिए कदम नहीं उठाये गए| फ़्रांसिसी क्रांति के साथ राजनीतिक परिवर्तनों के लिए जो भी आन्दोलन हुए उसमे श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन, क्रांति के पश्चात राजनीतिक परिवर्तनों में श्रमिकों को महत्त्व नहीं मिला। जैसे-1789 ,1830 एवं 1848 की यूरोपीय क्रांति के दौरान। श्रमिकों की दयनीय दशा के विरुद्ध कई प्रकार की प्रतिक्रिया देख सकती थी ।जैसे- श्रमिकों के द्वारा मशीनों को तोड़ना,काम छोड़कर भागना,संगठन बनाने का प्रयास,राजनीतिक अधिकारों की मांग आदि। इन्हीं प्रयासों में औद्योगिक समाज के बुद्धिजीवियों ने भी श्रमिकों की दशा में सुधार की मांग की और यहीं से समाजवादी विचारधार की नींव पड़ी। उपरोक्त संदर्भों से स्पष्ट है कि उरोप के समाज में जब औदोगिकीकरण अपने वृद्धि की तरफ अग्रसर हो रहा था ।तभी समाज के एक तबका जो की अत्यंत ही विकट परिस्थितियों में जीवन यापन करने को मजबूर था और उद्योगपतियों द्वारा उनका शोषण बढ़ता जा रहा था । इन्ही कारणों ने समाजवाद की नीव का निर्माण किया ।जिसने साम्यवाद जैसे हिंसात्मक विचारधारा को नकारते हुए लोकतान्त्रिक तरीके से समाज के शोषित और वंचित वर्गो के कल्याण का मार्ग प्रस्तुत किया ।
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##Question:“समाजवाद और साम्यवाद समाज के गरीब और मजदूरों के न्याय पर आधारित संकल्पना है परन्तु फिर भी इनमे कुछ मूलभूत अंतर विद्यमान हैं|” उक्त सन्दर्भ का वर्णन कीजिये और आधुनिक विश्व इतिहास में समाजवाद के उदय की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द/10 अंक) Socialism and communism are concepts based on the justice of the poor and the workers of the society, but there are some fundamental differences between them.” Describe the above context and highlight the background of the rise of socialism in modern world history. (150- 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में साम्यवाद और समाजवाद के बारे में संक्षिप्त वर्णन कीजिये । उत्तर के पहले भाग में साम्यवाद और समाजवाद के अंतर को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में समाजवाद के उदय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में समाजवाद के उदभव के कारणो को संक्षिप्त में बताते हुए निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- समाजवाद और साम्यवाद चुकि दोनों अवधारणाओं के मूल में गरीब और शोषित वर्गों का उद्धार ही शामिल है, फिर भी समाजवाद और साम्यवाद में कुछ मूलभूत अंतर है। समाजवाद समाज के मजदूर और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित लोगों के सामाजिक और आर्थिक न्याय की बात करता है।जबकि साम्यवाद मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित है जिसमें मजदूर और वंचित तबकों के प्रति न्याय की स्थापना के लिए तथा वर्ग व राज्य विहीन समाज की स्थापना के लिए हिंसा पर जोर दिया गया है। साम्यवाद और समाजवाद को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- राज्य की अवधारणा के संदर्भ में - साम्यवाद राज्य विहीन समाज की स्थापना का समर्थक है, जबकि समाजवाद राज्य को आधार बनाकर कल्याणकारी कार्यों का समर्थनकरता है । सामाजिक वर्ग के संदर्भ में - साम्यवाद वर्ग विहीन समाज का समर्थन करता है, जबकि समाजवाद में वर्ग समन्व्यय तथा भेदभाव को समाप्त करने पर बलदिया जाता है । धर्म के संदर्भ में - साम्यवाद धर्म विहीन समाज का समर्थन करता है और धर्म को अफीम के समान मानता है, जबकि समाजवाद धर्म के कल्याणकारी स्वरुप पर बलदेता है । समाजवाद विभिन्न धर्मो के आदर के साथ आपसी सौहार्द की बात करता है । पूँजीवादके संदर्भ में - साम्यवाद में पूँजीवाद के उन्मूलन अर्थात आर्थिक गतिविधियों पर राज्य या समाज के नियंत्रण की बात की गयी,जबकि समाजवाद में पूंजीवाद में सुधार और आर्थिक गतिविधियों पर राज्य का नियंत्रणके साथ साथ निजी स्वामित्व की भूमिका को भी स्वीकार्यताप्रदान की गई है । समतापूर्ण समाज स्थापित करने के तरीके के संदर्भ में -साम्यवाद में हिंसात्मक तरीके से सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करने के बात की गई है । जबकि समाजवादी, लोकतान्त्रिक तरीके से सत्ता के नियंत्रण के पक्षधर हैं। यूरोप में समाजवाद के उदय के कारणो और उसकी पृष्ठभूमि को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है :- औद्योगिक क्रांति के साथ समाज में दो नए वर्गों का उदय हुआ– उद्योगपति और श्रमिक| एक तरफ संसाधनों पर नियंत्रण के कारण उद्योगपतियों का जीवन स्तर बेहतर तो दूसरी तरफ श्रमिकों की दशा दयनीय हो गई थी| जिन भी राष्ट्रों में औद्योगीकरण हुए वहां श्रमिकों की दयनीय दशा को देखा जा सकता था| औद्योगीकरण के साथ ही मुक्त बाज़ार ( अहस्तक्षेप) की विचारधारा लोकप्रिय हुई और राज्य के द्वारा श्रमिकों की दशा में सुधार के लिए कदम नहीं उठाये गए| फ़्रांसिसी क्रांति के साथ राजनीतिक परिवर्तनों के लिए जो भी आन्दोलन हुए उसमे श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन, क्रांति के पश्चात राजनीतिक परिवर्तनों में श्रमिकों को महत्त्व नहीं मिला। जैसे-1789 ,1830 एवं 1848 की यूरोपीय क्रांति के दौरान। श्रमिकों की दयनीय दशा के विरुद्ध कई प्रकार की प्रतिक्रिया देख सकती थी ।जैसे- श्रमिकों के द्वारा मशीनों को तोड़ना,काम छोड़कर भागना,संगठन बनाने का प्रयास,राजनीतिक अधिकारों की मांग आदि। इन्हीं प्रयासों में औद्योगिक समाज के बुद्धिजीवियों ने भी श्रमिकों की दशा में सुधार की मांग की और यहीं से समाजवादी विचारधार की नींव पड़ी। उपरोक्त संदर्भों से स्पष्ट है कि उरोप के समाज में जब औदोगिकीकरण अपने वृद्धि की तरफ अग्रसर हो रहा था ।तभी समाज के एक तबका जो की अत्यंत ही विकट परिस्थितियों में जीवन यापन करने को मजबूर था और उद्योगपतियों द्वारा उनका शोषण बढ़ता जा रहा था । इन्ही कारणों ने समाजवाद की नीव का निर्माण किया ।जिसने साम्यवाद जैसे हिंसात्मक विचारधारा को नकारते हुए लोकतान्त्रिक तरीके से समाज के शोषित और वंचित वर्गो के कल्याण का मार्ग प्रस्तुत किया ।
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भारत शासन अधिनियम,1919 में प्रांतो हेतु प्रस्तुत द्वैध शासन व्यवस्था का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Critical analysis of dual government system presented forthe provinces in the Government of India Act,1919.(200 words)
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एप्रोच :- भारत शासन अधिनियम 1919 की पृष्ठ्भूमि पर चर्चा करते हुए भूमिका दीजिये। द्वैध शासन की प्रमुख विशेषताएं लिखिए इसमें व्याप्त कमियों को स्पष्ट कीजिये 1935 के भारत शासनअधिनियम में प्रांतो में द्वैध शासन की समाप्ति बताते हुए निष्कर्ष लिखिए उत्तर प्रारूप :- भारत परिषद् अधिनियम 1909 से राष्ट्रवादियों में निराशा तथा प्रथम विश्वयुद्ध पश्चात उपजे असंतोष को शांत करने हेतु 1919 में भारत शासन अधिनियम लाया गया जिसे मोंटफोर्ड अधिनियम भी कहते है। इस अधिनियम में प्रांतो में भारतियों को सत्ता में शामिल करने का प्रयास किया गया और इसके लिए द्वैध शासन प्रणाली को अपनाया गया। द्वैधशासन की प्रमुख विशेषताएँ :- इसके अंतर्गत प्रत्यायोजित विषयों को 2 भाग मे बांटा गया । हस्तांतरित विषयों को भारतीय मंत्रियों के अधीन । जैसे शिक्षा , स्वास्थ्य ,स्थानीय शासन , उद्योग आदि आरक्षित विषय प्रांतीय गवर्नर के अधीन, जैसे कानून व् व्यवस्था ,भू राजस्व , सिंचाई , वित्त आदि गवर्नर जनरल व प्रांतीय गवर्नर को स्वविवेक से निर्णय लेने के व्यापक अधिकार । दोष :- कृत्रिम रूप से विषयों का बंटवारा - दायित्व व् जिम्मेदारी में एकरूपता का अभाव साइमन कमीशन द्वारा इसे संसदीय व्यवस्था का विरोधी बताया गया था विषयों का विभाजन अतार्किक रूप से , लोगों को पता ही नहीं था कि विषय के प्रशासन के लिए किसके पास अपील करे जैसे कृषकों को पता नहीं था कि कृषि की ख़राब स्थिति के लिए भारतीय मंत्रियों को या गवर्नर को जो भू राजस्व वसूलता तथा सिंचाई व्यवस्था। प्रांतों में उत्तरदायी शासन देने की जिस योजना को अंग्रेजों ने लागू किया था , उसमे नौकरशाही की भूमिका निर्धारित नहीं थी ICS अधिकारी मंत्रियों का प्राय:सहयोग नहीं करते थे , जिससे मंत्री अपना दायित्व पूरा नहीं कर पाते थे उपर्युक्त अधिनियम के द्वारा वास्तव में भारतीयों को शासन में शामिल करने का उद्देश्य स्वशासन प्रदान करना नहीं था अपितु तात्कालिक रूप से असंतोष को दबाना था। अपने दोषों के कारण द्वैध शासन की यह प्रणाली असफल रही जिसे साइमन कमिशन के द्वारा भी असफलबताया गया था। आगे चलकर 1935 के भारत शासनअधिनियम में इसे प्रांतो के स्तर पर समाप्त करते हुए केंद्र के स्तर पर लाने का प्रयास किया गया।
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##Question:भारत शासन अधिनियम,1919 में प्रांतो हेतु प्रस्तुत द्वैध शासन व्यवस्था का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Critical analysis of dual government system presented forthe provinces in the Government of India Act,1919.(200 words)##Answer:एप्रोच :- भारत शासन अधिनियम 1919 की पृष्ठ्भूमि पर चर्चा करते हुए भूमिका दीजिये। द्वैध शासन की प्रमुख विशेषताएं लिखिए इसमें व्याप्त कमियों को स्पष्ट कीजिये 1935 के भारत शासनअधिनियम में प्रांतो में द्वैध शासन की समाप्ति बताते हुए निष्कर्ष लिखिए उत्तर प्रारूप :- भारत परिषद् अधिनियम 1909 से राष्ट्रवादियों में निराशा तथा प्रथम विश्वयुद्ध पश्चात उपजे असंतोष को शांत करने हेतु 1919 में भारत शासन अधिनियम लाया गया जिसे मोंटफोर्ड अधिनियम भी कहते है। इस अधिनियम में प्रांतो में भारतियों को सत्ता में शामिल करने का प्रयास किया गया और इसके लिए द्वैध शासन प्रणाली को अपनाया गया। द्वैधशासन की प्रमुख विशेषताएँ :- इसके अंतर्गत प्रत्यायोजित विषयों को 2 भाग मे बांटा गया । हस्तांतरित विषयों को भारतीय मंत्रियों के अधीन । जैसे शिक्षा , स्वास्थ्य ,स्थानीय शासन , उद्योग आदि आरक्षित विषय प्रांतीय गवर्नर के अधीन, जैसे कानून व् व्यवस्था ,भू राजस्व , सिंचाई , वित्त आदि गवर्नर जनरल व प्रांतीय गवर्नर को स्वविवेक से निर्णय लेने के व्यापक अधिकार । दोष :- कृत्रिम रूप से विषयों का बंटवारा - दायित्व व् जिम्मेदारी में एकरूपता का अभाव साइमन कमीशन द्वारा इसे संसदीय व्यवस्था का विरोधी बताया गया था विषयों का विभाजन अतार्किक रूप से , लोगों को पता ही नहीं था कि विषय के प्रशासन के लिए किसके पास अपील करे जैसे कृषकों को पता नहीं था कि कृषि की ख़राब स्थिति के लिए भारतीय मंत्रियों को या गवर्नर को जो भू राजस्व वसूलता तथा सिंचाई व्यवस्था। प्रांतों में उत्तरदायी शासन देने की जिस योजना को अंग्रेजों ने लागू किया था , उसमे नौकरशाही की भूमिका निर्धारित नहीं थी ICS अधिकारी मंत्रियों का प्राय:सहयोग नहीं करते थे , जिससे मंत्री अपना दायित्व पूरा नहीं कर पाते थे उपर्युक्त अधिनियम के द्वारा वास्तव में भारतीयों को शासन में शामिल करने का उद्देश्य स्वशासन प्रदान करना नहीं था अपितु तात्कालिक रूप से असंतोष को दबाना था। अपने दोषों के कारण द्वैध शासन की यह प्रणाली असफल रही जिसे साइमन कमिशन के द्वारा भी असफलबताया गया था। आगे चलकर 1935 के भारत शासनअधिनियम में इसे प्रांतो के स्तर पर समाप्त करते हुए केंद्र के स्तर पर लाने का प्रयास किया गया।
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मार्क्सवाद की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए,समकालीन समाज में मार्क्स के प्रभावों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10 ) Mentioning the background of Marxism, discuss Marx"s influences in the contemporary society. (150-200 words , marks - 10)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, मार्क्सवाद का संक्षिप्त परिचय दीजिए। इसके बाद,मार्क्सवाद की पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, समकालीन समाज में मार्क्स के प्रभावों की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तिओं में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- मार्क्सवाद,समाजवादी विचारधारा की एक सशक्त धारा है जिसमें हिंसात्मक तरीके से सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर सामाजिक आर्थिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करना है।हालाँकि बाद के समय में लेनिन व माओ जैसे नेताओ द्वारा इस विचारधारा में कुछ संशोधन भी किये गए हैं। मार्क्सवाद:पृष्ठभूमि:- 1848 में कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो एवं दास कैपिटल नमक पुस्तक की रचना की। इन पुस्तकों में मार्क्सवादी विचारधारा का विस्तार से विश्लेषण किया गया तथा पूंजीवाद की कमियों को भी उजागर किया। मार्क्सवादी विचारधारा का लक्ष्य साम्यवाद की स्थापना है अर्थात राज्य एवं वर्ग विहीन समाज की स्थापना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में श्रमिकों की अहम भूमिका होगी क्योंकि श्रमिकों में क्रांतिकारी तत्व अधिक होते हैं। श्रमिकों के द्वारा क्रांतिहोगी इस विचार को ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर मार्क्स ने पुष्ट किया। मार्क्स ने कहा इतिहास के प्रत्येक दौर में सम्पत्तिशाली एवं सम्पतिविहीन लोगों में संघर्ष होता रहता ही और जब शोषण असहनीय होता है तो व्यवस्था बदल जाती है जैसे प्राचीन यूरोप में मालिकों एवं दासों के बीच संघर्ष। इसी संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या तथा वर्ग संघर्ष की चर्चा होती है। इसी प्रकार आधुनिक काल में पूंजीपतियों व श्रमिकों का संघर्ष है। पूंजीपतियों के द्वारा श्रमिकों का शोषण जब असहनीय होगा तब श्रमिकों की क्रांति व सर्वहारा की क्रांति होगी। यह सर्वप्रथम सर्वाधिक औद्योगिक देश में होगा और यह धीरे धीरे सभी औद्योगिक देशों में क्योंकिपूंजीवादी व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों के कारण संकट में आएगी। मज़दूरों के द्वारा सर्वप्रथम सर्वहारा का अधिनायकवादी चरण होगा अर्थात राज्य पर सर्वहारा का नियंत्रण होगा लेकिन आर्थिक संसाधनों पर समाज का स्वामित्व होगा और साम्यवादी समाज की स्थापना की दिशा में कार्य करेंगे। समकालीन समाज पर मार्क्स का प्रभाव:- मार्क्सवादी विचारधारा के पश्चात ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे राष्ट्रों में कल्याण के लिए कुछ कदम उठाये गए जैसे ट्रेड यूनियन की स्थापना, न्यूनतम मज़दूरी, काम के घंटो का निर्धारण, ब्रिटेन में मज़दूरों कोमत देने का अधिकार इत्यादि। मार्क्स ने साम्यवादियों को संगठित व प्रशिक्षित करने के लिए 1864 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल नामक संस्था की स्थापना की। विभिन्न देशों की ट्रेड यूनियनों में इसने गहरी पैठ बनाई। हड़तालों का आयोजन किया। 1871 में फ्रांस में थोड़े समय के लिए पेरिस कम्यून नामक एक सरकार भी बनी। जो समाजवादी विद्वान मार्क्स के विचारों से सहमत भी थे उन्होंने लोकतांत्रिक मार्ग से सामाजिक आर्थिक न्याय के लिए प्रयास किया। 1900 ईस्वी तक विभिन्न देशों में समाजवादी दलों की स्थापना हुई। इस प्रकार समकालीन समाज पर मार्क्सवादी विचारों का प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई दिया।
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##Question:मार्क्सवाद की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए,समकालीन समाज में मार्क्स के प्रभावों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10 ) Mentioning the background of Marxism, discuss Marx"s influences in the contemporary society. (150-200 words , marks - 10)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, मार्क्सवाद का संक्षिप्त परिचय दीजिए। इसके बाद,मार्क्सवाद की पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, समकालीन समाज में मार्क्स के प्रभावों की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तिओं में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- मार्क्सवाद,समाजवादी विचारधारा की एक सशक्त धारा है जिसमें हिंसात्मक तरीके से सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर सामाजिक आर्थिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करना है।हालाँकि बाद के समय में लेनिन व माओ जैसे नेताओ द्वारा इस विचारधारा में कुछ संशोधन भी किये गए हैं। मार्क्सवाद:पृष्ठभूमि:- 1848 में कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो एवं दास कैपिटल नमक पुस्तक की रचना की। इन पुस्तकों में मार्क्सवादी विचारधारा का विस्तार से विश्लेषण किया गया तथा पूंजीवाद की कमियों को भी उजागर किया। मार्क्सवादी विचारधारा का लक्ष्य साम्यवाद की स्थापना है अर्थात राज्य एवं वर्ग विहीन समाज की स्थापना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में श्रमिकों की अहम भूमिका होगी क्योंकि श्रमिकों में क्रांतिकारी तत्व अधिक होते हैं। श्रमिकों के द्वारा क्रांतिहोगी इस विचार को ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर मार्क्स ने पुष्ट किया। मार्क्स ने कहा इतिहास के प्रत्येक दौर में सम्पत्तिशाली एवं सम्पतिविहीन लोगों में संघर्ष होता रहता ही और जब शोषण असहनीय होता है तो व्यवस्था बदल जाती है जैसे प्राचीन यूरोप में मालिकों एवं दासों के बीच संघर्ष। इसी संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या तथा वर्ग संघर्ष की चर्चा होती है। इसी प्रकार आधुनिक काल में पूंजीपतियों व श्रमिकों का संघर्ष है। पूंजीपतियों के द्वारा श्रमिकों का शोषण जब असहनीय होगा तब श्रमिकों की क्रांति व सर्वहारा की क्रांति होगी। यह सर्वप्रथम सर्वाधिक औद्योगिक देश में होगा और यह धीरे धीरे सभी औद्योगिक देशों में क्योंकिपूंजीवादी व्यवस्था अपने अंतर्विरोधों के कारण संकट में आएगी। मज़दूरों के द्वारा सर्वप्रथम सर्वहारा का अधिनायकवादी चरण होगा अर्थात राज्य पर सर्वहारा का नियंत्रण होगा लेकिन आर्थिक संसाधनों पर समाज का स्वामित्व होगा और साम्यवादी समाज की स्थापना की दिशा में कार्य करेंगे। समकालीन समाज पर मार्क्स का प्रभाव:- मार्क्सवादी विचारधारा के पश्चात ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे राष्ट्रों में कल्याण के लिए कुछ कदम उठाये गए जैसे ट्रेड यूनियन की स्थापना, न्यूनतम मज़दूरी, काम के घंटो का निर्धारण, ब्रिटेन में मज़दूरों कोमत देने का अधिकार इत्यादि। मार्क्स ने साम्यवादियों को संगठित व प्रशिक्षित करने के लिए 1864 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल नामक संस्था की स्थापना की। विभिन्न देशों की ट्रेड यूनियनों में इसने गहरी पैठ बनाई। हड़तालों का आयोजन किया। 1871 में फ्रांस में थोड़े समय के लिए पेरिस कम्यून नामक एक सरकार भी बनी। जो समाजवादी विद्वान मार्क्स के विचारों से सहमत भी थे उन्होंने लोकतांत्रिक मार्ग से सामाजिक आर्थिक न्याय के लिए प्रयास किया। 1900 ईस्वी तक विभिन्न देशों में समाजवादी दलों की स्थापना हुई। इस प्रकार समकालीन समाज पर मार्क्सवादी विचारों का प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई दिया।
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आर्द्र भूमि की अवधारणा एवं महत्व को स्पष्ट कीजिये | आर्द्रभूमि के ह्रास के कारणों को बताते हुए, इस सन्दर्भ में रामसर संधि के महत्व का उल्लेख कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) Explain the concept and importance of wet land. Describing the reasons for the decline of wet land, mention the importance of Ramsar Treaty in this context.(150-200 words/10 marks)
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Approach भूमिका में आर्द्र भूमि की अवधारणा को स्पष्ट करना है | प्रथम भाग में आर्द्र भूमियों के महत्त्व का वर्णन करना है | दूसरे भाग में नम भूमियों के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये | तीसरे भाग में नम भूमियों के संरक्षण में रामसर संधि का महत्त्व स्पष्ट कीजिये | अंतिम में महत्वपूर्ण योगदान का संदर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - आर्द्र भूमि या नम भूमि, जल भराव/जमाव वाले क्षेत्र हैं अथवा जल संतृप्त भूमि को आर्द्र भूमि कहते हैं| यहाँ जल की स्थायी अथवा अस्थायी उपस्थिति बनी रहती है| आर्द्र भूमियों में हाइड्रिक मृदा पायी जाती है इसकी उपरी परत में अत्यधिक आर्द्रता होती है जिसके कारण यहाँ अनाक्सीकृत दशा होती है| नम भूमि में जलीय वनस्पति/पौधे पाए जाते हैं| नम भूमियाँ जैव विविधता समृद्ध जलीय पारितंत्र की प्रतिनिधि होती हैं यहाँ पक्षी, उभयचर, सरीसृप एवं डॉलफिन जैसे स्तनधारी पाए जाते हैं| आर्द्र भूमियों का तीन प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है यथा; प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित नम भूमियाँ, तटवर्ती अथवा आन्तरिक/अंदरूनी नम भूमियाँ और मीठे जल की अथवा लवणीय/खारे जल की नम भूमियाँ| झील, दलदली मैदान, नदीय बाढ़ का मैदान आदि प्राकृतिक अंदरूनी मीठे जल की नम भूमियों के उदाहरण हैं जबकि सांभर झील जैसी लवणीय झीलें प्राकृतिक अंदरूनी खारे जल की नम भूमियों का प्रतिनिधित्व करती हैं| लैगून, मैन्ग्रोव प्राकृतिक तटीय खारे जल की नम भूमियां हैं| मानव निर्मित/कृत्रिम अंदरूनी नम भूमियों में धान का खेत, जल कृषि तालाब, जलाशय आदि आते हैं, नमक उत्पादन के लिए निर्मित साल्ट पैन आदि मानव निर्मित/कृत्रिम तटीय नम भूमियों के उदाहरण हैं| आर्द्रभूमियां पारितंत्रीय एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं| आर्द्र भूमियों का पारितंत्रीय एवं आर्थिक महत्त्व आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं आर्द्र भूमि जल चक्र को बनाए रखने का काम करती हैं आर्द्र भूमि पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायक होती हैं, नम भूमियों में पाए जाने वाले तत्व एवं वनस्पतियाँ अवशिष्टों के निपटान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, ये जैव विविधता से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र होते हैं तथा कुछ प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल होते हैं, नम भूमियाँ; बाढ़, तूफ़ान, चक्रवात एवं सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा जैसे मैन्ग्रोव द्वारा सुनामी/चक्रवात से सुरक्षा आदि आर्द्र भूमियों के अनेक आर्थिक महत्त्व भी होते हैं जैसे ये कृषि सिंचाई में सहायक होती हैं, इसी प्रकार इनका उपयोग करके मत्स्य पालन किया जा सकता है, आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं इसके अतिरिक्त ये जल चक्र को बनाए रखने में सहायक होती हैं अतः आर्द्र भूमियों से पेय जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है नम भूमियों से मछली, झींगा आदि खाद्य विकल्पों की आपूर्ति होती है साथ ही कुछ आर्थिक महत्त्व के पौधों की आपूर्ति भी की जाती है, आर्द्र भूमियाँ पारिस्थितिकी पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होती है इसके अतिरिक्त इनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व भी होता है| इतने व्यापक महत्त्व के बाद भी वर्तमान में आर्द्र भूमियाँ ह्रासमान हैं| आर्द्र भूमियों के ह्रास के अनेक उत्तरदायी कारण हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से देख सकते हैं | नमभूमियों के ह्रास के कारण नम भूमि क्षेत्र में मानवीय अतिक्रमण यथा; नगरीकरण, क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र के रूप में बदलना उस क्षेत्र में आवासीय बस्तियों की स्थापना से नम भूमियों के अस्तित्व पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है, बढ़ते जल प्रदूषण के कारण नम भूमियों में नाइट्रेट एवं फास्फेट की अतिरिक्त आपूर्ति हो रही है जिसके कारण नम भूमियों में होने वाले सुपोषण से शैवाल प्रस्फुटन होता है जिससे वहां का BOD बढ़ जाता है इससे जलीय जीवों की मौत होने लगती है, बाह्य कारकों एवं नदियों के द्वारा गाद अथवा अवसाद का जमा होना नम भूमियों के ह्रास का एक प्रमुख कारण है| विदेशी आक्रामक प्रजातियों का आगमन जैसे जलकुम्भी द्वारा जल की सतह पर फ़ैल जाने से ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी आना, जलवायु परिवर्तन; तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्र स्तर के बढने के कारण, तापमान बढ़ने से होने वाले अधिक वाष्पन से जल की मात्रा का कम होना, बाढ़-सूखा आदि नम भूमियों के ह्रास के प्रमुख कारण हैं| आर्द्र भूमियों के बढ़ते ह्रास को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनके प्रयास किये गए हैं| इनमे रामसर संधि सर्वप्रमुख है| रामसर संधि एवं इसके उद्देश्य ईरान के रामसर शहर में 2 फरवरी 1971 को आयोजित सम्मलेन के दौरान इस संधि को प्रस्तावित किया गया, यह एक अंतरसरकारी संधि है| यह एक बाध्यकारी संधि है| वर्तमान में इसके 189 पक्षकार राष्ट्र हैं| नम भूमियों का सतत एवं विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना, रामसर स्थल(अन्तर्रष्ट्रीय महत्त्व की नम भूमियाँ) का पक्षकार राष्ट्रों द्वारा अधिसूचित करना और एक से अधिक राष्ट्रों से सम्बन्धित अंतर्देशीय नम भूमियों का संरक्षण एवं प्रबंधन रामसर संधि के प्रमुख उद्देश्य हैं, आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए रामसर संधि में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड के माध्यम से प्रयास किये जाते हैं मोंट्रेक्स रिकॉर्ड यह संकटग्रस्त रामसर स्थलों की सूची है, मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में ऐसी नम भूमियाँ जिसमें मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पारिस्थितिकीय परिवर्तन हो चुका हो अथवा हो रहा है या फिर होने की आशंका है को शामिल किया जाता है, यदि किसी रामसर स्थल को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल किया जाता है तो उसके अध्ययन के लिए एक रामसर एडवाइजरी मिशन (विशेषज्ञ समूह) गठन किया जाता है, संकटग्रस्त रामसर स्थल(मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल) के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाता है, इस व्यवस्था के माध्यम से रामसर संधि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नमभूमियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| वर्तमान में भारत के राजस्थान में केवलादेव एवं मणिपुर की लोकटक झील को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड को रखा गया| पूर्व में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में उड़ीसा की चिल्का झील भी शामिल थी जिसमे सुधार होने पर उसे सूची से हटा दिया गया है| इसी प्रकार विश्व के अनेक भागों में नम भूमियों के संरक्षण एवं उनके अन्तराष्ट्रीय प्रबंधन में रामसर संधि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है|
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##Question:आर्द्र भूमि की अवधारणा एवं महत्व को स्पष्ट कीजिये | आर्द्रभूमि के ह्रास के कारणों को बताते हुए, इस सन्दर्भ में रामसर संधि के महत्व का उल्लेख कीजिये | (150-200शब्द/ 10अंक) Explain the concept and importance of wet land. Describing the reasons for the decline of wet land, mention the importance of Ramsar Treaty in this context.(150-200 words/10 marks)##Answer:Approach भूमिका में आर्द्र भूमि की अवधारणा को स्पष्ट करना है | प्रथम भाग में आर्द्र भूमियों के महत्त्व का वर्णन करना है | दूसरे भाग में नम भूमियों के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये | तीसरे भाग में नम भूमियों के संरक्षण में रामसर संधि का महत्त्व स्पष्ट कीजिये | अंतिम में महत्वपूर्ण योगदान का संदर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - आर्द्र भूमि या नम भूमि, जल भराव/जमाव वाले क्षेत्र हैं अथवा जल संतृप्त भूमि को आर्द्र भूमि कहते हैं| यहाँ जल की स्थायी अथवा अस्थायी उपस्थिति बनी रहती है| आर्द्र भूमियों में हाइड्रिक मृदा पायी जाती है इसकी उपरी परत में अत्यधिक आर्द्रता होती है जिसके कारण यहाँ अनाक्सीकृत दशा होती है| नम भूमि में जलीय वनस्पति/पौधे पाए जाते हैं| नम भूमियाँ जैव विविधता समृद्ध जलीय पारितंत्र की प्रतिनिधि होती हैं यहाँ पक्षी, उभयचर, सरीसृप एवं डॉलफिन जैसे स्तनधारी पाए जाते हैं| आर्द्र भूमियों का तीन प्रकार से वर्गीकरण किया जाता है यथा; प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित नम भूमियाँ, तटवर्ती अथवा आन्तरिक/अंदरूनी नम भूमियाँ और मीठे जल की अथवा लवणीय/खारे जल की नम भूमियाँ| झील, दलदली मैदान, नदीय बाढ़ का मैदान आदि प्राकृतिक अंदरूनी मीठे जल की नम भूमियों के उदाहरण हैं जबकि सांभर झील जैसी लवणीय झीलें प्राकृतिक अंदरूनी खारे जल की नम भूमियों का प्रतिनिधित्व करती हैं| लैगून, मैन्ग्रोव प्राकृतिक तटीय खारे जल की नम भूमियां हैं| मानव निर्मित/कृत्रिम अंदरूनी नम भूमियों में धान का खेत, जल कृषि तालाब, जलाशय आदि आते हैं, नमक उत्पादन के लिए निर्मित साल्ट पैन आदि मानव निर्मित/कृत्रिम तटीय नम भूमियों के उदाहरण हैं| आर्द्रभूमियां पारितंत्रीय एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं| आर्द्र भूमियों का पारितंत्रीय एवं आर्थिक महत्त्व आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं आर्द्र भूमि जल चक्र को बनाए रखने का काम करती हैं आर्द्र भूमि पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायक होती हैं, नम भूमियों में पाए जाने वाले तत्व एवं वनस्पतियाँ अवशिष्टों के निपटान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, ये जैव विविधता से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र होते हैं तथा कुछ प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल होते हैं, नम भूमियाँ; बाढ़, तूफ़ान, चक्रवात एवं सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा जैसे मैन्ग्रोव द्वारा सुनामी/चक्रवात से सुरक्षा आदि आर्द्र भूमियों के अनेक आर्थिक महत्त्व भी होते हैं जैसे ये कृषि सिंचाई में सहायक होती हैं, इसी प्रकार इनका उपयोग करके मत्स्य पालन किया जा सकता है, आर्द्र भूमि भूजल पुनर्भरण/रिचार्ज करती हैं इसके अतिरिक्त ये जल चक्र को बनाए रखने में सहायक होती हैं अतः आर्द्र भूमियों से पेय जल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है नम भूमियों से मछली, झींगा आदि खाद्य विकल्पों की आपूर्ति होती है साथ ही कुछ आर्थिक महत्त्व के पौधों की आपूर्ति भी की जाती है, आर्द्र भूमियाँ पारिस्थितिकी पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होती है इसके अतिरिक्त इनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व भी होता है| इतने व्यापक महत्त्व के बाद भी वर्तमान में आर्द्र भूमियाँ ह्रासमान हैं| आर्द्र भूमियों के ह्रास के अनेक उत्तरदायी कारण हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से देख सकते हैं | नमभूमियों के ह्रास के कारण नम भूमि क्षेत्र में मानवीय अतिक्रमण यथा; नगरीकरण, क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र के रूप में बदलना उस क्षेत्र में आवासीय बस्तियों की स्थापना से नम भूमियों के अस्तित्व पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है, बढ़ते जल प्रदूषण के कारण नम भूमियों में नाइट्रेट एवं फास्फेट की अतिरिक्त आपूर्ति हो रही है जिसके कारण नम भूमियों में होने वाले सुपोषण से शैवाल प्रस्फुटन होता है जिससे वहां का BOD बढ़ जाता है इससे जलीय जीवों की मौत होने लगती है, बाह्य कारकों एवं नदियों के द्वारा गाद अथवा अवसाद का जमा होना नम भूमियों के ह्रास का एक प्रमुख कारण है| विदेशी आक्रामक प्रजातियों का आगमन जैसे जलकुम्भी द्वारा जल की सतह पर फ़ैल जाने से ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी आना, जलवायु परिवर्तन; तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्र स्तर के बढने के कारण, तापमान बढ़ने से होने वाले अधिक वाष्पन से जल की मात्रा का कम होना, बाढ़-सूखा आदि नम भूमियों के ह्रास के प्रमुख कारण हैं| आर्द्र भूमियों के बढ़ते ह्रास को देखते हुए इनके संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनके प्रयास किये गए हैं| इनमे रामसर संधि सर्वप्रमुख है| रामसर संधि एवं इसके उद्देश्य ईरान के रामसर शहर में 2 फरवरी 1971 को आयोजित सम्मलेन के दौरान इस संधि को प्रस्तावित किया गया, यह एक अंतरसरकारी संधि है| यह एक बाध्यकारी संधि है| वर्तमान में इसके 189 पक्षकार राष्ट्र हैं| नम भूमियों का सतत एवं विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना, रामसर स्थल(अन्तर्रष्ट्रीय महत्त्व की नम भूमियाँ) का पक्षकार राष्ट्रों द्वारा अधिसूचित करना और एक से अधिक राष्ट्रों से सम्बन्धित अंतर्देशीय नम भूमियों का संरक्षण एवं प्रबंधन रामसर संधि के प्रमुख उद्देश्य हैं, आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए रामसर संधि में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड के माध्यम से प्रयास किये जाते हैं मोंट्रेक्स रिकॉर्ड यह संकटग्रस्त रामसर स्थलों की सूची है, मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में ऐसी नम भूमियाँ जिसमें मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पारिस्थितिकीय परिवर्तन हो चुका हो अथवा हो रहा है या फिर होने की आशंका है को शामिल किया जाता है, यदि किसी रामसर स्थल को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल किया जाता है तो उसके अध्ययन के लिए एक रामसर एडवाइजरी मिशन (विशेषज्ञ समूह) गठन किया जाता है, संकटग्रस्त रामसर स्थल(मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल) के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाता है, इस व्यवस्था के माध्यम से रामसर संधि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नमभूमियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| वर्तमान में भारत के राजस्थान में केवलादेव एवं मणिपुर की लोकटक झील को मोंट्रेक्स रिकॉर्ड को रखा गया| पूर्व में मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में उड़ीसा की चिल्का झील भी शामिल थी जिसमे सुधार होने पर उसे सूची से हटा दिया गया है| इसी प्रकार विश्व के अनेक भागों में नम भूमियों के संरक्षण एवं उनके अन्तराष्ट्रीय प्रबंधन में रामसर संधि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है|
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”दीर्घकालीन सामाजिक असंतोष और निरंकुश राजतंत्रीय शासन के साथ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ख़राब हुई आर्थिक दशाओं ने, रूसी क्रांति(1917) की पृष्ठभूमि को तैयार किया|” उक्त कथन का वर्णन करते हुए रुसी क्रांति के विश्व व्यापी प्रभावों पर भी चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द/10 अंक) "With the long-term social discontent and autocratic monarchy, the economic conditions spoiled during the first world war caused the background of the Russian Revolution." Describing the above statement, discuss the worldwide influences of the Russian Revolution. (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण ;- · भूमिका में रूसी क्रांति के कारणो का संक्षेप में वर्णन कीजिये । · उत्तर के पहले भाग में रूस की क्रांति के सामाजिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में आर्थिक और राजनीतिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में रूस की क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- यूरोप में रूसी क्रांति न सिर्फ सामाजिक असंतोष और निरंकुश राजतंत्रीय शासन व्यवस्था के विरोध का परिणाम था। बल्कि, यह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान खराब हुई रूस की आर्थिक दशाओं का ही परिणाम था, जिसने रूस की क्रांति की पृष्ठभूमि को तैयार किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूस की आर्थिक और सामाजिक दशाओं के साथ-साथ रूस की राजनीतिक नीतियों ने लोगों को बाध्य किया कि वे वर्षों से चली आ रही राजतंत्र व्यवस्था को बदल कर, एक जनहित में नई सरकार की स्थापना करें। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सामाजिक असंतोष को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है :- यूरोपीय समाज की तरह रूसी समाज में भी काफी हद तक असमानता व्याप्त थी और रूस का समाज भूमिहीन किसानों और जमीदारों के बीच बटा हुआ था। 80% के करीब जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। जिसमें से एक तिहाई जनसंख्या भूमिहीन कृषकों की थी और कृषकों की दशा अत्यंत ही दयनीय थी। आये दिन कृषको और जमीदारों के मध्य विवाद आम बात थी। रूस में औद्योगिक क्रांति विदेशी पूंजी निवेश पर आधारित थी और मुख्यतः पश्चिमी रूस में केंद्रित थी। जिसकी वजह से रूस में भौगोलिक असमानता भी विकसित हुई। रूस में अन्य औद्योगिक राष्ट्र की तरह मजदूरों की दशा भी अत्यंत दयनीय थी और कारखानों में हड़ताल एक आम बात थी। समाज का निचला तबका अत्यधिक कर के बोझ और बेरोजगारी से परेशान था। रूस में बढ़ती शिक्षा स्तर व प्रेस पर सरकारी नियंत्रण, लोगों में जन आक्रोश को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। रूस में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी भी राजतंत्रात्मक व्यवस्था से असंतुष्ट थे और लोगों में उदारवादी और साम्यवादी विचारधारा के प्रचार प्रसार के लिए कार्य कर रहे थे। इसके साथ ही रूस में गैरकानूनी रूप से कई संगठन भी सक्रिय थे। जैसे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी मजदूरों के बीच सक्रिय थी और सोशल रिवॉल्यूशनरी पार्टी किसानों के बीच सक्रिय थी और इनके द्वारा लोगों को संगठित करने का प्रयास किया जा रहा था। रूस में इसके साथ ही राजनीतिक कारणों ने भी रूस की क्रांति को बढ़ावा दिया और एक नई व्यवस्था की स्थापना के लिए लोगों को प्रेरित किया। जिसको हम निम्न बिंदुओं से समझ सकते हैं :- रूस की जनता में पहले से मौजूद असंतोष को निकोलस द्वितीय की नीतियों ने और बढ़ा दिया। अल्पसंख्यकों के ऊपर जबरजस्ती रूसी भाषा थोपे जाने से उनके भीतर भी असंतोष की भावना विकसित हुई। रूस में राजनीतिक प्रणाली में सुधार न किए जाने के कारण, बुद्धिजीवी भी राजतंत्र से क्षुब्द थे। 1905 में जापान द्वारा रूस की पराजय से राजतंत्र की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और पूरे देश में राजनीतिक सुधारों की मांग, समाज के विभिन्न तबकों द्वारा की जाने लगी। कठोर नीति ने हड़तालओं की श्रंखला प्रारंभ कर दी। जार ने हड़तालो को दबाने के लिए राजनीतिक सुधारों की घोषणा की। लेकिन, इन सुधारों के पीछे मुख्य मकसद संसद पर राजतंत्र के पकड़ को मजबूत करना ही था। 1960 में बोस्निया संकट, स्ताल्पिक नामक योग्य मंत्री की हत्या, प्रशासन में जार की पत्नी का हस्तक्षेप आदि कार्यों ने राजतंत्र की प्रतिष्ठा को कम किया। रूस की क्रांति के पीछे राजनीतिक और सामाजिक कारकों के साथ-साथ तत्कालीन आर्थिक कारणों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो निम्नलिखित है : रूस की प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1916 तक आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय हो चुकी थी तथा युद्ध में भी रूस के लगभग सात लाख सैनिक मारे जा चुके थे। सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति समय पर नहीं की जा रही थी। साथ ही परिवहन व्यवस्था भी लचर थी जिसके कारण सेना में असंतोष बढ़ने लगा। युद्ध के दौरान एक तरफ जहां रूस का आयात प्रभावित हुआ। वहीं दूसरी तरफ लगातार हड़ताल के कारण उत्पादन व्यवस्था भी ठप हो गई और रूस आर्थिक मंदी की तरफ अग्रसर हो गया। आवश्यक वस्तुओं पर राजकीय नियंत्रण के कारण महंगाई में वृद्धि हुई और मार्च 1917 में रोटी को लेकर दंगे प्रारंभ हो गया। जिसको दबाने के लिए प्रदर्शनकारियों पर सेना को गोली चलने का आदेश दिया गया, जिसे सेना ने मानने से मना कर दिया। अंततःराजा को त्यागपत्र देना पड़ा। उपरोक्त घटनाक्रमों के कारण रूस में सत्ता परिवर्तन हुआ और रूसी क्रांति का सफल आयोजन किया गया। जिसके पश्चात सत्ता साम्यवादी नेता लेनिन के हाथों में आ गई। रूसी क्रांति का रूस के साथ-साथ, विश्व के अन्य देशों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। जिसको हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- राजनीतिक प्रभाव :- मार्क्सवादी विचारधारा को यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया गया और रूस में इसकी सफलता से इस विचारधारा का विश्व के अन्य भागों में तेजी से प्रसार हुआ। रुसी क्रांति के पश्चात यूरोप के कई देशों में साम्यवादी पार्टियों की स्थापना हुई एवं श्रमिक संगठनों की संख्या में वृद्धि हुई। रूस में राजनीतिक क्षेत्र में कुछ नए प्रयोग किये गए जैसे- व्यस्क मताधिकार, महिलाओं को मताधिकार आदि| इसका भी क्रन्तिकारी प्रभाव विश्व के अन्य राष्ट्रों पर देखा गया। 1950 तक यूरोप के अधिकांश राष्ट्रों ने महिलाओं को मत देने का अधिकार दिया। रुसी क्रांति ने उपनिवेशवाद पर प्रश्न चिन्ह उठाये और इसे शोषण पर आधारित व्यवस्था बताया। इसका उपनिवेशों पर व्यापक प्रभाव देखा गया। उपनिवेशों में मार्क्सवादी संगठनों की स्थापना, ट्रेड यूनियन की स्थापना, लोकतान्त्रिक संगठनों में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव आदि को देखा जा सकता है| उपनिवेशों में क्रांतिकारियों को संसाधन, प्रशिक्षण आदि उपलब्द्ध करवाकर राष्ट्रीय आन्दोलन को मजबूत किया गया। जैसे- भारत,चीन आदि में। रूस में बोल्शेविकों की सफलता मात्र ने उपनिवेशों में राष्ट्रवादियों को प्रोत्साहित किया और यह धारणा मजबूत हुई कि एकजुट होकर बड़ी से बड़ी शक्तियों को भी चुनौती दी जा सकती है । आर्थिकप्रभाव- पूँजीवादी मॉडल के एक वैकल्पिक मॉडल का निर्माण। सबकी न्यूनतम जरूरतों को पूर्ण करना, समान कार्य के लिए समान वेतन आदि समानतापरकमूल्यों को बढ़ावा। जो आर्थिक समानता लाने में सहायक। महामंदी और पूंजीवादी राष्ट्रों पर प्रभाव तथा उन्हें कल्याणकारी कार्यों को करने हेतु बाध्य होना पड़ा। उपनिवेशों पर इसका सकारात्मक प्रभाव । नवस्वतंत्र राष्ट्रों कीआर्थिक नीतियों पर भी प्रभाव। जैसे-भारत सामाजिक प्रभाव- आम लोगों की भूमिका और आम लोगों का उत्थान इस क्रांति का लक्ष्य था| फलतः आम लोगों में जागरूकता इसका एक महत्वपूर्ण पहलू था| प्रत्येक स्तर पर एक समान शिक्षा ,स्वास्थ्य, रोजगार में समानता देखी जा सकती थी। रूस में धार्मिक संपत्ति पर कब्ज़ाकरके उसको सामाजिक हितो में प्रयोग किया गया। साहित्य में मानविकी विषयों पर मार्क्सवाद का विश्वव्यापी प्रभावबढ़ा। उपरोक्त बिंदुओं से स्पष्ट है कि रूस की क्रांति में महज किसी एक कारण की उपस्थिति न होकर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों कारकों की प्रमुख भूमिका थी। जिसने जनता को एकजुट कर सत्ता परिवर्तन के लिए बाध्य किया तथा रूस में हुई सफल रूसी क्रांति ने विश्व के अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत का काम किया और तत्कालीन उपनिवेशओं में सत्ता संघर्ष और स्वतंत्रता की प्राप्ति के आंदोलन को प्रबल बनाया। जिससे उन देशों में भी समाजवाद और साम्यवाद का प्रचार-प्रसार संभव हो सका।
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##Question:”दीर्घकालीन सामाजिक असंतोष और निरंकुश राजतंत्रीय शासन के साथ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ख़राब हुई आर्थिक दशाओं ने, रूसी क्रांति(1917) की पृष्ठभूमि को तैयार किया|” उक्त कथन का वर्णन करते हुए रुसी क्रांति के विश्व व्यापी प्रभावों पर भी चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द/10 अंक) "With the long-term social discontent and autocratic monarchy, the economic conditions spoiled during the first world war caused the background of the Russian Revolution." Describing the above statement, discuss the worldwide influences of the Russian Revolution. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण ;- · भूमिका में रूसी क्रांति के कारणो का संक्षेप में वर्णन कीजिये । · उत्तर के पहले भाग में रूस की क्रांति के सामाजिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में आर्थिक और राजनीतिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में रूस की क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- यूरोप में रूसी क्रांति न सिर्फ सामाजिक असंतोष और निरंकुश राजतंत्रीय शासन व्यवस्था के विरोध का परिणाम था। बल्कि, यह प्रथम विश्व युद्ध के दौरान खराब हुई रूस की आर्थिक दशाओं का ही परिणाम था, जिसने रूस की क्रांति की पृष्ठभूमि को तैयार किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूस की आर्थिक और सामाजिक दशाओं के साथ-साथ रूस की राजनीतिक नीतियों ने लोगों को बाध्य किया कि वे वर्षों से चली आ रही राजतंत्र व्यवस्था को बदल कर, एक जनहित में नई सरकार की स्थापना करें। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सामाजिक असंतोष को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है :- यूरोपीय समाज की तरह रूसी समाज में भी काफी हद तक असमानता व्याप्त थी और रूस का समाज भूमिहीन किसानों और जमीदारों के बीच बटा हुआ था। 80% के करीब जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। जिसमें से एक तिहाई जनसंख्या भूमिहीन कृषकों की थी और कृषकों की दशा अत्यंत ही दयनीय थी। आये दिन कृषको और जमीदारों के मध्य विवाद आम बात थी। रूस में औद्योगिक क्रांति विदेशी पूंजी निवेश पर आधारित थी और मुख्यतः पश्चिमी रूस में केंद्रित थी। जिसकी वजह से रूस में भौगोलिक असमानता भी विकसित हुई। रूस में अन्य औद्योगिक राष्ट्र की तरह मजदूरों की दशा भी अत्यंत दयनीय थी और कारखानों में हड़ताल एक आम बात थी। समाज का निचला तबका अत्यधिक कर के बोझ और बेरोजगारी से परेशान था। रूस में बढ़ती शिक्षा स्तर व प्रेस पर सरकारी नियंत्रण, लोगों में जन आक्रोश को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। रूस में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी भी राजतंत्रात्मक व्यवस्था से असंतुष्ट थे और लोगों में उदारवादी और साम्यवादी विचारधारा के प्रचार प्रसार के लिए कार्य कर रहे थे। इसके साथ ही रूस में गैरकानूनी रूप से कई संगठन भी सक्रिय थे। जैसे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी मजदूरों के बीच सक्रिय थी और सोशल रिवॉल्यूशनरी पार्टी किसानों के बीच सक्रिय थी और इनके द्वारा लोगों को संगठित करने का प्रयास किया जा रहा था। रूस में इसके साथ ही राजनीतिक कारणों ने भी रूस की क्रांति को बढ़ावा दिया और एक नई व्यवस्था की स्थापना के लिए लोगों को प्रेरित किया। जिसको हम निम्न बिंदुओं से समझ सकते हैं :- रूस की जनता में पहले से मौजूद असंतोष को निकोलस द्वितीय की नीतियों ने और बढ़ा दिया। अल्पसंख्यकों के ऊपर जबरजस्ती रूसी भाषा थोपे जाने से उनके भीतर भी असंतोष की भावना विकसित हुई। रूस में राजनीतिक प्रणाली में सुधार न किए जाने के कारण, बुद्धिजीवी भी राजतंत्र से क्षुब्द थे। 1905 में जापान द्वारा रूस की पराजय से राजतंत्र की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और पूरे देश में राजनीतिक सुधारों की मांग, समाज के विभिन्न तबकों द्वारा की जाने लगी। कठोर नीति ने हड़तालओं की श्रंखला प्रारंभ कर दी। जार ने हड़तालो को दबाने के लिए राजनीतिक सुधारों की घोषणा की। लेकिन, इन सुधारों के पीछे मुख्य मकसद संसद पर राजतंत्र के पकड़ को मजबूत करना ही था। 1960 में बोस्निया संकट, स्ताल्पिक नामक योग्य मंत्री की हत्या, प्रशासन में जार की पत्नी का हस्तक्षेप आदि कार्यों ने राजतंत्र की प्रतिष्ठा को कम किया। रूस की क्रांति के पीछे राजनीतिक और सामाजिक कारकों के साथ-साथ तत्कालीन आर्थिक कारणों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो निम्नलिखित है : रूस की प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1916 तक आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय हो चुकी थी तथा युद्ध में भी रूस के लगभग सात लाख सैनिक मारे जा चुके थे। सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति समय पर नहीं की जा रही थी। साथ ही परिवहन व्यवस्था भी लचर थी जिसके कारण सेना में असंतोष बढ़ने लगा। युद्ध के दौरान एक तरफ जहां रूस का आयात प्रभावित हुआ। वहीं दूसरी तरफ लगातार हड़ताल के कारण उत्पादन व्यवस्था भी ठप हो गई और रूस आर्थिक मंदी की तरफ अग्रसर हो गया। आवश्यक वस्तुओं पर राजकीय नियंत्रण के कारण महंगाई में वृद्धि हुई और मार्च 1917 में रोटी को लेकर दंगे प्रारंभ हो गया। जिसको दबाने के लिए प्रदर्शनकारियों पर सेना को गोली चलने का आदेश दिया गया, जिसे सेना ने मानने से मना कर दिया। अंततःराजा को त्यागपत्र देना पड़ा। उपरोक्त घटनाक्रमों के कारण रूस में सत्ता परिवर्तन हुआ और रूसी क्रांति का सफल आयोजन किया गया। जिसके पश्चात सत्ता साम्यवादी नेता लेनिन के हाथों में आ गई। रूसी क्रांति का रूस के साथ-साथ, विश्व के अन्य देशों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। जिसको हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- राजनीतिक प्रभाव :- मार्क्सवादी विचारधारा को यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया गया और रूस में इसकी सफलता से इस विचारधारा का विश्व के अन्य भागों में तेजी से प्रसार हुआ। रुसी क्रांति के पश्चात यूरोप के कई देशों में साम्यवादी पार्टियों की स्थापना हुई एवं श्रमिक संगठनों की संख्या में वृद्धि हुई। रूस में राजनीतिक क्षेत्र में कुछ नए प्रयोग किये गए जैसे- व्यस्क मताधिकार, महिलाओं को मताधिकार आदि| इसका भी क्रन्तिकारी प्रभाव विश्व के अन्य राष्ट्रों पर देखा गया। 1950 तक यूरोप के अधिकांश राष्ट्रों ने महिलाओं को मत देने का अधिकार दिया। रुसी क्रांति ने उपनिवेशवाद पर प्रश्न चिन्ह उठाये और इसे शोषण पर आधारित व्यवस्था बताया। इसका उपनिवेशों पर व्यापक प्रभाव देखा गया। उपनिवेशों में मार्क्सवादी संगठनों की स्थापना, ट्रेड यूनियन की स्थापना, लोकतान्त्रिक संगठनों में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव आदि को देखा जा सकता है| उपनिवेशों में क्रांतिकारियों को संसाधन, प्रशिक्षण आदि उपलब्द्ध करवाकर राष्ट्रीय आन्दोलन को मजबूत किया गया। जैसे- भारत,चीन आदि में। रूस में बोल्शेविकों की सफलता मात्र ने उपनिवेशों में राष्ट्रवादियों को प्रोत्साहित किया और यह धारणा मजबूत हुई कि एकजुट होकर बड़ी से बड़ी शक्तियों को भी चुनौती दी जा सकती है । आर्थिकप्रभाव- पूँजीवादी मॉडल के एक वैकल्पिक मॉडल का निर्माण। सबकी न्यूनतम जरूरतों को पूर्ण करना, समान कार्य के लिए समान वेतन आदि समानतापरकमूल्यों को बढ़ावा। जो आर्थिक समानता लाने में सहायक। महामंदी और पूंजीवादी राष्ट्रों पर प्रभाव तथा उन्हें कल्याणकारी कार्यों को करने हेतु बाध्य होना पड़ा। उपनिवेशों पर इसका सकारात्मक प्रभाव । नवस्वतंत्र राष्ट्रों कीआर्थिक नीतियों पर भी प्रभाव। जैसे-भारत सामाजिक प्रभाव- आम लोगों की भूमिका और आम लोगों का उत्थान इस क्रांति का लक्ष्य था| फलतः आम लोगों में जागरूकता इसका एक महत्वपूर्ण पहलू था| प्रत्येक स्तर पर एक समान शिक्षा ,स्वास्थ्य, रोजगार में समानता देखी जा सकती थी। रूस में धार्मिक संपत्ति पर कब्ज़ाकरके उसको सामाजिक हितो में प्रयोग किया गया। साहित्य में मानविकी विषयों पर मार्क्सवाद का विश्वव्यापी प्रभावबढ़ा। उपरोक्त बिंदुओं से स्पष्ट है कि रूस की क्रांति में महज किसी एक कारण की उपस्थिति न होकर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों कारकों की प्रमुख भूमिका थी। जिसने जनता को एकजुट कर सत्ता परिवर्तन के लिए बाध्य किया तथा रूस में हुई सफल रूसी क्रांति ने विश्व के अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत का काम किया और तत्कालीन उपनिवेशओं में सत्ता संघर्ष और स्वतंत्रता की प्राप्ति के आंदोलन को प्रबल बनाया। जिससे उन देशों में भी समाजवाद और साम्यवाद का प्रचार-प्रसार संभव हो सका।
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वर्षा के विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में स्पष्ट करते हुए पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Briefly explain the different types of rainfall, analyze the distribution of rainfall on Earth. (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वर्षा को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| वर्षा का सम्बन्ध जल संसाधन से है जिसका उत्तरजीविता के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है| वायुमंडल में उपस्थित वे कण जिनके अन्दर जल संघनन शक्ति हो उन्हें संघनन नाभिक कहते है| एकत्रित एवं संघनित पदार्थ के जमाव को बादल कहते है| जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन का वहन नहीं कर पाती तब बादलों के अन्दर उपस्थित पानी या हिम के कण पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, इसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तीन प्रकार की होती है यथा संवहनीय वर्षा, पर्वतीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा| इन्ही रूप में समस्त ग्लोब पर होने वाले वर्षण के वितरण को प्रचलित पवनों एवं वायुदाब पेटियों के अंतर्गत समझा जा सकता है| वर्षा का वितरण वायुदाब पेटियों में वर्षा का वितरण निम्न वायुदाब पेटियां · इनमें वर्षा की संभावना अधिकतम क्योंकि यहाँ वायु का आरोहण होता है · आरोहण से वायु के तापमान में कमी होगी जिससे RH में वृद्धि होगी जिससे वायु संतृप्त होगी जिससे संघनन की सम्भावना बढ़ जायेगी जिससे बादल का निर्माण एवं वर्षण होगा · विषुवतीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है, यहाँ संवहनीय वर्षा होती है| · यहाँ विश्व में अधिकतम मात्रा वर्षा इसी क्षेत्र में होती है, सालों भर वर्षा के कारण सदाबहार वन पाए जाते हैं, · संवहनीय वर्षा होने के कारण वर्षा प्रायः शाम के समय होती है|दोपहर के बाद बादलों का जमाव होता है, इससे सापेक्षिक तापमान घट जाता है (बादल सौर प्रकाश को अवरोधित कर देता है) जबकि रात का तापमान सापेक्षिकरूप से बढ़ जाता है| · अमेज़न नदी द्रोणी और कांगो नदी द्रोणी तथा इंडोनेशिया, मलेशिया आदि द्वीपीय समूह में इसी प्रकार की वर्षा होती है| · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में भी सालों भर वर्षा होगी किन्तु यहाँ वाताग्रीय वर्षा होती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सर्दियों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि सर्दियों में वाताग्र तीव्र होते हैं · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में तापमान अपेक्षाकृत कम होता है अतः हिमपात की संभावना सालों भर बनी रहती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता में कमी के कारण वर्षा की मात्रा विषुवतीय क्षेत्र से कम होती है उच्च वायुदाब पेटियां · इस क्षेत्र में वर्षा की संभावना न्यूनतम होती है क्योंकि यहाँ वायु का अवरोहण होता है, · वायु का अवरोहण होने से वायु के तापमान में वृद्धि,जिससे RH की कमी आती है और संघनन की संभावना नही बन पाती,इससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरुप वर्षण नहीं हो पाता है · उपोष्ण कटिबंधीय एवं उपध्रुवीय कटिबंध क्षेत्र(उच्च वायुदाब पेटियां )में मरुस्थलों का विकास देखने को मिलता है क्योंकि यहाँ वर्षा कम होती है · अवरोहण के क्षेत्र में बादल नहीं बनते हैं किन्तु वायुदाब पेटियों के विस्थापन के कारण यहं कम मात्रा में वर्षा की संभावना बन जाती है प्रचलित पवन क्षेत्र में वर्षा का वितरण · तटवर्ती पवन(समुद्र से स्थल की ओर) वर्षा का आरोहण होने से वर्षा की संभावना होती है · सुदूरवर्ती पवन(स्थल से समुद्र की ओर) यहाँ वायु अवरोहित होती है अतः वर्षा कम होगी| व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में वितरण · महाद्वीपीय भाग मेंपश्चिमी भाग में सुदूरवर्ती पवन होने के कारण वर्षा कम होती है और मरुस्थलों का निर्माण होता है · पूर्वी भाग में तटवर्ती पवन होने कारण पर्याप्त मात्रा में वर्षा की संभावना होती है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर वर्षा की कमी तथा अधिक वाष्पीकरण के कारण शुद्ध उष्ण मरुस्थल का निर्माण होता है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में उष्णकटिबन्धीय चक्रवात का निर्माण होता है जिससे वर्षा पूर्वी तट पर होती है लेकिन पश्चिमी तट पर लगभग नही होती है पछुवा पवनों का क्षेत्र · पश्चिमी तट परतटवर्ती पवन होने के कारणवर्षा की मात्रा अधिक होती है · पूर्वी तट परसुदूरवर्ती पवन होने कारणवर्षा की मात्रा कम होती है · पछुआ पवन के सुदूरवर्ती क्षेत्र में पछुवा पवन से वर्षा नहीं होती है परन्तु कम वाष्पीकरण के कारण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात से होने वाली वर्षा के कारण मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है · ध्रुवीय पूर्वा का क्षेत्र इस क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता की कमी होती है| अतः यहाँ वर्षा की कमी रहती है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर वर्षा के वितरण को वायु संचरण की दिशा, धरातलीय तापमान, वायु का आरोहण-अवरोहण, आर्द्रता की उपस्थिति आदि अनेक कारक प्रभावित करते हैं|
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##Question:वर्षा के विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में स्पष्ट करते हुए पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) Briefly explain the different types of rainfall, analyze the distribution of rainfall on Earth. (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वर्षा को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| वर्षा का सम्बन्ध जल संसाधन से है जिसका उत्तरजीविता के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है| वायुमंडल में उपस्थित वे कण जिनके अन्दर जल संघनन शक्ति हो उन्हें संघनन नाभिक कहते है| एकत्रित एवं संघनित पदार्थ के जमाव को बादल कहते है| जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन का वहन नहीं कर पाती तब बादलों के अन्दर उपस्थित पानी या हिम के कण पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, इसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तीन प्रकार की होती है यथा संवहनीय वर्षा, पर्वतीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा| इन्ही रूप में समस्त ग्लोब पर होने वाले वर्षण के वितरण को प्रचलित पवनों एवं वायुदाब पेटियों के अंतर्गत समझा जा सकता है| वर्षा का वितरण वायुदाब पेटियों में वर्षा का वितरण निम्न वायुदाब पेटियां · इनमें वर्षा की संभावना अधिकतम क्योंकि यहाँ वायु का आरोहण होता है · आरोहण से वायु के तापमान में कमी होगी जिससे RH में वृद्धि होगी जिससे वायु संतृप्त होगी जिससे संघनन की सम्भावना बढ़ जायेगी जिससे बादल का निर्माण एवं वर्षण होगा · विषुवतीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है, यहाँ संवहनीय वर्षा होती है| · यहाँ विश्व में अधिकतम मात्रा वर्षा इसी क्षेत्र में होती है, सालों भर वर्षा के कारण सदाबहार वन पाए जाते हैं, · संवहनीय वर्षा होने के कारण वर्षा प्रायः शाम के समय होती है|दोपहर के बाद बादलों का जमाव होता है, इससे सापेक्षिक तापमान घट जाता है (बादल सौर प्रकाश को अवरोधित कर देता है) जबकि रात का तापमान सापेक्षिकरूप से बढ़ जाता है| · अमेज़न नदी द्रोणी और कांगो नदी द्रोणी तथा इंडोनेशिया, मलेशिया आदि द्वीपीय समूह में इसी प्रकार की वर्षा होती है| · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में भी सालों भर वर्षा होगी किन्तु यहाँ वाताग्रीय वर्षा होती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सर्दियों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि सर्दियों में वाताग्र तीव्र होते हैं · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में तापमान अपेक्षाकृत कम होता है अतः हिमपात की संभावना सालों भर बनी रहती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता में कमी के कारण वर्षा की मात्रा विषुवतीय क्षेत्र से कम होती है उच्च वायुदाब पेटियां · इस क्षेत्र में वर्षा की संभावना न्यूनतम होती है क्योंकि यहाँ वायु का अवरोहण होता है, · वायु का अवरोहण होने से वायु के तापमान में वृद्धि,जिससे RH की कमी आती है और संघनन की संभावना नही बन पाती,इससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरुप वर्षण नहीं हो पाता है · उपोष्ण कटिबंधीय एवं उपध्रुवीय कटिबंध क्षेत्र(उच्च वायुदाब पेटियां )में मरुस्थलों का विकास देखने को मिलता है क्योंकि यहाँ वर्षा कम होती है · अवरोहण के क्षेत्र में बादल नहीं बनते हैं किन्तु वायुदाब पेटियों के विस्थापन के कारण यहं कम मात्रा में वर्षा की संभावना बन जाती है प्रचलित पवन क्षेत्र में वर्षा का वितरण · तटवर्ती पवन(समुद्र से स्थल की ओर) वर्षा का आरोहण होने से वर्षा की संभावना होती है · सुदूरवर्ती पवन(स्थल से समुद्र की ओर) यहाँ वायु अवरोहित होती है अतः वर्षा कम होगी| व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में वितरण · महाद्वीपीय भाग मेंपश्चिमी भाग में सुदूरवर्ती पवन होने के कारण वर्षा कम होती है और मरुस्थलों का निर्माण होता है · पूर्वी भाग में तटवर्ती पवन होने कारण पर्याप्त मात्रा में वर्षा की संभावना होती है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर वर्षा की कमी तथा अधिक वाष्पीकरण के कारण शुद्ध उष्ण मरुस्थल का निर्माण होता है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में उष्णकटिबन्धीय चक्रवात का निर्माण होता है जिससे वर्षा पूर्वी तट पर होती है लेकिन पश्चिमी तट पर लगभग नही होती है पछुवा पवनों का क्षेत्र · पश्चिमी तट परतटवर्ती पवन होने के कारणवर्षा की मात्रा अधिक होती है · पूर्वी तट परसुदूरवर्ती पवन होने कारणवर्षा की मात्रा कम होती है · पछुआ पवन के सुदूरवर्ती क्षेत्र में पछुवा पवन से वर्षा नहीं होती है परन्तु कम वाष्पीकरण के कारण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात से होने वाली वर्षा के कारण मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है · ध्रुवीय पूर्वा का क्षेत्र इस क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता की कमी होती है| अतः यहाँ वर्षा की कमी रहती है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर वर्षा के वितरण को वायु संचरण की दिशा, धरातलीय तापमान, वायु का आरोहण-अवरोहण, आर्द्रता की उपस्थिति आदि अनेक कारक प्रभावित करते हैं|
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Trace the evolution of India"s approach towards South-East Asia from the Look East Policy to the Act East Policy. (10 marks/150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Historical ties between India and South East Asia - EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY -CONCLUSION The positive outcomes of these policies and the concerns which need to be addressed Answer:- India has had cultural and civilizational ties with South East Asia. For example, Buddhism, Islam and Hinduism travelled from India to these countries. Geography implied that India was central to reach SEA (monsoonal winds) during ancient times. For example, Bali Yatra in Odisha connotes people taking their boats and travelling to SEA in the olden days. Also, colonialism was another element of commonality- institutions, indentured labourers were taken by the Britishers to these areas. During our freedom struggle as well, the INA received support from this region Connectivity (also trade, investment) has been central to the Look East and Act East Policies. There has been a focus upon closeness and warmth with these countries. As per these policies, the SEA is to be treated as though it were an immediate neighbour. EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY 1) THE LOOK EAST POLICY AND it"s OBJECTIVE In 1992, Prime Minister Narasimha Raoji formulated the Look East Policy. It aimed for closer cooperation among the South East nations and India. Economic cooperation was the chief focus via trade and economic linkages as the SEA countries faced immense economic growth due to exports. 2) BACKGROUND The policy was formulated in the background of the collapse of USSR, Balance of Payment crisis and the complementarities that India shares with SEA. 3) SUCCESS OF LOOK EAST POLICY In 1992, we (India and South East Asia) became sectoral level partners. In 2002, we became summit level partners. Trade increased from $3.1bn to $12 billion between 1991 and 2012. 4) LOOK EAST 2.0 This policy was formulated in the late 90s (/first decade of the 21st century) for deeper and wider economic engagements 5) 2010- FREE TRADE AGREEMENT In 2010, an FTA on goods was signed. This led to the growth in trade by 41%. Also, a two-way flow of investments increased. 6) SECURITY AND STRATEGIC ISSUES Later on, the inclusion of security and strategic issues was seen in the Look East Policy. The main reason behind this was China, whichwas a larger neighbour of these countries. Therefore, it sought to balance China with the help of India (traditionally the US played that role). 7) ADDITION OF A DOMESTIC DIMENSION A domestic dimension was later added i.e. Looking East through the North East. Trade and connectivity were sought to be established between the North East and SEA. 7.1) Some projects that have been formulated and implemented are: The Trilateral Highway The BCIM corridor The Kaladan multi-modal project The Mekong Ganga Cooperation 8) ACT EAST POLICY It was evolved in 2014 by PM Shri Narendra Modiji. The focus was on a dynamic and action-oriented policy. 9) INCLUSION OF OTHER COUNTRIES Other countries such as Japan, S Korea etc. were also included in the policy. 10) MORE DIMENSIONS ADDED The focus was shifted to political, strategic and cultural dimensions, as well. Also, the focus was on ASEAN and ASEAN associated institutions. The areas of interest for cooperation are infrastructure, trade, skills, space, S&T, people to people exchange etc. 11) CURRENT DEVELOPMENTS In 2018, India and ASEAN completed 25 years of dialogue partnership (more than 30 dialogue mechanisms), 15 years of summit-level partnership, 5 years of strategic partnership (2012 onwards). The Delhi Dialogue (which started in 2009), took place in 2018 at New Delhi. 12) JAPAN Japan has also started an Act East Forum with India. Japan"s Free and Open Indo-Pacific Strategy converges with AEP beginning in the North East. China is a common adversary. As a result of these policies, several beneficial outcomes have been achieved. For example, trade is expanding significantly. The ASEAN countries accounted for 10.58% of India’s trade. Also, multiple agreements have been signed. For example, the FTA was signed in 2009 and came into effect in 2010. An agreement on trade and services was also signed. In terms of investments as well, ASEAN accounted for 12.5% of inbound FDI since 2000 (in which Singapore has had a significant share). The FDI flows into India between 2000 and 2015 have been $39 billion. In 2015, India announced $1 billion Line of Credit to ASEAN. Also, a fund of $ 77 million has been established for facilitating manufacturing in CLMV countries (Cambodia, Laos, Myanmar, Vietnam). The concern which needs to be addressed now is the widening trade deficit, which is currently favourable to the ASEAN countries.
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##Question:Trace the evolution of India"s approach towards South-East Asia from the Look East Policy to the Act East Policy. (10 marks/150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Historical ties between India and South East Asia - EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY -CONCLUSION The positive outcomes of these policies and the concerns which need to be addressed Answer:- India has had cultural and civilizational ties with South East Asia. For example, Buddhism, Islam and Hinduism travelled from India to these countries. Geography implied that India was central to reach SEA (monsoonal winds) during ancient times. For example, Bali Yatra in Odisha connotes people taking their boats and travelling to SEA in the olden days. Also, colonialism was another element of commonality- institutions, indentured labourers were taken by the Britishers to these areas. During our freedom struggle as well, the INA received support from this region Connectivity (also trade, investment) has been central to the Look East and Act East Policies. There has been a focus upon closeness and warmth with these countries. As per these policies, the SEA is to be treated as though it were an immediate neighbour. EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY 1) THE LOOK EAST POLICY AND it"s OBJECTIVE In 1992, Prime Minister Narasimha Raoji formulated the Look East Policy. It aimed for closer cooperation among the South East nations and India. Economic cooperation was the chief focus via trade and economic linkages as the SEA countries faced immense economic growth due to exports. 2) BACKGROUND The policy was formulated in the background of the collapse of USSR, Balance of Payment crisis and the complementarities that India shares with SEA. 3) SUCCESS OF LOOK EAST POLICY In 1992, we (India and South East Asia) became sectoral level partners. In 2002, we became summit level partners. Trade increased from $3.1bn to $12 billion between 1991 and 2012. 4) LOOK EAST 2.0 This policy was formulated in the late 90s (/first decade of the 21st century) for deeper and wider economic engagements 5) 2010- FREE TRADE AGREEMENT In 2010, an FTA on goods was signed. This led to the growth in trade by 41%. Also, a two-way flow of investments increased. 6) SECURITY AND STRATEGIC ISSUES Later on, the inclusion of security and strategic issues was seen in the Look East Policy. The main reason behind this was China, whichwas a larger neighbour of these countries. Therefore, it sought to balance China with the help of India (traditionally the US played that role). 7) ADDITION OF A DOMESTIC DIMENSION A domestic dimension was later added i.e. Looking East through the North East. Trade and connectivity were sought to be established between the North East and SEA. 7.1) Some projects that have been formulated and implemented are: The Trilateral Highway The BCIM corridor The Kaladan multi-modal project The Mekong Ganga Cooperation 8) ACT EAST POLICY It was evolved in 2014 by PM Shri Narendra Modiji. The focus was on a dynamic and action-oriented policy. 9) INCLUSION OF OTHER COUNTRIES Other countries such as Japan, S Korea etc. were also included in the policy. 10) MORE DIMENSIONS ADDED The focus was shifted to political, strategic and cultural dimensions, as well. Also, the focus was on ASEAN and ASEAN associated institutions. The areas of interest for cooperation are infrastructure, trade, skills, space, S&T, people to people exchange etc. 11) CURRENT DEVELOPMENTS In 2018, India and ASEAN completed 25 years of dialogue partnership (more than 30 dialogue mechanisms), 15 years of summit-level partnership, 5 years of strategic partnership (2012 onwards). The Delhi Dialogue (which started in 2009), took place in 2018 at New Delhi. 12) JAPAN Japan has also started an Act East Forum with India. Japan"s Free and Open Indo-Pacific Strategy converges with AEP beginning in the North East. China is a common adversary. As a result of these policies, several beneficial outcomes have been achieved. For example, trade is expanding significantly. The ASEAN countries accounted for 10.58% of India’s trade. Also, multiple agreements have been signed. For example, the FTA was signed in 2009 and came into effect in 2010. An agreement on trade and services was also signed. In terms of investments as well, ASEAN accounted for 12.5% of inbound FDI since 2000 (in which Singapore has had a significant share). The FDI flows into India between 2000 and 2015 have been $39 billion. In 2015, India announced $1 billion Line of Credit to ASEAN. Also, a fund of $ 77 million has been established for facilitating manufacturing in CLMV countries (Cambodia, Laos, Myanmar, Vietnam). The concern which needs to be addressed now is the widening trade deficit, which is currently favourable to the ASEAN countries.
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भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिये। इसके साथ हीस्पष्ट कीजिये कि यह भारतीय संविधान को किस प्रकार प्रभावित करता है?(150- 200 शब्द , 10 अंक) Discuss the major provisions of the Government of India Act 1935. Also, clarify how it affects the Indian Constitution. (150- 200 words, 10 marks)
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एप्रोच:- भारत शासन अधिनियम 1935 की पृष्ठ्भूमि देते हुए भूमिका दीजिये इसके प्रमुख प्रावधानों को लिखिए। भारतीय संविधान पर इसके प्रभावों को बताइये अन्य देशों केसंविधानों का प्रभाव भी बताते हुए संतुलित निष्कर्ष दीजिये उत्तर प्रारूप :- साइमन कमीशन की रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलनों के निष्कर्ष से भारत शासन अधिनियम 1935 की पृष्ठभूमि निर्माण हुई। इसके साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारतीयोंको शासन में अधिक भागीदारी प्रदान करने हेतु एक नए अधिनियम को लाने को विवश किया। 1935 का भारत सरकार अधिनियम के प्रमुख प्रावधान :- प्रांतो मे द्वैध शासन हटाकर केंद्र मे लागू करने का प्रस्ताव किया गया । पहली बार ब्रिटिश प्रांतो को 50 विषय स्वतंत्र रूप से दिया गए। जिन पर कानून बना सकते थे। केंद्र में गवर्नर जनरल को निर्वाचित भारतीय मंत्रियों एवं मनोनीत पार्षदों की सहायता से ब्रिटिश भारत का शासन चलाना था । वास्तव मे यह कभी अस्तित्व मे नहीं आयी । प्रांतीय स्वायत्ता का अर्थ :- प्रांतीय सरकार , प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होगी अर्थात जब तक उसे लोकप्रिय सदन में बहुमत हासिल है तभी तक वह सत्ता में रहेगी उसे उपलब्ध कराये गए विषय पर उसे कानून बनाने का और उन्हें लागू करने का पूरा अधिकार होगा। संघ , प्रांतीय व समवर्ती सूची अखिल भारतीय परिसंघ की संकल्पना की गयी थी , जिसमें ब्रिटिश प्रांतो के साथ साथ रजवाड़ों को भी शामिल किया जाना था इसके अंतर्गत गवर्नर जनरल और प्रांतीय गवर्नरों को अधिक विवेकीय अधिकार प्रदान किये गए , कई अधिमानी शक्तियां दी गयी। इसके साथ ही कि यदि चुने हुए भारतीय मंत्री , ब्रिटिश साम्राज्य के हितो के विरुद्ध कार्य करते है , तो उन्हें बर्खास्त किया जा सके। लन्दन में भारत राज्य सचिव को परामर्श देने के लिए 1858 में जिस परिषद् का गठन किया गया था। अब उसे भंग किया गया। ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता स्थापित अर्थात अपनी मर्जी के अनुरूप कोई भी संशोधन कर सकता था बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग करने के लिए एक अधिनियम पारित , ताकि ब्रिटिश शासन , भारत राज्य क्षेत्र पर अधिक ध्यान दे सके अल्पसंख्यकों को आवश्यकता से अधिक सुरक्षा व तरहीजी दी गयी। 6 ब्रिटिश प्रांतों - बंगाल , बिहार , बॉम्बे , मद्रास संयुक्त प्रान्त व असम को द्वि सदनीय बनाने का प्रस्ताव किया संघ और संघीय इकाइयों अथात ब्रिटिश प्रांतों के बीच उपजे विवाद को हल करने के लिए एक फेडरल कोर्ट के गठन का प्रस्ताव किया गया था इसे ही आज सुप्रीम कोर्ट कहते है भारतीय संविधान के भाग 5 अध्याय के अनुच्छेद 135 के अंतर्गत फेडरल कोर्ट की सभी शक्तियां आज भारतीय सुप्रीम कोर्ट को मिली है 1929 में यंग हिल्टन समिति का गठन किया गया , जिसकी सिफारिश पर 1935 में वाइसराय की कार्यकारी परिषद् में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम पारित किया था और उसे केंद्रीय बैंक का दर्जा दिया था , इसके अंतर्गत RBI को भारत एवं बर्मा दोनों के केंद्रीय बैंक का कार्य किया। वर्तमान भारतीय संविधान के निम्नलिखित अंश 1935 के भारत शासन अधिनियम से प्रभावित है: - प्रांतीय स्वायत्ता (अनुच्छेद 246 के अंतर्गत ) एक ऐसा परिसंघ जिसमे केंद्र अधिक शक्तिशाली है (अनुच्छेद 256 , 257 ,355 ,365 , 356 ) राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना ( अनुच्छेद 356) भारत सरकार की धारा 91के अंतर्गतइसे गवर्नर जनरल शासन कहते थे संघीय न्यायालय के रूप में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हाई कोर्ट व अधीनस्थ अदालतों के सम्बन्ध व उनके क्षेत्राधिकार सामान्य रूप से केंद्र राज्य सम्बन्ध जैसे वित्तीय सम्बन्ध राज्यों में राज्पालों की नियुक्ति एवं उनके विवेकीय अधिकार निर्वाचन प्रणाली नागरिकता सम्बन्धी कुछ उपबंध अखिल भारतीय सेवाओं की स्थिति प्रांतीय सिविल सेवा की स्थिति नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक संस्था (CAG ) राज्यों में स्थानीय निकायों का प्रबंध महान्यायवादी संस्था का निर्माण दंडात्मक कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया सिविल अथवा दीवानी मामलों में न्यायलयी प्रक्रिया संसदीय प्रक्रिया और प्रक्रिया नियम (सदन कापीठासीन अधिकारी जिस प्रकार संसद का संचालन करता है ) यद्यपि भारत का संविधान , 1935 के भारत शासनअधिनियम से अत्यधिक प्रभावित था किन्तु इसके साथ ही भारतीय संविधान पर अमेरिकी , ऑस्ट्रलिया , कनाडा आदि देशों के संविधानों से भी कुछ अंश लिए गए है।
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##Question:भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिये। इसके साथ हीस्पष्ट कीजिये कि यह भारतीय संविधान को किस प्रकार प्रभावित करता है?(150- 200 शब्द , 10 अंक) Discuss the major provisions of the Government of India Act 1935. Also, clarify how it affects the Indian Constitution. (150- 200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- भारत शासन अधिनियम 1935 की पृष्ठ्भूमि देते हुए भूमिका दीजिये इसके प्रमुख प्रावधानों को लिखिए। भारतीय संविधान पर इसके प्रभावों को बताइये अन्य देशों केसंविधानों का प्रभाव भी बताते हुए संतुलित निष्कर्ष दीजिये उत्तर प्रारूप :- साइमन कमीशन की रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलनों के निष्कर्ष से भारत शासन अधिनियम 1935 की पृष्ठभूमि निर्माण हुई। इसके साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारतीयोंको शासन में अधिक भागीदारी प्रदान करने हेतु एक नए अधिनियम को लाने को विवश किया। 1935 का भारत सरकार अधिनियम के प्रमुख प्रावधान :- प्रांतो मे द्वैध शासन हटाकर केंद्र मे लागू करने का प्रस्ताव किया गया । पहली बार ब्रिटिश प्रांतो को 50 विषय स्वतंत्र रूप से दिया गए। जिन पर कानून बना सकते थे। केंद्र में गवर्नर जनरल को निर्वाचित भारतीय मंत्रियों एवं मनोनीत पार्षदों की सहायता से ब्रिटिश भारत का शासन चलाना था । वास्तव मे यह कभी अस्तित्व मे नहीं आयी । प्रांतीय स्वायत्ता का अर्थ :- प्रांतीय सरकार , प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होगी अर्थात जब तक उसे लोकप्रिय सदन में बहुमत हासिल है तभी तक वह सत्ता में रहेगी उसे उपलब्ध कराये गए विषय पर उसे कानून बनाने का और उन्हें लागू करने का पूरा अधिकार होगा। संघ , प्रांतीय व समवर्ती सूची अखिल भारतीय परिसंघ की संकल्पना की गयी थी , जिसमें ब्रिटिश प्रांतो के साथ साथ रजवाड़ों को भी शामिल किया जाना था इसके अंतर्गत गवर्नर जनरल और प्रांतीय गवर्नरों को अधिक विवेकीय अधिकार प्रदान किये गए , कई अधिमानी शक्तियां दी गयी। इसके साथ ही कि यदि चुने हुए भारतीय मंत्री , ब्रिटिश साम्राज्य के हितो के विरुद्ध कार्य करते है , तो उन्हें बर्खास्त किया जा सके। लन्दन में भारत राज्य सचिव को परामर्श देने के लिए 1858 में जिस परिषद् का गठन किया गया था। अब उसे भंग किया गया। ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता स्थापित अर्थात अपनी मर्जी के अनुरूप कोई भी संशोधन कर सकता था बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग करने के लिए एक अधिनियम पारित , ताकि ब्रिटिश शासन , भारत राज्य क्षेत्र पर अधिक ध्यान दे सके अल्पसंख्यकों को आवश्यकता से अधिक सुरक्षा व तरहीजी दी गयी। 6 ब्रिटिश प्रांतों - बंगाल , बिहार , बॉम्बे , मद्रास संयुक्त प्रान्त व असम को द्वि सदनीय बनाने का प्रस्ताव किया संघ और संघीय इकाइयों अथात ब्रिटिश प्रांतों के बीच उपजे विवाद को हल करने के लिए एक फेडरल कोर्ट के गठन का प्रस्ताव किया गया था इसे ही आज सुप्रीम कोर्ट कहते है भारतीय संविधान के भाग 5 अध्याय के अनुच्छेद 135 के अंतर्गत फेडरल कोर्ट की सभी शक्तियां आज भारतीय सुप्रीम कोर्ट को मिली है 1929 में यंग हिल्टन समिति का गठन किया गया , जिसकी सिफारिश पर 1935 में वाइसराय की कार्यकारी परिषद् में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम पारित किया था और उसे केंद्रीय बैंक का दर्जा दिया था , इसके अंतर्गत RBI को भारत एवं बर्मा दोनों के केंद्रीय बैंक का कार्य किया। वर्तमान भारतीय संविधान के निम्नलिखित अंश 1935 के भारत शासन अधिनियम से प्रभावित है: - प्रांतीय स्वायत्ता (अनुच्छेद 246 के अंतर्गत ) एक ऐसा परिसंघ जिसमे केंद्र अधिक शक्तिशाली है (अनुच्छेद 256 , 257 ,355 ,365 , 356 ) राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना ( अनुच्छेद 356) भारत सरकार की धारा 91के अंतर्गतइसे गवर्नर जनरल शासन कहते थे संघीय न्यायालय के रूप में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हाई कोर्ट व अधीनस्थ अदालतों के सम्बन्ध व उनके क्षेत्राधिकार सामान्य रूप से केंद्र राज्य सम्बन्ध जैसे वित्तीय सम्बन्ध राज्यों में राज्पालों की नियुक्ति एवं उनके विवेकीय अधिकार निर्वाचन प्रणाली नागरिकता सम्बन्धी कुछ उपबंध अखिल भारतीय सेवाओं की स्थिति प्रांतीय सिविल सेवा की स्थिति नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक संस्था (CAG ) राज्यों में स्थानीय निकायों का प्रबंध महान्यायवादी संस्था का निर्माण दंडात्मक कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया सिविल अथवा दीवानी मामलों में न्यायलयी प्रक्रिया संसदीय प्रक्रिया और प्रक्रिया नियम (सदन कापीठासीन अधिकारी जिस प्रकार संसद का संचालन करता है ) यद्यपि भारत का संविधान , 1935 के भारत शासनअधिनियम से अत्यधिक प्रभावित था किन्तु इसके साथ ही भारतीय संविधान पर अमेरिकी , ऑस्ट्रलिया , कनाडा आदि देशों के संविधानों से भी कुछ अंश लिए गए है।
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प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। पर्वत निर्माण के संबंध में इस सिद्धान्त ने एक नई अवधारणा प्रस्तुत की है। चर्चा कीजिए। (150 -200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of plate tectonics theory. This theory has introduced a new concept in relation to mountain construction. Discuss (150 -200 words/10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण प्लेट विवर्तनिकी का परिचय देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। अवधारणा को स्पष्ट करते हुए और विस्तार कीजिए। इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि इस सिद्धान्त ने किस प्रकार पर्वत निर्माण प्रक्रिया को समझने में सहायता की। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त एक एकीकृत अवधारणा है जो एक साथ सागर नितल प्रसरण, महाद्वीप्य विस्थापन, क्रस्ट की संरचनाओं और विश्व में ज्वालामुखी गतिविधियों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती है।विवर्तनिकी प्लेटें स्वतंत्र रूप से दुर्बलतामंडल पर उत्प्लावित हैं और क्षैतिज अवस्था में गतिमान हैं। प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में अधिक घनत्व वाली प्लेट कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपति हो जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसारपृथ्वी स्थलमंडल सात मुख्य और कुछ गौण प्लेटों में विभाजित है। मुख्य प्लेटें जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट, प्रशांत प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, यूरेशियन प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट। प्लेट विवर्तनिकी के माध्यम से पर्वत निर्माणकारी प्रक्रिया को समझने में सुविधा हुई। प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में आपस में टकराने से क्रस्ट में उत्पन्न संपीडन के कारण वलित पर्वतों का निर्माण होता है। इसे निम्न तीन रूपों में समझ सकते हैं: महाद्वीपीय- महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण: जब प्लेटें टकराती हैं तो सापेक्षित रूप से अधिक घनत्व वाली महाद्वीपीय प्लेट का कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे आंशिक क्षेपण हो जाता है परिणाम स्वरूप पर्वतों का निर्माण होता है। जैसे कि यूरेशियाई और भारतीय प्लेट के टकराने से हिमालय का निर्माण। इसके माध्यम से निर्मित पर्वतों की ऊंचाई अधिक होती है क्योंकि प्लेटों के टकराने से अवसादों के कारण इसका निर्माण हुआ है। महाद्वीपीय प्लेटों का अभिसरण अभी तक जारी है इसी कारण से हिमालय की ऊंचाई अभी भी बढ़ रहा है। महाद्वीपीय- महासागरीय प्लेट अभिसरण : जब महाद्वीपीय महासागरीय प्लेटें आपस में टकराती हैं तो महासागरीय प्लेट का घनत्व अधिक होने के कारण इसका महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है तथा अधिक संपीड़न के कारण प्लेटों के किनारे पर वलन पड़ जाता है। इस प्रकार मोड़दार पर्वत का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए रॉकी और एंडीज़। अधिक घनत्व वाली प्लेट के क्षेपण के कारण महासागरीय गर्त का निर्माण होता है। वस्तुतः महासागरीय प्लेट अधिक गहराई में जाकर पिघल जाता है और मैग्मा के रूप में धरातल पर इंका पुनः उद्गार होता है। इससे छोटे छोटे पर्वत और पठार का निर्माण होता है। ज्वालामुखी पर्वत के बनने का कारण भी यही है। महासागरीय-महासागरीय प्लेट अभिसरण: जब दोनों प्लेटें टकराती हैं तो अधिक घनत्व वाली प्लेट का कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है। इस प्रक्रिया में द्वीपीय तोरण का निर्माण होता है। ये द्वीपीय तोरण इस प्रकार प्रतीत होते हैं कि समुद्र के नितल से पर्वत की चोटी निकली हुई है। इसका प्रमुख उदाहरण है जापान का द्वीपीय चाप। प्रत्येक चापों के किनारों पर गहरे महासागरीय गर्त पाये जाते हैं। क्षेपित प्लेट के पिघलने से ज्वालामुखी क्रियाएँ घटित होती हैं। इस स्थिति में ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है। निष्कर्षतः प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत को भू-विज्ञान के संबंध में सर्वाधिक स्वीकार्यता प्रपट हुई है। इसके माध्यम से पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखियों के वितरण प्रारूप की संतोषजनक व्याख्या हो सकी है। इस सिद्धांत ने महासागरीय और महाद्वीपीय भू पटल की निर्माण विधि पर भी प्रकाश डाला।
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##Question:प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। पर्वत निर्माण के संबंध में इस सिद्धान्त ने एक नई अवधारणा प्रस्तुत की है। चर्चा कीजिए। (150 -200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of plate tectonics theory. This theory has introduced a new concept in relation to mountain construction. Discuss (150 -200 words/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण प्लेट विवर्तनिकी का परिचय देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। अवधारणा को स्पष्ट करते हुए और विस्तार कीजिए। इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि इस सिद्धान्त ने किस प्रकार पर्वत निर्माण प्रक्रिया को समझने में सहायता की। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त एक एकीकृत अवधारणा है जो एक साथ सागर नितल प्रसरण, महाद्वीप्य विस्थापन, क्रस्ट की संरचनाओं और विश्व में ज्वालामुखी गतिविधियों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती है।विवर्तनिकी प्लेटें स्वतंत्र रूप से दुर्बलतामंडल पर उत्प्लावित हैं और क्षैतिज अवस्था में गतिमान हैं। प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में अधिक घनत्व वाली प्लेट कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपति हो जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसारपृथ्वी स्थलमंडल सात मुख्य और कुछ गौण प्लेटों में विभाजित है। मुख्य प्लेटें जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट, प्रशांत प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, यूरेशियन प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट। प्लेट विवर्तनिकी के माध्यम से पर्वत निर्माणकारी प्रक्रिया को समझने में सुविधा हुई। प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में आपस में टकराने से क्रस्ट में उत्पन्न संपीडन के कारण वलित पर्वतों का निर्माण होता है। इसे निम्न तीन रूपों में समझ सकते हैं: महाद्वीपीय- महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण: जब प्लेटें टकराती हैं तो सापेक्षित रूप से अधिक घनत्व वाली महाद्वीपीय प्लेट का कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे आंशिक क्षेपण हो जाता है परिणाम स्वरूप पर्वतों का निर्माण होता है। जैसे कि यूरेशियाई और भारतीय प्लेट के टकराने से हिमालय का निर्माण। इसके माध्यम से निर्मित पर्वतों की ऊंचाई अधिक होती है क्योंकि प्लेटों के टकराने से अवसादों के कारण इसका निर्माण हुआ है। महाद्वीपीय प्लेटों का अभिसरण अभी तक जारी है इसी कारण से हिमालय की ऊंचाई अभी भी बढ़ रहा है। महाद्वीपीय- महासागरीय प्लेट अभिसरण : जब महाद्वीपीय महासागरीय प्लेटें आपस में टकराती हैं तो महासागरीय प्लेट का घनत्व अधिक होने के कारण इसका महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है तथा अधिक संपीड़न के कारण प्लेटों के किनारे पर वलन पड़ जाता है। इस प्रकार मोड़दार पर्वत का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए रॉकी और एंडीज़। अधिक घनत्व वाली प्लेट के क्षेपण के कारण महासागरीय गर्त का निर्माण होता है। वस्तुतः महासागरीय प्लेट अधिक गहराई में जाकर पिघल जाता है और मैग्मा के रूप में धरातल पर इंका पुनः उद्गार होता है। इससे छोटे छोटे पर्वत और पठार का निर्माण होता है। ज्वालामुखी पर्वत के बनने का कारण भी यही है। महासागरीय-महासागरीय प्लेट अभिसरण: जब दोनों प्लेटें टकराती हैं तो अधिक घनत्व वाली प्लेट का कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है। इस प्रक्रिया में द्वीपीय तोरण का निर्माण होता है। ये द्वीपीय तोरण इस प्रकार प्रतीत होते हैं कि समुद्र के नितल से पर्वत की चोटी निकली हुई है। इसका प्रमुख उदाहरण है जापान का द्वीपीय चाप। प्रत्येक चापों के किनारों पर गहरे महासागरीय गर्त पाये जाते हैं। क्षेपित प्लेट के पिघलने से ज्वालामुखी क्रियाएँ घटित होती हैं। इस स्थिति में ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है। निष्कर्षतः प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत को भू-विज्ञान के संबंध में सर्वाधिक स्वीकार्यता प्रपट हुई है। इसके माध्यम से पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखियों के वितरण प्रारूप की संतोषजनक व्याख्या हो सकी है। इस सिद्धांत ने महासागरीय और महाद्वीपीय भू पटल की निर्माण विधि पर भी प्रकाश डाला।
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स्टालिन ने अपने शासन के पहले दशक में ही सोवियत संघ को परिवर्तित कर दिया। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Stalin transform the Soviet Union in the first decade of his rule. Discuss.(150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में स्टालिन के शासन की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,समझाइए की कैसेस्टालिन ने अपने शासन के पहले दशक में ही सोवियत संघ को परिवर्तित कर दिया। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- जोसेफ स्टालिन 1929 से 1953 तक सोवियत संघ का प्रमुख था।यहलेनिन के उत्तराधिकारी बने। इन्होने सोवियत संघ के मज़ूबत बनने के दौर में नेतृत्व किया। औधोगीकरण को तेज़ी से बढ़ाया और खेती का बलपूर्वक सामूहिकीकरण किया। इन्हे दूसरे विश्व युद्ध में जीत का श्रेय दिया जाता है। 1930 के दशक में भयानक आतंक और अपनी पार्टी में विरोधियों को कुचलने के लिए इनका नाम लिया जाता है। स्टालिन ने USSR की स्थिति को मज़बूत करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये:- उद्योगों के क्षेत्र में नियोजित विकास। पंचवर्षीय योजना के माध्यम से विकास किया गया। दक्षिण एवं पूर्वी विकास पर भी बल अर्थात संतुलित विकास, भारीउद्योगों पर बल दिया गयातथा द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व रक्षा उद्योगों पर बल दिया गया। महामंदी का प्रभाव भी रूसी उद्योगों पर नहीं दिखा इससे साम्यवादी व्यवस्था की लोकप्रियता बढ़ी। कृषि के क्षेत्र में स्टालिन ने सामूहिकीकरण की नीति अपनाई। पंचवर्षीय योजनाओं के प्रारम्भिक दौर में रूस के शहरों में अनाज का भारी संकट पैदा हो गया था। विभिन्न प्रयासों के बाद भी जब अनाज की कमी बानी रही तो सामूहिकीकरण का फैसला लिया गया। इसके अंतर्गत भूमि को राजकीय नियंत्रण मेंलिया गया। बड़े बड़े फार्मों पर खेती तथा खेती में ट्रेक्टर व अन्य मशीनों का प्रयोग किया गया। स्टालिन की इस नीति का व्यापक विरोध हुआ लेकिन कठोरतापूर्वक नीति को लागू की गई।यहाँ तक की विरोध करने वाले किसानों को यातनाएं दी जाती थी। गुस्साए किसानो ने विरोध जारी रखने के लिए अपने पशुओं तक को मारने लगे।आरम्भिक वर्षों में चुनौतियों के बावजूद खाद्यान के मामले में USSR आत्मनिर्भर हुआ। स्टालिन ने आतंक और एक अधिनायकवादी पकड़ के साथ शासन किया, ताकि जो कोई भी उसका विरोध करे उसे खत्म कर सके। उन्होंने गुप्त पुलिस की शक्तियों का विस्तार किया, नागरिकों को एक-दूसरे की जासूसी करने के लिए प्रोत्साहित किया और लाखों लोगों को मजबूर कर श्रम शिविरों मेंभेज दिया। इसके अतिरिक्त, स्टालिन ने सोवियत संघ में खुद के आसपास व्यक्तित्व का एक पंथ बनाया। उनके सम्मान में शहरों का नाम बदल दिया गया। सोवियत इतिहास की किताबें फिर से उन्हें क्रांति में एक प्रमुख भूमिका देने के लिए लिखी गईं और उसके जीवन के अन्य पहलुओं की कथाओं का वर्णन किया गया । उसका नाम भीसोवियत राष्ट्रगान का हिस्सा बन गया। उसकी सरकार ने सोवियत मीडिया को भी नियंत्रित किया। इस प्रकार स्टालिन के शासन केतहत सोवियत संघ एक किसान समाज से औद्योगिक, अधिनायकवादी और सैन्य शक्ति में परिवर्तित हो गया।
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##Question:स्टालिन ने अपने शासन के पहले दशक में ही सोवियत संघ को परिवर्तित कर दिया। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Stalin transform the Soviet Union in the first decade of his rule. Discuss.(150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में स्टालिन के शासन की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,समझाइए की कैसेस्टालिन ने अपने शासन के पहले दशक में ही सोवियत संघ को परिवर्तित कर दिया। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- जोसेफ स्टालिन 1929 से 1953 तक सोवियत संघ का प्रमुख था।यहलेनिन के उत्तराधिकारी बने। इन्होने सोवियत संघ के मज़ूबत बनने के दौर में नेतृत्व किया। औधोगीकरण को तेज़ी से बढ़ाया और खेती का बलपूर्वक सामूहिकीकरण किया। इन्हे दूसरे विश्व युद्ध में जीत का श्रेय दिया जाता है। 1930 के दशक में भयानक आतंक और अपनी पार्टी में विरोधियों को कुचलने के लिए इनका नाम लिया जाता है। स्टालिन ने USSR की स्थिति को मज़बूत करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये:- उद्योगों के क्षेत्र में नियोजित विकास। पंचवर्षीय योजना के माध्यम से विकास किया गया। दक्षिण एवं पूर्वी विकास पर भी बल अर्थात संतुलित विकास, भारीउद्योगों पर बल दिया गयातथा द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व रक्षा उद्योगों पर बल दिया गया। महामंदी का प्रभाव भी रूसी उद्योगों पर नहीं दिखा इससे साम्यवादी व्यवस्था की लोकप्रियता बढ़ी। कृषि के क्षेत्र में स्टालिन ने सामूहिकीकरण की नीति अपनाई। पंचवर्षीय योजनाओं के प्रारम्भिक दौर में रूस के शहरों में अनाज का भारी संकट पैदा हो गया था। विभिन्न प्रयासों के बाद भी जब अनाज की कमी बानी रही तो सामूहिकीकरण का फैसला लिया गया। इसके अंतर्गत भूमि को राजकीय नियंत्रण मेंलिया गया। बड़े बड़े फार्मों पर खेती तथा खेती में ट्रेक्टर व अन्य मशीनों का प्रयोग किया गया। स्टालिन की इस नीति का व्यापक विरोध हुआ लेकिन कठोरतापूर्वक नीति को लागू की गई।यहाँ तक की विरोध करने वाले किसानों को यातनाएं दी जाती थी। गुस्साए किसानो ने विरोध जारी रखने के लिए अपने पशुओं तक को मारने लगे।आरम्भिक वर्षों में चुनौतियों के बावजूद खाद्यान के मामले में USSR आत्मनिर्भर हुआ। स्टालिन ने आतंक और एक अधिनायकवादी पकड़ के साथ शासन किया, ताकि जो कोई भी उसका विरोध करे उसे खत्म कर सके। उन्होंने गुप्त पुलिस की शक्तियों का विस्तार किया, नागरिकों को एक-दूसरे की जासूसी करने के लिए प्रोत्साहित किया और लाखों लोगों को मजबूर कर श्रम शिविरों मेंभेज दिया। इसके अतिरिक्त, स्टालिन ने सोवियत संघ में खुद के आसपास व्यक्तित्व का एक पंथ बनाया। उनके सम्मान में शहरों का नाम बदल दिया गया। सोवियत इतिहास की किताबें फिर से उन्हें क्रांति में एक प्रमुख भूमिका देने के लिए लिखी गईं और उसके जीवन के अन्य पहलुओं की कथाओं का वर्णन किया गया । उसका नाम भीसोवियत राष्ट्रगान का हिस्सा बन गया। उसकी सरकार ने सोवियत मीडिया को भी नियंत्रित किया। इस प्रकार स्टालिन के शासन केतहत सोवियत संघ एक किसान समाज से औद्योगिक, अधिनायकवादी और सैन्य शक्ति में परिवर्तित हो गया।
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Among several factors for India’s potential growth, savings rate is the most effective one. Do you agree? What are the other factors available for growth potential?(150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Definition of GDP -CALCULATION OF GDP Expenditure Method Output Method Income Method -CONCLUSION Data and comparison(s) of (India’s) GDP Answer:- GDP i.e. Gross Domestic Production refers to the total value of goods and services produced within the boundaries of the economy , within a given year. There are three main methods to calculate the GDP. These are as follows CALCULATION OF GDP I EXPENDITURE METHOD 1) CONSUMPTION EXPENDITURE It refers to theexpenditure incurred by households in the economy. It is denoted by the letter ‘C’. 2) GOVERNMENT EXPENDITURE It refers to the government consumption expenditure (not government investment) and is denoted by the letter ‘G’. 3) INVESTMENT EXPENDITURE It refers to the investmentexpenditure bycorporates, both private and government, and is denoted by the letter ‘I’. 4) NET EXPORTS (NX) It refers to the difference between the exports (X) and imports (M) 5) FORMULA As per the rule: GDP = C + G + I + NX II OUTPUT METHOD 1) PRODUCTION THIS YEAR Production this year = Sales - opening stock + closing stock Opening stock is deducted because it is carried over from the previous year. Closing stock is added because it is produced in the current year and was not sold. 2) GDP CALCULATION GDP = Production (this year) x prices III INCOME METHOD It iscurrently being used by the Government of India. 1) COMPENSATION TO EMPLOYEES Individuals get salary as cash in hand. In addition to this, there is a certain cost to the company for employing the person in the form of expenditure on allowances etc. This is termed as compensation to employees. It is denoted by the symbol ‘CE’. 2) OPERATING SURPLUS The corporates earn operating surplus. This is the income minus expenditure i.e. profits. In India, there is a huge problem in the informal sector as well. Around 92% of the workers in India, work in the informal sector as per the NSSO. Therefore, this is also taken into account (as MI). 3) CONSUMPTION OF FIXED CAPITAL This refers to the depreciation (generally incurred in the machines) in the process of production (=> gross value). 4) FORMULA FOR CALCULATION OF GDP In India: GVA at factor prices= CE + OS/ MI + CFC GVA at basic prices= GVA at factor prices + production taxes – production subsidies GDP at Market Prices= GVA at basic prices + product taxes - product subsidies Calculation of GDP through any of the 3 methods should give the same value . Double Counting, i.e. the counting of the expenditure twice (same expenditure counted twice under different heads), is not allowed. As per the WB, IMF, India is the world"s 6th largest economy (GDP at current exchange rate) . At purchasing price parity (PPP), India is at the 3rd position (constant rank)in terms of GDP, China being number 1 . In terms of per capita income, India is the 119th richest country in the world. And in nominal terms, India is the 140th richest country.
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##Question:Among several factors for India’s potential growth, savings rate is the most effective one. Do you agree? What are the other factors available for growth potential?(150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Definition of GDP -CALCULATION OF GDP Expenditure Method Output Method Income Method -CONCLUSION Data and comparison(s) of (India’s) GDP Answer:- GDP i.e. Gross Domestic Production refers to the total value of goods and services produced within the boundaries of the economy , within a given year. There are three main methods to calculate the GDP. These are as follows CALCULATION OF GDP I EXPENDITURE METHOD 1) CONSUMPTION EXPENDITURE It refers to theexpenditure incurred by households in the economy. It is denoted by the letter ‘C’. 2) GOVERNMENT EXPENDITURE It refers to the government consumption expenditure (not government investment) and is denoted by the letter ‘G’. 3) INVESTMENT EXPENDITURE It refers to the investmentexpenditure bycorporates, both private and government, and is denoted by the letter ‘I’. 4) NET EXPORTS (NX) It refers to the difference between the exports (X) and imports (M) 5) FORMULA As per the rule: GDP = C + G + I + NX II OUTPUT METHOD 1) PRODUCTION THIS YEAR Production this year = Sales - opening stock + closing stock Opening stock is deducted because it is carried over from the previous year. Closing stock is added because it is produced in the current year and was not sold. 2) GDP CALCULATION GDP = Production (this year) x prices III INCOME METHOD It iscurrently being used by the Government of India. 1) COMPENSATION TO EMPLOYEES Individuals get salary as cash in hand. In addition to this, there is a certain cost to the company for employing the person in the form of expenditure on allowances etc. This is termed as compensation to employees. It is denoted by the symbol ‘CE’. 2) OPERATING SURPLUS The corporates earn operating surplus. This is the income minus expenditure i.e. profits. In India, there is a huge problem in the informal sector as well. Around 92% of the workers in India, work in the informal sector as per the NSSO. Therefore, this is also taken into account (as MI). 3) CONSUMPTION OF FIXED CAPITAL This refers to the depreciation (generally incurred in the machines) in the process of production (=> gross value). 4) FORMULA FOR CALCULATION OF GDP In India: GVA at factor prices= CE + OS/ MI + CFC GVA at basic prices= GVA at factor prices + production taxes – production subsidies GDP at Market Prices= GVA at basic prices + product taxes - product subsidies Calculation of GDP through any of the 3 methods should give the same value . Double Counting, i.e. the counting of the expenditure twice (same expenditure counted twice under different heads), is not allowed. As per the WB, IMF, India is the world"s 6th largest economy (GDP at current exchange rate) . At purchasing price parity (PPP), India is at the 3rd position (constant rank)in terms of GDP, China being number 1 . In terms of per capita income, India is the 119th richest country in the world. And in nominal terms, India is the 140th richest country.
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" हालाँकि वर्साय की अपमानजनक संधि को ही मुख्यतः जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के रूप में सर्वाधिक मान्यता दी जाती है परन्तु अन्य कई प्रमुख कारण भी थे जिन्होंने नाजीवाद तथा हिटलर को जर्मनी में स्थापित किया |" कथन की व्याख्या कीजिये | इसके साथ ही, हिटलर द्वारा अपनाए गए विभिन्न सिद्धांतों या विचारों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "Although the insulting treaty of versailles is recognized primarily as the rise of hitler and nazism in germany, there are also other major reasons for the establishment of nazism and hitler in germany." Explain the statement. Along with that, mention various theories adopted by hitler. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- हिटलर के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के रूप में वर्साय की संधि की भूमिका को बताईये| अगले भाग में, जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के अन्य प्रमुख कारणों की चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में, हिटलर द्वारा अपने गये विभिन्न सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- हिटलर ने एक सामान्य जर्मन सिपाही के रूप में प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था| जर्मनी की पराजय के बाद हुए वर्साय की संधि को वह बेहद अपमानजनक समझता था एवं युद्ध के पश्चात उसने घोषणा की कि जर्मन पराजय का मुख्य कारण उसके नेताओं की बुजदिली तथा वाईमर गणतंत्र है| इसके बाद उसने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रम दल या नात्सी पार्टी की सदस्यता ली| 1923 में उसे जर्मन सरकार का तख्ता पलटने के आरोप में जेल भी जाना पड़ा | जेल से रिहा होने के बाद उसने संगठन को पुनर्गठित किया| आर्थिक संकट के दौरान हिटलर की लोकप्रियता बढ़ी जैसे- 1919-23 के बीच आर्थिक अस्थिरता के माहौल में नाजीवादी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ी| पुनः, महामंदी(1929-32) के दौरान नाजीवादी दल को जनसमर्थन बढ़ता गया और 1932 के चुनाव में यह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आईएवं1933 में उसे चांसलर बनाया गया| जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के रूप में वर्साय की संधि की भूमिका प्रथम विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों ने पराजित जर्मनी को वर्साय की अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने को बाध्य किया था| जर्मनी के बहुत सारे प्रदेश छीन लिए गए थे तथा उसका नि:शस्त्रीकरण कर दिया गया था| संधि के हस्ताक्षर के समय भी जर्मन प्रतिनिधियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया था जिससे जर्मन जनता स्वयं को अपमानित महसूस करने लगी थी| जर्मन जनता एक ऐसे नेता की खोज में थी जो देश के अपमान को धोकर राष्ट्रीय गौरव की पुनः स्थापना कर सके| हिटलर ने जनता के इस मनोविज्ञान को समझा तथा यह घोषणा की कि सत्ता प्राप्त करते ही वह वर्साय में हुए अपमान का बदला लेगा| हिटलर के उदय के प्रमुख कारण में उपरोक्त को स्थान दिया जाता है; हालांकि यह हिटलर के उदय की पृष्ठभूमि को तैयार करता है एवं इसके अलावा अन्य कई सारे प्रमुख कारण थे जिन्होंने जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद को स्थापित करने में अपना प्रमुख योगदान दिया जैसे- आर्थिक महामंदी का प्रभाव - जर्मनी को क्षतिपूर्ति के रूप में एक भारी राशि मित्र राष्ट्रों को देनी पड़ी थी; साथ ही, मुआवजा चुकाने के लिए उसे अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा था| 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से जर्मनी भी प्रभावित हुआ जिससे बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि हुई, जनता की क्रय शक्ति कम हो गई तथा जनतंत्र के प्रति आम आदमी का मोहभंग होने लगा| हिटलर ने इस मौके का फायदा उठाया तथा बेकारी दूर करने, औपनिवेशिक विस्तार करने तथा जनता की क्रय शक्ति बढ़ाने आदि का आश्वासन दिया एवं सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त किया| साम्यवादी विचारधारा के बढ़ते हुए प्रभाव ने जर्मनी के पूंजीपति, उद्योगपति, धनिक वर्ग, जागीरदार एवं जमींदारों को भयभीत किया| उन्होंने विशेषकर मंदी के दौरान हिटलर को समर्थन दिया| यहूदी विरोध की भावना - जर्मनी में यहूदियों की संख्या हालांकि काफी कम थी परंतु वे व्यापार, व्यवसाय, राजनीति में अग्रणी थे| साधारण जर्मन जनता इन्हें वैभवशाली वर्ग के रूप में समझती थी तथा शोषक समझकर घृणा करती थी| प्रथम विश्व युद्ध में जर्मन जनता ने यहूदियों के विश्वासघात को जर्मनी की पराजय के कारण के रूप में भी देखा| हिटलर ने इस मुद्दे को काफी जोर-शोर से उठाया जिससे जर्मनजनता की सहानुभूति हिटलर एवं नाजी दल के प्रति हुई| सेना तथा नौकरशाही का समर्थन - हिटलर द्वारा युद्ध एवं पुनःशस्त्रीकरण का नारादिए जाने से सैनिक वर्ग ने नाजी पार्टी को समर्थन दिया|साथ ही, नौकरशाही के अधिकांश उच्च वर्गीय लोग जनतंत्र से घृणा करते थे जिसकी वजह से उन्होंने हिटलर को समर्थन दिया| स्वयं सेवक दल का निर्माण - युद्ध के उपरांत भारी संख्या में बेरोजगार जर्मन सैनिकों को हिटलर ने नाजी पार्टी के स्वयंसेवक के रूप में शामिल किया जिसके माध्यम से वह अपने सिद्धांतों का प्रचार करता था तथा विरोधियों का दमन करता था| राजनीतिक दलों की विफलता ने भी हिटलर के उदय का मार्ग प्रशस्त किया| एक तो जर्मनी में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर थी तथा दूसरा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के कारण मिलीजुली सरकार विभिन्न मुद्दों पर निर्णायक कदम नहीं उठा पा रही थी| साथ ही, वाईमर गणतंत्र को निरंतर वर्साय की संधि के कारण भावनात्मक विरोध का सामना करना होता था| महामंदी के दौरान परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर हुयी तथा राजनीतिक दलों के बीच असहमति का लाभ हिटलर को मिला तथा 1933 में उसे चांसलर बनाया गया| हिटलर की योग्यता - मुसोलिनी की तरह हिटलर भी कुशल वक्ता तथा अच्छा संगठनकर्ता था| यह भी एक कारण था कि नाजी दल में शामिल होने के 13 वर्षों के भीतर उसे सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित किया| एक मजबूत सरकार, राष्ट्रीय सम्मान, साम्यवादियों पर प्रहार, यहूदी विरोधी नीति, जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता, समाज के अधिकांश वर्गों को कुछ न कुछ आश्वासन जैसे मुद्दों को आधार बनाकर सामाजिक आधार का विस्तार किया| हिटलर द्वारा अपने गये विभिन्न सिद्धांत हिटलर द्वारा अपनाया गया नाजीवाद या राष्ट्रीय समाजवाद जनतंत्र, उदारवाद,साम्यवाद एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के विरुद्ध था | राष्ट्रीय समाजवाद का अर्थ राष्ट्रीयकरण एवं संपत्ति का बंटवारा नहीं था अपितु यह हिटलर के 25 सिद्धांतों पर आधारित था जिसमें वर्साय की संधि की अवमानना, जर्मनी के शत्रु यहूदियों को बाहर निकालना, जर्मन क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधकर एक जर्मन राज्य का निर्माण करना, साम्यवादी विचारों के प्रसार को रोकने आदि शामिल थे| राज्य की सर्वोच्च भूमिका जिसमें राज्य एक सर्वसत्तासंपन्न संस्था है तथा उसके समक्ष व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है| नाजी विचारधारा के तहत दल का स्थान सर्वोपरि है| इसके अनुसार राज्य ही नाजी दल था और नाजी दल ही राज्य| प्रजातीय शुद्धता- हिटलर आर्यों की भूमिका पर बल देता था जिसके अनुसार मानव संस्कृति की जितनी प्रगति हुई है उसकी आधारशिला आर्यों ने ही तैयार की है| वह जर्मन प्रजाति को विशुद्ध आर्य समझता था तथा अन्य सभी प्रजातियों से श्रेष्ठ समझता था| हिटलर के यहूदी विरोधी नारों में मुख्यतः आर्य की श्रेष्ठा का वर्णन होता था| साम्यवाद विरोध शक्ति, युद्ध एवं सैन्यवाद में विश्वास प्रजातंत्र विरोध - नाजीवाद मुख्यतः सर्व सत्तावादी राज्य की स्थापना में विश्वास रखता था जहां व्यक्ति के महत्व को नजरअंदाज किया गया था| महान नेता की संकल्पना - इसके तहत फ्यूहरर(नेता ) सदैव सही होता है तथा उसकी आज्ञा का पालन करना पवित्र कर्तव्य है| नेता की इच्छा कोही विधि माना जाता था| धर्म के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया - हिटलर नाजीवाद सिद्धांत के तहत दोहरी स्वामी भक्ति के पक्ष में नहीं था| उसका कहना था कि आप या तो जर्मन हो सकते हैं या ईसाई हो सकते हैं दोनों एक साथ नहीं हो सकते हैं| उग्र एवं आक्रामक विदेश नीति - इसके तहत विस्तारवादी एवं साम्राज्यवादी सिद्धांतों को बल दिया गया|
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##Question:" हालाँकि वर्साय की अपमानजनक संधि को ही मुख्यतः जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के रूप में सर्वाधिक मान्यता दी जाती है परन्तु अन्य कई प्रमुख कारण भी थे जिन्होंने नाजीवाद तथा हिटलर को जर्मनी में स्थापित किया |" कथन की व्याख्या कीजिये | इसके साथ ही, हिटलर द्वारा अपनाए गए विभिन्न सिद्धांतों या विचारों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "Although the insulting treaty of versailles is recognized primarily as the rise of hitler and nazism in germany, there are also other major reasons for the establishment of nazism and hitler in germany." Explain the statement. Along with that, mention various theories adopted by hitler. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- हिटलर के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के रूप में वर्साय की संधि की भूमिका को बताईये| अगले भाग में, जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के अन्य प्रमुख कारणों की चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में, हिटलर द्वारा अपने गये विभिन्न सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- हिटलर ने एक सामान्य जर्मन सिपाही के रूप में प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था| जर्मनी की पराजय के बाद हुए वर्साय की संधि को वह बेहद अपमानजनक समझता था एवं युद्ध के पश्चात उसने घोषणा की कि जर्मन पराजय का मुख्य कारण उसके नेताओं की बुजदिली तथा वाईमर गणतंत्र है| इसके बाद उसने राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रम दल या नात्सी पार्टी की सदस्यता ली| 1923 में उसे जर्मन सरकार का तख्ता पलटने के आरोप में जेल भी जाना पड़ा | जेल से रिहा होने के बाद उसने संगठन को पुनर्गठित किया| आर्थिक संकट के दौरान हिटलर की लोकप्रियता बढ़ी जैसे- 1919-23 के बीच आर्थिक अस्थिरता के माहौल में नाजीवादी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ी| पुनः, महामंदी(1929-32) के दौरान नाजीवादी दल को जनसमर्थन बढ़ता गया और 1932 के चुनाव में यह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आईएवं1933 में उसे चांसलर बनाया गया| जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद के उदय के रूप में वर्साय की संधि की भूमिका प्रथम विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों ने पराजित जर्मनी को वर्साय की अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने को बाध्य किया था| जर्मनी के बहुत सारे प्रदेश छीन लिए गए थे तथा उसका नि:शस्त्रीकरण कर दिया गया था| संधि के हस्ताक्षर के समय भी जर्मन प्रतिनिधियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया था जिससे जर्मन जनता स्वयं को अपमानित महसूस करने लगी थी| जर्मन जनता एक ऐसे नेता की खोज में थी जो देश के अपमान को धोकर राष्ट्रीय गौरव की पुनः स्थापना कर सके| हिटलर ने जनता के इस मनोविज्ञान को समझा तथा यह घोषणा की कि सत्ता प्राप्त करते ही वह वर्साय में हुए अपमान का बदला लेगा| हिटलर के उदय के प्रमुख कारण में उपरोक्त को स्थान दिया जाता है; हालांकि यह हिटलर के उदय की पृष्ठभूमि को तैयार करता है एवं इसके अलावा अन्य कई सारे प्रमुख कारण थे जिन्होंने जर्मनी में हिटलर तथा नाजीवाद को स्थापित करने में अपना प्रमुख योगदान दिया जैसे- आर्थिक महामंदी का प्रभाव - जर्मनी को क्षतिपूर्ति के रूप में एक भारी राशि मित्र राष्ट्रों को देनी पड़ी थी; साथ ही, मुआवजा चुकाने के लिए उसे अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा था| 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से जर्मनी भी प्रभावित हुआ जिससे बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि हुई, जनता की क्रय शक्ति कम हो गई तथा जनतंत्र के प्रति आम आदमी का मोहभंग होने लगा| हिटलर ने इस मौके का फायदा उठाया तथा बेकारी दूर करने, औपनिवेशिक विस्तार करने तथा जनता की क्रय शक्ति बढ़ाने आदि का आश्वासन दिया एवं सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त किया| साम्यवादी विचारधारा के बढ़ते हुए प्रभाव ने जर्मनी के पूंजीपति, उद्योगपति, धनिक वर्ग, जागीरदार एवं जमींदारों को भयभीत किया| उन्होंने विशेषकर मंदी के दौरान हिटलर को समर्थन दिया| यहूदी विरोध की भावना - जर्मनी में यहूदियों की संख्या हालांकि काफी कम थी परंतु वे व्यापार, व्यवसाय, राजनीति में अग्रणी थे| साधारण जर्मन जनता इन्हें वैभवशाली वर्ग के रूप में समझती थी तथा शोषक समझकर घृणा करती थी| प्रथम विश्व युद्ध में जर्मन जनता ने यहूदियों के विश्वासघात को जर्मनी की पराजय के कारण के रूप में भी देखा| हिटलर ने इस मुद्दे को काफी जोर-शोर से उठाया जिससे जर्मनजनता की सहानुभूति हिटलर एवं नाजी दल के प्रति हुई| सेना तथा नौकरशाही का समर्थन - हिटलर द्वारा युद्ध एवं पुनःशस्त्रीकरण का नारादिए जाने से सैनिक वर्ग ने नाजी पार्टी को समर्थन दिया|साथ ही, नौकरशाही के अधिकांश उच्च वर्गीय लोग जनतंत्र से घृणा करते थे जिसकी वजह से उन्होंने हिटलर को समर्थन दिया| स्वयं सेवक दल का निर्माण - युद्ध के उपरांत भारी संख्या में बेरोजगार जर्मन सैनिकों को हिटलर ने नाजी पार्टी के स्वयंसेवक के रूप में शामिल किया जिसके माध्यम से वह अपने सिद्धांतों का प्रचार करता था तथा विरोधियों का दमन करता था| राजनीतिक दलों की विफलता ने भी हिटलर के उदय का मार्ग प्रशस्त किया| एक तो जर्मनी में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर थी तथा दूसरा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के कारण मिलीजुली सरकार विभिन्न मुद्दों पर निर्णायक कदम नहीं उठा पा रही थी| साथ ही, वाईमर गणतंत्र को निरंतर वर्साय की संधि के कारण भावनात्मक विरोध का सामना करना होता था| महामंदी के दौरान परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर हुयी तथा राजनीतिक दलों के बीच असहमति का लाभ हिटलर को मिला तथा 1933 में उसे चांसलर बनाया गया| हिटलर की योग्यता - मुसोलिनी की तरह हिटलर भी कुशल वक्ता तथा अच्छा संगठनकर्ता था| यह भी एक कारण था कि नाजी दल में शामिल होने के 13 वर्षों के भीतर उसे सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित किया| एक मजबूत सरकार, राष्ट्रीय सम्मान, साम्यवादियों पर प्रहार, यहूदी विरोधी नीति, जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता, समाज के अधिकांश वर्गों को कुछ न कुछ आश्वासन जैसे मुद्दों को आधार बनाकर सामाजिक आधार का विस्तार किया| हिटलर द्वारा अपने गये विभिन्न सिद्धांत हिटलर द्वारा अपनाया गया नाजीवाद या राष्ट्रीय समाजवाद जनतंत्र, उदारवाद,साम्यवाद एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के विरुद्ध था | राष्ट्रीय समाजवाद का अर्थ राष्ट्रीयकरण एवं संपत्ति का बंटवारा नहीं था अपितु यह हिटलर के 25 सिद्धांतों पर आधारित था जिसमें वर्साय की संधि की अवमानना, जर्मनी के शत्रु यहूदियों को बाहर निकालना, जर्मन क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधकर एक जर्मन राज्य का निर्माण करना, साम्यवादी विचारों के प्रसार को रोकने आदि शामिल थे| राज्य की सर्वोच्च भूमिका जिसमें राज्य एक सर्वसत्तासंपन्न संस्था है तथा उसके समक्ष व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है| नाजी विचारधारा के तहत दल का स्थान सर्वोपरि है| इसके अनुसार राज्य ही नाजी दल था और नाजी दल ही राज्य| प्रजातीय शुद्धता- हिटलर आर्यों की भूमिका पर बल देता था जिसके अनुसार मानव संस्कृति की जितनी प्रगति हुई है उसकी आधारशिला आर्यों ने ही तैयार की है| वह जर्मन प्रजाति को विशुद्ध आर्य समझता था तथा अन्य सभी प्रजातियों से श्रेष्ठ समझता था| हिटलर के यहूदी विरोधी नारों में मुख्यतः आर्य की श्रेष्ठा का वर्णन होता था| साम्यवाद विरोध शक्ति, युद्ध एवं सैन्यवाद में विश्वास प्रजातंत्र विरोध - नाजीवाद मुख्यतः सर्व सत्तावादी राज्य की स्थापना में विश्वास रखता था जहां व्यक्ति के महत्व को नजरअंदाज किया गया था| महान नेता की संकल्पना - इसके तहत फ्यूहरर(नेता ) सदैव सही होता है तथा उसकी आज्ञा का पालन करना पवित्र कर्तव्य है| नेता की इच्छा कोही विधि माना जाता था| धर्म के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया - हिटलर नाजीवाद सिद्धांत के तहत दोहरी स्वामी भक्ति के पक्ष में नहीं था| उसका कहना था कि आप या तो जर्मन हो सकते हैं या ईसाई हो सकते हैं दोनों एक साथ नहीं हो सकते हैं| उग्र एवं आक्रामक विदेश नीति - इसके तहत विस्तारवादी एवं साम्राज्यवादी सिद्धांतों को बल दिया गया|
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महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों का उल्लेख करते हुए परीक्षण कीजिए कि प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत इन कमियों को दूर करने में किस सीमा तक सफल हुआ। (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the shortcomings of continental drift theory and examine how plate tectonics theory succeeds in removing these shortcomings. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त तथा प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का परिचय दीजिए। इसके पश्चात महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों का उल्लेख कीजिए। इन कमियों को दूर करने में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को लिखिए। इसके पश्चात प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त की कमियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। अंत में प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त के पक्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए निष्कर्ष लिखिए। अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त एक एकीकृत अवधारणा है जो एक साथ सागर नितल प्रसरण, महाद्वीप्य विस्थापन, क्रस्ट की संरचनाओं और विश्व में ज्वालामुखी गतिविधियों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती है। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियाँ: ज्वारीय बल से महाद्वीपों का विस्थापन तभी हो सकता है जब वह वर्तमान ज्वारीय बल से दस हजार करोड़ गुना अधिक शक्तिशाली हो। वेगनर ने यह नहीं बताया कि कार्बनीफेरस युग में ही पैंजिया का विभाजन क्यों प्रारम्भ हुआ। वेगनर ने बताया कि रॉकीज़ और एंडीज़ पर्वत श्रेणियाँ अमेरिका के पश्चिम की ओर प्रवाह के दौरान निर्मित हुई हैं, लेकिन यदि सियाल, सीमा पर बिना रुकावट के प्रवाहित हो रही है, तो सीमा इतना प्रतिरोध उत्पन्न नहीं कर सकती कि इससे वलित पर्वतों का निर्माण हो सके। अटलांटिक महासागर के दोनों तट पूर्णतया साम्य नहीं हैं। अटलांटिक महासागर के दोनों तटों की संरचना और विशेषताओं में समानता थी लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक तट दूसरे तट का विस्तार था और वे एक दूसरे से जुड़े थे। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने इन कमियों को दूर करने में निम्नलिखित प्रकार से सहायता किया: वेगनर के समय यह मान्यता थी कि पृथ्वी एक ठोस तथा गति रहित पिंड है परंतु विवर्तनिकी सिद्धांत ने प्लेटों की गति में सहायक बलों के माध्यम से धरातल व भूगर्भ के गतिशील होने को सिद्ध कर दिया। पुरचुम्बकत्व एवं सागर नितल के प्रसरण के प्रमाणों के आधार पर इस तथ्य का सत्यापन होता है कि महाद्वीप और महासागर स्थायी नहीं रहे हैं। इसके अनुसार कार्बनीफेरस युग से प्लेटों के संचलन तथा प्रवाह के कारण ही वर्तमान महासागरों का रूप प्राप्त हुआ। महाद्वीपों के संचलन में सहायक बलों के रूप में संवहनीय धाराएँ, स्लैब पुल व रिज पुश सिद्धांत की व्याख्या ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वेगनर ने यह नहीं बताया था कि पर्वतों की आयु में इतनी भिन्नता क्यों है। इसे विवर्तनिकी सिद्धांत ने महासागरीय कटक और गर्त के निर्माण की व्याख्या के माध्यम से सिद्ध किया। हालांकि प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में कुछ कमियाँ विद्यमान थीं जैसे- क्षेपण की तुलना में प्रसारित होते हुए कटक का विस्तार काफी अधिक है। यह सिद्धान्त यह व्याख्या करने में असफल रहा कि क्षेपण प्रशांत महासागर तट तक ही क्यों सीमित है, जबकि प्रसरण सभी महासागरों में पाया जाता है। पृथ्वी पर बहुत सी ऐसी पर्वतें हैं जिस्ङ्का प्लेट विवर्तनिकी से कोई संबंध नहीं है जैसे- ऑस्ट्रेलिया का ईस्टर्न हाइलैंड, दक्षिण अफ्रीका का ड्रेकेंसबर्ग आदि निष्कर्षतः महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत में कुछ कमियाँ विद्यमान थीं। परंतु यह भी सत्य है कि इसी सिद्धान्त ने क्रमिक खोजों को आधार प्रदान किया। इन कमियों को दूर करने तथा भूगर्भ के अध्ययन में नए आयामों को शामिल करने में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।इसके माध्यम से पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखियों के वितरण प्रारूप की संतोषजनक व्याख्या हो सकी है। इस सिद्धांत ने महासागरीय और महाद्वीपीय भू पटल की निर्माण विधि पर भी प्रकाश डाला।
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##Question:महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों का उल्लेख करते हुए परीक्षण कीजिए कि प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत इन कमियों को दूर करने में किस सीमा तक सफल हुआ। (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the shortcomings of continental drift theory and examine how plate tectonics theory succeeds in removing these shortcomings. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त तथा प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का परिचय दीजिए। इसके पश्चात महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों का उल्लेख कीजिए। इन कमियों को दूर करने में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को लिखिए। इसके पश्चात प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त की कमियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। अंत में प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त के पक्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए निष्कर्ष लिखिए। अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है।प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त एक एकीकृत अवधारणा है जो एक साथ सागर नितल प्रसरण, महाद्वीप्य विस्थापन, क्रस्ट की संरचनाओं और विश्व में ज्वालामुखी गतिविधियों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती है। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियाँ: ज्वारीय बल से महाद्वीपों का विस्थापन तभी हो सकता है जब वह वर्तमान ज्वारीय बल से दस हजार करोड़ गुना अधिक शक्तिशाली हो। वेगनर ने यह नहीं बताया कि कार्बनीफेरस युग में ही पैंजिया का विभाजन क्यों प्रारम्भ हुआ। वेगनर ने बताया कि रॉकीज़ और एंडीज़ पर्वत श्रेणियाँ अमेरिका के पश्चिम की ओर प्रवाह के दौरान निर्मित हुई हैं, लेकिन यदि सियाल, सीमा पर बिना रुकावट के प्रवाहित हो रही है, तो सीमा इतना प्रतिरोध उत्पन्न नहीं कर सकती कि इससे वलित पर्वतों का निर्माण हो सके। अटलांटिक महासागर के दोनों तट पूर्णतया साम्य नहीं हैं। अटलांटिक महासागर के दोनों तटों की संरचना और विशेषताओं में समानता थी लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक तट दूसरे तट का विस्तार था और वे एक दूसरे से जुड़े थे। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने इन कमियों को दूर करने में निम्नलिखित प्रकार से सहायता किया: वेगनर के समय यह मान्यता थी कि पृथ्वी एक ठोस तथा गति रहित पिंड है परंतु विवर्तनिकी सिद्धांत ने प्लेटों की गति में सहायक बलों के माध्यम से धरातल व भूगर्भ के गतिशील होने को सिद्ध कर दिया। पुरचुम्बकत्व एवं सागर नितल के प्रसरण के प्रमाणों के आधार पर इस तथ्य का सत्यापन होता है कि महाद्वीप और महासागर स्थायी नहीं रहे हैं। इसके अनुसार कार्बनीफेरस युग से प्लेटों के संचलन तथा प्रवाह के कारण ही वर्तमान महासागरों का रूप प्राप्त हुआ। महाद्वीपों के संचलन में सहायक बलों के रूप में संवहनीय धाराएँ, स्लैब पुल व रिज पुश सिद्धांत की व्याख्या ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वेगनर ने यह नहीं बताया था कि पर्वतों की आयु में इतनी भिन्नता क्यों है। इसे विवर्तनिकी सिद्धांत ने महासागरीय कटक और गर्त के निर्माण की व्याख्या के माध्यम से सिद्ध किया। हालांकि प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में कुछ कमियाँ विद्यमान थीं जैसे- क्षेपण की तुलना में प्रसारित होते हुए कटक का विस्तार काफी अधिक है। यह सिद्धान्त यह व्याख्या करने में असफल रहा कि क्षेपण प्रशांत महासागर तट तक ही क्यों सीमित है, जबकि प्रसरण सभी महासागरों में पाया जाता है। पृथ्वी पर बहुत सी ऐसी पर्वतें हैं जिस्ङ्का प्लेट विवर्तनिकी से कोई संबंध नहीं है जैसे- ऑस्ट्रेलिया का ईस्टर्न हाइलैंड, दक्षिण अफ्रीका का ड्रेकेंसबर्ग आदि निष्कर्षतः महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत में कुछ कमियाँ विद्यमान थीं। परंतु यह भी सत्य है कि इसी सिद्धान्त ने क्रमिक खोजों को आधार प्रदान किया। इन कमियों को दूर करने तथा भूगर्भ के अध्ययन में नए आयामों को शामिल करने में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।इसके माध्यम से पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखियों के वितरण प्रारूप की संतोषजनक व्याख्या हो सकी है। इस सिद्धांत ने महासागरीय और महाद्वीपीय भू पटल की निर्माण विधि पर भी प्रकाश डाला।
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पंथनिरपेक्षता से आप क्या समझते है ?भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा , धर्मनिरपेक्षता के पाश्चत्य मॉडल से किन अर्थों में भिन्न है ? संगत तर्कों के साथ स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द , अंक - 10 ) What do you understand by secularism? In what sense is the concept of secularism in India different from the western model of secularism? Explain with relevant arguments. (150- 200 words, marks - 10 )
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एप्रोच :- पंथनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये। भारत में धर्मनिरपेक्षता को समझाइये इसके बाद भारतीय और पश्चिमी व्याख्या में अंतर पर विचार व्यक्त कीजिए। निष्कर्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपना पक्ष रखिए। उत्तर प्रारूप :- भारत विभिन्न धर्मों व् मान्यताओं को मानने वाला देश है , इन विविधताओं में एकता ही भारतीय समाज की सुंदरता है। चूँकिकिसी एक धर्म में कई पंथ हो सकते है जैसे हिन्दू धर्म में वैष्णव पंथ, शैव पंथ आदि। इस तरहधर्मनिरपेक्षता में धर्म से निरपेक्ष रहना अर्थात धर्म के मामलों में हस्तक्षेप ना करना शामिल है, वहीं पंथनिरपेक्षता में इससे आगे बढ़कर विभिन्न पंथों के मामलों में निरपेक्ष रहना स्वीकार किया गया है। भारत में धर्मनिरपेक्षता :- धर्मनिरपेक्षतावाद एक विचारधारा है जो राजनीति से धर्म के पृथक्करण का समर्थन करता है। यह सरकारी संस्थाओं एवं राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिदेशित अधिकारियों को धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक पदाधिकारिओं से पृथक करने संबंधी सिद्धांत है। यह समाज को अनुभव कराने का प्रयास करता है कि किसी भी व्यक्ति को धार्मिक वर्चस्व से रहित होना चाहिए। प्रो एम वी पायली के अनुसार निम्न अर्थों में भारत में धर्मनिरपेक्षता को स्वीकार किया गया है राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और ना ही वह किसी धर्म केसाथ खुद की पहचान स्थापित करेगा व्यक्तियों को अपनी मर्जी के अनुसार किसी भी धर्म को अपनाने , मानने या ना मानने की पूरी छूट होगी धर्म के आधार पर किसी सार्वजानिक स्थल पर, किसी सरकारी कार्यालय में तथा किसी होटल , जलाशय , पार्क आदि स्थलों पर भेदभाव नहीं किया जा सकता यदि कोई सामाजिक कुरीति , किसी धर्म से अनुप्राणित है अर्थात उसे किसी धर्म के द्वारा मान्यता दी गयी है तो इस मामले में राज्य हस्तक्षेप कर सकता है भारतीय और पश्चिमी व्याख्या में अंतर :- भारतीय संदर्भ में सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। इसके विपरीत पाश्चात्य संदर्भ में राज्य का धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में राज्य किसी धर्म के साथ अपनी पहचान स्थापित नहीं कर सकता है। सभी धर्मों को समान रूप से नीतियों में लाभ दिये जाते हैं। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य न तो किसी धर्म को प्रोत्साहित कर सकता है न ही भेदभाव। भारत में राज्य के लिए जरूरी नहीं कि धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान प्रदान करे। यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दर्शाने कि अनुमति भी देता है जैसे- सामाजिक बुराइयों। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य कि कोई भूमिका नहीं है। चर्च अपने नियमों से धार्मिक मामलों को देखता है। भारत में सार्वजनिक स्थल पर या सामान्य विधि के अंतर्गत धर्म की निजी मान्यताओं व प्रतीकों के प्रयोग की इजाजत है ,किन्तु पश्चिमी देशों में इसकी अनुमति नहीं है इस प्रकार भारतीय अवधारणा में इसका सकारात्मक रूप अपनाया गया है। जहां राज्य का अपना कोई धर्म/पंथ नहीं है तथा राज्य के अधीन प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्राप्त है । यद्यपि यह स्वतंत्रता युक्तियुक्त निर्बन्धनों ( Reasonable Restriction) के अंतर्गत है। वहींपश्चिम में, यह चर्च और राज्य के मध्य कठोर पृथक्करण पर केन्द्रित है , जबकि भारत में सभी धर्मों के शांतिपूर्ण-अस्तित्व को केंद्र में रखा गया है।
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##Question:पंथनिरपेक्षता से आप क्या समझते है ?भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा , धर्मनिरपेक्षता के पाश्चत्य मॉडल से किन अर्थों में भिन्न है ? संगत तर्कों के साथ स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द , अंक - 10 ) What do you understand by secularism? In what sense is the concept of secularism in India different from the western model of secularism? Explain with relevant arguments. (150- 200 words, marks - 10 )##Answer:एप्रोच :- पंथनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये। भारत में धर्मनिरपेक्षता को समझाइये इसके बाद भारतीय और पश्चिमी व्याख्या में अंतर पर विचार व्यक्त कीजिए। निष्कर्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपना पक्ष रखिए। उत्तर प्रारूप :- भारत विभिन्न धर्मों व् मान्यताओं को मानने वाला देश है , इन विविधताओं में एकता ही भारतीय समाज की सुंदरता है। चूँकिकिसी एक धर्म में कई पंथ हो सकते है जैसे हिन्दू धर्म में वैष्णव पंथ, शैव पंथ आदि। इस तरहधर्मनिरपेक्षता में धर्म से निरपेक्ष रहना अर्थात धर्म के मामलों में हस्तक्षेप ना करना शामिल है, वहीं पंथनिरपेक्षता में इससे आगे बढ़कर विभिन्न पंथों के मामलों में निरपेक्ष रहना स्वीकार किया गया है। भारत में धर्मनिरपेक्षता :- धर्मनिरपेक्षतावाद एक विचारधारा है जो राजनीति से धर्म के पृथक्करण का समर्थन करता है। यह सरकारी संस्थाओं एवं राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिदेशित अधिकारियों को धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक पदाधिकारिओं से पृथक करने संबंधी सिद्धांत है। यह समाज को अनुभव कराने का प्रयास करता है कि किसी भी व्यक्ति को धार्मिक वर्चस्व से रहित होना चाहिए। प्रो एम वी पायली के अनुसार निम्न अर्थों में भारत में धर्मनिरपेक्षता को स्वीकार किया गया है राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और ना ही वह किसी धर्म केसाथ खुद की पहचान स्थापित करेगा व्यक्तियों को अपनी मर्जी के अनुसार किसी भी धर्म को अपनाने , मानने या ना मानने की पूरी छूट होगी धर्म के आधार पर किसी सार्वजानिक स्थल पर, किसी सरकारी कार्यालय में तथा किसी होटल , जलाशय , पार्क आदि स्थलों पर भेदभाव नहीं किया जा सकता यदि कोई सामाजिक कुरीति , किसी धर्म से अनुप्राणित है अर्थात उसे किसी धर्म के द्वारा मान्यता दी गयी है तो इस मामले में राज्य हस्तक्षेप कर सकता है भारतीय और पश्चिमी व्याख्या में अंतर :- भारतीय संदर्भ में सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। इसके विपरीत पाश्चात्य संदर्भ में राज्य का धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में राज्य किसी धर्म के साथ अपनी पहचान स्थापित नहीं कर सकता है। सभी धर्मों को समान रूप से नीतियों में लाभ दिये जाते हैं। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य न तो किसी धर्म को प्रोत्साहित कर सकता है न ही भेदभाव। भारत में राज्य के लिए जरूरी नहीं कि धर्म के हर पहलू को एक जैसा सम्मान प्रदान करे। यह संगठित धर्मों के कुछ पहलुओं के प्रति एक जैसा असम्मान दर्शाने कि अनुमति भी देता है जैसे- सामाजिक बुराइयों। पाश्चात्य संदर्भ में राज्य कि कोई भूमिका नहीं है। चर्च अपने नियमों से धार्मिक मामलों को देखता है। भारत में सार्वजनिक स्थल पर या सामान्य विधि के अंतर्गत धर्म की निजी मान्यताओं व प्रतीकों के प्रयोग की इजाजत है ,किन्तु पश्चिमी देशों में इसकी अनुमति नहीं है इस प्रकार भारतीय अवधारणा में इसका सकारात्मक रूप अपनाया गया है। जहां राज्य का अपना कोई धर्म/पंथ नहीं है तथा राज्य के अधीन प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार अन्तःकरण की स्वतंत्रता प्राप्त है । यद्यपि यह स्वतंत्रता युक्तियुक्त निर्बन्धनों ( Reasonable Restriction) के अंतर्गत है। वहींपश्चिम में, यह चर्च और राज्य के मध्य कठोर पृथक्करण पर केन्द्रित है , जबकि भारत में सभी धर्मों के शांतिपूर्ण-अस्तित्व को केंद्र में रखा गया है।
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भारतीय संघ की अवधारणा,अमेरिकी संघ से किस प्रकार भिन्न है? क्या भारत, वर्तमान में सहकारी संघवाद की ओर बढ़ रहा है? उदाहरण सहितसमझाइये। (150-200 शब्द/10 अंक ) How is the concept of Union of India differentfrom the American Union? Is India currently moving towards cooperative federalism? Explain with examples. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच :- भारतीय संघ पर भूमिका लिखते हुए प्रारम्भ कीजिये भारतीय संघ और अमेरिकी संघ के मध्य भिन्नता का बिंदु बताइये संक्षिप्त में कुछ बिंदु समानता पर भी दीजिये। सहकारी संघवाद को परिभाषित कीजिये। भारत में सहकारी संघवाद के विकास को लिखिए। उदहारण देते हुए निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत अर्थात इंडिया , राज्यों का संघ होगा। भारतीय व् अमेरिकी संघ में अंतर :- डॉ अम्बेडकर ने भारतीय संघ को अमेरिकी संघ से 2अर्थों में अलग बताया है। भारतीय संघ किसी समझौते की उपज नहीं है , दूसरी तरफ अमेरिकी संघ समझौते की उपज है अर्थात अमेरिका में केंद्र व राज्य के बीच एक समझौता हुआ , जिसके अनुसार राज्यों ने संघ में शामिल होने की एक शर्त रख दी उनकी पृथक पहचान के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी और वे इसके लिए अपना पृथक संविधान बना सकेंगे। अमेरिका में किसी भी संघीय विषय पर संविधान संशोधन में राज्यों कीप्रमुख भूमिका होती है(अमेरिका में कोई भी संविधान संशोधन तभी वैध माना जाता है जब 3 चौथाई राज्य अर्थात 50 में से 39 राज्य अपनी सहमति प्रकट कर दे। दूसरी तरफ भारत में संविधान संशोधन के मामले में प्रमुख भूमिका संसद की होती है भारत मेंकेंद्र सरकार ,राज्यों कीभौगोलिक सीमा में परिवर्तन करने को स्वतंत्र होती है। चाहे राज्य इसका विरोध क्यूँ ना करें।डॉ अम्बेडकर के कथनानुसार भारत में राज्यों की तुलना में केंद्र को अधिक तरहीजी दी गयी हैराज्यों के निर्माण के मामले में संसद की भूमिका सर्वोच्च है जबकि अमेरिका में संसद द्वारा नए राज्य का निर्माण संभव नहीं है अमेरिकी संघ को मानक प्रतिमान मानते हुए प्रख्यात विधिवेत्ताके सी व्हीअरेने कहा की भारत एक अर्द्धसंघीय व्यवस्था है , उनके अनुसार भारत में वास्तवएकात्मक शासन प्रणाली है , जबकि कुछ संघीय लक्षण सहायक तत्व के रूप में भारतीय संविधान में शामिल कर किया गए है सर्वोच्च न्यायालय ने गंगाराम मूलचंदानी बनाम राजस्थान राज्य 2001 के मुकदद्मे में भारत को पूर्ण संघ घोषित करते हुए इसकी निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है जो भारतीय व अमेरिकी संघ में समानता के कुछ लक्षण प्रदर्शित करती है। अमेरिका की तरह , भारत में भी संविधान सर्वोच्च विधि है अमेरिका की तरह भारत में भी केंद्र एवं राज्य के स्तर पर 2 सरकारें एक साथ चलती है संघीय व्यवस्था के अनुसार ही भारत में केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है अमेरिका की तरह , भारत में भी न्यायपालिका सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है अर्थात न्यायपालिका संविधान से बेमेल कार्यों को रद्द कर सकती है अत: इन आधारों पर भारत को एक पूर्ण संघ कहा जा सकता है भले ही भारत में अमेरिका की तरह दोहरी नागरिकता न हो , लोकसेवाओं का विभाजन ना हो। राज्यसभा में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व ना हो , किन्तु उपरोक्त लक्षणों के आधार पर सर आइवर जेनिंग्स ने भारत को केंद्र की ओर झुका हुआ एक संघ माना है जो उनके अनुसार भारत के लिए उचित भी है. सहकारी संघवाद :- सहकारी संघवाद एक ऐसी अवधारणा है, जिसमें केन्द्र और राज्य एक संबंध स्थापित करते हुए, एक दूसरे के सहयोग से अपनी समस्याओं का समाधान करते हैं। इस प्रकार के क्षैतिज संबंध यह दर्शाते हैं कि केन्द्र और राज्यों में से कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं है। इन संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाए रखने के लिए संविधान ने अंतरराज्यीय परिषद्, क्षेत्रीय परिषद्, सातवीं अनुसूची आदि का प्रावधान रखा है डी डीबसुने भारतीय संघ को अपने आप में अनूठा (Sui generis ) प्रणाली माना है। भारतीय संघ का अपना मौलिक स्वरुप है ,उनके अनुसार भारतीय संघ का सबसे बडा प्रमाण , भिन्न भिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारों का होना , जो केंद्र की सत्तारूढ़ दाल से अलग विचार धारा के आधार पर शासन करती है , को बताया जा सकता है। अमेरिका के प्रख्यात संविधान विशेषज्ञग्रानविले ऑस्टिनने भारत को सहकारी संघवाद का सबसे शानदार उदहारण बताया है ,उनके अनुसार जबसे भारत में केंद्रीयकृत दल की सत्ता कमजोर हुई है और क्षेत्रीय दलों काउभार हुआ है , केंद्र कोई भी निर्णय जो संघीय ढांचे को प्रभावित करता है , राज्यों के परामर्श के बिना नहीं ले सकता है. भारत में सहकारी संघवाद के कुछउदाहरण -नीति आयोग , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग , अंतर्राज्यीय परिषद्, GST कॉउन्सिल आदि में देखा जा सकता है। इनके द्वारा वर्तमान में सहकारी संघवाद से आगे बढ़ते हुए प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद की ओर प्रयास किये जा रहे है।
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##Question:भारतीय संघ की अवधारणा,अमेरिकी संघ से किस प्रकार भिन्न है? क्या भारत, वर्तमान में सहकारी संघवाद की ओर बढ़ रहा है? उदाहरण सहितसमझाइये। (150-200 शब्द/10 अंक ) How is the concept of Union of India differentfrom the American Union? Is India currently moving towards cooperative federalism? Explain with examples. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच :- भारतीय संघ पर भूमिका लिखते हुए प्रारम्भ कीजिये भारतीय संघ और अमेरिकी संघ के मध्य भिन्नता का बिंदु बताइये संक्षिप्त में कुछ बिंदु समानता पर भी दीजिये। सहकारी संघवाद को परिभाषित कीजिये। भारत में सहकारी संघवाद के विकास को लिखिए। उदहारण देते हुए निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत अर्थात इंडिया , राज्यों का संघ होगा। भारतीय व् अमेरिकी संघ में अंतर :- डॉ अम्बेडकर ने भारतीय संघ को अमेरिकी संघ से 2अर्थों में अलग बताया है। भारतीय संघ किसी समझौते की उपज नहीं है , दूसरी तरफ अमेरिकी संघ समझौते की उपज है अर्थात अमेरिका में केंद्र व राज्य के बीच एक समझौता हुआ , जिसके अनुसार राज्यों ने संघ में शामिल होने की एक शर्त रख दी उनकी पृथक पहचान के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी और वे इसके लिए अपना पृथक संविधान बना सकेंगे। अमेरिका में किसी भी संघीय विषय पर संविधान संशोधन में राज्यों कीप्रमुख भूमिका होती है(अमेरिका में कोई भी संविधान संशोधन तभी वैध माना जाता है जब 3 चौथाई राज्य अर्थात 50 में से 39 राज्य अपनी सहमति प्रकट कर दे। दूसरी तरफ भारत में संविधान संशोधन के मामले में प्रमुख भूमिका संसद की होती है भारत मेंकेंद्र सरकार ,राज्यों कीभौगोलिक सीमा में परिवर्तन करने को स्वतंत्र होती है। चाहे राज्य इसका विरोध क्यूँ ना करें।डॉ अम्बेडकर के कथनानुसार भारत में राज्यों की तुलना में केंद्र को अधिक तरहीजी दी गयी हैराज्यों के निर्माण के मामले में संसद की भूमिका सर्वोच्च है जबकि अमेरिका में संसद द्वारा नए राज्य का निर्माण संभव नहीं है अमेरिकी संघ को मानक प्रतिमान मानते हुए प्रख्यात विधिवेत्ताके सी व्हीअरेने कहा की भारत एक अर्द्धसंघीय व्यवस्था है , उनके अनुसार भारत में वास्तवएकात्मक शासन प्रणाली है , जबकि कुछ संघीय लक्षण सहायक तत्व के रूप में भारतीय संविधान में शामिल कर किया गए है सर्वोच्च न्यायालय ने गंगाराम मूलचंदानी बनाम राजस्थान राज्य 2001 के मुकदद्मे में भारत को पूर्ण संघ घोषित करते हुए इसकी निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है जो भारतीय व अमेरिकी संघ में समानता के कुछ लक्षण प्रदर्शित करती है। अमेरिका की तरह , भारत में भी संविधान सर्वोच्च विधि है अमेरिका की तरह भारत में भी केंद्र एवं राज्य के स्तर पर 2 सरकारें एक साथ चलती है संघीय व्यवस्था के अनुसार ही भारत में केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है अमेरिका की तरह , भारत में भी न्यायपालिका सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है अर्थात न्यायपालिका संविधान से बेमेल कार्यों को रद्द कर सकती है अत: इन आधारों पर भारत को एक पूर्ण संघ कहा जा सकता है भले ही भारत में अमेरिका की तरह दोहरी नागरिकता न हो , लोकसेवाओं का विभाजन ना हो। राज्यसभा में राज्यों का समान प्रतिनिधित्व ना हो , किन्तु उपरोक्त लक्षणों के आधार पर सर आइवर जेनिंग्स ने भारत को केंद्र की ओर झुका हुआ एक संघ माना है जो उनके अनुसार भारत के लिए उचित भी है. सहकारी संघवाद :- सहकारी संघवाद एक ऐसी अवधारणा है, जिसमें केन्द्र और राज्य एक संबंध स्थापित करते हुए, एक दूसरे के सहयोग से अपनी समस्याओं का समाधान करते हैं। इस प्रकार के क्षैतिज संबंध यह दर्शाते हैं कि केन्द्र और राज्यों में से कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं है। इन संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाए रखने के लिए संविधान ने अंतरराज्यीय परिषद्, क्षेत्रीय परिषद्, सातवीं अनुसूची आदि का प्रावधान रखा है डी डीबसुने भारतीय संघ को अपने आप में अनूठा (Sui generis ) प्रणाली माना है। भारतीय संघ का अपना मौलिक स्वरुप है ,उनके अनुसार भारतीय संघ का सबसे बडा प्रमाण , भिन्न भिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारों का होना , जो केंद्र की सत्तारूढ़ दाल से अलग विचार धारा के आधार पर शासन करती है , को बताया जा सकता है। अमेरिका के प्रख्यात संविधान विशेषज्ञग्रानविले ऑस्टिनने भारत को सहकारी संघवाद का सबसे शानदार उदहारण बताया है ,उनके अनुसार जबसे भारत में केंद्रीयकृत दल की सत्ता कमजोर हुई है और क्षेत्रीय दलों काउभार हुआ है , केंद्र कोई भी निर्णय जो संघीय ढांचे को प्रभावित करता है , राज्यों के परामर्श के बिना नहीं ले सकता है. भारत में सहकारी संघवाद के कुछउदाहरण -नीति आयोग , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग , अंतर्राज्यीय परिषद्, GST कॉउन्सिल आदि में देखा जा सकता है। इनके द्वारा वर्तमान में सहकारी संघवाद से आगे बढ़ते हुए प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद की ओर प्रयास किये जा रहे है।
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ऐसे कौन से कारण थें जिन्होने 1929 के आर्थिक महामंदी को प्रारंभ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? साथ ही, इस महामंदी के फलस्वरूप पड़ने वाले परिणामों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What were the reasons that caused an important role in starting the Great Economic Depression of 1929? Also, describe the consequences of this Great Economic Depression. (150- 200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- आर्थिक महामंदी की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए एवं उसे परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, आर्थिक महामंदी के पीछे उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, महामंदी के फलस्वरूप पड़ने वाले परिणामों की चर्चा कीजिये| उत्तर- अक्टूबर,1929 में संयुक्त राज्य अमेरिका के शेयर बाजार में भारी गिरावट के साथ संसार में वस्तुओं की कीमतें तेजी से गिरने लगी| सभी देशों में मुद्राओं का मूल्य भी गिरने लगा तथा बहुत सारे बैंक, उद्योग-धंधे बंद हो गए एवं लाखों मजदूर बेकार हो गए| लोगों के पास पैसे के अभाव में उनकी क्रय शक्ति कम थी तथा दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण सरकारें कर वसूल नहीं पा रही थी| इससे बजट असंतुलित होते गया| यह भीषण आर्थिक मंदी 1929 में शुरू हुई थी तथा 1931 में चरम सीमा पर जा पहुंची| बहुत सारे उपचारों के बावजूद भी 1934 तक इसका प्रभाव बना रहा | आर्थिक मंदी के पीछे उत्तरदायी कारण प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात उत्पन परिस्थितियां - प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका तथा जापान की अर्थव्यवस्था का व्यापक विकास हुआ| युद्ध एवं उसके पश्चात् बड़ी संख्या में यूरोपीय अप्रवासी बेहतर जीवन की तलाश में अमेरिका में बस गए| 1920 के दशक में औद्योगिक उत्पादन लगभग दोगुनी हो गयी लेकिन मुनाफे के अनुपात में श्रमिकों की मजदूरी नाममात्र की बढ़ी जिससे श्रमिकों की क्रयक्षमता प्रभावित हुयी| युद्ध के पश्चात पूंजीवादी देशों ने संरक्षणवादी नीति का पालन किया जिससे अमेरिका के बाहर अमेरिकी उत्पादों की मांग गिरी| अधिशेष उत्पादन - 1920 के दशक में कृषि के मशीनीकरण एवं रसायनों के प्रयोग के कारण बंपर उत्पादन हुआ जिससे कृषि उत्पादों की कीमतें गिरी तथा किसानों की क्रय-क्षमता भी गिरी| साथ ही,वैज्ञानिक खोजों तथा मशीनीकरण से भी उत्पादन में बढ़ोतरी हुई थी जो बाद में अधिशेष उत्पादन का कारण बनी| वैश्विक स्वर्ण भण्डार के वितरण का अनियमित होना -विश्वयुद्ध पश्चात के पुनर्निर्माण कार्यों में यूरोपीय राष्ट्रों को अमेरिका की तरफ से काफी मात्रा में ऋण दिया गया था| यूरोपीय मुद्राओं के मूल्य में कमी के कारण इस ऋण का पुनर्भुगतान स्वर्ण में किया जाने लगा जिससे अमेरिका में विशाल स्वर्ण-भण्डार निर्मित हो गया था| सोने के विषम विभाजन से मुद्रा की कीमतों में वृद्धि हुयी तथा वस्तुओं के मूल्यों में गिरावट आई एवं आर्थिक मंदी का मार्ग प्रशस्त हुआ| इसी दशक में अमेरिकी मध्यवर्ग द्वारा बैंकों से कर्ज लेकर बड़े पैमाने पर उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद की गई| साथ ही, बैंकों के कर्ज चुकाने और मुनाफे के उद्देश्य से शेयर बाजार की तेजी को देखते हुए ऋणधारकों ने शेयर बाजार में निवेश किया; यहाँ तक की बैंकों ने भी शेयर बाजार में निवेश किया| लेकिन जैसे ही शेयरों की कीमते गिरनी चालु हुयी वैसे ही किसी भी कीमत पर शेयरों को बेचा जाने लगा तथा अफवाहों के कारण लोगों ने बैंकों से पैसे निकालने शुरू किये| इसी पृष्ठभूमि में 24 अक्टूबर 1929 को शेयर बाजार में भारी गिरावट हुई(वॉल-स्ट्रीट क्रैश) | इस संकट के साथ अमेरिका ने सीमा शुल्क में वृद्धि की तथा जर्मनी को दिए जाने वाले पैसे रोक दिए| यूरोपीय देशों ने भी सीमा-शुल्कों में वृद्धि की तथा यह संकट गहराने लगा| आर्थिक महामंदी के परिणाम- राजनीतिक परिणाम मंदी के दौरान USSR की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि USSR का आर्थिक विकास जारी रहा| साम्यवादी विचारधारा की लोकप्रियता बढ़ीतथा पूंजीवादी व्यवस्था पर प्रश्न उठाये जाने लगे| फासीवादी शक्तियों के उदय तथा आक्रामक नीति के निर्धारण में इसकी प्रमुख भूमिका रही जैसे- जर्मनी में हिटलर की सरकार मंदी की पृष्ठभूमि में ही बनी; जापान में सैनिकवाद; इटली में मुसोलिनी द्वारा आक्रामक नीति का पालन | 1930 के दशक में ही राष्ट्रसंघ की व्यापक अवहेलना हुयी; ब्रिटेन तथा फ़्रांस केतुष्टीकरण की नीतिके पीछे भी मंदी की अहम भूमिका; मंदी के दौरान उपनिवेशों में भी राष्ट्रीय आंदोलनसे संबंधित गतिविधियाँ एवं राष्ट्रीय चेतना का प्रसार जैसे- भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन; कई देशों में सरकारों का पतन तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाये जाने लगे; ब्रिटेन की वैश्विक ताकत में तेजी से कमी आई तथा वैश्विक नेतृत्व ब्रिटेन की जगह अब संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर स्थानांतरित हो गया| आर्थिक परिणाम बड़ी संख्या में कारखाने तथा बैंक बंद हुए| सभी देशों के सरकार घाटे में चलने लगे तथा बजट घाटों को कम करने के लिए सरकारों ने करों में वृद्धि की| बेरोजगारों की संख्या बढ़ीजिससे अर्थव्यवस्था का सभी क्षेत्र प्रभावित हुआ| साथ ही, प्रति व्यक्ति आय में गिरावट से लोगों का जीवन-स्तर भी प्रतिकूलतः प्रभावित हुआ| हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था का यह संकट उपनिवेशों के लिए कुछ सीमा तक फायदे में रहा जैसे- सस्ते मशीनों का आयत, औद्योगिक विकास; वैश्विक मंदी की स्थिति से अमेरिका द्वारा न्यू-डील प्रोग्राम के तहत निकलने का प्रयास किया गया जिसके तहत पुनरुत्थान, सुधार तथा संतुलन की नीति अपनाकर आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ करने का प्रयास किया गया| अन्य देशों में भी सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत की गयी जिसके बाद 1934 से मंदी का प्रभाव खत्म होने लगा था|
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##Question:ऐसे कौन से कारण थें जिन्होने 1929 के आर्थिक महामंदी को प्रारंभ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? साथ ही, इस महामंदी के फलस्वरूप पड़ने वाले परिणामों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What were the reasons that caused an important role in starting the Great Economic Depression of 1929? Also, describe the consequences of this Great Economic Depression. (150- 200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- आर्थिक महामंदी की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए एवं उसे परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, आर्थिक महामंदी के पीछे उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, महामंदी के फलस्वरूप पड़ने वाले परिणामों की चर्चा कीजिये| उत्तर- अक्टूबर,1929 में संयुक्त राज्य अमेरिका के शेयर बाजार में भारी गिरावट के साथ संसार में वस्तुओं की कीमतें तेजी से गिरने लगी| सभी देशों में मुद्राओं का मूल्य भी गिरने लगा तथा बहुत सारे बैंक, उद्योग-धंधे बंद हो गए एवं लाखों मजदूर बेकार हो गए| लोगों के पास पैसे के अभाव में उनकी क्रय शक्ति कम थी तथा दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण सरकारें कर वसूल नहीं पा रही थी| इससे बजट असंतुलित होते गया| यह भीषण आर्थिक मंदी 1929 में शुरू हुई थी तथा 1931 में चरम सीमा पर जा पहुंची| बहुत सारे उपचारों के बावजूद भी 1934 तक इसका प्रभाव बना रहा | आर्थिक मंदी के पीछे उत्तरदायी कारण प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात उत्पन परिस्थितियां - प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका तथा जापान की अर्थव्यवस्था का व्यापक विकास हुआ| युद्ध एवं उसके पश्चात् बड़ी संख्या में यूरोपीय अप्रवासी बेहतर जीवन की तलाश में अमेरिका में बस गए| 1920 के दशक में औद्योगिक उत्पादन लगभग दोगुनी हो गयी लेकिन मुनाफे के अनुपात में श्रमिकों की मजदूरी नाममात्र की बढ़ी जिससे श्रमिकों की क्रयक्षमता प्रभावित हुयी| युद्ध के पश्चात पूंजीवादी देशों ने संरक्षणवादी नीति का पालन किया जिससे अमेरिका के बाहर अमेरिकी उत्पादों की मांग गिरी| अधिशेष उत्पादन - 1920 के दशक में कृषि के मशीनीकरण एवं रसायनों के प्रयोग के कारण बंपर उत्पादन हुआ जिससे कृषि उत्पादों की कीमतें गिरी तथा किसानों की क्रय-क्षमता भी गिरी| साथ ही,वैज्ञानिक खोजों तथा मशीनीकरण से भी उत्पादन में बढ़ोतरी हुई थी जो बाद में अधिशेष उत्पादन का कारण बनी| वैश्विक स्वर्ण भण्डार के वितरण का अनियमित होना -विश्वयुद्ध पश्चात के पुनर्निर्माण कार्यों में यूरोपीय राष्ट्रों को अमेरिका की तरफ से काफी मात्रा में ऋण दिया गया था| यूरोपीय मुद्राओं के मूल्य में कमी के कारण इस ऋण का पुनर्भुगतान स्वर्ण में किया जाने लगा जिससे अमेरिका में विशाल स्वर्ण-भण्डार निर्मित हो गया था| सोने के विषम विभाजन से मुद्रा की कीमतों में वृद्धि हुयी तथा वस्तुओं के मूल्यों में गिरावट आई एवं आर्थिक मंदी का मार्ग प्रशस्त हुआ| इसी दशक में अमेरिकी मध्यवर्ग द्वारा बैंकों से कर्ज लेकर बड़े पैमाने पर उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद की गई| साथ ही, बैंकों के कर्ज चुकाने और मुनाफे के उद्देश्य से शेयर बाजार की तेजी को देखते हुए ऋणधारकों ने शेयर बाजार में निवेश किया; यहाँ तक की बैंकों ने भी शेयर बाजार में निवेश किया| लेकिन जैसे ही शेयरों की कीमते गिरनी चालु हुयी वैसे ही किसी भी कीमत पर शेयरों को बेचा जाने लगा तथा अफवाहों के कारण लोगों ने बैंकों से पैसे निकालने शुरू किये| इसी पृष्ठभूमि में 24 अक्टूबर 1929 को शेयर बाजार में भारी गिरावट हुई(वॉल-स्ट्रीट क्रैश) | इस संकट के साथ अमेरिका ने सीमा शुल्क में वृद्धि की तथा जर्मनी को दिए जाने वाले पैसे रोक दिए| यूरोपीय देशों ने भी सीमा-शुल्कों में वृद्धि की तथा यह संकट गहराने लगा| आर्थिक महामंदी के परिणाम- राजनीतिक परिणाम मंदी के दौरान USSR की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि USSR का आर्थिक विकास जारी रहा| साम्यवादी विचारधारा की लोकप्रियता बढ़ीतथा पूंजीवादी व्यवस्था पर प्रश्न उठाये जाने लगे| फासीवादी शक्तियों के उदय तथा आक्रामक नीति के निर्धारण में इसकी प्रमुख भूमिका रही जैसे- जर्मनी में हिटलर की सरकार मंदी की पृष्ठभूमि में ही बनी; जापान में सैनिकवाद; इटली में मुसोलिनी द्वारा आक्रामक नीति का पालन | 1930 के दशक में ही राष्ट्रसंघ की व्यापक अवहेलना हुयी; ब्रिटेन तथा फ़्रांस केतुष्टीकरण की नीतिके पीछे भी मंदी की अहम भूमिका; मंदी के दौरान उपनिवेशों में भी राष्ट्रीय आंदोलनसे संबंधित गतिविधियाँ एवं राष्ट्रीय चेतना का प्रसार जैसे- भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन; कई देशों में सरकारों का पतन तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाये जाने लगे; ब्रिटेन की वैश्विक ताकत में तेजी से कमी आई तथा वैश्विक नेतृत्व ब्रिटेन की जगह अब संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर स्थानांतरित हो गया| आर्थिक परिणाम बड़ी संख्या में कारखाने तथा बैंक बंद हुए| सभी देशों के सरकार घाटे में चलने लगे तथा बजट घाटों को कम करने के लिए सरकारों ने करों में वृद्धि की| बेरोजगारों की संख्या बढ़ीजिससे अर्थव्यवस्था का सभी क्षेत्र प्रभावित हुआ| साथ ही, प्रति व्यक्ति आय में गिरावट से लोगों का जीवन-स्तर भी प्रतिकूलतः प्रभावित हुआ| हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था का यह संकट उपनिवेशों के लिए कुछ सीमा तक फायदे में रहा जैसे- सस्ते मशीनों का आयत, औद्योगिक विकास; वैश्विक मंदी की स्थिति से अमेरिका द्वारा न्यू-डील प्रोग्राम के तहत निकलने का प्रयास किया गया जिसके तहत पुनरुत्थान, सुधार तथा संतुलन की नीति अपनाकर आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ करने का प्रयास किया गया| अन्य देशों में भी सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत की गयी जिसके बाद 1934 से मंदी का प्रभाव खत्म होने लगा था|
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"Fascism emerged as an ideology between two world wars, when capitalism was in deep crisis." Discuss.(200 words) "दो विश्व युद्वों के मध्य,जब पूंजीवाद गहरे संकट में था, तब फासीवाद एक विचारधारा के रूप में उभर कर सामने आया।" चर्चा कीजिए।(200 शब्द)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में फासीवादी विचारधारा का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, फासीवादी विचारधारा के उदय की पृष्ठभूमिका उल्लेख कीजिए। इसके बाद फासीवाद की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- एक विचारधारा के रूप में फासीवाद 20 वीं शताब्दी में दो विश्व युद्धों के बीच उभर कर सामने आया।जब पूंजीवादी व्यवस्था गहरे संकट में घिर गई थी और मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन से खतरे का सामना कर रही थी, तभी जर्मनी के शासकोंने बुर्जुआ लोकतंत्र को समाप्त कर एक आक्रामक शासनकरने का विकल्प चुना। इसी प्रकारमुसोलिनी केइटली और जापान में भी फासीवादी शासन उभर कर सामने आया। आर्थिक महामंदी के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर परसामाजिक तनाव पैदा हुआ।सर्वप्रथम मुसोलिनी ने 1919 में फांसीवादी पार्टी की स्थापना की और इटली में 1922 में फांसीवादी सरकार बनी। इसके पश्चात 1933 में जर्मनी में सरकार बनी। आगे चलकर स्पेन पुर्तगाल अर्जेंटीना इत्यादि देशों में भी फांसीवादी सरकार बनी। हालाँकि फांसीवाद कोई विचारधारा नहीं है बल्कि एक प्रकार की कार्य योजना है जहाँ विशेष परिस्थितियों का लाभ उठाकर कोई व्यक्ति सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करता है, शक्ति का केन्द्रीकरण करता है और जीवन के सभी क्षेत्रों को नियमित करने का प्रयास भी (सर्व सत्तावादी राज्य) करता है। देश एवं काल के अनुसार फांसीवादी सरकारों में भिन्नताएं हो सकती हैं लेकिन कुछ सामान्य विशेषताएं उपर्युक्त चर्चित सभी देशों में दिखाई पड़ती हैं- लोकतंत्र विरोधी- शक्ति का केन्द्रीकरण, अभिव्यक्ति एवं प्रेस पर प्रतिबंध, चुनाव प्रक्रिया में फेर बदल, विपक्षी दलों पर प्रतिबंध इत्यादि। साम्यवाद विरोधी,युद्ध का महिमामंडन, प्रोपगेंडा, सर्वसत्तावादी। राष्ट्रवाद- उग्र या आक्रमक राष्ट्रवाद। राष्ट्रवाद फासीवाद का मुख्य आधार है। अधिनायकवाद- फासीवाद एक अधिनायकवादी राज्य की स्थापना को बढ़ावा देता है। यह उदार लोकतंत्र का विरोध करता है, मल्टी-पार्टी सिस्टम को अस्वीकार करता है, और एकल पार्टी व्यवस्थाका समर्थन करता है। अर्थव्यवस्था -फासीवादियों ने अंतरराष्ट्रीय मुक्त बाजार का विरोध किया और यह मुख्यधारा के समाजवाद को भी नकारता है। इस प्रकार फासीवाद ने 1930 के दशक से द्वितीय विश्व युद्ध तक क्षेत्रीय विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाया, जब आर्थिक महामंदी के कारण पूंजीवाद गहरे संकट में था।
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##Question:"Fascism emerged as an ideology between two world wars, when capitalism was in deep crisis." Discuss.(200 words) "दो विश्व युद्वों के मध्य,जब पूंजीवाद गहरे संकट में था, तब फासीवाद एक विचारधारा के रूप में उभर कर सामने आया।" चर्चा कीजिए।(200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में फासीवादी विचारधारा का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, फासीवादी विचारधारा के उदय की पृष्ठभूमिका उल्लेख कीजिए। इसके बाद फासीवाद की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- एक विचारधारा के रूप में फासीवाद 20 वीं शताब्दी में दो विश्व युद्धों के बीच उभर कर सामने आया।जब पूंजीवादी व्यवस्था गहरे संकट में घिर गई थी और मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन से खतरे का सामना कर रही थी, तभी जर्मनी के शासकोंने बुर्जुआ लोकतंत्र को समाप्त कर एक आक्रामक शासनकरने का विकल्प चुना। इसी प्रकारमुसोलिनी केइटली और जापान में भी फासीवादी शासन उभर कर सामने आया। आर्थिक महामंदी के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर परसामाजिक तनाव पैदा हुआ।सर्वप्रथम मुसोलिनी ने 1919 में फांसीवादी पार्टी की स्थापना की और इटली में 1922 में फांसीवादी सरकार बनी। इसके पश्चात 1933 में जर्मनी में सरकार बनी। आगे चलकर स्पेन पुर्तगाल अर्जेंटीना इत्यादि देशों में भी फांसीवादी सरकार बनी। हालाँकि फांसीवाद कोई विचारधारा नहीं है बल्कि एक प्रकार की कार्य योजना है जहाँ विशेष परिस्थितियों का लाभ उठाकर कोई व्यक्ति सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करता है, शक्ति का केन्द्रीकरण करता है और जीवन के सभी क्षेत्रों को नियमित करने का प्रयास भी (सर्व सत्तावादी राज्य) करता है। देश एवं काल के अनुसार फांसीवादी सरकारों में भिन्नताएं हो सकती हैं लेकिन कुछ सामान्य विशेषताएं उपर्युक्त चर्चित सभी देशों में दिखाई पड़ती हैं- लोकतंत्र विरोधी- शक्ति का केन्द्रीकरण, अभिव्यक्ति एवं प्रेस पर प्रतिबंध, चुनाव प्रक्रिया में फेर बदल, विपक्षी दलों पर प्रतिबंध इत्यादि। साम्यवाद विरोधी,युद्ध का महिमामंडन, प्रोपगेंडा, सर्वसत्तावादी। राष्ट्रवाद- उग्र या आक्रमक राष्ट्रवाद। राष्ट्रवाद फासीवाद का मुख्य आधार है। अधिनायकवाद- फासीवाद एक अधिनायकवादी राज्य की स्थापना को बढ़ावा देता है। यह उदार लोकतंत्र का विरोध करता है, मल्टी-पार्टी सिस्टम को अस्वीकार करता है, और एकल पार्टी व्यवस्थाका समर्थन करता है। अर्थव्यवस्था -फासीवादियों ने अंतरराष्ट्रीय मुक्त बाजार का विरोध किया और यह मुख्यधारा के समाजवाद को भी नकारता है। इस प्रकार फासीवाद ने 1930 के दशक से द्वितीय विश्व युद्ध तक क्षेत्रीय विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाया, जब आर्थिक महामंदी के कारण पूंजीवाद गहरे संकट में था।
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Among several factors for India"s potential growth, savings rate is the most effective one. Do you agree? What are the other factors available for growth potential? (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - SAVINGS AS DETERMINING GROWTH - THE OTHER FACTORS AVAILABLE FOR GROWTH -CONCLUSION Harrod-Domar model showing the strong relationship between investments (/savings) and growth-via data from the Indian economy Answer:- Growth is usually measured through the increase that is witnessed in the GDP (Gross Domestic Product). GDP= C + I + G + (X-M), where C refers to the consumption expenditure, I refers to the investment expenditure, G refers to the expenditure of the government and (X-M) refers to the net exports. SAVINGS AS DETERMINING GROWTH Savings are what channelize investments. That is, it is only when savings are available that investments are possible. Thereafter, investments are what mainly channelize the growth of the economy- When companies make investments, then, not only are goods and services (output) produced but also, it leads to job generation and thereby income generation. This leads to further demand for goods and services, leading to more investments. All this generates growth in the economy. YEAR----> 2O11-12 2012-13 2013-14 2014-15 2015-16 SAVINGS RATE 34.6 34.6 32.1 33.1 32.3 INVESTMENT RATE 39 38 33.8 34.4 33.3 S-I GAP -4.3 -4.8 -1.7 -1.3 -1.0 THE OTHER FACTORS AVAILABLE FOR GROWTH 1) HUGE MARKET There should be the presence of a proper, well developed and sizeable market. Only then would the factors of economics (like demand and supply) work freely (relatively freely in a mixed economy) and result in growth. 2) POLITICAL STABILITY If there are a lot of savings present in the economy (read deposits for loans in banks), but say war is going on, then people would not make investments, and the desired growth would not be witnessed. 3) LAW AND ORDER If the law and order situation is not good, then people would not have trust in the contracts. If there is no trust, then people would refrain from making much investment. 4) GOOD EXPECTATIONS When people believe that the market is doing well or will do well in future (bullish sentiments), then they would invest more. 5) AVAILABILITY OF RESOURCES Good availability of resources is also required for investments. If resources are available, then only would people invest. (Because the availability of resources is what ensures production facilitated by the investment money, for value addition) There is a strong correlation between investments and growth. As per the Harrod- Domar model, growth equals the investment rate divided by the ICOR. The ICOR is currently 4.3 in the Indian economy. The savings rate for 2016-17 (as per the Economic Survey of 2017-18) was 29%- That is why the growth of around 7% is witnessed currently (i.e. 29%/4.3). In 2009-10, the growth was around 10% because the savings rate was around 39%. Therefore, we can see a strong relationship between savings and growth rate. (Currently, given the ICOR, for a 10% growth rate, we would require around 40% in savings.)
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##Question:Among several factors for India"s potential growth, savings rate is the most effective one. Do you agree? What are the other factors available for growth potential? (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - SAVINGS AS DETERMINING GROWTH - THE OTHER FACTORS AVAILABLE FOR GROWTH -CONCLUSION Harrod-Domar model showing the strong relationship between investments (/savings) and growth-via data from the Indian economy Answer:- Growth is usually measured through the increase that is witnessed in the GDP (Gross Domestic Product). GDP= C + I + G + (X-M), where C refers to the consumption expenditure, I refers to the investment expenditure, G refers to the expenditure of the government and (X-M) refers to the net exports. SAVINGS AS DETERMINING GROWTH Savings are what channelize investments. That is, it is only when savings are available that investments are possible. Thereafter, investments are what mainly channelize the growth of the economy- When companies make investments, then, not only are goods and services (output) produced but also, it leads to job generation and thereby income generation. This leads to further demand for goods and services, leading to more investments. All this generates growth in the economy. YEAR----> 2O11-12 2012-13 2013-14 2014-15 2015-16 SAVINGS RATE 34.6 34.6 32.1 33.1 32.3 INVESTMENT RATE 39 38 33.8 34.4 33.3 S-I GAP -4.3 -4.8 -1.7 -1.3 -1.0 THE OTHER FACTORS AVAILABLE FOR GROWTH 1) HUGE MARKET There should be the presence of a proper, well developed and sizeable market. Only then would the factors of economics (like demand and supply) work freely (relatively freely in a mixed economy) and result in growth. 2) POLITICAL STABILITY If there are a lot of savings present in the economy (read deposits for loans in banks), but say war is going on, then people would not make investments, and the desired growth would not be witnessed. 3) LAW AND ORDER If the law and order situation is not good, then people would not have trust in the contracts. If there is no trust, then people would refrain from making much investment. 4) GOOD EXPECTATIONS When people believe that the market is doing well or will do well in future (bullish sentiments), then they would invest more. 5) AVAILABILITY OF RESOURCES Good availability of resources is also required for investments. If resources are available, then only would people invest. (Because the availability of resources is what ensures production facilitated by the investment money, for value addition) There is a strong correlation between investments and growth. As per the Harrod- Domar model, growth equals the investment rate divided by the ICOR. The ICOR is currently 4.3 in the Indian economy. The savings rate for 2016-17 (as per the Economic Survey of 2017-18) was 29%- That is why the growth of around 7% is witnessed currently (i.e. 29%/4.3). In 2009-10, the growth was around 10% because the savings rate was around 39%. Therefore, we can see a strong relationship between savings and growth rate. (Currently, given the ICOR, for a 10% growth rate, we would require around 40% in savings.)
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वैश्वीकरण की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | वैश्वीकरण ने किस प्रकार से भारतीय समाज को सकारात्मक तथा नकरात्मक रूप से प्रभावित किया है ? परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Clarify the concept of globalization. How has globalization affected Indian society positively and negatively? Examine.
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एप्रोच :- वैश्वीकरण को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभावों के संबंध मे भौतिक व वैचारिक प्रभावों मे वर्गीकृत करते हुए प्रस्तुत कीजिये संतुलित व भविष्यमूलक निष्कर्ष लिखिए उत्तर - वैश्वीकरणसे तात्पर्य राष्ट्रों के बीच बढ़ते आर्थिक , सामाजिक ,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक निर्भरता से है जिसके अंतर्गत राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरा विश्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ सामाजिक विन्यास बनाता हुआ दिख रहा है जिसे ग्लोबल विलेज कहा जाता है । वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव :- वैश्वीकरण के प्रभावों कोभौतिक प्रभावएवंवैचारिक प्रभावके स्तरों पर विभेदित कर सकते है जिसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष है | भौतिक प्रभाव :- सकारात्मक भौतिक प्रभाव :-इसमे मुख्य स्तर पर शिक्षा ,स्वास्थ्य , जीवन स्तर , दूर संचार व्यवस्थाओं आदि मे हो रही गुणवत्ता वृद्धि तथा बढ़ रहे विकल्पों के स्वरूप मे देखा जा सकता है एतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे वैश्वीकरण की शुरुआत को दूर संचार क्रांति से जोड़ा जाता है , जो सत्तर के दशक तक आते आते विश्व के आर्थिक एकीकरण को संभावित करने लगी। नकारात्मक भौतिक प्रभाव: -इसमे मुख्य रूप से बढ़ती हुई आर्थिक असमानता एवं डिजिटल विभाजन ,बढ़ती हुई उपभोक्तावादी सोच एवं संस्कृति प्रभावी होती जा रही है इसके अलावा तेजी से बढ़ रहे उद्योगों के द्वारा पड़ने वाले प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव , एक विशेष वर्ग तक ही लाभों का पहुँच पाना सम्मिलित है वैचारिक प्रभाव:- सकारात्मक वैचारिक प्रभाव: -इसमे बढ़ती लोकतान्त्रिक समझ , व्यक्तिवाद को सम्मान , निजता की रक्षा आदि महत्वपूर्ण पहलू आते है , जिसके फलस्वरूप नए विचार एवं नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है नकारात्मक वैचारिक प्रभाव - इसे वैश्वीकरण की बड़ी चुनौती कही जा रही है सैद्धांतिक स्तर पर यह कहा जाता है की जब भी कोई समाज /संस्कृति किसी दूसरी संस्कृति के संपर्क मे आती है तो उनमे से एक दूसरे को अधिक प्रभावित कर रहे होते है, वह दूसरी संस्कृति प्रारम्भिक अवस्था मे परिधि मे हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों का तो स्वागत करती है परंतु जैसे ही यह परिवर्तन उस संस्कृति की केंद्र विशिष्टता को प्रभावित करती है तो वह संस्कृति विशिष्टताओं के रक्षा हेतु संस्कृति का अभिकथन प्रारम्भ करती है फलस्वरूप इन परिवर्तनों को निष्क्रिय करने के प्रयास किए जाते है | यदि सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी है तो दोनों संस्कृतियों मे सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा होती है जैसे Brexit जैसी घटनाएँ, आदि | वहीं दूसरी ओर अगर सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी नहीं है तोगलन पत्र(melting pot) जैसी स्थिति उत्पन्न होती है | इसके साथ ही वैश्वीकरण के प्रभावों का महिलाओं , बच्चों , जनजातियों तथा खाद्य संस्कृति मे देखा जा रहा है । प्रयास किए जाने चाहिए कि स्थानीय संस्कृति का संरक्षण करते हुए वैश्विक मूल्यों को समाहित किया जा सके । इस हेतु प्रशासन को आवश्यक नीति निर्माण द्वारा चयनात्मक रूप से वैश्वीकरण के लाभों का लाभ उठाने की ओर कदम बढ़ाने चाहिए ।
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##Question:वैश्वीकरण की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | वैश्वीकरण ने किस प्रकार से भारतीय समाज को सकारात्मक तथा नकरात्मक रूप से प्रभावित किया है ? परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Clarify the concept of globalization. How has globalization affected Indian society positively and negatively? Examine.##Answer:एप्रोच :- वैश्वीकरण को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभावों के संबंध मे भौतिक व वैचारिक प्रभावों मे वर्गीकृत करते हुए प्रस्तुत कीजिये संतुलित व भविष्यमूलक निष्कर्ष लिखिए उत्तर - वैश्वीकरणसे तात्पर्य राष्ट्रों के बीच बढ़ते आर्थिक , सामाजिक ,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक निर्भरता से है जिसके अंतर्गत राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरा विश्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ सामाजिक विन्यास बनाता हुआ दिख रहा है जिसे ग्लोबल विलेज कहा जाता है । वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव :- वैश्वीकरण के प्रभावों कोभौतिक प्रभावएवंवैचारिक प्रभावके स्तरों पर विभेदित कर सकते है जिसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष है | भौतिक प्रभाव :- सकारात्मक भौतिक प्रभाव :-इसमे मुख्य स्तर पर शिक्षा ,स्वास्थ्य , जीवन स्तर , दूर संचार व्यवस्थाओं आदि मे हो रही गुणवत्ता वृद्धि तथा बढ़ रहे विकल्पों के स्वरूप मे देखा जा सकता है एतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे वैश्वीकरण की शुरुआत को दूर संचार क्रांति से जोड़ा जाता है , जो सत्तर के दशक तक आते आते विश्व के आर्थिक एकीकरण को संभावित करने लगी। नकारात्मक भौतिक प्रभाव: -इसमे मुख्य रूप से बढ़ती हुई आर्थिक असमानता एवं डिजिटल विभाजन ,बढ़ती हुई उपभोक्तावादी सोच एवं संस्कृति प्रभावी होती जा रही है इसके अलावा तेजी से बढ़ रहे उद्योगों के द्वारा पड़ने वाले प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव , एक विशेष वर्ग तक ही लाभों का पहुँच पाना सम्मिलित है वैचारिक प्रभाव:- सकारात्मक वैचारिक प्रभाव: -इसमे बढ़ती लोकतान्त्रिक समझ , व्यक्तिवाद को सम्मान , निजता की रक्षा आदि महत्वपूर्ण पहलू आते है , जिसके फलस्वरूप नए विचार एवं नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है नकारात्मक वैचारिक प्रभाव - इसे वैश्वीकरण की बड़ी चुनौती कही जा रही है सैद्धांतिक स्तर पर यह कहा जाता है की जब भी कोई समाज /संस्कृति किसी दूसरी संस्कृति के संपर्क मे आती है तो उनमे से एक दूसरे को अधिक प्रभावित कर रहे होते है, वह दूसरी संस्कृति प्रारम्भिक अवस्था मे परिधि मे हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों का तो स्वागत करती है परंतु जैसे ही यह परिवर्तन उस संस्कृति की केंद्र विशिष्टता को प्रभावित करती है तो वह संस्कृति विशिष्टताओं के रक्षा हेतु संस्कृति का अभिकथन प्रारम्भ करती है फलस्वरूप इन परिवर्तनों को निष्क्रिय करने के प्रयास किए जाते है | यदि सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी है तो दोनों संस्कृतियों मे सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा होती है जैसे Brexit जैसी घटनाएँ, आदि | वहीं दूसरी ओर अगर सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी नहीं है तोगलन पत्र(melting pot) जैसी स्थिति उत्पन्न होती है | इसके साथ ही वैश्वीकरण के प्रभावों का महिलाओं , बच्चों , जनजातियों तथा खाद्य संस्कृति मे देखा जा रहा है । प्रयास किए जाने चाहिए कि स्थानीय संस्कृति का संरक्षण करते हुए वैश्विक मूल्यों को समाहित किया जा सके । इस हेतु प्रशासन को आवश्यक नीति निर्माण द्वारा चयनात्मक रूप से वैश्वीकरण के लाभों का लाभ उठाने की ओर कदम बढ़ाने चाहिए ।
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वैश्वीकरण की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | वैश्वीकरण ने किस प्रकार से भारतीय समाज को सकारात्मक तथा नकरात्मक रूप से प्रभावित किया है ? परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Clarify the concept of globalization. How has globalization affected Indian society positively and negatively? Examine.
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एप्रोच :- वैश्वीकरण को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये | वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभावों के संबंध मे भौतिक व वैचारिक प्रभावों मे वर्गीकृत करते हुए प्रस्तुत कीजिये | संतुलित व भविष्यमूलक निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - वैश्वीकरणसे तात्पर्य राष्ट्रों के बीच बढ़ते आर्थिक , सामाजिक ,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक निर्भरता से है जिसके अंतर्गत राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरा विश्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ सामाजिक विन्यास बनाता हुआ दिख रहा है जिसे ग्लोबल विलेज कहा जाता है । वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव:- वैश्वीकरण के प्रभावों कोभौतिक प्रभावएवंवैचारिक प्रभावके स्तरों पर विभेदित कर सकते है जिसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष है | भौतिक प्रभाव :- सकारात्मक भौतिक प्रभाव:- इसमे मुख्य स्तर पर शिक्षा ,स्वास्थ्य , जीवन स्तर , दूर संचार व्यवस्थाओं आदि मे हो रही गुणवत्ता वृद्धि तथा बढ़ रहे विकल्पों के स्वरूप मे देखा जा सकता है एतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे वैश्वीकरण की शुरुआत को दूर संचार क्रांति से जोड़ा जाता है , जो सत्तर के दशक तक आते आते विश्व के आर्थिक एकीकरण को संभावित करने लगी। नकारात्मक भौतिक प्रभाव: -इसमे मुख्य रूप से बढ़ती हुई आर्थिक असमानता एवं डिजिटल विभाजन ,बढ़ती हुई उपभोक्तावादी सोच एवं संस्कृति प्रभावी होती जा रही है इसके अलावा तेजी से बढ़ रहे उद्योगों के द्वारा पड़ने वाले प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव , एक विशेष वर्ग तक ही लाभों का पहुँच पाना सम्मिलित है वैचारिक प्रभाव:- सकारात्मक वैचारिक प्रभाव:- इसमे बढ़ती लोकतान्त्रिक समझ , व्यक्तिवाद को सम्मान , निजता की रक्षा आदि महत्वपूर्ण पहलू आते है ,जिसके फलस्वरूप नए विचार एवं नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है नकारात्मक वैचारिक प्रभाव - इसे वैश्वीकरण की बड़ी चुनौती कही जा रही है- सैद्धांतिक स्तर पर यह कहा जाता है की जब भी कोई समाज /संस्कृति किसी दूसरी संस्कृति के संपर्क मे आती है तो उनमे से एक दूसरे को अधिक प्रभावित कर रहे होते है, वह दूसरी संस्कृति प्रारम्भिक अवस्था मे परिधि मे हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों का तो स्वागत करती है परंतु जैसे ही यह परिवर्तन उस संस्कृति की केंद्र विशिष्टता को प्रभावित करती है तो वह संस्कृति विशिष्टताओं के रक्षा हेतु संस्कृति का अभिकथन प्रारम्भ करती है फलस्वरूप इन परिवर्तनों को निष्क्रिय करने के प्रयास किए जाते है | यदि सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी है तो दोनों संस्कृतियों मे सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा होती है जैसे Brexit जैसी घटनाएँ, आदि | वहीं दूसरी ओर अगर सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी नहीं है तोगलन पत्र(melting pot) जैसी स्थिति उत्पन्न होती है | इसके साथ ही वैश्वीकरण के प्रभावों का महिलाओं , बच्चों , जनजातियों तथा खाद्य संस्कृति मे देखा जा रहा है । प्रयास किए जाने चाहिए कि स्थानीय संस्कृति का संरक्षण करते हुए वैश्विक मूल्यों को समाहित किया जा सके । इस हेतु प्रशासन को आवश्यक नीति निर्माण द्वारा चयनात्मक रूप से वैश्वीकरण के लाभों का लाभ उठाने की ओर कदम बढ़ाने चाहिए ।
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##Question:वैश्वीकरण की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | वैश्वीकरण ने किस प्रकार से भारतीय समाज को सकारात्मक तथा नकरात्मक रूप से प्रभावित किया है ? परीक्षण कीजिये | (200शब्द) Clarify the concept of globalization. How has globalization affected Indian society positively and negatively? Examine.##Answer:एप्रोच :- वैश्वीकरण को परिभाषित करते हुए भूमिका दीजिये | वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभावों के संबंध मे भौतिक व वैचारिक प्रभावों मे वर्गीकृत करते हुए प्रस्तुत कीजिये | संतुलित व भविष्यमूलक निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - वैश्वीकरणसे तात्पर्य राष्ट्रों के बीच बढ़ते आर्थिक , सामाजिक ,राजनैतिक तथा सांस्कृतिक निर्भरता से है जिसके अंतर्गत राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठकर पूरा विश्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ सामाजिक विन्यास बनाता हुआ दिख रहा है जिसे ग्लोबल विलेज कहा जाता है । वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव:- वैश्वीकरण के प्रभावों कोभौतिक प्रभावएवंवैचारिक प्रभावके स्तरों पर विभेदित कर सकते है जिसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष है | भौतिक प्रभाव :- सकारात्मक भौतिक प्रभाव:- इसमे मुख्य स्तर पर शिक्षा ,स्वास्थ्य , जीवन स्तर , दूर संचार व्यवस्थाओं आदि मे हो रही गुणवत्ता वृद्धि तथा बढ़ रहे विकल्पों के स्वरूप मे देखा जा सकता है एतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे वैश्वीकरण की शुरुआत को दूर संचार क्रांति से जोड़ा जाता है , जो सत्तर के दशक तक आते आते विश्व के आर्थिक एकीकरण को संभावित करने लगी। नकारात्मक भौतिक प्रभाव: -इसमे मुख्य रूप से बढ़ती हुई आर्थिक असमानता एवं डिजिटल विभाजन ,बढ़ती हुई उपभोक्तावादी सोच एवं संस्कृति प्रभावी होती जा रही है इसके अलावा तेजी से बढ़ रहे उद्योगों के द्वारा पड़ने वाले प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव , एक विशेष वर्ग तक ही लाभों का पहुँच पाना सम्मिलित है वैचारिक प्रभाव:- सकारात्मक वैचारिक प्रभाव:- इसमे बढ़ती लोकतान्त्रिक समझ , व्यक्तिवाद को सम्मान , निजता की रक्षा आदि महत्वपूर्ण पहलू आते है ,जिसके फलस्वरूप नए विचार एवं नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है नकारात्मक वैचारिक प्रभाव - इसे वैश्वीकरण की बड़ी चुनौती कही जा रही है- सैद्धांतिक स्तर पर यह कहा जाता है की जब भी कोई समाज /संस्कृति किसी दूसरी संस्कृति के संपर्क मे आती है तो उनमे से एक दूसरे को अधिक प्रभावित कर रहे होते है, वह दूसरी संस्कृति प्रारम्भिक अवस्था मे परिधि मे हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों का तो स्वागत करती है परंतु जैसे ही यह परिवर्तन उस संस्कृति की केंद्र विशिष्टता को प्रभावित करती है तो वह संस्कृति विशिष्टताओं के रक्षा हेतु संस्कृति का अभिकथन प्रारम्भ करती है फलस्वरूप इन परिवर्तनों को निष्क्रिय करने के प्रयास किए जाते है | यदि सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी है तो दोनों संस्कृतियों मे सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा होती है जैसे Brexit जैसी घटनाएँ, आदि | वहीं दूसरी ओर अगर सांस्कृतिक विशिष्टता अधिक प्रभावी नहीं है तोगलन पत्र(melting pot) जैसी स्थिति उत्पन्न होती है | इसके साथ ही वैश्वीकरण के प्रभावों का महिलाओं , बच्चों , जनजातियों तथा खाद्य संस्कृति मे देखा जा रहा है । प्रयास किए जाने चाहिए कि स्थानीय संस्कृति का संरक्षण करते हुए वैश्विक मूल्यों को समाहित किया जा सके । इस हेतु प्रशासन को आवश्यक नीति निर्माण द्वारा चयनात्मक रूप से वैश्वीकरण के लाभों का लाभ उठाने की ओर कदम बढ़ाने चाहिए ।
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चक्रवात को परिभाषित कीजिये ? उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध करते हुए इसके विकास के लिए आवश्यक दशाओं का विश्लेषण कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) Define cyclone? Listing the common characteristics of tropical cyclone, analyze the necessary conditions for its development (150-200 words/10 marks).
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में चक्रवात को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- दूसरे भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में चक्रवातों का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घडी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घडी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात| उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है · चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी| · चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है · उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है| चक्रवात के अंदर पवन वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर चलती है इसे प्रवणता पवन कहते हैं, इसके मध्य के भाग को ही चक्रवात की आँख कहते हैं| प्रायः चक्रवात की आँख में मौसम शांत रहता है किन्तु कभी कभी वायु केअवरोहण की संभावना होती है · चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है| · इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है| आवश्यक दशाएं समुद्र तल का तापमान · समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए · वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है, अपसरण के लिए संघनन की गुप्त उष्मा आवश्यक होती जिसके लिए वायु में नमी की मात्रा अधिक होना चाहिए और नमी की मात्रा की अधिकता के लिए तापमान का अधिक होना आवश्यक होता है इसीलिए समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए| · इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं · यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है · चूँकि ये व्यापारिक पवनों का क्षेत्र है इसलिए सामान्य तौर पर इसका निर्माण पूर्वी तट पर ही होता है क्योंकि व्यापारिक पवनों में नमी की मात्रा अधिक होगी, · नमी की आपूर्ति का रुकना और घर्षण बल के कारण धरातल पर चक्रवात की मृत्यु हो जाती है जिसे लैंडफॉल कहते हैं कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा · चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है · इसी कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात का निर्माण विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (6 डिग्री उत्तर से 6 डिग्री दक्षिण) में नही होता है चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति · चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है · यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र · एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
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##Question:चक्रवात को परिभाषित कीजिये ? उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध करते हुए इसके विकास के लिए आवश्यक दशाओं का विश्लेषण कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) Define cyclone? Listing the common characteristics of tropical cyclone, analyze the necessary conditions for its development (150-200 words/10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में चक्रवात को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- दूसरे भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में चक्रवातों का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घडी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घडी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात| उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है · चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी| · चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है · उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है| चक्रवात के अंदर पवन वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर चलती है इसे प्रवणता पवन कहते हैं, इसके मध्य के भाग को ही चक्रवात की आँख कहते हैं| प्रायः चक्रवात की आँख में मौसम शांत रहता है किन्तु कभी कभी वायु केअवरोहण की संभावना होती है · चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है| · इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है| आवश्यक दशाएं समुद्र तल का तापमान · समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए · वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है, अपसरण के लिए संघनन की गुप्त उष्मा आवश्यक होती जिसके लिए वायु में नमी की मात्रा अधिक होना चाहिए और नमी की मात्रा की अधिकता के लिए तापमान का अधिक होना आवश्यक होता है इसीलिए समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए| · इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं · यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है · चूँकि ये व्यापारिक पवनों का क्षेत्र है इसलिए सामान्य तौर पर इसका निर्माण पूर्वी तट पर ही होता है क्योंकि व्यापारिक पवनों में नमी की मात्रा अधिक होगी, · नमी की आपूर्ति का रुकना और घर्षण बल के कारण धरातल पर चक्रवात की मृत्यु हो जाती है जिसे लैंडफॉल कहते हैं कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा · चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है · इसी कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात का निर्माण विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (6 डिग्री उत्तर से 6 डिग्री दक्षिण) में नही होता है चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति · चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है · यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र · एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
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सूर्यातप की व्याख्या करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explaining insolation describe factors influencing it. (150-200 words, Marks -10 )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: सूर्यातप को स्पष्ट करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। इसे प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। सूर्य की सतह से ऊष्मा निरंतर लघु तरंगों के रूप में विकिरित होती रहती है सूर्य से विकिरित होने वाले इस ताप को सूर्यातप कहते हैं। वाह्य सतह से यह ऊर्जा फोटान के रूप में उत्सर्जित होती है। ऊर्जा का वितरण विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में होता है। भूतल पर सौर ऊर्जा का वितरण सर्वत्र समान नहीं होता है। पृथ्वी के विभिन्न भाग विभिन्न मात्रा में सूर्यातप प्राप्त करते हैं। कर्क एवं मकर रेखाओं के मध्य स्थित उष्णकटिबन्ध सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ध्रुवों पर सूर्यातप की इतनी कम मात्रा प्राप्त होती है कि यह भूमध्य रेखा पर प्राप्त सूर्यातप के आधे से भी कम होता है। सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक: आपतन कोण: पृथ्वी की गोलाभ आकृति के कारण सूर्य की किरणें धरातल पर सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। अक्षांश जितना उच्च होगा किरणों का नति कोण उतना ही कम होगा। लम्बवत किरणों का आपतन कोण अधिक होता है तथा धरातल के छोटे क्षेत्र पर पड़ने के कारण सूर्यातप का संकेन्द्रण होता है। तिरछी किरणें अधिक विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करती हैं, परिणामस्वरूप प्रति इकाई क्षेत्र में कम ऊष्मा प्राप्त होती है। दिन की अवधि: यदि अन्य दशाएँ समान हो तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी सूर्यातप की मात्रा उतनी अधिक होगी। ग्रीष्मकाल में दिन की लंबाई अधिक होने से प्राप्त की गई सूर्यातप की मात्र अधिक होती है। शीतकाल में इसके विपरीत स्थिति उत्पन्न होती है। वायुमंडल की पारदर्शिता: वायुमंडल की पारदर्शिता मेघों की उपस्थिति एवं उनकी मोटाई, जलवाष्प, धूलकणों की सांद्रता आदि पर निर्भर करती है। अधिक ऊर्जा वाली पराबैगनी किरणें ओज़ोन द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। सघन मेघ सौर विकिरण को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने में बाधा उत्पन्न करता है। जलवाष्प सौर विकिरण को अवशोषित कर लेते हैं परिणाम स्वरूप धरातल तक सौर विकिरण की थोड़ी मात्रा ही पहुँच पाती है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी: सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सूर्य से सबसे दूर होता है, पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर कहते हैं। इस स्थिति में सूर्यातप की कम मात्रा प्राप्त होती है। उपसौर अर्थात 4 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे पास होता है। इस स्थित में अपसौर की अपेक्षा सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है। सौर कलंक: इनकी संख्या में वृद्धि से सूर्यातप की मात्रा बढ़ती है।
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##Question:सूर्यातप की व्याख्या करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explaining insolation describe factors influencing it. (150-200 words, Marks -10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: सूर्यातप को स्पष्ट करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। इसे प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। सूर्य की सतह से ऊष्मा निरंतर लघु तरंगों के रूप में विकिरित होती रहती है सूर्य से विकिरित होने वाले इस ताप को सूर्यातप कहते हैं। वाह्य सतह से यह ऊर्जा फोटान के रूप में उत्सर्जित होती है। ऊर्जा का वितरण विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में होता है। भूतल पर सौर ऊर्जा का वितरण सर्वत्र समान नहीं होता है। पृथ्वी के विभिन्न भाग विभिन्न मात्रा में सूर्यातप प्राप्त करते हैं। कर्क एवं मकर रेखाओं के मध्य स्थित उष्णकटिबन्ध सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ध्रुवों पर सूर्यातप की इतनी कम मात्रा प्राप्त होती है कि यह भूमध्य रेखा पर प्राप्त सूर्यातप के आधे से भी कम होता है। सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक: आपतन कोण: पृथ्वी की गोलाभ आकृति के कारण सूर्य की किरणें धरातल पर सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। अक्षांश जितना उच्च होगा किरणों का नति कोण उतना ही कम होगा। लम्बवत किरणों का आपतन कोण अधिक होता है तथा धरातल के छोटे क्षेत्र पर पड़ने के कारण सूर्यातप का संकेन्द्रण होता है। तिरछी किरणें अधिक विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करती हैं, परिणामस्वरूप प्रति इकाई क्षेत्र में कम ऊष्मा प्राप्त होती है। दिन की अवधि: यदि अन्य दशाएँ समान हो तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी सूर्यातप की मात्रा उतनी अधिक होगी। ग्रीष्मकाल में दिन की लंबाई अधिक होने से प्राप्त की गई सूर्यातप की मात्र अधिक होती है। शीतकाल में इसके विपरीत स्थिति उत्पन्न होती है। वायुमंडल की पारदर्शिता: वायुमंडल की पारदर्शिता मेघों की उपस्थिति एवं उनकी मोटाई, जलवाष्प, धूलकणों की सांद्रता आदि पर निर्भर करती है। अधिक ऊर्जा वाली पराबैगनी किरणें ओज़ोन द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। सघन मेघ सौर विकिरण को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने में बाधा उत्पन्न करता है। जलवाष्प सौर विकिरण को अवशोषित कर लेते हैं परिणाम स्वरूप धरातल तक सौर विकिरण की थोड़ी मात्रा ही पहुँच पाती है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी: सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सूर्य से सबसे दूर होता है, पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर कहते हैं। इस स्थिति में सूर्यातप की कम मात्रा प्राप्त होती है। उपसौर अर्थात 4 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे पास होता है। इस स्थित में अपसौर की अपेक्षा सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है। सौर कलंक: इनकी संख्या में वृद्धि से सूर्यातप की मात्रा बढ़ती है।
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What was the policy of appeasement in the context of second World War?Why Britain, France and the Soviet Union adopted this policy?How far was this policy responsible for the outbreak of the Second World War? द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ मेंतुष्टीकरण की नीति क्या थी ? ब्रिटेन, फ्रांस एवं सोवियत संघ ने इस नीति को क्यों अपनाया? द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के लिए यह नीति कहां तक उत्तरदायी थी?
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में तुष्टीकरण की नीति का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात, समझाइये किब्रिटेन, फ्रांस एवं सोवियत संघ ने इस नीति को क्यों अपनाया। अंत में समझाइये किद्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के लिए तुष्टीकरण कीनीति कहां तक उत्तरदायी थी। उत्तर:- दोनों विश्व युद्धों के बीच फासीवादी शक्तियों के द्वारा स्थापित व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास व ब्रिटेन फ्रांस तथा राष्ट्रसंघ जैसी संस्थाओं के द्वारा इसे रोकने की कोशिशन करना तथा अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना इत्यादि के संदर्भ में तुष्टिकरण की चर्चा होती है। ब्रिटेन ने तुष्टीकरण कीनीति क्यों अपनाई ? प्रांरभ से ब्रिटेन में यह मान्यता थी किपेरिस सम्मलेन में कुछ राष्ट्रों के साथ अन्याय हुआ है यदि उनकी कुछ मांगे पूरी हो जाएँ तो फांसीवादी शक्तियों का जनाधार कम होगा। 1930 के दशक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री चिम्बरले ने विशेष तौर पर इस नीति का समर्थन किया। फासीवादी शक्तियों की साम्यवाद विरोधी नीति को ब्रिटेन सामरिक हथियार के तौर पर देख रहा था। महामंदी के दौरान ब्रिटिश अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रही थी इसलिए भी तनाव या युद्धों से बचने की कोशिश की गई। अमेरिका का अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिसे अलग रहना, USSR में साम्यवादी क्रांति जैसे कारणों से भी ब्रिटेन फासीवादी शक्तियों को चुनौती देने से बच रहा था क्योंकि तनाव की स्थिति में अधिकांशतः दायित्व इसके कंधों पर होता है। फ्रांस ने तुष्टीकरण कीनीति क्यों अपनाई? फासीवादी शक्तियों की साम्यवाद विरोधी नीति को फ्रांससामरिक हथियार के तौर पर देख रहा था। महामंदी के दौरान फ्रांस कीअर्थव्यवस्था आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रही थी इसलिए भी तनाव या युद्धों से बचने की कोशिश की गई। अमेरिका का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से अलग रहना, USSR में साम्यवादी क्रांति जैसे कारणों से भी फ्रांसफासीवादी शक्तियों को चुनौती देने से बच रहा था। USSR ने तुष्टीकरण कीनीति क्यों अपनाई? बोल्शेविक क्रांति के पश्चात USSR राजनीतिक तौर पर यूरोपीय व्यवस्था से अलग थलग रहा। न तो वह राष्ट्रसंघ का 1934 तक मेंबर था और न ही पेरिस सम्मलेन और आगे के सम्मेलनों में उसकी भागीदारी रही। पूंजीवादी देशों के साथ विचारधारा का टकराव एवं फासीवादी शक्तियों के प्रति तुष्टीकरणकी नीति को USSR अपने विरुद्ध मानता था जैसे ही USSR को तुष्टीकरणका मौका मिला उसने भी इसका लाभ उठाया व पश्चमी रूस तथा पोलैंड में अपनी स्थिति मज़बूत की। तुष्टीकरण के निम्नलिखित कारणों की वजह से द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई- तुष्टीकरण की नीति ने जर्मनी और इटली को अपार शक्ति प्राप्त करने में सक्षम बनाया। वे बड़ी सेना खड़ी कर सकते थे और इससे यूरोप में शांति को खतरा था। यह वर्साय की संधि का भी उल्लंघन था। ब्रिटेन का जर्मनी के साथ एक नौसेना का समझौता हुआ। राष्ट्रसंघ की विफलताभी एक जिम्मेदार कारक था जो निरस्त्रीकरण द्वारा शांति बनायेरखने में विफल साबित हुआ। राइनलैंड पर पुनः आधिपत्य ने फ्रांस को विचलित कर दिया। स्पैनिश गृहयुद्ध में, जर्मनी और इटली ने निर्णायक मदद भेजी और ब्रिटेन और फ्रांस ने हस्तक्षेप नहीं किया। ऑस्ट्रिया का अधिग्रहण औरफिर म्यूनिख पैक्ट के माध्यम से, ब्रिटेन और फ्रांस के आत्मसमर्पण के बाद, जर्मनी ने सुडेटेनलैंड प्राप्त किया।इसने जर्मनी को लगाकि अन्य राष्ट्रों में जर्मनी के साथयुद्ध लड़ने कीक्षमता नहीं है और जर्मनी नेदूसरे देशों की धमकियों को हल्के में लेना शुरूकर दिया। सुडेटेनलैंड प्राप्त करने के बाद, जर्मनी ने पूरे चेकोस्लोवाकिया को अधिग्रहीतकर लिया। इसके बाद, हिटलर ने रूस के साथ गैर-आक्रामक संधि पर हस्ताक्षर किए और पोलिश कॉरिडोर के माध्यम से रेल और सड़क संपर्क की मांग की, और रूस के साथगुप्त रूप से पोलैंड को आपस में बाँटने की सहमति बनी। यह सब हिटलर ने तुष्टीकरण की नीति के तहत किया।हिटलर के प्रतिरोध के अभाव ने उसे बड़े जोखिम उठाने को उकसाया।म्यूनिख समझौते में ब्रिटेन और फ्रांस के आत्मसमर्पण के साथ, हिटलर ने सोचा कि वे पोलैंड के मामले में भी चुपरहेंगे लेकिन जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया तो ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के साथयुद्ध की घोषणा कर दी।
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##Question:What was the policy of appeasement in the context of second World War?Why Britain, France and the Soviet Union adopted this policy?How far was this policy responsible for the outbreak of the Second World War? द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ मेंतुष्टीकरण की नीति क्या थी ? ब्रिटेन, फ्रांस एवं सोवियत संघ ने इस नीति को क्यों अपनाया? द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के लिए यह नीति कहां तक उत्तरदायी थी?##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में तुष्टीकरण की नीति का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात, समझाइये किब्रिटेन, फ्रांस एवं सोवियत संघ ने इस नीति को क्यों अपनाया। अंत में समझाइये किद्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के लिए तुष्टीकरण कीनीति कहां तक उत्तरदायी थी। उत्तर:- दोनों विश्व युद्धों के बीच फासीवादी शक्तियों के द्वारा स्थापित व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास व ब्रिटेन फ्रांस तथा राष्ट्रसंघ जैसी संस्थाओं के द्वारा इसे रोकने की कोशिशन करना तथा अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना इत्यादि के संदर्भ में तुष्टिकरण की चर्चा होती है। ब्रिटेन ने तुष्टीकरण कीनीति क्यों अपनाई ? प्रांरभ से ब्रिटेन में यह मान्यता थी किपेरिस सम्मलेन में कुछ राष्ट्रों के साथ अन्याय हुआ है यदि उनकी कुछ मांगे पूरी हो जाएँ तो फांसीवादी शक्तियों का जनाधार कम होगा। 1930 के दशक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री चिम्बरले ने विशेष तौर पर इस नीति का समर्थन किया। फासीवादी शक्तियों की साम्यवाद विरोधी नीति को ब्रिटेन सामरिक हथियार के तौर पर देख रहा था। महामंदी के दौरान ब्रिटिश अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रही थी इसलिए भी तनाव या युद्धों से बचने की कोशिश की गई। अमेरिका का अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिसे अलग रहना, USSR में साम्यवादी क्रांति जैसे कारणों से भी ब्रिटेन फासीवादी शक्तियों को चुनौती देने से बच रहा था क्योंकि तनाव की स्थिति में अधिकांशतः दायित्व इसके कंधों पर होता है। फ्रांस ने तुष्टीकरण कीनीति क्यों अपनाई? फासीवादी शक्तियों की साम्यवाद विरोधी नीति को फ्रांससामरिक हथियार के तौर पर देख रहा था। महामंदी के दौरान फ्रांस कीअर्थव्यवस्था आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रही थी इसलिए भी तनाव या युद्धों से बचने की कोशिश की गई। अमेरिका का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से अलग रहना, USSR में साम्यवादी क्रांति जैसे कारणों से भी फ्रांसफासीवादी शक्तियों को चुनौती देने से बच रहा था। USSR ने तुष्टीकरण कीनीति क्यों अपनाई? बोल्शेविक क्रांति के पश्चात USSR राजनीतिक तौर पर यूरोपीय व्यवस्था से अलग थलग रहा। न तो वह राष्ट्रसंघ का 1934 तक मेंबर था और न ही पेरिस सम्मलेन और आगे के सम्मेलनों में उसकी भागीदारी रही। पूंजीवादी देशों के साथ विचारधारा का टकराव एवं फासीवादी शक्तियों के प्रति तुष्टीकरणकी नीति को USSR अपने विरुद्ध मानता था जैसे ही USSR को तुष्टीकरणका मौका मिला उसने भी इसका लाभ उठाया व पश्चमी रूस तथा पोलैंड में अपनी स्थिति मज़बूत की। तुष्टीकरण के निम्नलिखित कारणों की वजह से द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई- तुष्टीकरण की नीति ने जर्मनी और इटली को अपार शक्ति प्राप्त करने में सक्षम बनाया। वे बड़ी सेना खड़ी कर सकते थे और इससे यूरोप में शांति को खतरा था। यह वर्साय की संधि का भी उल्लंघन था। ब्रिटेन का जर्मनी के साथ एक नौसेना का समझौता हुआ। राष्ट्रसंघ की विफलताभी एक जिम्मेदार कारक था जो निरस्त्रीकरण द्वारा शांति बनायेरखने में विफल साबित हुआ। राइनलैंड पर पुनः आधिपत्य ने फ्रांस को विचलित कर दिया। स्पैनिश गृहयुद्ध में, जर्मनी और इटली ने निर्णायक मदद भेजी और ब्रिटेन और फ्रांस ने हस्तक्षेप नहीं किया। ऑस्ट्रिया का अधिग्रहण औरफिर म्यूनिख पैक्ट के माध्यम से, ब्रिटेन और फ्रांस के आत्मसमर्पण के बाद, जर्मनी ने सुडेटेनलैंड प्राप्त किया।इसने जर्मनी को लगाकि अन्य राष्ट्रों में जर्मनी के साथयुद्ध लड़ने कीक्षमता नहीं है और जर्मनी नेदूसरे देशों की धमकियों को हल्के में लेना शुरूकर दिया। सुडेटेनलैंड प्राप्त करने के बाद, जर्मनी ने पूरे चेकोस्लोवाकिया को अधिग्रहीतकर लिया। इसके बाद, हिटलर ने रूस के साथ गैर-आक्रामक संधि पर हस्ताक्षर किए और पोलिश कॉरिडोर के माध्यम से रेल और सड़क संपर्क की मांग की, और रूस के साथगुप्त रूप से पोलैंड को आपस में बाँटने की सहमति बनी। यह सब हिटलर ने तुष्टीकरण की नीति के तहत किया।हिटलर के प्रतिरोध के अभाव ने उसे बड़े जोखिम उठाने को उकसाया।म्यूनिख समझौते में ब्रिटेन और फ्रांस के आत्मसमर्पण के साथ, हिटलर ने सोचा कि वे पोलैंड के मामले में भी चुपरहेंगे लेकिन जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया तो ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के साथयुद्ध की घोषणा कर दी।
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वाताग्र को परिभाषित करते हुए इसके रूपों की चर्चा कीजिये। इसके साथ ही शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात एवं जेट धाराओं के विकास में वाताग्रों की भूमिका को स्पष्ट कीजिये।(150-200 शब्द/10 अंक) Defining fronts, discuss its forms. Along with this, explain the role of the fronts in the development of temperate cyclone and jet streams.(150-200 words/ 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वाताग्र को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में वाताग्र के रूपों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात एवं जेट धाराओं के विकास में वाताग्रों की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जब दो वायुराशियाँ जिनके भौतिक गुणों में अंतर हो, आपस में मिलती हैं तो उनका अभिसरण जटिल हो जाता है, क्योंकि वो आपस में आसानी से मिल नहीं पाती हैं और ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है, इसी संक्रमण क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं|वाताग्र वायुमंडलीय परिसंचरण का एक अभिन्न अंग है जो एक विशाल क्षेत्र में मौसमी बदलाव ला कर मानव की गतिविधियों को प्रभावित करता है| इसके अतिरिक्त जेट धारा के निर्माण के लिए वाताग्र जलवायुविक अनुकूलता प्रदान करता है| ये वाताग्र शीतोष्णकटिबंधीय चक्रवात के उत्पत्ति स्थल होते हैं| प्रकृति एवं विशेषता के अनुसार वाताग्र को चार भागों में बाटा जाता है स्थिर वाताग्र · जब वायुराशियाँ आपस में मिलती हैं तो उस समय वो एक दुसरे की ओर आक्रमण नहीं करती हैं और वाताग्र एक सीढ़ी रेखा के रूप में रहता है, इसे ही स्थिर वाताग्र कहते हैं| · हालांकि वाताग्र बहुत थोड़े समय के लिए स्थिर रहता है क्योंकि धीरे-धीरे वायुराशियाँ एक दूसरे के क्षेत्र में आक्रमण करने लगती हैं · ठंडी वायुराशि भारी होने के कारण सदैव धरातल ग्रहण किये रहती है जबकि उष्ण वायु ऊपर उठती जाती है| इस स्थिति में दो वाताग्रों का निर्माण होता है यथा शीत एवं उष्ण शीत वाताग्र · जब ठंडी वायुराशी सक्रिय हो कर गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करते हुए उसे ऊपर की ओर ढकेलती है तो इसे शीत वाताग्र कहते हैं · इस क्षेत्र में गर्म वायु राशि के हल्के होने के कारण जो वाताग्रीय ढाल बनती है वो तीव्र होती है जिसका अनुपात 1:50 होता है · ठंडी वायु राशि भारी होने कारण बहुत आसानी से गर्म वायु राशि में प्रवेश करती है इसलिए शीत वताग्र का विस्थापन दर बहुत अधिक होता है · यदि इसे विषुवत रेखा से देखा जाय तो उत्तरी गोलार्ध में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के ये बायीं ओर बनता है · यहाँ हिमपात की संभावना काफी कम होती हैऔर कपासी बादलों के निर्माण की संभावना अधिक होती है उष्ण वाताग्र · जब गर्म वायुराशी सक्रिय हो कर ठंडी वायु राशि के क्षेत्र में प्रवेश करते हुए ऊपर उठती है तो ऐसी स्थिति में निर्मित वाताग्र को उष्ण वाताग्र कहते हैं · इसकी ढाल बहुत मंद अर्थात 1:200 होती है · चूँकि गर्म वायु राशि हल्की होती है अतः यह ठंडी वायु को बहुत आसानी से विस्थापित नहीं कर पाती है| इसलिए उष्ण वाताग्र का विस्थापन दर कम होता है · उष्ण वाताग्र में हिमपात की संभावना काफी अधिक होती हैऔर यहाँ स्तरी बादलों के निर्माण की संभावना अधिक होती है अधिविष्ट वाताग्र · जब शीत वाताग्र धीरे-धीरे उष्ण क्षेत्र को छोटा करते हुए उष्ण वाताग्र को छू लेता है तो ऐसी स्थिति में अधिविष्ट वाताग्र का निर्माण होता है| इस स्थिति में वाताग्र अपने अपने अंतिम चरण में होता है| · इस स्थिति में पूरे वाताग्रीय क्षेत्र में भौतिक गुणों की समानता स्थापित होती है अर्थात वाताग्र का अंत हो जाता है शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के विकास में वाताग्रों की भूमिका · उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में ध्रुवीय पूर्वा और पछुआ पवनों का अभिसरण होता है, इससे टकराव क्षेत्र के एक ओर शीत वाताग्र बनता है तो दूसरी ओर उष्ण वाताग्र बनता है · जब वायुराशियाँ एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश करती हैं तब वाताग्र के ऊपर टकराव क्षेत्र मेंरोस्बी वक्र का निर्माण होता है, ऐसे आठ से दस वक्र पूरी पृथ्वी को समेट लेते हैं| इस वक्र के कोर क्षेत्र में भौतिक गुणों का अंतर अधिकतम होता है अर्थात · वाताग्रों में ऊर्जा का हस्तांतरण अधिकतम होता है परिणामस्वरूप धरातल पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण होता है और वायु मंडल में जेट धारा का निर्माण होता है · वाताग्र का निर्माण सालों भर हो सकता है इसलिए शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण भी सालों भर हो सकता है किन्तु तापान्तर में अधिकता होने के कारण जाड़े के दिनों में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का निर्माण अधिक होता है जेट धारा की उत्पत्ति और विकास में वाताग्रों की भूमिका · वाताग्रीय क्षेत्र में तापान्तर अधिक होता है जिसके परिणामस्वरूप दाबांतर अधिक होता है · दाबांतर अधिक होने से दाब प्रवणता बल अधिक होगा जिससे वायु की गति तीव्र होगी, तीव्र गति की पवन को धारा कहते हैं, इसी कारण वाताग्रों के प्रभाव से जेट वायु धाराओं का निर्माण होता है| · ध्यातव्य है कि तापान्तर जितना अधिक होगा जेट धारा की गति उतनी ही तीव्र होगी| जाड़े के दिनों में जेट धारा की गति अधिक होती है क्योंकि इसमें मिलने वाली पवनों का तापान्तर अधिक होता है · जेट धाराएं एक तीव्र गति से चलने वाली भू-विक्षेपी पवन हैं जो वायुमंडल में क्षोभ सीमा के पास विसर्पण करते हुए चलती है| जेट धारा वायुमंडलीय परिसंचरण का अभिन्न अंग होते हुए धरातलीय वायुदाब, पवन, चक्रवात तथा वर्षा के वितरण को प्रभावित करती हैं| जिस प्रकार से वायुदाब पेटियां दोलन करती हैं उसी तरह से जेट धारा की अवस्थिति में भी परिवर्तन आता है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात एवं जेट धाराओं की उत्पत्ति एवं विकास में वाताग्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है|
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##Question:वाताग्र को परिभाषित करते हुए इसके रूपों की चर्चा कीजिये। इसके साथ ही शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात एवं जेट धाराओं के विकास में वाताग्रों की भूमिका को स्पष्ट कीजिये।(150-200 शब्द/10 अंक) Defining fronts, discuss its forms. Along with this, explain the role of the fronts in the development of temperate cyclone and jet streams.(150-200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वाताग्र को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में वाताग्र के रूपों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात एवं जेट धाराओं के विकास में वाताग्रों की भूमिका को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जब दो वायुराशियाँ जिनके भौतिक गुणों में अंतर हो, आपस में मिलती हैं तो उनका अभिसरण जटिल हो जाता है, क्योंकि वो आपस में आसानी से मिल नहीं पाती हैं और ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है, इसी संक्रमण क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं|वाताग्र वायुमंडलीय परिसंचरण का एक अभिन्न अंग है जो एक विशाल क्षेत्र में मौसमी बदलाव ला कर मानव की गतिविधियों को प्रभावित करता है| इसके अतिरिक्त जेट धारा के निर्माण के लिए वाताग्र जलवायुविक अनुकूलता प्रदान करता है| ये वाताग्र शीतोष्णकटिबंधीय चक्रवात के उत्पत्ति स्थल होते हैं| प्रकृति एवं विशेषता के अनुसार वाताग्र को चार भागों में बाटा जाता है स्थिर वाताग्र · जब वायुराशियाँ आपस में मिलती हैं तो उस समय वो एक दुसरे की ओर आक्रमण नहीं करती हैं और वाताग्र एक सीढ़ी रेखा के रूप में रहता है, इसे ही स्थिर वाताग्र कहते हैं| · हालांकि वाताग्र बहुत थोड़े समय के लिए स्थिर रहता है क्योंकि धीरे-धीरे वायुराशियाँ एक दूसरे के क्षेत्र में आक्रमण करने लगती हैं · ठंडी वायुराशि भारी होने के कारण सदैव धरातल ग्रहण किये रहती है जबकि उष्ण वायु ऊपर उठती जाती है| इस स्थिति में दो वाताग्रों का निर्माण होता है यथा शीत एवं उष्ण शीत वाताग्र · जब ठंडी वायुराशी सक्रिय हो कर गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करते हुए उसे ऊपर की ओर ढकेलती है तो इसे शीत वाताग्र कहते हैं · इस क्षेत्र में गर्म वायु राशि के हल्के होने के कारण जो वाताग्रीय ढाल बनती है वो तीव्र होती है जिसका अनुपात 1:50 होता है · ठंडी वायु राशि भारी होने कारण बहुत आसानी से गर्म वायु राशि में प्रवेश करती है इसलिए शीत वताग्र का विस्थापन दर बहुत अधिक होता है · यदि इसे विषुवत रेखा से देखा जाय तो उत्तरी गोलार्ध में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के ये बायीं ओर बनता है · यहाँ हिमपात की संभावना काफी कम होती हैऔर कपासी बादलों के निर्माण की संभावना अधिक होती है उष्ण वाताग्र · जब गर्म वायुराशी सक्रिय हो कर ठंडी वायु राशि के क्षेत्र में प्रवेश करते हुए ऊपर उठती है तो ऐसी स्थिति में निर्मित वाताग्र को उष्ण वाताग्र कहते हैं · इसकी ढाल बहुत मंद अर्थात 1:200 होती है · चूँकि गर्म वायु राशि हल्की होती है अतः यह ठंडी वायु को बहुत आसानी से विस्थापित नहीं कर पाती है| इसलिए उष्ण वाताग्र का विस्थापन दर कम होता है · उष्ण वाताग्र में हिमपात की संभावना काफी अधिक होती हैऔर यहाँ स्तरी बादलों के निर्माण की संभावना अधिक होती है अधिविष्ट वाताग्र · जब शीत वाताग्र धीरे-धीरे उष्ण क्षेत्र को छोटा करते हुए उष्ण वाताग्र को छू लेता है तो ऐसी स्थिति में अधिविष्ट वाताग्र का निर्माण होता है| इस स्थिति में वाताग्र अपने अपने अंतिम चरण में होता है| · इस स्थिति में पूरे वाताग्रीय क्षेत्र में भौतिक गुणों की समानता स्थापित होती है अर्थात वाताग्र का अंत हो जाता है शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के विकास में वाताग्रों की भूमिका · उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में ध्रुवीय पूर्वा और पछुआ पवनों का अभिसरण होता है, इससे टकराव क्षेत्र के एक ओर शीत वाताग्र बनता है तो दूसरी ओर उष्ण वाताग्र बनता है · जब वायुराशियाँ एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश करती हैं तब वाताग्र के ऊपर टकराव क्षेत्र मेंरोस्बी वक्र का निर्माण होता है, ऐसे आठ से दस वक्र पूरी पृथ्वी को समेट लेते हैं| इस वक्र के कोर क्षेत्र में भौतिक गुणों का अंतर अधिकतम होता है अर्थात · वाताग्रों में ऊर्जा का हस्तांतरण अधिकतम होता है परिणामस्वरूप धरातल पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण होता है और वायु मंडल में जेट धारा का निर्माण होता है · वाताग्र का निर्माण सालों भर हो सकता है इसलिए शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण भी सालों भर हो सकता है किन्तु तापान्तर में अधिकता होने के कारण जाड़े के दिनों में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का निर्माण अधिक होता है जेट धारा की उत्पत्ति और विकास में वाताग्रों की भूमिका · वाताग्रीय क्षेत्र में तापान्तर अधिक होता है जिसके परिणामस्वरूप दाबांतर अधिक होता है · दाबांतर अधिक होने से दाब प्रवणता बल अधिक होगा जिससे वायु की गति तीव्र होगी, तीव्र गति की पवन को धारा कहते हैं, इसी कारण वाताग्रों के प्रभाव से जेट वायु धाराओं का निर्माण होता है| · ध्यातव्य है कि तापान्तर जितना अधिक होगा जेट धारा की गति उतनी ही तीव्र होगी| जाड़े के दिनों में जेट धारा की गति अधिक होती है क्योंकि इसमें मिलने वाली पवनों का तापान्तर अधिक होता है · जेट धाराएं एक तीव्र गति से चलने वाली भू-विक्षेपी पवन हैं जो वायुमंडल में क्षोभ सीमा के पास विसर्पण करते हुए चलती है| जेट धारा वायुमंडलीय परिसंचरण का अभिन्न अंग होते हुए धरातलीय वायुदाब, पवन, चक्रवात तथा वर्षा के वितरण को प्रभावित करती हैं| जिस प्रकार से वायुदाब पेटियां दोलन करती हैं उसी तरह से जेट धारा की अवस्थिति में भी परिवर्तन आता है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात एवं जेट धाराओं की उत्पत्ति एवं विकास में वाताग्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है|
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केंद्रीय विधानमंडल की सरंचना का उल्लेख कीजिए। साथ में राज्यसभा के गैर-परिसंघीय लक्षणों की भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the structure of the Central Legislature. Also, discuss the non-federal characteristics of Rajya Sabha. (150-200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, केंद्रीय विधानमंडल की सरंचना का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,राज्यसभा के गैर-परिसंघीय लक्षणों की भी चर्चा कीजिए। अंत में सक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संसद को केंद्रीय विधानमंडल कहा जाता है जिसमें लोकसभा, राज्यसभा एवं राष्ट्रपति शामिल होते हैं। संसद के निचले सदन को लोकसभा एवं ऊपरी सदन को राज्यसभा कहा जाता है। संसद के निचले सदन में सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 निर्धारित की गई है। इनमें से 530 राज्यों से एवं 20 संघ राज्य क्षेत्रों केप्रतिनिधि होते हैं। एंग्लो-इंडियन समुदाय से भी राष्ट्रपति द्वारा दो सदस्यों को नामित किया जाता है। वर्तमान में लोकसभा में 545 सदस्य हैं जिसमें से 530 राज्यों से, 13 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों से एवं दो सदस्यएंग्लो-इंडियन समुदाय से राष्ट्रपति द्वारा नामित होते हैं। इसी प्रकार ऊपरी सदन में सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित है इनमें से 238 सदस्य राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होंगें एवं 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीतकिये जाते हैं। वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। इनमें से 229सदस्य राज्यों से, चार संघ राज्य क्षेत्रों से और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। राज्यसभा के गैर-परिसंघीय लक्षण:- सीटों का निर्धारण जनसँख्या के अनुपात में है न कि सभी राज्यों को एक समान प्रतिनिधित्व जिससेराज्यों की संसद में आवाज एवं अधिकारों की अनदेखी हो जाती है। कोई भी राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता है चाहे वह उस राज्य का निवासी हो या न हो, जिससे राज्य के प्रतिनिधित्व की वास्तविक झलक पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। संघीय पदों पर नियुक्ति के मामलें में राज्यसभा को कोई अधिकार नहीं है। धन विधेयक के मामले में राज्य सभा को लोकसभा सेकम शक्तियां प्राप्त हैं। यह धन विधेयक को अस्वीकृत एवं संशोधित नहीं कर सकती है और न ही धन विधेयक को राज्यसभा में शुरू किया जा सकता है और धन विधेयक को प्रमाणित करने की शक्ति भी लोकसभा अध्यक्ष के पास है। दोनों सदनों की सयुंक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है और सयुंक्त बैठक में लोकसभा के सदस्यों कासंख्या बल अधिक होने के कारण राज्यसभा को बायपास किये जाने के समान है। राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को नहीं हटा सकती। मंत्रिपरिषद को सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है अतः इस मामले में भी राज्यसभा की शक्तियां एवं नियंत्रण कम होने के कारण राज्य सभा परिसंघीय मामलों में कमजोर नजर आती है। इस प्रकार राज्यसभा के विभिन गैर-परिसंघीय लक्षण देखे जा सकते हैं परन्तु फिर भी राज्यसभा का परसंघीय व्यवस्था में एक विशेष स्थान है जो कि कार्यपालिका की निरंकुशता पर नियंत्रण करती है।
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##Question:केंद्रीय विधानमंडल की सरंचना का उल्लेख कीजिए। साथ में राज्यसभा के गैर-परिसंघीय लक्षणों की भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the structure of the Central Legislature. Also, discuss the non-federal characteristics of Rajya Sabha. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, केंद्रीय विधानमंडल की सरंचना का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,राज्यसभा के गैर-परिसंघीय लक्षणों की भी चर्चा कीजिए। अंत में सक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संसद को केंद्रीय विधानमंडल कहा जाता है जिसमें लोकसभा, राज्यसभा एवं राष्ट्रपति शामिल होते हैं। संसद के निचले सदन को लोकसभा एवं ऊपरी सदन को राज्यसभा कहा जाता है। संसद के निचले सदन में सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 निर्धारित की गई है। इनमें से 530 राज्यों से एवं 20 संघ राज्य क्षेत्रों केप्रतिनिधि होते हैं। एंग्लो-इंडियन समुदाय से भी राष्ट्रपति द्वारा दो सदस्यों को नामित किया जाता है। वर्तमान में लोकसभा में 545 सदस्य हैं जिसमें से 530 राज्यों से, 13 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों से एवं दो सदस्यएंग्लो-इंडियन समुदाय से राष्ट्रपति द्वारा नामित होते हैं। इसी प्रकार ऊपरी सदन में सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित है इनमें से 238 सदस्य राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होंगें एवं 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीतकिये जाते हैं। वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। इनमें से 229सदस्य राज्यों से, चार संघ राज्य क्षेत्रों से और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। राज्यसभा के गैर-परिसंघीय लक्षण:- सीटों का निर्धारण जनसँख्या के अनुपात में है न कि सभी राज्यों को एक समान प्रतिनिधित्व जिससेराज्यों की संसद में आवाज एवं अधिकारों की अनदेखी हो जाती है। कोई भी राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता है चाहे वह उस राज्य का निवासी हो या न हो, जिससे राज्य के प्रतिनिधित्व की वास्तविक झलक पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। संघीय पदों पर नियुक्ति के मामलें में राज्यसभा को कोई अधिकार नहीं है। धन विधेयक के मामले में राज्य सभा को लोकसभा सेकम शक्तियां प्राप्त हैं। यह धन विधेयक को अस्वीकृत एवं संशोधित नहीं कर सकती है और न ही धन विधेयक को राज्यसभा में शुरू किया जा सकता है और धन विधेयक को प्रमाणित करने की शक्ति भी लोकसभा अध्यक्ष के पास है। दोनों सदनों की सयुंक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है और सयुंक्त बैठक में लोकसभा के सदस्यों कासंख्या बल अधिक होने के कारण राज्यसभा को बायपास किये जाने के समान है। राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को नहीं हटा सकती। मंत्रिपरिषद को सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी बनाया गया है अतः इस मामले में भी राज्यसभा की शक्तियां एवं नियंत्रण कम होने के कारण राज्य सभा परिसंघीय मामलों में कमजोर नजर आती है। इस प्रकार राज्यसभा के विभिन गैर-परिसंघीय लक्षण देखे जा सकते हैं परन्तु फिर भी राज्यसभा का परसंघीय व्यवस्था में एक विशेष स्थान है जो कि कार्यपालिका की निरंकुशता पर नियंत्रण करती है।
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हालिया वर्षों में नगरीकरण की प्रवृति तेजी से बढ़ी है, इस प्रवृति ने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया है | परीक्षण कीजिये | साथ ही इस समस्या को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की भी चर्चा कीजिये | (200शब्द) In recent years the trend of urbanization has increased rapidly, this trend has resulted many problems. Examine. Also discuss the efforts made by the Government of India to address this problem.
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एप्रोच - भूमिका में नगरीकरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं को भी बताइए | इस समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वरा उठाये गए कदमों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नगरीकरण -यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे लोग अच्छे स्वास्थ्य , अच्छे आवास , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे व्यावसायिक अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं | नगरीकरण एक क्रमिक प्रक्रिया है | नगरीकरण से उपजी समस्याएँ वर्ल्ड अर्बनायिज़ेशन प्रॉस्पेक्ट्स के अनुसार विश्व में सर्वाधिक नगरीय जनसँख्या में भारत दूसरे स्थान पर है | बढ़ती जनसँख्या ने नगरों पर दबाव को बढाया है जिससे कई समस्याएँ उभर कर आई हैं - 1. मलिन बस्तियों की समस्या -शहरी क्षेत्रों में आवास की कमी और उपलब्ध आवासों में से भी अधिकांशतः कम गुणवत्ता वाले होते हैं | वृहद् पैमाने पर शहरी क्षेत्रों में बढ़ती जनसँख्या के कारण लोगों के पास मलिन बस्तियों में रहने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता , जिससे मलिन बस्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है | 2. जलआपूर्ति, जल निकासी एवं स्वच्छता - भारत के किसी भी शहर में 24 घंटे जल आपूर्ति उपलब्ध नहीं है |शहर मेंजल निकासी की स्थिति भी दयनीय रहती है एवं शहरों की स्वच्छता सम्बन्धी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रेरणा का पूर्णतया अभाव देखा जाता है | 3. प्रदूषण की समस्या -वर्तमान में शहरों की प्रमुख समस्या वायु प्रदूषण रहा है | WHO के अनुसार 14 शहरों की वायु गुणवत्ता ख़राब रही है | बढ़ते नगरीकरण के कारण यातायात के साधनों में वृद्धि होना , पेड़ों की कतई का बढ़ना , अपशिष्टों का निस्तारण ठीक प्रकार से न होना इत्यादि बढ़ते प्रदूषण के कारण हैं | भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास बढ़ते नगरीकरण से उपजी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - 1. प्रधानमंत्री आवास योजना -यह सभी के लिए आवास कार्यक्रम है , जिसमें 2022 तक नगरीय क्षेत्रों में सभी के लिए आवास उपलब्ध करना इसका लक्ष्य है | जिससे मलिन बस्तियों की समस्या का समाधान हो सकेगा | 2. स्मार्ट शहरों का विकास - यह मिशन 2015 में शुरू किया गया जिसका उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता में सुधार एवं आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहित करना है | 3. स्वच्छ भारत मिशन -यह 2 अक्टूबर 2014 को प्रारंभ किया गया था , इसका मुख्य उद्देश्य 2 अक्टूबर 2019 तक सभी नगरों को खुले में शौच से मुक्त कराना एवं आधुनिक एवं वैज्ञानिक ढंग से ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन करना , हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करना इत्यादि है | भारत में शहरी क्षेत्रों के रूपांतरण के लिए इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है | शहरी ठोस अपशिष्ट की सफाई हेतु , ऊर्जा संयंत्रों में अपशिष्टों के प्रयोग के लिए केंद्र में एक प्राधिकरण का निर्माण किया जाना चाहिए | वर्तमान में वायु प्रदूषण का मुख्य कारण बढ़ते यातायात के साधनों से है | इसके लिए सार्वजनिक यातायात प्रणाली को और बेहतर किया जाना चाहिए | ओला , मेट्रो आदि परिवहनों को और बढ़ावा दिया जाना चाहिए |
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##Question:हालिया वर्षों में नगरीकरण की प्रवृति तेजी से बढ़ी है, इस प्रवृति ने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया है | परीक्षण कीजिये | साथ ही इस समस्या को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की भी चर्चा कीजिये | (200शब्द) In recent years the trend of urbanization has increased rapidly, this trend has resulted many problems. Examine. Also discuss the efforts made by the Government of India to address this problem.##Answer:एप्रोच - भूमिका में नगरीकरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं को भी बताइए | इस समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वरा उठाये गए कदमों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नगरीकरण -यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे लोग अच्छे स्वास्थ्य , अच्छे आवास , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे व्यावसायिक अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं | नगरीकरण एक क्रमिक प्रक्रिया है | नगरीकरण से उपजी समस्याएँ वर्ल्ड अर्बनायिज़ेशन प्रॉस्पेक्ट्स के अनुसार विश्व में सर्वाधिक नगरीय जनसँख्या में भारत दूसरे स्थान पर है | बढ़ती जनसँख्या ने नगरों पर दबाव को बढाया है जिससे कई समस्याएँ उभर कर आई हैं - 1. मलिन बस्तियों की समस्या -शहरी क्षेत्रों में आवास की कमी और उपलब्ध आवासों में से भी अधिकांशतः कम गुणवत्ता वाले होते हैं | वृहद् पैमाने पर शहरी क्षेत्रों में बढ़ती जनसँख्या के कारण लोगों के पास मलिन बस्तियों में रहने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता , जिससे मलिन बस्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है | 2. जलआपूर्ति, जल निकासी एवं स्वच्छता - भारत के किसी भी शहर में 24 घंटे जल आपूर्ति उपलब्ध नहीं है |शहर मेंजल निकासी की स्थिति भी दयनीय रहती है एवं शहरों की स्वच्छता सम्बन्धी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रेरणा का पूर्णतया अभाव देखा जाता है | 3. प्रदूषण की समस्या -वर्तमान में शहरों की प्रमुख समस्या वायु प्रदूषण रहा है | WHO के अनुसार 14 शहरों की वायु गुणवत्ता ख़राब रही है | बढ़ते नगरीकरण के कारण यातायात के साधनों में वृद्धि होना , पेड़ों की कतई का बढ़ना , अपशिष्टों का निस्तारण ठीक प्रकार से न होना इत्यादि बढ़ते प्रदूषण के कारण हैं | भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास बढ़ते नगरीकरण से उपजी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - 1. प्रधानमंत्री आवास योजना -यह सभी के लिए आवास कार्यक्रम है , जिसमें 2022 तक नगरीय क्षेत्रों में सभी के लिए आवास उपलब्ध करना इसका लक्ष्य है | जिससे मलिन बस्तियों की समस्या का समाधान हो सकेगा | 2. स्मार्ट शहरों का विकास - यह मिशन 2015 में शुरू किया गया जिसका उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता में सुधार एवं आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहित करना है | 3. स्वच्छ भारत मिशन -यह 2 अक्टूबर 2014 को प्रारंभ किया गया था , इसका मुख्य उद्देश्य 2 अक्टूबर 2019 तक सभी नगरों को खुले में शौच से मुक्त कराना एवं आधुनिक एवं वैज्ञानिक ढंग से ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन करना , हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करना इत्यादि है | भारत में शहरी क्षेत्रों के रूपांतरण के लिए इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है | शहरी ठोस अपशिष्ट की सफाई हेतु , ऊर्जा संयंत्रों में अपशिष्टों के प्रयोग के लिए केंद्र में एक प्राधिकरण का निर्माण किया जाना चाहिए | वर्तमान में वायु प्रदूषण का मुख्य कारण बढ़ते यातायात के साधनों से है | इसके लिए सार्वजनिक यातायात प्रणाली को और बेहतर किया जाना चाहिए | ओला , मेट्रो आदि परिवहनों को और बढ़ावा दिया जाना चाहिए |
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हालिया वर्षों में नगरीकरण की प्रवृति तेजी से बढ़ी है, इस प्रवृति ने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया है। परीक्षण कीजिये। साथ ही इस समस्या को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की भी चर्चा कीजिये | (150- 200 शब्द) In recent years the trend of urbanization has increased rapidly, this trend has resulted many problems. Examine. Also discuss the efforts made by the Government of India to address this problem.(150-200 words)
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एप्रोच - भूमिका में नगरीकरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं को भी बताइए | इस समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वरा उठाये गए कदमों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नगरीकरण - यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे लोग अच्छे स्वास्थ्य , अच्छे आवास , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे व्यावसायिक अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं | नगरीकरण एक क्रमिक प्रक्रिया है | नगरीकरण से उपजी समस्याएँ - वर्ल्ड अर्बनायिज़ेशन प्रॉस्पेक्ट्स के अनुसार विश्व में सर्वाधिक नगरीय जनसँख्या में भारत दूसरे स्थान पर है | बढ़ती जनसँख्या ने नगरों पर दबाव को बढाया है जिससे कई समस्याएँ उभर कर आई हैं - 1. मलिन बस्तियों की समस्या - शहरी क्षेत्रों में आवास की कमी और उपलब्ध आवासों में से भी अधिकांशतः कम गुणवत्ता वाले होते हैं | वृहद् पैमाने पर शहरी क्षेत्रों में बढ़ती जनसँख्या के कारण लोगों के पास मलिन बस्तियों में रहने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता , जिससे मलिन बस्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है | 2. जल आपूर्ति, जल निकासी एवं स्वच्छता - भारत के किसी भी शहर में 24 घंटे जल आपूर्ति उपलब्ध नहीं है |शहर में जल निकासी की स्थिति भी दयनीय रहती है एवं शहरों की स्वच्छता सम्बन्धी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रेरणा का पूर्णतया अभाव देखा जाता है | 3. प्रदूषण की समस्या - वर्तमान में शहरों की प्रमुख समस्या वायु प्रदूषण रहा है | WHO के अनुसार 14 शहरों की वायु गुणवत्ता ख़राब रही है | बढ़ते नगरीकरण के कारण यातायात के साधनों में वृद्धि होना , पेड़ों की कतई का बढ़ना , अपशिष्टों का निस्तारण ठीक प्रकार से न होना इत्यादि बढ़ते प्रदूषण के कारण हैं | भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास - बढ़ते नगरीकरण से उपजी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - 1. प्रधानमंत्री आवास योजना - यह सभी के लिए आवास कार्यक्रम है , जिसमें 2022 तक नगरीय क्षेत्रों में सभी के लिए आवास उपलब्ध करना इसका लक्ष्य है | जिससे मलिन बस्तियों की समस्या का समाधान हो सकेगा | 2. स्मार्ट शहरों का विकास - यह मिशन 2015 में शुरू किया गया जिसका उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता में सुधार एवं आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहित करना है | 3. स्वच्छ भारत मिशन - यह 2 अक्टूबर 2014 को प्रारंभ किया गया था , इसका मुख्य उद्देश्य 2 अक्टूबर 2019 तक सभी नगरों को खुले में शौच से मुक्त कराना एवं आधुनिक एवं वैज्ञानिक ढंग से ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन करना , हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करना इत्यादि है | भारत में शहरी क्षेत्रों के रूपांतरण के लिए इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है | शहरी ठोस अपशिष्ट की सफाई हेतु , ऊर्जा संयंत्रों में अपशिष्टों के प्रयोग के लिए केंद्र में एक प्राधिकरण का निर्माण किया जाना चाहिए | वर्तमान में वायु प्रदूषण का मुख्य कारण बढ़ते यातायात के साधनों से है | इसके लिए सार्वजनिक यातायात प्रणाली को और बेहतर किया जाना चाहिए | ओला , मेट्रो आदि परिवहनों को और बढ़ावा दिया जाना चाहिए |
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##Question:हालिया वर्षों में नगरीकरण की प्रवृति तेजी से बढ़ी है, इस प्रवृति ने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया है। परीक्षण कीजिये। साथ ही इस समस्या को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की भी चर्चा कीजिये | (150- 200 शब्द) In recent years the trend of urbanization has increased rapidly, this trend has resulted many problems. Examine. Also discuss the efforts made by the Government of India to address this problem.(150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में नगरीकरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं को भी बताइए | इस समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वरा उठाये गए कदमों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नगरीकरण - यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे लोग अच्छे स्वास्थ्य , अच्छे आवास , अच्छी शिक्षा तथा अच्छे व्यावसायिक अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं | नगरीकरण एक क्रमिक प्रक्रिया है | नगरीकरण से उपजी समस्याएँ - वर्ल्ड अर्बनायिज़ेशन प्रॉस्पेक्ट्स के अनुसार विश्व में सर्वाधिक नगरीय जनसँख्या में भारत दूसरे स्थान पर है | बढ़ती जनसँख्या ने नगरों पर दबाव को बढाया है जिससे कई समस्याएँ उभर कर आई हैं - 1. मलिन बस्तियों की समस्या - शहरी क्षेत्रों में आवास की कमी और उपलब्ध आवासों में से भी अधिकांशतः कम गुणवत्ता वाले होते हैं | वृहद् पैमाने पर शहरी क्षेत्रों में बढ़ती जनसँख्या के कारण लोगों के पास मलिन बस्तियों में रहने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होता , जिससे मलिन बस्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है | 2. जल आपूर्ति, जल निकासी एवं स्वच्छता - भारत के किसी भी शहर में 24 घंटे जल आपूर्ति उपलब्ध नहीं है |शहर में जल निकासी की स्थिति भी दयनीय रहती है एवं शहरों की स्वच्छता सम्बन्धी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रेरणा का पूर्णतया अभाव देखा जाता है | 3. प्रदूषण की समस्या - वर्तमान में शहरों की प्रमुख समस्या वायु प्रदूषण रहा है | WHO के अनुसार 14 शहरों की वायु गुणवत्ता ख़राब रही है | बढ़ते नगरीकरण के कारण यातायात के साधनों में वृद्धि होना , पेड़ों की कतई का बढ़ना , अपशिष्टों का निस्तारण ठीक प्रकार से न होना इत्यादि बढ़ते प्रदूषण के कारण हैं | भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास - बढ़ते नगरीकरण से उपजी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - 1. प्रधानमंत्री आवास योजना - यह सभी के लिए आवास कार्यक्रम है , जिसमें 2022 तक नगरीय क्षेत्रों में सभी के लिए आवास उपलब्ध करना इसका लक्ष्य है | जिससे मलिन बस्तियों की समस्या का समाधान हो सकेगा | 2. स्मार्ट शहरों का विकास - यह मिशन 2015 में शुरू किया गया जिसका उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता में सुधार एवं आर्थिक संवृद्धि को प्रोत्साहित करना है | 3. स्वच्छ भारत मिशन - यह 2 अक्टूबर 2014 को प्रारंभ किया गया था , इसका मुख्य उद्देश्य 2 अक्टूबर 2019 तक सभी नगरों को खुले में शौच से मुक्त कराना एवं आधुनिक एवं वैज्ञानिक ढंग से ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन करना , हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करना इत्यादि है | भारत में शहरी क्षेत्रों के रूपांतरण के लिए इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है | शहरी ठोस अपशिष्ट की सफाई हेतु , ऊर्जा संयंत्रों में अपशिष्टों के प्रयोग के लिए केंद्र में एक प्राधिकरण का निर्माण किया जाना चाहिए | वर्तमान में वायु प्रदूषण का मुख्य कारण बढ़ते यातायात के साधनों से है | इसके लिए सार्वजनिक यातायात प्रणाली को और बेहतर किया जाना चाहिए | ओला , मेट्रो आदि परिवहनों को और बढ़ावा दिया जाना चाहिए |
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तापीय व्युत्क्रम क्या है ? उन जलवायवीय दशाओं का उल्लेख कीजिए जो तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं ? (150-200 शब्द, अंक -10 ) What is temperature inversion? Describe those climatic conditions that tends to temperature inversion? (150- 200 words, Marks - 10 )
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,तापीय व्युत्क्रम का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,उन जलवायवीय दशाओं का उल्लेख कीजिए जो तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँलिखते हुएउत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वायुमंडल की वह स्थिति जिसमें ऊंचाई बढ़ने के साथ साथ तापमान में भी वृद्धि होती है, तापीय व्युत्क्रम कहलाता है । जलवायु विज्ञानं में तापीय व्युत्क्रम एक महत्वपूर्ण प्रक्रम है जिसका प्रभाव मौसम के साथ साथ मानव की गतिविधियों पर भी पड़ता है। चूँकि ये सामान्य स्थिति के विपरीत स्थिति है इसीलिए इसका होना असामान्य बात है अर्थात निरंतरता का अभाव है। निम्नलिखित जलवायवीय दशाएं तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं- पार्थिव विकिरण की दर अथवा अवधि अधिक हो तो धरातलीयशीतलन की संभावना बढ़ जाती है जिससे किसी समय विशेष में तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र में , शहरी क्षेत्र में ,जाड़ेकी ठंडी लम्बी राते इत्यादि में। यदि एल्बिडो की दर अधिक हो तो व्युत्क्रम की स्थिति पैदा हो सकती है जैसे धुव्रीय क्षेत्र में । यहाँ पर लगभग वर्षभर तापीय व्युत्क्रम की स्थिति बनी रहती है। बादल वाली रातें तापीय व्युत्क्रम की अनुकूल स्थिति नहीं पैदा करतीहैंअर्थात साफ़ आकाश तापीय व्युत्क्रम केलिए अधिक अनुकूल है। इसीलिए विषुवतीय क्षेत्र में इसकी सम्भावना न्यूनतम होती है जबकि उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में अधिकतम होती है। शांत क्षेत्र, संचलित पवन वाले क्षेत्र से तापीय व्युत्क्रम के लिए अधिक अनुकूल होता है क्योंकि पवन ऊष्मा का स्थानांतरण क्षैतिज दिशा में करती है जबकि व्युत्क्रम की स्थिति लंबवत दिशा में देखी जाती है। पर्वतीय क्षेत्र की ऊपरी ढाल घाटी की तुलना में अधिक गर्म होती है क्योंकि सूर्य की किरणे उस पर सीधी पड़ती हैं। यह स्थिति दिन के समय में भी व्युत्क्रम उत्पन्न करती हैं। जब दो वायुराशियाँ आपस में अभिसरण करती है और यदि उनके तापमान मेंअंतर हो तो यह व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करती है। क्योंकि ठंठी वायुराशि भारीहोने के कारण धरातल ग्रहण करती है जबकि गर्म वायुराशि हल्की होने के कारण ऊपर उठती है अर्थात अभिसरण क्षेत्र में ऊंचाई में वृद्धि के साथ तापमान में भी वृद्धि हो रही है अर्थात तापीय व्युत्क्रम की स्थिति है। वायुमंडल के ऊपरी भाग में भी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जैसे समताप मंडल में ओजोन की उपस्थिति के कारण तापमान में ऊंचाई के साथ वृद्धि होती है जिसे हम ऊपरी वायु व्युत्क्रम(upper air inversion) कहते हैं। कई बार वायुराशियों के सामान्य संचलन से भी व्युत्क्रम की स्थिति पैदा होती है जैसे यदि कोई गर्म वायुराशि किसी ठन्डे क्षेत्र से गुजरती है तो वो व्युत्क्रम की स्थिति पैदा करती है क्योंकिवायुराशि की निचली परत तल के संपर्क में आने से ठंडी हो जाती है जबकि ऊपरी वायु गर्म ही रहती है। इस प्रकार उपरोक्त जलवायवीय दशाएं तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं।
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##Question:तापीय व्युत्क्रम क्या है ? उन जलवायवीय दशाओं का उल्लेख कीजिए जो तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं ? (150-200 शब्द, अंक -10 ) What is temperature inversion? Describe those climatic conditions that tends to temperature inversion? (150- 200 words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,तापीय व्युत्क्रम का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,उन जलवायवीय दशाओं का उल्लेख कीजिए जो तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँलिखते हुएउत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वायुमंडल की वह स्थिति जिसमें ऊंचाई बढ़ने के साथ साथ तापमान में भी वृद्धि होती है, तापीय व्युत्क्रम कहलाता है । जलवायु विज्ञानं में तापीय व्युत्क्रम एक महत्वपूर्ण प्रक्रम है जिसका प्रभाव मौसम के साथ साथ मानव की गतिविधियों पर भी पड़ता है। चूँकि ये सामान्य स्थिति के विपरीत स्थिति है इसीलिए इसका होना असामान्य बात है अर्थात निरंतरता का अभाव है। निम्नलिखित जलवायवीय दशाएं तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं- पार्थिव विकिरण की दर अथवा अवधि अधिक हो तो धरातलीयशीतलन की संभावना बढ़ जाती है जिससे किसी समय विशेष में तापीय व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र में , शहरी क्षेत्र में ,जाड़ेकी ठंडी लम्बी राते इत्यादि में। यदि एल्बिडो की दर अधिक हो तो व्युत्क्रम की स्थिति पैदा हो सकती है जैसे धुव्रीय क्षेत्र में । यहाँ पर लगभग वर्षभर तापीय व्युत्क्रम की स्थिति बनी रहती है। बादल वाली रातें तापीय व्युत्क्रम की अनुकूल स्थिति नहीं पैदा करतीहैंअर्थात साफ़ आकाश तापीय व्युत्क्रम केलिए अधिक अनुकूल है। इसीलिए विषुवतीय क्षेत्र में इसकी सम्भावना न्यूनतम होती है जबकि उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में अधिकतम होती है। शांत क्षेत्र, संचलित पवन वाले क्षेत्र से तापीय व्युत्क्रम के लिए अधिक अनुकूल होता है क्योंकि पवन ऊष्मा का स्थानांतरण क्षैतिज दिशा में करती है जबकि व्युत्क्रम की स्थिति लंबवत दिशा में देखी जाती है। पर्वतीय क्षेत्र की ऊपरी ढाल घाटी की तुलना में अधिक गर्म होती है क्योंकि सूर्य की किरणे उस पर सीधी पड़ती हैं। यह स्थिति दिन के समय में भी व्युत्क्रम उत्पन्न करती हैं। जब दो वायुराशियाँ आपस में अभिसरण करती है और यदि उनके तापमान मेंअंतर हो तो यह व्युत्क्रम की स्थिति उत्पन्न करती है। क्योंकि ठंठी वायुराशि भारीहोने के कारण धरातल ग्रहण करती है जबकि गर्म वायुराशि हल्की होने के कारण ऊपर उठती है अर्थात अभिसरण क्षेत्र में ऊंचाई में वृद्धि के साथ तापमान में भी वृद्धि हो रही है अर्थात तापीय व्युत्क्रम की स्थिति है। वायुमंडल के ऊपरी भाग में भी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जैसे समताप मंडल में ओजोन की उपस्थिति के कारण तापमान में ऊंचाई के साथ वृद्धि होती है जिसे हम ऊपरी वायु व्युत्क्रम(upper air inversion) कहते हैं। कई बार वायुराशियों के सामान्य संचलन से भी व्युत्क्रम की स्थिति पैदा होती है जैसे यदि कोई गर्म वायुराशि किसी ठन्डे क्षेत्र से गुजरती है तो वो व्युत्क्रम की स्थिति पैदा करती है क्योंकिवायुराशि की निचली परत तल के संपर्क में आने से ठंडी हो जाती है जबकि ऊपरी वायु गर्म ही रहती है। इस प्रकार उपरोक्त जलवायवीय दशाएं तापीय व्युत्क्रम को जन्म देती हैं।
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Discuss the challenges withState Police Forces ? Provide few solutions to overcome the challenges.(10 marks/ 150 Words)
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Brief Approach: 1. In brief talk about State Police like falling understatesubject etc 2. Challenges faced by state police forces including human resources, structural and operational. 3. Suggest solutions for reforms in police forces. Under the Constitution, the police is a state subject. Therefore, each of the 28 states has their own police forces. The centre is also allowed to maintain its own police forces to assist the states with ensuring law and order. Therefore, it maintains seven central police forces and some other police organisations for specialised tasks such as intelligence gathering, investigation, research and record-keeping, and training. The primary role of police forces is to uphold and enforce laws, investigate crimes and ensure security for people in the country. In a large and populous country like India, police forces need to be well-equipped, in terms of personnel, weaponry, forensic, communication and transport support, to perform their role well. But still, there are various issues that persist in the Police forces in India. These are: 1. Human Resources issue :Currently there are significant vacancies within the state police forces and some of the central armed police forces. The vacancy is around 24% average in almost all states thus causing huge human resources issues. 2. Constabulary related issues: (a)Qualifications and training related issues with the constabulary: The constabulary constitutes 86% of the state police forces, considered to perform a wide range of tasks but are not qualified and trained to perform such tasks. (b)Promotions and working conditions related issues: The Second Administrative Reforms Commission has further noted that the promotion opportunities and working conditions of constables are poor, and need to be improved.Generally, a constable in India can expect only one promotion in his lifetime and normally retires as a head constable, which weakens his incentive to perform well. (C)Housing and supporting infrastructure-related issues. 3.Crime investigation related issues: Mostly the police forces are not well equipped with role of investigating agencies and causing lack of poor investigation conclusion. 4.Underreporting of crime in India: Due to lack of trust of people with police. 5.Police infrastructure : Modern policing requires strong communication support, state-of-art or modern weapons, and a high degree of mobility. The CAG and the BPRD have noted shortcomings on several of these fronts includingWeaponry,Police vehicles andPolice Telecommunication Network (POLNET) etc. 6. Frequent transfers causing lack of stability and deter offices to take bold decisions. 7. Perception of corruption about the police in general publics mind. Thus to resolve these issues Supreme court in Prakash Singh case in 2006 provided various guidelines. These includes: 1.Constitute a State Security Commission (SSC) to reduce politicization. 2. Ensure that the DGP is appointed through a merit-based transparent process and secure a minimum tenure of two years. 3.Ensure that other police officers on operational duties (Including Superintendents of Police in-charge of a district and Station House Officers in-charge of a police station) are also provided with a minimum tenure of two years. 4.Separate the investigation and law and order functions of the police. 5.Set up a Police Establishment Board (PEB) to decide transfers, postings, promotions and other service-related matters of police officers of and below the rank of Deputy Superintendent of Police and make recommendations on postings and transfers above the rank of Deputy Superintendent of Police. 6.Set up a Police Complaints Authority (PCA) at the state level to inquire into public complaints against police officers of and above the rank of Deputy Superintendent of Police in cases of serious misconduct, including custodial death, grievous hurt etc. 7.Set up a National Security Commission (NSC) at the union level to prepare a panel for selection and placement of Chiefs of the Central Police Organisations (CPO) with a minimum tenure of two years. Apart from these, ways of addressing these challenges are through the community policing model.Community policing requires the police to work with the community for prevention and detection of crime, maintenance of public order, and resolving local conflicts, with the objective of providing a better quality of life and sense of security. Some success models are: 1.Janamaithri Suraksha in Kerala. 2. Meira Paibi (Torch-bearers) in Assam. All the above steps with proper focus on infrastructure, intelligence, and proper human resources training will ensure better capacity building of police and through them of the whole community to ensure better policing and grievance redressal.
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##Question:Discuss the challenges withState Police Forces ? Provide few solutions to overcome the challenges.(10 marks/ 150 Words)##Answer:Brief Approach: 1. In brief talk about State Police like falling understatesubject etc 2. Challenges faced by state police forces including human resources, structural and operational. 3. Suggest solutions for reforms in police forces. Under the Constitution, the police is a state subject. Therefore, each of the 28 states has their own police forces. The centre is also allowed to maintain its own police forces to assist the states with ensuring law and order. Therefore, it maintains seven central police forces and some other police organisations for specialised tasks such as intelligence gathering, investigation, research and record-keeping, and training. The primary role of police forces is to uphold and enforce laws, investigate crimes and ensure security for people in the country. In a large and populous country like India, police forces need to be well-equipped, in terms of personnel, weaponry, forensic, communication and transport support, to perform their role well. But still, there are various issues that persist in the Police forces in India. These are: 1. Human Resources issue :Currently there are significant vacancies within the state police forces and some of the central armed police forces. The vacancy is around 24% average in almost all states thus causing huge human resources issues. 2. Constabulary related issues: (a)Qualifications and training related issues with the constabulary: The constabulary constitutes 86% of the state police forces, considered to perform a wide range of tasks but are not qualified and trained to perform such tasks. (b)Promotions and working conditions related issues: The Second Administrative Reforms Commission has further noted that the promotion opportunities and working conditions of constables are poor, and need to be improved.Generally, a constable in India can expect only one promotion in his lifetime and normally retires as a head constable, which weakens his incentive to perform well. (C)Housing and supporting infrastructure-related issues. 3.Crime investigation related issues: Mostly the police forces are not well equipped with role of investigating agencies and causing lack of poor investigation conclusion. 4.Underreporting of crime in India: Due to lack of trust of people with police. 5.Police infrastructure : Modern policing requires strong communication support, state-of-art or modern weapons, and a high degree of mobility. The CAG and the BPRD have noted shortcomings on several of these fronts includingWeaponry,Police vehicles andPolice Telecommunication Network (POLNET) etc. 6. Frequent transfers causing lack of stability and deter offices to take bold decisions. 7. Perception of corruption about the police in general publics mind. Thus to resolve these issues Supreme court in Prakash Singh case in 2006 provided various guidelines. These includes: 1.Constitute a State Security Commission (SSC) to reduce politicization. 2. Ensure that the DGP is appointed through a merit-based transparent process and secure a minimum tenure of two years. 3.Ensure that other police officers on operational duties (Including Superintendents of Police in-charge of a district and Station House Officers in-charge of a police station) are also provided with a minimum tenure of two years. 4.Separate the investigation and law and order functions of the police. 5.Set up a Police Establishment Board (PEB) to decide transfers, postings, promotions and other service-related matters of police officers of and below the rank of Deputy Superintendent of Police and make recommendations on postings and transfers above the rank of Deputy Superintendent of Police. 6.Set up a Police Complaints Authority (PCA) at the state level to inquire into public complaints against police officers of and above the rank of Deputy Superintendent of Police in cases of serious misconduct, including custodial death, grievous hurt etc. 7.Set up a National Security Commission (NSC) at the union level to prepare a panel for selection and placement of Chiefs of the Central Police Organisations (CPO) with a minimum tenure of two years. Apart from these, ways of addressing these challenges are through the community policing model.Community policing requires the police to work with the community for prevention and detection of crime, maintenance of public order, and resolving local conflicts, with the objective of providing a better quality of life and sense of security. Some success models are: 1.Janamaithri Suraksha in Kerala. 2. Meira Paibi (Torch-bearers) in Assam. All the above steps with proper focus on infrastructure, intelligence, and proper human resources training will ensure better capacity building of police and through them of the whole community to ensure better policing and grievance redressal.
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द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये| साथ ही, द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe responsible causes behind the start of Second World War. Also, Mention the effects of World War II. (150- 200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- द्वितीय विश्वयुद्ध की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने के 20 वर्षों के अंदर ही विविध कारणों से दुनिया के राष्ट्र एक और भयानक एवं बड़े युद्ध करने को तैयार हो गये थें| प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात राष्ट्रों के अंदर आक्रामक राष्ट्रवादी भावना, प्रथम विश्वयुद्ध में दण्डित राष्ट्रों की प्रतिघात की लालसा, फासीवादी शक्तियों के आक्रामक रवैये आदि के फलस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध का होना अवश्यंभावी बन गया था| द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारण पूंजीवादी व्यवस्था का संकट - दोनों ही विश्वयुद्धों का एक महत्वपूर्ण कारण पूंजीवादी व्यवस्था का संकट था| असमानता पर आधारित विश्व आर्थिक व्यवस्था ने प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की| पेरिस सम्मेलन में इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तथा महामंदी के दौरान, यह एक व्यापक संकट में परिवर्तित हो गया| आर्थिक जरूरतों ने साम्राज्यवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया और द्वितीय विश्वयुद्ध का यह कारण बना| पेरिस सम्मेलन तथा वर्साय की संधि की त्रुटियाँ - द्वितीय विश्वयुद्द के मूल में पेरिस सम्मेलन को भी रखा जा सकता है| सम्मेलन में एक तरफ जर्मनी जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को अपमानित किया गया वहीँ दूसरी तरफ जापान एवं इटली जैसे विजेता राष्ट्र भी आहत थें| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिष्ठा एवं बाजार के लिए इन असंतुष्ट राष्ट्रों ने युद्ध को माध्यम बनाया| फासीवादी शक्तियों का उदय तथा आक्रामक नीति - विभिन्न कारणों से दोनों विश्वयुद्धों के बीच फासीवादी शक्तियों का उदय हुआ| फासीवादी शक्तियों ने, विशेषकर 1930 के दशक में, आक्रामक नीति अपनाई तथा इसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हुयी जैसे- इटली, जापान तथा जर्मनी की आक्रामक विदेश नीति| तुष्टीकरण का प्रभाव - फासीवादी शक्तियों को यदि सफलता मिली एवं उनकी महत्वाकांक्षा बढ़ी तो इसके लिए बहुत हद तक ब्रिटेन की तुष्टीकरण की नीति उत्तरदायी थी; साथ ही कुछ सीमा तक फ़्रांस एवं USSR की तुष्टीकरण की नीति भी| राष्ट्रसंघ की विफलता - राष्ट्रसंघ की अन्तर्निहित कमजोरियां तथा राष्ट्रसंघ के प्रति विभिन्न राष्ट्रों के दृष्टिकोण एवं तुष्टीकरण की नीति के कारण इसका महत्व गिरता गया| 1930 के दशक में फासीवादी शक्तियों पर अंकुश लगाने में राष्ट्रसंघ विफल रहा| जैसे- इटली द्वारा अबीसीनिया पर आक्रमण तथा जर्मनी द्वारा उसे सैन्य सहायता देना एवं राष्ट्रसंघ द्वारा इटली को आक्रमणकारी घोषित करने के बावजूद फ़्रांस,ब्रिटेन की तथस्तता ; निःशस्त्रीकरण में विफलता आदि कारणों से इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था की युद्धों को रोकने में विफलता अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण बनी| तात्कालिक कारण( जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण) - उपरोक्त सभी कारणों से यूरोप के राष्ट्र युद्ध के मुहाने पर खड़े थें| जर्मनी द्वारा पोलैंड के बंदरगाह हान्जिंग तक पहुँचने हेतु गलियारे की मांग पोलैंड द्वारा ठुकराने से हिटलर को पोलैंड पर आक्रमण का बहाना मिल गया| यूरोप के अन्य देशों ने पोलैंड के मुद्दे पर जर्मनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया तथाब्रिटेन, फ़्रांस आदि भी युद्ध में सम्मिलित हो गये| द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम ब्रिटेन, फ़्रांस, हॉलैंड जैसे साम्राज्यवादी शक्तियों का पतन ब्रिटेन की जगह अमेरिका एवं सोवियत संघ का महाशक्ति के रूप में उभरना दोनों महाशक्तियों के बीच विचारधारा एवं वर्चस्व को लेकर टकराव अर्थात शीतयुद्ध का प्रारंभ सैन्य संगठनों की स्थापना जैसे- नाटो, वार्सा पैक्ट; घातक हथियारों को लेकर प्रतिस्पर्धा; राष्ट्रसंघ के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना; विश्व आर्थिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक तथा गैट(GATT) की स्थापना विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया गुटनिरपेक्ष आंदोलन नवउपनिवेशवाद
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##Question:द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये| साथ ही, द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe responsible causes behind the start of Second World War. Also, Mention the effects of World War II. (150- 200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- द्वितीय विश्वयुद्ध की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने के 20 वर्षों के अंदर ही विविध कारणों से दुनिया के राष्ट्र एक और भयानक एवं बड़े युद्ध करने को तैयार हो गये थें| प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात राष्ट्रों के अंदर आक्रामक राष्ट्रवादी भावना, प्रथम विश्वयुद्ध में दण्डित राष्ट्रों की प्रतिघात की लालसा, फासीवादी शक्तियों के आक्रामक रवैये आदि के फलस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध का होना अवश्यंभावी बन गया था| द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारण पूंजीवादी व्यवस्था का संकट - दोनों ही विश्वयुद्धों का एक महत्वपूर्ण कारण पूंजीवादी व्यवस्था का संकट था| असमानता पर आधारित विश्व आर्थिक व्यवस्था ने प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की| पेरिस सम्मेलन में इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तथा महामंदी के दौरान, यह एक व्यापक संकट में परिवर्तित हो गया| आर्थिक जरूरतों ने साम्राज्यवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया और द्वितीय विश्वयुद्ध का यह कारण बना| पेरिस सम्मेलन तथा वर्साय की संधि की त्रुटियाँ - द्वितीय विश्वयुद्द के मूल में पेरिस सम्मेलन को भी रखा जा सकता है| सम्मेलन में एक तरफ जर्मनी जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को अपमानित किया गया वहीँ दूसरी तरफ जापान एवं इटली जैसे विजेता राष्ट्र भी आहत थें| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिष्ठा एवं बाजार के लिए इन असंतुष्ट राष्ट्रों ने युद्ध को माध्यम बनाया| फासीवादी शक्तियों का उदय तथा आक्रामक नीति - विभिन्न कारणों से दोनों विश्वयुद्धों के बीच फासीवादी शक्तियों का उदय हुआ| फासीवादी शक्तियों ने, विशेषकर 1930 के दशक में, आक्रामक नीति अपनाई तथा इसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हुयी जैसे- इटली, जापान तथा जर्मनी की आक्रामक विदेश नीति| तुष्टीकरण का प्रभाव - फासीवादी शक्तियों को यदि सफलता मिली एवं उनकी महत्वाकांक्षा बढ़ी तो इसके लिए बहुत हद तक ब्रिटेन की तुष्टीकरण की नीति उत्तरदायी थी; साथ ही कुछ सीमा तक फ़्रांस एवं USSR की तुष्टीकरण की नीति भी| राष्ट्रसंघ की विफलता - राष्ट्रसंघ की अन्तर्निहित कमजोरियां तथा राष्ट्रसंघ के प्रति विभिन्न राष्ट्रों के दृष्टिकोण एवं तुष्टीकरण की नीति के कारण इसका महत्व गिरता गया| 1930 के दशक में फासीवादी शक्तियों पर अंकुश लगाने में राष्ट्रसंघ विफल रहा| जैसे- इटली द्वारा अबीसीनिया पर आक्रमण तथा जर्मनी द्वारा उसे सैन्य सहायता देना एवं राष्ट्रसंघ द्वारा इटली को आक्रमणकारी घोषित करने के बावजूद फ़्रांस,ब्रिटेन की तथस्तता ; निःशस्त्रीकरण में विफलता आदि कारणों से इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था की युद्धों को रोकने में विफलता अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण बनी| तात्कालिक कारण( जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण) - उपरोक्त सभी कारणों से यूरोप के राष्ट्र युद्ध के मुहाने पर खड़े थें| जर्मनी द्वारा पोलैंड के बंदरगाह हान्जिंग तक पहुँचने हेतु गलियारे की मांग पोलैंड द्वारा ठुकराने से हिटलर को पोलैंड पर आक्रमण का बहाना मिल गया| यूरोप के अन्य देशों ने पोलैंड के मुद्दे पर जर्मनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया तथाब्रिटेन, फ़्रांस आदि भी युद्ध में सम्मिलित हो गये| द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम ब्रिटेन, फ़्रांस, हॉलैंड जैसे साम्राज्यवादी शक्तियों का पतन ब्रिटेन की जगह अमेरिका एवं सोवियत संघ का महाशक्ति के रूप में उभरना दोनों महाशक्तियों के बीच विचारधारा एवं वर्चस्व को लेकर टकराव अर्थात शीतयुद्ध का प्रारंभ सैन्य संगठनों की स्थापना जैसे- नाटो, वार्सा पैक्ट; घातक हथियारों को लेकर प्रतिस्पर्धा; राष्ट्रसंघ के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना; विश्व आर्थिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक तथा गैट(GATT) की स्थापना विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया गुटनिरपेक्ष आंदोलन नवउपनिवेशवाद
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Explain the tri-cellular meridonial model with a neat sketch. (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - HADLEY CELL - FERREL"S CELL - POLAR CELL -CONCLUSION Answer:- While studying the global/ planetary winds system, the climatologists have studied and informed us about three three-dimensional cells on the globe. These cells are called the Hadley Cells, Ferrell’s cells and the polar cells. The representation of these three cells on a plane is referred to as the tri-cellular meridional model. (The diagram taught by sir is required to be drawn- the representations of the cells on the globe is not to be drawn) I HADLEY CELL When winds travel over the land surface, they are continuously warming up as they move towards the hotter regions. By the time they reach 10 degrees N/S latitude, they face intense rapid heating and by the time they reach the 5 degrees N/S latitude zone, they have heated up significantly and lose their density. Hence, they are not stable and fluctuate. The 2 winds coming from the sub-tropical latitudes (around 30 degrees N/S) collide and merge. Here, the winds do not flow in any specific direction. The winds pile up and start moving against gravity. This vertical movement of the wind is known as convection. It is called a convective air current. The zone of mixing up of the 2 tropical winds is known as ITCZ/ doldrums- This is because the winds are in a confused state (no proper direction). The air ascends in the doldrums. [A diagram can be shown here- as shown by sir in class] Now the air moves in the upper Troposphere, up till the Tropopause. As the winds face the Normal Lapse Rate, they become dense (due to decrease in temperature). And by the time they reach the Tropopause, they become so dense that they need to sink down. But this cannot happen over the doldrums, because the rising convective air currents are quite strong. Therefore, they descend over 25-35 degrees N/S latitudes creating high pressure there. This forms the Hadley Cell. II FERREL"S CELL When warm Westerlies and cold Easterlies merge, the cold Easterlies uplift the warm winds (i.e. Westerlies) up till the Tropopause. Thereafter, the winds bifurcate. One branch sinks over the Sub-Tropical region, forming the Ferrell’s cell. This cell is formed between 30 degrees to 60 degrees latitudes North and South of the Equator. III POLAR CELL The branch (explained in the previous point) which sinks over the Polar Regions forms the Polar Cells (in the Northern and Southern Hemispheres). This cell is formed between 60 degrees and 90 degrees, both North and South of the Equator. Initially, climatologists believed that there were only two cells. It was Ferrell who discovered for the first time that there are intermediate cells as well.
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##Question:Explain the tri-cellular meridonial model with a neat sketch. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - HADLEY CELL - FERREL"S CELL - POLAR CELL -CONCLUSION Answer:- While studying the global/ planetary winds system, the climatologists have studied and informed us about three three-dimensional cells on the globe. These cells are called the Hadley Cells, Ferrell’s cells and the polar cells. The representation of these three cells on a plane is referred to as the tri-cellular meridional model. (The diagram taught by sir is required to be drawn- the representations of the cells on the globe is not to be drawn) I HADLEY CELL When winds travel over the land surface, they are continuously warming up as they move towards the hotter regions. By the time they reach 10 degrees N/S latitude, they face intense rapid heating and by the time they reach the 5 degrees N/S latitude zone, they have heated up significantly and lose their density. Hence, they are not stable and fluctuate. The 2 winds coming from the sub-tropical latitudes (around 30 degrees N/S) collide and merge. Here, the winds do not flow in any specific direction. The winds pile up and start moving against gravity. This vertical movement of the wind is known as convection. It is called a convective air current. The zone of mixing up of the 2 tropical winds is known as ITCZ/ doldrums- This is because the winds are in a confused state (no proper direction). The air ascends in the doldrums. [A diagram can be shown here- as shown by sir in class] Now the air moves in the upper Troposphere, up till the Tropopause. As the winds face the Normal Lapse Rate, they become dense (due to decrease in temperature). And by the time they reach the Tropopause, they become so dense that they need to sink down. But this cannot happen over the doldrums, because the rising convective air currents are quite strong. Therefore, they descend over 25-35 degrees N/S latitudes creating high pressure there. This forms the Hadley Cell. II FERREL"S CELL When warm Westerlies and cold Easterlies merge, the cold Easterlies uplift the warm winds (i.e. Westerlies) up till the Tropopause. Thereafter, the winds bifurcate. One branch sinks over the Sub-Tropical region, forming the Ferrell’s cell. This cell is formed between 30 degrees to 60 degrees latitudes North and South of the Equator. III POLAR CELL The branch (explained in the previous point) which sinks over the Polar Regions forms the Polar Cells (in the Northern and Southern Hemispheres). This cell is formed between 60 degrees and 90 degrees, both North and South of the Equator. Initially, climatologists believed that there were only two cells. It was Ferrell who discovered for the first time that there are intermediate cells as well.
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आपातकाल को इसके रूपों के साथ व्याख्यायित कीजिये| इसके साथ ही राष्ट्रीय आपात एवं राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain Emergency with its forms. Along with this, clarify the difference between the national emergency and the President rule. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में आपातकाल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में आपातकाल के रूपों को व्याख्यायित कीजिये 3- दूसरे भाग में राष्ट्रीय आपात एवं राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतर का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जब भी देश पर किसी भी तरह की आंतरिक-बाह्य, आर्थिक या संवैधानिक रूप से संकट आने की संभावना होती है तो देश में आपातकाल लगाया जा सकता है| आपातकाल की स्थिति में केंद्र सरकार के पास अधिक शक्ति आ जाती है| ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को बिना किसी अवरोध के गंभीर फैसले लेने योग्य बनाया जाता है| आपातकाल स्वरुपतः 3 प्रकार का होता है| राष्ट्रीय आपात अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है| इसे जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संविधान सशोधन अधिनियम के द्वारा 1978 के द्वारा संशोधित कर दिया| नवीन व्यवस्था के अनुसार अब अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति में से किसी भी आधार पर या सभी आधार पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है| किन्तु आंतरिक अशांति तभी मानी जायेगीजब सशत्र विद्रोह हो(चाहे वह जनता द्वारा किया जाए या पुलिस अथवा सेना के जवान आदि द्वारा हो)| इस स्थिति में केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र पूरे देश पर स्थापित होता है और राज्य सरकारों को कानून व व्यवस्था के पोषण, सुरक्षा और वित्त सम्बन्धी मामलों में वही करना होता है जो केंद्र सरकार निर्देशित करती है, भारत में इसे अनुच्छेद 352 के अंतर्गत रखा गया है जबकि 358 एवं 359 के अंतर्गत यह अधिकार क्षेत्र परिभाषित किये गए हैं राष्ट्रपति शासन · जब कोई राज्य सरकार संविधान प्रदत्त उपबन्धों के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो केंद्र सरकार उस राज्य सरकार को बर्खास्त कर वहां का शासन सीधे अपने हाथ में ले लेती हैं| भारत में अनुच्छेद 356 के अंतर्गत इसे राष्ट्रपति शासन कहते हैं| · उपरोक्त दोनों प्रकार के आपात काल भारत सरकार अधिनियम 1935 और कनाडा द्वारा अंग्रेजों द्वारा स्थापित अंग्रेजी शासन के अनुसार संशोधित रूप में भारतीय संविधान के भाग 18 के अंतर्गत शामिल किये गए हैं| वित्तीय आपात · जब देश की वितीय स्थिति गंभीर रूप से अस्थिर हो जाए और देश की वित्तीय साख पर कलंक लगने की आशंका हो तो राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 360 के अंतर्गत पूरे देश में वित्तीय आपातकाल लागू किया जा सकता| · भारत में अभी तक वितीय आपात नहीं लगाया गया है| राष्ट्रपति शासन बनाम राष्ट्रीय आपात राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) · राष्ट्रीय आपात को युद्ध, बाह्य आक्रमण व सशत्र विद्रोह से उत्पन्न आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया जाता है · राष्ट्रीय आपात को समूचे भारत राज्य क्षेत्र अथवा भारत के किसी एक हिस्से में भी लगाया जा सकता है · राष्ट्रीय आपात के लागू होने से राज्य सरकारों पर कोई असर नहीं होता अर्थात सरकारों का विघटन नहीं होता, · राष्ट्रीय आपात लागू होने परकेंद्र एवं राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन निलंबित हो जाता है और एकात्मक सरकार की स्थापना हो जाती है · राष्ट्रीय आपात के दौरान भाग 3 के अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर शेष सभी मौलिक अधिकार निलंबित किये जा सकते हैं · राष्ट्रीय आपात अनिश्चित काल तक के लिए लगाया जा सकता है · इसे संसद के दोनों सदनों द्वाराविशेष बहुमत सेसमर्थन देना आवश्यक होता है(संकल्प पारित करना आवश्यक होता है| · राष्ट्रीय आपात को उद्घोषणा की तिथि से 30 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना अनिवार्य होता है · अनुच्छेद 352A के अनुसार इसे कैबिनेट की सिफारिश पर ही लागू करने की घोषणा कर सकता है · इसके अंतर्गत राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास होता है| राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) · राष्ट्रपति शासन को लागू करने का कोई निश्चित आधार नहीं है| केवल संवैधानिक तंत्र की विफलता का उल्लेख है जिसे उस राज्य के राज्यपाल द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अपने अनुसार परिभाषित करती है · राष्ट्रपति शासन किसी राज्य के सम्पूर्ण क्षेत्र में लागू किया जाता है · इसका प्रमुख उद्देश्य राज्य सरकार को बर्खास्त करना होता है किन्तु सम्बन्धित राज्य की विधानसभा को भंग करना इसका प्रमुख उद्देश्य नहीं होता है, विधानसभा को जीवित निलंबन(Suspended Animation) की अवस्था में रखा जा सकता है · राष्ट्रपति शासन के दौरान किसी भी मौलिक अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है| · राष्ट्रपति शासन को अधिकतम 3 वर्ष के लिए लगाया जा सकता है · इस साधारण बहुमत से संसद स्वीकृत कर सकती है · इसे उद्घोषणा की तिथि से 60 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना चाहिए · इसे लागू करने के लिए कैबिनेट की सिफारिश का कोई उल्लेख नहीं है, इसके लिए केंद्र सरकार की सिफारिश पर्याप्त होती है · इसके अंतर्गत राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद अपने अतिरिक्त किसी अन्य पदाधिकारी जैसे राष्ट्रपति या राज्यपाल को भी दे सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जहाँ राष्ट्रीय आपात, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सन्दर्भ में महत्वपूर्व व्यवस्था है जबकि देश के राज्यों में शासन को संविधान के अनुरूप बनाए रखने में राष्ट्रपति शासन एक संविधान प्रदत्त प्रभावी व्यवस्था है किन्तु दोनों के मध्य विभिन्न आधारों पर महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं|
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##Question:आपातकाल को इसके रूपों के साथ व्याख्यायित कीजिये| इसके साथ ही राष्ट्रीय आपात एवं राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain Emergency with its forms. Along with this, clarify the difference between the national emergency and the President rule. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आपातकाल को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में आपातकाल के रूपों को व्याख्यायित कीजिये 3- दूसरे भाग में राष्ट्रीय आपात एवं राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतर का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जब भी देश पर किसी भी तरह की आंतरिक-बाह्य, आर्थिक या संवैधानिक रूप से संकट आने की संभावना होती है तो देश में आपातकाल लगाया जा सकता है| आपातकाल की स्थिति में केंद्र सरकार के पास अधिक शक्ति आ जाती है| ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को बिना किसी अवरोध के गंभीर फैसले लेने योग्य बनाया जाता है| आपातकाल स्वरुपतः 3 प्रकार का होता है| राष्ट्रीय आपात अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है| इसे जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संविधान सशोधन अधिनियम के द्वारा 1978 के द्वारा संशोधित कर दिया| नवीन व्यवस्था के अनुसार अब अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति में से किसी भी आधार पर या सभी आधार पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है| किन्तु आंतरिक अशांति तभी मानी जायेगीजब सशत्र विद्रोह हो(चाहे वह जनता द्वारा किया जाए या पुलिस अथवा सेना के जवान आदि द्वारा हो)| इस स्थिति में केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र पूरे देश पर स्थापित होता है और राज्य सरकारों को कानून व व्यवस्था के पोषण, सुरक्षा और वित्त सम्बन्धी मामलों में वही करना होता है जो केंद्र सरकार निर्देशित करती है, भारत में इसे अनुच्छेद 352 के अंतर्गत रखा गया है जबकि 358 एवं 359 के अंतर्गत यह अधिकार क्षेत्र परिभाषित किये गए हैं राष्ट्रपति शासन · जब कोई राज्य सरकार संविधान प्रदत्त उपबन्धों के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो केंद्र सरकार उस राज्य सरकार को बर्खास्त कर वहां का शासन सीधे अपने हाथ में ले लेती हैं| भारत में अनुच्छेद 356 के अंतर्गत इसे राष्ट्रपति शासन कहते हैं| · उपरोक्त दोनों प्रकार के आपात काल भारत सरकार अधिनियम 1935 और कनाडा द्वारा अंग्रेजों द्वारा स्थापित अंग्रेजी शासन के अनुसार संशोधित रूप में भारतीय संविधान के भाग 18 के अंतर्गत शामिल किये गए हैं| वित्तीय आपात · जब देश की वितीय स्थिति गंभीर रूप से अस्थिर हो जाए और देश की वित्तीय साख पर कलंक लगने की आशंका हो तो राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 360 के अंतर्गत पूरे देश में वित्तीय आपातकाल लागू किया जा सकता| · भारत में अभी तक वितीय आपात नहीं लगाया गया है| राष्ट्रपति शासन बनाम राष्ट्रीय आपात राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) · राष्ट्रीय आपात को युद्ध, बाह्य आक्रमण व सशत्र विद्रोह से उत्पन्न आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया जाता है · राष्ट्रीय आपात को समूचे भारत राज्य क्षेत्र अथवा भारत के किसी एक हिस्से में भी लगाया जा सकता है · राष्ट्रीय आपात के लागू होने से राज्य सरकारों पर कोई असर नहीं होता अर्थात सरकारों का विघटन नहीं होता, · राष्ट्रीय आपात लागू होने परकेंद्र एवं राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन निलंबित हो जाता है और एकात्मक सरकार की स्थापना हो जाती है · राष्ट्रीय आपात के दौरान भाग 3 के अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर शेष सभी मौलिक अधिकार निलंबित किये जा सकते हैं · राष्ट्रीय आपात अनिश्चित काल तक के लिए लगाया जा सकता है · इसे संसद के दोनों सदनों द्वाराविशेष बहुमत सेसमर्थन देना आवश्यक होता है(संकल्प पारित करना आवश्यक होता है| · राष्ट्रीय आपात को उद्घोषणा की तिथि से 30 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना अनिवार्य होता है · अनुच्छेद 352A के अनुसार इसे कैबिनेट की सिफारिश पर ही लागू करने की घोषणा कर सकता है · इसके अंतर्गत राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास होता है| राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) · राष्ट्रपति शासन को लागू करने का कोई निश्चित आधार नहीं है| केवल संवैधानिक तंत्र की विफलता का उल्लेख है जिसे उस राज्य के राज्यपाल द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अपने अनुसार परिभाषित करती है · राष्ट्रपति शासन किसी राज्य के सम्पूर्ण क्षेत्र में लागू किया जाता है · इसका प्रमुख उद्देश्य राज्य सरकार को बर्खास्त करना होता है किन्तु सम्बन्धित राज्य की विधानसभा को भंग करना इसका प्रमुख उद्देश्य नहीं होता है, विधानसभा को जीवित निलंबन(Suspended Animation) की अवस्था में रखा जा सकता है · राष्ट्रपति शासन के दौरान किसी भी मौलिक अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है| · राष्ट्रपति शासन को अधिकतम 3 वर्ष के लिए लगाया जा सकता है · इस साधारण बहुमत से संसद स्वीकृत कर सकती है · इसे उद्घोषणा की तिथि से 60 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना चाहिए · इसे लागू करने के लिए कैबिनेट की सिफारिश का कोई उल्लेख नहीं है, इसके लिए केंद्र सरकार की सिफारिश पर्याप्त होती है · इसके अंतर्गत राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद अपने अतिरिक्त किसी अन्य पदाधिकारी जैसे राष्ट्रपति या राज्यपाल को भी दे सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जहाँ राष्ट्रीय आपात, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सन्दर्भ में महत्वपूर्व व्यवस्था है जबकि देश के राज्यों में शासन को संविधान के अनुरूप बनाए रखने में राष्ट्रपति शासन एक संविधान प्रदत्त प्रभावी व्यवस्था है किन्तु दोनों के मध्य विभिन्न आधारों पर महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं|
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साम्प्रदायिकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | साथ ही उपयुक्त उदाहरणों द्वारा धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता में अंतर को स्पष्ट कीजिये | (200शब्द) Explain the concept of Communalism. Also explain the difference between Religiousness and Communalism by appropriate examples.
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एप्रोच - भूमिका में साम्रदायिकता की परिभाषा को स्पष्ट कीजिये तथा विभिन्न विचारकों द्वारा इसके सम्बन्ध दिए गए विचार को बताइए | पुनः धार्मिकता और साम्प्रदायिकता में अंतर को सपष्ट कीजिये | साथ में विभिन्न उदाहरणों द्वारा दोनों में अंतर को स्पष्ट करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | उत्तर - मोटे तौर पर साम्प्रदायिकता को धार्मिक अंध भक्ति कहा जाता है | प्रत्येक धार्मिक समूह अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता है | ऐसी कोशिशों के कारण धार्मिक समूहों के बीच घृणा , वैमनस्य व हिंसा की स्थितियां पैदा होती है | इन्हीं स्थितियों को हम समग्र रूप में साम्प्रदायिकता कहते हैं | लेकिन आजकल साम्प्रदायिकता में धार्मिक अंधभक्ति के साथ-साथ राजनीतिक उद्देश्य भी जुड़ गए हैं इसलिए हम यह कह सकते हैं कि साम्प्रदायिकता एक ऐसी संघर्ष मनोवृत्ति है, जिसके अंतर्गत एक विशेष सम्प्रदाय के अनुयायी अपने धार्मिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए अपने समूह को एनी धार्मिक समूहों के विरुद्ध संगठित करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उग्र प्रदर्शनों तथा हिंसा के लिए भड़काते हैं | अतः हम संक्षेप में कह सकते हैं कि - साम्प्रदायिकता = धार्मिक अंधविश्वास + राजनीतिक उद्देश्य साम्प्रदायिकता को परिभषित करते हुए कृष्णदत्त भट्ट ने लिखा है कि -" अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य समुदायों के प्रति उदासीनता , उपेक्षा , हेयदृष्टि, घृणा , विरोध एवं आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है , जिसका आधार वास्तविक अथवा काल्पनिक है कि उक्त सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट करने या हमें जानमाल की क्षति पहुचाने के लिए कटिबद्ध है |" उपरोक्त परिभाषा से साम्प्रदायिकता की निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट हो जाती हैं - साम्प्रदायिकता के मूल में ये भावना रहती है कि मेरा धर्म, मेरा मत , मेरा विशवास सर्वश्रेष्ठ है , इसे सर्वोपरि रहना चाहिए | साम्प्रदायिकता में अन्य धर्मों के प्रति घृणा ,विरोध , संघर्ष की भावना पायी जाती है | साम्प्रदायिकता का आधार यह काल्पनिक या वास्तविक भय है कि अन्य सम्प्रदाय मेरे सम्प्रदाय व संस्कृति को नष्ट कर देंगे | साम्प्रदायिकता अतिवादी प्रकृति की होती है | इसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती है | साम्प्रदायिकता का सम्बन्ध विशिष्ट धार्मिक समूह से या एक ही धर्म के अंतर्गत आने वाले विभिन्न पंथों से हो सकता है | जैसे - हिन्दू -मुस्लिम साम्प्रदायिकता , शिया-सुन्नी , वैष्णव-शैव इत्यादि पंथों के बीच साम्प्रदायिकता | धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता दोनों ही धर्म से जुड़े व्यवहार की ओर इंगित करते हैं , परन्तु धर्म से दोनों का सम्बन्ध बिल्कुल अलग प्रकृति का है | धार्मिकता और साम्प्रदायिकता के मध्य अंतर को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है - किसी धर्म विशेष के नियमों तथा मानदंडों का अंतर्मन से पालन करना तथा उसके आदर्शों को जीवन व्यवहार में लाना धार्मिकता है , वहीँ किसी धर्म विशेष के मानदंडों का पालन करते हुए अन्य समुदायों को निकृष्ट समझना ही साम्प्रदायिकता है | एक विचारधारा के रूप में धार्मिकता अहिंसा, सामूहिक अस्तित्व ,भाईचारा , प्रेम ,करुणा आदि का समर्थन करती है , जबकि विचारधारा के रूप में साम्प्रदायिकता नस्लवाद तथा फासीवाद से मिलती-जुलती है | धार्मिकता विशुद्ध रूप से मूल धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्रेरित होती है , जबकि साम्प्रदायिकता धर्म के बजाय राजनीति से अधिक प्रेरित होती है | धार्मिकता सम्पूर्ण मानव समाज के एकीकरण की बात करती है, वहीँ साम्प्रदायिकता समुदाय विशेष के हित को ही सर्वोपरि मानकर सामाजिक विघटन का कारण बनती है | धार्मिकता की चरम स्थिति सर्वधर्म-संभव , वैश्विक शान्ति , मानव मात्र का कल्याण है , वहीँ साम्प्रदायिकता की चरण परिणति हिंसा , नर-संहार व दंगों के रूप में दिखाई पड़ता है | स्वतंत्र भारत में कई ऐसे धार्मिक मुद्दे रहे हैं , जो धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ते गए | उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि का मुद्दा प्रकृति से तो पूर्णतः धार्मिक नज़र आता है , परन्तु बाबरी विध्वंस के बाद लम्बे समय से दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है |
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##Question:साम्प्रदायिकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | साथ ही उपयुक्त उदाहरणों द्वारा धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता में अंतर को स्पष्ट कीजिये | (200शब्द) Explain the concept of Communalism. Also explain the difference between Religiousness and Communalism by appropriate examples.##Answer:एप्रोच - भूमिका में साम्रदायिकता की परिभाषा को स्पष्ट कीजिये तथा विभिन्न विचारकों द्वारा इसके सम्बन्ध दिए गए विचार को बताइए | पुनः धार्मिकता और साम्प्रदायिकता में अंतर को सपष्ट कीजिये | साथ में विभिन्न उदाहरणों द्वारा दोनों में अंतर को स्पष्ट करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | उत्तर - मोटे तौर पर साम्प्रदायिकता को धार्मिक अंध भक्ति कहा जाता है | प्रत्येक धार्मिक समूह अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता है | ऐसी कोशिशों के कारण धार्मिक समूहों के बीच घृणा , वैमनस्य व हिंसा की स्थितियां पैदा होती है | इन्हीं स्थितियों को हम समग्र रूप में साम्प्रदायिकता कहते हैं | लेकिन आजकल साम्प्रदायिकता में धार्मिक अंधभक्ति के साथ-साथ राजनीतिक उद्देश्य भी जुड़ गए हैं इसलिए हम यह कह सकते हैं कि साम्प्रदायिकता एक ऐसी संघर्ष मनोवृत्ति है, जिसके अंतर्गत एक विशेष सम्प्रदाय के अनुयायी अपने धार्मिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए अपने समूह को एनी धार्मिक समूहों के विरुद्ध संगठित करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उग्र प्रदर्शनों तथा हिंसा के लिए भड़काते हैं | अतः हम संक्षेप में कह सकते हैं कि - साम्प्रदायिकता = धार्मिक अंधविश्वास + राजनीतिक उद्देश्य साम्प्रदायिकता को परिभषित करते हुए कृष्णदत्त भट्ट ने लिखा है कि -" अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य समुदायों के प्रति उदासीनता , उपेक्षा , हेयदृष्टि, घृणा , विरोध एवं आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है , जिसका आधार वास्तविक अथवा काल्पनिक है कि उक्त सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट करने या हमें जानमाल की क्षति पहुचाने के लिए कटिबद्ध है |" उपरोक्त परिभाषा से साम्प्रदायिकता की निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट हो जाती हैं - साम्प्रदायिकता के मूल में ये भावना रहती है कि मेरा धर्म, मेरा मत , मेरा विशवास सर्वश्रेष्ठ है , इसे सर्वोपरि रहना चाहिए | साम्प्रदायिकता में अन्य धर्मों के प्रति घृणा ,विरोध , संघर्ष की भावना पायी जाती है | साम्प्रदायिकता का आधार यह काल्पनिक या वास्तविक भय है कि अन्य सम्प्रदाय मेरे सम्प्रदाय व संस्कृति को नष्ट कर देंगे | साम्प्रदायिकता अतिवादी प्रकृति की होती है | इसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती है | साम्प्रदायिकता का सम्बन्ध विशिष्ट धार्मिक समूह से या एक ही धर्म के अंतर्गत आने वाले विभिन्न पंथों से हो सकता है | जैसे - हिन्दू -मुस्लिम साम्प्रदायिकता , शिया-सुन्नी , वैष्णव-शैव इत्यादि पंथों के बीच साम्प्रदायिकता | धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता दोनों ही धर्म से जुड़े व्यवहार की ओर इंगित करते हैं , परन्तु धर्म से दोनों का सम्बन्ध बिल्कुल अलग प्रकृति का है | धार्मिकता और साम्प्रदायिकता के मध्य अंतर को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है - किसी धर्म विशेष के नियमों तथा मानदंडों का अंतर्मन से पालन करना तथा उसके आदर्शों को जीवन व्यवहार में लाना धार्मिकता है , वहीँ किसी धर्म विशेष के मानदंडों का पालन करते हुए अन्य समुदायों को निकृष्ट समझना ही साम्प्रदायिकता है | एक विचारधारा के रूप में धार्मिकता अहिंसा, सामूहिक अस्तित्व ,भाईचारा , प्रेम ,करुणा आदि का समर्थन करती है , जबकि विचारधारा के रूप में साम्प्रदायिकता नस्लवाद तथा फासीवाद से मिलती-जुलती है | धार्मिकता विशुद्ध रूप से मूल धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्रेरित होती है , जबकि साम्प्रदायिकता धर्म के बजाय राजनीति से अधिक प्रेरित होती है | धार्मिकता सम्पूर्ण मानव समाज के एकीकरण की बात करती है, वहीँ साम्प्रदायिकता समुदाय विशेष के हित को ही सर्वोपरि मानकर सामाजिक विघटन का कारण बनती है | धार्मिकता की चरम स्थिति सर्वधर्म-संभव , वैश्विक शान्ति , मानव मात्र का कल्याण है , वहीँ साम्प्रदायिकता की चरण परिणति हिंसा , नर-संहार व दंगों के रूप में दिखाई पड़ता है | स्वतंत्र भारत में कई ऐसे धार्मिक मुद्दे रहे हैं , जो धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ते गए | उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि का मुद्दा प्रकृति से तो पूर्णतः धार्मिक नज़र आता है , परन्तु बाबरी विध्वंस के बाद लम्बे समय से दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है |
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"शीतयुद्ध दो देशों के मध्य केवल विचारधारा का युद्ध न होकर वर्चस्व का भी युद्ध था । " संगत तर्कों के आधार पर विश्लेषण कीजिये । (150-200 शब्द, 10 अंक ) "Cold War between two countries was not only a war of ideology but also a war of supremacy." Analysis on the basis of relevant arguments. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच :: · भूमिका में शीतयुद्ध की चर्चा कीजिये । · उत्तर के पहले भाग में शीतयुद्ध के संदर्भ में विचारधारा की भूमिका पर चर्चा कीजिये। · उत्तर के दूसरे भाग में शीतयुद्ध को वर्चस्व की लड़ाई होने के पक्ष में तर्क दीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में दोनों कारकों को शामिल करते हुए संतुलित निष्कर्ष दीजिये । उत्तर : शीतयुद्ध एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक अथवा कूटनीतिक युद्ध था जिसके माध्यम से एक गुट , दूसरे गुट के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करने का प्रयास कर रहा था। यह एक ऐसी स्थिति को बताता है, जिसमें न तो शांति थी और न ही वास्तविक युद्ध की स्थिति थी। इसका विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान व बाद के घटनाक्रमों से तेजी से हुआ। शीतयुद्ध में विचारधारा के प्रभाव को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- सोवियत संघ में बोल्शेविक क्रांति के बाद साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई थी , जिसे पूँजीवादी देश अपनी व्यवस्था के विरुद्ध देखते थे। ऐसे में विचारधारा को लेकर टकराव शीतयुद्ध के महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामने आया। साम्यवादी विचारधारा , पूंजीवाद के साथ सह अस्तित्व को नकारता है तथा पूँजीवाद का विकल्प देता है। पारस्परिक अविश्वास के तत्व का बढ़ना जिसमें रूस के द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध से अलग होने तथा पूँजीवादी राष्ट्रों द्वारा लेनिन विरोधी शक्तियों को समर्थन देना शामिल है। द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व ब्रिटेन व फ्रांस की तुष्टिकरण की नीति , द्वितीय मोर्चे के मुद्दे और परमाणु बम की जानकारी सोवियत संघ को न देने ने इसे और गंभीर बनाया। विचारधाराओं के इस युद्ध को कोरिया युद्ध , वियतनाम युद्ध, अरब इजरायल युद्ध में प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों को अमेरिका व सोवियत संघ द्वारा समर्थन के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि उपरोक्त बिन्दुओ के बावजूद शीतयुद्ध को केवल वैचारिक युद्ध न मानकर एक वर्चस्व की लड़ाई के रूप में भी माना जा सकता है और इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है:- 1991 के यूएसएसआर के विघटन के बावजूद अमेरिका रूस विवादचालू रहा, जबकि 1991 के बाद रूस की अर्थव्यवस्था में अमूल चूल परिवर्तन हुए और अब उसने भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को अपना लिया । 1970 के बाद के दशक के बाद चीन अमेरिका संबंधो में निकटता, जबकि चीन खुद ही एक साम्यवादी देश था । अगर ये लड़ाई विचारधारा की होती तो यह सहयोग संभव नही था । ईरान - रूस सहयोग पर अमेरिका से विवाद भी विचारधारा की जगह इसके राजनीतिक वर्चस्व को ही अभिव्यक्त करता है । राजनीतिक वर्चस्व के लिए सैनिक गठबंधनों और आर्थिक संस्थाओं की स्थापना जैसे वारसा पैक्ट ,नाटो , आईएमएफ़ , विश्व बैंक आदि। शीत युद्ध के दौरान सभी चरणो में दोनों गुटों के बीच तनाव देखा गया लेकिन तनाव की तीव्रता एक जैसी नही थी । हथियारो के दौड़ को बढ़ावा , जैसे परमाणु बम , हाइड्रोजन बम आदिका प्रतिस्पर्धी रूप में विकास । दोनों महाशक्तियों के बीच आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रो में प्रतिस्पर्धा जैस- खेल और मनोरजन के क्षेत्र में। अन्तरिक्ष की दुनिया और यूएनओ जैसे संगठन पर भी शीत युद्ध का व्यापक प्रभावदेखा गया । यद्यपि शीतयुद्ध पर प्रमुख प्रभाव विचारधाराओं का देखा जा सकता है किन्तु सोवियत संघ व चीन के मध्य विवाद तथा अमेरिका व चीन का नजदीक आना न केवल इसके वर्चस्ववादी प्रकृति को दर्शाता है बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि शीतयुद्ध बहुकारकीय और बहुआयामी था । साथ ही यह प्रवृति आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ती है । जिसको वर्तमान में वियतनाम – अमेरिका सहयोग , सऊदी अरब – अमेरिका सहयोग आदि के संदर्भ में समझा जा सकता है ।
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##Question:"शीतयुद्ध दो देशों के मध्य केवल विचारधारा का युद्ध न होकर वर्चस्व का भी युद्ध था । " संगत तर्कों के आधार पर विश्लेषण कीजिये । (150-200 शब्द, 10 अंक ) "Cold War between two countries was not only a war of ideology but also a war of supremacy." Analysis on the basis of relevant arguments. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच :: · भूमिका में शीतयुद्ध की चर्चा कीजिये । · उत्तर के पहले भाग में शीतयुद्ध के संदर्भ में विचारधारा की भूमिका पर चर्चा कीजिये। · उत्तर के दूसरे भाग में शीतयुद्ध को वर्चस्व की लड़ाई होने के पक्ष में तर्क दीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में दोनों कारकों को शामिल करते हुए संतुलित निष्कर्ष दीजिये । उत्तर : शीतयुद्ध एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक अथवा कूटनीतिक युद्ध था जिसके माध्यम से एक गुट , दूसरे गुट के प्रभाव क्षेत्र को सीमित करने का प्रयास कर रहा था। यह एक ऐसी स्थिति को बताता है, जिसमें न तो शांति थी और न ही वास्तविक युद्ध की स्थिति थी। इसका विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान व बाद के घटनाक्रमों से तेजी से हुआ। शीतयुद्ध में विचारधारा के प्रभाव को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- सोवियत संघ में बोल्शेविक क्रांति के बाद साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई थी , जिसे पूँजीवादी देश अपनी व्यवस्था के विरुद्ध देखते थे। ऐसे में विचारधारा को लेकर टकराव शीतयुद्ध के महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामने आया। साम्यवादी विचारधारा , पूंजीवाद के साथ सह अस्तित्व को नकारता है तथा पूँजीवाद का विकल्प देता है। पारस्परिक अविश्वास के तत्व का बढ़ना जिसमें रूस के द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध से अलग होने तथा पूँजीवादी राष्ट्रों द्वारा लेनिन विरोधी शक्तियों को समर्थन देना शामिल है। द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व ब्रिटेन व फ्रांस की तुष्टिकरण की नीति , द्वितीय मोर्चे के मुद्दे और परमाणु बम की जानकारी सोवियत संघ को न देने ने इसे और गंभीर बनाया। विचारधाराओं के इस युद्ध को कोरिया युद्ध , वियतनाम युद्ध, अरब इजरायल युद्ध में प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों को अमेरिका व सोवियत संघ द्वारा समर्थन के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि उपरोक्त बिन्दुओ के बावजूद शीतयुद्ध को केवल वैचारिक युद्ध न मानकर एक वर्चस्व की लड़ाई के रूप में भी माना जा सकता है और इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है:- 1991 के यूएसएसआर के विघटन के बावजूद अमेरिका रूस विवादचालू रहा, जबकि 1991 के बाद रूस की अर्थव्यवस्था में अमूल चूल परिवर्तन हुए और अब उसने भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को अपना लिया । 1970 के बाद के दशक के बाद चीन अमेरिका संबंधो में निकटता, जबकि चीन खुद ही एक साम्यवादी देश था । अगर ये लड़ाई विचारधारा की होती तो यह सहयोग संभव नही था । ईरान - रूस सहयोग पर अमेरिका से विवाद भी विचारधारा की जगह इसके राजनीतिक वर्चस्व को ही अभिव्यक्त करता है । राजनीतिक वर्चस्व के लिए सैनिक गठबंधनों और आर्थिक संस्थाओं की स्थापना जैसे वारसा पैक्ट ,नाटो , आईएमएफ़ , विश्व बैंक आदि। शीत युद्ध के दौरान सभी चरणो में दोनों गुटों के बीच तनाव देखा गया लेकिन तनाव की तीव्रता एक जैसी नही थी । हथियारो के दौड़ को बढ़ावा , जैसे परमाणु बम , हाइड्रोजन बम आदिका प्रतिस्पर्धी रूप में विकास । दोनों महाशक्तियों के बीच आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रो में प्रतिस्पर्धा जैस- खेल और मनोरजन के क्षेत्र में। अन्तरिक्ष की दुनिया और यूएनओ जैसे संगठन पर भी शीत युद्ध का व्यापक प्रभावदेखा गया । यद्यपि शीतयुद्ध पर प्रमुख प्रभाव विचारधाराओं का देखा जा सकता है किन्तु सोवियत संघ व चीन के मध्य विवाद तथा अमेरिका व चीन का नजदीक आना न केवल इसके वर्चस्ववादी प्रकृति को दर्शाता है बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि शीतयुद्ध बहुकारकीय और बहुआयामी था । साथ ही यह प्रवृति आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ती है । जिसको वर्तमान में वियतनाम – अमेरिका सहयोग , सऊदी अरब – अमेरिका सहयोग आदि के संदर्भ में समझा जा सकता है ।
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साम्प्रदायिकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | साथ ही उपयुक्त उदाहरणों द्वारा धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता में अंतर को स्पष्ट कीजिये | (150-200शब्द; 10 अंक) Explain the concept of Communalism. Also explain the difference between Religiousness and Communalism by appropriate examples.(150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच - भूमिका में साम्रदायिकता की परिभाषा को स्पष्ट कीजिये तथा विभिन्न विचारकों द्वारा इसके सम्बन्ध दिए गए विचार को बताइए | पुनः धार्मिकता और साम्प्रदायिकता में अंतर को सपष्ट कीजिये | साथ में विभिन्न उदाहरणों द्वारा दोनों में अंतर को स्पष्ट करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | उत्तर - मोटे तौर पर साम्प्रदायिकता को धार्मिक अंध भक्ति कहा जाता है | प्रत्येक धार्मिक समूह अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता है | ऐसी कोशिशों के कारण धार्मिक समूहों के बीच घृणा , वैमनस्य व हिंसा की स्थितियां पैदा होती है | इन्हीं स्थितियों को हम समग्र रूप में साम्प्रदायिकता कहते हैं | लेकिन आजकल साम्प्रदायिकता में धार्मिक अंधभक्ति के साथ-साथ राजनीतिक उद्देश्य भी जुड़ गए हैं इसलिए हम यह कह सकते हैं कि साम्प्रदायिकता एक ऐसी संघर्ष मनोवृत्ति है, जिसके अंतर्गत एक विशेष सम्प्रदाय के अनुयायी अपने धार्मिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए अपने समूह को एनी धार्मिक समूहों के विरुद्ध संगठित करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उग्र प्रदर्शनों तथा हिंसा के लिए भड़काते हैं | अतः हम संक्षेप में कह सकते हैं कि - साम्प्रदायिकता = धार्मिक अंधविश्वास + राजनीतिक उद्देश्य साम्प्रदायिकता को परिभषित करते हुए कृष्णदत्त भट्ट ने लिखा है कि -" अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य समुदायों के प्रति उदासीनता , उपेक्षा , हेयदृष्टि, घृणा , विरोध एवं आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है , जिसका आधार वास्तविक अथवा काल्पनिक है कि उक्त सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट करने या हमें जानमाल की क्षति पहुचाने के लिए कटिबद्ध है |" उपरोक्त परिभाषा से साम्प्रदायिकता की निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट हो जाती हैं - साम्प्रदायिकता के मूल में ये भावना रहती है कि मेरा धर्म, मेरा मत , मेरा विशवास सर्वश्रेष्ठ है , इसे सर्वोपरि रहना चाहिए | साम्प्रदायिकता में अन्य धर्मों के प्रति घृणा ,विरोध , संघर्ष की भावना पायी जाती है | साम्प्रदायिकता का आधार यह काल्पनिक या वास्तविक भय है कि अन्य सम्प्रदाय मेरे सम्प्रदाय व संस्कृति को नष्ट कर देंगे | साम्प्रदायिकता अतिवादी प्रकृति की होती है | इसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती है | साम्प्रदायिकता का सम्बन्ध विशिष्ट धार्मिक समूह से या एक ही धर्म के अंतर्गत आने वाले विभिन्न पंथों से हो सकता है | जैसे - हिन्दू -मुस्लिम साम्प्रदायिकता , शिया-सुन्नी , वैष्णव-शैव इत्यादि पंथों के बीच साम्प्रदायिकता | धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता दोनों ही धर्म से जुड़े व्यवहार की ओर इंगित करते हैं , परन्तु धर्म से दोनों का सम्बन्ध बिल्कुल अलग प्रकृति का है | धार्मिकता और साम्प्रदायिकता के मध्य अंतर को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है - किसी धर्म विशेष के नियमों तथा मानदंडों का अंतर्मन से पालन करना तथा उसके आदर्शों को जीवन व्यवहार में लाना धार्मिकता है , वहीँ किसी धर्म विशेष के मानदंडों का पालन करते हुए अन्य समुदायों को निकृष्ट समझना ही साम्प्रदायिकता है | एक विचारधारा के रूप में धार्मिकता अहिंसा, सामूहिक अस्तित्व ,भाईचारा , प्रेम ,करुणा आदि का समर्थन करती है , जबकि विचारधारा के रूप में साम्प्रदायिकता नस्लवाद तथा फासीवाद से मिलती-जुलती है | धार्मिकता विशुद्ध रूप से मूल धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्रेरित होती है , जबकि साम्प्रदायिकता धर्म के बजाय राजनीति से अधिक प्रेरित होती है | धार्मिकता सम्पूर्ण मानव समाज के एकीकरण की बात करती है, वहीँ साम्प्रदायिकता समुदाय विशेष के हित को ही सर्वोपरि मानकर सामाजिक विघटन का कारण बनती है | धार्मिकता की चरम स्थिति सर्वधर्म-संभव , वैश्विक शान्ति , मानव मात्र का कल्याण है , वहीँ साम्प्रदायिकता की चरण परिणति हिंसा , नर-संहार व दंगों के रूप में दिखाई पड़ता है | स्वतंत्र भारत में कई ऐसे धार्मिक मुद्दे रहे हैं , जो धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ते गए | उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि का मुद्दा प्रकृति से तो पूर्णतः धार्मिक नज़र आता है , परन्तु बाबरी विध्वंस के बाद लम्बे समय से दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है |
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##Question:साम्प्रदायिकता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | साथ ही उपयुक्त उदाहरणों द्वारा धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता में अंतर को स्पष्ट कीजिये | (150-200शब्द; 10 अंक) Explain the concept of Communalism. Also explain the difference between Religiousness and Communalism by appropriate examples.(150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में साम्रदायिकता की परिभाषा को स्पष्ट कीजिये तथा विभिन्न विचारकों द्वारा इसके सम्बन्ध दिए गए विचार को बताइए | पुनः धार्मिकता और साम्प्रदायिकता में अंतर को सपष्ट कीजिये | साथ में विभिन्न उदाहरणों द्वारा दोनों में अंतर को स्पष्ट करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | उत्तर - मोटे तौर पर साम्प्रदायिकता को धार्मिक अंध भक्ति कहा जाता है | प्रत्येक धार्मिक समूह अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे धर्म पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता है | ऐसी कोशिशों के कारण धार्मिक समूहों के बीच घृणा , वैमनस्य व हिंसा की स्थितियां पैदा होती है | इन्हीं स्थितियों को हम समग्र रूप में साम्प्रदायिकता कहते हैं | लेकिन आजकल साम्प्रदायिकता में धार्मिक अंधभक्ति के साथ-साथ राजनीतिक उद्देश्य भी जुड़ गए हैं इसलिए हम यह कह सकते हैं कि साम्प्रदायिकता एक ऐसी संघर्ष मनोवृत्ति है, जिसके अंतर्गत एक विशेष सम्प्रदाय के अनुयायी अपने धार्मिक और राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए अपने समूह को एनी धार्मिक समूहों के विरुद्ध संगठित करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उग्र प्रदर्शनों तथा हिंसा के लिए भड़काते हैं | अतः हम संक्षेप में कह सकते हैं कि - साम्प्रदायिकता = धार्मिक अंधविश्वास + राजनीतिक उद्देश्य साम्प्रदायिकता को परिभषित करते हुए कृष्णदत्त भट्ट ने लिखा है कि -" अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य समुदायों के प्रति उदासीनता , उपेक्षा , हेयदृष्टि, घृणा , विरोध एवं आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है , जिसका आधार वास्तविक अथवा काल्पनिक है कि उक्त सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट करने या हमें जानमाल की क्षति पहुचाने के लिए कटिबद्ध है |" उपरोक्त परिभाषा से साम्प्रदायिकता की निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट हो जाती हैं - साम्प्रदायिकता के मूल में ये भावना रहती है कि मेरा धर्म, मेरा मत , मेरा विशवास सर्वश्रेष्ठ है , इसे सर्वोपरि रहना चाहिए | साम्प्रदायिकता में अन्य धर्मों के प्रति घृणा ,विरोध , संघर्ष की भावना पायी जाती है | साम्प्रदायिकता का आधार यह काल्पनिक या वास्तविक भय है कि अन्य सम्प्रदाय मेरे सम्प्रदाय व संस्कृति को नष्ट कर देंगे | साम्प्रदायिकता अतिवादी प्रकृति की होती है | इसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती है | साम्प्रदायिकता का सम्बन्ध विशिष्ट धार्मिक समूह से या एक ही धर्म के अंतर्गत आने वाले विभिन्न पंथों से हो सकता है | जैसे - हिन्दू -मुस्लिम साम्प्रदायिकता , शिया-सुन्नी , वैष्णव-शैव इत्यादि पंथों के बीच साम्प्रदायिकता | धार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता दोनों ही धर्म से जुड़े व्यवहार की ओर इंगित करते हैं , परन्तु धर्म से दोनों का सम्बन्ध बिल्कुल अलग प्रकृति का है | धार्मिकता और साम्प्रदायिकता के मध्य अंतर को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है - किसी धर्म विशेष के नियमों तथा मानदंडों का अंतर्मन से पालन करना तथा उसके आदर्शों को जीवन व्यवहार में लाना धार्मिकता है , वहीँ किसी धर्म विशेष के मानदंडों का पालन करते हुए अन्य समुदायों को निकृष्ट समझना ही साम्प्रदायिकता है | एक विचारधारा के रूप में धार्मिकता अहिंसा, सामूहिक अस्तित्व ,भाईचारा , प्रेम ,करुणा आदि का समर्थन करती है , जबकि विचारधारा के रूप में साम्प्रदायिकता नस्लवाद तथा फासीवाद से मिलती-जुलती है | धार्मिकता विशुद्ध रूप से मूल धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्रेरित होती है , जबकि साम्प्रदायिकता धर्म के बजाय राजनीति से अधिक प्रेरित होती है | धार्मिकता सम्पूर्ण मानव समाज के एकीकरण की बात करती है, वहीँ साम्प्रदायिकता समुदाय विशेष के हित को ही सर्वोपरि मानकर सामाजिक विघटन का कारण बनती है | धार्मिकता की चरम स्थिति सर्वधर्म-संभव , वैश्विक शान्ति , मानव मात्र का कल्याण है , वहीँ साम्प्रदायिकता की चरण परिणति हिंसा , नर-संहार व दंगों के रूप में दिखाई पड़ता है | स्वतंत्र भारत में कई ऐसे धार्मिक मुद्दे रहे हैं , जो धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ते गए | उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि का मुद्दा प्रकृति से तो पूर्णतः धार्मिक नज़र आता है , परन्तु बाबरी विध्वंस के बाद लम्बे समय से दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है |
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वायुदाब पेटियों की व्याख्या कीजिए तथा इसके स्थानान्तरण के परिणामों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain pressure belts and describe the consequences of its shifting. (150-200 words/ 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: वायुदाब पेटियों का संक्षिप्त विवरण देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। विभिन्न वायुदाब पेटियों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए। वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण को स्पष्ट करते हुए इसके परिणामों को लिखिए। भूतल पर पायी जाने वाली वायुदाब व्यवस्था को उत्पन्न करने वाले कारकों को स्थूल रूप से दो वर्गों में विभाजित किया जाता है: तापीय कारक एवं गत्यात्मक कारक। धरातल पर इन कारकों द्वारा विभिन्न उच्च एवं निम्न वायुदाब पेटियों का निर्माण होता है। ये वायुदाब पेटियाँ निम्न हैं: भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी: भूमध्य रेखा के दोनों ओर 10 डिग्री उत्तर और दक्षिण अक्षांशों के मध्य स्थित है। सूर्यताप की अधिक मात्र के कारण धरातल गरम रहता है। इसे तापजन्य निम्नवायुदाब पेटी भी कहते हैं। उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी: दोनों गोलार्धों में 23.5 से 35 डिग्री अक्षांशों के मध्य उच्च वायुदाब पेटियाँ पायी जाती हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण निम्न वायुदाब क्षेत्रों से आरोहित वायु इन क्षेत्रों में अवतलित होती हैं। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी: इसका विस्तार दोनों गोलार्धों में 45 से 66.5 डिग्री अक्षांशों के बीच पाया जाता है। उपोष्ण और ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्रों से आने वाली पवने इस पेटी में अभिसारित होकर ऊपर की ओर आरोहित होती हैं। इस कारण यह निम्न वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है। ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी: निम्न ताप के कारण वायु में संकुचन होता है एवं उसका घनत्व बढ़ जाता है। अतः यहाँ वर्ष भर उच्च वायुदाब पाया जाता है। उच्च वायुदाब उत्तरी ध्रुव महासागर की तुलना में अंटार्कटिक महाद्वीप के स्थलीय क्षेत्र पर अधिक स्पष्ट होता है। गौरतलब है कि वायुदाब पेटियों में स्थायित्व नहीं होता है। पृथ्वी की वार्षिक गति के कारण इसकी सूर्य से संबन्धित स्थिति में परिवर्तन होता रहता है। 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत होता है इस स्थिति में सभी वायुदाब पेटियाँ उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाती हैं। इसी प्रकार 22 दिसम्बर ये पेटियाँ दक्षिण दिशा में स्थानांतरित हो जाती है। इस तरह ऋतु परिवर्तन के साथ वायु पेटियों में स्थानांतरण होता रहता है। जिसका प्रभाव इस प्रकार होता है: पवनों की उद्गम स्थल तथा गंतव्य स्थान में ऋतुवत परिवर्तन होता है। मानसून से संबन्धित कालिक पवनों का निर्माण होता है। अनुकूल मौसमी दशाओं के कारण वर्षा का वितरण सुनिश्चित करना। भूमध्य सागरीय तथा चीनी प्रकार की जलवायु क्षेत्र का निर्माण वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण के कारण ही होता है। वताग्र तथा जेट धारा की अवस्थिति में परिवर्तन होता है। इसके कारण ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ वर्षा की कुछ मात्र अवश्य प्राप्त होती है। भारत में दक्षिणी पश्चिमी मानसून के आने के साथ ही पश्चिमी जेट धाराओं का वापस लौटना और पूर्वी जेट धाराओं का प्रभाव इसका एक उदाहरण है।
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##Question:वायुदाब पेटियों की व्याख्या कीजिए तथा इसके स्थानान्तरण के परिणामों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain pressure belts and describe the consequences of its shifting. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: वायुदाब पेटियों का संक्षिप्त विवरण देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। विभिन्न वायुदाब पेटियों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए। वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण को स्पष्ट करते हुए इसके परिणामों को लिखिए। भूतल पर पायी जाने वाली वायुदाब व्यवस्था को उत्पन्न करने वाले कारकों को स्थूल रूप से दो वर्गों में विभाजित किया जाता है: तापीय कारक एवं गत्यात्मक कारक। धरातल पर इन कारकों द्वारा विभिन्न उच्च एवं निम्न वायुदाब पेटियों का निर्माण होता है। ये वायुदाब पेटियाँ निम्न हैं: भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी: भूमध्य रेखा के दोनों ओर 10 डिग्री उत्तर और दक्षिण अक्षांशों के मध्य स्थित है। सूर्यताप की अधिक मात्र के कारण धरातल गरम रहता है। इसे तापजन्य निम्नवायुदाब पेटी भी कहते हैं। उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी: दोनों गोलार्धों में 23.5 से 35 डिग्री अक्षांशों के मध्य उच्च वायुदाब पेटियाँ पायी जाती हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण निम्न वायुदाब क्षेत्रों से आरोहित वायु इन क्षेत्रों में अवतलित होती हैं। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी: इसका विस्तार दोनों गोलार्धों में 45 से 66.5 डिग्री अक्षांशों के बीच पाया जाता है। उपोष्ण और ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्रों से आने वाली पवने इस पेटी में अभिसारित होकर ऊपर की ओर आरोहित होती हैं। इस कारण यह निम्न वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है। ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी: निम्न ताप के कारण वायु में संकुचन होता है एवं उसका घनत्व बढ़ जाता है। अतः यहाँ वर्ष भर उच्च वायुदाब पाया जाता है। उच्च वायुदाब उत्तरी ध्रुव महासागर की तुलना में अंटार्कटिक महाद्वीप के स्थलीय क्षेत्र पर अधिक स्पष्ट होता है। गौरतलब है कि वायुदाब पेटियों में स्थायित्व नहीं होता है। पृथ्वी की वार्षिक गति के कारण इसकी सूर्य से संबन्धित स्थिति में परिवर्तन होता रहता है। 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत होता है इस स्थिति में सभी वायुदाब पेटियाँ उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाती हैं। इसी प्रकार 22 दिसम्बर ये पेटियाँ दक्षिण दिशा में स्थानांतरित हो जाती है। इस तरह ऋतु परिवर्तन के साथ वायु पेटियों में स्थानांतरण होता रहता है। जिसका प्रभाव इस प्रकार होता है: पवनों की उद्गम स्थल तथा गंतव्य स्थान में ऋतुवत परिवर्तन होता है। मानसून से संबन्धित कालिक पवनों का निर्माण होता है। अनुकूल मौसमी दशाओं के कारण वर्षा का वितरण सुनिश्चित करना। भूमध्य सागरीय तथा चीनी प्रकार की जलवायु क्षेत्र का निर्माण वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण के कारण ही होता है। वताग्र तथा जेट धारा की अवस्थिति में परिवर्तन होता है। इसके कारण ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ वर्षा की कुछ मात्र अवश्य प्राप्त होती है। भारत में दक्षिणी पश्चिमी मानसून के आने के साथ ही पश्चिमी जेट धाराओं का वापस लौटना और पूर्वी जेट धाराओं का प्रभाव इसका एक उदाहरण है।
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भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के आधारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 के विवादास्पद प्रावधानों को तर्कसंगत रूप से समझाइये। (200 शब्द ) Briefly describe the bases for obtaining Indian citizenship. Simultaneously, explain the controversial provisions of the Citizenship Amendment Act 2016. (200 words)
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एप्रोच :- नागरिकता से सम्बंधित ,संविधान के भाग 2 को बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के आधारों को लिखिए। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 के विवादास्पद प्रावधान को बताइये। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 में नागरिकता सम्बन्धी उपबंधों का जिक्र किया गया है. नागरिकता एक संवैधानिक व राजनीतिक संकल्पना है , जिसका किसी मातृभूमि के साथ राजनीतिक और संवैधानिक संबंध होता है इन दोनों के अभाव में उसे शरणार्थी मान लिया जाता है। हालाँकि अगर वह किसी देश का नागरिक नहीं है तो दूसरे देश में उसे राज्यविहीन माना जायेगा तथा शरणार्थी का संरक्षण नहीं मिलेगा। संविधाननिर्माताओं के अनुसार भारत में स्थायी निवास करने वाला व्यक्ति , जो भारतीय संविधान और भारत के राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों में आस्था रखता है , नागरिक माना जायेगा।सर्वोच्च न्यायालय ने केदार पांडेय वाद 1966 में यह स्पष्ट किया कि भारत में 2 ही तरह के लोग नागरिक माने जायेंगे।एक जिनका पैतृक अधिवास भारत में है. दूसरे वे जो भारत में कहीं बसने की इच्छा से घर बनाते है और वहीँ रहते है। 5 प्रकार से भारत का नागरिक - जन्म से - कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाता है, यदि उसके माता-पिता भारत के नागरिक हों अथवा यदि एक अभिभावक भारतीय हो और दूसरा अभिभावक उसके जन्म के समय पर गैर कानूनी अप्रवासी न हो, तो वह भारत का नागरिकहो सकता है वंश से -यदि किसी व्यक्ति का जन्म देश के बहार हुआ हो तो उसे वंशानुक्रम के आधार पर भारत की नागरिकता प्राप्त होगी , परंतु शर्त यह होगी कि उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो। उस बच्चे का पंजीकरण भारतीय दूतावास में 1 वर्ष के भीतर करना अनिवार्य है । यदि वह ऐसा नहीं करता उसे अलग से भारतीय सरकार से अनुमति लेनी होगी । पंजीकरण से - भारत सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को जोअवैध प्रवासी ना होको भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने पर नागरिकता दे सकती है इसकी निम्न विधियाँ है — भारतीय मूल के किसी व्यक्ति से विवाह करने पर और आवेदन से पूर्व जो व्यक्ति भारत में 7 वर्ष तक रहा हो , उसे आवेदन करने पर भारतीय नागरिकता दी जा सकती है ऐसे व्यक्ति जो भारतीय मूल के है पर स्वयं भारतीय नागरिक नहीं , उन्हें भारतीय नागरिक के आवेदन से पूर्व 7 वर्ष तक भारत में रहना अनिवार्य है। उन व्यक्तियों के अवयस्क बच्चे जो भारत के नागरिक हैं देशीयकरण- विदेशी नागरिकों द्वारा कुछ शर्तों जैसे अपने देश की नागरिकता का परित्याग कर देना , भारत की किसी प्रादेशिक भाषा का जानकार होना आदि अन्य शर्तों का पालनकरके भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकता है। अधिग्रहण से -यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे – हैदराबाद , जूनागढ़ और 1961 ई0 में गोवा को , 1962 ई0 में पांडिचेरी भारत में शामिल किए जाने पर वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गई। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 :- अफगानिस्तान ,पाकिस्तान व बांग्लादेश में जिन अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जाता है और यदि वे इस प्रताड़ना से बचनेके लिए भाग कर भारत आते है तो उन्हें भारत में 6 वर्ष के निवास के बादउनके आवेदन देने के 12 माह बाद भारत नागरिकता दे दी जायेगी। जबकिदेशीयकरण के लिए भारत में 14 वर्षों के दौरान ,12 वर्ष का निवास अनिवार्य है और नागरिकता के आवेदन करने से पूर्व भारत में 12 महीने पहले रहना अनिवार्य है , जिसे उपरोक्त विधेयक में काफी रियायत के साथ शामिल करने का प्रावधान है. इन अल्पसंखयकों में हिन्दू ,बौद्ध , जैन , सिख , ईसाई , पारसी को रखा गया है , जबकि बलूच , अहमदिया ,पश्तूनी ,यहूदी आदि भी इन देशों में अल्पसंख्यक है और उनकों भी प्रताड़ित किया जाता है। किन्तु प्रस्तावित विधेयक में उनका उल्लेख नहीं है विरोधी दलों का कहना है कि इसी तरह की व्यवस्था , नेपाल ,श्रीलंका और म्यांमार में धार्मिक प्रताड़ना के शिकार उन अल्पसंख्यकों के लिए भी की जाये जो इस प्रताड़ना से बचने के लिए भारत आते है। अत : इसी कारणों से यह विधेयक विवादास्पद हो गया है और राज्यसभा में पारित नहीं हो सका है। सरकार के लिए महत्वपूर्ण है कि वह वृहत्तर दृष्टिकोण के साथ वह अपने पडोसी देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकोंके साथसमान स्तर पर व्यवहार करे. यह भारत की संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम की नीति को समेटे हुए होना चाहिए।
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##Question:भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के आधारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 के विवादास्पद प्रावधानों को तर्कसंगत रूप से समझाइये। (200 शब्द ) Briefly describe the bases for obtaining Indian citizenship. Simultaneously, explain the controversial provisions of the Citizenship Amendment Act 2016. (200 words)##Answer:एप्रोच :- नागरिकता से सम्बंधित ,संविधान के भाग 2 को बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के आधारों को लिखिए। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 के विवादास्पद प्रावधान को बताइये। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 में नागरिकता सम्बन्धी उपबंधों का जिक्र किया गया है. नागरिकता एक संवैधानिक व राजनीतिक संकल्पना है , जिसका किसी मातृभूमि के साथ राजनीतिक और संवैधानिक संबंध होता है इन दोनों के अभाव में उसे शरणार्थी मान लिया जाता है। हालाँकि अगर वह किसी देश का नागरिक नहीं है तो दूसरे देश में उसे राज्यविहीन माना जायेगा तथा शरणार्थी का संरक्षण नहीं मिलेगा। संविधाननिर्माताओं के अनुसार भारत में स्थायी निवास करने वाला व्यक्ति , जो भारतीय संविधान और भारत के राष्ट्रीय गौरव के प्रतीकों में आस्था रखता है , नागरिक माना जायेगा।सर्वोच्च न्यायालय ने केदार पांडेय वाद 1966 में यह स्पष्ट किया कि भारत में 2 ही तरह के लोग नागरिक माने जायेंगे।एक जिनका पैतृक अधिवास भारत में है. दूसरे वे जो भारत में कहीं बसने की इच्छा से घर बनाते है और वहीँ रहते है। 5 प्रकार से भारत का नागरिक - जन्म से - कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाता है, यदि उसके माता-पिता भारत के नागरिक हों अथवा यदि एक अभिभावक भारतीय हो और दूसरा अभिभावक उसके जन्म के समय पर गैर कानूनी अप्रवासी न हो, तो वह भारत का नागरिकहो सकता है वंश से -यदि किसी व्यक्ति का जन्म देश के बहार हुआ हो तो उसे वंशानुक्रम के आधार पर भारत की नागरिकता प्राप्त होगी , परंतु शर्त यह होगी कि उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो। उस बच्चे का पंजीकरण भारतीय दूतावास में 1 वर्ष के भीतर करना अनिवार्य है । यदि वह ऐसा नहीं करता उसे अलग से भारतीय सरकार से अनुमति लेनी होगी । पंजीकरण से - भारत सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को जोअवैध प्रवासी ना होको भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने पर नागरिकता दे सकती है इसकी निम्न विधियाँ है — भारतीय मूल के किसी व्यक्ति से विवाह करने पर और आवेदन से पूर्व जो व्यक्ति भारत में 7 वर्ष तक रहा हो , उसे आवेदन करने पर भारतीय नागरिकता दी जा सकती है ऐसे व्यक्ति जो भारतीय मूल के है पर स्वयं भारतीय नागरिक नहीं , उन्हें भारतीय नागरिक के आवेदन से पूर्व 7 वर्ष तक भारत में रहना अनिवार्य है। उन व्यक्तियों के अवयस्क बच्चे जो भारत के नागरिक हैं देशीयकरण- विदेशी नागरिकों द्वारा कुछ शर्तों जैसे अपने देश की नागरिकता का परित्याग कर देना , भारत की किसी प्रादेशिक भाषा का जानकार होना आदि अन्य शर्तों का पालनकरके भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकता है। अधिग्रहण से -यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे – हैदराबाद , जूनागढ़ और 1961 ई0 में गोवा को , 1962 ई0 में पांडिचेरी भारत में शामिल किए जाने पर वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गई। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 :- अफगानिस्तान ,पाकिस्तान व बांग्लादेश में जिन अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जाता है और यदि वे इस प्रताड़ना से बचनेके लिए भाग कर भारत आते है तो उन्हें भारत में 6 वर्ष के निवास के बादउनके आवेदन देने के 12 माह बाद भारत नागरिकता दे दी जायेगी। जबकिदेशीयकरण के लिए भारत में 14 वर्षों के दौरान ,12 वर्ष का निवास अनिवार्य है और नागरिकता के आवेदन करने से पूर्व भारत में 12 महीने पहले रहना अनिवार्य है , जिसे उपरोक्त विधेयक में काफी रियायत के साथ शामिल करने का प्रावधान है. इन अल्पसंखयकों में हिन्दू ,बौद्ध , जैन , सिख , ईसाई , पारसी को रखा गया है , जबकि बलूच , अहमदिया ,पश्तूनी ,यहूदी आदि भी इन देशों में अल्पसंख्यक है और उनकों भी प्रताड़ित किया जाता है। किन्तु प्रस्तावित विधेयक में उनका उल्लेख नहीं है विरोधी दलों का कहना है कि इसी तरह की व्यवस्था , नेपाल ,श्रीलंका और म्यांमार में धार्मिक प्रताड़ना के शिकार उन अल्पसंख्यकों के लिए भी की जाये जो इस प्रताड़ना से बचने के लिए भारत आते है। अत : इसी कारणों से यह विधेयक विवादास्पद हो गया है और राज्यसभा में पारित नहीं हो सका है। सरकार के लिए महत्वपूर्ण है कि वह वृहत्तर दृष्टिकोण के साथ वह अपने पडोसी देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकोंके साथसमान स्तर पर व्यवहार करे. यह भारत की संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम की नीति को समेटे हुए होना चाहिए।
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द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। साथ ही1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 से 200 शब्द) Mention the reasons that laid the background of the Cold War, after World War II. Also discuss the factors that reduce the stress of Cold War after 1953. (10 Marks, 150 to 200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में शीत युद्ध का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। इसके बाद,1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- 1945-1991 केकाल के दौरानअमेरिका तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में विचारधारा एवं नेतृत्व को लेकरराजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में टकराव एवं प्रतिस्पर्धा के रूप में शीत युद्ध को परिभाषित किया जा सकता है। रूस के नेतृत्व में साम्यवादी और अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवादी देश दो खेमों में बंट गए थे। इन दोनों गुटों में आपसी प्रत्यक्ष युद्ध कभी नहीं हुआ लेकिन संघर्ष एवं तनाव की स्थिति बनी रही। शीत युद्ध के लक्षण दूसरे विश्व युद्ध के प्रारंभ से ही दिखने लगे थे। दोनों महाशक्तियां अपने अपने संकीर्ण स्वार्थों को लेकर युद्ध लड़ रही थी। रूस एवं अमेरिका के पारस्परिक मतभेदों ने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की जिन्हे निम्नलिखत कारणों से समझा जा सकता है- याल्टा सम्मेलन- सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना। पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा को लेकर टकराव की स्थिति। परस्पर अविश्वास- 1939 पूर्व(प्रथम विश्वयुद्ध से साम्यवादी रूस का अलग होना, फासीवादी शक्तियों के तुष्टीकरण से रूस में संदेह आदि) तथा 1939-45(जर्मनी-रूस अनाक्रमण समझौता, पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ की मजबूत स्थिति,हिटलर के रूस आक्रमण के समय द्वितीय फ्रंट का ना खोलना आदि) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियां ।1945 एवं 1946 की परिस्थितियों नेशीत युद्ध को सतह पर उभारने का कार्य किया जैसे स्टालिन एवं चर्चिल के कथन,1947 में ट्रूमैन डॉक्ट्रिन इत्यादि। पोटसडम सम्मेलन- पोलैंड तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में चुनाव को लेकर साम्यवादी रूस से तनाव बढ़ना। अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने की घटना को रूस द्वारा अपने विरुद्ध माना जाना। 1946 के दौरानपूर्वी यूरोपीय देशों पर सोवियत संघ द्वारा पकड़ मजबूत करना, साथ ही यूनान एवं तुर्की में भी साम्यवाद एवं लोकतांत्रिक शक्तियों में संघर्ष। 1948-49 में बर्लिन नाकेबंदी के साथ शीत युद्ध को लेकर जो भी संशय था वह छंट गया और यह स्पष्ट हो गया की दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर गई है। 1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारक:- 1953-1962 का दूसराचरण:- इसचरण को शीत युगीन तनावों को कम करने और तनाव को बढ़ानेदोनों ही दृष्टिकोण से जाना जाता है- तनाव को कम करने में कुछ कारकों की भूमिका थी जैसे 1953 में स्टालिन की मृत्यु तथा ख़्रुश्चेव के द्वारा पूंजीवादी देशों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात करना। अमेरिका ने सिनेटर मैकार्थी को साम्यवादी विरोधी नीतियों के लिए जाना जाता था, इसका भी अमेरिकी राजनीती पर प्रभाव कम हुआ। दोनों ही गुट युद्ध के विनाशक स्वरूप को समझ रहे थे और आर्थिक दबाव भी महशूस कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में तनाव को कम करने के कुछ कदम उठाये गए जैसे- USSR के द्वारा फ़िनलैंड से सैनिक अड्डों को हटाना, UNO में 16 राष्ट्रों के प्रवेश पर से वीटो को हटाना,ऑस्ट्रिया के एकीकरण पर इन शर्तों के साथ सहमत होना कि जर्मनी में उसका विलय नहीं होगा। 1953 में कोरिया के मुद्दे पर समझौता,1954 में वियतनाम के मुद्दे पर समझौता इत्यादि। हालाँकि इस चरण में कुछतनाव बढ़ाने वाले उदाहरण भी थे जैसे,1955 में वार्सा पैक्ट पर समझौता, 1961 में बर्लिन दीवार का निर्माण, 1962 में क्यूबा मिशाइल संकट इत्यादि। 1963-1969 का तीसरा चरण: (तनाव शैथिल्य):- अमेरिका और USSR के बीच हॉटलाइन की स्थापना। 1963 में PTBT की स्थापना। 1967 में नाभिकीय बमके प्रसार को रोकने तथा नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को लेकर एनपीटी हुई। 1972 में अमेरिका एवं USSR के बीच SALT-1 नामक समझौता हुआ। पहली बार शस्त्रों की संख्या को सीमित करने के लिए दोनों महशक्तियों में सहमति बनी। 1975 में हेलसिंकी सम्मेलन हुआ। यूरोपीय देशों की सीमाओं को बनाये रखने पर सहमति हुई। और साम्यवादी देशों में मानवाधिकारों के सम्मान पर सहमति बनी। इसी वर्ष वियतनाम में गृहयुद्ध समाप्त हुआ। 1970 के दशक में अमेरिका एवं चीन के संबंधों में उत्तरोत्तर सुधार हुआ। हालाँकि इस चरण में भी तनाव को बढ़ाने वाली कुछ घटनाएं हुई जैसे वियतनाम गृहयुद्ध, अरब- इजरायल युद्ध, भारत- बांग्लादेश युद्ध इत्यादि। 1979-1991 काचौथा चरण:- 1987-INF संधि:-पहली बार शस्त्रों की संख्या में कटौती को लेकर समझौता हुआ। 1988 में USSR ने अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलाया तथा पूर्वी यूरोप में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया। 1989 में बर्लिन की दीवार तोड़ दी गई और 1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ। वार्सा पैक्ट को समाप्त कर दिया गया दिसंबर 1991 में USSR के विघटन के साथ एक गुट का अंत हो गया।1945-1991 के काल को शीत युद्ध का काल कहते हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में 1945 से पूर्व तथा 1991 के पश्चात भी शीत युद्ध जैसी विशेषताएं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में देखी जा सकती हैं।
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##Question:द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। साथ ही1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 से 200 शब्द) Mention the reasons that laid the background of the Cold War, after World War II. Also discuss the factors that reduce the stress of Cold War after 1953. (10 Marks, 150 to 200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में शीत युद्ध का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। इसके बाद,1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- 1945-1991 केकाल के दौरानअमेरिका तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में विचारधारा एवं नेतृत्व को लेकरराजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में टकराव एवं प्रतिस्पर्धा के रूप में शीत युद्ध को परिभाषित किया जा सकता है। रूस के नेतृत्व में साम्यवादी और अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवादी देश दो खेमों में बंट गए थे। इन दोनों गुटों में आपसी प्रत्यक्ष युद्ध कभी नहीं हुआ लेकिन संघर्ष एवं तनाव की स्थिति बनी रही। शीत युद्ध के लक्षण दूसरे विश्व युद्ध के प्रारंभ से ही दिखने लगे थे। दोनों महाशक्तियां अपने अपने संकीर्ण स्वार्थों को लेकर युद्ध लड़ रही थी। रूस एवं अमेरिका के पारस्परिक मतभेदों ने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की जिन्हे निम्नलिखत कारणों से समझा जा सकता है- याल्टा सम्मेलन- सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना। पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा को लेकर टकराव की स्थिति। परस्पर अविश्वास- 1939 पूर्व(प्रथम विश्वयुद्ध से साम्यवादी रूस का अलग होना, फासीवादी शक्तियों के तुष्टीकरण से रूस में संदेह आदि) तथा 1939-45(जर्मनी-रूस अनाक्रमण समझौता, पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ की मजबूत स्थिति,हिटलर के रूस आक्रमण के समय द्वितीय फ्रंट का ना खोलना आदि) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियां ।1945 एवं 1946 की परिस्थितियों नेशीत युद्ध को सतह पर उभारने का कार्य किया जैसे स्टालिन एवं चर्चिल के कथन,1947 में ट्रूमैन डॉक्ट्रिन इत्यादि। पोटसडम सम्मेलन- पोलैंड तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में चुनाव को लेकर साम्यवादी रूस से तनाव बढ़ना। अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने की घटना को रूस द्वारा अपने विरुद्ध माना जाना। 1946 के दौरानपूर्वी यूरोपीय देशों पर सोवियत संघ द्वारा पकड़ मजबूत करना, साथ ही यूनान एवं तुर्की में भी साम्यवाद एवं लोकतांत्रिक शक्तियों में संघर्ष। 1948-49 में बर्लिन नाकेबंदी के साथ शीत युद्ध को लेकर जो भी संशय था वह छंट गया और यह स्पष्ट हो गया की दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर गई है। 1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारक:- 1953-1962 का दूसराचरण:- इसचरण को शीत युगीन तनावों को कम करने और तनाव को बढ़ानेदोनों ही दृष्टिकोण से जाना जाता है- तनाव को कम करने में कुछ कारकों की भूमिका थी जैसे 1953 में स्टालिन की मृत्यु तथा ख़्रुश्चेव के द्वारा पूंजीवादी देशों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात करना। अमेरिका ने सिनेटर मैकार्थी को साम्यवादी विरोधी नीतियों के लिए जाना जाता था, इसका भी अमेरिकी राजनीती पर प्रभाव कम हुआ। दोनों ही गुट युद्ध के विनाशक स्वरूप को समझ रहे थे और आर्थिक दबाव भी महशूस कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में तनाव को कम करने के कुछ कदम उठाये गए जैसे- USSR के द्वारा फ़िनलैंड से सैनिक अड्डों को हटाना, UNO में 16 राष्ट्रों के प्रवेश पर से वीटो को हटाना,ऑस्ट्रिया के एकीकरण पर इन शर्तों के साथ सहमत होना कि जर्मनी में उसका विलय नहीं होगा। 1953 में कोरिया के मुद्दे पर समझौता,1954 में वियतनाम के मुद्दे पर समझौता इत्यादि। हालाँकि इस चरण में कुछतनाव बढ़ाने वाले उदाहरण भी थे जैसे,1955 में वार्सा पैक्ट पर समझौता, 1961 में बर्लिन दीवार का निर्माण, 1962 में क्यूबा मिशाइल संकट इत्यादि। 1963-1969 का तीसरा चरण: (तनाव शैथिल्य):- अमेरिका और USSR के बीच हॉटलाइन की स्थापना। 1963 में PTBT की स्थापना। 1967 में नाभिकीय बमके प्रसार को रोकने तथा नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को लेकर एनपीटी हुई। 1972 में अमेरिका एवं USSR के बीच SALT-1 नामक समझौता हुआ। पहली बार शस्त्रों की संख्या को सीमित करने के लिए दोनों महशक्तियों में सहमति बनी। 1975 में हेलसिंकी सम्मेलन हुआ। यूरोपीय देशों की सीमाओं को बनाये रखने पर सहमति हुई। और साम्यवादी देशों में मानवाधिकारों के सम्मान पर सहमति बनी। इसी वर्ष वियतनाम में गृहयुद्ध समाप्त हुआ। 1970 के दशक में अमेरिका एवं चीन के संबंधों में उत्तरोत्तर सुधार हुआ। हालाँकि इस चरण में भी तनाव को बढ़ाने वाली कुछ घटनाएं हुई जैसे वियतनाम गृहयुद्ध, अरब- इजरायल युद्ध, भारत- बांग्लादेश युद्ध इत्यादि। 1979-1991 काचौथा चरण:- 1987-INF संधि:-पहली बार शस्त्रों की संख्या में कटौती को लेकर समझौता हुआ। 1988 में USSR ने अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलाया तथा पूर्वी यूरोप में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया। 1989 में बर्लिन की दीवार तोड़ दी गई और 1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ। वार्सा पैक्ट को समाप्त कर दिया गया दिसंबर 1991 में USSR के विघटन के साथ एक गुट का अंत हो गया।1945-1991 के काल को शीत युद्ध का काल कहते हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में 1945 से पूर्व तथा 1991 के पश्चात भी शीत युद्ध जैसी विशेषताएं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में देखी जा सकती हैं।
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Explain the different types of warm and cold local winds with suitable examples. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH:- -INTRODUCTION - THE DIFFERENT TYPES OF LOCAL WINDS WARM LOCAL WINDS COLD LOCAL WINDS Answer:- Local winds are winds which originate and flow due to certain local factors. These flow over limited distances- 10 km to a maximum 100 km. In India, Loos are one of the most famous local winds, which flow over the Great Northern Planes, resulting in the increase in temperature (and even deaths at many places) THE DIFFERENT TYPES OF LOCAL WINDS Based on thermal conditions, there are broadly two types of local winds: I WARM LOCAL WINDS 1) CHINOOK These warm winds blow over western USA (Rockies)- the Californian region. In winters, due to the very low temperatures, ice is formed over the grass. The winds descend down the Rockies, and experience adiabatic warming- More pressure due to decrease in the volume of air leads to an increase in the increase in the intensity of temperature. The Chinook winds therefore thaw the grass, and hence are good for cattle and their survival (fodder for cattle). Therefore, these winds are also known as ‘snow eaters’. 2) FOEHN These warm winds descend down the mountains in France and Switzerland and ripen the grapes fast during winters. 3) ZONDA It blows over Argentina (Andes). Due to these winds, the grass remains frost free. The dry and dusty winds -----> 4) HARMATTAN/ DOCTOR WINDS These are dusty winds, which neutralize the moisture over the Gulf of Guinea and its surrounding areas. (Therefore, the people get respite from the intense sultry conditions there- and hence are also called ‘doctor winds’). These winds come from the (originate in the) Sahara desert. 5) SIROCCO It blows from the Atlas Mountains, then over the Mediterranean Sea, crosses it, and sheds some rain over Italy etc. (These are dry winds but give rain as they pick up moisture from the sea). It is also known as: 5.1) Leveche in Spain 5.2) Khamsin in Egypt 5.3) Sirocco in Italy 5.4) Chilli in Tunisia 5.5) Brick Fielders in Australia. These are dust ladenwinds which blow from the land to the ocean. 5.6) Santa Ana in California. II COLD LOCAL WINDS 1) BLIZZARDS These blow from the Arctic Circle to North America. These winds are highly dangerous as they freeze the lungs hence resulting in deaths. These are also known as the Burrans in Siberia. 2) MISTRAL They blow over the Alps, south of France- they blow over the Rhone Valley (without any obstruction) and are helpful for the orchards. 3) BORA They blow over the Adriatic Sea in the Balkans. 4) PAMPEROS They blow over the southern tip of Argentina (very close to Antarctica). Hence, these are extremely cold winds 5) SOUTHERN BUSTERS OF AUSTRALIA These are another type of cold winds which blow over Australia.
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##Question:Explain the different types of warm and cold local winds with suitable examples. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH:- -INTRODUCTION - THE DIFFERENT TYPES OF LOCAL WINDS WARM LOCAL WINDS COLD LOCAL WINDS Answer:- Local winds are winds which originate and flow due to certain local factors. These flow over limited distances- 10 km to a maximum 100 km. In India, Loos are one of the most famous local winds, which flow over the Great Northern Planes, resulting in the increase in temperature (and even deaths at many places) THE DIFFERENT TYPES OF LOCAL WINDS Based on thermal conditions, there are broadly two types of local winds: I WARM LOCAL WINDS 1) CHINOOK These warm winds blow over western USA (Rockies)- the Californian region. In winters, due to the very low temperatures, ice is formed over the grass. The winds descend down the Rockies, and experience adiabatic warming- More pressure due to decrease in the volume of air leads to an increase in the increase in the intensity of temperature. The Chinook winds therefore thaw the grass, and hence are good for cattle and their survival (fodder for cattle). Therefore, these winds are also known as ‘snow eaters’. 2) FOEHN These warm winds descend down the mountains in France and Switzerland and ripen the grapes fast during winters. 3) ZONDA It blows over Argentina (Andes). Due to these winds, the grass remains frost free. The dry and dusty winds -----> 4) HARMATTAN/ DOCTOR WINDS These are dusty winds, which neutralize the moisture over the Gulf of Guinea and its surrounding areas. (Therefore, the people get respite from the intense sultry conditions there- and hence are also called ‘doctor winds’). These winds come from the (originate in the) Sahara desert. 5) SIROCCO It blows from the Atlas Mountains, then over the Mediterranean Sea, crosses it, and sheds some rain over Italy etc. (These are dry winds but give rain as they pick up moisture from the sea). It is also known as: 5.1) Leveche in Spain 5.2) Khamsin in Egypt 5.3) Sirocco in Italy 5.4) Chilli in Tunisia 5.5) Brick Fielders in Australia. These are dust ladenwinds which blow from the land to the ocean. 5.6) Santa Ana in California. II COLD LOCAL WINDS 1) BLIZZARDS These blow from the Arctic Circle to North America. These winds are highly dangerous as they freeze the lungs hence resulting in deaths. These are also known as the Burrans in Siberia. 2) MISTRAL They blow over the Alps, south of France- they blow over the Rhone Valley (without any obstruction) and are helpful for the orchards. 3) BORA They blow over the Adriatic Sea in the Balkans. 4) PAMPEROS They blow over the southern tip of Argentina (very close to Antarctica). Hence, these are extremely cold winds 5) SOUTHERN BUSTERS OF AUSTRALIA These are another type of cold winds which blow over Australia.
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"USSR के गठन मे ही उसके विघटन के बीज निहित थे , जिन्हें गोर्वाचेब की नीतियों ने बढ़ावा दिया " । इस कथनके संदर्भ मे यूएसएसआर के विघटन के कारकों का विश्लेषण कीजिये। (200 शब्द) "The formation of the USSR contained seeds of its disintegration, which were promoted by the policies of Gorbacheb". Analyze the factors of the disintegration of the USSR in the context of this statement. (200 words)
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अप्रोच :- सोवियत संघ पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। सोवियत संघ के गठन की कमियों को लिखिए । गोर्वाचेव की नीतियाँ को बताएं जिन्होने सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया को तीव्र किया। गोर्वाचेव की भूमिका पर संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर :- 1917 की क्रांति के पश्चात सोवियत संघ मे मार्क्स के सैद्धांतिक विचारों से आगे बढ़ते हुए साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई , इसका प्रभाव तात्कालिक विश्व पर पड़ा तथा पूंजीवादी व साम्यवादी देशों के मध्य वैचारिक मतभेद ने शीतयुद्ध को जन्म दिया। इस शीतयुद्ध की समाप्ति 1991 मे सोवियत संघ के विघटन के साथ हुई । सोवियत संघ के गठन की कमियाँ:- आर्थिक कारण:- सोवियत रूस के आर्थिक विकास के मॉडलमें पूँजीगत एवं भारी उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया था। अतः इसके अंतर्गत उपभोक्ता सामग्रियों की कमी पड गयी। इसके साथ ही शीतयुद्ध के कारण हथियारों की प्रतिस्पर्धा के कारण भी गैर योजनागत व्यय में वृद्धि हुई।सोवियत रूस को एक बड़ी राशि अनुदान तथा निवेश के रूप में तृतीय विश्व के देशों को देनी होती थी, जिसके कारण सोवियत रूस की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक दबाव बहुत अधिक था। कठोर राजनैतिक नियंत्रण :- लेनिन के अंतर्गत सोवियत रूस में "एक दल का तानाशाह " स्थापित किया गया था। स्टालिन के अंतर्गत वह "एक व्यक्ति की तानाशाही" के रूप में तब्दील हो गया ।व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया गया था। कलाकारों और लेखकों पर पाबंदी लगा दी गयी। जाहिर है कि इस कठोर नीति के कारण सोवियत रूस के लोगों में असंतोष था। सोवियत रूस का बहुराष्ट्रीय एवं नस्लवादी चरित्र :- बोल्शेविक क्रांति के मध्य भी लेनिन को रूसी अल्पसंख्यकों की समस्या का सामना करना पड़ रहा था।लेनिन ने एक व्यावहारिक नीति का सहारा लेकर अल्पसंख्यकों के असंतोष को दूर करने का प्रयास किया था। उसने सोवियत रूस को गणतंत्रों के संघ के रूप में तब्दील कर दिया। स्टालिन के कठोर शासन के अंतर्गत नस्लवादी विभाजन दबा रहा, किन्तु गोर्बाचेव की उदार नीतियों ने अल्पसंख्यकों की आकांक्षा को बढ़ाया। गोर्वाचेव की नीतियाँ:- गोर्वाचेव ने खुलेपन एवं सुधारों का दृष्टिकोण और संस्थागत सुधारों की दिशा मे कार्य शुरू किया । इन नीतियों ने सोवियत रूस के विघटन का मार्ग प्रशस्त किया । किसी बंद समाज को अचानक से खोलना सोवियत रूस के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ। गोर्वाचेव नेपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ), जिसके तहत औद्योगिक क्षेत्रों और व्यवसाय पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण की स्थिति मे भी कमी लायी गयी , केंद्रीकृत नियोजन को भी समाप्त करने का प्रयास किया गया । यह नीति सम्भवता लेनिन की नई आर्थिक नीति से परिचालित थी। इसके साथ हीग्लासनोस्त( वैचारिक खुलापन ) की नीतिपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ) की नीति से अधिक घातक सिद्ध हुई । इसकेतहत सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र के नियंत्रण को भी समाप्त कर प्रेस को स्वतन्त्रता दी गयी अगर हम सोवियत संघ की तुलना समकालीन चीन से करते है तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि चीन ने आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू की किन्तु राजनीतिक नियंत्रण को ढीला नहीं किया। इस प्रकार चीन ,पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में क्रमिक रूप से संक्रमित हो गया, वहीं सोवियत संघ में ग्लासनोस्त की नीति घातक सिद्ध हुई।इस प्रकार सोवियत संघ के विघटन में विविध कारको की भूमिका रही थी , किन्तु गोर्बाचेव की नीतियों के कारण श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया आरंभ हो गयी थी।
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##Question:"USSR के गठन मे ही उसके विघटन के बीज निहित थे , जिन्हें गोर्वाचेब की नीतियों ने बढ़ावा दिया " । इस कथनके संदर्भ मे यूएसएसआर के विघटन के कारकों का विश्लेषण कीजिये। (200 शब्द) "The formation of the USSR contained seeds of its disintegration, which were promoted by the policies of Gorbacheb". Analyze the factors of the disintegration of the USSR in the context of this statement. (200 words)##Answer:अप्रोच :- सोवियत संघ पर संक्षिप्त भूमिका दीजिये। सोवियत संघ के गठन की कमियों को लिखिए । गोर्वाचेव की नीतियाँ को बताएं जिन्होने सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया को तीव्र किया। गोर्वाचेव की भूमिका पर संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर :- 1917 की क्रांति के पश्चात सोवियत संघ मे मार्क्स के सैद्धांतिक विचारों से आगे बढ़ते हुए साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई , इसका प्रभाव तात्कालिक विश्व पर पड़ा तथा पूंजीवादी व साम्यवादी देशों के मध्य वैचारिक मतभेद ने शीतयुद्ध को जन्म दिया। इस शीतयुद्ध की समाप्ति 1991 मे सोवियत संघ के विघटन के साथ हुई । सोवियत संघ के गठन की कमियाँ:- आर्थिक कारण:- सोवियत रूस के आर्थिक विकास के मॉडलमें पूँजीगत एवं भारी उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया था। अतः इसके अंतर्गत उपभोक्ता सामग्रियों की कमी पड गयी। इसके साथ ही शीतयुद्ध के कारण हथियारों की प्रतिस्पर्धा के कारण भी गैर योजनागत व्यय में वृद्धि हुई।सोवियत रूस को एक बड़ी राशि अनुदान तथा निवेश के रूप में तृतीय विश्व के देशों को देनी होती थी, जिसके कारण सोवियत रूस की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक दबाव बहुत अधिक था। कठोर राजनैतिक नियंत्रण :- लेनिन के अंतर्गत सोवियत रूस में "एक दल का तानाशाह " स्थापित किया गया था। स्टालिन के अंतर्गत वह "एक व्यक्ति की तानाशाही" के रूप में तब्दील हो गया ।व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया गया था। कलाकारों और लेखकों पर पाबंदी लगा दी गयी। जाहिर है कि इस कठोर नीति के कारण सोवियत रूस के लोगों में असंतोष था। सोवियत रूस का बहुराष्ट्रीय एवं नस्लवादी चरित्र :- बोल्शेविक क्रांति के मध्य भी लेनिन को रूसी अल्पसंख्यकों की समस्या का सामना करना पड़ रहा था।लेनिन ने एक व्यावहारिक नीति का सहारा लेकर अल्पसंख्यकों के असंतोष को दूर करने का प्रयास किया था। उसने सोवियत रूस को गणतंत्रों के संघ के रूप में तब्दील कर दिया। स्टालिन के कठोर शासन के अंतर्गत नस्लवादी विभाजन दबा रहा, किन्तु गोर्बाचेव की उदार नीतियों ने अल्पसंख्यकों की आकांक्षा को बढ़ाया। गोर्वाचेव की नीतियाँ:- गोर्वाचेव ने खुलेपन एवं सुधारों का दृष्टिकोण और संस्थागत सुधारों की दिशा मे कार्य शुरू किया । इन नीतियों ने सोवियत रूस के विघटन का मार्ग प्रशस्त किया । किसी बंद समाज को अचानक से खोलना सोवियत रूस के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ। गोर्वाचेव नेपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ), जिसके तहत औद्योगिक क्षेत्रों और व्यवसाय पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण की स्थिति मे भी कमी लायी गयी , केंद्रीकृत नियोजन को भी समाप्त करने का प्रयास किया गया । यह नीति सम्भवता लेनिन की नई आर्थिक नीति से परिचालित थी। इसके साथ हीग्लासनोस्त( वैचारिक खुलापन ) की नीतिपेरेस्त्रोइका(आर्थिक खुलापन ) की नीति से अधिक घातक सिद्ध हुई । इसकेतहत सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र के नियंत्रण को भी समाप्त कर प्रेस को स्वतन्त्रता दी गयी अगर हम सोवियत संघ की तुलना समकालीन चीन से करते है तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि चीन ने आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू की किन्तु राजनीतिक नियंत्रण को ढीला नहीं किया। इस प्रकार चीन ,पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में क्रमिक रूप से संक्रमित हो गया, वहीं सोवियत संघ में ग्लासनोस्त की नीति घातक सिद्ध हुई।इस प्रकार सोवियत संघ के विघटन में विविध कारको की भूमिका रही थी , किन्तु गोर्बाचेव की नीतियों के कारण श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया आरंभ हो गयी थी।
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गैर-सरकारी संगठनों को परिभाषित कीजिये | गैर सरकारी संगठनों के महत्व को बताते हुए इसके वित्तीयन से सम्बंधित चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Define the NGO"s. Discussing the importance of NGO"s, Describe the challanges related to its financing.
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दृष्टिकोण :- भूमिका में गैर सरकारी संगठन की चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में गैर सरकारी संगठन के महत्व को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में गैर सरकारी संगठन से जुड़े वित्तीय चुनौतियों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- NGO से तात्पर्य से ऐसे गैर सरकारी संगठन से है जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत या कंपनी एक्ट 2013 के तहत पंजीकृत होते हैं और समाज में बिना किसी लाभ के वंचित तबकों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाते है और साथ ही उनके लिए आर्थिक अवसरों के सृजन की वकालत करते है।एनजीओ सामान्यतया निजी व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जो कुछ विशेष सामाजिक सिद्धांत में विश्वास करता है और वे स्वतंत्र प्रजातांत्रिक और गैर नस्लीय सार्वजनिक संगठन के रूप में वंचित लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए कार्य करते हैं। एनजीओ किसी राजनितिक दल से संबंधित नहीं होते। भारत में सरकार के पास आर्थिक संसाधनों की कमी होती है, जिसके कारण सरकार कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त विकास नहीं कर पाती। जिसकी वजह से कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में आगे और कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं। इन क्षेत्रों के बीच में आर्थिक और सामाजिक विषमता देखने को मिलती है। गैर सरकारी संगठन इसी आर्थिक और सामाजिक विषमता को कम करने में अपना योगदान देते हैं। भारत में गैर सरकारी संगठनों के महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- गैर सरकारी संगठन ऐसे कार्यों को करते हैं जिन कार्यों को करने के लिए राज्य के पास पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं होते है । उन जगहों पर एनजीओ सरकार के अनुपूरक की तरह कार्य करते हैं। इसका प्रभावी उदाहरण केरल जैसे राज्यों में साक्षरता के लिए कार्य करने वाले बहुत से एनजीओ के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे कार्य जिनको करने में राज्य ज्यादा इच्छुक नहीं होते, एनजीओ द्वारा उन कार्यों को भी किया जाता है। जैसे समाज में जाति प्रथा, सांप्रदायिकता, आपसी वैमनस्य आदि को मिटाने के लिए एनजीओ द्वारा प्रभावी रूप से कार्य किया जाता है । सामाजिक बुराइयों से लड़ने और समाज में इसके प्रति जागरूकता फैलाने में गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जैसे - कन्या भ्रूण हत्या, लिंग परीक्षण, महिला-बाल विकास, दहेज प्रथा, जाति प्रथा, बहु-विवाह, बाल विवाह आदि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने और महिला शिक्षा, श्रम बल महिला भागीदारी, विधवा पुनर्विवाह आदि को बढ़ावा देने में गैर सरकारी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । निराश्रितों को आश्रय प्रदान करने में महाराष्ट्र के कुछ एनजीओ ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महाराष्ट्र में युवा (YUVA) और स्पार्क (SPARK ) जैसे एनजीओ ने झुग्गी झोपड़ियों के विनाश का विरोध करते हुए, उनमें ही गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा जनजाति अधिकारों के लिए भी समय समय पर आवाज उठाई जाती है। इसके साथ ही विभिन्न विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी आवाज उठाई जाती है । भारत में गैर सरकारी संगठन एक महत्वपूर्ण दबाव समूह के रूप में भी काम करते हैं तथा भारत में भोजन का अधिकार(RTF ), शिक्षा का अधिकार (RTE), जानने का अधिकार (RTI ) और मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण योजनाएं गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप के कारण ही संभव हो पाई । इसके साथ ही भारत में बहुत सारे एनजीओ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। जिनमें ग्रीन पीस, मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ, इंटरनेशनल सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट आदि प्रमुख है । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त से जुड़ी अनेक चुनौतियां हैं जिसमें मुख्यतः दो चुनौतियों को लेकर काफी विवाद रहता है जिसे निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है :- अपर्याप्त निधि( फंड):- भारत में अधिकतर एनजीओ धनाभाव की समस्या का सामना कर रहे हैं । सरकार द्वारा गैर सरकारी संगठनों को शत प्रतिशत सहायता प्रदान नहीं की जाती और साथ ही इन को दिए जाने वाले वित्त में काफी विलंब भी होता है जिसके कारण यह अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं कर पाते । अनेक एनजीओ जोकि विदेशों से वाह्य चंदा प्राप्त करते हैं उनमें से अधिकतर काला धन शोधन में संलिप्त है और काले धन को सफेद धन में परिवर्तित करने का अवैध कार्य करते हैं। इसके साथ ही कुछ एनजीओ विदेशी धन से भारत में विकास कार्यों में भी रुकावट पैदा करते हैं ।हाल ही में ग्रीनपीस नामक एनजीओ पर इसका आरोप लगा । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त के नियमन और नियंत्रण के संदर्भ में कुछ कानून भी बनाए गए हैं जो उनके द्वारा अवैध वित्तीय क्रियाकलापों को नियंत्रित करते हैं। जैसे- फॉरेन कोंट्रीबुसन रेगुलेशन एक्ट ( एफसीआरए ) 2010 , जिसके तहत प्रत्येक एनजीओ को गृह मंत्रालय के अधीन, प्रत्येक 5 वर्ष में अपने को पुनः रजिस्टर करवाना पड़ता है। इसके साथ ही काला धन शोधन को फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट ( फेमा) 1999 के तहत भी नियंत्रित किया जाता है। भारत में हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा अवैध विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसके दुरुपयोग के साथ-साथ अपने खातों का सही व्यौरा न देने के कारण, अनेक गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस निरस्त कर दिया गया । अतः गैर सरकारी संगठनों के महत्व को देखते हुए तथा इनके द्वारा समाज में किए जा रहे महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कार्यों को देखते हुए इनकी पहुंच और प्रभाविता को बढ़ाने की आवश्यकता है। ताकि समाज के सुभेद्य और सीमांत वर्गो तक पहुंचा जा सके और उनके जीवन में गुणवत्तापूर्ण विकास किया जा सके। लेकिन, साथ ही गैर सरकारी संगठनों को अपने कार्य और वित्त में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है ताकि देशी और विदेशी दोनों प्रकार के चंदो का देश के विकास में ही प्रयोग किया जा सके ।
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##Question:गैर-सरकारी संगठनों को परिभाषित कीजिये | गैर सरकारी संगठनों के महत्व को बताते हुए इसके वित्तीयन से सम्बंधित चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Define the NGO"s. Discussing the importance of NGO"s, Describe the challanges related to its financing.##Answer:दृष्टिकोण :- भूमिका में गैर सरकारी संगठन की चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में गैर सरकारी संगठन के महत्व को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में गैर सरकारी संगठन से जुड़े वित्तीय चुनौतियों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- NGO से तात्पर्य से ऐसे गैर सरकारी संगठन से है जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत या कंपनी एक्ट 2013 के तहत पंजीकृत होते हैं और समाज में बिना किसी लाभ के वंचित तबकों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाते है और साथ ही उनके लिए आर्थिक अवसरों के सृजन की वकालत करते है।एनजीओ सामान्यतया निजी व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जो कुछ विशेष सामाजिक सिद्धांत में विश्वास करता है और वे स्वतंत्र प्रजातांत्रिक और गैर नस्लीय सार्वजनिक संगठन के रूप में वंचित लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए कार्य करते हैं। एनजीओ किसी राजनितिक दल से संबंधित नहीं होते। भारत में सरकार के पास आर्थिक संसाधनों की कमी होती है, जिसके कारण सरकार कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त विकास नहीं कर पाती। जिसकी वजह से कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में आगे और कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं। इन क्षेत्रों के बीच में आर्थिक और सामाजिक विषमता देखने को मिलती है। गैर सरकारी संगठन इसी आर्थिक और सामाजिक विषमता को कम करने में अपना योगदान देते हैं। भारत में गैर सरकारी संगठनों के महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- गैर सरकारी संगठन ऐसे कार्यों को करते हैं जिन कार्यों को करने के लिए राज्य के पास पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं होते है । उन जगहों पर एनजीओ सरकार के अनुपूरक की तरह कार्य करते हैं। इसका प्रभावी उदाहरण केरल जैसे राज्यों में साक्षरता के लिए कार्य करने वाले बहुत से एनजीओ के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे कार्य जिनको करने में राज्य ज्यादा इच्छुक नहीं होते, एनजीओ द्वारा उन कार्यों को भी किया जाता है। जैसे समाज में जाति प्रथा, सांप्रदायिकता, आपसी वैमनस्य आदि को मिटाने के लिए एनजीओ द्वारा प्रभावी रूप से कार्य किया जाता है । सामाजिक बुराइयों से लड़ने और समाज में इसके प्रति जागरूकता फैलाने में गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जैसे - कन्या भ्रूण हत्या, लिंग परीक्षण, महिला-बाल विकास, दहेज प्रथा, जाति प्रथा, बहु-विवाह, बाल विवाह आदि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने और महिला शिक्षा, श्रम बल महिला भागीदारी, विधवा पुनर्विवाह आदि को बढ़ावा देने में गैर सरकारी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । निराश्रितों को आश्रय प्रदान करने में महाराष्ट्र के कुछ एनजीओ ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महाराष्ट्र में युवा (YUVA) और स्पार्क (SPARK ) जैसे एनजीओ ने झुग्गी झोपड़ियों के विनाश का विरोध करते हुए, उनमें ही गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा जनजाति अधिकारों के लिए भी समय समय पर आवाज उठाई जाती है। इसके साथ ही विभिन्न विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी आवाज उठाई जाती है । भारत में गैर सरकारी संगठन एक महत्वपूर्ण दबाव समूह के रूप में भी काम करते हैं तथा भारत में भोजन का अधिकार(RTF ), शिक्षा का अधिकार (RTE), जानने का अधिकार (RTI ) और मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण योजनाएं गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप के कारण ही संभव हो पाई । इसके साथ ही भारत में बहुत सारे एनजीओ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। जिनमें ग्रीन पीस, मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ, इंटरनेशनल सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट आदि प्रमुख है । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त से जुड़ी अनेक चुनौतियां हैं जिसमें मुख्यतः दो चुनौतियों को लेकर काफी विवाद रहता है जिसे निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है :- अपर्याप्त निधि( फंड):- भारत में अधिकतर एनजीओ धनाभाव की समस्या का सामना कर रहे हैं । सरकार द्वारा गैर सरकारी संगठनों को शत प्रतिशत सहायता प्रदान नहीं की जाती और साथ ही इन को दिए जाने वाले वित्त में काफी विलंब भी होता है जिसके कारण यह अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं कर पाते । अनेक एनजीओ जोकि विदेशों से वाह्य चंदा प्राप्त करते हैं उनमें से अधिकतर काला धन शोधन में संलिप्त है और काले धन को सफेद धन में परिवर्तित करने का अवैध कार्य करते हैं। इसके साथ ही कुछ एनजीओ विदेशी धन से भारत में विकास कार्यों में भी रुकावट पैदा करते हैं ।हाल ही में ग्रीनपीस नामक एनजीओ पर इसका आरोप लगा । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त के नियमन और नियंत्रण के संदर्भ में कुछ कानून भी बनाए गए हैं जो उनके द्वारा अवैध वित्तीय क्रियाकलापों को नियंत्रित करते हैं। जैसे- फॉरेन कोंट्रीबुसन रेगुलेशन एक्ट ( एफसीआरए ) 2010 , जिसके तहत प्रत्येक एनजीओ को गृह मंत्रालय के अधीन, प्रत्येक 5 वर्ष में अपने को पुनः रजिस्टर करवाना पड़ता है। इसके साथ ही काला धन शोधन को फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट ( फेमा) 1999 के तहत भी नियंत्रित किया जाता है। भारत में हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा अवैध विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसके दुरुपयोग के साथ-साथ अपने खातों का सही व्यौरा न देने के कारण, अनेक गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस निरस्त कर दिया गया । अतः गैर सरकारी संगठनों के महत्व को देखते हुए तथा इनके द्वारा समाज में किए जा रहे महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कार्यों को देखते हुए इनकी पहुंच और प्रभाविता को बढ़ाने की आवश्यकता है। ताकि समाज के सुभेद्य और सीमांत वर्गो तक पहुंचा जा सके और उनके जीवन में गुणवत्तापूर्ण विकास किया जा सके। लेकिन, साथ ही गैर सरकारी संगठनों को अपने कार्य और वित्त में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है ताकि देशी और विदेशी दोनों प्रकार के चंदो का देश के विकास में ही प्रयोग किया जा सके ।
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"राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में कुछ समानताएं है तो कुछ भिन्नताएं भी हैं।" कथन कोस्पष्ट कीजिए। (200 शब्द) "There are some similarities between the powers of the President and the Governor, there are some differences too." Elucidate the statement.(200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के पद का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में समानताओं का उल्लेख कीजिए। इसके बादराष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- संविधान के भाग पांच केअनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का उल्लेख है जिसका प्रमुख राष्ट्रपति को माना गया है। ऐसी ही व्यवस्था संघ की इकाइयों के लिएसंविधान में राज्यपाल के संदर्भ में उल्लेखित है। संविधान के छठें भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्यकार्यपालिका का वर्णन है, जिसका मुखिया राज्यपाल होता है। राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर भी कार्य करता है। इस तरह राज्यपाल की भूमिका दोहरी होती है। समानताएँ:- राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों को संवैधानिक प्रमुखों का दर्जा प्राप्त है। उनके नाम पर सभी कार्यकारी निर्णय लिए जाते हैं हालाँकि दोनों ही स्तर परवास्तविक शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है। सभी साधारण / मनी बिल को पारित किए जाने से पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल कीसहमति प्राप्त करनी होती है। दोनों के पास अध्यादेशों को लागू करने की शक्तियां हैं। सभी धन विधेयकों को लोकसभा में राष्ट्रपति और राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व सिफारिश के साथ हीपेश किया जा सकता है। भिन्नताएं:- राज्य में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ, संघ में राष्ट्रपति की तुलना में व्यापक हैं। राज्यपाल किसी को दोषी ठहराए जाने पर मौत की सजा कोक्षमा नहीं कर सकता, हालांकि वह इस तरह की सजा को कम कर सकता है। केवल राष्ट्रपति के पास ही मौत की सजा पाए व्यक्ति को क्षमा करने की शक्ति है। राष्ट्रपति लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामित कर सकता है वहीँराज्यपाल राज्य विधानमंडल में एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सदस्य को नामित कर सकता है। राष्ट्रपति ने राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित करता है वहीँराज्यों में जहाँ भी द्विसदनीय विधायिकाएँ मौजूद हैं, राज्यपाल राज्य विधान परिषद के 1/6 सदस्यों को नामित करता है। केवल राष्ट्रपति ही युद्ध या शांति की घोषणा कर सकते हैं, राज्यपाल के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है। केवल राष्ट्रपति ही किसी व्यक्ति को मार्शल लॉ के तहत दंडित कर सकते हैं, राज्यपाल को ऐसी शक्तियां नहीं दी गई। इस प्रकार दोनों ही पदों की शक्तियों में समानताएं एवं भिन्नताएं होते हुए भी दोनोंकी अपनी अपनी विशेषताएं एवं महत्व है।
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##Question:"राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में कुछ समानताएं है तो कुछ भिन्नताएं भी हैं।" कथन कोस्पष्ट कीजिए। (200 शब्द) "There are some similarities between the powers of the President and the Governor, there are some differences too." Elucidate the statement.(200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के पद का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में समानताओं का उल्लेख कीजिए। इसके बादराष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- संविधान के भाग पांच केअनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का उल्लेख है जिसका प्रमुख राष्ट्रपति को माना गया है। ऐसी ही व्यवस्था संघ की इकाइयों के लिएसंविधान में राज्यपाल के संदर्भ में उल्लेखित है। संविधान के छठें भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्यकार्यपालिका का वर्णन है, जिसका मुखिया राज्यपाल होता है। राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर भी कार्य करता है। इस तरह राज्यपाल की भूमिका दोहरी होती है। समानताएँ:- राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों को संवैधानिक प्रमुखों का दर्जा प्राप्त है। उनके नाम पर सभी कार्यकारी निर्णय लिए जाते हैं हालाँकि दोनों ही स्तर परवास्तविक शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है। सभी साधारण / मनी बिल को पारित किए जाने से पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल कीसहमति प्राप्त करनी होती है। दोनों के पास अध्यादेशों को लागू करने की शक्तियां हैं। सभी धन विधेयकों को लोकसभा में राष्ट्रपति और राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व सिफारिश के साथ हीपेश किया जा सकता है। भिन्नताएं:- राज्य में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ, संघ में राष्ट्रपति की तुलना में व्यापक हैं। राज्यपाल किसी को दोषी ठहराए जाने पर मौत की सजा कोक्षमा नहीं कर सकता, हालांकि वह इस तरह की सजा को कम कर सकता है। केवल राष्ट्रपति के पास ही मौत की सजा पाए व्यक्ति को क्षमा करने की शक्ति है। राष्ट्रपति लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामित कर सकता है वहीँराज्यपाल राज्य विधानमंडल में एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सदस्य को नामित कर सकता है। राष्ट्रपति ने राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित करता है वहीँराज्यों में जहाँ भी द्विसदनीय विधायिकाएँ मौजूद हैं, राज्यपाल राज्य विधान परिषद के 1/6 सदस्यों को नामित करता है। केवल राष्ट्रपति ही युद्ध या शांति की घोषणा कर सकते हैं, राज्यपाल के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है। केवल राष्ट्रपति ही किसी व्यक्ति को मार्शल लॉ के तहत दंडित कर सकते हैं, राज्यपाल को ऐसी शक्तियां नहीं दी गई। इस प्रकार दोनों ही पदों की शक्तियों में समानताएं एवं भिन्नताएं होते हुए भी दोनोंकी अपनी अपनी विशेषताएं एवं महत्व है।
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गैर-सरकारी संगठनों(NGOs) को परिभाषित कीजिए। गैर सरकारी संगठनों के महत्व को बताते हुए इसके वित्तीयन से सम्बंधित चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Define non-governmental organizations (NGOs). Explaining the importance of NGOs, also mention the challenges related to its financing. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण :- भूमिका में गैर सरकारी संगठन की चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में गैर सरकारी संगठन के महत्व को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में गैर सरकारी संगठन से जुड़े वित्तीय चुनौतियों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- NGO से तात्पर्य से ऐसे गैर सरकारी संगठन से है जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत या कंपनी एक्ट 2013 के तहत पंजीकृत होते हैं और समाज में बिना किसी लाभ के वंचित तबकों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाते है और साथ ही उनके लिए आर्थिक अवसरों के सृजन की वकालत करते है।एनजीओ सामान्यतया निजी व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जो कुछ विशेष सामाजिक सिद्धांत में विश्वास करता है और वे स्वतंत्र प्रजातांत्रिक और गैर नस्लीय सार्वजनिक संगठन के रूप में वंचित लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए कार्य करते हैं। एनजीओ किसी राजनितिक दल से संबंधित नहीं होते। भारत में सरकार के पास आर्थिक संसाधनों की कमी होती है, जिसके कारण सरकार कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त विकास नहीं कर पाती। जिसकी वजह से कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में आगे और कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं। इन क्षेत्रों के बीच में आर्थिक और सामाजिक विषमता देखने को मिलती है। गैर सरकारी संगठन इसी आर्थिक और सामाजिक विषमता को कम करने में अपना योगदान देते हैं। भारत में गैर सरकारी संगठनों के महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- गैर सरकारी संगठन ऐसे कार्यों को करते हैं जिन कार्यों को करने के लिए राज्य के पास पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं होते है । उन जगहों पर एनजीओ सरकार के अनुपूरक की तरह कार्य करते हैं। इसका प्रभावी उदाहरण केरल जैसे राज्यों में साक्षरता के लिए कार्य करने वाले बहुत से एनजीओ के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे कार्य जिनको करने में राज्य ज्यादा इच्छुक नहीं होते, एनजीओ द्वारा उन कार्यों को भी किया जाता है। जैसे समाज में जाति प्रथा, सांप्रदायिकता, आपसी वैमनस्य आदि को मिटाने के लिए एनजीओ द्वारा प्रभावी रूप से कार्य किया जाता है । सामाजिक बुराइयों से लड़ने और समाज में इसके प्रति जागरूकता फैलाने में गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जैसे - कन्या भ्रूण हत्या, लिंग परीक्षण, महिला-बाल विकास, दहेज प्रथा, जाति प्रथा, बहु-विवाह, बाल विवाह आदि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने और महिला शिक्षा, श्रम बल महिला भागीदारी, विधवा पुनर्विवाह आदि को बढ़ावा देने में गैर सरकारी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । निराश्रितों को आश्रय प्रदान करने में महाराष्ट्र के कुछ एनजीओ ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महाराष्ट्र में युवा (YUVA) और स्पार्क (SPARK ) जैसे एनजीओ ने झुग्गी झोपड़ियों के विनाश का विरोध करते हुए, उनमें ही गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा जनजाति अधिकारों के लिए भी समय समय पर आवाज उठाई जाती है। इसके साथ ही विभिन्न विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी आवाज उठाई जाती है । भारत में गैर सरकारी संगठन एक महत्वपूर्ण दबाव समूह के रूप में भी काम करते हैं तथा भारत में भोजन का अधिकार(RTF ), शिक्षा का अधिकार (RTE), जानने का अधिकार (RTI ) और मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण योजनाएं गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप के कारण ही संभव हो पाई । इसके साथ ही भारत में बहुत सारे एनजीओ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। जिनमें ग्रीन पीस, मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ, इंटरनेशनल सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट आदि प्रमुख है । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त से जुड़ी अनेक चुनौतियां हैं जिसमें मुख्यतः दो चुनौतियों को लेकर काफी विवाद रहता है जिसे निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है :- अपर्याप्त निधि( फंड):- भारत में अधिकतर एनजीओ धनाभाव की समस्या का सामना कर रहे हैं । सरकार द्वारा गैर सरकारी संगठनों को शत प्रतिशत सहायता प्रदान नहीं की जाती और साथ ही इन को दिए जाने वाले वित्त में काफी विलंब भी होता है जिसके कारण यह अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं कर पाते । अनेक एनजीओ जोकि विदेशों से वाह्य चंदा प्राप्त करते हैं उनमें से अधिकतर काला धन शोधन में संलिप्त है और काले धन को सफेद धन में परिवर्तित करने का अवैध कार्य करते हैं। इसके साथ ही कुछ एनजीओ विदेशी धन से भारत में विकास कार्यों में भी रुकावट पैदा करते हैं ।हाल ही में ग्रीनपीस नामक एनजीओ पर इसका आरोप लगा । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त के नियमन और नियंत्रण के संदर्भ में कुछ कानून भी बनाए गए हैं जो उनके द्वारा अवैध वित्तीय क्रियाकलापों को नियंत्रित करते हैं। जैसे- फॉरेन कोंट्रीबुसन रेगुलेशन एक्ट ( एफसीआरए ) 2010, जिसके तहत प्रत्येक एनजीओ को गृह मंत्रालय के अधीन, प्रत्येक 5 वर्ष में अपने को पुनः रजिस्टर करवाना पड़ता है। इसके साथ ही काला धन शोधन को फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट ( फेमा) 1999 के तहत भी नियंत्रित किया जाता है। भारत में हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा अवैध विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसके दुरुपयोग के साथ-साथ अपने खातों का सही व्यौरा न देने के कारण, अनेक गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस निरस्त कर दिया गया । अतः गैर सरकारी संगठनों के महत्व को देखते हुए तथा इनके द्वारा समाज में किए जा रहे महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कार्यों को देखते हुए इनकी पहुंच और प्रभाविता को बढ़ाने की आवश्यकता है। ताकि समाज के सुभेद्य और सीमांत वर्गो तक पहुंचा जा सके और उनके जीवन में गुणवत्तापूर्ण विकास किया जा सके। लेकिन, साथ ही गैर सरकारी संगठनों को अपने कार्य और वित्त में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है ताकि देशी और विदेशी दोनों प्रकार के चंदो का देश के विकास में ही प्रयोग किया जा सके ।
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##Question:गैर-सरकारी संगठनों(NGOs) को परिभाषित कीजिए। गैर सरकारी संगठनों के महत्व को बताते हुए इसके वित्तीयन से सम्बंधित चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Define non-governmental organizations (NGOs). Explaining the importance of NGOs, also mention the challenges related to its financing. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण :- भूमिका में गैर सरकारी संगठन की चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में गैर सरकारी संगठन के महत्व को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में गैर सरकारी संगठन से जुड़े वित्तीय चुनौतियों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- NGO से तात्पर्य से ऐसे गैर सरकारी संगठन से है जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत या कंपनी एक्ट 2013 के तहत पंजीकृत होते हैं और समाज में बिना किसी लाभ के वंचित तबकों के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाते है और साथ ही उनके लिए आर्थिक अवसरों के सृजन की वकालत करते है।एनजीओ सामान्यतया निजी व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जो कुछ विशेष सामाजिक सिद्धांत में विश्वास करता है और वे स्वतंत्र प्रजातांत्रिक और गैर नस्लीय सार्वजनिक संगठन के रूप में वंचित लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए कार्य करते हैं। एनजीओ किसी राजनितिक दल से संबंधित नहीं होते। भारत में सरकार के पास आर्थिक संसाधनों की कमी होती है, जिसके कारण सरकार कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त विकास नहीं कर पाती। जिसकी वजह से कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में आगे और कुछ क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं। इन क्षेत्रों के बीच में आर्थिक और सामाजिक विषमता देखने को मिलती है। गैर सरकारी संगठन इसी आर्थिक और सामाजिक विषमता को कम करने में अपना योगदान देते हैं। भारत में गैर सरकारी संगठनों के महत्व को हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- गैर सरकारी संगठन ऐसे कार्यों को करते हैं जिन कार्यों को करने के लिए राज्य के पास पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं होते है । उन जगहों पर एनजीओ सरकार के अनुपूरक की तरह कार्य करते हैं। इसका प्रभावी उदाहरण केरल जैसे राज्यों में साक्षरता के लिए कार्य करने वाले बहुत से एनजीओ के रूप में देखा जा सकता है । ऐसे कार्य जिनको करने में राज्य ज्यादा इच्छुक नहीं होते, एनजीओ द्वारा उन कार्यों को भी किया जाता है। जैसे समाज में जाति प्रथा, सांप्रदायिकता, आपसी वैमनस्य आदि को मिटाने के लिए एनजीओ द्वारा प्रभावी रूप से कार्य किया जाता है । सामाजिक बुराइयों से लड़ने और समाज में इसके प्रति जागरूकता फैलाने में गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जैसे - कन्या भ्रूण हत्या, लिंग परीक्षण, महिला-बाल विकास, दहेज प्रथा, जाति प्रथा, बहु-विवाह, बाल विवाह आदि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने और महिला शिक्षा, श्रम बल महिला भागीदारी, विधवा पुनर्विवाह आदि को बढ़ावा देने में गैर सरकारी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । निराश्रितों को आश्रय प्रदान करने में महाराष्ट्र के कुछ एनजीओ ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महाराष्ट्र में युवा (YUVA) और स्पार्क (SPARK ) जैसे एनजीओ ने झुग्गी झोपड़ियों के विनाश का विरोध करते हुए, उनमें ही गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा जनजाति अधिकारों के लिए भी समय समय पर आवाज उठाई जाती है। इसके साथ ही विभिन्न विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी आवाज उठाई जाती है । भारत में गैर सरकारी संगठन एक महत्वपूर्ण दबाव समूह के रूप में भी काम करते हैं तथा भारत में भोजन का अधिकार(RTF ), शिक्षा का अधिकार (RTE), जानने का अधिकार (RTI ) और मनरेगा जैसे महत्वपूर्ण योजनाएं गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप के कारण ही संभव हो पाई । इसके साथ ही भारत में बहुत सारे एनजीओ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। जिनमें ग्रीन पीस, मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ, इंटरनेशनल सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट आदि प्रमुख है । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त से जुड़ी अनेक चुनौतियां हैं जिसमें मुख्यतः दो चुनौतियों को लेकर काफी विवाद रहता है जिसे निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है :- अपर्याप्त निधि( फंड):- भारत में अधिकतर एनजीओ धनाभाव की समस्या का सामना कर रहे हैं । सरकार द्वारा गैर सरकारी संगठनों को शत प्रतिशत सहायता प्रदान नहीं की जाती और साथ ही इन को दिए जाने वाले वित्त में काफी विलंब भी होता है जिसके कारण यह अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं कर पाते । अनेक एनजीओ जोकि विदेशों से वाह्य चंदा प्राप्त करते हैं उनमें से अधिकतर काला धन शोधन में संलिप्त है और काले धन को सफेद धन में परिवर्तित करने का अवैध कार्य करते हैं। इसके साथ ही कुछ एनजीओ विदेशी धन से भारत में विकास कार्यों में भी रुकावट पैदा करते हैं ।हाल ही में ग्रीनपीस नामक एनजीओ पर इसका आरोप लगा । भारत में गैर सरकारी संगठनों के वित्त के नियमन और नियंत्रण के संदर्भ में कुछ कानून भी बनाए गए हैं जो उनके द्वारा अवैध वित्तीय क्रियाकलापों को नियंत्रित करते हैं। जैसे- फॉरेन कोंट्रीबुसन रेगुलेशन एक्ट ( एफसीआरए ) 2010, जिसके तहत प्रत्येक एनजीओ को गृह मंत्रालय के अधीन, प्रत्येक 5 वर्ष में अपने को पुनः रजिस्टर करवाना पड़ता है। इसके साथ ही काला धन शोधन को फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट ( फेमा) 1999 के तहत भी नियंत्रित किया जाता है। भारत में हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा अवैध विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसके दुरुपयोग के साथ-साथ अपने खातों का सही व्यौरा न देने के कारण, अनेक गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस निरस्त कर दिया गया । अतः गैर सरकारी संगठनों के महत्व को देखते हुए तथा इनके द्वारा समाज में किए जा रहे महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कार्यों को देखते हुए इनकी पहुंच और प्रभाविता को बढ़ाने की आवश्यकता है। ताकि समाज के सुभेद्य और सीमांत वर्गो तक पहुंचा जा सके और उनके जीवन में गुणवत्तापूर्ण विकास किया जा सके। लेकिन, साथ ही गैर सरकारी संगठनों को अपने कार्य और वित्त में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है ताकि देशी और विदेशी दोनों प्रकार के चंदो का देश के विकास में ही प्रयोग किया जा सके ।
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विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। साथ ही, शासनमें पारदर्शिता एवं जवाबदेही लानेहेतुविभिन्न माध्यमों के महत्व का उल्लेख कीजिए। (200 शब्द) Explain the concept of good governance givenby the World Bank. Also, mention the importance of various mediums to bring thetransparency and accountability in governance. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में सुशासन का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके बादशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों के महत्व का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है। समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है। सुशासन की अवधारणा को सर्वप्रथम विश्व बैंक के द्वारा 1992 मेंप्रतिपादित किया गया। विश्व बैंक के द्वारा प्रतिपादित सुशासन की आठ मौलिक विशेषताएं हैं- सुशासन सहमति उन्मुख होना चाहिए। इसमें लोगों की अधिकाधिकभागीदारी हो। उत्तरदायित्व/सवेंदनशीलता की भावना। विधि का शासन होना चाहिए। प्रभावशीलता एवं कार्यकुशलता होनी चाहिए। समता(इक्विटी) एवं समावेशन पारदर्शिता जवाबदेहिता शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों का निम्नलिखतमहत्व है- सूचना का अधिकार:- सूचना के अधिकार का महत्व, नागरिकों को सशक्त बनाने, सरकार के कार्य में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना और वास्तविक अर्थों में हमारे लोकतंत्र को लोगों के लिए कामयाब बनाना है। यह स्पष्ट हें कि एक जानकार नागरिक प्रशासन के साधनों पर आवश्यक सतर्कता बनाए रखने के लिए बेहतर सक्षम है और सरकार को अधिक जवाबदेह बनाता है। यह कानून नागरिकों को सरकार की गतिविधियों के बारे में जानकारी देने के लिए एक बड़ा कदम है। सिटिज़न चार्टर:- इसके निम्नलिखित महत्व हैं- सेवा का मानक निर्धारित करना;उदार होना और पूरी सूचना देना; परामर्श करना तथा सहभागी बनाना; पहुंच को प्रोत्साहित करना व विकल्प को बढ़ावा देना; सभी के साथ निष्पक्षता का व्यवहार; अव्यवस्था होने पर प्रणाली को व्यवस्थित करना; संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग; नवाचार और सुधार; अन्य प्रदाताओं के साथ कार्य करना इत्यादि । व्हिसल ब्लोअर:- यह कानून, नियम, विनियम का उल्लंघन और /या सार्वजनिक हितों को प्रत्यक्ष रूप से खतरा जैसे धोखाधड़ी, स्वास्थ्य / सुरक्षा का उल्लंघन और भ्रष्टाचार इत्यादि मुद्दों को उजागर करता है। अतःशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु इसका भी महत्व है इसी प्रकार ई- शासन,लोकपाल एवं लोकायुक्त, आचरण सहिंता, नीति शास्त्र सहिंता(कोड ऑफ़ एथिक्स), सामाजिक लेखा परीक्षण इत्यादि माध्यमों का भीशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने में विशेष योगदान है।
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##Question:विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। साथ ही, शासनमें पारदर्शिता एवं जवाबदेही लानेहेतुविभिन्न माध्यमों के महत्व का उल्लेख कीजिए। (200 शब्द) Explain the concept of good governance givenby the World Bank. Also, mention the importance of various mediums to bring thetransparency and accountability in governance. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में सुशासन का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके बादशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों के महत्व का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है। समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है। सुशासन की अवधारणा को सर्वप्रथम विश्व बैंक के द्वारा 1992 मेंप्रतिपादित किया गया। विश्व बैंक के द्वारा प्रतिपादित सुशासन की आठ मौलिक विशेषताएं हैं- सुशासन सहमति उन्मुख होना चाहिए। इसमें लोगों की अधिकाधिकभागीदारी हो। उत्तरदायित्व/सवेंदनशीलता की भावना। विधि का शासन होना चाहिए। प्रभावशीलता एवं कार्यकुशलता होनी चाहिए। समता(इक्विटी) एवं समावेशन पारदर्शिता जवाबदेहिता शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों का निम्नलिखतमहत्व है- सूचना का अधिकार:- सूचना के अधिकार का महत्व, नागरिकों को सशक्त बनाने, सरकार के कार्य में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना और वास्तविक अर्थों में हमारे लोकतंत्र को लोगों के लिए कामयाब बनाना है। यह स्पष्ट हें कि एक जानकार नागरिक प्रशासन के साधनों पर आवश्यक सतर्कता बनाए रखने के लिए बेहतर सक्षम है और सरकार को अधिक जवाबदेह बनाता है। यह कानून नागरिकों को सरकार की गतिविधियों के बारे में जानकारी देने के लिए एक बड़ा कदम है। सिटिज़न चार्टर:- इसके निम्नलिखित महत्व हैं- सेवा का मानक निर्धारित करना;उदार होना और पूरी सूचना देना; परामर्श करना तथा सहभागी बनाना; पहुंच को प्रोत्साहित करना व विकल्प को बढ़ावा देना; सभी के साथ निष्पक्षता का व्यवहार; अव्यवस्था होने पर प्रणाली को व्यवस्थित करना; संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग; नवाचार और सुधार; अन्य प्रदाताओं के साथ कार्य करना इत्यादि । व्हिसल ब्लोअर:- यह कानून, नियम, विनियम का उल्लंघन और /या सार्वजनिक हितों को प्रत्यक्ष रूप से खतरा जैसे धोखाधड़ी, स्वास्थ्य / सुरक्षा का उल्लंघन और भ्रष्टाचार इत्यादि मुद्दों को उजागर करता है। अतःशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु इसका भी महत्व है इसी प्रकार ई- शासन,लोकपाल एवं लोकायुक्त, आचरण सहिंता, नीति शास्त्र सहिंता(कोड ऑफ़ एथिक्स), सामाजिक लेखा परीक्षण इत्यादि माध्यमों का भीशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने में विशेष योगदान है।
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विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन के लक्षणों का उल्लेख कीजिए। साथ ही, शासनमें पारदर्शिता एवं जवाबदेही लानेहेतुविभिन्न माध्यमों के महत्व की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the characterstics of good governance givenby the World Bank. Also, explain the importance of various mediums to bring thetransparency and accountability in governance. (150-200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में सुशासन का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके बादशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों के महत्व का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है। समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है। सुशासन की अवधारणा को सर्वप्रथम विश्व बैंक के द्वारा 1992 मेंप्रतिपादित किया गया। विश्व बैंक के द्वारा प्रतिपादित सुशासन की आठ मौलिक विशेषताएं हैं- सुशासन सहमति उन्मुख होना चाहिए। इसमें लोगों की अधिकाधिकभागीदारी हो। उत्तरदायित्व/सवेंदनशीलता की भावना। विधि का शासन होना चाहिए। प्रभावशीलता एवं कार्यकुशलता होनी चाहिए। समता(इक्विटी) एवं समावेशन पारदर्शिता जवाबदेहिता शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों का निम्नलिखतमहत्व है- सूचना का अधिकार:- सूचना के अधिकार का महत्व, नागरिकों को सशक्त बनाने, सरकार के कार्य में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना और वास्तविक अर्थों में हमारे लोकतंत्र को लोगों के लिए कामयाब बनाना है। यह स्पष्ट हें कि एक जानकार नागरिक प्रशासन के साधनों पर आवश्यक सतर्कता बनाए रखने के लिए बेहतर सक्षम है और सरकार को अधिक जवाबदेह बनाता है। यह कानून नागरिकों को सरकार की गतिविधियों के बारे में जानकारी देने के लिए एक बड़ा कदम है। सिटिज़न चार्टर:- इसके निम्नलिखित महत्व हैं- सेवा का मानक निर्धारित करना;उदार होना और पूरी सूचना देना; परामर्श करना तथा सहभागी बनाना; पहुंच को प्रोत्साहित करना व विकल्प को बढ़ावा देना; सभी के साथ निष्पक्षता का व्यवहार; अव्यवस्था होने पर प्रणाली को व्यवस्थित करना; संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग; नवाचार और सुधार; अन्य प्रदाताओं के साथ कार्य करना इत्यादि। व्हिसल ब्लोअर:- यह कानून, नियम, विनियम का उल्लंघन और /या सार्वजनिक हितों को प्रत्यक्ष रूप से खतरा जैसे धोखाधड़ी, स्वास्थ्य / सुरक्षा का उल्लंघन और भ्रष्टाचार इत्यादि मुद्दों को उजागर करता है। अतःशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु इसका भी महत्व है इसी प्रकार ई- शासन,लोकपाल एवं लोकायुक्त, आचरण सहिंता, नीति शास्त्र सहिंता(कोड ऑफ़ एथिक्स), सामाजिक लेखा परीक्षण इत्यादि माध्यमों का भीशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने में विशेष योगदान है।
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##Question:विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन के लक्षणों का उल्लेख कीजिए। साथ ही, शासनमें पारदर्शिता एवं जवाबदेही लानेहेतुविभिन्न माध्यमों के महत्व की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the characterstics of good governance givenby the World Bank. Also, explain the importance of various mediums to bring thetransparency and accountability in governance. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में सुशासन का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सुशासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। इसके बादशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों के महत्व का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- सुशासन की अवधारणा को इसकी विशेषताओं या मान्यताओं के आधार पर सर्वव्यापी तरीके से परिभाषित किया जाना संभव नहीं है क्योंकि प्रत्येक देश की शासन प्रणाली पर अपने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश या वातावरण का प्रभाव होता है। समय के परिवर्तन के साथ सुशासन के मानकों में परिवर्तन का होना भी स्वाभाविक है अतः सुशासन एक गतिशील अवधारणा है। सुशासन की अवधारणा को सर्वप्रथम विश्व बैंक के द्वारा 1992 मेंप्रतिपादित किया गया। विश्व बैंक के द्वारा प्रतिपादित सुशासन की आठ मौलिक विशेषताएं हैं- सुशासन सहमति उन्मुख होना चाहिए। इसमें लोगों की अधिकाधिकभागीदारी हो। उत्तरदायित्व/सवेंदनशीलता की भावना। विधि का शासन होना चाहिए। प्रभावशीलता एवं कार्यकुशलता होनी चाहिए। समता(इक्विटी) एवं समावेशन पारदर्शिता जवाबदेहिता शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु विभिन्न माध्यमों का निम्नलिखतमहत्व है- सूचना का अधिकार:- सूचना के अधिकार का महत्व, नागरिकों को सशक्त बनाने, सरकार के कार्य में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना और वास्तविक अर्थों में हमारे लोकतंत्र को लोगों के लिए कामयाब बनाना है। यह स्पष्ट हें कि एक जानकार नागरिक प्रशासन के साधनों पर आवश्यक सतर्कता बनाए रखने के लिए बेहतर सक्षम है और सरकार को अधिक जवाबदेह बनाता है। यह कानून नागरिकों को सरकार की गतिविधियों के बारे में जानकारी देने के लिए एक बड़ा कदम है। सिटिज़न चार्टर:- इसके निम्नलिखित महत्व हैं- सेवा का मानक निर्धारित करना;उदार होना और पूरी सूचना देना; परामर्श करना तथा सहभागी बनाना; पहुंच को प्रोत्साहित करना व विकल्प को बढ़ावा देना; सभी के साथ निष्पक्षता का व्यवहार; अव्यवस्था होने पर प्रणाली को व्यवस्थित करना; संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग; नवाचार और सुधार; अन्य प्रदाताओं के साथ कार्य करना इत्यादि। व्हिसल ब्लोअर:- यह कानून, नियम, विनियम का उल्लंघन और /या सार्वजनिक हितों को प्रत्यक्ष रूप से खतरा जैसे धोखाधड़ी, स्वास्थ्य / सुरक्षा का उल्लंघन और भ्रष्टाचार इत्यादि मुद्दों को उजागर करता है। अतःशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने हेतु इसका भी महत्व है इसी प्रकार ई- शासन,लोकपाल एवं लोकायुक्त, आचरण सहिंता, नीति शास्त्र सहिंता(कोड ऑफ़ एथिक्स), सामाजिक लेखा परीक्षण इत्यादि माध्यमों का भीशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने में विशेष योगदान है।
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Explain the various quantitative measures available with the RBI to control the money supply in the economy (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE QUANTITATIVE MEASURES AVAILABLE WITH THE RBI TO CONTROL THE MONEY SUPPLY IN THE ECONOMY - CONCLUSION Answer:- The Reserve Bank of India (RBI) is the controller of credit, created by commercial banks in the economy. It controls the credit on the basis of two methods, which are also known as credit controllers. These are quantitative and qualitative measures. THE QUANTITATIVE MEASURES AVAILABLE WITH THE RBI TO CONTROL THE MONEY SUPPLY IN THE ECONOMY 1) BANK RATE It is that rate of interest at which the central bank of a country provides re-financing facilities/ re-discounting facilities to the various commercial banks. 1.1) At present, this rate is 6% (A few days ago, it was 6.25%) 1.2) The bank rate has been aligned to the MSF rate, and therefore it changes automatically as and when the MSF rate changes alongside policy repo-rate changes. 1.3) The RBI increases the bank rate during inflation and decreases it during the slowdown/ recession. 2) CASH RESERVE RATIO (CRR) The CRR is that ratio of the average daily balance of the net demand and time liabilities (NDTL), which a bank has to necessarily keep with the central bank of the country in the form of cash. 2.1) The current CRR is 4% 2.2) When the CRR is increased, it is called a tight monetary policy and when it is decreased, it is called a liberal credit policy. 3) STATUTORY LIQUIDITY RATIO (SLR) It is that ratio of the NDTL of the banks in India that banks maintain with themselves at any given point of time in the form of liquid assets such as cash, gold, government securities. 3.1) At present, this ratio is 19% 3.2) The purpose of SLR is two-fold: · It enables the government to borrow from the banking system · On the other hand, it ensures that there is enough cash with the bank so as to avoid a run on the bank 4) REPO AND REVERSE REPO RATE Open market operations are the operations conducted by the central bank of a country from time to time, under which it keeps on buying government securities from banks or financial institutions and also keeps selling to banks and financial institutions. 4.1) It generals sell government securities at the time of inflation and buys government securities during the time of recession. 4.2) Repo means repurchase options. Repos are essentially a short term auction conducted by the RBI in India since 1992, so as to even out the short term fluctuations in the money market. Thus, the RBI frequently adopts re-purchase options so as to keep control of the short-term fluctuations of demand and supply, of credit and money in the market. 4.3) Repo means the injection on liquidity in the market through the buying of securities from the bank with the agreement to sell them back at a fixed date. Reverse repo means the absorption of liquidity by the RBI through the borrowing of funds from banks/ financial institutions in the short-term. 4.4) After the 2nd of October, 2013, the RBI is making repo of different tenures such as 7, 14, 28 and 56 days. 4.5) The current repo rate is 5.75%, while the reverse repo rate is 5.5% 5) MARGINAL STANDING FACILITY (MSF) The MSF is a facility under which the scheduled commercial banks can borrow additional amount of overnight money from the RBI by dipping into their SLR portfolios (currently 1% of NDTL) at a penal rate of interest, currently 25 basis points above the repo rate. This provides a safety valve against un-anticipated liquidity shocks to the banking system. At present, the MSF rate is 6%. RATIOS----> CRR SLR REPO-RATE REVERSE REPO-RATE MSF BANK RATE CURRENT RATE 4% 19% 5.75% 5.5% 6% 6% ( The graph taught by sir regarding Interest Rate Corridor can also be inserted here- difference/ corridor between MSF and reverse-repo rate) The qualitative measures used by the RBI are rationing of credit, regulating loans for consumption purposes, variation is marginal requirements, moral suasion and direct action.
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##Question:Explain the various quantitative measures available with the RBI to control the money supply in the economy (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE QUANTITATIVE MEASURES AVAILABLE WITH THE RBI TO CONTROL THE MONEY SUPPLY IN THE ECONOMY - CONCLUSION Answer:- The Reserve Bank of India (RBI) is the controller of credit, created by commercial banks in the economy. It controls the credit on the basis of two methods, which are also known as credit controllers. These are quantitative and qualitative measures. THE QUANTITATIVE MEASURES AVAILABLE WITH THE RBI TO CONTROL THE MONEY SUPPLY IN THE ECONOMY 1) BANK RATE It is that rate of interest at which the central bank of a country provides re-financing facilities/ re-discounting facilities to the various commercial banks. 1.1) At present, this rate is 6% (A few days ago, it was 6.25%) 1.2) The bank rate has been aligned to the MSF rate, and therefore it changes automatically as and when the MSF rate changes alongside policy repo-rate changes. 1.3) The RBI increases the bank rate during inflation and decreases it during the slowdown/ recession. 2) CASH RESERVE RATIO (CRR) The CRR is that ratio of the average daily balance of the net demand and time liabilities (NDTL), which a bank has to necessarily keep with the central bank of the country in the form of cash. 2.1) The current CRR is 4% 2.2) When the CRR is increased, it is called a tight monetary policy and when it is decreased, it is called a liberal credit policy. 3) STATUTORY LIQUIDITY RATIO (SLR) It is that ratio of the NDTL of the banks in India that banks maintain with themselves at any given point of time in the form of liquid assets such as cash, gold, government securities. 3.1) At present, this ratio is 19% 3.2) The purpose of SLR is two-fold: · It enables the government to borrow from the banking system · On the other hand, it ensures that there is enough cash with the bank so as to avoid a run on the bank 4) REPO AND REVERSE REPO RATE Open market operations are the operations conducted by the central bank of a country from time to time, under which it keeps on buying government securities from banks or financial institutions and also keeps selling to banks and financial institutions. 4.1) It generals sell government securities at the time of inflation and buys government securities during the time of recession. 4.2) Repo means repurchase options. Repos are essentially a short term auction conducted by the RBI in India since 1992, so as to even out the short term fluctuations in the money market. Thus, the RBI frequently adopts re-purchase options so as to keep control of the short-term fluctuations of demand and supply, of credit and money in the market. 4.3) Repo means the injection on liquidity in the market through the buying of securities from the bank with the agreement to sell them back at a fixed date. Reverse repo means the absorption of liquidity by the RBI through the borrowing of funds from banks/ financial institutions in the short-term. 4.4) After the 2nd of October, 2013, the RBI is making repo of different tenures such as 7, 14, 28 and 56 days. 4.5) The current repo rate is 5.75%, while the reverse repo rate is 5.5% 5) MARGINAL STANDING FACILITY (MSF) The MSF is a facility under which the scheduled commercial banks can borrow additional amount of overnight money from the RBI by dipping into their SLR portfolios (currently 1% of NDTL) at a penal rate of interest, currently 25 basis points above the repo rate. This provides a safety valve against un-anticipated liquidity shocks to the banking system. At present, the MSF rate is 6%. RATIOS----> CRR SLR REPO-RATE REVERSE REPO-RATE MSF BANK RATE CURRENT RATE 4% 19% 5.75% 5.5% 6% 6% ( The graph taught by sir regarding Interest Rate Corridor can also be inserted here- difference/ corridor between MSF and reverse-repo rate) The qualitative measures used by the RBI are rationing of credit, regulating loans for consumption purposes, variation is marginal requirements, moral suasion and direct action.
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Discuss how China is posing a threat to India"s border security and suggest a way forward for resolving them?(150 words/10 marks)
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Approach : • Give a brief account of India-China relations • Discuss India-China border issues or problems along with other issues. • Mentions the steps taken and Suggest a way forward Answer: The rise of India and China as two major economic and political actors in both regional and global politics has caught global attention. The two emerging and enduring powers representing two modes of civilization signify a complex and dynamic relationship in world politics. India-China border Issues : • Unsettled and disputed boundaries: India has border disputes with China at Arunanchal Pradesh, Aksai Chin and Sikkim ( Doklam issue). China’s aggressiveness is causing a lot of trouble to India as well as Indians living in these disputed areas. • China is maintaining good relations with India’s neighbours to isolate India. For example, China is developing its rail and roadways to Tibet and Nepal under the Sino-Nepal friendship treaty, which poses a security threat to India. • China-Pakistan Economic Corridor passes through India’s territory, without the permission of India. • China showed no concern for McMohan Line (1914 Simla Convention signed between the British and the Tibetan representatives) which it said was imposed by “imperialists.” • China’s role in India’s internal security threats in this phase has been wide-ranging: clandestine support to militant groups, no objection to Indian insurgent leaders taking asylum in its territory, turning a blind eye to Chinese arms flows into India and conducting cyber warfare. It went on to revive its contacts with old militant groups like NSCN and PLA and extended support to newer groups like the United Liberation Front of Asom (ULFA), National Democratic Front of Bodoland (NDFB) and All Tripura Tiger Force (ATTF). Other issues: • India is importing Chinese goods in large amounts. These products are cheaper than Indian ones, which is a threat to Indian manufacturers. • China is devaluing its currency. It is a threat to not just India but many other countries, which are importing Chinese goods. Because with fewer costs, Indian traders are more likely to increase their imports leading to a reduction of prices, i.e. deflation. • China is turning into a competition to India in exporting some goods to other countries. Recently China has started exporting its manufacturing goods to the United Kingdom by train to reduce its cost of export and gave tough competition to India. • Chinese software professionals are the biggest competition for Indian software professionals working in Foreign countries, especially in the USA and Europe. Steps taken: • In July 1976, both countries restored ambassador-level relations. Higher political contacts were revived with the visit of the then-Indian External Affairs Minister, Atal Bihari Vajpayee to China in February 1979. • During the visits, the two governments had agreed to commence negotiations based on the ‘Five Principles of Peaceful Coexistence. It was agreed to establish a Joint Working Group (JWG) to seek a fair, reasonable and mutually acceptable solution to the boundary question and set up a Joint Economic Group (JEG). • Both Delhi and Beijing seemed to be convinced that only an assertive policy will work and for the past few years, they have been exploiting leverages and pressures, particularly with respect to India’s US tilt and China’s Pak tilt. • PM Modi during his visit to China attempted a course correction. It is being called a ‘reset’. Way Forward: • There is a need to take a fresh look at the modus vivendi. The existing ones do not really address the issue in a forthright way. We need to build on the positives of the relationship and take forward the agreements reached in 2014 during Xi Jinping’s visit to India and PM Modi’s visit to China in 2015. • Both countries should acknowledge the existing convergence of interests in the international sphere, for example in West Asia and Afghanistan. • Treaty of Good-Neighbourliness and Friendly Cooperation, early harvest on the border issue and alignment of the BRI with India’s development strategy. • Strengthening people–to–people contact would help in bridging the trust gap.
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##Question:Discuss how China is posing a threat to India"s border security and suggest a way forward for resolving them?(150 words/10 marks)##Answer:Approach : • Give a brief account of India-China relations • Discuss India-China border issues or problems along with other issues. • Mentions the steps taken and Suggest a way forward Answer: The rise of India and China as two major economic and political actors in both regional and global politics has caught global attention. The two emerging and enduring powers representing two modes of civilization signify a complex and dynamic relationship in world politics. India-China border Issues : • Unsettled and disputed boundaries: India has border disputes with China at Arunanchal Pradesh, Aksai Chin and Sikkim ( Doklam issue). China’s aggressiveness is causing a lot of trouble to India as well as Indians living in these disputed areas. • China is maintaining good relations with India’s neighbours to isolate India. For example, China is developing its rail and roadways to Tibet and Nepal under the Sino-Nepal friendship treaty, which poses a security threat to India. • China-Pakistan Economic Corridor passes through India’s territory, without the permission of India. • China showed no concern for McMohan Line (1914 Simla Convention signed between the British and the Tibetan representatives) which it said was imposed by “imperialists.” • China’s role in India’s internal security threats in this phase has been wide-ranging: clandestine support to militant groups, no objection to Indian insurgent leaders taking asylum in its territory, turning a blind eye to Chinese arms flows into India and conducting cyber warfare. It went on to revive its contacts with old militant groups like NSCN and PLA and extended support to newer groups like the United Liberation Front of Asom (ULFA), National Democratic Front of Bodoland (NDFB) and All Tripura Tiger Force (ATTF). Other issues: • India is importing Chinese goods in large amounts. These products are cheaper than Indian ones, which is a threat to Indian manufacturers. • China is devaluing its currency. It is a threat to not just India but many other countries, which are importing Chinese goods. Because with fewer costs, Indian traders are more likely to increase their imports leading to a reduction of prices, i.e. deflation. • China is turning into a competition to India in exporting some goods to other countries. Recently China has started exporting its manufacturing goods to the United Kingdom by train to reduce its cost of export and gave tough competition to India. • Chinese software professionals are the biggest competition for Indian software professionals working in Foreign countries, especially in the USA and Europe. Steps taken: • In July 1976, both countries restored ambassador-level relations. Higher political contacts were revived with the visit of the then-Indian External Affairs Minister, Atal Bihari Vajpayee to China in February 1979. • During the visits, the two governments had agreed to commence negotiations based on the ‘Five Principles of Peaceful Coexistence. It was agreed to establish a Joint Working Group (JWG) to seek a fair, reasonable and mutually acceptable solution to the boundary question and set up a Joint Economic Group (JEG). • Both Delhi and Beijing seemed to be convinced that only an assertive policy will work and for the past few years, they have been exploiting leverages and pressures, particularly with respect to India’s US tilt and China’s Pak tilt. • PM Modi during his visit to China attempted a course correction. It is being called a ‘reset’. Way Forward: • There is a need to take a fresh look at the modus vivendi. The existing ones do not really address the issue in a forthright way. We need to build on the positives of the relationship and take forward the agreements reached in 2014 during Xi Jinping’s visit to India and PM Modi’s visit to China in 2015. • Both countries should acknowledge the existing convergence of interests in the international sphere, for example in West Asia and Afghanistan. • Treaty of Good-Neighbourliness and Friendly Cooperation, early harvest on the border issue and alignment of the BRI with India’s development strategy. • Strengthening people–to–people contact would help in bridging the trust gap.
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संसद में विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में विभिन्न प्रकार के विधेयकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। इसके साथ ही साधारण विधेयक एवं धन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Briefly describe different types of bills in the context of the legislative process in parliament. Also, clarify the difference between the ordinary bill and the money Bill. (150-200 words/10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसद में प्रस्तुत विधेयकों का परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिये। साधारण एवं धन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिये। विधायी प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में सम्पन्न होती है। प्रत्येक सदन में विधेयक विभिन्न चरणों से गुजरता है। संसद में प्रस्तुत होने वाले विधेयकों को निम्न चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: साधारण विधेयक: वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी विषयों से सम्बद्ध विधेयक साधारण विधेयक कहलाते हैं। धन विधेयक: ये विधेयक वित्तीय विषयों जैसे -करारोपण, लोक व्यय इत्यादि से संबन्धित होते हैं। वित्त विधेयक: ये विधेयक भी वित्तीय विषयों से ही संबन्धित होते हैं परंतु धन विधेयक से भिन्न होते हैं। संविधान संशोधन विधेयक: ये विधेयक संविधान उपबंधों में संशोधन से संबन्धित होते हैं। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जाता है। साधारण विधेयक एवं धन विधेयक में अंतर: साधारण विधेयक धन विधेयक इसे लोकसभा या राज्यसभा काही भी पुरः स्थापित किया जा सकता है। इसे सिर्फ लोकसभा में पुरः स्थापित किया जा सकता है। इसे मंत्री या गैर सरकारी सदस्य दोनों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। इसे सिर्फ मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह बिना राष्ट्रपति की संतुति के प्रस्तुत किया अजाता है इसके लिए राष्ट्रपति की संतुति आवश्यक है। इसे राज्यसभा अधिकतम 6 माह के लिए रोक सकती है इसे राज्यसभा अधिकतम 14 दिन के लिए रोक सकती है। राज्यसभा में भेजने के लिए अध्यक्ष के प्रमाणन की जरूरत नहीं होती है। इसे अध्यक्ष के प्रमाणन की जरूरत होती है। इसे दोनों सदनों से पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा जाता है। इसे सिर्फ लोकसभा से पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। संयुक्त बैठक जैसी कोई व्यवस्था नहीं है । असहमति की अवस्था में राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकता है। ऐसे विधेयकों को राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जा सकता है। ऐसे विधेयक एक बार पास होने के पश्चात पुनर्विचार हेतु वापस नहीं किया जा सकता है।
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##Question:संसद में विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में विभिन्न प्रकार के विधेयकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। इसके साथ ही साधारण विधेयक एवं धन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Briefly describe different types of bills in the context of the legislative process in parliament. Also, clarify the difference between the ordinary bill and the money Bill. (150-200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसद में प्रस्तुत विधेयकों का परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिये। साधारण एवं धन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिये। विधायी प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में सम्पन्न होती है। प्रत्येक सदन में विधेयक विभिन्न चरणों से गुजरता है। संसद में प्रस्तुत होने वाले विधेयकों को निम्न चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: साधारण विधेयक: वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी विषयों से सम्बद्ध विधेयक साधारण विधेयक कहलाते हैं। धन विधेयक: ये विधेयक वित्तीय विषयों जैसे -करारोपण, लोक व्यय इत्यादि से संबन्धित होते हैं। वित्त विधेयक: ये विधेयक भी वित्तीय विषयों से ही संबन्धित होते हैं परंतु धन विधेयक से भिन्न होते हैं। संविधान संशोधन विधेयक: ये विधेयक संविधान उपबंधों में संशोधन से संबन्धित होते हैं। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जाता है। साधारण विधेयक एवं धन विधेयक में अंतर: साधारण विधेयक धन विधेयक इसे लोकसभा या राज्यसभा काही भी पुरः स्थापित किया जा सकता है। इसे सिर्फ लोकसभा में पुरः स्थापित किया जा सकता है। इसे मंत्री या गैर सरकारी सदस्य दोनों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। इसे सिर्फ मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह बिना राष्ट्रपति की संतुति के प्रस्तुत किया अजाता है इसके लिए राष्ट्रपति की संतुति आवश्यक है। इसे राज्यसभा अधिकतम 6 माह के लिए रोक सकती है इसे राज्यसभा अधिकतम 14 दिन के लिए रोक सकती है। राज्यसभा में भेजने के लिए अध्यक्ष के प्रमाणन की जरूरत नहीं होती है। इसे अध्यक्ष के प्रमाणन की जरूरत होती है। इसे दोनों सदनों से पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा जाता है। इसे सिर्फ लोकसभा से पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। संयुक्त बैठक जैसी कोई व्यवस्था नहीं है । असहमति की अवस्था में राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकता है। ऐसे विधेयकों को राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जा सकता है। ऐसे विधेयक एक बार पास होने के पश्चात पुनर्विचार हेतु वापस नहीं किया जा सकता है।
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सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | भारत सरकार द्वारा दिव्यांग जनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु किये जाने वाले प्रयासों की चर्चा कीजिये | (200शब्द) Explain the concept of social security. Discuss the efforts made by the Government of India for social security for the Divyangjan.
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एप्रोच - भूमिका में सामजिक सुरक्षा की अवधारणा को विस्तार पूर्वक बताइए | इसके बाद दिव्यान्गजनों के लिए किये गए सामाजिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है किसी समाज में सामूहिक स्तर पर समाज के अत्यधिक वंचित समुदायों की प्रगति के लिए किये जा रहे अतिरिक्त प्रयास | भारत में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत इस सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाता है | इससे अनुच्छेद 41 के अंतर्गत वृद्धजन , दिव्यान्गजन ; अनुच्छेद 46 के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं जनजाति ; अनुछेद 39 (E F ) के अंतर्गत बाल मजदूरों इत्यादि को रखा गया है | दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु प्रयास - विकलांगता/ दिव्यान्गता से तात्पर्य किसी व्यक्ति में शारीरिक अक्षमता के कारण जीवन स्तर प्रतिकूल प्रभाव से है |इन दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - अनुच्छेद 41 के प्रावधान 1995 PWD कानून - इसके अंतर्गत स्वास्थ्य लाभ एवं कृत्रिम अंगों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के सन्दर्भ में प्रयास किये गए | वर्ष 2016 में इस कानून को संशोधित कर के RPWD कर दिया गया जो संयुक्त राष्ट्र विकलांग सशक्तिकरण 2006 के मानकों पर खरा उतरता है | इस नए कानून के अंतर्गन 21 विकलांग श्रेणियों को विभक्त किया गया है , साथ ही यदि 60% दिव्यान्गता हो तो बेंच मार्क विकलांगता कहा गया | वर्ष 1997 में राष्ट्रीय विकलांगजनों हेतु वित्तीय विकास आयोग का गठन किया गया | वर्ष 2003 में दीनदयाल उपाध्याय संस्थानों द्वारा दिव्यान्गजनों को कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध किया जा रहा है | 2016-17 सुगम्य भारतीय अभियान के अंतर्गत अवसंरचना को दिव्यांगजनों हेतु 2020 तक शत प्रतिशत सुलभ बनाना सुनिश्चित किया जा रहा है , जिससे दिव्यान्गजनों को और अधिक लाभ पहुंचाया जा सके | उपर्युक्त प्रयासों को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु लगातार नए कानूनों एवं प्रावधानों के माध्यम से प्रयास किये जा रहे हैं , जो कि काफी हद तक सफल भी रहे हैं |
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##Question:सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | भारत सरकार द्वारा दिव्यांग जनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु किये जाने वाले प्रयासों की चर्चा कीजिये | (200शब्द) Explain the concept of social security. Discuss the efforts made by the Government of India for social security for the Divyangjan.##Answer:एप्रोच - भूमिका में सामजिक सुरक्षा की अवधारणा को विस्तार पूर्वक बताइए | इसके बाद दिव्यान्गजनों के लिए किये गए सामाजिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है किसी समाज में सामूहिक स्तर पर समाज के अत्यधिक वंचित समुदायों की प्रगति के लिए किये जा रहे अतिरिक्त प्रयास | भारत में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत इस सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाता है | इससे अनुच्छेद 41 के अंतर्गत वृद्धजन , दिव्यान्गजन ; अनुच्छेद 46 के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं जनजाति ; अनुछेद 39 (E F ) के अंतर्गत बाल मजदूरों इत्यादि को रखा गया है | दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु प्रयास - विकलांगता/ दिव्यान्गता से तात्पर्य किसी व्यक्ति में शारीरिक अक्षमता के कारण जीवन स्तर प्रतिकूल प्रभाव से है |इन दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - अनुच्छेद 41 के प्रावधान 1995 PWD कानून - इसके अंतर्गत स्वास्थ्य लाभ एवं कृत्रिम अंगों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के सन्दर्भ में प्रयास किये गए | वर्ष 2016 में इस कानून को संशोधित कर के RPWD कर दिया गया जो संयुक्त राष्ट्र विकलांग सशक्तिकरण 2006 के मानकों पर खरा उतरता है | इस नए कानून के अंतर्गन 21 विकलांग श्रेणियों को विभक्त किया गया है , साथ ही यदि 60% दिव्यान्गता हो तो बेंच मार्क विकलांगता कहा गया | वर्ष 1997 में राष्ट्रीय विकलांगजनों हेतु वित्तीय विकास आयोग का गठन किया गया | वर्ष 2003 में दीनदयाल उपाध्याय संस्थानों द्वारा दिव्यान्गजनों को कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध किया जा रहा है | 2016-17 सुगम्य भारतीय अभियान के अंतर्गत अवसंरचना को दिव्यांगजनों हेतु 2020 तक शत प्रतिशत सुलभ बनाना सुनिश्चित किया जा रहा है , जिससे दिव्यान्गजनों को और अधिक लाभ पहुंचाया जा सके | उपर्युक्त प्रयासों को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु लगातार नए कानूनों एवं प्रावधानों के माध्यम से प्रयास किये जा रहे हैं , जो कि काफी हद तक सफल भी रहे हैं |
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सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जो सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करते हैं|( 150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the need to ensure accountability of the government. Along with this, discuss those tools which ensure the accountability of the government. (150-200 Words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में जनता द्वारा शक्तियों के प्रत्यायोजन को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से संसद सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है 4- अंतिम में कुछ सीमाओं और समाधान बताते हुए उत्तर स्पष्ट कीजिये| संसदीय शासन प्रणाली में शासन के सुचारू संचालन के लिए एक संगठित निकाय की आवश्यकता होती है| यह संगठित निकाय शासन के सन्दर्भ में जनता का प्रतिनिधित्व करता है| इस निकाय अथवा सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया होता है| संसदीय शासन प्रणाली में प्रत्यायोजन का क्रम जनता से होकर संसद, संसद के माध्यम से मंत्रिपरिषद, मंत्रिपरिषद के अंतर्गत मंत्रिमंडल से होते हुए प्रधानमन्त्री तक जाता है| अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए| इसीलिए कहा जाता है| यदि शक्तियों का प्रत्यायोजन न हुआ होता तो जवाबदेहिता सुनिश्चित नही की जा सकती थी| सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता · संसदीय शासन प्रणाली की मूल विचारधारा के अनुरूप शासन हेतु सरकार को संसद के प्रति जवाबदेह माना गया है| · इस जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाना अनिवार्य है| · सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए · जनता के प्रति जवाबदेहिता सुनिश्चित करने हेतु यह दायित्व संसद को सौंपा गया जो कि देश कासर्वोच्च जन प्रतिनिधित्व निकायहै| · समाज के संरक्षक के रूप में सरकार को दायित्व सौंपा गया है एवं इस उद्देश्य से सरकार के द्वारा स्वनिर्णय या विवेकी शक्तियों का अभ्यास किया जाता है जिसके दुरुपयोग की संभावनाएं बनी रहती हैं एवं इसकी रोकथाम की दिशा में सरकार की जवाबदेहिता का होना अति आवश्यक है(गार्डियन को भी गार्ड करना आवश्यक है) · संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण करने का मौलिक उद्देश्य आम जनता व्यापक हितों को सुनिश्चित किये जाने से है| जिसकी प्रकृति प्रत्यक्ष, आंतरिक एवं सकारात्मक-नकारात्मक दोनों है| · यह नियंत्रण आंतरिक होगा क्योंकि सरकार संसद का अभिन्न अंग होती है| संसद के प्रति सरकार की यह जवाबदेहिता प्रत्यक्ष होती है जबकि जनता के प्रति यह जवाबदेहिता परोक्ष है| संसद द्वारा जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के उपकरण · संसद के द्वारा विभिन्न माध्यमों या साधनों या तकनीकों के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाता है ताकि सरकार की जवाबदेहिता को सुनिश्चित किया जा सके|जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, धन्यवाद प्रस्ताव · स्थगन प्रस्ताव/कामरोको प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना होता है · ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर मंत्री के ध्यान को आकर्षित करना होता है| यह भारत के संसदीय नवाचार का एक परिणाम है · अविश्वास प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार समर्थन में प्राप्त बहुमत की पुष्टि या परीक्षण करना है) अब तक भारत में कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव आ चुके हैं अंतिम बार जुलाई 2018 मेंआया था| · निंदा प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार की नीतियों की आलोचना किये जाने से है| · कटौती प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार के द्वारा प्रस्तुत अनुदान की मांग पर चर्चा एवं विचार-विमर्श किये जाने से है · आधे घंटे की चर्चा, जिन प्रश्नों का उत्तर मंत्री दे चुका हो उन पर पुनः चर्चा करने के लिए इसको आयोजित किया जाता है · CAG के द्वारा किया जाने वाले लेखा परीक्षण पर चर्चा, ध्यातव्य है कि भारत सरकार के लेखा का दायित्व CGA(कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स) का है|दोनों अलग पद है| जहाँ CAG एक संवैधानिक पद है वहीँ CGA एक कार्यकारी पद है जो वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है| · संसदीय समितियां यथा; संसद की वित्तीय समितियां, गैर वित्तीय समितियां एवं संसद की विभागीय स्थायी समितियां (संख्या 24) इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संसद विभिन्न उपकरणों, प्रक्रियाओं के माध्यम से सरकार पर नियंत्रण स्थापित करती है और इस प्रकार सरकार के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करती है| तथापि सरकार को संसद में प्राप्त बहुमत, तकनीकी ज्ञान और दक्षता का न होना, कमजोर और अप्रभावी विपक्ष, संसद के पास समयाभाव आदिकारणों से संसद के द्वारा सरकार पर किये जाने वाले नियंत्रण को मात्र मिथ्या माना जाता है किन्तु सरकार द्वारा संसद द्वारा पारित कानून के अधीन रह कर कार्य किया जाता है और अंतिम रूप से जन मत की संतुष्ट करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है अतः सरकार पर संसद का नियंत्रण मिथ्या नहीं माना जा सकता है|
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##Question:सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जो सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करते हैं|( 150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the need to ensure accountability of the government. Along with this, discuss those tools which ensure the accountability of the government. (150-200 Words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जनता द्वारा शक्तियों के प्रत्यायोजन को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से संसद सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है 4- अंतिम में कुछ सीमाओं और समाधान बताते हुए उत्तर स्पष्ट कीजिये| संसदीय शासन प्रणाली में शासन के सुचारू संचालन के लिए एक संगठित निकाय की आवश्यकता होती है| यह संगठित निकाय शासन के सन्दर्भ में जनता का प्रतिनिधित्व करता है| इस निकाय अथवा सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया होता है| संसदीय शासन प्रणाली में प्रत्यायोजन का क्रम जनता से होकर संसद, संसद के माध्यम से मंत्रिपरिषद, मंत्रिपरिषद के अंतर्गत मंत्रिमंडल से होते हुए प्रधानमन्त्री तक जाता है| अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए| इसीलिए कहा जाता है| यदि शक्तियों का प्रत्यायोजन न हुआ होता तो जवाबदेहिता सुनिश्चित नही की जा सकती थी| सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता · संसदीय शासन प्रणाली की मूल विचारधारा के अनुरूप शासन हेतु सरकार को संसद के प्रति जवाबदेह माना गया है| · इस जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाना अनिवार्य है| · सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए · जनता के प्रति जवाबदेहिता सुनिश्चित करने हेतु यह दायित्व संसद को सौंपा गया जो कि देश कासर्वोच्च जन प्रतिनिधित्व निकायहै| · समाज के संरक्षक के रूप में सरकार को दायित्व सौंपा गया है एवं इस उद्देश्य से सरकार के द्वारा स्वनिर्णय या विवेकी शक्तियों का अभ्यास किया जाता है जिसके दुरुपयोग की संभावनाएं बनी रहती हैं एवं इसकी रोकथाम की दिशा में सरकार की जवाबदेहिता का होना अति आवश्यक है(गार्डियन को भी गार्ड करना आवश्यक है) · संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण करने का मौलिक उद्देश्य आम जनता व्यापक हितों को सुनिश्चित किये जाने से है| जिसकी प्रकृति प्रत्यक्ष, आंतरिक एवं सकारात्मक-नकारात्मक दोनों है| · यह नियंत्रण आंतरिक होगा क्योंकि सरकार संसद का अभिन्न अंग होती है| संसद के प्रति सरकार की यह जवाबदेहिता प्रत्यक्ष होती है जबकि जनता के प्रति यह जवाबदेहिता परोक्ष है| संसद द्वारा जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के उपकरण · संसद के द्वारा विभिन्न माध्यमों या साधनों या तकनीकों के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाता है ताकि सरकार की जवाबदेहिता को सुनिश्चित किया जा सके|जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, धन्यवाद प्रस्ताव · स्थगन प्रस्ताव/कामरोको प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना होता है · ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर मंत्री के ध्यान को आकर्षित करना होता है| यह भारत के संसदीय नवाचार का एक परिणाम है · अविश्वास प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार समर्थन में प्राप्त बहुमत की पुष्टि या परीक्षण करना है) अब तक भारत में कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव आ चुके हैं अंतिम बार जुलाई 2018 मेंआया था| · निंदा प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार की नीतियों की आलोचना किये जाने से है| · कटौती प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार के द्वारा प्रस्तुत अनुदान की मांग पर चर्चा एवं विचार-विमर्श किये जाने से है · आधे घंटे की चर्चा, जिन प्रश्नों का उत्तर मंत्री दे चुका हो उन पर पुनः चर्चा करने के लिए इसको आयोजित किया जाता है · CAG के द्वारा किया जाने वाले लेखा परीक्षण पर चर्चा, ध्यातव्य है कि भारत सरकार के लेखा का दायित्व CGA(कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स) का है|दोनों अलग पद है| जहाँ CAG एक संवैधानिक पद है वहीँ CGA एक कार्यकारी पद है जो वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है| · संसदीय समितियां यथा; संसद की वित्तीय समितियां, गैर वित्तीय समितियां एवं संसद की विभागीय स्थायी समितियां (संख्या 24) इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संसद विभिन्न उपकरणों, प्रक्रियाओं के माध्यम से सरकार पर नियंत्रण स्थापित करती है और इस प्रकार सरकार के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करती है| तथापि सरकार को संसद में प्राप्त बहुमत, तकनीकी ज्ञान और दक्षता का न होना, कमजोर और अप्रभावी विपक्ष, संसद के पास समयाभाव आदिकारणों से संसद के द्वारा सरकार पर किये जाने वाले नियंत्रण को मात्र मिथ्या माना जाता है किन्तु सरकार द्वारा संसद द्वारा पारित कानून के अधीन रह कर कार्य किया जाता है और अंतिम रूप से जन मत की संतुष्ट करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है अतः सरकार पर संसद का नियंत्रण मिथ्या नहीं माना जा सकता है|
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सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | भारत सरकार द्वारा दिव्यांग जनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु किये जाने वाले प्रयासों की चर्चा कीजिये | (200शब्द) Explain the concept of social security. Discuss the efforts made by the Government of India for social security for the Divyangjan.
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एप्रोच - भूमिका में सामजिक सुरक्षा की अवधारणा को विस्तार पूर्वक बताइए | इसके बाद दिव्यान्गजनों के लिए किये गए सामाजिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है किसी समाज में सामूहिक स्तर पर समाज के अत्यधिक वंचित समुदायों की प्रगति के लिए किये जा रहे अतिरिक्त प्रयास | भारत में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत इस सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाता है | इससे अनुच्छेद 41 के अंतर्गत वृद्धजन , दिव्यान्गजन ; अनुच्छेद 46 के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं जनजाति ; अनुछेद 39 (E F ) के अंतर्गत बाल मजदूरों इत्यादि को रखा गया है | दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु प्रयास - विकलांगता/ दिव्यान्गता से तात्पर्य किसी व्यक्ति में शारीरिक अक्षमता के कारण जीवन स्तर प्रतिकूल प्रभाव से है |इन दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - अनुच्छेद 41 के प्रावधान 1995 PWD कानून - इसके अंतर्गत स्वास्थ्य लाभ एवं कृत्रिम अंगों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के सन्दर्भ में प्रयास किये गए | वर्ष 2016 में इस कानून को संशोधित कर के RPWD कर दिया गया जो संयुक्त राष्ट्र विकलांग सशक्तिकरण 2006 के मानकों पर खरा उतरता है | इस नए कानून के अंतर्गन 21 विकलांग श्रेणियों को विभक्त किया गया है , साथ ही यदि 60% दिव्यान्गता हो तो बेंच मार्क विकलांगता कहा गया | वर्ष 1997 में राष्ट्रीय विकलांगजनों हेतु वित्तीय विकास आयोग का गठन किया गया | वर्ष 2003 में दीनदयाल उपाध्याय संस्थानों द्वारा दिव्यान्गजनों को कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध किया जा रहा है | 2016-17 सुगम्य भारतीय अभियान के अंतर्गत अवसंरचना को दिव्यांगजनों हेतु 2020 तक शत प्रतिशत सुलभ बनाना सुनिश्चित किया जा रहा है , जिससे दिव्यान्गजनों को और अधिक लाभ पहुंचाया जा सके | उपर्युक्त प्रयासों को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु लगातार नए कानूनों एवं प्रावधानों के माध्यम से प्रयास किये जा रहे हैं , जो कि काफी हद तक सफल भी रहे हैं |
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##Question:सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये | भारत सरकार द्वारा दिव्यांग जनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु किये जाने वाले प्रयासों की चर्चा कीजिये | (200शब्द) Explain the concept of social security. Discuss the efforts made by the Government of India for social security for the Divyangjan.##Answer:एप्रोच - भूमिका में सामजिक सुरक्षा की अवधारणा को विस्तार पूर्वक बताइए | इसके बाद दिव्यान्गजनों के लिए किये गए सामाजिक कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है किसी समाज में सामूहिक स्तर पर समाज के अत्यधिक वंचित समुदायों की प्रगति के लिए किये जा रहे अतिरिक्त प्रयास | भारत में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत इस सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाता है | इससे अनुच्छेद 41 के अंतर्गत वृद्धजन , दिव्यान्गजन ; अनुच्छेद 46 के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं जनजाति ; अनुछेद 39 (E F ) के अंतर्गत बाल मजदूरों इत्यादि को रखा गया है | दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु प्रयास - विकलांगता/ दिव्यान्गता से तात्पर्य किसी व्यक्ति में शारीरिक अक्षमता के कारण जीवन स्तर प्रतिकूल प्रभाव से है |इन दिव्यान्गजनों की सामाजिक सुरक्षा के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं - अनुच्छेद 41 के प्रावधान 1995 PWD कानून - इसके अंतर्गत स्वास्थ्य लाभ एवं कृत्रिम अंगों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के सन्दर्भ में प्रयास किये गए | वर्ष 2016 में इस कानून को संशोधित कर के RPWD कर दिया गया जो संयुक्त राष्ट्र विकलांग सशक्तिकरण 2006 के मानकों पर खरा उतरता है | इस नए कानून के अंतर्गन 21 विकलांग श्रेणियों को विभक्त किया गया है , साथ ही यदि 60% दिव्यान्गता हो तो बेंच मार्क विकलांगता कहा गया | वर्ष 1997 में राष्ट्रीय विकलांगजनों हेतु वित्तीय विकास आयोग का गठन किया गया | वर्ष 2003 में दीनदयाल उपाध्याय संस्थानों द्वारा दिव्यान्गजनों को कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध किया जा रहा है | 2016-17 सुगम्य भारतीय अभियान के अंतर्गत अवसंरचना को दिव्यांगजनों हेतु 2020 तक शत प्रतिशत सुलभ बनाना सुनिश्चित किया जा रहा है , जिससे दिव्यान्गजनों को और अधिक लाभ पहुंचाया जा सके | उपर्युक्त प्रयासों को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा हेतु लगातार नए कानूनों एवं प्रावधानों के माध्यम से प्रयास किये जा रहे हैं , जो कि काफी हद तक सफल भी रहे हैं |
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सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से संसद सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है|( 200 शब्द) Explain the need to ensure government"s accountability. Along with this, discuss the devices through which the Parliament ensures accountability of Government.(200 Words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में जनता द्वारा शक्तियों के प्रत्यायोजन को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से संसद सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है 4- अंतिम में कुछ सीमाओं और समाधान बताते हुए उत्तर स्पष्ट कीजिये| संसदीय शासन प्रणाली में शासन के सुचारू संचालन के लिए एक संगठित निकाय की आवश्यकता होती है| यह संगठित निकाय शासन के सन्दर्भ में जनता का प्रतिनिधित्व करता है| इस निकाय अथवा सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया होता है| संसदीय शासन प्रणाली में प्रत्यायोजन का क्रम जनता से होकर संसद, संसद के माध्यम से मंत्रिपरिषद, मंत्रिपरिषद के अंतर्गत मंत्रिमंडल से होते हुए प्रधानमन्त्री तक जाता है| अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए| इसीलिए कहा जाता है| यदि शक्तियों का प्रत्यायोजन न हुआ होता तो जवाबदेहिता सुनिश्चित नही की जा सकती थी| सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता · संसदीय शासन प्रणाली की मूल विचारधारा के अनुरूप शासन हेतु सरकार को संसद के प्रति जवाबदेह माना गया है| · इस जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाना अनिवार्य है| · सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए · जनता के प्रति जवाबदेहिता सुनिश्चित करने हेतु यह दायित्व संसद को सौंपा गया जो कि देश कासर्वोच्च जन प्रतिनिधित्व निकायहै| · समाज के संरक्षक के रूप में सरकार को दायित्व सौंपा गया है एवं इस उद्देश्य से सरकार के द्वारा स्वनिर्णय या विवेकी शक्तियों का अभ्यास किया जाता है जिसके दुरुपयोग की संभावनाएं बनी रहती हैं एवं इसकी रोकथाम की दिशा में सरकार की जवाबदेहिता का होना अति आवश्यक है(गार्डियन को भी गार्ड करना आवश्यक है) · संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण करने का मौलिक उद्देश्य आम जनता व्यापक हितों को सुनिश्चित किये जाने से है| जिसकी प्रकृति प्रत्यक्ष, आंतरिक एवं सकारात्मक-नकारात्मक दोनों है| · यह नियंत्रण आंतरिक होगा क्योंकि सरकार संसद का अभिन्न अंग होती है| संसद के प्रति सरकार की यह जवाबदेहिता प्रत्यक्ष होती है जबकि जनता के प्रति यह जवाबदेहिता परोक्ष है| संसद द्वारा जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के उपकरण · संसद के द्वारा विभिन्न माध्यमों या साधनों या तकनीकों के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाता है ताकि सरकार की जवाबदेहिता को सुनिश्चित किया जा सके|जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, धन्यवाद प्रस्ताव · स्थगन प्रस्ताव/कामरोको प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना होता है · ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर मंत्री के ध्यान को आकर्षित करना होता है| यह भारत के संसदीय नवाचार का एक परिणाम है · अविश्वास प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार समर्थन में प्राप्त बहुमत की पुष्टि या परीक्षण करना है) अब तक भारत में कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव आ चुके हैं अंतिम बार जुलाई 2018 मेंआया था| · निंदा प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार की नीतियों की आलोचना किये जाने से है| · कटौती प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार के द्वारा प्रस्तुत अनुदान की मांग पर चर्चा एवं विचार-विमर्श किये जाने से है · आधे घंटे की चर्चा, जिन प्रश्नों का उत्तर मंत्री दे चुका हो उन पर पुनः चर्चा करने के लिए इसको आयोजित किया जाता है · CAG के द्वारा किया जाने वाले लेखा परीक्षण पर चर्चा, ध्यातव्य है कि भारत सरकार के लेखा का दायित्व CGA(कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स) का है|दोनों अलग पद है| जहाँ CAG एक संवैधानिक पद है वहीँ CGA एक कार्यकारी पद है जो वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है| · संसदीय समितियां यथा; संसद की वित्तीय समितियां, गैर वित्तीय समितियां एवं संसद की विभागीय स्थायी समितियां (संख्या 24) इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संसद विभिन्न उपकरणों, प्रक्रियाओं के माध्यम से सरकार पर नियंत्रण स्थापित करती है और इस प्रकार सरकार के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करती है| तथापि सरकार को संसद में प्राप्त बहुमत, तकनीकी ज्ञान और दक्षता का न होना, कमजोर और अप्रभावी विपक्ष, संसद के पास समयाभाव आदिकारणों से संसद के द्वारा सरकार पर किये जाने वाले नियंत्रण को मात्र मिथ्या माना जाता है किन्तु सरकार द्वारा संसद द्वारा पारित कानून के अधीन रह कर कार्य किया जाता है और अंतिम रूप से जन मत की संतुष्ट करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है अतः सरकार पर संसद का नियंत्रण मिथ्या नहीं माना जा सकता है|
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##Question:सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से संसद सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है|( 200 शब्द) Explain the need to ensure government"s accountability. Along with this, discuss the devices through which the Parliament ensures accountability of Government.(200 Words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जनता द्वारा शक्तियों के प्रत्यायोजन को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में उन उपकरणों की चर्चा कीजिये जिनके माध्यम से संसद सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है 4- अंतिम में कुछ सीमाओं और समाधान बताते हुए उत्तर स्पष्ट कीजिये| संसदीय शासन प्रणाली में शासन के सुचारू संचालन के लिए एक संगठित निकाय की आवश्यकता होती है| यह संगठित निकाय शासन के सन्दर्भ में जनता का प्रतिनिधित्व करता है| इस निकाय अथवा सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया होता है| संसदीय शासन प्रणाली में प्रत्यायोजन का क्रम जनता से होकर संसद, संसद के माध्यम से मंत्रिपरिषद, मंत्रिपरिषद के अंतर्गत मंत्रिमंडल से होते हुए प्रधानमन्त्री तक जाता है| अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए| इसीलिए कहा जाता है| यदि शक्तियों का प्रत्यायोजन न हुआ होता तो जवाबदेहिता सुनिश्चित नही की जा सकती थी| सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता · संसदीय शासन प्रणाली की मूल विचारधारा के अनुरूप शासन हेतु सरकार को संसद के प्रति जवाबदेह माना गया है| · इस जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाना अनिवार्य है| · सरकार के द्वारा जिन शक्तियों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा हस्तानांतरित या प्रत्यायोजित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा शक्तियों का अभ्यास करते समय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए · जनता के प्रति जवाबदेहिता सुनिश्चित करने हेतु यह दायित्व संसद को सौंपा गया जो कि देश कासर्वोच्च जन प्रतिनिधित्व निकायहै| · समाज के संरक्षक के रूप में सरकार को दायित्व सौंपा गया है एवं इस उद्देश्य से सरकार के द्वारा स्वनिर्णय या विवेकी शक्तियों का अभ्यास किया जाता है जिसके दुरुपयोग की संभावनाएं बनी रहती हैं एवं इसकी रोकथाम की दिशा में सरकार की जवाबदेहिता का होना अति आवश्यक है(गार्डियन को भी गार्ड करना आवश्यक है) · संसद के द्वारा सरकार पर नियंत्रण करने का मौलिक उद्देश्य आम जनता व्यापक हितों को सुनिश्चित किये जाने से है| जिसकी प्रकृति प्रत्यक्ष, आंतरिक एवं सकारात्मक-नकारात्मक दोनों है| · यह नियंत्रण आंतरिक होगा क्योंकि सरकार संसद का अभिन्न अंग होती है| संसद के प्रति सरकार की यह जवाबदेहिता प्रत्यक्ष होती है जबकि जनता के प्रति यह जवाबदेहिता परोक्ष है| संसद द्वारा जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के उपकरण · संसद के द्वारा विभिन्न माध्यमों या साधनों या तकनीकों के द्वारा सरकार पर नियंत्रण किया जाता है ताकि सरकार की जवाबदेहिता को सुनिश्चित किया जा सके|जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, धन्यवाद प्रस्ताव · स्थगन प्रस्ताव/कामरोको प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना होता है · ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्त्व के तत्कालीन मुद्दों पर मंत्री के ध्यान को आकर्षित करना होता है| यह भारत के संसदीय नवाचार का एक परिणाम है · अविश्वास प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार समर्थन में प्राप्त बहुमत की पुष्टि या परीक्षण करना है) अब तक भारत में कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव आ चुके हैं अंतिम बार जुलाई 2018 मेंआया था| · निंदा प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार की नीतियों की आलोचना किये जाने से है| · कटौती प्रस्ताव, इसका मौलिक उद्देश्य सरकार के द्वारा प्रस्तुत अनुदान की मांग पर चर्चा एवं विचार-विमर्श किये जाने से है · आधे घंटे की चर्चा, जिन प्रश्नों का उत्तर मंत्री दे चुका हो उन पर पुनः चर्चा करने के लिए इसको आयोजित किया जाता है · CAG के द्वारा किया जाने वाले लेखा परीक्षण पर चर्चा, ध्यातव्य है कि भारत सरकार के लेखा का दायित्व CGA(कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स) का है|दोनों अलग पद है| जहाँ CAG एक संवैधानिक पद है वहीँ CGA एक कार्यकारी पद है जो वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है| · संसदीय समितियां यथा; संसद की वित्तीय समितियां, गैर वित्तीय समितियां एवं संसद की विभागीय स्थायी समितियां (संख्या 24) इस प्रकार स्पष्ट होता है कि संसद विभिन्न उपकरणों, प्रक्रियाओं के माध्यम से सरकार पर नियंत्रण स्थापित करती है और इस प्रकार सरकार के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करती है| तथापि सरकार को संसद में प्राप्त बहुमत, तकनीकी ज्ञान और दक्षता का न होना, कमजोर और अप्रभावी विपक्ष, संसद के पास समयाभाव आदिकारणों से संसद के द्वारा सरकार पर किये जाने वाले नियंत्रण को मात्र मिथ्या माना जाता है किन्तु सरकार द्वारा संसद द्वारा पारित कानून के अधीन रह कर कार्य किया जाता है और अंतिम रूप से जन मत की संतुष्ट करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है अतः सरकार पर संसद का नियंत्रण मिथ्या नहीं माना जा सकता है|
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"संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया किया जाता है परन्तुव्यावहारिकता मेंजवाबदेही को पूर्ण रूप सेप्राप्त करना संभव नहीं है। आलोचनात्मकचर्चा कीजिए।(200 शब्द) " Various means are used by the Parliament to control the government but practically, it is not possible to attain full degree of accountability." Critically discuss.(200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता की आवश्यकता के महत्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यमों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद समझाइए कि कैसेव्यावहारिकता में जवाबदेही को पूर्ण रूप से प्राप्त करना संभव नहीं है? अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- सरकार का सवैंधानिक दायित्व है कि वहसंसद के प्रति जवाबदेही हो।सरकार के द्वारा शासन हेतु जिन कार्यों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा प्रत्यायोजित या हस्तानांतरित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार संसद के माध्यम से आम जनता के प्रति जवाबदेह हो । समाज का नेतृत्व सरकार के पास होता है एवं सरकार समाज का सरंक्षक होती है। एक सरंक्षक होने के नाते सरकार को विवेकाधिकार की शक्तियां प्राप्त है जिनका अभ्यास उचित दिशा में एवं उचित प्रयोजन हेतु किया जाना चाहिए। संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यम:- प्रश्नकाल दौरान संसद सदस्यों द्वारा मंत्रियों से प्रश्न पूछकर। शून्यकाल के दौरान प्रश्न पूछकर। राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव द्वारा। स्थगन या काम रोको प्रस्ताव: इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्व के मुद्दे पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना। ध्यान आकर्षण प्रस्ताव के द्वारा। निंदा प्रस्ताव: सरकार की नीतियों की आलोचना करके। कटौती प्रस्ताव के द्वारा। CAG: इसके रिपोर्ट पर चर्चा के माध्यम से। संसद की समितियां: वित्तीय,गैर-वित्तीय और DRSCs : इन समितियों के द्वारा संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता को अधिक प्रत्यक्ष एवं विशेषीकृत बनाने का प्रयास किया गया है। संसद के द्वारा सरकार पर किया जाने वाला नियंत्रण मात्र एक मिथ्या है क्योंकि संसद मेंसरकार का बहुमत होता है।अतःविभिन्न सीमायें है जिनकी वजह से जवाबदेही को पूर्ण तरिके प्राप्त करना संभव नहीं है,जैसे- जब सरकार के पास बहुमत कम हो, विपक्ष दल की भूमिका प्रभावी और सकारात्मक न हो, संसदीय चर्चा शासन के व्यापक हितो से अधिक सम्बंधित न होकर निहित राजनीतिक स्वार्थों के प्रति संचालित होने के कारण। संसद के पास तकनीकी ज्ञान एवं समय का अभाव के कारण। उपर्युक्त व्यववहारिक सीमाओं के बावजूद भी संसद द्वारा सरकार पर किये जाने नियंत्रण का एक विशिष्ट औचित्य है जैसे जन विचार को प्रभावित करना, सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार हेतु बाध्य करना, सरकार का निर्णय प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में अंततः संसद का निर्णय होता है और सरकार इस निर्णय के अधीन एवं अंतर्गत रहते हुए शासन के दायित्वों की परिपूर्ति करता है।
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##Question:"संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया किया जाता है परन्तुव्यावहारिकता मेंजवाबदेही को पूर्ण रूप सेप्राप्त करना संभव नहीं है। आलोचनात्मकचर्चा कीजिए।(200 शब्द) " Various means are used by the Parliament to control the government but practically, it is not possible to attain full degree of accountability." Critically discuss.(200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता की आवश्यकता के महत्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यमों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद समझाइए कि कैसेव्यावहारिकता में जवाबदेही को पूर्ण रूप से प्राप्त करना संभव नहीं है? अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- सरकार का सवैंधानिक दायित्व है कि वहसंसद के प्रति जवाबदेही हो।सरकार के द्वारा शासन हेतु जिन कार्यों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा प्रत्यायोजित या हस्तानांतरित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार संसद के माध्यम से आम जनता के प्रति जवाबदेह हो । समाज का नेतृत्व सरकार के पास होता है एवं सरकार समाज का सरंक्षक होती है। एक सरंक्षक होने के नाते सरकार को विवेकाधिकार की शक्तियां प्राप्त है जिनका अभ्यास उचित दिशा में एवं उचित प्रयोजन हेतु किया जाना चाहिए। संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यम:- प्रश्नकाल दौरान संसद सदस्यों द्वारा मंत्रियों से प्रश्न पूछकर। शून्यकाल के दौरान प्रश्न पूछकर। राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव द्वारा। स्थगन या काम रोको प्रस्ताव: इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्व के मुद्दे पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना। ध्यान आकर्षण प्रस्ताव के द्वारा। निंदा प्रस्ताव: सरकार की नीतियों की आलोचना करके। कटौती प्रस्ताव के द्वारा। CAG: इसके रिपोर्ट पर चर्चा के माध्यम से। संसद की समितियां: वित्तीय,गैर-वित्तीय और DRSCs : इन समितियों के द्वारा संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता को अधिक प्रत्यक्ष एवं विशेषीकृत बनाने का प्रयास किया गया है। संसद के द्वारा सरकार पर किया जाने वाला नियंत्रण मात्र एक मिथ्या है क्योंकि संसद मेंसरकार का बहुमत होता है।अतःविभिन्न सीमायें है जिनकी वजह से जवाबदेही को पूर्ण तरिके प्राप्त करना संभव नहीं है,जैसे- जब सरकार के पास बहुमत कम हो, विपक्ष दल की भूमिका प्रभावी और सकारात्मक न हो, संसदीय चर्चा शासन के व्यापक हितो से अधिक सम्बंधित न होकर निहित राजनीतिक स्वार्थों के प्रति संचालित होने के कारण। संसद के पास तकनीकी ज्ञान एवं समय का अभाव के कारण। उपर्युक्त व्यववहारिक सीमाओं के बावजूद भी संसद द्वारा सरकार पर किये जाने नियंत्रण का एक विशिष्ट औचित्य है जैसे जन विचार को प्रभावित करना, सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार हेतु बाध्य करना, सरकार का निर्णय प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में अंततः संसद का निर्णय होता है और सरकार इस निर्णय के अधीन एवं अंतर्गत रहते हुए शासन के दायित्वों की परिपूर्ति करता है।
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While India has pursued a Look East Policy involving South East Asia for a long time now, there seems to be a "look west" policy in the making involving West Asia. Discuss in the context of India"s engagement with West Asia in recent years. ( 150 words/10 marks)
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Approach: • As Intro, quote Former PM stating the need of having Look West Policy • Highlight the areas of India’s engagement in West Asia • Also discuss the challenges in formulation Look West Policy. Ans: According to the Former Prime Minister of India, "the Gulf region, like South-East and South Asia, is part of our natural economic hinterland. We must pursue closer economic relations with all our neighbours in our wider Asian neighbourhood. India has successfully pursued a Look East policy to come closer to the countries of South-East Asia. We must, similarly, come closer to our western a Strong ties between the west Asian countries. The statement clearly indicates the demand of Look West policy especially in light of recent visits by the Prime Minister of India to various Middle East countries from Iran to Israel. Areas of India’s engagement in West Asia 1. The major area of Complementarity is Energy Resources, India is deficient on this front and Middle East countries are abundant Eg. 70 per cent of India’s imported energy needs come from West Asia 2. India is big market for Middle East countries for their products. 3. Amid a slump in global oil prices and rising aspirations of the youth in the Gulf region, the monarchies find in India an attractive destination and partner to diversify into non-oil sectors. The key Gulf States of Saudi Arabia and the United Arab Emirates (UAE) are emerging as key investors in India. 4. They are important partners in anti-terrorism and de-radicalisation initiatives like UAE and Saudi Arabia 5. India’s diaspora in the Gulf, numbering between around 7 and 8 million, has of course always been important to the country’s economy and its policy objective of alleviating poverty. The Gulf is India’s main source of expat remittances. In 2015-2016, Indian workers sent back $35.9 billion in valuable foreign exchange. 6. Not only Economic advantage, Indian diaspora provides a unique soft power advantage that improves India’s image as it competes with more powerful states in the region like USA, Russia, china etc. 7. Iran is India’s faster gateway to Afghanistan, Central Asia, Russia and beyond. Several connectivity projects via Iran will expand India’s footprints in the Eurasian region. 8. India’s maritime doctrine of 2009 and 2015 state that the Gulf and Arabian Sea are vital to India’s interests, including securing choke points. Despite having such a wide areas of interest in the region, there exist significant challenges, which make formulation of Look west policy a tedious task: 1. First and foremost challenge is to define the area covered under the policy, as there are large no. of countries lying west to India. 2. In the Middle East region, there is major divide on the lines of Shia and Sunni and long history of rivalry between countries like Iran with Saudi Arabia and Israel, Israel and Palestine etc. In such circumstances, taking a stance through the policy would upset relations with some of the countries. Besides, India’s Look West Policy will prove fruitful when GCC’s Look East” policy gives India an equal scope of assimilating its interests in the region.
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##Question:While India has pursued a Look East Policy involving South East Asia for a long time now, there seems to be a "look west" policy in the making involving West Asia. Discuss in the context of India"s engagement with West Asia in recent years. ( 150 words/10 marks)##Answer:Approach: • As Intro, quote Former PM stating the need of having Look West Policy • Highlight the areas of India’s engagement in West Asia • Also discuss the challenges in formulation Look West Policy. Ans: According to the Former Prime Minister of India, "the Gulf region, like South-East and South Asia, is part of our natural economic hinterland. We must pursue closer economic relations with all our neighbours in our wider Asian neighbourhood. India has successfully pursued a Look East policy to come closer to the countries of South-East Asia. We must, similarly, come closer to our western a Strong ties between the west Asian countries. The statement clearly indicates the demand of Look West policy especially in light of recent visits by the Prime Minister of India to various Middle East countries from Iran to Israel. Areas of India’s engagement in West Asia 1. The major area of Complementarity is Energy Resources, India is deficient on this front and Middle East countries are abundant Eg. 70 per cent of India’s imported energy needs come from West Asia 2. India is big market for Middle East countries for their products. 3. Amid a slump in global oil prices and rising aspirations of the youth in the Gulf region, the monarchies find in India an attractive destination and partner to diversify into non-oil sectors. The key Gulf States of Saudi Arabia and the United Arab Emirates (UAE) are emerging as key investors in India. 4. They are important partners in anti-terrorism and de-radicalisation initiatives like UAE and Saudi Arabia 5. India’s diaspora in the Gulf, numbering between around 7 and 8 million, has of course always been important to the country’s economy and its policy objective of alleviating poverty. The Gulf is India’s main source of expat remittances. In 2015-2016, Indian workers sent back $35.9 billion in valuable foreign exchange. 6. Not only Economic advantage, Indian diaspora provides a unique soft power advantage that improves India’s image as it competes with more powerful states in the region like USA, Russia, china etc. 7. Iran is India’s faster gateway to Afghanistan, Central Asia, Russia and beyond. Several connectivity projects via Iran will expand India’s footprints in the Eurasian region. 8. India’s maritime doctrine of 2009 and 2015 state that the Gulf and Arabian Sea are vital to India’s interests, including securing choke points. Despite having such a wide areas of interest in the region, there exist significant challenges, which make formulation of Look west policy a tedious task: 1. First and foremost challenge is to define the area covered under the policy, as there are large no. of countries lying west to India. 2. In the Middle East region, there is major divide on the lines of Shia and Sunni and long history of rivalry between countries like Iran with Saudi Arabia and Israel, Israel and Palestine etc. In such circumstances, taking a stance through the policy would upset relations with some of the countries. Besides, India’s Look West Policy will prove fruitful when GCC’s Look East” policy gives India an equal scope of assimilating its interests in the region.
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प्लासी के युद्ध के क्या कारण थे? बंगाल पर ब्रिटिश वर्चस्व के विकास में इसके महत्व पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) What were the reasons for Plassey"s war? Discuss its importance in the development of British domination over Bengal. (150-200 words, Marks -10 )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में प्लासी युद्ध के उद्भव का परिचय दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारणों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद बंगाल बार ब्रिटिश प्रभाव के संबंध में महत्व पर चर्चा कीजिए। समग्र रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। प्लासी का युद्ध अंग्रेजों और बंगाल के नवाब के बीच 1757 में हुआ। इसकी पृष्ठभूमि अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा, आपसी मतभेद, अधिकारों आदि के कारण तैयार हुई। इस युद्ध में अंग्रेजों की जीत हुई। प्लासी के युद्ध के कारण: अंग्रेजों की साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ कर्नाटक युद्ध में सफलता से कंपनी में आत्मविश्वास था। 1717 के फरमान को लेकर कंपनी एवं बंगाल के मध्य तनाव उत्पन्न हुआ। गौरतलब है कि 1717 में फर्रूखसियर द्वारा कंपनी को बंगाल, बिहार, उड़ीसा में व्यापार की अनुमति प्रदान की गयी थी। जिसे मानने के लिए नवाब तैयार नहीं था। दस्तक जारी करने का अधिकार दिया गया। नवाब के विरोधियों को संरक्षण। भारतीय वस्तुओं पर कलकत्ता में कर लगाना। महत्व: आर्थिक: इस युद्ध के पश्चात 24 परगना का जमींदारी अधिकार कंपनी को प्राप्त हो गया। इसके पूर्व तक नवाब के अधीन भारतीय शासकों के पास यह अधिकार था। ब्रिटिश कर्मचारियों को व्यापार और आय पर कर देने की आवश्यकता नहीं थी। नवाब द्वारा कंपनी को एक बड़ी राशि उपहार एवं मुआवजे के रूप में देना पड़ा। जिसका प्रभाव नवाब के राजस्व पर पड़ा। इसके परिणाम स्वरूप वह कंपनी का लगभग गुलाम हो गया। व्यापार एवं वाणिज्य पर अंग्रेजों का लगभग एकाधिकार हो गया। फ्रांसीसी पुनः खोयी स्थिति कभी प्राप्त नहीं कर पाए। राजनीतिक : बंगाल में राजनीतिक शक्ति के रूप में कंपनी की पहचान स्थापित हुई। जो अभी तक मात्र व्यापारिक कार्यों के लिए ही जाने जाते थे। प्लासी के युद्ध के पश्चात बंगाल के प्रशासन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हुआ। इससे अंग्रेजों को बंगाल के समृद्ध संसाधनों तक पहुँच प्राप्त हुई। इसके आधार पर उत्तरी भारत में भी अपने प्रभाव का विस्तार किया। ईस्ट इंडिया कंपनी केवल वाणिज्यिक निकाय नहीं रह गयी बल्कि सैन्य कंपनी बन गयी। कंपनी के पास एक बहुत बड़ा भू-भाग था, जिसको केवल हथियारों से सुसज्जित सैन्य बलों द्वारा ही नियंत्रित एवं सुरक्षित रखा जा सकता था। भारतीय इतिहास में प्लासी का युद्ध अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार का प्रवेश द्वार माना जाता है। इसके माध्यम से अंग्रेजों ने बंगाल का आर्थिक शोषण प्रारम्भ कर दिया। अंततः बक्सर के युद्ध ने बंगाल में पूर्ण साम्राज्य स्थापित करने में मदद की।
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##Question:प्लासी के युद्ध के क्या कारण थे? बंगाल पर ब्रिटिश वर्चस्व के विकास में इसके महत्व पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) What were the reasons for Plassey"s war? Discuss its importance in the development of British domination over Bengal. (150-200 words, Marks -10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में प्लासी युद्ध के उद्भव का परिचय दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारणों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद बंगाल बार ब्रिटिश प्रभाव के संबंध में महत्व पर चर्चा कीजिए। समग्र रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। प्लासी का युद्ध अंग्रेजों और बंगाल के नवाब के बीच 1757 में हुआ। इसकी पृष्ठभूमि अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा, आपसी मतभेद, अधिकारों आदि के कारण तैयार हुई। इस युद्ध में अंग्रेजों की जीत हुई। प्लासी के युद्ध के कारण: अंग्रेजों की साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ कर्नाटक युद्ध में सफलता से कंपनी में आत्मविश्वास था। 1717 के फरमान को लेकर कंपनी एवं बंगाल के मध्य तनाव उत्पन्न हुआ। गौरतलब है कि 1717 में फर्रूखसियर द्वारा कंपनी को बंगाल, बिहार, उड़ीसा में व्यापार की अनुमति प्रदान की गयी थी। जिसे मानने के लिए नवाब तैयार नहीं था। दस्तक जारी करने का अधिकार दिया गया। नवाब के विरोधियों को संरक्षण। भारतीय वस्तुओं पर कलकत्ता में कर लगाना। महत्व: आर्थिक: इस युद्ध के पश्चात 24 परगना का जमींदारी अधिकार कंपनी को प्राप्त हो गया। इसके पूर्व तक नवाब के अधीन भारतीय शासकों के पास यह अधिकार था। ब्रिटिश कर्मचारियों को व्यापार और आय पर कर देने की आवश्यकता नहीं थी। नवाब द्वारा कंपनी को एक बड़ी राशि उपहार एवं मुआवजे के रूप में देना पड़ा। जिसका प्रभाव नवाब के राजस्व पर पड़ा। इसके परिणाम स्वरूप वह कंपनी का लगभग गुलाम हो गया। व्यापार एवं वाणिज्य पर अंग्रेजों का लगभग एकाधिकार हो गया। फ्रांसीसी पुनः खोयी स्थिति कभी प्राप्त नहीं कर पाए। राजनीतिक : बंगाल में राजनीतिक शक्ति के रूप में कंपनी की पहचान स्थापित हुई। जो अभी तक मात्र व्यापारिक कार्यों के लिए ही जाने जाते थे। प्लासी के युद्ध के पश्चात बंगाल के प्रशासन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हुआ। इससे अंग्रेजों को बंगाल के समृद्ध संसाधनों तक पहुँच प्राप्त हुई। इसके आधार पर उत्तरी भारत में भी अपने प्रभाव का विस्तार किया। ईस्ट इंडिया कंपनी केवल वाणिज्यिक निकाय नहीं रह गयी बल्कि सैन्य कंपनी बन गयी। कंपनी के पास एक बहुत बड़ा भू-भाग था, जिसको केवल हथियारों से सुसज्जित सैन्य बलों द्वारा ही नियंत्रित एवं सुरक्षित रखा जा सकता था। भारतीय इतिहास में प्लासी का युद्ध अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार का प्रवेश द्वार माना जाता है। इसके माध्यम से अंग्रेजों ने बंगाल का आर्थिक शोषण प्रारम्भ कर दिया। अंततः बक्सर के युद्ध ने बंगाल में पूर्ण साम्राज्य स्थापित करने में मदद की।
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द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात विउपनिवेशीकरण के कारणों का उल्लेख करते हुए, विउपनिवेशीकरण में आने वाली बाधाओं की भी चर्चा कीजिए। (200 शब्द) while mentioning the reasons for mutation after World War II, Also discuss the barriers to disinvestment. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, विउपनिवेशीकरण का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात विउपनिवेशीकरण के कारणों एवं विउपनिवेशीकरण में आने वाली बाधाओं की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष उत्तर:- द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के संदर्भ मेंविउपनिवेशीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। 1945 से 1975 के बीच अधिकांशतः उपनिवेशों को आज़ादी मिली। विउपनिवेशीकरण के कारण:- किसी भी देश की स्वतंत्रता में राष्ट्रीय आंदोलन का मत्वपूर्ण महत्व रहा है। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय चेतना के उदय में भिन्नताएं हो सकती हैं फिर भी कुछ सामान्य कारकों में सभी देशों में राष्ट्रीय चेतना एवं आंदोलन को प्रभावित किया। हितों का टकराव रहा। पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार एवं आधुनिक विचारों का प्रभाव रहा। प्रेस की भूमिका से जागरूकता। साम्राज्यवादी शक्तियों की नस्लीय नीति। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में उपनिवेशों की जनता की भागीदारी के कारण। 1917 के पश्चात विशेषकर एशिया के देशों में साम्यवादी विचारधारा का प्रसार हुआ। प्रायः सभी देशों में राष्ट्रीय आंदोलन की हिंसक व अहिंसक धाराएं, भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिंसक धाराओं का प्रभाव अधिक। द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव- साम्राज्यवादी शक्तियों की सैनिक व आर्थिक स्थिति कमजोर एशियाई उपनिवेशों पर जापान का नियंत्रण इससे भी साम्राज्यवादीदेशों का सैनिक व आर्थिक आधार कमजोर हुआ। जापान की सफलता ने विशेषकर एशियाई राष्ट्रवादियों में उत्साह का संचार किया विश्व युद्ध में उपनिवेशों के सैनिकों ने भी भाग लिया। इनमें राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ तथा साम्राज्यवादी शक्तियों की अपराज्यता सम्बन्धी मिथकता को नज़दीक से टूटता हुआ देखा। ब्रिटेन एवं अमेरिका ने अटलांटिक चार्टर के माध्यम से आत्मनिर्णय के अधिकारों का समर्थन किया। इससे भी राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहन मिला। विउपनिवेशीकरण में सामान्य बाधाएं :- राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्यतः दो धाराओं में विभाजित होना तथा प्रायः दोनों में टकराव(विशेषकर एशिया में) शीत युद्ध एवं महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने भी विउपनिवेशीकरण को प्रभावित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा उपनिवेशों पर किसी न किसी प्रकार से नियंत्रण बनाये रखने की कोशिश। भौगोलिक चुनौतियां जैसी कैरिबियन द्वीप समूह, मलेसिया इत्यादि देशों को एक सूत्र में पिरोना एक बड़ी चुनौती थी। सामाजिक तनाव जैसे भारत में धर्म के नाम पर टकराव, सायप्रस में ईसाई व इस्लाम धर्म तथा यूनान व तुर्की के बीच टकराव, अफ़्रीकी समाज में जनजातीय टकराव और जहां श्वेत आबादी अधिक थी वहां श्वेतों एवं अश्वेतों में टकराव इत्यादि। इस प्रकार विभिन्न बाधाओं के बावजूद विउपनिवेशीकरण जारी रहा।
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##Question:द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात विउपनिवेशीकरण के कारणों का उल्लेख करते हुए, विउपनिवेशीकरण में आने वाली बाधाओं की भी चर्चा कीजिए। (200 शब्द) while mentioning the reasons for mutation after World War II, Also discuss the barriers to disinvestment. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, विउपनिवेशीकरण का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात विउपनिवेशीकरण के कारणों एवं विउपनिवेशीकरण में आने वाली बाधाओं की चर्चा कीजिए। निष्कर्ष उत्तर:- द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के संदर्भ मेंविउपनिवेशीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। 1945 से 1975 के बीच अधिकांशतः उपनिवेशों को आज़ादी मिली। विउपनिवेशीकरण के कारण:- किसी भी देश की स्वतंत्रता में राष्ट्रीय आंदोलन का मत्वपूर्ण महत्व रहा है। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय चेतना के उदय में भिन्नताएं हो सकती हैं फिर भी कुछ सामान्य कारकों में सभी देशों में राष्ट्रीय चेतना एवं आंदोलन को प्रभावित किया। हितों का टकराव रहा। पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार एवं आधुनिक विचारों का प्रभाव रहा। प्रेस की भूमिका से जागरूकता। साम्राज्यवादी शक्तियों की नस्लीय नीति। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में उपनिवेशों की जनता की भागीदारी के कारण। 1917 के पश्चात विशेषकर एशिया के देशों में साम्यवादी विचारधारा का प्रसार हुआ। प्रायः सभी देशों में राष्ट्रीय आंदोलन की हिंसक व अहिंसक धाराएं, भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिंसक धाराओं का प्रभाव अधिक। द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव- साम्राज्यवादी शक्तियों की सैनिक व आर्थिक स्थिति कमजोर एशियाई उपनिवेशों पर जापान का नियंत्रण इससे भी साम्राज्यवादीदेशों का सैनिक व आर्थिक आधार कमजोर हुआ। जापान की सफलता ने विशेषकर एशियाई राष्ट्रवादियों में उत्साह का संचार किया विश्व युद्ध में उपनिवेशों के सैनिकों ने भी भाग लिया। इनमें राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ तथा साम्राज्यवादी शक्तियों की अपराज्यता सम्बन्धी मिथकता को नज़दीक से टूटता हुआ देखा। ब्रिटेन एवं अमेरिका ने अटलांटिक चार्टर के माध्यम से आत्मनिर्णय के अधिकारों का समर्थन किया। इससे भी राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहन मिला। विउपनिवेशीकरण में सामान्य बाधाएं :- राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्यतः दो धाराओं में विभाजित होना तथा प्रायः दोनों में टकराव(विशेषकर एशिया में) शीत युद्ध एवं महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने भी विउपनिवेशीकरण को प्रभावित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा उपनिवेशों पर किसी न किसी प्रकार से नियंत्रण बनाये रखने की कोशिश। भौगोलिक चुनौतियां जैसी कैरिबियन द्वीप समूह, मलेसिया इत्यादि देशों को एक सूत्र में पिरोना एक बड़ी चुनौती थी। सामाजिक तनाव जैसे भारत में धर्म के नाम पर टकराव, सायप्रस में ईसाई व इस्लाम धर्म तथा यूनान व तुर्की के बीच टकराव, अफ़्रीकी समाज में जनजातीय टकराव और जहां श्वेत आबादी अधिक थी वहां श्वेतों एवं अश्वेतों में टकराव इत्यादि। इस प्रकार विभिन्न बाधाओं के बावजूद विउपनिवेशीकरण जारी रहा।
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"संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया किया जाता है परन्तुव्यावहारिकता मेंजवाबदेही को पूर्ण रूप सेप्राप्त करना संभव नहीं है। आलोचनात्मकचर्चा कीजिए।(200 शब्द) " Various means are used by the Parliament to control the government but practically, it is not possible to attain full degree of accountability." Critically discuss.(200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता की आवश्यकता के महत्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यमों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद समझाइए कि कैसेव्यावहारिकता में जवाबदेही को पूर्ण रूप से प्राप्त करना संभव नहीं है? अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- सरकार का सवैंधानिक दायित्व है कि वहसंसद के प्रति जवाबदेही हो।सरकार के द्वारा शासन हेतु जिन कार्यों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा प्रत्यायोजित या हस्तानांतरित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार संसद के माध्यम से आम जनता के प्रति जवाबदेह हो । समाज का नेतृत्व सरकार के पास होता है एवं सरकार समाज का सरंक्षक होती है। एक सरंक्षक होने के नाते सरकार को विवेकाधिकार की शक्तियां प्राप्त है जिनका अभ्यास उचित दिशा में एवं उचित प्रयोजन हेतु किया जाना चाहिए। संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यम:- प्रश्नकाल दौरान संसद सदस्यों द्वारा मंत्रियों से प्रश्न पूछकर। शून्यकाल के दौरान प्रश्न पूछकर। राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव द्वारा। स्थगन या काम रोको प्रस्ताव: इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्व के मुद्दे पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना। ध्यान आकर्षण प्रस्ताव के द्वारा। निंदा प्रस्ताव: सरकार की नीतियों की आलोचना करके। कटौती प्रस्ताव के द्वारा। CAG: इसके रिपोर्ट पर चर्चा के माध्यम से। संसद की समितियां: वित्तीय,गैर-वित्तीय और DRSCs : इन समितियों के द्वारा संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता को अधिक प्रत्यक्ष एवं विशेषीकृत बनाने का प्रयास किया गया है। संसद के द्वारा सरकार पर किया जाने वाला नियंत्रण मात्र एक मिथ्या है क्योंकि संसद मेंसरकार का बहुमत होता है।अतःविभिन्न सीमायें है जिनकी वजह से जवाबदेही को पूर्ण तरिके प्राप्त करना संभव नहीं है, जैसे- जब सरकार के पास बहुमत कम हो, विपक्ष दल की भूमिका प्रभावी और सकारात्मक न हो, संसदीय चर्चा शासन के व्यापक हितो से अधिक सम्बंधित न होकर निहित राजनीतिक स्वार्थों के प्रति संचालित होने के कारण। संसद के पास तकनीकी ज्ञान एवं समय का अभाव के कारण। उपर्युक्त व्यववहारिक सीमाओं के बावजूद भी संसद द्वारा सरकार पर किये जाने नियंत्रण का एक विशिष्ट औचित्य है जैसे जन विचार को प्रभावित करना, सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार हेतु बाध्य करना, सरकार का निर्णय प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में अंततः संसद का निर्णय होता है और सरकार इस निर्णय के अधीन एवं अंतर्गत रहते हुए शासन के दायित्वों की परिपूर्ति करता है।
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##Question:"संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया किया जाता है परन्तुव्यावहारिकता मेंजवाबदेही को पूर्ण रूप सेप्राप्त करना संभव नहीं है। आलोचनात्मकचर्चा कीजिए।(200 शब्द) " Various means are used by the Parliament to control the government but practically, it is not possible to attain full degree of accountability." Critically discuss.(200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता की आवश्यकता के महत्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यमों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद समझाइए कि कैसेव्यावहारिकता में जवाबदेही को पूर्ण रूप से प्राप्त करना संभव नहीं है? अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- सरकार का सवैंधानिक दायित्व है कि वहसंसद के प्रति जवाबदेही हो।सरकार के द्वारा शासन हेतु जिन कार्यों का अभ्यास किया जाता है वह जनता के द्वारा प्रत्यायोजित या हस्तानांतरित किया गया है अतः यह आवश्यक है कि सरकार संसद के माध्यम से आम जनता के प्रति जवाबदेह हो । समाज का नेतृत्व सरकार के पास होता है एवं सरकार समाज का सरंक्षक होती है। एक सरंक्षक होने के नाते सरकार को विवेकाधिकार की शक्तियां प्राप्त है जिनका अभ्यास उचित दिशा में एवं उचित प्रयोजन हेतु किया जाना चाहिए। संसद द्वारा, सरकार पर नियंत्रण के विभिन्न माध्यम:- प्रश्नकाल दौरान संसद सदस्यों द्वारा मंत्रियों से प्रश्न पूछकर। शून्यकाल के दौरान प्रश्न पूछकर। राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव द्वारा। स्थगन या काम रोको प्रस्ताव: इसका मौलिक उद्देश्य लोक महत्व के मुद्दे पर सदन के ध्यान को आकर्षित करना। ध्यान आकर्षण प्रस्ताव के द्वारा। निंदा प्रस्ताव: सरकार की नीतियों की आलोचना करके। कटौती प्रस्ताव के द्वारा। CAG: इसके रिपोर्ट पर चर्चा के माध्यम से। संसद की समितियां: वित्तीय,गैर-वित्तीय और DRSCs : इन समितियों के द्वारा संसद के प्रति सरकार की जवाबदेहिता को अधिक प्रत्यक्ष एवं विशेषीकृत बनाने का प्रयास किया गया है। संसद के द्वारा सरकार पर किया जाने वाला नियंत्रण मात्र एक मिथ्या है क्योंकि संसद मेंसरकार का बहुमत होता है।अतःविभिन्न सीमायें है जिनकी वजह से जवाबदेही को पूर्ण तरिके प्राप्त करना संभव नहीं है, जैसे- जब सरकार के पास बहुमत कम हो, विपक्ष दल की भूमिका प्रभावी और सकारात्मक न हो, संसदीय चर्चा शासन के व्यापक हितो से अधिक सम्बंधित न होकर निहित राजनीतिक स्वार्थों के प्रति संचालित होने के कारण। संसद के पास तकनीकी ज्ञान एवं समय का अभाव के कारण। उपर्युक्त व्यववहारिक सीमाओं के बावजूद भी संसद द्वारा सरकार पर किये जाने नियंत्रण का एक विशिष्ट औचित्य है जैसे जन विचार को प्रभावित करना, सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार हेतु बाध्य करना, सरकार का निर्णय प्रजातांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में अंततः संसद का निर्णय होता है और सरकार इस निर्णय के अधीन एवं अंतर्गत रहते हुए शासन के दायित्वों की परिपूर्ति करता है।
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विदेश नीति से आप क्या समझते हैं ? भारत के संदर्भ में, विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले घरेलू कारकों का उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the foreign policy? In the reference to India, analyze the domestic factors influencing foreign policy, with examples. (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये | मुख्य भाग में विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | अंतिम भाग में विदेश नीति का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ अन्य तत्व किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति की स्थापना एवं विकास को भी इन्ही मूलभूत कारकों ने प्रभावित किया है| विदेश नीति को प्रभावित करने वाले घरेलू कारक भौगोलिक कारण एकदेश की भौगोलिक अवस्थिति एवं भौतिक स्थलाकृति उस राज्य की विदेश नीति पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। प्राकृतिक सीमाओं की उपस्थिति एक देश को सुरक्षा का भाव प्रदान करती है जो शांतिपूर्ण समय में घरेलू विकास पर ध्यान दे सकता है| हिन्द महासागर से लगे 9 राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का विकास, समुद्री मार्ग से होने वाला मुंबई जैसा हमला, चीन की आक्रामक समुद्र नीति, हिन्द महासागर का आर्थिक महत्त्व एवं प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग से व्यापार आदि कारक भारतीय विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं भोगोलिक रूप से भारत से लगे हुए दक्षिण पूर्व एशिया का आर्थिक-सामरिक महत्त्व जैसे निवेश की संभावना, सुरक्षात्मक सहयोग, चीन का प्रति-संतुलन आदि तत्व विदेश नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इतिहास एवं परम्परा भारतीय धर्मों यथा जैन-बौद्ध की परम्परा के आधार पर विकसित परम्पराएं जैसे मत भिन्नता का सम्मान, सहिष्णुता, अहिंसा, धर्म निरपेक्षता, पंचशील दर्शन आदितत्व विदेश नीति को प्रभावित करते हैं मौर्य शासक अशोक की सांस्कृतिक कूटनीति, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल प्रोजेक्ट मौसम, केरल सरकार द्वारा स्पाइस रूट पहल, पश्चिमी भारत द्वारा कॉटन रूट आदि पहलें विदेश नीति के संदर्भ में इतिहास और परम्पराओं के महत्त्व को स्पष्ट करती हैं| आर्थिक स्थितियां 1991 के पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था के काल में भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति के साथ ही सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध पर आधारित थी| इस समय विदेश नीति मुख्यतः राजनीतिक मुद्दों पर ही केन्द्रित दिखती है, 1991 के बाद नयी तकनीकी, नए निवेश क्षेत्रों की आवश्यकता ने विदेश नीति को प्रभावित किया है और उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ता गया, इसी समय भारतीय विदेश नीति में नए तत्व शामिल होते हैं जैसे लुक ईस्ट नीति, अनेक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन, मुक्त व्यापार क्षेत्रों की स्थापना आदि | वैचारिक कारण भारत की विदेश नीति पंचशील पर आधारित है इसके प्रमुख घटक सहिष्णुता, अहिंसा, अहस्तक्षेप की नीति आदि हैं आर्थिक विचारधाराओं में परिवर्तन जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारवादी आर्थिक विचारधारा को अपनाने से विदेश नीति में परिवर्तन दिखाई देता है रंगभेद की नीति, स्वतंत्रता, समानता आदि वैचारिक कारक भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक कारक हैं नेतृत्व की प्रकृति भारत की स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक जवाहरलाल नेहरु प्रधान मंत्री रहे, इन्होने विदेश नीति की आधारशिला रखी, भारत के आरंभिक नेतृत्व की विदेश नीति आदर्शवादी थी,नेहरु जी द्वारा गुट-निरपेक्षता, पंचशील आदि विचारधाराओं को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया गया | इसके बाद नेतृत्व के आधार पर विदेश नीति आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर विकसित हुई, उदाहरणार्थ इंदिरा गांधी द्वारा किया गया पोखरण परीक्षण, बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सहयोग आदि इसके बाद भारतीय विदेश नीति में नेतृत्व द्वारा प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों का समावेश किया गया, वर्तमान में नेतृत्व द्वारा आर्थिक कूटनीति, आतंक के विरुद्ध जीरो टोलेरेंस की नीति अपनाई जा रही हैं| लोकमत/ट्रैक2 कूटनीति विविध क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा दिए गए विचार एवं अवधारणाओं को सरकार विदेश नीति के निर्धारण में स्थान देती है | इसी प्रकार जनता-जनता सम्पर्क एवं अंतःक्रिया,किसी विशेष मुद्दे पर नागरिकों का मत विदेश नीति के निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है जैसे आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रया की मांग आदि | सूचना एवं संचार क्रान्ति के माध्यम से ट्रैक 2 कूटनीति का विकास आदि कारक विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त घरेलू कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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##Question:विदेश नीति से आप क्या समझते हैं ? भारत के संदर्भ में, विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले घरेलू कारकों का उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the foreign policy? In the reference to India, analyze the domestic factors influencing foreign policy, with examples. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये | मुख्य भाग में विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | अंतिम भाग में विदेश नीति का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ अन्य तत्व किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति की स्थापना एवं विकास को भी इन्ही मूलभूत कारकों ने प्रभावित किया है| विदेश नीति को प्रभावित करने वाले घरेलू कारक भौगोलिक कारण एकदेश की भौगोलिक अवस्थिति एवं भौतिक स्थलाकृति उस राज्य की विदेश नीति पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। प्राकृतिक सीमाओं की उपस्थिति एक देश को सुरक्षा का भाव प्रदान करती है जो शांतिपूर्ण समय में घरेलू विकास पर ध्यान दे सकता है| हिन्द महासागर से लगे 9 राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का विकास, समुद्री मार्ग से होने वाला मुंबई जैसा हमला, चीन की आक्रामक समुद्र नीति, हिन्द महासागर का आर्थिक महत्त्व एवं प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग से व्यापार आदि कारक भारतीय विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं भोगोलिक रूप से भारत से लगे हुए दक्षिण पूर्व एशिया का आर्थिक-सामरिक महत्त्व जैसे निवेश की संभावना, सुरक्षात्मक सहयोग, चीन का प्रति-संतुलन आदि तत्व विदेश नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इतिहास एवं परम्परा भारतीय धर्मों यथा जैन-बौद्ध की परम्परा के आधार पर विकसित परम्पराएं जैसे मत भिन्नता का सम्मान, सहिष्णुता, अहिंसा, धर्म निरपेक्षता, पंचशील दर्शन आदितत्व विदेश नीति को प्रभावित करते हैं मौर्य शासक अशोक की सांस्कृतिक कूटनीति, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल प्रोजेक्ट मौसम, केरल सरकार द्वारा स्पाइस रूट पहल, पश्चिमी भारत द्वारा कॉटन रूट आदि पहलें विदेश नीति के संदर्भ में इतिहास और परम्पराओं के महत्त्व को स्पष्ट करती हैं| आर्थिक स्थितियां 1991 के पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था के काल में भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति के साथ ही सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध पर आधारित थी| इस समय विदेश नीति मुख्यतः राजनीतिक मुद्दों पर ही केन्द्रित दिखती है, 1991 के बाद नयी तकनीकी, नए निवेश क्षेत्रों की आवश्यकता ने विदेश नीति को प्रभावित किया है और उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ता गया, इसी समय भारतीय विदेश नीति में नए तत्व शामिल होते हैं जैसे लुक ईस्ट नीति, अनेक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन, मुक्त व्यापार क्षेत्रों की स्थापना आदि | वैचारिक कारण भारत की विदेश नीति पंचशील पर आधारित है इसके प्रमुख घटक सहिष्णुता, अहिंसा, अहस्तक्षेप की नीति आदि हैं आर्थिक विचारधाराओं में परिवर्तन जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारवादी आर्थिक विचारधारा को अपनाने से विदेश नीति में परिवर्तन दिखाई देता है रंगभेद की नीति, स्वतंत्रता, समानता आदि वैचारिक कारक भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक कारक हैं नेतृत्व की प्रकृति भारत की स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक जवाहरलाल नेहरु प्रधान मंत्री रहे, इन्होने विदेश नीति की आधारशिला रखी, भारत के आरंभिक नेतृत्व की विदेश नीति आदर्शवादी थी,नेहरु जी द्वारा गुट-निरपेक्षता, पंचशील आदि विचारधाराओं को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया गया | इसके बाद नेतृत्व के आधार पर विदेश नीति आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर विकसित हुई, उदाहरणार्थ इंदिरा गांधी द्वारा किया गया पोखरण परीक्षण, बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सहयोग आदि इसके बाद भारतीय विदेश नीति में नेतृत्व द्वारा प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों का समावेश किया गया, वर्तमान में नेतृत्व द्वारा आर्थिक कूटनीति, आतंक के विरुद्ध जीरो टोलेरेंस की नीति अपनाई जा रही हैं| लोकमत/ट्रैक2 कूटनीति विविध क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा दिए गए विचार एवं अवधारणाओं को सरकार विदेश नीति के निर्धारण में स्थान देती है | इसी प्रकार जनता-जनता सम्पर्क एवं अंतःक्रिया,किसी विशेष मुद्दे पर नागरिकों का मत विदेश नीति के निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है जैसे आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रया की मांग आदि | सूचना एवं संचार क्रान्ति के माध्यम से ट्रैक 2 कूटनीति का विकास आदि कारक विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त घरेलू कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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विदेश नीति से आप क्या समझते हैं? भारत के संदर्भ में, विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले घरेलू कारकों का उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| (200 शब्द) What do you understand by foreign policy? In the reference to India, analyze the domestic factors influencing foreign policy.including examples.
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दृष्टिकोण- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये मुख्य भाग में विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में विदेश नीति का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर - किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ अन्य तत्व किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति की स्थापना एवं विकास को भी इन्ही मूलभूत कारकों ने प्रभावित किया है| विदेश नीति को प्रभावित करने वाले घरेलू कारक भौगोलिक कारण एकदेश की भौगोलिक अवस्थिति एवं भौतिक स्थलाकृति उस राज्य की विदेश नीति पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। प्राकृतिक सीमाओं की उपस्थिति एक देश को सुरक्षा का भाव प्रदान करती है जो शांतिपूर्ण समय में घरेलू विकास पर ध्यान दे सकता है| हिन्द महासागर से लगे 9 राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का विकास, समुद्री मार्ग से होने वाला मुंबई जैसा हमला, चीन की आक्रामक समुद्र नीति, हिन्द महासागर का आर्थिक महत्त्व एवं प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग से व्यापार आदि कारक भारतीय विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं| भोगोलिक रूप से भारत से लगे हुए दक्षिण पूर्व एशिया का आर्थिक-सामरिक महत्त्व जैसे निवेश की संभावना, सुरक्षात्मक सहयोग, चीन का प्रति-संतुलन आदि तत्व विदेश नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इतिहास एवं परम्परा भारतीय धर्मों यथा जैन-बौद्ध की परम्परा के आधार पर विकसित परम्पराएं जैसे मत भिन्नता का सम्मान, सहिष्णुता, अहिंसा, धर्म निरपेक्षता, पंचशील दर्शन आदितत्व विदेश नीति को प्रभावित करते हैं| मौर्य शासक अशोक की सांस्कृतिक कूटनीति, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल प्रोजेक्ट मौसम, केरल सरकार द्वारा स्पाइस रूट पहल, पश्चिमी भारत द्वारा कॉटन रूट आदि पहलें विदेश नीति के संदर्भ में इतिहास और परम्पराओं के महत्त्व को स्पष्ट करती हैं| आर्थिक स्थितियां 1991 के पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था के काल में भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति के साथ ही सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध पर आधारित थी| इस समय विदेश नीति मुख्यतः राजनीतिक मुद्दों पर ही केन्द्रित दिखती है | 1991 के बाद नयी तकनीकी, नए निवेश क्षेत्रों की आवश्यकता ने विदेश नीति को प्रभावित किया है और उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ता गया, इसी समय भारतीय विदेश नीति में नए तत्व शामिल होते हैं जैसे लुक ईस्ट नीति, अनेक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन, मुक्त व्यापार क्षेत्रों की स्थापना आदि | वैचारिक कारण भारत की विदेश नीति पंचशील पर आधारित है इसके प्रमुख घटक सहिष्णुता, अहिंसा, अहस्तक्षेप की नीति आदि हैं | आर्थिक विचारधाराओं में परिवर्तन जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारवादी आर्थिक विचारधारा को अपनाने से विदेश नीति में परिवर्तन दिखाई देता है| रंगभेद की नीति, स्वतंत्रता, समानता आदि वैचारिक कारक भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक कारक हैं| नेतृत्व की प्रकृति भारत की स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक जवाहरलाल नेहरु प्रधान मंत्री रहे, इन्होने विदेश नीति की आधारशिला रखी, भारत के आरंभिक नेतृत्व की विदेश नीति आदर्शवादी थी,नेहरु जी द्वारा गुट-निरपेक्षता, पंचशील आदि विचारधाराओं को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया गया | इसके बाद नेतृत्व के आधार पर विदेश नीति आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर विकसित हुई, उदाहरणार्थ इंदिरा गांधी द्वारा किया गया पोखरण परीक्षण, बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सहयोग आदि | इसके बाद भारतीय विदेश नीति में नेतृत्व द्वारा प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों का समावेश किया गया, वर्तमान में नेतृत्व द्वारा आर्थिक कूटनीति, आतंक के विरुद्ध जीरो टोलेरेंस की नीति अपनाई जा रही हैं| लोकमत/ ट्रैक2 कूटनीति विविध क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा दिए गए विचार एवं अवधारणाओं को सरकार विदेश नीति के निर्धारण में स्थान देती है | इसी प्रकार जनता-जनता सम्पर्क एवं अंतःक्रिया,किसी विशेष मुद्दे पर नागरिकों का मत विदेश नीति के निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है जैसे आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रया की मांग आदि | सूचना एवं संचार क्रान्ति के माध्यम से ट्रैक 2 कूटनीति का विकास आदि कारक विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त घरेलू कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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##Question:विदेश नीति से आप क्या समझते हैं? भारत के संदर्भ में, विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले घरेलू कारकों का उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| (200 शब्द) What do you understand by foreign policy? In the reference to India, analyze the domestic factors influencing foreign policy.including examples.##Answer:दृष्टिकोण- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये मुख्य भाग में विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| अंतिम भाग में विदेश नीति का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये उत्तर - किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ अन्य तत्व किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति की स्थापना एवं विकास को भी इन्ही मूलभूत कारकों ने प्रभावित किया है| विदेश नीति को प्रभावित करने वाले घरेलू कारक भौगोलिक कारण एकदेश की भौगोलिक अवस्थिति एवं भौतिक स्थलाकृति उस राज्य की विदेश नीति पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। प्राकृतिक सीमाओं की उपस्थिति एक देश को सुरक्षा का भाव प्रदान करती है जो शांतिपूर्ण समय में घरेलू विकास पर ध्यान दे सकता है| हिन्द महासागर से लगे 9 राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का विकास, समुद्री मार्ग से होने वाला मुंबई जैसा हमला, चीन की आक्रामक समुद्र नीति, हिन्द महासागर का आर्थिक महत्त्व एवं प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग से व्यापार आदि कारक भारतीय विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं| भोगोलिक रूप से भारत से लगे हुए दक्षिण पूर्व एशिया का आर्थिक-सामरिक महत्त्व जैसे निवेश की संभावना, सुरक्षात्मक सहयोग, चीन का प्रति-संतुलन आदि तत्व विदेश नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इतिहास एवं परम्परा भारतीय धर्मों यथा जैन-बौद्ध की परम्परा के आधार पर विकसित परम्पराएं जैसे मत भिन्नता का सम्मान, सहिष्णुता, अहिंसा, धर्म निरपेक्षता, पंचशील दर्शन आदितत्व विदेश नीति को प्रभावित करते हैं| मौर्य शासक अशोक की सांस्कृतिक कूटनीति, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल प्रोजेक्ट मौसम, केरल सरकार द्वारा स्पाइस रूट पहल, पश्चिमी भारत द्वारा कॉटन रूट आदि पहलें विदेश नीति के संदर्भ में इतिहास और परम्पराओं के महत्त्व को स्पष्ट करती हैं| आर्थिक स्थितियां 1991 के पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था के काल में भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति के साथ ही सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध पर आधारित थी| इस समय विदेश नीति मुख्यतः राजनीतिक मुद्दों पर ही केन्द्रित दिखती है | 1991 के बाद नयी तकनीकी, नए निवेश क्षेत्रों की आवश्यकता ने विदेश नीति को प्रभावित किया है और उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ता गया, इसी समय भारतीय विदेश नीति में नए तत्व शामिल होते हैं जैसे लुक ईस्ट नीति, अनेक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन, मुक्त व्यापार क्षेत्रों की स्थापना आदि | वैचारिक कारण भारत की विदेश नीति पंचशील पर आधारित है इसके प्रमुख घटक सहिष्णुता, अहिंसा, अहस्तक्षेप की नीति आदि हैं | आर्थिक विचारधाराओं में परिवर्तन जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारवादी आर्थिक विचारधारा को अपनाने से विदेश नीति में परिवर्तन दिखाई देता है| रंगभेद की नीति, स्वतंत्रता, समानता आदि वैचारिक कारक भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक कारक हैं| नेतृत्व की प्रकृति भारत की स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक जवाहरलाल नेहरु प्रधान मंत्री रहे, इन्होने विदेश नीति की आधारशिला रखी, भारत के आरंभिक नेतृत्व की विदेश नीति आदर्शवादी थी,नेहरु जी द्वारा गुट-निरपेक्षता, पंचशील आदि विचारधाराओं को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया गया | इसके बाद नेतृत्व के आधार पर विदेश नीति आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर विकसित हुई, उदाहरणार्थ इंदिरा गांधी द्वारा किया गया पोखरण परीक्षण, बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सहयोग आदि | इसके बाद भारतीय विदेश नीति में नेतृत्व द्वारा प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों का समावेश किया गया, वर्तमान में नेतृत्व द्वारा आर्थिक कूटनीति, आतंक के विरुद्ध जीरो टोलेरेंस की नीति अपनाई जा रही हैं| लोकमत/ ट्रैक2 कूटनीति विविध क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा दिए गए विचार एवं अवधारणाओं को सरकार विदेश नीति के निर्धारण में स्थान देती है | इसी प्रकार जनता-जनता सम्पर्क एवं अंतःक्रिया,किसी विशेष मुद्दे पर नागरिकों का मत विदेश नीति के निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है जैसे आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रया की मांग आदि | सूचना एवं संचार क्रान्ति के माध्यम से ट्रैक 2 कूटनीति का विकास आदि कारक विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त घरेलू कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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लाभ के पद से आप क्या समझते हैं? इस पद केविवादित होने एवं न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने मेंनिभाई गई भूमिका के संदर्भ मेंचर्चा कीजिए। (200 शब्द) What do you understand by the office of profit? Discuss the office of profit in the context of itsdisputed role and the role played in resolving the dispute by the judiciary. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,लाभ के पद का कापरिचय दीजिए। तत्पश्चात, इस पद से सम्बंधित विभिन्न विवादों का उल्लेख कीजिए तथा इसमें न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने के प्रयासों की भूमिका का उल्लेख कीजिए। अंत में एक निष्पक्ष निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, किसी भी विधायक द्वारा सरकार में ऐसे ‘लाभ के पद’ को हासिल नहीं किया जा सकता है जिसमें सरकारी भत्ते या अन्य शक्तियाँ मिलती हैं।अगर कोई सांसद/विधायक किसी लाभ के पद पर आसीन पाया जाता है तो संसद या संबंधित विधानसभा में उसकी सदस्यता को अयोग्य करार दिया जा सकता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद 102(1)(क) तथा अनुच्छेद 191(1)(क) में लाभ के पद का उल्लेख किया गया है, किंतु लाभ के पद को परिभाषित नहीं किया गया है। अनुच्छेद 103 के अनुसार जब लाभ के पद का प्रश्न आये तो राष्ट्रपति, चुनाव आयोग की राय के अनुसार निर्णय लेगा। इसी संदर्भ में हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त संसदीय सचिवों को लाभ के पद का उल्लंघन मानते हुए राष्ट्रपति ने उनकी सदस्यता ख़ारिज कर दी थी। लाभ के पद के संदर्भ में भारत में कोई स्थापित प्रक्रिया नहीं है ऐसे में न्यायालय की भूमिका उल्लेखनीय हो जाती है। विभिन्न वाद में न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप किया गया है एवं निर्णय दिए गए है जैसे- मौलाना अब्दुल शकुर बनाम रिखब चंद,1958 :- सुप्रीम कोर्ट ने लाभ के पद को परिभाषित किया और कुछ शर्ते भी बताई जैसे- क्या सम्बंधित लाभ के पद के लाभार्थी को कार्यालय में नियुक्त करने की शक्ति सरकार के पास है। क्या सरकार उस नियुक्त लाभार्थी की नियुक्ति को अपनी विवेकीय शक्तियों का प्रयोग कर हटा सकती है। क्या उसे सरकार के राजस्व से पारितोषिक भुगतान हो रहा है। प्रद्युत बारदोलाई मामला, 2001:- इस केस में लाभ के पद की जाँच के पांच टेस्ट बताये है- क्या नियुक्ति सरकार द्वारा की गई है ? क्या सरकार नियुक्त व्यक्ति को पद से हटा सकती है ? क्या सरकार पारितोषिक का भुगतान करती है? नियुक्त व्यक्ति के कार्य क्या हैं? क्या वह सरकार के लिए कार्य करता है और क्या उन कार्यों पर सरकार का किसी प्रकार का कोई नियंत्रण है ? गुरु गोबिंद बनाम शंकरी प्रसाद घोषाल,1964:- इस केस में कहा गया कि कोई व्यक्ति लाभ का पद धारण करता है इसका टेस्ट प्रत्येक मामले को अलग से उसके तथ्योंकी जाँच करने पर निर्भर करेगा। जया बच्चन मामला,2006 :- इस मामले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा किराज्य के अधीन किसी भी ऐसे पद को लाभ का पद माना जायेगा जिस पद पर आसीन व्यक्ति सरकारी खजाने से पैसा निकालने और उसे खर्च करने के लिए अधिकृत हो, भले ही वास्तव में वह ऐसा न कर रहा हो। स्पष्ट है कि लाभ के पद के संदर्भ में न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है फिर भी इस संदर्भ में एक सुस्पष्ट नियम का अभाव देखा गया है। इस संदर्भ में इंग्लॅण्ड में प्रचलित प्रथा का अनुपालन अनुकरणीय हो सकता है। वहां किसी भी पद को सृजित करने के साथही नियम भी बना दिए जाते है कि जो पद सृजित हुआ है वह लाभ का पद होगा कि नहीं।
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##Question:लाभ के पद से आप क्या समझते हैं? इस पद केविवादित होने एवं न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने मेंनिभाई गई भूमिका के संदर्भ मेंचर्चा कीजिए। (200 शब्द) What do you understand by the office of profit? Discuss the office of profit in the context of itsdisputed role and the role played in resolving the dispute by the judiciary. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,लाभ के पद का कापरिचय दीजिए। तत्पश्चात, इस पद से सम्बंधित विभिन्न विवादों का उल्लेख कीजिए तथा इसमें न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने के प्रयासों की भूमिका का उल्लेख कीजिए। अंत में एक निष्पक्ष निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, किसी भी विधायक द्वारा सरकार में ऐसे ‘लाभ के पद’ को हासिल नहीं किया जा सकता है जिसमें सरकारी भत्ते या अन्य शक्तियाँ मिलती हैं।अगर कोई सांसद/विधायक किसी लाभ के पद पर आसीन पाया जाता है तो संसद या संबंधित विधानसभा में उसकी सदस्यता को अयोग्य करार दिया जा सकता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद 102(1)(क) तथा अनुच्छेद 191(1)(क) में लाभ के पद का उल्लेख किया गया है, किंतु लाभ के पद को परिभाषित नहीं किया गया है। अनुच्छेद 103 के अनुसार जब लाभ के पद का प्रश्न आये तो राष्ट्रपति, चुनाव आयोग की राय के अनुसार निर्णय लेगा। इसी संदर्भ में हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त संसदीय सचिवों को लाभ के पद का उल्लंघन मानते हुए राष्ट्रपति ने उनकी सदस्यता ख़ारिज कर दी थी। लाभ के पद के संदर्भ में भारत में कोई स्थापित प्रक्रिया नहीं है ऐसे में न्यायालय की भूमिका उल्लेखनीय हो जाती है। विभिन्न वाद में न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप किया गया है एवं निर्णय दिए गए है जैसे- मौलाना अब्दुल शकुर बनाम रिखब चंद,1958 :- सुप्रीम कोर्ट ने लाभ के पद को परिभाषित किया और कुछ शर्ते भी बताई जैसे- क्या सम्बंधित लाभ के पद के लाभार्थी को कार्यालय में नियुक्त करने की शक्ति सरकार के पास है। क्या सरकार उस नियुक्त लाभार्थी की नियुक्ति को अपनी विवेकीय शक्तियों का प्रयोग कर हटा सकती है। क्या उसे सरकार के राजस्व से पारितोषिक भुगतान हो रहा है। प्रद्युत बारदोलाई मामला, 2001:- इस केस में लाभ के पद की जाँच के पांच टेस्ट बताये है- क्या नियुक्ति सरकार द्वारा की गई है ? क्या सरकार नियुक्त व्यक्ति को पद से हटा सकती है ? क्या सरकार पारितोषिक का भुगतान करती है? नियुक्त व्यक्ति के कार्य क्या हैं? क्या वह सरकार के लिए कार्य करता है और क्या उन कार्यों पर सरकार का किसी प्रकार का कोई नियंत्रण है ? गुरु गोबिंद बनाम शंकरी प्रसाद घोषाल,1964:- इस केस में कहा गया कि कोई व्यक्ति लाभ का पद धारण करता है इसका टेस्ट प्रत्येक मामले को अलग से उसके तथ्योंकी जाँच करने पर निर्भर करेगा। जया बच्चन मामला,2006 :- इस मामले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा किराज्य के अधीन किसी भी ऐसे पद को लाभ का पद माना जायेगा जिस पद पर आसीन व्यक्ति सरकारी खजाने से पैसा निकालने और उसे खर्च करने के लिए अधिकृत हो, भले ही वास्तव में वह ऐसा न कर रहा हो। स्पष्ट है कि लाभ के पद के संदर्भ में न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है फिर भी इस संदर्भ में एक सुस्पष्ट नियम का अभाव देखा गया है। इस संदर्भ में इंग्लॅण्ड में प्रचलित प्रथा का अनुपालन अनुकरणीय हो सकता है। वहां किसी भी पद को सृजित करने के साथही नियम भी बना दिए जाते है कि जो पद सृजित हुआ है वह लाभ का पद होगा कि नहीं।
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चुनाव सुधार के रूप में निर्वाचन में राज्य द्वारा वित्तपोषण, स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है किन्तु विभिन्न आधारों पर इसका विरोध किया जाता है| स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) As electorale reform, State funding in elections can play an important role in the development of healthy democracy, but it is opposed on different grounds. Clarify (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश को व्याख्यायित कीजिये 2- प्रथम भाग में स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इसके विरोध के आधारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| वर्तमान समय में निर्वाचन के व्यय का वहन राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के द्वारा स्वतः अपने स्तर पर किया जाता हैजो कि निजी योगदान पर आधारित होता है| इसके कारण निर्वाचन प्रक्रिया में धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है जो कि निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु उचित नहीं है| इस समस्या के समाधान के तौर पर निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है| निर्वाचन सुधार पर गठित विविध समितियों के द्वारा जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, इन्द्रजीत गुप्ता समिति आदि ने भी निर्वाचन में राज्य के निवेश का समर्थन किया है| ध्यातव्य है कि इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए किया गया था स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में स्टेट फंडिंग का महत्त्व · इससे धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव निर्वाचन में कम या प्रतिबंधित होगा · इससे निर्वाचन में काले धन के प्रयोग की संभावनाएं सीमित होंगी · इसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया में एक सामान स्तर प्राप्त होगा · राजनीतिक दलों के द्वारा प्रजातंत्र को बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है अतः राजनीतिक दलों को निर्वाचन हेतु राज्य/सरकार का सहयोग प्राप्त होना चाहिए · सरकार जब विकास के लिए NGO को फंड कर सकती है तो उसे राजनीतिक दलों को भी देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र विकास से अधिक महत्वपूर्ण है · निर्वाचन में राज्य का निवेश होने पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के द्वारा आम जनता के व्यापक हितों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना संभव हो पायेगा · निर्वाचन में राज्य का निवेश राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है| यह नागरिकों के प्रति राजनीतिक दलों की जवाबदेहिता को भी प्रोत्साहित करने का एक माध्यम होगा विरोध के आधार · फंड की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी की संभावना अधिक हो जायेगी जो कि पहले से ही काफी अधिक है · अधिकाँश मामलों में राजनीतिक दलों का गठन कुछ चिन्हित/चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिपूर्ति हेतु किया जाता है तब ऐसी स्थिति में उसके व्यय का वहन राज्य या सरकार के द्वारा किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है · 1951 से लेकर अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा बिना राज्य के सहयोग के निर्वाचन में भाग लिया जा रहा है एवं कई मामलों में निर्धारित सीमा से अधिक व्यय किया जाता है| अतः राजनीतिक दलों में कोई आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की कमी नहीं है परन्तु सरकार के आर्थिक संसाधन सीमित हैं अतः सरकार के द्वारा सीमित आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकासात्मक प्राथमिकताओं को लागू करने पर किया जाना चाहिए न की निर्वाचन में निवेश करने हेतु किया जाय| · निर्वाचन में राज्य का निवेश स्वतः अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता है कि निजी योगदान का प्रभाव/भूमिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी| अतः ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया के अधिक खर्चीला होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी| जो की निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु लाभकारी नहीं होंगी| इस प्रकार स्पष्ट होता है की निर्वाचन में राज्य द्वारा फंडिंग के लाभों के साथ ही अनेक सीमाएं भी हैं| इसके सामाधान के रूप में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप निर्वाचन में राज्य या सरकार का निवेश होना चाहिए परन्तु यह निवेश वस्तु एवं सामग्री के रूप में होना चाहिए| राजनीतिक दलों के पंजीकरण के मानकों और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए एवं निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को गैर-पंजीकृत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि निर्वाचन में राज्य द्वारा किया गया निवेश स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके|
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##Question:चुनाव सुधार के रूप में निर्वाचन में राज्य द्वारा वित्तपोषण, स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है किन्तु विभिन्न आधारों पर इसका विरोध किया जाता है| स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) As electorale reform, State funding in elections can play an important role in the development of healthy democracy, but it is opposed on different grounds. Clarify (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश को व्याख्यायित कीजिये 2- प्रथम भाग में स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इसके विरोध के आधारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| वर्तमान समय में निर्वाचन के व्यय का वहन राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के द्वारा स्वतः अपने स्तर पर किया जाता हैजो कि निजी योगदान पर आधारित होता है| इसके कारण निर्वाचन प्रक्रिया में धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है जो कि निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु उचित नहीं है| इस समस्या के समाधान के तौर पर निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है| निर्वाचन सुधार पर गठित विविध समितियों के द्वारा जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, इन्द्रजीत गुप्ता समिति आदि ने भी निर्वाचन में राज्य के निवेश का समर्थन किया है| ध्यातव्य है कि इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए किया गया था स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में स्टेट फंडिंग का महत्त्व · इससे धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव निर्वाचन में कम या प्रतिबंधित होगा · इससे निर्वाचन में काले धन के प्रयोग की संभावनाएं सीमित होंगी · इसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया में एक सामान स्तर प्राप्त होगा · राजनीतिक दलों के द्वारा प्रजातंत्र को बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है अतः राजनीतिक दलों को निर्वाचन हेतु राज्य/सरकार का सहयोग प्राप्त होना चाहिए · सरकार जब विकास के लिए NGO को फंड कर सकती है तो उसे राजनीतिक दलों को भी देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र विकास से अधिक महत्वपूर्ण है · निर्वाचन में राज्य का निवेश होने पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के द्वारा आम जनता के व्यापक हितों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना संभव हो पायेगा · निर्वाचन में राज्य का निवेश राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है| यह नागरिकों के प्रति राजनीतिक दलों की जवाबदेहिता को भी प्रोत्साहित करने का एक माध्यम होगा विरोध के आधार · फंड की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी की संभावना अधिक हो जायेगी जो कि पहले से ही काफी अधिक है · अधिकाँश मामलों में राजनीतिक दलों का गठन कुछ चिन्हित/चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिपूर्ति हेतु किया जाता है तब ऐसी स्थिति में उसके व्यय का वहन राज्य या सरकार के द्वारा किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है · 1951 से लेकर अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा बिना राज्य के सहयोग के निर्वाचन में भाग लिया जा रहा है एवं कई मामलों में निर्धारित सीमा से अधिक व्यय किया जाता है| अतः राजनीतिक दलों में कोई आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की कमी नहीं है परन्तु सरकार के आर्थिक संसाधन सीमित हैं अतः सरकार के द्वारा सीमित आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकासात्मक प्राथमिकताओं को लागू करने पर किया जाना चाहिए न की निर्वाचन में निवेश करने हेतु किया जाय| · निर्वाचन में राज्य का निवेश स्वतः अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता है कि निजी योगदान का प्रभाव/भूमिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी| अतः ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया के अधिक खर्चीला होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी| जो की निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु लाभकारी नहीं होंगी| इस प्रकार स्पष्ट होता है की निर्वाचन में राज्य द्वारा फंडिंग के लाभों के साथ ही अनेक सीमाएं भी हैं| इसके सामाधान के रूप में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप निर्वाचन में राज्य या सरकार का निवेश होना चाहिए परन्तु यह निवेश वस्तु एवं सामग्री के रूप में होना चाहिए| राजनीतिक दलों के पंजीकरण के मानकों और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए एवं निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को गैर-पंजीकृत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि निर्वाचन में राज्य द्वारा किया गया निवेश स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके|
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चुनाव सुधार के रूप में निर्वाचन में राज्य द्वारा वित्तपोषण, स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है किन्तु विभिन्न आधारों पर इसका विरोध किया जाता है| स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) As electoral reform, State funding in elections can play an important role in the direction of healthy democracy, but it is opposed on different grounds. Clarify (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश को व्याख्यायित कीजिये 2- प्रथम भाग में स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इसके विरोध के आधारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| वर्तमान समय में निर्वाचन के व्यय का वहन राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के द्वारा स्वतः अपने स्तर पर किया जाता हैजो कि निजी योगदान पर आधारित होता है| इसके कारण निर्वाचन प्रक्रिया में धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है जो कि निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु उचित नहीं है| इस समस्या के समाधान के तौर पर निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है| निर्वाचन सुधार पर गठित विविध समितियों के द्वारा जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, इन्द्रजीत गुप्ता समिति आदि ने भी निर्वाचन में राज्य के निवेश का समर्थन किया है| ध्यातव्य है कि इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए किया गया था स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में स्टेट फंडिंग का महत्त्व · इससे धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव निर्वाचन में कम या प्रतिबंधित होगा · इससे निर्वाचन में काले धन के प्रयोग की संभावनाएं सीमित होंगी · इसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया में एक सामान स्तर प्राप्त होगा · राजनीतिक दलों के द्वारा प्रजातंत्र को बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है अतः राजनीतिक दलों को निर्वाचन हेतु राज्य/सरकार का सहयोग प्राप्त होना चाहिए · सरकार जब विकास के लिए NGO को फंड कर सकती है तो उसे राजनीतिक दलों को भी देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र विकास से अधिक महत्वपूर्ण है · निर्वाचन में राज्य का निवेश होने पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के द्वारा आम जनता के व्यापक हितों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना संभव हो पायेगा · निर्वाचन में राज्य का निवेश राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है| यह नागरिकों के प्रति राजनीतिक दलों की जवाबदेहिता को भी प्रोत्साहित करने का एक माध्यम होगा विरोध के आधार · फंड की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी की संभावना अधिक हो जायेगी जो कि पहले से ही काफी अधिक है · अधिकाँश मामलों में राजनीतिक दलों का गठन कुछ चिन्हित/चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिपूर्ति हेतु किया जाता है तब ऐसी स्थिति में उसके व्यय का वहन राज्य या सरकार के द्वारा किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है · 1951 से लेकर अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा बिना राज्य के सहयोग के निर्वाचन में भाग लिया जा रहा है एवं कई मामलों में निर्धारित सीमा से अधिक व्यय किया जाता है| अतः राजनीतिक दलों में कोई आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की कमी नहीं है परन्तु सरकार के आर्थिक संसाधन सीमित हैं अतः सरकार के द्वारा सीमित आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकासात्मक प्राथमिकताओं को लागू करने पर किया जाना चाहिए न की निर्वाचन में निवेश करने हेतु किया जाय| · निर्वाचन में राज्य का निवेश स्वतः अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता है कि निजी योगदान का प्रभाव/भूमिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी| अतः ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया के अधिक खर्चीला होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी| जो की निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु लाभकारी नहीं होंगी| इस प्रकार स्पष्ट होता है की निर्वाचन में राज्य द्वारा फंडिंग के लाभों के साथ ही अनेक सीमाएं भी हैं| इसके सामाधान के रूप में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप निर्वाचन में राज्य या सरकार का निवेश होना चाहिए परन्तु यह निवेश वस्तु एवं सामग्री के रूप में होना चाहिए| राजनीतिक दलों के पंजीकरण के मानकों और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए एवं निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को गैर-पंजीकृत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि निर्वाचन में राज्य द्वारा किया गया निवेश स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके|
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##Question:चुनाव सुधार के रूप में निर्वाचन में राज्य द्वारा वित्तपोषण, स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है किन्तु विभिन्न आधारों पर इसका विरोध किया जाता है| स्पष्ट कीजिये| (200 शब्द) As electoral reform, State funding in elections can play an important role in the direction of healthy democracy, but it is opposed on different grounds. Clarify (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश को व्याख्यायित कीजिये 2- प्रथम भाग में स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में इसके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इसके विरोध के आधारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| वर्तमान समय में निर्वाचन के व्यय का वहन राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के द्वारा स्वतः अपने स्तर पर किया जाता हैजो कि निजी योगदान पर आधारित होता है| इसके कारण निर्वाचन प्रक्रिया में धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है जो कि निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु उचित नहीं है| इस समस्या के समाधान के तौर पर निर्वाचन में राज्य द्वारा निवेश का विकल्प प्रस्तुत किया जाता है| निर्वाचन सुधार पर गठित विविध समितियों के द्वारा जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, इन्द्रजीत गुप्ता समिति आदि ने भी निर्वाचन में राज्य के निवेश का समर्थन किया है| ध्यातव्य है कि इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए किया गया था स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में स्टेट फंडिंग का महत्त्व · इससे धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव निर्वाचन में कम या प्रतिबंधित होगा · इससे निर्वाचन में काले धन के प्रयोग की संभावनाएं सीमित होंगी · इसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन प्रक्रिया में एक सामान स्तर प्राप्त होगा · राजनीतिक दलों के द्वारा प्रजातंत्र को बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया जाता है अतः राजनीतिक दलों को निर्वाचन हेतु राज्य/सरकार का सहयोग प्राप्त होना चाहिए · सरकार जब विकास के लिए NGO को फंड कर सकती है तो उसे राजनीतिक दलों को भी देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र विकास से अधिक महत्वपूर्ण है · निर्वाचन में राज्य का निवेश होने पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के द्वारा आम जनता के व्यापक हितों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना संभव हो पायेगा · निर्वाचन में राज्य का निवेश राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है| यह नागरिकों के प्रति राजनीतिक दलों की जवाबदेहिता को भी प्रोत्साहित करने का एक माध्यम होगा विरोध के आधार · फंड की प्राप्ति के लिए राजनीतिक दलों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी की संभावना अधिक हो जायेगी जो कि पहले से ही काफी अधिक है · अधिकाँश मामलों में राजनीतिक दलों का गठन कुछ चिन्हित/चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की परिपूर्ति हेतु किया जाता है तब ऐसी स्थिति में उसके व्यय का वहन राज्य या सरकार के द्वारा किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है · 1951 से लेकर अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा बिना राज्य के सहयोग के निर्वाचन में भाग लिया जा रहा है एवं कई मामलों में निर्धारित सीमा से अधिक व्यय किया जाता है| अतः राजनीतिक दलों में कोई आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता की कमी नहीं है परन्तु सरकार के आर्थिक संसाधन सीमित हैं अतः सरकार के द्वारा सीमित आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकासात्मक प्राथमिकताओं को लागू करने पर किया जाना चाहिए न की निर्वाचन में निवेश करने हेतु किया जाय| · निर्वाचन में राज्य का निवेश स्वतः अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता है कि निजी योगदान का प्रभाव/भूमिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी| अतः ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया के अधिक खर्चीला होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी| जो की निष्पक्ष एवं सुचारू निर्वाचन हेतु लाभकारी नहीं होंगी| इस प्रकार स्पष्ट होता है की निर्वाचन में राज्य द्वारा फंडिंग के लाभों के साथ ही अनेक सीमाएं भी हैं| इसके सामाधान के रूप में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप निर्वाचन में राज्य या सरकार का निवेश होना चाहिए परन्तु यह निवेश वस्तु एवं सामग्री के रूप में होना चाहिए| राजनीतिक दलों के पंजीकरण के मानकों और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए एवं निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को गैर-पंजीकृत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए ताकि निर्वाचन में राज्य द्वारा किया गया निवेश स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके|
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सहायक संधि की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए भारत में ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार में इसके महत्व पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Mentioning the significance of the subsidiary alliance discuss its importance in the British Empire expansion in India. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण : भूमिका में सहायक संधि प्रणाली का परिचय दीजिए। उत्तर के प्रथम भाग में इस प्रणाली की विशेषताओं की चर्चा कीजिए। इसके बाद महत्व पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल के समय लॉर्ड वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अँग्रेजी राजनीतिक परिधि के अंतर्गत लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया । इसकी सहायता से भारत मे अँग्रेजी सत्ता की श्रेष्ठता स्थापित करने मे सहायता मिली। इसके अंतर्गत भारत के कई राज्य आ गए जैसे - हैदराबाद , मैसूर , तंजौर, अवधा, पेशवा इत्यादि । सहायक संधि की विशेषताएँ - सहायक संधि अपनाने वाले राज्यों को अपनी राजधानी में ब्रिटिश रेजीडेंट रखना होता था। भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कम्पनी के अधीन होंगे. वे कोई युद्ध नहीं करेंगें तथा अन्य राज्यों से बातचीत भी कंपनी के द्वारा ही होगी। बड़े राज्यों को अपने यहां एक ऐसी सेना रखनी होती थी जिसकी कमान कंपनी के हाथों में होती थी. इसका उद्देश्य सार्वजनिक शान्ति बनाए रखना था। इसके लिए उन्हें पूर्ण प्रभुसत्तायुक्त प्रदेश कंपनी को देना था तथा छोटे राज्यों को कंपनी को नकद धन देना था। राज्य कंपनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं रख सकते थे। कंपनी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करेगी तथाकंपनी राज्यों की प्रत्येक प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करेगी। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में सहायक संधि का महत्व: कंपनी ने उन प्रदेशों में सम्पूर्ण प्रभुसत्ता हासिल कर ली जिन्हे राज्य द्वारा ब्रिटिश सेना के रख-रखाव के बदले में प्रदान किया जाता था। फ्रांसीसी कार्यवाही को संतुलित करने की शक्ति प्राप्त हो गयी। उस समय जो नेपोलियन का भय व्याप्त था उससे मुक़ाबला करने के लिए ब्रिटिश अब तैयार हो गए। भारतीय राज्यों के राज्यक्षेत्र में ही अपने सैन्य दस्तों को तैनात कर अंग्रेजों ने अपने रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण स्थलों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिए। भारत के तत्कालीन महत्वपूर्ण प्रान्तों हैदराबाद, मैसूर, तंजौर तथा अवध आदि से हस्ताक्षर करा कर भारत के एक बड़े भू भाग पर अंग्रेजों ने सांकेतिक रूप से कब्जा कर लिया था। इसने भारतीय राज्यों की निःशस्त्र कर दिया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी महासंघ बनाने की संभावना से भारतीय राजाओं को वंचित कर दिया। अंग्रेजों का सैन्य खर्च कम हुआ। जिससे सैनिकों की संख्या में वृद्धि हुई। अंततः जिसका प्रयोग भारतियों के खिलाफ ही हुआ। एक संधि के माध्यम से लगभग सभी महत्वपूर्ण भारतीय राज्य कंपनी के संरक्षण में आ गए। निष्कर्षतः अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ सहायक संधि की यह नीति अपने आप में पहली महत्वपूर्ण साम्राज्यवादी नीति थी। इसके प्रावधान इस प्रकार थे कि भारतीय शासकों को प्रतीत हुआ कि उनके हित में है परंतु ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार के लिए इस नीति ने मार्ग प्रशस्त किया।
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##Question:सहायक संधि की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए भारत में ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार में इसके महत्व पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Mentioning the significance of the subsidiary alliance discuss its importance in the British Empire expansion in India. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण : भूमिका में सहायक संधि प्रणाली का परिचय दीजिए। उत्तर के प्रथम भाग में इस प्रणाली की विशेषताओं की चर्चा कीजिए। इसके बाद महत्व पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल के समय लॉर्ड वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अँग्रेजी राजनीतिक परिधि के अंतर्गत लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया । इसकी सहायता से भारत मे अँग्रेजी सत्ता की श्रेष्ठता स्थापित करने मे सहायता मिली। इसके अंतर्गत भारत के कई राज्य आ गए जैसे - हैदराबाद , मैसूर , तंजौर, अवधा, पेशवा इत्यादि । सहायक संधि की विशेषताएँ - सहायक संधि अपनाने वाले राज्यों को अपनी राजधानी में ब्रिटिश रेजीडेंट रखना होता था। भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कम्पनी के अधीन होंगे. वे कोई युद्ध नहीं करेंगें तथा अन्य राज्यों से बातचीत भी कंपनी के द्वारा ही होगी। बड़े राज्यों को अपने यहां एक ऐसी सेना रखनी होती थी जिसकी कमान कंपनी के हाथों में होती थी. इसका उद्देश्य सार्वजनिक शान्ति बनाए रखना था। इसके लिए उन्हें पूर्ण प्रभुसत्तायुक्त प्रदेश कंपनी को देना था तथा छोटे राज्यों को कंपनी को नकद धन देना था। राज्य कंपनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं रख सकते थे। कंपनी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करेगी तथाकंपनी राज्यों की प्रत्येक प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करेगी। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में सहायक संधि का महत्व: कंपनी ने उन प्रदेशों में सम्पूर्ण प्रभुसत्ता हासिल कर ली जिन्हे राज्य द्वारा ब्रिटिश सेना के रख-रखाव के बदले में प्रदान किया जाता था। फ्रांसीसी कार्यवाही को संतुलित करने की शक्ति प्राप्त हो गयी। उस समय जो नेपोलियन का भय व्याप्त था उससे मुक़ाबला करने के लिए ब्रिटिश अब तैयार हो गए। भारतीय राज्यों के राज्यक्षेत्र में ही अपने सैन्य दस्तों को तैनात कर अंग्रेजों ने अपने रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण स्थलों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिए। भारत के तत्कालीन महत्वपूर्ण प्रान्तों हैदराबाद, मैसूर, तंजौर तथा अवध आदि से हस्ताक्षर करा कर भारत के एक बड़े भू भाग पर अंग्रेजों ने सांकेतिक रूप से कब्जा कर लिया था। इसने भारतीय राज्यों की निःशस्त्र कर दिया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी महासंघ बनाने की संभावना से भारतीय राजाओं को वंचित कर दिया। अंग्रेजों का सैन्य खर्च कम हुआ। जिससे सैनिकों की संख्या में वृद्धि हुई। अंततः जिसका प्रयोग भारतियों के खिलाफ ही हुआ। एक संधि के माध्यम से लगभग सभी महत्वपूर्ण भारतीय राज्य कंपनी के संरक्षण में आ गए। निष्कर्षतः अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ सहायक संधि की यह नीति अपने आप में पहली महत्वपूर्ण साम्राज्यवादी नीति थी। इसके प्रावधान इस प्रकार थे कि भारतीय शासकों को प्रतीत हुआ कि उनके हित में है परंतु ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार के लिए इस नीति ने मार्ग प्रशस्त किया।
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Discuss the different types of folds with suitable diagrams. Also, Bring out the difference between fold and fault mountains. (150 words/10 marks)
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Approach: Define the term folds Briefly describe different types of folds with diagram Bring out the differences between folds and faults Answer: Fold:- Wave-like bends are formed in the crustal rocks due to tangential compressive forces resulting from horizontal movement caused by the endogenetic forces originating deep within the earth are called FOLDS. The up folded rock strata in the arch-like form are called anticlines while the down folded structure forming trough-like features is called a syncline. Types of Folds:- Symmetrical Fold:- These are simple folds, the limbs (both) of which incline uniformly. These folds are an example of an open fold. Symmetrical folds are formed when the compressive forces work regularly but with moderate intensity. Example Alps. Asymmetric Folds:- These are characterized by unequal and irregular limbs. Both the limbs are inclined at different angles. One limb is relatively larger and the inclination is moderate and regular while the other limb is relatively shorter with steep inclination. Recumbent Folds:- These are formed when the compressive forces are so strong that both the limbs of the fold become parallel as well as horizontal, eg. Carrick Castle of Scotland Overturned Folds:- These are the folds in which one limb of the fold is thrust upon another gold due to intense compressive forces. Limbs are seldom horizontal. Nappes:- These are the result of complex folding mechanisms caused by intense horizontal movement and resultant compressive forces. Both the limbs of recumbent folds are parallel and horizontal and due to continued compressive force, one limb of the recumbent folds slide forward and overrides the other fold. These are found in the Himalayas, Alps. Differences between the Folds and Faults:- The folds are formed when the dominant force is compressive force whereas faults can occur either due to tensional or compressional forces. In faults, the rock strata lose its continuity whereas the continuity is maintained in the folds except in Nappes. The up folded and down folded rock strata are known as anticline and synclines whereas the trough-like depression in a fault is called Graben and the upthrown block is called Horst. The sides of mountains formed by faults are steep whereas the mountains formed by folding have either steep sides or one side steep and other side slants slightly. Upwarping and down warping are the features that occurred in folds whereas cracks, fractures, ruptures are the features of faults. Recurrent seismicity is a common feature in folded mountain belts whereas this is not the case with the faults. The Himalayas, the Alps, are the examples of fold mountains, whereas Black Forest, Vindyas, are examples of block Mountains.
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##Question:Discuss the different types of folds with suitable diagrams. Also, Bring out the difference between fold and fault mountains. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: Define the term folds Briefly describe different types of folds with diagram Bring out the differences between folds and faults Answer: Fold:- Wave-like bends are formed in the crustal rocks due to tangential compressive forces resulting from horizontal movement caused by the endogenetic forces originating deep within the earth are called FOLDS. The up folded rock strata in the arch-like form are called anticlines while the down folded structure forming trough-like features is called a syncline. Types of Folds:- Symmetrical Fold:- These are simple folds, the limbs (both) of which incline uniformly. These folds are an example of an open fold. Symmetrical folds are formed when the compressive forces work regularly but with moderate intensity. Example Alps. Asymmetric Folds:- These are characterized by unequal and irregular limbs. Both the limbs are inclined at different angles. One limb is relatively larger and the inclination is moderate and regular while the other limb is relatively shorter with steep inclination. Recumbent Folds:- These are formed when the compressive forces are so strong that both the limbs of the fold become parallel as well as horizontal, eg. Carrick Castle of Scotland Overturned Folds:- These are the folds in which one limb of the fold is thrust upon another gold due to intense compressive forces. Limbs are seldom horizontal. Nappes:- These are the result of complex folding mechanisms caused by intense horizontal movement and resultant compressive forces. Both the limbs of recumbent folds are parallel and horizontal and due to continued compressive force, one limb of the recumbent folds slide forward and overrides the other fold. These are found in the Himalayas, Alps. Differences between the Folds and Faults:- The folds are formed when the dominant force is compressive force whereas faults can occur either due to tensional or compressional forces. In faults, the rock strata lose its continuity whereas the continuity is maintained in the folds except in Nappes. The up folded and down folded rock strata are known as anticline and synclines whereas the trough-like depression in a fault is called Graben and the upthrown block is called Horst. The sides of mountains formed by faults are steep whereas the mountains formed by folding have either steep sides or one side steep and other side slants slightly. Upwarping and down warping are the features that occurred in folds whereas cracks, fractures, ruptures are the features of faults. Recurrent seismicity is a common feature in folded mountain belts whereas this is not the case with the faults. The Himalayas, the Alps, are the examples of fold mountains, whereas Black Forest, Vindyas, are examples of block Mountains.
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चुनाव सुधारोंकेसंदर्भ में NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व काआलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द) Criticallyanalyzethe importance of the NOTA and recall system in the context of electoral reforms. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका में NOTA और वापस बुलाने की प्रणालीका एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व को उल्लेखित कीजिए। इसके पश्चातNOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली की व्यववहारिकता से संबंधित पहलुओं का उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नोटा(NOTA) का अर्थ है, इनमें से कोई नहीं। यदि चुनाव लड़ रहे कैंडिडेट में से कोई भी कैंडिडेट पसंद नहीं है तो नोटा एक अच्छा विकल्प है। सर्वप्रथम 2013 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग मशीन में इस विकल्प को उपलब्ध कराया गया।राईट टू रिकॉल के तहत, मतदाता, जनप्रतिनिधियों केसामान्य कार्यकाल की समाप्ति से पहले निर्वाचित प्रतिनिधियोंको हटाने की शक्ति रखते है। NOTA का महत्त्व :- राजनीतिक प्रक्रिया में जनभागीदारी को अधिक प्रोत्साहित किया जाना। मत देने के अधिकार का आशय यह भी होता है कि हम किसी के भी पक्ष में मत न दें अतः नोटा प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित है। नोटा प्रत्यासियों की गुणवत्ता तय करने में सहायक होता है। जब मताधिकार का अभ्यास गोपनीयता के आधार पर किया जाता है जो मत न देने का अधिकार की गोपनीयता को बनाये रखने हेतु नोटा का एक विशिष्ट महत्व है। समाज के वर्गों को बहिष्कार का अवसर देता है जब वे प्रत्याशियों से सहमत नहीं होते। नोटा के माध्यम से मतदाता को जो सूचना या जानकारी प्रत्याशियों के बारे में प्राप्त होती है उसका बेहतर अनुप्रयोग किया जा सकता है। वापस बुलाने की प्रणाली/Recall का महत्व:- निर्वाचित सदस्य की जवाबदेहिता नागरिकों के प्रति अधिक होगी। इसके माध्यम से जनता के द्वारा जनप्रतिनिधियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण को बनाये रखा जाना संभव हो पाता है। यह निर्वाचित सदस्यों को जनसेवक के रूप में कार्य करने हेतु बाध्य करता है। निर्वाचित करने का अधिकार स्वतः अपने आप में वापस बुलाने के अधिकार को प्रदान करता है अतः यह प्रजातांत्रिक विचारधारा के अनुरूप है। प्रतिनिधित्व प्रजातंत्र का झुकाव भागीदारी प्रजातंत्र की और होगा। जन प्रतिनिधियों की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने का एक माध्यम है। हालाँकि इस प्रणाली की कुछ चिंताएं भी है जैसे- राईट टू रिकॉल अत्यधिक लोकतंत्र(excessive democracy) को जन्म दे सकता है जो कि वापस बुलाए जाने के सतत खतरे के कारण, प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को कम कर देगा और इससे निपटने के लिए प्रतिनिधि हमेशा जनदबाव में कार्य करेंगे। यह जनदबाव प्रतिनिधियों को उनके स्वयं के निर्णयों को प्रभावित करेगा जो अंतिम रूप से हानिकारक हो सकता है। भारत जैसे देश में यह विधायिका को अस्थिर कर सकता है। हालाँकिवापस बुलाने की प्रणाली वांछित है परन्तु व्यावहारिक रूपमें इसे लागू करने मेंगंभीर चुनौतियां भी है। भारत जैसे वृहत देश में इसे लागू करने से पूर्व इसकी व्यावहारिकता की जांच और व्यापक चर्चा एवं सहमति आवश्यक है।
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##Question:चुनाव सुधारोंकेसंदर्भ में NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व काआलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द) Criticallyanalyzethe importance of the NOTA and recall system in the context of electoral reforms. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका में NOTA और वापस बुलाने की प्रणालीका एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व को उल्लेखित कीजिए। इसके पश्चातNOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली की व्यववहारिकता से संबंधित पहलुओं का उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नोटा(NOTA) का अर्थ है, इनमें से कोई नहीं। यदि चुनाव लड़ रहे कैंडिडेट में से कोई भी कैंडिडेट पसंद नहीं है तो नोटा एक अच्छा विकल्प है। सर्वप्रथम 2013 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग मशीन में इस विकल्प को उपलब्ध कराया गया।राईट टू रिकॉल के तहत, मतदाता, जनप्रतिनिधियों केसामान्य कार्यकाल की समाप्ति से पहले निर्वाचित प्रतिनिधियोंको हटाने की शक्ति रखते है। NOTA का महत्त्व :- राजनीतिक प्रक्रिया में जनभागीदारी को अधिक प्रोत्साहित किया जाना। मत देने के अधिकार का आशय यह भी होता है कि हम किसी के भी पक्ष में मत न दें अतः नोटा प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित है। नोटा प्रत्यासियों की गुणवत्ता तय करने में सहायक होता है। जब मताधिकार का अभ्यास गोपनीयता के आधार पर किया जाता है जो मत न देने का अधिकार की गोपनीयता को बनाये रखने हेतु नोटा का एक विशिष्ट महत्व है। समाज के वर्गों को बहिष्कार का अवसर देता है जब वे प्रत्याशियों से सहमत नहीं होते। नोटा के माध्यम से मतदाता को जो सूचना या जानकारी प्रत्याशियों के बारे में प्राप्त होती है उसका बेहतर अनुप्रयोग किया जा सकता है। वापस बुलाने की प्रणाली/Recall का महत्व:- निर्वाचित सदस्य की जवाबदेहिता नागरिकों के प्रति अधिक होगी। इसके माध्यम से जनता के द्वारा जनप्रतिनिधियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण को बनाये रखा जाना संभव हो पाता है। यह निर्वाचित सदस्यों को जनसेवक के रूप में कार्य करने हेतु बाध्य करता है। निर्वाचित करने का अधिकार स्वतः अपने आप में वापस बुलाने के अधिकार को प्रदान करता है अतः यह प्रजातांत्रिक विचारधारा के अनुरूप है। प्रतिनिधित्व प्रजातंत्र का झुकाव भागीदारी प्रजातंत्र की और होगा। जन प्रतिनिधियों की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने का एक माध्यम है। हालाँकि इस प्रणाली की कुछ चिंताएं भी है जैसे- राईट टू रिकॉल अत्यधिक लोकतंत्र(excessive democracy) को जन्म दे सकता है जो कि वापस बुलाए जाने के सतत खतरे के कारण, प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को कम कर देगा और इससे निपटने के लिए प्रतिनिधि हमेशा जनदबाव में कार्य करेंगे। यह जनदबाव प्रतिनिधियों को उनके स्वयं के निर्णयों को प्रभावित करेगा जो अंतिम रूप से हानिकारक हो सकता है। भारत जैसे देश में यह विधायिका को अस्थिर कर सकता है। हालाँकिवापस बुलाने की प्रणाली वांछित है परन्तु व्यावहारिक रूपमें इसे लागू करने मेंगंभीर चुनौतियां भी है। भारत जैसे वृहत देश में इसे लागू करने से पूर्व इसकी व्यावहारिकता की जांच और व्यापक चर्चा एवं सहमति आवश्यक है।
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What do you understand by foreign policy? With reference to India, analyze the domestic factors influencing foreign policy with the help of examples. (150 words)
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Approach- 1. Define foreign policy 2. Explain the domestic factors that influence the foreign policy with example 3. Conclude with giving reference to the international factors also. Answer- According to J. Bandopadhyay Foreign Policy involves an exercise of choice of ends and means in an international setting. It is a nation protocol for making and maintaining relations with foreign countries Domestic Factors influencing Foreign Policy 1. Geographical Factor - A permanent and stable determinant of foreign policy is geography. Geography determines the climate, resources, topography, frontiers, and neighbors which in turn determines the foreign policy. Former PM A.B.Bajpai has rightly said that you can change friends, not neighbors. For example India’s Policy towards hostile neighbors Pakistan & China, geopolitics in Indo-Pacific region, various development assistance program in Bangladesh, Nepal, and Sri Lanka. 2. History- Another guide to foreign policy is the history of the country From history alone the nation inherits a style and culture which in turn influences foreign policymaking. Example- India’s National Movement influenced India’s foreign policy after independence. The policy of non-alignment and Panchsheel. 3. Ideology- The core values of Indian philosophy such as Satya, Ahimsa, Dharma, Anekantavada, and Arthasastra all had importance in India’s Foreign policy. Example- India has not forcefully occupied any nation in the last thousand years, India is also the biggest contributor in the UN foreign peacekeeping force. India through NAM provided leadership to third world countries. India is a socialist state and the value of socialism has a clear impact on the economic and foreign policy of the nation. Example- India has good relation with Russia and other socialist countries after independence due to the shared bond of socialism. 4. Economic Factors:- Today, no state in the world can boast of economic self-sufficiency. This mutual interdependence of the economies also works as a determinant of foreign policy. So, nations make their foreign policies in a way so that their trade may have a favorable balance in international economic activity. Example- New Economic Policy, 1991, India maintains a good relationship with both S Arabia and Iran due to its energy needs, One of the favorite destinations of Foreign investment, etc. 5. National and Military Capacity- The nation’s military capacity determines its stature at the world stage and also influences its foreign policy. The military initiatives have now come in disguise with development initiatives. Example- Cooperation of USSR, India- China war 1962, Rise of China as Nuclear power in 1964, India-Pakistan war 1965, 1971, Issue of NPT, Indo-US nuclear deal, recent deals with the US- COMCASA, India has dehyphenated Israel and Palestine due to strategic needs of the present time. 6. Public Opinion- Especially in democratic countries public opinion cannot be ignored as one of the determinants of foreign policy. It is often vague, volatile, amenable to quick changes, and difficult to mobilize. But once on a particular problem public opinion is mobilized and expressed in clear terms, it becomes difficult for the government to overlook it while taking the decision on the issue in question. Example- the pressure of public opinion that Krishna Menon had to resign in 1962 after the Chinese aggression, Current India- Pakistan relations, and respective foreign policies of both the nations. Domestic factors play an important role in shaping the foreign policy of a country. Along with these factors, there are international factors such as the existence of power blocs, the role of the UN, economic development needs, etc. It also plays a decisive role in shaping the country’s foreign policy.
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##Question:What do you understand by foreign policy? With reference to India, analyze the domestic factors influencing foreign policy with the help of examples. (150 words)##Answer:Approach- 1. Define foreign policy 2. Explain the domestic factors that influence the foreign policy with example 3. Conclude with giving reference to the international factors also. Answer- According to J. Bandopadhyay Foreign Policy involves an exercise of choice of ends and means in an international setting. It is a nation protocol for making and maintaining relations with foreign countries Domestic Factors influencing Foreign Policy 1. Geographical Factor - A permanent and stable determinant of foreign policy is geography. Geography determines the climate, resources, topography, frontiers, and neighbors which in turn determines the foreign policy. Former PM A.B.Bajpai has rightly said that you can change friends, not neighbors. For example India’s Policy towards hostile neighbors Pakistan & China, geopolitics in Indo-Pacific region, various development assistance program in Bangladesh, Nepal, and Sri Lanka. 2. History- Another guide to foreign policy is the history of the country From history alone the nation inherits a style and culture which in turn influences foreign policymaking. Example- India’s National Movement influenced India’s foreign policy after independence. The policy of non-alignment and Panchsheel. 3. Ideology- The core values of Indian philosophy such as Satya, Ahimsa, Dharma, Anekantavada, and Arthasastra all had importance in India’s Foreign policy. Example- India has not forcefully occupied any nation in the last thousand years, India is also the biggest contributor in the UN foreign peacekeeping force. India through NAM provided leadership to third world countries. India is a socialist state and the value of socialism has a clear impact on the economic and foreign policy of the nation. Example- India has good relation with Russia and other socialist countries after independence due to the shared bond of socialism. 4. Economic Factors:- Today, no state in the world can boast of economic self-sufficiency. This mutual interdependence of the economies also works as a determinant of foreign policy. So, nations make their foreign policies in a way so that their trade may have a favorable balance in international economic activity. Example- New Economic Policy, 1991, India maintains a good relationship with both S Arabia and Iran due to its energy needs, One of the favorite destinations of Foreign investment, etc. 5. National and Military Capacity- The nation’s military capacity determines its stature at the world stage and also influences its foreign policy. The military initiatives have now come in disguise with development initiatives. Example- Cooperation of USSR, India- China war 1962, Rise of China as Nuclear power in 1964, India-Pakistan war 1965, 1971, Issue of NPT, Indo-US nuclear deal, recent deals with the US- COMCASA, India has dehyphenated Israel and Palestine due to strategic needs of the present time. 6. Public Opinion- Especially in democratic countries public opinion cannot be ignored as one of the determinants of foreign policy. It is often vague, volatile, amenable to quick changes, and difficult to mobilize. But once on a particular problem public opinion is mobilized and expressed in clear terms, it becomes difficult for the government to overlook it while taking the decision on the issue in question. Example- the pressure of public opinion that Krishna Menon had to resign in 1962 after the Chinese aggression, Current India- Pakistan relations, and respective foreign policies of both the nations. Domestic factors play an important role in shaping the foreign policy of a country. Along with these factors, there are international factors such as the existence of power blocs, the role of the UN, economic development needs, etc. It also plays a decisive role in shaping the country’s foreign policy.
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भारत से ब्रिटिश शासन का अंत एक बहुत बड़ी कीमत के साथ हुआ था| इस संदर्भ में, तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| साथ ही, भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) The end of British rulein India cameWithvery high cost. In this context, Mention the emerging problems and challenges faced by newlyindependent India. Also, Describe the results of the Partition of India. (200 words)
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एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में,भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का अंत कीजिये| उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूद मुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ| नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँ भी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माण एक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ; जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास सीमा का निर्धारण कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण भूमि सुधार के माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण भारत के विभाजन से उत्पन परिणाम राजनीतिक परिणाम साम्प्रदायिकता का विकास पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध प्रशासन,सेना आदि के बँटवारे को लेकर विवाद सीमा-निर्धारण तथा कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद सामाजिक परिणाम शरणार्थी संकट बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन अमानवीय व्यवहार धार्मिक टकराव तथा धार्मिक संरचना को देखकर आवागमन तथा निवास इत्यादि के निर्णय लोगों पर मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव जान-माल की व्यापक क्षति तथा संपति का नुकसान आर्थिक परिणाम विभाजन के कारण राजनीतिक अस्थिरता तथा अव्यवस्था की स्थिति ने तात्कालिक तौर पर समकालिक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया; कृषि को भी व्यापक नुकसान क्योंकि सिंचाई से युक्त एक बड़ा क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण में; जूट उद्योगों पर दुष्प्रभाव विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया|
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##Question:भारत से ब्रिटिश शासन का अंत एक बहुत बड़ी कीमत के साथ हुआ था| इस संदर्भ में, तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| साथ ही, भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) The end of British rulein India cameWithvery high cost. In this context, Mention the emerging problems and challenges faced by newlyindependent India. Also, Describe the results of the Partition of India. (200 words)##Answer:एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में,भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का अंत कीजिये| उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूद मुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ| नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँ भी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माण एक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ; जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास सीमा का निर्धारण कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण भूमि सुधार के माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण भारत के विभाजन से उत्पन परिणाम राजनीतिक परिणाम साम्प्रदायिकता का विकास पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध प्रशासन,सेना आदि के बँटवारे को लेकर विवाद सीमा-निर्धारण तथा कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद सामाजिक परिणाम शरणार्थी संकट बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन अमानवीय व्यवहार धार्मिक टकराव तथा धार्मिक संरचना को देखकर आवागमन तथा निवास इत्यादि के निर्णय लोगों पर मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव जान-माल की व्यापक क्षति तथा संपति का नुकसान आर्थिक परिणाम विभाजन के कारण राजनीतिक अस्थिरता तथा अव्यवस्था की स्थिति ने तात्कालिक तौर पर समकालिक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया; कृषि को भी व्यापक नुकसान क्योंकि सिंचाई से युक्त एक बड़ा क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण में; जूट उद्योगों पर दुष्प्रभाव विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया|
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चुनाव सुधारोंकेसंदर्भ में NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व काआलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द) Criticallyanalyzethe importance of the NOTA and recall system in the context of electoral reforms. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका में NOTA और वापस बुलाने की प्रणालीका एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व को उल्लेखित कीजिए। इसके पश्चातNOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली की व्यववहारिकता से संबंधित पहलुओं का उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नोटा(NOTA) का अर्थ है, इनमें से कोई नहीं। यदिचुनाव लड़ रहे कैंडिडेट में से कोई भी कैंडिडेट पसंद नहीं है तो नोटा एक अच्छा विकल्प है। सर्वप्रथम2013 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग मशीन में इस विकल्प को उपलब्ध कराया गया।राईट टू रिकॉल के तहत, मतदाता, जनप्रतिनिधियों केसामान्य कार्यकाल की समाप्ति से पहले निर्वाचित प्रतिनिधियोंको हटाने की शक्ति रखतेहै। NOTA का महत्त्व :- राजनीतिक प्रक्रिया में जनभागीदारी को अधिक प्रोत्साहित किया जाना। मत देने के अधिकार का आशय यह भी होता है कि हम किसी के भी पक्ष में मत न दें अतः नोटा प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित है। नोटा प्रत्यासियों की गुणवत्ता तय करने में सहायक होता है। जब मताधिकार का अभ्यास गोपनीयता के आधार पर किया जाता है जो मत न देने का अधिकार की गोपनीयता को बनाये रखने हेतु नोटा का एक विशिष्ट महत्व है। समाज के वर्गों को बहिष्कार का अवसर देता है जब वे प्रत्याशियों से सहमत नहीं होते। नोटा के माध्यम से मतदाता को जो सूचना या जानकारी प्रत्याशियों के बारे में प्राप्त होती है उसका बेहतर अनुप्रयोग किया जा सकता है। वापस बुलाने की प्रणाली/Recall का महत्व:- निर्वाचित सदस्य की जवाबदेहिता नागरिकों के प्रति अधिक होगी। इसके माध्यम से जनता के द्वारा जनप्रतिनिधियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण को बनाये रखा जाना संभव हो पाता है। यह निर्वाचित सदस्यों को जनसेवक के रूप में कार्य करने हेतु बाध्य करता है। निर्वाचित करने का अधिकार स्वतः अपने आप में वापस बुलाने के अधिकार को प्रदान करता है अतः यह प्रजातांत्रिक विचारधारा के अनुरूप है। प्रतिनिधित्व प्रजातंत्र का झुकाव भागीदारी प्रजातंत्र की और होगा। जन प्रतिनिधियों की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने का एक माध्यम है। हालाँकि इस प्रणाली की कुछ चिंताएं भी है जैसे- राईट टू रिकॉल अत्यधिक लोकतंत्र(excessive democracy) को जन्म दे सकता है जो कि वापस बुलाए जाने के सतत खतरे के कारण, प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को कम कर देगा और इससे निपटने के लिए प्रतिनिधि हमेशा जनदबाव में कार्य करेंगे। यह जनदबाव प्रतिनिधियों को उनके स्वयं के निर्णयों को प्रभावित करेगा जो अंतिम रूप से हानिकारक हो सकता है। भारत जैसे देश में यह विधायिका को अस्थिर कर सकता है। हालाँकिवापस बुलाने की प्रणाली वांछित है परन्तु व्यावहारिक रूपमें इसे लागू करने मेंगंभीर चुनौतियां भी है। भारत जैसे वृहत देश में इसे लागू करने से पूर्व इसकी व्यावहारिकता की जांच और व्यापकचर्चा एवं सहमति आवश्यक है।
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##Question:चुनाव सुधारोंकेसंदर्भ में NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व काआलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (200 शब्द) Criticallyanalyzethe importance of the NOTA and recall system in the context of electoral reforms. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका में NOTA और वापस बुलाने की प्रणालीका एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, NOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली के महत्व को उल्लेखित कीजिए। इसके पश्चातNOTA एवं वापस बुलाने की प्रणाली की व्यववहारिकता से संबंधित पहलुओं का उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नोटा(NOTA) का अर्थ है, इनमें से कोई नहीं। यदिचुनाव लड़ रहे कैंडिडेट में से कोई भी कैंडिडेट पसंद नहीं है तो नोटा एक अच्छा विकल्प है। सर्वप्रथम2013 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग मशीन में इस विकल्प को उपलब्ध कराया गया।राईट टू रिकॉल के तहत, मतदाता, जनप्रतिनिधियों केसामान्य कार्यकाल की समाप्ति से पहले निर्वाचित प्रतिनिधियोंको हटाने की शक्ति रखतेहै। NOTA का महत्त्व :- राजनीतिक प्रक्रिया में जनभागीदारी को अधिक प्रोत्साहित किया जाना। मत देने के अधिकार का आशय यह भी होता है कि हम किसी के भी पक्ष में मत न दें अतः नोटा प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित है। नोटा प्रत्यासियों की गुणवत्ता तय करने में सहायक होता है। जब मताधिकार का अभ्यास गोपनीयता के आधार पर किया जाता है जो मत न देने का अधिकार की गोपनीयता को बनाये रखने हेतु नोटा का एक विशिष्ट महत्व है। समाज के वर्गों को बहिष्कार का अवसर देता है जब वे प्रत्याशियों से सहमत नहीं होते। नोटा के माध्यम से मतदाता को जो सूचना या जानकारी प्रत्याशियों के बारे में प्राप्त होती है उसका बेहतर अनुप्रयोग किया जा सकता है। वापस बुलाने की प्रणाली/Recall का महत्व:- निर्वाचित सदस्य की जवाबदेहिता नागरिकों के प्रति अधिक होगी। इसके माध्यम से जनता के द्वारा जनप्रतिनिधियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण को बनाये रखा जाना संभव हो पाता है। यह निर्वाचित सदस्यों को जनसेवक के रूप में कार्य करने हेतु बाध्य करता है। निर्वाचित करने का अधिकार स्वतः अपने आप में वापस बुलाने के अधिकार को प्रदान करता है अतः यह प्रजातांत्रिक विचारधारा के अनुरूप है। प्रतिनिधित्व प्रजातंत्र का झुकाव भागीदारी प्रजातंत्र की और होगा। जन प्रतिनिधियों की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने का एक माध्यम है। हालाँकि इस प्रणाली की कुछ चिंताएं भी है जैसे- राईट टू रिकॉल अत्यधिक लोकतंत्र(excessive democracy) को जन्म दे सकता है जो कि वापस बुलाए जाने के सतत खतरे के कारण, प्रतिनिधियों की स्वतंत्रता को कम कर देगा और इससे निपटने के लिए प्रतिनिधि हमेशा जनदबाव में कार्य करेंगे। यह जनदबाव प्रतिनिधियों को उनके स्वयं के निर्णयों को प्रभावित करेगा जो अंतिम रूप से हानिकारक हो सकता है। भारत जैसे देश में यह विधायिका को अस्थिर कर सकता है। हालाँकिवापस बुलाने की प्रणाली वांछित है परन्तु व्यावहारिक रूपमें इसे लागू करने मेंगंभीर चुनौतियां भी है। भारत जैसे वृहत देश में इसे लागू करने से पूर्व इसकी व्यावहारिकता की जांच और व्यापकचर्चा एवं सहमति आवश्यक है।
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Mr. X is the head of an NGO working in the field of environment conservation and protection. He is in dire need of funds for the NGO’s operations and payments to his staff. He is approached by an official of a large infrastructure company, who is ready to provide the required funding for the NGO. But, in a quid pro quo, he asks Mr. X to raise objections over the bypassing of Environmental Impact Assessment (EIA) norms in an ongoing PPP project through his NGO. This project is being implemented by a rival infrastructure company. Mr. X knows that there have been instances of high level corruption in the process of granting EIA to mega projects and the information provided by the official seems to be authentic. Hence, he accepts the money and agrees to raise the objection. (a) Considering the circumstances of the case, is Mr. X correct in accepting the money? Give appropriate reasons for your answer. (b) If you were in place of Mr. X, what would have been your course of action? Give reasons for it.
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Approach: · Briefly mention the case summary and ethical issues involved. · Examine whether Mr X is correct in his action. · Mention what you have done, giving appropriate reasons for the same. Answer: Case Summary: Mr X is running an NGO is asked by a corporate to raise objections about laxity in granting EIA approval to a project of a rival corporate in exchange of funding to the NGO. Convinced that these objections are true, he agrees. (a) In this case, several ethical issues arise before Mr X, which could cloud his apparently good action. · Means v/s End: Though the end result of his action will be highlighting the corruption, but his motive is questionable. Highlighting corruption to get funding conflates arguable means to achieve desired ends. · Environmental Ethics v/s Personal Ethics: His action is eventually going to benefit the environment conservation and protection but this occurs at the cost of his integrity. · Organisational benefit v/s organisational ethics: Again the organisation is benefitting by receiving the funds it direly needed but at the cost of compromise of organisational ethics of transparency in funding and objective decision making without quid pro quo. · Truthfulness of Charges: It is only mentioned that charges seem authentic. Before agreeing to raise them, it is expected that he verifies them on his own. Thus, it may appear that his action was pragmatic and necessary for the survival of NGO and eventually beneficial on counts of tackling corruption and protecting the environment. Yet this action can’t be justified on account of personal and organisational values. It will set a wrong precedent and he is letting his NGO being used as a tool in the corporate rivalry. It will affect the objectives and impartial conduct of the NGO, which is of utmost importance for NGOs working in critical fields with so much public interest at stake. The dearth of money is a problem which much social organisation face. Accepting money in circumstances such as the one seems an easy way out but not the right way. (b) If I would have been in the place of Mr X, I would have taken the following course: · Independently inquire about the charges that have been presented before me so much that truth is not compromised. · I would refuse to take money in exchange for raising objections as it would be in line with my commitment to organisational values and personal integrity. · I would discuss the situation with my employees and ask them to accept cuts in pay for a brief period. I would make them understand the importance of serving the public interest, which is the motto of an NGO against being an instrument to beat the competition. · If the charges are found to be true it would have to be raised anyway with the authorities · If they are found to be false I would report the matter to appropriate agencies like Competition Commission etc. mentioning how a campaign to malign the image of competitors is being undertaken. · Meanwhile, I will raise funding requests with other potential Donors or ask past donors for urgent funding making them aware of the crisis that the NGO is undergoing. · If we keep our ethical and moral standards high it will continuously reflect in our work. This will encourage honest and public-oriented donors to help us and show belief in us. This will be a morale booster for the organisation in the long run and it would further reinforce our commitment in honestly serving the public interest. Thus, without compromising with my values and organisational ethics, I can expect to overcome the crisis while doing the needful for the cause of environment. Though difficulties will arise, they can be overcome eventually without ceding ethical grounds.
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##Question:Mr. X is the head of an NGO working in the field of environment conservation and protection. He is in dire need of funds for the NGO’s operations and payments to his staff. He is approached by an official of a large infrastructure company, who is ready to provide the required funding for the NGO. But, in a quid pro quo, he asks Mr. X to raise objections over the bypassing of Environmental Impact Assessment (EIA) norms in an ongoing PPP project through his NGO. This project is being implemented by a rival infrastructure company. Mr. X knows that there have been instances of high level corruption in the process of granting EIA to mega projects and the information provided by the official seems to be authentic. Hence, he accepts the money and agrees to raise the objection. (a) Considering the circumstances of the case, is Mr. X correct in accepting the money? Give appropriate reasons for your answer. (b) If you were in place of Mr. X, what would have been your course of action? Give reasons for it.##Answer:Approach: · Briefly mention the case summary and ethical issues involved. · Examine whether Mr X is correct in his action. · Mention what you have done, giving appropriate reasons for the same. Answer: Case Summary: Mr X is running an NGO is asked by a corporate to raise objections about laxity in granting EIA approval to a project of a rival corporate in exchange of funding to the NGO. Convinced that these objections are true, he agrees. (a) In this case, several ethical issues arise before Mr X, which could cloud his apparently good action. · Means v/s End: Though the end result of his action will be highlighting the corruption, but his motive is questionable. Highlighting corruption to get funding conflates arguable means to achieve desired ends. · Environmental Ethics v/s Personal Ethics: His action is eventually going to benefit the environment conservation and protection but this occurs at the cost of his integrity. · Organisational benefit v/s organisational ethics: Again the organisation is benefitting by receiving the funds it direly needed but at the cost of compromise of organisational ethics of transparency in funding and objective decision making without quid pro quo. · Truthfulness of Charges: It is only mentioned that charges seem authentic. Before agreeing to raise them, it is expected that he verifies them on his own. Thus, it may appear that his action was pragmatic and necessary for the survival of NGO and eventually beneficial on counts of tackling corruption and protecting the environment. Yet this action can’t be justified on account of personal and organisational values. It will set a wrong precedent and he is letting his NGO being used as a tool in the corporate rivalry. It will affect the objectives and impartial conduct of the NGO, which is of utmost importance for NGOs working in critical fields with so much public interest at stake. The dearth of money is a problem which much social organisation face. Accepting money in circumstances such as the one seems an easy way out but not the right way. (b) If I would have been in the place of Mr X, I would have taken the following course: · Independently inquire about the charges that have been presented before me so much that truth is not compromised. · I would refuse to take money in exchange for raising objections as it would be in line with my commitment to organisational values and personal integrity. · I would discuss the situation with my employees and ask them to accept cuts in pay for a brief period. I would make them understand the importance of serving the public interest, which is the motto of an NGO against being an instrument to beat the competition. · If the charges are found to be true it would have to be raised anyway with the authorities · If they are found to be false I would report the matter to appropriate agencies like Competition Commission etc. mentioning how a campaign to malign the image of competitors is being undertaken. · Meanwhile, I will raise funding requests with other potential Donors or ask past donors for urgent funding making them aware of the crisis that the NGO is undergoing. · If we keep our ethical and moral standards high it will continuously reflect in our work. This will encourage honest and public-oriented donors to help us and show belief in us. This will be a morale booster for the organisation in the long run and it would further reinforce our commitment in honestly serving the public interest. Thus, without compromising with my values and organisational ethics, I can expect to overcome the crisis while doing the needful for the cause of environment. Though difficulties will arise, they can be overcome eventually without ceding ethical grounds.
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भारतीय विदेश नीति के वर्तमान स्वरुप को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कारकों ने सुनिश्चित किया है| उपयुक्त उदाहरणों द्वारा इस कथन की पुष्टि कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) The present form of Indian foreign policy has been ensured by various international factors. Confirm the statement with relevant examples. (150-200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त सूचना दीजिये | मुख्य भाग में भारतीय विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारक अंतर्राष्ट्रीय कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | अंतिम में कारकों के साथ ही विदेश नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्त्व को बताते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये | किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति के विकास और नीति को आकार देने में भूमिका निभाने वाले कारकों को निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भारत की स्वतंत्रता और विश्वयुद्ध के बाद विश्व शक्ति गुट की राजनीति, शीत युद्ध, नव शीत युद्ध का सामना कर रहा था| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की स्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| स्वतंत्रता के बाद भारत को उपरोक्त स्थिति का सामना करना पडा इसीलिए भारत को गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई गयी | भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी | इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था | इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था | पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | पड़ोस एवं बाह्य विश्व का वातावरण स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया | 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का समाना किया, इसी के ठीक पहले भारत ने सूखे का सामना किया था, लगातार बढती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी, ये एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी, भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| इसकी पृष्ठभूमि में 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था और चीन एक परमाणु शक्ति बन चुका था| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया, इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे आसियान आदि, इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| सोवियत संघ भारत का सहयोगी देश था| सोवियत संघ द्वारा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1991 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ,इसके बाद भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश की आवश्यकता थी अतः भारत ने विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ, भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई, इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| वैश्विक स्तर पर पाइरेसी की समस्या 2011 में चरम पर पहुच गयी, विश्व भर के जहाज लुटे गए| इसकी प्रतिक्रिया में हिंदमहासागर में विश्व की समस्त बड़ी शक्तियों ने अपनी नौसेना को तैनात किया है| इसके परिणामस्वरुप हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो गया| इसे ध्यान में रखते हुए भारत ने हिन्द महासागरीय देशों के साथ सम्बन्धों मेंनिरंतर सुधार के लिए कूटनीतिक प्रयास किये है जैसे मालदीव, सेशल्स, दक्षिण पूर्वी एशिया, आदि| इसी के साथ ब्लू इकॉनमी पहल, बिम्सटेक आदि प्रयासों को भी देखा जा सकता है| 2001 के बाद भारत द्वारा विश्व का विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और भारत के आर्थिक विकास ने NSG के प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करता है, भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| इससे भारत को एक सहयोगी देश प्राप्त हुआ| इसके बाद सोवियत संघ ने भारत में तकनीकी विकास में पूर्ण सहयोग किया| सोवियत संघ ने बाद में भारत को विभिन्न हथियारों का तकनीकी हस्तांतरण भी किया | 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| वर्ष 2000 में भारत ने रूस के साथ रणनीतिक सहयोग संधि की गयी इससे दोनों देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों और पहलुओं पर सहयोग बढ़ता गया है और सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती गयी है| दोनों देश नाभिकीय तकनीकी के संयुक्त विपणन के लिए तैयार हैं| इससे भारत को सहयोगी राष्ट्रों के विकास में सहायता करने का अवसर प्राप्त होगा| इसी संदर्भ में भारत द्वारा विएतनाम में नाभिकीय तकनीकी विकास को समझ सकते हैं| इससे चीन की आक्रामकता को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| 1985 में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढाने और सभी देशों का विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्क संधि की गयी| 2006 में साफ्टा सम्पन्न किया गया| इसके माध्यम से भारत को क्षेत्रीय स्तर पर सम्बन्धों में सुधार करने में सहायता प्राप्त हुई है| सैन्य कारक भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है | भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं | इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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##Question:भारतीय विदेश नीति के वर्तमान स्वरुप को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कारकों ने सुनिश्चित किया है| उपयुक्त उदाहरणों द्वारा इस कथन की पुष्टि कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) The present form of Indian foreign policy has been ensured by various international factors. Confirm the statement with relevant examples. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त सूचना दीजिये | मुख्य भाग में भारतीय विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारक अंतर्राष्ट्रीय कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | अंतिम में कारकों के साथ ही विदेश नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्त्व को बताते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये | किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति के विकास और नीति को आकार देने में भूमिका निभाने वाले कारकों को निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भारत की स्वतंत्रता और विश्वयुद्ध के बाद विश्व शक्ति गुट की राजनीति, शीत युद्ध, नव शीत युद्ध का सामना कर रहा था| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की स्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| स्वतंत्रता के बाद भारत को उपरोक्त स्थिति का सामना करना पडा इसीलिए भारत को गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई गयी | भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी | इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था | इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था | पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | पड़ोस एवं बाह्य विश्व का वातावरण स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया | 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का समाना किया, इसी के ठीक पहले भारत ने सूखे का सामना किया था, लगातार बढती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी, ये एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी, भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| इसकी पृष्ठभूमि में 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था और चीन एक परमाणु शक्ति बन चुका था| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया, इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे आसियान आदि, इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| सोवियत संघ भारत का सहयोगी देश था| सोवियत संघ द्वारा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1991 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ,इसके बाद भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश की आवश्यकता थी अतः भारत ने विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ, भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई, इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| वैश्विक स्तर पर पाइरेसी की समस्या 2011 में चरम पर पहुच गयी, विश्व भर के जहाज लुटे गए| इसकी प्रतिक्रिया में हिंदमहासागर में विश्व की समस्त बड़ी शक्तियों ने अपनी नौसेना को तैनात किया है| इसके परिणामस्वरुप हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो गया| इसे ध्यान में रखते हुए भारत ने हिन्द महासागरीय देशों के साथ सम्बन्धों मेंनिरंतर सुधार के लिए कूटनीतिक प्रयास किये है जैसे मालदीव, सेशल्स, दक्षिण पूर्वी एशिया, आदि| इसी के साथ ब्लू इकॉनमी पहल, बिम्सटेक आदि प्रयासों को भी देखा जा सकता है| 2001 के बाद भारत द्वारा विश्व का विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और भारत के आर्थिक विकास ने NSG के प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करता है, भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| इससे भारत को एक सहयोगी देश प्राप्त हुआ| इसके बाद सोवियत संघ ने भारत में तकनीकी विकास में पूर्ण सहयोग किया| सोवियत संघ ने बाद में भारत को विभिन्न हथियारों का तकनीकी हस्तांतरण भी किया | 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| वर्ष 2000 में भारत ने रूस के साथ रणनीतिक सहयोग संधि की गयी इससे दोनों देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों और पहलुओं पर सहयोग बढ़ता गया है और सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती गयी है| दोनों देश नाभिकीय तकनीकी के संयुक्त विपणन के लिए तैयार हैं| इससे भारत को सहयोगी राष्ट्रों के विकास में सहायता करने का अवसर प्राप्त होगा| इसी संदर्भ में भारत द्वारा विएतनाम में नाभिकीय तकनीकी विकास को समझ सकते हैं| इससे चीन की आक्रामकता को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| 1985 में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढाने और सभी देशों का विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्क संधि की गयी| 2006 में साफ्टा सम्पन्न किया गया| इसके माध्यम से भारत को क्षेत्रीय स्तर पर सम्बन्धों में सुधार करने में सहायता प्राप्त हुई है| सैन्य कारक भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है | भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं | इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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वैसी परिस्थितियों की चर्चा कीजिये जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर उत्पन गतिरोध के समाधान के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है? साथ ही, लोकसभा भंग होने के साथ ही समाप्त होने वाले तथा नहीं समाप्त होने वाले विधेयकों एवं नोटिसों/संकल्पों/प्रस्तावों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the circumstances when the President convenes a joint meeting of both the Houses of Parliament to resolve the impedance stumbling on a bill? Also, Write Down thebills and notices/resolutions/proposals ending with the dissolution of the Lok Sabha and not ending with the dissolution of the Lok Sabha. (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में,वैसी परिस्थितियों का जिक्र कीजिये जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर उत्पन गतिरोध के समाधान के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है| अगले भाग में, लोकसभा भंग होने के साथ ही समाप्त होने वाले विधेयकों तथा नोटिस/संकल्पों/प्रस्तावों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, वैसे विधेयकों का उल्लेख कीजिये जो लोकसभा भंग होने के बावजूद भी समाप्त नहीं होते हैं| उत्तर- किसी विधेयक के अधिनियम/कानून बनने के चरण में जब कोई विधेयक एक सदन से पारित हो जाता है तो उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है| अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी साधारण विधेयक पर उत्पन गतिरोध के समाधान के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है हालांकि इस संदर्भ में, राज्य विधानमंडल की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है| साथ ही, धन विधेयक तथा संविधान(संशोधन) विधेयकों के संदर्भ में भी संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है| संयुक्त बैठक बुलाने हेतु परिस्थितियां - जब लोकसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यसभा 180 दिन से अधिक समय तक अपने पास रोके रखे| जब राज्यसभा लोकसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को ख़ारिज कर दे| जब लोकसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यसभा संशोधित कर दे तथा लोकसभा उसपर सहमत ना हो| वित विधेयक प्रथम श्रेणी तथा द्वितीय श्रेणी को पारित करने के लिए भी संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है| यदि लोकसभा भंग होने के पहले राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला रखी है तो भी यह बैठक होगी और भंग लोकसभा के सदस्य इस बैठक में शामिल होंगे| लोकसभा भंग होने के साथ निम्नलिखित समाप्त हो जाते हैं - लोकसभा में लंबित विधेयक; लोकसभा द्वारा पारित कोई विधेयक जो या तो अभी लोकसभा के पास ही है या उसे राज्यसभा के पास भेजा तो गया है किंतु वह राज्यसभा में लंबित है| यदि राज्यसभा द्वारा पारित कोई विधेयक लोकसभा को प्रेषित किया जा चूका है किंतु लोकसभा ने उसे पारित करने की प्रक्रिया पूरी नहीं की है अथवा वह लोकसभा में लंबित है| वह विधेयक जिसका उद्गम लोकसभा में हुआ हो किंतु लोकसभा में अभी उसे पारित करने की प्रक्रिया पर विचार नहीं हुआ हो| निम्नलिखित नोटिस/संकल्प/प्रस्ताव भी यदि वो लोकसभा में लंबित हो तो वह लोकसभा भंग होने के साथ समाप्त हो जाते हैं- महाभियोग संबंधी प्रस्ताव सरकार के किसी निर्णय संबंधी संकल्प राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को संप्रेषित कोई संदेश कटौती/स्थगन/अविश्वास प्रस्ताव राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को प्रेषित कोई नोटिस अथवा लोकसभा के किसी सदस्य द्वारा सरकार से प्रश्न पूछने संबंधित दिया गया कोई नोटिस निम्नलिखित विधेयक लोकसभा के भंग होने के साथ भी समाप्त नहीं होते - यदि राज्यसभा में किसी विधेयक का उद्गम हुआ है एवं वह राज्यसभा में ही लंबित है अथवा राज्यसभा ने उसे पारित करने के बाद भी लोकसभा को प्रेषित नहीं किया है| यदि किसी विधेयक को दोनों सदनों ने पारित कर दिया है एवं उसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा जा चूका हो| यदि किसी विधेयक को राष्ट्रपति ने सदन के पुनर्विचार हेतु वापस कर रखा हो| यदि राष्ट्रपति ने यह घोषणा कर रखी है कि वह किसी विधेयक को पारित करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का फैसला कर चूका है|
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##Question:वैसी परिस्थितियों की चर्चा कीजिये जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर उत्पन गतिरोध के समाधान के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है? साथ ही, लोकसभा भंग होने के साथ ही समाप्त होने वाले तथा नहीं समाप्त होने वाले विधेयकों एवं नोटिसों/संकल्पों/प्रस्तावों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the circumstances when the President convenes a joint meeting of both the Houses of Parliament to resolve the impedance stumbling on a bill? Also, Write Down thebills and notices/resolutions/proposals ending with the dissolution of the Lok Sabha and not ending with the dissolution of the Lok Sabha. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में,वैसी परिस्थितियों का जिक्र कीजिये जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर उत्पन गतिरोध के समाधान के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है| अगले भाग में, लोकसभा भंग होने के साथ ही समाप्त होने वाले विधेयकों तथा नोटिस/संकल्पों/प्रस्तावों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, वैसे विधेयकों का उल्लेख कीजिये जो लोकसभा भंग होने के बावजूद भी समाप्त नहीं होते हैं| उत्तर- किसी विधेयक के अधिनियम/कानून बनने के चरण में जब कोई विधेयक एक सदन से पारित हो जाता है तो उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है| अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी साधारण विधेयक पर उत्पन गतिरोध के समाधान के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है हालांकि इस संदर्भ में, राज्य विधानमंडल की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है| साथ ही, धन विधेयक तथा संविधान(संशोधन) विधेयकों के संदर्भ में भी संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है| संयुक्त बैठक बुलाने हेतु परिस्थितियां - जब लोकसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यसभा 180 दिन से अधिक समय तक अपने पास रोके रखे| जब राज्यसभा लोकसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को ख़ारिज कर दे| जब लोकसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यसभा संशोधित कर दे तथा लोकसभा उसपर सहमत ना हो| वित विधेयक प्रथम श्रेणी तथा द्वितीय श्रेणी को पारित करने के लिए भी संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है| यदि लोकसभा भंग होने के पहले राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला रखी है तो भी यह बैठक होगी और भंग लोकसभा के सदस्य इस बैठक में शामिल होंगे| लोकसभा भंग होने के साथ निम्नलिखित समाप्त हो जाते हैं - लोकसभा में लंबित विधेयक; लोकसभा द्वारा पारित कोई विधेयक जो या तो अभी लोकसभा के पास ही है या उसे राज्यसभा के पास भेजा तो गया है किंतु वह राज्यसभा में लंबित है| यदि राज्यसभा द्वारा पारित कोई विधेयक लोकसभा को प्रेषित किया जा चूका है किंतु लोकसभा ने उसे पारित करने की प्रक्रिया पूरी नहीं की है अथवा वह लोकसभा में लंबित है| वह विधेयक जिसका उद्गम लोकसभा में हुआ हो किंतु लोकसभा में अभी उसे पारित करने की प्रक्रिया पर विचार नहीं हुआ हो| निम्नलिखित नोटिस/संकल्प/प्रस्ताव भी यदि वो लोकसभा में लंबित हो तो वह लोकसभा भंग होने के साथ समाप्त हो जाते हैं- महाभियोग संबंधी प्रस्ताव सरकार के किसी निर्णय संबंधी संकल्प राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को संप्रेषित कोई संदेश कटौती/स्थगन/अविश्वास प्रस्ताव राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को प्रेषित कोई नोटिस अथवा लोकसभा के किसी सदस्य द्वारा सरकार से प्रश्न पूछने संबंधित दिया गया कोई नोटिस निम्नलिखित विधेयक लोकसभा के भंग होने के साथ भी समाप्त नहीं होते - यदि राज्यसभा में किसी विधेयक का उद्गम हुआ है एवं वह राज्यसभा में ही लंबित है अथवा राज्यसभा ने उसे पारित करने के बाद भी लोकसभा को प्रेषित नहीं किया है| यदि किसी विधेयक को दोनों सदनों ने पारित कर दिया है एवं उसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा जा चूका हो| यदि किसी विधेयक को राष्ट्रपति ने सदन के पुनर्विचार हेतु वापस कर रखा हो| यदि राष्ट्रपति ने यह घोषणा कर रखी है कि वह किसी विधेयक को पारित करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का फैसला कर चूका है|
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भारतीय विदेश नीति के वर्तमान स्वरुप को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कारकों ने सुनिश्चित किया है | उपयुक्त उदाहरणों द्वारा इस कथन की पुष्टि कीजिये | (200 शब्द) The present form of Indian foreign policy has been ensured by various international factors. Confirm the statement with relevant examples.
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दृष्टिकोण भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त सूचना दीजिये | मुख्य भाग में भारतीय विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारक अंतर्राष्ट्रीय कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | अंतिम में कारकों के साथ ही विदेश नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्त्व को बताते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये | उत्तर- किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति के विकास और नीति को आकार देने में भूमिका निभाने वाले कारकों को निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भारत की स्वतंत्रता और विश्वयुद्ध के बाद विश्व शक्ति गुट की राजनीति, शीत युद्ध, नव शीत युद्ध का सामना कर रहा था| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की स्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| स्वतंत्रता के बाद भारत को उपरोक्त स्थिति का सामना करना पडा इसीलिए भारत को गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई गयी | भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी | इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था | इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था | पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | पड़ोस एवं बाह्य विश्व का वातावरण स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया | 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का समाना किया, इसी के ठीक पहले भारत ने सूखे का सामना किया था, लगातार बढती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी, ये एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी, भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| इसकी पृष्ठभूमि में 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था और चीन एक परमाणु शक्ति बन चुका था| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया, इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे आसियान आदि, इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| सोवियत संघ भारत का सहयोगी देश था| सोवियत संघ द्वारा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1991 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ,इसके बाद भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश की आवश्यकता थी अतः भारत ने विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ, भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई, इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| वैश्विक स्तर पर पाइरेसी की समस्या 2011 में चरम पर पहुच गयी, विश्व भर के जहाज लुटे गए| इसकी प्रतिक्रिया में हिंदमहासागर में विश्व की समस्त बड़ी शक्तियों ने अपनी नौसेना को तैनात किया है| इसके परिणामस्वरुप हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो गया| इसे ध्यान में रखते हुए भारत ने हिन्द महासागरीय देशों के साथ सम्बन्धों मेंनिरंतर सुधार के लिए कूटनीतिक प्रयास किये है जैसे मालदीव, सेशल्स, दक्षिण पूर्वी एशिया, आदि| इसी के साथ ब्लू इकॉनमी पहल, बिम्सटेक आदि प्रयासों को भी देखा जा सकता है| 2001 के बाद भारत द्वारा विश्व का विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और भारत के आर्थिक विकास ने NSG के प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करता है, भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| इससे भारत को एक सहयोगी देश प्राप्त हुआ| इसके बाद सोवियत संघ ने भारत में तकनीकी विकास में पूर्ण सहयोग किया| सोवियत संघ ने बाद में भारत को विभिन्न हथियारों का तकनीकी हस्तांतरण भी किया | 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| वर्ष 2000 में भारत ने रूस के साथ रणनीतिक सहयोग संधि की गयी इससे दोनों देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों और पहलुओं पर सहयोग बढ़ता गया है और सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती गयी है| दोनों देश नाभिकीय तकनीकी के संयुक्त विपणन के लिए तैयार हैं| इससे भारत को सहयोगी राष्ट्रों के विकास में सहायता करने का अवसर प्राप्त होगा| इसी संदर्भ में भारत द्वारा विएतनाम में नाभिकीय तकनीकी विकास को समझ सकते हैं| इससे चीन की आक्रामकता को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| 1985 में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढाने और सभी देशों का विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्क संधि की गयी| 2006 में साफ्टा सम्पन्न किया गया| इसके माध्यम से भारत को क्षेत्रीय स्तर पर सम्बन्धों में सुधार करने में सहायता प्राप्त हुई है| सैन्य कारक भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है | भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं | इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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##Question:भारतीय विदेश नीति के वर्तमान स्वरुप को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कारकों ने सुनिश्चित किया है | उपयुक्त उदाहरणों द्वारा इस कथन की पुष्टि कीजिये | (200 शब्द) The present form of Indian foreign policy has been ensured by various international factors. Confirm the statement with relevant examples.##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त सूचना दीजिये | मुख्य भाग में भारतीय विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारक अंतर्राष्ट्रीय कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये | अंतिम में कारकों के साथ ही विदेश नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्त्व को बताते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये | उत्तर- किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति के विकास और नीति को आकार देने में भूमिका निभाने वाले कारकों को निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भारत की स्वतंत्रता और विश्वयुद्ध के बाद विश्व शक्ति गुट की राजनीति, शीत युद्ध, नव शीत युद्ध का सामना कर रहा था| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की स्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| स्वतंत्रता के बाद भारत को उपरोक्त स्थिति का सामना करना पडा इसीलिए भारत को गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई गयी | भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी | इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था | इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था | पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | पड़ोस एवं बाह्य विश्व का वातावरण स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया | 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का समाना किया, इसी के ठीक पहले भारत ने सूखे का सामना किया था, लगातार बढती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी, ये एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी, भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| इसकी पृष्ठभूमि में 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था और चीन एक परमाणु शक्ति बन चुका था| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया, इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे आसियान आदि, इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| सोवियत संघ भारत का सहयोगी देश था| सोवियत संघ द्वारा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1991 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ,इसके बाद भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश की आवश्यकता थी अतः भारत ने विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ, भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई, इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| वैश्विक स्तर पर पाइरेसी की समस्या 2011 में चरम पर पहुच गयी, विश्व भर के जहाज लुटे गए| इसकी प्रतिक्रिया में हिंदमहासागर में विश्व की समस्त बड़ी शक्तियों ने अपनी नौसेना को तैनात किया है| इसके परिणामस्वरुप हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो गया| इसे ध्यान में रखते हुए भारत ने हिन्द महासागरीय देशों के साथ सम्बन्धों मेंनिरंतर सुधार के लिए कूटनीतिक प्रयास किये है जैसे मालदीव, सेशल्स, दक्षिण पूर्वी एशिया, आदि| इसी के साथ ब्लू इकॉनमी पहल, बिम्सटेक आदि प्रयासों को भी देखा जा सकता है| 2001 के बाद भारत द्वारा विश्व का विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और भारत के आर्थिक विकास ने NSG के प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करता है, भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| इससे भारत को एक सहयोगी देश प्राप्त हुआ| इसके बाद सोवियत संघ ने भारत में तकनीकी विकास में पूर्ण सहयोग किया| सोवियत संघ ने बाद में भारत को विभिन्न हथियारों का तकनीकी हस्तांतरण भी किया | 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| वर्ष 2000 में भारत ने रूस के साथ रणनीतिक सहयोग संधि की गयी इससे दोनों देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों और पहलुओं पर सहयोग बढ़ता गया है और सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती गयी है| दोनों देश नाभिकीय तकनीकी के संयुक्त विपणन के लिए तैयार हैं| इससे भारत को सहयोगी राष्ट्रों के विकास में सहायता करने का अवसर प्राप्त होगा| इसी संदर्भ में भारत द्वारा विएतनाम में नाभिकीय तकनीकी विकास को समझ सकते हैं| इससे चीन की आक्रामकता को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| 1985 में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढाने और सभी देशों का विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्क संधि की गयी| 2006 में साफ्टा सम्पन्न किया गया| इसके माध्यम से भारत को क्षेत्रीय स्तर पर सम्बन्धों में सुधार करने में सहायता प्राप्त हुई है| सैन्य कारक भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है | भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं | इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
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भारत के विशेष सन्दर्भ में, भ्रष्टाचार के प्रचलन को एक मुख्यएक चुनौती के रूप में व्याख्यायित कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि कैसे भ्रष्टाचार विभिन्न कारकों का एक सम्मिलित परिणाम है| (200 शब्द) With special reference to India, explain the prevalence of corruption as a major challenge. Along with this, clarify how corruption is an inclusive result of various factors. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भ्रष्टाचार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में एक चुनौती के रूप में भ्रष्टाचार को व्याख्यायित कीजिये 3- दूसरे खंड में भ्रष्टाचार के निर्धारक कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है| CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है| वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है| जबकिडेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है| इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है| भ्रष्टाचार एक चुनौती के रूप में · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सरकार के द्वारा जिन संस्थानों का गठन किया गया वह भी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने आपको अलग नहीं रख पाया है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · भ्रष्टाचार का प्रभाव शासन प्रणाली के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान है जो इस समस्या को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सामाजिक स्तर पर व्यापक जन जागरूकता की कमी दिखाई देती है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है| अतः इस सन्दर्भ में सिविल संगठनों की भूमिका अपेक्षित है| · भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक नुकसान से जोड़ कर देखा जाता है न कि आत्मसम्मान से जुडा हुआ विषय माना जाता है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · वर्तमान लोकतांत्रिक परिवेश में प्रत्येक नागरिक को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह शासन व प्रशासन से वैधानिक सेवाओं को प्राप्त करे एवं इस सेवा को प्राप्त करने हेतु कोई गैर-वैधानिक भुगतान न करे| जो सेवायें नागरिकों को सहज ही प्राप्त होनी चाहिए भ्रष्टाचार उन वैधानिक सेवाओं की प्राप्ति के लिए होता है अतः एक चुनौती है| · भारत में भ्रष्टाचार की मूल प्रकृति लालच या लोभ पर आधारित है न की आवश्यकता आधारित है| ऐसी स्थिति में वैधानिक उपायों के द्वारा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाया जाना पूर्णतयः संभव नहीं है|अतः भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में नैतिक मानकों को विकसित करने का महत्त्व अधिक हो जाता है| · CPI के आधार भारत को प्राप्त विगत वर्षों के अंकों में सुधार हुआ है किन्तु यह सराहनीय नहीं है(2003 में 36 अंक 2018 में 41)| भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में सरकार का प्रयास कारगर या प्रभावी नहीं है| · इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में भ्रष्टाचार समस्या के स्तर से आगे बढ़ते हुए एक चुनौती का रूप धारण कर कर चुका है| यह भारत में विविध कारणों से उत्पन्न हुआ है| जिनका विवरण निम्नलिखित है- ऐतिहासिक कारक · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों का जनता के साथ अधिक प्रत्यक्ष संपर्क था जहाँ दैनिक भ्रष्टाचार की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं| · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय अधिकारियों के द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों की जीवन शैली का अनुसरण वैधानिक वेतनमान के द्वारा किया जाना संभव नहीं हो पाता था| · स्वतंत्रता के समय विशेषकर उच्चतर स्तर पर सरकारी अधिकारियों की संख्या में भारी कमी का होना एवं इस कमी को पूरा करने हेतु सरकार के द्वारा भर्ती करते समय सत्यनिष्ठा जैसे पहलुओं पर विशेष बल नहीं दिया गया| राजनीतिक कारक · राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी| लोकपाल के गठन के लिए पहला बिल 1968 में आया था लेकिन इसका गठन 2019 में हो पाया है| अतः स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है| · भविष्य में लोकपाल को सरकार से प्राप्त सहयोग का स्तर भी यह सुनिश्चित करेगा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति है अथवा नहीं| · राजनीतिक भ्रष्टाचार स्वतः अपने आप में शासन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हेतु उत्तरदायी है क्योंकि शासन का नेतृत्व राजनीतिक प्रणाली के पास होता है| · राजनीति में अपराधीकरण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है · नकारात्मक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भ्रष्टाचार को बढ़ाती है| प्रशासनिक कारक · प्रशासनिक नियमावली का जटिल होना भ्रष्टाचार की संभावना को बढ़ता है · जन शिकायतों के निवारण हेतु उचित प्रशासनिक तंत्र के अभाव का होना · प्रशासनिक अधिकारियों के लिए नीतिशास्त्र संहिता न होना/आचार संहिता का प्रभावी ना होना · प्रशासन की प्रक्रिया में पर्याप्त जन भागीदारी का न होना · प्रशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता की कमी · प्रशासन का अधिक सत्तावादी होना · प्रशासन एवं नागरिकों के मध्य का सम्बन्ध सुचारू न होना · प्रशासन में लालफीताशाही की उपस्थिति होना सामाजिक-सांस्कृतिक कारक · शासन एक सामाजिक परिवेश में कार्य करता है अतः शासन की कार्य प्रणाली पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है · शासन में पारदर्शिताकी कमी, जवाबदेहिता की कमी, लालफीताशाही का होना, सत्तावादी होना आदि समाज का ही प्रक्षेपण है · शासन के द्वारा समाज को विभिन्न प्रकार की सेवायें उपलब्ध कराई जाती हैं एवं इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति/अधिकारी स्वतः समाज का एक अभिन्न अंग होता है अतः ऐसी स्थिति में शासन के नकारात्मक पहलुओं पर सामाजिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है| · शासन की कार्यप्रणाली में नातेदारी, भाई-भतीजावाद आदि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं से प्रभावित होती है आर्थिक कारक · लोकसेवकों को दिए जाने वाले वेतन सेवा शर्तों की अपर्याप्तता को भी भ्रष्टाचार का एक कारण माना जाता है परन्तु यह तर्क संगत नहीं है · बाजार आधारित अर्थव्यवस्था स्वतः अपने आप में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करती है क्योंकि बाजारवाद व्यक्ति के लोभ को बढाता है · सामाजिक परिवेश में किसी व्यक्ति की उपलब्धियों का आकलन उसके द्वारा अर्जित आर्थिक संसाधनों के आधार पर किया जाता है न की आय अर्जन के माध्यम या स्रोतों के आधार पर| इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है वैधानिक कारक · लोकसेवकों को संवैधानिक एवं वैधानिक संरक्षण प्राप्त है (अनुच्छेद 311)इन संरक्षणों का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित किया जाना था परन्तु व्यवहारिकता में इन संरक्षणों की आड़ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलाता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु जो विधिक उपाय (जैसे भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम 1988) किये गए हैं वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैंजो उपाय पर्याप्त हैं उनका परिपालन प्रभावी तरीके से किया जाना संभव नहीं हो पाता है · विधिक उपायों की आंतरिक प्रक्रिया काफी जटिल (12 से 13 चरण )होने के कारण आरोपित व्यक्तियों को भ्रष्टाचार हेतु दंडित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| · आरोपित एवं दण्डित लोकसेवकों के मध्य का अंतराल व्यापक है जिसका मूल कारण विधिक है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|
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##Question:भारत के विशेष सन्दर्भ में, भ्रष्टाचार के प्रचलन को एक मुख्यएक चुनौती के रूप में व्याख्यायित कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि कैसे भ्रष्टाचार विभिन्न कारकों का एक सम्मिलित परिणाम है| (200 शब्द) With special reference to India, explain the prevalence of corruption as a major challenge. Along with this, clarify how corruption is an inclusive result of various factors. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भ्रष्टाचार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में एक चुनौती के रूप में भ्रष्टाचार को व्याख्यायित कीजिये 3- दूसरे खंड में भ्रष्टाचार के निर्धारक कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है| CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है| वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है| जबकिडेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है| इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है| भ्रष्टाचार एक चुनौती के रूप में · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सरकार के द्वारा जिन संस्थानों का गठन किया गया वह भी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने आपको अलग नहीं रख पाया है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · भ्रष्टाचार का प्रभाव शासन प्रणाली के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान है जो इस समस्या को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सामाजिक स्तर पर व्यापक जन जागरूकता की कमी दिखाई देती है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है| अतः इस सन्दर्भ में सिविल संगठनों की भूमिका अपेक्षित है| · भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक नुकसान से जोड़ कर देखा जाता है न कि आत्मसम्मान से जुडा हुआ विषय माना जाता है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · वर्तमान लोकतांत्रिक परिवेश में प्रत्येक नागरिक को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह शासन व प्रशासन से वैधानिक सेवाओं को प्राप्त करे एवं इस सेवा को प्राप्त करने हेतु कोई गैर-वैधानिक भुगतान न करे| जो सेवायें नागरिकों को सहज ही प्राप्त होनी चाहिए भ्रष्टाचार उन वैधानिक सेवाओं की प्राप्ति के लिए होता है अतः एक चुनौती है| · भारत में भ्रष्टाचार की मूल प्रकृति लालच या लोभ पर आधारित है न की आवश्यकता आधारित है| ऐसी स्थिति में वैधानिक उपायों के द्वारा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाया जाना पूर्णतयः संभव नहीं है|अतः भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में नैतिक मानकों को विकसित करने का महत्त्व अधिक हो जाता है| · CPI के आधार भारत को प्राप्त विगत वर्षों के अंकों में सुधार हुआ है किन्तु यह सराहनीय नहीं है(2003 में 36 अंक 2018 में 41)| भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में सरकार का प्रयास कारगर या प्रभावी नहीं है| · इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में भ्रष्टाचार समस्या के स्तर से आगे बढ़ते हुए एक चुनौती का रूप धारण कर कर चुका है| यह भारत में विविध कारणों से उत्पन्न हुआ है| जिनका विवरण निम्नलिखित है- ऐतिहासिक कारक · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों का जनता के साथ अधिक प्रत्यक्ष संपर्क था जहाँ दैनिक भ्रष्टाचार की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं| · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय अधिकारियों के द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों की जीवन शैली का अनुसरण वैधानिक वेतनमान के द्वारा किया जाना संभव नहीं हो पाता था| · स्वतंत्रता के समय विशेषकर उच्चतर स्तर पर सरकारी अधिकारियों की संख्या में भारी कमी का होना एवं इस कमी को पूरा करने हेतु सरकार के द्वारा भर्ती करते समय सत्यनिष्ठा जैसे पहलुओं पर विशेष बल नहीं दिया गया| राजनीतिक कारक · राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी| लोकपाल के गठन के लिए पहला बिल 1968 में आया था लेकिन इसका गठन 2019 में हो पाया है| अतः स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है| · भविष्य में लोकपाल को सरकार से प्राप्त सहयोग का स्तर भी यह सुनिश्चित करेगा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति है अथवा नहीं| · राजनीतिक भ्रष्टाचार स्वतः अपने आप में शासन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हेतु उत्तरदायी है क्योंकि शासन का नेतृत्व राजनीतिक प्रणाली के पास होता है| · राजनीति में अपराधीकरण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है · नकारात्मक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भ्रष्टाचार को बढ़ाती है| प्रशासनिक कारक · प्रशासनिक नियमावली का जटिल होना भ्रष्टाचार की संभावना को बढ़ता है · जन शिकायतों के निवारण हेतु उचित प्रशासनिक तंत्र के अभाव का होना · प्रशासनिक अधिकारियों के लिए नीतिशास्त्र संहिता न होना/आचार संहिता का प्रभावी ना होना · प्रशासन की प्रक्रिया में पर्याप्त जन भागीदारी का न होना · प्रशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता की कमी · प्रशासन का अधिक सत्तावादी होना · प्रशासन एवं नागरिकों के मध्य का सम्बन्ध सुचारू न होना · प्रशासन में लालफीताशाही की उपस्थिति होना सामाजिक-सांस्कृतिक कारक · शासन एक सामाजिक परिवेश में कार्य करता है अतः शासन की कार्य प्रणाली पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है · शासन में पारदर्शिताकी कमी, जवाबदेहिता की कमी, लालफीताशाही का होना, सत्तावादी होना आदि समाज का ही प्रक्षेपण है · शासन के द्वारा समाज को विभिन्न प्रकार की सेवायें उपलब्ध कराई जाती हैं एवं इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति/अधिकारी स्वतः समाज का एक अभिन्न अंग होता है अतः ऐसी स्थिति में शासन के नकारात्मक पहलुओं पर सामाजिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है| · शासन की कार्यप्रणाली में नातेदारी, भाई-भतीजावाद आदि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं से प्रभावित होती है आर्थिक कारक · लोकसेवकों को दिए जाने वाले वेतन सेवा शर्तों की अपर्याप्तता को भी भ्रष्टाचार का एक कारण माना जाता है परन्तु यह तर्क संगत नहीं है · बाजार आधारित अर्थव्यवस्था स्वतः अपने आप में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करती है क्योंकि बाजारवाद व्यक्ति के लोभ को बढाता है · सामाजिक परिवेश में किसी व्यक्ति की उपलब्धियों का आकलन उसके द्वारा अर्जित आर्थिक संसाधनों के आधार पर किया जाता है न की आय अर्जन के माध्यम या स्रोतों के आधार पर| इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है वैधानिक कारक · लोकसेवकों को संवैधानिक एवं वैधानिक संरक्षण प्राप्त है (अनुच्छेद 311)इन संरक्षणों का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित किया जाना था परन्तु व्यवहारिकता में इन संरक्षणों की आड़ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलाता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु जो विधिक उपाय (जैसे भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम 1988) किये गए हैं वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैंजो उपाय पर्याप्त हैं उनका परिपालन प्रभावी तरीके से किया जाना संभव नहीं हो पाता है · विधिक उपायों की आंतरिक प्रक्रिया काफी जटिल (12 से 13 चरण )होने के कारण आरोपित व्यक्तियों को भ्रष्टाचार हेतु दंडित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| · आरोपित एवं दण्डित लोकसेवकों के मध्य का अंतराल व्यापक है जिसका मूल कारण विधिक है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|
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भारत के विशेष सन्दर्भ में, भ्रष्टाचार के प्रचलन को एक मुख्य चुनौती के रूप में व्याख्यायित कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि कैसे भ्रष्टाचार विभिन्न कारकों का एक सम्मिलित परिणाम है| (150- 200 शब्द, अंक-10 ) With special reference to India, explain the prevalence of corruption as a major challenge. Along with this, clarify how corruption is an inclusive result of various factors. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भ्रष्टाचार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में एक चुनौती के रूप में भ्रष्टाचार को व्याख्यायित कीजिये 3- दूसरे खंड में भ्रष्टाचार के निर्धारक कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है| CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है| वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है| जबकिडेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है| इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है| भ्रष्टाचार एक चुनौती के रूप में · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सरकार के द्वारा जिन संस्थानों का गठन किया गया वह भी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने आपको अलग नहीं रख पाया है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · भ्रष्टाचार का प्रभाव शासन प्रणाली के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान है जो इस समस्या को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सामाजिक स्तर पर व्यापक जन जागरूकता की कमी दिखाई देती है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है| अतः इस सन्दर्भ में सिविल संगठनों की भूमिका अपेक्षित है| · भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक नुकसान से जोड़ कर देखा जाता है न कि आत्मसम्मान से जुडा हुआ विषय माना जाता है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · वर्तमान लोकतांत्रिक परिवेश में प्रत्येक नागरिक को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह शासन व प्रशासन से वैधानिक सेवाओं को प्राप्त करे एवं इस सेवा को प्राप्त करने हेतु कोई गैर-वैधानिक भुगतान न करे| जो सेवायें नागरिकों को सहज ही प्राप्त होनी चाहिए भ्रष्टाचार उन वैधानिक सेवाओं की प्राप्ति के लिए होता है अतः एक चुनौती है| · भारत में भ्रष्टाचार की मूल प्रकृति लालच या लोभ पर आधारित है न की आवश्यकता आधारित है| ऐसी स्थिति में वैधानिक उपायों के द्वारा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाया जाना पूर्णतयः संभव नहीं है|अतः भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में नैतिक मानकों को विकसित करने का महत्त्व अधिक हो जाता है| · CPI के आधार भारत को प्राप्त विगत वर्षों के अंकों में सुधार हुआ है किन्तु यह सराहनीय नहीं है(2003 में 36 अंक 2018 में 41)| भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में सरकार का प्रयास कारगर या प्रभावी नहीं है| · इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में भ्रष्टाचार समस्या के स्तर से आगे बढ़ते हुए एक चुनौती का रूप धारण कर कर चुका है| यह भारत में विविध कारणों से उत्पन्न हुआ है| जिनका विवरण निम्नलिखित है- ऐतिहासिक कारक · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों का जनता के साथ अधिक प्रत्यक्ष संपर्क था जहाँ दैनिक भ्रष्टाचार की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं| · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय अधिकारियों के द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों की जीवन शैली का अनुसरण वैधानिक वेतनमान के द्वारा किया जाना संभव नहीं हो पाता था| · स्वतंत्रता के समय विशेषकर उच्चतर स्तर पर सरकारी अधिकारियों की संख्या में भारी कमी का होना एवं इस कमी को पूरा करने हेतु सरकार के द्वारा भर्ती करते समय सत्यनिष्ठा जैसे पहलुओं पर विशेष बल नहीं दिया गया| राजनीतिक कारक · राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी| लोकपाल के गठन के लिए पहला बिल 1968 में आया था लेकिन इसका गठन 2019 में हो पाया है| अतः स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है| · भविष्य में लोकपाल को सरकार से प्राप्त सहयोग का स्तर भी यह सुनिश्चित करेगा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति है अथवा नहीं| · राजनीतिक भ्रष्टाचार स्वतः अपने आप में शासन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हेतु उत्तरदायी है क्योंकि शासन का नेतृत्व राजनीतिक प्रणाली के पास होता है| · राजनीति में अपराधीकरण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है · नकारात्मक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भ्रष्टाचार को बढ़ाती है| प्रशासनिक कारक · प्रशासनिक नियमावली का जटिल होना भ्रष्टाचार की संभावना को बढ़ता है · जन शिकायतों के निवारण हेतु उचित प्रशासनिक तंत्र के अभाव का होना · प्रशासनिक अधिकारियों के लिए नीतिशास्त्र संहिता न होना/आचार संहिता का प्रभावी ना होना · प्रशासन की प्रक्रिया में पर्याप्त जन भागीदारी का न होना · प्रशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता की कमी · प्रशासन का अधिक सत्तावादी होना · प्रशासन एवं नागरिकों के मध्य का सम्बन्ध सुचारू न होना · प्रशासन में लालफीताशाही की उपस्थिति होना सामाजिक-सांस्कृतिक कारक · शासन एक सामाजिक परिवेश में कार्य करता है अतः शासन की कार्य प्रणाली पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है · शासन में पारदर्शिताकी कमी, जवाबदेहिता की कमी, लालफीताशाही का होना, सत्तावादी होना आदि समाज का ही प्रक्षेपण है · शासन के द्वारा समाज को विभिन्न प्रकार की सेवायें उपलब्ध कराई जाती हैं एवं इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति/अधिकारी स्वतः समाज का एक अभिन्न अंग होता है अतः ऐसी स्थिति में शासन के नकारात्मक पहलुओं पर सामाजिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है| · शासन की कार्यप्रणाली में नातेदारी, भाई-भतीजावाद आदि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं से प्रभावित होती है आर्थिक कारक · लोकसेवकों को दिए जाने वाले वेतन सेवा शर्तों की अपर्याप्तता को भी भ्रष्टाचार का एक कारण माना जाता है परन्तु यह तर्क संगत नहीं है · बाजार आधारित अर्थव्यवस्था स्वतः अपने आप में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करती है क्योंकि बाजारवाद व्यक्ति के लोभ को बढाता है · सामाजिक परिवेश में किसी व्यक्ति की उपलब्धियों का आकलन उसके द्वारा अर्जित आर्थिक संसाधनों के आधार पर किया जाता है न की आय अर्जन के माध्यम या स्रोतों के आधार पर| इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है वैधानिक कारक · लोकसेवकों को संवैधानिक एवं वैधानिक संरक्षण प्राप्त है (अनुच्छेद 311)इन संरक्षणों का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित किया जाना था परन्तु व्यवहारिकता में इन संरक्षणों की आड़ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलाता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु जो विधिक उपाय (जैसे भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम 1988) किये गए हैं वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैंजो उपाय पर्याप्त हैं उनका परिपालन प्रभावी तरीके से किया जाना संभव नहीं हो पाता है · विधिक उपायों की आंतरिक प्रक्रिया काफी जटिल (12 से 13 चरण )होने के कारण आरोपित व्यक्तियों को भ्रष्टाचार हेतु दंडित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| · आरोपित एवं दण्डित लोकसेवकों के मध्य का अंतराल व्यापक है जिसका मूल कारण विधिक है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|
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##Question:भारत के विशेष सन्दर्भ में, भ्रष्टाचार के प्रचलन को एक मुख्य चुनौती के रूप में व्याख्यायित कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि कैसे भ्रष्टाचार विभिन्न कारकों का एक सम्मिलित परिणाम है| (150- 200 शब्द, अंक-10 ) With special reference to India, explain the prevalence of corruption as a major challenge. Along with this, clarify how corruption is an inclusive result of various factors. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भ्रष्टाचार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में एक चुनौती के रूप में भ्रष्टाचार को व्याख्यायित कीजिये 3- दूसरे खंड में भ्रष्टाचार के निर्धारक कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भ्रष्टाचार का आशय निजी हितों के लिए सरकारी पद या लोक संसाधनों के दुरुपयोग किये जाने से है| CPI(भ्रष्टाचार परिदृश्य सूचकांक)जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी किया जाता है| वर्ष 2018 में 180 देशों में भारत की रैंक 78 है और भारत को प्राप्त भारांक 41 है| जबकिडेनमार्क में सबसे कम भ्रष्टाचार (प्रथम रैंक) है जिसको 88 भारांक प्राप्त हुआ है| इस तरह स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है किन्तु भारत में यह समस्या से आगे बढ़ते हुए चुनौती का रूप धारण कर चुका है| भ्रष्टाचार एक चुनौती के रूप में · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सरकार के द्वारा जिन संस्थानों का गठन किया गया वह भी किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने आपको अलग नहीं रख पाया है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · भ्रष्टाचार का प्रभाव शासन प्रणाली के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान है जो इस समस्या को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु सामाजिक स्तर पर व्यापक जन जागरूकता की कमी दिखाई देती है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है| अतः इस सन्दर्भ में सिविल संगठनों की भूमिका अपेक्षित है| · भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक नुकसान से जोड़ कर देखा जाता है न कि आत्मसम्मान से जुडा हुआ विषय माना जाता है| इस प्रकार भ्रष्टाचार एक चुनौती बना हुआ है · वर्तमान लोकतांत्रिक परिवेश में प्रत्येक नागरिक को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह शासन व प्रशासन से वैधानिक सेवाओं को प्राप्त करे एवं इस सेवा को प्राप्त करने हेतु कोई गैर-वैधानिक भुगतान न करे| जो सेवायें नागरिकों को सहज ही प्राप्त होनी चाहिए भ्रष्टाचार उन वैधानिक सेवाओं की प्राप्ति के लिए होता है अतः एक चुनौती है| · भारत में भ्रष्टाचार की मूल प्रकृति लालच या लोभ पर आधारित है न की आवश्यकता आधारित है| ऐसी स्थिति में वैधानिक उपायों के द्वारा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाया जाना पूर्णतयः संभव नहीं है|अतः भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में नैतिक मानकों को विकसित करने का महत्त्व अधिक हो जाता है| · CPI के आधार भारत को प्राप्त विगत वर्षों के अंकों में सुधार हुआ है किन्तु यह सराहनीय नहीं है(2003 में 36 अंक 2018 में 41)| भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में सरकार का प्रयास कारगर या प्रभावी नहीं है| · इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में भ्रष्टाचार समस्या के स्तर से आगे बढ़ते हुए एक चुनौती का रूप धारण कर कर चुका है| यह भारत में विविध कारणों से उत्पन्न हुआ है| जिनका विवरण निम्नलिखित है- ऐतिहासिक कारक · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों का जनता के साथ अधिक प्रत्यक्ष संपर्क था जहाँ दैनिक भ्रष्टाचार की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं| · ब्रिटिश शासन काल में भारतीय अधिकारियों के द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों की जीवन शैली का अनुसरण वैधानिक वेतनमान के द्वारा किया जाना संभव नहीं हो पाता था| · स्वतंत्रता के समय विशेषकर उच्चतर स्तर पर सरकारी अधिकारियों की संख्या में भारी कमी का होना एवं इस कमी को पूरा करने हेतु सरकार के द्वारा भर्ती करते समय सत्यनिष्ठा जैसे पहलुओं पर विशेष बल नहीं दिया गया| राजनीतिक कारक · राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी| लोकपाल के गठन के लिए पहला बिल 1968 में आया था लेकिन इसका गठन 2019 में हो पाया है| अतः स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है| · भविष्य में लोकपाल को सरकार से प्राप्त सहयोग का स्तर भी यह सुनिश्चित करेगा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति है अथवा नहीं| · राजनीतिक भ्रष्टाचार स्वतः अपने आप में शासन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हेतु उत्तरदायी है क्योंकि शासन का नेतृत्व राजनीतिक प्रणाली के पास होता है| · राजनीति में अपराधीकरण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है · नकारात्मक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भ्रष्टाचार को बढ़ाती है| प्रशासनिक कारक · प्रशासनिक नियमावली का जटिल होना भ्रष्टाचार की संभावना को बढ़ता है · जन शिकायतों के निवारण हेतु उचित प्रशासनिक तंत्र के अभाव का होना · प्रशासनिक अधिकारियों के लिए नीतिशास्त्र संहिता न होना/आचार संहिता का प्रभावी ना होना · प्रशासन की प्रक्रिया में पर्याप्त जन भागीदारी का न होना · प्रशासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता की कमी · प्रशासन का अधिक सत्तावादी होना · प्रशासन एवं नागरिकों के मध्य का सम्बन्ध सुचारू न होना · प्रशासन में लालफीताशाही की उपस्थिति होना सामाजिक-सांस्कृतिक कारक · शासन एक सामाजिक परिवेश में कार्य करता है अतः शासन की कार्य प्रणाली पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है · शासन में पारदर्शिताकी कमी, जवाबदेहिता की कमी, लालफीताशाही का होना, सत्तावादी होना आदि समाज का ही प्रक्षेपण है · शासन के द्वारा समाज को विभिन्न प्रकार की सेवायें उपलब्ध कराई जाती हैं एवं इसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति/अधिकारी स्वतः समाज का एक अभिन्न अंग होता है अतः ऐसी स्थिति में शासन के नकारात्मक पहलुओं पर सामाजिक कारकों के प्रभाव का होना स्वाभाविक है| · शासन की कार्यप्रणाली में नातेदारी, भाई-भतीजावाद आदि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं से प्रभावित होती है आर्थिक कारक · लोकसेवकों को दिए जाने वाले वेतन सेवा शर्तों की अपर्याप्तता को भी भ्रष्टाचार का एक कारण माना जाता है परन्तु यह तर्क संगत नहीं है · बाजार आधारित अर्थव्यवस्था स्वतः अपने आप में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करती है क्योंकि बाजारवाद व्यक्ति के लोभ को बढाता है · सामाजिक परिवेश में किसी व्यक्ति की उपलब्धियों का आकलन उसके द्वारा अर्जित आर्थिक संसाधनों के आधार पर किया जाता है न की आय अर्जन के माध्यम या स्रोतों के आधार पर| इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है वैधानिक कारक · लोकसेवकों को संवैधानिक एवं वैधानिक संरक्षण प्राप्त है (अनुच्छेद 311)इन संरक्षणों का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित किया जाना था परन्तु व्यवहारिकता में इन संरक्षणों की आड़ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलाता है · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु जो विधिक उपाय (जैसे भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम 1988) किये गए हैं वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैंजो उपाय पर्याप्त हैं उनका परिपालन प्रभावी तरीके से किया जाना संभव नहीं हो पाता है · विधिक उपायों की आंतरिक प्रक्रिया काफी जटिल (12 से 13 चरण )होने के कारण आरोपित व्यक्तियों को भ्रष्टाचार हेतु दंडित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| · आरोपित एवं दण्डित लोकसेवकों के मध्य का अंतराल व्यापक है जिसका मूल कारण विधिक है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार स्वरूपतः परिवेशीय है जो कि ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक, विधिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के अंतःक्रिया का एक सम्मिलित परिणाम है|
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सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand with Integrity?How integrity helps a civil servant in performing his duties? (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में. सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में ,यह बताईये किसत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्द इन्टिजर(Integer) से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थ ईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतोंका गुण रखने वाला व्यक्ति होता है| सत्यनिष्ठा को कार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतताकी अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एक गुणात्मक अवधारणा है अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है| भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एक परिपूर्ण अवधारणा है जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानि व्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा| सत्यनिष्ठागैर-समझौता एवं गैर-चयनितहोता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है| सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो| पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु 1962 में संथानम समिति का गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य को भ्रष्टाचार निवारक समिति के रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर 1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठन किया गया जिसे 2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जा दिया गया| सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में योगदान नोलन समिति द्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है| सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)है अतः यह मूल्यों का एकीकरण है जोलोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारालोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार परकिया जाता है| यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपनेकर्तव्यों के निर्वहन में संवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वको जन्म देती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारासरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहींकिया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि लोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करना चाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक कोईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरीहै | एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक में पेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमान होती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)हैअतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना;
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##Question:सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand with Integrity?How integrity helps a civil servant in performing his duties? (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में. सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में ,यह बताईये किसत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्द इन्टिजर(Integer) से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थ ईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतोंका गुण रखने वाला व्यक्ति होता है| सत्यनिष्ठा को कार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतताकी अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एक गुणात्मक अवधारणा है अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है| भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एक परिपूर्ण अवधारणा है जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानि व्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा| सत्यनिष्ठागैर-समझौता एवं गैर-चयनितहोता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है| सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो| पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु 1962 में संथानम समिति का गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य को भ्रष्टाचार निवारक समिति के रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर 1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठन किया गया जिसे 2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जा दिया गया| सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में योगदान नोलन समिति द्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है| सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)है अतः यह मूल्यों का एकीकरण है जोलोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारालोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार परकिया जाता है| यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपनेकर्तव्यों के निर्वहन में संवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वको जन्म देती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारासरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहींकिया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि लोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करना चाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक कोईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरीहै | एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक में पेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमान होती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)हैअतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना;
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न्यूनतम समर्थन मूल्य से आप क्या समझते हैं? इसके गणना की विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। साथ ही इससे संबन्धित मुद्दों की व्याख्या कीजिए।(150-200 शब्द) What do you understand by minimum support price? Give a brief overview of its methods of calculation. Also explain the issues related to it. (150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में बताइये। गणना की तीन विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिये। वर्तमान समय में इसे लागू करने में आने वाले विभिन्न मुद्दों की व्याख्या कीजिये। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत है जिस पर सरकार किसानों से फसलों की खरीद करती है भले ही उन प्रचलित कीमत कुछ भी हो। कृषि मंत्रालय में अंतर्गत कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) 23 फसलों के लिए MSP की सिफ़ारिश करता है। जिसके आधार पर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति MSP घोषित करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना की विधियाँ: CACP किसी फसल के लिए MSP की सिफ़ारिश करते समय विभिन्न कारकों जैसे कृषि की लागत, उत्पाद की मांग-आपूर्ति की स्थिति बाजार मूल्य प्रवृत्तियों और अन्य फसलों की तुलना में मूल्य अनुपात को ध्यान में रखता है। इसी आधार पर गणना की निम्नलिखित विधियाँ प्रचलित हैं: A2: इसके अंतर्गत सभी प्रकार के कैश व्यय को शामिल किया जाता है जिसका प्रयोग उत्पादन में हुआ है। जैसे - बीज, उर्वरक, श्रम लागत, ईंधन लागत आदि। A2+FL: इसके अंतर्गत अन्य लागत के साथ ही पारिवारिक श्रम को भी शामिल किया जाता है। C2: इसके अंतर्गत मालिक द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में सम्पूर्ण नकद व्यय, वस्तुरूप आरोपित मूल्य में किया गया व्यय, पट्टे पर ली गयी भूमि पर दिया गया लगान, पारिवारिक श्रम का प्रत्यारोपित मूल्य, भूमि को छोड़कर पूंजी सम्पत्तियों के मूल्य पर व्याज तथा धारित भूमि का लगानी मूल्य शामिल किया जाता है। मुद्दे: MSP के सब्सिडी भर से राजकोषीय स्वस्थ्य और अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। MSP में भारत द्वारा की गयी हालिया वृद्धि के कारण डबल्यूटीओ द्वारा निर्धारित भारत की सब्सिडी सीमा के संदर्भ में आपत्ति व्यक्त की गयी है। राज्य सरकारों से उचित परामर्श नहीं लिया जाता है। जिसके कारण राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित किसानों में असंतोष बढ़ा है। MSP ने दलों, तिलहन, मोटे अनाज आदि की तुलना में गेहूं, चावल और गणना की खरीद पर अत्यधिक ध्यान दिया है। जागरूकता का अभाव है। नीति आयोग के अनुसार बुवाई के मौसम से पूर्वा कम किसान MSP से अवगत थे। 62% किसानों को फसल बुवाई केपश्चात एमएसपी के बारे में सूचित किया गया है। कई राज्यों में किए गए अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि किसान सरकार द्वारा घोषित MSP से खेती की लागत तक वसूल करने में असमर्थ थे। इसके परिणामस्वरूप कुछ राज्यों में विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में जल की गुणवत्ता के साथ मृदा की उर्वरता में गिरावट हुई है। इसके कारण पूर्वोत्तर राज्यों के आठ भेदभाव हुआ है। जिनमें MSP पर फसल खरीद की प्रवृत्ति न्यूनतम है या अस्तित्व में ही नहीं है। खरीद केन्द्रों की अत्यधिक दूरी पर अवस्थिति किसानों के लिए परिवहन की उच्च लागत, खरीद केन्द्रों का अनियमित कार्य समय, किसानों को MSP के भुगतान में विलंब होता है। गौरतलब है कि किसानों की आय दोगुनी करने तथा उन्हे सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिरिता प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि उत्पादों का उचित मूल्य मिले। इसके लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया जाना चाहिए। साथ ही मौसमी कारकों के कारण फसलों के खराब होने या लागत में वृद्धि को देखते हुए उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
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##Question:न्यूनतम समर्थन मूल्य से आप क्या समझते हैं? इसके गणना की विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। साथ ही इससे संबन्धित मुद्दों की व्याख्या कीजिए।(150-200 शब्द) What do you understand by minimum support price? Give a brief overview of its methods of calculation. Also explain the issues related to it. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में बताइये। गणना की तीन विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिये। वर्तमान समय में इसे लागू करने में आने वाले विभिन्न मुद्दों की व्याख्या कीजिये। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत है जिस पर सरकार किसानों से फसलों की खरीद करती है भले ही उन प्रचलित कीमत कुछ भी हो। कृषि मंत्रालय में अंतर्गत कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) 23 फसलों के लिए MSP की सिफ़ारिश करता है। जिसके आधार पर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति MSP घोषित करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना की विधियाँ: CACP किसी फसल के लिए MSP की सिफ़ारिश करते समय विभिन्न कारकों जैसे कृषि की लागत, उत्पाद की मांग-आपूर्ति की स्थिति बाजार मूल्य प्रवृत्तियों और अन्य फसलों की तुलना में मूल्य अनुपात को ध्यान में रखता है। इसी आधार पर गणना की निम्नलिखित विधियाँ प्रचलित हैं: A2: इसके अंतर्गत सभी प्रकार के कैश व्यय को शामिल किया जाता है जिसका प्रयोग उत्पादन में हुआ है। जैसे - बीज, उर्वरक, श्रम लागत, ईंधन लागत आदि। A2+FL: इसके अंतर्गत अन्य लागत के साथ ही पारिवारिक श्रम को भी शामिल किया जाता है। C2: इसके अंतर्गत मालिक द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में सम्पूर्ण नकद व्यय, वस्तुरूप आरोपित मूल्य में किया गया व्यय, पट्टे पर ली गयी भूमि पर दिया गया लगान, पारिवारिक श्रम का प्रत्यारोपित मूल्य, भूमि को छोड़कर पूंजी सम्पत्तियों के मूल्य पर व्याज तथा धारित भूमि का लगानी मूल्य शामिल किया जाता है। मुद्दे: MSP के सब्सिडी भर से राजकोषीय स्वस्थ्य और अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। MSP में भारत द्वारा की गयी हालिया वृद्धि के कारण डबल्यूटीओ द्वारा निर्धारित भारत की सब्सिडी सीमा के संदर्भ में आपत्ति व्यक्त की गयी है। राज्य सरकारों से उचित परामर्श नहीं लिया जाता है। जिसके कारण राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित किसानों में असंतोष बढ़ा है। MSP ने दलों, तिलहन, मोटे अनाज आदि की तुलना में गेहूं, चावल और गणना की खरीद पर अत्यधिक ध्यान दिया है। जागरूकता का अभाव है। नीति आयोग के अनुसार बुवाई के मौसम से पूर्वा कम किसान MSP से अवगत थे। 62% किसानों को फसल बुवाई केपश्चात एमएसपी के बारे में सूचित किया गया है। कई राज्यों में किए गए अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि किसान सरकार द्वारा घोषित MSP से खेती की लागत तक वसूल करने में असमर्थ थे। इसके परिणामस्वरूप कुछ राज्यों में विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में जल की गुणवत्ता के साथ मृदा की उर्वरता में गिरावट हुई है। इसके कारण पूर्वोत्तर राज्यों के आठ भेदभाव हुआ है। जिनमें MSP पर फसल खरीद की प्रवृत्ति न्यूनतम है या अस्तित्व में ही नहीं है। खरीद केन्द्रों की अत्यधिक दूरी पर अवस्थिति किसानों के लिए परिवहन की उच्च लागत, खरीद केन्द्रों का अनियमित कार्य समय, किसानों को MSP के भुगतान में विलंब होता है। गौरतलब है कि किसानों की आय दोगुनी करने तथा उन्हे सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिरिता प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि उत्पादों का उचित मूल्य मिले। इसके लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया जाना चाहिए। साथ ही मौसमी कारकों के कारण फसलों के खराब होने या लागत में वृद्धि को देखते हुए उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
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सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? (200 शब्द) What do you understand with Integrity?How integrity helps a civil servant in performing his duties? (200 Words)
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एप्रोच- पहले भाग में. सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में ,यह बताईये किसत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्द इन्टिजर(Integer) से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थ ईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतों का गुण रखने वाला व्यक्ति होता है| सत्यनिष्ठा को कार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतता की अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एकगुणात्मक अवधारणाहै अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है| भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एक परिपूर्ण अवधारणा है जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानि व्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा| सत्यनिष्ठागैर-समझौता एवं गैर-चयनितहोता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है| सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो| पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु 1962 में संथानम समिति का गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य को भ्रष्टाचार निवारक समिति के रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर 1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठन किया गया जिसे 2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जा दिया गया| सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में योगदान नोलन समिति द्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है| सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)है अतः यह मूल्यों का एकीकरण है जो लोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है | केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारा लोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार पर किया जाता है| यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपने कर्तव्यों के निर्वहन में संवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्व को जन्म देती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारा सरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहीं किया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि लोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करना चाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक को ईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक में पेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमान होती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)है अतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना;
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##Question:सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? (200 शब्द) What do you understand with Integrity?How integrity helps a civil servant in performing his duties? (200 Words)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में. सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में ,यह बताईये किसत्यनिष्ठा लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में कैसे मदद करती है? उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्द इन्टिजर(Integer) से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थ ईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतों का गुण रखने वाला व्यक्ति होता है| सत्यनिष्ठा को कार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतता की अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एकगुणात्मक अवधारणाहै अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है| भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एक परिपूर्ण अवधारणा है जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानि व्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा| सत्यनिष्ठागैर-समझौता एवं गैर-चयनितहोता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है| सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो| पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु 1962 में संथानम समिति का गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य को भ्रष्टाचार निवारक समिति के रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर 1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठन किया गया जिसे 2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जा दिया गया| सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में योगदान नोलन समिति द्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है| सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)है अतः यह मूल्यों का एकीकरण है जो लोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है | केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारा लोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार पर किया जाता है| यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपने कर्तव्यों के निर्वहन में संवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्व को जन्म देती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारा सरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहीं किया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि लोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करना चाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक को ईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक में पेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमान होती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)है अतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना;
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भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से भारत मेंएकीकरण की प्रक्रिया को मज़बूती मिली। स्पष्ट कीजिए। (200 शब्द) Reorganisation of states on linguistic basis strengthened the process of integration in India. Elucidate. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन कीपृष्ठभूमि का संक्षिप्तपरिचय दीजिए। इसके बादभाषाई आधार पर राज्यों केपुनर्गठन की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए सिद्द कीजिए कि कैसे इससे एकीकरण की प्रक्रिया को मज़बूती मिली। उत्तर:- स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह विचार सामने आया कि लोकतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए।गांधी जी सहित अन्य नेताओं द्वारा सामान्य तौर पर यह स्वीकार कर लिया गया था कि आजाद भारत अपनी प्रशासनिक इकाइयों के सीमा को भाषायी सिद्धांत पर निर्धारित करेगा। स्वतंत्रता पश्चात भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के कई प्रयास हुए जिनका भारत की एकता एवं अखण्डता पर भी असर हुआ। अतः भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग ने जोर पकड़ा। निम्नलिखित बिन्दुओ से एकीकरण की प्रक्रिया को समझ सकते हैं- प्रांतों या राज्यों के प्रशासनिक इकाई के रूप में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक इत्यादि विभिन्न कारकों की भूमिका होती है। ब्रिटिश शासनकाल में प्रांतों का गठन राजनीतिक प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए किया गया जैसे बंगाल, मद्रास एवं बॉम्बे नामक प्रान्त। 21 सदी में प्रशासनिक सुविधा के साथ साथ राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के उद्देश्य से भी प्रांतों का गठन हुआ जैसे बंगाल विभाजन का निर्णय तथा भाषाई आधार पर बिहार एवं उड़ीसा का गठन। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया। नेहरू रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया गया। आज़ादी के पश्चात राज्यों के पुनर्गठन विशेषकर भाषाई आधार पर पुनर्गठन को कुछ वर्षों के लिए कांग्रेस स्थगित करना चाहती थी। इसका मुख्य कारण था राष्ट्र के समक्ष उत्पन्न कई महत्वपूर्ण चुनौतियां जैसे साम्प्रदायिक दंगे, शरणार्थी संकट, खाद्यान संकट इत्यादि। संविधान सभा के द्वारा 1948 में एस के धर आयोग का गठन किया गया। आयोग ने केवल भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को उचित नहीं माना। इसकी सिफारिश का दक्षिण एवं पश्चिम के राज्यों में विरोध हुआ। 1948 में JVP समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भी समकालीन परिस्थितियों में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का समर्थन नहीं किया लेकिन यह भी कहा कि लम्बे समय तक इन मांगों की उपेक्षा नहीं हो सकती। इस समिति की सिफारिशों के विरुद्ध भी देश के कई राज्यों में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग की जाने लगी। 1952 में पी.श्रीरामलू नेता का एक पृथक राज्य के मांग के लिए उपवास के दौरान निधन हुआ। इसके पश्चात हिंसात्मक आंदोलन हुआ और 1953 में आंध्र को पृथक राज्य का दर्जा दिया गया। 1953 में ही फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने भाषा के साथ साथ आर्थिक प्रशासनिक पहलुओं को भी ध्यान में रखते हुए पुनर्गठन की सिफारिश की। 1956 में 14 राज्य तथा 6 संघ शासित क्षेत्रों का गठन हुआ। दक्षिण में तमिल, कन्नड़,मलयालम एवं तेलगु को आधार बनाते हुए राज्यों की सीमाओं का निर्धारण किया गया। इसके बावजूद महाराष्ट्र, पंजाब एवं उत्तर पूर्वी राज्यों में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग जारी रही। 1956 में ही महाराष्ट्र एवं गुजरात को अलग प्रान्त का दर्जा दिए जाने तथा बॉम्बे पर नियंत्रण को लेकर हिंसक आंदोलन हुआ। जन दबाव को देखते हुए सरकारने 1960 में महाराष्ट्र एवं गुजरात को दो अलग प्रांतों का दर्जा दिया गया और बॉम्बे पर महाराष्ट्र का नियंत्रण हुआ। धर्म एवं भाषा के नाम पर पंजाबी प्रान्त की भी मांग की जा रही थी। 1966 में भाषाई आधार पर पंजाब और हरियाणा को अलग किया गया। इस प्रकार आज़ादी के दो दशक पश्चात राज्यों के पुनर्गठन एवं भाषाई आधार पर गठन को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से सुलझा लिया गया एवं एकीकरण की प्रक्रिया को मज़बूती मिली।
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##Question:भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से भारत मेंएकीकरण की प्रक्रिया को मज़बूती मिली। स्पष्ट कीजिए। (200 शब्द) Reorganisation of states on linguistic basis strengthened the process of integration in India. Elucidate. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन कीपृष्ठभूमि का संक्षिप्तपरिचय दीजिए। इसके बादभाषाई आधार पर राज्यों केपुनर्गठन की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए सिद्द कीजिए कि कैसे इससे एकीकरण की प्रक्रिया को मज़बूती मिली। उत्तर:- स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह विचार सामने आया कि लोकतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए।गांधी जी सहित अन्य नेताओं द्वारा सामान्य तौर पर यह स्वीकार कर लिया गया था कि आजाद भारत अपनी प्रशासनिक इकाइयों के सीमा को भाषायी सिद्धांत पर निर्धारित करेगा। स्वतंत्रता पश्चात भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के कई प्रयास हुए जिनका भारत की एकता एवं अखण्डता पर भी असर हुआ। अतः भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग ने जोर पकड़ा। निम्नलिखित बिन्दुओ से एकीकरण की प्रक्रिया को समझ सकते हैं- प्रांतों या राज्यों के प्रशासनिक इकाई के रूप में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक इत्यादि विभिन्न कारकों की भूमिका होती है। ब्रिटिश शासनकाल में प्रांतों का गठन राजनीतिक प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए किया गया जैसे बंगाल, मद्रास एवं बॉम्बे नामक प्रान्त। 21 सदी में प्रशासनिक सुविधा के साथ साथ राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के उद्देश्य से भी प्रांतों का गठन हुआ जैसे बंगाल विभाजन का निर्णय तथा भाषाई आधार पर बिहार एवं उड़ीसा का गठन। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया। नेहरू रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया गया। आज़ादी के पश्चात राज्यों के पुनर्गठन विशेषकर भाषाई आधार पर पुनर्गठन को कुछ वर्षों के लिए कांग्रेस स्थगित करना चाहती थी। इसका मुख्य कारण था राष्ट्र के समक्ष उत्पन्न कई महत्वपूर्ण चुनौतियां जैसे साम्प्रदायिक दंगे, शरणार्थी संकट, खाद्यान संकट इत्यादि। संविधान सभा के द्वारा 1948 में एस के धर आयोग का गठन किया गया। आयोग ने केवल भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को उचित नहीं माना। इसकी सिफारिश का दक्षिण एवं पश्चिम के राज्यों में विरोध हुआ। 1948 में JVP समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भी समकालीन परिस्थितियों में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का समर्थन नहीं किया लेकिन यह भी कहा कि लम्बे समय तक इन मांगों की उपेक्षा नहीं हो सकती। इस समिति की सिफारिशों के विरुद्ध भी देश के कई राज्यों में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग की जाने लगी। 1952 में पी.श्रीरामलू नेता का एक पृथक राज्य के मांग के लिए उपवास के दौरान निधन हुआ। इसके पश्चात हिंसात्मक आंदोलन हुआ और 1953 में आंध्र को पृथक राज्य का दर्जा दिया गया। 1953 में ही फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने भाषा के साथ साथ आर्थिक प्रशासनिक पहलुओं को भी ध्यान में रखते हुए पुनर्गठन की सिफारिश की। 1956 में 14 राज्य तथा 6 संघ शासित क्षेत्रों का गठन हुआ। दक्षिण में तमिल, कन्नड़,मलयालम एवं तेलगु को आधार बनाते हुए राज्यों की सीमाओं का निर्धारण किया गया। इसके बावजूद महाराष्ट्र, पंजाब एवं उत्तर पूर्वी राज्यों में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग जारी रही। 1956 में ही महाराष्ट्र एवं गुजरात को अलग प्रान्त का दर्जा दिए जाने तथा बॉम्बे पर नियंत्रण को लेकर हिंसक आंदोलन हुआ। जन दबाव को देखते हुए सरकारने 1960 में महाराष्ट्र एवं गुजरात को दो अलग प्रांतों का दर्जा दिया गया और बॉम्बे पर महाराष्ट्र का नियंत्रण हुआ। धर्म एवं भाषा के नाम पर पंजाबी प्रान्त की भी मांग की जा रही थी। 1966 में भाषाई आधार पर पंजाब और हरियाणा को अलग किया गया। इस प्रकार आज़ादी के दो दशक पश्चात राज्यों के पुनर्गठन एवं भाषाई आधार पर गठन को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से सुलझा लिया गया एवं एकीकरण की प्रक्रिया को मज़बूती मिली।
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संसदीय समितियों से आप क्या समझते हैं? संसदीय समितियों की आवश्यकता क्यों है? कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में इन समितियों की भूमिका का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Parliamentary Committees? Why the parliamentary committees are needed in the house? Describe the role of these committees in establishing parliamentary control over the executive. (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में, संसदीय समितियों के बारे में चर्चा कीजिये| अगले भाग में,संसदीय समितियों की आवश्यकता के आयामों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में,कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में इन समितियों की भूमिका का वर्णन कीजिये| उत्तर- संसदीय समितियों का तात्पर्य सदन की वैसी समितियों से है जिसकी नियुक्ति या चुनाव सदन द्वारा किया गया हो अथवा अध्यक्ष/सभापति द्वारा इसको नामनिर्दिष्ट किया गया हो| यह अध्यक्ष/सभापति के निर्देशानुसार कार्य करती है तथा अपनी रिपोर्ट सदन को या अध्यक्ष/सभापति को प्रस्तुत करती हैं| संविधान में संसदीय समितियों के बारे में विशेष रूप से कोई उपबंध नहीं किया गया है परंतु अनुच्छेद 118(i) के अंतर्गत दोनों सदनों द्वारा निर्मित नियमों के अधीन इसका गठन किया जाता है| प्रकृति के आधार पर संसदीय समितियां दो प्रकार की होती हैं - स्थाई समितियां और तदर्थ समितियां | स्थाई समितियां स्थाई और नियमित होती हैं तथा इनके कार्य निरंतर प्रकृति के होते हैं; जैसे- लोकलेखा समिति, प्राक्कलन समिति, सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति, विभाग से संबंधित स्थाई समितियां आदि| तदर्थ समितियां एक विशिष्ट प्रयोजन के लिए गठित की जाती है तथा प्रयोजन समाप्त होते ही एवं रिपोर्ट प्रस्तुतकरने के साथ ही वह समाप्त हो जाती है;जैसे- जांच समितियां, सलाहकार समितियां, संयुक्त संसदीय समिति आदि| संसदीय समितियों की आवश्यकता के आयाम तेजी से बदलती दुनिया एवं डिजिटल समय के साथ संसद के कार्य न केवल विविध है बल्कि जटिल प्रवृत्ति के हैं| साथ ही साथ आधुनिक समय में बहुत ही व्यापक मुद्दों पर आधारित विस्तृत आयाम संसद के समक्ष प्रस्तुत होते हैं| संसद के पास सभी मुद्दों पर चर्चा हेतु काफी सीमित समय होता है| अतः संसद समस्त विधायी उपायों और अन्य मामलों की गहन छानबीन नहीं कर सकती है| साथ ही, प्रशासन पर निगरानी जैसे कार्य भी इनके द्वारा करना असंभव सा हो जाता है| इस संदर्भ में संसद अपना बहुत सा कार्य इन समितियों को स्थानांतरित कर देती है|संसदीय समितियां संसद की दक्षता तथा विशेषज्ञता को निम्नलिखित तरीके से बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है - संसद के पास विचाराधीन मुद्दों का गहन अध्ययन करके; विभिन्न मंत्रालयों/विभागों का प्रभावी पर्यवेक्षण करके संसद के कार्यभार को कम करना; संसदीय समितियां विभिन्न दलों के मध्य विचारधारात्मक और दलगत मुद्दों को दूर करके उनके बीच सर्वसम्मति बनाने , विषयों से संबंधित विशेषज्ञता विकसित करने और स्वतंत्र विशेषज्ञों और हितधारकों के साथ परामर्श करने में सक्षम बनाने हेतु एक मंच प्रदान करती है| निर्णय निर्माण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बनाने में; संसद तथा सरकार के बीच समन्वय बनाना; कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में इन समितियों की भूमिका भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका तीनों अंगों के मध्य चेक एंड बैलेंस की स्थिति बनाने का प्रयास किया गया है| इस संदर्भ में, कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने हेतु भी कुछ प्रावधान किए गए हैं| इन प्रावधानों में कानून बनाकर कार्यपालिका पर नियंत्रण; बजट के माध्यम से नियंत्रण; प्रस्ताव/संकल्प/प्रश्न आदि के माध्यम से नियंत्रण तथा संसदीय समितियों के माध्यम से नियंत्रण के पक्ष शामिल हैं| लोक लेखा समिति के माध्यम से सरकार के वित्त पर संसदीय निरीक्षण बनाया जाना संभव हुआ है| लोक लेखा समिति का मुख्य कार्य भारत के नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक द्वारा प्रस्तुत लेखा परीक्षा रिपोर्ट की जांच करना है जिससे यह कार्यपालिका द्वारा अनाधिकृत व्यय या स्वीकृत सीमाओं से अधिक व्यय संबंधी गतिविधियों को उद्घाटित करता है| यह विस्तृत प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक निधि का उपयोग करने तथा अपव्यय और अक्षमता को रोकने हेतु कार्यपालिका द्वारा विवेक,ज्ञान और औचित्य का प्रयोग किया जाये; जैसे - 2जी घोटाला तथा कोयला घोटाला जाँच के संदर्भ में लोक लेखा समिति की अहम भूमिका रही थी | इसके द्वारा निम्न कार्य भी किये जाते हैं - खर्च करने वाले प्राधिकारी की सक्षमता की जाँच; पुनःविनियोजन के क़ानूनी पहलु की जाँच; निगमों/सरकारी प्रतिष्ठानों/विनिर्माण कार्यों आदि से संबंधित बैलेंस-शीट की जाँच ताकि आय-व्यय का सही मिलान हो; सहायक/अर्धस्वायत्त संस्थानों/निगमों आदि के आय-व्यय के लेखा-जोखा पर कैग द्वारा किये लेखापरीक्षण की जाँच; सरकारी उपक्रमों संबंधित समिति के द्वारा विनिर्दिष्ट सरकारी उपक्रमों के प्रतिवेदन और लेखों की जांच करके संबंधित विभागों और उपक्रमों पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है| यह इसको देखती है कि क्या सरकारी उपक्रम समुचित व्यापारिक सिद्धांतों और विवेकपूर्ण वाणिज्यिकउद्देश्यों के अनुरूप चल रहे हैं कि नहीं? विभागों से संबंधित स्थाई समितियों के माध्यम से प्रशासन पर संसदीय निगरानी रखी जाती है| यह संबंधित मंत्रालय/विभाग के अनुदान मांगों पर विचार करती हैं तथाविधेयकों का निरीक्षण करती है| यह संबंध मंत्रालय/विभाग के वार्षिक प्रतिवेदन पर विचार करती है तथा दोनों सदनों में प्रस्तुत राष्ट्रीय मूलभूत, दीर्घकालीन नीतिगत दस्तावेजों पर विचार करके उस पर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है| स्थाई समितियां कार्यपालिका को दीर्घकालिक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने तथा व्यापक नीति निर्माण हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश मार्गदर्शन और जानकारी प्रदान करती है| प्राक्कलन समिति सरकार के वर्तमान नीतियों की आलोचना किये बिना ऐसे वैकल्पिक नीतियों का सुझाव देती है जिससे कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके| समिति यह देखती है कि उपरोक्त उद्देश्य के लिए सरकार जो पैसा खर्च कर रही है कि वह वास्तव में निर्धारित सीमा के भीतर है कि नहीं| यदि नहीं तो समिति सरकार को इसे ठीक करने के सुझाव देती है जैसा कि बजट के प्राक्कलन में पहले निर्धारित किया जा चूका हो| समिति सरकार को यह सुझाव भी देती है कि वह प्राक्कलन अर्थात मंत्रालयों के द्वारा मांगी गयी धनराशि को किस रूप में संसद में प्रस्तुत करे| विभिन्न प्रकार के तदर्थ समितियों के माध्यम के माध्यम से कार्यपालिका पर नियंत्रण विभिन्न घोटालों से संबंधित जाँच समितियां सरकार द्वारा पेश विधेयकों पर विचार करने तथा प्रतिवेदन देने हेतु गठित सलाहकार समितियां राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित विवादित मुद्दों, भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच आदि हेतु गठित संयुक्त संसदीय समितियां
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##Question:संसदीय समितियों से आप क्या समझते हैं? संसदीय समितियों की आवश्यकता क्यों है? कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में इन समितियों की भूमिका का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Parliamentary Committees? Why the parliamentary committees are needed in the house? Describe the role of these committees in establishing parliamentary control over the executive. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, संसदीय समितियों के बारे में चर्चा कीजिये| अगले भाग में,संसदीय समितियों की आवश्यकता के आयामों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में,कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में इन समितियों की भूमिका का वर्णन कीजिये| उत्तर- संसदीय समितियों का तात्पर्य सदन की वैसी समितियों से है जिसकी नियुक्ति या चुनाव सदन द्वारा किया गया हो अथवा अध्यक्ष/सभापति द्वारा इसको नामनिर्दिष्ट किया गया हो| यह अध्यक्ष/सभापति के निर्देशानुसार कार्य करती है तथा अपनी रिपोर्ट सदन को या अध्यक्ष/सभापति को प्रस्तुत करती हैं| संविधान में संसदीय समितियों के बारे में विशेष रूप से कोई उपबंध नहीं किया गया है परंतु अनुच्छेद 118(i) के अंतर्गत दोनों सदनों द्वारा निर्मित नियमों के अधीन इसका गठन किया जाता है| प्रकृति के आधार पर संसदीय समितियां दो प्रकार की होती हैं - स्थाई समितियां और तदर्थ समितियां | स्थाई समितियां स्थाई और नियमित होती हैं तथा इनके कार्य निरंतर प्रकृति के होते हैं; जैसे- लोकलेखा समिति, प्राक्कलन समिति, सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति, विभाग से संबंधित स्थाई समितियां आदि| तदर्थ समितियां एक विशिष्ट प्रयोजन के लिए गठित की जाती है तथा प्रयोजन समाप्त होते ही एवं रिपोर्ट प्रस्तुतकरने के साथ ही वह समाप्त हो जाती है;जैसे- जांच समितियां, सलाहकार समितियां, संयुक्त संसदीय समिति आदि| संसदीय समितियों की आवश्यकता के आयाम तेजी से बदलती दुनिया एवं डिजिटल समय के साथ संसद के कार्य न केवल विविध है बल्कि जटिल प्रवृत्ति के हैं| साथ ही साथ आधुनिक समय में बहुत ही व्यापक मुद्दों पर आधारित विस्तृत आयाम संसद के समक्ष प्रस्तुत होते हैं| संसद के पास सभी मुद्दों पर चर्चा हेतु काफी सीमित समय होता है| अतः संसद समस्त विधायी उपायों और अन्य मामलों की गहन छानबीन नहीं कर सकती है| साथ ही, प्रशासन पर निगरानी जैसे कार्य भी इनके द्वारा करना असंभव सा हो जाता है| इस संदर्भ में संसद अपना बहुत सा कार्य इन समितियों को स्थानांतरित कर देती है|संसदीय समितियां संसद की दक्षता तथा विशेषज्ञता को निम्नलिखित तरीके से बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है - संसद के पास विचाराधीन मुद्दों का गहन अध्ययन करके; विभिन्न मंत्रालयों/विभागों का प्रभावी पर्यवेक्षण करके संसद के कार्यभार को कम करना; संसदीय समितियां विभिन्न दलों के मध्य विचारधारात्मक और दलगत मुद्दों को दूर करके उनके बीच सर्वसम्मति बनाने , विषयों से संबंधित विशेषज्ञता विकसित करने और स्वतंत्र विशेषज्ञों और हितधारकों के साथ परामर्श करने में सक्षम बनाने हेतु एक मंच प्रदान करती है| निर्णय निर्माण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित बनाने में; संसद तथा सरकार के बीच समन्वय बनाना; कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में इन समितियों की भूमिका भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका तीनों अंगों के मध्य चेक एंड बैलेंस की स्थिति बनाने का प्रयास किया गया है| इस संदर्भ में, कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने हेतु भी कुछ प्रावधान किए गए हैं| इन प्रावधानों में कानून बनाकर कार्यपालिका पर नियंत्रण; बजट के माध्यम से नियंत्रण; प्रस्ताव/संकल्प/प्रश्न आदि के माध्यम से नियंत्रण तथा संसदीय समितियों के माध्यम से नियंत्रण के पक्ष शामिल हैं| लोक लेखा समिति के माध्यम से सरकार के वित्त पर संसदीय निरीक्षण बनाया जाना संभव हुआ है| लोक लेखा समिति का मुख्य कार्य भारत के नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक द्वारा प्रस्तुत लेखा परीक्षा रिपोर्ट की जांच करना है जिससे यह कार्यपालिका द्वारा अनाधिकृत व्यय या स्वीकृत सीमाओं से अधिक व्यय संबंधी गतिविधियों को उद्घाटित करता है| यह विस्तृत प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक निधि का उपयोग करने तथा अपव्यय और अक्षमता को रोकने हेतु कार्यपालिका द्वारा विवेक,ज्ञान और औचित्य का प्रयोग किया जाये; जैसे - 2जी घोटाला तथा कोयला घोटाला जाँच के संदर्भ में लोक लेखा समिति की अहम भूमिका रही थी | इसके द्वारा निम्न कार्य भी किये जाते हैं - खर्च करने वाले प्राधिकारी की सक्षमता की जाँच; पुनःविनियोजन के क़ानूनी पहलु की जाँच; निगमों/सरकारी प्रतिष्ठानों/विनिर्माण कार्यों आदि से संबंधित बैलेंस-शीट की जाँच ताकि आय-व्यय का सही मिलान हो; सहायक/अर्धस्वायत्त संस्थानों/निगमों आदि के आय-व्यय के लेखा-जोखा पर कैग द्वारा किये लेखापरीक्षण की जाँच; सरकारी उपक्रमों संबंधित समिति के द्वारा विनिर्दिष्ट सरकारी उपक्रमों के प्रतिवेदन और लेखों की जांच करके संबंधित विभागों और उपक्रमों पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है| यह इसको देखती है कि क्या सरकारी उपक्रम समुचित व्यापारिक सिद्धांतों और विवेकपूर्ण वाणिज्यिकउद्देश्यों के अनुरूप चल रहे हैं कि नहीं? विभागों से संबंधित स्थाई समितियों के माध्यम से प्रशासन पर संसदीय निगरानी रखी जाती है| यह संबंधित मंत्रालय/विभाग के अनुदान मांगों पर विचार करती हैं तथाविधेयकों का निरीक्षण करती है| यह संबंध मंत्रालय/विभाग के वार्षिक प्रतिवेदन पर विचार करती है तथा दोनों सदनों में प्रस्तुत राष्ट्रीय मूलभूत, दीर्घकालीन नीतिगत दस्तावेजों पर विचार करके उस पर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है| स्थाई समितियां कार्यपालिका को दीर्घकालिक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने तथा व्यापक नीति निर्माण हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश मार्गदर्शन और जानकारी प्रदान करती है| प्राक्कलन समिति सरकार के वर्तमान नीतियों की आलोचना किये बिना ऐसे वैकल्पिक नीतियों का सुझाव देती है जिससे कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके| समिति यह देखती है कि उपरोक्त उद्देश्य के लिए सरकार जो पैसा खर्च कर रही है कि वह वास्तव में निर्धारित सीमा के भीतर है कि नहीं| यदि नहीं तो समिति सरकार को इसे ठीक करने के सुझाव देती है जैसा कि बजट के प्राक्कलन में पहले निर्धारित किया जा चूका हो| समिति सरकार को यह सुझाव भी देती है कि वह प्राक्कलन अर्थात मंत्रालयों के द्वारा मांगी गयी धनराशि को किस रूप में संसद में प्रस्तुत करे| विभिन्न प्रकार के तदर्थ समितियों के माध्यम के माध्यम से कार्यपालिका पर नियंत्रण विभिन्न घोटालों से संबंधित जाँच समितियां सरकार द्वारा पेश विधेयकों पर विचार करने तथा प्रतिवेदन देने हेतु गठित सलाहकार समितियां राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित विवादित मुद्दों, भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच आदि हेतु गठित संयुक्त संसदीय समितियां
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सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के महत्व की व्याख्या करते हुए इसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of the Right to Information Act, 2005 and discuss the challenges faced in its implementation. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सूचना को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सूचना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में RTI अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जब किसी दिए हुए आंकड़े का प्रसंस्करण और उसका विश्लेषण किया जाता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष को सूचना कहा जाता है| माना जाता है कि सूचना से युक्त व्यक्ति अधिक सशक्त होगा| इसीलिए सूचना को कभी कभी सत्ता का आधार माना जाता है| सूचना का आदान-प्रदान अंततः शक्तियों का हस्तांतरण है जो कि जन सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है| इसी सन्दर्भ में सूचना सुशासन कि स्थापना के लिए एक आवश्यक माध्यम माना जाता है| सुशासन हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना अति आवश्यक है| सुशासन की स्थापना में सूचना के महत्त्व · सरकार के द्वारा किसी भी दायित्व की परिपूर्ति हेतु सूचना का होना अति आवश्यक है जैसे कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना, राजस्व प्रशासन, न्याय का प्रशासन, कल्याण, विकास इत्यादि · सरकार के द्वारा कल्याण एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण, परिपालन एवं मूल्यांकन करने हेतु सूचनाओं का विशेष महत्त्व है · शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है जो कि शासन में विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करती है · सूचना का आदान-प्रदान लोकतांत्रिक व्यवस्था कि एक मूल विशेषता है इसके माध्यम शासन प्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्रोत्साहित किया जाना संभव हो पाता है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार या शासन को जन अपेक्षाओं से अवगत कराती है एवं इसके माध्यम से सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों कि अधिक बेहतर जानकारी आम जनता को दी जा सकती है · लोक संसाधनों के बेहतर अनुप्रयोग हेतु भी सूचना का होना अति आवश्यक है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार के प्रति जन विश्वास को प्रोत्साहित करती है · सूचनाओं के माध्यम से सरकार एवं नागरिक दोनों को उसके कर्तव्यों एवं अधिकारों से अवगत कराया जाता है · शासन प्रणाली कि प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है इसके माध्यम से जन अपेक्षाओं की वास्तविक परिपूर्ति या व्यवहारिकता को सुनिश्चित किया जाता है · सूचना केउपरोक्त महत्त्व को देखते हुए SC ने RTI को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19-1) का विस्तारीकरण माना है| भारत सरकार ने इसी दिशा में प्रयास करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित किया है| RTI अधिनियम के मुख्य प्रावधान एवं उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन · इस अधिनियम के अंतर्गत भारत का कोई नागरिक लोक प्राधिकारी से सूचना या जानकारी को प्राप्त कर सकता है एवं सूचना को प्राप्त करने हेतु कारणों कि जानकारी दिया जाना आवश्यक नहीं है · अधिनयम के अनुसार लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे निकाय प्राधिकारी या स्वशासन के संस्थान से है जिसकी स्थापना या गठन संविधान के द्वारा या संविधान के अधीन, संसद या राज्य विधानमंडल की विधि के द्वाराअथवा सरकार के आदेशानुसार या जारी अधिसूचना के द्वारा हुई हो| ध्यातव्य है की अधिनियम की अस्पष्टता के चलते राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में नहीं लाया जा सका है · इस अधिनियम के अंतर्गत नागरिकों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु अपना आवेदन जन सूचना अधिकारी(PIO) के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है| इस जन सूचना अधिकारी(PIO) को लोक प्राधिकारी के द्वारा नामांकित किया जाता है| किन्तु अधिकाँश मामलों में PIO एवं APIO एक ही स्थान पर नामांकित कर दिया जाता है ताकि सूचना प्रदान करने के लिए 5 दिनों का अतिरिक्त समय लोक प्राधिकारी को प्राप्त हो सके|यह प्रावधान के मूलभाव का उल्लंघन है| · गरीबी रेखा से नीचे के व्यक्तियों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु कोई शुल्क अदा नहीं करनी होगी जबकि अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण लोक प्राधिकारी के द्वारा किया जाना है| BPL व्यक्तियों कि मूलभूत चिंताए मौलिक आवश्यकताओं कि पूर्ति से सम्बन्धित है अतः कानून में शुल्क के न होने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत होना चाहिए ना कि इसे लोक प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया जाए| · सूचना आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति हेतु प्रस्तावित योग्यता/अर्हता में यह उल्लेख किया गया है कि वह ऐसा ख्यातिप्राप्त व्यक्ति होगा जिसे विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मीडिया या शासन और प्रशासन पर व्यापक ज्ञान एवं अनुभव प्राप्त हो| सूचना आयोग के सदस्य के रूप में सिविल सेवा पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है जबकि अधिनियम कि सफलता हेतु यह आवश्यक है कि आयोग में प्रतिनिधित्व अधिक व्यापक होना चाहिये| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुसार यह अनुशंसा कि गयी है कि आयोग के कम से कम 50 % सदस्य गैर सिविल सेवा पृष्ठभूमि से होने चाहिए| · सूचना को विलम्ब से प्रदान करने पर यह अधिनियम 250 रूपये प्रतिदिन के आधार पर जुर्माना आरोपित करता है, यह जुर्माना सूचना आयोग द्वारा लगाया जाएगा| जुर्माने कि यह राशि अधिकतम 25 हजार हो सकती है| केवल आर्थिक दंड अधिनियम को प्रभावी नहीं बना सकता है| इस प्रावधान को अधिक कारगर बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इसे पीनल सजा के रूप में व्यक्त किया जाय| · अधिनियम में अपवादों का भी उल्लेख किया गया है जिनके बारे में नागरिकों को सूचना नहीं दी जा सकती है| इस प्रावधान कि सीमा यह है कि इसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव है और बड़ी संख्या में विषयों को अपवाद के रूप में रखा गया है इससे अधिनियम की प्रभावकारिता कम होती है| अतः अधिनियम में अपवादों को संक्षिप्त एवं वस्तुनिष्ठ किया जाना चाहिए ताकि अपवादों के आधार पर नागरिकों को सूचनाओं को प्राप्त करने से अधिक वंचित ण किया जा सके| · सूचना आयोग का आदेश या निर्णय सरकार के लिए अधिनियम के अनुसार बाध्यकारी है परन्तु इससे बाध्यकारी बनाने हेतु कोई विधिक प्रावधान नहीं किया गया है| अतः सरकार आयोग के निर्णय को किस सीमा तक लागू करेगी यह उसके नैतिक दायित्वों पर निर्भर करती है| समय के परिवर्तन के साथ सूचना आयोग के समक्ष अपीलीय मामलों कि संख्या बढती जा रही है जो कि अधिनियम के प्रति बढती जन जागरूकता को दर्शाता है किन्तु इसके साथ-साथ इतने अधिक अपीलीय मामलों का विलंबित होना इस अधिनियम के उद्दश्य को भी पराजित करती है| अतः इस अधिनियम की सफलता विधिक प्रावधानों के कारगर होने के साथ-साथ लोक प्राधिकारियों के समर्पण, इमानदारी, वस्तुनिष्ठता, संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है| इस अधिनियम कि सफलता हेतु यह भी आवश्यक है कि लोक प्राधिकारी के द्वारा अधिक से अधिक सूचनाएं अपनी पहल शक्ति के आधार पर नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएँ जो कि लोक प्राधिकारी में इस कानून के प्रति स्वजवाबदेहिता कि मांग करती है| इसके साथ ही भी यह आवश्यक है कि लोकसेवकों की आचरण नियमावली, मंत्रियों के शपथ के प्रारूप, राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 के प्रावधानों में भी यथोचित एवं आवश्यक परिवर्तन किया जाना चाहिए|
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##Question:सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के महत्व की व्याख्या करते हुए इसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of the Right to Information Act, 2005 and discuss the challenges faced in its implementation. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सूचना को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सूचना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में RTI अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जब किसी दिए हुए आंकड़े का प्रसंस्करण और उसका विश्लेषण किया जाता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष को सूचना कहा जाता है| माना जाता है कि सूचना से युक्त व्यक्ति अधिक सशक्त होगा| इसीलिए सूचना को कभी कभी सत्ता का आधार माना जाता है| सूचना का आदान-प्रदान अंततः शक्तियों का हस्तांतरण है जो कि जन सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है| इसी सन्दर्भ में सूचना सुशासन कि स्थापना के लिए एक आवश्यक माध्यम माना जाता है| सुशासन हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना अति आवश्यक है| सुशासन की स्थापना में सूचना के महत्त्व · सरकार के द्वारा किसी भी दायित्व की परिपूर्ति हेतु सूचना का होना अति आवश्यक है जैसे कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना, राजस्व प्रशासन, न्याय का प्रशासन, कल्याण, विकास इत्यादि · सरकार के द्वारा कल्याण एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण, परिपालन एवं मूल्यांकन करने हेतु सूचनाओं का विशेष महत्त्व है · शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है जो कि शासन में विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करती है · सूचना का आदान-प्रदान लोकतांत्रिक व्यवस्था कि एक मूल विशेषता है इसके माध्यम शासन प्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्रोत्साहित किया जाना संभव हो पाता है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार या शासन को जन अपेक्षाओं से अवगत कराती है एवं इसके माध्यम से सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों कि अधिक बेहतर जानकारी आम जनता को दी जा सकती है · लोक संसाधनों के बेहतर अनुप्रयोग हेतु भी सूचना का होना अति आवश्यक है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार के प्रति जन विश्वास को प्रोत्साहित करती है · सूचनाओं के माध्यम से सरकार एवं नागरिक दोनों को उसके कर्तव्यों एवं अधिकारों से अवगत कराया जाता है · शासन प्रणाली कि प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है इसके माध्यम से जन अपेक्षाओं की वास्तविक परिपूर्ति या व्यवहारिकता को सुनिश्चित किया जाता है · सूचना केउपरोक्त महत्त्व को देखते हुए SC ने RTI को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19-1) का विस्तारीकरण माना है| भारत सरकार ने इसी दिशा में प्रयास करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित किया है| RTI अधिनियम के मुख्य प्रावधान एवं उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन · इस अधिनियम के अंतर्गत भारत का कोई नागरिक लोक प्राधिकारी से सूचना या जानकारी को प्राप्त कर सकता है एवं सूचना को प्राप्त करने हेतु कारणों कि जानकारी दिया जाना आवश्यक नहीं है · अधिनयम के अनुसार लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे निकाय प्राधिकारी या स्वशासन के संस्थान से है जिसकी स्थापना या गठन संविधान के द्वारा या संविधान के अधीन, संसद या राज्य विधानमंडल की विधि के द्वाराअथवा सरकार के आदेशानुसार या जारी अधिसूचना के द्वारा हुई हो| ध्यातव्य है की अधिनियम की अस्पष्टता के चलते राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में नहीं लाया जा सका है · इस अधिनियम के अंतर्गत नागरिकों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु अपना आवेदन जन सूचना अधिकारी(PIO) के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है| इस जन सूचना अधिकारी(PIO) को लोक प्राधिकारी के द्वारा नामांकित किया जाता है| किन्तु अधिकाँश मामलों में PIO एवं APIO एक ही स्थान पर नामांकित कर दिया जाता है ताकि सूचना प्रदान करने के लिए 5 दिनों का अतिरिक्त समय लोक प्राधिकारी को प्राप्त हो सके|यह प्रावधान के मूलभाव का उल्लंघन है| · गरीबी रेखा से नीचे के व्यक्तियों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु कोई शुल्क अदा नहीं करनी होगी जबकि अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण लोक प्राधिकारी के द्वारा किया जाना है| BPL व्यक्तियों कि मूलभूत चिंताए मौलिक आवश्यकताओं कि पूर्ति से सम्बन्धित है अतः कानून में शुल्क के न होने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत होना चाहिए ना कि इसे लोक प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया जाए| · सूचना आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति हेतु प्रस्तावित योग्यता/अर्हता में यह उल्लेख किया गया है कि वह ऐसा ख्यातिप्राप्त व्यक्ति होगा जिसे विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मीडिया या शासन और प्रशासन पर व्यापक ज्ञान एवं अनुभव प्राप्त हो| सूचना आयोग के सदस्य के रूप में सिविल सेवा पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है जबकि अधिनियम कि सफलता हेतु यह आवश्यक है कि आयोग में प्रतिनिधित्व अधिक व्यापक होना चाहिये| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुसार यह अनुशंसा कि गयी है कि आयोग के कम से कम 50 % सदस्य गैर सिविल सेवा पृष्ठभूमि से होने चाहिए| · सूचना को विलम्ब से प्रदान करने पर यह अधिनियम 250 रूपये प्रतिदिन के आधार पर जुर्माना आरोपित करता है, यह जुर्माना सूचना आयोग द्वारा लगाया जाएगा| जुर्माने कि यह राशि अधिकतम 25 हजार हो सकती है| केवल आर्थिक दंड अधिनियम को प्रभावी नहीं बना सकता है| इस प्रावधान को अधिक कारगर बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इसे पीनल सजा के रूप में व्यक्त किया जाय| · अधिनियम में अपवादों का भी उल्लेख किया गया है जिनके बारे में नागरिकों को सूचना नहीं दी जा सकती है| इस प्रावधान कि सीमा यह है कि इसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव है और बड़ी संख्या में विषयों को अपवाद के रूप में रखा गया है इससे अधिनियम की प्रभावकारिता कम होती है| अतः अधिनियम में अपवादों को संक्षिप्त एवं वस्तुनिष्ठ किया जाना चाहिए ताकि अपवादों के आधार पर नागरिकों को सूचनाओं को प्राप्त करने से अधिक वंचित ण किया जा सके| · सूचना आयोग का आदेश या निर्णय सरकार के लिए अधिनियम के अनुसार बाध्यकारी है परन्तु इससे बाध्यकारी बनाने हेतु कोई विधिक प्रावधान नहीं किया गया है| अतः सरकार आयोग के निर्णय को किस सीमा तक लागू करेगी यह उसके नैतिक दायित्वों पर निर्भर करती है| समय के परिवर्तन के साथ सूचना आयोग के समक्ष अपीलीय मामलों कि संख्या बढती जा रही है जो कि अधिनियम के प्रति बढती जन जागरूकता को दर्शाता है किन्तु इसके साथ-साथ इतने अधिक अपीलीय मामलों का विलंबित होना इस अधिनियम के उद्दश्य को भी पराजित करती है| अतः इस अधिनियम की सफलता विधिक प्रावधानों के कारगर होने के साथ-साथ लोक प्राधिकारियों के समर्पण, इमानदारी, वस्तुनिष्ठता, संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है| इस अधिनियम कि सफलता हेतु यह भी आवश्यक है कि लोक प्राधिकारी के द्वारा अधिक से अधिक सूचनाएं अपनी पहल शक्ति के आधार पर नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएँ जो कि लोक प्राधिकारी में इस कानून के प्रति स्वजवाबदेहिता कि मांग करती है| इसके साथ ही भी यह आवश्यक है कि लोकसेवकों की आचरण नियमावली, मंत्रियों के शपथ के प्रारूप, राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 के प्रावधानों में भी यथोचित एवं आवश्यक परिवर्तन किया जाना 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"नेहरु काल में भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांतों का निर्माण हुआ, साथ ही इसमें कुछ सीमायें भी थी |" कथन पर टिप्पणी कीजिये | (150-200शब्द/10 अंक) "In the Nehru period, the objectives and principles of Indian foreign policy were created, along with this, there were some limitations". Comment on the statement. (150-200 words/10Marks)
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नेहरु के समय के विदेश नीति के आधार को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात उस समय के विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत को संक्षेप में बताइए | पुनः इसके बाद इस नीति नीति में कुछ सीमायें भी थी, उसका भी वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टि के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की कुछ प्राथमिकताएं जैसे कि राष्ट्र का आर्थिक विकास , राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना , विदेशी मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को बनाए रखना एवं विश्व शांति थी | किसी भी स्वाभिमानी और शांतिप्रिय देश के लिए ऐसी नीति बनाना स्वाभाविक भी होता है | भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की घटनाएं , घरेलू आवश्यकताओं तथा महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे व्यक्तियों ,आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी | भारत की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत -नेहरु जी के विदेश नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे , जैसे - क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता दोनों नीतियों के दबाव से स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाना | पंचशील का सिद्धांत अपनाना अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना | उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना | सॉफ्ट पॉवर का प्रयोग करना | भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा यद्यपि भारतीय विदेश नीति जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों पर आधारित रही परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी रहीं जो निम्नलिखित हैं कश्मीर समस्या - NAM की नीति का पालन करते हुए कश्मीर की समस्या को समाधान के लिए यू एन के समक्ष रखना परन्तु अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के कारण इस समस्या का समाधान न हो पाना | भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्ध - इन दोनों युद्धों के पश्चात् NAM के सदस्यों द्वारा इन युद्धों का विरोध नहीं करना और न ही चीन एवं पाकिस्तान का खुलकर विरोध करना | यू एन एस सी की सदस्यता न लेना - गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने आदर्शवाद के कारण यू एन एस सी जैसी शक्तिशाली संस्था की सदस्यता नहीं ग्रहण की | इन सभी सीमाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति में वर्तमान समय तक पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी विचारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य उपस्थिति रही है |भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है | उदाहरण - अमेरिका द्वारा इराक पर युद्ध की आलोचना ,यू एन एस सी में सुधार का पुरजोर समर्थन करना इत्यादि | चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने पूरी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ के हिंदी-चीनी भाई-भाई-का नारा भी दिया था | वर्तमान में भी उनकी नीतियों की निरंतरता भारतीय विदेश नीति में देखी जा सकती है|
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##Question:"नेहरु काल में भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांतों का निर्माण हुआ, साथ ही इसमें कुछ सीमायें भी थी |" कथन पर टिप्पणी कीजिये | (150-200शब्द/10 अंक) "In the Nehru period, the objectives and principles of Indian foreign policy were created, along with this, there were some limitations". Comment on the statement. (150-200 words/10Marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नेहरु के समय के विदेश नीति के आधार को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात उस समय के विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत को संक्षेप में बताइए | पुनः इसके बाद इस नीति नीति में कुछ सीमायें भी थी, उसका भी वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टि के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की कुछ प्राथमिकताएं जैसे कि राष्ट्र का आर्थिक विकास , राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना , विदेशी मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को बनाए रखना एवं विश्व शांति थी | किसी भी स्वाभिमानी और शांतिप्रिय देश के लिए ऐसी नीति बनाना स्वाभाविक भी होता है | भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की घटनाएं , घरेलू आवश्यकताओं तथा महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे व्यक्तियों ,आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी | भारत की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत -नेहरु जी के विदेश नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे , जैसे - क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता दोनों नीतियों के दबाव से स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाना | पंचशील का सिद्धांत अपनाना अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना | उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना | सॉफ्ट पॉवर का प्रयोग करना | भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा यद्यपि भारतीय विदेश नीति जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों पर आधारित रही परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी रहीं जो निम्नलिखित हैं कश्मीर समस्या - NAM की नीति का पालन करते हुए कश्मीर की समस्या को समाधान के लिए यू एन के समक्ष रखना परन्तु अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के कारण इस समस्या का समाधान न हो पाना | भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्ध - इन दोनों युद्धों के पश्चात् NAM के सदस्यों द्वारा इन युद्धों का विरोध नहीं करना और न ही चीन एवं पाकिस्तान का खुलकर विरोध करना | यू एन एस सी की सदस्यता न लेना - गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने आदर्शवाद के कारण यू एन एस सी जैसी शक्तिशाली संस्था की सदस्यता नहीं ग्रहण की | इन सभी सीमाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति में वर्तमान समय तक पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी विचारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य उपस्थिति रही है |भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है | उदाहरण - अमेरिका द्वारा इराक पर युद्ध की आलोचना ,यू एन एस सी में सुधार का पुरजोर समर्थन करना इत्यादि | चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने पूरी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ के हिंदी-चीनी भाई-भाई-का नारा भी दिया था | वर्तमान में भी उनकी नीतियों की निरंतरता भारतीय विदेश नीति में देखी जा सकती है|
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सूचना का अधिकार नैतिक शासन का मूलभूत आधार है इस संदर्भ में सूचना के अधिकार का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के प्रमुख प्रावधानों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Right to information is the fundamental basis of ethical governance, in this context, explain the importance of right to information. Along with this, critically evaluate the main provisions of the Right to Information Act 2005. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सूचना को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सूचना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में RTI अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का मूल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जब किसी दिए हुए आंकड़े का प्रसंस्करण और उसका विश्लेषण किया जाता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष को सूचना कहा जाता है| माना जाता है कि सूचना से युक्त व्यक्ति अधिक सशक्त होगा| इसीलिए सूचना को कभी कभी सत्ता का आधार माना जाता है| सूचना का आदान-प्रदान अंततः शक्तियों का हस्तांतरण है जो कि जन सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है| इसी सन्दर्भ में सूचना सुशासन कि स्थापना के लिए एक आवश्यक माध्यम माना जाता है| सुशासन हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना अति आवश्यक है| सुशासन की स्थापना में सूचना के महत्त्व · सरकार के द्वारा किसी भी दायित्व की परिपूर्ति हेतु सूचना का होना अति आवश्यक है जैसे कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना, राजस्व प्रशासन, न्याय का प्रशासन, कल्याण, विकास इत्यादि · सरकार के द्वारा कल्याण एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण, परिपालन एवं मूल्यांकन करने हेतु सूचनाओं का विशेष महत्त्व है · शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है जो कि शासन में विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करती है · सूचना का आदान-प्रदान लोकतांत्रिक व्यवस्था कि एक मूल विशेषता है इसके माध्यम शासन प्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्रोत्साहित किया जाना संभव हो पाता है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार या शासन को जन अपेक्षाओं से अवगत कराती है एवं इसके माध्यम से सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों कि अधिक बेहतर जानकारी आम जनता को दी जा सकती है · लोक संसाधनों के बेहतर अनुप्रयोग हेतु भी सूचना का होना अति आवश्यक है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार के प्रति जन विश्वास को प्रोत्साहित करती है · सूचनाओं के माध्यम से सरकार एवं नागरिक दोनों को उसके कर्तव्यों एवं अधिकारों से अवगत कराया जाता है · शासन प्रणाली कि प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है इसके माध्यम से जन अपेक्षाओं की वास्तविक परिपूर्ति या व्यवहारिकता को सुनिश्चित किया जाता है · सूचना केउपरोक्त महत्त्व को देखते हुए SC ने RTI को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19-1) का विस्तारीकरण माना है| भारत सरकार ने इसी दिशा में प्रयास करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित किया है| RTI अधिनियम के मुख्य प्रावधान एवं उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन · इस अधिनियम के अंतर्गत भारत का कोई नागरिक लोक प्राधिकारी से सूचना या जानकारी को प्राप्त कर सकता है एवं सूचना को प्राप्त करने हेतु कारणों कि जानकारी दिया जाना आवश्यक नहीं है · अधिनयम के अनुसार लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे निकाय प्राधिकारी या स्वशासन के संस्थान से है जिसकी स्थापना या गठन संविधान के द्वारा या संविधान के अधीन, संसद या राज्य विधानमंडल की विधि के द्वाराअथवा सरकार के आदेशानुसार या जारी अधिसूचना के द्वारा हुई हो| ध्यातव्य है की अधिनियम की अस्पष्टता के चलते राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में नहीं लाया जा सका है · इस अधिनियम के अंतर्गत नागरिकों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु अपना आवेदन जन सूचना अधिकारी(PIO) के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है| इस जन सूचना अधिकारी(PIO) को लोक प्राधिकारी के द्वारा नामांकित किया जाता है| किन्तु अधिकाँश मामलों में PIO एवं APIO एक ही स्थान पर नामांकित कर दिया जाता है ताकि सूचना प्रदान करने के लिए 5 दिनों का अतिरिक्त समय लोक प्राधिकारी को प्राप्त हो सके|यह प्रावधान के मूलभाव का उल्लंघन है| · गरीबी रेखा से नीचे के व्यक्तियों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु कोई शुल्क अदा नहीं करनी होगी जबकि अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण लोक प्राधिकारी के द्वारा किया जाना है| BPL व्यक्तियों कि मूलभूत चिंताए मौलिक आवश्यकताओं कि पूर्ति से सम्बन्धित है अतः कानून में शुल्क के न होने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत होना चाहिए ना कि इसे लोक प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया जाए| · सूचना आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति हेतु प्रस्तावित योग्यता/अर्हता में यह उल्लेख किया गया है कि वह ऐसा ख्यातिप्राप्त व्यक्ति होगा जिसे विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मीडिया या शासन और प्रशासन पर व्यापक ज्ञान एवं अनुभव प्राप्त हो| सूचना आयोग के सदस्य के रूप में सिविल सेवा पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है जबकि अधिनियम कि सफलता हेतु यह आवश्यक है कि आयोग में प्रतिनिधित्व अधिक व्यापक होना चाहिये| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुसार यह अनुशंसा कि गयी है कि आयोग के कम से कम 50 % सदस्य गैर सिविल सेवा पृष्ठभूमि से होने चाहिए| · सूचना को विलम्ब से प्रदान करने पर यह अधिनियम 250 रूपये प्रतिदिन के आधार पर जुर्माना आरोपित करता है, यह जुर्माना सूचना आयोग द्वारा लगाया जाएगा| जुर्माने कि यह राशि अधिकतम 25 हजार हो सकती है| केवल आर्थिक दंड अधिनियम को प्रभावी नहीं बना सकता है| इस प्रावधान को अधिक कारगर बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इसे पीनल सजा के रूप में व्यक्त किया जाय| · अधिनियम में अपवादों का भी उल्लेख किया गया है जिनके बारे में नागरिकों को सूचना नहीं दी जा सकती है| इस प्रावधान कि सीमा यह है कि इसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव है और बड़ी संख्या में विषयों को अपवाद के रूप में रखा गया है इससे अधिनियम की प्रभावकारिता कम होती है| अतः अधिनियम में अपवादों को संक्षिप्त एवं वस्तुनिष्ठ किया जाना चाहिए ताकि अपवादों के आधार पर नागरिकों को सूचनाओं को प्राप्त करने से अधिक वंचित ण किया जा सके| · सूचना आयोग का आदेश या निर्णय सरकार के लिए अधिनियम के अनुसार बाध्यकारी है परन्तु इससे बाध्यकारी बनाने हेतु कोई विधिक प्रावधान नहीं किया गया है| अतः सरकार आयोग के निर्णय को किस सीमा तक लागू करेगी यह उसके नैतिक दायित्वों पर निर्भर करती है| समय के परिवर्तन के साथ सूचना आयोग के समक्ष अपीलीय मामलों कि संख्या बढती जा रही है जो कि अधिनियम के प्रति बढती जन जागरूकता को दर्शाता है किन्तु इसके साथ-साथ इतने अधिक अपीलीय मामलों का विलंबित होना इस अधिनियम के उद्दश्य को भी पराजित करती है| अतः इस अधिनियम की सफलता विधिक प्रावधानों के कारगर होने के साथ-साथ लोक प्राधिकारियों के समर्पण, इमानदारी, वस्तुनिष्ठता, संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है| इस अधिनियम कि सफलता हेतु यह भी आवश्यक है कि लोक प्राधिकारी के द्वारा अधिक से अधिक सूचनाएं अपनी पहल शक्ति के आधार पर नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएँ जो कि लोक प्राधिकारी में इस कानून के प्रति स्वजवाबदेहिता कि मांग करती है| इसके साथ ही भी यह आवश्यक है कि लोकसेवकों की आचरण नियमावली, मंत्रियों के शपथ के प्रारूप, राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 के प्रावधानों में भी यथोचित एवं आवश्यक परिवर्तन किया जाना चाहिए|
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##Question:सूचना का अधिकार नैतिक शासन का मूलभूत आधार है इस संदर्भ में सूचना के अधिकार का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के प्रमुख प्रावधानों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Right to information is the fundamental basis of ethical governance, in this context, explain the importance of right to information. Along with this, critically evaluate the main provisions of the Right to Information Act 2005. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सूचना को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सूचना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में RTI अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का मूल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जब किसी दिए हुए आंकड़े का प्रसंस्करण और उसका विश्लेषण किया जाता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष को सूचना कहा जाता है| माना जाता है कि सूचना से युक्त व्यक्ति अधिक सशक्त होगा| इसीलिए सूचना को कभी कभी सत्ता का आधार माना जाता है| सूचना का आदान-प्रदान अंततः शक्तियों का हस्तांतरण है जो कि जन सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है| इसी सन्दर्भ में सूचना सुशासन कि स्थापना के लिए एक आवश्यक माध्यम माना जाता है| सुशासन हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना अति आवश्यक है| सुशासन की स्थापना में सूचना के महत्त्व · सरकार के द्वारा किसी भी दायित्व की परिपूर्ति हेतु सूचना का होना अति आवश्यक है जैसे कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना, राजस्व प्रशासन, न्याय का प्रशासन, कल्याण, विकास इत्यादि · सरकार के द्वारा कल्याण एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण, परिपालन एवं मूल्यांकन करने हेतु सूचनाओं का विशेष महत्त्व है · शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है जो कि शासन में विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करती है · सूचना का आदान-प्रदान लोकतांत्रिक व्यवस्था कि एक मूल विशेषता है इसके माध्यम शासन प्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्रोत्साहित किया जाना संभव हो पाता है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार या शासन को जन अपेक्षाओं से अवगत कराती है एवं इसके माध्यम से सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों कि अधिक बेहतर जानकारी आम जनता को दी जा सकती है · लोक संसाधनों के बेहतर अनुप्रयोग हेतु भी सूचना का होना अति आवश्यक है · सूचना का आदान-प्रदान सरकार के प्रति जन विश्वास को प्रोत्साहित करती है · सूचनाओं के माध्यम से सरकार एवं नागरिक दोनों को उसके कर्तव्यों एवं अधिकारों से अवगत कराया जाता है · शासन प्रणाली कि प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है इसके माध्यम से जन अपेक्षाओं की वास्तविक परिपूर्ति या व्यवहारिकता को सुनिश्चित किया जाता है · सूचना केउपरोक्त महत्त्व को देखते हुए SC ने RTI को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19-1) का विस्तारीकरण माना है| भारत सरकार ने इसी दिशा में प्रयास करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित किया है| RTI अधिनियम के मुख्य प्रावधान एवं उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन · इस अधिनियम के अंतर्गत भारत का कोई नागरिक लोक प्राधिकारी से सूचना या जानकारी को प्राप्त कर सकता है एवं सूचना को प्राप्त करने हेतु कारणों कि जानकारी दिया जाना आवश्यक नहीं है · अधिनयम के अनुसार लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे निकाय प्राधिकारी या स्वशासन के संस्थान से है जिसकी स्थापना या गठन संविधान के द्वारा या संविधान के अधीन, संसद या राज्य विधानमंडल की विधि के द्वाराअथवा सरकार के आदेशानुसार या जारी अधिसूचना के द्वारा हुई हो| ध्यातव्य है की अधिनियम की अस्पष्टता के चलते राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में नहीं लाया जा सका है · इस अधिनियम के अंतर्गत नागरिकों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु अपना आवेदन जन सूचना अधिकारी(PIO) के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है| इस जन सूचना अधिकारी(PIO) को लोक प्राधिकारी के द्वारा नामांकित किया जाता है| किन्तु अधिकाँश मामलों में PIO एवं APIO एक ही स्थान पर नामांकित कर दिया जाता है ताकि सूचना प्रदान करने के लिए 5 दिनों का अतिरिक्त समय लोक प्राधिकारी को प्राप्त हो सके|यह प्रावधान के मूलभाव का उल्लंघन है| · गरीबी रेखा से नीचे के व्यक्तियों के द्वारा सूचना को प्राप्त करने हेतु कोई शुल्क अदा नहीं करनी होगी जबकि अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण लोक प्राधिकारी के द्वारा किया जाना है| BPL व्यक्तियों कि मूलभूत चिंताए मौलिक आवश्यकताओं कि पूर्ति से सम्बन्धित है अतः कानून में शुल्क के न होने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| अन्य के लिए शुल्क का निर्धारण कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत होना चाहिए ना कि इसे लोक प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया जाए| · सूचना आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति हेतु प्रस्तावित योग्यता/अर्हता में यह उल्लेख किया गया है कि वह ऐसा ख्यातिप्राप्त व्यक्ति होगा जिसे विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मीडिया या शासन और प्रशासन पर व्यापक ज्ञान एवं अनुभव प्राप्त हो| सूचना आयोग के सदस्य के रूप में सिविल सेवा पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है जबकि अधिनियम कि सफलता हेतु यह आवश्यक है कि आयोग में प्रतिनिधित्व अधिक व्यापक होना चाहिये| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुसार यह अनुशंसा कि गयी है कि आयोग के कम से कम 50 % सदस्य गैर सिविल सेवा पृष्ठभूमि से होने चाहिए| · सूचना को विलम्ब से प्रदान करने पर यह अधिनियम 250 रूपये प्रतिदिन के आधार पर जुर्माना आरोपित करता है, यह जुर्माना सूचना आयोग द्वारा लगाया जाएगा| जुर्माने कि यह राशि अधिकतम 25 हजार हो सकती है| केवल आर्थिक दंड अधिनियम को प्रभावी नहीं बना सकता है| इस प्रावधान को अधिक कारगर बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इसे पीनल सजा के रूप में व्यक्त किया जाय| · अधिनियम में अपवादों का भी उल्लेख किया गया है जिनके बारे में नागरिकों को सूचना नहीं दी जा सकती है| इस प्रावधान कि सीमा यह है कि इसमें वस्तुनिष्ठता का अभाव है और बड़ी संख्या में विषयों को अपवाद के रूप में रखा गया है इससे अधिनियम की प्रभावकारिता कम होती है| अतः अधिनियम में अपवादों को संक्षिप्त एवं वस्तुनिष्ठ किया जाना चाहिए ताकि अपवादों के आधार पर नागरिकों को सूचनाओं को प्राप्त करने से अधिक वंचित ण किया जा सके| · सूचना आयोग का आदेश या निर्णय सरकार के लिए अधिनियम के अनुसार बाध्यकारी है परन्तु इससे बाध्यकारी बनाने हेतु कोई विधिक प्रावधान नहीं किया गया है| अतः सरकार आयोग के निर्णय को किस सीमा तक लागू करेगी यह उसके नैतिक दायित्वों पर निर्भर करती है| समय के परिवर्तन के साथ सूचना आयोग के समक्ष अपीलीय मामलों कि संख्या बढती जा रही है जो कि अधिनियम के प्रति बढती जन जागरूकता को दर्शाता है किन्तु इसके साथ-साथ इतने अधिक अपीलीय मामलों का विलंबित होना इस अधिनियम के उद्दश्य को भी पराजित करती है| अतः इस अधिनियम की सफलता विधिक प्रावधानों के कारगर होने के साथ-साथ लोक प्राधिकारियों के समर्पण, इमानदारी, वस्तुनिष्ठता, संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है| इस अधिनियम कि सफलता हेतु यह भी आवश्यक है कि लोक प्राधिकारी के द्वारा अधिक से अधिक सूचनाएं अपनी पहल शक्ति के आधार पर नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएँ जो कि लोक प्राधिकारी में इस कानून के प्रति स्वजवाबदेहिता कि मांग करती है| इसके साथ ही भी यह आवश्यक है कि लोकसेवकों की आचरण नियमावली, मंत्रियों के शपथ के प्रारूप, राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 के प्रावधानों में भी यथोचित एवं आवश्यक परिवर्तन किया जाना चाहिए|
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सुशासन की स्थापना में सूचना के आदान-प्रदान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of information exchange in the establishment of good governance. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण: सूचना को परिभाषित करते हुए उत्तर का परिचय लिखिए। सुशासन की स्थापना में सूचना के आदान-प्रदान का महत्व बिन्दुवार लिखिए। अंत में, कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर: जब किसी दिए हुए आंकड़े का प्रसंस्करण और उसका विश्लेषण किया जाता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष को सूचना कहा जाता है| माना जाता है कि सूचना से युक्त व्यक्ति अधिक सशक्त होगा| इसीलिए सूचना को कभी कभी सत्ता का आधार माना जाता है| सूचना का आदान-प्रदान अंततः शक्तियों का हस्तांतरण है जो कि जन सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है| इसी सन्दर्भ में सूचना सुशासन कि स्थापना के लिए एक आवश्यक माध्यम माना जाता है| सुशासन हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना अति आवश्यक है। सुशासन की स्थापना में सूचना के आदान-प्रदान का महत्व निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है:- सरकार के द्वारा किसी भी दायित्व की परिपूर्ति हेतु सूचना का होना अति आवश्यक है जैसे कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना, राजस्व प्रशासन, न्याय का प्रशासन, कल्याण, विकास इत्यादि सरकार के द्वारा कल्याण एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण, परिपालन एवं मूल्यांकन करने हेतु सूचनाओं का विशेष महत्त्व है शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है जो कि शासन में विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करती है सूचना का आदान-प्रदान लोकतांत्रिक व्यवस्था कि एक मूल विशेषता है इसके माध्यम शासन प्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्रोत्साहित किया जाना संभव हो पाता है सूचना का आदान-प्रदान सरकार या शासन को जन अपेक्षाओं से अवगत कराती है एवं इसके माध्यम से सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों कि अधिक बेहतर जानकारी आम जनता को दी जा सकती है लोक संसाधनों के बेहतर अनुप्रयोग हेतु भी सूचना का होना अति आवश्यक है सूचना का आदान-प्रदान सरकार के प्रति जन विश्वास को प्रोत्साहित करती है सूचनाओं के माध्यम से सरकार एवं नागरिक दोनों को उसके कर्तव्यों एवं अधिकारों से अवगत कराया जाता है शासन प्रणाली कि प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है इसके माध्यम से जन अपेक्षाओं की वास्तविक परिपूर्ति या व्यवहारिकता को सुनिश्चित किया जाता है सूचना केउपरोक्त महत्त्व को देखते हुए SC ने RTI को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19-1) का विस्तारीकरण माना है| भारत सरकार ने इसी दिशा में प्रयास करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित किया है। इस दिशा में भारत सरकार द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम को 2005 में पारित किया है।समय के परिवर्तन के साथ सूचना आयोग के समक्ष अपीलीय मामलों कि संख्या बढती जा रही है जो कि अधिनियम के प्रति बढती जन जागरूकता को दर्शाता है किन्तु इसके साथ-साथ इतने अधिक अपीलीय मामलों का विलंबित होना इस अधिनियम के उद्दश्य को भी पराजित करती है| अतः इस अधिनियम की सफलता विधिक प्रावधानों के कारगर होने के साथ-साथ लोक प्राधिकारियों के समर्पण, इमानदारी, वस्तुनिष्ठता, संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है| इस अधिनियम कि सफलता हेतु यह भी आवश्यक है कि लोक प्राधिकारी के द्वारा अधिक से अधिक सूचनाएं अपनी पहल शक्ति के आधार पर नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएँ जो कि लोक प्राधिकारी में इस कानून के प्रति स्वजवाबदेहिता कि मांग करती है| इसके साथ ही भी यह आवश्यक है कि लोकसेवकों की आचरण नियमावली, मंत्रियों के शपथ के प्रारूप, राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 के प्रावधानों में भी यथोचित एवं आवश्यक परिवर्तन किया जाना चाहिए।
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##Question:सुशासन की स्थापना में सूचना के आदान-प्रदान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of information exchange in the establishment of good governance. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: सूचना को परिभाषित करते हुए उत्तर का परिचय लिखिए। सुशासन की स्थापना में सूचना के आदान-प्रदान का महत्व बिन्दुवार लिखिए। अंत में, कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर: जब किसी दिए हुए आंकड़े का प्रसंस्करण और उसका विश्लेषण किया जाता है तब उससे प्राप्त निष्कर्ष को सूचना कहा जाता है| माना जाता है कि सूचना से युक्त व्यक्ति अधिक सशक्त होगा| इसीलिए सूचना को कभी कभी सत्ता का आधार माना जाता है| सूचना का आदान-प्रदान अंततः शक्तियों का हस्तांतरण है जो कि जन सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है| इसी सन्दर्भ में सूचना सुशासन कि स्थापना के लिए एक आवश्यक माध्यम माना जाता है| सुशासन हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना अति आवश्यक है। सुशासन की स्थापना में सूचना के आदान-प्रदान का महत्व निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है:- सरकार के द्वारा किसी भी दायित्व की परिपूर्ति हेतु सूचना का होना अति आवश्यक है जैसे कानून एवं व्यवस्था को बना कर रखना, राजस्व प्रशासन, न्याय का प्रशासन, कल्याण, विकास इत्यादि सरकार के द्वारा कल्याण एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण, परिपालन एवं मूल्यांकन करने हेतु सूचनाओं का विशेष महत्त्व है शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है जो कि शासन में विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहित करती है सूचना का आदान-प्रदान लोकतांत्रिक व्यवस्था कि एक मूल विशेषता है इसके माध्यम शासन प्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्रोत्साहित किया जाना संभव हो पाता है सूचना का आदान-प्रदान सरकार या शासन को जन अपेक्षाओं से अवगत कराती है एवं इसके माध्यम से सरकार के द्वारा किये जाने वाले प्रयासों कि अधिक बेहतर जानकारी आम जनता को दी जा सकती है लोक संसाधनों के बेहतर अनुप्रयोग हेतु भी सूचना का होना अति आवश्यक है सूचना का आदान-प्रदान सरकार के प्रति जन विश्वास को प्रोत्साहित करती है सूचनाओं के माध्यम से सरकार एवं नागरिक दोनों को उसके कर्तव्यों एवं अधिकारों से अवगत कराया जाता है शासन प्रणाली कि प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु सूचना के आदान-प्रदान का होना आवश्यक है इसके माध्यम से जन अपेक्षाओं की वास्तविक परिपूर्ति या व्यवहारिकता को सुनिश्चित किया जाता है सूचना केउपरोक्त महत्त्व को देखते हुए SC ने RTI को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19-1) का विस्तारीकरण माना है| भारत सरकार ने इसी दिशा में प्रयास करते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित किया है। इस दिशा में भारत सरकार द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम को 2005 में पारित किया है।समय के परिवर्तन के साथ सूचना आयोग के समक्ष अपीलीय मामलों कि संख्या बढती जा रही है जो कि अधिनियम के प्रति बढती जन जागरूकता को दर्शाता है किन्तु इसके साथ-साथ इतने अधिक अपीलीय मामलों का विलंबित होना इस अधिनियम के उद्दश्य को भी पराजित करती है| अतः इस अधिनियम की सफलता विधिक प्रावधानों के कारगर होने के साथ-साथ लोक प्राधिकारियों के समर्पण, इमानदारी, वस्तुनिष्ठता, संवेदनशीलता एवं सत्यनिष्ठा पर निर्भर करती है| इस अधिनियम कि सफलता हेतु यह भी आवश्यक है कि लोक प्राधिकारी के द्वारा अधिक से अधिक सूचनाएं अपनी पहल शक्ति के आधार पर नागरिकों को उपलब्ध कराई जाएँ जो कि लोक प्राधिकारी में इस कानून के प्रति स्वजवाबदेहिता कि मांग करती है| इसके साथ ही भी यह आवश्यक है कि लोकसेवकों की आचरण नियमावली, मंत्रियों के शपथ के प्रारूप, राजकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 के प्रावधानों में भी यथोचित एवं आवश्यक परिवर्तन किया जाना चाहिए।
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संचार यासंप्रेषणसे आप क्या समझते हैं? सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| साथ ही, इस संदर्भ में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली तथाकार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do youunderstand byCommunication?Describe the role of communication to make the exchange of information more effective. Also, in this context, discuss the functioning of the Right to Information Act and theChallenges related to its implementation. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- संचार/संप्रेषण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये| उत्तर- संचार/सम्प्रेषण का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों/ईकाईयों के बीच सूचनाओं/विचारों/भावनाओं के आदान-प्रदान से है| परंतु संचार का मौलिक भाव समझ या साझेदारी है| अतः संचार उद्देश्य उन्मुखी होता है| संचार हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरुरी है| संचार सांकेतिक होता है - मौखिक, अमौखिक, लिखित संचार|संचार प्रक्रिया में निम्नांकित तथ्यों को देखा जा सकता है-सेंडर, इनकोडिंग, संदेश, चैनल, प्राप्तकर्ता,डिकोडिंग,फीडबैक/प्रतिपुष्टि, नॉइज़(Noise)| सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका विभिन्न शासी निकायों, संगठनों और आम जनता के मध्य विभिन्न सूचनाओं तथा डाटा का साझाकरण बहुत आवश्यक है| सरकार/शासन द्वारा प्रत्येक दायित्वों जैसे- कानून एवं व्यवस्था; राजस्व प्रशासन, न्याय प्रशासन, कल्याण एवं विकास हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है तथा, सूचना का आदान-प्रदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मूल है| इसके माध्यम से सरकार को जनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है| शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु भी सूचना का आदन-प्रदान होना बहुत जरुरी है| यह शासन प्रणाली में जन भागीदारी को प्रोत्सहित करती है| सूचना का स्थानांतरण अंततः शक्ति का स्थानांतरण है जो कि शासन प्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करता है एवं जन सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती है| उपरोक्त सभी उद्देश्यों का मूललक्ष्य तभी प्राप्त हो सकेगा जब सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी रूप से हुआ हो| इस संदर्भ में संचार निम्नलिखित तरीके से अपनी भूमिका निभाता है - जब संचार स्पष्ट होगा तभी वांक्षित सूचना सही एवं व्यवस्थित तरीके से संबंधित स्रोत तक पहुँच सकेगी| व्यक्ति/संगठन/सरकार सूचनाओं के माध्यम से जो बातें कहना चाहते होंगे वह तभी सामने वाले पक्ष को बेहतर तरीके से समझ में आएगी जब सूचनाओं के कहने का माध्यम अर्थात संचार पारदर्शी एवं स्पष्ट हो| सूचनाओं के साझाकरण को त्वरित बनाने हेतु तीव्र एवं सरल संचार प्रभावी भूमिका निभा सकता है| सूचनाओं को लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी बनाने में मनोरंजक एवं रोचक संचार अच्छा रोल अदा कर सकता है| सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है| यह सरकार तथा उसके सहायक निकायों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करता है| इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी नागरिक सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना का अनुरोध कर सकता है जिसका शीघ्रातिशीघ्र या 30 दिनों के भीतर उत्तर दिया जाना अनिवार्य है| लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे प्राधिकारी/निकाय/स्वसरकार के संस्थान से है जिसका गठन/स्थापना - संविधान के द्वारा या इसके अधीन; संसद/राज्य विधानमंडल के अधिनियम के द्वारा; सरकार के द्वारा जारी आदेश/अधिसूचना के द्वारा हो| इसमें निम्नांकित शामिल हैं- सरकार के स्वामित्व/नियंत्रण/वास्तविक रूप से वितपोषित निकाय; गैर-सरकारी संगठन जिसका वितपोषण प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से सरकार के निधि से| यह अधिनियम दो महत्वपूर्ण अधिकारियों - लोक सूचना अधिकारी(पीआईओ-PIO) तथा अपीलीय प्राधिकारियों(AAs) से संबंधित है जो इसके क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं पीआईओ किसी सामान्य व्यक्ति के लिए संपर्क के प्रथम बिंदु के रूप में कार्य करते हैं जो विभिन्न मुद्दों पर सूचना की मांग करने वाले आरटीआई आवेदकों को संबोधित करते हैं| यदि पीआईओ समय पर सूचना प्रदान करने में विफल रहते हैं या आवेदक प्रदान की गई सूचना से संतुष्ट नहीं है तो अपीलीय प्राधिकारियों के द्वारा मामले में हस्तक्षेप किया जाता है| अपीलीय प्राधिकारी इस मामले पर सुनवाई कर सकता है और निर्देश दे सकता है| इन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है| यदि आवेदक फिर भी असंतुष्ट हैं तो वह सूचना आयोग को सुनवाई के लिए दूसरी अपील हेतु आवेदन कर सकता है| यह आवेदन या तो केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के पास किए जा सकते हैं | केंद्रीय सूचना आयोग केंद्र सरकार के विभागों से तथा राज्य सूचना आयोग राज्य सरकार के विभागों से संबंधित है| केंद्रीय सूचना आयोग के पास राज्य सूचना आयोग के संदर्भ में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं हैऔर ना ही राज्य सूचना आयोग के आदेश के विरुद्ध केंद्रीय सूचना आयोग में शिकायत या अपील दायर की जा सकती है| सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ यदि सूचना के अधिकार अधिनियम को संबंधित हितधारकों और एजेंसियों के द्वारा इसकी भावना के प्रति सही उत्तरदायित्व से निर्वहन किया जाए तो यह भारतीय नौकरशाही में क्रांति ला सकता है| इसके अधिकांश कार्यों का निर्वहन संबंधित सरकारों तथा सूचना आयोगों को करना होता है परंतु साथ ही साथ विभिन्न एजेंसियों, मीडिया, सिविल सोसायटी आदि का भी योगदान रहता है| सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन संबंधी निम्न चुनौतियां विद्यमान है- लोगों में जनजागरूकता का अभाव - कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग के सर्वेक्षण के अनुसार केवल 15% लोग ही आरटीआई अधिनियम से परिचित हैं| इनमें भी वंचित वर्गों, महिलाओं, ग्रामीण जनसंख्या तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में जागरूकता का स्तर बेहद ही कम है| शिकायत दर्ज करने में बाधाएं एवं जटिलताएं - सूचना की मांग करने वाले लोगों के लिए यूजर गाइड की अनुपलब्धता ;जिससे आरटीआई आवेदन से संबंधित प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई फलस्वरूप उनके द्वारा सूचना के अधिकार का समुचित उपयोग करने में अवरोध ; ऑफलाइन आरटीआई आवेदन करने हेतु असुविधाजनक भुगतान चैनल लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन दर्ज करने में समुचित सहायता का अभाव - यह कार्यान्वयन संबंधी एक गंभीर चुनौती है क्योंकि हमारे देश में साक्षरता का स्तर काफी कम है| प्राधिकरणों का यह दायित्व होना चाहिए कि वे लोगों को उनके अधिकारों के प्राप्ति में सहायता प्रदान करें| आरटीआई आवेदन तथा पीआईओ के उत्तरों के लिए मानक प्रारूपों से संबंधित मुद्दे प्रदत सूचना से संबंधित मुद्दे दी गई सूचना की निम्न गुणवत्ता तथा अधिकांशतः अधूरी तथा गलत जानकारी सूचना के एकत्रण तथा संयोजन से जुड़े मुद्दे - संबंधित प्रशिक्षित पीआईओ तथा सक्षमकारी अवसंरचना( कंप्यूटर, स्केनर, इंटरनेट कनेक्टिविटी ,फोटोकॉपी) की अनुपलब्धता के कारण यह परिस्थिति और भी गंभीर हो जाती है| पीआईओ के प्रशिक्षण स्थानांतरण और प्रेरणा का निम्न स्तर अधिकांश पीआईओ और अपीलीय प्राधिकारियां सूचना के अधिकार अधिनियम के आवेदनों का उपयुक्त ढंग से उत्तर देने या सूचना प्रदान करने के तरीकों से अनभिज्ञ हैं | इसके साथ ही अपीलीय प्राधिकारियों के आदेशों की अनदेखी कर दी जाती है| राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर लंबित मामलों की अत्यधिक संख्या अर्थदंड/जुर्माना का आरोपण न होना अनुचित कार्यों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले या हत्या सूचनाओं के प्रकाशन में सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा की गई लापरवाही
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##Question:संचार यासंप्रेषणसे आप क्या समझते हैं? सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| साथ ही, इस संदर्भ में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली तथाकार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do youunderstand byCommunication?Describe the role of communication to make the exchange of information more effective. Also, in this context, discuss the functioning of the Right to Information Act and theChallenges related to its implementation. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- संचार/संप्रेषण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये| उत्तर- संचार/सम्प्रेषण का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों/ईकाईयों के बीच सूचनाओं/विचारों/भावनाओं के आदान-प्रदान से है| परंतु संचार का मौलिक भाव समझ या साझेदारी है| अतः संचार उद्देश्य उन्मुखी होता है| संचार हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरुरी है| संचार सांकेतिक होता है - मौखिक, अमौखिक, लिखित संचार|संचार प्रक्रिया में निम्नांकित तथ्यों को देखा जा सकता है-सेंडर, इनकोडिंग, संदेश, चैनल, प्राप्तकर्ता,डिकोडिंग,फीडबैक/प्रतिपुष्टि, नॉइज़(Noise)| सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका विभिन्न शासी निकायों, संगठनों और आम जनता के मध्य विभिन्न सूचनाओं तथा डाटा का साझाकरण बहुत आवश्यक है| सरकार/शासन द्वारा प्रत्येक दायित्वों जैसे- कानून एवं व्यवस्था; राजस्व प्रशासन, न्याय प्रशासन, कल्याण एवं विकास हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है तथा, सूचना का आदान-प्रदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मूल है| इसके माध्यम से सरकार को जनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है| शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु भी सूचना का आदन-प्रदान होना बहुत जरुरी है| यह शासन प्रणाली में जन भागीदारी को प्रोत्सहित करती है| सूचना का स्थानांतरण अंततः शक्ति का स्थानांतरण है जो कि शासन प्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करता है एवं जन सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती है| उपरोक्त सभी उद्देश्यों का मूललक्ष्य तभी प्राप्त हो सकेगा जब सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी रूप से हुआ हो| इस संदर्भ में संचार निम्नलिखित तरीके से अपनी भूमिका निभाता है - जब संचार स्पष्ट होगा तभी वांक्षित सूचना सही एवं व्यवस्थित तरीके से संबंधित स्रोत तक पहुँच सकेगी| व्यक्ति/संगठन/सरकार सूचनाओं के माध्यम से जो बातें कहना चाहते होंगे वह तभी सामने वाले पक्ष को बेहतर तरीके से समझ में आएगी जब सूचनाओं के कहने का माध्यम अर्थात संचार पारदर्शी एवं स्पष्ट हो| सूचनाओं के साझाकरण को त्वरित बनाने हेतु तीव्र एवं सरल संचार प्रभावी भूमिका निभा सकता है| सूचनाओं को लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी बनाने में मनोरंजक एवं रोचक संचार अच्छा रोल अदा कर सकता है| सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है| यह सरकार तथा उसके सहायक निकायों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करता है| इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी नागरिक सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना का अनुरोध कर सकता है जिसका शीघ्रातिशीघ्र या 30 दिनों के भीतर उत्तर दिया जाना अनिवार्य है| लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे प्राधिकारी/निकाय/स्वसरकार के संस्थान से है जिसका गठन/स्थापना - संविधान के द्वारा या इसके अधीन; संसद/राज्य विधानमंडल के अधिनियम के द्वारा; सरकार के द्वारा जारी आदेश/अधिसूचना के द्वारा हो| इसमें निम्नांकित शामिल हैं- सरकार के स्वामित्व/नियंत्रण/वास्तविक रूप से वितपोषित निकाय; गैर-सरकारी संगठन जिसका वितपोषण प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से सरकार के निधि से| यह अधिनियम दो महत्वपूर्ण अधिकारियों - लोक सूचना अधिकारी(पीआईओ-PIO) तथा अपीलीय प्राधिकारियों(AAs) से संबंधित है जो इसके क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं पीआईओ किसी सामान्य व्यक्ति के लिए संपर्क के प्रथम बिंदु के रूप में कार्य करते हैं जो विभिन्न मुद्दों पर सूचना की मांग करने वाले आरटीआई आवेदकों को संबोधित करते हैं| यदि पीआईओ समय पर सूचना प्रदान करने में विफल रहते हैं या आवेदक प्रदान की गई सूचना से संतुष्ट नहीं है तो अपीलीय प्राधिकारियों के द्वारा मामले में हस्तक्षेप किया जाता है| अपीलीय प्राधिकारी इस मामले पर सुनवाई कर सकता है और निर्देश दे सकता है| इन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है| यदि आवेदक फिर भी असंतुष्ट हैं तो वह सूचना आयोग को सुनवाई के लिए दूसरी अपील हेतु आवेदन कर सकता है| यह आवेदन या तो केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के पास किए जा सकते हैं | केंद्रीय सूचना आयोग केंद्र सरकार के विभागों से तथा राज्य सूचना आयोग राज्य सरकार के विभागों से संबंधित है| केंद्रीय सूचना आयोग के पास राज्य सूचना आयोग के संदर्भ में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं हैऔर ना ही राज्य सूचना आयोग के आदेश के विरुद्ध केंद्रीय सूचना आयोग में शिकायत या अपील दायर की जा सकती है| सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ यदि सूचना के अधिकार अधिनियम को संबंधित हितधारकों और एजेंसियों के द्वारा इसकी भावना के प्रति सही उत्तरदायित्व से निर्वहन किया जाए तो यह भारतीय नौकरशाही में क्रांति ला सकता है| इसके अधिकांश कार्यों का निर्वहन संबंधित सरकारों तथा सूचना आयोगों को करना होता है परंतु साथ ही साथ विभिन्न एजेंसियों, मीडिया, सिविल सोसायटी आदि का भी योगदान रहता है| सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन संबंधी निम्न चुनौतियां विद्यमान है- लोगों में जनजागरूकता का अभाव - कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग के सर्वेक्षण के अनुसार केवल 15% लोग ही आरटीआई अधिनियम से परिचित हैं| इनमें भी वंचित वर्गों, महिलाओं, ग्रामीण जनसंख्या तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में जागरूकता का स्तर बेहद ही कम है| शिकायत दर्ज करने में बाधाएं एवं जटिलताएं - सूचना की मांग करने वाले लोगों के लिए यूजर गाइड की अनुपलब्धता ;जिससे आरटीआई आवेदन से संबंधित प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई फलस्वरूप उनके द्वारा सूचना के अधिकार का समुचित उपयोग करने में अवरोध ; ऑफलाइन आरटीआई आवेदन करने हेतु असुविधाजनक भुगतान चैनल लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन दर्ज करने में समुचित सहायता का अभाव - यह कार्यान्वयन संबंधी एक गंभीर चुनौती है क्योंकि हमारे देश में साक्षरता का स्तर काफी कम है| प्राधिकरणों का यह दायित्व होना चाहिए कि वे लोगों को उनके अधिकारों के प्राप्ति में सहायता प्रदान करें| आरटीआई आवेदन तथा पीआईओ के उत्तरों के लिए मानक प्रारूपों से संबंधित मुद्दे प्रदत सूचना से संबंधित मुद्दे दी गई सूचना की निम्न गुणवत्ता तथा अधिकांशतः अधूरी तथा गलत जानकारी सूचना के एकत्रण तथा संयोजन से जुड़े मुद्दे - संबंधित प्रशिक्षित पीआईओ तथा सक्षमकारी अवसंरचना( कंप्यूटर, स्केनर, इंटरनेट कनेक्टिविटी ,फोटोकॉपी) की अनुपलब्धता के कारण यह परिस्थिति और भी गंभीर हो जाती है| पीआईओ के प्रशिक्षण स्थानांतरण और प्रेरणा का निम्न स्तर अधिकांश पीआईओ और अपीलीय प्राधिकारियां सूचना के अधिकार अधिनियम के आवेदनों का उपयुक्त ढंग से उत्तर देने या सूचना प्रदान करने के तरीकों से अनभिज्ञ हैं | इसके साथ ही अपीलीय प्राधिकारियों के आदेशों की अनदेखी कर दी जाती है| राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर लंबित मामलों की अत्यधिक संख्या अर्थदंड/जुर्माना का आरोपण न होना अनुचित कार्यों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले या हत्या सूचनाओं के प्रकाशन में सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा की गई लापरवाही
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भारत में भूमि सुधार के लिए सरकार ने प्रयास किया परंतु इसमें वांछित सफलता प्राप्त नहीं हुई, इसके क्या कारण थे? इसे और प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दीजिए। (10 अंक / 150-200 शब्द) Government had tried for land reform in India but the desired success was not achieved, what were the reasons? Suggest to make it more effective. (10 marks / 150- 200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में भूमि सुधार के बारे में लिखिए पहले कथन को स्पष्ट करने के लिए सरकार के कुछ प्रयासों का उल्लेख कीजिए। असफलता के कारणों को बताइये। अंत में सुझाव दीजिए। भूमि सुधार का तात्पर्य कृषि भू-जोतों पर हदबंदी लागू करने करके अर्जित अधिशेष भूमि को छोटे किसानों और भूमिहीन खेतिहरों के मध्य उसे वितरित करने से है। विस्तृत रूप से इसमें स्वामित्व, संचालन, पट्टा, बिक्री और भूमि के उत्तराधिकार संबंधी विनियमन सम्मिलित हैं। भूमि सुधार के लिए सरकार के प्रयास: जमींदारी उन्मूलन अधिनियम काश्तकारी विनियमन भूमि हदबंदी खेतिहरों को भूमि प्रदान करना सहकारी कृषि अधिग्रहित भूमि के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करना गौरतलब है कि स्वतन्त्रता के पश्चात से ही भूमि सुधारों के लिए सरकार ने व्यापक प्रयास शुरू किया। हालांकि इन प्रयासों से उचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सका। पश्चिम बंगाल, केरल को छोड़कर शेष भारत में नकारात्मक स्थिति बनी रही। भूमि सुधारों की असफलता के पीछे कारणों को इस प्रकार समझ सकते हैं: सरकार द्वारा जो कानून, नियम बनाए गए उनमें कमियाँ विद्यमान थीं। इन कमियों का अनुचित लाभ उठाया गया। भूमि राज्य सूची का विषय होने के कारण क़ानूनों को प्रत्येक राज्य की आवश्यकता के अनुसार लागू नहीं किया जा सका। प्रत्येक राज्य के लिए एक प्रकार के नियम लागू करना सबसे बड़ी भूल थी। इन सुधारों के प्रति राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव दिखाई देता है। विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में कृषि हमेशा से ही प्राथमिकता वाला क्षेत्र नहीं रहा। व्यक्तिगत स्तर पर लोगों में अपने भूमि के प्रति लगाव ने समेकन में बाधा उत्पन्न किया।ऐसी धारणा की भूमि उसी की है जो उस पर खेती करता है ने नकारात्मक प्रभाव डाला। ब्रिटिश काल से चली आ रही जमींदारी प्रवृत्ति ने धारणाओं को बदलने में बाधा उत्पन्न की। पूर्वोत्तर राज्यों में जनजतिया क्षेत्रों में भूमि अभिलेखों और भूमि प्रशासन की व्यवस्था में व्याप्त अंतर भी भूमि सुधारों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करते हैं। सुझाव: भूमि पर वास्तविक रूप से खेती करने वाले काश्तकारों के लिए पर्याप्त रिन और पूंजी का प्रावधान करना। सरकारी विनियमन को अंततः चरणबद्ध रूप से समाप्त किया जाना चाहिए ताकि किसान कृषि उत्पादों को सीधे बाजार में बिक्री कर सके और बाजार शक्तियाँ कृषि उपज की कीमतों को नियंत्रित कर सकें। भूमि पट्टे और संविदात्मक कृषि को प्रोत्साहित करना। सभी राज्यों द्वारा प्रभावी रूप से वन अधिकार अधिनियम का कार्यान्वयन किया जाना। कृषि उद्देश्यों के लिए विशेष रूप से उपजाऊ कृषि भूमि का संरक्षण करना।
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##Question:भारत में भूमि सुधार के लिए सरकार ने प्रयास किया परंतु इसमें वांछित सफलता प्राप्त नहीं हुई, इसके क्या कारण थे? इसे और प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दीजिए। (10 अंक / 150-200 शब्द) Government had tried for land reform in India but the desired success was not achieved, what were the reasons? Suggest to make it more effective. (10 marks / 150- 200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण भूमिका में भूमि सुधार के बारे में लिखिए पहले कथन को स्पष्ट करने के लिए सरकार के कुछ प्रयासों का उल्लेख कीजिए। असफलता के कारणों को बताइये। अंत में सुझाव दीजिए। भूमि सुधार का तात्पर्य कृषि भू-जोतों पर हदबंदी लागू करने करके अर्जित अधिशेष भूमि को छोटे किसानों और भूमिहीन खेतिहरों के मध्य उसे वितरित करने से है। विस्तृत रूप से इसमें स्वामित्व, संचालन, पट्टा, बिक्री और भूमि के उत्तराधिकार संबंधी विनियमन सम्मिलित हैं। भूमि सुधार के लिए सरकार के प्रयास: जमींदारी उन्मूलन अधिनियम काश्तकारी विनियमन भूमि हदबंदी खेतिहरों को भूमि प्रदान करना सहकारी कृषि अधिग्रहित भूमि के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करना गौरतलब है कि स्वतन्त्रता के पश्चात से ही भूमि सुधारों के लिए सरकार ने व्यापक प्रयास शुरू किया। हालांकि इन प्रयासों से उचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सका। पश्चिम बंगाल, केरल को छोड़कर शेष भारत में नकारात्मक स्थिति बनी रही। भूमि सुधारों की असफलता के पीछे कारणों को इस प्रकार समझ सकते हैं: सरकार द्वारा जो कानून, नियम बनाए गए उनमें कमियाँ विद्यमान थीं। इन कमियों का अनुचित लाभ उठाया गया। भूमि राज्य सूची का विषय होने के कारण क़ानूनों को प्रत्येक राज्य की आवश्यकता के अनुसार लागू नहीं किया जा सका। प्रत्येक राज्य के लिए एक प्रकार के नियम लागू करना सबसे बड़ी भूल थी। इन सुधारों के प्रति राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव दिखाई देता है। विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में कृषि हमेशा से ही प्राथमिकता वाला क्षेत्र नहीं रहा। व्यक्तिगत स्तर पर लोगों में अपने भूमि के प्रति लगाव ने समेकन में बाधा उत्पन्न किया।ऐसी धारणा की भूमि उसी की है जो उस पर खेती करता है ने नकारात्मक प्रभाव डाला। ब्रिटिश काल से चली आ रही जमींदारी प्रवृत्ति ने धारणाओं को बदलने में बाधा उत्पन्न की। पूर्वोत्तर राज्यों में जनजतिया क्षेत्रों में भूमि अभिलेखों और भूमि प्रशासन की व्यवस्था में व्याप्त अंतर भी भूमि सुधारों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करते हैं। सुझाव: भूमि पर वास्तविक रूप से खेती करने वाले काश्तकारों के लिए पर्याप्त रिन और पूंजी का प्रावधान करना। सरकारी विनियमन को अंततः चरणबद्ध रूप से समाप्त किया जाना चाहिए ताकि किसान कृषि उत्पादों को सीधे बाजार में बिक्री कर सके और बाजार शक्तियाँ कृषि उपज की कीमतों को नियंत्रित कर सकें। भूमि पट्टे और संविदात्मक कृषि को प्रोत्साहित करना। सभी राज्यों द्वारा प्रभावी रूप से वन अधिकार अधिनियम का कार्यान्वयन किया जाना। कृषि उद्देश्यों के लिए विशेष रूप से उपजाऊ कृषि भूमि का संरक्षण करना।
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अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकारसे आप क्या समझते हैं? उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में अनुच्छेद 21 में हो रहे विस्तार पर चर्चा कीजिए ( 200 शब्द) What do you understand by the right tolife and personal liberty provided by Article 21?Discuss the expansion in Article 21 in light of the Supreme Court"s judgments.(200 words)
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एप्रोच :- भारतीय संविधान केअनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को बताते हुए शुरुआत कीजिये। उच्चतम न्यायालय के विभिन्ननिर्णयों को बताते हुएअनुच्छेद 21 में हो रहे विस्तार को स्पष्ट कीजिये। संतुलित व सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा विहित प्रक्रिया का कठोरता से और श्रद्धा पूर्वक पालन किया गया हो। उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णय - ए के गोपालन वाद - इसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था दी गयी कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध ही सुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के। अर्थात राज्य राज्य इस स्वतन्त्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है। मेनका गाँधी वाद - अनुच्छेद 19 और 21 जलरुद्ध विभाजन नहीं है ।इन दोनों को एक साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए जैसे भ्रमण पर रोक लगाना अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघनहै।विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया तभी स्वीकार की जाएगी, जब वह मूल रूप से और प्रक्रियात्मक रूप से उचित हो। मारूराम बनाम भारत संघ 1980 राष्ट्रपति व् राज्यपाल कीदयायाचिका की शक्ति की न्यायिक समीक्षा संभव केहर सिंह बनाम भारत संघ 1989 में स्थापित किया बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य 1980 अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही मृत्युदंड देने की व्यवस्था स्थापित। PUCL बनाम भारत संघ 1997 सूचना के अधिकार को मौलिक अधिकार का अंग माना। इसे अनुच्छेद 19 के अंतर्गत रखने का सुझाव दिया। जाहिरा हबीबुल्ला शेख बनाम गुजरात राज्य 2004 कानून के शासन और विधि की उचित प्रक्रिया को एक साथ लागू करने का सुझाव अरुमुगम बनाम तमिलनाडु राज्य 2011 खाप पंचायतों को कानून के शासन के विपरीत पाया आपराधिक न्याय प्रणाली व मौलिक अधिकार (सर्वोच्च न्यायालय के नवीन फैसलों के परिप्रेक्ष्य में ) के एस पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ 2017 निजता का अधिकार पैन कार्ड , सब्सिडी तथा आयकर रिटर्न भरने जैसे मामलों में आधार की अनिवार्यता बनी रहेगी।किन्तु बैंक में खाता खोलने एवं सिम लेने का मामले में स्वैच्छिक होगा नाज फाउंडेशन वाद 2013 -अनुच्छेद 21 में प्राप्त निजता, सम्मान के साथ जीने के अधिकार, चयन के अधिकार के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को वैध माना नवतेज सिंह जौहर वाद - उच्चतम न्यायालय ने आईपीसी की धारा 377 पर रोक लगा दी तथा समलैंगिकता को वैध माना। इस प्रकार मेनका गांधी वाद में विस्तृत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को और संवैधानिक मजबूती प्रदान किया। उपरोक्त चर्चा स्पष्ट है कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने अनेक नए अधिकारों को शामिल किया। इसमें प्रमुख रूप से निजता के अधिकार, चयन की स्वतन्त्रता का व्यापक महत्व है।हालांकि निजता के अधिकार के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय कई संभावनाओं को उत्पन्न करता है जिसमें जिसमें सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष विद्यमान हैं।इस प्रकार संविधान के व्याख्याता के रूप में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णय अनुच्छेद 21 को अत्यधिक प्रभावी रूप देते हैं।
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##Question:अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकारसे आप क्या समझते हैं? उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में अनुच्छेद 21 में हो रहे विस्तार पर चर्चा कीजिए ( 200 शब्द) What do you understand by the right tolife and personal liberty provided by Article 21?Discuss the expansion in Article 21 in light of the Supreme Court"s judgments.(200 words)##Answer:एप्रोच :- भारतीय संविधान केअनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को बताते हुए शुरुआत कीजिये। उच्चतम न्यायालय के विभिन्ननिर्णयों को बताते हुएअनुच्छेद 21 में हो रहे विस्तार को स्पष्ट कीजिये। संतुलित व सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा विहित प्रक्रिया का कठोरता से और श्रद्धा पूर्वक पालन किया गया हो। उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णय - ए के गोपालन वाद - इसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था दी गयी कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध ही सुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के। अर्थात राज्य राज्य इस स्वतन्त्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है। मेनका गाँधी वाद - अनुच्छेद 19 और 21 जलरुद्ध विभाजन नहीं है ।इन दोनों को एक साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए जैसे भ्रमण पर रोक लगाना अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघनहै।विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया तभी स्वीकार की जाएगी, जब वह मूल रूप से और प्रक्रियात्मक रूप से उचित हो। मारूराम बनाम भारत संघ 1980 राष्ट्रपति व् राज्यपाल कीदयायाचिका की शक्ति की न्यायिक समीक्षा संभव केहर सिंह बनाम भारत संघ 1989 में स्थापित किया बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य 1980 अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही मृत्युदंड देने की व्यवस्था स्थापित। PUCL बनाम भारत संघ 1997 सूचना के अधिकार को मौलिक अधिकार का अंग माना। इसे अनुच्छेद 19 के अंतर्गत रखने का सुझाव दिया। जाहिरा हबीबुल्ला शेख बनाम गुजरात राज्य 2004 कानून के शासन और विधि की उचित प्रक्रिया को एक साथ लागू करने का सुझाव अरुमुगम बनाम तमिलनाडु राज्य 2011 खाप पंचायतों को कानून के शासन के विपरीत पाया आपराधिक न्याय प्रणाली व मौलिक अधिकार (सर्वोच्च न्यायालय के नवीन फैसलों के परिप्रेक्ष्य में ) के एस पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ 2017 निजता का अधिकार पैन कार्ड , सब्सिडी तथा आयकर रिटर्न भरने जैसे मामलों में आधार की अनिवार्यता बनी रहेगी।किन्तु बैंक में खाता खोलने एवं सिम लेने का मामले में स्वैच्छिक होगा नाज फाउंडेशन वाद 2013 -अनुच्छेद 21 में प्राप्त निजता, सम्मान के साथ जीने के अधिकार, चयन के अधिकार के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को वैध माना नवतेज सिंह जौहर वाद - उच्चतम न्यायालय ने आईपीसी की धारा 377 पर रोक लगा दी तथा समलैंगिकता को वैध माना। इस प्रकार मेनका गांधी वाद में विस्तृत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को और संवैधानिक मजबूती प्रदान किया। उपरोक्त चर्चा स्पष्ट है कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने अनेक नए अधिकारों को शामिल किया। इसमें प्रमुख रूप से निजता के अधिकार, चयन की स्वतन्त्रता का व्यापक महत्व है।हालांकि निजता के अधिकार के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय कई संभावनाओं को उत्पन्न करता है जिसमें जिसमें सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष विद्यमान हैं।इस प्रकार संविधान के व्याख्याता के रूप में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णय अनुच्छेद 21 को अत्यधिक प्रभावी रूप देते हैं।
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संचार/सम्प्रेषण से आप क्या समझते हैं? सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| साथ ही, इस संदर्भ में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली तथाकार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये| (200 शब्द) What do youunderstand byCommunication?Describe the role of communication to make the exchange of information more effective. Also, in this context, discuss the functioning of the Right to Information Act and theChallenges related to its implementation. (200 words)
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एप्रोच- संचार/संप्रेषण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये| उत्तर- संचार/सम्प्रेषण का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों/ईकाईयों के बीच सूचनाओं/विचारों/भावनाओं के आदान-प्रदान से है| परंतु संचार का मौलिक भाव समझ या साझेदारी है| अतः संचार उद्देश्य उन्मुखी होता है| संचार हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरुरी है| संचार सांकेतिक होता है - मौखिक, अमौखिक, लिखित संचार|संचार प्रक्रिया में निम्नांकित तथ्यों को देखा जा सकता है-सेंडर, इनकोडिंग, संदेश, चैनल, प्राप्तकर्ता,डिकोडिंग,फीडबैक/प्रतिपुष्टि, नॉइज़(Noise)| सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका विभिन्न शासी निकायों, संगठनों और आम जनता के मध्य विभिन्न सूचनाओं तथा डाटा का साझाकरण बहुत आवश्यक है| सरकार/शासन द्वारा प्रत्येक दायित्वों जैसे- कानून एवं व्यवस्था; राजस्व प्रशासन, न्याय प्रशासन, कल्याण एवं विकास हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है तथा, सूचना का आदान-प्रदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मूल है| इसके माध्यम से सरकार को जनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है| शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु भी सूचना का आदन-प्रदान होना बहुत जरुरी है| यह शासन प्रणाली में जन भागीदारी को प्रोत्सहित करती है| सूचना का स्थानांतरण अंततः शक्ति का स्थानांतरण है जो कि शासन प्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करता है एवं जन सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती है| उपरोक्त सभी उद्देश्यों का मूललक्ष्य तभी प्राप्त हो सकेगा जब सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी रूप से हुआ हो| इस संदर्भ में संचार निम्नलिखित तरीके से अपनी भूमिका निभाता है - जब संचार स्पष्ट होगा तभी वांक्षित सूचना सही एवं व्यवस्थित तरीके से संबंधित स्रोत तक पहुँच सकेगी| व्यक्ति/संगठन/सरकार सूचनाओं के माध्यम से जो बातें कहना चाहते होंगे वह तभी सामने वाले पक्ष को बेहतर तरीके से समझ में आएगी जब सूचनाओं के कहने का माध्यम अर्थात संचार पारदर्शी एवं स्पष्ट हो| सूचनाओं के साझाकरण को त्वरित बनाने हेतु तीव्र एवं सरल संचार प्रभावी भूमिका निभा सकता है| सूचनाओं को लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी बनाने में मनोरंजक एवं रोचक संचार अच्छा रोल अदा कर सकता है| सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है| यह सरकार तथा उसके सहायक निकायों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करता है| इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी नागरिक सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना का अनुरोध कर सकता है जिसका शीघ्रातिशीघ्र या 30 दिनों के भीतर उत्तर दिया जाना अनिवार्य है|लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे प्राधिकारी/निकाय/स्वसरकार के संस्थान से है जिसका गठन/स्थापना - संविधान के द्वारा या इसके अधीन; संसद/राज्य विधानमंडल के अधिनियम के द्वारा; सरकार के द्वारा जारी आदेश/अधिसूचना के द्वारा हो|इसमें निम्नांकित शामिल हैं- सरकार के स्वामित्व/नियंत्रण/वास्तविक रूप से वितपोषित निकाय; गैर-सरकारी संगठन जिसका वितपोषण प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से सरकार के निधि से| यह अधिनियम दो महत्वपूर्ण अधिकारियों - लोक सूचना अधिकारी(पीआईओ-PIO) तथा अपीलीय प्राधिकारियों(AAs) से संबंधित है जो इसके क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं पीआईओ किसी सामान्य व्यक्ति के लिए संपर्क के प्रथम बिंदु के रूप में कार्य करते हैं जो विभिन्न मुद्दों पर सूचना की मांग करने वाले आरटीआई आवेदकों को संबोधित करते हैं| यदि पीआईओ समय पर सूचना प्रदान करने में विफल रहते हैं या आवेदक प्रदान की गई सूचना से संतुष्ट नहीं है तो अपीलीय प्राधिकारियों के द्वारा मामले में हस्तक्षेप किया जाता है| अपीलीय प्राधिकारी इस मामले पर सुनवाई कर सकता है और निर्देश दे सकता है| इन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है| यदि आवेदक फिर भी असंतुष्ट हैं तो वह सूचना आयोग को सुनवाई के लिए दूसरी अपीलहेतु आवेदन कर सकता है| यह आवेदन या तो केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के पास किए जा सकते हैं |केंद्रीय सूचना आयोग केंद्र सरकार के विभागों से तथा राज्य सूचना आयोग राज्य सरकार के विभागों से संबंधित है| केंद्रीय सूचना आयोग के पास राज्य सूचना आयोग के संदर्भ में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं हैऔर ना ही राज्य सूचना आयोग के आदेश के विरुद्ध केंद्रीय सूचना आयोग में शिकायत या अपील दायर की जा सकती है| सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ यदि सूचना के अधिकार अधिनियम को संबंधित हितधारकों और एजेंसियों के द्वारा इसकी भावना के प्रति सही उत्तरदायित्व से निर्वहन किया जाए तो यह भारतीय नौकरशाही में क्रांति ला सकता है| इसके अधिकांश कार्यों का निर्वहन संबंधित सरकारों तथा सूचना आयोगों को करना होता है परंतु साथ ही साथ विभिन्न एजेंसियों, मीडिया, सिविल सोसायटी आदि का भी योगदान रहता है| सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन संबंधी निम्न चुनौतियां विद्यमान है- लोगों में जनजागरूकता का अभाव - कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग के सर्वेक्षण के अनुसार केवल 15% लोग ही आरटीआई अधिनियम से परिचित हैं| इनमें भी वंचित वर्गों, महिलाओं, ग्रामीण जनसंख्या तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में जागरूकता का स्तर बेहद ही कम है| शिकायत दर्ज करने में बाधाएं एवं जटिलताएं - सूचना की मांग करने वाले लोगों के लिए यूजर गाइड की अनुपलब्धता ;जिससे आरटीआई आवेदन से संबंधित प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई फलस्वरूप उनके द्वारा सूचना के अधिकार का समुचित उपयोग करने में अवरोध ; ऑफलाइन आरटीआई आवेदन करने हेतु असुविधाजनक भुगतान चैनल लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन दर्ज करने में समुचित सहायता का अभाव - यह कार्यान्वयन संबंधी एक गंभीर चुनौती है क्योंकि हमारे देश में साक्षरता का स्तर काफी कम है| प्राधिकरणों का यह दायित्व होना चाहिए कि वे लोगों को उनके अधिकारों के प्राप्ति में सहायता प्रदान करें| आरटीआई आवेदन तथा पीआईओ के उत्तरों के लिए मानक प्रारूपों से संबंधित मुद्दे प्रदत सूचना से संबंधित मुद्दे दी गई सूचना की निम्न गुणवत्ता तथा अधिकांशतः अधूरी तथा गलत जानकारी सूचना के एकत्रण तथा संयोजन से जुड़े मुद्दे - संबंधित प्रशिक्षित पीआईओ तथा सक्षमकारी अवसंरचना( कंप्यूटर, स्केनर, इंटरनेट कनेक्टिविटी ,फोटोकॉपी) की अनुपलब्धता के कारण यह परिस्थिति और भी गंभीर हो जाती है| पीआईओ के प्रशिक्षण स्थानांतरण और प्रेरणा का निम्न स्तर अधिकांश पीआईओ और अपीलीय प्राधिकारियां सूचना के अधिकार अधिनियम के आवेदनों का उपयुक्त ढंग से उत्तर देने या सूचना प्रदान करने के तरीकों से अनभिज्ञ हैं | इसके साथ ही अपीलीय प्राधिकारियों के आदेशों की अनदेखी कर दी जाती है| राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर लंबित मामलों की अत्यधिक संख्या अर्थदंड/जुर्माना का आरोपण न होना अनुचित कार्यों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले या हत्या सूचनाओं के प्रकाशन में सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा की गई लापरवाही
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##Question:संचार/सम्प्रेषण से आप क्या समझते हैं? सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| साथ ही, इस संदर्भ में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली तथाकार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये| (200 शब्द) What do youunderstand byCommunication?Describe the role of communication to make the exchange of information more effective. Also, in this context, discuss the functioning of the Right to Information Act and theChallenges related to its implementation. (200 words)##Answer:एप्रोच- संचार/संप्रेषण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में, सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये| उत्तर- संचार/सम्प्रेषण का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों/ईकाईयों के बीच सूचनाओं/विचारों/भावनाओं के आदान-प्रदान से है| परंतु संचार का मौलिक भाव समझ या साझेदारी है| अतः संचार उद्देश्य उन्मुखी होता है| संचार हेतु कम से कम दो व्यक्तियों का होना जरुरी है| संचार सांकेतिक होता है - मौखिक, अमौखिक, लिखित संचार|संचार प्रक्रिया में निम्नांकित तथ्यों को देखा जा सकता है-सेंडर, इनकोडिंग, संदेश, चैनल, प्राप्तकर्ता,डिकोडिंग,फीडबैक/प्रतिपुष्टि, नॉइज़(Noise)| सूचनाओं के आदान-प्रदान को अधिक प्रभावी बनाने हेतु संचार की भूमिका विभिन्न शासी निकायों, संगठनों और आम जनता के मध्य विभिन्न सूचनाओं तथा डाटा का साझाकरण बहुत आवश्यक है| सरकार/शासन द्वारा प्रत्येक दायित्वों जैसे- कानून एवं व्यवस्था; राजस्व प्रशासन, न्याय प्रशासन, कल्याण एवं विकास हेतु सूचनाओं का होना अतिआवश्यक है तथा, सूचना का आदान-प्रदान प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मूल है| इसके माध्यम से सरकार को जनअपेक्षाओं की जानकारी प्राप्त होती है| शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिताको सुनिश्चित करने हेतु भी सूचना का आदन-प्रदान होना बहुत जरुरी है| यह शासन प्रणाली में जन भागीदारी को प्रोत्सहित करती है| सूचना का स्थानांतरण अंततः शक्ति का स्थानांतरण है जो कि शासन प्रणाली को अधिक विकेंद्रीकृत करता है एवं जन सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करती है| उपरोक्त सभी उद्देश्यों का मूललक्ष्य तभी प्राप्त हो सकेगा जब सूचनाओं का आदान-प्रदान प्रभावी रूप से हुआ हो| इस संदर्भ में संचार निम्नलिखित तरीके से अपनी भूमिका निभाता है - जब संचार स्पष्ट होगा तभी वांक्षित सूचना सही एवं व्यवस्थित तरीके से संबंधित स्रोत तक पहुँच सकेगी| व्यक्ति/संगठन/सरकार सूचनाओं के माध्यम से जो बातें कहना चाहते होंगे वह तभी सामने वाले पक्ष को बेहतर तरीके से समझ में आएगी जब सूचनाओं के कहने का माध्यम अर्थात संचार पारदर्शी एवं स्पष्ट हो| सूचनाओं के साझाकरण को त्वरित बनाने हेतु तीव्र एवं सरल संचार प्रभावी भूमिका निभा सकता है| सूचनाओं को लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी बनाने में मनोरंजक एवं रोचक संचार अच्छा रोल अदा कर सकता है| सूचना के अधिकार अधिनियम की कार्यप्रणाली सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है| यह सरकार तथा उसके सहायक निकायों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करता है| इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कोई भी नागरिक सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना का अनुरोध कर सकता है जिसका शीघ्रातिशीघ्र या 30 दिनों के भीतर उत्तर दिया जाना अनिवार्य है|लोक प्राधिकारी का आशय ऐसे प्राधिकारी/निकाय/स्वसरकार के संस्थान से है जिसका गठन/स्थापना - संविधान के द्वारा या इसके अधीन; संसद/राज्य विधानमंडल के अधिनियम के द्वारा; सरकार के द्वारा जारी आदेश/अधिसूचना के द्वारा हो|इसमें निम्नांकित शामिल हैं- सरकार के स्वामित्व/नियंत्रण/वास्तविक रूप से वितपोषित निकाय; गैर-सरकारी संगठन जिसका वितपोषण प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से सरकार के निधि से| यह अधिनियम दो महत्वपूर्ण अधिकारियों - लोक सूचना अधिकारी(पीआईओ-PIO) तथा अपीलीय प्राधिकारियों(AAs) से संबंधित है जो इसके क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं पीआईओ किसी सामान्य व्यक्ति के लिए संपर्क के प्रथम बिंदु के रूप में कार्य करते हैं जो विभिन्न मुद्दों पर सूचना की मांग करने वाले आरटीआई आवेदकों को संबोधित करते हैं| यदि पीआईओ समय पर सूचना प्रदान करने में विफल रहते हैं या आवेदक प्रदान की गई सूचना से संतुष्ट नहीं है तो अपीलीय प्राधिकारियों के द्वारा मामले में हस्तक्षेप किया जाता है| अपीलीय प्राधिकारी इस मामले पर सुनवाई कर सकता है और निर्देश दे सकता है| इन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है| यदि आवेदक फिर भी असंतुष्ट हैं तो वह सूचना आयोग को सुनवाई के लिए दूसरी अपीलहेतु आवेदन कर सकता है| यह आवेदन या तो केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के पास किए जा सकते हैं |केंद्रीय सूचना आयोग केंद्र सरकार के विभागों से तथा राज्य सूचना आयोग राज्य सरकार के विभागों से संबंधित है| केंद्रीय सूचना आयोग के पास राज्य सूचना आयोग के संदर्भ में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं हैऔर ना ही राज्य सूचना आयोग के आदेश के विरुद्ध केंद्रीय सूचना आयोग में शिकायत या अपील दायर की जा सकती है| सूचना के अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ यदि सूचना के अधिकार अधिनियम को संबंधित हितधारकों और एजेंसियों के द्वारा इसकी भावना के प्रति सही उत्तरदायित्व से निर्वहन किया जाए तो यह भारतीय नौकरशाही में क्रांति ला सकता है| इसके अधिकांश कार्यों का निर्वहन संबंधित सरकारों तथा सूचना आयोगों को करना होता है परंतु साथ ही साथ विभिन्न एजेंसियों, मीडिया, सिविल सोसायटी आदि का भी योगदान रहता है| सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन संबंधी निम्न चुनौतियां विद्यमान है- लोगों में जनजागरूकता का अभाव - कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग के सर्वेक्षण के अनुसार केवल 15% लोग ही आरटीआई अधिनियम से परिचित हैं| इनमें भी वंचित वर्गों, महिलाओं, ग्रामीण जनसंख्या तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में जागरूकता का स्तर बेहद ही कम है| शिकायत दर्ज करने में बाधाएं एवं जटिलताएं - सूचना की मांग करने वाले लोगों के लिए यूजर गाइड की अनुपलब्धता ;जिससे आरटीआई आवेदन से संबंधित प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने में कठिनाई फलस्वरूप उनके द्वारा सूचना के अधिकार का समुचित उपयोग करने में अवरोध ; ऑफलाइन आरटीआई आवेदन करने हेतु असुविधाजनक भुगतान चैनल लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदन दर्ज करने में समुचित सहायता का अभाव - यह कार्यान्वयन संबंधी एक गंभीर चुनौती है क्योंकि हमारे देश में साक्षरता का स्तर काफी कम है| प्राधिकरणों का यह दायित्व होना चाहिए कि वे लोगों को उनके अधिकारों के प्राप्ति में सहायता प्रदान करें| आरटीआई आवेदन तथा पीआईओ के उत्तरों के लिए मानक प्रारूपों से संबंधित मुद्दे प्रदत सूचना से संबंधित मुद्दे दी गई सूचना की निम्न गुणवत्ता तथा अधिकांशतः अधूरी तथा गलत जानकारी सूचना के एकत्रण तथा संयोजन से जुड़े मुद्दे - संबंधित प्रशिक्षित पीआईओ तथा सक्षमकारी अवसंरचना( कंप्यूटर, स्केनर, इंटरनेट कनेक्टिविटी ,फोटोकॉपी) की अनुपलब्धता के कारण यह परिस्थिति और भी गंभीर हो जाती है| पीआईओ के प्रशिक्षण स्थानांतरण और प्रेरणा का निम्न स्तर अधिकांश पीआईओ और अपीलीय प्राधिकारियां सूचना के अधिकार अधिनियम के आवेदनों का उपयुक्त ढंग से उत्तर देने या सूचना प्रदान करने के तरीकों से अनभिज्ञ हैं | इसके साथ ही अपीलीय प्राधिकारियों के आदेशों की अनदेखी कर दी जाती है| राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर लंबित मामलों की अत्यधिक संख्या अर्थदंड/जुर्माना का आरोपण न होना अनुचित कार्यों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले या हत्या सूचनाओं के प्रकाशन में सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा की गई लापरवाही
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"उत्तर पूर्वी भारत का एकीकरण, राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण चुनौती बना।" कथन का मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) "Integration of North Eastern India made a significant challenge towards national integration." Evaluate the statement. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में उत्तरीपूर्वी भारत की जनजातीय आबादी और वहां की परिस्थितयों का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में उत्तरी पूर्वी भारत के एकीकरण की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए समझाइए कि कैसे यह राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण चुनौती बना। अंत में संक्षेप मेंनिष्कर्ष लिखिए। उत्तर:- जनजातीय आबादी के वितरण को दो भागों में विभाजित कर केदेख सकते है- प्रथम उत्तरपूर्वी भारत तथा शेष भारत।शेष भारत की जनजातीय आबादी बीसवीं सदी में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जुड़ती गई। राष्ट्रीय आंदोलन से पूर्व ही अंग्रेजों के शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध यहाँ कई विद्रोह हुए। राष्ट्रीय आंदोलनके साथ इन क्षेत्रों में कोई प्रभावी नेतृत्व उभर कर सामने नहीं आया। (अपवाद है झारखण्ड में जयपाल सिंह) लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में इनके मुद्दों को भी महत्व दिया गया। आज़ादी से पूर्व या पश्चात इन क्षेत्रों में कोई अलगाववादी स्वर नहीं उठे लेकिन पांचवी अनुसूची,लोकसभा विधानसभा में आरक्षण, प्रशासनिक सेवाओं में आरक्षण इत्यादि उपायों के द्वारा इन्हे स्वाययता प्रदान की गई और इन्हे अपनी संस्कृति के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी। उत्तरी पूर्वी भारत केराष्ट्रीय एकीकरण की पृष्ठभूमि एवं चुनौतियां:- शेष भारत के विपरीत उत्तर पूर्वी भारत की परिस्थितियां अधिक जटिल थी। 1830 तक उत्तर पूर्वी भारत पर अंग्रेजों का बहुत हद तक नियंत्रण स्थापित हो चूका था। प्रथम बर्मा युद्ध के पश्चात बर्मा के साथ सीमाओं को लेकर भी सहमति बन चुकी थी। 1870 के दशक में प्रशासन के दृष्टिकोण से उत्तर पूर्वी भारत में तीन प्रकार की व्यवस्था देखी जा सकती है। एक तरफ मणिपुर त्रिपुरा और सिक्किम जैसी रियासतें जो अंग्रेजों की अधीनता को स्वीकारकरती थी तो दूसरी तरफ अरुणाचल, नागालैंड,मिज़ोरम इत्यादि क्षेत्रों पर केंद्र सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण तथा तीसरी तरफ बंगाल के साथ असम का मैदानी क्षेत्र था जहाँ केंद्रीय नियंत्रण अधिक प्रभावशाली था वहां ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का प्रसार हुआ। यहाँ आधुनिक शिक्षा का प्रसार एवं धर्मांतरण भी हुआ । साथ ही इस क्षेत्र में संस्कृति की रक्षा के नाम पर लोगों के आवागमन को प्रतिबंधित किया गया तथा बाहरी लोगों द्वाराभूमि की खरीद बिक्री पर भी रोक लगाई गई। विभिन्न कारणों से ब्रिटिश शासनकाल में मैदानी एवं पर्वतीय लोगों के बीच दूरियां बढ़ती गई तथा असम के मैदानी इलाकों में भी असमियां या बंगला लोगों के बीच दूरियां बढ़ती गई। (इसके सांस्कृतिक कारण के साथ साथ आर्थिक कारण भी थे ) पर्वतीय क्षेत्रों में कठोर सरकारी नियंत्रण के कारण राष्ट्रीय चेतना का प्रसार अपवाद स्वरूप ही हो पाया। फलतः मैदानी इलाकों के साथ साथ शेष भारत से इसका जुड़ाव नहीं हो पाया। आज़ादी से पूर्व नागालैंड मिजोरम इत्यादि क्षेत्रों में अलगाववादी स्वर भी उठने लगे थे। अतः उपरोक्त पृष्ठभूमि में उत्तरपूर्वी भारत का एकीकरण, राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण चुनौती बना।स्वंत्रता के पश्चात उत्तर पूर्वी भारत के जिन क्षेत्रो पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण था उन क्षेत्रों का हस्तांतरण भारत सरकार को किया गया। 1947 में नेफा के रूप में अरुणाचल प्रदेश के प्रशासन का संचालनकेंद्रीय सरकार के द्वारा किया गया। शेष उत्तर पूर्वी राज्यों को असम के अधीन रखा गया। आज़ादी के पश्चात नेहरूजी ने समस्त जनजातीय क्षेत्र को लेकर कुछ नीतियों को सामने रखा तथा अलगाववादी स्वर मुखर हुआ लेकिनभारत सरकार की स्पष्ट नीति थी कि अलगाववाद के साथ कठोर नीति अपनाई जाये। बाद में अन्य आंदोलनों के संदर्भ में असम राज्य पुनर्गठन किया गया।1963 में नागालैंड का गठन, 1972 में मेघालय त्रिपुरा एवं मणिपुर को राज्य का दर्जा तथा 1987 में अरूणाचल एवं मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया। इस प्रकार उत्तरी पूर्वी भारत का एकीकरण किया गया।
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##Question:"उत्तर पूर्वी भारत का एकीकरण, राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण चुनौती बना।" कथन का मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) "Integration of North Eastern India made a significant challenge towards national integration." Evaluate the statement. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में उत्तरीपूर्वी भारत की जनजातीय आबादी और वहां की परिस्थितयों का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में उत्तरी पूर्वी भारत के एकीकरण की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए समझाइए कि कैसे यह राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण चुनौती बना। अंत में संक्षेप मेंनिष्कर्ष लिखिए। उत्तर:- जनजातीय आबादी के वितरण को दो भागों में विभाजित कर केदेख सकते है- प्रथम उत्तरपूर्वी भारत तथा शेष भारत।शेष भारत की जनजातीय आबादी बीसवीं सदी में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जुड़ती गई। राष्ट्रीय आंदोलन से पूर्व ही अंग्रेजों के शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध यहाँ कई विद्रोह हुए। राष्ट्रीय आंदोलनके साथ इन क्षेत्रों में कोई प्रभावी नेतृत्व उभर कर सामने नहीं आया। (अपवाद है झारखण्ड में जयपाल सिंह) लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में इनके मुद्दों को भी महत्व दिया गया। आज़ादी से पूर्व या पश्चात इन क्षेत्रों में कोई अलगाववादी स्वर नहीं उठे लेकिन पांचवी अनुसूची,लोकसभा विधानसभा में आरक्षण, प्रशासनिक सेवाओं में आरक्षण इत्यादि उपायों के द्वारा इन्हे स्वाययता प्रदान की गई और इन्हे अपनी संस्कृति के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी। उत्तरी पूर्वी भारत केराष्ट्रीय एकीकरण की पृष्ठभूमि एवं चुनौतियां:- शेष भारत के विपरीत उत्तर पूर्वी भारत की परिस्थितियां अधिक जटिल थी। 1830 तक उत्तर पूर्वी भारत पर अंग्रेजों का बहुत हद तक नियंत्रण स्थापित हो चूका था। प्रथम बर्मा युद्ध के पश्चात बर्मा के साथ सीमाओं को लेकर भी सहमति बन चुकी थी। 1870 के दशक में प्रशासन के दृष्टिकोण से उत्तर पूर्वी भारत में तीन प्रकार की व्यवस्था देखी जा सकती है। एक तरफ मणिपुर त्रिपुरा और सिक्किम जैसी रियासतें जो अंग्रेजों की अधीनता को स्वीकारकरती थी तो दूसरी तरफ अरुणाचल, नागालैंड,मिज़ोरम इत्यादि क्षेत्रों पर केंद्र सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण तथा तीसरी तरफ बंगाल के साथ असम का मैदानी क्षेत्र था जहाँ केंद्रीय नियंत्रण अधिक प्रभावशाली था वहां ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का प्रसार हुआ। यहाँ आधुनिक शिक्षा का प्रसार एवं धर्मांतरण भी हुआ । साथ ही इस क्षेत्र में संस्कृति की रक्षा के नाम पर लोगों के आवागमन को प्रतिबंधित किया गया तथा बाहरी लोगों द्वाराभूमि की खरीद बिक्री पर भी रोक लगाई गई। विभिन्न कारणों से ब्रिटिश शासनकाल में मैदानी एवं पर्वतीय लोगों के बीच दूरियां बढ़ती गई तथा असम के मैदानी इलाकों में भी असमियां या बंगला लोगों के बीच दूरियां बढ़ती गई। (इसके सांस्कृतिक कारण के साथ साथ आर्थिक कारण भी थे ) पर्वतीय क्षेत्रों में कठोर सरकारी नियंत्रण के कारण राष्ट्रीय चेतना का प्रसार अपवाद स्वरूप ही हो पाया। फलतः मैदानी इलाकों के साथ साथ शेष भारत से इसका जुड़ाव नहीं हो पाया। आज़ादी से पूर्व नागालैंड मिजोरम इत्यादि क्षेत्रों में अलगाववादी स्वर भी उठने लगे थे। अतः उपरोक्त पृष्ठभूमि में उत्तरपूर्वी भारत का एकीकरण, राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण चुनौती बना।स्वंत्रता के पश्चात उत्तर पूर्वी भारत के जिन क्षेत्रो पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण था उन क्षेत्रों का हस्तांतरण भारत सरकार को किया गया। 1947 में नेफा के रूप में अरुणाचल प्रदेश के प्रशासन का संचालनकेंद्रीय सरकार के द्वारा किया गया। शेष उत्तर पूर्वी राज्यों को असम के अधीन रखा गया। आज़ादी के पश्चात नेहरूजी ने समस्त जनजातीय क्षेत्र को लेकर कुछ नीतियों को सामने रखा तथा अलगाववादी स्वर मुखर हुआ लेकिनभारत सरकार की स्पष्ट नीति थी कि अलगाववाद के साथ कठोर नीति अपनाई जाये। बाद में अन्य आंदोलनों के संदर्भ में असम राज्य पुनर्गठन किया गया।1963 में नागालैंड का गठन, 1972 में मेघालय त्रिपुरा एवं मणिपुर को राज्य का दर्जा तथा 1987 में अरूणाचल एवं मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया। इस प्रकार उत्तरी पूर्वी भारत का एकीकरण किया गया।
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भारत से ब्रिटिश शासन का अंत एक बहुत बड़ी कीमत के साथ हुआ था | इस संदर्भ में, तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये | साथ ही, भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| (150 200 शब्द/10 अंक) The end of British rule in India came With a very high cost. In this context, Mention the emerging problems and challenges faced by newly independent India. Also, Describe the results of the Partition of India. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में,भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का अंत कीजिये| उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूद मुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ| नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँ भी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माण एक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ; जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास सीमा का निर्धारण कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण भूमि सुधार के माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण करने की चुनौती गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण भारत के विभाजन से उत्पन परिणाम राजनीतिक परिणाम साम्प्रदायिकता का विकास पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध प्रशासन,सेना आदि के बँटवारे को लेकर विवाद सीमा-निर्धारण तथा कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद सामाजिक परिणाम शरणार्थी संकट बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा अमानवीय व्यवहार धार्मिक टकराव तथा धार्मिक संरचना को देखकर आवागमन तथा निवास इत्यादि के निर्णय लोगों पर मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव जान-माल की व्यापक क्षति तथा संपति का नुकसान आर्थिक परिणाम विभाजन के कारण राजनीतिक अस्थिरता तथा अव्यवस्था की स्थिति ने तात्कालिक तौर पर समकालिक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया; शरणार्थियों के पुनर्वास की लागत; कृषि को भी व्यापक नुकसान क्योंकि सिंचाई से युक्त एक बड़ा क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण में; जूट उद्योगों पर दुष्प्रभाव विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया|
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##Question:भारत से ब्रिटिश शासन का अंत एक बहुत बड़ी कीमत के साथ हुआ था | इस संदर्भ में, तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये | साथ ही, भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| (150 200 शब्द/10 अंक) The end of British rule in India came With a very high cost. In this context, Mention the emerging problems and challenges faced by newly independent India. Also, Describe the results of the Partition of India. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अगले भाग में,भारत के विभाजन से उत्पन परिणामों का वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का अंत कीजिये| उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप 15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूद मुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ| नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँ भी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माण एक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ; जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास सीमा का निर्धारण कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण भूमि सुधार के माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण करने की चुनौती गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण भारत के विभाजन से उत्पन परिणाम राजनीतिक परिणाम साम्प्रदायिकता का विकास पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध प्रशासन,सेना आदि के बँटवारे को लेकर विवाद सीमा-निर्धारण तथा कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद सामाजिक परिणाम शरणार्थी संकट बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा अमानवीय व्यवहार धार्मिक टकराव तथा धार्मिक संरचना को देखकर आवागमन तथा निवास इत्यादि के निर्णय लोगों पर मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव जान-माल की व्यापक क्षति तथा संपति का नुकसान आर्थिक परिणाम विभाजन के कारण राजनीतिक अस्थिरता तथा अव्यवस्था की स्थिति ने तात्कालिक तौर पर समकालिक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया; शरणार्थियों के पुनर्वास की लागत; कृषि को भी व्यापक नुकसान क्योंकि सिंचाई से युक्त एक बड़ा क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण में; जूट उद्योगों पर दुष्प्रभाव विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया|
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परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अंतर्गत शामिल तत्वों को सुझाइए | इस सन्दर्भ में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा कीजिये ,साथ ही इसके पक्ष व विपक्ष में दिए गए तर्कों की भी चर्चा कीजिये (150-200 शब्द , अंक-10 ) Suggest elements included under the NPT. In this context, discuss the principles of India"s nuclear theory and also discuss the given arugument in favour and opposition of it. ( 150-200 Words , Marks - 10 )
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत परमाणु अप्रसार संधि के बारे में संछिप्त में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात एनपीटी में शामिल तत्वों को भी बताइए | अंत में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा करते हुए इसके पक्ष- विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- परमाणु अप्रसार संधि एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संधि है | इसका उद्देश्य परमाणु हथियार और हथियार प्रौद्योगिकी के प्रसार को रोकना, परमाणु निरस्त्रीकरण , नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण ढंग से उपयोग है | परमाणु अप्रसार की संधि 1968 में दुनिया के समक्ष हस्ताक्षर के लिए लायी गयी एवं 1970 से यह प्रभावी हुई | वर्तमान में पांच परमाणु हथियार संपन्न देश - अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन और 191 देश इसके हस्ताक्षरकर्ता देश हैं | भारत इस संधि का भाग नहीं है | NPT के तीन स्तम्भ हैं - परमाणु अप्रसार संधि- क्षैतिज और उर्ध्वाधर - NPT की संधि इस क्षैतिज प्रसार को रोकने के लिए TIME LINE की बात करती है किन्तु उर्ध्वाधर प्रसार की बात नहीं करती | निःशस्त्रीकरण -NPT पूर्ण रूप से निःशस्त्रीकरण की बात नहीं करता है| नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग भारत का परमाणु सिद्धांत - भारत एक जिम्मेदार परमाणु संपन्न राष्ट्र है | भारत ने NPT को भेदभावपूर्ण संधि बताते इसमें सुधार की मांग की है | क्योंकि यह संधि परमाणु संपन्न एवं गैर परमाणु हथियार वाले देशों के बीच , परमाणु हथियारों से सम्बंधित असमानता को जन्म देती है | वर्ष 2003 में में भारत ने अपने परमाणु सिद्धांत को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जो निम्नवत है - न्यूनतम निवारक क्षमता - भारत अपनी सुरक्षा के लिए जितनी परमाणु हथियारों की आवश्यकता होगी , उतना ही हथियार रखेगा एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे हथियारों की होड़ में शामिल नहीं होगा | नो फर्स्ट यूज़ - भारत कभी भी किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं करेगा , परन्तु परमाणु हथियारों का प्रयोग यदि कोई देश उसके ऊपर करता है तो वह भी हार्ड पॉवर का प्रयोग करने से नहीं चूकेगा | गैर परमाणु हथियार वाले देशों के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं किया जायेगा | परमाणु हमले को न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी के माध्यम से नागरिक राजनीतिक नेतृत्व द्वारा ही अधिकृत किया जाएगा | भारत पर बड़े जैविक या रासायनिक हमले की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग किया जा सकता है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधित कुछचिंताएंदिखाई पड़ती हैं जैसे - पहले हमले को स्वीकृति देना जिससे देश संकट में आ सकता है | पहले हमले के विरुद्ध बचाव के लिए महंगी व विस्तृत बैलिस्टिक मिसाइल डिफेन्स प्रणाली का प्रयोग करना, जो अर्थव्यवस्था पर भर डालेगा | छोटे परमाणु हथियारों के विरुद्ध क्या यही नीति अपनाई जा सकती है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधितपक्ष में तर्कइस प्रकार है - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में उभरा और उसके अनेक लाभ हुए , जैसे- आर्थिक प्रतिबंधों का हटना, असैनिक परमाणु सहयोग आदि | शत्रु पर दबाव को बढ़ाने के लिए यह नीति उपयोगी है | इस नीति से परमाणु प्रसार पर रोक लगेगी एवं सेना या मिलिट्री या न्यूक्लियर हथियारों पर खर्च कम होगा | भारत की परमाणु नीति भारत के सुरक्षा हितों को सुनिश्चित करती है | भारत को इस नीति पर कायम रहते हुए , पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को ओर बढ़ना चाहिए एवं विश्व का शांति गुरु बनकर विश्व को नेत्रित्व प्रदान करना चाहिए |
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##Question:परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अंतर्गत शामिल तत्वों को सुझाइए | इस सन्दर्भ में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा कीजिये ,साथ ही इसके पक्ष व विपक्ष में दिए गए तर्कों की भी चर्चा कीजिये (150-200 शब्द , अंक-10 ) Suggest elements included under the NPT. In this context, discuss the principles of India"s nuclear theory and also discuss the given arugument in favour and opposition of it. ( 150-200 Words , Marks - 10 )##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत परमाणु अप्रसार संधि के बारे में संछिप्त में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात एनपीटी में शामिल तत्वों को भी बताइए | अंत में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा करते हुए इसके पक्ष- विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- परमाणु अप्रसार संधि एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संधि है | इसका उद्देश्य परमाणु हथियार और हथियार प्रौद्योगिकी के प्रसार को रोकना, परमाणु निरस्त्रीकरण , नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण ढंग से उपयोग है | परमाणु अप्रसार की संधि 1968 में दुनिया के समक्ष हस्ताक्षर के लिए लायी गयी एवं 1970 से यह प्रभावी हुई | वर्तमान में पांच परमाणु हथियार संपन्न देश - अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन और 191 देश इसके हस्ताक्षरकर्ता देश हैं | भारत इस संधि का भाग नहीं है | NPT के तीन स्तम्भ हैं - परमाणु अप्रसार संधि- क्षैतिज और उर्ध्वाधर - NPT की संधि इस क्षैतिज प्रसार को रोकने के लिए TIME LINE की बात करती है किन्तु उर्ध्वाधर प्रसार की बात नहीं करती | निःशस्त्रीकरण -NPT पूर्ण रूप से निःशस्त्रीकरण की बात नहीं करता है| नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग भारत का परमाणु सिद्धांत - भारत एक जिम्मेदार परमाणु संपन्न राष्ट्र है | भारत ने NPT को भेदभावपूर्ण संधि बताते इसमें सुधार की मांग की है | क्योंकि यह संधि परमाणु संपन्न एवं गैर परमाणु हथियार वाले देशों के बीच , परमाणु हथियारों से सम्बंधित असमानता को जन्म देती है | वर्ष 2003 में में भारत ने अपने परमाणु सिद्धांत को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जो निम्नवत है - न्यूनतम निवारक क्षमता - भारत अपनी सुरक्षा के लिए जितनी परमाणु हथियारों की आवश्यकता होगी , उतना ही हथियार रखेगा एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे हथियारों की होड़ में शामिल नहीं होगा | नो फर्स्ट यूज़ - भारत कभी भी किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं करेगा , परन्तु परमाणु हथियारों का प्रयोग यदि कोई देश उसके ऊपर करता है तो वह भी हार्ड पॉवर का प्रयोग करने से नहीं चूकेगा | गैर परमाणु हथियार वाले देशों के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं किया जायेगा | परमाणु हमले को न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी के माध्यम से नागरिक राजनीतिक नेतृत्व द्वारा ही अधिकृत किया जाएगा | भारत पर बड़े जैविक या रासायनिक हमले की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग किया जा सकता है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधित कुछचिंताएंदिखाई पड़ती हैं जैसे - पहले हमले को स्वीकृति देना जिससे देश संकट में आ सकता है | पहले हमले के विरुद्ध बचाव के लिए महंगी व विस्तृत बैलिस्टिक मिसाइल डिफेन्स प्रणाली का प्रयोग करना, जो अर्थव्यवस्था पर भर डालेगा | छोटे परमाणु हथियारों के विरुद्ध क्या यही नीति अपनाई जा सकती है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधितपक्ष में तर्कइस प्रकार है - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में उभरा और उसके अनेक लाभ हुए , जैसे- आर्थिक प्रतिबंधों का हटना, असैनिक परमाणु सहयोग आदि | शत्रु पर दबाव को बढ़ाने के लिए यह नीति उपयोगी है | इस नीति से परमाणु प्रसार पर रोक लगेगी एवं सेना या मिलिट्री या न्यूक्लियर हथियारों पर खर्च कम होगा | भारत की परमाणु नीति भारत के सुरक्षा हितों को सुनिश्चित करती है | भारत को इस नीति पर कायम रहते हुए , पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को ओर बढ़ना चाहिए एवं विश्व का शांति गुरु बनकर विश्व को नेत्रित्व प्रदान करना चाहिए |
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परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अंतर्गत शामिल तत्वों को सुझाइए | इस सन्दर्भ में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा कीजिये,साथ ही इसके पक्ष व विपक्ष में दिए गए तर्कों की भी चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) Suggest elements included under the NPT. In this context, discuss the principles of India"s nuclear theory and also discuss the given argument in favor and opposition of it. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत परमाणु अप्रसार संधि के बारे में संछिप्त में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात एनपीटी में शामिल तत्वों को भी बताइए | अंत में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा करते हुए इसके पक्ष- विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- परमाणु अप्रसार संधि एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संधि है | इसका उद्देश्य परमाणु हथियार और हथियार प्रौद्योगिकी के प्रसार को रोकना, परमाणु निरस्त्रीकरण , नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण ढंग से उपयोग है | परमाणु अप्रसार की संधि 1968 में दुनिया के समक्ष हस्ताक्षर के लिए लायी गयी एवं 1970 से यह प्रभावी हुई | वर्तमान में पांच परमाणु हथियार संपन्न देश - अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन और 191 देश इसके हस्ताक्षरकर्ता देश हैं | भारत इस संधि का भाग नहीं है | NPT के तीन स्तम्भ हैं - परमाणु अप्रसार संधि - क्षैतिज और उर्ध्वाधर - NPT की संधि इस क्षैतिज प्रसार को रोकने के लिए TIME LINE की बात करती है किन्तु उर्ध्वाधर प्रसार की बात नहीं करती | निःशस्त्रीकरण - NPT पूर्ण रूप से निःशस्त्रीकरण की बात नहीं करता है | नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग भारत का परमाणु सिद्धांत - भारत एक जिम्मेदार परमाणु संपन्न राष्ट्र है | भारत ने NPT को भेदभावपूर्ण संधि बताते इसमें सुधार की मांग की है | क्योंकि यह संधि परमाणु संपन्न एवं गैर परमाणु हथियार वाले देशों के बीच , परमाणु हथियारों से सम्बंधित असमानता को जन्म देती है | वर्ष 2003 में में भारत ने अपने परमाणु सिद्धांत को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जो निम्नवत है - न्यूनतम निवारक क्षमता - भारत अपनी सुरक्षा के लिए जितनी परमाणु हथियारों की आवश्यकता होगी , उतना ही हथियार रखेगा एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे हथियारों की होड़ में शामिल नहीं होगा | नो फर्स्ट यूज़ - भारत कभी भी किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं करेगा , परन्तु परमाणु हथियारों का प्रयोग यदि कोई देश उसके ऊपर करता है तो वह भी हार्ड पॉवर का प्रयोग करने से नहीं चूकेगा | गैर परमाणु हथियार वाले देशों के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं किया जायेगा | परमाणु हमले को न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी के माध्यम से नागरिक राजनीतिक नेतृत्व द्वारा ही अधिकृत किया जाएगा | भारत पर बड़े जैविक या रासायनिक हमले की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग किया जा सकता है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधित कुछ चिंताएं दिखाई पड़ती हैं जैसे - पहले हमले को स्वीकृति देना जिससे देश संकट में आ सकता है | पहले हमले के विरुद्ध बचाव के लिए महंगी व विस्तृत बैलिस्टिक मिसाइल डिफेन्स प्रणाली का प्रयोग करना, जो अर्थव्यवस्था पर भर डालेगा | छोटे परमाणु हथियारों के विरुद्ध क्या यही नीति अपनाई जा सकती है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधित पक्ष में तर्क इस प्रकार है - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में उभरा और उसके अनेक लाभ हुए , जैसे- आर्थिक प्रतिबंधों का हटना, असैनिक परमाणु सहयोग आदि | शत्रु पर दबाव को बढ़ाने के लिए यह नीति उपयोगी है | इस नीति से परमाणु प्रसार पर रोक लगेगी एवं सेना या मिलिट्री या न्यूक्लियर हथियारों पर खर्च कम होगा | भारत की परमाणु नीति भारत के सुरक्षा हितों को सुनिश्चित करती है | भारत को इस नीति पर कायम रहते हुए , पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को ओर बढ़ना चाहिए एवं विश्व का शांति गुरु बनकर विश्व को नेत्रित्व प्रदान करना चाहिए |
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##Question:परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अंतर्गत शामिल तत्वों को सुझाइए | इस सन्दर्भ में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा कीजिये,साथ ही इसके पक्ष व विपक्ष में दिए गए तर्कों की भी चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) Suggest elements included under the NPT. In this context, discuss the principles of India"s nuclear theory and also discuss the given argument in favor and opposition of it. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत परमाणु अप्रसार संधि के बारे में संछिप्त में बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात एनपीटी में शामिल तत्वों को भी बताइए | अंत में भारत के परमाणु सिद्धांत की चर्चा करते हुए इसके पक्ष- विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- परमाणु अप्रसार संधि एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संधि है | इसका उद्देश्य परमाणु हथियार और हथियार प्रौद्योगिकी के प्रसार को रोकना, परमाणु निरस्त्रीकरण , नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण ढंग से उपयोग है | परमाणु अप्रसार की संधि 1968 में दुनिया के समक्ष हस्ताक्षर के लिए लायी गयी एवं 1970 से यह प्रभावी हुई | वर्तमान में पांच परमाणु हथियार संपन्न देश - अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन और 191 देश इसके हस्ताक्षरकर्ता देश हैं | भारत इस संधि का भाग नहीं है | NPT के तीन स्तम्भ हैं - परमाणु अप्रसार संधि - क्षैतिज और उर्ध्वाधर - NPT की संधि इस क्षैतिज प्रसार को रोकने के लिए TIME LINE की बात करती है किन्तु उर्ध्वाधर प्रसार की बात नहीं करती | निःशस्त्रीकरण - NPT पूर्ण रूप से निःशस्त्रीकरण की बात नहीं करता है | नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग भारत का परमाणु सिद्धांत - भारत एक जिम्मेदार परमाणु संपन्न राष्ट्र है | भारत ने NPT को भेदभावपूर्ण संधि बताते इसमें सुधार की मांग की है | क्योंकि यह संधि परमाणु संपन्न एवं गैर परमाणु हथियार वाले देशों के बीच , परमाणु हथियारों से सम्बंधित असमानता को जन्म देती है | वर्ष 2003 में में भारत ने अपने परमाणु सिद्धांत को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जो निम्नवत है - न्यूनतम निवारक क्षमता - भारत अपनी सुरक्षा के लिए जितनी परमाणु हथियारों की आवश्यकता होगी , उतना ही हथियार रखेगा एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे हथियारों की होड़ में शामिल नहीं होगा | नो फर्स्ट यूज़ - भारत कभी भी किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं करेगा , परन्तु परमाणु हथियारों का प्रयोग यदि कोई देश उसके ऊपर करता है तो वह भी हार्ड पॉवर का प्रयोग करने से नहीं चूकेगा | गैर परमाणु हथियार वाले देशों के विरुद्ध परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं किया जायेगा | परमाणु हमले को न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी के माध्यम से नागरिक राजनीतिक नेतृत्व द्वारा ही अधिकृत किया जाएगा | भारत पर बड़े जैविक या रासायनिक हमले की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग किया जा सकता है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधित कुछ चिंताएं दिखाई पड़ती हैं जैसे - पहले हमले को स्वीकृति देना जिससे देश संकट में आ सकता है | पहले हमले के विरुद्ध बचाव के लिए महंगी व विस्तृत बैलिस्टिक मिसाइल डिफेन्स प्रणाली का प्रयोग करना, जो अर्थव्यवस्था पर भर डालेगा | छोटे परमाणु हथियारों के विरुद्ध क्या यही नीति अपनाई जा सकती है | नो फर्स्ट यूज़ से सम्बंधित पक्ष में तर्क इस प्रकार है - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में उभरा और उसके अनेक लाभ हुए , जैसे- आर्थिक प्रतिबंधों का हटना, असैनिक परमाणु सहयोग आदि | शत्रु पर दबाव को बढ़ाने के लिए यह नीति उपयोगी है | इस नीति से परमाणु प्रसार पर रोक लगेगी एवं सेना या मिलिट्री या न्यूक्लियर हथियारों पर खर्च कम होगा | भारत की परमाणु नीति भारत के सुरक्षा हितों को सुनिश्चित करती है | भारत को इस नीति पर कायम रहते हुए , पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण को ओर बढ़ना चाहिए एवं विश्व का शांति गुरु बनकर विश्व को नेत्रित्व प्रदान करना चाहिए |
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कोलेजियम प्रणाली की संरचना एवं कार्यों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही उन आधारों को भी स्पष्ट कीजिये जिनके आधार पर कोलेजियम प्रणाली की आलोचना की जाती है(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the structure and function of the collegium system. Along with this, also explain the bases on which the collagenium system is criticized (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण- 1- भूमिका में कोलेजियम प्रणाली को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में कोलेजियम प्रणाली की संरचना एवं कार्यों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में आलोचना के आधारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये कोलेजियम पांच न्यायाधीशों का समूह है| इन पांच न्यायाधीशों में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज है| सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों की कमेटी (कोलेजियम) नियुक्ति व स्थानान्तरण का फैसला करती है| कोलेजियम की सिफारिश मानना सरकार के लिए आवश्यक होता है। यह व्यवस्था 1993 से लागू है| कोलेजियम प्रणाली: संरचना व कार्य · द्वितीय जज वाद 1993 में SC के 9 न्यायाधीशों कि पीठ ने कोलेजियम व्यवस्था की स्थापना की · राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के अंतर्गत SC को दिए गए सन्दर्भ के प्रत्युत्तर में न्यायमूर्ति SP भरुचा की पीठ ने 1998 में(तृतीय जज वाद) कोलेजियम कि संरचना व उसकी कार्यप्रणाली का स्पष्ट रूप सामने रखा जो निम्नवत है- · कोलेजियम में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 4 अन्य वरिष्ठ जज सदस्य के रूप में शामिल होंगे · यदि इस कोलेजियम के कम से कम दो सदस्य SC व HC में नियुक्त होने वाले किसी जज के नाम पर प्रारम्भ में ही असहमत होंगे तो ऐसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश को चाहिए कि उस नाम पर पुनर्विचार के लिए आग्रही न हो| · कोलेजियम को चाहिए कि वह एक राय से उपरोक्त नाम पर विचार करे, · यदि कोलेजियम के चार सदस्य किसी नाम पर सहमत होंगे तो किन्तु मुख्य न्यायाधीश इससे असहमत हो तो उस नाम पर भी विचार ण किया जाए · यदि कोलेजियम को लगता है कि उसे अधिवक्ता संघ(बार एसोसियेशन) से परामर्श करना चाहिए तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र होगा · कोलेजियम के सदस्यों के विचार लिखित रूप में दर्ज किये जाने चाहिए · सरकार को चाहिए कि वह कोलेजियम को अपने खुफिया तन्त्र कि सुविधाएं/सेवायें उपलब्ध कराये जिससे कि कोलेजियम सही व्यक्ति का चुनाव कर सके| · राष्ट्रपति कोलेजियम की सिफारिश को एक बार कोलेजियम के पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है| किन्तु यदि कोलेजियम ने पुनः उस नाम को राष्ट्रपति के पास नियुक्ति हेतु भेज दिया तो फिर राष्ट्रपति के लिए यह बाध्यकारी सिफारिश होगी कोलेजियम प्रणाली की आलोचना के आधार · कोलेजियम प्रणाली एक गैर संवैधानिक निकाय है, यह गैर सांविधिक निकाय भी है अर्थात इसका उल्लेख न तो भारतीय संविधान में है और न ही इसे किसी विधानमंडल ने निर्मित किया है|अतः कोलेजियम कि कार्यप्रणाली को लेकर और इसे न्यायिक सक्रियता से जोड़ कर इसकी आलोचना होती रही है| · सर्वोच्च न्यायालय कि सेवा निवृत्त जज जस्टिस रूमा पाल ने नवम्बर 2011 में तारकुंदे मेमोरियल भाषण में कहा कि वास्तव में कोलेजियम एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सब कुछ गोपनीय रहता है, उनके अनुसार इसके द्वारा जजों कि नियुक्ति इतनी गोपनीय रखी जाती है कि स्वयं साथी जज भी नियुक्ति के बाद इस नाम पर हैरानी व्यक्त करते हैं, उनके अनुसार इस नियुक्ति में निजी सम्बन्धों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है| योग्यता की भूमिका बहुत कम होती है| · इसी प्रकार न्यायमूर्ति AP शाह, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस जगतीचेल्मेश्वर ने भी कोलेजियम प्रणाली की आलोचना कि है| · जस्टिस कुरियन जोसेफ जो कि स्वयं कोलेजियम प्रणाली के सदस्य रह चुके है, वह इसके तानाशाही रवैये पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं| उनके अनुसार जस्टिस चेलमेश्वर जो इस कोलेजियम के एक अन्य पूर्व सदस्य रह चुके हैं, बिलकुल सही कहते हैं कि " कोलेजियम में न तो पारदर्शिता है न ही कोई जवाबदेहिता है और न ही कोई वस्तुनिष्ठता है|" · भारत सरकार की पूर्व अतिरिक्त सोलिसीटर जनरल इंदिरा जयसिंह के अनुसार कई गंभीर मसलों पर विशेषग्य अधिवक्ताओं की राय को नकार दिया जाता है, विशेषकर ऐसे अधिवक्ताओं कि राय जो पर्यावरण एवं आम जनता के मुद्दों के विशेषग्य होते हैं| · कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, जिसमें एक भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लोढ़ा भी शामिल हैं, कोलेजियम को कई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं जिससे उसके निर्णय विवादास्पद रहते हैं जैसे उसका अपना सचिवालय न होना, आसूचना एकत्रण के लिए स्वतंत्र संस्था का अभाव आदि| · वर्तमान सरकार द्वारा कोलेजियम का विरोध इस आधार पर किया गया है की इसमें प्रक्रिया स्मृति ज्ञापन का अभाव है| इसे जस्टिस JS केहर की पीठ ने स्वीकार किया था| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मुख्यतः अपारदर्शिता के आधार पर कोलेजियम व्यवस्था कि आलोचना कि जाती है जिसके कारण न्यायपालिका पर जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| अतः इस दिशा में न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित रखते हुए प्रयास करने की आवश्यकता है|
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##Question:कोलेजियम प्रणाली की संरचना एवं कार्यों को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही उन आधारों को भी स्पष्ट कीजिये जिनके आधार पर कोलेजियम प्रणाली की आलोचना की जाती है(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the structure and function of the collegium system. Along with this, also explain the bases on which the collagenium system is criticized (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में कोलेजियम प्रणाली को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में कोलेजियम प्रणाली की संरचना एवं कार्यों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में आलोचना के आधारों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये कोलेजियम पांच न्यायाधीशों का समूह है| इन पांच न्यायाधीशों में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज है| सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों की कमेटी (कोलेजियम) नियुक्ति व स्थानान्तरण का फैसला करती है| कोलेजियम की सिफारिश मानना सरकार के लिए आवश्यक होता है। यह व्यवस्था 1993 से लागू है| कोलेजियम प्रणाली: संरचना व कार्य · द्वितीय जज वाद 1993 में SC के 9 न्यायाधीशों कि पीठ ने कोलेजियम व्यवस्था की स्थापना की · राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के अंतर्गत SC को दिए गए सन्दर्भ के प्रत्युत्तर में न्यायमूर्ति SP भरुचा की पीठ ने 1998 में(तृतीय जज वाद) कोलेजियम कि संरचना व उसकी कार्यप्रणाली का स्पष्ट रूप सामने रखा जो निम्नवत है- · कोलेजियम में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 4 अन्य वरिष्ठ जज सदस्य के रूप में शामिल होंगे · यदि इस कोलेजियम के कम से कम दो सदस्य SC व HC में नियुक्त होने वाले किसी जज के नाम पर प्रारम्भ में ही असहमत होंगे तो ऐसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश को चाहिए कि उस नाम पर पुनर्विचार के लिए आग्रही न हो| · कोलेजियम को चाहिए कि वह एक राय से उपरोक्त नाम पर विचार करे, · यदि कोलेजियम के चार सदस्य किसी नाम पर सहमत होंगे तो किन्तु मुख्य न्यायाधीश इससे असहमत हो तो उस नाम पर भी विचार ण किया जाए · यदि कोलेजियम को लगता है कि उसे अधिवक्ता संघ(बार एसोसियेशन) से परामर्श करना चाहिए तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र होगा · कोलेजियम के सदस्यों के विचार लिखित रूप में दर्ज किये जाने चाहिए · सरकार को चाहिए कि वह कोलेजियम को अपने खुफिया तन्त्र कि सुविधाएं/सेवायें उपलब्ध कराये जिससे कि कोलेजियम सही व्यक्ति का चुनाव कर सके| · राष्ट्रपति कोलेजियम की सिफारिश को एक बार कोलेजियम के पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है| किन्तु यदि कोलेजियम ने पुनः उस नाम को राष्ट्रपति के पास नियुक्ति हेतु भेज दिया तो फिर राष्ट्रपति के लिए यह बाध्यकारी सिफारिश होगी कोलेजियम प्रणाली की आलोचना के आधार · कोलेजियम प्रणाली एक गैर संवैधानिक निकाय है, यह गैर सांविधिक निकाय भी है अर्थात इसका उल्लेख न तो भारतीय संविधान में है और न ही इसे किसी विधानमंडल ने निर्मित किया है|अतः कोलेजियम कि कार्यप्रणाली को लेकर और इसे न्यायिक सक्रियता से जोड़ कर इसकी आलोचना होती रही है| · सर्वोच्च न्यायालय कि सेवा निवृत्त जज जस्टिस रूमा पाल ने नवम्बर 2011 में तारकुंदे मेमोरियल भाषण में कहा कि वास्तव में कोलेजियम एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सब कुछ गोपनीय रहता है, उनके अनुसार इसके द्वारा जजों कि नियुक्ति इतनी गोपनीय रखी जाती है कि स्वयं साथी जज भी नियुक्ति के बाद इस नाम पर हैरानी व्यक्त करते हैं, उनके अनुसार इस नियुक्ति में निजी सम्बन्धों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है| योग्यता की भूमिका बहुत कम होती है| · इसी प्रकार न्यायमूर्ति AP शाह, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस जगतीचेल्मेश्वर ने भी कोलेजियम प्रणाली की आलोचना कि है| · जस्टिस कुरियन जोसेफ जो कि स्वयं कोलेजियम प्रणाली के सदस्य रह चुके है, वह इसके तानाशाही रवैये पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं| उनके अनुसार जस्टिस चेलमेश्वर जो इस कोलेजियम के एक अन्य पूर्व सदस्य रह चुके हैं, बिलकुल सही कहते हैं कि " कोलेजियम में न तो पारदर्शिता है न ही कोई जवाबदेहिता है और न ही कोई वस्तुनिष्ठता है|" · भारत सरकार की पूर्व अतिरिक्त सोलिसीटर जनरल इंदिरा जयसिंह के अनुसार कई गंभीर मसलों पर विशेषग्य अधिवक्ताओं की राय को नकार दिया जाता है, विशेषकर ऐसे अधिवक्ताओं कि राय जो पर्यावरण एवं आम जनता के मुद्दों के विशेषग्य होते हैं| · कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, जिसमें एक भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लोढ़ा भी शामिल हैं, कोलेजियम को कई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं जिससे उसके निर्णय विवादास्पद रहते हैं जैसे उसका अपना सचिवालय न होना, आसूचना एकत्रण के लिए स्वतंत्र संस्था का अभाव आदि| · वर्तमान सरकार द्वारा कोलेजियम का विरोध इस आधार पर किया गया है की इसमें प्रक्रिया स्मृति ज्ञापन का अभाव है| इसे जस्टिस JS केहर की पीठ ने स्वीकार किया था| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मुख्यतः अपारदर्शिता के आधार पर कोलेजियम व्यवस्था कि आलोचना कि जाती है जिसके कारण न्यायपालिका पर जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| अतः इस दिशा में न्यायिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित रखते हुए प्रयास करने की आवश्यकता है|
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