Question
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भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से संबन्धित मुद्दों की व्याख्या कीजिए। इन मुद्दों के समाधान के लिए सरकार ने कौन से कदम उठाए हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the issues related to infrastructure financing in India. What steps have been taken by the government to resolve these issues? (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: अवसंरचना के बारे में संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। वित्तपोषण से संबन्धित मुद्दों की व्याख्या कीजिए। सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख कीजिए। अवसंरचना विकास एक कठिन कार्य है, क्योंकि इसमें बड़ी मात्र में निवेश दीर्घ निर्माण अवधि प्रक्रियात्मक विलंब एवं एक लंबे समय के बाद प्रतिफल प्राप्त होने जैसे तत्व शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत सड़क, रेल, ऊर्जा आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं। अवसंरचनात्मक विकास की विशिष्ट विशेषताएँ कुछ ऐसे मुद्दों को प्रस्तुत करती हैं जो विशेष रूप से अवसंरचना के वित्तपोषण से संबन्धित हैं। अवसंरचनात्मक वित्तपोषण से संबन्धित मुद्दे: राजकोषीय भार: अवसंरचनात्मक क्षेत्र में कुल निवेश के लगभग 50 प्रतिशत की पूर्ति सरकार द्वारा बजट आवंटन के माध्यम से की जाती है। अवसंरचना क्षेत्र को दीर्घकालिक ऋण प्रदान करने की वाणिज्यिक बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता सीमित है। बीमा एवं पेंशन निधि पर यह बाध्यता आरोपित की गयी कि उनके द्वारा अपने धन के एक बड़े हिस्से का निवेश सरकारी प्रतिभूतियों में किया जाना चाहिए। भारत में अवसंरचना क्षेत्र का एक बड़ा भाग विशेष रूप से सिंचाई, जल आपूर्ति शहरी स्वच्छता और राज्य सड़क परिवहन आदि विभिन्न कारणों से व्यवसायीकरण के लिए उपयुक्त नहीं है। परिणामस्वरूप सरकार इन सेवाओं पर पर्याप्त उपयोगकर्ता शुल्क आरोपित करने की स्थिति में नहीं है। भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय स्वीकृति से संबन्धित मुद्दे अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं। इन अनिश्चितताओं से निवेशकों और बैंको की जोखिम लेने की क्षमताएं प्रभावित होती हैं। सरकार द्वारा उठाए गए कदम : अवसंरचना क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाएं जैसे- BOT, HAM, EPC व्यहार्यता अंतराल वित्तीयन (VGF) के माध्यम से ऐसे क्षेत्र जहां लाभ कम है वहाँ निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए वित्त प्रदान करना। उत्खनन, विद्युत आदि क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग से 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति प्रदान की गयी है। इंडिया इनफ्रास्ट्रक्चर फ़ाइनेंस कंपनी लिमिटेड की स्थापना की गयी। अवसंरचना ऋण निधियों की स्थापना की गयी है। राष्ट्रीय अवसंरचना निवेश कोष (NIIF) के माध्यम से सार्वभौमिक निवेश को आकर्षित करने के प्रयास किया जा रहा। वाह्य वाणिज्यिक उधार नीतियों को उदारीकृत और युक्तिसंगत बनाना।
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##Question:भारत में अवसंरचना वित्तपोषण से संबन्धित मुद्दों की व्याख्या कीजिए। इन मुद्दों के समाधान के लिए सरकार ने कौन से कदम उठाए हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the issues related to infrastructure financing in India. What steps have been taken by the government to resolve these issues? (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: अवसंरचना के बारे में संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। वित्तपोषण से संबन्धित मुद्दों की व्याख्या कीजिए। सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख कीजिए। अवसंरचना विकास एक कठिन कार्य है, क्योंकि इसमें बड़ी मात्र में निवेश दीर्घ निर्माण अवधि प्रक्रियात्मक विलंब एवं एक लंबे समय के बाद प्रतिफल प्राप्त होने जैसे तत्व शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत सड़क, रेल, ऊर्जा आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं। अवसंरचनात्मक विकास की विशिष्ट विशेषताएँ कुछ ऐसे मुद्दों को प्रस्तुत करती हैं जो विशेष रूप से अवसंरचना के वित्तपोषण से संबन्धित हैं। अवसंरचनात्मक वित्तपोषण से संबन्धित मुद्दे: राजकोषीय भार: अवसंरचनात्मक क्षेत्र में कुल निवेश के लगभग 50 प्रतिशत की पूर्ति सरकार द्वारा बजट आवंटन के माध्यम से की जाती है। अवसंरचना क्षेत्र को दीर्घकालिक ऋण प्रदान करने की वाणिज्यिक बैंकिंग क्षेत्र की क्षमता सीमित है। बीमा एवं पेंशन निधि पर यह बाध्यता आरोपित की गयी कि उनके द्वारा अपने धन के एक बड़े हिस्से का निवेश सरकारी प्रतिभूतियों में किया जाना चाहिए। भारत में अवसंरचना क्षेत्र का एक बड़ा भाग विशेष रूप से सिंचाई, जल आपूर्ति शहरी स्वच्छता और राज्य सड़क परिवहन आदि विभिन्न कारणों से व्यवसायीकरण के लिए उपयुक्त नहीं है। परिणामस्वरूप सरकार इन सेवाओं पर पर्याप्त उपयोगकर्ता शुल्क आरोपित करने की स्थिति में नहीं है। भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय स्वीकृति से संबन्धित मुद्दे अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं। इन अनिश्चितताओं से निवेशकों और बैंको की जोखिम लेने की क्षमताएं प्रभावित होती हैं। सरकार द्वारा उठाए गए कदम : अवसंरचना क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाएं जैसे- BOT, HAM, EPC व्यहार्यता अंतराल वित्तीयन (VGF) के माध्यम से ऐसे क्षेत्र जहां लाभ कम है वहाँ निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए वित्त प्रदान करना। उत्खनन, विद्युत आदि क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग से 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति प्रदान की गयी है। इंडिया इनफ्रास्ट्रक्चर फ़ाइनेंस कंपनी लिमिटेड की स्थापना की गयी। अवसंरचना ऋण निधियों की स्थापना की गयी है। राष्ट्रीय अवसंरचना निवेश कोष (NIIF) के माध्यम से सार्वभौमिक निवेश को आकर्षित करने के प्रयास किया जा रहा। वाह्य वाणिज्यिक उधार नीतियों को उदारीकृत और युक्तिसंगत बनाना।
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के सन्दर्भ में युक्तियुक्त निर्बन्धनों का विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द ,अंक - 10 ) Critical analysis of the right of religious freedom received under Article 25 of the indian constitution. (150-200 words, Marks - 10 )
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एप्रोच :- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की भारत में आवश्यकता बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लिखिये। युक्तियुक्त निर्बंधनों को स्पष्ट करते हुए आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत में विभिन्न धर्मों , पंथों को मानने वाले निवास करते है तथा अपने धर्म के अनुसार मान्यताओं का पालन करते है. ऐसे में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने तथा सामाजिक भ्रातत्व बढ़ाने हेतु धर्म की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत शामिल किया गया है। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद 25 - 25 (1 )- अंत:करण की स्वतंत्रता , धर्म को मानने , उसके आचरण करने , उसके प्रसार प्रचार की स्वतंत्रता 25 (2 )- राज्य किसी आर्थिक, धार्मिक , राजनीतिक या लौकिक क्रियाकलाप को विनियमित करने के लिए कानून बना सकता है सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए तथा हिन्दू मंदिरों अथवा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने के सम्बन्ध में राज्य कानून बना सकता है , यद्यपि ये अधिकार स्वयं मेंपूर्ण नहीं हैलोक स्वास्थ्य , नैतिकता व स्वास्थ्य आदि युक्तियुक्त निर्बंधन के तहत इन्हे सीमित किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है जिन्हे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते है जैसे :- राज्य , अजान , भजन के लिए लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है गाय संरक्षण या किसी पशु के संरक्षण के नाम पर किसी समुदाय के व्यक्ति को प्रताड़ित करना या मोब लिंचिंग करना गंभीर अपराध। यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण ही पुजारी होने का दावा।किसी अन्य जाति का भी कोई व्यक्ति , मंदिर का पुजारी बन सकता है। बकरीद के अवसर पर बकरे की बलि , इस्लाम का मूल भाग नहीं है यदि कोई धार्मिक संस्था अपने कल्याणकारी कार्यों को करने में विफल रहती है तो राज्य उसका अधिग्रहण कर सकता है हिन्दू धर्म में बहु विवाह , हिन्दू धर्म का आवश्यक अंग नहीं है अत : राज्य इसे रोकने के लिए कानून बना सकता है प्रचार प्रसार का कदाचित यह अर्थ नहीं हुआ कि दूसरों को झांचा देकर , डरा धमकाकर , लालच देकर उसका धर्म परिवर्तन किया जाये। राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की स्थापना नहीं कर सकता,किन्तु अगर उसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय ने स्थापित किया है तो राज्य उसे वित्तीय सहायता देने से मना नहीं कर सकता। संविधान में धर्म को परिभाषित नहीं किया गया है , किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर हिन्दू धर्म विश्वास वाद 1951 में धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा है कि यह व्यक्तियों व समुदायों के निजी आस्था का विषय है। जो ईश्वरवादी , अनीश्वरवादी , नास्तिक कुछ भी हो सकता है। इसके अनुयायी कुछ विशिष्ट नैतिक संहिता का अनुसरण करते है , जो विभिन्न प्रकार के समारोह , कर्मकांड , पूजा पद्द्ति के रूप में दिखाई पड़ती है।भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश D S Thakur के अनुसार धर्म , व्यक्ति और उसकी परम सत्ता के बीच एक संचार माध्यम है , जो उसके आचरण को विनियमित करता है , इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है। इसप्रकार सामाजिक कल्याण व धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाते हुए ही इनका पालन करना उचित होगा।
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##Question:भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के सन्दर्भ में युक्तियुक्त निर्बन्धनों का विश्लेषण कीजिये। (150-200 शब्द ,अंक - 10 ) Critical analysis of the right of religious freedom received under Article 25 of the indian constitution. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच :- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की भारत में आवश्यकता बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लिखिये। युक्तियुक्त निर्बंधनों को स्पष्ट करते हुए आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत में विभिन्न धर्मों , पंथों को मानने वाले निवास करते है तथा अपने धर्म के अनुसार मान्यताओं का पालन करते है. ऐसे में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने तथा सामाजिक भ्रातत्व बढ़ाने हेतु धर्म की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत शामिल किया गया है। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद 25 - 25 (1 )- अंत:करण की स्वतंत्रता , धर्म को मानने , उसके आचरण करने , उसके प्रसार प्रचार की स्वतंत्रता 25 (2 )- राज्य किसी आर्थिक, धार्मिक , राजनीतिक या लौकिक क्रियाकलाप को विनियमित करने के लिए कानून बना सकता है सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए तथा हिन्दू मंदिरों अथवा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने के सम्बन्ध में राज्य कानून बना सकता है , यद्यपि ये अधिकार स्वयं मेंपूर्ण नहीं हैलोक स्वास्थ्य , नैतिकता व स्वास्थ्य आदि युक्तियुक्त निर्बंधन के तहत इन्हे सीमित किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है जिन्हे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते है जैसे :- राज्य , अजान , भजन के लिए लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है गाय संरक्षण या किसी पशु के संरक्षण के नाम पर किसी समुदाय के व्यक्ति को प्रताड़ित करना या मोब लिंचिंग करना गंभीर अपराध। यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण ही पुजारी होने का दावा।किसी अन्य जाति का भी कोई व्यक्ति , मंदिर का पुजारी बन सकता है। बकरीद के अवसर पर बकरे की बलि , इस्लाम का मूल भाग नहीं है यदि कोई धार्मिक संस्था अपने कल्याणकारी कार्यों को करने में विफल रहती है तो राज्य उसका अधिग्रहण कर सकता है हिन्दू धर्म में बहु विवाह , हिन्दू धर्म का आवश्यक अंग नहीं है अत : राज्य इसे रोकने के लिए कानून बना सकता है प्रचार प्रसार का कदाचित यह अर्थ नहीं हुआ कि दूसरों को झांचा देकर , डरा धमकाकर , लालच देकर उसका धर्म परिवर्तन किया जाये। राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की स्थापना नहीं कर सकता,किन्तु अगर उसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय ने स्थापित किया है तो राज्य उसे वित्तीय सहायता देने से मना नहीं कर सकता। संविधान में धर्म को परिभाषित नहीं किया गया है , किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर हिन्दू धर्म विश्वास वाद 1951 में धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा है कि यह व्यक्तियों व समुदायों के निजी आस्था का विषय है। जो ईश्वरवादी , अनीश्वरवादी , नास्तिक कुछ भी हो सकता है। इसके अनुयायी कुछ विशिष्ट नैतिक संहिता का अनुसरण करते है , जो विभिन्न प्रकार के समारोह , कर्मकांड , पूजा पद्द्ति के रूप में दिखाई पड़ती है।भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश D S Thakur के अनुसार धर्म , व्यक्ति और उसकी परम सत्ता के बीच एक संचार माध्यम है , जो उसके आचरण को विनियमित करता है , इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है। इसप्रकार सामाजिक कल्याण व धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाते हुए ही इनका पालन करना उचित होगा।
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OBOR की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | OBOR को लेकर भारत की चिंताओं को रेखांकित कीजिये, साथ ही यह भी बताइए कि भारत इसके प्रत्युत्तर में क्या कदम उठा रहा है ? (200 शब्द) Explain the Concept of OBOR. Underline the concerns of India over OBOR, alongwith this explain that what steps India is taking in its response?
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एप्रोच - भूमिका में OBOR के बारे में संक्षिप्त परिचय दीजिये | इसके बाद OBOR से सम्बंधित भारत की चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इसके बाद इसके प्रत्युत्तर में भारत द्वारा किये जा रहे प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वन बेल्ट- वन रोड इनिशिएटिव चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है | इसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका ,यूरोप एवं चीन के बीच सम्बद्धता तथा सहयोग को विकसित करना है | वन बेल्ट - वन रोड इनिशिएटिव के दो भाग हैं - भूमि आधारित सिल्क रोड ( रेल लाइन , सड़के आदि ) समुद्री रेशम मार्ग (पत्तनों का निर्माण) OBOR को लेकर भारत की चिंताएं - संप्रभुता का मुद्दा - ओबोर का एक भाग CPEC (चीन -पाकिस्तान इकोनोमिक कोरिडोर), पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है , जो भारत का अभिन्न अंग है | जिससे यह भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाता है | भारत को घेरने की रणनीति - चीन लगातार ओबोर के माध्यम से भारत को हिन्द महासागर में घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है , जिसे कुछ विश्लेषकों द्वारा " मोतियों की माला " (STRING OF PEARLS) का नाम दिया गया है | "मोतियों की माला" भारत के लिए एक चुनौती है उदहारण के तौर पर - श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट, पाकिस्तान में ग्वादर और करांची , बांग्लादेश में चटगाँव , म्यांमार में यांगून , जिबूती में मिलिट्री बेस आदि के द्वारा चीन, व्यपार के साथ-साथ मिलिट्री बेस के रूप में इन सबका उपयोग कर सकता है | सुरक्षा से सम्बंधित मुद्दे - चीन के OBOR प्रोजेक्ट में म्यांमार व बंगलादेश भी सम्मिलित हो गए हैं जिससे इन देशों में चीन की उपस्थिति सुदृढ़ होगी , जो उत्तर पूर्वी भारत में अशांति को बढ़ावा दे सकता है | जो भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती होगा | OBOR के प्रत्युत्तर में भारत के द्वारा उठाये गए कदम - 1. प्रोजेक्ट मौसम - भारत अपनी सॉफ्ट डिप्लोमेसी के तहत हिन्द महासागर के देशों के मध्य संचार सुविधाओं को बेहतर कर सांस्कृतिक मूल्यों एवं सरोकारों का आदान प्रदान करेगा | 2. सागरमाला प्रोजेक्ट - इस प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत बंदरगाहों का आधुनिकीकरण ,नए बंदरगाहों का विकास बंदरगाह कनेक्टिविटी बढ़ने के लिए करेगा , जिससे हिन्द महासागर में उपस्थित देश समुद्र के माध्यम से भारत के साथ व्यापार कर सके | 3. चाबहार पोर्ट - भारत ग्वादर पोर्ट को काउंट करते हुए ईरान में चाबहार पोर्ट का निर्माण कर रहा है ताकि वह इसके माध्यम से अफगानिस्तान एवं अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापर सहयोग कर सके | 4. क्वाड डायलॉग ( अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया ) - ये सभी देश समुद्र पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन के लिए चीन पर एक दबाव समूह का कार्य करते हैं | 5. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा - इसके माध्यम से भारत मध्य एशिया ईरान, रूस में अपनी पहुंच को सुनिश्चित कर पायेगा , एवं इस गलियारे से व्यापर में वृद्धि होगी | OBOR से सम्बंधित चुनौतियों पर भारत को चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ -साथ स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी का प्रयोग करना चाहिये ताकि भारत के प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित किया जा सके |
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##Question:OBOR की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | OBOR को लेकर भारत की चिंताओं को रेखांकित कीजिये, साथ ही यह भी बताइए कि भारत इसके प्रत्युत्तर में क्या कदम उठा रहा है ? (200 शब्द) Explain the Concept of OBOR. Underline the concerns of India over OBOR, alongwith this explain that what steps India is taking in its response?##Answer:एप्रोच - भूमिका में OBOR के बारे में संक्षिप्त परिचय दीजिये | इसके बाद OBOR से सम्बंधित भारत की चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इसके बाद इसके प्रत्युत्तर में भारत द्वारा किये जा रहे प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वन बेल्ट- वन रोड इनिशिएटिव चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है | इसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका ,यूरोप एवं चीन के बीच सम्बद्धता तथा सहयोग को विकसित करना है | वन बेल्ट - वन रोड इनिशिएटिव के दो भाग हैं - भूमि आधारित सिल्क रोड ( रेल लाइन , सड़के आदि ) समुद्री रेशम मार्ग (पत्तनों का निर्माण) OBOR को लेकर भारत की चिंताएं - संप्रभुता का मुद्दा - ओबोर का एक भाग CPEC (चीन -पाकिस्तान इकोनोमिक कोरिडोर), पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है , जो भारत का अभिन्न अंग है | जिससे यह भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाता है | भारत को घेरने की रणनीति - चीन लगातार ओबोर के माध्यम से भारत को हिन्द महासागर में घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है , जिसे कुछ विश्लेषकों द्वारा " मोतियों की माला " (STRING OF PEARLS) का नाम दिया गया है | "मोतियों की माला" भारत के लिए एक चुनौती है उदहारण के तौर पर - श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट, पाकिस्तान में ग्वादर और करांची , बांग्लादेश में चटगाँव , म्यांमार में यांगून , जिबूती में मिलिट्री बेस आदि के द्वारा चीन, व्यपार के साथ-साथ मिलिट्री बेस के रूप में इन सबका उपयोग कर सकता है | सुरक्षा से सम्बंधित मुद्दे - चीन के OBOR प्रोजेक्ट में म्यांमार व बंगलादेश भी सम्मिलित हो गए हैं जिससे इन देशों में चीन की उपस्थिति सुदृढ़ होगी , जो उत्तर पूर्वी भारत में अशांति को बढ़ावा दे सकता है | जो भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती होगा | OBOR के प्रत्युत्तर में भारत के द्वारा उठाये गए कदम - 1. प्रोजेक्ट मौसम - भारत अपनी सॉफ्ट डिप्लोमेसी के तहत हिन्द महासागर के देशों के मध्य संचार सुविधाओं को बेहतर कर सांस्कृतिक मूल्यों एवं सरोकारों का आदान प्रदान करेगा | 2. सागरमाला प्रोजेक्ट - इस प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत बंदरगाहों का आधुनिकीकरण ,नए बंदरगाहों का विकास बंदरगाह कनेक्टिविटी बढ़ने के लिए करेगा , जिससे हिन्द महासागर में उपस्थित देश समुद्र के माध्यम से भारत के साथ व्यापार कर सके | 3. चाबहार पोर्ट - भारत ग्वादर पोर्ट को काउंट करते हुए ईरान में चाबहार पोर्ट का निर्माण कर रहा है ताकि वह इसके माध्यम से अफगानिस्तान एवं अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापर सहयोग कर सके | 4. क्वाड डायलॉग ( अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया ) - ये सभी देश समुद्र पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन के लिए चीन पर एक दबाव समूह का कार्य करते हैं | 5. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा - इसके माध्यम से भारत मध्य एशिया ईरान, रूस में अपनी पहुंच को सुनिश्चित कर पायेगा , एवं इस गलियारे से व्यापर में वृद्धि होगी | OBOR से सम्बंधित चुनौतियों पर भारत को चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ -साथ स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी का प्रयोग करना चाहिये ताकि भारत के प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित किया जा सके |
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OBOR की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | OBOR को लेकर भारत की चिंताओं को रेखांकित कीजिये, साथ ही यह भी बताइए कि भारत इसके प्रत्युत्तर में क्या कदम उठा रहा है ? (200 शब्द) Explain the Concept of OBOR. Underline the concerns of India over OBOR, alongwith this explain that what steps India is taking in its response?
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एप्रोच - भूमिका में OBOR के बारे में संक्षिप्त परिचय दीजिये | इसके बाद OBOR से सम्बंधित भारत की चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इसके बाद इसके प्रत्युत्तर में भारत द्वारा किये जा रहे प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वन बेल्ट- वन रोड इनिशिएटिव चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है | इसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका ,यूरोप एवं चीन के बीच सम्बद्धता तथा सहयोग को विकसित करना है | वन बेल्ट - वन रोड इनिशिएटिव के दो भाग हैं - भूमि आधारित सिल्क रोड ( रेल लाइन , सड़के आदि ) समुद्री रेशम मार्ग (पत्तनों का निर्माण) OBOR को लेकर भारत की चिंताएं - संप्रभुता का मुद्दा -ओबोर का एक भाग CPEC (चीन -पाकिस्तान इकोनोमिक कोरिडोर), पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है , जो भारत का अभिन्न अंग है | जिससे यह भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाता है | भारत को घेरने की रणनीति -चीन लगातार ओबोर के माध्यम से भारत को हिन्द महासागर में घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है , जिसे कुछ विश्लेषकों द्वारा "मोतियों की माला "(STRING OF PEARLS) का नाम दिया गया है | "मोतियों की माला" भारत के लिए एक चुनौती है | उदहारण के तौर पर - श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट, पाकिस्तान में ग्वादर और करांची , बांग्लादेश में चटगाँव , म्यांमार में यांगून , जिबूती में मिलिट्री बेस आदि के द्वारा चीन, व्यपार के साथ-साथ मिलिट्री बेस के रूप में इन सबका उपयोग कर सकता है | सुरक्षा से सम्बंधित मुद्दे - चीन के OBOR प्रोजेक्ट में म्यांमार व बंगलादेश भी सम्मिलित हो गए हैं जिससे इन देशों में चीन की उपस्थिति सुदृढ़ होगी , जो उत्तर पूर्वी भारत में अशांति को बढ़ावा दे सकता है | जो भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती होगा | OBOR के प्रत्युत्तर में भारत के द्वारा उठाये गए कदम - 1. प्रोजेक्ट मौसम- भारत अपनी सॉफ्ट डिप्लोमेसी के तहत हिन्द महासागर के देशों के मध्य संचार सुविधाओं को बेहतर कर सांस्कृतिक मूल्यों एवं सरोकारों का आदान प्रदान करेगा| 2. सागरमाला प्रोजेक्ट - इस प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत बंदरगाहों का आधुनिकीकरण ,नए बंदरगाहों का विकास बंदरगाह कनेक्टिविटी बढ़ने के लिए करेगा , जिससे हिन्द महासागर में उपस्थित देश समुद्र के माध्यम से भारत के साथ व्यापार कर सके | 3. चाबहार पोर्ट - भारत ग्वादर पोर्ट को काउंट करते हुए ईरान में चाबहार पोर्ट का निर्माण कर रहा है ताकि वह इसके माध्यम से अफगानिस्तान एवं अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापर सहयोग कर सके | 4. क्वाड डायलॉग ( अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया ) - ये सभी देश समुद्र पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन के लिए चीन पर एक दबाव समूह का कार्य करते हैं | 5. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा - इसके माध्यम से भारत मध्य एशिया ईरान, रूस में अपनी पहुंच को सुनिश्चित कर पायेगा , एवं इस गलियारे से व्यापर में वृद्धि होगी | OBOR से सम्बंधित चुनौतियों पर भारत को चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ -साथ स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी का प्रयोग करना चाहिये ताकि भारत के प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित किया जा सके |
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##Question:OBOR की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | OBOR को लेकर भारत की चिंताओं को रेखांकित कीजिये, साथ ही यह भी बताइए कि भारत इसके प्रत्युत्तर में क्या कदम उठा रहा है ? (200 शब्द) Explain the Concept of OBOR. Underline the concerns of India over OBOR, alongwith this explain that what steps India is taking in its response?##Answer:एप्रोच - भूमिका में OBOR के बारे में संक्षिप्त परिचय दीजिये | इसके बाद OBOR से सम्बंधित भारत की चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इसके बाद इसके प्रत्युत्तर में भारत द्वारा किये जा रहे प्रयासों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वन बेल्ट- वन रोड इनिशिएटिव चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है | इसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका ,यूरोप एवं चीन के बीच सम्बद्धता तथा सहयोग को विकसित करना है | वन बेल्ट - वन रोड इनिशिएटिव के दो भाग हैं - भूमि आधारित सिल्क रोड ( रेल लाइन , सड़के आदि ) समुद्री रेशम मार्ग (पत्तनों का निर्माण) OBOR को लेकर भारत की चिंताएं - संप्रभुता का मुद्दा -ओबोर का एक भाग CPEC (चीन -पाकिस्तान इकोनोमिक कोरिडोर), पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है , जो भारत का अभिन्न अंग है | जिससे यह भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाता है | भारत को घेरने की रणनीति -चीन लगातार ओबोर के माध्यम से भारत को हिन्द महासागर में घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है , जिसे कुछ विश्लेषकों द्वारा "मोतियों की माला "(STRING OF PEARLS) का नाम दिया गया है | "मोतियों की माला" भारत के लिए एक चुनौती है | उदहारण के तौर पर - श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट, पाकिस्तान में ग्वादर और करांची , बांग्लादेश में चटगाँव , म्यांमार में यांगून , जिबूती में मिलिट्री बेस आदि के द्वारा चीन, व्यपार के साथ-साथ मिलिट्री बेस के रूप में इन सबका उपयोग कर सकता है | सुरक्षा से सम्बंधित मुद्दे - चीन के OBOR प्रोजेक्ट में म्यांमार व बंगलादेश भी सम्मिलित हो गए हैं जिससे इन देशों में चीन की उपस्थिति सुदृढ़ होगी , जो उत्तर पूर्वी भारत में अशांति को बढ़ावा दे सकता है | जो भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती होगा | OBOR के प्रत्युत्तर में भारत के द्वारा उठाये गए कदम - 1. प्रोजेक्ट मौसम- भारत अपनी सॉफ्ट डिप्लोमेसी के तहत हिन्द महासागर के देशों के मध्य संचार सुविधाओं को बेहतर कर सांस्कृतिक मूल्यों एवं सरोकारों का आदान प्रदान करेगा| 2. सागरमाला प्रोजेक्ट - इस प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत बंदरगाहों का आधुनिकीकरण ,नए बंदरगाहों का विकास बंदरगाह कनेक्टिविटी बढ़ने के लिए करेगा , जिससे हिन्द महासागर में उपस्थित देश समुद्र के माध्यम से भारत के साथ व्यापार कर सके | 3. चाबहार पोर्ट - भारत ग्वादर पोर्ट को काउंट करते हुए ईरान में चाबहार पोर्ट का निर्माण कर रहा है ताकि वह इसके माध्यम से अफगानिस्तान एवं अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापर सहयोग कर सके | 4. क्वाड डायलॉग ( अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया ) - ये सभी देश समुद्र पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन के लिए चीन पर एक दबाव समूह का कार्य करते हैं | 5. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा - इसके माध्यम से भारत मध्य एशिया ईरान, रूस में अपनी पहुंच को सुनिश्चित कर पायेगा , एवं इस गलियारे से व्यापर में वृद्धि होगी | OBOR से सम्बंधित चुनौतियों पर भारत को चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ -साथ स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी का प्रयोग करना चाहिये ताकि भारत के प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित किया जा सके |
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स्वतंत्रता पश्चात भारत में पूर्वोतर क्षेत्र का एकीकरण अपने साथ विशिष्ट चुनौतियों को समाहित किये हुआ था| कथन का विश्लेषण कीजिये| साथ ही, स्वतंत्रता पश्चात उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) The integration of the North-East region in Post independent India was characterized by specific challenges. Analyze the statement. Also, Give the details of the restructuring of North-East India after independence. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच - नवस्वतंत्र भारत में पूर्वोतर क्षेत्र की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, पूर्वोतर क्षेत्र के एकीकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दर्शाईये| अंतिम भाग में, इन चुनौतियों से पार पाते हुए उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये| उत्तर- 19वीं सदी में राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वोतर क्षेत्र में 3 प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी - असम को प्रान्त का दर्जा या बंगाल प्रांत के भाग के रूप में प्रशासन; असम के पर्वतीय क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण; मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि रियासतों में अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन कुछ स्वायत्तता| स्वतंत्रता के समय मणिपुर तथा त्रिपुरा को छोड़कर संपूर्ण पूर्वोतर क्षेत्र असम में शामिल था| सांस्कृतिक एवं जनजातीय विविधता असम के मैदानी भागों को छोड़कर सभी पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक तौर पर विद्यमान थी| पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान मैदानी भाग में रहने वाले असमिया तथा बंगाली भाषी लोगों से काफी अलग थी| साथ ही, पूर्वोतर क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित विशिष्ट चुनौतियाँ विद्यमान थी- भौगोलिक तथा नृजातीय विविधता - भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर क्षेत्र का अलगाव तथा नृजातीयता, भाषा, सामाजिक संगठन तथा आर्थिक विकास के स्तरों पर व्यापक विविधता| पारंपरिक समाजों की बहुलता जिसने एकल राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के कार्य को कठिन बनाया| शेष भारत से सांस्कृतिक अलगाव - जनजातियों के विशिष्ट पहचान तथा यहां पाए जाने वाले नृजातीय समूह के उप राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने शेष भारत से अलगाव को बढ़ावा दिया| लगभग हर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति में विभिन्नता मौजूद थी| उदाहरणस्वरूप- पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों के मध्य व्याप्त वैमनस्य की भावना| भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कम जुडाव की वजह से पूर्वोत्तर के मूल निवासियों में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का अभाव देखने को मिलता है| अंग्रेजों द्वारा पृथक्करण और शोषण की नीति का अनुसरण | पूर्वोत्तर राज्य के जनजातीय लोगों का शेष भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन से अलगाव था उसपर से जनजातीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों तक ही सीमित था जो सामान्यतः उनके दृष्टिकोण को भारत विरोधी बनाने की कोशिश करते रहते थे| उग्रवादी समूहों द्वारा निभाई गई भूमिका जिन्होंने भारतीय संघ में क्षेत्रों का विलय का विरोध किया| अन्य देशों का प्रभाव जैसे मिजोनेता बर्मा में शामिल होना चाहते थे| पहचान का मुद्दा - व्यापक पैमाने पर प्रवासन के कारण स्थानीय निवासियों के मध्य पहचान खोने का संकट; जैसे - पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के कारण असम के स्थानीय लोगों के मन में संदेह| आज़ादी पश्चात विविध कारणों से पर्वतीय तथा मैदानी लोगों के बीच तनाव का बढ़ना जैसे -प्रशासनिक उपेक्षा; अपेक्षित आर्थिक सहायता ना मिलना; संकट के दौरान राहत-कार्यों में विलंब इत्यादि उपरोक्त वजहों के कारण पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण की प्रक्रिया बाकी भारतीय क्षेत्रों के मुकाबले अधिक जटिल थी| उत्तर पूर्वी भारत का पुनर्गठन पूर्वोत्तर के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम 1948 में उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को नेफा नाम से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया जिसे 1987 में अलग अरुणाचल प्रदेश राज्य के रूप में मान्यता दी गई| असम सरकार के भेदभावपूर्णरवैये की वजह से जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष बड़ा तथा अलग राज्य के मुद्दे जोर पकड़ने लगे | इस संदर्भ में 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों द्वारा ऑल पार्टी हील लीडर कॉन्फ्रेंस बनाया गया तथा असमिया भाषा के मुद्दे पर व्यापक विरोध-प्रदर्शन, हड़ताल आदि करना चालू कर दिया गया| अंततः 1969 में संविधान संशोधन के माध्यम से असम के अंदर मेघालय राज्य का निर्माण हुआ| 1972 में पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुनर्गठन के रूप में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा मणिपुर एवं त्रिपुरा के केंद्र शासित प्रदेशों को भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया| इस प्रकार, असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा का पुनर्गठन हुआ एवं जटिलता सिर्फ नागालैंडएवं मिजोरम में ही बची| मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी समूहों द्वारा हिंसक मार्ग अपनाया गया| परंतु सेना द्वारा इस समस्या को प्रभावशाली ढंग से सुलझाया गया एवं 1986 में मिजो नेशनल फ्रंट तथा भारत सरकार के मध्य शांति समझौते के फलस्वरूप 1987 में अलग मिजोरम राज्य का गठन हुआ | उसी प्रकार, नगालैंड के अलगाववादियों ने भी भारत संघ में एकीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया परंतु भारत सरकार द्वारा अलगाववाद तथा पृथकतावाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया| लंबी चली वार्ताओं एवं सैनिक कार्यवाहियों के बाद 1963 में अलग नागालैंड राज्य अस्तित्व में आया| इस प्रकार आधुनिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वरूप में आया जिसके एकीकरण में जनजातीय विविधता तथा भाषा का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था| हालांकि, अभी भी जनजातीय क्षेत्रों से स्वायत्तता एवं आजादी की मांग यदा-कदा उठती रहती है परंतु उनका जमीनी आधार काफी कम हो चुका है|
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##Question:स्वतंत्रता पश्चात भारत में पूर्वोतर क्षेत्र का एकीकरण अपने साथ विशिष्ट चुनौतियों को समाहित किये हुआ था| कथन का विश्लेषण कीजिये| साथ ही, स्वतंत्रता पश्चात उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) The integration of the North-East region in Post independent India was characterized by specific challenges. Analyze the statement. Also, Give the details of the restructuring of North-East India after independence. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - नवस्वतंत्र भारत में पूर्वोतर क्षेत्र की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, पूर्वोतर क्षेत्र के एकीकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दर्शाईये| अंतिम भाग में, इन चुनौतियों से पार पाते हुए उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये| उत्तर- 19वीं सदी में राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वोतर क्षेत्र में 3 प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी - असम को प्रान्त का दर्जा या बंगाल प्रांत के भाग के रूप में प्रशासन; असम के पर्वतीय क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण; मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि रियासतों में अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन कुछ स्वायत्तता| स्वतंत्रता के समय मणिपुर तथा त्रिपुरा को छोड़कर संपूर्ण पूर्वोतर क्षेत्र असम में शामिल था| सांस्कृतिक एवं जनजातीय विविधता असम के मैदानी भागों को छोड़कर सभी पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक तौर पर विद्यमान थी| पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान मैदानी भाग में रहने वाले असमिया तथा बंगाली भाषी लोगों से काफी अलग थी| साथ ही, पूर्वोतर क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित विशिष्ट चुनौतियाँ विद्यमान थी- भौगोलिक तथा नृजातीय विविधता - भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर क्षेत्र का अलगाव तथा नृजातीयता, भाषा, सामाजिक संगठन तथा आर्थिक विकास के स्तरों पर व्यापक विविधता| पारंपरिक समाजों की बहुलता जिसने एकल राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के कार्य को कठिन बनाया| शेष भारत से सांस्कृतिक अलगाव - जनजातियों के विशिष्ट पहचान तथा यहां पाए जाने वाले नृजातीय समूह के उप राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने शेष भारत से अलगाव को बढ़ावा दिया| लगभग हर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति में विभिन्नता मौजूद थी| उदाहरणस्वरूप- पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों के मध्य व्याप्त वैमनस्य की भावना| भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कम जुडाव की वजह से पूर्वोत्तर के मूल निवासियों में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का अभाव देखने को मिलता है| अंग्रेजों द्वारा पृथक्करण और शोषण की नीति का अनुसरण | पूर्वोत्तर राज्य के जनजातीय लोगों का शेष भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन से अलगाव था उसपर से जनजातीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों तक ही सीमित था जो सामान्यतः उनके दृष्टिकोण को भारत विरोधी बनाने की कोशिश करते रहते थे| उग्रवादी समूहों द्वारा निभाई गई भूमिका जिन्होंने भारतीय संघ में क्षेत्रों का विलय का विरोध किया| अन्य देशों का प्रभाव जैसे मिजोनेता बर्मा में शामिल होना चाहते थे| पहचान का मुद्दा - व्यापक पैमाने पर प्रवासन के कारण स्थानीय निवासियों के मध्य पहचान खोने का संकट; जैसे - पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के कारण असम के स्थानीय लोगों के मन में संदेह| आज़ादी पश्चात विविध कारणों से पर्वतीय तथा मैदानी लोगों के बीच तनाव का बढ़ना जैसे -प्रशासनिक उपेक्षा; अपेक्षित आर्थिक सहायता ना मिलना; संकट के दौरान राहत-कार्यों में विलंब इत्यादि उपरोक्त वजहों के कारण पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण की प्रक्रिया बाकी भारतीय क्षेत्रों के मुकाबले अधिक जटिल थी| उत्तर पूर्वी भारत का पुनर्गठन पूर्वोत्तर के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम 1948 में उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को नेफा नाम से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया जिसे 1987 में अलग अरुणाचल प्रदेश राज्य के रूप में मान्यता दी गई| असम सरकार के भेदभावपूर्णरवैये की वजह से जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष बड़ा तथा अलग राज्य के मुद्दे जोर पकड़ने लगे | इस संदर्भ में 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों द्वारा ऑल पार्टी हील लीडर कॉन्फ्रेंस बनाया गया तथा असमिया भाषा के मुद्दे पर व्यापक विरोध-प्रदर्शन, हड़ताल आदि करना चालू कर दिया गया| अंततः 1969 में संविधान संशोधन के माध्यम से असम के अंदर मेघालय राज्य का निर्माण हुआ| 1972 में पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुनर्गठन के रूप में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा मणिपुर एवं त्रिपुरा के केंद्र शासित प्रदेशों को भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया| इस प्रकार, असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा का पुनर्गठन हुआ एवं जटिलता सिर्फ नागालैंडएवं मिजोरम में ही बची| मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी समूहों द्वारा हिंसक मार्ग अपनाया गया| परंतु सेना द्वारा इस समस्या को प्रभावशाली ढंग से सुलझाया गया एवं 1986 में मिजो नेशनल फ्रंट तथा भारत सरकार के मध्य शांति समझौते के फलस्वरूप 1987 में अलग मिजोरम राज्य का गठन हुआ | उसी प्रकार, नगालैंड के अलगाववादियों ने भी भारत संघ में एकीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया परंतु भारत सरकार द्वारा अलगाववाद तथा पृथकतावाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया| लंबी चली वार्ताओं एवं सैनिक कार्यवाहियों के बाद 1963 में अलग नागालैंड राज्य अस्तित्व में आया| इस प्रकार आधुनिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वरूप में आया जिसके एकीकरण में जनजातीय विविधता तथा भाषा का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था| हालांकि, अभी भी जनजातीय क्षेत्रों से स्वायत्तता एवं आजादी की मांग यदा-कदा उठती रहती है परंतु उनका जमीनी आधार काफी कम हो चुका है|
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वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से आप क्या समझते हैं? इस सन्दर्भ में लोक अदालत एवं स्थायी लोक अदालत की कार्यप्रणाली और महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द/10 अंक) What do you think of the Alternative Dispute Settlement Mechanism? Explain the working and importance of Lok Adalat in this context. (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में लोक अदालत और ग्राम न्यायालयों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र केअन्तर्गत विवाद समाधान की वे प्रक्रियाएँ और तकनीकें आती हैं जो विवाद में उलझे पक्षों को बिनाप्रक्रियात्मक मुकदमें के ही विवाद का समाधान खोजने में सहायता करतीं हैं| इसके अंतर्गत वर्गीय कार्यवाई, संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुलह और मध्यस्थता आदि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं | वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं सामान्य तौर पर कम खर्चीली और त्वरित स्वरुप की होती हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं इस रूप में विशिष्ट होती हैं कि ये वाद-प्रतिवादी की परिस्थिति को एक दूसरे को समझने का मौक़ा देती हैं| भारत में विभिन्न न्यायालयी इकाइयां वैकल्पिक विवाद निपटान तन्त्र के रूप में कार्य कर रही हैं| इनमें परिवार अदालत, लोक अदालत और ग्राम न्यायालय प्रमुख हैं| राष्ट्रीय लोक अदालत/स्थायी लोक अदालत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(NALSA)अधिनियम 1987 के अंतर्गत लोक अदालतों का गठन किया जाता है वर्ष 2002 में इसे संशोधित कर स्थायी लोक अदालत गठित करने की व्यवस्था की गयी| यह दिल्ली में स्थित है, यह उपभोग आधारित सेवाओं के क्षेत्र में उन मुकदमों को निपटाती है जो या तो अभी न्यायालय में लाये नहीं गए हैं या फिर निचली अदालतों में लंबित हैं यथा; परिवहन सेवाओं के मामले डाक-तार अथवा टेलीफोन सेवा के क्षेत्र में गठित अदालतें जल एवं विद्युत् आपूर्ति आदि के क्षेत्र गठित अदालतें साफ़-सफाई से सम्बन्धित मामले अस्पताल, औषधि वितरण केंद्र के मामले बीमा सम्बन्धी सेवाओं से उत्पन्न विवाद के मामले ग्राम न्यायालय ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के अंतर्गत पंचायतों के मध्यवर्ती स्तर जैसे क्षेत्र समितियां या ब्लाक स्तर पर ग्राम न्यायालय गठित करने की व्यवस्था की गई वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड और गोवा जैसे राज्यों में ये पंचायतें कार्य कर रही हैं इनका उद्देश्य ग्राम वासियों को घर बैठे ही उनके छोटे मोटे विवाद का निवारण कर उन्हें सरल एवं सुलभ न्याय दिलाना है ग्राम न्यायालयों को सिविल कोर्ट के अधिकार प्राप्त होते हैं अर्थात वह साक्ष्यों का परीक्षण कर सकता है, गवाहों से पूछताछ कर सकता है, अर्थ दंड लगा सकता है और पीड़ित व्यक्ति के पक्ष में फैसला भी दे सकता है प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ग्राम न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश होता है| यह न्यायिक मजिस्ट्रेट होता है जो राज्य सरकार द्वारा सम्बन्धित HC से परामर्श के बाद नियुक्त किया जाता है, इसके वेतन और भत्ते वही होते हैं जो उस राज्य में HC के अधीन किसी प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को दिए जाते हैं इसमें गाँव के स्तर पर उपजे विवाद जो जमीन-जायदाद, पारिवारिक झगडे तथा गाँव की सीमा को लेकर उपजे झगडे लाये जाते हैं और कम महत्त्व के आपराधिक मुकदमें भी ग्राम न्यायालयों में लाये जाते हैं ये विवाद आपसी बात चीत तथा मान-मनौवल के आधार पर हल किये जाते हैं इस न्यायालय का काउन्सिल/सलाहकार जो की प्रायः कोई वकील या सामाजिक कार्यकर्ता होता है घर-घर जा कर विवाद से जुड़े व्यक्तियों व परिवारों से बात कर उनकी राय लेता है और उन्हें समझा-बुझा कर न्यायालय तक लाता है ताकि विवाद को हल किया जा सके ऐसा करते हुए यह कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की शर्तों से बंधा नही होता जैसे बिना गवाही के किसी मुकदमें को हल किया जा सकता है इस प्रकार देखते हैं कि उपरोक्त प्रणालियाँ सहज एवं सर्वसुलभ आधार पर न्याय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाईया हैं| कानून और कानूनी मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अदालतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। अदालती समय की बढ़ती मांग को देखते हुए यह प्रयास किया जाना चाहिए कि अदालत में पहुंचने से पहले ही कुछ मामलों को वैकल्पिक तरीकों से सुलझा लिया जाए| इनकी कुछ सीमाएं जैसे घरेलू हिंसा से निपटने के सन्दर्भ में पर्याप्त शक्तियों से संपन्न न होना, कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता में कमी आदि का समाधान किया जाना चाहिए|ताकि भारत जैसे देश में जहाँ न्यायालय पर अतिरिक्त वादों का भार बढ़ता जा रहा है, वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र अपने औचित्य का सिद्ध कर सकें|
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##Question:वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से आप क्या समझते हैं? इस सन्दर्भ में लोक अदालत एवं स्थायी लोक अदालत की कार्यप्रणाली और महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द/10 अंक) What do you think of the Alternative Dispute Settlement Mechanism? Explain the working and importance of Lok Adalat in this context. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में लोक अदालत और ग्राम न्यायालयों का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र केअन्तर्गत विवाद समाधान की वे प्रक्रियाएँ और तकनीकें आती हैं जो विवाद में उलझे पक्षों को बिनाप्रक्रियात्मक मुकदमें के ही विवाद का समाधान खोजने में सहायता करतीं हैं| इसके अंतर्गत वर्गीय कार्यवाई, संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुलह और मध्यस्थता आदि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं | वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं सामान्य तौर पर कम खर्चीली और त्वरित स्वरुप की होती हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं इस रूप में विशिष्ट होती हैं कि ये वाद-प्रतिवादी की परिस्थिति को एक दूसरे को समझने का मौक़ा देती हैं| भारत में विभिन्न न्यायालयी इकाइयां वैकल्पिक विवाद निपटान तन्त्र के रूप में कार्य कर रही हैं| इनमें परिवार अदालत, लोक अदालत और ग्राम न्यायालय प्रमुख हैं| राष्ट्रीय लोक अदालत/स्थायी लोक अदालत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(NALSA)अधिनियम 1987 के अंतर्गत लोक अदालतों का गठन किया जाता है वर्ष 2002 में इसे संशोधित कर स्थायी लोक अदालत गठित करने की व्यवस्था की गयी| यह दिल्ली में स्थित है, यह उपभोग आधारित सेवाओं के क्षेत्र में उन मुकदमों को निपटाती है जो या तो अभी न्यायालय में लाये नहीं गए हैं या फिर निचली अदालतों में लंबित हैं यथा; परिवहन सेवाओं के मामले डाक-तार अथवा टेलीफोन सेवा के क्षेत्र में गठित अदालतें जल एवं विद्युत् आपूर्ति आदि के क्षेत्र गठित अदालतें साफ़-सफाई से सम्बन्धित मामले अस्पताल, औषधि वितरण केंद्र के मामले बीमा सम्बन्धी सेवाओं से उत्पन्न विवाद के मामले ग्राम न्यायालय ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के अंतर्गत पंचायतों के मध्यवर्ती स्तर जैसे क्षेत्र समितियां या ब्लाक स्तर पर ग्राम न्यायालय गठित करने की व्यवस्था की गई वर्तमान में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड और गोवा जैसे राज्यों में ये पंचायतें कार्य कर रही हैं इनका उद्देश्य ग्राम वासियों को घर बैठे ही उनके छोटे मोटे विवाद का निवारण कर उन्हें सरल एवं सुलभ न्याय दिलाना है ग्राम न्यायालयों को सिविल कोर्ट के अधिकार प्राप्त होते हैं अर्थात वह साक्ष्यों का परीक्षण कर सकता है, गवाहों से पूछताछ कर सकता है, अर्थ दंड लगा सकता है और पीड़ित व्यक्ति के पक्ष में फैसला भी दे सकता है प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ग्राम न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश होता है| यह न्यायिक मजिस्ट्रेट होता है जो राज्य सरकार द्वारा सम्बन्धित HC से परामर्श के बाद नियुक्त किया जाता है, इसके वेतन और भत्ते वही होते हैं जो उस राज्य में HC के अधीन किसी प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को दिए जाते हैं इसमें गाँव के स्तर पर उपजे विवाद जो जमीन-जायदाद, पारिवारिक झगडे तथा गाँव की सीमा को लेकर उपजे झगडे लाये जाते हैं और कम महत्त्व के आपराधिक मुकदमें भी ग्राम न्यायालयों में लाये जाते हैं ये विवाद आपसी बात चीत तथा मान-मनौवल के आधार पर हल किये जाते हैं इस न्यायालय का काउन्सिल/सलाहकार जो की प्रायः कोई वकील या सामाजिक कार्यकर्ता होता है घर-घर जा कर विवाद से जुड़े व्यक्तियों व परिवारों से बात कर उनकी राय लेता है और उन्हें समझा-बुझा कर न्यायालय तक लाता है ताकि विवाद को हल किया जा सके ऐसा करते हुए यह कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की शर्तों से बंधा नही होता जैसे बिना गवाही के किसी मुकदमें को हल किया जा सकता है इस प्रकार देखते हैं कि उपरोक्त प्रणालियाँ सहज एवं सर्वसुलभ आधार पर न्याय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाईया हैं| कानून और कानूनी मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अदालतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। अदालती समय की बढ़ती मांग को देखते हुए यह प्रयास किया जाना चाहिए कि अदालत में पहुंचने से पहले ही कुछ मामलों को वैकल्पिक तरीकों से सुलझा लिया जाए| इनकी कुछ सीमाएं जैसे घरेलू हिंसा से निपटने के सन्दर्भ में पर्याप्त शक्तियों से संपन्न न होना, कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता में कमी आदि का समाधान किया जाना चाहिए|ताकि भारत जैसे देश में जहाँ न्यायालय पर अतिरिक्त वादों का भार बढ़ता जा रहा है, वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र अपने औचित्य का सिद्ध कर सकें|
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"भारत -चीन संबंधों में अनेक विवादित मुद्दों के होते हुए भी सहयोग के तत्व मौजूद हैं |" इस कथन की समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Despite the many controversial issues in India-China relations, there are elements of co-operation. Analyze this statement. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच- भूमिका में भारत -चीन संबंधों के महत्व को बताते हुए चीन का सामान्य परिचय दीजिये | भारत -चीन के विवादित मुद्दों को रेखांकित कीजिये | इसके बाद भारत- चीन संबंधों में सहयोग के आयाम का भी उल्लेख कीजिये | अंत सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चीन भारत का पड़ोसी देश है , जो भारत के साथ लगभग 3,488 किलोमीटर की कुल सीमा साझा करता है | 30 दिसंबर 1949 : पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना द्वारा 1 अक्टूबर को की गयी उद्घोषणा के बाद भारत , चीन को मान्यता देने वाला प्रथम देश बना | चीन के निर्माण के बाद इसने अपने विकास की गति को निरंतर बनाये रखा है | विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में चीन का अपना प्रमुख स्थान है | पडोसी देश होने के नाते चीन भारत के लिए बहुत महत्व रखता है, साथ ही चुनौतियों का भी सामना भारत को करना पड़ता है | एशिया महाद्वीप में चीन अपने प्रभाव को निरंतर बढाता जा रहा है | इस सन्दर्भ में भारत के साथ चीन के सम्बन्ध उतार- चढाव भरे रहे हैं | भारत -चीन संबंधो में कुछ विवादित मुद्दों को यहाँ रेखांकित किया जा सकता है | भारत -चीन विवादित मुद्दे व्यापर असंतुलन - चीन का व्यापर संतुलन भारत से अच्छा है | भारत को इसमें घाटे की स्थिति है | नदी-जल विवाद - ब्रह्मपुत्र नदी जल विवाद | सीमा विवाद - मैकमोहन रेखा, डोकलाम विवाद, मैकडोनाल्ड लाइन आदि दलाईलामा और तिब्बत को लेकर विवाद स्टेपल वीजा को लेकर विवाद भूटान और नेपाल में चीन का बढ़ता दखल स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स ( हिन्द महासागर में भारत को घेरने की रणनीति) क्वाड्रीलेटरल डायलॉग वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटीव को लेकर भारत की असहमति आतंकवाद को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में चीन का अडंगा, आदि इन विवादित मुद्दों के होने के बावजूद भारत और चीन में सहयोग के भी आयाम बहुत से हैं | इन सहयोगात्मक मुद्दों को अपनाकर भारत -चीन अपने विकास पथ पर निरंतर अग्रसर हो सकते हैं | भारत -चीन बहुपक्षीय सहयोग के आयाम - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-चीन कई मुद्दों पर बहुपक्षीय मंचों पर वार्ता करते रहे हैं | सहयोग के ऐसे कई उदहारण निम्नलिखित हैं - बीसीआईएम (BCIM)- बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक गलियारे के माध्यम से क्षेत्रीय जुड़ाव हेतु वार्ताओं में शामिल हो रहे हैं | ब्रिक्स (BRICS) - पारस्परिक चिंताओं के मुद्दे पर बहुपक्षीय सहयोग हेतु यह एक मंच है , जिसमे रूस , ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका भी शमिल है | बेसिक (BASIC) - चार बड़े व नए औद्योगिक देशों (भारत, चीन ,ब्राजील, द.अफ्रीका) के गुट का एक समझौता है | बेसिक संयुक्त रूप से कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मलेन हेतु कार्य करने बनाया गया है | रिक (RIC) - रूस , भारत , चीन के विदेशमंत्री स्तर का फोरम है | प्रमुख वैश्विक मुद्दों - जैसे-कट्टरपंथी विचार , आतंकवाद आदि को सुलझाने का माध्यम है | एससीओ(SCO)- मध्य एशिया आधारित संगठन जिसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद का सामना करना है, भारत और चीन इसके सदस्य देश हैं | इन संगठनों के अतिरिक्त भारत और चीन कई और संगठनो और मंचो पर एक दूसरे से सहयोग कर रहे हैं, जैसे - AIIB , G-20 और UNSC में चीन के सहयोग की अपेक्षा है भारत को | आगे की राह - भारत और चीन एशिया की बड़ी शक्तियां हैं, दोनों देशों को आपस में विवादित मुद्दों को सुलझाकर आगे बढ़ना चाहिए | सहयोग के अन्य आयामों को अपनाना चाहिए | आज चीन अपनी व्यापर और विनिर्माण के लिए विश्व में प्रमुख स्थान रखता है , चीन के वस्तुओं के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है , भारत को भी चाहिए की चीन के सहयोग से अपने व्यापार को गति दे | दोनों देशों के सहयोग से ही उनकी प्रगति हो सकती है |
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##Question:"भारत -चीन संबंधों में अनेक विवादित मुद्दों के होते हुए भी सहयोग के तत्व मौजूद हैं |" इस कथन की समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Despite the many controversial issues in India-China relations, there are elements of co-operation. Analyze this statement. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भूमिका में भारत -चीन संबंधों के महत्व को बताते हुए चीन का सामान्य परिचय दीजिये | भारत -चीन के विवादित मुद्दों को रेखांकित कीजिये | इसके बाद भारत- चीन संबंधों में सहयोग के आयाम का भी उल्लेख कीजिये | अंत सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चीन भारत का पड़ोसी देश है , जो भारत के साथ लगभग 3,488 किलोमीटर की कुल सीमा साझा करता है | 30 दिसंबर 1949 : पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना द्वारा 1 अक्टूबर को की गयी उद्घोषणा के बाद भारत , चीन को मान्यता देने वाला प्रथम देश बना | चीन के निर्माण के बाद इसने अपने विकास की गति को निरंतर बनाये रखा है | विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में चीन का अपना प्रमुख स्थान है | पडोसी देश होने के नाते चीन भारत के लिए बहुत महत्व रखता है, साथ ही चुनौतियों का भी सामना भारत को करना पड़ता है | एशिया महाद्वीप में चीन अपने प्रभाव को निरंतर बढाता जा रहा है | इस सन्दर्भ में भारत के साथ चीन के सम्बन्ध उतार- चढाव भरे रहे हैं | भारत -चीन संबंधो में कुछ विवादित मुद्दों को यहाँ रेखांकित किया जा सकता है | भारत -चीन विवादित मुद्दे व्यापर असंतुलन - चीन का व्यापर संतुलन भारत से अच्छा है | भारत को इसमें घाटे की स्थिति है | नदी-जल विवाद - ब्रह्मपुत्र नदी जल विवाद | सीमा विवाद - मैकमोहन रेखा, डोकलाम विवाद, मैकडोनाल्ड लाइन आदि दलाईलामा और तिब्बत को लेकर विवाद स्टेपल वीजा को लेकर विवाद भूटान और नेपाल में चीन का बढ़ता दखल स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स ( हिन्द महासागर में भारत को घेरने की रणनीति) क्वाड्रीलेटरल डायलॉग वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटीव को लेकर भारत की असहमति आतंकवाद को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में चीन का अडंगा, आदि इन विवादित मुद्दों के होने के बावजूद भारत और चीन में सहयोग के भी आयाम बहुत से हैं | इन सहयोगात्मक मुद्दों को अपनाकर भारत -चीन अपने विकास पथ पर निरंतर अग्रसर हो सकते हैं | भारत -चीन बहुपक्षीय सहयोग के आयाम - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-चीन कई मुद्दों पर बहुपक्षीय मंचों पर वार्ता करते रहे हैं | सहयोग के ऐसे कई उदहारण निम्नलिखित हैं - बीसीआईएम (BCIM)- बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक गलियारे के माध्यम से क्षेत्रीय जुड़ाव हेतु वार्ताओं में शामिल हो रहे हैं | ब्रिक्स (BRICS) - पारस्परिक चिंताओं के मुद्दे पर बहुपक्षीय सहयोग हेतु यह एक मंच है , जिसमे रूस , ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका भी शमिल है | बेसिक (BASIC) - चार बड़े व नए औद्योगिक देशों (भारत, चीन ,ब्राजील, द.अफ्रीका) के गुट का एक समझौता है | बेसिक संयुक्त रूप से कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मलेन हेतु कार्य करने बनाया गया है | रिक (RIC) - रूस , भारत , चीन के विदेशमंत्री स्तर का फोरम है | प्रमुख वैश्विक मुद्दों - जैसे-कट्टरपंथी विचार , आतंकवाद आदि को सुलझाने का माध्यम है | एससीओ(SCO)- मध्य एशिया आधारित संगठन जिसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद का सामना करना है, भारत और चीन इसके सदस्य देश हैं | इन संगठनों के अतिरिक्त भारत और चीन कई और संगठनो और मंचो पर एक दूसरे से सहयोग कर रहे हैं, जैसे - AIIB , G-20 और UNSC में चीन के सहयोग की अपेक्षा है भारत को | आगे की राह - भारत और चीन एशिया की बड़ी शक्तियां हैं, दोनों देशों को आपस में विवादित मुद्दों को सुलझाकर आगे बढ़ना चाहिए | सहयोग के अन्य आयामों को अपनाना चाहिए | आज चीन अपनी व्यापर और विनिर्माण के लिए विश्व में प्रमुख स्थान रखता है , चीन के वस्तुओं के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है , भारत को भी चाहिए की चीन के सहयोग से अपने व्यापार को गति दे | दोनों देशों के सहयोग से ही उनकी प्रगति हो सकती है |
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भारत -चीन संबंधों में अनेक विवादित मुद्दों के होते हुए भी सहयोग के तत्व मौजूद हैं | इस कथन की समीक्षा कीजिये | (200 शब्द) Despite the many controversial issues in India-China relations, there are elements of co-operation. Analyze this statement.
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एप्रोच- भूमिका में भारत -चीन संबंधों के महत्व को बताते हुए चीन का सामान्य परिचय दीजिये | भारत -चीन के विवादित मुद्दों को रेखांकित कीजिये | इसके बाद भारत- चीन संबंधों में सहयोग के आयाम का भी उल्लेख कीजिये | अंत सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चीन भारत का पड़ोसी देश है , जो भारत के साथ लगभग 3,488 किलोमीटर की कुल सीमा साझा करता है | 30 दिसंबर 1949 : पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना द्वारा 1 अक्टूबर को की गयी उद्घोषणा के बाद भारत , चीन को मान्यता देने वाला प्रथम देश बना | चीन के निर्माण के बाद इसने अपने विकास की गति को निरंतर बनाये रखा है | विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में चीन का अपना प्रमुख स्थान है | पडोसी देश होने के नाते चीन भारत के लिए बहुत महत्व रखता है, साथ ही चुनौतियों का भी सामना भारत को करना पड़ता है | एशिया महाद्वीप में चीन अपने प्रभाव को निरंतर बढाता जा रहा है | इस सन्दर्भ में भारत के साथ चीन के सम्बन्ध उतार- चढाव भरे रहे हैं | भारत -चीन संबंधो में कुछ विवादित मुद्दों को यहाँ रेखांकित किया जा सकता है | भारत -चीन विवादित मुद्दे व्यापर असंतुलन - चीन का व्यापर संतुलन भारत से अच्छा है | भारत को इसमें घाटे की स्थिति है | नदी-जल विवाद - ब्रह्मपुत्र नदी जल विवाद | सीमा विवाद - मैकमोहन रेखा, डोकलाम विवाद, मैकडोनाल्ड लाइन आदि दलाईलामा और तिब्बत को लेकर विवाद स्टेपल वीजा को लेकर विवाद भूटान और नेपाल में चीन का बढ़ता दखल स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स ( हिन्द महासागर में भारत को घेरने की रणनीति) क्वाड्रीलेटरल डायलॉग वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटीव को लेकर भारत की असहमति आतंकवाद को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में चीन का अडंगा, आदि | इन विवादित मुद्दों के होने के बावजूद भारत और चीन में सहयोग के भी आयाम बहुत से हैं | इन सहयोगात्मक मुद्दों को अपनाकर भारत -चीन अपने विकास पथ पर निरंतर अग्रसर हो सकते हैं | भारत -चीन बहुपक्षीय सहयोग के आयाम - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-चीन कई मुद्दों पर बहुपक्षीय मंचों पर वार्ता करते रहे हैं | सहयोग के ऐसे कई उदहारण निम्नलिखित हैं - बीसीआईएम (BCIM)- बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक गलियारे के माध्यम से क्षेत्रीय जुड़ाव हेतु वार्ताओं में शामिल हो रहे हैं | ब्रिक्स (BRICS) -पारस्परिक चिंताओं के मुद्दे पर बहुपक्षीय सहयोग हेतु यह एक मंच है , जिसमे रूस , ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका भी शमिल है | बेसिक (BASIC) -चार बड़े व नए औद्योगिक देशों (भारत, चीन ,ब्राजील, द.अफ्रीका) के गुट का एक समझौता है | बेसिक संयुक्त रूप से कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मलेन हेतु कार्य करने बनाया गया है| रिक (RIC) - रूस , भारत , चीन के विदेशमंत्री स्तर का फोरम है | प्रमुख वैश्विक मुद्दों - जैसे-कट्टरपंथी विचार , आतंकवाद आदि को सुलझाने का माध्यम है | एससीओ(SCO) -मध्य एशिया आधारित संगठन जिसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद का सामना करना है, भारत और चीन इसके सदस्य देश हैं | इन संगठनों के अतिरिक्त भारत और चीन कई और संगठनो और मंचो पर एक दूसरे से सहयोग कर रहे हैं, जैसे - AIIB , G-20 और UNSC में चीन के सहयोग की अपेक्षा है भारत को | आगे की राह - भारत और चीन एशिया की बड़ी शक्तियां हैं, दोनों देशों को आपस में विवादित मुद्दों को सुलझाकर आगे बढ़ना चाहिए | सहयोग के अन्य आयामों को अपनाना चाहिए | आज चीन अपनी व्यापर और विनिर्माण के लिए विश्व में प्रमुख स्थान रखता है , चीन के वस्तुओं के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है , भारत को भी चाहिए की चीन के सहयोग से अपने व्यापार को गति दे | दोनों देशों के सहयोग से ही उनकी प्रगति हो सकती है |
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##Question:भारत -चीन संबंधों में अनेक विवादित मुद्दों के होते हुए भी सहयोग के तत्व मौजूद हैं | इस कथन की समीक्षा कीजिये | (200 शब्द) Despite the many controversial issues in India-China relations, there are elements of co-operation. Analyze this statement.##Answer:एप्रोच- भूमिका में भारत -चीन संबंधों के महत्व को बताते हुए चीन का सामान्य परिचय दीजिये | भारत -चीन के विवादित मुद्दों को रेखांकित कीजिये | इसके बाद भारत- चीन संबंधों में सहयोग के आयाम का भी उल्लेख कीजिये | अंत सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चीन भारत का पड़ोसी देश है , जो भारत के साथ लगभग 3,488 किलोमीटर की कुल सीमा साझा करता है | 30 दिसंबर 1949 : पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना द्वारा 1 अक्टूबर को की गयी उद्घोषणा के बाद भारत , चीन को मान्यता देने वाला प्रथम देश बना | चीन के निर्माण के बाद इसने अपने विकास की गति को निरंतर बनाये रखा है | विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में चीन का अपना प्रमुख स्थान है | पडोसी देश होने के नाते चीन भारत के लिए बहुत महत्व रखता है, साथ ही चुनौतियों का भी सामना भारत को करना पड़ता है | एशिया महाद्वीप में चीन अपने प्रभाव को निरंतर बढाता जा रहा है | इस सन्दर्भ में भारत के साथ चीन के सम्बन्ध उतार- चढाव भरे रहे हैं | भारत -चीन संबंधो में कुछ विवादित मुद्दों को यहाँ रेखांकित किया जा सकता है | भारत -चीन विवादित मुद्दे व्यापर असंतुलन - चीन का व्यापर संतुलन भारत से अच्छा है | भारत को इसमें घाटे की स्थिति है | नदी-जल विवाद - ब्रह्मपुत्र नदी जल विवाद | सीमा विवाद - मैकमोहन रेखा, डोकलाम विवाद, मैकडोनाल्ड लाइन आदि दलाईलामा और तिब्बत को लेकर विवाद स्टेपल वीजा को लेकर विवाद भूटान और नेपाल में चीन का बढ़ता दखल स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स ( हिन्द महासागर में भारत को घेरने की रणनीति) क्वाड्रीलेटरल डायलॉग वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटीव को लेकर भारत की असहमति आतंकवाद को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में चीन का अडंगा, आदि | इन विवादित मुद्दों के होने के बावजूद भारत और चीन में सहयोग के भी आयाम बहुत से हैं | इन सहयोगात्मक मुद्दों को अपनाकर भारत -चीन अपने विकास पथ पर निरंतर अग्रसर हो सकते हैं | भारत -चीन बहुपक्षीय सहयोग के आयाम - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-चीन कई मुद्दों पर बहुपक्षीय मंचों पर वार्ता करते रहे हैं | सहयोग के ऐसे कई उदहारण निम्नलिखित हैं - बीसीआईएम (BCIM)- बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक गलियारे के माध्यम से क्षेत्रीय जुड़ाव हेतु वार्ताओं में शामिल हो रहे हैं | ब्रिक्स (BRICS) -पारस्परिक चिंताओं के मुद्दे पर बहुपक्षीय सहयोग हेतु यह एक मंच है , जिसमे रूस , ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका भी शमिल है | बेसिक (BASIC) -चार बड़े व नए औद्योगिक देशों (भारत, चीन ,ब्राजील, द.अफ्रीका) के गुट का एक समझौता है | बेसिक संयुक्त रूप से कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मलेन हेतु कार्य करने बनाया गया है| रिक (RIC) - रूस , भारत , चीन के विदेशमंत्री स्तर का फोरम है | प्रमुख वैश्विक मुद्दों - जैसे-कट्टरपंथी विचार , आतंकवाद आदि को सुलझाने का माध्यम है | एससीओ(SCO) -मध्य एशिया आधारित संगठन जिसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद का सामना करना है, भारत और चीन इसके सदस्य देश हैं | इन संगठनों के अतिरिक्त भारत और चीन कई और संगठनो और मंचो पर एक दूसरे से सहयोग कर रहे हैं, जैसे - AIIB , G-20 और UNSC में चीन के सहयोग की अपेक्षा है भारत को | आगे की राह - भारत और चीन एशिया की बड़ी शक्तियां हैं, दोनों देशों को आपस में विवादित मुद्दों को सुलझाकर आगे बढ़ना चाहिए | सहयोग के अन्य आयामों को अपनाना चाहिए | आज चीन अपनी व्यापर और विनिर्माण के लिए विश्व में प्रमुख स्थान रखता है , चीन के वस्तुओं के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है , भारत को भी चाहिए की चीन के सहयोग से अपने व्यापार को गति दे | दोनों देशों के सहयोग से ही उनकी प्रगति हो सकती है |
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Identify the significance of River waters in India-China Relations. Highlight major concerns India has. Also, suggest a way forward to adequately manage and resolve the issues involved. (10Marks/ 150words)
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Brief Approach 1. Introduce the answer by briefly highlighting the significance of river waters in India-china relations. 2. Highlight major issues/concerns India has related to these river systems. 3. Suggest suitable solutions. 4. Give an appropriate conclusion. Answer: India and China share major River systems such as the Indus and the Brahmaputra, known as the Yarlung Tsangpo in Tibet before it enters India. At about 2900 kilometers long, the Brahmaputra is an important river for irrigation, hydroelectricity generation, and transportation for both India and China. However, there are major concerns/issues regarding these river systems between the two countries. Issues: 1. No comprehensive river water agreement between the two countries, unlike Indus Water Treaty between India- Pakistan. 2. Even though the two countries have agreements that require the upstream country(China) to share hydrological data of the Brahmaputra river during the Monsoon season, it is not sufficient as: (a) It is limited only to the Monsoon season and not pertaining to the rest of the year. (b) In some years, such as 2017, India did not receive any hydrological data despite the agreement. Delhi has also asked for data for non-monsoonal flows of the river because there are suspicions in India that China could divert the waters of the Brahmaputra to its parched regions during dry seasons. 3. There are concerns with Chinese dam-building activities upstream of the Brahmaputra river. For example, Jiexu, Zangmu dam, etc. It has raised concerns such as: (a) Possibility of divergence of water, thus issue of flooding in lower riparian areas, like North-eastern states of India. (b) Effect on Ecology. For example, in 2017 the issue of the pollution of the Siang river contaminated the flow of the Brahmaputra in Assam. Solutions: 1. Long-Term Solution: Comprehensive River water agreement with China. 2. Better information sharing of existing agreements and expansion of the agreements. 3. Augment measurement and monitoring capabilities. For example, the use of satellites, effective hydrological mapping, etc to enhance India’s capabilities. 4. Basin Management approach to effectively handle concerns/issues related to river waters between the two countries. Thus need for an hour, is both a long-term and interim solution to address concerns related to sharing of river systems between the two countries.
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##Question:Identify the significance of River waters in India-China Relations. Highlight major concerns India has. Also, suggest a way forward to adequately manage and resolve the issues involved. (10Marks/ 150words)##Answer:Brief Approach 1. Introduce the answer by briefly highlighting the significance of river waters in India-china relations. 2. Highlight major issues/concerns India has related to these river systems. 3. Suggest suitable solutions. 4. Give an appropriate conclusion. Answer: India and China share major River systems such as the Indus and the Brahmaputra, known as the Yarlung Tsangpo in Tibet before it enters India. At about 2900 kilometers long, the Brahmaputra is an important river for irrigation, hydroelectricity generation, and transportation for both India and China. However, there are major concerns/issues regarding these river systems between the two countries. Issues: 1. No comprehensive river water agreement between the two countries, unlike Indus Water Treaty between India- Pakistan. 2. Even though the two countries have agreements that require the upstream country(China) to share hydrological data of the Brahmaputra river during the Monsoon season, it is not sufficient as: (a) It is limited only to the Monsoon season and not pertaining to the rest of the year. (b) In some years, such as 2017, India did not receive any hydrological data despite the agreement. Delhi has also asked for data for non-monsoonal flows of the river because there are suspicions in India that China could divert the waters of the Brahmaputra to its parched regions during dry seasons. 3. There are concerns with Chinese dam-building activities upstream of the Brahmaputra river. For example, Jiexu, Zangmu dam, etc. It has raised concerns such as: (a) Possibility of divergence of water, thus issue of flooding in lower riparian areas, like North-eastern states of India. (b) Effect on Ecology. For example, in 2017 the issue of the pollution of the Siang river contaminated the flow of the Brahmaputra in Assam. Solutions: 1. Long-Term Solution: Comprehensive River water agreement with China. 2. Better information sharing of existing agreements and expansion of the agreements. 3. Augment measurement and monitoring capabilities. For example, the use of satellites, effective hydrological mapping, etc to enhance India’s capabilities. 4. Basin Management approach to effectively handle concerns/issues related to river waters between the two countries. Thus need for an hour, is both a long-term and interim solution to address concerns related to sharing of river systems between the two countries.
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Identify Significance of River waters in India-China Relations.Highlight major concerns India has.Also, suggest way forward to adequately manage and resolve the issues involved?(150 words/10 Marks)
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Brief Approach 1. Introduce the answer by briefly highlighting significance of river waters in India-china relations. 2. Highlight major issues/concerns India has related to these river systems. 3. Suggest suitable solutions. 4. Give appropriate conclusion. Answer : India and China share major River systems such as the Indus and the Brahmaputra, known as the Yarlung Tsangpo in Tibet before it enters India. At about 2900 kilometers long, the Brahmaputra is an important river for irrigation, hydroelectricity generation and transportation for both India and China. However, there are major concerns/issues regarding these river systems between the two countries. Issues 1. No comprehensive river water agreement between the two countries, unlike Indus water Treaty between India- Pakistan. 2. Even though the two countries have agreements that requires upstream country(China) to share hydrological data of Brahmaputra river during Monsoon season, it is not sufficient as: (a) It is limited only to the Monsoon season and not pertaining to rest of the year. (b) In some years, such as 2017, India did not receive any hydrological data despite the agreement. Delhi has also asked for data for non-monsoonal flows of the river, because there are suspicions in India that China could divert the waters of the Brahmaputra to its parched regions during dry seasons. 3. There are concerns with Chinese dam building activities on upstream of Brahmaputra river. For example, Jiexu, Zangmu dam etc. It has raised concerns such as: (a) Possibility of divergence of water, thus issue of flooding in lower riparian areas, like North-eastern states of India. (b) Effect on Ecology. For example, in 2017 the issue of the pollution of the Siang river which contaminated the flow of the Brahmaputra in Assam. Solutions 1. Long Term Solution: Comprehensive River water agreement with China. 2. Better information sharing of existing agreements and expansion of the agreements. 3. Augment measurement and monitoring capabilities. For example, use of satellite, effective hydrological mapping etc to enhance India’s capabilities. 4. Basin Management approach to effectively handle concerns/issues related to river waters between the two countries. Thus need of an hour, is both long term and interim solutions to address concerns related to sharing of river systems between the two countries.
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##Question:Identify Significance of River waters in India-China Relations.Highlight major concerns India has.Also, suggest way forward to adequately manage and resolve the issues involved?(150 words/10 Marks)##Answer:Brief Approach 1. Introduce the answer by briefly highlighting significance of river waters in India-china relations. 2. Highlight major issues/concerns India has related to these river systems. 3. Suggest suitable solutions. 4. Give appropriate conclusion. Answer : India and China share major River systems such as the Indus and the Brahmaputra, known as the Yarlung Tsangpo in Tibet before it enters India. At about 2900 kilometers long, the Brahmaputra is an important river for irrigation, hydroelectricity generation and transportation for both India and China. However, there are major concerns/issues regarding these river systems between the two countries. Issues 1. No comprehensive river water agreement between the two countries, unlike Indus water Treaty between India- Pakistan. 2. Even though the two countries have agreements that requires upstream country(China) to share hydrological data of Brahmaputra river during Monsoon season, it is not sufficient as: (a) It is limited only to the Monsoon season and not pertaining to rest of the year. (b) In some years, such as 2017, India did not receive any hydrological data despite the agreement. Delhi has also asked for data for non-monsoonal flows of the river, because there are suspicions in India that China could divert the waters of the Brahmaputra to its parched regions during dry seasons. 3. There are concerns with Chinese dam building activities on upstream of Brahmaputra river. For example, Jiexu, Zangmu dam etc. It has raised concerns such as: (a) Possibility of divergence of water, thus issue of flooding in lower riparian areas, like North-eastern states of India. (b) Effect on Ecology. For example, in 2017 the issue of the pollution of the Siang river which contaminated the flow of the Brahmaputra in Assam. Solutions 1. Long Term Solution: Comprehensive River water agreement with China. 2. Better information sharing of existing agreements and expansion of the agreements. 3. Augment measurement and monitoring capabilities. For example, use of satellite, effective hydrological mapping etc to enhance India’s capabilities. 4. Basin Management approach to effectively handle concerns/issues related to river waters between the two countries. Thus need of an hour, is both long term and interim solutions to address concerns related to sharing of river systems between the two countries.
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"उत्तर-पश्चिम भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए अंग्रेजों को अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा।" इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) "For the expansion of empire in northwestern India, the British had to face many wars." Analyze this statement. (150-200 words/10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर पश्चिम भारत में साम्राज्य विस्तार की तत्कालीन स्थिति का विवरण देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। इसके बाद क्रमिक रूप से अफगान, सिंध, पंजाब आदि युद्धों का विवरण देते हुए उनके परिणामों का विश्लेषण कीजिए। अंत में युद्धों का समग्र परिणाम लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। भारत के उत्तरवर्ती शासकों ने एक वैज्ञानिक सीमा की खोज में अफगानिस्तान एवं सिंधु नदी के बीच स्थित प्रदेश में पहुँचने तथा आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया। इस समय तक अंग्रेज़ मध्य, पूर्वी तथा दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य विस्तार में लगे हुए थे। अंग्रेज़ अपने आपको आंतरिक रूप से तो मजबूत करना ही चाहते थे साथ में वाह्य आक्रमणों को रोकने के लिए भी सीमाओं की सुरक्षा का प्रयास कर रहे थे। इसी उद्देश्य से उन्होने उत्तर-पश्चिम भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए प्रयास किया। हालांकि इस क्षेत्र में उनका यह प्रयास इतना आसान नहीं था। विभिन्न शक्तिशाली राजाओं से युद्ध के सामना करना पड़ा जिसमें उन्हे पहले पराजय भी झेलना पड़ा। इन युद्धों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अफगानिस्तान के विरुद्ध युद्ध: रूसी साम्राज्यवाद के डर से अफगानिस्तान के विरुद्ध 1839-42 के बीच युद्ध किया गया। अफगान उस समय का अत्यंत ही समृद्ध, शक्तिशाली तथा सैनिक क्षमता से परिपूर्ण क्षेत्र था। प्रथम अफगान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय हुई। इसके पश्चात अंग्रेजों ने अकर्मण्यता की नीति अपनायी। इसके अंतर्गत अफगानों के साथ सहयोग स्थापित हुआ। सिंध विजय: गौरतलब है कि अफगान युद्ध के समय सिंध ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसके बावजूद भी अंग्रेजों ने सिंध को जीता। इसका कारण था कि अंग्रेजों का प्रमुख उद्देश्य साम्राज्य विस्तार था साथ में अफगान युद्ध में पराजय से ब्रिटिश को ठेंस पहुंचा था। वे सिंध पर विजय के माध्यम से अपनी खोयी प्रतिष्ठा पाना चाहते थे इस युद्ध के पश्चात उत्तर-पश्चिम भारत में अंग्रेजों को साम्राज्य विस्तार में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली। दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर भारत तक उनका प्रसार साम्राज्यवादी जड़ों को मजबूत किया। अंग्रेजों एवं सिखों में युद्ध: पंजाब उस समय का एक अत्यंत ही शक्तिशाली साम्राज्य हुआ करता करता था। तत्कालीन शासक रंजीत सिंह कि मृत्यु के पश्चात दो आंग्ल सिख युद्ध हुए। यह ब्रिटिश के लिए अंतिम निर्णायक युद्ध साबित हुआ जिसके माध्यम से उत्तर-पश्चिम भारत में उनकी विजय आसान हो गयी। रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात इस प्रदेश के सामरिक महत्व ने इसे जीतने के लिए अंग्रेजों को उकसाया। प्रथम युद्ध में लाहौर की संधि के साथ अप्रत्यक्ष किया गया तथा दूसरे युद्ध में पूरे पंजाब पर अधिकार हो गया। उपरोक्त युद्धों के बाद सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र में अंग्रेजों का प्रभाव स्थापित हो गया। आंतरिक रूप से उन्हे चुनौती देने वाली भी कोई शक्ति मौजूद नहीं थी। अब अंग्रेजों ने न केवल युद्धों के माध्यम से बल्कि प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक प्रत्येक क्षेत्र में नीतियों के माध्यम से भारत पर शासन करना प्रारम्भ कर दिया।
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##Question:"उत्तर-पश्चिम भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए अंग्रेजों को अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा।" इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) "For the expansion of empire in northwestern India, the British had to face many wars." Analyze this statement. (150-200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर पश्चिम भारत में साम्राज्य विस्तार की तत्कालीन स्थिति का विवरण देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। इसके बाद क्रमिक रूप से अफगान, सिंध, पंजाब आदि युद्धों का विवरण देते हुए उनके परिणामों का विश्लेषण कीजिए। अंत में युद्धों का समग्र परिणाम लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। भारत के उत्तरवर्ती शासकों ने एक वैज्ञानिक सीमा की खोज में अफगानिस्तान एवं सिंधु नदी के बीच स्थित प्रदेश में पहुँचने तथा आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया। इस समय तक अंग्रेज़ मध्य, पूर्वी तथा दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य विस्तार में लगे हुए थे। अंग्रेज़ अपने आपको आंतरिक रूप से तो मजबूत करना ही चाहते थे साथ में वाह्य आक्रमणों को रोकने के लिए भी सीमाओं की सुरक्षा का प्रयास कर रहे थे। इसी उद्देश्य से उन्होने उत्तर-पश्चिम भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए प्रयास किया। हालांकि इस क्षेत्र में उनका यह प्रयास इतना आसान नहीं था। विभिन्न शक्तिशाली राजाओं से युद्ध के सामना करना पड़ा जिसमें उन्हे पहले पराजय भी झेलना पड़ा। इन युद्धों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अफगानिस्तान के विरुद्ध युद्ध: रूसी साम्राज्यवाद के डर से अफगानिस्तान के विरुद्ध 1839-42 के बीच युद्ध किया गया। अफगान उस समय का अत्यंत ही समृद्ध, शक्तिशाली तथा सैनिक क्षमता से परिपूर्ण क्षेत्र था। प्रथम अफगान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय हुई। इसके पश्चात अंग्रेजों ने अकर्मण्यता की नीति अपनायी। इसके अंतर्गत अफगानों के साथ सहयोग स्थापित हुआ। सिंध विजय: गौरतलब है कि अफगान युद्ध के समय सिंध ने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसके बावजूद भी अंग्रेजों ने सिंध को जीता। इसका कारण था कि अंग्रेजों का प्रमुख उद्देश्य साम्राज्य विस्तार था साथ में अफगान युद्ध में पराजय से ब्रिटिश को ठेंस पहुंचा था। वे सिंध पर विजय के माध्यम से अपनी खोयी प्रतिष्ठा पाना चाहते थे इस युद्ध के पश्चात उत्तर-पश्चिम भारत में अंग्रेजों को साम्राज्य विस्तार में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली। दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर भारत तक उनका प्रसार साम्राज्यवादी जड़ों को मजबूत किया। अंग्रेजों एवं सिखों में युद्ध: पंजाब उस समय का एक अत्यंत ही शक्तिशाली साम्राज्य हुआ करता करता था। तत्कालीन शासक रंजीत सिंह कि मृत्यु के पश्चात दो आंग्ल सिख युद्ध हुए। यह ब्रिटिश के लिए अंतिम निर्णायक युद्ध साबित हुआ जिसके माध्यम से उत्तर-पश्चिम भारत में उनकी विजय आसान हो गयी। रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात इस प्रदेश के सामरिक महत्व ने इसे जीतने के लिए अंग्रेजों को उकसाया। प्रथम युद्ध में लाहौर की संधि के साथ अप्रत्यक्ष किया गया तथा दूसरे युद्ध में पूरे पंजाब पर अधिकार हो गया। उपरोक्त युद्धों के बाद सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र में अंग्रेजों का प्रभाव स्थापित हो गया। आंतरिक रूप से उन्हे चुनौती देने वाली भी कोई शक्ति मौजूद नहीं थी। अब अंग्रेजों ने न केवल युद्धों के माध्यम से बल्कि प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक प्रत्येक क्षेत्र में नीतियों के माध्यम से भारत पर शासन करना प्रारम्भ कर दिया।
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"वर्तमान में भारत में महिलाएं विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं गणित के क्षेत्र में शिक्षित हो रही हैंलेकिन महिला वैज्ञानिकों की कमी है।" इस संदर्भ में महिला वैज्ञानिकों की कमी के कारणों का उल्लेख करते हुए, साथ में उनके उपायों पर भी चर्चा कीजिए।(200 शब्द) Presently, in India women are being educated in the field of science, technology, medicine, and mathematics but lack of women scientists.In this context, discuss the causes of the lack of women scientists and discuss their measures. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में महिलाओं की विज्ञान शिक्षा तक पहुँच के कुछ तथ्य या डाटा दीजिए। तत्पश्चात, उन बाधाओं का वर्णन कीजिए जो महिलाओं को विज्ञान की शिक्षा की पहुँच से दूर करती हैं। उसके बाद उन बाधाओं को दूर करने के उपायों को सुझाइए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- हाल ही में मणिपुर विश्वविद्यालय में आयोजित महिला साइंस कांग्रेस के उद्घाटन के अवसर पर केवल दो महिलाओं की मौजूदगी , महिलाओं की सांइस के क्षेत्र में कमी एवं उनके द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को दर्शाता है।विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों केवैज्ञानिक संकाय में केवल 25% महिलाएं ही हैं, हालाँकिजैविक अनुसंधान संस्थान इसकाएक अपवाद हैं। महिला वैज्ञानिकों की कमी के कारण/बाधाएँ या रुकावटें:- फिजिकल बाधाएं:- ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल और कॉलेजों का घर से अधिक दूरी पर होना, ट्रांसपोर्ट सुविधाओं की अनुपलब्धता, विज्ञान के कोर्सेज की स्कूलों व कॉलेजों में अनुपलब्धता, हॉस्टल सुविधाओं का अपर्याप्त या खस्ताहाल होना इत्यादि रुकावटें महिलाओं के विज्ञान की शिक्षा तक पहुँच को रोकती हैं और यह महिला वैज्ञानिकों की कमी का कारण बनता है। सामाजिक बाधाएं:- लड़कियों तथा लिंग के प्रति पूर्वाग्रह रखना, गरीब परिवार की लड़कियां घर के कामों एवं बच्चों को देखभाल में लग जाती है। लड़की को अधिक पढ़ाना, अधिक स्वतंत्रता देना अनैतिक एवं परिवार की गरिमा को ठेंस पहुँचाने वाला समझा जाता है। उदाहरण के लिए अभी हाल ही में अलवर में एक महिला द्वारा घर से बाहर काम पर जाने से उसके ससूर द्वारा कोल्ड बल्डेड मर्डर कर दिया गया। आर्थिक बाधाएं:- सीमित आर्थिक संसाधन तथा वित्तीय तंगी से महिलाओं एवं बालिकाओं पर बेटों की अपेक्षा कम खर्च करना, जिसका कारण लड़के द्वारा परिवार का भरण पोषण करने वाला समझना है। विज्ञान विषय का कला एवं वाणिज्य से अधिक महंगा होने के कारण भी कई परिवार विज्ञान विषय में बालिकाओं को प्रवेश नहीं दिलाते। इसके कारण अंततः महिलायें वैज्ञानिक नहीं बन पाती। मनोवैज्ञानिक स्तर की बाधाएं:- लिंग संबंधी नकारात्मक धारणाएं लड़कियोंको विश्वास दिलाती है कि साइंस सिर्फ लड़कों का विषय है। वे सोचती है कि वे बुद्धि के स्तर पर लड़कों से कमजोर हैं इसलिए वे विज्ञान विषय की और आकर्षित नहीं होती और अंततः महिला वैज्ञानिकों की कमी देखने को मिलती है। त्रुटिपूर्ण शिक्षा नीतियां:- लिंग संबंधीभेदभावों के सिलेबस में शामिल होने एवं उनमें वर्षों तक कोई सुधार न करने की वजह से भी विज्ञान विषय महिलाओं को उनकी पहुँच से दूर करता है। कंटेंट का ही स्त्रीकरण होना:- नए विषय होम साइंस को रूढ़िवादियों ने नकारात्मक रूप से स्वीकार किया। रूढ़िवादियों ने माना कि अगर महिलाओं को चूल्हा चौका ही तो करना है तो वे विज्ञान पढ़ के क्या करेंगी ? मर्दाना संस्कृति:- विज्ञान विषय का सिलेबस, सभी नीतियां, क्लासरूम में लड़कियों को अलग बैठाना,लड़कियों और लड़कों के लिए अलग अलग स्कूल, वातावरण इत्यादि सभी पक्षपाती हैं। किताबों के पन्नो पर भी महिलाओं और लड़कियों की तस्वीरें किसी किसी पन्ने पर ही दिखती हैं। बाधाओं को दूर करने के उपाय:- फिजिकल बाधाओं को दूर करना:- सर्व शिक्षा अभियान के तहत लड़कियों को स्कूल तक पहुँचने के लिए साइकलों का वितरण किया गया है। यह एक अच्छा कदम है। महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना, छात्राओं के लिए और अधिक संख्या में हॉस्टलों का निर्माण करना, कनेक्टिविटी एवं ट्रांसपोर्ट सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना। इस दिशा में आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना अच्छी पहल साबित हो सकती है। आर्थिक बाधाओं को दूर करना:- मुफ़्त स्कूली शिक्षा की व्यवस्था, छात्रवृति योजनाएं इत्यादि का क्रियान्वयन। सुकन्या समृद्धि योजना महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में अच्छी पहल है। महिलाओं के लिए चलाई जा रही सभी स्कीमों की वृहत पब्लिसिटी होनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक लाभार्थी इसका लाभ उठा सकें। सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक बाधाओं को हटाना:- जागरूकता, पूर्वाग्रहों को तोडना,व्यवहार परिवर्तन इत्यादि तकनीकों के माध्यम से ऐसे प्रोग्रामों का निर्माण तथा उनका व्यापक स्तर पर प्रचार ताकि जन जागरूकता के साथ व्यवहार परिवर्तन भी लाया जा सके। सरकारी नीतियों एवं विज्ञान संस्कृति को लिंग-न्यायसंगत बनाना। विज्ञान पारम्परिक रूप से पुरुषों का क्षेत्र रहा है। सामाजिक, धार्मिक एवं लिंग पूर्वाग्रहों से विज्ञान विषय महिलाओं की पहुँच से दूर रहा है जिससे महिला वैज्ञानिकों की कमी है। हालाँकि भारत ने अन्य विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की है परन्तु अभी भी महिलाओं के लिए सभी क्षेत्रों में बहुत कुछ किया जाना बाकि है।
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##Question:"वर्तमान में भारत में महिलाएं विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं गणित के क्षेत्र में शिक्षित हो रही हैंलेकिन महिला वैज्ञानिकों की कमी है।" इस संदर्भ में महिला वैज्ञानिकों की कमी के कारणों का उल्लेख करते हुए, साथ में उनके उपायों पर भी चर्चा कीजिए।(200 शब्द) Presently, in India women are being educated in the field of science, technology, medicine, and mathematics but lack of women scientists.In this context, discuss the causes of the lack of women scientists and discuss their measures. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में महिलाओं की विज्ञान शिक्षा तक पहुँच के कुछ तथ्य या डाटा दीजिए। तत्पश्चात, उन बाधाओं का वर्णन कीजिए जो महिलाओं को विज्ञान की शिक्षा की पहुँच से दूर करती हैं। उसके बाद उन बाधाओं को दूर करने के उपायों को सुझाइए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- हाल ही में मणिपुर विश्वविद्यालय में आयोजित महिला साइंस कांग्रेस के उद्घाटन के अवसर पर केवल दो महिलाओं की मौजूदगी , महिलाओं की सांइस के क्षेत्र में कमी एवं उनके द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को दर्शाता है।विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों केवैज्ञानिक संकाय में केवल 25% महिलाएं ही हैं, हालाँकिजैविक अनुसंधान संस्थान इसकाएक अपवाद हैं। महिला वैज्ञानिकों की कमी के कारण/बाधाएँ या रुकावटें:- फिजिकल बाधाएं:- ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल और कॉलेजों का घर से अधिक दूरी पर होना, ट्रांसपोर्ट सुविधाओं की अनुपलब्धता, विज्ञान के कोर्सेज की स्कूलों व कॉलेजों में अनुपलब्धता, हॉस्टल सुविधाओं का अपर्याप्त या खस्ताहाल होना इत्यादि रुकावटें महिलाओं के विज्ञान की शिक्षा तक पहुँच को रोकती हैं और यह महिला वैज्ञानिकों की कमी का कारण बनता है। सामाजिक बाधाएं:- लड़कियों तथा लिंग के प्रति पूर्वाग्रह रखना, गरीब परिवार की लड़कियां घर के कामों एवं बच्चों को देखभाल में लग जाती है। लड़की को अधिक पढ़ाना, अधिक स्वतंत्रता देना अनैतिक एवं परिवार की गरिमा को ठेंस पहुँचाने वाला समझा जाता है। उदाहरण के लिए अभी हाल ही में अलवर में एक महिला द्वारा घर से बाहर काम पर जाने से उसके ससूर द्वारा कोल्ड बल्डेड मर्डर कर दिया गया। आर्थिक बाधाएं:- सीमित आर्थिक संसाधन तथा वित्तीय तंगी से महिलाओं एवं बालिकाओं पर बेटों की अपेक्षा कम खर्च करना, जिसका कारण लड़के द्वारा परिवार का भरण पोषण करने वाला समझना है। विज्ञान विषय का कला एवं वाणिज्य से अधिक महंगा होने के कारण भी कई परिवार विज्ञान विषय में बालिकाओं को प्रवेश नहीं दिलाते। इसके कारण अंततः महिलायें वैज्ञानिक नहीं बन पाती। मनोवैज्ञानिक स्तर की बाधाएं:- लिंग संबंधी नकारात्मक धारणाएं लड़कियोंको विश्वास दिलाती है कि साइंस सिर्फ लड़कों का विषय है। वे सोचती है कि वे बुद्धि के स्तर पर लड़कों से कमजोर हैं इसलिए वे विज्ञान विषय की और आकर्षित नहीं होती और अंततः महिला वैज्ञानिकों की कमी देखने को मिलती है। त्रुटिपूर्ण शिक्षा नीतियां:- लिंग संबंधीभेदभावों के सिलेबस में शामिल होने एवं उनमें वर्षों तक कोई सुधार न करने की वजह से भी विज्ञान विषय महिलाओं को उनकी पहुँच से दूर करता है। कंटेंट का ही स्त्रीकरण होना:- नए विषय होम साइंस को रूढ़िवादियों ने नकारात्मक रूप से स्वीकार किया। रूढ़िवादियों ने माना कि अगर महिलाओं को चूल्हा चौका ही तो करना है तो वे विज्ञान पढ़ के क्या करेंगी ? मर्दाना संस्कृति:- विज्ञान विषय का सिलेबस, सभी नीतियां, क्लासरूम में लड़कियों को अलग बैठाना,लड़कियों और लड़कों के लिए अलग अलग स्कूल, वातावरण इत्यादि सभी पक्षपाती हैं। किताबों के पन्नो पर भी महिलाओं और लड़कियों की तस्वीरें किसी किसी पन्ने पर ही दिखती हैं। बाधाओं को दूर करने के उपाय:- फिजिकल बाधाओं को दूर करना:- सर्व शिक्षा अभियान के तहत लड़कियों को स्कूल तक पहुँचने के लिए साइकलों का वितरण किया गया है। यह एक अच्छा कदम है। महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना, छात्राओं के लिए और अधिक संख्या में हॉस्टलों का निर्माण करना, कनेक्टिविटी एवं ट्रांसपोर्ट सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना। इस दिशा में आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना अच्छी पहल साबित हो सकती है। आर्थिक बाधाओं को दूर करना:- मुफ़्त स्कूली शिक्षा की व्यवस्था, छात्रवृति योजनाएं इत्यादि का क्रियान्वयन। सुकन्या समृद्धि योजना महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में अच्छी पहल है। महिलाओं के लिए चलाई जा रही सभी स्कीमों की वृहत पब्लिसिटी होनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक लाभार्थी इसका लाभ उठा सकें। सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक बाधाओं को हटाना:- जागरूकता, पूर्वाग्रहों को तोडना,व्यवहार परिवर्तन इत्यादि तकनीकों के माध्यम से ऐसे प्रोग्रामों का निर्माण तथा उनका व्यापक स्तर पर प्रचार ताकि जन जागरूकता के साथ व्यवहार परिवर्तन भी लाया जा सके। सरकारी नीतियों एवं विज्ञान संस्कृति को लिंग-न्यायसंगत बनाना। विज्ञान पारम्परिक रूप से पुरुषों का क्षेत्र रहा है। सामाजिक, धार्मिक एवं लिंग पूर्वाग्रहों से विज्ञान विषय महिलाओं की पहुँच से दूर रहा है जिससे महिला वैज्ञानिकों की कमी है। हालाँकि भारत ने अन्य विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की है परन्तु अभी भी महिलाओं के लिए सभी क्षेत्रों में बहुत कुछ किया जाना बाकि है।
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भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की अहम् भूमिका हो सकती है लेकिन इसके लिए पंचायती राज से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना अतिआवश्यक है| उपरोक्त कथन को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द;10 अंक) Panchayats can play an important role in strengthening Indian Democracy but It is very important to solve the problems related to Panchayati Raj. Explain the above statement. (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच- पंचायतों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की अहम् भूमिका दिखाईये| अगले भाग में, पंचायती राज से जुड़ी समस्याओं को लिखिए| निष्कर्षतः, उपरोक्त समस्याओं के समाधान को लोकतंत्र की मजबूती से जोड़ते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- स्थानीय स्तर पर शक्तियों के विकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की स्थापना हेतु भारत में पंचायती राज की अवधारणा का विकास किया गया था| भारत में प्राचीन काल से ही पंचायतों का अस्तित्व रहा है जिसे देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 40 के अंतर्गत इसके गठन हेतु राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपा गया था| तत्पश्चात बलवंतराय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी.वी.के. राव समिति तथा एम.एल.सिंघवी समिति के सिफारिशों के द्वारा क्रमशः इसको ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु प्रयास किया गया| अंततः 1992 में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया तथा भाग-9 के अंतर्गत अनुच्छेद243 से 243"O" तक इसके विभिन्न प्रावधानों का वर्णन किया गया| इसके साथ ही, संविधान में 11वीं अनुसूची भी जोड़ी गयी जिसमें 29 विषय शामिल किये गये| भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की भूमिका प्रत्यक्ष लोकतंत्र को बढ़ावा देने में ग्राम सभाओं की अहम् भूमिका क्योंकि इसमें उस ग्राम के सभी मतदाता शामिल होते हैं| इससेना सिर्फ विकास एवं योजना निर्माण/निगरानी/मूल्यांकन आदि में सभी की सहभागिता सुनिश्चित होती है बल्कि लोकतंत्र को सुदृढ़ता प्रदान करने में यह अहम् भूमिका अदा कर सकता है| पंच-परमेश्वर की हमारी प्राचीन संस्कृति को बढ़ावा देकर लोकतांत्रिक मूल्यों के सतत विकास में योगदान; महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण से महिला सशक्तिकरण ; अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों हेतु सीटों के आरक्षण से सामाजिक न्याय को प्रोत्साहन ; 11वीं अनुसूची में वर्णित विषयों से आर्थिक एवं सामाजिक न्याय को बढ़ावा जैसे- कृषि से संबंधित विषय; भूमि-सुधार तथा भूमि-संरक्षण; वंचितों एवं कमजोर वर्गों का कल्याण; जनवितरण व्यवस्था; महिला एवं बाल विकास;गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम; परिवार कल्याण आदि| लोगों के मध्य एकता को प्रोत्साहन तथा सामुदायिक भावना को बढ़ावा; सशक्त तरीके से योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जिससे लोकतंत्र के प्रति आस्था का विकास; ग्राम सशक्तिकरण से भारत का विकास की ओर बढ़ना; पंचायतों के उपरोक्त महत्वों के द्वारा उन मूल्यों तथा कारकों को बढ़ावा मिलता है जिससे लोकतंत्र की मूल जड़ों का सतत विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है| पंचायती राज संस्थाओं से जुड़ी चुनौतियाँ राजनीतिक चुनौतियाँ स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव का नहीं होना; चुनाव में सभी वर्गों की सहभागिता का अभाव तथा सहभागिता के लिए उपयुक्त वातावरण का अभाव; पंचायतों की कार्यप्रणाली पक्षपातपूर्ण; कृत्यात्मक चुनौतियाँ विषयों का हस्तांतरण नहीं होना; विषयों के अनुरूप जबावदेही निर्धारित नहीं; अंतरक्षेत्रीय अधिकारिता का निर्धारण नहीं; वितीयचुनौतियाँ वास्तव में संसाधनों का हस्तांतरण नहीं; अधिकांश पंचायतों को कर/शुल्क आदि लगाने/वसूलने का अधिकार नहीं; संसाधनों के प्रयोग में पारदर्शिता का अभाव जैसे -लेखाजोखा/लेखापरीक्षण का ना होना; राज्य वित आयोग की सिफारिशों को लागू करने में राज्य-सरकारों की आनाकानी; प्रशासनिक चुनौतियां कार्मिक प्रबंधन, प्रशिक्षण आदि की कोई पृथक व्यवस्था नहीं; जिले के स्तर पर कमजोर नियोजन-ढाँचा जबकि मध्यवर्ती तथा ग्राम स्तर पर इनका पूरी तरह अभाव; स्थानीय संसाधनों एवं क्षमता का सही तरीके से दोहन नहीं; राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थानीय निकायों का प्रयोग जिससे पारदर्शिता का अभाव; योजना कार्यान्वयन पर निगरानी तथा मूल्यांकन का अभाव; पंचायती राज से जुड़ी उपरोक्त चुनौतियाँ इसके मूल भावना पर प्रहार करती हैं| जरुरत इस बात है कि इन चुनौतियों को सरकार द्वारा बेहतर तरीके से निपटा जाये ताकि स्थानीय स्तर पर शक्तियों का विकेंद्रीकरण प्रभावी तरीके से सुनिश्चित हो सके एवं लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती मिल सके|
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##Question:भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की अहम् भूमिका हो सकती है लेकिन इसके लिए पंचायती राज से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना अतिआवश्यक है| उपरोक्त कथन को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द;10 अंक) Panchayats can play an important role in strengthening Indian Democracy but It is very important to solve the problems related to Panchayati Raj. Explain the above statement. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- पंचायतों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की अहम् भूमिका दिखाईये| अगले भाग में, पंचायती राज से जुड़ी समस्याओं को लिखिए| निष्कर्षतः, उपरोक्त समस्याओं के समाधान को लोकतंत्र की मजबूती से जोड़ते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- स्थानीय स्तर पर शक्तियों के विकेंद्रीकरण तथा ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की स्थापना हेतु भारत में पंचायती राज की अवधारणा का विकास किया गया था| भारत में प्राचीन काल से ही पंचायतों का अस्तित्व रहा है जिसे देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 40 के अंतर्गत इसके गठन हेतु राज्यों को उत्तरदायित्व सौंपा गया था| तत्पश्चात बलवंतराय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी.वी.के. राव समिति तथा एम.एल.सिंघवी समिति के सिफारिशों के द्वारा क्रमशः इसको ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु प्रयास किया गया| अंततः 1992 में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया तथा भाग-9 के अंतर्गत अनुच्छेद243 से 243"O" तक इसके विभिन्न प्रावधानों का वर्णन किया गया| इसके साथ ही, संविधान में 11वीं अनुसूची भी जोड़ी गयी जिसमें 29 विषय शामिल किये गये| भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में पंचायतों की भूमिका प्रत्यक्ष लोकतंत्र को बढ़ावा देने में ग्राम सभाओं की अहम् भूमिका क्योंकि इसमें उस ग्राम के सभी मतदाता शामिल होते हैं| इससेना सिर्फ विकास एवं योजना निर्माण/निगरानी/मूल्यांकन आदि में सभी की सहभागिता सुनिश्चित होती है बल्कि लोकतंत्र को सुदृढ़ता प्रदान करने में यह अहम् भूमिका अदा कर सकता है| पंच-परमेश्वर की हमारी प्राचीन संस्कृति को बढ़ावा देकर लोकतांत्रिक मूल्यों के सतत विकास में योगदान; महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण से महिला सशक्तिकरण ; अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों हेतु सीटों के आरक्षण से सामाजिक न्याय को प्रोत्साहन ; 11वीं अनुसूची में वर्णित विषयों से आर्थिक एवं सामाजिक न्याय को बढ़ावा जैसे- कृषि से संबंधित विषय; भूमि-सुधार तथा भूमि-संरक्षण; वंचितों एवं कमजोर वर्गों का कल्याण; जनवितरण व्यवस्था; महिला एवं बाल विकास;गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम; परिवार कल्याण आदि| लोगों के मध्य एकता को प्रोत्साहन तथा सामुदायिक भावना को बढ़ावा; सशक्त तरीके से योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जिससे लोकतंत्र के प्रति आस्था का विकास; ग्राम सशक्तिकरण से भारत का विकास की ओर बढ़ना; पंचायतों के उपरोक्त महत्वों के द्वारा उन मूल्यों तथा कारकों को बढ़ावा मिलता है जिससे लोकतंत्र की मूल जड़ों का सतत विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है| पंचायती राज संस्थाओं से जुड़ी चुनौतियाँ राजनीतिक चुनौतियाँ स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव का नहीं होना; चुनाव में सभी वर्गों की सहभागिता का अभाव तथा सहभागिता के लिए उपयुक्त वातावरण का अभाव; पंचायतों की कार्यप्रणाली पक्षपातपूर्ण; कृत्यात्मक चुनौतियाँ विषयों का हस्तांतरण नहीं होना; विषयों के अनुरूप जबावदेही निर्धारित नहीं; अंतरक्षेत्रीय अधिकारिता का निर्धारण नहीं; वितीयचुनौतियाँ वास्तव में संसाधनों का हस्तांतरण नहीं; अधिकांश पंचायतों को कर/शुल्क आदि लगाने/वसूलने का अधिकार नहीं; संसाधनों के प्रयोग में पारदर्शिता का अभाव जैसे -लेखाजोखा/लेखापरीक्षण का ना होना; राज्य वित आयोग की सिफारिशों को लागू करने में राज्य-सरकारों की आनाकानी; प्रशासनिक चुनौतियां कार्मिक प्रबंधन, प्रशिक्षण आदि की कोई पृथक व्यवस्था नहीं; जिले के स्तर पर कमजोर नियोजन-ढाँचा जबकि मध्यवर्ती तथा ग्राम स्तर पर इनका पूरी तरह अभाव; स्थानीय संसाधनों एवं क्षमता का सही तरीके से दोहन नहीं; राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थानीय निकायों का प्रयोग जिससे पारदर्शिता का अभाव; योजना कार्यान्वयन पर निगरानी तथा मूल्यांकन का अभाव; पंचायती राज से जुड़ी उपरोक्त चुनौतियाँ इसके मूल भावना पर प्रहार करती हैं| जरुरत इस बात है कि इन चुनौतियों को सरकार द्वारा बेहतर तरीके से निपटा जाये ताकि स्थानीय स्तर पर शक्तियों का विकेंद्रीकरण प्रभावी तरीके से सुनिश्चित हो सके एवं लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती मिल सके|
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Scientific research in Indian universities is declining, because a career in science is not as attractive as our business operations, engineering oradministration, and the universities are becoming consumer oriented. Critically comment. (200 words)
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Basic Approach- Briefly list down the reasons for students opting for engineering, administration and business operations more than that of scientific research Suggest way forward to resolve the above issues Answer- Every year in newspaper and media we come across the news of graduates from IIT"s, IIM"s being placed with a huge salary of eight figures. Which made our understanding limited to jobs, placement and pay scale. This is also observed in students who are increasingly emphasising on prestige, influence and monetary compensations. As of now all of these factors are fulfilled by engineering, administration or MBA courses. Because of this over the years lesser and lesser emphasis is being given on courses related to scientific research, rarely do we see students opting there the first preference to research domain. This can also be verified by interviews of board topers when they are asked about their future plans. This has made a shift in the scale as now India is producing more engineers, MBA"s then it really needs. At the same time, there is a dearth of researchers in India. This has also resulted in lesser number of patients filled by India in comparison to the US, China and Japan. Where, as per the figure of WIPO the patents filledwas 56,142 for the US, followed by China (53,345) and Japan (49,702), in comparison to India which has filled just1,583 patents in 2018. This itself is the indicator that India needs to stress more on its scientific research institutes. Another major reason for such a situation is the funding of universities in India. where they heavily rely on government funding, which makes them function like business enterprises, focussing on early results. In other comparable countries like the US. Europe, Japan, etc. The research institutes and universities collaborate with corporate organisations for their fundings. Who not only finance their projects but also donate a substantial amount for functioning on institutes. This reason has severely restricted the development of Indian institutes. Another reason for such a scenario is a low fee in Indian universities which makesstudents the ‘consumer’, and the university the ‘corporation’ fulfilling the demand for certain courses. There is also the issue of rot learning in India, where from the beginning of education we focus on rot learning then the practical applications. Wayforward- Allowing universities and research institutes to find there own fundings through collaboration with corporations. Making institutes free to design course and fee structure. Creating an ecosystem wherein innovations are rewarded monetarily. Encouraging institutes to file more patent.
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##Question:Scientific research in Indian universities is declining, because a career in science is not as attractive as our business operations, engineering oradministration, and the universities are becoming consumer oriented. Critically comment. (200 words)##Answer:Basic Approach- Briefly list down the reasons for students opting for engineering, administration and business operations more than that of scientific research Suggest way forward to resolve the above issues Answer- Every year in newspaper and media we come across the news of graduates from IIT"s, IIM"s being placed with a huge salary of eight figures. Which made our understanding limited to jobs, placement and pay scale. This is also observed in students who are increasingly emphasising on prestige, influence and monetary compensations. As of now all of these factors are fulfilled by engineering, administration or MBA courses. Because of this over the years lesser and lesser emphasis is being given on courses related to scientific research, rarely do we see students opting there the first preference to research domain. This can also be verified by interviews of board topers when they are asked about their future plans. This has made a shift in the scale as now India is producing more engineers, MBA"s then it really needs. At the same time, there is a dearth of researchers in India. This has also resulted in lesser number of patients filled by India in comparison to the US, China and Japan. Where, as per the figure of WIPO the patents filledwas 56,142 for the US, followed by China (53,345) and Japan (49,702), in comparison to India which has filled just1,583 patents in 2018. This itself is the indicator that India needs to stress more on its scientific research institutes. Another major reason for such a situation is the funding of universities in India. where they heavily rely on government funding, which makes them function like business enterprises, focussing on early results. In other comparable countries like the US. Europe, Japan, etc. The research institutes and universities collaborate with corporate organisations for their fundings. Who not only finance their projects but also donate a substantial amount for functioning on institutes. This reason has severely restricted the development of Indian institutes. Another reason for such a scenario is a low fee in Indian universities which makesstudents the ‘consumer’, and the university the ‘corporation’ fulfilling the demand for certain courses. There is also the issue of rot learning in India, where from the beginning of education we focus on rot learning then the practical applications. Wayforward- Allowing universities and research institutes to find there own fundings through collaboration with corporations. Making institutes free to design course and fee structure. Creating an ecosystem wherein innovations are rewarded monetarily. Encouraging institutes to file more patent.
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समकालीन पारिवारिक संरचना में हो रहे बदलाव परिवार अदालतों को प्रासंगिक बनाते हैं| इस सन्दर्भ में परिवार अदालतों के उद्देश्यों एवं महत्त्व की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही इनकी सीमाओं को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Changes in contemporary family structure make family courts relevant. In this context, discuss the objectives and importance of the family courts. Along with this, also clarify their limitations. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कथन को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में परिवार अदालतों के सन्दर्भ में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र के बारे में जानकारी दीजिये 3- दुसरे भाग में परिवार अदालतों का स्वरुप, महत्त्व एवं उद्देश्यों कि चर्चा कीजिये 4- तीसरे भाग में परिवार अदालतों की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण, आर्थिक सशक्तिकरण, अधिकारों कि चेतना आदि के कारणों से वर्तमान समाजों में पारिवारिक संरचना में विघटन के तत्व समाहित हो रहे हैं| इसके परिणाम स्वरुप पारिवारिक विवादों में वृद्धि देखी जा रही है| अतः इन विवादों के सहज एवं सुलभ निपटारे के सन्दर्भ में परिवार अदालतों कि प्रासंगिकता बढती जा रही है| परिवार अदालत, वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र का एक रूप है| भारत में विभिन्न न्यायालयी इकाइयां वैकल्पिक विवाद निपटान तन्त्र के रूप में कार्य कर रही हैं| इनमें, परिवार अदालतों के अतिरिक्त लोक अदालत और ग्राम न्यायालय प्रमुख हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र केअन्तर्गत विवाद समाधान की वे प्रक्रियाएँ और तकनीकें आती हैं जो विवाद में उलझे पक्षों को बिनाप्रक्रियात्मक मुकदमें के ही विवाद का समाधान खोजने में सहायता करतीं हैं| इसके अंतर्गत वर्गीय कार्यवाई, संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुलह और मध्यस्थता आदि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं | वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं सामान्य तौर पर कम खर्चीली और त्वरित स्वरुप की होती हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं इस रूप में विशिष्ट होती हैं कि ये वाद-प्रतिवादी की परिस्थिति को एक दूसरे को समझने का मौक़ा देती हैं| परिवार अदालत · परिवार अदालतों की अवधारणा का जन्म अमेरिका में पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ जबकि भारत में परिवार अदालत अधिनियम 1984 के अंतर्गत इन अदालतों का गठन शुरू हुआ| · प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट इन अदालतों के प्रमुख होते हैं| सम्बन्धित HC से परमर्श के बाद राज्य सरकार द्वारा इनकी नियुक्ति की जाती है, · इसमें मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त दो अन्य लोग भी रहते हैं जिसमें प्रायः एक वकील और एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता/कार्यकर्त्री जो पारिवारिक झगड़ों को निपटाने की कला से भिज्ञ हो, मजिस्ट्रेट के सहायक होते हैं| · इसमें परिवार सम्बन्धी मामले जैसे विवाह सम्बन्धी विवाद, संपत्ति में उत्तराधिकार और भरण-पोषण सम्बन्धी विवाद, विवाह विच्छेद विवाद, विधिक रूप से पति-पत्नी का एक दूसरे से पृथक सम्बन्धी विवाद तथा नाबालिग बच्चे के अभिरक्षा सम्बन्धी विवाद इत्यादि इस न्यायालय में विचारार्थ लाये जाते हैं| महत्त्व एवं उद्देश्य · परिवार अदालतों में नियमित अदालतों जैसा बोझिल वातावरण नही होता यहाँ सरल वातावरण में आपसी बातचीत के आधार पर विवाद हल किये जाते हैं · परिवार अदालतों के माध्यम से ऐसी अदालतों का गठन करना जो पारिवारिक मामलों को सहजता से हल कर सकें · एक ऐसे तौर-तरीके जो कि नियमित अदालतों से भिन्न होते हैं, को अपनाना जिससे पारिवारिक झगडे बिना कटुता के आपसी मेल मिलाप के आधार पर हल किये जा सकें| · ये अत्यंत कम खर्चीले होते हैं क्योंकि इन्मने नियमित अदालतों कि तरह साक्ष्य जुटाने या शिकायतों कि जांच करने या कोर्ट में ट्रायल करने जैसे खर्चीले उपाय नहीं अपनाए जाते हैं · यह मूलतः अनौपचारिक तौर-तरीके अपना कर पारिवारिक विवादों को हल करने का प्रयास करते हैं| अतः इनमें अधिक लचीलापन होता है| अधिनियम की सीमाएं · इसमें घरेलू हिंसा जैसे मामले शामिल नहीं हैं ताकि न्यायालय इसमें पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिला सके और दोषी व्यक्ति को दण्डित कर सके| · पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए अलग से किसी व्यवस्था का प्रावधान नहीं है, · इन अदालतों का अधिकार क्षेत्र अत्यंत सीमित है · इसमें पूरे देश में एकरूपता नहीं है, चूँकि इसका संचालन राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार होता है इसलिए इसमें राज्यवार काफी विसंगति देखने को मिलती है · इन अदालतों को न्यायालय कि अवमानना का अधिकार नहीं प्राप्त है जिससे इनकी प्रभाविता में कमी आती है|अवमानना का अधिकार इनको न्याय प्रदान करने के सन्दर्भ में सशक्त बनाएगा| · वर्तमान में इन न्यायालयों में पुरुष जजों कि बहुलता है जो महिला संकट के प्रति उतने संवेदनशील नहीं होते| इन न्यायालयों में महिला जजों कि संख्या बढाई जानी चाहिए, · इसमें कोई पक्षकार अपनी बात रखने के लिए अधिवक्ता प्रस्तुत कर सकता है इससे प्रायः मामलों को हल करने में देरी होती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि समकालीन पारिवारिक संरचना में आ रहे परिवर्तनों और सहज न्याय कि उपलब्धता के सन्दर्भ में परिवार अदालत प्रासंगिक एवं महत्वपूर्ण हैं| किन्तु परिवार अदालतों कि सीमाएं इसकी प्रासंगिकता को सिद्ध करने में बाधक है| इनकी प्रभावकारिता को बढाने केलिए इस अधिनियम में नागरिक प्रक्रिया संहिता/सिविल प्रोसीजर कोड को शामिल किया जाना चाहिए था जिससे इन अदालतों का अधिकार क्षेत्र बढाया जा सके| पारिवारिक विवादों को हल करने के लिए विशेषकर पीड़ित महिलाओं कि सहायता के लिए NGOs को शामिल किये जाने कि आवश्यकता है|
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##Question:समकालीन पारिवारिक संरचना में हो रहे बदलाव परिवार अदालतों को प्रासंगिक बनाते हैं| इस सन्दर्भ में परिवार अदालतों के उद्देश्यों एवं महत्त्व की चर्चा कीजिये| इसके साथ ही इनकी सीमाओं को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Changes in contemporary family structure make family courts relevant. In this context, discuss the objectives and importance of the family courts. Along with this, also clarify their limitations. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कथन को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में परिवार अदालतों के सन्दर्भ में वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र के बारे में जानकारी दीजिये 3- दुसरे भाग में परिवार अदालतों का स्वरुप, महत्त्व एवं उद्देश्यों कि चर्चा कीजिये 4- तीसरे भाग में परिवार अदालतों की सीमाओं को स्पष्ट कीजिये 5- अंतिम में समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण, आर्थिक सशक्तिकरण, अधिकारों कि चेतना आदि के कारणों से वर्तमान समाजों में पारिवारिक संरचना में विघटन के तत्व समाहित हो रहे हैं| इसके परिणाम स्वरुप पारिवारिक विवादों में वृद्धि देखी जा रही है| अतः इन विवादों के सहज एवं सुलभ निपटारे के सन्दर्भ में परिवार अदालतों कि प्रासंगिकता बढती जा रही है| परिवार अदालत, वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र का एक रूप है| भारत में विभिन्न न्यायालयी इकाइयां वैकल्पिक विवाद निपटान तन्त्र के रूप में कार्य कर रही हैं| इनमें, परिवार अदालतों के अतिरिक्त लोक अदालत और ग्राम न्यायालय प्रमुख हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र केअन्तर्गत विवाद समाधान की वे प्रक्रियाएँ और तकनीकें आती हैं जो विवाद में उलझे पक्षों को बिनाप्रक्रियात्मक मुकदमें के ही विवाद का समाधान खोजने में सहायता करतीं हैं| इसके अंतर्गत वर्गीय कार्यवाई, संधिवार्ता, मध्यस्थता, सुलह और मध्यस्थता आदि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं | वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं सामान्य तौर पर कम खर्चीली और त्वरित स्वरुप की होती हैं| वैकल्पिक विवाद निपटान प्रक्रियाएं इस रूप में विशिष्ट होती हैं कि ये वाद-प्रतिवादी की परिस्थिति को एक दूसरे को समझने का मौक़ा देती हैं| परिवार अदालत · परिवार अदालतों की अवधारणा का जन्म अमेरिका में पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ जबकि भारत में परिवार अदालत अधिनियम 1984 के अंतर्गत इन अदालतों का गठन शुरू हुआ| · प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट इन अदालतों के प्रमुख होते हैं| सम्बन्धित HC से परमर्श के बाद राज्य सरकार द्वारा इनकी नियुक्ति की जाती है, · इसमें मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त दो अन्य लोग भी रहते हैं जिसमें प्रायः एक वकील और एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता/कार्यकर्त्री जो पारिवारिक झगड़ों को निपटाने की कला से भिज्ञ हो, मजिस्ट्रेट के सहायक होते हैं| · इसमें परिवार सम्बन्धी मामले जैसे विवाह सम्बन्धी विवाद, संपत्ति में उत्तराधिकार और भरण-पोषण सम्बन्धी विवाद, विवाह विच्छेद विवाद, विधिक रूप से पति-पत्नी का एक दूसरे से पृथक सम्बन्धी विवाद तथा नाबालिग बच्चे के अभिरक्षा सम्बन्धी विवाद इत्यादि इस न्यायालय में विचारार्थ लाये जाते हैं| महत्त्व एवं उद्देश्य · परिवार अदालतों में नियमित अदालतों जैसा बोझिल वातावरण नही होता यहाँ सरल वातावरण में आपसी बातचीत के आधार पर विवाद हल किये जाते हैं · परिवार अदालतों के माध्यम से ऐसी अदालतों का गठन करना जो पारिवारिक मामलों को सहजता से हल कर सकें · एक ऐसे तौर-तरीके जो कि नियमित अदालतों से भिन्न होते हैं, को अपनाना जिससे पारिवारिक झगडे बिना कटुता के आपसी मेल मिलाप के आधार पर हल किये जा सकें| · ये अत्यंत कम खर्चीले होते हैं क्योंकि इन्मने नियमित अदालतों कि तरह साक्ष्य जुटाने या शिकायतों कि जांच करने या कोर्ट में ट्रायल करने जैसे खर्चीले उपाय नहीं अपनाए जाते हैं · यह मूलतः अनौपचारिक तौर-तरीके अपना कर पारिवारिक विवादों को हल करने का प्रयास करते हैं| अतः इनमें अधिक लचीलापन होता है| अधिनियम की सीमाएं · इसमें घरेलू हिंसा जैसे मामले शामिल नहीं हैं ताकि न्यायालय इसमें पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिला सके और दोषी व्यक्ति को दण्डित कर सके| · पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए अलग से किसी व्यवस्था का प्रावधान नहीं है, · इन अदालतों का अधिकार क्षेत्र अत्यंत सीमित है · इसमें पूरे देश में एकरूपता नहीं है, चूँकि इसका संचालन राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार होता है इसलिए इसमें राज्यवार काफी विसंगति देखने को मिलती है · इन अदालतों को न्यायालय कि अवमानना का अधिकार नहीं प्राप्त है जिससे इनकी प्रभाविता में कमी आती है|अवमानना का अधिकार इनको न्याय प्रदान करने के सन्दर्भ में सशक्त बनाएगा| · वर्तमान में इन न्यायालयों में पुरुष जजों कि बहुलता है जो महिला संकट के प्रति उतने संवेदनशील नहीं होते| इन न्यायालयों में महिला जजों कि संख्या बढाई जानी चाहिए, · इसमें कोई पक्षकार अपनी बात रखने के लिए अधिवक्ता प्रस्तुत कर सकता है इससे प्रायः मामलों को हल करने में देरी होती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि समकालीन पारिवारिक संरचना में आ रहे परिवर्तनों और सहज न्याय कि उपलब्धता के सन्दर्भ में परिवार अदालत प्रासंगिक एवं महत्वपूर्ण हैं| किन्तु परिवार अदालतों कि सीमाएं इसकी प्रासंगिकता को सिद्ध करने में बाधक है| इनकी प्रभावकारिता को बढाने केलिए इस अधिनियम में नागरिक प्रक्रिया संहिता/सिविल प्रोसीजर कोड को शामिल किया जाना चाहिए था जिससे इन अदालतों का अधिकार क्षेत्र बढाया जा सके| पारिवारिक विवादों को हल करने के लिए विशेषकर पीड़ित महिलाओं कि सहायता के लिए NGOs को शामिल किये जाने कि आवश्यकता है|
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स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? इस संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव दर्शाते हुए विभिन्न मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये। साथ ही, नेहरु के दौर की विदेश नीति की उपलब्धियों का जिक्र कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) What challenges did India face in shaping foreign policy in the early years of Post Independence? In this context, Write Down the effect of the Heritage of the National Movement and Mention various Guiding Principles. Also, Mention the achievements of the Nehru"s era foreign policy. (150-200 words/ 10 Marks)
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एप्रोच - पहले भाग में,स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, विदेश नीति पर राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव तथा विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों को बताईये| अंतिम भाग में,नेहरु के दौर की विदेश नीति की उपलब्धियों का जिक्र कीजिये| उत्तर- भारत की स्वतंत्रता के समय वैश्विक स्तर पर विभिन्न समस्याएं मौजूद थी- द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव(शीतयुद्ध); संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना तथा विऔपनिवेशीकरण की प्रक्रिया आदि| साथ ही, भारत के समक्ष ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में बहुत सारी चुनौतियाँ विद्यमान थी| ऐसे में, स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को, भारत के आकार तथा संस्कृति के अनुरूप एक स्वतंत्र स्थान तथा आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने की आवश्यकता ने निर्देशित किया| स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियां शीत युद्ध के संदर्भ में महाशक्तियों से संबंधों का निर्धारण करने की चुनौती क्योंकि कोई एक देश से हमारी निकटता दूसरे देश के साथ हमारे संबंधों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता था| पड़ोसी देशों(विशेषकर पाकिस्तान एवं चीन) से संबंधों का निर्धारण; अंतर्राष्ट्रीय संगठनों(जैसे - गैट, संयुक्तराष्ट्र, विश्व बैंक आदि) के परिप्रेक्ष्य में भारत का दृष्टिकोण; विदेश नीति के सिद्धांतों एवं क्रियान्वयन संबंधी आधारभूत ढांचों का निर्माण; सैनिक एवं आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण; भारत की विदेश नीति तथा राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ जारी विश्वव्यापी संघर्ष का एक भाग था| स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष ने कई एशियाई और अफ़्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलनों को प्रेरित किया था| साथ ही, भारत के विशाल आकार, अवस्थिति और शक्ति की संभाव्यता के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने वैश्विक मामलों में, खासकर एशियाई मामलों पर, भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की परिकल्पना की| साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोध जैसे -1927 में ब्रुसेल्स सम्मेलन में भारत की भागीदारी; चीन पर जापानी आक्रमण के दौरान जापानी वस्तुओं का बहिष्कार; आज़ादी से पूर्व नई दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आदि| फासीवाद का विरोध; रंगभेद का विरोध ; राष्ट्रीय आंदोलन पर दोनों विचारधाराओं(उदारवादी एवं साम्यवादी) के प्रभाव के कारण स्वाभाविक रूप से विदेश नीति प्रभावित; अंतर्राष्ट्रीय विवादों का लोकतांत्रिक तरीके से समाधान, युद्ध का विरोध; विदेश नीति को मार्गदर्शित करने वाले सिद्धांत गुटनिरपेक्षता - दोनों गुटों से दूरी बनाये रखते हुए मुद्दों के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति का पालन; पंचशील का सिद्धांत - आक्रमण नहीं; आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं; अखंडता का सम्मान; समानता पर आधारित संबंध; शांतिपूर्ण सहअस्तित्व; 1954 में सर्वप्रथम चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के स्तर पर इस सिद्धांत को आगे लाया गया| नेहरु के दौर में विदेश नीति की उपलब्धियाँ नेहरु के दौर में विदेश नीति के तीन प्रमुख उद्देश्य थें- वर्षों के श्रम से प्राप्त संप्रभुता की रक्षा करना; क्षेत्रीय अखंडता का संरक्षण करना; तीव्र आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना; इस संदर्भ में हम नेहरु की उपलब्धियों को निम्न रूप से देख सकते हैं- देश की एकता, अखंडता को अक्षुण्ण बनाये रखने में नेहरु बहुत हद तक सफल रहे थें| कुछ अपवादों(कश्मीर विवाद तथा चीन से युद्ध) को छोड़कर उन्हें देश के एकीकरण की प्रक्रिया में भी सफलता मिली | दोनों महाशक्तियों से संबंधों का निर्धारण तथा दोनों गुटों से सहयोग जैसे -USSR द्वारा बोकारो,भिलाई के स्टील प्लांट स्थापना में सहयोग; दोनों गुटों से खाद्यान सहायता तथा अमेरिकी सहयोग से नेहरु-पश्चात हरित क्रांति की प्रक्रिया; दोनों गुटों से सैनिक-साजोसामान की आपूर्ति तथा चीन युद्ध के दौरान दोनों गुटों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग आदि| पड़ोसी देशों में चीन एवं पाकिस्तान के अतिरिक्त अन्य देशों से संबंध बेहतर; नवस्वतंत्र देशों की आज़ादी का खुलकर समर्थन जैसे -1948 में इंडोनेशिया के मुद्दे पर नई दिल्ली में एक सम्मेलन का आयोजन; इससे भारत की एक विशिष्ट पहचान का बनना| गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आधार प्रदान कर नवस्वतंत्र राष्ट्रों को एक नई दिशा प्रदान करना| अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता तथा संयुक्तराष्ट्र अभियानों में भाग लेकर भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति-व्यवस्था का समर्थक तथा नियमों के पालन करने वाले राष्ट्र के रूप में पहचान स्थापित करना; विदेश नीति का मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार करना जो आज भी भारत की विदेश नीति को मार्गदर्शित करती है|
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##Question:स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? इस संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव दर्शाते हुए विभिन्न मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये। साथ ही, नेहरु के दौर की विदेश नीति की उपलब्धियों का जिक्र कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) What challenges did India face in shaping foreign policy in the early years of Post Independence? In this context, Write Down the effect of the Heritage of the National Movement and Mention various Guiding Principles. Also, Mention the achievements of the Nehru"s era foreign policy. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:एप्रोच - पहले भाग में,स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, विदेश नीति पर राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव तथा विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों को बताईये| अंतिम भाग में,नेहरु के दौर की विदेश नीति की उपलब्धियों का जिक्र कीजिये| उत्तर- भारत की स्वतंत्रता के समय वैश्विक स्तर पर विभिन्न समस्याएं मौजूद थी- द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव(शीतयुद्ध); संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना तथा विऔपनिवेशीकरण की प्रक्रिया आदि| साथ ही, भारत के समक्ष ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में बहुत सारी चुनौतियाँ विद्यमान थी| ऐसे में, स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को, भारत के आकार तथा संस्कृति के अनुरूप एक स्वतंत्र स्थान तथा आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने की आवश्यकता ने निर्देशित किया| स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियां शीत युद्ध के संदर्भ में महाशक्तियों से संबंधों का निर्धारण करने की चुनौती क्योंकि कोई एक देश से हमारी निकटता दूसरे देश के साथ हमारे संबंधों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता था| पड़ोसी देशों(विशेषकर पाकिस्तान एवं चीन) से संबंधों का निर्धारण; अंतर्राष्ट्रीय संगठनों(जैसे - गैट, संयुक्तराष्ट्र, विश्व बैंक आदि) के परिप्रेक्ष्य में भारत का दृष्टिकोण; विदेश नीति के सिद्धांतों एवं क्रियान्वयन संबंधी आधारभूत ढांचों का निर्माण; सैनिक एवं आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण; भारत की विदेश नीति तथा राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ जारी विश्वव्यापी संघर्ष का एक भाग था| स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष ने कई एशियाई और अफ़्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलनों को प्रेरित किया था| साथ ही, भारत के विशाल आकार, अवस्थिति और शक्ति की संभाव्यता के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने वैश्विक मामलों में, खासकर एशियाई मामलों पर, भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की परिकल्पना की| साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोध जैसे -1927 में ब्रुसेल्स सम्मेलन में भारत की भागीदारी; चीन पर जापानी आक्रमण के दौरान जापानी वस्तुओं का बहिष्कार; आज़ादी से पूर्व नई दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आदि| फासीवाद का विरोध; रंगभेद का विरोध ; राष्ट्रीय आंदोलन पर दोनों विचारधाराओं(उदारवादी एवं साम्यवादी) के प्रभाव के कारण स्वाभाविक रूप से विदेश नीति प्रभावित; अंतर्राष्ट्रीय विवादों का लोकतांत्रिक तरीके से समाधान, युद्ध का विरोध; विदेश नीति को मार्गदर्शित करने वाले सिद्धांत गुटनिरपेक्षता - दोनों गुटों से दूरी बनाये रखते हुए मुद्दों के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति का पालन; पंचशील का सिद्धांत - आक्रमण नहीं; आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं; अखंडता का सम्मान; समानता पर आधारित संबंध; शांतिपूर्ण सहअस्तित्व; 1954 में सर्वप्रथम चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के स्तर पर इस सिद्धांत को आगे लाया गया| नेहरु के दौर में विदेश नीति की उपलब्धियाँ नेहरु के दौर में विदेश नीति के तीन प्रमुख उद्देश्य थें- वर्षों के श्रम से प्राप्त संप्रभुता की रक्षा करना; क्षेत्रीय अखंडता का संरक्षण करना; तीव्र आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना; इस संदर्भ में हम नेहरु की उपलब्धियों को निम्न रूप से देख सकते हैं- देश की एकता, अखंडता को अक्षुण्ण बनाये रखने में नेहरु बहुत हद तक सफल रहे थें| कुछ अपवादों(कश्मीर विवाद तथा चीन से युद्ध) को छोड़कर उन्हें देश के एकीकरण की प्रक्रिया में भी सफलता मिली | दोनों महाशक्तियों से संबंधों का निर्धारण तथा दोनों गुटों से सहयोग जैसे -USSR द्वारा बोकारो,भिलाई के स्टील प्लांट स्थापना में सहयोग; दोनों गुटों से खाद्यान सहायता तथा अमेरिकी सहयोग से नेहरु-पश्चात हरित क्रांति की प्रक्रिया; दोनों गुटों से सैनिक-साजोसामान की आपूर्ति तथा चीन युद्ध के दौरान दोनों गुटों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग आदि| पड़ोसी देशों में चीन एवं पाकिस्तान के अतिरिक्त अन्य देशों से संबंध बेहतर; नवस्वतंत्र देशों की आज़ादी का खुलकर समर्थन जैसे -1948 में इंडोनेशिया के मुद्दे पर नई दिल्ली में एक सम्मेलन का आयोजन; इससे भारत की एक विशिष्ट पहचान का बनना| गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आधार प्रदान कर नवस्वतंत्र राष्ट्रों को एक नई दिशा प्रदान करना| अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता तथा संयुक्तराष्ट्र अभियानों में भाग लेकर भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति-व्यवस्था का समर्थक तथा नियमों के पालन करने वाले राष्ट्र के रूप में पहचान स्थापित करना; विदेश नीति का मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार करना जो आज भी भारत की विदेश नीति को मार्गदर्शित करती है|
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भारत -पाकिस्तान संबंधों में विवादित मुद्दों को बताइए | साथ ही इसकी भी चर्चा कीजिये कि चीन -पाकिस्तान गठजोड़ ने किस प्रकार भारत की चिन्ताओं में वृद्धि की है ? (150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the disputed issues in india-pakistan relations. Along with this, discuss how the china-pakistan axis has increased the concerns of india? (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारत-पाकिस्तान में विवादित मुद्दों को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात चीन -पाकिस्तान गठजोड़ की चर्चा करते हुए, इससे उत्पन्न चिंताओं को बताइए | अंत में भारत-पाकिस्तान संबंधों में समाधान के बिंदु बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं पाकिस्तान के मध्य कई विवादित मुद्दे हैं इनमे से कुछ प्रमुख निम्नवत हैं - सीमा पर आतंकवाद - पाकिस्तान 1990 के बाद लगातार भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवादी संगठन जैसे लश्कर ए तैयबा इत्यादि का सहारा ले रहा है | FATF की ग्रे सूची में पकिस्तान का रखा जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पुष्टि करता है | सियाचिन विवाद - भारत एवं पकिस्तान के मध्य 1971 के शिमला समझौते में दोनों के मध्य NJ9842 उत्तर तक सीमा को स्वीकार किया गया है | पकिस्तान सियाचिन को अपना भाग बताते हुए NJ9842के पश्चिम तक अपनी सीमा बताता है जबकि भारतNJ9842 के उत्तर पूर्व तक अपनी सीमा मानता है तथा सियाचिन को अपना भाग मानता है, यह दोनों के मध्य विवाद है | सरक्रीक - यह गुजरात के रन ऑफ कच्छ में बानगंगा से सम्बंधित है |भारत 1914 में हुए समझौते के अनुसार ,सीमा के प्याल्वाग सिद्धांत को स्वीकार करते हुए सेक्शन 10 को मानता है ,जबकि पाकिस्तान सेक्शन 9 को मानता है| सिन्धु जल समझौता ( 1960 ) - चिनाब बेसिन पर स्थित भारत की पाकलदल , रातले , लोअर कलनाई परियोजनाओं पर पाकिस्तान द्वारा भारत पर सिन्धु नदी समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है जबकि यह परियोजनाएं फ्लोइंग रिवर पर बनी है | जाधव केस - वर्तमान में पाकिस्तान द्वारा भारत के नागरिक जाधव को पकड़कर उल्लंघन करते हुए भारत के प्रतिनिधि को उनसे मिलने से रोका | यह केस अब ICJ में है | भारत पाकिस्तान के मध्य विवाद ने चीन को पाकिस्तान की तरफ बढ़ने का अवसर प्रदान किया , जिससे उत्पन्न चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं - CPEC - भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए यह गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुज़र रहा है | आतंकवाद के खिलाफ एक्शन लेने के विरुद्ध - जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकवादी के खिलाफ फिल्हाल चीन का रवैया स्पष्ट नहीं है ,हालाँकि अब इस आतंकवादी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है | भारत में अस्थिरता लेन का प्रयास - चीन एवं पाकिस्तान , ड्रग ट्रैफिकिंग , जाली नोट , आतंकवाद इत्यादि के माध्यम से भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे हैं | UNSC एवं NSG में भारत की सदस्यता - चीन द्वारा पाकिस्तान के समर्थन में , भारत के UNSC एवं NSG में प्रवेश के विरुद्ध गठजोड़ एक प्रमुख मुद्दा है | भारत को पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए | इस कड़ी में भारत को पाकिस्तान के साथ विभिन्न मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए उदहारण के लिए व्यापार के सम्बन्ध में , TAPI एवं IPI गैस पाईप लाइन के माध्यम से एवं शंघाई कारपोरेशन संगठन इत्यादि की सहायता से भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरी रखना चाहिए |
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##Question:भारत -पाकिस्तान संबंधों में विवादित मुद्दों को बताइए | साथ ही इसकी भी चर्चा कीजिये कि चीन -पाकिस्तान गठजोड़ ने किस प्रकार भारत की चिन्ताओं में वृद्धि की है ? (150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the disputed issues in india-pakistan relations. Along with this, discuss how the china-pakistan axis has increased the concerns of india? (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारत-पाकिस्तान में विवादित मुद्दों को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात चीन -पाकिस्तान गठजोड़ की चर्चा करते हुए, इससे उत्पन्न चिंताओं को बताइए | अंत में भारत-पाकिस्तान संबंधों में समाधान के बिंदु बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं पाकिस्तान के मध्य कई विवादित मुद्दे हैं इनमे से कुछ प्रमुख निम्नवत हैं - सीमा पर आतंकवाद - पाकिस्तान 1990 के बाद लगातार भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवादी संगठन जैसे लश्कर ए तैयबा इत्यादि का सहारा ले रहा है | FATF की ग्रे सूची में पकिस्तान का रखा जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पुष्टि करता है | सियाचिन विवाद - भारत एवं पकिस्तान के मध्य 1971 के शिमला समझौते में दोनों के मध्य NJ9842 उत्तर तक सीमा को स्वीकार किया गया है | पकिस्तान सियाचिन को अपना भाग बताते हुए NJ9842के पश्चिम तक अपनी सीमा बताता है जबकि भारतNJ9842 के उत्तर पूर्व तक अपनी सीमा मानता है तथा सियाचिन को अपना भाग मानता है, यह दोनों के मध्य विवाद है | सरक्रीक - यह गुजरात के रन ऑफ कच्छ में बानगंगा से सम्बंधित है |भारत 1914 में हुए समझौते के अनुसार ,सीमा के प्याल्वाग सिद्धांत को स्वीकार करते हुए सेक्शन 10 को मानता है ,जबकि पाकिस्तान सेक्शन 9 को मानता है| सिन्धु जल समझौता ( 1960 ) - चिनाब बेसिन पर स्थित भारत की पाकलदल , रातले , लोअर कलनाई परियोजनाओं पर पाकिस्तान द्वारा भारत पर सिन्धु नदी समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है जबकि यह परियोजनाएं फ्लोइंग रिवर पर बनी है | जाधव केस - वर्तमान में पाकिस्तान द्वारा भारत के नागरिक जाधव को पकड़कर उल्लंघन करते हुए भारत के प्रतिनिधि को उनसे मिलने से रोका | यह केस अब ICJ में है | भारत पाकिस्तान के मध्य विवाद ने चीन को पाकिस्तान की तरफ बढ़ने का अवसर प्रदान किया , जिससे उत्पन्न चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं - CPEC - भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए यह गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुज़र रहा है | आतंकवाद के खिलाफ एक्शन लेने के विरुद्ध - जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकवादी के खिलाफ फिल्हाल चीन का रवैया स्पष्ट नहीं है ,हालाँकि अब इस आतंकवादी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है | भारत में अस्थिरता लेन का प्रयास - चीन एवं पाकिस्तान , ड्रग ट्रैफिकिंग , जाली नोट , आतंकवाद इत्यादि के माध्यम से भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे हैं | UNSC एवं NSG में भारत की सदस्यता - चीन द्वारा पाकिस्तान के समर्थन में , भारत के UNSC एवं NSG में प्रवेश के विरुद्ध गठजोड़ एक प्रमुख मुद्दा है | भारत को पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए | इस कड़ी में भारत को पाकिस्तान के साथ विभिन्न मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए उदहारण के लिए व्यापार के सम्बन्ध में , TAPI एवं IPI गैस पाईप लाइन के माध्यम से एवं शंघाई कारपोरेशन संगठन इत्यादि की सहायता से भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरी रखना चाहिए |
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भारत -पाकिस्तान संबंधों में विवादित मुद्दों को बताइए | साथ ही इसकी भी चर्चा कीजिये कि चीन -पाकिस्तान गठजोड़ ने किस प्रकार भारत की चिन्ताओं में वृद्धि की है ? (200 शब्द) Discuss the disputed issues in India-Pakistan relations. Alongwith this discuss how the China-Pakistan axis has increased the concerns of India ?
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारत-पाकिस्तान में विवादित मुद्दों को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात चीन -पाकिस्तान गठजोड़ की चर्चा करते हुए, इससे उत्पन्न चिंताओं को बताइए | अंत में भारत-पाकिस्तान संबंधों में समाधान के बिंदु बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं पाकिस्तान के मध्य कई विवादित मुद्दे हैं इनमे से कुछ प्रमुख निम्नवत हैं - सीमा पर आतंकवाद - पाकिस्तान 1990 के बाद लगातार भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवादी संगठन जैसे लश्कर ए तैयबा इत्यादि का सहारा ले रहा है | FATF की ग्रे सूची में पकिस्तान का रखा जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पुष्टि करता है | सियाचिन विवाद - भारत एवं पकिस्तान के मध्य 1971 के शिमला समझौते में दोनों के मध्य NJ9842 उत्तर तक सीमा को स्वीकार किया गया है | पकिस्तान सियाचिन को अपना भाग बताते हुए NJ9842के पश्चिम तक अपनी सीमा बताता है जबकि भारतNJ9842 के उत्तर पूर्व तक अपनी सीमा मानता है तथा सियाचिन को अपना भाग मानता है, यह दोनों के मध्य विवाद है | सरक्रीक - यह गुजरात के रन ऑफ कच्छ में बानगंगा से सम्बंधित है |भारत 1914 में हुए समझौते के अनुसार ,सीमा के प्याल्वाग सिद्धांत को स्वीकार करते हुए सेक्शन 10 को मानता है ,जबकि पाकिस्तान सेक्शन 9 को मानता है| सिन्धु जल समझौता ( 1960 ) - चिनाब बेसिन पर स्थित भारत की पाकलदल , रातले , लोअर कलनाई परियोजनाओं पर पाकिस्तान द्वारा भारत पर सिन्धु नदी समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है जबकि यह परियोजनाएं फ्लोइंग रिवर पर बनी है | जाधव केस - वर्तमान में पाकिस्तान द्वारा भारत के नागरिक जाधव को पकड़कर उल्लंघन करते हुए भारत के प्रतिनिधि को उनसे मिलने से रोका | यह केस अब ICJ में है | भारत पाकिस्तान के मध्य विवाद ने चीन को पाकिस्तान की तरफ बढ़ने का अवसर प्रदान किया , जिससे उत्पन्न चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं - CPEC - भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए यह गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुज़र रहा है| आतंकवाद के खिलाफ एक्शन लेने के विरुद्ध- जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकवादी के खिलाफ फिल्हाल चीन का रवैया स्पष्ट नहीं है ,हालाँकि अब इस आतंकवादी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है | भारत में अस्थिरता लेन का प्रयास - चीन एवं पाकिस्तान , ड्रग ट्रैफिकिंग , जाली नोट , आतंकवाद इत्यादि के माध्यम से भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे हैं | UNSC एवं NSG में भारत की सदस्यता - चीन द्वारा पाकिस्तान के समर्थन में , भारत के UNSC एवं NSG में प्रवेश के विरुद्ध गठजोड़ एक प्रमुख मुद्दा है | भारत को पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए | इस कड़ी में भारत को पाकिस्तान के साथ विभिन्न मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए उदहारण के लिए व्यापार के सम्बन्ध में , TAPI एवं IPI गैस पाईप लाइन के माध्यम से एवं शंघाई कारपोरेशन संगठन इत्यादि की सहायता से भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरी रखना चाहिए |
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##Question:भारत -पाकिस्तान संबंधों में विवादित मुद्दों को बताइए | साथ ही इसकी भी चर्चा कीजिये कि चीन -पाकिस्तान गठजोड़ ने किस प्रकार भारत की चिन्ताओं में वृद्धि की है ? (200 शब्द) Discuss the disputed issues in India-Pakistan relations. Alongwith this discuss how the China-Pakistan axis has increased the concerns of India ?##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत भारत-पाकिस्तान में विवादित मुद्दों को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात चीन -पाकिस्तान गठजोड़ की चर्चा करते हुए, इससे उत्पन्न चिंताओं को बताइए | अंत में भारत-पाकिस्तान संबंधों में समाधान के बिंदु बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं पाकिस्तान के मध्य कई विवादित मुद्दे हैं इनमे से कुछ प्रमुख निम्नवत हैं - सीमा पर आतंकवाद - पाकिस्तान 1990 के बाद लगातार भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवादी संगठन जैसे लश्कर ए तैयबा इत्यादि का सहारा ले रहा है | FATF की ग्रे सूची में पकिस्तान का रखा जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पुष्टि करता है | सियाचिन विवाद - भारत एवं पकिस्तान के मध्य 1971 के शिमला समझौते में दोनों के मध्य NJ9842 उत्तर तक सीमा को स्वीकार किया गया है | पकिस्तान सियाचिन को अपना भाग बताते हुए NJ9842के पश्चिम तक अपनी सीमा बताता है जबकि भारतNJ9842 के उत्तर पूर्व तक अपनी सीमा मानता है तथा सियाचिन को अपना भाग मानता है, यह दोनों के मध्य विवाद है | सरक्रीक - यह गुजरात के रन ऑफ कच्छ में बानगंगा से सम्बंधित है |भारत 1914 में हुए समझौते के अनुसार ,सीमा के प्याल्वाग सिद्धांत को स्वीकार करते हुए सेक्शन 10 को मानता है ,जबकि पाकिस्तान सेक्शन 9 को मानता है| सिन्धु जल समझौता ( 1960 ) - चिनाब बेसिन पर स्थित भारत की पाकलदल , रातले , लोअर कलनाई परियोजनाओं पर पाकिस्तान द्वारा भारत पर सिन्धु नदी समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है जबकि यह परियोजनाएं फ्लोइंग रिवर पर बनी है | जाधव केस - वर्तमान में पाकिस्तान द्वारा भारत के नागरिक जाधव को पकड़कर उल्लंघन करते हुए भारत के प्रतिनिधि को उनसे मिलने से रोका | यह केस अब ICJ में है | भारत पाकिस्तान के मध्य विवाद ने चीन को पाकिस्तान की तरफ बढ़ने का अवसर प्रदान किया , जिससे उत्पन्न चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं - CPEC - भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाते हुए यह गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुज़र रहा है| आतंकवाद के खिलाफ एक्शन लेने के विरुद्ध- जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकवादी के खिलाफ फिल्हाल चीन का रवैया स्पष्ट नहीं है ,हालाँकि अब इस आतंकवादी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है | भारत में अस्थिरता लेन का प्रयास - चीन एवं पाकिस्तान , ड्रग ट्रैफिकिंग , जाली नोट , आतंकवाद इत्यादि के माध्यम से भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे हैं | UNSC एवं NSG में भारत की सदस्यता - चीन द्वारा पाकिस्तान के समर्थन में , भारत के UNSC एवं NSG में प्रवेश के विरुद्ध गठजोड़ एक प्रमुख मुद्दा है | भारत को पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए | इस कड़ी में भारत को पाकिस्तान के साथ विभिन्न मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए उदहारण के लिए व्यापार के सम्बन्ध में , TAPI एवं IPI गैस पाईप लाइन के माध्यम से एवं शंघाई कारपोरेशन संगठन इत्यादि की सहायता से भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरी रखना चाहिए |
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भारत में अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ प्रमुख भू-राजस्व नीतियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। साथ ही, इन नीतियों के प्रभावों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) Briefly introduce major land revenue policies initiated by the British in India. Also, discuss the impact of these policies in detail. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में नीतियों की पृष्ठभूमि लिखिए। मुख्य भाग के प्रथम खंड में जमींदारी, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व्यवस्था के बारे में बताइये। इसके बाद इन प्रमुख नीतियों के निहितार्थों को लिखिए। निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया।कंपनी ने करों के निर्धारण और वसूली के लिए कई नए प्रकार के भू-राजस्व बंदोबस्त प्रारम्भ किए। इनमें से कुछ प्रमुख नीतियाँ इस प्रकार हैं: स्थायी या जमींदारी व्यवस्था: 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा स्थायी रूप से लागू। इसके अतिरिक्त चार्ल्स ग्रांट, जॉन शोर नामक व्यक्तियों का प्रमुख योगदान। इसके अंतर्गत जमींदार को भूमि का स्थायी मालिक बनाकर भूमि पर अधिकार को पैतृक बना दिया गया। यह अधिकार हस्तांतरणीय था अर्थात् वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी उत्तराधिकारी को दे सकते थे। किसानों से वसूल किए गए कुल रकम का 10/11 भाग कंपनी को देना तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था। रैयतवाड़ी व्यवस्था: थॉमस मुनरो द्वारा प्रारम्भ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बंबई एवं असम के कुछ भागों में लागू किया गया। इस व्यवस्था में किसानों के साथ सीधा बंदोबस्त किया गया। भू- राजस्व का निर्धारण भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था। महालवाड़ी व्यवस्था: यह व्यवस्था मध्य प्रांत, पंजाब, उत्तर प्रदेश के आगरा में लागू की गयी। लॉर्ड हेस्टिंग्स, थॉमसन, मार्टिन बर्ड प्रमुख व्यक्ति भू-राजस्व नीतियों के निहितार्थ: कृषि का पूंजीवादी रूपांतरण इन नीतियों का प्रभाव यह हुआ कि कृषि के परंपरागत ढांचे का ह्रास होने लगा। अंग्रेजों ने इसे अपने व्यापारिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया। राजस्व वसूली के नियमों में अनिश्चितता के कारण शोषण की प्रवृत्ति पायी गयी। नीलामी जैसी व्यवस्था ने किसानों में सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। किसानों तथा ग्रामीण समुदाय के परंपरा आधारित अधिकारों की अनदेखी की गयी। इसके कारण वे केवल खेतिहर मजदूर बन गए। पुलिस, न्यायालय का हस्तक्षेप बढ़ा क्योंकि राजस्व भुगतान न कर पाने पर अंग्रेजों ने दंडात्मक व्यवस्था अपनाई। इस व्यवस्था से ग्रामीण समाज की समूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया। किसान दिनों-दिन निर्धन होते गए। बड़े पैमाने पर भूमि का हस्तांतरण हुआ। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में जमींदारी, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी आदि प्रमुख भू-राजस्व नीतियों को अपनाया गया था। इन सभी नीतियों का प्रमुख उद्देश्य अत्यधिक आर्थिक लाभ था जिसका परिणाम आर्थिक शोषण, किसानों की दयनीय स्थिति तथा अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में प्रतिलक्षित होता है।
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##Question:भारत में अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ प्रमुख भू-राजस्व नीतियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। साथ ही, इन नीतियों के प्रभावों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) Briefly introduce major land revenue policies initiated by the British in India. Also, discuss the impact of these policies in detail. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में नीतियों की पृष्ठभूमि लिखिए। मुख्य भाग के प्रथम खंड में जमींदारी, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी व्यवस्था के बारे में बताइये। इसके बाद इन प्रमुख नीतियों के निहितार्थों को लिखिए। निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक व्यय की पूर्ति करने तथा अधिकाधिक धन कमाने के उद्देश्य से भारत की कृषि व्यवस्था में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया।कंपनी ने करों के निर्धारण और वसूली के लिए कई नए प्रकार के भू-राजस्व बंदोबस्त प्रारम्भ किए। इनमें से कुछ प्रमुख नीतियाँ इस प्रकार हैं: स्थायी या जमींदारी व्यवस्था: 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा स्थायी रूप से लागू। इसके अतिरिक्त चार्ल्स ग्रांट, जॉन शोर नामक व्यक्तियों का प्रमुख योगदान। इसके अंतर्गत जमींदार को भूमि का स्थायी मालिक बनाकर भूमि पर अधिकार को पैतृक बना दिया गया। यह अधिकार हस्तांतरणीय था अर्थात् वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी उत्तराधिकारी को दे सकते थे। किसानों से वसूल किए गए कुल रकम का 10/11 भाग कंपनी को देना तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था। रैयतवाड़ी व्यवस्था: थॉमस मुनरो द्वारा प्रारम्भ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बंबई एवं असम के कुछ भागों में लागू किया गया। इस व्यवस्था में किसानों के साथ सीधा बंदोबस्त किया गया। भू- राजस्व का निर्धारण भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था। महालवाड़ी व्यवस्था: यह व्यवस्था मध्य प्रांत, पंजाब, उत्तर प्रदेश के आगरा में लागू की गयी। लॉर्ड हेस्टिंग्स, थॉमसन, मार्टिन बर्ड प्रमुख व्यक्ति भू-राजस्व नीतियों के निहितार्थ: कृषि का पूंजीवादी रूपांतरण इन नीतियों का प्रभाव यह हुआ कि कृषि के परंपरागत ढांचे का ह्रास होने लगा। अंग्रेजों ने इसे अपने व्यापारिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया। राजस्व वसूली के नियमों में अनिश्चितता के कारण शोषण की प्रवृत्ति पायी गयी। नीलामी जैसी व्यवस्था ने किसानों में सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। किसानों तथा ग्रामीण समुदाय के परंपरा आधारित अधिकारों की अनदेखी की गयी। इसके कारण वे केवल खेतिहर मजदूर बन गए। पुलिस, न्यायालय का हस्तक्षेप बढ़ा क्योंकि राजस्व भुगतान न कर पाने पर अंग्रेजों ने दंडात्मक व्यवस्था अपनाई। इस व्यवस्था से ग्रामीण समाज की समूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया। किसान दिनों-दिन निर्धन होते गए। बड़े पैमाने पर भूमि का हस्तांतरण हुआ। इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में जमींदारी, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी आदि प्रमुख भू-राजस्व नीतियों को अपनाया गया था। इन सभी नीतियों का प्रमुख उद्देश्य अत्यधिक आर्थिक लाभ था जिसका परिणाम आर्थिक शोषण, किसानों की दयनीय स्थिति तथा अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में प्रतिलक्षित होता है।
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तकनीक के स्वदेशीकरण से क्या तात्पर्य है ? तकनीक स्वदेशीकरण की चुनौतियों को बताते हुए , सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द ) What does the indigenization of technology mean? Discussing the challenges of technology indigenization, discuss the efforts being made by the government. (200 words)
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· भूमिका में तकनीक के स्वदेशीकरण को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में तकनीक के स्वदेशीकरण में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में तकनीक स्वदेशीकरण के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में उठाए जा सकने वाले कुछ अन्य कदमों के साथ निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- तकनीक का स्वदेशीकरण से तात्पर्य मौजूदा तकनीक में अनुसंधान और विकास कार्य करना, तकनीक हस्तांतरण द्वारा प्रोदौगिकी की उपलब्धता सुनिश्चित करना, राष्ट्र की आवश्यकता अनुसार तकनीक का विकास तथा राष्ट्रीय संसाधनो का प्रभावी उपयोग करना शामिल है । हालांकि वर्तमान में भारत रक्षा के साथ साथ अन्य क्षेत्रो में भी अनुसंधान और विकास कार्यक्रम चला रहा था ताकि तकनीकों के स्वदेशीकरण को बढ़ावा दिया जा सके । इसके बावजूद तकनीकों के स्वदेशीकरण में अनेक चुनौतियाँ है जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- अंतर राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियाँ सहयोगी देशो द्वारा पुरानी तकनीक का ही हस्तांतरण किया जाता है । एनएसजी जैसे समूहो की सदस्यता का अभाव आईपीआर की समस्या राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियाँ स्वदेशीकरण के लिए वित्त की कमी क्षेत्र विशेषज्ञ का अभाव प्रभावी नीति निर्माण का अभाव निजी क्षेत्र की प्रभावी भागीदारिता का अभाव विनिर्माण क्षेत्र का प्रभावी क्षेत्र का विकास नही होना संस्थाओं के स्तर पर चुनौतियाँ संस्थाओ के स्तर पर योजनाबद्ध कार्य की कमी संस्थाओ के स्तर पर स्वायत्ता का अभाव विशेषज्ञ वैज्ञानिक को प्रभावी प्रोत्साहन का अभाव ( ब्रेन ड्रेन की समस्या ) सरकार द्वारा इन चुनौतियों को कम करने तथा स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिए बहुआयामी प्रयास किए जा रहे हैं । जैसे – मेक इन इंडिया के तहत तकनीकों के स्वदेशीकरण को बढ़ावा जैसे राफेल और एफ़ -16 जैसे लड़ाकू विमानो के घरेलू निर्माण पर वार्ता जारी है । रक्षा हथियारों की खरीद से संबन्धित न्यू डिफेंस प्रॉक्यूरमेंट नीति का निर्माण किया गया है । जिसमे घरेलू इकाईयों से खरीद को बढ़ावा दिया गया है । तकनीकों के स्वदेशीकरण के लिए मिसाइल सहयोग संबंधी समझौते भी किए गए हैं जैसे बराक मिसाइल के लिए इज़राइल से और ब्रह्मोस के लिए रूस से सहयोग संबंधी समझौता । भारत ने अपने बल पर भी अनेक तकनीकों को विकसित किया है और वर्तमान में उनका प्रभावी उपयोग भी कर रहा है जैसे पीएसएलवी और जीएलएसवी से संबन्धित तकनीक । भारत द्वारा स्वदेशी रूप में विकसित तेजस लड़ाकू विमान , आईएनएस विक्रांत , अग्नि मिसाइल आदि इसी प्रकार के कुछ उदाहरण हैं । हालांकि इन सब प्रयासों के बावजूद अभी भी भारत रक्षा के क्षेत्र में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है और रक्षा क्षेत्र के साथ साथ अन्य क्षेत्रो में भी तकनीक के स्वदेशीकरण की दर काफी धीरे है । जिसमे सरकार को उचित नीति निर्माण के साथ साथ अनुसंधान और विकास के लिए वित्त उपलब्धता और अनुकूलित वातावरण उपलब्ध करवाकर इसे बढ़ावा दिया जा सकता है ।
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##Question:तकनीक के स्वदेशीकरण से क्या तात्पर्य है ? तकनीक स्वदेशीकरण की चुनौतियों को बताते हुए , सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द ) What does the indigenization of technology mean? Discussing the challenges of technology indigenization, discuss the efforts being made by the government. (200 words) ##Answer:· भूमिका में तकनीक के स्वदेशीकरण को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में तकनीक के स्वदेशीकरण में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में तकनीक स्वदेशीकरण के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में उठाए जा सकने वाले कुछ अन्य कदमों के साथ निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- तकनीक का स्वदेशीकरण से तात्पर्य मौजूदा तकनीक में अनुसंधान और विकास कार्य करना, तकनीक हस्तांतरण द्वारा प्रोदौगिकी की उपलब्धता सुनिश्चित करना, राष्ट्र की आवश्यकता अनुसार तकनीक का विकास तथा राष्ट्रीय संसाधनो का प्रभावी उपयोग करना शामिल है । हालांकि वर्तमान में भारत रक्षा के साथ साथ अन्य क्षेत्रो में भी अनुसंधान और विकास कार्यक्रम चला रहा था ताकि तकनीकों के स्वदेशीकरण को बढ़ावा दिया जा सके । इसके बावजूद तकनीकों के स्वदेशीकरण में अनेक चुनौतियाँ है जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- अंतर राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियाँ सहयोगी देशो द्वारा पुरानी तकनीक का ही हस्तांतरण किया जाता है । एनएसजी जैसे समूहो की सदस्यता का अभाव आईपीआर की समस्या राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियाँ स्वदेशीकरण के लिए वित्त की कमी क्षेत्र विशेषज्ञ का अभाव प्रभावी नीति निर्माण का अभाव निजी क्षेत्र की प्रभावी भागीदारिता का अभाव विनिर्माण क्षेत्र का प्रभावी क्षेत्र का विकास नही होना संस्थाओं के स्तर पर चुनौतियाँ संस्थाओ के स्तर पर योजनाबद्ध कार्य की कमी संस्थाओ के स्तर पर स्वायत्ता का अभाव विशेषज्ञ वैज्ञानिक को प्रभावी प्रोत्साहन का अभाव ( ब्रेन ड्रेन की समस्या ) सरकार द्वारा इन चुनौतियों को कम करने तथा स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिए बहुआयामी प्रयास किए जा रहे हैं । जैसे – मेक इन इंडिया के तहत तकनीकों के स्वदेशीकरण को बढ़ावा जैसे राफेल और एफ़ -16 जैसे लड़ाकू विमानो के घरेलू निर्माण पर वार्ता जारी है । रक्षा हथियारों की खरीद से संबन्धित न्यू डिफेंस प्रॉक्यूरमेंट नीति का निर्माण किया गया है । जिसमे घरेलू इकाईयों से खरीद को बढ़ावा दिया गया है । तकनीकों के स्वदेशीकरण के लिए मिसाइल सहयोग संबंधी समझौते भी किए गए हैं जैसे बराक मिसाइल के लिए इज़राइल से और ब्रह्मोस के लिए रूस से सहयोग संबंधी समझौता । भारत ने अपने बल पर भी अनेक तकनीकों को विकसित किया है और वर्तमान में उनका प्रभावी उपयोग भी कर रहा है जैसे पीएसएलवी और जीएलएसवी से संबन्धित तकनीक । भारत द्वारा स्वदेशी रूप में विकसित तेजस लड़ाकू विमान , आईएनएस विक्रांत , अग्नि मिसाइल आदि इसी प्रकार के कुछ उदाहरण हैं । हालांकि इन सब प्रयासों के बावजूद अभी भी भारत रक्षा के क्षेत्र में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है और रक्षा क्षेत्र के साथ साथ अन्य क्षेत्रो में भी तकनीक के स्वदेशीकरण की दर काफी धीरे है । जिसमे सरकार को उचित नीति निर्माण के साथ साथ अनुसंधान और विकास के लिए वित्त उपलब्धता और अनुकूलित वातावरण उपलब्ध करवाकर इसे बढ़ावा दिया जा सकता है ।
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With respect to oceanography, what do you understand by the salinity? State the factors affecting salinity of the ocean waters? (10 Marks / 150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - UNDERSTANDING SALINITY - THE FACTORS AFFECTING SALINITY OF OCEAN WATERS Answer:- Graphy means a description of something. Therefore, oceanography means the description of oceans. It is important to study oceans not only due to the significance that water holds for sustaining life on the planet but also due to the great paradox that it holds. This is to say that 97% of the water of planet Earth lies in the oceans. Yet, only 1% is available on the surface in the continents. 97% of water is thus not fit for human consumption only. This is due to salinity UNDERSTANDING SALINITY 1) DEFINITION OF SALINITY It refers to the number of dissolved salts in grams per kilograms of water. 2) DATA The average salinity of all the oceans is around 34.5 gm/kg. The salinity of the oceans in the Northern Hemisphere is 34 gm/kg. The salinity of the oceans in the Southern Hemisphere is around 35 gm/kg. 3) COMPOSITION OF SALTS IN THE OCEAN WATER Sodium chloride, Magnesium chloride, Magnesium Sulphate, Calcium Sulphate and Pottasium Sulphate are the salts present in the oceans in the same order (with respect to dominancy in amounts). 4) SOURCES OF SALINITY IN THE OCEANS 4.1) Terrestrial Sources- This is the most important source. They add salts in a slow but continuous manner. The carbon dioxide of the air mixes with the rain waters, producing acidic water, which dissolves the minerals. These minerals are taken into the oceans (from the land). Additionally, sunlight implies that the water evaporates, leaving behind the salts and minerals. The process takes place over and over again, over millions of years. 4.2) Sub-marine Sources- Volcanic activity, in the oceans, produces pyroclastic materials (which are aggregates of minerals). This makes the ocean waters saline. The reactions are quick but it is a discontinuous process 4.3) Cosmic Sources- These account forless than 1% of the ocean salinity. The space dust burnt in the Mesosphere, when reaches the Earth, contributes the salinity of the oceans. THE FACTORS AFFECTING SALINITY OF OCEAN WATERS 1) TEMPERATURE/ EVAPORATION Increase in temperature leads to an increase in evaporation and hence more salinity. Therefore, the higher salinity bodies exist in the Tropical regions. 2) PRESSURE The pressure is inversely proportional to temperature. Hence, pressure and salinity are inversely proportional to each other. Therefore, high-pressure areas imply lower salinity. 3) INFLUX OF FRESHWATER The influx of freshwater leads to lower salinity. The influx of freshwater can be on account of: 3.1) High rainfall- Therefore, the equator has less saline ocean waters. 3.2) Mouths of the rivers- Influx of freshwater there moderates the salinity levels. 3.3) Melting of ice- Only waters which are not salts can become ice. Therefore, in winters the areas have more salinity, whereas during summers there is low salinity 4) WINDS When winds blow continuously from the land to the ocean, the surface water gets continuously dragged from one side of the ocean to the other. Therefore, surface water accumulates on the other side. In the Tropical areas, the western coast of the continents experiences a rise in the sea level, while the eastern coast experiences a fall in the sea level. This creates a sea-saw effect over the surface waters. Where there is an accumulation of water, there the surface waters experience high temperature and hence more salinity. More piling up of water on this side creates more pressure for the water to go down resulting in cold upwelling on the other side of the ocean.
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##Question:With respect to oceanography, what do you understand by the salinity? State the factors affecting salinity of the ocean waters? (10 Marks / 150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - UNDERSTANDING SALINITY - THE FACTORS AFFECTING SALINITY OF OCEAN WATERS Answer:- Graphy means a description of something. Therefore, oceanography means the description of oceans. It is important to study oceans not only due to the significance that water holds for sustaining life on the planet but also due to the great paradox that it holds. This is to say that 97% of the water of planet Earth lies in the oceans. Yet, only 1% is available on the surface in the continents. 97% of water is thus not fit for human consumption only. This is due to salinity UNDERSTANDING SALINITY 1) DEFINITION OF SALINITY It refers to the number of dissolved salts in grams per kilograms of water. 2) DATA The average salinity of all the oceans is around 34.5 gm/kg. The salinity of the oceans in the Northern Hemisphere is 34 gm/kg. The salinity of the oceans in the Southern Hemisphere is around 35 gm/kg. 3) COMPOSITION OF SALTS IN THE OCEAN WATER Sodium chloride, Magnesium chloride, Magnesium Sulphate, Calcium Sulphate and Pottasium Sulphate are the salts present in the oceans in the same order (with respect to dominancy in amounts). 4) SOURCES OF SALINITY IN THE OCEANS 4.1) Terrestrial Sources- This is the most important source. They add salts in a slow but continuous manner. The carbon dioxide of the air mixes with the rain waters, producing acidic water, which dissolves the minerals. These minerals are taken into the oceans (from the land). Additionally, sunlight implies that the water evaporates, leaving behind the salts and minerals. The process takes place over and over again, over millions of years. 4.2) Sub-marine Sources- Volcanic activity, in the oceans, produces pyroclastic materials (which are aggregates of minerals). This makes the ocean waters saline. The reactions are quick but it is a discontinuous process 4.3) Cosmic Sources- These account forless than 1% of the ocean salinity. The space dust burnt in the Mesosphere, when reaches the Earth, contributes the salinity of the oceans. THE FACTORS AFFECTING SALINITY OF OCEAN WATERS 1) TEMPERATURE/ EVAPORATION Increase in temperature leads to an increase in evaporation and hence more salinity. Therefore, the higher salinity bodies exist in the Tropical regions. 2) PRESSURE The pressure is inversely proportional to temperature. Hence, pressure and salinity are inversely proportional to each other. Therefore, high-pressure areas imply lower salinity. 3) INFLUX OF FRESHWATER The influx of freshwater leads to lower salinity. The influx of freshwater can be on account of: 3.1) High rainfall- Therefore, the equator has less saline ocean waters. 3.2) Mouths of the rivers- Influx of freshwater there moderates the salinity levels. 3.3) Melting of ice- Only waters which are not salts can become ice. Therefore, in winters the areas have more salinity, whereas during summers there is low salinity 4) WINDS When winds blow continuously from the land to the ocean, the surface water gets continuously dragged from one side of the ocean to the other. Therefore, surface water accumulates on the other side. In the Tropical areas, the western coast of the continents experiences a rise in the sea level, while the eastern coast experiences a fall in the sea level. This creates a sea-saw effect over the surface waters. Where there is an accumulation of water, there the surface waters experience high temperature and hence more salinity. More piling up of water on this side creates more pressure for the water to go down resulting in cold upwelling on the other side of the ocean.
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भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को बताते हुए , भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है | स्पष्ट कीजिये | (10 अंक/150-200 शब्द) Explaining the importance of Afghanistan to India, discuss the cooperation India has with Afghanistan. Alongwith this India has to face many challenges. Clarify.(10 marks/150-200 words)
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एप्रोच - भूमिका में भारत -अफगानिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों को बताते हुए भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात भारत-अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजये | पुनः दोनों देशों के मध्य विद्यमान चुनौतियों को बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और अफगानिस्तान के मध्य सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से विद्यमान है | दोनों देशों ने 2011 में एक सामरिक साझेदारी समझौता किया ,जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम जुड़े | दोनों देशों ने मिलकर इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध सामरिक और सैन्य सहयोग भी विकसित किया है | भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ सहयोग के आयाम - अफगानिस्तान के विकास परियोजनाओं में भारत ने 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का योगदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है | भारत ने अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे- जरांज देलाराम राजमार्ग, संसद भवन, भारत -अफगानिस्तान मैत्री बाँध इत्यादि कार्यों में वित्तपोषण और निर्माण कार्य किया है | भारत ने अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक समबन्धों को बढ़ाने एवं अफगानिस्तान की हिन्द महासागर के साथ तथा अन्य देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के चाबहार को निर्मित करने में लगा हुआ है | इसके अतिरिक्त भारत अफगानिस्तान के साथ "इंटरनेशनल नार्थ -साउथ कोरिडोर लापस लाजुली"पर काम कर रहा है | "हार्ट ऑफ एशिया" प्रक्रिया या इस्ताम्बुल प्रक्रिया अफगानिस्तान को अधिकाधिक सहायता प्रदान करने के लिए की गयी | भारत, हार्ट ऑफ एशिया प्रक्रिया के तहत व्यापर, वाणिज्य एवं निवेश हेतु विश्वास बहाली उपायों का अग्रणी देश है | भारत- अफगानिस्तान संबंधो में चुनौतियाँ - दोनों देशों के मध्य सहयोग में सबसे बड़ी बाधा भौगोलिक निकटता की कमी है | पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव में किसी भी प्रकार की वृद्धि का विरोध करता है एवं हक्कानी नेटवर्क के माध्यम से अफगानिस्तान में हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है | अफगानिस्तान में चीन का बढ़ता प्रभाव भी एक डिप्लोमेटिक चुनौती है | भारत को अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता और विकास लाने के लिए निरंतर दोनों देशों के मध्य सहयोग को बढ़ाना चाहिए | भारत को अफगानिस्तान में पाकिस्तान को भी कूटनीतिक तौर पर सकारात्मक भूमिका में लाने का प्रयास करना चाहिए | उदाहरण के तौर पर तापी जैसी परियोजनाओं के माध्यम से | भारत, चीन को एक चुनौती न मानकर उसके साथ अफगानिस्तान में सहयोग के एक नए आयाम को जन्म दे सकता है, अतः भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर पूरे एशिया में शांति व्यवस्था को बहाल करने में एक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहिए |
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##Question:भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को बताते हुए , भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है | स्पष्ट कीजिये | (10 अंक/150-200 शब्द) Explaining the importance of Afghanistan to India, discuss the cooperation India has with Afghanistan. Alongwith this India has to face many challenges. Clarify.(10 marks/150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत -अफगानिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों को बताते हुए भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात भारत-अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजये | पुनः दोनों देशों के मध्य विद्यमान चुनौतियों को बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और अफगानिस्तान के मध्य सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से विद्यमान है | दोनों देशों ने 2011 में एक सामरिक साझेदारी समझौता किया ,जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम जुड़े | दोनों देशों ने मिलकर इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध सामरिक और सैन्य सहयोग भी विकसित किया है | भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ सहयोग के आयाम - अफगानिस्तान के विकास परियोजनाओं में भारत ने 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का योगदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है | भारत ने अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे- जरांज देलाराम राजमार्ग, संसद भवन, भारत -अफगानिस्तान मैत्री बाँध इत्यादि कार्यों में वित्तपोषण और निर्माण कार्य किया है | भारत ने अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक समबन्धों को बढ़ाने एवं अफगानिस्तान की हिन्द महासागर के साथ तथा अन्य देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के चाबहार को निर्मित करने में लगा हुआ है | इसके अतिरिक्त भारत अफगानिस्तान के साथ "इंटरनेशनल नार्थ -साउथ कोरिडोर लापस लाजुली"पर काम कर रहा है | "हार्ट ऑफ एशिया" प्रक्रिया या इस्ताम्बुल प्रक्रिया अफगानिस्तान को अधिकाधिक सहायता प्रदान करने के लिए की गयी | भारत, हार्ट ऑफ एशिया प्रक्रिया के तहत व्यापर, वाणिज्य एवं निवेश हेतु विश्वास बहाली उपायों का अग्रणी देश है | भारत- अफगानिस्तान संबंधो में चुनौतियाँ - दोनों देशों के मध्य सहयोग में सबसे बड़ी बाधा भौगोलिक निकटता की कमी है | पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव में किसी भी प्रकार की वृद्धि का विरोध करता है एवं हक्कानी नेटवर्क के माध्यम से अफगानिस्तान में हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है | अफगानिस्तान में चीन का बढ़ता प्रभाव भी एक डिप्लोमेटिक चुनौती है | भारत को अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता और विकास लाने के लिए निरंतर दोनों देशों के मध्य सहयोग को बढ़ाना चाहिए | भारत को अफगानिस्तान में पाकिस्तान को भी कूटनीतिक तौर पर सकारात्मक भूमिका में लाने का प्रयास करना चाहिए | उदाहरण के तौर पर तापी जैसी परियोजनाओं के माध्यम से | भारत, चीन को एक चुनौती न मानकर उसके साथ अफगानिस्तान में सहयोग के एक नए आयाम को जन्म दे सकता है, अतः भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर पूरे एशिया में शांति व्यवस्था को बहाल करने में एक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहिए |
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Trace the evolution from the Look East Policy to the Act East Policy. (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Historical ties between India and South East Asia - EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY -CONCLUSION The positive outcomes of these policies and the concerns which need to be addressed Answer:- India has had cultural and civilizational ties with South East Asia. For example, Buddhism, Islam and Hinduism travelled from India to these countries. Geography implied that India was central to reach SEA (monsoonal winds) during ancient times. For example, Bali Yatra in Odisha connotes people taking their boats and travelling to SEA in the olden days. Also, colonialism was another element of commonality- institutions, indentured labourers were taken by the Britishers to these areas. During our freedom struggle as well, the INA received support from this region Connectivity (also trade, investment) has been central to the Look East and Act East Policies. There has been a focus upon closeness and warmth with these countries. As per these policies, the SEA is to be treated as though it were an immediate neighbour. EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY 1) THE LOOK EAST POLICY AND it"s OBJECTIVE In 1992, Prime Minister Narasimha Raoji formulated the Look East Policy. It aimed for closer cooperation among the South East nations and India. Economic cooperation was the chief focus via trade and economic linkages as the SEA countries faced immense economic growth due to exports. 2) BACKGROUND The policy was formulated in the background of the collapse of USSR, Balance of Payment crisis and the complementarities that India shares with SEA. 3) SUCCESS OF LOOK EAST POLICY In 1992, we (India and South East Asia) became sectoral level partners. In 2002, we became summit level partners. Trade increased from $3.1bn to $12 billion between 1991 and 2012. 4) LOOK EAST 2.0 This policy was formulated in the late 90s (/first decade of the 21st century) for deeper and wider economic engagements 5) 2010- FREE TRADE AGREEMENT In 2010, an FTA on goods was signed. This led to the growth in trade by 41%. Also, a two-way flow of investments increased. 6) SECURITY AND STRATEGIC ISSUES Later on, the inclusion of security and strategic issues was seen in the Look East Policy. The main reason behind this was China, whichwas a larger neighbour of these countries. Therefore, it sought to balance China with the help of India (traditionally the US played that role). 7) ADDITION OF A DOMESTIC DIMENSION A domestic dimension was later added i.e. Looking East through the North East. Trade and connectivity were sought to be established between the North East and SEA. 7.1) Some projects that have been formulated and implemented are: The Trilateral Highway The BCIM corridor The Kaladan multi-modal project The Mekong Ganga Cooperation 8) ACT EAST POLICY It was evolved in 2014 by PM Shri Narendra Modiji. The focus was on a dynamic and action-oriented policy. 9) INCLUSION OF OTHER COUNTRIES Other countries such as Japan, S Korea etc. were also included in the policy. 10) MORE DIMENSIONS ADDED The focus was shifted to political, strategic and cultural dimensions, as well. Also, the focus was on ASEAN and ASEAN associated institutions. The areas of interest for cooperation are infrastructure, trade, skills, space, S&T, people to people exchange etc. 11) CURRENT DEVELOPMENTS In 2018, India and ASEAN completed 25 years of dialogue partnership (more than 30 dialogue mechanisms), 15 years of summit-level partnership, 5 years of strategic partnership (2012 onwards). The Delhi Dialogue (which started in 2009), took place in 2018 at New Delhi. 12) JAPAN Japan has also started an Act East Forum with India. Japan"s Free and Open Indo-Pacific Strategy converges with AEP beginning in the North East. China is a common adversary. As a result of these policies, several beneficial outcomes have been achieved. For example, trade is expanding significantly. The ASEAN countries accounted for 10.58% of India’s trade. Also, multiple agreements have been signed. For example, the FTA was signed in 2009 and came into effect in 2010. An agreement on trade and services was also signed. In terms of investments as well, ASEAN accounted for 12.5% of inbound FDI since 2000 (in which Singapore has had a significant share). The FDI flows into India between 2000 and 2015 have been $39 billion. In 2015, India announced $1 billion Line of Credit to ASEAN. Also, a fund of $ 77 million has been established for facilitating manufacturing in CLMV countries. The concern which needs to be addressed now is the widening trade deficit, which is currently favourable to the ASEAN countries.
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##Question:Trace the evolution from the Look East Policy to the Act East Policy. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Historical ties between India and South East Asia - EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY -CONCLUSION The positive outcomes of these policies and the concerns which need to be addressed Answer:- India has had cultural and civilizational ties with South East Asia. For example, Buddhism, Islam and Hinduism travelled from India to these countries. Geography implied that India was central to reach SEA (monsoonal winds) during ancient times. For example, Bali Yatra in Odisha connotes people taking their boats and travelling to SEA in the olden days. Also, colonialism was another element of commonality- institutions, indentured labourers were taken by the Britishers to these areas. During our freedom struggle as well, the INA received support from this region Connectivity (also trade, investment) has been central to the Look East and Act East Policies. There has been a focus upon closeness and warmth with these countries. As per these policies, the SEA is to be treated as though it were an immediate neighbour. EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY 1) THE LOOK EAST POLICY AND it"s OBJECTIVE In 1992, Prime Minister Narasimha Raoji formulated the Look East Policy. It aimed for closer cooperation among the South East nations and India. Economic cooperation was the chief focus via trade and economic linkages as the SEA countries faced immense economic growth due to exports. 2) BACKGROUND The policy was formulated in the background of the collapse of USSR, Balance of Payment crisis and the complementarities that India shares with SEA. 3) SUCCESS OF LOOK EAST POLICY In 1992, we (India and South East Asia) became sectoral level partners. In 2002, we became summit level partners. Trade increased from $3.1bn to $12 billion between 1991 and 2012. 4) LOOK EAST 2.0 This policy was formulated in the late 90s (/first decade of the 21st century) for deeper and wider economic engagements 5) 2010- FREE TRADE AGREEMENT In 2010, an FTA on goods was signed. This led to the growth in trade by 41%. Also, a two-way flow of investments increased. 6) SECURITY AND STRATEGIC ISSUES Later on, the inclusion of security and strategic issues was seen in the Look East Policy. The main reason behind this was China, whichwas a larger neighbour of these countries. Therefore, it sought to balance China with the help of India (traditionally the US played that role). 7) ADDITION OF A DOMESTIC DIMENSION A domestic dimension was later added i.e. Looking East through the North East. Trade and connectivity were sought to be established between the North East and SEA. 7.1) Some projects that have been formulated and implemented are: The Trilateral Highway The BCIM corridor The Kaladan multi-modal project The Mekong Ganga Cooperation 8) ACT EAST POLICY It was evolved in 2014 by PM Shri Narendra Modiji. The focus was on a dynamic and action-oriented policy. 9) INCLUSION OF OTHER COUNTRIES Other countries such as Japan, S Korea etc. were also included in the policy. 10) MORE DIMENSIONS ADDED The focus was shifted to political, strategic and cultural dimensions, as well. Also, the focus was on ASEAN and ASEAN associated institutions. The areas of interest for cooperation are infrastructure, trade, skills, space, S&T, people to people exchange etc. 11) CURRENT DEVELOPMENTS In 2018, India and ASEAN completed 25 years of dialogue partnership (more than 30 dialogue mechanisms), 15 years of summit-level partnership, 5 years of strategic partnership (2012 onwards). The Delhi Dialogue (which started in 2009), took place in 2018 at New Delhi. 12) JAPAN Japan has also started an Act East Forum with India. Japan"s Free and Open Indo-Pacific Strategy converges with AEP beginning in the North East. China is a common adversary. As a result of these policies, several beneficial outcomes have been achieved. For example, trade is expanding significantly. The ASEAN countries accounted for 10.58% of India’s trade. Also, multiple agreements have been signed. For example, the FTA was signed in 2009 and came into effect in 2010. An agreement on trade and services was also signed. In terms of investments as well, ASEAN accounted for 12.5% of inbound FDI since 2000 (in which Singapore has had a significant share). The FDI flows into India between 2000 and 2015 have been $39 billion. In 2015, India announced $1 billion Line of Credit to ASEAN. Also, a fund of $ 77 million has been established for facilitating manufacturing in CLMV countries. The concern which needs to be addressed now is the widening trade deficit, which is currently favourable to the ASEAN countries.
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Trace the evolution from the Look East Policy to the Act East Policy. (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Historical ties between India and South East Asia - EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY -CONCLUSION The positive outcomes of these policies and the concerns which need to be addressed Answer:- India has had cultural and civilizational ties with South East Asia. For example, Buddhism, Islam and Hinduism travelled from India to these countries. Geography implied that India was central to reach SEA (monsoonal winds) during ancient times. For example, Bali Yatra in Odisha connotes people taking their boats and travelling to SEA in the olden days. Also, colonialism was another element of commonality- institutions, indentured laborers were taken by the Britishers to these areas. During our freedom struggle as well, the INA received support from this region Connectivity (also trade, investment) has been central to the Look East and Act East Policies. There has been focus upon closeness and warmth with these countries. As per these policies, SEA is to be treated as though it were an immediate neighbor. EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY 1) THE LOOK EAST POLICY AND ITS OBJECTIVE In 1992, Prime Minister Narsimha Raoji formulated the Look East Policy. It aimed for closer cooperation among the South East nations and India. Economic cooperation was the chief focus via trade and economic linkages as the SEA countries faced immense economic growth due to exports. 2) BACKGROUND The policy was formulated in the background of the collapse of USSR, Balance of Payment crisis and the complementarities that India shares with SEA. 3) SUCCESS OF LOOK EAST POLICY In 1992, we (India and South East Asia) became sectoral level partners. In 2002, we became summit level partners. Trade increased from $3.1bn to $12 billion between 1991 and 2012. 4) LOOK EAST 2.0 This policy was formulated in the late 90s (/first decade of the 21st century) for deeper and wider economic engagements 5) 2010- FREE TRADE AGREEMENT In 2010, an FTA on goods was signed. This led to the growth in trade by 41%. Also, a two way flow of investments increased. 6) SECURITY AND STRATEGIC ISSUES Later on, the inclusion of security and strategic issues was seen in the Look East Policy. The main reason behind this was China, whichwas a larger neighbor of these countries. Therefore, it sought to balance China with the help of India (traditionally US played that role). 7) ADDITION OF A DOMESTIC DIMENSION A domestic dimension was later added i.e. Looking East through the North East. Trade and connectivity was sought to be established between the North East and SEA. 7.1) Some projects that have been formulated and implemented are: The Trilateral Highway The BCIM corridor The Kaladan multi modal project The Mekong Ganga Cooperation 8) ACT EAST POLICY It was evolved in 2014 by PM Shri Narendra Modiji. The focus was on a dynamic and action oriented policy. 9) INCLUSION OF OTHER COUNTRIES Other countries such as Japan, S Korea etc. were also included in the policy. 10) MORE DIMENSIONS ADDED The focus was shifted to political, strategic and cultural dimensions, as well. Also, the focus was on ASEAN and ASEAN associated institutions. The areas of interest for cooperation are infrastructure, trade, skills, space, S&T, people to people exchange etc. 11) CURRENT DEVELOPMENTS In 2018, India and ASEAN completed 25 years of dialogue partnership (more than 30 dialogue mechanisms), 15 years of summit level partnership, 5 years of strategic partnership (2012 onwards). The Delhi Dialogue (which started in 2009), took place in 2018 at New Delhi. 12) JAPAN Japan has also started an Act East Forum with India. Japan"s Free and Open Indo-Pacific Strategy converges with AEP beginning in the North East. China is the common adversary. As a result of these policies, several beneficial outcomes have been achieved. For example, trade is expanding significantly. The ASEAN countries accounted for 10.58% of India’s trade. Also, multiple agreements have been signed. For example, the FTA was signed in 2009 and came into effect in 2010. An agreement on trade and services was also signed. In terms of investments as well, ASEAN accounted for 12.5% of inbound FDI since 2000 (in which Singapore has had a significant share). The FDI flows into India between 2000 and 2015 have been $39 billion. In 2015, India announced $1 billion Line of Credit to ASEAN. Also, a fund of $ 77 million has been established for facilitating manufacturing in CLMV countries. The concern which needs to be addressed now is the widening trade deficit, which is currently favorable to the ASEAN countries.
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##Question:Trace the evolution from the Look East Policy to the Act East Policy. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION Historical ties between India and South East Asia - EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY -CONCLUSION The positive outcomes of these policies and the concerns which need to be addressed Answer:- India has had cultural and civilizational ties with South East Asia. For example, Buddhism, Islam and Hinduism travelled from India to these countries. Geography implied that India was central to reach SEA (monsoonal winds) during ancient times. For example, Bali Yatra in Odisha connotes people taking their boats and travelling to SEA in the olden days. Also, colonialism was another element of commonality- institutions, indentured laborers were taken by the Britishers to these areas. During our freedom struggle as well, the INA received support from this region Connectivity (also trade, investment) has been central to the Look East and Act East Policies. There has been focus upon closeness and warmth with these countries. As per these policies, SEA is to be treated as though it were an immediate neighbor. EVOLUTION OF THE ACT EAST POLICY FROM THE LOOK EAST POLICY 1) THE LOOK EAST POLICY AND ITS OBJECTIVE In 1992, Prime Minister Narsimha Raoji formulated the Look East Policy. It aimed for closer cooperation among the South East nations and India. Economic cooperation was the chief focus via trade and economic linkages as the SEA countries faced immense economic growth due to exports. 2) BACKGROUND The policy was formulated in the background of the collapse of USSR, Balance of Payment crisis and the complementarities that India shares with SEA. 3) SUCCESS OF LOOK EAST POLICY In 1992, we (India and South East Asia) became sectoral level partners. In 2002, we became summit level partners. Trade increased from $3.1bn to $12 billion between 1991 and 2012. 4) LOOK EAST 2.0 This policy was formulated in the late 90s (/first decade of the 21st century) for deeper and wider economic engagements 5) 2010- FREE TRADE AGREEMENT In 2010, an FTA on goods was signed. This led to the growth in trade by 41%. Also, a two way flow of investments increased. 6) SECURITY AND STRATEGIC ISSUES Later on, the inclusion of security and strategic issues was seen in the Look East Policy. The main reason behind this was China, whichwas a larger neighbor of these countries. Therefore, it sought to balance China with the help of India (traditionally US played that role). 7) ADDITION OF A DOMESTIC DIMENSION A domestic dimension was later added i.e. Looking East through the North East. Trade and connectivity was sought to be established between the North East and SEA. 7.1) Some projects that have been formulated and implemented are: The Trilateral Highway The BCIM corridor The Kaladan multi modal project The Mekong Ganga Cooperation 8) ACT EAST POLICY It was evolved in 2014 by PM Shri Narendra Modiji. The focus was on a dynamic and action oriented policy. 9) INCLUSION OF OTHER COUNTRIES Other countries such as Japan, S Korea etc. were also included in the policy. 10) MORE DIMENSIONS ADDED The focus was shifted to political, strategic and cultural dimensions, as well. Also, the focus was on ASEAN and ASEAN associated institutions. The areas of interest for cooperation are infrastructure, trade, skills, space, S&T, people to people exchange etc. 11) CURRENT DEVELOPMENTS In 2018, India and ASEAN completed 25 years of dialogue partnership (more than 30 dialogue mechanisms), 15 years of summit level partnership, 5 years of strategic partnership (2012 onwards). The Delhi Dialogue (which started in 2009), took place in 2018 at New Delhi. 12) JAPAN Japan has also started an Act East Forum with India. Japan"s Free and Open Indo-Pacific Strategy converges with AEP beginning in the North East. China is the common adversary. As a result of these policies, several beneficial outcomes have been achieved. For example, trade is expanding significantly. The ASEAN countries accounted for 10.58% of India’s trade. Also, multiple agreements have been signed. For example, the FTA was signed in 2009 and came into effect in 2010. An agreement on trade and services was also signed. In terms of investments as well, ASEAN accounted for 12.5% of inbound FDI since 2000 (in which Singapore has had a significant share). The FDI flows into India between 2000 and 2015 have been $39 billion. In 2015, India announced $1 billion Line of Credit to ASEAN. Also, a fund of $ 77 million has been established for facilitating manufacturing in CLMV countries. The concern which needs to be addressed now is the widening trade deficit, which is currently favorable to the ASEAN countries.
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भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को बताते हुए , भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है | स्पष्ट कीजिये | (200 शब्द) Explaining the importance of Afghanistan to India, discuss the cooperation India has with Afghanistan. Alongwith this India has to face many challanges. Clarify.
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एप्रोच - भूमिका में भारत -अफगानिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों को बताते हुए भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात भारत-अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजये | पुनः दोनों देशों के मध्य विद्यमान चुनौतियों को बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और अफगानिस्तान के मध्य सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से विद्यमान है | दोनों देशों ने 2011 में एक सामरिक साझेदारी समझौता किया ,जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम जुड़े | दोनों देशों ने मिलकर इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध सामरिक और सैन्य सहयोग भी विकसित किया है | भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ सहयोग के आयाम - अफगानिस्तान के विकास परियोजनाओं में भारत ने 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का योगदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है | भारत ने अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे- जरांज देलाराम राजमार्ग, संसद भवन, भारत -अफगानिस्तान मैत्री बाँध इत्यादि कार्यों में वित्तपोषण और निर्माण कार्य किया है | भारत ने अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक समबन्धों को बढ़ाने एवं अफगानिस्तान की हिन्द महासागर के साथ तथा अन्य देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के चाबहार को निर्मित करने में लगा हुआ है | इसके अतिरिक्त भारत अफगानिस्तान के साथ " इंटरनेशनल नार्थ -साउथ कोरिडोर लापस लाजुली" पर काम कर रहा है | "हार्ट ऑफ एशिया" प्रक्रिया या इस्ताम्बुल प्रक्रिया अफगानिस्तान को अधिकाधिक सहायता प्रदान करने के लिए की गयी | भारत, हार्ट ऑफ एशिया प्रक्रिया के तहत व्यापर, वाणिज्य एवं निवेश हेतु विश्वास बहाली उपायों का अग्रणी देश है | भारत- अफगानिस्तान संबंधो में चुनौतियाँ - दोनों देशों के मध्य सहयोग में सबसे बड़ी बाधा भौगोलिक निकटता की कमी है | पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव में किसी भी प्रकार की वृद्धि का विरोध करता है एवं हक्कानी नेटवर्क के माध्यम से अफगानिस्तान में हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है | अफगानिस्तान में चीन का बढ़ता प्रभाव भी एक डिप्लोमेटिक चुनौती है | भारत को अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता और विकास लाने के लिए निरंतर दोनों देशों के मध्य सहयोग को बढ़ाना चाहिए | भारत को अफगानिस्तान में पाकिस्तान को भी कूटनीतिक तौर पर सकारात्मक भूमिका में लाने का प्रयास करना चाहिए | उदाहरण के तौर पर तापी जैसी परियोजनाओं के माध्यम से | भारत, चीन को एक चुनौती न मानकर उसके साथ अफगानिस्तान में सहयोग के एक नए आयाम को जन्म दे सकता है, अतः भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर पूरे एशिया में शांति व्यवस्था को बहाल करने में एक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहिए |
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##Question:भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को बताते हुए , भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है | स्पष्ट कीजिये | (200 शब्द) Explaining the importance of Afghanistan to India, discuss the cooperation India has with Afghanistan. Alongwith this India has to face many challanges. Clarify. ##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत -अफगानिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों को बताते हुए भारत के लिए अफगानिस्तान के महत्व को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात भारत-अफगानिस्तान के साथ किये जा रहे सहयोग की चर्चा कीजये | पुनः दोनों देशों के मध्य विद्यमान चुनौतियों को बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और अफगानिस्तान के मध्य सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से विद्यमान है | दोनों देशों ने 2011 में एक सामरिक साझेदारी समझौता किया ,जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम जुड़े | दोनों देशों ने मिलकर इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध सामरिक और सैन्य सहयोग भी विकसित किया है | भारत द्वारा अफगानिस्तान के साथ सहयोग के आयाम - अफगानिस्तान के विकास परियोजनाओं में भारत ने 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का योगदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है | भारत ने अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे- जरांज देलाराम राजमार्ग, संसद भवन, भारत -अफगानिस्तान मैत्री बाँध इत्यादि कार्यों में वित्तपोषण और निर्माण कार्य किया है | भारत ने अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक समबन्धों को बढ़ाने एवं अफगानिस्तान की हिन्द महासागर के साथ तथा अन्य देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के चाबहार को निर्मित करने में लगा हुआ है | इसके अतिरिक्त भारत अफगानिस्तान के साथ " इंटरनेशनल नार्थ -साउथ कोरिडोर लापस लाजुली" पर काम कर रहा है | "हार्ट ऑफ एशिया" प्रक्रिया या इस्ताम्बुल प्रक्रिया अफगानिस्तान को अधिकाधिक सहायता प्रदान करने के लिए की गयी | भारत, हार्ट ऑफ एशिया प्रक्रिया के तहत व्यापर, वाणिज्य एवं निवेश हेतु विश्वास बहाली उपायों का अग्रणी देश है | भारत- अफगानिस्तान संबंधो में चुनौतियाँ - दोनों देशों के मध्य सहयोग में सबसे बड़ी बाधा भौगोलिक निकटता की कमी है | पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव में किसी भी प्रकार की वृद्धि का विरोध करता है एवं हक्कानी नेटवर्क के माध्यम से अफगानिस्तान में हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है | अफगानिस्तान में चीन का बढ़ता प्रभाव भी एक डिप्लोमेटिक चुनौती है | भारत को अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता और विकास लाने के लिए निरंतर दोनों देशों के मध्य सहयोग को बढ़ाना चाहिए | भारत को अफगानिस्तान में पाकिस्तान को भी कूटनीतिक तौर पर सकारात्मक भूमिका में लाने का प्रयास करना चाहिए | उदाहरण के तौर पर तापी जैसी परियोजनाओं के माध्यम से | भारत, चीन को एक चुनौती न मानकर उसके साथ अफगानिस्तान में सहयोग के एक नए आयाम को जन्म दे सकता है, अतः भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर पूरे एशिया में शांति व्यवस्था को बहाल करने में एक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहिए |
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लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये| इसके साथ ही अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द,10 अंक) Review the key provisions of the Lokpal and Lokayukta Act 2013. Along with this, give suggestion for making the Act effective. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकपाल की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये 3- दूसरे भाग में अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये| लोकपाल की अवधारणा ओम्बड्समैन से प्रेरित है| ओम्बड्समैन कि अवधारणा स्वीडेन से ली गयी है|ओम्बड्समैन का आशय संसद के द्वारा नियुक्त किये गए ऐसे अधिकारी से हैं जो कि प्रशासनिक या कार्यकारी एवं न्यायिक शक्तियों के दुरुपयोग की जांच-पड़ताल करता है ताकि इसके माध्यम से जनता की शिकायतों का निवारण किया जा सके| ओम्बड्समैन के आधार पर भारत में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त के गठन की सिफारिश की गयी| इस आयोग के अनुसार, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के मंत्रियों एवं सचिवों को केन्द्रीय स्तर पर लोकपाल की जांच-पड़ताल के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए, जबकि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के शेष अधिकारी अपने अपने सम्बन्धित लोकायुक्त की जांच पड़ताल के क्षेत्राधिकार में शामिल किये जाने चाहिए| प्रथम ARC की अनुशंसा के आधार पर प्रथम लोकपाल विधेयक लोकसभा के समक्ष वर्ष 1968(चौथी लोकसभा) में प्रस्तुत किया गया| लम्बे प्रयास के बाद इस दिशा में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 को 16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया एवं इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरान्त भारत में प्रथम लोकपाल ने 24 मार्च 2019 को कार्यभार ग्रहण किया| अधिनियम की समीक्षा · लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक 8 सदस्यों के द्वारा किया जाना है जिसमे से 50 % न्यायिक सदस्य होंगे| इसके कम से कम 50 % सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से होंगे| ध्यातव्य है कि भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसका सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, समुदाय या लिंग से ना हो कर प्रत्येक व्यक्ति से है| | · लोकपाल का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष कि आयु तक है, इसमें जो पहले हो| लोकपाल के अध्यक्ष का वेतन,भत्ता एवं अन्य सेवा शर्तें भारत के CJI के समकक्ष है जबकि अन्य सदस्यों का HC के न्यायाधीश के समकक्ष है| लोकपाल के अंतर्गत दो शाखाएं होंगी यथा जांच पड़ताल शाखा एवं अभियोजन शाखा| · लोकपाल का प्रशासनिक व्यय, जिसमें वेतन-भत्ते एवं पेंशन को भी शामिल किया गया है जो कि भारत की संचित निधि पर भारित व्यय होगा · लोकपाल के द्वारा किये गए जांच पड़ताल के मामलों पर सुनवाई एवं निर्णय करने हेतु केंद्र सरकार लोकपाल की अनुशंसा पर विशेष न्यायालय का गठन करेगी · लोकपाल का यह कर्तव्य होगा की वह राष्ट्रपति अपना वार्षित प्रतिवेदन प्रस्तुत करे एवं राष्ट्रपति के द्वारा इस प्रतिवेदन एवं अस्वीकृत मामलों एवं इसके कारणों कि जानकारी से संसद के प्रत्येक सदन को उपलब्ध कराया जाएगा · शिकायत निराधार होने पर शिकायतकर्ता को एक वर्ष तक का कारावास एवं अधिक से अधिक एक लाख रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है| इस प्रावधान के कारण आम व्यक्तियों की पहुच अधिक संकीर्ण होगी| · वर्तमान समय में लोकपाल को विधिक मान्यता दी गयी है इससे लोकपाल कि प्रभाविता कमजोर होती है · अधिनियम के अनुसार लोकपाल विशिष्ट लोककर्ताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच-पड़ताल करेगा, लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे में प्रधानमंत्री, संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य, संसद के सदस्य, एवं ग्रुप A से लेकर ग्रुप D तक के लोकसेवकों को शामिल किया गया है| · लोकपाल जांच पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा जैसे प्रधानमन्त्री के सन्दर्भ में लोकसभा के समक्ष, संघीय मंत्रिपरिषद के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष,लोकसेवकों के सन्दर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष आदि| · लोकपाल का सम्बन्ध जनता की व्यापक शिकायतों के निवारण से न होकर केवल भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच पड़ताल करने तक सीमित है अतः भारत में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकीर्ण है| · इस अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध जांच पड़ताल कीपहलतभी कर सकता है जबकि इस प्रस्ताव का अनुमोदन कम से कम दो तिहाई सदस्यों के द्वारा किया जाए| लोकपाल, PM के विरुद्ध भ्रष्टाचार के किसी भी ऐसे आरोप की जांच पड़ताल नहीं कर सकता है यदि उसका सम्बन्ध बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा से, अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध से, लोक व्यवस्था से, नाभिकीय ऊर्जा से या अन्तरिक्ष विज्ञान से हो| इन अपवादों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि व्यवहारिकता में प्रधानमंत्री लोकपाल कि जांच पड़ताल के दायरे से बाहर हो जाता है क्योंकि प्रधानमंत्री का लगभग प्रत्येक कार्य लोकव्यवस्था से ही सम्बन्धित होता है| · इस अधिनियम के अनुसार लोकपाल के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा एकचयनसमिति की अनुशंषा के आधार पर किया जाना है| इसचयनसमिति का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होगा, इसके अन्य सदस्यों में लोकसभा में विपक्ष का नेता, लोकसभा अध्यक्ष, भारत का मुख्य न्यायाधेस्श या उसके द्वारा मनोनीत SC का कोई न्यायाधीश, ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता जिसकी अनुशंसाचयनसमिति के अन्य सदस्यों के द्वारा की जानी है| इस आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किया जाना है|चयन समिति में किसी भी रिक्तता होने के आधार पर लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी · अधिनियम के अनुसार कम से कम 7 व्यक्तियों के द्वारा एक खोज समिति का गठन किया जाना है जो कि चयन समिति को अपनी अनुशंसाएं देगा| चयन समिति खोज समिति के द्वारा अनुशंसित व्यक्तियों के अलावा भी नामों पर विचार कर सकती है| यह प्रावधान अपने आप में खोज समिति के गठन के उद्देश्य को पराजित करती है| · लोकपाल का एक सचिव होगा जो कि भारत सरकार के सचिव के दर्जे का होगा, जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार के द्वारा भेजे गए नामों के समूह में से लोकपाल के अध्यक्ष द्वारा की जायेगी| अतः प्रशासनिक दृष्टिकोण से लोकपाल सरकार पर निर्भर है| इससे जांच पड़ताल के निष्पक्ष होने कि संभावना कम होगी| · लोकपाल जांच पड़ताल हेतु सरकारी अभिकरणों पर निर्भर होगा, अतः लोकपाल के पास कोई स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का ना होना इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करती है| · लोकपाल का गठन, ओम्बड्समैन की अवधारणा पर आधारित है परन्तु यह ओम्बड्समैन की भावना के अनुरूप नहीं है| जिस देश में संसद जन विश्वसनीयता को अपेक्षित मात्रा में प्राप्त नहीं करती है उस देश में संसद के द्वारा गठित लोकपाल कितना प्रभावी होगा वह स्वतः अपने आप में एक चर्चा का विषय है| ओम्बड्समैन के अनुसार लोकपाल को संसद के प्रति जवाबदेह होना चाहिए ताकि इसके माध्यम से लोकपाल आम जनता के प्रति जवाबदेह हो सके,परन्तु भारत में एक प्रकार से संसद को ही लोकपाल के प्रति जवाबदेह बना दिया गया है| अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव · लोकपाल की नियुक्ति करते समय एक मात्र आधार योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए न कि कोई अन्य मानक| · लोकपाल को अधिक प्रभावी बनाने हेतु इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए जिसकी सिफारिश द्वितीय ARC द्वारा की गयी है| · लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे को अधिक बनाने हेतु भ्रष्टाचार के साथ साथ कुप्रशासन से सम्बन्धित शिकायतों को भी शामिल किया जाना चाहिए| · लोकपाल के पास अपना एक स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का होना अपरिहार्य है|ताकि इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया सुनिश्चित हो सके| · लोकपाल को अधिकाधिक आत्म निर्भर एवं स्वायत्त बनाने के प्रयास होने चाहिए · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु भारत में पहले से विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार निवारण से आगे बढ़ते हुए जन शिकायतों के व्यापक निराकरण हेतु किये जाने वाले प्रयास की दिशा में लोकपाल का गठन किया जाना अधिक उचित एवं प्रासंगिक होगा| · भारत में न्यायिक व्यवस्था की तरह लोकपाल एवं लोकायुक्त के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित किया जाना बेहतर होगा एवं लोकायुक्त को लोकपाल के अधीन कार्य करना चाहिए| · द्वितीय ARC के अनुसार, केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त, राज्य स्तर पर लोकायुक्त एवं जिले स्तर स्थानीय ओम्बड्समैन का गठन किया जाना चाहिए| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त एक प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि लोकायुक्त का गठन प्रत्येक राज्य में यथाशीघ्र किया जाए| अधिकाँश राज्यों में लोकायुक्त निष्क्रिय रूप से कार्यरत हैं जबकि कुछ राज्यों में लोकायुक्त सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जिन राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत है वहां पर लोकायुक्त की कार्यप्रणाली को अति सक्रिय बनाने का प्रयास किया जाए| भ्रष्टाचार एवं बहुल एवं विविध कारकों का परिणाम है| लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत भ्रष्टाचार से सम्बन्धित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता| अतः लोकपाल के गठन के उपरान्त भी भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगने की संभावनाएं सीमित हैं| भ्रष्टाचार का सम्बन्ध समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट का एक परिणाम है एवं नैतिक मूल्यों के विकास की दिशा में विधिक संस्थान की तुलना में सामाजिकरण की प्रक्रिया का एक विशेष प्रभाव है|अतः एक स्वस्थ समाजीकरण भारत को भ्रष्टाचार से लड़ने में अधिक प्रभावी होगा|
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##Question:लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये| इसके साथ ही अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द,10 अंक) Review the key provisions of the Lokpal and Lokayukta Act 2013. Along with this, give suggestion for making the Act effective. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकपाल की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये 3- दूसरे भाग में अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये| लोकपाल की अवधारणा ओम्बड्समैन से प्रेरित है| ओम्बड्समैन कि अवधारणा स्वीडेन से ली गयी है|ओम्बड्समैन का आशय संसद के द्वारा नियुक्त किये गए ऐसे अधिकारी से हैं जो कि प्रशासनिक या कार्यकारी एवं न्यायिक शक्तियों के दुरुपयोग की जांच-पड़ताल करता है ताकि इसके माध्यम से जनता की शिकायतों का निवारण किया जा सके| ओम्बड्समैन के आधार पर भारत में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त के गठन की सिफारिश की गयी| इस आयोग के अनुसार, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के मंत्रियों एवं सचिवों को केन्द्रीय स्तर पर लोकपाल की जांच-पड़ताल के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए, जबकि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के शेष अधिकारी अपने अपने सम्बन्धित लोकायुक्त की जांच पड़ताल के क्षेत्राधिकार में शामिल किये जाने चाहिए| प्रथम ARC की अनुशंसा के आधार पर प्रथम लोकपाल विधेयक लोकसभा के समक्ष वर्ष 1968(चौथी लोकसभा) में प्रस्तुत किया गया| लम्बे प्रयास के बाद इस दिशा में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 को 16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया एवं इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरान्त भारत में प्रथम लोकपाल ने 24 मार्च 2019 को कार्यभार ग्रहण किया| अधिनियम की समीक्षा · लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक 8 सदस्यों के द्वारा किया जाना है जिसमे से 50 % न्यायिक सदस्य होंगे| इसके कम से कम 50 % सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से होंगे| ध्यातव्य है कि भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसका सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, समुदाय या लिंग से ना हो कर प्रत्येक व्यक्ति से है| | · लोकपाल का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष कि आयु तक है, इसमें जो पहले हो| लोकपाल के अध्यक्ष का वेतन,भत्ता एवं अन्य सेवा शर्तें भारत के CJI के समकक्ष है जबकि अन्य सदस्यों का HC के न्यायाधीश के समकक्ष है| लोकपाल के अंतर्गत दो शाखाएं होंगी यथा जांच पड़ताल शाखा एवं अभियोजन शाखा| · लोकपाल का प्रशासनिक व्यय, जिसमें वेतन-भत्ते एवं पेंशन को भी शामिल किया गया है जो कि भारत की संचित निधि पर भारित व्यय होगा · लोकपाल के द्वारा किये गए जांच पड़ताल के मामलों पर सुनवाई एवं निर्णय करने हेतु केंद्र सरकार लोकपाल की अनुशंसा पर विशेष न्यायालय का गठन करेगी · लोकपाल का यह कर्तव्य होगा की वह राष्ट्रपति अपना वार्षित प्रतिवेदन प्रस्तुत करे एवं राष्ट्रपति के द्वारा इस प्रतिवेदन एवं अस्वीकृत मामलों एवं इसके कारणों कि जानकारी से संसद के प्रत्येक सदन को उपलब्ध कराया जाएगा · शिकायत निराधार होने पर शिकायतकर्ता को एक वर्ष तक का कारावास एवं अधिक से अधिक एक लाख रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है| इस प्रावधान के कारण आम व्यक्तियों की पहुच अधिक संकीर्ण होगी| · वर्तमान समय में लोकपाल को विधिक मान्यता दी गयी है इससे लोकपाल कि प्रभाविता कमजोर होती है · अधिनियम के अनुसार लोकपाल विशिष्ट लोककर्ताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच-पड़ताल करेगा, लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे में प्रधानमंत्री, संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य, संसद के सदस्य, एवं ग्रुप A से लेकर ग्रुप D तक के लोकसेवकों को शामिल किया गया है| · लोकपाल जांच पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा जैसे प्रधानमन्त्री के सन्दर्भ में लोकसभा के समक्ष, संघीय मंत्रिपरिषद के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष,लोकसेवकों के सन्दर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष आदि| · लोकपाल का सम्बन्ध जनता की व्यापक शिकायतों के निवारण से न होकर केवल भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच पड़ताल करने तक सीमित है अतः भारत में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकीर्ण है| · इस अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध जांच पड़ताल कीपहलतभी कर सकता है जबकि इस प्रस्ताव का अनुमोदन कम से कम दो तिहाई सदस्यों के द्वारा किया जाए| लोकपाल, PM के विरुद्ध भ्रष्टाचार के किसी भी ऐसे आरोप की जांच पड़ताल नहीं कर सकता है यदि उसका सम्बन्ध बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा से, अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध से, लोक व्यवस्था से, नाभिकीय ऊर्जा से या अन्तरिक्ष विज्ञान से हो| इन अपवादों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि व्यवहारिकता में प्रधानमंत्री लोकपाल कि जांच पड़ताल के दायरे से बाहर हो जाता है क्योंकि प्रधानमंत्री का लगभग प्रत्येक कार्य लोकव्यवस्था से ही सम्बन्धित होता है| · इस अधिनियम के अनुसार लोकपाल के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा एकचयनसमिति की अनुशंषा के आधार पर किया जाना है| इसचयनसमिति का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होगा, इसके अन्य सदस्यों में लोकसभा में विपक्ष का नेता, लोकसभा अध्यक्ष, भारत का मुख्य न्यायाधेस्श या उसके द्वारा मनोनीत SC का कोई न्यायाधीश, ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता जिसकी अनुशंसाचयनसमिति के अन्य सदस्यों के द्वारा की जानी है| इस आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किया जाना है|चयन समिति में किसी भी रिक्तता होने के आधार पर लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी · अधिनियम के अनुसार कम से कम 7 व्यक्तियों के द्वारा एक खोज समिति का गठन किया जाना है जो कि चयन समिति को अपनी अनुशंसाएं देगा| चयन समिति खोज समिति के द्वारा अनुशंसित व्यक्तियों के अलावा भी नामों पर विचार कर सकती है| यह प्रावधान अपने आप में खोज समिति के गठन के उद्देश्य को पराजित करती है| · लोकपाल का एक सचिव होगा जो कि भारत सरकार के सचिव के दर्जे का होगा, जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार के द्वारा भेजे गए नामों के समूह में से लोकपाल के अध्यक्ष द्वारा की जायेगी| अतः प्रशासनिक दृष्टिकोण से लोकपाल सरकार पर निर्भर है| इससे जांच पड़ताल के निष्पक्ष होने कि संभावना कम होगी| · लोकपाल जांच पड़ताल हेतु सरकारी अभिकरणों पर निर्भर होगा, अतः लोकपाल के पास कोई स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का ना होना इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करती है| · लोकपाल का गठन, ओम्बड्समैन की अवधारणा पर आधारित है परन्तु यह ओम्बड्समैन की भावना के अनुरूप नहीं है| जिस देश में संसद जन विश्वसनीयता को अपेक्षित मात्रा में प्राप्त नहीं करती है उस देश में संसद के द्वारा गठित लोकपाल कितना प्रभावी होगा वह स्वतः अपने आप में एक चर्चा का विषय है| ओम्बड्समैन के अनुसार लोकपाल को संसद के प्रति जवाबदेह होना चाहिए ताकि इसके माध्यम से लोकपाल आम जनता के प्रति जवाबदेह हो सके,परन्तु भारत में एक प्रकार से संसद को ही लोकपाल के प्रति जवाबदेह बना दिया गया है| अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव · लोकपाल की नियुक्ति करते समय एक मात्र आधार योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए न कि कोई अन्य मानक| · लोकपाल को अधिक प्रभावी बनाने हेतु इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए जिसकी सिफारिश द्वितीय ARC द्वारा की गयी है| · लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे को अधिक बनाने हेतु भ्रष्टाचार के साथ साथ कुप्रशासन से सम्बन्धित शिकायतों को भी शामिल किया जाना चाहिए| · लोकपाल के पास अपना एक स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का होना अपरिहार्य है|ताकि इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया सुनिश्चित हो सके| · लोकपाल को अधिकाधिक आत्म निर्भर एवं स्वायत्त बनाने के प्रयास होने चाहिए · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु भारत में पहले से विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार निवारण से आगे बढ़ते हुए जन शिकायतों के व्यापक निराकरण हेतु किये जाने वाले प्रयास की दिशा में लोकपाल का गठन किया जाना अधिक उचित एवं प्रासंगिक होगा| · भारत में न्यायिक व्यवस्था की तरह लोकपाल एवं लोकायुक्त के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित किया जाना बेहतर होगा एवं लोकायुक्त को लोकपाल के अधीन कार्य करना चाहिए| · द्वितीय ARC के अनुसार, केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त, राज्य स्तर पर लोकायुक्त एवं जिले स्तर स्थानीय ओम्बड्समैन का गठन किया जाना चाहिए| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त एक प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि लोकायुक्त का गठन प्रत्येक राज्य में यथाशीघ्र किया जाए| अधिकाँश राज्यों में लोकायुक्त निष्क्रिय रूप से कार्यरत हैं जबकि कुछ राज्यों में लोकायुक्त सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जिन राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत है वहां पर लोकायुक्त की कार्यप्रणाली को अति सक्रिय बनाने का प्रयास किया जाए| भ्रष्टाचार एवं बहुल एवं विविध कारकों का परिणाम है| लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत भ्रष्टाचार से सम्बन्धित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता| अतः लोकपाल के गठन के उपरान्त भी भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगने की संभावनाएं सीमित हैं| भ्रष्टाचार का सम्बन्ध समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट का एक परिणाम है एवं नैतिक मूल्यों के विकास की दिशा में विधिक संस्थान की तुलना में सामाजिकरण की प्रक्रिया का एक विशेष प्रभाव है|अतः एक स्वस्थ समाजीकरण भारत को भ्रष्टाचार से लड़ने में अधिक प्रभावी होगा|
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लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये| इसके साथ ही अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150 - 200 शब्द , अंक - 10 ) Review the key provisions of the Lokpal and Lokayukta Act 2013. Along with this, give suggestion for making the Act effective. (150 - 200 words , Marks - 10 )
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकपाल की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये 3- दूसरे भाग में अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये| लोकपाल की अवधारणा ओम्बड्समैन से प्रेरित है| ओम्बड्समैन कि अवधारणा स्वीडेन से ली गयी है|ओम्बड्समैन का आशय संसद के द्वारा नियुक्त किये गए ऐसे अधिकारी से हैं जो कि प्रशासनिक या कार्यकारी एवं न्यायिक शक्तियों के दुरुपयोग की जांच-पड़ताल करता है ताकि इसके माध्यम से जनता की शिकायतों का निवारण किया जा सके| ओम्बड्समैन के आधार पर भारत में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त के गठन की सिफारिश की गयी| इस आयोग के अनुसार, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के मंत्रियों एवं सचिवों को केन्द्रीय स्तर पर लोकपाल की जांच-पड़ताल के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए, जबकि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के शेष अधिकारी अपने अपने सम्बन्धित लोकायुक्त की जांच पड़ताल के क्षेत्राधिकार में शामिल किये जाने चाहिए| प्रथम ARC की अनुशंसा के आधार पर प्रथम लोकपाल विधेयक लोकसभा के समक्ष वर्ष 1968(चौथी लोकसभा) में प्रस्तुत किया गया| लम्बे प्रयास के बाद इस दिशा में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 को 16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया एवं इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरान्त भारत में प्रथम लोकपाल ने 24 मार्च 2019 को कार्यभार ग्रहण किया| अधिनियम की समीक्षा · लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक 8 सदस्यों के द्वारा किया जाना है जिसमे से 50 % न्यायिक सदस्य होंगे| इसके कम से कम 50 % सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से होंगे| ध्यातव्य है कि भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसका सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, समुदाय या लिंग से ना हो कर प्रत्येक व्यक्ति से है| | · लोकपाल का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष कि आयु तक है, इसमें जो पहले हो| लोकपाल के अध्यक्ष का वेतन,भत्ता एवं अन्य सेवा शर्तें भारत के CJI के समकक्ष है जबकि अन्य सदस्यों का HC के न्यायाधीश के समकक्ष है| लोकपाल के अंतर्गत दो शाखाएं होंगी यथा जांच पड़ताल शाखा एवं अभियोजन शाखा| · लोकपाल का प्रशासनिक व्यय, जिसमें वेतन-भत्ते एवं पेंशन को भी शामिल किया गया है जो कि भारत की संचित निधि पर भारित व्यय होगा · लोकपाल के द्वारा किये गए जांच पड़ताल के मामलों पर सुनवाई एवं निर्णय करने हेतु केंद्र सरकार लोकपाल की अनुशंसा पर विशेष न्यायालय का गठन करेगी · लोकपाल का यह कर्तव्य होगा की वह राष्ट्रपति अपना वार्षित प्रतिवेदन प्रस्तुत करे एवं राष्ट्रपति के द्वारा इस प्रतिवेदन एवं अस्वीकृत मामलों एवं इसके कारणों कि जानकारी से संसद के प्रत्येक सदन को उपलब्ध कराया जाएगा · शिकायत निराधार होने पर शिकायतकर्ता को एक वर्ष तक का कारावास एवं अधिक से अधिक एक लाख रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है| इस प्रावधान के कारण आम व्यक्तियों की पहुच अधिक संकीर्ण होगी| · वर्तमान समय में लोकपाल को विधिक मान्यता दी गयी है इससे लोकपाल कि प्रभाविता कमजोर होती है · अधिनियम के अनुसार लोकपाल विशिष्ट लोककर्ताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच-पड़ताल करेगा, लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे में प्रधानमंत्री, संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य, संसद के सदस्य, एवं ग्रुप A से लेकर ग्रुप D तक के लोकसेवकों को शामिल किया गया है| · लोकपाल जांच पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा जैसे प्रधानमन्त्री के सन्दर्भ में लोकसभा के समक्ष, संघीय मंत्रिपरिषद के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष,लोकसेवकों के सन्दर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष आदि| · लोकपाल का सम्बन्ध जनता की व्यापक शिकायतों के निवारण से न होकर केवल भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच पड़ताल करने तक सीमित है अतः भारत में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकीर्ण है| · इस अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध जांच पड़ताल कीपहलतभी कर सकता है जबकि इस प्रस्ताव का अनुमोदन कम से कम दो तिहाई सदस्यों के द्वारा किया जाए| लोकपाल, PM के विरुद्ध भ्रष्टाचार के किसी भी ऐसे आरोप की जांच पड़ताल नहीं कर सकता है यदि उसका सम्बन्ध बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा से, अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध से, लोक व्यवस्था से, नाभिकीय ऊर्जा से या अन्तरिक्ष विज्ञान से हो| इन अपवादों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि व्यवहारिकता में प्रधानमंत्री लोकपाल कि जांच पड़ताल के दायरे से बाहर हो जाता है क्योंकि प्रधानमंत्री का लगभग प्रत्येक कार्य लोकव्यवस्था से ही सम्बन्धित होता है| · इस अधिनियम के अनुसार लोकपाल के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा एकचयनसमिति की अनुशंषा के आधार पर किया जाना है| इसचयनसमिति का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होगा, इसके अन्य सदस्यों में लोकसभा में विपक्ष का नेता, लोकसभा अध्यक्ष, भारत का मुख्य न्यायाधेस्श या उसके द्वारा मनोनीत SC का कोई न्यायाधीश, ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता जिसकी अनुशंसाचयनसमिति के अन्य सदस्यों के द्वारा की जानी है| इस आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किया जाना है|चयन समिति में किसी भी रिक्तता होने के आधार पर लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी · अधिनियम के अनुसार कम से कम 7 व्यक्तियों के द्वारा एक खोज समिति का गठन किया जाना है जो कि चयन समिति को अपनी अनुशंसाएं देगा| चयन समिति खोज समिति के द्वारा अनुशंसित व्यक्तियों के अलावा भी नामों पर विचार कर सकती है| यह प्रावधान अपने आप में खोज समिति के गठन के उद्देश्य को पराजित करती है| · लोकपाल का एक सचिव होगा जो कि भारत सरकार के सचिव के दर्जे का होगा, जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार के द्वारा भेजे गए नामों के समूह में से लोकपाल के अध्यक्ष द्वारा की जायेगी| अतः प्रशासनिक दृष्टिकोण से लोकपाल सरकार पर निर्भर है| इससे जांच पड़ताल के निष्पक्ष होने कि संभावना कम होगी| · लोकपाल जांच पड़ताल हेतु सरकारी अभिकरणों पर निर्भर होगा, अतः लोकपाल के पास कोई स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का ना होना इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करती है| · लोकपाल का गठन, ओम्बड्समैन की अवधारणा पर आधारित है परन्तु यह ओम्बड्समैन की भावना के अनुरूप नहीं है| जिस देश में संसद जन विश्वसनीयता को अपेक्षित मात्रा में प्राप्त नहीं करती है उस देश में संसद के द्वारा गठित लोकपाल कितना प्रभावी होगा वह स्वतः अपने आप में एक चर्चा का विषय है| ओम्बड्समैन के अनुसार लोकपाल को संसद के प्रति जवाबदेह होना चाहिए ताकि इसके माध्यम से लोकपाल आम जनता के प्रति जवाबदेह हो सके,परन्तु भारत में एक प्रकार से संसद को ही लोकपाल के प्रति जवाबदेह बना दिया गया है| अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव · लोकपाल की नियुक्ति करते समय एक मात्र आधार योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए न कि कोई अन्य मानक| · लोकपाल को अधिक प्रभावी बनाने हेतु इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए जिसकी सिफारिश द्वितीय ARC द्वारा की गयी है| · लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे को अधिक बनाने हेतु भ्रष्टाचार के साथ साथ कुप्रशासन से सम्बन्धित शिकायतों को भी शामिल किया जाना चाहिए| · लोकपाल के पास अपना एक स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का होना अपरिहार्य है|ताकि इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया सुनिश्चित हो सके| · लोकपाल को अधिकाधिक आत्म निर्भर एवं स्वायत्त बनाने के प्रयास होने चाहिए · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु भारत में पहले से विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार निवारण से आगे बढ़ते हुए जन शिकायतों के व्यापक निराकरण हेतु किये जाने वाले प्रयास की दिशा में लोकपाल का गठन किया जाना अधिक उचित एवं प्रासंगिक होगा| · भारत में न्यायिक व्यवस्था की तरह लोकपाल एवं लोकायुक्त के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित किया जाना बेहतर होगा एवं लोकायुक्त को लोकपाल के अधीन कार्य करना चाहिए| · द्वितीय ARC के अनुसार, केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त, राज्य स्तर पर लोकायुक्त एवं जिले स्तर स्थानीय ओम्बड्समैन का गठन किया जाना चाहिए| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त एक प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि लोकायुक्त का गठन प्रत्येक राज्य में यथाशीघ्र किया जाए| अधिकाँश राज्यों में लोकायुक्त निष्क्रिय रूप से कार्यरत हैं जबकि कुछ राज्यों में लोकायुक्त सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जिन राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत है वहां पर लोकायुक्त की कार्यप्रणाली को अति सक्रिय बनाने का प्रयास किया जाए| भ्रष्टाचार एवं बहुल एवं विविध कारकों का परिणाम है| लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत भ्रष्टाचार से सम्बन्धित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता| अतः लोकपाल के गठन के उपरान्त भी भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगने की संभावनाएं सीमित हैं| भ्रष्टाचार का सम्बन्ध समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट का एक परिणाम है एवं नैतिक मूल्यों के विकास की दिशा में विधिक संस्थान की तुलना में सामाजिकरण की प्रक्रिया का एक विशेष प्रभाव है|अतः एक स्वस्थ समाजीकरण भारत को भ्रष्टाचार से लड़ने में अधिक प्रभावी होगा|
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##Question:लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये| इसके साथ ही अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150 - 200 शब्द , अंक - 10 ) Review the key provisions of the Lokpal and Lokayukta Act 2013. Along with this, give suggestion for making the Act effective. (150 - 200 words , Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकपाल की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के प्रमुख प्रावधानों की समीक्षा कीजिये 3- दूसरे भाग में अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिये 4- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष दीजिये| लोकपाल की अवधारणा ओम्बड्समैन से प्रेरित है| ओम्बड्समैन कि अवधारणा स्वीडेन से ली गयी है|ओम्बड्समैन का आशय संसद के द्वारा नियुक्त किये गए ऐसे अधिकारी से हैं जो कि प्रशासनिक या कार्यकारी एवं न्यायिक शक्तियों के दुरुपयोग की जांच-पड़ताल करता है ताकि इसके माध्यम से जनता की शिकायतों का निवारण किया जा सके| ओम्बड्समैन के आधार पर भारत में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त के गठन की सिफारिश की गयी| इस आयोग के अनुसार, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के मंत्रियों एवं सचिवों को केन्द्रीय स्तर पर लोकपाल की जांच-पड़ताल के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए, जबकि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के शेष अधिकारी अपने अपने सम्बन्धित लोकायुक्त की जांच पड़ताल के क्षेत्राधिकार में शामिल किये जाने चाहिए| प्रथम ARC की अनुशंसा के आधार पर प्रथम लोकपाल विधेयक लोकसभा के समक्ष वर्ष 1968(चौथी लोकसभा) में प्रस्तुत किया गया| लम्बे प्रयास के बाद इस दिशा में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 को 16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया एवं इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उपरान्त भारत में प्रथम लोकपाल ने 24 मार्च 2019 को कार्यभार ग्रहण किया| अधिनियम की समीक्षा · लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक 8 सदस्यों के द्वारा किया जाना है जिसमे से 50 % न्यायिक सदस्य होंगे| इसके कम से कम 50 % सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से होंगे| ध्यातव्य है कि भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसका सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, समुदाय या लिंग से ना हो कर प्रत्येक व्यक्ति से है| | · लोकपाल का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष कि आयु तक है, इसमें जो पहले हो| लोकपाल के अध्यक्ष का वेतन,भत्ता एवं अन्य सेवा शर्तें भारत के CJI के समकक्ष है जबकि अन्य सदस्यों का HC के न्यायाधीश के समकक्ष है| लोकपाल के अंतर्गत दो शाखाएं होंगी यथा जांच पड़ताल शाखा एवं अभियोजन शाखा| · लोकपाल का प्रशासनिक व्यय, जिसमें वेतन-भत्ते एवं पेंशन को भी शामिल किया गया है जो कि भारत की संचित निधि पर भारित व्यय होगा · लोकपाल के द्वारा किये गए जांच पड़ताल के मामलों पर सुनवाई एवं निर्णय करने हेतु केंद्र सरकार लोकपाल की अनुशंसा पर विशेष न्यायालय का गठन करेगी · लोकपाल का यह कर्तव्य होगा की वह राष्ट्रपति अपना वार्षित प्रतिवेदन प्रस्तुत करे एवं राष्ट्रपति के द्वारा इस प्रतिवेदन एवं अस्वीकृत मामलों एवं इसके कारणों कि जानकारी से संसद के प्रत्येक सदन को उपलब्ध कराया जाएगा · शिकायत निराधार होने पर शिकायतकर्ता को एक वर्ष तक का कारावास एवं अधिक से अधिक एक लाख रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है| इस प्रावधान के कारण आम व्यक्तियों की पहुच अधिक संकीर्ण होगी| · वर्तमान समय में लोकपाल को विधिक मान्यता दी गयी है इससे लोकपाल कि प्रभाविता कमजोर होती है · अधिनियम के अनुसार लोकपाल विशिष्ट लोककर्ताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच-पड़ताल करेगा, लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे में प्रधानमंत्री, संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य, संसद के सदस्य, एवं ग्रुप A से लेकर ग्रुप D तक के लोकसेवकों को शामिल किया गया है| · लोकपाल जांच पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा जैसे प्रधानमन्त्री के सन्दर्भ में लोकसभा के समक्ष, संघीय मंत्रिपरिषद के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष,लोकसेवकों के सन्दर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष आदि| · लोकपाल का सम्बन्ध जनता की व्यापक शिकायतों के निवारण से न होकर केवल भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच पड़ताल करने तक सीमित है अतः भारत में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकीर्ण है| · इस अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध जांच पड़ताल कीपहलतभी कर सकता है जबकि इस प्रस्ताव का अनुमोदन कम से कम दो तिहाई सदस्यों के द्वारा किया जाए| लोकपाल, PM के विरुद्ध भ्रष्टाचार के किसी भी ऐसे आरोप की जांच पड़ताल नहीं कर सकता है यदि उसका सम्बन्ध बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा से, अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध से, लोक व्यवस्था से, नाभिकीय ऊर्जा से या अन्तरिक्ष विज्ञान से हो| इन अपवादों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि व्यवहारिकता में प्रधानमंत्री लोकपाल कि जांच पड़ताल के दायरे से बाहर हो जाता है क्योंकि प्रधानमंत्री का लगभग प्रत्येक कार्य लोकव्यवस्था से ही सम्बन्धित होता है| · इस अधिनियम के अनुसार लोकपाल के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा एकचयनसमिति की अनुशंषा के आधार पर किया जाना है| इसचयनसमिति का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होगा, इसके अन्य सदस्यों में लोकसभा में विपक्ष का नेता, लोकसभा अध्यक्ष, भारत का मुख्य न्यायाधेस्श या उसके द्वारा मनोनीत SC का कोई न्यायाधीश, ख्याति प्राप्त विधिवेत्ता जिसकी अनुशंसाचयनसमिति के अन्य सदस्यों के द्वारा की जानी है| इस आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किया जाना है|चयन समिति में किसी भी रिक्तता होने के आधार पर लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी · अधिनियम के अनुसार कम से कम 7 व्यक्तियों के द्वारा एक खोज समिति का गठन किया जाना है जो कि चयन समिति को अपनी अनुशंसाएं देगा| चयन समिति खोज समिति के द्वारा अनुशंसित व्यक्तियों के अलावा भी नामों पर विचार कर सकती है| यह प्रावधान अपने आप में खोज समिति के गठन के उद्देश्य को पराजित करती है| · लोकपाल का एक सचिव होगा जो कि भारत सरकार के सचिव के दर्जे का होगा, जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार के द्वारा भेजे गए नामों के समूह में से लोकपाल के अध्यक्ष द्वारा की जायेगी| अतः प्रशासनिक दृष्टिकोण से लोकपाल सरकार पर निर्भर है| इससे जांच पड़ताल के निष्पक्ष होने कि संभावना कम होगी| · लोकपाल जांच पड़ताल हेतु सरकारी अभिकरणों पर निर्भर होगा, अतः लोकपाल के पास कोई स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का ना होना इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करती है| · लोकपाल का गठन, ओम्बड्समैन की अवधारणा पर आधारित है परन्तु यह ओम्बड्समैन की भावना के अनुरूप नहीं है| जिस देश में संसद जन विश्वसनीयता को अपेक्षित मात्रा में प्राप्त नहीं करती है उस देश में संसद के द्वारा गठित लोकपाल कितना प्रभावी होगा वह स्वतः अपने आप में एक चर्चा का विषय है| ओम्बड्समैन के अनुसार लोकपाल को संसद के प्रति जवाबदेह होना चाहिए ताकि इसके माध्यम से लोकपाल आम जनता के प्रति जवाबदेह हो सके,परन्तु भारत में एक प्रकार से संसद को ही लोकपाल के प्रति जवाबदेह बना दिया गया है| अधिनियम को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव · लोकपाल की नियुक्ति करते समय एक मात्र आधार योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए न कि कोई अन्य मानक| · लोकपाल को अधिक प्रभावी बनाने हेतु इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए जिसकी सिफारिश द्वितीय ARC द्वारा की गयी है| · लोकपाल की जांच पड़ताल के दायरे को अधिक बनाने हेतु भ्रष्टाचार के साथ साथ कुप्रशासन से सम्बन्धित शिकायतों को भी शामिल किया जाना चाहिए| · लोकपाल के पास अपना एक स्वतंत्र जांच पड़ताल अभिकरण का होना अपरिहार्य है|ताकि इसकी निष्पक्ष कार्यप्रक्रिया सुनिश्चित हो सके| · लोकपाल को अधिकाधिक आत्म निर्भर एवं स्वायत्त बनाने के प्रयास होने चाहिए · भ्रष्टाचार की रोकथाम हेतु भारत में पहले से विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार निवारण से आगे बढ़ते हुए जन शिकायतों के व्यापक निराकरण हेतु किये जाने वाले प्रयास की दिशा में लोकपाल का गठन किया जाना अधिक उचित एवं प्रासंगिक होगा| · भारत में न्यायिक व्यवस्था की तरह लोकपाल एवं लोकायुक्त के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित किया जाना बेहतर होगा एवं लोकायुक्त को लोकपाल के अधीन कार्य करना चाहिए| · द्वितीय ARC के अनुसार, केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त, राज्य स्तर पर लोकायुक्त एवं जिले स्तर स्थानीय ओम्बड्समैन का गठन किया जाना चाहिए| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त एक प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि लोकायुक्त का गठन प्रत्येक राज्य में यथाशीघ्र किया जाए| अधिकाँश राज्यों में लोकायुक्त निष्क्रिय रूप से कार्यरत हैं जबकि कुछ राज्यों में लोकायुक्त सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जिन राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत है वहां पर लोकायुक्त की कार्यप्रणाली को अति सक्रिय बनाने का प्रयास किया जाए| भ्रष्टाचार एवं बहुल एवं विविध कारकों का परिणाम है| लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत भ्रष्टाचार से सम्बन्धित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता| अतः लोकपाल के गठन के उपरान्त भी भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगने की संभावनाएं सीमित हैं| भ्रष्टाचार का सम्बन्ध समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट का एक परिणाम है एवं नैतिक मूल्यों के विकास की दिशा में विधिक संस्थान की तुलना में सामाजिकरण की प्रक्रिया का एक विशेष प्रभाव है|अतः एक स्वस्थ समाजीकरण भारत को भ्रष्टाचार से लड़ने में अधिक प्रभावी होगा|
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ब्रिटिश भारत में कृषि के वाणिज्यीकरण से आप क्या समझते हैं? इस नीति को अपनाने के कारणों की चर्चा करते हुए, भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) What do you think of commercialization of agriculture in British India? Discuss the reasons for adopting this policy and evaluate its impact on the Indian economy. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कृषि वाणिज्यीकरण को समझाइए। कारणों का उल्लेख कीजिए। इस व्यवस्था के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए। निष्कर्ष में साम्राज्यवादी प्रसार में इसके महत्व को लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय कृषि में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ जिसे कृषि का वाणिज्यीकरण कहा गया। इसके पहले कृषि जीवनयापन का मार्ग थी न कि व्यापारिक प्रयत्न। अब कुछ विशेष फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा। बागान उद्योगों जैसे चाय, काफी, रबर एवं नील इत्यादि में कृषि का वाणिज्यीकरण अपने चरमोत्कर्ष में पहुँच गया। वाणिज्यीकरण को अपनाने के कारण: परिवहन के साधनों में परिवर्तन तथा संचार के साधनों के विकास से कृषि उत्पादों तक पहुँच आसान हुई जिससे इसको व्यापारिक रूप देना आसान हुआ। अमेरिका में गृह युद्ध प्रारम्भ होने से भारतीय कपास की माँग बढ़ने लगी। मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार होने से राष्ट्रीय कृषि बाजार का अभ्युदय हुआ। ब्रिटेन को माँग को पूरा करने के लिए कच्चे माल की आवश्यकता अंग्रेजों द्वारा भू राजस्व एकत्रित करना आसान हो गया। उन्हे प्रतीत होने लगा कि कृषि को व्यापारिक रूप देने से स्थायी राजस्व में और वृद्धि की जा सकती है। कृषि के वाणिज्यीकरण का प्रभावों का मूल्यांकन: सकारात्मक प्रभाव: राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव हुआ। भारतीय कृषि उत्पादों को पहचान मिली जैसे-कपास, नील आदि। फसल विविधिकरण को बढ़ावा जैसे कॉफी, चाय अफीम की खेती प्रारम्भ हुआ। इससे भारतीय व्यापारियों एवं बड़े किसानों को लाभ भी मिला। नकारात्मक प्रभाव: यह एक थोपी हुई व्यवस्था थी जिसमें अंग्रेजों का स्वार्थ छिपा था। वाणिज्यिकरण ने प्राथमिक उत्पादकों को ऋण ग्रस्तता व गरीबी के दुष्चक्र में फसाया कच्चे मालों का निर्यात और तैयार मालों का आयात प्रारम्भ हुआ। इस प्रक्रिया में आधुनिकीकरण के लिए उन्नत, बीज तकनीकी, मशीनों आदि की उपेक्षा हुई। अकाल के दिनों में भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा। वाणिज्यीकरण ने परिवहन प्रणाली ने भी प्रभावित किया रेलवे एवं सड़कों के विकास में साम्राज्यवादी हितों को महत्व दिया गया। वाणिज्यीकरण ने कृषि का उपनिवेशिकरण किया। कृषि का पतन या ह्रास हुआ कृषि के वाणिज्यीकरण से न तो कृषकों को लाभ हुआ और न ही कृषि उत्पादन में वृद्धि देखी गयी। इसके माध्यम से अंग्रेजों ने अपनी जरूरतों को पूरा किया तथा अर्थव्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर बना दिया। भारतीयों की स्थिति दयनीय बनाने में यह एक कूटनीतिक कदम था जो उद्योगों के विकास का आधार बना। इससे साम्राज्यवादी पकड़ और मजबूत हुई।
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##Question:ब्रिटिश भारत में कृषि के वाणिज्यीकरण से आप क्या समझते हैं? इस नीति को अपनाने के कारणों की चर्चा करते हुए, भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) What do you think of commercialization of agriculture in British India? Discuss the reasons for adopting this policy and evaluate its impact on the Indian economy. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कृषि वाणिज्यीकरण को समझाइए। कारणों का उल्लेख कीजिए। इस व्यवस्था के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए। निष्कर्ष में साम्राज्यवादी प्रसार में इसके महत्व को लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय कृषि में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ जिसे कृषि का वाणिज्यीकरण कहा गया। इसके पहले कृषि जीवनयापन का मार्ग थी न कि व्यापारिक प्रयत्न। अब कुछ विशेष फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा। बागान उद्योगों जैसे चाय, काफी, रबर एवं नील इत्यादि में कृषि का वाणिज्यीकरण अपने चरमोत्कर्ष में पहुँच गया। वाणिज्यीकरण को अपनाने के कारण: परिवहन के साधनों में परिवर्तन तथा संचार के साधनों के विकास से कृषि उत्पादों तक पहुँच आसान हुई जिससे इसको व्यापारिक रूप देना आसान हुआ। अमेरिका में गृह युद्ध प्रारम्भ होने से भारतीय कपास की माँग बढ़ने लगी। मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार होने से राष्ट्रीय कृषि बाजार का अभ्युदय हुआ। ब्रिटेन को माँग को पूरा करने के लिए कच्चे माल की आवश्यकता अंग्रेजों द्वारा भू राजस्व एकत्रित करना आसान हो गया। उन्हे प्रतीत होने लगा कि कृषि को व्यापारिक रूप देने से स्थायी राजस्व में और वृद्धि की जा सकती है। कृषि के वाणिज्यीकरण का प्रभावों का मूल्यांकन: सकारात्मक प्रभाव: राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव हुआ। भारतीय कृषि उत्पादों को पहचान मिली जैसे-कपास, नील आदि। फसल विविधिकरण को बढ़ावा जैसे कॉफी, चाय अफीम की खेती प्रारम्भ हुआ। इससे भारतीय व्यापारियों एवं बड़े किसानों को लाभ भी मिला। नकारात्मक प्रभाव: यह एक थोपी हुई व्यवस्था थी जिसमें अंग्रेजों का स्वार्थ छिपा था। वाणिज्यिकरण ने प्राथमिक उत्पादकों को ऋण ग्रस्तता व गरीबी के दुष्चक्र में फसाया कच्चे मालों का निर्यात और तैयार मालों का आयात प्रारम्भ हुआ। इस प्रक्रिया में आधुनिकीकरण के लिए उन्नत, बीज तकनीकी, मशीनों आदि की उपेक्षा हुई। अकाल के दिनों में भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा। वाणिज्यीकरण ने परिवहन प्रणाली ने भी प्रभावित किया रेलवे एवं सड़कों के विकास में साम्राज्यवादी हितों को महत्व दिया गया। वाणिज्यीकरण ने कृषि का उपनिवेशिकरण किया। कृषि का पतन या ह्रास हुआ कृषि के वाणिज्यीकरण से न तो कृषकों को लाभ हुआ और न ही कृषि उत्पादन में वृद्धि देखी गयी। इसके माध्यम से अंग्रेजों ने अपनी जरूरतों को पूरा किया तथा अर्थव्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर बना दिया। भारतीयों की स्थिति दयनीय बनाने में यह एक कूटनीतिक कदम था जो उद्योगों के विकास का आधार बना। इससे साम्राज्यवादी पकड़ और मजबूत हुई।
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लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| साथ ही, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका की समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Give the deatails about structure, constitution and functions of the lokpal formed under the lokpal and lokayukta act, 2013. Also, review the role of lokpal formed under this act. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में,लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| अगले भाग में, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्कों को स्पष्ट करते हुए उसकी भूमिका की समीक्षा कीजिये| उत्तर- लोकपाल उच्च सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार की शिकायतें सुनने एवं उस पर कार्यवाही करने के निमित्त पद है| 2013 में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम निर्मित किया गया था जिसे 16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया| हालाँकि इस अधिनियम के तहत पहली बार,24 मार्च 2019 में भारत के प्रथम लोकपाल ने अपना कार्यभार संभाला| इसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष के अन्दर प्रत्येक राज्य में राज्य विधानमंडल के विधि के द्वारा लोकायुक्त का गठन किया जाना है| इस बीच विभिन्न राज्यों के द्वारा अपने-अपने स्तर पर लोकायुक्त का गठन किया गया एवं इस दिशा मेंसर्वप्रथम विधेयक ओड़िसामें पारित किया गया| हालाँकि इसकासर्वप्रथम गठन महाराष्ट्र मेंकिया गया| अबतक लोकायुक्त का गठन सारे राज्यों में नहीं किया गया है| लोकपाल का गठन तथा संरचना प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुशंसा के आधार पर लोकपाल के गठन हेतु सर्वप्रथम विधेयक चौथी लोकसभा के सामने 1968 में प्रस्तुत किया गया था| अतीत में, लोकपाल कानून बनाने के सभी प्रयास विफल रहे। लोकसभा में लोकपाल पर आठ विधेयक पेश किये गये थे, लेकिन 1985 के विधेयक को छोड़कर विभिन्न लोकसभाओं के भंग होने के कारण ये विधेयक अधर में रह गये। अंतिम सफलता 2013 में हाथ लगी जब अंतिम रूप से संसद द्वारालोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 पारित कर दिया गया| इस अधिनियम के द्वारा लोकपाल के संदर्भ में निम्न प्रावधान किये गये है - लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक आठ सदस्यों के द्वारा किया जाना है जिसमें से 50% सदस्य न्यायिक सदस्य होंगे एवं कम से कम 50% सदस्य उन व्यक्तियों में से होंगे जो कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से हों| लोकपाल की नियुक्ति करते समय एकमात्र मानक व्यक्ति की योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसका प्रभाव/सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, धर्म या लिंग से नहीं है| लोकपाल के अधीन जाँच-पड़ताल की शाखा तथा अभियोजन शाखा का गठन ; लोकपाल के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जानी है जो कि एक चयन समिति की अनुशंसा पर आधारित होगा| चयन समिति की संरचना - अध्यक्ष- प्रधानमंत्री सदस्य- लोकसभा अध्यक्ष; लोकसभा में विपक्ष का नेता; भारत का मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा मनोनीत सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश; राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत एक ख्यातिप्राप्त विधिवेता जिसकी अनुशंसा चयन समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों के द्वारा की जानी है| चयन समिति में किसी प्रकार की रिक्तता होने के कारण लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी| सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार , बिना लोकसभा में विपक्ष के नेता के लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है एवं लोकपाल के गठन में विलंब का होना इस अधिनियम के उद्देश्य को पराजित करती है अतः सरकार द्वारा यथाशीघ्र लोकपाल की नियुक्ति की जानी चाहिए| इस अधिनियम के अनुसार एक सर्च समिति का गठन किया जाना है जिसमें कम से कम 7 सदस्य होंगे| यह खोज समिति नामों का सुझाव चयन समिति को करेगा| परंतु प्रावधानों के अनुसार चयन समिति ऐसे नामों पर भी विचार कर सकती है जिसकी अनुशंसा खोज-समिति के द्वारा ना की गई हो| लोकपाल के कार्य- लोकपाल के द्वारा निम्नांकित के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल की जा सकती है - प्रधानमंत्री -प्रधानमंत्री को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे में अधिनियम में शामिल किया गया है किंतु कुछ संरक्षणों एवं प्रावधानों के साथ जो एक प्रकार से व्यावहारिकता में PM को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे से बाहर कर देता है| अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध लोकपाल के द्वारा जाँच की पहल तभी की जा सकती है जब कुल सदस्यों का कम से कम 2/3 सदस्य इस प्रस्ताव का समर्थन करें| साथ ही, लोकपाल प्रधानमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के उन आरोपों की जाँच-पड़ताल नहीं कर सकता है जो कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध, बाहरी एवं आतंरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु-ऊर्जा एवं अंतरिक्ष से संबंधित हो| संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य संसद के सदस्य समूह ए, बी, सी तथा डी के अधिकारियों तथा सरकार के कर्मचारियों सहित सभी श्रेणीयों के लोकसेवक , लोकपाल के क्षेत्राधिकार में आएंगे। लोकपाल द्वारा मुख्य सर्तकता आयुक्त को शिकायत भेजे जाने पर मुख्य सतर्कता आयुक्त समूह ए तथा बी के अधिकारियों के मामले में अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आगे निर्णय के लिए लोकपाल को वापस भेजेगें। समूह सी तथा डी कर्मचारियों के मामले में मुख्य सतर्कता आयुक्त अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए सीवीसी कानून के तहत आगे बढेगे। उनकी कार्रवाई की रिपोर्टिंग तथा समीक्षा लोकपाल द्वारा की जाएंगी। लोकपाल जाँच-पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी को प्रस्तुत करेगा जैसे - प्रधानमंत्री के संदर्भ में लोकसभा के समक्ष; अन्य मंत्रियों के संदर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष; संसद सदस्यों के संदर्भ में लोकसभाअध्यक्ष/सभापति; लोकसेवकों के संदर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष; लोकपाल द्वारा सीबीआई सहित किसी अन्य जांच एजेंसी को सौंपे गए मामले में अधीक्षण तथा निर्देशन का अधिकार लोकपाल के पास होगा। लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्क हालाँकि, लोकपाल का गठन ओम्बड्समैन के विचारधारा पर आधारित है परंतु इसका उद्देश्य जनशिकायतों के निवारण से ना होकर सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल से है अतः ओम्बड्समैन की तुलना में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकुचित है| चूँकि, भ्रष्टाचार का होना जनशिकायतों का एक आयाम है ना कि एकमात्र आयाम एवं लोकपाल का संबंध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच तक सीमित है ना कि कुप्रशासन के कारण उत्पन होने वाले जनता के शिकायतों के निराकरण हेतु जैसे- लालफीताशाही; दुर्व्यवहार आदि|अतः इसके माध्यम से वास्तविक उद्देश्यों के प्राप्ति हेतु शंकाएं विद्यमान है| भ्रष्टाचार के निवारण हेतु पहले से कई विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः लोकपाल के गठन का उद्देश्य इससे कुछ आगे होना चाहिए जो कि जनता के व्यापक शिकायतों के निवारण से संबंधित हो परंतु मौजूदा अधिनियम में ऐसा किया जाना संभव नहीं हो पाया है| भ्रष्टाचार बहुआयामी कारकों का परिणाम है जबकि लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत कार्य करते हुए भ्रष्टाचार से संबंधित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता है| भ्रष्टाचार के निराकरण के संदर्भ में समाज के नैतिक मूल्यों का विशेष योगदान होता है जिसका विकास सामाजिकरण की प्रक्रिया का परिणाम होता है| लोकपाल एक विधिक संस्थान के रूप में सामाजिक-नैतिक मूल्यों को विकसित करे, यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है| लोकपाल की तरह भारत में राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त 1970 के दशक से कार्यरत है परंतु इसके बाद भी भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोकथाम संभव नहीं हो पाया है| अतः लोकपाल अपने उद्देश्य में कितना सफल होगा, यह अपने आप में एक चर्चा का विषय है| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के संदर्भ में सिफारिश की गयी थी| साथ ही,आयोग की अनुशंसा के अनुसार केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त; राज्य स्तर पर लोकायुक्त तथा जिला स्तर पर स्थानीय लोकायुक्त की नियुक्ति की जानी चाहिए| हालाँकि, 116वाँ संविधान संशोधन विधेयक के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त को संवैधानिक दर्जा देने का प्रयास किया गया परंतु यह विधेयक लोकसभा में पारित ना होने के कारण समाप्त हो गया था| वर्तमान लोकपाल के संदर्भ में उपरोक्त सिफारिशों का अभाव है| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे एवं लोकायुक्त की प्रभावकारिता ओम्बड्समैन के गठन एवं कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है जिसकी अनुशंसा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गई है| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि न्यायपालिका की तरह लोकपाल, लोकायुक्त एवं स्थानीय ओम्बड्समैन के बीच एकीकृत संरचना एवं कार्यप्रणाली को विकसित किया जाये|
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##Question:लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| साथ ही, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका की समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Give the deatails about structure, constitution and functions of the lokpal formed under the lokpal and lokayukta act, 2013. Also, review the role of lokpal formed under this act. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में,लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| अगले भाग में, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्कों को स्पष्ट करते हुए उसकी भूमिका की समीक्षा कीजिये| उत्तर- लोकपाल उच्च सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार की शिकायतें सुनने एवं उस पर कार्यवाही करने के निमित्त पद है| 2013 में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम निर्मित किया गया था जिसे 16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया| हालाँकि इस अधिनियम के तहत पहली बार,24 मार्च 2019 में भारत के प्रथम लोकपाल ने अपना कार्यभार संभाला| इसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष के अन्दर प्रत्येक राज्य में राज्य विधानमंडल के विधि के द्वारा लोकायुक्त का गठन किया जाना है| इस बीच विभिन्न राज्यों के द्वारा अपने-अपने स्तर पर लोकायुक्त का गठन किया गया एवं इस दिशा मेंसर्वप्रथम विधेयक ओड़िसामें पारित किया गया| हालाँकि इसकासर्वप्रथम गठन महाराष्ट्र मेंकिया गया| अबतक लोकायुक्त का गठन सारे राज्यों में नहीं किया गया है| लोकपाल का गठन तथा संरचना प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुशंसा के आधार पर लोकपाल के गठन हेतु सर्वप्रथम विधेयक चौथी लोकसभा के सामने 1968 में प्रस्तुत किया गया था| अतीत में, लोकपाल कानून बनाने के सभी प्रयास विफल रहे। लोकसभा में लोकपाल पर आठ विधेयक पेश किये गये थे, लेकिन 1985 के विधेयक को छोड़कर विभिन्न लोकसभाओं के भंग होने के कारण ये विधेयक अधर में रह गये। अंतिम सफलता 2013 में हाथ लगी जब अंतिम रूप से संसद द्वारालोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 पारित कर दिया गया| इस अधिनियम के द्वारा लोकपाल के संदर्भ में निम्न प्रावधान किये गये है - लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक आठ सदस्यों के द्वारा किया जाना है जिसमें से 50% सदस्य न्यायिक सदस्य होंगे एवं कम से कम 50% सदस्य उन व्यक्तियों में से होंगे जो कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से हों| लोकपाल की नियुक्ति करते समय एकमात्र मानक व्यक्ति की योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसका प्रभाव/सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, धर्म या लिंग से नहीं है| लोकपाल के अधीन जाँच-पड़ताल की शाखा तथा अभियोजन शाखा का गठन ; लोकपाल के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जानी है जो कि एक चयन समिति की अनुशंसा पर आधारित होगा| चयन समिति की संरचना - अध्यक्ष- प्रधानमंत्री सदस्य- लोकसभा अध्यक्ष; लोकसभा में विपक्ष का नेता; भारत का मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा मनोनीत सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश; राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत एक ख्यातिप्राप्त विधिवेता जिसकी अनुशंसा चयन समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों के द्वारा की जानी है| चयन समिति में किसी प्रकार की रिक्तता होने के कारण लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी| सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार , बिना लोकसभा में विपक्ष के नेता के लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है एवं लोकपाल के गठन में विलंब का होना इस अधिनियम के उद्देश्य को पराजित करती है अतः सरकार द्वारा यथाशीघ्र लोकपाल की नियुक्ति की जानी चाहिए| इस अधिनियम के अनुसार एक सर्च समिति का गठन किया जाना है जिसमें कम से कम 7 सदस्य होंगे| यह खोज समिति नामों का सुझाव चयन समिति को करेगा| परंतु प्रावधानों के अनुसार चयन समिति ऐसे नामों पर भी विचार कर सकती है जिसकी अनुशंसा खोज-समिति के द्वारा ना की गई हो| लोकपाल के कार्य- लोकपाल के द्वारा निम्नांकित के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल की जा सकती है - प्रधानमंत्री -प्रधानमंत्री को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे में अधिनियम में शामिल किया गया है किंतु कुछ संरक्षणों एवं प्रावधानों के साथ जो एक प्रकार से व्यावहारिकता में PM को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे से बाहर कर देता है| अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध लोकपाल के द्वारा जाँच की पहल तभी की जा सकती है जब कुल सदस्यों का कम से कम 2/3 सदस्य इस प्रस्ताव का समर्थन करें| साथ ही, लोकपाल प्रधानमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के उन आरोपों की जाँच-पड़ताल नहीं कर सकता है जो कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध, बाहरी एवं आतंरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु-ऊर्जा एवं अंतरिक्ष से संबंधित हो| संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य संसद के सदस्य समूह ए, बी, सी तथा डी के अधिकारियों तथा सरकार के कर्मचारियों सहित सभी श्रेणीयों के लोकसेवक , लोकपाल के क्षेत्राधिकार में आएंगे। लोकपाल द्वारा मुख्य सर्तकता आयुक्त को शिकायत भेजे जाने पर मुख्य सतर्कता आयुक्त समूह ए तथा बी के अधिकारियों के मामले में अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आगे निर्णय के लिए लोकपाल को वापस भेजेगें। समूह सी तथा डी कर्मचारियों के मामले में मुख्य सतर्कता आयुक्त अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए सीवीसी कानून के तहत आगे बढेगे। उनकी कार्रवाई की रिपोर्टिंग तथा समीक्षा लोकपाल द्वारा की जाएंगी। लोकपाल जाँच-पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी को प्रस्तुत करेगा जैसे - प्रधानमंत्री के संदर्भ में लोकसभा के समक्ष; अन्य मंत्रियों के संदर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष; संसद सदस्यों के संदर्भ में लोकसभाअध्यक्ष/सभापति; लोकसेवकों के संदर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष; लोकपाल द्वारा सीबीआई सहित किसी अन्य जांच एजेंसी को सौंपे गए मामले में अधीक्षण तथा निर्देशन का अधिकार लोकपाल के पास होगा। लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्क हालाँकि, लोकपाल का गठन ओम्बड्समैन के विचारधारा पर आधारित है परंतु इसका उद्देश्य जनशिकायतों के निवारण से ना होकर सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल से है अतः ओम्बड्समैन की तुलना में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकुचित है| चूँकि, भ्रष्टाचार का होना जनशिकायतों का एक आयाम है ना कि एकमात्र आयाम एवं लोकपाल का संबंध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच तक सीमित है ना कि कुप्रशासन के कारण उत्पन होने वाले जनता के शिकायतों के निराकरण हेतु जैसे- लालफीताशाही; दुर्व्यवहार आदि|अतः इसके माध्यम से वास्तविक उद्देश्यों के प्राप्ति हेतु शंकाएं विद्यमान है| भ्रष्टाचार के निवारण हेतु पहले से कई विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः लोकपाल के गठन का उद्देश्य इससे कुछ आगे होना चाहिए जो कि जनता के व्यापक शिकायतों के निवारण से संबंधित हो परंतु मौजूदा अधिनियम में ऐसा किया जाना संभव नहीं हो पाया है| भ्रष्टाचार बहुआयामी कारकों का परिणाम है जबकि लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत कार्य करते हुए भ्रष्टाचार से संबंधित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता है| भ्रष्टाचार के निराकरण के संदर्भ में समाज के नैतिक मूल्यों का विशेष योगदान होता है जिसका विकास सामाजिकरण की प्रक्रिया का परिणाम होता है| लोकपाल एक विधिक संस्थान के रूप में सामाजिक-नैतिक मूल्यों को विकसित करे, यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है| लोकपाल की तरह भारत में राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त 1970 के दशक से कार्यरत है परंतु इसके बाद भी भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोकथाम संभव नहीं हो पाया है| अतः लोकपाल अपने उद्देश्य में कितना सफल होगा, यह अपने आप में एक चर्चा का विषय है| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के संदर्भ में सिफारिश की गयी थी| साथ ही,आयोग की अनुशंसा के अनुसार केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त; राज्य स्तर पर लोकायुक्त तथा जिला स्तर पर स्थानीय लोकायुक्त की नियुक्ति की जानी चाहिए| हालाँकि, 116वाँ संविधान संशोधन विधेयक के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त को संवैधानिक दर्जा देने का प्रयास किया गया परंतु यह विधेयक लोकसभा में पारित ना होने के कारण समाप्त हो गया था| वर्तमान लोकपाल के संदर्भ में उपरोक्त सिफारिशों का अभाव है| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे एवं लोकायुक्त की प्रभावकारिता ओम्बड्समैन के गठन एवं कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है जिसकी अनुशंसा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गई है| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि न्यायपालिका की तरह लोकपाल, लोकायुक्त एवं स्थानीय ओम्बड्समैन के बीच एकीकृत संरचना एवं कार्यप्रणाली को विकसित किया जाये|
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During its revolution around the sun, the earth"s northern hemisphere experiences winter when it is closer to the sun, Why? Explain the various reasons behind the occurrence of seasons on the surface of the earth. (200 words/10 marks)
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APPROACH Introduction: Mention about change in seasons. Body: Following two parts need to be addressed: Mention reasons for the occurrence of winter in the northern hemisphere, during its revolution of Earth around the sun. Reasons behind the occurrence of seasons on the surface of the Earth. Conclusion: Positive and optimistic ending on ways to resolve global warming. ANSWER : The seasons are created as Earth spins on its axis and moves in an elliptical orbit around the sun. This orbit takes 365 days to complete and is the reason that humans experience the seasons: winter, spring, summer, and fall. However, other factors influence the seasons as well. The movement of the earth around the sun in a fixed path or orbit is called Revolution. The revolutionof Earth around the sun is one of the major reasons for the change in seasons. During its revolution around the sun, the Earth"s northern hemisphere experiences winter when it is closer to the sun. The reason for this can be understood through the occurrence of the winter solstice which is a result of the combined effect of the revolution of Earth around the sun and the axial tilt. On 22nd December, the Tropic of Capricorn receives direct rays of the sun as the South Pole tilts towards it. As the sun’s rays fall vertically at the Tropic of Capricorn, a larger portion of the Southern Hemisphere gets light. Therefore, it is summer in the Southern Hemisphere with longer days and shorter nights. The reverse happens in the Northern Hemisphere. This position of the earth is called the Winter Solstice. Note : A diagram regarding summer and winter solstice will be appreciated. There are various reasons behind the occurrence of seasons on the surface of the earth : Earth"s Axial Tilt - The axis of the Earth is tilted by an angle of 22.5 degrees. This influences the seasons as Earthrevolvesin orbit around the sun. Earth’s axis causes the Northern Hemisphere to point toward the sun during the summer months. This happens at the beginning of summer in the month of June. Not only this, axial tilt leads to increased distance from the sun during the winter months. This is at the beginning of December. Whereas, at the time when Earth is pointing at a 90-degree angle, toward or away from the sun, the Northern Hemisphere experiences spring and fall seasons. Seasons in the Southern Hemisphere are the opposite. Sunlight - Sunlight influences the seasons. During the summer season, the sun is positioneddirectly overhead. This leads to the maximum amount of heatbeing transferred to the ground. Opposite to this, during the winter months, the sun is positioned lower in the sky. This, in turn, leads to less absorption of heat by the ground, leading to colder climates. Earth"s Surface -Earthallows the atmosphere to absorb or lose heat. This, in turn, influences the seasons. For example, areas that are darker with dense vegetation can absorb more amount of heat during the summer months, while areas with ice and snow reflect and lose more amount of heat. Altitude - Altitudealso influences the seasons. It is the reason because of which some areas may remain cold, even during the summer months. Higher elevations are typically colder, with the highest altitudes having a harder time sustaining life. The winter months at high elevations are the harshest winters of all, with continual storms. Wind Patterns - As the season changes, so do the wind patterns. In the winter months, when the sunlight is less intense, cold air begins to collect in the Northern Hemisphere. Conversely, in the summer months, warm air and sunlight heat up the Northern Hemisphere. Wind patterns change with the seasons, moving north or south. Distance from the sea - It is the reason for less seasonal variation for regions near to coastal areas. Also, the places distantly located from the sea face extreme variations in temperature and season. Local Factors - Factors like El-Nino, La Nina, Southern Oscillation impact seasons, especially the monsoons in the Indian Subcontinent. Apart from that, topographical conditions like deserts and vegetations also impact seasons. Global Warming - It has been one of the major reasons for the change in season and the increase in excessive temperatures in recent years. Thus it can be understood that the season of a place is a combined effect of multiple parameters. Of all this anthropological factor has contributed to global warming. Seasons play an important role in the existence of life on Earth. So, there is an urgent need to tackle global warming through combined and sustained efforts. Sustainable Development Goals are a good initiative towards this. Also, the agreement amongst the nations to tackle global warming through the reduction of emissions (Paris) will yield positive results.
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##Question:During its revolution around the sun, the earth"s northern hemisphere experiences winter when it is closer to the sun, Why? Explain the various reasons behind the occurrence of seasons on the surface of the earth. (200 words/10 marks)##Answer:APPROACH Introduction: Mention about change in seasons. Body: Following two parts need to be addressed: Mention reasons for the occurrence of winter in the northern hemisphere, during its revolution of Earth around the sun. Reasons behind the occurrence of seasons on the surface of the Earth. Conclusion: Positive and optimistic ending on ways to resolve global warming. ANSWER : The seasons are created as Earth spins on its axis and moves in an elliptical orbit around the sun. This orbit takes 365 days to complete and is the reason that humans experience the seasons: winter, spring, summer, and fall. However, other factors influence the seasons as well. The movement of the earth around the sun in a fixed path or orbit is called Revolution. The revolutionof Earth around the sun is one of the major reasons for the change in seasons. During its revolution around the sun, the Earth"s northern hemisphere experiences winter when it is closer to the sun. The reason for this can be understood through the occurrence of the winter solstice which is a result of the combined effect of the revolution of Earth around the sun and the axial tilt. On 22nd December, the Tropic of Capricorn receives direct rays of the sun as the South Pole tilts towards it. As the sun’s rays fall vertically at the Tropic of Capricorn, a larger portion of the Southern Hemisphere gets light. Therefore, it is summer in the Southern Hemisphere with longer days and shorter nights. The reverse happens in the Northern Hemisphere. This position of the earth is called the Winter Solstice. Note : A diagram regarding summer and winter solstice will be appreciated. There are various reasons behind the occurrence of seasons on the surface of the earth : Earth"s Axial Tilt - The axis of the Earth is tilted by an angle of 22.5 degrees. This influences the seasons as Earthrevolvesin orbit around the sun. Earth’s axis causes the Northern Hemisphere to point toward the sun during the summer months. This happens at the beginning of summer in the month of June. Not only this, axial tilt leads to increased distance from the sun during the winter months. This is at the beginning of December. Whereas, at the time when Earth is pointing at a 90-degree angle, toward or away from the sun, the Northern Hemisphere experiences spring and fall seasons. Seasons in the Southern Hemisphere are the opposite. Sunlight - Sunlight influences the seasons. During the summer season, the sun is positioneddirectly overhead. This leads to the maximum amount of heatbeing transferred to the ground. Opposite to this, during the winter months, the sun is positioned lower in the sky. This, in turn, leads to less absorption of heat by the ground, leading to colder climates. Earth"s Surface -Earthallows the atmosphere to absorb or lose heat. This, in turn, influences the seasons. For example, areas that are darker with dense vegetation can absorb more amount of heat during the summer months, while areas with ice and snow reflect and lose more amount of heat. Altitude - Altitudealso influences the seasons. It is the reason because of which some areas may remain cold, even during the summer months. Higher elevations are typically colder, with the highest altitudes having a harder time sustaining life. The winter months at high elevations are the harshest winters of all, with continual storms. Wind Patterns - As the season changes, so do the wind patterns. In the winter months, when the sunlight is less intense, cold air begins to collect in the Northern Hemisphere. Conversely, in the summer months, warm air and sunlight heat up the Northern Hemisphere. Wind patterns change with the seasons, moving north or south. Distance from the sea - It is the reason for less seasonal variation for regions near to coastal areas. Also, the places distantly located from the sea face extreme variations in temperature and season. Local Factors - Factors like El-Nino, La Nina, Southern Oscillation impact seasons, especially the monsoons in the Indian Subcontinent. Apart from that, topographical conditions like deserts and vegetations also impact seasons. Global Warming - It has been one of the major reasons for the change in season and the increase in excessive temperatures in recent years. Thus it can be understood that the season of a place is a combined effect of multiple parameters. Of all this anthropological factor has contributed to global warming. Seasons play an important role in the existence of life on Earth. So, there is an urgent need to tackle global warming through combined and sustained efforts. Sustainable Development Goals are a good initiative towards this. Also, the agreement amongst the nations to tackle global warming through the reduction of emissions (Paris) will yield positive results.
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राज्य के नीति निर्देशक तत्वों से आप क्या समझते है ?इसके साथ हीराज्य के द्वारा नीति निर्माण में इसके महत्त्व पर चर्चा कीजिये। (200 शब्द ) What do you understand by directive principles of state policy? Inaddition, discuss its importance in state policy formulation. (200 words)
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एप्रोच :- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को बताते हुए प्रारम्भ कीजिये। संक्षिप्त में इसके उद्देश्य भी लिखिए। राज्य के द्वारा नीति निर्माण में इसके महत्त्व को तर्कों सहित बताइये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान के भाग 4 मेंराज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख किया गया है , जिनका उद्देश्य उन आदर्शों को स्थापित करना था , जिन्हे राज्य के द्वारा नीति निर्माण में समाहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। यद्यपि ये वाद योग्य नहीं है , किन्तु संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों तथा सरकार की नीतियों में यह परिलक्षित होते है।डॉ अंबेडकर के अनुसार, यह लोगों को आर्थिक जनतंत्र उपलब्ध कराने को दिए गए है। संविधान सभा के मुख्य संवैधानिक सलाहकार बी एन राव के अनुसार , अधिकारों को 2 भागों में रखा गया है , एक जो लोगों को राजनीतिक अधिकार देते है और ये वाद योग्य है अर्थात यदि राज्य इनकी उपेक्षा करता है तो इन्हे लागू कराने के लिए लोग न्यायालय जा सकते है। अर्थात मौलिक अधिकार। . ऐसे अधिकार , जो राज्य के संसाधन पर निर्भर होंगे और इसीलिए इन्हे लागू कराने के लिए न्यायालय नहीं जा सकता अर्थात यह वाद योग्य नहीं होंगे।यद्यपि वाद योग्य ना होते हुए भी , नीति निर्देशक तत्व , नैतिक उपदेश की भांति होंगे अर्थात यदि राज्य , इन्हे लागू नहीं करता है तो लोग चुनाव में उस सरकार को दण्डित करेंगे। उद्देश्य - लोगों का कल्याण सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की स्थापना लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना संसाधनों का समान वितरण अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सद्भाव की स्थापना नीति निर्देशक तत्वों काराज्य कीनीतियों मेंमहत्त्व - अवसरों , सुविधाओं आदि में असमानता दूर कर समाज में अमीर और गरीब के बीच भेदभाव मिटाना (अनुच्छेद 38 (2)), इन्हें हम अपनी कर प्रणाली मेंप्रगतिशील कराधान में देख सकते है। जिसमें आय बढ़ने के साथ ही कर की दर भी बढ़ती जाती है। कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना - अनुच्छेद 38 (1 ) इसका उदाहरण सरकार के द्वारा PDS प्रणाली , कम दरों पर खाद्य आपूर्ति आदि को रखा जा सकता है। समाज के कमजोर वर्गों का उत्थान - अनुच्छेद 39 (e), 39(f) लैंगिक भेदभाव को मिटाना - अनुच्छेद 39 (d) महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए निर्मित विभिन्न अधिनियम घरेलू उद्योगों की स्थापना - अनुच्छेद 43 उपयोगी पशुओं को मारने पर रोक -अनुच्छेद 48 मद्य निषेध लागू करना -अनुच्छेद 47 ग्राम पंचायतों का गठन -अनुच्छेद 40 73 वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया। इस प्रकार वाद योग्य ना होते हुए भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का राज्य की नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है तथा यह संविधान के आदर्शों को प्राप्त करने हेतु मार्गदर्शन भी प्रस्तुत करता है तथा राज्य को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय की प्राप्ति में सहायक है।
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##Question:राज्य के नीति निर्देशक तत्वों से आप क्या समझते है ?इसके साथ हीराज्य के द्वारा नीति निर्माण में इसके महत्त्व पर चर्चा कीजिये। (200 शब्द ) What do you understand by directive principles of state policy? Inaddition, discuss its importance in state policy formulation. (200 words)##Answer:एप्रोच :- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को बताते हुए प्रारम्भ कीजिये। संक्षिप्त में इसके उद्देश्य भी लिखिए। राज्य के द्वारा नीति निर्माण में इसके महत्त्व को तर्कों सहित बताइये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान के भाग 4 मेंराज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख किया गया है , जिनका उद्देश्य उन आदर्शों को स्थापित करना था , जिन्हे राज्य के द्वारा नीति निर्माण में समाहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। यद्यपि ये वाद योग्य नहीं है , किन्तु संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों तथा सरकार की नीतियों में यह परिलक्षित होते है।डॉ अंबेडकर के अनुसार, यह लोगों को आर्थिक जनतंत्र उपलब्ध कराने को दिए गए है। संविधान सभा के मुख्य संवैधानिक सलाहकार बी एन राव के अनुसार , अधिकारों को 2 भागों में रखा गया है , एक जो लोगों को राजनीतिक अधिकार देते है और ये वाद योग्य है अर्थात यदि राज्य इनकी उपेक्षा करता है तो इन्हे लागू कराने के लिए लोग न्यायालय जा सकते है। अर्थात मौलिक अधिकार। . ऐसे अधिकार , जो राज्य के संसाधन पर निर्भर होंगे और इसीलिए इन्हे लागू कराने के लिए न्यायालय नहीं जा सकता अर्थात यह वाद योग्य नहीं होंगे।यद्यपि वाद योग्य ना होते हुए भी , नीति निर्देशक तत्व , नैतिक उपदेश की भांति होंगे अर्थात यदि राज्य , इन्हे लागू नहीं करता है तो लोग चुनाव में उस सरकार को दण्डित करेंगे। उद्देश्य - लोगों का कल्याण सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की स्थापना लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना संसाधनों का समान वितरण अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सद्भाव की स्थापना नीति निर्देशक तत्वों काराज्य कीनीतियों मेंमहत्त्व - अवसरों , सुविधाओं आदि में असमानता दूर कर समाज में अमीर और गरीब के बीच भेदभाव मिटाना (अनुच्छेद 38 (2)), इन्हें हम अपनी कर प्रणाली मेंप्रगतिशील कराधान में देख सकते है। जिसमें आय बढ़ने के साथ ही कर की दर भी बढ़ती जाती है। कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना - अनुच्छेद 38 (1 ) इसका उदाहरण सरकार के द्वारा PDS प्रणाली , कम दरों पर खाद्य आपूर्ति आदि को रखा जा सकता है। समाज के कमजोर वर्गों का उत्थान - अनुच्छेद 39 (e), 39(f) लैंगिक भेदभाव को मिटाना - अनुच्छेद 39 (d) महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए निर्मित विभिन्न अधिनियम घरेलू उद्योगों की स्थापना - अनुच्छेद 43 उपयोगी पशुओं को मारने पर रोक -अनुच्छेद 48 मद्य निषेध लागू करना -अनुच्छेद 47 ग्राम पंचायतों का गठन -अनुच्छेद 40 73 वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया। इस प्रकार वाद योग्य ना होते हुए भी राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का राज्य की नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है तथा यह संविधान के आदर्शों को प्राप्त करने हेतु मार्गदर्शन भी प्रस्तुत करता है तथा राज्य को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय की प्राप्ति में सहायक है।
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लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| साथ ही, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका की समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) Give the deatails about Structure, Constitution and Functions of the Lokpal formed under the Lokpal and Lokayukta Act, 2013. Also, Review the role of Lokpal formed under this Act. (150-200 words/10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में,लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| अगले भाग में, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्कों को स्पष्ट करते हुए उसकी भूमिका की समीक्षा कीजिये| उत्तर- लोकपाल उच्च सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार की शिकायतें सुनने एवं उस पर कार्यवाही करने के निमित्त पद है| 2013 में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम निर्मित किया गया था जिसे16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया| हालाँकि इस अधिनियम के तहत पहली बार,24 मार्च 2019 में भारत के प्रथम लोकपाल ने अपना कार्यभार संभाला|इसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष के अन्दर प्रत्येक राज्य में राज्य विधानमंडल के विधि के द्वारा लोकायुक्तका गठन किया जाना है| इस बीच विभिन्न राज्यों के द्वारा अपने-अपने स्तर पर लोकायुक्त का गठन किया गया एवं इस दिशा मेंसर्वप्रथम विधेयक ओड़िसामें पारित किया गया| हालाँकि इसकासर्वप्रथम गठन महाराष्ट्र मेंकिया गया| अबतक लोकायुक्त का गठन सारे राज्यों में नहीं किया गया है| लोकपाल का गठन तथा संरचना प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुशंसा के आधार पर लोकपाल के गठन हेतु सर्वप्रथम विधेयक चौथी लोकसभा के सामने 1968 में प्रस्तुत किया गया था| अतीत में, लोकपाल कानून बनाने के सभी प्रयास विफल रहे। लोकसभा में लोकपाल पर आठ विधेयक पेश किये गये थे, लेकिन 1985 के विधेयक को छोड़कर विभिन्न लोकसभाओं के भंग होने के कारण ये विधेयक अधर में रह गये। अंतिम सफलता 2013 में हाथ लगी जब अंतिम रूप से संसद द्वारालोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 पारित कर दिया गया| इस अधिनियम के द्वारा लोकपाल के संदर्भ में निम्न प्रावधान किये गये है - लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक आठ सदस्यों के द्वाराकिया जाना है जिसमें से 50% सदस्य न्यायिक सदस्य होंगे एवं कम से कम 50% सदस्य उन व्यक्तियों में से होंगे जो कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से हों| लोकपाल की नियुक्ति करते समय एकमात्र मानक व्यक्ति की योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसका प्रभाव/सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, धर्म या लिंग से नहीं है| लोकपाल के अधीन जाँच-पड़ताल की शाखा तथा अभियोजन शाखा का गठन; लोकपाल के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जानी है जो कि एक चयन समिति की अनुशंसा पर आधारित होगा| चयन समिति की संरचना- अध्यक्ष- प्रधानमंत्री; सदस्य- लोकसभा अध्यक्ष; लोकसभा में विपक्ष का नेता; भारत का मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा मनोनीत सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश; राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत एक ख्यातिप्राप्त विधिवेता जिसकी अनुशंसा चयन समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों के द्वारा की जानी है| चयन समिति में किसी प्रकार की रिक्तता होने के कारण लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी| सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार , बिना लोकसभा में विपक्ष के नेता के लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है एवं लोकपाल के गठन में विलंब का होना इस अधिनियम के उद्देश्य को पराजित करती है अतः सरकार द्वारा यथाशीघ्र लोकपाल की नियुक्ति की जानी चाहिए| इस अधिनियम के अनुसार एक सर्च समिति का गठन किया जाना है जिसमें कम से कम 7 सदस्य होंगे| यह खोज समिति नामों का सुझाव चयन समिति को करेगा| परंतु प्रावधानों के अनुसार चयन समिति ऐसे नामों पर भी विचार कर सकती है जिसकी अनुशंसा खोज-समिति के द्वारा ना की गई हो| लोकपाल के कार्य- लोकपाल के द्वारा निम्नांकित के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल की जा सकती है - प्रधानमंत्री -प्रधानमंत्री को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे में अधिनियम में शामिल किया गया है किंतु कुछ संरक्षणों एवं प्रावधानों के साथ जो एक प्रकार से व्यावहारिकता में PM को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे से बाहर कर देता है| अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध लोकपाल के द्वारा जाँच की पहल तभी की जा सकती है जब कुल सदस्यों का कम से कम 2/3 सदस्य इस प्रस्ताव का समर्थन करें| साथ ही, लोकपाल प्रधानमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के उन आरोपों की जाँच-पड़ताल नहीं कर सकता है जो कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध, बाहरी एवं आतंरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु-ऊर्जा एवं अंतरिक्ष से संबंधित हो| संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य संसद के सदस्य समूह ए, बी, सी तथा डी के अधिकारियों तथा सरकार के कर्मचारियों सहित सभी श्रेणीयों के लोकसेवक, लोकपाल के क्षेत्राधिकार में आएंगे। लोकपाल द्वारा मुख्य सर्तकता आयुक्त को शिकायत भेजे जाने पर मुख्य सतर्कता आयुक्त समूह ए तथा बी के अधिकारियों के मामले में अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आगे निर्णय के लिए लोकपाल को वापस भेजेगें। समूह सी तथा डी कर्मचारियों के मामले में मुख्य सतर्कता आयुक्त अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए सीवीसी कानून के तहत आगे बढेगे। उनकी कार्रवाई की रिपोर्टिंग तथा समीक्षा लोकपाल द्वारा की जाएंगी। लोकपाल जाँच-पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी कोप्रस्तुत करेगा जैसे - प्रधानमंत्री के संदर्भ में लोकसभा के समक्ष; अन्य मंत्रियों के संदर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष; संसद सदस्यों के संदर्भ में लोकसभाअध्यक्ष/सभापति; लोकसेवकों के संदर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष; लोकपाल द्वारा सीबीआई सहित किसी अन्य जांच एजेंसी को सौंपे गए मामले में अधीक्षण तथा निर्देशन का अधिकार लोकपाल के पास होगा। लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्क हालाँकि, लोकपाल का गठन ओम्बड्समैन के विचारधारा पर आधारित है परंतु इसका उद्देश्य जनशिकायतों के निवारण से ना होकर सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल से है अतः ओम्बड्समैन की तुलना में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकुचित है| चूँकि, भ्रष्टाचार का होना जनशिकायतों का एक आयाम है ना कि एकमात्र आयाम एवं लोकपाल का संबंध भ्रष्टाचार केआरोपों की जाँच तक सीमित है ना कि कुप्रशासन के कारण उत्पन होने वाले जनता के शिकायतों के निराकरण हेतु जैसे- लालफीताशाही; दुर्व्यवहार आदि|अतः इसके माध्यम से वास्तविक उद्देश्यों के प्राप्ति हेतु शंकाएं विद्यमान है| भ्रष्टाचार के निवारण हेतु पहले से कई विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः लोकपाल के गठन का उद्देश्य इससे कुछ आगे होना चाहिए जो कि जनता के व्यापक शिकायतों के निवारण से संबंधित हो परंतु मौजूदा अधिनियम में ऐसा किया जाना संभव नहीं हो पाया है| भ्रष्टाचार बहुआयामी कारकों का परिणाम है जबकि लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत कार्य करते हुए भ्रष्टाचार से संबंधित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता है| भ्रष्टाचार के निराकरण के संदर्भ में समाज के नैतिक मूल्यों का विशेष योगदान होता है जिसका विकास सामाजिकरण की प्रक्रिया का परिणाम होता है| लोकपाल एक विधिक संस्थान के रूप में सामाजिक-नैतिक मूल्यों को विकसित करे, यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है| लोकपाल की तरह भारत में राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त 1970 के दशक से कार्यरत है परंतु इसके बाद भी भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोकथाम संभव नहीं हो पाया है| अतः लोकपाल अपने उद्देश्य में कितना सफल होगा, यह अपने आप में एक चर्चा का विषय है| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के संदर्भ में सिफारिश की गयी थी| साथ ही,आयोग की अनुशंसा के अनुसार केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त; राज्य स्तर पर लोकायुक्त तथा जिला स्तर पर स्थानीय लोकायुक्त की नियुक्ति की जानी चाहिए| हालाँकि, 116वाँ संविधान संशोधन विधेयक के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त को संवैधानिक दर्जा देने का प्रयास किया गया परंतु यह विधेयक लोकसभा में पारित ना होने के कारण समाप्त हो गया था|वर्तमान लोकपाल के संदर्भ में उपरोक्त सिफारिशों का अभाव है| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे एवं लोकायुक्त की प्रभावकारिता ओम्बड्समैन के गठन एवं कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है जिसकी अनुशंसा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गई है| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि न्यायपालिका की तरह लोकपाल, लोकायुक्त एवं स्थानीय ओम्बड्समैन के बीच एकीकृत संरचना एवं कार्यप्रणाली को विकसित किया जाये|
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##Question:लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| साथ ही, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका की समीक्षा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) Give the deatails about Structure, Constitution and Functions of the Lokpal formed under the Lokpal and Lokayukta Act, 2013. Also, Review the role of Lokpal formed under this Act. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में,लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 के अंतर्गत गठित लोकपाल की संरचना, गठन तथा कार्यों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| अगले भाग में, इस अधिनियम के तहत गठित लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्कों को स्पष्ट करते हुए उसकी भूमिका की समीक्षा कीजिये| उत्तर- लोकपाल उच्च सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार की शिकायतें सुनने एवं उस पर कार्यवाही करने के निमित्त पद है| 2013 में लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम निर्मित किया गया था जिसे16 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया| हालाँकि इस अधिनियम के तहत पहली बार,24 मार्च 2019 में भारत के प्रथम लोकपाल ने अपना कार्यभार संभाला|इसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष के अन्दर प्रत्येक राज्य में राज्य विधानमंडल के विधि के द्वारा लोकायुक्तका गठन किया जाना है| इस बीच विभिन्न राज्यों के द्वारा अपने-अपने स्तर पर लोकायुक्त का गठन किया गया एवं इस दिशा मेंसर्वप्रथम विधेयक ओड़िसामें पारित किया गया| हालाँकि इसकासर्वप्रथम गठन महाराष्ट्र मेंकिया गया| अबतक लोकायुक्त का गठन सारे राज्यों में नहीं किया गया है| लोकपाल का गठन तथा संरचना प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुशंसा के आधार पर लोकपाल के गठन हेतु सर्वप्रथम विधेयक चौथी लोकसभा के सामने 1968 में प्रस्तुत किया गया था| अतीत में, लोकपाल कानून बनाने के सभी प्रयास विफल रहे। लोकसभा में लोकपाल पर आठ विधेयक पेश किये गये थे, लेकिन 1985 के विधेयक को छोड़कर विभिन्न लोकसभाओं के भंग होने के कारण ये विधेयक अधर में रह गये। अंतिम सफलता 2013 में हाथ लगी जब अंतिम रूप से संसद द्वारालोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम,2013 पारित कर दिया गया| इस अधिनियम के द्वारा लोकपाल के संदर्भ में निम्न प्रावधान किये गये है - लोकपाल का गठन एक अध्यक्ष एवं अधिक से अधिक आठ सदस्यों के द्वाराकिया जाना है जिसमें से 50% सदस्य न्यायिक सदस्य होंगे एवं कम से कम 50% सदस्य उन व्यक्तियों में से होंगे जो कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं में से हों| लोकपाल की नियुक्ति करते समय एकमात्र मानक व्यक्ति की योग्यता एवं सत्यनिष्ठा होनी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसका प्रभाव/सम्बन्ध किसी विशिष्ट जाति, वर्ग, धर्म या लिंग से नहीं है| लोकपाल के अधीन जाँच-पड़ताल की शाखा तथा अभियोजन शाखा का गठन; लोकपाल के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जानी है जो कि एक चयन समिति की अनुशंसा पर आधारित होगा| चयन समिति की संरचना- अध्यक्ष- प्रधानमंत्री; सदस्य- लोकसभा अध्यक्ष; लोकसभा में विपक्ष का नेता; भारत का मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा मनोनीत सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश; राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत एक ख्यातिप्राप्त विधिवेता जिसकी अनुशंसा चयन समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों के द्वारा की जानी है| चयन समिति में किसी प्रकार की रिक्तता होने के कारण लोकपाल की नियुक्ति अमान्य नहीं होगी| सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार , बिना लोकसभा में विपक्ष के नेता के लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है एवं लोकपाल के गठन में विलंब का होना इस अधिनियम के उद्देश्य को पराजित करती है अतः सरकार द्वारा यथाशीघ्र लोकपाल की नियुक्ति की जानी चाहिए| इस अधिनियम के अनुसार एक सर्च समिति का गठन किया जाना है जिसमें कम से कम 7 सदस्य होंगे| यह खोज समिति नामों का सुझाव चयन समिति को करेगा| परंतु प्रावधानों के अनुसार चयन समिति ऐसे नामों पर भी विचार कर सकती है जिसकी अनुशंसा खोज-समिति के द्वारा ना की गई हो| लोकपाल के कार्य- लोकपाल के द्वारा निम्नांकित के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल की जा सकती है - प्रधानमंत्री -प्रधानमंत्री को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे में अधिनियम में शामिल किया गया है किंतु कुछ संरक्षणों एवं प्रावधानों के साथ जो एक प्रकार से व्यावहारिकता में PM को लोकपाल के जाँच-पड़ताल के दायरे से बाहर कर देता है| अधिनियम के अनुसार प्रधानमंत्री के विरुद्ध लोकपाल के द्वारा जाँच की पहल तभी की जा सकती है जब कुल सदस्यों का कम से कम 2/3 सदस्य इस प्रस्ताव का समर्थन करें| साथ ही, लोकपाल प्रधानमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के उन आरोपों की जाँच-पड़ताल नहीं कर सकता है जो कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध, बाहरी एवं आतंरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु-ऊर्जा एवं अंतरिक्ष से संबंधित हो| संघीय मंत्रिपरिषद के सदस्य संसद के सदस्य समूह ए, बी, सी तथा डी के अधिकारियों तथा सरकार के कर्मचारियों सहित सभी श्रेणीयों के लोकसेवक, लोकपाल के क्षेत्राधिकार में आएंगे। लोकपाल द्वारा मुख्य सर्तकता आयुक्त को शिकायत भेजे जाने पर मुख्य सतर्कता आयुक्त समूह ए तथा बी के अधिकारियों के मामले में अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आगे निर्णय के लिए लोकपाल को वापस भेजेगें। समूह सी तथा डी कर्मचारियों के मामले में मुख्य सतर्कता आयुक्त अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए सीवीसी कानून के तहत आगे बढेगे। उनकी कार्रवाई की रिपोर्टिंग तथा समीक्षा लोकपाल द्वारा की जाएंगी। लोकपाल जाँच-पड़ताल का प्रतिवेदन उपयुक्त प्राधिकारी कोप्रस्तुत करेगा जैसे - प्रधानमंत्री के संदर्भ में लोकसभा के समक्ष; अन्य मंत्रियों के संदर्भ में प्रधानमंत्री के समक्ष; संसद सदस्यों के संदर्भ में लोकसभाअध्यक्ष/सभापति; लोकसेवकों के संदर्भ में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समक्ष; लोकपाल द्वारा सीबीआई सहित किसी अन्य जांच एजेंसी को सौंपे गए मामले में अधीक्षण तथा निर्देशन का अधिकार लोकपाल के पास होगा। लोकपाल की भूमिका के संदर्भ में आलोचना के तर्क हालाँकि, लोकपाल का गठन ओम्बड्समैन के विचारधारा पर आधारित है परंतु इसका उद्देश्य जनशिकायतों के निवारण से ना होकर सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-पड़ताल से है अतः ओम्बड्समैन की तुलना में लोकपाल के गठन का उद्देश्य संकुचित है| चूँकि, भ्रष्टाचार का होना जनशिकायतों का एक आयाम है ना कि एकमात्र आयाम एवं लोकपाल का संबंध भ्रष्टाचार केआरोपों की जाँच तक सीमित है ना कि कुप्रशासन के कारण उत्पन होने वाले जनता के शिकायतों के निराकरण हेतु जैसे- लालफीताशाही; दुर्व्यवहार आदि|अतः इसके माध्यम से वास्तविक उद्देश्यों के प्राप्ति हेतु शंकाएं विद्यमान है| भ्रष्टाचार के निवारण हेतु पहले से कई विधिक संस्थान कार्यरत हैं अतः लोकपाल के गठन का उद्देश्य इससे कुछ आगे होना चाहिए जो कि जनता के व्यापक शिकायतों के निवारण से संबंधित हो परंतु मौजूदा अधिनियम में ऐसा किया जाना संभव नहीं हो पाया है| भ्रष्टाचार बहुआयामी कारकों का परिणाम है जबकि लोकपाल विधिक प्रावधानों के अधीन एवं अंतर्गत कार्य करते हुए भ्रष्टाचार से संबंधित सारे कारकों पर प्रहार नहीं कर सकता है| भ्रष्टाचार के निराकरण के संदर्भ में समाज के नैतिक मूल्यों का विशेष योगदान होता है जिसका विकास सामाजिकरण की प्रक्रिया का परिणाम होता है| लोकपाल एक विधिक संस्थान के रूप में सामाजिक-नैतिक मूल्यों को विकसित करे, यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है| लोकपाल की तरह भारत में राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त 1970 के दशक से कार्यरत है परंतु इसके बाद भी भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोकथाम संभव नहीं हो पाया है| अतः लोकपाल अपने उद्देश्य में कितना सफल होगा, यह अपने आप में एक चर्चा का विषय है| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के संदर्भ में सिफारिश की गयी थी| साथ ही,आयोग की अनुशंसा के अनुसार केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय लोकायुक्त; राज्य स्तर पर लोकायुक्त तथा जिला स्तर पर स्थानीय लोकायुक्त की नियुक्ति की जानी चाहिए| हालाँकि, 116वाँ संविधान संशोधन विधेयक के द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त को संवैधानिक दर्जा देने का प्रयास किया गया परंतु यह विधेयक लोकसभा में पारित ना होने के कारण समाप्त हो गया था|वर्तमान लोकपाल के संदर्भ में उपरोक्त सिफारिशों का अभाव है| लोकपाल के प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकायुक्त प्रभावी संस्थान के रूप में कार्य करे एवं लोकायुक्त की प्रभावकारिता ओम्बड्समैन के गठन एवं कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है जिसकी अनुशंसा द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गई है| इस उद्देश्य से यह आवश्यक है कि न्यायपालिका की तरह लोकपाल, लोकायुक्त एवं स्थानीय ओम्बड्समैन के बीच एकीकृत संरचना एवं कार्यप्रणाली को विकसित किया जाये|
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नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत चलाये जा रहे तीन चरणीय कार्यक्रम की चर्चा कीजिए। इस संदर्भ में नाभिकीयऊर्जा कार्यक्रम से संबंधित विभिन्नचुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए।(200 शब्द) Discuss the three-stageprogram being run under the Nuclear Power Generation Program. Also highlight the various challenges related to the nuclear energy program in this context. (200 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भारत में परमाणु ऊर्जा की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत चलाये जा रहे तीन चरणीय कार्यक्रम की चर्चा कीजिए। इसके पश्चातनाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम से संबंधित विभिन्न चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। अंत में संक्षेप मेंएक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए । उत्तर:- भारत ने नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। इसका श्रेय डॉ॰ होमी भाभा द्वारा प्रारंभ किए गए महत्वपूर्ण प्रयासों को जाता है जिन्होंने भारतीय नाभिकीय कार्यक्रम की कल्पना करते हुए इसकी आधारशिला रखी।भारत में गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में परमाणु बिजली केंद्र है। ये केंद्र सरकार के अधीन हैं। नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत चलायाजा रहातीन चरणीय कार्यक्रम:- चरण 1-दाबित भारी जल(pressurised heavy water reactor(PHWR)):- भारत के नाभिकीय कार्यक्रम का प्रथम चरण पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी पर आधारित था जिसके निम्नलिखित लाभ हैं:- सीमित यूरेनियम स्रोतों का सर्वोत्तम उपयोग।ईंधन: U 235 + U 238 द्वितीय चरण ईंधन हेतु उच्चतर प्लूटोनियम का उत्पादन स्वदेशी प्रौद्योगिकी की उपलब्धता पीएचडब्ल्यूआर अभिकल्पन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है, बृहत् दाब वाहिका की बजाय बहुल दाब नलिका संगरुपण मंदक और शीतलक- D2o,पीएचडब्ल्यूआर में मंदक और प्राथमिक शीतलक के रूप में काम करने के लिए उच्च शुद्धता वाले भारी जल का प्रयोग किया जाता है। चरण 2- तीव्र प्रजनन सयंत्र(fast breeder reactor):- भारत का प्रथम 40 मेगावाट वाला तीव्र प्रजनक परीक्षण रिएक्टर (फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर, एफबीटीआर) 1985 में शुरूहुआ। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और तत्कालीन यूएसएसआर के अलावा भारत छठवाँ देश हुआ जिसके पास एफ बी टी आर के निर्माण तथा प्रचालन की प्रौद्योगिकी है। ईंधन - Th 232+U 239 शीतलक- द्रव सोडियम पीएफबीआर के अभिकल्पन हेतु आवश्यक है:- बाष्प द्रव चालन कार्यविधि का विस्तृत और पूरा ज्ञान। वायु, जल तथा सोडियम के पर्यावरण में इन प्रयोगों को करने की सुविधा। उच्च तापीय सोडियम सुविधाओं की स्थापना और उनके सुरक्षित प्रचालन की क्षमता इत्यादि। चरण 3- उन्नत भारी जल सयंत्र(थोरियम रिएक्टर)(advanced heavy water reactor): - ईंधन- Th 232+U 233 यह एक थर्मल ब्रीडर रिएक्टर होगा,इसके प्रारंभिक ईंधन चार्ज के बाद प्राकृतिक थोरियम को उपयोग में लाकरजिसे सैद्धांतिक रूप से फिर से ईंधन दिया जा सकता है।क्षमता निर्माणहोने के बाद ही तीसरे चरण की शुरुआतकी जानी है। नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम से संबंधित चुनौतियां:- परमाणु प्रौद्योगिकी की वास्तविक समस्याओं में सुरक्षा और अपशिष्ट प्रबंधन शामिल हैं। चेर्नोबिल, थ्री माइल आईलैंड, फुकुशिमा जैसी घटनाएं गंभीर चिंता का विषयहैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्र (एनपीपी) के लिए भूमि अधिग्रहण और स्थान का चयन भी देश में एकप्रमुख समस्या है। तमिलनाडु में एनपीपी के कुडनकुलम और आंध्र प्रदेश के कोववाड़ा में भूमि अधिग्रहण संबंधी चुनौतियों के कारण प्रोजेक्ट्स मेंदेरी का सामना करना पड़ा है। चूंकि भारत एनपीटी और एनएसजी का हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं है, इसलिए भारत को गंभीर प्रतिबंधों का सामना करना पड़सकता है। हालाँकि,2009 की छूट और कई देशों के साथ द्विपक्षीय असैन्य परमाणु ऊर्जा समझौतों के बाद यह स्थिति बदल गई है। भारत में रिप्रोसेसिंगऔर संवर्धन क्षमता को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके लिए भारत को खर्च किए गए ईंधन का पूरी तरह से उपयोग करने और अपनी संवर्धन क्षमता बढ़ाने के लिए उन्नत तकनीक की आवश्यकता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर की जरूरतों के मोर्चे पर और कोशिस करने की आवश्यकता है। हालाँकिभारत ने उपकरण और कौशल विकास के निर्माण के लिए औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बहुत मेहनत की है। कई विश्वविद्यालय और संस्थान एनपीपी के लिए इंजीनियरिंग मैनपावर प्रदान करते हैं। इसलिए इन उपरोक्त चुनौतियों से निपटने हेतुभारत कोपरमाणु ऊर्जा के उपयोग की सेफ्टीऔर सिक्योरिटीसुनिश्चित करने के लिएकौशल बेसको मेंटेन रखना,प्रभावी सुरक्षा विनियमन बनाए रखना,अपशिष्ट निपटान और प्रबंधन के लिए गंभीरता से विचार करना एवंअंतर्राष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था को बनाए रखना और सुदृढ़ करना महत्वपूर्ण होगा।
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##Question:नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत चलाये जा रहे तीन चरणीय कार्यक्रम की चर्चा कीजिए। इस संदर्भ में नाभिकीयऊर्जा कार्यक्रम से संबंधित विभिन्नचुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए।(200 शब्द) Discuss the three-stageprogram being run under the Nuclear Power Generation Program. Also highlight the various challenges related to the nuclear energy program in this context. (200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भारत में परमाणु ऊर्जा की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत चलाये जा रहे तीन चरणीय कार्यक्रम की चर्चा कीजिए। इसके पश्चातनाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम से संबंधित विभिन्न चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। अंत में संक्षेप मेंएक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए । उत्तर:- भारत ने नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। इसका श्रेय डॉ॰ होमी भाभा द्वारा प्रारंभ किए गए महत्वपूर्ण प्रयासों को जाता है जिन्होंने भारतीय नाभिकीय कार्यक्रम की कल्पना करते हुए इसकी आधारशिला रखी।भारत में गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में परमाणु बिजली केंद्र है। ये केंद्र सरकार के अधीन हैं। नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत चलायाजा रहातीन चरणीय कार्यक्रम:- चरण 1-दाबित भारी जल(pressurised heavy water reactor(PHWR)):- भारत के नाभिकीय कार्यक्रम का प्रथम चरण पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी पर आधारित था जिसके निम्नलिखित लाभ हैं:- सीमित यूरेनियम स्रोतों का सर्वोत्तम उपयोग।ईंधन: U 235 + U 238 द्वितीय चरण ईंधन हेतु उच्चतर प्लूटोनियम का उत्पादन स्वदेशी प्रौद्योगिकी की उपलब्धता पीएचडब्ल्यूआर अभिकल्पन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है, बृहत् दाब वाहिका की बजाय बहुल दाब नलिका संगरुपण मंदक और शीतलक- D2o,पीएचडब्ल्यूआर में मंदक और प्राथमिक शीतलक के रूप में काम करने के लिए उच्च शुद्धता वाले भारी जल का प्रयोग किया जाता है। चरण 2- तीव्र प्रजनन सयंत्र(fast breeder reactor):- भारत का प्रथम 40 मेगावाट वाला तीव्र प्रजनक परीक्षण रिएक्टर (फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर, एफबीटीआर) 1985 में शुरूहुआ। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और तत्कालीन यूएसएसआर के अलावा भारत छठवाँ देश हुआ जिसके पास एफ बी टी आर के निर्माण तथा प्रचालन की प्रौद्योगिकी है। ईंधन - Th 232+U 239 शीतलक- द्रव सोडियम पीएफबीआर के अभिकल्पन हेतु आवश्यक है:- बाष्प द्रव चालन कार्यविधि का विस्तृत और पूरा ज्ञान। वायु, जल तथा सोडियम के पर्यावरण में इन प्रयोगों को करने की सुविधा। उच्च तापीय सोडियम सुविधाओं की स्थापना और उनके सुरक्षित प्रचालन की क्षमता इत्यादि। चरण 3- उन्नत भारी जल सयंत्र(थोरियम रिएक्टर)(advanced heavy water reactor): - ईंधन- Th 232+U 233 यह एक थर्मल ब्रीडर रिएक्टर होगा,इसके प्रारंभिक ईंधन चार्ज के बाद प्राकृतिक थोरियम को उपयोग में लाकरजिसे सैद्धांतिक रूप से फिर से ईंधन दिया जा सकता है।क्षमता निर्माणहोने के बाद ही तीसरे चरण की शुरुआतकी जानी है। नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम से संबंधित चुनौतियां:- परमाणु प्रौद्योगिकी की वास्तविक समस्याओं में सुरक्षा और अपशिष्ट प्रबंधन शामिल हैं। चेर्नोबिल, थ्री माइल आईलैंड, फुकुशिमा जैसी घटनाएं गंभीर चिंता का विषयहैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्र (एनपीपी) के लिए भूमि अधिग्रहण और स्थान का चयन भी देश में एकप्रमुख समस्या है। तमिलनाडु में एनपीपी के कुडनकुलम और आंध्र प्रदेश के कोववाड़ा में भूमि अधिग्रहण संबंधी चुनौतियों के कारण प्रोजेक्ट्स मेंदेरी का सामना करना पड़ा है। चूंकि भारत एनपीटी और एनएसजी का हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं है, इसलिए भारत को गंभीर प्रतिबंधों का सामना करना पड़सकता है। हालाँकि,2009 की छूट और कई देशों के साथ द्विपक्षीय असैन्य परमाणु ऊर्जा समझौतों के बाद यह स्थिति बदल गई है। भारत में रिप्रोसेसिंगऔर संवर्धन क्षमता को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके लिए भारत को खर्च किए गए ईंधन का पूरी तरह से उपयोग करने और अपनी संवर्धन क्षमता बढ़ाने के लिए उन्नत तकनीक की आवश्यकता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर की जरूरतों के मोर्चे पर और कोशिस करने की आवश्यकता है। हालाँकिभारत ने उपकरण और कौशल विकास के निर्माण के लिए औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बहुत मेहनत की है। कई विश्वविद्यालय और संस्थान एनपीपी के लिए इंजीनियरिंग मैनपावर प्रदान करते हैं। इसलिए इन उपरोक्त चुनौतियों से निपटने हेतुभारत कोपरमाणु ऊर्जा के उपयोग की सेफ्टीऔर सिक्योरिटीसुनिश्चित करने के लिएकौशल बेसको मेंटेन रखना,प्रभावी सुरक्षा विनियमन बनाए रखना,अपशिष्ट निपटान और प्रबंधन के लिए गंभीरता से विचार करना एवंअंतर्राष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था को बनाए रखना और सुदृढ़ करना महत्वपूर्ण होगा।
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In the context of Oceanic Relief Features, discuss the major and minor relief features? (10 marks/150 Words)
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Brief Approach 1. Introduce by briefly explaining oceanic relief features. 2. Highlight Major Relief Features. 3. Then, highlight Minor Relief Features Solution : Ocean relief is largely due to tectonic, volcanic, erosional and depositional processes and their interactions. Ocean relief features are divided into Major and Minor relief features. Major Relief Features 1. Continental Shelf : • Continental Shelf of all oceans together covers 7.5% of the total area of the oceans. • Continental Shelf is the gently sloping seaward extension of the continental plate. • Highly economically important(Hub of resources like Food resources, Minerals nodules, energy minerals, etc). • They provide the richest fishing grounds: Grand Banks, Doggers"s Banks etc. • Examples: Continental Shelf of South-East Asia, Great Banks around Newfoundland, Submerged region between Australia and New Guinea. 2. Continental Slope : • The gradient of the slope region varies between 2-5°. • Continental Slope occupies 8.5% of the volume of Ocean. • only Minor Relief feature present in this region is Submarine Canyons, rest all minor relief features are present in Abyssal Plains. 3. Continental rise: • Occupy less than 1% of the volume of Ocean • The connecting junction between the Abyssal plain and Continental Slope. • Smallest of all the Major relief features. • The continental slope gradually loses its steepness with depth. 4. Abyssal Plains : • occupy 80% of the volume of the ocean. • Cover all the minor relief features like Trenches, Abyssal hills, Ridges etc(except submarine canyons) • These are the flattest and smoothest regions of the world Minor Relief features 1.Trenches : These areas are the deepest parts of the oceans. They are of tectonic origin and are formed during ocean-ocean convergence and ocean-continent convergence. The trenches are very common in the Pacific Ocean, For Example-The Mariana Trench off the Guam Islands in the Pacific Ocean is the deepest trench. 2.Seamount : It is a mountain with pointed summits, rising from the seafloor that does not reach the surface of the ocean. Seamounts are volcanic in origin. 3. Guyots: The flat-topped mountains (seamounts) are known as guyots. 4. Mid-Oceanic Ridges : A mid-oceanic ridge is composed of two chains of mountains separated by a large depression. They form where two tectonic plates are spreading apart (Divergent Boundary). They form the largest mountain systems on earth. These ridges are either broad, like a plateau, gently sloping or in the form of steep-sided narrow mountains.
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##Question:In the context of Oceanic Relief Features, discuss the major and minor relief features? (10 marks/150 Words)##Answer:Brief Approach 1. Introduce by briefly explaining oceanic relief features. 2. Highlight Major Relief Features. 3. Then, highlight Minor Relief Features Solution : Ocean relief is largely due to tectonic, volcanic, erosional and depositional processes and their interactions. Ocean relief features are divided into Major and Minor relief features. Major Relief Features 1. Continental Shelf : • Continental Shelf of all oceans together covers 7.5% of the total area of the oceans. • Continental Shelf is the gently sloping seaward extension of the continental plate. • Highly economically important(Hub of resources like Food resources, Minerals nodules, energy minerals, etc). • They provide the richest fishing grounds: Grand Banks, Doggers"s Banks etc. • Examples: Continental Shelf of South-East Asia, Great Banks around Newfoundland, Submerged region between Australia and New Guinea. 2. Continental Slope : • The gradient of the slope region varies between 2-5°. • Continental Slope occupies 8.5% of the volume of Ocean. • only Minor Relief feature present in this region is Submarine Canyons, rest all minor relief features are present in Abyssal Plains. 3. Continental rise: • Occupy less than 1% of the volume of Ocean • The connecting junction between the Abyssal plain and Continental Slope. • Smallest of all the Major relief features. • The continental slope gradually loses its steepness with depth. 4. Abyssal Plains : • occupy 80% of the volume of the ocean. • Cover all the minor relief features like Trenches, Abyssal hills, Ridges etc(except submarine canyons) • These are the flattest and smoothest regions of the world Minor Relief features 1.Trenches : These areas are the deepest parts of the oceans. They are of tectonic origin and are formed during ocean-ocean convergence and ocean-continent convergence. The trenches are very common in the Pacific Ocean, For Example-The Mariana Trench off the Guam Islands in the Pacific Ocean is the deepest trench. 2.Seamount : It is a mountain with pointed summits, rising from the seafloor that does not reach the surface of the ocean. Seamounts are volcanic in origin. 3. Guyots: The flat-topped mountains (seamounts) are known as guyots. 4. Mid-Oceanic Ridges : A mid-oceanic ridge is composed of two chains of mountains separated by a large depression. They form where two tectonic plates are spreading apart (Divergent Boundary). They form the largest mountain systems on earth. These ridges are either broad, like a plateau, gently sloping or in the form of steep-sided narrow mountains.
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भारत- भूटान के सम्बन्ध ऐसे हैं, जैसे दूध को पानी से अलग नहीं किया जा सकता | इस कथन के सन्दर्भ में भूटान ,भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ? बिन्दुवार बताइए | साथ ही भारत -भूटान के सहयोगात्मक और चुनौतियों के मुद्दों की भी चर्चा कीजिए | (150-200 शब्द/10 अंक) India-Bhutan relations are such that milk can not be separated from water. In the context of this statement, why are Bhutan important for India? Point out. Alongwith this discuss the area of cooperation and challanges between India and Bhutan. (150 to 200 words/10 Marks)
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए भूटान के महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात भूटान की भौगोलिक संरचना को बताते हुए भारत के लिए इसके महत्व को बताइए | अंत में भारत और भूटान के सहयोग और चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और भूटान के सम्बन्ध 1949 में संपन्न मैत्री संधि से चले आ रहे हैं | भारत के लिए भूटान निम्नलिखित रूप से महत्वपूर्ण है - भूटान चीन और भारत के मध्यबफर स्टेटका कार्य करता है | चुम्बी घाटी और डोकलाम ट्राई जंक्शनकी वजह से भूटान, भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही से होकर चीन पूर्वोत्तर में प्रवेश कर सकता है | सामरिक महत्व के लिए भूटान का सहयोग भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है -चिकेन नेक | भारत उत्तर-पूर्व क्षेत्र से सिलीगुडी कोरिडोर से जुड़ता है, जिसमे भूटान की महत्वपूर्ण भूमिका है | उत्तर-पूर्व में उग्रवादियों का सफाया करने में भूटान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | दक्षिण पूर्व एशिया में भूटान ही एक मात्र देश है, जो चीन के OBOR का हिस्सा नहीं है | यह दर्शाता है कि भूटान का लगाव भारत के प्रति है | इसके अतिरिक्त भारत और भूटान के मध्य सहयोग के अन्य आयाम और भी है, जो निम्नलिखित हैं- सहयोग के आयाम - भारत -भूटान को ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराता है , जिसमे पन विद्युत बिजली परियोजना - ताबा और चुकी महत्वपूर्ण हैं | भारत और भूटान का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सहयोग प्राचीन काल से रहा है | भारत और भूटान में कूटनीतिक और सामरिक संधियाँ 1949 से चली आ रही है | भारत, भूटान में आर्थिक रूप से अनेक सहयोग कर रहा है - जैसे - भारत, भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, भूटान में इंडियन करेंसी चलती है, भूटान के पंचवर्षीय योजना का वित्तीयन भारत करता है | इन सबके अतिरिक्त भारत और भूटान के संबंधो में कुछ चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आई हैं , जिसका उल्लेख किया जाना यहाँ आवश्यक है- चुनौतियाँ भूटान के कुछ लोगो द्वारा यह प्रचारित किया जाता है कि 2013 के भूटान के चुनाव में DDT पार्टी को हराने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | यह भूटान की संप्रभुता और उसके आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जाता है, जिसका वे लोग विरोध करते हैं | हाल ही में भूटान ने BBIN (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया और नेपाल चार देशों का संगठन) से अपने को अलग कर लिया है | इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत के लिए भूटान का अति महत्वपूर्ण स्थान है ,जहाँ भारत के सामरिक हित के लिए भूटान अति महत्वपूर्ण है वहीँ भूटान की आर्थिक और भौगोलिक सुरक्षा के लिए भारत भी उसके लिए महत्वपूर्ण है | कुछ चुनौतियों के बावजूद भारत और भूटान के सम्बन्ध अभी भी परस्पर सहयोग और मित्रता का बना हुआ है , जो की जरूरी भी है | दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते हुए प्रभाव से भारत को अपने हितों की सुरक्षा करना अति प्रमुख है , जिसमे भूटान का सहयोग भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है |
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##Question:भारत- भूटान के सम्बन्ध ऐसे हैं, जैसे दूध को पानी से अलग नहीं किया जा सकता | इस कथन के सन्दर्भ में भूटान ,भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ? बिन्दुवार बताइए | साथ ही भारत -भूटान के सहयोगात्मक और चुनौतियों के मुद्दों की भी चर्चा कीजिए | (150-200 शब्द/10 अंक) India-Bhutan relations are such that milk can not be separated from water. In the context of this statement, why are Bhutan important for India? Point out. Alongwith this discuss the area of cooperation and challanges between India and Bhutan. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए भूटान के महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात भूटान की भौगोलिक संरचना को बताते हुए भारत के लिए इसके महत्व को बताइए | अंत में भारत और भूटान के सहयोग और चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और भूटान के सम्बन्ध 1949 में संपन्न मैत्री संधि से चले आ रहे हैं | भारत के लिए भूटान निम्नलिखित रूप से महत्वपूर्ण है - भूटान चीन और भारत के मध्यबफर स्टेटका कार्य करता है | चुम्बी घाटी और डोकलाम ट्राई जंक्शनकी वजह से भूटान, भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही से होकर चीन पूर्वोत्तर में प्रवेश कर सकता है | सामरिक महत्व के लिए भूटान का सहयोग भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है -चिकेन नेक | भारत उत्तर-पूर्व क्षेत्र से सिलीगुडी कोरिडोर से जुड़ता है, जिसमे भूटान की महत्वपूर्ण भूमिका है | उत्तर-पूर्व में उग्रवादियों का सफाया करने में भूटान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | दक्षिण पूर्व एशिया में भूटान ही एक मात्र देश है, जो चीन के OBOR का हिस्सा नहीं है | यह दर्शाता है कि भूटान का लगाव भारत के प्रति है | इसके अतिरिक्त भारत और भूटान के मध्य सहयोग के अन्य आयाम और भी है, जो निम्नलिखित हैं- सहयोग के आयाम - भारत -भूटान को ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराता है , जिसमे पन विद्युत बिजली परियोजना - ताबा और चुकी महत्वपूर्ण हैं | भारत और भूटान का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सहयोग प्राचीन काल से रहा है | भारत और भूटान में कूटनीतिक और सामरिक संधियाँ 1949 से चली आ रही है | भारत, भूटान में आर्थिक रूप से अनेक सहयोग कर रहा है - जैसे - भारत, भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, भूटान में इंडियन करेंसी चलती है, भूटान के पंचवर्षीय योजना का वित्तीयन भारत करता है | इन सबके अतिरिक्त भारत और भूटान के संबंधो में कुछ चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आई हैं , जिसका उल्लेख किया जाना यहाँ आवश्यक है- चुनौतियाँ भूटान के कुछ लोगो द्वारा यह प्रचारित किया जाता है कि 2013 के भूटान के चुनाव में DDT पार्टी को हराने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | यह भूटान की संप्रभुता और उसके आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जाता है, जिसका वे लोग विरोध करते हैं | हाल ही में भूटान ने BBIN (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया और नेपाल चार देशों का संगठन) से अपने को अलग कर लिया है | इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत के लिए भूटान का अति महत्वपूर्ण स्थान है ,जहाँ भारत के सामरिक हित के लिए भूटान अति महत्वपूर्ण है वहीँ भूटान की आर्थिक और भौगोलिक सुरक्षा के लिए भारत भी उसके लिए महत्वपूर्ण है | कुछ चुनौतियों के बावजूद भारत और भूटान के सम्बन्ध अभी भी परस्पर सहयोग और मित्रता का बना हुआ है , जो की जरूरी भी है | दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते हुए प्रभाव से भारत को अपने हितों की सुरक्षा करना अति प्रमुख है , जिसमे भूटान का सहयोग भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है |
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Gandhara sculpture owed as much to the Romans as to the Greeks. Explain. (150 words/10 marks)
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Brief approach- Provide a brief note on Gandhara school of arts List down the Romana and Greek influences Answer- The Gandhara School of art had also developed in first century AD along with Mathura School during the reign of Kushana emperor Kanishka. Both Shakas andKushanas were patrons of Gandhara School. Gandharan sculptures show strong Greek influences in the depiction of a ‘man-god’ and of wavy hair, sandals, and extensive drapery. The depiction of Buddha as a ‘man-god’ in Gandharan sculpture is believed to be inspired by Greek mythology. Some examples ofGandharan art depict both Buddha and the Greek god, Hercules. Stucco plaster, which was commonly observed in Greek art, was widely used in Gandharan artwork for the decoration of monastic and cult buildings. Similarly, the representation of Buddha in human form was due to Roman influence. The Roman and Greek Influences in Gandhara Buddha are enumerated as follows: Roman influence Artistic interpretation: The legendary interpretation of Buddha is sometimes presented through roman motifs like Triton. Artistic techniques: In artistic interpretation; Buddha of Gandhara is sometimes presented through roman art techniques using vine scroll; cherub wearing Garland. Anthropomorphic tradition: The tradition of representation of Buddha in human form is inspired by Roman anthropomorphic tradition. Dresses: The outer robe of Buddha of Gandhara like kaaya; antarvasa resembles the attire of Roman gods. Greek influences Greek god as Protector: In many images of Buddha in Gandhara; he is seen under the protection of Greek god Hercules. Vajrapani: Vajrapani found in the right hand of future Buddha is told as a transformed symbol of Hercules who is seen as the protector of Buddha. Greek architectural influence : Some images of Buddha in Gandhara are presented in the Greek architectural environment bearing the affinity of Corinthian. Artistic beauty: The Apollo-like face of Buddha; natural realism; wavy hair as seen in images of Buddha in Gandhara resembles Hellenistic tradition Intellectual affinity: The hello and bun of Gandhara Buddha signify intellectual imbibitions of Buddha from Greek The Bamyan Buddha of Afghanistan is a classic example of the Gandhara School. Thus, both Roman and Greek traditions enrich the Gandhara sculpture.
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##Question:Gandhara sculpture owed as much to the Romans as to the Greeks. Explain. (150 words/10 marks)##Answer:Brief approach- Provide a brief note on Gandhara school of arts List down the Romana and Greek influences Answer- The Gandhara School of art had also developed in first century AD along with Mathura School during the reign of Kushana emperor Kanishka. Both Shakas andKushanas were patrons of Gandhara School. Gandharan sculptures show strong Greek influences in the depiction of a ‘man-god’ and of wavy hair, sandals, and extensive drapery. The depiction of Buddha as a ‘man-god’ in Gandharan sculpture is believed to be inspired by Greek mythology. Some examples ofGandharan art depict both Buddha and the Greek god, Hercules. Stucco plaster, which was commonly observed in Greek art, was widely used in Gandharan artwork for the decoration of monastic and cult buildings. Similarly, the representation of Buddha in human form was due to Roman influence. The Roman and Greek Influences in Gandhara Buddha are enumerated as follows: Roman influence Artistic interpretation: The legendary interpretation of Buddha is sometimes presented through roman motifs like Triton. Artistic techniques: In artistic interpretation; Buddha of Gandhara is sometimes presented through roman art techniques using vine scroll; cherub wearing Garland. Anthropomorphic tradition: The tradition of representation of Buddha in human form is inspired by Roman anthropomorphic tradition. Dresses: The outer robe of Buddha of Gandhara like kaaya; antarvasa resembles the attire of Roman gods. Greek influences Greek god as Protector: In many images of Buddha in Gandhara; he is seen under the protection of Greek god Hercules. Vajrapani: Vajrapani found in the right hand of future Buddha is told as a transformed symbol of Hercules who is seen as the protector of Buddha. Greek architectural influence : Some images of Buddha in Gandhara are presented in the Greek architectural environment bearing the affinity of Corinthian. Artistic beauty: The Apollo-like face of Buddha; natural realism; wavy hair as seen in images of Buddha in Gandhara resembles Hellenistic tradition Intellectual affinity: The hello and bun of Gandhara Buddha signify intellectual imbibitions of Buddha from Greek The Bamyan Buddha of Afghanistan is a classic example of the Gandhara School. Thus, both Roman and Greek traditions enrich the Gandhara sculpture.
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वित आयोग की संरचना को बताते हुए उसके कार्यों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the structure of Finance Commission and explain its functions. (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- वित आयोग से सम्बंधित संवैधानिक प्रावधानों को बताते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए| पहले भाग में वित्त आयोग की संरचना को बताईये| दुसरे भाग में वित्त आयोग के कार्यों का वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः 15 वें वित आयोग का संक्षिप्तता से उल्लेख करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- अनुच्छेद 280 के अंतर्गत अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष या उससे पहले भी वित्त आयोग का गठन किया जाता है| वित्त आयोग की संरचना - संरचना,कार्य का निर्धारण, सदस्यों की योग्यता तथा चयन विधि संसद द्वारा तय किये जाते हैं| इसमें एक अध्यक्ष तथा 4 अन्य सदस्य होतें हैं जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है| इसका अध्यक्ष लोक सेवा के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त कोई व्यक्ति होता है अन्य चार सदस्यों को निम्नलिखित में से चुना जाना चाहिए- किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या उस पद हेतु योग्य व्यक्ति| लेखा एवं वित्त मामलों का विशेषज्ञ| प्रशासन तथा वित्तीय मामलों में अनुभवी व्यक्ति| अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञाता| वित आयोग के कार्य- निवल कर राजस्व(केंद्र द्वारा संग्रहित) को केंद्र-राज्यों के बीच बांटने का तौर-तरीका निर्धारित करना( उर्ध्वाधर ) तथा पुनः राज्यों के बीच बांटने का तौर-तरीका निर्धारण करना( क्षैतिज) | केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले राजस्व अनुदान का तौर-तरीका निर्धारित करना कोई अन्य ऐसा कार्य जो राष्ट्रपति द्वारा इस आयोग को सौंपा जाये| राज्य वित आयोग द्वारा की गयी सिफारिशों के आधार पर नगरपालिकाओं तथा पंचायतों की वितीय स्थिति सुधारने के लिए राज्यों के संचित निधि के संवर्धन के उपाय| आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है जो इसे संसद के दोनों सदनों में रखता है| वर्तमान में 15वें वित आयोग का गठन एन.के.सिंह की अध्यक्षता में किया गया है जो 2020-2025 समयावधि हेतु अपनी सिफारिशें देगा|
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##Question:वित आयोग की संरचना को बताते हुए उसके कार्यों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the structure of Finance Commission and explain its functions. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- वित आयोग से सम्बंधित संवैधानिक प्रावधानों को बताते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए| पहले भाग में वित्त आयोग की संरचना को बताईये| दुसरे भाग में वित्त आयोग के कार्यों का वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः 15 वें वित आयोग का संक्षिप्तता से उल्लेख करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- अनुच्छेद 280 के अंतर्गत अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष या उससे पहले भी वित्त आयोग का गठन किया जाता है| वित्त आयोग की संरचना - संरचना,कार्य का निर्धारण, सदस्यों की योग्यता तथा चयन विधि संसद द्वारा तय किये जाते हैं| इसमें एक अध्यक्ष तथा 4 अन्य सदस्य होतें हैं जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है| इसका अध्यक्ष लोक सेवा के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त कोई व्यक्ति होता है अन्य चार सदस्यों को निम्नलिखित में से चुना जाना चाहिए- किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या उस पद हेतु योग्य व्यक्ति| लेखा एवं वित्त मामलों का विशेषज्ञ| प्रशासन तथा वित्तीय मामलों में अनुभवी व्यक्ति| अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञाता| वित आयोग के कार्य- निवल कर राजस्व(केंद्र द्वारा संग्रहित) को केंद्र-राज्यों के बीच बांटने का तौर-तरीका निर्धारित करना( उर्ध्वाधर ) तथा पुनः राज्यों के बीच बांटने का तौर-तरीका निर्धारण करना( क्षैतिज) | केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले राजस्व अनुदान का तौर-तरीका निर्धारित करना कोई अन्य ऐसा कार्य जो राष्ट्रपति द्वारा इस आयोग को सौंपा जाये| राज्य वित आयोग द्वारा की गयी सिफारिशों के आधार पर नगरपालिकाओं तथा पंचायतों की वितीय स्थिति सुधारने के लिए राज्यों के संचित निधि के संवर्धन के उपाय| आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है जो इसे संसद के दोनों सदनों में रखता है| वर्तमान में 15वें वित आयोग का गठन एन.के.सिंह की अध्यक्षता में किया गया है जो 2020-2025 समयावधि हेतु अपनी सिफारिशें देगा|
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भारत- भूटान के सम्बन्ध ऐसे हैं, जैसे दूध को पानी से अलग नहीं किया जा सकता | इस कथन के सन्दर्भ में भूटान ,भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ? बिन्दुवार बताइए | साथ ही भारत -भूटान के सहयोगात्मक और चुनौतियों के मुद्दों की भी चर्चा कीजिए | (200 शब्द) India-Bhutan relations are such that milk can not be separated from water. In the context of this statement, why Bhutan is important for India? Point out. Alongwith this discuss the area of cooperation and challanges between India and Bhutan.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए भूटान के महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात भूटान की भौगोलिक संरचना को बताते हुए भारत के लिए इसके महत्व को बताइए | अंत में भारत और भूटान के सहयोग और चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और भूटान के सम्बन्ध 1949 में संपन्न मैत्री संधि से चले आ रहे हैं | भारत के लिए भूटान निम्नलिखित रूप से महत्वपूर्ण है - भूटान चीन और भारत के मध्य बफर स्टेट का कार्य करता है | चुम्बी घाटी और डोकलाम ट्राई जंक्शन की वजह से भूटान, भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही से होकर चीन पूर्वोत्तर में प्रवेश कर सकता है | सामरिक महत्व के लिए भूटान का सहयोग भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है - चिकेन नेक | भारत उत्तर-पूर्व क्षेत्र से सिलीगुडी कोरिडोर से जुड़ता है, जिसमे भूटान की महत्वपूर्ण भूमिका है | उत्तर-पूर्व में उग्रवादियों का सफाया करने में भूटान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | दक्षिण पूर्व एशिया में भूटान ही एक मात्र देश है, जो चीन के OBOR का हिस्सा नहीं है | यह दर्शाता है कि भूटान का लगाव भारत के प्रति है | इसके अतिरिक्त भारत और भूटान के मध्य सहयोग के अन्य आयाम और भी है, जो निम्नलिखित हैं- सहयोग के आयाम - भारत -भूटान को ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराता है , जिसमे पन विद्युत बिजली परियोजना - ताबा और चुकी महत्वपूर्ण हैं | भारत और भूटान का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सहयोग प्राचीन काल से रहा है | भारत और भूटान में कूटनीतिक और सामरिक संधियाँ 1949 से चली आ रही है | भारत, भूटान में आर्थिक रूप से अनेक सहयोग कर रहा है - जैसे - भारत, भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, भूटान में इंडियन करेंसी चलती है, भूटान के पंचवर्षीय योजना का वित्तीयन भारत करता है | इन सबके अतिरिक्त भारत और भूटान के संबंधो में कुछ चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आई हैं , जिसका उल्लेख किया जाना यहाँ आवश्यक है - चुनौतियाँ - भूटान के कुछ लोगो द्वारा यह प्रचारित किया जाता है कि 2013 के भूटान के चुनाव में DDT पार्टी को हराने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | यह भूटान की संप्रभुता और उसके आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जाता है, जिसका वे लोग विरोध करते हैं | हाल ही में भूटान ने BBIN (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया और नेपाल चार देशों का संगठन) से अपने को अलग कर लिया है | इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत के लिए भूटान का अति महत्वपूर्ण स्थान है ,जहाँ भारत के सामरिक हित के लिए भूटान अति महत्वपूर्ण है वहीँ भूटान की आर्थिक और भौगोलिक सुरक्षा के लिए भारत भी उसके लिए महत्वपूर्ण है | कुछ चुनौतियों के बावजूद भारत और भूटान के सम्बन्ध अभी भी परस्पर सहयोग और मित्रता का बना हुआ है , जो की जरूरी भी है | दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते हुए प्रभाव से भारत को अपने हितों की सुरक्षा करना अति प्रमुख है , जिसमे भूटान का सहयोग भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है |
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##Question:भारत- भूटान के सम्बन्ध ऐसे हैं, जैसे दूध को पानी से अलग नहीं किया जा सकता | इस कथन के सन्दर्भ में भूटान ,भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ? बिन्दुवार बताइए | साथ ही भारत -भूटान के सहयोगात्मक और चुनौतियों के मुद्दों की भी चर्चा कीजिए | (200 शब्द) India-Bhutan relations are such that milk can not be separated from water. In the context of this statement, why Bhutan is important for India? Point out. Alongwith this discuss the area of cooperation and challanges between India and Bhutan.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए भूटान के महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात भूटान की भौगोलिक संरचना को बताते हुए भारत के लिए इसके महत्व को बताइए | अंत में भारत और भूटान के सहयोग और चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और भूटान के सम्बन्ध 1949 में संपन्न मैत्री संधि से चले आ रहे हैं | भारत के लिए भूटान निम्नलिखित रूप से महत्वपूर्ण है - भूटान चीन और भारत के मध्य बफर स्टेट का कार्य करता है | चुम्बी घाटी और डोकलाम ट्राई जंक्शन की वजह से भूटान, भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही से होकर चीन पूर्वोत्तर में प्रवेश कर सकता है | सामरिक महत्व के लिए भूटान का सहयोग भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है - चिकेन नेक | भारत उत्तर-पूर्व क्षेत्र से सिलीगुडी कोरिडोर से जुड़ता है, जिसमे भूटान की महत्वपूर्ण भूमिका है | उत्तर-पूर्व में उग्रवादियों का सफाया करने में भूटान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | दक्षिण पूर्व एशिया में भूटान ही एक मात्र देश है, जो चीन के OBOR का हिस्सा नहीं है | यह दर्शाता है कि भूटान का लगाव भारत के प्रति है | इसके अतिरिक्त भारत और भूटान के मध्य सहयोग के अन्य आयाम और भी है, जो निम्नलिखित हैं- सहयोग के आयाम - भारत -भूटान को ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराता है , जिसमे पन विद्युत बिजली परियोजना - ताबा और चुकी महत्वपूर्ण हैं | भारत और भूटान का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सहयोग प्राचीन काल से रहा है | भारत और भूटान में कूटनीतिक और सामरिक संधियाँ 1949 से चली आ रही है | भारत, भूटान में आर्थिक रूप से अनेक सहयोग कर रहा है - जैसे - भारत, भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, भूटान में इंडियन करेंसी चलती है, भूटान के पंचवर्षीय योजना का वित्तीयन भारत करता है | इन सबके अतिरिक्त भारत और भूटान के संबंधो में कुछ चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आई हैं , जिसका उल्लेख किया जाना यहाँ आवश्यक है - चुनौतियाँ - भूटान के कुछ लोगो द्वारा यह प्रचारित किया जाता है कि 2013 के भूटान के चुनाव में DDT पार्टी को हराने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | यह भूटान की संप्रभुता और उसके आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जाता है, जिसका वे लोग विरोध करते हैं | हाल ही में भूटान ने BBIN (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया और नेपाल चार देशों का संगठन) से अपने को अलग कर लिया है | इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत के लिए भूटान का अति महत्वपूर्ण स्थान है ,जहाँ भारत के सामरिक हित के लिए भूटान अति महत्वपूर्ण है वहीँ भूटान की आर्थिक और भौगोलिक सुरक्षा के लिए भारत भी उसके लिए महत्वपूर्ण है | कुछ चुनौतियों के बावजूद भारत और भूटान के सम्बन्ध अभी भी परस्पर सहयोग और मित्रता का बना हुआ है , जो की जरूरी भी है | दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते हुए प्रभाव से भारत को अपने हितों की सुरक्षा करना अति प्रमुख है , जिसमे भूटान का सहयोग भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है |
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ई-शासन से आप क्या समझते हैं? भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by e-governance? Referring to the efforts being made by the Government of India, discuss the challenges faced by it. (150-200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में ई-शासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में ई-शासन के लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में ई-शासन की चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में भारत कि स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ई. शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन के लाभ · ई.शासन समाज को अधिक सशक्त बनाता है| · ई.शासन के माध्यम से सरकार एवं नागरिकों के मध्य का संपर्क सूत्र अधिक व्यापक होता है जो कि शासन प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करती है| · यह शासनतन्त्र की लागत को कम करती है · सरकार की प्रतिक्रिया के समय को भी सीमित करती है · ई.शासन सरकार में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या या आकार को भी सीमित करती है · इसके माध्यम से शासनतंत्र की आंतरिक संरचना में स्तरों की संख्या कम होती है| · ई.शासन के माध्यम से सरकारी तंत्र में अधिक विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहन मिलाता है जो कि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है ई.शासन की चुनौतियां · भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| · तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) · तकनीकी साक्षरता की कमी · प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना · ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी · विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा · गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) भारत की स्थिति · उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि · भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है · 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है| · डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है · डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है, प्राप्त अंक 0.9551 हैं| इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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##Question:ई-शासन से आप क्या समझते हैं? भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by e-governance? Referring to the efforts being made by the Government of India, discuss the challenges faced by it. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में ई-शासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में ई-शासन के लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में ई-शासन की चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में भारत कि स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ई. शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन के लाभ · ई.शासन समाज को अधिक सशक्त बनाता है| · ई.शासन के माध्यम से सरकार एवं नागरिकों के मध्य का संपर्क सूत्र अधिक व्यापक होता है जो कि शासन प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करती है| · यह शासनतन्त्र की लागत को कम करती है · सरकार की प्रतिक्रिया के समय को भी सीमित करती है · ई.शासन सरकार में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या या आकार को भी सीमित करती है · इसके माध्यम से शासनतंत्र की आंतरिक संरचना में स्तरों की संख्या कम होती है| · ई.शासन के माध्यम से सरकारी तंत्र में अधिक विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहन मिलाता है जो कि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है ई.शासन की चुनौतियां · भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| · तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) · तकनीकी साक्षरता की कमी · प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना · ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी · विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा · गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) भारत की स्थिति · उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि · भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है · 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है| · डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है · डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है, प्राप्त अंक 0.9551 हैं| इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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ई-शासन की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके लाभों और चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) What do you think of the concept of e-governance? List its benefits and challenges. (150-200 words/ 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में ई-शासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में ई-शासन के लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में ई-शासन की चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में भारत कि स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ई. शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन के लाभ · ई.शासन समाज को अधिक सशक्त बनाता है| · ई.शासन के माध्यम से सरकार एवं नागरिकों के मध्य का संपर्क सूत्र अधिक व्यापक होता है जो कि शासन प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करती है| · यह शासनतन्त्र की लागत को कम करती है · सरकार की प्रतिक्रिया के समय को भी सीमित करती है · ई.शासन सरकार में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या या आकार को भी सीमित करती है · इसके माध्यम से शासनतंत्र की आंतरिक संरचना में स्तरों की संख्या कम होती है| · ई.शासन के माध्यम से सरकारी तंत्र में अधिक विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहन मिलाता है जो कि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है ई.शासन की चुनौतियां · भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| · तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) · तकनीकी साक्षरता की कमी · प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना · ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी · विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा · गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) भारत की स्थिति · उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि · भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है · 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है| · डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है · डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है, प्राप्त अंक 0.9551 हैं| इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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##Question:ई-शासन की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके लाभों और चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द/ 10 अंक) What do you think of the concept of e-governance? List its benefits and challenges. (150-200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में ई-शासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में ई-शासन के लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में ई-शासन की चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में भारत कि स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ई. शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है|ई. शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है ई.शासन के लाभ · ई.शासन समाज को अधिक सशक्त बनाता है| · ई.शासन के माध्यम से सरकार एवं नागरिकों के मध्य का संपर्क सूत्र अधिक व्यापक होता है जो कि शासन प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करती है| · यह शासनतन्त्र की लागत को कम करती है · सरकार की प्रतिक्रिया के समय को भी सीमित करती है · ई.शासन सरकार में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या या आकार को भी सीमित करती है · इसके माध्यम से शासनतंत्र की आंतरिक संरचना में स्तरों की संख्या कम होती है| · ई.शासन के माध्यम से सरकारी तंत्र में अधिक विकेंद्रीकरण को प्रोत्साहन मिलाता है जो कि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है ई.शासन की चुनौतियां · भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| · तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) · तकनीकी साक्षरता की कमी · प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना · ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी · विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा · गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) भारत की स्थिति · उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि · भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है · 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है| · डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है · डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है| भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है, प्राप्त अंक 0.9551 हैं| इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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ई-शासन से आप क्या समझते हैं? भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by e-governance? Referring to the efforts being made by the Government of India, discuss the challenges faced by it. (150-200 words)
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दृष्टिकोण भूमिका में ई-शासन को परिभाषित कीजिये इसके बाद भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लिखिए। दूसरे भाग में ई-शासन की चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिये ई-शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है। ई-शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है भारत की स्थिति उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है| डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है।भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है ई-शासन की चुनौतियां भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) तकनीकी साक्षरता की कमी प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है, प्राप्त अंक 0.9551 हैं| इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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##Question:ई-शासन से आप क्या समझते हैं? भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by e-governance? Referring to the efforts being made by the Government of India, discuss the challenges faced by it. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में ई-शासन को परिभाषित कीजिये इसके बाद भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लिखिए। दूसरे भाग में ई-शासन की चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिये ई-शासन का आशय शासन तंत्र की प्रक्रिया में ICT का अनुप्रयोग करना है ताकि इसके माध्यम से शासन तंत्र में परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन को प्राप्त किया जा सके| ई. शासन के चार मौलिक चरण हैं यथा सूचना, परस्पर तालमेल, लेनदेन, परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन| परिवर्तन या ट्रांसफारमेशन के अंतर्गत सम्पूर्ण सूचना प्रणाली का एकीकरण किया जाना चाहिए एवं जनता के द्वारा गवर्नमेंट टू सिटीजन,गवर्नमेंट टू बिजिनेस सेवाओं को एक काउंटर के माध्यम से प्राप्त किया जा सके अतः ट्रांसफारमेशन के माध्यम से सभी सेवाओं को प्राप्त करने के लिए एकल सूत्री संपर्क को स्थापित किया जाना ई.शासन का अंतिम उद्देश्य है। ई-शासन, सुशासन को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण आधार है जिसका मौलिक उद्देश्य स्मार्ट (सरल, नैतिक, जवाबदेह, संवेदनशील, पारदर्शी) सरकार, के उद्देश्य को प्राप्त किया जाना है भारत की स्थिति उपरोक्त सीमाओं के बावजूद भी भारत में ई.शासन की दिशा में कई सफल प्रयोगों को देखा जा सकता है जैसे भूमि परियोजना(कर्नाटक), CARD(आंध्र प्रदेश), ज्ञानदूत(MP) लोकवाणी परियोजना(UP), ई.मित्र(लोकमित्र+जनमित्र, राजस्थान ), FRIENDS (केरल) आदि भारत सरकार के द्वारा ई.शासन की दिशा में निम्नांकित प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है जैसे 2006 में प्रारम्भ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान, द्वितीय ARC द्वारा प्रस्तुत 11 प्रतिवेदन में ई.शासन पर अनुशंसाएं प्रस्तुत की गयीं| भारत सरकार के द्वारा ई.शासन को बेहतर तरीके से लागू करने की दिशा में नेशनल ई गवर्नेंस पुरस्कार का वितरण किया जाता है 2015 में भारत सरकार के द्वारा डिजिटल इंडिया कि शुरुआत की गयी इसी के साथ नेशनल ई.गवर्नेंस प्लान 2.0 को लागू किया गयाडिजिटल इंडिया के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं-प्रत्येक नागरिक की उपयोगिता हेतु डिजिटल अवसंरचना पर बल, शासन एवं सेवायें जनता की मांग पर उपलब्ध कराना एवं नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण करना| डिजिटल इंडिया के 9 मौलिक स्तम्भ हैं जिसमें विशेष रूप से स्तम्भ नम्बर 4 का सम्बन्ध ई.शासन से है जिसका उद्देश्य तकनीक के द्वारा सरकार में सुधार करना है एवं स्तम्भ नम्बर 5 का सम्बन्ध ई.क्रान्ति से है जिसके माध्यम से सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रस्तुत किया जाना है| डिजिटल इंडिया एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका सम्बन्ध सरकार के विभिन्न विभागों से है एवं इसके माध्यम से IT+IT=IT को प्राप्त किया जाना है डिजिटल इंडिया के अंतर्गत भारत नेट के माध्यम से देश की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को डिजिटल सम्पर्क के साथ जोड़ा जा रहा है।भारत सरकार के द्वारा प्रगति(प्रोएक्टिव गवरनेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंट) की शुरुआत की गयी है ई-शासन की चुनौतियां भारत में ई.शासन से सम्बन्धित निम्नलिखित चुनौतियों को देखा जा सकता है जिनके कारण ई.शासन के वास्तविक लाभ को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाया है| तकनीकी आधारभूत संरचना की कमी(डिजिटल अवसंरचना) तकनीकी साक्षरता की कमी प्रशिक्षण के द्वारा ई.शासन के प्रति अभिवृत्ति परिवर्तन को प्राप्त न किया जाना ई.शासन के दीर्घकालीन लाभों को लेकर समाज में व्यापक जनजागरूकता की कमी विशिष्ट भाषाओं का वर्चस्व& साइबर सुरक्षा का मुद्दा गरीबी एवं सामाजिक-आर्थिक असमानता( ग्रामीण-नगरीय, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित) UN के द्वारा 193 देशों के सर्वेक्षण के आधार पर EGDI(ई.शासन विकास सूचकांक) में भारत का स्थान 96 है एवं भारत को प्राप्त अंक 0.5669 है| UN के द्वारा घोषित EPI(ई.शासन भागीदारी सूचकांक) में भारत की रैंक 15 वीं है, प्राप्त अंक 0.9551 हैं| इस प्रकार देखते हैं कि विभिन्न सीमाओं के बावजूद भी विश्वव्यापी स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर है|
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18वीं सदी के मध्य से लेकर स्वतंत्रता की प्राप्ति तक भारत में ब्रिटिश शासन के आर्थिक नीतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Critically examine the economic policies of British rule in India from the middle of the 18th century till independence. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: आर्थिक नीतियों के उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद संक्षिप्त रूप में इन आर्थिक नीतियों का उल्लेख कीजिए। इन आर्थिक नीतियों के नकारात्मक पक्षों का विस्तार से वर्णन कीजिए। संक्षेप में सकारात्मक पक्षों को भी लिखिए। निष्कर्ष में इसके कारण भारत की दयनीय स्थिति का विवरण देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। अंग्रेजों ने आर्थिक नीतियाँ अपनाईं उनसे भारत की अर्थव्यवस्था का रूपान्तरण एक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में हो गया, जिसके स्वरूप और ढांचे का निर्धारण ब्रिटिश अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार हुआ। अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ आर्थिक नीतियों को तीन चरणों में बाँट सकते हैं: वाणिज्यिक पूंजीवाद का चरण(1757-1813) दीवानी अधिकार प्राप्त कर भू-राजस्व पर अधिकार किया गया इसी से भारतीय कच्चे माल को कहरीदा गया और निर्यात किया जाने लगा। कृषि के वाणिज्यीकरण के माध्यम से भारतीय कृषि व्यवस्था को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करना अद्योगिक पूंजीवाद का चरण(1813-1857) इस दौर में भारत प्रमुख आयतक बन गया। एक तरफा मुक्त व्यापार की नीति को अपनाया गया। वित्तीय पूंजीवाद का चरण (1857 के बाद) ब्रिटेन ने अपनी पूंजी को भारत में निवेश किया जिसके फलस्वरूप रेलवे, टेलीग्राफ आदि का विकास हुआ। परिवहन, संचार के माध्यम से सुदूर क्षेत्रों तक पहुँच स्थापित हुआ। ध्यातव्य है कि 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बुद्धजीवियों ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का समर्थन किया क्योंकि उनका मानना था कि अंग्रेज़ सरकार अत्याधुनिक तकनीक एवं पूंजीवादी आर्थिक संगठन द्वारा देश का आधुनिकीकरण कर रही है। लेकिन 1860 के पश्चात भारतीयों में राजनीतिक चेतना का तेजी से प्रसार हुआ तथा ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का वास्तविक स्वरूप उनके सम्मुख अनावृत्त होने लगा। दादाभाई नौरोजी , आर. सी. दत्त जैसे प्रमुख आर्थिक विश्लेषकों ने अपने अध्ययन से सिद्ध किया कि किस प्रकार अनाज एवं कच्चे माल के रूप में भारत का धन इंग्लैंड भेजा जाता है और फिर किस प्रकार वह विनिर्मित उत्पादों का रूप लेकर भारतीय बाज़ारों पर कब्जा करता है। ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन इस प्रकार है: इन आलोचकों ने तर्क दिया कि अंग्रेजों ने रेलवे का विकास अपने वाणिज्यिक हितों के लिए किया है न कि भारत के प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए। इस दौरान भारत का विदेशी व्यापार देश के बिलकुल प्रतिकूल है। कर के अत्यधिक बोझ से गरीबों पर और बोझ बढ़ा भारत में विदेशी पूंजी निवेश के प्रभाव अत्यंत नकारात्मक थे क्योंकि इससे राजनीतिक वशीकरण तथा विदेशी निवेशकों के हितों का पक्षपोषण होता है। आर्थिक निकास का सिद्धान्त प्रस्तुत करने से देश के सामने साम्राज्यवादियोंकी वास्तविक मंशा उजागर हो गयी तथा इस धारणा का खोखलापन सार्वजनिक हो गया कि विदेशी शासन भारत के हित में है। इस दौर में निर्धनता में अत्यधिक वृद्धि हुई। परम्परागत उद्योगों का ह्रास हुआ। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के सकारात्मक प्रभाव भी पड़े। भारत में अद्योगीकरण से भारतीय उद्योगपतियों का उद्भव हुआ। शिक्षा में तार्किकता का विकास हुआ जिससे एक सीमा तक तकनीकी शिक्षा को अपनाने में मदद मिली। रेलवे जैसे परिवहन के साधनों के विकास से दीर्घकाल में लाभ हुआ। जन आंदोलन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता मिली। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि आर्थिक नीतियों के माध्यम से अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का प्रयोग कर अपने उत्पादों के लिए भारत को बजरके रूप में प्रयोग किया। भारतीय कृषि, उद्योग, समाज आदि पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके कारण देश गुलामी कि जंजीरों से जकड़ता चला गया।अंततः भारतीय अर्थव्यवस्था उपनिवेशी अर्थव्यवस्था में रूपांतरित हो गयी।
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##Question:18वीं सदी के मध्य से लेकर स्वतंत्रता की प्राप्ति तक भारत में ब्रिटिश शासन के आर्थिक नीतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150-200 शब्द; 10 अंक) Critically examine the economic policies of British rule in India from the middle of the 18th century till independence. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: आर्थिक नीतियों के उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद संक्षिप्त रूप में इन आर्थिक नीतियों का उल्लेख कीजिए। इन आर्थिक नीतियों के नकारात्मक पक्षों का विस्तार से वर्णन कीजिए। संक्षेप में सकारात्मक पक्षों को भी लिखिए। निष्कर्ष में इसके कारण भारत की दयनीय स्थिति का विवरण देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। अंग्रेजों ने आर्थिक नीतियाँ अपनाईं उनसे भारत की अर्थव्यवस्था का रूपान्तरण एक औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में हो गया, जिसके स्वरूप और ढांचे का निर्धारण ब्रिटिश अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार हुआ। अंग्रेजों द्वारा प्रारम्भ आर्थिक नीतियों को तीन चरणों में बाँट सकते हैं: वाणिज्यिक पूंजीवाद का चरण(1757-1813) दीवानी अधिकार प्राप्त कर भू-राजस्व पर अधिकार किया गया इसी से भारतीय कच्चे माल को कहरीदा गया और निर्यात किया जाने लगा। कृषि के वाणिज्यीकरण के माध्यम से भारतीय कृषि व्यवस्था को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करना अद्योगिक पूंजीवाद का चरण(1813-1857) इस दौर में भारत प्रमुख आयतक बन गया। एक तरफा मुक्त व्यापार की नीति को अपनाया गया। वित्तीय पूंजीवाद का चरण (1857 के बाद) ब्रिटेन ने अपनी पूंजी को भारत में निवेश किया जिसके फलस्वरूप रेलवे, टेलीग्राफ आदि का विकास हुआ। परिवहन, संचार के माध्यम से सुदूर क्षेत्रों तक पहुँच स्थापित हुआ। ध्यातव्य है कि 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बुद्धजीवियों ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का समर्थन किया क्योंकि उनका मानना था कि अंग्रेज़ सरकार अत्याधुनिक तकनीक एवं पूंजीवादी आर्थिक संगठन द्वारा देश का आधुनिकीकरण कर रही है। लेकिन 1860 के पश्चात भारतीयों में राजनीतिक चेतना का तेजी से प्रसार हुआ तथा ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का वास्तविक स्वरूप उनके सम्मुख अनावृत्त होने लगा। दादाभाई नौरोजी , आर. सी. दत्त जैसे प्रमुख आर्थिक विश्लेषकों ने अपने अध्ययन से सिद्ध किया कि किस प्रकार अनाज एवं कच्चे माल के रूप में भारत का धन इंग्लैंड भेजा जाता है और फिर किस प्रकार वह विनिर्मित उत्पादों का रूप लेकर भारतीय बाज़ारों पर कब्जा करता है। ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन इस प्रकार है: इन आलोचकों ने तर्क दिया कि अंग्रेजों ने रेलवे का विकास अपने वाणिज्यिक हितों के लिए किया है न कि भारत के प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए। इस दौरान भारत का विदेशी व्यापार देश के बिलकुल प्रतिकूल है। कर के अत्यधिक बोझ से गरीबों पर और बोझ बढ़ा भारत में विदेशी पूंजी निवेश के प्रभाव अत्यंत नकारात्मक थे क्योंकि इससे राजनीतिक वशीकरण तथा विदेशी निवेशकों के हितों का पक्षपोषण होता है। आर्थिक निकास का सिद्धान्त प्रस्तुत करने से देश के सामने साम्राज्यवादियोंकी वास्तविक मंशा उजागर हो गयी तथा इस धारणा का खोखलापन सार्वजनिक हो गया कि विदेशी शासन भारत के हित में है। इस दौर में निर्धनता में अत्यधिक वृद्धि हुई। परम्परागत उद्योगों का ह्रास हुआ। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के सकारात्मक प्रभाव भी पड़े। भारत में अद्योगीकरण से भारतीय उद्योगपतियों का उद्भव हुआ। शिक्षा में तार्किकता का विकास हुआ जिससे एक सीमा तक तकनीकी शिक्षा को अपनाने में मदद मिली। रेलवे जैसे परिवहन के साधनों के विकास से दीर्घकाल में लाभ हुआ। जन आंदोलन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता मिली। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि आर्थिक नीतियों के माध्यम से अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का प्रयोग कर अपने उत्पादों के लिए भारत को बजरके रूप में प्रयोग किया। भारतीय कृषि, उद्योग, समाज आदि पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके कारण देश गुलामी कि जंजीरों से जकड़ता चला गया।अंततः भारतीय अर्थव्यवस्था उपनिवेशी अर्थव्यवस्था में रूपांतरित हो गयी।
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सिटिज़न चार्टर से क्या अभिप्राय है ? भारत में इससे जुड़ी चुनौतियों तथा इस संदर्भ में सुझावो की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द ) What does the Citizen Charter mean? Discuss the challenges related to it in India and the suggestions in this context. (200 words)
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· भूमिका में सिटिज़न चार्टर को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में इससे जुड़ी चुनौतियों का जिक्र कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इसे प्रभावी बनाए जाने के उपायों की चर्चा कीजिये । · अंतिम भाग में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- सिटिज़न चार्टर से तात्पर्य सरकारी संगठनो और नागरिकों के बीच एक सामाजिक समझौता से है, ताकि इसके माध्यम से नागरिकों को समयबद्ध और गुणवत्ता पूर्ण वस्तु और सेवाएँ प्रदान की जा सके । सिटिज़न चार्टर सरकार के स्वपहल शक्ति पर आधारित होती है । चार्टर मौलिक रूप से 6 सिद्धांतों पर आधारित है :- गुणवत्ता चयन मानक मूल्य जबाबदेहिता पारदर्शिता सिटिज़न चार्टर से जुड़ी हुई कुछ वर्तमान चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :- ज्यादातर संगठनो में सिटिज़न चार्टर का नागरिक केन्द्रित न होना तथा इसके प्रावधानों को निर्धारित करते समय नागरिकों के साथ व्यापक विचार विमर्श न किया जाना । जनअपक्षाओं के परिवर्तनशील प्रकृति के कारण, चार्टर के प्रावधानों में भी उचित परिवर्तन न किया जाना चाहिए । चार्टर के प्रावधानों में लोक सेवाको के अनुशासन और शिष्टाचार जैसे व्याहरिक पहलुओ पर बल न दिया जाना । चार्टर के प्रावधानों में शिकायत निवारण तंत्र का प्रभावी प्रावधान न होना। जिसके कारण चार्टर के अनुपालन को बेहतर तरीके से सुनिश्चित नही हो पाता। चार्टर में सेवा को प्राप्त करने हेतु अदा की गई कीमत का उचित मूल्य प्रदान किए जाने पर बल नही दिया जाता । चार्टर के प्रावधानों की जानकारी शासन की प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध नही होती , विशेषकर निम्न स्तर पर । चार्टर की भाषा सरल और गैर तकनीकी नही होती जिससे इसको आम व्यक्ति द्वारा समझे जाने में कठिनाई होती है । चार्टर का समुचित प्रचार और प्रसार न किया जाना । जिसके कारण लोगो में इससे जुड़ी जनजागरूकता का अभाव । चार्टर के अनुपालन से संबन्धित विधिक अनिवार्यता का अभाव उपरोक्त चुनौतियों को कम करने और उनके प्रभावी निराकरण की दिशा में सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे हैं । जैसे :- भारत में सिटिज़न चार्टर की शुरुवात 1997 में स्वैच्छिक आधार हुई । चार्टर के परिपालन को अधिक प्रोत्साहित करने हेतु 2005 में sevottam की शुरुवात की गई । 2007 में जन शिकायताओं के प्रभावी निराकरण हेतु CPGRAMS (centralized public grievances redressal and monitoring system ) पोर्टल की शुरुवात की गई । वर्तमान समय में जन शिकायतों के सर्वांगीण और व्यापक निराकरण हेतु सीपी ग्राम का एकीकरण, राज्य स्तरीय जन शिकायत तंत्र के साथ किया जा रहा है । 2011 में सिटिज़न चार्टर विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया । इसी बीच कुछ राज्य सरकारो के द्वारा लोक सेवा अधिकार अधिनियम के द्वारा सिटिज़न चार्टर को विधिक मान्यता के रूप में लागू किया गया । राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसके कानून में यह प्रावधान किया गया की सेवाओ को प्रदान करने में विफल होने पर संबन्धित अधिकारी को सजा दी जाएगी । उपरोक्त उठाए गए कदमो के साथ साथ सिटिज़न चार्टर को ज्यादा से ज्यादा नागरिक केन्द्रित बनाने , उसके निर्माण के स्तर पर जन भागीदारी बढ़ाने , प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र को विकसित करने के साथ साथ सरकारी तंत्र द्वारा इसको अपने अनिवार्य कर्तव्यो के तहत मानकर नागरिक मांग आधारित सेवाओं को प्रभावी तरीके से उपलब्ध करवाकर सिटिज़न चार्टर के मूलभाव को सफल बनाया जा सकता है ।
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##Question:सिटिज़न चार्टर से क्या अभिप्राय है ? भारत में इससे जुड़ी चुनौतियों तथा इस संदर्भ में सुझावो की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द ) What does the Citizen Charter mean? Discuss the challenges related to it in India and the suggestions in this context. (200 words) ##Answer:· भूमिका में सिटिज़न चार्टर को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में इससे जुड़ी चुनौतियों का जिक्र कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इसे प्रभावी बनाए जाने के उपायों की चर्चा कीजिये । · अंतिम भाग में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- सिटिज़न चार्टर से तात्पर्य सरकारी संगठनो और नागरिकों के बीच एक सामाजिक समझौता से है, ताकि इसके माध्यम से नागरिकों को समयबद्ध और गुणवत्ता पूर्ण वस्तु और सेवाएँ प्रदान की जा सके । सिटिज़न चार्टर सरकार के स्वपहल शक्ति पर आधारित होती है । चार्टर मौलिक रूप से 6 सिद्धांतों पर आधारित है :- गुणवत्ता चयन मानक मूल्य जबाबदेहिता पारदर्शिता सिटिज़न चार्टर से जुड़ी हुई कुछ वर्तमान चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :- ज्यादातर संगठनो में सिटिज़न चार्टर का नागरिक केन्द्रित न होना तथा इसके प्रावधानों को निर्धारित करते समय नागरिकों के साथ व्यापक विचार विमर्श न किया जाना । जनअपक्षाओं के परिवर्तनशील प्रकृति के कारण, चार्टर के प्रावधानों में भी उचित परिवर्तन न किया जाना चाहिए । चार्टर के प्रावधानों में लोक सेवाको के अनुशासन और शिष्टाचार जैसे व्याहरिक पहलुओ पर बल न दिया जाना । चार्टर के प्रावधानों में शिकायत निवारण तंत्र का प्रभावी प्रावधान न होना। जिसके कारण चार्टर के अनुपालन को बेहतर तरीके से सुनिश्चित नही हो पाता। चार्टर में सेवा को प्राप्त करने हेतु अदा की गई कीमत का उचित मूल्य प्रदान किए जाने पर बल नही दिया जाता । चार्टर के प्रावधानों की जानकारी शासन की प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध नही होती , विशेषकर निम्न स्तर पर । चार्टर की भाषा सरल और गैर तकनीकी नही होती जिससे इसको आम व्यक्ति द्वारा समझे जाने में कठिनाई होती है । चार्टर का समुचित प्रचार और प्रसार न किया जाना । जिसके कारण लोगो में इससे जुड़ी जनजागरूकता का अभाव । चार्टर के अनुपालन से संबन्धित विधिक अनिवार्यता का अभाव उपरोक्त चुनौतियों को कम करने और उनके प्रभावी निराकरण की दिशा में सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे हैं । जैसे :- भारत में सिटिज़न चार्टर की शुरुवात 1997 में स्वैच्छिक आधार हुई । चार्टर के परिपालन को अधिक प्रोत्साहित करने हेतु 2005 में sevottam की शुरुवात की गई । 2007 में जन शिकायताओं के प्रभावी निराकरण हेतु CPGRAMS (centralized public grievances redressal and monitoring system ) पोर्टल की शुरुवात की गई । वर्तमान समय में जन शिकायतों के सर्वांगीण और व्यापक निराकरण हेतु सीपी ग्राम का एकीकरण, राज्य स्तरीय जन शिकायत तंत्र के साथ किया जा रहा है । 2011 में सिटिज़न चार्टर विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया । इसी बीच कुछ राज्य सरकारो के द्वारा लोक सेवा अधिकार अधिनियम के द्वारा सिटिज़न चार्टर को विधिक मान्यता के रूप में लागू किया गया । राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसके कानून में यह प्रावधान किया गया की सेवाओ को प्रदान करने में विफल होने पर संबन्धित अधिकारी को सजा दी जाएगी । उपरोक्त उठाए गए कदमो के साथ साथ सिटिज़न चार्टर को ज्यादा से ज्यादा नागरिक केन्द्रित बनाने , उसके निर्माण के स्तर पर जन भागीदारी बढ़ाने , प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र को विकसित करने के साथ साथ सरकारी तंत्र द्वारा इसको अपने अनिवार्य कर्तव्यो के तहत मानकर नागरिक मांग आधारित सेवाओं को प्रभावी तरीके से उपलब्ध करवाकर सिटिज़न चार्टर के मूलभाव को सफल बनाया जा सकता है ।
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सिटिज़न चार्टर से क्या अभिप्राय है ? भारत में इससे जुड़ी चुनौतियों तथा इस संदर्भ में सुझावो की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द ) What does the Citizen Charter mean? Discuss the challenges related to it in India and the suggestions in this context. (200 words)
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· भूमिका में सिटिज़न चार्टर को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में इससे जुड़ी चुनौतियों का जिक्र कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इसे प्रभावी बनाए जाने के उपायों की चर्चा कीजिये । · अंतिम भाग में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- सिटिज़न चार्टर से तात्पर्य सरकारी संगठनो और नागरिकों के बीच एक सामाजिक समझौता से है, ताकि इसके माध्यम से नागरिकों को समयबद्ध और गुणवत्ता पूर्ण वस्तु और सेवाएँ प्रदान की जा सके । सिटिज़न चार्टर सरकार के स्वपहल शक्ति पर आधारित होती है । चार्टर मौलिक रूप से 6 सिद्धांतों पर आधारित है :- गुणवत्ता चयन मानक मूल्य जबाबदेहिता पारदर्शिता सिटिज़न चार्टर से जुड़ी हुई कुछ वर्तमान चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :- ज्यादातर संगठनो में सिटिज़न चार्टर का नागरिक केन्द्रित न होना तथा इसके प्रावधानों को निर्धारित करते समय नागरिकों के साथ व्यापक विचार विमर्श न किया जाना । जनअपक्षाओं के परिवर्तनशील प्रकृति के कारण, चार्टर के प्रावधानों में भी उचित परिवर्तन न किया जाना चाहिए । चार्टर के प्रावधानों में लोक सेवाको के अनुशासन और शिष्टाचार जैसे व्याहरिक पहलुओ पर बल न दिया जाना । चार्टर के प्रावधानों में शिकायत निवारण तंत्र का प्रभावी प्रावधान न होना। जिसके कारण चार्टर के अनुपालन को बेहतर तरीके से सुनिश्चित नही हो पाता। चार्टर में सेवा को प्राप्त करने हेतु अदा की गई कीमत का उचित मूल्य प्रदान किए जाने पर बल नही दिया जाता । चार्टर के प्रावधानों की जानकारी शासन की प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध नही होती , विशेषकर निम्न स्तर पर । चार्टर की भाषा सरल और गैर तकनीकी नही होती जिससे इसको आम व्यक्ति द्वारा समझे जाने में कठिनाई होती है । चार्टर का समुचित प्रचार और प्रसार न किया जाना । जिसके कारण लोगो में इससे जुड़ी जनजागरूकता का अभाव । चार्टर के अनुपालन से संबन्धित विधिक अनिवार्यता का अभाव उपरोक्त चुनौतियों को कम करने और उनके प्रभावी निराकरण की दिशा में सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे है। जैसे :- भारत में सिटिज़न चार्टर की शुरुवात 1997 में स्वैच्छिक आधार हुई । चार्टर के परिपालन को अधिक प्रोत्साहित करने हेतु 2005 में sevottam की शुरुवात की गई । 2007 में जन शिकायताओं के प्रभावी निराकरण हेतु CPGRAMS (centralized public grievances redressal and monitoring system ) पोर्टल की शुरुवात की गई । वर्तमान समय में जन शिकायतों के सर्वांगीण और व्यापक निराकरण हेतु सीपी ग्राम का एकीकरण, राज्य स्तरीय जन शिकायत तंत्र के साथ किया जा रहा है । 2011 में सिटिज़न चार्टर विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया । इसी बीच कुछ राज्य सरकारो के द्वारा लोक सेवा अधिकार अधिनियम के द्वारा सिटिज़न चार्टर को विधिक मान्यता के रूप में लागू किया गया । राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसके कानून में यह प्रावधान किया गया की सेवाओ को प्रदान करने में विफल होने पर संबन्धित अधिकारी को सजा दी जाएगी । उपरोक्त उठाए गए कदमो के साथ साथ सिटिज़न चार्टर को ज्यादा से ज्यादा नागरिक केन्द्रित बनाने , उसके निर्माण के स्तर पर जन भागीदारी बढ़ाने , प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र को विकसित करने के साथ साथ सरकारी तंत्र द्वारा इसको अपने अनिवार्य कर्तव्यो के तहत मानकर नागरिक मांग आधारित सेवाओं को प्रभावी तरीके से उपलब्ध करवाकर सिटिज़न चार्टर के मूलभाव को सफल बनाया जा सकता है ।
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##Question:सिटिज़न चार्टर से क्या अभिप्राय है ? भारत में इससे जुड़ी चुनौतियों तथा इस संदर्भ में सुझावो की भी चर्चा कीजिये । ( 200 शब्द ) What does the Citizen Charter mean? Discuss the challenges related to it in India and the suggestions in this context. (200 words) ##Answer:· भूमिका में सिटिज़न चार्टर को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में इससे जुड़ी चुनौतियों का जिक्र कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इसे प्रभावी बनाए जाने के उपायों की चर्चा कीजिये । · अंतिम भाग में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- सिटिज़न चार्टर से तात्पर्य सरकारी संगठनो और नागरिकों के बीच एक सामाजिक समझौता से है, ताकि इसके माध्यम से नागरिकों को समयबद्ध और गुणवत्ता पूर्ण वस्तु और सेवाएँ प्रदान की जा सके । सिटिज़न चार्टर सरकार के स्वपहल शक्ति पर आधारित होती है । चार्टर मौलिक रूप से 6 सिद्धांतों पर आधारित है :- गुणवत्ता चयन मानक मूल्य जबाबदेहिता पारदर्शिता सिटिज़न चार्टर से जुड़ी हुई कुछ वर्तमान चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं :- ज्यादातर संगठनो में सिटिज़न चार्टर का नागरिक केन्द्रित न होना तथा इसके प्रावधानों को निर्धारित करते समय नागरिकों के साथ व्यापक विचार विमर्श न किया जाना । जनअपक्षाओं के परिवर्तनशील प्रकृति के कारण, चार्टर के प्रावधानों में भी उचित परिवर्तन न किया जाना चाहिए । चार्टर के प्रावधानों में लोक सेवाको के अनुशासन और शिष्टाचार जैसे व्याहरिक पहलुओ पर बल न दिया जाना । चार्टर के प्रावधानों में शिकायत निवारण तंत्र का प्रभावी प्रावधान न होना। जिसके कारण चार्टर के अनुपालन को बेहतर तरीके से सुनिश्चित नही हो पाता। चार्टर में सेवा को प्राप्त करने हेतु अदा की गई कीमत का उचित मूल्य प्रदान किए जाने पर बल नही दिया जाता । चार्टर के प्रावधानों की जानकारी शासन की प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध नही होती , विशेषकर निम्न स्तर पर । चार्टर की भाषा सरल और गैर तकनीकी नही होती जिससे इसको आम व्यक्ति द्वारा समझे जाने में कठिनाई होती है । चार्टर का समुचित प्रचार और प्रसार न किया जाना । जिसके कारण लोगो में इससे जुड़ी जनजागरूकता का अभाव । चार्टर के अनुपालन से संबन्धित विधिक अनिवार्यता का अभाव उपरोक्त चुनौतियों को कम करने और उनके प्रभावी निराकरण की दिशा में सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे है। जैसे :- भारत में सिटिज़न चार्टर की शुरुवात 1997 में स्वैच्छिक आधार हुई । चार्टर के परिपालन को अधिक प्रोत्साहित करने हेतु 2005 में sevottam की शुरुवात की गई । 2007 में जन शिकायताओं के प्रभावी निराकरण हेतु CPGRAMS (centralized public grievances redressal and monitoring system ) पोर्टल की शुरुवात की गई । वर्तमान समय में जन शिकायतों के सर्वांगीण और व्यापक निराकरण हेतु सीपी ग्राम का एकीकरण, राज्य स्तरीय जन शिकायत तंत्र के साथ किया जा रहा है । 2011 में सिटिज़न चार्टर विधेयक संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया । इसी बीच कुछ राज्य सरकारो के द्वारा लोक सेवा अधिकार अधिनियम के द्वारा सिटिज़न चार्टर को विधिक मान्यता के रूप में लागू किया गया । राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसके कानून में यह प्रावधान किया गया की सेवाओ को प्रदान करने में विफल होने पर संबन्धित अधिकारी को सजा दी जाएगी । उपरोक्त उठाए गए कदमो के साथ साथ सिटिज़न चार्टर को ज्यादा से ज्यादा नागरिक केन्द्रित बनाने , उसके निर्माण के स्तर पर जन भागीदारी बढ़ाने , प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र को विकसित करने के साथ साथ सरकारी तंत्र द्वारा इसको अपने अनिवार्य कर्तव्यो के तहत मानकर नागरिक मांग आधारित सेवाओं को प्रभावी तरीके से उपलब्ध करवाकर सिटिज़न चार्टर के मूलभाव को सफल बनाया जा सकता है ।
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भारत के लिए नेपाल की व्यापक महत्ता होने के बावजूद, हाल के दिनों में भारत-नेपाल संबंधों में गिरावट देखी जा रही है जो एक मुख्य चिंता का विषय है |“ उक्त कथन की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Despite the extensive importance of Nepal to India, there has been a decline in Indo-Nepal relations in recent days which is a major concern. Explain the above statement. (150-200 Words, 10 Marks)
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एप्रोच - भूमिका में भारत -नेपाल के संबंधों की ऐतिहसिकता को बताते हुए नेपाल का सामान्य परिचय दीजिये | इसके बाद नेपाल- भारत के संबंधों में चुनौतियों के बिंदु को रेखांकित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत व नेपाल मित्रता एवं सहयोग का अद्वितीय सम्बन्ध साझा करते हैं , दोनों के मध्य 1950 में हुई शांति एवं मित्रता की संधि दोनों के विशिष्ट संबंधों की आधारशिला है |हाल के वर्षों में बदलते राजनीतिक विचार एवं बदलते वैश्विक परिदृश्य से भारत एवं नेपाल के संबंधों में गिरावट देखी जा रही है , इसके कारण निम्नलिखित हैं - 2015 में बने नेपाल के संविधान से भारत की असहमति थी क्योंकि इस संविधान में मधेसी समुदायों के हितों को अनदेखा किया गया | भारत द्वारा उनके आतंरिक मामलों में दखल देने का आरोप है | नेपाली कांग्रेस के द्वारा 2015 में हुए ब्लॉक एड का भारत पर आरोप के कारण दोनों देशों के मध्य असंतोष है , जिसके कारण नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भारत विरोधी भावनाएं उत्पन्न हुईं | 1950 की संधि में संशोधन की मांग नेपाल के द्वारा की गयी , परन्तु भारत भी संशोधन किये जाने के पक्ष में है | नेपाल के राजनीतिज्ञों का चीन की ओर झुकाव जैसे वन बेल्ट वन रूट इनिशिएटिव में चीन के साथ जुड़ गया है | हाल ही में नेपाल द्वारा बिम्सटेक सैन्याभ्यास का बहिष्कार कर दिया गया है | इसके अतिरिक्त विमुद्रीकरण ,सुरक्षा से सम्बंधित भारत एवं नेपाल के मध्य कुछ विवाद हैं | नेपाल को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी में चीन द्वारा सहयोग किया जा रहा है जो अब तक भारतीय एकाधिकार में था | नेपाल एवं चीन के मध्य व्यापर 39% की दर से बढ़ रहा है , जबकि अब तक नेपाल से सबसे ज्यादा व्यापार भारत का होता था | चीन, नेपाल में FDI का सबसे बड़े निवेशक के तौर पर उभरा है | नेपाल, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पडोसी देश है| नेपाल , भारत के लिए राजनितिक, सुरक्षा ,सामाजिक,आर्थिक एवं सामरिक रूप से अति महत्त्वपूर्ण है | भारत नेपाल के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करके पुनः अपने संबंधों को गति प्रदान कर सकता है | भारत को नेपाल की मिलिट्री को आधुनिक बनाने , सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने, बस व रेल कनेक्टिविटी इत्यादि विकासात्मक कार्यों के साथBBIN नेटवर्कको जल्द से जल्द पूरा करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए |भारत को अपने पडोसी देशों के साथ सहयोगात्मक संबंध रखते हुएस्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसीका प्रयोग करना चाहिए एवं अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना चाहिए |
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##Question:भारत के लिए नेपाल की व्यापक महत्ता होने के बावजूद, हाल के दिनों में भारत-नेपाल संबंधों में गिरावट देखी जा रही है जो एक मुख्य चिंता का विषय है |“ उक्त कथन की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Despite the extensive importance of Nepal to India, there has been a decline in Indo-Nepal relations in recent days which is a major concern. Explain the above statement. (150-200 Words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत -नेपाल के संबंधों की ऐतिहसिकता को बताते हुए नेपाल का सामान्य परिचय दीजिये | इसके बाद नेपाल- भारत के संबंधों में चुनौतियों के बिंदु को रेखांकित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत व नेपाल मित्रता एवं सहयोग का अद्वितीय सम्बन्ध साझा करते हैं , दोनों के मध्य 1950 में हुई शांति एवं मित्रता की संधि दोनों के विशिष्ट संबंधों की आधारशिला है |हाल के वर्षों में बदलते राजनीतिक विचार एवं बदलते वैश्विक परिदृश्य से भारत एवं नेपाल के संबंधों में गिरावट देखी जा रही है , इसके कारण निम्नलिखित हैं - 2015 में बने नेपाल के संविधान से भारत की असहमति थी क्योंकि इस संविधान में मधेसी समुदायों के हितों को अनदेखा किया गया | भारत द्वारा उनके आतंरिक मामलों में दखल देने का आरोप है | नेपाली कांग्रेस के द्वारा 2015 में हुए ब्लॉक एड का भारत पर आरोप के कारण दोनों देशों के मध्य असंतोष है , जिसके कारण नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भारत विरोधी भावनाएं उत्पन्न हुईं | 1950 की संधि में संशोधन की मांग नेपाल के द्वारा की गयी , परन्तु भारत भी संशोधन किये जाने के पक्ष में है | नेपाल के राजनीतिज्ञों का चीन की ओर झुकाव जैसे वन बेल्ट वन रूट इनिशिएटिव में चीन के साथ जुड़ गया है | हाल ही में नेपाल द्वारा बिम्सटेक सैन्याभ्यास का बहिष्कार कर दिया गया है | इसके अतिरिक्त विमुद्रीकरण ,सुरक्षा से सम्बंधित भारत एवं नेपाल के मध्य कुछ विवाद हैं | नेपाल को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी में चीन द्वारा सहयोग किया जा रहा है जो अब तक भारतीय एकाधिकार में था | नेपाल एवं चीन के मध्य व्यापर 39% की दर से बढ़ रहा है , जबकि अब तक नेपाल से सबसे ज्यादा व्यापार भारत का होता था | चीन, नेपाल में FDI का सबसे बड़े निवेशक के तौर पर उभरा है | नेपाल, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पडोसी देश है| नेपाल , भारत के लिए राजनितिक, सुरक्षा ,सामाजिक,आर्थिक एवं सामरिक रूप से अति महत्त्वपूर्ण है | भारत नेपाल के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करके पुनः अपने संबंधों को गति प्रदान कर सकता है | भारत को नेपाल की मिलिट्री को आधुनिक बनाने , सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने, बस व रेल कनेक्टिविटी इत्यादि विकासात्मक कार्यों के साथBBIN नेटवर्कको जल्द से जल्द पूरा करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए |भारत को अपने पडोसी देशों के साथ सहयोगात्मक संबंध रखते हुएस्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसीका प्रयोग करना चाहिए एवं अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना चाहिए |
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भारत के लिए नेपाल की व्यापक महत्ता होने के बावजूद, हाल के दिनों में भारत-नेपाल संबंधों में गिरावट देखी जा रही है जो एक मुख्य चिंता का विषय है |“ उक्त कथन की व्याख्या कीजिये | (200 शब्द ) Despite the extensive importance of Nepal to India, there has been a decline in Indo-Nepal relations in recent days which is a major concern. Explain the above statement.
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एप्रोच - भूमिका में भारत -नेपाल के संबंधों की ऐतिहसिकता को बताते हुए नेपाल का सामान्य परिचय दीजिये | इसके बाद नेपाल- भारत के संबंधों में चुनौतियों के बिंदु को रेखांकित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत व नेपाल मित्रता एवं सहयोग का अद्वितीय सम्बन्ध साझा करते हैं , दोनों के मध्य 1950 में हुई शांति एवं मित्रता की संधि दोनों के विशिष्ट संबंधों की आधारशिला है |हाल के वर्षों में बदलते राजनीतिक विचार एवं बदलते वैश्विक परिदृश्य से भारत एवं नेपाल के संबंधों में गिरावट देखी जा रही है , इसके कारण निम्नलिखित हैं - 2015 में बने नेपाल के संविधान से भारत की असहमति थी क्योंकि इस संविधान में मधेसी समुदायों के हितों को अनदेखा किया गया | भारत द्वारा उनके आतंरिक मामलों में दखल देने का आरोप है | नेपाली कांग्रेस के द्वारा 2015 में हुए ब्लॉक एड का भारत पर आरोप के कारण दोनों देशों के मध्य असंतोष है , जिसके कारण नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भारत विरोधी भावनाएं उत्पन्न हुईं | 1950 की संधि में संशोधन की मांग नेपाल के द्वारा की गयी , परन्तु भारत भी संशोधन किये जाने के पक्ष में है | नेपाल के राजनीतिज्ञों का चीन की ओर झुकाव जैसे वन बेल्ट वन रूट इनिशिएटिव में चीन के साथ जुड़ गया है | हाल ही में नेपाल द्वारा बिम्सटेक सैन्याभ्यास का बहिष्कार कर दिया गया है | इसके अतिरिक्त विमुद्रीकरण ,सुरक्षा से सम्बंधित भारत एवं नेपाल के मध्य कुछ विवाद हैं | नेपाल को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी में चीन द्वारा सहयोग किया जा रहा है जो अब तक भारतीय एकाधिकार में था | नेपाल एवं चीन के मध्य व्यापर 39% की दर से बढ़ रहा है , जबकि अब तक नेपाल से सबसे ज्यादा व्यापार भारत का होता था | चीन, नेपाल में FDI का सबसे बड़े निवेशक के तौर पर उभरा है | नेपाल, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पडोसी देश है| नेपाल , भारत के लिए राजनितिक, सुरक्षा ,सामाजिक,आर्थिक एवं सामरिक रूप से अति महत्त्वपूर्ण है | भारत नेपाल के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करके पुनः अपने संबंधों को गति प्रदान कर सकता है | भारत को नेपाल की मिलिट्री को आधुनिक बनाने , सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने, बस व रेल कनेक्टिविटी इत्यादि विकासात्मक कार्यों के साथ BBIN नेटवर्क को जल्द से जल्द पूरा करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए |भारत को अपने पडोसी देशों के साथ सहयोगात्मक संबंध रखते हुए स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी का प्रयोग करना चाहिए एवं अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना चाहिए |
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##Question:भारत के लिए नेपाल की व्यापक महत्ता होने के बावजूद, हाल के दिनों में भारत-नेपाल संबंधों में गिरावट देखी जा रही है जो एक मुख्य चिंता का विषय है |“ उक्त कथन की व्याख्या कीजिये | (200 शब्द ) Despite the extensive importance of Nepal to India, there has been a decline in Indo-Nepal relations in recent days which is a major concern. Explain the above statement.##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत -नेपाल के संबंधों की ऐतिहसिकता को बताते हुए नेपाल का सामान्य परिचय दीजिये | इसके बाद नेपाल- भारत के संबंधों में चुनौतियों के बिंदु को रेखांकित कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत व नेपाल मित्रता एवं सहयोग का अद्वितीय सम्बन्ध साझा करते हैं , दोनों के मध्य 1950 में हुई शांति एवं मित्रता की संधि दोनों के विशिष्ट संबंधों की आधारशिला है |हाल के वर्षों में बदलते राजनीतिक विचार एवं बदलते वैश्विक परिदृश्य से भारत एवं नेपाल के संबंधों में गिरावट देखी जा रही है , इसके कारण निम्नलिखित हैं - 2015 में बने नेपाल के संविधान से भारत की असहमति थी क्योंकि इस संविधान में मधेसी समुदायों के हितों को अनदेखा किया गया | भारत द्वारा उनके आतंरिक मामलों में दखल देने का आरोप है | नेपाली कांग्रेस के द्वारा 2015 में हुए ब्लॉक एड का भारत पर आरोप के कारण दोनों देशों के मध्य असंतोष है , जिसके कारण नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भारत विरोधी भावनाएं उत्पन्न हुईं | 1950 की संधि में संशोधन की मांग नेपाल के द्वारा की गयी , परन्तु भारत भी संशोधन किये जाने के पक्ष में है | नेपाल के राजनीतिज्ञों का चीन की ओर झुकाव जैसे वन बेल्ट वन रूट इनिशिएटिव में चीन के साथ जुड़ गया है | हाल ही में नेपाल द्वारा बिम्सटेक सैन्याभ्यास का बहिष्कार कर दिया गया है | इसके अतिरिक्त विमुद्रीकरण ,सुरक्षा से सम्बंधित भारत एवं नेपाल के मध्य कुछ विवाद हैं | नेपाल को ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी में चीन द्वारा सहयोग किया जा रहा है जो अब तक भारतीय एकाधिकार में था | नेपाल एवं चीन के मध्य व्यापर 39% की दर से बढ़ रहा है , जबकि अब तक नेपाल से सबसे ज्यादा व्यापार भारत का होता था | चीन, नेपाल में FDI का सबसे बड़े निवेशक के तौर पर उभरा है | नेपाल, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पडोसी देश है| नेपाल , भारत के लिए राजनितिक, सुरक्षा ,सामाजिक,आर्थिक एवं सामरिक रूप से अति महत्त्वपूर्ण है | भारत नेपाल के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करके पुनः अपने संबंधों को गति प्रदान कर सकता है | भारत को नेपाल की मिलिट्री को आधुनिक बनाने , सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने, बस व रेल कनेक्टिविटी इत्यादि विकासात्मक कार्यों के साथ BBIN नेटवर्क को जल्द से जल्द पूरा करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए |भारत को अपने पडोसी देशों के साथ सहयोगात्मक संबंध रखते हुए स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी का प्रयोग करना चाहिए एवं अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना चाहिए |
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लोकतंत्र में जनता की शिकायतों का निराकरण करना अतिमहत्वपूर्ण होता है| इस संदर्भ में, प्रशासनिक सुधार एवं लोक-शिकायत विभाग(DARPG) तथा लोक शिकायत निदेशालय की भूमिका का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) It is very important to solve public grievances in democracy. In this context, Describe the role of Department of Administrative Reform and Public-Complaint(DARPG) and Directorate of Public Grievances. (200 words)
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एप्रोच- भूमिका में, पहले कथन को संक्षिप्तता से स्पष्ट कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, जनता की शिकायतों का निराकरण करने में प्रशासनिक सुधार एवं लोक-शिकायत विभाग की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,जनता की शिकायतों का निराकरण करने में लोक-शिकायत निदेशालय की भूमिका का वर्णन कीजिये| इनकी महता को ज्यादा प्रचारित करने संबंधी सुझावों के साथ उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- लोकतंत्र की प्रभावी भूमिका जनता(लोक) तथा शासन-प्रणाली(तंत्र) के मध्य बेहतर संबंधों की आधारशिला पर टिका हुआ है| किसी भी देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी बेहतर ढंग से सुचारू रूप से चल सकती है जब जनता की शिकायतों का प्रभावी एवं त्वरित निराकरण किया जाये| शासन एवं शासन से जुड़े कर्मियों द्वारा जनता से जुड़े मुद्दों एवं उसपर लोगों की शंकाओं/शिकायतों के विलंब से समाधान से लोकतंत्र की मूल भावना को ठेस पहुँचती है| भारत में भी, लोकतंत्र की बेहतरी के लिए जनता की शिकायतों का उच्च स्तर पर भी समाधान का प्रयास किया गया है| इस संदर्भ में प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग तथा लोक शिकायत निदेशालय की भूमिका अहम् हो जाती है| प्रशासनिक सुधार एवं लोक-शिकायत विभाग(DARPG) तथा इसकी भूमिका इसके द्वारा प्राप्त की गई शिकायतें संबंधित मंत्रालयों/विभागों या राज्य सरकारें/केंद्र सरकार को अग्रसारित कर दी जाती हैं ताकि वे विभागीय नियमावली के अनुसार संबंधित पदाधिकारी/कर्मी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सके| यह उन विभागों/विषयक्षेत्रों आदि की पहचान करता है जहाँ भ्रष्टाचार की संभावना अधिक होती है| यह नागरिकों के हित संबंधी सरकारी नीति निर्माण में उपयुक्त सुझाव देता है ताकि सरकारी मशीनरी लोगों को गुणवता आधारित सेवाएँ प्रदान कर सके और लोगों की शिकायतें दूर कर सकें| वास्तव में यही इसका सबसे प्रमुख कार्य है| यह शिकायत निवारण के क्षेत्र में नोडल एजेंसी का कार्य करती है अर्थात यह उन नीतिगत पहल का सुझाव सरकार को देती है जिसे अपनाकर सरकार अपने कामकाज में पारदर्शिता ला सकती है और शिकायतों के उद्गम को कमजोर कर सकती है| लोक शिकायत निदेशालय तथा इसकी भूमिका 1988 में कैबिनेट सचिवालय के अंतर्गत लोगों की व्यक्तिगत शिकायतों के निवारण के लिए इसका गठन किया गया था| यह वास्तव में एक अपीलीय निकाय है अर्थात जब संबंधित विभाग/मंत्रालय/एजेंसी लोगों की शिकायतों का निवारण करने में आनाकानी करते हैं तो लोग इन विभागों/मंत्रालयों के विरुद्ध अथवा उनके फैसलों के विरुद्ध इसमें शिकायत कर सकते हैं| DARPG अपीलीय निकाय नहीं है जबकि लोक शिकायत निदेशालय एक अपीलीय निकाय है| यह संबंधित विभाग/मंत्रालय आदि से किसी भी जरुरी फाइल/रिकॉर्ड को तलब कर सकता है| संबंधित अधिकारियों को नोटिस देकर बुला सकता है और उनसे पूछ सकता है कि कैसे लोगों की शिकायतें निपटाई नहीं गयी| तत्पश्चात यह संबंधित विभाग/मंत्रालय/एजेंसी को एक और मौका देते हुए उनके भूल सुधार का अवसर देता है जिसके लिए अधिकतम एक माह का समय दिया जाता है| उपरोक्त दोनों संस्थानों के कार्यों को देखकर शिकायतों के निपटारे में इनकी प्रभावी भूमिका का अंदाजा लगाया जा सकता है| जरुरत बस इस बात की है कि इन प्रावधानों का सही एवं व्यापक स्तर पर पालन हो तथा जनजागरूकता के माध्यम से इन संस्थानों के प्रति आम जनमानस को अवगत कराया जाये |
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##Question:लोकतंत्र में जनता की शिकायतों का निराकरण करना अतिमहत्वपूर्ण होता है| इस संदर्भ में, प्रशासनिक सुधार एवं लोक-शिकायत विभाग(DARPG) तथा लोक शिकायत निदेशालय की भूमिका का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) It is very important to solve public grievances in democracy. In this context, Describe the role of Department of Administrative Reform and Public-Complaint(DARPG) and Directorate of Public Grievances. (200 words)##Answer:एप्रोच- भूमिका में, पहले कथन को संक्षिप्तता से स्पष्ट कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, जनता की शिकायतों का निराकरण करने में प्रशासनिक सुधार एवं लोक-शिकायत विभाग की भूमिका का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,जनता की शिकायतों का निराकरण करने में लोक-शिकायत निदेशालय की भूमिका का वर्णन कीजिये| इनकी महता को ज्यादा प्रचारित करने संबंधी सुझावों के साथ उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- लोकतंत्र की प्रभावी भूमिका जनता(लोक) तथा शासन-प्रणाली(तंत्र) के मध्य बेहतर संबंधों की आधारशिला पर टिका हुआ है| किसी भी देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी बेहतर ढंग से सुचारू रूप से चल सकती है जब जनता की शिकायतों का प्रभावी एवं त्वरित निराकरण किया जाये| शासन एवं शासन से जुड़े कर्मियों द्वारा जनता से जुड़े मुद्दों एवं उसपर लोगों की शंकाओं/शिकायतों के विलंब से समाधान से लोकतंत्र की मूल भावना को ठेस पहुँचती है| भारत में भी, लोकतंत्र की बेहतरी के लिए जनता की शिकायतों का उच्च स्तर पर भी समाधान का प्रयास किया गया है| इस संदर्भ में प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग तथा लोक शिकायत निदेशालय की भूमिका अहम् हो जाती है| प्रशासनिक सुधार एवं लोक-शिकायत विभाग(DARPG) तथा इसकी भूमिका इसके द्वारा प्राप्त की गई शिकायतें संबंधित मंत्रालयों/विभागों या राज्य सरकारें/केंद्र सरकार को अग्रसारित कर दी जाती हैं ताकि वे विभागीय नियमावली के अनुसार संबंधित पदाधिकारी/कर्मी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सके| यह उन विभागों/विषयक्षेत्रों आदि की पहचान करता है जहाँ भ्रष्टाचार की संभावना अधिक होती है| यह नागरिकों के हित संबंधी सरकारी नीति निर्माण में उपयुक्त सुझाव देता है ताकि सरकारी मशीनरी लोगों को गुणवता आधारित सेवाएँ प्रदान कर सके और लोगों की शिकायतें दूर कर सकें| वास्तव में यही इसका सबसे प्रमुख कार्य है| यह शिकायत निवारण के क्षेत्र में नोडल एजेंसी का कार्य करती है अर्थात यह उन नीतिगत पहल का सुझाव सरकार को देती है जिसे अपनाकर सरकार अपने कामकाज में पारदर्शिता ला सकती है और शिकायतों के उद्गम को कमजोर कर सकती है| लोक शिकायत निदेशालय तथा इसकी भूमिका 1988 में कैबिनेट सचिवालय के अंतर्गत लोगों की व्यक्तिगत शिकायतों के निवारण के लिए इसका गठन किया गया था| यह वास्तव में एक अपीलीय निकाय है अर्थात जब संबंधित विभाग/मंत्रालय/एजेंसी लोगों की शिकायतों का निवारण करने में आनाकानी करते हैं तो लोग इन विभागों/मंत्रालयों के विरुद्ध अथवा उनके फैसलों के विरुद्ध इसमें शिकायत कर सकते हैं| DARPG अपीलीय निकाय नहीं है जबकि लोक शिकायत निदेशालय एक अपीलीय निकाय है| यह संबंधित विभाग/मंत्रालय आदि से किसी भी जरुरी फाइल/रिकॉर्ड को तलब कर सकता है| संबंधित अधिकारियों को नोटिस देकर बुला सकता है और उनसे पूछ सकता है कि कैसे लोगों की शिकायतें निपटाई नहीं गयी| तत्पश्चात यह संबंधित विभाग/मंत्रालय/एजेंसी को एक और मौका देते हुए उनके भूल सुधार का अवसर देता है जिसके लिए अधिकतम एक माह का समय दिया जाता है| उपरोक्त दोनों संस्थानों के कार्यों को देखकर शिकायतों के निपटारे में इनकी प्रभावी भूमिका का अंदाजा लगाया जा सकता है| जरुरत बस इस बात की है कि इन प्रावधानों का सही एवं व्यापक स्तर पर पालन हो तथा जनजागरूकता के माध्यम से इन संस्थानों के प्रति आम जनमानस को अवगत कराया जाये |
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लोकसेवा में तटस्थता का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही लोकसेवा की कार्यप्रणाली में तटस्थता के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain impartiality in civil services. Along with this, highlight the positive and negative concequences of impartiality in the working of civil services. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में तटस्थता को समग्रता में परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवा में तटस्थता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में लोकसेवा की कार्यप्रणाली में तटस्थता के प्रभावों को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में तटस्थता की स्थापना के आधारों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये तटस्थता का तात्पर्य, लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवा में तटस्थता का महत्त्व · लोकसेवकों की तटस्थता इस बात की अपेक्षा करती है कि लोकसेवक अपने अधिकतम क्षमता के साथ आचार संहिता का पालन करते हुए प्रत्येक सरकार की सेवा करेगा · एक लोकसेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो कि मंत्रियों या सरकार के विश्वास के प्राप्त करे किन्तु यही विश्वासआने वाली सरकारों के प्रति भी होना चाहिए · लोकसेवकों के द्वारा उन सभी प्रतिबंधों का अनुपालन किया जाना चाहिए जो कि राजनीतिक गतिविधियों के सन्दर्भ में प्रस्तावित किया गया हो · लोकसेवक उस प्रकार से कार्य न करे जो कि सरकार की नीतियों में अंतर करे · लोकसेवक के द्वारा सरकारी संसाधनों का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नहीं किया जाना चाहिए एवं इसके साथ-साथ लोकसेवकों को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित नहीं होना चाहिए · लोकसेवकों कि तटस्थता एक गुणात्मक अवधारणा को दर्शाती है अतः इसका वास्तविक मापन मात्रात्मक रूप से किया जाना संभव नहीं है · लोकसेवकों की तटस्थता को विकसित करने की दिशा में नैतिक मूल्यों को विकसित किये जाने का एक विशेष महत्त्व है| · ध्यातव्य है कि केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रावधान के अनुसार प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव राजनीतिक तटस्थता का अनुपालन करना है एवं इस आचरण नियमावली में लोकसेवकों के राजनीति एवं निर्वाचन में भाग लेने हेतु प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है| फ़्रांस में लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गयी है परन्तु इसके बावजूद भी भी फ़्रांस का लोकसेवक तटस्थ होता है| तटस्थता के सकारात्मक प्रभाव · लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति को लेकर जन विश्वसनीयता का अधिक होना · इसके माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों का विश्वास लोकसेवकों की वफादारी पर होता है · तटस्थता लोकसेवकों के मनोबल को प्रोत्साहित करता है · यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकती है, अतः यह भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में भी सहायक सिद्ध होती है · यह संसदीय शासन प्रणाली की एक मांग है · तटस्थता, राजनीति एवं लोकसेवकों के मधुर एवं सुचारू सम्बन्ध को विकसित करने में सहायक सिद्ध होता है तटस्थता के नकारात्मक प्रभाव · अनामिता लोकसेवकों के मनोबल को हतोत्साहित करती है · यह विकासात्मक अनिवार्यताओं में एक प्रतिरोधक का कार्य करती है · यह लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रवृत्ति को उत्पन्न करती है जो कि नवाचार एवं सुधारात्मक प्रयासों को लागू करने हेतु उचित नहीं माना गया है · यह लोकसेवकों कि अतिसक्रियता को हतोत्साहित करती हैं इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि तटस्थता लोकसेवा के लिए अनिवार्य है तथापि इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं| इसके बाद भी सुचारू शासन-प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए तटस्थता अपरिहार्य है| अतः शासन के तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच के अंतर की मात्रा उच्चतर स्तर तक होनी चाहिए| लोकसेवकों के दैनिक प्रशासनिक क्रियाकलापों में राजनीतिक हस्तक्षेप की मात्रा निम्नतर स्तर पर होनी चाहिये और लोकसेवकों के प्रति जन विश्वास की मात्रा उच्चतर स्तर पर होनी चाहिए|
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##Question:लोकसेवा में तटस्थता का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही लोकसेवा की कार्यप्रणाली में तटस्थता के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain impartiality in civil services. Along with this, highlight the positive and negative concequences of impartiality in the working of civil services. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में तटस्थता को समग्रता में परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवा में तटस्थता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में लोकसेवा की कार्यप्रणाली में तटस्थता के प्रभावों को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में तटस्थता की स्थापना के आधारों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये तटस्थता का तात्पर्य, लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवा में तटस्थता का महत्त्व · लोकसेवकों की तटस्थता इस बात की अपेक्षा करती है कि लोकसेवक अपने अधिकतम क्षमता के साथ आचार संहिता का पालन करते हुए प्रत्येक सरकार की सेवा करेगा · एक लोकसेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो कि मंत्रियों या सरकार के विश्वास के प्राप्त करे किन्तु यही विश्वासआने वाली सरकारों के प्रति भी होना चाहिए · लोकसेवकों के द्वारा उन सभी प्रतिबंधों का अनुपालन किया जाना चाहिए जो कि राजनीतिक गतिविधियों के सन्दर्भ में प्रस्तावित किया गया हो · लोकसेवक उस प्रकार से कार्य न करे जो कि सरकार की नीतियों में अंतर करे · लोकसेवक के द्वारा सरकारी संसाधनों का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नहीं किया जाना चाहिए एवं इसके साथ-साथ लोकसेवकों को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित नहीं होना चाहिए · लोकसेवकों कि तटस्थता एक गुणात्मक अवधारणा को दर्शाती है अतः इसका वास्तविक मापन मात्रात्मक रूप से किया जाना संभव नहीं है · लोकसेवकों की तटस्थता को विकसित करने की दिशा में नैतिक मूल्यों को विकसित किये जाने का एक विशेष महत्त्व है| · ध्यातव्य है कि केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रावधान के अनुसार प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव राजनीतिक तटस्थता का अनुपालन करना है एवं इस आचरण नियमावली में लोकसेवकों के राजनीति एवं निर्वाचन में भाग लेने हेतु प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है| फ़्रांस में लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गयी है परन्तु इसके बावजूद भी भी फ़्रांस का लोकसेवक तटस्थ होता है| तटस्थता के सकारात्मक प्रभाव · लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति को लेकर जन विश्वसनीयता का अधिक होना · इसके माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों का विश्वास लोकसेवकों की वफादारी पर होता है · तटस्थता लोकसेवकों के मनोबल को प्रोत्साहित करता है · यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकती है, अतः यह भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में भी सहायक सिद्ध होती है · यह संसदीय शासन प्रणाली की एक मांग है · तटस्थता, राजनीति एवं लोकसेवकों के मधुर एवं सुचारू सम्बन्ध को विकसित करने में सहायक सिद्ध होता है तटस्थता के नकारात्मक प्रभाव · अनामिता लोकसेवकों के मनोबल को हतोत्साहित करती है · यह विकासात्मक अनिवार्यताओं में एक प्रतिरोधक का कार्य करती है · यह लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रवृत्ति को उत्पन्न करती है जो कि नवाचार एवं सुधारात्मक प्रयासों को लागू करने हेतु उचित नहीं माना गया है · यह लोकसेवकों कि अतिसक्रियता को हतोत्साहित करती हैं इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि तटस्थता लोकसेवा के लिए अनिवार्य है तथापि इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं| इसके बाद भी सुचारू शासन-प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए तटस्थता अपरिहार्य है| अतः शासन के तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच के अंतर की मात्रा उच्चतर स्तर तक होनी चाहिए| लोकसेवकों के दैनिक प्रशासनिक क्रियाकलापों में राजनीतिक हस्तक्षेप की मात्रा निम्नतर स्तर पर होनी चाहिये और लोकसेवकों के प्रति जन विश्वास की मात्रा उच्चतर स्तर पर होनी चाहिए|
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लोकसेवा में निष्पक्षता और तटस्थता का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही लोकसेवा की कार्यप्रणाली मेंनिष्पक्षता और तटस्थता के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain impartiality and non-partisanship in civil services. Along with this, highlight the positive and negative concequences of impartiality and non-partisanship in the working of civil services. (150-200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में तटस्थता को समग्रता में परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवा में तटस्थता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में लोकसेवा की कार्यप्रणाली में तटस्थता के प्रभावों को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में तटस्थता की स्थापना के आधारों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये तटस्थता का तात्पर्य, लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवा में तटस्थता का महत्त्व · लोकसेवकों की तटस्थता इस बात की अपेक्षा करती है कि लोकसेवक अपने अधिकतम क्षमता के साथ आचार संहिता का पालन करते हुए प्रत्येक सरकार की सेवा करेगा · एक लोकसेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो कि मंत्रियों या सरकार के विश्वास के प्राप्त करे किन्तु यही विश्वासआने वाली सरकारों के प्रति भी होना चाहिए · लोकसेवकों के द्वारा उन सभी प्रतिबंधों का अनुपालन किया जाना चाहिए जो कि राजनीतिक गतिविधियों के सन्दर्भ में प्रस्तावित किया गया हो · लोकसेवक उस प्रकार से कार्य न करे जो कि सरकार की नीतियों में अंतर करे · लोकसेवक के द्वारा सरकारी संसाधनों का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नहीं किया जाना चाहिए एवं इसके साथ-साथ लोकसेवकों को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित नहीं होना चाहिए · लोकसेवकों कि तटस्थता एक गुणात्मक अवधारणा को दर्शाती है अतः इसका वास्तविक मापन मात्रात्मक रूप से किया जाना संभव नहीं है · लोकसेवकों की तटस्थता को विकसित करने की दिशा में नैतिक मूल्यों को विकसित किये जाने का एक विशेष महत्त्व है| · ध्यातव्य है कि केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रावधान के अनुसार प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव राजनीतिक तटस्थता का अनुपालन करना है एवं इस आचरण नियमावली में लोकसेवकों के राजनीति एवं निर्वाचन में भाग लेने हेतु प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है| फ़्रांस में लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गयी है परन्तु इसके बावजूद भी भी फ़्रांस का लोकसेवक तटस्थ होता है| तटस्थता के सकारात्मक प्रभाव · लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति को लेकर जन विश्वसनीयता का अधिक होना · इसके माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों का विश्वास लोकसेवकों की वफादारी पर होता है · तटस्थता लोकसेवकों के मनोबल को प्रोत्साहित करता है · यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकती है, अतः यह भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में भी सहायक सिद्ध होती है · यह संसदीय शासन प्रणाली की एक मांग है · तटस्थता, राजनीति एवं लोकसेवकों के मधुर एवं सुचारू सम्बन्ध को विकसित करने में सहायक सिद्ध होता है तटस्थता के नकारात्मक प्रभाव · अनामिता लोकसेवकों के मनोबल को हतोत्साहित करती है · यह विकासात्मक अनिवार्यताओं में एक प्रतिरोधक का कार्य करती है · यह लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रवृत्ति को उत्पन्न करती है जो कि नवाचार एवं सुधारात्मक प्रयासों को लागू करने हेतु उचित नहीं माना गया है · यह लोकसेवकों कि अतिसक्रियता को हतोत्साहित करती हैं इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि तटस्थता लोकसेवा के लिए अनिवार्य है तथापि इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं| इसके बाद भी सुचारू शासन-प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए तटस्थता अपरिहार्य है| अतः शासन के तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच के अंतर की मात्रा उच्चतर स्तर तक होनी चाहिए| लोकसेवकों के दैनिक प्रशासनिक क्रियाकलापों में राजनीतिक हस्तक्षेप की मात्रा निम्नतर स्तर पर होनी चाहिये और लोकसेवकों के प्रति जन विश्वास की मात्रा उच्चतर स्तर पर होनी चाहिए|
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##Question:लोकसेवा में निष्पक्षता और तटस्थता का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही लोकसेवा की कार्यप्रणाली मेंनिष्पक्षता और तटस्थता के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain impartiality and non-partisanship in civil services. Along with this, highlight the positive and negative concequences of impartiality and non-partisanship in the working of civil services. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में तटस्थता को समग्रता में परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवा में तटस्थता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में लोकसेवा की कार्यप्रणाली में तटस्थता के प्रभावों को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में तटस्थता की स्थापना के आधारों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये तटस्थता का तात्पर्य, लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवा में तटस्थता का महत्त्व · लोकसेवकों की तटस्थता इस बात की अपेक्षा करती है कि लोकसेवक अपने अधिकतम क्षमता के साथ आचार संहिता का पालन करते हुए प्रत्येक सरकार की सेवा करेगा · एक लोकसेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो कि मंत्रियों या सरकार के विश्वास के प्राप्त करे किन्तु यही विश्वासआने वाली सरकारों के प्रति भी होना चाहिए · लोकसेवकों के द्वारा उन सभी प्रतिबंधों का अनुपालन किया जाना चाहिए जो कि राजनीतिक गतिविधियों के सन्दर्भ में प्रस्तावित किया गया हो · लोकसेवक उस प्रकार से कार्य न करे जो कि सरकार की नीतियों में अंतर करे · लोकसेवक के द्वारा सरकारी संसाधनों का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नहीं किया जाना चाहिए एवं इसके साथ-साथ लोकसेवकों को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित नहीं होना चाहिए · लोकसेवकों कि तटस्थता एक गुणात्मक अवधारणा को दर्शाती है अतः इसका वास्तविक मापन मात्रात्मक रूप से किया जाना संभव नहीं है · लोकसेवकों की तटस्थता को विकसित करने की दिशा में नैतिक मूल्यों को विकसित किये जाने का एक विशेष महत्त्व है| · ध्यातव्य है कि केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रावधान के अनुसार प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव राजनीतिक तटस्थता का अनुपालन करना है एवं इस आचरण नियमावली में लोकसेवकों के राजनीति एवं निर्वाचन में भाग लेने हेतु प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है| फ़्रांस में लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गयी है परन्तु इसके बावजूद भी भी फ़्रांस का लोकसेवक तटस्थ होता है| तटस्थता के सकारात्मक प्रभाव · लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति को लेकर जन विश्वसनीयता का अधिक होना · इसके माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों का विश्वास लोकसेवकों की वफादारी पर होता है · तटस्थता लोकसेवकों के मनोबल को प्रोत्साहित करता है · यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकती है, अतः यह भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में भी सहायक सिद्ध होती है · यह संसदीय शासन प्रणाली की एक मांग है · तटस्थता, राजनीति एवं लोकसेवकों के मधुर एवं सुचारू सम्बन्ध को विकसित करने में सहायक सिद्ध होता है तटस्थता के नकारात्मक प्रभाव · अनामिता लोकसेवकों के मनोबल को हतोत्साहित करती है · यह विकासात्मक अनिवार्यताओं में एक प्रतिरोधक का कार्य करती है · यह लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रवृत्ति को उत्पन्न करती है जो कि नवाचार एवं सुधारात्मक प्रयासों को लागू करने हेतु उचित नहीं माना गया है · यह लोकसेवकों कि अतिसक्रियता को हतोत्साहित करती हैं इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि तटस्थता लोकसेवा के लिए अनिवार्य है तथापि इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं| इसके बाद भी सुचारू शासन-प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए तटस्थता अपरिहार्य है| अतः शासन के तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच के अंतर की मात्रा उच्चतर स्तर तक होनी चाहिए| लोकसेवकों के दैनिक प्रशासनिक क्रियाकलापों में राजनीतिक हस्तक्षेप की मात्रा निम्नतर स्तर पर होनी चाहिये और लोकसेवकों के प्रति जन विश्वास की मात्रा उच्चतर स्तर पर होनी चाहिए|
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रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, इस अधिनियम के प्रावधानों का मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly describe the background of Regulating act 1773 and evaluate the provisions of this act. (150-200 words; 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर का प्रारम्भ इस एक्ट का संक्षिप्त परिचय देते हुए कीजिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिए कि वे कौन सी परिस्थितियाँ थी जिससे कंपनी के कार्यों को विनियमित करने कि आवश्यकता हुई। इस एक्ट के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए तथा इसके सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का वर्णन कीजिए। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। 1773 के रेगुलटिंग एक्ट संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित किया। इसके साथ ही कंपनी के कार्यों को ब्रिटिश सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता दी गयी। इस एक्ट की पृष्ठभूमि को निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: बक्सर के युद्ध के पश्चात संधि के माध्यम से कंपनी ने राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त कर लिया। 1765 के बाद प्रशासन की दोहरी प्रणाली प्रारम्भ होने से कंपनी द्वारा शोषण बढ़ गया। कंपनी के कर्मचारियों के मध्य भ्रष्टाचार बढ़ गया। निजी व्यापार में भी संलिप्तता पायी गयी इस सभी कारकों के कारण कंपनी को भारी नुकसान हुआ तथा उसके कर्मचारी अधिक लाभान्वित हुए। जिसे देखकर ब्रिटिश सरकार कंपनी के मामले में कानून बनाने का निर्णय लिया। प्रमुख प्रावधान: बंगाल के गवर्नर जनरल को बंबई व मद्रास की प्रेसीडेंसियों का अधिकार दिया गया। गवर्नर जनरल तथा चार अन्य सदस्यों के साथ एक प्रशासक मण्डल गठित किया गया। अब कानून बनाने का अधिकार गवर्नर जनरल की परिषद को दिया गया। बंगाल में उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गयी। ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया गया। कर्मचारियों के वेतन भत्ते तथा कार्यकाल निश्चित कर दिया गया। सकारात्मक प्रभाव: भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकारी पहल भारत पर संसद के माध्यम से शासन की शुरुआत कंपनी की तानाशाही प्रवृति में बदलाव आया। संवैधानिक शासन का प्रारम्भ हुआ। नकारात्मक प्रभाव: इसका उद्देश्य भारतीय व्यवस्था को नियंत्रित कर भारत पर नियंत्रण को ब्रिटिश समाज के लिए फायदेमंद बनाना परिषद के सदस्यों के मध्य तनावपूर्ण संबंध थे अधिनियम के बावजूद भ्रष्टाचार का बड़े पैमाने पर प्रचलन था। गवर्नर जनरल कोई भी प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए अपनी परिषद् की कृपा पर निर्भर रहने लगा और 4 सदस्यों में से 3 सदस्य एक तरफ होकर गवर्नर जनरल के विरोध में खड़े हो जाते थे सपरिषद गवर्नर जनरल और कलकत्ते स्थित सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट व् अधिनस्थ न्यायालयों के मध्य क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं। भारत व ब्रिटेन के मध्य दूरी के कारण व्यवहार में नियंत्रण लागू नहीं हो सका. इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने भारत में साम्राज्य विस्तार व आर्थिक लाभ को अधिक करने के लिए इस एक्ट का निर्माण किया। इसके माध्यम से प्रशासनिक, न्यायिक, व्यापारिक पहलुओं को अपने हितों के अनुसार परिवर्तित करने का प्रयास किया गया। जिसके कुछ सकारात्मक प्रभाव तो दिखाई दिये परंतु यह अधिनियम अंग्रेजों के साम्राज्यवादी प्रसार की दिशा में एक सार्थक कदम के रूप में कार्य किया।
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##Question:रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, इस अधिनियम के प्रावधानों का मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly describe the background of Regulating act 1773 and evaluate the provisions of this act. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर का प्रारम्भ इस एक्ट का संक्षिप्त परिचय देते हुए कीजिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिए कि वे कौन सी परिस्थितियाँ थी जिससे कंपनी के कार्यों को विनियमित करने कि आवश्यकता हुई। इस एक्ट के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए तथा इसके सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का वर्णन कीजिए। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। 1773 के रेगुलटिंग एक्ट संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित किया। इसके साथ ही कंपनी के कार्यों को ब्रिटिश सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता दी गयी। इस एक्ट की पृष्ठभूमि को निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: बक्सर के युद्ध के पश्चात संधि के माध्यम से कंपनी ने राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त कर लिया। 1765 के बाद प्रशासन की दोहरी प्रणाली प्रारम्भ होने से कंपनी द्वारा शोषण बढ़ गया। कंपनी के कर्मचारियों के मध्य भ्रष्टाचार बढ़ गया। निजी व्यापार में भी संलिप्तता पायी गयी इस सभी कारकों के कारण कंपनी को भारी नुकसान हुआ तथा उसके कर्मचारी अधिक लाभान्वित हुए। जिसे देखकर ब्रिटिश सरकार कंपनी के मामले में कानून बनाने का निर्णय लिया। प्रमुख प्रावधान: बंगाल के गवर्नर जनरल को बंबई व मद्रास की प्रेसीडेंसियों का अधिकार दिया गया। गवर्नर जनरल तथा चार अन्य सदस्यों के साथ एक प्रशासक मण्डल गठित किया गया। अब कानून बनाने का अधिकार गवर्नर जनरल की परिषद को दिया गया। बंगाल में उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गयी। ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया गया। कर्मचारियों के वेतन भत्ते तथा कार्यकाल निश्चित कर दिया गया। सकारात्मक प्रभाव: भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकारी पहल भारत पर संसद के माध्यम से शासन की शुरुआत कंपनी की तानाशाही प्रवृति में बदलाव आया। संवैधानिक शासन का प्रारम्भ हुआ। नकारात्मक प्रभाव: इसका उद्देश्य भारतीय व्यवस्था को नियंत्रित कर भारत पर नियंत्रण को ब्रिटिश समाज के लिए फायदेमंद बनाना परिषद के सदस्यों के मध्य तनावपूर्ण संबंध थे अधिनियम के बावजूद भ्रष्टाचार का बड़े पैमाने पर प्रचलन था। गवर्नर जनरल कोई भी प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए अपनी परिषद् की कृपा पर निर्भर रहने लगा और 4 सदस्यों में से 3 सदस्य एक तरफ होकर गवर्नर जनरल के विरोध में खड़े हो जाते थे सपरिषद गवर्नर जनरल और कलकत्ते स्थित सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट व् अधिनस्थ न्यायालयों के मध्य क्षेत्राधिकार स्पष्ट नहीं। भारत व ब्रिटेन के मध्य दूरी के कारण व्यवहार में नियंत्रण लागू नहीं हो सका. इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने भारत में साम्राज्य विस्तार व आर्थिक लाभ को अधिक करने के लिए इस एक्ट का निर्माण किया। इसके माध्यम से प्रशासनिक, न्यायिक, व्यापारिक पहलुओं को अपने हितों के अनुसार परिवर्तित करने का प्रयास किया गया। जिसके कुछ सकारात्मक प्रभाव तो दिखाई दिये परंतु यह अधिनियम अंग्रेजों के साम्राज्यवादी प्रसार की दिशा में एक सार्थक कदम के रूप में कार्य किया।
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तटस्थता को परिभाषित कीजिये । इसके विभिन्न आयामो की चर्चा करते हुए इसके निर्धारक कारकों पर प्रकाश डालिए ( 150 शब्द ) Define impartiality. Discuss on its various dimensions and highlight its determinant factors (150 words)
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दृष्टिकोण · भूमिका में तटस्थता को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में तटस्थता के विभिन्न आयामो की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में तटस्थता की निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये। उत्तर :- इंपार्सियाल्टी ( तटस्थता ) का मतलब सबके प्रति समान व्यवहार है जिसके 2 पहलू हैं पहला राजनीतिक दलो के प्रति और दूसरा जनता के प्रति । राजनीतिक दलो के प्रति इंपार्टीयलिटी को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि लोक सेवको को राजनीतिक गतिविधियों में भाग नही लेना चाहिए , जिसे नॉनपार्टिजन की संज्ञा दी जाती है। पॉलिटिकल इंपार्टीयलिटी और नॉन पार्टिजन दोनों मिलकर लोक सेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है । लोक सेवक को सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक विचार धारा के प्रति वचनबद्ध नही होना चाहिए । एक तटस्थ लोक सेवक से अपेक्षा की जाती है कि सरकार के नीतियो और कार्यक्रमों के साथ लोक सेवक के नाम को प्रत्यक्ष संबन्धित न किया जाए । तटस्थता के विभिन्न आयामो को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं, जैसे :- इंपार्सियाल्टी जनता के प्रति समान व्यवहार पर बल देती है लेकिन यह समान व्यवहार समान परिस्थितियों में लागू होता है । अतः इंपार्सियाल्टी इस बात का भी समर्थन करती है की परिस्थिति आसमान होने पर व्यवहार आसमान होना चाहिए ।अतः इंपार्सियाल्टी सकारात्मक भेदभाव की अनुमति देता है । इंपार्सियाल्टी लोक सेवको से यह अपेक्षा करती है कि वह प्रत्येक सरकार की सेवा अपनी अधिकतम क्षमता ( ability ) के अनुसार करे और ऐसा करते समय लोक सेवको के द्वारा आचार संहिता का अनुपालन किया जाए । इंपार्सियाल्टी इस बात पर बल देती है कि लोक सेवक का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जोकि मंत्रियो के विश्वास को प्राप्त कर सके । परत्नु यह विश्वास आगामी मंत्रियो और सरकार के प्रति भी होना चाहिए । लोक सेवक को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचार धारा से प्रभावित होकर अपने कर्तव्यों का निष्पादन नही करना चाहिए । लोक सेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो सरकार के नीतियों के अनुकूल हो तथा लोक सेवक के द्वारा सरकारी संसाधन का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नही किया जाना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवकों को मंत्रियों / सरकार के प्रति वफादार होना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवक राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में प्रस्तावित अनुबन्धो का अनुपालन करना चाहिए । केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के तहत यह उल्लेखित किया गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक प्रत्येक समय पर राजनीतिक तटस्थता को बना कर रखना होगा । नियम 5 के अंतर्गत लोक सेवको के राजनीति और निर्वाचन में भाग लेने संबन्धित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवको का व्यवहार पक्षपात पूर्ण ( partiality ) और पूर्वाग्रह ( prejudice ) से ग्रसित नही होना चाहिए । तटस्थता एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है । अतः इसका मात्रात्मक रूप से मापन किया जाना वास्तविकता में संभव नही है ।तटस्थ लोक सेवक का आकलन निम्नांकित मानको के आधार पर किया जा सकता है :- राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच की तटस्थता की मात्रा या डिग्री लोक सेवको के द्वारा नीति निर्माण की मात्रा राजनीति के द्वारा लोक सेवाको के दैनिक प्रशासनिक क्रिया कलापों में हस्तक्षेप की मात्रा लोक सेवको के प्रति जन विश्वसनीयता की मात्रा हालांकि वर्तमान में, समय के परिवर्तन के साथ राजनीतिक परिवेश में जो मानक ताा तटस्थता हेतु उच्चतर स्तर का होना चाहिए वह निम्नतर स्तर का तथा जो निम्नतर स्तर का होना चाहिए वो उच्चतर स्तर का हो गया है। लोक सेवको का तटस्थ होना संसदीय शासन प्रणाली, योग्यता प्रणाली, बहुदलीय प्रणाली आदि कारकों पर निर्भर करता है ।
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##Question:तटस्थता को परिभाषित कीजिये । इसके विभिन्न आयामो की चर्चा करते हुए इसके निर्धारक कारकों पर प्रकाश डालिए ( 150 शब्द ) Define impartiality. Discuss on its various dimensions and highlight its determinant factors (150 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में तटस्थता को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में तटस्थता के विभिन्न आयामो की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में तटस्थता की निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये। उत्तर :- इंपार्सियाल्टी ( तटस्थता ) का मतलब सबके प्रति समान व्यवहार है जिसके 2 पहलू हैं पहला राजनीतिक दलो के प्रति और दूसरा जनता के प्रति । राजनीतिक दलो के प्रति इंपार्टीयलिटी को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि लोक सेवको को राजनीतिक गतिविधियों में भाग नही लेना चाहिए , जिसे नॉनपार्टिजन की संज्ञा दी जाती है। पॉलिटिकल इंपार्टीयलिटी और नॉन पार्टिजन दोनों मिलकर लोक सेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है । लोक सेवक को सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक विचार धारा के प्रति वचनबद्ध नही होना चाहिए । एक तटस्थ लोक सेवक से अपेक्षा की जाती है कि सरकार के नीतियो और कार्यक्रमों के साथ लोक सेवक के नाम को प्रत्यक्ष संबन्धित न किया जाए । तटस्थता के विभिन्न आयामो को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं, जैसे :- इंपार्सियाल्टी जनता के प्रति समान व्यवहार पर बल देती है लेकिन यह समान व्यवहार समान परिस्थितियों में लागू होता है । अतः इंपार्सियाल्टी इस बात का भी समर्थन करती है की परिस्थिति आसमान होने पर व्यवहार आसमान होना चाहिए ।अतः इंपार्सियाल्टी सकारात्मक भेदभाव की अनुमति देता है । इंपार्सियाल्टी लोक सेवको से यह अपेक्षा करती है कि वह प्रत्येक सरकार की सेवा अपनी अधिकतम क्षमता ( ability ) के अनुसार करे और ऐसा करते समय लोक सेवको के द्वारा आचार संहिता का अनुपालन किया जाए । इंपार्सियाल्टी इस बात पर बल देती है कि लोक सेवक का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जोकि मंत्रियो के विश्वास को प्राप्त कर सके । परत्नु यह विश्वास आगामी मंत्रियो और सरकार के प्रति भी होना चाहिए । लोक सेवक को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचार धारा से प्रभावित होकर अपने कर्तव्यों का निष्पादन नही करना चाहिए । लोक सेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो सरकार के नीतियों के अनुकूल हो तथा लोक सेवक के द्वारा सरकारी संसाधन का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नही किया जाना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवकों को मंत्रियों / सरकार के प्रति वफादार होना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवक राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में प्रस्तावित अनुबन्धो का अनुपालन करना चाहिए । केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के तहत यह उल्लेखित किया गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक प्रत्येक समय पर राजनीतिक तटस्थता को बना कर रखना होगा । नियम 5 के अंतर्गत लोक सेवको के राजनीति और निर्वाचन में भाग लेने संबन्धित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवको का व्यवहार पक्षपात पूर्ण ( partiality ) और पूर्वाग्रह ( prejudice ) से ग्रसित नही होना चाहिए । तटस्थता एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है । अतः इसका मात्रात्मक रूप से मापन किया जाना वास्तविकता में संभव नही है ।तटस्थ लोक सेवक का आकलन निम्नांकित मानको के आधार पर किया जा सकता है :- राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच की तटस्थता की मात्रा या डिग्री लोक सेवको के द्वारा नीति निर्माण की मात्रा राजनीति के द्वारा लोक सेवाको के दैनिक प्रशासनिक क्रिया कलापों में हस्तक्षेप की मात्रा लोक सेवको के प्रति जन विश्वसनीयता की मात्रा हालांकि वर्तमान में, समय के परिवर्तन के साथ राजनीतिक परिवेश में जो मानक ताा तटस्थता हेतु उच्चतर स्तर का होना चाहिए वह निम्नतर स्तर का तथा जो निम्नतर स्तर का होना चाहिए वो उच्चतर स्तर का हो गया है। लोक सेवको का तटस्थ होना संसदीय शासन प्रणाली, योग्यता प्रणाली, बहुदलीय प्रणाली आदि कारकों पर निर्भर करता है ।
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समान नागरिक संहिता, भारत में एक समतामूलक समाज की स्थापना करने में सहायक होगी। स्पष्ट कीजिये(150 -200 शब्द ) The uniformcivil code will help in establishing an equitable society in India. Explain (150-200 words)
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एप्रोच :- समान नागरिक संहिता का अर्थ बतातेहुए भूमिका दीजिये इसके पश्चात यह स्पष्टकीजिये कि किस प्रकार समान नागरिक संहिता भारत में समतामूलक समाज की स्थापना करेगी| संक्षिप्त में कुछ चुनौतियाँ भी लिखिए सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- समान नागरिक सहिंता का अर्थ है ,सिविल मामलों जेसे -शादी , तलाक ,सम्पति आदि में एक समान कानूनों का लागू होना | समान नागरिक सहिंता की चर्चा भारतीय संविधान के अनुच्छेद -44 (DPSP )के तहत चर्चा की गयी हैं | भारत में गोवा एक मात्र राज्य है जहाँ समान नागरिक सहिंता लागू हैं| निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इसे लागू करने की वकालत की जाती हैं – समान नागरिक सहिंता, अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सभी नागरिकों के समानता के अधिकार को सुनिश्चित करेगा धार्मिक संहिताओं से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु समान नागरिक सहिंता आवश्यक है| क्योंकि समान नागरिक सहिंता की अनुपस्थिति में अल्पसंख्यक वर्गों की महिलाओं के विभिन्न अधिकारों का हनन होता है| समान नागरिक संहिता से संहितागत बहुलता का समापन होगा जिससे यह राष्ट्रीय एकीकरण में सहायक होगा समान नागरिक संहिता, अधिकारों को सुनिश्चित कर समाज का सशक्तिकरण करेगी| इससे भेदभावमूलक व्यक्तिगत कानूनों की समाप्ति होगी और मानवाधिकारों को बढ़ावामिलेगा किसी भी सम्प्रदाय के प्रायः 4 निजी संहिताएँ होती हैं| विवाह, संपत्ति में उत्तराधिकार, गोद लेने की प्रथा और विवाह विच्छेद अर्थात तलाक संहिता| यह लम्बे समय से चर्चा का एक मुद्दा रहा है कि क्या निजी संहितायें समुदाय विशेष के धर्म से प्रेरित होती हैं ? सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न निर्णयों में अपना मत प्रस्तुत भी किया है जैसे - सरला मुद्गल बनाम भारत संघ 1995 में SC ने कहा कि किसी धर्म और उसके निजी संहिता के मध्य सीधा सम्बन्ध नहीं होता| शबनम हाशमी बनाम भारत संघ वाद 2014 में SC ने किशोर न्याय अधिनियम 2000 को एक पंथनिरपेक्ष कानून घोषित करते हुए बताया कि यह हिन्दू-मुस्लिम या अन्य सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होगा| मुस्लिम महिलायें(तलाक के समय अधिकार संरक्षण)अधिनियम 1986 में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा निर्धारित मेहर की शर्त को SC के निर्णयों पर प्राथमिकता दिया गया|| यह समान नागरिक संहिता की भावना के विरुद्ध था अतः SC ने शाहबानों वाद में दिए गए फैसले को पलटने सम्बन्धी संसद के निर्णय को बाद के कई अन्य फैसलों में उचित नहीं बताया है|जैसे डेनियल लतीफ़ वाद 2001 में SC ने शाहबानो वाद में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को उचित बताया और समान नागरिक संहिता के पक्ष में निर्णय दिया| यहाँ यह बताना आवश्यक है कि विश्व के अनेक इस्लामी राष्ट्रों जैसे इरान, मिस्र, मोरक्को, जोर्डन, सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान एवं ट्यूनीशिया जैसे देशों ने बहु विवाह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है| यदि ऐसा है तो भारत में इसे क्यों नही लागू किया जा सकता| अतः उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में यह कहा जा सकता है कि भारत में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए| समान नागरिक सहिंता को लागू करने की चुनौतियां - विविधता में एकता के कारणभारत में एक समान विधि का निर्माण एवं क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है| समान नागरिक संहिता के माध्यम से बहुसंख्यकों के रीति रिवाज अल्पसंख्यकों पर आरोपित करने का तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है तर्क दिया जाता है कि समान नागरिक संहिता के माध्यम से राज्यों द्वारा व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संविधान द्वारा प्रदत्त स्वत्रंतता के अधिकार की भावना के विपरीत होगा समान नागरिक संहिता एक संवेदनशील मुद्दा है इसके आरोपण से देश की एकता अखंडता के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत हो सकती हैं| अतः स्पष्ट होता है कि समान नागरिक संहिता समतामूलक समाज की स्थापना के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण होगा किन्तु इसका आरोपण भारत के समक्ष विभिन्न चुनौतियों को उत्पन्न कर सकता है| अतः समाज को स्वयं इसकी पहल करनी चाहिए तथा सरकार को पहले उन प्रावधानों को हटाने के प्रयास करने चाहिए जो सीधे मूल व मानवाधिकार की विरुद्ध हों|
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##Question:समान नागरिक संहिता, भारत में एक समतामूलक समाज की स्थापना करने में सहायक होगी। स्पष्ट कीजिये(150 -200 शब्द ) The uniformcivil code will help in establishing an equitable society in India. Explain (150-200 words)##Answer:एप्रोच :- समान नागरिक संहिता का अर्थ बतातेहुए भूमिका दीजिये इसके पश्चात यह स्पष्टकीजिये कि किस प्रकार समान नागरिक संहिता भारत में समतामूलक समाज की स्थापना करेगी| संक्षिप्त में कुछ चुनौतियाँ भी लिखिए सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- समान नागरिक सहिंता का अर्थ है ,सिविल मामलों जेसे -शादी , तलाक ,सम्पति आदि में एक समान कानूनों का लागू होना | समान नागरिक सहिंता की चर्चा भारतीय संविधान के अनुच्छेद -44 (DPSP )के तहत चर्चा की गयी हैं | भारत में गोवा एक मात्र राज्य है जहाँ समान नागरिक सहिंता लागू हैं| निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इसे लागू करने की वकालत की जाती हैं – समान नागरिक सहिंता, अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सभी नागरिकों के समानता के अधिकार को सुनिश्चित करेगा धार्मिक संहिताओं से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु समान नागरिक सहिंता आवश्यक है| क्योंकि समान नागरिक सहिंता की अनुपस्थिति में अल्पसंख्यक वर्गों की महिलाओं के विभिन्न अधिकारों का हनन होता है| समान नागरिक संहिता से संहितागत बहुलता का समापन होगा जिससे यह राष्ट्रीय एकीकरण में सहायक होगा समान नागरिक संहिता, अधिकारों को सुनिश्चित कर समाज का सशक्तिकरण करेगी| इससे भेदभावमूलक व्यक्तिगत कानूनों की समाप्ति होगी और मानवाधिकारों को बढ़ावामिलेगा किसी भी सम्प्रदाय के प्रायः 4 निजी संहिताएँ होती हैं| विवाह, संपत्ति में उत्तराधिकार, गोद लेने की प्रथा और विवाह विच्छेद अर्थात तलाक संहिता| यह लम्बे समय से चर्चा का एक मुद्दा रहा है कि क्या निजी संहितायें समुदाय विशेष के धर्म से प्रेरित होती हैं ? सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न निर्णयों में अपना मत प्रस्तुत भी किया है जैसे - सरला मुद्गल बनाम भारत संघ 1995 में SC ने कहा कि किसी धर्म और उसके निजी संहिता के मध्य सीधा सम्बन्ध नहीं होता| शबनम हाशमी बनाम भारत संघ वाद 2014 में SC ने किशोर न्याय अधिनियम 2000 को एक पंथनिरपेक्ष कानून घोषित करते हुए बताया कि यह हिन्दू-मुस्लिम या अन्य सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होगा| मुस्लिम महिलायें(तलाक के समय अधिकार संरक्षण)अधिनियम 1986 में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा निर्धारित मेहर की शर्त को SC के निर्णयों पर प्राथमिकता दिया गया|| यह समान नागरिक संहिता की भावना के विरुद्ध था अतः SC ने शाहबानों वाद में दिए गए फैसले को पलटने सम्बन्धी संसद के निर्णय को बाद के कई अन्य फैसलों में उचित नहीं बताया है|जैसे डेनियल लतीफ़ वाद 2001 में SC ने शाहबानो वाद में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को उचित बताया और समान नागरिक संहिता के पक्ष में निर्णय दिया| यहाँ यह बताना आवश्यक है कि विश्व के अनेक इस्लामी राष्ट्रों जैसे इरान, मिस्र, मोरक्को, जोर्डन, सीरिया, तुर्की, पाकिस्तान एवं ट्यूनीशिया जैसे देशों ने बहु विवाह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है| यदि ऐसा है तो भारत में इसे क्यों नही लागू किया जा सकता| अतः उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में यह कहा जा सकता है कि भारत में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए| समान नागरिक सहिंता को लागू करने की चुनौतियां - विविधता में एकता के कारणभारत में एक समान विधि का निर्माण एवं क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है| समान नागरिक संहिता के माध्यम से बहुसंख्यकों के रीति रिवाज अल्पसंख्यकों पर आरोपित करने का तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है तर्क दिया जाता है कि समान नागरिक संहिता के माध्यम से राज्यों द्वारा व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संविधान द्वारा प्रदत्त स्वत्रंतता के अधिकार की भावना के विपरीत होगा समान नागरिक संहिता एक संवेदनशील मुद्दा है इसके आरोपण से देश की एकता अखंडता के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत हो सकती हैं| अतः स्पष्ट होता है कि समान नागरिक संहिता समतामूलक समाज की स्थापना के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण होगा किन्तु इसका आरोपण भारत के समक्ष विभिन्न चुनौतियों को उत्पन्न कर सकता है| अतः समाज को स्वयं इसकी पहल करनी चाहिए तथा सरकार को पहले उन प्रावधानों को हटाने के प्रयास करने चाहिए जो सीधे मूल व मानवाधिकार की विरुद्ध हों|
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तटस्थता को परिभाषित कीजिये । इसके विभिन्न आयामो की चर्चा करते हुए इसके निर्धारक कारकों पर प्रकाश डालिए ( 150 शब्द ) Define impartiality. Discuss on its various dimensions and highlight its determinant factors (150 words)
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दृष्टिकोण · भूमिका में तटस्थता को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में तटस्थता के विभिन्न आयामो की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में तटस्थता की निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये। उत्तर :- इंपार्सियाल्टी ( तटस्थता ) का मतलब सबके प्रति समान व्यवहार है जिसके 2 पहलू हैं पहला राजनीतिक दलो के प्रति और दूसरा जनता के प्रति । राजनीतिक दलो के प्रति इंपार्टीयलिटी को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि लोक सेवको को राजनीतिक गतिविधियों में भाग नही लेना चाहिए , जिसे नॉनपार्टिजन की संज्ञा दी जाती है। पॉलिटिकल इंपार्टीयलिटी और नॉन पार्टिजन दोनों मिलकर लोक सेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है । लोक सेवक को सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक विचार धारा के प्रति वचनबद्ध नही होना चाहिए । एक तटस्थ लोक सेवक से अपेक्षा की जाती है कि सरकार के नीतियो और कार्यक्रमों के साथ लोक सेवक के नाम को प्रत्यक्ष संबन्धित न किया जाए । तटस्थता के विभिन्न आयामो को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं, जैसे :- इंपार्सियाल्टी जनता के प्रति समान व्यवहार पर बल देती है लेकिन यह समान व्यवहार समान परिस्थितियों में लागू होता है । अतः इंपार्सियाल्टी इस बात का भी समर्थन करती है की परिस्थिति आसमान होने पर व्यवहार आसमान होना चाहिए ।अतः इंपार्सियाल्टी सकारात्मक भेदभाव की अनुमति देता है । इंपार्सियाल्टी लोक सेवको से यह अपेक्षा करती है कि वह प्रत्येक सरकार की सेवा अपनी अधिकतम क्षमता ( ability ) के अनुसार करे और ऐसा करते समय लोक सेवको के द्वारा आचार संहिता का अनुपालन किया जाए । इंपार्सियाल्टी इस बात पर बल देती है कि लोक सेवक का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जोकि मंत्रियो के विश्वास को प्राप्त कर सके । परत्नु यह विश्वास आगामी मंत्रियो और सरकार के प्रति भी होना चाहिए । लोक सेवक को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचार धारा से प्रभावित होकर अपने कर्तव्यों का निष्पादन नही करना चाहिए । लोक सेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो सरकार के नीतियों के अनुकूल हो तथा लोक सेवक के द्वारा सरकारी संसाधन का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नही किया जाना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवकों को मंत्रियों / सरकार के प्रति वफादार होना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवक राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में प्रस्तावित अनुबन्धो का अनुपालन करना चाहिए । केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के तहत यह उल्लेखित किया गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक प्रत्येक समय पर राजनीतिक तटस्थता को बना कर रखना होगा । नियम 5 के अंतर्गत लोक सेवको के राजनीति और निर्वाचन में भाग लेने संबन्धित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवको का व्यवहार पक्षपात पूर्ण ( partiality ) और पूर्वाग्रह ( prejudice ) से ग्रसित नही होना चाहिए । तटस्थता एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है । अतः इसका मात्रात्मक रूप से मापन किया जाना वास्तविकता में संभव नही है ।तटस्थ लोक सेवक का आकलन निम्नांकित मानको के आधार पर किया जा सकता है :- राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच की तटस्थता की मात्रा या डिग्री लोक सेवको के द्वारा नीति निर्माण की मात्रा राजनीति के द्वारा लोक सेवाको के दैनिक प्रशासनिक क्रिया कलापों में हस्तक्षेप की मात्रा लोक सेवको के प्रति जन विश्वसनीयता की मात्रा हालांकि वर्तमान में, समय के परिवर्तन के साथ राजनीतिक परिवेश में जो मानक ताा तटस्थता हेतु उच्चतर स्तर का होना चाहिए वह निम्नतर स्तर का तथा जो निम्नतर स्तर का होना चाहिए वो उच्चतर स्तर का हो गया है। लोक सेवको का तटस्थ होना संसदीय शासन प्रणाली, योग्यता प्रणाली, बहुदलीय प्रणाली आदि कारकों पर निर्भर करता है ।
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##Question:तटस्थता को परिभाषित कीजिये । इसके विभिन्न आयामो की चर्चा करते हुए इसके निर्धारक कारकों पर प्रकाश डालिए ( 150 शब्द ) Define impartiality. Discuss on its various dimensions and highlight its determinant factors (150 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में तटस्थता को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में तटस्थता के विभिन्न आयामो की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में तटस्थता की निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये। उत्तर :- इंपार्सियाल्टी ( तटस्थता ) का मतलब सबके प्रति समान व्यवहार है जिसके 2 पहलू हैं पहला राजनीतिक दलो के प्रति और दूसरा जनता के प्रति । राजनीतिक दलो के प्रति इंपार्टीयलिटी को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि लोक सेवको को राजनीतिक गतिविधियों में भाग नही लेना चाहिए , जिसे नॉनपार्टिजन की संज्ञा दी जाती है। पॉलिटिकल इंपार्टीयलिटी और नॉन पार्टिजन दोनों मिलकर लोक सेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है । लोक सेवक को सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक विचार धारा के प्रति वचनबद्ध नही होना चाहिए । एक तटस्थ लोक सेवक से अपेक्षा की जाती है कि सरकार के नीतियो और कार्यक्रमों के साथ लोक सेवक के नाम को प्रत्यक्ष संबन्धित न किया जाए । तटस्थता के विभिन्न आयामो को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं, जैसे :- इंपार्सियाल्टी जनता के प्रति समान व्यवहार पर बल देती है लेकिन यह समान व्यवहार समान परिस्थितियों में लागू होता है । अतः इंपार्सियाल्टी इस बात का भी समर्थन करती है की परिस्थिति आसमान होने पर व्यवहार आसमान होना चाहिए ।अतः इंपार्सियाल्टी सकारात्मक भेदभाव की अनुमति देता है । इंपार्सियाल्टी लोक सेवको से यह अपेक्षा करती है कि वह प्रत्येक सरकार की सेवा अपनी अधिकतम क्षमता ( ability ) के अनुसार करे और ऐसा करते समय लोक सेवको के द्वारा आचार संहिता का अनुपालन किया जाए । इंपार्सियाल्टी इस बात पर बल देती है कि लोक सेवक का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जोकि मंत्रियो के विश्वास को प्राप्त कर सके । परत्नु यह विश्वास आगामी मंत्रियो और सरकार के प्रति भी होना चाहिए । लोक सेवक को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचार धारा से प्रभावित होकर अपने कर्तव्यों का निष्पादन नही करना चाहिए । लोक सेवक का व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए जो सरकार के नीतियों के अनुकूल हो तथा लोक सेवक के द्वारा सरकारी संसाधन का प्रयोग राजनीतिक हितों के लिए नही किया जाना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवकों को मंत्रियों / सरकार के प्रति वफादार होना चाहिए । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवक राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में प्रस्तावित अनुबन्धो का अनुपालन करना चाहिए । केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के तहत यह उल्लेखित किया गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक प्रत्येक समय पर राजनीतिक तटस्थता को बना कर रखना होगा । नियम 5 के अंतर्गत लोक सेवको के राजनीति और निर्वाचन में भाग लेने संबन्धित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है । इंपार्सियाल्टी यह अपेक्षा करती है कि लोक सेवको का व्यवहार पक्षपात पूर्ण ( partiality ) और पूर्वाग्रह ( prejudice ) से ग्रसित नही होना चाहिए । तटस्थता एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है । अतः इसका मात्रात्मक रूप से मापन किया जाना वास्तविकता में संभव नही है ।तटस्थ लोक सेवक का आकलन निम्नांकित मानको के आधार पर किया जा सकता है :- राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच की तटस्थता की मात्रा या डिग्री लोक सेवको के द्वारा नीति निर्माण की मात्रा राजनीति के द्वारा लोक सेवाको के दैनिक प्रशासनिक क्रिया कलापों में हस्तक्षेप की मात्रा लोक सेवको के प्रति जन विश्वसनीयता की मात्रा हालांकि वर्तमान में, समय के परिवर्तन के साथ राजनीतिक परिवेश में जो मानक ताा तटस्थता हेतु उच्चतर स्तर का होना चाहिए वह निम्नतर स्तर का तथा जो निम्नतर स्तर का होना चाहिए वो उच्चतर स्तर का हो गया है। लोक सेवको का तटस्थ होना संसदीय शासन प्रणाली, योग्यता प्रणाली, बहुदलीय प्रणाली आदि कारकों पर निर्भर करता है ।
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"किसी समाज की व्याख्या में निरंतरता एवं परिवर्तन के मुख्य घटकों को मानक बनाते हुए उसकी विशेषताओं की चर्चा की जाती है।" भारतीय समाज के संदर्भ में कथन का विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) "In the interpretation of a society, the main components of continuity and change are standardized and its characteristics are discussed." Analyze the statement in the context of Indian society. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में भारतीय समाज की पृष्ठभूमि काएक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, भारतीय समाज की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्षलिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- पंण्डित नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की कला एवं संस्कृति, नाटक एवं तीज त्योंहार इत्यादि उस समाज की समृद्धि के जीवंत उदाहरण होते हैं। अतः यह कहाजा सकता है कि प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में भारतीय समाज जो मुख्यतः ग्रामीण समाज था आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर एक समृद्ध समाज था। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के फलस्वरूप भारतीय ग्रामीण समाज पर अनेक प्रतिकूल प्रभाव पड़े जैसेग्रामीण समाज विघटित होना शुरू हुआ जिसमें कमजोर वर्गों पर शोषण, बढ़ती रूढ़िवादिता एवं अन्धविश्वास, बढ़ता शहरी पलायन इत्यादि सामाजिक कुरुतियां पनपीं। किसी समाज की वैज्ञानिक व्याख्या में निरंतरता एवं परिवर्तन के मुख्य घटकों को मानक बनाते हुए उसकी विशेषताओं की चर्चा की जाती है।उस आधार पर भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं- मुख्यतः ग्रामीण समाज:- भारतीय समाज मुख्यतः ग्रामीण समाज है जो आर्थिक विकास के क्रम में थोड़ा पीछे दिखाई पड़ता है।(यही कारण है कि विगत वर्षों में ग्रामीण समाज के पुनर्जीवन हेतु अनेकों प्रयास किये जा रहे हैं) जनगणना 2011 की परिभाषा के अनुसार भारत में 68.85 प्रतिशत जनसँख्या ग्रामीण है। जाति व्यवस्था:- भारतवर्ष में सामाजिक असमानता एक अति विशिष्ट संस्थान के रूप में पायी जाती है जिसे जाति व्यवस्था कहते है जो निरंतर भी है परन्तु धीरे धीरे विघटित भी हो रही है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था:- भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक समाज है जिसका महिलाओं की जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यद्यपि 21वीं सदी का भारत नारी सशक्तिकरण हेतु कृतसंकल्पित है। व्यक्तिवाद एवं समाज में सामंजस्य:- व्यक्तिवाद एक नैतिक, राजनीतिक या सामाजिक दृष्टिकोण है जो मानवीय स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता इत्यादि पर बल देता है। जबकि समूहवाद किसी समूह के प्रत्येक सदस्य पर समूह को प्राथमिकता प्रदान करता है। भारतीय समाज में इनके मध्यएक समरसता दिखाई पड़ती है। नृजातीय एवं जनजातीय समूह:- भारत वर्ष में जनजातीय समूहों का विन्यास विविध रूप वाला है जो करीब भारत की जनसँख्या का 8.6 प्रतिशत है। भारत विश्व में विद्यमान लगभग सभी नृजातीय समूहों का वास-स्थान है। आधुनिकता एवं रूढ़िवादिता में द्वंद्व:- भारतीय समाज में आधुनिकता और रूढ़िवादिता में सामंजस्य दिखाई पड़ता है साथ ही द्वंद्व की स्थिति भी परिलक्षित होती है। अध्यात्मवाद और भौतिकवाद के मध्य संतुलन:- अध्यात्मवाद मुख्यतः किसी व्यक्ति के ईश्वर से सम्बंधित अनुभव पर केंद्रित होता है। जबकि भौतिकवाद भौतिक परिसम्पत्ति और शारीरिक सुख को आध्यात्मिक मूल्यों से अधिक मानने की एक प्रवृति है। भारत में इन दोनों ही अनुभवों का प्रचलन है और जिनमे समरसता भी विद्यमान है। भारतीय समाज बहुभाषाई, बहुसांस्कृतिक, बहुनृजातीय, बहुधार्मिक समाज है जिसमे विविधता में एकता भारतीय समाज को एक अति विशिष्ट पूंजी प्रदान करता है(सामाजिक पूंजी: से आशयसमाज के सदस्यों में परस्पर सौहार्द एवं सामंजस्य से है जो उस समाज की प्रगति को सुनिश्चित करता है) इसी प्रकार वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भारतीय समाज की एक महान सांस्कृतिक विरासत है। इसके उत्तरोतर विकास के दौरान समय समय पर विभिन्न समुदायों और उनकी जीवनशैलियों को समायोजित किया है। इस प्रकार भारतीय समाज की व्याख्या में उपरोक्त निरंतरता एवं परिवर्तन के मुख्य घटक महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं।
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##Question:"किसी समाज की व्याख्या में निरंतरता एवं परिवर्तन के मुख्य घटकों को मानक बनाते हुए उसकी विशेषताओं की चर्चा की जाती है।" भारतीय समाज के संदर्भ में कथन का विश्लेषण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) "In the interpretation of a society, the main components of continuity and change are standardized and its characteristics are discussed." Analyze the statement in the context of Indian society. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में भारतीय समाज की पृष्ठभूमि काएक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, भारतीय समाज की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्षलिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- पंण्डित नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की कला एवं संस्कृति, नाटक एवं तीज त्योंहार इत्यादि उस समाज की समृद्धि के जीवंत उदाहरण होते हैं। अतः यह कहाजा सकता है कि प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में भारतीय समाज जो मुख्यतः ग्रामीण समाज था आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर एक समृद्ध समाज था। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के फलस्वरूप भारतीय ग्रामीण समाज पर अनेक प्रतिकूल प्रभाव पड़े जैसेग्रामीण समाज विघटित होना शुरू हुआ जिसमें कमजोर वर्गों पर शोषण, बढ़ती रूढ़िवादिता एवं अन्धविश्वास, बढ़ता शहरी पलायन इत्यादि सामाजिक कुरुतियां पनपीं। किसी समाज की वैज्ञानिक व्याख्या में निरंतरता एवं परिवर्तन के मुख्य घटकों को मानक बनाते हुए उसकी विशेषताओं की चर्चा की जाती है।उस आधार पर भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं- मुख्यतः ग्रामीण समाज:- भारतीय समाज मुख्यतः ग्रामीण समाज है जो आर्थिक विकास के क्रम में थोड़ा पीछे दिखाई पड़ता है।(यही कारण है कि विगत वर्षों में ग्रामीण समाज के पुनर्जीवन हेतु अनेकों प्रयास किये जा रहे हैं) जनगणना 2011 की परिभाषा के अनुसार भारत में 68.85 प्रतिशत जनसँख्या ग्रामीण है। जाति व्यवस्था:- भारतवर्ष में सामाजिक असमानता एक अति विशिष्ट संस्थान के रूप में पायी जाती है जिसे जाति व्यवस्था कहते है जो निरंतर भी है परन्तु धीरे धीरे विघटित भी हो रही है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था:- भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक समाज है जिसका महिलाओं की जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यद्यपि 21वीं सदी का भारत नारी सशक्तिकरण हेतु कृतसंकल्पित है। व्यक्तिवाद एवं समाज में सामंजस्य:- व्यक्तिवाद एक नैतिक, राजनीतिक या सामाजिक दृष्टिकोण है जो मानवीय स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता इत्यादि पर बल देता है। जबकि समूहवाद किसी समूह के प्रत्येक सदस्य पर समूह को प्राथमिकता प्रदान करता है। भारतीय समाज में इनके मध्यएक समरसता दिखाई पड़ती है। नृजातीय एवं जनजातीय समूह:- भारत वर्ष में जनजातीय समूहों का विन्यास विविध रूप वाला है जो करीब भारत की जनसँख्या का 8.6 प्रतिशत है। भारत विश्व में विद्यमान लगभग सभी नृजातीय समूहों का वास-स्थान है। आधुनिकता एवं रूढ़िवादिता में द्वंद्व:- भारतीय समाज में आधुनिकता और रूढ़िवादिता में सामंजस्य दिखाई पड़ता है साथ ही द्वंद्व की स्थिति भी परिलक्षित होती है। अध्यात्मवाद और भौतिकवाद के मध्य संतुलन:- अध्यात्मवाद मुख्यतः किसी व्यक्ति के ईश्वर से सम्बंधित अनुभव पर केंद्रित होता है। जबकि भौतिकवाद भौतिक परिसम्पत्ति और शारीरिक सुख को आध्यात्मिक मूल्यों से अधिक मानने की एक प्रवृति है। भारत में इन दोनों ही अनुभवों का प्रचलन है और जिनमे समरसता भी विद्यमान है। भारतीय समाज बहुभाषाई, बहुसांस्कृतिक, बहुनृजातीय, बहुधार्मिक समाज है जिसमे विविधता में एकता भारतीय समाज को एक अति विशिष्ट पूंजी प्रदान करता है(सामाजिक पूंजी: से आशयसमाज के सदस्यों में परस्पर सौहार्द एवं सामंजस्य से है जो उस समाज की प्रगति को सुनिश्चित करता है) इसी प्रकार वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भारतीय समाज की एक महान सांस्कृतिक विरासत है। इसके उत्तरोतर विकास के दौरान समय समय पर विभिन्न समुदायों और उनकी जीवनशैलियों को समायोजित किया है। इस प्रकार भारतीय समाज की व्याख्या में उपरोक्त निरंतरता एवं परिवर्तन के मुख्य घटक महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं।
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A renowned and critically acclaimed producer-director has come up with a new movie based on retelling of the freedom movement. The trailer of this project depicts prominent freedom fighters and various aspects of their personalities. It is a project that involves substantial sums of money and has taken collaborative efforts of 3 years. However, certain political and social activists have objected to what they perceived as negative portrayal of some freedom fighters. As such, they have opposed the release of this movie and issued threats with serious consequences. This has come in the context of increase in the number of instances involving many groups issuing threats against one or the other movie. In such a context you have been designated as the head of a special committee with the broad responsibility of reviewing the film certification process in general as well as the checking the historical accuracy of the events depicted in this particular movie. (a) Who are the key stakeholders you would involve as part of the consultation process? (b) What are the principles that you would consider while giving your recommendations to the government? (c) Also, provide an outline of a solution that you deem appropriate in the prevailing context. (250 words)
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Brief Approach 1. Introduce the case highlighting facts of the case and Ethical issues concerned. 2. Identify the key Stakeholders for the Consultation process. 3. Discuss the principles and values to be considered while giving recommendations. 4. Discuss the solution/improvements to the film certification process and a mechanism to objectively review the historical accuracy of events. Solution The above case study highlights the situation where a new movie based on retelling of freedom movement has come under the scanner and opposition of certain social and political activists. It has been argued by these groups that the film portrays some freedom fighters in a negative light. However, it has been perceived based on trailer. The given case study presents the conflict between Freedom of speech and expression and the Sentiments of certain section of society. It also involves the commercial interests of the individual and emotional interest of community. Further, issuing threats violates principle of Rule of law. (a) This is a complex subject that involves legal issues and rights of creative production of the filmmakers and can potentially affect wide sections of the society. The following stakeholders are required: 1. Legal experts to understand the complexities of the case. 2. Representatives of the film industry 3. Members of the Central Board of film Certification 4. Indian Broadcasting foundation as spokesperson of broadcasting industry. 5. Civil society representatives to gain an audience perspective. 6. Renowned historians to check the historical accuracy of the particular movie. (b) The recommendations to be made to the government for the certification process will be based on the following principles: 1. Right to artistic expression is part of the fundamental right to speech and expression under the constitution and should be respected as well as restrained as such. 2. Film remains responsible and sensitive to values and standards of the society. 3. Artistic freedom includes right to portray fiction along with documented history. However, since historical claims are often unsettled, care must be taken to provide disclaimers as and when necessary. 4. Difference between a commercial cinema and a documentary must be maintained. 5. Categorization of films should empower audience to make informed viewing choices. 6. Ensuring Rule of Law is maintained, even if there is negative portrayal. (c) Outline of Solution The following steps may be taken: 1. A central advisory panel should be constituted with experts such as historians to objectively assess the historical accuracy of the film in a time-bound manner. 2. A restricted accuracy of the film should be organized for al key stakeholders. 3. Reports from these should be presented to CBFC in a time-bound manner, following wich the movie can be released , with edits, if required . 4. Adequate law and order arrangements shoud be made upon release of the movie to uphold the rule of law and freedom. The essence of mature democracy is freedom of speech and expression. Organizations and pressure groups should not be allowed to dictate policies or hurt the creative expression of artists. A robust certification process is essential to ensure the creative freedom of filmmakers as well as empower the audience to make informed choices.
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##Question:A renowned and critically acclaimed producer-director has come up with a new movie based on retelling of the freedom movement. The trailer of this project depicts prominent freedom fighters and various aspects of their personalities. It is a project that involves substantial sums of money and has taken collaborative efforts of 3 years. However, certain political and social activists have objected to what they perceived as negative portrayal of some freedom fighters. As such, they have opposed the release of this movie and issued threats with serious consequences. This has come in the context of increase in the number of instances involving many groups issuing threats against one or the other movie. In such a context you have been designated as the head of a special committee with the broad responsibility of reviewing the film certification process in general as well as the checking the historical accuracy of the events depicted in this particular movie. (a) Who are the key stakeholders you would involve as part of the consultation process? (b) What are the principles that you would consider while giving your recommendations to the government? (c) Also, provide an outline of a solution that you deem appropriate in the prevailing context. (250 words)##Answer:Brief Approach 1. Introduce the case highlighting facts of the case and Ethical issues concerned. 2. Identify the key Stakeholders for the Consultation process. 3. Discuss the principles and values to be considered while giving recommendations. 4. Discuss the solution/improvements to the film certification process and a mechanism to objectively review the historical accuracy of events. Solution The above case study highlights the situation where a new movie based on retelling of freedom movement has come under the scanner and opposition of certain social and political activists. It has been argued by these groups that the film portrays some freedom fighters in a negative light. However, it has been perceived based on trailer. The given case study presents the conflict between Freedom of speech and expression and the Sentiments of certain section of society. It also involves the commercial interests of the individual and emotional interest of community. Further, issuing threats violates principle of Rule of law. (a) This is a complex subject that involves legal issues and rights of creative production of the filmmakers and can potentially affect wide sections of the society. The following stakeholders are required: 1. Legal experts to understand the complexities of the case. 2. Representatives of the film industry 3. Members of the Central Board of film Certification 4. Indian Broadcasting foundation as spokesperson of broadcasting industry. 5. Civil society representatives to gain an audience perspective. 6. Renowned historians to check the historical accuracy of the particular movie. (b) The recommendations to be made to the government for the certification process will be based on the following principles: 1. Right to artistic expression is part of the fundamental right to speech and expression under the constitution and should be respected as well as restrained as such. 2. Film remains responsible and sensitive to values and standards of the society. 3. Artistic freedom includes right to portray fiction along with documented history. However, since historical claims are often unsettled, care must be taken to provide disclaimers as and when necessary. 4. Difference between a commercial cinema and a documentary must be maintained. 5. Categorization of films should empower audience to make informed viewing choices. 6. Ensuring Rule of Law is maintained, even if there is negative portrayal. (c) Outline of Solution The following steps may be taken: 1. A central advisory panel should be constituted with experts such as historians to objectively assess the historical accuracy of the film in a time-bound manner. 2. A restricted accuracy of the film should be organized for al key stakeholders. 3. Reports from these should be presented to CBFC in a time-bound manner, following wich the movie can be released , with edits, if required . 4. Adequate law and order arrangements shoud be made upon release of the movie to uphold the rule of law and freedom. The essence of mature democracy is freedom of speech and expression. Organizations and pressure groups should not be allowed to dictate policies or hurt the creative expression of artists. A robust certification process is essential to ensure the creative freedom of filmmakers as well as empower the audience to make informed choices.
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Discuss the contribution of political philosophers during the age of enlightenment. (150 words)
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Approach Introduce with the idea of enlightenment Explain the contributions of various political philosophers during the age of enlightenment Conclude accordingly Answer: The enlightenment which started with the idea of scientific revolution was intellectual, philosophical, cultural and social movement that spread throughout the Europe during the 17th and 18th Century. The 17th and 18th century is called as Age of Enlightenment or the Age of Reason. Various political philosophers from Europe and America has contributed towards the idea of enlightenment through their philosophies. Thomas Hobbes: Thomas Hobbes, an English philosopher and scientist, was one of the key figures in the political debates of the Enlightenment period. He introduced a social contract theory based on the relation between the absolute sovereign and the civil society.Hobbes favoured an authoritarian state to control the greedy and selfish nature of man. Any power exercised by this authoritarian state cannot be resisted because the protector’s sovereign power derives from individuals’ surrendering their own sovereign power for protection. The individuals are thereby the authors of all decisions made by the sovereign. His model of authritarian state also included control by state of the church and religion. John Locke: Locke’s political theory was founded on social contract theory. He believed that human nature is characterized by reason and tolerance, but he assumed that the sole right to defend in the state of nature was not enough, so people established a civil society to resolve conflicts in a civil way with help from government in a state of society. Locke’s conception of natural rights is captured in his best known statement that individuals have a right to protect their “life, health, liberty, or possessions” and in his belief that the natural right to property is derived from labor. Montesque: His political theory work, particularly the idea of separation of powers, shaped the modern democratic government. He was influenced by the British poiltical system and hence his idea is based on the constitutional monarchy and parliamentary supremacy. Voltaire: Voltaire was a French Enlightenment writer, historian, and philosopher, who glorified the idea of reason, attacked the Catholic Church and advocated freedom of religion, freedom of expression, and separation of church and state. Rousseau: whose conceptualization of social contract, the theory of natural human, and works on education greatly influenced the political, philosophical, and social western tradition.Rousseau is also considered the father of modern democracy and republicanism. He propunded the theory of general/popular will, demolished the old notion of the divine origin of Kingship/state and propagated social contract theory for protection of life and property Thomas Jefferson: He emphasised upon right of the American colonies to rebel against colonial power.He played important role in drafting the Declaration of American Independence (1776) and played major role in bringing 1st Amendment in American Constitution which included the chapter of Fundamental Rights. Thomas Payne: An American thinker particularly known for his work Common Sense in which he espoused the cause of American Independence on the basis of the enlightenment approaches like rationality. His famous statement is "it is repugnant to common sense that a continent(America) full of resources will be government by an island (Britain)". Through the efforts of various political philosophers, the Enlightenment has been hailed as the foundation of modern western political and intellectual culture where it helped to brought political modernization to the west by introducing democratic values and institutions and the creation of modern, liberal democracies.
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##Question:Discuss the contribution of political philosophers during the age of enlightenment. (150 words)##Answer:Approach Introduce with the idea of enlightenment Explain the contributions of various political philosophers during the age of enlightenment Conclude accordingly Answer: The enlightenment which started with the idea of scientific revolution was intellectual, philosophical, cultural and social movement that spread throughout the Europe during the 17th and 18th Century. The 17th and 18th century is called as Age of Enlightenment or the Age of Reason. Various political philosophers from Europe and America has contributed towards the idea of enlightenment through their philosophies. Thomas Hobbes: Thomas Hobbes, an English philosopher and scientist, was one of the key figures in the political debates of the Enlightenment period. He introduced a social contract theory based on the relation between the absolute sovereign and the civil society.Hobbes favoured an authoritarian state to control the greedy and selfish nature of man. Any power exercised by this authoritarian state cannot be resisted because the protector’s sovereign power derives from individuals’ surrendering their own sovereign power for protection. The individuals are thereby the authors of all decisions made by the sovereign. His model of authritarian state also included control by state of the church and religion. John Locke: Locke’s political theory was founded on social contract theory. He believed that human nature is characterized by reason and tolerance, but he assumed that the sole right to defend in the state of nature was not enough, so people established a civil society to resolve conflicts in a civil way with help from government in a state of society. Locke’s conception of natural rights is captured in his best known statement that individuals have a right to protect their “life, health, liberty, or possessions” and in his belief that the natural right to property is derived from labor. Montesque: His political theory work, particularly the idea of separation of powers, shaped the modern democratic government. He was influenced by the British poiltical system and hence his idea is based on the constitutional monarchy and parliamentary supremacy. Voltaire: Voltaire was a French Enlightenment writer, historian, and philosopher, who glorified the idea of reason, attacked the Catholic Church and advocated freedom of religion, freedom of expression, and separation of church and state. Rousseau: whose conceptualization of social contract, the theory of natural human, and works on education greatly influenced the political, philosophical, and social western tradition.Rousseau is also considered the father of modern democracy and republicanism. He propunded the theory of general/popular will, demolished the old notion of the divine origin of Kingship/state and propagated social contract theory for protection of life and property Thomas Jefferson: He emphasised upon right of the American colonies to rebel against colonial power.He played important role in drafting the Declaration of American Independence (1776) and played major role in bringing 1st Amendment in American Constitution which included the chapter of Fundamental Rights. Thomas Payne: An American thinker particularly known for his work Common Sense in which he espoused the cause of American Independence on the basis of the enlightenment approaches like rationality. His famous statement is "it is repugnant to common sense that a continent(America) full of resources will be government by an island (Britain)". Through the efforts of various political philosophers, the Enlightenment has been hailed as the foundation of modern western political and intellectual culture where it helped to brought political modernization to the west by introducing democratic values and institutions and the creation of modern, liberal democracies.
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Explain the natural vegetation of India with examples. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE NATURAL VEGETATION OF INDIA I MOIST VEGETATION II DRY VEGETATION III MONTANE FORESTS ANSWER: Natural vegetation means the vegetation which occurs naturally, without any human interference. That is why agriculture is not natural vegetation, whereas forest cover is the natural vegetation. The forest cover was 22.84% in 2016. It fell to 21.34% in 2018. This decrease was due to the practice of shifting cultivation in the North East (NE) of India, and the practice of mining in Andhra Pradesh. THE NATURAL VEGETATION OF INDIA The Government of India classifiesvegetation in India as: I MOIST VEGETATION 1) MOIST EVERGREEN 1) Temperature: of 22-25 degrees Celsius is required. 2) Precipitation: of more than 250 cm of rainfall is required. 3) Characteristic: The vegetation remains green irrespective of seasons. 4) Areas- This vegetation is found in the western parts of Western Ghats (WG), Parts of NE India, Andaman and Nicobar islands 5) Species- Mahogany, Ebony, Bamboo, rubber, palm etc. are found here. 6) Mesophytes- which can withstand great temperatures and precipitation are found here. Trees reach up to 60m. There is stiff competition for sunlight. 7) Epiphytes- like creep, ferns and bamboo are found here. 2) MOIST SEMI-EVERGREEN 1) Characteristic: It is a transitional zone between moist evergreen and moist deciduous. 2) Rainfall: of 200-250 cm is required. 3) Temperature- 23-25 degrees Celsius are required. 4) Species - rosewood, laurel, chestnut, Champa are found here. 5) Areas- The vegetation covers the areas of the eastern margins of the WG, the west coast, a majority of the NE India, the Odisha coast and the Andaman and Nicobarislands. 3) MOIST DECIDUOUS 1) Deciduous means shedding of leaves at a particular time of the year to preserve moisture 2) Rain: 100-200 cm is required. 3) Temperature: 27 degrees Celsius is required. 4) Areas: The vegetation covers the areas of the Shiwalik foothills, Manipur, Mizoram, eastern hills of MP, Chhattisgarh, parts of Chotanagpur plateau (CNP), Odisha and West Bengal (WB). 5) Species: Teak, Sal, Amla, Mahua, Jamun, Sesham, Gurjan are found here. Moist deciduous + dry deciduous = monsoonal vegetation: > 50% of Indian vegetation 6) Moist deciduous accounts for 37% of the geographical area of India 4) LITTORAL AND SWAMP/ MANGROVES 1) It is found where the river water meets seawater. Such waters are called brackish waters , as they are neither as salty as the sea waters, nor as salty as the fresh river waters. 2) Ecotone- These are transitional areas (as described above). 3) Vegetation - pneumatophores ,i.e. roots penetrate deep into the soil and are also visible on the surface, are found here 4) Edge effect- This is seen when the pneumatophores are greater in number than the adjoining area species. 5) Edge species found here - Sundri trees, Agar, Rhizophola, Canes, Screw pines 6) The important mangroves of India are Sunderbans (WB), Coringa (Andhra Pradesh), Bhittarkanika (Odisha), Pitchavaram (Tamil Nadu), Gulf of Mannar (near Rameshwaram), Kerala mangroves and Goan mangroves. (Diagram be drawn here) II DRY VEGETATION 1) DRY EVERGREEN 1) Rainfall: of 100 cm is required. 2) Temperature: 28 degrees Celsius is required. 3) Trees - have a very rich canopy and remain green throughout the year 4) Species - Mango, Sandalwood, Mulberry, Bamboo, Banana are found here. 5 ) Areas - This type of vegetation covers the areas of WB, Odisha, TN, Western parts of the EG. 2) DRY DECIDUOUS 1) It covers 28% of forest cover in India 2) Rainfall- of 50-100 cm is required. 3) Temperature: of more than 28 degrees Celsius. 4) Characteristics: Trees shed their leaves seasonally. There is rich good undergrowth dominated by grass and climbers. However, Summers and autumn are characterized by open forests 5) Species- Teak, Sal, Tendu, Red sanders, Satinwood, Pala, Arjun, Peepal, Banyan, Tamarind, Neem are found here. 6) Areas- This type of vegetation covers the areas of the Deccan plateau, Malwa plateau, CNP and the Bundelkhand plateau 3) THORNY VEG 1) High temperatures : of 30 degrees Celsius are required. 2) Rainfall: of 25-50 cm is required. 3) Species- xerophytes like Cactus, Acacia and Babul are found here. 4) Areas- This type of vegetation covers the areas of western Rajasthan, southern Punjab, northern Gujarat, southern AP, parts of northern Karnataka, Telangana and TN. III MONTANE FORESTS 1) MONTAINE SUB-TROPICAL These are further classified into two types: 1.1) Broad leaved: 1) Rainfall: of 75-125 cm is required. 2) Temperature : of 18-21 degrees Celsius is required. 3) Areas - This type of vegetation covers the areas of Eastern Himalayas, WG, Mahabaleshwaram, Maikala, Satpuras, Mount Abu, southern Nilgiris, south Palani and south Anamalai Hills 4) Characteristics- The leaves are sharp-faced. This does not allow the water to accumulate on the leaves, which could otherwise lead to fungal growth there. 5) Species- oak, chestnut, birch, pines etc. are found here. 1.2) Sub-Tropical Moist Pine: 1) They are found at a height of 1,500-2,500 metres. 2) Areas- This type of vegetation covers the areas of Arunachal Pradesh, Nagaland, Manipur, Meghalaya and Sikkim 3) Dominant species - cheer/ pines are found here 2) MONTANE TEMPERATE These are further classified into 3 types: 2.1)Moist Himalayan Temperaqte vegetation: 1) These are found at a height of 1,500-3,500 metres. 2) Areas- This type of vegetation covers the areas of Jammu and Kashmir, HP, Uttarakhand and Sikkim. 3) Species- Spruce, Cedar, Pine, Fir etc. are found here 4) Speciality - all these species available in a pure strand . 2.2) Dry Himalayan Temperate vegetation 1) These are found at a height of 1,500-3,500 metres. 2) Areas : This type of vegetation is found in Ladakh, Karakoram and Gharwal regions. 3) Species- Deodar is the dominant species found here. 2.3) Alpine vegetation 1) It is found at a height of more than 3,500 metres. 2) Vegetation- Rhododendrons are found from the snow line at around 5,500 m till 4,800 m. These are very colourful and small plant species. Their syrup is very useful for heart diseases. Beyond that, Alpine grass in the western Himalayas, known as Mergs, is found till about 4,400 m. Coniferous forests are found between 4,400-3,500 m. 3) Species- Spruce, juniper, birch, fir, cedar are found here. India is one of the most biodiverse countries in the world, however, in the recent past, it has seen severe degradation of flora and fauna. Incorporating sustainable development goals with a focus on the conservation of flora and fauna is essential for a sustainable future. (A diagram must be drawn here)
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##Question:Explain the natural vegetation of India with examples. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE NATURAL VEGETATION OF INDIA I MOIST VEGETATION II DRY VEGETATION III MONTANE FORESTS ANSWER: Natural vegetation means the vegetation which occurs naturally, without any human interference. That is why agriculture is not natural vegetation, whereas forest cover is the natural vegetation. The forest cover was 22.84% in 2016. It fell to 21.34% in 2018. This decrease was due to the practice of shifting cultivation in the North East (NE) of India, and the practice of mining in Andhra Pradesh. THE NATURAL VEGETATION OF INDIA The Government of India classifiesvegetation in India as: I MOIST VEGETATION 1) MOIST EVERGREEN 1) Temperature: of 22-25 degrees Celsius is required. 2) Precipitation: of more than 250 cm of rainfall is required. 3) Characteristic: The vegetation remains green irrespective of seasons. 4) Areas- This vegetation is found in the western parts of Western Ghats (WG), Parts of NE India, Andaman and Nicobar islands 5) Species- Mahogany, Ebony, Bamboo, rubber, palm etc. are found here. 6) Mesophytes- which can withstand great temperatures and precipitation are found here. Trees reach up to 60m. There is stiff competition for sunlight. 7) Epiphytes- like creep, ferns and bamboo are found here. 2) MOIST SEMI-EVERGREEN 1) Characteristic: It is a transitional zone between moist evergreen and moist deciduous. 2) Rainfall: of 200-250 cm is required. 3) Temperature- 23-25 degrees Celsius are required. 4) Species - rosewood, laurel, chestnut, Champa are found here. 5) Areas- The vegetation covers the areas of the eastern margins of the WG, the west coast, a majority of the NE India, the Odisha coast and the Andaman and Nicobarislands. 3) MOIST DECIDUOUS 1) Deciduous means shedding of leaves at a particular time of the year to preserve moisture 2) Rain: 100-200 cm is required. 3) Temperature: 27 degrees Celsius is required. 4) Areas: The vegetation covers the areas of the Shiwalik foothills, Manipur, Mizoram, eastern hills of MP, Chhattisgarh, parts of Chotanagpur plateau (CNP), Odisha and West Bengal (WB). 5) Species: Teak, Sal, Amla, Mahua, Jamun, Sesham, Gurjan are found here. Moist deciduous + dry deciduous = monsoonal vegetation: > 50% of Indian vegetation 6) Moist deciduous accounts for 37% of the geographical area of India 4) LITTORAL AND SWAMP/ MANGROVES 1) It is found where the river water meets seawater. Such waters are called brackish waters , as they are neither as salty as the sea waters, nor as salty as the fresh river waters. 2) Ecotone- These are transitional areas (as described above). 3) Vegetation - pneumatophores ,i.e. roots penetrate deep into the soil and are also visible on the surface, are found here 4) Edge effect- This is seen when the pneumatophores are greater in number than the adjoining area species. 5) Edge species found here - Sundri trees, Agar, Rhizophola, Canes, Screw pines 6) The important mangroves of India are Sunderbans (WB), Coringa (Andhra Pradesh), Bhittarkanika (Odisha), Pitchavaram (Tamil Nadu), Gulf of Mannar (near Rameshwaram), Kerala mangroves and Goan mangroves. (Diagram be drawn here) II DRY VEGETATION 1) DRY EVERGREEN 1) Rainfall: of 100 cm is required. 2) Temperature: 28 degrees Celsius is required. 3) Trees - have a very rich canopy and remain green throughout the year 4) Species - Mango, Sandalwood, Mulberry, Bamboo, Banana are found here. 5 ) Areas - This type of vegetation covers the areas of WB, Odisha, TN, Western parts of the EG. 2) DRY DECIDUOUS 1) It covers 28% of forest cover in India 2) Rainfall- of 50-100 cm is required. 3) Temperature: of more than 28 degrees Celsius. 4) Characteristics: Trees shed their leaves seasonally. There is rich good undergrowth dominated by grass and climbers. However, Summers and autumn are characterized by open forests 5) Species- Teak, Sal, Tendu, Red sanders, Satinwood, Pala, Arjun, Peepal, Banyan, Tamarind, Neem are found here. 6) Areas- This type of vegetation covers the areas of the Deccan plateau, Malwa plateau, CNP and the Bundelkhand plateau 3) THORNY VEG 1) High temperatures : of 30 degrees Celsius are required. 2) Rainfall: of 25-50 cm is required. 3) Species- xerophytes like Cactus, Acacia and Babul are found here. 4) Areas- This type of vegetation covers the areas of western Rajasthan, southern Punjab, northern Gujarat, southern AP, parts of northern Karnataka, Telangana and TN. III MONTANE FORESTS 1) MONTAINE SUB-TROPICAL These are further classified into two types: 1.1) Broad leaved: 1) Rainfall: of 75-125 cm is required. 2) Temperature : of 18-21 degrees Celsius is required. 3) Areas - This type of vegetation covers the areas of Eastern Himalayas, WG, Mahabaleshwaram, Maikala, Satpuras, Mount Abu, southern Nilgiris, south Palani and south Anamalai Hills 4) Characteristics- The leaves are sharp-faced. This does not allow the water to accumulate on the leaves, which could otherwise lead to fungal growth there. 5) Species- oak, chestnut, birch, pines etc. are found here. 1.2) Sub-Tropical Moist Pine: 1) They are found at a height of 1,500-2,500 metres. 2) Areas- This type of vegetation covers the areas of Arunachal Pradesh, Nagaland, Manipur, Meghalaya and Sikkim 3) Dominant species - cheer/ pines are found here 2) MONTANE TEMPERATE These are further classified into 3 types: 2.1)Moist Himalayan Temperaqte vegetation: 1) These are found at a height of 1,500-3,500 metres. 2) Areas- This type of vegetation covers the areas of Jammu and Kashmir, HP, Uttarakhand and Sikkim. 3) Species- Spruce, Cedar, Pine, Fir etc. are found here 4) Speciality - all these species available in a pure strand . 2.2) Dry Himalayan Temperate vegetation 1) These are found at a height of 1,500-3,500 metres. 2) Areas : This type of vegetation is found in Ladakh, Karakoram and Gharwal regions. 3) Species- Deodar is the dominant species found here. 2.3) Alpine vegetation 1) It is found at a height of more than 3,500 metres. 2) Vegetation- Rhododendrons are found from the snow line at around 5,500 m till 4,800 m. These are very colourful and small plant species. Their syrup is very useful for heart diseases. Beyond that, Alpine grass in the western Himalayas, known as Mergs, is found till about 4,400 m. Coniferous forests are found between 4,400-3,500 m. 3) Species- Spruce, juniper, birch, fir, cedar are found here. India is one of the most biodiverse countries in the world, however, in the recent past, it has seen severe degradation of flora and fauna. Incorporating sustainable development goals with a focus on the conservation of flora and fauna is essential for a sustainable future. (A diagram must be drawn here)
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एक लोकसेवक से अपेक्षित मूल्यों के मध्य अंतरनिर्भरता का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कीजिये कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) By analyzing interdependence between expected values from a public servant, clarify that integrity is the value of values. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता · लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| समर्पण प्रतिबद्धताके उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे| सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिएसमानुभूतियुक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूति व्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसेकरुणा (कम्पैशन)की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवकसहिष्णुताके मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक है| · सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँतटस्थताका तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथाभेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| · भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों मेंवस्तुनिष्ठताका होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
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##Question:एक लोकसेवक से अपेक्षित मूल्यों के मध्य अंतरनिर्भरता का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कीजिये कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) By analyzing interdependence between expected values from a public servant, clarify that integrity is the value of values. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता · लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| समर्पण प्रतिबद्धताके उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे| सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिएसमानुभूतियुक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूति व्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसेकरुणा (कम्पैशन)की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवकसहिष्णुताके मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक है| · सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँतटस्थताका तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथाभेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| · भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों मेंवस्तुनिष्ठताका होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
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एक लोकसेवक से अपेक्षित मूल्यों के मध्य अंतरनिर्भरता का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कीजिये कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है| (150-200 शब्द, 10 अंक) By analyzing interdependence between expected values from a public servant, clarify that integrity is the value of values. (150-200 words, Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता · लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| समर्पण प्रतिबद्धता के उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे| सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिए समानुभूति युक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूति व्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसे करुणा (कम्पैशन) की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक सहिष्णुता के मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक है| · सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँ तटस्थता का तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता | एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| · भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों में वस्तुनिष्ठता का होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
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##Question:एक लोकसेवक से अपेक्षित मूल्यों के मध्य अंतरनिर्भरता का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कीजिये कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है| (150-200 शब्द, 10 अंक) By analyzing interdependence between expected values from a public servant, clarify that integrity is the value of values. (150-200 words, Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में लोकसेवा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उससे मूल्यों के मूल्य के रूप में स्पष्ट कीजिये सरकार के द्वारा नागरिकों को जिन सेवाओं को प्रदान किया जाता है उन्हें लोकसेवा कहते हैं| लोकसेवाओं का सम्बन्ध मौलिक रूप से नियामिकीय सेवा(कर संग्रह, न्याय प्रशासन तथा कानून एवं व्यवस्था), विकासात्मक सेवा( सामाजिक विकास-शिक्षा स्वास्थ्य आदि एवं आर्थिक विकास में कृषि परिवहन आदि),कल्याण सेवा(समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए सेवा),एवं आपातकालीन सेवा(बाढ़,सूखा, आपदा आदि के दौरान प्रदत्त सेवायें) से होता है| संसदीय शासन व्यवस्था में प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण मंत्रियों द्वारा किया जाता है परंतु देश का प्रशासनलोक सेवाअधिकारियों के एक विशाल समूह द्वारा चलाया जाता है| यही समूह लोकसेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होता है| अतः लोकसेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसेवकों से कुछ मूल्यों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों में अंतरनिर्भरता · लोकसेवकों के मूल्यों के चार मौलिक आयाम है यथा नैतिक मूल्य(सत्यनिष्ठा, इमानदारी, सम्मान, प्रोबिटी), मानवीय मूल्य(समानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, मानवता), लोकतांत्रिक मूल्य(तटस्थता, जवाबदेहिता, समावेशिता, पारदर्शिता और विधि का शासन) एवं पेशेवर मूल्य(प्रभावशीलता, कार्यकुशलता, नवाचार, दक्षता, समर्पण, नेतृत्व)| इन मूल्यों में परस्पर अंतरनिर्भरता देखने को मिलती है| समर्पण प्रतिबद्धता के उच्चतम स्तर को दर्शाता है| अतः इसके अंतर्गत लोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपना सम्पूर्ण समय, ध्यान, ऊर्जा एवं स्वतः अपने आप को लोकसेवा के प्रति केन्द्रित कर दे| सत्यनिष्ठा इस बात की मांग करती है कि लोकसेवकों के लिए लोक हित सर्वोपरि है एवं इस दिशा में लोकसेवकों के लिए समर्पण का होना आवश्यक है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के लिए समानुभूति युक्त होना अति आवश्यक है ताकि इसके माध्यम से लोकसेवक विशेषकर समाज के कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की समस्याओं कावास्तविकविश्लेषण कर सके एवं इसके निराकरण की दिशा में प्रभावी नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू कर सके| जब समानुभूति व्यवहार में परिवर्तित होती है तो उसे करुणा (कम्पैशन) की संज्ञा दी जाती है| महात्मा गांधी के अनुसार, धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो कि दूसरे की पीड़ा को समझता है सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक सहिष्णुता के मूल्य से युक्त हो| लोकसेवकों में समानुभूति एवं करुणा को प्राप्त करने हेतु सहिष्णुता का होना अति आवश्यक है विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विचारों की बहुलता एवं विविधता अधिक है| · सत्यनिष्ठा यह मांग करती है कि लोकसेवक तटस्थ हो, यहाँ तटस्थता का तात्पर्य लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता | एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वहअनामिता(Anonymity)के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति,राजनीतिक दलों के प्रति)समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| · भेदभावरहितता को प्राप्त करने हेतु लोकसेवकों में वस्तुनिष्ठता का होना अनिवार्य है|बिना वस्तुनिष्ठता के लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा को प्राप्त किया जाना संभव नहीं है उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि लोकसेवकों से अपेक्षित मूल्यों पारस्परिक अंतरनिर्भरता है| ध्यातव्य है कि एक लोक सेवक का व्यवहार एक लोक सेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमें किसी भी प्रकार की कमी का होना या अभाव का होना सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाता है| अतः सत्यनिष्ठा एक व्यापक एवं सर्वांगीणमूल्य(Value)को दर्शाती है|मूल्य का आशय किसी व्यक्ति के मानसिक प्राथमिकता से है अर्थात उसकी पसंद या नापसंद से है| व्यक्तिगत स्तर पर प्राथमिकता उसके मानव होने की प्राथमिकता, संगठन की प्राथमिकता, सामाजिक प्राथमिकता आदि से मेल खानी चाहिए|मनसा वाचा कर्मणा समभाव ही सत्यनिष्ठा है| यह किसी लोकसेवा का आधारभूत मूल्य है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सत्यनिष्ठा मूल्यों का मूल्य है|
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संविधान की आधारभूत संरचना से आप क्या समझते हैं?विभिन्न न्यायिक निर्णयों द्वारा इस सिद्धान्त के क्रमिक विकास पर चर्चा कीजिए। (150 -200 शब्द; 10 अंक ) What do you understand by the basic structure of the constitution? Discuss the progressive development of this doctrine by various judicial decisions. (150 -200 words; 10 Marks)
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अप्रोच :- संविधान की आधारभूत संरचना को स्पष्ट करतेहुए प्रारंभ कीजिये। विभिन्न न्यायिक निर्णयों द्वारा इस सिद्धान्त के विकास को समझाये जिसमेकेशवानंद भारती केस पर विशेष बल दीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानन्द भारती मामले में आधारभूत संरचना का सिद्धान्त स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर सीमाएं आरोपित करना है ताकि संविधान की आधारिक संरचना में कोई परिवर्तन न किया जा सके। वस्तुतः ये मौलिक प्रावधान और सिद्धान्त संविधान की भावना की रक्षा के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हैं। संविधान संशोधन व राज्य के आधारभूत लक्षण का सिद्धांत का विकास- शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ 1951 प्रथम संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को स्थापित किया और सरकार की उस कार्यवाही को उचित बताया , जिसके अंतर्गत संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार होते हुए भी सीमित किया जा सकता है सार्वजनिक कल्याण के लिए सरकार किसी की जमीन का अधिग्रहण कर सकती है और यह अनुच्छेद 16 और 19 का उल्लंघन नहीं माना जायेगा। सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य 1965 17 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1964 को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी और सीलिंग कानून को उचित बताया। गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6 :5 के बहुमत से ना केवल , पूर्व में दिए अपने ही फैसले को पलट दिया बल्कि निम्नलिखित व्यवस्था दी। मौलिक अधिकारों में कोई भी संशोधन करने के उपरांत जिस अधिनियम का निर्माण होता है , वह 13 (2 ) में वर्णित विधि की परिभाषा में आएगा। इसलिए इसे भाग 3 के साथ असंगत होने की स्थिति में रद्द किया जा सकता है। मौलिक अधिकारों में किसी भी तरह का बदलाव एक नयी संविधान सभा ही कर सकती है ;इसे वर्तमान संसद संशोधित नहीं कर सकती। संसद के संविधान संशोधन के अधिकार को संविधायी अधिकार मानने से इंकार कर दिया , बल्कि इसे आगंतुक लक्षण माना। 24 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971 के द्वारा गोलकनाथ वाद में दिए गए उपरोक्त फैसले को फलत दिया। संसद ने इस अधिनियम के माध्यम से यह व्यवस्था दी कि संविधान संशोधन के उपरांत जिस अधिनियम का निर्माण होगा , वह 13 (2 ) की परिभाषा में विधि नहीं माना जायेगा। साथ ही एक अन्य संशोधन के द्वारा 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 368 में उपवाक्य 4 और 5 जोड़े गए , जिसके अनुसार यह व्यवस्था दी गयी कि संसद द्वारा संविधान संशोधन के उपरांत जिस अधिनियम का निर्माण होगा। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट उसकी समीक्षा नहीं कर सकेंगे। संसद के पास असीमित शक्तियां होंगी। मिनर्वा मिल वाद 1980 में 368 (4) और 368(5) दोनों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया , किन्तु 24 वें संविधान संशोधन द्वारा स्थापित व्यवस्था को केशवानंद भारती वाद में सही ठहराया था। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर संसद द्वारा संविधान के किसी भी भाग में संशोधन के अधिकार की वैधता स्वीकार कर ली अर्थात उसने 24 वें संविधान संशोधन 1971 के उस उपबंध को स्वीकार कर किया,जिसमे यह कहा गया थाकी संसदअनुच्छेद 368 में वर्णित प्रक्रिया का वर्णन करके किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है अत: भाग 3 में भी संशोधन किया जा सकता है। इस संशोधन के उपरांत निर्मित अधिनियम, 13 (2 ) की परिभाषा में नहीं आएगा। किन्तु इसी मुक़्क़ददमे में उसने आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया। उसके अनुसार संविधान के कुछ ऐसे लक्षण है , जिन्हे संसद संशोधित नहीं कर सकती। हालाँकि न्यायालय ने यह नहीं बताया कि वह कौन कौन से लक्षण है , किन्तु बाद के विभिन्न फैसलों में निम्नलिखित को आधारभूत लक्षण घोषित किया गया न्यायिक समीक्षा या पुनर्वलोकन सम्प्रभुता देश कासंघीय ढांचा देश की एकता व अखंडता गणतांत्रिक चरित्र विधि का शासन विधि की उचित प्रक्रिया पंथ निरपेक्षता समाजवादी प्रारूप लोकतंत्र यह सिद्धान्त वर्तमान की परिस्थितियों के अनुरूपनिरंतर विकसित हो रहा है तथा न्यायपालिका ने अपने उत्तरवर्ती निर्णयों के माध्यम से आधारिक संरचना के क्षेत्र को और अधिक विस्तृत किया है।
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##Question:संविधान की आधारभूत संरचना से आप क्या समझते हैं?विभिन्न न्यायिक निर्णयों द्वारा इस सिद्धान्त के क्रमिक विकास पर चर्चा कीजिए। (150 -200 शब्द; 10 अंक ) What do you understand by the basic structure of the constitution? Discuss the progressive development of this doctrine by various judicial decisions. (150 -200 words; 10 Marks)##Answer:अप्रोच :- संविधान की आधारभूत संरचना को स्पष्ट करतेहुए प्रारंभ कीजिये। विभिन्न न्यायिक निर्णयों द्वारा इस सिद्धान्त के विकास को समझाये जिसमेकेशवानंद भारती केस पर विशेष बल दीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानन्द भारती मामले में आधारभूत संरचना का सिद्धान्त स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर सीमाएं आरोपित करना है ताकि संविधान की आधारिक संरचना में कोई परिवर्तन न किया जा सके। वस्तुतः ये मौलिक प्रावधान और सिद्धान्त संविधान की भावना की रक्षा के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हैं। संविधान संशोधन व राज्य के आधारभूत लक्षण का सिद्धांत का विकास- शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ 1951 प्रथम संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता को स्थापित किया और सरकार की उस कार्यवाही को उचित बताया , जिसके अंतर्गत संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार होते हुए भी सीमित किया जा सकता है सार्वजनिक कल्याण के लिए सरकार किसी की जमीन का अधिग्रहण कर सकती है और यह अनुच्छेद 16 और 19 का उल्लंघन नहीं माना जायेगा। सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य 1965 17 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1964 को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी और सीलिंग कानून को उचित बताया। गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 1967 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6 :5 के बहुमत से ना केवल , पूर्व में दिए अपने ही फैसले को पलट दिया बल्कि निम्नलिखित व्यवस्था दी। मौलिक अधिकारों में कोई भी संशोधन करने के उपरांत जिस अधिनियम का निर्माण होता है , वह 13 (2 ) में वर्णित विधि की परिभाषा में आएगा। इसलिए इसे भाग 3 के साथ असंगत होने की स्थिति में रद्द किया जा सकता है। मौलिक अधिकारों में किसी भी तरह का बदलाव एक नयी संविधान सभा ही कर सकती है ;इसे वर्तमान संसद संशोधित नहीं कर सकती। संसद के संविधान संशोधन के अधिकार को संविधायी अधिकार मानने से इंकार कर दिया , बल्कि इसे आगंतुक लक्षण माना। 24 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971 के द्वारा गोलकनाथ वाद में दिए गए उपरोक्त फैसले को फलत दिया। संसद ने इस अधिनियम के माध्यम से यह व्यवस्था दी कि संविधान संशोधन के उपरांत जिस अधिनियम का निर्माण होगा , वह 13 (2 ) की परिभाषा में विधि नहीं माना जायेगा। साथ ही एक अन्य संशोधन के द्वारा 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 368 में उपवाक्य 4 और 5 जोड़े गए , जिसके अनुसार यह व्यवस्था दी गयी कि संसद द्वारा संविधान संशोधन के उपरांत जिस अधिनियम का निर्माण होगा। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट उसकी समीक्षा नहीं कर सकेंगे। संसद के पास असीमित शक्तियां होंगी। मिनर्वा मिल वाद 1980 में 368 (4) और 368(5) दोनों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया , किन्तु 24 वें संविधान संशोधन द्वारा स्थापित व्यवस्था को केशवानंद भारती वाद में सही ठहराया था। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर संसद द्वारा संविधान के किसी भी भाग में संशोधन के अधिकार की वैधता स्वीकार कर ली अर्थात उसने 24 वें संविधान संशोधन 1971 के उस उपबंध को स्वीकार कर किया,जिसमे यह कहा गया थाकी संसदअनुच्छेद 368 में वर्णित प्रक्रिया का वर्णन करके किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है अत: भाग 3 में भी संशोधन किया जा सकता है। इस संशोधन के उपरांत निर्मित अधिनियम, 13 (2 ) की परिभाषा में नहीं आएगा। किन्तु इसी मुक़्क़ददमे में उसने आधारभूत लक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया। उसके अनुसार संविधान के कुछ ऐसे लक्षण है , जिन्हे संसद संशोधित नहीं कर सकती। हालाँकि न्यायालय ने यह नहीं बताया कि वह कौन कौन से लक्षण है , किन्तु बाद के विभिन्न फैसलों में निम्नलिखित को आधारभूत लक्षण घोषित किया गया न्यायिक समीक्षा या पुनर्वलोकन सम्प्रभुता देश कासंघीय ढांचा देश की एकता व अखंडता गणतांत्रिक चरित्र विधि का शासन विधि की उचित प्रक्रिया पंथ निरपेक्षता समाजवादी प्रारूप लोकतंत्र यह सिद्धान्त वर्तमान की परिस्थितियों के अनुरूपनिरंतर विकसित हो रहा है तथा न्यायपालिका ने अपने उत्तरवर्ती निर्णयों के माध्यम से आधारिक संरचना के क्षेत्र को और अधिक विस्तृत किया है।
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वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द) Discuss the relevance of Kaushalya"s good governance approach in the context of the current regime. (150 words)
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दृष्टिकोण भूमिका में संक्षेप में कौटिल्य का परिचय दीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । मौर्य काल में चन्द्रगुप्त मौर्य के आचार्य कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में प्रशासन से संबन्धित महत्वपूर्ण विषयो पर प्रभावी दृष्टिकोण का उल्लेख किया है । यह कार्य भी उन्होने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में किया जो आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है तथा अगर उस दृष्टिकोण को भारतीय शासन और प्रशासन में क्रियान्वित किया जाए तो भारतीय सुशासन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है । सुशासन / नैतिक शासन के संदर्भ में हम कौटिल्य के दृष्टिकोण को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- कौटिल्य के अनुसार राजा को राज्य का सेवक होना चाहिए व राजा के मूल्य प्रजा की इच्छाओ पर आधारित होना चाहिए ( वर्तमान समय में भी लोक सेवकों का मूल्य जन अपेक्षाओ को प्रदर्शित करती है )। राजा को अपने व्यक्तित्व का विलय कर्तव्य और उतरदायित्व के साथ करना चाहिए ( लोक सेवा के लिए आवश्यक अपने कार्य के प्रति समर्पण के गुण को दर्शाता है )। लोककल्याण को सुनिश्चित करने हेतु एक सुचारु शासन प्रणाली का होना आवश्यक है तथा यह शासन प्रणाली जनकेन्द्रित होगा ( सत्यनिष्ठा को गुण को प्रदर्शित करता है)। आचरण संहिता का अनुपालन करते हुए राजा और मंत्रियो को अनुशासित जीवन का पालन करना चाहिए ताकि वह समाज के लिए आदर्श बन सके ।( आदर्श नेतृत्व ) राजा का प्राथमिक दायित्व व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता के संरक्षण से है और इस संदर्भ में राजा का प्रमुख दायित्व कानून और व्यवस्था को बनाए रखने से है व इस दायित्व में किसी प्रकार की खामी हेतु प्रत्यक्ष दायित्व स्वतः राजा का होगा ( यह मंत्रियो और प्रशासको के जबाबदेहिता के गुण को प्रदर्शित करता है)। कौटिल्य के अनुसार राजा व लोक सेवको के लिए भत्ता और वेतन निर्धारित होना चाहिए व इस निर्धारित वेतन से अधिक कोई आर्थिक लाभ प्राप्त करने का वह हकदार नही होगा । भ्रष्टाचार के निराकरण हेतु सारे संभव उपाय किए जाने चाहिए । लोक गतिविधि या लोक संसाधन व निजी गतिविधि या संसाधनो के बीच अंतर होना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार शासन की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु मंत्रियों का फेर बदल होना चाहिए । कौटिल्य के द्वारा उच्चतर स्तर पर विशेष रुप से ध्यान केन्द्रित किया गया है ताकि इसका सकारात्मक प्रभाव निम्नतर स्तर पर भी विद्यमान रहे । राजा में नेतृत्व, बुद्धिमता, ऊर्जा और नैतिक आचरण जैसे गुणो की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। कौटिल्य के द्वारा सुशासन और नैतिक शासन के संदर्भ में जिस दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया उसका महत्व वर्तमान समय में भी विद्यमान है। वर्तमान में शासन और प्रशासन के स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाचार , जबाबदेहिता का अभाव और उनकी कार्य प्रणाली में बढ़ती अपारदर्शिता अति गंभीर चिंताएँ है । कौटिल्य के द्वार सुशासन के इन्ही व्यवहारिक पक्षों पर विशेष बल दिया गया है । अतः इसका अनुप्रयोग अधिक संभव है ।
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##Question:वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द) Discuss the relevance of Kaushalya"s good governance approach in the context of the current regime. (150 words) ##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में संक्षेप में कौटिल्य का परिचय दीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । मौर्य काल में चन्द्रगुप्त मौर्य के आचार्य कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में प्रशासन से संबन्धित महत्वपूर्ण विषयो पर प्रभावी दृष्टिकोण का उल्लेख किया है । यह कार्य भी उन्होने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में किया जो आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है तथा अगर उस दृष्टिकोण को भारतीय शासन और प्रशासन में क्रियान्वित किया जाए तो भारतीय सुशासन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है । सुशासन / नैतिक शासन के संदर्भ में हम कौटिल्य के दृष्टिकोण को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- कौटिल्य के अनुसार राजा को राज्य का सेवक होना चाहिए व राजा के मूल्य प्रजा की इच्छाओ पर आधारित होना चाहिए ( वर्तमान समय में भी लोक सेवकों का मूल्य जन अपेक्षाओ को प्रदर्शित करती है )। राजा को अपने व्यक्तित्व का विलय कर्तव्य और उतरदायित्व के साथ करना चाहिए ( लोक सेवा के लिए आवश्यक अपने कार्य के प्रति समर्पण के गुण को दर्शाता है )। लोककल्याण को सुनिश्चित करने हेतु एक सुचारु शासन प्रणाली का होना आवश्यक है तथा यह शासन प्रणाली जनकेन्द्रित होगा ( सत्यनिष्ठा को गुण को प्रदर्शित करता है)। आचरण संहिता का अनुपालन करते हुए राजा और मंत्रियो को अनुशासित जीवन का पालन करना चाहिए ताकि वह समाज के लिए आदर्श बन सके ।( आदर्श नेतृत्व ) राजा का प्राथमिक दायित्व व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता के संरक्षण से है और इस संदर्भ में राजा का प्रमुख दायित्व कानून और व्यवस्था को बनाए रखने से है व इस दायित्व में किसी प्रकार की खामी हेतु प्रत्यक्ष दायित्व स्वतः राजा का होगा ( यह मंत्रियो और प्रशासको के जबाबदेहिता के गुण को प्रदर्शित करता है)। कौटिल्य के अनुसार राजा व लोक सेवको के लिए भत्ता और वेतन निर्धारित होना चाहिए व इस निर्धारित वेतन से अधिक कोई आर्थिक लाभ प्राप्त करने का वह हकदार नही होगा । भ्रष्टाचार के निराकरण हेतु सारे संभव उपाय किए जाने चाहिए । लोक गतिविधि या लोक संसाधन व निजी गतिविधि या संसाधनो के बीच अंतर होना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार शासन की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु मंत्रियों का फेर बदल होना चाहिए । कौटिल्य के द्वारा उच्चतर स्तर पर विशेष रुप से ध्यान केन्द्रित किया गया है ताकि इसका सकारात्मक प्रभाव निम्नतर स्तर पर भी विद्यमान रहे । राजा में नेतृत्व, बुद्धिमता, ऊर्जा और नैतिक आचरण जैसे गुणो की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। कौटिल्य के द्वारा सुशासन और नैतिक शासन के संदर्भ में जिस दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया उसका महत्व वर्तमान समय में भी विद्यमान है। वर्तमान में शासन और प्रशासन के स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाचार , जबाबदेहिता का अभाव और उनकी कार्य प्रणाली में बढ़ती अपारदर्शिता अति गंभीर चिंताएँ है । कौटिल्य के द्वार सुशासन के इन्ही व्यवहारिक पक्षों पर विशेष बल दिया गया है । अतः इसका अनुप्रयोग अधिक संभव है ।
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ब्रिटिश काल में सिविल सेवा के विकास का विवरण देते हुए साम्राज्यवाद के प्रसार में इसकी भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Giving details of the development of civil services in the British period discuss its role in the expansion of imperialism. (150-200 words/10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में सिविल सेवा के उद्भव को लिखिए। इसके पश्चात इसके क्रमिक विकास का संक्षिप्त विवरण दीजिए। संयुक्त रूप से अंग्रेजों द्वारा सिविल सेवा के कारण साम्राज्यवादी प्रवृत्ति में विस्तार पर चर्चा कीजिए। अंत में अंग्रेज़ अपने उद्देश्यों में कितना सफल हुए इसको लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। भारत में सिविल सेवा अंग्रेजों की देन है जिसका औपचारिक रूप से शुरुआत लॉर्ड कार्नवालिस के समय हुआ। इसलिए इसे भारतीय सिविल सेवा का जनक भी कहा जाता है। 1780 के दशक के प्रारम्भ इसमें समय के साथ अनेक बदलाव हुए। इसके क्रमिक विकास को इस प्रकार से समझ सकते हैं: कार्नवालिस ने उच्च लोकसेवा आयोग की शुरुआत की। वेलेजली ने कंपनी के लोक सेवकों को प्रशिक्षण देने के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। 1833 के चार्टर एक्ट के माध्यम से कंपनी के लोकसेवकों के चयन के आधार के रूप में खुली प्रतियोगिता प्रणाली की शुरुआत का प्रयास किया गया। 1861 में भारतीय सिविल सेवा अधिनियम पारित हुआ। इसमें परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखा गया । एचिसन कमेटी के सुझावों के बाद सिविल सेवा को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया- सिविल सेवा, प्रांतीय सिविल सेवा, अधीनस्थ सिविल सेवा। मांटफोर्ड सुधारों के माध्यम से अधिक संख्या में भारतीयों की भर्ती की प्रक्रिया प्रारम्भ की गयी। भारत शासन अधिनियम, 1935 के माध्यम से संघ एवं प्रांतीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की गयी। गौरतलब है कि सिविल सेवाओं का भारत में प्रसार अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति का एक प्रमुख भाग था। इसके माध्यम से भारतीय राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे। सिविल सेवाओं ने साम्राज्य प्रसार में निम्न प्रकार से योगदान दिया: इसके माध्यम से अंग्रेजों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि जमीनी स्तर की समस्याओं के समाधान के लिए वे प्रतिबद्ध हैं। भारत की ग्रामीण व्यवस्था व सामाजिक स्थिति का सही आकलन इसके माध्यम से कर सके। इसके माध्यम से अंग्रेज़ अपनी नीतियों को लागू करने में कामयाब रहे। एक सीमित मात्रा में भारतीयों को शामिल करके काफी हद जनता के आक्रोश को शांत करने में कामयाब रहे। इसके माध्यम बहुत से भारतीय जो शामिल हुए वे भी अंग्रेजों के ही हितों को सोचते थे। इस व्यवस्था ने भारतीयों के मन में पाश्चात्य विचारों को प्रसारित करने सहायता की। वर्तमान में भी इसे देखा जा सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत में सिविल सेवा का प्रसार अंग्रेजों की एक योजनबद्ध नीति का भाग था। जिसके माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था को सही रूप स संचालित करने में अंग्रेज़ सफल हुए परंतु इसका अत्यधिक लाभ अंग्रेजों को ही हुआ। यद्यपि इस सेवा के भारतीयकरण के प्रयास किए गए परंतु स्वतन्त्रता प्राप्ति तक सीमित सफलता मिली।
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##Question:ब्रिटिश काल में सिविल सेवा के विकास का विवरण देते हुए साम्राज्यवाद के प्रसार में इसकी भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Giving details of the development of civil services in the British period discuss its role in the expansion of imperialism. (150-200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में सिविल सेवा के उद्भव को लिखिए। इसके पश्चात इसके क्रमिक विकास का संक्षिप्त विवरण दीजिए। संयुक्त रूप से अंग्रेजों द्वारा सिविल सेवा के कारण साम्राज्यवादी प्रवृत्ति में विस्तार पर चर्चा कीजिए। अंत में अंग्रेज़ अपने उद्देश्यों में कितना सफल हुए इसको लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। भारत में सिविल सेवा अंग्रेजों की देन है जिसका औपचारिक रूप से शुरुआत लॉर्ड कार्नवालिस के समय हुआ। इसलिए इसे भारतीय सिविल सेवा का जनक भी कहा जाता है। 1780 के दशक के प्रारम्भ इसमें समय के साथ अनेक बदलाव हुए। इसके क्रमिक विकास को इस प्रकार से समझ सकते हैं: कार्नवालिस ने उच्च लोकसेवा आयोग की शुरुआत की। वेलेजली ने कंपनी के लोक सेवकों को प्रशिक्षण देने के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। 1833 के चार्टर एक्ट के माध्यम से कंपनी के लोकसेवकों के चयन के आधार के रूप में खुली प्रतियोगिता प्रणाली की शुरुआत का प्रयास किया गया। 1861 में भारतीय सिविल सेवा अधिनियम पारित हुआ। इसमें परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी रखा गया । एचिसन कमेटी के सुझावों के बाद सिविल सेवा को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया- सिविल सेवा, प्रांतीय सिविल सेवा, अधीनस्थ सिविल सेवा। मांटफोर्ड सुधारों के माध्यम से अधिक संख्या में भारतीयों की भर्ती की प्रक्रिया प्रारम्भ की गयी। भारत शासन अधिनियम, 1935 के माध्यम से संघ एवं प्रांतीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की गयी। गौरतलब है कि सिविल सेवाओं का भारत में प्रसार अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति का एक प्रमुख भाग था। इसके माध्यम से भारतीय राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे। सिविल सेवाओं ने साम्राज्य प्रसार में निम्न प्रकार से योगदान दिया: इसके माध्यम से अंग्रेजों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि जमीनी स्तर की समस्याओं के समाधान के लिए वे प्रतिबद्ध हैं। भारत की ग्रामीण व्यवस्था व सामाजिक स्थिति का सही आकलन इसके माध्यम से कर सके। इसके माध्यम से अंग्रेज़ अपनी नीतियों को लागू करने में कामयाब रहे। एक सीमित मात्रा में भारतीयों को शामिल करके काफी हद जनता के आक्रोश को शांत करने में कामयाब रहे। इसके माध्यम बहुत से भारतीय जो शामिल हुए वे भी अंग्रेजों के ही हितों को सोचते थे। इस व्यवस्था ने भारतीयों के मन में पाश्चात्य विचारों को प्रसारित करने सहायता की। वर्तमान में भी इसे देखा जा सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत में सिविल सेवा का प्रसार अंग्रेजों की एक योजनबद्ध नीति का भाग था। जिसके माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था को सही रूप स संचालित करने में अंग्रेज़ सफल हुए परंतु इसका अत्यधिक लाभ अंग्रेजों को ही हुआ। यद्यपि इस सेवा के भारतीयकरण के प्रयास किए गए परंतु स्वतन्त्रता प्राप्ति तक सीमित सफलता मिली।
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वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द) Discuss the relevance of Kaushalya"s good governance approach in the context of the current regime. (150 words)
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· भूमिका में संक्षेप में कौटिल्य का परिचय दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । मौर्य काल में चन्द्रगुप्त मौर्य के आचार्य कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में प्रशासन से संबन्धित महत्वपूर्ण विषयो पर प्रभावी दृष्टिकोण का उल्लेख किया है । यह कार्य भी उन्होने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में किया जो आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है तथा अगर उस दृष्टिकोण को भारतीय शासन और प्रशासन में क्रियान्वित किया जाए तो भारतीय सुशासन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है । सुशासन / नैतिक शासन के संदर्भ में हम कौटिल्य के दृष्टिकोण को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- कौटिल्य के अनुसार राजा को राज्य का सेवक होना चाहिए व राजा के मूल्य प्रजा की इच्छाओ पर आधारित होना चाहिए ( वर्तमान समय में भी लोक सेवकों का मूल्य जन अपेक्षाओ को प्रदर्शित करती है )। राजा को अपने व्यक्तित्व का विलय कर्तव्य और उतरदायित्व के साथ करना चाहिए ( लोक सेवा के लिए आवश्यक अपने कार्य के प्रति समर्पण के गुण को दर्शाता है )। लोककल्याण को सुनिश्चित करने हेतु एक सुचारु शासन प्रणाली का होना आवश्यक है तथा यह शासन प्रणाली जनकेन्द्रित होगा ( सत्यनिष्ठा को गुण को प्रदर्शित करता है)। आचरण संहिता का अनुपालन करते हुए राजा और मंत्रियो को अनुशासित जीवन का पालन करना चाहिए ताकि वह समाज के लिए आदर्श बन सके ।( आदर्श नेतृत्व ) राजा का प्राथमिक दायित्व व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता के संरक्षण से है और इस संदर्भ में राजा का प्रमुख दायित्व कानून और व्यवस्था को बनाए रखने से है व इस दायित्व में किसी प्रकार की खामी हेतु प्रत्यक्ष दायित्व स्वतः राजा का होगा ( यह मंत्रियो और प्रशासको के जबाबदेहिता के गुण को प्रदर्शित करता है)। कौटिल्य के अनुसार राजा व लोक सेवको के लिए भत्ता और वेतन निर्धारित होना चाहिए व इस निर्धारित वेतन से अधिक कोई आर्थिक लाभ प्राप्त करने का वह हकदार नही होगा । भ्रष्टाचार के निराकरण हेतु सारे संभव उपाय किए जाने चाहिए । लोक गतिविधि या लोक संसाधन व निजी गतिविधि या संसाधनो के बीच अंतर होना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार शासन की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु मंत्रियों का फेर बदल होना चाहिए । कौटिल्य के द्वारा उच्चतर स्तर पर विशेष रुप से ध्यान केन्द्रित किया गया है ताकि इसका सकारात्मक प्रभाव निम्नतर स्तर पर भी विद्यमान रहे । राजा में नेतृत्व, बुद्धिमता, ऊर्जा और नैतिक आचरण जैसे गुणो की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। कौटिल्य के द्वारा सुशासन और नैतिक शासन के संदर्भ में जिस दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया उसका महत्व वर्तमान समय में भी विद्यमान है। वर्तमान में शासन और प्रशासन के स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाचार , जबाबदेहिता का अभाव और उनकी कार्य प्रणाली में बढ़ती अपारदर्शिता अति गंभीर चिंताएँ है । कौटिल्य के द्वार सुशासन के इन्ही व्यवहारिक पक्षों पर विशेष बल दिया गया है । अतः इसका अनुप्रयोग अधिक संभव है ।
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##Question:वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द) Discuss the relevance of Kaushalya"s good governance approach in the context of the current regime. (150 words)##Answer:· भूमिका में संक्षेप में कौटिल्य का परिचय दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में कौटिल्य के सुशासन संबंधी दृष्टिकोण की वर्तमान शासन के परिपेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । मौर्य काल में चन्द्रगुप्त मौर्य के आचार्य कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में प्रशासन से संबन्धित महत्वपूर्ण विषयो पर प्रभावी दृष्टिकोण का उल्लेख किया है । यह कार्य भी उन्होने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में किया जो आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है तथा अगर उस दृष्टिकोण को भारतीय शासन और प्रशासन में क्रियान्वित किया जाए तो भारतीय सुशासन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है । सुशासन / नैतिक शासन के संदर्भ में हम कौटिल्य के दृष्टिकोण को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- कौटिल्य के अनुसार राजा को राज्य का सेवक होना चाहिए व राजा के मूल्य प्रजा की इच्छाओ पर आधारित होना चाहिए ( वर्तमान समय में भी लोक सेवकों का मूल्य जन अपेक्षाओ को प्रदर्शित करती है )। राजा को अपने व्यक्तित्व का विलय कर्तव्य और उतरदायित्व के साथ करना चाहिए ( लोक सेवा के लिए आवश्यक अपने कार्य के प्रति समर्पण के गुण को दर्शाता है )। लोककल्याण को सुनिश्चित करने हेतु एक सुचारु शासन प्रणाली का होना आवश्यक है तथा यह शासन प्रणाली जनकेन्द्रित होगा ( सत्यनिष्ठा को गुण को प्रदर्शित करता है)। आचरण संहिता का अनुपालन करते हुए राजा और मंत्रियो को अनुशासित जीवन का पालन करना चाहिए ताकि वह समाज के लिए आदर्श बन सके ।( आदर्श नेतृत्व ) राजा का प्राथमिक दायित्व व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता के संरक्षण से है और इस संदर्भ में राजा का प्रमुख दायित्व कानून और व्यवस्था को बनाए रखने से है व इस दायित्व में किसी प्रकार की खामी हेतु प्रत्यक्ष दायित्व स्वतः राजा का होगा ( यह मंत्रियो और प्रशासको के जबाबदेहिता के गुण को प्रदर्शित करता है)। कौटिल्य के अनुसार राजा व लोक सेवको के लिए भत्ता और वेतन निर्धारित होना चाहिए व इस निर्धारित वेतन से अधिक कोई आर्थिक लाभ प्राप्त करने का वह हकदार नही होगा । भ्रष्टाचार के निराकरण हेतु सारे संभव उपाय किए जाने चाहिए । लोक गतिविधि या लोक संसाधन व निजी गतिविधि या संसाधनो के बीच अंतर होना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार शासन की गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु मंत्रियों का फेर बदल होना चाहिए । कौटिल्य के द्वारा उच्चतर स्तर पर विशेष रुप से ध्यान केन्द्रित किया गया है ताकि इसका सकारात्मक प्रभाव निम्नतर स्तर पर भी विद्यमान रहे । राजा में नेतृत्व, बुद्धिमता, ऊर्जा और नैतिक आचरण जैसे गुणो की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। कौटिल्य के द्वारा सुशासन और नैतिक शासन के संदर्भ में जिस दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया उसका महत्व वर्तमान समय में भी विद्यमान है। वर्तमान में शासन और प्रशासन के स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाचार , जबाबदेहिता का अभाव और उनकी कार्य प्रणाली में बढ़ती अपारदर्शिता अति गंभीर चिंताएँ है । कौटिल्य के द्वार सुशासन के इन्ही व्यवहारिक पक्षों पर विशेष बल दिया गया है । अतः इसका अनुप्रयोग अधिक संभव है ।
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संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150-200 शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150-200 Words)
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एप्रोच: - सर्वप्रथम, संक्षेप मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा को समझाइये। तत्पश्चात, विभिन्न तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मेंनिचली यामध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षेत्रीय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपाश्चात्यीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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##Question:संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150-200 शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150-200 Words)##Answer:एप्रोच: - सर्वप्रथम, संक्षेप मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा को समझाइये। तत्पश्चात, विभिन्न तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मेंनिचली यामध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षेत्रीय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपाश्चात्यीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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Define potential GDP and explain its determinants. What are the factors that have been inhibiting India from realizing its potential GDP? (2020) (150 words/10 marks)
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Approach 1. Write a short note on HDI. 2. Different determinants of HDI. 3. Write about the merits of HDi and analyze how it is not a comprehensive index. 4. Give your opinion. Answer United nations development program (UNDP) published its first human development report in 1990.The HDI was created to emphasize that people and their capabilities should be the ultimate criteria for assessing the development of a country, not economic growth alone.The index is based on the human development approach, developed by Amartya Sen, often framed in terms of whether people are able to "be" and "do" desirable things in life. The HDI framework comprises three indices: Life Expectancy Index, based on life expectancy at birth. The index is 1 when it is 85 years and 0 when it is 20 years. Education Index , based on mean years of schooling (15 is the projected maximum for 2025) and expected years of schooling (18 is the projected maximum – this is the equivalent of achieving a postgraduate degree in most countries). Income Index , based on Gross National Income (GNI) per capita by Purchasing Power Parity (PPP), which considers exchange rates and inflation adjustments when determining individual wealth. The index is 1 when GNI per capita is US$75,000 or above, and 0 when it is US$100. The human development index is the geometric mean of the life expectancy index, Education index, and Income index. Together, these three indices provide, in broad-brush terms, an indication of a person’s capabilities and wellbeing. They provide a richer picture of progress than the gross domestic product (GDP), which relates to a country’s wealth, or even GDP per capita, which tells us something about an individual’s means but nothing about their life outcomes. Shortcomings and Critique of the Human Development Index (HDI) - For estimating literacy rate, expected years of schooling by children at the entrance age is used which overstates the literacy rate as in many countries (including India) many children who join primary school later drop out at some stage. In preparing HDI equal weight of 1/3 is given to each of the three variables, namely, life expectancy, literacy rate and GNI per capita. This involves some value judgment and seems to be quite arbitrary. Besides, since these three components of HDI are measured in different units, to give equal weight to each component of HDI does not make much sense. In constructing the human development index, the role of quality has been ignored. For example, there is a big difference between the extra year of life for a healthy well-educated person and an extra one year life for a person who is bed-ridden and has limited capability to do work. Similarly, in constructing HDI only the number of years of schooling is taken into account while the quality of education also matters a lot for good living. Due to the lack of adequate data about the quality of health and education, it is not incorporated in the construction of HDI. But without the quality of health and education being considered, HDI does not represent the true index of human development. An important drawback of the human development index (HDI), is that it is of composite character which makes it an imperfect indicator of the development or well-being of the people. If these three components are highly correlated to each other, then a single one will serve the purpose of comparing the levels of development and well-being of the people of different countries. But Overall, the HDI has the potential to provide a simple impression of development that can be unpacked to indicate progress with respect to the SDGs. It can be used to complement alternative measures of development. And while factors such as conflict may not be reflected in the HDI, they may be captured in relation to their impact on wealth, access to education and life expectancy.
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##Question:Define potential GDP and explain its determinants. What are the factors that have been inhibiting India from realizing its potential GDP? (2020) (150 words/10 marks)##Answer:Approach 1. Write a short note on HDI. 2. Different determinants of HDI. 3. Write about the merits of HDi and analyze how it is not a comprehensive index. 4. Give your opinion. Answer United nations development program (UNDP) published its first human development report in 1990.The HDI was created to emphasize that people and their capabilities should be the ultimate criteria for assessing the development of a country, not economic growth alone.The index is based on the human development approach, developed by Amartya Sen, often framed in terms of whether people are able to "be" and "do" desirable things in life. The HDI framework comprises three indices: Life Expectancy Index, based on life expectancy at birth. The index is 1 when it is 85 years and 0 when it is 20 years. Education Index , based on mean years of schooling (15 is the projected maximum for 2025) and expected years of schooling (18 is the projected maximum – this is the equivalent of achieving a postgraduate degree in most countries). Income Index , based on Gross National Income (GNI) per capita by Purchasing Power Parity (PPP), which considers exchange rates and inflation adjustments when determining individual wealth. The index is 1 when GNI per capita is US$75,000 or above, and 0 when it is US$100. The human development index is the geometric mean of the life expectancy index, Education index, and Income index. Together, these three indices provide, in broad-brush terms, an indication of a person’s capabilities and wellbeing. They provide a richer picture of progress than the gross domestic product (GDP), which relates to a country’s wealth, or even GDP per capita, which tells us something about an individual’s means but nothing about their life outcomes. Shortcomings and Critique of the Human Development Index (HDI) - For estimating literacy rate, expected years of schooling by children at the entrance age is used which overstates the literacy rate as in many countries (including India) many children who join primary school later drop out at some stage. In preparing HDI equal weight of 1/3 is given to each of the three variables, namely, life expectancy, literacy rate and GNI per capita. This involves some value judgment and seems to be quite arbitrary. Besides, since these three components of HDI are measured in different units, to give equal weight to each component of HDI does not make much sense. In constructing the human development index, the role of quality has been ignored. For example, there is a big difference between the extra year of life for a healthy well-educated person and an extra one year life for a person who is bed-ridden and has limited capability to do work. Similarly, in constructing HDI only the number of years of schooling is taken into account while the quality of education also matters a lot for good living. Due to the lack of adequate data about the quality of health and education, it is not incorporated in the construction of HDI. But without the quality of health and education being considered, HDI does not represent the true index of human development. An important drawback of the human development index (HDI), is that it is of composite character which makes it an imperfect indicator of the development or well-being of the people. If these three components are highly correlated to each other, then a single one will serve the purpose of comparing the levels of development and well-being of the people of different countries. But Overall, the HDI has the potential to provide a simple impression of development that can be unpacked to indicate progress with respect to the SDGs. It can be used to complement alternative measures of development. And while factors such as conflict may not be reflected in the HDI, they may be captured in relation to their impact on wealth, access to education and life expectancy.
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Briefly explain Universal Basic Income. Highlighting its Benefits and Issues concerned , do you think India should adopt UBI.Critically Examine?(150 words) 10 Marks
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Approach 1. Introduce the answer by briefly explaining the concept of Universal Basic Income. 2. Highlight the benefits of Universal basic income 3. Bring out issues concerned with the implementation of Universal Basic Income 4. Give a suitable way forward, one can suggest either way whether India Should adopt UBI or not. Answer A Universal basic income is a regular, periodic cash payment delivered unconditionally to all citizens on an individual basis, without the requirement of work or willingness to work. The idea of UBI was first stated in the Economic survey of 2016-17. The Survey targets the bottom 75% of Population to be provided with basic income. The second alternative suggested was to target only women, who face a lack of social, economic empowerment. The third alternative suggested basic income to vulnerable groups such as old age, pregnant women, destitute mothers etc. Benefits of Universal Basic Income 1. It provides insurance against unemployment and hence helps in reducing poverty. 2. A UBI treats beneficiaries as agents and entrusts citizens with the responsibility of using welfare spending as they see best; this may not be the case with in-kind transfers. 3. Economic Survey suggested that basic income transfer into bank accounts will increase the demand for financial services and will promote financial inclusion. 4. A guaranteed income will reduce the pressures of finding a basic living on a daily basis. 5. A UBI in place of a plethora of separate government schemes will reduce the administrative burden on the state. 6. It will lead to equitable distribution of wealth, in case if only poor will receive the benefits. Issues/Arguments against Universal Basic Income 1. A minimum guaranteed income might make people lazy and opt-out of the labour market. 2. Once introduced, it may become difficult for the government to wind up a UBI in case of failure. 3. No guarantee that income will be spent on education, health etc and might be used for temptation goods like Alcohol, Tobacco etc. 4. Given the current status of financial access among the poor, a UBI may put too much stress on the banking system. 5. The opposition may arise from the provision of the transfer to rich individuals as it might seem to trump the idea of equity and state welfare for the poor. 6. Centre-State negotiations on cost-sharing for the programme could delay its implementation. Way Forward Though the concept of Basic income will support especially those who live below the poverty line and may try to address inequality in society. But as a long term solution, the focus should be more on the empowerment of people with Guaranteed minimum wage, education & healthcare reforms.
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##Question:Briefly explain Universal Basic Income. Highlighting its Benefits and Issues concerned , do you think India should adopt UBI.Critically Examine?(150 words) 10 Marks##Answer:Approach 1. Introduce the answer by briefly explaining the concept of Universal Basic Income. 2. Highlight the benefits of Universal basic income 3. Bring out issues concerned with the implementation of Universal Basic Income 4. Give a suitable way forward, one can suggest either way whether India Should adopt UBI or not. Answer A Universal basic income is a regular, periodic cash payment delivered unconditionally to all citizens on an individual basis, without the requirement of work or willingness to work. The idea of UBI was first stated in the Economic survey of 2016-17. The Survey targets the bottom 75% of Population to be provided with basic income. The second alternative suggested was to target only women, who face a lack of social, economic empowerment. The third alternative suggested basic income to vulnerable groups such as old age, pregnant women, destitute mothers etc. Benefits of Universal Basic Income 1. It provides insurance against unemployment and hence helps in reducing poverty. 2. A UBI treats beneficiaries as agents and entrusts citizens with the responsibility of using welfare spending as they see best; this may not be the case with in-kind transfers. 3. Economic Survey suggested that basic income transfer into bank accounts will increase the demand for financial services and will promote financial inclusion. 4. A guaranteed income will reduce the pressures of finding a basic living on a daily basis. 5. A UBI in place of a plethora of separate government schemes will reduce the administrative burden on the state. 6. It will lead to equitable distribution of wealth, in case if only poor will receive the benefits. Issues/Arguments against Universal Basic Income 1. A minimum guaranteed income might make people lazy and opt-out of the labour market. 2. Once introduced, it may become difficult for the government to wind up a UBI in case of failure. 3. No guarantee that income will be spent on education, health etc and might be used for temptation goods like Alcohol, Tobacco etc. 4. Given the current status of financial access among the poor, a UBI may put too much stress on the banking system. 5. The opposition may arise from the provision of the transfer to rich individuals as it might seem to trump the idea of equity and state welfare for the poor. 6. Centre-State negotiations on cost-sharing for the programme could delay its implementation. Way Forward Though the concept of Basic income will support especially those who live below the poverty line and may try to address inequality in society. But as a long term solution, the focus should be more on the empowerment of people with Guaranteed minimum wage, education & healthcare reforms.
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दुर्गम क्षेत्र एवं सीमा विवादों के कारण सीमा प्रबंधन एक कठिन कार्य है| इस संदर्भ में भारत में प्रभावशाली सीमा प्रबंधन की चुनौतियों एवं रणनीतियों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/10 अंक) Border management is a difficult task due to difficult terrain and border disputes. In this context, briefly discuss the challenges and strategies of effective border management in India. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच - भूमिका में सीमा प्रबंधन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये | इसके पश्चात सीमा प्रबंधन की चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | तदोपरांत सरकार द्वारा अपनाई गयीं रणनीतियों को बताइए | अंत में सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सीमा सुरक्षा का दृष्टिकोण केवल सीमाओं से सम्बंधित हैं , वही सीमा प्रबंधन एक व्यापक शब्द है जो न केवल सीमाओं की सुरक्षा बल्कि सीमाओं से सम्बद्ध देश के हितों की सुरक्षा को भी सम्मिलित करता है | सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ - सीमा प्रबंधन से सम्बंधित मुख्य चुनौती भौगोलिक कारकों से होती है , उदाहरण के लिए दुर्गम भूभाग , दलदल ,नदियाँ इत्यादि | सीमा प्रबंधन पूर्वी क्षेत्र में मुख्य चुनौती है क्योंकि वहां अवसंरचनात्मक विकास नहीं हुआ है | पडोसी देशों के साथ संबंधों में अस्थिरता ,सत्ता परिवर्तन से निकटवर्ती राज्यों में अस्थिरता से प्रभावित होती है | उदाहरण के लिए बांग्लादेश में सरकार परिवर्तन और म्यांमार में सैनिक शासन का हमारे संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है| सीमा पर अवसंरचनात्मक विकास के लिए वित्त में कमी ,जिससे त्वरित विकास नहीं हो पाता है | सीमा रेखा का निर्धारण विशेषकर चीन के साथ, सीमा पर चीन द्वारा अतिक्रमण एवं विकास में अवरोध डालना | सरकार द्वारा बनायी गयीं रणनीतियां एवं प्रयास - भूमि सीमा प्रबंधन - 1. डबल पंक्ति बाड़ एवं उसका विद्युतीकरण 2. फ्लड लाइट्स का प्रयोग 3. स्मार्ट फेंसिंग तटीय सुरक्षा प्रणाली - 1.समुद्री सीमा शुल्क संगठन 2. भारतीय तटरक्षक बल 3. समुद्री पुलिस बल सुझाव - सीमा पर निगरानी के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी विशेषकर उपग्रह और हवाई चित्रण का प्रयोग करना चाहिए | हेलीकाप्टर यूनिट्स की स्थापना के माध्यम से हवाई निगरानी का प्रयोग करना चाहिए | एकल बिंदु नियंत्रण का सिद्धांत या एक- बल - एक -सीमा सिद्धांत का अक्षरशः पालन करना चाहिए | भारतीय तटरक्षक बल को तटीय सुरक्षा के लिए जिम्मेदार एकल प्राधिकरण के रूप में नामित किया जाना चाहिए | भारतीय तटरक्षकबल को गृह मंत्रालय के तहत लाया जाना चाहिए एवं समुद्री पुलिस को प्रशिक्षण प्रदान करने के मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए | सीमाओं का उचित प्रबंधन करने के लिए भारत को सहभागी और बहुराष्ट्रीय एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है |इसके अतिरिक्त सीमा पर स्थित आबादी में अलगाव की भावना को रोकने के लिए ,सीमा सुरक्षा बलों द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम को अपनाना चाहिए | इसके साथ ही सीमा - व्यापार में वृद्धि एवं स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को बढ़ाना चाहिये , जिससे अवैध तस्करी को रोका जा सके और जो सुरक्षा के साथ-साथ लोगों के मध्य सौहार्द एवं देश के विकास में योगदान करे |
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##Question:दुर्गम क्षेत्र एवं सीमा विवादों के कारण सीमा प्रबंधन एक कठिन कार्य है| इस संदर्भ में भारत में प्रभावशाली सीमा प्रबंधन की चुनौतियों एवं रणनीतियों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/10 अंक) Border management is a difficult task due to difficult terrain and border disputes. In this context, briefly discuss the challenges and strategies of effective border management in India. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सीमा प्रबंधन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये | इसके पश्चात सीमा प्रबंधन की चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | तदोपरांत सरकार द्वारा अपनाई गयीं रणनीतियों को बताइए | अंत में सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सीमा सुरक्षा का दृष्टिकोण केवल सीमाओं से सम्बंधित हैं , वही सीमा प्रबंधन एक व्यापक शब्द है जो न केवल सीमाओं की सुरक्षा बल्कि सीमाओं से सम्बद्ध देश के हितों की सुरक्षा को भी सम्मिलित करता है | सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ - सीमा प्रबंधन से सम्बंधित मुख्य चुनौती भौगोलिक कारकों से होती है , उदाहरण के लिए दुर्गम भूभाग , दलदल ,नदियाँ इत्यादि | सीमा प्रबंधन पूर्वी क्षेत्र में मुख्य चुनौती है क्योंकि वहां अवसंरचनात्मक विकास नहीं हुआ है | पडोसी देशों के साथ संबंधों में अस्थिरता ,सत्ता परिवर्तन से निकटवर्ती राज्यों में अस्थिरता से प्रभावित होती है | उदाहरण के लिए बांग्लादेश में सरकार परिवर्तन और म्यांमार में सैनिक शासन का हमारे संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है| सीमा पर अवसंरचनात्मक विकास के लिए वित्त में कमी ,जिससे त्वरित विकास नहीं हो पाता है | सीमा रेखा का निर्धारण विशेषकर चीन के साथ, सीमा पर चीन द्वारा अतिक्रमण एवं विकास में अवरोध डालना | सरकार द्वारा बनायी गयीं रणनीतियां एवं प्रयास - भूमि सीमा प्रबंधन - 1. डबल पंक्ति बाड़ एवं उसका विद्युतीकरण 2. फ्लड लाइट्स का प्रयोग 3. स्मार्ट फेंसिंग तटीय सुरक्षा प्रणाली - 1.समुद्री सीमा शुल्क संगठन 2. भारतीय तटरक्षक बल 3. समुद्री पुलिस बल सुझाव - सीमा पर निगरानी के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी विशेषकर उपग्रह और हवाई चित्रण का प्रयोग करना चाहिए | हेलीकाप्टर यूनिट्स की स्थापना के माध्यम से हवाई निगरानी का प्रयोग करना चाहिए | एकल बिंदु नियंत्रण का सिद्धांत या एक- बल - एक -सीमा सिद्धांत का अक्षरशः पालन करना चाहिए | भारतीय तटरक्षक बल को तटीय सुरक्षा के लिए जिम्मेदार एकल प्राधिकरण के रूप में नामित किया जाना चाहिए | भारतीय तटरक्षकबल को गृह मंत्रालय के तहत लाया जाना चाहिए एवं समुद्री पुलिस को प्रशिक्षण प्रदान करने के मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए | सीमाओं का उचित प्रबंधन करने के लिए भारत को सहभागी और बहुराष्ट्रीय एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है |इसके अतिरिक्त सीमा पर स्थित आबादी में अलगाव की भावना को रोकने के लिए ,सीमा सुरक्षा बलों द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम को अपनाना चाहिए | इसके साथ ही सीमा - व्यापार में वृद्धि एवं स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को बढ़ाना चाहिये , जिससे अवैध तस्करी को रोका जा सके और जो सुरक्षा के साथ-साथ लोगों के मध्य सौहार्द एवं देश के विकास में योगदान करे |
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दुर्गम क्षेत्र एवं कुछ देशों के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधों के कारण सीमा प्रबंधन एक कठिन कार्य है | प्रभावशाली सीमा प्रबंधन की चुनौतियों एवं रणनीतियों पर संछिप्त चर्चा कीजिये | (200शब्द) Due to remote area and hostile relations with some countries, border management is a tough task. Discuss in brief the challenges and strategies of effective border mangement.
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एप्रोच - भूमिका में सीमा प्रबंधन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये | इसके पश्चात सीमा प्रबंधन की चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | तदोपरांत सरकार द्वारा अपनाई गयीं रणनीतियों को बताइए | अंत में सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सीमा सुरक्षा का दृष्टिकोण केवल सीमाओं से सम्बंधित हैं , वही सीमा प्रबंधन एक व्यापक शब्द है जो न केवल सीमाओं की सुरक्षा बल्कि सीमाओं से सम्बद्ध देश के हितों की सुरक्षा को भी सम्मिलित करता है | सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ - सीमा प्रबंधन से सम्बंधित मुख्य चुनौती भौगोलिक कारकों से होती है , उदाहरण के लिए दुर्गम भूभाग , दलदल ,नदियाँ इत्यादि | सीमा प्रबंधन पूर्वी क्षेत्र में मुख्य चुनौती है क्योंकि वहां अवसंरचनात्मक विकास नहीं हुआ है | पडोसी देशों के साथ संबंधों में अस्थिरता ,सत्ता परिवर्तन से निकटवर्ती राज्यों में अस्थिरता से प्रभावित होती है | उदाहरण के लिए बांग्लादेश में सरकार परिवर्तन और म्यांमार में सैनिक शासन का हमारे संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है| सीमा पर अवसंरचनात्मक विकास के लिए वित्त में कमी ,जिससे त्वरित विकास नहीं हो पाता है | सीमा रेखा का निर्धारण विशेषकर चीन के साथ, सीमा पर चीन द्वारा अतिक्रमण एवं विकास में अवरोध डालना | सरकार द्वारा बनायी गयीं रणनीतियां एवं प्रयास - भूमि सीमा प्रबंधन - 1. डबल पंक्ति बाड़ एवं उसका विद्युतीकरण 2. फ्लड लाइट्स का प्रयोग 3. स्मार्ट फेंसिंग तटीय सुरक्षा प्रणाली - 1.समुद्री सीमा शुल्क संगठन 2. भारतीय तटरक्षक बल 3. समुद्री पुलिस बल सुझाव - सीमा पर निगरानी के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी विशेषकर उपग्रह और हवाई चित्रण का प्रयोग करना चाहिए | हेलीकाप्टर यूनिट्स की स्थापना के माध्यम से हवाई निगरानी का प्रयोग करना चाहिए | एकल बिंदु नियंत्रण का सिद्धांत या एक- बल - एक -सीमा सिद्धांत का अक्षरशः पालन करना चाहिए | भारतीय तटरक्षक बल को तटीय सुरक्षा के लिए जिम्मेदार एकल प्राधिकरण के रूप में नामित किया जाना चाहिए | भारतीय तटरक्षकबल को गृह मंत्रालय के तहत लाया जाना चाहिए एवं समुद्री पुलिस को प्रशिक्षण प्रदान करने के मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए | सीमाओं का उचित प्रबंधन करने के लिए भारत को सहभागी और बहुराष्ट्रीय एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है |इसके अतिरिक्त सीमा पर स्थित आबादी में अलगाव की भावना को रोकने के लिए ,सीमा सुरक्षा बलों द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम को अपनाना चाहिए | इसके साथ ही सीमा - व्यापार में वृद्धि एवं स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को बढ़ाना चाहिये , जिससे अवैध तस्करी को रोका जा सके और जो सुरक्षा के साथ-साथ लोगों के मध्य सौहार्द एवं देश के विकास में योगदान करे |
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##Question:दुर्गम क्षेत्र एवं कुछ देशों के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधों के कारण सीमा प्रबंधन एक कठिन कार्य है | प्रभावशाली सीमा प्रबंधन की चुनौतियों एवं रणनीतियों पर संछिप्त चर्चा कीजिये | (200शब्द) Due to remote area and hostile relations with some countries, border management is a tough task. Discuss in brief the challenges and strategies of effective border mangement.##Answer:एप्रोच - भूमिका में सीमा प्रबंधन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये | इसके पश्चात सीमा प्रबंधन की चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | तदोपरांत सरकार द्वारा अपनाई गयीं रणनीतियों को बताइए | अंत में सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सीमा सुरक्षा का दृष्टिकोण केवल सीमाओं से सम्बंधित हैं , वही सीमा प्रबंधन एक व्यापक शब्द है जो न केवल सीमाओं की सुरक्षा बल्कि सीमाओं से सम्बद्ध देश के हितों की सुरक्षा को भी सम्मिलित करता है | सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ - सीमा प्रबंधन से सम्बंधित मुख्य चुनौती भौगोलिक कारकों से होती है , उदाहरण के लिए दुर्गम भूभाग , दलदल ,नदियाँ इत्यादि | सीमा प्रबंधन पूर्वी क्षेत्र में मुख्य चुनौती है क्योंकि वहां अवसंरचनात्मक विकास नहीं हुआ है | पडोसी देशों के साथ संबंधों में अस्थिरता ,सत्ता परिवर्तन से निकटवर्ती राज्यों में अस्थिरता से प्रभावित होती है | उदाहरण के लिए बांग्लादेश में सरकार परिवर्तन और म्यांमार में सैनिक शासन का हमारे संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है| सीमा पर अवसंरचनात्मक विकास के लिए वित्त में कमी ,जिससे त्वरित विकास नहीं हो पाता है | सीमा रेखा का निर्धारण विशेषकर चीन के साथ, सीमा पर चीन द्वारा अतिक्रमण एवं विकास में अवरोध डालना | सरकार द्वारा बनायी गयीं रणनीतियां एवं प्रयास - भूमि सीमा प्रबंधन - 1. डबल पंक्ति बाड़ एवं उसका विद्युतीकरण 2. फ्लड लाइट्स का प्रयोग 3. स्मार्ट फेंसिंग तटीय सुरक्षा प्रणाली - 1.समुद्री सीमा शुल्क संगठन 2. भारतीय तटरक्षक बल 3. समुद्री पुलिस बल सुझाव - सीमा पर निगरानी के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी विशेषकर उपग्रह और हवाई चित्रण का प्रयोग करना चाहिए | हेलीकाप्टर यूनिट्स की स्थापना के माध्यम से हवाई निगरानी का प्रयोग करना चाहिए | एकल बिंदु नियंत्रण का सिद्धांत या एक- बल - एक -सीमा सिद्धांत का अक्षरशः पालन करना चाहिए | भारतीय तटरक्षक बल को तटीय सुरक्षा के लिए जिम्मेदार एकल प्राधिकरण के रूप में नामित किया जाना चाहिए | भारतीय तटरक्षकबल को गृह मंत्रालय के तहत लाया जाना चाहिए एवं समुद्री पुलिस को प्रशिक्षण प्रदान करने के मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए | सीमाओं का उचित प्रबंधन करने के लिए भारत को सहभागी और बहुराष्ट्रीय एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है |इसके अतिरिक्त सीमा पर स्थित आबादी में अलगाव की भावना को रोकने के लिए ,सीमा सुरक्षा बलों द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम को अपनाना चाहिए | इसके साथ ही सीमा - व्यापार में वृद्धि एवं स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को बढ़ाना चाहिये , जिससे अवैध तस्करी को रोका जा सके और जो सुरक्षा के साथ-साथ लोगों के मध्य सौहार्द एवं देश के विकास में योगदान करे |
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State the significant aspects of India’sapproach towardsAfrica. Also, identifying the concerns affecting the future of this relationship, suggest measures to strengthen and sustain this partnership? (150 words/10 Marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE SIGNIFICANT ASPECTS OF INDIA’S APPROACH TOWARDS AFRICA - THE CONCERNS AFFECTING THE FUTURE OF THIS RELATIONSHIP - FURTHER MEASURES TO STRENGTHEN AND SUSTAIN THIS PARTNERSHIP -CONCLUSION Answer:- The relations between India and Africa can be described as one between the world"s fastest growing continent with the world"s fastest growing economy. There is support from Africa for the seat the UNSC (United Nations Security Council), along with cooperation at multilateral platforms like BRICS, IBSA and BASIC groupings. THE SIGNIFICANT ASPECTS OF INDIA’S APPROACH TOWARDS AFRICA The significant aspects of India’s approach towards Africa are as follows:- I THE FOUNDATION OF RELATIONS 1) SIMILARITIES There are many similarities as a common colonial history, common developmental issues, and socio-economic similarities in terms of urbanization, industrialization, young and poor population. 2) COMPLEMENTARITIES There are many complementarities as well in this relationship- India has a growing need for Africa"s resources and markets. Also, Africa needs India"s investments. Apart from this, India is uniquely favourable as a development partner for Africa. It can take help from India to become self-sustainable. India"s system of "jugaad" is suitable for Africa as a result of the meager resources (since its vast resources are yet untapped). 3) PRIVATE SECTOR DRIVEN RELATIONSHIP The relationship is largely driven by the private sector. 4) HEALTH SECTOR India has helped Africa a lot in the health sector as well with respect to HIV, the supply of generic medicines, which has cut the cost of healthcare. India was helpful in dealing with Ebola disease as well. 5) DIGITAL TECHNOLOGY In terms of digital technology, India provided help to Africa. For example, Pan-Africa e-network is a classic case in point. It was launched in 2009 and 47 countries are a part of it. It is entirely funded by India. The program focuses on e-commerce, e-governance, infotainment etc. II THE GLOBAL SIGNIFICANCE OF THE RELATIONSHIP The global significance of the relationship can be stated in terms of:- 1) SDG GOALS The success of achieving the goals depends on both India and Africa achieving the same. 2) ENVIRONMENT Both countries are rich in flora and fauna. Also, both are vulnerable to climate change. 3) ECONOMIC INTERESTS Both will benefit from multilateral, negotiated and rules-based order at the WTO. India can contribute its capital, skills and technological capabilities to Africa. III THE CHINA FACTOR In the last two decades, India ran cold in its approach towards Africa, and China stepped in and made progress there. A lot of Chinese labour has been brought in there. Jobs are not created for Africans as a result of the Chinese investment in the region. They are also blamed for poor compliance with safety and environmental standards. Therefore, India took important steps. 1) A programme called ‘Focus Africa’ was launched. 2) The IAFS has been in existence since 2008. It aims at cooperation between both sides and also for development measure for Africa. Its 1st summit was held at Delhi and provided for duty-free access to Africa"s LDCs (Least Developed Countries). In the summit of 2011 at Adis Ababa, $5 bn in soft loans and $500 mn as grants were given to Africa. The 2015 summit was held at New Delhi. 3) More than 20 high-level visits have taken place from the Indian side to Africa. In 2017, the President visited Djibouti and Ethiopia. In 2016, the PM visited 4 African nations. 4) In May 2017, India hosted the meeting of the African Development Bank. 5) Prime Minister Narendra Modi gifted cows to Rwanda. 6) There has been a surge in P2P contacts. 7) Stress on cultural and informational contacts for creating awareness. 8) ITEC scholarships are being provided. 9) Capacity programs are being undertaken for the training of the African diplomats. What sets India apart is capacity building, training institutions in Africa, deployment of ICT to help build a knowledge economy in Africa IV TRADE 1) DATA Trade increased by more than 8 fold between 2001 and 2017. India accounts for 6.4% share of the trade in Africa. Africa is the 3rd largest export destination for India. India is the 4th largest export destination for Africa. In 2017, Africa accounted for 10.5% of its crude oil imports. 2) THE NATURE OF TRADE Primary commodities constitute 75% of Africa"s exports toIndia. India"s exports to Africa are mainlyof petroleum and pharmaceutical products. Therefore, there is a need to diversify. 2.1) Chinese trade is much larger and it is also not diversified, hence there is a high level of dissatisfaction there. 3) COMPARISON In 2000, India and China were at a similar level (wrt trade). In 2010, China made significant progress and in 2015 and beyond, China became a much larger player than India in Africa. 4) POTENTIAL Trade can double by 2021 if appropriate steps are taken like ensuring finance availability, access to markets, knowledge and awareness about the same etc. V INVESTMENTS India"s FDI into Africa is increasing and vice-versa. VI DEVELOPMENT PARTNERSHIP 1) FINANCIAL SUPPORT India has provided $7.4 bn concessional credit and $1.2 billion grant since 2008. It is investing in capacity building institutions, public transport, clean energy etc. in Africa. In the IAFS 2015, $ 10 bn as Line of Credit and $600 mn as grants were provided. Apart from this, 50,000 scholarships have been provided to Africa 1.1) The Significance:- of all this is for the achievement of SDGs, development financing as traditional donations from OECD countries are decreasing 2) ASIA AFRICA GROWTH CORRIDOR This has been put in place to promote the synergy between Asia and Japan in Africa, achieve the SDG goals etc. It has been introduced as an alternative to BRI, as it is a consultative mechanism. THE CONCERNS AFFECTING THE FUTURE OF THIS RELATIONSHIP 1) TRADE The issues affecting trade arelow commodity prices implying that the value (not volume) of trade is affected. 2) INVESTMENTS- THE CHINA FACTOR China is a much larger investor in Africa as compared to India. In 1990, India was ahead of China in terms of investments. In 2009, as well , India was ahead. But then in 2014, China"s investments exceeded India"s (due to OBOR and BRI projects) 3) SECURITY ISSUES 3.1) TERRORISM- It has transnational links, which can destabilize India 3.2) PIRACY- on the eastern coast of Africa threatens trade 3.3) MARITIME SECURITY- affects the sea lines of communication. 3.4) THE CHINA FACTOR- It has the lead in supplying surveillance hardware 4) DRUG-TRAFFICKING This is a huge problem for India, as the major drug trafficking routes on the western side pass through the horn of Africa region. 5) CHALLENGES TO DEVELOPMENT Africa is at a different level of development as compared to India. Also, in forums like the Asia Africa Growth Corridor, India and Japan- face a wide gulf in decision making processes. Therefore, it must involve as many countries as possible in such forums. FURTHER MEASURES TO STRENGTHEN AND SUSTAIN THIS PARTNERSHIP Apart from the numerous measures already being taken by India, as discussed above, more needs to be done along the following lines. 1) Acknowledgement India must acknowledge that it is not the only country with a strategy for China. USA, EU etc. also have such strategies. Therefore, we must develop synergy and partnerships with such countries. For Example-Japan and India, France and India. 2) LONG TERM PERSPECTIVE India should view Africa from a long term perspective. It should continue to engage in the development of the area. 3) BILATERAL MECHANISMS Projects must be implemented through greater bilateral mechanisms. 4) INDIAN DIASPORA China does not have the presence of such a large diaspora there. 5) ANGLOPHONE COUNTRIES India can use the opportunity where English is a familiar language 6) LAST MILE DELIVERY We should focus on improving the last mile delivery chain. There will be a lot of Indians to go and work there. We can use them for project implementation. 7) ADVERTISEMENTS We must advertise our contribution adequately. For example, the Incredible India Campaign is a step in the correct direction. 8) LEVERAGE OUR STRONG ASSETS Two of our strong assets, i.e. the private sector and the Indian diaspora, must be leveraged to India’s advantage. 9) SURPLUS PRODUCTION In the area of military hardware, India needs to produce a surplus of its indigenous hardware, so that it can think of taking a lead in the export of the same to the African nations. 10) TRAINING INSTITUTIONS Indian military training institutions are of global reputation and also use English as the medium of training. Therefore, India can offer its training facilities for the training of the African forces. It can have leverage over China since they use Chinese as the medium of training. Our world-class military training institutions can be our advantage. India trains in English but China trains in Mandarin. 11) SOFT POWER STRATEGY India must create a narrative to convince the Africans that engaging with us will be mutually beneficial Our economic engagement with Africa is increasing. Therefore, ties do not just depend upon the quantitative factors i.e. trade and investment, but also on winning the hearts and minds of the people. This means that the Africans need to be convinced that economically engaging with India would be mutually beneficial for both Africa and India. Also, we must learn from China"s experience- not to repeat its mistakes and fill in/ take advantage of the discontent that they have created over there to improve relations.
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##Question:State the significant aspects of India’sapproach towardsAfrica. Also, identifying the concerns affecting the future of this relationship, suggest measures to strengthen and sustain this partnership? (150 words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE SIGNIFICANT ASPECTS OF INDIA’S APPROACH TOWARDS AFRICA - THE CONCERNS AFFECTING THE FUTURE OF THIS RELATIONSHIP - FURTHER MEASURES TO STRENGTHEN AND SUSTAIN THIS PARTNERSHIP -CONCLUSION Answer:- The relations between India and Africa can be described as one between the world"s fastest growing continent with the world"s fastest growing economy. There is support from Africa for the seat the UNSC (United Nations Security Council), along with cooperation at multilateral platforms like BRICS, IBSA and BASIC groupings. THE SIGNIFICANT ASPECTS OF INDIA’S APPROACH TOWARDS AFRICA The significant aspects of India’s approach towards Africa are as follows:- I THE FOUNDATION OF RELATIONS 1) SIMILARITIES There are many similarities as a common colonial history, common developmental issues, and socio-economic similarities in terms of urbanization, industrialization, young and poor population. 2) COMPLEMENTARITIES There are many complementarities as well in this relationship- India has a growing need for Africa"s resources and markets. Also, Africa needs India"s investments. Apart from this, India is uniquely favourable as a development partner for Africa. It can take help from India to become self-sustainable. India"s system of "jugaad" is suitable for Africa as a result of the meager resources (since its vast resources are yet untapped). 3) PRIVATE SECTOR DRIVEN RELATIONSHIP The relationship is largely driven by the private sector. 4) HEALTH SECTOR India has helped Africa a lot in the health sector as well with respect to HIV, the supply of generic medicines, which has cut the cost of healthcare. India was helpful in dealing with Ebola disease as well. 5) DIGITAL TECHNOLOGY In terms of digital technology, India provided help to Africa. For example, Pan-Africa e-network is a classic case in point. It was launched in 2009 and 47 countries are a part of it. It is entirely funded by India. The program focuses on e-commerce, e-governance, infotainment etc. II THE GLOBAL SIGNIFICANCE OF THE RELATIONSHIP The global significance of the relationship can be stated in terms of:- 1) SDG GOALS The success of achieving the goals depends on both India and Africa achieving the same. 2) ENVIRONMENT Both countries are rich in flora and fauna. Also, both are vulnerable to climate change. 3) ECONOMIC INTERESTS Both will benefit from multilateral, negotiated and rules-based order at the WTO. India can contribute its capital, skills and technological capabilities to Africa. III THE CHINA FACTOR In the last two decades, India ran cold in its approach towards Africa, and China stepped in and made progress there. A lot of Chinese labour has been brought in there. Jobs are not created for Africans as a result of the Chinese investment in the region. They are also blamed for poor compliance with safety and environmental standards. Therefore, India took important steps. 1) A programme called ‘Focus Africa’ was launched. 2) The IAFS has been in existence since 2008. It aims at cooperation between both sides and also for development measure for Africa. Its 1st summit was held at Delhi and provided for duty-free access to Africa"s LDCs (Least Developed Countries). In the summit of 2011 at Adis Ababa, $5 bn in soft loans and $500 mn as grants were given to Africa. The 2015 summit was held at New Delhi. 3) More than 20 high-level visits have taken place from the Indian side to Africa. In 2017, the President visited Djibouti and Ethiopia. In 2016, the PM visited 4 African nations. 4) In May 2017, India hosted the meeting of the African Development Bank. 5) Prime Minister Narendra Modi gifted cows to Rwanda. 6) There has been a surge in P2P contacts. 7) Stress on cultural and informational contacts for creating awareness. 8) ITEC scholarships are being provided. 9) Capacity programs are being undertaken for the training of the African diplomats. What sets India apart is capacity building, training institutions in Africa, deployment of ICT to help build a knowledge economy in Africa IV TRADE 1) DATA Trade increased by more than 8 fold between 2001 and 2017. India accounts for 6.4% share of the trade in Africa. Africa is the 3rd largest export destination for India. India is the 4th largest export destination for Africa. In 2017, Africa accounted for 10.5% of its crude oil imports. 2) THE NATURE OF TRADE Primary commodities constitute 75% of Africa"s exports toIndia. India"s exports to Africa are mainlyof petroleum and pharmaceutical products. Therefore, there is a need to diversify. 2.1) Chinese trade is much larger and it is also not diversified, hence there is a high level of dissatisfaction there. 3) COMPARISON In 2000, India and China were at a similar level (wrt trade). In 2010, China made significant progress and in 2015 and beyond, China became a much larger player than India in Africa. 4) POTENTIAL Trade can double by 2021 if appropriate steps are taken like ensuring finance availability, access to markets, knowledge and awareness about the same etc. V INVESTMENTS India"s FDI into Africa is increasing and vice-versa. VI DEVELOPMENT PARTNERSHIP 1) FINANCIAL SUPPORT India has provided $7.4 bn concessional credit and $1.2 billion grant since 2008. It is investing in capacity building institutions, public transport, clean energy etc. in Africa. In the IAFS 2015, $ 10 bn as Line of Credit and $600 mn as grants were provided. Apart from this, 50,000 scholarships have been provided to Africa 1.1) The Significance:- of all this is for the achievement of SDGs, development financing as traditional donations from OECD countries are decreasing 2) ASIA AFRICA GROWTH CORRIDOR This has been put in place to promote the synergy between Asia and Japan in Africa, achieve the SDG goals etc. It has been introduced as an alternative to BRI, as it is a consultative mechanism. THE CONCERNS AFFECTING THE FUTURE OF THIS RELATIONSHIP 1) TRADE The issues affecting trade arelow commodity prices implying that the value (not volume) of trade is affected. 2) INVESTMENTS- THE CHINA FACTOR China is a much larger investor in Africa as compared to India. In 1990, India was ahead of China in terms of investments. In 2009, as well , India was ahead. But then in 2014, China"s investments exceeded India"s (due to OBOR and BRI projects) 3) SECURITY ISSUES 3.1) TERRORISM- It has transnational links, which can destabilize India 3.2) PIRACY- on the eastern coast of Africa threatens trade 3.3) MARITIME SECURITY- affects the sea lines of communication. 3.4) THE CHINA FACTOR- It has the lead in supplying surveillance hardware 4) DRUG-TRAFFICKING This is a huge problem for India, as the major drug trafficking routes on the western side pass through the horn of Africa region. 5) CHALLENGES TO DEVELOPMENT Africa is at a different level of development as compared to India. Also, in forums like the Asia Africa Growth Corridor, India and Japan- face a wide gulf in decision making processes. Therefore, it must involve as many countries as possible in such forums. FURTHER MEASURES TO STRENGTHEN AND SUSTAIN THIS PARTNERSHIP Apart from the numerous measures already being taken by India, as discussed above, more needs to be done along the following lines. 1) Acknowledgement India must acknowledge that it is not the only country with a strategy for China. USA, EU etc. also have such strategies. Therefore, we must develop synergy and partnerships with such countries. For Example-Japan and India, France and India. 2) LONG TERM PERSPECTIVE India should view Africa from a long term perspective. It should continue to engage in the development of the area. 3) BILATERAL MECHANISMS Projects must be implemented through greater bilateral mechanisms. 4) INDIAN DIASPORA China does not have the presence of such a large diaspora there. 5) ANGLOPHONE COUNTRIES India can use the opportunity where English is a familiar language 6) LAST MILE DELIVERY We should focus on improving the last mile delivery chain. There will be a lot of Indians to go and work there. We can use them for project implementation. 7) ADVERTISEMENTS We must advertise our contribution adequately. For example, the Incredible India Campaign is a step in the correct direction. 8) LEVERAGE OUR STRONG ASSETS Two of our strong assets, i.e. the private sector and the Indian diaspora, must be leveraged to India’s advantage. 9) SURPLUS PRODUCTION In the area of military hardware, India needs to produce a surplus of its indigenous hardware, so that it can think of taking a lead in the export of the same to the African nations. 10) TRAINING INSTITUTIONS Indian military training institutions are of global reputation and also use English as the medium of training. Therefore, India can offer its training facilities for the training of the African forces. It can have leverage over China since they use Chinese as the medium of training. Our world-class military training institutions can be our advantage. India trains in English but China trains in Mandarin. 11) SOFT POWER STRATEGY India must create a narrative to convince the Africans that engaging with us will be mutually beneficial Our economic engagement with Africa is increasing. Therefore, ties do not just depend upon the quantitative factors i.e. trade and investment, but also on winning the hearts and minds of the people. This means that the Africans need to be convinced that economically engaging with India would be mutually beneficial for both Africa and India. Also, we must learn from China"s experience- not to repeat its mistakes and fill in/ take advantage of the discontent that they have created over there to improve relations.
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जनजातीय समूहों से आप क्या समझते हैं?भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तिकरणहेतु किये गए प्रयासों की समीक्षा कीजिए।(150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by the tribal groups? Review the initiatives of the Indian government for their empowerment. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, अनुसूचित जनजाति का एक संक्षिप्त परिचयदीजिए। तत्पश्चात,भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में इन समूहों सम्बंधित चुनौतियों का उल्लेख करते हुए, निष्कर्षतः उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़े हैं भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास:- सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा(PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को क्षात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं।अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
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##Question:जनजातीय समूहों से आप क्या समझते हैं?भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तिकरणहेतु किये गए प्रयासों की समीक्षा कीजिए।(150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by the tribal groups? Review the initiatives of the Indian government for their empowerment. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, अनुसूचित जनजाति का एक संक्षिप्त परिचयदीजिए। तत्पश्चात,भारत सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में इन समूहों सम्बंधित चुनौतियों का उल्लेख करते हुए, निष्कर्षतः उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़े हैं भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास:- सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा(PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को क्षात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं।अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
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जम्मू कश्मीर में व्याप्त आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष उपस्थित मुख्य चुनौतियों के साथ-साथ इनसे मुक्ति पाने के लिए भारत सरकर द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Alongwith the main challanges faced by the state by terrorism in Jammu and Kashmir, describe the efforts made by the Indian government to get rid of them.(150 to 200 Words, 10 Marks)
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एप्रोच- भूमिका में आतंकवाद की परिभाषा को देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात जम्मू -कश्मीर में आतंकवाद को लेकर जो चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं, उसको बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए जो प्रयास किये जा रहे हैं, उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 21 वीं सदी की सबसे ज्वलंत समस्या आतंकवाद है | जिसका भारत में हम लगभग पांच दशकों से भ अधिक समय से सामना कर रहें हैं | यह समस्या किसी एक की नहीं है, पूरे समाज, पूरे देश और पूरे विश्व की है | "कन्वेंशन ऑन प्रेवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ टेरोरिज्म" (1937) द्वारा आतंकवाद को निम्न शब्दों में व्यक्त किया गया है - " आतंकवाद का अभिप्राय उन आपराधिक कृत्यों से है जो किसी राज्य के विरुद्ध उन्मुख हो और जिनका उद्देश्य कुछ खास लोगों के मध्य या जनमानस के मन में भय का आतंक पैदा करना हो | " आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष चुनौतियाँ - जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की समस्या 90 के दशक से देखी जा रही है , जिससे राज्य को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है - उग्रवाद और चरमपंथ में बढ़ोत्तरी - जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय हिन्दू , सिख इत्यादि के विरुद्ध बढ़ती हिंसा, उग्रवादी समूहों द्वारा पत्थरबाजों को प्रोत्साहित करना, वहाबी एवं पैन -इस्लामिक विचारधारा का बढ़ता प्रभाव इत्यादि | आतंकवाद के प्रचलित डोमेन का सक्रिय होना - आतंकवादी बुरहान वानी को मृत्यु दंड दिए जाने पर पूरी घाटी में विद्रोह, आतंकवाद के पॉपुलर डोमेन को दर्शाता है | जो राज्य के सम्मुख प्रमुख चुनौती है अवैध तस्करी में बढ़ोतरी - आतंकवादी गतिविधियों के कारण राज्य में सीमा पार से ड्रग्स एवं हथियारों की अवैध तस्करी बढ़ी है | राज्य में अस्थिरता एवं महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा - आतंकवादी संगठन राज्य में वहां की विधानसभा चुनावों के दौरान विद्रोह उत्पन्न करने एवं वहां की विधानसभा पर हमला करके राज्य में अस्थिरता लाने का प्रयास करते हैं | आतंकवादी महिलाओं एवं बच्चों को सर्वप्रथम अपना निशाना बनाते हैं , उदहारण - स्कूलों पर हमला करना इत्यादि| यह राज्य के लिए एक गंभीर चुनौती है | भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए किये जा रहे प्रयास - प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण योजना - इसका उद्देश्य कश्मीरियों को रोजगार प्रदान करना है | कश्मीरी लोगों का पुनर्वास - हिन्दू, सिख आदि को भी कश्मीर में पुनर्स्थापित करना | भारत-दर्शन योजना - कश्मीर के युवाओं को शेष भारत से जोड़ने के लिए भारत भ्रमण | अंतरराष्ट्रीय दबाव - पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद के कारण, भारत द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा रहा है | उदहारण- FATF की ग्रे सूची में शामिल पाकिस्तान को काली सूची में डालने का प्रयास | सैनिक कार्यवाही - आतंकवादियों को जम्मू -कश्मीर से खदेड़ने के लिए कई ऑपरेशन चलाये गए | उदाहरण - ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन आल आउट आदि चलाये जा रहे हैं | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों पर सर्जिकल स्ट्राइक, एवं एयर स्ट्राइक की गयी , जिससे आतंकवाद के मूल को ख़त्म किया जा सके | इस प्रकार इन प्रयासों से भारत सरकार आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कदम उठाते हुए आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है |
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##Question:जम्मू कश्मीर में व्याप्त आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष उपस्थित मुख्य चुनौतियों के साथ-साथ इनसे मुक्ति पाने के लिए भारत सरकर द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये | (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Alongwith the main challanges faced by the state by terrorism in Jammu and Kashmir, describe the efforts made by the Indian government to get rid of them.(150 to 200 Words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भूमिका में आतंकवाद की परिभाषा को देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात जम्मू -कश्मीर में आतंकवाद को लेकर जो चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं, उसको बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए जो प्रयास किये जा रहे हैं, उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 21 वीं सदी की सबसे ज्वलंत समस्या आतंकवाद है | जिसका भारत में हम लगभग पांच दशकों से भ अधिक समय से सामना कर रहें हैं | यह समस्या किसी एक की नहीं है, पूरे समाज, पूरे देश और पूरे विश्व की है | "कन्वेंशन ऑन प्रेवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ टेरोरिज्म" (1937) द्वारा आतंकवाद को निम्न शब्दों में व्यक्त किया गया है - " आतंकवाद का अभिप्राय उन आपराधिक कृत्यों से है जो किसी राज्य के विरुद्ध उन्मुख हो और जिनका उद्देश्य कुछ खास लोगों के मध्य या जनमानस के मन में भय का आतंक पैदा करना हो | " आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष चुनौतियाँ - जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की समस्या 90 के दशक से देखी जा रही है , जिससे राज्य को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है - उग्रवाद और चरमपंथ में बढ़ोत्तरी - जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय हिन्दू , सिख इत्यादि के विरुद्ध बढ़ती हिंसा, उग्रवादी समूहों द्वारा पत्थरबाजों को प्रोत्साहित करना, वहाबी एवं पैन -इस्लामिक विचारधारा का बढ़ता प्रभाव इत्यादि | आतंकवाद के प्रचलित डोमेन का सक्रिय होना - आतंकवादी बुरहान वानी को मृत्यु दंड दिए जाने पर पूरी घाटी में विद्रोह, आतंकवाद के पॉपुलर डोमेन को दर्शाता है | जो राज्य के सम्मुख प्रमुख चुनौती है अवैध तस्करी में बढ़ोतरी - आतंकवादी गतिविधियों के कारण राज्य में सीमा पार से ड्रग्स एवं हथियारों की अवैध तस्करी बढ़ी है | राज्य में अस्थिरता एवं महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा - आतंकवादी संगठन राज्य में वहां की विधानसभा चुनावों के दौरान विद्रोह उत्पन्न करने एवं वहां की विधानसभा पर हमला करके राज्य में अस्थिरता लाने का प्रयास करते हैं | आतंकवादी महिलाओं एवं बच्चों को सर्वप्रथम अपना निशाना बनाते हैं , उदहारण - स्कूलों पर हमला करना इत्यादि| यह राज्य के लिए एक गंभीर चुनौती है | भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए किये जा रहे प्रयास - प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण योजना - इसका उद्देश्य कश्मीरियों को रोजगार प्रदान करना है | कश्मीरी लोगों का पुनर्वास - हिन्दू, सिख आदि को भी कश्मीर में पुनर्स्थापित करना | भारत-दर्शन योजना - कश्मीर के युवाओं को शेष भारत से जोड़ने के लिए भारत भ्रमण | अंतरराष्ट्रीय दबाव - पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद के कारण, भारत द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा रहा है | उदहारण- FATF की ग्रे सूची में शामिल पाकिस्तान को काली सूची में डालने का प्रयास | सैनिक कार्यवाही - आतंकवादियों को जम्मू -कश्मीर से खदेड़ने के लिए कई ऑपरेशन चलाये गए | उदाहरण - ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन आल आउट आदि चलाये जा रहे हैं | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों पर सर्जिकल स्ट्राइक, एवं एयर स्ट्राइक की गयी , जिससे आतंकवाद के मूल को ख़त्म किया जा सके | इस प्रकार इन प्रयासों से भारत सरकार आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कदम उठाते हुए आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है |
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लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये| इसके साथ ही भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को बताते हुए, इसमें सुधार के लिए उपाय सुझाइए| (150-200 शब्द/10 अंक) Outline the characteristics of the healthy work culture of public services. Along with this, while addressing the real work culture of Indian Public Service, suggest ways to improve it, (150-200 words/10 अंक)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कार्य संस्कृति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये 3- दुसरे भाग में भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये कार्य संस्कृति का आशय कार्य प्रकृति एवं प्रक्रिया को लेकर व्यक्तियों के दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होता है|इसका सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार, अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध एवं कार्य-वातावरण से होता है| अतः कार्य संस्कृति एक गतिशील अवधारणा है| कार्य संस्कृति के दो मौलिक आयाम होते हैं यथा कार्य नीतिशास्त्र एवं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos| जहाँ कार्य नीतिशास्त्र का सम्बन्ध क्या होना चाहिए(आदर्श) से है जबकि वहीं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos वास्तविक स्थिति(व्यवहारिकता) को स्पष्ट करता है कार्य नीतिशास्त्र अथवा स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताएं · कर्मचारियों का संतुष्ट होना ताकि संगठन की उत्पादकता को प्रोत्साहित किया जा सके|कर्मचारियों की संतुष्टि को सुनिश्चित करने हेतु प्रतिफल की मात्रा उसके योगदान से अधिक होनी चाहिए ताकि यह प्रतिफल एक प्रेरणा (incentive) के रूप में कार्य कर सके| प्रतिफल की प्रकृति आर्थिक एवं गैर-आर्थिक(अधिक बल) दोनों होनी चाहिए · कार्य संस्कृति कर्मचारियों के मध्य सुचारू सम्बन्ध को विकसित करती हो · कर्मचारियों के साथ सामान व्यवहार(equity) का होना आवश्यक है · कर्मचारियों के मध्य विश्वसनीय एवं अर्थपूर्ण सूचनाओं का हस्तानातरण होना चाहिए · कर्मचारियों के प्रति संगठन की नीतियाँ मैत्रीपूर्ण होनी चाहिए · उच्च अधिकारी का व्यवहार अपने अधिनस्थों के प्रति एक मार्गदर्शक या संरक्षक या अभिभावक के रूप में होनी चाहिए · संगठन के प्रति अपनत्व की भावना को विकसित करने हेतु टीम निर्माण की गतिविधियों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए · सत्ता या प्राधिकार का उचित हस्तानान्तरण या प्रत्यायोजन उपयुक्त स्तरों पर किया जाना चाहिए · कर्मचारियों की पहचान उसके कार्य से होनी चाहिए अतः कर्मचारियों में समर्पण की भावना का होना आवश्यक है · कार्यदशाओं में लचीलेपन का होनाएवं कार्य नवाचारों को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना · अनुशासन के महत्त्व को बना कर रखा जाना चाहिए|और · संगठन में कर्मचारी संघों की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति अथवा कार्य प्रकृति · भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति निम्नलिखित विशेषताओं को दर्शाती है · लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना · कार्य वातावरण का अनुकूल न होना · अधिकारियों का अधिक सत्तावादी होनाएवं लालफीताशाही · भाई-भतीजावाद · लोकसेवा के प्रति समर्पण की कमी · जन समस्याओं के प्रति उदासीनता एवं संवेदनहीनता · सरकार की कार्य प्रणाली में अधिक जटिलता का होना · उच्चतर उपलब्धि या निष्पादन को प्राप्त करने हेतु उचित प्रेरणाओं की कमी का होना · गोपनीयता की संस्कृति का होना · सुधार के प्रति अवरोध या प्रतिरोध का होना एवं लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने पर विशेष बल दिया जाना · जन अपेक्षाओं को पूरा करने हेतु सरकारी तंत्र में अपेक्षित क्षमता एवं दक्षता की कमी का होना इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय लोकसेवा की कार्य संस्कृति अपेक्षाकृत रूप से स्वस्थ नहीं है| इन समस्याओं को दूर करने के लिए एवं एक स्वस्थ कार्य संस्कृति को विकसित करने की दिशा में अधोवत उपाय किये जा सकते हैं जैसे नौकरशाही अभिवृत्ति को लोकतांत्रिक अभिवृत्ति में बदलना, शासन तंत्र में पारदर्शी संस्कृति को विकसित किया जाना जो कि आंतरिक एवं बाह्य दोनों होनी चाहिए,लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता को अधिक वास्तविक एवं व्यापक बनाया जाना चाहिए, शासन तंत्र की संरचना की प्रक्रिया एवं व्यवहार में तत्परता के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जाना चाहिए, नियमित एवं स्वतंत्र आधार पर संगठन के कार्य प्रारूप की समीक्षा किया जाना, शासन प्रक्रिया में जन-भागीदारी की अति सक्रियता को प्रोत्साहित किया जाना एवं इस उद्देश्य से शक्तियों के हस्तानांतरण एवं विकेंद्रीकरण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि कार्य संस्कृति को स्वस्थ बनाया जा सके और ऐसे सभी प्रयास किये जाने चाहिए जो कि लोकसेवकों की पेशेवर दक्षता को विकसित करने के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास कर सके ताकि लोकसेवक सत्यनिष्ठा के आधार पर जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति करे|
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##Question:लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये| इसके साथ ही भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को बताते हुए, इसमें सुधार के लिए उपाय सुझाइए| (150-200 शब्द/10 अंक) Outline the characteristics of the healthy work culture of public services. Along with this, while addressing the real work culture of Indian Public Service, suggest ways to improve it, (150-200 words/10 अंक)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कार्य संस्कृति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये 3- दुसरे भाग में भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये कार्य संस्कृति का आशय कार्य प्रकृति एवं प्रक्रिया को लेकर व्यक्तियों के दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होता है|इसका सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार, अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध एवं कार्य-वातावरण से होता है| अतः कार्य संस्कृति एक गतिशील अवधारणा है| कार्य संस्कृति के दो मौलिक आयाम होते हैं यथा कार्य नीतिशास्त्र एवं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos| जहाँ कार्य नीतिशास्त्र का सम्बन्ध क्या होना चाहिए(आदर्श) से है जबकि वहीं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos वास्तविक स्थिति(व्यवहारिकता) को स्पष्ट करता है कार्य नीतिशास्त्र अथवा स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताएं · कर्मचारियों का संतुष्ट होना ताकि संगठन की उत्पादकता को प्रोत्साहित किया जा सके|कर्मचारियों की संतुष्टि को सुनिश्चित करने हेतु प्रतिफल की मात्रा उसके योगदान से अधिक होनी चाहिए ताकि यह प्रतिफल एक प्रेरणा (incentive) के रूप में कार्य कर सके| प्रतिफल की प्रकृति आर्थिक एवं गैर-आर्थिक(अधिक बल) दोनों होनी चाहिए · कार्य संस्कृति कर्मचारियों के मध्य सुचारू सम्बन्ध को विकसित करती हो · कर्मचारियों के साथ सामान व्यवहार(equity) का होना आवश्यक है · कर्मचारियों के मध्य विश्वसनीय एवं अर्थपूर्ण सूचनाओं का हस्तानातरण होना चाहिए · कर्मचारियों के प्रति संगठन की नीतियाँ मैत्रीपूर्ण होनी चाहिए · उच्च अधिकारी का व्यवहार अपने अधिनस्थों के प्रति एक मार्गदर्शक या संरक्षक या अभिभावक के रूप में होनी चाहिए · संगठन के प्रति अपनत्व की भावना को विकसित करने हेतु टीम निर्माण की गतिविधियों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए · सत्ता या प्राधिकार का उचित हस्तानान्तरण या प्रत्यायोजन उपयुक्त स्तरों पर किया जाना चाहिए · कर्मचारियों की पहचान उसके कार्य से होनी चाहिए अतः कर्मचारियों में समर्पण की भावना का होना आवश्यक है · कार्यदशाओं में लचीलेपन का होनाएवं कार्य नवाचारों को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना · अनुशासन के महत्त्व को बना कर रखा जाना चाहिए|और · संगठन में कर्मचारी संघों की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति अथवा कार्य प्रकृति · भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति निम्नलिखित विशेषताओं को दर्शाती है · लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना · कार्य वातावरण का अनुकूल न होना · अधिकारियों का अधिक सत्तावादी होनाएवं लालफीताशाही · भाई-भतीजावाद · लोकसेवा के प्रति समर्पण की कमी · जन समस्याओं के प्रति उदासीनता एवं संवेदनहीनता · सरकार की कार्य प्रणाली में अधिक जटिलता का होना · उच्चतर उपलब्धि या निष्पादन को प्राप्त करने हेतु उचित प्रेरणाओं की कमी का होना · गोपनीयता की संस्कृति का होना · सुधार के प्रति अवरोध या प्रतिरोध का होना एवं लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने पर विशेष बल दिया जाना · जन अपेक्षाओं को पूरा करने हेतु सरकारी तंत्र में अपेक्षित क्षमता एवं दक्षता की कमी का होना इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय लोकसेवा की कार्य संस्कृति अपेक्षाकृत रूप से स्वस्थ नहीं है| इन समस्याओं को दूर करने के लिए एवं एक स्वस्थ कार्य संस्कृति को विकसित करने की दिशा में अधोवत उपाय किये जा सकते हैं जैसे नौकरशाही अभिवृत्ति को लोकतांत्रिक अभिवृत्ति में बदलना, शासन तंत्र में पारदर्शी संस्कृति को विकसित किया जाना जो कि आंतरिक एवं बाह्य दोनों होनी चाहिए,लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता को अधिक वास्तविक एवं व्यापक बनाया जाना चाहिए, शासन तंत्र की संरचना की प्रक्रिया एवं व्यवहार में तत्परता के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जाना चाहिए, नियमित एवं स्वतंत्र आधार पर संगठन के कार्य प्रारूप की समीक्षा किया जाना, शासन प्रक्रिया में जन-भागीदारी की अति सक्रियता को प्रोत्साहित किया जाना एवं इस उद्देश्य से शक्तियों के हस्तानांतरण एवं विकेंद्रीकरण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि कार्य संस्कृति को स्वस्थ बनाया जा सके और ऐसे सभी प्रयास किये जाने चाहिए जो कि लोकसेवकों की पेशेवर दक्षता को विकसित करने के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास कर सके ताकि लोकसेवक सत्यनिष्ठा के आधार पर जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति करे|
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जम्मू कश्मीर में व्याप्त आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष उपस्थित मुख्य चुनौतियों के साथ-साथ इनसे मुक्ति पाने के लिए भारत सरकर द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Alongwith the main challanges faced by the state by terrorism in Jammu and Kashmir, describe the efforts made by the Indian government to get rid of them.
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एप्रोच- भूमिका में आतंकवाद की परिभाषा को देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात जम्मू -कश्मीर में आतंकवाद को लेकर जो चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं, उसको बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए जो प्रयास किये जा रहे हैं, उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 21 वीं सदी की सबसे ज्वलंत समस्या आतंकवाद है | जिसका भारत में हम लगभग पांच दशकों से भ अधिक समय से सामना कर रहें हैं | यह समस्या किसी एक की नहीं है, पूरे समाज, पूरे देश और पूरे विश्व की है |"कन्वेंशन ऑन प्रेवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ टेरोरिज्म"(1937) द्वारा आतंकवाद को निम्न शब्दों में व्यक्त किया गया है - " आतंकवाद का अभिप्राय उन आपराधिक कृत्यों से है जो किसी राज्य के विरुद्ध उन्मुख हो और जिनका उद्देश्य कुछ खास लोगों के मध्य या जनमानस के मन में भय का आतंक पैदा करना हो | " आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष चुनौतियाँ -जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की समस्या 90 के दशक से देखी जा रही है , जिससे राज्य को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है - उग्रवाद और चरमपंथ में बढ़ोत्तरी - जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय हिन्दू , सिख इत्यादि के विरुद्ध बढ़ती हिंसा, उग्रवादी समूहों द्वारा पत्थरबाजों को प्रोत्साहित करना, वहाबी एवं पैन -इस्लामिक विचारधारा का बढ़ता प्रभाव इत्यादि | आतंकवाद के प्रचलित डोमेन का सक्रिय होना - आतंकवादी बुरहान वानी को मृत्यु दंड दिए जाने पर पूरी घाटी में विद्रोह, आतंकवाद के पॉपुलर डोमेन को दर्शाता है | जो राज्य के सम्मुख प्रमुख चुनौती है | अवैध तस्करी में बढ़ोतरी -आतंकवादी गतिविधियों के कारण राज्य में सीमा पार से ड्रग्स एवं हथियारों की अवैध तस्करी बढ़ी है | राज्य में अस्थिरता एवं महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा - आतंकवादी संगठन राज्य में वहां की विधानसभा चुनावों के दौरान विद्रोह उत्पन्न करने एवं वहां की विधानसभा पर हमला करके राज्य में अस्थिरता लाने का प्रयास करते हैं | आतंकवादी महिलाओं एवं बच्चों को सर्वप्रथम अपना निशाना बनाते हैं , उदहारण - स्कूलों पर हमला करना इत्यादि| यह राज्य के लिए एक गंभीर चुनौती है | भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए किये जा रहे प्रयास - प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण योजना - इसका उद्देश्य कश्मीरियों को रोजगार प्रदान करना है | कश्मीरी लोगों का पुनर्वास -हिन्दू, सिख आदि को भी कश्मीर में पुनर्स्थापित करना | भारत-दर्शन योजना - कश्मीर के युवाओं को शेष भारत से जोड़ने के लिए भारत भ्रमण | अंतरराष्ट्रीय दबाव - पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद के कारण, भारत द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा रहा है | उदहारण- FATF की ग्रे सूची में शामिल पाकिस्तान को काली सूची में डालने का प्रयास | सैनिक कार्यवाही- आतंकवादियों को जम्मू -कश्मीर से खदेड़ने के लिए कई ऑपरेशन चलाये गए | उदाहरण - ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन आल आउट आदि चलाये जा रहे हैं | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों पर सर्जिकल स्ट्राइक, एवं एयर स्ट्राइक की गयी , जिससे आतंकवाद के मूल को ख़त्म किया जा सके | इस प्रकार इन प्रयासों से भारत सरकार आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कदम उठाते हुए आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है |
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##Question:जम्मू कश्मीर में व्याप्त आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष उपस्थित मुख्य चुनौतियों के साथ-साथ इनसे मुक्ति पाने के लिए भारत सरकर द्वारा किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Alongwith the main challanges faced by the state by terrorism in Jammu and Kashmir, describe the efforts made by the Indian government to get rid of them.##Answer:एप्रोच- भूमिका में आतंकवाद की परिभाषा को देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात जम्मू -कश्मीर में आतंकवाद को लेकर जो चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं, उसको बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए जो प्रयास किये जा रहे हैं, उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 21 वीं सदी की सबसे ज्वलंत समस्या आतंकवाद है | जिसका भारत में हम लगभग पांच दशकों से भ अधिक समय से सामना कर रहें हैं | यह समस्या किसी एक की नहीं है, पूरे समाज, पूरे देश और पूरे विश्व की है |"कन्वेंशन ऑन प्रेवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ टेरोरिज्म"(1937) द्वारा आतंकवाद को निम्न शब्दों में व्यक्त किया गया है - " आतंकवाद का अभिप्राय उन आपराधिक कृत्यों से है जो किसी राज्य के विरुद्ध उन्मुख हो और जिनका उद्देश्य कुछ खास लोगों के मध्य या जनमानस के मन में भय का आतंक पैदा करना हो | " आतंकवाद के द्वारा राज्य के समक्ष चुनौतियाँ -जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की समस्या 90 के दशक से देखी जा रही है , जिससे राज्य को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है - उग्रवाद और चरमपंथ में बढ़ोत्तरी - जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय हिन्दू , सिख इत्यादि के विरुद्ध बढ़ती हिंसा, उग्रवादी समूहों द्वारा पत्थरबाजों को प्रोत्साहित करना, वहाबी एवं पैन -इस्लामिक विचारधारा का बढ़ता प्रभाव इत्यादि | आतंकवाद के प्रचलित डोमेन का सक्रिय होना - आतंकवादी बुरहान वानी को मृत्यु दंड दिए जाने पर पूरी घाटी में विद्रोह, आतंकवाद के पॉपुलर डोमेन को दर्शाता है | जो राज्य के सम्मुख प्रमुख चुनौती है | अवैध तस्करी में बढ़ोतरी -आतंकवादी गतिविधियों के कारण राज्य में सीमा पार से ड्रग्स एवं हथियारों की अवैध तस्करी बढ़ी है | राज्य में अस्थिरता एवं महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा - आतंकवादी संगठन राज्य में वहां की विधानसभा चुनावों के दौरान विद्रोह उत्पन्न करने एवं वहां की विधानसभा पर हमला करके राज्य में अस्थिरता लाने का प्रयास करते हैं | आतंकवादी महिलाओं एवं बच्चों को सर्वप्रथम अपना निशाना बनाते हैं , उदहारण - स्कूलों पर हमला करना इत्यादि| यह राज्य के लिए एक गंभीर चुनौती है | भारत सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए किये जा रहे प्रयास - प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण योजना - इसका उद्देश्य कश्मीरियों को रोजगार प्रदान करना है | कश्मीरी लोगों का पुनर्वास -हिन्दू, सिख आदि को भी कश्मीर में पुनर्स्थापित करना | भारत-दर्शन योजना - कश्मीर के युवाओं को शेष भारत से जोड़ने के लिए भारत भ्रमण | अंतरराष्ट्रीय दबाव - पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद के कारण, भारत द्वारा पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा रहा है | उदहारण- FATF की ग्रे सूची में शामिल पाकिस्तान को काली सूची में डालने का प्रयास | सैनिक कार्यवाही- आतंकवादियों को जम्मू -कश्मीर से खदेड़ने के लिए कई ऑपरेशन चलाये गए | उदाहरण - ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन आल आउट आदि चलाये जा रहे हैं | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों पर सर्जिकल स्ट्राइक, एवं एयर स्ट्राइक की गयी , जिससे आतंकवाद के मूल को ख़त्म किया जा सके | इस प्रकार इन प्रयासों से भारत सरकार आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कदम उठाते हुए आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है |
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वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत का अनुपालनलोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग को सुनिश्चित करता है| टिप्पणी कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Compliance with the rules or principles of financial propriety ensures the optimal utilisation of public fund. Comment (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये प्रथम भाग में बजट कि संक्षिप्त चर्चा करते हुए वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार वित्तीय औचित्य का अनुपालन लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग को सुनिश्चित करता है अंतिम में वित्तीय औचित्य के अनुपालन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| लोकनिधि का उपयोग लोक वित्तीय प्रणाली का अभिन्न अंग है जिसका संचालन या नियमन बजटीय प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है|लोक वित्तीय प्रणाली मौलिक रूप से पांच पहलुओं को शामिल करती है यथा; योजना एवं बजट, संसाधनों का आवंटन, संसाधनों का उपयोग, लेखा प्रणाली औरलेखा परीक्षण| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग के सन्दर्भ में बजट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है| बजट का आशय सरकार के आगामी वर्ष के आय एवं व्यय की अनुमानित राशि से है| अतः बजट मौलिक रूप से सरकार का एक वित्तीय या आर्थिक दस्तावेज होता है| बजट सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन एवं विकास स्थापित करने का एक माध्यम होता है|बजट, न्याय एवं समता को प्राप्त करने का एक माध्यम होता है| बजट के उद्देश्यों के निर्धारण में नैतिक मूल्यों, दर्शनों एवं आदर्शों का महत्वपूर्ण योगदान होता है| बजट, सरकार में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्राप्त करने में सहायक होता है| बजट द्वारा निर्धारित मानकों के अंतर्गत लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग को सुनिश्चित करने हेतु लोक अधिकारियों के द्वारावित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांतका अनुसरण किया जाना चाहिए| वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत कुछ नैतिक नियमों का सेट है जो वित्तीय अनुशासन को सुनिश्चित करते हैं जो निम्नलिखित हैं- वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत प्रत्येक लोक अधिकारी के द्वारा लोक व्यय करते समय उसी प्रकार की सतर्कता रखनी चाहिए जो कि निजी व्यय के सन्दर्भ में रखी जाती है लोक अधिकारी के द्वारा परिस्थिति की मांग से अधिक व्यय नहीं किया जाना चाहिए (यह किसी विधि द्वारा संभव नहीं हो सकता) यदि कानून इस बात की अनुमति नहीं देता है, लोकनिधि का उपयोग व्यक्तिगत लाभों या किसी विशिष्ट वर्ग के हितों हेतु नहीं किया जाना चाहिए(केस स्टडी मेंउपयोगी-विधि का अनुपालन) लोकनिधि का उपयोग करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्यूनतम लागत या कीमत के स्थान पर कुल कीमत के अधिकतम परिणाम को प्राप्त किया जाए लोकाधिकारी के द्वारा लोकव्यय की स्वीकृति की शक्ति का अभ्यास अपने व्यक्तिगत लाभों (प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष) हेतु नहीं किया जाना चाहिए लोक अधिकारियों को दिए गए भत्ते का उपयोग मुनाफे के स्रोत के रूप में नहीं किया जाना चाहिए कार्यकुशल एवं प्रभावी व्यय को सुनिश्चित करने हेतु यह नियम और कानून के अनुरूप होनी चाहिए लोकनिधि के उपयोग के माध्यम से प्राप्त उद्देश्यों की उपलब्धि हेतु लोक प्राधिकारी को स्वतः जवाबदेह होना चाहिए लोकनिधि के उपयोग की प्रक्रिया में वित्तीय लेन देन के अभिलेखों पर पक्षधर समूहों की पहुच होनी चाहिये लोक प्राधिकारी के द्वारा व्यय करते समय आर्थिक मूल्यों (जैसे कार्यकुशलता) के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों(जैसे सशक्तिकरण आदि) पर भी विशेष बल दिया जाना चाहिये| लोकनिधि का उपयोग पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए और यह पारदर्शिता दिखनी भी चाहिए लोकनिधि के उपयोग की प्रक्रिया में निष्पक्षता का होना अति आवश्यक है लोकनिधि से किये जाने वाले व्यय की प्रगति पर निरन्तर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यय स्वीकृत राशि से अधिक न हो एवं व्यय का लाभ प्रभावित समूह को प्राप्त होना चाहिए लोक निधि के उपयोग का मूल्यांकन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों आधारों पर किया जाना चहिये लोकनिधि का उपयोग हेतु उत्तरदायी लोक प्राधिकारी में सम्पूर्ण सत्यनिष्ठा होनी चाहिए एवं लोकनिधि का उपयोग करते समय लोक हित एकमात्र मानक होनी चाहिए लोकनिधि के उपयोग के बेहतर प्रबंधन को प्रोत्साहित करने हेतु ई-शासन, ICT का अनुप्रयोग करना चाहिए लोक निधि के उपयोग को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सामाजिक लेखा परिक्षण, परिणाम बजट, लैंगिक बजटिंग जैसे नवाचारों के अनुप्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए लोकनिधि का उपयोग करते समय गैर-विनियोजन, निधि का हस्तानान्तरण, निधि का दुरूपयोग, अत्यधिक व्यय, फिजूलखर्ची इत्यादि पर रोकथाम का होना आवश्यक है| उपरोक्त सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए लोकसेवक वित्तीय अनुशासन को प्राप्त करते हैं जिसके माध्यम से लोकनिधियों का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित होता है| लोकनिधि का उपयोग बेहतर तरीके से करने हेतु लोक प्राधिकारियों को संस्थागत मूल्यों के साथ व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों को विकसित करने पर भी विशेष बल देना चाहिए| उपरोक्त सिद्धांतों का अनुपालन केवल विधि के द्वारा नहीं सुनिश्चित किया जा सकता अतः लोक अधिकारियों का नैतिक एवं सत्यनिष्ठ होना आवश्यक है|
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##Question:वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत का अनुपालनलोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग को सुनिश्चित करता है| टिप्पणी कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Compliance with the rules or principles of financial propriety ensures the optimal utilisation of public fund. Comment (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग का अभिप्राय स्पष्ट कीजिये प्रथम भाग में बजट कि संक्षिप्त चर्चा करते हुए वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये दूसरे भाग में स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार वित्तीय औचित्य का अनुपालन लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग को सुनिश्चित करता है अंतिम में वित्तीय औचित्य के अनुपालन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| लोकनिधि का उपयोग लोक वित्तीय प्रणाली का अभिन्न अंग है जिसका संचालन या नियमन बजटीय प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है|लोक वित्तीय प्रणाली मौलिक रूप से पांच पहलुओं को शामिल करती है यथा; योजना एवं बजट, संसाधनों का आवंटन, संसाधनों का उपयोग, लेखा प्रणाली औरलेखा परीक्षण| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग के सन्दर्भ में बजट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है| बजट का आशय सरकार के आगामी वर्ष के आय एवं व्यय की अनुमानित राशि से है| अतः बजट मौलिक रूप से सरकार का एक वित्तीय या आर्थिक दस्तावेज होता है| बजट सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन एवं विकास स्थापित करने का एक माध्यम होता है|बजट, न्याय एवं समता को प्राप्त करने का एक माध्यम होता है| बजट के उद्देश्यों के निर्धारण में नैतिक मूल्यों, दर्शनों एवं आदर्शों का महत्वपूर्ण योगदान होता है| बजट, सरकार में पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को प्राप्त करने में सहायक होता है| बजट द्वारा निर्धारित मानकों के अंतर्गत लोकनिधि के अनुकूलतम उपयोग को सुनिश्चित करने हेतु लोक अधिकारियों के द्वारावित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांतका अनुसरण किया जाना चाहिए| वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत कुछ नैतिक नियमों का सेट है जो वित्तीय अनुशासन को सुनिश्चित करते हैं जो निम्नलिखित हैं- वित्तीय औचित्य के नियम या सिद्धांत प्रत्येक लोक अधिकारी के द्वारा लोक व्यय करते समय उसी प्रकार की सतर्कता रखनी चाहिए जो कि निजी व्यय के सन्दर्भ में रखी जाती है लोक अधिकारी के द्वारा परिस्थिति की मांग से अधिक व्यय नहीं किया जाना चाहिए (यह किसी विधि द्वारा संभव नहीं हो सकता) यदि कानून इस बात की अनुमति नहीं देता है, लोकनिधि का उपयोग व्यक्तिगत लाभों या किसी विशिष्ट वर्ग के हितों हेतु नहीं किया जाना चाहिए(केस स्टडी मेंउपयोगी-विधि का अनुपालन) लोकनिधि का उपयोग करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्यूनतम लागत या कीमत के स्थान पर कुल कीमत के अधिकतम परिणाम को प्राप्त किया जाए लोकाधिकारी के द्वारा लोकव्यय की स्वीकृति की शक्ति का अभ्यास अपने व्यक्तिगत लाभों (प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष) हेतु नहीं किया जाना चाहिए लोक अधिकारियों को दिए गए भत्ते का उपयोग मुनाफे के स्रोत के रूप में नहीं किया जाना चाहिए कार्यकुशल एवं प्रभावी व्यय को सुनिश्चित करने हेतु यह नियम और कानून के अनुरूप होनी चाहिए लोकनिधि के उपयोग के माध्यम से प्राप्त उद्देश्यों की उपलब्धि हेतु लोक प्राधिकारी को स्वतः जवाबदेह होना चाहिए लोकनिधि के उपयोग की प्रक्रिया में वित्तीय लेन देन के अभिलेखों पर पक्षधर समूहों की पहुच होनी चाहिये लोक प्राधिकारी के द्वारा व्यय करते समय आर्थिक मूल्यों (जैसे कार्यकुशलता) के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों(जैसे सशक्तिकरण आदि) पर भी विशेष बल दिया जाना चाहिये| लोकनिधि का उपयोग पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए और यह पारदर्शिता दिखनी भी चाहिए लोकनिधि के उपयोग की प्रक्रिया में निष्पक्षता का होना अति आवश्यक है लोकनिधि से किये जाने वाले व्यय की प्रगति पर निरन्तर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यय स्वीकृत राशि से अधिक न हो एवं व्यय का लाभ प्रभावित समूह को प्राप्त होना चाहिए लोक निधि के उपयोग का मूल्यांकन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों आधारों पर किया जाना चहिये लोकनिधि का उपयोग हेतु उत्तरदायी लोक प्राधिकारी में सम्पूर्ण सत्यनिष्ठा होनी चाहिए एवं लोकनिधि का उपयोग करते समय लोक हित एकमात्र मानक होनी चाहिए लोकनिधि के उपयोग के बेहतर प्रबंधन को प्रोत्साहित करने हेतु ई-शासन, ICT का अनुप्रयोग करना चाहिए लोक निधि के उपयोग को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सामाजिक लेखा परिक्षण, परिणाम बजट, लैंगिक बजटिंग जैसे नवाचारों के अनुप्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए लोकनिधि का उपयोग करते समय गैर-विनियोजन, निधि का हस्तानान्तरण, निधि का दुरूपयोग, अत्यधिक व्यय, फिजूलखर्ची इत्यादि पर रोकथाम का होना आवश्यक है| उपरोक्त सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए लोकसेवक वित्तीय अनुशासन को प्राप्त करते हैं जिसके माध्यम से लोकनिधियों का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित होता है| लोकनिधि का उपयोग बेहतर तरीके से करने हेतु लोक प्राधिकारियों को संस्थागत मूल्यों के साथ व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों को विकसित करने पर भी विशेष बल देना चाहिए| उपरोक्त सिद्धांतों का अनुपालन केवल विधि के द्वारा नहीं सुनिश्चित किया जा सकता अतः लोक अधिकारियों का नैतिक एवं सत्यनिष्ठ होना आवश्यक है|
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लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये| इसके साथ ही भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को बताते हुए, इसमें सुधार के लिए उपाय सुझाइए| (200 शब्द) Outline the characteristics of the healthy work culture of public services. Along with this, while addressing the real work culture of Indian Public Service,suggest ways to improve it, (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कार्य संस्कृति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये 3- दुसरे भाग में भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये कार्य संस्कृति का आशय कार्य प्रकृति एवं प्रक्रिया को लेकर व्यक्तियों के दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होता है|इसका सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार, अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध एवं कार्य-वातावरण से होता है| अतः कार्य संस्कृति एक गतिशील अवधारणा है| कार्य संस्कृति के दो मौलिक आयाम होते हैं यथा कार्य नीतिशास्त्र एवं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos| जहाँ कार्य नीतिशास्त्र का सम्बन्ध क्या होना चाहिए(आदर्श) से है जबकि वहीं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos वास्तविक स्थिति(व्यवहारिकता) को स्पष्ट करता है कार्य नीतिशास्त्र अथवा स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताएं · कर्मचारियों का संतुष्ट होना ताकि संगठन की उत्पादकता को प्रोत्साहित किया जा सके|कर्मचारियों की संतुष्टि को सुनिश्चित करने हेतु प्रतिफल की मात्रा उसके योगदान से अधिक होनी चाहिए ताकि यह प्रतिफल एक प्रेरणा (incentive) के रूप में कार्य कर सके| प्रतिफल की प्रकृति आर्थिक एवं गैर-आर्थिक(अधिक बल) दोनों होनी चाहिए · कार्य संस्कृति कर्मचारियों के मध्य सुचारू सम्बन्ध को विकसित करती हो · कर्मचारियों के साथ सामान व्यवहार(equity) का होना आवश्यक है · कर्मचारियों के मध्य विश्वसनीय एवं अर्थपूर्ण सूचनाओं का हस्तानातरण होना चाहिए · कर्मचारियों के प्रति संगठन की नीतियाँ मैत्रीपूर्ण होनी चाहिए · उच्च अधिकारी का व्यवहार अपने अधिनस्थों के प्रति एक मार्गदर्शक या संरक्षक या अभिभावक के रूप में होनी चाहिए · संगठन के प्रति अपनत्व की भावना को विकसित करने हेतु टीम निर्माण की गतिविधियों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए · सत्ता या प्राधिकार का उचित हस्तानान्तरण या प्रत्यायोजन उपयुक्त स्तरों पर किया जाना चाहिए · कर्मचारियों की पहचान उसके कार्य से होनी चाहिए अतः कर्मचारियों में समर्पण की भावना का होना आवश्यक है · कार्यदशाओं में लचीलेपन का होनाएवं कार्य नवाचारों को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना · अनुशासन के महत्त्व को बना कर रखा जाना चाहिए|और · संगठन में कर्मचारी संघों की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति अथवा कार्य प्रकृति · भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति निम्नलिखित विशेषताओं को दर्शाती है · लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना · कार्य वातावरण का अनुकूल न होना · अधिकारियों का अधिक सत्तावादी होनाएवं लालफीताशाही · भाई-भतीजावाद · लोकसेवा के प्रति समर्पण की कमी · जन समस्याओं के प्रति उदासीनता एवं संवेदनहीनता · सरकार की कार्य प्रणाली में अधिक जटिलता का होना · उच्चतर उपलब्धि या निष्पादन को प्राप्त करने हेतु उचित प्रेरणाओं की कमी का होना · गोपनीयता की संस्कृति का होना · सुधार के प्रति अवरोध या प्रतिरोध का होना एवं लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने पर विशेष बल दिया जाना · जन अपेक्षाओं को पूरा करने हेतु सरकारी तंत्र में अपेक्षित क्षमता एवं दक्षता की कमी का होना इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय लोकसेवा की कार्य संस्कृति अपेक्षाकृत रूप से स्वस्थ नहीं है| इन समस्याओं को दूर करने के लिए एवं एक स्वस्थ कार्य संस्कृति को विकसित करने की दिशा में अधोवत उपाय किये जा सकते हैं जैसे नौकरशाही अभिवृत्ति को लोकतांत्रिक अभिवृत्ति में बदलना, शासन तंत्र में पारदर्शी संस्कृति को विकसित किया जाना जो कि आंतरिक एवं बाह्य दोनों होनी चाहिए,लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता को अधिक वास्तविक एवं व्यापक बनाया जाना चाहिए, शासन तंत्र की संरचना की प्रक्रिया एवं व्यवहार में तत्परता के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जाना चाहिए, नियमित एवं स्वतंत्र आधार पर संगठन के कार्य प्रारूप की समीक्षा किया जाना, शासन प्रक्रिया में जन-भागीदारी की अति सक्रियता को प्रोत्साहित किया जाना एवं इस उद्देश्य से शक्तियों के हस्तानांतरण एवं विकेंद्रीकरण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि कार्य संस्कृति को स्वस्थ बनाया जा सके और ऐसे सभी प्रयास किये जाने चाहिए जो कि लोकसेवकों की पेशेवर दक्षता को विकसित करने के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास कर सके ताकि लोकसेवक सत्यनिष्ठा के आधार पर जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति करे|
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##Question:लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये| इसके साथ ही भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को बताते हुए, इसमें सुधार के लिए उपाय सुझाइए| (200 शब्द) Outline the characteristics of the healthy work culture of public services. Along with this, while addressing the real work culture of Indian Public Service,suggest ways to improve it, (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कार्य संस्कृति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में लोक सेवा की स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित कीजिये 3- दुसरे भाग में भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में समाधानात्मक सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये कार्य संस्कृति का आशय कार्य प्रकृति एवं प्रक्रिया को लेकर व्यक्तियों के दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होता है|इसका सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार, अन्तः पारस्परिक सम्बन्ध एवं कार्य-वातावरण से होता है| अतः कार्य संस्कृति एक गतिशील अवधारणा है| कार्य संस्कृति के दो मौलिक आयाम होते हैं यथा कार्य नीतिशास्त्र एवं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos| जहाँ कार्य नीतिशास्त्र का सम्बन्ध क्या होना चाहिए(आदर्श) से है जबकि वहीं कार्य प्रकृति/लोकाचार/Ethos वास्तविक स्थिति(व्यवहारिकता) को स्पष्ट करता है कार्य नीतिशास्त्र अथवा स्वस्थ कार्य संस्कृति की विशेषताएं · कर्मचारियों का संतुष्ट होना ताकि संगठन की उत्पादकता को प्रोत्साहित किया जा सके|कर्मचारियों की संतुष्टि को सुनिश्चित करने हेतु प्रतिफल की मात्रा उसके योगदान से अधिक होनी चाहिए ताकि यह प्रतिफल एक प्रेरणा (incentive) के रूप में कार्य कर सके| प्रतिफल की प्रकृति आर्थिक एवं गैर-आर्थिक(अधिक बल) दोनों होनी चाहिए · कार्य संस्कृति कर्मचारियों के मध्य सुचारू सम्बन्ध को विकसित करती हो · कर्मचारियों के साथ सामान व्यवहार(equity) का होना आवश्यक है · कर्मचारियों के मध्य विश्वसनीय एवं अर्थपूर्ण सूचनाओं का हस्तानातरण होना चाहिए · कर्मचारियों के प्रति संगठन की नीतियाँ मैत्रीपूर्ण होनी चाहिए · उच्च अधिकारी का व्यवहार अपने अधिनस्थों के प्रति एक मार्गदर्शक या संरक्षक या अभिभावक के रूप में होनी चाहिए · संगठन के प्रति अपनत्व की भावना को विकसित करने हेतु टीम निर्माण की गतिविधियों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए · सत्ता या प्राधिकार का उचित हस्तानान्तरण या प्रत्यायोजन उपयुक्त स्तरों पर किया जाना चाहिए · कर्मचारियों की पहचान उसके कार्य से होनी चाहिए अतः कर्मचारियों में समर्पण की भावना का होना आवश्यक है · कार्यदशाओं में लचीलेपन का होनाएवं कार्य नवाचारों को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना · अनुशासन के महत्त्व को बना कर रखा जाना चाहिए|और · संगठन में कर्मचारी संघों की सकारात्मक भूमिका को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति अथवा कार्य प्रकृति · भारतीय लोकसेवा की वास्तविक कार्य संस्कृति निम्नलिखित विशेषताओं को दर्शाती है · लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना · कार्य वातावरण का अनुकूल न होना · अधिकारियों का अधिक सत्तावादी होनाएवं लालफीताशाही · भाई-भतीजावाद · लोकसेवा के प्रति समर्पण की कमी · जन समस्याओं के प्रति उदासीनता एवं संवेदनहीनता · सरकार की कार्य प्रणाली में अधिक जटिलता का होना · उच्चतर उपलब्धि या निष्पादन को प्राप्त करने हेतु उचित प्रेरणाओं की कमी का होना · गोपनीयता की संस्कृति का होना · सुधार के प्रति अवरोध या प्रतिरोध का होना एवं लोकसेवकों में यथास्थिति को बनाए रखने पर विशेष बल दिया जाना · जन अपेक्षाओं को पूरा करने हेतु सरकारी तंत्र में अपेक्षित क्षमता एवं दक्षता की कमी का होना इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय लोकसेवा की कार्य संस्कृति अपेक्षाकृत रूप से स्वस्थ नहीं है| इन समस्याओं को दूर करने के लिए एवं एक स्वस्थ कार्य संस्कृति को विकसित करने की दिशा में अधोवत उपाय किये जा सकते हैं जैसे नौकरशाही अभिवृत्ति को लोकतांत्रिक अभिवृत्ति में बदलना, शासन तंत्र में पारदर्शी संस्कृति को विकसित किया जाना जो कि आंतरिक एवं बाह्य दोनों होनी चाहिए,लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता को अधिक वास्तविक एवं व्यापक बनाया जाना चाहिए, शासन तंत्र की संरचना की प्रक्रिया एवं व्यवहार में तत्परता के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जाना चाहिए, नियमित एवं स्वतंत्र आधार पर संगठन के कार्य प्रारूप की समीक्षा किया जाना, शासन प्रक्रिया में जन-भागीदारी की अति सक्रियता को प्रोत्साहित किया जाना एवं इस उद्देश्य से शक्तियों के हस्तानांतरण एवं विकेंद्रीकरण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि कार्य संस्कृति को स्वस्थ बनाया जा सके और ऐसे सभी प्रयास किये जाने चाहिए जो कि लोकसेवकों की पेशेवर दक्षता को विकसित करने के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास कर सके ताकि लोकसेवक सत्यनिष्ठा के आधार पर जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति करे|
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भारत में लोकसेवाओं के मध्य सामान्यतः किस प्रकार की कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं विद्यमान है? इस संदर्भ में, स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किन उपायों पर बल दिया जाना चाहिए? (200 शब्द) In General, What kind of Work-Culture related problems existamong the public services in India? In this context, What measures should be emphasized for developing Healthy Work-Culture? (200 words)
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एप्रोच- कार्यसंस्कृति को परिभाषित करते हुए एवं भारत में लोकसेवाओं को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याओं को बताईये| अंतिम भाग में, लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों को दर्शायिये| उपरोक्त उपायों के प्रभाव को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- कार्यसंस्कृति का आशय कार्य-प्रकृति को लेकर व्यक्तियों का सामान्य दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होताहै| यह एक गतिशील अवधारणा है जो कर्मचारियों की संतुष्टि पर आधारित होता है ताकि संगठन/सरकार की उत्पादकता को प्रोत्साहन मिल सके| भारत में लोकसेवाओं के अंतर्गत शासन-प्रणाली में निहित अधिकारी-कर्मचारी, जन-प्रतिनिधि आदि लोकसेवकों के कार्यों को रखा जाता है जिनके माध्यम से तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के साथ-साथ जनता के हित में कार्यों को क्रियान्वित किया जाता है| लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति हेतुकर्मचारियों की संतुष्टि, कर्मचारियों के बीच सुचारू संबंध, कर्मचारियों के मन में सरकार के प्रति अपनत्व भावना के निर्माण हेतु टीम-निर्माण,अधिकारी का व्यवहार कर्मचारियों के प्रति मार्गदर्शक/संरक्षक/अभिभावक के रूप में आदि विशेषताओं का होना अनिवार्यमाना जाता है| भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं हालाँकि स्वस्थ कार्यसंस्कृति किसी भी संगठन या सरकार के कार्यकुशलता हेतु आवश्यक होती है लेकिन भारत में लोकसेवाओं के बीच वास्तविकता में कार्यसंस्कृति संबंधी कुछ गंभीर समस्याएं विद्यमान हैं - लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना; कार्य वातावरण का अनुकूल ना होना; अधिकारियों का व्यवहार सत्तावादी होना; लालफीताशाही एवं भाई-भतीजावाद का होना; लोकसेवाओं के प्रति समर्पण का अभाव; जनसमस्याओं के प्रति उदासीनता; सरकार की कार्यप्रणाली में अधिक जटिलता का होना; बेहतर उपलब्धि हेतु उपयुक्त प्रेरणाओं की कमी का अभाव; किसी भी तरह के सुधार के विरुद्ध तथा नवाचार के प्रति प्रेरणा का अभाव; कार्यस्थल पर भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक व्यवहार का होना; गोपनीयता की संस्कृति आदि| स्वस्थ्य कार्यसंस्कृति को विकसित करने हेतु निम्नांकित उपायों पर बल दिया जाना चाहिए- नौकरशाही अभिवृति का रूपान्तरण लोकतांत्रिक अभिवृति में किया जाना चाहिए| आतंरिक एवं बाहरी दोनों स्तरों पर पारदर्शिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि परस्पर विश्वास की कार्यसंस्कृति को विकसित किया जा सके| लोकसेवकों के आचरण-संहिता का निर्धारण अधिक व्यापक एवं वास्तविकता के आधार पर किया जाना चाहिए| सरकार के विभिन्न स्तरों की कार्य प्रक्रिया का नियमित एवं स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि इससे प्राप्त फीडबैक के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जा सके| ऐसे सारे प्रयास किये जाने चाहिए ताकि कर्मचारियों में पेशेवर दक्षता के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास किया जा सके ताकि सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहन मिल पाए| सरकार की कार्यप्रणाली में नागरिकों के अतिसक्रिय भागीदारी को महत्व दिया जाये एवं इसके लिए शासन प्रक्रिया में प्रत्यायोजन एवं विविधिकरण को प्रोत्साहित करने पर बल देना चाहिए| उपरोक्त उपायों को अपनाने से लोकसेवकों की कार्यसंस्कृति में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन लाया जाना संभव हो सकेगा जिससे ना सिर्फ शासन व्यवस्था को सुचारू तरीके से जनोन्मुखी बनाने में मदद मिल सकेगी बल्कि जनता की शिकायतों का प्रभावी तरीके से निपटारा भी हो सकेगा|
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##Question:भारत में लोकसेवाओं के मध्य सामान्यतः किस प्रकार की कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं विद्यमान है? इस संदर्भ में, स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किन उपायों पर बल दिया जाना चाहिए? (200 शब्द) In General, What kind of Work-Culture related problems existamong the public services in India? In this context, What measures should be emphasized for developing Healthy Work-Culture? (200 words)##Answer:एप्रोच- कार्यसंस्कृति को परिभाषित करते हुए एवं भारत में लोकसेवाओं को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याओं को बताईये| अंतिम भाग में, लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों को दर्शायिये| उपरोक्त उपायों के प्रभाव को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- कार्यसंस्कृति का आशय कार्य-प्रकृति को लेकर व्यक्तियों का सामान्य दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होताहै| यह एक गतिशील अवधारणा है जो कर्मचारियों की संतुष्टि पर आधारित होता है ताकि संगठन/सरकार की उत्पादकता को प्रोत्साहन मिल सके| भारत में लोकसेवाओं के अंतर्गत शासन-प्रणाली में निहित अधिकारी-कर्मचारी, जन-प्रतिनिधि आदि लोकसेवकों के कार्यों को रखा जाता है जिनके माध्यम से तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के साथ-साथ जनता के हित में कार्यों को क्रियान्वित किया जाता है| लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति हेतुकर्मचारियों की संतुष्टि, कर्मचारियों के बीच सुचारू संबंध, कर्मचारियों के मन में सरकार के प्रति अपनत्व भावना के निर्माण हेतु टीम-निर्माण,अधिकारी का व्यवहार कर्मचारियों के प्रति मार्गदर्शक/संरक्षक/अभिभावक के रूप में आदि विशेषताओं का होना अनिवार्यमाना जाता है| भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं हालाँकि स्वस्थ कार्यसंस्कृति किसी भी संगठन या सरकार के कार्यकुशलता हेतु आवश्यक होती है लेकिन भारत में लोकसेवाओं के बीच वास्तविकता में कार्यसंस्कृति संबंधी कुछ गंभीर समस्याएं विद्यमान हैं - लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना; कार्य वातावरण का अनुकूल ना होना; अधिकारियों का व्यवहार सत्तावादी होना; लालफीताशाही एवं भाई-भतीजावाद का होना; लोकसेवाओं के प्रति समर्पण का अभाव; जनसमस्याओं के प्रति उदासीनता; सरकार की कार्यप्रणाली में अधिक जटिलता का होना; बेहतर उपलब्धि हेतु उपयुक्त प्रेरणाओं की कमी का अभाव; किसी भी तरह के सुधार के विरुद्ध तथा नवाचार के प्रति प्रेरणा का अभाव; कार्यस्थल पर भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक व्यवहार का होना; गोपनीयता की संस्कृति आदि| स्वस्थ्य कार्यसंस्कृति को विकसित करने हेतु निम्नांकित उपायों पर बल दिया जाना चाहिए- नौकरशाही अभिवृति का रूपान्तरण लोकतांत्रिक अभिवृति में किया जाना चाहिए| आतंरिक एवं बाहरी दोनों स्तरों पर पारदर्शिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि परस्पर विश्वास की कार्यसंस्कृति को विकसित किया जा सके| लोकसेवकों के आचरण-संहिता का निर्धारण अधिक व्यापक एवं वास्तविकता के आधार पर किया जाना चाहिए| सरकार के विभिन्न स्तरों की कार्य प्रक्रिया का नियमित एवं स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि इससे प्राप्त फीडबैक के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जा सके| ऐसे सारे प्रयास किये जाने चाहिए ताकि कर्मचारियों में पेशेवर दक्षता के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास किया जा सके ताकि सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहन मिल पाए| सरकार की कार्यप्रणाली में नागरिकों के अतिसक्रिय भागीदारी को महत्व दिया जाये एवं इसके लिए शासन प्रक्रिया में प्रत्यायोजन एवं विविधिकरण को प्रोत्साहित करने पर बल देना चाहिए| उपरोक्त उपायों को अपनाने से लोकसेवकों की कार्यसंस्कृति में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन लाया जाना संभव हो सकेगा जिससे ना सिर्फ शासन व्यवस्था को सुचारू तरीके से जनोन्मुखी बनाने में मदद मिल सकेगी बल्कि जनता की शिकायतों का प्रभावी तरीके से निपटारा भी हो सकेगा|
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भारत में लोकसेवाओं के मध्य सामान्यतः किस प्रकार की कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं विद्यमान है? इस संदर्भ में, स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किन उपायों पर बल दिया जाना चाहिए? (150-200 शब्द; 10 अंक) What kind of work culture related problems, in general, exist among the public services in India? In this context, what measures should be emphasized for developing healthy work culture? (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- कार्यसंस्कृति को परिभाषित करते हुए एवं भारत में लोकसेवाओं को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याओं को बताईये| अंतिम भाग में, लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों को दर्शायिये| उपरोक्त उपायों के प्रभाव को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- कार्यसंस्कृति का आशय कार्य-प्रकृति को लेकर व्यक्तियों का सामान्य दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होताहै| यह एक गतिशील अवधारणा है जो कर्मचारियों की संतुष्टि पर आधारित होता है ताकि संगठन/सरकार की उत्पादकता को प्रोत्साहन मिल सके| भारत में लोकसेवाओं के अंतर्गत शासन-प्रणाली में निहित अधिकारी-कर्मचारी, जन-प्रतिनिधि आदि लोकसेवकों के कार्यों को रखा जाता है जिनके माध्यम से तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के साथ-साथ जनता के हित में कार्यों को क्रियान्वित किया जाता है| लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति हेतुकर्मचारियों की संतुष्टि, कर्मचारियों के बीच सुचारू संबंध, कर्मचारियों के मन में सरकार के प्रति अपनत्व भावना के निर्माण हेतु टीम-निर्माण,अधिकारी का व्यवहार कर्मचारियों के प्रति मार्गदर्शक/संरक्षक/अभिभावक के रूप में आदि विशेषताओं का होना अनिवार्यमाना जाता है| भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं हालाँकि स्वस्थ कार्यसंस्कृति किसी भी संगठन या सरकार के कार्यकुशलता हेतु आवश्यक होती है लेकिन भारत में लोकसेवाओं के बीच वास्तविकता में कार्यसंस्कृति संबंधी कुछ गंभीर समस्याएं विद्यमान हैं - लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना; कार्य वातावरण का अनुकूल ना होना; अधिकारियों का व्यवहार सत्तावादी होना; लालफीताशाही एवं भाई-भतीजावाद का होना; लोकसेवाओं के प्रति समर्पण का अभाव; जनसमस्याओं के प्रति उदासीनता; सरकार की कार्यप्रणाली में अधिक जटिलता का होना; बेहतर उपलब्धि हेतु उपयुक्त प्रेरणाओं की कमी का अभाव; किसी भी तरह के सुधार के विरुद्ध तथा नवाचार के प्रति प्रेरणा का अभाव; कार्यस्थल पर भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक व्यवहार का होना; गोपनीयता की संस्कृति आदि| स्वस्थ्य कार्यसंस्कृति को विकसित करने हेतु निम्नांकित उपायों पर बल दिया जाना चाहिए- नौकरशाही अभिवृति का रूपान्तरण लोकतांत्रिक अभिवृति में किया जाना चाहिए| आतंरिक एवं बाहरी दोनों स्तरों पर पारदर्शिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि परस्पर विश्वास की कार्यसंस्कृति को विकसित किया जा सके| लोकसेवकों के आचरण-संहिता का निर्धारण अधिक व्यापक एवं वास्तविकता के आधार पर किया जाना चाहिए| सरकार के विभिन्न स्तरों की कार्य प्रक्रिया का नियमित एवं स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि इससे प्राप्त फीडबैक के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जा सके| ऐसे सारे प्रयास किये जाने चाहिए ताकि कर्मचारियों में पेशेवर दक्षता के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास किया जा सके ताकि सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहन मिल पाए| सरकार की कार्यप्रणाली में नागरिकों के अतिसक्रिय भागीदारी को महत्व दिया जाये एवं इसके लिए शासन प्रक्रिया में प्रत्यायोजन एवं विविधिकरण को प्रोत्साहित करने पर बल देना चाहिए| उपरोक्त उपायों को अपनाने से लोकसेवकों की कार्यसंस्कृति में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन लाया जाना संभव हो सकेगा जिससे ना सिर्फ शासन व्यवस्था को सुचारू तरीके से जनोन्मुखी बनाने में मदद मिल सकेगी बल्कि जनता की शिकायतों का प्रभावी तरीके से निपटारा भी हो सकेगा|
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##Question:भारत में लोकसेवाओं के मध्य सामान्यतः किस प्रकार की कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं विद्यमान है? इस संदर्भ में, स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किन उपायों पर बल दिया जाना चाहिए? (150-200 शब्द; 10 अंक) What kind of work culture related problems, in general, exist among the public services in India? In this context, what measures should be emphasized for developing healthy work culture? (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- कार्यसंस्कृति को परिभाषित करते हुए एवं भारत में लोकसेवाओं को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याओं को बताईये| अंतिम भाग में, लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति विकसित करने हेतु किये जा सकने वाले उपायों को दर्शायिये| उपरोक्त उपायों के प्रभाव को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- कार्यसंस्कृति का आशय कार्य-प्रकृति को लेकर व्यक्तियों का सामान्य दृष्टिकोण से है जो कि सामूहिक रूप से अभिव्यक्त होताहै| यह एक गतिशील अवधारणा है जो कर्मचारियों की संतुष्टि पर आधारित होता है ताकि संगठन/सरकार की उत्पादकता को प्रोत्साहन मिल सके| भारत में लोकसेवाओं के अंतर्गत शासन-प्रणाली में निहित अधिकारी-कर्मचारी, जन-प्रतिनिधि आदि लोकसेवकों के कार्यों को रखा जाता है जिनके माध्यम से तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के साथ-साथ जनता के हित में कार्यों को क्रियान्वित किया जाता है| लोकसेवाओं में स्वस्थ कार्यसंस्कृति हेतुकर्मचारियों की संतुष्टि, कर्मचारियों के बीच सुचारू संबंध, कर्मचारियों के मन में सरकार के प्रति अपनत्व भावना के निर्माण हेतु टीम-निर्माण,अधिकारी का व्यवहार कर्मचारियों के प्रति मार्गदर्शक/संरक्षक/अभिभावक के रूप में आदि विशेषताओं का होना अनिवार्यमाना जाता है| भारत में लोकसेवकों के मध्य विद्यमान कार्यसंस्कृति संबंधी समस्याएं हालाँकि स्वस्थ कार्यसंस्कृति किसी भी संगठन या सरकार के कार्यकुशलता हेतु आवश्यक होती है लेकिन भारत में लोकसेवाओं के बीच वास्तविकता में कार्यसंस्कृति संबंधी कुछ गंभीर समस्याएं विद्यमान हैं - लोकहित की कीमत पर निजी हितों को प्रोत्साहित किया जाना; कार्य वातावरण का अनुकूल ना होना; अधिकारियों का व्यवहार सत्तावादी होना; लालफीताशाही एवं भाई-भतीजावाद का होना; लोकसेवाओं के प्रति समर्पण का अभाव; जनसमस्याओं के प्रति उदासीनता; सरकार की कार्यप्रणाली में अधिक जटिलता का होना; बेहतर उपलब्धि हेतु उपयुक्त प्रेरणाओं की कमी का अभाव; किसी भी तरह के सुधार के विरुद्ध तथा नवाचार के प्रति प्रेरणा का अभाव; कार्यस्थल पर भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक व्यवहार का होना; गोपनीयता की संस्कृति आदि| स्वस्थ्य कार्यसंस्कृति को विकसित करने हेतु निम्नांकित उपायों पर बल दिया जाना चाहिए- नौकरशाही अभिवृति का रूपान्तरण लोकतांत्रिक अभिवृति में किया जाना चाहिए| आतंरिक एवं बाहरी दोनों स्तरों पर पारदर्शिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि परस्पर विश्वास की कार्यसंस्कृति को विकसित किया जा सके| लोकसेवकों के आचरण-संहिता का निर्धारण अधिक व्यापक एवं वास्तविकता के आधार पर किया जाना चाहिए| सरकार के विभिन्न स्तरों की कार्य प्रक्रिया का नियमित एवं स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि इससे प्राप्त फीडबैक के आधार पर सुधारात्मक प्रयासों को लागू किया जा सके| ऐसे सारे प्रयास किये जाने चाहिए ताकि कर्मचारियों में पेशेवर दक्षता के साथ-साथ पेशेवर मूल्यों का भी विकास किया जा सके ताकि सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहन मिल पाए| सरकार की कार्यप्रणाली में नागरिकों के अतिसक्रिय भागीदारी को महत्व दिया जाये एवं इसके लिए शासन प्रक्रिया में प्रत्यायोजन एवं विविधिकरण को प्रोत्साहित करने पर बल देना चाहिए| उपरोक्त उपायों को अपनाने से लोकसेवकों की कार्यसंस्कृति में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन लाया जाना संभव हो सकेगा जिससे ना सिर्फ शासन व्यवस्था को सुचारू तरीके से जनोन्मुखी बनाने में मदद मिल सकेगी बल्कि जनता की शिकायतों का प्रभावी तरीके से निपटारा भी हो सकेगा|
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भारत में कंपनी काल में शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रमुख प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसके उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Evaluate its objectives by mentioning the major efforts made for the expansion of education during the company period in India. (150-200 words/10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कंपनी का भारत में शासन स्थापना कोलिखते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन प्रयासों का उल्लेख कीजिए। शिक्षा के विकास के पीछे वास्तविक उद्देश्यों का विवरण दीजिये इसके सकारात्मक पक्षों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। निष्कर्ष में ब्रिटिश शिक्षा नीति के सम्पूर्ण प्रभावों का समग्र रूप प्रस्तुत कीजिए। उत्तर संरचना : बंगाल विजय के पश्चात भारत में कम्पनी का औपचारिक शासन स्थापित होता है तथा वेलेजली की सहायक संधि नीति द्वारा तीव्र विस्तार को प्राप्त किया। ऐसे में कंपनी को प्रशासनिक व्यवस्था हेतु सस्ते भारतीय क्लर्कों की आवश्यकता हुई , जिस परिणाम भारत में शिक्षा विकास हेतु प्रयास किये जाने प्रारंभ हुए। शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रमुख प्रयास: 1813 के चार्टर एक्ट के माध्यम से शिक्षा पर प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए का व्यय मैकाले स्मरण पत्र द्वारा अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत चार्ल्स वुड्स डिस्पैच हंटर कमेटी अंग्रेजों ने अपनी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए शिक्षा नीति का विकास किया। आधुनिक शिक्षा नीति के प्रारम्भ का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का सृजन करना था जो रक्त और रंग से भारतीय जबकि रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ हो। आधुनिक पश्चिमी शिक्षा इस भावना का समावेश करती थी कि वे हीन हैं तथा उन्हे एक विदेशी शक्ति द्वारा शासित होना चाहिए। इस शिक्षा नीति का मूल्यांकन इस प्रकार है: 1813 के चार्टर अधिनियम के माध्यम से स्वीकृत राशि शिक्षा के प्रोत्साहन हेतु अपर्याप्त थी। मैकाले स्मरण पत्र, 1835 द्वारा किसी भी स्थानीय भाषा के समर्थन को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया। अधोमुखी निस्यंदन सिद्धान्त का लक्ष्य केवल कुछ भारतीयों को शिक्षित करना था, जिनसे ब्रिटिश और भारतीय जनता के मध्य एक संपर्क सूत्र के रूप में करने की अपेक्षा की गयी थी। भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को प्रतिबंधित किया। महिला शिक्षा पर ध्यान नहीं, क्योंकि महिलाये ब्रिटिश की जरूरत को पूरा नहीं करती थी विज्ञानं एंड प्रोधोगिकी की शिक्षा का विकास नहीं हालांकि ब्रिटिश शिक्षा नीति ने कुछ सकारात्मक प्रभाव भी डाले: भारतियों में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ वुड्स डिस्पैच ने शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव को आधार प्रदान किया। भारत में भी तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा मिला। निष्कर्षतः अंग्रेजों द्वारा पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार-प्रसार अपने स्वार्थपूर्ति के लिए किया गया जिसमें वे सफल भी हुए परंतु इसके सकारात्मक उद्देश्यों को पूर्णतः अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता है।
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##Question:भारत में कंपनी काल में शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रमुख प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसके उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) Evaluate its objectives by mentioning the major efforts made for the expansion of education during the company period in India. (150-200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में कंपनी का भारत में शासन स्थापना कोलिखते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन प्रयासों का उल्लेख कीजिए। शिक्षा के विकास के पीछे वास्तविक उद्देश्यों का विवरण दीजिये इसके सकारात्मक पक्षों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। निष्कर्ष में ब्रिटिश शिक्षा नीति के सम्पूर्ण प्रभावों का समग्र रूप प्रस्तुत कीजिए। उत्तर संरचना : बंगाल विजय के पश्चात भारत में कम्पनी का औपचारिक शासन स्थापित होता है तथा वेलेजली की सहायक संधि नीति द्वारा तीव्र विस्तार को प्राप्त किया। ऐसे में कंपनी को प्रशासनिक व्यवस्था हेतु सस्ते भारतीय क्लर्कों की आवश्यकता हुई , जिस परिणाम भारत में शिक्षा विकास हेतु प्रयास किये जाने प्रारंभ हुए। शिक्षा के प्रसार के लिए किए गए प्रमुख प्रयास: 1813 के चार्टर एक्ट के माध्यम से शिक्षा पर प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए का व्यय मैकाले स्मरण पत्र द्वारा अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत चार्ल्स वुड्स डिस्पैच हंटर कमेटी अंग्रेजों ने अपनी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए शिक्षा नीति का विकास किया। आधुनिक शिक्षा नीति के प्रारम्भ का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का सृजन करना था जो रक्त और रंग से भारतीय जबकि रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ हो। आधुनिक पश्चिमी शिक्षा इस भावना का समावेश करती थी कि वे हीन हैं तथा उन्हे एक विदेशी शक्ति द्वारा शासित होना चाहिए। इस शिक्षा नीति का मूल्यांकन इस प्रकार है: 1813 के चार्टर अधिनियम के माध्यम से स्वीकृत राशि शिक्षा के प्रोत्साहन हेतु अपर्याप्त थी। मैकाले स्मरण पत्र, 1835 द्वारा किसी भी स्थानीय भाषा के समर्थन को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया। अधोमुखी निस्यंदन सिद्धान्त का लक्ष्य केवल कुछ भारतीयों को शिक्षित करना था, जिनसे ब्रिटिश और भारतीय जनता के मध्य एक संपर्क सूत्र के रूप में करने की अपेक्षा की गयी थी। भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को प्रतिबंधित किया। महिला शिक्षा पर ध्यान नहीं, क्योंकि महिलाये ब्रिटिश की जरूरत को पूरा नहीं करती थी विज्ञानं एंड प्रोधोगिकी की शिक्षा का विकास नहीं हालांकि ब्रिटिश शिक्षा नीति ने कुछ सकारात्मक प्रभाव भी डाले: भारतियों में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ वुड्स डिस्पैच ने शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव को आधार प्रदान किया। भारत में भी तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा मिला। निष्कर्षतः अंग्रेजों द्वारा पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार-प्रसार अपने स्वार्थपूर्ति के लिए किया गया जिसमें वे सफल भी हुए परंतु इसके सकारात्मक उद्देश्यों को पूर्णतः अस्वीकार्य नहीं किया जा सकता है।
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राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। इसके साथ ही उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिये जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है।(150-200 शब्द , अंक -10 ) Briefly discuss the constitutional provisions that define the relation of the President and the Council of Ministers. Along with that, also clarify the circumstances when the President is not obliged to consult the Council of Ministers. (150-200 words , marks -10 ).
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एप्रोच :- राष्ट्रपति की भूमिका को बताते हुए प्रारम्भ कीजिये राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को लिखिए। उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिये जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है. संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान केअनुच्छेद 53 (1) में स्पष्ट किया गया है किसंघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी , जो उसे सीधे अथवा अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम से संचालित करेगा। राष्ट्रपति के नाम से ही संघ के सभी कार्य संचालित किये जातेहै। राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधान:- अनुच्छेद 74 (1) - केंद्र में एक मंत्रिपरिषद , जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होगा और वह राष्ट्रपति को संघ के शासन संचालनमें सहायता वपरामर्श देगा। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा इसमें एक नया वाक्य जोड़ा गया - "और राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा"। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा इसमें एक औरनया वाक्य - "और राष्ट्रपति उपरोक्त परामर्श को एक बार पुनर्विचार के लिए वापिस कर सकेगा"। अनुच्छेद 75 (1)- प्रधान मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा , जबकि मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति करेगा अनुच्छेद 75 (2) - राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त , मंत्री अपने पद पर बने रहेंगे , इसका अर्थ यह कि मंत्री व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होंगे। अनुच्छेद 75 (3) -केंद्रीय मंत्रिपरिषद, लोकसभाके प्रति सामूहिक रूप सेउत्तरदायी होगी ऐसी परिस्थितियां , जब राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं होती - यदि पदासीन प्रधानमंत्री की सहसा मृत्यु हो जाये , तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत भंग हो जाएगी। , ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अपने विवेक से किसी नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर मंत्रीपरिषद् की संरचना करनी होगी , जिससे संवैधानिक संकट से बचा जा सके। यदि प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे देता है तो तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत: भंग हो जाएगी। यदि लोकसभा के आमचुनाव के पश्चात किसी दाल को स्पष्ट बहुमत ना मिले तो राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी ऐसे नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर देगा जो उसकी दृष्टि में स्थायी सरकार देने में सक्षम हों यदि किसी प्रधानमंत्री के दल अथवा उसकी सरकार के विरुद्ध अर्थात उसकी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत कर रखा है और PM को लगता है कि वह अपनी सरकार बचाने में सफल नहीं हो पायेगा , तो इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए वह राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने की सिफारिश करता है , किन्तु राष्ट्रपति ऐसी स्थिति में उसका परामर्श मानने को बाध्य नहीं है , बल्कि वह वैकल्पिक सरकार के गठन का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 103 (2)- यदि संसद के किसी सदस्य की निरर्हता का कोई प्रश्न हो , तो राष्ट्रपति ,निर्वाचन आयोग के परामर्श पर कार्य करेगा। अनुच्छेद 217 (2 ) के अनुसार हाई कोर्ट के जज की आयु को लेकर कोई विवाद हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति , भारत के मुख्य न्यायधीश के परामर्श के अनुरूप कार्य करेगा। इस प्रकार संविधान में संसदीय व्यवस्था के अनुरूप प्रधानमंत्री को प्राथमिकता दी गयी है , किन्तु इसके बाद भी संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति के पास ऐसी कई शक्तियां होती है , जिनका उपयोग वह स्वतंत्र पूर्वक कर सकता है।
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##Question:राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये। इसके साथ ही उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिये जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है।(150-200 शब्द , अंक -10 ) Briefly discuss the constitutional provisions that define the relation of the President and the Council of Ministers. Along with that, also clarify the circumstances when the President is not obliged to consult the Council of Ministers. (150-200 words , marks -10 ).##Answer:एप्रोच :- राष्ट्रपति की भूमिका को बताते हुए प्रारम्भ कीजिये राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को लिखिए। उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिये जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है. संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारतीय संविधान केअनुच्छेद 53 (1) में स्पष्ट किया गया है किसंघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी , जो उसे सीधे अथवा अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम से संचालित करेगा। राष्ट्रपति के नाम से ही संघ के सभी कार्य संचालित किये जातेहै। राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधान:- अनुच्छेद 74 (1) - केंद्र में एक मंत्रिपरिषद , जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होगा और वह राष्ट्रपति को संघ के शासन संचालनमें सहायता वपरामर्श देगा। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा इसमें एक नया वाक्य जोड़ा गया - "और राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा"। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा इसमें एक औरनया वाक्य - "और राष्ट्रपति उपरोक्त परामर्श को एक बार पुनर्विचार के लिए वापिस कर सकेगा"। अनुच्छेद 75 (1)- प्रधान मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा , जबकि मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति करेगा अनुच्छेद 75 (2) - राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त , मंत्री अपने पद पर बने रहेंगे , इसका अर्थ यह कि मंत्री व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होंगे। अनुच्छेद 75 (3) -केंद्रीय मंत्रिपरिषद, लोकसभाके प्रति सामूहिक रूप सेउत्तरदायी होगी ऐसी परिस्थितियां , जब राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं होती - यदि पदासीन प्रधानमंत्री की सहसा मृत्यु हो जाये , तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत भंग हो जाएगी। , ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अपने विवेक से किसी नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर मंत्रीपरिषद् की संरचना करनी होगी , जिससे संवैधानिक संकट से बचा जा सके। यदि प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे देता है तो तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत: भंग हो जाएगी। यदि लोकसभा के आमचुनाव के पश्चात किसी दाल को स्पष्ट बहुमत ना मिले तो राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी ऐसे नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर देगा जो उसकी दृष्टि में स्थायी सरकार देने में सक्षम हों यदि किसी प्रधानमंत्री के दल अथवा उसकी सरकार के विरुद्ध अर्थात उसकी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत कर रखा है और PM को लगता है कि वह अपनी सरकार बचाने में सफल नहीं हो पायेगा , तो इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए वह राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने की सिफारिश करता है , किन्तु राष्ट्रपति ऐसी स्थिति में उसका परामर्श मानने को बाध्य नहीं है , बल्कि वह वैकल्पिक सरकार के गठन का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 103 (2)- यदि संसद के किसी सदस्य की निरर्हता का कोई प्रश्न हो , तो राष्ट्रपति ,निर्वाचन आयोग के परामर्श पर कार्य करेगा। अनुच्छेद 217 (2 ) के अनुसार हाई कोर्ट के जज की आयु को लेकर कोई विवाद हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति , भारत के मुख्य न्यायधीश के परामर्श के अनुरूप कार्य करेगा। इस प्रकार संविधान में संसदीय व्यवस्था के अनुरूप प्रधानमंत्री को प्राथमिकता दी गयी है , किन्तु इसके बाद भी संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति के पास ऐसी कई शक्तियां होती है , जिनका उपयोग वह स्वतंत्र पूर्वक कर सकता है।
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सामाजिक कर्तव्यों एवं व्यक्तिगत अधिकारों को परिभाषित कीजिए। साथ ही समझाइए कि सामाजिक संदर्भ में इनकी क्या उपयोगिता है? (150 शब्द) Define social duties and individualrights. Also, explain what is their usefulness in a social context? (150 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,सामाजिक कर्तव्यों एवं व्यक्तिगत अधिकारों को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, यहसमझाइए कि सामाजिक संदर्भ में इनकी क्या उपयोगिता है? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- टी एच मार्शल के अनुसार सामाजिक कर्त्तव्यों से तात्पर्य किसी व्यक्ति का दिए गए समाज में सदस्यता के आधार पर संदर्भित दायित्व से है। अतः यह समझना अनिवार्य है कि कर्तव्य हमेशा सापेक्षिक होते हैं। वहीँ दूसरी तरफ अधिकार से तात्पर्य किसी व्यक्ति को समाज से दिए जाने वाला सरंक्षण से है जो सामान्य परिस्थितियों में प्रभावी रहना चाहिए। सामाजिक कर्तव्यों एवं व्यक्तिगत अधिकारों की उपयोगिता:- भारतीय समाज की कुछ मुख्य विशेषताओं में सामाजिक कर्तव्यों तथा व्यक्तिगत अधिकारों के मध्य संतुलन को समाज का एक अभिन्न अंग माना गया है। रामायण और महाभारत भारतीय समाज का चित्रण करते हैं। रामायण में कर्तव्य-बद्ध समाज को दर्शाया गया है, जहाँ राजा से लेकर आम जनता तक हर कोई अधिकारों के लिए कर्तव्यों का पालन करता है और विषम समय में भी शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। दूसरी ओर, महाभारत में अधिकारों पर आधारित समाज को चित्रित किया गया है, जहाँ राजा से लेकर आम जनता तक, सभी को अधिकार मिलते हैं और हर कोई अपने-अपने अधिकारों की माँग करता है। नतीजतन, हर कोई बेचैन हो गया जिसकी परिणति एक महान युद्ध में हुई। यदि किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों के बदले में सम्मान की अपेक्षा है, तो उस व्यक्ति द्वारादूसरों के अधिकारों का सम्मान करने का भीपारस्परिक दायित्व है।उदाहरण के लिए, धार्मिक स्वतंत्रताका अधिकार, यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के सदस्यों को उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप से बचाया जाए; इसका मतलब है कि जब अन्य धार्मिक प्रथाओं की बात आए तोउन अल्पसंख्यकों को भीउसी सहिष्णुता का पालनकरना होगा।स्वयं की स्वतंत्रता का लाभ उठाने के लिए, व्यक्ति दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करने का दायित्व स्वीकार करता है। केवल इस तरह से ही सभी के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है और सामाजिक सद्भाव कोप्राप्त किया जाता है। समाज तभी कामयाब हो सकता है जब हर कोई अपने साथी नागरिकों के लिए अपने दायित्वों को पूरा करे। अधिकारों का प्रयोग करने के लिए,दूसरों को भी वहीसम्मान देना चाहिए, जिसकी आप दूसरों सेअपेक्षा करते हैं। उदाहरण के लिएअगर मुझे काम करने और कमाने का अधिकार है, तो दूसरों के अधिकार को पहचानना और उसका सम्मान करनाभी मेरा कर्तव्य है और मुझे यह सुनिश्चित भी करना होगा की उनके अधिकारों को कोई नुकसान न पहुंचें। अधिकार समाज में उत्पन्न होते हैं। इसलिए, अधिकारों का आनंद लेते हुए, हमें हमेशा सामाजिक हित को बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए। समाज के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए अपने अधिकारों का उपयोग करना हममें से हर एक का कर्तव्य है। इस प्रकार सामाजिक संदर्भ में अधिकार एवं कर्तव्य दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और भारतीय समाज में इन दोनों के मध्य संतुलन को महत्व दिया गया है।
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##Question:सामाजिक कर्तव्यों एवं व्यक्तिगत अधिकारों को परिभाषित कीजिए। साथ ही समझाइए कि सामाजिक संदर्भ में इनकी क्या उपयोगिता है? (150 शब्द) Define social duties and individualrights. Also, explain what is their usefulness in a social context? (150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,सामाजिक कर्तव्यों एवं व्यक्तिगत अधिकारों को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, यहसमझाइए कि सामाजिक संदर्भ में इनकी क्या उपयोगिता है? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- टी एच मार्शल के अनुसार सामाजिक कर्त्तव्यों से तात्पर्य किसी व्यक्ति का दिए गए समाज में सदस्यता के आधार पर संदर्भित दायित्व से है। अतः यह समझना अनिवार्य है कि कर्तव्य हमेशा सापेक्षिक होते हैं। वहीँ दूसरी तरफ अधिकार से तात्पर्य किसी व्यक्ति को समाज से दिए जाने वाला सरंक्षण से है जो सामान्य परिस्थितियों में प्रभावी रहना चाहिए। सामाजिक कर्तव्यों एवं व्यक्तिगत अधिकारों की उपयोगिता:- भारतीय समाज की कुछ मुख्य विशेषताओं में सामाजिक कर्तव्यों तथा व्यक्तिगत अधिकारों के मध्य संतुलन को समाज का एक अभिन्न अंग माना गया है। रामायण और महाभारत भारतीय समाज का चित्रण करते हैं। रामायण में कर्तव्य-बद्ध समाज को दर्शाया गया है, जहाँ राजा से लेकर आम जनता तक हर कोई अधिकारों के लिए कर्तव्यों का पालन करता है और विषम समय में भी शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। दूसरी ओर, महाभारत में अधिकारों पर आधारित समाज को चित्रित किया गया है, जहाँ राजा से लेकर आम जनता तक, सभी को अधिकार मिलते हैं और हर कोई अपने-अपने अधिकारों की माँग करता है। नतीजतन, हर कोई बेचैन हो गया जिसकी परिणति एक महान युद्ध में हुई। यदि किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों के बदले में सम्मान की अपेक्षा है, तो उस व्यक्ति द्वारादूसरों के अधिकारों का सम्मान करने का भीपारस्परिक दायित्व है।उदाहरण के लिए, धार्मिक स्वतंत्रताका अधिकार, यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के सदस्यों को उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप से बचाया जाए; इसका मतलब है कि जब अन्य धार्मिक प्रथाओं की बात आए तोउन अल्पसंख्यकों को भीउसी सहिष्णुता का पालनकरना होगा।स्वयं की स्वतंत्रता का लाभ उठाने के लिए, व्यक्ति दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करने का दायित्व स्वीकार करता है। केवल इस तरह से ही सभी के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है और सामाजिक सद्भाव कोप्राप्त किया जाता है। समाज तभी कामयाब हो सकता है जब हर कोई अपने साथी नागरिकों के लिए अपने दायित्वों को पूरा करे। अधिकारों का प्रयोग करने के लिए,दूसरों को भी वहीसम्मान देना चाहिए, जिसकी आप दूसरों सेअपेक्षा करते हैं। उदाहरण के लिएअगर मुझे काम करने और कमाने का अधिकार है, तो दूसरों के अधिकार को पहचानना और उसका सम्मान करनाभी मेरा कर्तव्य है और मुझे यह सुनिश्चित भी करना होगा की उनके अधिकारों को कोई नुकसान न पहुंचें। अधिकार समाज में उत्पन्न होते हैं। इसलिए, अधिकारों का आनंद लेते हुए, हमें हमेशा सामाजिक हित को बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए। समाज के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए अपने अधिकारों का उपयोग करना हममें से हर एक का कर्तव्य है। इस प्रकार सामाजिक संदर्भ में अधिकार एवं कर्तव्य दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और भारतीय समाज में इन दोनों के मध्य संतुलन को महत्व दिया गया है।
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पूर्वोत्तर भारत में विप्लव के विभिन्न कारणों की संछिप्त में चर्चा कीजिए | साथ ही भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए उठाये गए कदमों को रेखांकित कीजिये | (200 शब्द ) Discuss in brief the various reasons of insurgency in North-East. Alongwith this, underline the steps taken by the Indian government to stop it.
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एप्रोच - भूमिका में पूर्वोत्तर भारत का सामान्य परिचय देते हुए , विप्लव को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात विप्लव के कारणों को बताइए | इसके पश्चात भारत सरकार द्वारा विप्लव के विरुद्ध उठाये गए कदमों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूर्वोत्तर भारत से आशय भारत के सर्वाधिक पूर्वी क्षेत्रों से है जिसमे एक साथ जुड़े "सात बहनों" के नाम से प्रसिद्ध राज्य और सिक्किम शामिल है | पूर्वोत्तर भारत, शेष भारत से से "चिकेन नेक" जिसे सिलीगुड़ी कोरिडोर के नाम से जानते हैं , से जुड़ा हुआ है | विप्लव का सामान्य अर्थ - उपद्रव , हलचल या उग्रवाद से होता है | विप्लव के कारण - जनजातियों की बहुलता- यह पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी समस्या है, इससे जनजातियों में एक-दूसरे के प्रति विद्वेष की भावना, असुरक्षा की भावना रहती है, जो पूरे क्षेत्र में विप्लव का कारण बनती है | अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सम्बद्धता- पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की सीमा किसी न किसी अन्य देश के साथ के साथ मिलती है एवं उस राज्य तथा देशों में नृजातीय एवं जनजातीय समानता के कारण वे दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं | अवैध प्रवासी- यह समस्या, वर्तमान समय में पूर्वोत्तर भारत राज्यों में विप्लव का मुख्य कारण है , क्योंकि इससे जनजातियों में अपनी सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक अधिकारों में गिरावट का भय जन्म लेता है | आर्थिक/ संरचनात्मक विकास का आभाव- पूर्वोत्तर राज्यों में भौगोलिक जटिलताओं के कारण संरचनात्मक विकास तीव्र गति से नहीं हो पाया, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी उत्पन्न होती है | यह कमी युवाओं में असंतोष का मुख्य कारण बनता है | सांस्कृतिक समन्वय एवं राष्ट्रवाद की कमी- पूर्वोत्तर भारत एक पतले मार्ग चिकेन नेक के माध्यम से शेष भारत से जुड़ा हुआ है , जिससे उनका आवागमन प्रभावित होता है तथा इस कारण पूर्वोत्तर और शेष भारत के मध्य सांस्कृतिक समन्वय नहीं हो पाता है | इस कारण वे अपने आप को अलग रखने का प्रयत्न करते है , इसका परिणाम उनके राष्ट्र के प्रति प्रेम में कमी के रूप में नजर आता है | विप्लव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम - वार्ता और सहमति- पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय संगठनों से वार्ता एवं उनकी समस्याओं का निदान | इसके साथ ही उनकी उचित मांगों पर सहमति | हिंसा के प्रति जीरो टोलरेंस- भारत सरकार द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि वह उन्ही संगठनों से बात करेगा जो हिंसा का त्याग करेंगे | यदि हिंसा होतो है तो उस स्थति में AFSPA को लागू किया जाएगा | अवैध प्रवसन के प्रति सख्त कार्यवाही- भारत सरकार द्वारा बॉर्डर पर तेजी से फेंसिंग एवं बाड़ लगाए जा रहे हैं, जिससे अवैध प्रवासन को रोका जा सके | "NRC (असम), तथा रजिस्टर ऑफ इंट्रीजीनस इनहैबिटेंट्स ऑफ नागालैंड" जैसी व्यवस्थाओं से भी अवैध प्रवासियों को पहचाना जा रहा है| संरचनात्मक सुविधाओं का विकास- पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जोड़ने के लिए रेल संपर्क मार्ग, सड़क संपर्क मार्ग, हवाई सुविधा इत्यादि का विकास तेजी से किया जा रहा है | इस कार्य से रोजगार का सृजन होगा एवं स्तर में वृद्धि होगी | सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने का प्रयास- भारत सरकार द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृतियों को विभिन्न माध्यमों से शेष भारत से जोड़कर सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने की कोशिश कर रही है | जैसे-एक भारत श्रेष्ठ भारत | पूर्वोत्तर भारत में भारत सरकार द्वारा सराहनीय कार्य किये जा रहे हैं | हाल के वर्षो में पूर्वोत्तर में विप्लव के क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी दिखाई पड़ी है |
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##Question:पूर्वोत्तर भारत में विप्लव के विभिन्न कारणों की संछिप्त में चर्चा कीजिए | साथ ही भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए उठाये गए कदमों को रेखांकित कीजिये | (200 शब्द ) Discuss in brief the various reasons of insurgency in North-East. Alongwith this, underline the steps taken by the Indian government to stop it.##Answer:एप्रोच - भूमिका में पूर्वोत्तर भारत का सामान्य परिचय देते हुए , विप्लव को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात विप्लव के कारणों को बताइए | इसके पश्चात भारत सरकार द्वारा विप्लव के विरुद्ध उठाये गए कदमों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूर्वोत्तर भारत से आशय भारत के सर्वाधिक पूर्वी क्षेत्रों से है जिसमे एक साथ जुड़े "सात बहनों" के नाम से प्रसिद्ध राज्य और सिक्किम शामिल है | पूर्वोत्तर भारत, शेष भारत से से "चिकेन नेक" जिसे सिलीगुड़ी कोरिडोर के नाम से जानते हैं , से जुड़ा हुआ है | विप्लव का सामान्य अर्थ - उपद्रव , हलचल या उग्रवाद से होता है | विप्लव के कारण - जनजातियों की बहुलता- यह पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी समस्या है, इससे जनजातियों में एक-दूसरे के प्रति विद्वेष की भावना, असुरक्षा की भावना रहती है, जो पूरे क्षेत्र में विप्लव का कारण बनती है | अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सम्बद्धता- पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की सीमा किसी न किसी अन्य देश के साथ के साथ मिलती है एवं उस राज्य तथा देशों में नृजातीय एवं जनजातीय समानता के कारण वे दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं | अवैध प्रवासी- यह समस्या, वर्तमान समय में पूर्वोत्तर भारत राज्यों में विप्लव का मुख्य कारण है , क्योंकि इससे जनजातियों में अपनी सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक अधिकारों में गिरावट का भय जन्म लेता है | आर्थिक/ संरचनात्मक विकास का आभाव- पूर्वोत्तर राज्यों में भौगोलिक जटिलताओं के कारण संरचनात्मक विकास तीव्र गति से नहीं हो पाया, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी उत्पन्न होती है | यह कमी युवाओं में असंतोष का मुख्य कारण बनता है | सांस्कृतिक समन्वय एवं राष्ट्रवाद की कमी- पूर्वोत्तर भारत एक पतले मार्ग चिकेन नेक के माध्यम से शेष भारत से जुड़ा हुआ है , जिससे उनका आवागमन प्रभावित होता है तथा इस कारण पूर्वोत्तर और शेष भारत के मध्य सांस्कृतिक समन्वय नहीं हो पाता है | इस कारण वे अपने आप को अलग रखने का प्रयत्न करते है , इसका परिणाम उनके राष्ट्र के प्रति प्रेम में कमी के रूप में नजर आता है | विप्लव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम - वार्ता और सहमति- पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय संगठनों से वार्ता एवं उनकी समस्याओं का निदान | इसके साथ ही उनकी उचित मांगों पर सहमति | हिंसा के प्रति जीरो टोलरेंस- भारत सरकार द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि वह उन्ही संगठनों से बात करेगा जो हिंसा का त्याग करेंगे | यदि हिंसा होतो है तो उस स्थति में AFSPA को लागू किया जाएगा | अवैध प्रवसन के प्रति सख्त कार्यवाही- भारत सरकार द्वारा बॉर्डर पर तेजी से फेंसिंग एवं बाड़ लगाए जा रहे हैं, जिससे अवैध प्रवासन को रोका जा सके | "NRC (असम), तथा रजिस्टर ऑफ इंट्रीजीनस इनहैबिटेंट्स ऑफ नागालैंड" जैसी व्यवस्थाओं से भी अवैध प्रवासियों को पहचाना जा रहा है| संरचनात्मक सुविधाओं का विकास- पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जोड़ने के लिए रेल संपर्क मार्ग, सड़क संपर्क मार्ग, हवाई सुविधा इत्यादि का विकास तेजी से किया जा रहा है | इस कार्य से रोजगार का सृजन होगा एवं स्तर में वृद्धि होगी | सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने का प्रयास- भारत सरकार द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृतियों को विभिन्न माध्यमों से शेष भारत से जोड़कर सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने की कोशिश कर रही है | जैसे-एक भारत श्रेष्ठ भारत | पूर्वोत्तर भारत में भारत सरकार द्वारा सराहनीय कार्य किये जा रहे हैं | हाल के वर्षो में पूर्वोत्तर में विप्लव के क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी दिखाई पड़ी है |
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पूर्वोत्तर भारत में विप्लव के विभिन्न कारणों की संछिप्त में चर्चा कीजिए | साथ ही भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए उठाये गए कदमों को रेखांकित कीजिये | (200 शब्द ) Discuss in brief the various reasons of insurgency in North-East. Alongwith this, underline the steps taken by the Indian government to stop it.
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एप्रोच - भूमिका में पूर्वोत्तर भारत का सामान्य परिचय देते हुए , विप्लव को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात विप्लव के कारणों को बताइए | इसके पश्चात भारत सरकार द्वारा विप्लव के विरुद्ध उठाये गए कदमों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूर्वोत्तर भारत से आशय भारत के सर्वाधिक पूर्वी क्षेत्रों से है जिसमे एक साथ जुड़े "सात बहनों" के नाम से प्रसिद्ध राज्य और सिक्किम शामिल है | पूर्वोत्तर भारत, शेष भारत से से "चिकेन नेक" जिसे सिलीगुड़ी कोरिडोर के नाम से जानते हैं , से जुड़ा हुआ है | विप्लव का सामान्य अर्थ - उपद्रव , हलचल या उग्रवाद से होता है | विप्लव के कारण - जनजातियों की बहुलता - यह पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी समस्या है, इससे जनजातियों में एक-दूसरे के प्रति विद्वेष की भावना, असुरक्षा की भावना रहती है, जो पूरे क्षेत्र में विप्लव का कारण बनती है | अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सम्बद्धता - पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की सीमा किसी न किसी अन्य देश के साथ के साथ मिलती है एवं उस राज्य तथा देशों में नृजातीय एवं जनजातीय समानता के कारण वे दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं | अवैध प्रवासी - यह समस्या, वर्तमान समय में पूर्वोत्तर भारत राज्यों में विप्लव का मुख्य कारण है , क्योंकि इससे जनजातियों में अपनी सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक अधिकारों में गिरावट का भय जन्म लेता है | आर्थिक/ संरचनात्मक विकास का आभाव - पूर्वोत्तर राज्यों में भौगोलिक जटिलताओं के कारण संरचनात्मक विकास तीव्र गति से नहीं हो पाया, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी उत्पन्न होती है | यह कमी युवाओं में असंतोष का मुख्य कारण बनता है | सांस्कृतिक समन्वय एवं राष्ट्रवाद की कमी - पूर्वोत्तर भारत एक पतले मार्ग चिकेन नेक के माध्यम से शेष भारत से जुड़ा हुआ है , जिससे उनका आवागमन प्रभावित होता है तथा इस कारण पूर्वोत्तर और शेष भारत के मध्य सांस्कृतिक समन्वय नहीं हो पाता है | इस कारण वे अपने आप को अलग रखने का प्रयत्न करते है , इसका परिणाम उनके राष्ट्र के प्रति प्रेम में कमी के रूप में नजर आता है | विप्लव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम - वार्ता और सहमति - पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय संगठनों से वार्ता एवं उनकी समस्याओं का निदान | इसके साथ ही उनकी उचित मांगों पर सहमति | हिंसा के प्रति जीरो टोलरेंस - भारत सरकार द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि वह उन्ही संगठनों से बात करेगा जो हिंसा का त्याग करेंगे | यदि हिंसा होतो है तो उस स्थति में AFSPA को लागू किया जाएगा | अवैध प्रवसन के प्रति सख्त कार्यवाही - भारत सरकार द्वारा बॉर्डर पर तेजी से फेंसिंग एवं बाड़ लगाए जा रहे हैं, जिससे अवैध प्रवासन को रोका जा सके | "NRC (असम), तथा रजिस्टर ऑफ इंट्रीजीनस इनहैबिटेंट्स ऑफ नागालैंड" जैसी व्यवस्थाओं से भी अवैध प्रवासियों को पहचाना जा रहा है | संरचनात्मक सुविधाओं का विकास - पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जोड़ने के लिए रेल संपर्क मार्ग, सड़क संपर्क मार्ग, हवाई सुविधा इत्यादि का विकास तेजी से किया जा रहा है | इस कार्य से रोजगार का सृजन होगा एवं स्तर में वृद्धि होगी | सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने का प्रयास - भारत सरकार द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृतियों को विभिन्न माध्यमों से शेष भारत से जोड़कर सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने की कोशिश कर रही है | जैसे- एक भारत श्रेष्ठ भारत | पूर्वोत्तर भारत में भारत सरकार द्वारा सराहनीय कार्य किये जा रहे हैं | हाल के वर्षो में पूर्वोत्तर में विप्लव के क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी दिखाई पड़ी है |
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##Question:पूर्वोत्तर भारत में विप्लव के विभिन्न कारणों की संछिप्त में चर्चा कीजिए | साथ ही भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए उठाये गए कदमों को रेखांकित कीजिये | (200 शब्द ) Discuss in brief the various reasons of insurgency in North-East. Alongwith this, underline the steps taken by the Indian government to stop it.##Answer:एप्रोच - भूमिका में पूर्वोत्तर भारत का सामान्य परिचय देते हुए , विप्लव को संक्षेप में बताइए | इसके पश्चात विप्लव के कारणों को बताइए | इसके पश्चात भारत सरकार द्वारा विप्लव के विरुद्ध उठाये गए कदमों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पूर्वोत्तर भारत से आशय भारत के सर्वाधिक पूर्वी क्षेत्रों से है जिसमे एक साथ जुड़े "सात बहनों" के नाम से प्रसिद्ध राज्य और सिक्किम शामिल है | पूर्वोत्तर भारत, शेष भारत से से "चिकेन नेक" जिसे सिलीगुड़ी कोरिडोर के नाम से जानते हैं , से जुड़ा हुआ है | विप्लव का सामान्य अर्थ - उपद्रव , हलचल या उग्रवाद से होता है | विप्लव के कारण - जनजातियों की बहुलता - यह पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी समस्या है, इससे जनजातियों में एक-दूसरे के प्रति विद्वेष की भावना, असुरक्षा की भावना रहती है, जो पूरे क्षेत्र में विप्लव का कारण बनती है | अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सम्बद्धता - पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की सीमा किसी न किसी अन्य देश के साथ के साथ मिलती है एवं उस राज्य तथा देशों में नृजातीय एवं जनजातीय समानता के कारण वे दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं | अवैध प्रवासी - यह समस्या, वर्तमान समय में पूर्वोत्तर भारत राज्यों में विप्लव का मुख्य कारण है , क्योंकि इससे जनजातियों में अपनी सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक अधिकारों में गिरावट का भय जन्म लेता है | आर्थिक/ संरचनात्मक विकास का आभाव - पूर्वोत्तर राज्यों में भौगोलिक जटिलताओं के कारण संरचनात्मक विकास तीव्र गति से नहीं हो पाया, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी उत्पन्न होती है | यह कमी युवाओं में असंतोष का मुख्य कारण बनता है | सांस्कृतिक समन्वय एवं राष्ट्रवाद की कमी - पूर्वोत्तर भारत एक पतले मार्ग चिकेन नेक के माध्यम से शेष भारत से जुड़ा हुआ है , जिससे उनका आवागमन प्रभावित होता है तथा इस कारण पूर्वोत्तर और शेष भारत के मध्य सांस्कृतिक समन्वय नहीं हो पाता है | इस कारण वे अपने आप को अलग रखने का प्रयत्न करते है , इसका परिणाम उनके राष्ट्र के प्रति प्रेम में कमी के रूप में नजर आता है | विप्लव को कम करने हेतु भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम - वार्ता और सहमति - पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय संगठनों से वार्ता एवं उनकी समस्याओं का निदान | इसके साथ ही उनकी उचित मांगों पर सहमति | हिंसा के प्रति जीरो टोलरेंस - भारत सरकार द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि वह उन्ही संगठनों से बात करेगा जो हिंसा का त्याग करेंगे | यदि हिंसा होतो है तो उस स्थति में AFSPA को लागू किया जाएगा | अवैध प्रवसन के प्रति सख्त कार्यवाही - भारत सरकार द्वारा बॉर्डर पर तेजी से फेंसिंग एवं बाड़ लगाए जा रहे हैं, जिससे अवैध प्रवासन को रोका जा सके | "NRC (असम), तथा रजिस्टर ऑफ इंट्रीजीनस इनहैबिटेंट्स ऑफ नागालैंड" जैसी व्यवस्थाओं से भी अवैध प्रवासियों को पहचाना जा रहा है | संरचनात्मक सुविधाओं का विकास - पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जोड़ने के लिए रेल संपर्क मार्ग, सड़क संपर्क मार्ग, हवाई सुविधा इत्यादि का विकास तेजी से किया जा रहा है | इस कार्य से रोजगार का सृजन होगा एवं स्तर में वृद्धि होगी | सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने का प्रयास - भारत सरकार द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृतियों को विभिन्न माध्यमों से शेष भारत से जोड़कर सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ाने की कोशिश कर रही है | जैसे- एक भारत श्रेष्ठ भारत | पूर्वोत्तर भारत में भारत सरकार द्वारा सराहनीय कार्य किये जा रहे हैं | हाल के वर्षो में पूर्वोत्तर में विप्लव के क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी दिखाई पड़ी है |
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प्लासी के लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के विभिन्न भागों में राजनीतिक दखल एवं प्रभुत्व बढ़ता चला गया| इस संदर्भ में, प्लासी की लड़ाई के कारणों का उल्लेख कीजिये| साथ ही, इसके परिणामों की व्याख्या कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) After the Battle of Plassey, the East India Company"s political influence and dominance increased in different parts of India. In this context, mention the causes for the Battle of Plassey. Also, explain its consequences. (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच- प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, प्लासी के युद्ध के कारणों का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में, प्लासी के युद्ध के घटनाक्रम को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए इसके परिणामों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- भारत में ब्रिटिश राजनीतिक सता का आरंभ 1757 के प्लासी युद्ध से माना जाता है जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराया था| कर्नाटक युद्धों में फ्रांसीसियों को हराने से उत्साहित अंग्रेजों ने अपने अनुभवों का बेहतर इस्तेमाल इस युद्ध में किया| बंगाल तब भारत का सबसे धनी तथा उपजाऊ प्रांत था| साथ ही, इससे कंपनी तथा उसके कर्मचारियों के लाभदायक हित भी जुड़े हुए थें| कंपनी 1717 में मुग़ल सम्राट के द्वारा मिले शाही फरमान का प्रयोग कर अवैध व्यापार कर रही थी जिससे बंगाल के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँच रहा था|इसी पृष्ठभूमि में सिराजुद्दौला ने 1756 में कासिमबाजार तथा कलकता को अपने नियंत्रण में ले लिया तथा अंग्रेजों को फुल्टा नामक द्वीप पर शरण लेनी पड़ी| तत्पश्चात मद्रास से आये वाटसन तथा क्लाईव के नेतृत्व में नौसैनिक सहायता के द्वारा अंग्रेजों ने वापस सिराजुद्दौला को चुनौती दी तथा कलकता को वापस जीतलिया| हालाँकि दोनों पक्षों के मध्य जल्द ही प्लासी में 23 जून,1757 को एक और निर्णायक युद्ध हुआ| प्लासी के युद्ध के कारण - अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा; 1717 के फरमान(आदेश) के दुरूपयोग को लेकर विवाद- फर्रुख्सियार के द्वारा दिए गए दस्तक के अधिकार से बंगाल के राजस्व को हानि पहुँचना तथा इसका दुरूपयोग कर कंपनी के कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार पर भी कर न चुकाना जिससे नवाब का क्रोधित होना; सिराजुद्दौला की संप्रभुता को चुनौती - द्वितीय कर्नाटक युद्ध से उत्साहित होकर अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला की सता को चुनौती दी जैसे- भारतीय वस्तुओं पर कलकता में कर लगाना, नवाब के मना करने के बावजूद कलकता की किलेबंदी करना, नवाब के विरोधियों को संरक्षण इत्यादि| इसे सिराज ने अपनी संप्रभुता के उल्लंघन के रूप लिया| सिराजुद्दौला की प्रतिक्रिया - सिराजुद्दौला ने जून,1756 में कासिमबाजार एवं कलकता पर नियंत्रण स्थापित किया तथा ब्रिटिश अधिकारियों को फुल्टा द्वीप में शरण लेनी पड़ी| सिराजुद्दौला ने कलकता की जिम्मेदारी मानिकचंद नामक अधिकारी को सौंपी जिसके द्वारा विश्वासघात किया गया| काल-कोठरी(ब्लैक-होल) की घटना - हौलबेल ने इस घटना का जिक्र किया| हालाँकि ऐतिहासिक तौर पर यह प्रमाणित नहीं हो पाया है फिर भी इसने सिराजुद्दौला से प्रतिशोध के लिए अंग्रेजों को एकजुट किया| कलकता पर अंग्रेजों का नियंत्रण - जनवरी 1757 में क्लाईव के नेतृत्व में कलकता पर अंग्रेजों का पुनः नियंत्रण स्थापित हुआ| सिराजुद्दौला ने तात्कालिक तौर पर अंग्रेजों की संप्रभुता को स्वीकार किया| हालाँकि मज़बूरी में नवाब ने अंग्रेजों की सारी मांगें मान ली थी पर अंग्रेज उसकी जगह अपने किसी विश्वासपात्र को गद्दी पर बैठाना चाहते थें| क्लाईव के द्वारा षड़यंत्र - क्लाईव ने नवाब को हटाने की योजना बनाई| इस षड़यंत्र में मुख्य सेनापति मीरजाफर के साथ-साथ कई अन्य अधिकारी व बड़े व्यापारी भी शामिल थें| योजना के अनुसार ही प्लासी नामक स्थान पर दोनों की सेना में टकराव हुआ तथा कुछ ही घंटों में अंग्रेजों की जीत हो गई| प्लासी के युद्ध के परिणाम राजनीतिक परिणाम पूर्व(बंगाल, उड़ीसा) में राजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय ; बंगाल के नवाब की राजनीतिक स्थिति का कमजोर होना जिससे बंगाल के राजनीतिक प्रशासन पर अंग्रेजों का प्रभाव जैसे - नवाब के अधिकारियों की नियुक्ति में हस्तक्षेप आदि| अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा बढ़ी तथा इसका असर अन्य भारतीय क्षेत्रों में राजनीतिक दखल के रूप में देखने को मिला| आर्थिक परिणाम अंग्रेजों को एक बड़ी राशि मुआवजे के रूप में; 24 परगना की जमींदारी तथा उपहार के रूप में भी एक अच्छी-खासी रकम अंग्रेजों ने ली| बं गाल के समृद्ध संसाधनों तक पहुँच का लाभ अंग्रेजों ने तृतीय कर्नाटक युद्ध तथा उत्तर भारत में अभी अपने क्षेत्र विस्तार में किया| कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार पर भी मुक्त व्यापार की सुविधा दी गई| अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने फ्रांसीसी तथा डच कंपनियों को कमजोर बनाकर बंगाल के व्यापार तथा वाणिज्य पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया| प्लासी के लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक वाणिज्यिक निकाय ना होकर सैन्य कंपनी के रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया| अब इसके पास एक बहुत बड़ा भूभाग था जिसे एक प्रशिक्षित सेना के माध्यम से ही सुरक्षित रखा जा सकता था| इसके फलस्वरूप कंपनी सैन्य-सुदृढ़ीकरण की ओर बढ़ती चली गई तथा भारत के विभिन्न भागों में इसका राजनीतिक दखल एवं प्रभुत्व बढ़ता चला गया|
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##Question:प्लासी के लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के विभिन्न भागों में राजनीतिक दखल एवं प्रभुत्व बढ़ता चला गया| इस संदर्भ में, प्लासी की लड़ाई के कारणों का उल्लेख कीजिये| साथ ही, इसके परिणामों की व्याख्या कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) After the Battle of Plassey, the East India Company"s political influence and dominance increased in different parts of India. In this context, mention the causes for the Battle of Plassey. Also, explain its consequences. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, प्लासी के युद्ध के कारणों का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में, प्लासी के युद्ध के घटनाक्रम को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए इसके परिणामों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- भारत में ब्रिटिश राजनीतिक सता का आरंभ 1757 के प्लासी युद्ध से माना जाता है जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराया था| कर्नाटक युद्धों में फ्रांसीसियों को हराने से उत्साहित अंग्रेजों ने अपने अनुभवों का बेहतर इस्तेमाल इस युद्ध में किया| बंगाल तब भारत का सबसे धनी तथा उपजाऊ प्रांत था| साथ ही, इससे कंपनी तथा उसके कर्मचारियों के लाभदायक हित भी जुड़े हुए थें| कंपनी 1717 में मुग़ल सम्राट के द्वारा मिले शाही फरमान का प्रयोग कर अवैध व्यापार कर रही थी जिससे बंगाल के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँच रहा था|इसी पृष्ठभूमि में सिराजुद्दौला ने 1756 में कासिमबाजार तथा कलकता को अपने नियंत्रण में ले लिया तथा अंग्रेजों को फुल्टा नामक द्वीप पर शरण लेनी पड़ी| तत्पश्चात मद्रास से आये वाटसन तथा क्लाईव के नेतृत्व में नौसैनिक सहायता के द्वारा अंग्रेजों ने वापस सिराजुद्दौला को चुनौती दी तथा कलकता को वापस जीतलिया| हालाँकि दोनों पक्षों के मध्य जल्द ही प्लासी में 23 जून,1757 को एक और निर्णायक युद्ध हुआ| प्लासी के युद्ध के कारण - अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा; 1717 के फरमान(आदेश) के दुरूपयोग को लेकर विवाद- फर्रुख्सियार के द्वारा दिए गए दस्तक के अधिकार से बंगाल के राजस्व को हानि पहुँचना तथा इसका दुरूपयोग कर कंपनी के कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार पर भी कर न चुकाना जिससे नवाब का क्रोधित होना; सिराजुद्दौला की संप्रभुता को चुनौती - द्वितीय कर्नाटक युद्ध से उत्साहित होकर अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला की सता को चुनौती दी जैसे- भारतीय वस्तुओं पर कलकता में कर लगाना, नवाब के मना करने के बावजूद कलकता की किलेबंदी करना, नवाब के विरोधियों को संरक्षण इत्यादि| इसे सिराज ने अपनी संप्रभुता के उल्लंघन के रूप लिया| सिराजुद्दौला की प्रतिक्रिया - सिराजुद्दौला ने जून,1756 में कासिमबाजार एवं कलकता पर नियंत्रण स्थापित किया तथा ब्रिटिश अधिकारियों को फुल्टा द्वीप में शरण लेनी पड़ी| सिराजुद्दौला ने कलकता की जिम्मेदारी मानिकचंद नामक अधिकारी को सौंपी जिसके द्वारा विश्वासघात किया गया| काल-कोठरी(ब्लैक-होल) की घटना - हौलबेल ने इस घटना का जिक्र किया| हालाँकि ऐतिहासिक तौर पर यह प्रमाणित नहीं हो पाया है फिर भी इसने सिराजुद्दौला से प्रतिशोध के लिए अंग्रेजों को एकजुट किया| कलकता पर अंग्रेजों का नियंत्रण - जनवरी 1757 में क्लाईव के नेतृत्व में कलकता पर अंग्रेजों का पुनः नियंत्रण स्थापित हुआ| सिराजुद्दौला ने तात्कालिक तौर पर अंग्रेजों की संप्रभुता को स्वीकार किया| हालाँकि मज़बूरी में नवाब ने अंग्रेजों की सारी मांगें मान ली थी पर अंग्रेज उसकी जगह अपने किसी विश्वासपात्र को गद्दी पर बैठाना चाहते थें| क्लाईव के द्वारा षड़यंत्र - क्लाईव ने नवाब को हटाने की योजना बनाई| इस षड़यंत्र में मुख्य सेनापति मीरजाफर के साथ-साथ कई अन्य अधिकारी व बड़े व्यापारी भी शामिल थें| योजना के अनुसार ही प्लासी नामक स्थान पर दोनों की सेना में टकराव हुआ तथा कुछ ही घंटों में अंग्रेजों की जीत हो गई| प्लासी के युद्ध के परिणाम राजनीतिक परिणाम पूर्व(बंगाल, उड़ीसा) में राजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय ; बंगाल के नवाब की राजनीतिक स्थिति का कमजोर होना जिससे बंगाल के राजनीतिक प्रशासन पर अंग्रेजों का प्रभाव जैसे - नवाब के अधिकारियों की नियुक्ति में हस्तक्षेप आदि| अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा बढ़ी तथा इसका असर अन्य भारतीय क्षेत्रों में राजनीतिक दखल के रूप में देखने को मिला| आर्थिक परिणाम अंग्रेजों को एक बड़ी राशि मुआवजे के रूप में; 24 परगना की जमींदारी तथा उपहार के रूप में भी एक अच्छी-खासी रकम अंग्रेजों ने ली| बं गाल के समृद्ध संसाधनों तक पहुँच का लाभ अंग्रेजों ने तृतीय कर्नाटक युद्ध तथा उत्तर भारत में अभी अपने क्षेत्र विस्तार में किया| कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार पर भी मुक्त व्यापार की सुविधा दी गई| अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने फ्रांसीसी तथा डच कंपनियों को कमजोर बनाकर बंगाल के व्यापार तथा वाणिज्य पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया| प्लासी के लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी केवल एक वाणिज्यिक निकाय ना होकर सैन्य कंपनी के रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया| अब इसके पास एक बहुत बड़ा भूभाग था जिसे एक प्रशिक्षित सेना के माध्यम से ही सुरक्षित रखा जा सकता था| इसके फलस्वरूप कंपनी सैन्य-सुदृढ़ीकरण की ओर बढ़ती चली गई तथा भारत के विभिन्न भागों में इसका राजनीतिक दखल एवं प्रभुत्व बढ़ता चला गया|
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केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये| इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Point out the main provisions of the Central Civil Services Code of Conduct 1964 and their practical limitations. Discuss the recommendations submitted by the Second Administrative Reform Commission towards reforms in this. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में आचरण संहिता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में, केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये 3- दूसरे भाग में, इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आचरण संहिता का आशय निर्धारित मूल्यों एवं नियमों के सेट से है जो किसी लोकसेवक के व्यवहार को विनियमित करने के लिए संहिताबद्ध किये गए हों| आचरण संहिता का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के द्वारा नैतिक निर्णय को प्राप्त करने हेतु नैतिक दुविधाओं के निराकरण या समाधान को सुनिश्चित किये जाने से है| परन्तु आचरण संहिता उन सभी नैतिक दुविधाओं के समाधान हेतु मार्गदर्शन प्रदान करे यह व्यवहारिक रूप से सम्भव नहीं है फिर भी यह नैतिक मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है| भारत में लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता का उल्लेख 1964 के नियमावली में किया गया है केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 · प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो सरकारी सेवक के रूप में उचित न हो(नकारात्मक प्रावधान) · प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को बना कर रखा जाना चाहिए| इसके साथ ही कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव सरकारी दायित्वों के निष्पादन में गोपनीयता को बना कर रखा जाना चाहिए (अन्तर्विरोध) · कोई सरकारी सेवक अपने अपने सरकारी दायित्वों के निष्पादन में दुर्व्यवहार या अशिष्ट व्यवहार नहीं करेगा · कोई क्लास 1 अधिकारी बिना सरकार की पूर्व सहमति के अपने पुत्र या पुत्री या निर्भर/आश्रित को ऐसी कंपनी में रोजगार को स्वीकृत करने की अनुमति नहीं देगा जिसका सरकार के साथ कोई तालमेल हो| यह एक भ्रमात्मक नियम है और निजीकरण के दौर में यह प्रावधान अव्यवहारिक भी है, यदि कोई चीज अनैतिक है तो सरकार की पूर्वानुमति उसे नैतिक कैसे बना सकती है, अतः यह प्रावधान अपने आप में उचित नहीं है| · कोई सरकारी सेवक या उसके परिवार का सदस्य किसी उपहार कोई स्वीकार नहीं कर सकता है|नियमावली के अनुसार ग्रुप A का अधिकारी 20 हजार रूपये तक, ग्रुप B का अधिकारी 15 हजार रूपये तक एवं ग्रुप C का अधिकारी 7500 के मूल्य का उपहार स्वीकार कर सकता है एवं इस मूल्य से अधिक राशि के उपहार को स्वीकार करने हेतु सरकार की स्वीकृति का होना आवश्यक है| वर्तमान महंगाई के दौर में स्वीकृत उपहार का मूल्य अव्यवहारिक है एवं उपहार के आदान-प्रदान में वास्तविक मूल्य का निर्धारण किया जाना अपने आप में संभव नहीं है| · कोई सरकारी सेवक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तो दहेज़ देगा और न ही दहेज़ लेगा| जब दहेज़ निवारण अधिनियम 1961 के माध्यम से दहेज़ को रोकने का प्रयास किया गया है तो ऐसी स्थिति में इसे आचरण संहिता में शामिल किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| · कोई लोकसेवक 14 वर्ष से कम किसी बच्चे को कार्य हेतु रोजगार में नहीं रखेगा, यहाँ भी बाल श्रम कानून का संदर्भ दिया जा सकता है · कोई सरकारी सेवक सार्वजनिक स्थल में शराब या ड्रग का प्रयोग नहीं करेगा और इस अवस्था में नहीं दिखेगा| कोई लोकसेवक शराब या ड्रग का प्रयोग अत्यधिक मात्रा(अस्पष्ट) में नहीं करेगा| ऐसे प्रावधानों को आचरण नियमावली में शामिल किये जाने का कोई अर्थपूर्ण औचित्य नहीं है क्योंकि इसका सम्बन्ध व्यक्ति की जीवनशैली से है एवं यह आचरण संहिता के सतही पहलुओं को दर्शाता है| आचरण संहिता की सीमाएं · परन्तु समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों की कार्य प्रकृति में जिस प्रकार का परिवर्तन हुआ है उसके अनुरूप आचरण संहिता में आवश्यक संशोधन या परिवर्तन को प्राप्त नहीं किया गया है · अतः आचरण संहिता अपनी प्रासंगिकता को पूर्णतयः साबित करने या स्थापित करने की स्थिति में नहीं है · आचरण संहिता अधिकतर मामलों में सतही पहलुओं पर विशेष रूप से केन्द्रित है न कि लोकसेवकों के वास्तविक कार्य की विषय वस्तु से, इसके परिणामस्वरुप आचरण संहिता का अनुपालन प्रायः उल्लंघन के रूप में किया जाता है न कि अनुसरण के रूप में| · आचरण संहिता कई अवसरों पर शंकाओं का समाधान न करके खुद शंकाओं को उत्पन्न करती है एवं कई प्रावधानों में अंतर्विरोध होने के कारण यह स्वतः अपने आप में नैतिक दुविधाओं को उत्पन्न करती है न कि उसके निराकरण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करती है · अधिकाँश मामलों में आचरण संहिता इस बात का उल्लेख करती है कि लोकसेवकों को क्या नहीं करना चाहिए जबकि वास्तविक में आचरण संहिता को विभिन्न परिस्थितियों में लोकसेवकों को अति सक्रिय मार्गदर्शन प्राप्त होनी चाहिए ताकि आचरण संहिता के माध्यम से नैतिक दुविधाओं का प्रभावी समाधान किया जा सके · अतः वर्तमान में आचरण सहिता की प्रकृति नकारात्मक है जबकि इसकी प्रकृति सकारात्मक होनी चाहिए · उपरोक्त सीमाएं आचरण संहिता में व्यापक सुधार की अपेक्षा स्पष्ट करती है अतः द्वितीय ARC द्वारा इस दिशा में प्रयास किये गए हैं| द्वितीय ARC की संस्तुतियां · आचरण संहिता की व्यवहारिक सीमाओं के समाधान हेतु द्वितीय ARC द्वारा आचरण संहिता को अधिक बनाने की अनुशंषा की गयी है, इस व्यापक आचरण संहिता का निर्धारण 3 स्तरों पर किया जाना चाहिए · चूँकि लोकसेवकों के मूल्यों का सम्बन्ध जन अपेक्षाओं से है| अतः प्रथम या सर्वोच्च स्तर पर लोकसेवकों के मूल्यों एवं नैतिक मानकों का उल्लेख किया जाना चाहिए जिसका अनुपालन लोकसेवकों के द्वारा किया जाना है जैसे संविधान के प्रति वचनबद्धता, सत्यनिष्ठा एवं आचरण के उच्चतम मानक, निष्पक्षता एवं गैर-तरफदारी, वस्तुनिष्ठता और जन समस्याओं के प्रति वचनबद्धता और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति समानुभूति · द्वितीय स्तर पर, नीतिपरक संहिता(CODE OF ETHICS) को उल्लेखित किया जाना है जो कि लोकसेवकों के व्यवहार को शासित करने हेतु व्यापक सिद्धांतों से सम्बन्धित होगा| लोकसेवकों के नैतिक संहिता में निम्नलिखित पहलुओं पर बल दिया जाना है जैसेसत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, लोकसेवा के प्रति वचनबद्धता, खुली जवाबदेहिता, कर्तव्यों के प्रति समर्पणऔर एक आदर्श व्यवहार का होना · तीसरे स्तर पर, आचरण संहिता को उल्लेखित किया जाना है आचरण संहिता का सम्बन्ध लोकसेवकों के आचरण को नियमित करने हेतु विशिष्ट दिशानिर्देश से है| इसके अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में स्वीकृत एवं अस्वीकृत इन दोनों प्रकार के लोकसेवकों के व्यवहार को वर्णित किया जाना है| उपरोक्त तीनों स्तरों को मिलाकर व्यापक आचरण संहिता का निर्माण होगा| मूल्यों को आचरण या व्यवहार में परिवर्तित करने हेतु नैतिक सिद्धांतों का होना अति आवश्यक है अतः नीति संहिता लोकसेवकों के मूल्यों एवं आचरण संहिता के मध्य का सेतु या कड़ी है| अतः प्रशासन में सत्यनिष्ठा को स्थापित करने के लिए आचरण संहिता में व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है|
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##Question:केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये| इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Point out the main provisions of the Central Civil Services Code of Conduct 1964 and their practical limitations. Discuss the recommendations submitted by the Second Administrative Reform Commission towards reforms in this. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आचरण संहिता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में, केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये 3- दूसरे भाग में, इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आचरण संहिता का आशय निर्धारित मूल्यों एवं नियमों के सेट से है जो किसी लोकसेवक के व्यवहार को विनियमित करने के लिए संहिताबद्ध किये गए हों| आचरण संहिता का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के द्वारा नैतिक निर्णय को प्राप्त करने हेतु नैतिक दुविधाओं के निराकरण या समाधान को सुनिश्चित किये जाने से है| परन्तु आचरण संहिता उन सभी नैतिक दुविधाओं के समाधान हेतु मार्गदर्शन प्रदान करे यह व्यवहारिक रूप से सम्भव नहीं है फिर भी यह नैतिक मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है| भारत में लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता का उल्लेख 1964 के नियमावली में किया गया है केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 · प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो सरकारी सेवक के रूप में उचित न हो(नकारात्मक प्रावधान) · प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को बना कर रखा जाना चाहिए| इसके साथ ही कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव सरकारी दायित्वों के निष्पादन में गोपनीयता को बना कर रखा जाना चाहिए (अन्तर्विरोध) · कोई सरकारी सेवक अपने अपने सरकारी दायित्वों के निष्पादन में दुर्व्यवहार या अशिष्ट व्यवहार नहीं करेगा · कोई क्लास 1 अधिकारी बिना सरकार की पूर्व सहमति के अपने पुत्र या पुत्री या निर्भर/आश्रित को ऐसी कंपनी में रोजगार को स्वीकृत करने की अनुमति नहीं देगा जिसका सरकार के साथ कोई तालमेल हो| यह एक भ्रमात्मक नियम है और निजीकरण के दौर में यह प्रावधान अव्यवहारिक भी है, यदि कोई चीज अनैतिक है तो सरकार की पूर्वानुमति उसे नैतिक कैसे बना सकती है, अतः यह प्रावधान अपने आप में उचित नहीं है| · कोई सरकारी सेवक या उसके परिवार का सदस्य किसी उपहार कोई स्वीकार नहीं कर सकता है|नियमावली के अनुसार ग्रुप A का अधिकारी 20 हजार रूपये तक, ग्रुप B का अधिकारी 15 हजार रूपये तक एवं ग्रुप C का अधिकारी 7500 के मूल्य का उपहार स्वीकार कर सकता है एवं इस मूल्य से अधिक राशि के उपहार को स्वीकार करने हेतु सरकार की स्वीकृति का होना आवश्यक है| वर्तमान महंगाई के दौर में स्वीकृत उपहार का मूल्य अव्यवहारिक है एवं उपहार के आदान-प्रदान में वास्तविक मूल्य का निर्धारण किया जाना अपने आप में संभव नहीं है| · कोई सरकारी सेवक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तो दहेज़ देगा और न ही दहेज़ लेगा| जब दहेज़ निवारण अधिनियम 1961 के माध्यम से दहेज़ को रोकने का प्रयास किया गया है तो ऐसी स्थिति में इसे आचरण संहिता में शामिल किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| · कोई लोकसेवक 14 वर्ष से कम किसी बच्चे को कार्य हेतु रोजगार में नहीं रखेगा, यहाँ भी बाल श्रम कानून का संदर्भ दिया जा सकता है · कोई सरकारी सेवक सार्वजनिक स्थल में शराब या ड्रग का प्रयोग नहीं करेगा और इस अवस्था में नहीं दिखेगा| कोई लोकसेवक शराब या ड्रग का प्रयोग अत्यधिक मात्रा(अस्पष्ट) में नहीं करेगा| ऐसे प्रावधानों को आचरण नियमावली में शामिल किये जाने का कोई अर्थपूर्ण औचित्य नहीं है क्योंकि इसका सम्बन्ध व्यक्ति की जीवनशैली से है एवं यह आचरण संहिता के सतही पहलुओं को दर्शाता है| आचरण संहिता की सीमाएं · परन्तु समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों की कार्य प्रकृति में जिस प्रकार का परिवर्तन हुआ है उसके अनुरूप आचरण संहिता में आवश्यक संशोधन या परिवर्तन को प्राप्त नहीं किया गया है · अतः आचरण संहिता अपनी प्रासंगिकता को पूर्णतयः साबित करने या स्थापित करने की स्थिति में नहीं है · आचरण संहिता अधिकतर मामलों में सतही पहलुओं पर विशेष रूप से केन्द्रित है न कि लोकसेवकों के वास्तविक कार्य की विषय वस्तु से, इसके परिणामस्वरुप आचरण संहिता का अनुपालन प्रायः उल्लंघन के रूप में किया जाता है न कि अनुसरण के रूप में| · आचरण संहिता कई अवसरों पर शंकाओं का समाधान न करके खुद शंकाओं को उत्पन्न करती है एवं कई प्रावधानों में अंतर्विरोध होने के कारण यह स्वतः अपने आप में नैतिक दुविधाओं को उत्पन्न करती है न कि उसके निराकरण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करती है · अधिकाँश मामलों में आचरण संहिता इस बात का उल्लेख करती है कि लोकसेवकों को क्या नहीं करना चाहिए जबकि वास्तविक में आचरण संहिता को विभिन्न परिस्थितियों में लोकसेवकों को अति सक्रिय मार्गदर्शन प्राप्त होनी चाहिए ताकि आचरण संहिता के माध्यम से नैतिक दुविधाओं का प्रभावी समाधान किया जा सके · अतः वर्तमान में आचरण सहिता की प्रकृति नकारात्मक है जबकि इसकी प्रकृति सकारात्मक होनी चाहिए · उपरोक्त सीमाएं आचरण संहिता में व्यापक सुधार की अपेक्षा स्पष्ट करती है अतः द्वितीय ARC द्वारा इस दिशा में प्रयास किये गए हैं| द्वितीय ARC की संस्तुतियां · आचरण संहिता की व्यवहारिक सीमाओं के समाधान हेतु द्वितीय ARC द्वारा आचरण संहिता को अधिक बनाने की अनुशंषा की गयी है, इस व्यापक आचरण संहिता का निर्धारण 3 स्तरों पर किया जाना चाहिए · चूँकि लोकसेवकों के मूल्यों का सम्बन्ध जन अपेक्षाओं से है| अतः प्रथम या सर्वोच्च स्तर पर लोकसेवकों के मूल्यों एवं नैतिक मानकों का उल्लेख किया जाना चाहिए जिसका अनुपालन लोकसेवकों के द्वारा किया जाना है जैसे संविधान के प्रति वचनबद्धता, सत्यनिष्ठा एवं आचरण के उच्चतम मानक, निष्पक्षता एवं गैर-तरफदारी, वस्तुनिष्ठता और जन समस्याओं के प्रति वचनबद्धता और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति समानुभूति · द्वितीय स्तर पर, नीतिपरक संहिता(CODE OF ETHICS) को उल्लेखित किया जाना है जो कि लोकसेवकों के व्यवहार को शासित करने हेतु व्यापक सिद्धांतों से सम्बन्धित होगा| लोकसेवकों के नैतिक संहिता में निम्नलिखित पहलुओं पर बल दिया जाना है जैसेसत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, लोकसेवा के प्रति वचनबद्धता, खुली जवाबदेहिता, कर्तव्यों के प्रति समर्पणऔर एक आदर्श व्यवहार का होना · तीसरे स्तर पर, आचरण संहिता को उल्लेखित किया जाना है आचरण संहिता का सम्बन्ध लोकसेवकों के आचरण को नियमित करने हेतु विशिष्ट दिशानिर्देश से है| इसके अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में स्वीकृत एवं अस्वीकृत इन दोनों प्रकार के लोकसेवकों के व्यवहार को वर्णित किया जाना है| उपरोक्त तीनों स्तरों को मिलाकर व्यापक आचरण संहिता का निर्माण होगा| मूल्यों को आचरण या व्यवहार में परिवर्तित करने हेतु नैतिक सिद्धांतों का होना अति आवश्यक है अतः नीति संहिता लोकसेवकों के मूल्यों एवं आचरण संहिता के मध्य का सेतु या कड़ी है| अतः प्रशासन में सत्यनिष्ठा को स्थापित करने के लिए आचरण संहिता में व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है|
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नीतिशास्त्र के संदर्भ में, केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये| इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये (150-200 शब्द; 10 अंक) Point out the main provisions of the Central Civil Services Code of Conduct 1964 and their practical limitations in the context of ethics. Discuss the recommendations submitted by the Second Administrative Reform Commission towards reforms in this (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में आचरण संहिता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में, केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये 3- दूसरे भाग में, इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आचरण संहिता का आशय निर्धारित मूल्यों एवं नियमों के सेट से है जो किसी लोकसेवक के व्यवहार को विनियमित करने के लिए संहिताबद्ध किये गए हों| आचरण संहिता का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के द्वारा नैतिक निर्णय को प्राप्त करने हेतु नैतिक दुविधाओं के निराकरण या समाधान को सुनिश्चित किये जाने से है| परन्तु आचरण संहिता उन सभी नैतिक दुविधाओं के समाधान हेतु मार्गदर्शन प्रदान करे यह व्यवहारिक रूप से सम्भव नहीं है फिर भी यह नैतिक मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है| भारत में लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता का उल्लेख 1964 के नियमावली में किया गया है केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 ·प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो सरकारी सेवक के रूप में उचित न हो(नकारात्मक प्रावधान) · प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को बना कर रखा जाना चाहिए| इसके साथ ही कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव सरकारी दायित्वों के निष्पादन में गोपनीयता को बना कर रखा जाना चाहिए (अन्तर्विरोध) · कोई सरकारी सेवक अपने अपने सरकारी दायित्वों के निष्पादन में दुर्व्यवहार या अशिष्ट व्यवहार नहीं करेगा · कोई क्लास 1 अधिकारी बिना सरकार की पूर्व सहमति के अपने पुत्र या पुत्री या निर्भर/आश्रित को ऐसी कंपनी में रोजगार को स्वीकृत करने की अनुमति नहीं देगा जिसका सरकार के साथ कोई तालमेल हो| यह एक भ्रमात्मक नियम है और निजीकरण के दौर में यह प्रावधान अव्यवहारिक भी है, यदि कोई चीज अनैतिक है तो सरकार की पूर्वानुमति उसे नैतिक कैसे बना सकती है, अतः यह प्रावधान अपने आप में उचित नहीं है| · कोई सरकारी सेवक या उसके परिवार का सदस्य किसी उपहार कोई स्वीकार नहीं कर सकता है|नियमावली के अनुसार ग्रुप A का अधिकारी 20 हजार रूपये तक, ग्रुप B का अधिकारी 15 हजार रूपये तक एवं ग्रुप C का अधिकारी 7500 के मूल्य का उपहार स्वीकार कर सकता है एवं इस मूल्य से अधिक राशि के उपहार को स्वीकार करने हेतु सरकार की स्वीकृति का होना आवश्यक है| वर्तमान महंगाई के दौर में स्वीकृत उपहार का मूल्य अव्यवहारिक है एवं उपहार के आदान-प्रदान में वास्तविक मूल्य का निर्धारण किया जाना अपने आप में संभव नहीं है| · कोई सरकारी सेवक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तो दहेज़ देगा और न ही दहेज़ लेगा| जब दहेज़ निवारण अधिनियम 1961 के माध्यम से दहेज़ को रोकने का प्रयास किया गया है तो ऐसी स्थिति में इसे आचरण संहिता में शामिल किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| · कोई लोकसेवक 14 वर्ष से कम किसी बच्चे को कार्य हेतु रोजगार में नहीं रखेगा, यहाँ भी बाल श्रम कानून का संदर्भ दिया जा सकता है · कोई सरकारी सेवक सार्वजनिक स्थल में शराब या ड्रग का प्रयोग नहीं करेगा और इस अवस्था में नहीं दिखेगा| कोई लोकसेवक शराब या ड्रग का प्रयोग अत्यधिक मात्रा(अस्पष्ट) में नहीं करेगा| ऐसे प्रावधानों को आचरण नियमावली में शामिल किये जाने का कोई अर्थपूर्ण औचित्य नहीं है क्योंकि इसका सम्बन्ध व्यक्ति की जीवनशैली से है एवं यह आचरण संहिता के सतही पहलुओं को दर्शाता है| आचरण संहिता की सीमाएं ·परन्तु समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों की कार्य प्रकृति में जिस प्रकार का परिवर्तन हुआ है उसके अनुरूप आचरण संहिता में आवश्यक संशोधन या परिवर्तन को प्राप्त नहीं किया गया है · अतः आचरण संहिता अपनी प्रासंगिकता को पूर्णतयः साबित करने या स्थापित करने की स्थिति में नहीं है · आचरण संहिता अधिकतर मामलों में सतही पहलुओं पर विशेष रूप से केन्द्रित है न कि लोकसेवकों के वास्तविक कार्य की विषय वस्तु से, इसके परिणामस्वरुप आचरण संहिता का अनुपालन प्रायः उल्लंघन के रूप में किया जाता है न कि अनुसरण के रूप में| · आचरण संहिता कई अवसरों पर शंकाओं का समाधान न करके खुद शंकाओं को उत्पन्न करती है एवं कई प्रावधानों में अंतर्विरोध होने के कारण यह स्वतः अपने आप में नैतिक दुविधाओं को उत्पन्न करती है न कि उसके निराकरण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करती है · अधिकाँश मामलों में आचरण संहिता इस बात का उल्लेख करती है कि लोकसेवकों को क्या नहीं करना चाहिए जबकि वास्तविक में आचरण संहिता को विभिन्न परिस्थितियों में लोकसेवकों को अति सक्रिय मार्गदर्शन प्राप्त होनी चाहिए ताकि आचरण संहिता के माध्यम से नैतिक दुविधाओं का प्रभावी समाधान किया जा सके · अतः वर्तमान में आचरण सहिता की प्रकृति नकारात्मक है जबकि इसकी प्रकृति सकारात्मक होनी चाहिए · उपरोक्त सीमाएं आचरण संहिता में व्यापक सुधार की अपेक्षा स्पष्ट करती है अतः द्वितीय ARC द्वारा इस दिशा में प्रयास किये गए हैं| द्वितीय ARC की संस्तुतियां · आचरण संहिता की व्यवहारिक सीमाओं के समाधान हेतु द्वितीय ARC द्वारा आचरण संहिता को अधिक बनाने की अनुशंषा की गयी है, इस व्यापक आचरण संहिता का निर्धारण 3 स्तरों पर किया जाना चाहिए · चूँकि लोकसेवकों के मूल्यों का सम्बन्ध जन अपेक्षाओं से है| अतः प्रथम या सर्वोच्च स्तर पर लोकसेवकों के मूल्यों एवं नैतिक मानकों का उल्लेख किया जाना चाहिए जिसका अनुपालन लोकसेवकों के द्वारा किया जाना है जैसे संविधान के प्रति वचनबद्धता, सत्यनिष्ठा एवं आचरण के उच्चतम मानक, निष्पक्षता एवं गैर-तरफदारी, वस्तुनिष्ठता और जन समस्याओं के प्रति वचनबद्धता और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति समानुभूति · द्वितीय स्तर पर, नीतिपरक संहिता(CODE OF ETHICS) को उल्लेखित किया जाना है जो कि लोकसेवकों के व्यवहार को शासित करने हेतु व्यापक सिद्धांतों से सम्बन्धित होगा| लोकसेवकों के नैतिक संहिता में निम्नलिखित पहलुओं पर बल दिया जाना है जैसेसत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, लोकसेवा के प्रति वचनबद्धता, खुली जवाबदेहिता, कर्तव्यों के प्रति समर्पणऔर एक आदर्श व्यवहार का होना · तीसरे स्तर पर, आचरण संहिता को उल्लेखित किया जाना है आचरण संहिता का सम्बन्ध लोकसेवकों के आचरण को नियमित करने हेतु विशिष्ट दिशानिर्देश से है| इसके अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में स्वीकृत एवं अस्वीकृत इन दोनों प्रकार के लोकसेवकों के व्यवहार को वर्णित किया जाना है| उपरोक्त तीनों स्तरों को मिलाकर व्यापक आचरण संहिता का निर्माण होगा| मूल्यों को आचरण या व्यवहार में परिवर्तित करने हेतु नैतिक सिद्धांतों का होना अति आवश्यक है अतः नीति संहिता लोकसेवकों के मूल्यों एवं आचरण संहिता के मध्य का सेतु या कड़ी है| अतः प्रशासन में सत्यनिष्ठा को स्थापित करने के लिए आचरण संहिता में व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है|
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##Question:नीतिशास्त्र के संदर्भ में, केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये| इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये (150-200 शब्द; 10 अंक) Point out the main provisions of the Central Civil Services Code of Conduct 1964 and their practical limitations in the context of ethics. Discuss the recommendations submitted by the Second Administrative Reform Commission towards reforms in this (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में आचरण संहिता को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में, केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 के प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित कीजिये 3- दूसरे भाग में, इसमें सुधार की दिशा में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा प्रस्तुत संस्तुतियों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये आचरण संहिता का आशय निर्धारित मूल्यों एवं नियमों के सेट से है जो किसी लोकसेवक के व्यवहार को विनियमित करने के लिए संहिताबद्ध किये गए हों| आचरण संहिता का मौलिक उद्देश्य लोकसेवकों के द्वारा नैतिक निर्णय को प्राप्त करने हेतु नैतिक दुविधाओं के निराकरण या समाधान को सुनिश्चित किये जाने से है| परन्तु आचरण संहिता उन सभी नैतिक दुविधाओं के समाधान हेतु मार्गदर्शन प्रदान करे यह व्यवहारिक रूप से सम्भव नहीं है फिर भी यह नैतिक मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है| भारत में लोकसेवकों के लिए आचरण संहिता का उल्लेख 1964 के नियमावली में किया गया है केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1964 ·प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो सरकारी सेवक के रूप में उचित न हो(नकारात्मक प्रावधान) · प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता को बना कर रखा जाना चाहिए| इसके साथ ही कहा गया है कि प्रत्येक सरकारी सेवक को सदैव सरकारी दायित्वों के निष्पादन में गोपनीयता को बना कर रखा जाना चाहिए (अन्तर्विरोध) · कोई सरकारी सेवक अपने अपने सरकारी दायित्वों के निष्पादन में दुर्व्यवहार या अशिष्ट व्यवहार नहीं करेगा · कोई क्लास 1 अधिकारी बिना सरकार की पूर्व सहमति के अपने पुत्र या पुत्री या निर्भर/आश्रित को ऐसी कंपनी में रोजगार को स्वीकृत करने की अनुमति नहीं देगा जिसका सरकार के साथ कोई तालमेल हो| यह एक भ्रमात्मक नियम है और निजीकरण के दौर में यह प्रावधान अव्यवहारिक भी है, यदि कोई चीज अनैतिक है तो सरकार की पूर्वानुमति उसे नैतिक कैसे बना सकती है, अतः यह प्रावधान अपने आप में उचित नहीं है| · कोई सरकारी सेवक या उसके परिवार का सदस्य किसी उपहार कोई स्वीकार नहीं कर सकता है|नियमावली के अनुसार ग्रुप A का अधिकारी 20 हजार रूपये तक, ग्रुप B का अधिकारी 15 हजार रूपये तक एवं ग्रुप C का अधिकारी 7500 के मूल्य का उपहार स्वीकार कर सकता है एवं इस मूल्य से अधिक राशि के उपहार को स्वीकार करने हेतु सरकार की स्वीकृति का होना आवश्यक है| वर्तमान महंगाई के दौर में स्वीकृत उपहार का मूल्य अव्यवहारिक है एवं उपहार के आदान-प्रदान में वास्तविक मूल्य का निर्धारण किया जाना अपने आप में संभव नहीं है| · कोई सरकारी सेवक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तो दहेज़ देगा और न ही दहेज़ लेगा| जब दहेज़ निवारण अधिनियम 1961 के माध्यम से दहेज़ को रोकने का प्रयास किया गया है तो ऐसी स्थिति में इसे आचरण संहिता में शामिल किये जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं है| · कोई लोकसेवक 14 वर्ष से कम किसी बच्चे को कार्य हेतु रोजगार में नहीं रखेगा, यहाँ भी बाल श्रम कानून का संदर्भ दिया जा सकता है · कोई सरकारी सेवक सार्वजनिक स्थल में शराब या ड्रग का प्रयोग नहीं करेगा और इस अवस्था में नहीं दिखेगा| कोई लोकसेवक शराब या ड्रग का प्रयोग अत्यधिक मात्रा(अस्पष्ट) में नहीं करेगा| ऐसे प्रावधानों को आचरण नियमावली में शामिल किये जाने का कोई अर्थपूर्ण औचित्य नहीं है क्योंकि इसका सम्बन्ध व्यक्ति की जीवनशैली से है एवं यह आचरण संहिता के सतही पहलुओं को दर्शाता है| आचरण संहिता की सीमाएं ·परन्तु समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों की कार्य प्रकृति में जिस प्रकार का परिवर्तन हुआ है उसके अनुरूप आचरण संहिता में आवश्यक संशोधन या परिवर्तन को प्राप्त नहीं किया गया है · अतः आचरण संहिता अपनी प्रासंगिकता को पूर्णतयः साबित करने या स्थापित करने की स्थिति में नहीं है · आचरण संहिता अधिकतर मामलों में सतही पहलुओं पर विशेष रूप से केन्द्रित है न कि लोकसेवकों के वास्तविक कार्य की विषय वस्तु से, इसके परिणामस्वरुप आचरण संहिता का अनुपालन प्रायः उल्लंघन के रूप में किया जाता है न कि अनुसरण के रूप में| · आचरण संहिता कई अवसरों पर शंकाओं का समाधान न करके खुद शंकाओं को उत्पन्न करती है एवं कई प्रावधानों में अंतर्विरोध होने के कारण यह स्वतः अपने आप में नैतिक दुविधाओं को उत्पन्न करती है न कि उसके निराकरण हेतु मार्गदर्शन प्रदान करती है · अधिकाँश मामलों में आचरण संहिता इस बात का उल्लेख करती है कि लोकसेवकों को क्या नहीं करना चाहिए जबकि वास्तविक में आचरण संहिता को विभिन्न परिस्थितियों में लोकसेवकों को अति सक्रिय मार्गदर्शन प्राप्त होनी चाहिए ताकि आचरण संहिता के माध्यम से नैतिक दुविधाओं का प्रभावी समाधान किया जा सके · अतः वर्तमान में आचरण सहिता की प्रकृति नकारात्मक है जबकि इसकी प्रकृति सकारात्मक होनी चाहिए · उपरोक्त सीमाएं आचरण संहिता में व्यापक सुधार की अपेक्षा स्पष्ट करती है अतः द्वितीय ARC द्वारा इस दिशा में प्रयास किये गए हैं| द्वितीय ARC की संस्तुतियां · आचरण संहिता की व्यवहारिक सीमाओं के समाधान हेतु द्वितीय ARC द्वारा आचरण संहिता को अधिक बनाने की अनुशंषा की गयी है, इस व्यापक आचरण संहिता का निर्धारण 3 स्तरों पर किया जाना चाहिए · चूँकि लोकसेवकों के मूल्यों का सम्बन्ध जन अपेक्षाओं से है| अतः प्रथम या सर्वोच्च स्तर पर लोकसेवकों के मूल्यों एवं नैतिक मानकों का उल्लेख किया जाना चाहिए जिसका अनुपालन लोकसेवकों के द्वारा किया जाना है जैसे संविधान के प्रति वचनबद्धता, सत्यनिष्ठा एवं आचरण के उच्चतम मानक, निष्पक्षता एवं गैर-तरफदारी, वस्तुनिष्ठता और जन समस्याओं के प्रति वचनबद्धता और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति समानुभूति · द्वितीय स्तर पर, नीतिपरक संहिता(CODE OF ETHICS) को उल्लेखित किया जाना है जो कि लोकसेवकों के व्यवहार को शासित करने हेतु व्यापक सिद्धांतों से सम्बन्धित होगा| लोकसेवकों के नैतिक संहिता में निम्नलिखित पहलुओं पर बल दिया जाना है जैसेसत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, लोकसेवा के प्रति वचनबद्धता, खुली जवाबदेहिता, कर्तव्यों के प्रति समर्पणऔर एक आदर्श व्यवहार का होना · तीसरे स्तर पर, आचरण संहिता को उल्लेखित किया जाना है आचरण संहिता का सम्बन्ध लोकसेवकों के आचरण को नियमित करने हेतु विशिष्ट दिशानिर्देश से है| इसके अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में स्वीकृत एवं अस्वीकृत इन दोनों प्रकार के लोकसेवकों के व्यवहार को वर्णित किया जाना है| उपरोक्त तीनों स्तरों को मिलाकर व्यापक आचरण संहिता का निर्माण होगा| मूल्यों को आचरण या व्यवहार में परिवर्तित करने हेतु नैतिक सिद्धांतों का होना अति आवश्यक है अतः नीति संहिता लोकसेवकों के मूल्यों एवं आचरण संहिता के मध्य का सेतु या कड़ी है| अतः प्रशासन में सत्यनिष्ठा को स्थापित करने के लिए आचरण संहिता में व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है|
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भारत का राष्ट्रपति, ब्रिटिश क्राउन की तरहकेवल सांकेतिक प्रधान नहीं है। संगत तर्कों द्वारा स्पष्ट कीजिये। (200 शब्द ) The President of India is not the nominal head like theBritish Crown. Define with relevant arguments. (200 words)
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निम्न निष्कर्ष - PM -वास्तविक प्रधान राष्ट्रपति -सांकेतिक प्रधान भारत के राष्ट्रपति के पास ब्रिटिश क्राउन की तरह विवेकीय शक्ति ना होना यद्यपि अधिक शक्तिशाली राष्ट्रपति के अधिकार - अनुच्छेद 78 (a )-राष्ट्रपति देश के शासन संबंधी कामकाज और विधायन संबंधी प्रस्ताव के सन्दर्भ में क्या फैसला हुआ है , उसकी सूचना मांग सकता है। अनुच्छेद 78 (b )- संघ के शासन संबंधी मामलों और विधायन संबंधी प्रस्ताव के सन्दर्भ में वह कोई अभीष्ट सूचना , उपलब्ध कराने के सन्दर्भ में PM को निर्देश दे सकता है। अनुच्छेद 78 (c )- यदि राष्ट्रपति को किसी भी समय ऐसा लगता है कि कोई किसी निर्णय मंत्री ने अकेले ले लिया है , जबकि मंत्री परिषद् में विमर्श के बाद उस पर निर्णय लिया जाना था तो वह PM या उस मंत्री को निर्णय दे सकता है कि वे इस मामले को मंत्री परिषद् में विचार विमर्श के लिए प्रस्तुत करें , उसके बाद राष्ट्रपति के समक्ष लाएं उपरोक्त उपवाक्यों से स्पष्ट है कि राष्ट्रपति , PM से पूछ कर ये फैसलेनहीं लेगा। इससे यह भीस्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति , PM के द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्यनहीं है । अत: इस उपबंध के आलोक में राष्ट्रपति सांकेतिक प्रधानसमीचीन नहीं लगता
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##Question:भारत का राष्ट्रपति, ब्रिटिश क्राउन की तरहकेवल सांकेतिक प्रधान नहीं है। संगत तर्कों द्वारा स्पष्ट कीजिये। (200 शब्द ) The President of India is not the nominal head like theBritish Crown. Define with relevant arguments. (200 words)##Answer:निम्न निष्कर्ष - PM -वास्तविक प्रधान राष्ट्रपति -सांकेतिक प्रधान भारत के राष्ट्रपति के पास ब्रिटिश क्राउन की तरह विवेकीय शक्ति ना होना यद्यपि अधिक शक्तिशाली राष्ट्रपति के अधिकार - अनुच्छेद 78 (a )-राष्ट्रपति देश के शासन संबंधी कामकाज और विधायन संबंधी प्रस्ताव के सन्दर्भ में क्या फैसला हुआ है , उसकी सूचना मांग सकता है। अनुच्छेद 78 (b )- संघ के शासन संबंधी मामलों और विधायन संबंधी प्रस्ताव के सन्दर्भ में वह कोई अभीष्ट सूचना , उपलब्ध कराने के सन्दर्भ में PM को निर्देश दे सकता है। अनुच्छेद 78 (c )- यदि राष्ट्रपति को किसी भी समय ऐसा लगता है कि कोई किसी निर्णय मंत्री ने अकेले ले लिया है , जबकि मंत्री परिषद् में विमर्श के बाद उस पर निर्णय लिया जाना था तो वह PM या उस मंत्री को निर्णय दे सकता है कि वे इस मामले को मंत्री परिषद् में विचार विमर्श के लिए प्रस्तुत करें , उसके बाद राष्ट्रपति के समक्ष लाएं उपरोक्त उपवाक्यों से स्पष्ट है कि राष्ट्रपति , PM से पूछ कर ये फैसलेनहीं लेगा। इससे यह भीस्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति , PM के द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्यनहीं है । अत: इस उपबंध के आलोक में राष्ट्रपति सांकेतिक प्रधानसमीचीन नहीं लगता
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1857 की क्रांति के कारणों का उल्लेख करते हुए इसके परिणामों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150 -200 शब्द; 10 अंक ) Discuss the results of the revolution of 1857 mentioning its reasons in detail. (150 -200 words; 10 Marks )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 1857 के क्रांति के उद्भव को लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में कारणों को का उल्लेख कीजिए। इसके बाद परिणामों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अंग्रेजों के विरुद्ध यह पहला व्यापक स्तर पर प्रयास था। इसके माध्यम से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने विरोध को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। कारण: आर्थिक कारण: भूराजस्व नीति से किसानो मे व्यापक असंतोष उद्योगों के पतन के कारण कारीगरों मे असंतोष विस्तारवादी नीति के कारण शासक वर्ग तथा अन्य वर्गों की स्थिति खराब। राजनीतिक कारण: 1857 तक अधिकांश राज्य अंग्रेजों के अधीन या निर्भर । 1856 मे अवध के विलय की घटना । अन्य राजनीतिक कारण: अंग्रेजों की नस्लीय नीति , अफगान युद्ध, संथाल विद्रोह सामाजिक कारण : ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुधार व शिक्षा नीति का प्रभाव। धार्मिक कारण : 1850 मे धार्मिक निरयोगता कानून सरकारी खर्चों पर मिशनरियों की सहायता सैनिक कारण : केवल निम्न पदों पर भारतियों की नियुक्ति, कम वेतन, धार्मिक चिन्हों व प्रतिकों के प्रयोग पर प्रतिबंध। तात्कालिक कारण : चर्बी वाले कारतूस का मुद्दा व मेरठ से सैनिकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ । 1857 की क्रांति के परिणाम: ब्रिटिश नीति के संदर्भ मे : सैन्य नीति: अंग्रेजों ने सेना और सैन्य सामग्रियों पर एकाधिकार कर लिया जिससे भविष्य में भारतीय सैनिकों की ओर से कोई खतरा न उत्पन्न हो। किसी भी भारतीय को उच्च सैनिक पद प्रदान न करने की नीति अपनायी गयी। प्रशासनिक नीति : क्रांति के पश्चात नीतियों में सकरतमक बदलाव भी आए। भारतीयों को प्रशासन में शामिल करने के व्यवस्था को अपनाया जाने लगा। समाज सुधार के प्रति नीति:अंग्रेजों ने समाज सुधार के प्रति उदासीन रवैय्या अपनाया उन्हे प्रतीत होने लगा कि सामाजिक सुधारों से जागरूकता में वृद्धि होगी जो ब्रिटिश व्यवस्था के लिए सही साबित नहीं होगा। राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव व महत्व: शिक्षित भारतियों द्वारा संगठन, कार्यक्रम ,आदि का महत्व समझा। आम लोगों की भागीदारी ने सरकार के शोषणकारी चरित्र को प्रत्क्ष्यत रूप मे दर्शाया। विद्रोहियों के कार्यों ने आगे लोगों को प्रेरणा प्रदान किया। राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ घटनाओं को इसने सीधे प्रभावित किया। निष्कर्षतः 1857 का विद्रोह शताब्दियों से शोषित, प्रताड़ित एवं उपेक्षित भारतीय जन समूह की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कंठा का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत स्वतन्त्रता संघर्ष था। यह विद्रोह यद्यपि सफल नहीं हो सका किन्तु इसने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के बीज बोये एवं इस क्रांति के दूरगामी परिणाम हुए।
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##Question:1857 की क्रांति के कारणों का उल्लेख करते हुए इसके परिणामों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150 -200 शब्द; 10 अंक ) Discuss the results of the revolution of 1857 mentioning its reasons in detail. (150 -200 words; 10 Marks )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 1857 के क्रांति के उद्भव को लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में कारणों को का उल्लेख कीजिए। इसके बाद परिणामों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अंग्रेजों के विरुद्ध यह पहला व्यापक स्तर पर प्रयास था। इसके माध्यम से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने विरोध को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। कारण: आर्थिक कारण: भूराजस्व नीति से किसानो मे व्यापक असंतोष उद्योगों के पतन के कारण कारीगरों मे असंतोष विस्तारवादी नीति के कारण शासक वर्ग तथा अन्य वर्गों की स्थिति खराब। राजनीतिक कारण: 1857 तक अधिकांश राज्य अंग्रेजों के अधीन या निर्भर । 1856 मे अवध के विलय की घटना । अन्य राजनीतिक कारण: अंग्रेजों की नस्लीय नीति , अफगान युद्ध, संथाल विद्रोह सामाजिक कारण : ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुधार व शिक्षा नीति का प्रभाव। धार्मिक कारण : 1850 मे धार्मिक निरयोगता कानून सरकारी खर्चों पर मिशनरियों की सहायता सैनिक कारण : केवल निम्न पदों पर भारतियों की नियुक्ति, कम वेतन, धार्मिक चिन्हों व प्रतिकों के प्रयोग पर प्रतिबंध। तात्कालिक कारण : चर्बी वाले कारतूस का मुद्दा व मेरठ से सैनिकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ । 1857 की क्रांति के परिणाम: ब्रिटिश नीति के संदर्भ मे : सैन्य नीति: अंग्रेजों ने सेना और सैन्य सामग्रियों पर एकाधिकार कर लिया जिससे भविष्य में भारतीय सैनिकों की ओर से कोई खतरा न उत्पन्न हो। किसी भी भारतीय को उच्च सैनिक पद प्रदान न करने की नीति अपनायी गयी। प्रशासनिक नीति : क्रांति के पश्चात नीतियों में सकरतमक बदलाव भी आए। भारतीयों को प्रशासन में शामिल करने के व्यवस्था को अपनाया जाने लगा। समाज सुधार के प्रति नीति:अंग्रेजों ने समाज सुधार के प्रति उदासीन रवैय्या अपनाया उन्हे प्रतीत होने लगा कि सामाजिक सुधारों से जागरूकता में वृद्धि होगी जो ब्रिटिश व्यवस्था के लिए सही साबित नहीं होगा। राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव व महत्व: शिक्षित भारतियों द्वारा संगठन, कार्यक्रम ,आदि का महत्व समझा। आम लोगों की भागीदारी ने सरकार के शोषणकारी चरित्र को प्रत्क्ष्यत रूप मे दर्शाया। विद्रोहियों के कार्यों ने आगे लोगों को प्रेरणा प्रदान किया। राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ घटनाओं को इसने सीधे प्रभावित किया। निष्कर्षतः 1857 का विद्रोह शताब्दियों से शोषित, प्रताड़ित एवं उपेक्षित भारतीय जन समूह की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कंठा का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत स्वतन्त्रता संघर्ष था। यह विद्रोह यद्यपि सफल नहीं हो सका किन्तु इसने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के बीज बोये एवं इस क्रांति के दूरगामी परिणाम हुए।
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नैतिक दुविधा से क्या तात्पर्य है? इस संदर्भ में नैतिक मार्गदर्शन के आधारो की चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द , अंक -10 ) What is mean by ethical dilemma? Discuss the basis of ethical guidance in this context. (150-200 words, marks -10 )
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· भूमिका में नैतिक दुबिधा की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में नैतिक दुबिधा के समाधान में मार्गदर्शक आधारों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नैतिक दुविधा से तात्पर्य उचित एवं अनुचित के बीच के चयन से संबंधित न होकर बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक उचित के बीच का चयन से है । जिसमे कोई भी विकल्प पूर्ण रूप से सही या गलत नही होता , बल्कि उनके सही या गलत होने में डिग्री का अंतर होता है ।कुछ विकल्प कम सही और कुछ ज्यादा सही होते हैं । सिविल सेवक के सेवा कार्य में नैतिक दुबिधा निम्नलिखित बिन्दुओ से समझी जा सकती है :- नियंत्रण बनाम स्व-निर्णय लोक हित बनाम सार्वजनिक हित निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक मूल्य राजनीतिक सेवक बनाम लोकसेवक गोपनीयता एवं पारदर्शिता तटस्थता एवं प्रतिबद्धता उपरोक्त मानकों के कारण लोक सेवक को नैतिक दुबिधा का सामना करना पड़ता है । नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु लोक सेवकों द्वारा विधि और अंतरात्मा को नैतिक मार्गदर्शन के स्त्रोत के रूप में अपनाया जाता है । जिसमे विधि बाहरी मार्गदर्शक के रूप में तथा अंतरात्मा आंतरिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है । इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है । विधि का आशय , नियम , मान्यताओ , परंपरों आदि से है जो की संगठन या समाज प्रत्येक के लिए बाध्यकारी होता है । विधि लिखित और अलिखित दोनों हो सकता है । विधि स्वतः अपने आप में नैतिक मूल्यो का सहिंताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करती है और सामाजिक व्यवस्था समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर होती है । विधि नैतिकता को नियमित करती है और नैतिकता स्वतः विधि के द्वारा नियमित होती है । कोई विधि सामाजिक स्वीकृति को तभी प्राप्त करती है जब वह सामाजिक नैतिक मूल्यो के अनुरूप हो । वैधानिकता और नैतिकता एक दूसरे पर परस्पर रूप से निर्भर हैं । एक अच्छा नागरिक बनने हेतु विधि का अनुपालन किया जाना आवश्यक है। जबकि एक अच्छा मानव प्राणी बनने के लिए नैतिकता का अनुपालन किया जाना आवश्यक है । एक अच्छा नागरिक सदैव अच्छा मानव हो या एक अच्छा मानव सदैव अच्छा नागरिक हो यह अनिवार्य नही है लेकिन इसकी संभावना अधिक है । प्रत्येक विधि नैतिक मूल्यो का संहिताकरण है। अतः अच्छे नागरिक द्वारा विधि का पालन किया जाना स्वतः नैतिक मूल्यो के अनुपालन को भी दर्शाती है । विधि कोई सुझाव या अनुशंसा नही बल्कि बाध्यकारी होती है । जब विधि के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु मार्गदर्शन संभव न हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है जो नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्त्रोत है । अंतरात्मा कोई भावना या अनुभूति न होकर तार्किक चिंतन और विवेकशीलता पर आधारित है। अंतरात्मा मानव प्राणी का आधार है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा का अनुपालन करे । विधि का आशय किसी कार्य या क्रियाशीलता से संबन्धित सामान्य नियम से है जबकि अंतरात्मा विशिष्ट कार्य या क्रियाशीलता हेतु व्यवहारिक नियम को प्रस्तावित करने से है । अंतरात्मा विधि से अधिक व्यापक होगी ।अंतरात्मा का विकास नैतिक मूल्यो को विकसित करने पर आधारित होती है । अतः अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना चाहिए । अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करने हेतु यह आवश्यक है कि इसे शिक्षित किया जाए नही तो यह अंतरात्मा की संकट स्थिति को उत्पन्न करती है ।ऐसी स्थिति में अंतरात्मा अपनी नैतिक मूल्य का योगदान नही दे पाती । अतः लोक सेवको के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान में विधि के साथ साथ अंतरात्मा का मार्गदर्शन अतिआवश्यक होता है । अंतरात्मा के मार्गदर्शन के लिए, अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना और अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि प्रशासन व प्रबंधन का आशय चीज़ों को उचित तरीके से किए जाने से है और दूसरा उचित चीज़ों को किए जाने से है ।अंतरात्मा का आधार विवेकशीलता है । महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से अपील का कोई अन्य उच्चतर न्यायालय नही है।
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##Question:नैतिक दुविधा से क्या तात्पर्य है? इस संदर्भ में नैतिक मार्गदर्शन के आधारो की चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द , अंक -10 ) What is mean by ethical dilemma? Discuss the basis of ethical guidance in this context. (150-200 words, marks -10 )##Answer:· भूमिका में नैतिक दुबिधा की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में नैतिक दुबिधा के समाधान में मार्गदर्शक आधारों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नैतिक दुविधा से तात्पर्य उचित एवं अनुचित के बीच के चयन से संबंधित न होकर बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक उचित के बीच का चयन से है । जिसमे कोई भी विकल्प पूर्ण रूप से सही या गलत नही होता , बल्कि उनके सही या गलत होने में डिग्री का अंतर होता है ।कुछ विकल्प कम सही और कुछ ज्यादा सही होते हैं । सिविल सेवक के सेवा कार्य में नैतिक दुबिधा निम्नलिखित बिन्दुओ से समझी जा सकती है :- नियंत्रण बनाम स्व-निर्णय लोक हित बनाम सार्वजनिक हित निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक मूल्य राजनीतिक सेवक बनाम लोकसेवक गोपनीयता एवं पारदर्शिता तटस्थता एवं प्रतिबद्धता उपरोक्त मानकों के कारण लोक सेवक को नैतिक दुबिधा का सामना करना पड़ता है । नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु लोक सेवकों द्वारा विधि और अंतरात्मा को नैतिक मार्गदर्शन के स्त्रोत के रूप में अपनाया जाता है । जिसमे विधि बाहरी मार्गदर्शक के रूप में तथा अंतरात्मा आंतरिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है । इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है । विधि का आशय , नियम , मान्यताओ , परंपरों आदि से है जो की संगठन या समाज प्रत्येक के लिए बाध्यकारी होता है । विधि लिखित और अलिखित दोनों हो सकता है । विधि स्वतः अपने आप में नैतिक मूल्यो का सहिंताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करती है और सामाजिक व्यवस्था समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर होती है । विधि नैतिकता को नियमित करती है और नैतिकता स्वतः विधि के द्वारा नियमित होती है । कोई विधि सामाजिक स्वीकृति को तभी प्राप्त करती है जब वह सामाजिक नैतिक मूल्यो के अनुरूप हो । वैधानिकता और नैतिकता एक दूसरे पर परस्पर रूप से निर्भर हैं । एक अच्छा नागरिक बनने हेतु विधि का अनुपालन किया जाना आवश्यक है। जबकि एक अच्छा मानव प्राणी बनने के लिए नैतिकता का अनुपालन किया जाना आवश्यक है । एक अच्छा नागरिक सदैव अच्छा मानव हो या एक अच्छा मानव सदैव अच्छा नागरिक हो यह अनिवार्य नही है लेकिन इसकी संभावना अधिक है । प्रत्येक विधि नैतिक मूल्यो का संहिताकरण है। अतः अच्छे नागरिक द्वारा विधि का पालन किया जाना स्वतः नैतिक मूल्यो के अनुपालन को भी दर्शाती है । विधि कोई सुझाव या अनुशंसा नही बल्कि बाध्यकारी होती है । जब विधि के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु मार्गदर्शन संभव न हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है जो नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्त्रोत है । अंतरात्मा कोई भावना या अनुभूति न होकर तार्किक चिंतन और विवेकशीलता पर आधारित है। अंतरात्मा मानव प्राणी का आधार है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा का अनुपालन करे । विधि का आशय किसी कार्य या क्रियाशीलता से संबन्धित सामान्य नियम से है जबकि अंतरात्मा विशिष्ट कार्य या क्रियाशीलता हेतु व्यवहारिक नियम को प्रस्तावित करने से है । अंतरात्मा विधि से अधिक व्यापक होगी ।अंतरात्मा का विकास नैतिक मूल्यो को विकसित करने पर आधारित होती है । अतः अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना चाहिए । अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करने हेतु यह आवश्यक है कि इसे शिक्षित किया जाए नही तो यह अंतरात्मा की संकट स्थिति को उत्पन्न करती है ।ऐसी स्थिति में अंतरात्मा अपनी नैतिक मूल्य का योगदान नही दे पाती । अतः लोक सेवको के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान में विधि के साथ साथ अंतरात्मा का मार्गदर्शन अतिआवश्यक होता है । अंतरात्मा के मार्गदर्शन के लिए, अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना और अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि प्रशासन व प्रबंधन का आशय चीज़ों को उचित तरीके से किए जाने से है और दूसरा उचित चीज़ों को किए जाने से है ।अंतरात्मा का आधार विवेकशीलता है । महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से अपील का कोई अन्य उच्चतर न्यायालय नही है।
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नैतिक दुविधा से क्या तात्पर्य है ? इस संदर्भ में नैतिक मार्गदर्शन के आधारो की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) What does ethical dilemmas mean? Discuss the basis of ethical guidance in this context. (150 words)
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भूमिका में नैतिक दुबिधा की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में नैतिक दुबिधा के समाधान में मार्गदर्शक आधारों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नैतिक दुविधा से तात्पर्य उचित एवं अनुचित के बीच के चयन से संबंधित न होकर बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक उचित के बीच का चयन से है । जिसमे कोई भी विकल्प पूर्ण रूप से सही या गलत नही होता , बल्कि उनके सही या गलत होने में डिग्री का अंतर होता है ।कुछ विकल्प कम सही और कुछ ज्यादा सही होते हैं । सिविल सेवक के सेवा कार्य में नैतिक दुविधा निम्नलिखित बिन्दुओ से समझी जा सकती है :- नियंत्रण बनाम स्व-निर्णय लोक हित बनाम सार्वजनिक हित निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक मूल्य राजनीतिक सेवक बनाम लोकसेवक गोपनीयता एवं पारदर्शिता तटस्थता एवं प्रतिबद्धता उपरोक्त मानकों के कारण लोक सेवक को नैतिक दुविधा का सामना करना पड़ता है । नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु लोक सेवकों द्वारा विधि और अंतरात्मा को नैतिक मार्गदर्शन के स्त्रोत के रूप में अपनाया जाता है । जिसमे विधि बाहरी मार्गदर्शक के रूप में तथा अंतरात्मा आंतरिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है । इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है । विधि का आशय , नियम , मान्यताओ , परंपरों आदि से है जो की संगठन या समाज प्रत्येक के लिए बाध्यकारी होता है । विधि लिखित और अलिखित दोनों हो सकता है । विधि स्वतः अपने आप में नैतिक मूल्यो का सहिंताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करती है और सामाजिक व्यवस्था समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर होती है । विधि नैतिकता को नियमित करती है और नैतिकता स्वतः विधि के द्वारा नियमित होती है । कोई विधि सामाजिक स्वीकृति को तभी प्राप्त करती है जब वह सामाजिक नैतिक मूल्यो के अनुरूप हो । वैधानिकता और नैतिकता एक दूसरे पर परस्पर रूप से निर्भर हैं । एक अच्छा नागरिक बनने हेतु विधि का अनुपालन किया जाना आवश्यक है। जबकि एक अच्छा मानव प्राणी बनने के लिए नैतिकता का अनुपालन किया जाना आवश्यक है । एक अच्छा नागरिक सदैव अच्छा मानव हो या एक अच्छा मानव सदैव अच्छा नागरिक हो यह अनिवार्य नही है लेकिन इसकी संभावना अधिक है । प्रत्येक विधि नैतिक मूल्यो का संहिताकरण है। अतः अच्छे नागरिक द्वारा विधि का पालन किया जाना स्वतः नैतिक मूल्यो के अनुपालन को भी दर्शाती है । विधि कोई सुझाव या अनुशंसा नही बल्कि बाध्यकारी होती है । जब विधि के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु मार्गदर्शन संभव न हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है जो नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्त्रोत है । अंतरात्मा कोई भावना या अनुभूति न होकर तार्किक चिंतन और विवेकशीलता पर आधारित है। अंतरात्मा मानव प्राणी का आधार है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा का अनुपालन करे । विधि का आशय किसी कार्य या क्रियाशीलता से संबन्धित सामान्य नियम से है जबकि अंतरात्मा विशिष्ट कार्य या क्रियाशीलता हेतु व्यवहारिक नियम को प्रस्तावित करने से है । अंतरात्मा विधि से अधिक व्यापक होगी ।अंतरात्मा का विकास नैतिक मूल्यो को विकसित करने पर आधारित होती है । अतः अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना चाहिए । अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करने हेतु यह आवश्यक है कि इसे शिक्षित किया जाए नही तो यह अंतरात्मा की संकट स्थिति को उत्पन्न करती है ।ऐसी स्थिति में अंतरात्मा अपनी नैतिक मूल्य का योगदान नही दे पाती । अतः लोक सेवको के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान में विधि के साथ साथ अंतरात्मा का मार्गदर्शन अतिआवश्यक होता है । अंतरात्मा के मार्गदर्शन के लिए, अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना और अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि प्रशासन व प्रबंधन का आशय चीज़ों को उचित तरीके से किए जाने से है और दूसरा उचित चीज़ों को किए जाने से है ।अंतरात्मा का आधार विवेकशीलता है । महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से अपील का कोई अन्य उच्चतर न्यायालय नही है।
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##Question:नैतिक दुविधा से क्या तात्पर्य है ? इस संदर्भ में नैतिक मार्गदर्शन के आधारो की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) What does ethical dilemmas mean? Discuss the basis of ethical guidance in this context. (150 words)##Answer: भूमिका में नैतिक दुबिधा की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में नैतिक दुबिधा के समाधान में मार्गदर्शक आधारों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नैतिक दुविधा से तात्पर्य उचित एवं अनुचित के बीच के चयन से संबंधित न होकर बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक उचित के बीच का चयन से है । जिसमे कोई भी विकल्प पूर्ण रूप से सही या गलत नही होता , बल्कि उनके सही या गलत होने में डिग्री का अंतर होता है ।कुछ विकल्प कम सही और कुछ ज्यादा सही होते हैं । सिविल सेवक के सेवा कार्य में नैतिक दुविधा निम्नलिखित बिन्दुओ से समझी जा सकती है :- नियंत्रण बनाम स्व-निर्णय लोक हित बनाम सार्वजनिक हित निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण आर्थिक मूल्य बनाम सामाजिक मूल्य राजनीतिक सेवक बनाम लोकसेवक गोपनीयता एवं पारदर्शिता तटस्थता एवं प्रतिबद्धता उपरोक्त मानकों के कारण लोक सेवक को नैतिक दुविधा का सामना करना पड़ता है । नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु लोक सेवकों द्वारा विधि और अंतरात्मा को नैतिक मार्गदर्शन के स्त्रोत के रूप में अपनाया जाता है । जिसमे विधि बाहरी मार्गदर्शक के रूप में तथा अंतरात्मा आंतरिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है । इसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है । विधि का आशय , नियम , मान्यताओ , परंपरों आदि से है जो की संगठन या समाज प्रत्येक के लिए बाध्यकारी होता है । विधि लिखित और अलिखित दोनों हो सकता है । विधि स्वतः अपने आप में नैतिक मूल्यो का सहिंताकरण है जोकि सामाजिक व्यवस्था को नियंत्रित करती है और सामाजिक व्यवस्था समाज में विद्यमान नैतिक व्यवस्था पर निर्भर होती है । विधि नैतिकता को नियमित करती है और नैतिकता स्वतः विधि के द्वारा नियमित होती है । कोई विधि सामाजिक स्वीकृति को तभी प्राप्त करती है जब वह सामाजिक नैतिक मूल्यो के अनुरूप हो । वैधानिकता और नैतिकता एक दूसरे पर परस्पर रूप से निर्भर हैं । एक अच्छा नागरिक बनने हेतु विधि का अनुपालन किया जाना आवश्यक है। जबकि एक अच्छा मानव प्राणी बनने के लिए नैतिकता का अनुपालन किया जाना आवश्यक है । एक अच्छा नागरिक सदैव अच्छा मानव हो या एक अच्छा मानव सदैव अच्छा नागरिक हो यह अनिवार्य नही है लेकिन इसकी संभावना अधिक है । प्रत्येक विधि नैतिक मूल्यो का संहिताकरण है। अतः अच्छे नागरिक द्वारा विधि का पालन किया जाना स्वतः नैतिक मूल्यो के अनुपालन को भी दर्शाती है । विधि कोई सुझाव या अनुशंसा नही बल्कि बाध्यकारी होती है । जब विधि के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान हेतु मार्गदर्शन संभव न हो तो व्यक्ति अंतरात्मा की ओर देखता है जो नैतिक मार्गदर्शन का आंतरिक स्त्रोत है । अंतरात्मा कोई भावना या अनुभूति न होकर तार्किक चिंतन और विवेकशीलता पर आधारित है। अंतरात्मा मानव प्राणी का आधार है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अंतरात्मा का अनुपालन करे । विधि का आशय किसी कार्य या क्रियाशीलता से संबन्धित सामान्य नियम से है जबकि अंतरात्मा विशिष्ट कार्य या क्रियाशीलता हेतु व्यवहारिक नियम को प्रस्तावित करने से है । अंतरात्मा विधि से अधिक व्यापक होगी ।अंतरात्मा का विकास नैतिक मूल्यो को विकसित करने पर आधारित होती है । अतः अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना चाहिए । अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करने हेतु यह आवश्यक है कि इसे शिक्षित किया जाए नही तो यह अंतरात्मा की संकट स्थिति को उत्पन्न करती है ।ऐसी स्थिति में अंतरात्मा अपनी नैतिक मूल्य का योगदान नही दे पाती । अतः लोक सेवको के द्वारा नैतिक दुबिधा के समाधान में विधि के साथ साथ अंतरात्मा का मार्गदर्शन अतिआवश्यक होता है । अंतरात्मा के मार्गदर्शन के लिए, अंतरात्मा को शिक्षित किया जाना और अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि प्रशासन व प्रबंधन का आशय चीज़ों को उचित तरीके से किए जाने से है और दूसरा उचित चीज़ों को किए जाने से है ।अंतरात्मा का आधार विवेकशीलता है । महात्मा गांधी के अनुसार अंतरात्मा के न्यायालय से अपील का कोई अन्य उच्चतर न्यायालय नही है।
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भारतीय समाज में विविधता में एकता का स्वरूप, परस्पर सौहार्द से जन्मीं एकजुटता का है| आलोचनात्मक चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) In Indian society, the nature of unity in diversity is of solidarity born of mutual harmony. Discuss Critically. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद, उन चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिए जो इस एकता के लिए खतरा हैं। अंत में संक्षेप में निष्पक्षनिष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का है जिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8,अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा नीतिया भी राष्ट्रीय एकता की उर्वरा शक्तियां हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता को चुनौतियां:- इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांसो में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी(डेमोक्रेसी डेफिसिट) के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। निष्कर्षतः कहाजा सकता है कि हालाँकि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है। और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
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##Question:भारतीय समाज में विविधता में एकता का स्वरूप, परस्पर सौहार्द से जन्मीं एकजुटता का है| आलोचनात्मक चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) In Indian society, the nature of unity in diversity is of solidarity born of mutual harmony. Discuss Critically. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद, उन चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिए जो इस एकता के लिए खतरा हैं। अंत में संक्षेप में निष्पक्षनिष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का है जिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8,अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा नीतिया भी राष्ट्रीय एकता की उर्वरा शक्तियां हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता को चुनौतियां:- इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांसो में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी(डेमोक्रेसी डेफिसिट) के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। निष्कर्षतः कहाजा सकता है कि हालाँकि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है। और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
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Explain latitudes and longitudes with the help of the diagrams and also bring out differences between the two? (150 words / 10 Marks)
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Approach: Define the latitude and Longitude The student should provide good self-explanatory diagrams for them Bring out the differences between the two Answer: Latitude: Latitude is the angular distance of a point on the earth"s surface, measured in degrees from the centre of the earth. It is parallel to a line, the equator which lies midway between the poles, the lines are therefore called parallels of latitude and on a globe are actually circles becoming smaller polewards. The equator represents 0 degrees and the North and South poles are 90 degrees N and 90 degrees S respectively. The most important lines of latitudes are the Equator (0 degrees), the Tropic of Cancer (23.5 degrees N), the Tropic of Capricorn (23.5 degrees S), the Arctic Circle (66.5 degrees N), and the Antarctic Circle (66.5 degrees S) Longitude: Longitude is an angular distance, measured in degrees along the equator east or west of the Prime Meridian. On the Globe, longitudes are shown as the series of semi-circles that run from pole to pole passing through the equator. Such lines are also called meridians. Difference between the Latitude and the Longitude: Latitude Longitude These are called as the parallels These are called the Meridians These are represented by a complete circle around the globe These are represented by the semi-circles around the globe These are horizontal imaginary lines running across the globe These are vertical imaginary lines running across the globe 0 degrees is the Equator and the angular distance increases from there in both north and south directions up to 90 degrees 0 Degrees is the standard meridian and is called the Prime Meridian (PM) and the East and West directions are calculated with respect to this PM The length of the latitudes decreases as we move from the equator towards the poles The length of the longitudes remains the same as they run from pole to pole The distance between the two latitudes remains the same throughout the globe The distance between the two longitudes decreases as we move from the equator to the poles in either direction (N-S) Both latitudes and longitude are helpful in identifying any location on the earth in a precise manner.
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##Question:Explain latitudes and longitudes with the help of the diagrams and also bring out differences between the two? (150 words / 10 Marks)##Answer:Approach: Define the latitude and Longitude The student should provide good self-explanatory diagrams for them Bring out the differences between the two Answer: Latitude: Latitude is the angular distance of a point on the earth"s surface, measured in degrees from the centre of the earth. It is parallel to a line, the equator which lies midway between the poles, the lines are therefore called parallels of latitude and on a globe are actually circles becoming smaller polewards. The equator represents 0 degrees and the North and South poles are 90 degrees N and 90 degrees S respectively. The most important lines of latitudes are the Equator (0 degrees), the Tropic of Cancer (23.5 degrees N), the Tropic of Capricorn (23.5 degrees S), the Arctic Circle (66.5 degrees N), and the Antarctic Circle (66.5 degrees S) Longitude: Longitude is an angular distance, measured in degrees along the equator east or west of the Prime Meridian. On the Globe, longitudes are shown as the series of semi-circles that run from pole to pole passing through the equator. Such lines are also called meridians. Difference between the Latitude and the Longitude: Latitude Longitude These are called as the parallels These are called the Meridians These are represented by a complete circle around the globe These are represented by the semi-circles around the globe These are horizontal imaginary lines running across the globe These are vertical imaginary lines running across the globe 0 degrees is the Equator and the angular distance increases from there in both north and south directions up to 90 degrees 0 Degrees is the standard meridian and is called the Prime Meridian (PM) and the East and West directions are calculated with respect to this PM The length of the latitudes decreases as we move from the equator towards the poles The length of the longitudes remains the same as they run from pole to pole The distance between the two latitudes remains the same throughout the globe The distance between the two longitudes decreases as we move from the equator to the poles in either direction (N-S) Both latitudes and longitude are helpful in identifying any location on the earth in a precise manner.
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नक्सलवाद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्यों की संछिप्त में चर्चा कीजिये । (200 शब्द ) Explaining the theoretical background of Naxalism, discuss its objectives in brief.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नक्सलवाद के बारे में बताते हुए करिए | इसके बाद नक्सलवाद की सैद्धांतिक पृष्ठिभूमि बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | पुनः नक्सलवाद के उद्देश्यों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के गाँव नक्सलबाड़ी से हुई | नक्सलवाद की शुरुआत साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा से प्रेरित थी | कभी-कभी इसे माओवादी भी कहते हैं ,क्योंकि यह चीनी नेता माओत्से तुंग के राजनीतिक विचारधारा से भी प्रभावित है | नक्सलवाद की शुरुआत, गरीबी , भूखमरी, असमानता, बेरोजगारी , अविकासात्मक प्रक्रिया के कारण उत्पन्न हुई | परन्तु आज के समय में नक्सलवाद की मांग समय के साथ-साथ बदल गयी है, अब नक्सलवादी विकासात्मक प्रक्रिया के साथ नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के द्वारा समाज की मुख्य धारा में जुड़ रहें हैं | नक्सलवाद के उद्देश्य- नक्सलवाद की समस्या गरीबी, असंतोष , शोषण, बेरोजगारी से उत्पन्न हुई | नक्सलवादी अपने शुरूआती चरण में (1967से) अपने हितों की मांग कर रहा था | उसका उद्देश्य सिर्फ समाज के निचले तबके के लोगों का उत्थान करना था | नक्सलवाद का उद्देश्य समाज के उच्च वर्गों द्वारा किये जाने वाले शोषण से मुक्ति पाना था | जिसके लिए वो अपने लोगों में सरकार के प्रति घृणा का भाव पैदा करते हैं | परन्तु आज नक्सलवाद का उद्देश्य बदल चुका है, शुरूआती चरण में वो जिन आदिवासियों, गरीबों के लिए अपने हितों की मांग करते थे, आज उन्ही का शोषण कर रहे हैं | इस प्रकार वो शासन के अन्दर रहकर लोकतंत्र को समाजवादी, माओवादी विचारधारा का मुखौटा पहनाकर भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहे हैं | नक्सलवाद के लिए सियासी दल एक चुनावी हवा है , जिस पर मौका मिलते ही वो अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं | आज उनका उद्देश्य आदिवासी, निचले तबके के लोगों का उत्थान करना नहीं, बल्कि उनको दबा, धमकाकर उन पर अधिकार ज़माना है | नक्सलवादी आज आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है | इसको जड़ से समाप्त करने के लिए भारत सरकार को कड़ा से कड़ा कदम उठाना चाहिए | क्योंकि आज देश के हर प्रान्त में नक्सलवाद की पहुँच तेजी से हो रही है | यद्यपि कि अनेक चुनौतियाँ मौजूद है फिर भी इस दिशा में भारत सरकार अनेक विकास के कार्य के साथ-साथ कठोर कदमों को भी अपनाने में संकोच नहीं कर रही है |
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##Question:नक्सलवाद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्यों की संछिप्त में चर्चा कीजिये । (200 शब्द ) Explaining the theoretical background of Naxalism, discuss its objectives in brief.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नक्सलवाद के बारे में बताते हुए करिए | इसके बाद नक्सलवाद की सैद्धांतिक पृष्ठिभूमि बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | पुनः नक्सलवाद के उद्देश्यों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के गाँव नक्सलबाड़ी से हुई | नक्सलवाद की शुरुआत साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा से प्रेरित थी | कभी-कभी इसे माओवादी भी कहते हैं ,क्योंकि यह चीनी नेता माओत्से तुंग के राजनीतिक विचारधारा से भी प्रभावित है | नक्सलवाद की शुरुआत, गरीबी , भूखमरी, असमानता, बेरोजगारी , अविकासात्मक प्रक्रिया के कारण उत्पन्न हुई | परन्तु आज के समय में नक्सलवाद की मांग समय के साथ-साथ बदल गयी है, अब नक्सलवादी विकासात्मक प्रक्रिया के साथ नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के द्वारा समाज की मुख्य धारा में जुड़ रहें हैं | नक्सलवाद के उद्देश्य- नक्सलवाद की समस्या गरीबी, असंतोष , शोषण, बेरोजगारी से उत्पन्न हुई | नक्सलवादी अपने शुरूआती चरण में (1967से) अपने हितों की मांग कर रहा था | उसका उद्देश्य सिर्फ समाज के निचले तबके के लोगों का उत्थान करना था | नक्सलवाद का उद्देश्य समाज के उच्च वर्गों द्वारा किये जाने वाले शोषण से मुक्ति पाना था | जिसके लिए वो अपने लोगों में सरकार के प्रति घृणा का भाव पैदा करते हैं | परन्तु आज नक्सलवाद का उद्देश्य बदल चुका है, शुरूआती चरण में वो जिन आदिवासियों, गरीबों के लिए अपने हितों की मांग करते थे, आज उन्ही का शोषण कर रहे हैं | इस प्रकार वो शासन के अन्दर रहकर लोकतंत्र को समाजवादी, माओवादी विचारधारा का मुखौटा पहनाकर भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहे हैं | नक्सलवाद के लिए सियासी दल एक चुनावी हवा है , जिस पर मौका मिलते ही वो अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं | आज उनका उद्देश्य आदिवासी, निचले तबके के लोगों का उत्थान करना नहीं, बल्कि उनको दबा, धमकाकर उन पर अधिकार ज़माना है | नक्सलवादी आज आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है | इसको जड़ से समाप्त करने के लिए भारत सरकार को कड़ा से कड़ा कदम उठाना चाहिए | क्योंकि आज देश के हर प्रान्त में नक्सलवाद की पहुँच तेजी से हो रही है | यद्यपि कि अनेक चुनौतियाँ मौजूद है फिर भी इस दिशा में भारत सरकार अनेक विकास के कार्य के साथ-साथ कठोर कदमों को भी अपनाने में संकोच नहीं कर रही है |
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लॉर्ड वेलेजली द्वारा लागू किये गए सहायक संधि की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये| सहायक संधि के माध्यम से भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को क्या लाभ पहुंचा था ? (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the key features of the doctrine of subsidiary alliance implemented by lord wellesley. What benefit the british east india company got in india through the doctrine of subsidiary alliance? (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- ब्रिटिश प्रभुसता का प्रशासनिक नीति द्वारा विस्तार के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,लॉर्ड वेलेजली द्वारा लागू किये गए सहायक संधि की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,सहायक संधि के माध्यम से भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी कोपहुँचने वाले लाभों का जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, सहायक संधि स्वीकार करने वाले कुछ राज्यों का उल्लेख करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया, कंपनी द्वारा 1757 से 1857 के दौरान दो तरफ पद्धतियों से अपनाई गई- एक तो विजय एवं युद्ध के द्वारा समामेलन की नीति और दूसरे कूटनीतिक एवं प्रशासनिक तंत्र द्वारा समामेलन की नीति| कूटनीतिक एवं प्रशासनिक साधनों में वारेन हेस्टिंग्स की रिंग फेंस पॉलिसी, वेलेजली की सहायक संधि और डलहौजी की व्यपगत सिद्धांत प्रमुख थें| लॉर्ड वेलेजली(1798-1805) को नेपोलियन के खतरे को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से भारत भेजा गया था| नेपोलियन मिस्त्र तक पहुंच चुका था और लाल सागर से होकर भारत पर आक्रमण की योजना बना रहा था| वेलेजली ने फैसला किया कि नेपोलियन से मुकाबला करने का सबसे अच्छा तरीका यह सुनिश्चित करना है कि उसे किसी भी भारतीय शासक से सहायता प्राप्त ना हो | इसके लिए राजनीतिक प्रभाव को स्थापित करना आवश्यक था| वेलेजली ने सहायक संधि केमाध्यम से भारत में अंग्रेजी सत्ता को श्रेष्ठता प्रदान की तथा भारतीय राज्यों को सहायक संधि को स्वीकार करने के लिए विवश किया गया| सहायक संधि स्वीकार न करने की स्थिति में बल का प्रयोग किया गया| सहायक संधि की प्रमुख विशेषताएं भारतीय राज्यों के विदेशी संबंधों को कंपनी के नियंत्रणाधीन कर दिया गया था| किसी भी राज्य को कंपनी की अनुमति के बिना युद्ध/शांति की घोषणा करने की अनुमति नहीं थी| इसके अलावा अन्य राज्यों के साथ बातचीत करने के लिए कंपनी की मध्यस्थता भी आवश्यक थी| कंपनी को राज्यों के राज्य क्षेत्र के भीतर ही अपना सैन्य दस्ता रखना होता था| इन दस्तों के रखरखाव हेतु अपेक्षाकृत बड़े राज्यों ने अपने राज्य के कुछ निश्चित हिस्सों पर कंपनी को संप्रभु अधिकार दे दिए थे जबकि छोटे राज्यों से इस रखरखाव का खर्च नगद में वसूला जाता था| राज्यों को प्रशासनिक सलाह देने के लिए एक ब्रिटिश रेजीडेंट की नियुक्ति जो राज्य के दिन-प्रतिदिन के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, का प्रावधान था| कंपनी को आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं थी| यूरोपीय लोगों को रोजगार देने के मामले में राज्य को कंपनी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक था| सहायक संधि के माध्यम से कंपनी को लाभ- इसके फलस्वरूप कंपनी के लिए रणनीतिक स्थानों पर बिना किसी बड़े खर्चे के अतिरिक्त सैन्य बल रखना आसान हो गया| इसने भारतीय राज्यों को निःशस्त्र कर दिया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी महासंघ बनाने की संभावना से भारतीय राजाओं को वंचित कर दिया गया| युद्ध के विनाशकारी प्रभाव से(जो कि कंपनी राजस्व व्यय की सबसे बड़ी मद थी) मुक्ति मिली तथा एक संधि के माध्यम से लगभग सभी महत्वपूर्ण भारतीय राज्य कंपनी के संरक्षण में आ गए| भारतीय राज्यों के राज्य क्षेत्र में ही अपने सैन्य दस्तों को तैनात कर अंग्रेजों ने रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण स्थलों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया| इसके फलस्वरूप कंपनी को भारत में किसी भी संभावित फ्रांसीसी कार्यवाही को प्रति संतुलित करने की शक्ति प्राप्त हो गई| कंपनी ने उन प्रदेशों में पूर्ण संप्रभुता हासिल कर ली जिन्हें राज्य द्वारा ब्रिटिश सेना के रखरखाव के बदले में उन्हें प्रदान किया गया था| सबसे पहले यह संधि हैदराबाद के निजाम(1798) से की गयी| इसके बाद, मैसूर के शासक(1800), तंजौर के राजा(1799), अवध के नवाब(1801), पेशवा(1801), बरार के भोंसले राजा(1803), सिंधिया(1804) और राजपूत राज्यों से संधि पर हस्ताक्षर करवाए गए| इस संधि ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार में विशिष्ट भूमिका का निर्वहन किया तथा इसके द्वारा अंग्रेजों को भारत में विस्तृत क्षेत्र की प्राप्ति हुई|
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##Question:लॉर्ड वेलेजली द्वारा लागू किये गए सहायक संधि की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये| सहायक संधि के माध्यम से भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को क्या लाभ पहुंचा था ? (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the key features of the doctrine of subsidiary alliance implemented by lord wellesley. What benefit the british east india company got in india through the doctrine of subsidiary alliance? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- ब्रिटिश प्रभुसता का प्रशासनिक नीति द्वारा विस्तार के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,लॉर्ड वेलेजली द्वारा लागू किये गए सहायक संधि की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,सहायक संधि के माध्यम से भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी कोपहुँचने वाले लाभों का जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, सहायक संधि स्वीकार करने वाले कुछ राज्यों का उल्लेख करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया, कंपनी द्वारा 1757 से 1857 के दौरान दो तरफ पद्धतियों से अपनाई गई- एक तो विजय एवं युद्ध के द्वारा समामेलन की नीति और दूसरे कूटनीतिक एवं प्रशासनिक तंत्र द्वारा समामेलन की नीति| कूटनीतिक एवं प्रशासनिक साधनों में वारेन हेस्टिंग्स की रिंग फेंस पॉलिसी, वेलेजली की सहायक संधि और डलहौजी की व्यपगत सिद्धांत प्रमुख थें| लॉर्ड वेलेजली(1798-1805) को नेपोलियन के खतरे को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से भारत भेजा गया था| नेपोलियन मिस्त्र तक पहुंच चुका था और लाल सागर से होकर भारत पर आक्रमण की योजना बना रहा था| वेलेजली ने फैसला किया कि नेपोलियन से मुकाबला करने का सबसे अच्छा तरीका यह सुनिश्चित करना है कि उसे किसी भी भारतीय शासक से सहायता प्राप्त ना हो | इसके लिए राजनीतिक प्रभाव को स्थापित करना आवश्यक था| वेलेजली ने सहायक संधि केमाध्यम से भारत में अंग्रेजी सत्ता को श्रेष्ठता प्रदान की तथा भारतीय राज्यों को सहायक संधि को स्वीकार करने के लिए विवश किया गया| सहायक संधि स्वीकार न करने की स्थिति में बल का प्रयोग किया गया| सहायक संधि की प्रमुख विशेषताएं भारतीय राज्यों के विदेशी संबंधों को कंपनी के नियंत्रणाधीन कर दिया गया था| किसी भी राज्य को कंपनी की अनुमति के बिना युद्ध/शांति की घोषणा करने की अनुमति नहीं थी| इसके अलावा अन्य राज्यों के साथ बातचीत करने के लिए कंपनी की मध्यस्थता भी आवश्यक थी| कंपनी को राज्यों के राज्य क्षेत्र के भीतर ही अपना सैन्य दस्ता रखना होता था| इन दस्तों के रखरखाव हेतु अपेक्षाकृत बड़े राज्यों ने अपने राज्य के कुछ निश्चित हिस्सों पर कंपनी को संप्रभु अधिकार दे दिए थे जबकि छोटे राज्यों से इस रखरखाव का खर्च नगद में वसूला जाता था| राज्यों को प्रशासनिक सलाह देने के लिए एक ब्रिटिश रेजीडेंट की नियुक्ति जो राज्य के दिन-प्रतिदिन के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, का प्रावधान था| कंपनी को आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं थी| यूरोपीय लोगों को रोजगार देने के मामले में राज्य को कंपनी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक था| सहायक संधि के माध्यम से कंपनी को लाभ- इसके फलस्वरूप कंपनी के लिए रणनीतिक स्थानों पर बिना किसी बड़े खर्चे के अतिरिक्त सैन्य बल रखना आसान हो गया| इसने भारतीय राज्यों को निःशस्त्र कर दिया और अंग्रेजों के खिलाफ कोई भी महासंघ बनाने की संभावना से भारतीय राजाओं को वंचित कर दिया गया| युद्ध के विनाशकारी प्रभाव से(जो कि कंपनी राजस्व व्यय की सबसे बड़ी मद थी) मुक्ति मिली तथा एक संधि के माध्यम से लगभग सभी महत्वपूर्ण भारतीय राज्य कंपनी के संरक्षण में आ गए| भारतीय राज्यों के राज्य क्षेत्र में ही अपने सैन्य दस्तों को तैनात कर अंग्रेजों ने रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण स्थलों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया| इसके फलस्वरूप कंपनी को भारत में किसी भी संभावित फ्रांसीसी कार्यवाही को प्रति संतुलित करने की शक्ति प्राप्त हो गई| कंपनी ने उन प्रदेशों में पूर्ण संप्रभुता हासिल कर ली जिन्हें राज्य द्वारा ब्रिटिश सेना के रखरखाव के बदले में उन्हें प्रदान किया गया था| सबसे पहले यह संधि हैदराबाद के निजाम(1798) से की गयी| इसके बाद, मैसूर के शासक(1800), तंजौर के राजा(1799), अवध के नवाब(1801), पेशवा(1801), बरार के भोंसले राजा(1803), सिंधिया(1804) और राजपूत राज्यों से संधि पर हस्ताक्षर करवाए गए| इस संधि ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार में विशिष्ट भूमिका का निर्वहन किया तथा इसके द्वारा अंग्रेजों को भारत में विस्तृत क्षेत्र की प्राप्ति हुई|
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नक्सलवाद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्यों की संछिप्त में चर्चा कीजिये । (200 शब्द ) Explaining the theoretical background of Naxalism, discuss its objectives in brief.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नक्सलवाद के बारे में बताते हुए करिए | इसके बाद नक्सलवाद की सैद्धांतिक पृष्ठिभूमि बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | पुनः नक्सलवाद के उद्देश्यों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के गाँव नक्सलबाड़ी से हुई | नक्सलवाद की शुरुआत साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा से प्रेरित थी | कभी-कभी इसे माओवादी भी कहते हैं ,क्योंकि यह चीनी नेता माओत्से तुंग के राजनीतिक विचारधारा से भी प्रभावित है | नक्सलवाद की शुरुआत, गरीबी , भूखमरी, असमानता, बेरोजगारी , अविकासात्मक प्रक्रिया के कारण उत्पन्न हुई | परन्तु आज के समय में नक्सलवाद की मांग समय के साथ-साथ बदल गयी है, अब नक्सलवादी विकासात्मक प्रक्रिया के साथ नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के द्वारा समाज की मुख्य धारा में जुड़ रहें हैं | नक्सलवाद के उद्देश्य- नक्सलवाद की समस्या गरीबी, असंतोष , शोषण, बेरोजगारी से उत्पन्न हुई | नक्सलवादी अपने शुरूआती चरण में (1967से) अपने हितों की मांग कर रहा था | उसका उद्देश्य सिर्फ समाज के निचले तबके के लोगों का उत्थान करना था | नक्सलवाद का उद्देश्य समाज के उच्च वर्गों द्वारा किये जाने वाले शोषण से मुक्ति पाना था | जिसके लिए वो अपने लोगों में सरकार के प्रति घृणा का भाव पैदा करते हैं | परन्तु आज नक्सलवाद का उद्देश्य बदल चुका है, शुरूआती चरण में वो जिन आदिवासियों, गरीबों के लिए अपने हितों की मांग करते थे, आज उन्ही का शोषण कर रहे हैं | इस प्रकार वो शासन के अन्दर रहकर लोकतंत्र को समाजवादी, माओवादी विचारधारा का मुखौटा पहनाकर भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहे हैं | नक्सलवाद के लिए सियासी दल एक चुनावी हवा है , जिस पर मौका मिलते ही वो अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं | आज उनका उद्देश्य आदिवासी, निचले तबके के लोगों का उत्थान करना नहीं, बल्कि उनको दबा, धमकाकर उन पर अधिकार ज़माना है | नक्सलवादी आज आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है | इसको जड़ से समाप्त करने के लिए भारत सरकार को कड़ा से कड़ा कदम उठाना चाहिए | क्योंकि आज देश के हर प्रान्त में नक्सलवाद की पहुँच तेजी से हो रही है | यद्यपि कि अनेक चुनौतियाँ मौजूद है फिर भी इस दिशा में भारत सरकार अनेक विकास के कार्य के साथ-साथ कठोर कदमों को भी अपनाने में संकोच नहीं कर रही है |
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##Question:नक्सलवाद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्यों की संछिप्त में चर्चा कीजिये । (200 शब्द ) Explaining the theoretical background of Naxalism, discuss its objectives in brief.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नक्सलवाद के बारे में बताते हुए करिए | इसके बाद नक्सलवाद की सैद्धांतिक पृष्ठिभूमि बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | पुनः नक्सलवाद के उद्देश्यों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के गाँव नक्सलबाड़ी से हुई | नक्सलवाद की शुरुआत साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा से प्रेरित थी | कभी-कभी इसे माओवादी भी कहते हैं ,क्योंकि यह चीनी नेता माओत्से तुंग के राजनीतिक विचारधारा से भी प्रभावित है | नक्सलवाद की शुरुआत, गरीबी , भूखमरी, असमानता, बेरोजगारी , अविकासात्मक प्रक्रिया के कारण उत्पन्न हुई | परन्तु आज के समय में नक्सलवाद की मांग समय के साथ-साथ बदल गयी है, अब नक्सलवादी विकासात्मक प्रक्रिया के साथ नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के द्वारा समाज की मुख्य धारा में जुड़ रहें हैं | नक्सलवाद के उद्देश्य- नक्सलवाद की समस्या गरीबी, असंतोष , शोषण, बेरोजगारी से उत्पन्न हुई | नक्सलवादी अपने शुरूआती चरण में (1967से) अपने हितों की मांग कर रहा था | उसका उद्देश्य सिर्फ समाज के निचले तबके के लोगों का उत्थान करना था | नक्सलवाद का उद्देश्य समाज के उच्च वर्गों द्वारा किये जाने वाले शोषण से मुक्ति पाना था | जिसके लिए वो अपने लोगों में सरकार के प्रति घृणा का भाव पैदा करते हैं | परन्तु आज नक्सलवाद का उद्देश्य बदल चुका है, शुरूआती चरण में वो जिन आदिवासियों, गरीबों के लिए अपने हितों की मांग करते थे, आज उन्ही का शोषण कर रहे हैं | इस प्रकार वो शासन के अन्दर रहकर लोकतंत्र को समाजवादी, माओवादी विचारधारा का मुखौटा पहनाकर भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहे हैं | नक्सलवाद के लिए सियासी दल एक चुनावी हवा है , जिस पर मौका मिलते ही वो अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं | आज उनका उद्देश्य आदिवासी, निचले तबके के लोगों का उत्थान करना नहीं, बल्कि उनको दबा, धमकाकर उन पर अधिकार ज़माना है | नक्सलवादी आज आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है | इसको जड़ से समाप्त करने के लिए भारत सरकार को कड़ा से कड़ा कदम उठाना चाहिए | क्योंकि आज देश के हर प्रान्त में नक्सलवाद की पहुँच तेजी से हो रही है | यद्यपि कि अनेक चुनौतियाँ मौजूद है फिर भी इस दिशा में भारत सरकार अनेक विकास के कार्य के साथ-साथ कठोर कदमों को भी अपनाने में संकोच नहीं कर रही है |
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Explain the right to Freedom of Conscience and Free Profession, Practice, and Propagation of Religion. Discuss with examples, on which grounds these rights can be restricted. (150 words/10 marks)
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Approach Briefly write the provisions given under article 25 Mention exceptions to Article 25 Discuss the grounds on which this right can be restricted along with examples. Answer – Article 25 says that all persons are equally entitled to freedom of conscience & the right to freely profess, practice & propagate religion. The implications of these are as follows Freedom of conscience: inner freedom of an individual to mould his relation with God or Creatures in whatever way he desires. Right to profess: Declaration of one’s religious beliefs & faith openly & freely. Right to practice: Performance of religious worship, rituals, ceremonies & exhibition of beliefs & ideas. Right to propagate: Transmission & dissemination of one’s religious beliefs to others or exposition of the tenets of one’s religion. But, it does not include a right to convert another person to one’s own religion. Forcible conversions impinge on the ‘freedom of conscience’ guaranteed to all the persons alike. Thus, it can be said that Article 25 covers not only religious beliefs (doctrines) but also religious practices (rituals). Moreover, these rights are available to all persons – citizens as well as non-citizens. However, these rights are subject to public order, morality, health & other provisions relating to fundamental rights. Further, the state is permitted to: 1) Regulate or restrict any economic, financial, political, or other secular activity associated with religious practice; and 2) Provide for social welfare & reform or throw open Hindu religious institutions of a public character to all classes and sections of Hindus. Examples – 1) An order under the Section 144 of the Criminal Procedure Code prohibiting such a procession in the Interest of the public order and morality is not violative of Article 25 of the Constitution. 2) Chapter XV of the Indian Penal Code declares certain religious acts are offensive if they tend to create breach of peace. 3) Section 295 A specially limits the religious freedom of propagation by making it an offence to outrage the religious feelings of any class of citizens by acts incompatible with a civilized way of behaviour. 4) Under section 153 A of the Indian Penal Code, it has been declared a crime to promote, on grounds of religion, race, enmity between different religious, racial or language groups. This section holds an act as a criminal offence if it is detrimental to the maintenance of harmony between different religious groups or is likely to disturb public tranquility.
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##Question:Explain the right to Freedom of Conscience and Free Profession, Practice, and Propagation of Religion. Discuss with examples, on which grounds these rights can be restricted. (150 words/10 marks)##Answer:Approach Briefly write the provisions given under article 25 Mention exceptions to Article 25 Discuss the grounds on which this right can be restricted along with examples. Answer – Article 25 says that all persons are equally entitled to freedom of conscience & the right to freely profess, practice & propagate religion. The implications of these are as follows Freedom of conscience: inner freedom of an individual to mould his relation with God or Creatures in whatever way he desires. Right to profess: Declaration of one’s religious beliefs & faith openly & freely. Right to practice: Performance of religious worship, rituals, ceremonies & exhibition of beliefs & ideas. Right to propagate: Transmission & dissemination of one’s religious beliefs to others or exposition of the tenets of one’s religion. But, it does not include a right to convert another person to one’s own religion. Forcible conversions impinge on the ‘freedom of conscience’ guaranteed to all the persons alike. Thus, it can be said that Article 25 covers not only religious beliefs (doctrines) but also religious practices (rituals). Moreover, these rights are available to all persons – citizens as well as non-citizens. However, these rights are subject to public order, morality, health & other provisions relating to fundamental rights. Further, the state is permitted to: 1) Regulate or restrict any economic, financial, political, or other secular activity associated with religious practice; and 2) Provide for social welfare & reform or throw open Hindu religious institutions of a public character to all classes and sections of Hindus. Examples – 1) An order under the Section 144 of the Criminal Procedure Code prohibiting such a procession in the Interest of the public order and morality is not violative of Article 25 of the Constitution. 2) Chapter XV of the Indian Penal Code declares certain religious acts are offensive if they tend to create breach of peace. 3) Section 295 A specially limits the religious freedom of propagation by making it an offence to outrage the religious feelings of any class of citizens by acts incompatible with a civilized way of behaviour. 4) Under section 153 A of the Indian Penal Code, it has been declared a crime to promote, on grounds of religion, race, enmity between different religious, racial or language groups. This section holds an act as a criminal offence if it is detrimental to the maintenance of harmony between different religious groups or is likely to disturb public tranquility.
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यद्यपि कैबिनेट सचिव,भारतीयप्रशासनिक सेवा का सर्वोच्च पद माना जाता है,किन्तुराज्यों के मुख्य सचिव की अपेक्षा कैबिनेट सचिव को कम शक्तियां प्राप्त हैं. चर्चाकीजिये।(200 शब्द ) Although the cabinet secretary is considered the highest post of the Indian Administrative Service, the Cabinet Secretary gets fewer powers than the Chief Secretary of the states. Discuss(200 words)
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एप्रोच :- भूमिका में कैबिनेट सचिव के पद कोस्पष्ट कीजिये। कैबिनेट सचिव के विशेष कार्य को बताते हुए इसकी प्रभावी स्थिति को बताएं। राज्यों के मुख्य सचिव तथाकैबिनेट सचिव कीशक्तियों की तुलना कीजिये। दोनों के मध्य संतुलन बनाते हुए निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है जिसमें मंत्रिमंडल को कार्यपालक का दर्जा प्राप्त है| प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल भारत सरकार के पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी लेता है| इस कार्य में मंत्रिमंडल के सहायतार्थ मंत्रिमंडल(कैबिनेट) सचिवालय होता है |इस प्रकार कैबिनेट सचिवालय केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्टाफ एजेंसी है| यह भारत के प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशन और नेतृत्व में कार्य करता है| केंद्र सरकार में उच्च स्तरीय नीति-निर्धारण प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है|इस कैबिनेट सचिवालय का प्रशासनिक प्रधान कैबिनेट सचिव होता है. कैबिनेट सचिव के विशेष कार्य: राष्ट्रपति द्वारा संसद के विशेष सत्र को संबोधित करने के लिए जो अभिभाषण तैयार किया जाता है ,उसे कैबिनेट सचिव ही अंतिम रूप देता है भारत सरकार द्वारा किसी भी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध जो भी आपराधिक मुकदद्मे शुरू किये जाते है ,यदि उन्हें सरकार वापिस लेना चाहे तो कैबिनेट सचिव की अनुमति आवश्यक। वर्ष 2000 में अंतर्राष्ट्रीय रासायनिक एवं जैव हथियारों को प्रतिबंधित करने के लिए जो संधि हुई ,उसे लागू कराने का दायित्व कैबिनेट सचिव का ही होता है राज्य केमुख्य सचिव तथा केंद्रीयकैबिनेट सचिव की शक्तियों की तुलना :- मुख्य सचिव ,अपने क्षेत्राधिकार में अधिक शक्तिशाली ,कैबिनेट सचिव से तुलना करने पर कैबिनेट सचिव कम शक्तिशाली नौकरशाह होता हैइसे निम्नलिखित सन्दर्भों में समझा जा सकता है - राज्य का मुख्य सचिव , सिविल सेवा का प्रमुख होता है अर्थात राज्य के किसी सिविल सेवक के विरुद्ध कोई भी अनुशासनात्मक कार्यवाही , उसकी सहमति के बिना नहीं हो सकती।दूसरी तरफ केंद्र के कैबिनेट सचिव के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं होगी। मुख्य सचिव , सामान्य प्रशासन का प्रधान पदाधिकारी होता है अर्थात राज्य के किसी भी विभाग या मंत्रालय से वह कोई भी फाइल तलब कर सकता है। उन्हें दिशा निर्देश दे सकता है , कर्तव्यहीनता की स्थिति में सम्बंधित पदाधिकारियों को दण्डित भी कर सकता है।कैबिनेट सचिव के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं होती है। मुख्य सचिव , प्राय : 4 विभागों का विभागाध्यक्ष भी होता है - सामान्य प्रशासन ,नियोजन , कार्मिक ,पेंशन व्लोक शिकायततथा सूचनाकैबिनेट सचिव के पास ऐसे कोई विभाग नहीं होतेैहै। मुख्य सचिव , राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाले सभी कर्मचारियों पर प्रतिअनुशानात्मक निगरानी रखता है अर्थात सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता को भी सीधे दण्डित कर सकता है।कैबिनेट सचिव के पास ऐसी शक्ति नहीं होती। मुख्य सचिव ,मीडिया, NGO , जनप्रतिनिधि आदि से बातचीत कर उनकी समस्या का निदान कर सकता है - किसी विवादास्पद या गंभीर विषय की जांच के लिए जांच आयोग कागठन कर सकता है , तथा इसके आधार पर उपयुक्त कार्यवाही कर सकता है। यद्यपि राज्यों के मुख्य सचिव की अपेक्षा कैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तु कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है|इसके साथ ही कैबिनेट सचिव के विशेष कार्य भी इसे महत्वपूर्ण बनाते है।
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##Question:यद्यपि कैबिनेट सचिव,भारतीयप्रशासनिक सेवा का सर्वोच्च पद माना जाता है,किन्तुराज्यों के मुख्य सचिव की अपेक्षा कैबिनेट सचिव को कम शक्तियां प्राप्त हैं. चर्चाकीजिये।(200 शब्द ) Although the cabinet secretary is considered the highest post of the Indian Administrative Service, the Cabinet Secretary gets fewer powers than the Chief Secretary of the states. Discuss(200 words)##Answer:एप्रोच :- भूमिका में कैबिनेट सचिव के पद कोस्पष्ट कीजिये। कैबिनेट सचिव के विशेष कार्य को बताते हुए इसकी प्रभावी स्थिति को बताएं। राज्यों के मुख्य सचिव तथाकैबिनेट सचिव कीशक्तियों की तुलना कीजिये। दोनों के मध्य संतुलन बनाते हुए निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है जिसमें मंत्रिमंडल को कार्यपालक का दर्जा प्राप्त है| प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल भारत सरकार के पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी लेता है| इस कार्य में मंत्रिमंडल के सहायतार्थ मंत्रिमंडल(कैबिनेट) सचिवालय होता है |इस प्रकार कैबिनेट सचिवालय केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्टाफ एजेंसी है| यह भारत के प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशन और नेतृत्व में कार्य करता है| केंद्र सरकार में उच्च स्तरीय नीति-निर्धारण प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है|इस कैबिनेट सचिवालय का प्रशासनिक प्रधान कैबिनेट सचिव होता है. कैबिनेट सचिव के विशेष कार्य: राष्ट्रपति द्वारा संसद के विशेष सत्र को संबोधित करने के लिए जो अभिभाषण तैयार किया जाता है ,उसे कैबिनेट सचिव ही अंतिम रूप देता है भारत सरकार द्वारा किसी भी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध जो भी आपराधिक मुकदद्मे शुरू किये जाते है ,यदि उन्हें सरकार वापिस लेना चाहे तो कैबिनेट सचिव की अनुमति आवश्यक। वर्ष 2000 में अंतर्राष्ट्रीय रासायनिक एवं जैव हथियारों को प्रतिबंधित करने के लिए जो संधि हुई ,उसे लागू कराने का दायित्व कैबिनेट सचिव का ही होता है राज्य केमुख्य सचिव तथा केंद्रीयकैबिनेट सचिव की शक्तियों की तुलना :- मुख्य सचिव ,अपने क्षेत्राधिकार में अधिक शक्तिशाली ,कैबिनेट सचिव से तुलना करने पर कैबिनेट सचिव कम शक्तिशाली नौकरशाह होता हैइसे निम्नलिखित सन्दर्भों में समझा जा सकता है - राज्य का मुख्य सचिव , सिविल सेवा का प्रमुख होता है अर्थात राज्य के किसी सिविल सेवक के विरुद्ध कोई भी अनुशासनात्मक कार्यवाही , उसकी सहमति के बिना नहीं हो सकती।दूसरी तरफ केंद्र के कैबिनेट सचिव के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं होगी। मुख्य सचिव , सामान्य प्रशासन का प्रधान पदाधिकारी होता है अर्थात राज्य के किसी भी विभाग या मंत्रालय से वह कोई भी फाइल तलब कर सकता है। उन्हें दिशा निर्देश दे सकता है , कर्तव्यहीनता की स्थिति में सम्बंधित पदाधिकारियों को दण्डित भी कर सकता है।कैबिनेट सचिव के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं होती है। मुख्य सचिव , प्राय : 4 विभागों का विभागाध्यक्ष भी होता है - सामान्य प्रशासन ,नियोजन , कार्मिक ,पेंशन व्लोक शिकायततथा सूचनाकैबिनेट सचिव के पास ऐसे कोई विभाग नहीं होतेैहै। मुख्य सचिव , राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाले सभी कर्मचारियों पर प्रतिअनुशानात्मक निगरानी रखता है अर्थात सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता को भी सीधे दण्डित कर सकता है।कैबिनेट सचिव के पास ऐसी शक्ति नहीं होती। मुख्य सचिव ,मीडिया, NGO , जनप्रतिनिधि आदि से बातचीत कर उनकी समस्या का निदान कर सकता है - किसी विवादास्पद या गंभीर विषय की जांच के लिए जांच आयोग कागठन कर सकता है , तथा इसके आधार पर उपयुक्त कार्यवाही कर सकता है। यद्यपि राज्यों के मुख्य सचिव की अपेक्षा कैबिनेट सचिवों को कम शक्तियां प्राप्त होती हैं किन्तु कार्यपालिका की प्रभावशीलता बढाने में कैबिनेट सचिव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है|इसके साथ ही कैबिनेट सचिव के विशेष कार्य भी इसे महत्वपूर्ण बनाते है।
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Oceanic Crustal rocks are much younger than the continental crust rocks. Explain with the help of the concept of sea floor spreading. (150 words/10 marks)
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Approach 1. Introduction: Briefly discuss the earlier ideas related to the age of oceanic and continental crust. 2. Central Body: (a) Explain the Seafloor spreading theory very briefly. (b)Show how Oceanic crust is younger than continental crust with the help of seafloor spreading. 3. Conclusion: Conclude with a closing line about the renewal of the oceanic crust. Answer Earlier it was believed that the Continental crust is floating over the Oceanic crust hence oceanic crust must be older than the continental crust. But Seafloor spreading theory sheds more light on the age of the oceanic and continental crust. The seafloor spreading hypothesis was proposed by the American geophysicist Harry H. Hess in 1960.By the use of the sonar, Hess was able to map the ocean floor and discovered the mid-Atlantic ridge (mid-ocean ridge). Pieces of evidence in support of Seafloor spreading - 1. Molten material - Hess’s discovery of the warmer temperature near the mid-Atlantic ridge when he began the ocean mapping, led to his evidence about the molten material underneath the ocean. 2. Seafloor drill - The samples obtained from the seafloor drill reveal that the rocks away from the mid-oceanic ridge were relatively older than the rocks near it. The old rocks were also denser and thicker compared to the thinner and less dense rocks in the mid-oceanic ridge. 3. Radiometric age dating and fossil ages 4. Magnetic stripes - The patterns of the magnetic field were compared to the rocks to determine their approximate ages. The investigation of the mid-ocean ridge, using the magnetic stripes resulted in three discoveries. First, stripes of normal and reversed polarity were alternating across the bottom of the ocean. Second, the alternate stripes of normal and reversed polarity formed a mirror image on the other side of the ridge. The third is the abrupt ending of stripes when it reached the edge of the continent or an ocean trench. Hess postulated that The mid-ocean ridge is the region where new oceanic crust is created. The oceanic crust is composed of rocks that move away from the ridge as new crust is formed. The formation of the new crust is due to the rising of the molten material (magma) from the mantle by convection currents. When the molten magma reaches the oceanic crust, it cools and pushes away the existing rocks from the ridge equally in both directions. A younger oceanic crust is then formed, causing the spread of the ocean floor.The new rock is dense but not as dense as the old rock that moves away from the ridge.As the rock moves, further, it becomes colder and denser until it reaches an ocean trench or continues spreading. It is believed that the successive movement of the rocks from the ridge progressively increases the ocean depth and has greater depths in the ocean trenches. Seafloor spreading leads to the renewal of the ocean floor every 200 million years, a period of time for building a mid-ocean ridge, moving away across the ocean and subduction into a trench. Hence the cyclic construction of the crust at the mid-oceanic ridge and destruction at the trenches cause the renewal of the Oceanic crust and because of this, the oceanic crust is much younger than the continental crust.
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##Question:Oceanic Crustal rocks are much younger than the continental crust rocks. Explain with the help of the concept of sea floor spreading. (150 words/10 marks)##Answer:Approach 1. Introduction: Briefly discuss the earlier ideas related to the age of oceanic and continental crust. 2. Central Body: (a) Explain the Seafloor spreading theory very briefly. (b)Show how Oceanic crust is younger than continental crust with the help of seafloor spreading. 3. Conclusion: Conclude with a closing line about the renewal of the oceanic crust. Answer Earlier it was believed that the Continental crust is floating over the Oceanic crust hence oceanic crust must be older than the continental crust. But Seafloor spreading theory sheds more light on the age of the oceanic and continental crust. The seafloor spreading hypothesis was proposed by the American geophysicist Harry H. Hess in 1960.By the use of the sonar, Hess was able to map the ocean floor and discovered the mid-Atlantic ridge (mid-ocean ridge). Pieces of evidence in support of Seafloor spreading - 1. Molten material - Hess’s discovery of the warmer temperature near the mid-Atlantic ridge when he began the ocean mapping, led to his evidence about the molten material underneath the ocean. 2. Seafloor drill - The samples obtained from the seafloor drill reveal that the rocks away from the mid-oceanic ridge were relatively older than the rocks near it. The old rocks were also denser and thicker compared to the thinner and less dense rocks in the mid-oceanic ridge. 3. Radiometric age dating and fossil ages 4. Magnetic stripes - The patterns of the magnetic field were compared to the rocks to determine their approximate ages. The investigation of the mid-ocean ridge, using the magnetic stripes resulted in three discoveries. First, stripes of normal and reversed polarity were alternating across the bottom of the ocean. Second, the alternate stripes of normal and reversed polarity formed a mirror image on the other side of the ridge. The third is the abrupt ending of stripes when it reached the edge of the continent or an ocean trench. Hess postulated that The mid-ocean ridge is the region where new oceanic crust is created. The oceanic crust is composed of rocks that move away from the ridge as new crust is formed. The formation of the new crust is due to the rising of the molten material (magma) from the mantle by convection currents. When the molten magma reaches the oceanic crust, it cools and pushes away the existing rocks from the ridge equally in both directions. A younger oceanic crust is then formed, causing the spread of the ocean floor.The new rock is dense but not as dense as the old rock that moves away from the ridge.As the rock moves, further, it becomes colder and denser until it reaches an ocean trench or continues spreading. It is believed that the successive movement of the rocks from the ridge progressively increases the ocean depth and has greater depths in the ocean trenches. Seafloor spreading leads to the renewal of the ocean floor every 200 million years, a period of time for building a mid-ocean ridge, moving away across the ocean and subduction into a trench. Hence the cyclic construction of the crust at the mid-oceanic ridge and destruction at the trenches cause the renewal of the Oceanic crust and because of this, the oceanic crust is much younger than the continental crust.
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लोक प्रशासन के संदर्भ में विशिष्ट नैतिक पहलुओ को बताइये और यह किस प्रकार निजी प्रशासन से भिन्न है चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Explain specific ethical aspects in the context of public administration and discuss how it is different from private administration. (150 words)
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· भूमिका में लोक प्रशासन की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में उसके नैतिक पहलुओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में लोक प्रशासन की निजी प्रशासन से तुलना कीजिये । उत्तर:- लोक प्रशासन से तात्पर्य जनता के हितो की रक्षा और उनके विकास को केंद्र में रखकर किया जा रहे संसाधनो के प्रबंधन से है । लोक प्रशासन का उदभव मानवीय सभ्यता के उदभव से जुड़ा हुआ है । लोक प्रशासन हालांकि एक पृथक अवधारणा नही है , इसके अनेक घटक निजी प्रशासन में भी देखे जा सकते हैं। जैसे :- दोनों क्षेत्रो में कार्यरत अधिकारियों के उत्तरदायित्व एक समान हैं तथा उनके बीच अधिकारियों का परस्पर आदान प्रदान। लोक प्रशासन व निजी संगठन की कार्य प्रक्रिया या प्रबंधन के तकनीकों में भी समानता देखने को मिलती है। जैसे:- योजना का निर्माण, समन्वय करना, नियंत्रण करना, लेखांकन की प्रणाली का होना आदि । लोक निगम एक ऐसा सरकारी संगठन है जो लोक प्रशासन और निजी प्रशासन इन दोनों की विशेताओं का एक सम्मलित परिणाम है । लोक निगम जबाबदेहिता के साथ साथ स्वायत्ता पर भी बल देती है जोकि क्रमशः लोक प्रशासन और निजी प्रशासन की विशेताओं के प्रभाव को दर्शाती है । हालांकि कई आधारों पर लोक प्रशासन , निजी प्रशासन से भिन्नता प्रदर्शित करता है । जिसे निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- लोक प्रशासन का परिवेश राजनीतिक होता है जबकि निजी प्रशासन का गैर राजनीतिक । लोक प्रशासन जनहित के उद्देश्य से कार्य करता है और इस संदर्भ में लोक प्रशासन के द्वारा विभिन्न प्रकार की सामाजिक सेवाएँ और वस्तुएं उपलब्ध कारवाई जाती हैं, ताकि सामाजिक विकास और कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।जबकि निजी प्रशासन का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है । लोक प्रशासन में कार्यो की संख्या का अधिक होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्यों की संख्या कम होती है । लोक प्रशसन में कार्य प्रकृति में अधिक विविधताहोती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति में अधिक एक रूपता होती है। लोक प्रशासन में कार्य प्रकृति अधिक जटिल होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति का सरलीकृत रूप पाया जाता है । लोक प्रशासन में नियम व कानून के दृढ़ता का होना पाया जाता है जबकि निजी प्रशासन में कानून का लचीलापन पाया जाता है। लोक प्रशासन आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की जबाबदेहिता को सुनिश्चित करता है जबकि निजी प्रशासन मौलिक रूप से आंतरिक जबाबदेहिता को ही प्रदर्शित करता हैं । उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के मध्य कुछ भिन्नता पायी जाती है। हालांकि यह भिन्नत अंतर मात्रा का हैं , न कि प्रकार का।लोक प्रशासन और निजी प्रशासन का उद्देश्य वास्तव में एक दूसरे का विकल्प न होकर एक दूसरे के पूरक हैं । लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के समानता का क्षेत्र समय के साथ अधिक व्यापक होता जा रहा है ।परंतु किसी भी अवस्था में दोनों प्रशासन एक होने की संज्ञा को प्राप्त नही कर सकते ।
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##Question:लोक प्रशासन के संदर्भ में विशिष्ट नैतिक पहलुओ को बताइये और यह किस प्रकार निजी प्रशासन से भिन्न है चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Explain specific ethical aspects in the context of public administration and discuss how it is different from private administration. (150 words)##Answer:· भूमिका में लोक प्रशासन की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में उसके नैतिक पहलुओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में लोक प्रशासन की निजी प्रशासन से तुलना कीजिये । उत्तर:- लोक प्रशासन से तात्पर्य जनता के हितो की रक्षा और उनके विकास को केंद्र में रखकर किया जा रहे संसाधनो के प्रबंधन से है । लोक प्रशासन का उदभव मानवीय सभ्यता के उदभव से जुड़ा हुआ है । लोक प्रशासन हालांकि एक पृथक अवधारणा नही है , इसके अनेक घटक निजी प्रशासन में भी देखे जा सकते हैं। जैसे :- दोनों क्षेत्रो में कार्यरत अधिकारियों के उत्तरदायित्व एक समान हैं तथा उनके बीच अधिकारियों का परस्पर आदान प्रदान। लोक प्रशासन व निजी संगठन की कार्य प्रक्रिया या प्रबंधन के तकनीकों में भी समानता देखने को मिलती है। जैसे:- योजना का निर्माण, समन्वय करना, नियंत्रण करना, लेखांकन की प्रणाली का होना आदि । लोक निगम एक ऐसा सरकारी संगठन है जो लोक प्रशासन और निजी प्रशासन इन दोनों की विशेताओं का एक सम्मलित परिणाम है । लोक निगम जबाबदेहिता के साथ साथ स्वायत्ता पर भी बल देती है जोकि क्रमशः लोक प्रशासन और निजी प्रशासन की विशेताओं के प्रभाव को दर्शाती है । हालांकि कई आधारों पर लोक प्रशासन , निजी प्रशासन से भिन्नता प्रदर्शित करता है । जिसे निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- लोक प्रशासन का परिवेश राजनीतिक होता है जबकि निजी प्रशासन का गैर राजनीतिक । लोक प्रशासन जनहित के उद्देश्य से कार्य करता है और इस संदर्भ में लोक प्रशासन के द्वारा विभिन्न प्रकार की सामाजिक सेवाएँ और वस्तुएं उपलब्ध कारवाई जाती हैं, ताकि सामाजिक विकास और कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।जबकि निजी प्रशासन का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है । लोक प्रशासन में कार्यो की संख्या का अधिक होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्यों की संख्या कम होती है । लोक प्रशसन में कार्य प्रकृति में अधिक विविधताहोती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति में अधिक एक रूपता होती है। लोक प्रशासन में कार्य प्रकृति अधिक जटिल होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति का सरलीकृत रूप पाया जाता है । लोक प्रशासन में नियम व कानून के दृढ़ता का होना पाया जाता है जबकि निजी प्रशासन में कानून का लचीलापन पाया जाता है। लोक प्रशासन आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की जबाबदेहिता को सुनिश्चित करता है जबकि निजी प्रशासन मौलिक रूप से आंतरिक जबाबदेहिता को ही प्रदर्शित करता हैं । उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के मध्य कुछ भिन्नता पायी जाती है। हालांकि यह भिन्नत अंतर मात्रा का हैं , न कि प्रकार का।लोक प्रशासन और निजी प्रशासन का उद्देश्य वास्तव में एक दूसरे का विकल्प न होकर एक दूसरे के पूरक हैं । लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के समानता का क्षेत्र समय के साथ अधिक व्यापक होता जा रहा है ।परंतु किसी भी अवस्था में दोनों प्रशासन एक होने की संज्ञा को प्राप्त नही कर सकते ।
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19वीं सदी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के लिए उत्तरदायी कारकों का उल्लेख करते हुए राजा राम मोहन राय की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) Mentioning the factors responsible for social-religious reform movements in the 19th century discuss the role of Raja Ram Mohan Roy. (150-200 words; 10 marks)
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1संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारकों का उल्लेख कीजिए इसके बाद राजा राम मोहन राय के योगदान पर चर्चा कीजिए। संक्षिप्त सारांश लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक: मध्यवर्ग का उदय आधुनिक शिक्षा का प्रसार प्रेस की भूमिका ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्राच्यवादियों की भूमिका शहरीकरण, परिवहन के आधुनिक साधन अंग्रेजी कानूनों का प्रभाव। राजा राम मोहन राय का योगदान: सामाजिक क्षेत्र में योगदान: उन्होने निम्न वर्ग के विरुद्ध छुआछूत का विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विभिन्न कूरीतियों का विरोध जैसे- सती प्रथा के अंत की वकालत की, बहु विवाह, पर्दा प्रथा आदि। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून बनवाने में भूमिका विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में योगदान: पुरोहितवाद, कर्मकांडों का विरोध किया। एकेश्वरवाद के समर्थक थे ब्रह्म समाज की स्थापना वे मौलिक सत्य और धार्मिक एकता में विश्वास रखते थे। शिक्षा के क्षेत्र में: समाज के सभी वर्गों तक आधुनिक शिक्षा का प्रसार के लिए प्रयासरत। 1817 में हिन्दू कॉलेज व इंग्लिश स्कूल की स्थापना। 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना। 1809 में एकेश्वरवादियों को उपहार तथा 1820 में प्रिसेप्ट ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक की रचना। संवाद कौमुदी, मीरातुल अखबार आदि अखबारों का प्रकाशन भी किया। राजनीतिक एवं आर्थिक: उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना की मांग अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार:1821 में नेपल्स मेंक्रांति की विफलता पर दुःख व्यक्त किया। 1823 में दक्षिणी अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज। 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कई कारण थे जिन्हे तत्कालीन समय के अनेक व्यक्तियों ने बढ़ावा दिया। इन महान सुधारकों में राजा राम मोहन राय का नाम सबसे पहले आता है। इन्हे सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का प्रवर्तक माना जाता है।
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##Question:19वीं सदी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के लिए उत्तरदायी कारकों का उल्लेख करते हुए राजा राम मोहन राय की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द; 10 अंक) Mentioning the factors responsible for social-religious reform movements in the 19th century discuss the role of Raja Ram Mohan Roy. (150-200 words; 10 marks)##Answer:1संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारकों का उल्लेख कीजिए इसके बाद राजा राम मोहन राय के योगदान पर चर्चा कीजिए। संक्षिप्त सारांश लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक: मध्यवर्ग का उदय आधुनिक शिक्षा का प्रसार प्रेस की भूमिका ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्राच्यवादियों की भूमिका शहरीकरण, परिवहन के आधुनिक साधन अंग्रेजी कानूनों का प्रभाव। राजा राम मोहन राय का योगदान: सामाजिक क्षेत्र में योगदान: उन्होने निम्न वर्ग के विरुद्ध छुआछूत का विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विभिन्न कूरीतियों का विरोध जैसे- सती प्रथा के अंत की वकालत की, बहु विवाह, पर्दा प्रथा आदि। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून बनवाने में भूमिका विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में योगदान: पुरोहितवाद, कर्मकांडों का विरोध किया। एकेश्वरवाद के समर्थक थे ब्रह्म समाज की स्थापना वे मौलिक सत्य और धार्मिक एकता में विश्वास रखते थे। शिक्षा के क्षेत्र में: समाज के सभी वर्गों तक आधुनिक शिक्षा का प्रसार के लिए प्रयासरत। 1817 में हिन्दू कॉलेज व इंग्लिश स्कूल की स्थापना। 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना। 1809 में एकेश्वरवादियों को उपहार तथा 1820 में प्रिसेप्ट ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक की रचना। संवाद कौमुदी, मीरातुल अखबार आदि अखबारों का प्रकाशन भी किया। राजनीतिक एवं आर्थिक: उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना की मांग अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार:1821 में नेपल्स मेंक्रांति की विफलता पर दुःख व्यक्त किया। 1823 में दक्षिणी अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज। 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कई कारण थे जिन्हे तत्कालीन समय के अनेक व्यक्तियों ने बढ़ावा दिया। इन महान सुधारकों में राजा राम मोहन राय का नाम सबसे पहले आता है। इन्हे सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का प्रवर्तक माना जाता है।
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नैनो प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते हैं? नैनो प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों का उल्लेख करते हुए, इस प्रौद्योगिकी से संबंधित चिंताओं की भी चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द, 10 अंक ) What do you understand by thenanotechnology? While mentioning the applications of Nano technology, also discuss the concerns related to this technology (150-200 words, 10 Marks).
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, नैनो प्रौद्योगिकी का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,नैनो प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद इसप्रौद्योगिकी से संबंधित चिंताओं की भी चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- यह शब्द नैनो व तकनीक से मिलकर बना है जिसका अर्थ है "अति सूक्ष्म" अर्थात एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा। यह विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत किसी पदार्थ के परमाणु या अणु स्तर पर अध्ययन किया जाता है। नैनो तकनीक रसायन विज्ञान व तकनीकी का संयोजन है जिसमें परमाणुओं को नैनो मीटर के स्तर पर संयोजित करने की तकनीक का अध्ययन होता है। नैनो प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग:- चिकित्सा के क्षेत्र में:इससे कैंसर का उपचार संभव है।इससे ऐसी सूक्ष्म दवा बनाई जा सकेगी, जो कैंसर की करोड़ों कोशिकाओं में से किसी एक को पहचान कर उसका अलग से इलाज कर सकेगी।नैनो गोल्ड के रूप में। बायो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में: डीएनए नैनो चिप, नैदानिक परिक्षण में, प्रोटीन डीएनए आरएनए का उपयोग इत्यादि कंप्यूटिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में:नैनो तकनीक का उपयोग हमारे कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसोंमें बहुत पहले से ही हो रहा है उदाहरण के लिए कंप्यूटर के सर्किट और प्रोसेसर को बनाने के लिए सिलिकॉन का इस्तेमाल किया जाता है जो कि एक अर्धचालक है।क्वांटम कंप्यूटिंग,नैनो चिप, क्वांटम डॉट टेक्नोलॉजी।आने वाले समय में इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बल्ब में भी होगा किसके कारण बिजली की खपत भी कम होगी और रौशनी भी अधिक होगी। उपभोक्ता उत्पाद में: नैनो फ़िल्टर, नैनो फैब्रिक, नैनो शैम्पू, चश्मे, फेसवॉश इत्यादि में संभावनाएं। रक्षा के क्षेत्र में:बॉर्डर क्षेत्रो में नैनो रोबोट, नैनो कम्पोज़िट-लड़ाकू विमान बनाने में उपयोग किया जा सकताहैं। अंतरिक्ष विज्ञान क्षेत्र में: NASA द्वारा हल्का अंतरिक्ष यान बनाने की संभावनाएं। कृषि के क्षेत्र में:नैनो टेक्नोलॉजी से खाद बनाई जा सकती है जिससे फसल के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। नैनो तकनीक में किसी भी पदार्थ की मॉलीक्यूलर असेंबलिंग को समझ कर उसके आकार को आपके बाल के आकार जितना छोटा बनाया जा सकता है और इसकी प्रोसेसिंग क्षमता भी आज की तुलना में कई गुणाबेहतर होगी। टेनिस की गेंद भी नैनो कम्पोसिट कोर से बनाई जाती हैं ताकि उनका बॉउंस अधिक हो और पुरानी तकनीक से बनी गेंदों की तुलना मे अधिक टिकाउ हो। पैकेजिंग जैसे की दूध आदि के कार्टन मे नैनो कण इस्तेमाल किये जाते हैँ ताकि दूध प्लास्टिक की थैली मे अधिक समय तक तरोताजा रहे। ये कुछ उदाहरण हैं उन वस्तुओँ के जिन्हे हम अपने दैनिक जीवन मे उपयोग मे लाते हैं। नैनो तकनीक से सम्बंधित नकारात्मक पक्ष या चिंताएं:- पर्यावरणीय प्रदूषण:- अति सूक्ष्म कण तेज़ी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते हैं जिससे प्रदूषण की अधिक संभावना। जैविक सांद्रण/ जैविक आवर्धन:- आहार श्रृंखला या खाद्य श्रृंखला में प्रवेश से पर्यावरण के साथ साथ स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव की चिंताएं। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव:- मानव शरीर में किसी प्रकार के रेडिकल द्वारा कोशिका क्षति की संभावना तथाकैंसर का खतरा भी एक चिंता का विषय है। सुरक्षा सम्बंधित खतरा:- नैनो हथियार जैसे एंथ्रेक्स, विषाणु के द्वारा शत्रु देश द्वारा उपयोग की संभावनाएं एवं चिंताएं। सरकारी खुपिया जानकारी में प्रयोग जैसेसायबर क्रिमिनल द्वारा नैनो सेंसर का उपयोग सम्भव है। दीर्घकालीन चिन्ताएं जैसेसमाज पर आर्थिक दुष्प्रभाव, जैसे विकसित और विकासशील राष्टों के बीच बढ़तीआर्थिक असमानताएंऔर अर्थव्यवस्था का पश्च-अभावग्रस्त(Post-depressant) अवस्था में जाना इत्यादिहैं। हालाँकि इन चिंताओं के बावजूद इस प्रौद्योगिकी में निवेश की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। भविष्य में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं होगा, जो नैनो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं करेगा। तकनीकी जानकारों का मानना है कि आने वाला समय नैनो टेक्नोलॉजी का होगा।
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##Question:नैनो प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते हैं? नैनो प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों का उल्लेख करते हुए, इस प्रौद्योगिकी से संबंधित चिंताओं की भी चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द, 10 अंक ) What do you understand by thenanotechnology? While mentioning the applications of Nano technology, also discuss the concerns related to this technology (150-200 words, 10 Marks).##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, नैनो प्रौद्योगिकी का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,नैनो प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद इसप्रौद्योगिकी से संबंधित चिंताओं की भी चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- यह शब्द नैनो व तकनीक से मिलकर बना है जिसका अर्थ है "अति सूक्ष्म" अर्थात एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा। यह विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत किसी पदार्थ के परमाणु या अणु स्तर पर अध्ययन किया जाता है। नैनो तकनीक रसायन विज्ञान व तकनीकी का संयोजन है जिसमें परमाणुओं को नैनो मीटर के स्तर पर संयोजित करने की तकनीक का अध्ययन होता है। नैनो प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग:- चिकित्सा के क्षेत्र में:इससे कैंसर का उपचार संभव है।इससे ऐसी सूक्ष्म दवा बनाई जा सकेगी, जो कैंसर की करोड़ों कोशिकाओं में से किसी एक को पहचान कर उसका अलग से इलाज कर सकेगी।नैनो गोल्ड के रूप में। बायो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में: डीएनए नैनो चिप, नैदानिक परिक्षण में, प्रोटीन डीएनए आरएनए का उपयोग इत्यादि कंप्यूटिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में:नैनो तकनीक का उपयोग हमारे कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसोंमें बहुत पहले से ही हो रहा है उदाहरण के लिए कंप्यूटर के सर्किट और प्रोसेसर को बनाने के लिए सिलिकॉन का इस्तेमाल किया जाता है जो कि एक अर्धचालक है।क्वांटम कंप्यूटिंग,नैनो चिप, क्वांटम डॉट टेक्नोलॉजी।आने वाले समय में इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बल्ब में भी होगा किसके कारण बिजली की खपत भी कम होगी और रौशनी भी अधिक होगी। उपभोक्ता उत्पाद में: नैनो फ़िल्टर, नैनो फैब्रिक, नैनो शैम्पू, चश्मे, फेसवॉश इत्यादि में संभावनाएं। रक्षा के क्षेत्र में:बॉर्डर क्षेत्रो में नैनो रोबोट, नैनो कम्पोज़िट-लड़ाकू विमान बनाने में उपयोग किया जा सकताहैं। अंतरिक्ष विज्ञान क्षेत्र में: NASA द्वारा हल्का अंतरिक्ष यान बनाने की संभावनाएं। कृषि के क्षेत्र में:नैनो टेक्नोलॉजी से खाद बनाई जा सकती है जिससे फसल के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। नैनो तकनीक में किसी भी पदार्थ की मॉलीक्यूलर असेंबलिंग को समझ कर उसके आकार को आपके बाल के आकार जितना छोटा बनाया जा सकता है और इसकी प्रोसेसिंग क्षमता भी आज की तुलना में कई गुणाबेहतर होगी। टेनिस की गेंद भी नैनो कम्पोसिट कोर से बनाई जाती हैं ताकि उनका बॉउंस अधिक हो और पुरानी तकनीक से बनी गेंदों की तुलना मे अधिक टिकाउ हो। पैकेजिंग जैसे की दूध आदि के कार्टन मे नैनो कण इस्तेमाल किये जाते हैँ ताकि दूध प्लास्टिक की थैली मे अधिक समय तक तरोताजा रहे। ये कुछ उदाहरण हैं उन वस्तुओँ के जिन्हे हम अपने दैनिक जीवन मे उपयोग मे लाते हैं। नैनो तकनीक से सम्बंधित नकारात्मक पक्ष या चिंताएं:- पर्यावरणीय प्रदूषण:- अति सूक्ष्म कण तेज़ी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते हैं जिससे प्रदूषण की अधिक संभावना। जैविक सांद्रण/ जैविक आवर्धन:- आहार श्रृंखला या खाद्य श्रृंखला में प्रवेश से पर्यावरण के साथ साथ स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव की चिंताएं। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव:- मानव शरीर में किसी प्रकार के रेडिकल द्वारा कोशिका क्षति की संभावना तथाकैंसर का खतरा भी एक चिंता का विषय है। सुरक्षा सम्बंधित खतरा:- नैनो हथियार जैसे एंथ्रेक्स, विषाणु के द्वारा शत्रु देश द्वारा उपयोग की संभावनाएं एवं चिंताएं। सरकारी खुपिया जानकारी में प्रयोग जैसेसायबर क्रिमिनल द्वारा नैनो सेंसर का उपयोग सम्भव है। दीर्घकालीन चिन्ताएं जैसेसमाज पर आर्थिक दुष्प्रभाव, जैसे विकसित और विकासशील राष्टों के बीच बढ़तीआर्थिक असमानताएंऔर अर्थव्यवस्था का पश्च-अभावग्रस्त(Post-depressant) अवस्था में जाना इत्यादिहैं। हालाँकि इन चिंताओं के बावजूद इस प्रौद्योगिकी में निवेश की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। भविष्य में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं होगा, जो नैनो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं करेगा। तकनीकी जानकारों का मानना है कि आने वाला समय नैनो टेक्नोलॉजी का होगा।
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