Question
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लोक प्रशासन के संदर्भ में विशिष्ट नैतिक पहलुओ को बताइये और यह किस प्रकार निजी प्रशासन से भिन्न है चर्चा कीजिये । (150 -200 शब्द/10 अंक) Explain specific ethical aspects in the context of public administration and discuss how it is different from private administration. (150-200 words/10 Marks)
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· भूमिका में लोक प्रशासन की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में उसके नैतिक पहलुओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में लोक प्रशासन की निजी प्रशासन से तुलना कीजिये । उत्तर:- लोक प्रशासन से तात्पर्य जनता के हितो की रक्षा और उनके विकास को केंद्र में रखकर किया जा रहे संसाधनो के प्रबंधन से है । लोक प्रशासन का उदभव मानवीय सभ्यता के उदभव से जुड़ा हुआ है । लोक प्रशासन हालांकि एक पृथक अवधारणा नही है , इसके अनेक घटक निजी प्रशासन में भी देखे जा सकते हैं। जैसे :- दोनों क्षेत्रो में कार्यरत अधिकारियों के उत्तरदायित्व एक समान हैं तथा उनके बीच अधिकारियों का परस्पर आदान प्रदान। लोक प्रशासन व निजी संगठन की कार्य प्रक्रिया या प्रबंधन के तकनीकों में भी समानता देखने को मिलती है। जैसे:- योजना का निर्माण, समन्वय करना, नियंत्रण करना, लेखांकन की प्रणाली का होना आदि । लोक निगम एक ऐसा सरकारी संगठन है जो लोक प्रशासन और निजी प्रशासन इन दोनों की विशेताओं का एक सम्मलित परिणाम है । लोक निगम जबाबदेहिता के साथ साथ स्वायत्ता पर भी बल देती है जोकि क्रमशः लोक प्रशासन और निजी प्रशासन की विशेताओं के प्रभाव को दर्शाती है । हालांकि कई आधारों पर लोक प्रशासन , निजी प्रशासन से भिन्नता प्रदर्शित करता है । जिसे निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- लोक प्रशासन का परिवेश राजनीतिक होता है जबकि निजी प्रशासन का गैर राजनीतिक । लोक प्रशासन जनहित के उद्देश्य से कार्य करता है और इस संदर्भ में लोक प्रशासन के द्वारा विभिन्न प्रकार की सामाजिक सेवाएँ और वस्तुएं उपलब्ध कारवाई जाती हैं, ताकि सामाजिक विकास और कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।जबकि निजी प्रशासन का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है । लोक प्रशासन में कार्यो की संख्या का अधिक होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्यों की संख्या कम होती है । लोक प्रशसन में कार्य प्रकृति में अधिक विविधताहोती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति में अधिक एक रूपता होती है। लोक प्रशासन में कार्य प्रकृति अधिक जटिल होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति का सरलीकृत रूप पाया जाता है । लोक प्रशासन में नियम व कानून के दृढ़ता का होना पाया जाता है जबकि निजी प्रशासन में कानून का लचीलापन पाया जाता है। लोक प्रशासन आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की जबाबदेहिता को सुनिश्चित करता है जबकि निजी प्रशासन मौलिक रूप से आंतरिक जबाबदेहिता को ही प्रदर्शित करता हैं । उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के मध्य कुछ भिन्नता पायी जाती है। हालांकि यह भिन्नत अंतर मात्रा का हैं , न कि प्रकार का।लोक प्रशासन और निजी प्रशासन का उद्देश्य वास्तव में एक दूसरे का विकल्प न होकर एक दूसरे के पूरक हैं । लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के समानता का क्षेत्र समय के साथ अधिक व्यापक होता जा रहा है ।परंतु किसी भी अवस्था में दोनों प्रशासन एक होने की संज्ञा को प्राप्त नही कर सकते ।
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##Question:लोक प्रशासन के संदर्भ में विशिष्ट नैतिक पहलुओ को बताइये और यह किस प्रकार निजी प्रशासन से भिन्न है चर्चा कीजिये । (150 -200 शब्द/10 अंक) Explain specific ethical aspects in the context of public administration and discuss how it is different from private administration. (150-200 words/10 Marks)##Answer:· भूमिका में लोक प्रशासन की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में उसके नैतिक पहलुओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में लोक प्रशासन की निजी प्रशासन से तुलना कीजिये । उत्तर:- लोक प्रशासन से तात्पर्य जनता के हितो की रक्षा और उनके विकास को केंद्र में रखकर किया जा रहे संसाधनो के प्रबंधन से है । लोक प्रशासन का उदभव मानवीय सभ्यता के उदभव से जुड़ा हुआ है । लोक प्रशासन हालांकि एक पृथक अवधारणा नही है , इसके अनेक घटक निजी प्रशासन में भी देखे जा सकते हैं। जैसे :- दोनों क्षेत्रो में कार्यरत अधिकारियों के उत्तरदायित्व एक समान हैं तथा उनके बीच अधिकारियों का परस्पर आदान प्रदान। लोक प्रशासन व निजी संगठन की कार्य प्रक्रिया या प्रबंधन के तकनीकों में भी समानता देखने को मिलती है। जैसे:- योजना का निर्माण, समन्वय करना, नियंत्रण करना, लेखांकन की प्रणाली का होना आदि । लोक निगम एक ऐसा सरकारी संगठन है जो लोक प्रशासन और निजी प्रशासन इन दोनों की विशेताओं का एक सम्मलित परिणाम है । लोक निगम जबाबदेहिता के साथ साथ स्वायत्ता पर भी बल देती है जोकि क्रमशः लोक प्रशासन और निजी प्रशासन की विशेताओं के प्रभाव को दर्शाती है । हालांकि कई आधारों पर लोक प्रशासन , निजी प्रशासन से भिन्नता प्रदर्शित करता है । जिसे निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- लोक प्रशासन का परिवेश राजनीतिक होता है जबकि निजी प्रशासन का गैर राजनीतिक । लोक प्रशासन जनहित के उद्देश्य से कार्य करता है और इस संदर्भ में लोक प्रशासन के द्वारा विभिन्न प्रकार की सामाजिक सेवाएँ और वस्तुएं उपलब्ध कारवाई जाती हैं, ताकि सामाजिक विकास और कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।जबकि निजी प्रशासन का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है । लोक प्रशासन में कार्यो की संख्या का अधिक होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्यों की संख्या कम होती है । लोक प्रशसन में कार्य प्रकृति में अधिक विविधताहोती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति में अधिक एक रूपता होती है। लोक प्रशासन में कार्य प्रकृति अधिक जटिल होती है जबकि निजी प्रशासन में कार्य प्रकृति का सरलीकृत रूप पाया जाता है । लोक प्रशासन में नियम व कानून के दृढ़ता का होना पाया जाता है जबकि निजी प्रशासन में कानून का लचीलापन पाया जाता है। लोक प्रशासन आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की जबाबदेहिता को सुनिश्चित करता है जबकि निजी प्रशासन मौलिक रूप से आंतरिक जबाबदेहिता को ही प्रदर्शित करता हैं । उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के मध्य कुछ भिन्नता पायी जाती है। हालांकि यह भिन्नत अंतर मात्रा का हैं , न कि प्रकार का।लोक प्रशासन और निजी प्रशासन का उद्देश्य वास्तव में एक दूसरे का विकल्प न होकर एक दूसरे के पूरक हैं । लोक प्रशासन और निजी प्रशासन के समानता का क्षेत्र समय के साथ अधिक व्यापक होता जा रहा है ।परंतु किसी भी अवस्था में दोनों प्रशासन एक होने की संज्ञा को प्राप्त नही कर सकते ।
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Write short notes on (i) Aravallis (ii) Patlands (iii) Badlands (iv) R-G gap. (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE ARAVALLIS - THE PATLANDS - THE BADLANDS - THE R-G GAP Answer:- The above-mentioned features (in the question) pertain to the important features of peninsular India. Peninsular India is a senile topography. Therefore, all erosion has taken place and mostly the rocks which are very hard to erode are only found here. The peninsula is (almost) completely made up of plateaus and hills. The peninsular India is composed of the Aravallis mountains, the Malwa plateau, the Bundelkhand Plateau, the Baghelkhand Plateau, the Vindhyas, the Satpuras and the Maikala plateau, the Chotanagpur plateau, the Meghalayan plateau, the Deccan plateau, the Western Ghats, the Eastern Ghats, the Andaman and Nicobar Islands and the Lakshadweep islands. THE ARAVALLIS 1) CLASSIFICATION They are the oldest fold mountains of India. 2) LOCATION They are located between Palanpur (Ahmedabad) and Delhi. 3) ELEVATION They have an elevation of 400-600m from the mean sea level. 4) PEAK The highest peak is the Gurushikhar peak in Mountain Abu, which lies in the southern section of the Aravallis. 5) IMPORTANCE 5.1) A very important sacred and important place, called Ajmer, is located in the Middle Aravallis. 5.2) The River Luni takes birth in the Aravallis, near Ajmer. 5.3) The Aravallis also forms a watershed between the Indus and Ganga Rivers. 5.4) Mahi and Sukhri are the other important rivers which take birth in the Aravallis. THE PATLANDS The Chotanagpur plateau is the second largest plateau of India (the first being the Deccan plateau). It is also called the Ruhr of India, as it made up of old igneous and metamorphic rocks (especially the Dharwar and Archaean rocks, which are the main sources of a number of minerals). The Chotanagpur plateau consists of a series of plateaus at different heights, one over the other, known as Peatlands. The best example for peatlands is the Ranchi plateau. THE BADLANDS A very important landform in the Malwa plateau is created by the course of the River Chambal, which had converted the land into ravines and gullies. This is the badland topography of India. Such land is unfit for cultivation or even for grazing. It is also called Chambal badlands. THE R-G GAP The Meghalayan plateau/ the Shillong plateau is considered to be a part of the peninsular India which got separated from the Rajmahal hills, forming a gap known as the R-G gap. Tectonic adjustments led to the part between the Rajmahal hills and Garo, Khasi and Jaintia Hills in Meghalaya to subside. This subsided part became a huge gap between the Chotanagpur plateau and Meghalaya known as the R-G gap, also known as the Malda gap (Malda is a district in West Bengal). This gap implies that Ganga and Brahmaputra Rivers get their slope and drain into the Bay of Bengal. This gap also leads to the Brahmaputra taking its U-turn (due to the slope) to finally drain into the Bay of Bengal. (The answer must be substantiated with diagrams that were taught and drawn by sir in class)
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##Question:Write short notes on (i) Aravallis (ii) Patlands (iii) Badlands (iv) R-G gap. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE ARAVALLIS - THE PATLANDS - THE BADLANDS - THE R-G GAP Answer:- The above-mentioned features (in the question) pertain to the important features of peninsular India. Peninsular India is a senile topography. Therefore, all erosion has taken place and mostly the rocks which are very hard to erode are only found here. The peninsula is (almost) completely made up of plateaus and hills. The peninsular India is composed of the Aravallis mountains, the Malwa plateau, the Bundelkhand Plateau, the Baghelkhand Plateau, the Vindhyas, the Satpuras and the Maikala plateau, the Chotanagpur plateau, the Meghalayan plateau, the Deccan plateau, the Western Ghats, the Eastern Ghats, the Andaman and Nicobar Islands and the Lakshadweep islands. THE ARAVALLIS 1) CLASSIFICATION They are the oldest fold mountains of India. 2) LOCATION They are located between Palanpur (Ahmedabad) and Delhi. 3) ELEVATION They have an elevation of 400-600m from the mean sea level. 4) PEAK The highest peak is the Gurushikhar peak in Mountain Abu, which lies in the southern section of the Aravallis. 5) IMPORTANCE 5.1) A very important sacred and important place, called Ajmer, is located in the Middle Aravallis. 5.2) The River Luni takes birth in the Aravallis, near Ajmer. 5.3) The Aravallis also forms a watershed between the Indus and Ganga Rivers. 5.4) Mahi and Sukhri are the other important rivers which take birth in the Aravallis. THE PATLANDS The Chotanagpur plateau is the second largest plateau of India (the first being the Deccan plateau). It is also called the Ruhr of India, as it made up of old igneous and metamorphic rocks (especially the Dharwar and Archaean rocks, which are the main sources of a number of minerals). The Chotanagpur plateau consists of a series of plateaus at different heights, one over the other, known as Peatlands. The best example for peatlands is the Ranchi plateau. THE BADLANDS A very important landform in the Malwa plateau is created by the course of the River Chambal, which had converted the land into ravines and gullies. This is the badland topography of India. Such land is unfit for cultivation or even for grazing. It is also called Chambal badlands. THE R-G GAP The Meghalayan plateau/ the Shillong plateau is considered to be a part of the peninsular India which got separated from the Rajmahal hills, forming a gap known as the R-G gap. Tectonic adjustments led to the part between the Rajmahal hills and Garo, Khasi and Jaintia Hills in Meghalaya to subside. This subsided part became a huge gap between the Chotanagpur plateau and Meghalaya known as the R-G gap, also known as the Malda gap (Malda is a district in West Bengal). This gap implies that Ganga and Brahmaputra Rivers get their slope and drain into the Bay of Bengal. This gap also leads to the Brahmaputra taking its U-turn (due to the slope) to finally drain into the Bay of Bengal. (The answer must be substantiated with diagrams that were taught and drawn by sir in class)
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संगठित अपराध को परिभाषित कीजिये | संगठित अपराध को रोकने के उपायों की संछिप्त में चर्चा कीजिये | (150 शब्द) Define the organized crime. Discuss the measures to prevent the organized crime.
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एप्रोच - भूमिका में संगठित अपराध क्या है ? इसको परिभाषित कीजिये | इसके पश्चात संगठित अपराध को रोकने के लिए भारत क्या रणनीति अपना रही है ? उसकी चर्चा कीजये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार - ऐसे समूह को संगठित अपराध की श्रेणी में रखा जाता है जो निम्नलिखित गतिविधियों में से किसी एक या सभी के अधीन होता है - तीन या तीन से अधिक व्यक्तियों का समूह जो सुनियोजित ढंग से गठित हुआ हो | ऐसे समूह का अस्तित्व तीन या चार वर्ष से हो किसी ऐसे अपराध या जिसमे कम से कम 4 वर्ष की कठोर सजा हो, को अंजाम देने के उद्देश्य से किया गया है | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ के लिए इकट्ठे हुए हों | संगठित अपराध को रोकने के उपाय - भारत सरकार ने आतंकवाद और संगठित अपराध के गठजोड़ को रोकने लिए एक बहु-आयामी नीति गठित की है | उपर्युक्त कामों के साथ भारत ने अनेक सशक्त कानूनों को निर्मित किया है - IPC की विभिन्न धाराएँ , महराष्ट्र में मकोका और गुजरात में गुजकोका , रासुका ,टाडा, पोटा , सीबीआई और एनआईए जैसी संस्थाएं , मनीलांड्रिंग से सम्बंधित क़ानून, पोस्को एक्ट -2012 आदि | संगठित अपराध की सूचना तथा उसको निष्प्रभावी करने के लिए एक मजबूत आसूचना तंत्र को गठित किये जाने की सख्त आवश्यकता है | संगठित अपराध से जुड़े व्यक्तियों के लिए कठोर कानून व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि उन तक वित्त- पहुँच इत्यादि को नियंत्रित किया जा सके | ऐसे समूहों और अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा क्षेत्रीय स्वयत्तता एवं सत्ता में भागीदारी के माध्यम से लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है ताकि वे देश के प्रति अपनी निष्ठां को बांये रख सके | संगठित अपराधों को रोकने में सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राप्त करना है | जिसके माध्यम से ही संगठित अपराधियों को प्राप्त होने वाली वित्तीय मदद, सैन्य उपकरण की मदद आदि पर रोक लगाई जा सके | इस प्रकार भारत सरकार संगठित अपराध और आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक योजना के तहत काम कर रही है | कुछ कानूनों का निर्माण हो चुका है कुछ पर अभी काम चल रहा है | इन प्रयासों से अब संगठित अपराध कमजोर होने लगा है , साथ ही इस पर अभी और कठोर पूर्वक निर्णय लेते इसे निष्प्रभावी करने की आवश्यकता है |
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##Question:संगठित अपराध को परिभाषित कीजिये | संगठित अपराध को रोकने के उपायों की संछिप्त में चर्चा कीजिये | (150 शब्द) Define the organized crime. Discuss the measures to prevent the organized crime.##Answer:एप्रोच - भूमिका में संगठित अपराध क्या है ? इसको परिभाषित कीजिये | इसके पश्चात संगठित अपराध को रोकने के लिए भारत क्या रणनीति अपना रही है ? उसकी चर्चा कीजये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार - ऐसे समूह को संगठित अपराध की श्रेणी में रखा जाता है जो निम्नलिखित गतिविधियों में से किसी एक या सभी के अधीन होता है - तीन या तीन से अधिक व्यक्तियों का समूह जो सुनियोजित ढंग से गठित हुआ हो | ऐसे समूह का अस्तित्व तीन या चार वर्ष से हो किसी ऐसे अपराध या जिसमे कम से कम 4 वर्ष की कठोर सजा हो, को अंजाम देने के उद्देश्य से किया गया है | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ के लिए इकट्ठे हुए हों | संगठित अपराध को रोकने के उपाय - भारत सरकार ने आतंकवाद और संगठित अपराध के गठजोड़ को रोकने लिए एक बहु-आयामी नीति गठित की है | उपर्युक्त कामों के साथ भारत ने अनेक सशक्त कानूनों को निर्मित किया है - IPC की विभिन्न धाराएँ , महराष्ट्र में मकोका और गुजरात में गुजकोका , रासुका ,टाडा, पोटा , सीबीआई और एनआईए जैसी संस्थाएं , मनीलांड्रिंग से सम्बंधित क़ानून, पोस्को एक्ट -2012 आदि | संगठित अपराध की सूचना तथा उसको निष्प्रभावी करने के लिए एक मजबूत आसूचना तंत्र को गठित किये जाने की सख्त आवश्यकता है | संगठित अपराध से जुड़े व्यक्तियों के लिए कठोर कानून व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि उन तक वित्त- पहुँच इत्यादि को नियंत्रित किया जा सके | ऐसे समूहों और अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा क्षेत्रीय स्वयत्तता एवं सत्ता में भागीदारी के माध्यम से लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है ताकि वे देश के प्रति अपनी निष्ठां को बांये रख सके | संगठित अपराधों को रोकने में सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राप्त करना है | जिसके माध्यम से ही संगठित अपराधियों को प्राप्त होने वाली वित्तीय मदद, सैन्य उपकरण की मदद आदि पर रोक लगाई जा सके | इस प्रकार भारत सरकार संगठित अपराध और आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक योजना के तहत काम कर रही है | कुछ कानूनों का निर्माण हो चुका है कुछ पर अभी काम चल रहा है | इन प्रयासों से अब संगठित अपराध कमजोर होने लगा है , साथ ही इस पर अभी और कठोर पूर्वक निर्णय लेते इसे निष्प्रभावी करने की आवश्यकता है |
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अभिवृत्ति से आप क्या समझते हैं? अपने जीवन से कोई उदाहरण देते हुए, मूल्य एवं अभिवृत्ति के बीच संबंध को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you mean by attitude? Giving an example from your life, explain the relationship between value and attitude. (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में अभिवृति को परिभाषित करते हुए उसके द्वारा निष्पादित किये जाने वाले कार्यों का वर्णन कीजिये| अभिवृति तथा मूल्य के बीच संबंध को बताते हुए इसे अपने जीवन से कोई उदाहरण देकर पुष्ट कीजिये| उत्तर- अभिवृति का संबंध सामाजिक वातावरण में विद्यमान किसी वस्तु/व्यक्ति/घटना/परिस्थिति/मुद्दा या अन्य के प्रति व्यक्ति के झुकाव या प्रवृति को दर्शाती है जो कि सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकती है अतः अभिवृति मूल्यांकन या आकलन के विशेषता को दर्शाती है|जब व्यक्ति के विचार या मत भावनात्मक एवं क्रियाशीलता के साथ जुड़ जाते हैं तो यह मात्र विचार ना रहकर व्यक्ति के अभिवृति(Attitude) को दर्शाती है| अभिवृति के 3 मौलिक भाग हैं - विचार/विश्वास; भावना; क्रियाशीलता या व्यवहारिक पक्ष| विश्वास अभिवृति के विचारात्मक/संज्ञानात्मक भाग को दर्शाती है जो कि अभिवृति की आधारशिला है जैसे- भगवान में विश्वास का होना; राजनीतिक विश्वास के रूप में प्रजातंत्र में विश्वास करना आदि| अभिवृति स्वतः अपने आप में व्यवहार नहीं होता है परंतु एक विशिष्ट तरीके से किये जाने वाले व्यवहार की प्रवृति को दर्शाती है| अभिवृति द्वारा निम्न कार्यों का निष्पादन किया जाता है- यह व्यक्ति को जीवन जीने का एक तरीका देता है ताकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने आंतरिक आवश्यकताओं की मध्यस्थता बाहरी वातावरण से करने की स्थिति में हो पाता है| अभिवृति व्यक्तियों के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है| किसी व्यक्ति के द्वारा अपने अभिरुचि का प्रयोग अनुकूलतम तरीके से करने हेतु सकारात्मक अभिवृति का होना आवश्यक है| अभिवृति ज्ञान के कार्य को भी सुनिश्चित करती है क्योंकि यह दुनिया की अधिक समझ देता है| अतः अभिवृति के चार मौलिक कार्य हैं- ज्ञान ; मूल्यों की अभिव्यक्ति; ईगो-डिफेन्स स्वसंरक्षण ; परस्पर तालमेल; अभिवृति तथा मूल्य मूल्य उस प्रकार के विश्वास या अभिवृति को दर्शाती है जिसका संबंध क्या होना चाहिए से है ; जैसे -नैतिक मूल्य| मूल्यों का निर्माण तब होता है जब विशिष्ट विश्वास या अभिवृति व्यक्ति के जीवन का अभिन्न भाग हो जाता है| अभिवृति मूल्यों से मिलती जुलती है परंतु मूल्य अधिक स्थायी एवं व्यक्ति के प्रकृति में निहित होती है| अतः मूल्यों का परिवर्तन कठिन होता है| अभिवृति एवं विश्वास विशिष्ट मूल्यों के अनुपालन का एक परिणाम है| अभिवृति का उद्भव मूल्य से होता है| इसके साथ-साथ कभी-कभी अभिवृति भी व्यक्ति के मूल्यों में परिवर्तन लाती है| अभिवृति एक छोटी चीज होती है जो कि बहुत बड़ा अंतर लाती है| अभिवृति मूल्यों को अभिव्यक्त करती है जो कि व्यक्तियों के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग होता है| NOTE- अगले भाग में छात्रों द्वारा प्रस्तुत अपने जीवन से उदाहरण को अभिवृति एवं मूल्य के बीच संबंध के संदर्भ में मूल्यांकित करना है| मूल्यांकन के कुछ आयाम- उनके उदाहरण की सच्चाई; उनके उदाहरण को उनकी अभिवृति से जोड़ना; कुछ खास मूल्यों ने किस प्रकार उस अभिवृति पर प्रभाव डाला; उस उदाहरण से उन्होंने किस प्रकार किसी खास मूल्य को अपनाया; आदि|
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##Question:अभिवृत्ति से आप क्या समझते हैं? अपने जीवन से कोई उदाहरण देते हुए, मूल्य एवं अभिवृत्ति के बीच संबंध को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you mean by attitude? Giving an example from your life, explain the relationship between value and attitude. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में अभिवृति को परिभाषित करते हुए उसके द्वारा निष्पादित किये जाने वाले कार्यों का वर्णन कीजिये| अभिवृति तथा मूल्य के बीच संबंध को बताते हुए इसे अपने जीवन से कोई उदाहरण देकर पुष्ट कीजिये| उत्तर- अभिवृति का संबंध सामाजिक वातावरण में विद्यमान किसी वस्तु/व्यक्ति/घटना/परिस्थिति/मुद्दा या अन्य के प्रति व्यक्ति के झुकाव या प्रवृति को दर्शाती है जो कि सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकती है अतः अभिवृति मूल्यांकन या आकलन के विशेषता को दर्शाती है|जब व्यक्ति के विचार या मत भावनात्मक एवं क्रियाशीलता के साथ जुड़ जाते हैं तो यह मात्र विचार ना रहकर व्यक्ति के अभिवृति(Attitude) को दर्शाती है| अभिवृति के 3 मौलिक भाग हैं - विचार/विश्वास; भावना; क्रियाशीलता या व्यवहारिक पक्ष| विश्वास अभिवृति के विचारात्मक/संज्ञानात्मक भाग को दर्शाती है जो कि अभिवृति की आधारशिला है जैसे- भगवान में विश्वास का होना; राजनीतिक विश्वास के रूप में प्रजातंत्र में विश्वास करना आदि| अभिवृति स्वतः अपने आप में व्यवहार नहीं होता है परंतु एक विशिष्ट तरीके से किये जाने वाले व्यवहार की प्रवृति को दर्शाती है| अभिवृति द्वारा निम्न कार्यों का निष्पादन किया जाता है- यह व्यक्ति को जीवन जीने का एक तरीका देता है ताकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने आंतरिक आवश्यकताओं की मध्यस्थता बाहरी वातावरण से करने की स्थिति में हो पाता है| अभिवृति व्यक्तियों के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है| किसी व्यक्ति के द्वारा अपने अभिरुचि का प्रयोग अनुकूलतम तरीके से करने हेतु सकारात्मक अभिवृति का होना आवश्यक है| अभिवृति ज्ञान के कार्य को भी सुनिश्चित करती है क्योंकि यह दुनिया की अधिक समझ देता है| अतः अभिवृति के चार मौलिक कार्य हैं- ज्ञान ; मूल्यों की अभिव्यक्ति; ईगो-डिफेन्स स्वसंरक्षण ; परस्पर तालमेल; अभिवृति तथा मूल्य मूल्य उस प्रकार के विश्वास या अभिवृति को दर्शाती है जिसका संबंध क्या होना चाहिए से है ; जैसे -नैतिक मूल्य| मूल्यों का निर्माण तब होता है जब विशिष्ट विश्वास या अभिवृति व्यक्ति के जीवन का अभिन्न भाग हो जाता है| अभिवृति मूल्यों से मिलती जुलती है परंतु मूल्य अधिक स्थायी एवं व्यक्ति के प्रकृति में निहित होती है| अतः मूल्यों का परिवर्तन कठिन होता है| अभिवृति एवं विश्वास विशिष्ट मूल्यों के अनुपालन का एक परिणाम है| अभिवृति का उद्भव मूल्य से होता है| इसके साथ-साथ कभी-कभी अभिवृति भी व्यक्ति के मूल्यों में परिवर्तन लाती है| अभिवृति एक छोटी चीज होती है जो कि बहुत बड़ा अंतर लाती है| अभिवृति मूल्यों को अभिव्यक्त करती है जो कि व्यक्तियों के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग होता है| NOTE- अगले भाग में छात्रों द्वारा प्रस्तुत अपने जीवन से उदाहरण को अभिवृति एवं मूल्य के बीच संबंध के संदर्भ में मूल्यांकित करना है| मूल्यांकन के कुछ आयाम- उनके उदाहरण की सच्चाई; उनके उदाहरण को उनकी अभिवृति से जोड़ना; कुछ खास मूल्यों ने किस प्रकार उस अभिवृति पर प्रभाव डाला; उस उदाहरण से उन्होंने किस प्रकार किसी खास मूल्य को अपनाया; आदि|
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संगठित अपराध को परिभाषित कीजिये | संगठित अपराध को रोकने के उपायों की संछिप्त में चर्चा कीजिये | (150 शब्द) Define the organized crime. Discuss the measures to prevent the organized crime.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भूमिका में संगठित अपराध को बताते हुए करिए | इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा बताते हुए उत्तर को विस्तृत कीजिये | अंत में संगठित अपराध को रोकने के उपायों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ हेतु , 3 या इससे अधिक व्यक्तियों का संगठित दल जो गंभीर अपराध या जुर्म करने के लिए एकत्रित हुआ हो | संगठित अपराध की श्रेणी में आता है | संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार तीन या तीन से अधिक व्यक्तियों का समूह जो सुनियोजित ढंग से गठित हुआ हो , संगठित अपराध की श्रेणी में आएगा | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ के लिए गठित हुआ, कुछ लोगों का समूह | संगठित अपराध के उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत सरकार द्वारा इन दिनों बहुमुखी रणनीति का निर्माण कर आतंकवाद और संगठित अपराध को रोकने एवं इनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने का कार्य कर रही है | भारत सरकार संगठित अपराध उन्मूलन के लिए क्षेत्रीय स्तर पर आसूचना तंत्रों व ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद ले रही है | भारत सरकार ऐसी रणनीति का निर्माण कर रही है, जिसमे सूक्ष्म विश्लेषण, समग्रता, सर्वदेशीयता, शक्ति एवं सहयोग के बीच समन्वय का प्रावधान है | भारत सरकार इस काम में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी ले रही है, जिसमे प्रत्यर्पण संधि, संयुक्त राष्ट्र प्रोटोकाल व हथियार व्यापार संधि अत्यंत महत्वपूर्ण है | इस काम में कभी-कभी सरकार को मानव अधिकार संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ता है | इस सन्दर्भ में भारत सरकार कठोर कानून व्यवस्था का भी निर्माण कर रही है | इस प्रकार सपष्ट है कि सरकार द्वारा संगठित अपराध को रोकने की दिशा में काफी प्रयत्न किये जा रहे हैं | यद्यपि कि इसमें अनेक चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना भी करना पद रहा है तथापि दृढ इक्छाशक्ति तथा रणनीतिक समन्वय से इसमें सफलता हासिल हो सकती है |
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##Question:संगठित अपराध को परिभाषित कीजिये | संगठित अपराध को रोकने के उपायों की संछिप्त में चर्चा कीजिये | (150 शब्द) Define the organized crime. Discuss the measures to prevent the organized crime.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भूमिका में संगठित अपराध को बताते हुए करिए | इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा बताते हुए उत्तर को विस्तृत कीजिये | अंत में संगठित अपराध को रोकने के उपायों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ हेतु , 3 या इससे अधिक व्यक्तियों का संगठित दल जो गंभीर अपराध या जुर्म करने के लिए एकत्रित हुआ हो | संगठित अपराध की श्रेणी में आता है | संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार तीन या तीन से अधिक व्यक्तियों का समूह जो सुनियोजित ढंग से गठित हुआ हो , संगठित अपराध की श्रेणी में आएगा | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक या अन्य प्रकार के लाभ के लिए गठित हुआ, कुछ लोगों का समूह | संगठित अपराध के उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत सरकार द्वारा इन दिनों बहुमुखी रणनीति का निर्माण कर आतंकवाद और संगठित अपराध को रोकने एवं इनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने का कार्य कर रही है | भारत सरकार संगठित अपराध उन्मूलन के लिए क्षेत्रीय स्तर पर आसूचना तंत्रों व ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद ले रही है | भारत सरकार ऐसी रणनीति का निर्माण कर रही है, जिसमे सूक्ष्म विश्लेषण, समग्रता, सर्वदेशीयता, शक्ति एवं सहयोग के बीच समन्वय का प्रावधान है | भारत सरकार इस काम में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी ले रही है, जिसमे प्रत्यर्पण संधि, संयुक्त राष्ट्र प्रोटोकाल व हथियार व्यापार संधि अत्यंत महत्वपूर्ण है | इस काम में कभी-कभी सरकार को मानव अधिकार संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ता है | इस सन्दर्भ में भारत सरकार कठोर कानून व्यवस्था का भी निर्माण कर रही है | इस प्रकार सपष्ट है कि सरकार द्वारा संगठित अपराध को रोकने की दिशा में काफी प्रयत्न किये जा रहे हैं | यद्यपि कि इसमें अनेक चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना भी करना पद रहा है तथापि दृढ इक्छाशक्ति तथा रणनीतिक समन्वय से इसमें सफलता हासिल हो सकती है |
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अभिवृत्तिसे आप क्या समझते हैं? अपने जीवन से कोई उदाहरण देते हुए,अभिवृत्ति तथा मूल्य के बीच संबंध को बताईये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do youmean byAttitude? Giving an example from your life, Explaintherelationship betweenAttitude and Value. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- पहले भाग में अभिवृति को परिभाषित करते हुए उसके द्वारा निष्पादित किये जाने वाले कार्यों का वर्णन कीजिये| अभिवृति तथा मूल्य के बीच संबंध को बताते हुए इसे अपने जीवन से कोई उदाहरण देकर पुष्ट कीजिये| उत्तर- अभिवृति का संबंध सामाजिक वातावरण में विद्यमान किसी वस्तु/व्यक्ति/घटना/परिस्थिति/मुद्दा या अन्य के प्रति व्यक्ति के झुकाव या प्रवृति को दर्शाती है जो कि सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकती है अतः अभिवृति मूल्यांकन या आकलन के विशेषता को दर्शाती है|जब व्यक्ति के विचार या मत भावनात्मक एवं क्रियाशीलता के साथ जुड़ जाते हैं तो यह मात्र विचार ना रहकर व्यक्ति के अभिवृति(Attitude) को दर्शाती है| अभिवृति के 3 मौलिक भाग हैं - विचार/विश्वास; भावना; क्रियाशीलता या व्यवहारिक पक्ष| विश्वास अभिवृति के विचारात्मक/संज्ञानात्मक भाग को दर्शाती है जो कि अभिवृति की आधारशिला है जैसे- भगवान में विश्वास का होना; राजनीतिक विश्वास के रूप में प्रजातंत्र में विश्वास करना आदि| अभिवृति स्वतः अपने आप में व्यवहार नहीं होता है परंतु एक विशिष्ट तरीके से किये जाने वाले व्यवहार की प्रवृति को दर्शाती है| अभिवृति द्वारा निम्न कार्यों का निष्पादन किया जाता है- यह व्यक्ति को जीवन जीने का एक तरीका देता है ताकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने आंतरिक आवश्यकताओं की मध्यस्थता बाहरी वातावरण से करने की स्थिति में हो पाता है| अभिवृति व्यक्तियों के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है| किसी व्यक्ति के द्वारा अपने अभिरुचि का प्रयोग अनुकूलतम तरीके से करने हेतु सकारात्मक अभिवृति का होना आवश्यक है| अभिवृति ज्ञान के कार्य को भी सुनिश्चित करती है क्योंकि यह दुनिया की अधिक समझ देता है| अतः अभिवृति के चार मौलिक कार्य हैं- ज्ञान ; मूल्यों की अभिव्यक्ति; ईगो-डिफेन्स स्वसंरक्षण ; परस्पर तालमेल; अभिवृति तथा मूल्य मूल्य उस प्रकार के विश्वास या अभिवृति को दर्शाती है जिसका संबंध क्या होना चाहिए से है ; जैसे -नैतिक मूल्य| मूल्यों का निर्माण तब होता है जब विशिष्ट विश्वास या अभिवृति व्यक्ति के जीवन का अभिन्न भाग हो जाता है| अभिवृति मूल्यों से मिलती जुलती है परंतु मूल्य अधिक स्थायी एवं व्यक्ति के प्रकृति में निहित होती है| अतः मूल्यों का परिवर्तन कठिन होता है| अभिवृति एवं विश्वास विशिष्ट मूल्यों के अनुपालन का एक परिणाम है| अभिवृति का उद्भव मूल्य से होता है| इसके साथ-साथ कभी-कभी अभिवृति भी व्यक्ति के मूल्यों में परिवर्तन लाती है| अभिवृति एक छोटी चीज होती है जो कि बहुत बड़ा अंतर लाती है| अभिवृति मूल्यों को अभिव्यक्त करती है जो कि व्यक्तियों के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग होता है| NOTE- अगले भाग में छात्रों द्वारा प्रस्तुत अपने जीवन से उदाहरण को अभिवृति एवं मूल्य के बीच संबंध के संदर्भ में मूल्यांकित करना है| मूल्यांकन के कुछ आयाम- उनके उदाहरण की सच्चाई; उनके उदाहरण को उनकी अभिवृति से जोड़ना; कुछ खास मूल्यों ने किस प्रकार उस अभिवृति पर प्रभाव डाला; उस उदाहरण से उन्होंने किस प्रकार किसी खास मूल्य को अपनाया; आदि|
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##Question:अभिवृत्तिसे आप क्या समझते हैं? अपने जीवन से कोई उदाहरण देते हुए,अभिवृत्ति तथा मूल्य के बीच संबंध को बताईये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do youmean byAttitude? Giving an example from your life, Explaintherelationship betweenAttitude and Value. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में अभिवृति को परिभाषित करते हुए उसके द्वारा निष्पादित किये जाने वाले कार्यों का वर्णन कीजिये| अभिवृति तथा मूल्य के बीच संबंध को बताते हुए इसे अपने जीवन से कोई उदाहरण देकर पुष्ट कीजिये| उत्तर- अभिवृति का संबंध सामाजिक वातावरण में विद्यमान किसी वस्तु/व्यक्ति/घटना/परिस्थिति/मुद्दा या अन्य के प्रति व्यक्ति के झुकाव या प्रवृति को दर्शाती है जो कि सकारात्मक या नकारात्मक या तटस्थ हो सकती है अतः अभिवृति मूल्यांकन या आकलन के विशेषता को दर्शाती है|जब व्यक्ति के विचार या मत भावनात्मक एवं क्रियाशीलता के साथ जुड़ जाते हैं तो यह मात्र विचार ना रहकर व्यक्ति के अभिवृति(Attitude) को दर्शाती है| अभिवृति के 3 मौलिक भाग हैं - विचार/विश्वास; भावना; क्रियाशीलता या व्यवहारिक पक्ष| विश्वास अभिवृति के विचारात्मक/संज्ञानात्मक भाग को दर्शाती है जो कि अभिवृति की आधारशिला है जैसे- भगवान में विश्वास का होना; राजनीतिक विश्वास के रूप में प्रजातंत्र में विश्वास करना आदि| अभिवृति स्वतः अपने आप में व्यवहार नहीं होता है परंतु एक विशिष्ट तरीके से किये जाने वाले व्यवहार की प्रवृति को दर्शाती है| अभिवृति द्वारा निम्न कार्यों का निष्पादन किया जाता है- यह व्यक्ति को जीवन जीने का एक तरीका देता है ताकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने आंतरिक आवश्यकताओं की मध्यस्थता बाहरी वातावरण से करने की स्थिति में हो पाता है| अभिवृति व्यक्तियों के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है| किसी व्यक्ति के द्वारा अपने अभिरुचि का प्रयोग अनुकूलतम तरीके से करने हेतु सकारात्मक अभिवृति का होना आवश्यक है| अभिवृति ज्ञान के कार्य को भी सुनिश्चित करती है क्योंकि यह दुनिया की अधिक समझ देता है| अतः अभिवृति के चार मौलिक कार्य हैं- ज्ञान ; मूल्यों की अभिव्यक्ति; ईगो-डिफेन्स स्वसंरक्षण ; परस्पर तालमेल; अभिवृति तथा मूल्य मूल्य उस प्रकार के विश्वास या अभिवृति को दर्शाती है जिसका संबंध क्या होना चाहिए से है ; जैसे -नैतिक मूल्य| मूल्यों का निर्माण तब होता है जब विशिष्ट विश्वास या अभिवृति व्यक्ति के जीवन का अभिन्न भाग हो जाता है| अभिवृति मूल्यों से मिलती जुलती है परंतु मूल्य अधिक स्थायी एवं व्यक्ति के प्रकृति में निहित होती है| अतः मूल्यों का परिवर्तन कठिन होता है| अभिवृति एवं विश्वास विशिष्ट मूल्यों के अनुपालन का एक परिणाम है| अभिवृति का उद्भव मूल्य से होता है| इसके साथ-साथ कभी-कभी अभिवृति भी व्यक्ति के मूल्यों में परिवर्तन लाती है| अभिवृति एक छोटी चीज होती है जो कि बहुत बड़ा अंतर लाती है| अभिवृति मूल्यों को अभिव्यक्त करती है जो कि व्यक्तियों के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग होता है| NOTE- अगले भाग में छात्रों द्वारा प्रस्तुत अपने जीवन से उदाहरण को अभिवृति एवं मूल्य के बीच संबंध के संदर्भ में मूल्यांकित करना है| मूल्यांकन के कुछ आयाम- उनके उदाहरण की सच्चाई; उनके उदाहरण को उनकी अभिवृति से जोड़ना; कुछ खास मूल्यों ने किस प्रकार उस अभिवृति पर प्रभाव डाला; उस उदाहरण से उन्होंने किस प्रकार किसी खास मूल्य को अपनाया; आदि|
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"स्वामी विवेकानंद 19 वीं शताब्दी से संबंधित थें, फिर भी उनके विचार और संदेश अतीत की तुलना में आज अधिक प्रासंगिक है और शायद, भविष्य में और अधिक प्रासंगिक होंगे।" स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द-200 शब्द; 10 अंक) "Swami Vivekananda was related to the 19th century, yet his thoughts and messages are more relevant today than in the past and, perhaps, will be more relevant in the future." Elucidate. (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,भूमिका में स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक संक्षिप्तपरिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में स्वामी विवेकानन्दके विचारों एवं संदेशों को का उल्लेख करते हुए समझाइए कि कैसेउन विचारों एवं संदेशों की प्रासंगिकता वर्तमान में भी बनी हुई है और कैसे यह भविष्य के लिए भी प्रासंगिक है? अंत में संक्षेप में उनके विचारों की महत्ता को निष्कर्षतः लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- स्वामी विवेकानंद,रामकृष्ण परमहंस के मुख्य शिष्य थे।उन्होंने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया से परिचित कराया और 19 वीं शताब्दी के अंत में हिंदू धर्म को विश्व मंच पर लाने औरअंतरधर्मजागरूकता बढ़ाने का श्रेय इन्हें दिया जाता है। उन्होंने 1987 में अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस संस्था ने भारत में व्यापक शैक्षिक और जनकल्याणकारी कार्य किए हैं ।उन्होंने 1893 में शिकागो (यू.एस.) में आयोजित धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व किया। स्वामी विवेकानन्द के विचार एवं संदेश एवं उनकी वर्तमान एवं भविष्य के लिए प्रासंगिकता:- सामाजिक क्षेत्र में:- जाती प्रथा, छुआछूत के आलोचक, समाज के सभी वर्गों के विकास को राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक मानते थे। आज भी समाज में भेदभाव बना हुआ है। ऊना जैसी घटनाएं, आर्टिकल 15 जैसा सिनेमा विवेकानंद के विचारों की प्रासंगिकता को बयान करती हैं। उन्होंने छुआछूत तथा हिन्दू धर्म के सम्बन्ध को लेकर व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि हिन्दू धर्म की यही स्थिति रही तो यह "मुझे मत छुओ" धर्म के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। रामकृष्ण परमहंस की तरह ही मानव सेवा को ईश्वर सेवा के तुल्य बताया। "मैं वैसे किसी ईश्वर को नहीं मानता जो गरीबों को दो वक्त की रोटी न दे लेकिन मरने के बाद मोक्ष की गारंटी दे" वर्तमान में भी कुपोषण एवं बढ़ती असमानता के संदर्भ में इनके विचार प्रासंगिक प्रतीत होते हैं और इनकी भविष्य में भी प्रासंगिकता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। महिलाओं में प्रचलित कुरूतियों की भी आलोचना की जैसे बाल विवाह, विधवाओं की दयनीय दशा इत्यादि। यहाँ भी धर्म के ठेकेदारों पर प्रहार करते हुए कहा "मैं वैसे धर्म को नहीं मानता जो विधवाओं के आंसू को न पोंछें लेकिन मरने के बाद मोक्ष की गारंटी दे" आज भी हमारे समाज में महिलाओं की दशा में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है हालाँकि कुछ सुधारजरूर हुआ है। लेकिन विवेकानंद के विचारों की उपयोगिता आगे भी बनी रहेगी। धार्मिक क्षेत्र में:- उनका मानना था कि प्रत्येक धर्म, अनंत परम - सर्वोच्च स्वतंत्रता, सर्वोच्च ज्ञान, सर्वोच्च खुशी का मार्ग प्रशस्त करता है।यह परमात्मा के हिस्से के रूप में किसी कीआत्माको साकार करके पूरा किया जा सकता है। पुरोहितवाद, अन्धविश्वास, कर्मकांड की आलोचना हालाँकि मूर्तिपूजा में इनकी आस्था थी। इन विचारों की प्रासंगिता आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। धर्म के क्षेत्र में भी वैज्ञानिक चिंतन तथा विभिन्न धर्मों के अच्छे तत्वों के संश्लेषण पर बल देते थे। धर्म एवं समाज सुधार के संदर्भ में इन्होने कहा कि सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथो को थोड़े समय के लिए विश्राम करने दिया जाए। 1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मलेन में इन्होने भारतीय चिंतन व अध्यात्म को दुनिया के सामने रखा। पूरी दुनिया में इसकी सराहना हुई। इन्होने कहा कि मानव के लिए बेहतर होगा कि वो पश्चिम के भौतिकवादी दृष्टिकोण और भारत के आध्यात्मिक दृष्टिकोण में समन्वय बैठाये। आज भी वैश्वीकरण के युग में विभिन्न देशों की संस्कृतियों एवं दृष्टिकोणों में जुड़ाव एवं समन्वय की झलक देखीजा सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में:- आधुनिक शिक्षा एवं महिला शिक्षा के समर्थक, राममोहन राय की तरह शिक्षा को आधुनिक परिवर्तनों का माध्यम मानते थे। स्वामी विवेकानंद ने हमारी मातृभूमि के उत्थान के लिए शिक्षा पर सबसे अधिक जोर दिया। उनके अनुसार, एक राष्ट्र, शिक्षा केसमानुपात मेंही उन्नत होता है। जितनी शिक्षा मिलेगी उतना ही उन्नत एवं समृद्ध होगा। उन्होंने एक मानव-निर्मित चरित्र-निर्माण शिक्षा की वकालत की(man-making character-building)। उन्होंने कहा कि शिक्षा द्वाराविद्यार्थियोंको आत्मनिर्भर होना चाहिएऔर जीवन की चुनौतियों का सामना करनाचाहिए। वह तथाकथित शिक्षित लोगोंकी अत्यधिक आलोचना करतेथे जो गरीबों और दलितों की परवाह नहीं करते। उपरोक्त शिक्षा संबंधी विचारों की महत्ता आज भी बनी हुई है। वंचित तबकों की शिक्षा तक पहुँच न होना, बालिकाओं एवं गरीब परिवार के बच्चों के स्कूल में नामांकन दर का कम होना, कौशल रहित रट्टा मारने कीपद्धति, नैतिक शिक्षा का सिलेबस में समावेश नहीं होना इत्यादि के संदर्भ में विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। युवा:- उनका मानना था कि यदि हमारे युवा दृढ़ संकल्पित हैं, तो उनके लिए दुनिया में कुछ भी हासिल करना असंभव नहीं है। अतः यह विचार भारत के भविष्य के निर्माण में सहायक हैं। डेमोग्राफिक डिविडेंट के संदर्भ में युवा शक्ति का पूर्ण लाभ उठा सकने के लिए विवेकानंद के विचारों को अपनाना अच्छा कदम साबित होगा।उन्होंने युवाओं से सफलता प्राप्त करने के लिए समर्पण का आग्रह किया। अत्यंत समर्पण के साथ एक चुनौती का पीछा करना वास्तव में हमारे युवाओं के लिए सफलता की राह होगी। विवेकानंद के विचारों की प्रसंगिकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि12 जनवरी को उनके जन्मदिन को, राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है और उस दिन से शुरू होने वाले सप्ताह को "राष्ट्रीय युवा सप्ताह" के रूप में मनायाजाता है। "राष्ट्रीय युवा सप्ताह" समारोह के हिस्से के रूप में, भारत सरकार हर साल "राष्ट्रीय युवा महोत्सव" आयोजित करती है। युवा उत्सव का उद्देश्य, राष्ट्रीय एकता की भावना, युवाओं में सांप्रदायिक सौहार्द, भाईचारे, और साहस की भावना को भरने के लिएएक मंच प्रदानकरना है। अतः स्पष्ट है किस्वामी विवेकानंद 19 वीं शताब्दी से सम्बंधित थे, फिर भी उनके विचार और संदेश अतीत की तुलना में आज अधिक प्रासंगिक है और शायद, भविष्य में और अधिक प्रासंगिक होंगे।स्वामी विवेकानंद जैसे व्यक्ति अपनी शारीरिक मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते, उनका प्रभाव,विचार और संदेशोंकी गति वर्ष बीतने के साथ साथ बढ़ती जाती है। और आखिरकार, वे उस मंज़िलतक पहुंच जाते हैं जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी।
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##Question:"स्वामी विवेकानंद 19 वीं शताब्दी से संबंधित थें, फिर भी उनके विचार और संदेश अतीत की तुलना में आज अधिक प्रासंगिक है और शायद, भविष्य में और अधिक प्रासंगिक होंगे।" स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द-200 शब्द; 10 अंक) "Swami Vivekananda was related to the 19th century, yet his thoughts and messages are more relevant today than in the past and, perhaps, will be more relevant in the future." Elucidate. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,भूमिका में स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक संक्षिप्तपरिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में स्वामी विवेकानन्दके विचारों एवं संदेशों को का उल्लेख करते हुए समझाइए कि कैसेउन विचारों एवं संदेशों की प्रासंगिकता वर्तमान में भी बनी हुई है और कैसे यह भविष्य के लिए भी प्रासंगिक है? अंत में संक्षेप में उनके विचारों की महत्ता को निष्कर्षतः लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- स्वामी विवेकानंद,रामकृष्ण परमहंस के मुख्य शिष्य थे।उन्होंने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया से परिचित कराया और 19 वीं शताब्दी के अंत में हिंदू धर्म को विश्व मंच पर लाने औरअंतरधर्मजागरूकता बढ़ाने का श्रेय इन्हें दिया जाता है। उन्होंने 1987 में अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस संस्था ने भारत में व्यापक शैक्षिक और जनकल्याणकारी कार्य किए हैं ।उन्होंने 1893 में शिकागो (यू.एस.) में आयोजित धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व किया। स्वामी विवेकानन्द के विचार एवं संदेश एवं उनकी वर्तमान एवं भविष्य के लिए प्रासंगिकता:- सामाजिक क्षेत्र में:- जाती प्रथा, छुआछूत के आलोचक, समाज के सभी वर्गों के विकास को राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक मानते थे। आज भी समाज में भेदभाव बना हुआ है। ऊना जैसी घटनाएं, आर्टिकल 15 जैसा सिनेमा विवेकानंद के विचारों की प्रासंगिकता को बयान करती हैं। उन्होंने छुआछूत तथा हिन्दू धर्म के सम्बन्ध को लेकर व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि हिन्दू धर्म की यही स्थिति रही तो यह "मुझे मत छुओ" धर्म के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। रामकृष्ण परमहंस की तरह ही मानव सेवा को ईश्वर सेवा के तुल्य बताया। "मैं वैसे किसी ईश्वर को नहीं मानता जो गरीबों को दो वक्त की रोटी न दे लेकिन मरने के बाद मोक्ष की गारंटी दे" वर्तमान में भी कुपोषण एवं बढ़ती असमानता के संदर्भ में इनके विचार प्रासंगिक प्रतीत होते हैं और इनकी भविष्य में भी प्रासंगिकता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। महिलाओं में प्रचलित कुरूतियों की भी आलोचना की जैसे बाल विवाह, विधवाओं की दयनीय दशा इत्यादि। यहाँ भी धर्म के ठेकेदारों पर प्रहार करते हुए कहा "मैं वैसे धर्म को नहीं मानता जो विधवाओं के आंसू को न पोंछें लेकिन मरने के बाद मोक्ष की गारंटी दे" आज भी हमारे समाज में महिलाओं की दशा में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है हालाँकि कुछ सुधारजरूर हुआ है। लेकिन विवेकानंद के विचारों की उपयोगिता आगे भी बनी रहेगी। धार्मिक क्षेत्र में:- उनका मानना था कि प्रत्येक धर्म, अनंत परम - सर्वोच्च स्वतंत्रता, सर्वोच्च ज्ञान, सर्वोच्च खुशी का मार्ग प्रशस्त करता है।यह परमात्मा के हिस्से के रूप में किसी कीआत्माको साकार करके पूरा किया जा सकता है। पुरोहितवाद, अन्धविश्वास, कर्मकांड की आलोचना हालाँकि मूर्तिपूजा में इनकी आस्था थी। इन विचारों की प्रासंगिता आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। धर्म के क्षेत्र में भी वैज्ञानिक चिंतन तथा विभिन्न धर्मों के अच्छे तत्वों के संश्लेषण पर बल देते थे। धर्म एवं समाज सुधार के संदर्भ में इन्होने कहा कि सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथो को थोड़े समय के लिए विश्राम करने दिया जाए। 1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मलेन में इन्होने भारतीय चिंतन व अध्यात्म को दुनिया के सामने रखा। पूरी दुनिया में इसकी सराहना हुई। इन्होने कहा कि मानव के लिए बेहतर होगा कि वो पश्चिम के भौतिकवादी दृष्टिकोण और भारत के आध्यात्मिक दृष्टिकोण में समन्वय बैठाये। आज भी वैश्वीकरण के युग में विभिन्न देशों की संस्कृतियों एवं दृष्टिकोणों में जुड़ाव एवं समन्वय की झलक देखीजा सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में:- आधुनिक शिक्षा एवं महिला शिक्षा के समर्थक, राममोहन राय की तरह शिक्षा को आधुनिक परिवर्तनों का माध्यम मानते थे। स्वामी विवेकानंद ने हमारी मातृभूमि के उत्थान के लिए शिक्षा पर सबसे अधिक जोर दिया। उनके अनुसार, एक राष्ट्र, शिक्षा केसमानुपात मेंही उन्नत होता है। जितनी शिक्षा मिलेगी उतना ही उन्नत एवं समृद्ध होगा। उन्होंने एक मानव-निर्मित चरित्र-निर्माण शिक्षा की वकालत की(man-making character-building)। उन्होंने कहा कि शिक्षा द्वाराविद्यार्थियोंको आत्मनिर्भर होना चाहिएऔर जीवन की चुनौतियों का सामना करनाचाहिए। वह तथाकथित शिक्षित लोगोंकी अत्यधिक आलोचना करतेथे जो गरीबों और दलितों की परवाह नहीं करते। उपरोक्त शिक्षा संबंधी विचारों की महत्ता आज भी बनी हुई है। वंचित तबकों की शिक्षा तक पहुँच न होना, बालिकाओं एवं गरीब परिवार के बच्चों के स्कूल में नामांकन दर का कम होना, कौशल रहित रट्टा मारने कीपद्धति, नैतिक शिक्षा का सिलेबस में समावेश नहीं होना इत्यादि के संदर्भ में विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। युवा:- उनका मानना था कि यदि हमारे युवा दृढ़ संकल्पित हैं, तो उनके लिए दुनिया में कुछ भी हासिल करना असंभव नहीं है। अतः यह विचार भारत के भविष्य के निर्माण में सहायक हैं। डेमोग्राफिक डिविडेंट के संदर्भ में युवा शक्ति का पूर्ण लाभ उठा सकने के लिए विवेकानंद के विचारों को अपनाना अच्छा कदम साबित होगा।उन्होंने युवाओं से सफलता प्राप्त करने के लिए समर्पण का आग्रह किया। अत्यंत समर्पण के साथ एक चुनौती का पीछा करना वास्तव में हमारे युवाओं के लिए सफलता की राह होगी। विवेकानंद के विचारों की प्रसंगिकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि12 जनवरी को उनके जन्मदिन को, राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है और उस दिन से शुरू होने वाले सप्ताह को "राष्ट्रीय युवा सप्ताह" के रूप में मनायाजाता है। "राष्ट्रीय युवा सप्ताह" समारोह के हिस्से के रूप में, भारत सरकार हर साल "राष्ट्रीय युवा महोत्सव" आयोजित करती है। युवा उत्सव का उद्देश्य, राष्ट्रीय एकता की भावना, युवाओं में सांप्रदायिक सौहार्द, भाईचारे, और साहस की भावना को भरने के लिएएक मंच प्रदानकरना है। अतः स्पष्ट है किस्वामी विवेकानंद 19 वीं शताब्दी से सम्बंधित थे, फिर भी उनके विचार और संदेश अतीत की तुलना में आज अधिक प्रासंगिक है और शायद, भविष्य में और अधिक प्रासंगिक होंगे।स्वामी विवेकानंद जैसे व्यक्ति अपनी शारीरिक मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते, उनका प्रभाव,विचार और संदेशोंकी गति वर्ष बीतने के साथ साथ बढ़ती जाती है। और आखिरकार, वे उस मंज़िलतक पहुंच जाते हैं जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी।
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“संसदीय मूलक प्रणाली में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को एक अंतिम उपाय के रूप में अपनाया जाना चाहिए जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है|” कथन के संदर्भ में उन परिस्थितियों की चर्चा कीजिये जब राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है| साथ ही अध्यादेश से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों को भी स्पष्ट कीजिये। ( 150-200 शब्द;10 अंक ) “In a parliamentary system, the ordinance power of the President should be adopted as a last resort, whereas in reality it is not.” With reference to the statement, discuss the circumstances when the President can issue an ordinance. Also, clarify the Supreme Court"s guidelines related to the ordinance. (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण : अध्यादेश से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिये । अध्यादेश जारी करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों की चर्चा कीजिये । अध्यादेश से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों की चर्चा कीजिये । संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया जा सकता है । अध्यादेश जारी करने के लिए संविधान में निम्नलिखित परिस्थितियों का वर्णन किया गया है : राष्ट्रपति केवल तभी अध्यादेश जारी कर सकता है जब संसद के दोनों अथवा दोनों में से किसी एक सदन का सत्र नहीं चल रहा हो । अध्यादेश केवल तभी जारी किया जाना चाहिए जब ऐसी परिस्थितियाँ हो जिंका अविलंब समाधान किया जाना आवश्यक हो और उसके लिए संसद के दोनों सत्रों का तुरंत आयोजन संभव न हो । जब संसद के दोनों सदन सत्र में हो तो राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश अमान्य व असंवैधानिक होगा । सरकार द्वारा संसद को बाईपास कर अध्यादेश जारी करने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश जारी किया है जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं :- कूपर केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि जानबूझकर संसद का सत्रावसान कर अध्यादेश जारी किया जाता है तो वह संविधान का उल्लंघन माना जाएगा । न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अध्यादेश जारी करने लिए राष्ट्रपति की संतुष्टि को असदभाव के आधार पर चुनौती दी जा सकती है । आगे डी. सी. वाधवा मामले में न्यायालय ने कहा कि अध्यादेश द्वारा विधि बनाने को विधायिका का विकल्प नहीं बनया जाना चाहिए । उपरोक्त न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखते हुए अध्यादेश जारी करना , वास्तव में लोकतंत्र की नींव को मजबूत करेगा। साथ ही यह विधायिका के द्वारा किसी विधेयकपर विभिन्न मतों को शामिल करते हुए एक बेहतर विधि को बनाने में सहायक होगा। इसलिए आवश्यकतानुसार ही इसका प्रयोग सीमित रूप में करना चाहिए।
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##Question:“संसदीय मूलक प्रणाली में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति को एक अंतिम उपाय के रूप में अपनाया जाना चाहिए जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है|” कथन के संदर्भ में उन परिस्थितियों की चर्चा कीजिये जब राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है| साथ ही अध्यादेश से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों को भी स्पष्ट कीजिये। ( 150-200 शब्द;10 अंक ) “In a parliamentary system, the ordinance power of the President should be adopted as a last resort, whereas in reality it is not.” With reference to the statement, discuss the circumstances when the President can issue an ordinance. Also, clarify the Supreme Court"s guidelines related to the ordinance. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : अध्यादेश से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिये । अध्यादेश जारी करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों की चर्चा कीजिये । अध्यादेश से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों की चर्चा कीजिये । संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया जा सकता है । अध्यादेश जारी करने के लिए संविधान में निम्नलिखित परिस्थितियों का वर्णन किया गया है : राष्ट्रपति केवल तभी अध्यादेश जारी कर सकता है जब संसद के दोनों अथवा दोनों में से किसी एक सदन का सत्र नहीं चल रहा हो । अध्यादेश केवल तभी जारी किया जाना चाहिए जब ऐसी परिस्थितियाँ हो जिंका अविलंब समाधान किया जाना आवश्यक हो और उसके लिए संसद के दोनों सत्रों का तुरंत आयोजन संभव न हो । जब संसद के दोनों सदन सत्र में हो तो राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश अमान्य व असंवैधानिक होगा । सरकार द्वारा संसद को बाईपास कर अध्यादेश जारी करने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश जारी किया है जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं :- कूपर केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि जानबूझकर संसद का सत्रावसान कर अध्यादेश जारी किया जाता है तो वह संविधान का उल्लंघन माना जाएगा । न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अध्यादेश जारी करने लिए राष्ट्रपति की संतुष्टि को असदभाव के आधार पर चुनौती दी जा सकती है । आगे डी. सी. वाधवा मामले में न्यायालय ने कहा कि अध्यादेश द्वारा विधि बनाने को विधायिका का विकल्प नहीं बनया जाना चाहिए । उपरोक्त न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखते हुए अध्यादेश जारी करना , वास्तव में लोकतंत्र की नींव को मजबूत करेगा। साथ ही यह विधायिका के द्वारा किसी विधेयकपर विभिन्न मतों को शामिल करते हुए एक बेहतर विधि को बनाने में सहायक होगा। इसलिए आवश्यकतानुसार ही इसका प्रयोग सीमित रूप में करना चाहिए।
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पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिए। साथ ही यह भी समझाइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है? (150-200 शब्द, अंक-10 ) Define the patriarchal society. Also, explain how does it determine the status of women in Indian society? (150-200 words, Marks-10 )
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एप्रोच:- सर्वप्रथम पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। तत्पश्चात, बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं अर्थात एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से प्रधान मानते हुए आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक संदर्भों में वरीयता दी जाती है। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विकास के साथ साथ विभिन्न आर्थिक कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे जाने लगे। वहीं महिलायें एक जिम्मेदारी सी दिखने लगी। कालान्तर में पितृवंशात्मकता को सुनिश्चित करने हेतु सांस्कृतिक स्तर पर पुरुषों को प्रधानता मिली। इन दोनों के फलस्वरूप राजनैतिक स्तर पर पुरुष प्रधान समझे जाने लगे जिससे पितृसत्तात्मकता जैसे सामाजिक संस्थान ने जन्म लिया। यही कारण है सुकुमॉय चक्रवर्ती के अनुसार जहाँ लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान है वहीँ जेंडर किसी व्यक्ति सामाजिक पहचान है। भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है। साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मकता को निम्नलिखित दो प्रकारों से समझा जा सकताहै- सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता जिसके अनुसार समान्य जनजीवन में पुरुष को महिलाओं से अधिक वरीयता दी जाती है तथा इसके फलस्वरूप जेंडर भूमिका भी निर्धारित होती है। व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता जहाँ परिवार रिश्तेदारी इत्यादि में महिलाओं से भिन्न व्यवहार किया जाता है। भारतवर्ष में यद्यपि व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता में कमी देखी जा रही है परन्तु दूसरी तरफ सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता बढ़ रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं- जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविकोपार्जन के संदर्भ में। सामाजिक असुरक्षा की भावना एवं सामाजिक कुरीतियां: सेक्स आधारित भ्रूण हत्याएं, दहेज़ हत्याएं इत्यादि। कामकाजी महिलाओं पर जेंडर भूमिका के अंतर्गत अतिरिक्त बोझ एवं सार्वजनिक नकारात्मक दृष्टिकोण इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम, आयरन की कमी है जिसके दुष्परिणाम उनके रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं में तथा नवजात शिशुओं में कुपोषण की समस्या भी पायी जा रही है जिसका दुष्परिणाम अधिक मातृत्व मृत्यूदर तथा शिशु मृत्यू दर में दिखाई पड़ता है। NSSO की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 83 प्रतिशत महिलायें उचित कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोशिशजारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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##Question:पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिए। साथ ही यह भी समझाइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है? (150-200 शब्द, अंक-10 ) Define the patriarchal society. Also, explain how does it determine the status of women in Indian society? (150-200 words, Marks-10 )##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। तत्पश्चात, बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं अर्थात एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से प्रधान मानते हुए आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक संदर्भों में वरीयता दी जाती है। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विकास के साथ साथ विभिन्न आर्थिक कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे जाने लगे। वहीं महिलायें एक जिम्मेदारी सी दिखने लगी। कालान्तर में पितृवंशात्मकता को सुनिश्चित करने हेतु सांस्कृतिक स्तर पर पुरुषों को प्रधानता मिली। इन दोनों के फलस्वरूप राजनैतिक स्तर पर पुरुष प्रधान समझे जाने लगे जिससे पितृसत्तात्मकता जैसे सामाजिक संस्थान ने जन्म लिया। यही कारण है सुकुमॉय चक्रवर्ती के अनुसार जहाँ लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान है वहीँ जेंडर किसी व्यक्ति सामाजिक पहचान है। भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है। साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मकता को निम्नलिखित दो प्रकारों से समझा जा सकताहै- सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता जिसके अनुसार समान्य जनजीवन में पुरुष को महिलाओं से अधिक वरीयता दी जाती है तथा इसके फलस्वरूप जेंडर भूमिका भी निर्धारित होती है। व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता जहाँ परिवार रिश्तेदारी इत्यादि में महिलाओं से भिन्न व्यवहार किया जाता है। भारतवर्ष में यद्यपि व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता में कमी देखी जा रही है परन्तु दूसरी तरफ सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता बढ़ रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं- जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविकोपार्जन के संदर्भ में। सामाजिक असुरक्षा की भावना एवं सामाजिक कुरीतियां: सेक्स आधारित भ्रूण हत्याएं, दहेज़ हत्याएं इत्यादि। कामकाजी महिलाओं पर जेंडर भूमिका के अंतर्गत अतिरिक्त बोझ एवं सार्वजनिक नकारात्मक दृष्टिकोण इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम, आयरन की कमी है जिसके दुष्परिणाम उनके रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं में तथा नवजात शिशुओं में कुपोषण की समस्या भी पायी जा रही है जिसका दुष्परिणाम अधिक मातृत्व मृत्यूदर तथा शिशु मृत्यू दर में दिखाई पड़ता है। NSSO की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 83 प्रतिशत महिलायें उचित कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोशिशजारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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Trade and Investment constitute an important part of the strategic partnership between India and the EU. Nonetheless, BTIA negotiation between the two has been stuck for a long time now. What are the reasons for such a delay in the finalisation of BTIA? Also, identify the key area of difference within negotiations. (250 Words/15 marks)
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Approach: 1. Substantiate the starting statement with data. 2. Write briefly about BTIA negotiation. 3. State the reasons for the delay in finalisation of BTIA 4. Highlight the key area of differences Ans : The EU as a bloc of 28 countries is India’s largest regional trading partner while India was the EU’s 9th largest trading partner in 2016. Bilateral trade in goods standing at US$ 88 bn in 2016. India received around US$ 83 bn FDI flows from Europe during 2000-17 constituting approximately 24% of the total FDI inflows into the country during the period making it one of the largest sources of FDI. India and the EU are in the process of negotiating a bilateral Broad-based Trade and Investment Agreement (BTIA) since 2007. These negotiations are pursuant to the commitment made by political leaders at the 7th India-EU Summit in 2006. The negotiations cover Trade in Goods, Trade in Services, Investment, Sanitary and Phyto-sanitary Measures, Technical Barriers to Trade, Trade Remedies, Rules of Origin, Customs and Trade Facilitation, Competition, Trade Defence,Government Procurement, Dispute Settlement, Intellectual Property Rights & Geographical Indications, Sustainable Development. So far 16 rounds of talks have been held. The last round was held in 2013, after which negotiations were suspended. The reasons for the delay in finalisation of BTIA are:- 1. Different Priorities: Both the parties to the negotiations have different priorities and interests. India is developing country wants EU to open borders for goods and people on the one hand, on the other hand, EU wants India to protect its investments and lowering tariffs to gain more security and market share. 2. Anti Dumping Activism: EU has at times initiated anti-dumping and countervailing duty-related actions on Indian exports. The natural concern is that tariff-free entry of Indian products into the EU market or vice-versa might fuel anti-dumping activism further. 3. Unilateral Termination of BITs by India: The recent unilateral termination of bilateral investment treaties (BITs) by India with many EU member countries including Germany has complicated things further, leaving many European businesses worried about investment protection in India. 4. International Economic Environment: Negotiations were stalled amid the prolonged downturn in Europe and its focus on concluding the Transatlantic Trade and Investment Partnership agreement with the US. 5. Communication Gap: In recent times the uncertainties over Brexit and inflexibility on both sides have prevented the resumption of formal talks. The key area of differences within the negotiation 1. Tariffs and Duties: EU has consistently sought lower import duties on a range of commodities. This time, the EU is seeking the lowering of tariffs on automobiles and wine products. 2. Stringent Standards: Continuance of stringent standard-related non-tariff barriers (NTBs) in the EU poses a major challenge for Indian exports. EU wants stringent measures on Sanitary and Phyto-Sanitary measures. 3. Labour and Environmental Standards: EU’s inclination to include environment and labour standards is a major area of concern for Indian negotiators 4. IPR regime standardisation: EU also wants India to have strong Intellectual property regime more than what is under TRIPS. India is currently in the list of nations which EU considers not data secure nations. India wants this status to be granted by the EU as it has a bearing on Indian IT companies wanting market access. 5. Mobility Issues: Issues related to facilitation ofgreater movement of professionals from one country to another, arising out of the Mode 4 provisions of the 1995 General Agreement on Trade in Servicesis another point of contention between the two sides. Some of India"s major exports such as apparel were excluded from the EU"s Generalised System of Preferences (GSP) while countries like Bangladesh benefited From it (Over 50% of Bangladesh exports are to EU). India"s export competitor"s such as Vietnam have also recently concluded a PTA with the EU. We need to undo this disadvantage.
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##Question:Trade and Investment constitute an important part of the strategic partnership between India and the EU. Nonetheless, BTIA negotiation between the two has been stuck for a long time now. What are the reasons for such a delay in the finalisation of BTIA? Also, identify the key area of difference within negotiations. (250 Words/15 marks)##Answer:Approach: 1. Substantiate the starting statement with data. 2. Write briefly about BTIA negotiation. 3. State the reasons for the delay in finalisation of BTIA 4. Highlight the key area of differences Ans : The EU as a bloc of 28 countries is India’s largest regional trading partner while India was the EU’s 9th largest trading partner in 2016. Bilateral trade in goods standing at US$ 88 bn in 2016. India received around US$ 83 bn FDI flows from Europe during 2000-17 constituting approximately 24% of the total FDI inflows into the country during the period making it one of the largest sources of FDI. India and the EU are in the process of negotiating a bilateral Broad-based Trade and Investment Agreement (BTIA) since 2007. These negotiations are pursuant to the commitment made by political leaders at the 7th India-EU Summit in 2006. The negotiations cover Trade in Goods, Trade in Services, Investment, Sanitary and Phyto-sanitary Measures, Technical Barriers to Trade, Trade Remedies, Rules of Origin, Customs and Trade Facilitation, Competition, Trade Defence,Government Procurement, Dispute Settlement, Intellectual Property Rights & Geographical Indications, Sustainable Development. So far 16 rounds of talks have been held. The last round was held in 2013, after which negotiations were suspended. The reasons for the delay in finalisation of BTIA are:- 1. Different Priorities: Both the parties to the negotiations have different priorities and interests. India is developing country wants EU to open borders for goods and people on the one hand, on the other hand, EU wants India to protect its investments and lowering tariffs to gain more security and market share. 2. Anti Dumping Activism: EU has at times initiated anti-dumping and countervailing duty-related actions on Indian exports. The natural concern is that tariff-free entry of Indian products into the EU market or vice-versa might fuel anti-dumping activism further. 3. Unilateral Termination of BITs by India: The recent unilateral termination of bilateral investment treaties (BITs) by India with many EU member countries including Germany has complicated things further, leaving many European businesses worried about investment protection in India. 4. International Economic Environment: Negotiations were stalled amid the prolonged downturn in Europe and its focus on concluding the Transatlantic Trade and Investment Partnership agreement with the US. 5. Communication Gap: In recent times the uncertainties over Brexit and inflexibility on both sides have prevented the resumption of formal talks. The key area of differences within the negotiation 1. Tariffs and Duties: EU has consistently sought lower import duties on a range of commodities. This time, the EU is seeking the lowering of tariffs on automobiles and wine products. 2. Stringent Standards: Continuance of stringent standard-related non-tariff barriers (NTBs) in the EU poses a major challenge for Indian exports. EU wants stringent measures on Sanitary and Phyto-Sanitary measures. 3. Labour and Environmental Standards: EU’s inclination to include environment and labour standards is a major area of concern for Indian negotiators 4. IPR regime standardisation: EU also wants India to have strong Intellectual property regime more than what is under TRIPS. India is currently in the list of nations which EU considers not data secure nations. India wants this status to be granted by the EU as it has a bearing on Indian IT companies wanting market access. 5. Mobility Issues: Issues related to facilitation ofgreater movement of professionals from one country to another, arising out of the Mode 4 provisions of the 1995 General Agreement on Trade in Servicesis another point of contention between the two sides. Some of India"s major exports such as apparel were excluded from the EU"s Generalised System of Preferences (GSP) while countries like Bangladesh benefited From it (Over 50% of Bangladesh exports are to EU). India"s export competitor"s such as Vietnam have also recently concluded a PTA with the EU. We need to undo this disadvantage.
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साइबर अपराध क्या है ? साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को बताते हुए, इसके रोकथाम की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की संक्षिप में चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक-10 ) What is cyber crime ? Explaining the challenges of cyber crime and hacking, discuss in brief the steps taken by the government towards its prevention. ( 150-200 Words , Mark - 10 )
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एप्रोच - भूमिका में साइबर अपराध के अर्थ को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को विस्तारपूर्वक बताइए | अंत में भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए किये जा रहे प्रयासों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - "एक व्यक्ति या संगठित समूह द्वारा साइबर स्पेस जैसे कंप्यूटर , इन्टरनेट इत्यादि का प्रयोग कर अपराध करना साइबर अपराध कहलाता है |" साइबर अपराध / हमले व्यक्तिगत कंप्यूटर (PC) स्पाईवेयर इंस्टाल करने से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र के महत्वपूर्ण अवसंरचना का विनाश करने तक हो सकता है | साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियाँ - संचार प्रणाली के अधिकांश सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर आयात किये जाते हैं, जिससे संचार उपकरणों में उपस्थित मैलवेयर को किसी भी समय रिमोट द्वारा सक्रीय किया जा सकता है, जोकि सुरक्षा की दृष्टि से एक गंभीर खतरा बन सकता है | साइबर अपराध से सबंधित व्यक्ति, संगठित समूह या राज्य को न केवल पहचानना बल्कि उनका उद्देश्य भी समझना भी कठिन है | जैसे- डूकु जैसे फाइल जिसका उद्देश्य और उसका केंद्र खोजना बहुत ही मुश्किल है | भारत को संरचनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है | यहाँ संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का का सीमांकन है एवं सुरक्षा एजेंसियों की बहुतायतता है | उदहारण - नैटग्रिड का विरोध (राज्यों द्वारा), सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय की कमी , आदि | सूचना अवसंरचना का एक महत्वपूर्ण भाग का स्वामित्व और संचालन निजी क्षेत्रक के पास है एवं उन्हें साइबर सुरक्षा से समबन्धित विनियमन एवं अन्य फ्रेमवर्क अपनाना लागत में वृद्धि प्रतीत होती है , जोकि साइबर सुरक्षा के लिए एक चुनौती है | सरकार द्वारा इस सन्दर्भ में किये जा रहे प्रयास - आईटी अधिनियम, 2000 - साइबर आतंकवाद से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के इसे अधिनियमित किया गया एवं वर्ष 2008 में संशोधन के तहत एक विधिक ढांचा भी विकसित किया गया है | 2012 राष्ट्रीय दूर संचार नीति - इसमें 2020 तक 60 से 80 % की सीमा तक दूरसंचार उपकरणों का घरेलू उत्पादन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है | आयातित संचार उपकरणों के लिए स्थानीय प्रमाणीकरण जैसे उपायों की घोषणा की गयी है | राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र की स्थापना एक नोडल एजेंसी के रूप में की गयी है, जिसका लक्ष्य साइबर आतंकवाद और अन्य खतरों से " महत्वपूर्ण अवसंरचना सूचना तंत्र (CII)" की सुरक्षा करना है | भारत में डिजिटल क्रांति के बाद सूचना प्रौद्योगिकी का तेजी से विकास हुआ है | e -मंडी से लेकर e - गवर्नेंस तक हर क्षेत्र में संचार नेटवर्क, आम नागरिक एवं सरकार सबके लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है | ऐसे में इसकी सुरक्षा के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित है - निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए | CII और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं की सुरक्षा रणनीति के तकनीकी नीतिगत और कानूनी आयामों संशोधित करना चाहिए |
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##Question:साइबर अपराध क्या है ? साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को बताते हुए, इसके रोकथाम की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की संक्षिप में चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक-10 ) What is cyber crime ? Explaining the challenges of cyber crime and hacking, discuss in brief the steps taken by the government towards its prevention. ( 150-200 Words , Mark - 10 )##Answer:एप्रोच - भूमिका में साइबर अपराध के अर्थ को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को विस्तारपूर्वक बताइए | अंत में भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए किये जा रहे प्रयासों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - "एक व्यक्ति या संगठित समूह द्वारा साइबर स्पेस जैसे कंप्यूटर , इन्टरनेट इत्यादि का प्रयोग कर अपराध करना साइबर अपराध कहलाता है |" साइबर अपराध / हमले व्यक्तिगत कंप्यूटर (PC) स्पाईवेयर इंस्टाल करने से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र के महत्वपूर्ण अवसंरचना का विनाश करने तक हो सकता है | साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियाँ - संचार प्रणाली के अधिकांश सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर आयात किये जाते हैं, जिससे संचार उपकरणों में उपस्थित मैलवेयर को किसी भी समय रिमोट द्वारा सक्रीय किया जा सकता है, जोकि सुरक्षा की दृष्टि से एक गंभीर खतरा बन सकता है | साइबर अपराध से सबंधित व्यक्ति, संगठित समूह या राज्य को न केवल पहचानना बल्कि उनका उद्देश्य भी समझना भी कठिन है | जैसे- डूकु जैसे फाइल जिसका उद्देश्य और उसका केंद्र खोजना बहुत ही मुश्किल है | भारत को संरचनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है | यहाँ संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का का सीमांकन है एवं सुरक्षा एजेंसियों की बहुतायतता है | उदहारण - नैटग्रिड का विरोध (राज्यों द्वारा), सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय की कमी , आदि | सूचना अवसंरचना का एक महत्वपूर्ण भाग का स्वामित्व और संचालन निजी क्षेत्रक के पास है एवं उन्हें साइबर सुरक्षा से समबन्धित विनियमन एवं अन्य फ्रेमवर्क अपनाना लागत में वृद्धि प्रतीत होती है , जोकि साइबर सुरक्षा के लिए एक चुनौती है | सरकार द्वारा इस सन्दर्भ में किये जा रहे प्रयास - आईटी अधिनियम, 2000 - साइबर आतंकवाद से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के इसे अधिनियमित किया गया एवं वर्ष 2008 में संशोधन के तहत एक विधिक ढांचा भी विकसित किया गया है | 2012 राष्ट्रीय दूर संचार नीति - इसमें 2020 तक 60 से 80 % की सीमा तक दूरसंचार उपकरणों का घरेलू उत्पादन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है | आयातित संचार उपकरणों के लिए स्थानीय प्रमाणीकरण जैसे उपायों की घोषणा की गयी है | राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र की स्थापना एक नोडल एजेंसी के रूप में की गयी है, जिसका लक्ष्य साइबर आतंकवाद और अन्य खतरों से " महत्वपूर्ण अवसंरचना सूचना तंत्र (CII)" की सुरक्षा करना है | भारत में डिजिटल क्रांति के बाद सूचना प्रौद्योगिकी का तेजी से विकास हुआ है | e -मंडी से लेकर e - गवर्नेंस तक हर क्षेत्र में संचार नेटवर्क, आम नागरिक एवं सरकार सबके लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है | ऐसे में इसकी सुरक्षा के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित है - निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए | CII और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं की सुरक्षा रणनीति के तकनीकी नीतिगत और कानूनी आयामों संशोधित करना चाहिए |
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साइबर अपराध क्या है ? साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को बताते हुए, इसके रोकथाम की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की संछिप्त में चर्चा कीजिये | (200 शब्द) What is cyber crime ? Explaining the challenges of cyber crime and hacking, discuss in brief the steps taken by the government towards its prevention.
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एप्रोच - भूमिका में साइबर अपराध के अर्थ को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को विस्तारपूर्वक बताइए | अंत में भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए किये जा रहे प्रयासों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - "एक व्यक्ति या संगठित समूह द्वारा साइबर स्पेस जैसे कंप्यूटर , इन्टरनेट इत्यादि का प्रयोग कर अपराध करना साइबर अपराध कहलाता है |" साइबर अपराध / हमले व्यक्तिगत कंप्यूटर (PC) स्पाईवेयर इंस्टाल करने से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र के महत्वपूर्ण अवसंरचना का विनाश करने तक हो सकता है | साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियाँ - संचार प्रणाली के अधिकांश सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर आयात किये जाते हैं, जिससे संचार उपकरणों में उपस्थित मैलवेयर को किसी भी समय रिमोट द्वारा सक्रीय किया जा सकता है, जोकि सुरक्षा की दृष्टि से एक गंभीर खतरा बन सकता है | साइबर अपराध से सबंधित व्यक्ति, संगठित समूह या राज्य को न केवल पहचानना बल्कि उनका उद्देश्य भी समझना भी कठिन है | जैसे-डूकु जैसे फाइलजिसका उद्देश्य और उसका केंद्र खोजना बहुत ही मुश्किल है | भारत को संरचनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है | यहाँ संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का का सीमांकन है एवं सुरक्षा एजेंसियों की बहुतायतता है | उदहारण -नैटग्रिड का विरोध(राज्यों द्वारा), सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय की कमी , आदि | सूचना अवसंरचना का एक महत्वपूर्ण भाग का स्वामित्व और संचालन निजी क्षेत्रक के पास है एवं उन्हें साइबर सुरक्षा से समबन्धित विनियमन एवं अन्य फ्रेमवर्क अपनाना लागत में वृद्धि प्रतीत होती है , जोकि साइबर सुरक्षा के लिए एक चुनौती है | सरकार द्वारा इस सन्दर्भ में किये जा रहे प्रयास - आईटी अधिनियम 2000 -साइबर आतंकवाद से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के इसे अधिनियमित किया गया एवं वर्ष 2008 में संशोधन के तहत एक विधिक ढांचा भी विकसित किया गया है | 2012 राष्ट्रीय दूर संचार नीति -इसमें 2020 तक 60 से 80 % की सीमा तक दूरसंचार उपकरणों का घरेलू उत्पादन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है | आयातित संचार उपकरणों के लिए स्थानीय प्रमाणीकरण जैसे उपायों की घोषणा की गयी है | राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र की स्थापना एक नोडल एजेंसी के रूप में की गयी है, जिसका लक्ष्य साइबर आतंकवाद और अन्य खतरों से "महत्वपूर्ण अवसंरचना सूचना तंत्र (CII)"की सुरक्षा करना है | भारत में डिजिटल क्रांति के बाद सूचना प्रौद्योगिकी का तेजी से विकास हुआ है | e -मंडी से लेकर e - गवर्नेंस तक हर क्षेत्र में संचार नेटवर्क, आम नागरिक एवं सरकार सबके लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है | ऐसे में इसकी सुरक्षा के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित है - निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए | CII और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं की सुरक्षा रणनीति के तकनीकी नीतिगत और कानूनी आयामों संशोधित करना चाहिए |
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##Question:साइबर अपराध क्या है ? साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को बताते हुए, इसके रोकथाम की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की संछिप्त में चर्चा कीजिये | (200 शब्द) What is cyber crime ? Explaining the challenges of cyber crime and hacking, discuss in brief the steps taken by the government towards its prevention.##Answer:एप्रोच - भूमिका में साइबर अपराध के अर्थ को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियों को विस्तारपूर्वक बताइए | अंत में भारत सरकार द्वारा इसे रोकने के लिए किये जा रहे प्रयासों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - "एक व्यक्ति या संगठित समूह द्वारा साइबर स्पेस जैसे कंप्यूटर , इन्टरनेट इत्यादि का प्रयोग कर अपराध करना साइबर अपराध कहलाता है |" साइबर अपराध / हमले व्यक्तिगत कंप्यूटर (PC) स्पाईवेयर इंस्टाल करने से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र के महत्वपूर्ण अवसंरचना का विनाश करने तक हो सकता है | साइबर अपराध और हैकिंग की चुनौतियाँ - संचार प्रणाली के अधिकांश सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर आयात किये जाते हैं, जिससे संचार उपकरणों में उपस्थित मैलवेयर को किसी भी समय रिमोट द्वारा सक्रीय किया जा सकता है, जोकि सुरक्षा की दृष्टि से एक गंभीर खतरा बन सकता है | साइबर अपराध से सबंधित व्यक्ति, संगठित समूह या राज्य को न केवल पहचानना बल्कि उनका उद्देश्य भी समझना भी कठिन है | जैसे-डूकु जैसे फाइलजिसका उद्देश्य और उसका केंद्र खोजना बहुत ही मुश्किल है | भारत को संरचनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है | यहाँ संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का का सीमांकन है एवं सुरक्षा एजेंसियों की बहुतायतता है | उदहारण -नैटग्रिड का विरोध(राज्यों द्वारा), सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय की कमी , आदि | सूचना अवसंरचना का एक महत्वपूर्ण भाग का स्वामित्व और संचालन निजी क्षेत्रक के पास है एवं उन्हें साइबर सुरक्षा से समबन्धित विनियमन एवं अन्य फ्रेमवर्क अपनाना लागत में वृद्धि प्रतीत होती है , जोकि साइबर सुरक्षा के लिए एक चुनौती है | सरकार द्वारा इस सन्दर्भ में किये जा रहे प्रयास - आईटी अधिनियम 2000 -साइबर आतंकवाद से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के इसे अधिनियमित किया गया एवं वर्ष 2008 में संशोधन के तहत एक विधिक ढांचा भी विकसित किया गया है | 2012 राष्ट्रीय दूर संचार नीति -इसमें 2020 तक 60 से 80 % की सीमा तक दूरसंचार उपकरणों का घरेलू उत्पादन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है | आयातित संचार उपकरणों के लिए स्थानीय प्रमाणीकरण जैसे उपायों की घोषणा की गयी है | राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र की स्थापना एक नोडल एजेंसी के रूप में की गयी है, जिसका लक्ष्य साइबर आतंकवाद और अन्य खतरों से "महत्वपूर्ण अवसंरचना सूचना तंत्र (CII)"की सुरक्षा करना है | भारत में डिजिटल क्रांति के बाद सूचना प्रौद्योगिकी का तेजी से विकास हुआ है | e -मंडी से लेकर e - गवर्नेंस तक हर क्षेत्र में संचार नेटवर्क, आम नागरिक एवं सरकार सबके लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है | ऐसे में इसकी सुरक्षा के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित है - निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए | CII और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं की सुरक्षा रणनीति के तकनीकी नीतिगत और कानूनी आयामों संशोधित करना चाहिए |
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Briefly introduce the permanent settlement policy of land revenue initiated by the British in India. Also, discuss its effects in detail. (10 marks/150 words)
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The Permanent Settlement of Bengal was brought into effect by Governor-General Lord Cornwallis in 1793. This was basically an agreement between the company and the Zamindars to fix the land revenue. First enacted in Bengal, Bihar, and Odisha. This was later followed in the northern Madras Presidency and the district of Varanasi. Cornwallis envisaged the creation of a hereditary class of landlords in India. This system was also called the Zamindari System. Features- • Landlords or Zamindars were recognized as the owners of the land. They were given hereditary rights of succession of the lands under them. • The Zamindars could sell or transfer the land as they wished. • The Zamindars’ proprietorship would stay as long as he paid the fixed revenue at the said date to the government. If they failed to pay, their rights would cease to exist and the land would be auctioned off. • The amount to be paid by the landlords was fixed. It was agreed that this would not increase in the future (permanent). • The fixed amount was the 10/11th portion of the revenue for the government and 1/10th was for the Zamindar. This tax rate was way higher than the prevailing rates in England. Effects on various sections- 1) ON THE ZAMINDARS- • While the Permanent Settlement was pro-Zamindar, the way in which it eventually worked out even the Zamindars lost. Default meant the loss of his land. The threat of losing land was very real more so because the revenue was fixed at a very high rate and the ryots could not often meet it. There were instances of the sale of Zamindari lands. • Given the precarious position of the Zamindars, they did not transform into improving landlords as expected of them. But in fact, many of them simply sub-let their land to different categories of people leading to a process popularly calledsub-infeudation. • And on the other hand, it also created a hierarchy of rentiers who would be dependent on the revenue derived from the primary products. This led to a situation where the entrepreneurial spirit was institutionally destroyed. 2) ON THE RYOTS- • The manner of implementation of the Permanent Settlement actually increased the insecurity of the peasants. The settlement fixed was quite high and it was not usually met. They became the victim of over-assessment;they had nobody (a zamindar) to help them out when falling short of dues. •It also left no room for respite in times of food shortage due to any calamity. The ryots or the peasants who were the actual tillers of the land and who paid their dues to the super-ordinate zamindars were the ones who did not really benefit from the Permanent Settlement. •The fragmentation of landmeant that they had to part with a larger portion of their produce. The customary occupancy rights which the peasants ‘held’ in relation to the land were taken away and they were transformed into tenants who could be evicted exploited and thus insecure in their hold of the land. However, instead of being a solution for ensuring a flowing avenue of revenues, Permanent Settlement led to increasing disappointment. The zamindars did not turn into improving landlords, and since the revenue was fixed any increase procured from the land was appropriated by the zamindars. Nonetheless, it was extended to the Madras Presidency where in the absence of a substantial zamindari class, the local polygars were recognized as zamindars.
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##Question:Briefly introduce the permanent settlement policy of land revenue initiated by the British in India. Also, discuss its effects in detail. (10 marks/150 words)##Answer:The Permanent Settlement of Bengal was brought into effect by Governor-General Lord Cornwallis in 1793. This was basically an agreement between the company and the Zamindars to fix the land revenue. First enacted in Bengal, Bihar, and Odisha. This was later followed in the northern Madras Presidency and the district of Varanasi. Cornwallis envisaged the creation of a hereditary class of landlords in India. This system was also called the Zamindari System. Features- • Landlords or Zamindars were recognized as the owners of the land. They were given hereditary rights of succession of the lands under them. • The Zamindars could sell or transfer the land as they wished. • The Zamindars’ proprietorship would stay as long as he paid the fixed revenue at the said date to the government. If they failed to pay, their rights would cease to exist and the land would be auctioned off. • The amount to be paid by the landlords was fixed. It was agreed that this would not increase in the future (permanent). • The fixed amount was the 10/11th portion of the revenue for the government and 1/10th was for the Zamindar. This tax rate was way higher than the prevailing rates in England. Effects on various sections- 1) ON THE ZAMINDARS- • While the Permanent Settlement was pro-Zamindar, the way in which it eventually worked out even the Zamindars lost. Default meant the loss of his land. The threat of losing land was very real more so because the revenue was fixed at a very high rate and the ryots could not often meet it. There were instances of the sale of Zamindari lands. • Given the precarious position of the Zamindars, they did not transform into improving landlords as expected of them. But in fact, many of them simply sub-let their land to different categories of people leading to a process popularly calledsub-infeudation. • And on the other hand, it also created a hierarchy of rentiers who would be dependent on the revenue derived from the primary products. This led to a situation where the entrepreneurial spirit was institutionally destroyed. 2) ON THE RYOTS- • The manner of implementation of the Permanent Settlement actually increased the insecurity of the peasants. The settlement fixed was quite high and it was not usually met. They became the victim of over-assessment;they had nobody (a zamindar) to help them out when falling short of dues. •It also left no room for respite in times of food shortage due to any calamity. The ryots or the peasants who were the actual tillers of the land and who paid their dues to the super-ordinate zamindars were the ones who did not really benefit from the Permanent Settlement. •The fragmentation of landmeant that they had to part with a larger portion of their produce. The customary occupancy rights which the peasants ‘held’ in relation to the land were taken away and they were transformed into tenants who could be evicted exploited and thus insecure in their hold of the land. However, instead of being a solution for ensuring a flowing avenue of revenues, Permanent Settlement led to increasing disappointment. The zamindars did not turn into improving landlords, and since the revenue was fixed any increase procured from the land was appropriated by the zamindars. Nonetheless, it was extended to the Madras Presidency where in the absence of a substantial zamindari class, the local polygars were recognized as zamindars.
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नौकरशाही अभिवृति से आप क्या समझते हैं? नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचारों का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) What do youmean by Bureaucratic Attitude? Describe Weber"sthoughts in terms of Bureaucratic Attitude. (200 words)
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एप्रोच- पहले भाग में नौकरशाही अभिवृति की व्याख्या कीजिए| अगले भाग में, नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में, वेबर के विचारों का वर्णन कीजिए| उत्तर- नियम और कानून का दृढ़ता से पालन किया जाना नौकरशाही अभिवृति को दर्शाती है| लोकसेवकों के द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में जिन कायदों तथा मूल्यों को अपनाया जाता है उनके आधार पर उनमें उपरोक्त अभिवृति का विकास होता है| शक्ति तथा सता केविभिन्न प्रारूपों के आधार पर नौकरशाही अभिवृति का निर्माण हुआ है|शक्ति का आशय किसी व्यक्ति के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के व्यवहार को अपने इच्छानुसार प्रभावित करने की प्रक्रिया से है एवं जब शक्ति का अभ्यास औचित्यपूर्ण होता है तो इसे सता या प्राधिकार की संज्ञा दी जाती है| औचित्य के आधार पर वेबर के द्वारा सता के तीन प्रारूपों को प्रस्तुत किया गया है - परंपरागत सता; चमत्कारिक सता; वैधानिक/विवेकशील सता| बेवर के द्वारा नौकरशाही अभिवृति का विश्लेषण वैधानिक/विवेकशील सता के आधार पर किया गया है जो कि नियम और कानून पर आधारित है| नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचार वेबर के अनुसार, नियम एवं कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना ही नौकरशाहों के अभिवृति को उजागर करता है परंतु यह नौकरशाही की कार्यप्रणाली में लालफीताशाही को उत्पन करती है| नियम और कानून साधन मात्र हैं परंतु इसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाना नौकरशाही के लिए साध्य बन जाता है एवं इसके परिणामस्वरूप नौकरशाही के द्वारा वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाता है| वेबर के द्वारा वैधानिक सता को विवेकशील होने की संज्ञा दी गयी है| विवेकशीलता नीतिशास्त्र का आधारभूत लक्षण है एवं विधि अपने आप में नैतिक मानकों का संहिताकरण है| अतः वेबर के द्वारा नौकरशाही के विधिक पक्ष पर बल दिया जाना स्वतः अपने आप में नौकरशाही के नैतिक दायित्वों को भी दर्शाती है| वेबर के द्वारा नौकरशाही के संदर्भ में निम्न विशेषताओं पर बल दिया गया है, जो नौकरशाही अभिवृति को आधार प्रदान करती है, - कार्य के विभाजन के द्वारा विशेषीकरण को प्राप्त किया जाना ताकि कार्यकुशलता को सुनिश्चित किया जा सके| कार्य विभाजन को सुनिश्चित करने हेतु पद-सोपानिक क्रम का होना आवश्यक है जिसका आशय उच्च स्तर के द्वारा निम्न स्तर पर किये जाने वाले नियंत्रण से है| परंतु, यही पद-सोपान नौकरशाही अभिवृति के रूप में लालफीताशाही, प्रतिबंधित संचार, अधिकारी-अधीनस्थ के आधार पर उंच-नीच की भावना आदि को जन्म देना एवं मनोबल को हतोत्साहित करती है | पद-सोपान क्रम, नौकरशाही की कल्पना एक बंद प्रणाली के रूप में करती है जो कि जन भागीदारी को शासन प्रक्रिया में हतोत्साहित करती है| नौकरशाही की भर्ती एवं पदोन्नति का आधार सिर्फ योग्यता होगा| नौकरशाही के द्वारा दिए गये योगदान के प्रतिफल के रूप में भुगतान नगदी आधार पर किया जाना जो कि अभिप्रेरणा के आर्थिक कारकों के महत्व को दर्शाती है जबकि प्रजातांत्रिक अभिवृति आर्थिक कारकों के साथ-साथ गैर-आर्थिक कारकों के प्रभाव पर भी बल देती है| नौकरशाही का व्यवहार उसके व्यक्तिगत मूल्यों से प्रभावित नहीं होना चाहिए| यह लोकसेवकों के वस्तुनिष्ठता के महत्व को दर्शाती है| परन्तु जन समस्यायों के प्रति वचनबद्धता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवक इसके प्रति अधिक संवेदनशील एवं जागरूक हो जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से मेल खाती है| नौकरशाही द्वारा अपने क्षेत्राधिकार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्पादन किया जाना चाहिए अतः नवाचार या सृजनात्मक प्रवृति को विकसित करने हेतु नौकरशाही अभिवृति को उचित नहीं माना गया है| परंतु, शक्तियों का अभ्यास के दुरूपयोग को रोकने हेतु यह आवश्यक है कि नौकरशाही अपने क्षेत्राधिकार के अधीन/अंतर्गत अपने दायित्वों का निर्वहन करे | वेबर के अनुसार सतारूढ़ राजनीतिक दल के राजनीतिक विचारधारा के प्रति नौकरशाही को तटस्थ होना चाहिए| अतः तटस्थता की अवधारणा को विकसित करने का श्रेय मैक्स वेबर को जाता है| तटस्थ लोकसेवक में नौकरशाही पर आधारित अभिवृति की व्यवहारिक सीमाओं को कम करने हेतु प्रजातांत्रिक अभिवृति का होना अतिआवश्यक है विशेषकर प्रजातांत्रिक जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति हेतु लोकसेवकों में समर्पण भावना भी होनी चाहिए| नौकरशाही अभिवृति शासन में सता के केंद्रीकरण पर आधारित है जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से अलग है क्योंकि प्रजातांत्रिक अभिवृतिका मूल आधार सता का प्रत्यायोजन एवं विकेंद्रीकरण है|
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##Question:नौकरशाही अभिवृति से आप क्या समझते हैं? नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचारों का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) What do youmean by Bureaucratic Attitude? Describe Weber"sthoughts in terms of Bureaucratic Attitude. (200 words)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में नौकरशाही अभिवृति की व्याख्या कीजिए| अगले भाग में, नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में, वेबर के विचारों का वर्णन कीजिए| उत्तर- नियम और कानून का दृढ़ता से पालन किया जाना नौकरशाही अभिवृति को दर्शाती है| लोकसेवकों के द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में जिन कायदों तथा मूल्यों को अपनाया जाता है उनके आधार पर उनमें उपरोक्त अभिवृति का विकास होता है| शक्ति तथा सता केविभिन्न प्रारूपों के आधार पर नौकरशाही अभिवृति का निर्माण हुआ है|शक्ति का आशय किसी व्यक्ति के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के व्यवहार को अपने इच्छानुसार प्रभावित करने की प्रक्रिया से है एवं जब शक्ति का अभ्यास औचित्यपूर्ण होता है तो इसे सता या प्राधिकार की संज्ञा दी जाती है| औचित्य के आधार पर वेबर के द्वारा सता के तीन प्रारूपों को प्रस्तुत किया गया है - परंपरागत सता; चमत्कारिक सता; वैधानिक/विवेकशील सता| बेवर के द्वारा नौकरशाही अभिवृति का विश्लेषण वैधानिक/विवेकशील सता के आधार पर किया गया है जो कि नियम और कानून पर आधारित है| नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचार वेबर के अनुसार, नियम एवं कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना ही नौकरशाहों के अभिवृति को उजागर करता है परंतु यह नौकरशाही की कार्यप्रणाली में लालफीताशाही को उत्पन करती है| नियम और कानून साधन मात्र हैं परंतु इसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाना नौकरशाही के लिए साध्य बन जाता है एवं इसके परिणामस्वरूप नौकरशाही के द्वारा वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाता है| वेबर के द्वारा वैधानिक सता को विवेकशील होने की संज्ञा दी गयी है| विवेकशीलता नीतिशास्त्र का आधारभूत लक्षण है एवं विधि अपने आप में नैतिक मानकों का संहिताकरण है| अतः वेबर के द्वारा नौकरशाही के विधिक पक्ष पर बल दिया जाना स्वतः अपने आप में नौकरशाही के नैतिक दायित्वों को भी दर्शाती है| वेबर के द्वारा नौकरशाही के संदर्भ में निम्न विशेषताओं पर बल दिया गया है, जो नौकरशाही अभिवृति को आधार प्रदान करती है, - कार्य के विभाजन के द्वारा विशेषीकरण को प्राप्त किया जाना ताकि कार्यकुशलता को सुनिश्चित किया जा सके| कार्य विभाजन को सुनिश्चित करने हेतु पद-सोपानिक क्रम का होना आवश्यक है जिसका आशय उच्च स्तर के द्वारा निम्न स्तर पर किये जाने वाले नियंत्रण से है| परंतु, यही पद-सोपान नौकरशाही अभिवृति के रूप में लालफीताशाही, प्रतिबंधित संचार, अधिकारी-अधीनस्थ के आधार पर उंच-नीच की भावना आदि को जन्म देना एवं मनोबल को हतोत्साहित करती है | पद-सोपान क्रम, नौकरशाही की कल्पना एक बंद प्रणाली के रूप में करती है जो कि जन भागीदारी को शासन प्रक्रिया में हतोत्साहित करती है| नौकरशाही की भर्ती एवं पदोन्नति का आधार सिर्फ योग्यता होगा| नौकरशाही के द्वारा दिए गये योगदान के प्रतिफल के रूप में भुगतान नगदी आधार पर किया जाना जो कि अभिप्रेरणा के आर्थिक कारकों के महत्व को दर्शाती है जबकि प्रजातांत्रिक अभिवृति आर्थिक कारकों के साथ-साथ गैर-आर्थिक कारकों के प्रभाव पर भी बल देती है| नौकरशाही का व्यवहार उसके व्यक्तिगत मूल्यों से प्रभावित नहीं होना चाहिए| यह लोकसेवकों के वस्तुनिष्ठता के महत्व को दर्शाती है| परन्तु जन समस्यायों के प्रति वचनबद्धता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवक इसके प्रति अधिक संवेदनशील एवं जागरूक हो जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से मेल खाती है| नौकरशाही द्वारा अपने क्षेत्राधिकार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्पादन किया जाना चाहिए अतः नवाचार या सृजनात्मक प्रवृति को विकसित करने हेतु नौकरशाही अभिवृति को उचित नहीं माना गया है| परंतु, शक्तियों का अभ्यास के दुरूपयोग को रोकने हेतु यह आवश्यक है कि नौकरशाही अपने क्षेत्राधिकार के अधीन/अंतर्गत अपने दायित्वों का निर्वहन करे | वेबर के अनुसार सतारूढ़ राजनीतिक दल के राजनीतिक विचारधारा के प्रति नौकरशाही को तटस्थ होना चाहिए| अतः तटस्थता की अवधारणा को विकसित करने का श्रेय मैक्स वेबर को जाता है| तटस्थ लोकसेवक में नौकरशाही पर आधारित अभिवृति की व्यवहारिक सीमाओं को कम करने हेतु प्रजातांत्रिक अभिवृति का होना अतिआवश्यक है विशेषकर प्रजातांत्रिक जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति हेतु लोकसेवकों में समर्पण भावना भी होनी चाहिए| नौकरशाही अभिवृति शासन में सता के केंद्रीकरण पर आधारित है जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से अलग है क्योंकि प्रजातांत्रिक अभिवृतिका मूल आधार सता का प्रत्यायोजन एवं विकेंद्रीकरण है|
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Discuss the revisions brought in the methodology of Calculating the National Income. What were the issues/concerns raised over the new method? Also, give arguments in support of the new methodology. (150 words/10 marks)
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Approach · Write in brief the controversy related to India’s New GDP series as an Intro · Discuss the revisions brought in the methodology of Calculating the National Income · Highlight the issue related to the new methodology · Write in support of the new methodology · Suggest a way forward. Ans Recently former chief economic advisor in his research paper concluded that growth during the period 2011-12 to 2016-17. It was because, in 2015, the Central Statistics Office came up with a revised methodology for the calculation of the GDP of the country according to the norms of IMF which are called the System of National accounts. Revisions in the Methodology 1. Change of base year to 2011-12 (from 2004-05) to capture the unorganized sector data. 2. Considering GDP at market prices as headline GDP instead of GDP at factor cost, to make the new calculation more consumer-centric. 3. Sector-wise growth rate to be estimated at GVA basic price. 4. Treating unincorporated enterprises maintaining accounts as quasi-corporations 5. Incorporation of the MCA21 database to ensure comprehensive coverage of the corporate sector in mining, manufacturing & services 6. Broader coverage of the financial sector by including stock brokers, stock exchanges, asset management companies, mutual funds and pension funds, as well as regulatory bodies, SEBI, PFRDA and IRDA. 7. Adopted Effective Labour Input (ELI) Method: Earlier, it was assumed that all categories of workers contribute equally. The new method addresses differential labour productivity issues by assigning weights to different categories of workers based on their productivity. 8. Use of results of recent surveys and censuses: Current data from the latest surveys have been incorporated in the GDP calculation. E.g. Agricultural Census 2010-11; All India Livestock Census, 2012; All India Debt and Investment Survey, 2013 etc. Issues in GDP Estimation in India Concerns about the accuracy of India’s new GDP series stem from legacy problems with the national accounts system in the country, which were either left unaddressed or aggravated during the base year change exercise in 2014-15. Volatile Revisions: The revisions (between advance estimates & revised estimates) in overall GDP numbers tend to have an upward bias, which raises questions about the credibility of GDP data. Overestimation bias in the informal sector: The new GDP series assumes that the informal manufacturing sector grew at the same rate as the formal manufacturing sector, which might have inflated informal sector growth in the new series. Use of Deflators: Wholesale price index (WPI) as a deflator for several sectors of the economy (particularly services) is inappropriate. The use of a common output deflator for both input and output instead of doing so with their respective prices creates a bias. The use of an untested corporate database and the manner in which it is used is contentious. The new GVA methodology shifted data collection from establishments (or factories) to enterprises (or firms). All the value added at enterprises classified as "manufacturing firms" goes into the calculation of manufacturing GVA. But, the activities of firms are much more diverse than factories (e.g. some subsidiaries may only look into services like transportation) and would not qualify as manufacturing. Lack of transparency and effective audit of the GDP database point to inadequate oversight of the Central Statistics Office (CSO), which is responsible for the National Accounts Statistics. Recent resignation of 2 members of the National Statistical Commission (NSC) and the non-appointment of new independent members appointed by the government further indicate a lack of autonomy in the statistical system in India. Arguments in support of the new series • India has been able to numerically improve its GDP estimates. • It would improve India’s sovereign credit rating and bring in more foreign investment. • It would also help India to claim a bigger quota at IMF Way Forward • Existing data sources including MCA21 database should be properly authenticated before plugging it into National Account Statistics. • New data sources and methodologies can be explored e.g. using transactions-level GST data to estimate expenditure-based estimates of GDP. • The shift from an establishment approach to an enterprise approach will be successful only if all the disaggregated information in the MCA21 database on the activities of a firm is classified properly into appropriate sectors.
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##Question:Discuss the revisions brought in the methodology of Calculating the National Income. What were the issues/concerns raised over the new method? Also, give arguments in support of the new methodology. (150 words/10 marks)##Answer:Approach · Write in brief the controversy related to India’s New GDP series as an Intro · Discuss the revisions brought in the methodology of Calculating the National Income · Highlight the issue related to the new methodology · Write in support of the new methodology · Suggest a way forward. Ans Recently former chief economic advisor in his research paper concluded that growth during the period 2011-12 to 2016-17. It was because, in 2015, the Central Statistics Office came up with a revised methodology for the calculation of the GDP of the country according to the norms of IMF which are called the System of National accounts. Revisions in the Methodology 1. Change of base year to 2011-12 (from 2004-05) to capture the unorganized sector data. 2. Considering GDP at market prices as headline GDP instead of GDP at factor cost, to make the new calculation more consumer-centric. 3. Sector-wise growth rate to be estimated at GVA basic price. 4. Treating unincorporated enterprises maintaining accounts as quasi-corporations 5. Incorporation of the MCA21 database to ensure comprehensive coverage of the corporate sector in mining, manufacturing & services 6. Broader coverage of the financial sector by including stock brokers, stock exchanges, asset management companies, mutual funds and pension funds, as well as regulatory bodies, SEBI, PFRDA and IRDA. 7. Adopted Effective Labour Input (ELI) Method: Earlier, it was assumed that all categories of workers contribute equally. The new method addresses differential labour productivity issues by assigning weights to different categories of workers based on their productivity. 8. Use of results of recent surveys and censuses: Current data from the latest surveys have been incorporated in the GDP calculation. E.g. Agricultural Census 2010-11; All India Livestock Census, 2012; All India Debt and Investment Survey, 2013 etc. Issues in GDP Estimation in India Concerns about the accuracy of India’s new GDP series stem from legacy problems with the national accounts system in the country, which were either left unaddressed or aggravated during the base year change exercise in 2014-15. Volatile Revisions: The revisions (between advance estimates & revised estimates) in overall GDP numbers tend to have an upward bias, which raises questions about the credibility of GDP data. Overestimation bias in the informal sector: The new GDP series assumes that the informal manufacturing sector grew at the same rate as the formal manufacturing sector, which might have inflated informal sector growth in the new series. Use of Deflators: Wholesale price index (WPI) as a deflator for several sectors of the economy (particularly services) is inappropriate. The use of a common output deflator for both input and output instead of doing so with their respective prices creates a bias. The use of an untested corporate database and the manner in which it is used is contentious. The new GVA methodology shifted data collection from establishments (or factories) to enterprises (or firms). All the value added at enterprises classified as "manufacturing firms" goes into the calculation of manufacturing GVA. But, the activities of firms are much more diverse than factories (e.g. some subsidiaries may only look into services like transportation) and would not qualify as manufacturing. Lack of transparency and effective audit of the GDP database point to inadequate oversight of the Central Statistics Office (CSO), which is responsible for the National Accounts Statistics. Recent resignation of 2 members of the National Statistical Commission (NSC) and the non-appointment of new independent members appointed by the government further indicate a lack of autonomy in the statistical system in India. Arguments in support of the new series • India has been able to numerically improve its GDP estimates. • It would improve India’s sovereign credit rating and bring in more foreign investment. • It would also help India to claim a bigger quota at IMF Way Forward • Existing data sources including MCA21 database should be properly authenticated before plugging it into National Account Statistics. • New data sources and methodologies can be explored e.g. using transactions-level GST data to estimate expenditure-based estimates of GDP. • The shift from an establishment approach to an enterprise approach will be successful only if all the disaggregated information in the MCA21 database on the activities of a firm is classified properly into appropriate sectors.
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नौकरशाही अभिवृति से आप क्या समझते हैं? नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचारों का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) What do youmean by Bureaucratic Attitude? Describe Weber"sthoughts in terms of Bureaucratic Attitude. (200 words)
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एप्रोच- पहले भाग में नौकरशाही अभिवृति की व्याख्या कीजिए| अगले भाग में, नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में, वेबर के विचारों का वर्णन कीजिए| उत्तर- नियम और कानून का दृढ़ता से पालन किया जाना नौकरशाही अभिवृति को दर्शाती है| लोकसेवकों के द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में जिन कायदों तथा मूल्यों को अपनाया जाता है उनके आधार पर उनमें उपरोक्त अभिवृति का विकास होता है| शक्ति तथा सता केविभिन्न प्रारूपों के आधार पर नौकरशाही अभिवृति का निर्माण हुआ है|शक्ति का आशय किसी व्यक्ति के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के व्यवहार को अपने इच्छानुसार प्रभावित करने की प्रक्रिया से है एवं जब शक्ति का अभ्यास औचित्यपूर्ण होता है तो इसे सता या प्राधिकार की संज्ञा दी जाती है| औचित्य के आधार पर वेबर के द्वारा सता के तीन प्रारूपों को प्रस्तुत किया गया है - परंपरागत सता; चमत्कारिक सता; वैधानिक/विवेकशील सता| बेवर के द्वारा नौकरशाही अभिवृति का विश्लेषण वैधानिक/विवेकशील सता के आधार पर किया गया है जो कि नियम और कानून पर आधारित है| नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचार वेबर के अनुसार, नियम एवं कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना ही नौकरशाहों के अभिवृति को उजागर करता है परंतु यह नौकरशाही की कार्यप्रणाली में लालफीताशाही को उत्पन करती है| नियम और कानून साधन मात्र हैं परंतु इसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाना नौकरशाही के लिए साध्य बन जाता है एवं इसके परिणामस्वरूप नौकरशाही के द्वारा वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाता है| वेबर के द्वारा वैधानिक सता को विवेकशील होने की संज्ञा दी गयी है| विवेकशीलता नीतिशास्त्र का आधारभूत लक्षण है एवं विधि अपने आप में नैतिक मानकों का संहिताकरण है| अतः वेबर के द्वारा नौकरशाही के विधिक पक्ष पर बल दिया जाना स्वतः अपने आप में नौकरशाही के नैतिक दायित्वों को भी दर्शाती है| वेबर के द्वारा नौकरशाही के संदर्भ में निम्न विशेषताओं पर बल दिया गया है, जो नौकरशाही अभिवृति को आधार प्रदान करती है, - कार्य के विभाजन के द्वारा विशेषीकरण को प्राप्त किया जाना ताकि कार्यकुशलता को सुनिश्चित किया जा सके| कार्य विभाजन को सुनिश्चित करने हेतु पद-सोपानिक क्रम का होना आवश्यक है जिसका आशय उच्च स्तर के द्वारा निम्न स्तर पर किये जाने वाले नियंत्रण से है| परंतु, यही पद-सोपान नौकरशाही अभिवृति के रूप में लालफीताशाही, प्रतिबंधित संचार, अधिकारी-अधीनस्थ के आधार पर उंच-नीच की भावना आदि को जन्म देना एवं मनोबल को हतोत्साहित करती है | पद-सोपान क्रम, नौकरशाही की कल्पना एक बंद प्रणाली के रूप में करती है जो कि जन भागीदारी को शासन प्रक्रिया में हतोत्साहित करती है| नौकरशाही की भर्ती एवं पदोन्नति का आधार सिर्फ योग्यता होगा| नौकरशाही के द्वारा दिए गये योगदान के प्रतिफल के रूप में भुगतान नगदी आधार पर किया जाना जो कि अभिप्रेरणा के आर्थिक कारकों के महत्व को दर्शाती है जबकि प्रजातांत्रिक अभिवृति आर्थिक कारकों के साथ-साथ गैर-आर्थिक कारकों के प्रभाव पर भी बल देती है| नौकरशाही का व्यवहार उसके व्यक्तिगत मूल्यों से प्रभावित नहीं होना चाहिए| यह लोकसेवकों के वस्तुनिष्ठता के महत्व को दर्शाती है| परन्तु जन समस्यायों के प्रति वचनबद्धता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवक इसके प्रति अधिक संवेदनशील एवं जागरूक हो जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से मेल खाती है| नौकरशाही द्वारा अपने क्षेत्राधिकार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्पादन किया जाना चाहिए अतः नवाचार या सृजनात्मक प्रवृति को विकसित करने हेतु नौकरशाही अभिवृति को उचित नहीं माना गया है| परंतु, शक्तियों का अभ्यास के दुरूपयोग को रोकने हेतु यह आवश्यक है कि नौकरशाही अपने क्षेत्राधिकार के अधीन/अंतर्गत अपने दायित्वों का निर्वहन करे| वेबर के अनुसार सतारूढ़ राजनीतिक दल केराजनीतिक विचारधारा के प्रति नौकरशाही को तटस्थ होना चाहिए| अतः तटस्थता की अवधारणा को विकसित करने का श्रेय मैक्स वेबर को जाता है| तटस्थ लोकसेवक में नौकरशाही पर आधारित अभिवृति की व्यवहारिक सीमाओं को कम करने हेतु प्रजातांत्रिक अभिवृति का होना अतिआवश्यक है विशेषकर प्रजातांत्रिक जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति हेतु लोकसेवकों में समर्पण भावना भी होनी चाहिए| नौकरशाही अभिवृति शासन में सता के केंद्रीकरण पर आधारित है जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से अलग है क्योंकि प्रजातांत्रिक अभिवृतिका मूल आधार सता का प्रत्यायोजन एवं विकेंद्रीकरण है|
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##Question:नौकरशाही अभिवृति से आप क्या समझते हैं? नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचारों का वर्णन कीजिये| (200 शब्द) What do youmean by Bureaucratic Attitude? Describe Weber"sthoughts in terms of Bureaucratic Attitude. (200 words)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में नौकरशाही अभिवृति की व्याख्या कीजिए| अगले भाग में, नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में, वेबर के विचारों का वर्णन कीजिए| उत्तर- नियम और कानून का दृढ़ता से पालन किया जाना नौकरशाही अभिवृति को दर्शाती है| लोकसेवकों के द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में जिन कायदों तथा मूल्यों को अपनाया जाता है उनके आधार पर उनमें उपरोक्त अभिवृति का विकास होता है| शक्ति तथा सता केविभिन्न प्रारूपों के आधार पर नौकरशाही अभिवृति का निर्माण हुआ है|शक्ति का आशय किसी व्यक्ति के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के व्यवहार को अपने इच्छानुसार प्रभावित करने की प्रक्रिया से है एवं जब शक्ति का अभ्यास औचित्यपूर्ण होता है तो इसे सता या प्राधिकार की संज्ञा दी जाती है| औचित्य के आधार पर वेबर के द्वारा सता के तीन प्रारूपों को प्रस्तुत किया गया है - परंपरागत सता; चमत्कारिक सता; वैधानिक/विवेकशील सता| बेवर के द्वारा नौकरशाही अभिवृति का विश्लेषण वैधानिक/विवेकशील सता के आधार पर किया गया है जो कि नियम और कानून पर आधारित है| नौकरशाही अभिवृति के संदर्भ में वेबर के विचार वेबर के अनुसार, नियम एवं कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना ही नौकरशाहों के अभिवृति को उजागर करता है परंतु यह नौकरशाही की कार्यप्रणाली में लालफीताशाही को उत्पन करती है| नियम और कानून साधन मात्र हैं परंतु इसका दृढ़ता से अनुपालन किया जाना नौकरशाही के लिए साध्य बन जाता है एवं इसके परिणामस्वरूप नौकरशाही के द्वारा वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना संभव नहीं हो पाता है| वेबर के द्वारा वैधानिक सता को विवेकशील होने की संज्ञा दी गयी है| विवेकशीलता नीतिशास्त्र का आधारभूत लक्षण है एवं विधि अपने आप में नैतिक मानकों का संहिताकरण है| अतः वेबर के द्वारा नौकरशाही के विधिक पक्ष पर बल दिया जाना स्वतः अपने आप में नौकरशाही के नैतिक दायित्वों को भी दर्शाती है| वेबर के द्वारा नौकरशाही के संदर्भ में निम्न विशेषताओं पर बल दिया गया है, जो नौकरशाही अभिवृति को आधार प्रदान करती है, - कार्य के विभाजन के द्वारा विशेषीकरण को प्राप्त किया जाना ताकि कार्यकुशलता को सुनिश्चित किया जा सके| कार्य विभाजन को सुनिश्चित करने हेतु पद-सोपानिक क्रम का होना आवश्यक है जिसका आशय उच्च स्तर के द्वारा निम्न स्तर पर किये जाने वाले नियंत्रण से है| परंतु, यही पद-सोपान नौकरशाही अभिवृति के रूप में लालफीताशाही, प्रतिबंधित संचार, अधिकारी-अधीनस्थ के आधार पर उंच-नीच की भावना आदि को जन्म देना एवं मनोबल को हतोत्साहित करती है | पद-सोपान क्रम, नौकरशाही की कल्पना एक बंद प्रणाली के रूप में करती है जो कि जन भागीदारी को शासन प्रक्रिया में हतोत्साहित करती है| नौकरशाही की भर्ती एवं पदोन्नति का आधार सिर्फ योग्यता होगा| नौकरशाही के द्वारा दिए गये योगदान के प्रतिफल के रूप में भुगतान नगदी आधार पर किया जाना जो कि अभिप्रेरणा के आर्थिक कारकों के महत्व को दर्शाती है जबकि प्रजातांत्रिक अभिवृति आर्थिक कारकों के साथ-साथ गैर-आर्थिक कारकों के प्रभाव पर भी बल देती है| नौकरशाही का व्यवहार उसके व्यक्तिगत मूल्यों से प्रभावित नहीं होना चाहिए| यह लोकसेवकों के वस्तुनिष्ठता के महत्व को दर्शाती है| परन्तु जन समस्यायों के प्रति वचनबद्धता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवक इसके प्रति अधिक संवेदनशील एवं जागरूक हो जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से मेल खाती है| नौकरशाही द्वारा अपने क्षेत्राधिकार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्पादन किया जाना चाहिए अतः नवाचार या सृजनात्मक प्रवृति को विकसित करने हेतु नौकरशाही अभिवृति को उचित नहीं माना गया है| परंतु, शक्तियों का अभ्यास के दुरूपयोग को रोकने हेतु यह आवश्यक है कि नौकरशाही अपने क्षेत्राधिकार के अधीन/अंतर्गत अपने दायित्वों का निर्वहन करे| वेबर के अनुसार सतारूढ़ राजनीतिक दल केराजनीतिक विचारधारा के प्रति नौकरशाही को तटस्थ होना चाहिए| अतः तटस्थता की अवधारणा को विकसित करने का श्रेय मैक्स वेबर को जाता है| तटस्थ लोकसेवक में नौकरशाही पर आधारित अभिवृति की व्यवहारिक सीमाओं को कम करने हेतु प्रजातांत्रिक अभिवृति का होना अतिआवश्यक है विशेषकर प्रजातांत्रिक जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति हेतु लोकसेवकों में समर्पण भावना भी होनी चाहिए| नौकरशाही अभिवृति शासन में सता के केंद्रीकरण पर आधारित है जो कि प्रजातांत्रिक अभिवृति से अलग है क्योंकि प्रजातांत्रिक अभिवृतिका मूल आधार सता का प्रत्यायोजन एवं विकेंद्रीकरण है|
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What are the features of the Monetary Policy Framework Agreement? Critically Analyse Inflation targeting Policy. (150 words/10 Marks)
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Approach: Brief Intro about Monetary Policy Framework Agreement Monetary Policy Committee, its composition in short. Discuss the Features of MPFA Briefly mention about Inflation targeting policy Write Benefits and limitations of Inflation targeting system in containing inflation. Conclude accordingly. Answer: In 2015, the Government of India and the Reserve Bank of India signed a Monetary Policy Framework Agreement. The new monetary policy framework was formed following the recommendations of a committee headed by RBI Deputy Governor Urjit Patel. This agreement requires a committee to be formed which would be called the monetary policy framework committee MPC will decide monetary policy instead of RBI Governor doing it single handily thereby bringing more accountability and thought into it. Amendment to RBI Act removed the governor’s powers to singularly set monetary policy vesting them in a six-member Monetary Policy Committee Composition of MPC- The committee will have six members. Of the six members, the government will nominate three. The RBI Governor will chair the committee. The governor will not enjoy a veto power to overrule the other panel members but will have a casting vote in case of a tie. No government official will be nominated to the MPC. The other three members would be from the RBI with the governor being the ex-officio chairperson. The Deputy Governor of RBI in charge of the monetary policy will be a member, as also an executive director of the central bank. Decisions will be taken by majority vote with each member having a vote. Features of MPFA- The objective of the monetary policy framework is to primarily maintain price stability while keeping in mind the objective of growth. The RBI will be responsible for containing inflation targets at 4% (with a standard deviation of 2%) in the medium term. Under Section 45ZA(1) of the RBI Act, 1934, the Central Government determines the inflation target in terms of the Consumer Price Index, once in every five years in consultation with the RBI. If RBI failed to reach the specified inflation targets, it would have to give an explanation in the form of a report to the Central Government. In the report, it shall give reasons for failure, remedial actions as well as estimated time within which the inflation target shall be achieved. RBI is mandated to publish a Monetary Policy Report every six months, explaining the sources of inflation and the forecasts of inflation for the coming period of six to eighteen months. Analysis of Inflation targeting policy- Inflation targeting is basically a monetary policy system wherein the central bank of a country (RBI in India) has a specific target inflation rate for the medium-term and publicizes this rate. It is assumed that at best the monetary policy could do in order to support growth for the long term is to sustain price stability. Benefits Specific targeting and reporting the reasons in case of failure to achieve targets would make Central Bank more accountable. It will reduce the scope of political interference in the decisions of the central bank. Decentralised decision making will not leave the scope of concentration of power. Limitations Monetary policy is not effective in containing supply-side factors which are more prominent in the case of India. It can pose a challenge to make a balance between inflation targeting and economic growth. Inflation occurred due to external factors like an increase in crude oil prices could not be dealt with by RBI efficiently as the factor is beyond their control. Hence, the step taken to constitute MPC for inflation targeting in a good step in a way. However we need to relook the structure and objectives of it as per the basis of situation.
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##Question:What are the features of the Monetary Policy Framework Agreement? Critically Analyse Inflation targeting Policy. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Brief Intro about Monetary Policy Framework Agreement Monetary Policy Committee, its composition in short. Discuss the Features of MPFA Briefly mention about Inflation targeting policy Write Benefits and limitations of Inflation targeting system in containing inflation. Conclude accordingly. Answer: In 2015, the Government of India and the Reserve Bank of India signed a Monetary Policy Framework Agreement. The new monetary policy framework was formed following the recommendations of a committee headed by RBI Deputy Governor Urjit Patel. This agreement requires a committee to be formed which would be called the monetary policy framework committee MPC will decide monetary policy instead of RBI Governor doing it single handily thereby bringing more accountability and thought into it. Amendment to RBI Act removed the governor’s powers to singularly set monetary policy vesting them in a six-member Monetary Policy Committee Composition of MPC- The committee will have six members. Of the six members, the government will nominate three. The RBI Governor will chair the committee. The governor will not enjoy a veto power to overrule the other panel members but will have a casting vote in case of a tie. No government official will be nominated to the MPC. The other three members would be from the RBI with the governor being the ex-officio chairperson. The Deputy Governor of RBI in charge of the monetary policy will be a member, as also an executive director of the central bank. Decisions will be taken by majority vote with each member having a vote. Features of MPFA- The objective of the monetary policy framework is to primarily maintain price stability while keeping in mind the objective of growth. The RBI will be responsible for containing inflation targets at 4% (with a standard deviation of 2%) in the medium term. Under Section 45ZA(1) of the RBI Act, 1934, the Central Government determines the inflation target in terms of the Consumer Price Index, once in every five years in consultation with the RBI. If RBI failed to reach the specified inflation targets, it would have to give an explanation in the form of a report to the Central Government. In the report, it shall give reasons for failure, remedial actions as well as estimated time within which the inflation target shall be achieved. RBI is mandated to publish a Monetary Policy Report every six months, explaining the sources of inflation and the forecasts of inflation for the coming period of six to eighteen months. Analysis of Inflation targeting policy- Inflation targeting is basically a monetary policy system wherein the central bank of a country (RBI in India) has a specific target inflation rate for the medium-term and publicizes this rate. It is assumed that at best the monetary policy could do in order to support growth for the long term is to sustain price stability. Benefits Specific targeting and reporting the reasons in case of failure to achieve targets would make Central Bank more accountable. It will reduce the scope of political interference in the decisions of the central bank. Decentralised decision making will not leave the scope of concentration of power. Limitations Monetary policy is not effective in containing supply-side factors which are more prominent in the case of India. It can pose a challenge to make a balance between inflation targeting and economic growth. Inflation occurred due to external factors like an increase in crude oil prices could not be dealt with by RBI efficiently as the factor is beyond their control. Hence, the step taken to constitute MPC for inflation targeting in a good step in a way. However we need to relook the structure and objectives of it as per the basis of situation.
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सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का भारतीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (150 -200 शब्द/10 अंक) During the British era, social-religious reform movements had far-reaching effects on Indian society. Evaluate this statement. (150 -200 words/10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के उद्भव को लिखिए। उत्तर के पहले भाग में इन सुधारों के सकारात्मक प्रभावों का वर्णन कीजिए। इसके बाद नकारात्मक पक्षों को लिखिए। नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पक्षों को शामिल करते हुए निष्कर्ष लिखिए। 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सामाजिक -धार्मिक सुधार आंदोलनों का भारतीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा: सामाजिक प्रभाव: सामाजिक कुरुतियों में बदलाव को लेकर आंदोलन चलाया गया। आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ। इन सुधारों ने सामाजिक-धार्मिक स्वतन्त्रता तथा मौलिक अधिकारों पर बल दिया। महिला मुक्ति की दिशा में भी ठोस शुरुआत हुई। जिसमें सती प्रथा का उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह आदि के माध्यम से महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने हेतु कार्य किया। धार्मिक प्रभाव: धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया गया। धार्मिक कट्टरता को कम करते हुए एक साथ विभिन्न धर्मो के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का मूल्यांकन प्रारम्भ हुआ। धर्म का सरलीकरण: जिसमें कर्मकांड, मूर्ति पूजा जैसी अन्य जटिलताएँ धीरे धीरे कम होने लगीं। राजनीतिक प्रभाव: लोकतान्त्रिक कार्य शैली को महत्व प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप में राष्ट्रीय चेतना का उदय औपनिवेशिक चरित्र का विश्लेषण उपरोक्त सकारात्मक प्रभावों के अतिरिक्त इन सुधारों की कुछ सीमाएं भी थीं जैसे कि: मुख्यतः शहरी आंदोलन के रूप में प्रचलित था। बंगाल, मद्रास जैसे बड़े क्षेत्रों में ही इनका अत्यधिक प्रभाव पड़ा। इस सुधारों ने एक बहुत ही छोटे अल्पसंख्यक वर्ग को प्रभावित किया जबकि विशाल जन-समूह की आवश्यकताओं को उपेक्षित किया। पुनरुत्थान वादी आंदोलन के कारण सांप्रदायिक चेतना का प्रसार हुआ। केवल धर्मग्रंथों के आधार पर आंदोलन ने वैज्ञानिक चिंतन को कमजोर किया। यद्यपि इन सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की कुछ सीमाएं थीं परंतु निश्चित रूप से यह निर्विवाद सत्य है कि इन आंदोलनों ने भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक जागरूकता पर आश्चर्यजनक और चिरस्थाई प्रभाव डाला, जिसने आधुनिक भारत के विकास की आधारशिला रखी।
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##Question:सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का भारतीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (150 -200 शब्द/10 अंक) During the British era, social-religious reform movements had far-reaching effects on Indian society. Evaluate this statement. (150 -200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के उद्भव को लिखिए। उत्तर के पहले भाग में इन सुधारों के सकारात्मक प्रभावों का वर्णन कीजिए। इसके बाद नकारात्मक पक्षों को लिखिए। नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पक्षों को शामिल करते हुए निष्कर्ष लिखिए। 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सामाजिक -धार्मिक सुधार आंदोलनों का भारतीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा: सामाजिक प्रभाव: सामाजिक कुरुतियों में बदलाव को लेकर आंदोलन चलाया गया। आधुनिक विचारों का प्रसार हुआ। इन सुधारों ने सामाजिक-धार्मिक स्वतन्त्रता तथा मौलिक अधिकारों पर बल दिया। महिला मुक्ति की दिशा में भी ठोस शुरुआत हुई। जिसमें सती प्रथा का उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह आदि के माध्यम से महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने हेतु कार्य किया। धार्मिक प्रभाव: धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया गया। धार्मिक कट्टरता को कम करते हुए एक साथ विभिन्न धर्मो के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का मूल्यांकन प्रारम्भ हुआ। धर्म का सरलीकरण: जिसमें कर्मकांड, मूर्ति पूजा जैसी अन्य जटिलताएँ धीरे धीरे कम होने लगीं। राजनीतिक प्रभाव: लोकतान्त्रिक कार्य शैली को महत्व प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप में राष्ट्रीय चेतना का उदय औपनिवेशिक चरित्र का विश्लेषण उपरोक्त सकारात्मक प्रभावों के अतिरिक्त इन सुधारों की कुछ सीमाएं भी थीं जैसे कि: मुख्यतः शहरी आंदोलन के रूप में प्रचलित था। बंगाल, मद्रास जैसे बड़े क्षेत्रों में ही इनका अत्यधिक प्रभाव पड़ा। इस सुधारों ने एक बहुत ही छोटे अल्पसंख्यक वर्ग को प्रभावित किया जबकि विशाल जन-समूह की आवश्यकताओं को उपेक्षित किया। पुनरुत्थान वादी आंदोलन के कारण सांप्रदायिक चेतना का प्रसार हुआ। केवल धर्मग्रंथों के आधार पर आंदोलन ने वैज्ञानिक चिंतन को कमजोर किया। यद्यपि इन सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की कुछ सीमाएं थीं परंतु निश्चित रूप से यह निर्विवाद सत्य है कि इन आंदोलनों ने भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक जागरूकता पर आश्चर्यजनक और चिरस्थाई प्रभाव डाला, जिसने आधुनिक भारत के विकास की आधारशिला रखी।
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भारतीय तटरक्षक बल के कार्यों का वर्णन करते हुए इसके महत्व को भी बताइए | (200 शब्द ) Describing the work of the Indian coast guard, also explain its importance.
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एप्रोच - भूमिका में तटरक्षक बल के बारे में सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात तटरक्षक बल के महत्व की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ तटरक्षक बल के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत की तटीय सीमा की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये भारतीय तट रक्षक बल का गठन किया गया |भारतीय तटरक्षक बल भारत के सभी समुद्री क्षेत्रों में लागू सभी राष्ट्रिय अधिनियमों के उपबंधों का प्रवर्तन करने के लिए प्रमुख संस्था है , जो निम्नलिखित है कार्य करता है - मछुआरों की सुरक्षा करना तथा समुद्र में संकट के समय उनकी सहायता करना | समुद्री प्रदूषण के निवारक एवं नियंत्रक सहित हमारे समुद्री पर्यावरण का संरक्षण और परिरक्षण करना | भारतीय समुद्री अधिनियमों का प्रवर्तन करना | समुद्र में जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करना | घुसपैठ ,अवैध प्रवासन और शरणार्थी अन्तः प्रवाह आदि से रोकथाम हेतु उपाय करना | भारतीय तटरक्षक बल का महत्त्व - अज्ञात पोतों की घुसपैठ रोकने हेतु कोस्टल सर्विलांस नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी आदि की जाती है | तटीय राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए स्वतः पहचान प्रणाली रिसीवरों तथा तटीय राडार ओवरलैपिंग की एक श्रंखला के माध्यम से सम्पूर्ण तट की निगरानी में महत्वपूर्ण योगदान है | नेशनल कमांड कम्युनिकेशन एंड इंटेलिजेंस नेटवर्क | मछुआरों के सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका | तटरक्षक पोतों एवं विमानों की निगरानी करना संयुक्त संचालन केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका | आधुनिक तकनीकी उपाय | भारतीय तटरक्षक बल की उपलब्धियां - समुद्री आतंक ,लूटपाटइत्यादि में सुधार | अज्ञात पोतों से तटीय सुरक्षा | घुसपैठियों के लिए समस्या | तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा | व्यापार में सहयोग इत्यादि | इस प्रकार तटरक्षक बल का कार्य तथा महत्व किसी भी देश के लिए अपना प्रमुख स्थान रखता है - भारत के सन्दर्भ में हिन्द- महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |
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##Question:भारतीय तटरक्षक बल के कार्यों का वर्णन करते हुए इसके महत्व को भी बताइए | (200 शब्द ) Describing the work of the Indian coast guard, also explain its importance.##Answer:एप्रोच - भूमिका में तटरक्षक बल के बारे में सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात तटरक्षक बल के महत्व की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ तटरक्षक बल के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत की तटीय सीमा की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये भारतीय तट रक्षक बल का गठन किया गया |भारतीय तटरक्षक बल भारत के सभी समुद्री क्षेत्रों में लागू सभी राष्ट्रिय अधिनियमों के उपबंधों का प्रवर्तन करने के लिए प्रमुख संस्था है , जो निम्नलिखित है कार्य करता है - मछुआरों की सुरक्षा करना तथा समुद्र में संकट के समय उनकी सहायता करना | समुद्री प्रदूषण के निवारक एवं नियंत्रक सहित हमारे समुद्री पर्यावरण का संरक्षण और परिरक्षण करना | भारतीय समुद्री अधिनियमों का प्रवर्तन करना | समुद्र में जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करना | घुसपैठ ,अवैध प्रवासन और शरणार्थी अन्तः प्रवाह आदि से रोकथाम हेतु उपाय करना | भारतीय तटरक्षक बल का महत्त्व - अज्ञात पोतों की घुसपैठ रोकने हेतु कोस्टल सर्विलांस नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी आदि की जाती है | तटीय राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए स्वतः पहचान प्रणाली रिसीवरों तथा तटीय राडार ओवरलैपिंग की एक श्रंखला के माध्यम से सम्पूर्ण तट की निगरानी में महत्वपूर्ण योगदान है | नेशनल कमांड कम्युनिकेशन एंड इंटेलिजेंस नेटवर्क | मछुआरों के सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका | तटरक्षक पोतों एवं विमानों की निगरानी करना संयुक्त संचालन केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका | आधुनिक तकनीकी उपाय | भारतीय तटरक्षक बल की उपलब्धियां - समुद्री आतंक ,लूटपाटइत्यादि में सुधार | अज्ञात पोतों से तटीय सुरक्षा | घुसपैठियों के लिए समस्या | तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा | व्यापार में सहयोग इत्यादि | इस प्रकार तटरक्षक बल का कार्य तथा महत्व किसी भी देश के लिए अपना प्रमुख स्थान रखता है - भारत के सन्दर्भ में हिन्द- महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |
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महिला सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the steps being taken by the Government of India to ensure women empowerment. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में महिलाओं के सशक्तीकरण की आवश्यकता को संदर्भित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंमहिला सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- महिला सशक्तीकरण सदियों से महिलाओं का पुरुषों द्वारा किए गए शोषण और भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए आवश्यक है।आधुनिकसमाज की सोच भी इतनी परिपक्क्व एवं नकारात्मक हो गईहै कि महिलाओं के खिलाफ विभिन्न प्रकार की कुरीतियाँ और प्रथाएँ आदर्श बन गई हैं,जैसे सतीप्रथा, दहेज प्रथा, पर्दाप्रथा, भ्रूण हत्या, पत्नी को जलाना, यौन हिंसा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और अन्य विभिन्न प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार इत्यादि। महिलाओं के खिलाफ अपराध या अत्याचार अबभी बढ़ रहे हैं। इनसे निपटने के लिए समाज में पुरानी सोच वाले लोगों के मन को सामाजिक योजनाओं और संवेदीकरण कार्यक्रमों के माध्यम से बदलना होगा। इसी संदर्भ में महिला सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित विभिन्न प्रयासकिए जा रहे हैं- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39, 42, 44,51A इत्यादि में महिलाओं के सर्वांगीण विकास पर बल दिया गया है। बीजिंग सम्मेलन:- इस दिशा में 90 के दशक में अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक चिंतन ने नई सोच दी जिसमें मुख्यतः वर्ष 1995 की बीजिंग घोषणा तथा कोफ़ी अन्नान द्वारा MDG की संकल्पना प्रस्तुत करना प्रमुख हैं। बीजिंग उद्घोषणा ने एशिया पैसिफिक राष्ट्रों में सार्वजनिक जीवन में लैंगिक असामनता के सभी आयामों को कम करने का संकल्प लिया वहीँ MDG में महिलाओं हेतु अतिरिक्त प्रयास को लक्ष्य माना गया तथा इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय कोष भी उपलब्ध कराये गए। ये लक्ष्यविभिन्न राष्ट्रों की सरकारों पर विभिन्न प्रतिबद्धताएं आरोपित करते हैं। जिसमें भारत सरकार का भी MDG के लक्ष्यों का पीछा करना एक प्रमुख उद्देश्य रहा। इन सबसे से प्रेरणा लेकर वर्ष 2001 में महिलासशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति बनाई गई जिसने महिलाओ के सर्वांगीण विकास का एक मसौदा तैयार किया गया। इस नीति को और बेहतर बनाते हुए वर्ष 2017 में महिलासशक्तीकरण हेतु राष्ट्रीय मिशन प्रारम्भ गया। जिसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं- स्वास्थ्य एवं पोषण,रोजगार परक शिक्षा एवं कौशल विकास, सुरक्षा, आश्रित महिलाओं हेतु प्रयास, मीडिया सवेंदीकरण एवंजेंडर बजटिंग। स्वास्थ्य एवं पोषण:- महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण को सुनिश्चित करने हेतु साथ ही अन्य संदर्भों में सर्वांगीण विकास हेतु वर्ष 2006 में एक अलग मंत्रालय बनाया गया।महिला एवं बाल विकास के अंतर्गत कुछ मुख्य फ्लैगशिप कार्यक्रम हेतु अन्य मंत्रालयों से आवश्यक सम्प्रेषण तथा सम्मिलित कार्यवाही द्वारा महिला सशक्तिकरण को सुनिश्चित कर रहे हैं। इस संदर्भ में कुछ मुख्य प्रयास निम्नलिखित हैं- राजीव गाँधी किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम:- इसके अंतर्गत 11 से 18 वर्ष तक किशोरियों को पोषण एवं गैर-पोषण लाभ सुनिश्चित कराये जा रहे हैं जिसमें निशुल्क कैल्शियम, आयरन की गोलियों को आशा की मदद से वितरित कराया जा रहा है। साथ ही उन्हें गैर पोषण सम्बन्धी लाभ भी उपलब्ध कराये जा रहे हैं जिसमें कौशल प्रशिक्षण इत्यादि सम्मिलित हैं। जननी सुरक्षा योजना:- इसे वर्ष 2005 में गर्भवती महिलाओं में पोषण, टीकाकरण एवं संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित करने हेतु इस योजना के अंतर्गत आशा की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। आशा राज्य द्वारा महिलाओं को ट्रेनिंग इत्यादि देकर स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने का एक प्रयास है। साथ ही आंगनबाड़ी कार्यक्रमों के अंतर्गत ANM इत्यादि द्वारा संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित किया जा रहा है। जननी सुरक्षा योजना के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गाँधी मातृत्व सहयोग योजना भी प्रारम्भ की गई। जिसका मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं में पोषण तथा संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित करने हेतु आर्थिक सहायता के विकल्प रखे गए। कालान्तर में इस स्कीम को और प्रभावशाली बनाते हुए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना प्रारम्भ की गई। जिसके मुख्य उद्देश्यों में DBT के अंतर्गत न सिर्फ आर्थिक सहायता दी जा रही है अपितु साथ ही गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के फ़ॉलोअप के प्रबंध भी किये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय पोषण मिशन के अंतर्गत महिलाओं एवं बच्चों के पोषण से सम्बंधित स्कीमों को एकीकृत करते हुए विश्व बैंक के सहयोग से पोषण को बेहतर बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं ताकि सतत विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। ई-गवर्नन्स के अंतर्गत मदर एवं चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम द्वारा गर्भवती महिलाओं, उनके टीकाकरण, संस्थागत प्रसव एवं नवजात शिशुओं के टीकाकरण तथा स्वास्थ्य का डिजिटलीकृत ब्यौरा तैयार किया जा रहा है। जिससे इस संदर्भ में नीतियों का प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वयन हो सके। नेशनल ई हेल्थ अथॉरिटी इस संदर्भ में एक नवाचार है। घटता लिंगानुपात एवं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ:- यद्यपि समान लिंगानुपात वर्ष 2001 में 933 से बढ़कर 2011 में बढ़कर 943 हुआ है परन्तु शिशु लिंगनुपात 927 से घटकर 919 हो गया है जो यह स्पष्ट करता है कि लिंग परिक्षण तथा कृत्रिम गर्भधारण में लिंग चयन हो रहे हैं।समृद्ध क्षेत्रों का लिंगानुपात तेज़ी से गिरा है जो यह स्पष्ट करता है कि पुरुष प्रधानता एवं तकनीकी सुलभता वह दो मुख्य घटक हैं जिनके कारण लिंगानुपात पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। अमीनो सेनटेसिस तथा 4.0 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड इत्यादि तकनीकों ने भ्रूण परीक्षण को सुलभ बना दिया यद्यपि इनके दुरूपयोग को रोकने हेतु वर्ष 1994 में PCPNDT एक्ट बनाया गया,जिसके अंतर्गत किसी भी प्रकार से भ्रूण परीक्षण एक दंडनीय अपराध है। वर्ष 2015 में इस समस्या की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया जिसके दो मुख्य उद्देश्यों में भ्रूण हत्याएं ख़त्म करना तथा बालिकाओं के संदर्भ में सामाजिक सोच को परिवर्तित करना है। इस संदर्भ में तीन मंत्रालय एक साथ इस योजना को विभिन्न चरणों में क्रियान्वित कर रहे हैं। पहले चरण में 100 जिले, द्वितीय चरण में 61 और तृतीय चरण में अखिल भारतीय स्तर पर इसे क्रियान्वित किया जा रहा है। रोजगार संबंधी शिक्षा प्रयास:- महिलाओं के रोजगार से संबंधी वर्ष 1986 में STEP योजना का प्रारम्भ किया गया। इसके अंतर्गत महिलाओं का कोई समूह यदि स्वरोजगार के विकल्प ढूंढ रहा हो तो उन्हें इस संदर्भ में आवश्यक प्रशिक्षण देते हुए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है जिसमे समूहों में अधिकतम 200 महिलाएं तथा प्रति व्यक्ति अधिकतम सहायता 16000 रूपये तक है। इस योजना द्वारा महिला संगठनों को भी इस संदर्भ में प्रोत्साहित किया जा रहा है। वर्ष 1986 में ही नाबार्ड द्वारा स्वयं सहायता समूह बैंक लिंक कार्यक्रम भी प्रारम्भ किये गए। स्वयं सहायता समूहों की परिकल्पना मोहम्मद यूनुस के ग्रामीण बैंक से प्रेरित है जिसके अंतर्गत परस्पर सहयोग द्वारा स्वरोजगार के विकल्प सुनिश्चित किये जा रहे हैं। कम से कम 20 सदस्यों का एक समूह जो स्वरोजगार के प्रयास कर रहा हो वह इस कार्यक्रम के अंतर्गत 4 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर सब प्राइम ऋण सुलभ कराये जा रहे हैं। इस संदर्भ में स्वयं सहायता के नाम से एक सेविंग अकाउंट खोला जाता है। वर्ष 1992 में इसे और व्यापक बनाते हुए वाणिज्यिक बैंको को छोड़कर सभी अन्य संस्थानों द्वारा स्वयं सहायता समूह बनाये जा रहे हैं। कुटुंब श्री नामक स्वयं सहायता समूह एक ज्वलंत उदाहरण है। महिलाओं की सुरक्षा हेतु मुख्य कानून:- दहेज़ निरोधक कानून, 1961. महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, वर्ष 1986, 2011 में संशोधित। वन स्टॉप सेंटर जिसके अंतर्गत शिकायत को सहज बनाया जा रहा है। महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा का कानून, 2005:- किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक प्रताड़ना से महिलाओं की सुरक्षा। IPC 498A के अंतर्गत दहेज़ के कारण हो रही घरेलू हिंसा जघन्य दंडनीय अपराध है। कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में कार्यस्थल पर यौनशोषण निरोधक कानून के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि महिलाओं पर कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार का यौनशोषण न हो रहा हो। जेंडर बजटिंग:- इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि महिलाओं के लिए यह कोईअलग से बजट की प्रक्रिया नहीं हैपरंतु सभी हितधारकों को समेकित करते हुए महिलाओं को अधिकतम लाभ पहुँचाना ही जेंडर बजटिंग का उद्देश्य है। जेंडर बजटिंग के चार मुख्य आयाम हैं:- स्रोतों एवं बजटीय आवंटन को महिलाओं के संदर्भ में आनुपातिक रूप से वितरण करना। नीतियों के प्रति लाभार्थियों की जानकारी तथा सिविल सोसाइटियों को इस दिशा में मार्गदर्शन एवं क्षमता निर्माण करना। बजट को जेंडर परिप्रेक्ष्य से विश्लेषित करते हुए लेखापरीक्षण की सुविधा। विभिन्न हितधारकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराना। महिला सशक्तीकरण का सबसे महत्वपूर्ण घटक शिक्षा तक महिलाओं की पहुँचहै। यह महिलाओं कोबेहतर आर्थिक विकास, कम प्रजनन दर, स्वास्थ्य और स्वच्छता और उन कारकों के बारे में जागरूकता की ओर ले जाताहै जो महिलाओं को पीछे धकेलते हैं। महिलाओं की शिक्षा से ही वर्क पार्टिसिपेशन रेट और महिलाओं कीराजनीतिक भागीदारी भी बढ़ती है। अतः भारत सरकार विभिन क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु विभिन्न प्रयास कर रही है लेकिन अभी भी बहुत कुछ कियाजाना बाकि है।
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##Question:महिला सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the steps being taken by the Government of India to ensure women empowerment. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में महिलाओं के सशक्तीकरण की आवश्यकता को संदर्भित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंमहिला सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- महिला सशक्तीकरण सदियों से महिलाओं का पुरुषों द्वारा किए गए शोषण और भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए आवश्यक है।आधुनिकसमाज की सोच भी इतनी परिपक्क्व एवं नकारात्मक हो गईहै कि महिलाओं के खिलाफ विभिन्न प्रकार की कुरीतियाँ और प्रथाएँ आदर्श बन गई हैं,जैसे सतीप्रथा, दहेज प्रथा, पर्दाप्रथा, भ्रूण हत्या, पत्नी को जलाना, यौन हिंसा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और अन्य विभिन्न प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार इत्यादि। महिलाओं के खिलाफ अपराध या अत्याचार अबभी बढ़ रहे हैं। इनसे निपटने के लिए समाज में पुरानी सोच वाले लोगों के मन को सामाजिक योजनाओं और संवेदीकरण कार्यक्रमों के माध्यम से बदलना होगा। इसी संदर्भ में महिला सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित विभिन्न प्रयासकिए जा रहे हैं- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39, 42, 44,51A इत्यादि में महिलाओं के सर्वांगीण विकास पर बल दिया गया है। बीजिंग सम्मेलन:- इस दिशा में 90 के दशक में अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक चिंतन ने नई सोच दी जिसमें मुख्यतः वर्ष 1995 की बीजिंग घोषणा तथा कोफ़ी अन्नान द्वारा MDG की संकल्पना प्रस्तुत करना प्रमुख हैं। बीजिंग उद्घोषणा ने एशिया पैसिफिक राष्ट्रों में सार्वजनिक जीवन में लैंगिक असामनता के सभी आयामों को कम करने का संकल्प लिया वहीँ MDG में महिलाओं हेतु अतिरिक्त प्रयास को लक्ष्य माना गया तथा इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय कोष भी उपलब्ध कराये गए। ये लक्ष्यविभिन्न राष्ट्रों की सरकारों पर विभिन्न प्रतिबद्धताएं आरोपित करते हैं। जिसमें भारत सरकार का भी MDG के लक्ष्यों का पीछा करना एक प्रमुख उद्देश्य रहा। इन सबसे से प्रेरणा लेकर वर्ष 2001 में महिलासशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति बनाई गई जिसने महिलाओ के सर्वांगीण विकास का एक मसौदा तैयार किया गया। इस नीति को और बेहतर बनाते हुए वर्ष 2017 में महिलासशक्तीकरण हेतु राष्ट्रीय मिशन प्रारम्भ गया। जिसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं- स्वास्थ्य एवं पोषण,रोजगार परक शिक्षा एवं कौशल विकास, सुरक्षा, आश्रित महिलाओं हेतु प्रयास, मीडिया सवेंदीकरण एवंजेंडर बजटिंग। स्वास्थ्य एवं पोषण:- महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण को सुनिश्चित करने हेतु साथ ही अन्य संदर्भों में सर्वांगीण विकास हेतु वर्ष 2006 में एक अलग मंत्रालय बनाया गया।महिला एवं बाल विकास के अंतर्गत कुछ मुख्य फ्लैगशिप कार्यक्रम हेतु अन्य मंत्रालयों से आवश्यक सम्प्रेषण तथा सम्मिलित कार्यवाही द्वारा महिला सशक्तिकरण को सुनिश्चित कर रहे हैं। इस संदर्भ में कुछ मुख्य प्रयास निम्नलिखित हैं- राजीव गाँधी किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम:- इसके अंतर्गत 11 से 18 वर्ष तक किशोरियों को पोषण एवं गैर-पोषण लाभ सुनिश्चित कराये जा रहे हैं जिसमें निशुल्क कैल्शियम, आयरन की गोलियों को आशा की मदद से वितरित कराया जा रहा है। साथ ही उन्हें गैर पोषण सम्बन्धी लाभ भी उपलब्ध कराये जा रहे हैं जिसमें कौशल प्रशिक्षण इत्यादि सम्मिलित हैं। जननी सुरक्षा योजना:- इसे वर्ष 2005 में गर्भवती महिलाओं में पोषण, टीकाकरण एवं संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित करने हेतु इस योजना के अंतर्गत आशा की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। आशा राज्य द्वारा महिलाओं को ट्रेनिंग इत्यादि देकर स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने का एक प्रयास है। साथ ही आंगनबाड़ी कार्यक्रमों के अंतर्गत ANM इत्यादि द्वारा संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित किया जा रहा है। जननी सुरक्षा योजना के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गाँधी मातृत्व सहयोग योजना भी प्रारम्भ की गई। जिसका मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं में पोषण तथा संस्थागत प्रसव को सुनिश्चित करने हेतु आर्थिक सहायता के विकल्प रखे गए। कालान्तर में इस स्कीम को और प्रभावशाली बनाते हुए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना प्रारम्भ की गई। जिसके मुख्य उद्देश्यों में DBT के अंतर्गत न सिर्फ आर्थिक सहायता दी जा रही है अपितु साथ ही गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के फ़ॉलोअप के प्रबंध भी किये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय पोषण मिशन के अंतर्गत महिलाओं एवं बच्चों के पोषण से सम्बंधित स्कीमों को एकीकृत करते हुए विश्व बैंक के सहयोग से पोषण को बेहतर बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं ताकि सतत विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। ई-गवर्नन्स के अंतर्गत मदर एवं चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम द्वारा गर्भवती महिलाओं, उनके टीकाकरण, संस्थागत प्रसव एवं नवजात शिशुओं के टीकाकरण तथा स्वास्थ्य का डिजिटलीकृत ब्यौरा तैयार किया जा रहा है। जिससे इस संदर्भ में नीतियों का प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वयन हो सके। नेशनल ई हेल्थ अथॉरिटी इस संदर्भ में एक नवाचार है। घटता लिंगानुपात एवं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ:- यद्यपि समान लिंगानुपात वर्ष 2001 में 933 से बढ़कर 2011 में बढ़कर 943 हुआ है परन्तु शिशु लिंगनुपात 927 से घटकर 919 हो गया है जो यह स्पष्ट करता है कि लिंग परिक्षण तथा कृत्रिम गर्भधारण में लिंग चयन हो रहे हैं।समृद्ध क्षेत्रों का लिंगानुपात तेज़ी से गिरा है जो यह स्पष्ट करता है कि पुरुष प्रधानता एवं तकनीकी सुलभता वह दो मुख्य घटक हैं जिनके कारण लिंगानुपात पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। अमीनो सेनटेसिस तथा 4.0 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड इत्यादि तकनीकों ने भ्रूण परीक्षण को सुलभ बना दिया यद्यपि इनके दुरूपयोग को रोकने हेतु वर्ष 1994 में PCPNDT एक्ट बनाया गया,जिसके अंतर्गत किसी भी प्रकार से भ्रूण परीक्षण एक दंडनीय अपराध है। वर्ष 2015 में इस समस्या की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया जिसके दो मुख्य उद्देश्यों में भ्रूण हत्याएं ख़त्म करना तथा बालिकाओं के संदर्भ में सामाजिक सोच को परिवर्तित करना है। इस संदर्भ में तीन मंत्रालय एक साथ इस योजना को विभिन्न चरणों में क्रियान्वित कर रहे हैं। पहले चरण में 100 जिले, द्वितीय चरण में 61 और तृतीय चरण में अखिल भारतीय स्तर पर इसे क्रियान्वित किया जा रहा है। रोजगार संबंधी शिक्षा प्रयास:- महिलाओं के रोजगार से संबंधी वर्ष 1986 में STEP योजना का प्रारम्भ किया गया। इसके अंतर्गत महिलाओं का कोई समूह यदि स्वरोजगार के विकल्प ढूंढ रहा हो तो उन्हें इस संदर्भ में आवश्यक प्रशिक्षण देते हुए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है जिसमे समूहों में अधिकतम 200 महिलाएं तथा प्रति व्यक्ति अधिकतम सहायता 16000 रूपये तक है। इस योजना द्वारा महिला संगठनों को भी इस संदर्भ में प्रोत्साहित किया जा रहा है। वर्ष 1986 में ही नाबार्ड द्वारा स्वयं सहायता समूह बैंक लिंक कार्यक्रम भी प्रारम्भ किये गए। स्वयं सहायता समूहों की परिकल्पना मोहम्मद यूनुस के ग्रामीण बैंक से प्रेरित है जिसके अंतर्गत परस्पर सहयोग द्वारा स्वरोजगार के विकल्प सुनिश्चित किये जा रहे हैं। कम से कम 20 सदस्यों का एक समूह जो स्वरोजगार के प्रयास कर रहा हो वह इस कार्यक्रम के अंतर्गत 4 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर सब प्राइम ऋण सुलभ कराये जा रहे हैं। इस संदर्भ में स्वयं सहायता के नाम से एक सेविंग अकाउंट खोला जाता है। वर्ष 1992 में इसे और व्यापक बनाते हुए वाणिज्यिक बैंको को छोड़कर सभी अन्य संस्थानों द्वारा स्वयं सहायता समूह बनाये जा रहे हैं। कुटुंब श्री नामक स्वयं सहायता समूह एक ज्वलंत उदाहरण है। महिलाओं की सुरक्षा हेतु मुख्य कानून:- दहेज़ निरोधक कानून, 1961. महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, वर्ष 1986, 2011 में संशोधित। वन स्टॉप सेंटर जिसके अंतर्गत शिकायत को सहज बनाया जा रहा है। महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा का कानून, 2005:- किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक प्रताड़ना से महिलाओं की सुरक्षा। IPC 498A के अंतर्गत दहेज़ के कारण हो रही घरेलू हिंसा जघन्य दंडनीय अपराध है। कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में कार्यस्थल पर यौनशोषण निरोधक कानून के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि महिलाओं पर कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार का यौनशोषण न हो रहा हो। जेंडर बजटिंग:- इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि महिलाओं के लिए यह कोईअलग से बजट की प्रक्रिया नहीं हैपरंतु सभी हितधारकों को समेकित करते हुए महिलाओं को अधिकतम लाभ पहुँचाना ही जेंडर बजटिंग का उद्देश्य है। जेंडर बजटिंग के चार मुख्य आयाम हैं:- स्रोतों एवं बजटीय आवंटन को महिलाओं के संदर्भ में आनुपातिक रूप से वितरण करना। नीतियों के प्रति लाभार्थियों की जानकारी तथा सिविल सोसाइटियों को इस दिशा में मार्गदर्शन एवं क्षमता निर्माण करना। बजट को जेंडर परिप्रेक्ष्य से विश्लेषित करते हुए लेखापरीक्षण की सुविधा। विभिन्न हितधारकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराना। महिला सशक्तीकरण का सबसे महत्वपूर्ण घटक शिक्षा तक महिलाओं की पहुँचहै। यह महिलाओं कोबेहतर आर्थिक विकास, कम प्रजनन दर, स्वास्थ्य और स्वच्छता और उन कारकों के बारे में जागरूकता की ओर ले जाताहै जो महिलाओं को पीछे धकेलते हैं। महिलाओं की शिक्षा से ही वर्क पार्टिसिपेशन रेट और महिलाओं कीराजनीतिक भागीदारी भी बढ़ती है। अतः भारत सरकार विभिन क्षेत्रों में महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु विभिन्न प्रयास कर रही है लेकिन अभी भी बहुत कुछ कियाजाना बाकि है।
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The basic structure of the constitution of India has been criticized for giving unreasonable power to the judiciary. Comment and support the statement. (150 words/10 marks ).
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Approach : Define the basic structure in an introductory part. Highlight criticism of the Basic Structure of the Constitution. Explain the importance ofthe Basic Structure of the Constitution Answer : in the Kesavananda Bharati case (1973), the Supreme Court laid down a new doctrine of the ‘basic structure’ (or ‘basic features’) of the Constitution. It ruled that the constituent power of Parliament under Article 368 does not enable it to alter the ‘basic structure of the Constitution. This means that the Parliament cannot abridge or take away a Fundamental Right that forms a part of the ‘basic structure of the Constitution. the Supreme Court in the Minerva Mills case (1980) said, “Since the Constitution had conferred a limited amending power on theParliament, the Parliament cannot under the exercise of that limited powerenlarge that very power into absolute power. Indeed, limited amendingpower is one of the basic features of the Constitution and, therefore, thelimitations on that power cannot be destroyed" In other words, Parliamentcannot, under article 368, expand its amending power so as to acquire foritself the right to repeal or abrogate the Constitution or to destroy its basicfeatures. The donee of a limited power cannot by the exercised of that powerconvert the limited power into an unlimited one”. The present position is that the Parliament under Article 368 can amend any part of the Constitution including the Fundamental Rights but without affecting the ‘basic structure of the Constitution. However, the Supreme Court is yet to define or clarify what constitutes the ‘basic structure of the Constitution. From the various judgements, the following have emerged as ‘basic features of the Constitution or elements/components/ingredients of the ‘basic structure of the constitution: The supremacy of the Constitution Sovereign, democratic and republican nature of the Indian polity Secular character of the Constitution etc. Criticism of the Basic Structure of the Constitution The Constitution of any country in the world does not have a concept like the basic structure of the constitution. One concrete principle of the judiciary says that the law has to be written and clear. It should not be ambiguous and arbitrary. However, the judiciary has not defined the Basic structure to date. As per the current interpretation of the Basic structure, it is up to the judiciary to decide which part of the constitution belongs to the basic structure and which does not. That means the principle is full of ambiguity. The intent of the invention of the Basic Structure was to limit the unlimited power of the parliament to amend the constitution. However, the judiciary has shited this unlimited power from the parliament to itself. Now, the judiciary can include any part in the basic structure and exclude any part which has already been included in it. Currently, Indian polity is facing the problem of judicial activism along with judicial overreach. In this context, the power given by the basic structure doctrine to the judiciary may further disturb the principle of checks and balances. Though the Doctrine of the Basic structure has done better good by curtailing the unlimited power of the executive which was the need of that time. However, with time, there needs to be better clarity about this doctrine before Indian polity faces any other face-off due to this doctrine.
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##Question:The basic structure of the constitution of India has been criticized for giving unreasonable power to the judiciary. Comment and support the statement. (150 words/10 marks ).##Answer:Approach : Define the basic structure in an introductory part. Highlight criticism of the Basic Structure of the Constitution. Explain the importance ofthe Basic Structure of the Constitution Answer : in the Kesavananda Bharati case (1973), the Supreme Court laid down a new doctrine of the ‘basic structure’ (or ‘basic features’) of the Constitution. It ruled that the constituent power of Parliament under Article 368 does not enable it to alter the ‘basic structure of the Constitution. This means that the Parliament cannot abridge or take away a Fundamental Right that forms a part of the ‘basic structure of the Constitution. the Supreme Court in the Minerva Mills case (1980) said, “Since the Constitution had conferred a limited amending power on theParliament, the Parliament cannot under the exercise of that limited powerenlarge that very power into absolute power. Indeed, limited amendingpower is one of the basic features of the Constitution and, therefore, thelimitations on that power cannot be destroyed" In other words, Parliamentcannot, under article 368, expand its amending power so as to acquire foritself the right to repeal or abrogate the Constitution or to destroy its basicfeatures. The donee of a limited power cannot by the exercised of that powerconvert the limited power into an unlimited one”. The present position is that the Parliament under Article 368 can amend any part of the Constitution including the Fundamental Rights but without affecting the ‘basic structure of the Constitution. However, the Supreme Court is yet to define or clarify what constitutes the ‘basic structure of the Constitution. From the various judgements, the following have emerged as ‘basic features of the Constitution or elements/components/ingredients of the ‘basic structure of the constitution: The supremacy of the Constitution Sovereign, democratic and republican nature of the Indian polity Secular character of the Constitution etc. Criticism of the Basic Structure of the Constitution The Constitution of any country in the world does not have a concept like the basic structure of the constitution. One concrete principle of the judiciary says that the law has to be written and clear. It should not be ambiguous and arbitrary. However, the judiciary has not defined the Basic structure to date. As per the current interpretation of the Basic structure, it is up to the judiciary to decide which part of the constitution belongs to the basic structure and which does not. That means the principle is full of ambiguity. The intent of the invention of the Basic Structure was to limit the unlimited power of the parliament to amend the constitution. However, the judiciary has shited this unlimited power from the parliament to itself. Now, the judiciary can include any part in the basic structure and exclude any part which has already been included in it. Currently, Indian polity is facing the problem of judicial activism along with judicial overreach. In this context, the power given by the basic structure doctrine to the judiciary may further disturb the principle of checks and balances. Though the Doctrine of the Basic structure has done better good by curtailing the unlimited power of the executive which was the need of that time. However, with time, there needs to be better clarity about this doctrine before Indian polity faces any other face-off due to this doctrine.
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वैसे कौन से कारण थें जिन्होंने ब्रिटिश भारत के शुरूआती चरणों में, भारतीय कृषि के वाणिज्यीकरण को प्रभावित किया था? साथ ही, भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके फलस्वरूप पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What were the reasons which influenced the Commercialization of Indian Agriculture in the early stages of British India? Also, Describe its consequences on the Indian economy. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- ब्रिटिश भारत के शुरूआती चरण में कृषि की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| कृषि के वाणिज्यीकरण को संक्षिप्तता से बताते हुए उसके पीछे उत्तरदायी कारणों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, कृषि के वाणिज्यीकरण के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिये| उत्तर- भारत मूलतः एक कृषि-प्रधान देश रहा है| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जो भारत में व्यापारिक उद्देश्यों के साथ आई थी, ने हालाँकि भारत के शासन की बागडोर संभाली फिर भी, उसका मूल उद्देश्य मुनाफा कमाना ही बना रहा| कंपनी के द्वारा वैसी ही नीतियाँ बनायी जाती थी जो उनके हित में हो| भू-राजस्व संबंधी नीतियाँ तथा कंपनी के व्यापारिक हितों के कारण भारतीय कृषि की हालत बदतर हो गयी थी| किसानों के ऊपर सरकार, जमींदार एवं साहूकारों का तिहरा बोझ होता था| साथ ही, कृषि में लगी अधिकांश जनसँख्या भूख एवं निर्धनता से बुरी तरह से ग्रसित थी| ब्रिटिश शासन की लगभग सभी नीतियों से भारतीय कृषि को अत्यधिक नुकसान पहुंचा तथा कृषकों की दरिद्रता अत्यंत बढ़ गयी| कृषि का वाणिज्यीकरण तथा उसके पीछे उत्तरदायी कारण बाजार को ध्यान में रखकर या मुनाफे को ध्यान में रखकर की गई कृषि को कृषि का वाणिज्यीकरण कहते हैं| तकनीकी अर्थों में, इसे पूंजीवादी कृषि भी कहते हैं|इसके अंतर्गत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर कृषि, कृषि का आधुनिकीकरण, कृषि से संबंधित विभिन्न प्रकार के बाजारों का विकास, पूरी प्रक्रिया को सरकारी सहयोग इत्यादिकार्य संपन्न किये जाते हैं|19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण ब्रिटिश ईस्ट इंडियाकंपनी के नीतियों का परिणाम थी|इसके पहले कृषि जीवनयापन का मार्ग थी न कि व्यापारिक प्रयत्न। अब कुछ विशेष फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा। बागान उद्योगों जैसे चाय, काफी, रबर एवं नील इत्यादि में कृषि का वाणिज्यीकरण अपने चरमोत्कर्ष में पहुँच गया। वाणिज्यीकरण के पीछे उत्तरदायी कारण - भू-राजस्व की नकद अदायगी के कारण; ब्रिटेन की आवश्यकताओं या औद्योगिक क्रांति के कारण जैसे- कपास एवं नील की खेती; व्यापार संतुलन को ध्यान में रखते हुए भी कुछ व्यावसायिक फसलों को बढ़ावा दिया गया जैसे- अफीम, चाय इत्यादि; अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी व्यापारिक कृषि को प्रभावित किया जैसे- अमेरिका में गृहयुद्ध के कारण ब्रिटेन को कपास की आपूर्ति प्रभावित हुई तो भारत में कपास की खेती में वृद्धि देखी गई| परिवहन के साधनों में परिवर्तन तथा नए जलमार्गों ने भी वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान की जैसे- भारत में रेलवे की शुरुआत; 1869 में स्वेज नहर की शुरुआत आदि| कृषि के वाणिज्यीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव- सकारात्मक प्रभाव - रैयतवाड़ी एवं महालवाड़ी बंदोबस्त से प्रभावित क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बड़े किसानों को इसका लाभ मिला तथा कुछ सीमा तक जमींदारी बंदोबस्त में भी| चाय, कॉफ़ी इत्यादि नए फसलों की शुरुआत; परिवहन के आधुनिक साधनों की शुरुआत; नकारात्मक प्रभाव - वाणिज्यीकरण एक थोपी गई प्रक्रिया थी ना की स्वाभाविक प्रक्रिया; कृषि के क्षेत्र में आधुनिक तरीकों का प्रयोग कभी-कभार ही किये गये जैसे- उन्नत बीज, रसायन, कृषि से संबंधित बीज, अनुसंधान, सिंचाई इत्यादि का प्रयोग| यह वाणिज्यीकरण श्रमिकों एवं किसानों के शोषण पर आधारित था जैसे- चाय के बागानों में श्रमिकों की स्थिति बंधुआ मजदूरों की तरह थी| इसी प्रकार प्राथमिक किसान को शायद ही कभी उचित कीमत मिल पायी हो| राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव ने भी बड़े व्यापारियों, महाजनों एवं ब्रिटिश व्यापारियों को लाभ पहुँचाया ना कि प्राथमिक उत्पादकों को| वास्तव में अखाद्य फसलों के कृषि के कारण किसान ऋणों के दुष्चक्र में फंसता गया| वाणिज्यीकरण ने व्यापार की प्रकृति को भी प्रभावित किया| कच्चे मालों के निर्यात की मात्रा बढ़ी| इससे भारतीय उद्योगों को भी नुकसान हुआ क्योंकि कच्चे माल की कीमत बढ़ने से उत्पादों की लागत बढ़ गए| वाणिज्यीकरण के कारण परिवहन के आधुनिक साधनों का सर्वप्रथम उन क्षेत्रों में विकास जहाँ बाजार एवं कच्चे माल की अत्याधिक संभावना थी|वाणिज्यीकरण का एक दुखद पक्ष यह भी था कि अकाल के दिनों में भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा| कुल मिलकर वाणिज्यीकरण ने भारतीय कृषि का उपनिवेशीकरण किया ना की आधुनिकीकरण जिससे ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय कृषि का अपकर्ष हुआ| 19वीं सदी के पूर्वार्ध में लगभग 14% की गिरावट उत्पादकता में देखी गई|
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##Question:वैसे कौन से कारण थें जिन्होंने ब्रिटिश भारत के शुरूआती चरणों में, भारतीय कृषि के वाणिज्यीकरण को प्रभावित किया था? साथ ही, भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके फलस्वरूप पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) What were the reasons which influenced the Commercialization of Indian Agriculture in the early stages of British India? Also, Describe its consequences on the Indian economy. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- ब्रिटिश भारत के शुरूआती चरण में कृषि की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| कृषि के वाणिज्यीकरण को संक्षिप्तता से बताते हुए उसके पीछे उत्तरदायी कारणों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, कृषि के वाणिज्यीकरण के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिये| उत्तर- भारत मूलतः एक कृषि-प्रधान देश रहा है| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जो भारत में व्यापारिक उद्देश्यों के साथ आई थी, ने हालाँकि भारत के शासन की बागडोर संभाली फिर भी, उसका मूल उद्देश्य मुनाफा कमाना ही बना रहा| कंपनी के द्वारा वैसी ही नीतियाँ बनायी जाती थी जो उनके हित में हो| भू-राजस्व संबंधी नीतियाँ तथा कंपनी के व्यापारिक हितों के कारण भारतीय कृषि की हालत बदतर हो गयी थी| किसानों के ऊपर सरकार, जमींदार एवं साहूकारों का तिहरा बोझ होता था| साथ ही, कृषि में लगी अधिकांश जनसँख्या भूख एवं निर्धनता से बुरी तरह से ग्रसित थी| ब्रिटिश शासन की लगभग सभी नीतियों से भारतीय कृषि को अत्यधिक नुकसान पहुंचा तथा कृषकों की दरिद्रता अत्यंत बढ़ गयी| कृषि का वाणिज्यीकरण तथा उसके पीछे उत्तरदायी कारण बाजार को ध्यान में रखकर या मुनाफे को ध्यान में रखकर की गई कृषि को कृषि का वाणिज्यीकरण कहते हैं| तकनीकी अर्थों में, इसे पूंजीवादी कृषि भी कहते हैं|इसके अंतर्गत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर कृषि, कृषि का आधुनिकीकरण, कृषि से संबंधित विभिन्न प्रकार के बाजारों का विकास, पूरी प्रक्रिया को सरकारी सहयोग इत्यादिकार्य संपन्न किये जाते हैं|19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण ब्रिटिश ईस्ट इंडियाकंपनी के नीतियों का परिणाम थी|इसके पहले कृषि जीवनयापन का मार्ग थी न कि व्यापारिक प्रयत्न। अब कुछ विशेष फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा। बागान उद्योगों जैसे चाय, काफी, रबर एवं नील इत्यादि में कृषि का वाणिज्यीकरण अपने चरमोत्कर्ष में पहुँच गया। वाणिज्यीकरण के पीछे उत्तरदायी कारण - भू-राजस्व की नकद अदायगी के कारण; ब्रिटेन की आवश्यकताओं या औद्योगिक क्रांति के कारण जैसे- कपास एवं नील की खेती; व्यापार संतुलन को ध्यान में रखते हुए भी कुछ व्यावसायिक फसलों को बढ़ावा दिया गया जैसे- अफीम, चाय इत्यादि; अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी व्यापारिक कृषि को प्रभावित किया जैसे- अमेरिका में गृहयुद्ध के कारण ब्रिटेन को कपास की आपूर्ति प्रभावित हुई तो भारत में कपास की खेती में वृद्धि देखी गई| परिवहन के साधनों में परिवर्तन तथा नए जलमार्गों ने भी वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान की जैसे- भारत में रेलवे की शुरुआत; 1869 में स्वेज नहर की शुरुआत आदि| कृषि के वाणिज्यीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव- सकारात्मक प्रभाव - रैयतवाड़ी एवं महालवाड़ी बंदोबस्त से प्रभावित क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बड़े किसानों को इसका लाभ मिला तथा कुछ सीमा तक जमींदारी बंदोबस्त में भी| चाय, कॉफ़ी इत्यादि नए फसलों की शुरुआत; परिवहन के आधुनिक साधनों की शुरुआत; नकारात्मक प्रभाव - वाणिज्यीकरण एक थोपी गई प्रक्रिया थी ना की स्वाभाविक प्रक्रिया; कृषि के क्षेत्र में आधुनिक तरीकों का प्रयोग कभी-कभार ही किये गये जैसे- उन्नत बीज, रसायन, कृषि से संबंधित बीज, अनुसंधान, सिंचाई इत्यादि का प्रयोग| यह वाणिज्यीकरण श्रमिकों एवं किसानों के शोषण पर आधारित था जैसे- चाय के बागानों में श्रमिकों की स्थिति बंधुआ मजदूरों की तरह थी| इसी प्रकार प्राथमिक किसान को शायद ही कभी उचित कीमत मिल पायी हो| राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव ने भी बड़े व्यापारियों, महाजनों एवं ब्रिटिश व्यापारियों को लाभ पहुँचाया ना कि प्राथमिक उत्पादकों को| वास्तव में अखाद्य फसलों के कृषि के कारण किसान ऋणों के दुष्चक्र में फंसता गया| वाणिज्यीकरण ने व्यापार की प्रकृति को भी प्रभावित किया| कच्चे मालों के निर्यात की मात्रा बढ़ी| इससे भारतीय उद्योगों को भी नुकसान हुआ क्योंकि कच्चे माल की कीमत बढ़ने से उत्पादों की लागत बढ़ गए| वाणिज्यीकरण के कारण परिवहन के आधुनिक साधनों का सर्वप्रथम उन क्षेत्रों में विकास जहाँ बाजार एवं कच्चे माल की अत्याधिक संभावना थी|वाणिज्यीकरण का एक दुखद पक्ष यह भी था कि अकाल के दिनों में भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा| कुल मिलकर वाणिज्यीकरण ने भारतीय कृषि का उपनिवेशीकरण किया ना की आधुनिकीकरण जिससे ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय कृषि का अपकर्ष हुआ| 19वीं सदी के पूर्वार्ध में लगभग 14% की गिरावट उत्पादकता में देखी गई|
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भारतीय तटरक्षक बल के कार्यों का वर्णन करते हुए इसके महत्व को भी बताइए | (200 शब्द ) Describing the work of the Indian coast guard, also explain its importance.
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एप्रोच - भूमिका में तटरक्षक बल के बारे में सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात तटरक्षक बल के महत्व की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ तटरक्षक बल के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत की तटीय सीमा की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये भारतीय तट रक्षक बल का गठन किया गया |भारतीय तटरक्षक बल भारत के सभी समुद्री क्षेत्रों में लागू सभी राष्ट्रिय अधिनियमों के उपबंधों का प्रवर्तन करने के लिए प्रमुख संस्था है , जो निम्नलिखित है कार्य करता है - मछुआरों की सुरक्षा करना तथा समुद्र में संकट के समय उनकी सहायता करना | समुद्री प्रदूषण के निवारक एवं नियंत्रक सहित हमारे समुद्री पर्यावरण का संरक्षण और परिरक्षण करना | भारतीय समुद्री अधिनियमों का प्रवर्तन करना | समुद्र में जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करना | घुसपैठ ,अवैध प्रवासन और शरणार्थी अन्तः प्रवाह आदि से रोकथाम हेतु उपाय करना | भारतीय तटरक्षक बल का महत्त्व - अज्ञात पोतों की घुसपैठ रोकने हेतुकोस्टल सर्विलांस नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी आदि की जाती है | तटीय राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए स्वतः पहचान प्रणाली रिसीवरों तथा तटीय राडार ओवरलैपिंग की एक श्रंखला के माध्यम से सम्पूर्ण तट की निगरानी में महत्वपूर्ण योगदान है | नेशनल कमांड कम्युनिकेशन एंड इंटेलिजेंस नेटवर्क | मछुआरों के सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका | तटरक्षक पोतों एवं विमानों की निगरानी करना संयुक्त संचालन केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका | आधुनिक तकनीकी उपाय | भारतीय तटरक्षक बल की उपलब्धियां - समुद्री आतंक ,लूटपाटइत्यादि में सुधार | अज्ञात पोतों से तटीय सुरक्षा | घुसपैठियों के लिए समस्या | तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा | व्यापार में सहयोग इत्यादि | इस प्रकार तटरक्षक बल का कार्य तथा महत्व किसी भी देश के लिए अपना प्रमुख स्थान रखता है - भारत के सन्दर्भ में हिन्द- महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |
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##Question:भारतीय तटरक्षक बल के कार्यों का वर्णन करते हुए इसके महत्व को भी बताइए | (200 शब्द ) Describing the work of the Indian coast guard, also explain its importance.##Answer:एप्रोच - भूमिका में तटरक्षक बल के बारे में सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात तटरक्षक बल के महत्व की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ तटरक्षक बल के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत की तटीय सीमा की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये भारतीय तट रक्षक बल का गठन किया गया |भारतीय तटरक्षक बल भारत के सभी समुद्री क्षेत्रों में लागू सभी राष्ट्रिय अधिनियमों के उपबंधों का प्रवर्तन करने के लिए प्रमुख संस्था है , जो निम्नलिखित है कार्य करता है - मछुआरों की सुरक्षा करना तथा समुद्र में संकट के समय उनकी सहायता करना | समुद्री प्रदूषण के निवारक एवं नियंत्रक सहित हमारे समुद्री पर्यावरण का संरक्षण और परिरक्षण करना | भारतीय समुद्री अधिनियमों का प्रवर्तन करना | समुद्र में जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करना | घुसपैठ ,अवैध प्रवासन और शरणार्थी अन्तः प्रवाह आदि से रोकथाम हेतु उपाय करना | भारतीय तटरक्षक बल का महत्त्व - अज्ञात पोतों की घुसपैठ रोकने हेतुकोस्टल सर्विलांस नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रॉनिक निगरानी आदि की जाती है | तटीय राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए स्वतः पहचान प्रणाली रिसीवरों तथा तटीय राडार ओवरलैपिंग की एक श्रंखला के माध्यम से सम्पूर्ण तट की निगरानी में महत्वपूर्ण योगदान है | नेशनल कमांड कम्युनिकेशन एंड इंटेलिजेंस नेटवर्क | मछुआरों के सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका | तटरक्षक पोतों एवं विमानों की निगरानी करना संयुक्त संचालन केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका | आधुनिक तकनीकी उपाय | भारतीय तटरक्षक बल की उपलब्धियां - समुद्री आतंक ,लूटपाटइत्यादि में सुधार | अज्ञात पोतों से तटीय सुरक्षा | घुसपैठियों के लिए समस्या | तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा | व्यापार में सहयोग इत्यादि | इस प्रकार तटरक्षक बल का कार्य तथा महत्व किसी भी देश के लिए अपना प्रमुख स्थान रखता है - भारत के सन्दर्भ में हिन्द- महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |
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भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ हीभावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये| (200 शब्द) Explain the meaning of emotional intelligence. Along with this, analyze the principles involve in developing emotional intelligence. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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##Question:भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ हीभावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये| (200 शब्द) Explain the meaning of emotional intelligence. Along with this, analyze the principles involve in developing emotional intelligence. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ हीभावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of emotional intelligence. Along with this, analyze the principles involve in developing emotional intelligence.(150-200 Words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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##Question:भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ हीभावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of emotional intelligence. Along with this, analyze the principles involve in developing emotional intelligence.(150-200 Words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता जैसे सिद्धांतभावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में किस प्रकार सहायक हैं|(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of emotional understanding / intelligence. Along with this, explain how self-awareness, empathy, self-regulation, motivation, social skills and happiness are helpful in developing emotional understanding / intelligence.(150-200 Words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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##Question:भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता जैसे सिद्धांतभावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में किस प्रकार सहायक हैं|(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of emotional understanding / intelligence. Along with this, explain how self-awareness, empathy, self-regulation, motivation, social skills and happiness are helpful in developing emotional understanding / intelligence.(150-200 Words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता जैसे सिद्धांत भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में किस प्रकार सहायक हैं| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of emotional understanding / intelligence. Along with this, explain how self-awareness, empathy, self-regulation, motivation, social skills and happiness are helpful in developing emotional understanding / intelligence. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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##Question:भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही स्पष्ट कीजिये कि स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता जैसे सिद्धांत भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में किस प्रकार सहायक हैं| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of emotional understanding / intelligence. Along with this, explain how self-awareness, empathy, self-regulation, motivation, social skills and happiness are helpful in developing emotional understanding / intelligence. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता को विकसित करने में सहायक सिद्धांतों का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में एक समाधानात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक समझ को विकसित करने में सहायक सिद्धांत प्रथम सिद्धांत-स्वजागरूकता · भावनाओं से स्वअवगत होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति के द्वारा अपनी भावना की समझ, अभिव्यक्ति के माध्यम एवं भावनाओं के प्रबंधन की दक्षता को विकसित किया जाना आवश्यक है ताकि भावनाओं को उचित तरीके से नियमित किया जा सके| · भावनाओं की उचित प्रस्तुति के लिए परिस्थिति में विद्यमान विभिन्न कारकों की समझ का होना आवश्यक है अतः भावनाओं को व्यक्त करने के पूर्व इसके प्रभाव को समझा जाना आवश्यक है · अपनी भावना हेतु व्यक्ति को स्वतः उत्तरदायी होना चाहिए द्वितीय सिद्धांत-समानुभूति · किसी अन्य के साथ अपनत्व को विकसित करने की दक्षता हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में संवेदना एवं समानुभूति हो, जो कि व्यक्तिगत एवं पेशेवर दोनों क्षेत्रों में आवश्यक है · समानुभूति को विकसित करने हेतु अन्य की भावना का सामान किया जाना आवश्यक है एवं अन्य के दृष्टिकोण को उसके अनुसार समझा जाए| इसे संभव करने हेतु यह आवश्यक है की अन्य की आवश्यकता एवं इच्छाओं को निहित रूप से समझना आवश्यक है तृतीय सिद्धांत-स्वविनियमन · भावनाओं का स्वनियंत्रण किया जाना आवश्यक है एवं इस सन्दर्भ में कुछ भी करने के पहले सोचना आवश्यक है · भावनाओं को स्वनियमित करने हेतु यह आवश्यक है की व्यक्ति अपनी मजबूती एवं कमियों की पहचान करे · स्वनियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि भावना का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति के द्वारा सही समय पर, सही स्थान पर, सही तरीके से किया जाये · अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के लिए गुस्सा होना आसान है, प्रत्येक व्यक्ति गुस्सा कर सकता है परन्तु सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय और सही जगह पर, सही प्रयोजन के लिए और सही तरीके से गुस्सा करना आसान नहीं है| चतुर्थ सिद्धांत-अभिप्रेरणा · अपनी भावना को लम्बे समय तक बनाए रखने हेतु यह आवश्यक है कि व्यक्ति में अभिप्रेरण की क्षमता हो · व्यक्ति की उपलब्धि दो कारकों पर निर्भर करती है यथा कार्य करने की दक्षता(इसके लिए IQ आवश्यक है) एवं कार्य करने की इच्छाशक्ति (यह अभिप्रेरणा पर निर्भर करता है) पंचम सिद्धांत-सामाजिक दक्षता · सामाजिक दक्षता को विकसित करने हेतु व्यक्ति के द्वारा प्रभावी तरीके से मानवीय परस्पर सम्बन्ध को विकसित किया जाना आवश्यक है| · भावनात्मक समझ एवं सामाजिक दक्षता के मध्य का सम्बन्ध कारण एवं प्रभाव के बीच का पारस्परिक सम्बन्ध है षष्टम सिद्धांत-प्रसन्नता · भावनात्मक समझ को विकसित करने हेतु व्यक्ति के लिए प्रसन्नता का होना आवश्यक है · व्यक्ति को कब प्रसन्न होना है और कब उदास होना है कि मान्यता को निर्धारित करने की दक्षता को विकसित करना चाहिए, सामान्यतः उच्चतर भावनात्मक समझ वाले व्यक्ति को एक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है| · व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है अतः मानवीय परस्पर सम्बन्ध की सामाजिक आवश्यकता की परिपूर्ति प्रत्येक व्यक्ति का आधारभूत लक्षण या विशेषता है जिससे सुचारू बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है, इसके लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति में ऐसी दक्षता हो कि वह प्रसन्नता के स्रोत एवं परिणाम इन दोनों का उचित प्रबंधन कर सके| भावना अपने आप में विषयनिष्ठ होती है जिसे वस्तुनिष्ठ एवं विवेकशील बनाने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है|व्यक्ति में भावनात्मक समझ का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके लिए व्यक्ति का प्रयास सतत होना चाहिए एवं इस प्रयास को प्रभावी बनाने हेतु उपरोक्त वर्णित स्वजागरूकता, समानुभूति, स्वविनियमन, अभिप्रेरणा, सामाजिक दक्षता एवं प्रसन्नता आदि उपरोक्त सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना आवश्यक है|
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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक चरण में नरमपंथियों के प्रमुख लक्ष्यों का उल्लेख करते हुए उनके कार्यों का विश्लेषण कीजिए।(150- 200 शब्द, अंक - 10 ) Mention the major goals of the moderates in the initial phase of the Indian national movement and analyze their works. (150 - 200 words, Marks - 10 )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में राष्ट्रवाद का उदय एवं नरमपंथी विचार के प्रसार को लिखिए। इसके बाद इनके लक्ष्यों का उल्लेख कीजिए। कार्यों के विश्लेषण में उपलब्धियों एवं कमियों दोनों को बताइये। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। काँग्रेस की स्थापना के बाद से ही भारत में राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार हुआ जिसके प्रारम्भिक चरण में काँग्रेस को नेतृत्व प्रदान करने के लिए नरमपंथी नेताओं ने योगदान दिया। इसमें दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि प्रमुख नेता शामिल थे। लक्ष्य: राजनीतिक संगठनों एवं नेताओं के बीच मित्रवत संबंध स्थापित करना जनता को लोकतान्त्रिक राजनीति के लिए प्रशिक्षित करना राष्ट्रीय मांगों का निर्धारण जिसमें आर्थिक, राजनीतिक मुद्दे प्रमुख थे। देश की जनता को आत्मनिर्भर एवं एकता के सूत्र में बांधने के लिए प्रयास करना। शिक्षा एवं सेवाओं को भारतीयों के हित के लिए प्रेरित करना। नरमपंथियों के कार्यों का विश्लेषण: समकालीन परिस्थितियों में अखिल भारतीय संस्था की स्थापना भारतीयों के हित की बात की गयी। किसान, श्रमिक, प्रेस, धन का दोहन आदि के मुद्दे। लोकतान्त्रिक शैली को आगे बढ़ाया। नरमपंथियों द्वारा साम्राज्य के प्रति राजभक्ति की अभिव्यक्ति तथा प्रशासनिक सुधार हेतु अनुनय-विनय की नीति अप्रासंगिक हो चुकी थी।परिणामस्वरूप काँग्रेस के अंदर ही नरमपंथी नेतृत्व एवं उनके विचारों पर एक बड़े समूह द्वारा सवालिया निशान खड़े किए जाने लगे। नरमपंथियों द्वारा कोई सशक्त राष्ट्रीय आंदोलन प्रारम्भ करने में असफल रहने का कारण जनसहभागिता की कमी मनी गयी और यह बात ज़ोर पकड़ने लगी कि इन्हे भिक्षावृत्ति की नीति त्याग कर अपने अधिकारों के लिए आवाज उथनी चाहिए। अपने विचारों का प्रसार करने का प्रयास तो किया गया परंतु आधार मुख्यतः शहरों तक ही सीमित था। 1857 के पश्चात भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को मजबूत करने में इन नेताओं ने सराहनीय कार्य किया। यद्यपि उनके यह प्रयास सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र को प्रभावित नहीं कर सके परंतु बंगाल विभाजन के बाद एक नयी विचारधारा को पनपने में आधार के रूप में कार्य किया।
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##Question:भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक चरण में नरमपंथियों के प्रमुख लक्ष्यों का उल्लेख करते हुए उनके कार्यों का विश्लेषण कीजिए।(150- 200 शब्द, अंक - 10 ) Mention the major goals of the moderates in the initial phase of the Indian national movement and analyze their works. (150 - 200 words, Marks - 10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में राष्ट्रवाद का उदय एवं नरमपंथी विचार के प्रसार को लिखिए। इसके बाद इनके लक्ष्यों का उल्लेख कीजिए। कार्यों के विश्लेषण में उपलब्धियों एवं कमियों दोनों को बताइये। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। काँग्रेस की स्थापना के बाद से ही भारत में राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार हुआ जिसके प्रारम्भिक चरण में काँग्रेस को नेतृत्व प्रदान करने के लिए नरमपंथी नेताओं ने योगदान दिया। इसमें दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि प्रमुख नेता शामिल थे। लक्ष्य: राजनीतिक संगठनों एवं नेताओं के बीच मित्रवत संबंध स्थापित करना जनता को लोकतान्त्रिक राजनीति के लिए प्रशिक्षित करना राष्ट्रीय मांगों का निर्धारण जिसमें आर्थिक, राजनीतिक मुद्दे प्रमुख थे। देश की जनता को आत्मनिर्भर एवं एकता के सूत्र में बांधने के लिए प्रयास करना। शिक्षा एवं सेवाओं को भारतीयों के हित के लिए प्रेरित करना। नरमपंथियों के कार्यों का विश्लेषण: समकालीन परिस्थितियों में अखिल भारतीय संस्था की स्थापना भारतीयों के हित की बात की गयी। किसान, श्रमिक, प्रेस, धन का दोहन आदि के मुद्दे। लोकतान्त्रिक शैली को आगे बढ़ाया। नरमपंथियों द्वारा साम्राज्य के प्रति राजभक्ति की अभिव्यक्ति तथा प्रशासनिक सुधार हेतु अनुनय-विनय की नीति अप्रासंगिक हो चुकी थी।परिणामस्वरूप काँग्रेस के अंदर ही नरमपंथी नेतृत्व एवं उनके विचारों पर एक बड़े समूह द्वारा सवालिया निशान खड़े किए जाने लगे। नरमपंथियों द्वारा कोई सशक्त राष्ट्रीय आंदोलन प्रारम्भ करने में असफल रहने का कारण जनसहभागिता की कमी मनी गयी और यह बात ज़ोर पकड़ने लगी कि इन्हे भिक्षावृत्ति की नीति त्याग कर अपने अधिकारों के लिए आवाज उथनी चाहिए। अपने विचारों का प्रसार करने का प्रयास तो किया गया परंतु आधार मुख्यतः शहरों तक ही सीमित था। 1857 के पश्चात भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को मजबूत करने में इन नेताओं ने सराहनीय कार्य किया। यद्यपि उनके यह प्रयास सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र को प्रभावित नहीं कर सके परंतु बंगाल विभाजन के बाद एक नयी विचारधारा को पनपने में आधार के रूप में कार्य किया।
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Critically examine the efforts taken by government to ensure the welfare of old people. (200 words)
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Structure:- Introduction: Central Body: Issues faced by the Old age People Steps that were taken by govt for old people Drawbacks/loopholes for critical examination Way Forward and a closing argument Answer:- The populationof Old age people is expected to reach up to 20% of the total population. Old age people face health, psychological and economic hardship which make them a vulnerable section of the society. Government. has taken many steps to address these issue which have a mixed result. Issues face by Old age people:- Failing health and economic insecurity Isolation and neglect Susceptible to abuse (physical, sexual, financial, etc.) Lack of preparedness Steps were taken by Govt.:- National Policy for an Older person :- to promote the health and welfare of senior citizens in India. This policy aims to encourage individuals to make provision for their own as well as their spouse’s old age. Extended coverage under the Antyodaya Scheme with emphasis on the provision of food at subsidized rates for the benefit of older persons especially the destitute and marginalized sections. Integrated Program for Older Persons: - This is a scheme that provides financial assistance up to 90 per cent of the project cost to non-governmental organizations or NGOs. This money is used to establish and maintain old age homes, daycare centres, mobile Medicare units and to provide non-institutional services to older persons. TheNational Mental Health Programfocuses on the needs of senior citizens who are affected by Alzheimer’s and other dementias, Parkinson’s disease, depression, and psychogeriatric disorders. Maintenance and Welfare of the Senior Citizens and Parents 2007 Act: - The Act provides the senior citizens to claim monthly maintenance from their children/relatives by Maintenance tribunal. National Policy for Senior citizen: - Promote the concept of Ageing in Place‟ or ageing in own home, housing, income security and homecare services, old age pension and access to healthcare insurance schemes and other programs and services to facilitate and sustain dignity in old age. Drawbacks of the policies:- The elderly in India are much more vulnerable because of the less govt. spending on the social security system. The formal pension system covers only a few, whereas more than 90 per cent of the workforce is in the informal sector and aren’t covered under the formal pension system An elderly population is a heterogeneous group and they have separate issues wrt rural; and urban regions. Hence, One size fits all approach of policies is not very effective Implementation of the policies is very poor The social assistance provided by the National Old Age Pension Scheme (NOAPS) by the Ministry of Rural Development is inadequate and distinguishes between BPL and non-BPL categories which are quite arbitrary. Way Forward:- Longevity dividend can be a new outlook towards old age people as a factor of active ageing Retirement should be decided not on the basis of age but performance Stereotypical attitude towards elderly people needs to be changed Promote income security, old-age pension, and housing Promote the care of senior citizen within the family and institutional care should be considered as last resort Need to work towards an inclusive and age-friendly society Recognize old people as productive assets and encourage employment opportunity.
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##Question:Critically examine the efforts taken by government to ensure the welfare of old people. (200 words)##Answer:Structure:- Introduction: Central Body: Issues faced by the Old age People Steps that were taken by govt for old people Drawbacks/loopholes for critical examination Way Forward and a closing argument Answer:- The populationof Old age people is expected to reach up to 20% of the total population. Old age people face health, psychological and economic hardship which make them a vulnerable section of the society. Government. has taken many steps to address these issue which have a mixed result. Issues face by Old age people:- Failing health and economic insecurity Isolation and neglect Susceptible to abuse (physical, sexual, financial, etc.) Lack of preparedness Steps were taken by Govt.:- National Policy for an Older person :- to promote the health and welfare of senior citizens in India. This policy aims to encourage individuals to make provision for their own as well as their spouse’s old age. Extended coverage under the Antyodaya Scheme with emphasis on the provision of food at subsidized rates for the benefit of older persons especially the destitute and marginalized sections. Integrated Program for Older Persons: - This is a scheme that provides financial assistance up to 90 per cent of the project cost to non-governmental organizations or NGOs. This money is used to establish and maintain old age homes, daycare centres, mobile Medicare units and to provide non-institutional services to older persons. TheNational Mental Health Programfocuses on the needs of senior citizens who are affected by Alzheimer’s and other dementias, Parkinson’s disease, depression, and psychogeriatric disorders. Maintenance and Welfare of the Senior Citizens and Parents 2007 Act: - The Act provides the senior citizens to claim monthly maintenance from their children/relatives by Maintenance tribunal. National Policy for Senior citizen: - Promote the concept of Ageing in Place‟ or ageing in own home, housing, income security and homecare services, old age pension and access to healthcare insurance schemes and other programs and services to facilitate and sustain dignity in old age. Drawbacks of the policies:- The elderly in India are much more vulnerable because of the less govt. spending on the social security system. The formal pension system covers only a few, whereas more than 90 per cent of the workforce is in the informal sector and aren’t covered under the formal pension system An elderly population is a heterogeneous group and they have separate issues wrt rural; and urban regions. Hence, One size fits all approach of policies is not very effective Implementation of the policies is very poor The social assistance provided by the National Old Age Pension Scheme (NOAPS) by the Ministry of Rural Development is inadequate and distinguishes between BPL and non-BPL categories which are quite arbitrary. Way Forward:- Longevity dividend can be a new outlook towards old age people as a factor of active ageing Retirement should be decided not on the basis of age but performance Stereotypical attitude towards elderly people needs to be changed Promote income security, old-age pension, and housing Promote the care of senior citizen within the family and institutional care should be considered as last resort Need to work towards an inclusive and age-friendly society Recognize old people as productive assets and encourage employment opportunity.
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"जनगणना 2011 के अनुसार भारत में घटता लिंगानुपात एक चिंता का विषय है हालाँकि, भारत सरकार के द्वारा इस संदर्भ में विभिन्न प्रयास भी किये जा रहे हैं।" समीक्षा कीजिए। (150 शब्द) According to the census 2011, the declining sexratio in India is a matter of concern, however, various stepsare also being takenby the Government of India in this context. Review. (150 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम,विभिन्न आकड़ों के द्वारा घटते लिंगानुपात की स्थिति पर प्रकाश डालिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में, घटते लिंगानुपात की स्थिति के विभिन्न कारणों को रेखांकित कीजिए। इसके बाद भारत सरकार द्वारा इस संदर्भ में किये जाये रहे विभिन्न प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में संतुलित निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- 1901 में भारत में पुरुषों की तुलना में 3.2 मिलियन कम महिलाएं थीं। 100वर्षबाद 2001 की जनगणना के समय यह कमी10 गुना बढ़कर 35 मिलियन हो गयी।जनगणना 2011 के अनुसारयद्यपि लिंगानुपात वर्ष 2001 में 933 से बढ़कर 943 हुआ है परन्तुसबसे अधिक चिंतनीयगिरावट 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग में देखी गई है। शिशु लिंगानुपात 927 से घटकर 919 हो गया है। 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग में शिशु लिंगानुपात 1941 में 1010 से 2001 में 927 होना तथा 2011 में यह और गिरकर 919 हो गया। जनगणना 2011 से सम्बंधितकुछ अन्य तथ्य एवं चिंताएं:- औद्योगिक देशों केअधिकांश समाजों में 0-6 वर्ष केबच्चों का लिंगानुपातस्वस्थ है, यानी 0 - 6 आयु वर्ग में लड़कियों और लड़कों की संख्या समान है लेकिनभारत में इसमें तेज़ी से गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इसके अतिरिक्तसमृद्ध क्षेत्रों का लिंगानुपात तेज़ी से गिरा है जैसे दिल्ली, पंजाब एवं हरियाणा,जो यह स्पष्ट करता है कि पुरुष प्रधानता एवं तकनीकी सुलभता वह दो मुख्य घटक हैं जिनके कारण लिंगानुपात पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसके विपरीतवास्तव में, कुछ सबसे पिछड़ेराज्यों का लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जातिगत संदर्भों में अनुसूचित जनजातियों का लिंगानुपात 990, अनुसूचित जातियों का 949 तथा सामान्य वर्ग का 901 यह स्पष्ट करता है कि जनजातीय समूहों में लैंगिक असमानता न होना तथा नई जैव प्रोद्योगिक तकनीकों का दुरूपयोग न होना इस संदर्भ में मुख्य घटक हैं। धार्मिक संदर्भ में सबसे अच्छा लिंगानुपात ईसाई समुदाय का 1030 है तथा न्यूनतम लिंगानुपात सिख समुदाय का 902 है। सिख समुदाय में शिशु लिंगानुपात घटकर 828 हो गया है। लिंगानुपात गिरने के कारण:- लड़कियों की संख्या में कमी के लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जैसे,बालिकाओं की उपेक्षा, उच्च मातृ मृत्यु दर, कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियोंके प्रति पूर्वाग्रह की व्यवस्था जिसकी जड़ें भारत के रूढ़िवादी सामाजिक इतिहास में भी देखीजा सकती हैइत्यादि। डायग्नोस्टिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग से सेक्स-चयनात्मक गर्भपात की सुविधा बढ़ी है।अमीनोसेनटेसिस(amniocentesis) तथा 4.0 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड इत्यादि तकनीकों ने भ्रूण परीक्षण को सुलभ बना दिया है । इसी संदर्भ में भारत सरकार के द्वारा इस संदर्भ में निम्नलिखित विभिन्न प्रयास भी किये जा रहे हैं- भारत सरकार द्वारालिंग चयन और कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे को सार्वजनिक एजेंडे पर रखा गया हैऔर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों में व्यापक जागरूकता पैदा की जा रही है। अमीनोसेनटेसिस तथा 4.0 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड इत्यादि तकनीकोंके दुरूपयोग को रोकने हेतु वर्ष 1994 में PCPNDT एक्ट बनाया गया,जिसके अंतर्गत किसी भी प्रकार से भ्रूण परीक्षण एक दंडनीय अपराध है।यह भ्रूण के लिंग के जन्म के पूर्व निर्धारण की सुविधाओं के संबंध में विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगाता है। प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का उपयोग करने वाले सभी क्लीनिकों को पंजीकृत होना आवश्यक है। अधिनियम का उल्लंघन करने परकारावास का भी प्रावधान है। वर्ष 2015 में इस समस्या की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया जिसके दो मुख्य उद्देश्यों में भ्रूण हत्याएं ख़त्म करना तथा बालिकाओं के संदर्भ में सामाजिक सोच को परिवर्तित करना है। इस संदर्भ में तीन मंत्रालय एक साथ इस योजना को विभिन्न चरणों में क्रियान्वित कर रहे हैं। पहले चरण में 100 जिले, द्वितीय चरण में 61 और तृतीय चरण में अखिल भारतीय स्तर पर इसे क्रियान्वित किया जा रहा है। इस योजना में अल्पावधि में लिंग अनुपात में सुधार लाने की परिकल्पना की गई है। इसमें शिशुलिंग अनुपात के साथ साथबेहतर स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा में लिंग समानता, बेहतर स्वच्छता एवं समान अवसर जैसे सभी प्रकार से एक होलोस्टिक दृष्टिकोण को अपनाया गया है। दीर्घावधि में लिंग के बीच विषमता को हटाने का प्रयास किया जाएगा। इसके अतिरिक्त महिलाओं से संबंधित विभिन्न योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। यह देखा गया है कि समाज मेंमहिलाओं से संबंधित विभिन्न रूढ़िगत प्रथाएं एवं पूर्वाग्रहविद्यमान हैं तथा विभिन्न सुविधाओं तक महिलाओं की पहुँच न होना भी इन पूर्वाग्रहों को बनाये रखने एवं उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव अंततः लिंगानुपात में गिरावट के रूप में दृष्टिगत होता है। इस संदर्भ में सरकार विभिन्न प्रयास कर रही है जैसे स्वच्छ भारत अभियान द्वारा शौचालयों के निर्माण से महिलाओं के जीवन को आसान बनाना, किशोरियों के लिए विभिन कार्यक्रम एवं योजनाएं इत्यादि। इसी प्रकार महिलाओं की सुरक्षा से सम्बंधित भी कई उपाए किये गए है जैसेदहेज़ निरोधक कानून 1961,महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, वर्ष 1986, वन स्टॉप सेंटर जिसके अंतर्गत शिकायत को सहज बनाया जा रहा है। महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा का कानून, 2005, IPC 498A के अंतर्गत दहेज़ के कारण हो रही घरेलू हिंसा जघन्य दंडनीय अपराध है। कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में कार्यस्थल पर यौनशोषण निरोधक कानून के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि महिलाओं पर कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार का यौनशोषण न हो रहा हो इत्यादि। जागरूकता अभियान के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय और निजी टेलीविजन नेटवर्क पर सेक्स चयन के बारे में अभियान तथासरकार के द्वाराब्रांड एंबेसडर का उपयोग भीकिया जा रहाहै। अतः भारत सरकार विभिन्न स्तर पर महिलाओं के जीवन को सुलभ बनाने के प्रयास कर रही है परन्तु जब सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं के प्रति भेदभावों, पूर्वाग्रहों एवं असमनताओं की जड़ें गहरी एवं मज़बूत हो तो उन्हें उखाड़ने में समय लगता है। भारत सरकार के प्रयास इस दिशा में सराहनीय हैं परन्तु अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकि है।
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##Question:"जनगणना 2011 के अनुसार भारत में घटता लिंगानुपात एक चिंता का विषय है हालाँकि, भारत सरकार के द्वारा इस संदर्भ में विभिन्न प्रयास भी किये जा रहे हैं।" समीक्षा कीजिए। (150 शब्द) According to the census 2011, the declining sexratio in India is a matter of concern, however, various stepsare also being takenby the Government of India in this context. Review. (150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,विभिन्न आकड़ों के द्वारा घटते लिंगानुपात की स्थिति पर प्रकाश डालिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में, घटते लिंगानुपात की स्थिति के विभिन्न कारणों को रेखांकित कीजिए। इसके बाद भारत सरकार द्वारा इस संदर्भ में किये जाये रहे विभिन्न प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में संतुलित निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापनकीजिए। उत्तर:- 1901 में भारत में पुरुषों की तुलना में 3.2 मिलियन कम महिलाएं थीं। 100वर्षबाद 2001 की जनगणना के समय यह कमी10 गुना बढ़कर 35 मिलियन हो गयी।जनगणना 2011 के अनुसारयद्यपि लिंगानुपात वर्ष 2001 में 933 से बढ़कर 943 हुआ है परन्तुसबसे अधिक चिंतनीयगिरावट 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग में देखी गई है। शिशु लिंगानुपात 927 से घटकर 919 हो गया है। 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग में शिशु लिंगानुपात 1941 में 1010 से 2001 में 927 होना तथा 2011 में यह और गिरकर 919 हो गया। जनगणना 2011 से सम्बंधितकुछ अन्य तथ्य एवं चिंताएं:- औद्योगिक देशों केअधिकांश समाजों में 0-6 वर्ष केबच्चों का लिंगानुपातस्वस्थ है, यानी 0 - 6 आयु वर्ग में लड़कियों और लड़कों की संख्या समान है लेकिनभारत में इसमें तेज़ी से गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इसके अतिरिक्तसमृद्ध क्षेत्रों का लिंगानुपात तेज़ी से गिरा है जैसे दिल्ली, पंजाब एवं हरियाणा,जो यह स्पष्ट करता है कि पुरुष प्रधानता एवं तकनीकी सुलभता वह दो मुख्य घटक हैं जिनके कारण लिंगानुपात पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसके विपरीतवास्तव में, कुछ सबसे पिछड़ेराज्यों का लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जातिगत संदर्भों में अनुसूचित जनजातियों का लिंगानुपात 990, अनुसूचित जातियों का 949 तथा सामान्य वर्ग का 901 यह स्पष्ट करता है कि जनजातीय समूहों में लैंगिक असमानता न होना तथा नई जैव प्रोद्योगिक तकनीकों का दुरूपयोग न होना इस संदर्भ में मुख्य घटक हैं। धार्मिक संदर्भ में सबसे अच्छा लिंगानुपात ईसाई समुदाय का 1030 है तथा न्यूनतम लिंगानुपात सिख समुदाय का 902 है। सिख समुदाय में शिशु लिंगानुपात घटकर 828 हो गया है। लिंगानुपात गिरने के कारण:- लड़कियों की संख्या में कमी के लिए कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जैसे,बालिकाओं की उपेक्षा, उच्च मातृ मृत्यु दर, कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियोंके प्रति पूर्वाग्रह की व्यवस्था जिसकी जड़ें भारत के रूढ़िवादी सामाजिक इतिहास में भी देखीजा सकती हैइत्यादि। डायग्नोस्टिक प्रक्रियाओं के दुरुपयोग से सेक्स-चयनात्मक गर्भपात की सुविधा बढ़ी है।अमीनोसेनटेसिस(amniocentesis) तथा 4.0 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड इत्यादि तकनीकों ने भ्रूण परीक्षण को सुलभ बना दिया है । इसी संदर्भ में भारत सरकार के द्वारा इस संदर्भ में निम्नलिखित विभिन्न प्रयास भी किये जा रहे हैं- भारत सरकार द्वारालिंग चयन और कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे को सार्वजनिक एजेंडे पर रखा गया हैऔर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों में व्यापक जागरूकता पैदा की जा रही है। अमीनोसेनटेसिस तथा 4.0 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड इत्यादि तकनीकोंके दुरूपयोग को रोकने हेतु वर्ष 1994 में PCPNDT एक्ट बनाया गया,जिसके अंतर्गत किसी भी प्रकार से भ्रूण परीक्षण एक दंडनीय अपराध है।यह भ्रूण के लिंग के जन्म के पूर्व निर्धारण की सुविधाओं के संबंध में विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगाता है। प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का उपयोग करने वाले सभी क्लीनिकों को पंजीकृत होना आवश्यक है। अधिनियम का उल्लंघन करने परकारावास का भी प्रावधान है। वर्ष 2015 में इस समस्या की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया जिसके दो मुख्य उद्देश्यों में भ्रूण हत्याएं ख़त्म करना तथा बालिकाओं के संदर्भ में सामाजिक सोच को परिवर्तित करना है। इस संदर्भ में तीन मंत्रालय एक साथ इस योजना को विभिन्न चरणों में क्रियान्वित कर रहे हैं। पहले चरण में 100 जिले, द्वितीय चरण में 61 और तृतीय चरण में अखिल भारतीय स्तर पर इसे क्रियान्वित किया जा रहा है। इस योजना में अल्पावधि में लिंग अनुपात में सुधार लाने की परिकल्पना की गई है। इसमें शिशुलिंग अनुपात के साथ साथबेहतर स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा में लिंग समानता, बेहतर स्वच्छता एवं समान अवसर जैसे सभी प्रकार से एक होलोस्टिक दृष्टिकोण को अपनाया गया है। दीर्घावधि में लिंग के बीच विषमता को हटाने का प्रयास किया जाएगा। इसके अतिरिक्त महिलाओं से संबंधित विभिन्न योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। यह देखा गया है कि समाज मेंमहिलाओं से संबंधित विभिन्न रूढ़िगत प्रथाएं एवं पूर्वाग्रहविद्यमान हैं तथा विभिन्न सुविधाओं तक महिलाओं की पहुँच न होना भी इन पूर्वाग्रहों को बनाये रखने एवं उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव अंततः लिंगानुपात में गिरावट के रूप में दृष्टिगत होता है। इस संदर्भ में सरकार विभिन्न प्रयास कर रही है जैसे स्वच्छ भारत अभियान द्वारा शौचालयों के निर्माण से महिलाओं के जीवन को आसान बनाना, किशोरियों के लिए विभिन कार्यक्रम एवं योजनाएं इत्यादि। इसी प्रकार महिलाओं की सुरक्षा से सम्बंधित भी कई उपाए किये गए है जैसेदहेज़ निरोधक कानून 1961,महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, वर्ष 1986, वन स्टॉप सेंटर जिसके अंतर्गत शिकायत को सहज बनाया जा रहा है। महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा का कानून, 2005, IPC 498A के अंतर्गत दहेज़ के कारण हो रही घरेलू हिंसा जघन्य दंडनीय अपराध है। कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में कार्यस्थल पर यौनशोषण निरोधक कानून के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि महिलाओं पर कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार का यौनशोषण न हो रहा हो इत्यादि। जागरूकता अभियान के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय और निजी टेलीविजन नेटवर्क पर सेक्स चयन के बारे में अभियान तथासरकार के द्वाराब्रांड एंबेसडर का उपयोग भीकिया जा रहाहै। अतः भारत सरकार विभिन्न स्तर पर महिलाओं के जीवन को सुलभ बनाने के प्रयास कर रही है परन्तु जब सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं के प्रति भेदभावों, पूर्वाग्रहों एवं असमनताओं की जड़ें गहरी एवं मज़बूत हो तो उन्हें उखाड़ने में समय लगता है। भारत सरकार के प्रयास इस दिशा में सराहनीय हैं परन्तु अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकि है।
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What are corals? Explaining the phenomenon of coral bleaching mention some of its causes. (10 marks/150 words)
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Brief Approach:- Write a short introduction on Corals. Explain the concept of Coral Bleaching. · Write down the reasons for Coral Bleaching. Answer:- Corals are marine polyps that live in colonies. They are invertebrates and are classified as either warm water corals or cold water corals. The warm water corals live in a symbiotic relation with the Zooxanthellae (algae) and are responsible for the reef formation, which are protective shells of calcium carbonate. They obtain their energy from the zooxanthellae which performs photosynthesis. Coral reefs are important for marine ecosystem as they help in recycling of the resources, are areas of high biodiversity and also help absorbcarbon dioxide which is a greenhouse gas and hence knows as the tropical rainforests of the ocean. Coral Bleaching is a phenomenon which occurs when the reef building corals are stressed due to unfavourable environmental condition. The zooxanthellaes are expelled from the coral tissue which leads to the discolouration of the corals. When a coral bleaches, it is not dead. Corals can survive a bleaching event, but they are under more stress and are subject to mortality as they are starved off of food which may cause irreversible damages to the coral reef.The Great Barrier Reef situated off eastern coast of Australia has suffered mass coral bleaching in the recent decades. Reasons for Coral Bleaching:- Change in the water temperature on the surface of the ocean due to climate change. Coral bleaching not only takes place when the water temperature increases but also when the water is too cold. Eg. Observed in January 2010 in USA. Reef forming corals survive in clear water as the sunlight can penetrate for photosynthesis. The excess sedimentation of the coast has contributed to the coral bleaching The increasingcarbon dioxide emission has increased the dissolved carbon dioxide in the oceans which increases the acidity of the water. This causes the calcium carbonate structure to weaken leaving the corals vulnerable. Corals are negative affected by changing sea water salinity which is another consequence of the climate change. The activity such as cyanide fishing may also lead to events of coral bleaching as it may inhibit the photosynthetic ability of the zooxanthellae. The pollutants which find their way to the seas and oceans also contribute to coral bleaching. They speed the growth of other damaging algae and also impede coral growth and reproduction. Not only are the coral reefs important for the health of our oceans and an important source of livelihood for people in forms of tourism and fishing but they also help break the waves and reduces erosion of the coast. Coral reef acts as a barrier along coastline and reduces the energy of Tsunamis. It is imperative we take measures to address the phenomenon of coral bleaching.
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##Question:What are corals? Explaining the phenomenon of coral bleaching mention some of its causes. (10 marks/150 words)##Answer:Brief Approach:- Write a short introduction on Corals. Explain the concept of Coral Bleaching. · Write down the reasons for Coral Bleaching. Answer:- Corals are marine polyps that live in colonies. They are invertebrates and are classified as either warm water corals or cold water corals. The warm water corals live in a symbiotic relation with the Zooxanthellae (algae) and are responsible for the reef formation, which are protective shells of calcium carbonate. They obtain their energy from the zooxanthellae which performs photosynthesis. Coral reefs are important for marine ecosystem as they help in recycling of the resources, are areas of high biodiversity and also help absorbcarbon dioxide which is a greenhouse gas and hence knows as the tropical rainforests of the ocean. Coral Bleaching is a phenomenon which occurs when the reef building corals are stressed due to unfavourable environmental condition. The zooxanthellaes are expelled from the coral tissue which leads to the discolouration of the corals. When a coral bleaches, it is not dead. Corals can survive a bleaching event, but they are under more stress and are subject to mortality as they are starved off of food which may cause irreversible damages to the coral reef.The Great Barrier Reef situated off eastern coast of Australia has suffered mass coral bleaching in the recent decades. Reasons for Coral Bleaching:- Change in the water temperature on the surface of the ocean due to climate change. Coral bleaching not only takes place when the water temperature increases but also when the water is too cold. Eg. Observed in January 2010 in USA. Reef forming corals survive in clear water as the sunlight can penetrate for photosynthesis. The excess sedimentation of the coast has contributed to the coral bleaching The increasingcarbon dioxide emission has increased the dissolved carbon dioxide in the oceans which increases the acidity of the water. This causes the calcium carbonate structure to weaken leaving the corals vulnerable. Corals are negative affected by changing sea water salinity which is another consequence of the climate change. The activity such as cyanide fishing may also lead to events of coral bleaching as it may inhibit the photosynthetic ability of the zooxanthellae. The pollutants which find their way to the seas and oceans also contribute to coral bleaching. They speed the growth of other damaging algae and also impede coral growth and reproduction. Not only are the coral reefs important for the health of our oceans and an important source of livelihood for people in forms of tourism and fishing but they also help break the waves and reduces erosion of the coast. Coral reef acts as a barrier along coastline and reduces the energy of Tsunamis. It is imperative we take measures to address the phenomenon of coral bleaching.
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What do you understand by base year in GDP calculation? What are the rationale and criteria for selecting a Base year in GDP calculation? (150 words/10 marks)
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Approach- 1. Define base year. 2. Explain the criteria for choosing base year in GDP calculation. Answer- To make the Calculations of Gross domestic product or Gross national product easier, economists use a price index to find the real GNP/GDP. A price index is a number showing the changes in the overall level of prices. It shows a change in the general price level of the economy. The base year is the year used as the beginning or the reference year for constructing an index, and which is usually assigned an arbitrary value of 100. A base year is used for comparison in the measure of business activity or economic index. For example, to find the rate ofinflationbetween 2013and 2018, 2013isthe base yearor the first year in the time set. The base year can also describe the starting point from a point of growthor a baseline for calculatingsame-store sales. The base year is also used for calculating real GDP and nominal GDP with the help of it GDP deflator can also be found. The Indian government had earlier changed the base year to 2011-12 from 2004-05. Recently the government announces to change the base year for calculation of GDP and retail inflation to 2017-18 and 2018 respectively, which is likely to come to effect by 2019-20. Following are the criterion for choosing the base year. 1. Stability of macroeconomic parameters. It has to be a normal year without large fluctuations in production, trade, and prices of goods and services. 2. Data availability - Data available for the year should be reliable. 3. Comparability - so that the same parameter should be in use in both the years. therefore it should be a recent year and not go long back into history. Hence choosing the correct base year on the basis of given criterion ensures correct estimation of GDP and inflation
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##Question:What do you understand by base year in GDP calculation? What are the rationale and criteria for selecting a Base year in GDP calculation? (150 words/10 marks)##Answer:Approach- 1. Define base year. 2. Explain the criteria for choosing base year in GDP calculation. Answer- To make the Calculations of Gross domestic product or Gross national product easier, economists use a price index to find the real GNP/GDP. A price index is a number showing the changes in the overall level of prices. It shows a change in the general price level of the economy. The base year is the year used as the beginning or the reference year for constructing an index, and which is usually assigned an arbitrary value of 100. A base year is used for comparison in the measure of business activity or economic index. For example, to find the rate ofinflationbetween 2013and 2018, 2013isthe base yearor the first year in the time set. The base year can also describe the starting point from a point of growthor a baseline for calculatingsame-store sales. The base year is also used for calculating real GDP and nominal GDP with the help of it GDP deflator can also be found. The Indian government had earlier changed the base year to 2011-12 from 2004-05. Recently the government announces to change the base year for calculation of GDP and retail inflation to 2017-18 and 2018 respectively, which is likely to come to effect by 2019-20. Following are the criterion for choosing the base year. 1. Stability of macroeconomic parameters. It has to be a normal year without large fluctuations in production, trade, and prices of goods and services. 2. Data availability - Data available for the year should be reliable. 3. Comparability - so that the same parameter should be in use in both the years. therefore it should be a recent year and not go long back into history. Hence choosing the correct base year on the basis of given criterion ensures correct estimation of GDP and inflation
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Write a short note on the Finance Commission of India, with special emphasis on the 14th and 15th Finance Commissions. (250 words/15marks)
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BRIEF APPROACH: INTRODUCTION FUNCTIONS OF THE FINANCE COMMISSION OF INDIA THE 14th FINANCE COMMISSION THE 15th FINANCE COMMISSION CONCLUSION Answer:- Article 280 provides for the Finance Commission of India. The President of India appoints FC every 5th year. FUNCTIONS OF THE FINANCE COMMISSION OF INDIA The functions of FC as per the constitution of India are: 1) DISTRIBUTION OF TAXES It decides the distribution of taxes between the centre and states. 2) Article 275 It determines the amount of grants-in-aid to be provided to the state governments. 3) AUGMENTING THE CONSOLIDATED FUNDS OF STATES It decides for the supplementing the state government revenue for the working of Panchayats and municipalities. 4) ANY OTHER FUNCTION Any other function as referred to the Commission by the President THE 14th FINANCE COMMISSION 1) CHAIRMAN It was headed by YV Reddy. 2) PERIOD It has been constituted for the period from 1st April 2015 to 31st March 2020 3) RECOMMENDATIONS It recommended that 42% of the nenetroceeds ( grants) be devolved to the state governments. 3.1) The parameters on the basis of which this amount must be distributed between the states (horizontal distribution) are: Population - 17.5% weightage has been given to this aspect. Demographic change - 10% weightage has been given to this aspect. Income distance- 50% weightage given Area- 15% weightage given Forest cover- remaining weightage has been given to this aspect. THE 15th FINANCE COMMISSION 1) CHAIRMAN The 15th FC is headed by N.K. Singh. 2) TIME PERIOD It has been constituted for the period from 1st April 2020 to 31st March 2025. 3) TASKS It has been provided with the following tasks: 3.1) Strengthen cooperative federalism. 3.2) Improve the quality of public spending. 3.3) To help protect fiscal stability 5) ISSUE The 15th Finance Commission has come under controversy due to the alleged decision to consider 2011 the census for determining the population of the state. (The more the population, the more the s they would receive from the centre).center if this recommendation is implemented it would result in the south Indian states being further penalized . The reports expected of the 15th Finance Commission are expected in 2019, only after which it would be possible to make a more detailed and conclusive analysis/ judgment regarding the recommendations.
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##Question:Write a short note on the Finance Commission of India, with special emphasis on the 14th and 15th Finance Commissions. (250 words/15marks)##Answer:BRIEF APPROACH: INTRODUCTION FUNCTIONS OF THE FINANCE COMMISSION OF INDIA THE 14th FINANCE COMMISSION THE 15th FINANCE COMMISSION CONCLUSION Answer:- Article 280 provides for the Finance Commission of India. The President of India appoints FC every 5th year. FUNCTIONS OF THE FINANCE COMMISSION OF INDIA The functions of FC as per the constitution of India are: 1) DISTRIBUTION OF TAXES It decides the distribution of taxes between the centre and states. 2) Article 275 It determines the amount of grants-in-aid to be provided to the state governments. 3) AUGMENTING THE CONSOLIDATED FUNDS OF STATES It decides for the supplementing the state government revenue for the working of Panchayats and municipalities. 4) ANY OTHER FUNCTION Any other function as referred to the Commission by the President THE 14th FINANCE COMMISSION 1) CHAIRMAN It was headed by YV Reddy. 2) PERIOD It has been constituted for the period from 1st April 2015 to 31st March 2020 3) RECOMMENDATIONS It recommended that 42% of the nenetroceeds ( grants) be devolved to the state governments. 3.1) The parameters on the basis of which this amount must be distributed between the states (horizontal distribution) are: Population - 17.5% weightage has been given to this aspect. Demographic change - 10% weightage has been given to this aspect. Income distance- 50% weightage given Area- 15% weightage given Forest cover- remaining weightage has been given to this aspect. THE 15th FINANCE COMMISSION 1) CHAIRMAN The 15th FC is headed by N.K. Singh. 2) TIME PERIOD It has been constituted for the period from 1st April 2020 to 31st March 2025. 3) TASKS It has been provided with the following tasks: 3.1) Strengthen cooperative federalism. 3.2) Improve the quality of public spending. 3.3) To help protect fiscal stability 5) ISSUE The 15th Finance Commission has come under controversy due to the alleged decision to consider 2011 the census for determining the population of the state. (The more the population, the more the s they would receive from the centre).center if this recommendation is implemented it would result in the south Indian states being further penalized . The reports expected of the 15th Finance Commission are expected in 2019, only after which it would be possible to make a more detailed and conclusive analysis/ judgment regarding the recommendations.
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भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द) Describe the key features of Indian society. (150 -200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं| भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है| इसमें कई धर्म,जाति,भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं. उनकी संस्कृतियां अलग हैं,लोक-व्यवहार अलग हैं| भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं · ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज स्वयं में निरन्तरता एवं परिवर्तन का एक सजीव उदाहरण रहा है| समकालीन भारतीय समाज की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं- · भारतीय समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है जिसकी अधिकाँश जनसंख्या कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर निर्भर है · भारतीय समाज में सामाजिक असमानता हेतु जाति आधारित सामाजिक संस्था विद्यमान है जो समकालीन भारत में परिवर्तित हो रही है · भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी पायी जाती है · भारतीय समाज का एक बड़ा समुदाय जनजातीय समुदाय है जो तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है · भारतीय समाज में परंपरा एवं आधुनिकता में एक सामंजस्य दिखाई देता है, इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना)(जनेऊ के साथ टाई धारण करना) · भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक संस्थानों के मध्य एक परस्पर सामंजस्य एवं संतुलन दिखाई देता है, जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करता है(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना) · भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय, बहु-भाषाई, बहु धार्मिक एवं भौगोलिक क्षेत्रीय विविधता वाला समाज है किन्तु इनमें विविधता में एकता भी दिखाई देती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है|
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##Question:भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द) Describe the key features of Indian society. (150 -200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं| भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है| इसमें कई धर्म,जाति,भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं. उनकी संस्कृतियां अलग हैं,लोक-व्यवहार अलग हैं| भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं · ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज स्वयं में निरन्तरता एवं परिवर्तन का एक सजीव उदाहरण रहा है| समकालीन भारतीय समाज की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं- · भारतीय समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है जिसकी अधिकाँश जनसंख्या कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर निर्भर है · भारतीय समाज में सामाजिक असमानता हेतु जाति आधारित सामाजिक संस्था विद्यमान है जो समकालीन भारत में परिवर्तित हो रही है · भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी पायी जाती है · भारतीय समाज का एक बड़ा समुदाय जनजातीय समुदाय है जो तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है · भारतीय समाज में परंपरा एवं आधुनिकता में एक सामंजस्य दिखाई देता है, इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना)(जनेऊ के साथ टाई धारण करना) · भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक संस्थानों के मध्य एक परस्पर सामंजस्य एवं संतुलन दिखाई देता है, जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करता है(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना) · भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय, बहु-भाषाई, बहु धार्मिक एवं भौगोलिक क्षेत्रीय विविधता वाला समाज है किन्तु इनमें विविधता में एकता भी दिखाई देती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है|
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भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the key features of Indian society. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं| भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है| इसमें कई धर्म,जाति,भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं. उनकी संस्कृतियां अलग हैं,लोक-व्यवहार अलग हैं| भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं · ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज स्वयं में निरन्तरता एवं परिवर्तन का एक सजीव उदाहरण रहा है| समकालीन भारतीय समाज की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं- · भारतीय समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है जिसकी अधिकाँश जनसंख्या कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर निर्भर है · भारतीय समाज में सामाजिक असमानता हेतु जाति आधारित सामाजिक संस्था विद्यमान है जो समकालीन भारत में परिवर्तित हो रही है · भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी पायी जाती है · भारतीय समाज का एक बड़ा समुदाय जनजातीय समुदाय है जो तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है · भारतीय समाज में परंपरा एवं आधुनिकता में एक सामंजस्य दिखाई देता है, इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना)(जनेऊ के साथ टाई धारण करना) · भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक संस्थानों के मध्य एक परस्पर सामंजस्य एवं संतुलन दिखाई देता है, जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करता है(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना) · भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय, बहु-भाषाई, बहु धार्मिक एवं भौगोलिक क्षेत्रीय विविधता वाला समाज है किन्तु इनमें विविधता में एकता भी दिखाई देती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है|
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##Question:भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the key features of Indian society. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं| भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है| इसमें कई धर्म,जाति,भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं. उनकी संस्कृतियां अलग हैं,लोक-व्यवहार अलग हैं| भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं · ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज स्वयं में निरन्तरता एवं परिवर्तन का एक सजीव उदाहरण रहा है| समकालीन भारतीय समाज की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं- · भारतीय समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है जिसकी अधिकाँश जनसंख्या कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर निर्भर है · भारतीय समाज में सामाजिक असमानता हेतु जाति आधारित सामाजिक संस्था विद्यमान है जो समकालीन भारत में परिवर्तित हो रही है · भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी पायी जाती है · भारतीय समाज का एक बड़ा समुदाय जनजातीय समुदाय है जो तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है · भारतीय समाज में परंपरा एवं आधुनिकता में एक सामंजस्य दिखाई देता है, इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना)(जनेऊ के साथ टाई धारण करना) · भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक संस्थानों के मध्य एक परस्पर सामंजस्य एवं संतुलन दिखाई देता है, जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करता है(परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना) · भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय, बहु-भाषाई, बहु धार्मिक एवं भौगोलिक क्षेत्रीय विविधता वाला समाज है किन्तु इनमें विविधता में एकता भी दिखाई देती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है|
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Disability is as much social as it is physical”. Discuss. (150 words)
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Disability is as much social as it is physical”. Discuss Structure:- 1. Definition and issues in brief 2. How disability is a physical issue 3. How disability is a social issue as well 4. Way Forward Answer:- Disability refers to the lack of ability to perform an activity which is considered normal for a human being; It has a negative connotation and is used in the context of developing countries as against differently-abled people. How disability is a physical issue:- Physical barriers are structural obstacles in natural or manmade environments that prevent or block mobility (moving around in the environment) or access Absence of a weight scale that accommodates wheelchairs or others who have difficulty stepping up. Railways, education institutes, and other infrastructures don’t provide special provisions for disabled people which restricts them for easy access to the services. Communication barriers are experienced by people who have disabilities that affect hearing, speaking, reading, writing, and or understanding, Disability as a social problem The differently-abled person is disabled not because he/she is physically or mentally impaired, but due to the inherent nature of society which stigmatizes and ostracize them. There is a cultural perception in the society that disability is retribution of past Karma for which there is no respite. Stereotyping: People sometimes stereotype those with disabilities, assuming their quality of life is poor or that they are unhealthy because of their impairments. Within society attitudes like Stigma,prejudice, anddiscrimination may come from people’s ideas related to disability There exist an attitude of mocking and sympathy where a disabled person is viewed as a victim who is often being ridiculed. Underreporting for differently-abled people in census further leads to the ostracization of them from govt. schemes People with mental disability face the most isolation as they are considered not fit to communicate in society as a result of social stigma. Apart from these, there are policy barriers too where individuals with disabilities are denied access to programs, services, benefits, or opportunities to participate as a result of physical barriers Because of policy and infrastructure lacuna, they have limited access to education, skills and job opportunity and political representation. It leads to poverty and unhygienic conditions. Govt. fails to provide infra and facility, because it is considered there retribution of and karma. Because of the lack of access to the infrastructure and services, people with some disability are not able to enjoy their political, economic and socio-cultural rights. Hence, they exist as a ghost Citizens. Way Forward:- Strong laws are required to serve as deterrence and promote e-learning ad mandatory compliance with the accessibility Under Right to Education, promote inclusive education without labelling To create special schools for the disabled people to taking care of their special needs Special disability courts for speedy disposal of cases The incentive to private employers and resource creation through Cess. Reservation can be extended to private jobs and Promote Entrepreneurship through hand holding Create an institute for professional caretakers following NSDA( National Skill Development Authority) guidelines
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##Question:Disability is as much social as it is physical”. Discuss. (150 words)##Answer:Disability is as much social as it is physical”. Discuss Structure:- 1. Definition and issues in brief 2. How disability is a physical issue 3. How disability is a social issue as well 4. Way Forward Answer:- Disability refers to the lack of ability to perform an activity which is considered normal for a human being; It has a negative connotation and is used in the context of developing countries as against differently-abled people. How disability is a physical issue:- Physical barriers are structural obstacles in natural or manmade environments that prevent or block mobility (moving around in the environment) or access Absence of a weight scale that accommodates wheelchairs or others who have difficulty stepping up. Railways, education institutes, and other infrastructures don’t provide special provisions for disabled people which restricts them for easy access to the services. Communication barriers are experienced by people who have disabilities that affect hearing, speaking, reading, writing, and or understanding, Disability as a social problem The differently-abled person is disabled not because he/she is physically or mentally impaired, but due to the inherent nature of society which stigmatizes and ostracize them. There is a cultural perception in the society that disability is retribution of past Karma for which there is no respite. Stereotyping: People sometimes stereotype those with disabilities, assuming their quality of life is poor or that they are unhealthy because of their impairments. Within society attitudes like Stigma,prejudice, anddiscrimination may come from people’s ideas related to disability There exist an attitude of mocking and sympathy where a disabled person is viewed as a victim who is often being ridiculed. Underreporting for differently-abled people in census further leads to the ostracization of them from govt. schemes People with mental disability face the most isolation as they are considered not fit to communicate in society as a result of social stigma. Apart from these, there are policy barriers too where individuals with disabilities are denied access to programs, services, benefits, or opportunities to participate as a result of physical barriers Because of policy and infrastructure lacuna, they have limited access to education, skills and job opportunity and political representation. It leads to poverty and unhygienic conditions. Govt. fails to provide infra and facility, because it is considered there retribution of and karma. Because of the lack of access to the infrastructure and services, people with some disability are not able to enjoy their political, economic and socio-cultural rights. Hence, they exist as a ghost Citizens. Way Forward:- Strong laws are required to serve as deterrence and promote e-learning ad mandatory compliance with the accessibility Under Right to Education, promote inclusive education without labelling To create special schools for the disabled people to taking care of their special needs Special disability courts for speedy disposal of cases The incentive to private employers and resource creation through Cess. Reservation can be extended to private jobs and Promote Entrepreneurship through hand holding Create an institute for professional caretakers following NSDA( National Skill Development Authority) guidelines
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Discuss the evolution of extensive commercial grain farming. How does it differ from intensive commercial (mixed farming) agriculture? (150 words | 10 marks )
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Brief Approach:- Write a brief introduction to the evolution of Extensive Commercial Grain Farming. Discuss some of its features Compare its feature with intensive commercial agriculture Answer:- Extensive commercial grain farming refers to the practice of growing food grains on large scale for commercial purposes. It is practised in the temperate regions. With the changes in the economic structure in light of the industrial revolution, the traditional farmers moved from rural areas to urban and found employment in the secondary sector. This led to a decline in production of food grains such as Oats, Barley etc. and threatened the food security of the region. Such a situation led to the origin of Extensive commercial grain agriculture in the rural areas of western European countries. Features of Extensive commercial grain agriculture:- It is practised on large farm areas. Highly mechanized due to the shortage of agricultural labourers on account of their migration to towns. Farming is done for commercial purpose only. Usually monoculture i.e. only one type of crop is grown. Use of chemical inputs such as fertilizers and insecticides. The western middle class is the biggest consumer of the products from such practice. The above features are a direct result of the need for evolution of such an agricultural practise. Intensive commercial agriculture is also known as mixed farming is a modern concept which focuses on the production of food based on best practices of intensive subsistence agriculture and extensive commercial grain farming. Intensive commercial agriculture compared with Extensive commercial grain farming:- Intensive commercial agriculture is practised on smaller farmland compared to extensive commercial grain farming. It is labour intensive and requires trained and skilled labours and farmers whereas extensive commercial grain farming are not labour intensive. Rearing of livestock is practised in intensive commercial agriculture whereas there is no such practise in the other case. The inputs in case of intensive commercial agriculture are organic such as by-products from the animals reared are used whereas in extensive commercial grain farming the inputs are chemically manufactured in factories such as the insecticides and fertilizers. It grows a variety of crops incuding exotic crops in small quantity whereas extensive grain farming practices monoculture i.e. one food crop is grown in huge quantity. The products of intensive commercial agriculture are utilized by the rich class as they are costly whereas in the other case the products are unitlized by the middle class because they are cheaper Though extensive commercial grain farming differs from intensive commercial farming, they both rely on scientific techniques and machines to improve agricultural productivity. However with the increasing population, the pressure on land has increased and changing lifestyle such as more use of animal products, preference for organic products has led to more Intensive commercial agriculture being practised across the globe.
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##Question:Discuss the evolution of extensive commercial grain farming. How does it differ from intensive commercial (mixed farming) agriculture? (150 words | 10 marks )##Answer:Brief Approach:- Write a brief introduction to the evolution of Extensive Commercial Grain Farming. Discuss some of its features Compare its feature with intensive commercial agriculture Answer:- Extensive commercial grain farming refers to the practice of growing food grains on large scale for commercial purposes. It is practised in the temperate regions. With the changes in the economic structure in light of the industrial revolution, the traditional farmers moved from rural areas to urban and found employment in the secondary sector. This led to a decline in production of food grains such as Oats, Barley etc. and threatened the food security of the region. Such a situation led to the origin of Extensive commercial grain agriculture in the rural areas of western European countries. Features of Extensive commercial grain agriculture:- It is practised on large farm areas. Highly mechanized due to the shortage of agricultural labourers on account of their migration to towns. Farming is done for commercial purpose only. Usually monoculture i.e. only one type of crop is grown. Use of chemical inputs such as fertilizers and insecticides. The western middle class is the biggest consumer of the products from such practice. The above features are a direct result of the need for evolution of such an agricultural practise. Intensive commercial agriculture is also known as mixed farming is a modern concept which focuses on the production of food based on best practices of intensive subsistence agriculture and extensive commercial grain farming. Intensive commercial agriculture compared with Extensive commercial grain farming:- Intensive commercial agriculture is practised on smaller farmland compared to extensive commercial grain farming. It is labour intensive and requires trained and skilled labours and farmers whereas extensive commercial grain farming are not labour intensive. Rearing of livestock is practised in intensive commercial agriculture whereas there is no such practise in the other case. The inputs in case of intensive commercial agriculture are organic such as by-products from the animals reared are used whereas in extensive commercial grain farming the inputs are chemically manufactured in factories such as the insecticides and fertilizers. It grows a variety of crops incuding exotic crops in small quantity whereas extensive grain farming practices monoculture i.e. one food crop is grown in huge quantity. The products of intensive commercial agriculture are utilized by the rich class as they are costly whereas in the other case the products are unitlized by the middle class because they are cheaper Though extensive commercial grain farming differs from intensive commercial farming, they both rely on scientific techniques and machines to improve agricultural productivity. However with the increasing population, the pressure on land has increased and changing lifestyle such as more use of animal products, preference for organic products has led to more Intensive commercial agriculture being practised across the globe.
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What are synthetic textiles? Why has it been called the textile of future? (150 words)
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Brief Approach:- Write a brief introduction on the current trend of use of synthetic textiles. Explain briefly what are Synthetic textiles. Write down advantages over natural textiles to show that it is the textile of the future. Answer:- Demand for man-made fibre (MMF) textiles all over the world is increasing as a substitute for natural textiles amid changes in global fashion trends. Currently, MMF dominates global textile fibre consumption with 72% MMF and only 28% Natural Fibre as per Ministry of Textiles. Synthetic textiles are manmade textiles manufactured through the chemical process of polymerization i.e. combining monomers to forms a long chain or polymer. They have superior property when compared to natural fibres such as Cotton and Jute. Rayon, Nylon, Polyester etc. are some examples of synthetic fibre which have substituted many natural fibres. Not only has the luxurious and soft texture of natural fibres been easily duplicated by the synthetic fibres but they also have several advantages over natural fibres. Advantages over Natural Fibre:- They are independent of the climatic condition of the region. Eg. Silk garments industry needs silk as raw material which is available only in the country where the silkworm can survive or they need to be imported. They are not affected by climate change as not dependent upon agricultural output for their production. The availability of raw materials is consistent as the major raw materials are by-products of refining crude oil. Many new refineries are also coming up in developed as well as developing nations as the import of crude oil is preferred over refined petroleum products because of the opportunity to open up other dependent industries such as Textile. This allows for even distribution of raw material across the globe. They can be made in any desired size or thickness compared to natural fibres. The characteristics of the textile can also be adjusted by virtue of chemical treatments. Eg. Quick-drying cloth, waterproof cloth etc. are possible because of synthetic textiles. They are very durable, resistant to chemicals, not prone to stretching or wrinkling. Eg. Polyester Since the characteristics of the textile can be tweaked, they make for more comfortable and aesthetically appealing clothes in terms of colour or weight. India is the second-largest producer of synthetic textile. The textile vision to achieve the production level of $350 billion by the year 2024-25 would require much growth in the synthetic textile industry. Hence the textile of the future can contribute significantly to the future on Indian textile.
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##Question:What are synthetic textiles? Why has it been called the textile of future? (150 words)##Answer:Brief Approach:- Write a brief introduction on the current trend of use of synthetic textiles. Explain briefly what are Synthetic textiles. Write down advantages over natural textiles to show that it is the textile of the future. Answer:- Demand for man-made fibre (MMF) textiles all over the world is increasing as a substitute for natural textiles amid changes in global fashion trends. Currently, MMF dominates global textile fibre consumption with 72% MMF and only 28% Natural Fibre as per Ministry of Textiles. Synthetic textiles are manmade textiles manufactured through the chemical process of polymerization i.e. combining monomers to forms a long chain or polymer. They have superior property when compared to natural fibres such as Cotton and Jute. Rayon, Nylon, Polyester etc. are some examples of synthetic fibre which have substituted many natural fibres. Not only has the luxurious and soft texture of natural fibres been easily duplicated by the synthetic fibres but they also have several advantages over natural fibres. Advantages over Natural Fibre:- They are independent of the climatic condition of the region. Eg. Silk garments industry needs silk as raw material which is available only in the country where the silkworm can survive or they need to be imported. They are not affected by climate change as not dependent upon agricultural output for their production. The availability of raw materials is consistent as the major raw materials are by-products of refining crude oil. Many new refineries are also coming up in developed as well as developing nations as the import of crude oil is preferred over refined petroleum products because of the opportunity to open up other dependent industries such as Textile. This allows for even distribution of raw material across the globe. They can be made in any desired size or thickness compared to natural fibres. The characteristics of the textile can also be adjusted by virtue of chemical treatments. Eg. Quick-drying cloth, waterproof cloth etc. are possible because of synthetic textiles. They are very durable, resistant to chemicals, not prone to stretching or wrinkling. Eg. Polyester Since the characteristics of the textile can be tweaked, they make for more comfortable and aesthetically appealing clothes in terms of colour or weight. India is the second-largest producer of synthetic textile. The textile vision to achieve the production level of $350 billion by the year 2024-25 would require much growth in the synthetic textile industry. Hence the textile of the future can contribute significantly to the future on Indian textile.
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जेंडर बजटिंग से आप क्या समझते हैं? भारत में जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you mean by Gender Budgeting? Explain the arguments in favor of the necessity of Gender Budgeting in India. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच- पहले भाग में, जेंडर बजटिंग को परिभाषित करते हुए उसके विभिन्न आयामों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,भारत में जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- जेंडर बजटिंग का आशय बजटीय आवंटन एवं उनके क्रियान्वयन को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने से है जिसमें नीति निर्माण से लेकर परिणाम प्राप्ति तक जेंडर बजट को एक दृष्टिकोण बनाया जाता है| जेंडर बजट अलग से बजट की प्रक्रिया नहीं है परंतु सभी हितधारकों को समेकित करते हुए महिलाओं को अधिकतम लाभ पहुँचाने का एक प्रयास है| जेंडर बजटिंग के निम्नलिखित चार मुख्य आयाम हैं- स्रोतों एवं बजटीय आवंटन को महिलाओं के संदर्भ में आनुपातिक रूप से वितरित किये जाने को सुनिश्चित करना; जेंडर बजट सेल इत्यादि माध्यमों से यह सुनिश्चित करना कि लाभार्थी उनके संदर्भ में बनायी जा रही नीतियों से परिचित हों तथा आवश्यक सिविल सोसाइटियों को इस दिशा में मार्गदर्शन एवं क्षमता निर्माण; बजट को जेंडर परिप्रेक्ष्य से विश्लेषित करते हुए लेखापरीक्षण की सुविधा; जेंडर बजटिंग के अंतर्गत विभिन्न हितधारकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की सुविधा; भारत में पहली बार 2005-2006 के आम बजट में इस हेतु प्रयास चालू किये गये थें| 2007 में LBSNAA ने जेंडर बजटिंग को प्रयोग में लाना चालु किया था| वर्तमान में 57 केंद्रीय मंत्रालयों एवं 21 राज्य सरकारों ने जेंडर बजटिंग को नीति-निर्धारण का अभिन्न अंग स्वीकार किया है| भारत में जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्क महिलाएं, भारत की जनसंख्या का 48% हिस्सा हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसरों आदि जैसे कई सामाजिक संकेतकों पर पुरुषों से पीछे हैं| ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे रिपोर्टों के माध्यम से भी भारत में महिलाओं की बदहाल स्थिति को समझा जा सकता है| जेंडर बजटिंग महिला सशक्तिकरण कोप्राप्त करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि विकास का लाभ महिलाओं तक भी समान रूप से पहुँच सके| बजट आवंटन के पैटर्न के माध्यम से संसाधनों का आवंटन पुरुषों और महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करता है| सरकार जिस तरह से संसाधनों का आवंटन करती है, उसमें लैंगिक असमानताओं को बदलने की क्षमता है। इसे देखते हुए, जेंडर बजटिंग को लैंगिंक संतुलन को प्राप्त करने के लिए एक उपकरण के रूप में समझा जा सकता है| पर्याप्त संसाधन आवंटन पर बल देकर महिलाओं के लिए नीतिगत प्रतिबद्धता और आवंटन के बीच अंतर को संबोधित करना संभव हो सकता है| लैंगिक संतुलन को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों को लागू करने हेतु प्रोत्साहन को बढ़ावा देना तथा उनके निगरानी एवं मूल्यांकन को भी जेंडर बजटिंग के माध्यम से प्राप्त करना संभव है| महिलाओं की आर्थिक समानता को सुनिश्चित करने हेतुसरकारी बजट की प्रभावशीलता, दक्षता, जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार लाने में जेंडर बजटिंग अहम् रोल अदा कर सकता है| सरकार द्वारा महिलाओं के हित में चलाये जा रहे कार्यक्रमों की आधिकारिक मूल्यांकन तथा वास्तविक मूल्यांकनसे उसकी तुलना को सुनिश्चित करने हेतु; अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के संदर्भ में भारतीय प्रतिबद्धता को दिखाने हेतु; अगर जेंडर बजटिंग के विभिन्न आयामों को प्रभावी रूप से ईमानदारी पूर्वक लागू किया जाये तो आधी आबादी के हितों को बेहतर तरीके से लागू करने में यह एक प्रभावी उपकरण सिद्ध हो सकता है|
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##Question:जेंडर बजटिंग से आप क्या समझते हैं? भारत में जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) What do you mean by Gender Budgeting? Explain the arguments in favor of the necessity of Gender Budgeting in India. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, जेंडर बजटिंग को परिभाषित करते हुए उसके विभिन्न आयामों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,भारत में जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- जेंडर बजटिंग का आशय बजटीय आवंटन एवं उनके क्रियान्वयन को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने से है जिसमें नीति निर्माण से लेकर परिणाम प्राप्ति तक जेंडर बजट को एक दृष्टिकोण बनाया जाता है| जेंडर बजट अलग से बजट की प्रक्रिया नहीं है परंतु सभी हितधारकों को समेकित करते हुए महिलाओं को अधिकतम लाभ पहुँचाने का एक प्रयास है| जेंडर बजटिंग के निम्नलिखित चार मुख्य आयाम हैं- स्रोतों एवं बजटीय आवंटन को महिलाओं के संदर्भ में आनुपातिक रूप से वितरित किये जाने को सुनिश्चित करना; जेंडर बजट सेल इत्यादि माध्यमों से यह सुनिश्चित करना कि लाभार्थी उनके संदर्भ में बनायी जा रही नीतियों से परिचित हों तथा आवश्यक सिविल सोसाइटियों को इस दिशा में मार्गदर्शन एवं क्षमता निर्माण; बजट को जेंडर परिप्रेक्ष्य से विश्लेषित करते हुए लेखापरीक्षण की सुविधा; जेंडर बजटिंग के अंतर्गत विभिन्न हितधारकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की सुविधा; भारत में पहली बार 2005-2006 के आम बजट में इस हेतु प्रयास चालू किये गये थें| 2007 में LBSNAA ने जेंडर बजटिंग को प्रयोग में लाना चालु किया था| वर्तमान में 57 केंद्रीय मंत्रालयों एवं 21 राज्य सरकारों ने जेंडर बजटिंग को नीति-निर्धारण का अभिन्न अंग स्वीकार किया है| भारत में जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्क महिलाएं, भारत की जनसंख्या का 48% हिस्सा हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसरों आदि जैसे कई सामाजिक संकेतकों पर पुरुषों से पीछे हैं| ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे रिपोर्टों के माध्यम से भी भारत में महिलाओं की बदहाल स्थिति को समझा जा सकता है| जेंडर बजटिंग महिला सशक्तिकरण कोप्राप्त करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि विकास का लाभ महिलाओं तक भी समान रूप से पहुँच सके| बजट आवंटन के पैटर्न के माध्यम से संसाधनों का आवंटन पुरुषों और महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करता है| सरकार जिस तरह से संसाधनों का आवंटन करती है, उसमें लैंगिक असमानताओं को बदलने की क्षमता है। इसे देखते हुए, जेंडर बजटिंग को लैंगिंक संतुलन को प्राप्त करने के लिए एक उपकरण के रूप में समझा जा सकता है| पर्याप्त संसाधन आवंटन पर बल देकर महिलाओं के लिए नीतिगत प्रतिबद्धता और आवंटन के बीच अंतर को संबोधित करना संभव हो सकता है| लैंगिक संतुलन को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों को लागू करने हेतु प्रोत्साहन को बढ़ावा देना तथा उनके निगरानी एवं मूल्यांकन को भी जेंडर बजटिंग के माध्यम से प्राप्त करना संभव है| महिलाओं की आर्थिक समानता को सुनिश्चित करने हेतुसरकारी बजट की प्रभावशीलता, दक्षता, जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार लाने में जेंडर बजटिंग अहम् रोल अदा कर सकता है| सरकार द्वारा महिलाओं के हित में चलाये जा रहे कार्यक्रमों की आधिकारिक मूल्यांकन तथा वास्तविक मूल्यांकनसे उसकी तुलना को सुनिश्चित करने हेतु; अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के संदर्भ में भारतीय प्रतिबद्धता को दिखाने हेतु; अगर जेंडर बजटिंग के विभिन्न आयामों को प्रभावी रूप से ईमानदारी पूर्वक लागू किया जाये तो आधी आबादी के हितों को बेहतर तरीके से लागू करने में यह एक प्रभावी उपकरण सिद्ध हो सकता है|
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राजनीति के अपराधीकरण से आप क्या समझते हैं? इसको रोकने की दिशा में चुनाव आयोग को किस प्रकार सशक्त किया जा सकता है? (150- 200 शब्द; 10 अंक) What do you think of criminalization of politics? How the Election commission can be empowered to stop this ? (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में राजनीति के अपराधीकरण को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में चुनाव आयोग को सशक्त करने के उपाय सुझाइए 3- अंतिम में सशक्त करने की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये राजनीति के अपराधीकरण का आशय राजनीतिक हितों को पूरा करने हेतु अपराधियों के सहयोग को प्राप्त करने एवं राजनीतिक व्यवस्था के द्वारा ऐसे अपराधियों को संरक्षण प्रदान करने से है| राजनीति के अपराधीकरण का आशय यह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों का निर्वाचित निकायों का सदस्य हो जाना| स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में अपराध का राजनीतीकरण शुरूआती समय से ही विद्यमान है| समय के परिवर्तन के साथ ऐसे व्यक्तियों की संख्या में निर्वाचित निकायों के मेम्बर्स के रूप में बढती जा रही है|2019 में चुनी गयी लोकसभा में 43 % आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सदस्य है जिनमें लगभग 29 % पर गंभीर आपराधिक मुकदमें हैं| राजनीति के अपराधीकरण का दुष्प्रभाव लोकतंत्र पर काफी गंभीर होता है| अतः इस प्रक्रिया को रोकना आवश्यक है| इसके लिए चुनाव आयोग को सशक्त बनाना आवश्यक है| चुनाव आयोग को सशक्त करने के उपाय · कालेधन का प्रयोग, मतदाताओं को रिश्वत देना या धन के आधार पर चुनाव को प्रभावित करना आदि को संज्ञेय(जिसमें जमानत नहीं होती) अपराध घोषित किया जाए · मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने EVM के साथ छेड़छाड़ करने आदि को भी संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए · भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी के अनुसार केवल अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग को जो शक्तियां प्राप्त हैं उनके आधार पर चुनाव में धांधली को रोकना संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि वास्तव में ये अवशिष्ट शक्तियों की तरह हैं|अतः इसके लिए संविधान संशोधन कर निर्वाचन आयोग को अलग से शक्ति देनी होगी| · एक से अधिक जगह पर चुनाव लड़ने पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चाहिए(1996 में दो जगह तक सीमित किया गया है) · एग्जिट पोल एवं ओपिनियन पोल्स पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए क्योंकि ये मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं · लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जाएँ · मोडल कोड ऑफ़ कंडक्ट जो 1991 में अस्तित्व में आया था उसे विधिक दर्जा दिया जाना चाहिए और इसके अंतर्गत, उल्लंघन करने पर जेल भेजने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए, उल्लंघन में बारंबारता होने पर चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार होना चाहिए · केन्द्रीय सूचना आयोग के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शैलेष गांधी ने एक सुझाव दिया था कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाया जाए|निर्वाचन आयोग भी इसकी वकालत करता है| · चुनाव सुधार पर गठित विधि पैनल ने यह सुझाव दिया है कि गलत शपथ पत्र को दाखिल करने वालों को कम से कम 2 वर्ष जेल की सजा होनी चाहिए, निर्वाचन आयोग भी इस प्रावधान के पक्ष में है · पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी के अनुसार निर्वाचन आयोग के पास SC व HC की तरह अवमानना की कार्यवाई करने का अधिकार होना चाहिए| ताकि आयोग गड़बड़ियों को रोक सके और राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया को रोक सकने हेतु सक्षम हो सके| चूँकि राजनीति के अपराधीकरण की स्थिति में संसद के द्वारा निर्मित विधि/कानून की सामाजिक स्वीकृति या मान्यता कम हो जाती है, इससे संसद की गरिमा पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है| संसद के प्रति जन विश्वसनीयता में भी कमी आती है| अतः राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए चुनाव आयोग को सशक्त करना आवश्यक है|
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##Question:राजनीति के अपराधीकरण से आप क्या समझते हैं? इसको रोकने की दिशा में चुनाव आयोग को किस प्रकार सशक्त किया जा सकता है? (150- 200 शब्द; 10 अंक) What do you think of criminalization of politics? How the Election commission can be empowered to stop this ? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राजनीति के अपराधीकरण को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में चुनाव आयोग को सशक्त करने के उपाय सुझाइए 3- अंतिम में सशक्त करने की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये राजनीति के अपराधीकरण का आशय राजनीतिक हितों को पूरा करने हेतु अपराधियों के सहयोग को प्राप्त करने एवं राजनीतिक व्यवस्था के द्वारा ऐसे अपराधियों को संरक्षण प्रदान करने से है| राजनीति के अपराधीकरण का आशय यह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों का निर्वाचित निकायों का सदस्य हो जाना| स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में अपराध का राजनीतीकरण शुरूआती समय से ही विद्यमान है| समय के परिवर्तन के साथ ऐसे व्यक्तियों की संख्या में निर्वाचित निकायों के मेम्बर्स के रूप में बढती जा रही है|2019 में चुनी गयी लोकसभा में 43 % आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सदस्य है जिनमें लगभग 29 % पर गंभीर आपराधिक मुकदमें हैं| राजनीति के अपराधीकरण का दुष्प्रभाव लोकतंत्र पर काफी गंभीर होता है| अतः इस प्रक्रिया को रोकना आवश्यक है| इसके लिए चुनाव आयोग को सशक्त बनाना आवश्यक है| चुनाव आयोग को सशक्त करने के उपाय · कालेधन का प्रयोग, मतदाताओं को रिश्वत देना या धन के आधार पर चुनाव को प्रभावित करना आदि को संज्ञेय(जिसमें जमानत नहीं होती) अपराध घोषित किया जाए · मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने EVM के साथ छेड़छाड़ करने आदि को भी संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए · भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी के अनुसार केवल अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग को जो शक्तियां प्राप्त हैं उनके आधार पर चुनाव में धांधली को रोकना संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि वास्तव में ये अवशिष्ट शक्तियों की तरह हैं|अतः इसके लिए संविधान संशोधन कर निर्वाचन आयोग को अलग से शक्ति देनी होगी| · एक से अधिक जगह पर चुनाव लड़ने पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चाहिए(1996 में दो जगह तक सीमित किया गया है) · एग्जिट पोल एवं ओपिनियन पोल्स पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए क्योंकि ये मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं · लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जाएँ · मोडल कोड ऑफ़ कंडक्ट जो 1991 में अस्तित्व में आया था उसे विधिक दर्जा दिया जाना चाहिए और इसके अंतर्गत, उल्लंघन करने पर जेल भेजने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए, उल्लंघन में बारंबारता होने पर चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार होना चाहिए · केन्द्रीय सूचना आयोग के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शैलेष गांधी ने एक सुझाव दिया था कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाया जाए|निर्वाचन आयोग भी इसकी वकालत करता है| · चुनाव सुधार पर गठित विधि पैनल ने यह सुझाव दिया है कि गलत शपथ पत्र को दाखिल करने वालों को कम से कम 2 वर्ष जेल की सजा होनी चाहिए, निर्वाचन आयोग भी इस प्रावधान के पक्ष में है · पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी के अनुसार निर्वाचन आयोग के पास SC व HC की तरह अवमानना की कार्यवाई करने का अधिकार होना चाहिए| ताकि आयोग गड़बड़ियों को रोक सके और राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया को रोक सकने हेतु सक्षम हो सके| चूँकि राजनीति के अपराधीकरण की स्थिति में संसद के द्वारा निर्मित विधि/कानून की सामाजिक स्वीकृति या मान्यता कम हो जाती है, इससे संसद की गरिमा पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है| संसद के प्रति जन विश्वसनीयता में भी कमी आती है| अतः राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए चुनाव आयोग को सशक्त करना आवश्यक है|
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In recent years relation between India and USA has acquired depth and diversity. Highlight the key features, prospects, and challenges of this relationship? (150 Words/10 Marks)
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Approach: Give a brief intro about the depth and diversified relations between INDIA and USA. Discuss the key features, prospects and challenges with some examples Conclude with a way forward. Answer: Relations between India and the United States have seen a substantial improvement in the last two decades with a convergence of views on many issues. From the president, Bill Clinton to Donald Trump all has ensured the long-lasting ties between India and the U.S. The Trump administration made India eligible for defence-related technologies under a “strategic trade authorization,” going a step further than the Obama administration, which had designated India as a “major defence partner.” Key features and prospects: Cooperation of Nuclear Energy: - More than thousands of Indian scientist between 1955-75 participated in US nuclear energy research projects. Design work for the Trombay reprocessing facility, assisting in building and fuelling the Tarapur reactors, Bilateral dialogues and visits: More than 50 bilateral dialogues were held, there have been regular contacts at political and official levels on bilateral, regional and global issues. 2+2 Dialogue : the dialogue is seen as the vehicle to elevate the strategic relations between the two countries as well as pave the way for future summits. Frequent visits between the heads of the two countries: 2015 President Obama visits India on republic day as chief guest. Later on, in 2016 Modi visits USA for multilateral Nuclear security summit and the US Recognised India as a “Major Defence Partner”. Defence Cooperation : it emerged as a major pillar of India-US strategic partnership. The signing of “New Framework for India-US Defence Relations” in 2005 has resulted in intensification in defence trade, joint exercises, personnel exchanges, collaboration and cooperation in maritime security and counter-piracy and exchange between each of three services. For example Malabar exercise, RIMPAC, Defence Technology and Trade Initiative etc. It is expected that at the end of this year India and the United States will conduct a new bilateral tri-services exercise, which was announced at two-plus-two dialogue. Last month, two Indian naval ships – INSKolkata and INSShakti– participated in a joint naval exercise with the United States, the Philippines, and Japan. This significant naval event has been viewed as India offering support to the Philippines in its claims over disputed parts of the South China Sea. Foundational Agreements: The three agreements- Logistics support agreement (LEMOA), COMCASA and Basic Exchange and Cooperation Agreement for geospatial Cooperation (BECA) are referred to as the foundational agreements which the U.S signs with countries with which it has close military ties. In 2018 India has been recognized as a Strategic Trade Authorization-1 (STA-1) country. It eases controls on high-technology dual-use exports. Counter-terrorism and internal security: India-US counter-terrorism cooperation was signed in 2010 to expand collaboration on counter-terrorism, information sharing and capacity building and consequently a HOMELAND SECURITY DIALOGUE was announced. Economic cooperation: India is currently 9th largest goods trading partner with $87.5 billion in total (two way) goods trade during 2018. Goods exports totalled $33.1 billion; goods imports totalled $54.4 billion. The U.S. goods trade deficit with India was $21.3 billion in 2018. Challenges: However, on strategic issues, the convergence between India and the United States is limited at present. In fact, there are significant divergences. Peaceful neighbour: On Pakistan, India and the United States continue to have divergent views. US military and civil aid to Pakistan and the continuing support for terrorism from Pakistan is a matter of grave security concern for India. The United States has also been maintaining near silence on Chinese plans to supply additional reactors to Pakistan. Trade ties are also a source of tensions. India has been a huge beneficiary of the Generalized System of Preferences (GSP) program, but the Trump administration is moving ahead to end it. The GSP is a preferential trade program that gives developing countries like India easier access to the American market by reducing duties on their exports. New Delhi has been forced to stop concessional oil imports from both Iran and Venezuela and these heavy-handed American tactics have led to a sharp rise in India’s oil import bill. India’s energy security requires the stable Middle East and New Delhi cannot be expected to downgrade its profile in the region. The United States has also been critical of India’s bid to purchase the Russian made S-400 air defence system. Washington argues that if India buys the S-400, it will violate the Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act (CAATSA). The biggest challenge New Delhi faces is that if it defies American diktat, there would be economic sanctions as well as restrictions on high-tech defence cooperation with Washington. But if India cancels the S-400 deal, its traditional ties with Russia are bound to suffer. IPR Issue: The main difference between the two sides stems from the fact that while the US sees IPR purely from the commercial point of view, India sees it as a development measure. USTR claimed that India has maintained extremely high custom duties directed towards IP-intensive products such as medical devices, pharmaceuticals, ICT products, solar energy equipment etc, USTR retained India on the special 301 report priority watch list. US-China Trade war: India’ rise is ensured by the stable global economic order but the trade war between the USA and China poses a threat to India’s dream. The disputes between the two nations have heated up the global economic order which has its own repercussions on India’s trade. Sanctions on IRAN: India’s relation with Iran is the most crucial and important aspect to connect India to Central Asia. So far, the United States has exempted the Iranian port of Chabahar – which lets India bypass Pakistan to create a transportation corridor to Afghanistan – from punitive sanctions, but many in India remain deeply suspicious of America’s future intentions. Way forward: New Delhi is required to balance its relations deftly, at a time of rising U.S.-China confrontation It is high time for the leadership and the diplomatic machinery on both sides to sit down and seriously negotiate. While India and the United States both call for a rules-based order in the Indo-Pacific, targeting China’s intransigence over security matters, India joins China and Russia to call out the United States’ unilateral trade protectionism. The interlocutors of the Modi government must convincingly argue before Pompeo that a long-term American commitment to India in the Indo-Pacific region is the only way to operationalize the vast potential in Indo-U.S. strategic relationship into concrete policy outcomes while preparing India as a credible counterweight to the Chinese power in Asia.
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##Question:In recent years relation between India and USA has acquired depth and diversity. Highlight the key features, prospects, and challenges of this relationship? (150 Words/10 Marks)##Answer:Approach: Give a brief intro about the depth and diversified relations between INDIA and USA. Discuss the key features, prospects and challenges with some examples Conclude with a way forward. Answer: Relations between India and the United States have seen a substantial improvement in the last two decades with a convergence of views on many issues. From the president, Bill Clinton to Donald Trump all has ensured the long-lasting ties between India and the U.S. The Trump administration made India eligible for defence-related technologies under a “strategic trade authorization,” going a step further than the Obama administration, which had designated India as a “major defence partner.” Key features and prospects: Cooperation of Nuclear Energy: - More than thousands of Indian scientist between 1955-75 participated in US nuclear energy research projects. Design work for the Trombay reprocessing facility, assisting in building and fuelling the Tarapur reactors, Bilateral dialogues and visits: More than 50 bilateral dialogues were held, there have been regular contacts at political and official levels on bilateral, regional and global issues. 2+2 Dialogue : the dialogue is seen as the vehicle to elevate the strategic relations between the two countries as well as pave the way for future summits. Frequent visits between the heads of the two countries: 2015 President Obama visits India on republic day as chief guest. Later on, in 2016 Modi visits USA for multilateral Nuclear security summit and the US Recognised India as a “Major Defence Partner”. Defence Cooperation : it emerged as a major pillar of India-US strategic partnership. The signing of “New Framework for India-US Defence Relations” in 2005 has resulted in intensification in defence trade, joint exercises, personnel exchanges, collaboration and cooperation in maritime security and counter-piracy and exchange between each of three services. For example Malabar exercise, RIMPAC, Defence Technology and Trade Initiative etc. It is expected that at the end of this year India and the United States will conduct a new bilateral tri-services exercise, which was announced at two-plus-two dialogue. Last month, two Indian naval ships – INSKolkata and INSShakti– participated in a joint naval exercise with the United States, the Philippines, and Japan. This significant naval event has been viewed as India offering support to the Philippines in its claims over disputed parts of the South China Sea. Foundational Agreements: The three agreements- Logistics support agreement (LEMOA), COMCASA and Basic Exchange and Cooperation Agreement for geospatial Cooperation (BECA) are referred to as the foundational agreements which the U.S signs with countries with which it has close military ties. In 2018 India has been recognized as a Strategic Trade Authorization-1 (STA-1) country. It eases controls on high-technology dual-use exports. Counter-terrorism and internal security: India-US counter-terrorism cooperation was signed in 2010 to expand collaboration on counter-terrorism, information sharing and capacity building and consequently a HOMELAND SECURITY DIALOGUE was announced. Economic cooperation: India is currently 9th largest goods trading partner with $87.5 billion in total (two way) goods trade during 2018. Goods exports totalled $33.1 billion; goods imports totalled $54.4 billion. The U.S. goods trade deficit with India was $21.3 billion in 2018. Challenges: However, on strategic issues, the convergence between India and the United States is limited at present. In fact, there are significant divergences. Peaceful neighbour: On Pakistan, India and the United States continue to have divergent views. US military and civil aid to Pakistan and the continuing support for terrorism from Pakistan is a matter of grave security concern for India. The United States has also been maintaining near silence on Chinese plans to supply additional reactors to Pakistan. Trade ties are also a source of tensions. India has been a huge beneficiary of the Generalized System of Preferences (GSP) program, but the Trump administration is moving ahead to end it. The GSP is a preferential trade program that gives developing countries like India easier access to the American market by reducing duties on their exports. New Delhi has been forced to stop concessional oil imports from both Iran and Venezuela and these heavy-handed American tactics have led to a sharp rise in India’s oil import bill. India’s energy security requires the stable Middle East and New Delhi cannot be expected to downgrade its profile in the region. The United States has also been critical of India’s bid to purchase the Russian made S-400 air defence system. Washington argues that if India buys the S-400, it will violate the Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act (CAATSA). The biggest challenge New Delhi faces is that if it defies American diktat, there would be economic sanctions as well as restrictions on high-tech defence cooperation with Washington. But if India cancels the S-400 deal, its traditional ties with Russia are bound to suffer. IPR Issue: The main difference between the two sides stems from the fact that while the US sees IPR purely from the commercial point of view, India sees it as a development measure. USTR claimed that India has maintained extremely high custom duties directed towards IP-intensive products such as medical devices, pharmaceuticals, ICT products, solar energy equipment etc, USTR retained India on the special 301 report priority watch list. US-China Trade war: India’ rise is ensured by the stable global economic order but the trade war between the USA and China poses a threat to India’s dream. The disputes between the two nations have heated up the global economic order which has its own repercussions on India’s trade. Sanctions on IRAN: India’s relation with Iran is the most crucial and important aspect to connect India to Central Asia. So far, the United States has exempted the Iranian port of Chabahar – which lets India bypass Pakistan to create a transportation corridor to Afghanistan – from punitive sanctions, but many in India remain deeply suspicious of America’s future intentions. Way forward: New Delhi is required to balance its relations deftly, at a time of rising U.S.-China confrontation It is high time for the leadership and the diplomatic machinery on both sides to sit down and seriously negotiate. While India and the United States both call for a rules-based order in the Indo-Pacific, targeting China’s intransigence over security matters, India joins China and Russia to call out the United States’ unilateral trade protectionism. The interlocutors of the Modi government must convincingly argue before Pompeo that a long-term American commitment to India in the Indo-Pacific region is the only way to operationalize the vast potential in Indo-U.S. strategic relationship into concrete policy outcomes while preparing India as a credible counterweight to the Chinese power in Asia.
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"भारत व मालदीव में सहयोग के विभिन्न क्षेत्र विद्यमान होने के बावजूद पिछले कुछ वर्षो में दोनों देशों के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव देखे गए हैं |" टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "In spite of having different areas of cooperation in India and the Maldives, there has been considerable fluctuation in relations between both countries over the past few years." Comment. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच- भूमिका में भारत के लिए मालदीव के महत्व का संछिप्त में चर्चा कीजिये | इसके बाद भारत-मालदीव संबंधों में सहयोग के मुद्दों की चर्चा कीजिये | पुनः दोनों के संबंधो में हालिया वर्षो में चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत, 1965 में मालदीव की स्वतंत्रता के बाद उसे मान्यता प्रदान करने और उसके साथ राजनयिक संबंधों को स्थापित करने वाला पहला राष्ट्र था | वर्ष 1981 में हुए एक व्यापार समझौते ने भी दोनों देशो के बीच सहयोग के एक नए आयाम को जोड़ा | भारत और मालदीव के मध्य सहयोग - आरम्भ से भारत लगातार मालदीव को इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा, रडार आदि की सुविधा प्रदान कर रहा है | वर्तमान में भारत ने मालदीव को 100 मिलियन डॉलर की ऋण सुविधा प्रदान की है | इसके अतिरिक्त गुजराल डॉक्ट्रिन के अपने सिद्धांत द्वारा भारत, मालदीव को आवासीय इकाइयों के निर्माण में एवं इंदिरा गाँधी मेमोरियल हॉस्पिटल में बेडों की संख्या बढाने और अभियांत्रिकी और तकनीकी के क्षेत्रों में भी सहयोग कर रहा है | उदाहरण के तौर पर जैसे- 2014 में हुए पानी संकट के बाद भारत, मालदीव को डीशैलीनेशन प्लांट को स्थापित करने में मदद कर रहा है | यद्यपि भारत , मालदीव को सभी क्षेत्रों में सहयोग करता है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के मध्य संबंधों में उतर-चढाव दिखाई दिए -जिसके निम्नलिखित कारण हैं- वर्ष 2017 में मालदीव ने इंडिया-फर्स्ट की नीति को दरकिनार करते हुए अपना पहला मुक्त व्यापार समझौता चीन के साथ किया | भारतीय कंपनी GMR के साथ हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण के समझौते को रद्द करने के पश्चात, मालदीव ने चीन की कंपनी के साथ इस समझौते को आगे बढाया | चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में मालदीव एक महत्वपूर्ण देश बन गया है | मालदीव में लगभग 70% का निवेश केवल चीन का है, एवं सबसे ज्यादा व्यापार भी चीन के साथ होता है | इसके अतिरिक्त, मालदीव द्वारा पारित नया कानून जो कुछ निर्धारित शर्तों पर भूमि पर पूर्ण विदेशी स्वामित्व की अनुमति देता है, जो चीन के लिए सहायक सिद्ध होगा, जिससे भारत को चुनौती मिल सकती है | यद्यपि इन चुनौतियों के बावजूद वर्तमान में दोनों देशों के प्रमुखों की एक-दूसरे के देश में पहली यात्रा, दोनों देशो के मध्य सहयोग का नया आयाम जोड़ते हुए दिखाई देती है | भारत को मालदीव के साथ अपने संबंधों को गति प्रदान करने के लिए अपने निवेश को बढ़ाना चाहिए | इसके अतिरिक्तमालदीव के साथव्यापर को बढाने के लिए मुक्त व्यापर समझौते का प्रेस करना चाहिए | भारत को मालदीव के साथ ट्रैक टू डिप्लोमेसी के तहत अपने समबंधो में सुधार करते हुए अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों पर जोर देना चाहिए |
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##Question:"भारत व मालदीव में सहयोग के विभिन्न क्षेत्र विद्यमान होने के बावजूद पिछले कुछ वर्षो में दोनों देशों के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव देखे गए हैं |" टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "In spite of having different areas of cooperation in India and the Maldives, there has been considerable fluctuation in relations between both countries over the past few years." Comment. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भूमिका में भारत के लिए मालदीव के महत्व का संछिप्त में चर्चा कीजिये | इसके बाद भारत-मालदीव संबंधों में सहयोग के मुद्दों की चर्चा कीजिये | पुनः दोनों के संबंधो में हालिया वर्षो में चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत, 1965 में मालदीव की स्वतंत्रता के बाद उसे मान्यता प्रदान करने और उसके साथ राजनयिक संबंधों को स्थापित करने वाला पहला राष्ट्र था | वर्ष 1981 में हुए एक व्यापार समझौते ने भी दोनों देशो के बीच सहयोग के एक नए आयाम को जोड़ा | भारत और मालदीव के मध्य सहयोग - आरम्भ से भारत लगातार मालदीव को इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा, रडार आदि की सुविधा प्रदान कर रहा है | वर्तमान में भारत ने मालदीव को 100 मिलियन डॉलर की ऋण सुविधा प्रदान की है | इसके अतिरिक्त गुजराल डॉक्ट्रिन के अपने सिद्धांत द्वारा भारत, मालदीव को आवासीय इकाइयों के निर्माण में एवं इंदिरा गाँधी मेमोरियल हॉस्पिटल में बेडों की संख्या बढाने और अभियांत्रिकी और तकनीकी के क्षेत्रों में भी सहयोग कर रहा है | उदाहरण के तौर पर जैसे- 2014 में हुए पानी संकट के बाद भारत, मालदीव को डीशैलीनेशन प्लांट को स्थापित करने में मदद कर रहा है | यद्यपि भारत , मालदीव को सभी क्षेत्रों में सहयोग करता है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के मध्य संबंधों में उतर-चढाव दिखाई दिए -जिसके निम्नलिखित कारण हैं- वर्ष 2017 में मालदीव ने इंडिया-फर्स्ट की नीति को दरकिनार करते हुए अपना पहला मुक्त व्यापार समझौता चीन के साथ किया | भारतीय कंपनी GMR के साथ हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण के समझौते को रद्द करने के पश्चात, मालदीव ने चीन की कंपनी के साथ इस समझौते को आगे बढाया | चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में मालदीव एक महत्वपूर्ण देश बन गया है | मालदीव में लगभग 70% का निवेश केवल चीन का है, एवं सबसे ज्यादा व्यापार भी चीन के साथ होता है | इसके अतिरिक्त, मालदीव द्वारा पारित नया कानून जो कुछ निर्धारित शर्तों पर भूमि पर पूर्ण विदेशी स्वामित्व की अनुमति देता है, जो चीन के लिए सहायक सिद्ध होगा, जिससे भारत को चुनौती मिल सकती है | यद्यपि इन चुनौतियों के बावजूद वर्तमान में दोनों देशों के प्रमुखों की एक-दूसरे के देश में पहली यात्रा, दोनों देशो के मध्य सहयोग का नया आयाम जोड़ते हुए दिखाई देती है | भारत को मालदीव के साथ अपने संबंधों को गति प्रदान करने के लिए अपने निवेश को बढ़ाना चाहिए | इसके अतिरिक्तमालदीव के साथव्यापर को बढाने के लिए मुक्त व्यापर समझौते का प्रेस करना चाहिए | भारत को मालदीव के साथ ट्रैक टू डिप्लोमेसी के तहत अपने समबंधो में सुधार करते हुए अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों पर जोर देना चाहिए |
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समृद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के विघटन में उपनिवेशवाद की भूमिका की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Discuss the role of colonialism in the disintegration of prosperous Indian rural society. (150 words)
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दृष्टिकोण · भूमिका में भारतीय ग्रामीण समाज के संदर्भ में चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में ग्रामीण समाज पर, उपनिवेशवाद के कारण पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- ग्रामीण समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है । जनगणना 2011 के अनुसार 68.5 % जनसंख्या ग्रामीण है और 49.5 % जनसंख्या कृषि आधारित रोजगार पर आधारित है। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में भारतीय समाज एक समृद्ध , ग्रामीण समाज था , जो मुख्यतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था। पंडित नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की कला ,संस्कृति , स्थापत्य , साहित्य आदि समाज की समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।प्राचीन और मध्य भारत मे अनेकों ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जो भारतीय समाज के ग्रामीण होने और समृद्ध होने के उदाहरण हैं। उपनिवेशवाद और ग्रामीण समाज का विघटन उपनिवेशवादी नीतियो के फलस्वरूप भारतीय समाज के संरचनात्मक और सामाजिक घटको पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना प्रारम्म्भ हुआ। नई भूमि बंदोबस्त व्यवस्था में जमीदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया । साथ ही लगान वसूलने के संदर्भ में उन्हे स्वाधिकार प्रदान कर दिया गया । जिससे जमीदारों ने गरीब किसानो से मनमाना लगान वसूलना प्रारम्भ किया। जिससे उनकी दशा दिन प्रतिदिन खराब होती गई । किसानो द्वारा जमीदारों को लगान चुकाने के लिए साहूकारों से अत्यधिक दर पर उधार लेना प्रारम्भ किया। जिससे वे ऋणग्रसता से ग्रसित हो गए। जो उनके शोषण का प्रमुख कारण बना । भारतीय ग्रामीण समाज में कुशल कारीगर भी मौजूद थे। ब्रिटिश उपनिवेशी सरकार द्वारा भारतीय कारीगरों से जबरदस्ती उनका समान सस्ते पर खरीदा जाता था और ब्रिटेन में उसे मनमाने दामो पर बेच कर मुनाफा कमाया जाता था । जिससे भारतीय ग्रामीण कारीगरों की भी दशा खराब हुई । इसके साथ ही जनजाति क्षेत्रो में भी ब्रिटिश सरकार द्वारा जंगल और जमीन के लिए उनके क्षेत्रो का अधिग्रहण किया गया । जिससे उनका सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक स्थिति खराब हुई और उनका शोषण होना प्रारम्भ हुआ । इसके साथ ही ब्रिटेन में तैयार सस्ते माल को भारत में महंगे दामो में जबरदस्ती बेचना और भारतीय मालों पर ब्रिटेन में उच्च आयात शुल्क आरोपित किया ।जिससे भारतीय सामानों की विदेशी बाज़ारों में मांग कम हुई । जिससे भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई । उपरोक्त कारणो ने ग्रामीण समाज के सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर बर्बाद कर दिया । जिसके दुष्परिणाम सामाजिक स्तर पर बढ़ता अंधविश्वास, कमजोर वर्गो का शोषण आदि प्रारम्भ हुए। इन सभी समस्याओ को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास दादा भाई नवरोजी द्वारा किया गया ।
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##Question:समृद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के विघटन में उपनिवेशवाद की भूमिका की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Discuss the role of colonialism in the disintegration of prosperous Indian rural society. (150 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में भारतीय ग्रामीण समाज के संदर्भ में चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में ग्रामीण समाज पर, उपनिवेशवाद के कारण पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- ग्रामीण समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है । जनगणना 2011 के अनुसार 68.5 % जनसंख्या ग्रामीण है और 49.5 % जनसंख्या कृषि आधारित रोजगार पर आधारित है। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में भारतीय समाज एक समृद्ध , ग्रामीण समाज था , जो मुख्यतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था। पंडित नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की कला ,संस्कृति , स्थापत्य , साहित्य आदि समाज की समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।प्राचीन और मध्य भारत मे अनेकों ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जो भारतीय समाज के ग्रामीण होने और समृद्ध होने के उदाहरण हैं। उपनिवेशवाद और ग्रामीण समाज का विघटन उपनिवेशवादी नीतियो के फलस्वरूप भारतीय समाज के संरचनात्मक और सामाजिक घटको पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना प्रारम्म्भ हुआ। नई भूमि बंदोबस्त व्यवस्था में जमीदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया । साथ ही लगान वसूलने के संदर्भ में उन्हे स्वाधिकार प्रदान कर दिया गया । जिससे जमीदारों ने गरीब किसानो से मनमाना लगान वसूलना प्रारम्भ किया। जिससे उनकी दशा दिन प्रतिदिन खराब होती गई । किसानो द्वारा जमीदारों को लगान चुकाने के लिए साहूकारों से अत्यधिक दर पर उधार लेना प्रारम्भ किया। जिससे वे ऋणग्रसता से ग्रसित हो गए। जो उनके शोषण का प्रमुख कारण बना । भारतीय ग्रामीण समाज में कुशल कारीगर भी मौजूद थे। ब्रिटिश उपनिवेशी सरकार द्वारा भारतीय कारीगरों से जबरदस्ती उनका समान सस्ते पर खरीदा जाता था और ब्रिटेन में उसे मनमाने दामो पर बेच कर मुनाफा कमाया जाता था । जिससे भारतीय ग्रामीण कारीगरों की भी दशा खराब हुई । इसके साथ ही जनजाति क्षेत्रो में भी ब्रिटिश सरकार द्वारा जंगल और जमीन के लिए उनके क्षेत्रो का अधिग्रहण किया गया । जिससे उनका सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक स्थिति खराब हुई और उनका शोषण होना प्रारम्भ हुआ । इसके साथ ही ब्रिटेन में तैयार सस्ते माल को भारत में महंगे दामो में जबरदस्ती बेचना और भारतीय मालों पर ब्रिटेन में उच्च आयात शुल्क आरोपित किया ।जिससे भारतीय सामानों की विदेशी बाज़ारों में मांग कम हुई । जिससे भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई । उपरोक्त कारणो ने ग्रामीण समाज के सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर बर्बाद कर दिया । जिसके दुष्परिणाम सामाजिक स्तर पर बढ़ता अंधविश्वास, कमजोर वर्गो का शोषण आदि प्रारम्भ हुए। इन सभी समस्याओ को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास दादा भाई नवरोजी द्वारा किया गया ।
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समृद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के विघटन में उपनिवेशवाद की भूमिका की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Discuss the role of colonialism in the disintegration of prosperous Indian rural society. (150 words)
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दृष्टिकोण · भूमिका में भारतीय ग्रामीण समाज के संदर्भ में चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में ग्रामीण समाज पर, उपनिवेशवाद के कारण पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- ग्रामीण समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है । जनगणना 2011 के अनुसार 68.5 % जनसंख्या ग्रामीण है और 49.5 % जनसंख्या कृषि आधारित रोजगार पर आधारित है। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में भारतीय समाज एक समृद्ध , ग्रामीण समाज था , जो मुख्यतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था। पंडित नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की कला ,संस्कृति , स्थापत्य , साहित्य आदि समाज की समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।प्राचीन और मध्य भारत मे अनेकों ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जो भारतीय समाज के ग्रामीण होने और समृद्ध होने के उदाहरण हैं। उपनिवेशवाद और ग्रामीण समाज का विघटन · उपनिवेशवादी नीतियो के फलस्वरूप भारतीय समाज के संरचनात्मक और सामाजिक घटको पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना प्रारम्म्भ हुआ। नई भूमि बंदोबस्त व्यवस्था में जमीदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया । साथ ही लगान वसूलने के संदर्भ में उन्हे स्वाधिकार प्रदान कर दिया गया । जिससे जमीदारों ने गरीब किसानो से मनमाना लगान वसूलना प्रारम्भ किया। जिससे उनकी दशा दिन प्रतिदिन खराब होती गई । · किसानो द्वारा जमीदारों को लगान चुकाने के लिए साहूकारों से अत्यधिक दर पर उधार लेना प्रारम्भ किया। जिससे वे ऋणग्रसता से ग्रसित हो गए। जो उनके शोषण का प्रमुख कारण बना । · भारतीय ग्रामीण समाज में कुशल कारीगर भी मौजूद थे। ब्रिटिश उपनिवेशी सरकार द्वारा भारतीय कारीगरों से जबरदस्ती उनका समान सस्ते पर खरीदा जाता था और ब्रिटेन में उसे मनमाने दामो पर बेच कर मुनाफा कमाया जाता था । जिससे भारतीय ग्रामीण कारीगरों की भी दशा खराब हुई । · इसके साथ ही जनजाति क्षेत्रो में भी ब्रिटिश सरकार द्वारा जंगल और जमीन के लिए उनके क्षेत्रो का अधिग्रहण किया गया । जिससे उनका सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक स्थिति खराब हुई और उनका शोषण होना प्रारम्भ हुआ । · इसके साथ ही ब्रिटेन में तैयार सस्ते माल को भारत में महंगे दामो में जबरदस्ती बेचना और भारतीय मालों पर ब्रिटेन में उच्च आयात शुल्क आरोपित किया ।जिससे भारतीय सामानों की विदेशी बाज़ारों में मांग कम हुई । जिससे भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई । उपरोक्त कारणो ने ग्रामीण समाज के सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर बर्बाद कर दिया । जिसके दुष्परिणाम सामाजिक स्तर पर बढ़ता अंधविश्वास, कमजोर वर्गो का शोषण आदि प्रारम्भ हुए। इन सभी समस्याओ को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास दादा भाई नवरोजी द्वारा किया गया ।
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##Question:समृद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के विघटन में उपनिवेशवाद की भूमिका की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Discuss the role of colonialism in the disintegration of prosperous Indian rural society. (150 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में भारतीय ग्रामीण समाज के संदर्भ में चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में ग्रामीण समाज पर, उपनिवेशवाद के कारण पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- ग्रामीण समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है । जनगणना 2011 के अनुसार 68.5 % जनसंख्या ग्रामीण है और 49.5 % जनसंख्या कृषि आधारित रोजगार पर आधारित है। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में भारतीय समाज एक समृद्ध , ग्रामीण समाज था , जो मुख्यतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था। पंडित नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की कला ,संस्कृति , स्थापत्य , साहित्य आदि समाज की समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।प्राचीन और मध्य भारत मे अनेकों ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जो भारतीय समाज के ग्रामीण होने और समृद्ध होने के उदाहरण हैं। उपनिवेशवाद और ग्रामीण समाज का विघटन · उपनिवेशवादी नीतियो के फलस्वरूप भारतीय समाज के संरचनात्मक और सामाजिक घटको पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना प्रारम्म्भ हुआ। नई भूमि बंदोबस्त व्यवस्था में जमीदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया । साथ ही लगान वसूलने के संदर्भ में उन्हे स्वाधिकार प्रदान कर दिया गया । जिससे जमीदारों ने गरीब किसानो से मनमाना लगान वसूलना प्रारम्भ किया। जिससे उनकी दशा दिन प्रतिदिन खराब होती गई । · किसानो द्वारा जमीदारों को लगान चुकाने के लिए साहूकारों से अत्यधिक दर पर उधार लेना प्रारम्भ किया। जिससे वे ऋणग्रसता से ग्रसित हो गए। जो उनके शोषण का प्रमुख कारण बना । · भारतीय ग्रामीण समाज में कुशल कारीगर भी मौजूद थे। ब्रिटिश उपनिवेशी सरकार द्वारा भारतीय कारीगरों से जबरदस्ती उनका समान सस्ते पर खरीदा जाता था और ब्रिटेन में उसे मनमाने दामो पर बेच कर मुनाफा कमाया जाता था । जिससे भारतीय ग्रामीण कारीगरों की भी दशा खराब हुई । · इसके साथ ही जनजाति क्षेत्रो में भी ब्रिटिश सरकार द्वारा जंगल और जमीन के लिए उनके क्षेत्रो का अधिग्रहण किया गया । जिससे उनका सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक स्थिति खराब हुई और उनका शोषण होना प्रारम्भ हुआ । · इसके साथ ही ब्रिटेन में तैयार सस्ते माल को भारत में महंगे दामो में जबरदस्ती बेचना और भारतीय मालों पर ब्रिटेन में उच्च आयात शुल्क आरोपित किया ।जिससे भारतीय सामानों की विदेशी बाज़ारों में मांग कम हुई । जिससे भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई । उपरोक्त कारणो ने ग्रामीण समाज के सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक सभी स्तरों पर बर्बाद कर दिया । जिसके दुष्परिणाम सामाजिक स्तर पर बढ़ता अंधविश्वास, कमजोर वर्गो का शोषण आदि प्रारम्भ हुए। इन सभी समस्याओ को क्रमबद्ध रूप से समझने का प्रयास दादा भाई नवरोजी द्वारा किया गया ।
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Briefly describe different types of bills in the context of the legislative process in parliament. Also, clarify the difference between the ordinary bill and the money Bill. (150 words/10 marks )
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Brief Approach: Start the answer with the introduction of the Bills presented in Parliament. Explain the difference between ordinary and money bills. Answer- The legislative process takes place in both houses of Parliament. The Bill goes through different stages in each House. After being passed by both the houses, the bill goes for the assent of President, where on getting the assent, the bill becomes an act. There are four types of Bills:- Ordinary Bill: - Bills related to all subjects other than financial matters are called Ordinary Bills. Money Bills: - These bills are related to financial matters such as taxation, public expenditure, etc. Finance Bill: - These bills are also related to financial matters but are different from money bills. Constitution Amendment Bill: - These bills are related to the amendment of constitutional provisions. It is amended under Article 368. Difference between an ordinary bill and a Money bill An ordinary bill can be introduced anywhere in the Lok Sabha or the Rajya Sabha. Whereas the Money Bill can beintroduced only in the Lok Sabha. The ordinary bill can be introduced by both the minister or private member. Whereas the Money Bill is presented only by a Minister. Ordinarybills can be submitted without the approval of the President. Whereas the President"s approval is required for introducing the Money bill. The Rajya Sabha can keep the ordinary bill for a maximum period of 6 months. While the Rajya Sabha can keep the Money Bill for a maximum period of 14 days. The certification of the Speaker is not required to send an ordinary bill to the Rajya Sabha. Whereas the Money Bill requires the certification of the Speaker. After the passage of both the Houses, Ordinary Bill is sent for the assent of the President. Whereas the Money Bill is sent to the President only after it is passed by the Lok Sabha. Ordinary Bills can be returned by the President for reconsideration. However, once the Money Bill is passed, it cannot be returned for reconsideration.
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##Question:Briefly describe different types of bills in the context of the legislative process in parliament. Also, clarify the difference between the ordinary bill and the money Bill. (150 words/10 marks )##Answer: Brief Approach: Start the answer with the introduction of the Bills presented in Parliament. Explain the difference between ordinary and money bills. Answer- The legislative process takes place in both houses of Parliament. The Bill goes through different stages in each House. After being passed by both the houses, the bill goes for the assent of President, where on getting the assent, the bill becomes an act. There are four types of Bills:- Ordinary Bill: - Bills related to all subjects other than financial matters are called Ordinary Bills. Money Bills: - These bills are related to financial matters such as taxation, public expenditure, etc. Finance Bill: - These bills are also related to financial matters but are different from money bills. Constitution Amendment Bill: - These bills are related to the amendment of constitutional provisions. It is amended under Article 368. Difference between an ordinary bill and a Money bill An ordinary bill can be introduced anywhere in the Lok Sabha or the Rajya Sabha. Whereas the Money Bill can beintroduced only in the Lok Sabha. The ordinary bill can be introduced by both the minister or private member. Whereas the Money Bill is presented only by a Minister. Ordinarybills can be submitted without the approval of the President. Whereas the President"s approval is required for introducing the Money bill. The Rajya Sabha can keep the ordinary bill for a maximum period of 6 months. While the Rajya Sabha can keep the Money Bill for a maximum period of 14 days. The certification of the Speaker is not required to send an ordinary bill to the Rajya Sabha. Whereas the Money Bill requires the certification of the Speaker. After the passage of both the Houses, Ordinary Bill is sent for the assent of the President. Whereas the Money Bill is sent to the President only after it is passed by the Lok Sabha. Ordinary Bills can be returned by the President for reconsideration. However, once the Money Bill is passed, it cannot be returned for reconsideration.
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Discuss the rationale behindimposing emergency in India. Criticallly comment on its implications. (200 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE RATIONALE BEHIND IMPOSING EMERGENCY - THE OVERALL ANALYSIS OF EMERGENCY Positive outcomes Negative outcomes -CONCLUSION Outcome of the emergency Answer:- Emergency, under Article 352, was imposed in the country on the 25th of June, 1975 on grounds of internal disturbance. It was imposed by President Fakhruddin Ali Ahmed, upon the advice of Prime Minister Indira Gandhi due to certain disturbing and compelling reasons as discussed below. The emergency was finally revoked in March, 1977. THE RATIONALE BEHIND IMPOSING EMERGENCY 1) SECURITY ENDANGERED India"s stability, security, integrity and democracy endangered. 2) JP MOVEMENT The disruptive character of the JP movement provided a compelling need to declare emergency in the country. 3) CONTAINING VIOLENCE The opposition was accused of inciting armed forces and the police together. 4) RAPID ECONOMIN DEVELOPMENT There was a need to implement rapid economic development in the interest of the poor. 5) EXTERNAL INTERVENTION There was a fear of external intervention with the intention to de-stabilize India. THE OVERALL ANALYSIS OF EMERGENCY The positive outcomes of the emergency were:- POLITICAL 1) Action was taken against anti-social elements. 2) Steps were taken to prevent tax evasion. SOCIAL 1) In the first phase of the emergency, there was a return of normal and orderly life. 2) Distribution of surplus land was done. 3) Implementation of land ceiling was effected. 4) The 20 point program was launched for the socio-economic upliftment of the poor. 5) Abolition of bonded labor was effected. ECONOMIC 1) Improvement was seen in the economy. 2) The year saw good monsoonal rain and hence improved agricultural productivity in the first phase of the emergency. 3) Reduction of prices was witnessed. Thus, the consumers/ people were very satisfied. The negative outcomes of the emergency were:- 1) Many important and main leaders from the opposition parties were arrested. 2) The Fundamental Rights of the citizens were suspended. 3) Press was censored. 4) Certain organizations like RSS, CPI (ML) were banned. 5) The federal provisions of the constitution were suspended. 6) Internal democracy within congress was crippled. This was because Indira Gandhi did not take the consent of the Cabinet Members before implementing emergency. 7) The powers of Judiciary were curtailed under 42nd Amendment Act. The outcome of the emergency was that at the end of the 1st Phase of emergency, there was acceptance among the public with respect to the imposition of emergency. However, at the later stages of emergency, people got disillusioned due to economic growth not being sustained, decline in agricultural output, anti-social elements resuming their acts, Congress failing to create new agencies of social change, loss of trust due to a censored press, development of an extra-constitutional center of power under Sanjay Gandhi:- He lost the 5-point program; forced sterilization and slum clearance projects backfired. Finally, the 1977 elections were announced and the Congress was voted out of power from the Centre.
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##Question:Discuss the rationale behindimposing emergency in India. Criticallly comment on its implications. (200 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE RATIONALE BEHIND IMPOSING EMERGENCY - THE OVERALL ANALYSIS OF EMERGENCY Positive outcomes Negative outcomes -CONCLUSION Outcome of the emergency Answer:- Emergency, under Article 352, was imposed in the country on the 25th of June, 1975 on grounds of internal disturbance. It was imposed by President Fakhruddin Ali Ahmed, upon the advice of Prime Minister Indira Gandhi due to certain disturbing and compelling reasons as discussed below. The emergency was finally revoked in March, 1977. THE RATIONALE BEHIND IMPOSING EMERGENCY 1) SECURITY ENDANGERED India"s stability, security, integrity and democracy endangered. 2) JP MOVEMENT The disruptive character of the JP movement provided a compelling need to declare emergency in the country. 3) CONTAINING VIOLENCE The opposition was accused of inciting armed forces and the police together. 4) RAPID ECONOMIN DEVELOPMENT There was a need to implement rapid economic development in the interest of the poor. 5) EXTERNAL INTERVENTION There was a fear of external intervention with the intention to de-stabilize India. THE OVERALL ANALYSIS OF EMERGENCY The positive outcomes of the emergency were:- POLITICAL 1) Action was taken against anti-social elements. 2) Steps were taken to prevent tax evasion. SOCIAL 1) In the first phase of the emergency, there was a return of normal and orderly life. 2) Distribution of surplus land was done. 3) Implementation of land ceiling was effected. 4) The 20 point program was launched for the socio-economic upliftment of the poor. 5) Abolition of bonded labor was effected. ECONOMIC 1) Improvement was seen in the economy. 2) The year saw good monsoonal rain and hence improved agricultural productivity in the first phase of the emergency. 3) Reduction of prices was witnessed. Thus, the consumers/ people were very satisfied. The negative outcomes of the emergency were:- 1) Many important and main leaders from the opposition parties were arrested. 2) The Fundamental Rights of the citizens were suspended. 3) Press was censored. 4) Certain organizations like RSS, CPI (ML) were banned. 5) The federal provisions of the constitution were suspended. 6) Internal democracy within congress was crippled. This was because Indira Gandhi did not take the consent of the Cabinet Members before implementing emergency. 7) The powers of Judiciary were curtailed under 42nd Amendment Act. The outcome of the emergency was that at the end of the 1st Phase of emergency, there was acceptance among the public with respect to the imposition of emergency. However, at the later stages of emergency, people got disillusioned due to economic growth not being sustained, decline in agricultural output, anti-social elements resuming their acts, Congress failing to create new agencies of social change, loss of trust due to a censored press, development of an extra-constitutional center of power under Sanjay Gandhi:- He lost the 5-point program; forced sterilization and slum clearance projects backfired. Finally, the 1977 elections were announced and the Congress was voted out of power from the Centre.
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जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन में क्या सम्बन्ध है? इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के मुख्य प्रभावों की चर्चा कीजिये।(150-200 शब्द; 10 अंक) What is the relation between climate change and global warming? Along with this, discuss the major effects of climate change. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण : भूमिका में जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन को समझाइए और उनके बीच संबंधो को स्पष्ट कीजिये। इसके बाद जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर चर्चा कीजिए। उत्तर के अंतिम भाग में जलवायु परिवर्तन से निपटने के संदर्भ में निष्कर्ष भी दीजिये । एक बड़े भूभाग में होने वाला दीर्घकालिक मौसमी परिवर्तन , जलवायु परिवर्तन कहलाता है । मौसम में परिवर्तन जहा एक अल्प कालिक प्रक्रिया है , वही जलवायु परिवर्तन एक दीर्घ कालिक परिवर्तन है।जिसमे परिवर्तन एक लंबे अवधि के दौरान होता है तथा इसमे परिवर्तन के अनेक कारण हो सकते है ।पृथ्वी के चारों ओर गैसों का एक वायुमंडल पाया जाता है, जो एक सूर्य से आने वाली विकिरण को अंदर आने तो देता है लेकिन जब पृथ्वी की सतह से उनका परावर्तन होता है तो वें किरणे उतनी मात्रा में ही पृथ्वी से वापस नही जाती , बल्कि वायुमंडल में मौजूद इन गैसों द्वारा उनका अवशोषण कर लिया जाता है । जिससे धरती पर जीवन के लिए आवश्यक ऊष्मा बनी रहती है ।पृथ्वी पर मौजूद इन गैसों को ग्रीन हाउस गैस और इस प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते है । हालांकि यह प्रक्रिया पृथ्वी पर जीवन जीने के लिए आवश्यक है। लेकिन जब एक मात्रा से अधिक इन गैसों की सांद्रता वायुमंडल में बढ़ जाती है तो ग्रीन हाउस प्रभाव भी बढ़ जाता है । जिससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ने लगता है और इसे ही वैश्विक तापन कहते है । जिसके कारण जलवायु में परिवर्तन होने लगता है ।इसके साथ ही इस वैश्विक तापन का प्रभाव दाब , पवन, सागरीय धाराओं आदि पर भी पड़ता है । इन ग्रीन हाउस गैसों में कार्बनडाई ऑक्साइड ( CO2 ), मेथन( CH4 ), नाइट्रस ऑक्साइड(N2O), सल्फर हेक्सा फ्लोराइड (SF6) , क्लोरो फ़्लोरो कार्बन(CFC) , हाइड्रो फ़्लोरो कार्बन(HCF) , ओज़ोन(O3) , जलवाष्प (H2O)आदि शामिल हैं । जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले मौसमी परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से लोगो को प्रभावित करने लगे है जैसे मानसून में देरी , सूखा , अकाल के घटना यों में वृद्धि , कृषि उत्पादकता में कमी आदि । जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- गंभीर मौसमी घटनाएँ :- चक्रवातों, हरिकेन, टोर्नेडो, टायफून आदि की संख्या एवं बारम्बारता में वृद्धि, जिसके प्रभाव जापान, फिलीपींस आदि देशो में देखा जा सकता है । एल नीनो प्रभाव और कमजोर मानसून , साथ ही बाढ़ और सूखे की तीव्रता और बारम्बारतामें भी वृद्धिदेखी जा रही है । हीट वेव्स की तीव्रता में वृद्धि, जिसकी भयावहता उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में इससे होने वाली मौतों के रूप में देखी जा सकती है । जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। जिससे कृषि की उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित होने का खतरा । दावानलजैसी घटनाओं में वृद्धि हो रही है। जैसे उत्तराखंड और अमेरिका के कैलिफोर्निया में लगी दावानल आदि । सागरीय जल स्तर में वृद्धि :- तटीय क्षेत्रों के जलमग्न होने की प्रबल संभावना । द्वीपीय राष्ट्रों के जलमग्न होने की प्रबल संभावना । पर्यावरणीय शरणार्थीयों की उभरती हुई समस्या , जो सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करेगी । जैव विविधता की क्षति :- प्रवाल विरंजन जैसे- हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में मौजूद प्रवालों पर संकट , जो की सागरीय एकोसिस्टम की, की ( key ) प्रजाति मानी जाती है। उसके प्रभावित होने से समुद्रीय परिस्थितिकी तंत्र के सम्पूर्ण तंत्र की अवरोध आने की संभावना आवास विखंडन जैसे- ग्लेशियर के पिघलने के कारण, पोलर बिअर, स्नो लेपर्ड आदि सबसे ज्यादा प्रभावित, अर्थात Ecocide की घटना में वृद्धि। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव :- नए रोगों का उत्पन्न होना। जल सम्बन्धी रोगों का होना। जैसे- हैजाआदि । नए प्रकार के फसल और पौधो सम्बन्धी रोग। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या बन गया है और इसका प्रभाव सम्पूर्ण विश्व पर दिखाई देने लगा है । इस संदर्भ में हाल ही में हुए कुछ वैश्विक समझौते इस संदर्भ पर विश्व की चिंता को प्रकट करते है । जैस पेरिस कॉप 21 समझौता और किगाली समझौता आदि। हालांकि इस उभरते वैश्विक समस्या के संदर्भ में सभी देशो को एक साथ आकर प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है क्योकि यह सम्पूर्ण मानव जाति के समक्ष उत्पन्न खतरा है ।
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##Question:जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन में क्या सम्बन्ध है? इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के मुख्य प्रभावों की चर्चा कीजिये।(150-200 शब्द; 10 अंक) What is the relation between climate change and global warming? Along with this, discuss the major effects of climate change. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : भूमिका में जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन को समझाइए और उनके बीच संबंधो को स्पष्ट कीजिये। इसके बाद जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर चर्चा कीजिए। उत्तर के अंतिम भाग में जलवायु परिवर्तन से निपटने के संदर्भ में निष्कर्ष भी दीजिये । एक बड़े भूभाग में होने वाला दीर्घकालिक मौसमी परिवर्तन , जलवायु परिवर्तन कहलाता है । मौसम में परिवर्तन जहा एक अल्प कालिक प्रक्रिया है , वही जलवायु परिवर्तन एक दीर्घ कालिक परिवर्तन है।जिसमे परिवर्तन एक लंबे अवधि के दौरान होता है तथा इसमे परिवर्तन के अनेक कारण हो सकते है ।पृथ्वी के चारों ओर गैसों का एक वायुमंडल पाया जाता है, जो एक सूर्य से आने वाली विकिरण को अंदर आने तो देता है लेकिन जब पृथ्वी की सतह से उनका परावर्तन होता है तो वें किरणे उतनी मात्रा में ही पृथ्वी से वापस नही जाती , बल्कि वायुमंडल में मौजूद इन गैसों द्वारा उनका अवशोषण कर लिया जाता है । जिससे धरती पर जीवन के लिए आवश्यक ऊष्मा बनी रहती है ।पृथ्वी पर मौजूद इन गैसों को ग्रीन हाउस गैस और इस प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते है । हालांकि यह प्रक्रिया पृथ्वी पर जीवन जीने के लिए आवश्यक है। लेकिन जब एक मात्रा से अधिक इन गैसों की सांद्रता वायुमंडल में बढ़ जाती है तो ग्रीन हाउस प्रभाव भी बढ़ जाता है । जिससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ने लगता है और इसे ही वैश्विक तापन कहते है । जिसके कारण जलवायु में परिवर्तन होने लगता है ।इसके साथ ही इस वैश्विक तापन का प्रभाव दाब , पवन, सागरीय धाराओं आदि पर भी पड़ता है । इन ग्रीन हाउस गैसों में कार्बनडाई ऑक्साइड ( CO2 ), मेथन( CH4 ), नाइट्रस ऑक्साइड(N2O), सल्फर हेक्सा फ्लोराइड (SF6) , क्लोरो फ़्लोरो कार्बन(CFC) , हाइड्रो फ़्लोरो कार्बन(HCF) , ओज़ोन(O3) , जलवाष्प (H2O)आदि शामिल हैं । जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले मौसमी परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से लोगो को प्रभावित करने लगे है जैसे मानसून में देरी , सूखा , अकाल के घटना यों में वृद्धि , कृषि उत्पादकता में कमी आदि । जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- गंभीर मौसमी घटनाएँ :- चक्रवातों, हरिकेन, टोर्नेडो, टायफून आदि की संख्या एवं बारम्बारता में वृद्धि, जिसके प्रभाव जापान, फिलीपींस आदि देशो में देखा जा सकता है । एल नीनो प्रभाव और कमजोर मानसून , साथ ही बाढ़ और सूखे की तीव्रता और बारम्बारतामें भी वृद्धिदेखी जा रही है । हीट वेव्स की तीव्रता में वृद्धि, जिसकी भयावहता उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में इससे होने वाली मौतों के रूप में देखी जा सकती है । जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। जिससे कृषि की उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित होने का खतरा । दावानलजैसी घटनाओं में वृद्धि हो रही है। जैसे उत्तराखंड और अमेरिका के कैलिफोर्निया में लगी दावानल आदि । सागरीय जल स्तर में वृद्धि :- तटीय क्षेत्रों के जलमग्न होने की प्रबल संभावना । द्वीपीय राष्ट्रों के जलमग्न होने की प्रबल संभावना । पर्यावरणीय शरणार्थीयों की उभरती हुई समस्या , जो सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करेगी । जैव विविधता की क्षति :- प्रवाल विरंजन जैसे- हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में मौजूद प्रवालों पर संकट , जो की सागरीय एकोसिस्टम की, की ( key ) प्रजाति मानी जाती है। उसके प्रभावित होने से समुद्रीय परिस्थितिकी तंत्र के सम्पूर्ण तंत्र की अवरोध आने की संभावना आवास विखंडन जैसे- ग्लेशियर के पिघलने के कारण, पोलर बिअर, स्नो लेपर्ड आदि सबसे ज्यादा प्रभावित, अर्थात Ecocide की घटना में वृद्धि। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव :- नए रोगों का उत्पन्न होना। जल सम्बन्धी रोगों का होना। जैसे- हैजाआदि । नए प्रकार के फसल और पौधो सम्बन्धी रोग। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या बन गया है और इसका प्रभाव सम्पूर्ण विश्व पर दिखाई देने लगा है । इस संदर्भ में हाल ही में हुए कुछ वैश्विक समझौते इस संदर्भ पर विश्व की चिंता को प्रकट करते है । जैस पेरिस कॉप 21 समझौता और किगाली समझौता आदि। हालांकि इस उभरते वैश्विक समस्या के संदर्भ में सभी देशो को एक साथ आकर प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है क्योकि यह सम्पूर्ण मानव जाति के समक्ष उत्पन्न खतरा है ।
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What is the Keynesian school of economics? Also, examine the utility of both Keynesian and Classical schools of thought. (10 Marks/150 words)
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Approach 1 . Introduce with the Keynesian school of thought. 2 . Explain the Classical thought along with its relevance 3 . Give the important tenets of Keynesian School of thought 4 . Conclude with the relevance in contemporary economies. Answer- Keynesian economics was developed by the British economist John Maynard Keynes during the 1930s in an attempt to understand the Great Depression. Keynesian economics is an economic theory of total spending in the economy and its effects on output and inflation. Keynes advocated for increased government expenditures and lower taxes to stimulate demand and pull the global economy out of the depression. Classical School of Thought and its utility- It originated during the late 18th century with Adam Smith and that reached maturity in the works of David Ricardo and John Stuart Mill. The theories of the classical school, which dominated economic thinking in Great Britain until about 1870, focused on economic growth and economic freedom, stressing laissez-faire ideas and free competition. Classical school economists believed in the following- 1 . Strongly opposed to the mercantilist theory and policy that had prevailed in Britain since the 16th century. 2 . They believed that free competition and free trade would best promote a nation’s economic growth. The entire community benefits most when each of its members follows his or her own self-interest. They believed in “Invisible hands of God”. 3 . They relied on the adjustment of demand and supply in the economy automatically, without any government intervention. 4 . In analyzing the workings of free enterprise, Smith introduced the concept of a labor theory of value and a theory of distribution. Keynesian School questioned the classical school at the time of the Great Depression of the 1930s. They believed that government intervention is important to generate demand in the economy. The utility of Keynesian school of thought - Keynesian described how the economy works with the help of the following observations. 1 . A Keynesian believes that aggregate demand is influenced by a host of economic decisions- both public and private. The public decisions include, most prominently, those on monetary and fiscal (i.e., spending and tax) policies. Initially, they gave more emphasis to fiscal policy. 2 . Changes in aggregate demand, whether anticipated or unanticipated, have their greatest short-run effect on real output and employment, not on prices. It is shown by Philips Curve. In the long run, Keynesian quote- “In the long run, we are all dead,” to make the point. 3 . Keynesians believe that prices, and especially wages, respond slowly to changes in supply and demand, resulting in periodic shortages and surpluses, especially of labor. 4 . Some Keynesians are more concerned about combating unemployment than about conquering inflation. There are shortcomings of Keynesians also. The problem of high inflation and fiscal viability of public finances are the major issues with this model. In the contemporary world, it is very important to incorporate both the school of thoughts i.e. market-driven with necessary government intervention. Economic Survey also emphasizes that the "Invisible Hand" should be supported by the "Hand of Trust".
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##Question:What is the Keynesian school of economics? Also, examine the utility of both Keynesian and Classical schools of thought. (10 Marks/150 words)##Answer:Approach 1 . Introduce with the Keynesian school of thought. 2 . Explain the Classical thought along with its relevance 3 . Give the important tenets of Keynesian School of thought 4 . Conclude with the relevance in contemporary economies. Answer- Keynesian economics was developed by the British economist John Maynard Keynes during the 1930s in an attempt to understand the Great Depression. Keynesian economics is an economic theory of total spending in the economy and its effects on output and inflation. Keynes advocated for increased government expenditures and lower taxes to stimulate demand and pull the global economy out of the depression. Classical School of Thought and its utility- It originated during the late 18th century with Adam Smith and that reached maturity in the works of David Ricardo and John Stuart Mill. The theories of the classical school, which dominated economic thinking in Great Britain until about 1870, focused on economic growth and economic freedom, stressing laissez-faire ideas and free competition. Classical school economists believed in the following- 1 . Strongly opposed to the mercantilist theory and policy that had prevailed in Britain since the 16th century. 2 . They believed that free competition and free trade would best promote a nation’s economic growth. The entire community benefits most when each of its members follows his or her own self-interest. They believed in “Invisible hands of God”. 3 . They relied on the adjustment of demand and supply in the economy automatically, without any government intervention. 4 . In analyzing the workings of free enterprise, Smith introduced the concept of a labor theory of value and a theory of distribution. Keynesian School questioned the classical school at the time of the Great Depression of the 1930s. They believed that government intervention is important to generate demand in the economy. The utility of Keynesian school of thought - Keynesian described how the economy works with the help of the following observations. 1 . A Keynesian believes that aggregate demand is influenced by a host of economic decisions- both public and private. The public decisions include, most prominently, those on monetary and fiscal (i.e., spending and tax) policies. Initially, they gave more emphasis to fiscal policy. 2 . Changes in aggregate demand, whether anticipated or unanticipated, have their greatest short-run effect on real output and employment, not on prices. It is shown by Philips Curve. In the long run, Keynesian quote- “In the long run, we are all dead,” to make the point. 3 . Keynesians believe that prices, and especially wages, respond slowly to changes in supply and demand, resulting in periodic shortages and surpluses, especially of labor. 4 . Some Keynesians are more concerned about combating unemployment than about conquering inflation. There are shortcomings of Keynesians also. The problem of high inflation and fiscal viability of public finances are the major issues with this model. In the contemporary world, it is very important to incorporate both the school of thoughts i.e. market-driven with necessary government intervention. Economic Survey also emphasizes that the "Invisible Hand" should be supported by the "Hand of Trust".
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भारत असतत जनसंख्या वृद्धि की समस्या का सामना कर रहा है जिसे नियंत्रित करने के लिएभारत सरकार स्वतंत्रता पश्चात से हीनिरंतर प्रयासरत है। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) India is facing the problem of unsustainablepopulation growth, to control it,the Indian government is continuously trying since independence. Discuss. (150-200 words)
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एप्रोच: - सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत मेंअसतत जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में जनसँख्या नियंत्रण के लिए स्वतंत्रता पश्चात से ही भारत सरकार द्वारा किये जा रहे रहे प्रयासों की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- इस वर्ष जून में जारी संयुक्त राष्ट्र की `World Population Prospects 2019’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत की जनसंख्या एक दशक से भी कम समय में चीन से आगे निकलने का अनुमान है। भारत वर्तमान में तेजी से बढ़ती जनसंख्या और इसके कारण सीमित संसाधनों पर दबाव का सामना कर रहा है। इसका प्रभाव आने वाले समय मेंखाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र पर और अधिक दिखाई देगा। हालाँकि भारत सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में स्वतंत्रता पश्चात से ही विभिन्न प्रयास किये गए हैं जिसके फलस्वरूप24 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही टोटल फर्टिलिटी रेट(TFR)2.1 के प्रतिस्थापन स्तर तक पहुंच चुकीहै। स्वतंत्रता पश्चात से ही भारत सरकार द्वारा किये जा रहे रहे प्रयास:- 1951 में, भारत राज्य प्रायोजित "परिवार नियोजन कार्यक्रम" शुरू करनेवाले विकासशील देशों में पहला बन गया। 1950 में स्थापित किए गए योजना आयोग को परिवार नियोजन कार्यक्रम पर निर्णय लेने का काम दिया गया। 1952 में, एक जनसंख्या नीति समिति का गठन किया गया। इस समिति ने " परिवार नियोजनअनुसंधान और कार्यक्रम समिति " के गठन की सिफारिश की। लेकिन 1951-52 में बनाई गई नीतियां प्रकृति में एड-हॉक थीं और मुख्य रूप से आत्म-नियंत्रण पर आधारित थीं इसलिए यह सफल नहीं रहीं। इसके बाद, 1956 में, एक "केंद्रीय परिवार नियोजन बोर्ड" की स्थापना की गई। इस बोर्ड ने नसबंदी पर ज्यादा फोकस किया। हालाँकि, 1960 के दशक तक जनसंख्या नियंत्रण पर कोई ठोस नीति नहीं अपनाई गई और सरकार देश की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छे तरिके की खोज कर रही थी। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 1976:- 1976 में, भारत सरकार अपनी पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति लेकर आई। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए इस नीति के तहतकई उपाय सुझाये गए जिनमें सेकुछ उपाय इस प्रकार हैं:- लड़कियों और लड़कों के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र क्रमशः 18 और 21 तक बढ़ाना। जन्म नियंत्रण(बर्थ कण्ट्रोल) के लिए मौद्रिक प्रोत्साहन। औपचारिक और गैर-औपचारिक दोनों माध्यमों से महिलाओं के साक्षरता स्तर में सुधार। राज्यों के साथ केंद्रीय संसाधनों को साझा करने के लिएजनसंख्या को एक कारक के रूप में बनाया गया। परिवार कल्याण कार्यक्रमों में राज्यों के प्रदर्शन के आधार परकेंद्रीय सहायता का 8%राज्यों को देने का प्रावधान किया गया। मीडिया के सभी रूपों का उपयोग करके परिवार कल्याण कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने का संकल्प। औपचारिक शिक्षा प्रणाली में जनसंख्या नियंत्रण से संबंधितशिक्षा को बढ़ाना इत्यादि। 1 989 करुणाकरन समिति का गठन:- इस समिति ने आवश्यक शोध पर बल दिया और इस संदर्भ में वर्ष 1993 में स्वामीनाथन टास्कफोर्स का गठन किया गया, जिसमें यह परिकल्पना प्रस्तुत की, कि एक नईजनसँख्या नीति बनाते हुए उन सभी घटकों पर समेकित प्रयास किये जाये जो जनसँख्या को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति:- इस जनसँख्या के कुछ महत्वपूर्ण एवं दीर्घकालिक लक्ष्य जैसे वर्ष 2045 में नेट रिप्रोडक्टिव रेट को एक(1) करने का लक्ष्य रखा गया। लघुकालिक लक्ष्यों में कुछ मुख्य निम्नलिखित है- अवसरंचनात्मक स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर किये जाना, जिससे संस्थागत प्रसव को बढाकर 80 प्रतिशत तक लाया जा सके तथा सभी महिलाओं को आशा एवं ANM की मदद से संस्थागतप्रसव हेतु प्रेरित किया जाये। MMR को घटाकर 100 के नीचे तथा शिशु मृत्यू दर को घटाकर 30 के नीचे लाया जाये। बालक एवं बालिकाओं को 6-14 वर्ष की आयु में नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाये तथा उनके ड्राप आउट को घटाकर 20 प्रतिशत से नीचे लाया जाये। जन्म मृत्यू तथा विवाह का शत प्रतिशत रजिस्ट्रेशन सुनिश्चित किया जाये। समाज में व्यक्तियों को गर्भ निरोधक उपायों के संदर्भ में जागरूक बनाना, गर्भपात को निःशुल्क उपलब्ध कराना तथा साथ ही STDs के संदर्भ में जागरूक बनाते हुए आवश्यक दवाओं को सुलभ करना। इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु एक जनसंख्या स्थिरता कोष की परिकल्पना प्रस्तुत की गई तथा चिकित्सा की अन्य प्रणालियों को समेकित करने की सिफारिश भी की गई। जिसे पहले आईएसएम तथा बाद में आयुष का नाम दिया गया। संसद सदस्य राकेश सिन्हा द्वारा भी हाल ही में राज्यसभा मेंजनसंख्या नियंत्रण से सम्बंधित निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किया गया है। जिसमेंदो से अधिक बच्चों वाले लोगों के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लाभ से वंचित करना, निर्वाचित प्रतिनिधि को अयोग्य घोषित करना इत्यादि शामिल है।विधेयक यह भी सुझाव देता है कि सरकारी कर्मचारियों को एक वचन देना चाहिए कि वे दो से अधिक बच्चे पैदा नहींकरेंगे। हालाँकिपीडीएस के लाभ से वंचित करना जैसे प्रावधान के कारण इस बिल की आलोचना भी की जा रही है क्योंकि इससे सबसे अधिक हासिये पर उपस्थित लोग प्रभावित होंगे। इसलिएएक समेकित दृष्टिकोण अपनाते हुए अब इस दिशा में और भीप्रयास अपेक्षित हैं।
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##Question:भारत असतत जनसंख्या वृद्धि की समस्या का सामना कर रहा है जिसे नियंत्रित करने के लिएभारत सरकार स्वतंत्रता पश्चात से हीनिरंतर प्रयासरत है। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) India is facing the problem of unsustainablepopulation growth, to control it,the Indian government is continuously trying since independence. Discuss. (150-200 words)##Answer:एप्रोच: - सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत मेंअसतत जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में जनसँख्या नियंत्रण के लिए स्वतंत्रता पश्चात से ही भारत सरकार द्वारा किये जा रहे रहे प्रयासों की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- इस वर्ष जून में जारी संयुक्त राष्ट्र की `World Population Prospects 2019’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत की जनसंख्या एक दशक से भी कम समय में चीन से आगे निकलने का अनुमान है। भारत वर्तमान में तेजी से बढ़ती जनसंख्या और इसके कारण सीमित संसाधनों पर दबाव का सामना कर रहा है। इसका प्रभाव आने वाले समय मेंखाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र पर और अधिक दिखाई देगा। हालाँकि भारत सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में स्वतंत्रता पश्चात से ही विभिन्न प्रयास किये गए हैं जिसके फलस्वरूप24 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही टोटल फर्टिलिटी रेट(TFR)2.1 के प्रतिस्थापन स्तर तक पहुंच चुकीहै। स्वतंत्रता पश्चात से ही भारत सरकार द्वारा किये जा रहे रहे प्रयास:- 1951 में, भारत राज्य प्रायोजित "परिवार नियोजन कार्यक्रम" शुरू करनेवाले विकासशील देशों में पहला बन गया। 1950 में स्थापित किए गए योजना आयोग को परिवार नियोजन कार्यक्रम पर निर्णय लेने का काम दिया गया। 1952 में, एक जनसंख्या नीति समिति का गठन किया गया। इस समिति ने " परिवार नियोजनअनुसंधान और कार्यक्रम समिति " के गठन की सिफारिश की। लेकिन 1951-52 में बनाई गई नीतियां प्रकृति में एड-हॉक थीं और मुख्य रूप से आत्म-नियंत्रण पर आधारित थीं इसलिए यह सफल नहीं रहीं। इसके बाद, 1956 में, एक "केंद्रीय परिवार नियोजन बोर्ड" की स्थापना की गई। इस बोर्ड ने नसबंदी पर ज्यादा फोकस किया। हालाँकि, 1960 के दशक तक जनसंख्या नियंत्रण पर कोई ठोस नीति नहीं अपनाई गई और सरकार देश की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छे तरिके की खोज कर रही थी। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 1976:- 1976 में, भारत सरकार अपनी पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति लेकर आई। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए इस नीति के तहतकई उपाय सुझाये गए जिनमें सेकुछ उपाय इस प्रकार हैं:- लड़कियों और लड़कों के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र क्रमशः 18 और 21 तक बढ़ाना। जन्म नियंत्रण(बर्थ कण्ट्रोल) के लिए मौद्रिक प्रोत्साहन। औपचारिक और गैर-औपचारिक दोनों माध्यमों से महिलाओं के साक्षरता स्तर में सुधार। राज्यों के साथ केंद्रीय संसाधनों को साझा करने के लिएजनसंख्या को एक कारक के रूप में बनाया गया। परिवार कल्याण कार्यक्रमों में राज्यों के प्रदर्शन के आधार परकेंद्रीय सहायता का 8%राज्यों को देने का प्रावधान किया गया। मीडिया के सभी रूपों का उपयोग करके परिवार कल्याण कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने का संकल्प। औपचारिक शिक्षा प्रणाली में जनसंख्या नियंत्रण से संबंधितशिक्षा को बढ़ाना इत्यादि। 1 989 करुणाकरन समिति का गठन:- इस समिति ने आवश्यक शोध पर बल दिया और इस संदर्भ में वर्ष 1993 में स्वामीनाथन टास्कफोर्स का गठन किया गया, जिसमें यह परिकल्पना प्रस्तुत की, कि एक नईजनसँख्या नीति बनाते हुए उन सभी घटकों पर समेकित प्रयास किये जाये जो जनसँख्या को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति:- इस जनसँख्या के कुछ महत्वपूर्ण एवं दीर्घकालिक लक्ष्य जैसे वर्ष 2045 में नेट रिप्रोडक्टिव रेट को एक(1) करने का लक्ष्य रखा गया। लघुकालिक लक्ष्यों में कुछ मुख्य निम्नलिखित है- अवसरंचनात्मक स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर किये जाना, जिससे संस्थागत प्रसव को बढाकर 80 प्रतिशत तक लाया जा सके तथा सभी महिलाओं को आशा एवं ANM की मदद से संस्थागतप्रसव हेतु प्रेरित किया जाये। MMR को घटाकर 100 के नीचे तथा शिशु मृत्यू दर को घटाकर 30 के नीचे लाया जाये। बालक एवं बालिकाओं को 6-14 वर्ष की आयु में नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाये तथा उनके ड्राप आउट को घटाकर 20 प्रतिशत से नीचे लाया जाये। जन्म मृत्यू तथा विवाह का शत प्रतिशत रजिस्ट्रेशन सुनिश्चित किया जाये। समाज में व्यक्तियों को गर्भ निरोधक उपायों के संदर्भ में जागरूक बनाना, गर्भपात को निःशुल्क उपलब्ध कराना तथा साथ ही STDs के संदर्भ में जागरूक बनाते हुए आवश्यक दवाओं को सुलभ करना। इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु एक जनसंख्या स्थिरता कोष की परिकल्पना प्रस्तुत की गई तथा चिकित्सा की अन्य प्रणालियों को समेकित करने की सिफारिश भी की गई। जिसे पहले आईएसएम तथा बाद में आयुष का नाम दिया गया। संसद सदस्य राकेश सिन्हा द्वारा भी हाल ही में राज्यसभा मेंजनसंख्या नियंत्रण से सम्बंधित निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किया गया है। जिसमेंदो से अधिक बच्चों वाले लोगों के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लाभ से वंचित करना, निर्वाचित प्रतिनिधि को अयोग्य घोषित करना इत्यादि शामिल है।विधेयक यह भी सुझाव देता है कि सरकारी कर्मचारियों को एक वचन देना चाहिए कि वे दो से अधिक बच्चे पैदा नहींकरेंगे। हालाँकिपीडीएस के लाभ से वंचित करना जैसे प्रावधान के कारण इस बिल की आलोचना भी की जा रही है क्योंकि इससे सबसे अधिक हासिये पर उपस्थित लोग प्रभावित होंगे। इसलिएएक समेकित दृष्टिकोण अपनाते हुए अब इस दिशा में और भीप्रयास अपेक्षित हैं।
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What do you understand by inflation? Explain the terms hyper-inflation and depression related to inflation. (150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - UNDERSTANDING INFLATION - HYPER-INFLATION - DEPRESSION - CONCLUSION Answer:- Inflation means a rise in the general price level in an economy UNDERSTANDING INFLATION 1) DEFINITION Inflation can be defined as a situation characterized by a substantial rise in the general price level observed over a period of time, which may generate an expectation of a future price rise. 1.1) Inflation can also be defined as a decrease in the purchasing power of each unit of currency. This is because, after inflation, each unit of currency can now buy lesser goods and services. 2) FACTORS LEADING TO INFLATION Inflation in the economy can arise due to two broad factors. 2.1) DEMAND SIDE FACTORS: It basically occurs in a situation when the aggregate demand in the economy has exceeded the aggregate supply. It could further be described as a situation where too much money chases just a few goods. For example, an increase in population black money, an increase in the money supply, an increase in government expenditure, an increase in wages and salaries, an increase in foreign exchange reserves, etc. (Graph should be drawn here- a rightward shift of the demand curve) 2.2) SUPPLY SIDE FACTORS: This is a key factor for the rising inflation in India. For example, erratic monsoons and shortfall in production, wastage and loss in transit, hoarding, speculations, black marketing, import-cost push factors etc. (Graph should be drawn here- a leftward shift of the supply curve) HYPER-INFLATION When the inflation rate increases a lot to double or triple digits, it is termed as hyper-inflation. For example, it can reach very high rates like 100%, 500%, 1000% etc. There are mainly 2 reasons behind hyper-inflation: (i) Political instability (ii) When a country is in war. In India, the maximum inflation we have witnessed up till present times was in May 1974 at 34%. This was due to political instability. Zimbabwe also witnessed huge inflation due to political instability. DEPRESSION It originated in the USA, after a fall in stock prices there that began around 4th September 1929 and became worldwide news with the stock market crash of October 29, 1929, known as black Tuesday. Between 1929 and 1932, the world GDP fell by an estimated 15%. Personal income, tax revenue, profits and prices dropped, while international trade dropped by more than 50%. Unemployment in the USA reached 25% and in some countries, it increased to as high as 33%. This situation rocked the entire Western Europe and USA during 1929-33, known as the Great Depression of the 1930s. Inflation is desirable in an economy up to a certain extent. That means it should neither be too high nor too low. This is evident from the explanation and the effects mentioned for the above two terms, related to high inflation and low inflation (/ negative inflation) in the economy- When the inflation rate is too high, consumers, particularly the poor, are affected. There is a loss of welfare in the economy. When the inflation rate is too low, then investments suffer. Since the prices are low, the producers do not get an incentive to invest (as profits made would be low). Thus, there is depression in the economy. It is only when the inflation rate is optimum, that the producers will have an incentive to invest. This creates employment, increase in wages, thereby increasing the demand in the economy. This further provides an incentive for the producers to invest more- Thus, setting in growth and prosperity in the economy via the multiplier effect. In our economy, currently, the inflation rate of 4% +- 2% has been set as desirable (and hence the inflation targeting is done to achieve/ remain within this limit).
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##Question:What do you understand by inflation? Explain the terms hyper-inflation and depression related to inflation. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - UNDERSTANDING INFLATION - HYPER-INFLATION - DEPRESSION - CONCLUSION Answer:- Inflation means a rise in the general price level in an economy UNDERSTANDING INFLATION 1) DEFINITION Inflation can be defined as a situation characterized by a substantial rise in the general price level observed over a period of time, which may generate an expectation of a future price rise. 1.1) Inflation can also be defined as a decrease in the purchasing power of each unit of currency. This is because, after inflation, each unit of currency can now buy lesser goods and services. 2) FACTORS LEADING TO INFLATION Inflation in the economy can arise due to two broad factors. 2.1) DEMAND SIDE FACTORS: It basically occurs in a situation when the aggregate demand in the economy has exceeded the aggregate supply. It could further be described as a situation where too much money chases just a few goods. For example, an increase in population black money, an increase in the money supply, an increase in government expenditure, an increase in wages and salaries, an increase in foreign exchange reserves, etc. (Graph should be drawn here- a rightward shift of the demand curve) 2.2) SUPPLY SIDE FACTORS: This is a key factor for the rising inflation in India. For example, erratic monsoons and shortfall in production, wastage and loss in transit, hoarding, speculations, black marketing, import-cost push factors etc. (Graph should be drawn here- a leftward shift of the supply curve) HYPER-INFLATION When the inflation rate increases a lot to double or triple digits, it is termed as hyper-inflation. For example, it can reach very high rates like 100%, 500%, 1000% etc. There are mainly 2 reasons behind hyper-inflation: (i) Political instability (ii) When a country is in war. In India, the maximum inflation we have witnessed up till present times was in May 1974 at 34%. This was due to political instability. Zimbabwe also witnessed huge inflation due to political instability. DEPRESSION It originated in the USA, after a fall in stock prices there that began around 4th September 1929 and became worldwide news with the stock market crash of October 29, 1929, known as black Tuesday. Between 1929 and 1932, the world GDP fell by an estimated 15%. Personal income, tax revenue, profits and prices dropped, while international trade dropped by more than 50%. Unemployment in the USA reached 25% and in some countries, it increased to as high as 33%. This situation rocked the entire Western Europe and USA during 1929-33, known as the Great Depression of the 1930s. Inflation is desirable in an economy up to a certain extent. That means it should neither be too high nor too low. This is evident from the explanation and the effects mentioned for the above two terms, related to high inflation and low inflation (/ negative inflation) in the economy- When the inflation rate is too high, consumers, particularly the poor, are affected. There is a loss of welfare in the economy. When the inflation rate is too low, then investments suffer. Since the prices are low, the producers do not get an incentive to invest (as profits made would be low). Thus, there is depression in the economy. It is only when the inflation rate is optimum, that the producers will have an incentive to invest. This creates employment, increase in wages, thereby increasing the demand in the economy. This further provides an incentive for the producers to invest more- Thus, setting in growth and prosperity in the economy via the multiplier effect. In our economy, currently, the inflation rate of 4% +- 2% has been set as desirable (and hence the inflation targeting is done to achieve/ remain within this limit).
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Earth atmoshpere is multilayered and complex. Explain the structure of the Earth atmoshere in brief. (200 words)
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Approach - Briefly explain the theory Explain the stages Explain Significance Answer - The Big Bang theory also is known as the "expanding universe theory” is one of the most widely accepted theories explaining the origin of the universe. It was Edwin Hubble, who provided evidence regarding the expanding nature of the universe. The expansion occurs in such a way that the distance between the stars and galaxies increases without any increase in the size of the stars. Edwin identifies three stages of the evolution of the universe:- 1. Stage 1 - Beginning All the matter of the universe existed as a "tiny ball" called Singularity having an unimaginably small volume, infinite temperature & density. 2. Stage 2 - At the Big Bang As the "tiny ball" exploded violently, the energy started expanding at a very rapid pace in the initial moments. With time, energy started getting converted into matter. 3. Stage 3 - Within 3,00,000 years The temperature dropped to 4500K and gave rise to atomic matter. Here on, the universe became transparent. Various cosmic bodies started taking shapes. Significance - With the benefit of improved telescopes, Hubble proved that the light coming from these galaxies was shifted a little towards the red end of the spectrum due to the Doppler effect known as “redshift”, which indicated that the galaxies were moving away from us. It not only explains the formation of the universe but also the formation of galaxies, stars, planets and the existence of dark matter and energy or black hole. Various evidence like microwave background and electromagnetic wave spectrum have helped us to understand other phenomena of the universe Thus, in the present context, it gives us an insight into our universe; helps provide a test for general relativity theory, which could have been used to predict the expansion."
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##Question:Earth atmoshpere is multilayered and complex. Explain the structure of the Earth atmoshere in brief. (200 words)##Answer:Approach - Briefly explain the theory Explain the stages Explain Significance Answer - The Big Bang theory also is known as the "expanding universe theory” is one of the most widely accepted theories explaining the origin of the universe. It was Edwin Hubble, who provided evidence regarding the expanding nature of the universe. The expansion occurs in such a way that the distance between the stars and galaxies increases without any increase in the size of the stars. Edwin identifies three stages of the evolution of the universe:- 1. Stage 1 - Beginning All the matter of the universe existed as a "tiny ball" called Singularity having an unimaginably small volume, infinite temperature & density. 2. Stage 2 - At the Big Bang As the "tiny ball" exploded violently, the energy started expanding at a very rapid pace in the initial moments. With time, energy started getting converted into matter. 3. Stage 3 - Within 3,00,000 years The temperature dropped to 4500K and gave rise to atomic matter. Here on, the universe became transparent. Various cosmic bodies started taking shapes. Significance - With the benefit of improved telescopes, Hubble proved that the light coming from these galaxies was shifted a little towards the red end of the spectrum due to the Doppler effect known as “redshift”, which indicated that the galaxies were moving away from us. It not only explains the formation of the universe but also the formation of galaxies, stars, planets and the existence of dark matter and energy or black hole. Various evidence like microwave background and electromagnetic wave spectrum have helped us to understand other phenomena of the universe Thus, in the present context, it gives us an insight into our universe; helps provide a test for general relativity theory, which could have been used to predict the expansion."
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भारत- श्रीलंका सम्बन्ध में सहयोग के आयाम को बताइए | साथ ही दोनों के संबंधो में चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये | (200 शब्द) Explain the dimensions of cooperation in Relation to India-Sri Lanka, Also discuss the challanges in both relations.
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एप्रोच - भूमिका में भारत- श्रीलंका संबंधों की ऐतिहासिकता बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत- श्रीलंका के संबंधों में सहयोग को आयाम को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत- श्रीलंका संबंधो में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण (समाधान) के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत एवं श्रीलंका के सम्बन्ध 2500 वर्षों से अधिक पुराने हैं | वर्ष 1974 में भारत तथा श्रीलंका के बीच समुद्री समझौता हुआ , जिसके तहत भारत ने गुजराल डॉक्ट्रिन के तहत कच्छ तीवु द्वीप श्रीलंका को सौंपा , जिससे दोनों के मध्य सहयोग का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ | भारत श्रीलंका के मध्य सहयोग निम्नलिखित आधारों पर समझ सकते हैं - आर्थिक सहयोग रक्षा सुरक्षा से सम्बंधित सहयोग अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक सहयोग सांस्कृतिक सहयोग - वर्ष 2000 में भारत एवं श्रीलंका के मध्य मुक्त व्यापार समझौता लागू हुआ एवं भारत , श्रीलंका का सबसे बड़ा वैश्विक व्यापारिक भागीदार देश है | भारत , श्रीलंका के चार शीर्ष निवेशकों में से एक है | - भारत ने मालदीव एवं श्रीलंका के मध्य मिलकर वर्ष 2011 में एक त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा समझौता पर स्वीकृति दी | इसके अतिरिक्त भारत श्रीलंका के लिए सुरक्षा ट्रेनिंग प्रोग्राम में भी सहायता करता है | दोनों देश द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास भी करते हैं जैसे - मित्र शक्ति एवं स्लिनेक्स (SLINEX ) आदि | - हाल ही में श्रीलंका में समाप्त हुई विशाल मानवीय चुनौती के बाद भारत ने श्रीलंका में अवसंरचनात्मक सहयोग के साथ अपने गुजराल डॉक्ट्रिन को बढ़ाया जैसे उदहारण के लिए आवासीय इकाइयों का निर्माण , उत्तरी रेलवे लाइनों का निर्माण , व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना इत्यादि | - वर्ष 1977 में दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक सहयोग को लेकर एक समझौता हुआ | वर्तमान में श्रीलंका भी भारत के नालंदा प्रोजेक्ट में एक भागीदार देश है | हाल ही में दोनों देशों ने बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति के 2600वें वर्ष को एक स्मरणोत्सव के रूप में मनाया | दोनों देशों के मध्य चुनौतियां - मछुआरा विवाद - मछुआरे अधिकतर सीमाओं से सम्बंधित जानकारी से अनभिज्ञ होते हैं , जिससे वे श्रीलंका के पानी में जाकर मछली पकड़ने का प्रयास करते है एवं श्रीलंकाई नौसेना द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है इससे दोनों देशों के मध्य यह विवाद का मुद्दा बना रहता है | संघीय स्वरुप - भारत शुरू से ही मानवीय मूल्यों का पक्षधर रहा है उसका मानना है कि श्रीलंका को संघीय स्वरुप को वास्तविकता में अपनाना चाहिए एवं श्रीलंका इसे अपना आतंरिक मामला मानता है , यह दोनों के मध्य विवाद का विषय है | चीन का बढ़ता प्रभाव - हाल में वर्ष (2005-15 ) के मध्य श्रीलंका में चीन का निवेश तेजी से बढ़ा , जिसके फलस्वरूप श्रीलंका , चीन की वन बेल्ट वन रोड का प्रबल समर्थक है जिसका फलस्वरूप श्रीलंका में वर्तमान में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश चीन का है | श्रीलंका, भारत के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है | भारत को श्रीलंका के साथ संबंधों में सुदृढ़ता लाने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर काम करना चाहिए - मछुआरों से सम्बंधित समस्या के सम्बन्ध में एक स्थायी सचिवालय का निर्माण किया जाना चाहिए , जो देशों से सम्बंधित हो | भारत को श्रीलंका के आतंरिक मामलों में दखल से बचना चाहिए एवं द्विपक्षीय स्तर पर मानवीय मूल्यों एवं सहयोग को लेकर बात करनी चाहिए | चीन की "चेक बुक डिप्लोमेसी " से बहार निकलने के लिए , भारत को श्रीलंका की वित्तीय सहायता करनी चाहिए | श्रीलंका बहुत वर्षों से भारत का सहयोगी रहा है, अतः भारत को श्रीलंका के साथ सहयोग करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए |
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##Question:भारत- श्रीलंका सम्बन्ध में सहयोग के आयाम को बताइए | साथ ही दोनों के संबंधो में चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये | (200 शब्द) Explain the dimensions of cooperation in Relation to India-Sri Lanka, Also discuss the challanges in both relations.##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत- श्रीलंका संबंधों की ऐतिहासिकता बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत- श्रीलंका के संबंधों में सहयोग को आयाम को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत- श्रीलंका संबंधो में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण (समाधान) के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत एवं श्रीलंका के सम्बन्ध 2500 वर्षों से अधिक पुराने हैं | वर्ष 1974 में भारत तथा श्रीलंका के बीच समुद्री समझौता हुआ , जिसके तहत भारत ने गुजराल डॉक्ट्रिन के तहत कच्छ तीवु द्वीप श्रीलंका को सौंपा , जिससे दोनों के मध्य सहयोग का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ | भारत श्रीलंका के मध्य सहयोग निम्नलिखित आधारों पर समझ सकते हैं - आर्थिक सहयोग रक्षा सुरक्षा से सम्बंधित सहयोग अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक सहयोग सांस्कृतिक सहयोग - वर्ष 2000 में भारत एवं श्रीलंका के मध्य मुक्त व्यापार समझौता लागू हुआ एवं भारत , श्रीलंका का सबसे बड़ा वैश्विक व्यापारिक भागीदार देश है | भारत , श्रीलंका के चार शीर्ष निवेशकों में से एक है | - भारत ने मालदीव एवं श्रीलंका के मध्य मिलकर वर्ष 2011 में एक त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा समझौता पर स्वीकृति दी | इसके अतिरिक्त भारत श्रीलंका के लिए सुरक्षा ट्रेनिंग प्रोग्राम में भी सहायता करता है | दोनों देश द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास भी करते हैं जैसे - मित्र शक्ति एवं स्लिनेक्स (SLINEX ) आदि | - हाल ही में श्रीलंका में समाप्त हुई विशाल मानवीय चुनौती के बाद भारत ने श्रीलंका में अवसंरचनात्मक सहयोग के साथ अपने गुजराल डॉक्ट्रिन को बढ़ाया जैसे उदहारण के लिए आवासीय इकाइयों का निर्माण , उत्तरी रेलवे लाइनों का निर्माण , व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना इत्यादि | - वर्ष 1977 में दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक सहयोग को लेकर एक समझौता हुआ | वर्तमान में श्रीलंका भी भारत के नालंदा प्रोजेक्ट में एक भागीदार देश है | हाल ही में दोनों देशों ने बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति के 2600वें वर्ष को एक स्मरणोत्सव के रूप में मनाया | दोनों देशों के मध्य चुनौतियां - मछुआरा विवाद - मछुआरे अधिकतर सीमाओं से सम्बंधित जानकारी से अनभिज्ञ होते हैं , जिससे वे श्रीलंका के पानी में जाकर मछली पकड़ने का प्रयास करते है एवं श्रीलंकाई नौसेना द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है इससे दोनों देशों के मध्य यह विवाद का मुद्दा बना रहता है | संघीय स्वरुप - भारत शुरू से ही मानवीय मूल्यों का पक्षधर रहा है उसका मानना है कि श्रीलंका को संघीय स्वरुप को वास्तविकता में अपनाना चाहिए एवं श्रीलंका इसे अपना आतंरिक मामला मानता है , यह दोनों के मध्य विवाद का विषय है | चीन का बढ़ता प्रभाव - हाल में वर्ष (2005-15 ) के मध्य श्रीलंका में चीन का निवेश तेजी से बढ़ा , जिसके फलस्वरूप श्रीलंका , चीन की वन बेल्ट वन रोड का प्रबल समर्थक है जिसका फलस्वरूप श्रीलंका में वर्तमान में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश चीन का है | श्रीलंका, भारत के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है | भारत को श्रीलंका के साथ संबंधों में सुदृढ़ता लाने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर काम करना चाहिए - मछुआरों से सम्बंधित समस्या के सम्बन्ध में एक स्थायी सचिवालय का निर्माण किया जाना चाहिए , जो देशों से सम्बंधित हो | भारत को श्रीलंका के आतंरिक मामलों में दखल से बचना चाहिए एवं द्विपक्षीय स्तर पर मानवीय मूल्यों एवं सहयोग को लेकर बात करनी चाहिए | चीन की "चेक बुक डिप्लोमेसी " से बहार निकलने के लिए , भारत को श्रीलंका की वित्तीय सहायता करनी चाहिए | श्रीलंका बहुत वर्षों से भारत का सहयोगी रहा है, अतः भारत को श्रीलंका के साथ सहयोग करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए |
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संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150 शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150 words)
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एप्रोच:- भूमिका मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की अवधारणा को समझाइये। उत्तर के दूसरे भाग में स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । उत्तर के अंतिम भाग में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर: भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में निचली या मध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जाति व्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चिमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया जाता है । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपश्चिमीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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##Question:संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150 शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150 words)##Answer:एप्रोच:- भूमिका मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की अवधारणा को समझाइये। उत्तर के दूसरे भाग में स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । उत्तर के अंतिम भाग में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर: भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में निचली या मध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जाति व्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चिमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया जाता है । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपश्चिमीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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उपनिवेशकालीन भारत में रेलवे के विकास ने मिश्रित एवं बहुआयामी प्रभाव उत्पन्न किये| चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) The development of the railway in colonial India produced mixed and multi-dimensional effects. Discuss (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में रेलवे के विकास की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में मिश्रित एवं बहुआयामी प्रभावों के सन्दर्भ एन निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में रेलवे का विकास विभिन्न कारकों का परिणाम था|19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर मंदी का प्रभाव था| मुख्यतः इस्पात एवं कपड़ा उद्योग के द्वारा भारत में बाजार के विस्तार के लिए उत्पन्न दबाव था| ब्रिटिश पूंजीपति भी मुनाफे को ध्यान में रख कर निवेश के लिए प्रेरित थे| इसके साथ ही ब्रिटिश भारत की सरकार भी सामरिक-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रेलवे के विकास का समर्थन करती थी| अतः विभिन्न कारकों ने ब्रिटिश भारत में रेलवे के विकास को प्रोत्साहित किया था| रेलवे के विकास ने भारत पर विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न किये जो नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों अर्थात मिश्रित प्रकृति के थे| नकारात्मक प्रभाव उद्योगों औरपरिवहनपर प्रभाव · रेलवे के विकास के साथ ही भारत में आधुनिक उद्योगों की शुरुआत हुई|देशी एवं विदेशी दोनों पूजीपतियों ने उद्योगों में निवेश किया · सरकार ने भाडा/किराया नीति, भौगोलिक विन्यास आदि क्षेत्रों में ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा · सरकार के असहयोग के बावजूद स्वदेशी उद्यमशीलता विकसित हुईकिन्तु रेलवे ने ग्रामीण उद्योगों को व्यापक क्षति पहुचाई · ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारना भारत में रेलवे को प्रारम्भ करने का एक प्रमुख उद्देश्य था, रेलवे ने कपड़ा एवं इस्पात उद्योगों को गति प्रदान की · परिवहन के क्षेत्र में भी रेलवे का आगमन एक नए युग की शुरुआत थी हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में औपनिवेशिक हितों को ही महत्त्व दिया गया कृषि पर प्रभाव · रेलवे के कारण भारत में वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया को गति मिली · इसके साथ ही बड़ी मात्रा में अखाद्य फसलों के साथ-साथ खाद्य फसलों का भी निर्यात किया गया व्यापार पर प्रभाव · रेलवे ने भारत को खेतिहर उपनिवेश के रूप में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया · एक ओर कच्चे माल के निर्यात की मात्रा बढ़ी तो दूसरी ओर तैयार मालों के आयात की मात्रा भी बढ़ी रोजगार पर प्रभाव · रेलवे के विकास की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए · हालांकि उच्च पदों पर मुख्यतः अंग्रेजों की नियुक्ति की गयी एवं निम्नस्तरीय कर्मचारी के रूप में भारतीयों की नियुक्ति की गयी · कुल मिलाकर रेलवे ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उपनिवेशीकरण तथा धन के दोहन को गति प्रदान की सकारात्मक आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव आर्थिक दृष्टिकोण से · सरकार के असहयोगी रवैये के बाद भी आधुनिक उद्योगों का भारत में विकास, · परिवहन के द्रुतगामी साधन की शुरुआत हुई · रोजगार के अवसरों की उपलब्धता बढ़ी आदि सामाजिक दृष्टिकोण से · जाति-प्रथा, छुआछूत, धार्मिक अलगाव, लिंग असमानता जैसी सामाजिक समस्याओं को कमजोर करने मेंमें रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी · उपरोक्त समस्याओं के सन्दर्भ में लोगों के दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में भी रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी राजनीतिक दृष्टिकोण से · रेलवे के विकास से विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर संपर्क बढ़ा जिससे राजनीतिक नेताओं एवं संगठनों के मध्य सहयोग की संभावना बढ़ी · ब्रिटिश विरोधी भावनाओं के उदय में रेलवे का महत्वपूर्ण योगदान देख सकते हैं · ब्रिटिश साझा शत्रु हैं इस बात को समझने और राष्ट्रवाद के उदय में रेलवे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में रेलवे के विकास ने दीघ्गामी बहुआयामी एवं मिश्रित परिणाम उत्पन्न किये|
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##Question:उपनिवेशकालीन भारत में रेलवे के विकास ने मिश्रित एवं बहुआयामी प्रभाव उत्पन्न किये| चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) The development of the railway in colonial India produced mixed and multi-dimensional effects. Discuss (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में रेलवे के विकास की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में मिश्रित एवं बहुआयामी प्रभावों के सन्दर्भ एन निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में रेलवे का विकास विभिन्न कारकों का परिणाम था|19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर मंदी का प्रभाव था| मुख्यतः इस्पात एवं कपड़ा उद्योग के द्वारा भारत में बाजार के विस्तार के लिए उत्पन्न दबाव था| ब्रिटिश पूंजीपति भी मुनाफे को ध्यान में रख कर निवेश के लिए प्रेरित थे| इसके साथ ही ब्रिटिश भारत की सरकार भी सामरिक-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रेलवे के विकास का समर्थन करती थी| अतः विभिन्न कारकों ने ब्रिटिश भारत में रेलवे के विकास को प्रोत्साहित किया था| रेलवे के विकास ने भारत पर विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न किये जो नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों अर्थात मिश्रित प्रकृति के थे| नकारात्मक प्रभाव उद्योगों औरपरिवहनपर प्रभाव · रेलवे के विकास के साथ ही भारत में आधुनिक उद्योगों की शुरुआत हुई|देशी एवं विदेशी दोनों पूजीपतियों ने उद्योगों में निवेश किया · सरकार ने भाडा/किराया नीति, भौगोलिक विन्यास आदि क्षेत्रों में ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा · सरकार के असहयोग के बावजूद स्वदेशी उद्यमशीलता विकसित हुईकिन्तु रेलवे ने ग्रामीण उद्योगों को व्यापक क्षति पहुचाई · ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारना भारत में रेलवे को प्रारम्भ करने का एक प्रमुख उद्देश्य था, रेलवे ने कपड़ा एवं इस्पात उद्योगों को गति प्रदान की · परिवहन के क्षेत्र में भी रेलवे का आगमन एक नए युग की शुरुआत थी हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में औपनिवेशिक हितों को ही महत्त्व दिया गया कृषि पर प्रभाव · रेलवे के कारण भारत में वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया को गति मिली · इसके साथ ही बड़ी मात्रा में अखाद्य फसलों के साथ-साथ खाद्य फसलों का भी निर्यात किया गया व्यापार पर प्रभाव · रेलवे ने भारत को खेतिहर उपनिवेश के रूप में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया · एक ओर कच्चे माल के निर्यात की मात्रा बढ़ी तो दूसरी ओर तैयार मालों के आयात की मात्रा भी बढ़ी रोजगार पर प्रभाव · रेलवे के विकास की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए · हालांकि उच्च पदों पर मुख्यतः अंग्रेजों की नियुक्ति की गयी एवं निम्नस्तरीय कर्मचारी के रूप में भारतीयों की नियुक्ति की गयी · कुल मिलाकर रेलवे ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उपनिवेशीकरण तथा धन के दोहन को गति प्रदान की सकारात्मक आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव आर्थिक दृष्टिकोण से · सरकार के असहयोगी रवैये के बाद भी आधुनिक उद्योगों का भारत में विकास, · परिवहन के द्रुतगामी साधन की शुरुआत हुई · रोजगार के अवसरों की उपलब्धता बढ़ी आदि सामाजिक दृष्टिकोण से · जाति-प्रथा, छुआछूत, धार्मिक अलगाव, लिंग असमानता जैसी सामाजिक समस्याओं को कमजोर करने मेंमें रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी · उपरोक्त समस्याओं के सन्दर्भ में लोगों के दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में भी रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका थी राजनीतिक दृष्टिकोण से · रेलवे के विकास से विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर संपर्क बढ़ा जिससे राजनीतिक नेताओं एवं संगठनों के मध्य सहयोग की संभावना बढ़ी · ब्रिटिश विरोधी भावनाओं के उदय में रेलवे का महत्वपूर्ण योगदान देख सकते हैं · ब्रिटिश साझा शत्रु हैं इस बात को समझने और राष्ट्रवाद के उदय में रेलवे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में रेलवे के विकास ने दीघ्गामी बहुआयामी एवं मिश्रित परिणाम उत्पन्न किये|
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भारत- श्रीलंका सम्बन्ध में सहयोग के आयाम को बताइए | साथ ही दोनों के संबंधो में चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये | (200 शब्द) Explain the dimensions of cooperation in Relation to India-Sri Lanka, Also discuss the challanges in both relations.
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एप्रोच - भूमिका में भारत- श्रीलंका संबंधों की ऐतिहासिकता बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत- श्रीलंका के संबंधों में सहयोग को आयाम को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत- श्रीलंका संबंधो में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण (समाधान) के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत एवं श्रीलंका के सम्बन्ध 2500 वर्षों से अधिक पुराने हैं | वर्ष 1974 में भारत तथा श्रीलंका के बीच समुद्री समझौता हुआ , जिसके तहत भारत ने गुजराल डॉक्ट्रिन के तहत कच्छ तीवु द्वीप श्रीलंका को सौंपा , जिससे दोनों के मध्य सहयोग का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ | भारत श्रीलंका के मध्य सहयोग निम्नलिखित आधारों पर समझ सकते हैं - आर्थिक सहयोग रक्षा सुरक्षा से सम्बंधित सहयोग अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक सहयोग सांस्कृतिक सहयोग - वर्ष 2000 में भारत एवं श्रीलंका के मध्यमुक्त व्यापार समझौतालागू हुआ एवं भारत , श्रीलंका का सबसे बड़ा वैश्विक व्यापारिक भागीदार देश है | भारत , श्रीलंका के चार शीर्ष निवेशकों में से एक है | -भारत ने मालदीव एवं श्रीलंकाके मध्य मिलकर वर्ष 2011 में एक त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा समझौता पर स्वीकृति दी | इसके अतिरिक्त भारत श्रीलंका के लिए सुरक्षा ट्रेनिंग प्रोग्राम में भी सहायता करता है | दोनों देश द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास भी करते हैं जैसे - मित्र शक्ति एवं स्लिनेक्स (SLINEX ) आदि | - हाल ही में श्रीलंका में समाप्त हुईविशाल मानवीय चुनौती के बाद भारत ने श्रीलंका में अवसंरचनात्मक सहयोग के साथ अपने गुजराल डॉक्ट्रिन को बढ़ाया जैसे उदहारण के लिए आवासीय इकाइयों का निर्माण , उत्तरी रेलवे लाइनों का निर्माण , व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना इत्यादि | - वर्ष 1977 में दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक सहयोग को लेकर एक समझौता हुआ | वर्तमान में श्रीलंका भी भारत के नालंदा प्रोजेक्ट में एक भागीदार देश है | हाल ही में दोनों देशों ने बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति के 2600वें वर्ष को एक स्मरणोत्सव के रूप में मनाया | दोनों देशों के मध्य चुनौतियां - मछुआरा विवाद - मछुआरे अधिकतर सीमाओं से सम्बंधित जानकारी से अनभिज्ञ होते हैं , जिससे वे श्रीलंका के पानी में जाकर मछली पकड़ने का प्रयास करते है एवं श्रीलंकाई नौसेना द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है इससे दोनों देशों के मध्य यह विवाद का मुद्दा बना रहता है | संघीय स्वरुप - भारत शुरू से ही मानवीय मूल्यों का पक्षधर रहा है उसका मानना है कि श्रीलंका को संघीय स्वरुप को वास्तविकता में अपनाना चाहिए एवं श्रीलंका इसे अपना आतंरिक मामला मानता है , यह दोनों के मध्य विवाद का विषय है | चीन का बढ़ता प्रभाव - हाल में वर्ष (2005-15 ) के मध्य श्रीलंका में चीन का निवेश तेजी से बढ़ा , जिसके फलस्वरूप श्रीलंका , चीन की वन बेल्ट वन रोड का प्रबल समर्थक है जिसका फलस्वरूप श्रीलंका में वर्तमान में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश चीन का है | श्रीलंका, भारत के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है | भारत को श्रीलंका के साथ संबंधों में सुदृढ़ता लाने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर काम करना चाहिए - मछुआरों से सम्बंधित समस्या के सम्बन्ध में एक स्थायी सचिवालय का निर्माण किया जाना चाहिए , जो देशों से सम्बंधित हो | भारत को श्रीलंका के आतंरिक मामलों में दखल से बचना चाहिए एवं द्विपक्षीय स्तर पर मानवीय मूल्यों एवं सहयोग को लेकर बात करनी चाहिए | चीन की "चेक बुक डिप्लोमेसी " से बहार निकलने के लिए , भारत को श्रीलंका की वित्तीय सहायता करनी चाहिए | श्रीलंका बहुत वर्षों से भारत का सहयोगी रहा है, अतः भारत को श्रीलंका के साथ सहयोग करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए |
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##Question:भारत- श्रीलंका सम्बन्ध में सहयोग के आयाम को बताइए | साथ ही दोनों के संबंधो में चुनौतियों की भी चर्चा कीजिये | (200 शब्द) Explain the dimensions of cooperation in Relation to India-Sri Lanka, Also discuss the challanges in both relations.##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत- श्रीलंका संबंधों की ऐतिहासिकता बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत- श्रीलंका के संबंधों में सहयोग को आयाम को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में भारत- श्रीलंका संबंधो में चुनौतियों को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण (समाधान) के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत एवं श्रीलंका के सम्बन्ध 2500 वर्षों से अधिक पुराने हैं | वर्ष 1974 में भारत तथा श्रीलंका के बीच समुद्री समझौता हुआ , जिसके तहत भारत ने गुजराल डॉक्ट्रिन के तहत कच्छ तीवु द्वीप श्रीलंका को सौंपा , जिससे दोनों के मध्य सहयोग का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ | भारत श्रीलंका के मध्य सहयोग निम्नलिखित आधारों पर समझ सकते हैं - आर्थिक सहयोग रक्षा सुरक्षा से सम्बंधित सहयोग अवसंरचनात्मक एवं विकासात्मक सहयोग सांस्कृतिक सहयोग - वर्ष 2000 में भारत एवं श्रीलंका के मध्यमुक्त व्यापार समझौतालागू हुआ एवं भारत , श्रीलंका का सबसे बड़ा वैश्विक व्यापारिक भागीदार देश है | भारत , श्रीलंका के चार शीर्ष निवेशकों में से एक है | -भारत ने मालदीव एवं श्रीलंकाके मध्य मिलकर वर्ष 2011 में एक त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा समझौता पर स्वीकृति दी | इसके अतिरिक्त भारत श्रीलंका के लिए सुरक्षा ट्रेनिंग प्रोग्राम में भी सहायता करता है | दोनों देश द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास भी करते हैं जैसे - मित्र शक्ति एवं स्लिनेक्स (SLINEX ) आदि | - हाल ही में श्रीलंका में समाप्त हुईविशाल मानवीय चुनौती के बाद भारत ने श्रीलंका में अवसंरचनात्मक सहयोग के साथ अपने गुजराल डॉक्ट्रिन को बढ़ाया जैसे उदहारण के लिए आवासीय इकाइयों का निर्माण , उत्तरी रेलवे लाइनों का निर्माण , व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना इत्यादि | - वर्ष 1977 में दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक सहयोग को लेकर एक समझौता हुआ | वर्तमान में श्रीलंका भी भारत के नालंदा प्रोजेक्ट में एक भागीदार देश है | हाल ही में दोनों देशों ने बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति के 2600वें वर्ष को एक स्मरणोत्सव के रूप में मनाया | दोनों देशों के मध्य चुनौतियां - मछुआरा विवाद - मछुआरे अधिकतर सीमाओं से सम्बंधित जानकारी से अनभिज्ञ होते हैं , जिससे वे श्रीलंका के पानी में जाकर मछली पकड़ने का प्रयास करते है एवं श्रीलंकाई नौसेना द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है इससे दोनों देशों के मध्य यह विवाद का मुद्दा बना रहता है | संघीय स्वरुप - भारत शुरू से ही मानवीय मूल्यों का पक्षधर रहा है उसका मानना है कि श्रीलंका को संघीय स्वरुप को वास्तविकता में अपनाना चाहिए एवं श्रीलंका इसे अपना आतंरिक मामला मानता है , यह दोनों के मध्य विवाद का विषय है | चीन का बढ़ता प्रभाव - हाल में वर्ष (2005-15 ) के मध्य श्रीलंका में चीन का निवेश तेजी से बढ़ा , जिसके फलस्वरूप श्रीलंका , चीन की वन बेल्ट वन रोड का प्रबल समर्थक है जिसका फलस्वरूप श्रीलंका में वर्तमान में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश चीन का है | श्रीलंका, भारत के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है | भारत को श्रीलंका के साथ संबंधों में सुदृढ़ता लाने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर काम करना चाहिए - मछुआरों से सम्बंधित समस्या के सम्बन्ध में एक स्थायी सचिवालय का निर्माण किया जाना चाहिए , जो देशों से सम्बंधित हो | भारत को श्रीलंका के आतंरिक मामलों में दखल से बचना चाहिए एवं द्विपक्षीय स्तर पर मानवीय मूल्यों एवं सहयोग को लेकर बात करनी चाहिए | चीन की "चेक बुक डिप्लोमेसी " से बहार निकलने के लिए , भारत को श्रीलंका की वित्तीय सहायता करनी चाहिए | श्रीलंका बहुत वर्षों से भारत का सहयोगी रहा है, अतः भारत को श्रीलंका के साथ सहयोग करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए |
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संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150 शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150 words)
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एप्रोच:- भूमिका मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की अवधारणा को समझाइये। उत्तर के दूसरे भाग में स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । उत्तर के अंतिम भाग में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर: भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में निचली या मध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जाति व्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चिमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया जाता है । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपश्चिमीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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##Question:संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150 शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150 words)##Answer:एप्रोच:- भूमिका मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण की अवधारणा को समझाइये। उत्तर के दूसरे भाग में स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । उत्तर के अंतिम भाग में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर: भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की । इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में निचली या मध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जाति व्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चिमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया जाता है । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पश्चिमीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपश्चिमीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। इस प्रकार आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
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दल बदल के आधार पर निरर्हता की विभिन्न स्थितियों का विवरण दीजिए। इस संबंध में किहोतो होलोहन मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Give details of different situations of the disqualification on the basis of defection. In this regard, explain the judgment given by the Supreme Court in the case of the Kihoto hollohan case. (150-200 words; 10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में दल बदल कानून के संवैधानिक स्थिति का विवरण दीजिए। इसके बाद इसकी संवैधानिक स्थिति का वर्णन कीजिए। दूसरे भाग में उच्चतम न्यायालय द्वारा संशोधन के संबंध में दिये गए निर्णय की व्याख्या कीजिए। वर्तमान संदर्भ में इसकी सार्थकता को स्पष्ट करते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से "दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा लाया गया है। इसके अनुसार सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल- परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में प्रावधान किया गया है। दल बदल के आधार पर निर्हर्ता की विभिन्न स्थितियाँ: वह स्वेच्छा से राजीतिक दल की सदस्यता छोड़ दे। यदि व्यक्ति अपने राजीतिक दल के विपक्ष में मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा उसे 15 दिन के भीतर क्षमादान न मिला हो। निर्दलीयसदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले। मनोनीत सदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले । दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता निम्न दो परिस्थितियों में लागू नहीं होती है: दल-विभाजन की स्थिति में यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी चुना जाता है गौरतलब है कि संविधान के 52वें संशोधन को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी। जिसे कीहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू मामला कहा जाता हैं। उच्चतम न्यायालय के विचार इस प्रकार हैं: यह संशोधन वैध है जो कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थिरता के लिए आवश्यक है। इस प्रकार SC ने कानून की संवैधानिकता को बनाए रखा। यह कानून व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। कानून से संविधान की मूल संरचना प्रभावित नहीं होती है। इसके साथ यह भी स्पष्ट किया गया कि निरहर्ता संबंधी निर्णय अध्यक्ष करेगा परंतु उसका यह निर्णय न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होगा। इस प्रकार दल बदल संबंधी यह कानून राजनीतिक दलों को अपने सदस्यों के साथ चलने में सहायता करता है। हालांकि इसका दुरुपयोग भी देखा गया। परंतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने इसकी संवैधानिकता को बनाए रखा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जहां पूर्ण बहुमत की सरकारें नहीं बन रही हैं ऐसे में इस प्रकार के कानून की आवश्यकता है।
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##Question:दल बदल के आधार पर निरर्हता की विभिन्न स्थितियों का विवरण दीजिए। इस संबंध में किहोतो होलोहन मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Give details of different situations of the disqualification on the basis of defection. In this regard, explain the judgment given by the Supreme Court in the case of the Kihoto hollohan case. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में दल बदल कानून के संवैधानिक स्थिति का विवरण दीजिए। इसके बाद इसकी संवैधानिक स्थिति का वर्णन कीजिए। दूसरे भाग में उच्चतम न्यायालय द्वारा संशोधन के संबंध में दिये गए निर्णय की व्याख्या कीजिए। वर्तमान संदर्भ में इसकी सार्थकता को स्पष्ट करते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से "दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा लाया गया है। इसके अनुसार सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल- परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में प्रावधान किया गया है। दल बदल के आधार पर निर्हर्ता की विभिन्न स्थितियाँ: वह स्वेच्छा से राजीतिक दल की सदस्यता छोड़ दे। यदि व्यक्ति अपने राजीतिक दल के विपक्ष में मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा उसे 15 दिन के भीतर क्षमादान न मिला हो। निर्दलीयसदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले। मनोनीत सदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले । दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता निम्न दो परिस्थितियों में लागू नहीं होती है: दल-विभाजन की स्थिति में यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी चुना जाता है गौरतलब है कि संविधान के 52वें संशोधन को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी। जिसे कीहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू मामला कहा जाता हैं। उच्चतम न्यायालय के विचार इस प्रकार हैं: यह संशोधन वैध है जो कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थिरता के लिए आवश्यक है। इस प्रकार SC ने कानून की संवैधानिकता को बनाए रखा। यह कानून व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। कानून से संविधान की मूल संरचना प्रभावित नहीं होती है। इसके साथ यह भी स्पष्ट किया गया कि निरहर्ता संबंधी निर्णय अध्यक्ष करेगा परंतु उसका यह निर्णय न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होगा। इस प्रकार दल बदल संबंधी यह कानून राजनीतिक दलों को अपने सदस्यों के साथ चलने में सहायता करता है। हालांकि इसका दुरुपयोग भी देखा गया। परंतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने इसकी संवैधानिकता को बनाए रखा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जहां पूर्ण बहुमत की सरकारें नहीं बन रही हैं ऐसे में इस प्रकार के कानून की आवश्यकता है।
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क्या कारण था कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक आते-आते "नरमदलीय" अपनी घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्यों के प्रति राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफल हो गए थें| (150-200 शब्द; 10 अंक) Why did the "Moderates" fail to carry conviction with the nation about their proclaimed ideology and political goals by the end of the nineteenth century? (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- 19वीं सदी के उतरार्ध में, ब्रिटिश भारत में नरमदलियों के उदय तथा उनकी घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्यों को बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| उन कारणों को बताईये जिसकी वजह से, 19वीं सदी के अंत तक आते-आते,"नरमदलीय" अपनी घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्यों के प्रति राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफल हो गए थें| निष्कर्षतः असफल होने के बावजूद नरमपंथियों के योगदानों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- राष्ट्रीय आंदोलन के आरंभिक दौर(1885-1905) में संवैधानिक सुधारों एवं अधिकारों की मांग हेतु शुरूआती नेताओं ने उदारवादी एवं संवैधानिक रास्तों को अपनाकर अपनी बातों/मांगों को सभाओं, याचिकाओं, प्रार्थना-पत्रों आदि के माध्यम से ब्रिटिश सरकार एवं संसद के समक्ष रखने का मार्ग चुना था| कॉंग्रेस एवं कुछ अन्य संगठनों की स्थापना के साथ इन आरंभिक नरमपंथी राष्ट्रवादियों ने सुसंगठित तरीके से अपनी मांगों को आगे बढ़ाया| आरंभिक राष्ट्रवादियों के इन संवैधानिक तरीकों के कारण ही उन्हें नरमदलीय विचारधारा का पोषक माना जाता है| इन आरंभिक राष्ट्रवादियों में दादाभाई भाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले आदि प्रमुख थें| इन आरंभिक राष्ट्रवादियों कीकुछ घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्य थें जो कि निम्नवत हैं - भारत के आर्थिक दोहन की तार्किक आलोचना करते हुए ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का विरोध ; संवैधानिक एवं व्यवस्थापिका संबंधी सुधारों की मांग ; सामान्य प्रशासकीय सुधारों की मांग जैसे- सिविल सेवाओं का भारतीयकरण, न्यायिक एवं प्रशासनिक सुधार, सामाजिक एवं कल्याणकारी खर्चों में वृद्धि, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा आदि| नरमदलियों के अपने घोषित विचारधारा एवं राजनीतक लक्ष्यों के प्रति राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफलता के कारण ये राष्ट्रवादी अंग्रेजों की उदारता में विश्वास करते थें| इनका मानना था कि ब्रिटिश शासन को विस्थापित करने की जगह उनमें सुधार लाना भारत के लिए ज्यादा बेहतर कदम होगा| इनके द्वारा संवैधानिक साधनों एवं ज्ञापनों को जनसमूह की शक्ति से ज्यादा महत्व दिया गया| इसके फलस्वरूप इन्होने साधारण तथा आम जनमानस से दूरी बनाए रखी तथा इनके द्वारा जनांदोलन के निर्माण का अत्यंत कम प्रयास किया गया| दमनकारी ब्रिटिश सरकार के समक्ष याचना तथा प्रार्थना जैसे क़दमों की वजह से आम जनता इनके विचारधारा को निरर्थक मानती थी| सरकार द्वारा इनके प्रयासों के कारण लाए गये 1892 के भारत-परिषद् अधिनियम की भारतीय सन्दर्भों में कोई खास महत्व नहीं था| ऐसे निरर्थक क़दमों की वजह से युवाओं तथा शिक्षित वर्गों का इनकी विचारधारा तथा लक्ष्यों से मोहभंग होने लगा था| नरमदलीय नेता सालों भर सक्रीय नहीं रहते थें| कॉंग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के समय ही इनकी गतिविधियाँ ज्यादा होती थी| कॉंग्रेस तथा इनके प्रयासों में आम भारतीय जनता को जागृत करने हेतु कुछ खास कदम विद्यमान नहीं थें| ये भारतीय जनमानस की जगह लंदन में भारतीय हितों के पक्ष में वातावरण निर्मित करने का अत्यधिक प्रयास करते थें| 19वीं सदी के आखरी दशक में अकाल के कारण 90 लाख से अधिक लोग मारे गये| सरकार के द्वारा राहत कार्यों की उपेक्षा की गई तथा नरमदलियों ने भी इस संबंध में सरकार के खिलाफ कोई उग्र कदम नहीं उठाया गया जिससे भी आम जनमानस एवं राष्ट्रवादी युवाओं में असंतोष बढ़ता गया| शिक्षा एवं बेरोजगारी में वृद्धि की समस्या को भी वे उचित तरीके से सरकार के समक्ष उठा पाने में असफल सिद्ध हुए| उपरोक्त कारणों की वजह से वे राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफल सिद्ध हुए तथा 20वीं सदी के आरंभिक वर्षों में उग्र राष्ट्रवाद का उदय हुआ जो बंगभंग आंदोलन तथा स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलनों के बाद जनता के समक्ष नरमपंथियों के विकल्प के रूप में देखा गया| हालाँकि उनकी आम जनमानस से दूरी की बावजूद भी कुछ महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ रही थी जैसे- भारत में राजनीतिक जागरूकता, राष्ट्रवाद, लोकतांत्रिक विचारों का आरंभिक प्रसार; ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों की तार्किक रूप से आलोचना; औपनिवेशिक शासन के दमनकारी राजनीतिक-आर्थिक चरित्र के संदर्भ में वैश्विक चेतना जगाने का प्रयास आदि|
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##Question:क्या कारण था कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक आते-आते "नरमदलीय" अपनी घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्यों के प्रति राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफल हो गए थें| (150-200 शब्द; 10 अंक) Why did the "Moderates" fail to carry conviction with the nation about their proclaimed ideology and political goals by the end of the nineteenth century? (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- 19वीं सदी के उतरार्ध में, ब्रिटिश भारत में नरमदलियों के उदय तथा उनकी घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्यों को बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| उन कारणों को बताईये जिसकी वजह से, 19वीं सदी के अंत तक आते-आते,"नरमदलीय" अपनी घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्यों के प्रति राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफल हो गए थें| निष्कर्षतः असफल होने के बावजूद नरमपंथियों के योगदानों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- राष्ट्रीय आंदोलन के आरंभिक दौर(1885-1905) में संवैधानिक सुधारों एवं अधिकारों की मांग हेतु शुरूआती नेताओं ने उदारवादी एवं संवैधानिक रास्तों को अपनाकर अपनी बातों/मांगों को सभाओं, याचिकाओं, प्रार्थना-पत्रों आदि के माध्यम से ब्रिटिश सरकार एवं संसद के समक्ष रखने का मार्ग चुना था| कॉंग्रेस एवं कुछ अन्य संगठनों की स्थापना के साथ इन आरंभिक नरमपंथी राष्ट्रवादियों ने सुसंगठित तरीके से अपनी मांगों को आगे बढ़ाया| आरंभिक राष्ट्रवादियों के इन संवैधानिक तरीकों के कारण ही उन्हें नरमदलीय विचारधारा का पोषक माना जाता है| इन आरंभिक राष्ट्रवादियों में दादाभाई भाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले आदि प्रमुख थें| इन आरंभिक राष्ट्रवादियों कीकुछ घोषित विचारधारा एवं राजनीतिक लक्ष्य थें जो कि निम्नवत हैं - भारत के आर्थिक दोहन की तार्किक आलोचना करते हुए ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का विरोध ; संवैधानिक एवं व्यवस्थापिका संबंधी सुधारों की मांग ; सामान्य प्रशासकीय सुधारों की मांग जैसे- सिविल सेवाओं का भारतीयकरण, न्यायिक एवं प्रशासनिक सुधार, सामाजिक एवं कल्याणकारी खर्चों में वृद्धि, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा आदि| नरमदलियों के अपने घोषित विचारधारा एवं राजनीतक लक्ष्यों के प्रति राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफलता के कारण ये राष्ट्रवादी अंग्रेजों की उदारता में विश्वास करते थें| इनका मानना था कि ब्रिटिश शासन को विस्थापित करने की जगह उनमें सुधार लाना भारत के लिए ज्यादा बेहतर कदम होगा| इनके द्वारा संवैधानिक साधनों एवं ज्ञापनों को जनसमूह की शक्ति से ज्यादा महत्व दिया गया| इसके फलस्वरूप इन्होने साधारण तथा आम जनमानस से दूरी बनाए रखी तथा इनके द्वारा जनांदोलन के निर्माण का अत्यंत कम प्रयास किया गया| दमनकारी ब्रिटिश सरकार के समक्ष याचना तथा प्रार्थना जैसे क़दमों की वजह से आम जनता इनके विचारधारा को निरर्थक मानती थी| सरकार द्वारा इनके प्रयासों के कारण लाए गये 1892 के भारत-परिषद् अधिनियम की भारतीय सन्दर्भों में कोई खास महत्व नहीं था| ऐसे निरर्थक क़दमों की वजह से युवाओं तथा शिक्षित वर्गों का इनकी विचारधारा तथा लक्ष्यों से मोहभंग होने लगा था| नरमदलीय नेता सालों भर सक्रीय नहीं रहते थें| कॉंग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के समय ही इनकी गतिविधियाँ ज्यादा होती थी| कॉंग्रेस तथा इनके प्रयासों में आम भारतीय जनता को जागृत करने हेतु कुछ खास कदम विद्यमान नहीं थें| ये भारतीय जनमानस की जगह लंदन में भारतीय हितों के पक्ष में वातावरण निर्मित करने का अत्यधिक प्रयास करते थें| 19वीं सदी के आखरी दशक में अकाल के कारण 90 लाख से अधिक लोग मारे गये| सरकार के द्वारा राहत कार्यों की उपेक्षा की गई तथा नरमदलियों ने भी इस संबंध में सरकार के खिलाफ कोई उग्र कदम नहीं उठाया गया जिससे भी आम जनमानस एवं राष्ट्रवादी युवाओं में असंतोष बढ़ता गया| शिक्षा एवं बेरोजगारी में वृद्धि की समस्या को भी वे उचित तरीके से सरकार के समक्ष उठा पाने में असफल सिद्ध हुए| उपरोक्त कारणों की वजह से वे राष्ट्र के विश्वास को जगाने में असफल सिद्ध हुए तथा 20वीं सदी के आरंभिक वर्षों में उग्र राष्ट्रवाद का उदय हुआ जो बंगभंग आंदोलन तथा स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलनों के बाद जनता के समक्ष नरमपंथियों के विकल्प के रूप में देखा गया| हालाँकि उनकी आम जनमानस से दूरी की बावजूद भी कुछ महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ रही थी जैसे- भारत में राजनीतिक जागरूकता, राष्ट्रवाद, लोकतांत्रिक विचारों का आरंभिक प्रसार; ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों की तार्किक रूप से आलोचना; औपनिवेशिक शासन के दमनकारी राजनीतिक-आर्थिक चरित्र के संदर्भ में वैश्विक चेतना जगाने का प्रयास आदि|
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भारत में नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं को रेखांकित करते हुए इनको दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किएजा रहेप्रयासों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Underlining the problems caused by urbanization in India,Discuss the efforts being made by the Government of India to overcome them. (150–200 words; 10 Marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में नगरीकरण की बढ़ती प्रवृति के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए दिए गए कथन को पुष्ट कीजिए कि वास्तव में नगरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। तत्पश्चात, मुख्य भाग में शहरीकरण से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद मुख्य भाग में ही आगे,इन समस्याओं को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। उत्तर:- भारत की शहरी आबादी2001 से 2011 तक 32 प्रतिशतबढ़ी है, जबकि इसी अवधि मेंसम्पूर्ण आबादी 18 प्रतिशत बढ़ी है। वर्ष 2011की जनगणना के अनुसार, देश की 31प्रतिशतआबादी (377 मिलियन लोग) शहरों में रहतीहै, और देश की जीडीपी में इनका 63 प्रतिशतका योगदान है। 2031 तक शहरी आबादी 600मिलियन तक बढ़ने का अनुमान है। अतः शहरी आबादी बढ़ने के साथ, शहरों में बेहतर बुनियादी ढाँचे और सेवाएं प्रदान करने की आवश्यकता बढ़ रही है तथा इसके साथ साथइस संदर्भ में विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों का भी सामना करना पड़रहा है। शहरीकरण से उत्पन्न विभिन्न समस्याएंऔर चुनौतियां:- स्लम या मलीन बस्तियों का विस्तार। प्रणव सेन समिति के अनुसार स्लम से तात्पर्य कम से कम 20घरों के एक ऐसे समाजसे है जिसमें रहने वाले लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो रहे हों, जिसमें शुद्ध पेयजल, विद्युत् आपूर्ति, जलनिकासी इत्यादि जैसी समस्याएं सम्मिलित हैं। क्षेत्र आधारित घेटो(Ghetto) का निर्माण जिससे संघर्ष की स्थिति जन्म लेती है। विभिन्न प्रकार के प्रदूषण जिसमें मुख्यतः ध्वनी प्रदूषण तथा इ वेस्ट प्रमुख हैं सामाजिक स्तर पर अलगाव के कारण मद्यपान, मादक द्रवों का सेवन इत्यादि समस्याएं भी इसके परिणाम हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ता अत्याचार,साइबर अपराध, रोडरेज इत्यादि समस्याएं भी इसके परिणाम हैं। गेटेड कम्युनिटीज की समस्या से विभिन्न समुदायों में अलगाव की भावना इत्यादि। शहरीकरण की समस्यायों को दूर करने हेतुभारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास:- हैबिटैट वन के अंतर्गत शहर की परिसीमा को निर्धारित करते हुए शहरी विन्यास को तीव्र करने हेतु एक आर्थिक संस्थान की परिकल्पना दी गई। इसी क्रम में भारतीय संदर्भ में हुडको (HUDCO) की स्थापना की गई, जो आर्थिक तकनीकी सहायता प्रदान करते हुए शहरों की अवसरंचना को त्वरित कर रहा है। हैबिटैट-2 के अंतर्गत इस बात पर बल दिया गया कि शहरों के सतत विकास हेतु रीजनल नियमन किया जाये तथा हैबिटैट-3 में पर्यावरणीय घटकों को अनिवार्य बनाते हुए शहरीकरण की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इस संदर्भ मेंभारत सरकार ने वर्ष 2005 में JNNRUM के अंतर्गत निम्नलिखित दो संदर्भों को शहर विकास का अनिवार्य घटक बनाया- अवसरंचनात्मक स्तर पर तेज़ी से विकास किया जाना तथा इस संदर्भ में एक मंत्रालय का गठन किया गया। शहरी गरीबी को ख़त्म करने के साथ साथ स्लम बस्तियों को नयी कॉलोनियों में विकसित करना तथा इस संदर्भ में एक मंत्रालय का गठन। कालान्तर में वर्ष 2009 में इसी केअंतर्गत राजीव आवास योजना भी प्रारम्भ की गई। जिसका उद्देश्य उचित आवसीय व्यवस्था सुलभ कराना था। वर्तमान में इस स्कीम को प्रधानमंत्रीआवास योजना-शहरी में सम्मिलित कर लिया गया है। तथा JNNURM को AMRUT के अंतर्गत सम्मिलित करते हुए नवाचार द्वारा शहरी विकास किया जा रहा है। साथ ही स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत रेट्रोफिटिंग पुनर्स्थापन एवं विस्तारण प्रक्रिया द्वारा स्मार्ट शहर बनाये जा रहे हैं। रेट्रोफिटिंग से तात्पर्य अवसरंचना में ही आवश्यक परिवर्तन करते हुए नवीनीकरण से है। ऊर्ध्वाधर बागवानी इसका एक अच्छा उदाहरण है। साथ ही जल संचयन के संदर्भ में किये जा रहे विभिन्न कार्यक्रम भी इसी के अंतर्गत रखे जाते हैं। पुनर्स्थापन से तात्पर्य दिए गए क्षेत्र को नए सिरे से विकसित करने से है। वर्तमान का साउथ किदवई नगर तथा मुंबई का भिंडी बाजार क्षेत्र इसी योजना के अंतर्गत पुनर्स्थापित कियेजा रहेहै। विस्तारण से तात्पर्य क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर दोनों संदर्भों से है। जहाँ पर एक तरफ FSI को बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। साथ ही शहर को ऊर्ध्वाधर विस्तारण हेतु बिग डाटा की मदद से संभावित क्षेत्रों को रेखांकित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त शहरी निकायों की वित्तीय फंडिंग एवं खस्ताहाल शासन से सम्बंधित भी विभिन्न प्रस्ताव लाये गए हैं- VCF(वैल्यू कैप्चरिंग फंड):- फरवरी 2017 में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा VCF नीति की रूपरेखा पेश की गई। वीसीएफ एक सिद्धांत है जिसके अनुसारबुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश से लाभान्वित होने वाले लोगों को इसके लिए भुगतान करना चाहिए। वर्तमान में जब सरकारें किसी क्षेत्र में सड़कों, हवाई अड्डों और उद्योगों में निवेश करती हैं, तो उस क्षेत्र में निजी संपत्ति के मालिक इससे लाभान्वित होते हैं। अतः इनसे लाभान्वित लोगों सेभूमि मूल्य कर, भूमि उपयोग बदलने के लिए शुल्क, विकास शुल्क, भूमि पूलिंग सिस्टम इत्यादि के रूप में चार्ज किया जाता है। नगरपालिका बांड: नगरपालिका बांड शहरी स्थानीय निकायों द्वारा जारी किए गए बांड होते हैं,जो बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए धन जुटाते हैं।बॉन्ड बाजार में किसी शहरका प्रदर्शन उसके राजकोषीय प्रदर्शन पर निर्भर करता है और क्रेडिट रेटिंग के माध्यम से किसी शहर के वित्तीय हालात या स्वास्थ्य का पता लगाया जा सकता है।सितंबर 2016 में, शहरी विकास मंत्रालय ने क्रेडिट रेटिंग वाले शहरों कानिर्धारण करना शुरू किया है। ये क्रेडिट रेटिंग शहरों की परिसंपत्तियों और देनदारियों, राजस्व, पूंजी निवेश के लिए उपलब्ध संसाधनों, लेखांकन प्रथाओं और अन्य प्रशासनिक प्रथाओं के आधार पर निर्धारित की गई है। अतः यह कदमबेहतर निष्पादन करने वालेशहरों को वित्त जुटाने में सहायक होगा। क्रेडिट रेटिंग के अलावा, शहरी विकास मंत्रालय भी स्वच्छ भारत रैंकिंग, और सिटी लिवेबिलिटी इंडेक्स जैसे अन्य डेटा इंडेक्सके साथ आया है। ये रैंकिंग शहरों में प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ावा देती हैं, और साल-दर-साल उनके प्रदर्शन में मदद करेंगीं। इस प्रकारशहरीकरण की समस्यायों को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा विभिन्न स्तर परप्रयासकिए जा रहे हैं परन्तु अब भी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
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##Question:भारत में नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं को रेखांकित करते हुए इनको दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किएजा रहेप्रयासों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Underlining the problems caused by urbanization in India,Discuss the efforts being made by the Government of India to overcome them. (150–200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में नगरीकरण की बढ़ती प्रवृति के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए दिए गए कथन को पुष्ट कीजिए कि वास्तव में नगरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। तत्पश्चात, मुख्य भाग में शहरीकरण से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद मुख्य भाग में ही आगे,इन समस्याओं को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। उत्तर:- भारत की शहरी आबादी2001 से 2011 तक 32 प्रतिशतबढ़ी है, जबकि इसी अवधि मेंसम्पूर्ण आबादी 18 प्रतिशत बढ़ी है। वर्ष 2011की जनगणना के अनुसार, देश की 31प्रतिशतआबादी (377 मिलियन लोग) शहरों में रहतीहै, और देश की जीडीपी में इनका 63 प्रतिशतका योगदान है। 2031 तक शहरी आबादी 600मिलियन तक बढ़ने का अनुमान है। अतः शहरी आबादी बढ़ने के साथ, शहरों में बेहतर बुनियादी ढाँचे और सेवाएं प्रदान करने की आवश्यकता बढ़ रही है तथा इसके साथ साथइस संदर्भ में विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों का भी सामना करना पड़रहा है। शहरीकरण से उत्पन्न विभिन्न समस्याएंऔर चुनौतियां:- स्लम या मलीन बस्तियों का विस्तार। प्रणव सेन समिति के अनुसार स्लम से तात्पर्य कम से कम 20घरों के एक ऐसे समाजसे है जिसमें रहने वाले लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो रहे हों, जिसमें शुद्ध पेयजल, विद्युत् आपूर्ति, जलनिकासी इत्यादि जैसी समस्याएं सम्मिलित हैं। क्षेत्र आधारित घेटो(Ghetto) का निर्माण जिससे संघर्ष की स्थिति जन्म लेती है। विभिन्न प्रकार के प्रदूषण जिसमें मुख्यतः ध्वनी प्रदूषण तथा इ वेस्ट प्रमुख हैं सामाजिक स्तर पर अलगाव के कारण मद्यपान, मादक द्रवों का सेवन इत्यादि समस्याएं भी इसके परिणाम हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ता अत्याचार,साइबर अपराध, रोडरेज इत्यादि समस्याएं भी इसके परिणाम हैं। गेटेड कम्युनिटीज की समस्या से विभिन्न समुदायों में अलगाव की भावना इत्यादि। शहरीकरण की समस्यायों को दूर करने हेतुभारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास:- हैबिटैट वन के अंतर्गत शहर की परिसीमा को निर्धारित करते हुए शहरी विन्यास को तीव्र करने हेतु एक आर्थिक संस्थान की परिकल्पना दी गई। इसी क्रम में भारतीय संदर्भ में हुडको (HUDCO) की स्थापना की गई, जो आर्थिक तकनीकी सहायता प्रदान करते हुए शहरों की अवसरंचना को त्वरित कर रहा है। हैबिटैट-2 के अंतर्गत इस बात पर बल दिया गया कि शहरों के सतत विकास हेतु रीजनल नियमन किया जाये तथा हैबिटैट-3 में पर्यावरणीय घटकों को अनिवार्य बनाते हुए शहरीकरण की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इस संदर्भ मेंभारत सरकार ने वर्ष 2005 में JNNRUM के अंतर्गत निम्नलिखित दो संदर्भों को शहर विकास का अनिवार्य घटक बनाया- अवसरंचनात्मक स्तर पर तेज़ी से विकास किया जाना तथा इस संदर्भ में एक मंत्रालय का गठन किया गया। शहरी गरीबी को ख़त्म करने के साथ साथ स्लम बस्तियों को नयी कॉलोनियों में विकसित करना तथा इस संदर्भ में एक मंत्रालय का गठन। कालान्तर में वर्ष 2009 में इसी केअंतर्गत राजीव आवास योजना भी प्रारम्भ की गई। जिसका उद्देश्य उचित आवसीय व्यवस्था सुलभ कराना था। वर्तमान में इस स्कीम को प्रधानमंत्रीआवास योजना-शहरी में सम्मिलित कर लिया गया है। तथा JNNURM को AMRUT के अंतर्गत सम्मिलित करते हुए नवाचार द्वारा शहरी विकास किया जा रहा है। साथ ही स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत रेट्रोफिटिंग पुनर्स्थापन एवं विस्तारण प्रक्रिया द्वारा स्मार्ट शहर बनाये जा रहे हैं। रेट्रोफिटिंग से तात्पर्य अवसरंचना में ही आवश्यक परिवर्तन करते हुए नवीनीकरण से है। ऊर्ध्वाधर बागवानी इसका एक अच्छा उदाहरण है। साथ ही जल संचयन के संदर्भ में किये जा रहे विभिन्न कार्यक्रम भी इसी के अंतर्गत रखे जाते हैं। पुनर्स्थापन से तात्पर्य दिए गए क्षेत्र को नए सिरे से विकसित करने से है। वर्तमान का साउथ किदवई नगर तथा मुंबई का भिंडी बाजार क्षेत्र इसी योजना के अंतर्गत पुनर्स्थापित कियेजा रहेहै। विस्तारण से तात्पर्य क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर दोनों संदर्भों से है। जहाँ पर एक तरफ FSI को बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। साथ ही शहर को ऊर्ध्वाधर विस्तारण हेतु बिग डाटा की मदद से संभावित क्षेत्रों को रेखांकित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त शहरी निकायों की वित्तीय फंडिंग एवं खस्ताहाल शासन से सम्बंधित भी विभिन्न प्रस्ताव लाये गए हैं- VCF(वैल्यू कैप्चरिंग फंड):- फरवरी 2017 में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा VCF नीति की रूपरेखा पेश की गई। वीसीएफ एक सिद्धांत है जिसके अनुसारबुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश से लाभान्वित होने वाले लोगों को इसके लिए भुगतान करना चाहिए। वर्तमान में जब सरकारें किसी क्षेत्र में सड़कों, हवाई अड्डों और उद्योगों में निवेश करती हैं, तो उस क्षेत्र में निजी संपत्ति के मालिक इससे लाभान्वित होते हैं। अतः इनसे लाभान्वित लोगों सेभूमि मूल्य कर, भूमि उपयोग बदलने के लिए शुल्क, विकास शुल्क, भूमि पूलिंग सिस्टम इत्यादि के रूप में चार्ज किया जाता है। नगरपालिका बांड: नगरपालिका बांड शहरी स्थानीय निकायों द्वारा जारी किए गए बांड होते हैं,जो बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए धन जुटाते हैं।बॉन्ड बाजार में किसी शहरका प्रदर्शन उसके राजकोषीय प्रदर्शन पर निर्भर करता है और क्रेडिट रेटिंग के माध्यम से किसी शहर के वित्तीय हालात या स्वास्थ्य का पता लगाया जा सकता है।सितंबर 2016 में, शहरी विकास मंत्रालय ने क्रेडिट रेटिंग वाले शहरों कानिर्धारण करना शुरू किया है। ये क्रेडिट रेटिंग शहरों की परिसंपत्तियों और देनदारियों, राजस्व, पूंजी निवेश के लिए उपलब्ध संसाधनों, लेखांकन प्रथाओं और अन्य प्रशासनिक प्रथाओं के आधार पर निर्धारित की गई है। अतः यह कदमबेहतर निष्पादन करने वालेशहरों को वित्त जुटाने में सहायक होगा। क्रेडिट रेटिंग के अलावा, शहरी विकास मंत्रालय भी स्वच्छ भारत रैंकिंग, और सिटी लिवेबिलिटी इंडेक्स जैसे अन्य डेटा इंडेक्सके साथ आया है। ये रैंकिंग शहरों में प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ावा देती हैं, और साल-दर-साल उनके प्रदर्शन में मदद करेंगीं। इस प्रकारशहरीकरण की समस्यायों को दूर करने हेतु भारत सरकार द्वारा विभिन्न स्तर परप्रयासकिए जा रहे हैं परन्तु अब भी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
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Explain the law of supply and demand. Also, discuss applicability of this law with the help of various types of goods. (150 words/10 marks)
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Approach 1. Introduction - give a definition of the Law of supply and demand. 2. Body - explain the Law of supply and demand, comment on the applicability and limitations of the law with the help of examples. Answer The law of demand states that all other things being equal, the quantity bought of a good or service is a function of price. As long as nothing else changes, people will buy less of something when its price rises. They"ll buy more when its price falls. If the amount bought changes a lot when the price does, then it"s calledelastic demand. An example of this is ice cream. You can easily get a different dessert if the price rises too high. If the quantity doesn"t change much when the price does, that"s calledinelastic demand.An example of this is gasoline. You need to buy enough to get to work regardless of the price. The law of supply states that other factors remaining constant, price and quantity supplied of a good are directly related to each other. In other words, when the price paid by buyers for a good rise, then suppliers increase the supply of that good in the market. This law will be applicable only if the below-mentioned points are fulfilled. 1. No change in the price of related commodities. 2. No change in income of the consumer. 3. No change in taste and preferences, customs, habit and fashion of the consumer. 4. No change in the size of the population 5. No expectation regarding the future change in price. Limitations/Exceptions of the law of demand 1. Inferior goods/ Giffen goods -Some special varieties of inferior goods are termed as Giffen goods. Cheaper varieties of goods like low priced rice, low priced bread, etc. are some examples of Giffen goods.when the price of bread increased, the low paid British workers purchased a lesser quantity of bread, which is against the law of demand.| 2.Goods having prestige value -Few goods like a diamond can be purchased only by rich people. The prices of these goods are so high that they are beyond the capacity of common people.In this case, a consumer will buy less of the diamonds at a low price because with the fall in price, its prestige value goes down. 3. Price expectation -When the consumer expects that the price of the commodity is going to fall in the near future, they do not buy more even if the price is lower. 4.Fear of shortage - When people feel that a commodity is going to be scarce in the near future, they buy more of it even if there is a current rise in price. 5.Change in income - The demand for goods and services is also affected by the change in income of the consumers. 6.Change in fashion - The law of demand is not applicable when the goods are considered to be out of fashion. 7.Basic necessities of life - In case of basic necessities of life such as salt, rice, medicine, etc. the law of demand is not applicable as the demand for such necessary goods does not change with the rise or fall in price. Besides the limitations of the law of supply and demand. The law is applicable to all the other products.
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##Question:Explain the law of supply and demand. Also, discuss applicability of this law with the help of various types of goods. (150 words/10 marks)##Answer:Approach 1. Introduction - give a definition of the Law of supply and demand. 2. Body - explain the Law of supply and demand, comment on the applicability and limitations of the law with the help of examples. Answer The law of demand states that all other things being equal, the quantity bought of a good or service is a function of price. As long as nothing else changes, people will buy less of something when its price rises. They"ll buy more when its price falls. If the amount bought changes a lot when the price does, then it"s calledelastic demand. An example of this is ice cream. You can easily get a different dessert if the price rises too high. If the quantity doesn"t change much when the price does, that"s calledinelastic demand.An example of this is gasoline. You need to buy enough to get to work regardless of the price. The law of supply states that other factors remaining constant, price and quantity supplied of a good are directly related to each other. In other words, when the price paid by buyers for a good rise, then suppliers increase the supply of that good in the market. This law will be applicable only if the below-mentioned points are fulfilled. 1. No change in the price of related commodities. 2. No change in income of the consumer. 3. No change in taste and preferences, customs, habit and fashion of the consumer. 4. No change in the size of the population 5. No expectation regarding the future change in price. Limitations/Exceptions of the law of demand 1. Inferior goods/ Giffen goods -Some special varieties of inferior goods are termed as Giffen goods. Cheaper varieties of goods like low priced rice, low priced bread, etc. are some examples of Giffen goods.when the price of bread increased, the low paid British workers purchased a lesser quantity of bread, which is against the law of demand.| 2.Goods having prestige value -Few goods like a diamond can be purchased only by rich people. The prices of these goods are so high that they are beyond the capacity of common people.In this case, a consumer will buy less of the diamonds at a low price because with the fall in price, its prestige value goes down. 3. Price expectation -When the consumer expects that the price of the commodity is going to fall in the near future, they do not buy more even if the price is lower. 4.Fear of shortage - When people feel that a commodity is going to be scarce in the near future, they buy more of it even if there is a current rise in price. 5.Change in income - The demand for goods and services is also affected by the change in income of the consumers. 6.Change in fashion - The law of demand is not applicable when the goods are considered to be out of fashion. 7.Basic necessities of life - In case of basic necessities of life such as salt, rice, medicine, etc. the law of demand is not applicable as the demand for such necessary goods does not change with the rise or fall in price. Besides the limitations of the law of supply and demand. The law is applicable to all the other products.
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हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियों का उल्लेख कीजिये तथा इससे निपटने के लिए भारत सरकार की रणनीति की चर्चा कीजिए | (200 शब्द ) Explain the strategic challanges for India in the Indian- Ocean region also discuss the strategy of the Government of India to deal with it.
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एप्रोच- उत्तर का प्रारंभ हिन्द -महासागर क्षेत्र की अवस्थिति तथा महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात इस क्षेत्र में भारत के सामने चुनातियों की चर्चा कीजिये | तत्पश्चात चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की रणनीति की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हिन्द- महासागर विश्व के कुल महासागरीय क्षेत्रफल का लगभग पांचवा भाग आच्छादित करता है | यह विश्व के तीन प्रमुख महासागरों में से सबसे छोटा और भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है | हिन्द महासागर में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियां निम्नलिखित है - सबसे प्रमुख चुनौती इस क्षेत्र में चीन की महत्वाकांक्षाए और गतिविधियां हैं | चीन इस क्षेत्र में भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है - स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स, OBOR के तहत | एक और चुनौती पाकिस्तान से भी है, जो भारत को सतत एक खतरा मानता है तथा इस क्षेत्र में तनाव बढाता है | बहुपक्षीय तंत्र उदहारण के लिए SAARC इत्यादि की सीमित सफलता भारत के लिए चिंता का विषय है | दूसरी ओर भारत समग्र समुद्री सहयोग बहु-पक्षीयतावाद पर आधारित है | उपर्युक्त चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने अपनी रणनीति बनायीं है - जो की निम्नलिखित है - मेरीटाइम सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी -2015 प्रोजेक्ट मौसम - यह परियोजना "मौसम " भारत के संस्कृति मंत्रालय की पहल है | एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कोरिडोर - यहएशिया -अफ्रीका के सामाजिक - आर्थिक विकास के उद्देश्य से भारत- जापान सहयोग सके माध्मयम झौता है | चीन की बढ़ती दखल को यह परियोजना प्रति-संतुलित करेगा | सागर - हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत की शांति , स्थिरता और समृद्धि को यह परियोजना सुनिश्चित करता है | प्रमुख सैन्य अभ्यास के माध्यम से इस क्षेत्र में चीन के दखल को प्रति-संतुलित किया जा रहा है , जैसे- मालाबार सैन्य अभ्यास | (भारत और अमेरिका के बीच) क्षेत्रीय फोरम के माध्यम से इस क्षेत्र में शांति को स्थायी बनाया जा सकता है | भारत इस क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देकर अपने पक्ष में स्थितियों को कर सकता है और इस दिशा में भारत प्रयासरत भी है | हिन्द-महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ की अवधारणा को साकार करने के लिए इतिहास और भूगोल को अपना विस्तार करना चाहिए और भारत को अपने आस-पास के द्वीपों पर अपनी (मित्रतापूर्ण) पकड़ को बनाये रखना चाहिए | उक्त वर्णित सन्दर्भों में प्रधानमंत्री की हाल ही में मालदीव की यात्रा का आकलन किया जाना चाहिए | इस प्रकार पडोसी देशों की ये यात्राएं दूरगामी कूटनीतिक परिणाम देने वाली होंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है |
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##Question:हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियों का उल्लेख कीजिये तथा इससे निपटने के लिए भारत सरकार की रणनीति की चर्चा कीजिए | (200 शब्द ) Explain the strategic challanges for India in the Indian- Ocean region also discuss the strategy of the Government of India to deal with it.##Answer:एप्रोच- उत्तर का प्रारंभ हिन्द -महासागर क्षेत्र की अवस्थिति तथा महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात इस क्षेत्र में भारत के सामने चुनातियों की चर्चा कीजिये | तत्पश्चात चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की रणनीति की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हिन्द- महासागर विश्व के कुल महासागरीय क्षेत्रफल का लगभग पांचवा भाग आच्छादित करता है | यह विश्व के तीन प्रमुख महासागरों में से सबसे छोटा और भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है | हिन्द महासागर में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियां निम्नलिखित है - सबसे प्रमुख चुनौती इस क्षेत्र में चीन की महत्वाकांक्षाए और गतिविधियां हैं | चीन इस क्षेत्र में भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है - स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स, OBOR के तहत | एक और चुनौती पाकिस्तान से भी है, जो भारत को सतत एक खतरा मानता है तथा इस क्षेत्र में तनाव बढाता है | बहुपक्षीय तंत्र उदहारण के लिए SAARC इत्यादि की सीमित सफलता भारत के लिए चिंता का विषय है | दूसरी ओर भारत समग्र समुद्री सहयोग बहु-पक्षीयतावाद पर आधारित है | उपर्युक्त चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने अपनी रणनीति बनायीं है - जो की निम्नलिखित है - मेरीटाइम सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी -2015 प्रोजेक्ट मौसम - यह परियोजना "मौसम " भारत के संस्कृति मंत्रालय की पहल है | एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कोरिडोर - यहएशिया -अफ्रीका के सामाजिक - आर्थिक विकास के उद्देश्य से भारत- जापान सहयोग सके माध्मयम झौता है | चीन की बढ़ती दखल को यह परियोजना प्रति-संतुलित करेगा | सागर - हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत की शांति , स्थिरता और समृद्धि को यह परियोजना सुनिश्चित करता है | प्रमुख सैन्य अभ्यास के माध्यम से इस क्षेत्र में चीन के दखल को प्रति-संतुलित किया जा रहा है , जैसे- मालाबार सैन्य अभ्यास | (भारत और अमेरिका के बीच) क्षेत्रीय फोरम के माध्यम से इस क्षेत्र में शांति को स्थायी बनाया जा सकता है | भारत इस क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देकर अपने पक्ष में स्थितियों को कर सकता है और इस दिशा में भारत प्रयासरत भी है | हिन्द-महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ की अवधारणा को साकार करने के लिए इतिहास और भूगोल को अपना विस्तार करना चाहिए और भारत को अपने आस-पास के द्वीपों पर अपनी (मित्रतापूर्ण) पकड़ को बनाये रखना चाहिए | उक्त वर्णित सन्दर्भों में प्रधानमंत्री की हाल ही में मालदीव की यात्रा का आकलन किया जाना चाहिए | इस प्रकार पडोसी देशों की ये यात्राएं दूरगामी कूटनीतिक परिणाम देने वाली होंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है |
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हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियों का उल्लेख कीजिये तथा इससे निपटने के लिए भारत सरकार की रणनीति की चर्चा कीजिए | (200 शब्द ) Explain the strategic challanges for India in the Indian- Ocean region also discuss the strategy of the Government of India to deal with it.
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अप्रोच- उत्तर का प्रारंभ हिन्द -महासागर क्षेत्र की अवस्थिति तथा महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात इस क्षेत्र में भारत के सामने चुनातियों की चर्चा कीजिये | तत्पश्चात चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की रणनीति की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हिन्द- महासागर विश्व के कुल महासागरीय क्षेत्रफल का लगभग पांचवा भाग आच्छादित करता है | यह विश्व के तीन प्रमुख महासागरों में से सबसे छोटा और भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है | हिन्द महासागर में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियां निम्नलिखित है - सबसे प्रमुख चुनौती इस क्षेत्र में चीन की महत्वाकांक्षाए और गतिविधियां हैं | चीन इस क्षेत्र में भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है -स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स, OBORके तहत | एक और चुनौती पाकिस्तान से भी है, जो भारत को सतत एक खतरा मानता है तथा इस क्षेत्र में तनाव बढाता है | बहुपक्षीय तंत्र उदहारण के लिए SAARC इत्यादि की सीमित सफलता भारत के लिए चिंता का विषय है | दूसरी ओर भारत समग्र समुद्री सहयोग बहु-पक्षीयतावाद पर आधारित है | उपर्युक्त चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने अपनी रणनीति बनायीं है - जो की निम्नलिखित है - मेरीटाइम सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी -2015 प्रोजेक्ट मौसम -यह परियोजना "मौसम " भारत के संस्कृति मंत्रालय की पहल है | एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कोरिडोर -यहएशिया -अफ्रीका के सामाजिक - आर्थिक विकास के उद्देश्य से भारत- जापान सहयोग सके माध्मयम झौता है | चीन की बढ़ती दखल को यह परियोजना प्रति-संतुलित करेगा | सागर -हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत की शांति , स्थिरता और समृद्धि को यह परियोजना सुनिश्चित करता है | प्रमुख सैन्य अभ्यास के माध्यम से इस क्षेत्र में चीन के दखल को प्रति-संतुलित किया जा रहा है , जैसे- मालाबारसैन्य अभ्यास | (भारत और अमेरिका के बीच) क्षेत्रीय फोरम के माध्यम से इस क्षेत्र में शांति को स्थायी बनाया जा सकता है | भारत इस क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देकर अपने पक्ष में स्थितियों को कर सकता है और इस दिशा में भारत प्रयासरत भी है | हिन्द-महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ की अवधारणा को साकार करने के लिए इतिहास और भूगोल को अपना विस्तार करना चाहिए और भारत को अपने आस-पास के द्वीपों पर अपनी (मित्रतापूर्ण) पकड़ को बनाये रखना चाहिए | उक्त वर्णित सन्दर्भों में प्रधानमंत्री की हाल ही में मालदीव की यात्रा का आकलन किया जाना चाहिए | इस प्रकार पडोसी देशों की ये यात्राएं दूरगामी कूटनीतिक परिणाम देने वाली होंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है |
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##Question:हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियों का उल्लेख कीजिये तथा इससे निपटने के लिए भारत सरकार की रणनीति की चर्चा कीजिए | (200 शब्द ) Explain the strategic challanges for India in the Indian- Ocean region also discuss the strategy of the Government of India to deal with it.##Answer:अप्रोच- उत्तर का प्रारंभ हिन्द -महासागर क्षेत्र की अवस्थिति तथा महत्व को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात इस क्षेत्र में भारत के सामने चुनातियों की चर्चा कीजिये | तत्पश्चात चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की रणनीति की चर्चा कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हिन्द- महासागर विश्व के कुल महासागरीय क्षेत्रफल का लगभग पांचवा भाग आच्छादित करता है | यह विश्व के तीन प्रमुख महासागरों में से सबसे छोटा और भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है | हिन्द महासागर में भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियां निम्नलिखित है - सबसे प्रमुख चुनौती इस क्षेत्र में चीन की महत्वाकांक्षाए और गतिविधियां हैं | चीन इस क्षेत्र में भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है -स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स, OBORके तहत | एक और चुनौती पाकिस्तान से भी है, जो भारत को सतत एक खतरा मानता है तथा इस क्षेत्र में तनाव बढाता है | बहुपक्षीय तंत्र उदहारण के लिए SAARC इत्यादि की सीमित सफलता भारत के लिए चिंता का विषय है | दूसरी ओर भारत समग्र समुद्री सहयोग बहु-पक्षीयतावाद पर आधारित है | उपर्युक्त चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने अपनी रणनीति बनायीं है - जो की निम्नलिखित है - मेरीटाइम सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी -2015 प्रोजेक्ट मौसम -यह परियोजना "मौसम " भारत के संस्कृति मंत्रालय की पहल है | एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कोरिडोर -यहएशिया -अफ्रीका के सामाजिक - आर्थिक विकास के उद्देश्य से भारत- जापान सहयोग सके माध्मयम झौता है | चीन की बढ़ती दखल को यह परियोजना प्रति-संतुलित करेगा | सागर -हिन्द-महासागर क्षेत्र में भारत की शांति , स्थिरता और समृद्धि को यह परियोजना सुनिश्चित करता है | प्रमुख सैन्य अभ्यास के माध्यम से इस क्षेत्र में चीन के दखल को प्रति-संतुलित किया जा रहा है , जैसे- मालाबारसैन्य अभ्यास | (भारत और अमेरिका के बीच) क्षेत्रीय फोरम के माध्यम से इस क्षेत्र में शांति को स्थायी बनाया जा सकता है | भारत इस क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देकर अपने पक्ष में स्थितियों को कर सकता है और इस दिशा में भारत प्रयासरत भी है | हिन्द-महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ की अवधारणा को साकार करने के लिए इतिहास और भूगोल को अपना विस्तार करना चाहिए और भारत को अपने आस-पास के द्वीपों पर अपनी (मित्रतापूर्ण) पकड़ को बनाये रखना चाहिए | उक्त वर्णित सन्दर्भों में प्रधानमंत्री की हाल ही में मालदीव की यात्रा का आकलन किया जाना चाहिए | इस प्रकार पडोसी देशों की ये यात्राएं दूरगामी कूटनीतिक परिणाम देने वाली होंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है |
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अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दो को समझाते हुए, सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक ) Explaining the issues related to Scheduled Tribes, discuss the efforts of the government in this direction. (150-200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण भूमिका में अनुसूचित जनजाति का संक्षिप्त परिचयदीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इनसे जुड़े मुद्दो को बताइये । उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़ापन जनजाति समाज से संबन्धित मुद्दो में प्रमुख मुद्दे जल ,जमीन और जंगल को लेकर है ।जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ब्रिटिश उननिवेशवाद के फलस्वरूप इन जनजाति समूहो का तेजी से विस्थापन प्रारम्भ हुआ क्योकि ये अधिकांशतः उन क्षेत्रो में पाये जाते थे , जहां पर प्राकृतिक स्त्रोत के भंडार थे ।परियोजनाओ की स्थापना के साथ ही इनके पुनर्वास की कोई प्रभावी व्यवस्था नही की जाती है । जिससे इनके अंदर असंतोष उत्पन्न होता है । वर्तमान समय में हो रहे जंगलो के विनाश ने जंगली जानवरो के साथ साथ इन वनवासी समुदाय को भी जंगल से बाहर रहने वाले मानव समुदाय के संपर्क में आने को मजबूर किया है , जिससे इनके और मुख्य धारा के लोगों के बीच कोन्फ़्लिक्त बढ़ता जा रहा है । प्रकृति संसाधनो के दोहन के कारण इनको अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है और यही क्रम आज भी जारी है तथा विभिन्न विकासपरक परियोजनाओ के कारण इनको जमीनो का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया जाता है । विस्थापन के साथ साथ इनमे अपनी संस्कृति के क्षरण के कारण भी असंतोष उत्पन्न होता है । भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासो को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं : - सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा (PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को छात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं।अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
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##Question:अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दो को समझाते हुए, सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक ) Explaining the issues related to Scheduled Tribes, discuss the efforts of the government in this direction. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में अनुसूचित जनजाति का संक्षिप्त परिचयदीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इनसे जुड़े मुद्दो को बताइये । उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़ापन जनजाति समाज से संबन्धित मुद्दो में प्रमुख मुद्दे जल ,जमीन और जंगल को लेकर है ।जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ब्रिटिश उननिवेशवाद के फलस्वरूप इन जनजाति समूहो का तेजी से विस्थापन प्रारम्भ हुआ क्योकि ये अधिकांशतः उन क्षेत्रो में पाये जाते थे , जहां पर प्राकृतिक स्त्रोत के भंडार थे ।परियोजनाओ की स्थापना के साथ ही इनके पुनर्वास की कोई प्रभावी व्यवस्था नही की जाती है । जिससे इनके अंदर असंतोष उत्पन्न होता है । वर्तमान समय में हो रहे जंगलो के विनाश ने जंगली जानवरो के साथ साथ इन वनवासी समुदाय को भी जंगल से बाहर रहने वाले मानव समुदाय के संपर्क में आने को मजबूर किया है , जिससे इनके और मुख्य धारा के लोगों के बीच कोन्फ़्लिक्त बढ़ता जा रहा है । प्रकृति संसाधनो के दोहन के कारण इनको अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है और यही क्रम आज भी जारी है तथा विभिन्न विकासपरक परियोजनाओ के कारण इनको जमीनो का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया जाता है । विस्थापन के साथ साथ इनमे अपनी संस्कृति के क्षरण के कारण भी असंतोष उत्पन्न होता है । भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासो को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं : - सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा (PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को छात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं।अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
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Critically evaluate different steps and measures taken by government to fight against Naxalism. Suggest the way forward. (150 words/10 marks)
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Approach: · Define Naxalism and its reason as Intro · Enumerate steps and Measures taken by government · Write the achievements of Govt efforts · Highlight the lacuna in govt steps · Suggest the way forward. Naxalism signifies a particular kind of militant and violent armed struggle by the peasants and tribals who accept Marxist-Leninist ideology. Mismanagement of forests, tribal policies not implemented well, the growing inter and intra-regional disparities, absence of proper industrialisation and lack of land reforms, unemployment, and poverty etc. are some of the reasons for the emergence of Naxalism. Steps and Measures taken by government A. National Policy and Action Plan implemented by MHA since 2015 is a multi-pronged strategy in the areas of security, development, ensuring rights & entitlement of local communities etc. to combat Left Wing Extremism (LWE). B. Major Sub –Schemes under Scheme Modernization of Police Forces for 2017-20, · Security Related Expenditure (SRE) Scheme aims at strengthening the capacity of the LWE affected States to fight against the LWE problem in an effective manner. · Media Plan Scheme: to counter the Maoist propaganda. C. Infrastructure development initiatives o Road Requirement Plan-I, RRP-I & II for improving road connectivity in LWE affected districts. o LWE Mobile Tower Project to improve mobile connectivity in the LWE areas. o The National Technical Research Organization (NTRO) is assisting the Security Forces in anti-Naxal operations by providing Unmanned Aerial Vehicles (UAVs). D. Skill Development related Schemes ROSHNI is a special initiative under, Pandit Deen Dayal Upadhyaya Grameen Kaushalya Yojana which envisages training and placement of rural poor youth from LWE affected districts. E. Surrender and rehabilitation policies: Incentives are given for surrendering with weapons/ammunition. The surrenderees are also imparted vocational training with a monthly stipend for a maximum period of 36 months. F. Institutional measures a) Black Panther combat force - A specialised anti-Naxal combat force for Chhattisgarh on the lines of Greyhounds unit in Telangana and Andhra Pradesh. b) Multi-disciplinary groups to check funding of Naxalites - Union ministry of home affairs has formed multi-disciplinary groups with officers from central agencies, including from the IB, NIA, CBI, ED and DRI, and state police to choke the financial flow to Maoists. G. Constructively engaging youth through education: Seeing the success of educational hub and a livelihood centre in Dantewada district, the government has now opened up livelihood centres, known as Livelihood Colleges, in all the districts. F. More bank branches have been opened to ensure financial inclusion. These steps taken by govt have shown result in the following ways: o Greater presence of security forces across the LWE affected States. o Loss of cadres/leaders on account of arrests and desertions. o More acceptance of Rehabilitation program of govt by Naxals. o Better development & monitoring of development schemes in affected areas o Insurgency fatigue among the Maoist cadres. o Shortage of funds, arms and ammunitions through choking of funds. However, even after so many years and efforts, problems could not be completely eliminated because: · Root cause of Naxalism has not been addressed i.e. unemployment, poverty etc. · Excessive use of force by state has further alienated the people. · Lack of coordination between central & state govt and among various state govt. · Lack of coordination between civilian govt and police administration · Lack of responsibility by state govt · Lack of nationwide comprehensive approach to combat Naxalism Way forward o Capacity building of state police and govt machinery. o Training and orientation included reorientation of CAPF to the root cause of Naxalism o Raising of Anti-naxalite forces such as grey hound in other states o Avoiding center- state conflict Centre should play a supportive role with state police forces taking the lead o Effective implementation of the Scheduled Tribes and other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Rights) Act, 2006. o Eliminating the root cause of the problem that is leading to the alienation of tribals in this area. The focus should now be on building roads, increasing administrative and political access of the tribals, improving reach of government schemes etc.
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##Question:Critically evaluate different steps and measures taken by government to fight against Naxalism. Suggest the way forward. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: · Define Naxalism and its reason as Intro · Enumerate steps and Measures taken by government · Write the achievements of Govt efforts · Highlight the lacuna in govt steps · Suggest the way forward. Naxalism signifies a particular kind of militant and violent armed struggle by the peasants and tribals who accept Marxist-Leninist ideology. Mismanagement of forests, tribal policies not implemented well, the growing inter and intra-regional disparities, absence of proper industrialisation and lack of land reforms, unemployment, and poverty etc. are some of the reasons for the emergence of Naxalism. Steps and Measures taken by government A. National Policy and Action Plan implemented by MHA since 2015 is a multi-pronged strategy in the areas of security, development, ensuring rights & entitlement of local communities etc. to combat Left Wing Extremism (LWE). B. Major Sub –Schemes under Scheme Modernization of Police Forces for 2017-20, · Security Related Expenditure (SRE) Scheme aims at strengthening the capacity of the LWE affected States to fight against the LWE problem in an effective manner. · Media Plan Scheme: to counter the Maoist propaganda. C. Infrastructure development initiatives o Road Requirement Plan-I, RRP-I & II for improving road connectivity in LWE affected districts. o LWE Mobile Tower Project to improve mobile connectivity in the LWE areas. o The National Technical Research Organization (NTRO) is assisting the Security Forces in anti-Naxal operations by providing Unmanned Aerial Vehicles (UAVs). D. Skill Development related Schemes ROSHNI is a special initiative under, Pandit Deen Dayal Upadhyaya Grameen Kaushalya Yojana which envisages training and placement of rural poor youth from LWE affected districts. E. Surrender and rehabilitation policies: Incentives are given for surrendering with weapons/ammunition. The surrenderees are also imparted vocational training with a monthly stipend for a maximum period of 36 months. F. Institutional measures a) Black Panther combat force - A specialised anti-Naxal combat force for Chhattisgarh on the lines of Greyhounds unit in Telangana and Andhra Pradesh. b) Multi-disciplinary groups to check funding of Naxalites - Union ministry of home affairs has formed multi-disciplinary groups with officers from central agencies, including from the IB, NIA, CBI, ED and DRI, and state police to choke the financial flow to Maoists. G. Constructively engaging youth through education: Seeing the success of educational hub and a livelihood centre in Dantewada district, the government has now opened up livelihood centres, known as Livelihood Colleges, in all the districts. F. More bank branches have been opened to ensure financial inclusion. These steps taken by govt have shown result in the following ways: o Greater presence of security forces across the LWE affected States. o Loss of cadres/leaders on account of arrests and desertions. o More acceptance of Rehabilitation program of govt by Naxals. o Better development & monitoring of development schemes in affected areas o Insurgency fatigue among the Maoist cadres. o Shortage of funds, arms and ammunitions through choking of funds. However, even after so many years and efforts, problems could not be completely eliminated because: · Root cause of Naxalism has not been addressed i.e. unemployment, poverty etc. · Excessive use of force by state has further alienated the people. · Lack of coordination between central & state govt and among various state govt. · Lack of coordination between civilian govt and police administration · Lack of responsibility by state govt · Lack of nationwide comprehensive approach to combat Naxalism Way forward o Capacity building of state police and govt machinery. o Training and orientation included reorientation of CAPF to the root cause of Naxalism o Raising of Anti-naxalite forces such as grey hound in other states o Avoiding center- state conflict Centre should play a supportive role with state police forces taking the lead o Effective implementation of the Scheduled Tribes and other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Rights) Act, 2006. o Eliminating the root cause of the problem that is leading to the alienation of tribals in this area. The focus should now be on building roads, increasing administrative and political access of the tribals, improving reach of government schemes etc.
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भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को रेखांकित कीजिये। साथ ही, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के पहले चरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Outline the reasons for the rise of revolutionary nationalism in India. Also, describe the characteristics of the first phase of revolutionary nationalism. (150-200 words, Marks - 10 )
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एप्रोच- भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में,क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के पहले चरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिये| उत्तर- राष्ट्रीय चेतना से युक्त विचारधारा जो हिंसात्मक गतिविधियों के द्वारा ब्रिटिश शासन का अंत चाहता था उसे भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाती है| क्रां तिकारी राष्ट्रवाद का पहला चरण 1907 से 1915 के बीच का मानाजाता है जब बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा दिल्ली जैसे क्षेत्रों में इन विचारों से ओतप्रोत क्रांतिकारी अपनी उग्र गतिविधियों के माध्यम से ब्रिटिश शासन का विरोध करने लगे थें|विभिन्न संगठनों(जैसे- बंगाल में अनुशीलन समिति;अभिनव भारत आदि) तथा पत्र-पत्रिकाओं( संध्या, युगांतर, भवानी मंदिर,इंडियन सोशियोलॉजिस्ट,वंदे मातरम आदि)के माध्यम से वे अपना प्रसार बढ़ा रहे थें| प्रमुख क्रांतिकारियों में बारीन्द्र घोष, भूपेंद्र दत्त,पुलिन बिहारी दास,हेमचंद्र कानूनगो, प्रफुल्ल चाकी एवं खुदीराम बोस,चापेकर बंधु, सावरकर बंधु,अजित सिंह,बाघा जतिन आदि प्रमुख थें| इसी समय दिल्ली में 1912 में रासबिहारी बोस ने वायसराय हार्डिंग पर बम फेंका था|भारत से बाहर श्यामजी कृष्ण वर्मा, वी.डी. सावरकर; लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा,मैडम भीकाजी कामा,वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय जैसे क्रांतिकारी राष्ट्रवादी अपनी गतिविधियों कोबढ़ाने में लगे थें| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारण- नरमदलीय नेतृत्व से निराशा; स्वदेशी आंदोलन की विफलता; सरकार की दमनकारी गतिविधियाँ; अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रभाव जैसे- आयरलैंड एवं रूस की क्रांतिकारी गतिविधियाँ; कुछ अंतर्राष्ट्रीय घटनाएँ जैसे- इथियोपिया के द्वारा इटली की पराजय; जापान के द्वारा रूस की पराजय इत्यादि से भी क्रांतिकारी उत्साहित थें| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के पहले चरण की विशेषताएं - 1890 के दशक में भारत में राजनीतिक हत्याओं की शुरुआत हुयी तथा स्वदेशी आंदोलन के कमजोर पड़ते ही क्रांतिकारी गतिविधियों में तीव्रता देखी गई| पहले चरण में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रसार भारत के विभिन्न शहरों के साथ-साथ लंदन, पेरिस, बर्लिन इत्यादि यूरोपीय शहरों में भी दिखाई पड़ते हैं| अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारियों से संपर्क जैसे- हेमचंद्र कानूनगो; मैडम भीकाजी कामा इत्यादि के द्वारा प्रयास| प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रों से भी सहयोग प्राप्त करने की कोशिश की गई जैसे- जीमरमान योजना जर्मन सरकार के सहयोग से ; हालाँकि क्रांतिकारी गतिविधियाँ गुप्त रूप से संचालित की गई लेकिन इनके प्रयास संगठित थें जैसे- अभिनव भारत, अनुशीलन समिति, भारत माता सोसाइटी इत्यादि संस्थाओं का संगठित अभियान; क्रांतिकारियों का लक्ष्य अंग्रेजों को हिंदुस्तान से निकालना था साथ ही ब्रिटिश अधिकारियों में दहशत का भाव उत्पन करना इत्यादि कार्य भी किये गये| इस दृष्टि से अलोकप्रिय अधिकारियों एवंब्रिटिश समर्थक भारतीय सहयोगियों को निशाना बनाया गया| सरकारी खजाने को लूटना तथा अधिकाधिक युवाओं को क्रांतिकारी उद्देश्य से जोड़ना इत्यादि भी इनकी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ थीं| प्रारंभिक चरण में मुख्यतः शहरी पृष्ठभूमि के शिक्षित युवाओं की अहम् भूमिका दिखाई पड़ती है| क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रति लोगों की सहानुभूति तो थी लेकिन जन-समर्थन नहीं देखा गया| प्रथम चरण में महिला क्रांतिकारियों ने भी प्रमुखतः अप्रत्यक्ष अहम् भूमिका निभाई| सरकारी दमन, जनसमर्थन का अभाव, संसाधनों की कमी, हिंसात्मक गतिविधियों की सीमाएँ, राष्ट्रीय आंदोलन की लोकतांत्रिक धाराओं की पुनःसक्रियता इत्यादि कारणों से आंदोलन कमजोर हुआ तथा गांधीजी के भारत में पदार्पण के बाद मुख्यतः लोकतांत्रिक तरीकों से ही राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा|
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##Question:भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को रेखांकित कीजिये। साथ ही, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के पहले चरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Outline the reasons for the rise of revolutionary nationalism in India. Also, describe the characteristics of the first phase of revolutionary nationalism. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच- भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में,क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के पहले चरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिये| उत्तर- राष्ट्रीय चेतना से युक्त विचारधारा जो हिंसात्मक गतिविधियों के द्वारा ब्रिटिश शासन का अंत चाहता था उसे भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाती है| क्रां तिकारी राष्ट्रवाद का पहला चरण 1907 से 1915 के बीच का मानाजाता है जब बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा दिल्ली जैसे क्षेत्रों में इन विचारों से ओतप्रोत क्रांतिकारी अपनी उग्र गतिविधियों के माध्यम से ब्रिटिश शासन का विरोध करने लगे थें|विभिन्न संगठनों(जैसे- बंगाल में अनुशीलन समिति;अभिनव भारत आदि) तथा पत्र-पत्रिकाओं( संध्या, युगांतर, भवानी मंदिर,इंडियन सोशियोलॉजिस्ट,वंदे मातरम आदि)के माध्यम से वे अपना प्रसार बढ़ा रहे थें| प्रमुख क्रांतिकारियों में बारीन्द्र घोष, भूपेंद्र दत्त,पुलिन बिहारी दास,हेमचंद्र कानूनगो, प्रफुल्ल चाकी एवं खुदीराम बोस,चापेकर बंधु, सावरकर बंधु,अजित सिंह,बाघा जतिन आदि प्रमुख थें| इसी समय दिल्ली में 1912 में रासबिहारी बोस ने वायसराय हार्डिंग पर बम फेंका था|भारत से बाहर श्यामजी कृष्ण वर्मा, वी.डी. सावरकर; लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा,मैडम भीकाजी कामा,वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय जैसे क्रांतिकारी राष्ट्रवादी अपनी गतिविधियों कोबढ़ाने में लगे थें| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारण- नरमदलीय नेतृत्व से निराशा; स्वदेशी आंदोलन की विफलता; सरकार की दमनकारी गतिविधियाँ; अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रभाव जैसे- आयरलैंड एवं रूस की क्रांतिकारी गतिविधियाँ; कुछ अंतर्राष्ट्रीय घटनाएँ जैसे- इथियोपिया के द्वारा इटली की पराजय; जापान के द्वारा रूस की पराजय इत्यादि से भी क्रांतिकारी उत्साहित थें| क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के पहले चरण की विशेषताएं - 1890 के दशक में भारत में राजनीतिक हत्याओं की शुरुआत हुयी तथा स्वदेशी आंदोलन के कमजोर पड़ते ही क्रांतिकारी गतिविधियों में तीव्रता देखी गई| पहले चरण में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रसार भारत के विभिन्न शहरों के साथ-साथ लंदन, पेरिस, बर्लिन इत्यादि यूरोपीय शहरों में भी दिखाई पड़ते हैं| अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारियों से संपर्क जैसे- हेमचंद्र कानूनगो; मैडम भीकाजी कामा इत्यादि के द्वारा प्रयास| प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रों से भी सहयोग प्राप्त करने की कोशिश की गई जैसे- जीमरमान योजना जर्मन सरकार के सहयोग से ; हालाँकि क्रांतिकारी गतिविधियाँ गुप्त रूप से संचालित की गई लेकिन इनके प्रयास संगठित थें जैसे- अभिनव भारत, अनुशीलन समिति, भारत माता सोसाइटी इत्यादि संस्थाओं का संगठित अभियान; क्रांतिकारियों का लक्ष्य अंग्रेजों को हिंदुस्तान से निकालना था साथ ही ब्रिटिश अधिकारियों में दहशत का भाव उत्पन करना इत्यादि कार्य भी किये गये| इस दृष्टि से अलोकप्रिय अधिकारियों एवंब्रिटिश समर्थक भारतीय सहयोगियों को निशाना बनाया गया| सरकारी खजाने को लूटना तथा अधिकाधिक युवाओं को क्रांतिकारी उद्देश्य से जोड़ना इत्यादि भी इनकी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ थीं| प्रारंभिक चरण में मुख्यतः शहरी पृष्ठभूमि के शिक्षित युवाओं की अहम् भूमिका दिखाई पड़ती है| क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रति लोगों की सहानुभूति तो थी लेकिन जन-समर्थन नहीं देखा गया| प्रथम चरण में महिला क्रांतिकारियों ने भी प्रमुखतः अप्रत्यक्ष अहम् भूमिका निभाई| सरकारी दमन, जनसमर्थन का अभाव, संसाधनों की कमी, हिंसात्मक गतिविधियों की सीमाएँ, राष्ट्रीय आंदोलन की लोकतांत्रिक धाराओं की पुनःसक्रियता इत्यादि कारणों से आंदोलन कमजोर हुआ तथा गांधीजी के भारत में पदार्पण के बाद मुख्यतः लोकतांत्रिक तरीकों से ही राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा|
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अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दो को समझाते हुए , सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Explaining the issues related to Scheduled Tribes, discuss the efforts of the government in this direction. (150 words)
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दृष्टिकोण भूमिका में अनुसूचित जनजाति का संक्षिप्त परिचयदीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इनसे जुड़े मुद्दो को बताइये । उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़ापन जनजाति समाज से संबन्धित मुद्दो में प्रमुख मुद्दे जल ,जमीन और जंगल को लेकर है ।जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ब्रिटिश उननिवेशवाद के फलस्वरूप इन जनजाति समूहो का तेजी से विस्थापन प्रारम्भ हुआ क्योकि ये अधिकांशतः उन क्षेत्रो में पाये जाते थे , जहां पर प्राकृतिक स्त्रोत के भंडार थे ।परियोजनाओ की स्थापना के साथ ही इनके पुनर्वास की कोई प्रभावी व्यवस्था नही की जाती है । जिससे इनके अंदर असंतोष उत्पन्न होता है । वर्तमान समय में हो रहे जंगलो के विनाश ने जंगली जानवरो के साथ साथ इन वनवासी समुदाय को भी जंगल से बाहर रहने वाले मानव समुदाय के संपर्क में आने को मजबूर किया है , जिससे इनके और मुख्य धारा के लोगों के बीच कोन्फ़्लिक्त बढ़ता जा रहा है । प्रकृति संसाधनो के दोहन के कारण इनको अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है और यही क्रम आज भी जारी है तथा विभिन्न विकासपरक परियोजनाओ के कारण इनको जमीनो का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया जाता है । विस्थापन के साथ साथ इनमे अपनी संस्कृति के क्षरण के कारण भी असंतोष उत्पन्न होता है । भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास:- सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा (PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को छात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं।अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
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##Question:अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दो को समझाते हुए , सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) Explaining the issues related to Scheduled Tribes, discuss the efforts of the government in this direction. (150 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में अनुसूचित जनजाति का संक्षिप्त परिचयदीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इनसे जुड़े मुद्दो को बताइये । उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण(primitive tribals) भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़ापन जनजाति समाज से संबन्धित मुद्दो में प्रमुख मुद्दे जल ,जमीन और जंगल को लेकर है ।जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ब्रिटिश उननिवेशवाद के फलस्वरूप इन जनजाति समूहो का तेजी से विस्थापन प्रारम्भ हुआ क्योकि ये अधिकांशतः उन क्षेत्रो में पाये जाते थे , जहां पर प्राकृतिक स्त्रोत के भंडार थे ।परियोजनाओ की स्थापना के साथ ही इनके पुनर्वास की कोई प्रभावी व्यवस्था नही की जाती है । जिससे इनके अंदर असंतोष उत्पन्न होता है । वर्तमान समय में हो रहे जंगलो के विनाश ने जंगली जानवरो के साथ साथ इन वनवासी समुदाय को भी जंगल से बाहर रहने वाले मानव समुदाय के संपर्क में आने को मजबूर किया है , जिससे इनके और मुख्य धारा के लोगों के बीच कोन्फ़्लिक्त बढ़ता जा रहा है । प्रकृति संसाधनो के दोहन के कारण इनको अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है और यही क्रम आज भी जारी है तथा विभिन्न विकासपरक परियोजनाओ के कारण इनको जमीनो का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया जाता है । विस्थापन के साथ साथ इनमे अपनी संस्कृति के क्षरण के कारण भी असंतोष उत्पन्न होता है । भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास:- सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा (PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को छात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं।अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
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कार्यपालिका के कार्यों पर नियंत्रण स्थापित करने में समितियों की विशेष भूमिका है। संसद की वित्तीय समितियों के संदर्भ में इस कथन की व्याख्या कीजिए। (150 शब्द) Committees have special role in establishing control over executive. Explain this statement in the context of parliament"s financial committees. (150 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में संसदीय समितियों का संदर्भ दीजिए। पहले कथन को स्पष्ट करने के लिए समितियों के महत्व को लिखिए। इसके बाद पहले कथन के ही संदर्भ में वित्तीय समितियों का विवरण दीजिए। निष्कर्ष में इन समितियों के महत्व को लिखिए। उत्तर- भारत के संविधान में विभिन्न स्थानों पर संसदीय समितियों का उल्लेख है। ये दो प्रकार की होती हैं- स्थायी समितियां एवं अस्थायी समितियां। अस्थायी समितियों को जांच और सलाहकारी समितियों में बांटा गया है। भारत का संसद एक वृहत निकाय है जो इसके समक्ष आने वाले मुद्दों पर प्रभावी रूप से विचार करती है तथा उसके कार्य विस्तृत, जटिल एवं व्यापक हैं। इसके अलावा इसके पास न तो पर्याप्त समय है और न ही आवश्यक विशेषता कि वह सभी संवैधानिक उपायों और अन्य मामलों की गहन जांच करे। इस लिए इसके कार्यों को संपादित करने के लिए विभिन्न संसदीय समितियां इसकी सहायता करती हैं। गौरतलब है कि इन संसदीय समितियों में कुछ विशेषीकृत समितियां भी हैं जो विशेष रूप से वित्तीय कार्यों की जांच करती हैं। इनका विवरण इस प्रकार है: लोकलेखा समिति: इस समिति का प्रमुख कार्य CAG की वार्षिक रिपोर्ट की जांच करना है। यह समिति न केवल विधिक दृष्टि से सार्वजनिक व्यय की जांच करती है अपितु इस संबंध में तकनीकी खामियों का भी आकलन करती है। केंद्र सरकार के विनियोग खातों एवं वित्त खातों की जांच करते हुए वित्तीय पारदर्शिता का बढ़ावा देने में सहायता करता है। स्वायत्त और अर्ध स्वायत्त निकायों के लेखाओं की जांच करना जिनकी लेखा परीक्षा CAG द्वारा की जाती है। प्राक्कलन समिति: इस समिति का कार्य बजट में सम्मिलित अनुमानों की जांच करना और लोकव्यय में मितव्ययिता के सुझाव देना है। यह जांच करता है किनीति अनुमानों के अनुसार धन अपनी सीमाओं में ही व्यय हो। प्रशासन को और प्रभावी बनाने के लिए करते हुए संसद में पेश किए जाने वाले अनुमानों का प्रारूप भी प्रस्तुत करती है। सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति: यह उपक्रमों के लेखा एवं रिपोर्ट का परीक्षण करती है। सरकारी उपक्रमों का व्यवसाय के सिद्धांतों एवं वाणिज्य प्रयोग के तहत काम का परीक्षण सरकारी उपक्रमों पर CAG की रिपोर्ट का परीक्षण करती है। इस प्रकार सम्पूर्ण विवरण से स्पष्ट है कि संसद के कार्यों को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए इन समितियों का व्यापक महत्व है। इसी संदर्भ में वित्तीय समितियां प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और मितव्ययिता बढ़ाने का कार्य करती हैं।
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##Question:कार्यपालिका के कार्यों पर नियंत्रण स्थापित करने में समितियों की विशेष भूमिका है। संसद की वित्तीय समितियों के संदर्भ में इस कथन की व्याख्या कीजिए। (150 शब्द) Committees have special role in establishing control over executive. Explain this statement in the context of parliament"s financial committees. (150 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में संसदीय समितियों का संदर्भ दीजिए। पहले कथन को स्पष्ट करने के लिए समितियों के महत्व को लिखिए। इसके बाद पहले कथन के ही संदर्भ में वित्तीय समितियों का विवरण दीजिए। निष्कर्ष में इन समितियों के महत्व को लिखिए। उत्तर- भारत के संविधान में विभिन्न स्थानों पर संसदीय समितियों का उल्लेख है। ये दो प्रकार की होती हैं- स्थायी समितियां एवं अस्थायी समितियां। अस्थायी समितियों को जांच और सलाहकारी समितियों में बांटा गया है। भारत का संसद एक वृहत निकाय है जो इसके समक्ष आने वाले मुद्दों पर प्रभावी रूप से विचार करती है तथा उसके कार्य विस्तृत, जटिल एवं व्यापक हैं। इसके अलावा इसके पास न तो पर्याप्त समय है और न ही आवश्यक विशेषता कि वह सभी संवैधानिक उपायों और अन्य मामलों की गहन जांच करे। इस लिए इसके कार्यों को संपादित करने के लिए विभिन्न संसदीय समितियां इसकी सहायता करती हैं। गौरतलब है कि इन संसदीय समितियों में कुछ विशेषीकृत समितियां भी हैं जो विशेष रूप से वित्तीय कार्यों की जांच करती हैं। इनका विवरण इस प्रकार है: लोकलेखा समिति: इस समिति का प्रमुख कार्य CAG की वार्षिक रिपोर्ट की जांच करना है। यह समिति न केवल विधिक दृष्टि से सार्वजनिक व्यय की जांच करती है अपितु इस संबंध में तकनीकी खामियों का भी आकलन करती है। केंद्र सरकार के विनियोग खातों एवं वित्त खातों की जांच करते हुए वित्तीय पारदर्शिता का बढ़ावा देने में सहायता करता है। स्वायत्त और अर्ध स्वायत्त निकायों के लेखाओं की जांच करना जिनकी लेखा परीक्षा CAG द्वारा की जाती है। प्राक्कलन समिति: इस समिति का कार्य बजट में सम्मिलित अनुमानों की जांच करना और लोकव्यय में मितव्ययिता के सुझाव देना है। यह जांच करता है किनीति अनुमानों के अनुसार धन अपनी सीमाओं में ही व्यय हो। प्रशासन को और प्रभावी बनाने के लिए करते हुए संसद में पेश किए जाने वाले अनुमानों का प्रारूप भी प्रस्तुत करती है। सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति: यह उपक्रमों के लेखा एवं रिपोर्ट का परीक्षण करती है। सरकारी उपक्रमों का व्यवसाय के सिद्धांतों एवं वाणिज्य प्रयोग के तहत काम का परीक्षण सरकारी उपक्रमों पर CAG की रिपोर्ट का परीक्षण करती है। इस प्रकार सम्पूर्ण विवरण से स्पष्ट है कि संसद के कार्यों को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए इन समितियों का व्यापक महत्व है। इसी संदर्भ में वित्तीय समितियां प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और मितव्ययिता बढ़ाने का कार्य करती हैं।
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वैश्वीकरण ने किस हद तकभारतीय समाज को प्रभावित किया है? आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150 शब्द) To what extent did globalization impactIndian society? Discuss Critically.(150 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में संक्षेप मेंवैश्वीकरण को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में समझाइये कि किस प्रकार से वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को प्रभावित किया है। यहाँ इसके नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों पहलुओं की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप मेंएक निष्पक्ष निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वैश्वीकरण का तात्पर्य राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ते हुए सम्पूर्ण विश्व को आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समरूपता प्रदान करने से है। जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण विश्व एक एकीकृत बाजार तथा ग्लोबल विलेज के रूप में परिवर्तित हो रहा है। वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव:- सरंचनात्मक सकारात्मक प्रभाव:- शिक्षा स्वास्थ्य, रोजगार, जीवन स्तर के साधन इत्यादि में बढ़ोतरी हुई है साथ ही इनकी गुणवत्ता एवं दक्षता में भी सुपरिणाम देखे जा रहे है। नकारात्मक सरंचनात्मक प्रभाव:- बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति के परिणामस्वरूप सरंचनात्मक स्तर पर सर्वाधिक नकारात्मक प्रभाव पर्यावरणीय नुकसान का हो रहा है ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार वैश्वीकरण ने आर्थिक असमानता में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी की है जिसके अंतर्गत संसाधनों का अधिकतम लाभ समाज के कुछ प्रभावशाली वर्ग को ही मिल रहा है। डिजिटल डिवाइड बढ़ा है। इसकातात्पर्य एक ऐसी परिकल्पना से है जिसके अंतर्गत डिजिटल संदर्भों में विश्व दो वर्गों में बंट गया है। एक वे जो इसका लाभ उठा रहे हैं और दूसरे वे जो इसकी कीमत चूका रहे हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय नुकसान को संदर्भित करते हुए क्लाइमेट न्याय की परिकल्पना प्रस्तुत की जहाँ उन्होंने सम्पूर्ण विश्व समाज से आने वाली पीढ़ियों हेतु पर्यावरण सुरक्षा तथा समकालीन वंचित लोगों हेतु पर्यावरणीय सुलभता की वकालत की। सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव:- इसके अंतर्गत वैश्वीकरण ने न सिर्फ लोकतांत्रीकरण को प्रोत्साहित किया है अपितु विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक संस्थानों में नवाचार को भी बढ़ाया है। साथ ही सकारात्मक स्तर पर इन संस्थानों में पारदर्शिता भी बढ़ी है। नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव:- इसमें मुख्यतः उपभोक्तावादी संस्कृति का बढ़ना तथा "संस्कृतियों के मध्य संघर्ष" में बढ़ोतरी प्रमुख हैं। जब भी कोई दो संस्कृतियां परस्पर सम्पर्क में आती हैं तो एक संस्कृति दूसरे को सापेक्षिक रूप में अधिक प्रभावित कर रही होती है। प्रारम्भ में तो वह संस्कृति स्वीकार करती है परन्तु जैसे ही दिए गए संस्कृति के कोर पर प्रभाव दिखना प्रारम्भ होता है, कोर इसका विरोध करता है यदि कोर सुदृढ़ है तो ये उस परिवर्तन का विरोध करते हुए संस्कृति को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करता है परन्तु यदि कोर सुदृढ़ नहीं है तो क्रमशः क्षयित होना प्रारम्भ कर देता है। इन्हें क्रमशः कोर प्रख्यान(Assertion) तथा मेल्टिंग पॉट कहा जाता है। यही कारण है कि तेज़ी से हो रहे वैश्वीकरण में यद्यपि इतिहास का अंत परन्तु कालान्तर में वैश्वीकरण का अंत जैसी प्रतिपरिकल्पना भी प्रतिपादित हुई। भारतीय समाज के संदर्भ में कोर की अनेकों विशेषताओं में सर्वप्रमुख विविधता में एकता है जो मास संस्कृति के अंतर्गत धीरे धीरे कमजोर पड़ी है जो स्वयं में एक चुनौती है। मिक्स प्रभाव:- वैश्वीकरण ने संस्कृति को काफी गहरे रूप में प्रभावित किया है। इसके प्रभाव से भारत में वेश-भूषा, खान-पान, संगीत, भाषा, विचार आदि क्षेत्रों में कई परिवर्तन देखने को मिलते हैं। वेशभूषा के संदर्भ में सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं व पुरुषों के पहनावे को लेकर दिखता है। महिलाओं में जहाँ चुस्त कपड़े पहनने का प्रचलन बढ़ा है, वही पुरुषों में कोट पेंट एवं टाई पहनने का प्रचलन दिखता है। इनका प्रभाव मिला जुला रहा है। कुछ विद्वान इन्हे अच्छा मानते हैं तो कुछ रूढ़िवादी इसका कठोर विरोध भी करते हैं। वैश्वीकरण के कारण भाषा कई प्रकार से प्रभावित हुई है। एक ओर भूमंडलीकरण ने भाषा को तकनीकी रूप से समृद्ध किया है। वहीं दूसरी ओर मातृभाषा पर विदेशी भाषाओं का प्रभाव भी दिखाई पड़ता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को विभिन्न प्रकार से प्रभावित किया है जिसके परिणाम मिक्स रहे हैं, कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक।
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##Question:वैश्वीकरण ने किस हद तकभारतीय समाज को प्रभावित किया है? आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150 शब्द) To what extent did globalization impactIndian society? Discuss Critically.(150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में संक्षेप मेंवैश्वीकरण को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में समझाइये कि किस प्रकार से वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को प्रभावित किया है। यहाँ इसके नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों पहलुओं की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप मेंएक निष्पक्ष निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वैश्वीकरण का तात्पर्य राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ते हुए सम्पूर्ण विश्व को आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समरूपता प्रदान करने से है। जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण विश्व एक एकीकृत बाजार तथा ग्लोबल विलेज के रूप में परिवर्तित हो रहा है। वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव:- सरंचनात्मक सकारात्मक प्रभाव:- शिक्षा स्वास्थ्य, रोजगार, जीवन स्तर के साधन इत्यादि में बढ़ोतरी हुई है साथ ही इनकी गुणवत्ता एवं दक्षता में भी सुपरिणाम देखे जा रहे है। नकारात्मक सरंचनात्मक प्रभाव:- बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति के परिणामस्वरूप सरंचनात्मक स्तर पर सर्वाधिक नकारात्मक प्रभाव पर्यावरणीय नुकसान का हो रहा है ऑक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार वैश्वीकरण ने आर्थिक असमानता में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी की है जिसके अंतर्गत संसाधनों का अधिकतम लाभ समाज के कुछ प्रभावशाली वर्ग को ही मिल रहा है। डिजिटल डिवाइड बढ़ा है। इसकातात्पर्य एक ऐसी परिकल्पना से है जिसके अंतर्गत डिजिटल संदर्भों में विश्व दो वर्गों में बंट गया है। एक वे जो इसका लाभ उठा रहे हैं और दूसरे वे जो इसकी कीमत चूका रहे हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय नुकसान को संदर्भित करते हुए क्लाइमेट न्याय की परिकल्पना प्रस्तुत की जहाँ उन्होंने सम्पूर्ण विश्व समाज से आने वाली पीढ़ियों हेतु पर्यावरण सुरक्षा तथा समकालीन वंचित लोगों हेतु पर्यावरणीय सुलभता की वकालत की। सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव:- इसके अंतर्गत वैश्वीकरण ने न सिर्फ लोकतांत्रीकरण को प्रोत्साहित किया है अपितु विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक संस्थानों में नवाचार को भी बढ़ाया है। साथ ही सकारात्मक स्तर पर इन संस्थानों में पारदर्शिता भी बढ़ी है। नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभाव:- इसमें मुख्यतः उपभोक्तावादी संस्कृति का बढ़ना तथा "संस्कृतियों के मध्य संघर्ष" में बढ़ोतरी प्रमुख हैं। जब भी कोई दो संस्कृतियां परस्पर सम्पर्क में आती हैं तो एक संस्कृति दूसरे को सापेक्षिक रूप में अधिक प्रभावित कर रही होती है। प्रारम्भ में तो वह संस्कृति स्वीकार करती है परन्तु जैसे ही दिए गए संस्कृति के कोर पर प्रभाव दिखना प्रारम्भ होता है, कोर इसका विरोध करता है यदि कोर सुदृढ़ है तो ये उस परिवर्तन का विरोध करते हुए संस्कृति को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करता है परन्तु यदि कोर सुदृढ़ नहीं है तो क्रमशः क्षयित होना प्रारम्भ कर देता है। इन्हें क्रमशः कोर प्रख्यान(Assertion) तथा मेल्टिंग पॉट कहा जाता है। यही कारण है कि तेज़ी से हो रहे वैश्वीकरण में यद्यपि इतिहास का अंत परन्तु कालान्तर में वैश्वीकरण का अंत जैसी प्रतिपरिकल्पना भी प्रतिपादित हुई। भारतीय समाज के संदर्भ में कोर की अनेकों विशेषताओं में सर्वप्रमुख विविधता में एकता है जो मास संस्कृति के अंतर्गत धीरे धीरे कमजोर पड़ी है जो स्वयं में एक चुनौती है। मिक्स प्रभाव:- वैश्वीकरण ने संस्कृति को काफी गहरे रूप में प्रभावित किया है। इसके प्रभाव से भारत में वेश-भूषा, खान-पान, संगीत, भाषा, विचार आदि क्षेत्रों में कई परिवर्तन देखने को मिलते हैं। वेशभूषा के संदर्भ में सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं व पुरुषों के पहनावे को लेकर दिखता है। महिलाओं में जहाँ चुस्त कपड़े पहनने का प्रचलन बढ़ा है, वही पुरुषों में कोट पेंट एवं टाई पहनने का प्रचलन दिखता है। इनका प्रभाव मिला जुला रहा है। कुछ विद्वान इन्हे अच्छा मानते हैं तो कुछ रूढ़िवादी इसका कठोर विरोध भी करते हैं। वैश्वीकरण के कारण भाषा कई प्रकार से प्रभावित हुई है। एक ओर भूमंडलीकरण ने भाषा को तकनीकी रूप से समृद्ध किया है। वहीं दूसरी ओर मातृभाषा पर विदेशी भाषाओं का प्रभाव भी दिखाई पड़ता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को विभिन्न प्रकार से प्रभावित किया है जिसके परिणाम मिक्स रहे हैं, कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक।
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Explain the concept of Basic price, Market price, and Factor cost. (10 Marks/150 words)
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Approach- 1. In introduction talk about change in the methodology of GDP 2. Give the definition of Basic price, Market price, and factor cost. 3. Explain production taxes and subsidies. Answer In India, GDP is estimated by the Central Statistical Office (CSO). Under the Fiscal Responsibility and Budget Management Act 2003 and Rules thereunder, the Ministry of Finance uses the GDP numbers (at current prices) to peg the fiscal targets. In the revision of National Accounts statistics done by the Central Statistical Organization (CSO) in January 2015, it was decided that sector-wise wise estimates of Gross Value Added (GVA) will now be given at basic prices instead of factor cost. For any commodity, the basic price is the amount receivable by the producer from the purchaser for a unit of a product minus any tax on the product plus any subsidy on the product. However, GVA at basic prices will include production taxes and exclude production subsidies available on the commodity. Basic prices = factor cost + (Production taxes - Production subsidies) Production taxes or production subsidies are paid or received with relation to production and are independent of the volume of actual production. Some examples of production taxes are land revenues, stamps and registration fees and tax on the profession. Some production subsidies include subsidies to Railways, input subsidies to farmers, subsidies to the village and small industries, administrative subsidies to corporations or cooperatives, etc. Product taxes or subsidies are paid or received on per unit of product. Some examples of product taxes are excise tax, sales tax, service tax, and import and export duties. Product subsidies include food, petroleum and fertilizer subsidies, interest subsidies given to farmers, households, etc. through banks. GVA at factor cost includes no taxes and excludes no subsidies and GDP at market prices include both production and product taxes and excludes both production and product subsidies. For any commodity Market price is the amount received when we add product taxes and subtract product subsidies to the basic price. Market prices = Basic prices + Product taxes- Product subsidies The concept of GVA at basic prices follows from the United Nation"s System of National Accounts (SNA) introduced in 1993 and carried forward in an identical fashion in SNA 2008 as a part of the revision of compilation and classification systems. This has been adopted by CSO in its base revision carried out in January 2015.
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##Question:Explain the concept of Basic price, Market price, and Factor cost. (10 Marks/150 words)##Answer:Approach- 1. In introduction talk about change in the methodology of GDP 2. Give the definition of Basic price, Market price, and factor cost. 3. Explain production taxes and subsidies. Answer In India, GDP is estimated by the Central Statistical Office (CSO). Under the Fiscal Responsibility and Budget Management Act 2003 and Rules thereunder, the Ministry of Finance uses the GDP numbers (at current prices) to peg the fiscal targets. In the revision of National Accounts statistics done by the Central Statistical Organization (CSO) in January 2015, it was decided that sector-wise wise estimates of Gross Value Added (GVA) will now be given at basic prices instead of factor cost. For any commodity, the basic price is the amount receivable by the producer from the purchaser for a unit of a product minus any tax on the product plus any subsidy on the product. However, GVA at basic prices will include production taxes and exclude production subsidies available on the commodity. Basic prices = factor cost + (Production taxes - Production subsidies) Production taxes or production subsidies are paid or received with relation to production and are independent of the volume of actual production. Some examples of production taxes are land revenues, stamps and registration fees and tax on the profession. Some production subsidies include subsidies to Railways, input subsidies to farmers, subsidies to the village and small industries, administrative subsidies to corporations or cooperatives, etc. Product taxes or subsidies are paid or received on per unit of product. Some examples of product taxes are excise tax, sales tax, service tax, and import and export duties. Product subsidies include food, petroleum and fertilizer subsidies, interest subsidies given to farmers, households, etc. through banks. GVA at factor cost includes no taxes and excludes no subsidies and GDP at market prices include both production and product taxes and excludes both production and product subsidies. For any commodity Market price is the amount received when we add product taxes and subtract product subsidies to the basic price. Market prices = Basic prices + Product taxes- Product subsidies The concept of GVA at basic prices follows from the United Nation"s System of National Accounts (SNA) introduced in 1993 and carried forward in an identical fashion in SNA 2008 as a part of the revision of compilation and classification systems. This has been adopted by CSO in its base revision carried out in January 2015.
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ब्रिटिश काल में न्यायिक ढाँचे के क्रमबद्ध विकास का वर्णन कीजिये| इसके साथ ही उपनिवेश कालीन भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the evolution of the judicial structure in British period. Along with this, clarify the positive and negative aspects of Indian judicial system in the colonial era (150-200 words; 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में ब्रिटिश न्यायिक-प्रशासनिक ढाँचे की स्थापना के बारे सूचित कीजिये 2- प्रथम भाग में न्यायिक ढाँचे के क्रमबद्ध विकास का वर्णन कीजिये 3- दूसरे भाग में उपनिवेश कालीन भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में न्याय व्यवस्था का स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में अंग्रेजों के शासन का प्रमुख उद्देश्य उनके औपनिवेशिक हितों की पूर्ति और उसमें निर्नात्र वृद्धि करते रहने से था| भारत पर अपनी राजनीतिक-आर्थिक पकड़ को मजबूत करने और विभिन्न तरीकों से अपने आर्थिक लाभों को बढाते रहने के लिए अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रशासनिक ढाँचे को संगठित रूप से स्थापित किया गया| इसके अंतर्गत सिविल सेवा, पुलिस व्यवस्था, सैन्य प्रशां एवं न्याय व्यवस्था को शामिल किया जाता है| भारत में अंग्रेजो द्वारा स्थापित न्याय व्यवस्था क्रमबद्ध रूप से विकसित हुई थी| विकास क्रम · वारेन हेस्टिंग्स के समय प्रान्तों के स्तर पर सदर दीवानी एवं फौजदारी अदालत का गठन किया गया था · इसी समय जिले स्तर पर जिला दीवानी एवं फौजदारी अदालतों की स्थापना भी की गयी थी · कार्नवालिस ने सदर अदालत एवं जिला अदालत के मध्य स्तरों पर दीवानी मामलों के लिए प्रांतीय न्यायालय तथा फौजदारी मामलों के लिए सर्किट न्यायालयों की स्थापना की · कार्नवालिस के द्वारा जिला दीवानी अदालत के निचले स्तर पर रजिस्ट्रार एवं मुंसिफ की अदालतें भी गठित की · इसी समय कलक्टर से न्यायिक अधिकार ले लिए गए और अलग से जिला जज की नियुक्ति की गयी तथाशक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत का भी ध्यान रखा गया था · दंड विधान को संहिताबद्ध किया गया इसके साथ ही कानून के शासन को प्रभावी रूप से लागू किया गयाइन्ही अर्थों में कार्नवालिस कोड शब्द का जिक्र किया जाता है · विलियम बेंटिक के समय संयुक्त प्रांत एवं दिल्ली के लिए इलाहाबाद में सदर दीवानी एवं फौजदारी अदालत की स्थापना की गयी · इसी समय से निचली अदालतों में भारतीय भाषाओं को महत्त्व दिया जाने लगा और न्यायिक पदों पर भारतीय की पदोन्नति का प्रावधान भी किया गया · कार्नवालिस के द्वारा गठित प्रांतीय एवं क्षेत्रीय(सर्किट) न्यायालय को समाप्त किया गया इसके साथ ही कलक्टर को फिर से न्यायिक अधिकार दे दिए गए| · केनिंग के समय 1861 में इंडियन हाई कोर्ट एक्ट के द्वारा सदर दीवानी, निजामत तथा उच्चतम न्यायालय को समाप्त कर कलकत्ता बॉम्बे एवं मद्रास में उच्च न्यायालयों के गठन का प्रावधान किया गयातथा · 1935 के अधिनियम में भारत के लिए उच्च न्यायालयों से ऊपर एक संघीय न्यायालय का गठन किया गया सकारात्मक पहलू · 1859 से 1861 के मध्य IPC, CPC और CRPC जैसे आधुनिक कानूनों को लागू किया गया · ब्रिटिश शासन काल में क्रमशः कानून के शासन की अवधारणा को भी मजबूती मिली · भारत में किसी शासक की मर्जी या धर्मग्रंथों के आधार पर प्रशासन का संचालन नहीं होगा · यह सुनिश्चित किया गया कि प्रशासन का संचालन मानव निर्मित कानूनों के द्वारा किया जाएगा| · विधि के शासन के साथ ही कानून के समक्ष समानता की अवधारणा भी ब्रिटिश शासन काल में ही स्थापित हुई · यह सुनिश्चित किया गया कि जाति, धर्म, वर्ग इत्यादि के आधारों पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की सीमाएं · प्रशासनिक ढाँचे की तरह न्यायिक ढाँचे की स्थापना का उद्देश्य भी भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को मजबूत करना ही था · आधुनिक कानूनों के साथ कानूनी जटिलताएं भी निरंतर बढती गयीं · आम लोगों को न्याय प्राप्ति में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था · कानून के शासन एवं कानून के समक्ष समानता के कुछ अपवाद भी देखने को मिलते हैं · कुछ कानून ऐसे थे जिनका उद्देश्य भारतीयों के साथ भेदभाव करना था जैसे सिविल सेवा परीक्षा से सम्बन्धित प्रावधान का उपस्थित होना आदि · कानून के समक्ष समानता के भी कई व्यवहारिक अपवाद देखने को मिलते हैं जैसे न्याय, धनी वर्ग के लिए ही सुलभ था, ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय न्यायाधीश अंग्रेजों को सजा नहीं दे सकते थे आदि उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में विकसित न्यायिक व्यवस्था विभिन्न अर्थों में प्रगतिशील थी किन्तु इसकी कुछ विशेषताएं सम्पूर्ण व्यवस्था के चरित्र को प्रतिगामी बनाती थीं|
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##Question:ब्रिटिश काल में न्यायिक ढाँचे के क्रमबद्ध विकास का वर्णन कीजिये| इसके साथ ही उपनिवेश कालीन भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the evolution of the judicial structure in British period. Along with this, clarify the positive and negative aspects of Indian judicial system in the colonial era (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में ब्रिटिश न्यायिक-प्रशासनिक ढाँचे की स्थापना के बारे सूचित कीजिये 2- प्रथम भाग में न्यायिक ढाँचे के क्रमबद्ध विकास का वर्णन कीजिये 3- दूसरे भाग में उपनिवेश कालीन भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में न्याय व्यवस्था का स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में अंग्रेजों के शासन का प्रमुख उद्देश्य उनके औपनिवेशिक हितों की पूर्ति और उसमें निर्नात्र वृद्धि करते रहने से था| भारत पर अपनी राजनीतिक-आर्थिक पकड़ को मजबूत करने और विभिन्न तरीकों से अपने आर्थिक लाभों को बढाते रहने के लिए अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रशासनिक ढाँचे को संगठित रूप से स्थापित किया गया| इसके अंतर्गत सिविल सेवा, पुलिस व्यवस्था, सैन्य प्रशां एवं न्याय व्यवस्था को शामिल किया जाता है| भारत में अंग्रेजो द्वारा स्थापित न्याय व्यवस्था क्रमबद्ध रूप से विकसित हुई थी| विकास क्रम · वारेन हेस्टिंग्स के समय प्रान्तों के स्तर पर सदर दीवानी एवं फौजदारी अदालत का गठन किया गया था · इसी समय जिले स्तर पर जिला दीवानी एवं फौजदारी अदालतों की स्थापना भी की गयी थी · कार्नवालिस ने सदर अदालत एवं जिला अदालत के मध्य स्तरों पर दीवानी मामलों के लिए प्रांतीय न्यायालय तथा फौजदारी मामलों के लिए सर्किट न्यायालयों की स्थापना की · कार्नवालिस के द्वारा जिला दीवानी अदालत के निचले स्तर पर रजिस्ट्रार एवं मुंसिफ की अदालतें भी गठित की · इसी समय कलक्टर से न्यायिक अधिकार ले लिए गए और अलग से जिला जज की नियुक्ति की गयी तथाशक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत का भी ध्यान रखा गया था · दंड विधान को संहिताबद्ध किया गया इसके साथ ही कानून के शासन को प्रभावी रूप से लागू किया गयाइन्ही अर्थों में कार्नवालिस कोड शब्द का जिक्र किया जाता है · विलियम बेंटिक के समय संयुक्त प्रांत एवं दिल्ली के लिए इलाहाबाद में सदर दीवानी एवं फौजदारी अदालत की स्थापना की गयी · इसी समय से निचली अदालतों में भारतीय भाषाओं को महत्त्व दिया जाने लगा और न्यायिक पदों पर भारतीय की पदोन्नति का प्रावधान भी किया गया · कार्नवालिस के द्वारा गठित प्रांतीय एवं क्षेत्रीय(सर्किट) न्यायालय को समाप्त किया गया इसके साथ ही कलक्टर को फिर से न्यायिक अधिकार दे दिए गए| · केनिंग के समय 1861 में इंडियन हाई कोर्ट एक्ट के द्वारा सदर दीवानी, निजामत तथा उच्चतम न्यायालय को समाप्त कर कलकत्ता बॉम्बे एवं मद्रास में उच्च न्यायालयों के गठन का प्रावधान किया गयातथा · 1935 के अधिनियम में भारत के लिए उच्च न्यायालयों से ऊपर एक संघीय न्यायालय का गठन किया गया सकारात्मक पहलू · 1859 से 1861 के मध्य IPC, CPC और CRPC जैसे आधुनिक कानूनों को लागू किया गया · ब्रिटिश शासन काल में क्रमशः कानून के शासन की अवधारणा को भी मजबूती मिली · भारत में किसी शासक की मर्जी या धर्मग्रंथों के आधार पर प्रशासन का संचालन नहीं होगा · यह सुनिश्चित किया गया कि प्रशासन का संचालन मानव निर्मित कानूनों के द्वारा किया जाएगा| · विधि के शासन के साथ ही कानून के समक्ष समानता की अवधारणा भी ब्रिटिश शासन काल में ही स्थापित हुई · यह सुनिश्चित किया गया कि जाति, धर्म, वर्ग इत्यादि के आधारों पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की सीमाएं · प्रशासनिक ढाँचे की तरह न्यायिक ढाँचे की स्थापना का उद्देश्य भी भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को मजबूत करना ही था · आधुनिक कानूनों के साथ कानूनी जटिलताएं भी निरंतर बढती गयीं · आम लोगों को न्याय प्राप्ति में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था · कानून के शासन एवं कानून के समक्ष समानता के कुछ अपवाद भी देखने को मिलते हैं · कुछ कानून ऐसे थे जिनका उद्देश्य भारतीयों के साथ भेदभाव करना था जैसे सिविल सेवा परीक्षा से सम्बन्धित प्रावधान का उपस्थित होना आदि · कानून के समक्ष समानता के भी कई व्यवहारिक अपवाद देखने को मिलते हैं जैसे न्याय, धनी वर्ग के लिए ही सुलभ था, ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय न्यायाधीश अंग्रेजों को सजा नहीं दे सकते थे आदि उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में विकसित न्यायिक व्यवस्था विभिन्न अर्थों में प्रगतिशील थी किन्तु इसकी कुछ विशेषताएं सम्पूर्ण व्यवस्था के चरित्र को प्रतिगामी बनाती थीं|
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Identify the challenges in India-Myanmar relations. Also, discuss the areas of cooperation to reduce these challenges. (150 words/ 10 marks)
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एप्रोच- भारत -म्यांमार संबंधो की महत्ता बताते हुए इसकी अवस्थिति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद दोनों देशो के संबंधों में चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को कम करने के लिए सहयोग के मुद्दे को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत -म्यांमार के साथ 1600 किलोमीटर से अधिक लम्बी स्थलीय सीमा साझा करता है | साथ ही यह बंगाल की खाड़ी में अपनी सागरीय सीमा भी साझा करता है | म्यांमार , भारत के लिए सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व रखता है , वह भी तब जब चीन की आक्रामक विदेश नीति से भारत की चिंताएं और पडोसी देशों की चिंताएं और बढ़ जाती हों, भारत के लिए म्यांमार का महत्व इस सन्दर्भ में और भी बढ़ जाता है | इन सबके बावजूद भारत और म्यांमार के संबंधों में कुछ चुनौतियाँ देखी जा सकती हैं,जो निम्नलिखित हैं - भारत- म्यांमार संबंधो में चुनौतियाँ - एफएमआर (FMR) और बॉर्डर फेन्सिंग - भारत और म्यांमार के बीच यह मुद्दा एक चुनौती है | रोहिंग्या संकट - भारत और म्यांमार के बीच रोहिंग्या संकट पर आम सहमति नहीं बन पा रही है | गोल्डेन ट्रायंगल - थाईलैंड, लाओस और म्यांमार के बीच यह सीमा है | यह भी भारत और म्यांमार के बीच एक चुनौती है | भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जबकि म्यांमार में बिना सेना के सहमति के संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता | भारत चाहता है कि म्यांमार में भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मजबूत हो | नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के प्रावधानों का हनन | म्यांमार में सेना की 25% सीटें रिजर्व हैं | इन सब चुनौतियों के बावजूद भारत - म्यांमार में सहयोग के कई मुद्दे मौजूद हैं , जो कि निम्नलिखित हैं - भारत और म्यांमार दोनों देशो में बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं तथा दोनों अपने निकट सांस्कृतिक संबंधों तथा अपनेपन की गहरी भावना को साझा करते हैं | म्यांमार भारत से सीमा साझा करने वाला एक मात्र आसियान देश है, इसलिए भारत के लिए म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है | म्यांमार के साथ भारत " लुक ईस्ट " और वर्तमान में "एक्ट ईस्ट" के माध्यम से अधिक आर्थिक एकीकरण के लिए प्रयासरत है | भारत और म्यांमार ने 1970 में द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये थे | भारत ने 2008 में म्यांमार को सार्क के एक पर्यवेक्षक के रूप में सम्मिलित करने का समर्थन किया था | म्यांमार की आसियान ,बिम्सटेक और मेकांग गंगा सहयोग की सदस्यता ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक क्षेत्रीय आयाम प्रस्तुत किया है | म्यांमार विभिन्न अन्तराष्ट्रीय संगठनों में भारत के पक्ष का समर्थन करता है | भारत और म्यांमार सहयोग के आयाम 2010 के बाद लोकतंत्र की मजबूती के बाद लगातार बढे हैं |लेकिन म्यांमार वास्तविक रूप से अभी भी लोकतान्त्रिक नहीं है | गोल्डेन ट्रायंगल जब तक है तब तक लाओस ,म्यांमार और थाईलैंड में ब्राउन सुगर का केंद्र है ,यह भारत के लिए प्रमुख चिंता का विषय है ,इसका निदान अतिआवश्यक है|
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##Question:Identify the challenges in India-Myanmar relations. Also, discuss the areas of cooperation to reduce these challenges. (150 words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच- भारत -म्यांमार संबंधो की महत्ता बताते हुए इसकी अवस्थिति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद दोनों देशो के संबंधों में चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को कम करने के लिए सहयोग के मुद्दे को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत -म्यांमार के साथ 1600 किलोमीटर से अधिक लम्बी स्थलीय सीमा साझा करता है | साथ ही यह बंगाल की खाड़ी में अपनी सागरीय सीमा भी साझा करता है | म्यांमार , भारत के लिए सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व रखता है , वह भी तब जब चीन की आक्रामक विदेश नीति से भारत की चिंताएं और पडोसी देशों की चिंताएं और बढ़ जाती हों, भारत के लिए म्यांमार का महत्व इस सन्दर्भ में और भी बढ़ जाता है | इन सबके बावजूद भारत और म्यांमार के संबंधों में कुछ चुनौतियाँ देखी जा सकती हैं,जो निम्नलिखित हैं - भारत- म्यांमार संबंधो में चुनौतियाँ - एफएमआर (FMR) और बॉर्डर फेन्सिंग - भारत और म्यांमार के बीच यह मुद्दा एक चुनौती है | रोहिंग्या संकट - भारत और म्यांमार के बीच रोहिंग्या संकट पर आम सहमति नहीं बन पा रही है | गोल्डेन ट्रायंगल - थाईलैंड, लाओस और म्यांमार के बीच यह सीमा है | यह भी भारत और म्यांमार के बीच एक चुनौती है | भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जबकि म्यांमार में बिना सेना के सहमति के संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता | भारत चाहता है कि म्यांमार में भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मजबूत हो | नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के प्रावधानों का हनन | म्यांमार में सेना की 25% सीटें रिजर्व हैं | इन सब चुनौतियों के बावजूद भारत - म्यांमार में सहयोग के कई मुद्दे मौजूद हैं , जो कि निम्नलिखित हैं - भारत और म्यांमार दोनों देशो में बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं तथा दोनों अपने निकट सांस्कृतिक संबंधों तथा अपनेपन की गहरी भावना को साझा करते हैं | म्यांमार भारत से सीमा साझा करने वाला एक मात्र आसियान देश है, इसलिए भारत के लिए म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है | म्यांमार के साथ भारत " लुक ईस्ट " और वर्तमान में "एक्ट ईस्ट" के माध्यम से अधिक आर्थिक एकीकरण के लिए प्रयासरत है | भारत और म्यांमार ने 1970 में द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये थे | भारत ने 2008 में म्यांमार को सार्क के एक पर्यवेक्षक के रूप में सम्मिलित करने का समर्थन किया था | म्यांमार की आसियान ,बिम्सटेक और मेकांग गंगा सहयोग की सदस्यता ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक क्षेत्रीय आयाम प्रस्तुत किया है | म्यांमार विभिन्न अन्तराष्ट्रीय संगठनों में भारत के पक्ष का समर्थन करता है | भारत और म्यांमार सहयोग के आयाम 2010 के बाद लोकतंत्र की मजबूती के बाद लगातार बढे हैं |लेकिन म्यांमार वास्तविक रूप से अभी भी लोकतान्त्रिक नहीं है | गोल्डेन ट्रायंगल जब तक है तब तक लाओस ,म्यांमार और थाईलैंड में ब्राउन सुगर का केंद्र है ,यह भारत के लिए प्रमुख चिंता का विषय है ,इसका निदान अतिआवश्यक है|
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पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिए। साथ ही यह भी समझाइएकि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है? (150 शब्द) Define the patriarchal society. Also, explainhow can it determine the status of women in Indian society? (150 words)
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एप्रोच:- भूमिका में पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। उत्तर के पहले भाग में बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं अर्थात एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से प्रधान मानते हुए आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक संदर्भों में वरीयता दी जाती है। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विकास के साथ साथ विभिन्न आर्थिक कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे जाने लगे। वहीं महिलायें एक जिम्मेदारी सी दिखने लगी। कालान्तर में पितृवंशात्मकता को सुनिश्चित करने हेतु सांस्कृतिक स्तर पर पुरुषों को प्रधानता मिली। इन दोनों के फलस्वरूप राजनैतिक स्तर पर पुरुष प्रधान समझे जाने लगे जिससे पितृसत्तात्मकता जैसे सामाजिक संस्थान ने जन्म लिया। यही कारण है सुकुमॉय चक्रवर्ती के अनुसार जहाँ लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान है वहीँ जेंडर किसी व्यक्ति सामाजिक पहचान है। भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है। साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मकता को निम्नलिखित दो प्रकारों से समझा जा सकताहै- सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता जिसके अनुसार सामान्य जनजीवन में पुरुष को महिलाओं से अधिक वरीयता दी जाती है तथा इसके फलस्वरूप जेंडर भूमिका भी निर्धारित होती है। व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता जहाँ परिवार रिश्तेदारी इत्यादि में महिलाओं से भिन्न व्यवहार किया जाता है। भारतवर्ष में यद्यपि व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता में कमी देखी जा रही है परन्तु दूसरी तरफ सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता बढ़ रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं- जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविकोपार्जन के संदर्भ में। सामाजिक असुरक्षा की भावना एवं सामाजिक कुरीतियां: सेक्स आधारित भ्रूण हत्याएं, दहेज़ हत्याएं इत्यादि। कामकाजी महिलाओं पर जेंडर भूमिका के अंतर्गत अतिरिक्त बोझ एवं सार्वजनिक नकारात्मक दृष्टिकोण इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम, आयरन की कमी है जिसके दुष्परिणाम उनके रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं में तथा नवजात शिशुओं में कुपोषण की समस्या भी पायी जा रही है जिसका दुष्परिणाम अधिक मातृत्व मृत्यूदर तथा शिशु मृत्यू दर में दिखाई पड़ता है। NSSO की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 83 प्रतिशत महिलायें उचित कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोशिशजारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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##Question:पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिए। साथ ही यह भी समझाइएकि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है? (150 शब्द) Define the patriarchal society. Also, explainhow can it determine the status of women in Indian society? (150 words)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। उत्तर के पहले भाग में बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं अर्थात एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से प्रधान मानते हुए आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक संदर्भों में वरीयता दी जाती है। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विकास के साथ साथ विभिन्न आर्थिक कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे जाने लगे। वहीं महिलायें एक जिम्मेदारी सी दिखने लगी। कालान्तर में पितृवंशात्मकता को सुनिश्चित करने हेतु सांस्कृतिक स्तर पर पुरुषों को प्रधानता मिली। इन दोनों के फलस्वरूप राजनैतिक स्तर पर पुरुष प्रधान समझे जाने लगे जिससे पितृसत्तात्मकता जैसे सामाजिक संस्थान ने जन्म लिया। यही कारण है सुकुमॉय चक्रवर्ती के अनुसार जहाँ लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान है वहीँ जेंडर किसी व्यक्ति सामाजिक पहचान है। भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है। साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मकता को निम्नलिखित दो प्रकारों से समझा जा सकताहै- सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता जिसके अनुसार सामान्य जनजीवन में पुरुष को महिलाओं से अधिक वरीयता दी जाती है तथा इसके फलस्वरूप जेंडर भूमिका भी निर्धारित होती है। व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता जहाँ परिवार रिश्तेदारी इत्यादि में महिलाओं से भिन्न व्यवहार किया जाता है। भारतवर्ष में यद्यपि व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता में कमी देखी जा रही है परन्तु दूसरी तरफ सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता बढ़ रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं- जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविकोपार्जन के संदर्भ में। सामाजिक असुरक्षा की भावना एवं सामाजिक कुरीतियां: सेक्स आधारित भ्रूण हत्याएं, दहेज़ हत्याएं इत्यादि। कामकाजी महिलाओं पर जेंडर भूमिका के अंतर्गत अतिरिक्त बोझ एवं सार्वजनिक नकारात्मक दृष्टिकोण इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम, आयरन की कमी है जिसके दुष्परिणाम उनके रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं में तथा नवजात शिशुओं में कुपोषण की समस्या भी पायी जा रही है जिसका दुष्परिणाम अधिक मातृत्व मृत्यूदर तथा शिशु मृत्यू दर में दिखाई पड़ता है। NSSO की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 83 प्रतिशत महिलायें उचित कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोशिशजारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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भारत-म्यांमार सबंधों में चुनौतियों की पहचान कीजिए | साथ ही इन चुनौतियों को कम करने के लिए सहयोग के क्षेत्रों की चर्चा कीजिए | (150-200 शब्द, 10 अंक ) Identify the challenges in India-Myanmar relations. Also discuss the areas of cooperation to reduce these challenges. (150-200 Word, 10 Marks)
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एप्रोच- भारत -म्यांमार संबंधो की महत्ता बताते हुए इसकी अवस्थिति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद दोनों देशो के संबंधों में चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को कम करने के लिए सहयोग के मुद्दे को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत -म्यांमार के साथ 1600 किलोमीटर से अधिक लम्बी स्थलीय सीमा साझा करता है | साथ ही यह बंगाल की खाड़ी में अपनी सागरीय सीमा भी साझा करता है | म्यांमार , भारत के लिए सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व रखता है , वह भी तब जब चीन की आक्रामक विदेश नीति से भारत की चिंताएं और पडोसी देशों की चिंताएं और बढ़ जाती हों, भारत के लिए म्यांमार का महत्व इस सन्दर्भ में और भी बढ़ जाता है | इन सबके बावजूद भारत और म्यांमार के संबंधों में कुछ चुनौतियाँ देखी जा सकती हैं,जो निम्नलिखित हैं - भारत- म्यांमार संबंधो में चुनौतियाँ - एफएमआर (FMR) और बॉर्डर फेन्सिंग- भारत और म्यांमार के बीच यह मुद्दा एक चुनौती है | रोहिंग्या संकट- भारत और म्यांमार के बीच रोहिंग्या संकट पर आम सहमति नहीं बन पा रही है | गोल्डेन ट्रायंगल- थाईलैंड, लाओस और म्यांमार के बीच यह सीमा है | यह भी भारत और म्यांमार के बीच एक चुनौती है | भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जबकि म्यांमार में बिना सेना के सहमति के संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता | भारत चाहता है कि म्यांमार में भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मजबूत हो | नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के प्रावधानों का हनन | म्यांमार में सेना की 25% सीटें रिजर्व हैं | इन सब चुनौतियों के बावजूद भारत - म्यांमार में सहयोग के कई मुद्दे मौजूद हैं , जो कि निम्नलिखित हैं - भारत और म्यांमार दोनों देशो में बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं तथा दोनों अपने निकट सांस्कृतिक संबंधों तथा अपनेपन की गहरी भावना को साझा करते हैं | म्यांमार भारत से सीमा साझा करने वाला एक मात्र आसियान देश है, इसलिए भारत के लिए म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है | म्यांमार के साथ भारत " लुक ईस्ट " और वर्तमान में "एक्ट ईस्ट" के माध्यम से अधिक आर्थिक एकीकरण के लिए प्रयासरत है | भारत और म्यांमार ने 1970 में द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये थे | भारत ने 2008 में म्यांमार को सार्क के एक पर्यवेक्षक के रूप में सम्मिलित करने का समर्थन किया था | म्यांमार की आसियान ,बिम्सटेक और मेकांग गंगा सहयोग की सदस्यता ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक क्षेत्रीय आयाम प्रस्तुत किया है | म्यांमार विभिन्न अन्तराष्ट्रीय संगठनों में भारत के पक्ष का समर्थन करता है | भारत और म्यांमार सहयोग के आयाम 2010 के बाद लोकतंत्र की मजबूती के बाद लगातार बढे हैं |लेकिन म्यांमार वास्तविक रूप से अभी भी लोकतान्त्रिक नहीं है | गोल्डेन ट्रायंगल जब तक है तब तक लाओस ,म्यांमार और थाईलैंड में ब्राउन सुगर का केंद्र है ,यह भारत के लिए प्रमुख चिंता का विषय है ,इसका निदान अतिआवश्यक है|
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##Question:भारत-म्यांमार सबंधों में चुनौतियों की पहचान कीजिए | साथ ही इन चुनौतियों को कम करने के लिए सहयोग के क्षेत्रों की चर्चा कीजिए | (150-200 शब्द, 10 अंक ) Identify the challenges in India-Myanmar relations. Also discuss the areas of cooperation to reduce these challenges. (150-200 Word, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत -म्यांमार संबंधो की महत्ता बताते हुए इसकी अवस्थिति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद दोनों देशो के संबंधों में चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में चुनौतियों को कम करने के लिए सहयोग के मुद्दे को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत -म्यांमार के साथ 1600 किलोमीटर से अधिक लम्बी स्थलीय सीमा साझा करता है | साथ ही यह बंगाल की खाड़ी में अपनी सागरीय सीमा भी साझा करता है | म्यांमार , भारत के लिए सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व रखता है , वह भी तब जब चीन की आक्रामक विदेश नीति से भारत की चिंताएं और पडोसी देशों की चिंताएं और बढ़ जाती हों, भारत के लिए म्यांमार का महत्व इस सन्दर्भ में और भी बढ़ जाता है | इन सबके बावजूद भारत और म्यांमार के संबंधों में कुछ चुनौतियाँ देखी जा सकती हैं,जो निम्नलिखित हैं - भारत- म्यांमार संबंधो में चुनौतियाँ - एफएमआर (FMR) और बॉर्डर फेन्सिंग- भारत और म्यांमार के बीच यह मुद्दा एक चुनौती है | रोहिंग्या संकट- भारत और म्यांमार के बीच रोहिंग्या संकट पर आम सहमति नहीं बन पा रही है | गोल्डेन ट्रायंगल- थाईलैंड, लाओस और म्यांमार के बीच यह सीमा है | यह भी भारत और म्यांमार के बीच एक चुनौती है | भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जबकि म्यांमार में बिना सेना के सहमति के संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता | भारत चाहता है कि म्यांमार में भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मजबूत हो | नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के प्रावधानों का हनन | म्यांमार में सेना की 25% सीटें रिजर्व हैं | इन सब चुनौतियों के बावजूद भारत - म्यांमार में सहयोग के कई मुद्दे मौजूद हैं , जो कि निम्नलिखित हैं - भारत और म्यांमार दोनों देशो में बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं तथा दोनों अपने निकट सांस्कृतिक संबंधों तथा अपनेपन की गहरी भावना को साझा करते हैं | म्यांमार भारत से सीमा साझा करने वाला एक मात्र आसियान देश है, इसलिए भारत के लिए म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है | म्यांमार के साथ भारत " लुक ईस्ट " और वर्तमान में "एक्ट ईस्ट" के माध्यम से अधिक आर्थिक एकीकरण के लिए प्रयासरत है | भारत और म्यांमार ने 1970 में द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये थे | भारत ने 2008 में म्यांमार को सार्क के एक पर्यवेक्षक के रूप में सम्मिलित करने का समर्थन किया था | म्यांमार की आसियान ,बिम्सटेक और मेकांग गंगा सहयोग की सदस्यता ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक क्षेत्रीय आयाम प्रस्तुत किया है | म्यांमार विभिन्न अन्तराष्ट्रीय संगठनों में भारत के पक्ष का समर्थन करता है | भारत और म्यांमार सहयोग के आयाम 2010 के बाद लोकतंत्र की मजबूती के बाद लगातार बढे हैं |लेकिन म्यांमार वास्तविक रूप से अभी भी लोकतान्त्रिक नहीं है | गोल्डेन ट्रायंगल जब तक है तब तक लाओस ,म्यांमार और थाईलैंड में ब्राउन सुगर का केंद्र है ,यह भारत के लिए प्रमुख चिंता का विषय है ,इसका निदान अतिआवश्यक है|
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पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिए। साथ ही यह भी समझाइएकि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है? (150 शब्द) Define the patriarchal society. Also, explainhow can it determine the status of women in Indian society? (150 words)
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एप्रोच:- भूमिका में पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। उत्तर के पहले भाग में बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं अर्थात एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से प्रधान मानते हुए आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक संदर्भों में वरीयता दी जाती है। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विकास के साथ साथ विभिन्न आर्थिक कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे जाने लगे। वहीं महिलायें एक जिम्मेदारी सी दिखने लगी। कालान्तर में पितृवंशात्मकता को सुनिश्चित करने हेतु सांस्कृतिक स्तर पर पुरुषों को प्रधानता मिली। इन दोनों के फलस्वरूप राजनैतिक स्तर पर पुरुष प्रधान समझे जाने लगे जिससे पितृसत्तात्मकता जैसे सामाजिक संस्थान ने जन्म लिया। यही कारण है सुकुमॉय चक्रवर्ती के अनुसार जहाँ लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान है वहीँ जेंडर किसी व्यक्ति सामाजिक पहचान है। भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है। साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मकता को निम्नलिखित दो प्रकारों से समझा जा सकताहै- सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता जिसके अनुसार सामान्य जनजीवन में पुरुष को महिलाओं से अधिक वरीयता दी जाती है तथा इसके फलस्वरूप जेंडर भूमिका भी निर्धारित होती है। व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता जहाँ परिवार रिश्तेदारी इत्यादि में महिलाओं से भिन्न व्यवहार किया जाता है। भारतवर्ष में यद्यपि व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता में कमी देखी जा रही है परन्तु दूसरी तरफ सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता बढ़ रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं- जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविकोपार्जन के संदर्भ में। सामाजिक असुरक्षा की भावना एवं सामाजिक कुरीतियां: सेक्स आधारित भ्रूण हत्याएं, दहेज़ हत्याएं इत्यादि। कामकाजी महिलाओं पर जेंडर भूमिका के अंतर्गत अतिरिक्त बोझ एवं सार्वजनिक नकारात्मक दृष्टिकोण इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम, आयरन की कमी है जिसके दुष्परिणाम उनके रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं में तथा नवजात शिशुओं में कुपोषण की समस्या भी पायी जा रही है जिसका दुष्परिणाम अधिक मातृत्व मृत्यूदर तथा शिशु मृत्यू दर में दिखाई पड़ता है। NSSO की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 83 प्रतिशत महिलायें उचित कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोशिशजारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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##Question:पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिए। साथ ही यह भी समझाइएकि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है? (150 शब्द) Define the patriarchal society. Also, explainhow can it determine the status of women in Indian society? (150 words)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में पितृसत्तात्मक समाज को परिभाषित कीजिये। उत्तर के पहले भाग में बताइए कि यह किस प्रकार से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को निर्धारित करता है ? अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- पितृसत्तात्मक समाज को सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं अर्थात एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था से जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से प्रधान मानते हुए आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक संदर्भों में वरीयता दी जाती है। पितृसत्ता एवं भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति:- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विकास के साथ साथ विभिन्न आर्थिक कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे जाने लगे। वहीं महिलायें एक जिम्मेदारी सी दिखने लगी। कालान्तर में पितृवंशात्मकता को सुनिश्चित करने हेतु सांस्कृतिक स्तर पर पुरुषों को प्रधानता मिली। इन दोनों के फलस्वरूप राजनैतिक स्तर पर पुरुष प्रधान समझे जाने लगे जिससे पितृसत्तात्मकता जैसे सामाजिक संस्थान ने जन्म लिया। यही कारण है सुकुमॉय चक्रवर्ती के अनुसार जहाँ लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान है वहीँ जेंडर किसी व्यक्ति सामाजिक पहचान है। भारतीय समाज में पितृसत्ता की विचाराधारा इस पर निर्धारित है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर पुरुषों का नियन्त्रण है या होना चाहिए। इस व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है। एक संयुक्त परिवार में आम तौर पर एक कुलपति प्रायः सबसे बुज़ुर्ग का नेतृत्व होता है। इस व्यवस्था को प्रायः पारिवारिक पितृसत्ता कहते हैं। ऐसे घरों में पुरुष प्रधान होता है, वो परिवार का पालन पोषण करता है। संयुक्त परिवारों के मुकाबले में एकल परिवारों में पित्तृसत्ता की अभिव्यक्त्ति जोड़े कम पाए जाते हैं। भारतीय समाज में स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को धर्म और धर्म की व्याख्या करने वाले ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते। लड़की को पहले पिता, फिर पति और बाद में बेटों के संरक्षण में रहना चाहिए।इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भी कहा जाता है। भारतीय समाज में पितृसत्ता में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक होती है जहाँ एक तरफ उन्हें घर के ज्यादा से ज्यादा काम का जिम्मा लेना होता है। वहीं दूसरी ओर, घरेलू व्यवस्था में उनका प्रभाव और सम्मान उतना ही कम होता है। साथ ही उन्हें आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अधीनता, दमन और उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ता है। पितृसत्ता में महिलाओं को शक्ति और वर्चस्व के साधनों से वंचित करने पर उनकी सहमति आसानी से हासिल कर ली जाती है और जब महिलाएं पितृसत्ता के इशारों पर ज़िन्दगी जीने लगती हैं तो उन्हें वर्गीय सुविधाएँ मिलने लगती हैं और उन्हें मान-सम्मान के तमगों से भी नवाज़ा जाता है। वहीं दूसरी तरफ जो महिलाएं पितृसत्ता के कायदे-कानूनों और तौर-तरीकों को अपना सहयोग या सहमति नहीं देती हैं उन्हें बुरा करार दे दिया जाता है और उन्हें उनके पुरुषों की सम्पत्ति और सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। पितृसत्तात्मकता को निम्नलिखित दो प्रकारों से समझा जा सकताहै- सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता जिसके अनुसार सामान्य जनजीवन में पुरुष को महिलाओं से अधिक वरीयता दी जाती है तथा इसके फलस्वरूप जेंडर भूमिका भी निर्धारित होती है। व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता जहाँ परिवार रिश्तेदारी इत्यादि में महिलाओं से भिन्न व्यवहार किया जाता है। भारतवर्ष में यद्यपि व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता में कमी देखी जा रही है परन्तु दूसरी तरफ सार्वजनिक पितृसत्तात्मकता बढ़ रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं- जीवन संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीविकोपार्जन के संदर्भ में। सामाजिक असुरक्षा की भावना एवं सामाजिक कुरीतियां: सेक्स आधारित भ्रूण हत्याएं, दहेज़ हत्याएं इत्यादि। कामकाजी महिलाओं पर जेंडर भूमिका के अंतर्गत अतिरिक्त बोझ एवं सार्वजनिक नकारात्मक दृष्टिकोण इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम, आयरन की कमी है जिसके दुष्परिणाम उनके रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर पड़ रहे हैं। साथ ही गर्भवती महिलाओं में तथा नवजात शिशुओं में कुपोषण की समस्या भी पायी जा रही है जिसका दुष्परिणाम अधिक मातृत्व मृत्यूदर तथा शिशु मृत्यू दर में दिखाई पड़ता है। NSSO की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 83 प्रतिशत महिलायें उचित कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं। पितृसत्ता का प्रभाव सिर्फ देश के ज़्यादातर नागरिकों पर ही नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका जैसे संस्थान भी इसके असर से बचे हुए नहीं हैं, जिन पर घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून, कार्यस्थल पर यौन हमलों के ख़िलाफ़ क़ानून, संशोधित दहेज निषेध क़ानून और बलात्कार विरोधी क़ानून और दूसरे क़ानूनों को लागू कराने का दायित्व है। एक तरफ बलात्कार, दहेज संबंधी हिंसा, घरेलू हिंसा और कार्यस्थलों पर यौन हिंसा के मामलों में कई गुना बढ़ोतरी देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में इनसे जुड़े कानूनों की या तो धज्जियां उड़ाई जा रही हैं या दूसरे मामलों में इन्हें लागू ही नहीं किया जा रहा है। हाल ही में हमने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट को दहेज निषेध अधिनियम (डाउरी प्रिवेंशन एक्ट) की धारा 498 ए के तहत झूठे मुकदमे दायर किए जाने के बारे में बात करते और इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी करते देखा । हालाँकि इन दिशा निर्देशों को बाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा ख़ारिज कर दिया गया । मैरिटल रेप को पवित्र क़रार देना, IPC की धारा 377 को बचाए रखने की कोशिशजारी रखना, एंटी रोमियो स्क्वाड द्वारा मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं भारतीय समाज में पितृसत्ता की गहरी जड़ों की कहानी बयान करती हैं। अतः पितृसत्ता को चुनौती देने वाले समाज सुधार आंदोलनों को मज़बूत बनाना और उन्हें प्राथमिकता में शामिल करना तथा इन आंदोलनों द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका पर दबाव समूह का काम करना पितृसत्ता को तोड़ने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा।
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North East Region of India has been infested with insurgency for a long time. Analyse the major reasons for the survival of armed insurgency in the region.( 150 words/10 marks)
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Approach · Brief Introduction on social setup in North East region · Enumerate reasons for the survival of armed insurgency in the region · Bring out impact of insurgency in brief · Conclude on an optimistic note. Ans North-East India is culturally and ethnically diverse and due to its distinct socio-cultural background and particular historical evolution, the North-East region of India holds several fault lines around which many insurgent groups have been thriving for a very long time. The major reasons behind the evolution and survival of armed insurgency in this region are- o This region has been one of the most neglected regions in terms of developments and is the main cause behind the resentment of the people living in this area. The insurgent groups take advantage of resentment of people and get support base. o Alienation of population frommainstreampolitical process, where the insurgent groupcontinueto boycott the dialogue and electoral process. (Ex – NSCN-Khaplang group) o Hilly terrain and dense forestgive strategic advantages for the insurgent Guerilla groups and at the sametimeit createsbighurdle for thecounter insurgencyoperations. o Racial clashes are very common here due todiverseracial profile of the region. In a fracturedsocietythe insurgent groups penetrate easily. o Active and covert foreign support to these insurgent groups, through training, logistic and moral support has also been a big hurdle to eradicate these groups. o Issues related to security and AFSPA have created deep sense of alienation due to human rights violation and excess by security forces. o Porous international borders and easy availability of arms. 98% of NE is contiguous with the international border, which allows terror outfits to get safe sanctuaries in neighboring countries. Golden triangle continues to be a major source of funding for arms and ammunition. This insurgency has adversely impacted the region by causing political instability and violence, Economic backwardness and development deficit, social unrest due to ethnic tensions and increased crimes like drug menace, illegal arms trafficking etc The twin approach of development andcounter insurgencyoperations coupled with honest political dialogue process may provide the best answer to the long infested insurgency in the North-East.
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##Question:North East Region of India has been infested with insurgency for a long time. Analyse the major reasons for the survival of armed insurgency in the region.( 150 words/10 marks)##Answer:Approach · Brief Introduction on social setup in North East region · Enumerate reasons for the survival of armed insurgency in the region · Bring out impact of insurgency in brief · Conclude on an optimistic note. Ans North-East India is culturally and ethnically diverse and due to its distinct socio-cultural background and particular historical evolution, the North-East region of India holds several fault lines around which many insurgent groups have been thriving for a very long time. The major reasons behind the evolution and survival of armed insurgency in this region are- o This region has been one of the most neglected regions in terms of developments and is the main cause behind the resentment of the people living in this area. The insurgent groups take advantage of resentment of people and get support base. o Alienation of population frommainstreampolitical process, where the insurgent groupcontinueto boycott the dialogue and electoral process. (Ex – NSCN-Khaplang group) o Hilly terrain and dense forestgive strategic advantages for the insurgent Guerilla groups and at the sametimeit createsbighurdle for thecounter insurgencyoperations. o Racial clashes are very common here due todiverseracial profile of the region. In a fracturedsocietythe insurgent groups penetrate easily. o Active and covert foreign support to these insurgent groups, through training, logistic and moral support has also been a big hurdle to eradicate these groups. o Issues related to security and AFSPA have created deep sense of alienation due to human rights violation and excess by security forces. o Porous international borders and easy availability of arms. 98% of NE is contiguous with the international border, which allows terror outfits to get safe sanctuaries in neighboring countries. Golden triangle continues to be a major source of funding for arms and ammunition. This insurgency has adversely impacted the region by causing political instability and violence, Economic backwardness and development deficit, social unrest due to ethnic tensions and increased crimes like drug menace, illegal arms trafficking etc The twin approach of development andcounter insurgencyoperations coupled with honest political dialogue process may provide the best answer to the long infested insurgency in the North-East.
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Write downthe main provisions of the Congress-League Agreement in the Lucknow session of 1916. Also, CriticallyAnalyse this agreement. (200 words/10 marks)
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Approach Briefly write about Lucknow pact in introduction Explain the provisions of the pact in detail For critical anaysis explain in terms of fruitful outcomes and shortfall of the fact conclude Answer- Lucknow Pact was an agreement which held in Lucknow, in 1916 at the joint session of both the parties (Muslim League and the Indian National Congress). According to the pact, the Congress and the League agreed to join their efforts in order to get their political aspirations fulfilled. Provisions of Lucknow Pact 1916 A majority of the members of the Legislative Councils to be elected. At least half the seats to be filled by Indians, in the Viceroy"s Executive Council. The provinces should be free as much as possible from the control of Central Governments in matters of finance and administration. Separate electorates should be provided for all the communities until they ask for joint electorate. Provision for the separation of judiciary from the executive. In case of minority political representation, a system of weightage to be adopted in which minorities were to be given more representation in the government than proportional to their share in the population. Legislative Council term to be 5 years and the strength of the Central Legislative Council to be increased to 150. 4/5 of the Central and Legislative (Provincial) should be elected and 1/5 to be nominated. The salaries of the Secretary of State for Indian Affairs not to be paid from Indian funds rather it has to be paid by the British government from their own funds. The relations of the secretary with the Government of India should be similar to those of the colonial Secretary with the Governments of the Dominion. Critical Evaluation of Lucknow Pact 1916 It was based on the perception of bringing together the educated Hindus and Muslims as separate political entities without secularization of their political views and most importantly it did not involve Hindu and Muslim masses. As the Hindu-Muslim masses were not involved the Lucknow pact of 1916 therefore left the way open to the future revival of communalism in India. The unity between the two factions of the congress (i.e. Moderates & Extremists), and between Congress & Muslim League during the Lucknow Session of Congress, aroused great political enthusiasm in the country. Lucknow pact paved the way for Hindu-Muslim cooperation in the Khilafat movement (Agitation of Indian Muslims to preserve the authority of Ottoman Sultan as a Caliph of Islam) and Non-Cooperation movement from 1920. According to the Lucknow pact of 1916, any legislature would not work if more than 3/4th member of any religion were against such resolution, acceptance of such proposal led to the introduction of a kind of communal veto in legislature.The Lucknow Pact, enhanced the League"s power in Indian politics.
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##Question:Write downthe main provisions of the Congress-League Agreement in the Lucknow session of 1916. Also, CriticallyAnalyse this agreement. (200 words/10 marks)##Answer:Approach Briefly write about Lucknow pact in introduction Explain the provisions of the pact in detail For critical anaysis explain in terms of fruitful outcomes and shortfall of the fact conclude Answer- Lucknow Pact was an agreement which held in Lucknow, in 1916 at the joint session of both the parties (Muslim League and the Indian National Congress). According to the pact, the Congress and the League agreed to join their efforts in order to get their political aspirations fulfilled. Provisions of Lucknow Pact 1916 A majority of the members of the Legislative Councils to be elected. At least half the seats to be filled by Indians, in the Viceroy"s Executive Council. The provinces should be free as much as possible from the control of Central Governments in matters of finance and administration. Separate electorates should be provided for all the communities until they ask for joint electorate. Provision for the separation of judiciary from the executive. In case of minority political representation, a system of weightage to be adopted in which minorities were to be given more representation in the government than proportional to their share in the population. Legislative Council term to be 5 years and the strength of the Central Legislative Council to be increased to 150. 4/5 of the Central and Legislative (Provincial) should be elected and 1/5 to be nominated. The salaries of the Secretary of State for Indian Affairs not to be paid from Indian funds rather it has to be paid by the British government from their own funds. The relations of the secretary with the Government of India should be similar to those of the colonial Secretary with the Governments of the Dominion. Critical Evaluation of Lucknow Pact 1916 It was based on the perception of bringing together the educated Hindus and Muslims as separate political entities without secularization of their political views and most importantly it did not involve Hindu and Muslim masses. As the Hindu-Muslim masses were not involved the Lucknow pact of 1916 therefore left the way open to the future revival of communalism in India. The unity between the two factions of the congress (i.e. Moderates & Extremists), and between Congress & Muslim League during the Lucknow Session of Congress, aroused great political enthusiasm in the country. Lucknow pact paved the way for Hindu-Muslim cooperation in the Khilafat movement (Agitation of Indian Muslims to preserve the authority of Ottoman Sultan as a Caliph of Islam) and Non-Cooperation movement from 1920. According to the Lucknow pact of 1916, any legislature would not work if more than 3/4th member of any religion were against such resolution, acceptance of such proposal led to the introduction of a kind of communal veto in legislature.The Lucknow Pact, enhanced the League"s power in Indian politics.
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होमरूल लीग आंदोलन प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये। क्या कारण थे कि 1919 तक आते-आते यह आंदोलन धीमा पड़ गया? (10 अंक/150-200 शब्द) List the responsible factors for starting the Home Rule League Movement. Whatwerethe reasons that the movement had slowed down by 1919? (10marks/150-200 words)
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एप्रोच- होमरूल आंदोलन की पृष्ठभूमि तथा उसके बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,होमरूल लीग आंदोलन प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| अंतिम भाग में, आंदोलन के 1919 तक आते-आते धीमे पड़ जाने के कारणों को बताईये| निष्कर्षतः, होमरूल आंदोलन के योगदान को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में लोकमान्य तिलक तथा एनी बेसेंट द्वारा स्थापित होमरूल लीग(आयरलैंड की तर्ज पर) एक महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया थी जिसने भारतीयों में राष्ट्रवादी चेतना को जागृत करने में अहम योगदान दिया था| आंदोलन के संचालन के लिए तिलक एवं एनी बेसेंट द्वारा अलग-अलग संगठन की स्थापना की गई और कार्यक्षेत्रों का बंटवारा कर आंदोलन की शुरुआत हुयी जैसे- तिलक ने अप्रैल 1916 में आंदोलन की शुरुआत की तथा तिलक का कार्यक्षेत्र- कर्नाटक, मध्य-प्रांत, बेरार तथा महाराष्ट्र था वहीँ शेष भारत में आंदोलन का संचालन एनी बेसेंट को करना था| दोनों लीगो का उद्देश्य उग्र राजनीति के एक नए रूप की शुरुआत करना था एवं स्वतंत्रता आंदोलन के प्रक्रिया में इसने अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ी| होमरूल लीग आंदोलन प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारक प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन एवं युद्ध में हुए व्यय की पूर्ति के लिए भारतीयों पर अत्यधिक उच्च करों का आरोपण जिससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि एवं जनता में असंतोष व्याप्त होना| इसकी वजह से लोग किसी भी सरकार विरोधी गतिविधि में भाग लेने हेतु तैयार थे| 1914 में जेल से रिहा होने के पश्चात तिलक राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने में फिर से सक्रिय हुए| उन्होंने आयरलैंड की होमरुल लीग के तर्ज पर प्रशासनिक सुधारों हेतु अहिंसात्मक आंदोलन एवं स्वराज की प्राप्ति पर बल दिया| आयरलैंड की थियोसॉफिस्ट एनी बेसेंट ने भी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन देने हेतु आयरिश होमरूल लीग के तर्ज पर भारत में आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया| इस लीग के माध्यम से वे अपने विचारों को जनता में प्रसारित कर अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाना चाहती थीं| 1907 में कॉंग्रेस में विभाजन से होने वाले नुकसान को दोनों गुट महसूस कर रहे थें| तिलक के साथ-साथ एनी बेसेंट भी दोनों गुटों में एकता की कोशिश कर रही थी| तिलक एवं बेसेंट ने पहले नरमपंथियों एवं गरमपंथियों दोनों के समर्थन का प्रयास किया परंतु यह प्रयास असफल होने पर उन्होंने स्वतंत्र रूप से राष्ट्रवादी गतिविधियों को संचालित करने हेतु होमरूल आंदोलन का सहारा लिया| राष्ट्रवादियों के एक वर्ग का यह मानना कि सरकार का ध्यान आकर्षित करने हेतु यह सही समय है एवं उस पर दबाव डालना आवश्यक है| मार्ले-मिंटो सुधारों का वास्तविक स्वरूप सामने आने पर गरमपंथियों का भी भ्रम सरकार की निष्ठा से टूट गया था| प्रथम विश्व युद्ध के समय वैश्विक साम्राज्यवादी शक्तियों के वास्तविक चरित्र से जनता अवगत हुई तथा यूरोपीय शक्तियों की अपराजेयता का मिथक भी टूट चुका था| विभिन्न कारणों से रुढ़िवादी मुसलमानों में भी असंतोष था; जैसे- बंगाल विभाजन रद्द किये जाने से|साथ ही, मुस्लिम समाज में भी राष्ट्रीय चेतना से युक्त नवयुवकों की संख्या में वृद्धि हुयी जैसे- जिन्ना, मोहम्मद अली , मौलाना आज़ाद आदि| युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भी आत्मनिर्णय के अधिकारों का आश्वासन दिया था| अप्रैल 1916 में तिलक द्वारा तथा सितम्बर 1916 में एनी बेसेंट द्वारा आंदोलन की शुरुआत की गयी| होमरूल आंदोलन के अंतर्गत स्वशासन के संदर्भ में अखबारों में लेख, पैम्पलेट्स, पुस्तकालय, सदस्यता अभियान इत्यादि को आधार बनाया गया| होमरूल लीग शीघ्र ही लोकप्रिय होने लगा तथा इसके सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि होने लगी| सरकार ने प्रारंभ में आंदोलन के प्रति कठोर नीति अपनाईतथा तिलक एवं एनी बेसेंट को गिरफ्तार किया गया| हालांकि भारतीयों द्वारा सरकार की दमनकारी कार्रवाईयों का व्यापक विरोध हुआ फिर भी 1919 आते-आते होमरूल लीग आंदोलन का उन्माद ठंडा पड़ने लग गया था| आंदोलन के 1919 तक आते-आते धीमे पड़ जाने के कारण आंदोलन में प्रभावी संगठन का अभाव; 1917-18 के सांप्रदायिक दंगों का भी आंदोलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा| कुछ नरमपंथी नेताओं का एनी बेसेंट को जेल से रिहा करने तथा सरकार द्वारा सुधारों का आश्वासन देने मात्र से ही संतुष्ट हो जाना; एनी बेसेंट का खुद भी सुधारों की घोषणा के पश्चात लीग की उपयोगिता को लेकर असमंजस में होना; तिलक के अहिंसात्मक प्रतिरोध की घोषणा से भी नरमपंथी इस आंदोलन से दूरी बनाने लगे थें| जुलाई,1918 में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के सार्वजनिक होने से नरमपंथियों एवं गरमपंथियों के मध्य मतभेद का पुनः उभरना; मुकदमे के सिलसिले में तिलक के इंग्लैंड जाने से तथा सुधारों की घोषणा के बाद एनी बेसेंट के ब्रिटिश समर्थक होने के बाद होमरूल आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया तथा गांधीजी के उत्थान के बाद यह मृतप्राय हो गया| हालांकि यह आंदोलन जल्द ही समाप्त हो गया था फिर भीइस आंदोलन के साथ फिर एक बार राजनीतिक सक्रियता का वातावरण निर्मित हुआ एवं अगस्त घोषणा से आंदोलन को वैधता मिली| होमरूल लीग के अधिकांशतः कार्यकर्ताओं ने गांधीजी को सहयोग किया तथा राष्ट्रवादियों की एक नयी पीढ़ी को उभारने का भी इसने कार्य किया| साथ ही, आंदोलन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी तथा यूपी,बिहार जैसे क्षेत्रों में कॉंग्रेस के जनाधार का विस्तार हुआ|
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##Question:होमरूल लीग आंदोलन प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये। क्या कारण थे कि 1919 तक आते-आते यह आंदोलन धीमा पड़ गया? (10 अंक/150-200 शब्द) List the responsible factors for starting the Home Rule League Movement. Whatwerethe reasons that the movement had slowed down by 1919? (10marks/150-200 words)##Answer:एप्रोच- होमरूल आंदोलन की पृष्ठभूमि तथा उसके बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,होमरूल लीग आंदोलन प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| अंतिम भाग में, आंदोलन के 1919 तक आते-आते धीमे पड़ जाने के कारणों को बताईये| निष्कर्षतः, होमरूल आंदोलन के योगदान को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में लोकमान्य तिलक तथा एनी बेसेंट द्वारा स्थापित होमरूल लीग(आयरलैंड की तर्ज पर) एक महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया थी जिसने भारतीयों में राष्ट्रवादी चेतना को जागृत करने में अहम योगदान दिया था| आंदोलन के संचालन के लिए तिलक एवं एनी बेसेंट द्वारा अलग-अलग संगठन की स्थापना की गई और कार्यक्षेत्रों का बंटवारा कर आंदोलन की शुरुआत हुयी जैसे- तिलक ने अप्रैल 1916 में आंदोलन की शुरुआत की तथा तिलक का कार्यक्षेत्र- कर्नाटक, मध्य-प्रांत, बेरार तथा महाराष्ट्र था वहीँ शेष भारत में आंदोलन का संचालन एनी बेसेंट को करना था| दोनों लीगो का उद्देश्य उग्र राजनीति के एक नए रूप की शुरुआत करना था एवं स्वतंत्रता आंदोलन के प्रक्रिया में इसने अपनी एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ी| होमरूल लीग आंदोलन प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारक प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन एवं युद्ध में हुए व्यय की पूर्ति के लिए भारतीयों पर अत्यधिक उच्च करों का आरोपण जिससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि एवं जनता में असंतोष व्याप्त होना| इसकी वजह से लोग किसी भी सरकार विरोधी गतिविधि में भाग लेने हेतु तैयार थे| 1914 में जेल से रिहा होने के पश्चात तिलक राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाने में फिर से सक्रिय हुए| उन्होंने आयरलैंड की होमरुल लीग के तर्ज पर प्रशासनिक सुधारों हेतु अहिंसात्मक आंदोलन एवं स्वराज की प्राप्ति पर बल दिया| आयरलैंड की थियोसॉफिस्ट एनी बेसेंट ने भी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन देने हेतु आयरिश होमरूल लीग के तर्ज पर भारत में आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया| इस लीग के माध्यम से वे अपने विचारों को जनता में प्रसारित कर अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाना चाहती थीं| 1907 में कॉंग्रेस में विभाजन से होने वाले नुकसान को दोनों गुट महसूस कर रहे थें| तिलक के साथ-साथ एनी बेसेंट भी दोनों गुटों में एकता की कोशिश कर रही थी| तिलक एवं बेसेंट ने पहले नरमपंथियों एवं गरमपंथियों दोनों के समर्थन का प्रयास किया परंतु यह प्रयास असफल होने पर उन्होंने स्वतंत्र रूप से राष्ट्रवादी गतिविधियों को संचालित करने हेतु होमरूल आंदोलन का सहारा लिया| राष्ट्रवादियों के एक वर्ग का यह मानना कि सरकार का ध्यान आकर्षित करने हेतु यह सही समय है एवं उस पर दबाव डालना आवश्यक है| मार्ले-मिंटो सुधारों का वास्तविक स्वरूप सामने आने पर गरमपंथियों का भी भ्रम सरकार की निष्ठा से टूट गया था| प्रथम विश्व युद्ध के समय वैश्विक साम्राज्यवादी शक्तियों के वास्तविक चरित्र से जनता अवगत हुई तथा यूरोपीय शक्तियों की अपराजेयता का मिथक भी टूट चुका था| विभिन्न कारणों से रुढ़िवादी मुसलमानों में भी असंतोष था; जैसे- बंगाल विभाजन रद्द किये जाने से|साथ ही, मुस्लिम समाज में भी राष्ट्रीय चेतना से युक्त नवयुवकों की संख्या में वृद्धि हुयी जैसे- जिन्ना, मोहम्मद अली , मौलाना आज़ाद आदि| युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भी आत्मनिर्णय के अधिकारों का आश्वासन दिया था| अप्रैल 1916 में तिलक द्वारा तथा सितम्बर 1916 में एनी बेसेंट द्वारा आंदोलन की शुरुआत की गयी| होमरूल आंदोलन के अंतर्गत स्वशासन के संदर्भ में अखबारों में लेख, पैम्पलेट्स, पुस्तकालय, सदस्यता अभियान इत्यादि को आधार बनाया गया| होमरूल लीग शीघ्र ही लोकप्रिय होने लगा तथा इसके सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि होने लगी| सरकार ने प्रारंभ में आंदोलन के प्रति कठोर नीति अपनाईतथा तिलक एवं एनी बेसेंट को गिरफ्तार किया गया| हालांकि भारतीयों द्वारा सरकार की दमनकारी कार्रवाईयों का व्यापक विरोध हुआ फिर भी 1919 आते-आते होमरूल लीग आंदोलन का उन्माद ठंडा पड़ने लग गया था| आंदोलन के 1919 तक आते-आते धीमे पड़ जाने के कारण आंदोलन में प्रभावी संगठन का अभाव; 1917-18 के सांप्रदायिक दंगों का भी आंदोलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा| कुछ नरमपंथी नेताओं का एनी बेसेंट को जेल से रिहा करने तथा सरकार द्वारा सुधारों का आश्वासन देने मात्र से ही संतुष्ट हो जाना; एनी बेसेंट का खुद भी सुधारों की घोषणा के पश्चात लीग की उपयोगिता को लेकर असमंजस में होना; तिलक के अहिंसात्मक प्रतिरोध की घोषणा से भी नरमपंथी इस आंदोलन से दूरी बनाने लगे थें| जुलाई,1918 में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के सार्वजनिक होने से नरमपंथियों एवं गरमपंथियों के मध्य मतभेद का पुनः उभरना; मुकदमे के सिलसिले में तिलक के इंग्लैंड जाने से तथा सुधारों की घोषणा के बाद एनी बेसेंट के ब्रिटिश समर्थक होने के बाद होमरूल आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया तथा गांधीजी के उत्थान के बाद यह मृतप्राय हो गया| हालांकि यह आंदोलन जल्द ही समाप्त हो गया था फिर भीइस आंदोलन के साथ फिर एक बार राजनीतिक सक्रियता का वातावरण निर्मित हुआ एवं अगस्त घोषणा से आंदोलन को वैधता मिली| होमरूल लीग के अधिकांशतः कार्यकर्ताओं ने गांधीजी को सहयोग किया तथा राष्ट्रवादियों की एक नयी पीढ़ी को उभारने का भी इसने कार्य किया| साथ ही, आंदोलन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी तथा यूपी,बिहार जैसे क्षेत्रों में कॉंग्रेस के जनाधार का विस्तार हुआ|
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Basic structure doctrine has protected Indian democracy from the unlimited power of Article 368. Comment and support the statement. (150 words/10 Marks)
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Approach : Define the basic structure in an introductory part. Explain the importance ofthe Basic Structure of the Constitution. Highlight the issues related to the Basic Structure of the Constitution. Answer : in the Kesavananda Bharati case (1973), the Supreme Courtlaid down a new doctrine of the ‘basic structure’ (or ‘basic features’) of theConstitution. It ruled that the constituent power of Parliament under Article368 does not enable it to alter the ‘basic structure’ of the Constitution. Thismeans that the Parliament cannot abridge or take away a Fundamental Rightthat forms a part of the ‘basic structure’ of the Constitution. The present position is that the Parliament under Article 368 can amend anypart of the Constitution including the Fundamental Rights but withoutaffecting the ‘basic structure’ of the Constitution. However, the SupremeCourt is yet to define or clarify as to what constitutes the ‘basic structure’ ofthe Constitution. From the various judgements, the following have emergedas ‘basic features’ of the Constitution or elements/components/ingredientsof the ‘basic structure’ of the constitution: The supremacy of the Constitution Sovereign, democratic and republican nature of the Indian polity Secular character of the Constitution etc. The doctrine of basic structure has come under the criticism of scholars but if such limitations on the amending power of the Parliament will not be there, then, a day may come, when it will be made a criminal offence to criticize the government in power and the citizens may not be left with their basic inalienable rights what the Constitution guarantees to them under Part III. Criticizing this doctrine with the argument that the constituent power gets transferred from the elected representatives of the people to the judges of the Supreme Court one should not forget the majoritarian power of which the Parliament is in possession of. The judiciary is the protector and final interpreter of the Constitution and it is also below the Constitution. This doctrine was meant for a special use in times when Constitutional amendments threatened the basic framework of the Constitution. The reason for not defining this doctrine may be, the Judiciary is afraid of the Legislature that if they will give a clear cut list of the basic structure, then the Parliament may come forward with some other alternatives. Thanks, professor Dietrich Conrad who on his visit to India makes us aware that there is some implied inherent limitation on the amending power of the Parliament which Palkhivala successfully pleaded in the Keshavananda case and that Mr M. K. Nambyartried in Golakh Nath but because of judicial hesitation, it took about half a decade time after Golakh Nath to get it approved. This doctrine protects our basic rights and every act of the Parliament is now subject to this doctrine and puts a full stop on the unconstitutional-Constitutional amendments game of the Parliament, e.g., then. R. Coelho case, where the Ninth Schedule was enacted with the purpose to give effect to laws relating to land reforms. The purpose failed and the history clearly shows for what purpose, the Schedule was used. Various enactments were put down in the Ninth Schedule to provide them with a shield that they will be beyond judicial review though many of them were not related to the agrarian reforms.[106] Basic structure doctrine is the reply to the dubious steps adopted to misuse the Ninth Schedule and the judgment as a whole is laudable. Mr K. R. Narayanan (the former President of India) once said, we have destroyed the Constitution, and Constitution has not destroyed us appears true as the Parliament has on many occasions proved this in order to show their power. Nani A. Palkhivala while delivering his speech on Twenty-Fourth Constitutional Amendment concluded with the words…let the Constitution of India be sovereign. This doctrine is not the result of an extrajudicial effort but what actually led was the attempts which were made by the Parliament many times to bring changes in the Constitution in exercise of its constituent power, then only judiciary came forward with this theory of ‘implied limitation’ in the form of basic structure that the Parliament can amend whatever it wants to, but cannot amend the basic structure of the Constitution. Why it cannot amend the basic structure of the Constitution owes from the language of Article 368 itself that …the Constitution‘shall stand amended’ in accordance with the Bill. So, the argument of Mr. Pandit Kanahiyya Lal Mishra seems quite strong that amend the Constitution in the light of the provisions contained in the Constitution but in such a way so that the basic structure of the Constitution should remain the same and the Constitution shall stand amended, and not sit amended because if the basic structure of the Constitution will be amended then the Constitution will no longer remain to stand amended rather, it will be opposite of the stand amended. But, since passing of the Constitution in 1949, we are witnessing, how the Parliament is making our Constitution ‘stand amended’ while attempts have been made to abrogate and restrict the basic inalienable rights of the subjects and because of this, there is a tussle between the Judiciary and Legislature on one hand and with the Executive on other. It is just like when the Parliament is in doubt it has no other option than to amend. After all, a Constitution like a machine is a lifeless thing. It acquires life because of the men who control it and operates it and India needs today nothing more than a set of honest men who will have the interest of the country before them. The basic structure doctrine is a mean to give a momentum to the living principles of the ‘Rule of Law’ and connotes that none is above the Constitution and the Constitution is supreme.
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##Question:Basic structure doctrine has protected Indian democracy from the unlimited power of Article 368. Comment and support the statement. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach : Define the basic structure in an introductory part. Explain the importance ofthe Basic Structure of the Constitution. Highlight the issues related to the Basic Structure of the Constitution. Answer : in the Kesavananda Bharati case (1973), the Supreme Courtlaid down a new doctrine of the ‘basic structure’ (or ‘basic features’) of theConstitution. It ruled that the constituent power of Parliament under Article368 does not enable it to alter the ‘basic structure’ of the Constitution. Thismeans that the Parliament cannot abridge or take away a Fundamental Rightthat forms a part of the ‘basic structure’ of the Constitution. The present position is that the Parliament under Article 368 can amend anypart of the Constitution including the Fundamental Rights but withoutaffecting the ‘basic structure’ of the Constitution. However, the SupremeCourt is yet to define or clarify as to what constitutes the ‘basic structure’ ofthe Constitution. From the various judgements, the following have emergedas ‘basic features’ of the Constitution or elements/components/ingredientsof the ‘basic structure’ of the constitution: The supremacy of the Constitution Sovereign, democratic and republican nature of the Indian polity Secular character of the Constitution etc. The doctrine of basic structure has come under the criticism of scholars but if such limitations on the amending power of the Parliament will not be there, then, a day may come, when it will be made a criminal offence to criticize the government in power and the citizens may not be left with their basic inalienable rights what the Constitution guarantees to them under Part III. Criticizing this doctrine with the argument that the constituent power gets transferred from the elected representatives of the people to the judges of the Supreme Court one should not forget the majoritarian power of which the Parliament is in possession of. The judiciary is the protector and final interpreter of the Constitution and it is also below the Constitution. This doctrine was meant for a special use in times when Constitutional amendments threatened the basic framework of the Constitution. The reason for not defining this doctrine may be, the Judiciary is afraid of the Legislature that if they will give a clear cut list of the basic structure, then the Parliament may come forward with some other alternatives. Thanks, professor Dietrich Conrad who on his visit to India makes us aware that there is some implied inherent limitation on the amending power of the Parliament which Palkhivala successfully pleaded in the Keshavananda case and that Mr M. K. Nambyartried in Golakh Nath but because of judicial hesitation, it took about half a decade time after Golakh Nath to get it approved. This doctrine protects our basic rights and every act of the Parliament is now subject to this doctrine and puts a full stop on the unconstitutional-Constitutional amendments game of the Parliament, e.g., then. R. Coelho case, where the Ninth Schedule was enacted with the purpose to give effect to laws relating to land reforms. The purpose failed and the history clearly shows for what purpose, the Schedule was used. Various enactments were put down in the Ninth Schedule to provide them with a shield that they will be beyond judicial review though many of them were not related to the agrarian reforms.[106] Basic structure doctrine is the reply to the dubious steps adopted to misuse the Ninth Schedule and the judgment as a whole is laudable. Mr K. R. Narayanan (the former President of India) once said, we have destroyed the Constitution, and Constitution has not destroyed us appears true as the Parliament has on many occasions proved this in order to show their power. Nani A. Palkhivala while delivering his speech on Twenty-Fourth Constitutional Amendment concluded with the words…let the Constitution of India be sovereign. This doctrine is not the result of an extrajudicial effort but what actually led was the attempts which were made by the Parliament many times to bring changes in the Constitution in exercise of its constituent power, then only judiciary came forward with this theory of ‘implied limitation’ in the form of basic structure that the Parliament can amend whatever it wants to, but cannot amend the basic structure of the Constitution. Why it cannot amend the basic structure of the Constitution owes from the language of Article 368 itself that …the Constitution‘shall stand amended’ in accordance with the Bill. So, the argument of Mr. Pandit Kanahiyya Lal Mishra seems quite strong that amend the Constitution in the light of the provisions contained in the Constitution but in such a way so that the basic structure of the Constitution should remain the same and the Constitution shall stand amended, and not sit amended because if the basic structure of the Constitution will be amended then the Constitution will no longer remain to stand amended rather, it will be opposite of the stand amended. But, since passing of the Constitution in 1949, we are witnessing, how the Parliament is making our Constitution ‘stand amended’ while attempts have been made to abrogate and restrict the basic inalienable rights of the subjects and because of this, there is a tussle between the Judiciary and Legislature on one hand and with the Executive on other. It is just like when the Parliament is in doubt it has no other option than to amend. After all, a Constitution like a machine is a lifeless thing. It acquires life because of the men who control it and operates it and India needs today nothing more than a set of honest men who will have the interest of the country before them. The basic structure doctrine is a mean to give a momentum to the living principles of the ‘Rule of Law’ and connotes that none is above the Constitution and the Constitution is supreme.
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Write down the main provisions of the Congress-League Agreement in the Lucknow session of 1916. Also, critically analyze this agreement. (150 words/10 marks)
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Approach Introduction-Write briefly about lucknow pact Main body- illustarte the main provisions of Lucknow pact Critical evalaution-write the positive outcomes as well shortfall of the Lucknow Pact Conclusion Answer Lucknow Pact was an agreement which held in Lucknow, in 1916 at the joint session of both the parties (Muslim League and the Indian National Congress). According to the pact, the Congress and the League agreed to join their efforts in order to get their political aspirations fulfilled. Provisions of Lucknow Pact 1916: -A majority of the members of the Legislative Councils to be elected. -At least half the seats to be filled by Indians, in the Viceroy"s Executive Council. -The provinces should be free as much as possible from the control of Central Governments in matters of finance and administration. -Separate electorates should be provided for all the communities until they ask for joint electorate. -Provision for the separation of judiciary from the executive. -In case of minority political representation, a system of weightage to be adopted in which minorities were to be given more representation in the government than proportional to their share in the population. -Legislative Council term to be 5 years and the strength of the Central Legislative Council to be increased to 150. 4/5 of the Central and Legislative (Provincial) should be elected and 1/5 to be nominated. -The salaries of the Secretary of State for Indian Affairs not to be paid from Indian funds rather it has to be paid by the British government from their own funds. -The relations of the secretary with the Government of India should be similar to those of the colonial Secretary with the Governments of the Dominion. Critical Evaluation of Lucknow Pact 1916 -It was based on the perception of bringing together the educated Hindus and Muslims as separate political entities without secularization of their political views and most importantly it did not involve Hindu and Muslim masses. -As the Hindu-Muslim masses were not involved the Lucknow pact of 1916 therefore left the way open to the future revival of communalism in India. -The unity between the two factions of the congress (i.e. Moderates & Extremists), and between Congress & Muslim League during the Lucknow Session of Congress, aroused great political enthusiasm in the country. Lucknow pact paved the way for Hindu-Muslim cooperation in the Khilafat movement (Agitation of Indian Muslims to preserve the authority of Ottoman Sultan as a Caliph of Islam) and Non-Cooperation movement from 1920.
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##Question:Write down the main provisions of the Congress-League Agreement in the Lucknow session of 1916. Also, critically analyze this agreement. (150 words/10 marks)##Answer:Approach Introduction-Write briefly about lucknow pact Main body- illustarte the main provisions of Lucknow pact Critical evalaution-write the positive outcomes as well shortfall of the Lucknow Pact Conclusion Answer Lucknow Pact was an agreement which held in Lucknow, in 1916 at the joint session of both the parties (Muslim League and the Indian National Congress). According to the pact, the Congress and the League agreed to join their efforts in order to get their political aspirations fulfilled. Provisions of Lucknow Pact 1916: -A majority of the members of the Legislative Councils to be elected. -At least half the seats to be filled by Indians, in the Viceroy"s Executive Council. -The provinces should be free as much as possible from the control of Central Governments in matters of finance and administration. -Separate electorates should be provided for all the communities until they ask for joint electorate. -Provision for the separation of judiciary from the executive. -In case of minority political representation, a system of weightage to be adopted in which minorities were to be given more representation in the government than proportional to their share in the population. -Legislative Council term to be 5 years and the strength of the Central Legislative Council to be increased to 150. 4/5 of the Central and Legislative (Provincial) should be elected and 1/5 to be nominated. -The salaries of the Secretary of State for Indian Affairs not to be paid from Indian funds rather it has to be paid by the British government from their own funds. -The relations of the secretary with the Government of India should be similar to those of the colonial Secretary with the Governments of the Dominion. Critical Evaluation of Lucknow Pact 1916 -It was based on the perception of bringing together the educated Hindus and Muslims as separate political entities without secularization of their political views and most importantly it did not involve Hindu and Muslim masses. -As the Hindu-Muslim masses were not involved the Lucknow pact of 1916 therefore left the way open to the future revival of communalism in India. -The unity between the two factions of the congress (i.e. Moderates & Extremists), and between Congress & Muslim League during the Lucknow Session of Congress, aroused great political enthusiasm in the country. Lucknow pact paved the way for Hindu-Muslim cooperation in the Khilafat movement (Agitation of Indian Muslims to preserve the authority of Ottoman Sultan as a Caliph of Islam) and Non-Cooperation movement from 1920.
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सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसमें शामिल आधार वर्ष , साधन लागत और बाजार मूल्य से आप क्या समझते हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the concept of gross domestic product(GDP) and gross national product(GNP). What do you understand by base year, factor cost and market price included in it. (150-200 words; 10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर के पहले भाग में जीडीपी व जीएनपी को परिभाषित कीजिए तथा उदाहरणों के माध्यम से और स्पष्टता लाईए। दूसरे भाग में आधार वर्ष, साधन लागत और बाजार मूल्य की व्याख्या कीजिए। किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समायावधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। अतः यह किसी देश की घरेलू सीमा के अंतर्गत निवासियों या गैर-निवासियों या फ़र्मों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मौद्रिक मूल्य होता है। उदाहरण के माध्यम से इसे ऐसे ऐसे समझ सकते हैं: एक जापानी कंपनी द्वारा भारत में निर्मित कारों को भारत के जीडीपी में सम्मिलित किया जाएगा जबकि टाटा मोटर्स द्वारा ब्रिटेन में निर्मित जगुआर कारों को भारत के जीडीपी में सम्मिलित नहीं किया जाएगा। जीएनपी से तात्पर्य है घरेलू सीमा के भीतर या बाहर एक देश के निवासियों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को जीएनपी कहते हैं। इसे उदाहरण के माध्यम से इस प्रकार समझ सकते हैं: इन्फोसिस या टीसीएस जैसी भारतीय कंपनियाँ अमेरिका में अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवाती हैं तो इन सेवाओं का मूल्य भारत के जीएनपी की गणना करते समय सम्मिलित किया जाता है। आधार वर्ष: स्थिर मूल्य पर जीडीपी तथा जीएनपी की गणना के लिए आधार वर्ष निर्धारित किया जाता है। यह वह वर्ष होता है जब सामान्य रूप से वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य उतार चढ़ाव बहुत ही कम रहता है। जीडीपी की गणना में आधार वर्ष 2011-12 निर्धारित किया गया है। साधन लागत : वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में प्रयुक्त या उपभोग की गयी उतपदान के सभी कारकों की लागत को संदर्भित करता है। इसमें भूमि के लिए किराया, पूंजी के लिए व्याज, श्रम के लिए मजदूरी और उद्यमिता के लिए लाभ शामिल है। यह वास्तविक उत्पादन लागत है जिस पर किसी फ़र्म द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। साधन लागत पर गणना करते समय अप्रत्यक्ष कारों को घटाया जाता है तथा सरकार द्वारा दी गयी सब्सिडी को जोड़ा जाता है। बाजार मूल्य: यह वस्तुओं एवं सेवाओं के वास्तविक लेन-देन को संदर्भित करता है। इसमें अप्रत्यक्ष कर तथा सब्सिडी सम्मिलित होते हैं। अप्रत्यक्ष कर वस्तु के मूल्य को बढ़ा देते हैं और सब्सिडी इसको कम करती है।
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##Question:सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसमें शामिल आधार वर्ष , साधन लागत और बाजार मूल्य से आप क्या समझते हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the concept of gross domestic product(GDP) and gross national product(GNP). What do you understand by base year, factor cost and market price included in it. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: उत्तर के पहले भाग में जीडीपी व जीएनपी को परिभाषित कीजिए तथा उदाहरणों के माध्यम से और स्पष्टता लाईए। दूसरे भाग में आधार वर्ष, साधन लागत और बाजार मूल्य की व्याख्या कीजिए। किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समायावधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। अतः यह किसी देश की घरेलू सीमा के अंतर्गत निवासियों या गैर-निवासियों या फ़र्मों द्वारा एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मौद्रिक मूल्य होता है। उदाहरण के माध्यम से इसे ऐसे ऐसे समझ सकते हैं: एक जापानी कंपनी द्वारा भारत में निर्मित कारों को भारत के जीडीपी में सम्मिलित किया जाएगा जबकि टाटा मोटर्स द्वारा ब्रिटेन में निर्मित जगुआर कारों को भारत के जीडीपी में सम्मिलित नहीं किया जाएगा। जीएनपी से तात्पर्य है घरेलू सीमा के भीतर या बाहर एक देश के निवासियों द्वारा उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को जीएनपी कहते हैं। इसे उदाहरण के माध्यम से इस प्रकार समझ सकते हैं: इन्फोसिस या टीसीएस जैसी भारतीय कंपनियाँ अमेरिका में अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवाती हैं तो इन सेवाओं का मूल्य भारत के जीएनपी की गणना करते समय सम्मिलित किया जाता है। आधार वर्ष: स्थिर मूल्य पर जीडीपी तथा जीएनपी की गणना के लिए आधार वर्ष निर्धारित किया जाता है। यह वह वर्ष होता है जब सामान्य रूप से वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य उतार चढ़ाव बहुत ही कम रहता है। जीडीपी की गणना में आधार वर्ष 2011-12 निर्धारित किया गया है। साधन लागत : वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में प्रयुक्त या उपभोग की गयी उतपदान के सभी कारकों की लागत को संदर्भित करता है। इसमें भूमि के लिए किराया, पूंजी के लिए व्याज, श्रम के लिए मजदूरी और उद्यमिता के लिए लाभ शामिल है। यह वास्तविक उत्पादन लागत है जिस पर किसी फ़र्म द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। साधन लागत पर गणना करते समय अप्रत्यक्ष कारों को घटाया जाता है तथा सरकार द्वारा दी गयी सब्सिडी को जोड़ा जाता है। बाजार मूल्य: यह वस्तुओं एवं सेवाओं के वास्तविक लेन-देन को संदर्भित करता है। इसमें अप्रत्यक्ष कर तथा सब्सिडी सम्मिलित होते हैं। अप्रत्यक्ष कर वस्तु के मूल्य को बढ़ा देते हैं और सब्सिडी इसको कम करती है।
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भारत मेंनिर्धनता के प्रमुख कारणों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। साथ ही निर्धनताउन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। (150 शब्द) In brief, mention the major causes of poverty in India. Also, discuss the measures being taken to eradicate it. (150 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में निर्धनता को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत में निर्धनता के प्रमुख कारणों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। इसके बाद मुख्य भाग में आगे, भारत मेंनिर्धनता उन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निर्धनता से तात्पर्य किसी व्यक्ति की सतत जीविकोपार्जन के साधन की अनुपलब्धता की वजह से मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित होने से है, जो निम्नलिखित चार आयामों में स्वयं को प्रदर्शित करता है- अवसरंचनात्मक अभाव जिसकी वजह से मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध न हो। राजनैतिक स्तर पर पृथक्करण एवं उसके परिणामस्वररूप प्रतिकूल जीवन संभावनाएं। आय स्रोतों का अभाव तथा भूख एवं कुपोषण का होना तथा सामाजिक स्तर पर भेदभाव एवं वंचना। भारत में निर्धनता के प्रमुख कारण:- रंगराजन समिति के अनुसार निर्धनता के तीन निम्नलिखित मुख्य कारण दिखाई पड़ते हैं- शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल प्रशिक्षण एवं रोजगार के साधनों का अभाव। आर्थिक असमानता से बढ़ती आर्थिक वंचना तथा खाद्य असुरक्षा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का प्रभावीढंग से इस्तेमाल न हो पाना। भारत में निर्धनता उन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयास:- भारतीय संदर्भ में गरीबी के मापन हेतु अनेक प्रयास किये गए जिसमें कुछ मुख्य निम्नलिखित हैं- अलघ समिति ने मूलभूत आवश्यकताओं के आधार पर वंचित लोगों को गरीब मानते हुए उनके लिए उपाय सुझाये। लकड़ावाला समिति ने इस परिभाषा को और स्पष्ट करते हुए कैलोरी उपभोग के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी, शहरी क्षेत्रों में 2200 तथा औसतन 2250 कैलोरी को मानक मानते हुए गरीबी रेखा निर्धारित की। तेंदुलकर समिति ने खाद्य पदार्थों के आधार पर ग्रामीण क्षेत्र में 816 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति माह तथा शहरी क्षेत्र में 1000 व्यक्ति प्रति व्यक्ति प्रति माह को आधार बनाते हुए गरीबी रेखा निर्धारित की। वर्ष 2012 में रंगराजन समिति ने खाद्य पदार्थों तथा अन्य उपभोग की वस्तुओं को समेकित करते हुए पांच व्यक्तियों के एक परिवार को आधार बनाया, जहाँ पर ग्रामीण क्षेत्र में 4860 रूपये प्रति परिवार प्रति माह तथा शहरी क्षेत्रों में 7035 रूपये प्रति परिवारप्रति माह को गरीबी रेखा निर्धारित की। वर्तमान में नीति आयोग, तेंदुलकर समिति की परिभाषा को उपयोग में ला रहा है। रंगराजन समिति के अनुसार गरीबी रेखा की परिकल्पना स्वयं में अपूर्ण है अतः उन्होंने यह सुझाया कि इस संदर्भ में निम्नलिखित तीन समूहों के आधार पर कल्याणकारी नीतियों के लाभ दिए जाएँ- स्वतः बहिष्कृत:- इसमें उच्च आय वर्ग वालों लोगों को रखा जाये। स्वतः सम्मिलित:- इसमें अति वंचित समूहों को रखा जाये जैसे की PVTGs, निराश्रित एवं भिक्षा इत्यादि द्वारा जीविकोपार्जन करने वाले इत्यादि। एक वंचना सूचि बनाते हुए जिसमें सात मुख्य संदर्भ हों के आधार पर लोक कल्याणकारी नीतियों के लाभ दिए जाएँ। रंगराजन समितिने MDG समीक्षा समिति के उस सुझाव को भी उपयोगी बताया जिसमें यह प्रस्ताव है कि शहरों में बॉटम 25 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्र में बॉटम 35 प्रतिशत के संदर्भ में लोक कल्याणकारी नीतियों को केंद्रित किया जाये। SECC, 2011 के आंकड़ों को आधार बनाते हुए लोकहितकारी नीतियों के अंतर्गत लाभार्थियों को चिन्हित किया जा रहा है जिसमें ग्रामीण संदर्भ में सक्सेना समिति की सिफारिशें तथा शहरी संदर्भों में हासिम समिति की सिफारिशों के आधार पर गरीबी हटाने के प्रयास किये जा रहे हैं। भारत में निर्धनता समापन हेतु एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है जिसमे रोजगार सृजन को अधिक महत्व दिया गया है। इस संदर्भ में कुछ मुख्य प्रयास निम्नलिखित हैं- 1975 में 20 सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण तथा संस्थागत ऋण के सहयोग से रोजगार सृजन तथा अवसरंचना एवं दक्षता निर्माण हेतु वित्तीय सहायता इत्यादि के प्रबंध किये गए। 1979 से ग्रामीण युवाओं को आवश्यक तकनीकी कौशल प्रशिक्षण देते हुए CAPARD के अंतर्गत लाभान्वित किया रहा है। इंदिरा आवास योजना के सहयोग से मूलभूत आवश्यकता को ग्रामीण संदर्भों में सुनिश्चित करने के प्रयास किये गए। 1989 में जवाहर रोजगार योजना एवं नेहरू रोजगार योजना के सहयोग से ग्रामीण एवं शहरी युवाओं को स्वरोजगार के संसाधन दिए गए। शिक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु 1995 सेमिड डे मील के अंतर्गत विद्यार्थियों हेतु भोजन का प्रबंध किया जा रहा है। 1997 में स्वर्ण जयंती स्वरोजगार विकल्पों के माध्यम से गरीबी हटाने के प्रयास किये जा रहे हैं। 2001 मेंसर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को समेकित किया गया। 2005 सेमनरेगा के अंतर्गत स्वरोजगार के विकल्प दिए गए। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका तथा शहरी क्षेत्रों में NULM के अंतर्गत रोजगार सृजित किये जा रहे हैं। वर्ष 2008-09 में स्वावलम्बन तथा कालान्तर में अटल पेंशन योजना के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। इसके अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण हेतु NSDC के सहयोग से ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षण तथा मुद्रा, स्टैंडअप एवं पेमेंट बैंकों के माधयम से माइक्रो फाइनेंस को सुनिश्चित किया जा रहा है। इस प्रकार भारत में गरीबी के उन्मूलन हेतु विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्रकार के प्रयास किये गए हैं जो वर्तमान में भी जारी है। हालाँकि इस संदर्भ में अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकि है।
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##Question:भारत मेंनिर्धनता के प्रमुख कारणों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। साथ ही निर्धनताउन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। (150 शब्द) In brief, mention the major causes of poverty in India. Also, discuss the measures being taken to eradicate it. (150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में निर्धनता को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत में निर्धनता के प्रमुख कारणों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। इसके बाद मुख्य भाग में आगे, भारत मेंनिर्धनता उन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयासों की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निर्धनता से तात्पर्य किसी व्यक्ति की सतत जीविकोपार्जन के साधन की अनुपलब्धता की वजह से मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित होने से है, जो निम्नलिखित चार आयामों में स्वयं को प्रदर्शित करता है- अवसरंचनात्मक अभाव जिसकी वजह से मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध न हो। राजनैतिक स्तर पर पृथक्करण एवं उसके परिणामस्वररूप प्रतिकूल जीवन संभावनाएं। आय स्रोतों का अभाव तथा भूख एवं कुपोषण का होना तथा सामाजिक स्तर पर भेदभाव एवं वंचना। भारत में निर्धनता के प्रमुख कारण:- रंगराजन समिति के अनुसार निर्धनता के तीन निम्नलिखित मुख्य कारण दिखाई पड़ते हैं- शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल प्रशिक्षण एवं रोजगार के साधनों का अभाव। आर्थिक असमानता से बढ़ती आर्थिक वंचना तथा खाद्य असुरक्षा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का प्रभावीढंग से इस्तेमाल न हो पाना। भारत में निर्धनता उन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयास:- भारतीय संदर्भ में गरीबी के मापन हेतु अनेक प्रयास किये गए जिसमें कुछ मुख्य निम्नलिखित हैं- अलघ समिति ने मूलभूत आवश्यकताओं के आधार पर वंचित लोगों को गरीब मानते हुए उनके लिए उपाय सुझाये। लकड़ावाला समिति ने इस परिभाषा को और स्पष्ट करते हुए कैलोरी उपभोग के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी, शहरी क्षेत्रों में 2200 तथा औसतन 2250 कैलोरी को मानक मानते हुए गरीबी रेखा निर्धारित की। तेंदुलकर समिति ने खाद्य पदार्थों के आधार पर ग्रामीण क्षेत्र में 816 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति माह तथा शहरी क्षेत्र में 1000 व्यक्ति प्रति व्यक्ति प्रति माह को आधार बनाते हुए गरीबी रेखा निर्धारित की। वर्ष 2012 में रंगराजन समिति ने खाद्य पदार्थों तथा अन्य उपभोग की वस्तुओं को समेकित करते हुए पांच व्यक्तियों के एक परिवार को आधार बनाया, जहाँ पर ग्रामीण क्षेत्र में 4860 रूपये प्रति परिवार प्रति माह तथा शहरी क्षेत्रों में 7035 रूपये प्रति परिवारप्रति माह को गरीबी रेखा निर्धारित की। वर्तमान में नीति आयोग, तेंदुलकर समिति की परिभाषा को उपयोग में ला रहा है। रंगराजन समिति के अनुसार गरीबी रेखा की परिकल्पना स्वयं में अपूर्ण है अतः उन्होंने यह सुझाया कि इस संदर्भ में निम्नलिखित तीन समूहों के आधार पर कल्याणकारी नीतियों के लाभ दिए जाएँ- स्वतः बहिष्कृत:- इसमें उच्च आय वर्ग वालों लोगों को रखा जाये। स्वतः सम्मिलित:- इसमें अति वंचित समूहों को रखा जाये जैसे की PVTGs, निराश्रित एवं भिक्षा इत्यादि द्वारा जीविकोपार्जन करने वाले इत्यादि। एक वंचना सूचि बनाते हुए जिसमें सात मुख्य संदर्भ हों के आधार पर लोक कल्याणकारी नीतियों के लाभ दिए जाएँ। रंगराजन समितिने MDG समीक्षा समिति के उस सुझाव को भी उपयोगी बताया जिसमें यह प्रस्ताव है कि शहरों में बॉटम 25 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्र में बॉटम 35 प्रतिशत के संदर्भ में लोक कल्याणकारी नीतियों को केंद्रित किया जाये। SECC, 2011 के आंकड़ों को आधार बनाते हुए लोकहितकारी नीतियों के अंतर्गत लाभार्थियों को चिन्हित किया जा रहा है जिसमें ग्रामीण संदर्भ में सक्सेना समिति की सिफारिशें तथा शहरी संदर्भों में हासिम समिति की सिफारिशों के आधार पर गरीबी हटाने के प्रयास किये जा रहे हैं। भारत में निर्धनता समापन हेतु एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है जिसमे रोजगार सृजन को अधिक महत्व दिया गया है। इस संदर्भ में कुछ मुख्य प्रयास निम्नलिखित हैं- 1975 में 20 सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण तथा संस्थागत ऋण के सहयोग से रोजगार सृजन तथा अवसरंचना एवं दक्षता निर्माण हेतु वित्तीय सहायता इत्यादि के प्रबंध किये गए। 1979 से ग्रामीण युवाओं को आवश्यक तकनीकी कौशल प्रशिक्षण देते हुए CAPARD के अंतर्गत लाभान्वित किया रहा है। इंदिरा आवास योजना के सहयोग से मूलभूत आवश्यकता को ग्रामीण संदर्भों में सुनिश्चित करने के प्रयास किये गए। 1989 में जवाहर रोजगार योजना एवं नेहरू रोजगार योजना के सहयोग से ग्रामीण एवं शहरी युवाओं को स्वरोजगार के संसाधन दिए गए। शिक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु 1995 सेमिड डे मील के अंतर्गत विद्यार्थियों हेतु भोजन का प्रबंध किया जा रहा है। 1997 में स्वर्ण जयंती स्वरोजगार विकल्पों के माध्यम से गरीबी हटाने के प्रयास किये जा रहे हैं। 2001 मेंसर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को समेकित किया गया। 2005 सेमनरेगा के अंतर्गत स्वरोजगार के विकल्प दिए गए। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका तथा शहरी क्षेत्रों में NULM के अंतर्गत रोजगार सृजित किये जा रहे हैं। वर्ष 2008-09 में स्वावलम्बन तथा कालान्तर में अटल पेंशन योजना के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। इसके अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण हेतु NSDC के सहयोग से ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षण तथा मुद्रा, स्टैंडअप एवं पेमेंट बैंकों के माधयम से माइक्रो फाइनेंस को सुनिश्चित किया जा रहा है। इस प्रकार भारत में गरीबी के उन्मूलन हेतु विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्रकार के प्रयास किये गए हैं जो वर्तमान में भी जारी है। हालाँकि इस संदर्भ में अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकि है।
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The Supreme Court in its judgment on 26/11 slammed the media for its lust for TRPs, which jeopardized the security of the nation. Can the actions of media be justified in the context of right to freedom and speech? Discuss the principles and concerns that the media should keep in mind while covering such incidents. (200 words)
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Approach: In the introduction, some background about the role of electronic media during 26/11 attack and the Supreme Court’s observation should be provided. Then discuss the rightness or wrongness of media actions in context balancing freedom of speech with national security and right to life. Then outline a few principles, which should be adhered to by media while covering such sensitive incidents. Answer: In the hunger of TRP and in a blind rush to present the news before any other news channel the media during the 26/11 attack on Mumbai worked utterly irresponsibly. They kept providing instant news update which kept the terrorist and their cross border handlers informed and updated about the security operation and put many lives at risk. About the role of media Supreme Court observed that it is not possible to find out whether the security forces actually suffered any casualty or injuries on account of the way their operations were being displayed on the TV screen. But it is beyond doubt that the way their operations were freely shown made the task of the security forces not only exceedingly difficult but also dangerous and risky. Any attempt to justify the conduct of the TV channels by citing the right to freedom of speech and expression would be totally wrong and unacceptable in such a situation as national security when many lives are at risk cannot be held hostage to the claim of a right which is being misused. The visuals that were shown live by the TV channels could have also been shown after all the terrorists were neutralized. But, in that case, the TV programmes would not have had the same shrill, scintillating and chilling effect and would not have shot up the TRP ratings of the channels. It must, therefore, be held that by covering live, the terrorists attack Mumbai in the way it was done, the Indian TV channels were not serving any national interest or social cause. On the contrary, they were acting in their own commercial interests putting the national security in jeopardy. There are still no regulations in place by the government regarding coverage of news live which could compromise national interest. But then, do we need to wait for a regulation? When it comes to the national interest, you don"t wait for regulation, you just act responsibly. Principles: There can be some principles which media should keep in mind while covering an incident which affects national security or can result in loss of life; such as: 1. Human life must be given utmost importance, media should overlook TRP and commercialinterest when human life is at stake. 2. National security must never be compromised in the name of freedom of speech and expression.Media must act sensibly and responsibly. 3. The live telecast of such incident can wait for some time if it can help in saving life or serving justice. 4. Sensationalisation of security issue should never be done. Concerns: This irresponsible behaviour can do much harm to the argument that any regulatory mechanism for the media must only come from within. And it can hamper freedom of speech and expression. This kind of behaviour may also dilute the role of media as the fourth pillar of democracy. Therefore, media must keep the safety of security agency as well as the secrecy of intelligence agencies at work while reporting such incidences."
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##Question:The Supreme Court in its judgment on 26/11 slammed the media for its lust for TRPs, which jeopardized the security of the nation. Can the actions of media be justified in the context of right to freedom and speech? Discuss the principles and concerns that the media should keep in mind while covering such incidents. (200 words)##Answer:Approach: In the introduction, some background about the role of electronic media during 26/11 attack and the Supreme Court’s observation should be provided. Then discuss the rightness or wrongness of media actions in context balancing freedom of speech with national security and right to life. Then outline a few principles, which should be adhered to by media while covering such sensitive incidents. Answer: In the hunger of TRP and in a blind rush to present the news before any other news channel the media during the 26/11 attack on Mumbai worked utterly irresponsibly. They kept providing instant news update which kept the terrorist and their cross border handlers informed and updated about the security operation and put many lives at risk. About the role of media Supreme Court observed that it is not possible to find out whether the security forces actually suffered any casualty or injuries on account of the way their operations were being displayed on the TV screen. But it is beyond doubt that the way their operations were freely shown made the task of the security forces not only exceedingly difficult but also dangerous and risky. Any attempt to justify the conduct of the TV channels by citing the right to freedom of speech and expression would be totally wrong and unacceptable in such a situation as national security when many lives are at risk cannot be held hostage to the claim of a right which is being misused. The visuals that were shown live by the TV channels could have also been shown after all the terrorists were neutralized. But, in that case, the TV programmes would not have had the same shrill, scintillating and chilling effect and would not have shot up the TRP ratings of the channels. It must, therefore, be held that by covering live, the terrorists attack Mumbai in the way it was done, the Indian TV channels were not serving any national interest or social cause. On the contrary, they were acting in their own commercial interests putting the national security in jeopardy. There are still no regulations in place by the government regarding coverage of news live which could compromise national interest. But then, do we need to wait for a regulation? When it comes to the national interest, you don"t wait for regulation, you just act responsibly. Principles: There can be some principles which media should keep in mind while covering an incident which affects national security or can result in loss of life; such as: 1. Human life must be given utmost importance, media should overlook TRP and commercialinterest when human life is at stake. 2. National security must never be compromised in the name of freedom of speech and expression.Media must act sensibly and responsibly. 3. The live telecast of such incident can wait for some time if it can help in saving life or serving justice. 4. Sensationalisation of security issue should never be done. Concerns: This irresponsible behaviour can do much harm to the argument that any regulatory mechanism for the media must only come from within. And it can hamper freedom of speech and expression. This kind of behaviour may also dilute the role of media as the fourth pillar of democracy. Therefore, media must keep the safety of security agency as well as the secrecy of intelligence agencies at work while reporting such incidences."
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With respect to the drainage system, shed light on the Himalayan drainage system of India. (150 words/10 marks)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE HIMALAYAN DRAINAGE SYSTEM OF INDIA RIVER INDUS RIVER JHELUM RIVER CHENAB RIVER RAVI RIVER BEAS RIVER SATLUJ Answer:- India’s drainage system is broadly divided into two types- Himalayan and peninsular drainage systems. The Himalayan drainage systems are perennial as they are snow-fed, draining northern India. The peninsular drainage systems are seasonal in nature, and drain peninsular India. The Himalayan drainage system mainly consists of Indus and its tributaries. (The map of the River Indus, with its tributaries, be drawn/depicted here) THE HIMALAYAN DRAINAGE SYSTEM OF INDIA I RIVER INDUS 1) SOURCE The source of the River is in Lake Mansarover, in Tibet (Kailash ranges). 2) PATH The River flows through China, India, Pakistan, and then finally drains into the Arabian Sea 3) MAJOR TRIBUTARIES Rivers Jhelum, Chenab, Ravi, Beas and Satluj are its main tributaries. 4) MINOR TRIBUTARIES Rivers Shyok, Lidar, Gilgit, Dras are its minor tributaries. II RIVER JHELUM 1) SOURCE The source of the River is in River Verinag (South East of Kashmir Valley). 2) DRAINAGE It flows along the border of India and Pakistan and drains into the River Chenab. 3) IMPORTANT TRIBUTARY River Kishenganga is its important tributary. III RIVER CHENAB 1) SOURCE It is formed by the confluence of 2 rivers. Rivers Chandra and Bhaga unite to form the Chenab. 2) IMPORTANCE It is the longest tributary of the River Indus. 3) DRAINAGE It drains into the Indus in Pakistan. 4) TRIBUTARIES Rivers Jhelum, Ravi, Beas and Satluj are its main tributaries. IV RIVER RAVI 1) SOURCE It is sourced in the Rohtang Pass in Himachal Pradesh. 2) IMPORTANT CITIES Important cities like Lahore and Amritsar are located on the banks of this River. V RIVER BEAS 1) SOURCE Its source is in Beas Kund (near Rohtang Pass). 2) IMPORTANCE 2.1) It is the smallest of the rivers of the Himalayan drainage system. 2.2) It meets River Satluj at Harike, which sources the Indira Gandhi canal for Marusthali regions. 3) DRAINAGE It drains completely within India. VI RIVER SATLUJ 1) SOURCE Its sources its waters from River Mansarover, at Rakas Taal Lake. It enters India at Shipkila Pass. 2) DRAINAGE It drains into River Chenab. 3) IMPORTANCE The Bhakra Nangal Dam has been constructed on this River. (The map of India should be drawn- the isohyet water divide of India should be depicted on this map).
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##Question:With respect to the drainage system, shed light on the Himalayan drainage system of India. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE HIMALAYAN DRAINAGE SYSTEM OF INDIA RIVER INDUS RIVER JHELUM RIVER CHENAB RIVER RAVI RIVER BEAS RIVER SATLUJ Answer:- India’s drainage system is broadly divided into two types- Himalayan and peninsular drainage systems. The Himalayan drainage systems are perennial as they are snow-fed, draining northern India. The peninsular drainage systems are seasonal in nature, and drain peninsular India. The Himalayan drainage system mainly consists of Indus and its tributaries. (The map of the River Indus, with its tributaries, be drawn/depicted here) THE HIMALAYAN DRAINAGE SYSTEM OF INDIA I RIVER INDUS 1) SOURCE The source of the River is in Lake Mansarover, in Tibet (Kailash ranges). 2) PATH The River flows through China, India, Pakistan, and then finally drains into the Arabian Sea 3) MAJOR TRIBUTARIES Rivers Jhelum, Chenab, Ravi, Beas and Satluj are its main tributaries. 4) MINOR TRIBUTARIES Rivers Shyok, Lidar, Gilgit, Dras are its minor tributaries. II RIVER JHELUM 1) SOURCE The source of the River is in River Verinag (South East of Kashmir Valley). 2) DRAINAGE It flows along the border of India and Pakistan and drains into the River Chenab. 3) IMPORTANT TRIBUTARY River Kishenganga is its important tributary. III RIVER CHENAB 1) SOURCE It is formed by the confluence of 2 rivers. Rivers Chandra and Bhaga unite to form the Chenab. 2) IMPORTANCE It is the longest tributary of the River Indus. 3) DRAINAGE It drains into the Indus in Pakistan. 4) TRIBUTARIES Rivers Jhelum, Ravi, Beas and Satluj are its main tributaries. IV RIVER RAVI 1) SOURCE It is sourced in the Rohtang Pass in Himachal Pradesh. 2) IMPORTANT CITIES Important cities like Lahore and Amritsar are located on the banks of this River. V RIVER BEAS 1) SOURCE Its source is in Beas Kund (near Rohtang Pass). 2) IMPORTANCE 2.1) It is the smallest of the rivers of the Himalayan drainage system. 2.2) It meets River Satluj at Harike, which sources the Indira Gandhi canal for Marusthali regions. 3) DRAINAGE It drains completely within India. VI RIVER SATLUJ 1) SOURCE Its sources its waters from River Mansarover, at Rakas Taal Lake. It enters India at Shipkila Pass. 2) DRAINAGE It drains into River Chenab. 3) IMPORTANCE The Bhakra Nangal Dam has been constructed on this River. (The map of India should be drawn- the isohyet water divide of India should be depicted on this map).
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एक्ट ईस्ट नीति" का दृष्टिकोण किस प्रकार "लुक ईस्ट नीति" का विस्तार है ? चर्चा कीजिये | साथ ही इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों को संक्षेप में बताइए | (200 शब्द ) How is the approach of "Act East Policy", an extension of "Look East Policy" ? Discuss. Also explain in brief, the challenges of India faces in this area.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत में "लुक ईस्ट पालिसी" को बताए हुए इसके साथ ही "एक्ट ईस्ट पालिसी" के बारे में बताइए | इसके बाद इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ चुनौतियों का समाधान बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में "लुक ईस्ट नीति" को 1991 में शुरू किया गया | इस नीति का मुख्य उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ सक्रीय जुड़ाव की नीति का पालन करना था | भारत द्वारा लुक ईस्ट नीति को लागू करने के लिए जिम्मेदार कारक - भुगतान संतुलन का संकट सोवियत संघ का विघटन चूंकि लुक ईस्ट नीति केवल आसियान देशों तक ही सीमित थी इसलिए इसमें परिवर्तन के उद्देश्य से 12 वें आसियान- भारत शिखर सम्मलेन में एक्ट ईस्ट नीति के रूप में लुक ईस्ट नीति का विस्तार किया गया | भारत की एक्ट ईस्ट नीति एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विस्तारित पड़ोस पर ध्यान केन्द्रित करती है | भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र हमारी एक्ट ईस्ट नीति की प्राथमिकता है | एक्ट ईस्ट नीति, एशिया -प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक सहयोग के साथ-साथ सामरिक सहयोग पर भी बल देती है | इस नीति के माध्यम से अनेक कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट को चलाया जा रहा है | उदाहरण के तौर पर - कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट , भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्ग इत्यादि | भारत के समक्ष चुनौतियाँ - दक्षिण पूर्व एशिया में भारत के व्यापार और निवेश दोनों में असंतुलन है | दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में चीन का निवेश बढ़ा है तथा चीन का प्रभाव भी निरंतर निवेश आदि के क्षेत्र में बढ़ा है | रोहिंग्या मुद्दे पर आसियान देशों की स्थिति भी भारत के समक्ष एक चुनौती है | आसियान के देशों में कट्टरपंथ एवं आतंकवाद का प्रभाव भी भारत के समक्ष एक गंभीर चुनौती है | आसियान के देशो में ड्रग और मानव तस्करी का बढ़ता ग्राफ भी भारत के समक्ष निरंतर चुनौती बना हुआ है | आसियान, भारत के लिए सामरिक एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है | भारत को आसियान के साथ अपने संबंधों में और दृढ़ता व विश्वास लाने के लिए कुछ उपाय किये जाने की आवश्यकता है - भारत को आसियान देशों के साथ अपने व्यापार को बढ़ाने एवं उसे संतुलित करने की आवश्यकता है | चीन के प्रति उत्तर में भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करना चाहिए | आसियान देशों के साथ आतंकवाद एवं कट्टरपंथ के विरुद्ध अभियानों में सहयोग करना चाहिए | आसियान देशो के साथ भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए एवं भारत को समुद्री सुरक्षा इत्यादि जैसे मुद्दों पर नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए |
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##Question:एक्ट ईस्ट नीति" का दृष्टिकोण किस प्रकार "लुक ईस्ट नीति" का विस्तार है ? चर्चा कीजिये | साथ ही इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों को संक्षेप में बताइए | (200 शब्द ) How is the approach of "Act East Policy", an extension of "Look East Policy" ? Discuss. Also explain in brief, the challenges of India faces in this area.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत में "लुक ईस्ट पालिसी" को बताए हुए इसके साथ ही "एक्ट ईस्ट पालिसी" के बारे में बताइए | इसके बाद इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ चुनौतियों का समाधान बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में "लुक ईस्ट नीति" को 1991 में शुरू किया गया | इस नीति का मुख्य उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ सक्रीय जुड़ाव की नीति का पालन करना था | भारत द्वारा लुक ईस्ट नीति को लागू करने के लिए जिम्मेदार कारक - भुगतान संतुलन का संकट सोवियत संघ का विघटन चूंकि लुक ईस्ट नीति केवल आसियान देशों तक ही सीमित थी इसलिए इसमें परिवर्तन के उद्देश्य से 12 वें आसियान- भारत शिखर सम्मलेन में एक्ट ईस्ट नीति के रूप में लुक ईस्ट नीति का विस्तार किया गया | भारत की एक्ट ईस्ट नीति एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विस्तारित पड़ोस पर ध्यान केन्द्रित करती है | भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र हमारी एक्ट ईस्ट नीति की प्राथमिकता है | एक्ट ईस्ट नीति, एशिया -प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक सहयोग के साथ-साथ सामरिक सहयोग पर भी बल देती है | इस नीति के माध्यम से अनेक कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट को चलाया जा रहा है | उदाहरण के तौर पर - कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट , भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्ग इत्यादि | भारत के समक्ष चुनौतियाँ - दक्षिण पूर्व एशिया में भारत के व्यापार और निवेश दोनों में असंतुलन है | दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में चीन का निवेश बढ़ा है तथा चीन का प्रभाव भी निरंतर निवेश आदि के क्षेत्र में बढ़ा है | रोहिंग्या मुद्दे पर आसियान देशों की स्थिति भी भारत के समक्ष एक चुनौती है | आसियान के देशों में कट्टरपंथ एवं आतंकवाद का प्रभाव भी भारत के समक्ष एक गंभीर चुनौती है | आसियान के देशो में ड्रग और मानव तस्करी का बढ़ता ग्राफ भी भारत के समक्ष निरंतर चुनौती बना हुआ है | आसियान, भारत के लिए सामरिक एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है | भारत को आसियान के साथ अपने संबंधों में और दृढ़ता व विश्वास लाने के लिए कुछ उपाय किये जाने की आवश्यकता है - भारत को आसियान देशों के साथ अपने व्यापार को बढ़ाने एवं उसे संतुलित करने की आवश्यकता है | चीन के प्रति उत्तर में भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करना चाहिए | आसियान देशों के साथ आतंकवाद एवं कट्टरपंथ के विरुद्ध अभियानों में सहयोग करना चाहिए | आसियान देशो के साथ भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए एवं भारत को समुद्री सुरक्षा इत्यादि जैसे मुद्दों पर नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए |
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उपनिवेशवाद के दूसरे चरण (1813-1858) में भारत में हुए शिक्षा के विकास को स्पष्ट कीजिये| साथ ही इसकी सीमाओं की भी चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the development of education in India in the second phase of colonialism (1813-1858). Also, discuss its limitations. (150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में शिक्षा के विकास की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में उपनिवेशवाद के दूसरे चरण (1813-1858) में भारत में हुए शिक्षा के विकास को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में इसकी सीमाओं को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में अंग्रेजों के शासन का प्रमुख उद्देश्य उनके औपनिवेशिक हितों की पूर्ति और उसमें निरंतर वृद्धि करते रहने से था| भारत पर अपनी राजनीतिक-आर्थिक पकड़ को मजबूत करने और विभिन्न तरीकों से अपने आर्थिक लाभों को बढाते रहने के लिए अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रशासनिक ढाँचे को संगठित रूप से स्थापित किया गया| इसके साथ ही अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रशासनिक सुविधा के लिए शिक्षा का विकास आरम्भ किया| भारत में शिक्षा के विकास में अंग्रेजों के योगदान को तीन चरणों में समझा जा सकता है| प्रथम चरण में कम्पनी की सरकार ने शिक्षा के विकास के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया| फिर भी इस दौरान कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गयी थी जैसे 1781 में कलकत्ता मदरसा(वारेन हेस्टिंग्स) 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज(जोनाथन डंकन)| इन संस्थाओं की स्थापना साम्राज्यवादी उद्देश्यों से की गयी थी जैसे भारत में शासन के लिए भारतीय भाषाओं का ज्ञान आवश्यक था तथा भारत के अभिजात्य वर्ग से सहयोग को ध्यान में रखते हुए भी यह महत्वपूर्णथा| उपनिवेशवाद का दुसरा चरण ब्रिटिश भारत में शिक्षा के विकास के दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण था द्वितीय चरण (1813 से 1858) में शिक्षा का विकास · 1813 के अधिनियम में शिक्षा के विकास के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रूपये व्यय का प्रावधान किया गया था · इस राशि को भारतीय शिक्षा या पाश्चात्य शिक्षा के विकास पर खर्च किया जाए, इस मुद्दे को लेकर एक विवाद प्रारम्भ हुआ आंग्ल-प्राच्य विवाद · प्राच्यवादी भारतीय भाषा में भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास के समर्थक थे| प्राच्यवादी,पाश्चात्य शिक्षा को भी भारतीय भाषा में दिए जाने के समर्थक थे| वारेन हेस्टिंग्स, मुनरो, एलफिन्सटन, प्रिन्सेप एवं एडमंड बर्क आदि प्रमुख प्राच्यवादी थे · दूसरी ओर कुछ विद्वान् एवं प्रशासक अंग्रेजी भाषा में पाश्चात्य शिक्षा के विकास के समर्थक थे इन्हें आंग्लवादी कहा गया है| इसाई मिशनरियों ने भी आंग्लवादियों का समर्थन किया था| इन्ही दो धाराओं के मध्य के विवाद को आंग्ल-प्राच्य विवाद कहा गया है|इस विवाद के कारण 10 वर्षों तक यह राशि भी खर्च नहीं की गयी| · 1823 में GCPI(general commission on public instruction)का गठन किया गया था, इस समिति में भी दोनों के मध्य विवाद जारी रहा| अंततः 1835 में गवर्नर जनरल बेंटिक को विवाद के समाधान के लिए कहा गया · मैकाले ने इस सन्दर्भ में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया और यह कहा कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि पाश्चात्य शिक्षा पर खर्च की जायेगी| इसी को आधार बना कर बेंटिक ने पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन किया| अंततः ऑकलैंड के शासनकाल में यह विवाद समाप्त हुआ · यह निर्धारित किया गया कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि का अधिकाँश भाग पाश्चात्य शिक्षा पर खर्च किया जाएगा तथा कुछ राशि प्राच्य शिक्षा पर भी खर्च की जायेगी| · 1850 तक विभिन्न नगरों में सरकारी स्कूल खोले गए जैसे कलकत्ता, पटना, आगरा, बरेली, बॉम्बे, मद्रास आदि · अंग्रेजी शिक्षा के विकास के लिए सरकार ने अधोगामी निस्यन्दन नीति का पालन किया · दुसरे चरण में 1858 तक विश्वविद्यालय के साथ-साथ रूडकी में इंजीनियरिंग कॉलेज तथा कुछ मेडिकल कॉलेज भी खोले गए थी · दूसरे चरण में शिक्षा के विकास के दृष्टिकोण से वुड्स का डिस्पैच सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है वुड्स डिस्पैच(1854) · इसे शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहा जाता है| · डिस्पैच में शिक्षा का उद्देश्य पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार माना गया था, · डिस्पैच में प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में जबकि उच्च शिक्षा अंग्रेजी भाषा में देने का प्रावधान किया गया था · प्रत्येक प्रांत में शिक्षा विभाग के गठन की अनुशंसा की गयी · शैक्षणिक संस्थाओं के लिए अनुदान की अनुशंसाकी गयी · डिस्पैच में शिक्षकों के प्रशिक्षण, महिला शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा का भी समर्थन किया गया था · औपचारिक तौर पर अधोगामी निस्यन्दन नीति को छोड़ने की बात कही गयी · लन्दन विश्वविद्यालय की तरह कलकत्ता, बॉम्बे एवं मद्रास में विश्वविद्यालय की स्थापना की अनुशंसा की गयी(इनकी स्थापना 1857 में की गयी विकास का महत्त्व · भारत में औपचारिक तौर पर पाश्चात्य शिक्षा की शुरुआत हुई · आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हुआ · उच्च शिक्षा के लिए भी कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गयी · सबसे महत्वपूर्ण यह था की सरकार ने शिक्षा के विकास का दायित्व स्वीकार किया और इसके लिए प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि व्यय की जाने लगी इस प्रकार दूसरे चरण में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विकास दखाई देता है किन्तु विकास के इस चरण में शिक्षा के विकास के सन्दर्भ में जो भी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं उसका सम्बन्ध बहुत कुछ ब्रिटेन की औद्योगिक परिस्थितियों से था|अंग्रेजों को भारत में सस्ते क्लर्कों की आवश्यकता थी साथ ही ब्रिटिश समर्थक वर्ग की आवश्यकता थी जो उनके लिए बाजार का विस्तार कर सके| अधोगामी निस्यन्दन नीति भी शिक्षा के विकास के प्रति प्रतिबद्धता पर एक प्रश्न चिन्ह है| प्रारम्भ में शिक्षा के विकास के लिए जो राशि निर्धारित की गयी 10 वर्षों तक वह भी खर्च नहीं की गयी| तकनीकी शिक्षा में भारतीयों के साथ नस्लीय आधार पर भेदभाव किया गया| महिला शिक्षा एवं आम लोगों की शिक्षा को महत्त्व नहीं दिया गया| अंग्रेजी शिक्षा की प्रकृति शहरी थी एवं यह बहुत खर्चीली शिक्षा थी| इसने शहरों एवं गाँवों तथा अमीरों एवं गरीबों के मध्य असमानता को बढाया| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि उपनिवेशवाद के दूसरे चरण में शिक्षा के क्षेत्र में हुआ विकास महत्वपूर्ण था किन्तु यह सीमाओं से मुक्त नहीं था
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##Question:उपनिवेशवाद के दूसरे चरण (1813-1858) में भारत में हुए शिक्षा के विकास को स्पष्ट कीजिये| साथ ही इसकी सीमाओं की भी चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the development of education in India in the second phase of colonialism (1813-1858). Also, discuss its limitations. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में शिक्षा के विकास की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में उपनिवेशवाद के दूसरे चरण (1813-1858) में भारत में हुए शिक्षा के विकास को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में इसकी सीमाओं को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत में अंग्रेजों के शासन का प्रमुख उद्देश्य उनके औपनिवेशिक हितों की पूर्ति और उसमें निरंतर वृद्धि करते रहने से था| भारत पर अपनी राजनीतिक-आर्थिक पकड़ को मजबूत करने और विभिन्न तरीकों से अपने आर्थिक लाभों को बढाते रहने के लिए अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रशासनिक ढाँचे को संगठित रूप से स्थापित किया गया| इसके साथ ही अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रशासनिक सुविधा के लिए शिक्षा का विकास आरम्भ किया| भारत में शिक्षा के विकास में अंग्रेजों के योगदान को तीन चरणों में समझा जा सकता है| प्रथम चरण में कम्पनी की सरकार ने शिक्षा के विकास के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया| फिर भी इस दौरान कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गयी थी जैसे 1781 में कलकत्ता मदरसा(वारेन हेस्टिंग्स) 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज(जोनाथन डंकन)| इन संस्थाओं की स्थापना साम्राज्यवादी उद्देश्यों से की गयी थी जैसे भारत में शासन के लिए भारतीय भाषाओं का ज्ञान आवश्यक था तथा भारत के अभिजात्य वर्ग से सहयोग को ध्यान में रखते हुए भी यह महत्वपूर्णथा| उपनिवेशवाद का दुसरा चरण ब्रिटिश भारत में शिक्षा के विकास के दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण था द्वितीय चरण (1813 से 1858) में शिक्षा का विकास · 1813 के अधिनियम में शिक्षा के विकास के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रूपये व्यय का प्रावधान किया गया था · इस राशि को भारतीय शिक्षा या पाश्चात्य शिक्षा के विकास पर खर्च किया जाए, इस मुद्दे को लेकर एक विवाद प्रारम्भ हुआ आंग्ल-प्राच्य विवाद · प्राच्यवादी भारतीय भाषा में भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास के समर्थक थे| प्राच्यवादी,पाश्चात्य शिक्षा को भी भारतीय भाषा में दिए जाने के समर्थक थे| वारेन हेस्टिंग्स, मुनरो, एलफिन्सटन, प्रिन्सेप एवं एडमंड बर्क आदि प्रमुख प्राच्यवादी थे · दूसरी ओर कुछ विद्वान् एवं प्रशासक अंग्रेजी भाषा में पाश्चात्य शिक्षा के विकास के समर्थक थे इन्हें आंग्लवादी कहा गया है| इसाई मिशनरियों ने भी आंग्लवादियों का समर्थन किया था| इन्ही दो धाराओं के मध्य के विवाद को आंग्ल-प्राच्य विवाद कहा गया है|इस विवाद के कारण 10 वर्षों तक यह राशि भी खर्च नहीं की गयी| · 1823 में GCPI(general commission on public instruction)का गठन किया गया था, इस समिति में भी दोनों के मध्य विवाद जारी रहा| अंततः 1835 में गवर्नर जनरल बेंटिक को विवाद के समाधान के लिए कहा गया · मैकाले ने इस सन्दर्भ में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया और यह कहा कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि पाश्चात्य शिक्षा पर खर्च की जायेगी| इसी को आधार बना कर बेंटिक ने पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन किया| अंततः ऑकलैंड के शासनकाल में यह विवाद समाप्त हुआ · यह निर्धारित किया गया कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि का अधिकाँश भाग पाश्चात्य शिक्षा पर खर्च किया जाएगा तथा कुछ राशि प्राच्य शिक्षा पर भी खर्च की जायेगी| · 1850 तक विभिन्न नगरों में सरकारी स्कूल खोले गए जैसे कलकत्ता, पटना, आगरा, बरेली, बॉम्बे, मद्रास आदि · अंग्रेजी शिक्षा के विकास के लिए सरकार ने अधोगामी निस्यन्दन नीति का पालन किया · दुसरे चरण में 1858 तक विश्वविद्यालय के साथ-साथ रूडकी में इंजीनियरिंग कॉलेज तथा कुछ मेडिकल कॉलेज भी खोले गए थी · दूसरे चरण में शिक्षा के विकास के दृष्टिकोण से वुड्स का डिस्पैच सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है वुड्स डिस्पैच(1854) · इसे शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहा जाता है| · डिस्पैच में शिक्षा का उद्देश्य पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार माना गया था, · डिस्पैच में प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में जबकि उच्च शिक्षा अंग्रेजी भाषा में देने का प्रावधान किया गया था · प्रत्येक प्रांत में शिक्षा विभाग के गठन की अनुशंसा की गयी · शैक्षणिक संस्थाओं के लिए अनुदान की अनुशंसाकी गयी · डिस्पैच में शिक्षकों के प्रशिक्षण, महिला शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा का भी समर्थन किया गया था · औपचारिक तौर पर अधोगामी निस्यन्दन नीति को छोड़ने की बात कही गयी · लन्दन विश्वविद्यालय की तरह कलकत्ता, बॉम्बे एवं मद्रास में विश्वविद्यालय की स्थापना की अनुशंसा की गयी(इनकी स्थापना 1857 में की गयी विकास का महत्त्व · भारत में औपचारिक तौर पर पाश्चात्य शिक्षा की शुरुआत हुई · आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हुआ · उच्च शिक्षा के लिए भी कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की गयी · सबसे महत्वपूर्ण यह था की सरकार ने शिक्षा के विकास का दायित्व स्वीकार किया और इसके लिए प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि व्यय की जाने लगी इस प्रकार दूसरे चरण में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विकास दखाई देता है किन्तु विकास के इस चरण में शिक्षा के विकास के सन्दर्भ में जो भी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं उसका सम्बन्ध बहुत कुछ ब्रिटेन की औद्योगिक परिस्थितियों से था|अंग्रेजों को भारत में सस्ते क्लर्कों की आवश्यकता थी साथ ही ब्रिटिश समर्थक वर्ग की आवश्यकता थी जो उनके लिए बाजार का विस्तार कर सके| अधोगामी निस्यन्दन नीति भी शिक्षा के विकास के प्रति प्रतिबद्धता पर एक प्रश्न चिन्ह है| प्रारम्भ में शिक्षा के विकास के लिए जो राशि निर्धारित की गयी 10 वर्षों तक वह भी खर्च नहीं की गयी| तकनीकी शिक्षा में भारतीयों के साथ नस्लीय आधार पर भेदभाव किया गया| महिला शिक्षा एवं आम लोगों की शिक्षा को महत्त्व नहीं दिया गया| अंग्रेजी शिक्षा की प्रकृति शहरी थी एवं यह बहुत खर्चीली शिक्षा थी| इसने शहरों एवं गाँवों तथा अमीरों एवं गरीबों के मध्य असमानता को बढाया| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि उपनिवेशवाद के दूसरे चरण में शिक्षा के क्षेत्र में हुआ विकास महत्वपूर्ण था किन्तु यह सीमाओं से मुक्त नहीं था
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एक्ट ईस्ट नीति" का दृष्टिकोण किस प्रकार "लुक ईस्ट नीति" का विस्तार है ? चर्चा कीजिये | साथ ही इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों को संक्षेप में बताइए | (200 शब्द ) How is the approach of "Act East Policy", an extension of "Look East Policy" ? Discuss. Also explain in brief, the challenges of India faces in this area.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत में "लुक ईस्ट पालिसी" को बताए हुए इसके साथ ही "एक्ट ईस्ट पालिसी" के बारे में बताइए | इसके बाद इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ चुनौतियों का समाधान बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में "लुक ईस्ट नीति" को 1991 में शुरू किया गया | इस नीति का मुख्य उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ सक्रीय जुड़ाव की नीति का पालन करना था | भारत द्वारा लुक ईस्ट नीति को लागू करने के लिए जिम्मेदार कारक - भुगतान संतुलन का संकट सोवियत संघ का विघटन चूंकिलुक ईस्ट नीतिकेवल आसियान देशों तक ही सीमित थी इसलिए इसमें परिवर्तन के उद्देश्य से12 वें आसियान- भारत शिखर सम्मलेनमें एक्ट ईस्ट नीति के रूप में लुक ईस्ट नीति का विस्तार किया गया | भारत कीएक्ट ईस्ट नीतिएशिया-प्रशांत क्षेत्र में विस्तारित पड़ोस पर ध्यान केन्द्रित करती है | भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र हमारी एक्ट ईस्ट नीति की प्राथमिकता है | एक्ट ईस्ट नीति, एशिया -प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक सहयोग के साथ-साथ सामरिक सहयोग पर भी बल देती है | इस नीति के माध्यम से अनेक कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट को चलाया जा रहा है | उदाहरण के तौर पर -कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट , भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्गइत्यादि | भारत के समक्ष चुनौतियाँ - दक्षिण पूर्व एशिया में भारत के व्यापार और निवेश दोनों में असंतुलन है | दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में चीन का निवेश बढ़ा है तथा चीन का प्रभाव भी निरंतर निवेश आदि के क्षेत्र में बढ़ा है | रोहिंग्या मुद्दे पर आसियान देशों की स्थिति भी भारत के समक्ष एक चुनौती है | आसियान के देशों में कट्टरपंथ एवं आतंकवाद का प्रभाव भी भारत के समक्ष एक गंभीर चुनौती है | आसियान के देशो में ड्रग और मानव तस्करी का बढ़ता ग्राफ भी भारत के समक्ष निरंतर चुनौती बना हुआ है | आसियान, भारत के लिए सामरिक एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है | भारत को आसियान के साथ अपने संबंधों में और दृढ़ता व विश्वास लाने के लिए कुछ उपाय किये जाने की आवश्यकता है - भारत को आसियान देशों के साथ अपने व्यापार को बढ़ाने एवं उसे संतुलित करने की आवश्यकता है | चीन के प्रति उत्तर में भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करना चाहिए | आसियान देशों के साथ आतंकवाद एवं कट्टरपंथ के विरुद्ध अभियानों में सहयोग करना चाहिए | आसियान देशो के साथ भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए एवं भारत को समुद्री सुरक्षा इत्यादि जैसे मुद्दों पर नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए |
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##Question:एक्ट ईस्ट नीति" का दृष्टिकोण किस प्रकार "लुक ईस्ट नीति" का विस्तार है ? चर्चा कीजिये | साथ ही इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों को संक्षेप में बताइए | (200 शब्द ) How is the approach of "Act East Policy", an extension of "Look East Policy" ? Discuss. Also explain in brief, the challenges of India faces in this area.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत में "लुक ईस्ट पालिसी" को बताए हुए इसके साथ ही "एक्ट ईस्ट पालिसी" के बारे में बताइए | इसके बाद इस क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियों की चर्चा कीजिये | अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ चुनौतियों का समाधान बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में "लुक ईस्ट नीति" को 1991 में शुरू किया गया | इस नीति का मुख्य उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ सक्रीय जुड़ाव की नीति का पालन करना था | भारत द्वारा लुक ईस्ट नीति को लागू करने के लिए जिम्मेदार कारक - भुगतान संतुलन का संकट सोवियत संघ का विघटन चूंकिलुक ईस्ट नीतिकेवल आसियान देशों तक ही सीमित थी इसलिए इसमें परिवर्तन के उद्देश्य से12 वें आसियान- भारत शिखर सम्मलेनमें एक्ट ईस्ट नीति के रूप में लुक ईस्ट नीति का विस्तार किया गया | भारत कीएक्ट ईस्ट नीतिएशिया-प्रशांत क्षेत्र में विस्तारित पड़ोस पर ध्यान केन्द्रित करती है | भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र हमारी एक्ट ईस्ट नीति की प्राथमिकता है | एक्ट ईस्ट नीति, एशिया -प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक सहयोग के साथ-साथ सामरिक सहयोग पर भी बल देती है | इस नीति के माध्यम से अनेक कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट को चलाया जा रहा है | उदाहरण के तौर पर -कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट , भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्गइत्यादि | भारत के समक्ष चुनौतियाँ - दक्षिण पूर्व एशिया में भारत के व्यापार और निवेश दोनों में असंतुलन है | दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में चीन का निवेश बढ़ा है तथा चीन का प्रभाव भी निरंतर निवेश आदि के क्षेत्र में बढ़ा है | रोहिंग्या मुद्दे पर आसियान देशों की स्थिति भी भारत के समक्ष एक चुनौती है | आसियान के देशों में कट्टरपंथ एवं आतंकवाद का प्रभाव भी भारत के समक्ष एक गंभीर चुनौती है | आसियान के देशो में ड्रग और मानव तस्करी का बढ़ता ग्राफ भी भारत के समक्ष निरंतर चुनौती बना हुआ है | आसियान, भारत के लिए सामरिक एवं आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है | भारत को आसियान के साथ अपने संबंधों में और दृढ़ता व विश्वास लाने के लिए कुछ उपाय किये जाने की आवश्यकता है - भारत को आसियान देशों के साथ अपने व्यापार को बढ़ाने एवं उसे संतुलित करने की आवश्यकता है | चीन के प्रति उत्तर में भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करना चाहिए | आसियान देशों के साथ आतंकवाद एवं कट्टरपंथ के विरुद्ध अभियानों में सहयोग करना चाहिए | आसियान देशो के साथ भारत को अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए एवं भारत को समुद्री सुरक्षा इत्यादि जैसे मुद्दों पर नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए |
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गांधी जी के प्रारम्भिक सत्याग्रहों(चंपारण, अहमदाबाद एवं खेड़ा) के बारे में चर्चा करते हुए स्वतंत्रता आन्दोलन में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10 ) Discussing to Gandhiji"s early satyagraha (Champaran, Ahmedabad and Kheda), clarify their importance in the freedom movement. (150-200 words, Marks-10 )
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में गांधी जी के भारत आगमन की सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में गांधी जी के प्रारम्भिक सत्याग्रहों के बारे में चर्चा कीजिये 3- अंतिम में इन आन्दोलनों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों ने भारत में गांधी जी की एक विशिष्ट छवि बनायी साथ ही जिस प्रकार गांधी जी ने भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों एवं वर्गों से सहयोग प्राप्त किया उससे भी एक नेता के तौर पर इनकी छवि सशक्त हुई|जनवरी 1915 में गांधी जी का भारत आगमन हुआ| गांधी जी द्वारा राजनीतिक गुरु गोखले की सलाह पर किसी आन्दोलन एवं संगठन में सक्रिय न हो कर सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया गया| 1916 में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की| 1917 में एनीबेसेंट की गिरफ्तारी का विरोध किया| 1917-18 में 3 क्षेत्रीय मुद्दों के साथ गांधी जी ने अपने राजनीतिक आन्दोलनों की शुरुआत की चंपारण सत्याग्रह · बिहार के चंपारण में कृषकों में तिनकाठिया पद्धति से असंतोष था तथा कृषक अवैध वसूली से किसान परेशान से थे · राजकुमार शुक्ल की आग्रह पर गांधी जी चंपारण पहुचे · चंपारण के कमिश्नर ने गांधी जी को चंपारण छोड़ने का निर्देश दिया, गांधी जी ने आदेश नहीं माना · गांधी जी ने किसानों की समस्याओं का अध्ययन किया और सुधारों की मांग की · सरकार ने चंपारण कृषक समिति बनायी जिसमें गांधी जी भी एक सदस्य थे · 1919 में चंपारण कृषक अधिनियम पारित हुआ और जबरन नील की खेती प्रतिबंधित की गयी और अवैध वसूली का 25 % किसानों को लौटाया गया · राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, आचार्य जेबी कृपलानी, नरहरि पारेख, ब्रज किशोर प्रसाद एवं मजहरुल हक़ आदि चंपारणआन्दोलन में गांधी जी के सहयोगी थे अहमदाबाद में आन्दोलन 1918 · मुद्दा- प्लेग बोनस को लेकर विवाद · उद्योगपतियों एवं मजदूरों ने गांधी जी को मध्यस्थता के लिए कहा · गांधी जी ने बढ़ी हुई मजदूरी का 35% बनाए रखने की मांग की जबकि पूंजीपति 20 % देने को तैयार थे · गांधी जी ने विरोध करते हुए अनशन किया अंततः पूंजीपतियों ने गांधी जी की शर्तों को माना · अनुसुइया साराभाई, इस आन्दोलन में गांधी जी की प्रमुख सहयोगीथीं · गांधी जी ने औद्योगिक विवादों के सन्दर्भ में तथा आर्थिक असमानता के सन्दर्भ में ट्रस्टीशिप के विचार को प्रस्तुत किया| उद्योगपतियों एवं जमीदारों को ट्रस्टी के रूप में कार्य करने की सलाह दी| · यह वर्ग संघर्ष के स्थान पर वर्ग समन्वय को महत्त्व देने वाला सिद्धांत है खेडा सत्याग्रह · गुजरात के खेडा जिलें में सूखे कारण फसलों को नुक्सान हुआ था तथा महंगाई एवं प्लेग से किसान परेशान थे · भू राजस्व कानून में यह प्रावधान था कि यदि उपज 25 % से कम होगी तो सरकार किसानों को राहत देगी · मोहनलाल पांड्या एक स्थानीय किसान नेता थे, सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी के सदस्य तथा गुजरात सभा ने सरकार से करों को माफ़ करने की मांग की किन्तु प्रारम्भ में सरकार इससे सहमत नहीं थी · अतः गांधी जी ने किसानों को कर की अदायगी न करने को कहा · अंततः सरकार ने यह आदेश जारी किया कि जो सक्षम नहीं हैं उनसे भू-राजस्व नहीं वसूला जाए · इस आन्दोलन में बल्लभ भाई पटेल, इन्दुलाल याज्ञनिक गांधी जी के मुख्य सहयोगी थे| तीनों आन्दोलनों का महत्त्व · आम लोगों से सम्बन्धित मुद्दों पर आन्दोलन के कारण गांधी जी की छवि एक जन नेता के रूप में निर्मित हुई · किसानों एवं मजदूरों का सम्बन्ध मुख्यतः ग्रामीण भारत से था अतः इन मुद्दों पर आन्दोलन राष्ट्रीय आन्दोलन के नए चरण में संक्रमण का संकेत भी था · किसानों एवं मजदूरों के मुद्दे ने राष्ट्रीय आन्दोलन के नए वर्गीय आधार का निर्माण किया · इन आन्दोलनों के दौरान गांधी जी ने आम लोगों के जीवन को करीब से समझा और यह अनुभव भविष्य के आन्दोलनों में उपयोगी साबित हुआ · इन आन्दोलनों के दौरान गांधी ने भारतीय भूमि पर सत्याग्रह के विभिन्न हथियारों को आजमाया · इन आन्दोलनों के दौरान गांधी जी को कुछ ऐसे नेताओं का सहयोग प्राप्त हुआ जो आगे भी समर्पित गांधीवादी नेता के रूप में जाने गए इस प्रकार स्पष्ट होता है कि उपरोक्त तीनों प्रारम्भिक आन्दोलनों से गांधीवादी राजनीति कि शुरुआत होती है| इन आन्दोलनों के द्वारा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के स्वरुप में व्यापक बदलाव लाये गए|
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##Question:गांधी जी के प्रारम्भिक सत्याग्रहों(चंपारण, अहमदाबाद एवं खेड़ा) के बारे में चर्चा करते हुए स्वतंत्रता आन्दोलन में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10 ) Discussing to Gandhiji"s early satyagraha (Champaran, Ahmedabad and Kheda), clarify their importance in the freedom movement. (150-200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में गांधी जी के भारत आगमन की सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में गांधी जी के प्रारम्भिक सत्याग्रहों के बारे में चर्चा कीजिये 3- अंतिम में इन आन्दोलनों का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों ने भारत में गांधी जी की एक विशिष्ट छवि बनायी साथ ही जिस प्रकार गांधी जी ने भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों एवं वर्गों से सहयोग प्राप्त किया उससे भी एक नेता के तौर पर इनकी छवि सशक्त हुई|जनवरी 1915 में गांधी जी का भारत आगमन हुआ| गांधी जी द्वारा राजनीतिक गुरु गोखले की सलाह पर किसी आन्दोलन एवं संगठन में सक्रिय न हो कर सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया गया| 1916 में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की| 1917 में एनीबेसेंट की गिरफ्तारी का विरोध किया| 1917-18 में 3 क्षेत्रीय मुद्दों के साथ गांधी जी ने अपने राजनीतिक आन्दोलनों की शुरुआत की चंपारण सत्याग्रह · बिहार के चंपारण में कृषकों में तिनकाठिया पद्धति से असंतोष था तथा कृषक अवैध वसूली से किसान परेशान से थे · राजकुमार शुक्ल की आग्रह पर गांधी जी चंपारण पहुचे · चंपारण के कमिश्नर ने गांधी जी को चंपारण छोड़ने का निर्देश दिया, गांधी जी ने आदेश नहीं माना · गांधी जी ने किसानों की समस्याओं का अध्ययन किया और सुधारों की मांग की · सरकार ने चंपारण कृषक समिति बनायी जिसमें गांधी जी भी एक सदस्य थे · 1919 में चंपारण कृषक अधिनियम पारित हुआ और जबरन नील की खेती प्रतिबंधित की गयी और अवैध वसूली का 25 % किसानों को लौटाया गया · राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, आचार्य जेबी कृपलानी, नरहरि पारेख, ब्रज किशोर प्रसाद एवं मजहरुल हक़ आदि चंपारणआन्दोलन में गांधी जी के सहयोगी थे अहमदाबाद में आन्दोलन 1918 · मुद्दा- प्लेग बोनस को लेकर विवाद · उद्योगपतियों एवं मजदूरों ने गांधी जी को मध्यस्थता के लिए कहा · गांधी जी ने बढ़ी हुई मजदूरी का 35% बनाए रखने की मांग की जबकि पूंजीपति 20 % देने को तैयार थे · गांधी जी ने विरोध करते हुए अनशन किया अंततः पूंजीपतियों ने गांधी जी की शर्तों को माना · अनुसुइया साराभाई, इस आन्दोलन में गांधी जी की प्रमुख सहयोगीथीं · गांधी जी ने औद्योगिक विवादों के सन्दर्भ में तथा आर्थिक असमानता के सन्दर्भ में ट्रस्टीशिप के विचार को प्रस्तुत किया| उद्योगपतियों एवं जमीदारों को ट्रस्टी के रूप में कार्य करने की सलाह दी| · यह वर्ग संघर्ष के स्थान पर वर्ग समन्वय को महत्त्व देने वाला सिद्धांत है खेडा सत्याग्रह · गुजरात के खेडा जिलें में सूखे कारण फसलों को नुक्सान हुआ था तथा महंगाई एवं प्लेग से किसान परेशान थे · भू राजस्व कानून में यह प्रावधान था कि यदि उपज 25 % से कम होगी तो सरकार किसानों को राहत देगी · मोहनलाल पांड्या एक स्थानीय किसान नेता थे, सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी के सदस्य तथा गुजरात सभा ने सरकार से करों को माफ़ करने की मांग की किन्तु प्रारम्भ में सरकार इससे सहमत नहीं थी · अतः गांधी जी ने किसानों को कर की अदायगी न करने को कहा · अंततः सरकार ने यह आदेश जारी किया कि जो सक्षम नहीं हैं उनसे भू-राजस्व नहीं वसूला जाए · इस आन्दोलन में बल्लभ भाई पटेल, इन्दुलाल याज्ञनिक गांधी जी के मुख्य सहयोगी थे| तीनों आन्दोलनों का महत्त्व · आम लोगों से सम्बन्धित मुद्दों पर आन्दोलन के कारण गांधी जी की छवि एक जन नेता के रूप में निर्मित हुई · किसानों एवं मजदूरों का सम्बन्ध मुख्यतः ग्रामीण भारत से था अतः इन मुद्दों पर आन्दोलन राष्ट्रीय आन्दोलन के नए चरण में संक्रमण का संकेत भी था · किसानों एवं मजदूरों के मुद्दे ने राष्ट्रीय आन्दोलन के नए वर्गीय आधार का निर्माण किया · इन आन्दोलनों के दौरान गांधी जी ने आम लोगों के जीवन को करीब से समझा और यह अनुभव भविष्य के आन्दोलनों में उपयोगी साबित हुआ · इन आन्दोलनों के दौरान गांधी ने भारतीय भूमि पर सत्याग्रह के विभिन्न हथियारों को आजमाया · इन आन्दोलनों के दौरान गांधी जी को कुछ ऐसे नेताओं का सहयोग प्राप्त हुआ जो आगे भी समर्पित गांधीवादी नेता के रूप में जाने गए इस प्रकार स्पष्ट होता है कि उपरोक्त तीनों प्रारम्भिक आन्दोलनों से गांधीवादी राजनीति कि शुरुआत होती है| इन आन्दोलनों के द्वारा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के स्वरुप में व्यापक बदलाव लाये गए|
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सामाजिक न्याय की अवधारणा से आप क्या समझते है? भारत में सामाजिक न्याय के संदर्भ में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the concept of social justice? Discuss the measures taken in the context of social justice in India. (150-200 words/10 marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, सामाजिक न्याय की अवधारणा का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत में सामाजिक न्याय के संदर्भ में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- जॉन रोल्स के अनुसार सामाजिक न्याय के लिएराष्ट्र यह सुनिश्चित करे किविकास का लाभ सभी वर्गों तक पहुँच रहा हो, अति वंचित समूहों के लिए सुरक्षात्मक भेदभाव के अंतर्गत अतिरिक्त प्रयास किये जाएँ एवंसभी के लिए मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हों और उनकेलिए लोक कल्याणकारी नीतियां बनाई जाएँ। भारतीय परिप्रेक्ष्य में जिस प्रकार से सामाजिक न्याय के प्रयास किये गए उस आधार पर इन्हें निम्नलिखित तीन चरणों में बांटा जा सकता है- प्रथम चरण(1947-1991):- इस चरण में आर्थिक विकास एवं लोक कल्याण दोनों ही सरकार की जिम्मेदारी थी, यही कारण है कि इस कालखंड में विकास की गति धीमी रही परन्तु इस चरण का सबसे बड़ा सकारात्मकपक्ष यह रहाकि विकास या लोक कल्याण के अभाव से जन्में दुष्परिणामों से बचा जा सका। इस चरण में 1975 के पश्चात विभिन्न राजनैतिक कारणों से विकास की प्रक्रिया को द्वितीयक मानते हुए "पहचान राजनीति" में बढ़ोतरी हुई। यद्यपि 1984 के बाद इसमें कुछ सुधार के संकेत भी दिखे। द्वितीय चरण(1991-2005):- इस चरण में निजीकरण को बढ़ावा देते हुए, आर्थिक विकास की जिम्मेदारी निजी उपक्रमों को दी गई। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि येउपक्रम लोक कल्याण में आवश्यक भूमिकाएं निभाएं। इस क्रम में अपना पूरा ध्यान केंद्रित करते हुए लोक कल्याण के संदर्भ में अवसरंचना एवं दक्षता निर्माण को प्राथमिकता दी गई। इसी समय यह भी सुनिश्चित किया गया कि सार्वजानिक वितरण प्रणाली तथा प्रशासनिक सुधार के संदर्भ में भी आवश्यक कार्य किये जाएँ। साथ ही सिटीजन चार्टर इत्यादि के माध्यम से लोकसेवाओं की गुणवत्ता को बढ़ाया जाये। तृतीय चरण(2005 से आज तक): - इस चरण में गवर्नमेंट से गवर्नेंस की परिकल्पना को मानते हुए आर्थिक विकास एवं लोक कल्याण दोनों संदर्भों को निजी संस्थानों के सहयोग से गुणवत्तापरक करते हुए सेवाएं दिए जाने की दिशा में प्रयास प्रारम्भ हुए। इस दौर में परफॉरमेंस बजट को आधार बनाते हुए जहाँ एक तरफ बजटीय आवंटन को बेहतर किये जाने लगा वहीँ दूसरी तरफ यह प्रयास भी प्रारम्भ हुए कि किस प्रकार सूचना का अधिकार कानून, सोशल ऑडिट इत्यादि के माध्यम से नागरिकों को और अधिक जागरूक बनाये जा सके ताकि पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित हो। इस प्रकार स्वतंत्रता पश्चात से ही भारत मेंसामाजिक न्याय के संदर्भ में विभिन्न प्रयास किये गए है जिनके परिणाम कई क्षेत्रों मेंसकारात्मक दिखाई पड़ते हैं हालांकि अभी भी बहुत कुछ और किये जाने की आवश्यकता है।
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##Question:सामाजिक न्याय की अवधारणा से आप क्या समझते है? भारत में सामाजिक न्याय के संदर्भ में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the concept of social justice? Discuss the measures taken in the context of social justice in India. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, सामाजिक न्याय की अवधारणा का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत में सामाजिक न्याय के संदर्भ में किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- जॉन रोल्स के अनुसार सामाजिक न्याय के लिएराष्ट्र यह सुनिश्चित करे किविकास का लाभ सभी वर्गों तक पहुँच रहा हो, अति वंचित समूहों के लिए सुरक्षात्मक भेदभाव के अंतर्गत अतिरिक्त प्रयास किये जाएँ एवंसभी के लिए मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हों और उनकेलिए लोक कल्याणकारी नीतियां बनाई जाएँ। भारतीय परिप्रेक्ष्य में जिस प्रकार से सामाजिक न्याय के प्रयास किये गए उस आधार पर इन्हें निम्नलिखित तीन चरणों में बांटा जा सकता है- प्रथम चरण(1947-1991):- इस चरण में आर्थिक विकास एवं लोक कल्याण दोनों ही सरकार की जिम्मेदारी थी, यही कारण है कि इस कालखंड में विकास की गति धीमी रही परन्तु इस चरण का सबसे बड़ा सकारात्मकपक्ष यह रहाकि विकास या लोक कल्याण के अभाव से जन्में दुष्परिणामों से बचा जा सका। इस चरण में 1975 के पश्चात विभिन्न राजनैतिक कारणों से विकास की प्रक्रिया को द्वितीयक मानते हुए "पहचान राजनीति" में बढ़ोतरी हुई। यद्यपि 1984 के बाद इसमें कुछ सुधार के संकेत भी दिखे। द्वितीय चरण(1991-2005):- इस चरण में निजीकरण को बढ़ावा देते हुए, आर्थिक विकास की जिम्मेदारी निजी उपक्रमों को दी गई। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि येउपक्रम लोक कल्याण में आवश्यक भूमिकाएं निभाएं। इस क्रम में अपना पूरा ध्यान केंद्रित करते हुए लोक कल्याण के संदर्भ में अवसरंचना एवं दक्षता निर्माण को प्राथमिकता दी गई। इसी समय यह भी सुनिश्चित किया गया कि सार्वजानिक वितरण प्रणाली तथा प्रशासनिक सुधार के संदर्भ में भी आवश्यक कार्य किये जाएँ। साथ ही सिटीजन चार्टर इत्यादि के माध्यम से लोकसेवाओं की गुणवत्ता को बढ़ाया जाये। तृतीय चरण(2005 से आज तक): - इस चरण में गवर्नमेंट से गवर्नेंस की परिकल्पना को मानते हुए आर्थिक विकास एवं लोक कल्याण दोनों संदर्भों को निजी संस्थानों के सहयोग से गुणवत्तापरक करते हुए सेवाएं दिए जाने की दिशा में प्रयास प्रारम्भ हुए। इस दौर में परफॉरमेंस बजट को आधार बनाते हुए जहाँ एक तरफ बजटीय आवंटन को बेहतर किये जाने लगा वहीँ दूसरी तरफ यह प्रयास भी प्रारम्भ हुए कि किस प्रकार सूचना का अधिकार कानून, सोशल ऑडिट इत्यादि के माध्यम से नागरिकों को और अधिक जागरूक बनाये जा सके ताकि पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित हो। इस प्रकार स्वतंत्रता पश्चात से ही भारत मेंसामाजिक न्याय के संदर्भ में विभिन्न प्रयास किये गए है जिनके परिणाम कई क्षेत्रों मेंसकारात्मक दिखाई पड़ते हैं हालांकि अभी भी बहुत कुछ और किये जाने की आवश्यकता है।
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Write short notes on: (i) Inland drainage system (ii) West flowing rivers (iii) Kosi and Damodar rivers (150 words)
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BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION -INLAND DRAINAGE SYSTEM -WEST FLOWING RIVERS -KOSI RIVER -DAMODAR RIVER Answer:- There are mainly three major river systems in India, viz. the Indus River system, the Ganga River system and the peninsular river system, including mighty rivers like the Godavari River, Cauvery River etc. (i) INLAND DRAINAGE SYSTEM These rivers do not have a mouth i.e. they do not meet the ocean. They dry within the land without meeting the sea. 1) RIVER LUNI It is the largest of the inland rivers in India. It takes birth in the Aravallis near Annasagar in Ajmer district. After travelling over the Bagar plains of Rajasthan, it enters the Marusthali area, reaches then Rann of Kutch and dries up there itself. 2) GHAGGHAR RIVER It takes birth in the Shivalik ranges. It travels in Rajasthan, enters the Marusthali area and dries up in the desert sands of Rajasthan. It was believe that River Ghaggar was the mighty tributary of River Saraswati. 3) SUVARNAREKHA/ SUBARNAREKHA It is a small river. Its importance is that its waters contain the alluvial placer gold deposits. It drains into the Bay of Bengal in Northern Odisha. (ii) WEST FLOWING RIVERS The Himalayan River systems mainly are west flowing: 1) RIVER INDUS AND ITS TRIBUTARIES These flow west-wards through India, enter Pakistan and finally drain into the Arabian Sea. Since, most of the peninsular rivers flow eastwards (due to the slope of the land), therefore, the rivers that flow westwards there are of more importance to us. The peninsular rivers which flow westward are:- 2) RIVER NARMADA 2.1) It sources its waters from the Amarkantak region. 2.2) It has a length of 1,312 km. 2.3) It drains through Madhya Pradesh, Maharashtra, and Gujarat and finally enters the Gulf of Cambay. 2.4) An ancient port called Bharuch port is located at the mouth of this river. 2.5) It travels through a rift valley between the Vindhyas and Satpuras. 2.6) TRIBUTARIES- Rivers Tawa, Hiran, Burnar, Dudhi and Baiyer are its tributaries. 2.7) DHUADHAR WATERFALLS - are formed at Jabalpur, where it enters the rift valley. 3) RIVER TAPI 3.1) The length of the river is 724 km 3.2) SOURCE- It sources its waters from the Betul Hills at Multan. 3.3) TRIBUTARIES- Rivers Betul, Purna and Vaghur are its tributaries. 4) OTHER SMALL STREAMS 2.1) GOA- Rivers Zuari and Mandovi flow westwards 2.2) KERALA- Rivers Periyar, Tamba and Idukki drains through the state. 2.3) GUJARAT- Rivers Sabarmati and Mahi are the westward rivers flowing towards the West. (iii) RIVER KOSI 1) SOURCE The birth place of the river is at the confluence of many minor streams. Therefore the river is also known as Sapta Koshi. 2) IMPORTANCE It is also known as the sorrow of Bihar due to its flooding nature. 3) TRIBUTARY OF THE GANGA The River Kosi meets Ganga at a place called Kursela in Bihar. DAMODAR RIVER 1) SOURCE It takes birth in the slopes of the Chotanagpur region. 2) IMPORTANCE 2.1) It is known as the sorrow of Bengal due to its flooding nature. 2.2) The DVC project has tamed this river. It consists of 4 dams, Tilliah, Maithon, Panchet and Konar. 3) TRIBUTARIES River Barakar is its tributary, which leads to the flooding of the River. (The answer should be substantiated with maps and diagrams)
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##Question:Write short notes on: (i) Inland drainage system (ii) West flowing rivers (iii) Kosi and Damodar rivers (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION -INLAND DRAINAGE SYSTEM -WEST FLOWING RIVERS -KOSI RIVER -DAMODAR RIVER Answer:- There are mainly three major river systems in India, viz. the Indus River system, the Ganga River system and the peninsular river system, including mighty rivers like the Godavari River, Cauvery River etc. (i) INLAND DRAINAGE SYSTEM These rivers do not have a mouth i.e. they do not meet the ocean. They dry within the land without meeting the sea. 1) RIVER LUNI It is the largest of the inland rivers in India. It takes birth in the Aravallis near Annasagar in Ajmer district. After travelling over the Bagar plains of Rajasthan, it enters the Marusthali area, reaches then Rann of Kutch and dries up there itself. 2) GHAGGHAR RIVER It takes birth in the Shivalik ranges. It travels in Rajasthan, enters the Marusthali area and dries up in the desert sands of Rajasthan. It was believe that River Ghaggar was the mighty tributary of River Saraswati. 3) SUVARNAREKHA/ SUBARNAREKHA It is a small river. Its importance is that its waters contain the alluvial placer gold deposits. It drains into the Bay of Bengal in Northern Odisha. (ii) WEST FLOWING RIVERS The Himalayan River systems mainly are west flowing: 1) RIVER INDUS AND ITS TRIBUTARIES These flow west-wards through India, enter Pakistan and finally drain into the Arabian Sea. Since, most of the peninsular rivers flow eastwards (due to the slope of the land), therefore, the rivers that flow westwards there are of more importance to us. The peninsular rivers which flow westward are:- 2) RIVER NARMADA 2.1) It sources its waters from the Amarkantak region. 2.2) It has a length of 1,312 km. 2.3) It drains through Madhya Pradesh, Maharashtra, and Gujarat and finally enters the Gulf of Cambay. 2.4) An ancient port called Bharuch port is located at the mouth of this river. 2.5) It travels through a rift valley between the Vindhyas and Satpuras. 2.6) TRIBUTARIES- Rivers Tawa, Hiran, Burnar, Dudhi and Baiyer are its tributaries. 2.7) DHUADHAR WATERFALLS - are formed at Jabalpur, where it enters the rift valley. 3) RIVER TAPI 3.1) The length of the river is 724 km 3.2) SOURCE- It sources its waters from the Betul Hills at Multan. 3.3) TRIBUTARIES- Rivers Betul, Purna and Vaghur are its tributaries. 4) OTHER SMALL STREAMS 2.1) GOA- Rivers Zuari and Mandovi flow westwards 2.2) KERALA- Rivers Periyar, Tamba and Idukki drains through the state. 2.3) GUJARAT- Rivers Sabarmati and Mahi are the westward rivers flowing towards the West. (iii) RIVER KOSI 1) SOURCE The birth place of the river is at the confluence of many minor streams. Therefore the river is also known as Sapta Koshi. 2) IMPORTANCE It is also known as the sorrow of Bihar due to its flooding nature. 3) TRIBUTARY OF THE GANGA The River Kosi meets Ganga at a place called Kursela in Bihar. DAMODAR RIVER 1) SOURCE It takes birth in the slopes of the Chotanagpur region. 2) IMPORTANCE 2.1) It is known as the sorrow of Bengal due to its flooding nature. 2.2) The DVC project has tamed this river. It consists of 4 dams, Tilliah, Maithon, Panchet and Konar. 3) TRIBUTARIES River Barakar is its tributary, which leads to the flooding of the River. (The answer should be substantiated with maps and diagrams)
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भावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही, शासन-प्रशासन मेंभावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ की उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) Define emotional intelligence. Along with this, explain the various aspects of the utility of emotional intelligence in governance. (150-200 Words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- दूसरे भाग में प्रशासन में भावनात्मक बुद्धिमत्ता कि उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक बुद्धिमत्ता शासन-प्रशासन में विभिन्न पहलुओं के साथ उपयोगितापूर्ण होती है| शासन-प्रशासन में भावनात्मक समझ की उपयोगिता मानवीय परस्पर सम्बन्ध प्रत्येक लोक सेवा एक जन सेवा होती है एवं प्रत्येक लोकशासन जन शासन होता हैअतः व्यक्ति को शासन का केंद्र बिंदु माना गया है व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी होता है अतः सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्तियों के द्वारा मानवीय परस्पर सम्बन्ध पर ध्यान दिया जाना एवं इस उद्देश्य की परिपूर्ति व्यक्तियों के द्वारा प्रभावी तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ या बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है व्यक्तियों की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि ऐसे व्यक्तियों के साथ अपने परस्पर तालमेल को स्थापित किया जाए जो भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर पर हो शासन का आशय सरकार एवं सिविल समाज संगठनों के नेटवर्क पर आधारित होती है जो कि स्वतः अपने आप में पारस्परिक सम्बन्ध की अनिवार्यता को दर्शाती है समूह की उत्पादकता समूह की उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु इसके सदस्यों में भावनातमक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है प्रशासन का सम्बन्ध सामान्य उद्देश्य प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयास को समुचित दिशा में निर्देशित किये जाने से है एवं इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु प्रशासन में कार्यरत व्यक्तियों में भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है जन संपर्क की स्थापना प्रशासक के द्वारा एक बेहतर जन संपर्क स्थापित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सामाजिक पूँजी का निर्माण किसी भी सन्गठन या सरकार या शासन के प्रभावी दायित्वों को पूरा करने हेतु चार प्रकार की पूँजी का होना आवश्यक है यथा भौतिक पूँजी, मानवीय पूँजी, वित्तीय पूँजी एवं सामाजिक पूँजी किसी भी सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूँजी में किया गया निवेश अधिक लाभकारी होता हैइस सन्दर्भ में भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है अन्य को प्रभावित करने में सहायक किसी प्रशासक की सफलता सत्ता या प्राधिकार के अभ्यास मात्र पर निर्भर न हो कर किसी अन्य को प्रभावित करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है इस दक्षता को विकसित करने हेतु प्रशासक में उच्चतर भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है निर्णयों को औचित्य प्रदान करने में सहायक भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता को औचित्य प्रदान करती है सरकार या शासन के द्वारा किये जाने वाले सुधारात्मक उपायों की कीमत जो समाज को वहन करना पड़ता है उसको विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ सरकार का प्राथमिक उद्देश्य आम जनता के व्यापक हितों को सुनिश्चित करना है एवं जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ का निर्माण करना है इसके लिए संवेदना/समानुभूति का होना आवश्यक है इस उद्देश्य से भावनात्मक समझ को विकसित किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है समाज के कमजोर वर्गों के प्रति प्रशासक के द्वारा अपने दायित्वों के प्रभावी निष्पादन हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है दीर्घजीवी लाभों को सुनिश्चित करने में भावनात्मक बुद्धिमत्ता का महत्त्व लोक संगठनों के साथ साथ निजी संगठनों के सन्दर्भ में भी देखने को मिलता है परन्तु लोक संगठनों का उद्देश्य जनहित होने के कारण इसका महत्त्व सरकारी संगठनों में अधिक होता है निजी संगठनों का प्राथमिक उद्देश्य मुनाफे के अर्जन से सम्बन्धित होता है किन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक मुनाफे के अर्जन को सुनिश्चित करने की दिशा में भावनात्मक समझ के महत्त्व का होना आवश्यक है CSR को प्रभावी बनाने में वर्तमान समय में निगम शासन(कॉर्पोरेट गवर्नेंस) CSR के महत्त्व पर बल देता है इसके अंतर्गत निजी संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपने विशिष्ट हितों से आगे बढ़ते हुए समाज के व्यापक हितों को सुनिश्चित करने की दिशा में अपना योगदान दे इस प्रक्रिया में निजी संगठनों एवं समाज के बीच के पारस्परिक सम्बन्धों की निर्भरता का अधिक व्यापक होना स्वाभाविक है जो स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्त्व को स्पष्ट करता है मूल्यों की व्यावहारिकता सुनिश्चित करने में लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्य जैसे संवेदना, सहिष्णुता, वस्तुनिष्ठता आदि के व्यवहारिकता को सुनिश्चित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सरकार या शासन की कार्यप्रणाली को संगठित एवं कार्य कुशल तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है नेतृत्व में सहायक लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व होते हैं यथा प्रशासक के रूप में, प्रबंधक के रूप में और नेता के रूप में लोकसेवक के नेतृत्व की क्षमता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है ताकि नेता में अन्य को अभिप्रेरित करने की क्षमता या दक्षता को प्राप्त किया जा सके निष्कर्ष शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध का सुचारू होना अपेक्षित है| इस अपेक्षा को पूरा करने हेतु भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है |लोकसेवक का परस्पर तालमेल संगठन के आंतरिक परिवेश में अधिकारी के साथ, अधिनस्थों के साथ, सहकर्मी के साथ एवं बाहरी परिवेश में जनता एवं सिविल संगठनों से होता है|इस प्रकार "सम्बन्ध" शासन का DNA होता है अतः भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता के विकास पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है|
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##Question:भावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही, शासन-प्रशासन मेंभावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ की उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) Define emotional intelligence. Along with this, explain the various aspects of the utility of emotional intelligence in governance. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- दूसरे भाग में प्रशासन में भावनात्मक बुद्धिमत्ता कि उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक बुद्धिमत्ता शासन-प्रशासन में विभिन्न पहलुओं के साथ उपयोगितापूर्ण होती है| शासन-प्रशासन में भावनात्मक समझ की उपयोगिता मानवीय परस्पर सम्बन्ध प्रत्येक लोक सेवा एक जन सेवा होती है एवं प्रत्येक लोकशासन जन शासन होता हैअतः व्यक्ति को शासन का केंद्र बिंदु माना गया है व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी होता है अतः सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्तियों के द्वारा मानवीय परस्पर सम्बन्ध पर ध्यान दिया जाना एवं इस उद्देश्य की परिपूर्ति व्यक्तियों के द्वारा प्रभावी तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ या बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है व्यक्तियों की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि ऐसे व्यक्तियों के साथ अपने परस्पर तालमेल को स्थापित किया जाए जो भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर पर हो शासन का आशय सरकार एवं सिविल समाज संगठनों के नेटवर्क पर आधारित होती है जो कि स्वतः अपने आप में पारस्परिक सम्बन्ध की अनिवार्यता को दर्शाती है समूह की उत्पादकता समूह की उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु इसके सदस्यों में भावनातमक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है प्रशासन का सम्बन्ध सामान्य उद्देश्य प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयास को समुचित दिशा में निर्देशित किये जाने से है एवं इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु प्रशासन में कार्यरत व्यक्तियों में भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है जन संपर्क की स्थापना प्रशासक के द्वारा एक बेहतर जन संपर्क स्थापित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सामाजिक पूँजी का निर्माण किसी भी सन्गठन या सरकार या शासन के प्रभावी दायित्वों को पूरा करने हेतु चार प्रकार की पूँजी का होना आवश्यक है यथा भौतिक पूँजी, मानवीय पूँजी, वित्तीय पूँजी एवं सामाजिक पूँजी किसी भी सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूँजी में किया गया निवेश अधिक लाभकारी होता हैइस सन्दर्भ में भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है अन्य को प्रभावित करने में सहायक किसी प्रशासक की सफलता सत्ता या प्राधिकार के अभ्यास मात्र पर निर्भर न हो कर किसी अन्य को प्रभावित करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है इस दक्षता को विकसित करने हेतु प्रशासक में उच्चतर भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है निर्णयों को औचित्य प्रदान करने में सहायक भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता को औचित्य प्रदान करती है सरकार या शासन के द्वारा किये जाने वाले सुधारात्मक उपायों की कीमत जो समाज को वहन करना पड़ता है उसको विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ सरकार का प्राथमिक उद्देश्य आम जनता के व्यापक हितों को सुनिश्चित करना है एवं जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ का निर्माण करना है इसके लिए संवेदना/समानुभूति का होना आवश्यक है इस उद्देश्य से भावनात्मक समझ को विकसित किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है समाज के कमजोर वर्गों के प्रति प्रशासक के द्वारा अपने दायित्वों के प्रभावी निष्पादन हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है दीर्घजीवी लाभों को सुनिश्चित करने में भावनात्मक बुद्धिमत्ता का महत्त्व लोक संगठनों के साथ साथ निजी संगठनों के सन्दर्भ में भी देखने को मिलता है परन्तु लोक संगठनों का उद्देश्य जनहित होने के कारण इसका महत्त्व सरकारी संगठनों में अधिक होता है निजी संगठनों का प्राथमिक उद्देश्य मुनाफे के अर्जन से सम्बन्धित होता है किन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक मुनाफे के अर्जन को सुनिश्चित करने की दिशा में भावनात्मक समझ के महत्त्व का होना आवश्यक है CSR को प्रभावी बनाने में वर्तमान समय में निगम शासन(कॉर्पोरेट गवर्नेंस) CSR के महत्त्व पर बल देता है इसके अंतर्गत निजी संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपने विशिष्ट हितों से आगे बढ़ते हुए समाज के व्यापक हितों को सुनिश्चित करने की दिशा में अपना योगदान दे इस प्रक्रिया में निजी संगठनों एवं समाज के बीच के पारस्परिक सम्बन्धों की निर्भरता का अधिक व्यापक होना स्वाभाविक है जो स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्त्व को स्पष्ट करता है मूल्यों की व्यावहारिकता सुनिश्चित करने में लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्य जैसे संवेदना, सहिष्णुता, वस्तुनिष्ठता आदि के व्यवहारिकता को सुनिश्चित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सरकार या शासन की कार्यप्रणाली को संगठित एवं कार्य कुशल तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है नेतृत्व में सहायक लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व होते हैं यथा प्रशासक के रूप में, प्रबंधक के रूप में और नेता के रूप में लोकसेवक के नेतृत्व की क्षमता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है ताकि नेता में अन्य को अभिप्रेरित करने की क्षमता या दक्षता को प्राप्त किया जा सके निष्कर्ष शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध का सुचारू होना अपेक्षित है| इस अपेक्षा को पूरा करने हेतु भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है |लोकसेवक का परस्पर तालमेल संगठन के आंतरिक परिवेश में अधिकारी के साथ, अधिनस्थों के साथ, सहकर्मी के साथ एवं बाहरी परिवेश में जनता एवं सिविल संगठनों से होता है|इस प्रकार "सम्बन्ध" शासन का DNA होता है अतः भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता के विकास पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है|
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पश्चिम एशिया में भारत के हितों के संदर्भ में सऊदी अरब आर्थिक-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन कुछ निहित चुनौतियों का समाधान विचारणीय है| चर्चा कीजिये (150-200 शब्द;10 अंक) Saudi Arabia is economically-strategicly important in the context of India"s interests in West Asia, but there are some inherent challenges to be addressed. Discuss. (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए सऊदी-अरब के संबंधों के महत्व की कर्चा करते हुए कीजिये | इसके पश्चात दोनों देशों के संबंधों में चुनौतियाँ क्या है ? इसकी चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और सऊदी-अरब के मध्य व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध लगभग 3000 वर्ष पुराने हैं | वर्तमान समय में ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीय इत्यादि मुद्दों पर भी दोनों देशों के संबंधो में सहयोग के नए आयाम जुड़े हैं | भारत के लिए सऊदी -अरब का महत्व - ऊर्जा सुरक्षा - वर्तमान में सऊदी अरब ,इराक के बाद भारत को दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है | हाल ही में ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भारत, UAE और सऊदी-अरब त्रिपक्षीय तेल सहयोग में शामिल हुआ है | प्रवासी भारतीय - सऊदी-अरब लगभग 3.2 मिलियन भारतीयों का निवास स्थल है | यह सऊदी-अरब में निवास करने वाला सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है | आतंकवाद - आतंकवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा है ,जिस पर दोनों देशों के मध्य सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है | वर्ष 2015 में सऊदी-अरब ने अबू-जिंदाल को निर्वासित किया जो 26/11 हमले का वांछित अपराधी था | इसके अतिरिक्त आतंकी फंडिंग आदि पर इंटेलिजेंस साझा करने लिए भी यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण देश है | पाकिस्तान का मुद्दा - सऊदी अरब पाकिस्तान का आल वेदर फ्रेंड रहा है, ऐसे में सऊदी-अरब से भारत को अपने संबंधों को बढाने से पाकिस्तान पर दबाव की राजनीति पर काम किया जा सकता है , ताकि पाकिस्तान ,आतंकवाद का प्रयोग भारत के विरुद्ध न कर सके | यद्यपि कि यह सत्य है कि सऊदी-अरब , भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसके बावजूद भारत और सऊदी-अरब के संबंधो में कुछ चुनौतियाँ भी हैं | जोकि निम्नलिखित हैं- सऊदी-अरब और पाकिस्तान सम्बन्ध - सऊदी अरब पाकिस्तान को मदरसे चलने के लिए फण्ड देता है, जिसका प्रयोग पाकिस्तान वहाबी विचारधारा को फैलाने में करता है | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने जनरल शरीफ को मुस्लिम देशों के कमांडर के रूप में चुना है | दोनों देशों के मध्य बढ़ते सम्बन्ध भारत के हितों को असुरक्षित कर सकते हैं | सऊदी - इरान शत्रुता- भारत के ईरान और सऊदी अरब दोनों से अच्छे सम्बन्ध हैं परन्तु सऊदी अरब व ईरान के बीच शत्रुता ईरान पर अमेरिकी प्रतिबन्ध लगाने के बाद और तीव्र हो गया है,जो भारत के समक्ष एक चुनौती है | विचारधारात्मक समस्या- भारत लिबरल इस्लामिक विचारधारा का पक्षधर रहा है जबकि सऊदी अरब वहाबी जैसी कट्टरपंथी विचारधारा को प्रोत्साहित करने के लिए फण्ड देता है जो की भारत के समक्ष एक चुनौती है| सऊदी अरब की आक्रामक नीति - सऊदी अरब पश्चिम एशिया में आक्रामक नीति अपनाता रहा है | उदाहरण के तौर पर इसे सीरिया और यमन में देखा जा सकता है| जबकि भारत किसी भी ऐसी आक्रामक नीति का विरोध करता रहा है एवं शांति से मुद्दों को सुलझाना भारत की विदेश नीति का एक अहम् हिस्सा रहा है | यहाँ हम देखते हैं कि भारत एवं सऊदी अरब दोनों देशों के मध्य सहयोग (दिल्ली घोषणा पत्र -2006,रियाद घोषणा पत्र -2010) साथ साथ कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं | भरत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हुए, सऊदी-अरब के साथ सहयोग को बढाते हुए अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए |
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##Question:पश्चिम एशिया में भारत के हितों के संदर्भ में सऊदी अरब आर्थिक-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन कुछ निहित चुनौतियों का समाधान विचारणीय है| चर्चा कीजिये (150-200 शब्द;10 अंक) Saudi Arabia is economically-strategicly important in the context of India"s interests in West Asia, but there are some inherent challenges to be addressed. Discuss. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए सऊदी-अरब के संबंधों के महत्व की कर्चा करते हुए कीजिये | इसके पश्चात दोनों देशों के संबंधों में चुनौतियाँ क्या है ? इसकी चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और सऊदी-अरब के मध्य व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध लगभग 3000 वर्ष पुराने हैं | वर्तमान समय में ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीय इत्यादि मुद्दों पर भी दोनों देशों के संबंधो में सहयोग के नए आयाम जुड़े हैं | भारत के लिए सऊदी -अरब का महत्व - ऊर्जा सुरक्षा - वर्तमान में सऊदी अरब ,इराक के बाद भारत को दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है | हाल ही में ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भारत, UAE और सऊदी-अरब त्रिपक्षीय तेल सहयोग में शामिल हुआ है | प्रवासी भारतीय - सऊदी-अरब लगभग 3.2 मिलियन भारतीयों का निवास स्थल है | यह सऊदी-अरब में निवास करने वाला सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है | आतंकवाद - आतंकवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा है ,जिस पर दोनों देशों के मध्य सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है | वर्ष 2015 में सऊदी-अरब ने अबू-जिंदाल को निर्वासित किया जो 26/11 हमले का वांछित अपराधी था | इसके अतिरिक्त आतंकी फंडिंग आदि पर इंटेलिजेंस साझा करने लिए भी यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण देश है | पाकिस्तान का मुद्दा - सऊदी अरब पाकिस्तान का आल वेदर फ्रेंड रहा है, ऐसे में सऊदी-अरब से भारत को अपने संबंधों को बढाने से पाकिस्तान पर दबाव की राजनीति पर काम किया जा सकता है , ताकि पाकिस्तान ,आतंकवाद का प्रयोग भारत के विरुद्ध न कर सके | यद्यपि कि यह सत्य है कि सऊदी-अरब , भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसके बावजूद भारत और सऊदी-अरब के संबंधो में कुछ चुनौतियाँ भी हैं | जोकि निम्नलिखित हैं- सऊदी-अरब और पाकिस्तान सम्बन्ध - सऊदी अरब पाकिस्तान को मदरसे चलने के लिए फण्ड देता है, जिसका प्रयोग पाकिस्तान वहाबी विचारधारा को फैलाने में करता है | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने जनरल शरीफ को मुस्लिम देशों के कमांडर के रूप में चुना है | दोनों देशों के मध्य बढ़ते सम्बन्ध भारत के हितों को असुरक्षित कर सकते हैं | सऊदी - इरान शत्रुता- भारत के ईरान और सऊदी अरब दोनों से अच्छे सम्बन्ध हैं परन्तु सऊदी अरब व ईरान के बीच शत्रुता ईरान पर अमेरिकी प्रतिबन्ध लगाने के बाद और तीव्र हो गया है,जो भारत के समक्ष एक चुनौती है | विचारधारात्मक समस्या- भारत लिबरल इस्लामिक विचारधारा का पक्षधर रहा है जबकि सऊदी अरब वहाबी जैसी कट्टरपंथी विचारधारा को प्रोत्साहित करने के लिए फण्ड देता है जो की भारत के समक्ष एक चुनौती है| सऊदी अरब की आक्रामक नीति - सऊदी अरब पश्चिम एशिया में आक्रामक नीति अपनाता रहा है | उदाहरण के तौर पर इसे सीरिया और यमन में देखा जा सकता है| जबकि भारत किसी भी ऐसी आक्रामक नीति का विरोध करता रहा है एवं शांति से मुद्दों को सुलझाना भारत की विदेश नीति का एक अहम् हिस्सा रहा है | यहाँ हम देखते हैं कि भारत एवं सऊदी अरब दोनों देशों के मध्य सहयोग (दिल्ली घोषणा पत्र -2006,रियाद घोषणा पत्र -2010) साथ साथ कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं | भरत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हुए, सऊदी-अरब के साथ सहयोग को बढाते हुए अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए |
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पश्चिम एशिया में भारत के लिए सऊदी -अरब के महत्व की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत -सऊदी अरब के संबंधो में चुनौतियों का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Discuss the importance of Saudi- Arabia for India in West-Asia. Also explain in brief the challenges in the relations between India and Saudi-Arabia.
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एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए सऊदी-अरब के संबंधों के महत्व की कर्चा करते हुए कीजिये | इसके पश्चात दोनों देशों के संबंधों में चुनौतियाँ क्या है ? इसकी चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और सऊदी-अरब के मध्य व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध लगभग 3000 वर्ष पुराने हैं | वर्तमान समय में ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीय इत्यादि मुद्दों पर भी दोनों देशों के संबंधो में सहयोग के नए आयाम जुड़े हैं | भारत के लिए सऊदी -अरब का महत्व - ऊर्जा सुरक्षा - वर्तमान में सऊदी अरब ,इराक के बाद भारत को दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है | हाल ही में ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भारत, UAE और सऊदी-अरब त्रिपक्षीय तेल सहयोग में शामिल हुआ है | प्रवासी भारतीय -सऊदी-अरब लगभग 3.2 मिलियन भारतीयों का निवास स्थल है | यह सऊदी-अरब में निवास करने वाला सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है | आतंकवाद - आतंकवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा है ,जिस पर दोनों देशों के मध्य सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है | वर्ष 2015 में सऊदी-अरब ने अबू-जिंदाल को निर्वासित किया जो 26/11 हमले का वांछित अपराधी था | इसके अतिरिक्त आतंकी फंडिंग आदि पर इंटेलिजेंस साझा करने लिए भी यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण देश है | पाकिस्तान का मुद्दा - सऊदी अरब पाकिस्तान काआल वेदर फ्रेंडरहा है, ऐसे में सऊदी-अरब से भारत को अपने संबंधों को बढाने से पाकिस्तान पर दबाव की राजनीति पर काम किया जा सकता है , ताकि पाकिस्तान ,आतंकवाद का प्रयोग भारत के विरुद्ध न कर सके | यद्यपि कि यह सत्य है कि सऊदी-अरब , भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसके बावजूद भारत और सऊदी-अरब के संबंधो में कुछचुनौतियाँभी हैं | जोकि निम्नलिखित हैं- सऊदी-अरब और पाकिस्तान सम्बन्ध - सऊदी अरब पाकिस्तान को मदरसे चलने के लिए फण्ड देता है, जिसका प्रयोग पाकिस्तान वहाबी विचारधारा को फैलाने में करता है | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने जनरल शरीफ को मुस्लिम देशों के कमांडर के रूप में चुना है | दोनों देशों के मध्य बढ़ते सम्बन्ध भारत के हितों को असुरक्षित कर सकते हैं | सऊदी - इरान शत्रुता- भारत के ईरान और सऊदी अरब दोनों से अच्छे सम्बन्ध हैं परन्तु सऊदी अरब व ईरान के बीच शत्रुता ईरान पर अमेरिकी प्रतिबन्ध लगाने के बाद और तीव्र हो गया है,जो भारत के समक्ष एक चुनौती है | विचारधारात्मक समस्या - भारत लिबरल इस्लामिक विचारधारा का पक्षधर रहा है जबकि सऊदी अरब वहाबी जैसी कट्टरपंथी विचारधारा को प्रोत्साहित करने के लिए फण्ड देता है जो की भारत के समक्ष एक चुनौती है| सऊदी अरब की आक्रामक नीति - सऊदी अरब पश्चिम एशिया में आक्रामक नीति अपनाता रहा है | उदाहरण के तौर पर इसे सीरिया और यमन में देखा जा सकता है| जबकि भारत किसी भी ऐसी आक्रामक नीति का विरोध करता रहा है एवं शांति से मुद्दों को सुलझाना भारत की विदेश नीति का एक अहम् हिस्सा रहा है | यहाँ हम देखते हैं कि भारत एवं सऊदी अरब दोनों देशों के मध्य सहयोग(दिल्ली घोषणा पत्र -2006,रियाद घोषणा पत्र -2010) साथ साथ कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं | भरत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हुए, सऊदी-अरब के साथ सहयोग को बढाते हुए अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए |
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##Question:पश्चिम एशिया में भारत के लिए सऊदी -अरब के महत्व की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत -सऊदी अरब के संबंधो में चुनौतियों का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Discuss the importance of Saudi- Arabia for India in West-Asia. Also explain in brief the challenges in the relations between India and Saudi-Arabia.##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत भारत के लिए सऊदी-अरब के संबंधों के महत्व की कर्चा करते हुए कीजिये | इसके पश्चात दोनों देशों के संबंधों में चुनौतियाँ क्या है ? इसकी चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत और सऊदी-अरब के मध्य व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध लगभग 3000 वर्ष पुराने हैं | वर्तमान समय में ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीय इत्यादि मुद्दों पर भी दोनों देशों के संबंधो में सहयोग के नए आयाम जुड़े हैं | भारत के लिए सऊदी -अरब का महत्व - ऊर्जा सुरक्षा - वर्तमान में सऊदी अरब ,इराक के बाद भारत को दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है | हाल ही में ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भारत, UAE और सऊदी-अरब त्रिपक्षीय तेल सहयोग में शामिल हुआ है | प्रवासी भारतीय -सऊदी-अरब लगभग 3.2 मिलियन भारतीयों का निवास स्थल है | यह सऊदी-अरब में निवास करने वाला सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है | आतंकवाद - आतंकवाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा है ,जिस पर दोनों देशों के मध्य सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है | वर्ष 2015 में सऊदी-अरब ने अबू-जिंदाल को निर्वासित किया जो 26/11 हमले का वांछित अपराधी था | इसके अतिरिक्त आतंकी फंडिंग आदि पर इंटेलिजेंस साझा करने लिए भी यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण देश है | पाकिस्तान का मुद्दा - सऊदी अरब पाकिस्तान काआल वेदर फ्रेंडरहा है, ऐसे में सऊदी-अरब से भारत को अपने संबंधों को बढाने से पाकिस्तान पर दबाव की राजनीति पर काम किया जा सकता है , ताकि पाकिस्तान ,आतंकवाद का प्रयोग भारत के विरुद्ध न कर सके | यद्यपि कि यह सत्य है कि सऊदी-अरब , भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसके बावजूद भारत और सऊदी-अरब के संबंधो में कुछचुनौतियाँभी हैं | जोकि निम्नलिखित हैं- सऊदी-अरब और पाकिस्तान सम्बन्ध - सऊदी अरब पाकिस्तान को मदरसे चलने के लिए फण्ड देता है, जिसका प्रयोग पाकिस्तान वहाबी विचारधारा को फैलाने में करता है | इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने जनरल शरीफ को मुस्लिम देशों के कमांडर के रूप में चुना है | दोनों देशों के मध्य बढ़ते सम्बन्ध भारत के हितों को असुरक्षित कर सकते हैं | सऊदी - इरान शत्रुता- भारत के ईरान और सऊदी अरब दोनों से अच्छे सम्बन्ध हैं परन्तु सऊदी अरब व ईरान के बीच शत्रुता ईरान पर अमेरिकी प्रतिबन्ध लगाने के बाद और तीव्र हो गया है,जो भारत के समक्ष एक चुनौती है | विचारधारात्मक समस्या - भारत लिबरल इस्लामिक विचारधारा का पक्षधर रहा है जबकि सऊदी अरब वहाबी जैसी कट्टरपंथी विचारधारा को प्रोत्साहित करने के लिए फण्ड देता है जो की भारत के समक्ष एक चुनौती है| सऊदी अरब की आक्रामक नीति - सऊदी अरब पश्चिम एशिया में आक्रामक नीति अपनाता रहा है | उदाहरण के तौर पर इसे सीरिया और यमन में देखा जा सकता है| जबकि भारत किसी भी ऐसी आक्रामक नीति का विरोध करता रहा है एवं शांति से मुद्दों को सुलझाना भारत की विदेश नीति का एक अहम् हिस्सा रहा है | यहाँ हम देखते हैं कि भारत एवं सऊदी अरब दोनों देशों के मध्य सहयोग(दिल्ली घोषणा पत्र -2006,रियाद घोषणा पत्र -2010) साथ साथ कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं | भरत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हुए, सऊदी-अरब के साथ सहयोग को बढाते हुए अपने प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करनी चाहिए |
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भावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही, शासन-प्रशासन मेंभावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ की उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये|(200 शब्द) Define emotional intelligence. Along with this, explain the various aspects of the utility of emotional intelligence in governance. (200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- दूसरे भाग में प्रशासन में भावनात्मक बुद्धिमत्ता कि उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक बुद्धिमत्ता शासन-प्रशासन में विभिन्न पहलुओं के साथ उपयोगितापूर्ण होती है| शासन-प्रशासन में भावनात्मक समझ की उपयोगिता मानवीय परस्पर सम्बन्ध प्रत्येक लोक सेवा एक जन सेवा होती है एवं प्रत्येक लोकशासन जन शासन होता हैअतः व्यक्ति को शासन का केंद्र बिंदु माना गया है व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी होता है अतः सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्तियों के द्वारा मानवीय परस्पर सम्बन्ध पर ध्यान दिया जाना एवं इस उद्देश्य की परिपूर्ति व्यक्तियों के द्वारा प्रभावी तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ या बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है व्यक्तियों की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि ऐसे व्यक्तियों के साथ अपने परस्पर तालमेल को स्थापित किया जाए जो भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर पर हो शासन का आशय सरकार एवं सिविल समाज संगठनों के नेटवर्क पर आधारित होती है जो कि स्वतः अपने आप में पारस्परिक सम्बन्ध की अनिवार्यता को दर्शाती है समूह की उत्पादकता समूह की उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु इसके सदस्यों में भावनातमक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है प्रशासन का सम्बन्ध सामान्य उद्देश्य प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयास को समुचित दिशा में निर्देशित किये जाने से है एवं इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु प्रशासन में कार्यरत व्यक्तियों में भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है जन संपर्क की स्थापना प्रशासक के द्वारा एक बेहतर जन संपर्क स्थापित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सामाजिक पूँजी का निर्माण किसी भी सन्गठन या सरकार या शासन के प्रभावी दायित्वों को पूरा करने हेतु चार प्रकार की पूँजी का होना आवश्यक है यथा भौतिक पूँजी, मानवीय पूँजी, वित्तीय पूँजी एवं सामाजिक पूँजी किसी भी सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूँजी में किया गया निवेश अधिक लाभकारी होता है इस सन्दर्भ में भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है अन्य को प्रभावित करने में सहायक किसी प्रशासक की सफलता सत्ता या प्राधिकार के अभ्यास मात्र पर निर्भर न हो कर किसी अन्य को प्रभावित करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है इस दक्षता को विकसित करने हेतु प्रशासक में उच्चतर भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है निर्णयों को औचित्य प्रदान करने में सहायक भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता को औचित्य प्रदान करती है सरकार या शासन के द्वारा किये जाने वाले सुधारात्मक उपायों की कीमत जो समाज को वहन करना पड़ता है उसको विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ सरकार का प्राथमिक उद्देश्य आम जनता के व्यापक हितों को सुनिश्चित करना है एवं जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ का निर्माण करना है इसके लिए संवेदना/समानुभूति का होना आवश्यक है इस उद्देश्य से भावनात्मक समझ को विकसित किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है समाज के कमजोर वर्गों के प्रति प्रशासक के द्वारा अपने दायित्वों के प्रभावी निष्पादन हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है दीर्घजीवी लाभों को सुनिश्चित करने में भावनात्मक बुद्धिमत्ता का महत्त्व लोक संगठनों के साथ साथ निजी संगठनों के सन्दर्भ में भी देखने को मिलता है परन्तु लोक संगठनों का उद्देश्य जनहित होने के कारण इसका महत्त्व सरकारी संगठनों में अधिक होता है निजी संगठनों का प्राथमिक उद्देश्य मुनाफे के अर्जन से सम्बन्धित होता है किन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक मुनाफे के अर्जन को सुनिश्चित करने की दिशा में भावनात्मक समझ के महत्त्व का होना आवश्यक है CSR को प्रभावी बनाने में वर्तमान समय में निगम शासन(कॉर्पोरेट गवर्नेंस) CSR के महत्त्व पर बल देता है इसके अंतर्गत निजी संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपने विशिष्ट हितों से आगे बढ़ते हुए समाज के व्यापक हितों को सुनिश्चित करने की दिशा में अपना योगदान दे इस प्रक्रिया में निजी संगठनों एवं समाज के बीच के पारस्परिक सम्बन्धों की निर्भरता का अधिक व्यापक होना स्वाभाविक है जो स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्त्व को स्पष्ट करता है मूल्यों की व्यावहारिकता सुनिश्चित करने में लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्य जैसे संवेदना, सहिष्णुता, वस्तुनिष्ठता आदि के व्यवहारिकता को सुनिश्चित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सरकार या शासन की कार्यप्रणाली को संगठित एवं कार्य कुशल तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है नेतृत्व में सहायक लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व होते हैं यथा प्रशासक के रूप में, प्रबंधक के रूप में और नेता के रूप में लोकसेवक के नेतृत्व की क्षमता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है ताकि नेता में अन्य को अभिप्रेरित करने की क्षमता या दक्षता को प्राप्त किया जा सके निष्कर्ष शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध का सुचारू होना अपेक्षित है| इस अपेक्षा को पूरा करने हेतु भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है |लोकसेवक का परस्पर तालमेल संगठन के आंतरिक परिवेश में अधिकारी के साथ, अधिनस्थों के साथ, सहकर्मी के साथ एवं बाहरी परिवेश में जनता एवं सिविल संगठनों से होता है|इस प्रकार "सम्बन्ध" शासन का DNA होता है अतः भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता के विकास पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है|
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##Question:भावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ को परिभाषित कीजिये| इसके साथ ही, शासन-प्रशासन मेंभावनात्मक बुद्धिमत्ता/समझ की उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये|(200 शब्द) Define emotional intelligence. Along with this, explain the various aspects of the utility of emotional intelligence in governance. (200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को परिभाषित कीजिये 2- दूसरे भाग में प्रशासन में भावनात्मक बुद्धिमत्ता कि उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से 6 प्रकार की मूल भावना होती है यथा गुस्सा, विस्मय, डर/भय, प्रसन्नता, उदासी, आश्चर्यचकित होना| भावनाएं स्वतः अपने आप में नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती हैं इसका निर्धारण सन्दर्भ एवं समय पर व्यक्ति की भावनात्मक समझ पर आधारित होता है| कई अवसरों पर एक से अधिक भावनाओं का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर देखने को मिलता है| भावनात्मक समझ का आशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति भावनाओं की स्व-पहचान/जागरूकता, भावनाओं का नियमन, अभिप्रेरणा, समानुभूति के माध्यम से सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय परस्पर सम्बन्ध को बनाए रखता है| भावनात्मक बुद्धिमत्ता शासन-प्रशासन में विभिन्न पहलुओं के साथ उपयोगितापूर्ण होती है| शासन-प्रशासन में भावनात्मक समझ की उपयोगिता मानवीय परस्पर सम्बन्ध प्रत्येक लोक सेवा एक जन सेवा होती है एवं प्रत्येक लोकशासन जन शासन होता हैअतः व्यक्ति को शासन का केंद्र बिंदु माना गया है व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी होता है अतः सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्तियों के द्वारा मानवीय परस्पर सम्बन्ध पर ध्यान दिया जाना एवं इस उद्देश्य की परिपूर्ति व्यक्तियों के द्वारा प्रभावी तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ या बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है व्यक्तियों की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि ऐसे व्यक्तियों के साथ अपने परस्पर तालमेल को स्थापित किया जाए जो भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर पर हो शासन का आशय सरकार एवं सिविल समाज संगठनों के नेटवर्क पर आधारित होती है जो कि स्वतः अपने आप में पारस्परिक सम्बन्ध की अनिवार्यता को दर्शाती है समूह की उत्पादकता समूह की उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु इसके सदस्यों में भावनातमक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है प्रशासन का सम्बन्ध सामान्य उद्देश्य प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयास को समुचित दिशा में निर्देशित किये जाने से है एवं इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु प्रशासन में कार्यरत व्यक्तियों में भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है जन संपर्क की स्थापना प्रशासक के द्वारा एक बेहतर जन संपर्क स्थापित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सामाजिक पूँजी का निर्माण किसी भी सन्गठन या सरकार या शासन के प्रभावी दायित्वों को पूरा करने हेतु चार प्रकार की पूँजी का होना आवश्यक है यथा भौतिक पूँजी, मानवीय पूँजी, वित्तीय पूँजी एवं सामाजिक पूँजी किसी भी सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूँजी में किया गया निवेश अधिक लाभकारी होता है इस सन्दर्भ में भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है अन्य को प्रभावित करने में सहायक किसी प्रशासक की सफलता सत्ता या प्राधिकार के अभ्यास मात्र पर निर्भर न हो कर किसी अन्य को प्रभावित करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है इस दक्षता को विकसित करने हेतु प्रशासक में उच्चतर भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है निर्णयों को औचित्य प्रदान करने में सहायक भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता को औचित्य प्रदान करती है सरकार या शासन के द्वारा किये जाने वाले सुधारात्मक उपायों की कीमत जो समाज को वहन करना पड़ता है उसको विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ सरकार का प्राथमिक उद्देश्य आम जनता के व्यापक हितों को सुनिश्चित करना है एवं जन अपेक्षाओं की बेहतर समझ का निर्माण करना है इसके लिए संवेदना/समानुभूति का होना आवश्यक है इस उद्देश्य से भावनात्मक समझ को विकसित किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है समाज के कमजोर वर्गों के प्रति प्रशासक के द्वारा अपने दायित्वों के प्रभावी निष्पादन हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है दीर्घजीवी लाभों को सुनिश्चित करने में भावनात्मक बुद्धिमत्ता का महत्त्व लोक संगठनों के साथ साथ निजी संगठनों के सन्दर्भ में भी देखने को मिलता है परन्तु लोक संगठनों का उद्देश्य जनहित होने के कारण इसका महत्त्व सरकारी संगठनों में अधिक होता है निजी संगठनों का प्राथमिक उद्देश्य मुनाफे के अर्जन से सम्बन्धित होता है किन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक मुनाफे के अर्जन को सुनिश्चित करने की दिशा में भावनात्मक समझ के महत्त्व का होना आवश्यक है CSR को प्रभावी बनाने में वर्तमान समय में निगम शासन(कॉर्पोरेट गवर्नेंस) CSR के महत्त्व पर बल देता है इसके अंतर्गत निजी संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि अपने विशिष्ट हितों से आगे बढ़ते हुए समाज के व्यापक हितों को सुनिश्चित करने की दिशा में अपना योगदान दे इस प्रक्रिया में निजी संगठनों एवं समाज के बीच के पारस्परिक सम्बन्धों की निर्भरता का अधिक व्यापक होना स्वाभाविक है जो स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्त्व को स्पष्ट करता है मूल्यों की व्यावहारिकता सुनिश्चित करने में लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्य जैसे संवेदना, सहिष्णुता, वस्तुनिष्ठता आदि के व्यवहारिकता को सुनिश्चित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है सरकार या शासन की कार्यप्रणाली को संगठित एवं कार्य कुशल तरीके से करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है नेतृत्व में सहायक लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व होते हैं यथा प्रशासक के रूप में, प्रबंधक के रूप में और नेता के रूप में लोकसेवक के नेतृत्व की क्षमता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है ताकि नेता में अन्य को अभिप्रेरित करने की क्षमता या दक्षता को प्राप्त किया जा सके निष्कर्ष शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध का सुचारू होना अपेक्षित है| इस अपेक्षा को पूरा करने हेतु भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है |लोकसेवक का परस्पर तालमेल संगठन के आंतरिक परिवेश में अधिकारी के साथ, अधिनस्थों के साथ, सहकर्मी के साथ एवं बाहरी परिवेश में जनता एवं सिविल संगठनों से होता है|इस प्रकार "सम्बन्ध" शासन का DNA होता है अतः भावनात्मक समझ/बुद्धिमत्ता के विकास पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है|
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भावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द) The importance of Emotional Intelligence(EI) exists in governance and administration. Elucidate. (150 words)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका भावनात्मक समझ का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंशासन एवं प्रशासन मेंभावनात्मक समझ के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भावनात्मक समझ सेआशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय सम्बन्ध को परस्पर बनाए रखता है। भावनात्मक समझ के कईमौलिक आयाम हैं, जैसे,स्वजागरूकता,समानुभूति,स्वविनियमन,अभिप्रेरणा,सामाजिक दक्षता,प्रसन्नता इत्यादि। इन सभी आयामों काशासन एवं प्रशासन में भी महत्व है। शासन एवं प्रशासन में भावनात्मक समझ का महत्व:- भावनात्मक समझ के विभिन्न आयामों का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। शासन मौलिक रूप से जनता का शासन होता है एवं लोक सेवाएं वास्तविकता में जनसेवा को दर्शाती है अतः शासन के केंद्रबिंदु में व्यक्ति होता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी है एवं सामाजिक प्राणी के रूप में मानवीय परस्पर सम्बन्ध का एक विशेष महत्व है। एवं व्यक्तियों के द्वारा इस दक्षता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। प्रशासन सामूहिक प्रयास के द्वारा एक सामान्य उद्देश्य प्राप्ति को सुनिश्चित करने पर बल देती है। इस सामूहिक प्रयास के माध्यम से उद्देश्य प्राप्ति की प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु समूह में टीम की भावना का होना आवश्यक है जो कि सदस्यों के अन्तः परस्पर सम्बन्ध पर आधारित होती है अतः प्रशासन की कार्यकुशलता प्रशासकों की भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। सामूहिक स्तर पर उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु समूह के सदस्यों में भावनात्मक समझ केउच्चतर स्तर का होना आवश्यक है अन्यथा समूह के किसी भी एक सदस्य में भावनात्मक समझ की कमी का होना, पूरेसमूह की उत्पादकता को प्रतिकूल तरिके से प्रभावित करती है। विभिन्न प्रशासकों की समान पदस्थिति होने पर भी उसकी उपलब्धि एवं निष्पादन का स्तर भिन्न होता है जिसका मौलिक कारण भावनात्मक समझ के स्तर में अंतर होना है। भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता के सामाजिक औचित्य की पुष्टि करने में सहायक होती है। भावनात्मक समझ शासन एवं प्रशासन के द्वारा किये जाने वाले विभिन्न नवाचार या सुधारात्मक प्रयासों को जनसमर्थन प्रदान करतीहै। सरकार के द्वारा लिए जाने वाले कठोर कदम के कारण जो जनता को कीमत अदा करनी पड़ती है उसका वहन जनता के द्वारा सरकार को दिए जाने वाले सहयोग के रूप में किया जाता है।अतः यहाँ भी भावनात्मक समझ का योगदान है। सरकार या संगठन या प्रशासन के द्वारा अपने अपने उद्देश्यों को प्राप्तकरने हेतु चार प्रकार के पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, भौतिक पूंजी, मानवीय पूंजी, वित्तीय पूंजी, सामाजिक पूंजी। सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूंजी के निर्माण में किया जाने वाला निवेश दीर्घकालिक आधार पर सबसे अधिक लाभकारी मानागया है। सीमित संसाधनों के माध्यम से सरकार के द्वारा जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति के माध्यम से संतुष्टि को प्रदान करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। सरकार या प्रशासन की लोकप्रियता काफी हद तक भावनात्मक समझ के स्तर पर निर्भर करती है। सरकार या शासन के द्वारा जनता के हितों को पूरा किया जाना इसका प्राथमिक उद्देश्य है जबकि निजी संगठनों का उद्देश्य मुनाफेके अर्जन से है परन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक लाभ के अर्जन के उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु जनहित पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यह स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्व को दर्शाती है। शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के बीच के परस्पर संबंध का सुचारु होना आवश्यक है। ऐसे सुचारु सम्बन्ध को विकसित करने हेतु सरकार एवं नागरिक दोनों के भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। शासन में जनभागीदारी मौलिक रुप से तीन कारकों पर निर्भर करती है- जनता में भागीदारी करने की दक्षता, जो कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास के स्तर परनिर्भर करती है। जनता में भागीदारी करने की इच्छाशक्ति एवं इसके लिए नागरिकों को अभिप्रेरित किया जाना आवश्यक है। यह उच्चतर भावनात्मक समझ की मांग करती है। सरकार के द्वारा जन भागीदारी हेतु उचित अवसर को प्रदान किया जाना। लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व हैं- प्रशासक के रूप में यानि नीतियों का क्रियान्वयन प्रबंधक के रूप में यानि संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग नेतृत्व के रूप में, अपनी टीम को उद्देश्य प्राप्ति की और या जनसेवा की और अभिप्रेरित करना। अतः प्रशासक, प्रबंधक एवंनेतृत्व के रूप में लोकसेवा की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उच्चतर भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है। नेता के दो मौलिक दायित्व हैं- कार्य दक्षता को विकसित करनाऔर दूसरा कार्य के प्रति इच्छाशक्ति को जागृत करना। लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्यों को प्राप्त करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जैसे,वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता, संवेदना, सहनशीलता, समर्पण इत्यादि। अभिवृति के एक भाग कासम्बन्ध भावनात्मक पहलू से है। अतः लोकसेवकों में भावनात्मक समझ की दक्षता को विकसितकरने हेतु अभिवृति परिवर्तन पर बल दिया जाना आवश्यक है। भावनात्मक समझ शासन या सरकार को अधिक संगठित एवं नियोजित बनाती है। अभिवृति परिवर्तन हेतु परसुएशन(धारणा) का महत्व एक साधन के रूप में देखने को मिलता है। एक प्रभावी धारक हेतु आवश्यक है कि उसकी भावनात्मक समझ का स्तर उच्चा हो। अतः प्रशासन एवं शासन की कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता काफी हद तक भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। इस प्रकार स्पष्ट है किभावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है।
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##Question:भावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द) The importance of Emotional Intelligence(EI) exists in governance and administration. Elucidate. (150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका भावनात्मक समझ का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंशासन एवं प्रशासन मेंभावनात्मक समझ के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भावनात्मक समझ सेआशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय सम्बन्ध को परस्पर बनाए रखता है। भावनात्मक समझ के कईमौलिक आयाम हैं, जैसे,स्वजागरूकता,समानुभूति,स्वविनियमन,अभिप्रेरणा,सामाजिक दक्षता,प्रसन्नता इत्यादि। इन सभी आयामों काशासन एवं प्रशासन में भी महत्व है। शासन एवं प्रशासन में भावनात्मक समझ का महत्व:- भावनात्मक समझ के विभिन्न आयामों का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। शासन मौलिक रूप से जनता का शासन होता है एवं लोक सेवाएं वास्तविकता में जनसेवा को दर्शाती है अतः शासन के केंद्रबिंदु में व्यक्ति होता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी है एवं सामाजिक प्राणी के रूप में मानवीय परस्पर सम्बन्ध का एक विशेष महत्व है। एवं व्यक्तियों के द्वारा इस दक्षता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। प्रशासन सामूहिक प्रयास के द्वारा एक सामान्य उद्देश्य प्राप्ति को सुनिश्चित करने पर बल देती है। इस सामूहिक प्रयास के माध्यम से उद्देश्य प्राप्ति की प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु समूह में टीम की भावना का होना आवश्यक है जो कि सदस्यों के अन्तः परस्पर सम्बन्ध पर आधारित होती है अतः प्रशासन की कार्यकुशलता प्रशासकों की भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। सामूहिक स्तर पर उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु समूह के सदस्यों में भावनात्मक समझ केउच्चतर स्तर का होना आवश्यक है अन्यथा समूह के किसी भी एक सदस्य में भावनात्मक समझ की कमी का होना, पूरेसमूह की उत्पादकता को प्रतिकूल तरिके से प्रभावित करती है। विभिन्न प्रशासकों की समान पदस्थिति होने पर भी उसकी उपलब्धि एवं निष्पादन का स्तर भिन्न होता है जिसका मौलिक कारण भावनात्मक समझ के स्तर में अंतर होना है। भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता के सामाजिक औचित्य की पुष्टि करने में सहायक होती है। भावनात्मक समझ शासन एवं प्रशासन के द्वारा किये जाने वाले विभिन्न नवाचार या सुधारात्मक प्रयासों को जनसमर्थन प्रदान करतीहै। सरकार के द्वारा लिए जाने वाले कठोर कदम के कारण जो जनता को कीमत अदा करनी पड़ती है उसका वहन जनता के द्वारा सरकार को दिए जाने वाले सहयोग के रूप में किया जाता है।अतः यहाँ भी भावनात्मक समझ का योगदान है। सरकार या संगठन या प्रशासन के द्वारा अपने अपने उद्देश्यों को प्राप्तकरने हेतु चार प्रकार के पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, भौतिक पूंजी, मानवीय पूंजी, वित्तीय पूंजी, सामाजिक पूंजी। सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूंजी के निर्माण में किया जाने वाला निवेश दीर्घकालिक आधार पर सबसे अधिक लाभकारी मानागया है। सीमित संसाधनों के माध्यम से सरकार के द्वारा जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति के माध्यम से संतुष्टि को प्रदान करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। सरकार या प्रशासन की लोकप्रियता काफी हद तक भावनात्मक समझ के स्तर पर निर्भर करती है। सरकार या शासन के द्वारा जनता के हितों को पूरा किया जाना इसका प्राथमिक उद्देश्य है जबकि निजी संगठनों का उद्देश्य मुनाफेके अर्जन से है परन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक लाभ के अर्जन के उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु जनहित पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यह स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्व को दर्शाती है। शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के बीच के परस्पर संबंध का सुचारु होना आवश्यक है। ऐसे सुचारु सम्बन्ध को विकसित करने हेतु सरकार एवं नागरिक दोनों के भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। शासन में जनभागीदारी मौलिक रुप से तीन कारकों पर निर्भर करती है- जनता में भागीदारी करने की दक्षता, जो कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास के स्तर परनिर्भर करती है। जनता में भागीदारी करने की इच्छाशक्ति एवं इसके लिए नागरिकों को अभिप्रेरित किया जाना आवश्यक है। यह उच्चतर भावनात्मक समझ की मांग करती है। सरकार के द्वारा जन भागीदारी हेतु उचित अवसर को प्रदान किया जाना। लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व हैं- प्रशासक के रूप में यानि नीतियों का क्रियान्वयन प्रबंधक के रूप में यानि संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग नेतृत्व के रूप में, अपनी टीम को उद्देश्य प्राप्ति की और या जनसेवा की और अभिप्रेरित करना। अतः प्रशासक, प्रबंधक एवंनेतृत्व के रूप में लोकसेवा की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उच्चतर भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है। नेता के दो मौलिक दायित्व हैं- कार्य दक्षता को विकसित करनाऔर दूसरा कार्य के प्रति इच्छाशक्ति को जागृत करना। लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्यों को प्राप्त करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जैसे,वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता, संवेदना, सहनशीलता, समर्पण इत्यादि। अभिवृति के एक भाग कासम्बन्ध भावनात्मक पहलू से है। अतः लोकसेवकों में भावनात्मक समझ की दक्षता को विकसितकरने हेतु अभिवृति परिवर्तन पर बल दिया जाना आवश्यक है। भावनात्मक समझ शासन या सरकार को अधिक संगठित एवं नियोजित बनाती है। अभिवृति परिवर्तन हेतु परसुएशन(धारणा) का महत्व एक साधन के रूप में देखने को मिलता है। एक प्रभावी धारक हेतु आवश्यक है कि उसकी भावनात्मक समझ का स्तर उच्चा हो। अतः प्रशासन एवं शासन की कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता काफी हद तक भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। इस प्रकार स्पष्ट है किभावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है।
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What is the recapitalization of Banks? Briefly explain the ways in which the Government recapitalizes Banks in India. (10 Marks/150 Words)
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Brief Approach: 1. Meaning of Recapitalisation 2.Why Recapitalisation is needed in the Indian Banking System. 3.Ways in which Government recapitalises banks in India. Model Answer: Recapitalisation is described as a strategy of enhancing the financial base of an entity to overcome a rough financial situation or to enhance its financial health. In the case of Public Sector banks, recapitalization is an injection of capital mainly through an equity investment by the government to financially strengthen them. Since the government is the majority shareholder of PSBs, the responsibility of adding capital to them falls on the shoulders of the government . Need of Recapitalisation: The recapitalisation was necessary because the PSBs are facing financial problems and they need money in the context of rising bad debts. Similarly, they need funds to meet the higher capital requirements under Basel III norms. Altogether, there are following three sound reasons for the recapitalization of PSBs. 1. The rising volume of bad assets has led to erosion of capital. 2. The Basel III capital norms require higher capital in banks. 3. Expanding credit needs in the economy can be made only with higher capital. As per the 2017-18 trend, PSBs account for nearly 90 per cent of Gross Non-Performing Assets (GNPAs) of the entire banking sector. According to the CAG Report, GNPAs of PSBs increased from Rs 2.27 lakh crore (31 March 2014) to Rs 6.83 lakh crore (provisional) as on 31 March 2017. This has again estimated to be increased to Rs 9.5 lakh crores as on June 2018. So, the main thrust of the government’s recapitalization effort is to tide over the bad debt problem of PSBs. Ways of Recapitalization: 1. Budgetary Allocation: The Government has been making recapitalization by providing funds through the budget.According to the Comptroller and Auditor General’s Report (2017), the government had infused Rs 1,18,724 crore in PSBs between 2008-09 to 2016-17. However, recapitalization through this route leads to increased fiscal deficit and takes government away from the path of Fiscal consolidation. 2. Proceeds from Disinvestment: A significant portion of money obtained from Disinvestment has also been put to recapitalize banks inorder to strengthen their Balance Sheet. 3.Market Borrowings: Herein, Banks raise capital from the market by diluting their own equity. In 2017-18PSBs targeted to mobilise Rs 58,000 crore from the market through borrowings.[RBI Report} 4.Recapitalisation Bonds: The government will issue recapitalisation bonds, which banks subscribe and enter it as an investment in their books. The banks lend money to the government for subscribing the bonds. This money raised by the government through this bond goes back to banks as capital. This immediately strengthens the balance-sheet of the banks and show capital-adequacy .On 20th December 2018, the government decided to issue an additional Rs 41000 crores recapitalisation bonds to provide money to PSBs. Way Forward: In order to realize its agenda of Responsive and Responsible Banking Government should implement the reform undertaken under EASE in the right spirit.EASE – Enhanced Access and Service Excellence, focuses on six themes of customer responsiveness, responsible banking, credit off take, PSBs as Udyami Mitra, deepening financial inclusion and digitization and developing personnel for brand PSB.
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##Question:What is the recapitalization of Banks? Briefly explain the ways in which the Government recapitalizes Banks in India. (10 Marks/150 Words)##Answer:Brief Approach: 1. Meaning of Recapitalisation 2.Why Recapitalisation is needed in the Indian Banking System. 3.Ways in which Government recapitalises banks in India. Model Answer: Recapitalisation is described as a strategy of enhancing the financial base of an entity to overcome a rough financial situation or to enhance its financial health. In the case of Public Sector banks, recapitalization is an injection of capital mainly through an equity investment by the government to financially strengthen them. Since the government is the majority shareholder of PSBs, the responsibility of adding capital to them falls on the shoulders of the government . Need of Recapitalisation: The recapitalisation was necessary because the PSBs are facing financial problems and they need money in the context of rising bad debts. Similarly, they need funds to meet the higher capital requirements under Basel III norms. Altogether, there are following three sound reasons for the recapitalization of PSBs. 1. The rising volume of bad assets has led to erosion of capital. 2. The Basel III capital norms require higher capital in banks. 3. Expanding credit needs in the economy can be made only with higher capital. As per the 2017-18 trend, PSBs account for nearly 90 per cent of Gross Non-Performing Assets (GNPAs) of the entire banking sector. According to the CAG Report, GNPAs of PSBs increased from Rs 2.27 lakh crore (31 March 2014) to Rs 6.83 lakh crore (provisional) as on 31 March 2017. This has again estimated to be increased to Rs 9.5 lakh crores as on June 2018. So, the main thrust of the government’s recapitalization effort is to tide over the bad debt problem of PSBs. Ways of Recapitalization: 1. Budgetary Allocation: The Government has been making recapitalization by providing funds through the budget.According to the Comptroller and Auditor General’s Report (2017), the government had infused Rs 1,18,724 crore in PSBs between 2008-09 to 2016-17. However, recapitalization through this route leads to increased fiscal deficit and takes government away from the path of Fiscal consolidation. 2. Proceeds from Disinvestment: A significant portion of money obtained from Disinvestment has also been put to recapitalize banks inorder to strengthen their Balance Sheet. 3.Market Borrowings: Herein, Banks raise capital from the market by diluting their own equity. In 2017-18PSBs targeted to mobilise Rs 58,000 crore from the market through borrowings.[RBI Report} 4.Recapitalisation Bonds: The government will issue recapitalisation bonds, which banks subscribe and enter it as an investment in their books. The banks lend money to the government for subscribing the bonds. This money raised by the government through this bond goes back to banks as capital. This immediately strengthens the balance-sheet of the banks and show capital-adequacy .On 20th December 2018, the government decided to issue an additional Rs 41000 crores recapitalisation bonds to provide money to PSBs. Way Forward: In order to realize its agenda of Responsive and Responsible Banking Government should implement the reform undertaken under EASE in the right spirit.EASE – Enhanced Access and Service Excellence, focuses on six themes of customer responsiveness, responsible banking, credit off take, PSBs as Udyami Mitra, deepening financial inclusion and digitization and developing personnel for brand PSB.
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1909 के भारत-परिषद अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए | साथ ही, इस अधिनियम के माध्यम से हुए सुधारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Write downthe key provisions of the Indian Councils Act of 1909. Also, Critically Evaluate the improvements made through this act. (150-200 words/ 10 Words)
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एप्रोच- 1909 के भारत-परिषद् अधिनियम की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,1909 के भारत-परिषद् अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में,इस अधिनियम के माध्यम से हुए सुधारों के सकारात्मक पक्षों पर प्रकाश डालिए| अगले भाग में,इस अधिनियम के माध्यम से हुए सुधारों के आलोचना के तर्कों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में, अपने विचारों के साथ उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- 1892 के भारत-परिषद् अधिनियम से राष्ट्रवादियों में असंतोष व्याप्त था एवं सुधारों के प्रति विलंब का कॉंग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा था| राष्ट्रीय नेता ब्रिटिश सरकार से निरंतर सुधारों की मांग कर रहे थें| साथ ही, बंगाल-विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन पहला देशव्यापी जन-आंदोलन था जिसमेंभारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी तथा अखिल भारतीय स्तर पर भागीदारी से ब्रिटिश सरकार दबाव महसूस कर रही थी| साथ ही, आंदोलन के दौरान स्वशासन की मांग की गयी| स्वदेशी आंदोलन के कमजोर होते ही क्रांतिकारी राष्ट्रवादी सक्रीय हुए| यहाँ तक कि, ब्रिटेन में कर्जन वायली की हत्याकी गयी|क्रांतिकारियों की सक्रियता से सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक था| साथ ही, स्वदेशी आंदोलन के समय सरकार ने संवैधानिक सुधारों का आश्वासन दिया था| इसी पृष्ठभूमि में 1909 का भारत-परिषद् अधिनियम(मॉर्ले-मिंटो सुधार) पारित हुआ| 1909 के भारत-परिषद् अधिनियम के प्रमुख प्रावधान - केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान-परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि तथा प्रांतीय विधान-परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत; केन्द्रीय विधानमंडल में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 69 जिसमें 37 सरकारी तथा 32 गैर-सरकारी थें| वायसराय परिषद् में दो अस्थायी सदस्य शामिल किए गए| पहली बार एक भारतीय सदस्य भी शामिल किया गया| सरकारी सदस्यों में 9 पदेन तथा 28 वायसराय द्वारा मनोनीत| 32 गैर-सरकारी सदस्यों में 5 वायसराय द्वारा मनोनीत तथा 27 निर्वाचित सदस्य| अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी|हालांकि अभी भी मनोनीत सदस्यों का बहुमत था| सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी जैसे- पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार; बजट के कुछ मदों पर अधिकार| अभी भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन तथा निर्वाचन के लिए संपति संबंधी योग्यताएं; धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय को पृथक निर्वाचन की सुविधा दी गयी तथा संपति संबंधी योग्यताएं भी निम्न रखीं गयी| सुधारों के सकारात्मक पहलु- पहली बार चुनाव-प्रणाली के सिद्धांत को मान्यता मिली | वायसराय परिषद् में पहली बार किसी भारतीय को सदस्य बनाया गया| अतिरिक्त सदस्यों तथा निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि से केंद्रीय विधायी परिषद् में राष्ट्रीय नेतृत्व की भी भागीदारी बढ़ी | अतिरिक्त सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि विधायिका के दृष्टिकोण से महत्व रखता है| संसदीय मंचों का उपयोग भारतीय नेता सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना करने में भी कर सकते थें| सुधारों के संदर्भ में आलोचना के बिंदु - अधिनियम को पारित करने का सबसे प्रमुख उद्देश्य था भारत में राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करना तथा सांप्रदायिक राजनीति को महत्व प्रदान करना | इसके माध्यम से उदारवादियों को दिग्भ्रमित कर राष्ट्रवादियों में फुट डालने का प्रयास किया गया था| वायसराय परिषद् में एक भारतीय को शामिल किया जाना स्वशासन संबंधी मांगों की पूर्णतया उपेक्षा थी| वायसराय अभी भी भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था ना कि भारतीय विधायी परिषद् के प्रति| विधायी परिषद् का नाममात्र के लिए भी कार्यपालिका पर नियंत्रण था प्रत्यक्ष निर्वाचन का अभाव तथा पृथक निर्वाचन लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार था| सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को अपनाकर राष्ट्रीय एकता को नष्ट करने का प्रयास किया गया तथा राजनीति में धर्म के औचित्य को मान्यता दी गयी जिसकी परिणति अंततः देश के विभाजन के रूप में हुयी | निर्वाचन के लिए संपति संबंधी योग्यताएं भी लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध था| मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीय राष्ट्रवादियों विशेषकर नरमपंथियों को अत्यधिक निराश किया| इन सुधारों से भारतीय राजनीतिक स्थिति/समस्याओं का कोई समाधान नहीं किया जा सकता था| इसी कारण सुधारों को लेकर महात्मा गांधी ने कहा था कि "मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने हमारा सर्वनाश कर दिया|"
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##Question:1909 के भारत-परिषद अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए | साथ ही, इस अधिनियम के माध्यम से हुए सुधारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए| (150-200 शब्द/ 10 अंक) Write downthe key provisions of the Indian Councils Act of 1909. Also, Critically Evaluate the improvements made through this act. (150-200 words/ 10 Words)##Answer:एप्रोच- 1909 के भारत-परिषद् अधिनियम की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,1909 के भारत-परिषद् अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में,इस अधिनियम के माध्यम से हुए सुधारों के सकारात्मक पक्षों पर प्रकाश डालिए| अगले भाग में,इस अधिनियम के माध्यम से हुए सुधारों के आलोचना के तर्कों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में, अपने विचारों के साथ उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- 1892 के भारत-परिषद् अधिनियम से राष्ट्रवादियों में असंतोष व्याप्त था एवं सुधारों के प्रति विलंब का कॉंग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा था| राष्ट्रीय नेता ब्रिटिश सरकार से निरंतर सुधारों की मांग कर रहे थें| साथ ही, बंगाल-विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन पहला देशव्यापी जन-आंदोलन था जिसमेंभारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी तथा अखिल भारतीय स्तर पर भागीदारी से ब्रिटिश सरकार दबाव महसूस कर रही थी| साथ ही, आंदोलन के दौरान स्वशासन की मांग की गयी| स्वदेशी आंदोलन के कमजोर होते ही क्रांतिकारी राष्ट्रवादी सक्रीय हुए| यहाँ तक कि, ब्रिटेन में कर्जन वायली की हत्याकी गयी|क्रांतिकारियों की सक्रियता से सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक था| साथ ही, स्वदेशी आंदोलन के समय सरकार ने संवैधानिक सुधारों का आश्वासन दिया था| इसी पृष्ठभूमि में 1909 का भारत-परिषद् अधिनियम(मॉर्ले-मिंटो सुधार) पारित हुआ| 1909 के भारत-परिषद् अधिनियम के प्रमुख प्रावधान - केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान-परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि तथा प्रांतीय विधान-परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत; केन्द्रीय विधानमंडल में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 69 जिसमें 37 सरकारी तथा 32 गैर-सरकारी थें| वायसराय परिषद् में दो अस्थायी सदस्य शामिल किए गए| पहली बार एक भारतीय सदस्य भी शामिल किया गया| सरकारी सदस्यों में 9 पदेन तथा 28 वायसराय द्वारा मनोनीत| 32 गैर-सरकारी सदस्यों में 5 वायसराय द्वारा मनोनीत तथा 27 निर्वाचित सदस्य| अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी|हालांकि अभी भी मनोनीत सदस्यों का बहुमत था| सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी जैसे- पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार; बजट के कुछ मदों पर अधिकार| अभी भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन तथा निर्वाचन के लिए संपति संबंधी योग्यताएं; धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय को पृथक निर्वाचन की सुविधा दी गयी तथा संपति संबंधी योग्यताएं भी निम्न रखीं गयी| सुधारों के सकारात्मक पहलु- पहली बार चुनाव-प्रणाली के सिद्धांत को मान्यता मिली | वायसराय परिषद् में पहली बार किसी भारतीय को सदस्य बनाया गया| अतिरिक्त सदस्यों तथा निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि से केंद्रीय विधायी परिषद् में राष्ट्रीय नेतृत्व की भी भागीदारी बढ़ी | अतिरिक्त सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि विधायिका के दृष्टिकोण से महत्व रखता है| संसदीय मंचों का उपयोग भारतीय नेता सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना करने में भी कर सकते थें| सुधारों के संदर्भ में आलोचना के बिंदु - अधिनियम को पारित करने का सबसे प्रमुख उद्देश्य था भारत में राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करना तथा सांप्रदायिक राजनीति को महत्व प्रदान करना | इसके माध्यम से उदारवादियों को दिग्भ्रमित कर राष्ट्रवादियों में फुट डालने का प्रयास किया गया था| वायसराय परिषद् में एक भारतीय को शामिल किया जाना स्वशासन संबंधी मांगों की पूर्णतया उपेक्षा थी| वायसराय अभी भी भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था ना कि भारतीय विधायी परिषद् के प्रति| विधायी परिषद् का नाममात्र के लिए भी कार्यपालिका पर नियंत्रण था प्रत्यक्ष निर्वाचन का अभाव तथा पृथक निर्वाचन लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार था| सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को अपनाकर राष्ट्रीय एकता को नष्ट करने का प्रयास किया गया तथा राजनीति में धर्म के औचित्य को मान्यता दी गयी जिसकी परिणति अंततः देश के विभाजन के रूप में हुयी | निर्वाचन के लिए संपति संबंधी योग्यताएं भी लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध था| मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीय राष्ट्रवादियों विशेषकर नरमपंथियों को अत्यधिक निराश किया| इन सुधारों से भारतीय राजनीतिक स्थिति/समस्याओं का कोई समाधान नहीं किया जा सकता था| इसी कारण सुधारों को लेकर महात्मा गांधी ने कहा था कि "मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने हमारा सर्वनाश कर दिया|"
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RBI की संरचना को स्पष्ट करते हुए इसके कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए। (150 शब्द) Explain the structure of RBI and explain its functions in detail. (150 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में आरबीआई की के बारे में लिखिए। आरबीआई की संरचना बताइये। इसके बाद कार्यों का विस्तार से विवरण दीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 के माध्यम से केन्द्रीय बैंक ने कार्य करना आरंभ कर दिया। 1949 में आरबीआई का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसका मुख्य कार्यालय मुंबई में है। आरबीआई की संरचना: एक गवर्नर चार अन्य सदस्य जिन्हे डिप्युटी गवर्नर कहा जाता है। RBI के कार्य एवं शक्तियाँ: पत्र मुद्रा का निर्गमन: आरबीआई अपने निर्गमन विभाग के माध्यम से पत्र मुद्रा जारी करता है। वर्तमान में 2 रुपये से लेकर 2000 रुपए तक के नोट जारी किए जाते है। वर्तमान में 200 करोड़ रुपए से अधिक जो भी मुद्रा निर्गमित होगी। उसके पीछे कोई न कोई प्रतिभूति रखना आवश्यक होगी। सरकार के बैंक के रूप में कार्य: आरबीआई सरकार को अल्पकालिक ऋण प्रदान करती है जिससे सरकार अपने सार्वजनिक व्यय तथा सार्वजनिक प्राप्ति के बीच घाटे को पूरा कर सके। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के बैंकर का भी कार्य करता है। मौद्रक नीति का क्रियान्वयन: गुणात्मक व मात्रात्मक तरीकों के माध्यम से बाजार में मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करने का कार्य भी आरबीआई ही करता है। इसमें रेपों राते, बैंक राते, सीआरआर एसएलआर आदि साधन आते हैं। बैंकों के बैंक के रूप में कार्य: बैंकिंग प्रणाली की सफलता विश्वास पर आधारित होता है। इस संदर्भ में शोध क्षमता बनाए रखना रिजर्व बैंक का प्राथमिक दायित्व है। अंतिम ऋणदाता के रूप में बैंकों को प्रतिभूतियों के बदले ऋण प्रदान करता है। अन्य कार्य व शक्तियाँ: विदेशी मुद्रा का प्रबंधन आईएमएफ़ में भारत के प्रतिनिधि के रूप में जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना। बैंकिंग विनियमन अधिनियम अधिनयम के माध्यम से अन्य वाणिज्यिक बैंको, वित्तीय संस्थाओं का विनयमन भी करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में आरबीआई केन्द्रीय बैंक के रूप में कार्य करते हुए मुद्रा प्रबंधन से संबन्धित महत्वपूर्ण कार्यों का संचालन करता है। इसमें मौद्रिक नीति, बैंकों के बैंक के रूप में , पत्र मुद्रा का निर्गमन जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं।
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##Question:RBI की संरचना को स्पष्ट करते हुए इसके कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए। (150 शब्द) Explain the structure of RBI and explain its functions in detail. (150 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में आरबीआई की के बारे में लिखिए। आरबीआई की संरचना बताइये। इसके बाद कार्यों का विस्तार से विवरण दीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 के माध्यम से केन्द्रीय बैंक ने कार्य करना आरंभ कर दिया। 1949 में आरबीआई का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसका मुख्य कार्यालय मुंबई में है। आरबीआई की संरचना: एक गवर्नर चार अन्य सदस्य जिन्हे डिप्युटी गवर्नर कहा जाता है। RBI के कार्य एवं शक्तियाँ: पत्र मुद्रा का निर्गमन: आरबीआई अपने निर्गमन विभाग के माध्यम से पत्र मुद्रा जारी करता है। वर्तमान में 2 रुपये से लेकर 2000 रुपए तक के नोट जारी किए जाते है। वर्तमान में 200 करोड़ रुपए से अधिक जो भी मुद्रा निर्गमित होगी। उसके पीछे कोई न कोई प्रतिभूति रखना आवश्यक होगी। सरकार के बैंक के रूप में कार्य: आरबीआई सरकार को अल्पकालिक ऋण प्रदान करती है जिससे सरकार अपने सार्वजनिक व्यय तथा सार्वजनिक प्राप्ति के बीच घाटे को पूरा कर सके। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के बैंकर का भी कार्य करता है। मौद्रक नीति का क्रियान्वयन: गुणात्मक व मात्रात्मक तरीकों के माध्यम से बाजार में मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करने का कार्य भी आरबीआई ही करता है। इसमें रेपों राते, बैंक राते, सीआरआर एसएलआर आदि साधन आते हैं। बैंकों के बैंक के रूप में कार्य: बैंकिंग प्रणाली की सफलता विश्वास पर आधारित होता है। इस संदर्भ में शोध क्षमता बनाए रखना रिजर्व बैंक का प्राथमिक दायित्व है। अंतिम ऋणदाता के रूप में बैंकों को प्रतिभूतियों के बदले ऋण प्रदान करता है। अन्य कार्य व शक्तियाँ: विदेशी मुद्रा का प्रबंधन आईएमएफ़ में भारत के प्रतिनिधि के रूप में जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना। बैंकिंग विनियमन अधिनियम अधिनयम के माध्यम से अन्य वाणिज्यिक बैंको, वित्तीय संस्थाओं का विनयमन भी करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में आरबीआई केन्द्रीय बैंक के रूप में कार्य करते हुए मुद्रा प्रबंधन से संबन्धित महत्वपूर्ण कार्यों का संचालन करता है। इसमें मौद्रिक नीति, बैंकों के बैंक के रूप में , पत्र मुद्रा का निर्गमन जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं।
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Discuss the factors which led to industrialization of Western Europe with examples of some Industrial region. (200 words)
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Brief Approach:- Write a brief introduction to the industrial revolution. Mention the factors which contributed to the industrialization of Western Europe. Illustrate your answer with some example of Industrial regions. Answer:- Before the first industrial revolution, the production and manufacturing of goods were from the cottage industry. With the advent of the scientific revolution, there were new technologies coming up which revolutionized the means of production. This development first took place in Western European countries such as England. Factors contributing to Industrialization of Western Europe:- Modern and scientific advancements such as the power loom contributed to industrialization as they led to mass production of goods, especially in the textile sector. There was an abundance of capital in Western European countries owing to the colonization in Asia, Africa etc. There was no shortage of raw materials such as cotton as they were being imported from the colonies at a very cheap rate. Eg. Cotton was imported from India. Means of transportation and communication were also developed such as canals and later rail network. The region had its own mineral resources such as iron and coal. Eg. Ruhr valley in Germany. The labour was domestic, mostly rural migrants who moved from agricultural activity to manufacturing due to higher income. These countries had access to a huge market- both domestic and international. Protectionist policies were followed i.e. imports from colonies were cheaper while exportsto them were costly. Further, the traditional industries in the colonies such as cottage industries were destroyed to reduce the competition the costly exported good faced, thus forcing people to buy western products. The industrialization took place in certain areas owing to their connectivity to the rest of the world like ports, availability of raw materials, cheap labour. Some regions that developed industrially are discussed below . England, Yorkshire and Nottingham, Lancashire, central Scotland were the major industrial regions in Britain. Manchester was known as the cotton polos of the world. Greater London region was known for the manufacture of consumer goods. In Germany, the major industrial regions include the resource-rich region of Ruhr, Rhine valley. In France Lorraine, Greater Paris area was industrialized. In Italy, the Po Valley region is the major industrial centre. It further spread to other areas such as Belgium, Netherlands and Scandinavian country like Norway, Sweden. While the western European countries were few of the first to be industrialized, industrialization has now spread across the globe. The continuous advancements in science and technology have changed the form of industrialization such as the up and coming 4th industrial revolution.
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##Question:Discuss the factors which led to industrialization of Western Europe with examples of some Industrial region. (200 words)##Answer:Brief Approach:- Write a brief introduction to the industrial revolution. Mention the factors which contributed to the industrialization of Western Europe. Illustrate your answer with some example of Industrial regions. Answer:- Before the first industrial revolution, the production and manufacturing of goods were from the cottage industry. With the advent of the scientific revolution, there were new technologies coming up which revolutionized the means of production. This development first took place in Western European countries such as England. Factors contributing to Industrialization of Western Europe:- Modern and scientific advancements such as the power loom contributed to industrialization as they led to mass production of goods, especially in the textile sector. There was an abundance of capital in Western European countries owing to the colonization in Asia, Africa etc. There was no shortage of raw materials such as cotton as they were being imported from the colonies at a very cheap rate. Eg. Cotton was imported from India. Means of transportation and communication were also developed such as canals and later rail network. The region had its own mineral resources such as iron and coal. Eg. Ruhr valley in Germany. The labour was domestic, mostly rural migrants who moved from agricultural activity to manufacturing due to higher income. These countries had access to a huge market- both domestic and international. Protectionist policies were followed i.e. imports from colonies were cheaper while exportsto them were costly. Further, the traditional industries in the colonies such as cottage industries were destroyed to reduce the competition the costly exported good faced, thus forcing people to buy western products. The industrialization took place in certain areas owing to their connectivity to the rest of the world like ports, availability of raw materials, cheap labour. Some regions that developed industrially are discussed below . England, Yorkshire and Nottingham, Lancashire, central Scotland were the major industrial regions in Britain. Manchester was known as the cotton polos of the world. Greater London region was known for the manufacture of consumer goods. In Germany, the major industrial regions include the resource-rich region of Ruhr, Rhine valley. In France Lorraine, Greater Paris area was industrialized. In Italy, the Po Valley region is the major industrial centre. It further spread to other areas such as Belgium, Netherlands and Scandinavian country like Norway, Sweden. While the western European countries were few of the first to be industrialized, industrialization has now spread across the globe. The continuous advancements in science and technology have changed the form of industrialization such as the up and coming 4th industrial revolution.
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पश्चिम एशिया में भारत के लिए ईरान के महत्व की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत के लिए चाबहार पत्तन के विशेष आर्थिक व सामरिक महत्व का संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Discuss the importance of Iran for India in West- Asia. Also explain in brief, the special economic and strategic importance of Chabahar Port for India.
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एप्रोच - भूमिका में भारत-ईरान सम्बन्धों की ऐतिहासिकता को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत के लिए ईरान के महत्व को बताते हुए उत्तर का विस्तार कीजिये | पुनः चाबहार पत्तन का आरती एवं सामरिक महत्व बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं ईरान के मध्य सम्बन्ध सदियों पुराने रहे हैं | सन 1947 तक दोनों ने आपस में सीमायें साझा कीं | वर्ष 1950 में भारत एवं ईरान के मध्य राजनयिक सम्बन्ध स्थापित हुए | वर्तमान समय में भारत द्वारा चलाये जा रहे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट , संस्कृति तथा ऊर्जा के क्षेत्र में ईरान के साथ सहयोग ने दोनों के मध्य संबंधों को नवीनता प्रदान की है | भारत के लिए ईरान का महत्व निम्नलिखित रूप से समझाया जा सकता है - ऊर्जा सुरक्षा - ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार एवं चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है | ईरान भारत के तेल आयातकों में सबसे प्रमुख रहा है | कनेक्टिविटी परियोजना - भारत ने ईरान के साथ मिलकर अफगानिस्तान तक पहुँच सुनिश्चित करने हेतु "" चाबहार बंदरगाह "" का निर्माण किया है |इसके अतिरिक्त चीन के प्रतिउत्तर में भारत ,ईरान एवं एशिया के साथ मिलकर मध्य एशिया को यूरोप तक जोड़ने के लिये अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण गलियारे पर काम कर रहा है | आतंकवाद को काउंटर करने में - अफगानिस्तान में तालिबान के विरूद्ध लड़ाई में ईरान एक महत्वपूर्ण सहायक है | अंततः ईरान पश्चिम एशिया में व्यापक प्रभाव वाली एक क्षेत्रीय शक्ति है , जो क्षेत्रीय स्थिरता में सहायक हो सकती है | भारत- ईरान के मध्य सहयोग - अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में ईरान-पाकिस्तान- भारत गैस पाइपलाइन दोनों के मध्य तेल- व्यापार चाबहार एवं उत्तर दक्षिण गलियारा भारत के लिए चाबहार पत्तन का महत्त्व आर्थिक महत्त्व यह पत्तन ऊर्जा समृद्ध देश के निकट है एवं अफगानिस्तान व मध्य एशिया के बाज़ार तक पहुँच को सुनिश्चित करने में सहायक है | इस पत्तन से अफगानिस्तान के साथ- साथ ईरान के साथ भी व्यापार के नए आयाम विकसित होंगे | सामरिक महत्व इस पत्तन से भारत होर्मुज संधि के इतर ,हिन्द महासागर में सीधे प्रवेश कर सकता है ,जिससे वह किसी भी संकट की स्थिति में अपने हितों को सुनिश्चित कर सकता है | चीन के हिन्द महासागर में बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह पत्तन सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है | इस पत्तन को चीन के प्रतिउत्तर में देखा जा सकता है , जो ग्वादर पत्तन को भारत को घेरने की रणनीति में विकसित कर रहा है | इस पत्तन से भारत, अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक अपना प्रभाव बढ़ाने एवं अपने शांति मिशन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है | ईरान भारत के लिए सामरिक व आर्थिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है | इसके लिए भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को प्रभावित करने वाली विश्व शक्तियों से स्वयं को दूर रखना चाहिए एवं अपने राष्ट्रीय हितों की ओर बढ़ते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को नए आयाम देने चाहिए |
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##Question:पश्चिम एशिया में भारत के लिए ईरान के महत्व की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत के लिए चाबहार पत्तन के विशेष आर्थिक व सामरिक महत्व का संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Discuss the importance of Iran for India in West- Asia. Also explain in brief, the special economic and strategic importance of Chabahar Port for India.##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत-ईरान सम्बन्धों की ऐतिहासिकता को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत के लिए ईरान के महत्व को बताते हुए उत्तर का विस्तार कीजिये | पुनः चाबहार पत्तन का आरती एवं सामरिक महत्व बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं ईरान के मध्य सम्बन्ध सदियों पुराने रहे हैं | सन 1947 तक दोनों ने आपस में सीमायें साझा कीं | वर्ष 1950 में भारत एवं ईरान के मध्य राजनयिक सम्बन्ध स्थापित हुए | वर्तमान समय में भारत द्वारा चलाये जा रहे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट , संस्कृति तथा ऊर्जा के क्षेत्र में ईरान के साथ सहयोग ने दोनों के मध्य संबंधों को नवीनता प्रदान की है | भारत के लिए ईरान का महत्व निम्नलिखित रूप से समझाया जा सकता है - ऊर्जा सुरक्षा - ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार एवं चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है | ईरान भारत के तेल आयातकों में सबसे प्रमुख रहा है | कनेक्टिविटी परियोजना - भारत ने ईरान के साथ मिलकर अफगानिस्तान तक पहुँच सुनिश्चित करने हेतु "" चाबहार बंदरगाह "" का निर्माण किया है |इसके अतिरिक्त चीन के प्रतिउत्तर में भारत ,ईरान एवं एशिया के साथ मिलकर मध्य एशिया को यूरोप तक जोड़ने के लिये अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण गलियारे पर काम कर रहा है | आतंकवाद को काउंटर करने में - अफगानिस्तान में तालिबान के विरूद्ध लड़ाई में ईरान एक महत्वपूर्ण सहायक है | अंततः ईरान पश्चिम एशिया में व्यापक प्रभाव वाली एक क्षेत्रीय शक्ति है , जो क्षेत्रीय स्थिरता में सहायक हो सकती है | भारत- ईरान के मध्य सहयोग - अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में ईरान-पाकिस्तान- भारत गैस पाइपलाइन दोनों के मध्य तेल- व्यापार चाबहार एवं उत्तर दक्षिण गलियारा भारत के लिए चाबहार पत्तन का महत्त्व आर्थिक महत्त्व यह पत्तन ऊर्जा समृद्ध देश के निकट है एवं अफगानिस्तान व मध्य एशिया के बाज़ार तक पहुँच को सुनिश्चित करने में सहायक है | इस पत्तन से अफगानिस्तान के साथ- साथ ईरान के साथ भी व्यापार के नए आयाम विकसित होंगे | सामरिक महत्व इस पत्तन से भारत होर्मुज संधि के इतर ,हिन्द महासागर में सीधे प्रवेश कर सकता है ,जिससे वह किसी भी संकट की स्थिति में अपने हितों को सुनिश्चित कर सकता है | चीन के हिन्द महासागर में बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह पत्तन सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है | इस पत्तन को चीन के प्रतिउत्तर में देखा जा सकता है , जो ग्वादर पत्तन को भारत को घेरने की रणनीति में विकसित कर रहा है | इस पत्तन से भारत, अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक अपना प्रभाव बढ़ाने एवं अपने शांति मिशन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है | ईरान भारत के लिए सामरिक व आर्थिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है | इसके लिए भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को प्रभावित करने वाली विश्व शक्तियों से स्वयं को दूर रखना चाहिए एवं अपने राष्ट्रीय हितों की ओर बढ़ते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को नए आयाम देने चाहिए |
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नीतिशास्त्र का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में नीतिशास्त्र का महत्त्व स्पष्ट कीजिये(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of Ethics. Along with this explain the importance of ethics in public life (150-200 Words; 10 Words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में नीतिशास्त्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है| नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकर व्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है मानवीय मूल्यों को विकसित करने हेतु परिवार, समाज एवं शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका का विशेष महत्त्व है जो कि समाजीकरण के विभिन्न महत्त्वपूर्ण कारक हैं| नीतिशास्त्र, व्यक्ति की निर्णय प्रक्रिया को अधिक तीव्रता प्रदान करती है| यदि व्यक्ति नैतिक होगा तो उसके मन में असमंजस नहीं होगा, नैतिक व्यक्ति के मन-विचार-कर्म में एकरूपता होती है नीतिशास्त्र का महत्त्व · नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को कम करता है · नीतिशास्त्र, व्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है · स्व-जवाबदेहिता को विकसित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्त्व है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध एवं व्यक्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित करती है · नीतिशास्त्र, समाज कल्याण, जन हित, सामाजिक हित एक संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवक या व्यक्ति के व्यवहार के उस पक्ष या आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है · नीतिशास्त्र, समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाती है · नीतिशास्त्र के माध्यम से व्यक्ति के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है · नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है · नीतिशास्त्र मानवीय सह सम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के मध्य नेतृत्व की भावना को उत्पन्न करती है · नीतिशास्त्र एक सर्वव्यापी प्रक्रिया होने के कारण इसका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में एवं विभिन्न स्तरों पर देखने को मिलता है जैसे राजनीति, प्रशासनिक, संगठनात्मक, सामाजिक पर्यावरण, व्यवसाय, चिकित्सा, लोकसेवा, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध आदि · कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नैतिकता सार्वजनिक जीवन के सुचारू रूप संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
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##Question:नीतिशास्त्र का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में नीतिशास्त्र का महत्त्व स्पष्ट कीजिये(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the meaning of Ethics. Along with this explain the importance of ethics in public life (150-200 Words; 10 Words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नीतिशास्त्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है| नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकर व्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है मानवीय मूल्यों को विकसित करने हेतु परिवार, समाज एवं शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका का विशेष महत्त्व है जो कि समाजीकरण के विभिन्न महत्त्वपूर्ण कारक हैं| नीतिशास्त्र, व्यक्ति की निर्णय प्रक्रिया को अधिक तीव्रता प्रदान करती है| यदि व्यक्ति नैतिक होगा तो उसके मन में असमंजस नहीं होगा, नैतिक व्यक्ति के मन-विचार-कर्म में एकरूपता होती है नीतिशास्त्र का महत्त्व · नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को कम करता है · नीतिशास्त्र, व्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है · स्व-जवाबदेहिता को विकसित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्त्व है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध एवं व्यक्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित करती है · नीतिशास्त्र, समाज कल्याण, जन हित, सामाजिक हित एक संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवक या व्यक्ति के व्यवहार के उस पक्ष या आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है · नीतिशास्त्र, समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाती है · नीतिशास्त्र के माध्यम से व्यक्ति के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है · नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है · नीतिशास्त्र मानवीय सह सम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के मध्य नेतृत्व की भावना को उत्पन्न करती है · नीतिशास्त्र एक सर्वव्यापी प्रक्रिया होने के कारण इसका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में एवं विभिन्न स्तरों पर देखने को मिलता है जैसे राजनीति, प्रशासनिक, संगठनात्मक, सामाजिक पर्यावरण, व्यवसाय, चिकित्सा, लोकसेवा, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध आदि · कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नैतिकता सार्वजनिक जीवन के सुचारू रूप संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
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