Question
stringlengths 0
3.53k
| Answer
stringlengths 1
12.2k
| prompt
stringlengths 21
12.4k
| __index_level_0__
int64 5
88.1k
|
|---|---|---|---|
पश्चिम एशिया में भारत के लिए ईरान के महत्व की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत के लिए चाबहार पत्तन के विशेष आर्थिक व सामरिक महत्व का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the importance of Iran for India in west asia. Also explain in brief, the special economic and strategic importance of chabahar port for India. (150-200 words/10 Marks)
|
एप्रोच - भूमिका में भारत-ईरान सम्बन्धों की ऐतिहासिकता को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत के लिए ईरान के महत्व को बताते हुए उत्तर का विस्तार कीजिये | पुनः चाबहार पत्तन का आरती एवं सामरिक महत्व बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं ईरान के मध्य सम्बन्ध सदियों पुराने रहे हैं | सन 1947 तक दोनों ने आपस में सीमायें साझा कीं | वर्ष 1950 में भारत एवं ईरान के मध्य राजनयिक सम्बन्ध स्थापित हुए | वर्तमान समय में भारत द्वारा चलाये जा रहे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट , संस्कृति तथा ऊर्जा के क्षेत्र में ईरान के साथ सहयोग ने दोनों के मध्य संबंधों को नवीनता प्रदान की है | भारत के लिए ईरान का महत्व निम्नलिखित रूप से समझाया जा सकता है - ऊर्जा सुरक्षा- ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार एवं चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है | ईरान भारत के तेल आयातकों में सबसे प्रमुख रहा है | कनेक्टिविटी परियोजना- भारत ने ईरान के साथ मिलकर अफगानिस्तान तक पहुँच सुनिश्चित करने हेतु "" चाबहार बंदरगाह "" का निर्माण किया है |इसके अतिरिक्त चीन के प्रतिउत्तर में भारत ,ईरान एवं एशिया के साथ मिलकर मध्य एशिया को यूरोप तक जोड़ने के लिये अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण गलियारे पर काम कर रहा है | आतंकवाद को काउंटर करने में- अफगानिस्तान में तालिबान के विरूद्ध लड़ाई में ईरान एक महत्वपूर्ण सहायक है | अंततः ईरान पश्चिम एशिया में व्यापक प्रभाव वाली एक क्षेत्रीय शक्ति है , जो क्षेत्रीय स्थिरता में सहायक हो सकती है | भारत- ईरान के मध्य सहयोग - अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में | ईरान-पाकिस्तान- भारत गैस पाइपलाइन | दोनों के मध्य तेल- व्यापार | चाबहार एवं उत्तर दक्षिण गलियारा | भारत के लिए चाबहार पत्तन का महत्त्व आर्थिक महत्त्व यह पत्तन ऊर्जा समृद्ध देश के निकट है एवं अफगानिस्तान व मध्य एशिया के बाज़ार तक पहुँच को सुनिश्चित करने में सहायक है | इस पत्तन से अफगानिस्तान के साथ- साथ ईरान के साथ भी व्यापार के नए आयाम विकसित होंगे | सामरिक महत्व इस पत्तन से भारत होर्मुज संधि के इतर ,हिन्द महासागर में सीधे प्रवेश कर सकता है ,जिससे वह किसी भी संकट की स्थिति में अपने हितों को सुनिश्चित कर सकता है | चीन के हिन्द महासागर में बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह पत्तन सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है | इस पत्तन को चीन के प्रतिउत्तर में देखा जा सकता है , जो ग्वादर पत्तन को भारत को घेरने की रणनीति में विकसित कर रहा है | इस पत्तन से भारत, अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक अपना प्रभाव बढ़ाने एवं अपने शांति मिशन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है | ईरान भारत के लिए सामरिक व आर्थिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है | इसके लिए भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को प्रभावित करने वाली विश्व शक्तियों से स्वयं को दूर रखना चाहिए एवं अपने राष्ट्रीय हितों की ओर बढ़ते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को नए आयाम देने चाहिए |
|
##Question:पश्चिम एशिया में भारत के लिए ईरान के महत्व की चर्चा कीजिये | साथ ही भारत के लिए चाबहार पत्तन के विशेष आर्थिक व सामरिक महत्व का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Discuss the importance of Iran for India in west asia. Also explain in brief, the special economic and strategic importance of chabahar port for India. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में भारत-ईरान सम्बन्धों की ऐतिहासिकता को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भारत के लिए ईरान के महत्व को बताते हुए उत्तर का विस्तार कीजिये | पुनः चाबहार पत्तन का आरती एवं सामरिक महत्व बताइए | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- भारत एवं ईरान के मध्य सम्बन्ध सदियों पुराने रहे हैं | सन 1947 तक दोनों ने आपस में सीमायें साझा कीं | वर्ष 1950 में भारत एवं ईरान के मध्य राजनयिक सम्बन्ध स्थापित हुए | वर्तमान समय में भारत द्वारा चलाये जा रहे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट , संस्कृति तथा ऊर्जा के क्षेत्र में ईरान के साथ सहयोग ने दोनों के मध्य संबंधों को नवीनता प्रदान की है | भारत के लिए ईरान का महत्व निम्नलिखित रूप से समझाया जा सकता है - ऊर्जा सुरक्षा- ईरान के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गैस भंडार एवं चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है | ईरान भारत के तेल आयातकों में सबसे प्रमुख रहा है | कनेक्टिविटी परियोजना- भारत ने ईरान के साथ मिलकर अफगानिस्तान तक पहुँच सुनिश्चित करने हेतु "" चाबहार बंदरगाह "" का निर्माण किया है |इसके अतिरिक्त चीन के प्रतिउत्तर में भारत ,ईरान एवं एशिया के साथ मिलकर मध्य एशिया को यूरोप तक जोड़ने के लिये अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण गलियारे पर काम कर रहा है | आतंकवाद को काउंटर करने में- अफगानिस्तान में तालिबान के विरूद्ध लड़ाई में ईरान एक महत्वपूर्ण सहायक है | अंततः ईरान पश्चिम एशिया में व्यापक प्रभाव वाली एक क्षेत्रीय शक्ति है , जो क्षेत्रीय स्थिरता में सहायक हो सकती है | भारत- ईरान के मध्य सहयोग - अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में | ईरान-पाकिस्तान- भारत गैस पाइपलाइन | दोनों के मध्य तेल- व्यापार | चाबहार एवं उत्तर दक्षिण गलियारा | भारत के लिए चाबहार पत्तन का महत्त्व आर्थिक महत्त्व यह पत्तन ऊर्जा समृद्ध देश के निकट है एवं अफगानिस्तान व मध्य एशिया के बाज़ार तक पहुँच को सुनिश्चित करने में सहायक है | इस पत्तन से अफगानिस्तान के साथ- साथ ईरान के साथ भी व्यापार के नए आयाम विकसित होंगे | सामरिक महत्व इस पत्तन से भारत होर्मुज संधि के इतर ,हिन्द महासागर में सीधे प्रवेश कर सकता है ,जिससे वह किसी भी संकट की स्थिति में अपने हितों को सुनिश्चित कर सकता है | चीन के हिन्द महासागर में बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यह पत्तन सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है | इस पत्तन को चीन के प्रतिउत्तर में देखा जा सकता है , जो ग्वादर पत्तन को भारत को घेरने की रणनीति में विकसित कर रहा है | इस पत्तन से भारत, अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक अपना प्रभाव बढ़ाने एवं अपने शांति मिशन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है | ईरान भारत के लिए सामरिक व आर्थिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण है | इसके लिए भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को प्रभावित करने वाली विश्व शक्तियों से स्वयं को दूर रखना चाहिए एवं अपने राष्ट्रीय हितों की ओर बढ़ते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को नए आयाम देने चाहिए |
| 45,252
|
भावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) The importance of Emotional Intelligence(EI) exists in governance and administration. Elucidate. (150-200 words; 10 Marks)
|
एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका भावनात्मक समझ का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंशासन एवं प्रशासन मेंभावनात्मक समझ के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भावनात्मक समझ सेआशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय सम्बन्ध को परस्परबनाए रखता है।भावनात्मक समझ के कईमौलिक आयाम हैं, जैसे,स्वजागरूकता,समानुभूति,स्वविनियमन,अभिप्रेरणा,सामाजिक दक्षता,प्रसन्नता इत्यादि। इन सभी आयामों काशासन एवं प्रशासन में भी महत्व है। शासन एवं प्रशासन में भावनात्मक समझ का महत्व:- भावनात्मक समझ के विभिन्न आयामों का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। शासन मौलिक रूप से जनता का शासन होता है एवं लोक सेवाएं वास्तविकता में जनसेवा को दर्शाती है अतः शासन के केंद्रबिंदु में व्यक्ति होता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी है एवं सामाजिक प्राणी के रूप में मानवीय परस्पर सम्बन्ध का एक विशेष महत्व है। एवं व्यक्तियों के द्वारा इस दक्षता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। प्रशासन सामूहिक प्रयास के द्वारा एक सामान्य उद्देश्य प्राप्ति को सुनिश्चित करने पर बल देती है। इस सामूहिक प्रयास के माध्यम से उद्देश्य प्राप्ति की प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु समूह में टीम की भावना का होना आवश्यक है जो कि सदस्यों के अन्तः परस्पर सम्बन्ध पर आधारित होती है अतः प्रशासन की कार्यकुशलता प्रशासकों की भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। सामूहिक स्तर पर उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु समूह के सदस्यों में भावनात्मक समझ केउच्चतर स्तर का होना आवश्यक है अन्यथा समूह के किसी भी एक सदस्य में भावनात्मक समझ की कमी का होना, पूरेसमूह की उत्पादकता को प्रतिकूल तरिके से प्रभावित करती है। विभिन्न प्रशासकों की समान पदस्थिति होने पर भी उसकी उपलब्धि एवं निष्पादन का स्तर भिन्न होता है जिसका मौलिक कारण भावनात्मक समझ के स्तर में अंतर होना है। भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता के सामाजिक औचित्य की पुष्टि करने में सहायक होती है। भावनात्मक समझ शासन एवं प्रशासन के द्वारा किये जाने वाले विभिन्न नवाचार या सुधारात्मक प्रयासों को जनसमर्थन प्रदान करतीहै। सरकार के द्वारा लिए जाने वाले कठोर कदम के कारण जो जनता को कीमत अदा करनी पड़ती है उसका वहन जनता के द्वारा सरकार को दिए जाने वाले सहयोग के रूप में किया जाता है।अतः यहाँ भी भावनात्मक समझ का योगदान है। सरकार या संगठन या प्रशासन के द्वारा अपने अपने उद्देश्यों को प्राप्तकरने हेतु चार प्रकार के पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, भौतिक पूंजी, मानवीय पूंजी, वित्तीय पूंजी, सामाजिक पूंजी।सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूंजी के निर्माण में किया जाने वाला निवेश दीर्घकालिक आधार पर सबसे अधिक लाभकारी मानागया है। सीमित संसाधनों के माध्यम से सरकार के द्वारा जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति के माध्यम से संतुष्टि को प्रदान करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। सरकार या प्रशासन की लोकप्रियता काफी हद तक भावनात्मक समझ के स्तर पर निर्भर करती है। सरकार या शासन के द्वारा जनता के हितों को पूरा किया जाना इसका प्राथमिक उद्देश्य है जबकि निजी संगठनों का उद्देश्य मुनाफेके अर्जन से है परन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक लाभ के अर्जन के उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु जनहित पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यह स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्व को दर्शाती है। शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के बीच के परस्पर संबंध का सुचारु होना आवश्यक है। ऐसे सुचारु सम्बन्ध को विकसित करने हेतु सरकार एवं नागरिक दोनों के भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। शासन में जनभागीदारी मौलिक रुप से तीन कारकों पर निर्भर करती है- जनता में भागीदारी करने की दक्षता, जो कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास के स्तर परनिर्भर करती है। जनता में भागीदारी करने की इच्छाशक्ति एवं इसके लिए नागरिकों को अभिप्रेरित किया जाना आवश्यक है। यह उच्चतर भावनात्मक समझ की मांग करती है। सरकार के द्वारा जन भागीदारी हेतु उचित अवसर को प्रदान किया जाना। लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व हैं- प्रशासक के रूप में यानि नीतियों का क्रियान्वयन प्रबंधक के रूप में यानि संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग नेतृत्व के रूप में, अपनी टीम को उद्देश्य प्राप्ति की और या जनसेवा की और अभिप्रेरित करना। अतः प्रशासक, प्रबंधक एवंनेतृत्व के रूप में लोकसेवा की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उच्चतर भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है। नेता के दो मौलिक दायित्व हैं- कार्य दक्षता को विकसित करनाऔर दूसरा कार्य के प्रति इच्छाशक्ति को जागृत करना। लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्यों को प्राप्त करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जैसे,वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता, संवेदना, सहनशीलता, समर्पण इत्यादि। अभिवृति के एक भाग कासम्बन्ध भावनात्मक पहलू से है। अतः लोकसेवकों में भावनात्मक समझ की दक्षता को विकसितकरने हेतु अभिवृति परिवर्तन पर बल दिया जाना आवश्यक है। भावनात्मक समझ शासन या सरकार को अधिक संगठित एवं नियोजित बनाती है। अभिवृति परिवर्तन हेतु परसुएशन(धारणा) का महत्व एक साधन के रूप में देखने को मिलता है। एक प्रभावी धारक हेतु आवश्यक है कि उसकी भावनात्मक समझ का स्तर उच्चा हो। अतः प्रशासन एवं शासन की कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता काफी हद तक भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। इस प्रकार स्पष्ट है किभावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है।
|
##Question:भावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) The importance of Emotional Intelligence(EI) exists in governance and administration. Elucidate. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका भावनात्मक समझ का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंशासन एवं प्रशासन मेंभावनात्मक समझ के अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भावनात्मक समझ सेआशय व्यक्ति की उस दक्षता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति सामाजिक सम्बन्ध/ मानवीय सम्बन्ध को परस्परबनाए रखता है।भावनात्मक समझ के कईमौलिक आयाम हैं, जैसे,स्वजागरूकता,समानुभूति,स्वविनियमन,अभिप्रेरणा,सामाजिक दक्षता,प्रसन्नता इत्यादि। इन सभी आयामों काशासन एवं प्रशासन में भी महत्व है। शासन एवं प्रशासन में भावनात्मक समझ का महत्व:- भावनात्मक समझ के विभिन्न आयामों का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है। शासन मौलिक रूप से जनता का शासन होता है एवं लोक सेवाएं वास्तविकता में जनसेवा को दर्शाती है अतः शासन के केंद्रबिंदु में व्यक्ति होता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी है एवं सामाजिक प्राणी के रूप में मानवीय परस्पर सम्बन्ध का एक विशेष महत्व है। एवं व्यक्तियों के द्वारा इस दक्षता को विकसित करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। प्रशासन सामूहिक प्रयास के द्वारा एक सामान्य उद्देश्य प्राप्ति को सुनिश्चित करने पर बल देती है। इस सामूहिक प्रयास के माध्यम से उद्देश्य प्राप्ति की प्रभावकारिता को सुनिश्चित करने हेतु समूह में टीम की भावना का होना आवश्यक है जो कि सदस्यों के अन्तः परस्पर सम्बन्ध पर आधारित होती है अतः प्रशासन की कार्यकुशलता प्रशासकों की भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। सामूहिक स्तर पर उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु समूह के सदस्यों में भावनात्मक समझ केउच्चतर स्तर का होना आवश्यक है अन्यथा समूह के किसी भी एक सदस्य में भावनात्मक समझ की कमी का होना, पूरेसमूह की उत्पादकता को प्रतिकूल तरिके से प्रभावित करती है। विभिन्न प्रशासकों की समान पदस्थिति होने पर भी उसकी उपलब्धि एवं निष्पादन का स्तर भिन्न होता है जिसका मौलिक कारण भावनात्मक समझ के स्तर में अंतर होना है। भावनात्मक समझ सरकार के निर्णय एवं क्रियाशीलता के सामाजिक औचित्य की पुष्टि करने में सहायक होती है। भावनात्मक समझ शासन एवं प्रशासन के द्वारा किये जाने वाले विभिन्न नवाचार या सुधारात्मक प्रयासों को जनसमर्थन प्रदान करतीहै। सरकार के द्वारा लिए जाने वाले कठोर कदम के कारण जो जनता को कीमत अदा करनी पड़ती है उसका वहन जनता के द्वारा सरकार को दिए जाने वाले सहयोग के रूप में किया जाता है।अतः यहाँ भी भावनात्मक समझ का योगदान है। सरकार या संगठन या प्रशासन के द्वारा अपने अपने उद्देश्यों को प्राप्तकरने हेतु चार प्रकार के पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है, भौतिक पूंजी, मानवीय पूंजी, वित्तीय पूंजी, सामाजिक पूंजी।सरकार या शासन के द्वारा सामाजिक पूंजी के निर्माण में किया जाने वाला निवेश दीर्घकालिक आधार पर सबसे अधिक लाभकारी मानागया है। सीमित संसाधनों के माध्यम से सरकार के द्वारा जन अपेक्षाओं की परिपूर्ति के माध्यम से संतुष्टि को प्रदान करने हेतु भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। सरकार या प्रशासन की लोकप्रियता काफी हद तक भावनात्मक समझ के स्तर पर निर्भर करती है। सरकार या शासन के द्वारा जनता के हितों को पूरा किया जाना इसका प्राथमिक उद्देश्य है जबकि निजी संगठनों का उद्देश्य मुनाफेके अर्जन से है परन्तु निजी संगठनों के द्वारा भी लम्बे समय तक लाभ के अर्जन के उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु जनहित पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यह स्वतः अपने आप में भावनात्मक समझ के महत्व को दर्शाती है। शासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार एवं नागरिकों के बीच के परस्पर संबंध का सुचारु होना आवश्यक है। ऐसे सुचारु सम्बन्ध को विकसित करने हेतु सरकार एवं नागरिक दोनों के भावनात्मक समझ के उच्चतर स्तर का होना आवश्यक है। शासन में जनभागीदारी मौलिक रुप से तीन कारकों पर निर्भर करती है- जनता में भागीदारी करने की दक्षता, जो कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास के स्तर परनिर्भर करती है। जनता में भागीदारी करने की इच्छाशक्ति एवं इसके लिए नागरिकों को अभिप्रेरित किया जाना आवश्यक है। यह उच्चतर भावनात्मक समझ की मांग करती है। सरकार के द्वारा जन भागीदारी हेतु उचित अवसर को प्रदान किया जाना। लोकसेवक के तीन मौलिक दायित्व हैं- प्रशासक के रूप में यानि नीतियों का क्रियान्वयन प्रबंधक के रूप में यानि संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग नेतृत्व के रूप में, अपनी टीम को उद्देश्य प्राप्ति की और या जनसेवा की और अभिप्रेरित करना। अतः प्रशासक, प्रबंधक एवंनेतृत्व के रूप में लोकसेवा की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उच्चतर भावनात्मक समझ का होना अति आवश्यक है। नेता के दो मौलिक दायित्व हैं- कार्य दक्षता को विकसित करनाऔर दूसरा कार्य के प्रति इच्छाशक्ति को जागृत करना। लोकसेवकों के अपेक्षित मूल्यों को प्राप्त करने हेतु भावनात्मक समझ का होना आवश्यक है जैसे,वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता, संवेदना, सहनशीलता, समर्पण इत्यादि। अभिवृति के एक भाग कासम्बन्ध भावनात्मक पहलू से है। अतः लोकसेवकों में भावनात्मक समझ की दक्षता को विकसितकरने हेतु अभिवृति परिवर्तन पर बल दिया जाना आवश्यक है। भावनात्मक समझ शासन या सरकार को अधिक संगठित एवं नियोजित बनाती है। अभिवृति परिवर्तन हेतु परसुएशन(धारणा) का महत्व एक साधन के रूप में देखने को मिलता है। एक प्रभावी धारक हेतु आवश्यक है कि उसकी भावनात्मक समझ का स्तर उच्चा हो। अतः प्रशासन एवं शासन की कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता काफी हद तक भावनात्मक समझ की दक्षता पर निर्भर करती है। इस प्रकार स्पष्ट है किभावनात्मक समझ का महत्व शासन एवं प्रशासन में विद्यमान है।
| 45,260
|
नीतिशास्त्र का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में नीतिशास्त्र का महत्त्व स्पष्ट कीजिये(150-200 शब्द;10 अंक) Explain the meaning of Ethics.Along with this explain the importance of ethics in public life (150-200 words; 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में नीतिशास्त्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है| नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकर व्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है मानवीय मूल्यों को विकसित करने हेतु परिवार, समाज एवं शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका का विशेष महत्त्व है जो कि समाजीकरण के विभिन्न महत्त्वपूर्ण कारक हैं| नीतिशास्त्र, व्यक्ति की निर्णय प्रक्रिया को अधिक तीव्रता प्रदान करती है| यदि व्यक्ति नैतिक होगा तो उसके मन में असमंजस नहीं होगा, नैतिक व्यक्ति के मन-विचार-कर्म में एकरूपता होती है नीतिशास्त्र का महत्त्व · नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को कम करता है · नीतिशास्त्र, व्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है · स्व-जवाबदेहिता को विकसित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्त्व है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध एवं व्यक्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित करती है · नीतिशास्त्र, समाज कल्याण, जन हित, सामाजिक हित एक संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवक या व्यक्ति के व्यवहार के उस पक्ष या आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है · नीतिशास्त्र, समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाती है · नीतिशास्त्र के माध्यम से व्यक्ति के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है · नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है · नीतिशास्त्र मानवीय सह सम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के मध्य नेतृत्व की भावना को उत्पन्न करती है · नीतिशास्त्र एक सर्वव्यापी प्रक्रिया होने के कारण इसका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में एवं विभिन्न स्तरों पर देखने को मिलता है जैसे राजनीति, प्रशासनिक, संगठनात्मक, सामाजिक पर्यावरण, व्यवसाय, चिकित्सा, लोकसेवा, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध आदि · कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नैतिकता सार्वजनिक जीवन के सुचारू रूप संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
|
##Question:नीतिशास्त्र का आशय स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में नीतिशास्त्र का महत्त्व स्पष्ट कीजिये(150-200 शब्द;10 अंक) Explain the meaning of Ethics.Along with this explain the importance of ethics in public life (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नीतिशास्त्र को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है| नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकर व्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है मानवीय मूल्यों को विकसित करने हेतु परिवार, समाज एवं शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका का विशेष महत्त्व है जो कि समाजीकरण के विभिन्न महत्त्वपूर्ण कारक हैं| नीतिशास्त्र, व्यक्ति की निर्णय प्रक्रिया को अधिक तीव्रता प्रदान करती है| यदि व्यक्ति नैतिक होगा तो उसके मन में असमंजस नहीं होगा, नैतिक व्यक्ति के मन-विचार-कर्म में एकरूपता होती है नीतिशास्त्र का महत्त्व · नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को कम करता है · नीतिशास्त्र, व्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है · स्व-जवाबदेहिता को विकसित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्त्व है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध एवं व्यक्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित करती है · नीतिशास्त्र, समाज कल्याण, जन हित, सामाजिक हित एक संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवक या व्यक्ति के व्यवहार के उस पक्ष या आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है · नीतिशास्त्र, समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करती है · नीतिशास्त्र, लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाती है · नीतिशास्त्र के माध्यम से व्यक्ति के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है · नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है · नीतिशास्त्र मानवीय सह सम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है · नीतिशास्त्र व्यक्तियों के मध्य नेतृत्व की भावना को उत्पन्न करती है · नीतिशास्त्र एक सर्वव्यापी प्रक्रिया होने के कारण इसका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में एवं विभिन्न स्तरों पर देखने को मिलता है जैसे राजनीति, प्रशासनिक, संगठनात्मक, सामाजिक पर्यावरण, व्यवसाय, चिकित्सा, लोकसेवा, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध आदि · कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि नैतिकता सार्वजनिक जीवन के सुचारू रूप संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है|
| 45,264
|
नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| साथ ही, लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the relationship between ethics and human interface or behavior. Also, In the context of public servants, mention the importance of ethics. (150-200 Words; 10 Words)
|
एप्रोच- नीतिशास्त्र के आशय को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| अगले भाग में,लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| उत्तर- नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से हैजो कि सामाजिक परिवेश में देखने को मिलता है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित/अनुचित,शुभ/अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है|नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकर व्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है| नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| नीतिशास्त्र ऐसे मानकों/नियमों/परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| मानवीय आचरण को हमेशा नीतिशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप रखने की आवश्यकता होनी चाहिए| नीतिशास्त्र संस्कृति का परिणाम होता है अतः समाजीकरण की प्रक्रिया का व्यक्ति के नैतिक मूल्यों एवं मानवीय आचरण के विकास में विशेष योगदान होता है| कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है | नीतिशास्त्र का महत्व व्यक्ति के विवेकशीलता, बुद्धिमता एवं तार्किक विश्लेषण पर आधारित है| मानवीय आचरण की नैतिकता का परिक्षण करने में नीतिशास्त्र के निर्धारकनिम्न तत्वों की अहम् भूमिका होती है- मानवीय क्रियाशीलता की परिस्थिति -इस आधार पर मानवीय आचरण3प्रकार के हो सकते हैं यथाउचित(सत्य बोलना),अनुचित(झूठ बोलना),उदासीन| मानवीय क्रियाशीलता जो विषयवस्तु या प्रकृति के आधार पर उचित हो वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के आधार पर अनुचित भी हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता या आचरण जो अपनी विषय-वस्तु या प्रकृति के आधार पर अनुचित हो(जैसे भ्रष्टाचार) वह सदैव अनुचित रहेगा अर्थात वह न ही परिस्थिति न ही प्रयोजन के कारण कभी उचित नहीं हो सकता है| जो मानवीय क्रियाशीलता विषयवस्तु के आधार पर उदासीन हो(न तो उचित/न ही अनुचित) वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के कारण उचित या अनुचित हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता का उद्देश्य/प्रयोजन/नीयत- इस दृष्टिकोण के अनुसार जिस मानवीय आचरण का प्रभाव शुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से उचित होगा एवं जिसका प्रभाव अशुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से अनुचित होगा| मानवीय आचरण का विषय; लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र का महत्व नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को सीमित/प्रतिबंधित करता है| नीतिशास्त्रव्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है| स्व-जवाबदेहिता को विकसित एवं प्रोत्साहित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्व है| नीतिशास्त्र व्यक्तियों के बीच के अंतरपरस्पर सम्बन्ध एवं व्य क्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित एवं प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रसमाजकल्याण,जनहित एवंसामाजिक हित के संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों या व्यक्तियों के व्यवहार के उस पक्ष/आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो| नीतिशास्त्रलोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों के प्रति सामाजिक विश्वास एवं मान्यता को सुदृढ़ करती है| नीतिशास्त्र,समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाता है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है| नीतिशास्त्र सामाजिक एकरूपता को बनाए रखने में लोकसेवकों को विशेष भूमिका अदा करने हेतु प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र मानवीय सहसम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है| अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है जो कि लोकसेवकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा, शांति एवं सहयोग बनाए रखने के लिए अतिआवश्यक है|
|
##Question:नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| साथ ही, लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Underline the relationship between ethics and human interface or behavior. Also, In the context of public servants, mention the importance of ethics. (150-200 Words; 10 Words)##Answer:एप्रोच- नीतिशास्त्र के आशय को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| अगले भाग में,लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| उत्तर- नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से हैजो कि सामाजिक परिवेश में देखने को मिलता है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित/अनुचित,शुभ/अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है|नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकर व्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है| नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| नीतिशास्त्र ऐसे मानकों/नियमों/परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| मानवीय आचरण को हमेशा नीतिशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप रखने की आवश्यकता होनी चाहिए| नीतिशास्त्र संस्कृति का परिणाम होता है अतः समाजीकरण की प्रक्रिया का व्यक्ति के नैतिक मूल्यों एवं मानवीय आचरण के विकास में विशेष योगदान होता है| कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है | नीतिशास्त्र का महत्व व्यक्ति के विवेकशीलता, बुद्धिमता एवं तार्किक विश्लेषण पर आधारित है| मानवीय आचरण की नैतिकता का परिक्षण करने में नीतिशास्त्र के निर्धारकनिम्न तत्वों की अहम् भूमिका होती है- मानवीय क्रियाशीलता की परिस्थिति -इस आधार पर मानवीय आचरण3प्रकार के हो सकते हैं यथाउचित(सत्य बोलना),अनुचित(झूठ बोलना),उदासीन| मानवीय क्रियाशीलता जो विषयवस्तु या प्रकृति के आधार पर उचित हो वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के आधार पर अनुचित भी हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता या आचरण जो अपनी विषय-वस्तु या प्रकृति के आधार पर अनुचित हो(जैसे भ्रष्टाचार) वह सदैव अनुचित रहेगा अर्थात वह न ही परिस्थिति न ही प्रयोजन के कारण कभी उचित नहीं हो सकता है| जो मानवीय क्रियाशीलता विषयवस्तु के आधार पर उदासीन हो(न तो उचित/न ही अनुचित) वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के कारण उचित या अनुचित हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता का उद्देश्य/प्रयोजन/नीयत- इस दृष्टिकोण के अनुसार जिस मानवीय आचरण का प्रभाव शुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से उचित होगा एवं जिसका प्रभाव अशुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से अनुचित होगा| मानवीय आचरण का विषय; लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र का महत्व नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को सीमित/प्रतिबंधित करता है| नीतिशास्त्रव्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है| स्व-जवाबदेहिता को विकसित एवं प्रोत्साहित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्व है| नीतिशास्त्र व्यक्तियों के बीच के अंतरपरस्पर सम्बन्ध एवं व्य क्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित एवं प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रसमाजकल्याण,जनहित एवंसामाजिक हित के संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों या व्यक्तियों के व्यवहार के उस पक्ष/आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो| नीतिशास्त्रलोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों के प्रति सामाजिक विश्वास एवं मान्यता को सुदृढ़ करती है| नीतिशास्त्र,समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाता है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है| नीतिशास्त्र सामाजिक एकरूपता को बनाए रखने में लोकसेवकों को विशेष भूमिका अदा करने हेतु प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र मानवीय सहसम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है| अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है जो कि लोकसेवकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा, शांति एवं सहयोग बनाए रखने के लिए अतिआवश्यक है|
| 45,283
|
नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| साथ ही, लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| (200 शब्द) Underline the relationship between Ethics andHuman Behavior. Also, In the context of Public Servants, Mention the importance of ethics. (200 words)
|
एप्रोच- नीतिशास्त्र के आशय को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| अगले भाग में,लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| उत्तर- नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से हैजो कि सामाजिक परिवेश में देखने को मिलता है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित/अनुचित,शुभ/अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है|नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकरव्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है| नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| नीतिशास्त्र ऐसे मानकों/नियमों/परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| मानवीय आचरण को हमेशा नीतिशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप रखने की आवश्यकता होनी चाहिए| नीतिशास्त्र संस्कृति का परिणाम होता है अतः समाजीकरण की प्रक्रिया का व्यक्ति के नैतिक मूल्यों एवं मानवीय आचरण के विकास में विशेष योगदान होता है| कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है| नीतिशास्त्र का महत्व व्यक्ति के विवेकशीलता, बुद्धिमता एवं तार्किक विश्लेषण पर आधारित है| मानवीय आचरण की नैतिकता का परिक्षण करने में नीतिशास्त्र के निर्धारकनिम्न तत्वों की अहम् भूमिका होती है- मानवीय क्रियाशीलता की परिस्थिति -इस आधार पर मानवीय आचरण3प्रकार के हो सकते हैं यथाउचित(सत्य बोलना),अनुचित(झूठ बोलना),उदासीन| मानवीय क्रियाशीलता जो विषयवस्तु या प्रकृति के आधार पर उचित हो वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के आधार पर अनुचित भी हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता या आचरण जो अपनी विषय-वस्तु या प्रकृति के आधार पर अनुचित हो(जैसे भ्रष्टाचार) वह सदैव अनुचित रहेगा अर्थात वह न ही परिस्थिति न ही प्रयोजन के कारण कभी उचित नहीं हो सकता है| जो मानवीय क्रियाशीलता विषयवस्तु के आधार पर उदासीन हो(न तो उचित/न ही अनुचित) वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के कारण उचित या अनुचित हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता का उद्देश्य/प्रयोजन/नीयत -इस दृष्टिकोण के अनुसार जिस मानवीय आचरण का प्रभाव शुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से उचित होगा एवं जिसका प्रभाव अशुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से अनुचित होगा| मानवीय आचरण का विषय ; लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र का महत्व नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को सीमित/प्रतिबंधित करता है| नीतिशास्त्रव्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है| स्व-जवाबदेहिता को विकसित एवं प्रोत्साहित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्व है| नीतिशास्त्र व्यक्तियों के बीच के अंतरपरस्पर सम्बन्ध एवं व्यक्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित एवं प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रसमाजकल्याण,जनहित एवंसामाजिक हित के संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों या व्यक्तियों के व्यवहार के उस पक्ष/आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो| नीतिशास्त्रलोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों के प्रति सामाजिक विश्वास एवं मान्यता को सुदृढ़ करती है| नीतिशास्त्र,समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाता है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है| नीतिशास्त्र सामाजिक एकरूपता को बनाए रखने में लोकसेवकों को विशेष भूमिका अदा करने हेतु प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र मानवीय सहसम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है| अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है जो कि लोकसेवकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा, शांति एवं सहयोग बनाए रखने के लिए अतिआवश्यक है|
|
##Question:नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| साथ ही, लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| (200 शब्द) Underline the relationship between Ethics andHuman Behavior. Also, In the context of Public Servants, Mention the importance of ethics. (200 words)##Answer:एप्रोच- नीतिशास्त्र के आशय को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण के बीच के संबंध को रेखांकित कीजिए| अगले भाग में,लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र के महत्व का उल्लेख कीजिए| उत्तर- नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से हैजो कि सामाजिक परिवेश में देखने को मिलता है| आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित/अनुचित,शुभ/अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है|नीतिशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत स्तर से सम्बन्धित न होकरव्यक्ति के मानव प्राणी, संगठन का सदस्य एवं समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति से है| नीतिशास्त्र तथा मानवीय आचरण नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| नीतिशास्त्र ऐसे मानकों/नियमों/परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है| मानवीय आचरण को हमेशा नीतिशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप रखने की आवश्यकता होनी चाहिए| नीतिशास्त्र संस्कृति का परिणाम होता है अतः समाजीकरण की प्रक्रिया का व्यक्ति के नैतिक मूल्यों एवं मानवीय आचरण के विकास में विशेष योगदान होता है| कोई मानवीय आचरण बिना नैतिक मूल्यों के उचित नहीं हो सकता है| नीतिशास्त्र का महत्व व्यक्ति के विवेकशीलता, बुद्धिमता एवं तार्किक विश्लेषण पर आधारित है| मानवीय आचरण की नैतिकता का परिक्षण करने में नीतिशास्त्र के निर्धारकनिम्न तत्वों की अहम् भूमिका होती है- मानवीय क्रियाशीलता की परिस्थिति -इस आधार पर मानवीय आचरण3प्रकार के हो सकते हैं यथाउचित(सत्य बोलना),अनुचित(झूठ बोलना),उदासीन| मानवीय क्रियाशीलता जो विषयवस्तु या प्रकृति के आधार पर उचित हो वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के आधार पर अनुचित भी हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता या आचरण जो अपनी विषय-वस्तु या प्रकृति के आधार पर अनुचित हो(जैसे भ्रष्टाचार) वह सदैव अनुचित रहेगा अर्थात वह न ही परिस्थिति न ही प्रयोजन के कारण कभी उचित नहीं हो सकता है| जो मानवीय क्रियाशीलता विषयवस्तु के आधार पर उदासीन हो(न तो उचित/न ही अनुचित) वह परिस्थिति एवं प्रयोजन के कारण उचित या अनुचित हो सकता है| मानवीय क्रियाशीलता का उद्देश्य/प्रयोजन/नीयत -इस दृष्टिकोण के अनुसार जिस मानवीय आचरण का प्रभाव शुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से उचित होगा एवं जिसका प्रभाव अशुभ हो वह आचरण नैतिकता के दृष्टिकोण से अनुचित होगा| मानवीय आचरण का विषय ; लोकसेवकों के संदर्भ में, नीतिशास्त्र का महत्व नीतिशास्त्र लोकसेवकों के स्वनिर्णय की शक्तियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को सीमित/प्रतिबंधित करता है| नीतिशास्त्रव्यक्तियों/लोकसेवकों में उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करता है| स्व-जवाबदेहिता को विकसित एवं प्रोत्साहित करने की दिशा में नीतिशास्त्र का एक विशेष महत्व है| नीतिशास्त्र व्यक्तियों के बीच के अंतरपरस्पर सम्बन्ध एवं व्यक्तियों और लोकसेवकों के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाने में सहायक सिद्ध होता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों/व्यक्तियों के उच्चतम आचरण को विकसित एवं प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रसमाजकल्याण,जनहित एवंसामाजिक हित के संरक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्रलोकसेवकों या व्यक्तियों के व्यवहार के उस पक्ष/आयाम को नियंत्रित करता है जो कि औपचारिक विधि या नियम कानून के द्वारा संभव न हो| नीतिशास्त्रलोकसेवकों में कार्यकुशलता एवं प्रभावशीलता को प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों के प्रति सामाजिक विश्वास एवं मान्यता को सुदृढ़ करती है| नीतिशास्त्र,समाज के दृष्टिकोण में लोकसेवकों की विश्वसनीयता को अधिक सुदृढ़ता प्रदान करता है| नीतिशास्त्र लोकसेवकों एवं राजनीतिज्ञों के मध्य के पारस्परिक सम्बन्ध को अधिक सुचारू बनाता है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा यह निर्णय किया जाना संभव हो पाता है कि उसके लिए क्या उचित या अनुचित है अथवा क्या शुभ या अशुभ है| नीतिशास्त्र के माध्यम से लोकसेवकों के द्वारा लोकसंसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करने हेतु एक विशेष दायित्व उत्पन्न होता है| नीतिशास्त्र सामाजिक एकरूपता को बनाए रखने में लोकसेवकों को विशेष भूमिका अदा करने हेतु प्रोत्साहित करता है| नीतिशास्त्र मानवीय सहसम्बन्ध में परस्पर विश्वास एवं भरोसा उत्पन्न करने में सहायक है| अतः नीतिशास्त्र समाज का एकीकरण करने में सहायक सिद्ध होता है जो कि लोकसेवकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा, शांति एवं सहयोग बनाए रखने के लिए अतिआवश्यक है|
| 45,290
|
Mention the characteristics of Peninsular India and briefly discuss the mineral types found there. (150 words/10 Marks)
|
Brief Approach:- Write a brief introduction on the geological regions of India with focus on Peninsular India. Write down some of its characteristics. Discuss the rocks types associated with Peninsular India. Please look for the diagram in the answer. Answer:- India comprises of three geological regions – peninsular India, northern mountains and the northern plains. The peninsular region extends up to the Aravali range near Delhi in the north and runs parallel to Ganga until the Rajmahal Hills in the east. The Karbi Anglong and the Meghalayan plateau also form a part of it separated by the Malda fault in West Bengal. In Rajasthan, the desert-like features overlay this block. Characteristics of Peninsular Block:- This region is composed of a great complex of ancient granite (igneous) and gneiss (metamorphic) rocks. Since it is old, it has undergone heavy weathering and thus it consists of relict and residual mountains like the Aravali hills, Nallamala hills, Javadi hills, Veliconda hills, the Palkonda range. The rivers here are flowing in their mature stage and are characterised by shallow valleys with a low gradient. The region is tectonically stable however there have been certain exceptions such as the submergence of the western coast, the rift valleys of Narmada, Tapi etc. Types of rock found:- Archean - They are the oldest rocks of earth’s crust and contains very little organic matter. They comprise of metallic minerals, radioactive metals like Uranium. These rocks are found around Bundelkhand, Bengal, Nilgiri in India. Dharwad - These are old rocks too found around Aravali, Chotanagpur region in India. These are rich in minerals such as Copper, Gold. Cuddapah - These rocks are famous for their shale formation where shale gases are found. The region they are found in are- Krishna valley, Nallamala hills. They also contain limestone reserves. Vindhyan - They are found near Chittorgarh, Sasaram. They are famous for slates, precious stones etc. Gondwana - These rocks are from the upper and middle Carboniferous period and thus are regions of reserves of coal. Found around the Damodar, Mahanadi valley. The coal found is mostly of Bituminous quality. Deccan trap - Found in the peninsular region around Maharashtra, these rocks are the result of volcanic activity. They were formed as Indian plate was moving over the Reunion islands from the mantle plumes. They are regions of Black soil (regur) and are associated with Cotton cultivation. Tertiary and quaternary - They are the most recent formed rocks in India. Found in the eastern coastal region, the Kutch region. They are characterized by the presence of natural gas reserves, crude oil reserves etc. The peninsular block is one of the most diverse and oldest regions in India in terms of its composition. They are also the source of many mineral and energy resources found in India. Studying the physiography of the region will not only help us understand more about the evolution of Earth but also contribute to India"s economic growth.
|
##Question:Mention the characteristics of Peninsular India and briefly discuss the mineral types found there. (150 words/10 Marks)##Answer:Brief Approach:- Write a brief introduction on the geological regions of India with focus on Peninsular India. Write down some of its characteristics. Discuss the rocks types associated with Peninsular India. Please look for the diagram in the answer. Answer:- India comprises of three geological regions – peninsular India, northern mountains and the northern plains. The peninsular region extends up to the Aravali range near Delhi in the north and runs parallel to Ganga until the Rajmahal Hills in the east. The Karbi Anglong and the Meghalayan plateau also form a part of it separated by the Malda fault in West Bengal. In Rajasthan, the desert-like features overlay this block. Characteristics of Peninsular Block:- This region is composed of a great complex of ancient granite (igneous) and gneiss (metamorphic) rocks. Since it is old, it has undergone heavy weathering and thus it consists of relict and residual mountains like the Aravali hills, Nallamala hills, Javadi hills, Veliconda hills, the Palkonda range. The rivers here are flowing in their mature stage and are characterised by shallow valleys with a low gradient. The region is tectonically stable however there have been certain exceptions such as the submergence of the western coast, the rift valleys of Narmada, Tapi etc. Types of rock found:- Archean - They are the oldest rocks of earth’s crust and contains very little organic matter. They comprise of metallic minerals, radioactive metals like Uranium. These rocks are found around Bundelkhand, Bengal, Nilgiri in India. Dharwad - These are old rocks too found around Aravali, Chotanagpur region in India. These are rich in minerals such as Copper, Gold. Cuddapah - These rocks are famous for their shale formation where shale gases are found. The region they are found in are- Krishna valley, Nallamala hills. They also contain limestone reserves. Vindhyan - They are found near Chittorgarh, Sasaram. They are famous for slates, precious stones etc. Gondwana - These rocks are from the upper and middle Carboniferous period and thus are regions of reserves of coal. Found around the Damodar, Mahanadi valley. The coal found is mostly of Bituminous quality. Deccan trap - Found in the peninsular region around Maharashtra, these rocks are the result of volcanic activity. They were formed as Indian plate was moving over the Reunion islands from the mantle plumes. They are regions of Black soil (regur) and are associated with Cotton cultivation. Tertiary and quaternary - They are the most recent formed rocks in India. Found in the eastern coastal region, the Kutch region. They are characterized by the presence of natural gas reserves, crude oil reserves etc. The peninsular block is one of the most diverse and oldest regions in India in terms of its composition. They are also the source of many mineral and energy resources found in India. Studying the physiography of the region will not only help us understand more about the evolution of Earth but also contribute to India"s economic growth.
| 45,294
|
सतत विकास लक्ष्य(SDGs) क्या हैं? भारत में सतत विकास लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या प्रयास किया जा रहा है? उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द,10 अंक) What are Sustainable Development Goals (SDGs)? What efforts are being made to fulfill the sustainable development goals in India? Illustrate with examples. (150-200 words, 10 Marks)
|
एप्रोच- पहले भाग में सतत विकास लक्ष्य की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए लक्ष्यों एवं उसके उद्देश्यों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताईये| दूसरे भाग में, भारत में इन लक्ष्यों को पूरा करने हेतु किये जा रहे प्रयासों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- सतत विकास एक ऐसा विकास है जो आने वाली पीढ़ियों के हितों से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है| सतत विकास की संकल्पनापर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोगके द्वारा दी गयी थी| 1 992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में सतत विकास की प्राप्ति हेतु एजेंडा 21नामक कार्ययोजना अपनाई गई थी| उसके बाद रियो+10(जोहांसबर्ग सम्मेलन)- 2002 में सहस्राब्दी विकास लक्ष्य(एमडीजी )को लागू करने का लक्ष्य रखा गया| सतत विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन(रियो+20) में 7 क्षेत्रों को चिन्हित किया गया था जिनपर प्राथमिकता देकर सतत विकास की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है| इस दस्तावेज मेंसतत विकास लक्ष्यों(एसडीजी)को विकसित करने हेतु समर्थन प्रदान किया गया था| सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों(जो कि 2015 में समाप्त हो गया था) के स्थान पर आगे का विकास एजेंडा अंगीकृत करने के लिए 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सहस्राब्दी सतत विकास लक्ष्य 2030 को अंगीकृत किया|इसका उद्दे श्य 2015 से 2030 तक गरीबी और भुखमरी को समाप्त करके तथा लैंगिक समानता सुनिश्चित करके समावेशी विकास को बढ़ावा देना है| इसमेंअगले 15 साल के लिए(2015-2030) 17 लक्ष्य तथा 169 प्रयोजन तय किए गए| इसमें गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य-सुरक्षा, समावेशी शिक्षा, लैंगिक समानता, जलवायु परिवर्तन का शमन तथा अनुकूलन एवं स्थायी सतत विकास हेतु अन्य लक्ष्य शामिल हैं| सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने हेतु भारत द्वारा किए गए प्रयास भारत ने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के दिशा में जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय(UNFCCC) तथा जैव विविधता संबंधी अभिसमय(सीबीडी) पर हस्ताक्षर किया है| राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के द्वारा स्वच्छ पर्यावरण तथा पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन; पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने हेतुराष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010 के माध्यम से एनजीटी का गठन; भारत में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं| जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत 8 आरंभिक उप मिशन तथा बाद में 4 और उपमिशन(कुल 12 उपमिशन) के द्वारा बहुआयामी एवंव्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है| राष्ट्रीय सौर मिशन - 2022 तक 100 गीगावॉट नवीकरणीय सौर ऊर्जा उत्पादन;अल्ट्रा मेगा सौर ऊर्जा परियोजनाएं;ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर; अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन आदि| राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा दक्षता मिशन - 2022 तक 10000 मेगावाट ऊर्जा बचत का लक्ष्य; राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन - नगरीय परिवहन,ऊर्जा दक्षता,ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि पर ध्यान;ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता; अमृत; स्मार्ट सिटी आदि; राष्ट्रीय जल मिशन - जल उपयोग की दक्षता बढ़ाना, बेसिन प्रबंधन आदि; हिमालय पारितंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय अभियान राष्ट्रीय हरित भारत मिशन - वनारोपण; राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीतिक ज्ञान मिशन राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन; राष्ट्रीय अवशिष्ट से ऊर्जा मिशन; राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन संबंधित स्वास्थ्य मिशन; राष्ट्रीय तटवर्तीय क्षेत्र मिशन; इसके अलावा सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए और भी अभियान/कार्यक्रम चलाए गए हैं- मनरेगा; राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान; राष्ट्रीय कृषि विकास योजना; इंटीग्रेटेड वॉटरशड मैनेजमेंट प्रोग्राम; परफॉर्म अचीवट्रेड योजना; सोलर रूफटॉप इन्वेस्टमेंट कार्यक्रम; प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना; स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम; आयुष्मान भारत; स्वच्छ भारत अभियान आदि|
|
##Question:सतत विकास लक्ष्य(SDGs) क्या हैं? भारत में सतत विकास लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या प्रयास किया जा रहा है? उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द,10 अंक) What are Sustainable Development Goals (SDGs)? What efforts are being made to fulfill the sustainable development goals in India? Illustrate with examples. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में सतत विकास लक्ष्य की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए लक्ष्यों एवं उसके उद्देश्यों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताईये| दूसरे भाग में, भारत में इन लक्ष्यों को पूरा करने हेतु किये जा रहे प्रयासों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिये| उत्तर- सतत विकास एक ऐसा विकास है जो आने वाली पीढ़ियों के हितों से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है| सतत विकास की संकल्पनापर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोगके द्वारा दी गयी थी| 1 992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में सतत विकास की प्राप्ति हेतु एजेंडा 21नामक कार्ययोजना अपनाई गई थी| उसके बाद रियो+10(जोहांसबर्ग सम्मेलन)- 2002 में सहस्राब्दी विकास लक्ष्य(एमडीजी )को लागू करने का लक्ष्य रखा गया| सतत विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन(रियो+20) में 7 क्षेत्रों को चिन्हित किया गया था जिनपर प्राथमिकता देकर सतत विकास की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है| इस दस्तावेज मेंसतत विकास लक्ष्यों(एसडीजी)को विकसित करने हेतु समर्थन प्रदान किया गया था| सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों(जो कि 2015 में समाप्त हो गया था) के स्थान पर आगे का विकास एजेंडा अंगीकृत करने के लिए 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सहस्राब्दी सतत विकास लक्ष्य 2030 को अंगीकृत किया|इसका उद्दे श्य 2015 से 2030 तक गरीबी और भुखमरी को समाप्त करके तथा लैंगिक समानता सुनिश्चित करके समावेशी विकास को बढ़ावा देना है| इसमेंअगले 15 साल के लिए(2015-2030) 17 लक्ष्य तथा 169 प्रयोजन तय किए गए| इसमें गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य-सुरक्षा, समावेशी शिक्षा, लैंगिक समानता, जलवायु परिवर्तन का शमन तथा अनुकूलन एवं स्थायी सतत विकास हेतु अन्य लक्ष्य शामिल हैं| सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने हेतु भारत द्वारा किए गए प्रयास भारत ने सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के दिशा में जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय(UNFCCC) तथा जैव विविधता संबंधी अभिसमय(सीबीडी) पर हस्ताक्षर किया है| राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के द्वारा स्वच्छ पर्यावरण तथा पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन; पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने हेतुराष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010 के माध्यम से एनजीटी का गठन; भारत में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं| जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत 8 आरंभिक उप मिशन तथा बाद में 4 और उपमिशन(कुल 12 उपमिशन) के द्वारा बहुआयामी एवंव्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है| राष्ट्रीय सौर मिशन - 2022 तक 100 गीगावॉट नवीकरणीय सौर ऊर्जा उत्पादन;अल्ट्रा मेगा सौर ऊर्जा परियोजनाएं;ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर; अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन आदि| राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा दक्षता मिशन - 2022 तक 10000 मेगावाट ऊर्जा बचत का लक्ष्य; राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन - नगरीय परिवहन,ऊर्जा दक्षता,ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि पर ध्यान;ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता; अमृत; स्मार्ट सिटी आदि; राष्ट्रीय जल मिशन - जल उपयोग की दक्षता बढ़ाना, बेसिन प्रबंधन आदि; हिमालय पारितंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय अभियान राष्ट्रीय हरित भारत मिशन - वनारोपण; राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीतिक ज्ञान मिशन राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन; राष्ट्रीय अवशिष्ट से ऊर्जा मिशन; राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन संबंधित स्वास्थ्य मिशन; राष्ट्रीय तटवर्तीय क्षेत्र मिशन; इसके अलावा सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए और भी अभियान/कार्यक्रम चलाए गए हैं- मनरेगा; राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान; राष्ट्रीय कृषि विकास योजना; इंटीग्रेटेड वॉटरशड मैनेजमेंट प्रोग्राम; परफॉर्म अचीवट्रेड योजना; सोलर रूफटॉप इन्वेस्टमेंट कार्यक्रम; प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना; स्ट्रीट लाइटिंग कार्यक्रम; आयुष्मान भारत; स्वच्छ भारत अभियान आदि|
| 45,295
|
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष चुनौतियों का संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Briefly mention the challenges to India at the time of Independence.
|
एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| इसके पश्चात तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अंत में,भारत के विभाजन से उत्पन चुनौतियों का संछिप्त में समाधान बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंतहो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँभी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ | जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास सीमा का निर्धारण कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया|
|
##Question:स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष चुनौतियों का संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (200 शब्द) Briefly mention the challenges to India at the time of Independence.##Answer:एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| इसके पश्चात तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन समस्याओं तथा चुनौतियों का जिक्र कीजिये| अंत में,भारत के विभाजन से उत्पन चुनौतियों का संछिप्त में समाधान बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंतहो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँभी विद्यमान थी- धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ | जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास सीमा का निर्धारण कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण विभाजन के पश्चात साम्प्रदायिकता के मुद्दे को भारत सरकार ने गंभीरता से लिया तथा वैचारिक स्तर के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के स्तर पर भी नेहरु एवं पटेल ने कठोरता बरती तथा शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण पा लिया गया| साथ ही, संविधान में अल्पसंख्यकों को विशेष प्रावधानों के माध्यम से सुरक्षा का आश्वासन दिया गया| पश्चिमी सीमा में शरणार्थियों की समस्या को सुगम तरीके से पुनर्वास के माध्यम से समाधान का प्रयास किया गया|
| 45,310
|
संसदीय कार्यवाही के साधनों का संक्षिप्त विवरण देते हुए निंदा एवं अविश्वास प्रस्ताव में अंतर स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Giving a brief description of the means of parliamentary proceeding, make the difference in censure and no confidence motion. (150-200 words; 10 Marks)
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में संसदीय कार्यवाही के साधन का परिचय दीजिए। इसके बाद कार्यवाही के साधन का विवरण दीजिए। निंदा एवं अविश्वास प्रस्ताव में अंतर स्पष्ट कीजिए। उत्तर- भारत की संसदीय व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए प्रक्रिया नियम का प्रयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत अनेक साधन हैं जो प्रतिदिन के कार्य को पूर्ण करने के लिए निर्देशित करते हैं। इसके साथ ही कुछ ऐसे भी साधन हैं जिसका उल्लेख प्रक्रिया नियमों में नहीं है। सभी प्रक्रिया नियमों में से कुछ प्रमुख साधनों का विवरण इस प्रकार है: प्रश्नकाल: संसद का पहला घंटा प्रश्नकाल के लिए होता है। इसमें तारांकित, अतारांकित, अल्प सूचना के प्रश्न पुछे जाते हैं। तारांकित प्रश्नों का उत्तर मौखिक दिया जाता है। जबकि अतारांकित प्रश्न के मामले में लिखित रिपोर्ट आवश्यक है। शून्यकाल: प्रक्रिया नियमों में इसका उल्लेख नहीं है। संसद सदस्य बिना पूर्व सूचना के मामले उठा सकते हैं। संसदीय प्रक्रिया में यह भारत की देन है। विशेषाधिकार प्रस्ताव: यह किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है, जब सदस्य यह महसूस करता है कि सही तथ्यों को प्रकट नहीं कर गलत सूचना देकर किसी मंत्री ने सदन के सदस्यों का विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है। इसका उद्देश्य मंत्री की निंदा करना है। स्थगन प्रस्ताव: यह लोकसभा में अविलंबनीय महत्व के मामले पर सदन में चर्चा करने के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है। निंदा प्रस्ताव तथा अविश्वास प्रस्ताव में अंतर: निंदा प्रस्ताव अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में इसे स्वीकार करने का कारण बताना अनिवार्य है लोकसभा में इसे स्वीकार करने का कारण बताना अनिवार्य नहीं है। यह किसी एक मंत्री या सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है। यह सिर्फ पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध ही लाया जा सकता है। यदि लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है। लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना अनिवार्य है। सरकारके नीतियों से असहमति प्रकट करने के लिए लाया जाता है। सरकार को अपदस्थ करने हेतु लाया जाता है।
|
##Question:संसदीय कार्यवाही के साधनों का संक्षिप्त विवरण देते हुए निंदा एवं अविश्वास प्रस्ताव में अंतर स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Giving a brief description of the means of parliamentary proceeding, make the difference in censure and no confidence motion. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में संसदीय कार्यवाही के साधन का परिचय दीजिए। इसके बाद कार्यवाही के साधन का विवरण दीजिए। निंदा एवं अविश्वास प्रस्ताव में अंतर स्पष्ट कीजिए। उत्तर- भारत की संसदीय व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए प्रक्रिया नियम का प्रयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत अनेक साधन हैं जो प्रतिदिन के कार्य को पूर्ण करने के लिए निर्देशित करते हैं। इसके साथ ही कुछ ऐसे भी साधन हैं जिसका उल्लेख प्रक्रिया नियमों में नहीं है। सभी प्रक्रिया नियमों में से कुछ प्रमुख साधनों का विवरण इस प्रकार है: प्रश्नकाल: संसद का पहला घंटा प्रश्नकाल के लिए होता है। इसमें तारांकित, अतारांकित, अल्प सूचना के प्रश्न पुछे जाते हैं। तारांकित प्रश्नों का उत्तर मौखिक दिया जाता है। जबकि अतारांकित प्रश्न के मामले में लिखित रिपोर्ट आवश्यक है। शून्यकाल: प्रक्रिया नियमों में इसका उल्लेख नहीं है। संसद सदस्य बिना पूर्व सूचना के मामले उठा सकते हैं। संसदीय प्रक्रिया में यह भारत की देन है। विशेषाधिकार प्रस्ताव: यह किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है, जब सदस्य यह महसूस करता है कि सही तथ्यों को प्रकट नहीं कर गलत सूचना देकर किसी मंत्री ने सदन के सदस्यों का विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है। इसका उद्देश्य मंत्री की निंदा करना है। स्थगन प्रस्ताव: यह लोकसभा में अविलंबनीय महत्व के मामले पर सदन में चर्चा करने के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है। निंदा प्रस्ताव तथा अविश्वास प्रस्ताव में अंतर: निंदा प्रस्ताव अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में इसे स्वीकार करने का कारण बताना अनिवार्य है लोकसभा में इसे स्वीकार करने का कारण बताना अनिवार्य नहीं है। यह किसी एक मंत्री या सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है। यह सिर्फ पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध ही लाया जा सकता है। यदि लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है। लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना अनिवार्य है। सरकारके नीतियों से असहमति प्रकट करने के लिए लाया जाता है। सरकार को अपदस्थ करने हेतु लाया जाता है।
| 45,322
|
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की विभिन्न उपलब्धियों का जिक्र कीजिए| मांट्रियल प्रोटोकॉल के इतने सफल होने के बावजूद भी किगाली समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी थी? (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the various achievements of Montreal Protocol. Despite the success of Montreal Protocol, Why did the Kigali agreement be required? (150-200 Words; 10 Marks)
|
एप्रोच- मांट्रियल प्रोटोकॉल के बारे में बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,मांट्रियल प्रोटॉकोल की विभिन्न उपलब्धियों का जिक्र कीजिए| अगले भाग में, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता को दर्शाते हुए, यह बताइए की किगाली समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी? उत्तर- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसके माध्यम से ओजोन परत के क्षरण हेतु जिम्मेदार पदार्थों के उत्पादन एवं उपभोग में कमी लाने का प्रयास किया गया था| सं युक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के प्रयासों से 1987 में इस प्रोटोकॉल को अपनाया गया था| इस प्रोटोकॉल के माध्यम से बाध्यकारी समझौते के तहत उत्सर्जन कम करने हेतु तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उपयोग एवं उत्पादन को पूरी तरीके से प्रतिबंधित करने हेतु विकसित एवं विकासशील देशों को अलग अलग समय सीमा का पालन करना था| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की उपलब्धियां ओजोन विघटनकारी पदार्थों का खात्मा - 2010 तक इस प्रोटोकॉल के माध्यम से सीएफसीसी तथाहेलॉन जैसे कई प्रमुख विघटनकारी तत्वों के उत्पादन तथा उपभोग पर अंकुश लगा लिया गया है| ओजोन परत का संरक्षण तथा उसकी मोटाई में बढ़ोतरी; वैश्विक तापन रोकने में भूमिका - सीएफसी हेलॉन, कार्बन टेट्राक्लोराइडजैसे ओजोन विघटनकारी पदार्थोंद्वारा वैश्विक तापन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती थी| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत इनपर रोकलगने से वैश्विक तापन की समस्या को भी हल करने में मदद मिलेगी| वैश्विक सहयोग का अनूठा उदाहरण यह प्रोटोकॉल पेश करता है| वस्तुतः यह एकमात्र ऐसी पर्यावरण संधि है जिसे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशअपनाते हैं| विकासशील देशों को संधि के क्रियान्वयन हेतु बहुपक्षीय फंड के माध्यम से विकसित देशों द्वारा वित की आपूर्ति सुनिश्चित हुई| लक्ष्यों को पूरा करने में विकसित एवं विकासशील देशों का व्यापक सहयोग एवं उत्साह ; स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संबंधी लाभ - इससे एक ओर जहाँ त्वचा कैंसर, सनबर्न जैसी बीमारियों से राहत मिली वहीं देशों को स्वास्थ्य क्षेत्र में कम सार्वजनिक करना पड़ा| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के क्रियान्वयन के 30 वर्षों के दौरान इस संधि ने असाधारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण पेश किया है| संयुक्त राष्ट्र के सभी 197 सदस्य देशों द्वारा मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अपनाने से इसे सार्वभौमिक समझौते के रूप में गिना जाता है|साथ ही, इसे इतिहास में सबसे अधिक सफल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि माना गया है| इसमें जनता, उद्योगों तथा सरकारों की जागरूकता; गैर हस्ताक्षरकर्ता देशों के प्रति व्यापार प्रतिबंध जैसे कठोर कदम; प्रोटोकॉल के तहत मजबूत प्रवर्तन प्रावधानों के साथ-साथ सुव्यवस्थित प्रतिबद्धता; वैश्विक जानकारियों एवं शोधों के साथ इसे लचीला बनाया जाना जैसे कदम सफलता हेतु उत्तरदायी थें| किगाली समझौता तथा इसकी आवश्यकता के पक्ष में तर्क 2016 के किगाली समझौते के द्वारा मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन करके हाइड्रोफ्लोरो कार्बन(HFC) श्रेणी के हरितगृह गैसों को भी नियमन के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है| इसमेंसभी हस्ताक्षरकर्ता देशों को HFC गैसों की कटौती की अलग-अलग समयसीमा के साथ तीन समूहों में विभाजित किया गया है| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल केवल ओजोन परत के जिम्मेदार ओजोन विघटनकारी पदार्थों के खात्मे पर केंद्रित था जिससे उसका दृष्टिकोण जलवायु परिवर्तन के अन्य आयामों के प्रति संकुचित था| ओजोन विघटनकारी पदार्थों(मुख्यतः CFCs) पर ही सिर्फ ध्यान देने से वैश्विक तापन से जुड़े उनके अन्य आयामों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया था| किगाली समझौते में ओजोन विघटनकारी पदार्थों के वैश्विक तापन में उनके योगदान वाले पक्ष पर ध्यान दिया गया है| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत CFCs पर रोक लगने से उसके विस्थापक के रूप में HFCs का व्यापक प्रयोग चालु हो गया था| HFCs कीओजोन विघटनकारी क्षमता तो नगण्य है परंतु इसकी वैश्विक तापन क्षमता काफी ज्यादा है| जलवायु परिवर्तन पर रोकथाम लगाने हेतुHFCsके उत्पादन तथा उपभोग पर भी नियंत्रण लगाना आवश्यक हो चला था| इस संदर्भमें, किगाली समझौता आवश्यक था| सभी पर्यावरणीय समझौते के लक्ष्यों को एकीकृत करने की दिशा में भी यह प्रयास जरुरी था|
|
##Question:मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की विभिन्न उपलब्धियों का जिक्र कीजिए| मांट्रियल प्रोटोकॉल के इतने सफल होने के बावजूद भी किगाली समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी थी? (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the various achievements of Montreal Protocol. Despite the success of Montreal Protocol, Why did the Kigali agreement be required? (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- मांट्रियल प्रोटोकॉल के बारे में बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,मांट्रियल प्रोटॉकोल की विभिन्न उपलब्धियों का जिक्र कीजिए| अगले भाग में, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता को दर्शाते हुए, यह बताइए की किगाली समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी? उत्तर- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसके माध्यम से ओजोन परत के क्षरण हेतु जिम्मेदार पदार्थों के उत्पादन एवं उपभोग में कमी लाने का प्रयास किया गया था| सं युक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के प्रयासों से 1987 में इस प्रोटोकॉल को अपनाया गया था| इस प्रोटोकॉल के माध्यम से बाध्यकारी समझौते के तहत उत्सर्जन कम करने हेतु तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उपयोग एवं उत्पादन को पूरी तरीके से प्रतिबंधित करने हेतु विकसित एवं विकासशील देशों को अलग अलग समय सीमा का पालन करना था| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की उपलब्धियां ओजोन विघटनकारी पदार्थों का खात्मा - 2010 तक इस प्रोटोकॉल के माध्यम से सीएफसीसी तथाहेलॉन जैसे कई प्रमुख विघटनकारी तत्वों के उत्पादन तथा उपभोग पर अंकुश लगा लिया गया है| ओजोन परत का संरक्षण तथा उसकी मोटाई में बढ़ोतरी; वैश्विक तापन रोकने में भूमिका - सीएफसी हेलॉन, कार्बन टेट्राक्लोराइडजैसे ओजोन विघटनकारी पदार्थोंद्वारा वैश्विक तापन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती थी| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत इनपर रोकलगने से वैश्विक तापन की समस्या को भी हल करने में मदद मिलेगी| वैश्विक सहयोग का अनूठा उदाहरण यह प्रोटोकॉल पेश करता है| वस्तुतः यह एकमात्र ऐसी पर्यावरण संधि है जिसे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशअपनाते हैं| विकासशील देशों को संधि के क्रियान्वयन हेतु बहुपक्षीय फंड के माध्यम से विकसित देशों द्वारा वित की आपूर्ति सुनिश्चित हुई| लक्ष्यों को पूरा करने में विकसित एवं विकासशील देशों का व्यापक सहयोग एवं उत्साह ; स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संबंधी लाभ - इससे एक ओर जहाँ त्वचा कैंसर, सनबर्न जैसी बीमारियों से राहत मिली वहीं देशों को स्वास्थ्य क्षेत्र में कम सार्वजनिक करना पड़ा| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के क्रियान्वयन के 30 वर्षों के दौरान इस संधि ने असाधारण अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण पेश किया है| संयुक्त राष्ट्र के सभी 197 सदस्य देशों द्वारा मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अपनाने से इसे सार्वभौमिक समझौते के रूप में गिना जाता है|साथ ही, इसे इतिहास में सबसे अधिक सफल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि माना गया है| इसमें जनता, उद्योगों तथा सरकारों की जागरूकता; गैर हस्ताक्षरकर्ता देशों के प्रति व्यापार प्रतिबंध जैसे कठोर कदम; प्रोटोकॉल के तहत मजबूत प्रवर्तन प्रावधानों के साथ-साथ सुव्यवस्थित प्रतिबद्धता; वैश्विक जानकारियों एवं शोधों के साथ इसे लचीला बनाया जाना जैसे कदम सफलता हेतु उत्तरदायी थें| किगाली समझौता तथा इसकी आवश्यकता के पक्ष में तर्क 2016 के किगाली समझौते के द्वारा मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन करके हाइड्रोफ्लोरो कार्बन(HFC) श्रेणी के हरितगृह गैसों को भी नियमन के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है| इसमेंसभी हस्ताक्षरकर्ता देशों को HFC गैसों की कटौती की अलग-अलग समयसीमा के साथ तीन समूहों में विभाजित किया गया है| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल केवल ओजोन परत के जिम्मेदार ओजोन विघटनकारी पदार्थों के खात्मे पर केंद्रित था जिससे उसका दृष्टिकोण जलवायु परिवर्तन के अन्य आयामों के प्रति संकुचित था| ओजोन विघटनकारी पदार्थों(मुख्यतः CFCs) पर ही सिर्फ ध्यान देने से वैश्विक तापन से जुड़े उनके अन्य आयामों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया था| किगाली समझौते में ओजोन विघटनकारी पदार्थों के वैश्विक तापन में उनके योगदान वाले पक्ष पर ध्यान दिया गया है| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत CFCs पर रोक लगने से उसके विस्थापक के रूप में HFCs का व्यापक प्रयोग चालु हो गया था| HFCs कीओजोन विघटनकारी क्षमता तो नगण्य है परंतु इसकी वैश्विक तापन क्षमता काफी ज्यादा है| जलवायु परिवर्तन पर रोकथाम लगाने हेतुHFCsके उत्पादन तथा उपभोग पर भी नियंत्रण लगाना आवश्यक हो चला था| इस संदर्भमें, किगाली समझौता आवश्यक था| सभी पर्यावरणीय समझौते के लक्ष्यों को एकीकृत करने की दिशा में भी यह प्रयास जरुरी था|
| 45,328
|
गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए। साथ ही NGOs काउत्तरदायित्व तय करने मेंसरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। (150 शब्द) highlight various issues related to non-governmental organizations (NGOs). Also, discuss the role of government in fixingthe accountability ofNGOs. (150 words)
|
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में NGOs का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए।साथ ही NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशनयानी गैर सरकारी संगठन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समस्याओं और विकास की गतिविधियों को बढावा देना होता है। इस फील्ड में महिला समस्या, बाल विकास, मानवाधिकार, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, शिक्षा इत्यादि से संबंधित स्वैच्छिक कार्य किये जाते हैं। गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दे;- खातों का हिसाब:- सीबीआई के अनुसार भारत में केवल 8 से 10 प्रतिशत NGOs ही अपने एकाउंट्स को फाइल करते हैं। इसलिए इनमें पारदर्शिता की कमी है। धन के दुरुपयोग का आरोप:- किसी क़ानूनी नियामकीय ढांचे के अभावके कारण NGOs की गतिविधियों को आशंका की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार मनीलॉन्ड्रिंग और गैर-क़ानूनी गतिविधियों में भी पैसा लगाने का आरोप लगता है। FCRA:- फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट NGOs को विदेशी धन प्राप्त करने की आज्ञा देता है लेकिन NGOs पर FCRA के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं। अभी हाल ही में सरकार द्वारा 20,000 NGOs को विदेशी धन लेने से रोका गया। वेस्टेड इंटरेस्ट:- विभिन्न NGOs पर, विभिन्न परियोजनाओं पर प्रदर्शन से सम्बंधित वेस्टेड इंटरेस्ट के आरोप भी लगते हैं कि वे जनता के हित में कार्य नहीं करते। जल्लिकट्टु एवं कुडनकुलम परमाणु परियोजना के विरोध प्रदर्शनों पर यही आरोप लगे थे। हालाँकि प्रथम, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट जैसे NGOs ने सामाजिक एवं विकास के पहलुओं पर अपना प्रशंसनीय योगदान दिया है। NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका:- भारत सरकार द्वारा वित्तीय अनुदान को आसान बनाने हेतु ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ई-गवर्नेंस के अंतर्गत NGO दर्पण पोर्टल बनाया है। इन NGOs के नियमन हेतु यह अपेक्षित है कि वे न सिर्फ स्वयं ही इंटरनल ऑडिट करते हों जिसकी एक प्रतिलिपि संबंधित अधिकारियों को फॉरवर्ड की जाये। साथ ही यदि आवश्यक हुआ तो शासन द्वारा भी उनका ऑडिट कराया जा सकता है। ये गैर सरकारी संगठन सोशल ऑडिट के अंतर्गत आते हैं जिसमें कोई भी नागरिक इनके क्रियान्वयन, बजटीय आवंटन इत्यादि संदर्भों परप्रश्न उठा सकता है। अतः NGOs की पारदर्शिता की दिशा में यह अच्छा कदम है। उपरोक्त समस्याओं केसमाधान के लिए योजना आयोग ने अपनी 11वीं एवं 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक स्वतंत्रराष्ट्रीय प्रमाणन एजेंसी के गठन का सुझाव दिया। इस एजेंसी के मैंडेट में NGOsकी रेटिंग्स जारी करना, जिससे इनमे पारदर्शिता एवं धन जुटाने में मदद मिले एवं वेस्टेड इंटरेस्ट को कम करने में भी यह एजेंसी सहायक सिद्ध हो, शामिल था। हालाँकि एजेंसी को रैंक देने की समस्या का सामना करना पड़सकता है जैसे विभिन्न NGOs के कार्यों की प्रकृति भिन्न भिन्न होती है एवं उनके ग्राउंड पर कार्य भी बहुत ही अलग किस्म के हो सकते हैं जैसे एक पेड़ लगाने वाले NGO से रिसर्च करने वाले NGO से तुलना करना एवं रेटिंग प्रदान करना अव्यवहारिक सिद्ध होगाइत्यादि। अतः इन समस्याओं के बावजूद एक स्वतंत्र प्रमाणन एजेंसी रैंकिंग सिस्टम को तैयार कर मददगार साबित हो सकती है। सरकारी कार्यों के विकल्प के तौर पर NGOs की भूमिका को प्रमोट करने से लायक NGOs को स्वीकृति मिलेगी एवं फर्जी NGOs स्वतः समाप्त हो जायेंगे।
|
##Question:गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए। साथ ही NGOs काउत्तरदायित्व तय करने मेंसरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। (150 शब्द) highlight various issues related to non-governmental organizations (NGOs). Also, discuss the role of government in fixingthe accountability ofNGOs. (150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में NGOs का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए।साथ ही NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशनयानी गैर सरकारी संगठन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समस्याओं और विकास की गतिविधियों को बढावा देना होता है। इस फील्ड में महिला समस्या, बाल विकास, मानवाधिकार, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, शिक्षा इत्यादि से संबंधित स्वैच्छिक कार्य किये जाते हैं। गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दे;- खातों का हिसाब:- सीबीआई के अनुसार भारत में केवल 8 से 10 प्रतिशत NGOs ही अपने एकाउंट्स को फाइल करते हैं। इसलिए इनमें पारदर्शिता की कमी है। धन के दुरुपयोग का आरोप:- किसी क़ानूनी नियामकीय ढांचे के अभावके कारण NGOs की गतिविधियों को आशंका की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार मनीलॉन्ड्रिंग और गैर-क़ानूनी गतिविधियों में भी पैसा लगाने का आरोप लगता है। FCRA:- फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट NGOs को विदेशी धन प्राप्त करने की आज्ञा देता है लेकिन NGOs पर FCRA के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं। अभी हाल ही में सरकार द्वारा 20,000 NGOs को विदेशी धन लेने से रोका गया। वेस्टेड इंटरेस्ट:- विभिन्न NGOs पर, विभिन्न परियोजनाओं पर प्रदर्शन से सम्बंधित वेस्टेड इंटरेस्ट के आरोप भी लगते हैं कि वे जनता के हित में कार्य नहीं करते। जल्लिकट्टु एवं कुडनकुलम परमाणु परियोजना के विरोध प्रदर्शनों पर यही आरोप लगे थे। हालाँकि प्रथम, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट जैसे NGOs ने सामाजिक एवं विकास के पहलुओं पर अपना प्रशंसनीय योगदान दिया है। NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका:- भारत सरकार द्वारा वित्तीय अनुदान को आसान बनाने हेतु ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ई-गवर्नेंस के अंतर्गत NGO दर्पण पोर्टल बनाया है। इन NGOs के नियमन हेतु यह अपेक्षित है कि वे न सिर्फ स्वयं ही इंटरनल ऑडिट करते हों जिसकी एक प्रतिलिपि संबंधित अधिकारियों को फॉरवर्ड की जाये। साथ ही यदि आवश्यक हुआ तो शासन द्वारा भी उनका ऑडिट कराया जा सकता है। ये गैर सरकारी संगठन सोशल ऑडिट के अंतर्गत आते हैं जिसमें कोई भी नागरिक इनके क्रियान्वयन, बजटीय आवंटन इत्यादि संदर्भों परप्रश्न उठा सकता है। अतः NGOs की पारदर्शिता की दिशा में यह अच्छा कदम है। उपरोक्त समस्याओं केसमाधान के लिए योजना आयोग ने अपनी 11वीं एवं 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक स्वतंत्रराष्ट्रीय प्रमाणन एजेंसी के गठन का सुझाव दिया। इस एजेंसी के मैंडेट में NGOsकी रेटिंग्स जारी करना, जिससे इनमे पारदर्शिता एवं धन जुटाने में मदद मिले एवं वेस्टेड इंटरेस्ट को कम करने में भी यह एजेंसी सहायक सिद्ध हो, शामिल था। हालाँकि एजेंसी को रैंक देने की समस्या का सामना करना पड़सकता है जैसे विभिन्न NGOs के कार्यों की प्रकृति भिन्न भिन्न होती है एवं उनके ग्राउंड पर कार्य भी बहुत ही अलग किस्म के हो सकते हैं जैसे एक पेड़ लगाने वाले NGO से रिसर्च करने वाले NGO से तुलना करना एवं रेटिंग प्रदान करना अव्यवहारिक सिद्ध होगाइत्यादि। अतः इन समस्याओं के बावजूद एक स्वतंत्र प्रमाणन एजेंसी रैंकिंग सिस्टम को तैयार कर मददगार साबित हो सकती है। सरकारी कार्यों के विकल्प के तौर पर NGOs की भूमिका को प्रमोट करने से लायक NGOs को स्वीकृति मिलेगी एवं फर्जी NGOs स्वतः समाप्त हो जायेंगे।
| 45,332
|
Explain what do you understand by venture capital. Also explain the terms related to this concept. (150 words)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - VENTURE CAPITAL- THE CONCEPT - THE TERMS RELATED TO VENTURE CAPITAL · PRIVATE EQUITY · ANGEL INVESTOR · CROWD FUNDING · ANGEL TAX ANSWER: The capital market bridges the gap between those who are in need of money for doing business, and those who have surplus money with them in the form of savings. Venture capital is one such method of raising finance for new businesses. The people who have surplus money can further increase their wealth by investing in new companies that have high prospects of growth tomorrow. VENTURE CAPITAL- THE CONCEPT The concept can be demonstrated with the help of an example. For example , Mr. X has a very good idea for a business. But he does not have money. The bank also refuses him a loan, as he does not have collateral. Here steps in the role of venture capitalists. There are people in the country, who have a lot of wealth and want to further increase this wealth. They can do so by investing in new businesses that will do well tomorrow. Now, say there is a person called Ratan Tata. He is willing to provide money to such people like Mr. X. Ratan Tata, therefore, hires 10-15 people from the best institutes of the country. He gives these professionals Rs. 10 crores and ask them to invest the money in new startups based on their wisdom and judgment. Now, Mr. X approaches Ratan Tata’s funds (called Ratan Tata Venture Capital Fund). He provides them with his idea, and its future prospects. He asks for Rs. 5 crores. Thus, the 10-15 professionals hired would analyze the business. On the basis of this analysis, they give him the go-ahead, but ask for 15% equity stake in the company. Now, say the company values Rs. 500 crores after 5 years. Therefore, Ratan Tata will benefit immensely. The logic of Ratan Tata would be to invest in 10 such new companies. Even if one company does well (and the rest go into loss), yet his net benefit will be huge, in terms of profit (and also equity stake in the company). Therefore, venture capitals help new startups materialize their businesses. SOME FACTUAL POINTS ABOUT VENTURE CAPITAL 1) Investments are made in new companies. 2) The equity share in the company depends upon negotiation- It can be 30%, 40% or even 75%. THE TERMS RELATED TO VENTURE CAPITAL 1) PRIVATE EQUITY The investment is made in already established companies, which want to expand. Here also equity shares are to be given to the investor, the percentage of which depends upon negotiation. 2) ANGEL INVESTOR It is a term used for anyone who provides funds to a company. It can be Venture Capital or Private Equity. They ask for equity ownership in the company. If not equity, then they can get convertible debentures or convertible preference shares, which will be converted into equity at a particular point of time. 3) CROWD FUNDING In this, a lot of investors come together and invest in small amounts. When the company does well they are provided with returns. They are provided with returns as per their percentage contribution in the company. 4) ANGEL TAX When the shares of the company are sold at a price higher than its market valuation, then an angel tax is to be paid on the additional money received. For example, I have a company called xyz ltd. It is doing very well. Today, the price of the shares of this company is Rs. 50 per share. So, an investor wants to buy my share, but I refuse to sell the same. Therefore, he is willing to pay me Rs. 75 per share for the shares of my company (xyz ltd.)- he wants to do this/ agrees, as the company is doing very well. Thus, I am getting an additional Rs. 25. Thus, the government will ask me to pay a tax on this Rs. 25 extra that I am receiving. This is called an angel tax. If the shares are sold at their current market price (i.e. current market valuation), then, no angel tax is to be paid.
|
##Question:Explain what do you understand by venture capital. Also explain the terms related to this concept. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - VENTURE CAPITAL- THE CONCEPT - THE TERMS RELATED TO VENTURE CAPITAL · PRIVATE EQUITY · ANGEL INVESTOR · CROWD FUNDING · ANGEL TAX ANSWER: The capital market bridges the gap between those who are in need of money for doing business, and those who have surplus money with them in the form of savings. Venture capital is one such method of raising finance for new businesses. The people who have surplus money can further increase their wealth by investing in new companies that have high prospects of growth tomorrow. VENTURE CAPITAL- THE CONCEPT The concept can be demonstrated with the help of an example. For example , Mr. X has a very good idea for a business. But he does not have money. The bank also refuses him a loan, as he does not have collateral. Here steps in the role of venture capitalists. There are people in the country, who have a lot of wealth and want to further increase this wealth. They can do so by investing in new businesses that will do well tomorrow. Now, say there is a person called Ratan Tata. He is willing to provide money to such people like Mr. X. Ratan Tata, therefore, hires 10-15 people from the best institutes of the country. He gives these professionals Rs. 10 crores and ask them to invest the money in new startups based on their wisdom and judgment. Now, Mr. X approaches Ratan Tata’s funds (called Ratan Tata Venture Capital Fund). He provides them with his idea, and its future prospects. He asks for Rs. 5 crores. Thus, the 10-15 professionals hired would analyze the business. On the basis of this analysis, they give him the go-ahead, but ask for 15% equity stake in the company. Now, say the company values Rs. 500 crores after 5 years. Therefore, Ratan Tata will benefit immensely. The logic of Ratan Tata would be to invest in 10 such new companies. Even if one company does well (and the rest go into loss), yet his net benefit will be huge, in terms of profit (and also equity stake in the company). Therefore, venture capitals help new startups materialize their businesses. SOME FACTUAL POINTS ABOUT VENTURE CAPITAL 1) Investments are made in new companies. 2) The equity share in the company depends upon negotiation- It can be 30%, 40% or even 75%. THE TERMS RELATED TO VENTURE CAPITAL 1) PRIVATE EQUITY The investment is made in already established companies, which want to expand. Here also equity shares are to be given to the investor, the percentage of which depends upon negotiation. 2) ANGEL INVESTOR It is a term used for anyone who provides funds to a company. It can be Venture Capital or Private Equity. They ask for equity ownership in the company. If not equity, then they can get convertible debentures or convertible preference shares, which will be converted into equity at a particular point of time. 3) CROWD FUNDING In this, a lot of investors come together and invest in small amounts. When the company does well they are provided with returns. They are provided with returns as per their percentage contribution in the company. 4) ANGEL TAX When the shares of the company are sold at a price higher than its market valuation, then an angel tax is to be paid on the additional money received. For example, I have a company called xyz ltd. It is doing very well. Today, the price of the shares of this company is Rs. 50 per share. So, an investor wants to buy my share, but I refuse to sell the same. Therefore, he is willing to pay me Rs. 75 per share for the shares of my company (xyz ltd.)- he wants to do this/ agrees, as the company is doing very well. Thus, I am getting an additional Rs. 25. Thus, the government will ask me to pay a tax on this Rs. 25 extra that I am receiving. This is called an angel tax. If the shares are sold at their current market price (i.e. current market valuation), then, no angel tax is to be paid.
| 45,335
|
What do you understand by the phenomenon of temperature inversion in meteorology? What are its types? How does it affect the weather and the inhabitants of the area? (250 words/15 Marks)
|
Approach : Explain the phenomenon of Temperature inversion Highlight the impact of temperature inversion on the weather and habitats of the place. Answer : Temperature Inversion • A temperature inversion is a reversal of the normal behaviour of temperature in the troposphere, in which a layer of cool air at the surface is overlain by a layer of warmer air. (Under normal conditions, the temperature usually decreases with height). Types of Temperature Inversion Temperature Inversion in Intermontane Valley (Air Drainage Type of Inversion) • Sometimes, the temperature in the lower layers of air increases instead of decreasing with elevation. This happens commonly along a sloping surface. • Here, the surface radiates heat back to space rapidly and cools down at a faster rate than the upper layers. As a result, the lower cold layers get condensed and become heavy. • The sloping surface underneath makes them move towards the bottom where the cold layer settles down as a zone of low temperature while the upper layers are relatively warmer. • This condition, opposite to normal vertical distribution of temperature, is known as Temperature Inversion. • In other words, the vertical temperature gets inverted during a temperature inversion. • This kind of temperature inversion is very strong in the middle and higher latitudes. It can be strong in regions with high mountains or deep valleys also. Ground Inversion (Surface Temperature Inversion) • A ground inversion develops when air is cooled by contact with a colder surface until it becomes cooler than the overlying atmosphere; this occurs most often on clear nights when the ground cools off rapidly by radiation. If the temperature of surface air drops below its dew point, fog may result. • This kind of temperature inversion is very common in the higher latitudes. • A surface temperature inversion in lower and middle latitudes occurs during cold nights and gets destroyed during the daytime. Subsidence Inversion (Upper Surface Temperature Inversion) • A subsidence inversion develops when a widespread layer of air descends. • The layer is compressed and heated by the resulting increase in atmospheric pressure, and as a result, the lapse rate of temperature is reduced. • If the air mass sinks low enough, the air at higher altitudes becomes warmer than at lower altitudes, producing a temperature inversion. • Subsidence inversions are common over the northern continents in winter (dry atmosphere) and over the subtropical oceans; these regions generally have subsiding air because they are located under large high-pressure centres. • This temperature inversion is called upper surface temperature inversion because it takes place in the upper parts of the atmosphere. Effects • Inversions play an important role in determining cloud forms, precipitation, and visibility. • An inversion acts as a cap on the upward movement of air from the layers below. As a result, convection produced by the heating of the air from below is limited to levels below the inversion. Diffusion of dust, smoke, and other air pollutants is likewise limited. • In regions where a pronounced low-level inversion is present, convective clouds cannot grow high enough to produce showers. • Visibility may be greatly reduced below the inversion due to the accumulation of dust and smoke particles. Because air near the base of an inversion tends to be cool, fog is frequently present there. • Inversions also affect diurnal variations in temperature. Diurnal variations tend to be very small. Effect on Habitants It may adversely affect crops. They generally grow orchids on the slope to avoid mist any other damage to crops.Since it creates foggy condition it may affect the traffic and movement of people. The overall effect on the economy of the region.
|
##Question:What do you understand by the phenomenon of temperature inversion in meteorology? What are its types? How does it affect the weather and the inhabitants of the area? (250 words/15 Marks)##Answer:Approach : Explain the phenomenon of Temperature inversion Highlight the impact of temperature inversion on the weather and habitats of the place. Answer : Temperature Inversion • A temperature inversion is a reversal of the normal behaviour of temperature in the troposphere, in which a layer of cool air at the surface is overlain by a layer of warmer air. (Under normal conditions, the temperature usually decreases with height). Types of Temperature Inversion Temperature Inversion in Intermontane Valley (Air Drainage Type of Inversion) • Sometimes, the temperature in the lower layers of air increases instead of decreasing with elevation. This happens commonly along a sloping surface. • Here, the surface radiates heat back to space rapidly and cools down at a faster rate than the upper layers. As a result, the lower cold layers get condensed and become heavy. • The sloping surface underneath makes them move towards the bottom where the cold layer settles down as a zone of low temperature while the upper layers are relatively warmer. • This condition, opposite to normal vertical distribution of temperature, is known as Temperature Inversion. • In other words, the vertical temperature gets inverted during a temperature inversion. • This kind of temperature inversion is very strong in the middle and higher latitudes. It can be strong in regions with high mountains or deep valleys also. Ground Inversion (Surface Temperature Inversion) • A ground inversion develops when air is cooled by contact with a colder surface until it becomes cooler than the overlying atmosphere; this occurs most often on clear nights when the ground cools off rapidly by radiation. If the temperature of surface air drops below its dew point, fog may result. • This kind of temperature inversion is very common in the higher latitudes. • A surface temperature inversion in lower and middle latitudes occurs during cold nights and gets destroyed during the daytime. Subsidence Inversion (Upper Surface Temperature Inversion) • A subsidence inversion develops when a widespread layer of air descends. • The layer is compressed and heated by the resulting increase in atmospheric pressure, and as a result, the lapse rate of temperature is reduced. • If the air mass sinks low enough, the air at higher altitudes becomes warmer than at lower altitudes, producing a temperature inversion. • Subsidence inversions are common over the northern continents in winter (dry atmosphere) and over the subtropical oceans; these regions generally have subsiding air because they are located under large high-pressure centres. • This temperature inversion is called upper surface temperature inversion because it takes place in the upper parts of the atmosphere. Effects • Inversions play an important role in determining cloud forms, precipitation, and visibility. • An inversion acts as a cap on the upward movement of air from the layers below. As a result, convection produced by the heating of the air from below is limited to levels below the inversion. Diffusion of dust, smoke, and other air pollutants is likewise limited. • In regions where a pronounced low-level inversion is present, convective clouds cannot grow high enough to produce showers. • Visibility may be greatly reduced below the inversion due to the accumulation of dust and smoke particles. Because air near the base of an inversion tends to be cool, fog is frequently present there. • Inversions also affect diurnal variations in temperature. Diurnal variations tend to be very small. Effect on Habitants It may adversely affect crops. They generally grow orchids on the slope to avoid mist any other damage to crops.Since it creates foggy condition it may affect the traffic and movement of people. The overall effect on the economy of the region.
| 45,336
|
राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के अंतर्गत भारत में हो रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the efforts being made in India under the National Climate Change Action Plan. (150-200 words, 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में इसके अंतर्गत चलाए गए मिशनों और प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में नवीनतम परिवर्तन एवं महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत के सम्मुख जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरे से निपटने के साथ साथ अपनी तीव्र आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की भी चुनौती है। जलवायु परिवर्तन से भारत के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण और गुणवत्ता में बदलाव आ सकता है और इससे लोगों की अजीविका पूरी तरह से प्रभावित हो सकती है। चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था का इसके प्राकृतिक संसाधनों तथा जलवायु की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि, जल और वानिकी आदि से गहरा संबंध हैं, इसलिये भारत को जलवायु से होने वाले संभावित परिवर्तनों के कारण बड़े खतरे का सामना करना पड़ सकता है। इसलिये पारिस्थितिकीय दृष्टि से सतत विकास का मार्ग तैयार करने के लिये भारत सरकार द्वारा वर्ष 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना का शुभारम्भ किया। इसके अंतर्गत निम्नलिखित मिशन अपनाए गए हैं राष्ट्रीय सौर मिशन · इसके अंतर्गत 2022 तक 100 GW तक सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है · इसके अंतर्गत ऑन ग्रिड एवं ऑफ ग्रिड सोलर पैनल इंस्टाल किये जा रहे हैं · नहरों को सोलर पैनलों के माध्यम से ढकने का कार्यक्रम चलाया जा रहा हैइसके साथ ही खेतों में सोलर वाटर पंप की स्थापना,सोलर पार्कआदि की स्थापना की जा रही है| · इस सन्दर्भ में भारत द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के रूप में पहल की गयी है ऊर्जा संरक्षण के लिए राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता मिशन · इसके अंतर्गत उपकरणों की दक्षता बढ़ा कर ऊर्जा उपभोग को युक्तियुक्त किये जाने के प्रयास हो रहे हैं · इसके लिए उजाला योजना (राष्ट्रीय LED बल्ब कार्यक्रम)चलाई जा रही है · ब्यूरो ऑफ़ एनर्जी एफिशिएंसी(BEE) के द्वारा इलेक्ट्रिक उपकरणों की स्टार रेटिंग के माध्यम से ऊर्जा दक्षता बढाई जा रही है राष्ट्रीय धारणीय आवास मिशन · इसके अंतर्गत ग्रीन बिल्डिंग के निर्माण की अवधारणा प्रस्तुत की गयी है · ग्रीन बिल्डिग पर्यावरण अनुकूल होते हैं · ग्रीन भवनों की विशेषताएं- ऊर्जा दक्षता, निम्न कार्बन उत्सर्जन, इंडक्शन कुकर, जल संचयन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, अपशिष्ट प्रबंधन आदि · TERI संस्था के द्वारा भवनों के लिए 5 स्टार रेटिंग प्रणाली GRIHA लायी गयी है राष्ट्रीय जल मिशन · इसके अंतर्गत जल प्रदुषण की रोकथाम के लिएजल संरक्षण का कार्यक्रम लाया गया है · राष्ट्रीय जल मिशन के अंतर्गतपेयजल कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा हैइसके अंतर्गत जल पुनर्चक्रण, जल का मूल्य निर्धारण, सिंचाई के लिए माइक्रो इरीगेशन प्रणालियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है हरित भारत मिशन · इसके अंतर्गत वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया जा रहा है · सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी एवं संयुक्त वन प्रबंधन के माध्यम सेवनों का संरक्षण एवं वृद्धि सुनिश्चित की जा रही है · इसके साथ ही भारत में राष्ट्रीय REDD+ कार्यक्रम चलाया जा रहा है राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन · जलवायु परिवर्तन को देखते हुए जलवायु अनुकूलित कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है · इसके लिए जैविक कृषि, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है राष्ट्रीय सतत हिमालयी पारितंत्र मिशन · जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतीय क्षेत्र में बादलों के फटने, हिमनद का तीव्रता से पिघलना जैसी आपदाओं का शमन एवं उनके निम्नीकरण के लिएसतत हिमालयी पारितंत्र मिशन लाया गया है · इस कार्यक्रम के अंतर्गत हिमालयी हिमनदों पर शोध कार्य किये जा रहे हैं · राष्ट्रीय सतत हिमालयी पारितंत्र मिशनहिमालयी जैव विविधता का संरक्षण के लिए भी प्रयास करता है जलवायु परिवर्तन के लिएराष्ट्रीय सामरिक ज्ञान मिशन · जलवायु परिवर्तन भारतीय राष्ट्रीय आकलन नेटवर्क का निर्माण किया गया है · इसके अंतर्गत विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं को आपस में जोड़ा गया है उपरोक्त के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा इसमें चार नयी कार्ययोजनायें इसमें शामिल की गयी हैं यथाराष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन इसका लक्ष्य 2022 तक 60 GW की अतिरक्त पवन ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है| अवशिष्ट से ऊर्जा का राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत नयी प्रौद्योगिकी के माध्यम से ठोस अपशिष्टों से विद्युत् उत्पादन के लिए कार्यक्रम आरम्भ किये गए हैं| इसके साथ ही राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन सम्बन्धित स्वास्थ्य मिशन एवं राष्ट्रीय तटवर्ती क्षेत्र मिशन आरम्भ किया गया है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के सन्दर्भ में भारत सरकार का दृष्टिकोण व्यापक है| जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में भारत सरकार के प्रयास सराहनीय हैं तथापि इन प्रयासों के अधिक तत्परता की अपेक्षा है|
|
##Question:राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के अंतर्गत भारत में हो रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss the efforts being made in India under the National Climate Change Action Plan. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में इसके अंतर्गत चलाए गए मिशनों और प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में नवीनतम परिवर्तन एवं महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत के सम्मुख जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरे से निपटने के साथ साथ अपनी तीव्र आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की भी चुनौती है। जलवायु परिवर्तन से भारत के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण और गुणवत्ता में बदलाव आ सकता है और इससे लोगों की अजीविका पूरी तरह से प्रभावित हो सकती है। चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था का इसके प्राकृतिक संसाधनों तथा जलवायु की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि, जल और वानिकी आदि से गहरा संबंध हैं, इसलिये भारत को जलवायु से होने वाले संभावित परिवर्तनों के कारण बड़े खतरे का सामना करना पड़ सकता है। इसलिये पारिस्थितिकीय दृष्टि से सतत विकास का मार्ग तैयार करने के लिये भारत सरकार द्वारा वर्ष 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना का शुभारम्भ किया। इसके अंतर्गत निम्नलिखित मिशन अपनाए गए हैं राष्ट्रीय सौर मिशन · इसके अंतर्गत 2022 तक 100 GW तक सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है · इसके अंतर्गत ऑन ग्रिड एवं ऑफ ग्रिड सोलर पैनल इंस्टाल किये जा रहे हैं · नहरों को सोलर पैनलों के माध्यम से ढकने का कार्यक्रम चलाया जा रहा हैइसके साथ ही खेतों में सोलर वाटर पंप की स्थापना,सोलर पार्कआदि की स्थापना की जा रही है| · इस सन्दर्भ में भारत द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के रूप में पहल की गयी है ऊर्जा संरक्षण के लिए राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता मिशन · इसके अंतर्गत उपकरणों की दक्षता बढ़ा कर ऊर्जा उपभोग को युक्तियुक्त किये जाने के प्रयास हो रहे हैं · इसके लिए उजाला योजना (राष्ट्रीय LED बल्ब कार्यक्रम)चलाई जा रही है · ब्यूरो ऑफ़ एनर्जी एफिशिएंसी(BEE) के द्वारा इलेक्ट्रिक उपकरणों की स्टार रेटिंग के माध्यम से ऊर्जा दक्षता बढाई जा रही है राष्ट्रीय धारणीय आवास मिशन · इसके अंतर्गत ग्रीन बिल्डिंग के निर्माण की अवधारणा प्रस्तुत की गयी है · ग्रीन बिल्डिग पर्यावरण अनुकूल होते हैं · ग्रीन भवनों की विशेषताएं- ऊर्जा दक्षता, निम्न कार्बन उत्सर्जन, इंडक्शन कुकर, जल संचयन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, अपशिष्ट प्रबंधन आदि · TERI संस्था के द्वारा भवनों के लिए 5 स्टार रेटिंग प्रणाली GRIHA लायी गयी है राष्ट्रीय जल मिशन · इसके अंतर्गत जल प्रदुषण की रोकथाम के लिएजल संरक्षण का कार्यक्रम लाया गया है · राष्ट्रीय जल मिशन के अंतर्गतपेयजल कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा हैइसके अंतर्गत जल पुनर्चक्रण, जल का मूल्य निर्धारण, सिंचाई के लिए माइक्रो इरीगेशन प्रणालियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है हरित भारत मिशन · इसके अंतर्गत वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया जा रहा है · सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी एवं संयुक्त वन प्रबंधन के माध्यम सेवनों का संरक्षण एवं वृद्धि सुनिश्चित की जा रही है · इसके साथ ही भारत में राष्ट्रीय REDD+ कार्यक्रम चलाया जा रहा है राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन · जलवायु परिवर्तन को देखते हुए जलवायु अनुकूलित कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है · इसके लिए जैविक कृषि, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है राष्ट्रीय सतत हिमालयी पारितंत्र मिशन · जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतीय क्षेत्र में बादलों के फटने, हिमनद का तीव्रता से पिघलना जैसी आपदाओं का शमन एवं उनके निम्नीकरण के लिएसतत हिमालयी पारितंत्र मिशन लाया गया है · इस कार्यक्रम के अंतर्गत हिमालयी हिमनदों पर शोध कार्य किये जा रहे हैं · राष्ट्रीय सतत हिमालयी पारितंत्र मिशनहिमालयी जैव विविधता का संरक्षण के लिए भी प्रयास करता है जलवायु परिवर्तन के लिएराष्ट्रीय सामरिक ज्ञान मिशन · जलवायु परिवर्तन भारतीय राष्ट्रीय आकलन नेटवर्क का निर्माण किया गया है · इसके अंतर्गत विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं को आपस में जोड़ा गया है उपरोक्त के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा इसमें चार नयी कार्ययोजनायें इसमें शामिल की गयी हैं यथाराष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन इसका लक्ष्य 2022 तक 60 GW की अतिरक्त पवन ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है| अवशिष्ट से ऊर्जा का राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत नयी प्रौद्योगिकी के माध्यम से ठोस अपशिष्टों से विद्युत् उत्पादन के लिए कार्यक्रम आरम्भ किये गए हैं| इसके साथ ही राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन सम्बन्धित स्वास्थ्य मिशन एवं राष्ट्रीय तटवर्ती क्षेत्र मिशन आरम्भ किया गया है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के सन्दर्भ में भारत सरकार का दृष्टिकोण व्यापक है| जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में भारत सरकार के प्रयास सराहनीय हैं तथापि इन प्रयासों के अधिक तत्परता की अपेक्षा है|
| 45,345
|
भारतीय समाजमें विविधता में एकता का स्वरूप, परस्पर सौहार्द से जन्मींएकजुटता का है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150 शब्द) In Indian society, the nature of unity in diversity is of solidarity born of mutual harmony. Discuss Critically.(150 words)
|
एप्रोच:- भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। उत्तर के तीसरे भाग में इस एकता के संदर्भ में मौजूद चुनौतियों की चर्चा कीजिये। उत्तर के अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का हैजिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8,अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा नीतिया भी राष्ट्रीय एकता की उर्वरा शक्तियां हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांशों में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी (डेमोक्रेसी डेफिसिट) के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। निष्कर्षतः यह कहाजा सकता है कि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
|
##Question:भारतीय समाजमें विविधता में एकता का स्वरूप, परस्पर सौहार्द से जन्मींएकजुटता का है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150 शब्द) In Indian society, the nature of unity in diversity is of solidarity born of mutual harmony. Discuss Critically.(150 words)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। उत्तर के तीसरे भाग में इस एकता के संदर्भ में मौजूद चुनौतियों की चर्चा कीजिये। उत्तर के अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का हैजिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8,अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा नीतिया भी राष्ट्रीय एकता की उर्वरा शक्तियां हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांशों में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी (डेमोक्रेसी डेफिसिट) के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। निष्कर्षतः यह कहाजा सकता है कि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
| 45,349
|
भारतीय समाजमें विविधता में एकता का स्वरूप, परस्पर सौहार्द से जन्मींएकजुटता का है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150 शब्द) In Indian society, the nature of unity in diversity is of solidarity born of mutual harmony. Discuss Critically.(150 words)
|
एप्रोच:- भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। उत्तर के तीसरे भाग में इस एकता के संदर्भ में मौजूद चुनौतियों की चर्चा कीजिये। उत्तर के अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का हैजिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8,अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा नीतिया भी राष्ट्रीय एकता की उर्वरा शक्तियां हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांशों में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी (डेमोक्रेसी डेफिसिट) के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। निष्कर्षतः यह कहाजा सकता है कि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
|
##Question:भारतीय समाजमें विविधता में एकता का स्वरूप, परस्पर सौहार्द से जन्मींएकजुटता का है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150 शब्द) In Indian society, the nature of unity in diversity is of solidarity born of mutual harmony. Discuss Critically.(150 words)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। उत्तर के तीसरे भाग में इस एकता के संदर्भ में मौजूद चुनौतियों की चर्चा कीजिये। उत्तर के अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर:- भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का हैजिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8,अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। इस संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा नीतिया भी राष्ट्रीय एकता की उर्वरा शक्तियां हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांशों में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी (डेमोक्रेसी डेफिसिट) के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। निष्कर्षतः यह कहाजा सकता है कि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
| 45,354
|
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासतों का उल्लेख कीजिये। साथ ही आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इनकी भूमिका पर प्रकाश डालिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the main political, economic and social heritage of the Indian National Movement. Also highlight their role in the process of modern nation building.(150-200 Words; 10 Marks)
|
एप्रोच - प्रस्तावना में राष्ट्रीय आन्दोलन में उत्पन्न मूल्यों के प्रेरक तत्वों या विचारकों के योगदान की भूमिका की चर्चा कीजिये | राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासत का उल्लेख कीजिये | उपरोक्त विरासतों के आधार पर विकसित आधुनिक राष्ट्र निर्माण के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इन विरासतों को वर्त्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली से जोड़ते हुए चर्चा कीजिये | उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वराज की प्राप्ति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी मुख्य रूप से शामिल किया गया था जिसमे गाँधी, अम्बेडकर जैसे कुछ महान विचारकों और उनके विचारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी| इसी आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कुछ आधुनिक मूल्यों को विकसित किये गए जिसने स्वतंत्रता पश्चात के भारत के लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र को पोषित करने का कार्य किया | स्वतंत्रता काल में राष्ट्रीय विरासत राजनीति में राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण योग्य नेतृत्व -कांग्रेस के भीतर एवं उसके बाहर आधुनिक विचारों का प्रभाव - स्वतंत्रता , समानता ,लोकतंत्र आदि भावनात्मक रूप से एकता विविधता को सम्मान -धर्म ,क्षेत्र,जाति के आधार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा विदेश नीति से सम्बंधित कुछ प्रमुख सिद्धांत जैसे- स्वतंत्र विदेश नीति ,रंगभेद,साम्राज्यवाद का विरोध आर्थिक क्षेत्र में सरकार की आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण जैसे-कृषि,परिवहन आदि कांग्रेस के द्वारा नियोजन समिति का गठन तथा बॉम्बे प्लान के द्वारा भी आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों का भी ढांचा तैयार किया गया |आर्थिक क्षेत्र में जो भी नीतियाँ बनी वह राष्ट्रीय आन्दोलन के अनुभवों और विरासत से प्रभावित थी| सामाजिक क्षेत्र बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति शिक्षा विशेषकर वैज्ञानिक शिक्षा पर राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा प्रारंभ से ही बल समाज के सभी वर्गों का उत्थान विशेषकर वंचित तबकों को विशेष महत्त्व दिए जाने पर सहमती राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया 1947से पूर्व,ब्रिटिश राज की भूमिका से जहाँ राष्ट्र के राजनीतिक,प्रशासनिक , आर्थिक और भौगोलिक एकीकरण को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना का एकीकरण और इसके साथ ही भावनात्मक रूप से जुडाव हुआ जिसने वास्तविक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मुख्य रूप से बढ़ावा दिया | वैचारिक विविधता को पहचान -विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों व नेताओं को संविधान सभा में शामिल किया जाना जैसे- अम्बेडकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि | कानून के शासन की स्थापना पर बल – इसके द्वारा संविधान का निर्माण कर व्यक्ति के मूल अधिकार,गरिमा पूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के साथ-साथ एकता और अखंडता को स्थापित करने में सहायक थे | योग्य नेतृत्व -अपेक्षाकृत योग्य राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | अखिल भारतीय सेवा - राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्ष नौकरशाही तंत्र की राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने में मुख्य भूमिका रही है| नौकरशाही ने भारत में एक राष्ट्र की भावना को मजबूत कर एकता और अखंडता के स्वर को मजबूत किया | साथ ही स्वतंत्रता काल में अलगाववाद के स्वर पर नियंत्रण करते हुए केन्द्रीय नीतियों को एकसमान तरीके से क्रियान्वयन करने में नौकरशाही ने मुख्य भूमिका निभाई है जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का मुख्य अंग है| सेना की भूमिका - स्वतंत्रता काल में अलगाववादी तत्व व साम्प्रदायिकता के स्वर मजबूत थे जिसके नियंत्रण में सेना की भूमिका देखि गयी जैसे- कश्मीर में कबीलाई आक्रमण के समय , बंगाल में हुए दंगों के दौरान आदि | इन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य के हिंदुस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना और आपदा कार्यों में सेना की मुख्य भूमिका रही | राष्ट्र की भावना - राष्ट्र गान,राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान तथा आधार पर भावनात्मक जुड़ावजो राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में ही आम आदमी के व्यवहार में लाये जा चुके थे| इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में विकसित आधारिक मूल्यों ने स्वतंत्र भारत में जनता एवं सरकार दोनों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य किया जो वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली की प्रमुख शक्ति है|
|
##Question:भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासतों का उल्लेख कीजिये। साथ ही आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इनकी भूमिका पर प्रकाश डालिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the main political, economic and social heritage of the Indian National Movement. Also highlight their role in the process of modern nation building.(150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - प्रस्तावना में राष्ट्रीय आन्दोलन में उत्पन्न मूल्यों के प्रेरक तत्वों या विचारकों के योगदान की भूमिका की चर्चा कीजिये | राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासत का उल्लेख कीजिये | उपरोक्त विरासतों के आधार पर विकसित आधुनिक राष्ट्र निर्माण के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इन विरासतों को वर्त्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली से जोड़ते हुए चर्चा कीजिये | उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वराज की प्राप्ति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी मुख्य रूप से शामिल किया गया था जिसमे गाँधी, अम्बेडकर जैसे कुछ महान विचारकों और उनके विचारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी| इसी आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कुछ आधुनिक मूल्यों को विकसित किये गए जिसने स्वतंत्रता पश्चात के भारत के लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र को पोषित करने का कार्य किया | स्वतंत्रता काल में राष्ट्रीय विरासत राजनीति में राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण योग्य नेतृत्व -कांग्रेस के भीतर एवं उसके बाहर आधुनिक विचारों का प्रभाव - स्वतंत्रता , समानता ,लोकतंत्र आदि भावनात्मक रूप से एकता विविधता को सम्मान -धर्म ,क्षेत्र,जाति के आधार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा विदेश नीति से सम्बंधित कुछ प्रमुख सिद्धांत जैसे- स्वतंत्र विदेश नीति ,रंगभेद,साम्राज्यवाद का विरोध आर्थिक क्षेत्र में सरकार की आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण जैसे-कृषि,परिवहन आदि कांग्रेस के द्वारा नियोजन समिति का गठन तथा बॉम्बे प्लान के द्वारा भी आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों का भी ढांचा तैयार किया गया |आर्थिक क्षेत्र में जो भी नीतियाँ बनी वह राष्ट्रीय आन्दोलन के अनुभवों और विरासत से प्रभावित थी| सामाजिक क्षेत्र बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति शिक्षा विशेषकर वैज्ञानिक शिक्षा पर राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा प्रारंभ से ही बल समाज के सभी वर्गों का उत्थान विशेषकर वंचित तबकों को विशेष महत्त्व दिए जाने पर सहमती राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया 1947से पूर्व,ब्रिटिश राज की भूमिका से जहाँ राष्ट्र के राजनीतिक,प्रशासनिक , आर्थिक और भौगोलिक एकीकरण को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना का एकीकरण और इसके साथ ही भावनात्मक रूप से जुडाव हुआ जिसने वास्तविक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मुख्य रूप से बढ़ावा दिया | वैचारिक विविधता को पहचान -विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों व नेताओं को संविधान सभा में शामिल किया जाना जैसे- अम्बेडकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि | कानून के शासन की स्थापना पर बल – इसके द्वारा संविधान का निर्माण कर व्यक्ति के मूल अधिकार,गरिमा पूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के साथ-साथ एकता और अखंडता को स्थापित करने में सहायक थे | योग्य नेतृत्व -अपेक्षाकृत योग्य राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | अखिल भारतीय सेवा - राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्ष नौकरशाही तंत्र की राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने में मुख्य भूमिका रही है| नौकरशाही ने भारत में एक राष्ट्र की भावना को मजबूत कर एकता और अखंडता के स्वर को मजबूत किया | साथ ही स्वतंत्रता काल में अलगाववाद के स्वर पर नियंत्रण करते हुए केन्द्रीय नीतियों को एकसमान तरीके से क्रियान्वयन करने में नौकरशाही ने मुख्य भूमिका निभाई है जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का मुख्य अंग है| सेना की भूमिका - स्वतंत्रता काल में अलगाववादी तत्व व साम्प्रदायिकता के स्वर मजबूत थे जिसके नियंत्रण में सेना की भूमिका देखि गयी जैसे- कश्मीर में कबीलाई आक्रमण के समय , बंगाल में हुए दंगों के दौरान आदि | इन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य के हिंदुस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना और आपदा कार्यों में सेना की मुख्य भूमिका रही | राष्ट्र की भावना - राष्ट्र गान,राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान तथा आधार पर भावनात्मक जुड़ावजो राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में ही आम आदमी के व्यवहार में लाये जा चुके थे| इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में विकसित आधारिक मूल्यों ने स्वतंत्र भारत में जनता एवं सरकार दोनों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य किया जो वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली की प्रमुख शक्ति है|
| 45,356
|
The New Economic Policy of 1921 of Lenin had influenced the policies adopted by India, soon after Independence. Evaluate. (150 words / 10 marks)
|
Approach: Briefly explain the National Economic Policy of 1921 as Introduction State the features of NEP 1921 Highlight the similarities between the policies adopted by India after Independence and NEP. Ans: Lenin’s introduced the National Economic Policy 1921 after the three years of civil war, social disruption, economic deprivation and famine.New Economic Policy(NEP) was the official economic reconstruction program of the USSR from 1921 to 1928. It replaced the economic policies ofwar Communism(1918–21), an emergency program established byLeninduring the civil war. Features of NEP of 1921 The economic system created by the NEP 1921 included "a free market and capitalism, both subject to state control". The Soviet authorities partially revoked the complete nationalization of industry (established during the period of War Communism of 1918 to 1921) and introduced a system of a mixed economy that allowed private individuals to own small enterprises. The state continued to control banks, foreign trade, and large industries. Large industries operated on an open market basis, but the state controlled the fixing of prices and the appointment of boards of directors. Private trade and wages were restored, and compulsory labour service was abolished. Forced requisition of grain was replaced by a specific tax in kind; peasants could retain excess produce and sell it for a profit. The NEP also sought to establish linkages between the rural economy and the urban economy. Policies of India after Independence Similar to NEP 1921 One of the unique characteristics of the Indian economy post-independence was the fact that it was a mixed economy. India adopted an economic policy that combined aspects of capitalism and socialism, just like Russia’s NEP adopted a policy combining communism and capitalism. India adopted State planning of development, there was a general recognition that the State not only control the fiscal and market development, it takes actions to ensure development happens with equity, which is the base concept of Socialism. Large sectors were under the control of the State and small enterprises were left open for the private sector. On the agrarian front, NEP was primarily agricultural policy. On the same lines, in India, the comprehensive land reforms set the massive network for agricultural extension, dismantled the zamindari system and set up tenancy reforms. Conclusion The New Economic Policy worked to save Soviet Economy from the ravages of the war communism. A similar effect of the policy took place for India, where the economy was suffering due to partition and underdeveloped industries.
|
##Question:The New Economic Policy of 1921 of Lenin had influenced the policies adopted by India, soon after Independence. Evaluate. (150 words / 10 marks)##Answer:Approach: Briefly explain the National Economic Policy of 1921 as Introduction State the features of NEP 1921 Highlight the similarities between the policies adopted by India after Independence and NEP. Ans: Lenin’s introduced the National Economic Policy 1921 after the three years of civil war, social disruption, economic deprivation and famine.New Economic Policy(NEP) was the official economic reconstruction program of the USSR from 1921 to 1928. It replaced the economic policies ofwar Communism(1918–21), an emergency program established byLeninduring the civil war. Features of NEP of 1921 The economic system created by the NEP 1921 included "a free market and capitalism, both subject to state control". The Soviet authorities partially revoked the complete nationalization of industry (established during the period of War Communism of 1918 to 1921) and introduced a system of a mixed economy that allowed private individuals to own small enterprises. The state continued to control banks, foreign trade, and large industries. Large industries operated on an open market basis, but the state controlled the fixing of prices and the appointment of boards of directors. Private trade and wages were restored, and compulsory labour service was abolished. Forced requisition of grain was replaced by a specific tax in kind; peasants could retain excess produce and sell it for a profit. The NEP also sought to establish linkages between the rural economy and the urban economy. Policies of India after Independence Similar to NEP 1921 One of the unique characteristics of the Indian economy post-independence was the fact that it was a mixed economy. India adopted an economic policy that combined aspects of capitalism and socialism, just like Russia’s NEP adopted a policy combining communism and capitalism. India adopted State planning of development, there was a general recognition that the State not only control the fiscal and market development, it takes actions to ensure development happens with equity, which is the base concept of Socialism. Large sectors were under the control of the State and small enterprises were left open for the private sector. On the agrarian front, NEP was primarily agricultural policy. On the same lines, in India, the comprehensive land reforms set the massive network for agricultural extension, dismantled the zamindari system and set up tenancy reforms. Conclusion The New Economic Policy worked to save Soviet Economy from the ravages of the war communism. A similar effect of the policy took place for India, where the economy was suffering due to partition and underdeveloped industries.
| 45,357
|
पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) से आप क्या समझते हैं? साथ ही, पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) के योजना तथा उसके विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Environmental Impact Assessment (EIA)? Also, Describe the planning and various steps of Environmental Impact Assessment (EIA). (150-200 words; 10 Marks)
|
एप्रोच- पहले भाग में,पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) की व्याख्या कीजिए| दूसरे भाग में,पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) के योजना तथा उसके विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए| उत्तर- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) एक साधन है जो कि प्रस्तावित विकास योजनाओं/कार्यक्रमों के पर्यावरणीय प्रभावों के मूल्यांकन में सहायक है| पर्यावरणीय प्रभाव आकलन व्यवस्थित ढंग से परियोजना के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभावों का आकलन करता है तथा प्रस्तावित परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की पहचान करने में मदद करता है| साथ ही, यह परियोजना के नकारात्मक प्रभावों को कम करने हेतु शमन के उपायों को भी प्रस्तुत करता है| EIA में परियोजनाओं को अनुमति EIA रिपोर्ट के आधार पर दिया जाता है| EIA प्रक्रिया में प्रदूषण के निम्नीकरण तथा उपशमन उपायों की जानकारी भी दी जाती है| EIA के माध्यम से बेहतर पर्यावरण प्रबंधन किया जा सकता है| पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) के महत्वपूर्ण पहलु- जोखिम की समीक्षा; पर्यावरणीय प्रबंधन; प्रदूषण संबंधित निगरानी तंत्र; EIA की योजना निम्न प्रकार है- स्पष्ट प्रावधान के साथ एक प्राथमिक पर्यावरणीय साधन के रूप में सेवा प्रदान करना; संभावी पर्यावरणीय प्रभावों के सभी प्रस्तावों की ओर स्थायी रूप से समाधान; वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग तथा प्रदूषण कम करने की युक्तियों का सुझाव; लघुकाल, दीर्घकाल, छोटे व बड़े पैमाने के प्रभावों को कम करने का प्रयास; एक लचीली पद्धति एवं लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना; प्रबंधन एवं मूल्यांकन के लिए समय-समय पर ऑडिटिंग कार्य करना; भारत में पर्यावरणीय मंजूरी तथाEIA के महत्वपूर्ण चरण- भारत में EIA प्रक्रिया, EIA नियम, पर्यावरण(संरक्षण) अधिनियम,1986 के अंतर्गत किया जाता है| भारत में अलग-अलग प्रकार के परियोजनाओं के लिए EIA के अंतर्गत निम्न प्रावधान हैं- छंटनी - इस प्रक्रिया में केंद्र एवं राज्य EIA प्राधिकरण के द्वारा परियोजनाओं को अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जाता है| बड़ी परियोजना जैसे- परमाणु-ऊर्जा, नदी-घाटी परियोजना, बंदरगाह इत्यादि में केंद्रीय EIA प्राधिकरण की भूमिका होती है| साथ ही, EIA के लिए मानदंड का निर्धारण किया जाता है| यह इस बात को तय करता है कि, क्या प्रस्तावित परियोजना के EIA की आवश्यकता है और यदि आवश्यकता है तो आकलन का स्तर क्या हो? विस्तारण/प्रयोजन - इस चरण में परियोजना संबंधित आंकड़ों का अध्ययन एवं EIA रिपोर्ट तैयार किया जाता है| इसमें उन प्रमुख मुद्दों एवं प्रभावों की पहचान की जाती है जिसकी जाँच की जानी है|यह कार्य एक विशेषज्ञ काउंसिल के द्वारा किया जाता है| EIA रिपोर्ट को परियोजना संबंधित कंपनी को सौंप दिया जाता है| लोक-परामर्श - इस चरण में जिला-प्रशासन द्वारा लोक-सुनवाई संबंधित विज्ञापन जारी किया जाता है| लोक-परामर्श के दौरान पूरी प्रक्रिया की विडियोग्राफी की जाती है तथा लोगों के लिखित राय भी लिया जाता ही| निम्न परियोजनाओं में लोक-परामर्श नहीं होता है - रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधित परियोजनाएं, SEZ,आईटी पार्क इत्यादि के अंदर नयी परियोजनाएं, आधुनिक सिंचाई परियोजनाएं, राष्ट्रीय राजमार्ग तथा रेलवे का विस्तारण जिसमें अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं होती है| निर्णय-निर्माण - EIA रिपोर्ट तथा लोक-परामर्श के दस्तावेजों का केंद्रीय अथवा राज्य-प्राधिकरण के द्वारा समीक्षा की जाती है एवं परियोजना की स्वीकृति दी जाती है| इस कार्य के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाता है| हालाँकि भारत में, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में अनेकों कमियां हैं जैसे- EIA की जिम्मेदारी परियोजना प्रस्तावक पर, जनसुनवाई में विलंब आदि; फिर भी इसकी पर्यावरण संरक्षण में अहम् भूमिका को देखते हुए कु छ ठोस क़दमों के साथ इसे ज्यादा प्रभावी एवं विस्तृत करने की आवश्यकता है|
|
##Question:पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) से आप क्या समझते हैं? साथ ही, पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) के योजना तथा उसके विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by Environmental Impact Assessment (EIA)? Also, Describe the planning and various steps of Environmental Impact Assessment (EIA). (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में,पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) की व्याख्या कीजिए| दूसरे भाग में,पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) के योजना तथा उसके विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए| उत्तर- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) एक साधन है जो कि प्रस्तावित विकास योजनाओं/कार्यक्रमों के पर्यावरणीय प्रभावों के मूल्यांकन में सहायक है| पर्यावरणीय प्रभाव आकलन व्यवस्थित ढंग से परियोजना के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभावों का आकलन करता है तथा प्रस्तावित परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की पहचान करने में मदद करता है| साथ ही, यह परियोजना के नकारात्मक प्रभावों को कम करने हेतु शमन के उपायों को भी प्रस्तुत करता है| EIA में परियोजनाओं को अनुमति EIA रिपोर्ट के आधार पर दिया जाता है| EIA प्रक्रिया में प्रदूषण के निम्नीकरण तथा उपशमन उपायों की जानकारी भी दी जाती है| EIA के माध्यम से बेहतर पर्यावरण प्रबंधन किया जा सकता है| पर्यावरणीय प्रभाव आकलन(EIA) के महत्वपूर्ण पहलु- जोखिम की समीक्षा; पर्यावरणीय प्रबंधन; प्रदूषण संबंधित निगरानी तंत्र; EIA की योजना निम्न प्रकार है- स्पष्ट प्रावधान के साथ एक प्राथमिक पर्यावरणीय साधन के रूप में सेवा प्रदान करना; संभावी पर्यावरणीय प्रभावों के सभी प्रस्तावों की ओर स्थायी रूप से समाधान; वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग तथा प्रदूषण कम करने की युक्तियों का सुझाव; लघुकाल, दीर्घकाल, छोटे व बड़े पैमाने के प्रभावों को कम करने का प्रयास; एक लचीली पद्धति एवं लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना; प्रबंधन एवं मूल्यांकन के लिए समय-समय पर ऑडिटिंग कार्य करना; भारत में पर्यावरणीय मंजूरी तथाEIA के महत्वपूर्ण चरण- भारत में EIA प्रक्रिया, EIA नियम, पर्यावरण(संरक्षण) अधिनियम,1986 के अंतर्गत किया जाता है| भारत में अलग-अलग प्रकार के परियोजनाओं के लिए EIA के अंतर्गत निम्न प्रावधान हैं- छंटनी - इस प्रक्रिया में केंद्र एवं राज्य EIA प्राधिकरण के द्वारा परियोजनाओं को अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जाता है| बड़ी परियोजना जैसे- परमाणु-ऊर्जा, नदी-घाटी परियोजना, बंदरगाह इत्यादि में केंद्रीय EIA प्राधिकरण की भूमिका होती है| साथ ही, EIA के लिए मानदंड का निर्धारण किया जाता है| यह इस बात को तय करता है कि, क्या प्रस्तावित परियोजना के EIA की आवश्यकता है और यदि आवश्यकता है तो आकलन का स्तर क्या हो? विस्तारण/प्रयोजन - इस चरण में परियोजना संबंधित आंकड़ों का अध्ययन एवं EIA रिपोर्ट तैयार किया जाता है| इसमें उन प्रमुख मुद्दों एवं प्रभावों की पहचान की जाती है जिसकी जाँच की जानी है|यह कार्य एक विशेषज्ञ काउंसिल के द्वारा किया जाता है| EIA रिपोर्ट को परियोजना संबंधित कंपनी को सौंप दिया जाता है| लोक-परामर्श - इस चरण में जिला-प्रशासन द्वारा लोक-सुनवाई संबंधित विज्ञापन जारी किया जाता है| लोक-परामर्श के दौरान पूरी प्रक्रिया की विडियोग्राफी की जाती है तथा लोगों के लिखित राय भी लिया जाता ही| निम्न परियोजनाओं में लोक-परामर्श नहीं होता है - रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधित परियोजनाएं, SEZ,आईटी पार्क इत्यादि के अंदर नयी परियोजनाएं, आधुनिक सिंचाई परियोजनाएं, राष्ट्रीय राजमार्ग तथा रेलवे का विस्तारण जिसमें अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं होती है| निर्णय-निर्माण - EIA रिपोर्ट तथा लोक-परामर्श के दस्तावेजों का केंद्रीय अथवा राज्य-प्राधिकरण के द्वारा समीक्षा की जाती है एवं परियोजना की स्वीकृति दी जाती है| इस कार्य के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाता है| हालाँकि भारत में, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में अनेकों कमियां हैं जैसे- EIA की जिम्मेदारी परियोजना प्रस्तावक पर, जनसुनवाई में विलंब आदि; फिर भी इसकी पर्यावरण संरक्षण में अहम् भूमिका को देखते हुए कु छ ठोस क़दमों के साथ इसे ज्यादा प्रभावी एवं विस्तृत करने की आवश्यकता है|
| 45,368
|
Explain the concept and components of FDI with respect to the Indian economy. (150 words/10 marks)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE CONCEPT OF FDI - THE COMPONENTS OF FDI -CONCLUSION ANSWER: The Balance of Payments summarizes all transactions that a country’s individuals, companies and government bodies complete with individuals, companies and governments outside the country. Broadly, the balance of payments accounts can be divided into two sets of accounts viz. the current account and the capital account. Foreign Direct Investment (FDI) forms a part and is one of the components of the capital account. THE CONCEPT OF FDI 1) DEFINITION Foreign investors invest in our country by setting up a plant or project, so as to produce and manufacture or provide a service.Anything more than 10% of equity stake in a company is counted as FDI in India. 2) LONG TERM It is a long term investment. 3) DESIRABILITY FDI brings with it the benefits of foreign exchange (non-volatile and stable kinds), technological innovation in the country, employment generation, increased income etc. due to direct investments made. All this leads to growth and progress of the economy, and also to an increase in the GDP (Gross Domestic Production) of an economy. 4) TYPES OF FDI (i) HORIZONTAL FDI This is the kind of FDI where the company produces the complete and same kind of goods as in the parent country. For example, Hyundai manufacturing cars in India. (ii) VERTICAL FDI In this, the company produces one of the components of the product, instead of producing the same product. For example, if Hyundai produced tyres in India, then it will be considered as vertical FDI. (iii) PLATFORM FDI When a country is used just as a platform for the sake of producing the product, but exporting it (the products so produced) to other countries for final consumption, then it is known as platform FDI. For example, Hyundai selling cars in other countries. The benefit is that it brings in foreign exchange in the country, apart from technological innovation and employment and income generation here. THE COMPONENTS OF FDI 1) EQUITY CAPITAL Buying/ investing more than 10% stake in an Indian company by a foreign national is considered as FDI. 2) RE-INVESTED EARNINGS When one starts a business in India and earns profits, she has 2 choices: (i) Convert the earned rupees into the respective foreign currency say dollars, and send the money back to the home country. (ii) Re-invest the money back here (i.e. in the Indian economy itself)- This is considered as FDI, even though it is in the form of rupees and not a foreign currency. 3) OTHER TYPES OF CAPITAL This comprises of convertible preference shares and debentures. For example, a company called POSCO from South Korea wants to initiate a steel plant in India. They decide upon the following for their capital/ funds requirements: 1) EQUITY SHARES This is of 70 crore shares of Rs. 10 each, amounting to a total amount of Rs. 700 crores. 2) DEBENTURES This is of 7 crore shares (mandatorily convertible into equity at a particular future date) of Rs. 100 each, amounting to a total amount of Rs. 700 crores. 3) PREFERENCE SHARES This is of 70 crore shares (mandatorily convertible into equity at a particular future date) of Rs. 10 each, amounting to a total amount of Rs. 700 crores. Therefore, in total, they want to invest Rs. 2,100 crores into the Indian economy. Now, say, that the exchange rate is Rs. 70 for 1$. This means that that they are bringing in $ 30 crores (i.e. 2,100/70). So, they bring in foreign currency and convert the same into rupees with the RBI. Now, equity means ownership. But say the preference shares and debentures are subject to redemption after 5 years. This means that the money will then go back from our economy. But FDI is supposed to be of long term. Therefore, preference shares and debentures are not counted as FDI. It will only be considered as FDI if these are convertible into equity and that too when they are mandatory to convert at a future date (as per a prior written commitment to the RBI). The reason why debt is not considered as FDI is that they (i.e. the debtors/ debenture holders) are the first to be paid back when a country goes bankrupt. The second in line here are the preference shareholders. The equity share holders are only the last to be paid back, and also may or may not be paid back in such a case. Therefore, equity stake ensures stability of finance and foreign exchange for the home country. Also, the most desirable debt-to-equity ratio is 2:1 (as per accountancy) Currently, as per the latest estimates, the services sector is receiving the maximum share of FDI in our economy. In states/ UTs/ cities, Mumbai (Maharashtra), and then Delhi and Karnataka are 3 topmost FDI destinations in our economy.
|
##Question:Explain the concept and components of FDI with respect to the Indian economy. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE CONCEPT OF FDI - THE COMPONENTS OF FDI -CONCLUSION ANSWER: The Balance of Payments summarizes all transactions that a country’s individuals, companies and government bodies complete with individuals, companies and governments outside the country. Broadly, the balance of payments accounts can be divided into two sets of accounts viz. the current account and the capital account. Foreign Direct Investment (FDI) forms a part and is one of the components of the capital account. THE CONCEPT OF FDI 1) DEFINITION Foreign investors invest in our country by setting up a plant or project, so as to produce and manufacture or provide a service.Anything more than 10% of equity stake in a company is counted as FDI in India. 2) LONG TERM It is a long term investment. 3) DESIRABILITY FDI brings with it the benefits of foreign exchange (non-volatile and stable kinds), technological innovation in the country, employment generation, increased income etc. due to direct investments made. All this leads to growth and progress of the economy, and also to an increase in the GDP (Gross Domestic Production) of an economy. 4) TYPES OF FDI (i) HORIZONTAL FDI This is the kind of FDI where the company produces the complete and same kind of goods as in the parent country. For example, Hyundai manufacturing cars in India. (ii) VERTICAL FDI In this, the company produces one of the components of the product, instead of producing the same product. For example, if Hyundai produced tyres in India, then it will be considered as vertical FDI. (iii) PLATFORM FDI When a country is used just as a platform for the sake of producing the product, but exporting it (the products so produced) to other countries for final consumption, then it is known as platform FDI. For example, Hyundai selling cars in other countries. The benefit is that it brings in foreign exchange in the country, apart from technological innovation and employment and income generation here. THE COMPONENTS OF FDI 1) EQUITY CAPITAL Buying/ investing more than 10% stake in an Indian company by a foreign national is considered as FDI. 2) RE-INVESTED EARNINGS When one starts a business in India and earns profits, she has 2 choices: (i) Convert the earned rupees into the respective foreign currency say dollars, and send the money back to the home country. (ii) Re-invest the money back here (i.e. in the Indian economy itself)- This is considered as FDI, even though it is in the form of rupees and not a foreign currency. 3) OTHER TYPES OF CAPITAL This comprises of convertible preference shares and debentures. For example, a company called POSCO from South Korea wants to initiate a steel plant in India. They decide upon the following for their capital/ funds requirements: 1) EQUITY SHARES This is of 70 crore shares of Rs. 10 each, amounting to a total amount of Rs. 700 crores. 2) DEBENTURES This is of 7 crore shares (mandatorily convertible into equity at a particular future date) of Rs. 100 each, amounting to a total amount of Rs. 700 crores. 3) PREFERENCE SHARES This is of 70 crore shares (mandatorily convertible into equity at a particular future date) of Rs. 10 each, amounting to a total amount of Rs. 700 crores. Therefore, in total, they want to invest Rs. 2,100 crores into the Indian economy. Now, say, that the exchange rate is Rs. 70 for 1$. This means that that they are bringing in $ 30 crores (i.e. 2,100/70). So, they bring in foreign currency and convert the same into rupees with the RBI. Now, equity means ownership. But say the preference shares and debentures are subject to redemption after 5 years. This means that the money will then go back from our economy. But FDI is supposed to be of long term. Therefore, preference shares and debentures are not counted as FDI. It will only be considered as FDI if these are convertible into equity and that too when they are mandatory to convert at a future date (as per a prior written commitment to the RBI). The reason why debt is not considered as FDI is that they (i.e. the debtors/ debenture holders) are the first to be paid back when a country goes bankrupt. The second in line here are the preference shareholders. The equity share holders are only the last to be paid back, and also may or may not be paid back in such a case. Therefore, equity stake ensures stability of finance and foreign exchange for the home country. Also, the most desirable debt-to-equity ratio is 2:1 (as per accountancy) Currently, as per the latest estimates, the services sector is receiving the maximum share of FDI in our economy. In states/ UTs/ cities, Mumbai (Maharashtra), and then Delhi and Karnataka are 3 topmost FDI destinations in our economy.
| 45,376
|
जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त को बताते हुए उसके विभिन्न अवस्थाओं की चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द/10 अंक) While describing the population transition theory, discuss its various stages. (150-200 words/10 Marks)
|
दृष्टिकोण · भूमिका में जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय दीजिये । · उत्तर के मुख्य भाग में इस सिद्धान्त के विभिन्न अवस्थाओ की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- जनांकिकीय संक्रमण या जनसांख्यिकीय संक्रमण एक जनसंख्या सिद्धांत है जो जनसांख्यिक इतिहास के आंकड़ों और सांख्यिकी पर आधारित है। इस सिद्धांत के प्रतिपादक डब्लू एम थॉमप्सन हैं। यह संक्रमण सिद्धांत उच्च प्रजनन दर से न्यून प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर से न्यून मृत्यु दर के जनसांख्यिकीय प्रतिमान को दर्शाता हैं। इसे जनसंख्या चक्र या ‘जनांकिकी संक्रमण’ कहते हैं । इस सिद्धान्त के तहत चार प्रावस्थाओ का उल्लेख किया जाता है ।जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- प्रारम्भिक अवस्था :- इस अवस्था में उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर दोनों पाया जाता है । यह स्थिति अल्पविकसित देशो में पायी जाती है जहा स्वास्थ सुविधाओ के बेहतर न होने के कारण उच्च मृत्यु दर पाई जाती है ।साथ ही जागरूकता के अभाव , परिवार नियोजन के साधनो की प्रभावी उपलब्धता का अभाव और उच्च मृत्यु दर के कारण लोगों द्वारा अधिक संतोनोपति पर ज़ोर दिया जाता है । इथोपिया , सोमालिया लाओस आदि देश इस अवस्था के अंतर्गत लिए जा सकते हैं। द्वितीय अवस्था :- इसे जनसंख्या विस्फोट या संक्रमण की अवस्था भी कहते हैं । उच्च जन्मदर एवं घटती मृत्युदर इस अवस्था की प्रमुख विशेषता होती है । यह अवस्था बेहतर स्वास्थ सुविधाओ के कारण आती है ।जिसमे बेहतर स्वास्थ सुविधा के कारण मृत्यु दर को काफी हद तक रोक लिया जाता है और जन्म दर अपनी गति से बढ़ती रहती है जिससे इस अवस्था में तीव्र जनसंख्या वृद्धि देखी जाती है । विश्व के अधिकतर विकासशील देश इसी अवस्था में हैं, जहाँ चिकित्सा-सुविधा के विस्तार से मृत्युदर में तो कमी आ गई है, परंतु सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में विशेष अंतर नहीं होने के कारण जन्मदर में अपेक्षित कमी नहीं आ पाई है । जैसे- जैसे द्वितीय अवस्था आगे बढ़ती है, जन्म दर में घीरे-धीरे गिरावट दिखाई देने लगती हैं। इस अवस्था वाले देशों में बेरोजगारी, अशिक्षा, बुनियादी सेवाओं की कमी, खाद्यान्न की कमी आदि की समस्या प्रमुख होती है । परंतु श्रमिकों की आपूर्ति बढ़ने से ‘सघन जीवन निर्वाह कृषि’ व अन्य विकास कार्य भी प्रारंभ होते हैं । अफ्रीका, म्यांमार, सऊदी अरब आदि इस अवस्था में आते देश हैं। तृतीय अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि में ह्रास की प्रवृत्ति की अवस्था है । साक्षरता में प्रसार, छोटे परिवार के प्रति जागरूकता एवं बढ़ते हुए सामाजिक-आर्थिक विकास के कारण जन्मदर में कमी आती है तथा मृत्युदर भी घटता जाता है । इस प्रकार, इस अवस्था में धीमी जनसंख्या वृद्धि होती है । पूर्वी यूरोप, चीन, मध्य एशिया आदि देशों में यह अवस्था देखने को मिलती है । वर्तमान में भारत पुर्तगाल , इजराइल आदि देश इसी अवस्था में हैं । चतुर्थ अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि की स्थिर अवस्था है । इस अवस्था में जन्मदर एवं मृत्युदर दोनों ही कम हो जाते हैं । यह विकसित समाज की विशेषता है । यूरोप , जी-8 के सदस्य राष्ट्र , सिंगापुर आदि देश इसी अवस्था में आते हैं। हालांकि इस सिद्धान्त के आलोचको का मानना है कि यह सिद्धान्त न तो उन घटको की चर्चा करता है जिनके द्वारा जनसंख्या नियंत्रित होती है और न ही मानवीय आपदाओ का जनसंख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है?, उसको बताता है। फिर भी यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से ज्यादा प्रचलित है और जनसंख्या संक्रमण को प्रभावी रूप से स्पष्ट करता है ।
|
##Question:जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त को बताते हुए उसके विभिन्न अवस्थाओं की चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द/10 अंक) While describing the population transition theory, discuss its various stages. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय दीजिये । · उत्तर के मुख्य भाग में इस सिद्धान्त के विभिन्न अवस्थाओ की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- जनांकिकीय संक्रमण या जनसांख्यिकीय संक्रमण एक जनसंख्या सिद्धांत है जो जनसांख्यिक इतिहास के आंकड़ों और सांख्यिकी पर आधारित है। इस सिद्धांत के प्रतिपादक डब्लू एम थॉमप्सन हैं। यह संक्रमण सिद्धांत उच्च प्रजनन दर से न्यून प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर से न्यून मृत्यु दर के जनसांख्यिकीय प्रतिमान को दर्शाता हैं। इसे जनसंख्या चक्र या ‘जनांकिकी संक्रमण’ कहते हैं । इस सिद्धान्त के तहत चार प्रावस्थाओ का उल्लेख किया जाता है ।जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- प्रारम्भिक अवस्था :- इस अवस्था में उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर दोनों पाया जाता है । यह स्थिति अल्पविकसित देशो में पायी जाती है जहा स्वास्थ सुविधाओ के बेहतर न होने के कारण उच्च मृत्यु दर पाई जाती है ।साथ ही जागरूकता के अभाव , परिवार नियोजन के साधनो की प्रभावी उपलब्धता का अभाव और उच्च मृत्यु दर के कारण लोगों द्वारा अधिक संतोनोपति पर ज़ोर दिया जाता है । इथोपिया , सोमालिया लाओस आदि देश इस अवस्था के अंतर्गत लिए जा सकते हैं। द्वितीय अवस्था :- इसे जनसंख्या विस्फोट या संक्रमण की अवस्था भी कहते हैं । उच्च जन्मदर एवं घटती मृत्युदर इस अवस्था की प्रमुख विशेषता होती है । यह अवस्था बेहतर स्वास्थ सुविधाओ के कारण आती है ।जिसमे बेहतर स्वास्थ सुविधा के कारण मृत्यु दर को काफी हद तक रोक लिया जाता है और जन्म दर अपनी गति से बढ़ती रहती है जिससे इस अवस्था में तीव्र जनसंख्या वृद्धि देखी जाती है । विश्व के अधिकतर विकासशील देश इसी अवस्था में हैं, जहाँ चिकित्सा-सुविधा के विस्तार से मृत्युदर में तो कमी आ गई है, परंतु सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में विशेष अंतर नहीं होने के कारण जन्मदर में अपेक्षित कमी नहीं आ पाई है । जैसे- जैसे द्वितीय अवस्था आगे बढ़ती है, जन्म दर में घीरे-धीरे गिरावट दिखाई देने लगती हैं। इस अवस्था वाले देशों में बेरोजगारी, अशिक्षा, बुनियादी सेवाओं की कमी, खाद्यान्न की कमी आदि की समस्या प्रमुख होती है । परंतु श्रमिकों की आपूर्ति बढ़ने से ‘सघन जीवन निर्वाह कृषि’ व अन्य विकास कार्य भी प्रारंभ होते हैं । अफ्रीका, म्यांमार, सऊदी अरब आदि इस अवस्था में आते देश हैं। तृतीय अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि में ह्रास की प्रवृत्ति की अवस्था है । साक्षरता में प्रसार, छोटे परिवार के प्रति जागरूकता एवं बढ़ते हुए सामाजिक-आर्थिक विकास के कारण जन्मदर में कमी आती है तथा मृत्युदर भी घटता जाता है । इस प्रकार, इस अवस्था में धीमी जनसंख्या वृद्धि होती है । पूर्वी यूरोप, चीन, मध्य एशिया आदि देशों में यह अवस्था देखने को मिलती है । वर्तमान में भारत पुर्तगाल , इजराइल आदि देश इसी अवस्था में हैं । चतुर्थ अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि की स्थिर अवस्था है । इस अवस्था में जन्मदर एवं मृत्युदर दोनों ही कम हो जाते हैं । यह विकसित समाज की विशेषता है । यूरोप , जी-8 के सदस्य राष्ट्र , सिंगापुर आदि देश इसी अवस्था में आते हैं। हालांकि इस सिद्धान्त के आलोचको का मानना है कि यह सिद्धान्त न तो उन घटको की चर्चा करता है जिनके द्वारा जनसंख्या नियंत्रित होती है और न ही मानवीय आपदाओ का जनसंख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है?, उसको बताता है। फिर भी यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से ज्यादा प्रचलित है और जनसंख्या संक्रमण को प्रभावी रूप से स्पष्ट करता है ।
| 45,385
|
क्रेडिट नियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा विभिन्न प्रकार के किन मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों को अपनाया जाता है| चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Which various types of quantitative and qualitative measures are adopted by the Reserve Bank for credit control. Discuss.(150-200 words; 10 Marks)
|
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में क्रेडिट नियंत्रण के लिए RBI की मौद्रिक नीति कासंक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंक्रेडिट नियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा अपनाये जाने वालेविभिन्न प्रकार के मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- रिज़र्व बैंक, वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए गएऋण का नियंत्रक है। यह दो तरीकों से वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए गए ऋण पर नियंत्रण करता है जिसेक्रेडिट नियंत्रक भी कहते हैं। क्रेडिट नियंत्रण को मौद्रिक नीति के जरिये लागू किया जाता है।मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है। मूल्य स्थिरता स्थायी विकास के लिए एक आवश्यक पूर्व शर्त है जिसके लिए निम्नलिखित विभिन्न उपाय अपनाये जाते हैं- मात्रात्मक उपाय(Quantative):- बैंक दर(Bank rate):- बैंक दर वह दर है जिसमें केंद्रीय बैंक, बैंकों को लम्बी अवधि के लिए ऋण प्रदान करता है। वर्तमान में यह दर 6 प्रतिशत है। यह वह दर है जिस पर रिज़र्व बैंक विनिमय बिलों या अन्य वाणिज्यिक पत्रों को खरीदने या बदलने की गारंटी देता है।बैंक दर MSF दर से जुडी हुई है और स्वचालित रूप से परिवर्तित होती है। MSF दर पॉलिसी रेपो दर के साथ बदलती है। मुद्रास्फीति की स्थिति में RBI बैंक दर को बढ़ा देता है और मंदी की स्थिति में घटा देता है। CRR(नगदी आरक्षित निधि अनुपात):- निवल मांग और समय देयताओं की हिस्सेदारी(नेट डिमांड एन्ड टाइम लायब्लिटी) जो बैंकों को RBI में नगदी के रूप में रखनी होती है जिसे RBI समय समय पर भारत के राजपत्र में अधिसूचित करता है। देश में जब साख की मात्रा को कम करना होता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात को बढ़ा देता है, इस अनुपात के बढ़ने से बैंको को अधिक नकद कोष रिजर्व बैंक के पास रखने पड़ते हैं तथा स्वयं उनके पास नकद की मात्रा कम हो जाती है। इस प्रकार इन बैंको के साख निर्माण की मात्रा कम हो जाती है, जिससे ये ग्राहकों को मँहगा एवं कम साख प्रदान करते हैं। इसके विपरीत नकद आरक्षित अनुपात में कमी होने से बैंकों को नकद कोष कम रखना पड़ता है जिससे साख निर्माण की मात्रा में वृद्धि होती है। वर्तमान में CRR 4 प्रतिशत है। एसएलआर(Statutory liquidity ratio): केन्द्रीय बैंक के निर्देशानुसार प्रत्येक व्यापारिक बैंक को अपने कुल दायित्यों का एक निश्चित प्रतिशत भाग तरल (नकद एवं प्रतिभूतियाँ) के रूप में अपने पास रखना होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि उस सीमा तक व्यापारिक बैंकों की साख सृजन शक्ति कम हो जाती है, साख की मात्रा कम करने के लिए केन्द्रीय बैंक इस अनुपात को बढ़ा देता है तथा साख की मात्रा में वृद्धि करने के लिए इस अनुपात को कम कर देता है। एसएलआर में परिवर्तन अक्सर निजी क्षेत्र को उधार देने के लिए बैंकिंग प्रणाली में संसाधनों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। वर्तमान में यह अनुपात 18.75 प्रतिशत है। रेपो दर और रिवर्स रेपो दर:- रेपो का इस्तेमाल RBI ने भारत में 1992 से आरम्भ किया। यह अल्पकालीन तरलता उपलब्ध करानेकी एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसके अन्तर्गत केवल एक वर्ष तक के लिए ऋण प्राप्त किया जा सकता है। जब वाणिज्यिक बैंक अपनी प्रतिभूतियाँ भारतीय रिजर्व बैंक को इस शर्त पर विक्रय करते हैं, कि रिजर्व बैंक इन प्रतिभूतियों को अल्पकाल में पुन: खरीद लेगा, तो रिजर्व बैंक को इस देय ब्याज की दर ‘रेपो रेट’ कहलाती है। जबकि रिवर्स रेपो में सरकारी प्रतिभूतियां बैंकों के पास रखकर, RBI बैंकों से उधार लेता है। वर्तमान में रेपो दर 5.75 प्रतिशत है और रिवर्स रेपो 5.50 प्रतिशत है। OMO(ऑपन मार्केट ऑपरेशन्स):- इसके अंतर्गतसरकारी प्रतिभूतियों की एकमुश्त खरीद एवं बिक्री करनाशामिल हैं। यह कार्य सरकार के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा किया जाता है।इन प्रतिभूतियों के क्रय के कारण प्रतिभूतियाँ केन्द्रीय बैंक के पासआ जाती हैं तथा कोष व्यावसायिक बैंकों के पास पहुँच जाता है। इस प्रकार बैंकों के पास अतिरिक्त कोष आ जाने से इनकी साख सृजन क्षमता में वृद्धि हो जाती है, जिससे ये बैंक ग्राहकों को अधिक साख उपलब्ध कराने में समर्थ होते हैं एवं इस प्रकार का विस्तार सम्भव होता है। LAF(लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी):- यह ओवरनाइट सुविधा के साथ साथ टर्म रेपो की नीलामी को शामिल करता है। टर्म रेपो इंटरबैंक मनी मार्केट को विकसित करने में मदद करती है। इससे मौद्रिक नीति के ट्रांसमिशन में भी सहायता मिलती है। MSF(सीमान्त स्थाई सुविधा):- ऐसी सुविधा जिसमें वाणिज्यिक बैंक RBI से ओवरनाइट अतिरिक्त राशि को एक सीमा तक अपने एसएलआर पोर्टफोलियो में गिरावट कर ब्याज की दंडात्मक दर पर उधार ले सकते हैं। यह बैंकिंग प्रणाली को अप्रत्यासित चलनिधि झटकों के खिलाफ सुरक्षावाल्व प्रदान करता है। गुणात्मक उपाय(Qualitative):- उधार राशि नियतन (Rationing of credit):- अन्तिम ऋणदाता के रूप में देश का केन्द्रीय बैंक अन्य बैंकों की साख-निर्माण क्षमता को सीमित करने के लिए साख का समभाजन भी कर सकता है। यह कई विधियों या उपायों द्वारा की जा सकती है। जैसे - किसी बैंक या कुछ बैंकों की पुनर्कटौती (Rediscounting) की सुविधा को समाप्त कर देना अथवा बैंको के लिए साख के कोटानिश्चित कर देनाइत्यादि। अत: केन्द्रीय बैंक साख का विस्तार करना चाहता है, तो पुनर्कटौती को लागू या बहाल कर दिया जाता है तथा विभिन्न व्यवसायों को दिये जाने वाले ऋणों की सीमा में वृद्धि कर दी जाती है। इसके विपरीत साख संकुचन के लिए पुनर्कटौती की सुविधा को समाप्त कर देना या ऋणों की सीमा को कम कर दिया जाता है। नैतिक दबाव(moral suasion):- देश की मौद्रिक नीति का नियमन एवं नियन्त्रण करने के कारण देश के केन्द्रीय बैंक का वाणिज्यिक बैंकों पर पर्याप्त प्रभाव रहता है। इसलिए केन्द्रीय बैंक कभी-कभी अन्य बैंकों को सलाह देकर तथा उन पर नैतिक दबाव डालकर उन्हें अपनी साख नीति का स्वेच्छापूर्वक पालन करने के लिए प्रेरित करता है। प्रत्यक्ष कार्यवाही(Direct action):- केन्द्रीय बैंक साख नियन्त्रण सम्बन्धी किये गये उपायों के लिए दिये गये निर्देशों का ठीक ढंग से पालन न करने वाले बैंकों के विरुद्ध प्रत्यक्ष या सीधी कार्यवाही कर सकता है। प्रत्यक्ष कार्यवाही के अन्तर्गत निम्न उपायों को शामिल किया जाता है- बैंकों को पुनर्कटौती की सुविधा बन्द कर देना, पुनर्कटौती की शर्तों में परिवर्तन करना, ऋण देने से मना कर देना, बैंकों पर मौद्रिक दण्ड लगाना इत्यादि। अपेक्षित मार्जिन की भिन्नता(Variation in margin requirement) खपत परियोजन के लिए क्रेडिट विनियमन(Regulating loans for consumption purpose ) इस प्रकार क्रेडिटनियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा विभिन्न प्रकार के मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों को अपनाया जाता है, जो आर्थिक विकास एवं अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
|
##Question:क्रेडिट नियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा विभिन्न प्रकार के किन मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों को अपनाया जाता है| चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Which various types of quantitative and qualitative measures are adopted by the Reserve Bank for credit control. Discuss.(150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में क्रेडिट नियंत्रण के लिए RBI की मौद्रिक नीति कासंक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंक्रेडिट नियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा अपनाये जाने वालेविभिन्न प्रकार के मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- रिज़र्व बैंक, वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए गएऋण का नियंत्रक है। यह दो तरीकों से वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए गए ऋण पर नियंत्रण करता है जिसेक्रेडिट नियंत्रक भी कहते हैं। क्रेडिट नियंत्रण को मौद्रिक नीति के जरिये लागू किया जाता है।मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है। मूल्य स्थिरता स्थायी विकास के लिए एक आवश्यक पूर्व शर्त है जिसके लिए निम्नलिखित विभिन्न उपाय अपनाये जाते हैं- मात्रात्मक उपाय(Quantative):- बैंक दर(Bank rate):- बैंक दर वह दर है जिसमें केंद्रीय बैंक, बैंकों को लम्बी अवधि के लिए ऋण प्रदान करता है। वर्तमान में यह दर 6 प्रतिशत है। यह वह दर है जिस पर रिज़र्व बैंक विनिमय बिलों या अन्य वाणिज्यिक पत्रों को खरीदने या बदलने की गारंटी देता है।बैंक दर MSF दर से जुडी हुई है और स्वचालित रूप से परिवर्तित होती है। MSF दर पॉलिसी रेपो दर के साथ बदलती है। मुद्रास्फीति की स्थिति में RBI बैंक दर को बढ़ा देता है और मंदी की स्थिति में घटा देता है। CRR(नगदी आरक्षित निधि अनुपात):- निवल मांग और समय देयताओं की हिस्सेदारी(नेट डिमांड एन्ड टाइम लायब्लिटी) जो बैंकों को RBI में नगदी के रूप में रखनी होती है जिसे RBI समय समय पर भारत के राजपत्र में अधिसूचित करता है। देश में जब साख की मात्रा को कम करना होता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात को बढ़ा देता है, इस अनुपात के बढ़ने से बैंको को अधिक नकद कोष रिजर्व बैंक के पास रखने पड़ते हैं तथा स्वयं उनके पास नकद की मात्रा कम हो जाती है। इस प्रकार इन बैंको के साख निर्माण की मात्रा कम हो जाती है, जिससे ये ग्राहकों को मँहगा एवं कम साख प्रदान करते हैं। इसके विपरीत नकद आरक्षित अनुपात में कमी होने से बैंकों को नकद कोष कम रखना पड़ता है जिससे साख निर्माण की मात्रा में वृद्धि होती है। वर्तमान में CRR 4 प्रतिशत है। एसएलआर(Statutory liquidity ratio): केन्द्रीय बैंक के निर्देशानुसार प्रत्येक व्यापारिक बैंक को अपने कुल दायित्यों का एक निश्चित प्रतिशत भाग तरल (नकद एवं प्रतिभूतियाँ) के रूप में अपने पास रखना होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि उस सीमा तक व्यापारिक बैंकों की साख सृजन शक्ति कम हो जाती है, साख की मात्रा कम करने के लिए केन्द्रीय बैंक इस अनुपात को बढ़ा देता है तथा साख की मात्रा में वृद्धि करने के लिए इस अनुपात को कम कर देता है। एसएलआर में परिवर्तन अक्सर निजी क्षेत्र को उधार देने के लिए बैंकिंग प्रणाली में संसाधनों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। वर्तमान में यह अनुपात 18.75 प्रतिशत है। रेपो दर और रिवर्स रेपो दर:- रेपो का इस्तेमाल RBI ने भारत में 1992 से आरम्भ किया। यह अल्पकालीन तरलता उपलब्ध करानेकी एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसके अन्तर्गत केवल एक वर्ष तक के लिए ऋण प्राप्त किया जा सकता है। जब वाणिज्यिक बैंक अपनी प्रतिभूतियाँ भारतीय रिजर्व बैंक को इस शर्त पर विक्रय करते हैं, कि रिजर्व बैंक इन प्रतिभूतियों को अल्पकाल में पुन: खरीद लेगा, तो रिजर्व बैंक को इस देय ब्याज की दर ‘रेपो रेट’ कहलाती है। जबकि रिवर्स रेपो में सरकारी प्रतिभूतियां बैंकों के पास रखकर, RBI बैंकों से उधार लेता है। वर्तमान में रेपो दर 5.75 प्रतिशत है और रिवर्स रेपो 5.50 प्रतिशत है। OMO(ऑपन मार्केट ऑपरेशन्स):- इसके अंतर्गतसरकारी प्रतिभूतियों की एकमुश्त खरीद एवं बिक्री करनाशामिल हैं। यह कार्य सरकार के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा किया जाता है।इन प्रतिभूतियों के क्रय के कारण प्रतिभूतियाँ केन्द्रीय बैंक के पासआ जाती हैं तथा कोष व्यावसायिक बैंकों के पास पहुँच जाता है। इस प्रकार बैंकों के पास अतिरिक्त कोष आ जाने से इनकी साख सृजन क्षमता में वृद्धि हो जाती है, जिससे ये बैंक ग्राहकों को अधिक साख उपलब्ध कराने में समर्थ होते हैं एवं इस प्रकार का विस्तार सम्भव होता है। LAF(लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी):- यह ओवरनाइट सुविधा के साथ साथ टर्म रेपो की नीलामी को शामिल करता है। टर्म रेपो इंटरबैंक मनी मार्केट को विकसित करने में मदद करती है। इससे मौद्रिक नीति के ट्रांसमिशन में भी सहायता मिलती है। MSF(सीमान्त स्थाई सुविधा):- ऐसी सुविधा जिसमें वाणिज्यिक बैंक RBI से ओवरनाइट अतिरिक्त राशि को एक सीमा तक अपने एसएलआर पोर्टफोलियो में गिरावट कर ब्याज की दंडात्मक दर पर उधार ले सकते हैं। यह बैंकिंग प्रणाली को अप्रत्यासित चलनिधि झटकों के खिलाफ सुरक्षावाल्व प्रदान करता है। गुणात्मक उपाय(Qualitative):- उधार राशि नियतन (Rationing of credit):- अन्तिम ऋणदाता के रूप में देश का केन्द्रीय बैंक अन्य बैंकों की साख-निर्माण क्षमता को सीमित करने के लिए साख का समभाजन भी कर सकता है। यह कई विधियों या उपायों द्वारा की जा सकती है। जैसे - किसी बैंक या कुछ बैंकों की पुनर्कटौती (Rediscounting) की सुविधा को समाप्त कर देना अथवा बैंको के लिए साख के कोटानिश्चित कर देनाइत्यादि। अत: केन्द्रीय बैंक साख का विस्तार करना चाहता है, तो पुनर्कटौती को लागू या बहाल कर दिया जाता है तथा विभिन्न व्यवसायों को दिये जाने वाले ऋणों की सीमा में वृद्धि कर दी जाती है। इसके विपरीत साख संकुचन के लिए पुनर्कटौती की सुविधा को समाप्त कर देना या ऋणों की सीमा को कम कर दिया जाता है। नैतिक दबाव(moral suasion):- देश की मौद्रिक नीति का नियमन एवं नियन्त्रण करने के कारण देश के केन्द्रीय बैंक का वाणिज्यिक बैंकों पर पर्याप्त प्रभाव रहता है। इसलिए केन्द्रीय बैंक कभी-कभी अन्य बैंकों को सलाह देकर तथा उन पर नैतिक दबाव डालकर उन्हें अपनी साख नीति का स्वेच्छापूर्वक पालन करने के लिए प्रेरित करता है। प्रत्यक्ष कार्यवाही(Direct action):- केन्द्रीय बैंक साख नियन्त्रण सम्बन्धी किये गये उपायों के लिए दिये गये निर्देशों का ठीक ढंग से पालन न करने वाले बैंकों के विरुद्ध प्रत्यक्ष या सीधी कार्यवाही कर सकता है। प्रत्यक्ष कार्यवाही के अन्तर्गत निम्न उपायों को शामिल किया जाता है- बैंकों को पुनर्कटौती की सुविधा बन्द कर देना, पुनर्कटौती की शर्तों में परिवर्तन करना, ऋण देने से मना कर देना, बैंकों पर मौद्रिक दण्ड लगाना इत्यादि। अपेक्षित मार्जिन की भिन्नता(Variation in margin requirement) खपत परियोजन के लिए क्रेडिट विनियमन(Regulating loans for consumption purpose ) इस प्रकार क्रेडिटनियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक द्वारा विभिन्न प्रकार के मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपायों को अपनाया जाता है, जो आर्थिक विकास एवं अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
| 45,387
|
पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन(EIA) से आप क्या समझते हैं|भारत के सन्दर्भ में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्रक्रिया के चरणों का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you consider with Environmental Impact Assessment (EIA)? Evaluate the steps of the Environmental Impact Assessment process in the context of India. (150-200 words, 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग मेंपर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के चरणों की व्याख्या कीजिये 3- दुसरे भाग में सीमाएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये EIA एक ऐसा साधन है जो पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन में सहायक है| EIA इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि प्रस्तावित विकास प्रक्रियाओं एवं मानवीय प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं और चुनौतियों को जाना जा सके तथाप्राप्त ज्ञान के आधार पर पर्यावरणीय प्रभावों के न्यूनीकरण के लिए सुझाव दिए जा सकें| EIA अनुमति दिए जाने से पूर्व निर्णय निर्माण सुनिश्चित किये जाने में सहायक होता है| EIA के तीन महत्वपूर्ण आयाम हैं यथा;जोखिम की समीक्षा,पर्यावरणीय प्रबंधन, प्रबंधन के बाद निगरानी|भारत में EIA प्रक्रिया पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अंतर्गत की जाती है| EIA में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन का दृष्टिकोण संभाव्य पर्यावरणीय प्रभाव की जानकारी वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग तथा प्रदूषण कम करने की युक्तियाँ अल्पकाल, दीर्घकाल तथा छोटे व बड़े पैमाने के प्रभावों के लिए उत्तरदायी सभी कारकों को संबोधित करना एक लचीली पद्धति अपनाना जिसमें लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके प्रबंधन व मूल्यांकन के लिए अंकेक्षण करना पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के चरण छटनी/स्क्रीनिंग इस चरण में परियोजनाओं को दो वर्गों में बांटा जाता है बड़ी परियोजनाओं की अनुमति केन्द्रीय पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण(CEIA) के द्वारा दी जाती है अन्य परियोजनाओं की अनुमति राज्य पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (SEIA) के द्वारा दी जाती है किसी भी परियोजना की छानबीन में निवेश का पैमाना, भौगोलिक क्षेत्र एवं परियोजना सम्बन्धित वैधानिक अनुमतियों आदि का निर्धारण किया जाता है विस्तारण(scoping) दूसरे चरण में परियोजना से सम्बन्धित पैमाना तय किया जाता है इसके अंतर्गत एक कंसलटेंट के द्वारा परियोजना के संभाव्य प्रभाव, प्रभाव के क्षेत्र, पर्यावरणीय प्रबंधन इत्यादि बिन्दुओं का आकलन किया जाता है इस प्रक्रिया में आंकड़ों के आधार पर पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की जाती है लोक परामर्श तीसरे चरण में जन सुनवाई को जिला प्रशासन द्वारा आयोजित किया जाता है यह प्रक्रिया CPCB या SPCB की निगरानी में संपन्न की जाती है सम्पूर्ण प्रक्रिया की विडियोग्राफी की जाती है और लोगों की लिखित राय ली जाती है SEZ, सूचना तकनीकी पार्कों के भीतर नयी परियोजनाओं कि संस्थापना, आधुनिक सिंचाई परियोजना, रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी परियोजनाएं, राष्ट्रीय मार्ग एवं रेल मार्ग के विस्तार में जिसमें अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं होती आदि परियोजनाओं में जनसुनवाई का आयोजन नहीं किया जाता है समीक्षा एवं निर्णय निर्माण यह अंतिम चरण में केन्द्रीय अथवा राज्य की विशेषज्ञ समिति के द्वारा EIA रिपोर्ट एवं लोक परामर्श दस्तावेजों का अध्ययन एवं समीक्षा की जाती है इस प्रक्रिया के द्वारा परियोजना की अनुमति दी जाती है अथवा अस्वीकृति दी जाती है| सीमाएं लालफीताशाही के कारण परियोजनाओं के आरम्भ में देरी होना, इससे परियोजना की लागत बढ़ जाती है और इसका सामाजिक-आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है कंसल्टेंट द्वारा कंपनी के हित में गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करना व्यापक जागरूकता के अभाव में लोक परामर्श अप्रभावी होता है, इसके साथ ही इनका आयोजन भी केवल खानापूर्ति के लिए किया जाता है विशेषज्ञ समितियों का निर्माण सरकार के द्वारा होता है अतः इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना के साथ अपारदर्शिता जैसी समस्याएं हो सकती हैं इस प्रकार स्पष्ट होता है कि धारणीय विकास के लिए पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन एक प्रभावशाली अवधारणा है किन्तु इसके क्रियान्वयन में त्रुटियाँ होने के कारण यह प्रभावी परिणाम नहीं उत्पन्न कर पाता है|अतः ई-प्रशासन, कंसलटेंट का प्रमाणीकरण एवं पंजीकरण, व्यापक जन भागीदारी एवं जागरूकता कार्यक्रम आदि के माध्यम से बेहतर पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन संभव हो सकेगा|
|
##Question:पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन(EIA) से आप क्या समझते हैं|भारत के सन्दर्भ में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्रक्रिया के चरणों का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you consider with Environmental Impact Assessment (EIA)? Evaluate the steps of the Environmental Impact Assessment process in the context of India. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग मेंपर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के चरणों की व्याख्या कीजिये 3- दुसरे भाग में सीमाएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये EIA एक ऐसा साधन है जो पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन में सहायक है| EIA इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि प्रस्तावित विकास प्रक्रियाओं एवं मानवीय प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं और चुनौतियों को जाना जा सके तथाप्राप्त ज्ञान के आधार पर पर्यावरणीय प्रभावों के न्यूनीकरण के लिए सुझाव दिए जा सकें| EIA अनुमति दिए जाने से पूर्व निर्णय निर्माण सुनिश्चित किये जाने में सहायक होता है| EIA के तीन महत्वपूर्ण आयाम हैं यथा;जोखिम की समीक्षा,पर्यावरणीय प्रबंधन, प्रबंधन के बाद निगरानी|भारत में EIA प्रक्रिया पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अंतर्गत की जाती है| EIA में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन का दृष्टिकोण संभाव्य पर्यावरणीय प्रभाव की जानकारी वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग तथा प्रदूषण कम करने की युक्तियाँ अल्पकाल, दीर्घकाल तथा छोटे व बड़े पैमाने के प्रभावों के लिए उत्तरदायी सभी कारकों को संबोधित करना एक लचीली पद्धति अपनाना जिसमें लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके प्रबंधन व मूल्यांकन के लिए अंकेक्षण करना पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के चरण छटनी/स्क्रीनिंग इस चरण में परियोजनाओं को दो वर्गों में बांटा जाता है बड़ी परियोजनाओं की अनुमति केन्द्रीय पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण(CEIA) के द्वारा दी जाती है अन्य परियोजनाओं की अनुमति राज्य पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (SEIA) के द्वारा दी जाती है किसी भी परियोजना की छानबीन में निवेश का पैमाना, भौगोलिक क्षेत्र एवं परियोजना सम्बन्धित वैधानिक अनुमतियों आदि का निर्धारण किया जाता है विस्तारण(scoping) दूसरे चरण में परियोजना से सम्बन्धित पैमाना तय किया जाता है इसके अंतर्गत एक कंसलटेंट के द्वारा परियोजना के संभाव्य प्रभाव, प्रभाव के क्षेत्र, पर्यावरणीय प्रबंधन इत्यादि बिन्दुओं का आकलन किया जाता है इस प्रक्रिया में आंकड़ों के आधार पर पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की जाती है लोक परामर्श तीसरे चरण में जन सुनवाई को जिला प्रशासन द्वारा आयोजित किया जाता है यह प्रक्रिया CPCB या SPCB की निगरानी में संपन्न की जाती है सम्पूर्ण प्रक्रिया की विडियोग्राफी की जाती है और लोगों की लिखित राय ली जाती है SEZ, सूचना तकनीकी पार्कों के भीतर नयी परियोजनाओं कि संस्थापना, आधुनिक सिंचाई परियोजना, रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी परियोजनाएं, राष्ट्रीय मार्ग एवं रेल मार्ग के विस्तार में जिसमें अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं होती आदि परियोजनाओं में जनसुनवाई का आयोजन नहीं किया जाता है समीक्षा एवं निर्णय निर्माण यह अंतिम चरण में केन्द्रीय अथवा राज्य की विशेषज्ञ समिति के द्वारा EIA रिपोर्ट एवं लोक परामर्श दस्तावेजों का अध्ययन एवं समीक्षा की जाती है इस प्रक्रिया के द्वारा परियोजना की अनुमति दी जाती है अथवा अस्वीकृति दी जाती है| सीमाएं लालफीताशाही के कारण परियोजनाओं के आरम्भ में देरी होना, इससे परियोजना की लागत बढ़ जाती है और इसका सामाजिक-आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है कंसल्टेंट द्वारा कंपनी के हित में गलत रिपोर्ट प्रस्तुत करना व्यापक जागरूकता के अभाव में लोक परामर्श अप्रभावी होता है, इसके साथ ही इनका आयोजन भी केवल खानापूर्ति के लिए किया जाता है विशेषज्ञ समितियों का निर्माण सरकार के द्वारा होता है अतः इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना के साथ अपारदर्शिता जैसी समस्याएं हो सकती हैं इस प्रकार स्पष्ट होता है कि धारणीय विकास के लिए पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन एक प्रभावशाली अवधारणा है किन्तु इसके क्रियान्वयन में त्रुटियाँ होने के कारण यह प्रभावी परिणाम नहीं उत्पन्न कर पाता है|अतः ई-प्रशासन, कंसलटेंट का प्रमाणीकरण एवं पंजीकरण, व्यापक जन भागीदारी एवं जागरूकता कार्यक्रम आदि के माध्यम से बेहतर पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन संभव हो सकेगा|
| 45,391
|
जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त को बताते हुए उसके विभिन्न अवस्थाओ की चर्चा कीजिए । (150 शब्द) Describe the population transition theory and discuss its various stages. (150 words)
|
दृष्टिकोण · भूमिका में जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय दीजिये । · उत्तर के मुख्य भाग में इस सिद्धान्त के विभिन्न अवस्थाओ की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- जनांकिकीय संक्रमण या जनसांख्यिकीय संक्रमण एक जनसंख्या सिद्धांत है जो जनसांख्यिक इतिहास के आंकड़ों और सांख्यिकी पर आधारित है। इस सिद्धांत के प्रतिपादक डब्लू एम थॉमप्सन हैं। यह संक्रमण सिद्धांत उच्च प्रजनन दर से न्यून प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर से न्यून मृत्यु दर के जनसांख्यिकीय प्रतिमान को दर्शाता हैं। इसे जनसंख्या चक्र या ‘जनांकिकी संक्रमण’ कहते हैं । इस सिद्धान्त के तहत चार प्रावस्थाओ का उल्लेख किया जाता है ।जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- प्रारम्भिक अवस्था : - इस अवस्था में उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर दोनों पाया जाता है । यह स्थिति अल्पविकसित देशो में पायी जाती है जहा स्वास्थ सुविधाओ के बेहतर न होने के कारण उच्च मृत्यु दर पाई जाती है ।साथ ही जागरूकता के अभाव , परिवार नियोजन के साधनो की प्रभावी उपलब्धता का अभाव और उच्च मृत्यु दर के कारण लोगों द्वारा अधिक संतोनोपति पर ज़ोर दिया जाता है । इथोपिया , सोमालिया लाओस आदि देश इस अवस्था के अंतर्गत लिए जा सकते हैं। द्वितीय अवस्था :- इसे जनसंख्या विस्फोट या संक्रमण की अवस्था भी कहते हैं । उच्च जन्मदर एवं घटती मृत्युदर इस अवस्था की प्रमुख विशेषता होती है । यह अवस्था बेहतर स्वास्थ सुविधाओ के कारण आती है ।जिसमे बेहतर स्वास्थ सुविधा के कारण मृत्यु दर को काफी हद तक रोक लिया जाता है और जन्म दर अपनी गति से बढ़ती रहती है जिससे इस अवस्था में तीव्र जनसंख्या वृद्धि देखी जाती है । विश्व के अधिकतर विकासशील देश इसी अवस्था में हैं, जहाँ चिकित्सा-सुविधा के विस्तार से मृत्युदर में तो कमी आ गई है। परंतु सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में विशेष अंतर नहीं होने के कारण जन्मदर में अपेक्षित कमी नहीं आ पाई है । जैसे- जैसे द्वितीय अवस्था आगे बढ़ती है, जन्म दर में घीरे-धीरे गिरावट दिखाई देने लगती हैं। इस अवस्था वाले देशों में बेरोजगारी, अशिक्षा, बुनियादी सेवाओं की कमी, खाद्यान्न की कमी आदि की समस्या प्रमुख होती है । परंतु श्रमिकों की आपूर्ति बढ़ने से ‘सघन जीवन निर्वाह कृषि’ व अन्य विकास कार्य भी प्रारंभ होते हैं । अफ्रीका, म्यांमार, सऊदी अरब आदि इस अवस्था में आते देश हैं। तृतीय अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि में ह्रास की प्रवृत्ति की अवस्था है । साक्षरता में प्रसार, छोटे परिवार के प्रति जागरूकता एवं बढ़ते हुए सामाजिक-आर्थिक विकास के कारण जन्मदर में कमी आती है तथा मृत्युदर भी घटता जाता है । इस प्रकार, इस अवस्था में धीमी जनसंख्या वृद्धि होती है । पूर्वी यूरोप, चीन, मध्य एशिया आदि देशों में यह अवस्था देखने को मिलती है । वर्तमान में भारत पुर्तगाल , इरजराइल आदि देश इसी अवस्था में हैं । चतुर्थ अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि की स्थिर अवस्था है । इस अवस्था में जन्मदर एवं मृत्युदर दोनों ही कम हो जाते हैं । यह विकसित समाज की विशेषता है । यूरोप , जी-8 के सदस्य राष्ट्र , सिंगापुर आदि देश इसी अवस्था में आते हैं। हालांकि, इस सिद्धान्त के आलोचको का मानना है कि यह सिद्धान्त न तो उन घटको की चर्चा करता है जिनके द्वारा जनसंख्या नियंत्रित होती है और न ही मानवीय आपदाओ का जनसंख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है?, उसको बताता है। फिर भी यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से ज्यादा प्रचलित है और जनसंख्या संक्रमण को प्रभावी रूप से स्पष्ट करता है ।
|
##Question:जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त को बताते हुए उसके विभिन्न अवस्थाओ की चर्चा कीजिए । (150 शब्द) Describe the population transition theory and discuss its various stages. (150 words) ##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में जनसंख्या संक्रमण सिद्धान्त का संक्षिप्त परिचय दीजिये । · उत्तर के मुख्य भाग में इस सिद्धान्त के विभिन्न अवस्थाओ की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- जनांकिकीय संक्रमण या जनसांख्यिकीय संक्रमण एक जनसंख्या सिद्धांत है जो जनसांख्यिक इतिहास के आंकड़ों और सांख्यिकी पर आधारित है। इस सिद्धांत के प्रतिपादक डब्लू एम थॉमप्सन हैं। यह संक्रमण सिद्धांत उच्च प्रजनन दर से न्यून प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर से न्यून मृत्यु दर के जनसांख्यिकीय प्रतिमान को दर्शाता हैं। इसे जनसंख्या चक्र या ‘जनांकिकी संक्रमण’ कहते हैं । इस सिद्धान्त के तहत चार प्रावस्थाओ का उल्लेख किया जाता है ।जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- प्रारम्भिक अवस्था : - इस अवस्था में उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर दोनों पाया जाता है । यह स्थिति अल्पविकसित देशो में पायी जाती है जहा स्वास्थ सुविधाओ के बेहतर न होने के कारण उच्च मृत्यु दर पाई जाती है ।साथ ही जागरूकता के अभाव , परिवार नियोजन के साधनो की प्रभावी उपलब्धता का अभाव और उच्च मृत्यु दर के कारण लोगों द्वारा अधिक संतोनोपति पर ज़ोर दिया जाता है । इथोपिया , सोमालिया लाओस आदि देश इस अवस्था के अंतर्गत लिए जा सकते हैं। द्वितीय अवस्था :- इसे जनसंख्या विस्फोट या संक्रमण की अवस्था भी कहते हैं । उच्च जन्मदर एवं घटती मृत्युदर इस अवस्था की प्रमुख विशेषता होती है । यह अवस्था बेहतर स्वास्थ सुविधाओ के कारण आती है ।जिसमे बेहतर स्वास्थ सुविधा के कारण मृत्यु दर को काफी हद तक रोक लिया जाता है और जन्म दर अपनी गति से बढ़ती रहती है जिससे इस अवस्था में तीव्र जनसंख्या वृद्धि देखी जाती है । विश्व के अधिकतर विकासशील देश इसी अवस्था में हैं, जहाँ चिकित्सा-सुविधा के विस्तार से मृत्युदर में तो कमी आ गई है। परंतु सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में विशेष अंतर नहीं होने के कारण जन्मदर में अपेक्षित कमी नहीं आ पाई है । जैसे- जैसे द्वितीय अवस्था आगे बढ़ती है, जन्म दर में घीरे-धीरे गिरावट दिखाई देने लगती हैं। इस अवस्था वाले देशों में बेरोजगारी, अशिक्षा, बुनियादी सेवाओं की कमी, खाद्यान्न की कमी आदि की समस्या प्रमुख होती है । परंतु श्रमिकों की आपूर्ति बढ़ने से ‘सघन जीवन निर्वाह कृषि’ व अन्य विकास कार्य भी प्रारंभ होते हैं । अफ्रीका, म्यांमार, सऊदी अरब आदि इस अवस्था में आते देश हैं। तृतीय अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि में ह्रास की प्रवृत्ति की अवस्था है । साक्षरता में प्रसार, छोटे परिवार के प्रति जागरूकता एवं बढ़ते हुए सामाजिक-आर्थिक विकास के कारण जन्मदर में कमी आती है तथा मृत्युदर भी घटता जाता है । इस प्रकार, इस अवस्था में धीमी जनसंख्या वृद्धि होती है । पूर्वी यूरोप, चीन, मध्य एशिया आदि देशों में यह अवस्था देखने को मिलती है । वर्तमान में भारत पुर्तगाल , इरजराइल आदि देश इसी अवस्था में हैं । चतुर्थ अवस्था :- यह जनसंख्या वृद्धि की स्थिर अवस्था है । इस अवस्था में जन्मदर एवं मृत्युदर दोनों ही कम हो जाते हैं । यह विकसित समाज की विशेषता है । यूरोप , जी-8 के सदस्य राष्ट्र , सिंगापुर आदि देश इसी अवस्था में आते हैं। हालांकि, इस सिद्धान्त के आलोचको का मानना है कि यह सिद्धान्त न तो उन घटको की चर्चा करता है जिनके द्वारा जनसंख्या नियंत्रित होती है और न ही मानवीय आपदाओ का जनसंख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है?, उसको बताता है। फिर भी यह सिद्धान्त सार्वभौमिक रूप से ज्यादा प्रचलित है और जनसंख्या संक्रमण को प्रभावी रूप से स्पष्ट करता है ।
| 45,397
|
Give the reasons for the informalization of the labor force in India. Discuss its effects on the Indian economy. (150 words/10 Marks)
|
Approach: Introduction: Briefly give the concept of informalization of labour force followed by statistics showing the extent of informalization of labour force in India. Body: Briefly discuss the reasons for informalization of the labour force. Explain its effects on employers, employees and the economy. Conclusion: Give a balanced conclusion suggesting some measures. Model Answer: The informalization of the labour force in an economy represents a situation in which the ratio of the informal labour force to the formal labour force—or the share of the informal labour force in the total labour force—increases over time. Since the 1980s, there has been increasinginformalizationof labour force in India. Extent of informalization of labour force in India: As per latest PLFS (2017-18) by NSSO, 10%labour force is e in formal employment and 90% employed in informal employment; About 19.2 % of theare employed in the organised sector and about 80.8 % is in the unorganised sector. During 2011-12, 8.1% are in the formal employment and 92 % are in the informal employment; just 2% shifted to formal jobs in 6 years; Reasons for informalization of the labour force: Failure of labour market to create formal jobs: While formal workers comprised 8% of the total workforce in 2011-2012, this increased to just 9.98 % in 2017-18, showing that the jobs that were created in the formal sector were mainly informal, employing workers with low earnings and with limited or no social protection. Even the organised sector is not creating many formal jobs in India; more than half of the jobs created are informal i.e., 49 per cent in 2017- 18. Complex/Tough labour laws: Excessive rules on employment have led to an inspector raj discouraging the companies and businesses to create formal employment. There are more than 100 labour acts from Centre and states. These multiplicity of laws are leading to rigid hiring and firing policies and increase in compliance cost. Nature of Indian economy: India"s organised sector is too small to create sufficient formal employment as we are underdeveloped country. Effects of informalization labour force on Indian Economy: On Employees: Informalization results in low salaries and job insecurity. Also , there is lack of social security (PF, insurance and pension) pushing many of them to poverty. On Employers: Benefits: low cost due to fewer salaries, low labour laws compliance cost, more flexibility in removing employees etc.; Drawbacks: Higher cost of hiring, less loyalty and less attachment for the company; more attrition rate; adverse effect on the company"s performance etc. On Economy: Lack of social security to the informal workers increases the public expenditure due to their reliance on government. This leads to higher fiscal deficit. The government should implement four proposed labour codes for wages, social security, safety and labour disputes. Also, fixed-term employment should be implemented in every sector in the economy. These along with creation of manufacturing base through ‘Make in India’ initiative will lead to creation of more formal employment.
|
##Question:Give the reasons for the informalization of the labor force in India. Discuss its effects on the Indian economy. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduction: Briefly give the concept of informalization of labour force followed by statistics showing the extent of informalization of labour force in India. Body: Briefly discuss the reasons for informalization of the labour force. Explain its effects on employers, employees and the economy. Conclusion: Give a balanced conclusion suggesting some measures. Model Answer: The informalization of the labour force in an economy represents a situation in which the ratio of the informal labour force to the formal labour force—or the share of the informal labour force in the total labour force—increases over time. Since the 1980s, there has been increasinginformalizationof labour force in India. Extent of informalization of labour force in India: As per latest PLFS (2017-18) by NSSO, 10%labour force is e in formal employment and 90% employed in informal employment; About 19.2 % of theare employed in the organised sector and about 80.8 % is in the unorganised sector. During 2011-12, 8.1% are in the formal employment and 92 % are in the informal employment; just 2% shifted to formal jobs in 6 years; Reasons for informalization of the labour force: Failure of labour market to create formal jobs: While formal workers comprised 8% of the total workforce in 2011-2012, this increased to just 9.98 % in 2017-18, showing that the jobs that were created in the formal sector were mainly informal, employing workers with low earnings and with limited or no social protection. Even the organised sector is not creating many formal jobs in India; more than half of the jobs created are informal i.e., 49 per cent in 2017- 18. Complex/Tough labour laws: Excessive rules on employment have led to an inspector raj discouraging the companies and businesses to create formal employment. There are more than 100 labour acts from Centre and states. These multiplicity of laws are leading to rigid hiring and firing policies and increase in compliance cost. Nature of Indian economy: India"s organised sector is too small to create sufficient formal employment as we are underdeveloped country. Effects of informalization labour force on Indian Economy: On Employees: Informalization results in low salaries and job insecurity. Also , there is lack of social security (PF, insurance and pension) pushing many of them to poverty. On Employers: Benefits: low cost due to fewer salaries, low labour laws compliance cost, more flexibility in removing employees etc.; Drawbacks: Higher cost of hiring, less loyalty and less attachment for the company; more attrition rate; adverse effect on the company"s performance etc. On Economy: Lack of social security to the informal workers increases the public expenditure due to their reliance on government. This leads to higher fiscal deficit. The government should implement four proposed labour codes for wages, social security, safety and labour disputes. Also, fixed-term employment should be implemented in every sector in the economy. These along with creation of manufacturing base through ‘Make in India’ initiative will lead to creation of more formal employment.
| 45,422
|
भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाले विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कारकों की चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss various international factors that determine India"s foreign policy. (150-200 words; 10 Marks)
|
एप्रोच- विदेश नीति को परिभाषित करते हुए एवं उसके विभिन्न निर्धारक तत्वों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में,भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाले विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कारकों की चर्चा कीजिए| निष्कर्षतः इन कारकों की भूमिका को वर्तमान संदर्भ में संक्षिप्तता से जोड़ते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उस राष्ट्र के अन्य देशों के साथ संबंध बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को संदर्भित करता है| अतः विदेश नीति वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में किसी राष्ट्र द्वारा लागू की गयी एवं अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसकी नीतिगत विशेषताओं को दर्शाती है| प्रत्येक राष्ट्र अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों, आतंरिक तथा बाह्य-सुरक्षा, व्यापार बढ़ोतरी तथा आर्थिक समृद्धि एवं अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक प्रश्नों के संदर्भ में अपने हितों की रुपरेखा विदेश नीति के तहत ही तय करता है| यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके माध्यम से वह राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने हेतु नीतियों का निर्माण करता है| विदेश नीति के निर्धारक कारकों में कुछ आतंरिक/घरेलू कारक हैं तो कुछ अंतर्राष्ट्रीय/बाहरी कारक |घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि प्रमुख हैं| इसी तरह निम्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं- अंतर्राष्ट्रीय राजनीति - द्वितीय विश्वयुद्ध तथा भारत की स्वतंत्रता के बाद विश्व में दो शक्ति गुटों की राजनीति चरम पर थी| विश्व में शीत युद्ध तथा उसके बाद नव शीत युद्ध का दौर आया| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की उपस्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| इसीलिए भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई| भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी जो कि हमारे विदेश नीति में भी दृष्टिगोचर होता है| इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा| इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था| इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था| पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| बाह्य वातावरण(पड़ोसी, क्षेत्रीय तथा विश्व के अन्य भागों का)- स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया| 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का सामना किया| लगातार बढ़ती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी| यह एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| वर्तमान समय में ओबोर का विरोध, लुक-ईस्ट से एक्ट-ईस्ट नीति जैसे मुद्दों का प्रभाव भी हमारी विदेश नीति में दिखाई देता है| संधियों की भूमिका- 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी| भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| वर्तमान समय में नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह में सदस्यता को लेकर भारत की कोशिश क्योंकि वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी गयी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया| इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे- आसियान| इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति तथा एक्ट-ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई| इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की एवं इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे - अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ| भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई| इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) तथा बिम्सटेक की भूमिका; संयुक्त राष्ट्र में विश्वास- संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करती है| भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| शांति सेना में अहम् योगदान की भूमिका; भारत द्वारा सुरक्षा परिषद् में सुधार की कोशिश भी विदेश नीति का महत्वपूर्ण निर्धारक कारक है| सैन्य कारक- भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है| भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं| इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे- मालाबार, इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण एवं विशेष भूमिका अपनी विदेश नीति के तहत निभा रहा है|
|
##Question:भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाले विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कारकों की चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss various international factors that determine India"s foreign policy. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- विदेश नीति को परिभाषित करते हुए एवं उसके विभिन्न निर्धारक तत्वों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में,भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाले विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कारकों की चर्चा कीजिए| निष्कर्षतः इन कारकों की भूमिका को वर्तमान संदर्भ में संक्षिप्तता से जोड़ते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उस राष्ट्र के अन्य देशों के साथ संबंध बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को संदर्भित करता है| अतः विदेश नीति वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में किसी राष्ट्र द्वारा लागू की गयी एवं अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसकी नीतिगत विशेषताओं को दर्शाती है| प्रत्येक राष्ट्र अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों, आतंरिक तथा बाह्य-सुरक्षा, व्यापार बढ़ोतरी तथा आर्थिक समृद्धि एवं अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक प्रश्नों के संदर्भ में अपने हितों की रुपरेखा विदेश नीति के तहत ही तय करता है| यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके माध्यम से वह राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने हेतु नीतियों का निर्माण करता है| विदेश नीति के निर्धारक कारकों में कुछ आतंरिक/घरेलू कारक हैं तो कुछ अंतर्राष्ट्रीय/बाहरी कारक |घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि प्रमुख हैं| इसी तरह निम्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं- अंतर्राष्ट्रीय राजनीति - द्वितीय विश्वयुद्ध तथा भारत की स्वतंत्रता के बाद विश्व में दो शक्ति गुटों की राजनीति चरम पर थी| विश्व में शीत युद्ध तथा उसके बाद नव शीत युद्ध का दौर आया| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की उपस्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| इसीलिए भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई| भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी जो कि हमारे विदेश नीति में भी दृष्टिगोचर होता है| इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा| इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था| इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था| पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| बाह्य वातावरण(पड़ोसी, क्षेत्रीय तथा विश्व के अन्य भागों का)- स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया| 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का सामना किया| लगातार बढ़ती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी| यह एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| वर्तमान समय में ओबोर का विरोध, लुक-ईस्ट से एक्ट-ईस्ट नीति जैसे मुद्दों का प्रभाव भी हमारी विदेश नीति में दिखाई देता है| संधियों की भूमिका- 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी| भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| वर्तमान समय में नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह में सदस्यता को लेकर भारत की कोशिश क्योंकि वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी गयी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया| इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे- आसियान| इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति तथा एक्ट-ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई| इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की एवं इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे - अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ| भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई| इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) तथा बिम्सटेक की भूमिका; संयुक्त राष्ट्र में विश्वास- संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करती है| भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| शांति सेना में अहम् योगदान की भूमिका; भारत द्वारा सुरक्षा परिषद् में सुधार की कोशिश भी विदेश नीति का महत्वपूर्ण निर्धारक कारक है| सैन्य कारक- भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है| भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं| इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे- मालाबार, इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण एवं विशेष भूमिका अपनी विदेश नीति के तहत निभा रहा है|
| 45,425
|
Economic Crisis of 1929 led to emergence of Fascist regime in many countries. Comment. (150 words)
|
Approach: · Explain the situation of the Great Depression of 1929 · Write briefly about Fascism. · Elaborate the economic conditions in different countries when led to the emergence of fascist regime. Answer : The Economic crisis or the Great Depression of 1929 was the greatest and longest economic recession inmodern world history. It began with the U.S.stock market crash of 1929and did not end until 1946 after World War II. This crisis had far-reaching impacts across the globe. Among various impacts, the Economic crisis had deeply affected European nations. It led to an international surge of fascism and the creation of several fascist regimes and regimes that adopted fascist policies. Fascism is a form of radical authoritarian nationalism characterized by one-party totalitarian regimes run by charismatic dictators, the glorification of violence, and racist ideology, in several nations, notably Italy, Spain Germany, and Japan. The term originated in Italy and is derived fromfascio,meaning a bundle of rods, and is used to symbolize strength through unity: a single rod is easily broken, while the bundle is difficult to break. Nazism in Germany: The period of 1923-29 was the period of economic stability as Germany got loans from USA under Dawes Plan and its economic recovery began. However in the period between 1929-33, due to great depression, US economy was down and thus stopped the availability of US loans. This hurt German economy, as theunemploymentrate before Nazi came to power was close to 30%. Adolph Hitler and his Nazi Party blamed the govt for all the ills of Germany and promised to restore the country"s economy and to rebuild its military. After becoming chancellor in 1932, Hitler outlawed labor unions, restructured the German industry into a series of cartels, and after 1935, instituted a massive program of military rearmament that ended high unemployment. Fascism in Spain: General Primo came to power in 1923, but had to resign in the context of mass protests that happened after the great depression in 1929. It led to economic crisis in Spain characterized by high unemployment, depreciation of currency, prices of agriculture commodities fell, wine and olive exports declined and land went out of cultivation. After his resignation, coalition govt came to power and thus created the situation of civil war which resulted Franco coming into power, who established fascists regime in Spain. Fascism in Japan: Japan enjoyed economic boom till 1921. However after that economic conditions started deteriorating and got more aggravated by the great depression as exports of Japan were badly hurt. In Manchuria, Chinese companies were trying to replace Japanese companies which became unbearable in the background of economic crises of 1929. As a result militarist seized control of the government and ran the country on Fascist lines. Fascism in Italy: In Italy, fascism arose even before the Depression"s onset under the leadership of Italian dictator Benito Mussolini. Thus poor economic conditions and the inability of present govt to solve the issues of people led to directly and indirectly emergence of fascists regime in various nations.
|
##Question:Economic Crisis of 1929 led to emergence of Fascist regime in many countries. Comment. (150 words)##Answer:Approach: · Explain the situation of the Great Depression of 1929 · Write briefly about Fascism. · Elaborate the economic conditions in different countries when led to the emergence of fascist regime. Answer : The Economic crisis or the Great Depression of 1929 was the greatest and longest economic recession inmodern world history. It began with the U.S.stock market crash of 1929and did not end until 1946 after World War II. This crisis had far-reaching impacts across the globe. Among various impacts, the Economic crisis had deeply affected European nations. It led to an international surge of fascism and the creation of several fascist regimes and regimes that adopted fascist policies. Fascism is a form of radical authoritarian nationalism characterized by one-party totalitarian regimes run by charismatic dictators, the glorification of violence, and racist ideology, in several nations, notably Italy, Spain Germany, and Japan. The term originated in Italy and is derived fromfascio,meaning a bundle of rods, and is used to symbolize strength through unity: a single rod is easily broken, while the bundle is difficult to break. Nazism in Germany: The period of 1923-29 was the period of economic stability as Germany got loans from USA under Dawes Plan and its economic recovery began. However in the period between 1929-33, due to great depression, US economy was down and thus stopped the availability of US loans. This hurt German economy, as theunemploymentrate before Nazi came to power was close to 30%. Adolph Hitler and his Nazi Party blamed the govt for all the ills of Germany and promised to restore the country"s economy and to rebuild its military. After becoming chancellor in 1932, Hitler outlawed labor unions, restructured the German industry into a series of cartels, and after 1935, instituted a massive program of military rearmament that ended high unemployment. Fascism in Spain: General Primo came to power in 1923, but had to resign in the context of mass protests that happened after the great depression in 1929. It led to economic crisis in Spain characterized by high unemployment, depreciation of currency, prices of agriculture commodities fell, wine and olive exports declined and land went out of cultivation. After his resignation, coalition govt came to power and thus created the situation of civil war which resulted Franco coming into power, who established fascists regime in Spain. Fascism in Japan: Japan enjoyed economic boom till 1921. However after that economic conditions started deteriorating and got more aggravated by the great depression as exports of Japan were badly hurt. In Manchuria, Chinese companies were trying to replace Japanese companies which became unbearable in the background of economic crises of 1929. As a result militarist seized control of the government and ran the country on Fascist lines. Fascism in Italy: In Italy, fascism arose even before the Depression"s onset under the leadership of Italian dictator Benito Mussolini. Thus poor economic conditions and the inability of present govt to solve the issues of people led to directly and indirectly emergence of fascists regime in various nations.
| 45,464
|
भारत के विशेष संदर्भ में, विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले घरेलू कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| (10 अंक;150-200 शब्द) In the special reference to the India, analyze the domestic factors influencing foreign policy.including examples. (10 marks;150-200 words)
|
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| 3- अंतिम भाग में विदेश नीति का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ अन्य तत्व किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति की स्थापना एवं विकास को भी इन्ही मूलभूत कारकों ने प्रभावित किया है| विदेश नीति को प्रभावित करने वाले कारक एवं सिद्धांत भौगोलिक कारण एक देश की भौगोलिक अवस्थिति एवं भौतिक स्थलाकृति उस राज्य की विदेश नीति पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। प्राकृतिक सीमाओं की उपस्थिति एक देश को सुरक्षा का भाव प्रदान करती है जो शांतिपूर्ण समय में घरेलू विकास पर ध्यान दे सकता है| हिन्द महासागर से लगे 9 राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का विकास, समुद्री मार्ग से होने वाला मुंबई जैसा हमला, चीन की आक्रामक समुद्र नीति, हिन्द महासागर का आर्थिक महत्त्व एवं प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग से व्यापार आदि कारक भारतीय विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं भगोलिक रूप से भारत से लगे हुए दक्षिण पूर्व एशिया का आर्थिक-सामरिक महत्त्व जैसे निवेश की संभावना, सुरक्षात्मक सहयोग, चीन का प्रति-संतुलन आदि तत्व विदेश नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इतिहास एवं परम्परा भारतीय धर्मों यथा जैन-बौद्ध की परम्परा के आधार पर विकसित परम्पराएं जैसे मत भिन्नता का सम्मान, सहिष्णुता, अहिंसा, धर्म निरपेक्षता, पंचशील दर्शन आदितत्व विदेश नीति को प्रभावित करते हैं मौर्य शासक अशोक की सांस्कृतिक कूटनीति, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल प्रोजेक्ट मौसम, केरल सरकार द्वारा स्पाइस रूट पहल, पश्चिमी भारत द्वारा कॉटन रूट आदि पहलें विदेश नीति के संदर्भ में इतिहास और परम्पराओं के महत्त्व को स्पष्ट करती हैं| आर्थिक स्थितियां 1991 के पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था के काल में भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति के साथ ही सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध पर आधारित थी| इस समय विदेश नीति मुख्यतः राजनीतिक मुद्दों पर ही केन्द्रित दिखती है, 1991 के बाद नयी तकनीकी, नए निवेश क्षेत्रों की आवश्यकता ने विदेश नीति को प्रभावित किया है और उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ता गया, इसी समय भारतीय विदेश नीति में नए तत्व शामिल होते हैं जैसे लुक ईस्ट नीति, अनेक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन, मुक्त व्यापार क्षेत्रों की स्थापना आदि वैचारिक कारण भारत की विदेश नीति पंचशील पर आधारित है इसके प्रमुख घटक सहिष्णुता, अहिंसा, अहस्तक्षेप की नीति आदि हैं आर्थिक विचारधाराओं में परिवर्तन जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारवादी आर्थिक विचारधारा को अपनाने से विदेश नीति में परिवर्तन दिखाई देता है रंगभेद की नीति, स्वतंत्रता, समानता आदि वैचारिक कारक भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक कारक हैं नेतृत्व की प्रकृति भारत की स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक जवाहरलाल नेहरु प्रधान मंत्री रहे, इन्होने विदेश नीति की आधारशिला रखी, भारत के आरंभिक नेतृत्व की विदेश नीति आदर्शवादी थी,नेहरु जी द्वारा गुट-निरपेक्षता, पंचशील आदि विचारधाराओं को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया गया, इसके बाद नेतृत्व के आधार पर विदेश नीति आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर विकसित हुई, उदाहरणार्थ इंदिरा गांधी द्वारा किया गया पोखरण परीक्षण, बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सहयोग आदि नरसिम्हाराव द्वारा उदारीकरण किया गया, जो तात्कालिक आर्थिक स्थितियों और नेतृत्व की दूरदर्शी प्रकृति के नेतृत्व का परिणाम है इसके बाद भारतीय विदेश नीति में नेतृत्व द्वारा प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों का समावेश किया गया, वर्तमान में नेतृत्व द्वारा आर्थिक कूटनीति, आतंक के विरुद्ध जीरो टोलेरेंस की नीति अपनाई जा रही हैं| लोकमत/ट्रैक 2 कूटनीति विविध क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा दिए गए विचार एवं अवधारणाओं को सरकार विदेश नीति के निर्धारण में स्थान देती है इसी प्रकार जनता-जनता सम्पर्क एवं अंतःक्रिया,किसी विशेष मुद्दे पर नागरिकों का मत विदेश नीति के निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है जैसे आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रया की मांग आदि सूचना एवं संचार क्रान्ति के माध्यम से ट्रैक 2 कूटनीति का विकास आदि कारक विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त घरेलू कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
|
##Question:भारत के विशेष संदर्भ में, विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले घरेलू कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| (10 अंक;150-200 शब्द) In the special reference to the India, analyze the domestic factors influencing foreign policy.including examples. (10 marks;150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में विदेश नीति पर प्रभाव डालने वाले कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये| 3- अंतिम भाग में विदेश नीति का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति यह एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ अन्य तत्व किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति की स्थापना एवं विकास को भी इन्ही मूलभूत कारकों ने प्रभावित किया है| विदेश नीति को प्रभावित करने वाले कारक एवं सिद्धांत भौगोलिक कारण एक देश की भौगोलिक अवस्थिति एवं भौतिक स्थलाकृति उस राज्य की विदेश नीति पर बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। प्राकृतिक सीमाओं की उपस्थिति एक देश को सुरक्षा का भाव प्रदान करती है जो शांतिपूर्ण समय में घरेलू विकास पर ध्यान दे सकता है| हिन्द महासागर से लगे 9 राज्यों और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का विकास, समुद्री मार्ग से होने वाला मुंबई जैसा हमला, चीन की आक्रामक समुद्र नीति, हिन्द महासागर का आर्थिक महत्त्व एवं प्राकृतिक संसाधन, समुद्री मार्ग से व्यापार आदि कारक भारतीय विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं भगोलिक रूप से भारत से लगे हुए दक्षिण पूर्व एशिया का आर्थिक-सामरिक महत्त्व जैसे निवेश की संभावना, सुरक्षात्मक सहयोग, चीन का प्रति-संतुलन आदि तत्व विदेश नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इतिहास एवं परम्परा भारतीय धर्मों यथा जैन-बौद्ध की परम्परा के आधार पर विकसित परम्पराएं जैसे मत भिन्नता का सम्मान, सहिष्णुता, अहिंसा, धर्म निरपेक्षता, पंचशील दर्शन आदितत्व विदेश नीति को प्रभावित करते हैं मौर्य शासक अशोक की सांस्कृतिक कूटनीति, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की पहल प्रोजेक्ट मौसम, केरल सरकार द्वारा स्पाइस रूट पहल, पश्चिमी भारत द्वारा कॉटन रूट आदि पहलें विदेश नीति के संदर्भ में इतिहास और परम्पराओं के महत्त्व को स्पष्ट करती हैं| आर्थिक स्थितियां 1991 के पूर्व नियोजित अर्थव्यवस्था के काल में भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति के साथ ही सोवियत संघ के साथ सम्बन्ध पर आधारित थी| इस समय विदेश नीति मुख्यतः राजनीतिक मुद्दों पर ही केन्द्रित दिखती है, 1991 के बाद नयी तकनीकी, नए निवेश क्षेत्रों की आवश्यकता ने विदेश नीति को प्रभावित किया है और उदारीकरण के बाद आर्थिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ता गया, इसी समय भारतीय विदेश नीति में नए तत्व शामिल होते हैं जैसे लुक ईस्ट नीति, अनेक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन, मुक्त व्यापार क्षेत्रों की स्थापना आदि वैचारिक कारण भारत की विदेश नीति पंचशील पर आधारित है इसके प्रमुख घटक सहिष्णुता, अहिंसा, अहस्तक्षेप की नीति आदि हैं आर्थिक विचारधाराओं में परिवर्तन जैसे नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारवादी आर्थिक विचारधारा को अपनाने से विदेश नीति में परिवर्तन दिखाई देता है रंगभेद की नीति, स्वतंत्रता, समानता आदि वैचारिक कारक भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक कारक हैं नेतृत्व की प्रकृति भारत की स्वतंत्रता के बाद लम्बे समय तक जवाहरलाल नेहरु प्रधान मंत्री रहे, इन्होने विदेश नीति की आधारशिला रखी, भारत के आरंभिक नेतृत्व की विदेश नीति आदर्शवादी थी,नेहरु जी द्वारा गुट-निरपेक्षता, पंचशील आदि विचारधाराओं को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया गया, इसके बाद नेतृत्व के आधार पर विदेश नीति आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर विकसित हुई, उदाहरणार्थ इंदिरा गांधी द्वारा किया गया पोखरण परीक्षण, बांग्लादेश की स्वतंत्रता में सहयोग आदि नरसिम्हाराव द्वारा उदारीकरण किया गया, जो तात्कालिक आर्थिक स्थितियों और नेतृत्व की दूरदर्शी प्रकृति के नेतृत्व का परिणाम है इसके बाद भारतीय विदेश नीति में नेतृत्व द्वारा प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों का समावेश किया गया, वर्तमान में नेतृत्व द्वारा आर्थिक कूटनीति, आतंक के विरुद्ध जीरो टोलेरेंस की नीति अपनाई जा रही हैं| लोकमत/ट्रैक 2 कूटनीति विविध क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा दिए गए विचार एवं अवधारणाओं को सरकार विदेश नीति के निर्धारण में स्थान देती है इसी प्रकार जनता-जनता सम्पर्क एवं अंतःक्रिया,किसी विशेष मुद्दे पर नागरिकों का मत विदेश नीति के निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है जैसे आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रया की मांग आदि सूचना एवं संचार क्रान्ति के माध्यम से ट्रैक 2 कूटनीति का विकास आदि कारक विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त घरेलू कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
| 45,474
|
भारत में बढ़ते छद्म नगरीकरण और उससे जुड़ी चुनौतियों को बताते हुए , इससे निपटने के लिए किया जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये ।( 150 शब्द ) Explaining the growing Psuedo-urbanization and challenges related to it in India, discuss the efforts being made to tackle it. (150 words)
|
दृष्टिकोण · भूमिका में छद्म नगरीकरण को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में छद्म नगरीकरण से संबन्धित चुनौतियों को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में छद्म नगरीकरण के निराकरण के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नगरीकरण से तात्पर्य एक प्रशासनिक इकाई वाले विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों द्वारा बनाई गई सामाजिक व्यवस्था से है। प्राचीन और मध्य कालीन समय में शहरो का विन्यास मुख्यतः कंटेनर मॉडेल का था जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से तो प्रभावी होते थे , परंतु एक निश्चित सीमा तक की आबादी ही वहाँ रह सकती थी। आधुनिक संदर्भों में वर्तमान शहर रिजनरेटिव मॉडेल के देखे जाते हैं जिसके अंतर्गत आवश्यकतानुसार शहरो की सीमा बढ़ती रहती है ।भारतीय संदर्भ में आधुनिक काल में हुए नगरीकरण को क्षद्म नगरीकरण कहा जा रहा है ।जिसके अंतर्गत शहरो में उपलबद्ध स्त्रोत, तेजी से बढ़ रही जनसंख्या जो मुख्यतः पलायन का परिणाम है, से सामंजस्व नही बैठा पा रही है। छद्म नगरीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ मलिन बस्तियों से संबन्धित समस्या - मलिन से तात्पर्य कम से कम 20 परिवारों के ऐसे समूह से है जो मूलभूत आवश्यकताओ जैसे विद्धुत आपूर्ति, शुद्ध पेयजल, पक्के मकान, व्यक्तिगत क्षेत्र की अनुपलब्धता आदि संदर्भों में वंचित हो । प्रजातीय संघर्ष -विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों में यदि सद्भाव न हो तो शहरो के अंदर घेटों समुदाय का सृजन होता है जिससे परस्पर असहिष्णुता बढ़ते हुए प्रजातीय संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करती है । घटते लिंगानुपात और महिलाओ पर अत्याचार - पलायन में प्रमुखता, पुरुष पलायन अधिक मात्रा में, जिसके कारण लिंगानुपात पर प्रतिकूल प्रभाव व महिला हिंसा की घटना में वृद्धि। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याएँ और बढ़ते अपराध, मदपन जैसी सामाजिक कुरीतियाँ, मादक द्रवों का सेवन आदि वेक्टर जनित रोगों द्वारा जन्मी समस्याएँ आदि। छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु किए जा रहे प्रयासो को 4 संदर्भों में देख जा सकता है :- अवसंरचनात्मक स्तर पर मूलभूत अवश्यकतों को सुलभ करना जिसमे 3 प्रकारो से लक्ष्य हासिल किए जाते है । रेट्रो फिटिंग - इसके अंतर्गत दिये गए अवसंरचना में ही सुधार किया जाता है। पुनर्निर्माण नगर विस्तारण आर्थिक स्तर पर शहरी गरीबो के लिए जीविकोपार्त्जन सुलभ कराना और पलायन को रोकने हेतु ग्रामीण क्षेत्रो मे आय स्त्रोतों का बढ़ाना और राष्ट्रीय शहरी जीविकों पार्जन मिशन जैसी योजनाओ का प्रभावी क्रियान्वयन वर्ष 2009 में इसके अंतर्गत राजीव आवास योजना प्रारम्भ की गई जिसे अब प्रधान मंत्री शहरी आवास योजना में विलय कर दिया गया है । राजनीतिक क्षेत्र में छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु ऐसी नीतियो और स्थानीय शहरी निकायो को अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए । शहरो के नवीनीकरण हेतु 2005 में शहरी नवीनीकरण मिशन के अंतर्गत शहरी अवसंरचना विकास मंत्रालय बनाया गया ।जिसे कालांतर में परिवर्तित करते हुए शहरी विकास मंत्रलाया में मिला दिया गया है और अटल मिशन फॉर रीजीविनेश"न और अर्बन ट्रांस्फ़ार्मेशन के अंतर्गत शहर नवीनीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं । वर्ष 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन द्वारा उपरोक्त सभी संदर्भों को मानते हुए नए शहर विकसित किए जा रहे हैं । हाउसिंग फॉर आल के अंतर्गत सभी के लिए आवास जैसी परिकल्पना को प्राप्त करने हेतु रेरा ( रियल स्टेट नियमन प्राधिकरण ) के सहयोग से आकर्षक ब्याज दरो पर गृह ऋण उपलब्ध करवाए जा रहे हैं । उपरोक्त कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के साथ साथ सरकार को अन्य फ्रंटो पर भी कार्य करने की आवश्यकता है जिससे मौजूद संसाधनो का प्रभावी उपयोग किया जा सके।
|
##Question:भारत में बढ़ते छद्म नगरीकरण और उससे जुड़ी चुनौतियों को बताते हुए , इससे निपटने के लिए किया जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये ।( 150 शब्द ) Explaining the growing Psuedo-urbanization and challenges related to it in India, discuss the efforts being made to tackle it. (150 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में छद्म नगरीकरण को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में छद्म नगरीकरण से संबन्धित चुनौतियों को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में छद्म नगरीकरण के निराकरण के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नगरीकरण से तात्पर्य एक प्रशासनिक इकाई वाले विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों द्वारा बनाई गई सामाजिक व्यवस्था से है। प्राचीन और मध्य कालीन समय में शहरो का विन्यास मुख्यतः कंटेनर मॉडेल का था जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से तो प्रभावी होते थे , परंतु एक निश्चित सीमा तक की आबादी ही वहाँ रह सकती थी। आधुनिक संदर्भों में वर्तमान शहर रिजनरेटिव मॉडेल के देखे जाते हैं जिसके अंतर्गत आवश्यकतानुसार शहरो की सीमा बढ़ती रहती है ।भारतीय संदर्भ में आधुनिक काल में हुए नगरीकरण को क्षद्म नगरीकरण कहा जा रहा है ।जिसके अंतर्गत शहरो में उपलबद्ध स्त्रोत, तेजी से बढ़ रही जनसंख्या जो मुख्यतः पलायन का परिणाम है, से सामंजस्व नही बैठा पा रही है। छद्म नगरीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ मलिन बस्तियों से संबन्धित समस्या - मलिन से तात्पर्य कम से कम 20 परिवारों के ऐसे समूह से है जो मूलभूत आवश्यकताओ जैसे विद्धुत आपूर्ति, शुद्ध पेयजल, पक्के मकान, व्यक्तिगत क्षेत्र की अनुपलब्धता आदि संदर्भों में वंचित हो । प्रजातीय संघर्ष -विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों में यदि सद्भाव न हो तो शहरो के अंदर घेटों समुदाय का सृजन होता है जिससे परस्पर असहिष्णुता बढ़ते हुए प्रजातीय संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करती है । घटते लिंगानुपात और महिलाओ पर अत्याचार - पलायन में प्रमुखता, पुरुष पलायन अधिक मात्रा में, जिसके कारण लिंगानुपात पर प्रतिकूल प्रभाव व महिला हिंसा की घटना में वृद्धि। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याएँ और बढ़ते अपराध, मदपन जैसी सामाजिक कुरीतियाँ, मादक द्रवों का सेवन आदि वेक्टर जनित रोगों द्वारा जन्मी समस्याएँ आदि। छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु किए जा रहे प्रयासो को 4 संदर्भों में देख जा सकता है :- अवसंरचनात्मक स्तर पर मूलभूत अवश्यकतों को सुलभ करना जिसमे 3 प्रकारो से लक्ष्य हासिल किए जाते है । रेट्रो फिटिंग - इसके अंतर्गत दिये गए अवसंरचना में ही सुधार किया जाता है। पुनर्निर्माण नगर विस्तारण आर्थिक स्तर पर शहरी गरीबो के लिए जीविकोपार्त्जन सुलभ कराना और पलायन को रोकने हेतु ग्रामीण क्षेत्रो मे आय स्त्रोतों का बढ़ाना और राष्ट्रीय शहरी जीविकों पार्जन मिशन जैसी योजनाओ का प्रभावी क्रियान्वयन वर्ष 2009 में इसके अंतर्गत राजीव आवास योजना प्रारम्भ की गई जिसे अब प्रधान मंत्री शहरी आवास योजना में विलय कर दिया गया है । राजनीतिक क्षेत्र में छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु ऐसी नीतियो और स्थानीय शहरी निकायो को अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए । शहरो के नवीनीकरण हेतु 2005 में शहरी नवीनीकरण मिशन के अंतर्गत शहरी अवसंरचना विकास मंत्रालय बनाया गया ।जिसे कालांतर में परिवर्तित करते हुए शहरी विकास मंत्रलाया में मिला दिया गया है और अटल मिशन फॉर रीजीविनेश"न और अर्बन ट्रांस्फ़ार्मेशन के अंतर्गत शहर नवीनीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं । वर्ष 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन द्वारा उपरोक्त सभी संदर्भों को मानते हुए नए शहर विकसित किए जा रहे हैं । हाउसिंग फॉर आल के अंतर्गत सभी के लिए आवास जैसी परिकल्पना को प्राप्त करने हेतु रेरा ( रियल स्टेट नियमन प्राधिकरण ) के सहयोग से आकर्षक ब्याज दरो पर गृह ऋण उपलब्ध करवाए जा रहे हैं । उपरोक्त कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के साथ साथ सरकार को अन्य फ्रंटो पर भी कार्य करने की आवश्यकता है जिससे मौजूद संसाधनो का प्रभावी उपयोग किया जा सके।
| 45,477
|
भारत में नगरीकरण और उससे जुड़ी चुनौतियों को बताते हुए, इससे निपटने के लिए किया जा रहे प्रयासों चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) While elaborating on urbanization in India and its associated challenges, discuss the efforts being made to deal with it. (150-200 words/10 marks)
|
दृष्टिकोण · भूमिका में छद्म नगरीकरण को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में छद्म नगरीकरण से संबन्धित चुनौतियों को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में छद्म नगरीकरण के निराकरण के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नगरीकरण से तात्पर्य एक प्रशासनिक इकाई वाले विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों द्वारा बनाई गई सामाजिक व्यवस्था से है। प्राचीन और मध्य कालीन समय में शहरो का विन्यास मुख्यतः कंटेनर मॉडेल का था जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से तो प्रभावी होते थे , परंतु एक निश्चित सीमा तक की आबादी ही वहाँ रह सकती थी। आधुनिक संदर्भों में वर्तमान शहर रिजनरेटिव मॉडेल के देखे जाते हैं जिसके अंतर्गत आवश्यकतानुसार शहरो की सीमा बढ़ती रहती है ।भारतीय संदर्भ में आधुनिक काल में हुए नगरीकरण को क्षद्म नगरीकरण कहा जा रहा है ।जिसके अंतर्गत शहरो में उपलबद्ध स्त्रोत, तेजी से बढ़ रही जनसंख्या जो मुख्यतः पलायन का परिणाम है, से सामंजस्व नही बैठा पा रही है। छद्म नगरीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ :- मलिन बस्तियों से संबन्धित समस्या - मलिन से तात्पर्य कम से कम 20 परिवारों के ऐसे समूह से है जो मूलभूत आवश्यकताओ जैसे विद्धुत आपूर्ति, शुद्ध पेयजल, पक्के मकान, व्यक्तिगत क्षेत्र की अनुपलब्धता आदि संदर्भों में वंचित हो । प्रजातीय संघर्ष -विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों में यदि सद्भाव न हो तो शहरो के अंदर घेटों समुदाय का सृजन होता है जिससे परस्पर असहिष्णुता बढ़ते हुए प्रजातीय संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करती है । घटते लिंगानुपात और महिलाओ पर अत्याचार - पलायन में प्रमुखता, पुरुष पलायन अधिक मात्रा में, जिसके कारण लिंगानुपात पर प्रतिकूल प्रभाव व महिला हिंसा की घटना में वृद्धि। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याएँ और बढ़ते अपराध, मदपन जैसी सामाजिक कुरीतियाँ, मादक द्रवों का सेवन आदि वेक्टर जनित रोगों द्वारा जन्मी समस्याएँ आदि। छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु किए जा रहे प्रयासो को 4 संदर्भों में देख जा सकता है :- अवसंरचनात्मक स्तर पर मूलभूत अवश्यकतों को सुलभ करना जिसमे 3 प्रकारो से लक्ष्य हासिल किए जाते है । रेट्रो फिटिंग - इसके अंतर्गत दिये गए अवसंरचना में ही सुधार किया जाता है। पुनर्निर्माण नगर विस्तारण आर्थिक स्तर पर शहरी गरीबो के लिए जीविकोपार्त्जन सुलभ कराना और पलायन को रोकने हेतु ग्रामीण क्षेत्रो मे आय स्त्रोतों का बढ़ाना और राष्ट्रीय शहरी जीविकों पार्जन मिशन जैसी योजनाओ का प्रभावी क्रियान्वयन वर्ष 2009 में इसके अंतर्गत राजीव आवास योजना प्रारम्भ की गई जिसे अब प्रधान मंत्री शहरी आवास योजना में विलय कर दिया गया है । राजनीतिक क्षेत्र में छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु ऐसी नीतियो और स्थानीय शहरी निकायो को अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए । शहरो के नवीनीकरण हेतु 2005 में शहरी नवीनीकरण मिशन के अंतर्गत शहरी अवसंरचना विकास मंत्रालय बनाया गया ।जिसे कालांतर में परिवर्तित करते हुए शहरी विकास मंत्रलाया में मिला दिया गया है और अटल मिशन फॉर रीजीविनेसन और अर्बन ट्रांस्फ़ार्मेशन के अंतर्गत शहर नवीनीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं । वर्ष 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन द्वारा उपरोक्त सभी संदर्भों को मानते हुए नए शहर विकसित किए जा रहे हैं । हाउसिंग फॉर आल के अंतर्गत सभी के लिए आवास जैसी परिकल्पना को प्राप्त करने हेतु रेरा ( रियल स्टेट नियमन प्राधिकरण ) के सहयोग से आकर्षक व्याज दरो पर गृह ऋण उपलब्ध करवाए जा रहे हैं । उपरोक्त कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के साथ साथ सरकार को अन्य फ्रंटो पर भी कार्य करने की आवश्यकता है जिससे मौजूद संसाधनो का प्रभावी उपयोग किया जा सके।
|
##Question:भारत में नगरीकरण और उससे जुड़ी चुनौतियों को बताते हुए, इससे निपटने के लिए किया जा रहे प्रयासों चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) While elaborating on urbanization in India and its associated challenges, discuss the efforts being made to deal with it. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में छद्म नगरीकरण को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में छद्म नगरीकरण से संबन्धित चुनौतियों को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में छद्म नगरीकरण के निराकरण के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नगरीकरण से तात्पर्य एक प्रशासनिक इकाई वाले विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों द्वारा बनाई गई सामाजिक व्यवस्था से है। प्राचीन और मध्य कालीन समय में शहरो का विन्यास मुख्यतः कंटेनर मॉडेल का था जो सुरक्षा के दृष्टिकोण से तो प्रभावी होते थे , परंतु एक निश्चित सीमा तक की आबादी ही वहाँ रह सकती थी। आधुनिक संदर्भों में वर्तमान शहर रिजनरेटिव मॉडेल के देखे जाते हैं जिसके अंतर्गत आवश्यकतानुसार शहरो की सीमा बढ़ती रहती है ।भारतीय संदर्भ में आधुनिक काल में हुए नगरीकरण को क्षद्म नगरीकरण कहा जा रहा है ।जिसके अंतर्गत शहरो में उपलबद्ध स्त्रोत, तेजी से बढ़ रही जनसंख्या जो मुख्यतः पलायन का परिणाम है, से सामंजस्व नही बैठा पा रही है। छद्म नगरीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ :- मलिन बस्तियों से संबन्धित समस्या - मलिन से तात्पर्य कम से कम 20 परिवारों के ऐसे समूह से है जो मूलभूत आवश्यकताओ जैसे विद्धुत आपूर्ति, शुद्ध पेयजल, पक्के मकान, व्यक्तिगत क्षेत्र की अनुपलब्धता आदि संदर्भों में वंचित हो । प्रजातीय संघर्ष -विभिन्न क्षेत्रो से आए लोगों में यदि सद्भाव न हो तो शहरो के अंदर घेटों समुदाय का सृजन होता है जिससे परस्पर असहिष्णुता बढ़ते हुए प्रजातीय संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करती है । घटते लिंगानुपात और महिलाओ पर अत्याचार - पलायन में प्रमुखता, पुरुष पलायन अधिक मात्रा में, जिसके कारण लिंगानुपात पर प्रतिकूल प्रभाव व महिला हिंसा की घटना में वृद्धि। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याएँ और बढ़ते अपराध, मदपन जैसी सामाजिक कुरीतियाँ, मादक द्रवों का सेवन आदि वेक्टर जनित रोगों द्वारा जन्मी समस्याएँ आदि। छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु किए जा रहे प्रयासो को 4 संदर्भों में देख जा सकता है :- अवसंरचनात्मक स्तर पर मूलभूत अवश्यकतों को सुलभ करना जिसमे 3 प्रकारो से लक्ष्य हासिल किए जाते है । रेट्रो फिटिंग - इसके अंतर्गत दिये गए अवसंरचना में ही सुधार किया जाता है। पुनर्निर्माण नगर विस्तारण आर्थिक स्तर पर शहरी गरीबो के लिए जीविकोपार्त्जन सुलभ कराना और पलायन को रोकने हेतु ग्रामीण क्षेत्रो मे आय स्त्रोतों का बढ़ाना और राष्ट्रीय शहरी जीविकों पार्जन मिशन जैसी योजनाओ का प्रभावी क्रियान्वयन वर्ष 2009 में इसके अंतर्गत राजीव आवास योजना प्रारम्भ की गई जिसे अब प्रधान मंत्री शहरी आवास योजना में विलय कर दिया गया है । राजनीतिक क्षेत्र में छद्म नगरीकरण से निपटने हेतु ऐसी नीतियो और स्थानीय शहरी निकायो को अधिक शक्तिशाली बनाने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए । शहरो के नवीनीकरण हेतु 2005 में शहरी नवीनीकरण मिशन के अंतर्गत शहरी अवसंरचना विकास मंत्रालय बनाया गया ।जिसे कालांतर में परिवर्तित करते हुए शहरी विकास मंत्रलाया में मिला दिया गया है और अटल मिशन फॉर रीजीविनेसन और अर्बन ट्रांस्फ़ार्मेशन के अंतर्गत शहर नवीनीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं । वर्ष 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन द्वारा उपरोक्त सभी संदर्भों को मानते हुए नए शहर विकसित किए जा रहे हैं । हाउसिंग फॉर आल के अंतर्गत सभी के लिए आवास जैसी परिकल्पना को प्राप्त करने हेतु रेरा ( रियल स्टेट नियमन प्राधिकरण ) के सहयोग से आकर्षक व्याज दरो पर गृह ऋण उपलब्ध करवाए जा रहे हैं । उपरोक्त कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के साथ साथ सरकार को अन्य फ्रंटो पर भी कार्य करने की आवश्यकता है जिससे मौजूद संसाधनो का प्रभावी उपयोग किया जा सके।
| 45,484
|
विदेश नीति से आप क्या समझते हैं? भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारकों का वर्णन कीजिए| (150 शब्द) What do youmean byForeign Policy? While taking special reference to India, Describe the Domestic defining factors of Foreign Policy. (150 words)
|
एप्रोच- विदेश नीति को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारकों का वर्णन कीजिए| उत्तर- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उस राष्ट्र के अन्य देशों के साथ संबंध बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को संदर्भित करता है| अतः विदेश नीति वै श्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में किसी राष्ट्र द्वारा लागू की गयी एवं अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसकी नीतिगत विशेषताओं को दर्शाती है| प्रत्येक राष्ट्र अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों, आतंरिक तथा बाह्य-सुरक्षा, व्यापार बढ़ोतरी तथा आर्थिक समृद्धि एवं अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक प्रश्नों के संदर्भ में अपने हितों की रुपरेखा विदेश नीति के तहत ही तय करता है| यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके माध्यम से वह राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने हेतु नीतियों का निर्माण करता है| इस प्रकार, भारत की विदेश नीति विश्व में अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित, अभिव्यक्त और प्राप्त करने का प्रयास करती है जहाँ ये हित कई प्रकार से घरेलू कारकों के साथ-साथ राष्ट्र की सीमाओं से बाहर स्थित तत्वों और कारकों पर निर्भर करते हैं| विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारक(भारत का विशेष संदर्भ)- भौगोलिक कारक - किसी भी राष्ट्र के विदेश नीति के निर्धारण में उस राष्ट्र के भौगौलिक स्थिति का बड़ा अहम योगदान होता है| भारत के संदर्भ में देखा जाए तो हिमालय, हिन्द महासागर, रेगिस्तान, दलदल(कच्छ-क्षेत्र) आदि से युक्त विस्तृत भौगोलिक विविधता विद्यमान है| भारत में होकर बहने वाली कई नदियाँ दूसरे देशों से आती/जाती है| साथ ही, भारत की भौगोलिक स्थिति के अनुसार, नाभिकीय खतरा; मिसाईल खतरा; फेल्ड राज्य, आतंकवादी गतिविधियाँ, इस्लामिक आतंकवाद, उग्र साम्यवादी खतरा जैसी चुनौतियाँ भी विद्यमान है| विदेश नीति के निर्धारण में उपरोक्त तत्वों का अहम् योगदान है| इतिहास और परंपरा - राष्ट्रों की ऐतिहासिक परिस्थिति तथा उसके अनुसार चलने वाले घटनाक्रमों का भी विदेश नीति पर प्रभाव स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है| प्रत्येक राष्ट्र अपने इतिहास से सबक सीखकर ही वर्तमान तथा भविष्य के संदर्भ में विभिन्न नीतियों का निर्माण करता है| भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो पंचशील; अहिंसा; अनेकांतवाद जैसे दर्शनों को विदेश नीति में समाहित करने का प्रयास किया गया है| अपने इतिहास तथा परंपरा से सीखकर ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र तथा एक न्यायसंगत तथा समानता युक्त विश्व-व्यवस्था का समर्थन किया है| गुटनिरपेक्षता, परमाणु अप्रसार संबंधी हमारी नीति; नाभिकीय नीति; लुक-ईस्ट तथा एक्ट-ईस्ट नीति; शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व एवं गैर-आक्रामकता जैसे विदेश नीति की विशेषताओं को भी भारत ने अपनी प्राचीनं समृद्ध संस्कृति तथा इतिहास से लेने का प्रयास किया है| आर्थिक परिस्थितियां - किसी देश के आर्थिक विकास की आवश्यकताएं एवं आर्थिक विकास की अवस्था उस देश की विदेश नीति और इनसे संबंधित विकल्पों में माध्यमों एवं उद्देश्यों दोनो दृष्टियों से योगदान करती है| भारत के संदर्भ में, 1991 से पहले विदेशी सहायता जैसे मुद्दे प्रमुख थें वहीँ 1991 के आर्थिक सुधारों के पश्चात उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण; मल्टी-एलाइनमेंट जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए विदेश नीति निर्धारित की जाती है| वैचारिक कारण - राजनीतिक परंपरा तथा दार्शनिक आधार के अनुरूप भारतगुटनिरपेक्ष आंदोलन को समर्थन; उपनिवेशवाद एवं नवउपनिवेशवाद का विरोध जैसे कदम उठाता रहा है| अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन आदि के संदर्भ में नीतियों के निर्धारण में भी वैचारिक पक्ष का अहम् योगदान रहा है| जलवायु कूटनीति जैसे आयामों के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है| इसके साथ ही, नेतृत्व की प्रकृतिएवंपब्लिक ओपिनियन(ट्रैक 2 डिप्लोमेसी) जैसे कारक भी विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारक के रूप में गिने जा सकते हैं| किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति की सफलता या असफलता के पीछे उपरोक्त घरेलू निर्धारक कारकों का अहम् योगदान होता है| विगत कई वर्षों में, भारत की विदेश नीति में हुए विकास को दृष्टिगत रखते हुए उपर्युक्त विमर्श के महत्व को पहचाना जा सकता है|
|
##Question:विदेश नीति से आप क्या समझते हैं? भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारकों का वर्णन कीजिए| (150 शब्द) What do youmean byForeign Policy? While taking special reference to India, Describe the Domestic defining factors of Foreign Policy. (150 words)##Answer:एप्रोच- विदेश नीति को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारकों का वर्णन कीजिए| उत्तर- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उस राष्ट्र के अन्य देशों के साथ संबंध बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को संदर्भित करता है| अतः विदेश नीति वै श्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में किसी राष्ट्र द्वारा लागू की गयी एवं अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसकी नीतिगत विशेषताओं को दर्शाती है| प्रत्येक राष्ट्र अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों, आतंरिक तथा बाह्य-सुरक्षा, व्यापार बढ़ोतरी तथा आर्थिक समृद्धि एवं अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक प्रश्नों के संदर्भ में अपने हितों की रुपरेखा विदेश नीति के तहत ही तय करता है| यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके माध्यम से वह राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने हेतु नीतियों का निर्माण करता है| इस प्रकार, भारत की विदेश नीति विश्व में अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित, अभिव्यक्त और प्राप्त करने का प्रयास करती है जहाँ ये हित कई प्रकार से घरेलू कारकों के साथ-साथ राष्ट्र की सीमाओं से बाहर स्थित तत्वों और कारकों पर निर्भर करते हैं| विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारक(भारत का विशेष संदर्भ)- भौगोलिक कारक - किसी भी राष्ट्र के विदेश नीति के निर्धारण में उस राष्ट्र के भौगौलिक स्थिति का बड़ा अहम योगदान होता है| भारत के संदर्भ में देखा जाए तो हिमालय, हिन्द महासागर, रेगिस्तान, दलदल(कच्छ-क्षेत्र) आदि से युक्त विस्तृत भौगोलिक विविधता विद्यमान है| भारत में होकर बहने वाली कई नदियाँ दूसरे देशों से आती/जाती है| साथ ही, भारत की भौगोलिक स्थिति के अनुसार, नाभिकीय खतरा; मिसाईल खतरा; फेल्ड राज्य, आतंकवादी गतिविधियाँ, इस्लामिक आतंकवाद, उग्र साम्यवादी खतरा जैसी चुनौतियाँ भी विद्यमान है| विदेश नीति के निर्धारण में उपरोक्त तत्वों का अहम् योगदान है| इतिहास और परंपरा - राष्ट्रों की ऐतिहासिक परिस्थिति तथा उसके अनुसार चलने वाले घटनाक्रमों का भी विदेश नीति पर प्रभाव स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है| प्रत्येक राष्ट्र अपने इतिहास से सबक सीखकर ही वर्तमान तथा भविष्य के संदर्भ में विभिन्न नीतियों का निर्माण करता है| भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो पंचशील; अहिंसा; अनेकांतवाद जैसे दर्शनों को विदेश नीति में समाहित करने का प्रयास किया गया है| अपने इतिहास तथा परंपरा से सीखकर ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र तथा एक न्यायसंगत तथा समानता युक्त विश्व-व्यवस्था का समर्थन किया है| गुटनिरपेक्षता, परमाणु अप्रसार संबंधी हमारी नीति; नाभिकीय नीति; लुक-ईस्ट तथा एक्ट-ईस्ट नीति; शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व एवं गैर-आक्रामकता जैसे विदेश नीति की विशेषताओं को भी भारत ने अपनी प्राचीनं समृद्ध संस्कृति तथा इतिहास से लेने का प्रयास किया है| आर्थिक परिस्थितियां - किसी देश के आर्थिक विकास की आवश्यकताएं एवं आर्थिक विकास की अवस्था उस देश की विदेश नीति और इनसे संबंधित विकल्पों में माध्यमों एवं उद्देश्यों दोनो दृष्टियों से योगदान करती है| भारत के संदर्भ में, 1991 से पहले विदेशी सहायता जैसे मुद्दे प्रमुख थें वहीँ 1991 के आर्थिक सुधारों के पश्चात उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण; मल्टी-एलाइनमेंट जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए विदेश नीति निर्धारित की जाती है| वैचारिक कारण - राजनीतिक परंपरा तथा दार्शनिक आधार के अनुरूप भारतगुटनिरपेक्ष आंदोलन को समर्थन; उपनिवेशवाद एवं नवउपनिवेशवाद का विरोध जैसे कदम उठाता रहा है| अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन आदि के संदर्भ में नीतियों के निर्धारण में भी वैचारिक पक्ष का अहम् योगदान रहा है| जलवायु कूटनीति जैसे आयामों के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है| इसके साथ ही, नेतृत्व की प्रकृतिएवंपब्लिक ओपिनियन(ट्रैक 2 डिप्लोमेसी) जैसे कारक भी विदेश नीति के घरेलू निर्धारक कारक के रूप में गिने जा सकते हैं| किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति की सफलता या असफलता के पीछे उपरोक्त घरेलू निर्धारक कारकों का अहम् योगदान होता है| विगत कई वर्षों में, भारत की विदेश नीति में हुए विकास को दृष्टिगत रखते हुए उपर्युक्त विमर्श के महत्व को पहचाना जा सकता है|
| 45,485
|
भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था के अतिरिक्त अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक का विशेष संदर्भ देते हुए इस कथन पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) There are several efforts being made in addition to the traditional banking system in the direction of financial inclusion in India. Discuss this statement while giving special reference to the payment bank and small finance bank. (150-200 words; 10 Marks)
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में वित्तीय समावेशन को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद कथन को स्पष्ट करने के लिए परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण दीजिए जो वित्तीय समावेशन में योगदान दे रहे। इसके पश्चात वित्तीय समावेशन के रूप में भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में बैंकों को और प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दीजिए। उत्तर- समाज के सामान्य लोगों के वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संस्थागत पहुँच सुनिश्चित करना वित्तीय समावेशन कहलाता है। भारत में वित्तीय समावेशन के लिए बैंक पहला और सबसे महत्वपूर्ण साधन है। यद्यपि यह सही है कि बैंकों की स्थापना मुख्य रूप से व्यापारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिया गया फिर भी राष्ट्रीयकरण के पश्चात इनके उद्देश्यों में बदलाव आया। इनकी पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों तक होने लगी। लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित करने और संस्थागत ऋण प्रदान करने वाणिज्यिक बैंकों के साथ-साथ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गयी। इसके कारण वित्तीय समावेशन को बढ़ाव मिला। इसी क्रम में जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था में नए आयाम जुड़ने लगे जैसे कि वित्तीय साक्षरता, तकनीकी विकास, डिजिटल साधनों का विकास होना प्रारम्भ हुआ है परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था से अलग व्यवस्था का विकास हुआ। इसके अंतर्गत प्रत्यक्ष लाभ स्थानांतरण, आधार आधारित हस्तांतरण व्यवस्था, यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस आदि महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। इसी संदर्भ में विगत कुछ वर्षों में लघु वित्त बैंक और भुगतान बैंक को विशेष प्रोत्साहन मिला है। इसके माध्यम से वित्तीय समावेशन को निम्न प्रकार से बढ़ावा दिया जा रहा है: लघु वित्त बैंक: इनकी स्थापना उन क्षेत्रों में कि गयी है जहां वाणिज्यिक बैंकों का बहुत कम पहुँच है। ये बैंक छोटे ऋण धारकों को लक्षित करते हैं जो बड़े बैंकों से ऋण प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इन बैंकों में कागजी औपचारिकताओं को कम करते हुए पैसे जमा करना, निकालना, ऋणों का वितरण आसान बनाया गया है। व्याज दरों को बहुत ही कम रखा जाता है तथा ऋण हेतु आवश्यक कोलेटरल जैसी औपचारिकता को सरल बनाया गया है। महिलाओं, एससी/एसटी, कमजोर वर्गों को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। कृषि तथा अन्य प्राथमिक क्षेत्रक उधारी को केन्द्रित किया जा रहा है। भुगतान बैंक: परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था से अलग ऑनलाइन माध्यम से बैंकिंग व्यवस्था को संचालित करने का कार्य। ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँच बढ़ाने के साथ शहरों में बैंकों के कार्य सरल करने में व्यापक महत्वपूर्ण हैं। भुगतान बैंकों का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा है कि ऑनलाइन भुगतान को प्रोत्साहित किया आजा रहा है। जैसे- पेटीएम, एयरटेल पेमेंट बैंक इनके माध्यम से छोटी बचत और प्रतिदिन के वित्तीय हस्तांतरण को बढ़ावा दिया गया है। ऐसे सुदूर क्षेत्र जहां संस्थागत बैंकिंग व्यवस्था नहीं है। वहाँ इंटरनेट के माध्यम से भुगतान बैंक कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था ने व्यापक योगदान दिया है। इसके साथ ही डिजिटल साधनों के विकास के साथ साथ नए प्रकार के बैंकिंग व्यवस्था का प्रचलन बढ़ रहा है। इसमें भुगतान बैंक, लघु वित्त बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
|
##Question:भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था के अतिरिक्त अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक का विशेष संदर्भ देते हुए इस कथन पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) There are several efforts being made in addition to the traditional banking system in the direction of financial inclusion in India. Discuss this statement while giving special reference to the payment bank and small finance bank. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में वित्तीय समावेशन को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद कथन को स्पष्ट करने के लिए परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण दीजिए जो वित्तीय समावेशन में योगदान दे रहे। इसके पश्चात वित्तीय समावेशन के रूप में भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में बैंकों को और प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दीजिए। उत्तर- समाज के सामान्य लोगों के वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संस्थागत पहुँच सुनिश्चित करना वित्तीय समावेशन कहलाता है। भारत में वित्तीय समावेशन के लिए बैंक पहला और सबसे महत्वपूर्ण साधन है। यद्यपि यह सही है कि बैंकों की स्थापना मुख्य रूप से व्यापारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिया गया फिर भी राष्ट्रीयकरण के पश्चात इनके उद्देश्यों में बदलाव आया। इनकी पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों तक होने लगी। लोगों को बचत के लिए प्रोत्साहित करने और संस्थागत ऋण प्रदान करने वाणिज्यिक बैंकों के साथ-साथ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गयी। इसके कारण वित्तीय समावेशन को बढ़ाव मिला। इसी क्रम में जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था में नए आयाम जुड़ने लगे जैसे कि वित्तीय साक्षरता, तकनीकी विकास, डिजिटल साधनों का विकास होना प्रारम्भ हुआ है परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था से अलग व्यवस्था का विकास हुआ। इसके अंतर्गत प्रत्यक्ष लाभ स्थानांतरण, आधार आधारित हस्तांतरण व्यवस्था, यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस आदि महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। इसी संदर्भ में विगत कुछ वर्षों में लघु वित्त बैंक और भुगतान बैंक को विशेष प्रोत्साहन मिला है। इसके माध्यम से वित्तीय समावेशन को निम्न प्रकार से बढ़ावा दिया जा रहा है: लघु वित्त बैंक: इनकी स्थापना उन क्षेत्रों में कि गयी है जहां वाणिज्यिक बैंकों का बहुत कम पहुँच है। ये बैंक छोटे ऋण धारकों को लक्षित करते हैं जो बड़े बैंकों से ऋण प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इन बैंकों में कागजी औपचारिकताओं को कम करते हुए पैसे जमा करना, निकालना, ऋणों का वितरण आसान बनाया गया है। व्याज दरों को बहुत ही कम रखा जाता है तथा ऋण हेतु आवश्यक कोलेटरल जैसी औपचारिकता को सरल बनाया गया है। महिलाओं, एससी/एसटी, कमजोर वर्गों को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। कृषि तथा अन्य प्राथमिक क्षेत्रक उधारी को केन्द्रित किया जा रहा है। भुगतान बैंक: परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था से अलग ऑनलाइन माध्यम से बैंकिंग व्यवस्था को संचालित करने का कार्य। ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँच बढ़ाने के साथ शहरों में बैंकों के कार्य सरल करने में व्यापक महत्वपूर्ण हैं। भुगतान बैंकों का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा है कि ऑनलाइन भुगतान को प्रोत्साहित किया आजा रहा है। जैसे- पेटीएम, एयरटेल पेमेंट बैंक इनके माध्यम से छोटी बचत और प्रतिदिन के वित्तीय हस्तांतरण को बढ़ावा दिया गया है। ऐसे सुदूर क्षेत्र जहां संस्थागत बैंकिंग व्यवस्था नहीं है। वहाँ इंटरनेट के माध्यम से भुगतान बैंक कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था ने व्यापक योगदान दिया है। इसके साथ ही डिजिटल साधनों के विकास के साथ साथ नए प्रकार के बैंकिंग व्यवस्था का प्रचलन बढ़ रहा है। इसमें भुगतान बैंक, लघु वित्त बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
| 45,497
|
Briefly discuss Amartya Sen"s capability approach of Justice?(150 words)
|
Structure of the Answer 1. In Introduction briefly highlight Amartya Sen idea of justice and how it is linked with Capability building approach. 2. Elaborate on Capacity building approach . 3. Conclude accordingly, highlighting its importance and how a step forward vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’. Answer Amartya Sen in his Idea of Justice equates Justice with Real Freedom. Real Freedom is when a person have capacity to do, what he wish to do. Capabilities are substantive freedom a person enjoys to lead a kind of life he has reason to value. The most basic capabilities for human development are : to lead long and healthy life, to be knowledgeable(educated), to have access to the resources and social services needed for a decent standard of living and to be able to participate in the life of the community. To reach objective of real freedom, State should intervene in a positive way i.e State should invest in Social Infrastructure, human Resource development etc. It means State should invest in Health, education, Skill development etc. It is also called Bottom Up approach. For Example, in the capability perspective, poverty is seen in terms of a shortfall of ‘basic capabilities’ . Thus to achieve real freedom , capabilities of poor need to be increased by providing nourishment, education and psychological development . Amartya Sen proposes that people lose capabilities when they lack freedom. Having freedom provides the space to develop capabilities. Therefore, all development, according to Sen, is development of human capabilities in the enabling environment of freedom. It goes a step further vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’ as stresses on people’s opportunities to make use of commodities to achieve well-being and not just resource distribution in society. Thus, capabilities approach offers a much broader perspective of development where everything revolves around people’s well-being.
|
##Question:Briefly discuss Amartya Sen"s capability approach of Justice?(150 words)##Answer:Structure of the Answer 1. In Introduction briefly highlight Amartya Sen idea of justice and how it is linked with Capability building approach. 2. Elaborate on Capacity building approach . 3. Conclude accordingly, highlighting its importance and how a step forward vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’. Answer Amartya Sen in his Idea of Justice equates Justice with Real Freedom. Real Freedom is when a person have capacity to do, what he wish to do. Capabilities are substantive freedom a person enjoys to lead a kind of life he has reason to value. The most basic capabilities for human development are : to lead long and healthy life, to be knowledgeable(educated), to have access to the resources and social services needed for a decent standard of living and to be able to participate in the life of the community. To reach objective of real freedom, State should intervene in a positive way i.e State should invest in Social Infrastructure, human Resource development etc. It means State should invest in Health, education, Skill development etc. It is also called Bottom Up approach. For Example, in the capability perspective, poverty is seen in terms of a shortfall of ‘basic capabilities’ . Thus to achieve real freedom , capabilities of poor need to be increased by providing nourishment, education and psychological development . Amartya Sen proposes that people lose capabilities when they lack freedom. Having freedom provides the space to develop capabilities. Therefore, all development, according to Sen, is development of human capabilities in the enabling environment of freedom. It goes a step further vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’ as stresses on people’s opportunities to make use of commodities to achieve well-being and not just resource distribution in society. Thus, capabilities approach offers a much broader perspective of development where everything revolves around people’s well-being.
| 45,512
|
Briefly discuss Amartya Sen"s capability approach of Justice?(150 words)
|
Structure of the Answer 1. In Introduction briefly highlight Amartya Sen idea of justice and how it is linked with Capability building approach. 2. Elaborate on Capacity building approach . 3. Conclude accordingly, highlighting its importance and how a step forward vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’. Answer Amartya Sen in his Idea of Justice equates Justice with Real Freedom. Real Freedom is when a person have capacity to do, what he wish to do. Capabilities are substantive freedom a person enjoys to lead a kind of life he has reason to value. The most basic capabilities for human development are : to lead long and healthy life, to be knowledgeable(educated), to have access to the resources and social services needed for a decent standard of living and to be able to participate in the life of the community. To reach objective of real freedom, State should intervene in a positive way i.e State should invest in Social Infrastructure, human Resource development etc. It means State should invest in Health, education, Skill development etc. It is also called Bottom Up approach. For Example, in the capability perspective, poverty is seen in terms of a shortfall of ‘basic capabilities’ . Thus to achieve real freedom , capabilities of poor need to be increased by providing nourishment, education and psychological development . Amartya Sen proposes that people lose capabilities when they lack freedom. Having freedom provides the space to develop capabilities. Therefore, all development, according to Sen, is development of human capabilities in the enabling environment of freedom. It goes a step further vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’ as stresses on people’s opportunities to make use of commodities to achieve well-being and not just resource distribution in society. Thus, capabilities approach offers a much broader perspective of development where everything revolves around people’s well-being.
|
##Question:Briefly discuss Amartya Sen"s capability approach of Justice?(150 words)##Answer:Structure of the Answer 1. In Introduction briefly highlight Amartya Sen idea of justice and how it is linked with Capability building approach. 2. Elaborate on Capacity building approach . 3. Conclude accordingly, highlighting its importance and how a step forward vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’. Answer Amartya Sen in his Idea of Justice equates Justice with Real Freedom. Real Freedom is when a person have capacity to do, what he wish to do. Capabilities are substantive freedom a person enjoys to lead a kind of life he has reason to value. The most basic capabilities for human development are : to lead long and healthy life, to be knowledgeable(educated), to have access to the resources and social services needed for a decent standard of living and to be able to participate in the life of the community. To reach objective of real freedom, State should intervene in a positive way i.e State should invest in Social Infrastructure, human Resource development etc. It means State should invest in Health, education, Skill development etc. It is also called Bottom Up approach. For Example, in the capability perspective, poverty is seen in terms of a shortfall of ‘basic capabilities’ . Thus to achieve real freedom , capabilities of poor need to be increased by providing nourishment, education and psychological development . Amartya Sen proposes that people lose capabilities when they lack freedom. Having freedom provides the space to develop capabilities. Therefore, all development, according to Sen, is development of human capabilities in the enabling environment of freedom. It goes a step further vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’ as stresses on people’s opportunities to make use of commodities to achieve well-being and not just resource distribution in society. Thus, capabilities approach offers a much broader perspective of development where everything revolves around people’s well-being.
| 45,513
|
Briefly discuss Amartya Sen"s capability approach of Justice?(10marks/150 words)
|
Structure of the Answer 1. In Introduction briefly highlight Amartya Sen idea of justice and how it is linked with Capability building approach. 2. Elaborate on Capacity building approach . 3. Conclude accordingly, highlighting its importance and how a step forward vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’. Answer Amartya Sen in his Idea of Justice equates Justice with Real Freedom. Real Freedom is when a person have capacity to do, what he wish to do. Capabilities are substantive freedom a person enjoys to lead a kind of life he has reason to value. The most basic capabilities for human development are : to lead long and healthy life, to be knowledgeable(educated), to have access to the resources and social services needed for a decent standard of living and to be able to participate in the life of the community. To reach objective of real freedom, State should intervene in a positive way i.e State should invest in Social Infrastructure, human Resource development etc. It means State should invest in Health, education, Skill development etc. It is also called Bottom Up approach. For Example, in the capability perspective, poverty is seen in terms of a shortfall of ‘basic capabilities’ . Thus to achieve real freedom , capabilities of poor need to be increased by providing nourishment, education and psychological development . Amartya Sen proposes that people lose capabilities when they lack freedom. Having freedom provides the space to develop capabilities. Therefore, all development, according to Sen, is development of human capabilities in the enabling environment of freedom. It goes a step further vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’ as stresses on people’s opportunities to make use of commodities to achieve well-being and not just resource distribution in society. Thus, capabilities approach offers a much broader perspective of development where everything revolves around people’s well-being.
|
##Question:Briefly discuss Amartya Sen"s capability approach of Justice?(10marks/150 words)##Answer:Structure of the Answer 1. In Introduction briefly highlight Amartya Sen idea of justice and how it is linked with Capability building approach. 2. Elaborate on Capacity building approach . 3. Conclude accordingly, highlighting its importance and how a step forward vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’. Answer Amartya Sen in his Idea of Justice equates Justice with Real Freedom. Real Freedom is when a person have capacity to do, what he wish to do. Capabilities are substantive freedom a person enjoys to lead a kind of life he has reason to value. The most basic capabilities for human development are : to lead long and healthy life, to be knowledgeable(educated), to have access to the resources and social services needed for a decent standard of living and to be able to participate in the life of the community. To reach objective of real freedom, State should intervene in a positive way i.e State should invest in Social Infrastructure, human Resource development etc. It means State should invest in Health, education, Skill development etc. It is also called Bottom Up approach. For Example, in the capability perspective, poverty is seen in terms of a shortfall of ‘basic capabilities’ . Thus to achieve real freedom , capabilities of poor need to be increased by providing nourishment, education and psychological development . Amartya Sen proposes that people lose capabilities when they lack freedom. Having freedom provides the space to develop capabilities. Therefore, all development, according to Sen, is development of human capabilities in the enabling environment of freedom. It goes a step further vis-à-vis John Rawls ‘Theory of Justice’ as stresses on people’s opportunities to make use of commodities to achieve well-being and not just resource distribution in society. Thus, capabilities approach offers a much broader perspective of development where everything revolves around people’s well-being.
| 45,514
|
भारतीय विदेश नीति के वर्तमान स्वरुप को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने सुनिश्चित किया है| चर्चा कीजिये| (200 शब्द, 10 अंक) The present form of Indian foreign policy has been ensured by various international factors. Discuss (200 words, 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारक अंतर्राष्ट्रीय कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये 3- अंतिम में कारकों के साथ ही विदेश नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्त्व को बताते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति के विकास और नीति को आकार देने में भूमिका निभाने वाले कारकों को निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भारत की स्वतंत्रता और विश्वयुद्ध के बाद विश्व शक्ति गुट की राजनीति, शीत युद्ध, नव शीत युद्ध का सामना कर रहा था| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की स्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| स्वतंत्रता के बाद भारत को उपरोक्त स्थिति का सामना करना पडा इसीलिए भारत को गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई गयी भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी|इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था| पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी पड़ोस एवं बाह्य विश्व का वातावरण स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का समाना किया, इसी के ठीक पहले भारत ने सूखे का सामना किया था, फिर भी लगातार बढती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी, ये एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी, भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| इसकी पृष्ठभूमि में 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था और चीन एक परमाणु शक्ति बन चुका था| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया, इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे आसियान आदि, इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| सोवियत संघ भारत का सहयोगी देश था| सोवियत संघ द्वारा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1991 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ,इसके बाद भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश की आवश्यकता थी अतः भारत ने विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ, भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई, इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| वैश्विक स्तर पर पाइरेसी की समस्या 2011 में चरम पर पहुच गयी, विश्व भर के जहाज लुटे गए| इसकी प्रतिक्रिया में हिंदमहासागर में विश्व की समस्त बड़ी शक्तियों ने अपनी नौसेना को तैनात किया है| इसके परिणामस्वरुप हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो गया| इसे ध्यान में रखते हुए भारत ने हिन्द महासागरीय देशों के साथ सम्बन्धों मेंनिरंतर सुधार के लिए कूटनीतिक प्रयास किये है जैसे मालदीव, सेशल्स, दक्षिण पूर्वी एशिया, आदि| इसी के साथ ब्लू इकॉनमी पहल, बिम्सटेक आदि प्रयासों को भी देखा जा सकता है| 2001 के बाद भारत द्वारा विश्व का विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और भारत के आर्थिक विकास ने NSG के प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करता है, भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| इससे भारत को एक सहयोगी देश प्राप्त हुआ| इसके बाद सोवियत संघ ने भारत में तकनीकी विकास में पूर्ण सहयोग किया| सोवियत संघ ने बाद में भारत को विभिन्न हथियारों का तकनीकी हस्तांतरण भी किया 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| वर्ष 2000 में भारत ने रूस के साथ रणनीतिक सहयोग संधि की गयी इससे दोनों देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों और पहलुओं पर सहयोग बढ़ता गया है और सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती गयी है| दोनों देश नाभिकीय तकनीकी के संयुक्त विपणन के लिए तैयार हैं| इससे भारत को सहयोगी राष्ट्रों के विकास में सहायता करने का अवसर प्राप्त होगा| इसी संदर्भ में भारत द्वारा विएतनाम में नाभिकीय तकनीकी विकास को समझ सकते हैं| इससे चीन की आक्रामकता को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| 1985 में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढाने और सभी देशों का विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्क संधि की गयी| 2006 में साफ्टा सम्पन्न किया गया| इसके माध्यम से भारत को क्षेत्रीय स्तर पर सम्बन्धों में सुधार करने में सहायता प्राप्त हुई है| सैन्य कारक भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं| इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
|
##Question:भारतीय विदेश नीति के वर्तमान स्वरुप को विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने सुनिश्चित किया है| चर्चा कीजिये| (200 शब्द, 10 अंक) The present form of Indian foreign policy has been ensured by various international factors. Discuss (200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारक अंतर्राष्ट्रीय कारकों की उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये 3- अंतिम में कारकों के साथ ही विदेश नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्त्व को बताते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| स्वतंत्रता पश्चात भारत की विदेश नीति के विकास और नीति को आकार देने में भूमिका निभाने वाले कारकों को निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भारत की स्वतंत्रता और विश्वयुद्ध के बाद विश्व शक्ति गुट की राजनीति, शीत युद्ध, नव शीत युद्ध का सामना कर रहा था| पूंजीवादी/साम्यवादी गुटों की स्थिति में विदेश नीति के स्वरुप का निर्धारण चुनौतीपूर्ण था| स्वतंत्रता के बाद भारत को उपरोक्त स्थिति का सामना करना पडा इसीलिए भारत को गुट निरपेक्षता की नीति अपनाई गयी भारत में दोनों विचारधाराओं का समन्वय कर लोकतांत्रिक समाजवाद और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई गयी|इस तरह से भारत ने वैश्विक शक्ति राजनीति से खुद को दूर रखा इसका कारण विचारधारात्मक और आर्थिक(संसाधनों का सदुपयोग) दोनों था इसी समय भारत ने पंचशील की अवधारणा प्रस्तुत की जो मूलतः शांतिपूर्ण सहस्तित्व पर आधारित थी| यह तत्कालीन शक्ति राजनीति की स्थिति में एक समाधान के रूप में था| पंचशील और गुटनिरपेक्षता की अवधारणाओं ने नव स्वतंत्र देशों की सुरक्षा, विकास और स्वतंत्र विदेश नीति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी पड़ोस एवं बाह्य विश्व का वातावरण स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों में भारत को कश्मीर मुद्दे एवं चीन के आक्रामक रवैये का सामना करना पडा| कश्मीर मुद्दे पर भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाते हुए बिना किसी गुट का हिस्सा बने, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र का सहारा लिया 1971में बांग्लादेश युद्ध के समय भारत ने शरणार्थी समस्या का समाना किया, इसी के ठीक पहले भारत ने सूखे का सामना किया था, फिर भी लगातार बढती शरणार्थी समस्या को देखते हुए मुक्तिवाहिनी को सहायता प्रदान की गयी, ये एक यथार्थवादी विदेश नीति का उदाहरण था| 1967 में भेदभावपूर्ण परमाणु अप्रसार संधि प्रस्तुत की गयी, भारतीय विदेश नीति ने भेदभावपूर्ण होने के कारण NPT का विरोध किया| इसकी पृष्ठभूमि में 1962 में हुआ भारत-चीन युद्ध था और चीन एक परमाणु शक्ति बन चुका था| 1990 के दशक के आर्थिक संकट(भुगतान असंतुलन) के समाधान के लिए नई आर्थिक नीति लायी गयी और उदारीकरण किया गया, इसके बाद विदेश नीति में इसी के अनुरूप परिवर्तन करते हुए उदारीकृत देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये गये जैसे आसियान आदि, इसी संदर्भ में लुक ईस्ट नीति को समझ सकते हैं| सोवियत संघ भारत का सहयोगी देश था| सोवियत संघ द्वारा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना गया| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| 1991 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ,इसके बाद भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश की आवश्यकता थी अतः भारत ने विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के प्रयास किये| 2001 में भारतीय संसद और अमेरिका के ट्विन टावर पर आतंकी हमला हुआ, भारत ने यहाँ आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी संघर्ष पर अमेरिका का पूर्ण समर्थन करने की नीति अपनाई, इसके बाद भारत-अमेरिका सम्बन्ध लगातार सुधरते गये| वैश्विक स्तर पर पाइरेसी की समस्या 2011 में चरम पर पहुच गयी, विश्व भर के जहाज लुटे गए| इसकी प्रतिक्रिया में हिंदमहासागर में विश्व की समस्त बड़ी शक्तियों ने अपनी नौसेना को तैनात किया है| इसके परिणामस्वरुप हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो गया| इसे ध्यान में रखते हुए भारत ने हिन्द महासागरीय देशों के साथ सम्बन्धों मेंनिरंतर सुधार के लिए कूटनीतिक प्रयास किये है जैसे मालदीव, सेशल्स, दक्षिण पूर्वी एशिया, आदि| इसी के साथ ब्लू इकॉनमी पहल, बिम्सटेक आदि प्रयासों को भी देखा जा सकता है| 2001 के बाद भारत द्वारा विश्व का विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और भारत के आर्थिक विकास ने NSG के प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान में भारत को एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में पहचान दी है| इस मामले पर अधिकाँश देश भारत के पक्ष में हैं| इसके पीछे लम्बे कूटनीतिक प्रयासों को समझा जा सकता है| अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में भारत की निष्ठा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करता है, भारत ने अमेरिकी अभियानों में इसी आधार पर सहभागिता नहीं की है| भारत का कहना है कि किसी भी देश पर कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से होनी चाहिए| 1971 में भारत-सोवियत संघ के मध्य शान्ति एवं मित्रता के लिए एक संधि की गयी| इससे भारत को एक सहयोगी देश प्राप्त हुआ| इसके बाद सोवियत संघ ने भारत में तकनीकी विकास में पूर्ण सहयोग किया| सोवियत संघ ने बाद में भारत को विभिन्न हथियारों का तकनीकी हस्तांतरण भी किया 1991 में भारत ने नयी आर्थिक नीति अपनाई इसके उपरान्त भारत ने WTO संधि में भागीदारी की इसके आधार पर विदेश नीति में अनेक परिवर्तन किये गये| जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की वकालत आदि| वर्ष 2000 में भारत ने रूस के साथ रणनीतिक सहयोग संधि की गयी इससे दोनों देशों के मध्य विभिन्न मुद्दों और पहलुओं पर सहयोग बढ़ता गया है और सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती गयी है| दोनों देश नाभिकीय तकनीकी के संयुक्त विपणन के लिए तैयार हैं| इससे भारत को सहयोगी राष्ट्रों के विकास में सहायता करने का अवसर प्राप्त होगा| इसी संदर्भ में भारत द्वारा विएतनाम में नाभिकीय तकनीकी विकास को समझ सकते हैं| इससे चीन की आक्रामकता को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी| 2005 में भारत-अमेरिका नागरिक-नाभिकीय समझौते ने नाभिकीय ऊर्जा संपन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्धों में सुधार सुनिश्चित किया है| वर्तमान में अधिकाँश नाभिकीय शक्ति संपन्न देश नाभिकीय ऊर्जा के मामले में भारत का समर्थन करते हैं| 1985 में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढाने और सभी देशों का विकास सुनिश्चित करने के लिए सार्क संधि की गयी| 2006 में साफ्टा सम्पन्न किया गया| इसके माध्यम से भारत को क्षेत्रीय स्तर पर सम्बन्धों में सुधार करने में सहायता प्राप्त हुई है| सैन्य कारक भारत की विदेश नीति पंचशील का अनुपालन करती है लेकिन राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भारत ने आवश्यकता अनुरूप सैन्य शक्ति का उपयोग भी किया है भारत द्वारा 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम, 1987 में श्रीलंका में शान्ति सेना को भेजना, मालदीव में ऑपरेशन कैक्टस आदि कूटनीतिक सैन्य ऑपरेशन किये गए हैं| इसी तरह भारत विश्व के विभिन्न देशों के साथ सैन्य अभ्यासों की श्रृंखला आयोजित करता है जैसे इन्द्रा, सिम्बैक्स आदि| इस प्रकार सैन्य संदर्भ में भारत की कूटनीति का आशय है कि राष्ट्रीय हितों पर जोखिम उत्पन्न होने पर भारतीय विदेश नीति सैन्य कारकों का प्रयोग भी कर सकती है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं कारकों का प्रभाव पड़ता है| भारत की विदेश नीति की स्थापना में उपरोक्त बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
| 45,520
|
प्लासी के युद्ध के कारणों और परिणामों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (200 शब्द) Describe the reasons and consequences of Plassey"s war in brief.
|
एप्रोच - भूमिका में प्लासी के युद्ध का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात युद्ध के कारणों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में युद्ध के परिणामों पर चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में ब्रिटिश शासन का आरम्भ प्लासी के युद्ध से माना जा सकता है , यह युद्ध केवल नाममात्र का युद्ध था | वास्तव में यह अंग्रेजों के षड़यंत्र एवं नवाब के दरबारियों के विश्वासघात का परिणाम था | प्लासी के युद्ध ने न केवल बंगाल विजय का रास्ता खोला बल्कि यह अंग्रेजों के लिए भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया | प्लासी के युद्ध के कारण - यह युद्ध अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा का परिणाम था , अंग्रेज भारत में न केवल व्यापार करना चाहते थे बल्कि शासन एवं राजस्व में भी दिलचस्पी रखते थे | 1717 में मुग़ल बादशाह द्वारा जारी शाही फरमान जिसमें अंग्रेजों को मुक्त व्यापार की अनुमति मिली थी , से बंगाल में काफी भ्रष्टाचार फ़ैल गया था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला इस फरमान को बदलना या संशोधित करना चाहता था , ऐसी स्थिति में नवाब और अंग्रेजों के मध्य टकराव की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक था | अंग्रेज लगातार नवाब सिराजुद्दौला की संप्रभुता को भी चुनौती दे रहे थे , वे नवाब के विरोधियों को संरक्षण , भारतीय वस्तुओं पर कलकत्ता में कर लगाना तथा कलकत्ता के चारों तरफ सुरक्षा घेरे की प्रक्रिया को आरम्भ करना , आदि जिससे नवाब अपनी संप्रभुता के लिए चुनौती मान रहा था | ब्रिटिश अधिकारी हालवेल ने नवाब पर "काल कोठरी " जैसी अमानवीय घटना का आरोप लगता है , यद्यपि की यह किसी अन्य साक्ष्य से पुष्ट नहीं हो पाता, फिर भी अंग्रेजों द्वारा इसे प्रतिशोध का आधार बनाया गया | प्लासी का युद्ध अंग्रेजी शासन के विस्तार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | इस सन्दर्भ में प्लासी के युद्ध के अनेक परिणाम हुए | प्लासी के युद्ध के परिणाम - प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के हाथ सफलता लगी | इस सफलता के साथ ही बंगाल में राजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय हुआ | बंगाल के शासक ( नवाब ) पर अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित हो गया | इसी क्रम में अंग्रेजों ने 1757 में मीरजाफर एवं 1760 में मीरकासिम को बंगाल का नवाब बनाया | बंगाल से अंग्रेजों को युद्ध हर्जाने के रूप में बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त हुई | बंगाल से प्राप्त संसाधनों का प्रयोग अंग्रेजों ने कर्नाटक युद्ध में फ्रांसीसियों के विरुद्ध किया जिससे इस युद्ध में उन्हें सफलता प्राप्त हुई | कंपनी एवं कंपनी के कर्मचारियों को बंगाल में अनेक व्यापारिक रियायते प्राप्त हुई | अंग्रेजों को 24 परगना की ज़मींदारी भी प्राप्त हुई | अंग्रेजों को भारत के सबसे समृद्ध राज्य की सम्पदा पर नियंत्रण स्थापित हो गया जिससे उनकी शक्ति एवं उत्साह में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और इसका प्रयोग अंग्रेजों ने देश के दूसरे भाग के विस्तार करने में किया | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्लासी का युद्ध अपने आप में भारतीय इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है |
|
##Question:प्लासी के युद्ध के कारणों और परिणामों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (200 शब्द) Describe the reasons and consequences of Plassey"s war in brief.##Answer:एप्रोच - भूमिका में प्लासी के युद्ध का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात युद्ध के कारणों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में युद्ध के परिणामों पर चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में ब्रिटिश शासन का आरम्भ प्लासी के युद्ध से माना जा सकता है , यह युद्ध केवल नाममात्र का युद्ध था | वास्तव में यह अंग्रेजों के षड़यंत्र एवं नवाब के दरबारियों के विश्वासघात का परिणाम था | प्लासी के युद्ध ने न केवल बंगाल विजय का रास्ता खोला बल्कि यह अंग्रेजों के लिए भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया | प्लासी के युद्ध के कारण - यह युद्ध अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा का परिणाम था , अंग्रेज भारत में न केवल व्यापार करना चाहते थे बल्कि शासन एवं राजस्व में भी दिलचस्पी रखते थे | 1717 में मुग़ल बादशाह द्वारा जारी शाही फरमान जिसमें अंग्रेजों को मुक्त व्यापार की अनुमति मिली थी , से बंगाल में काफी भ्रष्टाचार फ़ैल गया था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला इस फरमान को बदलना या संशोधित करना चाहता था , ऐसी स्थिति में नवाब और अंग्रेजों के मध्य टकराव की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक था | अंग्रेज लगातार नवाब सिराजुद्दौला की संप्रभुता को भी चुनौती दे रहे थे , वे नवाब के विरोधियों को संरक्षण , भारतीय वस्तुओं पर कलकत्ता में कर लगाना तथा कलकत्ता के चारों तरफ सुरक्षा घेरे की प्रक्रिया को आरम्भ करना , आदि जिससे नवाब अपनी संप्रभुता के लिए चुनौती मान रहा था | ब्रिटिश अधिकारी हालवेल ने नवाब पर "काल कोठरी " जैसी अमानवीय घटना का आरोप लगता है , यद्यपि की यह किसी अन्य साक्ष्य से पुष्ट नहीं हो पाता, फिर भी अंग्रेजों द्वारा इसे प्रतिशोध का आधार बनाया गया | प्लासी का युद्ध अंग्रेजी शासन के विस्तार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | इस सन्दर्भ में प्लासी के युद्ध के अनेक परिणाम हुए | प्लासी के युद्ध के परिणाम - प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के हाथ सफलता लगी | इस सफलता के साथ ही बंगाल में राजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय हुआ | बंगाल के शासक ( नवाब ) पर अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित हो गया | इसी क्रम में अंग्रेजों ने 1757 में मीरजाफर एवं 1760 में मीरकासिम को बंगाल का नवाब बनाया | बंगाल से अंग्रेजों को युद्ध हर्जाने के रूप में बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त हुई | बंगाल से प्राप्त संसाधनों का प्रयोग अंग्रेजों ने कर्नाटक युद्ध में फ्रांसीसियों के विरुद्ध किया जिससे इस युद्ध में उन्हें सफलता प्राप्त हुई | कंपनी एवं कंपनी के कर्मचारियों को बंगाल में अनेक व्यापारिक रियायते प्राप्त हुई | अंग्रेजों को 24 परगना की ज़मींदारी भी प्राप्त हुई | अंग्रेजों को भारत के सबसे समृद्ध राज्य की सम्पदा पर नियंत्रण स्थापित हो गया जिससे उनकी शक्ति एवं उत्साह में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और इसका प्रयोग अंग्रेजों ने देश के दूसरे भाग के विस्तार करने में किया | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्लासी का युद्ध अपने आप में भारतीय इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है |
| 45,521
|
What are the challenges to national security which are posed by the Media? Give examples of their positive contribution to ensuring National Security. Also, suggest measures to improve their contributions. (10 marks/150 words)
|
Approach: Write briefly about the role of media in National security State the Challenges posed by media in the internal security of India Highlight the Positive Contribution of media in internal security Suggest the way forward Answer The media and national security policies of a nation have a strong connection in the contemporary environment, both directly and indirectly. Media is considered an influential channel for effective communication. It provides a real exposure to the mass viewers about right or wrong process. However, with 24/7 coverage and the breaking news sensation, the boundaries between facts, opinions, and speculations have blurred. Challenges posed by media in the internal security of India: 1. Sensationalisation of national security issues by the media agencies, Indian media does not have a wider perspective of National Security issues 2. Coverage of Anti-terror operation in an irresponsible manner. 3. Indian media analysis and over-analysis of national security issues by former diplomats, generals, and academia’s armchair strategists distort a national security perspective. All these gentlemen can only draw on their outdated experience and none of them are privy to the latest inputs. Also in many cases, reticence is the first casualty after retirement. 4. Trivialisation and insensitive coverage of communal conflicts. It creates dividing tendencies among people on the basis of caste, creed, and religion, etc. Eg- Muzzafarnagar riot case, 2013 and Asifi case of Jammu & Kashmir. 5. Indian TV anchors discussing national security issues do not have the political and strategic maturity to discuss such issues as their western counterparts 6. Indian TV debates on national security issues tend to cut out the development of contrary views and perspective by imposing commercial breaks or go hectoring themselves, 7. There are successive intrusion and coverage of subjudice matters in a very irresponsible manner. 8. Spread of fake news and propaganda medium and Paid news for making over the image to enter politics. Positive Contribution of media in internal security Coverage of Kargil war updated the people of India of govt’s effort in ensuring national security, thus bridged the gap between the two and also the sacrifices of Military personnel strengthened the bond of fraternity among people. Coverage of Plane flying over India on 10th August 1999, a month after the Kargil war reported by media first and then it was shot down by Indian forces over Rann of Kutch. Media acts as mediators between the two communities TRACK-3 diplomacy- Aman ki Asha campaign in 1998. Way forward The press council of India has suggested that in the event of terrorist attacks, media should restrain from giving sensational and melodramatic reporting. A glimpse of which was witnessed during the Mumbai attack. Media should show greater restraint while covering issues of communal conflict. Eg-UK has an exemplary set of guidelines for war and terror coverage. The guidelines call use of proper terror coverage. Media agencies should evolve their own code of ethics and self-regulation mechanism. The government should also be proactive and provide accurate & reliable information to the public so that it does not get influenced by biased reporting by the news agency.
|
##Question:What are the challenges to national security which are posed by the Media? Give examples of their positive contribution to ensuring National Security. Also, suggest measures to improve their contributions. (10 marks/150 words)##Answer:Approach: Write briefly about the role of media in National security State the Challenges posed by media in the internal security of India Highlight the Positive Contribution of media in internal security Suggest the way forward Answer The media and national security policies of a nation have a strong connection in the contemporary environment, both directly and indirectly. Media is considered an influential channel for effective communication. It provides a real exposure to the mass viewers about right or wrong process. However, with 24/7 coverage and the breaking news sensation, the boundaries between facts, opinions, and speculations have blurred. Challenges posed by media in the internal security of India: 1. Sensationalisation of national security issues by the media agencies, Indian media does not have a wider perspective of National Security issues 2. Coverage of Anti-terror operation in an irresponsible manner. 3. Indian media analysis and over-analysis of national security issues by former diplomats, generals, and academia’s armchair strategists distort a national security perspective. All these gentlemen can only draw on their outdated experience and none of them are privy to the latest inputs. Also in many cases, reticence is the first casualty after retirement. 4. Trivialisation and insensitive coverage of communal conflicts. It creates dividing tendencies among people on the basis of caste, creed, and religion, etc. Eg- Muzzafarnagar riot case, 2013 and Asifi case of Jammu & Kashmir. 5. Indian TV anchors discussing national security issues do not have the political and strategic maturity to discuss such issues as their western counterparts 6. Indian TV debates on national security issues tend to cut out the development of contrary views and perspective by imposing commercial breaks or go hectoring themselves, 7. There are successive intrusion and coverage of subjudice matters in a very irresponsible manner. 8. Spread of fake news and propaganda medium and Paid news for making over the image to enter politics. Positive Contribution of media in internal security Coverage of Kargil war updated the people of India of govt’s effort in ensuring national security, thus bridged the gap between the two and also the sacrifices of Military personnel strengthened the bond of fraternity among people. Coverage of Plane flying over India on 10th August 1999, a month after the Kargil war reported by media first and then it was shot down by Indian forces over Rann of Kutch. Media acts as mediators between the two communities TRACK-3 diplomacy- Aman ki Asha campaign in 1998. Way forward The press council of India has suggested that in the event of terrorist attacks, media should restrain from giving sensational and melodramatic reporting. A glimpse of which was witnessed during the Mumbai attack. Media should show greater restraint while covering issues of communal conflict. Eg-UK has an exemplary set of guidelines for war and terror coverage. The guidelines call use of proper terror coverage. Media agencies should evolve their own code of ethics and self-regulation mechanism. The government should also be proactive and provide accurate & reliable information to the public so that it does not get influenced by biased reporting by the news agency.
| 45,522
|
प्लासी के युद्ध के कारणों और परिणामों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (200 शब्द) Describe the reasons and consequences of Plassey"s war in brief.
|
एप्रोच - भूमिका में प्लासी के युद्ध का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात युद्ध के कारणों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में युद्ध के परिणामों पर चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में ब्रिटिश शासन का आरम्भ प्लासी के युद्ध से माना जा सकता है , यह युद्ध केवल नाममात्र का युद्ध था | वास्तव में यह अंग्रेजों के षड़यंत्र एवं नवाब के दरबारियों के विश्वासघात का परिणाम था | प्लासी के युद्ध ने न केवल बंगाल विजय का रास्ता खोला बल्कि यह अंग्रेजों के लिए भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया | प्लासी के युद्ध के कारण - यह युद्ध अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा का परिणाम था , अंग्रेज भारत में न केवल व्यापार करना चाहते थे बल्कि शासन एवं राजस्व में भी दिलचस्पी रखते थे | 1717 में मुग़ल बादशाह द्वारा जारीशाही फरमानजिसमें अंग्रेजों को मुक्त व्यापार की अनुमति मिली थी , से बंगाल में काफी भ्रष्टाचार फ़ैल गया था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला इस फरमान को बदलना या संशोधित करना चाहता था , ऐसी स्थिति में नवाब और अंग्रेजों के मध्य टकराव की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक था | अंग्रेज लगातार नवाब सिराजुद्दौला की संप्रभुता को भी चुनौती दे रहे थे , वे नवाब के विरोधियों को संरक्षण , भारतीय वस्तुओं पर कलकत्ता में कर लगाना तथा कलकत्ता के चारों तरफ सुरक्षा घेरे की प्रक्रिया को आरम्भ करना , आदि जिससे नवाब अपनी संप्रभुता के लिए चुनौती मान रहा था | ब्रिटिश अधिकारीहालवेल ने नवाब पर "काल कोठरी" जैसी अमानवीय घटना का आरोप लगता है , यद्यपि की यह किसी अन्य साक्ष्य से पुष्ट नहीं हो पाता, फिर भी अंग्रेजों द्वारा इसे प्रतिशोध का आधार बनाया गया | प्लासी का युद्ध अंग्रेजी शासन के विस्तार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | इस सन्दर्भ में प्लासी के युद्ध के अनेक परिणाम हुए | प्लासी के युद्ध के परिणाम - प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के हाथ सफलता लगी | इस सफलता के साथ ही बंगाल में राजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय हुआ | बंगाल के शासक ( नवाब ) पर अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित हो गया | इसी क्रम में अंग्रेजों ने1757 में मीरजाफर एवं 1760 में मीरकासिम कोबंगाल का नवाब बनाया | बंगाल से अंग्रेजों को युद्ध हर्जाने के रूप में बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त हुई | बंगाल से प्राप्त संसाधनों का प्रयोग अंग्रेजों ने कर्नाटक युद्ध में फ्रांसीसियों के विरुद्ध किया जिससे इस युद्ध में उन्हें सफलता प्राप्त हुई | कंपनी एवं कंपनी के कर्मचारियों को बंगाल में अनेक व्यापारिक रियायते प्राप्त हुई | अंग्रेजों को 24 परगना की ज़मींदारी भी प्राप्त हुई | अंग्रेजों को भारत के सबसे समृद्ध राज्य की सम्पदा पर नियंत्रण स्थापित हो गया जिससे उनकी शक्ति एवं उत्साह में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और इसका प्रयोग अंग्रेजों ने देश के दूसरे भाग के विस्तार करने में किया | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्लासी का युद्ध अपने आप में भारतीय इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है |
|
##Question:प्लासी के युद्ध के कारणों और परिणामों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (200 शब्द) Describe the reasons and consequences of Plassey"s war in brief.##Answer:एप्रोच - भूमिका में प्लासी के युद्ध का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात युद्ध के कारणों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में युद्ध के परिणामों पर चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में ब्रिटिश शासन का आरम्भ प्लासी के युद्ध से माना जा सकता है , यह युद्ध केवल नाममात्र का युद्ध था | वास्तव में यह अंग्रेजों के षड़यंत्र एवं नवाब के दरबारियों के विश्वासघात का परिणाम था | प्लासी के युद्ध ने न केवल बंगाल विजय का रास्ता खोला बल्कि यह अंग्रेजों के लिए भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया | प्लासी के युद्ध के कारण - यह युद्ध अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा का परिणाम था , अंग्रेज भारत में न केवल व्यापार करना चाहते थे बल्कि शासन एवं राजस्व में भी दिलचस्पी रखते थे | 1717 में मुग़ल बादशाह द्वारा जारीशाही फरमानजिसमें अंग्रेजों को मुक्त व्यापार की अनुमति मिली थी , से बंगाल में काफी भ्रष्टाचार फ़ैल गया था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला इस फरमान को बदलना या संशोधित करना चाहता था , ऐसी स्थिति में नवाब और अंग्रेजों के मध्य टकराव की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक था | अंग्रेज लगातार नवाब सिराजुद्दौला की संप्रभुता को भी चुनौती दे रहे थे , वे नवाब के विरोधियों को संरक्षण , भारतीय वस्तुओं पर कलकत्ता में कर लगाना तथा कलकत्ता के चारों तरफ सुरक्षा घेरे की प्रक्रिया को आरम्भ करना , आदि जिससे नवाब अपनी संप्रभुता के लिए चुनौती मान रहा था | ब्रिटिश अधिकारीहालवेल ने नवाब पर "काल कोठरी" जैसी अमानवीय घटना का आरोप लगता है , यद्यपि की यह किसी अन्य साक्ष्य से पुष्ट नहीं हो पाता, फिर भी अंग्रेजों द्वारा इसे प्रतिशोध का आधार बनाया गया | प्लासी का युद्ध अंग्रेजी शासन के विस्तार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है | इस सन्दर्भ में प्लासी के युद्ध के अनेक परिणाम हुए | प्लासी के युद्ध के परिणाम - प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों के हाथ सफलता लगी | इस सफलता के साथ ही बंगाल में राजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय हुआ | बंगाल के शासक ( नवाब ) पर अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित हो गया | इसी क्रम में अंग्रेजों ने1757 में मीरजाफर एवं 1760 में मीरकासिम कोबंगाल का नवाब बनाया | बंगाल से अंग्रेजों को युद्ध हर्जाने के रूप में बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त हुई | बंगाल से प्राप्त संसाधनों का प्रयोग अंग्रेजों ने कर्नाटक युद्ध में फ्रांसीसियों के विरुद्ध किया जिससे इस युद्ध में उन्हें सफलता प्राप्त हुई | कंपनी एवं कंपनी के कर्मचारियों को बंगाल में अनेक व्यापारिक रियायते प्राप्त हुई | अंग्रेजों को 24 परगना की ज़मींदारी भी प्राप्त हुई | अंग्रेजों को भारत के सबसे समृद्ध राज्य की सम्पदा पर नियंत्रण स्थापित हो गया जिससे उनकी शक्ति एवं उत्साह में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और इसका प्रयोग अंग्रेजों ने देश के दूसरे भाग के विस्तार करने में किया | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्लासी का युद्ध अपने आप में भारतीय इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है |
| 45,527
|
गैर सरकारी संगठन से क्या अभिप्राय है ? जनकल्याण के संदर्भ में इनकी भूमिका को बताते हुए इनसे जुड़ी चिंताओ की भी चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) What does the non-governmental organization mean? Explaining their role in the context of public welfare, discuss the issues related to them.( 150 words )
|
· भूमिका में गैर सरकारी संगठन को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में जनकल्याण के संदर्भ में इनके महत्व की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इनसे जुड़ी चिंताओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- गैर सरकारी संगठन(NGO) से तात्पर्य एक निजी संगठन से है जो लोगों का दुख-दर्द दूर करने, निर्धनों के हितों का संवर्द्धन करने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएँ प्रदान करने अथवा सामुदायिक विकास के लिये गतिविधियाँ चलाता है। ये लाभ का वितरण अपने मालिकों और निदेशकों के बीच नहीं करते बल्कि प्राप्त लाभ को संगठन में ही लगाना होता है। वे किसी सार्वजनिक उद्देश्य को लक्षित होते हैं।1860के सोसाइटी एक्ट के द्वारा कोई भी स्वैच्छिक समूह लोक हित में कार्य करना चाहता है तो उसे आवश्यक सहयोग सरकार और सिविल समाज द्वारा प्रदान किया जाता है । गैर सरकारी संगठन का महत्व :- स्वतन्त्रता आंदोलन के समय जिस प्रकार से इन गैर सरकारी संगठनो ने समाज कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके कारण ही स्वतन्त्रता पश्चात न सिर्फ सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट को लागू रखा गया। ये इस संदर्भ में अति उपयोगी हो रहे हैं कि जहां पर मानव संसाधनो की कमी हो वहाँ पर शासन के सहयोगी बन सके। शासन और नागरिकों के बीच राजनीतिक सम्प्रेषण द्वारा ये गैर सरकारी संगठन लोकतंत्र को और प्रभावी बना रहे हैं। शोध आदि के माध्यम से ये सुशासन में एक निर्णयक भूमिका निभा रहे हैं। जिसमे नीतियो के लिए प्रारूप तैयार करना, उसके लिए आवश्यक सुधारो को रेखांकित करना तथा उचित अनुपालन हेतु डाटा प्रबंधन आदि प्रमुख हैं। गैर सरकारी संगठनों की उपस्थिति नागरिकों की आवाज को अभिव्यक्ति देकर सहभागी लोकतंत्र को सक्षम बनाती है। जागरूकता फैलाने, सामाजिक एकजुटता, सेवा वितरण, प्रशिक्षण, अध्ययन व अनुसंधान एवं सार्वजनिक अपेक्षा को स्वर देने में ये सहयोग करते हैं। सरकार के प्रदर्शन पर संवाद व निगरानी द्वारा वे राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित कराते हैं। भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार या मनरेगा और सबसे महत्त्वपूर्ण सूचना का अधिकार जैसे कई प्रमुख विधेयक गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप से ही पारित हुए। उपरोक्त सकारात्मक कार्यो के साथ ही गैर सरकारी संगठनो के जुड़ी कुछ चिंताएँ भी है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ये धनशोधन जैसी आपराधिक गतिविधियो में भी सम्मिलित हैं । इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार ये ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं जो राष्ट्रीय हितों के लिये नुकसानदेह हैं, सार्वजनिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं या देश की सुरक्षा, वैज्ञानिक, सामरिक या आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इनके कारण जीडीपी विकास पर प्रतिवर्ष 2-3 प्रतिशत का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । बहुत सारे NGO द्वारा सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाता है तथा अपने धन का सही व्यौरा आयकर विभाग को समय से उपलब्ध भी नही करवाया जाता है । गैर सरकारी संगठन समुदायों को सबल बनाते हैं, इसलिये उनके दमन की नहीं बल्कि उन्हें समर्थन देने की आवश्यकता है।सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को भागीदार के रूप में कार्य करना चाहिये और साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये पूरक की भूमिका निभानी चाहिये जो परस्पर विश्वास व सम्मान के मूल सिद्धांत पर आधारित हो और साझा उत्तरदायित्व व अधिकार रखता हो। अतः वर्तमान समय में इस संदर्भ में भी एक नियामक संस्था होनी चाहिए।
|
##Question:गैर सरकारी संगठन से क्या अभिप्राय है ? जनकल्याण के संदर्भ में इनकी भूमिका को बताते हुए इनसे जुड़ी चिंताओ की भी चर्चा कीजिये । ( 150 शब्द ) What does the non-governmental organization mean? Explaining their role in the context of public welfare, discuss the issues related to them.( 150 words )##Answer:· भूमिका में गैर सरकारी संगठन को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में जनकल्याण के संदर्भ में इनके महत्व की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इनसे जुड़ी चिंताओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- गैर सरकारी संगठन(NGO) से तात्पर्य एक निजी संगठन से है जो लोगों का दुख-दर्द दूर करने, निर्धनों के हितों का संवर्द्धन करने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएँ प्रदान करने अथवा सामुदायिक विकास के लिये गतिविधियाँ चलाता है। ये लाभ का वितरण अपने मालिकों और निदेशकों के बीच नहीं करते बल्कि प्राप्त लाभ को संगठन में ही लगाना होता है। वे किसी सार्वजनिक उद्देश्य को लक्षित होते हैं।1860के सोसाइटी एक्ट के द्वारा कोई भी स्वैच्छिक समूह लोक हित में कार्य करना चाहता है तो उसे आवश्यक सहयोग सरकार और सिविल समाज द्वारा प्रदान किया जाता है । गैर सरकारी संगठन का महत्व :- स्वतन्त्रता आंदोलन के समय जिस प्रकार से इन गैर सरकारी संगठनो ने समाज कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके कारण ही स्वतन्त्रता पश्चात न सिर्फ सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट को लागू रखा गया। ये इस संदर्भ में अति उपयोगी हो रहे हैं कि जहां पर मानव संसाधनो की कमी हो वहाँ पर शासन के सहयोगी बन सके। शासन और नागरिकों के बीच राजनीतिक सम्प्रेषण द्वारा ये गैर सरकारी संगठन लोकतंत्र को और प्रभावी बना रहे हैं। शोध आदि के माध्यम से ये सुशासन में एक निर्णयक भूमिका निभा रहे हैं। जिसमे नीतियो के लिए प्रारूप तैयार करना, उसके लिए आवश्यक सुधारो को रेखांकित करना तथा उचित अनुपालन हेतु डाटा प्रबंधन आदि प्रमुख हैं। गैर सरकारी संगठनों की उपस्थिति नागरिकों की आवाज को अभिव्यक्ति देकर सहभागी लोकतंत्र को सक्षम बनाती है। जागरूकता फैलाने, सामाजिक एकजुटता, सेवा वितरण, प्रशिक्षण, अध्ययन व अनुसंधान एवं सार्वजनिक अपेक्षा को स्वर देने में ये सहयोग करते हैं। सरकार के प्रदर्शन पर संवाद व निगरानी द्वारा वे राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित कराते हैं। भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार या मनरेगा और सबसे महत्त्वपूर्ण सूचना का अधिकार जैसे कई प्रमुख विधेयक गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप से ही पारित हुए। उपरोक्त सकारात्मक कार्यो के साथ ही गैर सरकारी संगठनो के जुड़ी कुछ चिंताएँ भी है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ये धनशोधन जैसी आपराधिक गतिविधियो में भी सम्मिलित हैं । इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार ये ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं जो राष्ट्रीय हितों के लिये नुकसानदेह हैं, सार्वजनिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं या देश की सुरक्षा, वैज्ञानिक, सामरिक या आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इनके कारण जीडीपी विकास पर प्रतिवर्ष 2-3 प्रतिशत का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । बहुत सारे NGO द्वारा सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाता है तथा अपने धन का सही व्यौरा आयकर विभाग को समय से उपलब्ध भी नही करवाया जाता है । गैर सरकारी संगठन समुदायों को सबल बनाते हैं, इसलिये उनके दमन की नहीं बल्कि उन्हें समर्थन देने की आवश्यकता है।सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को भागीदार के रूप में कार्य करना चाहिये और साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये पूरक की भूमिका निभानी चाहिये जो परस्पर विश्वास व सम्मान के मूल सिद्धांत पर आधारित हो और साझा उत्तरदायित्व व अधिकार रखता हो। अतः वर्तमान समय में इस संदर्भ में भी एक नियामक संस्था होनी चाहिए।
| 45,529
|
गैर सरकारी संगठन से क्या अभिप्राय है ? जनकल्याण के संदर्भ में इनकी भूमिका को बताते हुए इनसे जुड़ी चिंताओ की भी चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द/10 अंक) What does the non-governmental organization mean? Explaining their role in the context of public welfare, discuss the issues related to them. (150-200 words/10 Marks )
|
· भूमिका में गैर सरकारी संगठन को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में जनकल्याण के संदर्भ में इनके महत्व की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इनसे जुड़ी चिंताओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- गैर सरकारी संगठन(NGO) से तात्पर्य एक निजी संगठन से है जो लोगों का दुख-दर्द दूर करने, निर्धनों के हितों का संवर्द्धन करने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएँ प्रदान करने अथवा सामुदायिक विकास के लिये गतिविधियाँ चलाता है। ये लाभ का वितरण अपने मालिकों और निदेशकों के बीच नहीं करते बल्कि प्राप्त लाभ को संगठन में ही लगाना होता है। वे किसी सार्वजनिक उद्देश्य को लक्षित होते हैं।1860के सोसाइटी एक्ट के द्वारा कोई भी स्वैच्छिक समूह लोक हित में कार्य करना चाहता है तो उसे आवश्यक सहयोग सरकार और सिविल समाज द्वारा प्रदान किया जाता है । गैर सरकारी संगठन का महत्व :- स्वतन्त्रता आंदोलन के समय जिस प्रकार से इन गैर सरकारी संगठनो ने समाज कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके कारण ही स्वतन्त्रता पश्चात न सिर्फ सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट को लागू रखा गया। ये इस संदर्भ में अति उपयोगी हो रहे हैं कि जहां पर मानव संसाधनो की कमी हो वहाँ पर शासन के सहयोगी बन सके। शासन और नागरिकों के बीच राजनीतिक सम्प्रेषण द्वारा ये गैर सरकारी संगठन लोकतंत्र को और प्रभावी बना रहे हैं। शोध आदि के माध्यम से ये सुशासन में एक निर्णयक भूमिका निभा रहे हैं। जिसमे नीतियो के लिए प्रारूप तैयार करना, उसके लिए आवश्यक सुधारो को रेखांकित करना तथा उचित अनुपालन हेतु डाटा प्रबंधन आदि प्रमुख हैं। गैर सरकारी संगठनों की उपस्थिति नागरिकों की आवाज को अभिव्यक्ति देकर सहभागी लोकतंत्र को सक्षम बनाती है। जागरूकता फैलाने, सामाजिक एकजुटता, सेवा वितरण, प्रशिक्षण, अध्ययन व अनुसंधान एवं सार्वजनिक अपेक्षा को स्वर देने में ये सहयोग करते हैं। सरकार के प्रदर्शन पर संवाद व निगरानी द्वारा वे राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित कराते हैं। भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार या मनरेगा और सबसे महत्त्वपूर्ण सूचना का अधिकार जैसे कई प्रमुख विधेयक गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप से ही पारित हुए। उपरोक्त सकारात्मक कार्यो के साथ ही गैर सरकारी संगठनो के जुड़ी कुछ चिंताएँ भी है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ये धनशोधन जैसी आपराधिक गतिविधियो में भी सम्मिलित हैं । इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार ये ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं जो राष्ट्रीय हितों के लिये नुकसानदेह हैं, सार्वजनिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं या देश की सुरक्षा, वैज्ञानिक, सामरिक या आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इनके कारण जीडीपी विकास पर प्रतिवर्ष 2-3 प्रतिशत का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । बहुत सारे NGO द्वारा सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाता है तथा अपने धन का सही व्यौरा आयकर विभाग को समय से उपलब्ध भी नही करवाया जाता है । गैर सरकारी संगठन समुदायों को सबल बनाते हैं, इसलिये उनके दमन की नहीं बल्कि उन्हें समर्थन देने की आवश्यकता है।सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को भागीदार के रूप में कार्य करना चाहिये और साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये पूरक की भूमिका निभानी चाहिये जो परस्पर विश्वास व सम्मान के मूल सिद्धांत पर आधारित हो और साझा उत्तरदायित्व व अधिकार रखता हो। अतः वर्तमान समय में इस संदर्भ में भी एक नियामक संस्था होनी चाहिए।
|
##Question:गैर सरकारी संगठन से क्या अभिप्राय है ? जनकल्याण के संदर्भ में इनकी भूमिका को बताते हुए इनसे जुड़ी चिंताओ की भी चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द/10 अंक) What does the non-governmental organization mean? Explaining their role in the context of public welfare, discuss the issues related to them. (150-200 words/10 Marks )##Answer:· भूमिका में गैर सरकारी संगठन को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में जनकल्याण के संदर्भ में इनके महत्व की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग मे इनसे जुड़ी चिंताओ की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- गैर सरकारी संगठन(NGO) से तात्पर्य एक निजी संगठन से है जो लोगों का दुख-दर्द दूर करने, निर्धनों के हितों का संवर्द्धन करने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएँ प्रदान करने अथवा सामुदायिक विकास के लिये गतिविधियाँ चलाता है। ये लाभ का वितरण अपने मालिकों और निदेशकों के बीच नहीं करते बल्कि प्राप्त लाभ को संगठन में ही लगाना होता है। वे किसी सार्वजनिक उद्देश्य को लक्षित होते हैं।1860के सोसाइटी एक्ट के द्वारा कोई भी स्वैच्छिक समूह लोक हित में कार्य करना चाहता है तो उसे आवश्यक सहयोग सरकार और सिविल समाज द्वारा प्रदान किया जाता है । गैर सरकारी संगठन का महत्व :- स्वतन्त्रता आंदोलन के समय जिस प्रकार से इन गैर सरकारी संगठनो ने समाज कल्याण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके कारण ही स्वतन्त्रता पश्चात न सिर्फ सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट को लागू रखा गया। ये इस संदर्भ में अति उपयोगी हो रहे हैं कि जहां पर मानव संसाधनो की कमी हो वहाँ पर शासन के सहयोगी बन सके। शासन और नागरिकों के बीच राजनीतिक सम्प्रेषण द्वारा ये गैर सरकारी संगठन लोकतंत्र को और प्रभावी बना रहे हैं। शोध आदि के माध्यम से ये सुशासन में एक निर्णयक भूमिका निभा रहे हैं। जिसमे नीतियो के लिए प्रारूप तैयार करना, उसके लिए आवश्यक सुधारो को रेखांकित करना तथा उचित अनुपालन हेतु डाटा प्रबंधन आदि प्रमुख हैं। गैर सरकारी संगठनों की उपस्थिति नागरिकों की आवाज को अभिव्यक्ति देकर सहभागी लोकतंत्र को सक्षम बनाती है। जागरूकता फैलाने, सामाजिक एकजुटता, सेवा वितरण, प्रशिक्षण, अध्ययन व अनुसंधान एवं सार्वजनिक अपेक्षा को स्वर देने में ये सहयोग करते हैं। सरकार के प्रदर्शन पर संवाद व निगरानी द्वारा वे राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित कराते हैं। भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार या मनरेगा और सबसे महत्त्वपूर्ण सूचना का अधिकार जैसे कई प्रमुख विधेयक गैर सरकारी संगठनों के हस्तक्षेप से ही पारित हुए। उपरोक्त सकारात्मक कार्यो के साथ ही गैर सरकारी संगठनो के जुड़ी कुछ चिंताएँ भी है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- ये धनशोधन जैसी आपराधिक गतिविधियो में भी सम्मिलित हैं । इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार ये ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं जो राष्ट्रीय हितों के लिये नुकसानदेह हैं, सार्वजनिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं या देश की सुरक्षा, वैज्ञानिक, सामरिक या आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इनके कारण जीडीपी विकास पर प्रतिवर्ष 2-3 प्रतिशत का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । बहुत सारे NGO द्वारा सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाता है तथा अपने धन का सही व्यौरा आयकर विभाग को समय से उपलब्ध भी नही करवाया जाता है । गैर सरकारी संगठन समुदायों को सबल बनाते हैं, इसलिये उनके दमन की नहीं बल्कि उन्हें समर्थन देने की आवश्यकता है।सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को भागीदार के रूप में कार्य करना चाहिये और साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये पूरक की भूमिका निभानी चाहिये जो परस्पर विश्वास व सम्मान के मूल सिद्धांत पर आधारित हो और साझा उत्तरदायित्व व अधिकार रखता हो। अतः वर्तमान समय में इस संदर्भ में भी एक नियामक संस्था होनी चाहिए।
| 45,543
|
What is the collegium system? Mention its shortcomings and suggest measures to make the appointment transparent in the higher judiciary. (200 words/10 Marks)
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: कोलेजियम प्रणाली के बारे में बताते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके पश्चात इस व्यवस्था में निहित कमियों का उल्लेख कीजिए। इन कमियों को दूर करने के सुझाव दीजिए। उच्चतर न्यायालय अर्थात सूप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए जो प्रणाली आफ्नै जाती है उसे कॉलेजियम कहते हैं। इसका विकास न्यायपालिका द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णयों के क्रमिक विकास के रूप में हुआ है। गौरतलब है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद किया जाता है। प्रारम्भ में इस परामर्श शब्द को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इसी की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने प्रथम न्यायाधीश मामले 1982 में कहा गया कि परामर्श का मतलब सहमति नहीं नहीं है। लेकिन द्वितीय न्यायाधीश मामले में पाने पूर्वा के निर्णय में SC ने बदलाव किया। यह व्यवस्था दी गयी कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगा परंतु मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया यह सलाह अपने 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश से विचार-विमर्श के पश्चात ही देगा। इसी तरह तीसरे न्यायाधीश मामले में एक और बदलाव किया गया अब ,मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया परामर्श चार वरिष्ठतम न्यायाधीश से विचार विमर्श के पश्चात दिया जाएगा। गौरतलब है कि न्यायिक नियुक्ति की इस व्यवस्था में पारदर्शिता का अभाव है। इसी आधार पर इस व्यवस्था की आलोचना की जाती है। कॉलेजियम प्रणाली की कमियों का विवरण इस प्रकार है: यह व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। लिए गए निर्णयों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। विभिन्न नियुक्तियों पर भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार का भी आरोप लगता आया है। चूंकि में इसमें कार्यपालिका का कोई भी सदस्य शामिल नहीं है जो एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के मूल के विरुद्ध है। न्यायपालिका जनता के हित में निर्णय करती है अतः जनता द्वारा चुना हुआ कोई प्रतिनिधि भी शामिल होना चाहिए। इसके द्वारा लिए गए निर्णयों को सूचना के अधिकार के तहत मांगा नहीं जा सकता है। न्यायपालिका में नियुक्ति को और पारदर्शी बनाने के लिए सुझाव: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) जैसी व्यवस्था लाने की आवश्यकता है। हालांकि इसे असंवैधानिक करार दिया गया है फिर इसमें आवश्यक संशोधन करते हुए अपनाया जा सकता है। कॉलेजियम की जो वर्तमान व्यवस्था है उसके निर्णयों को ही पारदर्शी बनाया जा सकता है। मिनट्स ऑफ मीटिंग को सार्वजनिक किया जा सकता है। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीडिंग की जो वर्तमान व्यवस्था व्यवस्था अपनायी गयी है उसे और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। सूचना के अधिकार को इस मामले में भी लागू किया जाये। इसे पारदर्शिता के साथ-साथ जवाबदेही तय होगी। कॉलेजियम में ही सदस्यों की संख्या बढ़ाकर अन्य वर्गों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए।
|
##Question:What is the collegium system? Mention its shortcomings and suggest measures to make the appointment transparent in the higher judiciary. (200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: कोलेजियम प्रणाली के बारे में बताते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके पश्चात इस व्यवस्था में निहित कमियों का उल्लेख कीजिए। इन कमियों को दूर करने के सुझाव दीजिए। उच्चतर न्यायालय अर्थात सूप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए जो प्रणाली आफ्नै जाती है उसे कॉलेजियम कहते हैं। इसका विकास न्यायपालिका द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णयों के क्रमिक विकास के रूप में हुआ है। गौरतलब है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद किया जाता है। प्रारम्भ में इस परामर्श शब्द को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इसी की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने प्रथम न्यायाधीश मामले 1982 में कहा गया कि परामर्श का मतलब सहमति नहीं नहीं है। लेकिन द्वितीय न्यायाधीश मामले में पाने पूर्वा के निर्णय में SC ने बदलाव किया। यह व्यवस्था दी गयी कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगा परंतु मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया यह सलाह अपने 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश से विचार-विमर्श के पश्चात ही देगा। इसी तरह तीसरे न्यायाधीश मामले में एक और बदलाव किया गया अब ,मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया परामर्श चार वरिष्ठतम न्यायाधीश से विचार विमर्श के पश्चात दिया जाएगा। गौरतलब है कि न्यायिक नियुक्ति की इस व्यवस्था में पारदर्शिता का अभाव है। इसी आधार पर इस व्यवस्था की आलोचना की जाती है। कॉलेजियम प्रणाली की कमियों का विवरण इस प्रकार है: यह व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। लिए गए निर्णयों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है। विभिन्न नियुक्तियों पर भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार का भी आरोप लगता आया है। चूंकि में इसमें कार्यपालिका का कोई भी सदस्य शामिल नहीं है जो एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के मूल के विरुद्ध है। न्यायपालिका जनता के हित में निर्णय करती है अतः जनता द्वारा चुना हुआ कोई प्रतिनिधि भी शामिल होना चाहिए। इसके द्वारा लिए गए निर्णयों को सूचना के अधिकार के तहत मांगा नहीं जा सकता है। न्यायपालिका में नियुक्ति को और पारदर्शी बनाने के लिए सुझाव: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) जैसी व्यवस्था लाने की आवश्यकता है। हालांकि इसे असंवैधानिक करार दिया गया है फिर इसमें आवश्यक संशोधन करते हुए अपनाया जा सकता है। कॉलेजियम की जो वर्तमान व्यवस्था है उसके निर्णयों को ही पारदर्शी बनाया जा सकता है। मिनट्स ऑफ मीटिंग को सार्वजनिक किया जा सकता है। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीडिंग की जो वर्तमान व्यवस्था व्यवस्था अपनायी गयी है उसे और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। सूचना के अधिकार को इस मामले में भी लागू किया जाये। इसे पारदर्शिता के साथ-साथ जवाबदेही तय होगी। कॉलेजियम में ही सदस्यों की संख्या बढ़ाकर अन्य वर्गों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए।
| 45,549
|
What do you understand by Enlightenment? Enumerate important tendencies/traits of Enlightenment. [10 marks/150 words]
|
Approach: Explain the term enlightenment. Briefly elaborate on the important traits of enlightenment. Answer: Enlightenment was the age of science and philosophy which began in Europe as an aftermath of the renaissance during the late 17th, 18th and the 19th century. It led to the coming of many ideas related to different aspects of life challenging the existing positions and thoughts. Eg. Political philosophies such as western liberalism, secularism, rule of law etc. Traits of Enlightenment:- Deism : God was accepted as the creator of the Universe and the maker of laws governing it. God does not take part in the day to day activity. There was a shift from praying to human efforts. Naturalism : Not only it gave emphasis on an acknowledgement of natural instincts but also appreciates the friendly and benign character of nature i.e. nature is beautiful and bountiful- it has plenty of natural resources etc. World is functioning on the basis of some eternal laws. Humans can control the nature like in terms of extracting the resources that it provides. Empiricism : It refers to the scientific method of acquisition of knowledge which derives from observation, measurements and analysis. It is also known as positivism. It was believed to be the only acceptable method of any inference about the universe or its laws. Thus it is considered the key to the understanding of nature and utilizing its resources. However, it is subject to change based on any development in the understanding of the universe. Rationalism : Ability to reason was given the highest pedestal among human attribute. Objectivity was a key aspect of reason. It was believed that it is this ability which separates human from animals. This ability to reason leads to rational decision making. Individualism : Talked about the focus on the interest of an individual vis a vis those of the organizations. There was an emphasis on individual rights and freedoms – which led to the coming of many natural rights of a man like the right to life, liberty etc. It believed that an individual is capable of making the best decision in their interest. It can be linked to the emergence of Democracy. Optimism : It believed that human society will prosper based on the utilization of the human resource, natural resource and scientific inventions. This phase of enlightenment has helped evolved humanity into what we are today – be it the modern democracies or our space expeditions to understand the Universe. However, not all developments have been positive such as the world wars and atomic bombs but the belief on our ability to prosper is still strong.
|
##Question:What do you understand by Enlightenment? Enumerate important tendencies/traits of Enlightenment. [10 marks/150 words]##Answer:Approach: Explain the term enlightenment. Briefly elaborate on the important traits of enlightenment. Answer: Enlightenment was the age of science and philosophy which began in Europe as an aftermath of the renaissance during the late 17th, 18th and the 19th century. It led to the coming of many ideas related to different aspects of life challenging the existing positions and thoughts. Eg. Political philosophies such as western liberalism, secularism, rule of law etc. Traits of Enlightenment:- Deism : God was accepted as the creator of the Universe and the maker of laws governing it. God does not take part in the day to day activity. There was a shift from praying to human efforts. Naturalism : Not only it gave emphasis on an acknowledgement of natural instincts but also appreciates the friendly and benign character of nature i.e. nature is beautiful and bountiful- it has plenty of natural resources etc. World is functioning on the basis of some eternal laws. Humans can control the nature like in terms of extracting the resources that it provides. Empiricism : It refers to the scientific method of acquisition of knowledge which derives from observation, measurements and analysis. It is also known as positivism. It was believed to be the only acceptable method of any inference about the universe or its laws. Thus it is considered the key to the understanding of nature and utilizing its resources. However, it is subject to change based on any development in the understanding of the universe. Rationalism : Ability to reason was given the highest pedestal among human attribute. Objectivity was a key aspect of reason. It was believed that it is this ability which separates human from animals. This ability to reason leads to rational decision making. Individualism : Talked about the focus on the interest of an individual vis a vis those of the organizations. There was an emphasis on individual rights and freedoms – which led to the coming of many natural rights of a man like the right to life, liberty etc. It believed that an individual is capable of making the best decision in their interest. It can be linked to the emergence of Democracy. Optimism : It believed that human society will prosper based on the utilization of the human resource, natural resource and scientific inventions. This phase of enlightenment has helped evolved humanity into what we are today – be it the modern democracies or our space expeditions to understand the Universe. However, not all developments have been positive such as the world wars and atomic bombs but the belief on our ability to prosper is still strong.
| 45,553
|
Directive Principles of State Policy, though not legally enforceable in a court of law are perceived as the "conscience of the constitution" and are fundamental to the governance of the country. Comment. (10 marks/150 words)
|
Approach: Introduce in brief the rationale behind DPSP, and its criticism of being non-justiciable. List provisions that make them “fundamental” for good governance. Enumerate some legislations that operationalized them to highlight their relevance. Answer: The Directive principle of State Policy (Art 36-51 ) are novel features of Indian Constitution which advance socio-economic rights to citizens. They are labelled as the conscience of the constitution because they are recommendations from the constitutional makers to future lawmakers and administrators for good governance. DPSP were however made non-justiciable because of lack of financial resources and state capacity for their implementation just after independence. Article 37 states that they are ‘fundamental in the governance of the country and it shall be the duty of the state to apply them’. This is because of they- Promote the ideal of a welfare state- to achieve justice, liberty, equality and fraternity as outlined in the Preamble. Supplementary to fundamental rights- as they create a conducive environment for enjoying these rights. Serve as beacons for executive, legislature and judiciary to fulfil the constitutional vision of social-economic justice. Serve as a litmus test- for citizens to gauge the performance of any government. Their significance in governance is evident from the following laws that were enacted to operationalize some of these principles- Right to free legal aid (Article 39A)- Legal services Authorities Act, 1987. Organization of panchayats (Article 42)- 73rd amendment act. Right to work and public assistance (Article 41)- Minimum wages act, old age and disability pension, etc. The judiciary has also recognized the primacy of Article 39(b) and (c) over certain fundamental rights. Though non-justiciable, a government that rests on popular vote can hardly ignore the DPSP while shaping its policy and will have to answer before the electorate. Hence, awakened public opinion (and not judicial proceedings) is the key to fulfilling these principles.
|
##Question:Directive Principles of State Policy, though not legally enforceable in a court of law are perceived as the "conscience of the constitution" and are fundamental to the governance of the country. Comment. (10 marks/150 words)##Answer:Approach: Introduce in brief the rationale behind DPSP, and its criticism of being non-justiciable. List provisions that make them “fundamental” for good governance. Enumerate some legislations that operationalized them to highlight their relevance. Answer: The Directive principle of State Policy (Art 36-51 ) are novel features of Indian Constitution which advance socio-economic rights to citizens. They are labelled as the conscience of the constitution because they are recommendations from the constitutional makers to future lawmakers and administrators for good governance. DPSP were however made non-justiciable because of lack of financial resources and state capacity for their implementation just after independence. Article 37 states that they are ‘fundamental in the governance of the country and it shall be the duty of the state to apply them’. This is because of they- Promote the ideal of a welfare state- to achieve justice, liberty, equality and fraternity as outlined in the Preamble. Supplementary to fundamental rights- as they create a conducive environment for enjoying these rights. Serve as beacons for executive, legislature and judiciary to fulfil the constitutional vision of social-economic justice. Serve as a litmus test- for citizens to gauge the performance of any government. Their significance in governance is evident from the following laws that were enacted to operationalize some of these principles- Right to free legal aid (Article 39A)- Legal services Authorities Act, 1987. Organization of panchayats (Article 42)- 73rd amendment act. Right to work and public assistance (Article 41)- Minimum wages act, old age and disability pension, etc. The judiciary has also recognized the primacy of Article 39(b) and (c) over certain fundamental rights. Though non-justiciable, a government that rests on popular vote can hardly ignore the DPSP while shaping its policy and will have to answer before the electorate. Hence, awakened public opinion (and not judicial proceedings) is the key to fulfilling these principles.
| 45,566
|
भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| इस आंदोलन के संदर्भ में, गांधीजी ने विभिन्न वर्गों को क्या निर्देश दिए थें? (150-200 शब्द , अंक - 10 ) List the factors responsible for the Quit India Movement. In the context of this movement, what instructions did Gandhiji give to the various classes? (150-200 words, अंक - 10 )
|
एप्रोच- भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| अंतिम भाग में,भारत छोड़ो आंदोलन के समय गांधीजी द्वारा विभिन्न वर्गों को दिये गये निर्देशों का जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, इस आंदोलन की विशेषताओं तथा प्रसार को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होने के पश्चात भारत के विभिन्न प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया था| संकटग्रस्त ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के सक्रिय सहयोग को प्राप्त करने हेतु अगस्त प्रस्ताव तथा क्रिप्स मिशन का सहारा लिया| हालाँकि, क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को कांग्रेस के साथ-साथ मुस्लिम लीग ने भी अस्वीकार कर दिया| संवैधानिक गतिरोध को हल करने में क्रिप्स मिशन की असफलता ने संवैधानिक विकास के मुद्दे पर ब्रिटेन के अपरिवर्तित रुख को उजागर कर दिया तथा इससे कांग्रेस सदस्यों को गहरी निराशा हुई एवं संपूर्ण देश में ब्रिटिश सरकार विरोधी भावनाएं तीव्र हो गई| भारत-छोड़ो आंदोलन तथा शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारक- निराशा और असंतोष के वातावरण में गांधी जी ने कहा कि अंग्रेज भारत को उसके भाग्य पर या अराजकता की स्थिति में ही छोड़ दें| जापान के आक्रमण का खतरा तथा हिंदू-मुस्लिम मतभेद जैसी विकट समस्याओं का भी यही समाधान है कि अंग्रेज भारत को तुरंत छोड़ दें| 8 अगस्त 1942 को मुंबई(ग्वालियाटैंक) में मौलाना आजाद की अध्यक्षता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रसिद्ध भारत छोड़ो या अगस्त क्रांति का प्रस्ताव पारित किया | यह निश्चय किया गया कि व्यापक जन आंदोलन का नेतृत्व गांधीजी करेंगे तथा यदि गांधी जी और कांग्रेस का नेता बंदी बना लिए जाएंगे तो ऐसी स्थिति में प्रत्येक भारतीय अपना नेतृत्व करेगा| जीवनपर्यंत संघर्ष का आह्वान करते हुए गांधी जी ने " करो या मरो" का संकल्प देकर सबको प्रेरित किया| इसके साथ ही, निम्न कारकों की भी भूमिका- क्रिप्स मिशन की असफलता तथा अंग्रेजों को भारतीयों से विचार विमर्श के बिना उनके भविष्य निर्धारण का अधिकार मिल जाने का भय; सरकार के द्वारा कांग्रेस एवं राष्ट्रीय मांगों की उपेक्षा ; विश्व युद्ध के कारण मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि तथा चावल, नमक इत्यादि आवश्यक वस्तुओं के अभाव के कारण सरकार के विरुद्ध जनता में असंतोष; जापानी आक्रमण के भय से ब्रिटेन ने असम, बंगाल एवं उड़ीसा में दमनकारी एवं भेदभावपूर्ण नीति का सहारा लिया जैसे- सरकार द्वारा बंगाल और उड़ीसा की नावों को जापानियों द्वारा दुरुपयोग किए जाने के भय से जब्त कर लेना जिससे स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना; समाजवादियों के द्वारा प्रारंभ से ही आंदोलन चलाने के लिए कांग्रेस पर दबाव; दक्षिण पूर्व एशिया में ब्रिटेन की पराजय तथा शक्तिशाली ब्रिटेन के पतन के समाचार ने असंतोष को व्यक्त करने की इच्छाशक्ति भारतीयों में जगाई| ब्रिटिश शासन के स्थायित्व से लोगों की आस्था कम होने लगी तथा लोग डाकघरों एवं बैंकों से अपना रूपया वापस निकालने लगे| जापानियों की सफलता से क्रांतिकारियों में उत्साह; बर्मा तथा मलाया को खाली करने के ब्रिटिश सरकार के तौर तरीकों से भी काफी असंतोष जैसे- सरकार ने यूरोपीय बस्तियां खाली करा ली तथा स्थानीय निवासियों को उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया; निराशा के कारण जापानी आक्रमण का जनता द्वारा कोई प्रतिरोध न किए जाने की आशंका से राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को संघर्ष प्रारंभ करना अपरिहार्य लगने लगा| संघर्ष-तैयारी-संघर्ष के अंतिम चरण के रूप में इसे लेना; युद्ध की परिस्थितियां ब्रिटेन के प्रतिकूल; अगस्त क्रांति के माध्यम से आंदोलन की घोषणा होने के बाद वायसराय लिनलिथगो ने कठोर नीति अपनाई तथा 9 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही ऑपरेशन जीरो आवर के तहत कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया गया| कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर सरकार ने इसकी संपत्तियों को जब्त कर लिया तथा जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया| हालाँकि, इसके पहले ही गांधी जी ने समाज के विभिन्न वर्गों को आंदोलन के संदर्भ में निर्देश दिए थे जैसे- सरकारी सेवक त्यागपत्र नहीं देंगे लेकिन कांग्रेस से अपनी राजभक्ति घोषित कर दें; सैनिक सेना से त्यागपत्र नहीं दें किंतु अपने सहयोगियों एवं भारतीयों पर गोली नहीं चलाएं; छात्र - यदि आत्मविश्वास की भावना हो तो शिक्षण संस्थाओं में जाना बंद कर दें तथा पढ़ाई छोड़ दें; कृषक - यदि जमींदार सरकार विरोधी हो तो पारस्परिक सहमति के आधार पर तय किया गया लगान अदा करते रहे किंतु यदि जमींदार सरकार समर्थक हो तो लगान अदा करना बंद कर दें| राजा-महाराजा जनता को सहयोग करें तथा अपनी प्रजा की संप्रभुता को स्वीकार करें| देसी रियासतों के लोग शासकों का तभी सहयोग करें जब वे सरकार विरोधी हों तथा सभी स्वयं को एक अखिल भारतीय राष्ट्र का अंग घोषित करें|साथ ही देशी रियासतों की जनता से भी आंदोलन में भाग लेने की अपील; इस अवसर पर गांधी जी ने लोगों से कहा कि "या तो हम भारत को आजाद करायेंगे या इसी प्रयास में अपनी जान दे देंगे; अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे|" कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तार हो जाने के बावजूद भी समाजवादी, फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य, जेपी, लोहिया, अरूणा आसफ अली आदि नेताओं ने भूमिगत गतिविधियां जारी रखीं| साथ ही, देश के कई हिस्सों में समानांतर सरकारों का भी गठन हुआ| भारत छोड़ो आंदोलन में आम जनता ने आंदोलनकारियों का अभूतपूर्व सहयोग प्रदान किया तथा समाज का कोई भी वर्ग सहायता एवं समर्थन देने में पीछे नहीं था| उद्योगपतियों, छात्रों, सामान्य ग्रामीणों तथा पुलिस एवं सरकारी अधिकारियों ने भी आंदोलनकारियों कोपूर्ण समर्थन दिया| इस आंदोलन में जनसामान्य की भागीदारीअप्रत्याशित थी| लोगों ने अदम्य साहस एवं राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया हालांकि उन्हें प्रताड़ना तथा बर्बर एवं अमानवीय कार्रवाईयों का भी सहारा लेना पड़ा| क्षेत्रीय दृष्टिकोण से ब्रिटिश भारत के साथ-साथ रियासतों की भी व्यापक भागीदारी इसमें देखी गयी|
|
##Question:भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| इस आंदोलन के संदर्भ में, गांधीजी ने विभिन्न वर्गों को क्या निर्देश दिए थें? (150-200 शब्द , अंक - 10 ) List the factors responsible for the Quit India Movement. In the context of this movement, what instructions did Gandhiji give to the various classes? (150-200 words, अंक - 10 )##Answer:एप्रोच- भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| अंतिम भाग में,भारत छोड़ो आंदोलन के समय गांधीजी द्वारा विभिन्न वर्गों को दिये गये निर्देशों का जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, इस आंदोलन की विशेषताओं तथा प्रसार को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होने के पश्चात भारत के विभिन्न प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया था| संकटग्रस्त ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के सक्रिय सहयोग को प्राप्त करने हेतु अगस्त प्रस्ताव तथा क्रिप्स मिशन का सहारा लिया| हालाँकि, क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को कांग्रेस के साथ-साथ मुस्लिम लीग ने भी अस्वीकार कर दिया| संवैधानिक गतिरोध को हल करने में क्रिप्स मिशन की असफलता ने संवैधानिक विकास के मुद्दे पर ब्रिटेन के अपरिवर्तित रुख को उजागर कर दिया तथा इससे कांग्रेस सदस्यों को गहरी निराशा हुई एवं संपूर्ण देश में ब्रिटिश सरकार विरोधी भावनाएं तीव्र हो गई| भारत-छोड़ो आंदोलन तथा शुरू होने के पीछे उत्तरदायी कारक- निराशा और असंतोष के वातावरण में गांधी जी ने कहा कि अंग्रेज भारत को उसके भाग्य पर या अराजकता की स्थिति में ही छोड़ दें| जापान के आक्रमण का खतरा तथा हिंदू-मुस्लिम मतभेद जैसी विकट समस्याओं का भी यही समाधान है कि अंग्रेज भारत को तुरंत छोड़ दें| 8 अगस्त 1942 को मुंबई(ग्वालियाटैंक) में मौलाना आजाद की अध्यक्षता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रसिद्ध भारत छोड़ो या अगस्त क्रांति का प्रस्ताव पारित किया | यह निश्चय किया गया कि व्यापक जन आंदोलन का नेतृत्व गांधीजी करेंगे तथा यदि गांधी जी और कांग्रेस का नेता बंदी बना लिए जाएंगे तो ऐसी स्थिति में प्रत्येक भारतीय अपना नेतृत्व करेगा| जीवनपर्यंत संघर्ष का आह्वान करते हुए गांधी जी ने " करो या मरो" का संकल्प देकर सबको प्रेरित किया| इसके साथ ही, निम्न कारकों की भी भूमिका- क्रिप्स मिशन की असफलता तथा अंग्रेजों को भारतीयों से विचार विमर्श के बिना उनके भविष्य निर्धारण का अधिकार मिल जाने का भय; सरकार के द्वारा कांग्रेस एवं राष्ट्रीय मांगों की उपेक्षा ; विश्व युद्ध के कारण मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि तथा चावल, नमक इत्यादि आवश्यक वस्तुओं के अभाव के कारण सरकार के विरुद्ध जनता में असंतोष; जापानी आक्रमण के भय से ब्रिटेन ने असम, बंगाल एवं उड़ीसा में दमनकारी एवं भेदभावपूर्ण नीति का सहारा लिया जैसे- सरकार द्वारा बंगाल और उड़ीसा की नावों को जापानियों द्वारा दुरुपयोग किए जाने के भय से जब्त कर लेना जिससे स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना; समाजवादियों के द्वारा प्रारंभ से ही आंदोलन चलाने के लिए कांग्रेस पर दबाव; दक्षिण पूर्व एशिया में ब्रिटेन की पराजय तथा शक्तिशाली ब्रिटेन के पतन के समाचार ने असंतोष को व्यक्त करने की इच्छाशक्ति भारतीयों में जगाई| ब्रिटिश शासन के स्थायित्व से लोगों की आस्था कम होने लगी तथा लोग डाकघरों एवं बैंकों से अपना रूपया वापस निकालने लगे| जापानियों की सफलता से क्रांतिकारियों में उत्साह; बर्मा तथा मलाया को खाली करने के ब्रिटिश सरकार के तौर तरीकों से भी काफी असंतोष जैसे- सरकार ने यूरोपीय बस्तियां खाली करा ली तथा स्थानीय निवासियों को उनके भाग्य भरोसे छोड़ दिया; निराशा के कारण जापानी आक्रमण का जनता द्वारा कोई प्रतिरोध न किए जाने की आशंका से राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को संघर्ष प्रारंभ करना अपरिहार्य लगने लगा| संघर्ष-तैयारी-संघर्ष के अंतिम चरण के रूप में इसे लेना; युद्ध की परिस्थितियां ब्रिटेन के प्रतिकूल; अगस्त क्रांति के माध्यम से आंदोलन की घोषणा होने के बाद वायसराय लिनलिथगो ने कठोर नीति अपनाई तथा 9 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही ऑपरेशन जीरो आवर के तहत कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया गया| कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर सरकार ने इसकी संपत्तियों को जब्त कर लिया तथा जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया| हालाँकि, इसके पहले ही गांधी जी ने समाज के विभिन्न वर्गों को आंदोलन के संदर्भ में निर्देश दिए थे जैसे- सरकारी सेवक त्यागपत्र नहीं देंगे लेकिन कांग्रेस से अपनी राजभक्ति घोषित कर दें; सैनिक सेना से त्यागपत्र नहीं दें किंतु अपने सहयोगियों एवं भारतीयों पर गोली नहीं चलाएं; छात्र - यदि आत्मविश्वास की भावना हो तो शिक्षण संस्थाओं में जाना बंद कर दें तथा पढ़ाई छोड़ दें; कृषक - यदि जमींदार सरकार विरोधी हो तो पारस्परिक सहमति के आधार पर तय किया गया लगान अदा करते रहे किंतु यदि जमींदार सरकार समर्थक हो तो लगान अदा करना बंद कर दें| राजा-महाराजा जनता को सहयोग करें तथा अपनी प्रजा की संप्रभुता को स्वीकार करें| देसी रियासतों के लोग शासकों का तभी सहयोग करें जब वे सरकार विरोधी हों तथा सभी स्वयं को एक अखिल भारतीय राष्ट्र का अंग घोषित करें|साथ ही देशी रियासतों की जनता से भी आंदोलन में भाग लेने की अपील; इस अवसर पर गांधी जी ने लोगों से कहा कि "या तो हम भारत को आजाद करायेंगे या इसी प्रयास में अपनी जान दे देंगे; अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे|" कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तार हो जाने के बावजूद भी समाजवादी, फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य, जेपी, लोहिया, अरूणा आसफ अली आदि नेताओं ने भूमिगत गतिविधियां जारी रखीं| साथ ही, देश के कई हिस्सों में समानांतर सरकारों का भी गठन हुआ| भारत छोड़ो आंदोलन में आम जनता ने आंदोलनकारियों का अभूतपूर्व सहयोग प्रदान किया तथा समाज का कोई भी वर्ग सहायता एवं समर्थन देने में पीछे नहीं था| उद्योगपतियों, छात्रों, सामान्य ग्रामीणों तथा पुलिस एवं सरकारी अधिकारियों ने भी आंदोलनकारियों कोपूर्ण समर्थन दिया| इस आंदोलन में जनसामान्य की भागीदारीअप्रत्याशित थी| लोगों ने अदम्य साहस एवं राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया हालांकि उन्हें प्रताड़ना तथा बर्बर एवं अमानवीय कार्रवाईयों का भी सहारा लेना पड़ा| क्षेत्रीय दृष्टिकोण से ब्रिटिश भारत के साथ-साथ रियासतों की भी व्यापक भागीदारी इसमें देखी गयी|
| 45,567
|
किन आधारों पर क्लाइव को भारत में, ब्रिटिश साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है ? तर्क प्रस्तुत कीजिये | (200 शब्द) On which basis Clive considered as the real founder of the British Empire in India ? Introduce the logic"s.(200 word"s)
|
एप्रोच - भूमिका में क्लाइव का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात प्लासी के युद्ध में उसके योगदान को बताइए | अंत में क्लाइव की साम्राज्य विस्तार के सम्बन्ध में नीतियों की चर्चा करते हुए उसके अन्य योगदानों को भी बताइए | उत्तर - रॉबर्ट क्लाईव 1750 में कंपनी में एक क्लर्क था | कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अंग्रेजों की विजय में उसकी मुख्य भूमिका थी | इस जीत का यह परिणाम हुआ की डूप्ले को फ्रांस बुला लिया गया जो आने वाले समय में अंग्रेजों का मुख्य प्रतिद्वंदी हो सकता था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला ने 1756 में कलकत्ता पर अधिकार कर लिया था ,तब अंग्रेजों की मदद के लिए क्लाईव के नेतृत्व में सेना भेजी गयी और क्लाईव ने कलकत्ता को आजाद करा लिया |उसने फ्रांसीसियों की व्यापारिक कोठी चंद्रनगर पर भी कब्ज़ा कर लिया और सिराजुद्दौला के खिलाफ उसी के दरबार के कुछ लोगों को जैसे मीरजाफर , मानिकचंद , अमीचंद ,जगतसेठ,मीरखादिम और रायदुर्लभ को मिलाकर षड्यंत्र रचा, जिसका परिणाम यह हुआ की प्लासी के युद्ध में बहुत कम संसाधनों का प्रयोग कर के भी जीत अंग्रेजों की ही हुई | प्लासी की विजय के बाद अंग्रेज भारत में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पहचाने गए जिसका उन्हें आर्थिक लाभ भी हुआ जिसका प्रयोग उन्होंने तृतीय कर्नाटक युद्ध में किया | बक्सर के युद्ध में विजित होने के बाद अवध को आश्रित बनाने की नीति भी क्लाईव की देन थी ,इसके साथ ही बंगाल में द्वैध शासन लागू कर राजस्व व न्याय सम्बंधित अधिकारों को अपने पास रखने की नीति भी क्लाईव की ही देन थी | किसी भी शत्रु को लड़ने से पहले कमज़ोर कर देना, शत्रु पर एवं उनके आस पास के क्षेत्रों पर धीरे- धीरे अधिकार स्थापित करना ,उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाना एवं एकता की कमी का लाभ उठाना जैसी नीतियां क्लाईव की ही थीं , जिससे भारत में ब्रिटिश विस्तार का मौका मिला | क्लाईव के नेतृत्व में ही अंग्रेज कर्नाटक, बंगाल एवं अवध में व्यापारिक शक्ति के साथ साथ राजनीतिक शक्ति के रूप में भी उभरे और यहाँ के शासकों को नियंत्रित करना आरम्भ कर दिया जिससे ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी , इसीलिए क्लाईव को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है |
|
##Question:किन आधारों पर क्लाइव को भारत में, ब्रिटिश साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है ? तर्क प्रस्तुत कीजिये | (200 शब्द) On which basis Clive considered as the real founder of the British Empire in India ? Introduce the logic"s.(200 word"s)##Answer:एप्रोच - भूमिका में क्लाइव का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात प्लासी के युद्ध में उसके योगदान को बताइए | अंत में क्लाइव की साम्राज्य विस्तार के सम्बन्ध में नीतियों की चर्चा करते हुए उसके अन्य योगदानों को भी बताइए | उत्तर - रॉबर्ट क्लाईव 1750 में कंपनी में एक क्लर्क था | कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अंग्रेजों की विजय में उसकी मुख्य भूमिका थी | इस जीत का यह परिणाम हुआ की डूप्ले को फ्रांस बुला लिया गया जो आने वाले समय में अंग्रेजों का मुख्य प्रतिद्वंदी हो सकता था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला ने 1756 में कलकत्ता पर अधिकार कर लिया था ,तब अंग्रेजों की मदद के लिए क्लाईव के नेतृत्व में सेना भेजी गयी और क्लाईव ने कलकत्ता को आजाद करा लिया |उसने फ्रांसीसियों की व्यापारिक कोठी चंद्रनगर पर भी कब्ज़ा कर लिया और सिराजुद्दौला के खिलाफ उसी के दरबार के कुछ लोगों को जैसे मीरजाफर , मानिकचंद , अमीचंद ,जगतसेठ,मीरखादिम और रायदुर्लभ को मिलाकर षड्यंत्र रचा, जिसका परिणाम यह हुआ की प्लासी के युद्ध में बहुत कम संसाधनों का प्रयोग कर के भी जीत अंग्रेजों की ही हुई | प्लासी की विजय के बाद अंग्रेज भारत में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पहचाने गए जिसका उन्हें आर्थिक लाभ भी हुआ जिसका प्रयोग उन्होंने तृतीय कर्नाटक युद्ध में किया | बक्सर के युद्ध में विजित होने के बाद अवध को आश्रित बनाने की नीति भी क्लाईव की देन थी ,इसके साथ ही बंगाल में द्वैध शासन लागू कर राजस्व व न्याय सम्बंधित अधिकारों को अपने पास रखने की नीति भी क्लाईव की ही देन थी | किसी भी शत्रु को लड़ने से पहले कमज़ोर कर देना, शत्रु पर एवं उनके आस पास के क्षेत्रों पर धीरे- धीरे अधिकार स्थापित करना ,उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाना एवं एकता की कमी का लाभ उठाना जैसी नीतियां क्लाईव की ही थीं , जिससे भारत में ब्रिटिश विस्तार का मौका मिला | क्लाईव के नेतृत्व में ही अंग्रेज कर्नाटक, बंगाल एवं अवध में व्यापारिक शक्ति के साथ साथ राजनीतिक शक्ति के रूप में भी उभरे और यहाँ के शासकों को नियंत्रित करना आरम्भ कर दिया जिससे ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी , इसीलिए क्लाईव को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है |
| 45,584
|
सद्गुणों के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू के विचारों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the thoughts of Plato and Aristotle in terms of virtues. (150-200 words; 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में नैतिकता एवं सद्गुणों के मध्य स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में प्लेटो और अरस्तू के सद्गुण सम्बन्धी विचारों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा नैतिकता को सद्गुणों के व्यवहार का परिणाम माना गया है| सद्गुणों के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू दोनों विचारकों द्वारा चिंतन किया गया है किन्तु दोनों की मूल मान्यता एक ही होते हुए भी दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| प्लेटो की मान्यता · प्लेटो के अनुसार नैतिकता को व्यक्ति के सद्गुण के साथ सम्बन्धित किया जा सकता है · सद्गुण नीतिशास्त्र, चरित्र की अच्छी आदतों को विकसित करने पर बल देती है · अतः इसके द्वारा नैतिक शिक्षा(Moral education) के महत्त्व को उजागर किया गया है सद्गुण की अवधारणा · प्लेटो के अनुसार चार आधारभूत(CARDINAL) सद्गुण होते हैं यथा; बुद्धिमत्ता, साहस, संयम, न्याय · ये चारों सद्गुण एक दूसरे से प्राप्त नहीं हैं एवं अन्य नैतिक मूल्यों को इन चार सद्गुणों से प्राप्त किया जा सकता है या इन चार सद्गुणों के विभिन्न प्रारूप हैं · ये चार सद्गुण किसी भी सुख प्राप्त व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं जो कि अच्छे समाज का निर्माण करती है| प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य उन व्यक्तियों से मिल कर बनता है जिनके पास यह सद्गुण है आत्मा का सद्गुणों से सम्बन्ध · प्लेटो के द्वारा आत्मा पर विशेष रूप से बल दिया गया है, प्लेटो के अनुसार आत्मा के तीन भाग हैं यथा; तर्क,क्षुधा/भूख, भाव · तर्क, जब तर्क सही तरीके से कार्य करता है तो इससे बुद्धिमत्ता प्राप्त होती है · भूख/क्षुधा की इच्छा जब सही तरीके से होती है तो यह संयम(स्वनियंत्रण) को प्राप्त करता है · जब आत्मा या भाव(Spirit) जब सही भावना को व्यक्त करती है तो इससे साहस नामक सद्गुण प्राप्त होता है · आत्मा के तीनों भागों (तर्क, भूख, भाव/आत्मा) की अंतःक्रिया को सुचारू रूप से संपन्न किया जाता है तो यह अवस्था न्याय के सद्गुण को दर्शाती है · तर्क, भावना का नियंत्रण करता है और ये दोनों मिलकर भूख/क्षुधा को नियंत्रित करते हैं · प्लेटो के अनुसार समाज के तीन तत्व होते हैं यथा किसान, जो कि समाज का आधार होते हैं, तथा योद्धा एवं दार्शनिक राजा · किसान, आत्मा के क्षुधा तत्व की परिपूर्ति करता है जबकि योद्धा साहस को और दार्शनिक राजा तर्क/बुद्धिमत्ता की परिपूर्ति करता है · प्लेटो के द्वारा समाज के जिन तत्वों का उल्लेख किया गया है वह भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था से मेल खाती है परन्तु प्लेटो का सामाजिक वर्गीकरण योग्यता पर आधारित है जबकि वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म को माना गया है अरस्तू का सद्गुण सिद्धांत स्वर्ण औसत की अवधारणा · सद्गुण की सैद्धांतिक विचारधारा को अरस्तु के द्वारा स्वर्ण औसत के रूप में उल्लेखित किया गया है · अरस्तु के अनुसार, नैतिक सद्गुण उस प्रकार की अच्छी आदतें हैं जो कि भावनाओं को नियमित या नियंत्रित करती हैं · अरस्तु के अनुसार भावनाओं को नियंत्रित या नियमित करने हेतु दो अतिवादी चरित्र गुण(दुर्गुण) के मध्य एक औसत को प्राप्त किया जाना चाहिए और यह औसत व्यक्ति के लिए सद्गुण होगा|इसे ही स्वर्ण औसत का सिद्धांत कहा जाता है · उदाहरण के लिए डर या भय की प्राकृतिक भावना के सन्दर्भ में दो अतिवादी चारित्रिक लक्षण हो सकते हैं जैसे डर का सामना करने हेतु अत्यधिक साहस(दुस्साहस) का होना दुर्गुण/बुराई होगा परन्तु न्यूनतम साहस(कायरता) का होना भी दुर्गुण होगा| अतः दोनों के मध्य सद्गुण चरित्र के रूप में साहस होगा · डर की अनुभूति को अत्यधिक रोकना या नियंत्रित करना दुस्साहस होगा जो कि एक दुर्गुण है जबकि डर या भय का सामना करने हेतु अगर इस पर न्यूनतमनियंत्रण हो तो यह कायरता को अभिव्यक्त करता है · अरस्तु के अनुसार दो अतिवादी चारित्रिक लक्षणों के माध्य/औसत को सही तरीके से प्राप्त किया जाना एक आसान कार्य नहीं होगा, इसके लिए यह आवश्यक है कि तर्क की सहायता प्राप्त की जाए · सद्गुण औसत, कोई गणितीय औसत को नहीं दर्शाता है, इस औसत का निर्धारण विवेकशीलता या तार्किकता के आधार पर किया जाना संभव हो पाता है जो कि परिस्थिति के सापेक्षिक गुणों पर आधारित होता है · व्यक्तियों के द्वारा सद्गुणी जीवन को व्यतीत किया जाना इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि वह इस स्वर्ण औसत को प्राप्त नहीं कर पाता है अरस्तु के अनुसार गुस्सा तो कोई भी कर सकता है, यह तो आसान है परन्तु यह गुस्सा सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय पर, सही प्रयोजन के लिए एवं सही तरीके से किया जाना आसान नहीं है (भावनात्मक बुद्धिमत्ता) अरस्तु के अनुसार "मैं उसे साहसी मानता हूँ जो कि इच्छाओं पर नियंत्रण कर पाता है न कि अपने दुश्मनों पर काबू कर पाता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित निर्णय अरस्तु के दृष्टिकोण में एक सद्गुण है|"
|
##Question:सद्गुणों के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू के विचारों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the thoughts of Plato and Aristotle in terms of virtues. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नैतिकता एवं सद्गुणों के मध्य स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में प्लेटो और अरस्तू के सद्गुण सम्बन्धी विचारों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा नैतिकता को सद्गुणों के व्यवहार का परिणाम माना गया है| सद्गुणों के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू दोनों विचारकों द्वारा चिंतन किया गया है किन्तु दोनों की मूल मान्यता एक ही होते हुए भी दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| प्लेटो की मान्यता · प्लेटो के अनुसार नैतिकता को व्यक्ति के सद्गुण के साथ सम्बन्धित किया जा सकता है · सद्गुण नीतिशास्त्र, चरित्र की अच्छी आदतों को विकसित करने पर बल देती है · अतः इसके द्वारा नैतिक शिक्षा(Moral education) के महत्त्व को उजागर किया गया है सद्गुण की अवधारणा · प्लेटो के अनुसार चार आधारभूत(CARDINAL) सद्गुण होते हैं यथा; बुद्धिमत्ता, साहस, संयम, न्याय · ये चारों सद्गुण एक दूसरे से प्राप्त नहीं हैं एवं अन्य नैतिक मूल्यों को इन चार सद्गुणों से प्राप्त किया जा सकता है या इन चार सद्गुणों के विभिन्न प्रारूप हैं · ये चार सद्गुण किसी भी सुख प्राप्त व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं जो कि अच्छे समाज का निर्माण करती है| प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य उन व्यक्तियों से मिल कर बनता है जिनके पास यह सद्गुण है आत्मा का सद्गुणों से सम्बन्ध · प्लेटो के द्वारा आत्मा पर विशेष रूप से बल दिया गया है, प्लेटो के अनुसार आत्मा के तीन भाग हैं यथा; तर्क,क्षुधा/भूख, भाव · तर्क, जब तर्क सही तरीके से कार्य करता है तो इससे बुद्धिमत्ता प्राप्त होती है · भूख/क्षुधा की इच्छा जब सही तरीके से होती है तो यह संयम(स्वनियंत्रण) को प्राप्त करता है · जब आत्मा या भाव(Spirit) जब सही भावना को व्यक्त करती है तो इससे साहस नामक सद्गुण प्राप्त होता है · आत्मा के तीनों भागों (तर्क, भूख, भाव/आत्मा) की अंतःक्रिया को सुचारू रूप से संपन्न किया जाता है तो यह अवस्था न्याय के सद्गुण को दर्शाती है · तर्क, भावना का नियंत्रण करता है और ये दोनों मिलकर भूख/क्षुधा को नियंत्रित करते हैं · प्लेटो के अनुसार समाज के तीन तत्व होते हैं यथा किसान, जो कि समाज का आधार होते हैं, तथा योद्धा एवं दार्शनिक राजा · किसान, आत्मा के क्षुधा तत्व की परिपूर्ति करता है जबकि योद्धा साहस को और दार्शनिक राजा तर्क/बुद्धिमत्ता की परिपूर्ति करता है · प्लेटो के द्वारा समाज के जिन तत्वों का उल्लेख किया गया है वह भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था से मेल खाती है परन्तु प्लेटो का सामाजिक वर्गीकरण योग्यता पर आधारित है जबकि वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म को माना गया है अरस्तू का सद्गुण सिद्धांत स्वर्ण औसत की अवधारणा · सद्गुण की सैद्धांतिक विचारधारा को अरस्तु के द्वारा स्वर्ण औसत के रूप में उल्लेखित किया गया है · अरस्तु के अनुसार, नैतिक सद्गुण उस प्रकार की अच्छी आदतें हैं जो कि भावनाओं को नियमित या नियंत्रित करती हैं · अरस्तु के अनुसार भावनाओं को नियंत्रित या नियमित करने हेतु दो अतिवादी चरित्र गुण(दुर्गुण) के मध्य एक औसत को प्राप्त किया जाना चाहिए और यह औसत व्यक्ति के लिए सद्गुण होगा|इसे ही स्वर्ण औसत का सिद्धांत कहा जाता है · उदाहरण के लिए डर या भय की प्राकृतिक भावना के सन्दर्भ में दो अतिवादी चारित्रिक लक्षण हो सकते हैं जैसे डर का सामना करने हेतु अत्यधिक साहस(दुस्साहस) का होना दुर्गुण/बुराई होगा परन्तु न्यूनतम साहस(कायरता) का होना भी दुर्गुण होगा| अतः दोनों के मध्य सद्गुण चरित्र के रूप में साहस होगा · डर की अनुभूति को अत्यधिक रोकना या नियंत्रित करना दुस्साहस होगा जो कि एक दुर्गुण है जबकि डर या भय का सामना करने हेतु अगर इस पर न्यूनतमनियंत्रण हो तो यह कायरता को अभिव्यक्त करता है · अरस्तु के अनुसार दो अतिवादी चारित्रिक लक्षणों के माध्य/औसत को सही तरीके से प्राप्त किया जाना एक आसान कार्य नहीं होगा, इसके लिए यह आवश्यक है कि तर्क की सहायता प्राप्त की जाए · सद्गुण औसत, कोई गणितीय औसत को नहीं दर्शाता है, इस औसत का निर्धारण विवेकशीलता या तार्किकता के आधार पर किया जाना संभव हो पाता है जो कि परिस्थिति के सापेक्षिक गुणों पर आधारित होता है · व्यक्तियों के द्वारा सद्गुणी जीवन को व्यतीत किया जाना इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि वह इस स्वर्ण औसत को प्राप्त नहीं कर पाता है अरस्तु के अनुसार गुस्सा तो कोई भी कर सकता है, यह तो आसान है परन्तु यह गुस्सा सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय पर, सही प्रयोजन के लिए एवं सही तरीके से किया जाना आसान नहीं है (भावनात्मक बुद्धिमत्ता) अरस्तु के अनुसार "मैं उसे साहसी मानता हूँ जो कि इच्छाओं पर नियंत्रण कर पाता है न कि अपने दुश्मनों पर काबू कर पाता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित निर्णय अरस्तु के दृष्टिकोण में एक सद्गुण है|"
| 45,587
|
नैतिक गुण के रूप में सद्गुण के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू के विचारों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the thoughts of Plato and Aristotle in terms of virtues as moral attributes. (150-200 Words; 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में नैतिकता एवं सद्गुणों के मध्य स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में प्लेटो और अरस्तू के सद्गुण सम्बन्धी विचारों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा नैतिकता को सद्गुणों के व्यवहार का परिणाम माना गया है| सद्गुणों के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू दोनों विचारकों द्वारा चिंतन किया गया है किन्तु दोनों की मूल मान्यता एक ही होते हुए भी दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| प्लेटो की मान्यता · प्लेटो के अनुसार नैतिकता को व्यक्ति के सद्गुण के साथ सम्बन्धित किया जा सकता है · सद्गुण नीतिशास्त्र, चरित्र की अच्छी आदतों को विकसित करने पर बल देती है · अतः इसके द्वारा नैतिक शिक्षा(Moral education) के महत्त्व को उजागर किया गया है सद्गुण की अवधारणा · प्लेटो के अनुसार चार आधारभूत(CARDINAL) सद्गुण होते हैं यथा; बुद्धिमत्ता, साहस, संयम, न्याय · ये चारों सद्गुण एक दूसरे से प्राप्त नहीं हैं एवं अन्य नैतिक मूल्यों को इन चार सद्गुणों से प्राप्त किया जा सकता है या इन चार सद्गुणों के विभिन्न प्रारूप हैं · ये चार सद्गुण किसी भी सुख प्राप्त व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं जो कि अच्छे समाज का निर्माण करती है| प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य उन व्यक्तियों से मिल कर बनता है जिनके पास यह सद्गुण है आत्मा का सद्गुणों से सम्बन्ध · प्लेटो के द्वारा आत्मा पर विशेष रूप से बल दिया गया है, प्लेटो के अनुसार आत्मा के तीन भाग हैं यथा; तर्क,क्षुधा/भूख, भाव · तर्क, जब तर्क सही तरीके से कार्य करता है तो इससे बुद्धिमत्ता प्राप्त होती है · भूख/क्षुधा की इच्छा जब सही तरीके से होती है तो यह संयम(स्वनियंत्रण) को प्राप्त करता है · जब आत्मा या भाव(Spirit) जब सही भावना को व्यक्त करती है तो इससे साहस नामक सद्गुण प्राप्त होता है · आत्मा के तीनों भागों (तर्क, भूख, भाव/आत्मा) की अंतःक्रिया को सुचारू रूप से संपन्न किया जाता है तो यह अवस्था न्याय के सद्गुण को दर्शाती है · तर्क, भावना का नियंत्रण करता है और ये दोनों मिलकर भूख/क्षुधा को नियंत्रित करते हैं · प्लेटो के अनुसार समाज के तीन तत्व होते हैं यथा किसान, जो कि समाज का आधार होते हैं, तथा योद्धा एवं दार्शनिक राजा · किसान, आत्मा के क्षुधा तत्व की परिपूर्ति करता है जबकि योद्धा साहस को और दार्शनिक राजा तर्क/बुद्धिमत्ता की परिपूर्ति करता है · प्लेटो के द्वारा समाज के जिन तत्वों का उल्लेख किया गया है वह भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था से मेल खाती है परन्तु प्लेटो का सामाजिक वर्गीकरण योग्यता पर आधारित है जबकि वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म को माना गया है अरस्तू का सद्गुण सिद्धांत स्वर्ण औसत की अवधारणा · सद्गुण की सैद्धांतिक विचारधारा को अरस्तु के द्वारा स्वर्ण औसत के रूप में उल्लेखित किया गया है · अरस्तु के अनुसार, नैतिक सद्गुण उस प्रकार की अच्छी आदतें हैं जो कि भावनाओं को नियमित या नियंत्रित करती हैं · अरस्तु के अनुसार भावनाओं को नियंत्रित या नियमित करने हेतु दो अतिवादी चरित्र गुण(दुर्गुण) के मध्य एक औसत को प्राप्त किया जाना चाहिए और यह औसत व्यक्ति के लिए सद्गुण होगा|इसे ही स्वर्ण औसत का सिद्धांत कहा जाता है · उदाहरण के लिए डर या भय की प्राकृतिक भावना के सन्दर्भ में दो अतिवादी चारित्रिक लक्षण हो सकते हैं जैसे डर का सामना करने हेतु अत्यधिक साहस(दुस्साहस) का होना दुर्गुण/बुराई होगा परन्तु न्यूनतम साहस(कायरता) का होना भी दुर्गुण होगा| अतः दोनों के मध्य सद्गुण चरित्र के रूप में साहस होगा · डर की अनुभूति को अत्यधिक रोकना या नियंत्रित करना दुस्साहस होगा जो कि एक दुर्गुण है जबकि डर या भय का सामना करने हेतु अगर इस पर न्यूनतमनियंत्रण हो तो यह कायरता को अभिव्यक्त करता है · अरस्तु के अनुसार दो अतिवादी चारित्रिक लक्षणों के माध्य/औसत को सही तरीके से प्राप्त किया जाना एक आसान कार्य नहीं होगा, इसके लिए यह आवश्यक है कि तर्क की सहायता प्राप्त की जाए · सद्गुण औसत, कोई गणितीय औसत को नहीं दर्शाता है, इस औसत का निर्धारण विवेकशीलता या तार्किकता के आधार पर किया जाना संभव हो पाता है जो कि परिस्थिति के सापेक्षिक गुणों पर आधारित होता है · व्यक्तियों के द्वारा सद्गुणी जीवन को व्यतीत किया जाना इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि वह इस स्वर्ण औसत को प्राप्त नहीं कर पाता है अरस्तु के अनुसार गुस्सा तो कोई भी कर सकता है, यह तो आसान है परन्तु यह गुस्सा सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय पर, सही प्रयोजन के लिए एवं सही तरीके से किया जाना आसान नहीं है (भावनात्मक बुद्धिमत्ता) अरस्तु के अनुसार "मैं उसे साहसी मानता हूँ जो कि इच्छाओं पर नियंत्रण कर पाता है न कि अपने दुश्मनों पर काबू कर पाता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित निर्णय अरस्तु के दृष्टिकोण में एक सद्गुण है|"
|
##Question:नैतिक गुण के रूप में सद्गुण के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू के विचारों का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe the thoughts of Plato and Aristotle in terms of virtues as moral attributes. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नैतिकता एवं सद्गुणों के मध्य स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में प्लेटो और अरस्तू के सद्गुण सम्बन्धी विचारों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा नैतिकता को सद्गुणों के व्यवहार का परिणाम माना गया है| सद्गुणों के सन्दर्भ में प्लेटो और अरस्तू दोनों विचारकों द्वारा चिंतन किया गया है किन्तु दोनों की मूल मान्यता एक ही होते हुए भी दोनों के विचारों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| प्लेटो की मान्यता · प्लेटो के अनुसार नैतिकता को व्यक्ति के सद्गुण के साथ सम्बन्धित किया जा सकता है · सद्गुण नीतिशास्त्र, चरित्र की अच्छी आदतों को विकसित करने पर बल देती है · अतः इसके द्वारा नैतिक शिक्षा(Moral education) के महत्त्व को उजागर किया गया है सद्गुण की अवधारणा · प्लेटो के अनुसार चार आधारभूत(CARDINAL) सद्गुण होते हैं यथा; बुद्धिमत्ता, साहस, संयम, न्याय · ये चारों सद्गुण एक दूसरे से प्राप्त नहीं हैं एवं अन्य नैतिक मूल्यों को इन चार सद्गुणों से प्राप्त किया जा सकता है या इन चार सद्गुणों के विभिन्न प्रारूप हैं · ये चार सद्गुण किसी भी सुख प्राप्त व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं जो कि अच्छे समाज का निर्माण करती है| प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य उन व्यक्तियों से मिल कर बनता है जिनके पास यह सद्गुण है आत्मा का सद्गुणों से सम्बन्ध · प्लेटो के द्वारा आत्मा पर विशेष रूप से बल दिया गया है, प्लेटो के अनुसार आत्मा के तीन भाग हैं यथा; तर्क,क्षुधा/भूख, भाव · तर्क, जब तर्क सही तरीके से कार्य करता है तो इससे बुद्धिमत्ता प्राप्त होती है · भूख/क्षुधा की इच्छा जब सही तरीके से होती है तो यह संयम(स्वनियंत्रण) को प्राप्त करता है · जब आत्मा या भाव(Spirit) जब सही भावना को व्यक्त करती है तो इससे साहस नामक सद्गुण प्राप्त होता है · आत्मा के तीनों भागों (तर्क, भूख, भाव/आत्मा) की अंतःक्रिया को सुचारू रूप से संपन्न किया जाता है तो यह अवस्था न्याय के सद्गुण को दर्शाती है · तर्क, भावना का नियंत्रण करता है और ये दोनों मिलकर भूख/क्षुधा को नियंत्रित करते हैं · प्लेटो के अनुसार समाज के तीन तत्व होते हैं यथा किसान, जो कि समाज का आधार होते हैं, तथा योद्धा एवं दार्शनिक राजा · किसान, आत्मा के क्षुधा तत्व की परिपूर्ति करता है जबकि योद्धा साहस को और दार्शनिक राजा तर्क/बुद्धिमत्ता की परिपूर्ति करता है · प्लेटो के द्वारा समाज के जिन तत्वों का उल्लेख किया गया है वह भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था से मेल खाती है परन्तु प्लेटो का सामाजिक वर्गीकरण योग्यता पर आधारित है जबकि वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म को माना गया है अरस्तू का सद्गुण सिद्धांत स्वर्ण औसत की अवधारणा · सद्गुण की सैद्धांतिक विचारधारा को अरस्तु के द्वारा स्वर्ण औसत के रूप में उल्लेखित किया गया है · अरस्तु के अनुसार, नैतिक सद्गुण उस प्रकार की अच्छी आदतें हैं जो कि भावनाओं को नियमित या नियंत्रित करती हैं · अरस्तु के अनुसार भावनाओं को नियंत्रित या नियमित करने हेतु दो अतिवादी चरित्र गुण(दुर्गुण) के मध्य एक औसत को प्राप्त किया जाना चाहिए और यह औसत व्यक्ति के लिए सद्गुण होगा|इसे ही स्वर्ण औसत का सिद्धांत कहा जाता है · उदाहरण के लिए डर या भय की प्राकृतिक भावना के सन्दर्भ में दो अतिवादी चारित्रिक लक्षण हो सकते हैं जैसे डर का सामना करने हेतु अत्यधिक साहस(दुस्साहस) का होना दुर्गुण/बुराई होगा परन्तु न्यूनतम साहस(कायरता) का होना भी दुर्गुण होगा| अतः दोनों के मध्य सद्गुण चरित्र के रूप में साहस होगा · डर की अनुभूति को अत्यधिक रोकना या नियंत्रित करना दुस्साहस होगा जो कि एक दुर्गुण है जबकि डर या भय का सामना करने हेतु अगर इस पर न्यूनतमनियंत्रण हो तो यह कायरता को अभिव्यक्त करता है · अरस्तु के अनुसार दो अतिवादी चारित्रिक लक्षणों के माध्य/औसत को सही तरीके से प्राप्त किया जाना एक आसान कार्य नहीं होगा, इसके लिए यह आवश्यक है कि तर्क की सहायता प्राप्त की जाए · सद्गुण औसत, कोई गणितीय औसत को नहीं दर्शाता है, इस औसत का निर्धारण विवेकशीलता या तार्किकता के आधार पर किया जाना संभव हो पाता है जो कि परिस्थिति के सापेक्षिक गुणों पर आधारित होता है · व्यक्तियों के द्वारा सद्गुणी जीवन को व्यतीत किया जाना इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि वह इस स्वर्ण औसत को प्राप्त नहीं कर पाता है अरस्तु के अनुसार गुस्सा तो कोई भी कर सकता है, यह तो आसान है परन्तु यह गुस्सा सही व्यक्ति के साथ, सही मात्रा में, सही समय पर, सही प्रयोजन के लिए एवं सही तरीके से किया जाना आसान नहीं है (भावनात्मक बुद्धिमत्ता) अरस्तु के अनुसार "मैं उसे साहसी मानता हूँ जो कि इच्छाओं पर नियंत्रण कर पाता है न कि अपने दुश्मनों पर काबू कर पाता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित निर्णय अरस्तु के दृष्टिकोण में एक सद्गुण है|"
| 45,592
|
किन आधारों पर क्लाइव को भारत में, ब्रिटिश साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है ? तर्क प्रस्तुत कीजिये | (200 शब्द) On which basis Clive considered as the real founder of the British Empire in India ? Introduce the logic"s (200 words)
|
एप्रोच - भूमिका में क्लाइव का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात प्लासी के युद्ध में उसके योगदान को बताइए | अंत में क्लाइव की साम्राज्य विस्तार के सम्बन्ध में नीतियों की चर्चा करते हुए उसके अन्य योगदानों को भी बताइए | उत्तर - रॉबर्ट क्लाईव 1750 में कंपनी में एक क्लर्क था | कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अंग्रेजों की विजय में उसकी मुख्य भूमिका थी | इस जीत का यह परिणाम हुआ की डूप्ले को फ्रांस बुला लिया गया जो आने वाले समय में अंग्रेजों का मुख्य प्रतिद्वंदी हो सकता था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला ने 1756 में कलकत्ता पर अधिकार कर लिया था ,तब अंग्रेजों की मदद के लिए क्लाईव के नेतृत्व में सेना भेजी गयी और क्लाईव ने कलकत्ता को आजाद करा लिया |उसने फ्रांसीसियों की व्यापारिक कोठी चंद्रनगर पर भी कब्ज़ा कर लिया और सिराजुद्दौला के खिलाफ उसी के दरबार के कुछ लोगों को जैसे मीरजाफर , मानिकचंद , अमीचंद ,जगतसेठ,मीरखादिम और रायदुर्लभ को मिलाकर षड्यंत्र रचा, जिसका परिणाम यह हुआ की प्लासी के युद्ध में बहुत कम संसाधनों का प्रयोग कर के भी जीत अंग्रेजों की ही हुई | प्लासी की विजय के बाद अंग्रेज भारत में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पहचाने गए जिसका उन्हें आर्थिक लाभ भी हुआ जिसका प्रयोग उन्होंने तृतीय कर्नाटक युद्ध में किया | बक्सर के युद्ध में विजित होने के बाद अवध को आश्रित बनाने की नीति भी क्लाईव की देन थी ,इसके साथ ही बंगाल में द्वैध शासन लागू कर राजस्व व न्याय सम्बंधित अधिकारों को अपने पास रखने की नीति भी क्लाईव की ही देन थी | किसी भी शत्रु को लड़ने से पहले कमज़ोर कर देना, शत्रु पर एवं उनके आस पास के क्षेत्रों पर धीरे- धीरे अधिकार स्थापित करना ,उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाना एवं एकता की कमी का लाभ उठाना जैसी नीतियां क्लाईव की ही थीं , जिससे भारत में ब्रिटिश विस्तार का मौका मिला | क्लाईव के नेतृत्व में ही अंग्रेज कर्नाटक, बंगाल एवं अवध में व्यापारिक शक्ति के साथ साथ राजनीतिक शक्ति के रूप में भी उभरे और यहाँ के शासकों को नियंत्रित करना आरम्भ कर दिया जिससे ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी , इसीलिए क्लाईव को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है |
|
##Question:किन आधारों पर क्लाइव को भारत में, ब्रिटिश साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है ? तर्क प्रस्तुत कीजिये | (200 शब्द) On which basis Clive considered as the real founder of the British Empire in India ? Introduce the logic"s (200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में क्लाइव का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात प्लासी के युद्ध में उसके योगदान को बताइए | अंत में क्लाइव की साम्राज्य विस्तार के सम्बन्ध में नीतियों की चर्चा करते हुए उसके अन्य योगदानों को भी बताइए | उत्तर - रॉबर्ट क्लाईव 1750 में कंपनी में एक क्लर्क था | कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अंग्रेजों की विजय में उसकी मुख्य भूमिका थी | इस जीत का यह परिणाम हुआ की डूप्ले को फ्रांस बुला लिया गया जो आने वाले समय में अंग्रेजों का मुख्य प्रतिद्वंदी हो सकता था | बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला ने 1756 में कलकत्ता पर अधिकार कर लिया था ,तब अंग्रेजों की मदद के लिए क्लाईव के नेतृत्व में सेना भेजी गयी और क्लाईव ने कलकत्ता को आजाद करा लिया |उसने फ्रांसीसियों की व्यापारिक कोठी चंद्रनगर पर भी कब्ज़ा कर लिया और सिराजुद्दौला के खिलाफ उसी के दरबार के कुछ लोगों को जैसे मीरजाफर , मानिकचंद , अमीचंद ,जगतसेठ,मीरखादिम और रायदुर्लभ को मिलाकर षड्यंत्र रचा, जिसका परिणाम यह हुआ की प्लासी के युद्ध में बहुत कम संसाधनों का प्रयोग कर के भी जीत अंग्रेजों की ही हुई | प्लासी की विजय के बाद अंग्रेज भारत में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पहचाने गए जिसका उन्हें आर्थिक लाभ भी हुआ जिसका प्रयोग उन्होंने तृतीय कर्नाटक युद्ध में किया | बक्सर के युद्ध में विजित होने के बाद अवध को आश्रित बनाने की नीति भी क्लाईव की देन थी ,इसके साथ ही बंगाल में द्वैध शासन लागू कर राजस्व व न्याय सम्बंधित अधिकारों को अपने पास रखने की नीति भी क्लाईव की ही देन थी | किसी भी शत्रु को लड़ने से पहले कमज़ोर कर देना, शत्रु पर एवं उनके आस पास के क्षेत्रों पर धीरे- धीरे अधिकार स्थापित करना ,उत्तराधिकार युद्ध का लाभ उठाना एवं एकता की कमी का लाभ उठाना जैसी नीतियां क्लाईव की ही थीं , जिससे भारत में ब्रिटिश विस्तार का मौका मिला | क्लाईव के नेतृत्व में ही अंग्रेज कर्नाटक, बंगाल एवं अवध में व्यापारिक शक्ति के साथ साथ राजनीतिक शक्ति के रूप में भी उभरे और यहाँ के शासकों को नियंत्रित करना आरम्भ कर दिया जिससे ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी , इसीलिए क्लाईव को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है |
| 45,595
|
भारतीय विदेश नीति के विभिन्न उद्देश्यों एवं सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly describe the different objectives and principles of Indian Foreign Policy. (150-200 words; 10 Marks)
|
एप्रोच- विदेश नीति को संक्षिप्तता से परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, भारतीय विदेश नीति के विभिन्न उद्देश्यों का वर्णन कीजिए| अंतिम भाग में, भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः वर्तमान संदर्भ में उपरोक्त उद्देश्यों एवं सिद्धांतों की प्रासंगिकता को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उस राष्ट्र के अन्य देशों के साथ संबंध बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को संदर्भित करता है| अतः विदेश नीति वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में किसी राष्ट्र द्वारा लागू की गयी एवं अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसकी नीतिगत विशेषताओं को दर्शाती है| भारत भी अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों, आतंरिक तथा बाह्य-सुरक्षा, व्यापार बढ़ोतरी तथा आर्थिक समृद्धि एवं अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक प्रश्नों के संदर्भ में अपने हितों की रुपरेखा विदेश नीति के तहत ही तय करता है| यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके माध्यम से भारत या कोई अन्य राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने हेतु नीतियों का निर्माण करता है| इस प्रकार, भारत की विदेश नीति विश्व में अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित, अभिव्यक्त और प्राप्त करने का प्रयास करती है जहाँ ये हित कई प्रकार से घरेलू कारकों के साथ-साथ राष्ट्र की सीमाओं से बाहर स्थित तत्वों और कारकों पर निर्भर करते हैं| भारत की विदेश नीति के कुछ उद्देश्य हैं जो कि विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं| भारत की विदेश नीति के उद्देश्य क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता का ध्यान रखना जैसे- कश्मीर तथा अक्साई चिन जैसे हमारे क्षेत्रों पर विदेशी अनाधिकृत अधिकार का भारत द्वारा विरोध| इसी संदर्भ में हम उत्तर-पूर्व में अलगाववादी तत्वों के खिलाफ कठोर कदम उठाते हैं| कोई भी राष्ट्र संप्रभु रहकर ही राष्ट्रीय हितों का ध्यान रख सकता है अतः विदेश नीति की स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्षता की नीति भारतीय विदेश नीति का प्रमुख एवं आधारभूत स्तंभ है| अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना - दक्षिण एशिया तथा अफ-पाक क्षेत्र में शांति रहने से भारतीय विदेश नीति की दिशा एकदम अलग होसकती थी| इस संदर्भ में आतंकवाद को लेकर एक अंतर्राष्ट्रीय कानून के निर्माण हेतु भारत का प्रयास विदेश नीति का अन्य प्रमुख उद्देश्य है| भारत का आर्थिक विकास - 1991 से पहले आर्थिक सहायता के संदर्भ में विदेश नीति का निर्माण किया जाता था वहीँ 1991 के पश्चात भी आर्थिक कूटनीति का विदेश नीति निर्माण में अहम् योगदान रहा है जैसे- लुक-ईस्ट नीति, 2001-08 के बीच लगातार आर्थिक विकास दर का बढ़ना; विदेशी निवेश में बढ़ोतरी आदि| उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन - वियतनाम युद्ध का विरोध, नए राष्ट्रों की आज़ादी को समर्थन, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवाद एवं नव-उपनिवेशवाद के वर्तमान रूपों का विरोध; भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा - यमन में ऑपरेशन राहत जिसमें यमन, हाउती विद्रोही तथा सऊदी-अरब सभी को एक साथ साधना जैसे कदम| भारत की विदेश नीति के विभिन्न सिद्धांत कोई भी उद्देश्य कभी भी सिद्धांतविहीन नहीं हो सकता है| इस संदर्भ में, भारत की विदेश नीति तथा उसके उद्देश्यों को तय करते समय निम्न सिद्धांतों पर बल दिया गया था- पंचशील का सिद्धांत- यह सिद्धांत हमारी विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है जिसके अंतर्गत निम्न पांच सिद्धांत आते हैं- सभी देशों द्वारा अन्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना; दूसरे देश के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप ना करना; दूसरे देश पर आक्रमण ना करना; परस्पर सहयोग एवं लाभ को बढ़ावा देना; शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना; गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत - इसके तहत दुनिया के सैन्यीकरण को रोकना हमारी विदेश नीति का अभिन्न सिद्धांत है| भारतीय विदेश नीति दुनिया में गुटों के निर्माण को रोककरशांतिपूर्ण सहअस्तित्वपर आधारित बंधुतापूर्ण विश्व के निर्माण को प्रोत्साहित करती है| उपनिवेशवाद, नस्लवाद, आदि का विरोध करना; अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान - भारत का यह स्पष्ट मानना है कि विभिन्न क्षेत्रीय, द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय विवादों को सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों एवं संयुक्तराष्ट्र के प्रावधानों के अंतर्गत ही समाधान किया जाना चाहिए| इस संदर्भ में हम दक्षिण चीन सागर पर भारतीय रुख कोसमझ सकते हैं| भारतीय विदेश नीति संयुक्तराष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय कानून और एक न्यायसंगत और समान विश्व व्यवस्था का समर्थन करती है| नाभिकीय बमों का पहले प्रयोग ना करने की नीति - भारत एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में नाभिकीय हथियारों के किसी भी राष्ट्र परपहले ना प्रयोग करने की नीति पर चलता है| हालाँकि भारतीय नीति के अनुसार भारत पर नाभिकीय हमला होने की स्थिति में भारत तेजी से पलटवार करने की नीति पर चलेगा| भारतीय विदेश नीति के उपरोक्त उद्देश्यों एवं सिद्धांतों का विकास स्वतंत्रता पश्चात धीरे-धीरे क्रमिक रूप से हुआ है| वर्तमान समय में इन उद्देश्यों एवं सिद्धांतों को समसामयिक घटनाओं एवं मुद्दों के साथ जोड़कर ज्यादा संदर्भित बनाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे- दक्षिण चीन सागर में नौपरिवहन की स्वतंत्रता हेतु वियतनाम, फिलीपींस, इण्डोनेशिया आदि देशों के साथ सहयोग या आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक सहयोग को अपने पक्ष में करने का प्रयास आदि कदम|
|
##Question:भारतीय विदेश नीति के विभिन्न उद्देश्यों एवं सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly describe the different objectives and principles of Indian Foreign Policy. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- विदेश नीति को संक्षिप्तता से परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, भारतीय विदेश नीति के विभिन्न उद्देश्यों का वर्णन कीजिए| अंतिम भाग में, भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः वर्तमान संदर्भ में उपरोक्त उद्देश्यों एवं सिद्धांतों की प्रासंगिकता को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर- किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उस राष्ट्र के अन्य देशों के साथ संबंध बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल को संदर्भित करता है| अतः विदेश नीति वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में किसी राष्ट्र द्वारा लागू की गयी एवं अन्य राष्ट्रों/अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसकी नीतिगत विशेषताओं को दर्शाती है| भारत भी अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों, आतंरिक तथा बाह्य-सुरक्षा, व्यापार बढ़ोतरी तथा आर्थिक समृद्धि एवं अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक प्रश्नों के संदर्भ में अपने हितों की रुपरेखा विदेश नीति के तहत ही तय करता है| यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में उद्देश्यों एवं माध्यमों का चुनाव करने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके माध्यम से भारत या कोई अन्य राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने हेतु नीतियों का निर्माण करता है| इस प्रकार, भारत की विदेश नीति विश्व में अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित, अभिव्यक्त और प्राप्त करने का प्रयास करती है जहाँ ये हित कई प्रकार से घरेलू कारकों के साथ-साथ राष्ट्र की सीमाओं से बाहर स्थित तत्वों और कारकों पर निर्भर करते हैं| भारत की विदेश नीति के कुछ उद्देश्य हैं जो कि विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं| भारत की विदेश नीति के उद्देश्य क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता का ध्यान रखना जैसे- कश्मीर तथा अक्साई चिन जैसे हमारे क्षेत्रों पर विदेशी अनाधिकृत अधिकार का भारत द्वारा विरोध| इसी संदर्भ में हम उत्तर-पूर्व में अलगाववादी तत्वों के खिलाफ कठोर कदम उठाते हैं| कोई भी राष्ट्र संप्रभु रहकर ही राष्ट्रीय हितों का ध्यान रख सकता है अतः विदेश नीति की स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्षता की नीति भारतीय विदेश नीति का प्रमुख एवं आधारभूत स्तंभ है| अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना - दक्षिण एशिया तथा अफ-पाक क्षेत्र में शांति रहने से भारतीय विदेश नीति की दिशा एकदम अलग होसकती थी| इस संदर्भ में आतंकवाद को लेकर एक अंतर्राष्ट्रीय कानून के निर्माण हेतु भारत का प्रयास विदेश नीति का अन्य प्रमुख उद्देश्य है| भारत का आर्थिक विकास - 1991 से पहले आर्थिक सहायता के संदर्भ में विदेश नीति का निर्माण किया जाता था वहीँ 1991 के पश्चात भी आर्थिक कूटनीति का विदेश नीति निर्माण में अहम् योगदान रहा है जैसे- लुक-ईस्ट नीति, 2001-08 के बीच लगातार आर्थिक विकास दर का बढ़ना; विदेशी निवेश में बढ़ोतरी आदि| उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन - वियतनाम युद्ध का विरोध, नए राष्ट्रों की आज़ादी को समर्थन, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवाद एवं नव-उपनिवेशवाद के वर्तमान रूपों का विरोध; भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा - यमन में ऑपरेशन राहत जिसमें यमन, हाउती विद्रोही तथा सऊदी-अरब सभी को एक साथ साधना जैसे कदम| भारत की विदेश नीति के विभिन्न सिद्धांत कोई भी उद्देश्य कभी भी सिद्धांतविहीन नहीं हो सकता है| इस संदर्भ में, भारत की विदेश नीति तथा उसके उद्देश्यों को तय करते समय निम्न सिद्धांतों पर बल दिया गया था- पंचशील का सिद्धांत- यह सिद्धांत हमारी विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है जिसके अंतर्गत निम्न पांच सिद्धांत आते हैं- सभी देशों द्वारा अन्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना; दूसरे देश के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप ना करना; दूसरे देश पर आक्रमण ना करना; परस्पर सहयोग एवं लाभ को बढ़ावा देना; शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना; गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत - इसके तहत दुनिया के सैन्यीकरण को रोकना हमारी विदेश नीति का अभिन्न सिद्धांत है| भारतीय विदेश नीति दुनिया में गुटों के निर्माण को रोककरशांतिपूर्ण सहअस्तित्वपर आधारित बंधुतापूर्ण विश्व के निर्माण को प्रोत्साहित करती है| उपनिवेशवाद, नस्लवाद, आदि का विरोध करना; अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान - भारत का यह स्पष्ट मानना है कि विभिन्न क्षेत्रीय, द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय विवादों को सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों एवं संयुक्तराष्ट्र के प्रावधानों के अंतर्गत ही समाधान किया जाना चाहिए| इस संदर्भ में हम दक्षिण चीन सागर पर भारतीय रुख कोसमझ सकते हैं| भारतीय विदेश नीति संयुक्तराष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय कानून और एक न्यायसंगत और समान विश्व व्यवस्था का समर्थन करती है| नाभिकीय बमों का पहले प्रयोग ना करने की नीति - भारत एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति के रूप में नाभिकीय हथियारों के किसी भी राष्ट्र परपहले ना प्रयोग करने की नीति पर चलता है| हालाँकि भारतीय नीति के अनुसार भारत पर नाभिकीय हमला होने की स्थिति में भारत तेजी से पलटवार करने की नीति पर चलेगा| भारतीय विदेश नीति के उपरोक्त उद्देश्यों एवं सिद्धांतों का विकास स्वतंत्रता पश्चात धीरे-धीरे क्रमिक रूप से हुआ है| वर्तमान समय में इन उद्देश्यों एवं सिद्धांतों को समसामयिक घटनाओं एवं मुद्दों के साथ जोड़कर ज्यादा संदर्भित बनाने का प्रयास किया जा रहा है जैसे- दक्षिण चीन सागर में नौपरिवहन की स्वतंत्रता हेतु वियतनाम, फिलीपींस, इण्डोनेशिया आदि देशों के साथ सहयोग या आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक सहयोग को अपने पक्ष में करने का प्रयास आदि कदम|
| 45,604
|
इमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना। स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) The categorical imperative by Immanuel Kant was considered the universal ethical rule, as well as Kant, regarded as a means to individuals. Elucidate. (150-200 words/10 Marks)
|
एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका मेंइमैनुअल कांट के निरपेक्ष (categorical) आदेश का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिए कि कैसेइमैनुअल कांट द्वारानिरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही यह भी समझाइये कि कैसेकांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निरपेक्ष आदेश,एक स्पष्ट अनिवार्यता, बिना शर्त आवश्यकता को दर्शाता है, जिसकासभी परिस्थितियों में पालन होना चाहिए और अंत में जिसे न्ययोचित भी ठहराया जा सके।कांट के द्वारा निरपेक्ष(categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया, क्योंकि यह सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता हैं। निरपेक्ष आदेश का संदर्भ कोई बाहरी साध्य साबित नहीं होता परन्तु इस संकल्प की उचित दिशा होती है। शुभ संकल्पअपने आप में स्वयं के लिए शुभ है न कि किसी प्रभाव के कारण। कांट के अनुसार उचित कार्य को दो प्रकार की संतुष्टिकरनी चाहिए- तर्क आधारित नैतिक नियम के अनुरूप हों और अभिकर्ता उस कार्य को नैतिक नियम के शुद्ध सम्मान के रूप में करे। कांट के द्वारा सापेक्ष आदेश(hypothetical imperative) का समर्थन नहीं किया गया है जो कि किसी साध्य को प्राप्त करने हेतु किसी कार्य को विशिष्ट तरीके से करने हेतु किया जाता है। जो नियम किसी अन्य साध्य को प्राप्त करने हेतु बनाये गए हैं उसकी प्रकृति सापेक्ष आदेश के रूप में है। कांट के अनुसार व्यक्तियों को साध्य के रूप में माना जाना चाहिए, न की साधन के रूप में। यानि व्यक्तियों का व्यवहारएक दूसरे के प्रति गरिमापूर्ण होना चाहिए एवं व्यक्तियों का प्रयोग तंत्र या यंत्र के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। अतः व्यक्ति का व्यवहार साध्य के रूप में होना हमारा कार्य उस व्यक्ति के निहित मूल्य के महत्व को दर्शाताहै। अतः व्यक्ति का प्रयोग अपने लिए कुछ प्राप्त करने हेतु नहीं किया जाना चाहिए। अतः कांट का दृष्टिकोण वर्तमान समय के लोकसेवकों के जनसमर्पण एवं सत्यनिष्ठा प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक है। कांट के अनुसार किसी भी कार्य की नैतिकता एक सिद्दांत पर आधारितहै और वह सिद्दांत हैकर्तव्य के लिए,कर्तव्य का अनुपालन। क्योंकि कर्तव्यों का निर्धारण मानव प्राणी की बुद्धिमत्ता या तर्क पर आधारित सर्वव्यापक नैतिक नियम है। मानवीय क्रियाशीलता का नैतिक रूप से उचित होना उस कार्य के प्रभाव या परिणाम पर भी निर्भर करताहै अगर उसका प्रभाव प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल है। इस प्रभाव का परीक्षण तीन आधारों पर किया जा सकता है- नैतिक स्वार्थवाद के अंतर्गत कोई कार्य नैतिक रूप से उचित तभी होगा जब प्रभाव सिर्फ अभिकर्ता के लिए प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। नैतिक परार्थवाद के अंतर्गत ऐसे मानवीय क्रियाशीलता को उचित माना जाता है जिसका प्रभाव अभिकर्ता को छोड़कर अन्य पर प्रतिकूल की तुलना में अधिक अनुकूल हो। उपयोगितावाद ऐसी मानवीय क्रियाशीलता को उचित मानती है जिसका प्रभाव प्रत्येक पर प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। इस प्रकार स्पष्ट है किइमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना।
|
##Question:इमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना। स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) The categorical imperative by Immanuel Kant was considered the universal ethical rule, as well as Kant, regarded as a means to individuals. Elucidate. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका मेंइमैनुअल कांट के निरपेक्ष (categorical) आदेश का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिए कि कैसेइमैनुअल कांट द्वारानिरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही यह भी समझाइये कि कैसेकांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निरपेक्ष आदेश,एक स्पष्ट अनिवार्यता, बिना शर्त आवश्यकता को दर्शाता है, जिसकासभी परिस्थितियों में पालन होना चाहिए और अंत में जिसे न्ययोचित भी ठहराया जा सके।कांट के द्वारा निरपेक्ष(categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया, क्योंकि यह सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता हैं। निरपेक्ष आदेश का संदर्भ कोई बाहरी साध्य साबित नहीं होता परन्तु इस संकल्प की उचित दिशा होती है। शुभ संकल्पअपने आप में स्वयं के लिए शुभ है न कि किसी प्रभाव के कारण। कांट के अनुसार उचित कार्य को दो प्रकार की संतुष्टिकरनी चाहिए- तर्क आधारित नैतिक नियम के अनुरूप हों और अभिकर्ता उस कार्य को नैतिक नियम के शुद्ध सम्मान के रूप में करे। कांट के द्वारा सापेक्ष आदेश(hypothetical imperative) का समर्थन नहीं किया गया है जो कि किसी साध्य को प्राप्त करने हेतु किसी कार्य को विशिष्ट तरीके से करने हेतु किया जाता है। जो नियम किसी अन्य साध्य को प्राप्त करने हेतु बनाये गए हैं उसकी प्रकृति सापेक्ष आदेश के रूप में है। कांट के अनुसार व्यक्तियों को साध्य के रूप में माना जाना चाहिए, न की साधन के रूप में। यानि व्यक्तियों का व्यवहारएक दूसरे के प्रति गरिमापूर्ण होना चाहिए एवं व्यक्तियों का प्रयोग तंत्र या यंत्र के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। अतः व्यक्ति का व्यवहार साध्य के रूप में होना हमारा कार्य उस व्यक्ति के निहित मूल्य के महत्व को दर्शाताहै। अतः व्यक्ति का प्रयोग अपने लिए कुछ प्राप्त करने हेतु नहीं किया जाना चाहिए। अतः कांट का दृष्टिकोण वर्तमान समय के लोकसेवकों के जनसमर्पण एवं सत्यनिष्ठा प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक है। कांट के अनुसार किसी भी कार्य की नैतिकता एक सिद्दांत पर आधारितहै और वह सिद्दांत हैकर्तव्य के लिए,कर्तव्य का अनुपालन। क्योंकि कर्तव्यों का निर्धारण मानव प्राणी की बुद्धिमत्ता या तर्क पर आधारित सर्वव्यापक नैतिक नियम है। मानवीय क्रियाशीलता का नैतिक रूप से उचित होना उस कार्य के प्रभाव या परिणाम पर भी निर्भर करताहै अगर उसका प्रभाव प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल है। इस प्रभाव का परीक्षण तीन आधारों पर किया जा सकता है- नैतिक स्वार्थवाद के अंतर्गत कोई कार्य नैतिक रूप से उचित तभी होगा जब प्रभाव सिर्फ अभिकर्ता के लिए प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। नैतिक परार्थवाद के अंतर्गत ऐसे मानवीय क्रियाशीलता को उचित माना जाता है जिसका प्रभाव अभिकर्ता को छोड़कर अन्य पर प्रतिकूल की तुलना में अधिक अनुकूल हो। उपयोगितावाद ऐसी मानवीय क्रियाशीलता को उचित मानती है जिसका प्रभाव प्रत्येक पर प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। इस प्रकार स्पष्ट है किइमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना।
| 45,619
|
न्यायिक सक्रियता से आप क्या समझते हैं? क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि वर्त्तमान समय में न्यायिक सक्रियता के नाम पर न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया जा रहा है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by judicial activism? Do you agree with the idea that in the name of judicial activism in the current time, the judiciary is interfering in the jurisdiction of the executive? Give an argument in favor of your answer. (150-200 word/10 marks)
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: न्यायिक सक्रियता के बारे में बताते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। दूसरे भाग के उत्तर के लिए कोई एक पक्ष लेते हुए अपने विचार रखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। यह एक न्यायिक सिद्धान्त है जो न्यायाधीशों को प्रगतिशील और नहीं सामाजिक नीति के पक्ष में न्यायिक अधिकारी निर्णयों का सख्ती से पालन करने के लिए प्रेरित करता है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनैतिक व्यवस्था से अपनाया गाया है। इस उपकरण के माध्यम से विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानूनों के साथ-साथ कार्यपालिका के कार्यों की भी जांच की जाती है और उन्हे संविधान के अनुरूप अधिक संगत बनाने के लिए संशोधन का सुझाव दिया जाता है। भारत में जनहित याचिका के आरंभ के माध्यम से न्यायिक सक्रियता को स्थापित किया गया। गौरतलब है कि वर्तमान समय में न्यायपालिका द्वरा न्यायिक सक्रियता का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है। जिससे ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिससे प्रतीत हो रहा है कि न्यायपालिका की यह सक्रियता कार्यपालिका के लिए अतिक्रमण है। हालांकि वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो न्यायिक सक्रियता प्रयोग न्यायपालिका अपने दायरे में रहकर ही कर रही है जैसे कि: ऐसे विषय जिस पर कार्यपालिका कोई सख्त नियम नहीं बना पाती क्योंकि राजनीतिक नुकसान होने का भय रहता है। ऐसे में न्यायपालिका द्वारा इस साधन का प्रयोग सार्थक है जैसे- राष्ट्रीय राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब बिक्री पर प्रतिबंध सरकार को उसके कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए भी इसका प्रयोग किया गया है जैसे- बाल श्रम को रोकने के लिए हस्तक्षेप महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गयी है। सरकार द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने में असफल रहने पर न्यायपालिका ने कुछ कठोर कदम उठाए हैं जैसे- दिल्ली में डीजल वाहनों पर प्रतिबंध। खेल में पारदर्शिता लाने के लिए बीसीसीआई के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए हालिया हस्तक्षेप स्वीकार्य हैं। भीड़ हिंसा को रोकने में असफल रहे राज्य सरकारों को स्पष्ट कानून बनाने के लिए निर्देश दिये गए हैं। बच्चों के प्रति हिंसा को रोकने के लिय पोक्सो अधिनियम में बदलाव और फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना। इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हाल ही में न्यायिक सक्रियता को सकारात्मक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया गया है। हालांकि कई ऐसे मुद्दे हैं जहां न्यायिक अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न हुई। अतः शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कार्यपालिका और न्यायपलिका को आपसी समन्वय से कार्यों का संचालन करना चाहिए। कार्यपालिका को जनता के हिट में कार्य करना चाहिए तो न्यायपालिका को न्यायिक सक्रियता को एक सार्थक साधन के रूप में प्रयोग करने के लिए संवैधानिक दायरे में रहना चाहिए।
|
##Question:न्यायिक सक्रियता से आप क्या समझते हैं? क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि वर्त्तमान समय में न्यायिक सक्रियता के नाम पर न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया जा रहा है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by judicial activism? Do you agree with the idea that in the name of judicial activism in the current time, the judiciary is interfering in the jurisdiction of the executive? Give an argument in favor of your answer. (150-200 word/10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: न्यायिक सक्रियता के बारे में बताते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। दूसरे भाग के उत्तर के लिए कोई एक पक्ष लेते हुए अपने विचार रखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। यह एक न्यायिक सिद्धान्त है जो न्यायाधीशों को प्रगतिशील और नहीं सामाजिक नीति के पक्ष में न्यायिक अधिकारी निर्णयों का सख्ती से पालन करने के लिए प्रेरित करता है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनैतिक व्यवस्था से अपनाया गाया है। इस उपकरण के माध्यम से विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानूनों के साथ-साथ कार्यपालिका के कार्यों की भी जांच की जाती है और उन्हे संविधान के अनुरूप अधिक संगत बनाने के लिए संशोधन का सुझाव दिया जाता है। भारत में जनहित याचिका के आरंभ के माध्यम से न्यायिक सक्रियता को स्थापित किया गया। गौरतलब है कि वर्तमान समय में न्यायपालिका द्वरा न्यायिक सक्रियता का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है। जिससे ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिससे प्रतीत हो रहा है कि न्यायपालिका की यह सक्रियता कार्यपालिका के लिए अतिक्रमण है। हालांकि वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो न्यायिक सक्रियता प्रयोग न्यायपालिका अपने दायरे में रहकर ही कर रही है जैसे कि: ऐसे विषय जिस पर कार्यपालिका कोई सख्त नियम नहीं बना पाती क्योंकि राजनीतिक नुकसान होने का भय रहता है। ऐसे में न्यायपालिका द्वारा इस साधन का प्रयोग सार्थक है जैसे- राष्ट्रीय राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब बिक्री पर प्रतिबंध सरकार को उसके कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए भी इसका प्रयोग किया गया है जैसे- बाल श्रम को रोकने के लिए हस्तक्षेप महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गयी है। सरकार द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने में असफल रहने पर न्यायपालिका ने कुछ कठोर कदम उठाए हैं जैसे- दिल्ली में डीजल वाहनों पर प्रतिबंध। खेल में पारदर्शिता लाने के लिए बीसीसीआई के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए हालिया हस्तक्षेप स्वीकार्य हैं। भीड़ हिंसा को रोकने में असफल रहे राज्य सरकारों को स्पष्ट कानून बनाने के लिए निर्देश दिये गए हैं। बच्चों के प्रति हिंसा को रोकने के लिय पोक्सो अधिनियम में बदलाव और फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना। इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हाल ही में न्यायिक सक्रियता को सकारात्मक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया गया है। हालांकि कई ऐसे मुद्दे हैं जहां न्यायिक अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न हुई। अतः शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कार्यपालिका और न्यायपलिका को आपसी समन्वय से कार्यों का संचालन करना चाहिए। कार्यपालिका को जनता के हिट में कार्य करना चाहिए तो न्यायपालिका को न्यायिक सक्रियता को एक सार्थक साधन के रूप में प्रयोग करने के लिए संवैधानिक दायरे में रहना चाहिए।
| 45,621
|
What do you understand by ethical dilemmas? Discuss the different ethical dilemmas faced by civil servants. Also, state the approach to resolve these ethical dilemmas. (150 words)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS - THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS -CONCLUSION ANSWER: An ethical dilemma refers to a situation where the person has to choose between a right and a wrong, or between 2 right things conflicting with each other. Choosing between the legal choice and the humanitarian choice, between family and work etc. are just a few of the examples of ethical dilemmas. THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS The different ethical dilemmas faced by civil servants are- I PERSONAL COST DILEMMA 1) MEANING Here, the personal interest comes in conflict with public interest. Personal interest can be monetary, material gain, benefits to family members/ near and dear ones (nepotism) and benefits related to service conditions. Material gain can be of good posting, transfers, promotion, rewards etc. 2) VALUES The values involved arededication to public service, selflessness, impartiality and integrity.Impartiality means decisions based on merit and objective criteria. 3) THE CORRECT CHOICE/ THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA Public interest should always precede personal interest no matter what be the reason. Public office should never be used for private benefits- it means corruption and misuse of power (no matter how compelling the reason be). II RIGHT VERSUS RIGHT DILEMMA 2) MEANING Here two desirable values come in conflict with each other. 3) EXAMPLES Law versus ethics, merit versus social equity (concessions), environment versus development, impartiality versus compassion are some of the examples of such type of a dilemma. (All these are public interest versus public interest type dilemmas). 4) THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA The 1st best option is a synthesis of both the contending options, if possible. For example, going for sustainable development can be a solution to the development versus environment problem. The second best option is to pick one value over the other depending upon the situation. The other option is to go for an innovative solution (depending upon the specific case). III SITUATIONS OF CONFLICT OF INTEREST 1) MEANING In this there might be a conflict of interest between the civil servant’s own goals and aspirations and public interest, between two different stakeholders/ parties involved in the case etc. 2) EXAMPLES For example, being honest might come at the cost of a bad posting or even a threat to life. Development of a district or area might come at the cost of displacing a few aged and poor families. 3) SOLUTION In such cases, generally one interest has to be forgone. Therefore, it must be ensured that at no cost does life or even the dignity of life suffer. Both of these are fundamental as well as humanitarian rights (recognized and guaranteed by our constitution). If the question is of personal interest, then that must be forgone without second thoughts, as service to the nation is a civil servant’s primary duty- and this must be kept in mind, not only after coming into service, but also right from the time when one starts aspiring for such services. IV WHISTLEBLOWERS" DILEMMA 1) MEANING This means revealing some sensitive information like corruption, mal-governance etc. at the cost of risking one’s life. 2) EXAMPLES There are many examples of this, many famed and may not come to light as yet. The most famous cases are those of Satyendra Dubey, the whistleblower in the Ranjit Sinha case (defended by Prashant Bhushan) etc. 3) SOLUTION The officer must first inform the higher authorities. As the whistleblowers protection has become stronger than before through law, she must seek the appropriate level of protection from the government, and as much security is needed to protect her life. However, whatever be the case and situation, public interest must precede private interest. Any step at any point of time must not be taken by putting own interest before the nation’s interest. A choice might be a difficult choice. But this difficult choice might be the ethically correct choice. THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS I THE STEPS TO RESOLVE DILEMMAS 1) IDENTIFICATION OF DIFFERENT ETHICAL ISSUES IN THE CASE First, the various stakeholders of the case must be identified. Then, the ethical issues for various stakeholders be identified. Also the ethical values and the ethical dilemmas must be identified. 2) IDENTIFYING ALL THE POSSIBLE ALTERNATIVES OR SOLUTIONS TO RESOLVE THE DILEMMA Every option available must be identified. 3) ANALYZING EACH ALTERNATIVE INDEPENDENTLY AGAINST THE MERITS AND DEMERITS Each alternative/ option so identified must be analyzed by listing its merits and demerits. Not only merits and demerits, but also weights should be assigned to each merit and demerit. Because it is possible that the demerits might be many and merit only one, but the merit (for example, public interest, saving a child’s life etc.) might be so great that it outweighs all the other small demerits. 4) CHOOSING THE BEST ALTERNATIVE Based upon the analysis so done, the best alternative should be chosen. It can be a course of action as well, or a combination of one or two options. II POINTS TO BE TAKEN INTO ACCOUNT WHILE RESOLVING THE DILEMMA 1) THE CONSTITUTIONAL POSITION/ PROVISION ON THE MATTER One must know and give precedence to the constitutional provisions on the matter. The values of the preamble, fundamental rights, DPSPs, fundamental duties etc. must be considered and given prior importance while solving such dilemmas 2) LEGAL POSITION After that one must be aware of the law in place regarding the issue, and take action/ the decision accordingly. 3) SUPREME COURT JUDGMENT(S) This can also provide valuable inputs regarding the way forward or the correct course of action. For example, the Vishakha guidelines, Aruna Shanbaug case etc. 4) CODE OF CONDUCT AND CODE OF ETHICS These are professional ethics for a civil servant and are general guidelines, which must always be kept in mind and guide the behavior and decisions of the civil servants. Apart from the above, certain personal considerations are also very important while solving ethical dilemmas- like the conscience of the civil servants. This is of utmost importance in heinous crimes like manual scavenging, mob lynching, communal violence, sexual harassment/ crimes etc. Also, sometimes it is very important to be able to go against the majority. For example, Raja Ram Mohan Roy went against sati pratha. Civil servants should have such traits of courage and fearlessness against the evils of society and must be able to take the bold stand, like our freedom fighters were able to do in the past. Our country has many more freedom battles to fight against, such as injustice and atrocities against women, caste related social crimes, corruption in governance etc. And for this the iron steel framework in the form of the civil servants are of utmost importance, along with a vigil and active civil society.
|
##Question:What do you understand by ethical dilemmas? Discuss the different ethical dilemmas faced by civil servants. Also, state the approach to resolve these ethical dilemmas. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS - THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS -CONCLUSION ANSWER: An ethical dilemma refers to a situation where the person has to choose between a right and a wrong, or between 2 right things conflicting with each other. Choosing between the legal choice and the humanitarian choice, between family and work etc. are just a few of the examples of ethical dilemmas. THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS The different ethical dilemmas faced by civil servants are- I PERSONAL COST DILEMMA 1) MEANING Here, the personal interest comes in conflict with public interest. Personal interest can be monetary, material gain, benefits to family members/ near and dear ones (nepotism) and benefits related to service conditions. Material gain can be of good posting, transfers, promotion, rewards etc. 2) VALUES The values involved arededication to public service, selflessness, impartiality and integrity.Impartiality means decisions based on merit and objective criteria. 3) THE CORRECT CHOICE/ THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA Public interest should always precede personal interest no matter what be the reason. Public office should never be used for private benefits- it means corruption and misuse of power (no matter how compelling the reason be). II RIGHT VERSUS RIGHT DILEMMA 2) MEANING Here two desirable values come in conflict with each other. 3) EXAMPLES Law versus ethics, merit versus social equity (concessions), environment versus development, impartiality versus compassion are some of the examples of such type of a dilemma. (All these are public interest versus public interest type dilemmas). 4) THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA The 1st best option is a synthesis of both the contending options, if possible. For example, going for sustainable development can be a solution to the development versus environment problem. The second best option is to pick one value over the other depending upon the situation. The other option is to go for an innovative solution (depending upon the specific case). III SITUATIONS OF CONFLICT OF INTEREST 1) MEANING In this there might be a conflict of interest between the civil servant’s own goals and aspirations and public interest, between two different stakeholders/ parties involved in the case etc. 2) EXAMPLES For example, being honest might come at the cost of a bad posting or even a threat to life. Development of a district or area might come at the cost of displacing a few aged and poor families. 3) SOLUTION In such cases, generally one interest has to be forgone. Therefore, it must be ensured that at no cost does life or even the dignity of life suffer. Both of these are fundamental as well as humanitarian rights (recognized and guaranteed by our constitution). If the question is of personal interest, then that must be forgone without second thoughts, as service to the nation is a civil servant’s primary duty- and this must be kept in mind, not only after coming into service, but also right from the time when one starts aspiring for such services. IV WHISTLEBLOWERS" DILEMMA 1) MEANING This means revealing some sensitive information like corruption, mal-governance etc. at the cost of risking one’s life. 2) EXAMPLES There are many examples of this, many famed and may not come to light as yet. The most famous cases are those of Satyendra Dubey, the whistleblower in the Ranjit Sinha case (defended by Prashant Bhushan) etc. 3) SOLUTION The officer must first inform the higher authorities. As the whistleblowers protection has become stronger than before through law, she must seek the appropriate level of protection from the government, and as much security is needed to protect her life. However, whatever be the case and situation, public interest must precede private interest. Any step at any point of time must not be taken by putting own interest before the nation’s interest. A choice might be a difficult choice. But this difficult choice might be the ethically correct choice. THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS I THE STEPS TO RESOLVE DILEMMAS 1) IDENTIFICATION OF DIFFERENT ETHICAL ISSUES IN THE CASE First, the various stakeholders of the case must be identified. Then, the ethical issues for various stakeholders be identified. Also the ethical values and the ethical dilemmas must be identified. 2) IDENTIFYING ALL THE POSSIBLE ALTERNATIVES OR SOLUTIONS TO RESOLVE THE DILEMMA Every option available must be identified. 3) ANALYZING EACH ALTERNATIVE INDEPENDENTLY AGAINST THE MERITS AND DEMERITS Each alternative/ option so identified must be analyzed by listing its merits and demerits. Not only merits and demerits, but also weights should be assigned to each merit and demerit. Because it is possible that the demerits might be many and merit only one, but the merit (for example, public interest, saving a child’s life etc.) might be so great that it outweighs all the other small demerits. 4) CHOOSING THE BEST ALTERNATIVE Based upon the analysis so done, the best alternative should be chosen. It can be a course of action as well, or a combination of one or two options. II POINTS TO BE TAKEN INTO ACCOUNT WHILE RESOLVING THE DILEMMA 1) THE CONSTITUTIONAL POSITION/ PROVISION ON THE MATTER One must know and give precedence to the constitutional provisions on the matter. The values of the preamble, fundamental rights, DPSPs, fundamental duties etc. must be considered and given prior importance while solving such dilemmas 2) LEGAL POSITION After that one must be aware of the law in place regarding the issue, and take action/ the decision accordingly. 3) SUPREME COURT JUDGMENT(S) This can also provide valuable inputs regarding the way forward or the correct course of action. For example, the Vishakha guidelines, Aruna Shanbaug case etc. 4) CODE OF CONDUCT AND CODE OF ETHICS These are professional ethics for a civil servant and are general guidelines, which must always be kept in mind and guide the behavior and decisions of the civil servants. Apart from the above, certain personal considerations are also very important while solving ethical dilemmas- like the conscience of the civil servants. This is of utmost importance in heinous crimes like manual scavenging, mob lynching, communal violence, sexual harassment/ crimes etc. Also, sometimes it is very important to be able to go against the majority. For example, Raja Ram Mohan Roy went against sati pratha. Civil servants should have such traits of courage and fearlessness against the evils of society and must be able to take the bold stand, like our freedom fighters were able to do in the past. Our country has many more freedom battles to fight against, such as injustice and atrocities against women, caste related social crimes, corruption in governance etc. And for this the iron steel framework in the form of the civil servants are of utmost importance, along with a vigil and active civil society.
| 45,629
|
Foreign travellers in India have given account of India"s socio-political condition. In this context highlight the contribution of Chinese travellers. (150 words)
|
Approach Briefly write an introduction on the visit of foreign travellers to India since ancient time to the medieval era. Discuss how they have contributed to our knowledge of those times. Elaborate on the contributions of the Chinese travellers – Fa Hien and Hiuen Tsang. Answer India has been host to several travellers from across the world since the ancient times. While some travelled on their own accord to understand about the culture and religion prevalent in India like Fa-Hien, others were sanctioned by their kings such as Megasthenes. This trend continued in the medieval era when travellers like Al-Biruni, Ibn Batuta etc came to India. All these travellers reported about the customs and traditions, the polity and the economy of India as they travelled across various parts of the country. They had debates with the priests and scholars and also read the religious and philosophical texts. Eg. Al-Biruni learned Sanskrit to read Indian texts, further, in his book Kitab-ul-Hind, he mentions about the caste system, practice of Sati etc. Contribution of Chinese Travellers Fa-Hien was a Chinese monk who travelled to India during the time of Chandragupta II in his quest of more knowledge on Buddhism. He travelled to places which were important from Buddha’s life. Economic - While Fa-Hien did not give too much focus on the political condition he did mention about the economic prosperity and the low tax burden on people. Accounts of domestic and foreign trade were given along with some major ports. There were hospitals which provided free treatment – gives earliest evidence of charity. Society and Culture -He also wrote about the culinary habits such as most of the people were vegetarian and the consumption of alcohol was avoided. He mentioned about the practice of untouchability as he observed that untouchables had to sound a clapper in the streets so that people can avoid seeing them. We also learn that Hinduism and Buddhism were the major religion in those times from his works. Architecture - Fa-Hien described the beauty of Ashokan Palace in Patliputra – which tells that the palace still existed during Gupta time. He studied at Nalanda and also gave account of the settlement there. Fa-Hien described the towns of Magadha the largest in the gangetic plains. Hiuen-Tsang came to India during the time of King Harsha in the seventh century A.D. He came to India in search of Buddhist texts, beliefs and practices. He gave detailed account of the administrative, social and cultural condition of India. Administration - In his book, he mentions that the situation was peaceful and the King was welfare oriented who worked hard for his subjects. He also mentions about robbery from his own experiences which throws light on the law and order situation of the time. Economic - The burden of tax was less. Three quarter of the state’s income was spent for religious purposes. Agriculture was the prime occupation in the kingdom. Society and Culture - He gave descriptions of the Buddhist establishment in the Ajanta caves, described the city streets as circular and dirty and that many cities were in ruins such as Patliputra. Further, women were educated and there was no Purdah system however, untouchability was prevalent as he states that the executioners and scavengers were forced to live outside the city. These works also formed the basis for the British when they began archaeological excavation in mid nineteenth century. Thus we see how the works of these travellers have helped us understand our history better.
|
##Question:Foreign travellers in India have given account of India"s socio-political condition. In this context highlight the contribution of Chinese travellers. (150 words)##Answer:Approach Briefly write an introduction on the visit of foreign travellers to India since ancient time to the medieval era. Discuss how they have contributed to our knowledge of those times. Elaborate on the contributions of the Chinese travellers – Fa Hien and Hiuen Tsang. Answer India has been host to several travellers from across the world since the ancient times. While some travelled on their own accord to understand about the culture and religion prevalent in India like Fa-Hien, others were sanctioned by their kings such as Megasthenes. This trend continued in the medieval era when travellers like Al-Biruni, Ibn Batuta etc came to India. All these travellers reported about the customs and traditions, the polity and the economy of India as they travelled across various parts of the country. They had debates with the priests and scholars and also read the religious and philosophical texts. Eg. Al-Biruni learned Sanskrit to read Indian texts, further, in his book Kitab-ul-Hind, he mentions about the caste system, practice of Sati etc. Contribution of Chinese Travellers Fa-Hien was a Chinese monk who travelled to India during the time of Chandragupta II in his quest of more knowledge on Buddhism. He travelled to places which were important from Buddha’s life. Economic - While Fa-Hien did not give too much focus on the political condition he did mention about the economic prosperity and the low tax burden on people. Accounts of domestic and foreign trade were given along with some major ports. There were hospitals which provided free treatment – gives earliest evidence of charity. Society and Culture -He also wrote about the culinary habits such as most of the people were vegetarian and the consumption of alcohol was avoided. He mentioned about the practice of untouchability as he observed that untouchables had to sound a clapper in the streets so that people can avoid seeing them. We also learn that Hinduism and Buddhism were the major religion in those times from his works. Architecture - Fa-Hien described the beauty of Ashokan Palace in Patliputra – which tells that the palace still existed during Gupta time. He studied at Nalanda and also gave account of the settlement there. Fa-Hien described the towns of Magadha the largest in the gangetic plains. Hiuen-Tsang came to India during the time of King Harsha in the seventh century A.D. He came to India in search of Buddhist texts, beliefs and practices. He gave detailed account of the administrative, social and cultural condition of India. Administration - In his book, he mentions that the situation was peaceful and the King was welfare oriented who worked hard for his subjects. He also mentions about robbery from his own experiences which throws light on the law and order situation of the time. Economic - The burden of tax was less. Three quarter of the state’s income was spent for religious purposes. Agriculture was the prime occupation in the kingdom. Society and Culture - He gave descriptions of the Buddhist establishment in the Ajanta caves, described the city streets as circular and dirty and that many cities were in ruins such as Patliputra. Further, women were educated and there was no Purdah system however, untouchability was prevalent as he states that the executioners and scavengers were forced to live outside the city. These works also formed the basis for the British when they began archaeological excavation in mid nineteenth century. Thus we see how the works of these travellers have helped us understand our history better.
| 45,634
|
इमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट नेव्यक्तियोंको साध्य के रूप में भी माना। स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द) The categorical imperative by Immanuel Kant was considered the universal ethical rule, as well as Kant, regarded as a means to individuals. Elucidate. (150 words)
|
एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका मेंइमैनुअल कांट के निरपेक्ष (categorical) आदेश का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिए कि कैसेइमैनुअल कांट द्वारानिरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही यह भी समझाइये कि कैसेकांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निरपेक्ष आदेश,एक स्पष्ट अनिवार्यता, बिना शर्त आवश्यकता को दर्शाता है, जिसकासभी परिस्थितियों में पालन होना चाहिए और अंत में जिसे न्ययोचित भी ठहराया जा सके।कांट के द्वारा निरपेक्ष(categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया, क्योंकि यह सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता हैं। निरपेक्ष आदेश का संदर्भ कोई बाहरी साध्य साबित नहीं होता परन्तु इस संकल्प की उचित दिशा होती है। शुभ संकल्पअपने आप में स्वयं के लिए शुभ है न कि किसी प्रभाव के कारण। कांट के अनुसार उचित कार्य को दो प्रकार की संतुष्टिकरनी चाहिए- तर्क आधारित नैतिक नियम के अनुरूप हों और अभिकर्ता उस कार्य को नैतिक नियम के शुद्ध सम्मान के रूप में करे। कांट के द्वारा सापेक्ष आदेश(hypothetical imperative) का समर्थन नहीं किया गया है जो कि किसी साध्य को प्राप्त करने हेतु किसी कार्य को विशिष्ट तरिके से करने हेतु किया जाता है। जो नियम किसी अन्य साध्य को प्राप्त करने हेतु बनाये गए हैं उसकी प्रकृति सापेक्ष आदेश के रूप में है। कांट के अनुसार व्यक्तियों को साध्य के रूप में माना जाना चाहिए, न की साधन के रूप में। यानि व्यक्तियों का व्यवहारएक दूसरे के प्रति गरिमापूर्ण होना चाहिए एवं व्यक्तियों का प्रयोग तंत्र या यंत्र के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। अतः व्यक्ति का व्यवहार साध्य के रूप में होना हमारा कार्य उस व्यक्ति के निहित मूल्य के महत्व को दर्शाताहै। अतः व्यक्ति का प्रयोग अपने लिए कुछ प्राप्त करने हेतु नहीं किया जाना चाहिए। अतः कांट का दृष्टिकोण वर्तमान समय के लोकसेवकों के जनसमर्पण एवं सत्यनिष्ठा प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक है। कांट के अनुसार किसी भी कार्य की नैतिकता एक सिद्दांत पर आधारितहै और वह सिद्दांत हैकर्तव्य के लिए,कर्तव्य का अनुपालन। क्योंकि कर्तव्यों का निर्धारण मानव प्राणी की बुद्धिमत्ता या तर्क पर आधारित सर्वव्यापक नैतिक नियम है। मानवीय क्रियाशीलता का नैतिक रूप से उचित होना उस कार्य के प्रभाव या परिणाम पर भी निर्भर करताहै अगर उसका प्रभाव प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल है। इस प्रभाव का परीक्षण तीन आधारों पर किया जा सकता है- नैतिक स्वार्थवाद के अंतर्गत कोई कार्य नैतिक रूप से उचित तभी होगा जब प्रभाव सिर्फ अभिकर्ता के लिए प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। नैतिक परार्थवाद के अंतर्गत ऐसे मानवीय क्रियाशीलता को उचित माना जाता है जिसका प्रभाव अभिकर्ता को छोड़कर अन्य पर प्रतिकूल की तुलना में अधिक अनुकूल हो। उपयोगितावाद ऐसी मानवीय क्रियाशीलता को उचित मानती है जिसका प्रभाव प्रत्येक पर प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। इस प्रकार स्पष्ट है किइमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना।
|
##Question:इमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट नेव्यक्तियोंको साध्य के रूप में भी माना। स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द) The categorical imperative by Immanuel Kant was considered the universal ethical rule, as well as Kant, regarded as a means to individuals. Elucidate. (150 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका मेंइमैनुअल कांट के निरपेक्ष (categorical) आदेश का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिए कि कैसेइमैनुअल कांट द्वारानिरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही यह भी समझाइये कि कैसेकांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निरपेक्ष आदेश,एक स्पष्ट अनिवार्यता, बिना शर्त आवश्यकता को दर्शाता है, जिसकासभी परिस्थितियों में पालन होना चाहिए और अंत में जिसे न्ययोचित भी ठहराया जा सके।कांट के द्वारा निरपेक्ष(categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया, क्योंकि यह सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता हैं। निरपेक्ष आदेश का संदर्भ कोई बाहरी साध्य साबित नहीं होता परन्तु इस संकल्प की उचित दिशा होती है। शुभ संकल्पअपने आप में स्वयं के लिए शुभ है न कि किसी प्रभाव के कारण। कांट के अनुसार उचित कार्य को दो प्रकार की संतुष्टिकरनी चाहिए- तर्क आधारित नैतिक नियम के अनुरूप हों और अभिकर्ता उस कार्य को नैतिक नियम के शुद्ध सम्मान के रूप में करे। कांट के द्वारा सापेक्ष आदेश(hypothetical imperative) का समर्थन नहीं किया गया है जो कि किसी साध्य को प्राप्त करने हेतु किसी कार्य को विशिष्ट तरिके से करने हेतु किया जाता है। जो नियम किसी अन्य साध्य को प्राप्त करने हेतु बनाये गए हैं उसकी प्रकृति सापेक्ष आदेश के रूप में है। कांट के अनुसार व्यक्तियों को साध्य के रूप में माना जाना चाहिए, न की साधन के रूप में। यानि व्यक्तियों का व्यवहारएक दूसरे के प्रति गरिमापूर्ण होना चाहिए एवं व्यक्तियों का प्रयोग तंत्र या यंत्र के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। अतः व्यक्ति का व्यवहार साध्य के रूप में होना हमारा कार्य उस व्यक्ति के निहित मूल्य के महत्व को दर्शाताहै। अतः व्यक्ति का प्रयोग अपने लिए कुछ प्राप्त करने हेतु नहीं किया जाना चाहिए। अतः कांट का दृष्टिकोण वर्तमान समय के लोकसेवकों के जनसमर्पण एवं सत्यनिष्ठा प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक है। कांट के अनुसार किसी भी कार्य की नैतिकता एक सिद्दांत पर आधारितहै और वह सिद्दांत हैकर्तव्य के लिए,कर्तव्य का अनुपालन। क्योंकि कर्तव्यों का निर्धारण मानव प्राणी की बुद्धिमत्ता या तर्क पर आधारित सर्वव्यापक नैतिक नियम है। मानवीय क्रियाशीलता का नैतिक रूप से उचित होना उस कार्य के प्रभाव या परिणाम पर भी निर्भर करताहै अगर उसका प्रभाव प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल है। इस प्रभाव का परीक्षण तीन आधारों पर किया जा सकता है- नैतिक स्वार्थवाद के अंतर्गत कोई कार्य नैतिक रूप से उचित तभी होगा जब प्रभाव सिर्फ अभिकर्ता के लिए प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। नैतिक परार्थवाद के अंतर्गत ऐसे मानवीय क्रियाशीलता को उचित माना जाता है जिसका प्रभाव अभिकर्ता को छोड़कर अन्य पर प्रतिकूल की तुलना में अधिक अनुकूल हो। उपयोगितावाद ऐसी मानवीय क्रियाशीलता को उचित मानती है जिसका प्रभाव प्रत्येक पर प्रतिकूल होने की तुलना में अधिक अनुकूल हो। इस प्रकार स्पष्ट है किइमैनुअल कांट के द्वारा निरपेक्ष (categorical) आदेश को सर्वव्यापी नैतिक नियम माना गया तथा साथ ही कांट ने व्यक्तियों को साध्य के रूप में भी माना।
| 45,639
|
What do you understand by ethical dilemmas? Discuss the different ethical dilemmas faced by civil servants. Also, state the approach to resolving these ethical dilemmas. (150 words, 10 marks)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS - THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS -CONCLUSION ANSWER: An ethical dilemma refers to a situation where the person has to choose between a right and a wrong, or between 2 right things conflicting with each other. Choosing between the legal choice and the humanitarian choice, between family and work etc. are just a few of the examples of ethical dilemmas. THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS The different ethical dilemmas faced by civil servants are- I PERSONAL COST DILEMMA 1) MEANING Here, the personal interest comes in conflict with public interest. Personal interest can be monetary, material gain, benefits to family members/ near and dear ones (nepotism) and benefits related to service conditions. Material gain can be of good posting, transfers, promotion, rewards etc. 2) VALUES The values involved are dedication to public service, selflessness, impartiality and integrity. Impartiality means decisions based on merit and objective criteria. 3) THE CORRECT CHOICE/ THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA Public interest should always precede personal interest no matter what be the reason. Public office should never be used for private benefits- it means corruption and misuse of power (no matter how compelling the reason be). II RIGHT VERSUS RIGHT DILEMMA 2) MEANING Here two desirable values come in conflict with each other. 3) EXAMPLES Law versus ethics, merit versus social equity (concessions), environment versus development, impartiality versus compassion are some of the examples of such type of a dilemma. (All these are public interest versus public interest type dilemmas). 4) THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA The 1st best option is a synthesis of both the contending options, if possible. For example, going for sustainable development can be a solution to the development versus environment problem. The second best option is to pick one value over the other depending upon the situation. The other option is to go for an innovative solution (depending upon the specific case). III SITUATIONS OF CONFLICT OF INTEREST 1) MEANING In this there might be a conflict of interest between the civil servant’s own goals and aspirations and public interest, between two different stakeholders/ parties involved in the case etc. 2) EXAMPLES For example, being honest might come at the cost of a bad posting or even a threat to life. Development of a district or area might come at the cost of displacing a few aged and poor families. 3) SOLUTION In such cases, generally one interest has to be forgone. Therefore, it must be ensured that at no cost does life or even the dignity of life suffer. Both of these are fundamental as well as humanitarian rights (recognized and guaranteed by our constitution). If the question is of personal interest, then that must be forgone without second thoughts, as service to the nation is a civil servant’s primary duty- and this must be kept in mind, not only after coming into service, but also right from the time when one starts aspiring for such services. IV WHISTLEBLOWERS" DILEMMA 1) MEANING This means revealing some sensitive information like corruption, mal-governance etc. at the cost of risking one’s life. 2) EXAMPLES There are many examples of this, many famed and may not come to light as yet. The most famous cases are those of Satyendra Dubey, the whistleblower in the Ranjit Sinha case (defended by Prashant Bhushan) etc. 3) SOLUTION The officer must first inform the higher authorities. As the whistleblowers protection has become stronger than before through law, she must seek the appropriate level of protection from the government, and as much security is needed to protect her life. However, whatever be the case and situation, public interest must precede private interest. Any step at any point of time must not be taken by putting own interest before the nation’s interest. A choice might be a difficult choice. But this difficult choice might be the ethically correct choice. THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS I THE STEPS TO RESOLVE DILEMMAS 1) IDENTIFICATION OF DIFFERENT ETHICAL ISSUES IN THE CASE First, the various stakeholders of the case must be identified. Then, the ethical issues for various stakeholders be identified. Also the ethical values and the ethical dilemmas must be identified. 2) IDENTIFYING ALL THE POSSIBLE ALTERNATIVES OR SOLUTIONS TO RESOLVE THE DILEMMA Every option available must be identified. 3) ANALYZING EACH ALTERNATIVE INDEPENDENTLY AGAINST THE MERITS AND DEMERITS Each alternative/ option so identified must be analyzed by listing its merits and demerits. Not only merits and demerits, but also weights should be assigned to each merit and demerit. Because it is possible that the demerits might be many and merit only one, but the merit (for example, public interest, saving a child’s life etc.) might be so great that it outweighs all the other small demerits. 4) CHOOSING THE BEST ALTERNATIVE Based upon the analysis so done, the best alternative should be chosen. It can be a course of action as well, or a combination of one or two options. II POINTS TO BE TAKEN INTO ACCOUNT WHILE RESOLVING THE DILEMMA 1) THE CONSTITUTIONAL POSITION/ PROVISION ON THE MATTER One must know and give precedence to the constitutional provisions on the matter. The values of the preamble, fundamental rights, DPSPs, fundamental duties etc. must be considered and given prior importance while solving such dilemmas 2) LEGAL POSITION After that one must be aware of the law in place regarding the issue, and take action/ the decision accordingly. 3) SUPREME COURT JUDGMENT(S) This can also provide valuable inputs regarding the way forward or the correct course of action. For example, the Vishakha guidelines, Aruna Shanbaug case etc. 4) CODE OF CONDUCT AND CODE OF ETHICS These are professional ethics for a civil servant and are general guidelines, which must always be kept in mind and guide the behavior and decisions of the civil servants. Apart from the above, certain personal considerations are also very important while solving ethical dilemmas- like the conscience of the civil servants. This is of utmost importance in heinous crimes like manual scavenging, mob lynching, communal violence, sexual harassment/ crimes etc. Also, sometimes it is very important to be able to go against the majority. For example, Raja Ram Mohan Roy went against sati pratha. Civil servants should have such traits of courage and fearlessness against the evils of society and must be able to take the bold stand, like our freedom fighters were able to do in the past. Our country has many more freedom battles to fight against, such as injustice and atrocities against women, caste related social crimes, corruption in governance etc. And for this the iron steel framework in the form of the civil servants are of utmost importance, along with a vigil and active civil society.
|
##Question:What do you understand by ethical dilemmas? Discuss the different ethical dilemmas faced by civil servants. Also, state the approach to resolving these ethical dilemmas. (150 words, 10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS - THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS -CONCLUSION ANSWER: An ethical dilemma refers to a situation where the person has to choose between a right and a wrong, or between 2 right things conflicting with each other. Choosing between the legal choice and the humanitarian choice, between family and work etc. are just a few of the examples of ethical dilemmas. THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS The different ethical dilemmas faced by civil servants are- I PERSONAL COST DILEMMA 1) MEANING Here, the personal interest comes in conflict with public interest. Personal interest can be monetary, material gain, benefits to family members/ near and dear ones (nepotism) and benefits related to service conditions. Material gain can be of good posting, transfers, promotion, rewards etc. 2) VALUES The values involved are dedication to public service, selflessness, impartiality and integrity. Impartiality means decisions based on merit and objective criteria. 3) THE CORRECT CHOICE/ THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA Public interest should always precede personal interest no matter what be the reason. Public office should never be used for private benefits- it means corruption and misuse of power (no matter how compelling the reason be). II RIGHT VERSUS RIGHT DILEMMA 2) MEANING Here two desirable values come in conflict with each other. 3) EXAMPLES Law versus ethics, merit versus social equity (concessions), environment versus development, impartiality versus compassion are some of the examples of such type of a dilemma. (All these are public interest versus public interest type dilemmas). 4) THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA The 1st best option is a synthesis of both the contending options, if possible. For example, going for sustainable development can be a solution to the development versus environment problem. The second best option is to pick one value over the other depending upon the situation. The other option is to go for an innovative solution (depending upon the specific case). III SITUATIONS OF CONFLICT OF INTEREST 1) MEANING In this there might be a conflict of interest between the civil servant’s own goals and aspirations and public interest, between two different stakeholders/ parties involved in the case etc. 2) EXAMPLES For example, being honest might come at the cost of a bad posting or even a threat to life. Development of a district or area might come at the cost of displacing a few aged and poor families. 3) SOLUTION In such cases, generally one interest has to be forgone. Therefore, it must be ensured that at no cost does life or even the dignity of life suffer. Both of these are fundamental as well as humanitarian rights (recognized and guaranteed by our constitution). If the question is of personal interest, then that must be forgone without second thoughts, as service to the nation is a civil servant’s primary duty- and this must be kept in mind, not only after coming into service, but also right from the time when one starts aspiring for such services. IV WHISTLEBLOWERS" DILEMMA 1) MEANING This means revealing some sensitive information like corruption, mal-governance etc. at the cost of risking one’s life. 2) EXAMPLES There are many examples of this, many famed and may not come to light as yet. The most famous cases are those of Satyendra Dubey, the whistleblower in the Ranjit Sinha case (defended by Prashant Bhushan) etc. 3) SOLUTION The officer must first inform the higher authorities. As the whistleblowers protection has become stronger than before through law, she must seek the appropriate level of protection from the government, and as much security is needed to protect her life. However, whatever be the case and situation, public interest must precede private interest. Any step at any point of time must not be taken by putting own interest before the nation’s interest. A choice might be a difficult choice. But this difficult choice might be the ethically correct choice. THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS I THE STEPS TO RESOLVE DILEMMAS 1) IDENTIFICATION OF DIFFERENT ETHICAL ISSUES IN THE CASE First, the various stakeholders of the case must be identified. Then, the ethical issues for various stakeholders be identified. Also the ethical values and the ethical dilemmas must be identified. 2) IDENTIFYING ALL THE POSSIBLE ALTERNATIVES OR SOLUTIONS TO RESOLVE THE DILEMMA Every option available must be identified. 3) ANALYZING EACH ALTERNATIVE INDEPENDENTLY AGAINST THE MERITS AND DEMERITS Each alternative/ option so identified must be analyzed by listing its merits and demerits. Not only merits and demerits, but also weights should be assigned to each merit and demerit. Because it is possible that the demerits might be many and merit only one, but the merit (for example, public interest, saving a child’s life etc.) might be so great that it outweighs all the other small demerits. 4) CHOOSING THE BEST ALTERNATIVE Based upon the analysis so done, the best alternative should be chosen. It can be a course of action as well, or a combination of one or two options. II POINTS TO BE TAKEN INTO ACCOUNT WHILE RESOLVING THE DILEMMA 1) THE CONSTITUTIONAL POSITION/ PROVISION ON THE MATTER One must know and give precedence to the constitutional provisions on the matter. The values of the preamble, fundamental rights, DPSPs, fundamental duties etc. must be considered and given prior importance while solving such dilemmas 2) LEGAL POSITION After that one must be aware of the law in place regarding the issue, and take action/ the decision accordingly. 3) SUPREME COURT JUDGMENT(S) This can also provide valuable inputs regarding the way forward or the correct course of action. For example, the Vishakha guidelines, Aruna Shanbaug case etc. 4) CODE OF CONDUCT AND CODE OF ETHICS These are professional ethics for a civil servant and are general guidelines, which must always be kept in mind and guide the behavior and decisions of the civil servants. Apart from the above, certain personal considerations are also very important while solving ethical dilemmas- like the conscience of the civil servants. This is of utmost importance in heinous crimes like manual scavenging, mob lynching, communal violence, sexual harassment/ crimes etc. Also, sometimes it is very important to be able to go against the majority. For example, Raja Ram Mohan Roy went against sati pratha. Civil servants should have such traits of courage and fearlessness against the evils of society and must be able to take the bold stand, like our freedom fighters were able to do in the past. Our country has many more freedom battles to fight against, such as injustice and atrocities against women, caste related social crimes, corruption in governance etc. And for this the iron steel framework in the form of the civil servants are of utmost importance, along with a vigil and active civil society.
| 45,647
|
What do you understand by ethical dilemmas? Discuss the different ethical dilemmas faced by civil servants. Also state the approach to resolve these ethical dilemmas. (150 words)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS - THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS -CONCLUSION ANSWER: An ethical dilemma refers to a situation where the person has to choose between a right and a wrong, or between 2 right things conflicting with each other. Choosing between the legal choice and the humanitarian choice, between family and work etc. are just a few of the examples of ethical dilemmas. THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS The different ethical dilemmas faced by civil servants are- I PERSONAL COST DILEMMA 1) MEANING Here, the personal interest comes in conflict with public interest. Personal interest can be monetary, material gain, benefits to family members/ near and dear ones (nepotism) and benefits related to service conditions. Material gain can be of good posting, transfers, promotion, rewards etc. 2) VALUES The values involved arededication to public service, selflessness, impartiality and integrity.Impartiality means decisions based on merit and objective criteria. 3) THE CORRECT CHOICE/ THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA Public interest should always precede personal interest no matter what be the reason. Public office should never be used for private benefits- it means corruption and misuse of power (no matter how compelling the reason be). II RIGHT VERSUS RIGHT DILEMMA 2) MEANING Here two desirable values come in conflict with each other. 3) EXAMPLES Law versus ethics, merit versus social equity (concessions), environment versus development, impartiality versus compassion are some of the examples of such type of a dilemma. (All these are public interest versus public interest type dilemmas). 4) THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA The 1st best option is a synthesis of both the contending options, if possible. For example, going for sustainable development can be a solution to the development versus environment problem. The second best option is to pick one value over the other depending upon the situation. The other option is to go for an innovative solution (depending upon the specific case). III SITUATIONS OF CONFLICT OF INTEREST 1) MEANING In this there might be a conflict of interest between the civil servant’s own goals and aspirations and public interest, between two different stakeholders/ parties involved in the case etc. 2) EXAMPLES For example, being honest might come at the cost of a bad posting or even a threat to life. Development of a district or area might come at the cost of displacing a few aged and poor families. 3) SOLUTION In such cases, generally one interest has to be forgone. Therefore, it must be ensured that at no cost does life or even the dignity of life suffer. Both of these are fundamental as well as humanitarian rights (recognized and guaranteed by our constitution). If the question is of personal interest, then that must be forgone without second thoughts, as service to the nation is a civil servant’s primary duty- and this must be kept in mind, not only after coming into service, but also right from the time when one starts aspiring for such services. IV WHISTLEBLOWERS" DILEMMA 1) MEANING This means revealing some sensitive information like corruption, mal-governance etc. at the cost of risking one’s life. 2) EXAMPLES There are many examples of this, many famed and may not come to light as yet. The most famous cases are those of Satyendra Dubey, the whistleblower in the Ranjit Sinha case (defended by Prashant Bhushan) etc. 3) SOLUTION The officer must first inform the higher authorities. As the whistleblowers protection has become stronger than before through law, she must seek the appropriate level of protection from the government, and as much security is needed to protect her life. However, whatever be the case and situation, public interest must precede private interest. Any step at any point of time must not be taken by putting own interest before the nation’s interest. A choice might be a difficult choice. But this difficult choice might be the ethically correct choice. THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS I THE STEPS TO RESOLVE DILEMMAS 1) IDENTIFICATION OF DIFFERENT ETHICAL ISSUES IN THE CASE First, the various stakeholders of the case must be identified. Then, the ethical issues for various stakeholders be identified. Also the ethical values and the ethical dilemmas must be identified. 2) IDENTIFYING ALL THE POSSIBLE ALTERNATIVES OR SOLUTIONS TO RESOLVE THE DILEMMA Every option available must be identified. 3) ANALYZING EACH ALTERNATIVE INDEPENDENTLY AGAINST THE MERITS AND DEMERITS Each alternative/ option so identified must be analyzed by listing its merits and demerits. Not only merits and demerits, but also weights should be assigned to each merit and demerit. Because it is possible that the demerits might be many and merit only one, but the merit (for example, public interest, saving a child’s life etc.) might be so great that it outweighs all the other small demerits. 4) CHOOSING THE BEST ALTERNATIVE Based upon the analysis so done, the best alternative should be chosen. It can be a course of action as well, or a combination of one or two options. II POINTS TO BE TAKEN INTO ACCOUNT WHILE RESOLVING THE DILEMMA 1) THE CONSTITUTIONAL POSITION/ PROVISION ON THE MATTER One must know and give precedence to the constitutional provisions on the matter. The values of the preamble, fundamental rights, DPSPs, fundamental duties etc. must be considered and given prior importance while solving such dilemmas 2) LEGAL POSITION After that one must be aware of the law in place regarding the issue, and take action/ the decision accordingly. 3) SUPREME COURT JUDGMENT(S) This can also provide valuable inputs regarding the way forward or the correct course of action. For example, the Vishakha guidelines, Aruna Shanbaug case etc. 4) CODE OF CONDUCT AND CODE OF ETHICS These are professional ethics for a civil servant and are general guidelines, which must always be kept in mind and guide the behavior and decisions of the civil servants. Apart from the above, certain personal considerations are also very important while solving ethical dilemmas- like the conscience of the civil servants. This is of utmost importance in heinous crimes like manual scavenging, mob lynching, communal violence, sexual harassment/ crimes etc. Also, sometimes it is very important to be able to go against the majority. For example, Raja Ram Mohan Roy went against sati pratha. Civil servants should have such traits of courage and fearlessness against the evils of society and must be able to take the bold stand, like our freedom fighters were able to do in the past. Our country has many more freedom battles to fight against, such as injustice and atrocities against women, caste related social crimes, corruption in governance etc. And for this the iron steel framework in the form of the civil servants are of utmost importance, along with a vigil and active civil society.
|
##Question:What do you understand by ethical dilemmas? Discuss the different ethical dilemmas faced by civil servants. Also state the approach to resolve these ethical dilemmas. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS - THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS -CONCLUSION ANSWER: An ethical dilemma refers to a situation where the person has to choose between a right and a wrong, or between 2 right things conflicting with each other. Choosing between the legal choice and the humanitarian choice, between family and work etc. are just a few of the examples of ethical dilemmas. THE DIFFERENT ETHICAL DILEMMAS FACED BY CIVIL SERVANTS The different ethical dilemmas faced by civil servants are- I PERSONAL COST DILEMMA 1) MEANING Here, the personal interest comes in conflict with public interest. Personal interest can be monetary, material gain, benefits to family members/ near and dear ones (nepotism) and benefits related to service conditions. Material gain can be of good posting, transfers, promotion, rewards etc. 2) VALUES The values involved arededication to public service, selflessness, impartiality and integrity.Impartiality means decisions based on merit and objective criteria. 3) THE CORRECT CHOICE/ THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA Public interest should always precede personal interest no matter what be the reason. Public office should never be used for private benefits- it means corruption and misuse of power (no matter how compelling the reason be). II RIGHT VERSUS RIGHT DILEMMA 2) MEANING Here two desirable values come in conflict with each other. 3) EXAMPLES Law versus ethics, merit versus social equity (concessions), environment versus development, impartiality versus compassion are some of the examples of such type of a dilemma. (All these are public interest versus public interest type dilemmas). 4) THE SOLUTION TO SUCH A DILEMMA The 1st best option is a synthesis of both the contending options, if possible. For example, going for sustainable development can be a solution to the development versus environment problem. The second best option is to pick one value over the other depending upon the situation. The other option is to go for an innovative solution (depending upon the specific case). III SITUATIONS OF CONFLICT OF INTEREST 1) MEANING In this there might be a conflict of interest between the civil servant’s own goals and aspirations and public interest, between two different stakeholders/ parties involved in the case etc. 2) EXAMPLES For example, being honest might come at the cost of a bad posting or even a threat to life. Development of a district or area might come at the cost of displacing a few aged and poor families. 3) SOLUTION In such cases, generally one interest has to be forgone. Therefore, it must be ensured that at no cost does life or even the dignity of life suffer. Both of these are fundamental as well as humanitarian rights (recognized and guaranteed by our constitution). If the question is of personal interest, then that must be forgone without second thoughts, as service to the nation is a civil servant’s primary duty- and this must be kept in mind, not only after coming into service, but also right from the time when one starts aspiring for such services. IV WHISTLEBLOWERS" DILEMMA 1) MEANING This means revealing some sensitive information like corruption, mal-governance etc. at the cost of risking one’s life. 2) EXAMPLES There are many examples of this, many famed and may not come to light as yet. The most famous cases are those of Satyendra Dubey, the whistleblower in the Ranjit Sinha case (defended by Prashant Bhushan) etc. 3) SOLUTION The officer must first inform the higher authorities. As the whistleblowers protection has become stronger than before through law, she must seek the appropriate level of protection from the government, and as much security is needed to protect her life. However, whatever be the case and situation, public interest must precede private interest. Any step at any point of time must not be taken by putting own interest before the nation’s interest. A choice might be a difficult choice. But this difficult choice might be the ethically correct choice. THE GENERAL APPROACH FOR RESOLVING SUCH DILEMMAS I THE STEPS TO RESOLVE DILEMMAS 1) IDENTIFICATION OF DIFFERENT ETHICAL ISSUES IN THE CASE First, the various stakeholders of the case must be identified. Then, the ethical issues for various stakeholders be identified. Also the ethical values and the ethical dilemmas must be identified. 2) IDENTIFYING ALL THE POSSIBLE ALTERNATIVES OR SOLUTIONS TO RESOLVE THE DILEMMA Every option available must be identified. 3) ANALYZING EACH ALTERNATIVE INDEPENDENTLY AGAINST THE MERITS AND DEMERITS Each alternative/ option so identified must be analyzed by listing its merits and demerits. Not only merits and demerits, but also weights should be assigned to each merit and demerit. Because it is possible that the demerits might be many and merit only one, but the merit (for example, public interest, saving a child’s life etc.) might be so great that it outweighs all the other small demerits. 4) CHOOSING THE BEST ALTERNATIVE Based upon the analysis so done, the best alternative should be chosen. It can be a course of action as well, or a combination of one or two options. II POINTS TO BE TAKEN INTO ACCOUNT WHILE RESOLVING THE DILEMMA 1) THE CONSTITUTIONAL POSITION/ PROVISION ON THE MATTER One must know and give precedence to the constitutional provisions on the matter. The values of the preamble, fundamental rights, DPSPs, fundamental duties etc. must be considered and given prior importance while solving such dilemmas 2) LEGAL POSITION After that one must be aware of the law in place regarding the issue, and take action/ the decision accordingly. 3) SUPREME COURT JUDGMENT(S) This can also provide valuable inputs regarding the way forward or the correct course of action. For example, the Vishakha guidelines, Aruna Shanbaug case etc. 4) CODE OF CONDUCT AND CODE OF ETHICS These are professional ethics for a civil servant and are general guidelines, which must always be kept in mind and guide the behavior and decisions of the civil servants. Apart from the above, certain personal considerations are also very important while solving ethical dilemmas- like the conscience of the civil servants. This is of utmost importance in heinous crimes like manual scavenging, mob lynching, communal violence, sexual harassment/ crimes etc. Also, sometimes it is very important to be able to go against the majority. For example, Raja Ram Mohan Roy went against sati pratha. Civil servants should have such traits of courage and fearlessness against the evils of society and must be able to take the bold stand, like our freedom fighters were able to do in the past. Our country has many more freedom battles to fight against, such as injustice and atrocities against women, caste related social crimes, corruption in governance etc. And for this the iron steel framework in the form of the civil servants are of utmost importance, along with a vigil and active civil society.
| 45,648
|
नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने तथा प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द/10 अंक) To make the Citizen-Charter more effective and increase citizen participation in the administration, Mention the recommendations made by the Second Administrative Reform Commission. (150-200 words/10 marks)
|
एप्रोच- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तथा उसके विभिन्न सिफारिशों के संदर्भ में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में,नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ मेंद्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में,प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| उत्तर- वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में 2005 में प्रशासन के संदर्भ में विभिन्न आयामों पर सुझाव देने हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था| इस आयोग ने सरकार के सभी स्तरों पर सक्रीय, उत्तरदायी, जवाबदेह एवं कुशल व्यवस्था के निर्माण के संदर्भ में विभिन्न सिफारिशोंको प्रस्तुत किया था|इसमें शासन को ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु निम्न आयामों के संदर्भ में सुझाव प्रस्तुत किए गये थें-सुशासन के मास्टर कुंजी के रूप में सूचना के अधिकार का महत्व; मानव पूंजी तथा गवर्नेंस; शासन में नैतिकता तथा सार्वजनिक व्यवस्था; स्थानीय प्रशासन तथा विवाद सुलझाने के लिए क्षमता निर्माण; ई-गवर्नेंस तथा नागरिक केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देना; वितीय प्रबंधन प्रणाली को मजबूत बनाना आदि| नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिक चार्टर को प्रभावी बनाने हेतु सुधार के लिए एजेंडा के तहत निम्न आयामों पर विस्तृत ध्यान दिया जाना चाहिए- सभी के लिए एक आकार उपयुक्त नहीं है| संगठन के चार्टर के समग्र क्षेत्र के अंतर्गत प्रत्येक स्वतंत्र यूनिट के लिए नागरिक चार्टर तैयार किया जाना चाहिए| व्यापक परामर्श जिसके तहत प्रक्रिया में सिविल सोसायटी भी सम्मिलित हो| पक्की वचनबद्धता की जानी चाहिए| चार्टर में दी गई वचनबद्धताओं को पूरा करने के लिए आंतरिक प्रक्रिया और संरचना में सुधार किया जाना चाहिए| चूक के मामले में समाधान तंत्र का विकास; नागरिक चार्टर का समय समय पर आकलन; उपभोगता फीडबैक का इस्तेमाल करके बेंचमार्क निर्धारण; अधिकारियों को परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए; नागरिक केन्द्रिकता के लिए केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा वर्णित 7 उपाय मंडलों को उन सभी संगठनों के लिए अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए जो जनता के साथ अन्योन्यक्रिया करते हैं| प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिकों से सुझावों की प्राप्ति के लिए एक उपयुक्त पद्धति का विकास करना सभी सरकारी संगठनों के लिए अनिवार्य होना चाहिए जो सादे सुझाव बक्से से लेकर नागरिक समूहों के साथ समय-समय पर विचार विमर्श के रूप में हो सकता है| संबंधित संगठनों के अध्यक्षों को प्राप्त सुझाव पर, कठोर अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे कि यह एक सार्थक प्रक्रिया बन सके प्रोत्साहनों और पुरस्कारों की एक पद्धति लागू की जानी चाहिए ताकि जिन सुझावों के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण सुधार अथवा बचत प्राप्त हो उन्हें स्वीकार किया जा सके| प्रत्येक सरकारी संगठनों को निम्नलिखित आयामों को सुनिश्चित करना चाहिए - सभी शिकायतों के पंजीकरण के लिए एक त्रुटि रहित पद्धति; प्रतिक्रिया और समाधान के लिए एक निर्धारित समय अनुसूची; उपरोक्त को सुनिश्चित कराने के लिए निर्धारित मानदंडों का अनुपालन किया जाए तथा एक मॉनिटरन और आकलन पद्धति का विकास; ऐसी पद्धति को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों के उपयोग से मदद मिल सकती है| सरकारी संगठनों के प्रमुखों को नागरिकों की शिकायतों के समयबद्ध समाधान हेतु ऐसी पद्धति का विकास सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए| सभी सरकारी संगठनों द्वारा अपनी सेवाओं के संबंध में नागरिकों की प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाने के लिए नियमित नागरिक फीडबैक और सर्वेक्षण व नागरिक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाना चाहिए| इनका उपयोग संगठन की कार्यकुशलता में सुधार करने के लिए इनपुट के रूप में किया जा सकता है| यद्यपि शासन में नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए, समान रूप से कोई एक प्रक्रिया अथवा पद्धति निर्धारित नहीं की जा सकती, फिर भी सभी स्तरों पर सार्वजनिक एजेंसियों के बीच शासन में उनकी भागीदारी प्रोत्साहित करने के लिए संस्थागत पद्धतियां कायम करने की जरूरत है| ऐसे होने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक है- प्रत्येक विभाग/सार्वजनिक एजेंसियों में नीति की एक व्यापक समीक्षा; प्रशासनिक प्रक्रिया में संशोधन करना, जहां आवश्यक हो; शासन में नागरिक भागीदारी को संस्थागत बनाने का कार्य किसी वरिष्ठ स्तरीय अधिकारी को सौंपना; शासन में नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करने में कारगरता शामिल करने के लिए निष्पादन प्रबंधन समीक्षाएं; महिलाओं और शारीरिक विकलांगों की भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान नागरिक केंद्रीय प्रशासन का विशिष्टउद्देश्यहोना चाहिए और यह विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों में नागरिक चार्टर और शिकायत समाधान तंत्र सहित परिलक्षित होना चाहिए| सरकारी संगठनों को विनियामक कार्यों का निष्पादन करते समय उल्लेखित सिद्धांतों का पालन करना चाहिए| सरकारी एजेंसियों को, चाहे वह विकासात्मक हो या विनियामक, बाधाओं को न्यूनतम करने तथा नागरिकों के लिए अधिकतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए अपने संगठनों के अंदर एकल खिड़की एजेंसी अवधारणा लागू करनी चाहिए| अतः उपरोक्त व्यापक प्रावधानों के माध्यम से द्वितीय प्रशासनिक सुधार की अहम् भूमिका को समझा जा सकता है|
|
##Question:नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने तथा प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द/10 अंक) To make the Citizen-Charter more effective and increase citizen participation in the administration, Mention the recommendations made by the Second Administrative Reform Commission. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तथा उसके विभिन्न सिफारिशों के संदर्भ में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में,नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ मेंद्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में,प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| उत्तर- वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में 2005 में प्रशासन के संदर्भ में विभिन्न आयामों पर सुझाव देने हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था| इस आयोग ने सरकार के सभी स्तरों पर सक्रीय, उत्तरदायी, जवाबदेह एवं कुशल व्यवस्था के निर्माण के संदर्भ में विभिन्न सिफारिशोंको प्रस्तुत किया था|इसमें शासन को ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु निम्न आयामों के संदर्भ में सुझाव प्रस्तुत किए गये थें-सुशासन के मास्टर कुंजी के रूप में सूचना के अधिकार का महत्व; मानव पूंजी तथा गवर्नेंस; शासन में नैतिकता तथा सार्वजनिक व्यवस्था; स्थानीय प्रशासन तथा विवाद सुलझाने के लिए क्षमता निर्माण; ई-गवर्नेंस तथा नागरिक केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देना; वितीय प्रबंधन प्रणाली को मजबूत बनाना आदि| नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिक चार्टर को प्रभावी बनाने हेतु सुधार के लिए एजेंडा के तहत निम्न आयामों पर विस्तृत ध्यान दिया जाना चाहिए- सभी के लिए एक आकार उपयुक्त नहीं है| संगठन के चार्टर के समग्र क्षेत्र के अंतर्गत प्रत्येक स्वतंत्र यूनिट के लिए नागरिक चार्टर तैयार किया जाना चाहिए| व्यापक परामर्श जिसके तहत प्रक्रिया में सिविल सोसायटी भी सम्मिलित हो| पक्की वचनबद्धता की जानी चाहिए| चार्टर में दी गई वचनबद्धताओं को पूरा करने के लिए आंतरिक प्रक्रिया और संरचना में सुधार किया जाना चाहिए| चूक के मामले में समाधान तंत्र का विकास; नागरिक चार्टर का समय समय पर आकलन; उपभोगता फीडबैक का इस्तेमाल करके बेंचमार्क निर्धारण; अधिकारियों को परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए; नागरिक केन्द्रिकता के लिए केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा वर्णित 7 उपाय मंडलों को उन सभी संगठनों के लिए अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए जो जनता के साथ अन्योन्यक्रिया करते हैं| प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिकों से सुझावों की प्राप्ति के लिए एक उपयुक्त पद्धति का विकास करना सभी सरकारी संगठनों के लिए अनिवार्य होना चाहिए जो सादे सुझाव बक्से से लेकर नागरिक समूहों के साथ समय-समय पर विचार विमर्श के रूप में हो सकता है| संबंधित संगठनों के अध्यक्षों को प्राप्त सुझाव पर, कठोर अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे कि यह एक सार्थक प्रक्रिया बन सके प्रोत्साहनों और पुरस्कारों की एक पद्धति लागू की जानी चाहिए ताकि जिन सुझावों के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण सुधार अथवा बचत प्राप्त हो उन्हें स्वीकार किया जा सके| प्रत्येक सरकारी संगठनों को निम्नलिखित आयामों को सुनिश्चित करना चाहिए - सभी शिकायतों के पंजीकरण के लिए एक त्रुटि रहित पद्धति; प्रतिक्रिया और समाधान के लिए एक निर्धारित समय अनुसूची; उपरोक्त को सुनिश्चित कराने के लिए निर्धारित मानदंडों का अनुपालन किया जाए तथा एक मॉनिटरन और आकलन पद्धति का विकास; ऐसी पद्धति को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों के उपयोग से मदद मिल सकती है| सरकारी संगठनों के प्रमुखों को नागरिकों की शिकायतों के समयबद्ध समाधान हेतु ऐसी पद्धति का विकास सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए| सभी सरकारी संगठनों द्वारा अपनी सेवाओं के संबंध में नागरिकों की प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाने के लिए नियमित नागरिक फीडबैक और सर्वेक्षण व नागरिक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाना चाहिए| इनका उपयोग संगठन की कार्यकुशलता में सुधार करने के लिए इनपुट के रूप में किया जा सकता है| यद्यपि शासन में नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए, समान रूप से कोई एक प्रक्रिया अथवा पद्धति निर्धारित नहीं की जा सकती, फिर भी सभी स्तरों पर सार्वजनिक एजेंसियों के बीच शासन में उनकी भागीदारी प्रोत्साहित करने के लिए संस्थागत पद्धतियां कायम करने की जरूरत है| ऐसे होने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक है- प्रत्येक विभाग/सार्वजनिक एजेंसियों में नीति की एक व्यापक समीक्षा; प्रशासनिक प्रक्रिया में संशोधन करना, जहां आवश्यक हो; शासन में नागरिक भागीदारी को संस्थागत बनाने का कार्य किसी वरिष्ठ स्तरीय अधिकारी को सौंपना; शासन में नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करने में कारगरता शामिल करने के लिए निष्पादन प्रबंधन समीक्षाएं; महिलाओं और शारीरिक विकलांगों की भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान नागरिक केंद्रीय प्रशासन का विशिष्टउद्देश्यहोना चाहिए और यह विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों में नागरिक चार्टर और शिकायत समाधान तंत्र सहित परिलक्षित होना चाहिए| सरकारी संगठनों को विनियामक कार्यों का निष्पादन करते समय उल्लेखित सिद्धांतों का पालन करना चाहिए| सरकारी एजेंसियों को, चाहे वह विकासात्मक हो या विनियामक, बाधाओं को न्यूनतम करने तथा नागरिकों के लिए अधिकतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए अपने संगठनों के अंदर एकल खिड़की एजेंसी अवधारणा लागू करनी चाहिए| अतः उपरोक्त व्यापक प्रावधानों के माध्यम से द्वितीय प्रशासनिक सुधार की अहम् भूमिका को समझा जा सकता है|
| 45,654
|
The Himalayas play a key role in influencing the economic, cultural and politicalaspects of the region. In this context enumerate the importance of the Himalayas for India. (150 words)
|
Approach:- Write a brief introduction on Himalayas. Discuss its importance to India. Answer:- The Himalayas are young fold mountains formed due to the collision of the Indian plate with the Eurasian plate. Theyare the mightiest and the loftiest mountains of the world with as many as 40 peaks of over 7000 meters. They transverse from the west to east over the Indian sub-continent like a great wall and affect its climate, culture and society. Importance of Himalayas to India Climate: They intercept the summer monsoons coming from the Bay of Bengal and Arabian Sea causing precipitation in the entire Ganga Plains, North-Eastern Hills. They protect northern-plains from the cold continental air masses of central Asia. The Himalayas influence the path of Sub-tropical Jet stream flowing in the region. They split the jet stream and this split jet stream plays an important role in bring monsoons to India. Polity: They act as a natural boundary with our neighbouring countries. Eg China (Tibet) They also act as a natural defence barrier due to their lofty heights and extreme weather. Economy: Source of rivers like Ganga which supports the economy of densely populated states of Uttar Pradesh, Bihar etc. These rivers also bring huge deposits of fertile alluvial soil which supports the agriculture in the region. These rivers also create opportunity for allied agricultural activity like freshwater fishery. The Himalayan climate also supports production of many horticulture crops such as apples, oranges. Kashmir valley is renowned for Kesar production. Similarly the tea plantation in the eastern Himalayas like in Darjiling. Himalayas also have huge hydroelectric potential, helping us meet our power demand. There are a number of tourist spots. Cultural tourism such as pilgrimage to Kedarnath, Amarnath etc. Adventure sports such as rafting in Rishikesh, treks like valley of flowers etc.The latestmodel of tourism - eco-tourism is also gaining popularity in the Himalayas for a sustainble approach in some fragile ecosystem. These activities supports the local economy of the region. Bio-Diversity: Himalayas also support a very wide bio-diversity in terms of both Flora and Fauna. There are many medicinal plants as well as animals like Himalayan brown bear found there. Presence of temperate grasslands or Bugyals such as Auli, Bedni which also serves as skiing spots. Culture: The effect on climate translates to many cultural aspects such as the dressing sense and the culinary habit of the region. It has also helped us in our isolated evolution from the other neighbouring regions which has resulted in a unique and distinct culture. Eg. Indian culture is distinct from the culture of other Asian countries such as China in form of language, philosophy, architecture etc. Minerals: The himalayas also have reservers of certain minerals such as coal of anthracite quality. There are also some reserves of copper, zinc, cobalt etc. ( not taught in class yet, will be covered later) We see how the Himalayas have a far reaching impact on various facets of life in India, especially in the regions up to the northern plains. The Himalayas has become a part of our Indian identity.
|
##Question:The Himalayas play a key role in influencing the economic, cultural and politicalaspects of the region. In this context enumerate the importance of the Himalayas for India. (150 words)##Answer:Approach:- Write a brief introduction on Himalayas. Discuss its importance to India. Answer:- The Himalayas are young fold mountains formed due to the collision of the Indian plate with the Eurasian plate. Theyare the mightiest and the loftiest mountains of the world with as many as 40 peaks of over 7000 meters. They transverse from the west to east over the Indian sub-continent like a great wall and affect its climate, culture and society. Importance of Himalayas to India Climate: They intercept the summer monsoons coming from the Bay of Bengal and Arabian Sea causing precipitation in the entire Ganga Plains, North-Eastern Hills. They protect northern-plains from the cold continental air masses of central Asia. The Himalayas influence the path of Sub-tropical Jet stream flowing in the region. They split the jet stream and this split jet stream plays an important role in bring monsoons to India. Polity: They act as a natural boundary with our neighbouring countries. Eg China (Tibet) They also act as a natural defence barrier due to their lofty heights and extreme weather. Economy: Source of rivers like Ganga which supports the economy of densely populated states of Uttar Pradesh, Bihar etc. These rivers also bring huge deposits of fertile alluvial soil which supports the agriculture in the region. These rivers also create opportunity for allied agricultural activity like freshwater fishery. The Himalayan climate also supports production of many horticulture crops such as apples, oranges. Kashmir valley is renowned for Kesar production. Similarly the tea plantation in the eastern Himalayas like in Darjiling. Himalayas also have huge hydroelectric potential, helping us meet our power demand. There are a number of tourist spots. Cultural tourism such as pilgrimage to Kedarnath, Amarnath etc. Adventure sports such as rafting in Rishikesh, treks like valley of flowers etc.The latestmodel of tourism - eco-tourism is also gaining popularity in the Himalayas for a sustainble approach in some fragile ecosystem. These activities supports the local economy of the region. Bio-Diversity: Himalayas also support a very wide bio-diversity in terms of both Flora and Fauna. There are many medicinal plants as well as animals like Himalayan brown bear found there. Presence of temperate grasslands or Bugyals such as Auli, Bedni which also serves as skiing spots. Culture: The effect on climate translates to many cultural aspects such as the dressing sense and the culinary habit of the region. It has also helped us in our isolated evolution from the other neighbouring regions which has resulted in a unique and distinct culture. Eg. Indian culture is distinct from the culture of other Asian countries such as China in form of language, philosophy, architecture etc. Minerals: The himalayas also have reservers of certain minerals such as coal of anthracite quality. There are also some reserves of copper, zinc, cobalt etc. ( not taught in class yet, will be covered later) We see how the Himalayas have a far reaching impact on various facets of life in India, especially in the regions up to the northern plains. The Himalayas has become a part of our Indian identity.
| 45,664
|
नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने तथा प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध मेंद्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| (200 शब्द) To make the Citizen-Charter more effective and increase citizen participation in the administration, Mention the recommendations made by the Second Administrative Reform Commission. (200 words)
|
एप्रोच- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तथा उसके विभिन्न सिफारिशों के संदर्भ में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में,नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ मेंद्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में,प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| उत्तर- वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में 2005 में प्रशासन के संदर्भ में विभिन्न आयामों पर सुझाव देने हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था| इस आयोग ने सरकार के सभी स्तरों पर सक्रीय, उत्तरदायी, जवाबदेह एवं कुशल व्यवस्था के निर्माण के संदर्भ में विभिन्न सिफारिशों को प्रस्तुत किया था|इसमें शासन को ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु निम्न आयामों के संदर्भ में सुझाव प्रस्तुत किए गये थें-सुशासन के मास्टर कुंजी के रूप में सूचना के अधिकार का महत्व; मानव पूंजी तथा गवर्नेंस; शासन में नैतिकता तथा सार्वजनिक व्यवस्था; स्थानीय प्रशासन तथा विवाद सुलझाने के लिए क्षमता निर्माण; ई-गवर्नेंस तथा नागरिक केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देना; वितीय प्रबंधन प्रणाली को मजबूत बनाना आदि| नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिक चार्टर को प्रभावी बनाने हेतु सुधार के लिए एजेंडा के तहत निम्न आयामों पर विस्तृत ध्यान दिया जाना चाहिए- सभी के लिए एक आकार उपयुक्त नहीं है| संगठन के चार्टर के समग्र क्षेत्र के अंतर्गत प्रत्येक स्वतंत्र यूनिट के लिए नागरिक चार्टर तैयार किया जाना चाहिए| व्यापक परामर्श जिसके तहत प्रक्रिया में सिविल सोसायटी भी सम्मिलित हो| पक्की वचनबद्धता की जानी चाहिए| चार्टर में दी गई वचनबद्धताओं को पूरा करने के लिए आंतरिक प्रक्रिया और संरचना में सुधार किया जाना चाहिए| चूक के मामले में समाधान तंत्र का विकास; नागरिक चार्टर का समय समय पर आकलन; उपभोगता फीडबैक का इस्तेमाल करके बेंचमार्क निर्धारण; अधिकारियों को परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए; नागरिक केन्द्रिकता के लिए केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा वर्णित 7 उपाय मंडलों को उन सभी संगठनों के लिए अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए जो जनता के साथ अन्योन्यक्रिया करते हैं| प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिकों से सुझावों की प्राप्ति के लिए एक उपयुक्त पद्धति का विकास करना सभी सरकारी संगठनों के लिए अनिवार्य होना चाहिए जो सादे सुझाव बक्से से लेकर नागरिक समूहों के साथ समय-समय पर विचार विमर्श के रूप में हो सकता है| संबंधित संगठनों के अध्यक्षों को प्राप्त सुझाव पर, कठोर अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे कि यह एक सार्थक प्रक्रिया बन सके प्रोत्साहनों और पुरस्कारों की एक पद्धति लागू की जानी चाहिए ताकि जिन सुझावों के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण सुधार अथवा बचत प्राप्त हो उन्हें स्वीकार किया जा सके| प्रत्येक सरकारी संगठनों को निम्नलिखित आयामों को सुनिश्चित करना चाहिए - सभी शिकायतों के पंजीकरण के लिए एक त्रुटि रहित पद्धति; प्रतिक्रिया और समाधान के लिए एक निर्धारित समय अनुसूची; उपरोक्त को सुनिश्चित कराने के लिए निर्धारित मानदंडों का अनुपालन किया जाए तथा एक मॉनिटरन और आकलन पद्धति का विकास; ऐसी पद्धति को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों के उपयोग से मदद मिल सकती है| सरकारी संगठनों के प्रमुखों को नागरिकों की शिकायतों के समयबद्ध समाधान हेतु ऐसी पद्धति का विकास सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए| सभी सरकारी संगठनों द्वारा अपनी सेवाओं के संबंध में नागरिकों की प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाने के लिए नियमित नागरिक फीडबैक और सर्वेक्षण व नागरिक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाना चाहिए| इनका उपयोग संगठन की कार्यकुशलता में सुधार करने के लिए इनपुट के रूप में किया जा सकता है| यद्यपि शासन में नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए, समान रूप से कोई एक प्रक्रिया अथवा पद्धति निर्धारित नहीं की जा सकती, फिर भी सभी स्तरों पर सार्वजनिक एजेंसियों के बीच शासन में उनकी भागीदारी प्रोत्साहित करने के लिए संस्थागत पद्धतियां कायम करने की जरूरत है| ऐसे होने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक है- प्रत्येक विभाग/सार्वजनिक एजेंसियों में नीति की एक व्यापक समीक्षा; प्रशासनिक प्रक्रिया में संशोधन करना, जहां आवश्यक हो; शासन में नागरिक भागीदारी को संस्थागत बनाने का कार्य किसी वरिष्ठ स्तरीय अधिकारी को सौंपना; शासन में नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करने में कारगरता शामिल करने के लिए निष्पादन प्रबंधन समीक्षाएं; महिलाओं और शारीरिक विकलांगों की भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान नागरिक केंद्रीय प्रशासन का विशिष्टउद्देश्यहोना चाहिए और यह विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों में नागरिक चार्टर और शिकायत समाधान तंत्र सहित परिलक्षित होना चाहिए| सरकारी संगठनों को विनियामक कार्यों का निष्पादन करते समय उल्लेखित सिद्धांतों का पालन करना चाहिए| सरकारी एजेंसियों को, चाहे वह विकासात्मक हो या विनियामक, बाधाओं को न्यूनतम करने तथा नागरिकों के लिए अधिकतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए अपने संगठनों के अंदर एकल खिड़की एजेंसी अवधारणा लागू करनी चाहिए| अतः उपरोक्त व्यापक प्रावधानों के माध्यम से द्वितीय प्रशासनिक सुधार की अहम् भूमिका को समझा जा सकता है|
|
##Question:नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने तथा प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध मेंद्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| (200 शब्द) To make the Citizen-Charter more effective and increase citizen participation in the administration, Mention the recommendations made by the Second Administrative Reform Commission. (200 words)##Answer:एप्रोच- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग तथा उसके विभिन्न सिफारिशों के संदर्भ में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में,नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ मेंद्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में,प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा किए गये सिफारिशों का उल्लेख कीजिए| उत्तर- वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में 2005 में प्रशासन के संदर्भ में विभिन्न आयामों पर सुझाव देने हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था| इस आयोग ने सरकार के सभी स्तरों पर सक्रीय, उत्तरदायी, जवाबदेह एवं कुशल व्यवस्था के निर्माण के संदर्भ में विभिन्न सिफारिशों को प्रस्तुत किया था|इसमें शासन को ज्यादा प्रभावी बनाने हेतु निम्न आयामों के संदर्भ में सुझाव प्रस्तुत किए गये थें-सुशासन के मास्टर कुंजी के रूप में सूचना के अधिकार का महत्व; मानव पूंजी तथा गवर्नेंस; शासन में नैतिकता तथा सार्वजनिक व्यवस्था; स्थानीय प्रशासन तथा विवाद सुलझाने के लिए क्षमता निर्माण; ई-गवर्नेंस तथा नागरिक केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देना; वितीय प्रबंधन प्रणाली को मजबूत बनाना आदि| नागरिक चार्टर को अधिक प्रभावी बनाने के संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिक चार्टर को प्रभावी बनाने हेतु सुधार के लिए एजेंडा के तहत निम्न आयामों पर विस्तृत ध्यान दिया जाना चाहिए- सभी के लिए एक आकार उपयुक्त नहीं है| संगठन के चार्टर के समग्र क्षेत्र के अंतर्गत प्रत्येक स्वतंत्र यूनिट के लिए नागरिक चार्टर तैयार किया जाना चाहिए| व्यापक परामर्श जिसके तहत प्रक्रिया में सिविल सोसायटी भी सम्मिलित हो| पक्की वचनबद्धता की जानी चाहिए| चार्टर में दी गई वचनबद्धताओं को पूरा करने के लिए आंतरिक प्रक्रिया और संरचना में सुधार किया जाना चाहिए| चूक के मामले में समाधान तंत्र का विकास; नागरिक चार्टर का समय समय पर आकलन; उपभोगता फीडबैक का इस्तेमाल करके बेंचमार्क निर्धारण; अधिकारियों को परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए; नागरिक केन्द्रिकता के लिए केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा वर्णित 7 उपाय मंडलों को उन सभी संगठनों के लिए अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए जो जनता के साथ अन्योन्यक्रिया करते हैं| प्रशासन में नागरिक भागीदारी बढ़ाने के संबंध में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा की गयी सिफारिशें- नागरिकों से सुझावों की प्राप्ति के लिए एक उपयुक्त पद्धति का विकास करना सभी सरकारी संगठनों के लिए अनिवार्य होना चाहिए जो सादे सुझाव बक्से से लेकर नागरिक समूहों के साथ समय-समय पर विचार विमर्श के रूप में हो सकता है| संबंधित संगठनों के अध्यक्षों को प्राप्त सुझाव पर, कठोर अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे कि यह एक सार्थक प्रक्रिया बन सके प्रोत्साहनों और पुरस्कारों की एक पद्धति लागू की जानी चाहिए ताकि जिन सुझावों के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण सुधार अथवा बचत प्राप्त हो उन्हें स्वीकार किया जा सके| प्रत्येक सरकारी संगठनों को निम्नलिखित आयामों को सुनिश्चित करना चाहिए - सभी शिकायतों के पंजीकरण के लिए एक त्रुटि रहित पद्धति; प्रतिक्रिया और समाधान के लिए एक निर्धारित समय अनुसूची; उपरोक्त को सुनिश्चित कराने के लिए निर्धारित मानदंडों का अनुपालन किया जाए तथा एक मॉनिटरन और आकलन पद्धति का विकास; ऐसी पद्धति को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों के उपयोग से मदद मिल सकती है| सरकारी संगठनों के प्रमुखों को नागरिकों की शिकायतों के समयबद्ध समाधान हेतु ऐसी पद्धति का विकास सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए| सभी सरकारी संगठनों द्वारा अपनी सेवाओं के संबंध में नागरिकों की प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाने के लिए नियमित नागरिक फीडबैक और सर्वेक्षण व नागरिक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाना चाहिए| इनका उपयोग संगठन की कार्यकुशलता में सुधार करने के लिए इनपुट के रूप में किया जा सकता है| यद्यपि शासन में नागरिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए, समान रूप से कोई एक प्रक्रिया अथवा पद्धति निर्धारित नहीं की जा सकती, फिर भी सभी स्तरों पर सार्वजनिक एजेंसियों के बीच शासन में उनकी भागीदारी प्रोत्साहित करने के लिए संस्थागत पद्धतियां कायम करने की जरूरत है| ऐसे होने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक है- प्रत्येक विभाग/सार्वजनिक एजेंसियों में नीति की एक व्यापक समीक्षा; प्रशासनिक प्रक्रिया में संशोधन करना, जहां आवश्यक हो; शासन में नागरिक भागीदारी को संस्थागत बनाने का कार्य किसी वरिष्ठ स्तरीय अधिकारी को सौंपना; शासन में नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करने में कारगरता शामिल करने के लिए निष्पादन प्रबंधन समीक्षाएं; महिलाओं और शारीरिक विकलांगों की भागीदारी को सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान नागरिक केंद्रीय प्रशासन का विशिष्टउद्देश्यहोना चाहिए और यह विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों में नागरिक चार्टर और शिकायत समाधान तंत्र सहित परिलक्षित होना चाहिए| सरकारी संगठनों को विनियामक कार्यों का निष्पादन करते समय उल्लेखित सिद्धांतों का पालन करना चाहिए| सरकारी एजेंसियों को, चाहे वह विकासात्मक हो या विनियामक, बाधाओं को न्यूनतम करने तथा नागरिकों के लिए अधिकतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए अपने संगठनों के अंदर एकल खिड़की एजेंसी अवधारणा लागू करनी चाहिए| अतः उपरोक्त व्यापक प्रावधानों के माध्यम से द्वितीय प्रशासनिक सुधार की अहम् भूमिका को समझा जा सकता है|
| 45,670
|
भारत-चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिये| (10 अंक; 150 से 200 शब्द) Discuss the various dimensions of mutual cooperation between India and China. (10 marks;150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-चीन सम्बन्ध की संक्षिप्त पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में दोनों के मध्य सहयोग के आयामों की विस्तार से चर्चा कीजिए 3- अंतिम में सहयोग के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत, चीन को एक देश के रूप में मान्यता देने वाला प्राथन राष्ट्र था किन्तु जल्दी ही भारत को चीन के साथ युद्ध करना पडा| भारत एवं चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु हैं जैसे सीमा विवाद, तिब्बत मामला, आतंकवाद के सन्दर्भ में चीन का दृष्टिकोण, पाकिस्तान-चीन धुरी, व्यापार असंतुलन, OBOR एवं CPEC आदि| दोनों राष्ट्रों के हित अलग अलग हैं अतः दोनों के मध्य विवाद बने हुए हैं किन्तु इसके साथ ही भारत चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के अनेक आयाम हैं| NDB में भारत-चीन सहयोग · NDB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया| चीन इसके माध्यम से आर्थिक निर्भरता बढ़ाना चाहता होगा, चीन NDB में अधिकाँश फंडिंग करना चाहता था जिसका भारत द्वारा विरोध किया गया · अतः NDB की संरचना में सामान हिस्सेदारी का सिद्धांत अपनाया गया और प्रत्येक देश को 10 बिलियन डॉलर का योगदान निर्धारित किया गया, बाद में इसे 20 बिलियन डॉलर तक ले जाना है · यहाँ बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जायेंगेसभी सदस्यों को सामान महत्त्व देते हिये एक देश एक वोट का सिद्धांत अपनाया गया है, किसी भी देश को वीटो पॉवर नहीं दिया गया है · यह भारत एवं चीन के मध्य सहयोग का एक महत्वपूर्ण आयाम है, इसके माध्यम से विश्व बैंक को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है| क्योंकि IMF एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाएं पश्चिमी एवं विकसित देशों के पक्ष में झुई हुई हैं| एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक में सहयोग · ऐसे प्रोजेक्ट जिससे पूँजी निर्माण होता है ऐसी पूँजी को उपलब्ध कराने के लिए वर्तमान में IMF सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था है IMF आर्थिक योगदान के आधार पर ही मताधिकार दिया जाता है| · AIIB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया है| इसमें चीन का योगदान सर्वाधिक है (26 %) · भारत दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, इसमें भारत की भूमिका IMF की तुलना में विस्तृत हुई है · AIIB वस्तुतः IMF को प्रतिस्थापित करने का एक प्रयास है · इस प्रकार रूस, भारत एवं चीन ने आपसी सहयोग के माध्यम से नई वैश्विक व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं · ADB जो कि 1960 से कार्य कर रहा है, AIIB ने पिछले 5 वर्षों में ही ADB की कुल पूँजी के 2/3 पूँजी का एकत्रण कर लिया है रूस-चीन-भारत फोरम(RIC) · इसे 2002 में स्थापित किया गया है · अमेरिका आदि देशों द्वारा विश्व में एकतरफा कार्यवाई जैसे इराक युद्ध, सीरिया युद्ध आदि उदाहरणों को देखते हुए RIC संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है · अन्तराष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों से संचालित वैश्विक व्यवस्था का विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढाने के लिए, विश्व के समक्ष चुनौती उत्पन्न करने वाली समस्याओं का बहुपक्षीय आधार पर समाधान का आह्वान करता है · RIC विभिन्न क्षेत्रीय प्रभाव केन्द्रों के साथ बहुध्रुवीय विश्व का निर्माण करना चाहता है · RIC फोरम वैश्विक संरक्षणवाद, बाधाओं का आरोपण, एकपक्षीय मानकों का आरोपण आदि के माध्यम से व्यापार को बाधित करने वाले कारकों का विरोध करते हुए समानता के आधार पर व्यापार विस्तार करता है| · इस तरह से भारत एवं चीन RIC फोरम के माध्यम से अधिक व्यवस्थित एवं नियमित विश्व के निर्माण में आपस में सहयोग कर रहे हैं शंघाई सहयोग संगठन में सहयोग · इसमें अधिकांशतः मध्य एशियाई देश हैं जो पूर्व में सोवियत संघ के भाग थे अतः रूस इन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने के लिए SCO को 2001 में स्थापित किया गया · अतः इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य एशिया में विशेषकर मध्य एशिया के क्षेत्र में अमेरिका के प्रसार को रोकना है · 2015 में रूस द्वारा भारत को इसकी सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा गया, क्योंकि भारत एवं रूस के कुछ हित समान है| इसी के साथ चीन ने पाकिस्तान को सदस्यता देने का प्रस्ताव किया गया · क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी ढांचा(RATS) SCO की संस्था है जो आतंकवाद को रोकने के लिए बनाया गया है · इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत चीन एवं पाक को आतंकवाद के सन्दर्भ में सहयोग के लिए प्रेरित कर सकता है · यह संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय सहयोग, आतंकवाद के विस्तार को रोकना(रूस में चेचन क्षेत्र, चीन में जिनजियांग, भारत में कश्मीर का क्षेत्र आतंकवाद से पीड़ित है) को प्रस्तावित करता है अतः SCO के अंतर्गत भारत-चीन के मध्य सहयोग का एक आयाम खुलता है| IMF एवं विश्व बैंक में सुधार में सहयोग · इन संस्थाओं का झुकाव पश्चिमी विकसित देशों की ओर है |इन संस्थाओं की संरचना लोकतांत्रिक नहीं है · इन संस्थाओं में यूरोप एवं अमेरिका का दबदबा है औरकोटा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है · भारत एवं चीन विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं अतः वैश्विक संस्थाओं में इनको पर्याप्त महत्त्व मिलना चाहिए · अतः भारत एक चीन दोनों एक दूसरे का सहयोग करते हुए उपरोक्त वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करते हैं वुहान अनौपचारिक शिखर सम्मलेन · यह दोनों देशों के मध्य पहली अनौपचारिक बैठक थी जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री शामिल हुए · इसमें सीमा विवाद, व्यापार घाटा, आतंकवाद के समापन, विभिन्न वैश्विक चुनौतियों यथा जलवायु परिवर्तन आदि के समाधान के लिए सहयोग पर चर्चा की गयी · भारत ने सीमा प्रबंधन के स्थान पर सीमा विवाद के समाधान की मांग की जिसे चीन ने स्वीकार किया है · दोनों देशों ने आतंकवाद पर नियंत्रण के लिए सहयोग के आपसी सहमति दी है · दोनों देश शांत, स्थिर एवं लोकतांत्रिक अफगानिस्तान के लिए संयुक्त रूप से कार्य करने के लिए सहमत हुए हैं इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत और चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु होते हुए भी पारस्परिक सहयोग के भी अनेक आयाम है| भारत इन आयामों का उपयोग करते हुए चीन के साथ अपने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कर सकता है|
|
##Question:भारत-चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिये| (10 अंक; 150 से 200 शब्द) Discuss the various dimensions of mutual cooperation between India and China. (10 marks;150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-चीन सम्बन्ध की संक्षिप्त पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में दोनों के मध्य सहयोग के आयामों की विस्तार से चर्चा कीजिए 3- अंतिम में सहयोग के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत, चीन को एक देश के रूप में मान्यता देने वाला प्राथन राष्ट्र था किन्तु जल्दी ही भारत को चीन के साथ युद्ध करना पडा| भारत एवं चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु हैं जैसे सीमा विवाद, तिब्बत मामला, आतंकवाद के सन्दर्भ में चीन का दृष्टिकोण, पाकिस्तान-चीन धुरी, व्यापार असंतुलन, OBOR एवं CPEC आदि| दोनों राष्ट्रों के हित अलग अलग हैं अतः दोनों के मध्य विवाद बने हुए हैं किन्तु इसके साथ ही भारत चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के अनेक आयाम हैं| NDB में भारत-चीन सहयोग · NDB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया| चीन इसके माध्यम से आर्थिक निर्भरता बढ़ाना चाहता होगा, चीन NDB में अधिकाँश फंडिंग करना चाहता था जिसका भारत द्वारा विरोध किया गया · अतः NDB की संरचना में सामान हिस्सेदारी का सिद्धांत अपनाया गया और प्रत्येक देश को 10 बिलियन डॉलर का योगदान निर्धारित किया गया, बाद में इसे 20 बिलियन डॉलर तक ले जाना है · यहाँ बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जायेंगेसभी सदस्यों को सामान महत्त्व देते हिये एक देश एक वोट का सिद्धांत अपनाया गया है, किसी भी देश को वीटो पॉवर नहीं दिया गया है · यह भारत एवं चीन के मध्य सहयोग का एक महत्वपूर्ण आयाम है, इसके माध्यम से विश्व बैंक को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है| क्योंकि IMF एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाएं पश्चिमी एवं विकसित देशों के पक्ष में झुई हुई हैं| एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक में सहयोग · ऐसे प्रोजेक्ट जिससे पूँजी निर्माण होता है ऐसी पूँजी को उपलब्ध कराने के लिए वर्तमान में IMF सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था है IMF आर्थिक योगदान के आधार पर ही मताधिकार दिया जाता है| · AIIB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया है| इसमें चीन का योगदान सर्वाधिक है (26 %) · भारत दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, इसमें भारत की भूमिका IMF की तुलना में विस्तृत हुई है · AIIB वस्तुतः IMF को प्रतिस्थापित करने का एक प्रयास है · इस प्रकार रूस, भारत एवं चीन ने आपसी सहयोग के माध्यम से नई वैश्विक व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं · ADB जो कि 1960 से कार्य कर रहा है, AIIB ने पिछले 5 वर्षों में ही ADB की कुल पूँजी के 2/3 पूँजी का एकत्रण कर लिया है रूस-चीन-भारत फोरम(RIC) · इसे 2002 में स्थापित किया गया है · अमेरिका आदि देशों द्वारा विश्व में एकतरफा कार्यवाई जैसे इराक युद्ध, सीरिया युद्ध आदि उदाहरणों को देखते हुए RIC संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है · अन्तराष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों से संचालित वैश्विक व्यवस्था का विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढाने के लिए, विश्व के समक्ष चुनौती उत्पन्न करने वाली समस्याओं का बहुपक्षीय आधार पर समाधान का आह्वान करता है · RIC विभिन्न क्षेत्रीय प्रभाव केन्द्रों के साथ बहुध्रुवीय विश्व का निर्माण करना चाहता है · RIC फोरम वैश्विक संरक्षणवाद, बाधाओं का आरोपण, एकपक्षीय मानकों का आरोपण आदि के माध्यम से व्यापार को बाधित करने वाले कारकों का विरोध करते हुए समानता के आधार पर व्यापार विस्तार करता है| · इस तरह से भारत एवं चीन RIC फोरम के माध्यम से अधिक व्यवस्थित एवं नियमित विश्व के निर्माण में आपस में सहयोग कर रहे हैं शंघाई सहयोग संगठन में सहयोग · इसमें अधिकांशतः मध्य एशियाई देश हैं जो पूर्व में सोवियत संघ के भाग थे अतः रूस इन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने के लिए SCO को 2001 में स्थापित किया गया · अतः इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य एशिया में विशेषकर मध्य एशिया के क्षेत्र में अमेरिका के प्रसार को रोकना है · 2015 में रूस द्वारा भारत को इसकी सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा गया, क्योंकि भारत एवं रूस के कुछ हित समान है| इसी के साथ चीन ने पाकिस्तान को सदस्यता देने का प्रस्ताव किया गया · क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी ढांचा(RATS) SCO की संस्था है जो आतंकवाद को रोकने के लिए बनाया गया है · इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत चीन एवं पाक को आतंकवाद के सन्दर्भ में सहयोग के लिए प्रेरित कर सकता है · यह संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय सहयोग, आतंकवाद के विस्तार को रोकना(रूस में चेचन क्षेत्र, चीन में जिनजियांग, भारत में कश्मीर का क्षेत्र आतंकवाद से पीड़ित है) को प्रस्तावित करता है अतः SCO के अंतर्गत भारत-चीन के मध्य सहयोग का एक आयाम खुलता है| IMF एवं विश्व बैंक में सुधार में सहयोग · इन संस्थाओं का झुकाव पश्चिमी विकसित देशों की ओर है |इन संस्थाओं की संरचना लोकतांत्रिक नहीं है · इन संस्थाओं में यूरोप एवं अमेरिका का दबदबा है औरकोटा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है · भारत एवं चीन विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं अतः वैश्विक संस्थाओं में इनको पर्याप्त महत्त्व मिलना चाहिए · अतः भारत एक चीन दोनों एक दूसरे का सहयोग करते हुए उपरोक्त वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करते हैं वुहान अनौपचारिक शिखर सम्मलेन · यह दोनों देशों के मध्य पहली अनौपचारिक बैठक थी जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री शामिल हुए · इसमें सीमा विवाद, व्यापार घाटा, आतंकवाद के समापन, विभिन्न वैश्विक चुनौतियों यथा जलवायु परिवर्तन आदि के समाधान के लिए सहयोग पर चर्चा की गयी · भारत ने सीमा प्रबंधन के स्थान पर सीमा विवाद के समाधान की मांग की जिसे चीन ने स्वीकार किया है · दोनों देशों ने आतंकवाद पर नियंत्रण के लिए सहयोग के आपसी सहमति दी है · दोनों देश शांत, स्थिर एवं लोकतांत्रिक अफगानिस्तान के लिए संयुक्त रूप से कार्य करने के लिए सहमत हुए हैं इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत और चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु होते हुए भी पारस्परिक सहयोग के भी अनेक आयाम है| भारत इन आयामों का उपयोग करते हुए चीन के साथ अपने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कर सकता है|
| 45,694
|
विदेश नीति से आप क्या समझते हैं| विदेशी नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए इसके निर्धारक सिद्धांतों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you think of foreign policy? Explaining the objectives of foreign policy,Describe its determining principles. (150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में विदेश नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में विदेश नीति के निर्धारक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक वातावरण, संधियाँ एवं सैन्य कारकों जैसे विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| कुछ राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना विदेश नीति का उद्देश्य होता है| विदेश नीति के निर्धारण में सिद्धांतों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| विदेश नीति के उद्देश्य · क्षेत्रीय अखंडता और कूटनीतिक स्वतंत्रता · अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना · भारत का आर्थिक विकास सुनिश्चित करना · उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन · भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा एवं संरक्षण भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत · सिद्धांतवादी नीतियाँ धारक के उत्तरदायित्वबोध को प्रदर्शित करती हैं| विदेश नीति के सिद्धांत सामान्य तौर परिवर्तित नहीं किये जाते हैं, इनका प्रभाव सतत रूप से बना रहता है| यद्यपि इनमें नवाचार हो सकता है · पंचशील(सहअस्तित्व, अहस्तक्षेप आदि) यह भारतीय विदेश नीति में समानता के आदर्श को समाहित करने वाला सिद्धांत है| इसके माध्यम से भारत विश्व के छोटे-बड़े सभी देशों के साथ समानतापूर्ण सम्बन्ध स्थापना में सहायता मिलती है| · गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत, यह वस्तुतः भारतीय कूटनीति एवं विदेश नीति को स्वतंत्र रखने की गतिशील अवधारणा है| · भारतीय विदेश नीति उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और रंगभेद का विरोध करती है क्योंकि ये भारत के संविधान में दिए गए आदर्शों यथा स्वतंत्रता समानता और न्याय की अवधारणा के अनुरूप नहीं है| · भारतीय विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांत का अनुपालन करती है| · गुजराल सिद्धांत, पड़ोसियों के संदर्भ में पंचशील की अवधारणा है| वर्तमान भारतीय विदेश नीति इस सिद्धांत का अनुकरण करती है| · पहले प्रयोग न करने का सिद्धांत, भारत ने आक्रमण की स्थिति में प्रतिआक्रमण अथवा अपनी सुरक्षा के संदर्भ में ही नाभिकीय हथियारों के प्रयोग के सिद्धांत को अपनाया है| इसके अतिरिक्त भारतीय नाभिकीय सिद्धांत प्रावधान करता है कि भारत गैर-नाभिकीय देशों पर कभी नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा किन्तु जैविक एवं रासायनिक आक्रमण की स्थिति में और नाभिकीय आक्रमण होने की स्थिति में भारत नाभिकीय हथियारों का प्रयोग कर सकता है|भारत की इस नीति ने दक्षिण एशिया में नाभिकीय हथियारों की दौड़ को रोक दिया है| भारत की यह कूटनीति मूलतः आत्म रक्षात्मक है| · अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और कानूनों का निरंतर लोकतान्त्रिकरण एवं सशक्तिकरण भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख निर्देशक सिद्धांत है| इस संदर्भ में भारत ने WTO, UNSC, पर्यावरण कूटनीति आदि संदर्भों में इस सिद्धांत का प्रयोग किया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है| राष्ट्रीय हितों की पूर्ति किसी भी देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों की परिपूर्ति करना होता है| भारत की विदेश नीति के विकास में उपरोक्त सिद्धांतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
|
##Question:विदेश नीति से आप क्या समझते हैं| विदेशी नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए इसके निर्धारक सिद्धांतों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you think of foreign policy? Explaining the objectives of foreign policy,Describe its determining principles. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में विदेश नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में विदेश नीति के निर्धारक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक वातावरण, संधियाँ एवं सैन्य कारकों जैसे विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| कुछ राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना विदेश नीति का उद्देश्य होता है| विदेश नीति के निर्धारण में सिद्धांतों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| विदेश नीति के उद्देश्य · क्षेत्रीय अखंडता और कूटनीतिक स्वतंत्रता · अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना · भारत का आर्थिक विकास सुनिश्चित करना · उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन · भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा एवं संरक्षण भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत · सिद्धांतवादी नीतियाँ धारक के उत्तरदायित्वबोध को प्रदर्शित करती हैं| विदेश नीति के सिद्धांत सामान्य तौर परिवर्तित नहीं किये जाते हैं, इनका प्रभाव सतत रूप से बना रहता है| यद्यपि इनमें नवाचार हो सकता है · पंचशील(सहअस्तित्व, अहस्तक्षेप आदि) यह भारतीय विदेश नीति में समानता के आदर्श को समाहित करने वाला सिद्धांत है| इसके माध्यम से भारत विश्व के छोटे-बड़े सभी देशों के साथ समानतापूर्ण सम्बन्ध स्थापना में सहायता मिलती है| · गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत, यह वस्तुतः भारतीय कूटनीति एवं विदेश नीति को स्वतंत्र रखने की गतिशील अवधारणा है| · भारतीय विदेश नीति उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और रंगभेद का विरोध करती है क्योंकि ये भारत के संविधान में दिए गए आदर्शों यथा स्वतंत्रता समानता और न्याय की अवधारणा के अनुरूप नहीं है| · भारतीय विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांत का अनुपालन करती है| · गुजराल सिद्धांत, पड़ोसियों के संदर्भ में पंचशील की अवधारणा है| वर्तमान भारतीय विदेश नीति इस सिद्धांत का अनुकरण करती है| · पहले प्रयोग न करने का सिद्धांत, भारत ने आक्रमण की स्थिति में प्रतिआक्रमण अथवा अपनी सुरक्षा के संदर्भ में ही नाभिकीय हथियारों के प्रयोग के सिद्धांत को अपनाया है| इसके अतिरिक्त भारतीय नाभिकीय सिद्धांत प्रावधान करता है कि भारत गैर-नाभिकीय देशों पर कभी नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा किन्तु जैविक एवं रासायनिक आक्रमण की स्थिति में और नाभिकीय आक्रमण होने की स्थिति में भारत नाभिकीय हथियारों का प्रयोग कर सकता है|भारत की इस नीति ने दक्षिण एशिया में नाभिकीय हथियारों की दौड़ को रोक दिया है| भारत की यह कूटनीति मूलतः आत्म रक्षात्मक है| · अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और कानूनों का निरंतर लोकतान्त्रिकरण एवं सशक्तिकरण भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख निर्देशक सिद्धांत है| इस संदर्भ में भारत ने WTO, UNSC, पर्यावरण कूटनीति आदि संदर्भों में इस सिद्धांत का प्रयोग किया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है| राष्ट्रीय हितों की पूर्ति किसी भी देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों की परिपूर्ति करना होता है| भारत की विदेश नीति के विकास में उपरोक्त सिद्धांतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
| 45,700
|
Explain Humanism. How it came to be important during renaissance? (150 words)(10 Marks)
|
Approach: · Define Humanism as Intro · Explain briefly Humanism during the renaissance · Write the ways due to which Humanism became important during Renaissance Answer: Humanism is a philosophical and ethical stance that emphasizes the value and agency of human beings, individually and collectively, and generally prefers critical thinking and evidence over acceptance of dogma or superstition. Humanism refers to a perspective that affirms some notion of human freedom and progress. It views humans as solely responsible for the promotion and development of individuals and emphasizes a concern for man in relation to the world. Renaissance humanism was used to differentiate the development ofhumanismduring the Renaissance era from the earlier ones. Classical humanism was developed to respond to the utilitarian approach associated with the medieval scholars. Renaissance humanism is the study of various antiquities which began in Italy during the Renaissance era and spread across Europe from the 14th to 16th centuries. Humanists believed God had given humanity options and potential, and humanist thinkers had to act to make the most of this. During Renaissance, Humanism became important in following ways: · Francesco Petrarca is known as the father of humanism. Due to his and other humanists’ efforts ancient texts were translated to people’s language. During this period, most of the humanist’s efforts helped improve the translation and understanding of early and biblical Christian writings. · By the 1500s, Humanism was the dominant form of education, so widespread that it was dividing into a range of sub-developments. As perfected texts passed to other specialists, such as mathematicians and scientists, the recipients also became Humanist thinkers. · Renaissance Humanism’s ideas had spread to allow speeches and other orations to become classicized: diffusion was needed so more people could understand. · Both classical and Renaissance art focused on human beauty and nature. People, even when in religious works, were depicted living life and showing emotion, which was never done before. · Humanists were painters, architects, philosophers, philologists, scientists, travellers. Humanists were committed to a rational approach leading to academic initiatives. These included, for example, how to deal with perspective in painting, which changed the art of landscape painting; or the development of geometry and its application to architecture. It also involved a serious rethink about the exercising of power, under what conditions, how to define National interest. By the mid-16th century, Humanism had lost much of its power. Europe was engaged in a war of words, ideas, and sometimes weapons over the nature of Christianity (theReformation) and Humanist culture was overtaken by rival creeds, becoming semi-independent disciplines governed by the area’s faith.
|
##Question:Explain Humanism. How it came to be important during renaissance? (150 words)(10 Marks)##Answer:Approach: · Define Humanism as Intro · Explain briefly Humanism during the renaissance · Write the ways due to which Humanism became important during Renaissance Answer: Humanism is a philosophical and ethical stance that emphasizes the value and agency of human beings, individually and collectively, and generally prefers critical thinking and evidence over acceptance of dogma or superstition. Humanism refers to a perspective that affirms some notion of human freedom and progress. It views humans as solely responsible for the promotion and development of individuals and emphasizes a concern for man in relation to the world. Renaissance humanism was used to differentiate the development ofhumanismduring the Renaissance era from the earlier ones. Classical humanism was developed to respond to the utilitarian approach associated with the medieval scholars. Renaissance humanism is the study of various antiquities which began in Italy during the Renaissance era and spread across Europe from the 14th to 16th centuries. Humanists believed God had given humanity options and potential, and humanist thinkers had to act to make the most of this. During Renaissance, Humanism became important in following ways: · Francesco Petrarca is known as the father of humanism. Due to his and other humanists’ efforts ancient texts were translated to people’s language. During this period, most of the humanist’s efforts helped improve the translation and understanding of early and biblical Christian writings. · By the 1500s, Humanism was the dominant form of education, so widespread that it was dividing into a range of sub-developments. As perfected texts passed to other specialists, such as mathematicians and scientists, the recipients also became Humanist thinkers. · Renaissance Humanism’s ideas had spread to allow speeches and other orations to become classicized: diffusion was needed so more people could understand. · Both classical and Renaissance art focused on human beauty and nature. People, even when in religious works, were depicted living life and showing emotion, which was never done before. · Humanists were painters, architects, philosophers, philologists, scientists, travellers. Humanists were committed to a rational approach leading to academic initiatives. These included, for example, how to deal with perspective in painting, which changed the art of landscape painting; or the development of geometry and its application to architecture. It also involved a serious rethink about the exercising of power, under what conditions, how to define National interest. By the mid-16th century, Humanism had lost much of its power. Europe was engaged in a war of words, ideas, and sometimes weapons over the nature of Christianity (theReformation) and Humanist culture was overtaken by rival creeds, becoming semi-independent disciplines governed by the area’s faith.
| 45,702
|
सहायक संधि की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | वेलेजली ने भारत में किस प्रकार इस संधि का प्रयोग करते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को मजबूत किया ? (150-200 शब्द) Clarify the concept of subsidiary alliance. How did Wellesley use this alliance in India to strengthen the roots of British imperialism ? (150-200 Words)
|
एप्रोच - भूमिका में सहायक संधि को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद सहायक संधि लाने का उद्देश्य और इसकी विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में किस प्रकार यह संधि अंग्रेजों के लाभदायक रही उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सहायक संधि - भारतीय राज्यों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से मुख्यतः कंपनी पर निर्भर बनाये रखने की नीति के सन्दर्भ में इसकी चर्चा होती है | हालाँकि वेलेजली से पूर्व ब्रिटिश गवर्नर क्लाईव ने अवध राज्य के साथ सहायक संधि की थी, जबकि ये नीति भारत में डूप्ले के दिमाग की उपज थी | सहायक संधि के कारण - लॉर्ड वेलेजली को नेपोलियन के खतरे को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से भारत भेजा गया था , अतः उसने एक ऐसी नीति अपनाई जिससे कोई भी भारतीय शासक किसी एनी राज्य को किसी प्रकार की सहायता न दे सके |इसके लिए वेलेजली ने सहायक संधि का उपयोग करना सुनिश्चित किया और भारतीय राज्यों को संधि करने के लिए विवश किया | वेलेजली ने सहायक संधि करके क्रमशः हैदराबाद, मैसूर, तंजौर , अवध, भोंसले ,पेशवा एवं सिंधिया राज्यों को अंग्रेजों पर निर्भर बनाया | विशेषताएं - राज्य की विदेश नीति को कंपनी के नियंत्रण में कर दिया | सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कंपनी पर होगी ,इसके बदले में एक सम्प्रभुतायुक्त भूमि अंग्रेजों को प्राप्त होगी | प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट होगा जो की आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जबकि वास्तव में उसी कार्य के लिए बनाया गया | अंग्रेजों के दृष्टिकोण से लाभदायक - साम्राज्य का विस्तार भारतीय राज्यों को किसी भी बाहरी राज्य से संधि न करने का आदेश | भारतीय राजस्व से ही ब्रिटिश सेना का गठन एवं इस दृष्टिकोण से भारतीयों को पंगु कर दिया गया | राज्यों से नकद की जगह वेलेजली ने सम्प्रभुतायुक्त भूभाग लेना प्रारंभ कर दिया | हालाँकि सहायक संधि पूर्व से प्रचलित थी लेकिन वेलेजली ने इसे कठोर रूप से लागू कर दिया एवं भारतीयों के संप्रभुतायुक्त भूभाग ,तटवर्ती क्षेत्र एवं अन्य क्षेत्रों को हड़प कर भारतीयों को अपंग बना दिया ,जिससे भविष्य में किसी अन्य देश से किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त हो सके |
|
##Question:सहायक संधि की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | वेलेजली ने भारत में किस प्रकार इस संधि का प्रयोग करते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को मजबूत किया ? (150-200 शब्द) Clarify the concept of subsidiary alliance. How did Wellesley use this alliance in India to strengthen the roots of British imperialism ? (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सहायक संधि को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद सहायक संधि लाने का उद्देश्य और इसकी विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में किस प्रकार यह संधि अंग्रेजों के लाभदायक रही उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सहायक संधि - भारतीय राज्यों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से मुख्यतः कंपनी पर निर्भर बनाये रखने की नीति के सन्दर्भ में इसकी चर्चा होती है | हालाँकि वेलेजली से पूर्व ब्रिटिश गवर्नर क्लाईव ने अवध राज्य के साथ सहायक संधि की थी, जबकि ये नीति भारत में डूप्ले के दिमाग की उपज थी | सहायक संधि के कारण - लॉर्ड वेलेजली को नेपोलियन के खतरे को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से भारत भेजा गया था , अतः उसने एक ऐसी नीति अपनाई जिससे कोई भी भारतीय शासक किसी एनी राज्य को किसी प्रकार की सहायता न दे सके |इसके लिए वेलेजली ने सहायक संधि का उपयोग करना सुनिश्चित किया और भारतीय राज्यों को संधि करने के लिए विवश किया | वेलेजली ने सहायक संधि करके क्रमशः हैदराबाद, मैसूर, तंजौर , अवध, भोंसले ,पेशवा एवं सिंधिया राज्यों को अंग्रेजों पर निर्भर बनाया | विशेषताएं - राज्य की विदेश नीति को कंपनी के नियंत्रण में कर दिया | सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कंपनी पर होगी ,इसके बदले में एक सम्प्रभुतायुक्त भूमि अंग्रेजों को प्राप्त होगी | प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट होगा जो की आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जबकि वास्तव में उसी कार्य के लिए बनाया गया | अंग्रेजों के दृष्टिकोण से लाभदायक - साम्राज्य का विस्तार भारतीय राज्यों को किसी भी बाहरी राज्य से संधि न करने का आदेश | भारतीय राजस्व से ही ब्रिटिश सेना का गठन एवं इस दृष्टिकोण से भारतीयों को पंगु कर दिया गया | राज्यों से नकद की जगह वेलेजली ने सम्प्रभुतायुक्त भूभाग लेना प्रारंभ कर दिया | हालाँकि सहायक संधि पूर्व से प्रचलित थी लेकिन वेलेजली ने इसे कठोर रूप से लागू कर दिया एवं भारतीयों के संप्रभुतायुक्त भूभाग ,तटवर्ती क्षेत्र एवं अन्य क्षेत्रों को हड़प कर भारतीयों को अपंग बना दिया ,जिससे भविष्य में किसी अन्य देश से किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त हो सके |
| 45,703
|
विदेश नीति से आप क्या समझते हैं| विदेशी नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए इसके निर्धारक सिद्धांतों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you think of foreign policy? Explaining the objectives of foreign policy,Describe its determining principles. (150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में विदेश नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में विदेश नीति के निर्धारक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक वातावरण, संधियाँ एवं सैन्य कारकों जैसे विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| कुछ राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना विदेश नीति का उद्देश्य होता है| विदेश नीति के निर्धारण में सिद्धांतों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| विदेश नीति के उद्देश्य · क्षेत्रीय अखंडता और कूटनीतिक स्वतंत्रता · अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना · भारत का आर्थिक विकास सुनिश्चित करना · उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन · भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा एवं संरक्षण भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत · सिद्धांतवादी नीतियाँ धारक के उत्तरदायित्वबोध को प्रदर्शित करती हैं| विदेश नीति के सिद्धांत सामान्य तौर परिवर्तित नहीं किये जाते हैं, इनका प्रभाव सतत रूप से बना रहता है| यद्यपि इनमें नवाचार हो सकता है · पंचशील(सहअस्तित्व, अहस्तक्षेप आदि) यह भारतीय विदेश नीति में समानता के आदर्श को समाहित करने वाला सिद्धांत है| इसके माध्यम से भारत विश्व के छोटे-बड़े सभी देशों के साथ समानतापूर्ण सम्बन्ध स्थापना में सहायता मिलती है| · गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत, यह वस्तुतः भारतीय कूटनीति एवं विदेश नीति को स्वतंत्र रखने की गतिशील अवधारणा है| · भारतीय विदेश नीति उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और रंगभेद का विरोध करती है क्योंकि ये भारत के संविधान में दिए गए आदर्शों यथा स्वतंत्रता समानता और न्याय की अवधारणा के अनुरूप नहीं है| · भारतीय विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांत का अनुपालन करती है| · गुजराल सिद्धांत, पड़ोसियों के संदर्भ में पंचशील की अवधारणा है| वर्तमान भारतीय विदेश नीति इस सिद्धांत का अनुकरण करती है| · पहले प्रयोग न करने का सिद्धांत, भारत ने आक्रमण की स्थिति में प्रतिआक्रमण अथवा अपनी सुरक्षा के संदर्भ में ही नाभिकीय हथियारों के प्रयोग के सिद्धांत को अपनाया है| इसके अतिरिक्त भारतीय नाभिकीय सिद्धांत प्रावधान करता है कि भारत गैर-नाभिकीय देशों पर कभी नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा किन्तु जैविक एवं रासायनिक आक्रमण की स्थिति में और नाभिकीय आक्रमण होने की स्थिति में भारत नाभिकीय हथियारों का प्रयोग कर सकता है|भारत की इस नीति ने दक्षिण एशिया में नाभिकीय हथियारों की दौड़ को रोक दिया है| भारत की यह कूटनीति मूलतः आत्म रक्षात्मक है| · अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और कानूनों का निरंतर लोकतान्त्रिकरण एवं सशक्तिकरण भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख निर्देशक सिद्धांत है| इस संदर्भ में भारत ने WTO, UNSC, पर्यावरण कूटनीति आदि संदर्भों में इस सिद्धांत का प्रयोग किया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है| राष्ट्रीय हितों की पूर्ति किसी भी देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों की परिपूर्ति करना होता है| भारत की विदेश नीति के विकास में उपरोक्त सिद्धांतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
|
##Question:विदेश नीति से आप क्या समझते हैं| विदेशी नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए इसके निर्धारक सिद्धांतों का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you think of foreign policy? Explaining the objectives of foreign policy,Describe its determining principles. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विदेश नीति को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में विदेश नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में विदेश नीति के निर्धारक सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी देश की विदेश नीति, अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के वातावरण में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य द्वारा चुनी गई “स्वहितकारी” रणनीतियों का समूह होती है| किसी देश की विदेश नीति दूसरे देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सैनिक विषयों पर अपनाई जाने वाली नीतियों का एक समुच्चय है| विदेश नीति एक गतिशील अवधारणा है क्योंकि राष्ट्रीय हितों में होने वाला परिवर्तन विदेश नीति में परिवर्तन सुनिश्चित करता है और इसी के अनुरूप देशों के मध्य संबंधों में परिवर्तन सुनिश्चित होते हैं| विदेश नीति के उद्देश्य, प्रचलित एवं स्वीकृत सिद्धांत एवं कुछ आंतरिक एवं बाह्य अथवा अंतर्राष्ट्रीय कारक किसी देश की विदेश नीति को आकार प्रदान करते हैं | घरेलू कारकों में भौगोलिक कारक, इतिहास एवं परम्परा, आर्थिक स्थितियां, नेतृत्व की प्रकृति आदि विदेश नीति को आकार देने वाले प्रमुख कारक हैं इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक वातावरण, संधियाँ एवं सैन्य कारकों जैसे विभिन्न बाह्य/अंतर्राष्ट्रीय कारक भी विदेश नीति के स्वरुप के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं| कुछ राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना विदेश नीति का उद्देश्य होता है| विदेश नीति के निर्धारण में सिद्धांतों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है| विदेश नीति के उद्देश्य · क्षेत्रीय अखंडता और कूटनीतिक स्वतंत्रता · अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना · भारत का आर्थिक विकास सुनिश्चित करना · उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन · भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा एवं संरक्षण भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत · सिद्धांतवादी नीतियाँ धारक के उत्तरदायित्वबोध को प्रदर्शित करती हैं| विदेश नीति के सिद्धांत सामान्य तौर परिवर्तित नहीं किये जाते हैं, इनका प्रभाव सतत रूप से बना रहता है| यद्यपि इनमें नवाचार हो सकता है · पंचशील(सहअस्तित्व, अहस्तक्षेप आदि) यह भारतीय विदेश नीति में समानता के आदर्श को समाहित करने वाला सिद्धांत है| इसके माध्यम से भारत विश्व के छोटे-बड़े सभी देशों के साथ समानतापूर्ण सम्बन्ध स्थापना में सहायता मिलती है| · गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत, यह वस्तुतः भारतीय कूटनीति एवं विदेश नीति को स्वतंत्र रखने की गतिशील अवधारणा है| · भारतीय विदेश नीति उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और रंगभेद का विरोध करती है क्योंकि ये भारत के संविधान में दिए गए आदर्शों यथा स्वतंत्रता समानता और न्याय की अवधारणा के अनुरूप नहीं है| · भारतीय विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांत का अनुपालन करती है| · गुजराल सिद्धांत, पड़ोसियों के संदर्भ में पंचशील की अवधारणा है| वर्तमान भारतीय विदेश नीति इस सिद्धांत का अनुकरण करती है| · पहले प्रयोग न करने का सिद्धांत, भारत ने आक्रमण की स्थिति में प्रतिआक्रमण अथवा अपनी सुरक्षा के संदर्भ में ही नाभिकीय हथियारों के प्रयोग के सिद्धांत को अपनाया है| इसके अतिरिक्त भारतीय नाभिकीय सिद्धांत प्रावधान करता है कि भारत गैर-नाभिकीय देशों पर कभी नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा किन्तु जैविक एवं रासायनिक आक्रमण की स्थिति में और नाभिकीय आक्रमण होने की स्थिति में भारत नाभिकीय हथियारों का प्रयोग कर सकता है|भारत की इस नीति ने दक्षिण एशिया में नाभिकीय हथियारों की दौड़ को रोक दिया है| भारत की यह कूटनीति मूलतः आत्म रक्षात्मक है| · अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और कानूनों का निरंतर लोकतान्त्रिकरण एवं सशक्तिकरण भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख निर्देशक सिद्धांत है| इस संदर्भ में भारत ने WTO, UNSC, पर्यावरण कूटनीति आदि संदर्भों में इस सिद्धांत का प्रयोग किया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किसी देश की विदेश नीति पर अनेकों पहलुओं एवं सिद्धांतों का प्रभाव पड़ता है| राष्ट्रीय हितों की पूर्ति किसी भी देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों की परिपूर्ति करना होता है| भारत की विदेश नीति के विकास में उपरोक्त सिद्धांतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| राष्ट्रीय हितों की प्रकृति के आधार पर भारत आदर्शवादी अथवा व्यावहारिक विदेश नीति को अपना रहा है| भारत की विदेश नीति निरन्तर यथार्थवादी होती गयी है| इसी के आधार पर वर्तमान में न केवल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक मामलों में बल्कि आर्थिक मामलों, पर्यावरण कूटनीति आदि में भी भारत महत्वपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में उपस्थित है|
| 45,714
|
सहायक संधि की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | वेलेजली ने भारत में किस प्रकार इस संधि का प्रयोग करते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को मजबूत किया ? (150-200 शब्द) Clarify the concept of subsidiary alliance. How did Wellesley use this alliance in India to strengthen the roots of British imperialism ? (150-200 Words)
|
एप्रोच - भूमिका में सहायक संधि को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद सहायक संधि लाने का उद्देश्य और इसकी विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में किस प्रकार यह संधि अंग्रेजों के लाभदायक रही उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सहायक संधि - भारतीय राज्यों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से मुख्यतः कंपनी पर निर्भर बनाये रखने की नीति के सन्दर्भ में इसकी चर्चा होती है | हालाँकि वेलेजली से पूर्व ब्रिटिश गवर्नर क्लाईव ने अवध राज्य के साथ सहायक संधि की थी, जबकि ये नीति भारत में डूप्ले के दिमाग की उपज थी | सहायक संधि के कारण -लॉर्ड वेलेजली को नेपोलियन के खतरे को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से भारत भेजा गया था , अतः उसने एक ऐसी नीति अपनाई जिससे कोई भी भारतीय शासक किसी एनी राज्य को किसी प्रकार की सहायता न दे सके |इसके लिए वेलेजली ने सहायक संधि का उपयोग करना सुनिश्चित किया और भारतीय राज्यों को संधि करने के लिए विवश किया | वेलेजली ने सहायक संधि करके क्रमशः हैदराबाद, मैसूर, तंजौर , अवध, भोंसले ,पेशवा एवं सिंधिया राज्यों को अंग्रेजों पर निर्भर बनाया | विशेषताएं - राज्य की विदेश नीति को कंपनी के नियंत्रण में कर दिया | सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कंपनी पर होगी ,इसके बदले में एक सम्प्रभुतायुक्त भूमि अंग्रेजों को प्राप्त होगी | प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट होगा जो की आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जबकि वास्तव में उसी कार्य के लिए बनाया गया | अंग्रेजों के दृष्टिकोण से लाभदायक | साम्राज्य का विस्तार | भारतीय राज्यों को किसी भी बाहरी राज्य से संधि न करने का आदेश | भारतीय राजस्व से ही ब्रिटिश सेना का गठन एवं इस दृष्टिकोण से भारतीयों को पंगु कर दिया गया | राज्यों से नकद की जगह वेलेजली ने सम्प्रभुतायुक्त भूभाग लेना प्रारंभ कर दिया | हालाँकि सहायक संधि पूर्व से प्रचलित थी लेकिन वेलेजली ने इसे कठोर रूप से लागू कर दिया एवं भारतीयों के संप्रभुतायुक्त भूभाग ,तटवर्ती क्षेत्र एवं अन्य क्षेत्रों को हड़प कर भारतीयों को अपंग बना दिया ,जिससे भविष्य में किसी अन्य देश से किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त हो सके |
|
##Question:सहायक संधि की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये | वेलेजली ने भारत में किस प्रकार इस संधि का प्रयोग करते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को मजबूत किया ? (150-200 शब्द) Clarify the concept of subsidiary alliance. How did Wellesley use this alliance in India to strengthen the roots of British imperialism ? (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सहायक संधि को बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद सहायक संधि लाने का उद्देश्य और इसकी विशेषताओं को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में किस प्रकार यह संधि अंग्रेजों के लाभदायक रही उसकी चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सहायक संधि - भारतीय राज्यों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से मुख्यतः कंपनी पर निर्भर बनाये रखने की नीति के सन्दर्भ में इसकी चर्चा होती है | हालाँकि वेलेजली से पूर्व ब्रिटिश गवर्नर क्लाईव ने अवध राज्य के साथ सहायक संधि की थी, जबकि ये नीति भारत में डूप्ले के दिमाग की उपज थी | सहायक संधि के कारण -लॉर्ड वेलेजली को नेपोलियन के खतरे को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से भारत भेजा गया था , अतः उसने एक ऐसी नीति अपनाई जिससे कोई भी भारतीय शासक किसी एनी राज्य को किसी प्रकार की सहायता न दे सके |इसके लिए वेलेजली ने सहायक संधि का उपयोग करना सुनिश्चित किया और भारतीय राज्यों को संधि करने के लिए विवश किया | वेलेजली ने सहायक संधि करके क्रमशः हैदराबाद, मैसूर, तंजौर , अवध, भोंसले ,पेशवा एवं सिंधिया राज्यों को अंग्रेजों पर निर्भर बनाया | विशेषताएं - राज्य की विदेश नीति को कंपनी के नियंत्रण में कर दिया | सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कंपनी पर होगी ,इसके बदले में एक सम्प्रभुतायुक्त भूमि अंग्रेजों को प्राप्त होगी | प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट होगा जो की आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जबकि वास्तव में उसी कार्य के लिए बनाया गया | अंग्रेजों के दृष्टिकोण से लाभदायक | साम्राज्य का विस्तार | भारतीय राज्यों को किसी भी बाहरी राज्य से संधि न करने का आदेश | भारतीय राजस्व से ही ब्रिटिश सेना का गठन एवं इस दृष्टिकोण से भारतीयों को पंगु कर दिया गया | राज्यों से नकद की जगह वेलेजली ने सम्प्रभुतायुक्त भूभाग लेना प्रारंभ कर दिया | हालाँकि सहायक संधि पूर्व से प्रचलित थी लेकिन वेलेजली ने इसे कठोर रूप से लागू कर दिया एवं भारतीयों के संप्रभुतायुक्त भूभाग ,तटवर्ती क्षेत्र एवं अन्य क्षेत्रों को हड़प कर भारतीयों को अपंग बना दिया ,जिससे भविष्य में किसी अन्य देश से किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त हो सके |
| 45,720
|
सामरिक स्वायत्तता से आप क्या समझते हैं ? क्या भारत सामरिक रूप से पूर्ण स्वायत्त है ? (150-200 शब्द, अंक-10 ) what do you understand by strategic autonomy ? Is India Strategically Full Autonomous? (150-200 words, Marks-10 )
|
दृष्टिकोण: सामरिक स्वायत्तता को संक्षिप्त में परिभाषित कीजिये । कुछ उदाहरणों के माध्यम से सामरिक स्वायत्तता को समझाइए । भारत के सामरिक स्वायत्तता की चर्चा कीजिये । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : किसी राज्य की अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित व संरक्षित करते हुए आगे बढ़ाने की क्षमता को सामरिक स्वायत्तता के रूप में जाना जाता है । एक सामरिक रूप से स्वायत्त राष्ट्र की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति होती है और वह अन्य राष्ट्रों द्वारा किसी भी प्रकार से विवश हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर नीतिगत स्वतंत्रता रखता है । भारत की सामरिक स्वायत्तता के संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले कुछ बातों पर विचार करना आवश्यक है । पहला यह की द्विध्रुवीय अथवा बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपने साथियों के दबावों के कारण सुपरपावर भी कमजोर हो जाते हैं और उन्हें भी अपने कई निर्णयों पर पुनर्विचार करना पड़ता है । कई बार कुछ निर्णयों को परिवर्तित भी करना पड़ता है । इसी प्रकार भारत जैसी क्षेत्रीय शक्तियों को भी इन वैश्विक दबावों का सामना करना पड़ता है और कई मुद्दों पर भारत अपने नीतिगत निर्णयों में सामरिक रूप कम स्वायत्त दिखता है । इसका एक अच्छा उदाहरण ईरान पर भारत के निर्णय के रूप में हम देख सकते हैं । यहाँ एक दूसरा पहलू यह है की एक सामरिक रूप से स्वायत्त देश को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर बाहरी दबाव का पूर्ण विरोध करना चाहिए । यदि भारत के संबंध में बात करें तो हम देखते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से संवेदनशील मुद्दे यथा -: जम्मू और कश्मीर तथा परमाणु हथियार जैसे विषयों पर भारत किसी भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव को अश्विकार करते हुए अपनी पूर्ण स्वतंत्र नीति का अनुसरण करता है । उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में पूर्ण सामरिक स्वायत्तता जैसी संकल्पनाओं का वास्तविक अस्तित्व संभव नहीं है तथापि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संप्रभु राष्ट्र सामरिक रूप से स्वायत्त हैं और भारत भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सहित प्रमुख राष्ट्रीय हितों के मामलों में स्वायत्त है ।
|
##Question:सामरिक स्वायत्तता से आप क्या समझते हैं ? क्या भारत सामरिक रूप से पूर्ण स्वायत्त है ? (150-200 शब्द, अंक-10 ) what do you understand by strategic autonomy ? Is India Strategically Full Autonomous? (150-200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण: सामरिक स्वायत्तता को संक्षिप्त में परिभाषित कीजिये । कुछ उदाहरणों के माध्यम से सामरिक स्वायत्तता को समझाइए । भारत के सामरिक स्वायत्तता की चर्चा कीजिये । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : किसी राज्य की अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित व संरक्षित करते हुए आगे बढ़ाने की क्षमता को सामरिक स्वायत्तता के रूप में जाना जाता है । एक सामरिक रूप से स्वायत्त राष्ट्र की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति होती है और वह अन्य राष्ट्रों द्वारा किसी भी प्रकार से विवश हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर नीतिगत स्वतंत्रता रखता है । भारत की सामरिक स्वायत्तता के संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले कुछ बातों पर विचार करना आवश्यक है । पहला यह की द्विध्रुवीय अथवा बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपने साथियों के दबावों के कारण सुपरपावर भी कमजोर हो जाते हैं और उन्हें भी अपने कई निर्णयों पर पुनर्विचार करना पड़ता है । कई बार कुछ निर्णयों को परिवर्तित भी करना पड़ता है । इसी प्रकार भारत जैसी क्षेत्रीय शक्तियों को भी इन वैश्विक दबावों का सामना करना पड़ता है और कई मुद्दों पर भारत अपने नीतिगत निर्णयों में सामरिक रूप कम स्वायत्त दिखता है । इसका एक अच्छा उदाहरण ईरान पर भारत के निर्णय के रूप में हम देख सकते हैं । यहाँ एक दूसरा पहलू यह है की एक सामरिक रूप से स्वायत्त देश को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर बाहरी दबाव का पूर्ण विरोध करना चाहिए । यदि भारत के संबंध में बात करें तो हम देखते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से संवेदनशील मुद्दे यथा -: जम्मू और कश्मीर तथा परमाणु हथियार जैसे विषयों पर भारत किसी भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव को अश्विकार करते हुए अपनी पूर्ण स्वतंत्र नीति का अनुसरण करता है । उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में पूर्ण सामरिक स्वायत्तता जैसी संकल्पनाओं का वास्तविक अस्तित्व संभव नहीं है तथापि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संप्रभु राष्ट्र सामरिक रूप से स्वायत्त हैं और भारत भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सहित प्रमुख राष्ट्रीय हितों के मामलों में स्वायत्त है ।
| 45,728
|
संघ लोक सेवा आयोग की भूमिका को स्पष्ट कीजिए। क्या इसके सुझाव सलाहकारी प्रकृति के होते हैं? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the role of the Union Public Service Commission. Are its suggestions advisory in nature? Discuss (150-200 words; 10 marks)
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में संघ लोक सेवा आयोग के बारे में लिखिए। प्रश्न के कथन को स्पष्ट करने के लिए अपने विचार व्यक्त कीजिए। इसके बाद कथन के विपरीत संक्षिप्त रूप में कुछ बिन्दु लिखिए। निष्कर्ष में यूपीएससी को और सशक्त बनाने के लिए सुझाव दीजिए। संघ लोक सेवा आयोग भारत का केन्द्रीय भर्ती संस्था है। यह एक संवैधानिक निकाय है। संविधान के 14वें भाग में अनुच्छेद 315 से 323 तक में यूपीएससी की स्वतन्त्रता व शक्तियों आदि का विवरण है। गौरतलब है कि यूपीएससी को संविधान ने व्यापक अधिकार दिये हैं। संविधान आशा करता है कि संघ लोक सेवा आयोग भारत में मेरिट पद्धति का प्रहरी हो। इसके लिए वह केन्द्रीय सेवाओं व अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के संबंध में सरकार को सलाह देते है। हालांकि व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो यूपीएससी कि भूमिका सीमित होने के साथ-साथ सुझाव सलाहकारी प्रवृत्ति के होते हैं: पिछड़ी जातियों की नियुक्तियों पर आरक्षण देने के मामले पर कोई परामर्श नहीं लिया जाता है। आयोग एवं प्राधिकरण की अध्यक्षता, उच्च राजनयिक पदों, ग्रुप सी व डी आदि से संबन्धित मामलों पर कोई परामर्श नहीं लिया जाता है। सेवाओं एवं पदों पर एससी/एसटी के दावों के संबंध में यूपीएससी कोई सुझाव नहीं देता है। राष्ट्रपति यूपीएससी के दायरे से पद सेवा या विषय को हटा सकता है। केंद्र सरकार पर यह निर्भर है कि वह आयोग के सुझावों पर अमल करे या न करे। हालांकि स्वीकार न करने पर सार्थक कारण दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ऐसे नियम बना सकती है जिससे यूपीएससी के सलाहकारी कार्य को सीमित किया जा सके। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि अधिकांश मामलों में यूपीएससी कि भूमिका सीमित व सुझाव केवल सलाहकारी प्रवृत्ति के हैं। हालांकि कुछ विषय ऐसे है जिसमें उचित स्वतन्त्रता मिली हुई है। जैसे- अध्यक्ष व सदस्यों को हटाना, परीक्षा को संचालित करने, सदस्यों के वेतन भत्ते अखिल भारतीय सेवाओं से संबन्धित अनुशासनात्मक मुद्दों के संबद्ध में निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यूपीएससी कि भूमिका कुछ मामलों में सीमित है और इसके सुझाव सलाहकारी प्रवृत्ति के होते हैं। हालांकि प्रशासनिक मामलों में संविधान द्वारा इसे पर्याप्त स्वतन्त्रता प्राप्त है। आयोग की स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए परीक्षा प्रणाली में निर्णय लेने का अधिकार, वार्षिक रिपोर्ट पर विचार करना, अनुशासनात्मक मामलों के संबंध में दिये गए सुझावों पर अमल करना चाहिए।
|
##Question:संघ लोक सेवा आयोग की भूमिका को स्पष्ट कीजिए। क्या इसके सुझाव सलाहकारी प्रकृति के होते हैं? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the role of the Union Public Service Commission. Are its suggestions advisory in nature? Discuss (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में संघ लोक सेवा आयोग के बारे में लिखिए। प्रश्न के कथन को स्पष्ट करने के लिए अपने विचार व्यक्त कीजिए। इसके बाद कथन के विपरीत संक्षिप्त रूप में कुछ बिन्दु लिखिए। निष्कर्ष में यूपीएससी को और सशक्त बनाने के लिए सुझाव दीजिए। संघ लोक सेवा आयोग भारत का केन्द्रीय भर्ती संस्था है। यह एक संवैधानिक निकाय है। संविधान के 14वें भाग में अनुच्छेद 315 से 323 तक में यूपीएससी की स्वतन्त्रता व शक्तियों आदि का विवरण है। गौरतलब है कि यूपीएससी को संविधान ने व्यापक अधिकार दिये हैं। संविधान आशा करता है कि संघ लोक सेवा आयोग भारत में मेरिट पद्धति का प्रहरी हो। इसके लिए वह केन्द्रीय सेवाओं व अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के संबंध में सरकार को सलाह देते है। हालांकि व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो यूपीएससी कि भूमिका सीमित होने के साथ-साथ सुझाव सलाहकारी प्रवृत्ति के होते हैं: पिछड़ी जातियों की नियुक्तियों पर आरक्षण देने के मामले पर कोई परामर्श नहीं लिया जाता है। आयोग एवं प्राधिकरण की अध्यक्षता, उच्च राजनयिक पदों, ग्रुप सी व डी आदि से संबन्धित मामलों पर कोई परामर्श नहीं लिया जाता है। सेवाओं एवं पदों पर एससी/एसटी के दावों के संबंध में यूपीएससी कोई सुझाव नहीं देता है। राष्ट्रपति यूपीएससी के दायरे से पद सेवा या विषय को हटा सकता है। केंद्र सरकार पर यह निर्भर है कि वह आयोग के सुझावों पर अमल करे या न करे। हालांकि स्वीकार न करने पर सार्थक कारण दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ऐसे नियम बना सकती है जिससे यूपीएससी के सलाहकारी कार्य को सीमित किया जा सके। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि अधिकांश मामलों में यूपीएससी कि भूमिका सीमित व सुझाव केवल सलाहकारी प्रवृत्ति के हैं। हालांकि कुछ विषय ऐसे है जिसमें उचित स्वतन्त्रता मिली हुई है। जैसे- अध्यक्ष व सदस्यों को हटाना, परीक्षा को संचालित करने, सदस्यों के वेतन भत्ते अखिल भारतीय सेवाओं से संबन्धित अनुशासनात्मक मुद्दों के संबद्ध में निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यूपीएससी कि भूमिका कुछ मामलों में सीमित है और इसके सुझाव सलाहकारी प्रवृत्ति के होते हैं। हालांकि प्रशासनिक मामलों में संविधान द्वारा इसे पर्याप्त स्वतन्त्रता प्राप्त है। आयोग की स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए परीक्षा प्रणाली में निर्णय लेने का अधिकार, वार्षिक रिपोर्ट पर विचार करना, अनुशासनात्मक मामलों के संबंध में दिये गए सुझावों पर अमल करना चाहिए।
| 45,734
|
What do you understand by cropping patterns? State the indices for calculating the cropping pattern. (150 words)(10 Markers)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - INDICES TO CALCULATE THE CROPPING PATTERN - ANALYSIS -CONCLUSION ANSWER: Cropping pattern refers to the type of crops grown in an area at a particular point of time. Cropping pattern is the yardstick for calculating the agricultural development of an area. INDICES TO CALCULATE THE CROPPING PATTERN 1) CROP YIELD It is calculated by dividing the yield of a particular crop in the region by the total yield of all the crops in that region, multiplied by 100. 2) CROP INDEX It is calculated by dividing the area under cultivation of a particular crop in a region by the total area under cultivation in that region, multiplied by 100. It indicates how much land is occupied by a specific crop in the region. ANALYSIS Based on this, the cropping pattern is determined/ calculated for various crops as: 1) HIGH YIELD- HIGH DISPERSAL AREAS For example, such high yield-high dispersal areas for paddy are West Bengal, coastal Andhra Pradesh, Chhattisgarh and Tamil Nadu (The Cauvery delta area). 2) HIGH YIELD-LOW DISPERSAL AREAS For example, the high yield-low dispersal areas for paddy are Punjab and Haryana (during summers). Here the production is very high, but the area under occupation is less. 3) LOW YIELD-HIGH DISPERSAL AREAS For example, the low yield-high dispersal areas for paddy are Deccan plateau. The specific areas are Maharashtra, western Andhra Pradesh, Telangana. 4) LOW YIELD-LOW DISPERSAL AREAS For example, the low yield-low dispersal areas for paddy are Jammu and Kashmir (grown there during summers) A changing cropping pattern indicates development, while no change in the cropping pattern indicates stagnation.
|
##Question:What do you understand by cropping patterns? State the indices for calculating the cropping pattern. (150 words)(10 Markers)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - INDICES TO CALCULATE THE CROPPING PATTERN - ANALYSIS -CONCLUSION ANSWER: Cropping pattern refers to the type of crops grown in an area at a particular point of time. Cropping pattern is the yardstick for calculating the agricultural development of an area. INDICES TO CALCULATE THE CROPPING PATTERN 1) CROP YIELD It is calculated by dividing the yield of a particular crop in the region by the total yield of all the crops in that region, multiplied by 100. 2) CROP INDEX It is calculated by dividing the area under cultivation of a particular crop in a region by the total area under cultivation in that region, multiplied by 100. It indicates how much land is occupied by a specific crop in the region. ANALYSIS Based on this, the cropping pattern is determined/ calculated for various crops as: 1) HIGH YIELD- HIGH DISPERSAL AREAS For example, such high yield-high dispersal areas for paddy are West Bengal, coastal Andhra Pradesh, Chhattisgarh and Tamil Nadu (The Cauvery delta area). 2) HIGH YIELD-LOW DISPERSAL AREAS For example, the high yield-low dispersal areas for paddy are Punjab and Haryana (during summers). Here the production is very high, but the area under occupation is less. 3) LOW YIELD-HIGH DISPERSAL AREAS For example, the low yield-high dispersal areas for paddy are Deccan plateau. The specific areas are Maharashtra, western Andhra Pradesh, Telangana. 4) LOW YIELD-LOW DISPERSAL AREAS For example, the low yield-low dispersal areas for paddy are Jammu and Kashmir (grown there during summers) A changing cropping pattern indicates development, while no change in the cropping pattern indicates stagnation.
| 45,738
|
Discuss the ways to measure inflation. Do you think the proposed Producer Price Index will help in making counter-inflation measures more effective? (150 words/ 10 marks)
|
Approach: Define Inflation as Introduction Discuss about WPI and CPI to measure inflation Explain what PPI is and why it will help in making counter inflation measures more effective. Ans: Inflation is a quantitative measure of the rate at which the average price level of a basket of selected goods and services in an economy increases over a period of time. It is the constant rise in the general level of prices where a unit of currency buys less than it did in prior periods. Often expressed as a percentage, inflation indicates a decrease in thepurchasing powerof a nation’s currency. In India, generally, two kinds of indices are used to measure inflation—Wholesale Price Index (WPI) and Consumer Price Index (CPI). WPI: A wholesale price index (WPI) is an index that measures and tracks the changes in the price of goods in the stages before the retail level – that is, goods that are sold in bulk and traded between entities or businesses instead of consumers. It is usually expressed as a ratio or percentage. In India, WPI is also known as theheadline inflation rate. In India,Office of Economic Advisor(OEA), Department of Industrial Policy and Promotion, Ministry of Commerce and Industry calculates the WPI. CPI: The Consumer Price Index (CPI) is a measure that examines theweighted average of prices of a basket of consumer goods and services, such as transportation, food, and medical care. It is calculated by taking price changes for each item in the predetermined basket of goods and averaging them. Changes in the CPI are used to assess price changes associated with thecost of living; the CPI is one of the most frequently used statistics for identifying periods of inflation or deflation. Apart from the above two indices, there exists one more index i.e Producer Price Index(PPI). The majority of the OECD countries measure inflation based on PPI. Due to its various advantages, GOI has set up a committee headed by ProfessorBN Goldarto devise PPI. PPI: Producer Price Index(PPI) measures the average change in the price of goods and services as they leave the place of production, called output PPI or as they enter the production process, called input PPI. PPI estimates the change in average prices that a producer receives. It does not take into account transportation costs, traders" profit margins, etc. PPI measures the inflation rate at the production level. Effectiveness of Proposed producer price index The producer price index can identify various price alterations and changes before the goods enter the marketplace. Therefore, the PPI comes in considerably handy for the government to formulate adequate fiscal and monetary policies to counter inflation. The producer price index can be utilized to minimize or eliminate the effect of consumer market inflation on alterations in price and measurements. Producer price index gauges the cost of goods before they are released in the market, ready to be consumed, it can have a projecting value directly concerning their retail prices. Producer price index can be also used to balance other economic time series for price alterations and to interpret those numbers into inflation-free currency. The producer price index can measure the inflation’s real growth along with the reduction in the total output of an economy, while the consumer price index solely considers factors pertaining to the demand and supply in the economy. However, the producer price index cannot be used to calculate the standard of living or any other factor pertaining to the consumer. But considering its benefits and limitations, it can be said PPI can make counter inflation measures more effective.
|
##Question:Discuss the ways to measure inflation. Do you think the proposed Producer Price Index will help in making counter-inflation measures more effective? (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach: Define Inflation as Introduction Discuss about WPI and CPI to measure inflation Explain what PPI is and why it will help in making counter inflation measures more effective. Ans: Inflation is a quantitative measure of the rate at which the average price level of a basket of selected goods and services in an economy increases over a period of time. It is the constant rise in the general level of prices where a unit of currency buys less than it did in prior periods. Often expressed as a percentage, inflation indicates a decrease in thepurchasing powerof a nation’s currency. In India, generally, two kinds of indices are used to measure inflation—Wholesale Price Index (WPI) and Consumer Price Index (CPI). WPI: A wholesale price index (WPI) is an index that measures and tracks the changes in the price of goods in the stages before the retail level – that is, goods that are sold in bulk and traded between entities or businesses instead of consumers. It is usually expressed as a ratio or percentage. In India, WPI is also known as theheadline inflation rate. In India,Office of Economic Advisor(OEA), Department of Industrial Policy and Promotion, Ministry of Commerce and Industry calculates the WPI. CPI: The Consumer Price Index (CPI) is a measure that examines theweighted average of prices of a basket of consumer goods and services, such as transportation, food, and medical care. It is calculated by taking price changes for each item in the predetermined basket of goods and averaging them. Changes in the CPI are used to assess price changes associated with thecost of living; the CPI is one of the most frequently used statistics for identifying periods of inflation or deflation. Apart from the above two indices, there exists one more index i.e Producer Price Index(PPI). The majority of the OECD countries measure inflation based on PPI. Due to its various advantages, GOI has set up a committee headed by ProfessorBN Goldarto devise PPI. PPI: Producer Price Index(PPI) measures the average change in the price of goods and services as they leave the place of production, called output PPI or as they enter the production process, called input PPI. PPI estimates the change in average prices that a producer receives. It does not take into account transportation costs, traders" profit margins, etc. PPI measures the inflation rate at the production level. Effectiveness of Proposed producer price index The producer price index can identify various price alterations and changes before the goods enter the marketplace. Therefore, the PPI comes in considerably handy for the government to formulate adequate fiscal and monetary policies to counter inflation. The producer price index can be utilized to minimize or eliminate the effect of consumer market inflation on alterations in price and measurements. Producer price index gauges the cost of goods before they are released in the market, ready to be consumed, it can have a projecting value directly concerning their retail prices. Producer price index can be also used to balance other economic time series for price alterations and to interpret those numbers into inflation-free currency. The producer price index can measure the inflation’s real growth along with the reduction in the total output of an economy, while the consumer price index solely considers factors pertaining to the demand and supply in the economy. However, the producer price index cannot be used to calculate the standard of living or any other factor pertaining to the consumer. But considering its benefits and limitations, it can be said PPI can make counter inflation measures more effective.
| 45,744
|
उदारीकरण के बाद के काल में भारतीय विदेश नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं| संगत उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये| (10अंक; 150 से 200 शब्द ) After the liberalization period, significant changes in Indian foreign policy are seen. Explain through compatible examples. (10 marks;150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में उदारीकरण के पूर्व की विदेश नीति का संक्षिप परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में आये परिवर्तनों को उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में स्वरुप में परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय विदेश नीति स्वरूपतः गतिशील रही है| भारतीय विदेश नीति ने उदारीकरण के पूर्व आदर्शवादी विदेश नीति से प्रारम्भ होते हुए क्रमशः यथार्थवादी विदेशनीति का स्वरुप ग्रहण करती गयी है| उदारीकरण के पूर्व के चरण में भारतीय नेतृत्व द्वारा सॉफ्ट पॉवर के साथ ही हार्ड पॉवर कूटनीति का प्रयोग किया जाने लगा था| 90 के दशक के आर्थिक संकट ने भारतीय विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन किया| चिंतन का काल(1990 से 1998) · इस दौर में भारत ने पिछले चरणों में हुई गलतियों की समीक्षा की और स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाने कि प्रक्रिया शुरू की · इस चरण मेंसोवियत संघ का विघटन हो चुका था और भारत ने मित्रहीनता का सामना किया और सभी देशों के साथ सम्बन्ध बनाने पर बल दिया · इसी समय भारत ने आर्थिक संकट का सामना किया| अतः भारत को नयी आर्थिक नीति को अपनाया गया तथा दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ने का प्रयास किया गया| · अब भारत की विदेश नीति का आधार आर्थिक हो गया था| अर्थात बाजार निर्माण, पूँजी की प्राप्ति आदि के आधार पर सम्बन्ध बनाए जाने लगे| · इसी संदर्भ में भारत द्वारा पूरब की ओर देखो(Look East) की नीति अपनाई गयी, यह एक प्रकार से अमेरिका की ओर बढना था(सॉफ्ट पॉवर) 1993 में भारत और अमेरिका के मध्य समझौता हुआ और मालाबार सैन्य अभ्यास शुरू किया गया(हार्ड पॉवर)| इस तरह सॉफ्ट एवं हार्ड पॉवर कूटनीति का समायोजन करते हुए स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाई गयी| · इसी प्रकार उदारीकरण के बाद गुजराल सिद्धांत(सॉफ्ट पॉवर) के साथ ही कारगिल युद्ध के समय सेना का प्रयोग भारत की हार्ड पॉवर पालिसी को प्रकट करता है| शक्ति की वास्तविकता( 1998-2011) · भारत पिछले चरण में नयी आर्थिक नीति के साथ एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन चुका था, भारत स्वयं की शक्ति को पहचान चुका था| भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में पा कर विभिन्न देशों ने भारत के साथ सम्बन्ध स्थापना में रूचि दिखाई · यही दौर था जब भारत ने विश्व की सभी बड़ी शक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित किये, जैसे रूस के साथ ही अमेरिका के साथ भी सम्बन्ध मजबूत किये गए साथ ही भारत ने पर्यावरण एवं कृषि के मुद्दे को लेकर विकासशील देशों का नेतृत्व किया · इस तरह से भारत ने विश्व के विकसित एवं विकासशील देशों के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत किये और इसी समय वैश्विक संस्थाओं में भारत की सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है| · इस चरण में भारत ने विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की मांग करते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की| इसके साथ ही भारत ने परमपरागत व्यवस्था का विकल्प भी देने का प्रयास किया जैसे BRICS के माध्यम से NDB की स्थापना में सहयोग दिया| वापस भाविष्य में (2011 से 2014) · इस चरण में भारत ने वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों की समीक्षा की · इस चरण में भारत ने दो विचार प्रस्तुत किये यथा NAM 2 या बहु संलग्नता की नीति एवं सामरिक स्वायत्तता · NAM 2 का महत्त्व रूस-अमेरिका के मध्य बढ़ते तनाव(नव शीत युद्ध) के सन्दर्भ में है| इसमें भारत द्वारा निर्णय लिया गया कि शक्ति संघर्ष में नहीं उलझना है| · दूसरा सिद्धांत सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखना है अर्थात स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना है| कूटनीतिक निर्णयों पर किसी अन्य देश का दबाव न हो और न हीं हमारी नीति किसी अन्य देश के हितों की पूर्ति कर रही हों| · कोर हितों के सन्दर्भ में भारत ने पूर्ण सामरिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है जैसे रक्षा मामले, परमाणु शक्ति, कश्मीर मामला आदि वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों के संरक्षण में गतिमान है| सामने वाले के हितों को असुरक्षित न करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना ही प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित है| यह पंचशील सिद्धांत की समसामयिक परिभाषा है| इस तरह से वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित के अंतर्गत भारत गुट निरपेक्षता के स्थान पर समान संलग्नता की नीति पर बल दे रहा है| इस तरह उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन दिखाई देते हैं|
|
##Question:उदारीकरण के बाद के काल में भारतीय विदेश नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं| संगत उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये| (10अंक; 150 से 200 शब्द ) After the liberalization period, significant changes in Indian foreign policy are seen. Explain through compatible examples. (10 marks;150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में उदारीकरण के पूर्व की विदेश नीति का संक्षिप परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में आये परिवर्तनों को उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में स्वरुप में परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय विदेश नीति स्वरूपतः गतिशील रही है| भारतीय विदेश नीति ने उदारीकरण के पूर्व आदर्शवादी विदेश नीति से प्रारम्भ होते हुए क्रमशः यथार्थवादी विदेशनीति का स्वरुप ग्रहण करती गयी है| उदारीकरण के पूर्व के चरण में भारतीय नेतृत्व द्वारा सॉफ्ट पॉवर के साथ ही हार्ड पॉवर कूटनीति का प्रयोग किया जाने लगा था| 90 के दशक के आर्थिक संकट ने भारतीय विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन किया| चिंतन का काल(1990 से 1998) · इस दौर में भारत ने पिछले चरणों में हुई गलतियों की समीक्षा की और स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाने कि प्रक्रिया शुरू की · इस चरण मेंसोवियत संघ का विघटन हो चुका था और भारत ने मित्रहीनता का सामना किया और सभी देशों के साथ सम्बन्ध बनाने पर बल दिया · इसी समय भारत ने आर्थिक संकट का सामना किया| अतः भारत को नयी आर्थिक नीति को अपनाया गया तथा दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ने का प्रयास किया गया| · अब भारत की विदेश नीति का आधार आर्थिक हो गया था| अर्थात बाजार निर्माण, पूँजी की प्राप्ति आदि के आधार पर सम्बन्ध बनाए जाने लगे| · इसी संदर्भ में भारत द्वारा पूरब की ओर देखो(Look East) की नीति अपनाई गयी, यह एक प्रकार से अमेरिका की ओर बढना था(सॉफ्ट पॉवर) 1993 में भारत और अमेरिका के मध्य समझौता हुआ और मालाबार सैन्य अभ्यास शुरू किया गया(हार्ड पॉवर)| इस तरह सॉफ्ट एवं हार्ड पॉवर कूटनीति का समायोजन करते हुए स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाई गयी| · इसी प्रकार उदारीकरण के बाद गुजराल सिद्धांत(सॉफ्ट पॉवर) के साथ ही कारगिल युद्ध के समय सेना का प्रयोग भारत की हार्ड पॉवर पालिसी को प्रकट करता है| शक्ति की वास्तविकता( 1998-2011) · भारत पिछले चरण में नयी आर्थिक नीति के साथ एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन चुका था, भारत स्वयं की शक्ति को पहचान चुका था| भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में पा कर विभिन्न देशों ने भारत के साथ सम्बन्ध स्थापना में रूचि दिखाई · यही दौर था जब भारत ने विश्व की सभी बड़ी शक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित किये, जैसे रूस के साथ ही अमेरिका के साथ भी सम्बन्ध मजबूत किये गए साथ ही भारत ने पर्यावरण एवं कृषि के मुद्दे को लेकर विकासशील देशों का नेतृत्व किया · इस तरह से भारत ने विश्व के विकसित एवं विकासशील देशों के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत किये और इसी समय वैश्विक संस्थाओं में भारत की सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है| · इस चरण में भारत ने विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की मांग करते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की| इसके साथ ही भारत ने परमपरागत व्यवस्था का विकल्प भी देने का प्रयास किया जैसे BRICS के माध्यम से NDB की स्थापना में सहयोग दिया| वापस भाविष्य में (2011 से 2014) · इस चरण में भारत ने वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों की समीक्षा की · इस चरण में भारत ने दो विचार प्रस्तुत किये यथा NAM 2 या बहु संलग्नता की नीति एवं सामरिक स्वायत्तता · NAM 2 का महत्त्व रूस-अमेरिका के मध्य बढ़ते तनाव(नव शीत युद्ध) के सन्दर्भ में है| इसमें भारत द्वारा निर्णय लिया गया कि शक्ति संघर्ष में नहीं उलझना है| · दूसरा सिद्धांत सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखना है अर्थात स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना है| कूटनीतिक निर्णयों पर किसी अन्य देश का दबाव न हो और न हीं हमारी नीति किसी अन्य देश के हितों की पूर्ति कर रही हों| · कोर हितों के सन्दर्भ में भारत ने पूर्ण सामरिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है जैसे रक्षा मामले, परमाणु शक्ति, कश्मीर मामला आदि वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों के संरक्षण में गतिमान है| सामने वाले के हितों को असुरक्षित न करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना ही प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित है| यह पंचशील सिद्धांत की समसामयिक परिभाषा है| इस तरह से वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित के अंतर्गत भारत गुट निरपेक्षता के स्थान पर समान संलग्नता की नीति पर बल दे रहा है| इस तरह उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन दिखाई देते हैं|
| 45,746
|
"उदारीकरण के बाद के काल में भारतीय विदेश नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं |" संगत उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये | (150 से 200 शब्द/10 अंक) "After the liberalization period, significant changes in Indian foreign policy are seen". Explain through compatible examples. (150 to 200 words/10Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में उदारीकरण के पूर्व की विदेश नीति का संक्षिप परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में आये परिवर्तनों को उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में स्वरुप में परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय विदेश नीति स्वरूपतः गतिशील रही है| भारतीय विदेश नीति ने उदारीकरण के पूर्व आदर्शवादी विदेश नीति से प्रारम्भ होते हुए क्रमशः यथार्थवादी विदेशनीति का स्वरुप ग्रहण करती गयी है| उदारीकरण के पूर्व के चरण में भारतीय नेतृत्व द्वारा सॉफ्ट पॉवर के साथ ही हार्ड पॉवर कूटनीति का प्रयोग किया जाने लगा था| 90 के दशक के आर्थिक संकट ने भारतीय विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन किया| चिंतन का काल(1990 से 1998) · इस दौर में भारत ने पिछले चरणों में हुई गलतियों की समीक्षा की और स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाने कि प्रक्रिया शुरू की · इस चरण मेंसोवियत संघ का विघटन हो चुका था और भारत ने मित्रहीनता का सामना किया और सभी देशों के साथ सम्बन्ध बनाने पर बल दिया · इसी समय भारत ने आर्थिक संकट का सामना किया| अतः भारत को नयी आर्थिक नीति को अपनाया गया तथा दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ने का प्रयास किया गया| · अब भारत की विदेश नीति का आधार आर्थिक हो गया था| अर्थात बाजार निर्माण, पूँजी की प्राप्ति आदि के आधार पर सम्बन्ध बनाए जाने लगे| · इसी संदर्भ में भारत द्वारा पूरब की ओर देखो(Look East) की नीति अपनाई गयी, यह एक प्रकार से अमेरिका की ओर बढना था(सॉफ्ट पॉवर) 1993 में भारत और अमेरिका के मध्य समझौता हुआ और मालाबार सैन्य अभ्यास शुरू किया गया(हार्ड पॉवर)| इस तरह सॉफ्ट एवं हार्ड पॉवर कूटनीति का समायोजन करते हुए स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाई गयी| · इसी प्रकार उदारीकरण के बाद गुजराल सिद्धांत(सॉफ्ट पॉवर) के साथ ही कारगिल युद्ध के समय सेना का प्रयोग भारत की हार्ड पॉवर पालिसी को प्रकट करता है| शक्ति की वास्तविकता( 1998-2011) · भारत पिछले चरण में नयी आर्थिक नीति के साथ एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन चुका था, भारत स्वयं की शक्ति को पहचान चुका था| भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में पा कर विभिन्न देशों ने भारत के साथ सम्बन्ध स्थापना में रूचि दिखाई · यही दौर था जब भारत ने विश्व की सभी बड़ी शक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित किये, जैसे रूस के साथ ही अमेरिका के साथ भी सम्बन्ध मजबूत किये गए साथ ही भारत ने पर्यावरण एवं कृषि के मुद्दे को लेकर विकासशील देशों का नेतृत्व किया · इस तरह से भारत ने विश्व के विकसित एवं विकासशील देशों के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत किये और इसी समय वैश्विक संस्थाओं में भारत की सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है| · इस चरण में भारत ने विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की मांग करते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की| इसके साथ ही भारत ने परमपरागत व्यवस्था का विकल्प भी देने का प्रयास किया जैसे BRICS के माध्यम से NDB की स्थापना में सहयोग दिया| वापस भाविष्य में (2011 से 2014) · इस चरण में भारत ने वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों की समीक्षा की · इस चरण में भारत ने दो विचार प्रस्तुत किये यथा NAM 2 या बहु संलग्नता की नीति एवं सामरिक स्वायत्तता · NAM 2 का महत्त्व रूस-अमेरिका के मध्य बढ़ते तनाव(नव शीत युद्ध) के सन्दर्भ में है| इसमें भारत द्वारा निर्णय लिया गया कि शक्ति संघर्ष में नहीं उलझना है| · दूसरा सिद्धांत सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखना है अर्थात स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना है| कूटनीतिक निर्णयों पर किसी अन्य देश का दबाव न हो और न हीं हमारी नीति किसी अन्य देश के हितों की पूर्ति कर रही हों| · कोर हितों के सन्दर्भ में भारत ने पूर्ण सामरिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है जैसे रक्षा मामले, परमाणु शक्ति, कश्मीर मामला आदि वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों के संरक्षण में गतिमान है| सामने वाले के हितों को असुरक्षित न करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना ही प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित है| यह पंचशील सिद्धांत की समसामयिक परिभाषा है| इस तरह से वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित के अंतर्गत भारत गुट निरपेक्षता के स्थान पर समान संलग्नता की नीति पर बल दे रहा है| इस तरह उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन दिखाई देते हैं|
|
##Question:"उदारीकरण के बाद के काल में भारतीय विदेश नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं |" संगत उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये | (150 से 200 शब्द/10 अंक) "After the liberalization period, significant changes in Indian foreign policy are seen". Explain through compatible examples. (150 to 200 words/10Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में उदारीकरण के पूर्व की विदेश नीति का संक्षिप परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में आये परिवर्तनों को उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में स्वरुप में परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय विदेश नीति स्वरूपतः गतिशील रही है| भारतीय विदेश नीति ने उदारीकरण के पूर्व आदर्शवादी विदेश नीति से प्रारम्भ होते हुए क्रमशः यथार्थवादी विदेशनीति का स्वरुप ग्रहण करती गयी है| उदारीकरण के पूर्व के चरण में भारतीय नेतृत्व द्वारा सॉफ्ट पॉवर के साथ ही हार्ड पॉवर कूटनीति का प्रयोग किया जाने लगा था| 90 के दशक के आर्थिक संकट ने भारतीय विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन किया| चिंतन का काल(1990 से 1998) · इस दौर में भारत ने पिछले चरणों में हुई गलतियों की समीक्षा की और स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाने कि प्रक्रिया शुरू की · इस चरण मेंसोवियत संघ का विघटन हो चुका था और भारत ने मित्रहीनता का सामना किया और सभी देशों के साथ सम्बन्ध बनाने पर बल दिया · इसी समय भारत ने आर्थिक संकट का सामना किया| अतः भारत को नयी आर्थिक नीति को अपनाया गया तथा दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ने का प्रयास किया गया| · अब भारत की विदेश नीति का आधार आर्थिक हो गया था| अर्थात बाजार निर्माण, पूँजी की प्राप्ति आदि के आधार पर सम्बन्ध बनाए जाने लगे| · इसी संदर्भ में भारत द्वारा पूरब की ओर देखो(Look East) की नीति अपनाई गयी, यह एक प्रकार से अमेरिका की ओर बढना था(सॉफ्ट पॉवर) 1993 में भारत और अमेरिका के मध्य समझौता हुआ और मालाबार सैन्य अभ्यास शुरू किया गया(हार्ड पॉवर)| इस तरह सॉफ्ट एवं हार्ड पॉवर कूटनीति का समायोजन करते हुए स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनाई गयी| · इसी प्रकार उदारीकरण के बाद गुजराल सिद्धांत(सॉफ्ट पॉवर) के साथ ही कारगिल युद्ध के समय सेना का प्रयोग भारत की हार्ड पॉवर पालिसी को प्रकट करता है| शक्ति की वास्तविकता( 1998-2011) · भारत पिछले चरण में नयी आर्थिक नीति के साथ एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन चुका था, भारत स्वयं की शक्ति को पहचान चुका था| भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में पा कर विभिन्न देशों ने भारत के साथ सम्बन्ध स्थापना में रूचि दिखाई · यही दौर था जब भारत ने विश्व की सभी बड़ी शक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित किये, जैसे रूस के साथ ही अमेरिका के साथ भी सम्बन्ध मजबूत किये गए साथ ही भारत ने पर्यावरण एवं कृषि के मुद्दे को लेकर विकासशील देशों का नेतृत्व किया · इस तरह से भारत ने विश्व के विकसित एवं विकासशील देशों के साथ अपने सम्बन्ध मजबूत किये और इसी समय वैश्विक संस्थाओं में भारत की सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है| · इस चरण में भारत ने विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की मांग करते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की| इसके साथ ही भारत ने परमपरागत व्यवस्था का विकल्प भी देने का प्रयास किया जैसे BRICS के माध्यम से NDB की स्थापना में सहयोग दिया| वापस भाविष्य में (2011 से 2014) · इस चरण में भारत ने वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों की समीक्षा की · इस चरण में भारत ने दो विचार प्रस्तुत किये यथा NAM 2 या बहु संलग्नता की नीति एवं सामरिक स्वायत्तता · NAM 2 का महत्त्व रूस-अमेरिका के मध्य बढ़ते तनाव(नव शीत युद्ध) के सन्दर्भ में है| इसमें भारत द्वारा निर्णय लिया गया कि शक्ति संघर्ष में नहीं उलझना है| · दूसरा सिद्धांत सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखना है अर्थात स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना है| कूटनीतिक निर्णयों पर किसी अन्य देश का दबाव न हो और न हीं हमारी नीति किसी अन्य देश के हितों की पूर्ति कर रही हों| · कोर हितों के सन्दर्भ में भारत ने पूर्ण सामरिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है जैसे रक्षा मामले, परमाणु शक्ति, कश्मीर मामला आदि वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों के संरक्षण में गतिमान है| सामने वाले के हितों को असुरक्षित न करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना ही प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित है| यह पंचशील सिद्धांत की समसामयिक परिभाषा है| इस तरह से वर्तमान भारतीय विदेश नीति प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित के अंतर्गत भारत गुट निरपेक्षता के स्थान पर समान संलग्नता की नीति पर बल दे रहा है| इस तरह उदारीकरण के बाद भारतीय विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन दिखाई देते हैं|
| 45,751
|
फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) द्वारा पाकिस्तान को अपनी ग्रे-सूची में रखने के पीछे उत्तरदायी कारणों को सूचीबद्ध कीजिए | इस कदम का पाकिस्तान पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? (150-200 शब्द/10 अंक) List the responsible causes behind keeping pakistan in its gray-list by financial action task force (FATF). How this move can affect pakistan? (150-200 words/10 Marks)
|
एप्रोच- फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) तथा उसके उद्देश्यों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) द्वारा पाकिस्तान को अपनी ग्रे-सूची में रखने के पीछे उत्तरदायी कारणों को सूचीबद्ध कीजिए| अंतिम भाग में, ग्रे सूची में डाले जाने से पाकिस्तान पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| निष्कर्षतः भारत के संदर्भ में इस कदम की साथर्कता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) 1989 में जी-7 देशों की पहल पर स्थापित एक अंतःसरकारी संगठन है| इसका उद्देश्य टेरर फंडिंग, ड्रग्स तस्करी तथा हवाला कारोबार पर नजर रखकर वितीय क्षेत्र को इनसे मुक्त रखना है| फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) तीन सूचियों के माध्यम से किसी देश पर उपरोक्त संदिग्थ वितीय गतिविधियों हेतु नजर रखता है| यह किसी राष्ट्रको पहले निगरानी सूची में डाल सकता है तथाउसके बाद ग्रे सूची में डालकर संबंधित देश को इन गतिविधियों के रोकथाम हेतु चेतावनी देता है| अगर फिर भी कोई देशटेरर फंडिंग, ड्रग्स तस्करी तथा हवाला कारोबार जैसे क्षेत्रों में वितीय गतिविधियों के रोकथाम हेतु उपयुक्त कदम नहीं उठाता है तो वह अंततः उस देश को ब्लैक लिस्ट मेंभी डाल सकता है जिसके बाद संबंधित देश पर कई प्रकार के वितीय प्रतिबंध लागू हो जाते हैं| फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) द्वारा पाकिस्तान को अपनी ग्रे-सूची में रखने के पीछे उत्तरदायी कारण हाल ही में,फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) ने पाकिस्तान को निगरानी सूची से ग्रे सूची में डालने का फैसला किया है जिसके प्रमुख कारण निम्न हैं- पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद विरोधी वित्त पोषण और ,मनी-लाउनडरिंग के नियमों का पर्याप्त पालन नहीं किया जा रहा था| अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों ने पाकिस्तान को एफटीएएफ की निगरानी सूची से ग्रे सूची में रखने का प्रस्ताव दिया| हालांकि सऊदी अरब के नेतृत्व वाले खाड़ी सहयोग परिषद और तुर्की ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाले जाने का विरोध किया था| चीन ने इस कदम पर अपने पहले की आपत्तियों को हटा दिया था| अफगानिस्तान में अमेरिकी समर्थित शासन को तालिबान से बढ़ते खतरे को पाकिस्तानी समर्थन के रूप में भी देखा गया एवं अमेरिका ने पाकिस्तान के भीतर से चलने वाले आतंकवादी समूहों पर नरम होने के लिए पाकिस्तान को रक्षा और आर्थिक सहायता में कटौती की है| इन घटनाओं के अनुरूप अमेरिका ने ग्रे-सूची में पाकिस्तान को रखने के लिए एपीटीएफ में कदम उठाया| पाकिस्तान 2012 से 2015 तक एफएटीएफ की निगरानी सूची में शामिल था फिर भी संगठन द्वारा बताए गये सुधारों/निर्देशों को पालन करने में पाकिस्तान द्वारा आनाकानी की जा रही थी| सुरक्षा परिषद के 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा प्रतिबंधित समूह लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हक्कानी नेटवर्क जैसे तालिबान से जुड़े समूहों पर नजर रखा जाता है| आतंकवादी समूहों की वित्तीय गतिविधियों पर नियंत्रण ना रखने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया गया| हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकवादी सार्वजनिक रैलियों एवं चंदा के माध्यम से धन की उगाही पाकिस्तान में कर रहे थे| लश्कर-ए-तैयबा एवं जैश-ए-मोहम्मद दोनों आतंकवादी संगठन भारत में भीषण आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार हैं| पाकिस्तानी अदालत ने लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी को मुंबई आतंकवादी हमलों के प्रमुख योजनाकार होने के बावजूद भी जमानत दे दी थी| 1267 प्रतिबंध समिति के फैसले के तहत प्रतिबंधित इकाइयों को कोई भी धन नहीं मिल सकता है| फिर भी जकीउर रहमान लखवी को जमानत राशि मिली है और संबंधित अधिकारियों ने तब से उसका ट्रैक खो दिया है| ग्रे सूची में डाले जाने से पाकिस्तान पर पड़ने वाले प्रभाव चूँकि पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखा गया है अतः अब उसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी समूहों के लिए धन को रोकने हेतु विस्तृत कार्य योजना प्रदान करनी होगी| यदि पाकिस्तान उपरोक्त्त कदम के अनुपालन में विफल रहता है तो अगले कदम के रूप में पाकिस्तान को फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स की ब्लैक लिस्ट सूची में भी शामिल किया जा सकता है| अगर पाकिस्तान ब्लैक लिस्ट होगा तो उसके सभी वित्तीय प्रभाव में कटौती हो सकती है| अगर चीन आर्थिक रूप से पाकिस्तान की सहायता करना जारी रखेगा तो भी इसका वित्तपोषण मॉडल पाकिस्तान के कर्ज के बोझ कोई बढ़ाएगा| अपने विदेशी मुद्रा स्थिति को देखते हुए पाकिस्तान को अनिवार्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से बेलआउट की तलाश करनी होगी| विदेशी देश/संगठन पाकिस्तान को आर्थिक सहायता बंद कर देंगे| अंतर्राष्ट्रीय वितीय संस्थानों से मिलने वाले कर्ज बंद हो सकते हैं| यह कदम जर्जर पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को दिवालियापन की ओर ले जाएगा| फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) का यह कदम भारत की चिंताओं को ही पुष्टि करता है| भारत में होंने वाले ज्यादातर आतंकवादी गतिविधियों हेतु पाकिस्तान में ही जिम्मेदार तत्व शरण लिए हुए हैं| फिर भी, पाकिस्तान द्वारा इनपर अंकुश लगाने तथा उनके वितीय नेटवर्क को रोकने हेतु कोई खास कदाम नहीं उठाया जाता है| जब तक आतंकवादी आधारभूत संरचना को पाकिस्तान अंतिम रूप से नष्ट नहीं करता है तब तक पाकिस्तान पर ऐसे कठोर कदम के लिए आम सहमति को मजबूत किया जाना चाहिए|
|
##Question:फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) द्वारा पाकिस्तान को अपनी ग्रे-सूची में रखने के पीछे उत्तरदायी कारणों को सूचीबद्ध कीजिए | इस कदम का पाकिस्तान पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? (150-200 शब्द/10 अंक) List the responsible causes behind keeping pakistan in its gray-list by financial action task force (FATF). How this move can affect pakistan? (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) तथा उसके उद्देश्यों के बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) द्वारा पाकिस्तान को अपनी ग्रे-सूची में रखने के पीछे उत्तरदायी कारणों को सूचीबद्ध कीजिए| अंतिम भाग में, ग्रे सूची में डाले जाने से पाकिस्तान पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| निष्कर्षतः भारत के संदर्भ में इस कदम की साथर्कता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) 1989 में जी-7 देशों की पहल पर स्थापित एक अंतःसरकारी संगठन है| इसका उद्देश्य टेरर फंडिंग, ड्रग्स तस्करी तथा हवाला कारोबार पर नजर रखकर वितीय क्षेत्र को इनसे मुक्त रखना है| फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) तीन सूचियों के माध्यम से किसी देश पर उपरोक्त संदिग्थ वितीय गतिविधियों हेतु नजर रखता है| यह किसी राष्ट्रको पहले निगरानी सूची में डाल सकता है तथाउसके बाद ग्रे सूची में डालकर संबंधित देश को इन गतिविधियों के रोकथाम हेतु चेतावनी देता है| अगर फिर भी कोई देशटेरर फंडिंग, ड्रग्स तस्करी तथा हवाला कारोबार जैसे क्षेत्रों में वितीय गतिविधियों के रोकथाम हेतु उपयुक्त कदम नहीं उठाता है तो वह अंततः उस देश को ब्लैक लिस्ट मेंभी डाल सकता है जिसके बाद संबंधित देश पर कई प्रकार के वितीय प्रतिबंध लागू हो जाते हैं| फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) द्वारा पाकिस्तान को अपनी ग्रे-सूची में रखने के पीछे उत्तरदायी कारण हाल ही में,फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) ने पाकिस्तान को निगरानी सूची से ग्रे सूची में डालने का फैसला किया है जिसके प्रमुख कारण निम्न हैं- पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद विरोधी वित्त पोषण और ,मनी-लाउनडरिंग के नियमों का पर्याप्त पालन नहीं किया जा रहा था| अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों ने पाकिस्तान को एफटीएएफ की निगरानी सूची से ग्रे सूची में रखने का प्रस्ताव दिया| हालांकि सऊदी अरब के नेतृत्व वाले खाड़ी सहयोग परिषद और तुर्की ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाले जाने का विरोध किया था| चीन ने इस कदम पर अपने पहले की आपत्तियों को हटा दिया था| अफगानिस्तान में अमेरिकी समर्थित शासन को तालिबान से बढ़ते खतरे को पाकिस्तानी समर्थन के रूप में भी देखा गया एवं अमेरिका ने पाकिस्तान के भीतर से चलने वाले आतंकवादी समूहों पर नरम होने के लिए पाकिस्तान को रक्षा और आर्थिक सहायता में कटौती की है| इन घटनाओं के अनुरूप अमेरिका ने ग्रे-सूची में पाकिस्तान को रखने के लिए एपीटीएफ में कदम उठाया| पाकिस्तान 2012 से 2015 तक एफएटीएफ की निगरानी सूची में शामिल था फिर भी संगठन द्वारा बताए गये सुधारों/निर्देशों को पालन करने में पाकिस्तान द्वारा आनाकानी की जा रही थी| सुरक्षा परिषद के 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा प्रतिबंधित समूह लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हक्कानी नेटवर्क जैसे तालिबान से जुड़े समूहों पर नजर रखा जाता है| आतंकवादी समूहों की वित्तीय गतिविधियों पर नियंत्रण ना रखने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया गया| हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकवादी सार्वजनिक रैलियों एवं चंदा के माध्यम से धन की उगाही पाकिस्तान में कर रहे थे| लश्कर-ए-तैयबा एवं जैश-ए-मोहम्मद दोनों आतंकवादी संगठन भारत में भीषण आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार हैं| पाकिस्तानी अदालत ने लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी को मुंबई आतंकवादी हमलों के प्रमुख योजनाकार होने के बावजूद भी जमानत दे दी थी| 1267 प्रतिबंध समिति के फैसले के तहत प्रतिबंधित इकाइयों को कोई भी धन नहीं मिल सकता है| फिर भी जकीउर रहमान लखवी को जमानत राशि मिली है और संबंधित अधिकारियों ने तब से उसका ट्रैक खो दिया है| ग्रे सूची में डाले जाने से पाकिस्तान पर पड़ने वाले प्रभाव चूँकि पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखा गया है अतः अब उसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी समूहों के लिए धन को रोकने हेतु विस्तृत कार्य योजना प्रदान करनी होगी| यदि पाकिस्तान उपरोक्त्त कदम के अनुपालन में विफल रहता है तो अगले कदम के रूप में पाकिस्तान को फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स की ब्लैक लिस्ट सूची में भी शामिल किया जा सकता है| अगर पाकिस्तान ब्लैक लिस्ट होगा तो उसके सभी वित्तीय प्रभाव में कटौती हो सकती है| अगर चीन आर्थिक रूप से पाकिस्तान की सहायता करना जारी रखेगा तो भी इसका वित्तपोषण मॉडल पाकिस्तान के कर्ज के बोझ कोई बढ़ाएगा| अपने विदेशी मुद्रा स्थिति को देखते हुए पाकिस्तान को अनिवार्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से बेलआउट की तलाश करनी होगी| विदेशी देश/संगठन पाकिस्तान को आर्थिक सहायता बंद कर देंगे| अंतर्राष्ट्रीय वितीय संस्थानों से मिलने वाले कर्ज बंद हो सकते हैं| यह कदम जर्जर पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को दिवालियापन की ओर ले जाएगा| फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स(FATF) का यह कदम भारत की चिंताओं को ही पुष्टि करता है| भारत में होंने वाले ज्यादातर आतंकवादी गतिविधियों हेतु पाकिस्तान में ही जिम्मेदार तत्व शरण लिए हुए हैं| फिर भी, पाकिस्तान द्वारा इनपर अंकुश लगाने तथा उनके वितीय नेटवर्क को रोकने हेतु कोई खास कदाम नहीं उठाया जाता है| जब तक आतंकवादी आधारभूत संरचना को पाकिस्तान अंतिम रूप से नष्ट नहीं करता है तब तक पाकिस्तान पर ऐसे कठोर कदम के लिए आम सहमति को मजबूत किया जाना चाहिए|
| 45,760
|
Partly, the Cold War began as a result of the differences over the fate of post war Germany. Discuss (150 words)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY -THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR -CONCLUSION The key events post the ones discussed and the final ending of the cold war in 1991 Answer:- THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY The cold war was the result of the mutual destruction caused by the Second World War. However, the more fundamental reason for the cold war can be traced to the differences over the fate of post war Germany. Germany was defeated in World War II. The time period spanning from 1945-50 specifically pertains to such events which determined the fate of post war and Germany and the beginning of the cold war. 1) 1945- YALTA AND POSTDAM CONFERENCE In this conference, intensive deliberations were carried out over the fate of post war Germany. The debate was between the western powers (Britain, France and US) on one side and the Soviet Union on the other. 1.1) Britain, France and the US were of the opinion that the mistakes of World War I must not be repeated. Germany should not be punished, as it was by imposing the Treaty of Versailles post World War I. 1.2) The Western powers advocated for the re-construction of Germany and stabilization measures there, along with a multi-party democratic system, along with a capitalist order, in Germany, as this would prevent the rise of Nazi and Fascist powers again. 1.3) Soviet Union was strongly opposed to the idea of the creation of a strong and unified Germany, as that could pose a strong military threat to Soviet Union in future, as it did during World Wars I and II. Germany had attacked them thrice in 30 years. 1.4) Soviet Union and Stalin said that they would develop Eastern Germany as a buffer state between the capitalist west and the Soviet Union. Therefore, they were advocating a divided Germany. 1.5) Also, the Soviet Union aimed to extract minerals as war indemnity from eastern Germany. The Soviet Union did not trust the Western powers as they did not open the Western Front when the former had asked the latter to do so during the 2nd World War. The differences over Germany represented the wider differences between the west and Soviet Union and the distrust too. After this conference, Churchill said that an iron curtain has descended upon Europe (running between the western and eastern Germany). The above factors led to the partition of Germany including Berlin into West Berlin and East Berlin. 2) 1948- THE BERLIN BLOCKADE In the three years between 1945 and 1947 and the beginning of 1948, the western powers had power over West Germany and West Berlin. The US provided aid for the re-development of Germany. Therefore, western Germany including West Berlin was being developed. But East Germany remained underdeveloped. This led to a huge wave of migration . People simply walked over to West Berlin and West Germany and settled down there. This was a huge embarrassment for Soviet Union , because it showed that West Germany was more developed than East Germany, implying that the western model of development was better than that of the Soviet Union’s. Stalin, thus, enforced a blockade and cut off the land route connecting east to West Germany, in order to stop the wave of migration. The supply of food, fuel and other commodities was also stopped to West Berlin. Thus, the western powers used airlift i n order to provide the essential commodities to West Germany/ West Berlin. This was even a greater embarrassment for the Soviet Union . Therefore, Stalin and the Soviet Union was forced to remove the Berlin blockade after 9 months. THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR The Cold War started during the time of Stalin itself. The other reasons for the start of a cold war were: 1) VARYING IDEOLOGIES The capitalist and communist ideologies were completely different in nature. And both the countries (USA and USSR) wanted their ideology to spread and be accepted at the cost of the other. While the capitalist ideology believed in material wealth and accumulation, the communist ideology despised this as the pursuit of selfish means for selfish ends. They believed in equitable distribution of wealth. 2) OLD SUSPICIONS Britain and France supported the whites after the Russian Revolution. Russia was not invited in the treaty of Versailles. Also, Stalin believed that Britain and France delayed the opening of the 2nd front against Germany until 1944. 3) DIVISION OF CLASS In many countries, workers supported communism, while the industrial class favored capitalism. The cold war and interference of USA and USSR in domestic politics of other countries was not quite possible without local support. 4) FEAR OF SPREAD USA genuinely feared that the spirit of communism in one country will lead to its spread to many other countries 5) ROLE OF LEADERS 5.1) STALIN- He considered that peaceful co-existence with the west was impossible until final victory over capitalism 5.2) CHURCHILL -He used the term ‘iron-curtain’ to denote the spread of communism in Eastern Europe 5.3) ROOSEVELT AND TRUMAN- They generally feared communism and massive anti-communist propaganda. Hence, they even brought the public in support of the actions taken during the cold war Regarding, the cold war partly being a result of the differences over the fate of post war Germany, though the removal of the blockade brought the immediate issue to an end, yet the cold war continued with the formation of NATO in 1949 in line with the Truman doctrine and the Policy of Containment, the Warsaw Pact in 1955 etc. This went on till 1989, when the Berlin Wall collapsed, which led to the collapse of the Soviet Union in 1991 and the end of the Cold War.
|
##Question:Partly, the Cold War began as a result of the differences over the fate of post war Germany. Discuss (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY -THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR -CONCLUSION The key events post the ones discussed and the final ending of the cold war in 1991 Answer:- THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY The cold war was the result of the mutual destruction caused by the Second World War. However, the more fundamental reason for the cold war can be traced to the differences over the fate of post war Germany. Germany was defeated in World War II. The time period spanning from 1945-50 specifically pertains to such events which determined the fate of post war and Germany and the beginning of the cold war. 1) 1945- YALTA AND POSTDAM CONFERENCE In this conference, intensive deliberations were carried out over the fate of post war Germany. The debate was between the western powers (Britain, France and US) on one side and the Soviet Union on the other. 1.1) Britain, France and the US were of the opinion that the mistakes of World War I must not be repeated. Germany should not be punished, as it was by imposing the Treaty of Versailles post World War I. 1.2) The Western powers advocated for the re-construction of Germany and stabilization measures there, along with a multi-party democratic system, along with a capitalist order, in Germany, as this would prevent the rise of Nazi and Fascist powers again. 1.3) Soviet Union was strongly opposed to the idea of the creation of a strong and unified Germany, as that could pose a strong military threat to Soviet Union in future, as it did during World Wars I and II. Germany had attacked them thrice in 30 years. 1.4) Soviet Union and Stalin said that they would develop Eastern Germany as a buffer state between the capitalist west and the Soviet Union. Therefore, they were advocating a divided Germany. 1.5) Also, the Soviet Union aimed to extract minerals as war indemnity from eastern Germany. The Soviet Union did not trust the Western powers as they did not open the Western Front when the former had asked the latter to do so during the 2nd World War. The differences over Germany represented the wider differences between the west and Soviet Union and the distrust too. After this conference, Churchill said that an iron curtain has descended upon Europe (running between the western and eastern Germany). The above factors led to the partition of Germany including Berlin into West Berlin and East Berlin. 2) 1948- THE BERLIN BLOCKADE In the three years between 1945 and 1947 and the beginning of 1948, the western powers had power over West Germany and West Berlin. The US provided aid for the re-development of Germany. Therefore, western Germany including West Berlin was being developed. But East Germany remained underdeveloped. This led to a huge wave of migration . People simply walked over to West Berlin and West Germany and settled down there. This was a huge embarrassment for Soviet Union , because it showed that West Germany was more developed than East Germany, implying that the western model of development was better than that of the Soviet Union’s. Stalin, thus, enforced a blockade and cut off the land route connecting east to West Germany, in order to stop the wave of migration. The supply of food, fuel and other commodities was also stopped to West Berlin. Thus, the western powers used airlift i n order to provide the essential commodities to West Germany/ West Berlin. This was even a greater embarrassment for the Soviet Union . Therefore, Stalin and the Soviet Union was forced to remove the Berlin blockade after 9 months. THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR The Cold War started during the time of Stalin itself. The other reasons for the start of a cold war were: 1) VARYING IDEOLOGIES The capitalist and communist ideologies were completely different in nature. And both the countries (USA and USSR) wanted their ideology to spread and be accepted at the cost of the other. While the capitalist ideology believed in material wealth and accumulation, the communist ideology despised this as the pursuit of selfish means for selfish ends. They believed in equitable distribution of wealth. 2) OLD SUSPICIONS Britain and France supported the whites after the Russian Revolution. Russia was not invited in the treaty of Versailles. Also, Stalin believed that Britain and France delayed the opening of the 2nd front against Germany until 1944. 3) DIVISION OF CLASS In many countries, workers supported communism, while the industrial class favored capitalism. The cold war and interference of USA and USSR in domestic politics of other countries was not quite possible without local support. 4) FEAR OF SPREAD USA genuinely feared that the spirit of communism in one country will lead to its spread to many other countries 5) ROLE OF LEADERS 5.1) STALIN- He considered that peaceful co-existence with the west was impossible until final victory over capitalism 5.2) CHURCHILL -He used the term ‘iron-curtain’ to denote the spread of communism in Eastern Europe 5.3) ROOSEVELT AND TRUMAN- They generally feared communism and massive anti-communist propaganda. Hence, they even brought the public in support of the actions taken during the cold war Regarding, the cold war partly being a result of the differences over the fate of post war Germany, though the removal of the blockade brought the immediate issue to an end, yet the cold war continued with the formation of NATO in 1949 in line with the Truman doctrine and the Policy of Containment, the Warsaw Pact in 1955 etc. This went on till 1989, when the Berlin Wall collapsed, which led to the collapse of the Soviet Union in 1991 and the end of the Cold War.
| 45,766
|
The Cold War began as a result of the differences over the fate of post war Germany. Discuss (150 words/10 Marks)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY -THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR -CONCLUSION The key events post the ones discussed and the final ending of the cold war in 1991 Answer:- The cold war was the result of the mutual destruction caused by the Second World War. After World War II, the world was divided into two blocks, the communist block led by USSR, and the Capitalist block led by the USA. Both USA and USSR competed for hegemony in the economy, science and technology, world affairs and the military. It is called the cold war because the USA and USSR did not fight directly in the war. It was more a fight of ideologies than a fight at battlefields THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY The cold war was the result of the mutual destruction caused by the Second World War. However, the more fundamental reason for the cold war can be traced to the differences over the fate of post-war Germany. Germany was defeated in World War II. The time period spanning from 1945-50 specifically pertains to such events which determined the fate of post-war and Germany and the beginning of the cold war. 1) 1945- YALTA AND POTSDAM CONFERENCE In this conference, intensive deliberations were carried out over the fate of post-war Germany. The debate was between the western powers (Britain, France and the USA) on one side and the Soviet Union on the other. 1.1) Britain, France and the US were of the opinion that the mistakes of World War I must not be repeated . Germany should not be punished, as it was by imposing the Treaty of Versailles post World War I. 1.2) The Western powers advocated for the reconstruction of Germany and stabilization measures there, along with a multi-party democratic system , along with a capitalist order, in Germany, as this would prevent the rise of Nazi and Fascist powers again. 1.3) Soviet Union was strongly opposed to the idea of the creation of a strong and unified Germany, as that could pose a strong military threat to the Soviet Union in future, as it did during World Wars I and II. Germany had attacked them thrice in 30 years. 1.4) the Soviet Union and Stalin said that they would develop Eastern Germany as a buffer state between the capitalist West and the Soviet Union. Therefore, they were advocating a divided Germany. 1.5) Also, the Soviet Union aimed to extract minerals as war indemnity from eastern Germany. The Soviet Union did not trust the Western powers as they did not open the Western Front when the former had asked the latter to do so during the 2nd World War. The differences over Germany represented the wider differences between the West and Soviet Union and the distrust too. After this conference, Churchill said that an iron curtain had descended upon Europe (running between the western and eastern Germany). The above factors led to the partition of Germany including Berlin into West Berlin and East Berlin. 2) 1948- THE BERLIN BLOCKADE In the three years between 1945 and 1947 and the beginning of 1948, the western powers had power over West Germany and West Berlin. The US provided aid for the re-development of Germany. Therefore, western Germany including West Berlin was being developed. But East Germany remained underdeveloped. This led to a huge wave of migration . People simply walked over to West Berlin and West Germany and settled down there. This was a huge embarrassment for the Soviet Union because it showed that West Germany was more developed than East Germany, implying that the western model of development was better than that of the Soviet Union’s. Stalin, thus, enforced a blockade and cut off the land route connecting east to West Germany, in order to stop the wave of migration. The supply of food, fuel and other commodities was also stopped to West Berlin. Thus, the western powers used airlift in order to provide the essential commodities to West Germany/ West Berlin. This was even a greater embarrassment for the Soviet Union. Therefore, Stalin and the Soviet Union was forced to remove the Berlin blockade after 9 months. THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR The Cold War started during the time of Stalin itself. The other reasons for the start of cold war were: 1) VARYING IDEOLOGIES The capitalist and communist ideologies were completely different in nature. And both the countries (USA and USSR) wanted their ideology to spread and be accepted at the cost of the other. While the capitalist ideology believed in material wealth and accumulation, the communist ideology despised this as the pursuit of selfish means for selfish ends. They believed the inequitable distribution of wealth. 2) OLD SUSPICIONS Britain and France supported the whites after the Russian Revolution. Russia was not invited in the treaty of Versailles. Also, Stalin believed that Britain and France delayed the opening of the 2nd front against Germany until 1944. 3) DIVISION OF CLASS In many countries, workers supported communism, while the industrial class favoured capitalism. The cold war and interference of the USA and USSR in the domestic politics of other countries was not quite possible without local support 4) FEAR OF SPREAD The USA genuinely feared that the spirit of communism in one country will lead to its spread to many other countries 5) ROLE OF LEADERS 5.1) STALIN- He considered that peaceful co-existence with the west was impossible until final victory over capitalism 5.2) CHURCHILL- He used the term ‘iron-curtain’ to denote the spread of communism in Eastern Europe 5.3) ROOSEVELT AND TRUMAN- They generally feared communism and massive anti-communist propaganda. Hence, they even brought the public in support of the actions taken during the cold war Regarding, the cold war partly being a result of the differences over the fate of post-war Germany, though the removal of the blockade brought the immediate issue to an end, yet the cold war continued with the formation of NATO in 1949 in line with the Truman doctrine and the Policy of Containment, the Warsaw Pact in 1955 etc. This went on till 1989, when the Berlin Wall collapsed, which led to the collapse of the Soviet Union in 1991 and the end of the Cold War.
|
##Question:The Cold War began as a result of the differences over the fate of post war Germany. Discuss (150 words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY -THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR -CONCLUSION The key events post the ones discussed and the final ending of the cold war in 1991 Answer:- The cold war was the result of the mutual destruction caused by the Second World War. After World War II, the world was divided into two blocks, the communist block led by USSR, and the Capitalist block led by the USA. Both USA and USSR competed for hegemony in the economy, science and technology, world affairs and the military. It is called the cold war because the USA and USSR did not fight directly in the war. It was more a fight of ideologies than a fight at battlefields THE COLD WAR- A RESULT OF THE DIFFERENCES OVER THE FATE OF POST WAR GERMANY The cold war was the result of the mutual destruction caused by the Second World War. However, the more fundamental reason for the cold war can be traced to the differences over the fate of post-war Germany. Germany was defeated in World War II. The time period spanning from 1945-50 specifically pertains to such events which determined the fate of post-war and Germany and the beginning of the cold war. 1) 1945- YALTA AND POTSDAM CONFERENCE In this conference, intensive deliberations were carried out over the fate of post-war Germany. The debate was between the western powers (Britain, France and the USA) on one side and the Soviet Union on the other. 1.1) Britain, France and the US were of the opinion that the mistakes of World War I must not be repeated . Germany should not be punished, as it was by imposing the Treaty of Versailles post World War I. 1.2) The Western powers advocated for the reconstruction of Germany and stabilization measures there, along with a multi-party democratic system , along with a capitalist order, in Germany, as this would prevent the rise of Nazi and Fascist powers again. 1.3) Soviet Union was strongly opposed to the idea of the creation of a strong and unified Germany, as that could pose a strong military threat to the Soviet Union in future, as it did during World Wars I and II. Germany had attacked them thrice in 30 years. 1.4) the Soviet Union and Stalin said that they would develop Eastern Germany as a buffer state between the capitalist West and the Soviet Union. Therefore, they were advocating a divided Germany. 1.5) Also, the Soviet Union aimed to extract minerals as war indemnity from eastern Germany. The Soviet Union did not trust the Western powers as they did not open the Western Front when the former had asked the latter to do so during the 2nd World War. The differences over Germany represented the wider differences between the West and Soviet Union and the distrust too. After this conference, Churchill said that an iron curtain had descended upon Europe (running between the western and eastern Germany). The above factors led to the partition of Germany including Berlin into West Berlin and East Berlin. 2) 1948- THE BERLIN BLOCKADE In the three years between 1945 and 1947 and the beginning of 1948, the western powers had power over West Germany and West Berlin. The US provided aid for the re-development of Germany. Therefore, western Germany including West Berlin was being developed. But East Germany remained underdeveloped. This led to a huge wave of migration . People simply walked over to West Berlin and West Germany and settled down there. This was a huge embarrassment for the Soviet Union because it showed that West Germany was more developed than East Germany, implying that the western model of development was better than that of the Soviet Union’s. Stalin, thus, enforced a blockade and cut off the land route connecting east to West Germany, in order to stop the wave of migration. The supply of food, fuel and other commodities was also stopped to West Berlin. Thus, the western powers used airlift in order to provide the essential commodities to West Germany/ West Berlin. This was even a greater embarrassment for the Soviet Union. Therefore, Stalin and the Soviet Union was forced to remove the Berlin blockade after 9 months. THE OTHER REASONS FOR THE COLD WAR The Cold War started during the time of Stalin itself. The other reasons for the start of cold war were: 1) VARYING IDEOLOGIES The capitalist and communist ideologies were completely different in nature. And both the countries (USA and USSR) wanted their ideology to spread and be accepted at the cost of the other. While the capitalist ideology believed in material wealth and accumulation, the communist ideology despised this as the pursuit of selfish means for selfish ends. They believed the inequitable distribution of wealth. 2) OLD SUSPICIONS Britain and France supported the whites after the Russian Revolution. Russia was not invited in the treaty of Versailles. Also, Stalin believed that Britain and France delayed the opening of the 2nd front against Germany until 1944. 3) DIVISION OF CLASS In many countries, workers supported communism, while the industrial class favoured capitalism. The cold war and interference of the USA and USSR in the domestic politics of other countries was not quite possible without local support 4) FEAR OF SPREAD The USA genuinely feared that the spirit of communism in one country will lead to its spread to many other countries 5) ROLE OF LEADERS 5.1) STALIN- He considered that peaceful co-existence with the west was impossible until final victory over capitalism 5.2) CHURCHILL- He used the term ‘iron-curtain’ to denote the spread of communism in Eastern Europe 5.3) ROOSEVELT AND TRUMAN- They generally feared communism and massive anti-communist propaganda. Hence, they even brought the public in support of the actions taken during the cold war Regarding, the cold war partly being a result of the differences over the fate of post-war Germany, though the removal of the blockade brought the immediate issue to an end, yet the cold war continued with the formation of NATO in 1949 in line with the Truman doctrine and the Policy of Containment, the Warsaw Pact in 1955 etc. This went on till 1989, when the Berlin Wall collapsed, which led to the collapse of the Soviet Union in 1991 and the end of the Cold War.
| 45,770
|
वित्त आयोग की संरचना और कार्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। इसके साथ ही 15वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों से संबन्धित मुद्दों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Give a brief overview of the structure and functions of the Finance Commission. Along with this, discuss issues related to terms of reference of the 15th Finance Commission. (150-200 words)
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में वित्त आयोग के बारे में लिखिए। पहले भाग में संरचना और कार्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। इसके बाद 15वें वित्त आयोग की संदर्भ की शर्तों से संबन्धित मुद्दों पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में महत्व व सुझाव लिखिए। संविधान के अनुच्छेद 280 में वित्त आयोग की संरचना और कार्यों का उल्लेख किया गया। यह एक संवैधानिक निकाय है। संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिए और अन्य चार सदस्यों को इस प्रकार से चुना जाना चाहिए: किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इसके पद के लिए योग्य व्यक्ति ऐसा व्यक्ति जिसे भारत के लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो। ऐसा व्यक्ति जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो ऐसा व्यक्ति, जो अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो। वित्त आयोग के कार्य: संघ एवं राज्यों के बीच कारों के शुद्ध अगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धान्त राज्य वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों के आधार पर राज्यों में नगरपालिकाओं और पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए राज्य के संचित निधि के संवर्धन के लिए आवश्यक उपाय। राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय 15वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों से संबन्धित मुद्दों पर चर्चा: संदर्भ की शर्तों में जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह है 2011 की जनगणना को आधार बनाए जाने से है। इसे लेकर दक्षिण भारत के राज्य विरोध कर रहे हैं। इन राज्यों का तर्क है कि विगत कुछ वर्षों में उन्होने जनसंख्या में कमी के लिए काफी प्रयास किए हैं। यदि 2011 कि जनगणना को आधार बनाया जाता है तो राजस्व हानि होगी। जबकि उत्तर भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रयास नहीं किया है फिर भी उन्हे राजस्व अधिक प्राप्त होगा। 14वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को कर हस्तांतरण के संबंध में 32 % से 42 % करने की सिफ़ारिश की गयी थी जिस पर 15वें वित्त आयोग द्वारा परीक्षण करने की बात की जा रही है। राज्यों को आशंका है कि इससे उनका राजस्व कम हो जाएगा। पहले यह व्यवस्था थी कि राज्य 3% तक ऋण ले सकते थे। 15वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के बाद इसे कम करके 1.5% लाया जा सकता है। भारत में वित्तीय संघवाद को मजबूत करने के लिए वित्त आयोग का गठन किया गया। इसके सिफ़ारिशों के माध्यम से ही राजस्व का उचित वितरण किया जा सकता है। अतः यह आवश्यक है कि जो भी मुद्दे हों उसका उचित समाधान किया जाए। इसके लिए केंद्र सरकार को राज्यों के साथ विचार विमर्श करना चाहिए। चूंकि आयोग की सिफ़ारिशों बाध्य नहीं होती अतः इसमें तार्किक बदलाव किया जा सकता है।
|
##Question:वित्त आयोग की संरचना और कार्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। इसके साथ ही 15वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों से संबन्धित मुद्दों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Give a brief overview of the structure and functions of the Finance Commission. Along with this, discuss issues related to terms of reference of the 15th Finance Commission. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में वित्त आयोग के बारे में लिखिए। पहले भाग में संरचना और कार्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। इसके बाद 15वें वित्त आयोग की संदर्भ की शर्तों से संबन्धित मुद्दों पर चर्चा कीजिए। निष्कर्ष में महत्व व सुझाव लिखिए। संविधान के अनुच्छेद 280 में वित्त आयोग की संरचना और कार्यों का उल्लेख किया गया। यह एक संवैधानिक निकाय है। संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिए और अन्य चार सदस्यों को इस प्रकार से चुना जाना चाहिए: किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इसके पद के लिए योग्य व्यक्ति ऐसा व्यक्ति जिसे भारत के लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो। ऐसा व्यक्ति जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो ऐसा व्यक्ति, जो अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो। वित्त आयोग के कार्य: संघ एवं राज्यों के बीच कारों के शुद्ध अगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धान्त राज्य वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों के आधार पर राज्यों में नगरपालिकाओं और पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए राज्य के संचित निधि के संवर्धन के लिए आवश्यक उपाय। राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय 15वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों से संबन्धित मुद्दों पर चर्चा: संदर्भ की शर्तों में जो सबसे बड़ा मुद्दा है वह है 2011 की जनगणना को आधार बनाए जाने से है। इसे लेकर दक्षिण भारत के राज्य विरोध कर रहे हैं। इन राज्यों का तर्क है कि विगत कुछ वर्षों में उन्होने जनसंख्या में कमी के लिए काफी प्रयास किए हैं। यदि 2011 कि जनगणना को आधार बनाया जाता है तो राजस्व हानि होगी। जबकि उत्तर भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रयास नहीं किया है फिर भी उन्हे राजस्व अधिक प्राप्त होगा। 14वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को कर हस्तांतरण के संबंध में 32 % से 42 % करने की सिफ़ारिश की गयी थी जिस पर 15वें वित्त आयोग द्वारा परीक्षण करने की बात की जा रही है। राज्यों को आशंका है कि इससे उनका राजस्व कम हो जाएगा। पहले यह व्यवस्था थी कि राज्य 3% तक ऋण ले सकते थे। 15वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के बाद इसे कम करके 1.5% लाया जा सकता है। भारत में वित्तीय संघवाद को मजबूत करने के लिए वित्त आयोग का गठन किया गया। इसके सिफ़ारिशों के माध्यम से ही राजस्व का उचित वितरण किया जा सकता है। अतः यह आवश्यक है कि जो भी मुद्दे हों उसका उचित समाधान किया जाए। इसके लिए केंद्र सरकार को राज्यों के साथ विचार विमर्श करना चाहिए। चूंकि आयोग की सिफ़ारिशों बाध्य नहीं होती अतः इसमें तार्किक बदलाव किया जा सकता है।
| 45,774
|
Discuss the contribution of political philosophers during the age of enlightenment. (150 words)
|
Approach Introduce with the idea of enlightenment Explain the contributions of various political philosophers during the age of enlightenment Conclude accordingly Answer: The enlightenment which started with the idea of the scientific revolution was an intellectual, philosophical, cultural and social movement that spread throughout Europe during the 17th and 18th Century. The 17th and 18th century is called as Age of Enlightenment or the Age of Reason. Various political philosophers from Europe and America have contributed towards the idea of enlightenment through their philosophies. Thomas Hobbes : Thomas Hobbes, an English philosopher and scientist, was one of the key figures in the political debates of the Enlightenment period. He introduced a social contract theory based on the relation between the absolute sovereign and civil society. Hobbes favoured an authoritarian state to control the greedy and selfish nature of man. Any power exercised by this authoritarian state cannot be resisted because the protector’s sovereign power derives from individuals’ surrendering their own sovereign power for protection. The individuals are thereby the authors of all decisions made by the sovereign. His model of authoritarian state also included control by the state of the church and religion. John Locke: Locke’s political theory was founded on social contract theory. He believed that human nature is characterized by reason and tolerance, but he assumed that the sole right to defend in the state of nature was not enough, so people established a civil society to resolve conflicts in a civil way with help from the government in a state of society. Locke’s conception of natural rights is captured in his best-known statement that individuals have a right to protect their “life, health, liberty, or possessions” and in his belief that the natural right to property is derived from labour. Montesquieu: His political theory work, particularly the idea of separation of powers, shaped the modern democratic government. He was influenced by the British political system and hence his idea is based on the constitutional monarchy and parliamentary supremacy. Voltaire: Voltaire was a French Enlightenment writer, historian, and philosopher, who glorified the idea of reason, attacked the Catholic Church and advocated freedom of religion, freedom of expression, and separation of church and state. Rousseau: whose conceptualization of social contract, the theory of natural human, and works on education greatly influenced the political, philosophical, and social western tradition. Rousseau is also considered the father of modern democracy and republicanism. He propounded the theory of general/popular will, demolished the old notion of the divine origin of Kingship/state and propagated social contract theory for protection of life and property Thomas Jefferson: He emphasised upon the right of the American colonies to rebel against the colonial power. He played an important role in drafting the Declaration of American Independence (1776) and played a major role in bringing the 1st Amendment in the American Constitution which included the chapter of Fundamental Rights. Thomas Payne: An American thinker, particularly known for his work Common Sense in which he espoused the cause of American Independence on the basis of the enlightenment approaches like rationality. His famous statement is "it is repugnant to common sense that a continent(America) full of resources will be governed by an island (Britain)". Through the efforts of various political philosophers, the Enlightenment has been hailed as the foundation of modern western political and intellectual culture where it helped to bring political modernization to the west by introducing democratic values and institutions and the creation of modern, liberal democracies.
|
##Question:Discuss the contribution of political philosophers during the age of enlightenment. (150 words)##Answer:Approach Introduce with the idea of enlightenment Explain the contributions of various political philosophers during the age of enlightenment Conclude accordingly Answer: The enlightenment which started with the idea of the scientific revolution was an intellectual, philosophical, cultural and social movement that spread throughout Europe during the 17th and 18th Century. The 17th and 18th century is called as Age of Enlightenment or the Age of Reason. Various political philosophers from Europe and America have contributed towards the idea of enlightenment through their philosophies. Thomas Hobbes : Thomas Hobbes, an English philosopher and scientist, was one of the key figures in the political debates of the Enlightenment period. He introduced a social contract theory based on the relation between the absolute sovereign and civil society. Hobbes favoured an authoritarian state to control the greedy and selfish nature of man. Any power exercised by this authoritarian state cannot be resisted because the protector’s sovereign power derives from individuals’ surrendering their own sovereign power for protection. The individuals are thereby the authors of all decisions made by the sovereign. His model of authoritarian state also included control by the state of the church and religion. John Locke: Locke’s political theory was founded on social contract theory. He believed that human nature is characterized by reason and tolerance, but he assumed that the sole right to defend in the state of nature was not enough, so people established a civil society to resolve conflicts in a civil way with help from the government in a state of society. Locke’s conception of natural rights is captured in his best-known statement that individuals have a right to protect their “life, health, liberty, or possessions” and in his belief that the natural right to property is derived from labour. Montesquieu: His political theory work, particularly the idea of separation of powers, shaped the modern democratic government. He was influenced by the British political system and hence his idea is based on the constitutional monarchy and parliamentary supremacy. Voltaire: Voltaire was a French Enlightenment writer, historian, and philosopher, who glorified the idea of reason, attacked the Catholic Church and advocated freedom of religion, freedom of expression, and separation of church and state. Rousseau: whose conceptualization of social contract, the theory of natural human, and works on education greatly influenced the political, philosophical, and social western tradition. Rousseau is also considered the father of modern democracy and republicanism. He propounded the theory of general/popular will, demolished the old notion of the divine origin of Kingship/state and propagated social contract theory for protection of life and property Thomas Jefferson: He emphasised upon the right of the American colonies to rebel against the colonial power. He played an important role in drafting the Declaration of American Independence (1776) and played a major role in bringing the 1st Amendment in the American Constitution which included the chapter of Fundamental Rights. Thomas Payne: An American thinker, particularly known for his work Common Sense in which he espoused the cause of American Independence on the basis of the enlightenment approaches like rationality. His famous statement is "it is repugnant to common sense that a continent(America) full of resources will be governed by an island (Britain)". Through the efforts of various political philosophers, the Enlightenment has been hailed as the foundation of modern western political and intellectual culture where it helped to bring political modernization to the west by introducing democratic values and institutions and the creation of modern, liberal democracies.
| 45,789
|
सिन्धु जल संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये| भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा करते हुए सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट कीजिये| (10अंक; 150 से 200 शब्द) List the main provisions of the Indus Water Treaty. Discussing the possible consequences of water-geopolitics by India, clarify the current developments in the context of the Indus Water Treaty. (10 marks; 150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में सिन्धु जल संधि की पृष्ठभूमि बताइये 2- प्रथम भाग में संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत एवं पाकिस्तान के मध्य 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता के अंतर्गत सिंधु जल संधि की गयी थी|दोनों ही देश “जल के संबंध में विवेकशील” थे। उन्हें अहसास हो गया था कि इस साझा संसाधन तक अपने देश की दीर्घकालिक पहुंच की सुरक्षा के लिए सहयोग सबसे पहली आवश्यकता है। दोनों देशों में राजनीतिक राय स्पष्ट थी। पानी की कमी और परस्पर अविश्वास के शत्रुतापूर्ण माहौल में इस सीमित संसाधन के प्रतिस्पर्धी उपयोग के बावजूद, सहयोग ही एकमात्र रास्ता था| सिन्धु जल संधि (1960) प्रमुख प्रावधान · इस समझौते में कुल 6 नदियों को शामिल किया गया है सिन्धु, झेलम एवं चेनाब (पश्चिमी नदियों) के जल का अधिकतम(80%) उपभोग पाकिस्तान करेगा जबकि पूर्वी नदियों( रावी, व्यास एवं सतलज) पर यही अधिकार भारत को होगा| अर्थात समझौते में न केवल जल का बटवारा किया गया है बल्कि नदियों को भी बाटा गया है| · इस संधि के क्रियान्वयन के लिए सिन्धु नदी जल आयोग की स्थापना की है यदि कोई विवाद होगा तो उसका समाधान मध्यस्थता के माध्यम से होगा,मध्यस्थ का निर्णय बाध्यकारी होगा · मध्यस्थ के लिए भारत ने शर्त रखी कि उसे जल विभाजन का विशेषज्ञ होना चाहिए| संधि का महत्त्व · भारत ने पाक के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध होते हुए भी जल संधि की · आगामी समय में कई युद्ध हुए किन्तु भारत ने कभी जल प्रवाह नहीं रोका · इतने विवादों के बाद भी इस संधि का क्रियान्वयन इसे विश्व की सफलतम संधि माना जाता है · भारत ने अभी तक अपनी कूटनीति में जल का एक कारक के रूप में प्रयोग नहीं किया हैअर्थात भारत ने इस मामले में भू-राजनीति नहीं कर रहा है| यदि भारत अपनी कूटनीति के निर्धारण में जल को एक कारक के रूप में प्रयोग करेगा तो उसके निम्नलिखित प्रभाव होंगे- जल भू-राजनीति के संभावित प्रभाव · यदि भारत पाकिस्तान को जल प्रवाह बाधित करता है तो चीन भी इसी प्रक्रिया को अपना सकता है अतः भारत को जल की भू राजनीति नहीं करना चाहिए · बाँध एवं जलाशयो के निर्माण के लिए अनेक वर्षों तक कार्य करना पडेगा और अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होगी · इससे आतंकवादी संगठन, भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में सफल हो सकते हैं जिससे पाकिस्तानी नागरिकों में भारत के विरुद्ध मनःस्थिति का निर्माण होगा यह भारत के गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है इस संधि के माध्यम से भारत को एक नैतिक बढ़त मिलती है जिसका भारत की छवि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है| अतः भारत ने कभी जल को कूटनीति का एक कारक के तौर पर प्रयोग नहीं किया है फ़िर भी निकट वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलते हैं उरी हमले के बाद भारत सरकार ने इस संधि के सन्दर्भ में कुछ निर्णय लिए हैं यथा इस संधि की समीक्षा नहीं की जायेगी और इसे समाप्त भी नहीं किया जाएगा किन्तु नदियों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत् परियोजनाओं की स्थापना की जायेगी| आतंकवाद के रुकने तक सिन्धु नदी आयोग विवाद निवारण तंत्र पर वार्ता को निलंबित रखेंगे(हालांकि बाद में मीटिंग हुई है) तुलबुल नेविगेशन परियोजना(1987) जिसका पाकिस्तान ने संधि के आधार पर विरोध किया गया था, इसके निलंबन की समीक्षा की जायेगी| इसके साथ ही जम्मू कश्मीर के विकास के लिए संधि द्वारा प्राप्त 20 % जल का अधिकतम उपयोग किया जाएगा| इस तरह से देखते हैं कि भारत की जल नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आये हैं|
|
##Question:सिन्धु जल संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये| भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा करते हुए सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट कीजिये| (10अंक; 150 से 200 शब्द) List the main provisions of the Indus Water Treaty. Discussing the possible consequences of water-geopolitics by India, clarify the current developments in the context of the Indus Water Treaty. (10 marks; 150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सिन्धु जल संधि की पृष्ठभूमि बताइये 2- प्रथम भाग में संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत एवं पाकिस्तान के मध्य 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता के अंतर्गत सिंधु जल संधि की गयी थी|दोनों ही देश “जल के संबंध में विवेकशील” थे। उन्हें अहसास हो गया था कि इस साझा संसाधन तक अपने देश की दीर्घकालिक पहुंच की सुरक्षा के लिए सहयोग सबसे पहली आवश्यकता है। दोनों देशों में राजनीतिक राय स्पष्ट थी। पानी की कमी और परस्पर अविश्वास के शत्रुतापूर्ण माहौल में इस सीमित संसाधन के प्रतिस्पर्धी उपयोग के बावजूद, सहयोग ही एकमात्र रास्ता था| सिन्धु जल संधि (1960) प्रमुख प्रावधान · इस समझौते में कुल 6 नदियों को शामिल किया गया है सिन्धु, झेलम एवं चेनाब (पश्चिमी नदियों) के जल का अधिकतम(80%) उपभोग पाकिस्तान करेगा जबकि पूर्वी नदियों( रावी, व्यास एवं सतलज) पर यही अधिकार भारत को होगा| अर्थात समझौते में न केवल जल का बटवारा किया गया है बल्कि नदियों को भी बाटा गया है| · इस संधि के क्रियान्वयन के लिए सिन्धु नदी जल आयोग की स्थापना की है यदि कोई विवाद होगा तो उसका समाधान मध्यस्थता के माध्यम से होगा,मध्यस्थ का निर्णय बाध्यकारी होगा · मध्यस्थ के लिए भारत ने शर्त रखी कि उसे जल विभाजन का विशेषज्ञ होना चाहिए| संधि का महत्त्व · भारत ने पाक के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध होते हुए भी जल संधि की · आगामी समय में कई युद्ध हुए किन्तु भारत ने कभी जल प्रवाह नहीं रोका · इतने विवादों के बाद भी इस संधि का क्रियान्वयन इसे विश्व की सफलतम संधि माना जाता है · भारत ने अभी तक अपनी कूटनीति में जल का एक कारक के रूप में प्रयोग नहीं किया हैअर्थात भारत ने इस मामले में भू-राजनीति नहीं कर रहा है| यदि भारत अपनी कूटनीति के निर्धारण में जल को एक कारक के रूप में प्रयोग करेगा तो उसके निम्नलिखित प्रभाव होंगे- जल भू-राजनीति के संभावित प्रभाव · यदि भारत पाकिस्तान को जल प्रवाह बाधित करता है तो चीन भी इसी प्रक्रिया को अपना सकता है अतः भारत को जल की भू राजनीति नहीं करना चाहिए · बाँध एवं जलाशयो के निर्माण के लिए अनेक वर्षों तक कार्य करना पडेगा और अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होगी · इससे आतंकवादी संगठन, भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में सफल हो सकते हैं जिससे पाकिस्तानी नागरिकों में भारत के विरुद्ध मनःस्थिति का निर्माण होगा यह भारत के गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है इस संधि के माध्यम से भारत को एक नैतिक बढ़त मिलती है जिसका भारत की छवि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है| अतः भारत ने कभी जल को कूटनीति का एक कारक के तौर पर प्रयोग नहीं किया है फ़िर भी निकट वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलते हैं उरी हमले के बाद भारत सरकार ने इस संधि के सन्दर्भ में कुछ निर्णय लिए हैं यथा इस संधि की समीक्षा नहीं की जायेगी और इसे समाप्त भी नहीं किया जाएगा किन्तु नदियों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत् परियोजनाओं की स्थापना की जायेगी| आतंकवाद के रुकने तक सिन्धु नदी आयोग विवाद निवारण तंत्र पर वार्ता को निलंबित रखेंगे(हालांकि बाद में मीटिंग हुई है) तुलबुल नेविगेशन परियोजना(1987) जिसका पाकिस्तान ने संधि के आधार पर विरोध किया गया था, इसके निलंबन की समीक्षा की जायेगी| इसके साथ ही जम्मू कश्मीर के विकास के लिए संधि द्वारा प्राप्त 20 % जल का अधिकतम उपयोग किया जाएगा| इस तरह से देखते हैं कि भारत की जल नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आये हैं|
| 45,792
|
सिन्धु जल संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये| भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा करते हुए सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) List the main provisions of the Indus Water Treaty. Discussing the possible consequences of water-geopolitics by India, clarify the current developments in the context of the Indus Water Treaty. (150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में सिन्धु जल संधि की पृष्ठभूमि बताइये 2- प्रथम भाग में संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | भारत एवं पाकिस्तान के मध्य 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता के अंतर्गत सिंधु जल संधि की गयी थी|दोनों ही देश “जल के संबंध में विवेकशील” थे। उन्हें अहसास हो गया था कि इस साझा संसाधन तक अपने देश की दीर्घकालिक पहुंच की सुरक्षा के लिए सहयोग सबसे पहली आवश्यकता है। दोनों देशों में राजनीतिक राय स्पष्ट थी। पानी की कमी और परस्पर अविश्वास के शत्रुतापूर्ण माहौल में इस सीमित संसाधन के प्रतिस्पर्धी उपयोग के बावजूद, सहयोग ही एकमात्र रास्ता था| सिन्धु जल संधि (1960) प्रमुख प्रावधान · इस समझौते में कुल 6 नदियों को शामिल किया गया है सिन्धु, झेलम एवं चेनाब (पश्चिमी नदियों) के जल का अधिकतम(80%) उपभोग पाकिस्तान करेगा जबकि पूर्वी नदियों( रावी, व्यास एवं सतलज) पर यही अधिकार भारत को होगा| अर्थात समझौते में न केवल जल का बटवारा किया गया है बल्कि नदियों को भी बाटा गया है| · इस संधि के क्रियान्वयन के लिए सिन्धु नदी जल आयोग की स्थापना की है यदि कोई विवाद होगा तो उसका समाधान मध्यस्थता के माध्यम से होगा,मध्यस्थ का निर्णय बाध्यकारी होगा · मध्यस्थ के लिए भारत ने शर्त रखी कि उसे जल विभाजन का विशेषज्ञ होना चाहिए| संधि का महत्त्व · भारत ने पाक के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध होते हुए भी जल संधि की · आगामी समय में कई युद्ध हुए किन्तु भारत ने कभी जल प्रवाह नहीं रोका · इतने विवादों के बाद भी इस संधि का क्रियान्वयन इसे विश्व की सफलतम संधि माना जाता है · भारत ने अभी तक अपनी कूटनीति में जल का एक कारक के रूप में प्रयोग नहीं किया हैअर्थात भारत ने इस मामले में भू-राजनीति नहीं कर रहा है| यदि भारत अपनी कूटनीति के निर्धारण में जल को एक कारक के रूप में प्रयोग करेगा तो उसके निम्नलिखित प्रभाव होंगे- जल भू-राजनीति के संभावित प्रभाव · यदि भारत पाकिस्तान को जल प्रवाह बाधित करता है तो चीन भी इसी प्रक्रिया को अपना सकता है अतः भारत को जल की भू राजनीति नहीं करना चाहिए · बाँध एवं जलाशयो के निर्माण के लिए अनेक वर्षों तक कार्य करना पडेगा और अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होगी · इससे आतंकवादी संगठन, भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में सफल हो सकते हैं जिससे पाकिस्तानी नागरिकों में भारत के विरुद्ध मनःस्थिति का निर्माण होगा यह भारत के गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है इस संधि के माध्यम से भारत को एक नैतिक बढ़त मिलती है जिसका भारत की छवि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है| अतः भारत ने कभी जल को कूटनीति का एक कारक के तौर पर प्रयोग नहीं किया है फ़िर भी निकट वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलते हैं उरी हमले के बाद भारत सरकार ने इस संधि के सन्दर्भ में कुछ निर्णय लिए हैं यथा इस संधि की समीक्षा नहीं की जायेगी और इसे समाप्त भी नहीं किया जाएगा किन्तु नदियों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत् परियोजनाओं की स्थापना की जायेगी| आतंकवाद के रुकने तक सिन्धु नदी आयोग विवाद निवारण तंत्र पर वार्ता को निलंबित रखेंगे(हालांकि बाद में मीटिंग हुई है) तुलबुल नेविगेशन परियोजना(1987) जिसका पाकिस्तान ने संधि के आधार पर विरोध किया गया था, इसके निलंबन की समीक्षा की जायेगी| इसके साथ ही जम्मू कश्मीर के विकास के लिए संधि द्वारा प्राप्त 20 % जल का अधिकतम उपयोग किया जाएगा| इस तरह से देखते हैं कि भारत की जल नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आये हैं|
|
##Question:सिन्धु जल संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये| भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा करते हुए सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) List the main provisions of the Indus Water Treaty. Discussing the possible consequences of water-geopolitics by India, clarify the current developments in the context of the Indus Water Treaty. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सिन्धु जल संधि की पृष्ठभूमि बताइये 2- प्रथम भाग में संधि के प्रमुख प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में भारत द्वारा जल भू राजनीति के संभावित परिणामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में सिन्धु जल संधि के सन्दर्भ में हुए समसामयिक विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | भारत एवं पाकिस्तान के मध्य 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता के अंतर्गत सिंधु जल संधि की गयी थी|दोनों ही देश “जल के संबंध में विवेकशील” थे। उन्हें अहसास हो गया था कि इस साझा संसाधन तक अपने देश की दीर्घकालिक पहुंच की सुरक्षा के लिए सहयोग सबसे पहली आवश्यकता है। दोनों देशों में राजनीतिक राय स्पष्ट थी। पानी की कमी और परस्पर अविश्वास के शत्रुतापूर्ण माहौल में इस सीमित संसाधन के प्रतिस्पर्धी उपयोग के बावजूद, सहयोग ही एकमात्र रास्ता था| सिन्धु जल संधि (1960) प्रमुख प्रावधान · इस समझौते में कुल 6 नदियों को शामिल किया गया है सिन्धु, झेलम एवं चेनाब (पश्चिमी नदियों) के जल का अधिकतम(80%) उपभोग पाकिस्तान करेगा जबकि पूर्वी नदियों( रावी, व्यास एवं सतलज) पर यही अधिकार भारत को होगा| अर्थात समझौते में न केवल जल का बटवारा किया गया है बल्कि नदियों को भी बाटा गया है| · इस संधि के क्रियान्वयन के लिए सिन्धु नदी जल आयोग की स्थापना की है यदि कोई विवाद होगा तो उसका समाधान मध्यस्थता के माध्यम से होगा,मध्यस्थ का निर्णय बाध्यकारी होगा · मध्यस्थ के लिए भारत ने शर्त रखी कि उसे जल विभाजन का विशेषज्ञ होना चाहिए| संधि का महत्त्व · भारत ने पाक के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध होते हुए भी जल संधि की · आगामी समय में कई युद्ध हुए किन्तु भारत ने कभी जल प्रवाह नहीं रोका · इतने विवादों के बाद भी इस संधि का क्रियान्वयन इसे विश्व की सफलतम संधि माना जाता है · भारत ने अभी तक अपनी कूटनीति में जल का एक कारक के रूप में प्रयोग नहीं किया हैअर्थात भारत ने इस मामले में भू-राजनीति नहीं कर रहा है| यदि भारत अपनी कूटनीति के निर्धारण में जल को एक कारक के रूप में प्रयोग करेगा तो उसके निम्नलिखित प्रभाव होंगे- जल भू-राजनीति के संभावित प्रभाव · यदि भारत पाकिस्तान को जल प्रवाह बाधित करता है तो चीन भी इसी प्रक्रिया को अपना सकता है अतः भारत को जल की भू राजनीति नहीं करना चाहिए · बाँध एवं जलाशयो के निर्माण के लिए अनेक वर्षों तक कार्य करना पडेगा और अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होगी · इससे आतंकवादी संगठन, भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में सफल हो सकते हैं जिससे पाकिस्तानी नागरिकों में भारत के विरुद्ध मनःस्थिति का निर्माण होगा यह भारत के गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है इस संधि के माध्यम से भारत को एक नैतिक बढ़त मिलती है जिसका भारत की छवि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है| अतः भारत ने कभी जल को कूटनीति का एक कारक के तौर पर प्रयोग नहीं किया है फ़िर भी निकट वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलते हैं उरी हमले के बाद भारत सरकार ने इस संधि के सन्दर्भ में कुछ निर्णय लिए हैं यथा इस संधि की समीक्षा नहीं की जायेगी और इसे समाप्त भी नहीं किया जाएगा किन्तु नदियों की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत् परियोजनाओं की स्थापना की जायेगी| आतंकवाद के रुकने तक सिन्धु नदी आयोग विवाद निवारण तंत्र पर वार्ता को निलंबित रखेंगे(हालांकि बाद में मीटिंग हुई है) तुलबुल नेविगेशन परियोजना(1987) जिसका पाकिस्तान ने संधि के आधार पर विरोध किया गया था, इसके निलंबन की समीक्षा की जायेगी| इसके साथ ही जम्मू कश्मीर के विकास के लिए संधि द्वारा प्राप्त 20 % जल का अधिकतम उपयोग किया जाएगा| इस तरह से देखते हैं कि भारत की जल नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आये हैं|
| 45,795
|
ब्रिटिश काल में "कृषि के वाणिज्यीकरण" के अर्थ को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसके कारणों और परिणामों पर संछिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaning of commercialization of agriculture in British period. Also discuss in brief the reasons and consequences of it. (150-200 words)
|
भूमिका में कृषि के "वाणिज्यीकरण का अर्थ" का अर्थ संक्षेप में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद कृषि के वाणिज्यीकरण के कारणों का उल्लेख कीजये | पुनः इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा उसका भी उल्लेख कीजिये | अंत में अंग्रेजों की नीति के निहितार्थ को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- मुनाफे या नकद को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि को कृषि का वाणिज्यीकरण कहते हैं | हम यह भी कह सकते हैं की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि | ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यीकरण के निम्नलिखित कारण थे - ब्रिटिशों की औद्योगिक ज़रूरतें ब्रिटिश व्यापार संतुलन के लिए करायी जाने वाली व्यापारिक खेती जैसे अफीम व चाय की खेती | परिवहन के उन्नत साधन जैसे रेलवे आदि ने उत्प्रेरक का कार्य किया | भू राजस्व की नकद वसूली | 19वीं शताब्दी में जब यूरोप में जनसँख्या में वृद्धि हुई तो भारत से निर्यात बढ़ गया | अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जैसे अमेरिका में गृह युद्ध के कारण ब्रिटेन में कपास की खेती बाधित हुई तो भारत में कपास की खेती में वृद्धि हुई | कृषि के वाणिज्यीकरण का भारत पर प्रभाव - वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया से अपेक्षाकृत बड़े किसानों एवं कुछ क्षेत्रों में थोड़े समय के लिए समृद्धि देखी गयी | परिवहन के उन्नत साधनों का विकास हुआ | अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की तरफ झुकाव एवं चाय, कॉफी जैसी फसलों की खेती की जाने लगी | कच्चे माल के निर्यात के कारण उत्पादों की लागत बही | तैयार उत्पादों की जगह कच्चा माल निर्यात किया जाने लगा | प्राकृतिक आपदा से लोग परेशां हुए क्योंकि निर्यात के कारण खाद्यानों का आभाव होता गया | किसानों को नील ,जूट , अफीम जैसी व्यापारिक फसलों की खेती करने के लिए विवश किया गया ,जिसकी ब्रिटेन में अत्यधिक मांग थी | वास्तव में कृषि के वाणिज्यीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उपनिवेशीकरण किया न कि आधुनिकीकरण | वाणिज्यीकरण कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि एक थोपी गयी प्रक्रिया थी | यदि परिवहन के संसाधनों का विकास भी किया गया तो उसमे भी उनका स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण निहित था | कुल मिलाकर भारतीय कृषि को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का पूरक बना दिया गया |
|
##Question:ब्रिटिश काल में "कृषि के वाणिज्यीकरण" के अर्थ को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसके कारणों और परिणामों पर संछिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaning of commercialization of agriculture in British period. Also discuss in brief the reasons and consequences of it. (150-200 words)##Answer:भूमिका में कृषि के "वाणिज्यीकरण का अर्थ" का अर्थ संक्षेप में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद कृषि के वाणिज्यीकरण के कारणों का उल्लेख कीजये | पुनः इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा उसका भी उल्लेख कीजिये | अंत में अंग्रेजों की नीति के निहितार्थ को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- मुनाफे या नकद को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि को कृषि का वाणिज्यीकरण कहते हैं | हम यह भी कह सकते हैं की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि | ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यीकरण के निम्नलिखित कारण थे - ब्रिटिशों की औद्योगिक ज़रूरतें ब्रिटिश व्यापार संतुलन के लिए करायी जाने वाली व्यापारिक खेती जैसे अफीम व चाय की खेती | परिवहन के उन्नत साधन जैसे रेलवे आदि ने उत्प्रेरक का कार्य किया | भू राजस्व की नकद वसूली | 19वीं शताब्दी में जब यूरोप में जनसँख्या में वृद्धि हुई तो भारत से निर्यात बढ़ गया | अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जैसे अमेरिका में गृह युद्ध के कारण ब्रिटेन में कपास की खेती बाधित हुई तो भारत में कपास की खेती में वृद्धि हुई | कृषि के वाणिज्यीकरण का भारत पर प्रभाव - वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया से अपेक्षाकृत बड़े किसानों एवं कुछ क्षेत्रों में थोड़े समय के लिए समृद्धि देखी गयी | परिवहन के उन्नत साधनों का विकास हुआ | अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की तरफ झुकाव एवं चाय, कॉफी जैसी फसलों की खेती की जाने लगी | कच्चे माल के निर्यात के कारण उत्पादों की लागत बही | तैयार उत्पादों की जगह कच्चा माल निर्यात किया जाने लगा | प्राकृतिक आपदा से लोग परेशां हुए क्योंकि निर्यात के कारण खाद्यानों का आभाव होता गया | किसानों को नील ,जूट , अफीम जैसी व्यापारिक फसलों की खेती करने के लिए विवश किया गया ,जिसकी ब्रिटेन में अत्यधिक मांग थी | वास्तव में कृषि के वाणिज्यीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उपनिवेशीकरण किया न कि आधुनिकीकरण | वाणिज्यीकरण कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि एक थोपी गयी प्रक्रिया थी | यदि परिवहन के संसाधनों का विकास भी किया गया तो उसमे भी उनका स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण निहित था | कुल मिलाकर भारतीय कृषि को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का पूरक बना दिया गया |
| 45,800
|
What is importance of vultures in ecosystem? Discuss conservation measures to protect vultures in India.How TEEB concept can be used for conservation of Vultures in India? (250 words)
|
Brief Approach: · In Introduction briefly write about Vultures · Briefly Highlight the importance of Vultures in the Ecosystem · Briefly discuss threat/ dangers faced by Vultures in India · Discuss conservation measures to protect vultures in India · Discuss how TEEB concept can be used for the conservation of Vultures in India · Conclude the answer briefly. Answer: A vulture is a bird of prey that feed on dead animals and carcasses that is left uneaten from other predators. Vultures have a large, hooked beak, which makes tearing and eating flesh easier. Importance of Vultures in the Ecosystem · Vultures play a vital role as scavengers and keep the ecosystem clean by consuming parts of animals. · Vultures have an extremely corrosive stomach acid that allows them to consume rotting animal corpses. These scavenged leftovers are often infected with anthrax, botulinum toxins, rabies, and hog cholera that would otherwise kill other scavengers. · By ridding the ground of dead animals, vultures prevent diseases from spreading to humans and animals. Threat/ dangers faced by Vultures in India · Veterinary drugdiclofenacis widely used for treating livestock in India and is toxic to vultures. Bioaccumulation of Diclofenac causes kidney failure and visceral gout in Vultures leading to death. Because of it (diclofenac), in recent decades Vulture population in India has declined rapidly. Conservation measures to protect vultures in India · The government had released the “Vulture Recovery Plan” in 2006. The recovery plan put forward three major recommendations — diclofenac should be banned for veterinary use, a safe alternate for this drug should be found and conservation breeding programme should be initiated. · The government has banned the veterinary use of diclofenac in 2006. · The Bombay Natural History Society (BHNS) has led the movement of vulture conservation in India. The strategy is sustained conservation breeding for increasing their numbers, research and monitoring on the risks in natural habitats, sensitization about vulture conservation, and once there is increase in their population of captive-bred birds, release them in identified safe zones. · Conservation breeding centres: Ex-situ conservation initiative- Thevulture research facility at Pinjore, Haryana became Asia’s first Vulture Conservation Breeding Centre in 2005. At present, India has four vulture breeding facilities at Rani, Guwahati (Assam),Pinjore (Haryana),Buxa (West Bengal), and Bhopal (Madhya Pradesh).There are four more centres that are managed by the Central Zoo Authority (CZA) in Junagarh in Gujarat, Nandankanan in Orissa, Hyderabad in Telangana and Muta in Ranchi. · Vulture Safe Zones (VSZs) : In-situ conservation initiative-A Vulture Safe Zone (VSZ) is a geographical area of at least 100 Km radius, which is designated as natural habitat of wild vultures and is made free of the presence of the drug diclofenac in animal carcasses.VSZs aims to protect and increase the remaining vulture populations and act as future release sites for the captive-bred vultures.With concerted efforts of BNHS, VSZs are declared in Gujarat, Jharkhand, Uttarakhand, Uttar Pradesh and Assam. In few states vulture restaurants also have come upto provide diclofenac free carcasses. · A sustainable plan for future (2014 – 2025)-In order to make the vulture conservation programme sustainable, BNHS has identified a set of action points as part of its India blueprint. How TEEB concept can be used for the conservation of Vultures in India? Recently, Under The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) for vultures project, an economic assessment of ecosystem services provided by vultures (i.e. TEEB analysis) was conducted at Kanha-Pench corridor, Central India. The project found that the present investmentrequired in carcass disposal services for the next 50 years in rural areas is estimated to be around USD 5.50 million. The scavenging ability of 300 pairs of vultures is close to processing the potential of a medium sized carcass disposal plant (i.e. 60 carcasses per week). It is therefore economically more viableto invest in the breeding and re-introduction of vultures, and maintenance of VSZs instead of investing in carcass disposal plants.Further, this project recommended use of Indian formulation of meloxicam (an alternate medicine) in place of diclofenac for treatment of livestock by para-vets, which is only marginally costly as compared to diclofenac. Thus TEEB analysis for vultures will enablepolicy makers to make informed decisions about the identification of Vulture Safe Zones (VSZs), as well as regulatory requirements forvulture-safe drug formulations and thus will help in the conservation of Vultures in India.
|
##Question:What is importance of vultures in ecosystem? Discuss conservation measures to protect vultures in India.How TEEB concept can be used for conservation of Vultures in India? (250 words)##Answer:Brief Approach: · In Introduction briefly write about Vultures · Briefly Highlight the importance of Vultures in the Ecosystem · Briefly discuss threat/ dangers faced by Vultures in India · Discuss conservation measures to protect vultures in India · Discuss how TEEB concept can be used for the conservation of Vultures in India · Conclude the answer briefly. Answer: A vulture is a bird of prey that feed on dead animals and carcasses that is left uneaten from other predators. Vultures have a large, hooked beak, which makes tearing and eating flesh easier. Importance of Vultures in the Ecosystem · Vultures play a vital role as scavengers and keep the ecosystem clean by consuming parts of animals. · Vultures have an extremely corrosive stomach acid that allows them to consume rotting animal corpses. These scavenged leftovers are often infected with anthrax, botulinum toxins, rabies, and hog cholera that would otherwise kill other scavengers. · By ridding the ground of dead animals, vultures prevent diseases from spreading to humans and animals. Threat/ dangers faced by Vultures in India · Veterinary drugdiclofenacis widely used for treating livestock in India and is toxic to vultures. Bioaccumulation of Diclofenac causes kidney failure and visceral gout in Vultures leading to death. Because of it (diclofenac), in recent decades Vulture population in India has declined rapidly. Conservation measures to protect vultures in India · The government had released the “Vulture Recovery Plan” in 2006. The recovery plan put forward three major recommendations — diclofenac should be banned for veterinary use, a safe alternate for this drug should be found and conservation breeding programme should be initiated. · The government has banned the veterinary use of diclofenac in 2006. · The Bombay Natural History Society (BHNS) has led the movement of vulture conservation in India. The strategy is sustained conservation breeding for increasing their numbers, research and monitoring on the risks in natural habitats, sensitization about vulture conservation, and once there is increase in their population of captive-bred birds, release them in identified safe zones. · Conservation breeding centres: Ex-situ conservation initiative- Thevulture research facility at Pinjore, Haryana became Asia’s first Vulture Conservation Breeding Centre in 2005. At present, India has four vulture breeding facilities at Rani, Guwahati (Assam),Pinjore (Haryana),Buxa (West Bengal), and Bhopal (Madhya Pradesh).There are four more centres that are managed by the Central Zoo Authority (CZA) in Junagarh in Gujarat, Nandankanan in Orissa, Hyderabad in Telangana and Muta in Ranchi. · Vulture Safe Zones (VSZs) : In-situ conservation initiative-A Vulture Safe Zone (VSZ) is a geographical area of at least 100 Km radius, which is designated as natural habitat of wild vultures and is made free of the presence of the drug diclofenac in animal carcasses.VSZs aims to protect and increase the remaining vulture populations and act as future release sites for the captive-bred vultures.With concerted efforts of BNHS, VSZs are declared in Gujarat, Jharkhand, Uttarakhand, Uttar Pradesh and Assam. In few states vulture restaurants also have come upto provide diclofenac free carcasses. · A sustainable plan for future (2014 – 2025)-In order to make the vulture conservation programme sustainable, BNHS has identified a set of action points as part of its India blueprint. How TEEB concept can be used for the conservation of Vultures in India? Recently, Under The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) for vultures project, an economic assessment of ecosystem services provided by vultures (i.e. TEEB analysis) was conducted at Kanha-Pench corridor, Central India. The project found that the present investmentrequired in carcass disposal services for the next 50 years in rural areas is estimated to be around USD 5.50 million. The scavenging ability of 300 pairs of vultures is close to processing the potential of a medium sized carcass disposal plant (i.e. 60 carcasses per week). It is therefore economically more viableto invest in the breeding and re-introduction of vultures, and maintenance of VSZs instead of investing in carcass disposal plants.Further, this project recommended use of Indian formulation of meloxicam (an alternate medicine) in place of diclofenac for treatment of livestock by para-vets, which is only marginally costly as compared to diclofenac. Thus TEEB analysis for vultures will enablepolicy makers to make informed decisions about the identification of Vulture Safe Zones (VSZs), as well as regulatory requirements forvulture-safe drug formulations and thus will help in the conservation of Vultures in India.
| 45,807
|
ब्रिटिश काल में "कृषि के वाणिज्यीकरण" के अर्थ को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसके कारणों और परिणामों पर संछिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaning of commercialization of agriculture in British period. Also discuss in brief the reasons and consequences of it. (150-200 words)
|
भूमिका में कृषि के "वाणिज्यीकरण का अर्थ" का अर्थ संक्षेप में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद कृषि के वाणिज्यीकरण के कारणों का उल्लेख कीजये | पुनः इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा उसका भी उल्लेख कीजिये | अंत में अंग्रेजों की नीति के निहितार्थ को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- मुनाफे या नकद को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि को कृषि का वाणिज्यीकरण कहते हैं | हम यह भी कह सकते हैं की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि | ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यीकरण के निम्नलिखितकारणथे - ब्रिटिशों की औद्योगिक ज़रूरतें | ब्रिटिश व्यापार संतुलन के लिए करायी जाने वाली व्यापारिक खेती जैसे अफीम व चाय की खेती | परिवहन के उन्नत साधन जैसे रेलवे आदि ने उत्प्रेरक का कार्य किया | भू राजस्व की नकद वसूली | 19वीं शताब्दी में जब यूरोप में जनसँख्या में वृद्धि हुई तो भारत से निर्यात बढ़ गया | अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जैसे अमेरिका में गृह युद्ध के कारण ब्रिटेन में कपास की खेती बाधित हुई तो भारत में कपास की खेती में वृद्धि हुई | कृषि के वाणिज्यीकरण का भारत पर प्रभाव - वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया से अपेक्षाकृत बड़े किसानों एवं कुछ क्षेत्रों में थोड़े समय के लिए समृद्धि देखी गयी | परिवहन के उन्नत साधनों का विकास हुआ | अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की तरफ झुकाव एवं चाय, कॉफी जैसी फसलों की खेती की जाने लगी | कच्चे माल के निर्यात के कारण उत्पादों की लागत बही | तैयार उत्पादों की जगह कच्चा माल निर्यात किया जाने लगा | प्राकृतिक आपदा से लोग परेशां हुए क्योंकि निर्यात के कारण खाद्यानों का आभाव होता गया | किसानों को नील ,जूट , अफीम जैसी व्यापारिक फसलों की खेती करने के लिए विवश किया गया ,जिसकी ब्रिटेन में अत्यधिक मांग थी | वास्तव में कृषि के वाणिज्यीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उपनिवेशीकरण किया न कि आधुनिकीकरण | वाणिज्यीकरण कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि एक थोपी गयी प्रक्रिया थी | यदि परिवहन के संसाधनों का विकास भी किया गया तो उसमे भी उनका स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण निहित था | कुल मिलाकर भारतीय कृषि को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का पूरक बना दिया गया |
|
##Question:ब्रिटिश काल में "कृषि के वाणिज्यीकरण" के अर्थ को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसके कारणों और परिणामों पर संछिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaning of commercialization of agriculture in British period. Also discuss in brief the reasons and consequences of it. (150-200 words)##Answer:भूमिका में कृषि के "वाणिज्यीकरण का अर्थ" का अर्थ संक्षेप में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद कृषि के वाणिज्यीकरण के कारणों का उल्लेख कीजये | पुनः इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा उसका भी उल्लेख कीजिये | अंत में अंग्रेजों की नीति के निहितार्थ को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- मुनाफे या नकद को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि को कृषि का वाणिज्यीकरण कहते हैं | हम यह भी कह सकते हैं की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर की जाने वाली कृषि | ब्रिटिश काल में कृषि के वाणिज्यीकरण के निम्नलिखितकारणथे - ब्रिटिशों की औद्योगिक ज़रूरतें | ब्रिटिश व्यापार संतुलन के लिए करायी जाने वाली व्यापारिक खेती जैसे अफीम व चाय की खेती | परिवहन के उन्नत साधन जैसे रेलवे आदि ने उत्प्रेरक का कार्य किया | भू राजस्व की नकद वसूली | 19वीं शताब्दी में जब यूरोप में जनसँख्या में वृद्धि हुई तो भारत से निर्यात बढ़ गया | अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जैसे अमेरिका में गृह युद्ध के कारण ब्रिटेन में कपास की खेती बाधित हुई तो भारत में कपास की खेती में वृद्धि हुई | कृषि के वाणिज्यीकरण का भारत पर प्रभाव - वाणिज्यीकरण की प्रक्रिया से अपेक्षाकृत बड़े किसानों एवं कुछ क्षेत्रों में थोड़े समय के लिए समृद्धि देखी गयी | परिवहन के उन्नत साधनों का विकास हुआ | अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की तरफ झुकाव एवं चाय, कॉफी जैसी फसलों की खेती की जाने लगी | कच्चे माल के निर्यात के कारण उत्पादों की लागत बही | तैयार उत्पादों की जगह कच्चा माल निर्यात किया जाने लगा | प्राकृतिक आपदा से लोग परेशां हुए क्योंकि निर्यात के कारण खाद्यानों का आभाव होता गया | किसानों को नील ,जूट , अफीम जैसी व्यापारिक फसलों की खेती करने के लिए विवश किया गया ,जिसकी ब्रिटेन में अत्यधिक मांग थी | वास्तव में कृषि के वाणिज्यीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उपनिवेशीकरण किया न कि आधुनिकीकरण | वाणिज्यीकरण कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि एक थोपी गयी प्रक्रिया थी | यदि परिवहन के संसाधनों का विकास भी किया गया तो उसमे भी उनका स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण निहित था | कुल मिलाकर भारतीय कृषि को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था का पूरक बना दिया गया |
| 45,812
|
Write Down the various disputes between India and China. In this context, Clarify the background of the Doclam controversy and its effects on India-China relations. (200 words/10 Marks)
|
एप्रोच- भारत-चीन संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में,भारत-चीन के मध्य विद्यमान विभिन्न विवादों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, डोकलाम विवाद का परिचय देते हुए उसकी पृष्ठभूमि का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए| अंतिम भाग में, डोकलाम विवाद के संदर्भ में भारत की चिंताएँ, चीन की प्रतिक्रिया तथा इससे भारत-चीन संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः इस संदर्भ में वर्तमान स्थिति तथा आगे की राह को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- एशिया में भारत तथा चीन दो प्राचीन सभ्यताएँ हैं तथा दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी देश भी हैं| भारत-चीन लगभग 3380 किमी लंबी विस्तृत सीमा साझा करते हैं| साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से भारत जहाँ 1947 में आजाद हुआ वहीँ चीन ने 1949 में साम्यवादी व्यवस्था को अपनाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की| भारत- चीन संबंधों की प्रारंभिक पृष्ठभूमि पंचशील तथा हिंदी-चीनी भाई-भाई जैसे सिद्धांतों के साथ खुशनुमें माहौल में प्रारंभ हुयी थी लेकिन तिब्बत पर चीनी आक्रमण, दलाईलामा को भारत द्वारा शरण देना तथा 1962 के चीनी आक्रमण के पश्चात संबंधों में कटुता विद्यमान हो गयी| हालाँकि आज भारत-चीन के मध्य बेहतर आर्थिक संबंध हैं फिर भी अनेकों मुद्दों पर व्यापक मतभेद मौजूद हैं| भारत-चीन के मध्य विद्यमान मुद्दे- सीमा-विवाद का व्यापक मुद्दा- पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन लाइन तथा डोकलाम क्षेत्र - चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत मानना; पश्चिमी क्षेत्र में जॉनसन लाइन, मैकडोनाल्ड लाइन तथा लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल(LAC) को लेकर दोनों देशों के मध्य विद्यमान भ्रम ; अक्साई चिन पर चीनी कब्जा; दलाईलामा और तिब्बत का मुद्दा - चीन द्वारा दलाईलामा को अलगाववादी नेता के तौर पर देखना तथा भारत द्वारा तिब्बत के निर्वासित सरकार,दलाईलामा को शरण एवं मान्यता देना; आतंकवाद को लेकर रुख- चीन द्वारा पाकिस्तान प्रयोजित आतंकवाद तथा भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले आतंकवादियों के प्रति नरम रुख रखना जैसे- संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने में रोड़े अटकाना; नदी-जल विवाद- ब्रह्मपुत्र नदी के उपरी जलग्रहण क्षेत्र में चीन द्वारा बांध बनाना; सतलुज तथा सिंधु नदियों के जल से जुड़े विवाद; स्टेपल वीजा के माध्यम से भारत की संप्रभुता को चुनौती; बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव एवं चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरने पर भारत की संप्रभुता पर आंच; स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स के माध्यम से भारत को चारो तरफ घेरने की नीति- म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका,जिबूती जैसे देशों में व्यापारिक तथा नौसैनिक अड्डे का निर्माण भारत को हिन्द महासागर में घेरने हेतु; परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के प्रवेश को लेकर रोड़े अटकाना; भूटान एवं नेपाल में चीन द्वारा अपने प्रभाव का विस्तार करना जिससे भारतीय हितों को खतरा; व्यापार असंतुलन- भारत-चीन व्यापार का चीन के पक्ष में अत्यधिक झुका होना; क्वाड्रीलेटरल डायलॉग डोकलाम विवाद डोकलाम विवाद 1950 के दशक में शुरू हुआ था जब चीन ने भूटानी क्षेत्र के विशाल हिस्सों का दावा करने वाले मानचित्र प्रकाशित किए| 1990 के दशक के शुरू में चीन ने भूटान को " पैकेज्ड सौदा " का ऑफर दिया| चीन ने डोकलाम पठार के एक छोटे से हिस्से के बदले उत्तर में पासमलांग और जकरलांग घाटियों का ऑफर दिया| 1998 में पहली बार चीन-भूटान बॉर्डर पर शांति हेतु शांति समझौता हुआ| 2017 मेंभारतीय सैनिकों ने चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के रास्ते को रोकने हेतु हस्तक्षेप किया जो कि डोकलाम पठार पर सड़क निर्माण कार्य में लगे हुए थें| रोड निर्माण तथा भारत की चिंताएँ - एक संकीर्ण सिलीगुड़ी गलियारा(चिकेन नेक) जो उत्तर-पूर्व को शेष भारत से अलग करता है| यहकॉरिडोर चुम्बी वैली से मात्र 500 किमी दूर है| इस संदर्भ में यथास्थिति में बदलाव भारत के लिए गंभीर सुरक्षा प्रभाव उत्पन करेगा| भूटान तथा भारत के साथ चीन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने हेतु किए गए समझौते का चीन द्वारा उल्लंघन किया गया| भारत की डोकलाम में सैनिक उपस्थिति से इस रणनीतिक क्षेत्र में भारत की स्थिति ज्यादा मजबूत होगी| अगर भारत की जल्द प्रतिक्रिया ना होती तो भूटान पर भी दबाव ज्यादा बढ़ता चला गया| चीन की प्रतिक्रिया तथा भारत-चीन संबंधों पर प्रभाव - चीन ने कहा कि भारत डोकलाम में घुसपैठ कर रहा है तथा उसे रोकने हेतु दोनों देश की सेनाएं आमने-सामने आ गयीं जिससे एक गंभीर गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गयी| चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा के कम मुश्किल रास्ते नाथूला पास को बंद कर देना ; चीन ने भारत के सुरक्षाबलों को बिना शर्त डोकलाम से वापस चले जाने को कहा तथा यह कहा कि इसके बाद ही सार्थक वार्तालाप संभव है| भूटान की सुरक्षा को चुनौती देकर चीन भारत-भूटान विशेष संबंध को रोकने की उम्मीद करता है| चीन द्वारा बार-बार भूटान को भारत का पिछलग्गू दिखाने की कोशिश की जाती रही ताकि भूटान भारत के प्रभाव से बाहर निकलकर एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण किया जा सके| चीन द्वारा भूटान को लगातार ओबोर में शामिल होने हेतु दबाव बनाया गया| चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा एवं भारतीय संप्रभुता पर चीन द्वारा आँख मूंदना ; सीमापार आतंकवाद तथा आतंकवाद को लेकर चुप्पी; NSG सदस्यता को लेकर अड़ियल रुख; भारत द्वारा दलाईलामा को अरुणाचल प्रदेश में भेजकर भारतीय पक्ष को मजबूत बनाना; भारत द्वारा जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों के साथ हिंद महासागर में सहयोग जिससे चीन की चुनौती का समाधान करने का प्रयास; आगे की राह - भारत को चीन के साथ निरंतर सहयोग एवं संवाद को बढ़ावा देना चाहिए| साथ ही, भूटान के साथ हमारे सहयोग के संदर्भ में चीन को आश्वस्त करना भी एक कदम होना चाहिए| भारत सरकार को भूटान की संप्रभुता को ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता है एवं भूटान के अभिन्न मित्र तथा बड़े भाई की भूमिका के रूप में भारत को अपने हार्ड पॉवर का इस्तेमाल जरुर करना चाहिए|| भारत द्वारा चीन को दक्षिण चीन सागर में ज्यादा इंगेज करना भी इस संदर्भ में एक प्रभावी कदम सिद्ध हो सकता है|
|
##Question:Write Down the various disputes between India and China. In this context, Clarify the background of the Doclam controversy and its effects on India-China relations. (200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत-चीन संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिए| पहले भाग में,भारत-चीन के मध्य विद्यमान विभिन्न विवादों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, डोकलाम विवाद का परिचय देते हुए उसकी पृष्ठभूमि का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए| अंतिम भाग में, डोकलाम विवाद के संदर्भ में भारत की चिंताएँ, चीन की प्रतिक्रिया तथा इससे भारत-चीन संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः इस संदर्भ में वर्तमान स्थिति तथा आगे की राह को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- एशिया में भारत तथा चीन दो प्राचीन सभ्यताएँ हैं तथा दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी देश भी हैं| भारत-चीन लगभग 3380 किमी लंबी विस्तृत सीमा साझा करते हैं| साम्राज्यवादी शक्तियों के चंगुल से भारत जहाँ 1947 में आजाद हुआ वहीँ चीन ने 1949 में साम्यवादी व्यवस्था को अपनाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की| भारत- चीन संबंधों की प्रारंभिक पृष्ठभूमि पंचशील तथा हिंदी-चीनी भाई-भाई जैसे सिद्धांतों के साथ खुशनुमें माहौल में प्रारंभ हुयी थी लेकिन तिब्बत पर चीनी आक्रमण, दलाईलामा को भारत द्वारा शरण देना तथा 1962 के चीनी आक्रमण के पश्चात संबंधों में कटुता विद्यमान हो गयी| हालाँकि आज भारत-चीन के मध्य बेहतर आर्थिक संबंध हैं फिर भी अनेकों मुद्दों पर व्यापक मतभेद मौजूद हैं| भारत-चीन के मध्य विद्यमान मुद्दे- सीमा-विवाद का व्यापक मुद्दा- पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन लाइन तथा डोकलाम क्षेत्र - चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत मानना; पश्चिमी क्षेत्र में जॉनसन लाइन, मैकडोनाल्ड लाइन तथा लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल(LAC) को लेकर दोनों देशों के मध्य विद्यमान भ्रम ; अक्साई चिन पर चीनी कब्जा; दलाईलामा और तिब्बत का मुद्दा - चीन द्वारा दलाईलामा को अलगाववादी नेता के तौर पर देखना तथा भारत द्वारा तिब्बत के निर्वासित सरकार,दलाईलामा को शरण एवं मान्यता देना; आतंकवाद को लेकर रुख- चीन द्वारा पाकिस्तान प्रयोजित आतंकवाद तथा भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले आतंकवादियों के प्रति नरम रुख रखना जैसे- संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने में रोड़े अटकाना; नदी-जल विवाद- ब्रह्मपुत्र नदी के उपरी जलग्रहण क्षेत्र में चीन द्वारा बांध बनाना; सतलुज तथा सिंधु नदियों के जल से जुड़े विवाद; स्टेपल वीजा के माध्यम से भारत की संप्रभुता को चुनौती; बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव एवं चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरने पर भारत की संप्रभुता पर आंच; स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स के माध्यम से भारत को चारो तरफ घेरने की नीति- म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका,जिबूती जैसे देशों में व्यापारिक तथा नौसैनिक अड्डे का निर्माण भारत को हिन्द महासागर में घेरने हेतु; परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के प्रवेश को लेकर रोड़े अटकाना; भूटान एवं नेपाल में चीन द्वारा अपने प्रभाव का विस्तार करना जिससे भारतीय हितों को खतरा; व्यापार असंतुलन- भारत-चीन व्यापार का चीन के पक्ष में अत्यधिक झुका होना; क्वाड्रीलेटरल डायलॉग डोकलाम विवाद डोकलाम विवाद 1950 के दशक में शुरू हुआ था जब चीन ने भूटानी क्षेत्र के विशाल हिस्सों का दावा करने वाले मानचित्र प्रकाशित किए| 1990 के दशक के शुरू में चीन ने भूटान को " पैकेज्ड सौदा " का ऑफर दिया| चीन ने डोकलाम पठार के एक छोटे से हिस्से के बदले उत्तर में पासमलांग और जकरलांग घाटियों का ऑफर दिया| 1998 में पहली बार चीन-भूटान बॉर्डर पर शांति हेतु शांति समझौता हुआ| 2017 मेंभारतीय सैनिकों ने चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के रास्ते को रोकने हेतु हस्तक्षेप किया जो कि डोकलाम पठार पर सड़क निर्माण कार्य में लगे हुए थें| रोड निर्माण तथा भारत की चिंताएँ - एक संकीर्ण सिलीगुड़ी गलियारा(चिकेन नेक) जो उत्तर-पूर्व को शेष भारत से अलग करता है| यहकॉरिडोर चुम्बी वैली से मात्र 500 किमी दूर है| इस संदर्भ में यथास्थिति में बदलाव भारत के लिए गंभीर सुरक्षा प्रभाव उत्पन करेगा| भूटान तथा भारत के साथ चीन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने हेतु किए गए समझौते का चीन द्वारा उल्लंघन किया गया| भारत की डोकलाम में सैनिक उपस्थिति से इस रणनीतिक क्षेत्र में भारत की स्थिति ज्यादा मजबूत होगी| अगर भारत की जल्द प्रतिक्रिया ना होती तो भूटान पर भी दबाव ज्यादा बढ़ता चला गया| चीन की प्रतिक्रिया तथा भारत-चीन संबंधों पर प्रभाव - चीन ने कहा कि भारत डोकलाम में घुसपैठ कर रहा है तथा उसे रोकने हेतु दोनों देश की सेनाएं आमने-सामने आ गयीं जिससे एक गंभीर गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गयी| चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा के कम मुश्किल रास्ते नाथूला पास को बंद कर देना ; चीन ने भारत के सुरक्षाबलों को बिना शर्त डोकलाम से वापस चले जाने को कहा तथा यह कहा कि इसके बाद ही सार्थक वार्तालाप संभव है| भूटान की सुरक्षा को चुनौती देकर चीन भारत-भूटान विशेष संबंध को रोकने की उम्मीद करता है| चीन द्वारा बार-बार भूटान को भारत का पिछलग्गू दिखाने की कोशिश की जाती रही ताकि भूटान भारत के प्रभाव से बाहर निकलकर एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण किया जा सके| चीन द्वारा भूटान को लगातार ओबोर में शामिल होने हेतु दबाव बनाया गया| चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा एवं भारतीय संप्रभुता पर चीन द्वारा आँख मूंदना ; सीमापार आतंकवाद तथा आतंकवाद को लेकर चुप्पी; NSG सदस्यता को लेकर अड़ियल रुख; भारत द्वारा दलाईलामा को अरुणाचल प्रदेश में भेजकर भारतीय पक्ष को मजबूत बनाना; भारत द्वारा जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों के साथ हिंद महासागर में सहयोग जिससे चीन की चुनौती का समाधान करने का प्रयास; आगे की राह - भारत को चीन के साथ निरंतर सहयोग एवं संवाद को बढ़ावा देना चाहिए| साथ ही, भूटान के साथ हमारे सहयोग के संदर्भ में चीन को आश्वस्त करना भी एक कदम होना चाहिए| भारत सरकार को भूटान की संप्रभुता को ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता है एवं भूटान के अभिन्न मित्र तथा बड़े भाई की भूमिका के रूप में भारत को अपने हार्ड पॉवर का इस्तेमाल जरुर करना चाहिए|| भारत द्वारा चीन को दक्षिण चीन सागर में ज्यादा इंगेज करना भी इस संदर्भ में एक प्रभावी कदम सिद्ध हो सकता है|
| 45,817
|
भारत में स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था विकेन्द्रीकरण को लागू करने के व्यापक दृष्टिकोण को समाहित किए हुए है परंतु वास्तव में अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) The system of local self-government in India has encompassed a wider view of implementing decentralization but in reality many challenges exist. Discuss. (150-200 words, Marks - 10 )
|
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में स्थानीय स्वशासन के बारे में लिखिए। उत्तर के पहले भाग में स्थानीय स्वशासन द्वारा विकेन्द्रीकरण के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद इसके समक्ष चुनौतियों की व्याख्या कीजिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारत में जन भागीदारी के उद्देश्य से स्थानीय शासन प्रणाली को प्रारम्भ किया गया। इसके लिए 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से क्रमशः पंचायती राज व्यवस्था और स्थानीय शहरी स्वशासन की व्यवस्था प्रारम्भ की गयी। इस प्रणाली के माध्यम से एक उद्देश्य के रूप में विकेन्द्रीकरण की नीति आरंभ की गयी जिसके प्रमुख घटक इस प्रकार हैं: राजनीतिक : स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की प्रणाली स्थापित करना शासन प्रशासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास करना। समस्या: स्वतंत्र चुनाव नहीं, सबकी भागीदारी नहीं, कृत्यात्मक घटक: राज्य और केंद्र के मध्य विषयों का बंटवारा तार्किक रूप से करना वित्तीय: संसाधनों का बंटवारा, वित्तीय प्रबंधन प्रशासनिक : कार्मिक प्रबंधन व नियोजन, पारदर्शिता व जवाबदेही चुनौतियाँ: जमीनी स्तर जागरूकता कम होने से चुनाव प्रणाली पूर्णतः निष्पक्ष नहीं है। चुनावों में धन बल का प्रयोग किया जाता है। जनता की भागीदारी अभी भी सीमित है। समाज के कमजोर वर्ग, महिलाएं अभी भी वास्तविक रूप से भागीदार नहीं बनी है। स्थानीय स्वशासन के अंतर्गत जो भी विषय दिये गए हैं उसका हस्तांतरण राज्य सरकार उचित रूप से नहीं करती हैं। इस मामले में पंचायतों को कम स्वतन्त्रता प्राप्त है। स्थानीय स्तर पर राजस्व संग्रह के संसाधनों का अभाव है।विशेष रूप से पंचायतों को इस चुनौती का सामना करना पड़ता है। जमीनी स्तर पर नीतियों के क्रियान्वयन में विलंब होता है। अभी पारदर्शिता और जवाबदेही जैसी समस्या अभी विद्यमान है। कार्यों के संचालन के लिए विशेषज्ञता का न होना एक बड़ी चुनौती है। जमीनी स्तर पर सेवाओं के वितरण में भ्रष्टाचार की समस्या व्याप्त है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनियमितता विद्यमान है। इस प्रकार स्थानीय स्वशासन के माध्यम से विकेन्द्रीकरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ की गयी थी उसके अनेक सकरतमक पहलू हैं। जिसमें ब्यापक सीमा तक सफलता प्राप्त हुई है। हालांकि अभी भी पंचायतों और शहरी स्थानीय निकाय को मजबूत किया जाना चाहिए। इसके लिए राजस्व संग्रह की स्वतन्त्रता, चुनावों में कमजोर वर्गों की भागीदारी, अधिकारों का पहचान आदि से संबन्धित सुधार की आवश्यकता है।
|
##Question:भारत में स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था विकेन्द्रीकरण को लागू करने के व्यापक दृष्टिकोण को समाहित किए हुए है परंतु वास्तव में अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) The system of local self-government in India has encompassed a wider view of implementing decentralization but in reality many challenges exist. Discuss. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में स्थानीय स्वशासन के बारे में लिखिए। उत्तर के पहले भाग में स्थानीय स्वशासन द्वारा विकेन्द्रीकरण के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद इसके समक्ष चुनौतियों की व्याख्या कीजिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारत में जन भागीदारी के उद्देश्य से स्थानीय शासन प्रणाली को प्रारम्भ किया गया। इसके लिए 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से क्रमशः पंचायती राज व्यवस्था और स्थानीय शहरी स्वशासन की व्यवस्था प्रारम्भ की गयी। इस प्रणाली के माध्यम से एक उद्देश्य के रूप में विकेन्द्रीकरण की नीति आरंभ की गयी जिसके प्रमुख घटक इस प्रकार हैं: राजनीतिक : स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की प्रणाली स्थापित करना शासन प्रशासन में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास करना। समस्या: स्वतंत्र चुनाव नहीं, सबकी भागीदारी नहीं, कृत्यात्मक घटक: राज्य और केंद्र के मध्य विषयों का बंटवारा तार्किक रूप से करना वित्तीय: संसाधनों का बंटवारा, वित्तीय प्रबंधन प्रशासनिक : कार्मिक प्रबंधन व नियोजन, पारदर्शिता व जवाबदेही चुनौतियाँ: जमीनी स्तर जागरूकता कम होने से चुनाव प्रणाली पूर्णतः निष्पक्ष नहीं है। चुनावों में धन बल का प्रयोग किया जाता है। जनता की भागीदारी अभी भी सीमित है। समाज के कमजोर वर्ग, महिलाएं अभी भी वास्तविक रूप से भागीदार नहीं बनी है। स्थानीय स्वशासन के अंतर्गत जो भी विषय दिये गए हैं उसका हस्तांतरण राज्य सरकार उचित रूप से नहीं करती हैं। इस मामले में पंचायतों को कम स्वतन्त्रता प्राप्त है। स्थानीय स्तर पर राजस्व संग्रह के संसाधनों का अभाव है।विशेष रूप से पंचायतों को इस चुनौती का सामना करना पड़ता है। जमीनी स्तर पर नीतियों के क्रियान्वयन में विलंब होता है। अभी पारदर्शिता और जवाबदेही जैसी समस्या अभी विद्यमान है। कार्यों के संचालन के लिए विशेषज्ञता का न होना एक बड़ी चुनौती है। जमीनी स्तर पर सेवाओं के वितरण में भ्रष्टाचार की समस्या व्याप्त है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनियमितता विद्यमान है। इस प्रकार स्थानीय स्वशासन के माध्यम से विकेन्द्रीकरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ की गयी थी उसके अनेक सकरतमक पहलू हैं। जिसमें ब्यापक सीमा तक सफलता प्राप्त हुई है। हालांकि अभी भी पंचायतों और शहरी स्थानीय निकाय को मजबूत किया जाना चाहिए। इसके लिए राजस्व संग्रह की स्वतन्त्रता, चुनावों में कमजोर वर्गों की भागीदारी, अधिकारों का पहचान आदि से संबन्धित सुधार की आवश्यकता है।
| 45,823
|
What do you understand by resources? State the classification of the same. (10 Marks / 150 words)
|
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CHARACTERISTICS OF A RESOURCE -CLASSIFICATION OF RESOURCES -CONCLUSION ANSWER:- Any material or anything becomes a resource when it has utility as well as functionality. CHARACTERISTICS OF A RESOURCE Any societycan use a resource if it has: 1) CULTURAL VALUE The society must accept it. For example, Everglades in the USA was earlier a marshy area and described as a wasteland. But now it is considered as a wetland and is responsible for tourism in the economy. 2) VIABILITY There must be a capability to make use of the resource. That means utilizing the resource must be cost-effective. For example, Nigeria is unable to make use of its vast uranium resources. 3) TECHNOLOGY If there is no technology, then it cannot make use of the resource. For example, there exist significant shale gas reserves in India. But we are unable to make good of it due to lack of technology. CLASSIFICATION OF RESOURCES There are numerous ways of classifying a resource. Two ways are important for us. I THE FIRST TYPE OF CLASSIFICATION 1) RENEWABILITY Resources can be renewable and Non-Renewable . Renewable resources can be re-used over an over again, but non-renewable resources are subject to a one time use only. For example, petrol is a renewable resource while solar energy, water energy, wind energy etc. are non-renewable resources. 2) ORIGIN Based on origin, resources can be classified as biotic and abiotic. Biotic resources are organic in nature, while abiotic are inorganic in nature. 3) UTILITY Based on utility resources can be classified as raw materials and energy resources . Minerals, food, forests are raw materials. Energy resources are further classified into conventional and non-conventional resources. II ANOTHER CLASSIFICATION- This is a simple but intelligent classification. 1) MATERIALRESOURCES This is further classified as biotic and abiotic . Wood, food, forests, human resources etc. are biotic resources. While rocks, minerals, air, water, rocks and land are abiotic resources. 2) NON-MATERIAL These resources are intangible in nature. Skills, health and harmony in a society are the non-material resources. Without non-material resources, one cannot use material resources . For example, the Baluchistan region of Pakistan has vast resources of petrol, iron and crude oil but there is no control of the government over these resources. Therefore, due to a lack of harmony in society, they are unable to use these vast and very crucial resources, which could actually lead to the development of the area. III THE MINERAL RESOURCES- CLASSIFICATION OF MINERALS Minerals can be classified as: 1) METALLIC These can be further classified as: 1.1) Ferrous- Iron, Manganese, Nickel and Cobalt are the ferrous minerals. 1.2) Non-ferrous- Copper, Bauxite, Gold, Silver, Platinum etc. are the non-ferrous minerals. 2) NON-METALLIC These can be further classified into: 2.1) Energy- Coal, petroleum, Natural Gas are energy resources. 2.2) Non-energy- Gypsum, limestone, asbestos, mica, Phosphorus etc. are non-energy giving minerals. Malthus postulated that while population increases by geometric mean [i.e. (ab) sq], resources only increase by the arithmetic mean [(a+b)/2]. Therefore, he stated that there was an immediate need to curtail the growing population growth rate. But the opposite view held was that people innovate and thus the resources also increase at the geometric mean rate. The latter was held to be true.
|
##Question:What do you understand by resources? State the classification of the same. (10 Marks / 150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CHARACTERISTICS OF A RESOURCE -CLASSIFICATION OF RESOURCES -CONCLUSION ANSWER:- Any material or anything becomes a resource when it has utility as well as functionality. CHARACTERISTICS OF A RESOURCE Any societycan use a resource if it has: 1) CULTURAL VALUE The society must accept it. For example, Everglades in the USA was earlier a marshy area and described as a wasteland. But now it is considered as a wetland and is responsible for tourism in the economy. 2) VIABILITY There must be a capability to make use of the resource. That means utilizing the resource must be cost-effective. For example, Nigeria is unable to make use of its vast uranium resources. 3) TECHNOLOGY If there is no technology, then it cannot make use of the resource. For example, there exist significant shale gas reserves in India. But we are unable to make good of it due to lack of technology. CLASSIFICATION OF RESOURCES There are numerous ways of classifying a resource. Two ways are important for us. I THE FIRST TYPE OF CLASSIFICATION 1) RENEWABILITY Resources can be renewable and Non-Renewable . Renewable resources can be re-used over an over again, but non-renewable resources are subject to a one time use only. For example, petrol is a renewable resource while solar energy, water energy, wind energy etc. are non-renewable resources. 2) ORIGIN Based on origin, resources can be classified as biotic and abiotic. Biotic resources are organic in nature, while abiotic are inorganic in nature. 3) UTILITY Based on utility resources can be classified as raw materials and energy resources . Minerals, food, forests are raw materials. Energy resources are further classified into conventional and non-conventional resources. II ANOTHER CLASSIFICATION- This is a simple but intelligent classification. 1) MATERIALRESOURCES This is further classified as biotic and abiotic . Wood, food, forests, human resources etc. are biotic resources. While rocks, minerals, air, water, rocks and land are abiotic resources. 2) NON-MATERIAL These resources are intangible in nature. Skills, health and harmony in a society are the non-material resources. Without non-material resources, one cannot use material resources . For example, the Baluchistan region of Pakistan has vast resources of petrol, iron and crude oil but there is no control of the government over these resources. Therefore, due to a lack of harmony in society, they are unable to use these vast and very crucial resources, which could actually lead to the development of the area. III THE MINERAL RESOURCES- CLASSIFICATION OF MINERALS Minerals can be classified as: 1) METALLIC These can be further classified as: 1.1) Ferrous- Iron, Manganese, Nickel and Cobalt are the ferrous minerals. 1.2) Non-ferrous- Copper, Bauxite, Gold, Silver, Platinum etc. are the non-ferrous minerals. 2) NON-METALLIC These can be further classified into: 2.1) Energy- Coal, petroleum, Natural Gas are energy resources. 2.2) Non-energy- Gypsum, limestone, asbestos, mica, Phosphorus etc. are non-energy giving minerals. Malthus postulated that while population increases by geometric mean [i.e. (ab) sq], resources only increase by the arithmetic mean [(a+b)/2]. Therefore, he stated that there was an immediate need to curtail the growing population growth rate. But the opposite view held was that people innovate and thus the resources also increase at the geometric mean rate. The latter was held to be true.
| 45,826
|
विश्व इतिहास में 1830 एवं 1848 की क्रांतियों के कारण एवं परिणामों पर चर्चा कीजिए। ( 150- 200 शब्द) Discuss the reasons and consequences of the revolutions of 1830 and 1848 in world history. (150-200 words)
|
भूमिका में तात्कालिक यूरोपीय परिस्थितियों की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में 1830 और 1848 के क्रांतियों के कारणों की चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में इन क्रांतियों के परिणामों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंत में निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नैपोलियन को वाटरलू की पराजय के पश्चात् सेंट हेलेना द्वीप निर्वासित कर दिया गया, तत्पश्चात् आस्ट्रिया की राजधानी वियना में यूरोप के विजयी राष्ट्रों का 1815 में सम्मेलन हुआ । जिसका मुख्य उद्देश्य यूरोप के उस मानचित्र को पुनर्व्यवस्थित करना जिसे नेपोलियन ने अपने युद्ध और विजयों से उलट-पटल दिया था। वस्तुतः आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने नेपोलियन के विरूद्ध मोर्चा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1830 व 1848 की क्रांति के पीछे निहित कारणों को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- वियना समझौत से असंतुष्ट :- वियना कांग्रेस यूरोपीय देशों के राजदूतों का एक सम्मेलन था, जो सितंबर 1814 से जून 1815 को वियना में आयोजित किया गया था। इसकी अध्यक्षता ऑस्ट्रियाई राजनेता मेटरनिख ने की। इस कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्ध, नेपोलियन युद्ध और पवित्र रोमन साम्राज्य के विघटन से उत्पन्न होने वाले कई मुद्दों एवं समस्याओं को हल करना था । हालांकि इस समझौते फ्रांस के लोंगों को असंतुष्ट कर दिया । जिसने यूरोप के एक नई क्रांति को जन्म दिया । प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी विचारधारा संघर्ष :- 19 वी सदी के शुरुवाती दशकों में यूरोप में नए नए विचारो का प्रादुर्भाव हुआ। जिसमे फ्रांस की क्रांति से उत्पन्न विचार यथा स्वतन्त्रता, समानता , बंधुता के साथ साथ पूंजीवाद और साम्यवाद जैसे विचारधारों का प्रादुर्भाव हुआ । इसके साथ ही इन नए क्रांतिकारी विचारों के विरोधीगुट भी सक्रिय हो गए। जिससे इस समय प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं के बीच टकराव देखा गया। पश्चिमी यूरोप में औद्योगीकरण का प्रसार : - 19 वी सदी के प्रारम्भ में यूरोप के औद्योगीकरण प्रारम्भ हो चुका था। जिसके कारण बड़ी संख्या में श्रमिकों की गतिशीलता बढ़ी, मुक्त बाज़ार की अवधारण का विकास हुआ, श्रमिक स्वंतंत्रता, तीव्र आर्थिक विकास, रोजगार, जीवन गुणवत्ता स्तर विकास आदि की मांग उठने लगी। जिसने क्रांति को प्रेरित किया । 1830 और 1848 के क्रांति के परिणाम के परिणामो को हम निम्नलिखित घटकों के अंतर्गत समझ सकते हैं :- 1830 की क्रांति के परिणाम (लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण से ) - स्पेन और स्विट्ज़रलैंड में संवैधानिक सरकार का गठन फ्रांस में वैधता सिद्धान्त को चुनौती ब्रिटेन में राजनीतिक सुधार को लेकर आंदोलन राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से - इटली और जर्मनी में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार बेल्जियम को हालैंड से स्वतंत्रा बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार 1848 के क्रांति के परिणाम ( लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण से ) - सोर्डीनिया, प्रशा में संवैधानिक की स्थापना हालैंड और डेनमार्क आदि देशो में भी प्रशा से प्रेरित होकर संवैधानिक सरकार की स्थापना ब्रिटेन में राजनीतिक सुधार के लिए चर्चिस्ट आंदोलन राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से - इटली, जर्मनी और बाल्कन क्षेत्रो में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार औस्ट्रिया और रूस में भी राष्ट्रवादी सक्रिय उपरोक्त बिन्दुओ से स्पष्ट है कि 1830 व 1848 की क्रांति ने जहां राष्ट्रवाद जैसे प्रमुख मुद्दो को उभारा , वहीं यूरोप में वर्षो से चली आ रही राजतंत्र की व्यवस्था को सीमित किया, साथ ही संवैधानिक सुधार की मांगो को बढ़ावा दिया। साथ ही कई देशो में लोकतंतांत्रिक व्यवस्था की नीव रखा ।
|
##Question:विश्व इतिहास में 1830 एवं 1848 की क्रांतियों के कारण एवं परिणामों पर चर्चा कीजिए। ( 150- 200 शब्द) Discuss the reasons and consequences of the revolutions of 1830 and 1848 in world history. (150-200 words)##Answer: भूमिका में तात्कालिक यूरोपीय परिस्थितियों की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में 1830 और 1848 के क्रांतियों के कारणों की चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में इन क्रांतियों के परिणामों की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंत में निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- नैपोलियन को वाटरलू की पराजय के पश्चात् सेंट हेलेना द्वीप निर्वासित कर दिया गया, तत्पश्चात् आस्ट्रिया की राजधानी वियना में यूरोप के विजयी राष्ट्रों का 1815 में सम्मेलन हुआ । जिसका मुख्य उद्देश्य यूरोप के उस मानचित्र को पुनर्व्यवस्थित करना जिसे नेपोलियन ने अपने युद्ध और विजयों से उलट-पटल दिया था। वस्तुतः आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने नेपोलियन के विरूद्ध मोर्चा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1830 व 1848 की क्रांति के पीछे निहित कारणों को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- वियना समझौत से असंतुष्ट :- वियना कांग्रेस यूरोपीय देशों के राजदूतों का एक सम्मेलन था, जो सितंबर 1814 से जून 1815 को वियना में आयोजित किया गया था। इसकी अध्यक्षता ऑस्ट्रियाई राजनेता मेटरनिख ने की। इस कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्ध, नेपोलियन युद्ध और पवित्र रोमन साम्राज्य के विघटन से उत्पन्न होने वाले कई मुद्दों एवं समस्याओं को हल करना था । हालांकि इस समझौते फ्रांस के लोंगों को असंतुष्ट कर दिया । जिसने यूरोप के एक नई क्रांति को जन्म दिया । प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी विचारधारा संघर्ष :- 19 वी सदी के शुरुवाती दशकों में यूरोप में नए नए विचारो का प्रादुर्भाव हुआ। जिसमे फ्रांस की क्रांति से उत्पन्न विचार यथा स्वतन्त्रता, समानता , बंधुता के साथ साथ पूंजीवाद और साम्यवाद जैसे विचारधारों का प्रादुर्भाव हुआ । इसके साथ ही इन नए क्रांतिकारी विचारों के विरोधीगुट भी सक्रिय हो गए। जिससे इस समय प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं के बीच टकराव देखा गया। पश्चिमी यूरोप में औद्योगीकरण का प्रसार : - 19 वी सदी के प्रारम्भ में यूरोप के औद्योगीकरण प्रारम्भ हो चुका था। जिसके कारण बड़ी संख्या में श्रमिकों की गतिशीलता बढ़ी, मुक्त बाज़ार की अवधारण का विकास हुआ, श्रमिक स्वंतंत्रता, तीव्र आर्थिक विकास, रोजगार, जीवन गुणवत्ता स्तर विकास आदि की मांग उठने लगी। जिसने क्रांति को प्रेरित किया । 1830 और 1848 के क्रांति के परिणाम के परिणामो को हम निम्नलिखित घटकों के अंतर्गत समझ सकते हैं :- 1830 की क्रांति के परिणाम (लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण से ) - स्पेन और स्विट्ज़रलैंड में संवैधानिक सरकार का गठन फ्रांस में वैधता सिद्धान्त को चुनौती ब्रिटेन में राजनीतिक सुधार को लेकर आंदोलन राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से - इटली और जर्मनी में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार बेल्जियम को हालैंड से स्वतंत्रा बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार 1848 के क्रांति के परिणाम ( लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण से ) - सोर्डीनिया, प्रशा में संवैधानिक की स्थापना हालैंड और डेनमार्क आदि देशो में भी प्रशा से प्रेरित होकर संवैधानिक सरकार की स्थापना ब्रिटेन में राजनीतिक सुधार के लिए चर्चिस्ट आंदोलन राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण से - इटली, जर्मनी और बाल्कन क्षेत्रो में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार औस्ट्रिया और रूस में भी राष्ट्रवादी सक्रिय उपरोक्त बिन्दुओ से स्पष्ट है कि 1830 व 1848 की क्रांति ने जहां राष्ट्रवाद जैसे प्रमुख मुद्दो को उभारा , वहीं यूरोप में वर्षो से चली आ रही राजतंत्र की व्यवस्था को सीमित किया, साथ ही संवैधानिक सुधार की मांगो को बढ़ावा दिया। साथ ही कई देशो में लोकतंतांत्रिक व्यवस्था की नीव रखा ।
| 45,827
|
पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये| इससे भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाली विभिन्न चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इस सन्दर्भ में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? (10अंक;150 से 200 शब्द) Explain the meaning of Pakistan-China axis. Clarify the various concerns that arise in front of India by this axis. What should India"s strategy in this context? (10 marks;150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत पाक सम्बन्धों के बारे में परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में इस संदर्भ में भारत की चिंताएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत एवं पाकिस्तान के पारस्परिक सम्बन्ध स्वतंत्रता के बाद से ही तनावपूर्ण एवं अस्थिर रहे हैं| इसके पीछे अनेक कारण विद्यमान हैं जैसे इतिहास, भूगोल, आतंकवाद, तस्करी, घुसपैठ एवं पाकिस्तान-चीन धुरी का निर्माण आदि| पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधो के निर्धारण में पाकिस्तान-चीन धुरी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| पाकिस्तान-चीन की धुरी · अमेरिका के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली वित्तीय सहायता रोक दी गयी है इसके साथ ही विश्व के अन्य देश पाक को आतंकवादी देशी घोषित करने में लगे हुए हैं अतः पाकिस्तान के पास चीन के पास जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है · पाक, तालिबान को मजबूत करना चाहता ताकि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव बना रहेजबकि भारत, अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक एवं स्थिर शासन का पक्षकार है इसलिए भारत तालिबान का विरोध करता है · अपने जिनजियांग क्षेत्र को आतंकवाद से बचाए रखने के लिए चीन तालिबान को अपने पक्ष में बनाए रखता है · आतंकवाद के सन्दर्भ में भारत के प्रयासों को चीन UN में वीटो के माध्यम से बाधित करता रहा है · UNSC एवं NSG की सदस्यता को लेकर भारत के प्रति चीन की नीति पाकिस्तान के पक्ष में है · चीन, पाकिस्तान का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार एवं आर्थिक आशा है| CPEC के माध्यम से चीन द्वारा पाकिस्तान में अब तक का सबसे बड़ा निवेश किया है इससे भारत की संप्रभुता को भी चोट पहुचा है · OBOR के माध्यम से चीन एवं पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के महत्त्व को कम करने का प्रयास कर रहे हैं · पाकिस्तान को हथियारों की सर्वाधिक आपूर्ति चीन के माध्यम से होती है · उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है पाकिस्तान एवं चीन के मध्य एक धुरी का निर्माण हुआ है · दक्षिण पूर्वी एशिया में अमेरिकी प्रभाव है अतः चीन की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है|इसी कारण चीन, पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है|यदि दक्षिण पूर्वी एशिया में चीन को कोई समस्या होगी तो वह ग्वादर को एक विकल्प के तौर पर प्रयोग कर सकेगा भारत की चिंताएं · चीन एवं पाकिस्तान के कारण आतंकवाद को मिलता सहयोग · CPEC के माध्यम से भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होता है · भारत के पडोसी देशों में चीन अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहा है जिससे भारत के समक्ष कूटनीतिक चुनौती मिलती है · POK में CPEC के विकास के कारण भारत की संप्रभुता का हनन होता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में पाकिस्तान की संप्रभुता को मान्यता देता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में किया जाने वाला अवसंरचनात्मक विकास भारत के समक्ष सुरक्षा चिंताएं उत्पन्न करता है क्योंकि इससे पाकिस्तान की सेना की गतिशीलता आसान हो जायेगी · भारत की समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से ग्वादर एक बड़ी चिंता है क्योंकि भविष्य में इसका सैन्यीकरण किया जा सकता है अपेक्षित रणनीति · भारत एवं चीन के मध्य शक्ति अंतराल को भरने के लिए भारत को तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर चलाना होगा · पाकिस्तान एवं चीन को कूटनीतिक मामलों में अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, दोनों देशों के मध्य एक धुरी निर्मित हुई है अतः भारत की सामरिक नीति में दोनों देशों को एक इकाई के तौर पर देखा जाना चाहिए · चीन की नीतियों से पीड़ित देशों के साथ भारत को अपने सम्बन्ध निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए · चीन के आर्थिक शोषण एवं आक्रामक नीतितियों का प्रतिसंतुलन करने के लिए विश्व की ऐसी बड़ी शक्तियों के साथ निरन्तर सहयोग बढ़ाना चाहिए जिनके हित चीन के हितों से टकराते हैं · अतः भारत को हार्ड एवं सॉफ्ट पॉवर कूटनीति के समन्वय के माध्यम से स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनानी चाहिए वैदेशिक सम्बन्ध के कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत को CPEC एवं BCIM की सदस्यता ले लेनी चाहिए| इससे भारत एवं चीन के मध्य सहयोग के नए आयाम खुलेंगे जैसे अफगानिस्तान तक भारत कि पहुँच आसान होगी, यदि CPEC का विस्तार भारत में भी होता है तो भारत के सीमावर्ती राज्यों का विकास हो सकता है| जम्मू कश्मीर के युवाओं में यह भावना की भारत CPEC को स्वीकार नहीं कर रहा है अतः वह JK का विकास नहीं करना चाहता, CPEC में सदस्यता ऐसी विचारधारा पर रोक लगा सकती है| इससे पाकिस्तान-चीन धुरी को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी यद्यपि कि भारत ने अभी तक संप्रभुता के प्रश्न पर अपना सहयोग रोक रखा है|
|
##Question:पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये| इससे भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाली विभिन्न चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इस सन्दर्भ में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? (10अंक;150 से 200 शब्द) Explain the meaning of Pakistan-China axis. Clarify the various concerns that arise in front of India by this axis. What should India"s strategy in this context? (10 marks;150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत पाक सम्बन्धों के बारे में परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में इस संदर्भ में भारत की चिंताएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत एवं पाकिस्तान के पारस्परिक सम्बन्ध स्वतंत्रता के बाद से ही तनावपूर्ण एवं अस्थिर रहे हैं| इसके पीछे अनेक कारण विद्यमान हैं जैसे इतिहास, भूगोल, आतंकवाद, तस्करी, घुसपैठ एवं पाकिस्तान-चीन धुरी का निर्माण आदि| पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधो के निर्धारण में पाकिस्तान-चीन धुरी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| पाकिस्तान-चीन की धुरी · अमेरिका के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली वित्तीय सहायता रोक दी गयी है इसके साथ ही विश्व के अन्य देश पाक को आतंकवादी देशी घोषित करने में लगे हुए हैं अतः पाकिस्तान के पास चीन के पास जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है · पाक, तालिबान को मजबूत करना चाहता ताकि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव बना रहेजबकि भारत, अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक एवं स्थिर शासन का पक्षकार है इसलिए भारत तालिबान का विरोध करता है · अपने जिनजियांग क्षेत्र को आतंकवाद से बचाए रखने के लिए चीन तालिबान को अपने पक्ष में बनाए रखता है · आतंकवाद के सन्दर्भ में भारत के प्रयासों को चीन UN में वीटो के माध्यम से बाधित करता रहा है · UNSC एवं NSG की सदस्यता को लेकर भारत के प्रति चीन की नीति पाकिस्तान के पक्ष में है · चीन, पाकिस्तान का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार एवं आर्थिक आशा है| CPEC के माध्यम से चीन द्वारा पाकिस्तान में अब तक का सबसे बड़ा निवेश किया है इससे भारत की संप्रभुता को भी चोट पहुचा है · OBOR के माध्यम से चीन एवं पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के महत्त्व को कम करने का प्रयास कर रहे हैं · पाकिस्तान को हथियारों की सर्वाधिक आपूर्ति चीन के माध्यम से होती है · उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है पाकिस्तान एवं चीन के मध्य एक धुरी का निर्माण हुआ है · दक्षिण पूर्वी एशिया में अमेरिकी प्रभाव है अतः चीन की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है|इसी कारण चीन, पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है|यदि दक्षिण पूर्वी एशिया में चीन को कोई समस्या होगी तो वह ग्वादर को एक विकल्प के तौर पर प्रयोग कर सकेगा भारत की चिंताएं · चीन एवं पाकिस्तान के कारण आतंकवाद को मिलता सहयोग · CPEC के माध्यम से भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होता है · भारत के पडोसी देशों में चीन अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहा है जिससे भारत के समक्ष कूटनीतिक चुनौती मिलती है · POK में CPEC के विकास के कारण भारत की संप्रभुता का हनन होता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में पाकिस्तान की संप्रभुता को मान्यता देता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में किया जाने वाला अवसंरचनात्मक विकास भारत के समक्ष सुरक्षा चिंताएं उत्पन्न करता है क्योंकि इससे पाकिस्तान की सेना की गतिशीलता आसान हो जायेगी · भारत की समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से ग्वादर एक बड़ी चिंता है क्योंकि भविष्य में इसका सैन्यीकरण किया जा सकता है अपेक्षित रणनीति · भारत एवं चीन के मध्य शक्ति अंतराल को भरने के लिए भारत को तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर चलाना होगा · पाकिस्तान एवं चीन को कूटनीतिक मामलों में अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, दोनों देशों के मध्य एक धुरी निर्मित हुई है अतः भारत की सामरिक नीति में दोनों देशों को एक इकाई के तौर पर देखा जाना चाहिए · चीन की नीतियों से पीड़ित देशों के साथ भारत को अपने सम्बन्ध निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए · चीन के आर्थिक शोषण एवं आक्रामक नीतितियों का प्रतिसंतुलन करने के लिए विश्व की ऐसी बड़ी शक्तियों के साथ निरन्तर सहयोग बढ़ाना चाहिए जिनके हित चीन के हितों से टकराते हैं · अतः भारत को हार्ड एवं सॉफ्ट पॉवर कूटनीति के समन्वय के माध्यम से स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनानी चाहिए वैदेशिक सम्बन्ध के कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत को CPEC एवं BCIM की सदस्यता ले लेनी चाहिए| इससे भारत एवं चीन के मध्य सहयोग के नए आयाम खुलेंगे जैसे अफगानिस्तान तक भारत कि पहुँच आसान होगी, यदि CPEC का विस्तार भारत में भी होता है तो भारत के सीमावर्ती राज्यों का विकास हो सकता है| जम्मू कश्मीर के युवाओं में यह भावना की भारत CPEC को स्वीकार नहीं कर रहा है अतः वह JK का विकास नहीं करना चाहता, CPEC में सदस्यता ऐसी विचारधारा पर रोक लगा सकती है| इससे पाकिस्तान-चीन धुरी को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी यद्यपि कि भारत ने अभी तक संप्रभुता के प्रश्न पर अपना सहयोग रोक रखा है|
| 45,835
|
ब्रिटिश शासन काल में पारंपरिक उद्योगों के पतन के कारणों एवं परिणामों का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) In British rule, briefly describe the causes and consequences of the decline of traditional industries. (150-200 words)
|
एप्रोच - भूमिका में पारंपरिक उद्योगों के बारे में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद इन उद्योगों के पातं के कारणों के बताइए | अंत में इनके पतन से उत्पन्न आर्थिक पर्निनामों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- ब्रिटिश शासन काल के प्रारंभ में भारत के शहरी क्षेत्रों में कपड़ा ,हथियार आभूषण ,लकड़ी इत्यादि उद्योग थे , जिसका उद्देश्य व्यापार करना था ,जबकि गाँव में उपस्थित उद्योगों का उद्देश्य गाँव के निवासियों की ज़रूरतों को पूरा करना था | भारत के पारंपरिक उद्योगों का निम्नलिखित कारणों से पतन हुआ - ब्रिटिश अधिकारी अपने मुनाफे के लिए कारीगरों को परेशान करते थे | उनसे बहुत कम पैसों पर श्रम कराते थे | बाद में बुनकरों, हस्तशिल्पों ने अपने प्रारंभिक कार्यों को छोड़ दिया| एकतरफ़ा मुक्त व्यापार -ब्रिटेन में भारतीय वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक कर लगा दिया गया जबकि भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर कर नगण्य था | मुक्त व्यापार नीति -ब्रिटेन में निर्मित कुछ वस्तुएं जैसे सूती कपड़ा आदि भारत की तुलना में अधिक सस्ते तथा अधिक गुणवत्तायुक्त थे अतः लोगों का रुझान उन पर अधिक हो गया | अंतर्देशीय सीमा शुल्क -भारत में एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाने वाली वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगा दिया जाता था जिनसे वे वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाती थीं | रेलवे की भूमिका -रेलवे व परिवहन के उन्नत साधनों के विकास के कारण ब्रिटिश वस्तुओं की पहुँच दूर के क्षेत्रों और गांवों तक हो गयी | गाँव के लोग भी कम कीमतों के कारण उन्हें प्राथमिकता देने लगे | आर्थिक परिणाम - भारत का प्रारंभिक औद्योगिक ढांचा चरमरा गया तथा इनके पुनरुत्थान में बहुत अधिक समय लगा | पुराने व्यापारिक शहर जैसे सूरत , मुर्शिदाबाद , ढाका , आदि का पतन हुआ | श्रमिक बेरोजगार हो गए और वे कम आय पर भी काम करने को तैयार हो गए | रोजगार के आभाव में श्रमिकों का गावों की ओर पलायन हुआ | गावों की जनसँख्या बढ़ने पर कृषि पर जनसँख्या का भार पड़ने लगा | भूमि के उपविभाजन के द्वारा भूमि की उत्पादकता में कमी हुई | अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ध्यान में रखकर कृषि की गयी | तैयार माल के स्थान पर कच्चे माल को प्राथमिकता दी गयी | कुल मिलकर हम यह कह सकते हैं कि ब्रिटिश वस्तुओं को भारत में बेचने के उद्देश्य से यहाँ के पारंपरिक उद्योगों का पतन किया गया और ब्रिटिश उद्योगों को ध्यान में रखकर भारत की अर्थव्यवस्था संचालित की गयी | यह मुख्यत: ब्रिटिश औद्योगिक नीति का परिणाम था |
|
##Question:ब्रिटिश शासन काल में पारंपरिक उद्योगों के पतन के कारणों एवं परिणामों का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) In British rule, briefly describe the causes and consequences of the decline of traditional industries. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में पारंपरिक उद्योगों के बारे में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद इन उद्योगों के पातं के कारणों के बताइए | अंत में इनके पतन से उत्पन्न आर्थिक पर्निनामों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- ब्रिटिश शासन काल के प्रारंभ में भारत के शहरी क्षेत्रों में कपड़ा ,हथियार आभूषण ,लकड़ी इत्यादि उद्योग थे , जिसका उद्देश्य व्यापार करना था ,जबकि गाँव में उपस्थित उद्योगों का उद्देश्य गाँव के निवासियों की ज़रूरतों को पूरा करना था | भारत के पारंपरिक उद्योगों का निम्नलिखित कारणों से पतन हुआ - ब्रिटिश अधिकारी अपने मुनाफे के लिए कारीगरों को परेशान करते थे | उनसे बहुत कम पैसों पर श्रम कराते थे | बाद में बुनकरों, हस्तशिल्पों ने अपने प्रारंभिक कार्यों को छोड़ दिया| एकतरफ़ा मुक्त व्यापार -ब्रिटेन में भारतीय वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक कर लगा दिया गया जबकि भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर कर नगण्य था | मुक्त व्यापार नीति -ब्रिटेन में निर्मित कुछ वस्तुएं जैसे सूती कपड़ा आदि भारत की तुलना में अधिक सस्ते तथा अधिक गुणवत्तायुक्त थे अतः लोगों का रुझान उन पर अधिक हो गया | अंतर्देशीय सीमा शुल्क -भारत में एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाने वाली वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगा दिया जाता था जिनसे वे वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाती थीं | रेलवे की भूमिका -रेलवे व परिवहन के उन्नत साधनों के विकास के कारण ब्रिटिश वस्तुओं की पहुँच दूर के क्षेत्रों और गांवों तक हो गयी | गाँव के लोग भी कम कीमतों के कारण उन्हें प्राथमिकता देने लगे | आर्थिक परिणाम - भारत का प्रारंभिक औद्योगिक ढांचा चरमरा गया तथा इनके पुनरुत्थान में बहुत अधिक समय लगा | पुराने व्यापारिक शहर जैसे सूरत , मुर्शिदाबाद , ढाका , आदि का पतन हुआ | श्रमिक बेरोजगार हो गए और वे कम आय पर भी काम करने को तैयार हो गए | रोजगार के आभाव में श्रमिकों का गावों की ओर पलायन हुआ | गावों की जनसँख्या बढ़ने पर कृषि पर जनसँख्या का भार पड़ने लगा | भूमि के उपविभाजन के द्वारा भूमि की उत्पादकता में कमी हुई | अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ध्यान में रखकर कृषि की गयी | तैयार माल के स्थान पर कच्चे माल को प्राथमिकता दी गयी | कुल मिलकर हम यह कह सकते हैं कि ब्रिटिश वस्तुओं को भारत में बेचने के उद्देश्य से यहाँ के पारंपरिक उद्योगों का पतन किया गया और ब्रिटिश उद्योगों को ध्यान में रखकर भारत की अर्थव्यवस्था संचालित की गयी | यह मुख्यत: ब्रिटिश औद्योगिक नीति का परिणाम था |
| 45,841
|
What is an ecosystem? Discuss structure and function of the ecosystem. What are ecosystem services? List a few examples for the same. (200 words)
|
Approach: Define Ecosystem as Introduction Highlightthe structure and function of ecosystem Explain Ecosystem Services and its type with the help of examples. Give a contextual balanced conclusion Answer: An ecosystemis the functional unit ofnature, where living organisms interact among themselves and also with the surrounding physical environment. Ecosystem varies greatly in size from a small pond to alarge forest or a sea. Categories of ecosystem Since this system is too big and complex to be studied at one time, it is convenientto divide it into two basic categories, namely theterrestrial and the aquatic. Forest, grassland, and desertare some examples of terrestrial ecosystems; pond, lake, wetland, river, and estuary are some examples of aquaticecosystems. Crop fields and an aquarium may also beconsidered as man-made ecosystems. STRUCTURE OF ECOSYSTEM Interaction of biotic and abiotic components result in a physicalstructure that is characteristic for each type of ecosystem. Identificationand enumeration of plant and animal species of an ecosystem give itsspecies composition. Abioticfactors are the non-living parts of an environment. These include things such as sunlight, temperature, wind, water, soil and naturally occurring events such as storms, fires, and volcanic eruptions. Bioticfactors are the living parts of an environment, such as plants, animals, and micro-organisms. Together, they are the biological factors that determine a species" success. Each of these factors impacts others, and a mix of both is necessary for an ecosystem to survive. Function of Ecosystem The components of the ecosystem are seen to function as a unit when we consider the following aspects: (i) Productivity; (ii) Decomposition; (iii) Energy flow; and (iv) Nutrient cycling. ECOSYSTEM SERVICES According to TEEB, ecosystem services can be categorized into four main types: 1. Provisioning servicesare the products obtained from ecosystems such as food, fresh water, wood, fiber, genetic resources, and medicines. 2. Regulating servicesare defined as the benefits obtained from the regulation of ecosystem processes such as climate regulation, natural hazard regulation, water purification, and waste management, pollination or pest control. 3. Habitat serviceshighlight the importance of ecosystems to provide habitat for migratory species and to maintain the viability of gene-pools. 4. Cultural servicesinclude non-material benefits that people obtain from ecosystems such as spiritual enrichment, intellectual development, recreation and aesthetic values. Conclusion To Generate Greater Global awareness regarding the cost of services many initiatives are taken like The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) is a global initiative focused on “making nature’s values visible”. Its principal objective is to mainstream the values of biodiversity and ecosystem services into decision-making at all levels.
|
##Question:What is an ecosystem? Discuss structure and function of the ecosystem. What are ecosystem services? List a few examples for the same. (200 words)##Answer:Approach: Define Ecosystem as Introduction Highlightthe structure and function of ecosystem Explain Ecosystem Services and its type with the help of examples. Give a contextual balanced conclusion Answer: An ecosystemis the functional unit ofnature, where living organisms interact among themselves and also with the surrounding physical environment. Ecosystem varies greatly in size from a small pond to alarge forest or a sea. Categories of ecosystem Since this system is too big and complex to be studied at one time, it is convenientto divide it into two basic categories, namely theterrestrial and the aquatic. Forest, grassland, and desertare some examples of terrestrial ecosystems; pond, lake, wetland, river, and estuary are some examples of aquaticecosystems. Crop fields and an aquarium may also beconsidered as man-made ecosystems. STRUCTURE OF ECOSYSTEM Interaction of biotic and abiotic components result in a physicalstructure that is characteristic for each type of ecosystem. Identificationand enumeration of plant and animal species of an ecosystem give itsspecies composition. Abioticfactors are the non-living parts of an environment. These include things such as sunlight, temperature, wind, water, soil and naturally occurring events such as storms, fires, and volcanic eruptions. Bioticfactors are the living parts of an environment, such as plants, animals, and micro-organisms. Together, they are the biological factors that determine a species" success. Each of these factors impacts others, and a mix of both is necessary for an ecosystem to survive. Function of Ecosystem The components of the ecosystem are seen to function as a unit when we consider the following aspects: (i) Productivity; (ii) Decomposition; (iii) Energy flow; and (iv) Nutrient cycling. ECOSYSTEM SERVICES According to TEEB, ecosystem services can be categorized into four main types: 1. Provisioning servicesare the products obtained from ecosystems such as food, fresh water, wood, fiber, genetic resources, and medicines. 2. Regulating servicesare defined as the benefits obtained from the regulation of ecosystem processes such as climate regulation, natural hazard regulation, water purification, and waste management, pollination or pest control. 3. Habitat serviceshighlight the importance of ecosystems to provide habitat for migratory species and to maintain the viability of gene-pools. 4. Cultural servicesinclude non-material benefits that people obtain from ecosystems such as spiritual enrichment, intellectual development, recreation and aesthetic values. Conclusion To Generate Greater Global awareness regarding the cost of services many initiatives are taken like The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) is a global initiative focused on “making nature’s values visible”. Its principal objective is to mainstream the values of biodiversity and ecosystem services into decision-making at all levels.
| 45,842
|
पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये| इससे भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाली विभिन्न चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इस सन्दर्भ में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the meaning of Pakistan-China axis. Clarify the various concerns that arise in front of India by this axis. What should India"s strategy in this context? (150 to 200 words, 10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत पाक सम्बन्धों के बारे में परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में इस संदर्भ में भारत की चिंताएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत एवं पाकिस्तान के पारस्परिक सम्बन्ध स्वतंत्रता के बाद से ही तनावपूर्ण एवं अस्थिर रहे हैं| इसके पीछे अनेक कारण विद्यमान हैं जैसे इतिहास, भूगोल, आतंकवाद, तस्करी, घुसपैठ एवं पाकिस्तान-चीन धुरी का निर्माण आदि| पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधो के निर्धारण में पाकिस्तान-चीन धुरी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| पाकिस्तान-चीन की धुरी · अमेरिका के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली वित्तीय सहायता रोक दी गयी है इसके साथ ही विश्व के अन्य देश पाक को आतंकवादी देशी घोषित करने में लगे हुए हैं अतः पाकिस्तान के पास चीन के पास जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है · पाक, तालिबान को मजबूत करना चाहता ताकि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव बना रहेजबकि भारत, अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक एवं स्थिर शासन का पक्षकार है इसलिए भारत तालिबान का विरोध करता है · अपने जिनजियांग क्षेत्र को आतंकवाद से बचाए रखने के लिए चीन तालिबान को अपने पक्ष में बनाए रखता है · आतंकवाद के सन्दर्भ में भारत के प्रयासों को चीन UN में वीटो के माध्यम से बाधित करता रहा है · UNSC एवं NSG की सदस्यता को लेकर भारत के प्रति चीन की नीति पाकिस्तान के पक्ष में है · चीन, पाकिस्तान का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार एवं आर्थिक आशा है| CPEC के माध्यम से चीन द्वारा पाकिस्तान में अब तक का सबसे बड़ा निवेश किया है इससे भारत की संप्रभुता को भी चोट पहुचा है · OBOR के माध्यम से चीन एवं पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के महत्त्व को कम करने का प्रयास कर रहे हैं · पाकिस्तान को हथियारों की सर्वाधिक आपूर्ति चीन के माध्यम से होती है · उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है पाकिस्तान एवं चीन के मध्य एक धुरी का निर्माण हुआ है · दक्षिण पूर्वी एशिया में अमेरिकी प्रभाव है अतः चीन की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है|इसी कारण चीन, पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है|यदि दक्षिण पूर्वी एशिया में चीन को कोई समस्या होगी तो वह ग्वादर को एक विकल्प के तौर पर प्रयोग कर सकेगा भारत की चिंताएं · चीन एवं पाकिस्तान के कारण आतंकवाद को मिलता सहयोग · CPEC के माध्यम से भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होता है · भारत के पडोसी देशों में चीन अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहा है जिससे भारत के समक्ष कूटनीतिक चुनौती मिलती है · POK में CPEC के विकास के कारण भारत की संप्रभुता का हनन होता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में पाकिस्तान की संप्रभुता को मान्यता देता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में किया जाने वाला अवसंरचनात्मक विकास भारत के समक्ष सुरक्षा चिंताएं उत्पन्न करता है क्योंकि इससे पाकिस्तान की सेना की गतिशीलता आसान हो जायेगी · भारत की समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से ग्वादर एक बड़ी चिंता है क्योंकि भविष्य में इसका सैन्यीकरण किया जा सकता है अपेक्षित रणनीति · भारत एवं चीन के मध्य शक्ति अंतराल को भरने के लिए भारत को तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर चलाना होगा · पाकिस्तान एवं चीन को कूटनीतिक मामलों में अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, दोनों देशों के मध्य एक धुरी निर्मित हुई है अतः भारत की सामरिक नीति में दोनों देशों को एक इकाई के तौर पर देखा जाना चाहिए · चीन की नीतियों से पीड़ित देशों के साथ भारत को अपने सम्बन्ध निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए · चीन के आर्थिक शोषण एवं आक्रामक नीतितियों का प्रतिसंतुलन करने के लिए विश्व की ऐसी बड़ी शक्तियों के साथ निरन्तर सहयोग बढ़ाना चाहिए जिनके हित चीन के हितों से टकराते हैं · अतः भारत को हार्ड एवं सॉफ्ट पॉवर कूटनीति के समन्वय के माध्यम से स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनानी चाहिए वैदेशिक सम्बन्ध के कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत को CPEC एवं BCIM की सदस्यता ले लेनी चाहिए| इससे भारत एवं चीन के मध्य सहयोग के नए आयाम खुलेंगे जैसे अफगानिस्तान तक भारत कि पहुँच आसान होगी, यदि CPEC का विस्तार भारत में भी होता है तो भारत के सीमावर्ती राज्यों का विकास हो सकता है| जम्मू कश्मीर के युवाओं में यह भावना की भारत CPEC को स्वीकार नहीं कर रहा है अतः वह JK का विकास नहीं करना चाहता, CPEC में सदस्यता ऐसी विचारधारा पर रोक लगा सकती है| इससे पाकिस्तान-चीन धुरी को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी यद्यपि कि भारत ने अभी तक संप्रभुता के प्रश्न पर अपना सहयोग रोक रखा है|
|
##Question:पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये| इससे भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाली विभिन्न चिंताओं को स्पष्ट कीजिये | इस सन्दर्भ में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the meaning of Pakistan-China axis. Clarify the various concerns that arise in front of India by this axis. What should India"s strategy in this context? (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत पाक सम्बन्धों के बारे में परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पाकिस्तान-चीन धुरी का आशय स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में इस संदर्भ में भारत की चिंताएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत एवं पाकिस्तान के पारस्परिक सम्बन्ध स्वतंत्रता के बाद से ही तनावपूर्ण एवं अस्थिर रहे हैं| इसके पीछे अनेक कारण विद्यमान हैं जैसे इतिहास, भूगोल, आतंकवाद, तस्करी, घुसपैठ एवं पाकिस्तान-चीन धुरी का निर्माण आदि| पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधो के निर्धारण में पाकिस्तान-चीन धुरी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| पाकिस्तान-चीन की धुरी · अमेरिका के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली वित्तीय सहायता रोक दी गयी है इसके साथ ही विश्व के अन्य देश पाक को आतंकवादी देशी घोषित करने में लगे हुए हैं अतः पाकिस्तान के पास चीन के पास जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है · पाक, तालिबान को मजबूत करना चाहता ताकि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव बना रहेजबकि भारत, अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक एवं स्थिर शासन का पक्षकार है इसलिए भारत तालिबान का विरोध करता है · अपने जिनजियांग क्षेत्र को आतंकवाद से बचाए रखने के लिए चीन तालिबान को अपने पक्ष में बनाए रखता है · आतंकवाद के सन्दर्भ में भारत के प्रयासों को चीन UN में वीटो के माध्यम से बाधित करता रहा है · UNSC एवं NSG की सदस्यता को लेकर भारत के प्रति चीन की नीति पाकिस्तान के पक्ष में है · चीन, पाकिस्तान का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार एवं आर्थिक आशा है| CPEC के माध्यम से चीन द्वारा पाकिस्तान में अब तक का सबसे बड़ा निवेश किया है इससे भारत की संप्रभुता को भी चोट पहुचा है · OBOR के माध्यम से चीन एवं पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के महत्त्व को कम करने का प्रयास कर रहे हैं · पाकिस्तान को हथियारों की सर्वाधिक आपूर्ति चीन के माध्यम से होती है · उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है पाकिस्तान एवं चीन के मध्य एक धुरी का निर्माण हुआ है · दक्षिण पूर्वी एशिया में अमेरिकी प्रभाव है अतः चीन की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है|इसी कारण चीन, पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है|यदि दक्षिण पूर्वी एशिया में चीन को कोई समस्या होगी तो वह ग्वादर को एक विकल्प के तौर पर प्रयोग कर सकेगा भारत की चिंताएं · चीन एवं पाकिस्तान के कारण आतंकवाद को मिलता सहयोग · CPEC के माध्यम से भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होता है · भारत के पडोसी देशों में चीन अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहा है जिससे भारत के समक्ष कूटनीतिक चुनौती मिलती है · POK में CPEC के विकास के कारण भारत की संप्रभुता का हनन होता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में पाकिस्तान की संप्रभुता को मान्यता देता है · चीन द्वारा इस क्षेत्र में किया जाने वाला अवसंरचनात्मक विकास भारत के समक्ष सुरक्षा चिंताएं उत्पन्न करता है क्योंकि इससे पाकिस्तान की सेना की गतिशीलता आसान हो जायेगी · भारत की समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से ग्वादर एक बड़ी चिंता है क्योंकि भविष्य में इसका सैन्यीकरण किया जा सकता है अपेक्षित रणनीति · भारत एवं चीन के मध्य शक्ति अंतराल को भरने के लिए भारत को तीव्र आर्थिक विकास के पथ पर चलाना होगा · पाकिस्तान एवं चीन को कूटनीतिक मामलों में अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, दोनों देशों के मध्य एक धुरी निर्मित हुई है अतः भारत की सामरिक नीति में दोनों देशों को एक इकाई के तौर पर देखा जाना चाहिए · चीन की नीतियों से पीड़ित देशों के साथ भारत को अपने सम्बन्ध निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए · चीन के आर्थिक शोषण एवं आक्रामक नीतितियों का प्रतिसंतुलन करने के लिए विश्व की ऐसी बड़ी शक्तियों के साथ निरन्तर सहयोग बढ़ाना चाहिए जिनके हित चीन के हितों से टकराते हैं · अतः भारत को हार्ड एवं सॉफ्ट पॉवर कूटनीति के समन्वय के माध्यम से स्मार्ट पॉवर डिप्लोमेसी अपनानी चाहिए वैदेशिक सम्बन्ध के कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत को CPEC एवं BCIM की सदस्यता ले लेनी चाहिए| इससे भारत एवं चीन के मध्य सहयोग के नए आयाम खुलेंगे जैसे अफगानिस्तान तक भारत कि पहुँच आसान होगी, यदि CPEC का विस्तार भारत में भी होता है तो भारत के सीमावर्ती राज्यों का विकास हो सकता है| जम्मू कश्मीर के युवाओं में यह भावना की भारत CPEC को स्वीकार नहीं कर रहा है अतः वह JK का विकास नहीं करना चाहता, CPEC में सदस्यता ऐसी विचारधारा पर रोक लगा सकती है| इससे पाकिस्तान-चीन धुरी को प्रतिसंतुलित करने में सहायता मिलेगी यद्यपि कि भारत ने अभी तक संप्रभुता के प्रश्न पर अपना सहयोग रोक रखा है|
| 45,845
|
ब्रिटिश शासन काल में पारंपरिक उद्योगों के पतन के कारणों एवं आर्थिक परिणामों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) In British rule, briefly describe the causes and economic consequences of the decline of traditional industries. (150-200 words)
|
एप्रोच - भूमिका में पारंपरिक उद्योगों के बारे में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद इन उद्योगों के पतन के कारणों के बताइए | अंत में इनके पतन से उत्पन्न आर्थिक परिणामों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- ब्रिटिश शासन काल के प्रारंभ में भारत के शहरी क्षेत्रों में कपड़ा ,हथियार आभूषण ,लकड़ी इत्यादि उद्योग थे , जिसका उद्देश्य व्यापार करना था ,जबकि गाँव में उपस्थित उद्योगों का उद्देश्य गाँव के निवासियों की ज़रूरतों को पूरा करना था | भारत के पारंपरिक उद्योगों का निम्नलिखित कारणों से पतन हुआ - ब्रिटिश अधिकारी अपने मुनाफे के लिए कारीगरों को परेशान करते थे | उनसे बहुत कम पैसों पर श्रम कराते थे | बाद में बुनकरों, हस्तशिल्पों ने अपने प्रारंभिक कार्यों को छोड़ दिया| एकतरफ़ा मुक्त व्यापार - ब्रिटेन में भारतीय वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक कर लगा दिया गया जबकि भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर कर नगण्य था | मुक्त व्यापार नीति - ब्रिटेन में निर्मित कुछ वस्तुएं जैसे सूती कपड़ा आदि भारत की तुलना में अधिक सस्ते तथा अधिक गुणवत्तायुक्त थे अतः लोगों का रुझान उन पर अधिक हो गया | अंतर्देशीय सीमा शुल्क - भारत में एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाने वाली वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगा दिया जाता था जिनसे वे वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाती थीं | रेलवे की भूमिका - रेलवे व परिवहन के उन्नत साधनों के विकास के कारण ब्रिटिश वस्तुओं की पहुँच दूर के क्षेत्रों और गांवों तक हो गयी | गाँव के लोग भी कम कीमतों के कारण उन्हें प्राथमिकता देने लगे | आर्थिक परिणाम - भारत का प्रारंभिक औद्योगिक ढांचा चरमरा गया तथा इनके पुनरुत्थान में बहुत अधिक समय लगा | पुराने व्यापारिक शहर जैसे सूरत , मुर्शिदाबाद , ढाका , आदि का पतन हुआ | श्रमिक बेरोजगार हो गए और वे कम आय पर भी काम करने को तैयार हो गए | रोजगार के आभाव में श्रमिकों का गावों की ओर पलायन हुआ | गावों की जनसँख्या बढ़ने पर कृषि पर जनसँख्या का भार पड़ने लगा | भूमि के उपविभाजन के द्वारा भूमि की उत्पादकता में कमी हुई | अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ध्यान में रखकर कृषि की गयी | तैयार माल के स्थान पर कच्चे माल को प्राथमिकता दी गयी | कुल मिलकर हम यह कह सकते हैं कि ब्रिटिश वस्तुओं को भारत में बेचने के उद्देश्य से यहाँ के पारंपरिक उद्योगों का पतन किया गया और ब्रिटिश उद्योगों को ध्यान में रखकर भारत की अर्थव्यवस्था संचालित की गयी | यह मुख्यत: ब्रिटिश औद्योगिक नीति का परिणाम था |
|
##Question:ब्रिटिश शासन काल में पारंपरिक उद्योगों के पतन के कारणों एवं आर्थिक परिणामों का संछिप्त वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) In British rule, briefly describe the causes and economic consequences of the decline of traditional industries. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में पारंपरिक उद्योगों के बारे में बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद इन उद्योगों के पतन के कारणों के बताइए | अंत में इनके पतन से उत्पन्न आर्थिक परिणामों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- ब्रिटिश शासन काल के प्रारंभ में भारत के शहरी क्षेत्रों में कपड़ा ,हथियार आभूषण ,लकड़ी इत्यादि उद्योग थे , जिसका उद्देश्य व्यापार करना था ,जबकि गाँव में उपस्थित उद्योगों का उद्देश्य गाँव के निवासियों की ज़रूरतों को पूरा करना था | भारत के पारंपरिक उद्योगों का निम्नलिखित कारणों से पतन हुआ - ब्रिटिश अधिकारी अपने मुनाफे के लिए कारीगरों को परेशान करते थे | उनसे बहुत कम पैसों पर श्रम कराते थे | बाद में बुनकरों, हस्तशिल्पों ने अपने प्रारंभिक कार्यों को छोड़ दिया| एकतरफ़ा मुक्त व्यापार - ब्रिटेन में भारतीय वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक कर लगा दिया गया जबकि भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर कर नगण्य था | मुक्त व्यापार नीति - ब्रिटेन में निर्मित कुछ वस्तुएं जैसे सूती कपड़ा आदि भारत की तुलना में अधिक सस्ते तथा अधिक गुणवत्तायुक्त थे अतः लोगों का रुझान उन पर अधिक हो गया | अंतर्देशीय सीमा शुल्क - भारत में एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाने वाली वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगा दिया जाता था जिनसे वे वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाती थीं | रेलवे की भूमिका - रेलवे व परिवहन के उन्नत साधनों के विकास के कारण ब्रिटिश वस्तुओं की पहुँच दूर के क्षेत्रों और गांवों तक हो गयी | गाँव के लोग भी कम कीमतों के कारण उन्हें प्राथमिकता देने लगे | आर्थिक परिणाम - भारत का प्रारंभिक औद्योगिक ढांचा चरमरा गया तथा इनके पुनरुत्थान में बहुत अधिक समय लगा | पुराने व्यापारिक शहर जैसे सूरत , मुर्शिदाबाद , ढाका , आदि का पतन हुआ | श्रमिक बेरोजगार हो गए और वे कम आय पर भी काम करने को तैयार हो गए | रोजगार के आभाव में श्रमिकों का गावों की ओर पलायन हुआ | गावों की जनसँख्या बढ़ने पर कृषि पर जनसँख्या का भार पड़ने लगा | भूमि के उपविभाजन के द्वारा भूमि की उत्पादकता में कमी हुई | अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को ध्यान में रखकर कृषि की गयी | तैयार माल के स्थान पर कच्चे माल को प्राथमिकता दी गयी | कुल मिलकर हम यह कह सकते हैं कि ब्रिटिश वस्तुओं को भारत में बेचने के उद्देश्य से यहाँ के पारंपरिक उद्योगों का पतन किया गया और ब्रिटिश उद्योगों को ध्यान में रखकर भारत की अर्थव्यवस्था संचालित की गयी | यह मुख्यत: ब्रिटिश औद्योगिक नीति का परिणाम था |
| 45,849
|
औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं? क्या कारण था कि सर्वप्रथम ब्रिटेन में ही औद्योगीकरण की शुरुआत हुयी? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you mean by Industrialization? Why did the beginning of industrialization happen in Britain? (150-200 words; 10 Marks)
|
एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में औद्योगीकरण को संक्षिप्तता से बताईए| अगले भाग में, उन कारणों को सूचीबद्ध कीजिए कि क्योंसर्वप्रथम ब्रिटेन में ही औद्योगीकरण की शुरुआत हुयी| निष्कर्षतः ब्रिटिश औद्योगीकरण के परिणामों के बारे में अतिसंक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- औद्योगीकरण मानव के विकास यात्रा में एक नए चरण का प्रतिनिधित्व करता है| औद्योगीकरण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और यह उत्पादन पद्धति में व्यापक बदलाव से जुड़ा हुआ है जैसे- मशीनों के द्वारा उत्पादन, कारखानों में उत्पादन, मशीनों के संचालन के लिए ऊर्जा का प्रयोग इत्यादि| औद्योगीकरण ने आर्थिक जीवन के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को भी व्यापक तौर पर प्रभावित किया था| ब्रिटेन में ही औद्योगीकरण क्यों? कृषि में परिवर्तन(कृषि-क्रांति) - यूरोपीय राष्ट्रों में सर्वप्रथम ब्रिटेन में 18वीं सदी में कृषि के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है जैसे- शस्यावर्तन, बीज बोने का यंत्र, बड़े-बड़े फार्मों पर कृषि, बाड़ाबंदी आंदोलन(सरकारी समर्थन से बड़े जमींदारों द्वारा औने-पौने दामों पर छोटे किसानों से जमीनों को खरीदना) आदि| इन परिवर्तनों के कारण अधिशेष उत्पादन हुआ तथा जनसँख्या में वृद्धि हुयी तथा गैर-कृषि कार्यों में संलग्न लोगों को भोजन उपलब्ध हो पाया| साथ ही, श्रमिकों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हुयी थी| जनसँख्या वृद्धि- खाद्यानों की उपलब्धता, चिकित्सा क्षेत्र में सुधार इत्यादि कारणों से ब्रिटिश जनसँख्या में तीव्र वृद्धि देखी गयी जैसे- 1750 से 1800 के बीच पश्चिम यूरोप के बीस शहरों की आबादी दोगुनी हुई उसमें 11 शहर ब्रिटेन के थें| जनसँख्या वृद्धि के कारण मांग भी बढ़ी और श्रमिकों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो पायी| व्यापारिक क्रांति का प्रभाव - 16वीं से 18वीं सदी का युग व्यापारिक क्रांति के कारण भी महत्व रखता है| व्यापारिक क्रांति का लाभ लगभग सभी पश्चिमी यूरोपीय देशों को हुआ लेकिन 18वीं सदी के मध्य तक ब्रिटेन की स्थिति सर्वश्रेष्ठ थी| इससे उ द्योगों में निवेश के लिए पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित हुयी तथा बाजार एवं कच्चे माल के लिए उपनिवेश की भी उपलब्धता सुनिश्चित हो पायी| परिवहन के क्षेत्र में परिवर्तन - 18वीं सदी के अंत तक ब्रिटेन उन्नत परिवहन के मामलों में भी अन्य यूरोपीय देशों से आगे था जैसे- 1800 ई. तक सभी प्रमुख शहरों को नहरों से जोड़ दिया गया एवं लगभग 4000 मील नहरों का निर्माण हुआ था| इसी प्रकार मैकडेन के द्वारा पक्की सड़कों के निर्माण की शुरुआत तथा 1820 के दशक में व्यावसायिक तौर पर रेलवे के संचालन ने भी परिवहन में क्रांतिकारी बदलाव कियें| उन्नत परिवहन के कारण राष्ट्रीय बाजार का निर्माण हुआ, आयात-निर्यात सुगम हुआ तथा आधारभूत उद्योगों का विकास भी| राजनीतिक कारण- यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में ब्रिटेन राजनीतिक रूप से ज्यादा स्थिर था जैसे- 1688 की रक्तहीन क्रांति के पश्चात ब्रिटेन में अपेक्षाकृत स्थिर व्यवस्था थी तो दूसरी तरफ फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात या अन्य कारणों से भी यूरोपीय राष्ट्र संघर्षरत व अस्थिर थें| राजनीतिक अस्थिरता आर्थिक विकास एवं निवेश के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करती है| सरकार ने क्रेता के रूप में भी औद्योगिक प्रक्रियायों को समर्थन दिया तथा औद्योगीकरण के अनुकूल नीतियों का भी निर्माण किया जैसे- ब्रिटेन में एक प्रकार की मुद्रा, कानून, भाषा इत्यादि का विकास| इसी के साथ-साथ अहस्तक्षेप की नीति, मुक्त व्यापार की नीति, उपनिवेशों की स्थापना, उपनिवेशों के लिए युद्ध इत्यादि कारकों के द्वारा भी राज्य ने औद्योगिक प्रक्रियायों को समर्थन दिया| सामाजिक कारण- ब्रिटिश समाज में लोचशीलता, प्रगतिशीलता, समन्वयकारी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक शिक्षा को महत्व इत्यादि विशेषताएं थी| इससे समकालीन समाज में ब्रिटेन को एक अलग स्थान प्राप्त था जैसे- राजतंत्र से लोकतंत्र की ओर संक्रमण अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, 1750 से 1800 के बीच हजारों नए अनुसंधान किए गए यहाँ तक कि अभिजात्य वर्ग ने भी उद्योगों में पैसे निवेश किए इत्यादि| अन्य आर्थिक कारण- लोहे एवं कोयले की उपलब्धता; नदियों का नौगम्य होना; विकसित बैंकिंग ढाँचा जैसे- 1800 ई. तक लगभग 300 क्षेत्रीय बैंक आदि के फलस्वरूप भी ब्रिटेन की स्थिति अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के मुकाबले ज्यादा बेहतर थी| तकनीकी विकास के मामले में भी ब्रिटेन अग्रणी राष्ट्र था| ब्रिटेन के डर्बी परिवार ने लोहे को मनचाहा आकार देने के तकनीक का विकास किया तो मैकडेन ने पक्की सड़कों का वहीँ जेम्स वाट ने ईंजन का| कपड़े के क्षेत्र में भी कई नई मशीनों का आविष्कार हुआ जैसे- वाटरफ्रेम, पॉवरलूम, स्पिनिंग जेनी आदि| उपरोक्त कारणों की वजह से ब्रिटेन की स्थिति अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के मुकाबले औद्योगिक क्रांति हेतु ज्यादा अनुकूल थी| ब्रिटेन में इस औद्योगिक क्रांति की वजह से आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र पर व्यापक सकारात्मक प्रभाव पड़ा वहीँ इससे ब्रिटेन के सामाजिक क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए|
|
##Question:औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं? क्या कारण था कि सर्वप्रथम ब्रिटेन में ही औद्योगीकरण की शुरुआत हुयी? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you mean by Industrialization? Why did the beginning of industrialization happen in Britain? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में औद्योगीकरण को संक्षिप्तता से बताईए| अगले भाग में, उन कारणों को सूचीबद्ध कीजिए कि क्योंसर्वप्रथम ब्रिटेन में ही औद्योगीकरण की शुरुआत हुयी| निष्कर्षतः ब्रिटिश औद्योगीकरण के परिणामों के बारे में अतिसंक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- औद्योगीकरण मानव के विकास यात्रा में एक नए चरण का प्रतिनिधित्व करता है| औद्योगीकरण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और यह उत्पादन पद्धति में व्यापक बदलाव से जुड़ा हुआ है जैसे- मशीनों के द्वारा उत्पादन, कारखानों में उत्पादन, मशीनों के संचालन के लिए ऊर्जा का प्रयोग इत्यादि| औद्योगीकरण ने आर्थिक जीवन के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को भी व्यापक तौर पर प्रभावित किया था| ब्रिटेन में ही औद्योगीकरण क्यों? कृषि में परिवर्तन(कृषि-क्रांति) - यूरोपीय राष्ट्रों में सर्वप्रथम ब्रिटेन में 18वीं सदी में कृषि के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है जैसे- शस्यावर्तन, बीज बोने का यंत्र, बड़े-बड़े फार्मों पर कृषि, बाड़ाबंदी आंदोलन(सरकारी समर्थन से बड़े जमींदारों द्वारा औने-पौने दामों पर छोटे किसानों से जमीनों को खरीदना) आदि| इन परिवर्तनों के कारण अधिशेष उत्पादन हुआ तथा जनसँख्या में वृद्धि हुयी तथा गैर-कृषि कार्यों में संलग्न लोगों को भोजन उपलब्ध हो पाया| साथ ही, श्रमिकों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हुयी थी| जनसँख्या वृद्धि- खाद्यानों की उपलब्धता, चिकित्सा क्षेत्र में सुधार इत्यादि कारणों से ब्रिटिश जनसँख्या में तीव्र वृद्धि देखी गयी जैसे- 1750 से 1800 के बीच पश्चिम यूरोप के बीस शहरों की आबादी दोगुनी हुई उसमें 11 शहर ब्रिटेन के थें| जनसँख्या वृद्धि के कारण मांग भी बढ़ी और श्रमिकों की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो पायी| व्यापारिक क्रांति का प्रभाव - 16वीं से 18वीं सदी का युग व्यापारिक क्रांति के कारण भी महत्व रखता है| व्यापारिक क्रांति का लाभ लगभग सभी पश्चिमी यूरोपीय देशों को हुआ लेकिन 18वीं सदी के मध्य तक ब्रिटेन की स्थिति सर्वश्रेष्ठ थी| इससे उ द्योगों में निवेश के लिए पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित हुयी तथा बाजार एवं कच्चे माल के लिए उपनिवेश की भी उपलब्धता सुनिश्चित हो पायी| परिवहन के क्षेत्र में परिवर्तन - 18वीं सदी के अंत तक ब्रिटेन उन्नत परिवहन के मामलों में भी अन्य यूरोपीय देशों से आगे था जैसे- 1800 ई. तक सभी प्रमुख शहरों को नहरों से जोड़ दिया गया एवं लगभग 4000 मील नहरों का निर्माण हुआ था| इसी प्रकार मैकडेन के द्वारा पक्की सड़कों के निर्माण की शुरुआत तथा 1820 के दशक में व्यावसायिक तौर पर रेलवे के संचालन ने भी परिवहन में क्रांतिकारी बदलाव कियें| उन्नत परिवहन के कारण राष्ट्रीय बाजार का निर्माण हुआ, आयात-निर्यात सुगम हुआ तथा आधारभूत उद्योगों का विकास भी| राजनीतिक कारण- यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में ब्रिटेन राजनीतिक रूप से ज्यादा स्थिर था जैसे- 1688 की रक्तहीन क्रांति के पश्चात ब्रिटेन में अपेक्षाकृत स्थिर व्यवस्था थी तो दूसरी तरफ फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात या अन्य कारणों से भी यूरोपीय राष्ट्र संघर्षरत व अस्थिर थें| राजनीतिक अस्थिरता आर्थिक विकास एवं निवेश के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करती है| सरकार ने क्रेता के रूप में भी औद्योगिक प्रक्रियायों को समर्थन दिया तथा औद्योगीकरण के अनुकूल नीतियों का भी निर्माण किया जैसे- ब्रिटेन में एक प्रकार की मुद्रा, कानून, भाषा इत्यादि का विकास| इसी के साथ-साथ अहस्तक्षेप की नीति, मुक्त व्यापार की नीति, उपनिवेशों की स्थापना, उपनिवेशों के लिए युद्ध इत्यादि कारकों के द्वारा भी राज्य ने औद्योगिक प्रक्रियायों को समर्थन दिया| सामाजिक कारण- ब्रिटिश समाज में लोचशीलता, प्रगतिशीलता, समन्वयकारी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक शिक्षा को महत्व इत्यादि विशेषताएं थी| इससे समकालीन समाज में ब्रिटेन को एक अलग स्थान प्राप्त था जैसे- राजतंत्र से लोकतंत्र की ओर संक्रमण अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, 1750 से 1800 के बीच हजारों नए अनुसंधान किए गए यहाँ तक कि अभिजात्य वर्ग ने भी उद्योगों में पैसे निवेश किए इत्यादि| अन्य आर्थिक कारण- लोहे एवं कोयले की उपलब्धता; नदियों का नौगम्य होना; विकसित बैंकिंग ढाँचा जैसे- 1800 ई. तक लगभग 300 क्षेत्रीय बैंक आदि के फलस्वरूप भी ब्रिटेन की स्थिति अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के मुकाबले ज्यादा बेहतर थी| तकनीकी विकास के मामले में भी ब्रिटेन अग्रणी राष्ट्र था| ब्रिटेन के डर्बी परिवार ने लोहे को मनचाहा आकार देने के तकनीक का विकास किया तो मैकडेन ने पक्की सड़कों का वहीँ जेम्स वाट ने ईंजन का| कपड़े के क्षेत्र में भी कई नई मशीनों का आविष्कार हुआ जैसे- वाटरफ्रेम, पॉवरलूम, स्पिनिंग जेनी आदि| उपरोक्त कारणों की वजह से ब्रिटेन की स्थिति अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के मुकाबले औद्योगिक क्रांति हेतु ज्यादा अनुकूल थी| ब्रिटेन में इस औद्योगिक क्रांति की वजह से आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र पर व्यापक सकारात्मक प्रभाव पड़ा वहीँ इससे ब्रिटेन के सामाजिक क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए|
| 45,851
|
चीन पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के क्षेत्रों की चर्चा कीजिए। साथ ही समझाइए कि भारत के लिए इस बढ़ते सहयोग के क्या निहितार्थ हैं? (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss areas of growing cooperation between China and Pakistan. Also, explain what are the implications of this growing cooperation for India? (150-200 words, 10 marks)
|
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में चीन और पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के हाल ही के किसी उदाहरण का उल्लेख कर संदर्भ कोस्पष्ट कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में चीन एवं पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के क्षेत्रों की चर्चा कीजिए। और साथ हीसमझाइए कि भारत के लिए इस बढ़ते सहयोग के क्या निहितार्थ हैं? अंत में आगे की राह को सुझाते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- कई बार मसूद अजहर के खिलाफ चीन के समर्थन के कारणयूएनएससी में प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।चीन कईमौकों पर प्रस्ताव पर अपनी आपत्ति दर्ज कराकर इन्हें खारिज करा चुका। यह इनदोनों देशों के मध्य भारत के विरुद्ध एक होकर कार्य करने की रणनीति को दर्शाता है। हालाँकि बाद में भारत की सफल कूटनीतिक रणनीति के चलतेचीन द्वारा समर्थन किया गया। चीन पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के क्षेत्र:- UNSC में मसूद अज़हर के खिलाफ प्रस्ताव के सम्बन्ध मेंदोनों देशों का सहयोग देखने को मिलाऔर भारत केNSG की सदस्य्ता हासिल करने में भी चीन, पाकिस्तान को एक प्रॉक्सी की तरह इस्तेमाल करता है। अवसरंचना के क्षेत्र में भी दोनों देशों के मध्य सहयोग देखने को मिल रहा है।CPEC और मोतियों की माला प्रोजेक्ट भारत को चारों तरफ से घेरे की रणनीति के आयाम के ही हिस्से हैं। आतंकवाद से संबंधित पहलुओं पर भी दोनों देश एक जैसे दिखाई पड़ते हैं जैसे; अफगानिस्तान की शांति वार्ता को लेकर दोनों देशों का एक जैसा दृष्टिकोण एवं तालिबान को समर्थनइत्यादि। दोनों देशों के मध्यमिलिट्री सहयोग भी देखने को मिलता है। चीन पाकिस्तान को कई उन्नत दर्जे के हथियार प्रदान कर रहा है और CPEC की सुरक्षा को लेकर रणनीतिक साझेदारी भी दिखाई पड़ती है इत्यादि। इस बढ़ते सहयोग के भारत के लिए निहितार्थ:- भू-राजनैतिक चुनौती:- दोनों देशों के बढ़तेसहयोग सेपाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा मिलेगा तथाCPEC प्रोजेक्ट POK क्षेत्र से गुजरने के कारण भारत की सम्प्रभुता को प्रत्यक्ष रूप से चुनौती दे रहा है।ग्वादर पोर्ट भारत कोसुरक्षात्मक एवं रणनीतिक चुनौती पेश कर रहा है। ऊर्जा सुरक्षा चुनौती:- भारत अपनी ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा गल्फ देशों से प्राप्त करता है।और हिन्द महासागर में ग्वादर पोर्टतथा जिबूती में चीन नियंत्रण, भारत के समक्ष ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित चुनौती पेश कर रहे हैं। यदि महत्वपूर्ण चॉक पॉइंट्स के आस पास चीन एवं पाकिस्तान का प्रभाव रहता है तो यह भारत के साथ अशांति की स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती पेश कर सकता है। अफगानिस्तान की शांति रणनीति में चीन का बढ़ता महत्व एवं भारत एक मज़बूत स्टेकहोल्डर होने के बावजूद इसे शांति वार्ता से अलग थलग करना,भारत में अफगानिस्तान के निवेश एवं आतंकवाद के पहलुओं से सम्बंधित चुनौती बनेगा। दक्षिण एशिया के देशों में चीन का बढ़ता प्रभाव जिससे चीन भारत को अलग थलग करने की रणनीति बना रहा है। चीन भविष्य में भारत तनाव की स्थिति मेंपाकिस्तान का इस्तेमाल भी कर सकता है। आगे की राह(वे फॉरवर्ड):- भारत को अपनी आर्थिक एवं सुरक्षा से संबंधित क्षमता का विकास करना चाहिए। चीन और पकिस्तान की रणनीति को अलग अलग करके नहीं देखना चाहिए; भारत को इन दोनों को एक मानकर रणनीति बनानी चाहिए। चीन पाकिस्तान से संबंधित एक जैसी चिंता रखने वाले राष्ट्रों को एक साथ QUAD जैसे एक मंच पर आना चाहिए और और इस धुरी को प्रतिसंतुलित करना चाहिए। चीन के साथ द्विपक्षीय स्तर पर सहयोग को जारी रखना चाहिए। भारत एक पड़ोसी के रूप मेंएक बिग ब्रदर की भूमिका में है लेकिन कई बार नेपाल, श्रीलंका, मालद्वीव जैसे पड़ौसी देशों का चीन के प्रति झुकाव देखा गया है।इसलिएभारत को अपनेपड़ौसी देशों के साथ रणनीति में बदलाव की भी आवश्यकता है।
|
##Question:चीन पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के क्षेत्रों की चर्चा कीजिए। साथ ही समझाइए कि भारत के लिए इस बढ़ते सहयोग के क्या निहितार्थ हैं? (150-200 शब्द, 10 अंक) Discuss areas of growing cooperation between China and Pakistan. Also, explain what are the implications of this growing cooperation for India? (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में चीन और पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के हाल ही के किसी उदाहरण का उल्लेख कर संदर्भ कोस्पष्ट कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में चीन एवं पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के क्षेत्रों की चर्चा कीजिए। और साथ हीसमझाइए कि भारत के लिए इस बढ़ते सहयोग के क्या निहितार्थ हैं? अंत में आगे की राह को सुझाते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- कई बार मसूद अजहर के खिलाफ चीन के समर्थन के कारणयूएनएससी में प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।चीन कईमौकों पर प्रस्ताव पर अपनी आपत्ति दर्ज कराकर इन्हें खारिज करा चुका। यह इनदोनों देशों के मध्य भारत के विरुद्ध एक होकर कार्य करने की रणनीति को दर्शाता है। हालाँकि बाद में भारत की सफल कूटनीतिक रणनीति के चलतेचीन द्वारा समर्थन किया गया। चीन पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के क्षेत्र:- UNSC में मसूद अज़हर के खिलाफ प्रस्ताव के सम्बन्ध मेंदोनों देशों का सहयोग देखने को मिलाऔर भारत केNSG की सदस्य्ता हासिल करने में भी चीन, पाकिस्तान को एक प्रॉक्सी की तरह इस्तेमाल करता है। अवसरंचना के क्षेत्र में भी दोनों देशों के मध्य सहयोग देखने को मिल रहा है।CPEC और मोतियों की माला प्रोजेक्ट भारत को चारों तरफ से घेरे की रणनीति के आयाम के ही हिस्से हैं। आतंकवाद से संबंधित पहलुओं पर भी दोनों देश एक जैसे दिखाई पड़ते हैं जैसे; अफगानिस्तान की शांति वार्ता को लेकर दोनों देशों का एक जैसा दृष्टिकोण एवं तालिबान को समर्थनइत्यादि। दोनों देशों के मध्यमिलिट्री सहयोग भी देखने को मिलता है। चीन पाकिस्तान को कई उन्नत दर्जे के हथियार प्रदान कर रहा है और CPEC की सुरक्षा को लेकर रणनीतिक साझेदारी भी दिखाई पड़ती है इत्यादि। इस बढ़ते सहयोग के भारत के लिए निहितार्थ:- भू-राजनैतिक चुनौती:- दोनों देशों के बढ़तेसहयोग सेपाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा मिलेगा तथाCPEC प्रोजेक्ट POK क्षेत्र से गुजरने के कारण भारत की सम्प्रभुता को प्रत्यक्ष रूप से चुनौती दे रहा है।ग्वादर पोर्ट भारत कोसुरक्षात्मक एवं रणनीतिक चुनौती पेश कर रहा है। ऊर्जा सुरक्षा चुनौती:- भारत अपनी ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा गल्फ देशों से प्राप्त करता है।और हिन्द महासागर में ग्वादर पोर्टतथा जिबूती में चीन नियंत्रण, भारत के समक्ष ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित चुनौती पेश कर रहे हैं। यदि महत्वपूर्ण चॉक पॉइंट्स के आस पास चीन एवं पाकिस्तान का प्रभाव रहता है तो यह भारत के साथ अशांति की स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती पेश कर सकता है। अफगानिस्तान की शांति रणनीति में चीन का बढ़ता महत्व एवं भारत एक मज़बूत स्टेकहोल्डर होने के बावजूद इसे शांति वार्ता से अलग थलग करना,भारत में अफगानिस्तान के निवेश एवं आतंकवाद के पहलुओं से सम्बंधित चुनौती बनेगा। दक्षिण एशिया के देशों में चीन का बढ़ता प्रभाव जिससे चीन भारत को अलग थलग करने की रणनीति बना रहा है। चीन भविष्य में भारत तनाव की स्थिति मेंपाकिस्तान का इस्तेमाल भी कर सकता है। आगे की राह(वे फॉरवर्ड):- भारत को अपनी आर्थिक एवं सुरक्षा से संबंधित क्षमता का विकास करना चाहिए। चीन और पकिस्तान की रणनीति को अलग अलग करके नहीं देखना चाहिए; भारत को इन दोनों को एक मानकर रणनीति बनानी चाहिए। चीन पाकिस्तान से संबंधित एक जैसी चिंता रखने वाले राष्ट्रों को एक साथ QUAD जैसे एक मंच पर आना चाहिए और और इस धुरी को प्रतिसंतुलित करना चाहिए। चीन के साथ द्विपक्षीय स्तर पर सहयोग को जारी रखना चाहिए। भारत एक पड़ोसी के रूप मेंएक बिग ब्रदर की भूमिका में है लेकिन कई बार नेपाल, श्रीलंका, मालद्वीव जैसे पड़ौसी देशों का चीन के प्रति झुकाव देखा गया है।इसलिएभारत को अपनेपड़ौसी देशों के साथ रणनीति में बदलाव की भी आवश्यकता है।
| 45,857
|
Write a short note on MIGA. ( 150 Words/10 marks)
|
BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - ABOUT MIGA - CONCLUSION ANSWER: MIGA stands for the Multilateral Investment Guarantee Agency. It is one of the agencies of the World Bank. The other institutions which form a part of the World Bank are IBRD (International Bank for Reconstruction and Development], IDA [International Development Association], IFC [International Finance Corporation] and ICSID [International Centre for Settlement of Investment Disputes] ABOUT MIGA 1) ESTABLISHMENT It was established in 1988. 2) OBJECTIVE The main objective is to provide a guarantee of investment to the foreign investors operating in a country against non-commercial risks and losses i.e. loss and damage to foreign investors, plant and machinery, property, say due to terrorist attacks, communal violence and such other risks. 3) INDIA AS A MEMBER India became a member of MIGA in 1994 so that it could give confidence to foreign investors about their security if they faced losses due to non-commercial issues. 4) INSURANCE COVERAGE MIGA offers insurance cover for 5 types of non-commercial risks: (i) Currency inconvertibility and transfer restriction (ii) Government expropriation (iii) War, terrorism and civil disturbance (iv) Breach of contract (v) Non-honoring of financial obligations 5) MEMBER COUNTRIES MIGA is owned by its 181 member governments consisting of 156 developing and 25 industrialized countries. The members are composed of 180 UN members plus 1 Republic of Kosovo. 5.1) Membership in MIGA is only available to countries which are members of the World Bank, particularly IBRD [International Bank for Reconstruction and Development] MIGA mainly wants to increase investments at a global level. However, insurance cover is only provided when both countries are part of MIGA. Therefore, MIGA only works for member countries.
|
##Question:Write a short note on MIGA. ( 150 Words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - ABOUT MIGA - CONCLUSION ANSWER: MIGA stands for the Multilateral Investment Guarantee Agency. It is one of the agencies of the World Bank. The other institutions which form a part of the World Bank are IBRD (International Bank for Reconstruction and Development], IDA [International Development Association], IFC [International Finance Corporation] and ICSID [International Centre for Settlement of Investment Disputes] ABOUT MIGA 1) ESTABLISHMENT It was established in 1988. 2) OBJECTIVE The main objective is to provide a guarantee of investment to the foreign investors operating in a country against non-commercial risks and losses i.e. loss and damage to foreign investors, plant and machinery, property, say due to terrorist attacks, communal violence and such other risks. 3) INDIA AS A MEMBER India became a member of MIGA in 1994 so that it could give confidence to foreign investors about their security if they faced losses due to non-commercial issues. 4) INSURANCE COVERAGE MIGA offers insurance cover for 5 types of non-commercial risks: (i) Currency inconvertibility and transfer restriction (ii) Government expropriation (iii) War, terrorism and civil disturbance (iv) Breach of contract (v) Non-honoring of financial obligations 5) MEMBER COUNTRIES MIGA is owned by its 181 member governments consisting of 156 developing and 25 industrialized countries. The members are composed of 180 UN members plus 1 Republic of Kosovo. 5.1) Membership in MIGA is only available to countries which are members of the World Bank, particularly IBRD [International Bank for Reconstruction and Development] MIGA mainly wants to increase investments at a global level. However, insurance cover is only provided when both countries are part of MIGA. Therefore, MIGA only works for member countries.
| 45,867
|
चीन के वन बेल्ट वन रूट (OBOR) पहल का आशय स्पष्ट कीजिये| क्या आपको लगता है कि भारत को इसकी सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए ? अपने दृष्टिकोण के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कीजिये | (10 अंक;150 से 200 शब्द) Explain the China"s One Belt One Root (OBOR) initiative. Do you think India should join its membership? Give arguments in support of your point of view. (10marks;150 to 200 words)
|
दृष्टिकोण 1-भूमिका में OBOR की पृष्ठभूमि के रूप में मोतियों की मालाअवधारणा को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में OBOR के बारे में सूचनाएं दीजिये 3- दुसरे भाग में सदस्यता लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे भाग में सदस्यता न लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति और की गयी पहलों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, यह एक अपेक्षाकृत पुरानी चीनी सैन्य अवधारणा है, यह भारत को हिंदमहासागर के माध्यम से घेरने की नीति मानी जाती है| इसके अंतर्गत चिट्गोंग, कोको, हमबनटोटा, मराओ एवं ग्वादर में चीन अपने अड्डों का निर्माण कर रहा है| भारतीय एवं वैश्विक मनः स्थिति को देखते हुए 2013 में चीन ने इसका नाम बदला और विश्व को सन्देश देने का प्रयास किया कि यह गतिविधि व्यापार के विस्तार से सम्बन्धित है| वर्ष 2014 में कुछ वैश्विक गतिविधियों के कारण चीन ने वन बेल्ट वन रोड(OBOR) की अवधारणा प्रस्तुत की है| यह वस्तुतः मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का एक संशोधित रूप है| वन बेल्ट वन रोड OBOR · इसके अंतर्गत चीन, भू आधारित शिल्क रूट और समुद्री शिल्क रूट के माध्यम से अफ्रीका, यूरोप एवं एशिया में विकास करने का दावा करता है · इसके अंतर्गत चीन एशिया, अफ्रीका एवं यूरोप को समुद्री एवं स्थलीय मार्ग से जोड़ने के लिए मार्गों के विकास का व्यापक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है · चीन, इसके माध्यम से बहुध्रुवीय विश्व की स्थापना का दावा करता है OBOR पहल के निहितार्थ · दक्षिण पूर्वी एशिया, दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों को देखते हुए 2012 में अमेरिका द्वारा इंडो पैसिफिक रणनीति प्रस्तुत की गयी और घोषित किया गया कि प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी| · इसके माध्यम से दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के क्षेत्र में बढ़ते अमेरिकी प्रभाव को देखते हुए चीन को यह स्पष्ट हो गया कि भविष्व में इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम होगा|अतः चीन ने दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के स्थान पर पश्चिम की ओर के लिए अपनी रणनीति के रूप में OBOR को प्रस्तुत किया · पश्चिम एशिया में अमेरिका के शत्रु देश है, ऊर्जा सुरक्षा, बड़ा बाजार, पश्चिम एशिया में कम होता अमेरिकी प्रभाव आदि कारकों ने चीन को OBOR के लिए प्रेरित किया है| इसके साथ ही चीन ने OBOR को आगे बढाते हुए आर्कटिक रूट की स्थापना की बात भी की है| · OBOR को वर्ष 2014 में शुरू किया गया इसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आदि देश शामिल नहीं किये गए हैं| · OBOR का कुछ भाग भारत की संप्रभुता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करता है अतः भारत ने भी अभी तक इसकी सदस्यता ग्रहण नहीं की है| OBOR में भारत की सदस्यता के मिश्रित परिणाम प्राप्त होने की संभावना है जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| भारत की सदस्यता के पक्ष में तर्क · OBOR का केवल CPEC हिस्सा ही भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है यदि चीन CPEC परियोजना को खारिज कर दे तो भारत को इसका सदस्य बन सकता है इसके निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं · भारत के विरोध के बाद भी चीन OBOR के विकास को रोका नहीं है और न ही भारत इसको रोक पायेगा अतः भारत को उसका हिस्सा बनना चाहिए और सहयोग प्राप्त करना चाहिए · यह एक व्यापक क्षेत्रीय मंच है, इसमें भारत के अधिकाँश पडोसी शामिल है, यदि भारत इसका सदस्य नहीं बनता है तो इन पडोसी देशों का झुकाव चीन की ओर बढ़ता जाएगा और एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की स्थिति में गिरावट आएगी · भारत की सदस्यता दोनों पक्षों के लिए विन विन होगी, इस क्षेत्र में अवसंरचनात्मक विकास होगा इससे भारत को कनेक्टिविटी मिलेगी, परिवहन का विकास होगा, ब्लू इकॉनमी में लाभ, उर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी · चीन एक मजबूत अर्थव्यवस्था है जिसके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन है भारत को इसका लाभ उठाना चाहिए · SCO के सदस्य देशों में रूस एवं कुछ अन्य सदस्य राष्ट्र यह मानते हैं कि OBOR में चीन के प्रभाव को सीमित रखने के लिए उसमें भारत का होना आवश्यक है · OBOR के माध्यम से भारत को अन्य देशों से जुड़ने का मौक़ा मिलेगा इससे आर्थिक-सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाया जा सकेगा · यह प्राचीन रेशम मार्ग का आधुनिक संस्करण होगा, रेशम मार्ग के माध्यम से भारतीय व्यापार-वाणिज्य एवं संस्कृति(बौद्ध धर्म एवं दर्शन) ने शेष एशिया को प्रभावित किया था, यदि भारत OBOR की सदस्यता ग्रहण करेगा तो भारत, चीन के सांस्कृतिक एकाधिकार को रोकने में सफल हो सकेगा भारत की सदस्यता के विपक्ष में तर्क · भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि: · यह चीन की एकपक्षीय सामरिक परियोजना है दूसरी ओर इसमें पारदर्शिता की कमी है, यह मॉडल एवं स्वयं चीन स्वरूपतः लोकतांत्रिक नहीं हैं, चीन ने इस मॉडल का डिजाईन स्वयं निर्धारित किया है, इस के निर्धारण सदस्यों की भागीदारी नहीं रखी गयी है, अतः भारत को एकपक्षीय विचार को स्वीकार नहीं करना चाहिए · समुद्री शिल्क रूप, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का बदला हुआ नाम है, चीन इसके माध्यम से भारत को घेरने की रणनीति पर चल रहा है, इसके माध्यम से भविष्य में हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो सकता है| इससे भारत के समुद्री सामरिक हित प्रभावित होते हैं, अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए| भारत हमेशा समुद्री क्षेत्र के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर रहा है| · OBOR चीन के पक्ष में झुकी हुई एक व्यापक भू राजनीतिक परियोजना है| इसे एशिया पैसिफिक रणनीति की प्रतिक्रिया माना जाता है| · यदि हम इसके सदस्य बन जाते हैं तो यह एक प्रकार से POK पर पाकिस्तान के अधिकार को मान्यता देना होगा, इससे भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होगा अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए · ग्वादर बन्दरगाह पर भविष्व में पनडुब्बी तैनात की जा सकती है इससे भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न हो सकती है अतः भारत को प्रयास करना चाहिए कि चीन मलक्का मार्ग पर ही निर्भर रहे · OBOR के माध्यम से चीन म्यांमार एवं बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है, इससे उत्तर पूर्वी भारत में अस्थिरता की चुनौती बढ़ेगी अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत को अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| भारत को OBOR को प्रतिसंतुलित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत ने OBOR द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को प्रतिसंतुलित करने के लिए विभिन्न पहले की गयी हैं जैसेप्रोजेक्ट मौसम, सागर माला परियोजना, चाबहार बंदरगाह का विकास, INSTC, कालादान मल्टी मॉडल प्रोजेक्ट का विकास, हिन्द महासागर के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना पर बल जैसे भारत ने मेडागास्कर एवं शेसेल्स में नेवल पोर्ट स्थापित किये है| विभिन्न देशों के साथ भारत ने गठजोड़ स्थापित किये हैं जैसे फ़्रांस, जापान आदि तथा एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर की स्थापना इसके साथ ही 10 वर्ष के बाद क्वाड को 2018 में पुनर्जीवित किया गया है जो OBOR के प्रतिसंतुलन में भारत के लिए सहायक होगा
|
##Question:चीन के वन बेल्ट वन रूट (OBOR) पहल का आशय स्पष्ट कीजिये| क्या आपको लगता है कि भारत को इसकी सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए ? अपने दृष्टिकोण के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कीजिये | (10 अंक;150 से 200 शब्द) Explain the China"s One Belt One Root (OBOR) initiative. Do you think India should join its membership? Give arguments in support of your point of view. (10marks;150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1-भूमिका में OBOR की पृष्ठभूमि के रूप में मोतियों की मालाअवधारणा को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में OBOR के बारे में सूचनाएं दीजिये 3- दुसरे भाग में सदस्यता लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे भाग में सदस्यता न लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति और की गयी पहलों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, यह एक अपेक्षाकृत पुरानी चीनी सैन्य अवधारणा है, यह भारत को हिंदमहासागर के माध्यम से घेरने की नीति मानी जाती है| इसके अंतर्गत चिट्गोंग, कोको, हमबनटोटा, मराओ एवं ग्वादर में चीन अपने अड्डों का निर्माण कर रहा है| भारतीय एवं वैश्विक मनः स्थिति को देखते हुए 2013 में चीन ने इसका नाम बदला और विश्व को सन्देश देने का प्रयास किया कि यह गतिविधि व्यापार के विस्तार से सम्बन्धित है| वर्ष 2014 में कुछ वैश्विक गतिविधियों के कारण चीन ने वन बेल्ट वन रोड(OBOR) की अवधारणा प्रस्तुत की है| यह वस्तुतः मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का एक संशोधित रूप है| वन बेल्ट वन रोड OBOR · इसके अंतर्गत चीन, भू आधारित शिल्क रूट और समुद्री शिल्क रूट के माध्यम से अफ्रीका, यूरोप एवं एशिया में विकास करने का दावा करता है · इसके अंतर्गत चीन एशिया, अफ्रीका एवं यूरोप को समुद्री एवं स्थलीय मार्ग से जोड़ने के लिए मार्गों के विकास का व्यापक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है · चीन, इसके माध्यम से बहुध्रुवीय विश्व की स्थापना का दावा करता है OBOR पहल के निहितार्थ · दक्षिण पूर्वी एशिया, दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों को देखते हुए 2012 में अमेरिका द्वारा इंडो पैसिफिक रणनीति प्रस्तुत की गयी और घोषित किया गया कि प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी| · इसके माध्यम से दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के क्षेत्र में बढ़ते अमेरिकी प्रभाव को देखते हुए चीन को यह स्पष्ट हो गया कि भविष्व में इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम होगा|अतः चीन ने दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के स्थान पर पश्चिम की ओर के लिए अपनी रणनीति के रूप में OBOR को प्रस्तुत किया · पश्चिम एशिया में अमेरिका के शत्रु देश है, ऊर्जा सुरक्षा, बड़ा बाजार, पश्चिम एशिया में कम होता अमेरिकी प्रभाव आदि कारकों ने चीन को OBOR के लिए प्रेरित किया है| इसके साथ ही चीन ने OBOR को आगे बढाते हुए आर्कटिक रूट की स्थापना की बात भी की है| · OBOR को वर्ष 2014 में शुरू किया गया इसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आदि देश शामिल नहीं किये गए हैं| · OBOR का कुछ भाग भारत की संप्रभुता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करता है अतः भारत ने भी अभी तक इसकी सदस्यता ग्रहण नहीं की है| OBOR में भारत की सदस्यता के मिश्रित परिणाम प्राप्त होने की संभावना है जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| भारत की सदस्यता के पक्ष में तर्क · OBOR का केवल CPEC हिस्सा ही भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है यदि चीन CPEC परियोजना को खारिज कर दे तो भारत को इसका सदस्य बन सकता है इसके निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं · भारत के विरोध के बाद भी चीन OBOR के विकास को रोका नहीं है और न ही भारत इसको रोक पायेगा अतः भारत को उसका हिस्सा बनना चाहिए और सहयोग प्राप्त करना चाहिए · यह एक व्यापक क्षेत्रीय मंच है, इसमें भारत के अधिकाँश पडोसी शामिल है, यदि भारत इसका सदस्य नहीं बनता है तो इन पडोसी देशों का झुकाव चीन की ओर बढ़ता जाएगा और एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की स्थिति में गिरावट आएगी · भारत की सदस्यता दोनों पक्षों के लिए विन विन होगी, इस क्षेत्र में अवसंरचनात्मक विकास होगा इससे भारत को कनेक्टिविटी मिलेगी, परिवहन का विकास होगा, ब्लू इकॉनमी में लाभ, उर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी · चीन एक मजबूत अर्थव्यवस्था है जिसके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन है भारत को इसका लाभ उठाना चाहिए · SCO के सदस्य देशों में रूस एवं कुछ अन्य सदस्य राष्ट्र यह मानते हैं कि OBOR में चीन के प्रभाव को सीमित रखने के लिए उसमें भारत का होना आवश्यक है · OBOR के माध्यम से भारत को अन्य देशों से जुड़ने का मौक़ा मिलेगा इससे आर्थिक-सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाया जा सकेगा · यह प्राचीन रेशम मार्ग का आधुनिक संस्करण होगा, रेशम मार्ग के माध्यम से भारतीय व्यापार-वाणिज्य एवं संस्कृति(बौद्ध धर्म एवं दर्शन) ने शेष एशिया को प्रभावित किया था, यदि भारत OBOR की सदस्यता ग्रहण करेगा तो भारत, चीन के सांस्कृतिक एकाधिकार को रोकने में सफल हो सकेगा भारत की सदस्यता के विपक्ष में तर्क · भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि: · यह चीन की एकपक्षीय सामरिक परियोजना है दूसरी ओर इसमें पारदर्शिता की कमी है, यह मॉडल एवं स्वयं चीन स्वरूपतः लोकतांत्रिक नहीं हैं, चीन ने इस मॉडल का डिजाईन स्वयं निर्धारित किया है, इस के निर्धारण सदस्यों की भागीदारी नहीं रखी गयी है, अतः भारत को एकपक्षीय विचार को स्वीकार नहीं करना चाहिए · समुद्री शिल्क रूप, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का बदला हुआ नाम है, चीन इसके माध्यम से भारत को घेरने की रणनीति पर चल रहा है, इसके माध्यम से भविष्य में हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो सकता है| इससे भारत के समुद्री सामरिक हित प्रभावित होते हैं, अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए| भारत हमेशा समुद्री क्षेत्र के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर रहा है| · OBOR चीन के पक्ष में झुकी हुई एक व्यापक भू राजनीतिक परियोजना है| इसे एशिया पैसिफिक रणनीति की प्रतिक्रिया माना जाता है| · यदि हम इसके सदस्य बन जाते हैं तो यह एक प्रकार से POK पर पाकिस्तान के अधिकार को मान्यता देना होगा, इससे भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होगा अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए · ग्वादर बन्दरगाह पर भविष्व में पनडुब्बी तैनात की जा सकती है इससे भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न हो सकती है अतः भारत को प्रयास करना चाहिए कि चीन मलक्का मार्ग पर ही निर्भर रहे · OBOR के माध्यम से चीन म्यांमार एवं बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है, इससे उत्तर पूर्वी भारत में अस्थिरता की चुनौती बढ़ेगी अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत को अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| भारत को OBOR को प्रतिसंतुलित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत ने OBOR द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को प्रतिसंतुलित करने के लिए विभिन्न पहले की गयी हैं जैसेप्रोजेक्ट मौसम, सागर माला परियोजना, चाबहार बंदरगाह का विकास, INSTC, कालादान मल्टी मॉडल प्रोजेक्ट का विकास, हिन्द महासागर के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना पर बल जैसे भारत ने मेडागास्कर एवं शेसेल्स में नेवल पोर्ट स्थापित किये है| विभिन्न देशों के साथ भारत ने गठजोड़ स्थापित किये हैं जैसे फ़्रांस, जापान आदि तथा एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर की स्थापना इसके साथ ही 10 वर्ष के बाद क्वाड को 2018 में पुनर्जीवित किया गया है जो OBOR के प्रतिसंतुलन में भारत के लिए सहायक होगा
| 45,875
|
चीन के वन बेल्ट वन रूट (OBOR) पहल का आशय स्पष्ट कीजिये | क्या भारत को इसकी सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए ? समीक्षा कीजिए | (150 - 200 शब्द/10 अंक) Explain China"s One Belt One Root (OBOR) initiative. Should India accept membership of It ? make an analysis. (150 to 200 words/10 Marks)
|
दृष्टिकोण 1- भूमिका में OBOR की पृष्ठभूमि के रूप में मोतियों की माला अवधारणा को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में OBOR के बारे में सूचनाएं दीजिये 3- दुसरे भाग में सदस्यता लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे भाग में सदस्यता न लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति और की गयी पहलों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, यह एक अपेक्षाकृत पुरानी चीनी सैन्य अवधारणा है, यह भारत को हिंदमहासागर के माध्यम से घेरने की नीति मानी जाती है| इसके अंतर्गत चिट्गोंग, कोको, हमबनटोटा, मराओ एवं ग्वादर में चीन अपने अड्डों का निर्माण कर रहा है| भारतीय एवं वैश्विक मनः स्थिति को देखते हुए 2013 में चीन ने इसका नाम बदला और विश्व को सन्देश देने का प्रयास किया कि यह गतिविधि व्यापार के विस्तार से सम्बन्धित है| वर्ष 2014 में कुछ वैश्विक गतिविधियों के कारण चीन ने वन बेल्ट वन रोड(OBOR) की अवधारणा प्रस्तुत की है| यह वस्तुतः मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का एक संशोधित रूप है| वन बेल्ट वन रोड OBOR · इसके अंतर्गत चीन, भू आधारित शिल्क रूट और समुद्री शिल्क रूट के माध्यम से अफ्रीका, यूरोप एवं एशिया में विकास करने का दावा करता है · इसके अंतर्गत चीन एशिया, अफ्रीका एवं यूरोप को समुद्री एवं स्थलीय मार्ग से जोड़ने के लिए मार्गों के विकास का व्यापक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है · चीन, इसके माध्यम से बहुध्रुवीय विश्व की स्थापना का दावा करता है OBOR पहल के निहितार्थ · दक्षिण पूर्वी एशिया, दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों को देखते हुए 2012 में अमेरिका द्वारा इंडो पैसिफिक रणनीति प्रस्तुत की गयी और घोषित किया गया कि प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी| · इसके माध्यम से दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के क्षेत्र में बढ़ते अमेरिकी प्रभाव को देखते हुए चीन को यह स्पष्ट हो गया कि भविष्व में इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम होगा|अतः चीन ने दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के स्थान पर पश्चिम की ओर के लिए अपनी रणनीति के रूप में OBOR को प्रस्तुत किया · पश्चिम एशिया में अमेरिका के शत्रु देश है, ऊर्जा सुरक्षा, बड़ा बाजार, पश्चिम एशिया में कम होता अमेरिकी प्रभाव आदि कारकों ने चीन को OBOR के लिए प्रेरित किया है| इसके साथ ही चीन ने OBOR को आगे बढाते हुए आर्कटिक रूट की स्थापना की बात भी की है| · OBOR को वर्ष 2014 में शुरू किया गया इसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आदि देश शामिल नहीं किये गए हैं| · OBOR का कुछ भाग भारत की संप्रभुता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करता है अतः भारत ने भी अभी तक इसकी सदस्यता ग्रहण नहीं की है| OBOR में भारत की सदस्यता के मिश्रित परिणाम प्राप्त होने की संभावना है जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| भारत की सदस्यता के पक्ष में तर्क · OBOR का केवल CPEC हिस्सा ही भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है यदि चीन CPEC परियोजना को खारिज कर दे तो भारत को इसका सदस्य बन सकता है इसके निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं · भारत के विरोध के बाद भी चीन OBOR के विकास को रोका नहीं है और न ही भारत इसको रोक पायेगा अतः भारत को उसका हिस्सा बनना चाहिए और सहयोग प्राप्त करना चाहिए · यह एक व्यापक क्षेत्रीय मंच है, इसमें भारत के अधिकाँश पडोसी शामिल है, यदि भारत इसका सदस्य नहीं बनता है तो इन पडोसी देशों का झुकाव चीन की ओर बढ़ता जाएगा और एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की स्थिति में गिरावट आएगी · भारत की सदस्यता दोनों पक्षों के लिए विन विन होगी, इस क्षेत्र में अवसंरचनात्मक विकास होगा इससे भारत को कनेक्टिविटी मिलेगी, परिवहन का विकास होगा, ब्लू इकॉनमी में लाभ, उर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी · चीन एक मजबूत अर्थव्यवस्था है जिसके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन है भारत को इसका लाभ उठाना चाहिए · SCO के सदस्य देशों में रूस एवं कुछ अन्य सदस्य राष्ट्र यह मानते हैं कि OBOR में चीन के प्रभाव को सीमित रखने के लिए उसमें भारत का होना आवश्यक है · OBOR के माध्यम से भारत को अन्य देशों से जुड़ने का मौक़ा मिलेगा इससे आर्थिक-सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाया जा सकेगा · यह प्राचीन रेशम मार्ग का आधुनिक संस्करण होगा, रेशम मार्ग के माध्यम से भारतीय व्यापार-वाणिज्य एवं संस्कृति(बौद्ध धर्म एवं दर्शन) ने शेष एशिया को प्रभावित किया था, यदि भारत OBOR की सदस्यता ग्रहण करेगा तो भारत, चीन के सांस्कृतिक एकाधिकार को रोकने में सफल हो सकेगा भारत की सदस्यता के विपक्ष में तर्क · भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि: · यह चीन की एकपक्षीय सामरिक परियोजना है दूसरी ओर इसमें पारदर्शिता की कमी है, यह मॉडल एवं स्वयं चीन स्वरूपतः लोकतांत्रिक नहीं हैं, चीन ने इस मॉडल का डिजाईन स्वयं निर्धारित किया है, इस के निर्धारण सदस्यों की भागीदारी नहीं रखी गयी है, अतः भारत को एकपक्षीय विचार को स्वीकार नहीं करना चाहिए · समुद्री शिल्क रूप, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का बदला हुआ नाम है, चीन इसके माध्यम से भारत को घेरने की रणनीति पर चल रहा है, इसके माध्यम से भविष्य में हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो सकता है| इससे भारत के समुद्री सामरिक हित प्रभावित होते हैं, अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए| भारत हमेशा समुद्री क्षेत्र के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर रहा है| · OBOR चीन के पक्ष में झुकी हुई एक व्यापक भू राजनीतिक परियोजना है| इसे एशिया पैसिफिक रणनीति की प्रतिक्रिया माना जाता है| · यदि हम इसके सदस्य बन जाते हैं तो यह एक प्रकार से POK पर पाकिस्तान के अधिकार को मान्यता देना होगा, इससे भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होगा अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए · ग्वादर बन्दरगाह पर भविष्व में पनडुब्बी तैनात की जा सकती है इससे भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न हो सकती है अतः भारत को प्रयास करना चाहिए कि चीन मलक्का मार्ग पर ही निर्भर रहे · OBOR के माध्यम से चीन म्यांमार एवं बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है, इससे उत्तर पूर्वी भारत में अस्थिरता की चुनौती बढ़ेगी अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत को अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| भारत को OBOR को प्रतिसंतुलित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत ने OBOR द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को प्रतिसंतुलित करने के लिए विभिन्न पहले की गयी हैं जैसेप्रोजेक्ट मौसम, सागर माला परियोजना, चाबहार बंदरगाह का विकास, INSTC, कालादान मल्टी मॉडल प्रोजेक्ट का विकास, हिन्द महासागर के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना पर बल जैसे भारत ने मेडागास्कर एवं शेसेल्स में नेवल पोर्ट स्थापित किये है| विभिन्न देशों के साथ भारत ने गठजोड़ स्थापित किये हैं जैसे फ़्रांस, जापान आदि तथा एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर की स्थापना इसके साथ ही 10 वर्ष के बाद क्वाड को 2018 में पुनर्जीवित किया गया है जो OBOR के प्रतिसंतुलन में भारत के लिए सहायक होगा
|
##Question:चीन के वन बेल्ट वन रूट (OBOR) पहल का आशय स्पष्ट कीजिये | क्या भारत को इसकी सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए ? समीक्षा कीजिए | (150 - 200 शब्द/10 अंक) Explain China"s One Belt One Root (OBOR) initiative. Should India accept membership of It ? make an analysis. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में OBOR की पृष्ठभूमि के रूप में मोतियों की माला अवधारणा को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में OBOR के बारे में सूचनाएं दीजिये 3- दुसरे भाग में सदस्यता लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे भाग में सदस्यता न लेने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में भारत की अपेक्षित रणनीति और की गयी पहलों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, यह एक अपेक्षाकृत पुरानी चीनी सैन्य अवधारणा है, यह भारत को हिंदमहासागर के माध्यम से घेरने की नीति मानी जाती है| इसके अंतर्गत चिट्गोंग, कोको, हमबनटोटा, मराओ एवं ग्वादर में चीन अपने अड्डों का निर्माण कर रहा है| भारतीय एवं वैश्विक मनः स्थिति को देखते हुए 2013 में चीन ने इसका नाम बदला और विश्व को सन्देश देने का प्रयास किया कि यह गतिविधि व्यापार के विस्तार से सम्बन्धित है| वर्ष 2014 में कुछ वैश्विक गतिविधियों के कारण चीन ने वन बेल्ट वन रोड(OBOR) की अवधारणा प्रस्तुत की है| यह वस्तुतः मोतियों की माला अर्थात स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का एक संशोधित रूप है| वन बेल्ट वन रोड OBOR · इसके अंतर्गत चीन, भू आधारित शिल्क रूट और समुद्री शिल्क रूट के माध्यम से अफ्रीका, यूरोप एवं एशिया में विकास करने का दावा करता है · इसके अंतर्गत चीन एशिया, अफ्रीका एवं यूरोप को समुद्री एवं स्थलीय मार्ग से जोड़ने के लिए मार्गों के विकास का व्यापक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है · चीन, इसके माध्यम से बहुध्रुवीय विश्व की स्थापना का दावा करता है OBOR पहल के निहितार्थ · दक्षिण पूर्वी एशिया, दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों को देखते हुए 2012 में अमेरिका द्वारा इंडो पैसिफिक रणनीति प्रस्तुत की गयी और घोषित किया गया कि प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी| · इसके माध्यम से दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के क्षेत्र में बढ़ते अमेरिकी प्रभाव को देखते हुए चीन को यह स्पष्ट हो गया कि भविष्व में इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम होगा|अतः चीन ने दक्षिण पूर्वी एशिया एवं दक्षिणी चीन सागर के स्थान पर पश्चिम की ओर के लिए अपनी रणनीति के रूप में OBOR को प्रस्तुत किया · पश्चिम एशिया में अमेरिका के शत्रु देश है, ऊर्जा सुरक्षा, बड़ा बाजार, पश्चिम एशिया में कम होता अमेरिकी प्रभाव आदि कारकों ने चीन को OBOR के लिए प्रेरित किया है| इसके साथ ही चीन ने OBOR को आगे बढाते हुए आर्कटिक रूट की स्थापना की बात भी की है| · OBOR को वर्ष 2014 में शुरू किया गया इसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आदि देश शामिल नहीं किये गए हैं| · OBOR का कुछ भाग भारत की संप्रभुता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करता है अतः भारत ने भी अभी तक इसकी सदस्यता ग्रहण नहीं की है| OBOR में भारत की सदस्यता के मिश्रित परिणाम प्राप्त होने की संभावना है जिसे निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| भारत की सदस्यता के पक्ष में तर्क · OBOR का केवल CPEC हिस्सा ही भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है यदि चीन CPEC परियोजना को खारिज कर दे तो भारत को इसका सदस्य बन सकता है इसके निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं · भारत के विरोध के बाद भी चीन OBOR के विकास को रोका नहीं है और न ही भारत इसको रोक पायेगा अतः भारत को उसका हिस्सा बनना चाहिए और सहयोग प्राप्त करना चाहिए · यह एक व्यापक क्षेत्रीय मंच है, इसमें भारत के अधिकाँश पडोसी शामिल है, यदि भारत इसका सदस्य नहीं बनता है तो इन पडोसी देशों का झुकाव चीन की ओर बढ़ता जाएगा और एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की स्थिति में गिरावट आएगी · भारत की सदस्यता दोनों पक्षों के लिए विन विन होगी, इस क्षेत्र में अवसंरचनात्मक विकास होगा इससे भारत को कनेक्टिविटी मिलेगी, परिवहन का विकास होगा, ब्लू इकॉनमी में लाभ, उर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी · चीन एक मजबूत अर्थव्यवस्था है जिसके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन है भारत को इसका लाभ उठाना चाहिए · SCO के सदस्य देशों में रूस एवं कुछ अन्य सदस्य राष्ट्र यह मानते हैं कि OBOR में चीन के प्रभाव को सीमित रखने के लिए उसमें भारत का होना आवश्यक है · OBOR के माध्यम से भारत को अन्य देशों से जुड़ने का मौक़ा मिलेगा इससे आर्थिक-सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाया जा सकेगा · यह प्राचीन रेशम मार्ग का आधुनिक संस्करण होगा, रेशम मार्ग के माध्यम से भारतीय व्यापार-वाणिज्य एवं संस्कृति(बौद्ध धर्म एवं दर्शन) ने शेष एशिया को प्रभावित किया था, यदि भारत OBOR की सदस्यता ग्रहण करेगा तो भारत, चीन के सांस्कृतिक एकाधिकार को रोकने में सफल हो सकेगा भारत की सदस्यता के विपक्ष में तर्क · भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि: · यह चीन की एकपक्षीय सामरिक परियोजना है दूसरी ओर इसमें पारदर्शिता की कमी है, यह मॉडल एवं स्वयं चीन स्वरूपतः लोकतांत्रिक नहीं हैं, चीन ने इस मॉडल का डिजाईन स्वयं निर्धारित किया है, इस के निर्धारण सदस्यों की भागीदारी नहीं रखी गयी है, अतः भारत को एकपक्षीय विचार को स्वीकार नहीं करना चाहिए · समुद्री शिल्क रूप, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का बदला हुआ नाम है, चीन इसके माध्यम से भारत को घेरने की रणनीति पर चल रहा है, इसके माध्यम से भविष्य में हिन्द महासागर का सैन्यीकरण हो सकता है| इससे भारत के समुद्री सामरिक हित प्रभावित होते हैं, अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए| भारत हमेशा समुद्री क्षेत्र के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर रहा है| · OBOR चीन के पक्ष में झुकी हुई एक व्यापक भू राजनीतिक परियोजना है| इसे एशिया पैसिफिक रणनीति की प्रतिक्रिया माना जाता है| · यदि हम इसके सदस्य बन जाते हैं तो यह एक प्रकार से POK पर पाकिस्तान के अधिकार को मान्यता देना होगा, इससे भारत की संप्रभुता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न होगा अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं लेनी चाहिए · ग्वादर बन्दरगाह पर भविष्व में पनडुब्बी तैनात की जा सकती है इससे भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न हो सकती है अतः भारत को प्रयास करना चाहिए कि चीन मलक्का मार्ग पर ही निर्भर रहे · OBOR के माध्यम से चीन म्यांमार एवं बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है, इससे उत्तर पूर्वी भारत में अस्थिरता की चुनौती बढ़ेगी अतः भारत को OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत को अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए OBOR की सदस्यता नहीं ग्रहण करनी चाहिए| भारत को OBOR को प्रतिसंतुलित करने का प्रयास करना चाहिए| भारत ने OBOR द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को प्रतिसंतुलित करने के लिए विभिन्न पहले की गयी हैं जैसेप्रोजेक्ट मौसम, सागर माला परियोजना, चाबहार बंदरगाह का विकास, INSTC, कालादान मल्टी मॉडल प्रोजेक्ट का विकास, हिन्द महासागर के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना पर बल जैसे भारत ने मेडागास्कर एवं शेसेल्स में नेवल पोर्ट स्थापित किये है| विभिन्न देशों के साथ भारत ने गठजोड़ स्थापित किये हैं जैसे फ़्रांस, जापान आदि तथा एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर की स्थापना इसके साथ ही 10 वर्ष के बाद क्वाड को 2018 में पुनर्जीवित किया गया है जो OBOR के प्रतिसंतुलन में भारत के लिए सहायक होगा
| 45,878
|
Discuss each adjective attached to the word “Republic” in the preamble. Are they defendable in the present circumstances? (200 words)
|
Approach : Introduce an answer by defining the term republic. Explain in brief words like a sovereign, socialist, secular, democratic etc. Answer : A state in which supreme power is held by the people and their elected representatives, and which has an elected or nominated president rather than a monarch is called as the republic state. Following are the different adjectives attached to the word Republic in the preamble. SOVEREIGN India is neither a dependency nor a dominion of any other nation, It is an independent state.In the present times, the term ‘sovereignty’ may be losing rigid connotations of “supreme and absolute poweracknowledging no superior” -no modern state can be considered sovereign in that sense. However, throughthe words of the Preamble, what is sought to be established is the oneness of the people of India (not thepeople of different states but of one nation), that the sovereignty vests in the collectivity, and the that thepeople of India are not subordinate to any external authority. With the enactment of the Constitution Indiawas no longer a ‘dominion’ it was a ‘republic’. SOCIALIST The founding father did not want the constitution to be wedded to any particular politicalideology or ism or to be limited by any economic doctrine. it was the constitution (42nd amendment,1976) that introduction this word socialist to qualify our Republic. Socialism to mean “free forms of exploitation social, economic and political.” In a limited sense, It is difficult to define. As the supreme court says,’ Democratic socialism aims to end poverty, ignorance, disease and inequality of opportunity. Indian socialism is a blend of Marxism and Gandhism, leaning heavily towards Gandhian socialism’. SECULAR This term ‘secular’ too was added by the 42nd amendments of 1976. A secular state deals withthe individual as a citizen irrespective of his religion is not connected to a particular religion nor does it seesto promote or interfere with religion. The secular state must have nothing to do with religious affairs except whentheir management involves crime, fraud or becomes a threat to unity and integrity of the state. DEMOCRATIC The Constitution provides for representative parliamentary democracy under which theexecutive is responsible to the legislature for all its policies and action. the universal adult franchise, periodic election, rule of law, independent of the judiciary, and absence of discrimination on certain ground. in a broadersense, it includes not only political democracy but social and economic too. DR. Ambedkar remarked, “Parliamentary democracy cannot last unless there lies at the base of its socialdemocracy. What does social democracy mean? It means a way of life which recognize liberty, equality andfraternity.” Present status on defendability The Indian constitution gives the right to equality to all person and says that no citizen can be discriminated onthe ground of race, race caste, gender and place of birth. Usually, the record of India, when it comes topolitical rights is very good among the emerging nations.The judiciary plays an important role in overseeing the implementation of constitutional guarantees.The developments in India, particularly give me confidence that in the new millennium, we will not face theWorld empty-handed whether in terms of civilization attainments or economic strength.We need to feel proud, not in a narrow nationalistic sense, which in itself is significant but in a wider sense ofvalues that the constitution provided to their citizen, fraternity, tolerance for other points of view, spiritualquest and respect for cultural diversity."
|
##Question:Discuss each adjective attached to the word “Republic” in the preamble. Are they defendable in the present circumstances? (200 words)##Answer:Approach : Introduce an answer by defining the term republic. Explain in brief words like a sovereign, socialist, secular, democratic etc. Answer : A state in which supreme power is held by the people and their elected representatives, and which has an elected or nominated president rather than a monarch is called as the republic state. Following are the different adjectives attached to the word Republic in the preamble. SOVEREIGN India is neither a dependency nor a dominion of any other nation, It is an independent state.In the present times, the term ‘sovereignty’ may be losing rigid connotations of “supreme and absolute poweracknowledging no superior” -no modern state can be considered sovereign in that sense. However, throughthe words of the Preamble, what is sought to be established is the oneness of the people of India (not thepeople of different states but of one nation), that the sovereignty vests in the collectivity, and the that thepeople of India are not subordinate to any external authority. With the enactment of the Constitution Indiawas no longer a ‘dominion’ it was a ‘republic’. SOCIALIST The founding father did not want the constitution to be wedded to any particular politicalideology or ism or to be limited by any economic doctrine. it was the constitution (42nd amendment,1976) that introduction this word socialist to qualify our Republic. Socialism to mean “free forms of exploitation social, economic and political.” In a limited sense, It is difficult to define. As the supreme court says,’ Democratic socialism aims to end poverty, ignorance, disease and inequality of opportunity. Indian socialism is a blend of Marxism and Gandhism, leaning heavily towards Gandhian socialism’. SECULAR This term ‘secular’ too was added by the 42nd amendments of 1976. A secular state deals withthe individual as a citizen irrespective of his religion is not connected to a particular religion nor does it seesto promote or interfere with religion. The secular state must have nothing to do with religious affairs except whentheir management involves crime, fraud or becomes a threat to unity and integrity of the state. DEMOCRATIC The Constitution provides for representative parliamentary democracy under which theexecutive is responsible to the legislature for all its policies and action. the universal adult franchise, periodic election, rule of law, independent of the judiciary, and absence of discrimination on certain ground. in a broadersense, it includes not only political democracy but social and economic too. DR. Ambedkar remarked, “Parliamentary democracy cannot last unless there lies at the base of its socialdemocracy. What does social democracy mean? It means a way of life which recognize liberty, equality andfraternity.” Present status on defendability The Indian constitution gives the right to equality to all person and says that no citizen can be discriminated onthe ground of race, race caste, gender and place of birth. Usually, the record of India, when it comes topolitical rights is very good among the emerging nations.The judiciary plays an important role in overseeing the implementation of constitutional guarantees.The developments in India, particularly give me confidence that in the new millennium, we will not face theWorld empty-handed whether in terms of civilization attainments or economic strength.We need to feel proud, not in a narrow nationalistic sense, which in itself is significant but in a wider sense ofvalues that the constitution provided to their citizen, fraternity, tolerance for other points of view, spiritualquest and respect for cultural diversity."
| 45,882
|
ब्रिटिश शासन काल में अकाल के लिए सरकारी नीतियां उत्तरदायी थीं | इस कथन के आलोक में तर्क प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) Government policies were responsible for famine during British rule. Present the argument in the light of this statement. (150-200 words/10 Marks)
|
एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजों द्वारा अपनाई गयी शोषणकारी आर्थिक नीतियों की चर्चा करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात अकाल के लिए उत्तरदायी अंग्रेजों की नीतियों की चर्चा कीजिये | अंत में कुछ अकाल आयोगों की चर्चा करते हुए अकाल की गंभीरता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अंग्रेजों द्वारा भारत में अपने हितों को ध्यान में रखते हुए जिस प्रकार की शोषणकारी नीतियों को अपनाया गया , उसने भारत की बहुसंख्यक आबादी को अन्दर से झकझोर कर रख दिया | अंग्रेजों की कुछ आर्थिक नीतियों ने किसानों की निर्धनता की हर सीमा को पार करते हुए उन्हें काल के गाल में समेट लिया | इन नीतियों से अकालों की बारंबारता से किसानों को बहुत अधिक क्षति पहुंची | भारत में अकाल के लिए निम्नलिखित सरकारी नीतियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है - अत्यधिक मात्रा में कर वसूला जाना | जैसे ज़मींदारी बंदोबस्त में 10/11 हिस्सा सरकार को देना होता था ,जबकि रैयतवाड़ी व्यवस्था में कुल लागत का 50% देने का प्रावधान था | प्राकृतिक आपदा के समय भी भूराजस्व दर सामान ही रखी गयी और निर्दयतापूर्वक वसूला भी गया | किसानों तथा ज़मींदारों से भू राजस्व की कठोर शर्तों का पालन करवाया जैसे सूर्यास्त से पहले नियत तिथि पर भू राजस्व सरकार को देना तथा ऐसा न करने पर भूमि सरकार द्वारा हड़प लेना | वाणिज्यीकरण के कारण किसान ऋण में फंसते गए | कृषि में सरकार व ज़मींदारों के द्वारा निवेश न किया जाना | उद्योगों के पतन के कारण भारत का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया और बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए एवं कृषि पर निर्भर होने को मजबूर हो गए | किसानो को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर खेती करनी पड़ी | अकाल के समय भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा | 1858 के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने अकाल की समस्या पर ध्यान दिया | 1866 में कैम्पबेल आयोग तथा 1880 में स्ट्रेची आयोग का गठन हुआ | 1883 में अकाल संहिता बनायी गयी तथा इन सबके बावजूद इन सब आयोगों के गठन के बाद भी अकाल की समस्या ख़त्म नहीं हो सकी | वास्तव में अकाल को लेकर ब्रिटिश सरकार की नीतियां भ्रम पैदा करने वाली थीं , यही कारण था कि अकाल की समस्या को कभी भी जड़ से ख़तम नहीं किया जा सका |
|
##Question:ब्रिटिश शासन काल में अकाल के लिए सरकारी नीतियां उत्तरदायी थीं | इस कथन के आलोक में तर्क प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) Government policies were responsible for famine during British rule. Present the argument in the light of this statement. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजों द्वारा अपनाई गयी शोषणकारी आर्थिक नीतियों की चर्चा करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात अकाल के लिए उत्तरदायी अंग्रेजों की नीतियों की चर्चा कीजिये | अंत में कुछ अकाल आयोगों की चर्चा करते हुए अकाल की गंभीरता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अंग्रेजों द्वारा भारत में अपने हितों को ध्यान में रखते हुए जिस प्रकार की शोषणकारी नीतियों को अपनाया गया , उसने भारत की बहुसंख्यक आबादी को अन्दर से झकझोर कर रख दिया | अंग्रेजों की कुछ आर्थिक नीतियों ने किसानों की निर्धनता की हर सीमा को पार करते हुए उन्हें काल के गाल में समेट लिया | इन नीतियों से अकालों की बारंबारता से किसानों को बहुत अधिक क्षति पहुंची | भारत में अकाल के लिए निम्नलिखित सरकारी नीतियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है - अत्यधिक मात्रा में कर वसूला जाना | जैसे ज़मींदारी बंदोबस्त में 10/11 हिस्सा सरकार को देना होता था ,जबकि रैयतवाड़ी व्यवस्था में कुल लागत का 50% देने का प्रावधान था | प्राकृतिक आपदा के समय भी भूराजस्व दर सामान ही रखी गयी और निर्दयतापूर्वक वसूला भी गया | किसानों तथा ज़मींदारों से भू राजस्व की कठोर शर्तों का पालन करवाया जैसे सूर्यास्त से पहले नियत तिथि पर भू राजस्व सरकार को देना तथा ऐसा न करने पर भूमि सरकार द्वारा हड़प लेना | वाणिज्यीकरण के कारण किसान ऋण में फंसते गए | कृषि में सरकार व ज़मींदारों के द्वारा निवेश न किया जाना | उद्योगों के पतन के कारण भारत का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया और बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए एवं कृषि पर निर्भर होने को मजबूर हो गए | किसानो को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर खेती करनी पड़ी | अकाल के समय भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा | 1858 के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने अकाल की समस्या पर ध्यान दिया | 1866 में कैम्पबेल आयोग तथा 1880 में स्ट्रेची आयोग का गठन हुआ | 1883 में अकाल संहिता बनायी गयी तथा इन सबके बावजूद इन सब आयोगों के गठन के बाद भी अकाल की समस्या ख़त्म नहीं हो सकी | वास्तव में अकाल को लेकर ब्रिटिश सरकार की नीतियां भ्रम पैदा करने वाली थीं , यही कारण था कि अकाल की समस्या को कभी भी जड़ से ख़तम नहीं किया जा सका |
| 45,884
|
What is TEEB? How TEEB can help in vulture Conservation? Briefly highlight conservation measures taken by Government of India to protect the vultures in India. (150 words) 10 marks
|
Approach · Explain TEEB as Intro · Mention its aim in brief · Discuss how TEEB can help in vulture conservation and the project it has started · Highlight the conservation measures taken by the Government of India to protect the vultures in India. Ans: The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) is a global initiative focused on “making nature’s values visible”. Launched at the G8 meeting of environment ministers in Potsdam, Germany, in 2007, this major international initiative, funded by the European Commission, Germany, the United Kingdom, Norway, the Netherlands and Sweden, and managed by theUnited Nations Environment Programme as part of its Green Economy Initiative (GEI). It seeks to draw attention to the global economic benefits of biodiversity, to highlight the growing costs of biodiversity loss and ecosystem degradation, and to draw together expertise from the fields of science, economics and policy to enable practical actions moving forward. TEEB and Vulture conservation (a) In order forpolicymakers to beable to make informed decisions about the identification of Vulture Safe Zones (VSZs), as well as regulatory requirements forvulture-safe drug formulations, TEEB could provide an analysis for the economic cost of vultures. (b) TEEB has started a project for saving vultures with the name The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) for vultures, which was started in 2014 in Kanha Pench Corridor, Madhya Pradesh. Conservation measures are taken by GOI: There has been a sharp decline in the vulture population from 40 million to 19000 in less than three decades. The following are the important steps taken by the Government for protection of Vultures in the country: (i) Protection status of White-backed, Long-Billed and Slender Billed Vultures has been upgraded from Schedule IV to Schedule I of the Wild Life (Protection) Act, 1972. (ii) Two workshops were organized in consultation with scientists in New Delhi on September 2000 and April 2004 to work out a comprehensive strategy for conservation of vultures. (iii) Bombay Natural History Society in collaboration with the Haryana State Forest Department has taken up a project on conservation breeding of vultures. A ‘Vulture Captive Care facility’ has been established at Panchkula. (iv) The Ministry of Health has issued Gazette Notification dated 4.7.2008 prohibiting the manufacture of Diclofenac for animal use and vide notification dated 17.7.2015 restricting packaging of multi-dose vials of Diclofenac to single dose. (v) The State Governments have been advised to set up vulture care centres for the conservation of three species of vultures. (vi) Government of India has formulated a National Action Plan (2006) on Vulture Conservation. The Action Plan provides for strategies, actions for containing the decline of vulture population through ex-situ, in-situ vulture conservation. (vii) Department of forests of all states/UTs have been requested to constitute a Monitoring Committee for vulture conservation with a view to implementing the Action Plan, 2006 and for recovery of existing vulture sites. (viii) Captive breeding centres at Zoos at Bhopal, Bhubaneswar, Junagarh and Hyderabad have also been set up through Central Zoo Authority. (ix) Ministry has also taken initiatives to strengthen the mass education and awareness for vulture conservation. These steps were taken to ensure the revival of the vultures, however, certain other drugs which are harmful to the vultures are still in use within the vulture safe zones, for example, Aceclofenac, Carprofen, Flunixin, Ketoprofen, Nimesulide and Phenylbutazone etc. Ketoprofen was banned in the districts having vulture population in Tamil Nadu, however, Kerala and other southern states are yet to take action. To save these precious birds from extinction government, civil society and masses all have to come together on the same page, only then we can ensure a safe future for them.
|
##Question:What is TEEB? How TEEB can help in vulture Conservation? Briefly highlight conservation measures taken by Government of India to protect the vultures in India. (150 words) 10 marks##Answer:Approach · Explain TEEB as Intro · Mention its aim in brief · Discuss how TEEB can help in vulture conservation and the project it has started · Highlight the conservation measures taken by the Government of India to protect the vultures in India. Ans: The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) is a global initiative focused on “making nature’s values visible”. Launched at the G8 meeting of environment ministers in Potsdam, Germany, in 2007, this major international initiative, funded by the European Commission, Germany, the United Kingdom, Norway, the Netherlands and Sweden, and managed by theUnited Nations Environment Programme as part of its Green Economy Initiative (GEI). It seeks to draw attention to the global economic benefits of biodiversity, to highlight the growing costs of biodiversity loss and ecosystem degradation, and to draw together expertise from the fields of science, economics and policy to enable practical actions moving forward. TEEB and Vulture conservation (a) In order forpolicymakers to beable to make informed decisions about the identification of Vulture Safe Zones (VSZs), as well as regulatory requirements forvulture-safe drug formulations, TEEB could provide an analysis for the economic cost of vultures. (b) TEEB has started a project for saving vultures with the name The Economics of Ecosystems and Biodiversity (TEEB) for vultures, which was started in 2014 in Kanha Pench Corridor, Madhya Pradesh. Conservation measures are taken by GOI: There has been a sharp decline in the vulture population from 40 million to 19000 in less than three decades. The following are the important steps taken by the Government for protection of Vultures in the country: (i) Protection status of White-backed, Long-Billed and Slender Billed Vultures has been upgraded from Schedule IV to Schedule I of the Wild Life (Protection) Act, 1972. (ii) Two workshops were organized in consultation with scientists in New Delhi on September 2000 and April 2004 to work out a comprehensive strategy for conservation of vultures. (iii) Bombay Natural History Society in collaboration with the Haryana State Forest Department has taken up a project on conservation breeding of vultures. A ‘Vulture Captive Care facility’ has been established at Panchkula. (iv) The Ministry of Health has issued Gazette Notification dated 4.7.2008 prohibiting the manufacture of Diclofenac for animal use and vide notification dated 17.7.2015 restricting packaging of multi-dose vials of Diclofenac to single dose. (v) The State Governments have been advised to set up vulture care centres for the conservation of three species of vultures. (vi) Government of India has formulated a National Action Plan (2006) on Vulture Conservation. The Action Plan provides for strategies, actions for containing the decline of vulture population through ex-situ, in-situ vulture conservation. (vii) Department of forests of all states/UTs have been requested to constitute a Monitoring Committee for vulture conservation with a view to implementing the Action Plan, 2006 and for recovery of existing vulture sites. (viii) Captive breeding centres at Zoos at Bhopal, Bhubaneswar, Junagarh and Hyderabad have also been set up through Central Zoo Authority. (ix) Ministry has also taken initiatives to strengthen the mass education and awareness for vulture conservation. These steps were taken to ensure the revival of the vultures, however, certain other drugs which are harmful to the vultures are still in use within the vulture safe zones, for example, Aceclofenac, Carprofen, Flunixin, Ketoprofen, Nimesulide and Phenylbutazone etc. Ketoprofen was banned in the districts having vulture population in Tamil Nadu, however, Kerala and other southern states are yet to take action. To save these precious birds from extinction government, civil society and masses all have to come together on the same page, only then we can ensure a safe future for them.
| 45,885
|
ब्रिटिश शासन काल में अकाल के लिए सरकारी नीतियां उत्तरदायी थीं | इस कथन का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) Government policies were responsible for famine during the british rule. Analyze this statement. (150-200 words)
|
एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजों द्वारा अपनाई गयी शोषणकारी आर्थिक नीतियों की चर्चा करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात अकाल के लिए उत्तरदायी अंग्रेजों की नीतियों की चर्चा कीजिये | अंत में कुछ अकाल आयोगों की चर्चा करते हुए अकाल की गंभीरता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अंग्रेजों द्वारा भारत में अपने हितों को ध्यान में रखते हुए जिस प्रकार की शोषणकारी नीतियों को अपनाया गया , उसने भारत की बहुसंख्यक आबादी को अन्दर से झकझोर कर रख दिया | अंग्रेजों की कुछ आर्थिक नीतियों ने किसानों की निर्धनता की हर सीमा को पार करते हुए उन्हें काल के गाल में समेट लिया | इन नीतियों से अकालों की बारंबारता से किसानों को बहुत अधिक क्षति पहुंची | भारत में अकाल के लिए निम्नलिखित सरकारी नीतियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है - अत्यधिक मात्रा में कर वसूला जाना | जैसे ज़मींदारी बंदोबस्त में 10/11 हिस्सा सरकार को देना होता था ,जबकि रैयतवाड़ी व्यवस्था में कुल लागत का 50% देने का प्रावधान था | प्राकृतिक आपदा के समय भी भूराजस्व दर सामान ही रखी गयी और निर्दयतापूर्वक वसूला भी गया | किसानों तथा ज़मींदारों से भू राजस्व की कठोर शर्तों का पालन करवाया गे जैसे सूर्यास्त से पहले नियत तिथि पर भू राजस्व सरकार को देना तथा ऐसा न करने पर भूमि सरकार द्वारा हड़प लेना | वाणिज्यीकरण के कारण किसान ऋण में फंसते गए | कृषि में सरकार व ज़मींदारों के द्वारा निवेश न किया जाना | उद्योगों के पतन के कारण भारत का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया और बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए एवं कृषि पर निर्भर होने को मजबूर हो गए | किसानो को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर खेती करनी पड़ी | अकाल के समय भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा | 1858 के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने अकाल की समस्या पर ध्यान दिया | 1866 में कैम्पबेल आयोग तथा 1880 में स्ट्रेची आयोग का गठन हुआ | 1883 में अकाल संहिता बनायी गयी तथा इन सबके बावजूद इन सब आयोगों के गठन के बाद भी अकाल की समस्या ख़त्म नहीं हो सकी | वास्तव में अकाल को लेकर ब्रिटिश सरकार की नीतियां भ्रम पैदा करने वाली थीं , यही कारण था कि अकाल की समस्या को कभी भी जड़ से ख़तम नहीं किया जा सका |
|
##Question:ब्रिटिश शासन काल में अकाल के लिए सरकारी नीतियां उत्तरदायी थीं | इस कथन का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) Government policies were responsible for famine during the british rule. Analyze this statement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजों द्वारा अपनाई गयी शोषणकारी आर्थिक नीतियों की चर्चा करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात अकाल के लिए उत्तरदायी अंग्रेजों की नीतियों की चर्चा कीजिये | अंत में कुछ अकाल आयोगों की चर्चा करते हुए अकाल की गंभीरता को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - अंग्रेजों द्वारा भारत में अपने हितों को ध्यान में रखते हुए जिस प्रकार की शोषणकारी नीतियों को अपनाया गया , उसने भारत की बहुसंख्यक आबादी को अन्दर से झकझोर कर रख दिया | अंग्रेजों की कुछ आर्थिक नीतियों ने किसानों की निर्धनता की हर सीमा को पार करते हुए उन्हें काल के गाल में समेट लिया | इन नीतियों से अकालों की बारंबारता से किसानों को बहुत अधिक क्षति पहुंची | भारत में अकाल के लिए निम्नलिखित सरकारी नीतियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है - अत्यधिक मात्रा में कर वसूला जाना | जैसे ज़मींदारी बंदोबस्त में 10/11 हिस्सा सरकार को देना होता था ,जबकि रैयतवाड़ी व्यवस्था में कुल लागत का 50% देने का प्रावधान था | प्राकृतिक आपदा के समय भी भूराजस्व दर सामान ही रखी गयी और निर्दयतापूर्वक वसूला भी गया | किसानों तथा ज़मींदारों से भू राजस्व की कठोर शर्तों का पालन करवाया गे जैसे सूर्यास्त से पहले नियत तिथि पर भू राजस्व सरकार को देना तथा ऐसा न करने पर भूमि सरकार द्वारा हड़प लेना | वाणिज्यीकरण के कारण किसान ऋण में फंसते गए | कृषि में सरकार व ज़मींदारों के द्वारा निवेश न किया जाना | उद्योगों के पतन के कारण भारत का औद्योगिक ढांचा चरमरा गया और बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए एवं कृषि पर निर्भर होने को मजबूर हो गए | किसानो को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर खेती करनी पड़ी | अकाल के समय भी खाद्यानों का निर्यात जारी रहा | 1858 के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने अकाल की समस्या पर ध्यान दिया | 1866 में कैम्पबेल आयोग तथा 1880 में स्ट्रेची आयोग का गठन हुआ | 1883 में अकाल संहिता बनायी गयी तथा इन सबके बावजूद इन सब आयोगों के गठन के बाद भी अकाल की समस्या ख़त्म नहीं हो सकी | वास्तव में अकाल को लेकर ब्रिटिश सरकार की नीतियां भ्रम पैदा करने वाली थीं , यही कारण था कि अकाल की समस्या को कभी भी जड़ से ख़तम नहीं किया जा सका |
| 45,888
|
Subsets and Splits
No community queries yet
The top public SQL queries from the community will appear here once available.