Question
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19वीं सदी के संदर्भ में, नवसाम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं| साथ ही, उन कारकों की पहचान कीजिए जिसने नवसाम्राज्यवाद को प्रेरित किया था? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you mean by Neo-Imperialism, in the context of the 19th Century? Also, Identify the factors that inspired Neo-Imperialism. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- नवसाम्राज्यवाद को 19वीं सदी के संदर्भ में परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में,उन कारकों की पहचान कीजिए जिसने नवसाम्राज्यवाद को प्रेरित किया था| निष्कर्षतः, नवसाम्राज्यवाद की परिणति के रूप में विश्वयुद्धों को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- साम्राज्यवाद के दूसरे लहर के रूप में 19वीं सदी के उतरार्ध तथा 20वीं सदी के प्रारंभ में (1870-1945)नवसाम्राज्यवाद का उदय हुआ था|औद्योगिक क्रांति के पश्चात विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात बाजार एवं कच्चे माल को ध्यान में रखकर उपनिवेशों की स्थापना करना इस नवसाम्राज्यवाद का प्रमुख अभिलक्षणथा|यह यूरोपीय उपनिवेशवाद की 15वीं-19वीं सदी की पहली लहर से भिन्न थी| मूलतः यह औद्योगिक पूंजीवाद का परिणाम था | यूरोप में औद्योगिक क्रांति ने वह स्थिति उत्पन कर दी थी कि पुनः उपनिवेशवाद की एक नयी होड़ प्रारंभ हो गयी थी| औद्योगिक देशों के कारखानों से अतिरिक्त उत्पादन हेतु कच्चे माल और निर्यात बाजारों की खोज के लिए यूरोपीय शक्तियों, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच उपनिवेशों पर नियंत्रण के लिए एक प्रतिस्पर्धा चल रही थी जिससे नवसाम्राज्यवाद की संज्ञा दी जाती है| नवसाम्राज्यवाद को प्रेरित करने वाले कारक - औद्योगिक क्रांति तथा बाजारएवं कच्चे माल की जरुरत- औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के कारण अमेरिका, जापान, जर्मनी, इटली राष्ट्रों का भी औद्योगिक राष्ट्रों के रूप में उदय हुआ| इन्हें भी बाजार एवं कच्चे माल की आवश्यकता थी| परिणामतः उपनिवेशों को लेकर फिर एक बार प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुयी| निवेश को ध्यान में रखकर उपनिवेशों की स्थापना- इस चरण में पूंजी निवेश के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर भी उपनिवेशों की स्थापना की गयी| अधिकतम शोषण के उद्देश्य से रेलवे, खानों, बैंकों इत्यादि में पूंजी-निवेश किए गए जैसे- भारत में अंग्रेजोंद्वारा| यूरोपीय देशों का आर्थिक संरक्षणवादी रवैया- उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोपीय देशों में संरक्षणवाद की प्रकृति लगातार बढ़ती जा रही थी फलस्वरूप इन देशों ने औद्योगिक वस्तुओं के बाजार के लिए उपनिवेश की तरफ प्रतिस्पर्धा चालू कर दी जिससे साम्राज्यवादी शक्तियों के मध्य उपनिवेशों/बाजार हेतु ज्यादा तीव्र प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी| मुख्य उपनिवेशों की सुरक्षा को ध्यान में रखना- साम्राज्यवादी शक्तियों ने मुख्य उपनिवेशों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उपनिवेशों का विस्तार किया जैसे- अंग्रेजों ने भारत की सुरक्षा को ध्यान में रखकर साईप्रस, मिस्त्र, यमन आदि पर कब्ज़ा किया| इसी प्रकार फ्रांसीसियों ने अल्जीरिया की सुरक्षा को आधार बनाकर आसपास के राष्ट्रों पर कब्ज़ा किया| समाजवादी आंदोलन के खतरे से बचने की चुनौती- औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप पूंजीवाद को बढ़ावा मिला जिसके विरोध में समाजवादी विचारधारा का भी उदय प्रारंभ हुआ| यूरोपीय पूंजीवादी देश समाजवादी आंदोलनों एवं उनके विचारकों के प्रभाव से भयभीत हो चले थे एवं इन शासकों ने अपनी जनता का ध्यान घरेलू समस्याओं से हटाकर साम्राज्यवाद की ओर अग्रसर किया| समाजवाद एवं मार्क्सवाद की प्रगति को रोकने हेतु उपनिवेशवाद के माध्यम से साम्राज्यवादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया गया| श्वेत व्यक्तियों पर भार का सिद्धांत- साम्राज्यवादी विस्तार को विभिन्न आधारों पर न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी गयी जैसे- ब्रिटेन में श्वेत व्यक्तियों पर भार का सिद्धांत लोकप्रिय हुआ तो फ़्रांस में मिशन सिविलाइज़ेशन तो जर्मनी ने दुनिया को कल्चर बनाने का लक्ष्य रखा| राजनीतिक एवं कूटनीतिक कारक- यूरोपीय राजनीतिज्ञों का एक हिस्सा खासकर बिस्मार्क ने, साम्राज्यवाद का उपयोग कूटनीतिक औजार के रूप में किया| बिस्मार्क जहां एक तरफ फ्रांस केअहं को तुष्ट करना चाहता था वहीं दूसरी तरफ उसे यूरोपीय राजनीति में अकेला भी बना देना चाहता था| बिस्मार्क ने ही फ्रांस को ट्यूनीशिया जीतने के लिए प्रेरित किया ताकि इटली में फ्रांस की जगह जर्मनी का प्रभाव स्थापित हो जाए| इसी प्रकार फ्रांस को तुष्ट करने के लिए जर्मनी ने ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रसार को चुनौती देते हुए दक्षिण पश्चिमी अफ्रीका, टोगोलैंड, पूर्वी गुआना, कैमरून आदि क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया| दूसरी तरफ फ्रांस ने भी जर्मनी के आश्वासन के फलस्वरूप उत्तरी पूर्वी अफ्रीका की ओर कदम बढ़ाए|इन गतिविधियों से पूर्वी अफ्रीका में ब्रिटिश हितों को खतरा पहुंचने का भय व्याप्त हो गया एवं ब्रिटेन ने भी अपने उपनिवेशों की रक्षा के लिए युगांडा को जीत लिया| अफ्रीका के उपनिवेशीकरण को इन गतिविधियों की वजह से व्यापक तेजी मिली | 1884-85 में आयोजित बर्लिन कांग्रेस ने भी अफ़्रीकी विभाजन तथा उसके उपनिवेशीकरण को तेज़ बनाने का काम किया था| बिस्मार्क ने इसके माध्यम से यूरोपीय शक्तियों का ध्यान यूरोपीय राजनीति से हटाना चाहा था परंतु इसकी वजह से साम्राज्यवादी प्रसार को काफी बढ़ावा मिला जिसकी परिणति अफ्रीका के तीव्र उपनिवेशीकरण के रूप में देखने को मिली| उग्र राष्ट्रवाद ने भी साम्राज्यवाद को प्रोत्साहित किया| उपनिवेशों की स्थापना को प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा गया| इटली, जर्मनी, जापान आदि राष्ट्र प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए थें अतः उपनिवेशों की स्थापना को इन राष्ट्रों में विशेषकर प्रतिष्ठा से जोड़कर भी देखा गया| राष्ट्रवाद तथा क्रांतियों की भूमिका-जर्मनी तथा इटली के एकीकरण के पश्चात निरंकुश राजतंत्रों का उदय हुआ जिससे साम्राज्यवादी आक्रामकता में वृद्धि हुई तथा उपनिवेश के लिए होने वाले प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी हुई| 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात राष्ट्रवादी भावना का विकास अंततोगत्वा आर्थिकप्रतिद्वंद्विता के रूप में उभरकर सामने आया| यूरोपीय देशों में राष्ट्रवाद के परिणामस्वरूप औपनिवेशिक साम्राज्य विस्तार की मांग उठी| निरंकुश शासक सत्ता पर पकड़ बनाए रखने तथा जनता का ध्यान भटकाने के लिए साम्राज्यवाद पर निर्भर हो गए| महत्वपूर्ण सैन्य एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका - मिस्र में लॉर्ड क्रोमर, नाइजीरिया में लॉर्ड लुगार्ड, केप क्षेत्र में लॉर्ड मिलर, मोरक्को में मार्शल लियायतें आदि कुछ साहसिक सैन्य एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने भी साम्राज्यवाद को अपने ढंग से आगे बढ़ाया| इन विचारों से प्रभावित होकर संबंधित देशों के अधिकारियों एवं सैनिकों ने उत्साहित होकर साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया | खोजकर्ताओं का योगदान- स्टैनली एवं लिविंगस्टोन जैसे खोजकर्ताओं ने अफ्रीकी महादेश के विशाल क्षेत्र के अंदरूनी हिस्सों में स्थित दूरस्थ क्षेत्रों की खोज की| नए क्षेत्रों की खोज से भीउपनिवेशवाद को बढ़ावा मिला| ईसाई मिशनरियों की भूमिका- इस चरण में साम्राज्यवादी गतिविधियों के प्रसार में ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप में देखी गयी| नए-नए क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों के साथ व्यापारी तथा उनके संबंधित देश की सरकार भी प्रभाव में विस्तार का प्रयास करते थें| कभी-कभी स्थानीय सरकार एवं मिशनरियों के बीच टकराव को आधार बनाकर भी साम्राज्यवादी शक्तियां साम्राज्य का विस्तार करती थीं जैसे- चीन में कुछ एक अवसरों पर फ़्रांस एवं जर्मनी ने इसे आधार बनाया| ईसाई मिशनरियों ने ईसाई धर्म के नए क्षेत्रों में प्रचार प्रसार हेतु भी अपने सरकारों पर उन क्षेत्रों में उपनिवेश बनाने के लिए दबाव डाला|पिछड़े उपनिवेशों में श्रेष्ठ सभ्यता का प्रसार करने के उत्तरदायित्व के विचार ने भी औपनिवेशिक होड़ को बढ़ाने में मदद की उदाहरणस्वरूप- बेल्जियम द्वारा कांगो का शोषण करने के लिए इसी श्वेत श्रेष्ठता की भावना का साम्राज्यवादी रणनीति के रूप में इस्तेमाल हुआ| एशिया एवं अफ्रीका की परिस्थितियों ने भी साम्राज्य विस्तार के मार्ग को सुगम बनाया जैसे- राजनीतिक एकता का अभाव; राष्ट्रीय चेतना का अभाव; पिछड़ा सैन्य संगठन; तकनीकी पिछड़ापन इत्यादि| स्वयं उपनिवेशों के अंदर की हलचल जैसे- मिश्र के राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रतिक्रियास्वरूप ब्रिटेन ने 1882 ईसवी में उस पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित कर लिया; इथोपिया में भी विद्रोह से उस पर साम्राज्यवादी नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिली| भौगोलिक स्थानों की कमी- उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विश्व में निवेश हेतु क्षेत्रों की कमी हो गई थी| चीन तथा अफ्रीका के अंदरूनी क्षेत्र ही बचे हुए थे| साथ ही, इस नए औपनिवेशिक दौर में नए प्रतिस्पर्धी राज्यों का भी उदय हुआ था| महत्वपूर्ण सामरिक केंद्रों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण करके विश्व शक्ति बनने की भावना ; नवसाम्राज्यवाद के इसी होड़ के चलते एशिया तथा अफ्रीका के देशों में तीव्र उपनिवेशीकरण हुआ| साथ ही, यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य कटुता में भी वृद्धि हुयी जिससे गुटबंदी को प्रोत्साहन मिला| इन सभी घटनाओं की परिणति विश्वयुद्धों के रूप में सामने आयी|
##Question:19वीं सदी के संदर्भ में, नवसाम्राज्यवाद से आप क्या समझते हैं| साथ ही, उन कारकों की पहचान कीजिए जिसने नवसाम्राज्यवाद को प्रेरित किया था? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you mean by Neo-Imperialism, in the context of the 19th Century? Also, Identify the factors that inspired Neo-Imperialism. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- नवसाम्राज्यवाद को 19वीं सदी के संदर्भ में परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में,उन कारकों की पहचान कीजिए जिसने नवसाम्राज्यवाद को प्रेरित किया था| निष्कर्षतः, नवसाम्राज्यवाद की परिणति के रूप में विश्वयुद्धों को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- साम्राज्यवाद के दूसरे लहर के रूप में 19वीं सदी के उतरार्ध तथा 20वीं सदी के प्रारंभ में (1870-1945)नवसाम्राज्यवाद का उदय हुआ था|औद्योगिक क्रांति के पश्चात विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के पश्चात बाजार एवं कच्चे माल को ध्यान में रखकर उपनिवेशों की स्थापना करना इस नवसाम्राज्यवाद का प्रमुख अभिलक्षणथा|यह यूरोपीय उपनिवेशवाद की 15वीं-19वीं सदी की पहली लहर से भिन्न थी| मूलतः यह औद्योगिक पूंजीवाद का परिणाम था | यूरोप में औद्योगिक क्रांति ने वह स्थिति उत्पन कर दी थी कि पुनः उपनिवेशवाद की एक नयी होड़ प्रारंभ हो गयी थी| औद्योगिक देशों के कारखानों से अतिरिक्त उत्पादन हेतु कच्चे माल और निर्यात बाजारों की खोज के लिए यूरोपीय शक्तियों, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच उपनिवेशों पर नियंत्रण के लिए एक प्रतिस्पर्धा चल रही थी जिससे नवसाम्राज्यवाद की संज्ञा दी जाती है| नवसाम्राज्यवाद को प्रेरित करने वाले कारक - औद्योगिक क्रांति तथा बाजारएवं कच्चे माल की जरुरत- औद्योगिक क्रांति विशेषकर द्वितीय औद्योगिक क्रांति के कारण अमेरिका, जापान, जर्मनी, इटली राष्ट्रों का भी औद्योगिक राष्ट्रों के रूप में उदय हुआ| इन्हें भी बाजार एवं कच्चे माल की आवश्यकता थी| परिणामतः उपनिवेशों को लेकर फिर एक बार प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुयी| निवेश को ध्यान में रखकर उपनिवेशों की स्थापना- इस चरण में पूंजी निवेश के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर भी उपनिवेशों की स्थापना की गयी| अधिकतम शोषण के उद्देश्य से रेलवे, खानों, बैंकों इत्यादि में पूंजी-निवेश किए गए जैसे- भारत में अंग्रेजोंद्वारा| यूरोपीय देशों का आर्थिक संरक्षणवादी रवैया- उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोपीय देशों में संरक्षणवाद की प्रकृति लगातार बढ़ती जा रही थी फलस्वरूप इन देशों ने औद्योगिक वस्तुओं के बाजार के लिए उपनिवेश की तरफ प्रतिस्पर्धा चालू कर दी जिससे साम्राज्यवादी शक्तियों के मध्य उपनिवेशों/बाजार हेतु ज्यादा तीव्र प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी| मुख्य उपनिवेशों की सुरक्षा को ध्यान में रखना- साम्राज्यवादी शक्तियों ने मुख्य उपनिवेशों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उपनिवेशों का विस्तार किया जैसे- अंग्रेजों ने भारत की सुरक्षा को ध्यान में रखकर साईप्रस, मिस्त्र, यमन आदि पर कब्ज़ा किया| इसी प्रकार फ्रांसीसियों ने अल्जीरिया की सुरक्षा को आधार बनाकर आसपास के राष्ट्रों पर कब्ज़ा किया| समाजवादी आंदोलन के खतरे से बचने की चुनौती- औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप पूंजीवाद को बढ़ावा मिला जिसके विरोध में समाजवादी विचारधारा का भी उदय प्रारंभ हुआ| यूरोपीय पूंजीवादी देश समाजवादी आंदोलनों एवं उनके विचारकों के प्रभाव से भयभीत हो चले थे एवं इन शासकों ने अपनी जनता का ध्यान घरेलू समस्याओं से हटाकर साम्राज्यवाद की ओर अग्रसर किया| समाजवाद एवं मार्क्सवाद की प्रगति को रोकने हेतु उपनिवेशवाद के माध्यम से साम्राज्यवादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया गया| श्वेत व्यक्तियों पर भार का सिद्धांत- साम्राज्यवादी विस्तार को विभिन्न आधारों पर न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी गयी जैसे- ब्रिटेन में श्वेत व्यक्तियों पर भार का सिद्धांत लोकप्रिय हुआ तो फ़्रांस में मिशन सिविलाइज़ेशन तो जर्मनी ने दुनिया को कल्चर बनाने का लक्ष्य रखा| राजनीतिक एवं कूटनीतिक कारक- यूरोपीय राजनीतिज्ञों का एक हिस्सा खासकर बिस्मार्क ने, साम्राज्यवाद का उपयोग कूटनीतिक औजार के रूप में किया| बिस्मार्क जहां एक तरफ फ्रांस केअहं को तुष्ट करना चाहता था वहीं दूसरी तरफ उसे यूरोपीय राजनीति में अकेला भी बना देना चाहता था| बिस्मार्क ने ही फ्रांस को ट्यूनीशिया जीतने के लिए प्रेरित किया ताकि इटली में फ्रांस की जगह जर्मनी का प्रभाव स्थापित हो जाए| इसी प्रकार फ्रांस को तुष्ट करने के लिए जर्मनी ने ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रसार को चुनौती देते हुए दक्षिण पश्चिमी अफ्रीका, टोगोलैंड, पूर्वी गुआना, कैमरून आदि क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया| दूसरी तरफ फ्रांस ने भी जर्मनी के आश्वासन के फलस्वरूप उत्तरी पूर्वी अफ्रीका की ओर कदम बढ़ाए|इन गतिविधियों से पूर्वी अफ्रीका में ब्रिटिश हितों को खतरा पहुंचने का भय व्याप्त हो गया एवं ब्रिटेन ने भी अपने उपनिवेशों की रक्षा के लिए युगांडा को जीत लिया| अफ्रीका के उपनिवेशीकरण को इन गतिविधियों की वजह से व्यापक तेजी मिली | 1884-85 में आयोजित बर्लिन कांग्रेस ने भी अफ़्रीकी विभाजन तथा उसके उपनिवेशीकरण को तेज़ बनाने का काम किया था| बिस्मार्क ने इसके माध्यम से यूरोपीय शक्तियों का ध्यान यूरोपीय राजनीति से हटाना चाहा था परंतु इसकी वजह से साम्राज्यवादी प्रसार को काफी बढ़ावा मिला जिसकी परिणति अफ्रीका के तीव्र उपनिवेशीकरण के रूप में देखने को मिली| उग्र राष्ट्रवाद ने भी साम्राज्यवाद को प्रोत्साहित किया| उपनिवेशों की स्थापना को प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा गया| इटली, जर्मनी, जापान आदि राष्ट्र प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए थें अतः उपनिवेशों की स्थापना को इन राष्ट्रों में विशेषकर प्रतिष्ठा से जोड़कर भी देखा गया| राष्ट्रवाद तथा क्रांतियों की भूमिका-जर्मनी तथा इटली के एकीकरण के पश्चात निरंकुश राजतंत्रों का उदय हुआ जिससे साम्राज्यवादी आक्रामकता में वृद्धि हुई तथा उपनिवेश के लिए होने वाले प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी हुई| 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात राष्ट्रवादी भावना का विकास अंततोगत्वा आर्थिकप्रतिद्वंद्विता के रूप में उभरकर सामने आया| यूरोपीय देशों में राष्ट्रवाद के परिणामस्वरूप औपनिवेशिक साम्राज्य विस्तार की मांग उठी| निरंकुश शासक सत्ता पर पकड़ बनाए रखने तथा जनता का ध्यान भटकाने के लिए साम्राज्यवाद पर निर्भर हो गए| महत्वपूर्ण सैन्य एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका - मिस्र में लॉर्ड क्रोमर, नाइजीरिया में लॉर्ड लुगार्ड, केप क्षेत्र में लॉर्ड मिलर, मोरक्को में मार्शल लियायतें आदि कुछ साहसिक सैन्य एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने भी साम्राज्यवाद को अपने ढंग से आगे बढ़ाया| इन विचारों से प्रभावित होकर संबंधित देशों के अधिकारियों एवं सैनिकों ने उत्साहित होकर साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया | खोजकर्ताओं का योगदान- स्टैनली एवं लिविंगस्टोन जैसे खोजकर्ताओं ने अफ्रीकी महादेश के विशाल क्षेत्र के अंदरूनी हिस्सों में स्थित दूरस्थ क्षेत्रों की खोज की| नए क्षेत्रों की खोज से भीउपनिवेशवाद को बढ़ावा मिला| ईसाई मिशनरियों की भूमिका- इस चरण में साम्राज्यवादी गतिविधियों के प्रसार में ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप में देखी गयी| नए-नए क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों के साथ व्यापारी तथा उनके संबंधित देश की सरकार भी प्रभाव में विस्तार का प्रयास करते थें| कभी-कभी स्थानीय सरकार एवं मिशनरियों के बीच टकराव को आधार बनाकर भी साम्राज्यवादी शक्तियां साम्राज्य का विस्तार करती थीं जैसे- चीन में कुछ एक अवसरों पर फ़्रांस एवं जर्मनी ने इसे आधार बनाया| ईसाई मिशनरियों ने ईसाई धर्म के नए क्षेत्रों में प्रचार प्रसार हेतु भी अपने सरकारों पर उन क्षेत्रों में उपनिवेश बनाने के लिए दबाव डाला|पिछड़े उपनिवेशों में श्रेष्ठ सभ्यता का प्रसार करने के उत्तरदायित्व के विचार ने भी औपनिवेशिक होड़ को बढ़ाने में मदद की उदाहरणस्वरूप- बेल्जियम द्वारा कांगो का शोषण करने के लिए इसी श्वेत श्रेष्ठता की भावना का साम्राज्यवादी रणनीति के रूप में इस्तेमाल हुआ| एशिया एवं अफ्रीका की परिस्थितियों ने भी साम्राज्य विस्तार के मार्ग को सुगम बनाया जैसे- राजनीतिक एकता का अभाव; राष्ट्रीय चेतना का अभाव; पिछड़ा सैन्य संगठन; तकनीकी पिछड़ापन इत्यादि| स्वयं उपनिवेशों के अंदर की हलचल जैसे- मिश्र के राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रतिक्रियास्वरूप ब्रिटेन ने 1882 ईसवी में उस पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित कर लिया; इथोपिया में भी विद्रोह से उस पर साम्राज्यवादी नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिली| भौगोलिक स्थानों की कमी- उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विश्व में निवेश हेतु क्षेत्रों की कमी हो गई थी| चीन तथा अफ्रीका के अंदरूनी क्षेत्र ही बचे हुए थे| साथ ही, इस नए औपनिवेशिक दौर में नए प्रतिस्पर्धी राज्यों का भी उदय हुआ था| महत्वपूर्ण सामरिक केंद्रों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण करके विश्व शक्ति बनने की भावना ; नवसाम्राज्यवाद के इसी होड़ के चलते एशिया तथा अफ्रीका के देशों में तीव्र उपनिवेशीकरण हुआ| साथ ही, यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य कटुता में भी वृद्धि हुयी जिससे गुटबंदी को प्रोत्साहन मिला| इन सभी घटनाओं की परिणति विश्वयुद्धों के रूप में सामने आयी|
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What are Microfinance Institutions? Discuss the benefits of Microfinance Institutions. Do you think high-interest rates charged by MFIs from weaker sections are justified? Give reasons in support. (200 words/10 marks)
Approach: Define Micro Finance and Microfinance Institutions (MFI)in an intro Discuss the benefits of MFI, type of groups for lending and names of few MFIs Give arguments as to why charging high interest is not justified Also write reasons for charging high-interest rate which is justified. Answer Microfinance, alsocalledmicrocredit​, is a type of banking service provided to unemployed or low-income individuals or groups who otherwise would have no other access to financial services.Microfinance institutions (MFIs) are financial companies that provide small loans to people who do not have any access to banking facilities. The definition of “small loans” varies between countries. In India, all loans that are below Rs.1 lakh can be considered as microloans. Benefitsof Microfinance Institutions It enables people to expand their present opportunities – The income accumulation of poor households has improved due to the presence of microfinance institutions that offer funds for their businesses. It provides easy access to credit – Microfinance opportunities provide people credit when it is needed the most. Banks do not usually offer small loans to customers; MFIs providing microloans bridge this gap. It makes future investments possible– Microfinance makes more money available to the poor sections of the economy. So, apart from financing the basic needs of these families, MFIs also provide them with credit for constructing better houses, improving their healthcare facilities, and exploring better business opportunities. It serves the under-financed section of the society – The majority of the microfinance loans provided by MFIs are offered to women. Unemployed people and those with disabilities are also beneficiaries of microfinance. These financing options help people take control of their lives through the betterment of their living conditions. It helps in the generation of employment opportunities – Microfinance institutions help create jobs in impoverished communities. It inculcates the discipline of saving – When the basic needs of people are met, they are more inclined to start saving for the future. It is good for people living in backward areas to inculcate the habit of saving. It brings about significant economic gains – When people participate in microfinance activities, they are more likely to receive better levels of consumption and improved nutrition. This eventually leads to the growth of the community in terms of economic value. It results in better credit management practices – Microloans are mostly taken by women borrowers. Statistics prove that female borrowers are less likely to default on loans. Apart from providing empowerment, microloans also have better repayment rates as women pose a lesser risk to borrowers. This improves the credit management practices of the community. It results in better education – It has been noted that families benefiting from microloans are more likely to provide better and continued education for their children. Improvement in the family finances implies that children may not be pulled out of school for monetary reasons. There are several types of groups organized by microfinance institutions for offering credit, insurance, and financial training to the rural population in India like Joint Liability Group, Self Help group, Grameen Model Bank, Rural Cooperatives Examples: Bandhan Financial Services Limited, Asirvad Microfinance Limited, Cashpor Micro Credit, etc are the MFI operating in India. Microfinance institutions often charge 25 percent, 30 percent or even 80 percent interest on loans which seems to be very high especially when they are charged from poor people. The level of interest rates on small loans remains a highly sensitive and inflammatory topic in many places. For example, the charging of exorbitant interest rates was one of the allegations which resulted in the closure of fifty branches of two microfinance institutions by district authorities in the Indian state of Andra Pradesh in March 2006 Such high-interest rates seem to be unjustified because: 1. Already people are poor, charging high-interest rate from them will demotivate them to borrow even for productive purposes. 2. High-interest rates accompanied by paperwork will disincentives them to borrow from MFI. This will entrench the culture of money lending from the local moneylenders. 3. Non-repayment of loan and interest has led to high rates of farmers’ suicide. However, apparently it seems to be unjustified but in actual, this is not so because: Microfinance institutions borrow from banks with interest rates that range from 12 % to 15 %, then spend about 10 % on high costs, 5 % to protect against the high risk of default, 2 % to 5 % for supplemental support products such as insurance, and 5 % to 10 % for returns for investors. Microfinance institutions serve a unique client base that does not have access to traditional banking services due to their location in remote villages that increases the cost of traveling for the small amount of collection. High rates may simply attract higher-risk borrowers. This could cause lenders to avoid lending at all in those markets which they perceive to be higher risk. Borrowers willing to pay higher interest rates may also be more incentivized to make more risky investments When a poor person takes a loan from a microfinance institution, the interest rate is not the No. 1 or even a top 5 concern. Since the loan repayment cycle is so short. The borrowers are more concerned about getting enough capital to make a difference in their business Hence it is not only legitimate to allow high rates on microloans, but also necessary for the sustainability of lending institutions that focus on the poor.
##Question:What are Microfinance Institutions? Discuss the benefits of Microfinance Institutions. Do you think high-interest rates charged by MFIs from weaker sections are justified? Give reasons in support. (200 words/10 marks)##Answer:Approach: Define Micro Finance and Microfinance Institutions (MFI)in an intro Discuss the benefits of MFI, type of groups for lending and names of few MFIs Give arguments as to why charging high interest is not justified Also write reasons for charging high-interest rate which is justified. Answer Microfinance, alsocalledmicrocredit​, is a type of banking service provided to unemployed or low-income individuals or groups who otherwise would have no other access to financial services.Microfinance institutions (MFIs) are financial companies that provide small loans to people who do not have any access to banking facilities. The definition of “small loans” varies between countries. In India, all loans that are below Rs.1 lakh can be considered as microloans. Benefitsof Microfinance Institutions It enables people to expand their present opportunities – The income accumulation of poor households has improved due to the presence of microfinance institutions that offer funds for their businesses. It provides easy access to credit – Microfinance opportunities provide people credit when it is needed the most. Banks do not usually offer small loans to customers; MFIs providing microloans bridge this gap. It makes future investments possible– Microfinance makes more money available to the poor sections of the economy. So, apart from financing the basic needs of these families, MFIs also provide them with credit for constructing better houses, improving their healthcare facilities, and exploring better business opportunities. It serves the under-financed section of the society – The majority of the microfinance loans provided by MFIs are offered to women. Unemployed people and those with disabilities are also beneficiaries of microfinance. These financing options help people take control of their lives through the betterment of their living conditions. It helps in the generation of employment opportunities – Microfinance institutions help create jobs in impoverished communities. It inculcates the discipline of saving – When the basic needs of people are met, they are more inclined to start saving for the future. It is good for people living in backward areas to inculcate the habit of saving. It brings about significant economic gains – When people participate in microfinance activities, they are more likely to receive better levels of consumption and improved nutrition. This eventually leads to the growth of the community in terms of economic value. It results in better credit management practices – Microloans are mostly taken by women borrowers. Statistics prove that female borrowers are less likely to default on loans. Apart from providing empowerment, microloans also have better repayment rates as women pose a lesser risk to borrowers. This improves the credit management practices of the community. It results in better education – It has been noted that families benefiting from microloans are more likely to provide better and continued education for their children. Improvement in the family finances implies that children may not be pulled out of school for monetary reasons. There are several types of groups organized by microfinance institutions for offering credit, insurance, and financial training to the rural population in India like Joint Liability Group, Self Help group, Grameen Model Bank, Rural Cooperatives Examples: Bandhan Financial Services Limited, Asirvad Microfinance Limited, Cashpor Micro Credit, etc are the MFI operating in India. Microfinance institutions often charge 25 percent, 30 percent or even 80 percent interest on loans which seems to be very high especially when they are charged from poor people. The level of interest rates on small loans remains a highly sensitive and inflammatory topic in many places. For example, the charging of exorbitant interest rates was one of the allegations which resulted in the closure of fifty branches of two microfinance institutions by district authorities in the Indian state of Andra Pradesh in March 2006 Such high-interest rates seem to be unjustified because: 1. Already people are poor, charging high-interest rate from them will demotivate them to borrow even for productive purposes. 2. High-interest rates accompanied by paperwork will disincentives them to borrow from MFI. This will entrench the culture of money lending from the local moneylenders. 3. Non-repayment of loan and interest has led to high rates of farmers’ suicide. However, apparently it seems to be unjustified but in actual, this is not so because: Microfinance institutions borrow from banks with interest rates that range from 12 % to 15 %, then spend about 10 % on high costs, 5 % to protect against the high risk of default, 2 % to 5 % for supplemental support products such as insurance, and 5 % to 10 % for returns for investors. Microfinance institutions serve a unique client base that does not have access to traditional banking services due to their location in remote villages that increases the cost of traveling for the small amount of collection. High rates may simply attract higher-risk borrowers. This could cause lenders to avoid lending at all in those markets which they perceive to be higher risk. Borrowers willing to pay higher interest rates may also be more incentivized to make more risky investments When a poor person takes a loan from a microfinance institution, the interest rate is not the No. 1 or even a top 5 concern. Since the loan repayment cycle is so short. The borrowers are more concerned about getting enough capital to make a difference in their business Hence it is not only legitimate to allow high rates on microloans, but also necessary for the sustainability of lending institutions that focus on the poor.
46,010
भारत-चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the various dimensions of mutual cooperation between India and China. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-चीन सम्बन्ध की संक्षिप्त पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में दोनों के मध्य सहयोग के आयामों की विस्तार से चर्चा कीजिए 3- अंतिम में सहयोग के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत, चीन को एक देश के रूप में मान्यता देने वाला प्राथन राष्ट्र था किन्तु जल्दी ही भारत को चीन के साथ युद्ध करना पडा| भारत एवं चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु हैं जैसे सीमा विवाद, तिब्बत मामला, आतंकवाद के सन्दर्भ में चीन का दृष्टिकोण, पाकिस्तान-चीन धुरी, व्यापार असंतुलन, OBOR एवं CPEC आदि| दोनों राष्ट्रों के हित अलग अलग हैं अतः दोनों के मध्य विवाद बने हुए हैं किन्तु इसके साथ ही भारत चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के अनेक आयाम हैं| NDB में भारत-चीन सहयोग · NDB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया| चीन इसके माध्यम से आर्थिक निर्भरता बढ़ाना चाहता होगा, चीन NDB में अधिकाँश फंडिंग करना चाहता था जिसका भारत द्वारा विरोध किया गया · अतः NDB की संरचना में सामान हिस्सेदारी का सिद्धांत अपनाया गया और प्रत्येक देश को 10 बिलियन डॉलर का योगदान निर्धारित किया गया, बाद में इसे 20 बिलियन डॉलर तक ले जाना है · यहाँ बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जायेंगेसभी सदस्यों को सामान महत्त्व देते हिये एक देश एक वोट का सिद्धांत अपनाया गया है, किसी भी देश को वीटो पॉवर नहीं दिया गया है · यह भारत एवं चीन के मध्य सहयोग का एक महत्वपूर्ण आयाम है, इसके माध्यम से विश्व बैंक को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है| क्योंकि IMF एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाएं पश्चिमी एवं विकसित देशों के पक्ष में झुई हुई हैं| एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक में सहयोग · ऐसे प्रोजेक्ट जिससे पूँजी निर्माण होता है ऐसी पूँजी को उपलब्ध कराने के लिए वर्तमान में IMF सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था है IMF आर्थिक योगदान के आधार पर ही मताधिकार दिया जाता है| · AIIB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया है| इसमें चीन का योगदान सर्वाधिक है (26 %) · भारत दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, इसमें भारत की भूमिका IMF की तुलना में विस्तृत हुई है · AIIB वस्तुतः IMF को प्रतिस्थापित करने का एक प्रयास है · इस प्रकार रूस, भारत एवं चीन ने आपसी सहयोग के माध्यम से नई वैश्विक व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं · ADB जो कि 1960 से कार्य कर रहा है, AIIB ने पिछले 5 वर्षों में ही ADB की कुल पूँजी के 2/3 पूँजी का एकत्रण कर लिया है रूस-चीन-भारत फोरम(RIC) · इसे 2002 में स्थापित किया गया है · अमेरिका आदि देशों द्वारा विश्व में एकतरफा कार्यवाई जैसे इराक युद्ध, सीरिया युद्ध आदि उदाहरणों को देखते हुए RIC संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है · अन्तराष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों से संचालित वैश्विक व्यवस्था का विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढाने के लिए, विश्व के समक्ष चुनौती उत्पन्न करने वाली समस्याओं का बहुपक्षीय आधार पर समाधान का आह्वान करता है · RIC विभिन्न क्षेत्रीय प्रभाव केन्द्रों के साथ बहुध्रुवीय विश्व का निर्माण करना चाहता है · RIC फोरम वैश्विक संरक्षणवाद, बाधाओं का आरोपण, एकपक्षीय मानकों का आरोपण आदि के माध्यम से व्यापार को बाधित करने वाले कारकों का विरोध करते हुए समानता के आधार पर व्यापार विस्तार करता है| · इस तरह से भारत एवं चीन RIC फोरम के माध्यम से अधिक व्यवस्थित एवं नियमित विश्व के निर्माण में आपस में सहयोग कर रहे हैं शंघाई सहयोग संगठन में सहयोग · इसमें अधिकांशतः मध्य एशियाई देश हैं जो पूर्व में सोवियत संघ के भाग थे अतः रूस इन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने के लिए SCO को 2001 में स्थापित किया गया · अतः इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य एशिया में विशेषकर मध्य एशिया के क्षेत्र में अमेरिका के प्रसार को रोकना है · 2015 में रूस द्वारा भारत को इसकी सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा गया, क्योंकि भारत एवं रूस के कुछ हित समान है| इसी के साथ चीन ने पाकिस्तान को सदस्यता देने का प्रस्ताव किया गया · क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी ढांचा(RATS) SCO की संस्था है जो आतंकवाद को रोकने के लिए बनाया गया है · इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत चीन एवं पाक को आतंकवाद के सन्दर्भ में सहयोग के लिए प्रेरित कर सकता है · यह संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय सहयोग, आतंकवाद के विस्तार को रोकना(रूस में चेचन क्षेत्र, चीन में जिनजियांग, भारत में कश्मीर का क्षेत्र आतंकवाद से पीड़ित है) को प्रस्तावित करता है अतः SCO के अंतर्गत भारत-चीन के मध्य सहयोग का एक आयाम खुलता है| IMF एवं विश्व बैंक में सुधार में सहयोग · इन संस्थाओं का झुकाव पश्चिमी विकसित देशों की ओर है |इन संस्थाओं की संरचना लोकतांत्रिक नहीं है · इन संस्थाओं में यूरोप एवं अमेरिका का दबदबा है औरकोटा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है · भारत एवं चीन विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं अतः वैश्विक संस्थाओं में इनको पर्याप्त महत्त्व मिलना चाहिए · अतः भारत एक चीन दोनों एक दूसरे का सहयोग करते हुए उपरोक्त वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करते हैं वुहान अनौपचारिक शिखर सम्मलेन · यह दोनों देशों के मध्य पहली अनौपचारिक बैठक थी जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री शामिल हुए · इसमें सीमा विवाद, व्यापार घाटा, आतंकवाद के समापन, विभिन्न वैश्विक चुनौतियों यथा जलवायु परिवर्तन आदि के समाधान के लिए सहयोग पर चर्चा की गयी · भारत ने सीमा प्रबंधन के स्थान पर सीमा विवाद के समाधान की मांग की जिसे चीन ने स्वीकार किया है · दोनों देशों ने आतंकवाद पर नियंत्रण के लिए सहयोग के आपसी सहमति दी है · दोनों देश शांत, स्थिर एवं लोकतांत्रिक अफगानिस्तान के लिए संयुक्त रूप से कार्य करने के लिए सहमत हुए हैं इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत और चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु होते हुए भी पारस्परिक सहयोग के भी अनेक आयाम है| भारत इन आयामों का उपयोग करते हुए चीन के साथ अपने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कर सकता है|
##Question:भारत-चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the various dimensions of mutual cooperation between India and China. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-चीन सम्बन्ध की संक्षिप्त पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में दोनों के मध्य सहयोग के आयामों की विस्तार से चर्चा कीजिए 3- अंतिम में सहयोग के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत, चीन को एक देश के रूप में मान्यता देने वाला प्राथन राष्ट्र था किन्तु जल्दी ही भारत को चीन के साथ युद्ध करना पडा| भारत एवं चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु हैं जैसे सीमा विवाद, तिब्बत मामला, आतंकवाद के सन्दर्भ में चीन का दृष्टिकोण, पाकिस्तान-चीन धुरी, व्यापार असंतुलन, OBOR एवं CPEC आदि| दोनों राष्ट्रों के हित अलग अलग हैं अतः दोनों के मध्य विवाद बने हुए हैं किन्तु इसके साथ ही भारत चीन के मध्य पारस्परिक सहयोग के अनेक आयाम हैं| NDB में भारत-चीन सहयोग · NDB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया| चीन इसके माध्यम से आर्थिक निर्भरता बढ़ाना चाहता होगा, चीन NDB में अधिकाँश फंडिंग करना चाहता था जिसका भारत द्वारा विरोध किया गया · अतः NDB की संरचना में सामान हिस्सेदारी का सिद्धांत अपनाया गया और प्रत्येक देश को 10 बिलियन डॉलर का योगदान निर्धारित किया गया, बाद में इसे 20 बिलियन डॉलर तक ले जाना है · यहाँ बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जायेंगेसभी सदस्यों को सामान महत्त्व देते हिये एक देश एक वोट का सिद्धांत अपनाया गया है, किसी भी देश को वीटो पॉवर नहीं दिया गया है · यह भारत एवं चीन के मध्य सहयोग का एक महत्वपूर्ण आयाम है, इसके माध्यम से विश्व बैंक को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है| क्योंकि IMF एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाएं पश्चिमी एवं विकसित देशों के पक्ष में झुई हुई हैं| एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक में सहयोग · ऐसे प्रोजेक्ट जिससे पूँजी निर्माण होता है ऐसी पूँजी को उपलब्ध कराने के लिए वर्तमान में IMF सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था है IMF आर्थिक योगदान के आधार पर ही मताधिकार दिया जाता है| · AIIB को चीन द्वारा प्रस्तावित किया गया है| इसमें चीन का योगदान सर्वाधिक है (26 %) · भारत दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, इसमें भारत की भूमिका IMF की तुलना में विस्तृत हुई है · AIIB वस्तुतः IMF को प्रतिस्थापित करने का एक प्रयास है · इस प्रकार रूस, भारत एवं चीन ने आपसी सहयोग के माध्यम से नई वैश्विक व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं · ADB जो कि 1960 से कार्य कर रहा है, AIIB ने पिछले 5 वर्षों में ही ADB की कुल पूँजी के 2/3 पूँजी का एकत्रण कर लिया है रूस-चीन-भारत फोरम(RIC) · इसे 2002 में स्थापित किया गया है · अमेरिका आदि देशों द्वारा विश्व में एकतरफा कार्यवाई जैसे इराक युद्ध, सीरिया युद्ध आदि उदाहरणों को देखते हुए RIC संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है · अन्तराष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों से संचालित वैश्विक व्यवस्था का विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढाने के लिए, विश्व के समक्ष चुनौती उत्पन्न करने वाली समस्याओं का बहुपक्षीय आधार पर समाधान का आह्वान करता है · RIC विभिन्न क्षेत्रीय प्रभाव केन्द्रों के साथ बहुध्रुवीय विश्व का निर्माण करना चाहता है · RIC फोरम वैश्विक संरक्षणवाद, बाधाओं का आरोपण, एकपक्षीय मानकों का आरोपण आदि के माध्यम से व्यापार को बाधित करने वाले कारकों का विरोध करते हुए समानता के आधार पर व्यापार विस्तार करता है| · इस तरह से भारत एवं चीन RIC फोरम के माध्यम से अधिक व्यवस्थित एवं नियमित विश्व के निर्माण में आपस में सहयोग कर रहे हैं शंघाई सहयोग संगठन में सहयोग · इसमें अधिकांशतः मध्य एशियाई देश हैं जो पूर्व में सोवियत संघ के भाग थे अतः रूस इन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने के लिए SCO को 2001 में स्थापित किया गया · अतः इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य एशिया में विशेषकर मध्य एशिया के क्षेत्र में अमेरिका के प्रसार को रोकना है · 2015 में रूस द्वारा भारत को इसकी सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा गया, क्योंकि भारत एवं रूस के कुछ हित समान है| इसी के साथ चीन ने पाकिस्तान को सदस्यता देने का प्रस्ताव किया गया · क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी ढांचा(RATS) SCO की संस्था है जो आतंकवाद को रोकने के लिए बनाया गया है · इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत चीन एवं पाक को आतंकवाद के सन्दर्भ में सहयोग के लिए प्रेरित कर सकता है · यह संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय सहयोग, आतंकवाद के विस्तार को रोकना(रूस में चेचन क्षेत्र, चीन में जिनजियांग, भारत में कश्मीर का क्षेत्र आतंकवाद से पीड़ित है) को प्रस्तावित करता है अतः SCO के अंतर्गत भारत-चीन के मध्य सहयोग का एक आयाम खुलता है| IMF एवं विश्व बैंक में सुधार में सहयोग · इन संस्थाओं का झुकाव पश्चिमी विकसित देशों की ओर है |इन संस्थाओं की संरचना लोकतांत्रिक नहीं है · इन संस्थाओं में यूरोप एवं अमेरिका का दबदबा है औरकोटा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है · भारत एवं चीन विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं अतः वैश्विक संस्थाओं में इनको पर्याप्त महत्त्व मिलना चाहिए · अतः भारत एक चीन दोनों एक दूसरे का सहयोग करते हुए उपरोक्त वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करते हैं वुहान अनौपचारिक शिखर सम्मलेन · यह दोनों देशों के मध्य पहली अनौपचारिक बैठक थी जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री शामिल हुए · इसमें सीमा विवाद, व्यापार घाटा, आतंकवाद के समापन, विभिन्न वैश्विक चुनौतियों यथा जलवायु परिवर्तन आदि के समाधान के लिए सहयोग पर चर्चा की गयी · भारत ने सीमा प्रबंधन के स्थान पर सीमा विवाद के समाधान की मांग की जिसे चीन ने स्वीकार किया है · दोनों देशों ने आतंकवाद पर नियंत्रण के लिए सहयोग के आपसी सहमति दी है · दोनों देश शांत, स्थिर एवं लोकतांत्रिक अफगानिस्तान के लिए संयुक्त रूप से कार्य करने के लिए सहमत हुए हैं इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत और चीन के मध्य विवाद के अनेक बिंदु होते हुए भी पारस्परिक सहयोग के भी अनेक आयाम है| भारत इन आयामों का उपयोग करते हुए चीन के साथ अपने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कर सकता है|
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दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी के रूप में भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the importance of Bangladesh for India as an important regional partner in South Asia. ( 150-200 words)
दृष्टिकोण: भारत व बांग्लादेश के संबंधों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष में भारत की भूमिका ने भारत-बांग्लादेश संबंधो की आधारशिला निर्मित की । एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश के अस्तित्व को स्वीकार करने वाला भारत प्रथम देश था । भौगोलिक जुड़ाव व सांस्कृतिक साम्यता अन्य ऐसे तत्व हैं जिन्होंने भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । दक्षिण एशिया में बांग्लादेश भारत के बाद एक प्रमुख अर्थव्यवस्था है । साथ ही बदलती परिस्थितियों में शांति , स्थायित्व व विकास के लिए बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी के रूप में सामने आया है । भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं -: बांग्लादेश दक्षिण पूर्व एशिया के आसियान देशों के लिए सेतु का कार्य करता है । बांग्लादेश की मदद से भारत सीधे आसियान देशों के साथ संपर्क स्थापित कर सकता है । पूर्वोतर भारत के साथ बेहतर जुड़ाव के लिए भी बांग्लादेश महत्वपूर्ण है । बांग्लादेश के माध्यम से कोलकाता से पूर्वोतर की दूरी तीन चौथाई तक कम की जा सकती है बांग्लादेश विश्व में सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है । इस रूप में बांग्लादेश भारत के लिए बेहतर निवेश गंतव्य है । दक्षिण एशिया को एक प्रभावी क्षेत्रीय शक्ति बनाने में बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी सिद्ध हो सकता है । आतंकवाद का मुक़ाबला करने में भी बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख सहयोगी राष्ट्र सिद्ध हो सकता है । पूर्वोतर भारत में उग्रवाद तथा अलगाववाद को नियंत्रित करने, ड्रग तस्करी, संगठित अपराध आदि के क्षेत्र में भी बांग्लादेश हाल के दशकों में भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में सामने आया है । समुद्री मार्गों की सुरक्षा एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है जिसमे भारत- बांग्लादेश सहयोगी हो सकते हैं । चीन को प्रतिसंतुलित करने तथा दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव को सीमित करने में भी बांग्लादेश की भूमिका है । BIMSTEC, BBIN जैसे संगठनों में भारत-बांग्लादेश सहयोगी हैं जो भविष्य में दक्षिण एशिया के विकास का महत्वपूर्ण स्तम्भ सिद्ध हो सकता है । इसके अतिरिक्त आपदा प्रबंधन , सांस्कृतिक सहयोग आदि ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारत बांग्लादेश काफी सहयोग कर सकते हैं । इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी है । साथ ही दोनों देशों के मध्य सहयोग कि काफी संभावनाएं हैं जिनका दोहन किया जाना अभी शेष है ।
##Question:दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी के रूप में भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the importance of Bangladesh for India as an important regional partner in South Asia. ( 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: भारत व बांग्लादेश के संबंधों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष में भारत की भूमिका ने भारत-बांग्लादेश संबंधो की आधारशिला निर्मित की । एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश के अस्तित्व को स्वीकार करने वाला भारत प्रथम देश था । भौगोलिक जुड़ाव व सांस्कृतिक साम्यता अन्य ऐसे तत्व हैं जिन्होंने भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । दक्षिण एशिया में बांग्लादेश भारत के बाद एक प्रमुख अर्थव्यवस्था है । साथ ही बदलती परिस्थितियों में शांति , स्थायित्व व विकास के लिए बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी के रूप में सामने आया है । भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व को हम निम्नलिखित रूपों में देख सकते हैं -: बांग्लादेश दक्षिण पूर्व एशिया के आसियान देशों के लिए सेतु का कार्य करता है । बांग्लादेश की मदद से भारत सीधे आसियान देशों के साथ संपर्क स्थापित कर सकता है । पूर्वोतर भारत के साथ बेहतर जुड़ाव के लिए भी बांग्लादेश महत्वपूर्ण है । बांग्लादेश के माध्यम से कोलकाता से पूर्वोतर की दूरी तीन चौथाई तक कम की जा सकती है बांग्लादेश विश्व में सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है । इस रूप में बांग्लादेश भारत के लिए बेहतर निवेश गंतव्य है । दक्षिण एशिया को एक प्रभावी क्षेत्रीय शक्ति बनाने में बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी सिद्ध हो सकता है । आतंकवाद का मुक़ाबला करने में भी बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख सहयोगी राष्ट्र सिद्ध हो सकता है । पूर्वोतर भारत में उग्रवाद तथा अलगाववाद को नियंत्रित करने, ड्रग तस्करी, संगठित अपराध आदि के क्षेत्र में भी बांग्लादेश हाल के दशकों में भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में सामने आया है । समुद्री मार्गों की सुरक्षा एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है जिसमे भारत- बांग्लादेश सहयोगी हो सकते हैं । चीन को प्रतिसंतुलित करने तथा दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव को सीमित करने में भी बांग्लादेश की भूमिका है । BIMSTEC, BBIN जैसे संगठनों में भारत-बांग्लादेश सहयोगी हैं जो भविष्य में दक्षिण एशिया के विकास का महत्वपूर्ण स्तम्भ सिद्ध हो सकता है । इसके अतिरिक्त आपदा प्रबंधन , सांस्कृतिक सहयोग आदि ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारत बांग्लादेश काफी सहयोग कर सकते हैं । इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि बांग्लादेश भारत का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी है । साथ ही दोनों देशों के मध्य सहयोग कि काफी संभावनाएं हैं जिनका दोहन किया जाना अभी शेष है ।
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Write down the regional division of the Northern Plains. Delineate their extent on the map. Also, discuss some of their important significance to India. (10 marks/150 words)
Approach:- Write a brief introduction on northern plains. Write down the various regions northern plain is divided into Mention some of its socio-economic importance. Answer:- The northern plains are formed by the alluvial deposits brought by the rivers. These plains extend approximately 3,200 km from the east to the west. The average width of these plains varies from 150 to 300 km. The maximum depth of alluvium deposits varies between 1,000-2,000 m. These plains fromwest to east are classified into following regions. Punjab Haryana Plain Ganga Plain Brahmaputra Plain Punjab-Haryana plain also known as the Indus Plain is formed by the river system of the Indus. It lies to the west of Aravallis in the state of Rajasthan and south of Jhelum. This plain is formed due to deposits brought by the rivers like the Satluj, the Beas, Ravi, Chenab and Jhelum. This part of the plain has doabs i.e. the alluvial deposits brought and lying between two converging river. Punjab is names so as it is the land of 5 rivers. 3 cultural regions of Malwa, Doaba, Majha plain from South to North lies in this region. Ganga Plain is divided into three regions Upper Ganga Plain – Lies above 100 metre altitude line, bordered between the Shivaliks in north, Yamuna in the west and the Peninsula in the south. The rivers are fast flowing and the deposits are bhangar gradually turning into khaddar as we move to the east. Rohilkhand plain and Awadh plains are the two cultural regions here. Middle Ganga Plain – Lies between the 100 metre and 30 metre altitude line. Gently sloping gradient and the deposits are finer. The rivers meanders and changes course often eg. Kosi also known as the sorrow of Bihar. Mithila plain and Magadh plain are the cultural region in this plain. Lower Ganga Plain – Lies between 30 metres to the mean sea level. It covers the regions in eastern Bihar, West Bengal and Bangladesh. This region is characterised by Duar formation. Delta encompassed 2/3rd of the area under lower ganga plain. There are also ox-bow lakes, mangroves in the region. Brahmaputra Plain lies between the Himalayas, purvanchal and the Meghalaya Plateau. It is also knows as Assam Plains. The slopes are steeper in the east than west. Majuli island is the world’s largest riverine island found here which at present is highly vulnerable to erosion. This area is highly fertile. Significane of the Region:- It is the largest alluvial tract of the world extending for a length of 3200 km from the Indus to the Ganga. The northern plains are the cradle of Indian civilization since the vedic times - it is among the oldest permanently settled region of the world. The region is highly fertile and is vital for food security of the region. It is densely populated region. Eg. The densest populated state- Bihar, highest populated state – Uttar Pradesh and the UT of Delhi. Region experiences wide variety of climate such as tropical wet and dry, warm temperate etc. and thus also houses wide variety of vegetation. Agricultural activity also leads to agro-processing industry which provides employment. The plains also facilitate construction of modes of transport such as roads, railways. It is also the birth place of many religions like Buddhism, Jainism attributed to the stable polity of the region. Northern plain comprises almost 1/4th of the area of the country and houses and provides for 1/2 of its population. The rivers have immense cultural significance to the people in every part of the India. It has thus became part of identity of the people in the region.
##Question:Write down the regional division of the Northern Plains. Delineate their extent on the map. Also, discuss some of their important significance to India. (10 marks/150 words)##Answer:Approach:- Write a brief introduction on northern plains. Write down the various regions northern plain is divided into Mention some of its socio-economic importance. Answer:- The northern plains are formed by the alluvial deposits brought by the rivers. These plains extend approximately 3,200 km from the east to the west. The average width of these plains varies from 150 to 300 km. The maximum depth of alluvium deposits varies between 1,000-2,000 m. These plains fromwest to east are classified into following regions. Punjab Haryana Plain Ganga Plain Brahmaputra Plain Punjab-Haryana plain also known as the Indus Plain is formed by the river system of the Indus. It lies to the west of Aravallis in the state of Rajasthan and south of Jhelum. This plain is formed due to deposits brought by the rivers like the Satluj, the Beas, Ravi, Chenab and Jhelum. This part of the plain has doabs i.e. the alluvial deposits brought and lying between two converging river. Punjab is names so as it is the land of 5 rivers. 3 cultural regions of Malwa, Doaba, Majha plain from South to North lies in this region. Ganga Plain is divided into three regions Upper Ganga Plain – Lies above 100 metre altitude line, bordered between the Shivaliks in north, Yamuna in the west and the Peninsula in the south. The rivers are fast flowing and the deposits are bhangar gradually turning into khaddar as we move to the east. Rohilkhand plain and Awadh plains are the two cultural regions here. Middle Ganga Plain – Lies between the 100 metre and 30 metre altitude line. Gently sloping gradient and the deposits are finer. The rivers meanders and changes course often eg. Kosi also known as the sorrow of Bihar. Mithila plain and Magadh plain are the cultural region in this plain. Lower Ganga Plain – Lies between 30 metres to the mean sea level. It covers the regions in eastern Bihar, West Bengal and Bangladesh. This region is characterised by Duar formation. Delta encompassed 2/3rd of the area under lower ganga plain. There are also ox-bow lakes, mangroves in the region. Brahmaputra Plain lies between the Himalayas, purvanchal and the Meghalaya Plateau. It is also knows as Assam Plains. The slopes are steeper in the east than west. Majuli island is the world’s largest riverine island found here which at present is highly vulnerable to erosion. This area is highly fertile. Significane of the Region:- It is the largest alluvial tract of the world extending for a length of 3200 km from the Indus to the Ganga. The northern plains are the cradle of Indian civilization since the vedic times - it is among the oldest permanently settled region of the world. The region is highly fertile and is vital for food security of the region. It is densely populated region. Eg. The densest populated state- Bihar, highest populated state – Uttar Pradesh and the UT of Delhi. Region experiences wide variety of climate such as tropical wet and dry, warm temperate etc. and thus also houses wide variety of vegetation. Agricultural activity also leads to agro-processing industry which provides employment. The plains also facilitate construction of modes of transport such as roads, railways. It is also the birth place of many religions like Buddhism, Jainism attributed to the stable polity of the region. Northern plain comprises almost 1/4th of the area of the country and houses and provides for 1/2 of its population. The rivers have immense cultural significance to the people in every part of the India. It has thus became part of identity of the people in the region.
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घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक(D-SIBs) से आप क्या समझते हैं? इनके चयन के आधार का उल्लेख करते हुए ऐसे बैंकों की पृथक श्रेणी बनाने की आवश्यकता की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by the domestic systemically important bank(D-SIBs)? Explain the need to create a separate category of such banks, citing the basis of their selection. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक के बारे में लिखिए। इसके बाद इनके चयन के आधार लिखिए। बैंकों की ऐसी श्रेणी बनाने की आवश्यकता लिखिए। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक(DSIBs) बैंको की एक पृथक श्रेणी है जो उनकी व्यावसायिक पहुँच, बाजार क्षमता को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। वर्तमान में भारत में तीन बैंको को इस श्रेणी में रखा गया है- एसबीआई, ICICI, HDFC। घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक के चयन का आधार: ऐसे बैंक जिनकी संपत्ति जीडीपी के 2% से अधिक हो। बैंकों की आधार पूंजी इस प्रकार होती है कि किसी प्रकार के विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए वे तैयार रहते हैं। ऐसे बैंकों की कार्यप्रणाली में जटिलता बहुत ही कम या न्यूनतम होनी चाहिए। इस प्रकार के बैंकों के विविध कार्यों में समन्वय होना चाहिए। समान्यतः कोई बैंक निवेश, बीमा, सामाजिक सुधार आदि क्षेत्रों में कार्य करते हैं। ऐसे बैंकों के पृथक श्रेणी बनाने की आवश्यकता वाणिज्यिक बैंकों के मध्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा। अन्य बैंक भी इसमें शामिल होने के लिए प्रयास करेंगे। इन बैंकों को "टू बिग टू फ़ेल" कहा जाता है। इस प्रकार की श्रेणी निवेशकों और आम जनता में विश्वास बनाए रखेगा। विदेशी निवेशक जो अपनी कंपनियाँ हमारे देश में स्थापित करना चाहते हैं उन्हे प्राप्त मात्रा में ऋण प्राप्त हो सकेगा। अवसंरचना क्षेत्र के वित्तपोषण के लिए ऐसे बैंक सक्षम होंगे। इस प्रकार के बैंक अर्थव्यवस्था में स्थायित्व प्रदान करते हैं जिससे क्रेडिट रेटिंग में सुधार होता है। इस प्रकार बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए इस प्रकार की श्रेणी तैयार करने का प्रयास एक अनोखा पहल है। इससे न केवल बैंकों की अपनी स्थिति में सुधार होगा बल्कि अर्थव्यवस्था में स्थायित्व आएगा जिससे निवेश बढ़ेगा।
##Question:घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक(D-SIBs) से आप क्या समझते हैं? इनके चयन के आधार का उल्लेख करते हुए ऐसे बैंकों की पृथक श्रेणी बनाने की आवश्यकता की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by the domestic systemically important bank(D-SIBs)? Explain the need to create a separate category of such banks, citing the basis of their selection. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक के बारे में लिखिए। इसके बाद इनके चयन के आधार लिखिए। बैंकों की ऐसी श्रेणी बनाने की आवश्यकता लिखिए। निष्कर्ष में उत्तर का सारांश लिखिए। घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक(DSIBs) बैंको की एक पृथक श्रेणी है जो उनकी व्यावसायिक पहुँच, बाजार क्षमता को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। वर्तमान में भारत में तीन बैंको को इस श्रेणी में रखा गया है- एसबीआई, ICICI, HDFC। घरेलू प्रणालीगत महत्वपूर्ण बैंक के चयन का आधार: ऐसे बैंक जिनकी संपत्ति जीडीपी के 2% से अधिक हो। बैंकों की आधार पूंजी इस प्रकार होती है कि किसी प्रकार के विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए वे तैयार रहते हैं। ऐसे बैंकों की कार्यप्रणाली में जटिलता बहुत ही कम या न्यूनतम होनी चाहिए। इस प्रकार के बैंकों के विविध कार्यों में समन्वय होना चाहिए। समान्यतः कोई बैंक निवेश, बीमा, सामाजिक सुधार आदि क्षेत्रों में कार्य करते हैं। ऐसे बैंकों के पृथक श्रेणी बनाने की आवश्यकता वाणिज्यिक बैंकों के मध्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा। अन्य बैंक भी इसमें शामिल होने के लिए प्रयास करेंगे। इन बैंकों को "टू बिग टू फ़ेल" कहा जाता है। इस प्रकार की श्रेणी निवेशकों और आम जनता में विश्वास बनाए रखेगा। विदेशी निवेशक जो अपनी कंपनियाँ हमारे देश में स्थापित करना चाहते हैं उन्हे प्राप्त मात्रा में ऋण प्राप्त हो सकेगा। अवसंरचना क्षेत्र के वित्तपोषण के लिए ऐसे बैंक सक्षम होंगे। इस प्रकार के बैंक अर्थव्यवस्था में स्थायित्व प्रदान करते हैं जिससे क्रेडिट रेटिंग में सुधार होता है। इस प्रकार बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए इस प्रकार की श्रेणी तैयार करने का प्रयास एक अनोखा पहल है। इससे न केवल बैंकों की अपनी स्थिति में सुधार होगा बल्कि अर्थव्यवस्था में स्थायित्व आएगा जिससे निवेश बढ़ेगा।
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Indian coastal plain on both sides of the peninsula has distinct features, In this context compare and contrast the features of the western coastal plain and the eastern coastal plain. (150 words/10 Marks)
Approach A brief introduction to the Indian coastal plains can be written. Write the features of the coast on both sides to show the contrast in their feature. Students can also draw a diagram to show the emergent and submerged coast. Answer India has a long coastline of 7,517 Km including the islands of Andaman & Nicobar and Lakshadweep islands and supports 14.2% of the Indian population The coastal plains can be classified on the basis of location and active geomorphological processes. It is broadly divided into two categories (i) The western coastal plains (ii) The eastern coastal plains. Western Coastal Plain:- They are subdivided into the Kachchh and Kathiawar in Gujarat, Konkan in Maharashtra, the Goan coast in Goa and the Malabar coast in Karnataka and Kerala. They lie between the western ghats and the Arabian sea. The western coastal plains are an example of the submerged coastal plain. Because of this submergence, the western coast is narrower than the eastern coast with an average width of 65 km The western coastal plains are narrow in the middle and get broader towards the north and south. Further, it also aids in connectivity as submerged coast leads to Natural harbours. This also results in a high number of ports in Gujarat (40) and Maharashtra (53) Eg. Kandla port, and Kochi port. The rivers do not form a delta as most rivers have a very short course or they flow through rift valleys eg. The Narmada. The rocks are also erosion-resistant thus there is very minimal transportation of silt. There is also the presence of lagoons and backwaters on the Malabar Coast locally known as Kayals which are used for fishing, inland navigation and tourism. Eastern Coastal Plain:- The Eastern coastal plain extends from Kanyakumari in Tamil Nadu up to West Bengal. It lies between the Eastern ghats and the Bay of Bengal. Eastern coastal plains are known as the Coromandel Coast in Tamil Nadu. They are an example of emergent coast and thus are broader with an average width of 120 km. Eastern coastal plains are also characterized by deltas such as those formed by Mahanadi, Godavari, Krishna etc. These regions are fertile due to the alluvial deposits and hence support agricultural activities. Since it is an emergent coast this region lacks natural harbours and most of the ports here are constructed with help of dredging. This also leads to fewer ports in the region eg. Odisha has 2 ports. They form the longest beaches. Eg. Marina Beach We see that there are significant differences in the physiography of the ports despite this both the coastlines are important to India in securing its strategic interests, and economic interests in terms of trade and livelihood as well as influencing the society and culture of the region.
##Question:Indian coastal plain on both sides of the peninsula has distinct features, In this context compare and contrast the features of the western coastal plain and the eastern coastal plain. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach A brief introduction to the Indian coastal plains can be written. Write the features of the coast on both sides to show the contrast in their feature. Students can also draw a diagram to show the emergent and submerged coast. Answer India has a long coastline of 7,517 Km including the islands of Andaman & Nicobar and Lakshadweep islands and supports 14.2% of the Indian population The coastal plains can be classified on the basis of location and active geomorphological processes. It is broadly divided into two categories (i) The western coastal plains (ii) The eastern coastal plains. Western Coastal Plain:- They are subdivided into the Kachchh and Kathiawar in Gujarat, Konkan in Maharashtra, the Goan coast in Goa and the Malabar coast in Karnataka and Kerala. They lie between the western ghats and the Arabian sea. The western coastal plains are an example of the submerged coastal plain. Because of this submergence, the western coast is narrower than the eastern coast with an average width of 65 km The western coastal plains are narrow in the middle and get broader towards the north and south. Further, it also aids in connectivity as submerged coast leads to Natural harbours. This also results in a high number of ports in Gujarat (40) and Maharashtra (53) Eg. Kandla port, and Kochi port. The rivers do not form a delta as most rivers have a very short course or they flow through rift valleys eg. The Narmada. The rocks are also erosion-resistant thus there is very minimal transportation of silt. There is also the presence of lagoons and backwaters on the Malabar Coast locally known as Kayals which are used for fishing, inland navigation and tourism. Eastern Coastal Plain:- The Eastern coastal plain extends from Kanyakumari in Tamil Nadu up to West Bengal. It lies between the Eastern ghats and the Bay of Bengal. Eastern coastal plains are known as the Coromandel Coast in Tamil Nadu. They are an example of emergent coast and thus are broader with an average width of 120 km. Eastern coastal plains are also characterized by deltas such as those formed by Mahanadi, Godavari, Krishna etc. These regions are fertile due to the alluvial deposits and hence support agricultural activities. Since it is an emergent coast this region lacks natural harbours and most of the ports here are constructed with help of dredging. This also leads to fewer ports in the region eg. Odisha has 2 ports. They form the longest beaches. Eg. Marina Beach We see that there are significant differences in the physiography of the ports despite this both the coastlines are important to India in securing its strategic interests, and economic interests in terms of trade and livelihood as well as influencing the society and culture of the region.
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Discuss the characteristic features of Sun-synchronous and Geo-synchronous Orbit. Highlight the application of satellites sent in these orbits. (150 words/10 Marks)
Approach:- Explain what you mean by Orbit. Discuss the characteristics of Sun-synchronous and Geo-synchronous orbits. Write down the applications of satellites sent to these orbits Answer:- An orbit is a periodic path that an object in space takes around another one. An object in an orbit is called a satellite. A satellite can be natural or man-made, like the Moon and International Space Station respectively. An orbit can be circular or elliptical in shape. Sun-synchronous orbit:- These are the satellites orbiting the earth in a polar orbit i.e. from north to south around the earth. These orbits are typically at an altitude of 600-800 km with a time period between 96-100 minutes. The satellite passes over a point on the earth"s surface at the same local time every day thus facilitating monitoring and data collection. These satellites can either stay under illumination by the sun or stay in a shadow zone i.e. dawn/dusk orbit and night time orbit. This leads to its role in remote sensing. Placing a satellite in the sun’s illumination zone also allows the solar panels to work continuously as well as the functioning of any passive instruments. Geo-Synchronous orbit:- It is an orbit around the earth which has the same orbital period as the earth’s rotation which is 23 hours 59 minutes and 4 seconds. A circular geosynchronous orbit lies at 35,786 km above the earth’s surface. The satellite in this orbit appears to be in the same region in the sky at a given time of the day when viewed from a particular position on Earth. Thus these satellites facilitate communication, navigation etc. Geostationary orbit is a special case of geosynchronous orbit which is a circular orbit in Earth"s equatorial plane. Some satellites in these orbits sent by India:- Earth Observation- Thirteen operational satellites for earth observation are placed in Sun-synchronous orbit such as the RESOURCE-SAT-1, 2, CARTOSAT-1, 2, RISAT-1, SARAL etc. These satellites provide necessary data in diversified spatial, spectral and temporal resolutions to cater to different needs both in the country and for global usage. The data from these satellites are used for several applications covering agriculture, water resources, urban planning, rural development, mineral prospecting, environment, forestry, ocean resources and disaster management. Communication - The Indian National Satellite (INSAT) system is one of the largest domestic communication satellite systems in the Asia-Pacific region with nine operational communication satellites placed in Geo-stationary orbit . It provides services in telecommunications, television broadcasting, satellite newsgathering, societal applications, weather forecasting, disaster warning and Search and Rescue operations . GSAT series was later added to it. The latest launch was of GSAT-31 in February 2019. Navigation - The IRNSS is a set of navigation satellites placed in ISRO that has built a total of nine satellites in the IRNSS series; of which eight are currently in orbit. Three of these satellites are in geostationary orbit (GEO) while the remaining are in geosynchronous orbit (GSO) .The main objective is to provide Reliable Position, Navigation and Timing services over India and its neighbourhood, to provide fairly good accuracy to the user. It also has military applications.
##Question:Discuss the characteristic features of Sun-synchronous and Geo-synchronous Orbit. Highlight the application of satellites sent in these orbits. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach:- Explain what you mean by Orbit. Discuss the characteristics of Sun-synchronous and Geo-synchronous orbits. Write down the applications of satellites sent to these orbits Answer:- An orbit is a periodic path that an object in space takes around another one. An object in an orbit is called a satellite. A satellite can be natural or man-made, like the Moon and International Space Station respectively. An orbit can be circular or elliptical in shape. Sun-synchronous orbit:- These are the satellites orbiting the earth in a polar orbit i.e. from north to south around the earth. These orbits are typically at an altitude of 600-800 km with a time period between 96-100 minutes. The satellite passes over a point on the earth"s surface at the same local time every day thus facilitating monitoring and data collection. These satellites can either stay under illumination by the sun or stay in a shadow zone i.e. dawn/dusk orbit and night time orbit. This leads to its role in remote sensing. Placing a satellite in the sun’s illumination zone also allows the solar panels to work continuously as well as the functioning of any passive instruments. Geo-Synchronous orbit:- It is an orbit around the earth which has the same orbital period as the earth’s rotation which is 23 hours 59 minutes and 4 seconds. A circular geosynchronous orbit lies at 35,786 km above the earth’s surface. The satellite in this orbit appears to be in the same region in the sky at a given time of the day when viewed from a particular position on Earth. Thus these satellites facilitate communication, navigation etc. Geostationary orbit is a special case of geosynchronous orbit which is a circular orbit in Earth"s equatorial plane. Some satellites in these orbits sent by India:- Earth Observation- Thirteen operational satellites for earth observation are placed in Sun-synchronous orbit such as the RESOURCE-SAT-1, 2, CARTOSAT-1, 2, RISAT-1, SARAL etc. These satellites provide necessary data in diversified spatial, spectral and temporal resolutions to cater to different needs both in the country and for global usage. The data from these satellites are used for several applications covering agriculture, water resources, urban planning, rural development, mineral prospecting, environment, forestry, ocean resources and disaster management. Communication - The Indian National Satellite (INSAT) system is one of the largest domestic communication satellite systems in the Asia-Pacific region with nine operational communication satellites placed in Geo-stationary orbit . It provides services in telecommunications, television broadcasting, satellite newsgathering, societal applications, weather forecasting, disaster warning and Search and Rescue operations . GSAT series was later added to it. The latest launch was of GSAT-31 in February 2019. Navigation - The IRNSS is a set of navigation satellites placed in ISRO that has built a total of nine satellites in the IRNSS series; of which eight are currently in orbit. Three of these satellites are in geostationary orbit (GEO) while the remaining are in geosynchronous orbit (GSO) .The main objective is to provide Reliable Position, Navigation and Timing services over India and its neighbourhood, to provide fairly good accuracy to the user. It also has military applications.
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विश्व के जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण करते हुए इनकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये (150-200 शब्द/10 अंक) Classify the climatic regions of the world and discuss their characteristics (150-200 words/10 Marks).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जलवायु को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण करते हुए इनकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जलवायु एक विस्तृत एवं व्यापक शब्द है जिससे किसी प्रदेश के दीर्घकालीन मौसम का आभास होता है| इस शब्द की व्युत्पत्ति जल एवं वायु के पारस्परिक सम्मिलन से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ वायुमण्डल के जल एवं वायु प्रारूप से है| यह शब्द वायुमण्डल के संघटन का द्योतक है| एक अन्य परिभाषा के अनुसार एक लम्बी कालावधि तक पृथ्वी एवं वायुमण्डल में ऊर्जा एवं पदार्थ के विनिमय की क्रियाओं का प्रतिफल जलवायु है| अतः जलवायु न केवल सांख्यिकीय औसत से बढ़कर है अपितु इसके अन्तर्गत ऊष्मा, आर्द्रता तथा पवन-संचलन जैसी वायुमण्डलीय दशाओं का योग सम्मिलित है| भौतिक आगतों में अंतर के कारण पृथ्वी पर विभिन्न जलवायु प्रदेशों का विकास हुआ है और इनकी विशेषताएं अलग अलग हैं| जलवायु का वर्गीकरण विषुवतीय जलवायु (0 से 10 अक्षांश ) यहाँ दैनिक तापमान सामान्य रहता है(21 से 26 ) यहाँ दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर न्यूनतम होता है, मौसम में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता यह निम्न बायुदाबका क्षेत्र है अतः यहाँ वायु का अभिसरण होता है अतः यह अभिसरण क्षेत्र हैं, यहाँ वायु का संवहन/आरोहन होता है कभी कभी इसमें विषुवतीय पछुआ का संचलन होता है यहाँ सालो भर वर्षा होती है, यहाँ आर्द्रता सालों भर अधिक रहती है यहां मानव के लिए जलवायविक अनुकूलता कम होती है और जबकि अन्य जीव जंतुओं के अनुकूल होती है यहाँ विषुवतीय वर्षा वन पाए जाते हैं जैसे दक्षिण अमेरिका का सेलवास(अमेजन) यहाँ सूक्ष्म जीवाणुओं का अधिक विकास होता है जिससे बीमारियाँ अधिक फैलती हैं और मृत्युदर बढ़ जाती है जिसका प्रभाव जन्मदर पर पड़ता है (अधिक)अतः सामाजिक आर्थिक विकास कम रहता है उष्ण कटिबन्धीय जलवायु (10 से 30 अक्षांश ) यहाँ तापमान में मौसमी परिवर्तन देख सकते हैं गर्मी में तापमान बहुत अधिक और सर्दी में बहुत कम होता है वार्षिक तापान्तर विषुवतीय क्षेत्र से अधिक होता है ये प्रचलित पवनों का क्षेत्र है यहाँ व्यापारिक पवन प्रवाहित होती है व्यापारिक पवन उत्तरी गोलार्ध में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर चलेगी इससे पूर्वी तट पर सालों भर वर्षा होती है, महाद्वीपों के मध्य भाग में वर्षा कम होगी जबकि वार्षिक तापान्तर बहुत अधिक हो जाता है पश्चिमीभाग में वर्षा न्यूनतम हो जाती है जिससे तटीय क्षेत्र में मरुस्थलों का निर्माण होता है, इसका कारण दैनिक तापान्तर का अधिक होना है भूमध्य सागरीय जलवायु (30 से 45 अक्षांश ) वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण से यह दो प्रचलित पवनों का क्षेत्र है| इस क्षेत्र में गर्मी में व्यापारिक पवन प्रवाहित होती है जबकि सर्दी में पछुआ पवन प्रवाहित होती है इस क्षेत्र में व्यापारिक एवं पछुआ पवन दोनों तटवर्ती हो जाती हैं गर्मी के दिनों में पश्चिमी भाग में वर्षा कम होगी जबकि पूर्वी भाग(चीनी जलवायु) में वर्षा होती है(व्यापारिक पवनों के कारण) पछुआ पवन के प्रभाव के अंतर्गत पश्चिमी भाग में सर्दियों में वर्षा होगी जबकि पूर्वी भाग शुष्क रहता है यह रसदार फलों एवं सब्जियों के लिए विश्व में सबसे अधिक उपयुक्त जलवायु है ब्रिटिश तुल्य जलवायु (45 से 55 अक्षांश ) यह पछुआ पवनों का क्षेत्र है यहाँ भी तीन प्रकार की जलवायु विकसित होती है पश्चिमी भाग में पछुआ पवन तटवर्ती होती है जिसके प्रभाव क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है जिसे ब्रिटिश तुल्य जलवायु कहते हैं यहाँ महाद्वीपों के मध्य भाग में स्टेपी जलवायु पायी जाती है महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में वर्षा बिलकुल कम हो जाती है किन्तु इस क्षेत्र में शीतोष्ण चक्रवात से चक्र्वातीय वर्षा हो जाती है,इसके साथ ही तापमान की कमी के कारण वाष्पोत्सर्जन कम होता है अतः यहाँ मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है| टैगा जलवायु (55 से 65 अक्षांश ) यह निम्नवायुदाब का क्षेत्र है अतः इस क्षेत्र में वर्षा सालों भर होती है यहाँ विकसित कोणधारी वनों को टैगा वन कहते हैं, इस क्षेत्र के वनों को बोरियल वन भी कहते हैं यह जलवायु दक्षिणी गोलार्ध में नहीं पायी जाती है इसका प्रमुख विस्तार रूस एवं कनाडा में पाया जाता है टुंड्रा जलवायु (65 से 90 अक्षांश ) यहाँ तापमान बहुत कम होता है| यहाँ वनस्पतियों का विकास नहीं हो पाता है| केवल मोस एवं लाइकेन जैसी वनस्पतियों का विकास हो पाता है यह क्षेत्र हिमवासी जनजातियों जैसे एस्किमो आदि का निवास स्थान होता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भौतिक आगतों यथा तापमान, वायुदाब, वर्षा की मात्रा, वायु संचलन आदि के कारण पृथ्वी पर अनेक जलवायु क्षेत्रों का विकास हुआ है| इन सभी के अंतर्गत विशिष्ट सामाजिक आर्थिक स्थितियों का विकास होता है और संसाधनों की उपलब्धता एवं उनके दोहन स्तर के आधार पर विकास सुनिश्चित होता है|
##Question:विश्व के जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण करते हुए इनकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये (150-200 शब्द/10 अंक) Classify the climatic regions of the world and discuss their characteristics (150-200 words/10 Marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जलवायु को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण करते हुए इनकी विशेषताओं की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये जलवायु एक विस्तृत एवं व्यापक शब्द है जिससे किसी प्रदेश के दीर्घकालीन मौसम का आभास होता है| इस शब्द की व्युत्पत्ति जल एवं वायु के पारस्परिक सम्मिलन से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ वायुमण्डल के जल एवं वायु प्रारूप से है| यह शब्द वायुमण्डल के संघटन का द्योतक है| एक अन्य परिभाषा के अनुसार एक लम्बी कालावधि तक पृथ्वी एवं वायुमण्डल में ऊर्जा एवं पदार्थ के विनिमय की क्रियाओं का प्रतिफल जलवायु है| अतः जलवायु न केवल सांख्यिकीय औसत से बढ़कर है अपितु इसके अन्तर्गत ऊष्मा, आर्द्रता तथा पवन-संचलन जैसी वायुमण्डलीय दशाओं का योग सम्मिलित है| भौतिक आगतों में अंतर के कारण पृथ्वी पर विभिन्न जलवायु प्रदेशों का विकास हुआ है और इनकी विशेषताएं अलग अलग हैं| जलवायु का वर्गीकरण विषुवतीय जलवायु (0 से 10 अक्षांश ) यहाँ दैनिक तापमान सामान्य रहता है(21 से 26 ) यहाँ दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर न्यूनतम होता है, मौसम में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता यह निम्न बायुदाबका क्षेत्र है अतः यहाँ वायु का अभिसरण होता है अतः यह अभिसरण क्षेत्र हैं, यहाँ वायु का संवहन/आरोहन होता है कभी कभी इसमें विषुवतीय पछुआ का संचलन होता है यहाँ सालो भर वर्षा होती है, यहाँ आर्द्रता सालों भर अधिक रहती है यहां मानव के लिए जलवायविक अनुकूलता कम होती है और जबकि अन्य जीव जंतुओं के अनुकूल होती है यहाँ विषुवतीय वर्षा वन पाए जाते हैं जैसे दक्षिण अमेरिका का सेलवास(अमेजन) यहाँ सूक्ष्म जीवाणुओं का अधिक विकास होता है जिससे बीमारियाँ अधिक फैलती हैं और मृत्युदर बढ़ जाती है जिसका प्रभाव जन्मदर पर पड़ता है (अधिक)अतः सामाजिक आर्थिक विकास कम रहता है उष्ण कटिबन्धीय जलवायु (10 से 30 अक्षांश ) यहाँ तापमान में मौसमी परिवर्तन देख सकते हैं गर्मी में तापमान बहुत अधिक और सर्दी में बहुत कम होता है वार्षिक तापान्तर विषुवतीय क्षेत्र से अधिक होता है ये प्रचलित पवनों का क्षेत्र है यहाँ व्यापारिक पवन प्रवाहित होती है व्यापारिक पवन उत्तरी गोलार्ध में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर चलेगी इससे पूर्वी तट पर सालों भर वर्षा होती है, महाद्वीपों के मध्य भाग में वर्षा कम होगी जबकि वार्षिक तापान्तर बहुत अधिक हो जाता है पश्चिमीभाग में वर्षा न्यूनतम हो जाती है जिससे तटीय क्षेत्र में मरुस्थलों का निर्माण होता है, इसका कारण दैनिक तापान्तर का अधिक होना है भूमध्य सागरीय जलवायु (30 से 45 अक्षांश ) वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण से यह दो प्रचलित पवनों का क्षेत्र है| इस क्षेत्र में गर्मी में व्यापारिक पवन प्रवाहित होती है जबकि सर्दी में पछुआ पवन प्रवाहित होती है इस क्षेत्र में व्यापारिक एवं पछुआ पवन दोनों तटवर्ती हो जाती हैं गर्मी के दिनों में पश्चिमी भाग में वर्षा कम होगी जबकि पूर्वी भाग(चीनी जलवायु) में वर्षा होती है(व्यापारिक पवनों के कारण) पछुआ पवन के प्रभाव के अंतर्गत पश्चिमी भाग में सर्दियों में वर्षा होगी जबकि पूर्वी भाग शुष्क रहता है यह रसदार फलों एवं सब्जियों के लिए विश्व में सबसे अधिक उपयुक्त जलवायु है ब्रिटिश तुल्य जलवायु (45 से 55 अक्षांश ) यह पछुआ पवनों का क्षेत्र है यहाँ भी तीन प्रकार की जलवायु विकसित होती है पश्चिमी भाग में पछुआ पवन तटवर्ती होती है जिसके प्रभाव क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है जिसे ब्रिटिश तुल्य जलवायु कहते हैं यहाँ महाद्वीपों के मध्य भाग में स्टेपी जलवायु पायी जाती है महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में वर्षा बिलकुल कम हो जाती है किन्तु इस क्षेत्र में शीतोष्ण चक्रवात से चक्र्वातीय वर्षा हो जाती है,इसके साथ ही तापमान की कमी के कारण वाष्पोत्सर्जन कम होता है अतः यहाँ मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है| टैगा जलवायु (55 से 65 अक्षांश ) यह निम्नवायुदाब का क्षेत्र है अतः इस क्षेत्र में वर्षा सालों भर होती है यहाँ विकसित कोणधारी वनों को टैगा वन कहते हैं, इस क्षेत्र के वनों को बोरियल वन भी कहते हैं यह जलवायु दक्षिणी गोलार्ध में नहीं पायी जाती है इसका प्रमुख विस्तार रूस एवं कनाडा में पाया जाता है टुंड्रा जलवायु (65 से 90 अक्षांश ) यहाँ तापमान बहुत कम होता है| यहाँ वनस्पतियों का विकास नहीं हो पाता है| केवल मोस एवं लाइकेन जैसी वनस्पतियों का विकास हो पाता है यह क्षेत्र हिमवासी जनजातियों जैसे एस्किमो आदि का निवास स्थान होता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भौतिक आगतों यथा तापमान, वायुदाब, वर्षा की मात्रा, वायु संचलन आदि के कारण पृथ्वी पर अनेक जलवायु क्षेत्रों का विकास हुआ है| इन सभी के अंतर्गत विशिष्ट सामाजिक आर्थिक स्थितियों का विकास होता है और संसाधनों की उपलब्धता एवं उनके दोहन स्तर के आधार पर विकास सुनिश्चित होता है|
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1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में जो ढांचा बना, वह कुछ संशोधनों के साथ 1858 तक जारी रहा | इस कथन को स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द/10अंक ) The framework made in the context of Indian administration in the Pitt"s India act of 1784, continued till 1858 with some amendments. Clarify this statement. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- भूमिका में 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट को बताते हुए पिट्स इंडिया एक्ट का भी परिचय दीजिये | इसके बाद 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट को विस्तार से बताते हुए इसके महत्व को भी बताइए अंत में 1784 के एक्ट के बाद से 1858 तक के एक्ट का संक्षिप्त परिचय दीजिये | उत्तर- 1757 के प्लासी के युद्ध एवं 1764 के बक्सर युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर शासन का शिकंजा कसा और इसी शासन को अपने अनुकूल बनाये रखने के लिए कई एक्ट पारित किये | इन प्रावधानों में सबसे पहला रेगुलातिंग एक्ट था | 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट में बहुत से प्रावधानों को सम्मिलित किये जाने के बावजूद भी इसमें संशोधन की आवश्यकता महसूस की गयी , जिसके परिणामस्वरूप 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया |इस एक्ट में निम्नलिखित प्रावधान किये गए - इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का आरम्भ हुआ - (1) बोर्ड ऑफ डायरेक्टेर्स - व्यापारिक मामलों के लिए (2)बोर्ड ऑफ कंट्रोलर - राजनीतिक मामलों के लिए छह सदस्यीय बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का गठन किया गया ,जिसमे दो ब्रिटिश कैबिनेट के सदस्य थे और शेष प्रिवी काउंसिल के सदस्य थे | गवर्नर जनरल को यह अधिकार दे दिया गया था कि वह कमजोर प्रांतीय सरकारों को समाप्त कर सकती है | उपर्युक्त प्रावधानों को भी समय समय पर संशोधित किया जाता रहा | जैसे - 1793 एक्ट के अनुसार नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों व कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से ही दिया जाना सुनिश्चित कर दिया गया | 1813 के चार्टर अधिनियम के द्वारा कंपनी के अधिकारपत्र को 20 वर्षों तक के लिए बढ़ा दिया गया | 1813 के चार्टर एक्ट में कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया | 1833 के चार्टर एक्ट में विधिक परामर्श हेतु गवर्नर जनरल की परिषद में विधि सदस्य के रूप में एक सदस्य को शामिल किया गया | 1833 के चार्टर द्वारा कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए | 1853 के चार्टर एक्ट के अनुसार कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गयी | 1853 के अनुसार ही कंपनी के पदों को भरने के लिए मैकाले समिति का गठन किया गया | 1858 के द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर एवं बोर्ड ऑफ कंट्रोलर को हटाकर ब्रिटिश मंत्रिमंडल में एक सदस्य के रूप में भारत के राज्य सचिव की नियुक्ति की गयी | 1858 में ही गवर्नर जनरल का नाम बदलकर वाइसराय कर दिया गया और लार्ड कैनिंग भारत के प्रथम वाइसराय हुए | इस प्रकार समय समय पर लाये जाने वाले विभिन्न एक्ट के माध्यम से महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे, जो ब्रिटिश सरकार के पक्ष में थे और उससे वे लगातार लाभान्वित हो रहे थे |
##Question:1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में जो ढांचा बना, वह कुछ संशोधनों के साथ 1858 तक जारी रहा | इस कथन को स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द/10अंक ) The framework made in the context of Indian administration in the Pitt"s India act of 1784, continued till 1858 with some amendments. Clarify this statement. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- भूमिका में 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट को बताते हुए पिट्स इंडिया एक्ट का भी परिचय दीजिये | इसके बाद 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट को विस्तार से बताते हुए इसके महत्व को भी बताइए अंत में 1784 के एक्ट के बाद से 1858 तक के एक्ट का संक्षिप्त परिचय दीजिये | उत्तर- 1757 के प्लासी के युद्ध एवं 1764 के बक्सर युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर शासन का शिकंजा कसा और इसी शासन को अपने अनुकूल बनाये रखने के लिए कई एक्ट पारित किये | इन प्रावधानों में सबसे पहला रेगुलातिंग एक्ट था | 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट में बहुत से प्रावधानों को सम्मिलित किये जाने के बावजूद भी इसमें संशोधन की आवश्यकता महसूस की गयी , जिसके परिणामस्वरूप 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया |इस एक्ट में निम्नलिखित प्रावधान किये गए - इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का आरम्भ हुआ - (1) बोर्ड ऑफ डायरेक्टेर्स - व्यापारिक मामलों के लिए (2)बोर्ड ऑफ कंट्रोलर - राजनीतिक मामलों के लिए छह सदस्यीय बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का गठन किया गया ,जिसमे दो ब्रिटिश कैबिनेट के सदस्य थे और शेष प्रिवी काउंसिल के सदस्य थे | गवर्नर जनरल को यह अधिकार दे दिया गया था कि वह कमजोर प्रांतीय सरकारों को समाप्त कर सकती है | उपर्युक्त प्रावधानों को भी समय समय पर संशोधित किया जाता रहा | जैसे - 1793 एक्ट के अनुसार नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों व कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से ही दिया जाना सुनिश्चित कर दिया गया | 1813 के चार्टर अधिनियम के द्वारा कंपनी के अधिकारपत्र को 20 वर्षों तक के लिए बढ़ा दिया गया | 1813 के चार्टर एक्ट में कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया | 1833 के चार्टर एक्ट में विधिक परामर्श हेतु गवर्नर जनरल की परिषद में विधि सदस्य के रूप में एक सदस्य को शामिल किया गया | 1833 के चार्टर द्वारा कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए | 1853 के चार्टर एक्ट के अनुसार कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गयी | 1853 के अनुसार ही कंपनी के पदों को भरने के लिए मैकाले समिति का गठन किया गया | 1858 के द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर एवं बोर्ड ऑफ कंट्रोलर को हटाकर ब्रिटिश मंत्रिमंडल में एक सदस्य के रूप में भारत के राज्य सचिव की नियुक्ति की गयी | 1858 में ही गवर्नर जनरल का नाम बदलकर वाइसराय कर दिया गया और लार्ड कैनिंग भारत के प्रथम वाइसराय हुए | इस प्रकार समय समय पर लाये जाने वाले विभिन्न एक्ट के माध्यम से महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे, जो ब्रिटिश सरकार के पक्ष में थे और उससे वे लगातार लाभान्वित हो रहे थे |
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1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में जो ढांचा बना, वह कुछ संशोधनों के साथ 1858 तक जारी रहा | इस कथन को स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द/ 10 अंक) The framework made in the context of Indian administration in the pitt"s India act of 1784, continued till 1858 with some amendments. Clarify this statement. (150-200 words/ 10 Marks )
एप्रोच- भूमिका में 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट को बताते हुए पिट्स इंडिया एक्ट का भी परिचय दीजिये | इसके बाद 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट को विस्तार से बताते हुए इसके महत्व को भी बताइए अंत में 1784 के एक्ट के बाद से 1858 तक के एक्ट का संक्षिप्त परिचय दीजिये | उत्तर- 1757 के प्लासी के युद्ध एवं 1764 के बक्सर युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर शासन का शिकंजा कसा और इसी शासन को अपने अनुकूल बनाये रखने के लिए कई एक्ट पारित किये | इन प्रावधानों में सबसे पहला रेगुलातिंग एक्ट था | 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट में बहुत से प्रावधानों को सम्मिलित किये जाने के बावजूद भी इसमें संशोधन की आवश्यकता महसूस की गयी , जिसके परिणामस्वरूप 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया |इस एक्ट में निम्नलिखित प्रावधान किये गए - इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का आरम्भ हुआ - (1) बोर्ड ऑफ डायरेक्टेर्स - व्यापारिक मामलों के लिए (2)बोर्ड ऑफ कंट्रोलर - राजनीतिक मामलों के लिए छह सदस्यीय बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का गठन किया गया ,जिसमे दो ब्रिटिश कैबिनेट के सदस्य थे और शेष प्रिवी काउंसिल के सदस्य थे | गवर्नर जनरल को यह अधिकार दे दिया गया था कि वह कमजोर प्रांतीय सरकारों को समाप्त कर सकती है | उपर्युक्त प्रावधानों को भी समय समय पर संशोधित किया जाता रहा | जैसे - 1793 एक्ट के अनुसार नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों व कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से ही दिया जाना सुनिश्चित कर दिया गया | 1813 के चार्टर अधिनियम के द्वारा कंपनी के अधिकारपत्र को 20 वर्षों तक के लिए बढ़ा दिया गया | 1813 के चार्टर एक्ट में कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया | 1833 के चार्टर एक्ट में विधिक परामर्श हेतु गवर्नर जनरल की परिषद में विधि सदस्य के रूप में एक सदस्य को शामिल किया गया | 1833 के चार्टर द्वारा कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए | 1853 के चार्टर एक्ट के अनुसार कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गयी | 1853 के अनुसार ही कंपनी के पदों को भरने के लिए मैकाले समिति का गठन किया गया | 1858 के द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर एवं बोर्ड ऑफ कंट्रोलर को हटाकर ब्रिटिश मंत्रिमंडल में एक सदस्य के रूप में भारत के राज्य सचिव की नियुक्ति की गयी | 1858 में ही गवर्नर जनरल का नाम बदलकर वाइसराय कर दिया गया और लार्ड कैनिंग भारत के प्रथम वाइसराय हुए | इस प्रकार समय समय पर लाये जाने वाले विभिन्न एक्ट के माध्यम से महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे, जो ब्रिटिश सरकार के पक्ष में थे और उससे वे लगातार लाभान्वित हो रहे थे |
##Question:1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में जो ढांचा बना, वह कुछ संशोधनों के साथ 1858 तक जारी रहा | इस कथन को स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द/ 10 अंक) The framework made in the context of Indian administration in the pitt"s India act of 1784, continued till 1858 with some amendments. Clarify this statement. (150-200 words/ 10 Marks )##Answer:एप्रोच- भूमिका में 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट को बताते हुए पिट्स इंडिया एक्ट का भी परिचय दीजिये | इसके बाद 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट को विस्तार से बताते हुए इसके महत्व को भी बताइए अंत में 1784 के एक्ट के बाद से 1858 तक के एक्ट का संक्षिप्त परिचय दीजिये | उत्तर- 1757 के प्लासी के युद्ध एवं 1764 के बक्सर युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर शासन का शिकंजा कसा और इसी शासन को अपने अनुकूल बनाये रखने के लिए कई एक्ट पारित किये | इन प्रावधानों में सबसे पहला रेगुलातिंग एक्ट था | 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट में बहुत से प्रावधानों को सम्मिलित किये जाने के बावजूद भी इसमें संशोधन की आवश्यकता महसूस की गयी , जिसके परिणामस्वरूप 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया |इस एक्ट में निम्नलिखित प्रावधान किये गए - इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का आरम्भ हुआ - (1) बोर्ड ऑफ डायरेक्टेर्स - व्यापारिक मामलों के लिए (2)बोर्ड ऑफ कंट्रोलर - राजनीतिक मामलों के लिए छह सदस्यीय बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का गठन किया गया ,जिसमे दो ब्रिटिश कैबिनेट के सदस्य थे और शेष प्रिवी काउंसिल के सदस्य थे | गवर्नर जनरल को यह अधिकार दे दिया गया था कि वह कमजोर प्रांतीय सरकारों को समाप्त कर सकती है | उपर्युक्त प्रावधानों को भी समय समय पर संशोधित किया जाता रहा | जैसे - 1793 एक्ट के अनुसार नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों व कर्मचारियों का वेतन भारतीय राजस्व से ही दिया जाना सुनिश्चित कर दिया गया | 1813 के चार्टर अधिनियम के द्वारा कंपनी के अधिकारपत्र को 20 वर्षों तक के लिए बढ़ा दिया गया | 1813 के चार्टर एक्ट में कंपनी के भारत के साथ व्यापार करने के एकाधिकार को छीन लिया गया | 1833 के चार्टर एक्ट में विधिक परामर्श हेतु गवर्नर जनरल की परिषद में विधि सदस्य के रूप में एक सदस्य को शामिल किया गया | 1833 के चार्टर द्वारा कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए | 1853 के चार्टर एक्ट के अनुसार कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गयी | 1853 के अनुसार ही कंपनी के पदों को भरने के लिए मैकाले समिति का गठन किया गया | 1858 के द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर एवं बोर्ड ऑफ कंट्रोलर को हटाकर ब्रिटिश मंत्रिमंडल में एक सदस्य के रूप में भारत के राज्य सचिव की नियुक्ति की गयी | 1858 में ही गवर्नर जनरल का नाम बदलकर वाइसराय कर दिया गया और लार्ड कैनिंग भारत के प्रथम वाइसराय हुए | इस प्रकार समय समय पर लाये जाने वाले विभिन्न एक्ट के माध्यम से महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे, जो ब्रिटिश सरकार के पक्ष में थे और उससे वे लगातार लाभान्वित हो रहे थे |
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पृथ्वी पर बहने वाली पवनों को मुख्यतः तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है; प्राथमिक पवनें, कालिक पवनें एवं स्थानीय पवनें। चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द; 10 अंक) Winds blowing on the earth can be classified mainly into three parts; Primary Winds, Periodic Winds and Local Winds. Discuss. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में पवन को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंपृथ्वी पर बहने वाली मुख्य पवनों जैसे,प्राथमिक पवनें, कालिक पवनें एवं स्थानीय पवनों के वर्गीकरण की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- गतिशील वायु को पवन कहते हैं। पृथ्वी के धरातल पर वायुदाब में क्षैतिज विषमताओं के कारण पवनउच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है। यहपृथ्वी के लगभग समानांतर बहती है।पवन कई कारणों से अपनी दिशा में परिवर्तन करती हुई चलती हैं जैसे दाब प्रवणता बल, कॉरिऑलिस प्रभाव (Coriolis effect), अभिकेंद्रीय त्वरण और भू-घर्षण इत्यादि। पृथ्वी पर बहने वाली मुख्य पवनें:- प्राथमिक पवन:- येपवनें आधारभूत और व्यापक पवन संचार कीप्रणाली है। इन पवनों को पृथ्वीका प्राथमिक परिसंचरण कहा जाता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न वायुमंडलीय हलचलें या परिघटना इनपवनोंसे संबंधित है। इनपवनों को प्रचलित पवनें (popular wind) भी कहा जाता है। इन पवनों को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है- व्यापारिक पवनें:- ये पवनेंउपोष्ण उच्चवायुदाब पेटी से विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी ओर प्रवाहित होती हैं।इनकी दिशा उत्तरी गोलार्ध में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर होती है। यही कारण है की व्यापारिक पवनें उत्तरी गोलार्ध में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवनें कहलाती है। व्यापारिक पवनें उष्णकटिबंधीय महाद्वीपों में पूर्वी तटीय भाग पर वर्षा का प्रमुख माध्यम है, लेकिन पश्चिम की ओर यह क्रमशः शुष्क हो जाती है। व्यापारिक पवनों के अभिशरण से ही अतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का विकास होता है। यह एक गर्म क्षेत्र है जो विषुवतीय पेटी से बाहर कर्क-मकर रेखा के मध्य होता है. इन्हीं क्षेत्रों में निम्न वायुदाब के कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति होती है। पछुआ पवनें:- ये पवनेंउपोष्ण उच्चवायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर प्रवाहित होती है। पछुआ पवनें व्यापारिक पवनों की विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व होती है। इसीलिए उत्तरी गोलार्द्ध में इसे दक्षिण पश्चिम पछुआ पवन और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर पश्चिम पछुआ पवन कहते हैं। इन पवनोंके कारण शीतोष्णकटिबंधीय महाद्वीपों के पश्चिमी तटीय भागों पर पर्याप्त वर्षा होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में सागरीय भागों की अधिकता के कारण उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्ध में इनकी गति में अधिक वृद्धि हो जाती है। इसीलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में पछुआ पवनों को 40° अक्षांश के पास गरजती चालीसा (Roaring Forties), 50° अक्षांश के पास भयंकर पचासा (Furious Fifties) और 60° अक्षांश के पास चीखती साठा (Shrieking Sixties) कहा जाता है। ध्रुवीय पवनें:- ये ठंडी पवनेंहैं। येध्रुवीय उच्चवायुदाब से उत्पन्न होती हैं।ध्रुवीय पवनें व्यापारिक पवनों की दिशा का अनुशरण करती हैं। येउत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर प्रवाहित होती हैं।ध्रुवीय पवनों से महाद्वीपों के पूर्वी तटीय भाग पर थोड़ी मात्रा मेंवर्षा होती है। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में दो ऐसी राशियों का अभिसरण होता है जिनके भौतिक गुणों विशेषकर तापमान तथा आद्रता में काफी अंतर होता है इसलिए वे आपस में आसानी से मिल नहीं पाती हैं। अर्थात एक संक्रमण क्षेत्र का निर्माण होता है जहां पर तापान्तर के कारण ऊर्जा का आदान प्रदान होता है। इस संक्रमण क्षेत्र को हम वाताग्र कहते हैं जो वायुमंडलीय विक्षोभों तथा अन्य प्रकार के मौसमी परिवर्तन का केंद्र बन जाता है। कालिक पवनें: - समय के साथ दिशा में परिवर्तन को कालिक पवन कहते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार की होती हैं- दैनिक पवनें:- स्थल समीर:- रात में जल की अपेक्षा स्थल जल्दी ठण्डा हो जाता है, अतः समुद्र पर निम्न दाब तथा धरातल पर उच्च दाब बन जाता है। इसके कारण हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती हैं, जिन्हें स्थल समीर कहा जाता है। जल समीर:- दिन में जल की अपेक्षा स्थल जल्दी गर्म हो जाता है, इसलिए स्थल पर निम्न दाब बन जाता है, इसके कारण समुद्र से ठण्डी हवाएँ स्थल की ओर बहने लगती हैं, जिन्हें जल समीर कहा जाता है। घाटी एवं पर्वतीय समीर:- घाटी एवं पर्वतीय समीर पर्वतीय क्षेत्रों में घाटी और पर्वत के अपेक्षाकृत ऊपरी भाग के मध्य दिन एवं रात के तापमान में अंतर के कारण बहती है। मानसूनी पवनें:- जल एवं स्थल की स्वभावगत विशेषता के कारण इन दोनों के तापमान में अन्तर आने से हवा के दबाव में जो अन्तर आता है, वही मानसून के लिए जिम्मेदार है। जैसे भारत में दक्षिणी पश्चमी मानसून को लाने वाली पवनें। स्थानीय पवनें:- ये पवनेंमुख्यतः स्थानीय स्तर पर तापमान एवं वायुदाब की विशिष्ट दशाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है। स्थानीय पवनों को उनकी प्रकृति के अनुसार गर्म एवं ठंडी पवन में विभाजित किया जाता है। गर्म पवनों में चिनूक, फोन, सिराको, हरमट्टान, लू इत्यादि शामिल हैं औरठंडी पवनों में बोरा, मिस्ट्रल और ब्लिजार्ड इत्यादि आतीहैं।स्थानीय पवनें हालाँकि अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों में प्रभावी होती हैं,लेकिन क्षेत्र विशेष के मौसम और जलवायु कीये प्रमुख निर्धारक तत्व होती हैं। इस प्रकार पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न प्रकार की पवनें बहती हैं, जिनका मौसम एवं जलवायु की दशाओं के निर्धारण में प्रमुखयोगदान होता है।
##Question:पृथ्वी पर बहने वाली पवनों को मुख्यतः तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है; प्राथमिक पवनें, कालिक पवनें एवं स्थानीय पवनें। चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द; 10 अंक) Winds blowing on the earth can be classified mainly into three parts; Primary Winds, Periodic Winds and Local Winds. Discuss. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में पवन को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंपृथ्वी पर बहने वाली मुख्य पवनों जैसे,प्राथमिक पवनें, कालिक पवनें एवं स्थानीय पवनों के वर्गीकरण की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- गतिशील वायु को पवन कहते हैं। पृथ्वी के धरातल पर वायुदाब में क्षैतिज विषमताओं के कारण पवनउच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है। यहपृथ्वी के लगभग समानांतर बहती है।पवन कई कारणों से अपनी दिशा में परिवर्तन करती हुई चलती हैं जैसे दाब प्रवणता बल, कॉरिऑलिस प्रभाव (Coriolis effect), अभिकेंद्रीय त्वरण और भू-घर्षण इत्यादि। पृथ्वी पर बहने वाली मुख्य पवनें:- प्राथमिक पवन:- येपवनें आधारभूत और व्यापक पवन संचार कीप्रणाली है। इन पवनों को पृथ्वीका प्राथमिक परिसंचरण कहा जाता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न वायुमंडलीय हलचलें या परिघटना इनपवनोंसे संबंधित है। इनपवनों को प्रचलित पवनें (popular wind) भी कहा जाता है। इन पवनों को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है- व्यापारिक पवनें:- ये पवनेंउपोष्ण उच्चवायुदाब पेटी से विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी ओर प्रवाहित होती हैं।इनकी दिशा उत्तरी गोलार्ध में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर होती है। यही कारण है की व्यापारिक पवनें उत्तरी गोलार्ध में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवनें कहलाती है। व्यापारिक पवनें उष्णकटिबंधीय महाद्वीपों में पूर्वी तटीय भाग पर वर्षा का प्रमुख माध्यम है, लेकिन पश्चिम की ओर यह क्रमशः शुष्क हो जाती है। व्यापारिक पवनों के अभिशरण से ही अतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का विकास होता है। यह एक गर्म क्षेत्र है जो विषुवतीय पेटी से बाहर कर्क-मकर रेखा के मध्य होता है. इन्हीं क्षेत्रों में निम्न वायुदाब के कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति होती है। पछुआ पवनें:- ये पवनेंउपोष्ण उच्चवायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर प्रवाहित होती है। पछुआ पवनें व्यापारिक पवनों की विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व होती है। इसीलिए उत्तरी गोलार्द्ध में इसे दक्षिण पश्चिम पछुआ पवन और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर पश्चिम पछुआ पवन कहते हैं। इन पवनोंके कारण शीतोष्णकटिबंधीय महाद्वीपों के पश्चिमी तटीय भागों पर पर्याप्त वर्षा होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में सागरीय भागों की अधिकता के कारण उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्ध में इनकी गति में अधिक वृद्धि हो जाती है। इसीलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में पछुआ पवनों को 40° अक्षांश के पास गरजती चालीसा (Roaring Forties), 50° अक्षांश के पास भयंकर पचासा (Furious Fifties) और 60° अक्षांश के पास चीखती साठा (Shrieking Sixties) कहा जाता है। ध्रुवीय पवनें:- ये ठंडी पवनेंहैं। येध्रुवीय उच्चवायुदाब से उत्पन्न होती हैं।ध्रुवीय पवनें व्यापारिक पवनों की दिशा का अनुशरण करती हैं। येउत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर प्रवाहित होती हैं।ध्रुवीय पवनों से महाद्वीपों के पूर्वी तटीय भाग पर थोड़ी मात्रा मेंवर्षा होती है। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में दो ऐसी राशियों का अभिसरण होता है जिनके भौतिक गुणों विशेषकर तापमान तथा आद्रता में काफी अंतर होता है इसलिए वे आपस में आसानी से मिल नहीं पाती हैं। अर्थात एक संक्रमण क्षेत्र का निर्माण होता है जहां पर तापान्तर के कारण ऊर्जा का आदान प्रदान होता है। इस संक्रमण क्षेत्र को हम वाताग्र कहते हैं जो वायुमंडलीय विक्षोभों तथा अन्य प्रकार के मौसमी परिवर्तन का केंद्र बन जाता है। कालिक पवनें: - समय के साथ दिशा में परिवर्तन को कालिक पवन कहते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार की होती हैं- दैनिक पवनें:- स्थल समीर:- रात में जल की अपेक्षा स्थल जल्दी ठण्डा हो जाता है, अतः समुद्र पर निम्न दाब तथा धरातल पर उच्च दाब बन जाता है। इसके कारण हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती हैं, जिन्हें स्थल समीर कहा जाता है। जल समीर:- दिन में जल की अपेक्षा स्थल जल्दी गर्म हो जाता है, इसलिए स्थल पर निम्न दाब बन जाता है, इसके कारण समुद्र से ठण्डी हवाएँ स्थल की ओर बहने लगती हैं, जिन्हें जल समीर कहा जाता है। घाटी एवं पर्वतीय समीर:- घाटी एवं पर्वतीय समीर पर्वतीय क्षेत्रों में घाटी और पर्वत के अपेक्षाकृत ऊपरी भाग के मध्य दिन एवं रात के तापमान में अंतर के कारण बहती है। मानसूनी पवनें:- जल एवं स्थल की स्वभावगत विशेषता के कारण इन दोनों के तापमान में अन्तर आने से हवा के दबाव में जो अन्तर आता है, वही मानसून के लिए जिम्मेदार है। जैसे भारत में दक्षिणी पश्चमी मानसून को लाने वाली पवनें। स्थानीय पवनें:- ये पवनेंमुख्यतः स्थानीय स्तर पर तापमान एवं वायुदाब की विशिष्ट दशाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है। स्थानीय पवनों को उनकी प्रकृति के अनुसार गर्म एवं ठंडी पवन में विभाजित किया जाता है। गर्म पवनों में चिनूक, फोन, सिराको, हरमट्टान, लू इत्यादि शामिल हैं औरठंडी पवनों में बोरा, मिस्ट्रल और ब्लिजार्ड इत्यादि आतीहैं।स्थानीय पवनें हालाँकि अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों में प्रभावी होती हैं,लेकिन क्षेत्र विशेष के मौसम और जलवायु कीये प्रमुख निर्धारक तत्व होती हैं। इस प्रकार पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न प्रकार की पवनें बहती हैं, जिनका मौसम एवं जलवायु की दशाओं के निर्धारण में प्रमुखयोगदान होता है।
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प्रशासन में विकेंद्रीकरण को मजबूत करने में स्थानीय निकायों के महत्व को स्पष्ट कीजिए तथा इनकी वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए सुझाव दीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the importance of local bodies in strengthening decentralization in administration and give suggestions for improving their financial condition. (150-200 words; 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में स्थानीय निकायों के बारे में लिखिए। पहले भाग में प्रशासन विकेन्द्रीकरण को मजबूत करने में स्थानीय निकायों के महत्व को लिखिए। इसके बाद वित्तीय स्थिति में सुधार के सुझाव दीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। संविधान में 73वें व 74वें संशोधन के माध्यम से क्रमशः पंचायती राज व्यवस्था तथा स्थानीय शहरी स्वशासन प्रणाली की शुरुआत की गयी। संयुक्त रूप से इस व्यवस्था ने स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने में सहायता की। विकेन्द्रीकरण को मजबूत करने में स्थानीय निकायों का महत्व: इसके माध्यम से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की व्यवस्था स्थापित किया गया। जिसमें जमीनी स्तर पर महिला, पिछड़े वर्ग, एससी/एसटी की भागीदारी में वृद्धि हुई। महिलाओं, कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्था लागू की गयी। स्थानीय निकायों में वित्तीय विकेन्द्रीकरण के लिए राजस्व संग्रह को अपनाया गया है। राज्य वित्त आयोग भी इस संबंध में सुझाव दे रहा है। इस व्यवस्था से प्रशासनिक जवाबदेही तय हुई है। नीतियों के कार्यान्वयन में तीव्रता आने लगी है। वित्तीय स्थिति में सुधार के उपाय: गैर-सरकारी समुदाय आधारित व लाभार्थी वर्गों को भागीदार बनाने का प्रयास किया जाए। पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष, AMRUT का सदुपयोग करते हुए वित्तीय संसाधनों के वितरण को तर्क संगत बनाना चाहिए। पेशा अधिनियम के माध्यम से वन बहुल क्षेत्रों में प्रकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। वित्तीय सूचना प्रणाली गठित करना जिससे कि क्षेत्र की आवश्यकतानुसार आवंटन किया जाए। वित्तीय मामलों को लेकर पंचायत से राज्य स्तर तक पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। इस प्रकार स्थानीय निकायों ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में विकेन्द्रीकरण को मजबूत किया है। इन निकायों के स्थायित्व को बनाए रखने के लिए वित्तीय निर्भरता आवश्यक है। इसके लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा दिये गए उपर्युक्त सुझावों पर अमल किया जाना चाहिए।
##Question:प्रशासन में विकेंद्रीकरण को मजबूत करने में स्थानीय निकायों के महत्व को स्पष्ट कीजिए तथा इनकी वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए सुझाव दीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the importance of local bodies in strengthening decentralization in administration and give suggestions for improving their financial condition. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में स्थानीय निकायों के बारे में लिखिए। पहले भाग में प्रशासन विकेन्द्रीकरण को मजबूत करने में स्थानीय निकायों के महत्व को लिखिए। इसके बाद वित्तीय स्थिति में सुधार के सुझाव दीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। संविधान में 73वें व 74वें संशोधन के माध्यम से क्रमशः पंचायती राज व्यवस्था तथा स्थानीय शहरी स्वशासन प्रणाली की शुरुआत की गयी। संयुक्त रूप से इस व्यवस्था ने स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने में सहायता की। विकेन्द्रीकरण को मजबूत करने में स्थानीय निकायों का महत्व: इसके माध्यम से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की व्यवस्था स्थापित किया गया। जिसमें जमीनी स्तर पर महिला, पिछड़े वर्ग, एससी/एसटी की भागीदारी में वृद्धि हुई। महिलाओं, कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्था लागू की गयी। स्थानीय निकायों में वित्तीय विकेन्द्रीकरण के लिए राजस्व संग्रह को अपनाया गया है। राज्य वित्त आयोग भी इस संबंध में सुझाव दे रहा है। इस व्यवस्था से प्रशासनिक जवाबदेही तय हुई है। नीतियों के कार्यान्वयन में तीव्रता आने लगी है। वित्तीय स्थिति में सुधार के उपाय: गैर-सरकारी समुदाय आधारित व लाभार्थी वर्गों को भागीदार बनाने का प्रयास किया जाए। पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष, AMRUT का सदुपयोग करते हुए वित्तीय संसाधनों के वितरण को तर्क संगत बनाना चाहिए। पेशा अधिनियम के माध्यम से वन बहुल क्षेत्रों में प्रकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। वित्तीय सूचना प्रणाली गठित करना जिससे कि क्षेत्र की आवश्यकतानुसार आवंटन किया जाए। वित्तीय मामलों को लेकर पंचायत से राज्य स्तर तक पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। इस प्रकार स्थानीय निकायों ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में विकेन्द्रीकरण को मजबूत किया है। इन निकायों के स्थायित्व को बनाए रखने के लिए वित्तीय निर्भरता आवश्यक है। इसके लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा दिये गए उपर्युक्त सुझावों पर अमल किया जाना चाहिए।
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कंपनी काल (1757-1858) में शिक्षा के प्रसार के लिए किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इस शिक्षा नीति के उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द) Mention the efforts made for the expansion of education in comapny period. (1757-1858). Also evaluate the objectives of this education policy. ( 150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में कंपनी काल के कुछ प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1813 के चार्टर एक्ट से के प्रति अंग्रेजों की बदली नीति का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में शिक्षा के विकास में अंग्रेजो द्वारा अपनाई गयी नीति का मूल्यांकन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - कम्पनी काल (1757-1858) में शिक्षा के प्रसार के लिए अंग्रेजों की शिक्षा नीति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं देखा गया , बल्कि मध्ययुगीन शिक्षा पद्धति ही ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों में जारी रही |हालाँकि कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना अवश्य की गयी , जो निम्नलिखित हैं - 1781 में कलकत्ता मदरसा (वारेन हेस्टिंग्स ) 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (विलियम जोंस ) 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज (जोनाथन डंकन ) 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज (लार्ड वेलेजली ) 1813 के चार्टर एक्ट में भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए 1लाख रुपये की व्यवस्था की गयी , हालाँकि इसे भारतीय भाषा में भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास पर खर्च किया जाए या पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के विकास पर, इसमें विवाद उत्पन्न हो गया |इसे आंग्ल प्राच्य विवाद के नाम से जाना जाता है |लोक शिक्षा के लिए स्थापित सामान्य के 10 सदस्यों में 2 दल बनाये गए थे | एक आंग्ल या पाश्चात्य विद्या का समर्थक था , तो दूसरा प्राच्य | विद्या के समर्थकों का नेतृत्व लोक शिक्षा समिति के सचिव एच.टी.प्रिन्सेप ने किया ,जबकि इनका समर्थन समिति के मंत्री एच .एच.विल्सन ने किया | प्राच्य विद्या के समर्थकों ने वारेन हेस्टिंग्स एवं लार्ड मिन्टों की शिक्षा नीति का समर्थन करते हुए संस्कृत और अरबी भाषा के अध्ययन का समर्थन किया | दूसरी ओर आंग्ल या पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों का नेतृत्व मुनरो एवं एल्फिन्स्टन ने किया |इस दल का समर्थन मैकाले ने भी किया | 1835 में ही गवर्नर बैंटिक ने एक आदेश जारी करते हुए अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया | आकलैंड के शासन काल(1836 - 1842 ) में यह विवाद समाप्त हुआ | आपस में यह सहमति बनी कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि का अधिकाँश भाग अंग्रेजी शिक्षा पर व्यय होगा तथा कुछ राशि प्राच्य शिक्षा पर खर्च होगी | हालाँकि शिक्षा के विकास के लिए "" अधोगामी निस्यन्दन की नीति "" भी अपनाई गयी | शिक्षा के विकास के लिए किये जाने वाले सकारात्मक प्रयास - सरकार द्वारा शिक्षा के विकास के दायित्व का निर्वहन करना | स्कूलों एवं तकनीकी संस्थाओं की स्थापना | समानता,स्वतंत्रता,लोकतंत्र ,राष्ट्रीयता,पंथ निरपेक्षता ,तर्क ,बुद्धिवाद ,व्यक्तिवाद जैसे आधुनिक विचारों का प्रसार करना | महिला शिक्षा की औपचारिक शुरुआत करना | कम्पनी काल में शिक्षा के विकास में कुछ आलोचनात्मक पक्ष - शिक्षा के विकास के लिए निर्धारित राशि का व्यय न किया जाना | अधोगामी निस्यन्दन सिद्धांत का अपनाया जाना | शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना में विलम्ब किया जाना | तकनीकी संस्थाओं में नस्लीय आधार पर भेदभाव किया जाना | सरकारी नौकरी में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाया जाना | इस प्रकार अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा का उपयोग देश में अपनी राजनीतिक सत्ता को मजबूत बनाने के लिए करना चाहा | परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली धीरे-धीरे सरकारी समर्थन के अभाव और उससे अधिक 1844 की सरकारी घोषणा के कारण समाप्त हो गयी |
##Question:कंपनी काल (1757-1858) में शिक्षा के प्रसार के लिए किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इस शिक्षा नीति के उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द) Mention the efforts made for the expansion of education in comapny period. (1757-1858). Also evaluate the objectives of this education policy. ( 150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में कंपनी काल के कुछ प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1813 के चार्टर एक्ट से के प्रति अंग्रेजों की बदली नीति का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में शिक्षा के विकास में अंग्रेजो द्वारा अपनाई गयी नीति का मूल्यांकन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - कम्पनी काल (1757-1858) में शिक्षा के प्रसार के लिए अंग्रेजों की शिक्षा नीति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं देखा गया , बल्कि मध्ययुगीन शिक्षा पद्धति ही ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों में जारी रही |हालाँकि कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना अवश्य की गयी , जो निम्नलिखित हैं - 1781 में कलकत्ता मदरसा (वारेन हेस्टिंग्स ) 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (विलियम जोंस ) 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज (जोनाथन डंकन ) 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज (लार्ड वेलेजली ) 1813 के चार्टर एक्ट में भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए 1लाख रुपये की व्यवस्था की गयी , हालाँकि इसे भारतीय भाषा में भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास पर खर्च किया जाए या पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के विकास पर, इसमें विवाद उत्पन्न हो गया |इसे आंग्ल प्राच्य विवाद के नाम से जाना जाता है |लोक शिक्षा के लिए स्थापित सामान्य के 10 सदस्यों में 2 दल बनाये गए थे | एक आंग्ल या पाश्चात्य विद्या का समर्थक था , तो दूसरा प्राच्य | विद्या के समर्थकों का नेतृत्व लोक शिक्षा समिति के सचिव एच.टी.प्रिन्सेप ने किया ,जबकि इनका समर्थन समिति के मंत्री एच .एच.विल्सन ने किया | प्राच्य विद्या के समर्थकों ने वारेन हेस्टिंग्स एवं लार्ड मिन्टों की शिक्षा नीति का समर्थन करते हुए संस्कृत और अरबी भाषा के अध्ययन का समर्थन किया | दूसरी ओर आंग्ल या पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों का नेतृत्व मुनरो एवं एल्फिन्स्टन ने किया |इस दल का समर्थन मैकाले ने भी किया | 1835 में ही गवर्नर बैंटिक ने एक आदेश जारी करते हुए अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया | आकलैंड के शासन काल(1836 - 1842 ) में यह विवाद समाप्त हुआ | आपस में यह सहमति बनी कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि का अधिकाँश भाग अंग्रेजी शिक्षा पर व्यय होगा तथा कुछ राशि प्राच्य शिक्षा पर खर्च होगी | हालाँकि शिक्षा के विकास के लिए "" अधोगामी निस्यन्दन की नीति "" भी अपनाई गयी | शिक्षा के विकास के लिए किये जाने वाले सकारात्मक प्रयास - सरकार द्वारा शिक्षा के विकास के दायित्व का निर्वहन करना | स्कूलों एवं तकनीकी संस्थाओं की स्थापना | समानता,स्वतंत्रता,लोकतंत्र ,राष्ट्रीयता,पंथ निरपेक्षता ,तर्क ,बुद्धिवाद ,व्यक्तिवाद जैसे आधुनिक विचारों का प्रसार करना | महिला शिक्षा की औपचारिक शुरुआत करना | कम्पनी काल में शिक्षा के विकास में कुछ आलोचनात्मक पक्ष - शिक्षा के विकास के लिए निर्धारित राशि का व्यय न किया जाना | अधोगामी निस्यन्दन सिद्धांत का अपनाया जाना | शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना में विलम्ब किया जाना | तकनीकी संस्थाओं में नस्लीय आधार पर भेदभाव किया जाना | सरकारी नौकरी में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाया जाना | इस प्रकार अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा का उपयोग देश में अपनी राजनीतिक सत्ता को मजबूत बनाने के लिए करना चाहा | परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली धीरे-धीरे सरकारी समर्थन के अभाव और उससे अधिक 1844 की सरकारी घोषणा के कारण समाप्त हो गयी |
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Enumerate the important features of the Disaster Management Act 2005. Discuss various issues in its implementation and suggest an appropriate way forward. (200 words/10 marks)
APPROACH - Brief introduction - Enumerate Important features of the D.M Act 2005 -Discuss some achievements of the Act -Highlight the Various issues in the implementation of the Act - Suggest way forward Answer India took disaster management as its national priority after the 2004 Tsunami and enacted the Disaster Management Act 2005 with an integrated and holistic approach. Important features It constituted an apex body for disaster management called NDMA (National Disaster Management Authority), a separate capacity-building body NIDM (National Institute of Disaster Management) and separate police for a special response, rescue and search NDRF (National Disaster Response Force). The Disaster Management Division of the Ministry of Home Affairs’ retained responsibility for steering the national disaster response overall. It mandated the concerned Ministries and Departments to draw up their own plans in accordance with the National Plan. The Act further contains the provisions for financial mechanisms such as the creation of funds for the response, National Disaster Mitigation Fund and similar funds at the state and district levels. Some important achievements are as follows: NDRMF, (National Disaster Risk Management Framework) has been formulated which has spelled out the roles and guidelines for all stakeholders for the implementation of national strategies and policies. The initiative of the National Composite Risk Assessment collaboration with World Bank, National Hazard Atlas, National Response Plan, National Emergency Operation Center. Provided technical assistance to state disaster authorities. National disaster fund is created for meeting the expenses of emergency preparedness, response, mitigation, relief, and reconstruction. Mainstreaming of DRR (Disaster Risk Reduction) in development projects. It has helped saving lives by its early warning systems in Yemen 2007 cyclone in Sindh and Baluchistan province of Pakistan and other international relief to Srilanka, Myanmar, Indonesia, and Bangladesh. It has saved many lives and property and has mitigated the loss to a commendable extent during the Kedarnath flood, Jammu and Kashmir flood, HudHud Cyclone, and has again proven their worth in international platform during Recent Nepal earthquake as actively within six hours it provided logistics to Nepal. Various Issues in its Implementation: The states have not able to implement the concerned plans. NDMA has failed the states to prepare for the disaster they are vulnerable to. Regarding floods, NDMA has no system in place for the early warnings in the vulnerable areas like Uttrakhand. There is a lack of coordination between the government agencies and ministries responsible for disaster management like the ministry of earth sciences, state governments, and NDMA. NDMA has failed in performing many important functions like recommending the provision of funds for mitigation, as well as relief in repayment of loans or grants of fresh ones. Way Forward Disaster/Crisis Management should continue to be the primary responsibility of the State Governments and the Union Government should play a supportive role. The Act should provide a categorization of disasters (say, local, district, state or national level). This categorization along with the intensity of each type of disaster will help in determining the level of authority primarily responsible for dealing with the disaster as well as the scale of response and relief - detailed guidelines may be stipulated by the NDMA on this subject. The task of implementation of mitigation/prevention and response measures may be left to the State Governments and the district and local authorities with the line ministries/departments of Government of India, playing a supportive role. The law should cast a duty on every public functionary, to promptly inform the concerned authority about any crisis, if he/she feels that such authority does not have such information. The law should create a uniform structure at the apex level to handle all crises. Such a structure may be headed by the Prime Minister at the national level and the Chief Minister at the state level. At the administrative level, the structure is appropriately headed by the Cabinet Secretary and the Chief Secretary respectively. The law should make provisions for stringent punishment for the misutilization of funds meant for crisis/disaster management. The role of the local governments should be brought to the forefront of crisis/disaster management. The NEC as stipulated under the Disaster Management Act need not be constituted, and the NCMC should continue to be the apex coordination body. At the state level, the existing coordination mechanism under the Chief Secretary should continue.
##Question:Enumerate the important features of the Disaster Management Act 2005. Discuss various issues in its implementation and suggest an appropriate way forward. (200 words/10 marks)##Answer:APPROACH - Brief introduction - Enumerate Important features of the D.M Act 2005 -Discuss some achievements of the Act -Highlight the Various issues in the implementation of the Act - Suggest way forward Answer India took disaster management as its national priority after the 2004 Tsunami and enacted the Disaster Management Act 2005 with an integrated and holistic approach. Important features It constituted an apex body for disaster management called NDMA (National Disaster Management Authority), a separate capacity-building body NIDM (National Institute of Disaster Management) and separate police for a special response, rescue and search NDRF (National Disaster Response Force). The Disaster Management Division of the Ministry of Home Affairs’ retained responsibility for steering the national disaster response overall. It mandated the concerned Ministries and Departments to draw up their own plans in accordance with the National Plan. The Act further contains the provisions for financial mechanisms such as the creation of funds for the response, National Disaster Mitigation Fund and similar funds at the state and district levels. Some important achievements are as follows: NDRMF, (National Disaster Risk Management Framework) has been formulated which has spelled out the roles and guidelines for all stakeholders for the implementation of national strategies and policies. The initiative of the National Composite Risk Assessment collaboration with World Bank, National Hazard Atlas, National Response Plan, National Emergency Operation Center. Provided technical assistance to state disaster authorities. National disaster fund is created for meeting the expenses of emergency preparedness, response, mitigation, relief, and reconstruction. Mainstreaming of DRR (Disaster Risk Reduction) in development projects. It has helped saving lives by its early warning systems in Yemen 2007 cyclone in Sindh and Baluchistan province of Pakistan and other international relief to Srilanka, Myanmar, Indonesia, and Bangladesh. It has saved many lives and property and has mitigated the loss to a commendable extent during the Kedarnath flood, Jammu and Kashmir flood, HudHud Cyclone, and has again proven their worth in international platform during Recent Nepal earthquake as actively within six hours it provided logistics to Nepal. Various Issues in its Implementation: The states have not able to implement the concerned plans. NDMA has failed the states to prepare for the disaster they are vulnerable to. Regarding floods, NDMA has no system in place for the early warnings in the vulnerable areas like Uttrakhand. There is a lack of coordination between the government agencies and ministries responsible for disaster management like the ministry of earth sciences, state governments, and NDMA. NDMA has failed in performing many important functions like recommending the provision of funds for mitigation, as well as relief in repayment of loans or grants of fresh ones. Way Forward Disaster/Crisis Management should continue to be the primary responsibility of the State Governments and the Union Government should play a supportive role. The Act should provide a categorization of disasters (say, local, district, state or national level). This categorization along with the intensity of each type of disaster will help in determining the level of authority primarily responsible for dealing with the disaster as well as the scale of response and relief - detailed guidelines may be stipulated by the NDMA on this subject. The task of implementation of mitigation/prevention and response measures may be left to the State Governments and the district and local authorities with the line ministries/departments of Government of India, playing a supportive role. The law should cast a duty on every public functionary, to promptly inform the concerned authority about any crisis, if he/she feels that such authority does not have such information. The law should create a uniform structure at the apex level to handle all crises. Such a structure may be headed by the Prime Minister at the national level and the Chief Minister at the state level. At the administrative level, the structure is appropriately headed by the Cabinet Secretary and the Chief Secretary respectively. The law should make provisions for stringent punishment for the misutilization of funds meant for crisis/disaster management. The role of the local governments should be brought to the forefront of crisis/disaster management. The NEC as stipulated under the Disaster Management Act need not be constituted, and the NCMC should continue to be the apex coordination body. At the state level, the existing coordination mechanism under the Chief Secretary should continue.
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विभिन्न महासागरीय धाराओं की चर्चा करते हुए , उनको प्रभावित करने वाले कारकों पर प्रकाश डालिए । ( 150- 200 शब्द ) Discussing various oceanic currents, throw light on the factors affecting them. (150-200 words)
भूमिका में महासागरीय जलधाराओं की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में विभिन्न वैश्विक जलधाराओं की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में महासागरीय जलधाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये । उत्तर :- महासागरीय जलसमूह जो के निश्चित दिशा में लंबी दूरी तय करता है उसे महासागरीय जलधारा कहते है। पवन के बाद ऊर्जा वितरण का यह दूसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है जो निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश तक ऊर्जा का स्थानांतरण करता है। तापमान के आधार पर यह गर्म और ठंडी हो सकती है। ठंडी जलधारा, ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जबकि गर्म जलधारा विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर चलती है। गति के आधार पर इसे प्रवाह धारा तथा स्ट्रीम में बाटा जाता है। जबकि गहराई के आधार पर इसे धरातलीय, अर्धतलीय और गहरी धारा में बाटा जाता है। कुछ वैश्विक महासागरीय जलधाराओं में उत्तरी विषुवतरेखीय गर्म धारा, गल्फस्ट्रीम की गर्म जलधारा, कनारी की ठण्डी जलधारा, लैब्राडोर की ठण्डी धारा ब्राजील की गर्म धारा, फाकलैण्ड की ठण्डी धारा आदि जोकि अटलांटिक महासागर में में प्रभावित होती है ।इसके साथ ही कुछ प्रशांत महासागरीय जलधाराओं में आयोशिओ की ठंडी जलधारा और कुरोशियों की गर्म जलधारा आदि प्रमुख है। समुद्रीय धारा सागरीय जल की विशिष्टता को भी प्रभावित करती है, जैसे लवणता , घनत्व , वायु दाब तथा पवन के संचलन पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। कभी कभी धाराओ में आकस्मिक परिवतन जैसे अलनिनों और ला नीना, वैश्विक जलवायु परिवर्तन आदि के कारण भी देखा जाता है। इसके अतिरिक्त धाराएँ पोषक तत्वो का स्थानातरण भी करती हैं। महासागरीय धारा को प्रभावित करने वाले कारक - तापमान- अधिक तापमान वाले क्षेत्र में घनत्व कम होने के कारण, समुद्र तल उच्चा होता है और कम तापमान वाले क्षेत्र में घनत्व अधिक होने के कारण समुद्र तल नीचा होता है। परिणाम स्वरूप धरातल पर धाराएँ ध्रुव की ओर चलती है जबकि अधिक घनत्व के कारण नीचे अवतलन के कारण नीचे प्रवेश करके गहरी धारा का निर्माण करती है और ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर गति करती है । प्रचलित पवन - धाराओ को प्रभावित करने वाले सबसे स्पष्ट कारक पवन को माना जाता है। प्रचलित पवन वैश्विक स्तर पर धाराओ के क्षेत्रीय संचलन का निर्माण करता है। सुदूरवर्ती पवन घर्षण बल के द्वारा ऊपरी जल को तट से दूर धकेलती है। जिसको भरने के लिए जल नीचे से ऊपर की ओर आता है। जिसे उपवेललिंग कहा जाता है। परिणाम स्वरूप ठंडी धारा का निर्माण होता है। यह धीरे धीरे विषुवत रेखा की तरफ तटवर्ती पवन के क्षेत्र में गर्म जलधारा का निर्माण करती है। जहां पर डाउनवेल्लिंग होता है। इस प्रकार से अर्धतलीय धारा का निर्माण होता है जो धरतलीय धारा के विपरीत दिशा में चलते हुए, संचलन को पूरा करता है। यही कारण है की व्यापारिक पवन के क्षेत्र में महाद्वीप के पश्चिमी तट पर ठंडी धारा और पूर्वी तट पर गर्म धारा का निर्माण होता है। जबकि पछुवा पवन के क्षेत्र में पश्चिमी तट पर गर्म जलधारा और पूर्वी तट पर ठंडी जलधारा का निर्माण होता है। कोरियालीस बल - इसके कारण धाराएँ उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर मुड़ते हुए घड़ीं की सुई की दिशा में लगभग एक वृत्ताकार पथ पर संचलन करती है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में बाएँ मुड़ते हुए उल्टी दिशा में संचलन करती है। धाराएँ एक वृत्ताकार पट्टे का निर्माण करती है जिसे ज़ायर ( gyre ) कहते है जिसके मध्य भाग में समुद्र तल ऊंचा और शांत होता है। तट रेखा की आकृति - चुकि धाराएँ महाद्वीप को भेद नही सकती है। अतः यह महाद्वीप की तट रेखा का अनुसरण करती हैं। उपरोक्त कारण महासागरीय जलधाराओं को प्रभावित करती हैं ।
##Question:विभिन्न महासागरीय धाराओं की चर्चा करते हुए , उनको प्रभावित करने वाले कारकों पर प्रकाश डालिए । ( 150- 200 शब्द ) Discussing various oceanic currents, throw light on the factors affecting them. (150-200 words) ##Answer: भूमिका में महासागरीय जलधाराओं की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में विभिन्न वैश्विक जलधाराओं की चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में महासागरीय जलधाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिये । उत्तर :- महासागरीय जलसमूह जो के निश्चित दिशा में लंबी दूरी तय करता है उसे महासागरीय जलधारा कहते है। पवन के बाद ऊर्जा वितरण का यह दूसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है जो निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश तक ऊर्जा का स्थानांतरण करता है। तापमान के आधार पर यह गर्म और ठंडी हो सकती है। ठंडी जलधारा, ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जबकि गर्म जलधारा विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर चलती है। गति के आधार पर इसे प्रवाह धारा तथा स्ट्रीम में बाटा जाता है। जबकि गहराई के आधार पर इसे धरातलीय, अर्धतलीय और गहरी धारा में बाटा जाता है। कुछ वैश्विक महासागरीय जलधाराओं में उत्तरी विषुवतरेखीय गर्म धारा, गल्फस्ट्रीम की गर्म जलधारा, कनारी की ठण्डी जलधारा, लैब्राडोर की ठण्डी धारा ब्राजील की गर्म धारा, फाकलैण्ड की ठण्डी धारा आदि जोकि अटलांटिक महासागर में में प्रभावित होती है ।इसके साथ ही कुछ प्रशांत महासागरीय जलधाराओं में आयोशिओ की ठंडी जलधारा और कुरोशियों की गर्म जलधारा आदि प्रमुख है। समुद्रीय धारा सागरीय जल की विशिष्टता को भी प्रभावित करती है, जैसे लवणता , घनत्व , वायु दाब तथा पवन के संचलन पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। कभी कभी धाराओ में आकस्मिक परिवतन जैसे अलनिनों और ला नीना, वैश्विक जलवायु परिवर्तन आदि के कारण भी देखा जाता है। इसके अतिरिक्त धाराएँ पोषक तत्वो का स्थानातरण भी करती हैं। महासागरीय धारा को प्रभावित करने वाले कारक - तापमान- अधिक तापमान वाले क्षेत्र में घनत्व कम होने के कारण, समुद्र तल उच्चा होता है और कम तापमान वाले क्षेत्र में घनत्व अधिक होने के कारण समुद्र तल नीचा होता है। परिणाम स्वरूप धरातल पर धाराएँ ध्रुव की ओर चलती है जबकि अधिक घनत्व के कारण नीचे अवतलन के कारण नीचे प्रवेश करके गहरी धारा का निर्माण करती है और ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर गति करती है । प्रचलित पवन - धाराओ को प्रभावित करने वाले सबसे स्पष्ट कारक पवन को माना जाता है। प्रचलित पवन वैश्विक स्तर पर धाराओ के क्षेत्रीय संचलन का निर्माण करता है। सुदूरवर्ती पवन घर्षण बल के द्वारा ऊपरी जल को तट से दूर धकेलती है। जिसको भरने के लिए जल नीचे से ऊपर की ओर आता है। जिसे उपवेललिंग कहा जाता है। परिणाम स्वरूप ठंडी धारा का निर्माण होता है। यह धीरे धीरे विषुवत रेखा की तरफ तटवर्ती पवन के क्षेत्र में गर्म जलधारा का निर्माण करती है। जहां पर डाउनवेल्लिंग होता है। इस प्रकार से अर्धतलीय धारा का निर्माण होता है जो धरतलीय धारा के विपरीत दिशा में चलते हुए, संचलन को पूरा करता है। यही कारण है की व्यापारिक पवन के क्षेत्र में महाद्वीप के पश्चिमी तट पर ठंडी धारा और पूर्वी तट पर गर्म धारा का निर्माण होता है। जबकि पछुवा पवन के क्षेत्र में पश्चिमी तट पर गर्म जलधारा और पूर्वी तट पर ठंडी जलधारा का निर्माण होता है। कोरियालीस बल - इसके कारण धाराएँ उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर मुड़ते हुए घड़ीं की सुई की दिशा में लगभग एक वृत्ताकार पथ पर संचलन करती है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में बाएँ मुड़ते हुए उल्टी दिशा में संचलन करती है। धाराएँ एक वृत्ताकार पट्टे का निर्माण करती है जिसे ज़ायर ( gyre ) कहते है जिसके मध्य भाग में समुद्र तल ऊंचा और शांत होता है। तट रेखा की आकृति - चुकि धाराएँ महाद्वीप को भेद नही सकती है। अतः यह महाद्वीप की तट रेखा का अनुसरण करती हैं। उपरोक्त कारण महासागरीय जलधाराओं को प्रभावित करती हैं ।
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प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी के पराजय के पश्चात की गयी वर्साय की संधि के मुख्य प्रावधानों की चर्चा कीजिये| साथ ही इस संधि को लेकर जर्मनी की प्रमुख आपत्तियों को भी बताइए| (150 -200 शब्द/10 अंक) Discuss the main provisions of the Treaty of Versailles after the defeat of Germany in the First World War. Also, describe the major objections of Germany regarding this treaty. (150-200 Words/10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वर्साय की संधि के प्रादेशिक व्यवस्था को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात वर्साय की संधि के सैनिक व आर्थिक व्यवस्था को बताते हुए उत्तर को विस्तृत कीजिये | पुनः वर्साय की संधि को लेकर जर्मनी के आपत्तियों को बताइए | अंत में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण के रूप वर्साय की संधि की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- प्रादेशिक व्यवस्था एल्सस-लॉरेन प्रदेश : वर्साय-संधि द्वारा प्रादेशिक परिवर्तन करके जर्मनी का अंग-भंग कर दिया गया। 1871 में जर्मनी ने फ्रांस से एल्सेस-लॉरेन के प्रदेश छीन लिये थे। सभी ने एक स्वर से इस बात को स्वीकार किया कि यह एक गलत काम हुआ था और इसका अंत आवश्यक है; अतः संधि की शर्तों के द्वारा एल्सस-लोरेन के प्रदेश फ्रांस को वापस दे दिये गये। राइनलैंड : फ्रांस की सुरक्षा की दृष्टि से जर्मनी के राइनलैण्ड में मित्र राष्ट्रों की सेना 15 वर्षों तक रहेगी तथा राइन नदी के आस-पास के क्षेत्र को स्थाई रूप से निःशस्त्र कर दिया जाए ताकि जर्मनी किसी प्रकार की किलेबंदी न कर सके। सार क्षेत्र : सार क्षेत्र जर्मनी में कोयला क्षेत्र के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रदेश की शासन व्यवस्था की जिम्मेवारी राष्ट्रसंघ को सौंप दी गई किन्तु कोयले की खानों का स्वामित्व फ्रांस को दिया गया। यह भी तय हुआ कि 15 वर्षों बाद जनमत संग्रह द्वारा निश्चित किया जाएगा कि सार क्षेत्र के लोग जर्मनी के साथ रहना चाहते हैं या फ्रांस के साथ। यदि सारवासी जर्मनी के साथ मिलने की इच्छा प्रकट करें तो जर्मनी फ्रांस को निश्चित मूल्य देकर खानों को पुनः खरीद ले। बेल्जियम एवं डेनमार्क की प्राप्ति : यूपेन मार्शनेट और मलमेडी का प्रदेश बेल्जियम के अधीन कर दिया गया। श्लेशविग में जनमत संग्रह करके उसका उत्तरी भाग डेनमार्क को दे दिया गया। जर्मनी की पूर्वी सीमा : जर्मनी को सबसे अधिक नुकसान पूर्वी सीमा पर उठाना पड़ा। मित्र राष्ट्रों ने स्वतंत्र पोलैण्ड राज्य के निर्माण का निर्णय किया। डान्जिंग को स्वतंत्र नगर के रूप में परिवर्तित किया गया और उसे राष्ट्र संघ के संरक्षण में रख दिया गया। पोलैण्ड को समुद्री मार्ग देने के लिए डाजिंग के बंदरगाह का उपयोग करने का अधिकार दिया गया। मेमेल का बंदरगाह जर्मनी से लेकर लिथुआनिया को दे दिया गया। जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया के राज्य को मान्यता दी। इस प्रकार प्रादेशिक व्यवस्था के तहत जर्मनी को 25 हजार वर्ग मील का प्रदेश और 70 लाख की आबादी खोनी पड़ी। जर्मन उपनिवेश संबंधी व्यवस्था : मित्र राष्ट्र जर्मन उपनिवेशों को अपने-अपने साम्राज्य में मिलना चाहते थे किन्तु विल्सन ने इसका कड़ा विरोध किया। विल्सन के विरोध के कारण मित्र राष्ट्रों ने संरक्षण प्रणाली की शुरूआत की। इसका आशय यह था कि जो देश बहुत पिछड़े हुए है उनका समुचित कल्याण व विकास करना। सभ्य राष्ट्रों में पवित्र धरोहर के रूप राष्ट्रसंघ की ओर से इसकी उन्नति के लिए दिया जाना चाहिए। Mindet व्यवस्था के तहत जर्मनी को अपनी सभी उपनिवेश छोड़ने पड़े और उन्हें मित्र-राष्ट्रों के संरक्षण में रखा गया। प्रशांत महासागर के कई द्वीपों तथा अफ्रीकी महादेशों में स्थित उपनिवेश जर्मनी को खोने पड़े। सैनिक व्यवस्था जर्मन सेना की अधिकतम संख्या एक लाख कर दी गई। अनिवार्य सैनिक सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया; हवाई जहाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त नौसेना शक्ति को भी सीमित कर दिया गया। जर्मनी की नौसेना के केवल 6 युद्धपोत रखने की इजाजत दी गई। पनडुब्बियों को मित्र राष्ट्रों को सौंपने की बात की गई। निःशस्त्रीकरण की इस व्यवस्था का पालन करवाने तथा निगरानी रखने के लिए जर्मनी के खर्च पर मित्र राष्ट्रों का एक सैनिक आयोग स्थापित किया गया। इस प्रकार सैनिक दृष्टि से जर्मनी को पंगु बना दिया गया। आर्थिक व्यवस्था वर्साय संधि की 231वीं धारा के तहत जर्मनी व उसके सहयोगी राज्यों को युद्ध के लिए एक मात्र जिम्मेदार माना गया। अतः मित्रराष्ट्रों को युद्ध में जो क्षतिपूर्ति उठानी पड़ी थी, उसके लिए जर्मनी को क्षतिपूर्ति करने को कहा गया कि 1921 तक जर्मनी 5 अरब डालर मित्रराष्ट्रों को दे। मित्र राष्ट्रों को जर्मनी से कुछ वस्तु के आयात-निर्यात पर विशेष सुविधाएं दी गई। नील नहर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण कर उसे सभी जहाजों के लिए खुला छोड़ दिया गया। राजनैतिक व्यवस्था राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रसंघ की स्थापना वार्साय की संधि का महत्वपूर्ण अंग थी। विल्सन के प्रभाव के कारण ही राष्ट्रसंघ की धाराओं को वार्साय की संधि में रखा गया। राष्ट्रसंघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सुरक्षा को कायम करना था। जर्मनी की आपत्ति या पेरिस सम्मलेन की सीमायें जर्मनी की एक आपत्ति यह थी कि यह संधि जबरन उसपर थोपा गया और सम्मलेन में उसके प्रतिनिधियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया यहाँ तक कि मौखिक रूप से उसे अपना पक्ष भी नहीं रखने दिया गया; जर्मनी के संदर्भ में आत्म-निर्णय के अधिकारों को महत्व नहीं दिया गया, जैसे-आस्ट्रिया, सार इत्यादि के संदर्भ में लिए गए निर्णय; केवल जर्मन उपनिवेशों की देख-रेख की जिम्मेवारी राष्ट्र संघ को क्यों ; 1 लाख सैनिकों से कानून व्यवस्था को बनाये रखना मुश्किल है , फिर सीमा की सुरक्षा कैसे होगी ? और बेल्जियम से भी सैनिकों की कम संख्या जर्मनी जैसे साहसी राष्ट्र के लिए अपमान की तरह है; केवल जर्मनी को युद्ध का अपराधी माना गया जर्मनी का यह दृष्टिकोण था कि हम पराजित हैं इसलिए कटघरे में हैं; मुआवजे की राशि भी अव्यवहारिक तरीके से निर्धारित की गयी; आदि | 1919 ई. में जर्मनी असहाय था। उस समय चुपचाप आँखें बंद करकर वर्साय-संधि की शर्तों को मानने के सिवा उसके समक्ष कोई विकल्प नहीं था। परंतु, यह निश्चित था कि ऐसी कठोर और अपमानजनक संधि की शर्तों को कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र एक लंबे अरसे तक नहीं बर्दाश्त कर सकता था। यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि भविष्य में जर्मनी फिर युद्ध द्वारा ही अपने अपमान को धोने का प्रयास करे। इस प्रकार, द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज आरंभ से ही वर्साय-संधि की शर्तों में विद्यमान थे।
##Question:प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी के पराजय के पश्चात की गयी वर्साय की संधि के मुख्य प्रावधानों की चर्चा कीजिये| साथ ही इस संधि को लेकर जर्मनी की प्रमुख आपत्तियों को भी बताइए| (150 -200 शब्द/10 अंक) Discuss the main provisions of the Treaty of Versailles after the defeat of Germany in the First World War. Also, describe the major objections of Germany regarding this treaty. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वर्साय की संधि के प्रादेशिक व्यवस्था को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात वर्साय की संधि के सैनिक व आर्थिक व्यवस्था को बताते हुए उत्तर को विस्तृत कीजिये | पुनः वर्साय की संधि को लेकर जर्मनी के आपत्तियों को बताइए | अंत में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण के रूप वर्साय की संधि की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- प्रादेशिक व्यवस्था एल्सस-लॉरेन प्रदेश : वर्साय-संधि द्वारा प्रादेशिक परिवर्तन करके जर्मनी का अंग-भंग कर दिया गया। 1871 में जर्मनी ने फ्रांस से एल्सेस-लॉरेन के प्रदेश छीन लिये थे। सभी ने एक स्वर से इस बात को स्वीकार किया कि यह एक गलत काम हुआ था और इसका अंत आवश्यक है; अतः संधि की शर्तों के द्वारा एल्सस-लोरेन के प्रदेश फ्रांस को वापस दे दिये गये। राइनलैंड : फ्रांस की सुरक्षा की दृष्टि से जर्मनी के राइनलैण्ड में मित्र राष्ट्रों की सेना 15 वर्षों तक रहेगी तथा राइन नदी के आस-पास के क्षेत्र को स्थाई रूप से निःशस्त्र कर दिया जाए ताकि जर्मनी किसी प्रकार की किलेबंदी न कर सके। सार क्षेत्र : सार क्षेत्र जर्मनी में कोयला क्षेत्र के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रदेश की शासन व्यवस्था की जिम्मेवारी राष्ट्रसंघ को सौंप दी गई किन्तु कोयले की खानों का स्वामित्व फ्रांस को दिया गया। यह भी तय हुआ कि 15 वर्षों बाद जनमत संग्रह द्वारा निश्चित किया जाएगा कि सार क्षेत्र के लोग जर्मनी के साथ रहना चाहते हैं या फ्रांस के साथ। यदि सारवासी जर्मनी के साथ मिलने की इच्छा प्रकट करें तो जर्मनी फ्रांस को निश्चित मूल्य देकर खानों को पुनः खरीद ले। बेल्जियम एवं डेनमार्क की प्राप्ति : यूपेन मार्शनेट और मलमेडी का प्रदेश बेल्जियम के अधीन कर दिया गया। श्लेशविग में जनमत संग्रह करके उसका उत्तरी भाग डेनमार्क को दे दिया गया। जर्मनी की पूर्वी सीमा : जर्मनी को सबसे अधिक नुकसान पूर्वी सीमा पर उठाना पड़ा। मित्र राष्ट्रों ने स्वतंत्र पोलैण्ड राज्य के निर्माण का निर्णय किया। डान्जिंग को स्वतंत्र नगर के रूप में परिवर्तित किया गया और उसे राष्ट्र संघ के संरक्षण में रख दिया गया। पोलैण्ड को समुद्री मार्ग देने के लिए डाजिंग के बंदरगाह का उपयोग करने का अधिकार दिया गया। मेमेल का बंदरगाह जर्मनी से लेकर लिथुआनिया को दे दिया गया। जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया के राज्य को मान्यता दी। इस प्रकार प्रादेशिक व्यवस्था के तहत जर्मनी को 25 हजार वर्ग मील का प्रदेश और 70 लाख की आबादी खोनी पड़ी। जर्मन उपनिवेश संबंधी व्यवस्था : मित्र राष्ट्र जर्मन उपनिवेशों को अपने-अपने साम्राज्य में मिलना चाहते थे किन्तु विल्सन ने इसका कड़ा विरोध किया। विल्सन के विरोध के कारण मित्र राष्ट्रों ने संरक्षण प्रणाली की शुरूआत की। इसका आशय यह था कि जो देश बहुत पिछड़े हुए है उनका समुचित कल्याण व विकास करना। सभ्य राष्ट्रों में पवित्र धरोहर के रूप राष्ट्रसंघ की ओर से इसकी उन्नति के लिए दिया जाना चाहिए। Mindet व्यवस्था के तहत जर्मनी को अपनी सभी उपनिवेश छोड़ने पड़े और उन्हें मित्र-राष्ट्रों के संरक्षण में रखा गया। प्रशांत महासागर के कई द्वीपों तथा अफ्रीकी महादेशों में स्थित उपनिवेश जर्मनी को खोने पड़े। सैनिक व्यवस्था जर्मन सेना की अधिकतम संख्या एक लाख कर दी गई। अनिवार्य सैनिक सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया; हवाई जहाजों को प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त नौसेना शक्ति को भी सीमित कर दिया गया। जर्मनी की नौसेना के केवल 6 युद्धपोत रखने की इजाजत दी गई। पनडुब्बियों को मित्र राष्ट्रों को सौंपने की बात की गई। निःशस्त्रीकरण की इस व्यवस्था का पालन करवाने तथा निगरानी रखने के लिए जर्मनी के खर्च पर मित्र राष्ट्रों का एक सैनिक आयोग स्थापित किया गया। इस प्रकार सैनिक दृष्टि से जर्मनी को पंगु बना दिया गया। आर्थिक व्यवस्था वर्साय संधि की 231वीं धारा के तहत जर्मनी व उसके सहयोगी राज्यों को युद्ध के लिए एक मात्र जिम्मेदार माना गया। अतः मित्रराष्ट्रों को युद्ध में जो क्षतिपूर्ति उठानी पड़ी थी, उसके लिए जर्मनी को क्षतिपूर्ति करने को कहा गया कि 1921 तक जर्मनी 5 अरब डालर मित्रराष्ट्रों को दे। मित्र राष्ट्रों को जर्मनी से कुछ वस्तु के आयात-निर्यात पर विशेष सुविधाएं दी गई। नील नहर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण कर उसे सभी जहाजों के लिए खुला छोड़ दिया गया। राजनैतिक व्यवस्था राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रसंघ की स्थापना वार्साय की संधि का महत्वपूर्ण अंग थी। विल्सन के प्रभाव के कारण ही राष्ट्रसंघ की धाराओं को वार्साय की संधि में रखा गया। राष्ट्रसंघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सुरक्षा को कायम करना था। जर्मनी की आपत्ति या पेरिस सम्मलेन की सीमायें जर्मनी की एक आपत्ति यह थी कि यह संधि जबरन उसपर थोपा गया और सम्मलेन में उसके प्रतिनिधियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया यहाँ तक कि मौखिक रूप से उसे अपना पक्ष भी नहीं रखने दिया गया; जर्मनी के संदर्भ में आत्म-निर्णय के अधिकारों को महत्व नहीं दिया गया, जैसे-आस्ट्रिया, सार इत्यादि के संदर्भ में लिए गए निर्णय; केवल जर्मन उपनिवेशों की देख-रेख की जिम्मेवारी राष्ट्र संघ को क्यों ; 1 लाख सैनिकों से कानून व्यवस्था को बनाये रखना मुश्किल है , फिर सीमा की सुरक्षा कैसे होगी ? और बेल्जियम से भी सैनिकों की कम संख्या जर्मनी जैसे साहसी राष्ट्र के लिए अपमान की तरह है; केवल जर्मनी को युद्ध का अपराधी माना गया जर्मनी का यह दृष्टिकोण था कि हम पराजित हैं इसलिए कटघरे में हैं; मुआवजे की राशि भी अव्यवहारिक तरीके से निर्धारित की गयी; आदि | 1919 ई. में जर्मनी असहाय था। उस समय चुपचाप आँखें बंद करकर वर्साय-संधि की शर्तों को मानने के सिवा उसके समक्ष कोई विकल्प नहीं था। परंतु, यह निश्चित था कि ऐसी कठोर और अपमानजनक संधि की शर्तों को कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र एक लंबे अरसे तक नहीं बर्दाश्त कर सकता था। यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि भविष्य में जर्मनी फिर युद्ध द्वारा ही अपने अपमान को धोने का प्रयास करे। इस प्रकार, द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज आरंभ से ही वर्साय-संधि की शर्तों में विद्यमान थे।
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कंपनी काल (1757-1858) में शिक्षा के प्रसार के लिए किये गए सरकारी प्रयासों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इस शिक्षा नीति के उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द /10 अंक ) Mention the government efforts made for the expansion of education in the company period. (1757-1858). Also, evaluate the objectives of this education policy. ( 150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में कंपनी काल के कुछ प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1813 के चार्टर एक्ट से शिक्षा के प्रति अंग्रेजों की बदली नीति का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में शिक्षा के विकास में अंग्रेजो द्वारा अपनाई गयी नीति का मूल्यांकन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - कम्पनी काल (1757-1858) में के प्रसार के लिए अंग्रेजों की शिक्षा नीति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं देखा गया , बल्कि मध्ययुगीन शिक्षा पद्धति ही ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों में जारी रही | हालाँकि कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना अवश्य की गयी , जो निम्नलिखित हैं - 1781 में कलकत्ता मदरसा (वारेन हेस्टिंग्स ) 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (विलियम जोंस ) 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज (जोनाथन डंकन ) 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज (लार्ड वेलेजली ) 1813 के चार्टर एक्ट में भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए 1लाख रुपये की व्यवस्था की गयी , हालाँकि इसे भारतीय भाषा में भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास पर खर्च किया जााए या पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के विकास पर, इसमें विवाद उत्पन्न हो गया |इसे आंग्ल प्राच्य विवाद के नाम से जाना जाता है |लोक शिक्षा के लिए स्थापित सामान्य के 10 सदस्यों में 2 दल बनाये गए थे | एक आंग्ल या पाश्चात्य विद्या का समर्थक था , तो दूसरा प्राच्य | विद्या के समर्थकों का नेतृत्व लोक शिक्षा समिति के सचिव एच.टी.प्रिन्सेप ने किया ,जबकि इनका समर्थन समिति के मंत्री एच .एच.विल्सन ने किया | प्राच्य विद्या के समर्थकों ने वारेन हेस्टिंग्स एवं लार्ड मिन्टों की शिक्षा नीति का समर्थन करते हुए संस्कृत और अरबी भाषा के अध्ययन का समर्थन किया | दूसरी ओर आंग्ल या पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों का नेतृत्व मुनरो एवं एल्फिन्स्टन ने किया |इस दल का समर्थन मैकाले ने भी किया | 1835 में ही गवर्नर बैंटिक ने एक आदेश जारी करते हुए अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया | आकलैंड के शासन काल(1836 - 1842 ) में यह विवाद समाप्त हुआ | आपस में यह सहमति बनी कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि का अधिकाँश भाग अंग्रेजी शिक्षा पर व्यय होगा तथा कुछ राशि प्राच्य शिक्षा पर खर्च होगी | हालाँकि शिक्षा के विकास के लिए "" अधोगामी निस्यन्दन की नीति "" भी अपनाई गयी | शिक्षा के विकास के लिए किये जाने वाले सकारात्मक प्रयास - सरकार द्वारा शिक्षा के विकास के दायित्व का निर्वहन करना | स्कूलों एवं तकनीकी संस्थाओं की स्थापना | समानता,स्वतंत्रता,लोकतंत्र ,राष्ट्रीयता,पंथ निरपेक्षता ,तर्क ,बुद्धिवाद ,व्यक्तिवाद जैसे आधुनिक विचारों का प्रसार करना | महिला शिक्षा की औपचारिक शुरुआत करना | कम्पनी काल में शिक्षा के विकास में कुछ आलोचनात्मक पक्ष - शिक्षा के विकास के लिए निर्धारित राशि का व्यय न किया जाना | अधोगामी निस्यन्दन सिद्धांत का अपनाया जाना | शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना में विलम्ब किया जाना | तकनीकी संस्थाओं में नस्लीय आधार पर भेदभाव किया जाना | सरकारी नौकरी में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाया जाना | इस प्रकार अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा का उपयोग देश में अपनी राजनीतिक सत्ता को मजबूत बनाने के लिए करना चाहा | परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली धीरे-धीरे सरकारी समर्थन के अभाव और उससे अधिक 1844 की सरकारी घोषणा के कारण समाप्त हो गयी |
##Question:कंपनी काल (1757-1858) में शिक्षा के प्रसार के लिए किये गए सरकारी प्रयासों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इस शिक्षा नीति के उद्देश्यों का मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द /10 अंक ) Mention the government efforts made for the expansion of education in the company period. (1757-1858). Also, evaluate the objectives of this education policy. ( 150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में कंपनी काल के कुछ प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1813 के चार्टर एक्ट से शिक्षा के प्रति अंग्रेजों की बदली नीति का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में शिक्षा के विकास में अंग्रेजो द्वारा अपनाई गयी नीति का मूल्यांकन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - कम्पनी काल (1757-1858) में के प्रसार के लिए अंग्रेजों की शिक्षा नीति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं देखा गया , बल्कि मध्ययुगीन शिक्षा पद्धति ही ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों में जारी रही | हालाँकि कुछ शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना अवश्य की गयी , जो निम्नलिखित हैं - 1781 में कलकत्ता मदरसा (वारेन हेस्टिंग्स ) 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (विलियम जोंस ) 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज (जोनाथन डंकन ) 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज (लार्ड वेलेजली ) 1813 के चार्टर एक्ट में भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए 1लाख रुपये की व्यवस्था की गयी , हालाँकि इसे भारतीय भाषा में भारतीय शिक्षा पद्धति के विकास पर खर्च किया जााए या पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के विकास पर, इसमें विवाद उत्पन्न हो गया |इसे आंग्ल प्राच्य विवाद के नाम से जाना जाता है |लोक शिक्षा के लिए स्थापित सामान्य के 10 सदस्यों में 2 दल बनाये गए थे | एक आंग्ल या पाश्चात्य विद्या का समर्थक था , तो दूसरा प्राच्य | विद्या के समर्थकों का नेतृत्व लोक शिक्षा समिति के सचिव एच.टी.प्रिन्सेप ने किया ,जबकि इनका समर्थन समिति के मंत्री एच .एच.विल्सन ने किया | प्राच्य विद्या के समर्थकों ने वारेन हेस्टिंग्स एवं लार्ड मिन्टों की शिक्षा नीति का समर्थन करते हुए संस्कृत और अरबी भाषा के अध्ययन का समर्थन किया | दूसरी ओर आंग्ल या पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों का नेतृत्व मुनरो एवं एल्फिन्स्टन ने किया |इस दल का समर्थन मैकाले ने भी किया | 1835 में ही गवर्नर बैंटिक ने एक आदेश जारी करते हुए अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया | आकलैंड के शासन काल(1836 - 1842 ) में यह विवाद समाप्त हुआ | आपस में यह सहमति बनी कि शिक्षा के लिए निर्धारित राशि का अधिकाँश भाग अंग्रेजी शिक्षा पर व्यय होगा तथा कुछ राशि प्राच्य शिक्षा पर खर्च होगी | हालाँकि शिक्षा के विकास के लिए "" अधोगामी निस्यन्दन की नीति "" भी अपनाई गयी | शिक्षा के विकास के लिए किये जाने वाले सकारात्मक प्रयास - सरकार द्वारा शिक्षा के विकास के दायित्व का निर्वहन करना | स्कूलों एवं तकनीकी संस्थाओं की स्थापना | समानता,स्वतंत्रता,लोकतंत्र ,राष्ट्रीयता,पंथ निरपेक्षता ,तर्क ,बुद्धिवाद ,व्यक्तिवाद जैसे आधुनिक विचारों का प्रसार करना | महिला शिक्षा की औपचारिक शुरुआत करना | कम्पनी काल में शिक्षा के विकास में कुछ आलोचनात्मक पक्ष - शिक्षा के विकास के लिए निर्धारित राशि का व्यय न किया जाना | अधोगामी निस्यन्दन सिद्धांत का अपनाया जाना | शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना में विलम्ब किया जाना | तकनीकी संस्थाओं में नस्लीय आधार पर भेदभाव किया जाना | सरकारी नौकरी में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाया जाना | इस प्रकार अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा का उपयोग देश में अपनी राजनीतिक सत्ता को मजबूत बनाने के लिए करना चाहा | परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली धीरे-धीरे सरकारी समर्थन के अभाव और उससे अधिक 1844 की सरकारी घोषणा के कारण समाप्त हो गयी |
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Space debris is a major hazard and cause of concern. What steps are being taken to mitigate space debris? Explain. (150 words/10 marks)
Approach- - Define space debris - Explain why they are the cause for concern Answer Space debris encompasses both natural (meteoroid) and artificial (man-made) particles. Meteoroids are in orbit around the sun, while most artificial debris is in orbit around the Earth. Hence, the latter is more commonly referred to as orbital debris. The term Kessler syndrome is associated with Space Debris, which is used to describe a self-sustaining cascading collision of space debris in LEO (Low Earth Orbit). Why Space Debris is a concern? 1. Obstruction to various space endeavours: NASA estimates that there are about 500,000 pieces of debris larger than half an inch across in low orbit, posing a potential danger to the 780-odd satellites operating in the area. Space junk travels at speeds up to 30,000 km an hour, which turns tiny pieces of orbital debris into deadly shrapnel that can damage satellites, space shuttles, space stations and spacecraft with humans aboard. There can be a scenario where one accident in space might lead to cascading effect i.e. Kessler Syndrome 2. Increase the cost of missions : Various space agencies have to manoeuvre their space programme in light of increasing space debris thus adding to extra-economic and human resources on the space programme. 3. Debris is bound to increase- Space scientists are concerned about the inexpensive, tiny satellites called CubeSats, which are going to add space junk by around 15% in the next 10 years. Considering the above concerns few initiatives have been taken to clear up space debris. For example, Japan has launched the Kounotori 6 satellite, which uses a half-mile-long tether to remove some of the debris from Earth"s orbit. A team of ISRO and Physical Research Laboratory are working on setting up an observatory to track the space junk, Project Netra by ISRO. As part of the space junk cleanup, a new device named space harpoon that captures junk has been tested successfully by the RemoveDEBRIS project, a European multi-organization.
##Question:Space debris is a major hazard and cause of concern. What steps are being taken to mitigate space debris? Explain. (150 words/10 marks)##Answer:Approach- - Define space debris - Explain why they are the cause for concern Answer Space debris encompasses both natural (meteoroid) and artificial (man-made) particles. Meteoroids are in orbit around the sun, while most artificial debris is in orbit around the Earth. Hence, the latter is more commonly referred to as orbital debris. The term Kessler syndrome is associated with Space Debris, which is used to describe a self-sustaining cascading collision of space debris in LEO (Low Earth Orbit). Why Space Debris is a concern? 1. Obstruction to various space endeavours: NASA estimates that there are about 500,000 pieces of debris larger than half an inch across in low orbit, posing a potential danger to the 780-odd satellites operating in the area. Space junk travels at speeds up to 30,000 km an hour, which turns tiny pieces of orbital debris into deadly shrapnel that can damage satellites, space shuttles, space stations and spacecraft with humans aboard. There can be a scenario where one accident in space might lead to cascading effect i.e. Kessler Syndrome 2. Increase the cost of missions : Various space agencies have to manoeuvre their space programme in light of increasing space debris thus adding to extra-economic and human resources on the space programme. 3. Debris is bound to increase- Space scientists are concerned about the inexpensive, tiny satellites called CubeSats, which are going to add space junk by around 15% in the next 10 years. Considering the above concerns few initiatives have been taken to clear up space debris. For example, Japan has launched the Kounotori 6 satellite, which uses a half-mile-long tether to remove some of the debris from Earth"s orbit. A team of ISRO and Physical Research Laboratory are working on setting up an observatory to track the space junk, Project Netra by ISRO. As part of the space junk cleanup, a new device named space harpoon that captures junk has been tested successfully by the RemoveDEBRIS project, a European multi-organization.
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वायुदाब पेटियों एवं प्रचलित पवनों के क्षेत्र में वर्षा के वितरण की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the distribution of rainfall into the ​​air pressure belts and prevailing wind regions. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में वर्षा को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| वर्षा का सम्बन्ध जल संसाधन से है जिसका उत्तरजीविता के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है| वायुमंडल में उपस्थित वे कण जिनके अन्दर जल संघनन शक्ति हो उन्हें संघनन नाभिक कहते है| एकत्रित एवं संघनित पदार्थ के जमाव को बादल कहते है| जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन का वहन नहीं कर पाती तब बादलों के अन्दर उपस्थित पानी या हिम के कण पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, इसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तीन प्रकार की होती है यथा संवहनीय वर्षा, पर्वतीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा| इन्ही रूप में समस्त ग्लोब पर होने वाले वर्षण के वितरण को प्रचलित पवनों एवं वायुदाब पेटियों के अंतर्गत समझा जा सकता है| वर्षा का वितरण वायुदाब पेटियों में वर्षा का वितरण निम्न वायुदाब पेटियां · इनमें वर्षा की संभावना अधिकतम क्योंकि यहाँ वायु का आरोहण होता है · आरोहण से वायु के तापमान में कमी होगी जिससे RH में वृद्धि होगी जिससे वायु संतृप्त होगी जिससे संघनन की सम्भावना बढ़ जायेगी जिससे बादल का निर्माण एवं वर्षण होगा · विषुवतीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है, यहाँ संवहनीय वर्षा होती है| · यहाँ विश्व में अधिकतम मात्रा वर्षा इसी क्षेत्र में होती है, सालों भर वर्षा के कारण सदाबहार वन पाए जाते हैं, · संवहनीय वर्षा होने के कारण वर्षा प्रायः शाम के समय होती है|दोपहर के बाद बादलों का जमाव होता है, इससे सापेक्षिक तापमान घट जाता है (बादल सौर प्रकाश को अवरोधित कर देता है) जबकि रात का तापमान सापेक्षिकरूप से बढ़ जाता है| · अमेज़न नदी द्रोणी और कांगो नदी द्रोणी तथा इंडोनेशिया, मलेशिया आदि द्वीपीय समूह में इसी प्रकार की वर्षा होती है| · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में भी सालों भर वर्षा होगी किन्तु यहाँ वाताग्रीय वर्षा होती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सर्दियों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि सर्दियों में वाताग्र तीव्र होते हैं · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में तापमान अपेक्षाकृत कम होता है अतः हिमपात की संभावना सालों भर बनी रहती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता में कमी के कारण वर्षा की मात्रा विषुवतीय क्षेत्र से कम होती है उच्च वायुदाब पेटियां · इस क्षेत्र में वर्षा की संभावना न्यूनतम होती है क्योंकि यहाँ वायु का अवरोहण होता है, · वायु का अवरोहण होने से वायु के तापमान में वृद्धि,जिससे RH की कमी आती है और संघनन की संभावना नही बन पाती,इससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरुप वर्षण नहीं हो पाता है · उपोष्ण कटिबंधीय एवं उपध्रुवीय कटिबंध क्षेत्र(उच्च वायुदाब पेटियां )में मरुस्थलों का विकास देखने को मिलता है क्योंकि यहाँ वर्षा कम होती है · अवरोहण के क्षेत्र में बादल नहीं बनते हैं किन्तु वायुदाब पेटियों के विस्थापन के कारण यहं कम मात्रा में वर्षा की संभावना बन जाती है प्रचलित पवन क्षेत्र में वर्षा का वितरण · तटवर्ती पवन(समुद्र से स्थल की ओर) वर्षा का आरोहण होने से वर्षा की संभावना होती है · सुदूरवर्ती पवन(स्थल से समुद्र की ओर) यहाँ वायु अवरोहित होती है अतः वर्षा कम होगी| व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में वितरण · महाद्वीपीय भाग मेंपश्चिमी भाग में सुदूरवर्ती पवन होने के कारण वर्षा कम होती है और मरुस्थलों का निर्माण होता है · पूर्वी भाग में तटवर्ती पवन होने कारण पर्याप्त मात्रा में वर्षा की संभावना होती है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर वर्षा की कमी तथा अधिक वाष्पीकरण के कारण शुद्ध उष्ण मरुस्थल का निर्माण होता है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में उष्णकटिबन्धीय चक्रवात का निर्माण होता है जिससे वर्षा पूर्वी तट पर होती है लेकिन पश्चिमी तट पर लगभग नही होती है पछुवा पवनों का क्षेत्र · पश्चिमी तट परतटवर्ती पवन होने के कारणवर्षा की मात्रा अधिक होती है · पूर्वी तट परसुदूरवर्ती पवन होने कारणवर्षा की मात्रा कम होती है · पछुआ पवन के सुदूरवर्ती क्षेत्र में पछुवा पवन से वर्षा नहीं होती है परन्तु कम वाष्पीकरण के कारण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात से होने वाली वर्षा के कारण मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है · ध्रुवीय पूर्वा का क्षेत्र इस क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता की कमी होती है| अतः यहाँ वर्षा की कमी रहती है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर वर्षा के वितरण को वायु संचरण की दिशा, धरातलीय तापमान, वायु का आरोहण-अवरोहण, आर्द्रता की उपस्थिति आदि अनेक कारक प्रभावित करते हैं|
##Question:वायुदाब पेटियों एवं प्रचलित पवनों के क्षेत्र में वर्षा के वितरण की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the distribution of rainfall into the ​​air pressure belts and prevailing wind regions. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वर्षा को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये 3- अंतिम में वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| वर्षा का सम्बन्ध जल संसाधन से है जिसका उत्तरजीविता के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है| वायुमंडल में उपस्थित वे कण जिनके अन्दर जल संघनन शक्ति हो उन्हें संघनन नाभिक कहते है| एकत्रित एवं संघनित पदार्थ के जमाव को बादल कहते है| जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन का वहन नहीं कर पाती तब बादलों के अन्दर उपस्थित पानी या हिम के कण पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, इसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तीन प्रकार की होती है यथा संवहनीय वर्षा, पर्वतीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा| इन्ही रूप में समस्त ग्लोब पर होने वाले वर्षण के वितरण को प्रचलित पवनों एवं वायुदाब पेटियों के अंतर्गत समझा जा सकता है| वर्षा का वितरण वायुदाब पेटियों में वर्षा का वितरण निम्न वायुदाब पेटियां · इनमें वर्षा की संभावना अधिकतम क्योंकि यहाँ वायु का आरोहण होता है · आरोहण से वायु के तापमान में कमी होगी जिससे RH में वृद्धि होगी जिससे वायु संतृप्त होगी जिससे संघनन की सम्भावना बढ़ जायेगी जिससे बादल का निर्माण एवं वर्षण होगा · विषुवतीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है, यहाँ संवहनीय वर्षा होती है| · यहाँ विश्व में अधिकतम मात्रा वर्षा इसी क्षेत्र में होती है, सालों भर वर्षा के कारण सदाबहार वन पाए जाते हैं, · संवहनीय वर्षा होने के कारण वर्षा प्रायः शाम के समय होती है|दोपहर के बाद बादलों का जमाव होता है, इससे सापेक्षिक तापमान घट जाता है (बादल सौर प्रकाश को अवरोधित कर देता है) जबकि रात का तापमान सापेक्षिकरूप से बढ़ जाता है| · अमेज़न नदी द्रोणी और कांगो नदी द्रोणी तथा इंडोनेशिया, मलेशिया आदि द्वीपीय समूह में इसी प्रकार की वर्षा होती है| · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में भी सालों भर वर्षा होगी किन्तु यहाँ वाताग्रीय वर्षा होती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सर्दियों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि सर्दियों में वाताग्र तीव्र होते हैं · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में तापमान अपेक्षाकृत कम होता है अतः हिमपात की संभावना सालों भर बनी रहती है · उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता में कमी के कारण वर्षा की मात्रा विषुवतीय क्षेत्र से कम होती है उच्च वायुदाब पेटियां · इस क्षेत्र में वर्षा की संभावना न्यूनतम होती है क्योंकि यहाँ वायु का अवरोहण होता है, · वायु का अवरोहण होने से वायु के तापमान में वृद्धि,जिससे RH की कमी आती है और संघनन की संभावना नही बन पाती,इससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरुप वर्षण नहीं हो पाता है · उपोष्ण कटिबंधीय एवं उपध्रुवीय कटिबंध क्षेत्र(उच्च वायुदाब पेटियां )में मरुस्थलों का विकास देखने को मिलता है क्योंकि यहाँ वर्षा कम होती है · अवरोहण के क्षेत्र में बादल नहीं बनते हैं किन्तु वायुदाब पेटियों के विस्थापन के कारण यहं कम मात्रा में वर्षा की संभावना बन जाती है प्रचलित पवन क्षेत्र में वर्षा का वितरण · तटवर्ती पवन(समुद्र से स्थल की ओर) वर्षा का आरोहण होने से वर्षा की संभावना होती है · सुदूरवर्ती पवन(स्थल से समुद्र की ओर) यहाँ वायु अवरोहित होती है अतः वर्षा कम होगी| व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में वितरण · महाद्वीपीय भाग मेंपश्चिमी भाग में सुदूरवर्ती पवन होने के कारण वर्षा कम होती है और मरुस्थलों का निर्माण होता है · पूर्वी भाग में तटवर्ती पवन होने कारण पर्याप्त मात्रा में वर्षा की संभावना होती है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर वर्षा की कमी तथा अधिक वाष्पीकरण के कारण शुद्ध उष्ण मरुस्थल का निर्माण होता है · व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में उष्णकटिबन्धीय चक्रवात का निर्माण होता है जिससे वर्षा पूर्वी तट पर होती है लेकिन पश्चिमी तट पर लगभग नही होती है पछुवा पवनों का क्षेत्र · पश्चिमी तट परतटवर्ती पवन होने के कारणवर्षा की मात्रा अधिक होती है · पूर्वी तट परसुदूरवर्ती पवन होने कारणवर्षा की मात्रा कम होती है · पछुआ पवन के सुदूरवर्ती क्षेत्र में पछुवा पवन से वर्षा नहीं होती है परन्तु कम वाष्पीकरण के कारण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात से होने वाली वर्षा के कारण मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है · ध्रुवीय पूर्वा का क्षेत्र इस क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता की कमी होती है| अतः यहाँ वर्षा की कमी रहती है| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर वर्षा के वितरण को वायु संचरण की दिशा, धरातलीय तापमान, वायु का आरोहण-अवरोहण, आर्द्रता की उपस्थिति आदि अनेक कारक प्रभावित करते हैं|
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What are the different types of bills in Parliament? Explain these (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT TYPES OF BILLS IN PARLIAMENT -CONCLUSION ANSWER- Parliament is the supreme legislative body in the country. Every legislative process in Parliament takes place by motion, debate, discussion and voting. A motion which will lead to the passage of a law or an act is called a bill. Therefore, a bill is a motion, which if becomes successful, becomes an act. THE DIFFERENT TYPES OF BILLS IN PARLIAMENT Broadly, there are 4 types of bills in Parliament: I ORDINARY BILLS Any bill which is not a money bill, constitutional amendment bill, money bill or a financial bill, is an ordinary bill. 1) PRIOR RECOMMENDATION Prior recommendation of the President is not required to introduce such bills. 2) INTRODUCTION-HOUSES Such bills can be introduced in both the LS as well as the RS. 3) NECESSITY OF PASSAGE BY RAJYA SABHA RS is required to mandatorily pass the bill. 4) DEADLOCK In case of the disagreement between LS and RS, a deadlock possible 5) JOINT SITTING A joint Session can be called to break the deadlock 6) VETO OF BILL President can use his veto power here. II CONSTITUTIONAL AMENDMENT BILLS- ARTICLE 368 Such bills serve to amend the constitution of India. 1) PRIOR RECOMMENDATION The prior recommendation of the President is not required to introduce such bills. 2) INTRODUCTION-HOUSES Such bills can be introduced in both the LS as well as the RS 3) NECESSITY OF PASSAGE BY RAJYA SABHA RS is required to mandatorily pass the bill. 4) DEADLOCK In case of a disagreement between the LS and RS, a deadlock possible 5) JOINT SITTING Joint Session cannot be called to break the deadlock. It has to be passed by both the Houses sitting separately 6) LEGISLATIVE PREROGATIVE President cannot veto- The President has no role in such bills (only Parliament has the important role here) III MONEY BILLS- ARTICLE 110 ONLY 1) PRIOR RECOMMENDATION Prior recommendation of the President is required to introduce such bills. 2) INTRODUCTION-HOUSES They can be introduced in the LS only. 3) NECESSITY OF PASSAGE BY RAJYA SABHA RS is not required to mandatorily pass the bill. 7) DEADLOCK Since the RS is not required to mandatorily pass the bill, hence, a deadlock is not possible. Therefore, the question of a Joint Sessiondoes not arise. 8) CONCEPT These bills deal with the CFI (Consolidated Fund of India), which is actually the total money available with the Government of India (GoI). These bills seek for the imposition, abolition, regulation, remission or alteration of taxes. Thus, the CFI can be increased but also can be reduced by means of a reduction in tax collection or reduction or abolition of taxes. Therefore, CFI can reduce due to expenditures or lesser taxes. IV FINANCIAL BILLS- ARTICLE 117 These bills include CFI, but also include policy matters. Financial Bills are of two types- TYPE A They also deal with the CFI. But while such bills involve expenditure from the CFI, they also aim at crediting money to the CFI i.e. debit of money with the intention to credit money via the policy (i.e. from the return on investment) TYPE B These bills also deal with the CFI. However, they only aim only at the expenditure i.e. there is a debit of money but no credit of money into the CFI. For example, salaries, emoluments, etc. Generally, when a bill is passed by both the Houses of Parliament and receives the assent of the President, then it becomes an act (read law). For example, the 103rd amendment bill for the reservation of the economically weaker sections was the 124th constitutional amendment bill. This shows that 21 bills were there which were not passed.
##Question:What are the different types of bills in Parliament? Explain these (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE DIFFERENT TYPES OF BILLS IN PARLIAMENT -CONCLUSION ANSWER- Parliament is the supreme legislative body in the country. Every legislative process in Parliament takes place by motion, debate, discussion and voting. A motion which will lead to the passage of a law or an act is called a bill. Therefore, a bill is a motion, which if becomes successful, becomes an act. THE DIFFERENT TYPES OF BILLS IN PARLIAMENT Broadly, there are 4 types of bills in Parliament: I ORDINARY BILLS Any bill which is not a money bill, constitutional amendment bill, money bill or a financial bill, is an ordinary bill. 1) PRIOR RECOMMENDATION Prior recommendation of the President is not required to introduce such bills. 2) INTRODUCTION-HOUSES Such bills can be introduced in both the LS as well as the RS. 3) NECESSITY OF PASSAGE BY RAJYA SABHA RS is required to mandatorily pass the bill. 4) DEADLOCK In case of the disagreement between LS and RS, a deadlock possible 5) JOINT SITTING A joint Session can be called to break the deadlock 6) VETO OF BILL President can use his veto power here. II CONSTITUTIONAL AMENDMENT BILLS- ARTICLE 368 Such bills serve to amend the constitution of India. 1) PRIOR RECOMMENDATION The prior recommendation of the President is not required to introduce such bills. 2) INTRODUCTION-HOUSES Such bills can be introduced in both the LS as well as the RS 3) NECESSITY OF PASSAGE BY RAJYA SABHA RS is required to mandatorily pass the bill. 4) DEADLOCK In case of a disagreement between the LS and RS, a deadlock possible 5) JOINT SITTING Joint Session cannot be called to break the deadlock. It has to be passed by both the Houses sitting separately 6) LEGISLATIVE PREROGATIVE President cannot veto- The President has no role in such bills (only Parliament has the important role here) III MONEY BILLS- ARTICLE 110 ONLY 1) PRIOR RECOMMENDATION Prior recommendation of the President is required to introduce such bills. 2) INTRODUCTION-HOUSES They can be introduced in the LS only. 3) NECESSITY OF PASSAGE BY RAJYA SABHA RS is not required to mandatorily pass the bill. 7) DEADLOCK Since the RS is not required to mandatorily pass the bill, hence, a deadlock is not possible. Therefore, the question of a Joint Sessiondoes not arise. 8) CONCEPT These bills deal with the CFI (Consolidated Fund of India), which is actually the total money available with the Government of India (GoI). These bills seek for the imposition, abolition, regulation, remission or alteration of taxes. Thus, the CFI can be increased but also can be reduced by means of a reduction in tax collection or reduction or abolition of taxes. Therefore, CFI can reduce due to expenditures or lesser taxes. IV FINANCIAL BILLS- ARTICLE 117 These bills include CFI, but also include policy matters. Financial Bills are of two types- TYPE A They also deal with the CFI. But while such bills involve expenditure from the CFI, they also aim at crediting money to the CFI i.e. debit of money with the intention to credit money via the policy (i.e. from the return on investment) TYPE B These bills also deal with the CFI. However, they only aim only at the expenditure i.e. there is a debit of money but no credit of money into the CFI. For example, salaries, emoluments, etc. Generally, when a bill is passed by both the Houses of Parliament and receives the assent of the President, then it becomes an act (read law). For example, the 103rd amendment bill for the reservation of the economically weaker sections was the 124th constitutional amendment bill. This shows that 21 bills were there which were not passed.
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"1857 के विद्रोह की शरुआत यद्यपि की धार्मिक मुद्दे को लेकर हुई , किन्तु इस विद्रोह में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की व्यापक भागीदारी थी , जोकि ब्रिटिश नीतियों के प्रति व्यापक असंतोष का परिणाम था |" इस कथन की विवेचना कीजिये | (150-200 शब्द) The revolt of 1857, However, began with a religious issue,but there was widespread participation of various sections of Indian society in this revolt, which was the result of widespread dissatisfaction with British policies. Discus this statement.
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 1857 के क्रांति के उद्भव को लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में कारणों को का उल्लेख कीजिए। इसके बाद परिणामों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर - आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अंग्रेजों के विरुद्ध यह पहला व्यापक स्तर पर प्रयास था। इसके माध्यम से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने विरोध को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। 1857 के विद्रोह के कारण आर्थिक कारण: भूराजस्व नीति से किसानो मे व्यापक असंतोष उद्योगों के पतन के कारण कारीगरों मे असंतोष विस्तारवादी नीति के कारण शासक वर्ग तथा अन्य वर्गों की स्थिति खराब। राजनीतिक कारण: 1857 तक अधिकांश राज्य अंग्रेजों के अधीन या निर्भर । 1856 मे अवध के विलय की घटना । अन्य राजनीतिक कारण: अंग्रेजों की नस्लीय नीति , अफगान युद्ध, संथाल विद्रोह सामाजिक कारण :ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुधार व शिक्षा नीति का प्रभाव। धार्मिक कारण : 1850 मे धार्मिक निरयोगता कानून सरकारी खर्चों पर मिशनरियों की सहायता सैनिक कारण :केवल निम्न पदों पर भारतियों की नियुक्ति, कम वेतन, धार्मिक चिन्हों व प्रतिकों के प्रयोग पर प्रतिबंध। तात्कालिक कारण: चर्बी वाले कारतूस का मुद्दा व मेरठ से सैनिकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ । निष्कर्षतः 1857 का विद्रोह शताब्दियों से शोषित, प्रताड़ित एवं उपेक्षित भारतीय जन समूह की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कंठा का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत स्वतन्त्रता संघर्ष था। यह विद्रोह यद्यपि सफल नहीं हो सका किन्तु इसने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के बीज बोये एवं इस क्रांति के दूरगामी परिणाम हुए।
##Question:"1857 के विद्रोह की शरुआत यद्यपि की धार्मिक मुद्दे को लेकर हुई , किन्तु इस विद्रोह में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की व्यापक भागीदारी थी , जोकि ब्रिटिश नीतियों के प्रति व्यापक असंतोष का परिणाम था |" इस कथन की विवेचना कीजिये | (150-200 शब्द) The revolt of 1857, However, began with a religious issue,but there was widespread participation of various sections of Indian society in this revolt, which was the result of widespread dissatisfaction with British policies. Discus this statement.##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 1857 के क्रांति के उद्भव को लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में कारणों को का उल्लेख कीजिए। इसके बाद परिणामों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर - आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अंग्रेजों के विरुद्ध यह पहला व्यापक स्तर पर प्रयास था। इसके माध्यम से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने विरोध को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। 1857 के विद्रोह के कारण आर्थिक कारण: भूराजस्व नीति से किसानो मे व्यापक असंतोष उद्योगों के पतन के कारण कारीगरों मे असंतोष विस्तारवादी नीति के कारण शासक वर्ग तथा अन्य वर्गों की स्थिति खराब। राजनीतिक कारण: 1857 तक अधिकांश राज्य अंग्रेजों के अधीन या निर्भर । 1856 मे अवध के विलय की घटना । अन्य राजनीतिक कारण: अंग्रेजों की नस्लीय नीति , अफगान युद्ध, संथाल विद्रोह सामाजिक कारण :ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुधार व शिक्षा नीति का प्रभाव। धार्मिक कारण : 1850 मे धार्मिक निरयोगता कानून सरकारी खर्चों पर मिशनरियों की सहायता सैनिक कारण :केवल निम्न पदों पर भारतियों की नियुक्ति, कम वेतन, धार्मिक चिन्हों व प्रतिकों के प्रयोग पर प्रतिबंध। तात्कालिक कारण: चर्बी वाले कारतूस का मुद्दा व मेरठ से सैनिकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ । निष्कर्षतः 1857 का विद्रोह शताब्दियों से शोषित, प्रताड़ित एवं उपेक्षित भारतीय जन समूह की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कंठा का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत स्वतन्त्रता संघर्ष था। यह विद्रोह यद्यपि सफल नहीं हो सका किन्तु इसने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के बीज बोये एवं इस क्रांति के दूरगामी परिणाम हुए।
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ज्वार भाटा को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिये। इसके साथ ही ज्वार-भाटा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये।(150 से 200 शब्द, 10 अंक) Defining Tide-Ebb and describe the factors affecting it. Along with this, explain the importance of Tide and Ebb. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में ज्वार भाटा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में ज्वार-भाटा को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में ज्वार-भाटा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये चन्द्रमा एवं सूर्य एवं चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सागर के जल के ऊपर उठने तथा गिरने कोज्वारभाटाकहते हैं| जल के ऊपर उठकर आगे बढ़ाने कोज्वारतथा जल के नीचे गिरकर पीछे लौटने की क्रिया कोभाटा कहते हैं|ज्वार प्रतिदिन दो बार आता है- एक बार चन्द्रमा के आकर्षण से और दूसरी बार पृथ्वी के अपकेन्द्रीय बल के कारण| लेकिन इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर स्थित साउथेम्पटन में ज्वार प्रतिदिन चार बार आते हैं| ज्वार-भाटा को प्रभावित करने वाले कारक तीनों आकाशीय पिंडों की सापेक्षिक अवस्थिति · चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वीकीगुरुत्वाकर्षण शक्ति ही ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का प्रमुख कारण हैं। · जब उपरोक्त तीनों अंतरिक्षीय पिंड सिजजी(एक सीध में) की स्थिति में होते हैं गुरुत्वाकर्षण बल कि अधिकता के कारण उच्च ज्वार आते हैं, ऐसी स्थिति पूर्णिमा एवं अमावस्या को बनती है · प्रत्येक महीने की सप्तमी/अष्टमी को जब चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी तीनो एक समकोण की स्थिति में होते हैं तो सूर्य एवं चन्द्रमा द्वारा लगाया जाने वाला गुरुत्वाकर्षण बल एक दूसरे को प्रतिसंतुलित करने में प्रयुक्त हो जाता है अतः इस समय निम्न ज्वार की उत्पत्ति होती है अक्षांशीय अवस्थिति · 28.5 डिग्री उत्तर से दक्षिण के मध्य में चंद्रमा का चापीय उभार, पृथ्वी के चापीय उभार के मध्य न्यूनतम दूरी का निर्माण होता है · अतः इस क्षेत्र में चंद्रमा की लम्बवत किरने आपतित होती हैं इस कारण इस अक्षांशीय क्षेत्र में अधिकतम ऊँचाई वाले ज्वार की उत्पत्ति होती है तट की आकृति · सपाट तट में ज्वार की ऊँचाई अपेक्षाकृत कम होती है क्योंकि समुद्री जल का फैलाव हो जाता है · आड़े-तिरछे तट पर विशेष रूप से खाड़ी आकार के क्षेत्र मेंज्वार कि उंचाई अधिक होती है · फंडी की खाड़ी में विश्व के सर्वाधिक ऊँचाई वाले ज्वार आते हैं जबकि भारत में सबसे ऊँचे ज्वार खम्बात की खाड़ी में आते हैं जलाशयों की अवस्थिति(छोटे समुद्रों की अवस्थिति) · कभी कभी एक जलीय भाग एक से अधिक दिशा में ज्वार से जुडा होता है · इसके परिणाम स्वरुप वहां ज्वार की बारंबारता दो से अधिक हो जाती है जैसे इंग्लिश चैनल(south hampton) समुद्र की गहराई · जब गहराई अधिक होगी तो ज्वार की ऊँचाई कम होगी · जबकि गहराई कम होगी तो ज्वार की ऊँचाई अधिक होती है ज्वार भाटा का महत्त्व · बंदरगाह प्राकृतिक एवं कृत्रिम दोनों हो सकता है, पत्तन (पोर्ट) सदैव कृत्रिम होते हैं|डॉक, पत्तनों पर होते हैं जबकि पत्तन बंदरगाहों पर स्थित होते हैं| ज्वार-भाटा ज्वारीय पत्तनों के विकास में सहायक होता है जैसे भारत में हल्दिया पत्तन · ज्वार तटीय क्षेत्रों में समुद्री खाद्य की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं| इस प्रकार ज्वार समुद्री जैवमंडल जैसे समुद्री पौधों और मछलियों की प्रजनन गतिविधियों को भी प्रभावित करता है| ज्वारभाटा की नियमिता के कारण ज्वारीय क्षेत्र के समुद्री जीवों की संख्या में संतुलन बना रहता है| · ज्वार के कारण नदियों में अतिरिक्त जलापूर्ति हो जाती है जिससे नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है एवं निकटस्थ क्षेत्रों में बाढ़ की संभावना बन जाती है · नदियों में ज्वारीय जल के आगमन के बाद जब वह जल वापस समुद्र की ओर लौटता है तब वह नदी ताल में जमे अवसादों को निकालने का भी कार्य करता है इससे नदी अविरल रूप में बहने योग्य हो पाती है · उच्च ज्वार समुद्री नौवहन में सहायता करते हैं। वे समुंद्री किनारों के पानी का स्तर बढ़ा देते हैं जिसके कारण जहाज को बंदरगाह पर पहुंचाने में सहायता मिलती है| · किसी भी स्थान पर 24 घंटे में दो बार ज्वार आते हैं ये गतिज ऊर्जा से संपन्न होते हैं| इनका उपयोग ज्वारीय ऊर्जा के उत्पादन में किया जा सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ज्वार-भाटा मानवीय जीवन एवं उसकी गतिविधियों के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण होते हैं|
##Question:ज्वार भाटा को परिभाषित करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिये। इसके साथ ही ज्वार-भाटा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये।(150 से 200 शब्द, 10 अंक) Defining Tide-Ebb and describe the factors affecting it. Along with this, explain the importance of Tide and Ebb. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में ज्वार भाटा को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में ज्वार-भाटा को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में ज्वार-भाटा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये चन्द्रमा एवं सूर्य एवं चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सागर के जल के ऊपर उठने तथा गिरने कोज्वारभाटाकहते हैं| जल के ऊपर उठकर आगे बढ़ाने कोज्वारतथा जल के नीचे गिरकर पीछे लौटने की क्रिया कोभाटा कहते हैं|ज्वार प्रतिदिन दो बार आता है- एक बार चन्द्रमा के आकर्षण से और दूसरी बार पृथ्वी के अपकेन्द्रीय बल के कारण| लेकिन इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर स्थित साउथेम्पटन में ज्वार प्रतिदिन चार बार आते हैं| ज्वार-भाटा को प्रभावित करने वाले कारक तीनों आकाशीय पिंडों की सापेक्षिक अवस्थिति · चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वीकीगुरुत्वाकर्षण शक्ति ही ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का प्रमुख कारण हैं। · जब उपरोक्त तीनों अंतरिक्षीय पिंड सिजजी(एक सीध में) की स्थिति में होते हैं गुरुत्वाकर्षण बल कि अधिकता के कारण उच्च ज्वार आते हैं, ऐसी स्थिति पूर्णिमा एवं अमावस्या को बनती है · प्रत्येक महीने की सप्तमी/अष्टमी को जब चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी तीनो एक समकोण की स्थिति में होते हैं तो सूर्य एवं चन्द्रमा द्वारा लगाया जाने वाला गुरुत्वाकर्षण बल एक दूसरे को प्रतिसंतुलित करने में प्रयुक्त हो जाता है अतः इस समय निम्न ज्वार की उत्पत्ति होती है अक्षांशीय अवस्थिति · 28.5 डिग्री उत्तर से दक्षिण के मध्य में चंद्रमा का चापीय उभार, पृथ्वी के चापीय उभार के मध्य न्यूनतम दूरी का निर्माण होता है · अतः इस क्षेत्र में चंद्रमा की लम्बवत किरने आपतित होती हैं इस कारण इस अक्षांशीय क्षेत्र में अधिकतम ऊँचाई वाले ज्वार की उत्पत्ति होती है तट की आकृति · सपाट तट में ज्वार की ऊँचाई अपेक्षाकृत कम होती है क्योंकि समुद्री जल का फैलाव हो जाता है · आड़े-तिरछे तट पर विशेष रूप से खाड़ी आकार के क्षेत्र मेंज्वार कि उंचाई अधिक होती है · फंडी की खाड़ी में विश्व के सर्वाधिक ऊँचाई वाले ज्वार आते हैं जबकि भारत में सबसे ऊँचे ज्वार खम्बात की खाड़ी में आते हैं जलाशयों की अवस्थिति(छोटे समुद्रों की अवस्थिति) · कभी कभी एक जलीय भाग एक से अधिक दिशा में ज्वार से जुडा होता है · इसके परिणाम स्वरुप वहां ज्वार की बारंबारता दो से अधिक हो जाती है जैसे इंग्लिश चैनल(south hampton) समुद्र की गहराई · जब गहराई अधिक होगी तो ज्वार की ऊँचाई कम होगी · जबकि गहराई कम होगी तो ज्वार की ऊँचाई अधिक होती है ज्वार भाटा का महत्त्व · बंदरगाह प्राकृतिक एवं कृत्रिम दोनों हो सकता है, पत्तन (पोर्ट) सदैव कृत्रिम होते हैं|डॉक, पत्तनों पर होते हैं जबकि पत्तन बंदरगाहों पर स्थित होते हैं| ज्वार-भाटा ज्वारीय पत्तनों के विकास में सहायक होता है जैसे भारत में हल्दिया पत्तन · ज्वार तटीय क्षेत्रों में समुद्री खाद्य की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं| इस प्रकार ज्वार समुद्री जैवमंडल जैसे समुद्री पौधों और मछलियों की प्रजनन गतिविधियों को भी प्रभावित करता है| ज्वारभाटा की नियमिता के कारण ज्वारीय क्षेत्र के समुद्री जीवों की संख्या में संतुलन बना रहता है| · ज्वार के कारण नदियों में अतिरिक्त जलापूर्ति हो जाती है जिससे नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है एवं निकटस्थ क्षेत्रों में बाढ़ की संभावना बन जाती है · नदियों में ज्वारीय जल के आगमन के बाद जब वह जल वापस समुद्र की ओर लौटता है तब वह नदी ताल में जमे अवसादों को निकालने का भी कार्य करता है इससे नदी अविरल रूप में बहने योग्य हो पाती है · उच्च ज्वार समुद्री नौवहन में सहायता करते हैं। वे समुंद्री किनारों के पानी का स्तर बढ़ा देते हैं जिसके कारण जहाज को बंदरगाह पर पहुंचाने में सहायता मिलती है| · किसी भी स्थान पर 24 घंटे में दो बार ज्वार आते हैं ये गतिज ऊर्जा से संपन्न होते हैं| इनका उपयोग ज्वारीय ऊर्जा के उत्पादन में किया जा सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ज्वार-भाटा मानवीय जीवन एवं उसकी गतिविधियों के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण होते हैं|
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"भारत में प्राचीन काल से ही विज्ञान प्रौधोगिकी की एक समृद्ध परंपरा रही है "। इस कथन का परीक्षण कीजिए ( 150-200 शब्द ) "India has had a rich tradition of science and technology since ancient times." Examine this statement. ( 150-200 words)
दृष्टिकोण : भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । उदाहरणों के माध्यम से विभिन्न कालखण्डों में भारत में हुए वैज्ञानिक प्रगति को दर्शाइए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में विज्ञान के विकास व वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण हमें प्रारम्भिक मानव विकास के साथ ही देखने को मिलने लगता है । भीमबेटका के गुफाचित्र प्रारम्भिक मानव के वैज्ञानिक अभिवृति का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है । आगे प्राचीन काल के विभिन्न ग्रंथों से भी हमें भारतीयों के वैज्ञानिक मानसिकता व समृद्ध परंपरा का प्रमाण प्राप्त होता है । भारत में वैज्ञानिक विकास का सर्वप्रथम सुस्पष्ट व विकसित स्वरूप हमें सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है । बेहतरीन नगर नियोजन, जल प्रबंधन, पक्की ईटों का प्रयोग, कांसा व तांबा का उत्कृष्ट धातुकर्म आदि अनेक ऐसे उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जो स्पष्ट रूप में एक विकसित विज्ञान व प्रौधोगिकी के अनुप्रयोग को दर्शाता है । आगे वैदिक काल में भी हमें वैज्ञानिक प्रगति के कई साक्ष्य मिलते हैं , जैसे- अथर्ववेद से आयुर्वेद का प्राचीनतम प्रमाण प्राप्त होता है । इसी प्रकार यज्ञ कुंडों का निर्माण ज्यामिती का प्रमाण प्रस्तुत करता है । फिर अशोक के स्तंभ प्राचीन भारत में इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है । इसी प्रकार मूर्ति निर्माण, स्तूप , विहार व राजप्रासाद आदि भी बेहतरीन शिल्प विज्ञान का प्रमाण प्रस्तुत करता है अंकगणित , दशमलव प्रणाली, शून्य का आविष्कार ,पाई का मान आदि गणित के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को दर्शाता है । इसी प्रकार खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी भारतीयों की कई महत्वपूर्ण खोज व उपलब्धियां रही हैं । पृथ्वी से सूर्य की दूरी, चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण, पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिकर्मा आदि को खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया जा सकता है । आर्यभट्ट व वराहमिहिर प्राचीन भारत के सर्वप्रमुख खगोल विज्ञानी के रूप में जाने जाते हैं । चिकित्सा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियां बेहद महत्वपूर्ण रही है । सुश्रुत, चरक, धनवंतरी आदि चिकित्सकों ने भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को विकसित करने में अहम योगदान दिया । ये चिकित्सक शल्य चिकित्सा, मोतियाबिंब की सर्जरी , प्लास्टिक सर्जरी आदि का प्राचीनतम प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । प्राचीन काल की इस समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा का हमें आगे भी निरंतर विकास देखने को मिलता है तथापि राजनीतिक व अन्य कारणों से इसकी गति ज़रूर अवरुद्ध हुई । आगे अंग्रेजी शासन के काल में भी विज्ञान का विकास हुआ परंतु वास्तविक विकास आजादी के बाद ही देखने को मिलता है ।वर्तमान भारत के वैज्ञानिक विकास को प्राचीन काल की वैज्ञानिक विरासत ने निश्चित रूप में प्रेरित किया है । इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं की भारत में वैज्ञानिक परंपरा व वैज्ञानिक अभिवृति की जड़ें प्राचीन काल से ही मौजूद रही हैं ।
##Question:"भारत में प्राचीन काल से ही विज्ञान प्रौधोगिकी की एक समृद्ध परंपरा रही है "। इस कथन का परीक्षण कीजिए ( 150-200 शब्द ) "India has had a rich tradition of science and technology since ancient times." Examine this statement. ( 150-200 words) ##Answer:दृष्टिकोण : भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । उदाहरणों के माध्यम से विभिन्न कालखण्डों में भारत में हुए वैज्ञानिक प्रगति को दर्शाइए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में विज्ञान के विकास व वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण हमें प्रारम्भिक मानव विकास के साथ ही देखने को मिलने लगता है । भीमबेटका के गुफाचित्र प्रारम्भिक मानव के वैज्ञानिक अभिवृति का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है । आगे प्राचीन काल के विभिन्न ग्रंथों से भी हमें भारतीयों के वैज्ञानिक मानसिकता व समृद्ध परंपरा का प्रमाण प्राप्त होता है । भारत में वैज्ञानिक विकास का सर्वप्रथम सुस्पष्ट व विकसित स्वरूप हमें सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है । बेहतरीन नगर नियोजन, जल प्रबंधन, पक्की ईटों का प्रयोग, कांसा व तांबा का उत्कृष्ट धातुकर्म आदि अनेक ऐसे उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जो स्पष्ट रूप में एक विकसित विज्ञान व प्रौधोगिकी के अनुप्रयोग को दर्शाता है । आगे वैदिक काल में भी हमें वैज्ञानिक प्रगति के कई साक्ष्य मिलते हैं , जैसे- अथर्ववेद से आयुर्वेद का प्राचीनतम प्रमाण प्राप्त होता है । इसी प्रकार यज्ञ कुंडों का निर्माण ज्यामिती का प्रमाण प्रस्तुत करता है । फिर अशोक के स्तंभ प्राचीन भारत में इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है । इसी प्रकार मूर्ति निर्माण, स्तूप , विहार व राजप्रासाद आदि भी बेहतरीन शिल्प विज्ञान का प्रमाण प्रस्तुत करता है अंकगणित , दशमलव प्रणाली, शून्य का आविष्कार ,पाई का मान आदि गणित के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को दर्शाता है । इसी प्रकार खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी भारतीयों की कई महत्वपूर्ण खोज व उपलब्धियां रही हैं । पृथ्वी से सूर्य की दूरी, चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण, पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिकर्मा आदि को खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया जा सकता है । आर्यभट्ट व वराहमिहिर प्राचीन भारत के सर्वप्रमुख खगोल विज्ञानी के रूप में जाने जाते हैं । चिकित्सा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियां बेहद महत्वपूर्ण रही है । सुश्रुत, चरक, धनवंतरी आदि चिकित्सकों ने भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को विकसित करने में अहम योगदान दिया । ये चिकित्सक शल्य चिकित्सा, मोतियाबिंब की सर्जरी , प्लास्टिक सर्जरी आदि का प्राचीनतम प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । प्राचीन काल की इस समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा का हमें आगे भी निरंतर विकास देखने को मिलता है तथापि राजनीतिक व अन्य कारणों से इसकी गति ज़रूर अवरुद्ध हुई । आगे अंग्रेजी शासन के काल में भी विज्ञान का विकास हुआ परंतु वास्तविक विकास आजादी के बाद ही देखने को मिलता है ।वर्तमान भारत के वैज्ञानिक विकास को प्राचीन काल की वैज्ञानिक विरासत ने निश्चित रूप में प्रेरित किया है । इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं की भारत में वैज्ञानिक परंपरा व वैज्ञानिक अभिवृति की जड़ें प्राचीन काल से ही मौजूद रही हैं ।
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संविधान से आप क्या समझते हैं? लिखित व अलिखित संविधान की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the constitution? Mention the features of written and unwritten constitutions. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, संविधान का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात,लिखित व अलिखित संविधान की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष के रूप मेंएक या दो पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जो कानूनों को वैद्यता प्रदान करता है। यह विभिन्न संस्थानों के सिस्टम को संचालित करने के मूल सिद्दांतों की पुस्तिका है। यह नागरिकों एवं राज्य के मध्य संबंधों का संचालन करता है। यह मूलाधिकारों की गारंटी प्रदान करता है तथा राज्यों के नीति निर्देशक सिद्दांतों के माध्यम से सामाजिक राजनीतिक मूल्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। विचारधारा की अभिव्यक्ति, मूलभूत कानूनों की अभिव्यक्ति इत्यादि संविधान के प्रकार्य होतेहैं। लिखित व अलिखित संविधान की विशेषताएं:- लिखित संविधान:- लिखित संविधान भारत, कनाडा, अमेरिका इत्यादि देशों में पाया जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत है जहां संप्रभु देशों में से सबसे विस्तृत एवं लिखित सविंधान है। लिखित संविधान मेंसंशोधन, विशेष बहुमत के द्वारा किया जाता है। लिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों की स्थिति, कार्यपालिक एवं विधयिका दोनों के विरुद्ध प्रभावी होती है। कार्यपालिका एवं विधायिका दोनों को मौलिक अधिकारों का सम्मान करना पड़ता है। लिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों का आधार, बिल ऑफ़ राइट्स(अमेरिका में) है। लिखित संविधान मेंसंवैधानिक सर्वोच्चता, न्यायपालिक में निहित होती है। न्यायपालिका को संविधान की व्याख्या एवं इसका रक्षक माना गया है। अलिखित संविधान:- अलिखित संविधान का सबसे अच्छाउदाहरण ब्रिटेन है। ब्रिटेन में अलिखित संविधान पाया जाता है। यह अलिखित संविधानमध्यकालीन रीति रिवाज, संसदीय नियम इत्यादि द्वारा संचालित होता है। इस अलिखित संविधान मेंसंशोधन, विधानमंडल के साधारण बहुमत के द्वारा किया जा सकता है। यहाँ विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती। अलिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों की स्थिति, केवल कार्यपालिका के विरुद्ध प्रभावी होती है, विधायिका इसमें शामिल नहीं होती। अलिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों का आधार, संसदीय नियम व कार्यवाही होते हैं। अलग से मौलिक अधिकारों की सूचि हो यह जरूरी नहीं। अलिखित संविधान मेंसंवैधानिक सर्वोच्चता, संसद में निहित होती है न कि संविधान की सर्वोच्चता होती है। इस प्रकार लिखित एवं अलिखित संविधान की विभिन्न विशेषताएं होती हैं, जो किसी देश की शासन पद्धति को निर्धारित करती हैं।
##Question:संविधान से आप क्या समझते हैं? लिखित व अलिखित संविधान की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the constitution? Mention the features of written and unwritten constitutions. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, संविधान का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात,लिखित व अलिखित संविधान की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष के रूप मेंएक या दो पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जो कानूनों को वैद्यता प्रदान करता है। यह विभिन्न संस्थानों के सिस्टम को संचालित करने के मूल सिद्दांतों की पुस्तिका है। यह नागरिकों एवं राज्य के मध्य संबंधों का संचालन करता है। यह मूलाधिकारों की गारंटी प्रदान करता है तथा राज्यों के नीति निर्देशक सिद्दांतों के माध्यम से सामाजिक राजनीतिक मूल्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। विचारधारा की अभिव्यक्ति, मूलभूत कानूनों की अभिव्यक्ति इत्यादि संविधान के प्रकार्य होतेहैं। लिखित व अलिखित संविधान की विशेषताएं:- लिखित संविधान:- लिखित संविधान भारत, कनाडा, अमेरिका इत्यादि देशों में पाया जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत है जहां संप्रभु देशों में से सबसे विस्तृत एवं लिखित सविंधान है। लिखित संविधान मेंसंशोधन, विशेष बहुमत के द्वारा किया जाता है। लिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों की स्थिति, कार्यपालिक एवं विधयिका दोनों के विरुद्ध प्रभावी होती है। कार्यपालिका एवं विधायिका दोनों को मौलिक अधिकारों का सम्मान करना पड़ता है। लिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों का आधार, बिल ऑफ़ राइट्स(अमेरिका में) है। लिखित संविधान मेंसंवैधानिक सर्वोच्चता, न्यायपालिक में निहित होती है। न्यायपालिका को संविधान की व्याख्या एवं इसका रक्षक माना गया है। अलिखित संविधान:- अलिखित संविधान का सबसे अच्छाउदाहरण ब्रिटेन है। ब्रिटेन में अलिखित संविधान पाया जाता है। यह अलिखित संविधानमध्यकालीन रीति रिवाज, संसदीय नियम इत्यादि द्वारा संचालित होता है। इस अलिखित संविधान मेंसंशोधन, विधानमंडल के साधारण बहुमत के द्वारा किया जा सकता है। यहाँ विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती। अलिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों की स्थिति, केवल कार्यपालिका के विरुद्ध प्रभावी होती है, विधायिका इसमें शामिल नहीं होती। अलिखित संविधान मेंमौलिक अधिकारों का आधार, संसदीय नियम व कार्यवाही होते हैं। अलग से मौलिक अधिकारों की सूचि हो यह जरूरी नहीं। अलिखित संविधान मेंसंवैधानिक सर्वोच्चता, संसद में निहित होती है न कि संविधान की सर्वोच्चता होती है। इस प्रकार लिखित एवं अलिखित संविधान की विभिन्न विशेषताएं होती हैं, जो किसी देश की शासन पद्धति को निर्धारित करती हैं।
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1857 के विद्रोह की शरुआत यद्यपि की धार्मिक मुद्दे को लेकर हुई , किन्तु इस विद्रोह में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की व्यापक भागीदारी थी , जोकि ब्रिटिश नीतियों के प्रति व्यापक असंतोष का परिणाम था |" इस कथन की विवेचना कीजिये | (150-200 शब्द) The revolt of 1857, However, began with a religious issue,but there was widespread participation of various sections of Indian society in this revolt, which was the result of widespread dissatisfaction with British policies. Discus this statement.
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 1857 के क्रांति के उद्भव को लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में कारणों को का उल्लेख कीजिए। इसके बाद परिणामों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर - आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अंग्रेजों के विरुद्ध यह पहला व्यापक स्तर पर प्रयास था। इसके माध्यम से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने विरोध को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। 1857 के विद्रोह के कारण आर्थिक कारण :भूराजस्व नीति से किसानो मे व्यापक असंतोष उद्योगों के पतन के कारण कारीगरों मे असंतोष विस्तारवादी नीति के कारण शासक वर्ग तथा अन्य वर्गों की स्थिति खराब। राजनीतिक कारण: 1857 तक अधिकांश राज्य अंग्रेजों के अधीन या निर्भर । 1856 मे अवध के विलय की घटना । अन्य राजनीतिक कारण: अंग्रेजों की नस्लीय नीति , अफगान युद्ध, संथाल विद्रोह सामाजिक कारण :ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुधार व शिक्षा नीति का प्रभाव। धार्मिक कारण :1850 मे धार्मिक निरयोगता कानून सरकारी खर्चों पर मिशनरियों की सहायता सैनिक कारण :केवल निम्न पदों पर भारतियों की नियुक्ति, कम वेतन, धार्मिक चिन्हों व प्रतिकों के प्रयोग पर प्रतिबंध। तात्कालिक कारण: चर्बी वाले कारतूस का मुद्दा व मेरठ से सैनिकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ । निष्कर्षतः 1857 का विद्रोह शताब्दियों से शोषित, प्रताड़ित एवं उपेक्षित भारतीय जन समूह की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कंठा का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत स्वतन्त्रता संघर्ष था। यह विद्रोह यद्यपि सफल नहीं हो सका किन्तु इसने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के बीज बोये एवं इस क्रांति के दूरगामी परिणाम हुए।
##Question:1857 के विद्रोह की शरुआत यद्यपि की धार्मिक मुद्दे को लेकर हुई , किन्तु इस विद्रोह में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की व्यापक भागीदारी थी , जोकि ब्रिटिश नीतियों के प्रति व्यापक असंतोष का परिणाम था |" इस कथन की विवेचना कीजिये | (150-200 शब्द) The revolt of 1857, However, began with a religious issue,but there was widespread participation of various sections of Indian society in this revolt, which was the result of widespread dissatisfaction with British policies. Discus this statement.##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में 1857 के क्रांति के उद्भव को लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में कारणों को का उल्लेख कीजिए। इसके बाद परिणामों पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में उत्तर का निष्कर्ष लिखिए। उत्तर - आधुनिक भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अंग्रेजों के विरुद्ध यह पहला व्यापक स्तर पर प्रयास था। इसके माध्यम से भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपने विरोध को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। 1857 के विद्रोह के कारण आर्थिक कारण :भूराजस्व नीति से किसानो मे व्यापक असंतोष उद्योगों के पतन के कारण कारीगरों मे असंतोष विस्तारवादी नीति के कारण शासक वर्ग तथा अन्य वर्गों की स्थिति खराब। राजनीतिक कारण: 1857 तक अधिकांश राज्य अंग्रेजों के अधीन या निर्भर । 1856 मे अवध के विलय की घटना । अन्य राजनीतिक कारण: अंग्रेजों की नस्लीय नीति , अफगान युद्ध, संथाल विद्रोह सामाजिक कारण :ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुधार व शिक्षा नीति का प्रभाव। धार्मिक कारण :1850 मे धार्मिक निरयोगता कानून सरकारी खर्चों पर मिशनरियों की सहायता सैनिक कारण :केवल निम्न पदों पर भारतियों की नियुक्ति, कम वेतन, धार्मिक चिन्हों व प्रतिकों के प्रयोग पर प्रतिबंध। तात्कालिक कारण: चर्बी वाले कारतूस का मुद्दा व मेरठ से सैनिकों द्वारा विद्रोह प्रारम्भ । निष्कर्षतः 1857 का विद्रोह शताब्दियों से शोषित, प्रताड़ित एवं उपेक्षित भारतीय जन समूह की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कंठा का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत स्वतन्त्रता संघर्ष था। यह विद्रोह यद्यपि सफल नहीं हो सका किन्तु इसने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के बीज बोये एवं इस क्रांति के दूरगामी परिणाम हुए।
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उष्णकटिबंधीय चक्रवात की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये। साथ ही इसकी उत्पत्ति एवं विकास के लिए आवश्यक दशाओं को स्पष्ट कीजिये। (150 से 200 शब्द/10 अंक) List the majorcharacteristics of a tropical cyclone. Also, clarify the conditions required for its origin and development. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में चक्रवात को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- दूसरे भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में चक्रवातों का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है| यह किसी निम्नवायुदाब क्षेत्र के ऊपर अपेक्षाकृत तीव्र गति से चलने वाली निकटस्थ वायुमंडलीय परिसंचलन है| जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घडी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घडी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात| उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है · चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी| · चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है · उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है| चक्रवात के अंदर पवन वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर चलती है इसे प्रवणता पवन कहते हैं, इसके मध्य के भाग को ही चक्रवात की आँख कहते हैं| प्रायः चक्रवात की आँख में मौसम शांत रहता है किन्तु कभी कभी वायु केअवरोहण की संभावना होती है · चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है| · इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है| आवश्यक दशाएं समुद्र तल का तापमान · समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए · वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है, अपसरण के लिए संघनन की गुप्त उष्मा आवश्यक होती जिसके लिए वायु में नमी की मात्रा अधिक होना चाहिए और नमी की मात्रा की अधिकता के लिए तापमान का अधिक होना आवश्यक होता है इसीलिए समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए| · इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं · यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है · चूँकि ये व्यापारिक पवनों का क्षेत्र है इसलिए सामान्य तौर पर इसका निर्माण पूर्वी तट पर ही होता है क्योंकि व्यापारिक पवनों में नमी की मात्रा अधिक होगी, · नमी की आपूर्ति का रुकना और घर्षण बल के कारण धरातल पर चक्रवात की मृत्यु हो जाती है जिसे लैंडफॉल कहते हैं कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा · चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है · इसी कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात का निर्माण विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (6 डिग्री उत्तर से 6 डिग्री दक्षिण) में नही होता है चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति · चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है · यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र · एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
##Question:उष्णकटिबंधीय चक्रवात की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये। साथ ही इसकी उत्पत्ति एवं विकास के लिए आवश्यक दशाओं को स्पष्ट कीजिये। (150 से 200 शब्द/10 अंक) List the majorcharacteristics of a tropical cyclone. Also, clarify the conditions required for its origin and development. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में चक्रवात को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- दूसरे भाग में उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में चक्रवातों का महत्त्व बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है| यह किसी निम्नवायुदाब क्षेत्र के ऊपर अपेक्षाकृत तीव्र गति से चलने वाली निकटस्थ वायुमंडलीय परिसंचलन है| जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घडी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घडी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात| उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है · चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी| · चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है · उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है| चक्रवात के अंदर पवन वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर चलती है इसे प्रवणता पवन कहते हैं, इसके मध्य के भाग को ही चक्रवात की आँख कहते हैं| प्रायः चक्रवात की आँख में मौसम शांत रहता है किन्तु कभी कभी वायु केअवरोहण की संभावना होती है · चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी| · उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है| · इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है| आवश्यक दशाएं समुद्र तल का तापमान · समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए · वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है, अपसरण के लिए संघनन की गुप्त उष्मा आवश्यक होती जिसके लिए वायु में नमी की मात्रा अधिक होना चाहिए और नमी की मात्रा की अधिकता के लिए तापमान का अधिक होना आवश्यक होता है इसीलिए समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए| · इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं · यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है · चूँकि ये व्यापारिक पवनों का क्षेत्र है इसलिए सामान्य तौर पर इसका निर्माण पूर्वी तट पर ही होता है क्योंकि व्यापारिक पवनों में नमी की मात्रा अधिक होगी, · नमी की आपूर्ति का रुकना और घर्षण बल के कारण धरातल पर चक्रवात की मृत्यु हो जाती है जिसे लैंडफॉल कहते हैं कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा · चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है · इसी कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात का निर्माण विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी (6 डिग्री उत्तर से 6 डिग्री दक्षिण) में नही होता है चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति · चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है · यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र · एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
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19वीं सदी के समाजवादी आंदोलन तथा उसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| इसने समकालीन समाज तथा राजनीति पर किस तरह का प्रभाव डाला था? (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly describe the socialist movement of the 19th century and its various phases. What kind of impact did ithad on contemporary Society and Politics? (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में,19वीं सदी के समाजवादी आंदोलन तथा उसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| अगले भाग में, समाजवादी आंदोलन के द्वारा समकालीन समाज तथा राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| उत्तर- समाजवादी भावना का विकास मूलतः18वीं सदी के औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप हुआ था| औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप आर्थिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हुआ तथा बड़े उद्योगों के मशीनीकरण एवं पूंजीवादी भावना के प्रसार से पूंजीपतियों कावर्चस्व स्थापित हो गया| पूंजीपतियों की श्रमिक विरोधी नीतियों के फलस्वरुप मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भयानक गिरावट देखी गई तथा समाज मुख्यतः पूंजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग में विभाजित हो गया| श्रमिकों की आर्थिक दुर्दशा तथा सामाजिक पतन के इस दौर में कुछ महत्वपूर्ण लेखकों तथा विचारकों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ जिन्होंने यूरोपीय देशों में प्रचलित आर्थिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की एवं समाजवाद के रूप में एक नवीन विचारधारा का प्रतिपादन किया| समाजवादी चिंतन के द्वारा इन विचारों ने औद्योगिक संगठन एवं पूंजीपतियों तथा श्रमिकों के पारस्परिक संबंधों के विषय में नवीन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया| समाजवादी आंदोलन के विभिन्न चरण 1800-1850 का चरण इस अवधि में समाजवादी गतिविधियों का केंद्र पश्चिमी यूरोप के ब्रिटेन, फ़्रांस आदि देश थें| ब्रिटेन में रोबर्ट ओवन ने श्रमिकों की दशा में सुधार हेतु कुछ कदम उठाएं तथा उद्योगपतियों एवं राज्य से ऐसे कदम उठाने की अपील की जैसे- मजदूरों के कार्य के घंटे को निश्चित करना; वेतन वृद्धि, साप्ताहिक छुटी, मनोरंजन की सुविधाएँ इत्यादि| इसी प्रकार फ्रांस में साईमन फुरियर, लुई ब्लाँ जैसे समाजवादियों ने श्रमिकों की दशा में सुधार हेतु कुछ सुझाव दिएँ| जैसे- सहकारी समितियों के द्वारा आर्थिक गतिविधियों का संचालन होना चाहिए आदि| समकालीन समाज तथा राजनीति पर प्रभाव- इन विचारकों का समकालीन राजनीति पर कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ| राज्य एवं उद्योगपतियों ने मजदूरों की दशा में सुधार हेतु नगण्य प्रयास किए| इसी संदर्भ में कार्ल मार्क्स ने इन समाजवादियों को काल्पनिक समाजवादी कहा| समाजवादी विचारधारा के महत्व से इस चरण का अपना महत्व है| पहली बार बुद्धिजीवियों ने श्रमिकों की दशा में सुधार हेतु आवाज उठायी तथा पूंजीवाद को शोषण पर आधारित व्यवस्था बताया| दूसरे शब्दों में, समाजवादी विचारधारा की नींव पड़ी| 1850 से आगे का चरण समाजवादी विचारधारा के विकास के दृष्टिकोण से यह चरण विशेष महत्व रखता है क्योंकि 1848 के क्रांति के दौरान ही कार्ल मार्क्स नामक विचारक ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो(1848) के माध्यम से समाजवादी विचारधारा को एक निश्चित व तार्किक रूप प्रदान करने की कोशिश की| उसने अपने घोषणापत्र में आशा व्यक्त की कि संपूर्ण विश्व के मजदूरों में एकता स्थापित होगी तथा उनकी शक्ति के आगे पूंजीवादी ताकतों का पतन होगा| धन तथा शक्ति के असमान वितरण की जगह उत्पादन के साधनों पर सारे समाज के आधिपत्य को प्रोत्साहन दिया गया; पूंजीवाद की आलोचना उसने इस आधार पर की कि यह मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है बल्कि समाज में वर्गीय विभेद को बढ़ावा देता है| मार्क्स के अनुसार मजदूरों की मजदूरी घटाकर पूंजीपति वर्ग मुनाफा बढ़ाता है इसलिए श्रमिकों एवं पूंजीपतियों के हित परस्पर विरोधी हैं| पूंजीवाद की आलोचना करते हुए उसने इसके अंतर्गत आर्थिक संकट की अवश्यंभावी बताया क्योंकि मजदूरों की कुल क्रय शक्ति तथा कुल उत्पादन के बीच कोई साम्य नहीं था| उत्पादन व्यवस्था से मुनाफे को हटाकर उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व; 1867 में दास कैपिटल के माध्यम से इसका विषद विश्लेषण किया| मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था में अंतर्निहित बुराईयों को आधार बनाते हुए श्रमिकों की क्रांति तथा साम्यवादी समाज की अवधारणा सामने रखी| मार्क्स ने साम्यवाद को लक्ष्य के रूप में सामने रखा अर्थात राज्य एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना| इसी उद्देश्य से मार्क्स ने श्रमिकों के द्वारा क्रांति की अवधारणा सामने रखी जैसे जैसे औद्योगीकरण बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे श्रमिकों की संख्या और शोषण भी| सर्वप्रथम सर्वाधिक औद्योगिक देश में क्रांति होगी और फिर क्रमशः सभी औद्योगिक देशों में अर्थात वैश्विक स्तर पर यह क्रांति होगी| श्रमिकों की क्रांति का आशय जबरन तरीके से सता पर नियंत्रण एवं सर्वहारा के अधिनायकवाद की स्थापना से है| इस अवस्था में एकदलीय सरकार होगी तथा समस्त आर्थिक गतिविधियों का संचालन राज्य के द्वारा होगा| प्रत्येक व्यक्ति को योग्यता के अनुसार कार्य मिलेगा तथा आवश्यकता के अनुसार वेतन| श्रमिकों के द्वारा क्रांति की अनिवार्यता को इतिहास के भौतिकवादी व्याख्या और वर्ग संघर्ष को आधार बनाते हुए मार्क्स ने यह बात कही| जैसे- प्राचीन यूरोप में दासों एवं मालिकों में संघर्ष तथा व्यवस्था परिवर्तन; मध्ययुगीन यूरोप में सामंतों एवं अर्ध-दासों के बीच संघर्ष तथा व्यवस्था परिवर्तन इसी प्रकार आधुनिक काल में उद्योगपतियों एवं श्रमिकों के बीच संघर्ष; समकालीन समाज तथा राजनीति पर प्रभाव - मार्क्स के विचार का पहले चरण की तुलना में समकालीन समाज पर व्यापक प्रभाव दिखा; मार्क्स ने सर्वप्रथम समाजवादी आंदोलन को उदारवादी आंदोलन से अलग किया और आंदोलन को एक तार्किक आधार तथा लक्ष्य प्रदान किया| समाजवादी विचारधारा के प्रसार तथा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मजदूरों को संगठित करने के लिए अनेक दल और संगठन बनाए गए इनमें लीग ऑफ द जस्ट का नाम महत्वपूर्ण है जो बाद में कम्युनिस्ट लीग के रूप में रूपांतरित हो गया| कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के स्वरूप यूरोप के लगभग हर देश में क्रांतियां शुरू हो गई जिसके प्रमुख कार्य के रूप में समाजवादी विचारों से ओतप्रोत मजदूर थे| हालांकि सभी क्रांतियां विफल हो गई परंतु समाजवादी विचारधारा के अंतरराष्ट्रीय चरित्र की वजह से यूरोपीय देशों में अनेक संगठनों का उदय हुआ| विभिन्न देशों के समाजवादियों को संगठित करने, मजदूरों को जागरूक करने तथा आंदोलन के बीच समन्वय बिठाने के लिए 1864 में इंटरनेशनल वर्किंग मेंस एसोसिएशन या प्रथम इंटरनेशनल की स्थापना के फलस्वरूप समाजवाद एक विश्व आंदोलन के रूप में उभरकर सामने आया|इंटरनेशनल की स्थापना को पूंजीवादी सरकारों ने खतरा माना तथा उसे अवैध घोषित कर दमन का सहारा लिया गया| प्रशा तथा फ्रांस के बीच 1870 की लड़ाई में समाजवादी आंदोलन से प्रेरित होकर मजदूरों की एकजुटता का व्यापक रूप दिखाई दिया जिसके फलस्वरूप पेरिस के मजदूरों ने सत्ता पर कब्जा करके पेरिस को गणतंत्र घोषित कर दिया| पेरिस कम्यून के माध्यम से मजदूरों ने शासन व्यवस्था भी कुछ महीनों के लिए संभाली| कम्यून के विध्वंस तथा आपसी फुटों के चलते 1876 में प्रथम इंटरनेशनल हालांकि विघटित हो गया परंतु उन्नीसवीं सदी के आठवें तथा नौवें दशकों के दौरान जन आंदोलन का रूप ले लिया था| यूरोप के लगभग हर देशों में समाजवादी विचारधारा से प्रेरित दलों का गठन हुआ| 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 1889 में पेरिस में द्वितीय इंटरनेशनल की स्थापना हुई इसके माध्यम से समाजवादी आंदोलन को नई दिशा प्रदान हुई| तत्कालीन विश्व में सैन्य प्रतिस्पर्धा के बढ़ते रूप तथा युद्ध के मूल कारण के रूप में पूंजीवाद के होने का विचार समाजवादियों ने दिया तथा यह बताया कि पूंजीवाद के विनाश से युद्ध को खत्म किया जा सकता है| द्वितीय इंटरनेशनल ने पूंजीवादी व्यवस्था के प्रतिफल के रूप में उपनिवेशवाद की भर्त्सना की तथा समाजवादी दलों को पूंजीवादी देशों द्वारा उपनिवेशों की गुलामी का विरोध करने के लिए प्रेरित किया| मार्क्सवादी विचारधारा के आक्रामक दृष्टिकोण तथा प्रसार को देखते हुए उदारवादी राष्ट्रों ने भी कुछ बदलाव किए जैसे- ब्रिटेन में मजदूरों को मत देने का अधिकार तथा ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार मिला; वहीँ फ़्रांस एवं जर्मनी में राज्य के द्वारा बीमा की सुविधा भी उपलब्ध करायी गयी| बड़ी संख्या में समाजवादी विद्वान् मार्क्स के विचारों से सहमत नहीं थे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से समाजवादी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थें| 1880 एवं 90 के दशक में ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी तथा कई अन्य देशों में समाजवादी पार्टियों का गठन हुआ| मार्क्सवादी विचारधारा के साथ ट्रेड यूनियन आंदोलन को भी गति मिली| मार्क्स की मृत्यु के पश्चात औद्योगिक देशों में समाजवादी आंदोलन मुख्यतः दो रास्तों पर चला- प्रथम, लोकतांत्रिक रास्तों से समाजवादी लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश; द्वितीय मार्क्सवादी विचारधारा को आधार बनाकर पूंजीवादी व्यवस्था के उन्मूलन के लिए संघर्ष| हालांकि 19वीं सदी में समाजवादी आंदोलन किसी भी देश में समाजवादी क्रांति करने में सफल नहीं हो पाया था परंतु इसके चलते पूंजीवाद द्वारा उत्पन्न सामाजिक आर्थिक राजनीतिक समस्याओं तथा राजनैतिक प्रजातंत्र की कमियों के प्रति लोगों में जागरूकता लाई गई बाद के वर्षों में अनेक देशों में शक्तिशाली जन आंदोलनों के रूप में उभरा| 19 वीं सदी के अंत तक आते-आते समाजवादी विचारधारा इतनी व्यापक तौर पर आंदोलन का रूप ले ली थी किसने पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाई| सामाजिक-आर्थिक असमानता के कारणसमाजवाद का जनाधार बढ़ता गया एवं 1917 में रुसी क्रांति या मार्क्सवादी क्रांति के साथ समाजवाद के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुयी|
##Question:19वीं सदी के समाजवादी आंदोलन तथा उसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| इसने समकालीन समाज तथा राजनीति पर किस तरह का प्रभाव डाला था? (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly describe the socialist movement of the 19th century and its various phases. What kind of impact did ithad on contemporary Society and Politics? (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में,19वीं सदी के समाजवादी आंदोलन तथा उसके विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| अगले भाग में, समाजवादी आंदोलन के द्वारा समकालीन समाज तथा राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| उत्तर- समाजवादी भावना का विकास मूलतः18वीं सदी के औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप हुआ था| औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप आर्थिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हुआ तथा बड़े उद्योगों के मशीनीकरण एवं पूंजीवादी भावना के प्रसार से पूंजीपतियों कावर्चस्व स्थापित हो गया| पूंजीपतियों की श्रमिक विरोधी नीतियों के फलस्वरुप मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भयानक गिरावट देखी गई तथा समाज मुख्यतः पूंजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग में विभाजित हो गया| श्रमिकों की आर्थिक दुर्दशा तथा सामाजिक पतन के इस दौर में कुछ महत्वपूर्ण लेखकों तथा विचारकों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ जिन्होंने यूरोपीय देशों में प्रचलित आर्थिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की एवं समाजवाद के रूप में एक नवीन विचारधारा का प्रतिपादन किया| समाजवादी चिंतन के द्वारा इन विचारों ने औद्योगिक संगठन एवं पूंजीपतियों तथा श्रमिकों के पारस्परिक संबंधों के विषय में नवीन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया| समाजवादी आंदोलन के विभिन्न चरण 1800-1850 का चरण इस अवधि में समाजवादी गतिविधियों का केंद्र पश्चिमी यूरोप के ब्रिटेन, फ़्रांस आदि देश थें| ब्रिटेन में रोबर्ट ओवन ने श्रमिकों की दशा में सुधार हेतु कुछ कदम उठाएं तथा उद्योगपतियों एवं राज्य से ऐसे कदम उठाने की अपील की जैसे- मजदूरों के कार्य के घंटे को निश्चित करना; वेतन वृद्धि, साप्ताहिक छुटी, मनोरंजन की सुविधाएँ इत्यादि| इसी प्रकार फ्रांस में साईमन फुरियर, लुई ब्लाँ जैसे समाजवादियों ने श्रमिकों की दशा में सुधार हेतु कुछ सुझाव दिएँ| जैसे- सहकारी समितियों के द्वारा आर्थिक गतिविधियों का संचालन होना चाहिए आदि| समकालीन समाज तथा राजनीति पर प्रभाव- इन विचारकों का समकालीन राजनीति पर कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ| राज्य एवं उद्योगपतियों ने मजदूरों की दशा में सुधार हेतु नगण्य प्रयास किए| इसी संदर्भ में कार्ल मार्क्स ने इन समाजवादियों को काल्पनिक समाजवादी कहा| समाजवादी विचारधारा के महत्व से इस चरण का अपना महत्व है| पहली बार बुद्धिजीवियों ने श्रमिकों की दशा में सुधार हेतु आवाज उठायी तथा पूंजीवाद को शोषण पर आधारित व्यवस्था बताया| दूसरे शब्दों में, समाजवादी विचारधारा की नींव पड़ी| 1850 से आगे का चरण समाजवादी विचारधारा के विकास के दृष्टिकोण से यह चरण विशेष महत्व रखता है क्योंकि 1848 के क्रांति के दौरान ही कार्ल मार्क्स नामक विचारक ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो(1848) के माध्यम से समाजवादी विचारधारा को एक निश्चित व तार्किक रूप प्रदान करने की कोशिश की| उसने अपने घोषणापत्र में आशा व्यक्त की कि संपूर्ण विश्व के मजदूरों में एकता स्थापित होगी तथा उनकी शक्ति के आगे पूंजीवादी ताकतों का पतन होगा| धन तथा शक्ति के असमान वितरण की जगह उत्पादन के साधनों पर सारे समाज के आधिपत्य को प्रोत्साहन दिया गया; पूंजीवाद की आलोचना उसने इस आधार पर की कि यह मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है बल्कि समाज में वर्गीय विभेद को बढ़ावा देता है| मार्क्स के अनुसार मजदूरों की मजदूरी घटाकर पूंजीपति वर्ग मुनाफा बढ़ाता है इसलिए श्रमिकों एवं पूंजीपतियों के हित परस्पर विरोधी हैं| पूंजीवाद की आलोचना करते हुए उसने इसके अंतर्गत आर्थिक संकट की अवश्यंभावी बताया क्योंकि मजदूरों की कुल क्रय शक्ति तथा कुल उत्पादन के बीच कोई साम्य नहीं था| उत्पादन व्यवस्था से मुनाफे को हटाकर उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व; 1867 में दास कैपिटल के माध्यम से इसका विषद विश्लेषण किया| मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था में अंतर्निहित बुराईयों को आधार बनाते हुए श्रमिकों की क्रांति तथा साम्यवादी समाज की अवधारणा सामने रखी| मार्क्स ने साम्यवाद को लक्ष्य के रूप में सामने रखा अर्थात राज्य एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना| इसी उद्देश्य से मार्क्स ने श्रमिकों के द्वारा क्रांति की अवधारणा सामने रखी जैसे जैसे औद्योगीकरण बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे श्रमिकों की संख्या और शोषण भी| सर्वप्रथम सर्वाधिक औद्योगिक देश में क्रांति होगी और फिर क्रमशः सभी औद्योगिक देशों में अर्थात वैश्विक स्तर पर यह क्रांति होगी| श्रमिकों की क्रांति का आशय जबरन तरीके से सता पर नियंत्रण एवं सर्वहारा के अधिनायकवाद की स्थापना से है| इस अवस्था में एकदलीय सरकार होगी तथा समस्त आर्थिक गतिविधियों का संचालन राज्य के द्वारा होगा| प्रत्येक व्यक्ति को योग्यता के अनुसार कार्य मिलेगा तथा आवश्यकता के अनुसार वेतन| श्रमिकों के द्वारा क्रांति की अनिवार्यता को इतिहास के भौतिकवादी व्याख्या और वर्ग संघर्ष को आधार बनाते हुए मार्क्स ने यह बात कही| जैसे- प्राचीन यूरोप में दासों एवं मालिकों में संघर्ष तथा व्यवस्था परिवर्तन; मध्ययुगीन यूरोप में सामंतों एवं अर्ध-दासों के बीच संघर्ष तथा व्यवस्था परिवर्तन इसी प्रकार आधुनिक काल में उद्योगपतियों एवं श्रमिकों के बीच संघर्ष; समकालीन समाज तथा राजनीति पर प्रभाव - मार्क्स के विचार का पहले चरण की तुलना में समकालीन समाज पर व्यापक प्रभाव दिखा; मार्क्स ने सर्वप्रथम समाजवादी आंदोलन को उदारवादी आंदोलन से अलग किया और आंदोलन को एक तार्किक आधार तथा लक्ष्य प्रदान किया| समाजवादी विचारधारा के प्रसार तथा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मजदूरों को संगठित करने के लिए अनेक दल और संगठन बनाए गए इनमें लीग ऑफ द जस्ट का नाम महत्वपूर्ण है जो बाद में कम्युनिस्ट लीग के रूप में रूपांतरित हो गया| कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के स्वरूप यूरोप के लगभग हर देश में क्रांतियां शुरू हो गई जिसके प्रमुख कार्य के रूप में समाजवादी विचारों से ओतप्रोत मजदूर थे| हालांकि सभी क्रांतियां विफल हो गई परंतु समाजवादी विचारधारा के अंतरराष्ट्रीय चरित्र की वजह से यूरोपीय देशों में अनेक संगठनों का उदय हुआ| विभिन्न देशों के समाजवादियों को संगठित करने, मजदूरों को जागरूक करने तथा आंदोलन के बीच समन्वय बिठाने के लिए 1864 में इंटरनेशनल वर्किंग मेंस एसोसिएशन या प्रथम इंटरनेशनल की स्थापना के फलस्वरूप समाजवाद एक विश्व आंदोलन के रूप में उभरकर सामने आया|इंटरनेशनल की स्थापना को पूंजीवादी सरकारों ने खतरा माना तथा उसे अवैध घोषित कर दमन का सहारा लिया गया| प्रशा तथा फ्रांस के बीच 1870 की लड़ाई में समाजवादी आंदोलन से प्रेरित होकर मजदूरों की एकजुटता का व्यापक रूप दिखाई दिया जिसके फलस्वरूप पेरिस के मजदूरों ने सत्ता पर कब्जा करके पेरिस को गणतंत्र घोषित कर दिया| पेरिस कम्यून के माध्यम से मजदूरों ने शासन व्यवस्था भी कुछ महीनों के लिए संभाली| कम्यून के विध्वंस तथा आपसी फुटों के चलते 1876 में प्रथम इंटरनेशनल हालांकि विघटित हो गया परंतु उन्नीसवीं सदी के आठवें तथा नौवें दशकों के दौरान जन आंदोलन का रूप ले लिया था| यूरोप के लगभग हर देशों में समाजवादी विचारधारा से प्रेरित दलों का गठन हुआ| 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 1889 में पेरिस में द्वितीय इंटरनेशनल की स्थापना हुई इसके माध्यम से समाजवादी आंदोलन को नई दिशा प्रदान हुई| तत्कालीन विश्व में सैन्य प्रतिस्पर्धा के बढ़ते रूप तथा युद्ध के मूल कारण के रूप में पूंजीवाद के होने का विचार समाजवादियों ने दिया तथा यह बताया कि पूंजीवाद के विनाश से युद्ध को खत्म किया जा सकता है| द्वितीय इंटरनेशनल ने पूंजीवादी व्यवस्था के प्रतिफल के रूप में उपनिवेशवाद की भर्त्सना की तथा समाजवादी दलों को पूंजीवादी देशों द्वारा उपनिवेशों की गुलामी का विरोध करने के लिए प्रेरित किया| मार्क्सवादी विचारधारा के आक्रामक दृष्टिकोण तथा प्रसार को देखते हुए उदारवादी राष्ट्रों ने भी कुछ बदलाव किए जैसे- ब्रिटेन में मजदूरों को मत देने का अधिकार तथा ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार मिला; वहीँ फ़्रांस एवं जर्मनी में राज्य के द्वारा बीमा की सुविधा भी उपलब्ध करायी गयी| बड़ी संख्या में समाजवादी विद्वान् मार्क्स के विचारों से सहमत नहीं थे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से समाजवादी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थें| 1880 एवं 90 के दशक में ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी तथा कई अन्य देशों में समाजवादी पार्टियों का गठन हुआ| मार्क्सवादी विचारधारा के साथ ट्रेड यूनियन आंदोलन को भी गति मिली| मार्क्स की मृत्यु के पश्चात औद्योगिक देशों में समाजवादी आंदोलन मुख्यतः दो रास्तों पर चला- प्रथम, लोकतांत्रिक रास्तों से समाजवादी लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश; द्वितीय मार्क्सवादी विचारधारा को आधार बनाकर पूंजीवादी व्यवस्था के उन्मूलन के लिए संघर्ष| हालांकि 19वीं सदी में समाजवादी आंदोलन किसी भी देश में समाजवादी क्रांति करने में सफल नहीं हो पाया था परंतु इसके चलते पूंजीवाद द्वारा उत्पन्न सामाजिक आर्थिक राजनीतिक समस्याओं तथा राजनैतिक प्रजातंत्र की कमियों के प्रति लोगों में जागरूकता लाई गई बाद के वर्षों में अनेक देशों में शक्तिशाली जन आंदोलनों के रूप में उभरा| 19 वीं सदी के अंत तक आते-आते समाजवादी विचारधारा इतनी व्यापक तौर पर आंदोलन का रूप ले ली थी किसने पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाई| सामाजिक-आर्थिक असमानता के कारणसमाजवाद का जनाधार बढ़ता गया एवं 1917 में रुसी क्रांति या मार्क्सवादी क्रांति के साथ समाजवाद के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुयी|
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भारत के अलावा विश्व का कोई लोकतांत्रिक देश ऐसा नहीं है , जहाँ संविधान निवारण तथा निरोध क़ानूनों को समाहित करता है । विश्लेषण कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Apart from India, there is no democratic country in the world where the constitution incorporates the Prevention and Prohibition laws. Analyse (150-200 words)
दृष्टिकोण : निवारण-निरोध क़ानूनों का संक्षिप्त परिचय देते भूमिका लिखिए । भारतीय संविधान के उन अनुच्छेदों की चर्चा कीजिये जो निवारण-निरोध का आधार प्रदान करता है । भारतीय संविधान में इसे शामिल किए जाने के तर्काधारों की चर्चा कीजिये । निवारण-निरोध के दुरुपयोग को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : निवारण-निरोध को ऐसे क़ानूनों के रूप में जाना जाता है जिसके तहत अपराध पूर्व ही अपराध की रोकथाम के लिए संभावित अपराधी को हिरासत में लिया जाता है । भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 का दूसरा भाग निवारण-निरोध के लिए आधार प्रदान करता है । भारत विश्व का शायद इकलौता लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसके संविधान के अंतरिम भाग में निवारण-निरोध संबंधी कानून की पूरी व्यवस्थाएं हो तथापि यदि हम भारतीय संविधान निर्माण के समय की परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो हम इसका तर्काधार समझ सकते हैं । निवारण-निरोध के पक्ष में हम निम्न तर्कों को देख सकते हैं - भारत को आजादी के साथ विभाजन का भी दंश झेलना पड़ा था इसलिए राष्ट्र की एकता-अखंडता को दुष्प्रभावित करने वाले कारकों को नियंत्रित करने के लिए संविधान में कुछ निवारक प्रावधान की व्यवस्था की गयी । भारत में आतंकवाद , अलगाववाद, व नक्सलवाद की समस्या भी इस प्रकार के निवारण-निरोध कानून के लिए आधार प्रदान करता है । दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति व चीन-पाकिस्तान धुरी भी भारत के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न करता है और राष्ट्र की एकता व अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए कुछ कठोर प्रावधानों की आवश्यकता रही है । साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निवारण-निरोध के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्राप्त अधिकार असीमित नहीं हैं इसके संबंध में निम्न सुरक्षात्मक उपाय भी किए गए हैं- व्यक्ति की हिरासत तीन माह से ज्यादा बढ़ाई नहीं जा सकती है जब तक कि सलाहकार बोर्ड इस बारे में उचित कारण न बताए और इस सलाहकार बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे । सामान्यतः निरोध का आधार संबन्धित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए तथापि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना आवश्यक नहीं है । निरोध वाले व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह निरोध के आदेश के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन करे । इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि एक नवोदित राष्ट्र के रूप में भारत की अपनी कुछ चिंताओं के कारण संविधान में निवारण-निरोध का प्रावधान किया गया परंतु यह असीमित नहीं हैं और इसके साथ निरोध वाले व्यक्ति को भी कुछ अधिकार प्रदान किए गए ।
##Question:भारत के अलावा विश्व का कोई लोकतांत्रिक देश ऐसा नहीं है , जहाँ संविधान निवारण तथा निरोध क़ानूनों को समाहित करता है । विश्लेषण कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Apart from India, there is no democratic country in the world where the constitution incorporates the Prevention and Prohibition laws. Analyse (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : निवारण-निरोध क़ानूनों का संक्षिप्त परिचय देते भूमिका लिखिए । भारतीय संविधान के उन अनुच्छेदों की चर्चा कीजिये जो निवारण-निरोध का आधार प्रदान करता है । भारतीय संविधान में इसे शामिल किए जाने के तर्काधारों की चर्चा कीजिये । निवारण-निरोध के दुरुपयोग को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : निवारण-निरोध को ऐसे क़ानूनों के रूप में जाना जाता है जिसके तहत अपराध पूर्व ही अपराध की रोकथाम के लिए संभावित अपराधी को हिरासत में लिया जाता है । भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 का दूसरा भाग निवारण-निरोध के लिए आधार प्रदान करता है । भारत विश्व का शायद इकलौता लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसके संविधान के अंतरिम भाग में निवारण-निरोध संबंधी कानून की पूरी व्यवस्थाएं हो तथापि यदि हम भारतीय संविधान निर्माण के समय की परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो हम इसका तर्काधार समझ सकते हैं । निवारण-निरोध के पक्ष में हम निम्न तर्कों को देख सकते हैं - भारत को आजादी के साथ विभाजन का भी दंश झेलना पड़ा था इसलिए राष्ट्र की एकता-अखंडता को दुष्प्रभावित करने वाले कारकों को नियंत्रित करने के लिए संविधान में कुछ निवारक प्रावधान की व्यवस्था की गयी । भारत में आतंकवाद , अलगाववाद, व नक्सलवाद की समस्या भी इस प्रकार के निवारण-निरोध कानून के लिए आधार प्रदान करता है । दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति व चीन-पाकिस्तान धुरी भी भारत के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न करता है और राष्ट्र की एकता व अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए कुछ कठोर प्रावधानों की आवश्यकता रही है । साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निवारण-निरोध के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्राप्त अधिकार असीमित नहीं हैं इसके संबंध में निम्न सुरक्षात्मक उपाय भी किए गए हैं- व्यक्ति की हिरासत तीन माह से ज्यादा बढ़ाई नहीं जा सकती है जब तक कि सलाहकार बोर्ड इस बारे में उचित कारण न बताए और इस सलाहकार बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे । सामान्यतः निरोध का आधार संबन्धित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए तथापि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना आवश्यक नहीं है । निरोध वाले व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह निरोध के आदेश के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन करे । इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि एक नवोदित राष्ट्र के रूप में भारत की अपनी कुछ चिंताओं के कारण संविधान में निवारण-निरोध का प्रावधान किया गया परंतु यह असीमित नहीं हैं और इसके साथ निरोध वाले व्यक्ति को भी कुछ अधिकार प्रदान किए गए ।
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तकनीकी विकास ने बाल लिंगानुपात में गिरावट की प्रक्रिया को तीव्र किया है। इस कथन के संदर्भ में हालिया वर्षों में सुधार हेतु किये गए प्रयासों पर चर्चा कीजिये। (150 -200 शब्द ) Technological advances have accelerated the process of declining child sex ratio. In context of this statement, discuss the efforts made in recent years for improvement. (150 -200 words)
एप्रोच : बाल लिंगानुपात में गिरावट को बताते हुए भूमिका दीजिये। इस गिरावट मेंतकनीक का योगदान स्पष्ट कीजिये। विभिन्न सुधार प्रयासों को लिखिए। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप : जनसँख्या 2011 के आंकड़े सामान्य लिंगानुपात में सुधार को दर्शाते है किन्तु वहीँ शिशु लिंगानुपात 927 सेघटकर 914 हो गया| यह भारत में शिशु लिंगानुपात में गिरावट की ओर ध्यान आकर्षित करते है. तकनीक का योगदान : भारत में 1990 के दशक से ही डॉपलर 4.0 , अल्ट्रासॉउन्ड जैसे सुविधाओं ने भ्रूण लिंग परिक्षण को अति सहज बना दिया। जो स्पष्ट करता है कि पितृसत्तामक सोच यदि तकनीकियों का दुरुपयोग करने लगे तब इस प्रकार की समस्याएं जन्म लेती है। सामान्य लिंगानुपात के सन्दर्भ में भी क्षेत्रीय असामनता दिखाई पड़ती है| समृद्ध क्षेत्रों में जो विशेषकर कृषि आधारित आय के स्रोत के है , उनमें लिंगानुपात विपरीत है जबकिईसाई समुदाय एवं अनुसूचित जनजातियों का लिंगानुपात सर्वाधिक है जो यह स्पष्ट कर रहा है कि जिन समुदायों में लैंगिक असामनता कम है तथा तकनीकतक पहुंच कम है, वहां लिंगानुपात में समानता बनी हुई है। सुधार हेतु किये गए प्रयास : यद्यपि तकनीकीदुरुपयोग को रोकने हेतु वर्ष 1994 में भ्रूण लिंग परीक्षण निरुद्ध कानून बनाया गया जिसे 2003 में संशोधित करते हुए , प्रसव पूर्व एवं भ्रूण लिंग परीक्षण निरोधक कानून कहा गया जिसके अंतर्गत स्वैच्छिक या अस्वैच्छिक रूप से भ्रूण लिंग परीक्षण एक दंडनीय अपराध है। परन्तु 2011 के आंकड़े यह स्पष्ट करते है कि इन तकनीकियों का दुरूपयोग हो रहा है. इस दृष्टिकोण को बदलने हेतु वर्ष 2015 में बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम को प्रारंभ किया गया जो एक द्विउद्देश्यीय कार्यक्रम है लिंग परीक्षण निरोधक कानून को और सख्ती से अनुपालित किया जाये ( दिल्ली सरकार की खबरी योजना ) शिक्षा के माध्यम से बेटियों को स्रोत में परिवर्तित करते हुए उनके प्रति दृष्टिकोण को बदलना - प्रथम चरण में 100 जिलों में लागू किया गया , जिनमें से 95 वे जिले है , जिनका लिंगानुपात कम था और 5 सबसे अच्छे लिंगानुपात वाले जिलों को मानक बनाया गया। इसकेद्वितीय चरण में 61 और जिले जोड़े गए तथा वर्तमान में यह कार्यक्रम अखिल भारतीय है। प्रधान मंत्री मातृत्व वंदन योजना आर्थिक सहयोग प्रत्येक माह की 9 तारीख को विशेष कैंपो द्वारा फॉलो उप विशेषकर गर्भवती महिलाओं के संदर्भ में इसके अलावावर्ल्ड बैंक के सहयोग से बच्चोंमें कुपोषण की समस्या एवं गर्भवती महिलाओं में पोषक तत्वों की कमीं की समस्या से त्वरित निस्तारण करने हेतु राष्ट्रीय पोषण मिशन लागू किया गया , जिसमें 50 % का अंशदान वर्ल्ड बैंक का है तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों में अनुपातिक बजटीय आवंटन द्वारा कुपोषण के सन्दर्भ में स्टंटिंग की समस्या में गिरावट एवं टीकाकरण को सुनिश्चित करना लक्ष्य रखे गए है। इसके साथ ही सेल्फी विथ डॉटर जैसे कार्यक्रमों कोसोशल मीडिया के द्वारा प्रोत्साहित किया जाना इसी दिशा में एक कदम है।
##Question:तकनीकी विकास ने बाल लिंगानुपात में गिरावट की प्रक्रिया को तीव्र किया है। इस कथन के संदर्भ में हालिया वर्षों में सुधार हेतु किये गए प्रयासों पर चर्चा कीजिये। (150 -200 शब्द ) Technological advances have accelerated the process of declining child sex ratio. In context of this statement, discuss the efforts made in recent years for improvement. (150 -200 words)##Answer:एप्रोच : बाल लिंगानुपात में गिरावट को बताते हुए भूमिका दीजिये। इस गिरावट मेंतकनीक का योगदान स्पष्ट कीजिये। विभिन्न सुधार प्रयासों को लिखिए। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप : जनसँख्या 2011 के आंकड़े सामान्य लिंगानुपात में सुधार को दर्शाते है किन्तु वहीँ शिशु लिंगानुपात 927 सेघटकर 914 हो गया| यह भारत में शिशु लिंगानुपात में गिरावट की ओर ध्यान आकर्षित करते है. तकनीक का योगदान : भारत में 1990 के दशक से ही डॉपलर 4.0 , अल्ट्रासॉउन्ड जैसे सुविधाओं ने भ्रूण लिंग परिक्षण को अति सहज बना दिया। जो स्पष्ट करता है कि पितृसत्तामक सोच यदि तकनीकियों का दुरुपयोग करने लगे तब इस प्रकार की समस्याएं जन्म लेती है। सामान्य लिंगानुपात के सन्दर्भ में भी क्षेत्रीय असामनता दिखाई पड़ती है| समृद्ध क्षेत्रों में जो विशेषकर कृषि आधारित आय के स्रोत के है , उनमें लिंगानुपात विपरीत है जबकिईसाई समुदाय एवं अनुसूचित जनजातियों का लिंगानुपात सर्वाधिक है जो यह स्पष्ट कर रहा है कि जिन समुदायों में लैंगिक असामनता कम है तथा तकनीकतक पहुंच कम है, वहां लिंगानुपात में समानता बनी हुई है। सुधार हेतु किये गए प्रयास : यद्यपि तकनीकीदुरुपयोग को रोकने हेतु वर्ष 1994 में भ्रूण लिंग परीक्षण निरुद्ध कानून बनाया गया जिसे 2003 में संशोधित करते हुए , प्रसव पूर्व एवं भ्रूण लिंग परीक्षण निरोधक कानून कहा गया जिसके अंतर्गत स्वैच्छिक या अस्वैच्छिक रूप से भ्रूण लिंग परीक्षण एक दंडनीय अपराध है। परन्तु 2011 के आंकड़े यह स्पष्ट करते है कि इन तकनीकियों का दुरूपयोग हो रहा है. इस दृष्टिकोण को बदलने हेतु वर्ष 2015 में बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम को प्रारंभ किया गया जो एक द्विउद्देश्यीय कार्यक्रम है लिंग परीक्षण निरोधक कानून को और सख्ती से अनुपालित किया जाये ( दिल्ली सरकार की खबरी योजना ) शिक्षा के माध्यम से बेटियों को स्रोत में परिवर्तित करते हुए उनके प्रति दृष्टिकोण को बदलना - प्रथम चरण में 100 जिलों में लागू किया गया , जिनमें से 95 वे जिले है , जिनका लिंगानुपात कम था और 5 सबसे अच्छे लिंगानुपात वाले जिलों को मानक बनाया गया। इसकेद्वितीय चरण में 61 और जिले जोड़े गए तथा वर्तमान में यह कार्यक्रम अखिल भारतीय है। प्रधान मंत्री मातृत्व वंदन योजना आर्थिक सहयोग प्रत्येक माह की 9 तारीख को विशेष कैंपो द्वारा फॉलो उप विशेषकर गर्भवती महिलाओं के संदर्भ में इसके अलावावर्ल्ड बैंक के सहयोग से बच्चोंमें कुपोषण की समस्या एवं गर्भवती महिलाओं में पोषक तत्वों की कमीं की समस्या से त्वरित निस्तारण करने हेतु राष्ट्रीय पोषण मिशन लागू किया गया , जिसमें 50 % का अंशदान वर्ल्ड बैंक का है तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों में अनुपातिक बजटीय आवंटन द्वारा कुपोषण के सन्दर्भ में स्टंटिंग की समस्या में गिरावट एवं टीकाकरण को सुनिश्चित करना लक्ष्य रखे गए है। इसके साथ ही सेल्फी विथ डॉटर जैसे कार्यक्रमों कोसोशल मीडिया के द्वारा प्रोत्साहित किया जाना इसी दिशा में एक कदम है।
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"भारत में प्राचीन काल से ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की एक समृद्ध परंपरा रही है "। इस कथन का परीक्षण कीजिये । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) "India has had a rich tradition of science and technology since ancient times ". Examine this statement . (150-200 words; 10 Marks )
दृष्टिकोण : भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । उदाहरणों के माध्यम से विभिन्न कालखण्डों में भारत में हुए वैज्ञानिक प्रगति को दर्शाइए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में विज्ञान के विकास व वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण हमें प्रारम्भिक मानव विकास के साथ ही देखने को मिलने लगता है । भीमबेटका के गुफाचित्र प्रारम्भिक मानव के वैज्ञानिक अभिवृति का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है । आगे प्राचीन काल के विभिन्न ग्रंथों से भी हमें भारतीयों के वैज्ञानिक मानसिकता व समृद्ध परंपरा का प्रमाण प्राप्त होता है । भारत में वैज्ञानिक विकास का सर्वप्रथम सुस्पष्ट व विकसित स्वरूप हमें सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है । बेहतरीन नगर नियोजन, जल प्रबंधन, पक्की ईटों का प्रयोग, कांसा व तांबा का उत्कृष्ट धातुकर्म आदि अनेक ऐसे उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जो स्पष्ट रूप में एक विकसित विज्ञान व प्रौधोगिकी के अनुप्रयोग को दर्शाता है । आगे वैदिक काल में भी हमें वैज्ञानिक प्रगति के कई साक्ष्य मिलते हैं , जैसे- अथर्ववेद से आयुर्वेद का प्राचीनतम प्रमाण प्राप्त होता है । इसी प्रकार यज्ञ कुंडों का निर्माण ज्यामिती का प्रमाण प्रस्तुत करता है । फिर अशोक के स्तंभ प्राचीन भारत में इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है । इसी प्रकार मूर्ति निर्माण, स्तूप , विहार व राजप्रासाद आदि भी बेहतरीन शिल्प विज्ञान का प्रमाण प्रस्तुत करता है अंकगणित , दशमलव प्रणाली, शून्य का आविष्कार ,पाई का मान आदि गणित के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को दर्शाता है । इसी प्रकार खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी भारतीयों की कई महत्वपूर्ण खोज व उपलब्धियां रही हैं । पृथ्वी से सूर्य की दूरी, चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण, पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिकर्मा आदि को खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया जा सकता है । आर्यभट्ट व वराहमिहिर प्राचीन भारत के सर्वप्रमुख खगोल विज्ञानी के रूप में जाने जाते हैं । चिकित्सा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियां बेहद महत्वपूर्ण रही है । सुश्रुत, चरक, धनवंतरी आदि चिकित्सकों ने भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को विकसित करने में अहम योगदान दिया । ये चिकित्सक शल्य चिकित्सा, मोतियाबिंब की सर्जरी , प्लास्टिक सर्जरी आदि का प्राचीनतम प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । प्राचीन काल की इस समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा का हमें आगे भी निरंतर विकास देखने को मिलता है तथापि राजनीतिक व अन्य कारणों से इसकी गति ज़रूर अवरुद्ध हुई । आगे अंग्रेजी शासन के काल में भी विज्ञान का विकास हुआ परंतु वास्तविक विकास आजादी के बाद ही देखने को मिलता है ।वर्तमान भारत के वैज्ञानिक विकास को प्राचीन काल की वैज्ञानिक विरासत ने निश्चित रूप में प्रेरित किया है । इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं की भारत में वैज्ञानिक परंपरा व वैज्ञानिक अभिवृति की जड़ें प्राचीन काल से ही मौजूद रही हैं ।
##Question:"भारत में प्राचीन काल से ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की एक समृद्ध परंपरा रही है "। इस कथन का परीक्षण कीजिये । ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) "India has had a rich tradition of science and technology since ancient times ". Examine this statement . (150-200 words; 10 Marks )##Answer:दृष्टिकोण : भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । उदाहरणों के माध्यम से विभिन्न कालखण्डों में भारत में हुए वैज्ञानिक प्रगति को दर्शाइए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में विज्ञान के विकास व वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण हमें प्रारम्भिक मानव विकास के साथ ही देखने को मिलने लगता है । भीमबेटका के गुफाचित्र प्रारम्भिक मानव के वैज्ञानिक अभिवृति का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है । आगे प्राचीन काल के विभिन्न ग्रंथों से भी हमें भारतीयों के वैज्ञानिक मानसिकता व समृद्ध परंपरा का प्रमाण प्राप्त होता है । भारत में वैज्ञानिक विकास का सर्वप्रथम सुस्पष्ट व विकसित स्वरूप हमें सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है । बेहतरीन नगर नियोजन, जल प्रबंधन, पक्की ईटों का प्रयोग, कांसा व तांबा का उत्कृष्ट धातुकर्म आदि अनेक ऐसे उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जो स्पष्ट रूप में एक विकसित विज्ञान व प्रौधोगिकी के अनुप्रयोग को दर्शाता है । आगे वैदिक काल में भी हमें वैज्ञानिक प्रगति के कई साक्ष्य मिलते हैं , जैसे- अथर्ववेद से आयुर्वेद का प्राचीनतम प्रमाण प्राप्त होता है । इसी प्रकार यज्ञ कुंडों का निर्माण ज्यामिती का प्रमाण प्रस्तुत करता है । फिर अशोक के स्तंभ प्राचीन भारत में इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है । इसी प्रकार मूर्ति निर्माण, स्तूप , विहार व राजप्रासाद आदि भी बेहतरीन शिल्प विज्ञान का प्रमाण प्रस्तुत करता है अंकगणित , दशमलव प्रणाली, शून्य का आविष्कार ,पाई का मान आदि गणित के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को दर्शाता है । इसी प्रकार खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी भारतीयों की कई महत्वपूर्ण खोज व उपलब्धियां रही हैं । पृथ्वी से सूर्य की दूरी, चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण, पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिकर्मा आदि को खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया जा सकता है । आर्यभट्ट व वराहमिहिर प्राचीन भारत के सर्वप्रमुख खगोल विज्ञानी के रूप में जाने जाते हैं । चिकित्सा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियां बेहद महत्वपूर्ण रही है । सुश्रुत, चरक, धनवंतरी आदि चिकित्सकों ने भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को विकसित करने में अहम योगदान दिया । ये चिकित्सक शल्य चिकित्सा, मोतियाबिंब की सर्जरी , प्लास्टिक सर्जरी आदि का प्राचीनतम प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । प्राचीन काल की इस समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा का हमें आगे भी निरंतर विकास देखने को मिलता है तथापि राजनीतिक व अन्य कारणों से इसकी गति ज़रूर अवरुद्ध हुई । आगे अंग्रेजी शासन के काल में भी विज्ञान का विकास हुआ परंतु वास्तविक विकास आजादी के बाद ही देखने को मिलता है ।वर्तमान भारत के वैज्ञानिक विकास को प्राचीन काल की वैज्ञानिक विरासत ने निश्चित रूप में प्रेरित किया है । इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं की भारत में वैज्ञानिक परंपरा व वैज्ञानिक अभिवृति की जड़ें प्राचीन काल से ही मौजूद रही हैं ।
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Explain India’s stance towards the World Trade Organization"s Trade Facilitation Agreement (TFA) and analyse concerns arising out of it. (150 words / 10 marks)
Approach : Introduce the answer by explaining the concept of the Trade Facilitation Agreement. Discuss the stand of India about TFA over the period of time. Highlight the concern regarding TFA. Answer : "TFA is an agreement under the aegis of WTO to expedite the movement and clearances of goods in transit, and establishing effective cooperation between customs and other authorities. It consists of a broad series of trade facilitation reforms. India was initially opposed to signing TFA due to following reasons: 1. Accepting TFA which is sought mostly by developed countries will remove it as a bargaining chip for Indian interests leading to us having reduced power of negotiation for our food procurement programme. 2. It would affect India"s position as the leader of developing countries in WTO negotiations as developing countries mostly are confined as the source of raw material in open trade while developed countries provide finished goods leading to movement of capital from developing to developed. However, having been criticized for being a spoiler and in lieu of its economic considerations, India later signed the Trade Facilitation Agreement. But it was done by India only after we got a waiver on our public stockholding programme. This will have the following advantages: 1. It will lead to augmentation of storage infrastructure for perishable goods and faster clearance of such goods. 2. It will pave way for single-window clearance system, customs clearances. 3. It will result in reducing cargo release time for both imports and exports. 4. It will lead to further integration of Indian economy with the world economy leading to better, affordable products to be available in Indian markets. 5. MSMEs will be benefitted due to reduced paperwork in line with Make In India. Thus, it can be concluded decisions in the WTO are mostly taken by consensus and India joined the consensus in agreeing to the outcomes of Nairobi Ministerial Conference, after ensuring that its interest was protected.
##Question:Explain India’s stance towards the World Trade Organization"s Trade Facilitation Agreement (TFA) and analyse concerns arising out of it. (150 words / 10 marks)##Answer:Approach : Introduce the answer by explaining the concept of the Trade Facilitation Agreement. Discuss the stand of India about TFA over the period of time. Highlight the concern regarding TFA. Answer : "TFA is an agreement under the aegis of WTO to expedite the movement and clearances of goods in transit, and establishing effective cooperation between customs and other authorities. It consists of a broad series of trade facilitation reforms. India was initially opposed to signing TFA due to following reasons: 1. Accepting TFA which is sought mostly by developed countries will remove it as a bargaining chip for Indian interests leading to us having reduced power of negotiation for our food procurement programme. 2. It would affect India"s position as the leader of developing countries in WTO negotiations as developing countries mostly are confined as the source of raw material in open trade while developed countries provide finished goods leading to movement of capital from developing to developed. However, having been criticized for being a spoiler and in lieu of its economic considerations, India later signed the Trade Facilitation Agreement. But it was done by India only after we got a waiver on our public stockholding programme. This will have the following advantages: 1. It will lead to augmentation of storage infrastructure for perishable goods and faster clearance of such goods. 2. It will pave way for single-window clearance system, customs clearances. 3. It will result in reducing cargo release time for both imports and exports. 4. It will lead to further integration of Indian economy with the world economy leading to better, affordable products to be available in Indian markets. 5. MSMEs will be benefitted due to reduced paperwork in line with Make In India. Thus, it can be concluded decisions in the WTO are mostly taken by consensus and India joined the consensus in agreeing to the outcomes of Nairobi Ministerial Conference, after ensuring that its interest was protected.
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"वर्तमान भारत में महिलाएं STEM में शिक्षित हो रही हैं तथापि महिला वैज्ञानिको की भागीदारी काफी कम है" । आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिये । (150-200 शब्द ) Currently women in India are getting educated in STEM, however the participation of women scientists is very less. Make critical comments. ( 150-200 words)
दृष्टिकोण: कुछ आँकड़ों के माध्यम से भारत में महिलाओं के STEM में शिक्षा प्राप्ति की चर्चा कीजिये । महिला व पुरुष वैज्ञानिकों की संख्या के संबंध में संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की कम भागीदारी के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिये । उत्तर: आज़ादी के बाद पिछले 70 वर्षों में भारत में महिला शिक्षा के सभी आयामों में विकास देखा गया है और STEM क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है । भारत में विज्ञान में नामांकन में महिलाओं का प्रतिशत 7.1% (1950-51 ) से बढ़कर 40% ( 2016) तक पहुँच गया है । यहाँ तक कि PG व PhD में भी महिलाओं का प्रतिशत 25-30% तक हो गया है । परंतु शोधकर्ता व फ़ेकल्टी के रूप में उच्च संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी महज 15% के आसपास है । भारत में केवल 14% महिला वैज्ञानिक हैं जो शोध व अनुसंधान संस्थानों में कार्यरत हैं जबकि वैश्विक औसत 28% से अधिक है । इसी प्रकार यदि INSA, IAS तथा NAAS द्वारा प्रदान किए जाने वाले फ़ेलोशिप की बात की जाए तो महज 5% महिलाओं को यह प्राप्त होता है । इसरो भारत में विज्ञान व प्रौधौगिकी के विकास का एक आदर्श प्रस्तुत करता है तथापि इसमें महिलाओं की भागीदारी काफी कम रही है । इसरो के वैज्ञानिक व तकनीकी स्टाफ में केवल 8% महिलाएं हैं और आज तक कोई भी महिला इसरो की अध्यक्ष नहीं बन पायी है । एक अन्य तथ्य यह भी है कि शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार , जो विज्ञान के क्षेत्र में भारत का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार है , अब तक 500 से अधिक वैज्ञानिकों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है परंतु इनमें महिलाओं कि संख्या केवल 15 रही है । महिला वैज्ञानिकों की कम संख्या के कारण : पारंपरिक मानसिकता एक बड़ी समस्या है । परंपरागत रूप से महिलाओं को सॉफ्ट स्किल्स में बेहतर माना जाता है, उनसे अपेक्षा होती है कि वे ऐसे क्षेत्रों में ही करियर बनाएँ । विज्ञान व शोध जैसे क्षेत्र पुरुषों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं । वैश्विक स्तर पर भी महिला वैज्ञानिकों कि संख्या कम है तथापि भारत की संख्या अधिक चिंताजनक है । कई महिला वैज्ञानिकों का कहना है कि PG व PhD कार्यक्रम में अच्छी संख्या में महिलाओं के नामांकन के बावजूद वे इसे करियर विकल्प के रूप में परिणत नहीं कर पाती हैं क्योंकि बायोलाजिकल क्लॉक व पारिवारिक दबाव एक बड़ी बाधा उत्पन्न करती है । जो महिला वैज्ञानिक कार्यरत हैं वे भी पक्षपात की शिकायत करती हैं । 81% महिलाएं जो STEM से जुड़ी हैं वे लैंगिक भेदभाव व प्रदर्शन के अनुरूप प्रतिफल न मिलने की बात बताती हैं । विवाह के बाद शहर में परिवर्तन , प्रर्याप्त शोध संस्थानों के विकेन्द्रीकरण का अभाव आदि अन्य प्रमुख समस्याएँ हैं जो महिला वैज्ञानिकों की संख्या को प्रतिकूल रूप में प्रभावित करती है । सुझाव : सबसे पहले मानसिकता में परिवर्तन किए जाने की आवश्यकता है । महिला वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने के लिए स्कूल स्तर से ही सुधार किए जाने की आवश्यकता है । प्रमुख महिला वैज्ञानिकों के योगदानों से आम लोगों व छात्र, छात्राओं को परिचित कराया जाना चाहिए जिससे कि वे प्रेरणा प्राप्त कर सकें । उदाहरण के लिए मंगल मिशन में संलग्न महिला वैज्ञानिक । प्रर्याप्त शोध व अनुसंधान संस्थानों का विकास व विकेन्द्रीकरण किया जाना आवश्यक ताकि महिलाएं अपनी सुविधा अनुसार अपने शोध को जारी रख सकें । उन महिला वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना जो पुनः अपना शोध प्रारम्भ करना चाहती हैं । इस दिशा में सरकार द्वारा प्रारम्भ किरण (KIRAN) स्कीम बेहद महत्वपूर्ण है । इसी प्रकार महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को कम किया जाना भी आवश्यक है । उन्हें भी प्रर्याप्त वेतन , भत्ते व प्रतिफल दिया जाना चाहिए ।
##Question:"वर्तमान भारत में महिलाएं STEM में शिक्षित हो रही हैं तथापि महिला वैज्ञानिको की भागीदारी काफी कम है" । आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिये । (150-200 शब्द ) Currently women in India are getting educated in STEM, however the participation of women scientists is very less. Make critical comments. ( 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: कुछ आँकड़ों के माध्यम से भारत में महिलाओं के STEM में शिक्षा प्राप्ति की चर्चा कीजिये । महिला व पुरुष वैज्ञानिकों की संख्या के संबंध में संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की कम भागीदारी के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिये । उत्तर: आज़ादी के बाद पिछले 70 वर्षों में भारत में महिला शिक्षा के सभी आयामों में विकास देखा गया है और STEM क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है । भारत में विज्ञान में नामांकन में महिलाओं का प्रतिशत 7.1% (1950-51 ) से बढ़कर 40% ( 2016) तक पहुँच गया है । यहाँ तक कि PG व PhD में भी महिलाओं का प्रतिशत 25-30% तक हो गया है । परंतु शोधकर्ता व फ़ेकल्टी के रूप में उच्च संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी महज 15% के आसपास है । भारत में केवल 14% महिला वैज्ञानिक हैं जो शोध व अनुसंधान संस्थानों में कार्यरत हैं जबकि वैश्विक औसत 28% से अधिक है । इसी प्रकार यदि INSA, IAS तथा NAAS द्वारा प्रदान किए जाने वाले फ़ेलोशिप की बात की जाए तो महज 5% महिलाओं को यह प्राप्त होता है । इसरो भारत में विज्ञान व प्रौधौगिकी के विकास का एक आदर्श प्रस्तुत करता है तथापि इसमें महिलाओं की भागीदारी काफी कम रही है । इसरो के वैज्ञानिक व तकनीकी स्टाफ में केवल 8% महिलाएं हैं और आज तक कोई भी महिला इसरो की अध्यक्ष नहीं बन पायी है । एक अन्य तथ्य यह भी है कि शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार , जो विज्ञान के क्षेत्र में भारत का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार है , अब तक 500 से अधिक वैज्ञानिकों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है परंतु इनमें महिलाओं कि संख्या केवल 15 रही है । महिला वैज्ञानिकों की कम संख्या के कारण : पारंपरिक मानसिकता एक बड़ी समस्या है । परंपरागत रूप से महिलाओं को सॉफ्ट स्किल्स में बेहतर माना जाता है, उनसे अपेक्षा होती है कि वे ऐसे क्षेत्रों में ही करियर बनाएँ । विज्ञान व शोध जैसे क्षेत्र पुरुषों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं । वैश्विक स्तर पर भी महिला वैज्ञानिकों कि संख्या कम है तथापि भारत की संख्या अधिक चिंताजनक है । कई महिला वैज्ञानिकों का कहना है कि PG व PhD कार्यक्रम में अच्छी संख्या में महिलाओं के नामांकन के बावजूद वे इसे करियर विकल्प के रूप में परिणत नहीं कर पाती हैं क्योंकि बायोलाजिकल क्लॉक व पारिवारिक दबाव एक बड़ी बाधा उत्पन्न करती है । जो महिला वैज्ञानिक कार्यरत हैं वे भी पक्षपात की शिकायत करती हैं । 81% महिलाएं जो STEM से जुड़ी हैं वे लैंगिक भेदभाव व प्रदर्शन के अनुरूप प्रतिफल न मिलने की बात बताती हैं । विवाह के बाद शहर में परिवर्तन , प्रर्याप्त शोध संस्थानों के विकेन्द्रीकरण का अभाव आदि अन्य प्रमुख समस्याएँ हैं जो महिला वैज्ञानिकों की संख्या को प्रतिकूल रूप में प्रभावित करती है । सुझाव : सबसे पहले मानसिकता में परिवर्तन किए जाने की आवश्यकता है । महिला वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने के लिए स्कूल स्तर से ही सुधार किए जाने की आवश्यकता है । प्रमुख महिला वैज्ञानिकों के योगदानों से आम लोगों व छात्र, छात्राओं को परिचित कराया जाना चाहिए जिससे कि वे प्रेरणा प्राप्त कर सकें । उदाहरण के लिए मंगल मिशन में संलग्न महिला वैज्ञानिक । प्रर्याप्त शोध व अनुसंधान संस्थानों का विकास व विकेन्द्रीकरण किया जाना आवश्यक ताकि महिलाएं अपनी सुविधा अनुसार अपने शोध को जारी रख सकें । उन महिला वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना जो पुनः अपना शोध प्रारम्भ करना चाहती हैं । इस दिशा में सरकार द्वारा प्रारम्भ किरण (KIRAN) स्कीम बेहद महत्वपूर्ण है । इसी प्रकार महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को कम किया जाना भी आवश्यक है । उन्हें भी प्रर्याप्त वेतन , भत्ते व प्रतिफल दिया जाना चाहिए ।
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हिमालय की उत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए पूर्वी एवं पश्चिमी हिमालय की आकृति/संरचना में अंतर और परिणामों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explaining the origin of the Himalayas, discuss the differences and consequences in the shape/structure of the Eastern and Western Himalayas. (150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में हिमालय का संक्षिप्त परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पूर्वी एवं पश्चिमी हिमालय की आकृति/संरचना में सकारण अंतर स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में संरचना में अंतर से उत्पन्न परिणामों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत के उत्तर में पूर्व से पश्चिम की दिशा में विस्तृत पर्वतीय क्षेत्र को समग्र रूप से हिमालय के रूप में जाना जाता है| उत्तर एवं दक्षिण में इसके दो प्रमुख उपभाग हैं| पार हिमालय में काराकोरम एवं लद्दाख श्रेणी, कैलाश शामिल है जबकिहिमालय में वृहद् हिमालय, मध्य हिमालय एवं लघु हिमालय शामिल हैं| उपरोक्त दोनों का विभाजन इंडो सांग्पो सचर जोन (सिन्धु ब्रम्हपुत्र घाटी ) द्वारा होता है|दोनों में प्रमुख अंतर इनकी उत्पत्ति के आधार पर किया जाता है|पार हिमालय की उत्पत्ति महासागरीय एवं महाद्वीपीय प्लेट कि टक्कर से हुआ है जबकिहिमालय की उत्पत्ति महाद्वीपीय महाद्वीपीय प्लेट कि टक्कर से हुआ है| इसी तरहपूर्व से पश्चिम विभाजन करने पर हिमालय को कश्मीर/पंजाब/हिमाचल हिमालय (सिन्धु से सतलज),कुमाऊँ हिमालय (सतलज से काली नदी), नेपाल हिमालय( काली से तीस्ता), असम हिमालय (तीस्ता से दिहांग/ब्रम्हपुत्र), पूर्वांचल पहाड़ियां(दिहांग से पूर्व) में विभाजित किया जाता है| हिमालय की संरचना/आकृति हिमालय चापीय आकार का मोड़दार पर्वत है हिमालय को यह चापीय आकार जिन प्लेटों में टक्कर हुआ है उनके आकार के कारण प्राप्त हुआ है हिमालय की सबसे पहली टक्कर द्रास/कारगिल के आस-पास हुई थी, इस समय प्लेटों की गति सामान्य थी पहली टक्कर के बाद निक्षेपण की दर में अंतर आता है और पूर्व की ओर निक्षेपण की दर अधिक हो जाती है इसीलिए यह सुई की विपरीत दिशा में अपेक्षाकृत तेजी से गतिमान हुई थी जिसके कारण हिमालय को चापाकार आकृति प्राप्त हुई है पूर्वी तथा पश्चिमी हिमालय में देखा जाने वाला संरचनात्मक अंतर इसी गति में अंतर का परिणाम है पश्चिमी हिमालय की संरचना पश्चिमी हिमालय अत्यधिक चौड़ा है (300 KM) पश्चिमी हिमालय की ऊँचाई पूर्वी हिमालय की अपेक्षा कम है पश्चिमी हिमालय में दो घाटियाँ यथा कश्मीर एवं काठमांडू घाटी स्थित हैं पश्चिमी हिमालय में वलन की तीव्रता कम है तथा पश्चिमी हिमालय ढाल अपेक्षाकृत रूप सेमंद है पूर्वी हिमालय की संरचना पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा पूर्वी हिमालय की चौडाई कम है (50 KM) जबकि औसत ऊँचाई अधिक है पूर्वी हिमालय में समतल मैदान का अभाव पूर्वी हिमालय में वलन की तीव्रता बहुत अधिक है वलन की तीव्रता यहाँ ढाल बहुततीव्र है संरचना में अंतर के परिणाम तीव्र ढाल के ऊपर बहती हुई नदी द्वारा कटाव अधिक किया जाता है इसीलिए प्रायः पूर्वी नदियों में अवसाद की मात्रा अधिक होती है ब्रह्मपुत्र में प्रति इकाई क्षेत्रफल में अवसाद की मात्रा गंगा अथवा सिन्धु से अधिक होगी क्योंकि पूर्वी हिमालय की ढाल तीव्र है पूर्वी हिमालय विषुवत रेखा के अधिक निकट है अतः सामान ऊँचाई पर ही पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा तापमान अधिक होगा तापमान में यही अंतर दोनों क्षेत्रों की वनस्पतियों में भिन्नता का कारण है पूर्वी हिमालय के गिरिपद में वनस्पतियों के जो प्रकार पाए जायेंगे वे पश्चिमी हिमालय में अनुपस्थित होंगे इसी प्रकार पश्चिमी हिमालय के गिरिपद पर पाए जाने वाले वन के प्रकार पूर्वी हिमालय में अनुपस्थित होंगे पूर्वी हिमालय में जैव विविधता की अधिकता का कारण भी यही है समान तापमान के लिए पूर्वी हिमालय पर पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा कम ऊँचाई पर जाना होगा प्लेट का निक्षेपण उत्तर की ओर हो रहा है अतः हिमालय की प्रत्येक श्रेणी में दक्षिणी ढाल, उत्तरी ढाल की अपेक्षा अधिक तीव्र है जबकि उत्तरी ढाल मंद है| दक्षिणी ढाल से पर्वतारोहण मुश्किल होता है,इससे भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियां भी उत्पन्न होती हैं जैसे कारगिल युद्ध मेंभारत को नीचे होने के कारण मुश्किलों का सामना करना पडा था| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भिन्न कारणों से पूर्वी एवं पश्चिमी हिमालय की संरचना में आया अंतर विभिन्न परिणामों को उत्पन्न करता है|
##Question:हिमालय की उत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए पूर्वी एवं पश्चिमी हिमालय की आकृति/संरचना में अंतर और परिणामों की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explaining the origin of the Himalayas, discuss the differences and consequences in the shape/structure of the Eastern and Western Himalayas. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में हिमालय का संक्षिप्त परिचय दीजिये 2- प्रथम भाग में पूर्वी एवं पश्चिमी हिमालय की आकृति/संरचना में सकारण अंतर स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में संरचना में अंतर से उत्पन्न परिणामों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत के उत्तर में पूर्व से पश्चिम की दिशा में विस्तृत पर्वतीय क्षेत्र को समग्र रूप से हिमालय के रूप में जाना जाता है| उत्तर एवं दक्षिण में इसके दो प्रमुख उपभाग हैं| पार हिमालय में काराकोरम एवं लद्दाख श्रेणी, कैलाश शामिल है जबकिहिमालय में वृहद् हिमालय, मध्य हिमालय एवं लघु हिमालय शामिल हैं| उपरोक्त दोनों का विभाजन इंडो सांग्पो सचर जोन (सिन्धु ब्रम्हपुत्र घाटी ) द्वारा होता है|दोनों में प्रमुख अंतर इनकी उत्पत्ति के आधार पर किया जाता है|पार हिमालय की उत्पत्ति महासागरीय एवं महाद्वीपीय प्लेट कि टक्कर से हुआ है जबकिहिमालय की उत्पत्ति महाद्वीपीय महाद्वीपीय प्लेट कि टक्कर से हुआ है| इसी तरहपूर्व से पश्चिम विभाजन करने पर हिमालय को कश्मीर/पंजाब/हिमाचल हिमालय (सिन्धु से सतलज),कुमाऊँ हिमालय (सतलज से काली नदी), नेपाल हिमालय( काली से तीस्ता), असम हिमालय (तीस्ता से दिहांग/ब्रम्हपुत्र), पूर्वांचल पहाड़ियां(दिहांग से पूर्व) में विभाजित किया जाता है| हिमालय की संरचना/आकृति हिमालय चापीय आकार का मोड़दार पर्वत है हिमालय को यह चापीय आकार जिन प्लेटों में टक्कर हुआ है उनके आकार के कारण प्राप्त हुआ है हिमालय की सबसे पहली टक्कर द्रास/कारगिल के आस-पास हुई थी, इस समय प्लेटों की गति सामान्य थी पहली टक्कर के बाद निक्षेपण की दर में अंतर आता है और पूर्व की ओर निक्षेपण की दर अधिक हो जाती है इसीलिए यह सुई की विपरीत दिशा में अपेक्षाकृत तेजी से गतिमान हुई थी जिसके कारण हिमालय को चापाकार आकृति प्राप्त हुई है पूर्वी तथा पश्चिमी हिमालय में देखा जाने वाला संरचनात्मक अंतर इसी गति में अंतर का परिणाम है पश्चिमी हिमालय की संरचना पश्चिमी हिमालय अत्यधिक चौड़ा है (300 KM) पश्चिमी हिमालय की ऊँचाई पूर्वी हिमालय की अपेक्षा कम है पश्चिमी हिमालय में दो घाटियाँ यथा कश्मीर एवं काठमांडू घाटी स्थित हैं पश्चिमी हिमालय में वलन की तीव्रता कम है तथा पश्चिमी हिमालय ढाल अपेक्षाकृत रूप सेमंद है पूर्वी हिमालय की संरचना पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा पूर्वी हिमालय की चौडाई कम है (50 KM) जबकि औसत ऊँचाई अधिक है पूर्वी हिमालय में समतल मैदान का अभाव पूर्वी हिमालय में वलन की तीव्रता बहुत अधिक है वलन की तीव्रता यहाँ ढाल बहुततीव्र है संरचना में अंतर के परिणाम तीव्र ढाल के ऊपर बहती हुई नदी द्वारा कटाव अधिक किया जाता है इसीलिए प्रायः पूर्वी नदियों में अवसाद की मात्रा अधिक होती है ब्रह्मपुत्र में प्रति इकाई क्षेत्रफल में अवसाद की मात्रा गंगा अथवा सिन्धु से अधिक होगी क्योंकि पूर्वी हिमालय की ढाल तीव्र है पूर्वी हिमालय विषुवत रेखा के अधिक निकट है अतः सामान ऊँचाई पर ही पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा तापमान अधिक होगा तापमान में यही अंतर दोनों क्षेत्रों की वनस्पतियों में भिन्नता का कारण है पूर्वी हिमालय के गिरिपद में वनस्पतियों के जो प्रकार पाए जायेंगे वे पश्चिमी हिमालय में अनुपस्थित होंगे इसी प्रकार पश्चिमी हिमालय के गिरिपद पर पाए जाने वाले वन के प्रकार पूर्वी हिमालय में अनुपस्थित होंगे पूर्वी हिमालय में जैव विविधता की अधिकता का कारण भी यही है समान तापमान के लिए पूर्वी हिमालय पर पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा कम ऊँचाई पर जाना होगा प्लेट का निक्षेपण उत्तर की ओर हो रहा है अतः हिमालय की प्रत्येक श्रेणी में दक्षिणी ढाल, उत्तरी ढाल की अपेक्षा अधिक तीव्र है जबकि उत्तरी ढाल मंद है| दक्षिणी ढाल से पर्वतारोहण मुश्किल होता है,इससे भारत के समक्ष सामरिक चुनौतियां भी उत्पन्न होती हैं जैसे कारगिल युद्ध मेंभारत को नीचे होने के कारण मुश्किलों का सामना करना पडा था| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भिन्न कारणों से पूर्वी एवं पश्चिमी हिमालय की संरचना में आया अंतर विभिन्न परिणामों को उत्पन्न करता है|
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"फूट डालो और राज करो की नीति" के साथ ही, 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश नीति में कई अन्य परिवर्तन परिलक्षित होते हैं | स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) With the "divide and rule policy", many other changes have been reflected in British Policy after the revolt of 1857. Clarify. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में "फूट डालो और राज करो" की नीति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1857 के बाद सामाजिक,आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तनों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इन नीतियों ने कैसे राष्ट्रवाद की नीव रखी, उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 1857 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को एक महान परिवर्तन के पथ पर लाकर खड़ा कर दिया | 1857 की क्रांति से ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किये, जिससे ऐसी क्रान्ति फिर न उभर सके| इनमें से एक नीति "फूट डालो और राज करो" अपनाई ,जिससे हिन्दू व मुसलमानों की एकता में फूट डाली जा सके | इस नीति के अंतर्गत कई प्रकार के सैनिक , आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक परिवर्तन किये गए , जो निम्नलिखित हैं - ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गयी, दो भारतीय सैनिकों पर एक ब्रिटिश सैनिक नियुक्त किया गया | ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती ऐसी जगह पर होने लगी जहाँ पर विद्रोह होने की आशंका ज्यादा होती थी | सैनिकों को उनके संप्रदाय के अधार पर बांटा गया जैसे सिख रेजिमेंट , गढ़वाल रेजिमेंट , जाट रेजिमेंट इत्यादि | सेना में भी पात्र -पत्रिकाएं वर्जित थीं | भारतीय सेना एक भाड़े का टट्टू बनकर रह गयीं | अंग्रेजों का जो खुलकर समर्थन करते थे ऐसे शासकों को गोद लेने का अधिकार दिया गया | ब्रिटिशों के अन्य शासकों से जैसे सम्बन्ध थे उसी प्रकार ज़मींदारों से बनाये जाने का प्रयास करने लगे | 1857 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया | सिविल सेवा में दिखावे के लिए ही सही भारतीयों की नियुक्ति की अनुमति दे दी गयी | 1861 के अधिनियम से भारतियों को भी विधायी शक्ति में शामिल किया गया | भारतीय प्रजा के साथ अनेक प्रकार के भेदभाव किये जाने लगे | 1878 के वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के अंतर्गत देशी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | अन्य देशों से भारतीय साम्राज्य की रक्षा करना जिससे ब्रिटिश आर्थिक हित पूरा होता रहे | लोक सेवा परीक्षा में उम्र 23 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गयी | सभी प्रकार के शीर्ष पद यूरोपियों को दे दिए गए | इस प्रकार उपरोक्त नीतियों का कार्यान्वयन करके किसी भी ऐसी क्रांति को रोकने में ब्रिटिश सरकार ने काफी हद तक सफलता प्राप्त की | इन नीतियों का असर कुछ सालों तक रहा परन्तु 1857 की क्रांति ने राष्ट्रवाद की जो नींव रख दी थी उसका असर आगे के सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों पर पड़ा |
##Question:"फूट डालो और राज करो की नीति" के साथ ही, 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश नीति में कई अन्य परिवर्तन परिलक्षित होते हैं | स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) With the "divide and rule policy", many other changes have been reflected in British Policy after the revolt of 1857. Clarify. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में "फूट डालो और राज करो" की नीति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1857 के बाद सामाजिक,आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तनों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इन नीतियों ने कैसे राष्ट्रवाद की नीव रखी, उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 1857 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को एक महान परिवर्तन के पथ पर लाकर खड़ा कर दिया | 1857 की क्रांति से ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किये, जिससे ऐसी क्रान्ति फिर न उभर सके| इनमें से एक नीति "फूट डालो और राज करो" अपनाई ,जिससे हिन्दू व मुसलमानों की एकता में फूट डाली जा सके | इस नीति के अंतर्गत कई प्रकार के सैनिक , आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक परिवर्तन किये गए , जो निम्नलिखित हैं - ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गयी, दो भारतीय सैनिकों पर एक ब्रिटिश सैनिक नियुक्त किया गया | ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती ऐसी जगह पर होने लगी जहाँ पर विद्रोह होने की आशंका ज्यादा होती थी | सैनिकों को उनके संप्रदाय के अधार पर बांटा गया जैसे सिख रेजिमेंट , गढ़वाल रेजिमेंट , जाट रेजिमेंट इत्यादि | सेना में भी पात्र -पत्रिकाएं वर्जित थीं | भारतीय सेना एक भाड़े का टट्टू बनकर रह गयीं | अंग्रेजों का जो खुलकर समर्थन करते थे ऐसे शासकों को गोद लेने का अधिकार दिया गया | ब्रिटिशों के अन्य शासकों से जैसे सम्बन्ध थे उसी प्रकार ज़मींदारों से बनाये जाने का प्रयास करने लगे | 1857 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया | सिविल सेवा में दिखावे के लिए ही सही भारतीयों की नियुक्ति की अनुमति दे दी गयी | 1861 के अधिनियम से भारतियों को भी विधायी शक्ति में शामिल किया गया | भारतीय प्रजा के साथ अनेक प्रकार के भेदभाव किये जाने लगे | 1878 के वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के अंतर्गत देशी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | अन्य देशों से भारतीय साम्राज्य की रक्षा करना जिससे ब्रिटिश आर्थिक हित पूरा होता रहे | लोक सेवा परीक्षा में उम्र 23 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गयी | सभी प्रकार के शीर्ष पद यूरोपियों को दे दिए गए | इस प्रकार उपरोक्त नीतियों का कार्यान्वयन करके किसी भी ऐसी क्रांति को रोकने में ब्रिटिश सरकार ने काफी हद तक सफलता प्राप्त की | इन नीतियों का असर कुछ सालों तक रहा परन्तु 1857 की क्रांति ने राष्ट्रवाद की जो नींव रख दी थी उसका असर आगे के सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों पर पड़ा |
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"वर्तमान भारत में महिलाएं STEM में शिक्षित हो रही हैं तथापि महिला वैज्ञानिको की भागीदारी काफी कम है" । आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिये । (150-200 शब्द ) Currently women in India are getting educated in STEM, however the participation of women scientists is very less. Make critical comments. ( 150-200 words)
दृष्टिकोण: कुछ आँकड़ों के माध्यम से भारत में महिलाओं के STEM में शिक्षा प्राप्ति की चर्चा कीजिये । महिला व पुरुष वैज्ञानिकों की संख्या के संबंध में संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की कम भागीदारी के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिये । उत्तर: आज़ादी के बाद पिछले 70 वर्षों में भारत में महिला शिक्षा के सभी आयामों में विकास देखा गया है और STEM क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है । भारत में विज्ञान में नामांकन में महिलाओं का प्रतिशत 7.1% (1950-51 ) से बढ़कर 40% ( 2016) तक पहुँच गया है । यहाँ तक कि PG व PhD में भी महिलाओं का प्रतिशत 25-30% तक हो गया है । परंतु शोधकर्ता व फ़ेकल्टी के रूप में उच्च संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी महज 15% के आसपास है । भारत में केवल 14% महिला वैज्ञानिक हैं जो शोध व अनुसंधान संस्थानों में कार्यरत हैं जबकि वैश्विक औसत 28% से अधिक है । इसी प्रकार यदि INSA, IAS तथा NAAS द्वारा प्रदान किए जाने वाले फ़ेलोशिप की बात की जाए तो महज 5% महिलाओं को यह प्राप्त होता है । इसरो भारत में विज्ञान व प्रौधौगिकी के विकास का एक आदर्श प्रस्तुत करता है तथापि इसमें महिलाओं की भागीदारी काफी कम रही है । इसरो के वैज्ञानिक व तकनीकी स्टाफ में केवल 8% महिलाएं हैं और आज तक कोई भी महिला इसरो की अध्यक्ष नहीं बन पायी है । एक अन्य तथ्य यह भी है कि शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार , जो विज्ञान के क्षेत्र में भारत का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार है , अब तक 500 से अधिक वैज्ञानिकों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है परंतु इनमें महिलाओं कि संख्या केवल 15 रही है । महिला वैज्ञानिकों की कम संख्या के कारण : पारंपरिक मानसिकता एक बड़ी समस्या है । परंपरागत रूप से महिलाओं को सॉफ्ट स्किल्स में बेहतर माना जाता है, उनसे अपेक्षा होती है कि वे ऐसे क्षेत्रों में ही करियर बनाएँ । विज्ञान व शोध जैसे क्षेत्र पुरुषों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं । वैश्विक स्तर पर भी महिला वैज्ञानिकों कि संख्या कम है तथापि भारत की संख्या अधिक चिंताजनक है । कई महिला वैज्ञानिकों का कहना है कि PG व PhD कार्यक्रम में अच्छी संख्या में महिलाओं के नामांकन के बावजूद वे इसे करियर विकल्प के रूप में परिणत नहीं कर पाती हैं क्योंकि बायोलाजिकल क्लॉक व पारिवारिक दबाव एक बड़ी बाधा उत्पन्न करती है । जो महिला वैज्ञानिक कार्यरत हैं वे भी पक्षपात की शिकायत करती हैं । 81% महिलाएं जो STEM से जुड़ी हैं वे लैंगिक भेदभाव व प्रदर्शन के अनुरूप प्रतिफल न मिलने की बात बताती हैं । विवाह के बाद शहर में परिवर्तन , प्रर्याप्त शोध संस्थानों के विकेन्द्रीकरण का अभाव आदि अन्य प्रमुख समस्याएँ हैं जो महिला वैज्ञानिकों की संख्या को प्रतिकूल रूप में प्रभावित करती है । सुझाव : सबसे पहले मानसिकता में परिवर्तन किए जाने की आवश्यकता है । महिला वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने के लिए स्कूल स्तर से ही सुधार किए जाने की आवश्यकता है । प्रमुख महिला वैज्ञानिकों के योगदानों से आम लोगों व छात्र, छात्राओं को परिचित कराया जाना चाहिए जिससे कि वे प्रेरणा प्राप्त कर सकें । उदाहरण के लिए मंगल मिशन में संलग्न महिला वैज्ञानिक । प्रर्याप्त शोध व अनुसंधान संस्थानों का विकास व विकेन्द्रीकरण किया जाना आवश्यक ताकि महिलाएं अपनी सुविधा अनुसार अपने शोध को जारी रख सकें । उन महिला वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना जो पुनः अपना शोध प्रारम्भ करना चाहती हैं । इस दिशा में सरकार द्वारा प्रारम्भ किरण (KIRAN) स्कीम बेहद महत्वपूर्ण है । इसी प्रकार महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को कम किया जाना भी आवश्यक है । उन्हें भी प्रर्याप्त वेतन , भत्ते व प्रतिफल दिया जाना चाहिए ।
##Question:"वर्तमान भारत में महिलाएं STEM में शिक्षित हो रही हैं तथापि महिला वैज्ञानिको की भागीदारी काफी कम है" । आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिये । (150-200 शब्द ) Currently women in India are getting educated in STEM, however the participation of women scientists is very less. Make critical comments. ( 150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: कुछ आँकड़ों के माध्यम से भारत में महिलाओं के STEM में शिक्षा प्राप्ति की चर्चा कीजिये । महिला व पुरुष वैज्ञानिकों की संख्या के संबंध में संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की कम भागीदारी के कारणों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिये । उत्तर: आज़ादी के बाद पिछले 70 वर्षों में भारत में महिला शिक्षा के सभी आयामों में विकास देखा गया है और STEM क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है । भारत में विज्ञान में नामांकन में महिलाओं का प्रतिशत 7.1% (1950-51 ) से बढ़कर 40% ( 2016) तक पहुँच गया है । यहाँ तक कि PG व PhD में भी महिलाओं का प्रतिशत 25-30% तक हो गया है । परंतु शोधकर्ता व फ़ेकल्टी के रूप में उच्च संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी महज 15% के आसपास है । भारत में केवल 14% महिला वैज्ञानिक हैं जो शोध व अनुसंधान संस्थानों में कार्यरत हैं जबकि वैश्विक औसत 28% से अधिक है । इसी प्रकार यदि INSA, IAS तथा NAAS द्वारा प्रदान किए जाने वाले फ़ेलोशिप की बात की जाए तो महज 5% महिलाओं को यह प्राप्त होता है । इसरो भारत में विज्ञान व प्रौधौगिकी के विकास का एक आदर्श प्रस्तुत करता है तथापि इसमें महिलाओं की भागीदारी काफी कम रही है । इसरो के वैज्ञानिक व तकनीकी स्टाफ में केवल 8% महिलाएं हैं और आज तक कोई भी महिला इसरो की अध्यक्ष नहीं बन पायी है । एक अन्य तथ्य यह भी है कि शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार , जो विज्ञान के क्षेत्र में भारत का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार है , अब तक 500 से अधिक वैज्ञानिकों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है परंतु इनमें महिलाओं कि संख्या केवल 15 रही है । महिला वैज्ञानिकों की कम संख्या के कारण : पारंपरिक मानसिकता एक बड़ी समस्या है । परंपरागत रूप से महिलाओं को सॉफ्ट स्किल्स में बेहतर माना जाता है, उनसे अपेक्षा होती है कि वे ऐसे क्षेत्रों में ही करियर बनाएँ । विज्ञान व शोध जैसे क्षेत्र पुरुषों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं । वैश्विक स्तर पर भी महिला वैज्ञानिकों कि संख्या कम है तथापि भारत की संख्या अधिक चिंताजनक है । कई महिला वैज्ञानिकों का कहना है कि PG व PhD कार्यक्रम में अच्छी संख्या में महिलाओं के नामांकन के बावजूद वे इसे करियर विकल्प के रूप में परिणत नहीं कर पाती हैं क्योंकि बायोलाजिकल क्लॉक व पारिवारिक दबाव एक बड़ी बाधा उत्पन्न करती है । जो महिला वैज्ञानिक कार्यरत हैं वे भी पक्षपात की शिकायत करती हैं । 81% महिलाएं जो STEM से जुड़ी हैं वे लैंगिक भेदभाव व प्रदर्शन के अनुरूप प्रतिफल न मिलने की बात बताती हैं । विवाह के बाद शहर में परिवर्तन , प्रर्याप्त शोध संस्थानों के विकेन्द्रीकरण का अभाव आदि अन्य प्रमुख समस्याएँ हैं जो महिला वैज्ञानिकों की संख्या को प्रतिकूल रूप में प्रभावित करती है । सुझाव : सबसे पहले मानसिकता में परिवर्तन किए जाने की आवश्यकता है । महिला वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने के लिए स्कूल स्तर से ही सुधार किए जाने की आवश्यकता है । प्रमुख महिला वैज्ञानिकों के योगदानों से आम लोगों व छात्र, छात्राओं को परिचित कराया जाना चाहिए जिससे कि वे प्रेरणा प्राप्त कर सकें । उदाहरण के लिए मंगल मिशन में संलग्न महिला वैज्ञानिक । प्रर्याप्त शोध व अनुसंधान संस्थानों का विकास व विकेन्द्रीकरण किया जाना आवश्यक ताकि महिलाएं अपनी सुविधा अनुसार अपने शोध को जारी रख सकें । उन महिला वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना जो पुनः अपना शोध प्रारम्भ करना चाहती हैं । इस दिशा में सरकार द्वारा प्रारम्भ किरण (KIRAN) स्कीम बेहद महत्वपूर्ण है । इसी प्रकार महिलाओं के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव को कम किया जाना भी आवश्यक है । उन्हें भी प्रर्याप्त वेतन , भत्ते व प्रतिफल दिया जाना चाहिए ।
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रूसी क्रांति के घटित होने में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इसके विश्वव्यापी प्रभावों का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Mention the factors that helped the Russian Revolution to take place. Also, describe its worldwide effects. ( Words - 150-200 , Marks - 10 )
एप्रोच - · भूमिका में रूसी क्रांति के कारणो का संक्षेप में वर्णन कीजिये । · उत्तर के पहले भाग में रूस की क्रांति के सामाजिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में आर्थिक और राजनीतिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में रूस की क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूस की आर्थिक और सामाजिक दशाओं के साथ-साथ रूस की राजनीतिक नीतियों ने लोगों को बाध्य किया कि वे वर्षों से चली आ रही राजतंत्र व्यवस्था को बदल कर, एक जनहित में नई सरकार की स्थापना करें। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सामाजिक कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है - यूरोपीय समाज की तरह रूसी समाज में भी काफी हद तक असमानता व्याप्त थी और रूस का समाज भूमिहीन किसानों और जमीदारों के बीच बटा हुआ था। 80% के करीब जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। जिसमें से एक तिहाई जनसंख्या भूमिहीन कृषकों की थी और कृषकों की दशा अत्यंत ही दयनीय थी। आये दिन कृषको और जमीदारों के मध्य विवाद आम बात थी। रूस में औद्योगिक क्रांति विदेशी पूंजी निवेश पर आधारित थी और मुख्यतः पश्चिमी रूस में केंद्रित थी। जिसकी वजह से रूस में भौगोलिक असमानता भी विकसित हुई। रूस में अन्य औद्योगिक राष्ट्र की तरह मजदूरों की दशा भी अत्यंत दयनीय थी और कारखानों में हड़ताल एक आम बात थी। समाज का निचला तबका अत्यधिक कर के बोझ और बेरोजगारी से परेशान था। रूस में बढ़ती शिक्षा स्तर व प्रेस पर सरकारी नियंत्रण, लोगों में जन आक्रोश को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। रूस में इसके साथ ही राजनीतिक कारणों ने भी रूस की क्रांति को घटित किया - रूस की जनता में पहले से मौजूद असंतोष को निकोलस द्वितीय की नीतियों ने और बढ़ा दिया। अल्पसंख्यकों के ऊपर जबरजस्ती रूसी भाषा थोपे जाने से उनके भीतर भी असंतोष की भावना विकसित हुई। रूस में राजनीतिक प्रणाली में सुधार न किए जाने के कारण, बुद्धिजीवी भी राजतंत्र से क्षुब्द थे। 1960 में बोस्निया संकट, स्ताल्पिक नामक योग्य मंत्री की हत्या, प्रशासन में जार की पत्नी का हस्तक्षेप आदि कार्यों ने राजतंत्र की प्रतिष्ठा को कम किया। आर्थिक कारण - रूस की प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1916 तक आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय हो चुकी थी तथा युद्ध में भी रूस के लगभग सात लाख सैनिक मारे जा चुके थे। सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति समय पर नहीं की जा रही थी। साथ ही परिवहन व्यवस्था भी लचर थी जिसके कारण सेना में असंतोष बढ़ने लगा। युद्ध के दौरान एक तरफ जहां रूस का आयात प्रभावित हुआ। वहीं दूसरी तरफ लगातार हड़ताल के कारण उत्पादन व्यवस्था भी ठप हो गई और रूस आर्थिक मंदी की तरफ अग्रसर हो गया। आवश्यक वस्तुओं पर राजकीय नियंत्रण के कारण महंगाई में वृद्धि हुई और मार्च 1917 में रोटी को लेकर दंगे हुए | उपरोक्त घटनाक्रमों के कारण रूस में सत्ता परिवर्तन हुआ और रूसी क्रांति का सफल आयोजन किया गया। जिसके पश्चात सत्ता साम्यवादी नेता लेनिन के हाथों में आ गई। रूसी क्रांति का रूस के साथ-साथ, विश्व के अन्य देशों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। जिसको हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- राजनीतिक प्रभाव मार्क्सवादी विचारधारा को यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया गया और रूस में इसकी सफलता से इस विचारधारा का विश्व के अन्य भागों में तेजी से प्रसार हुआ। रुसी क्रांति के पश्चात यूरोप के कई देशों में साम्यवादी पार्टियों की स्थापना हुई एवं श्रमिक संगठनों की संख्या में वृद्धि हुई। रूस में राजनीतिक क्षेत्र में कुछ नए प्रयोग किये गए जैसे- व्यस्क मताधिकार, महिलाओं को मताधिकार आदि| इसका भी क्रन्तिकारी प्रभाव विश्व के अन्य राष्ट्रों पर देखा गया। 1950 तक यूरोप के अधिकांश राष्ट्रों ने महिलाओं को मत देने का अधिकार दिया। रुसी क्रांति ने उपनिवेशवाद पर प्रश्न चिन्ह उठाये और इसे शोषण पर आधारित व्यवस्था बताया। इसका उपनिवेशों पर व्यापक प्रभाव देखा गया। उपनिवेशों में मार्क्सवादी संगठनों की स्थापना, ट्रेड यूनियन की स्थापना, लोकतान्त्रिक संगठनों में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव आदि को देखा जा सकता है| उपनिवेशों में क्रांतिकारियों को संसाधन, प्रशिक्षण आदि उपलब्द्ध करवाकर राष्ट्रीय आन्दोलन को मजबूत किया गया। जैसे- भारत,चीन आदि में। आर्थिकप्रभाव- पूँजीवादी मॉडल के एक वैकल्पिक मॉडल का निर्माण। सबकी न्यूनतम जरूरतों को पूर्ण करना, समान कार्य के लिए समान वेतन आदि समानतापरकमूल्यों को बढ़ावा। जो आर्थिक समानता लाने में सहायक। महामंदी और पूंजीवादी राष्ट्रों पर प्रभाव तथा उन्हें कल्याणकारी कार्यों को करने हेतु बाध्य होना पड़ा। उपनिवेशों पर इसका सकारात्मक प्रभाव । नवस्वतंत्र राष्ट्रों कीआर्थिक नीतियों पर भी प्रभाव। जैसे-भारत सामाजिक प्रभाव- आम लोगों की भूमिका और आम लोगों का उत्थान इस क्रांति का लक्ष्य था| फलतः आम लोगों में जागरूकता इसका एक महत्वपूर्ण पहलू था| प्रत्येक स्तर पर एक समान शिक्षा ,स्वास्थ्य, रोजगार में समानता देखी जा सकती थी। रूस में धार्मिक संपत्ति पर कब्ज़ाकरके उसको सामाजिक हितो में प्रयोग किया गया | साहित्य में मानविकी विषयों पर मार्क्सवाद का विश्वव्यापी प्रभावबढ़ा। उपरोक्त बिंदुओं से स्पष्ट है कि रूस की क्रांति में महज किसी एक कारण की उपस्थिति न होकर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों कारकों की प्रमुख भूमिका थी। जिसने जनता को एकजुट कर सत्ता परिवर्तन के लिए बाध्य किया तथा रूस में हुई सफल रूसी क्रांति ने विश्व के अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत का काम किया और तत्कालीन उपनिवेशओं में सत्ता संघर्ष और स्वतंत्रता की प्राप्ति के आंदोलन को प्रबल बनाया। जिससे उन देशों में भी समाजवाद और साम्यवाद का प्रचार-प्रसार संभव हो सका।
##Question:रूसी क्रांति के घटित होने में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इसके विश्वव्यापी प्रभावों का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Mention the factors that helped the Russian Revolution to take place. Also, describe its worldwide effects. ( Words - 150-200 , Marks - 10 ) ##Answer:एप्रोच - · भूमिका में रूसी क्रांति के कारणो का संक्षेप में वर्णन कीजिये । · उत्तर के पहले भाग में रूस की क्रांति के सामाजिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में आर्थिक और राजनीतिक कारकों का विवरण दीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में रूस की क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूस की आर्थिक और सामाजिक दशाओं के साथ-साथ रूस की राजनीतिक नीतियों ने लोगों को बाध्य किया कि वे वर्षों से चली आ रही राजतंत्र व्यवस्था को बदल कर, एक जनहित में नई सरकार की स्थापना करें। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सामाजिक कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है - यूरोपीय समाज की तरह रूसी समाज में भी काफी हद तक असमानता व्याप्त थी और रूस का समाज भूमिहीन किसानों और जमीदारों के बीच बटा हुआ था। 80% के करीब जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। जिसमें से एक तिहाई जनसंख्या भूमिहीन कृषकों की थी और कृषकों की दशा अत्यंत ही दयनीय थी। आये दिन कृषको और जमीदारों के मध्य विवाद आम बात थी। रूस में औद्योगिक क्रांति विदेशी पूंजी निवेश पर आधारित थी और मुख्यतः पश्चिमी रूस में केंद्रित थी। जिसकी वजह से रूस में भौगोलिक असमानता भी विकसित हुई। रूस में अन्य औद्योगिक राष्ट्र की तरह मजदूरों की दशा भी अत्यंत दयनीय थी और कारखानों में हड़ताल एक आम बात थी। समाज का निचला तबका अत्यधिक कर के बोझ और बेरोजगारी से परेशान था। रूस में बढ़ती शिक्षा स्तर व प्रेस पर सरकारी नियंत्रण, लोगों में जन आक्रोश को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। रूस में इसके साथ ही राजनीतिक कारणों ने भी रूस की क्रांति को घटित किया - रूस की जनता में पहले से मौजूद असंतोष को निकोलस द्वितीय की नीतियों ने और बढ़ा दिया। अल्पसंख्यकों के ऊपर जबरजस्ती रूसी भाषा थोपे जाने से उनके भीतर भी असंतोष की भावना विकसित हुई। रूस में राजनीतिक प्रणाली में सुधार न किए जाने के कारण, बुद्धिजीवी भी राजतंत्र से क्षुब्द थे। 1960 में बोस्निया संकट, स्ताल्पिक नामक योग्य मंत्री की हत्या, प्रशासन में जार की पत्नी का हस्तक्षेप आदि कार्यों ने राजतंत्र की प्रतिष्ठा को कम किया। आर्थिक कारण - रूस की प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1916 तक आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दयनीय हो चुकी थी तथा युद्ध में भी रूस के लगभग सात लाख सैनिक मारे जा चुके थे। सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति समय पर नहीं की जा रही थी। साथ ही परिवहन व्यवस्था भी लचर थी जिसके कारण सेना में असंतोष बढ़ने लगा। युद्ध के दौरान एक तरफ जहां रूस का आयात प्रभावित हुआ। वहीं दूसरी तरफ लगातार हड़ताल के कारण उत्पादन व्यवस्था भी ठप हो गई और रूस आर्थिक मंदी की तरफ अग्रसर हो गया। आवश्यक वस्तुओं पर राजकीय नियंत्रण के कारण महंगाई में वृद्धि हुई और मार्च 1917 में रोटी को लेकर दंगे हुए | उपरोक्त घटनाक्रमों के कारण रूस में सत्ता परिवर्तन हुआ और रूसी क्रांति का सफल आयोजन किया गया। जिसके पश्चात सत्ता साम्यवादी नेता लेनिन के हाथों में आ गई। रूसी क्रांति का रूस के साथ-साथ, विश्व के अन्य देशों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। जिसको हम निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं :- राजनीतिक प्रभाव मार्क्सवादी विचारधारा को यथार्थ के धरातल पर क्रियान्वित किया गया और रूस में इसकी सफलता से इस विचारधारा का विश्व के अन्य भागों में तेजी से प्रसार हुआ। रुसी क्रांति के पश्चात यूरोप के कई देशों में साम्यवादी पार्टियों की स्थापना हुई एवं श्रमिक संगठनों की संख्या में वृद्धि हुई। रूस में राजनीतिक क्षेत्र में कुछ नए प्रयोग किये गए जैसे- व्यस्क मताधिकार, महिलाओं को मताधिकार आदि| इसका भी क्रन्तिकारी प्रभाव विश्व के अन्य राष्ट्रों पर देखा गया। 1950 तक यूरोप के अधिकांश राष्ट्रों ने महिलाओं को मत देने का अधिकार दिया। रुसी क्रांति ने उपनिवेशवाद पर प्रश्न चिन्ह उठाये और इसे शोषण पर आधारित व्यवस्था बताया। इसका उपनिवेशों पर व्यापक प्रभाव देखा गया। उपनिवेशों में मार्क्सवादी संगठनों की स्थापना, ट्रेड यूनियन की स्थापना, लोकतान्त्रिक संगठनों में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव आदि को देखा जा सकता है| उपनिवेशों में क्रांतिकारियों को संसाधन, प्रशिक्षण आदि उपलब्द्ध करवाकर राष्ट्रीय आन्दोलन को मजबूत किया गया। जैसे- भारत,चीन आदि में। आर्थिकप्रभाव- पूँजीवादी मॉडल के एक वैकल्पिक मॉडल का निर्माण। सबकी न्यूनतम जरूरतों को पूर्ण करना, समान कार्य के लिए समान वेतन आदि समानतापरकमूल्यों को बढ़ावा। जो आर्थिक समानता लाने में सहायक। महामंदी और पूंजीवादी राष्ट्रों पर प्रभाव तथा उन्हें कल्याणकारी कार्यों को करने हेतु बाध्य होना पड़ा। उपनिवेशों पर इसका सकारात्मक प्रभाव । नवस्वतंत्र राष्ट्रों कीआर्थिक नीतियों पर भी प्रभाव। जैसे-भारत सामाजिक प्रभाव- आम लोगों की भूमिका और आम लोगों का उत्थान इस क्रांति का लक्ष्य था| फलतः आम लोगों में जागरूकता इसका एक महत्वपूर्ण पहलू था| प्रत्येक स्तर पर एक समान शिक्षा ,स्वास्थ्य, रोजगार में समानता देखी जा सकती थी। रूस में धार्मिक संपत्ति पर कब्ज़ाकरके उसको सामाजिक हितो में प्रयोग किया गया | साहित्य में मानविकी विषयों पर मार्क्सवाद का विश्वव्यापी प्रभावबढ़ा। उपरोक्त बिंदुओं से स्पष्ट है कि रूस की क्रांति में महज किसी एक कारण की उपस्थिति न होकर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों कारकों की प्रमुख भूमिका थी। जिसने जनता को एकजुट कर सत्ता परिवर्तन के लिए बाध्य किया तथा रूस में हुई सफल रूसी क्रांति ने विश्व के अन्य देशों के लिए प्रेरणास्रोत का काम किया और तत्कालीन उपनिवेशओं में सत्ता संघर्ष और स्वतंत्रता की प्राप्ति के आंदोलन को प्रबल बनाया। जिससे उन देशों में भी समाजवाद और साम्यवाद का प्रचार-प्रसार संभव हो सका।
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"फूट डालो और राज करो की नीति" के शुरुआत के साथ ही, 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश नीति में कई अन्य परिवर्तन परिलक्षित होते हैं | स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द) With the introduction of the divide and rule policy, many other changes have been reflected in British Policy after the revolt of 1857. Clarify. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में "फूट डालो और राज करो" की नीति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1857 के बाद सामाजिक,आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तनों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इन नीतियों ने कैसे राष्ट्रवाद की नीव रखी, उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 1857 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को एक महान परिवर्तन के पथ पर लाकर खड़ा कर दिया | 1857 की क्रांति से ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किये, जिससे ऐसी क्रान्ति फिर न उभर सके| इनमें से एक नीति "फूट डालो और राज करो" अपनाई ,जिससे हिन्दू व मुसलमानों की एकता में फूट डाली जा सके | इस नीति के अंतर्गत कई प्रकार के सैनिक , आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक परिवर्तन किये गए , जो निम्नलिखित हैं - ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गयी, दो भारतीय सैनिकों पर एक ब्रिटिश सैनिक नियुक्त किया गया | ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती ऐसी जगह पर होने लगी जहाँ पर विद्रोह होने की आशंका ज्यादा होती थी | सैनिकों को उनके संप्रदाय के अधार पर बांटा गया जैसे सिख रेजिमेंट , गढ़वाल रेजिमेंट , जाट रेजिमेंट इत्यादि | सेना में भी पात्र -पत्रिकाएं वर्जित थीं | भारतीय सेना एक भाड़े का टट्टू बनकर रह गयीं | अंग्रेजों का जो खुलकर समर्थन करते थे ऐसे शासकों को गोद लेने का अधिकार दिया गया | ब्रिटिशों के अन्य शासकों से जैसे सम्बन्ध थे उसी प्रकार ज़मींदारों से बनाये जाने का प्रयास करने लगे | 1857 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया | सिविल सेवा में दिखावे के लिए ही सही भारतीयों की नियुक्ति की अनुमति दे दी गयी | 1861 के अधिनियम से भारतियों को भी विधायी शक्ति में शामिल किया गया | भारतीय प्रजा के साथ अनेक प्रकार के भेदभाव किये जाने लगे | 1878 के वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के अंतर्गत देशी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | अन्य देशों से भारतीय साम्राज्य की रक्षा करना जिससे ब्रिटिश आर्थिक हित पूरा होता रहे | लोक सेवा परीक्षा में उम्र 23 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गयी | सभी प्रकार के शीर्ष पद यूरोपियों को दे दिए गए | इस प्रकार उपरोक्त नीतियों का कार्यान्वयन करके किसी भी ऐसी क्रांति को रोकने में ब्रिटिश सरकार ने काफी हद तक सफलता प्राप्त की | इन नीतियों का असर कुछ सालों तक रहा परन्तु 1857 की क्रांति ने राष्ट्रवाद की जो नींव रख दी थी उसका असर आगे के सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों पर पड़ा |
##Question:"फूट डालो और राज करो की नीति" के शुरुआत के साथ ही, 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश नीति में कई अन्य परिवर्तन परिलक्षित होते हैं | स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द) With the introduction of the divide and rule policy, many other changes have been reflected in British Policy after the revolt of 1857. Clarify. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में "फूट डालो और राज करो" की नीति की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद 1857 के बाद सामाजिक,आर्थिक व राजनीतिक परिवर्तनों की चर्चा करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इन नीतियों ने कैसे राष्ट्रवाद की नीव रखी, उसका संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 1857 की क्रांति ने ब्रिटिश सरकार को एक महान परिवर्तन के पथ पर लाकर खड़ा कर दिया | 1857 की क्रांति से ब्रिटिश सरकार ने अपनी नीतियों में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किये, जिससे ऐसी क्रान्ति फिर न उभर सके| इनमें से एक नीति "फूट डालो और राज करो" अपनाई ,जिससे हिन्दू व मुसलमानों की एकता में फूट डाली जा सके | इस नीति के अंतर्गत कई प्रकार के सैनिक , आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक परिवर्तन किये गए , जो निम्नलिखित हैं - ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गयी, दो भारतीय सैनिकों पर एक ब्रिटिश सैनिक नियुक्त किया गया | ब्रिटिश सैनिकों की तैनाती ऐसी जगह पर होने लगी जहाँ पर विद्रोह होने की आशंका ज्यादा होती थी | सैनिकों को उनके संप्रदाय के अधार पर बांटा गया जैसे सिख रेजिमेंट , गढ़वाल रेजिमेंट , जाट रेजिमेंट इत्यादि | सेना में भी पात्र -पत्रिकाएं वर्जित थीं | भारतीय सेना एक भाड़े का टट्टू बनकर रह गयीं | अंग्रेजों का जो खुलकर समर्थन करते थे ऐसे शासकों को गोद लेने का अधिकार दिया गया | ब्रिटिशों के अन्य शासकों से जैसे सम्बन्ध थे उसी प्रकार ज़मींदारों से बनाये जाने का प्रयास करने लगे | 1857 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया | सिविल सेवा में दिखावे के लिए ही सही भारतीयों की नियुक्ति की अनुमति दे दी गयी | 1861 के अधिनियम से भारतियों को भी विधायी शक्ति में शामिल किया गया | भारतीय प्रजा के साथ अनेक प्रकार के भेदभाव किये जाने लगे | 1878 के वर्नाकुलर प्रेस एक्ट के अंतर्गत देशी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | अन्य देशों से भारतीय साम्राज्य की रक्षा करना जिससे ब्रिटिश आर्थिक हित पूरा होता रहे | लोक सेवा परीक्षा में उम्र 23 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गयी | सभी प्रकार के शीर्ष पद यूरोपियों को दे दिए गए | इस प्रकार उपरोक्त नीतियों का कार्यान्वयन करके किसी भी ऐसी क्रांति को रोकने में ब्रिटिश सरकार ने काफी हद तक सफलता प्राप्त की | इन नीतियों का असर कुछ सालों तक रहा परन्तु 1857 की क्रांति ने राष्ट्रवाद की जो नींव रख दी थी उसका असर आगे के सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों पर पड़ा |
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रेग्यूलेटिंग अधिनियम, 1773 के मुख्यप्रावधानोंपर प्रकाश डालिए। साथ ही इस अधिनियम से संबंधित प्रमुखदोषों पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Highlight the major provisions of the Regulating Act, 1773. Also, discuss the major demeritsrelated to this act. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भमिका मेंरेग्यूलेटिंग अधिनियम, 1773 की पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्प्श्चात, मुख्य भाग मेंरेग्यूलेटिंग अधिनियम, 1773 के मुख्य प्रावधानों पर प्रकाश डालिए तथा साथ ही इस अधिनियम से संबंधित प्रमुख दोषों पर भी चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्ष में पिट्स इंडिया एक्ट 1784 के महत्व को रेखांकित कीजिए। उत्तर:- 1773 में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक शक्ति के साथ साथ पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में भी स्थापित हो चुकी थी। अतः ब्रिटिश सरकार एवं कम्पनी के सम्बन्धों को पुनः परिभाषित किये जाने की मांग की जा रही थी। | ब्रिटिश समाज भी संक्रमण की प्रक्रिया से गुजर रहा था, उद्योगपतियों के द्वारा कम्पनी पर नियंत्रण एवं एकाधिकार समाप्त करने की मांग की जा रही थी। ब्रिटिश समाज में नैतिक आधारों पर तथा ईर्ष्यावश भी कम्पनी पर नियंत्रण की मांग की जा रही थी। इसीपृष्ठभूमि में 1773 का रेग्युलेटिंग अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम केमुख्य प्रावधान:- ब्रिटिश संसद द्वारा पारित उपरोक्त अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि पहली बार भारत में निदेशक मंडल के शासन को संसद की निगरानी में लाया गया अर्थात पहली बार ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासकीय और प्रशासकीय मामलों पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया। अब निदेशक मंडल को यह निर्देश दिया गया कि वे युद्ध, शांति, सामान्य प्रशासन, प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति सम्बन्धी सभी फैसलोंकी एक प्रतिलिपि संसदीय समिति को उपलब्ध करवाएं। जबकि राजस्व संबंधी मामलों से सम्बन्धी मामलों की प्रतिलिपि ब्रिटिश ट्रेजरी को उपलब्ध करवाए। जबकि सिविल सेवा व सैन्य सेवा संबंधी फैसलों की कॉपी ब्रिटिश केबिनेट के सम्बंधित मंत्रियों को उपलब्ध करवाए। कम्पनी के भारत में प्रशासन के दोषों को दूर करने के लिए निम्नलिखित पांच निदानकारी कदम उठाने का निर्देश दिया गया जिसे तत्काल प्रभाव से लागू करना था- बंगाल का गवर्नर अब बंगाल का गवर्नर जनरल कहा जायेगा और बॉम्बे तथा मद्रास प्रेजिडेंसी के ऊपर इस गवर्नर जनरल को निगरानीका अधिकार दे दिया गया अर्थात बॉम्बे व मद्रास प्रेजिडेंसी के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर जर्नल के निर्देशानुसार प्रशासनिक, युद्ध संबंधी तथा शांति से सम्बन्धी निर्णय लेने थे। अब बंगाल का गवर्नर जनरल कंपनी के प्रशासन व कारोबार संबंधी मामलों में अकेले निर्णय नहीं ले सकता था। उसको परामर्श देने के लिए एक चार सदस्यीय परिषद का गठन किया गया जिसमें बहुमत के आधार पर उसे फैसले लेने थे। कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट के गठन का प्रस्ताव किया गया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त तीन जज होने थे। न्यायालय को धार्मिक फौजदारी व सेना संबंधित चार प्रमुख विषयों से संबंधित मामलों का निस्तारण करना था। सिविल सिविल सेवा में सुधार पर बल दिया गया (बंगाल बिहार और उड़ीशा की दीवानी मिलने के बाद भू राजस्व की वसूली के लिए 1771 में पर्यवेक्षकों जो नियुक्ति की गई थी उन्हीं का नाम बदलकर कलेक्टर कर दिया गया और उन्हें मजिस्ट्रेट के अधिकार दे दिए गए) गवर्नर जनरल व निदेशक मंडल से यह अपेक्षा की गई वे ब्रिटिश संसद के द्वारा समय समय पर दिए गए निर्देशों अथवा निर्धारित विनियमनों का अनुपालन करें। कम्पनी के अधिकारी रिश्वत एवं उपहार नहीं लेंगे। इस प्रकारकानून के द्वारा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया था। अधिनियम के दोष:- इस अधिनियम का एक प्रमुख उद्देश्य था कम्पनी पर सरकारी नियंत्रण को स्थापित करना इसमें आंशिक सफलता ही प्राप्त हो पायी। भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में भी जो प्रावधान किये गए वह प्रभावी नहीं थेजैसे गवर्नर जनरल परिषद् के मध्य टकराव की स्थिति थी। प्रावधानों में अस्पष्टता के कारण गवर्नर जनरल तथा प्रान्तों के मध्य तनावपूर्ण सम्बन्ध थे। कलकत्ते स्थित सुप्रीम कोर्ट सपरिषद गवर्नर जनरल, सदर दीवानी व सदर निजामत अदालतों के क्षेत्राधिकार परिभाषित नहीं थे। सदर दीवानी व सदर निज़ामत क्रमशः दीवानी व फौजदारी मामलों में बंगाल में शीर्ष अदालतें थी जिनका गठन कलकत्ता में वारेन हेस्टिंग्स ने किया था। क्षेत्राधिकार स्पष्ट न होने के कारण इनके बीच प्रायः टकराव होते रहते थे उदाहरण के लिए ब्रिटिश प्रजा से संबंधित विवाद कौन देखेगा यह स्पष्ट नहीं था। सभी इसे अपना क्षेत्राधिकार बताते थे। कलकत्ता स्थित सर्वोच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालतों के अधिकार क्षेत्र परिभाषित नहीं थे। इससे प्रायः अपील की समस्या बनी रहती थी। कानूनी प्रावधान के बावजूद भ्रष्टाचार जारी रहा। 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट भारत में कम्पनी के शासन को विनियमित करने का प्रस्थान बिंदु था किन्तु यह अनेक सीमाओं से युक्त था। फिर भी इस अधिनियम का महत्त्व इस बात में है कि यह भारत में संवैधानिक विकास का प्रस्थान बिंदु था। इस एक्ट की कमियों में सुधार के लिए पिट्स इंडिया एक्ट के माध्यम से प्रयास किये गए जिसमेंसपरिषद गवर्नल जनरल की संख्या 4 से घटाकर तीन कर दी गई तथालंदन में एक नियंत्रक मंडल का गठन किया गया जो निदेशक मंडल के ऊपर होना था और इस नियंत्रक मंडल की अध्यक्षता राज्य सचिव को करनी थी जो प्रायः ब्रिटिश केबिनट का सदस्य होता था।
##Question:रेग्यूलेटिंग अधिनियम, 1773 के मुख्यप्रावधानोंपर प्रकाश डालिए। साथ ही इस अधिनियम से संबंधित प्रमुखदोषों पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Highlight the major provisions of the Regulating Act, 1773. Also, discuss the major demeritsrelated to this act. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भमिका मेंरेग्यूलेटिंग अधिनियम, 1773 की पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्प्श्चात, मुख्य भाग मेंरेग्यूलेटिंग अधिनियम, 1773 के मुख्य प्रावधानों पर प्रकाश डालिए तथा साथ ही इस अधिनियम से संबंधित प्रमुख दोषों पर भी चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्ष में पिट्स इंडिया एक्ट 1784 के महत्व को रेखांकित कीजिए। उत्तर:- 1773 में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारिक शक्ति के साथ साथ पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में भी स्थापित हो चुकी थी। अतः ब्रिटिश सरकार एवं कम्पनी के सम्बन्धों को पुनः परिभाषित किये जाने की मांग की जा रही थी। | ब्रिटिश समाज भी संक्रमण की प्रक्रिया से गुजर रहा था, उद्योगपतियों के द्वारा कम्पनी पर नियंत्रण एवं एकाधिकार समाप्त करने की मांग की जा रही थी। ब्रिटिश समाज में नैतिक आधारों पर तथा ईर्ष्यावश भी कम्पनी पर नियंत्रण की मांग की जा रही थी। इसीपृष्ठभूमि में 1773 का रेग्युलेटिंग अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम केमुख्य प्रावधान:- ब्रिटिश संसद द्वारा पारित उपरोक्त अधिनियम की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि पहली बार भारत में निदेशक मंडल के शासन को संसद की निगरानी में लाया गया अर्थात पहली बार ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासकीय और प्रशासकीय मामलों पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया। अब निदेशक मंडल को यह निर्देश दिया गया कि वे युद्ध, शांति, सामान्य प्रशासन, प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति सम्बन्धी सभी फैसलोंकी एक प्रतिलिपि संसदीय समिति को उपलब्ध करवाएं। जबकि राजस्व संबंधी मामलों से सम्बन्धी मामलों की प्रतिलिपि ब्रिटिश ट्रेजरी को उपलब्ध करवाए। जबकि सिविल सेवा व सैन्य सेवा संबंधी फैसलों की कॉपी ब्रिटिश केबिनेट के सम्बंधित मंत्रियों को उपलब्ध करवाए। कम्पनी के भारत में प्रशासन के दोषों को दूर करने के लिए निम्नलिखित पांच निदानकारी कदम उठाने का निर्देश दिया गया जिसे तत्काल प्रभाव से लागू करना था- बंगाल का गवर्नर अब बंगाल का गवर्नर जनरल कहा जायेगा और बॉम्बे तथा मद्रास प्रेजिडेंसी के ऊपर इस गवर्नर जनरल को निगरानीका अधिकार दे दिया गया अर्थात बॉम्बे व मद्रास प्रेजिडेंसी के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर जर्नल के निर्देशानुसार प्रशासनिक, युद्ध संबंधी तथा शांति से सम्बन्धी निर्णय लेने थे। अब बंगाल का गवर्नर जनरल कंपनी के प्रशासन व कारोबार संबंधी मामलों में अकेले निर्णय नहीं ले सकता था। उसको परामर्श देने के लिए एक चार सदस्यीय परिषद का गठन किया गया जिसमें बहुमत के आधार पर उसे फैसले लेने थे। कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट के गठन का प्रस्ताव किया गया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त तीन जज होने थे। न्यायालय को धार्मिक फौजदारी व सेना संबंधित चार प्रमुख विषयों से संबंधित मामलों का निस्तारण करना था। सिविल सिविल सेवा में सुधार पर बल दिया गया (बंगाल बिहार और उड़ीशा की दीवानी मिलने के बाद भू राजस्व की वसूली के लिए 1771 में पर्यवेक्षकों जो नियुक्ति की गई थी उन्हीं का नाम बदलकर कलेक्टर कर दिया गया और उन्हें मजिस्ट्रेट के अधिकार दे दिए गए) गवर्नर जनरल व निदेशक मंडल से यह अपेक्षा की गई वे ब्रिटिश संसद के द्वारा समय समय पर दिए गए निर्देशों अथवा निर्धारित विनियमनों का अनुपालन करें। कम्पनी के अधिकारी रिश्वत एवं उपहार नहीं लेंगे। इस प्रकारकानून के द्वारा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया था। अधिनियम के दोष:- इस अधिनियम का एक प्रमुख उद्देश्य था कम्पनी पर सरकारी नियंत्रण को स्थापित करना इसमें आंशिक सफलता ही प्राप्त हो पायी। भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में भी जो प्रावधान किये गए वह प्रभावी नहीं थेजैसे गवर्नर जनरल परिषद् के मध्य टकराव की स्थिति थी। प्रावधानों में अस्पष्टता के कारण गवर्नर जनरल तथा प्रान्तों के मध्य तनावपूर्ण सम्बन्ध थे। कलकत्ते स्थित सुप्रीम कोर्ट सपरिषद गवर्नर जनरल, सदर दीवानी व सदर निजामत अदालतों के क्षेत्राधिकार परिभाषित नहीं थे। सदर दीवानी व सदर निज़ामत क्रमशः दीवानी व फौजदारी मामलों में बंगाल में शीर्ष अदालतें थी जिनका गठन कलकत्ता में वारेन हेस्टिंग्स ने किया था। क्षेत्राधिकार स्पष्ट न होने के कारण इनके बीच प्रायः टकराव होते रहते थे उदाहरण के लिए ब्रिटिश प्रजा से संबंधित विवाद कौन देखेगा यह स्पष्ट नहीं था। सभी इसे अपना क्षेत्राधिकार बताते थे। कलकत्ता स्थित सर्वोच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालतों के अधिकार क्षेत्र परिभाषित नहीं थे। इससे प्रायः अपील की समस्या बनी रहती थी। कानूनी प्रावधान के बावजूद भ्रष्टाचार जारी रहा। 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट भारत में कम्पनी के शासन को विनियमित करने का प्रस्थान बिंदु था किन्तु यह अनेक सीमाओं से युक्त था। फिर भी इस अधिनियम का महत्त्व इस बात में है कि यह भारत में संवैधानिक विकास का प्रस्थान बिंदु था। इस एक्ट की कमियों में सुधार के लिए पिट्स इंडिया एक्ट के माध्यम से प्रयास किये गए जिसमेंसपरिषद गवर्नल जनरल की संख्या 4 से घटाकर तीन कर दी गई तथालंदन में एक नियंत्रक मंडल का गठन किया गया जो निदेशक मंडल के ऊपर होना था और इस नियंत्रक मंडल की अध्यक्षता राज्य सचिव को करनी थी जो प्रायः ब्रिटिश केबिनट का सदस्य होता था।
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वाताग्र से आप क्या समझते हैं? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by the fronts? Describe in detail the different types of fronts. (150-200 Words/10 marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, वाताग्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्षतः संक्षेप में वाताग्र के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वाताग्र निम्नवायुदाब के क्षेत्र में तब विकसितहोता हैजब दो विपरीत प्रकृति की वायुराशी विपरीत दिशा से आकर आपस में मिलती है। वाताग्र के विकास के लिएएक वायुराशिठंडी,शुष्क एवं भारी तथा दूसरी वायुराशिगर्म, हल्की एवं आर्द्र होनी चाहिए।इन वाताग्रों पर ठंडी एवं सघन वायुराशि, गर्म एवं हल्की वायुराशि को ऊपर उठा देती है। वाताग्र आसानी से परस्पर मिश्रित नहीं होते हैं। यह न तो धरातलीय सतहके समानांतर होता है और न ही उसके ऊपर लम्बवत होता है बल्कि ढलुआ सीमा के साथ एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। ढलुआ सीमा एक संक्रमण का क्षेत्र होता है जिसके आर पार मौसम की दशाओं में काफी अंतर होता है।वाताग्र मध्य अक्षाशों में निर्मित होते हैं और तीव्र वायुदाब और तापमान प्रवणता इनकी विशेषताएंहोती हैं। ये तापमान में अचानक बदलाव लातेहैं जिसके कारण वायु ऊपर उठती है और बादल का निर्माण करती है। वाताग्र के प्रकार:- उष्ण वाताग्र:- उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की ओर जहाँ गर्म पछुआ वायु आक्रामक होती है वहां उष्ण वाताग्र का विकास होता है। इसमें उष्ण वायुराशियाँ सक्रिय रूप से ठंडी और भारी वायुराशियों के ऊपर आरोहित हो जाती हैं। यह गर्म वायुराशि नीचे से ठंडी होती है जिससेसंघनन के बाद बादलों का निर्माण तथा वर्षा होनी शुरू हो जाती है। उष्ण वाताग्र में मंद ढाल के सहारे बड़े क्षेत्रों में और अपेक्षाकृत अधिक समय तक वर्षा प्राप्त होती है। यहाँ वर्षा मुख्यतः वर्षा स्तरी बादलों से होती है। बादलों का क्षैतिज विस्तार अधिक क्षेत्र में होने के कारण वर्षा उष्ण वाताग्र के प्रभाव वाले सभी क्षेत्रों में प्राप्त हो जातीहै। शीत वाताग्र:- शीत वाताग्र में ठंडी वायु के आक्रामक होने के कारण यह गर्म वायु को तीव्रता से उपर उठा देता है जिससे तीव्र ढाल वाले सीमाग्र का निर्माण होता है। यहाँ मुख्यतः वर्षा कपासी बादलों द्वारा वर्षा होती है। वर्षा अपेक्षाकृत तूफानी मौसम के साथ मुसलाधार होती है, जिससे कम समय में अधिक वर्षा प्राप्त होती है।इसमें तड़ितझंझा की भी उत्पत्ति होती है। तीव्र गति के कारण यह हजारों किलोमीटर दूर तक प्रवेश कर जाती है। शीतोष्ण चक्रवात की तूफानी वर्षा शीत वाताग्रों से ही संबंधित है। स्थाई वाताग्र:- जब वायुराशियों में किसी प्रकार की गति नहीं होती है तो उनके मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है। जब शीतवाताग्र और उष्ण वाताग्र स्थिर हो जाएँ तो स्थाई वाताग्र का निर्माण होता है। जिस क्षेत्र में ऐसे वाताग्र का निर्माण हो जाता है वहां लगातार कई दिनों तक आकाश मेघाच्छादित रहता है। ऐसीदशा में मौसम लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है,जिससे कई दिनों तक हल्की बूंदा-बूंदी होतीरहती है। अधिविष्ट वाताग्र:- यदि एक वायुराशि पूर्णतः धरातल के ऊपर उठ जाये तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं। जब शीत वाताग्र अपनी तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र तक पहुँच कर उससे मिल जाता है तो धरातल के साथ उष्ण वायुराशि का सम्पर्क समाप्त हो जाता है एवं अधिविष्ट वाताग्र का का निर्माण होता है। यह सामान्तया निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों के आसपास निर्मित होता है। इस प्रकार मौसम में परिवर्तन एवं वर्षा के संदर्भ में सभी वाताग्रों का अपना अपना महत्व है। ये सभी वाताग्र भिन्न भिन्न प्रदेशों में वहां मौसम में बदलाव द्वारा वहां के जीवन को प्रभावितकरते हैं।
##Question:वाताग्र से आप क्या समझते हैं? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by the fronts? Describe in detail the different types of fronts. (150-200 Words/10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, वाताग्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत उल्लेख कीजिए। अंत में निष्कर्षतः संक्षेप में वाताग्र के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- वाताग्र निम्नवायुदाब के क्षेत्र में तब विकसितहोता हैजब दो विपरीत प्रकृति की वायुराशी विपरीत दिशा से आकर आपस में मिलती है। वाताग्र के विकास के लिएएक वायुराशिठंडी,शुष्क एवं भारी तथा दूसरी वायुराशिगर्म, हल्की एवं आर्द्र होनी चाहिए।इन वाताग्रों पर ठंडी एवं सघन वायुराशि, गर्म एवं हल्की वायुराशि को ऊपर उठा देती है। वाताग्र आसानी से परस्पर मिश्रित नहीं होते हैं। यह न तो धरातलीय सतहके समानांतर होता है और न ही उसके ऊपर लम्बवत होता है बल्कि ढलुआ सीमा के साथ एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। ढलुआ सीमा एक संक्रमण का क्षेत्र होता है जिसके आर पार मौसम की दशाओं में काफी अंतर होता है।वाताग्र मध्य अक्षाशों में निर्मित होते हैं और तीव्र वायुदाब और तापमान प्रवणता इनकी विशेषताएंहोती हैं। ये तापमान में अचानक बदलाव लातेहैं जिसके कारण वायु ऊपर उठती है और बादल का निर्माण करती है। वाताग्र के प्रकार:- उष्ण वाताग्र:- उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की ओर जहाँ गर्म पछुआ वायु आक्रामक होती है वहां उष्ण वाताग्र का विकास होता है। इसमें उष्ण वायुराशियाँ सक्रिय रूप से ठंडी और भारी वायुराशियों के ऊपर आरोहित हो जाती हैं। यह गर्म वायुराशि नीचे से ठंडी होती है जिससेसंघनन के बाद बादलों का निर्माण तथा वर्षा होनी शुरू हो जाती है। उष्ण वाताग्र में मंद ढाल के सहारे बड़े क्षेत्रों में और अपेक्षाकृत अधिक समय तक वर्षा प्राप्त होती है। यहाँ वर्षा मुख्यतः वर्षा स्तरी बादलों से होती है। बादलों का क्षैतिज विस्तार अधिक क्षेत्र में होने के कारण वर्षा उष्ण वाताग्र के प्रभाव वाले सभी क्षेत्रों में प्राप्त हो जातीहै। शीत वाताग्र:- शीत वाताग्र में ठंडी वायु के आक्रामक होने के कारण यह गर्म वायु को तीव्रता से उपर उठा देता है जिससे तीव्र ढाल वाले सीमाग्र का निर्माण होता है। यहाँ मुख्यतः वर्षा कपासी बादलों द्वारा वर्षा होती है। वर्षा अपेक्षाकृत तूफानी मौसम के साथ मुसलाधार होती है, जिससे कम समय में अधिक वर्षा प्राप्त होती है।इसमें तड़ितझंझा की भी उत्पत्ति होती है। तीव्र गति के कारण यह हजारों किलोमीटर दूर तक प्रवेश कर जाती है। शीतोष्ण चक्रवात की तूफानी वर्षा शीत वाताग्रों से ही संबंधित है। स्थाई वाताग्र:- जब वायुराशियों में किसी प्रकार की गति नहीं होती है तो उनके मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है। जब शीतवाताग्र और उष्ण वाताग्र स्थिर हो जाएँ तो स्थाई वाताग्र का निर्माण होता है। जिस क्षेत्र में ऐसे वाताग्र का निर्माण हो जाता है वहां लगातार कई दिनों तक आकाश मेघाच्छादित रहता है। ऐसीदशा में मौसम लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है,जिससे कई दिनों तक हल्की बूंदा-बूंदी होतीरहती है। अधिविष्ट वाताग्र:- यदि एक वायुराशि पूर्णतः धरातल के ऊपर उठ जाये तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं। जब शीत वाताग्र अपनी तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र तक पहुँच कर उससे मिल जाता है तो धरातल के साथ उष्ण वायुराशि का सम्पर्क समाप्त हो जाता है एवं अधिविष्ट वाताग्र का का निर्माण होता है। यह सामान्तया निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों के आसपास निर्मित होता है। इस प्रकार मौसम में परिवर्तन एवं वर्षा के संदर्भ में सभी वाताग्रों का अपना अपना महत्व है। ये सभी वाताग्र भिन्न भिन्न प्रदेशों में वहां मौसम में बदलाव द्वारा वहां के जीवन को प्रभावितकरते हैं।
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तकनीकी के स्वदेशीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके महत्व व इससे संबंधित चुनौतियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द ) What do you understand by indigenization of technology? Briefly discuss its importance and challenges related to it. (150-200 words)
दृष्टिकोण: तकनीकी के स्वदेशीकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से तकनीकी के स्वदेशीकरण को समझाइए । तकनीकी के स्वदेशीकरण के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: सामान्यतया तकनीकी के स्वदेशीकरण से तात्पर्य है किसी राष्ट्र के द्वाराखरीदी हुई तकनीकी में अपनी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन करना । राष्ट्र द्वारा अपनी आवश्यकता के अनुरूप शोध व अनुसंधान कर आयातित तकनीकी में सुधार कर उसकी उपयोगिता में वृद्धि कि जाती है । तकनीकी के स्वदेशीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय संसाधनों ( मानव संसाधन व कच्चा माल दोनों ) का बेहतर व दक्षतापूर्ण प्रयोग संभव है । भारत में वर्ष 1983 से आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित स्पष्ट नीति का अनुसरण किया गया है और इसके तहत अंतरिक्ष व मिसाइल कार्यक्रम में स्वदेशी निर्माण को काफी बढ़ावा मिला है । तकनीकी के स्वदेशीकरण का महत्व : राष्ट्रीय संसाधनों का सही उपयोग । उदाहरण के लिए भारत के त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम से थोरीयम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में भी मदद मिलेगी जो भारत के थोरीयम संसाधन के प्रयोग के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण । मानव संसाधन में विकास : तकनीकी से संबन्धित आवश्यक कौशल का विकास में सहायक । तकनीकी के आयातक से तकनीकी के निर्यातक के रूप में परिवर्तन । इससे राष्ट्रीय आय व विदेशी मुद्रा की मात्रा में भी वृद्धि होगी । उदाहरण के लिए आज हम अंतरिक्ष तकनीकी से अच्छी कमाई कर रहे हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित तकनीकी में आत्मनिर्भरता । सामाजिक आर्थिक विकास में तकनीकी के अनुप्रयोग । सस्ती प्रौधोगिकी का निर्माण । आधुनिकीकरण व औधोगीकरण में सहायक । वैज्ञानिक अनुसंधान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियाँ : अंतराष्ट्रीय संधि/कन्वेन्शन/करार का दबाव ( eg... NPT, CTBT, PTBT आदि ) कुछ वैश्विक समूहों द्वारा व्यापार में अड़चन ( eg... MTCR, NSG ) भूराजनीतिक तनाव/दबाव जैसे- भारत पाकिस्तान तनाव । देश में स्वदेशीकरण के लिए आधारभूत संरचना का अभाव । शोध में वित्त की कमी । उन्नत प्रयोगशाला, संगठन व संस्थान का अभाव । वैज्ञानिकों द्वारा संस्था अथवा परियोजना को छोड़ना । परियोजना में देरी । स्वायत्तता में कमी/ लाल फीताशाही । वर्तमान में आवश्यकता है कि हम अपनी कूटनीति का प्रयोग कर द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते के माध्यम से आधुनिक तकनीकी तक अपनी पहुँच सुनिश्चित करें । साथ ही देश में शोध व अनुसंधान को बढ़ावा दें व इससे संबंधित आधारभूत संरचना के विकास को भी बढ़ाएँ ।
##Question:तकनीकी के स्वदेशीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके महत्व व इससे संबंधित चुनौतियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द ) What do you understand by indigenization of technology? Briefly discuss its importance and challenges related to it. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: तकनीकी के स्वदेशीकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से तकनीकी के स्वदेशीकरण को समझाइए । तकनीकी के स्वदेशीकरण के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: सामान्यतया तकनीकी के स्वदेशीकरण से तात्पर्य है किसी राष्ट्र के द्वाराखरीदी हुई तकनीकी में अपनी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन करना । राष्ट्र द्वारा अपनी आवश्यकता के अनुरूप शोध व अनुसंधान कर आयातित तकनीकी में सुधार कर उसकी उपयोगिता में वृद्धि कि जाती है । तकनीकी के स्वदेशीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय संसाधनों ( मानव संसाधन व कच्चा माल दोनों ) का बेहतर व दक्षतापूर्ण प्रयोग संभव है । भारत में वर्ष 1983 से आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित स्पष्ट नीति का अनुसरण किया गया है और इसके तहत अंतरिक्ष व मिसाइल कार्यक्रम में स्वदेशी निर्माण को काफी बढ़ावा मिला है । तकनीकी के स्वदेशीकरण का महत्व : राष्ट्रीय संसाधनों का सही उपयोग । उदाहरण के लिए भारत के त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम से थोरीयम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में भी मदद मिलेगी जो भारत के थोरीयम संसाधन के प्रयोग के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण । मानव संसाधन में विकास : तकनीकी से संबन्धित आवश्यक कौशल का विकास में सहायक । तकनीकी के आयातक से तकनीकी के निर्यातक के रूप में परिवर्तन । इससे राष्ट्रीय आय व विदेशी मुद्रा की मात्रा में भी वृद्धि होगी । उदाहरण के लिए आज हम अंतरिक्ष तकनीकी से अच्छी कमाई कर रहे हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित तकनीकी में आत्मनिर्भरता । सामाजिक आर्थिक विकास में तकनीकी के अनुप्रयोग । सस्ती प्रौधोगिकी का निर्माण । आधुनिकीकरण व औधोगीकरण में सहायक । वैज्ञानिक अनुसंधान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियाँ : अंतराष्ट्रीय संधि/कन्वेन्शन/करार का दबाव ( eg... NPT, CTBT, PTBT आदि ) कुछ वैश्विक समूहों द्वारा व्यापार में अड़चन ( eg... MTCR, NSG ) भूराजनीतिक तनाव/दबाव जैसे- भारत पाकिस्तान तनाव । देश में स्वदेशीकरण के लिए आधारभूत संरचना का अभाव । शोध में वित्त की कमी । उन्नत प्रयोगशाला, संगठन व संस्थान का अभाव । वैज्ञानिकों द्वारा संस्था अथवा परियोजना को छोड़ना । परियोजना में देरी । स्वायत्तता में कमी/ लाल फीताशाही । वर्तमान में आवश्यकता है कि हम अपनी कूटनीति का प्रयोग कर द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते के माध्यम से आधुनिक तकनीकी तक अपनी पहुँच सुनिश्चित करें । साथ ही देश में शोध व अनुसंधान को बढ़ावा दें व इससे संबंधित आधारभूत संरचना के विकास को भी बढ़ाएँ ।
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What are the objectives of the SARFAESI Act 2002? Discuss the recent amendment to the Act. (150 words/10 marks)
Approach : Introduce an answer by talking about the need for the introduction of the Act. Discuss the objectives of the SARFAESI Act. Talk about the recent amendment to the SARFAESI Act. Answer : "The Securitization and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest (SARFAESI) Act, 2002 is a legislation that helps financial institutions to ensure asset quality in multiple ways. This means that the Act was framed to address the problem of NPAs (Non-Performing Assets) or bad assets through different processes and mechanisms. As a legal mechanism to insulate assets, the Act addresses the interests of secured creditors (like banks). Several provisions of the Act give directives and powers to various institutions to manage the bad asset problem. The following are the main objectives of the SARFAESI Act. The Act provides the legal framework for securitization activities in India It gives the procedures for the transfer of NPAs to asset reconstruction companies for the reconstruction of the assets. The Act enforces the security interest without the Court’s intervention The Act gives powers to banks and financial institutions to take over the immovable property that is hypothecated or charged to enforce the recovery of debt. Features of the amendment to the SARFAESI Act in 2016 Government has amended the SARFAESI Act in August 2016 to empower the ARCs (Asset Reconstruction Companies), to rejuvenate Debt Recovery Tribunals (DRTs) and to enhance the effectiveness of asset reconstruction under the new bankruptcy law. The amendment has given more regulatory powers to the RBI on the working of ARCs. It was also aimed to empower asset reconstruction and the functioning of DRTs in the context of the newly enacted bankruptcy law. As per the amendment, the scope of the registry that contains the central database of all loans against properties given by all lenders has been widened to include more information. RBI will get more powers to audit and inspect ARCs and will get the freedom to remove the chairman or any director. It can also appoint central bank officials into the boards of ARCs. RBI will get the power to impose penalties on ARCs when the latter doesn’t follow the central bank’s directives. Similarly, it can regulate the fees charged by ARCs from banks while dealing with NPAs. The penalty amount has been increased from Rs 5 lakh to Rs 1 crore. The amendment has brought hire purchase and finance lease under the coverage of the SARFAESI Act. Regarding DRTs, the amendment aims to speed up the DRT procedures. Online procedures including electronic filing of recovery applications, documents and written statements will be initiated. The amendments are important for DRTs as they can play an important role under the new Bankruptcy law. DRTs will be the backbone of the bankruptcy code and deal with all insolvency proceedings involving individuals. The defaulter has to deposit 50 per cent of the debt due before filing an appeal at a DRT. These recent amendments in the SARFAESI Act will surely provide additional and much-required teeth to banks and financial institutions to fight the menace of NAP.
##Question:What are the objectives of the SARFAESI Act 2002? Discuss the recent amendment to the Act. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by talking about the need for the introduction of the Act. Discuss the objectives of the SARFAESI Act. Talk about the recent amendment to the SARFAESI Act. Answer : "The Securitization and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest (SARFAESI) Act, 2002 is a legislation that helps financial institutions to ensure asset quality in multiple ways. This means that the Act was framed to address the problem of NPAs (Non-Performing Assets) or bad assets through different processes and mechanisms. As a legal mechanism to insulate assets, the Act addresses the interests of secured creditors (like banks). Several provisions of the Act give directives and powers to various institutions to manage the bad asset problem. The following are the main objectives of the SARFAESI Act. The Act provides the legal framework for securitization activities in India It gives the procedures for the transfer of NPAs to asset reconstruction companies for the reconstruction of the assets. The Act enforces the security interest without the Court’s intervention The Act gives powers to banks and financial institutions to take over the immovable property that is hypothecated or charged to enforce the recovery of debt. Features of the amendment to the SARFAESI Act in 2016 Government has amended the SARFAESI Act in August 2016 to empower the ARCs (Asset Reconstruction Companies), to rejuvenate Debt Recovery Tribunals (DRTs) and to enhance the effectiveness of asset reconstruction under the new bankruptcy law. The amendment has given more regulatory powers to the RBI on the working of ARCs. It was also aimed to empower asset reconstruction and the functioning of DRTs in the context of the newly enacted bankruptcy law. As per the amendment, the scope of the registry that contains the central database of all loans against properties given by all lenders has been widened to include more information. RBI will get more powers to audit and inspect ARCs and will get the freedom to remove the chairman or any director. It can also appoint central bank officials into the boards of ARCs. RBI will get the power to impose penalties on ARCs when the latter doesn’t follow the central bank’s directives. Similarly, it can regulate the fees charged by ARCs from banks while dealing with NPAs. The penalty amount has been increased from Rs 5 lakh to Rs 1 crore. The amendment has brought hire purchase and finance lease under the coverage of the SARFAESI Act. Regarding DRTs, the amendment aims to speed up the DRT procedures. Online procedures including electronic filing of recovery applications, documents and written statements will be initiated. The amendments are important for DRTs as they can play an important role under the new Bankruptcy law. DRTs will be the backbone of the bankruptcy code and deal with all insolvency proceedings involving individuals. The defaulter has to deposit 50 per cent of the debt due before filing an appeal at a DRT. These recent amendments in the SARFAESI Act will surely provide additional and much-required teeth to banks and financial institutions to fight the menace of NAP.
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19 वीं सदी में भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन को प्रेरित करने वाले कारकों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए इस सुधार आन्दोलन में राजाराम मोहन राय के योगदानों को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Discussing briefly the factors that inspired the socio-religious reform movement in India in the 19th century, underline the contributions of Raja Ram Mohan Roy in this reform movement. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच - भूमिका में सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारकों का उल्लेख कीजिए इसके बाद राजा राम मोहन राय के योगदान पर चर्चा कीजिए। संक्षिप्त सारांश लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर - 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक: मध्यवर्ग का उदय आधुनिक शिक्षा का प्रसार प्रेस की भूमिका ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्राच्यवादियों की भूमिका शहरीकरण, परिवहन के आधुनिक साधन अंग्रेजी कानूनों का प्रभाव। राजा राम मोहन राय का योगदान: सामाजिक क्षेत्र में योगदान: उन्होने निम्न वर्ग के विरुद्ध छुआछूत का विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विभिन्न कूरीतियों का विरोध जैसे- सती प्रथा के अंत की वकालत की, बहु विवाह, पर्दा प्रथा आदि। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून बनवाने में भूमिका विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में योगदान :पुरोहितवाद, कर्मकांडों का विरोध किया। एकेश्वरवाद के समर्थक थे | ब्रह्म समाज की स्थापना वे मौलिक सत्य और धार्मिक एकता में विश्वास रखते थे। शिक्षा के क्षेत्र में :समाज के सभी वर्गों तक आधुनिक शिक्षा का प्रसार के लिए प्रयासरत। 1817 में हिन्दू कॉलेज व इंग्लिश स्कूल की स्थापना। 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना। 1809 में एकेश्वरवादियों को उपहार तथा 1820 में प्रिसेप्ट ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक की रचना। संवाद कौमुदी, मीरातुल अखबार आदि अखबारों का प्रकाशन भी किया। राजनीतिक एवं आर्थिक उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना की मांग अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार:1821 में नेपल्स मेंक्रांति की विफलता पर दुःख व्यक्त किया। 1823 में दक्षिणी अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज। 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कई कारण थे जिन्हे तत्कालीन समय के अनेक व्यक्तियों ने बढ़ावा दिया। इन महान सुधारकों में राजा राम मोहन राय का नाम सबसे पहले आता है। इन्हे सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का प्रवर्तक माना जाता है।
##Question:19 वीं सदी में भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन को प्रेरित करने वाले कारकों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए इस सुधार आन्दोलन में राजाराम मोहन राय के योगदानों को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Discussing briefly the factors that inspired the socio-religious reform movement in India in the 19th century, underline the contributions of Raja Ram Mohan Roy in this reform movement. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारकों का उल्लेख कीजिए इसके बाद राजा राम मोहन राय के योगदान पर चर्चा कीजिए। संक्षिप्त सारांश लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर - 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक: मध्यवर्ग का उदय आधुनिक शिक्षा का प्रसार प्रेस की भूमिका ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्राच्यवादियों की भूमिका शहरीकरण, परिवहन के आधुनिक साधन अंग्रेजी कानूनों का प्रभाव। राजा राम मोहन राय का योगदान: सामाजिक क्षेत्र में योगदान: उन्होने निम्न वर्ग के विरुद्ध छुआछूत का विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विभिन्न कूरीतियों का विरोध जैसे- सती प्रथा के अंत की वकालत की, बहु विवाह, पर्दा प्रथा आदि। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून बनवाने में भूमिका विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में योगदान :पुरोहितवाद, कर्मकांडों का विरोध किया। एकेश्वरवाद के समर्थक थे | ब्रह्म समाज की स्थापना वे मौलिक सत्य और धार्मिक एकता में विश्वास रखते थे। शिक्षा के क्षेत्र में :समाज के सभी वर्गों तक आधुनिक शिक्षा का प्रसार के लिए प्रयासरत। 1817 में हिन्दू कॉलेज व इंग्लिश स्कूल की स्थापना। 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना। 1809 में एकेश्वरवादियों को उपहार तथा 1820 में प्रिसेप्ट ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक की रचना। संवाद कौमुदी, मीरातुल अखबार आदि अखबारों का प्रकाशन भी किया। राजनीतिक एवं आर्थिक उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना की मांग अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार:1821 में नेपल्स मेंक्रांति की विफलता पर दुःख व्यक्त किया। 1823 में दक्षिणी अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज। 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कई कारण थे जिन्हे तत्कालीन समय के अनेक व्यक्तियों ने बढ़ावा दिया। इन महान सुधारकों में राजा राम मोहन राय का नाम सबसे पहले आता है। इन्हे सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का प्रवर्तक माना जाता है।
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तकनीकी के स्वदेशीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके महत्व व इससे संबंधित चुनौतियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द ) What do you understand by indigenization of technology? Briefly discuss its importance and challenges related to it. (150-200 words)
दृष्टिकोण: तकनीकी के स्वदेशीकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से तकनीकी के स्वदेशीकरण को समझाइए । तकनीकी के स्वदेशीकरण के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: सामान्यतया तकनीकी के स्वदेशीकरण से तात्पर्य है किसी राष्ट्र के द्वाराखरीदी हुई तकनीकी में अपनी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन करना । राष्ट्र द्वारा अपनी आवश्यकता के अनुरूप शोध व अनुसंधान कर आयातित तकनीकी में सुधार कर उसकी उपयोगिता में वृद्धि कि जाती है । तकनीकी के स्वदेशीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय संसाधनों ( मानव संसाधन व कच्चा माल दोनों ) का बेहतर व दक्षतापूर्ण प्रयोग संभव है । भारत में वर्ष 1983 से आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित स्पष्ट नीति का अनुसरण किया गया है और इसके तहत अंतरिक्ष व मिसाइल कार्यक्रम में स्वदेशी निर्माण को काफी बढ़ावा मिला है । तकनीकी के स्वदेशीकरण का महत्व : राष्ट्रीय संसाधनों का सही उपयोग । उदाहरण के लिए भारत के त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम से थोरीयम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में भी मदद मिलेगी जो भारत के थोरीयम संसाधन के प्रयोग के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण । मानव संसाधन में विकास : तकनीकी से संबन्धित आवश्यक कौशल का विकास में सहायक । तकनीकी के आयातक से तकनीकी के निर्यातक के रूप में परिवर्तन । इससे राष्ट्रीय आय व विदेशी मुद्रा की मात्रा में भी वृद्धि होगी । उदाहरण के लिए आज हम अंतरिक्ष तकनीकी से अच्छी कमाई कर रहे हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित तकनीकी में आत्मनिर्भरता । सामाजिक आर्थिक विकास में तकनीकी के अनुप्रयोग । सस्ती प्रौधोगिकी का निर्माण । आधुनिकीकरण व औधोगीकरण में सहायक । वैज्ञानिक अनुसंधान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियाँ : अंतराष्ट्रीय संधि/कन्वेन्शन/करार का दबाव ( eg... NPT, CTBT, PTBT आदि ) कुछ वैश्विक समूहों द्वारा व्यापार में अड़चन ( eg... MTCR, NSG ) भूराजनीतिक तनाव/दबाव जैसे- भारत पाकिस्तान तनाव । देश में स्वदेशीकरण के लिए आधारभूत संरचना का अभाव । शोध में वित्त की कमी । उन्नत प्रयोगशाला, संगठन व संस्थान का अभाव । वैज्ञानिकों द्वारा संस्था अथवा परियोजना को छोड़ना । परियोजना में देरी । स्वायत्तता में कमी/ लाल फीताशाही । वर्तमान में आवश्यकता है कि हम अपनी कूटनीति का प्रयोग कर द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते के माध्यम से आधुनिक तकनीकी तक अपनी पहुँच सुनिश्चित करें । साथ ही देश में शोध व अनुसंधान को बढ़ावा दें व इससे संबंधित आधारभूत संरचना के विकास को भी बढ़ाएँ ।
##Question:तकनीकी के स्वदेशीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके महत्व व इससे संबंधित चुनौतियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द ) What do you understand by indigenization of technology? Briefly discuss its importance and challenges related to it. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: तकनीकी के स्वदेशीकरण को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । कुछ उदाहरणों के माध्यम से तकनीकी के स्वदेशीकरण को समझाइए । तकनीकी के स्वदेशीकरण के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: सामान्यतया तकनीकी के स्वदेशीकरण से तात्पर्य है किसी राष्ट्र के द्वाराखरीदी हुई तकनीकी में अपनी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन करना । राष्ट्र द्वारा अपनी आवश्यकता के अनुरूप शोध व अनुसंधान कर आयातित तकनीकी में सुधार कर उसकी उपयोगिता में वृद्धि कि जाती है । तकनीकी के स्वदेशीकरण के माध्यम से राष्ट्रीय संसाधनों ( मानव संसाधन व कच्चा माल दोनों ) का बेहतर व दक्षतापूर्ण प्रयोग संभव है । भारत में वर्ष 1983 से आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित स्पष्ट नीति का अनुसरण किया गया है और इसके तहत अंतरिक्ष व मिसाइल कार्यक्रम में स्वदेशी निर्माण को काफी बढ़ावा मिला है । तकनीकी के स्वदेशीकरण का महत्व : राष्ट्रीय संसाधनों का सही उपयोग । उदाहरण के लिए भारत के त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम से थोरीयम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में भी मदद मिलेगी जो भारत के थोरीयम संसाधन के प्रयोग के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण । मानव संसाधन में विकास : तकनीकी से संबन्धित आवश्यक कौशल का विकास में सहायक । तकनीकी के आयातक से तकनीकी के निर्यातक के रूप में परिवर्तन । इससे राष्ट्रीय आय व विदेशी मुद्रा की मात्रा में भी वृद्धि होगी । उदाहरण के लिए आज हम अंतरिक्ष तकनीकी से अच्छी कमाई कर रहे हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित तकनीकी में आत्मनिर्भरता । सामाजिक आर्थिक विकास में तकनीकी के अनुप्रयोग । सस्ती प्रौधोगिकी का निर्माण । आधुनिकीकरण व औधोगीकरण में सहायक । वैज्ञानिक अनुसंधान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा । तकनीकी के स्वदेशीकरण से संबंधित चुनौतियाँ : अंतराष्ट्रीय संधि/कन्वेन्शन/करार का दबाव ( eg... NPT, CTBT, PTBT आदि ) कुछ वैश्विक समूहों द्वारा व्यापार में अड़चन ( eg... MTCR, NSG ) भूराजनीतिक तनाव/दबाव जैसे- भारत पाकिस्तान तनाव । देश में स्वदेशीकरण के लिए आधारभूत संरचना का अभाव । शोध में वित्त की कमी । उन्नत प्रयोगशाला, संगठन व संस्थान का अभाव । वैज्ञानिकों द्वारा संस्था अथवा परियोजना को छोड़ना । परियोजना में देरी । स्वायत्तता में कमी/ लाल फीताशाही । वर्तमान में आवश्यकता है कि हम अपनी कूटनीति का प्रयोग कर द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते के माध्यम से आधुनिक तकनीकी तक अपनी पहुँच सुनिश्चित करें । साथ ही देश में शोध व अनुसंधान को बढ़ावा दें व इससे संबंधित आधारभूत संरचना के विकास को भी बढ़ाएँ ।
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भारत के प्रमुख पठारी क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये| इसके साथ ही उनके निर्माण के कारकों और उनकी विशेषताओं का भी वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Point out the major plateau regions of India, along with this describe the factors of their formation and their characteristics. (150 to 200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में पठार को परिभाषित कीजिये, 2- प्रथम भाग में भारत में पठारों की उपस्थिति को स्पष्ट कीजिये, 3- दूसरे भाग में भारत के प्रमुख पठारी क्षेत्रों के निर्माण के कारकों एवं उनकी विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में पठारों के महत्व के संदर्भ में निष्कर्ष देकर उत्तर समाप्त कीजिये| पृथ्वी पर मिलने वाले द्वितीय क्रम के उच्चावचों अथवा स्थल रुपों मेंपठारअत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं|पठार ऊँचाई में पर्वतों से कम तथा मैदानों से अधिक ऊँचे होते हैं । सामान्यतया 5 सौ फीट से अधिक ऊँचे भाग को पठार कहते हैं। वस्तुतः इनकी मुख्य विशेषता यह है कि ये मैदानों की अपेक्षा थोड़े से अधिक ऊँचे होते हैं। पठारों का विस्तार पृथ्वी के लगभग 33 प्रतिशत भाग पर है। पठारों का निर्माण विभिन्न रूपों में हो सकता है| ये किसी भूगार्भिक क्रिया के कारण पृथ्वी के एक बड़े हिस्से का अपने आसपास की तुलना में ऊँचा उठ जाने के कारण निर्मित हो सकते हैं अथवा इनका निर्माण ज्वालामुखी के बाद लावा के एक स्थान पर अधिक मात्रा में जमा हो जाने के कारण भी हो सकता है| इसके अतिरिक्त पर्वत निरंतर अपक्षय-अपरदन से जब घिसकर नीचा हो जाए तो भी पठार निर्मित हो सकते हैं| पर्वतों के निर्माण के समय किसी समीपवर्ती भाग के अधिक ऊपर न उठ पाने के कारण भी पठार का निर्माण होता हैं। पठारों के निर्माण में अन्तर्जात एवं बहिर्जात दोनों बलों का योगदान होता है| पठारों को अंतर्पर्वतीय पठार, पर्वतपदीय पठार, महाद्वीपीय पठार, तटीय पठार, पीडमोंट पठार आदि रूपों में वर्गीकृत किया जाता है| भारत में पठारी क्षेत्र भारत के प्रायद्वीपीय भाग में लगभग 9 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में पठारी क्षेत्र विस्तृत है| इसकी औसत ऊँचाई 500-750 मी. के मध्य है । यह विश्व का सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय पठार है । यह विश्व के प्राचीनतम पठारों में से भी एक है । इस पठार की स्थलाकृति पर सभी महत्वपूर्ण भूसंचलन का प्रभाव पड़ा है । यहाँ लंबे समय से अपरदन की क्रिया जारी हैं । भूसंचलन और जलवायु परिवर्तन के कारण इस प्रदेश में नवीनता के भी प्रमाण मिलते हैं । इन प्रभावों के परिणामस्वरूप यह प्रदेश जटिल पठारी स्थलाकृति का प्रदेश बन गया है। यद्यपि यह पठारी स्थलाकृति है, लेकिन यहाँ अनेक अवशिष्ट पर्वत और पहाडि़याँ भी हैं । अधिकतर अवशिष्ट पर्वत पठार के सीमांत पर स्थित हैं । ये पर्वत ही तथा ऊँचाई और संरचना की विषमता इस पठारी क्षेत्र को उप पठारों में विभाजित करती हैं । अतः इसे ‘पठारों का पठार’ भी कहा गया है।प्रायद्वीपीय पठार एक मेज की आकृति वाला स्थल है जो पुराने क्रिस्टलीय आग्नेय और रूपांतरित शैलों से बना हुआ है|यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं उसके अपवाह के परिणामस्वरुप बना था| यह कारण है कि यह प्राचीनतम भूभाग का एक हिस्सा है| प्रायद्वीपीय पठार को कुछ निहित विशिष्टताओं के कारण विभिन्न स्थानीय नामों से भी जाना जाता है| प्रमुख पठारी क्षेत्र एवं उनकी विशेषताएं अरावली क्षेत्र अरावली, प्रायद्वीपीय पठार पर उपस्थित एकमात्र मोड़दार पर्वत है, यह प्रायद्वीपीय पठार का विस्तार है| इसका निर्माण पैलियोजोइक काल में हुआ था, इस प्रकार यह भारत का प्राचीनतम मोडदार पर्वत है| अरावली की लम्बाई लगभग 700 किमी है|यह यूराल एवं अप्लेशियन पर्वत कासमकालीनहै| उत्तर से दक्षिण जाने पर इसकी चौड़ाई एवं उचाई दोनों में वृद्धि होती है| प्राचीनकालीन होने के कारण लगातार अपक्षय अपरदन के कारण इसकी निरंतरता भंग हो गयी है| अतः इसे अवशिष्ट पर्वत के रूप में जाना जाता है| मालवा का पठार मालवा का पठार ज्वालामुखी निर्मित पठार है , यह निकटस्थ पहाड़ी क्षेत्र के बीच सपाट मैदानी क्षेत्र के रूप में है, प्रायद्वीपीय पठार की सघनतम आबादी वाला क्षेत्र है यहाँ भोपाल स्थित है छोटा नागपुर का पठार छोटा नागपुर का पठार विश्व के प्राचीनतम भागों में से एक जो प्रायद्वीपीय पठार का प्रमुख केन्द्रक है, छोटा नागपुर का पठार आर्कियन युग की प्राचीनतम रवेदार चट्टानों से निर्मित है, यह दो भागों में विभाजित है| उत्तरी भाग को हजारीबाग़ का पठार एवं दक्षिणी भाग को रांची के पठार के नाम से जाना जाता है,दोनों के बीच से दामोदर नदी बहती है| रांची का पठार विश्व में अपरदन चक्र के अंतिम रूप का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है, यहाँ बचे छोटे अवशेषों को पट भूमि कहा जाता है छोटा नागपुर का पठार खनिज की दृष्टि से अधिकतम विविधता वाला क्षेत्र है| अतः इसे भारत का रूर उपनाम से भी जाना जाता है, उदाहरण रानीगंज एवं झरिया कोयला क्षेत्र, सिंहभूम, क्योंझर, कोडरमा, जादूगुडा आदि क्षेत्र छोटा नागपुर का पठार के अंतर्गत ही आते हैं| दक्कन का पठार दक्कन के पठार का निर्माण क्रीटेशियस युग में हुआ| विस्तार उत्तर में तापी नदी से लेकर दक्षिण में 16डिग्री उत्तरी अक्षांश तक,पूर्व में तेलंगाना के पठार तक विस्तृतहै| दक्कन के पठार की गहराई पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है जो मुंबई के पास अधिकतम है| बहुत लम्बे समय से बहिर्जात बल के क्षेत्रीय अंतर के कारण दक्कन के पठार में सीढ़ीनुमा आकृति का निर्माण हुआ है, जिस कारण इसे दक्कन ट्रैप भी कहते हैं दक्कन के पठार में अपरदनात्मक अंतर के कारण कई उच्च भूमियाँ पर्वत का आभास कराती हैं, जैसे अजंता, बालाघाट, हरिश्चन्द्र श्रेणियां आदि पश्चिमी घाट पश्चिमी घाट अपेक्षाकृत नवीन स्थलाकृति है| पश्चिमी घाट, प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी भाग के भ्रंशन के कारण उत्पन्न हुआ है| जब भारतीय प्लेट की टक्कर उत्तर की ओर हो रही थी उसी समय पश्चिमी भाग टूट कर नीचे गिर गया, जिसके तीन मुख्य परिणाम हुएयथा अरब सागर का विस्तार, पश्चिमी घाट का निर्माण एवं प्रायद्वीपीय पठार ढाल में परिवर्तन| अर्थात पश्चिमी घाट का उत्थान विवर्तनिक परिघटना से सम्बन्धित है| इसका उत्तरी भाग दक्कन के पठार का भाग होने के कारण लावा से निर्मित है जबकि दक्षिणी भाग में अर्कियन युग के चट्टानें पायी जाती हैं जो कर्नाटक के पठार का भाग होने के कारण खनिज संपन्न है इस क्षेत्र से सबसे महत्वपूर्ण खनिज के रूप में लौह अयस्क की प्राप्ति होती है| बाबा बुदान की पहाड़ी में अवस्थित कुद्रेमुख खान,गोवा में बाईचोलिमप्रमुख लौह अयस्क खानें हैं| इसकी औसत ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है जो अन्नामलाई श्रेणी के अनाईमुड़ी पर सर्वोच्च है| नीलगिरी की पहाड़ी के पास पूर्वी-पश्चिमी घाट का मिलन होता है पूर्वी घाट पूर्वी घाट में पश्चिमी घाट की तरह निरंतरता नहीं है, ये प्राचीन होने के कारण अनेक नदियों ने बीच के क्षेत्र को काट काट कर निरंतरता को भंग किया है निरंतरता के भंग होने के कारण पूर्वी घाट छोटे एवं अलग-अलग टीलों के रूप में विद्यमान है, जैसे जावादी, शेवराय, बिलिगिरीरंगा आदि| कर्नाटक का पठार कर्नाटक का पठार दो भाग में विभाजित है, इसमें पश्चिमी भाग को मलनाड कहते है और पूर्वी भाग को मैदान कहते हैं मलनाड अर्कियन चट्टानों द्वारा निर्मित खनिज संपन्न है जबकि मैदान कृषि के लिए अधिक उपयुक्त है, परन्तु वर्षा की कमी के कारण यहाँ शुष्क क्षेत्र कृषि की जाती है| उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है की भारतीय पठारी क्षेत्र अनेक रूपों में विशिष्ट है| खनिजों की प्राप्ति के अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पठार में अनेक जलप्रपात मिलते हैं इन जल प्रपातों से विद्युत उत्पादन का कार्य किया जाता है। पठारों के बीच में अनेक प्राकृतिक गड्ढे मिलते हैं जिसके कारण तालाबों की अधिकता पाई जाती है जिससे सिंचाई व्यवस्था संभव हो पाती है। लावा पठार के अपरदन एवं अपक्षय के उपजाऊ काली मिट्टी निर्मित हुई है ।जो कपास सोयाबीन एवं चना की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। इसी प्रकार पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले समतल उच्च भागों पर लैटेराइट मिट्टी की उत्पत्ति हुई है। जिन पर मसाला चाय कॉफी इत्यादि की खेती संभव हो पाती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पठार आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं|
##Question:भारत के प्रमुख पठारी क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये| इसके साथ ही उनके निर्माण के कारकों और उनकी विशेषताओं का भी वर्णन कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Point out the major plateau regions of India, along with this describe the factors of their formation and their characteristics. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में पठार को परिभाषित कीजिये, 2- प्रथम भाग में भारत में पठारों की उपस्थिति को स्पष्ट कीजिये, 3- दूसरे भाग में भारत के प्रमुख पठारी क्षेत्रों के निर्माण के कारकों एवं उनकी विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में पठारों के महत्व के संदर्भ में निष्कर्ष देकर उत्तर समाप्त कीजिये| पृथ्वी पर मिलने वाले द्वितीय क्रम के उच्चावचों अथवा स्थल रुपों मेंपठारअत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं|पठार ऊँचाई में पर्वतों से कम तथा मैदानों से अधिक ऊँचे होते हैं । सामान्यतया 5 सौ फीट से अधिक ऊँचे भाग को पठार कहते हैं। वस्तुतः इनकी मुख्य विशेषता यह है कि ये मैदानों की अपेक्षा थोड़े से अधिक ऊँचे होते हैं। पठारों का विस्तार पृथ्वी के लगभग 33 प्रतिशत भाग पर है। पठारों का निर्माण विभिन्न रूपों में हो सकता है| ये किसी भूगार्भिक क्रिया के कारण पृथ्वी के एक बड़े हिस्से का अपने आसपास की तुलना में ऊँचा उठ जाने के कारण निर्मित हो सकते हैं अथवा इनका निर्माण ज्वालामुखी के बाद लावा के एक स्थान पर अधिक मात्रा में जमा हो जाने के कारण भी हो सकता है| इसके अतिरिक्त पर्वत निरंतर अपक्षय-अपरदन से जब घिसकर नीचा हो जाए तो भी पठार निर्मित हो सकते हैं| पर्वतों के निर्माण के समय किसी समीपवर्ती भाग के अधिक ऊपर न उठ पाने के कारण भी पठार का निर्माण होता हैं। पठारों के निर्माण में अन्तर्जात एवं बहिर्जात दोनों बलों का योगदान होता है| पठारों को अंतर्पर्वतीय पठार, पर्वतपदीय पठार, महाद्वीपीय पठार, तटीय पठार, पीडमोंट पठार आदि रूपों में वर्गीकृत किया जाता है| भारत में पठारी क्षेत्र भारत के प्रायद्वीपीय भाग में लगभग 9 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में पठारी क्षेत्र विस्तृत है| इसकी औसत ऊँचाई 500-750 मी. के मध्य है । यह विश्व का सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय पठार है । यह विश्व के प्राचीनतम पठारों में से भी एक है । इस पठार की स्थलाकृति पर सभी महत्वपूर्ण भूसंचलन का प्रभाव पड़ा है । यहाँ लंबे समय से अपरदन की क्रिया जारी हैं । भूसंचलन और जलवायु परिवर्तन के कारण इस प्रदेश में नवीनता के भी प्रमाण मिलते हैं । इन प्रभावों के परिणामस्वरूप यह प्रदेश जटिल पठारी स्थलाकृति का प्रदेश बन गया है। यद्यपि यह पठारी स्थलाकृति है, लेकिन यहाँ अनेक अवशिष्ट पर्वत और पहाडि़याँ भी हैं । अधिकतर अवशिष्ट पर्वत पठार के सीमांत पर स्थित हैं । ये पर्वत ही तथा ऊँचाई और संरचना की विषमता इस पठारी क्षेत्र को उप पठारों में विभाजित करती हैं । अतः इसे ‘पठारों का पठार’ भी कहा गया है।प्रायद्वीपीय पठार एक मेज की आकृति वाला स्थल है जो पुराने क्रिस्टलीय आग्नेय और रूपांतरित शैलों से बना हुआ है|यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं उसके अपवाह के परिणामस्वरुप बना था| यह कारण है कि यह प्राचीनतम भूभाग का एक हिस्सा है| प्रायद्वीपीय पठार को कुछ निहित विशिष्टताओं के कारण विभिन्न स्थानीय नामों से भी जाना जाता है| प्रमुख पठारी क्षेत्र एवं उनकी विशेषताएं अरावली क्षेत्र अरावली, प्रायद्वीपीय पठार पर उपस्थित एकमात्र मोड़दार पर्वत है, यह प्रायद्वीपीय पठार का विस्तार है| इसका निर्माण पैलियोजोइक काल में हुआ था, इस प्रकार यह भारत का प्राचीनतम मोडदार पर्वत है| अरावली की लम्बाई लगभग 700 किमी है|यह यूराल एवं अप्लेशियन पर्वत कासमकालीनहै| उत्तर से दक्षिण जाने पर इसकी चौड़ाई एवं उचाई दोनों में वृद्धि होती है| प्राचीनकालीन होने के कारण लगातार अपक्षय अपरदन के कारण इसकी निरंतरता भंग हो गयी है| अतः इसे अवशिष्ट पर्वत के रूप में जाना जाता है| मालवा का पठार मालवा का पठार ज्वालामुखी निर्मित पठार है , यह निकटस्थ पहाड़ी क्षेत्र के बीच सपाट मैदानी क्षेत्र के रूप में है, प्रायद्वीपीय पठार की सघनतम आबादी वाला क्षेत्र है यहाँ भोपाल स्थित है छोटा नागपुर का पठार छोटा नागपुर का पठार विश्व के प्राचीनतम भागों में से एक जो प्रायद्वीपीय पठार का प्रमुख केन्द्रक है, छोटा नागपुर का पठार आर्कियन युग की प्राचीनतम रवेदार चट्टानों से निर्मित है, यह दो भागों में विभाजित है| उत्तरी भाग को हजारीबाग़ का पठार एवं दक्षिणी भाग को रांची के पठार के नाम से जाना जाता है,दोनों के बीच से दामोदर नदी बहती है| रांची का पठार विश्व में अपरदन चक्र के अंतिम रूप का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है, यहाँ बचे छोटे अवशेषों को पट भूमि कहा जाता है छोटा नागपुर का पठार खनिज की दृष्टि से अधिकतम विविधता वाला क्षेत्र है| अतः इसे भारत का रूर उपनाम से भी जाना जाता है, उदाहरण रानीगंज एवं झरिया कोयला क्षेत्र, सिंहभूम, क्योंझर, कोडरमा, जादूगुडा आदि क्षेत्र छोटा नागपुर का पठार के अंतर्गत ही आते हैं| दक्कन का पठार दक्कन के पठार का निर्माण क्रीटेशियस युग में हुआ| विस्तार उत्तर में तापी नदी से लेकर दक्षिण में 16डिग्री उत्तरी अक्षांश तक,पूर्व में तेलंगाना के पठार तक विस्तृतहै| दक्कन के पठार की गहराई पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है जो मुंबई के पास अधिकतम है| बहुत लम्बे समय से बहिर्जात बल के क्षेत्रीय अंतर के कारण दक्कन के पठार में सीढ़ीनुमा आकृति का निर्माण हुआ है, जिस कारण इसे दक्कन ट्रैप भी कहते हैं दक्कन के पठार में अपरदनात्मक अंतर के कारण कई उच्च भूमियाँ पर्वत का आभास कराती हैं, जैसे अजंता, बालाघाट, हरिश्चन्द्र श्रेणियां आदि पश्चिमी घाट पश्चिमी घाट अपेक्षाकृत नवीन स्थलाकृति है| पश्चिमी घाट, प्रायद्वीपीय पठार के पश्चिमी भाग के भ्रंशन के कारण उत्पन्न हुआ है| जब भारतीय प्लेट की टक्कर उत्तर की ओर हो रही थी उसी समय पश्चिमी भाग टूट कर नीचे गिर गया, जिसके तीन मुख्य परिणाम हुएयथा अरब सागर का विस्तार, पश्चिमी घाट का निर्माण एवं प्रायद्वीपीय पठार ढाल में परिवर्तन| अर्थात पश्चिमी घाट का उत्थान विवर्तनिक परिघटना से सम्बन्धित है| इसका उत्तरी भाग दक्कन के पठार का भाग होने के कारण लावा से निर्मित है जबकि दक्षिणी भाग में अर्कियन युग के चट्टानें पायी जाती हैं जो कर्नाटक के पठार का भाग होने के कारण खनिज संपन्न है इस क्षेत्र से सबसे महत्वपूर्ण खनिज के रूप में लौह अयस्क की प्राप्ति होती है| बाबा बुदान की पहाड़ी में अवस्थित कुद्रेमुख खान,गोवा में बाईचोलिमप्रमुख लौह अयस्क खानें हैं| इसकी औसत ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है जो अन्नामलाई श्रेणी के अनाईमुड़ी पर सर्वोच्च है| नीलगिरी की पहाड़ी के पास पूर्वी-पश्चिमी घाट का मिलन होता है पूर्वी घाट पूर्वी घाट में पश्चिमी घाट की तरह निरंतरता नहीं है, ये प्राचीन होने के कारण अनेक नदियों ने बीच के क्षेत्र को काट काट कर निरंतरता को भंग किया है निरंतरता के भंग होने के कारण पूर्वी घाट छोटे एवं अलग-अलग टीलों के रूप में विद्यमान है, जैसे जावादी, शेवराय, बिलिगिरीरंगा आदि| कर्नाटक का पठार कर्नाटक का पठार दो भाग में विभाजित है, इसमें पश्चिमी भाग को मलनाड कहते है और पूर्वी भाग को मैदान कहते हैं मलनाड अर्कियन चट्टानों द्वारा निर्मित खनिज संपन्न है जबकि मैदान कृषि के लिए अधिक उपयुक्त है, परन्तु वर्षा की कमी के कारण यहाँ शुष्क क्षेत्र कृषि की जाती है| उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है की भारतीय पठारी क्षेत्र अनेक रूपों में विशिष्ट है| खनिजों की प्राप्ति के अतिरिक्त प्रायद्वीपीय पठार में अनेक जलप्रपात मिलते हैं इन जल प्रपातों से विद्युत उत्पादन का कार्य किया जाता है। पठारों के बीच में अनेक प्राकृतिक गड्ढे मिलते हैं जिसके कारण तालाबों की अधिकता पाई जाती है जिससे सिंचाई व्यवस्था संभव हो पाती है। लावा पठार के अपरदन एवं अपक्षय के उपजाऊ काली मिट्टी निर्मित हुई है ।जो कपास सोयाबीन एवं चना की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। इसी प्रकार पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले समतल उच्च भागों पर लैटेराइट मिट्टी की उत्पत्ति हुई है। जिन पर मसाला चाय कॉफी इत्यादि की खेती संभव हो पाती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पठार आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं|
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19 वीं सदी में भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन को प्रेरित करने वाले कारकों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | साथ ही इस आन्दोलन में राजाराम मोहन राय के योगदानों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Briefly describe the factors that motivated the socio-religious reform movement in India in the 19th century. Also discuss the contributions of Rajaram Mohan Roy in this movement. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारकों का उल्लेख कीजिए इसके बाद राजा राम मोहन राय के योगदान पर चर्चा कीजिए। संक्षिप्त सारांश लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर - 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक: मध्यवर्ग का उदय आधुनिक शिक्षा का प्रसार प्रेस की भूमिका ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्राच्यवादियों की भूमिका शहरीकरण, परिवहन के आधुनिक साधन अंग्रेजी कानूनों का प्रभाव। राजा राम मोहन राय का योगदान: सामाजिक क्षेत्र में योगदान: उन्होने निम्न वर्ग के विरुद्ध छुआछूत का विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विभिन्न कूरीतियों का विरोध जैसे- सती प्रथा के अंत की वकालत की, बहु विवाह, पर्दा प्रथा आदि। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून बनवाने में भूमिका विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में योगदान: पुरोहितवाद, कर्मकांडों का विरोध किया। एकेश्वरवाद के समर्थक थे ब्रह्म समाज की स्थापना वे मौलिक सत्य और धार्मिक एकता में विश्वास रखते थे। शिक्षा के क्षेत्र में :समाज के सभी वर्गों तक आधुनिक शिक्षा का प्रसार के लिए प्रयासरत। 1817 में हिन्दू कॉलेज व इंग्लिश स्कूल की स्थापना। 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना। 1809 में एकेश्वरवादियों को उपहार तथा 1820 में प्रिसेप्ट ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक की रचना। संवाद कौमुदी, मीरातुल अखबार आदि अखबारों का प्रकाशन भी किया। राजनीतिक एवं आर्थिक उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना की मांग अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार:1821 में नेपल्स मेंक्रांति की विफलता पर दुःख व्यक्त किया। 1823 में दक्षिणी अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज। 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कई कारण थे जिन्हे तत्कालीन समय के अनेक व्यक्तियों ने बढ़ावा दिया। इन महान सुधारकों में राजा राम मोहन राय का नाम सबसे पहले आता है। इन्हे सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का प्रवर्तक माना जाता है।
##Question:19 वीं सदी में भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन को प्रेरित करने वाले कारकों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | साथ ही इस आन्दोलन में राजाराम मोहन राय के योगदानों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Briefly describe the factors that motivated the socio-religious reform movement in India in the 19th century. Also discuss the contributions of Rajaram Mohan Roy in this movement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सामाजिक-धार्मिक स्थिति का विवरण दीजिए। उत्तर के पहले भाग में कारकों का उल्लेख कीजिए इसके बाद राजा राम मोहन राय के योगदान पर चर्चा कीजिए। संक्षिप्त सारांश लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर - 19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रणाली का विकास तथा पारंपरिक संस्थाओं का पुनरुत्थान सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों के दोहरे उद्देश्य के रूप में उभर कर आए। सुधार आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक: मध्यवर्ग का उदय आधुनिक शिक्षा का प्रसार प्रेस की भूमिका ईसाई मिशनरियों की भूमिका प्राच्यवादियों की भूमिका शहरीकरण, परिवहन के आधुनिक साधन अंग्रेजी कानूनों का प्रभाव। राजा राम मोहन राय का योगदान: सामाजिक क्षेत्र में योगदान: उन्होने निम्न वर्ग के विरुद्ध छुआछूत का विरोध किया। महिलाओं से संबंधित विभिन्न कूरीतियों का विरोध जैसे- सती प्रथा के अंत की वकालत की, बहु विवाह, पर्दा प्रथा आदि। 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून बनवाने में भूमिका विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में योगदान: पुरोहितवाद, कर्मकांडों का विरोध किया। एकेश्वरवाद के समर्थक थे ब्रह्म समाज की स्थापना वे मौलिक सत्य और धार्मिक एकता में विश्वास रखते थे। शिक्षा के क्षेत्र में :समाज के सभी वर्गों तक आधुनिक शिक्षा का प्रसार के लिए प्रयासरत। 1817 में हिन्दू कॉलेज व इंग्लिश स्कूल की स्थापना। 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना। 1809 में एकेश्वरवादियों को उपहार तथा 1820 में प्रिसेप्ट ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक की रचना। संवाद कौमुदी, मीरातुल अखबार आदि अखबारों का प्रकाशन भी किया। राजनीतिक एवं आर्थिक उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना की मांग अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार:1821 में नेपल्स मेंक्रांति की विफलता पर दुःख व्यक्त किया। 1823 में दक्षिणी अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज। 19वीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के कई कारण थे जिन्हे तत्कालीन समय के अनेक व्यक्तियों ने बढ़ावा दिया। इन महान सुधारकों में राजा राम मोहन राय का नाम सबसे पहले आता है। इन्हे सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का प्रवर्तक माना जाता है।
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वैसे कौन से कारण थें जिन्होंने इटली में फासीवाद के उदय को प्रेरित किया था? साथ ही, इटली में फासीवाद की विकास प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What were the reasons that prompted the rise of Fascism in Italy? Also, Highlight the rising of Fascism in Italy. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- फासीवाद को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| उत्तर के पहले भाग में, इटली में फासीवाद के उदय के कारणों का उल्लेख कीजिए| अंतिम भाग में, इटली मेंफासीवाद की विकास प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए| उत्तर- इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में जिस राजनीतिक विचारधारा का उदय हुआ था उसे फासीवाद की संज्ञा दी जाती है| इसके उदय में प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न समस्याएं, पेरिस शांति सम्मेलन के निर्णय, बिगड़ती आर्थिक व्यवस्था, साम्यवाद का प्रचार आदि कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी| फासीवाद से तात्पर्य निरंकुश तानाशाही से है जिसका मजबूत स्तंभ बर्बर तथा खुफिया पुलिस और निरंकुश, उद्दंड पार्टी कार्यकर्ता होता है| इसके तहत षड्यंत्रकारी तरीके से अफवाहें फैलाकर, विपक्षियों को बदनाम करते हुए, जनतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन किया जाता है| साम्यवाद का विरोध, सर्वोच्च नेता की व्यक्ति-पूजा और अंधभक्ति, पार्टी के सदस्यों का कबायली आचरण और विरोधियों का हिंसक उन्मूलन भी फासीवाद की पहचान है| इटली में फासीवाद के उदय के कारण- पेरिस सम्मेलन से निराशा - मित्रदेशों की ओर से प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेने के बदले 1915 में किए गए वादे के अनुरूप सभी क्षेत्र इटली को नहीं दिए गए जैसे- इटली को दिए जाने वाले कुछ प्रदेश यूगोस्लाविया को देना; अल्बानिया को इटली को सौंपे जाने की जगह स्वतंत्र देश बनाना आदि| इससे सरकार की प्रतिष्ठा में गिरावट आई और सार्वजनिक भावनाएं सरकार के विरुद्ध हो गयी| प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव - युद्ध से इटली को व्यापक जनधन की हानि हुयी| इटली पर राष्ट्रीय ऋण काफी बढ़ गया तथा उद्योग एवं व्यापार प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुएं| वस्तुओं के मूल्यों में बेतहाशा बढ़ोतरी से मुद्रा का भी अवमूल्यन हुआ| समाज के सभी वर्गों में असंतोष व्याप्त हो गया| इन परिस्थितियों में मुसोलिनी के रूप में एक मसीहा का उदय हुआ जिसने जनता से रोम के खोए हुए गौरव को वापस दिलाने तथा इटली की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का भरोसा दिलाया| असंतुष्ट जनता का प्रजातंत्रीय शासन-व्यवस्था से विश्वास उठ गया था एवं विद्रोहों तथा हडतालों की लंबी श्रृंखला से चौतरफा अव्यवस्था फ़ैल गयी थी| जनता अब एक स्थिर शक्तिशाली शासन की कामनाकर रही थी जो इन्हें इन कठिनाइयों से मुक्ति दिलाए| राष्ट्रवादियों में असंतोष - अबीसीनिया से हार, पेरिस सम्मेलन से निराशा; साम्यवाद का प्रसार - देश की अस्थिरता का लाभ उठाते हुए साम्यवादियों द्वारा अपने सिद्धांतों का भरपूर प्रसार किया जाना तथा जनअसंतोष का फायदा उठाते हुए सरकार के विरुद्ध सीधी कारवाई करना जिससे इटली में अराजकता का वातावरण उत्पन होना| इटली के साम्यवादी रूसी वोल्शेविकों की भांति किसानों और मजदूरों के सहयोग से क्रांति कर इटली में सर्वहारा शासन की स्थापना के लिए प्रयासरत थें| इससे आतंकित होकर पूंजीपतियों तथा जमींदारों ने मुसोलिनी का समर्थन करना शुरू कर दिया क्योंकि वह अपने आप को वोल्शेविकवाद का कट्टर विरोधी कहता था|आर्थिक समस्याओं ने भी इसे प्रसार का अवसर प्रदान किया| इटालियन उद्योगपति तथा जमींदार इससे चिंतित थें और सरकार साम्यवादियों से समुचित सुरक्षा नहीं कर पा रही थी | राजनीतिक अस्थिरता - पेरिस सम्मेलन में समुचित सम्मान ना दिला पाने के कारण लोकतांत्रिक सरकार की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची| विभिन्न कारणों से साझा सरकार का गठन हुआ और 1919 से 1922 के बीच पांच प्रधानमंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़ा| राजनीतिक अस्थिरता एवं उपरोक्त चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही प्रश्न उठाए जाने लगें| हिगेल के विचारों का योगदान ; मुसोलिनी की योग्यता - उपरोक्त परिस्थितियों ने मुसोलिनी के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की| वह अवसरवादी होने के साथ-साथ कुशल वक्ता एवं संगठनकर्ता भी था| 1919 में फासीवादी पार्टी की स्थापना की और अपने विचारों तथा भाषणों से समाज के एक बड़े वर्ग को आकर्षित करना प्रारंभ किया जैसे- उद्योगपतियों को साम्यवादियों से रक्षा का आश्वासन वहीँ श्रमिकों को न्यूनतम सुविधाओं का आश्वासन; सैनिकों एवं राष्ट्रवादियों/युवाओं को रोजगार तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सम्मान दिलाने का वादा| उसने एक तरफ पोप में आस्था व्यक्त की तो दूसरी तरफ गणतंत्र के विचारों को छोड़कर राजा का समर्थन किया| 1922 की गर्मियों में साम्यवादियों की आम हड़ताल की योजना को मुसोलिनी ने निजी सेना(ब्लैक शर्ट) के सहयोग से विफल बनाया| अक्टूबर 1922 में धमकाकर सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया| इटली में फासीवाद की विकास प्रक्रिया 1919 के चुनावों में फासीवादी पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिली; 1921 के चुनावों में 35 सीटें प्राप्त की तथा 1922 में नेपल्स में फासिस्ट सम्मेलन में यह घोषणा की कि तत्कालीन सरकार ने यदि सत्ता नहीं सौंपी तो रोम पर चढ़ाई कर दी जाएगी| 27 अक्टूबर, 1922 को 50 हजार ब्लैक शर्ट्स फासीवादी रोम में आकर मिलें अन्य जत्थों ने उत्तर के महत्वपूर्ण शहरों पर कब्ज़ा कर लिया| अतः विवश होकर सम्राट विक्टर एमैन्युअल 3 ने तत्कालीन सरकार को त्यागपत्र देने को कहा| 30अक्टूबर, 1922 को मुसोलिनी ने रोम में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तथा अपनी सरकार का गठन किया| 1923 में यह कानून (एसेरोबो कानून) पारित हुआ कि जिस दल को चुनाव में सर्वाधिक सीटें प्राप्त होंगी उसका दो-तिहाई बहुमत मान लिया जाएगा| अध्यादेशों के द्वारा शासन तथा यह भी आदेश जारी किया गया कि प्रधानमंत्री राजा के प्रति उत्तरदायी होगा ना कि संसद के प्रति | विपक्षी दलों पर प्रतिबंध ; पार्टी के भीतर तथा बाहर विरोधियों की निर्ममतापूर्वक हत्याएं; अख़बारों पर कठोर प्रतिबंध ; आर्थिक क्षेत्र में निगमित राज्य की अवधारणा ; सभी व्यवसायों को 22 भागों में विभाजित किया गया और प्रत्येक व्यवसाय से संबंधित एक संगठन जिसमें उद्योगपति व श्रमिकों के प्रतिनिधि के साथ-साथ फासीवादी कार्यकर्ता भी होते थें| हड़तालों को प्रतिबंधित किया गया और उद्योगपतियों को राष्ट्र के लिए आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन के निर्देश दिए गयें| निगमित राज्य में श्रमिकों के हितों का भी ध्यान रखा गया जैसे- न्यूनतम मजदूरी, साप्ताहिक छुटी, मनोरंजन की सुविधाएँ आदि| सामाजिक क्षेत्र में शिक्षा पर राजकीय नियंत्रण, प्रत्येक स्तर पर सैनिक शिक्षा तथा "मुसोलिनी हमेशा सही है" जैसे विचारों को महत्व| हिटलर के प्रभाव में 1930 के दशक के अंतिम वर्षों में यहूदी विरोधी नीति का पालन; धार्मिक क्षेत्र में 1929 में पोप से समझौता तथा 1871 में पोप को हुए नुकसान की भरपाई की गयी| पोप ने इटली को मान्यता प्रदान की| विदेश नीति के क्षेत्र में मुसोलिनी ने आक्रामक नीति अपनाई| फ्यूम बंदरगाह पर कब्ज़ा किया तथा थोड़े समय के लिए कोर्फु पर भी नियंत्रण स्थापित किया| हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ने के उद्देश्य से अपेक्षाकृत संयम बरतना प्रारंभ किया लेकिन विभिन्न कारणों से 1935 से पुनः आक्रामक नीति का पालन जैसे- 1935 में इथियोपिया पर कब्ज़ा; 1936 में हिटलर के साथ रोम-बर्लिन धुरी नामक समझौता; इसी वर्ष स्पेन के गृहयुद्ध में फासीवादी सरकार के समर्थन में सैन्य अभियान में शामिल हुआ और 1939 में अल्बानिया पर भी कब्ज़ा किया| हिटलर के साथ सैन्य सहयोग को लेकर एक स्टील पैक्ट हुआ|
##Question:वैसे कौन से कारण थें जिन्होंने इटली में फासीवाद के उदय को प्रेरित किया था? साथ ही, इटली में फासीवाद की विकास प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What were the reasons that prompted the rise of Fascism in Italy? Also, Highlight the rising of Fascism in Italy. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- फासीवाद को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| उत्तर के पहले भाग में, इटली में फासीवाद के उदय के कारणों का उल्लेख कीजिए| अंतिम भाग में, इटली मेंफासीवाद की विकास प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए| उत्तर- इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में जिस राजनीतिक विचारधारा का उदय हुआ था उसे फासीवाद की संज्ञा दी जाती है| इसके उदय में प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न समस्याएं, पेरिस शांति सम्मेलन के निर्णय, बिगड़ती आर्थिक व्यवस्था, साम्यवाद का प्रचार आदि कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी| फासीवाद से तात्पर्य निरंकुश तानाशाही से है जिसका मजबूत स्तंभ बर्बर तथा खुफिया पुलिस और निरंकुश, उद्दंड पार्टी कार्यकर्ता होता है| इसके तहत षड्यंत्रकारी तरीके से अफवाहें फैलाकर, विपक्षियों को बदनाम करते हुए, जनतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन किया जाता है| साम्यवाद का विरोध, सर्वोच्च नेता की व्यक्ति-पूजा और अंधभक्ति, पार्टी के सदस्यों का कबायली आचरण और विरोधियों का हिंसक उन्मूलन भी फासीवाद की पहचान है| इटली में फासीवाद के उदय के कारण- पेरिस सम्मेलन से निराशा - मित्रदेशों की ओर से प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेने के बदले 1915 में किए गए वादे के अनुरूप सभी क्षेत्र इटली को नहीं दिए गए जैसे- इटली को दिए जाने वाले कुछ प्रदेश यूगोस्लाविया को देना; अल्बानिया को इटली को सौंपे जाने की जगह स्वतंत्र देश बनाना आदि| इससे सरकार की प्रतिष्ठा में गिरावट आई और सार्वजनिक भावनाएं सरकार के विरुद्ध हो गयी| प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव - युद्ध से इटली को व्यापक जनधन की हानि हुयी| इटली पर राष्ट्रीय ऋण काफी बढ़ गया तथा उद्योग एवं व्यापार प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुएं| वस्तुओं के मूल्यों में बेतहाशा बढ़ोतरी से मुद्रा का भी अवमूल्यन हुआ| समाज के सभी वर्गों में असंतोष व्याप्त हो गया| इन परिस्थितियों में मुसोलिनी के रूप में एक मसीहा का उदय हुआ जिसने जनता से रोम के खोए हुए गौरव को वापस दिलाने तथा इटली की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का भरोसा दिलाया| असंतुष्ट जनता का प्रजातंत्रीय शासन-व्यवस्था से विश्वास उठ गया था एवं विद्रोहों तथा हडतालों की लंबी श्रृंखला से चौतरफा अव्यवस्था फ़ैल गयी थी| जनता अब एक स्थिर शक्तिशाली शासन की कामनाकर रही थी जो इन्हें इन कठिनाइयों से मुक्ति दिलाए| राष्ट्रवादियों में असंतोष - अबीसीनिया से हार, पेरिस सम्मेलन से निराशा; साम्यवाद का प्रसार - देश की अस्थिरता का लाभ उठाते हुए साम्यवादियों द्वारा अपने सिद्धांतों का भरपूर प्रसार किया जाना तथा जनअसंतोष का फायदा उठाते हुए सरकार के विरुद्ध सीधी कारवाई करना जिससे इटली में अराजकता का वातावरण उत्पन होना| इटली के साम्यवादी रूसी वोल्शेविकों की भांति किसानों और मजदूरों के सहयोग से क्रांति कर इटली में सर्वहारा शासन की स्थापना के लिए प्रयासरत थें| इससे आतंकित होकर पूंजीपतियों तथा जमींदारों ने मुसोलिनी का समर्थन करना शुरू कर दिया क्योंकि वह अपने आप को वोल्शेविकवाद का कट्टर विरोधी कहता था|आर्थिक समस्याओं ने भी इसे प्रसार का अवसर प्रदान किया| इटालियन उद्योगपति तथा जमींदार इससे चिंतित थें और सरकार साम्यवादियों से समुचित सुरक्षा नहीं कर पा रही थी | राजनीतिक अस्थिरता - पेरिस सम्मेलन में समुचित सम्मान ना दिला पाने के कारण लोकतांत्रिक सरकार की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची| विभिन्न कारणों से साझा सरकार का गठन हुआ और 1919 से 1922 के बीच पांच प्रधानमंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़ा| राजनीतिक अस्थिरता एवं उपरोक्त चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही प्रश्न उठाए जाने लगें| हिगेल के विचारों का योगदान ; मुसोलिनी की योग्यता - उपरोक्त परिस्थितियों ने मुसोलिनी के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की| वह अवसरवादी होने के साथ-साथ कुशल वक्ता एवं संगठनकर्ता भी था| 1919 में फासीवादी पार्टी की स्थापना की और अपने विचारों तथा भाषणों से समाज के एक बड़े वर्ग को आकर्षित करना प्रारंभ किया जैसे- उद्योगपतियों को साम्यवादियों से रक्षा का आश्वासन वहीँ श्रमिकों को न्यूनतम सुविधाओं का आश्वासन; सैनिकों एवं राष्ट्रवादियों/युवाओं को रोजगार तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सम्मान दिलाने का वादा| उसने एक तरफ पोप में आस्था व्यक्त की तो दूसरी तरफ गणतंत्र के विचारों को छोड़कर राजा का समर्थन किया| 1922 की गर्मियों में साम्यवादियों की आम हड़ताल की योजना को मुसोलिनी ने निजी सेना(ब्लैक शर्ट) के सहयोग से विफल बनाया| अक्टूबर 1922 में धमकाकर सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया| इटली में फासीवाद की विकास प्रक्रिया 1919 के चुनावों में फासीवादी पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिली; 1921 के चुनावों में 35 सीटें प्राप्त की तथा 1922 में नेपल्स में फासिस्ट सम्मेलन में यह घोषणा की कि तत्कालीन सरकार ने यदि सत्ता नहीं सौंपी तो रोम पर चढ़ाई कर दी जाएगी| 27 अक्टूबर, 1922 को 50 हजार ब्लैक शर्ट्स फासीवादी रोम में आकर मिलें अन्य जत्थों ने उत्तर के महत्वपूर्ण शहरों पर कब्ज़ा कर लिया| अतः विवश होकर सम्राट विक्टर एमैन्युअल 3 ने तत्कालीन सरकार को त्यागपत्र देने को कहा| 30अक्टूबर, 1922 को मुसोलिनी ने रोम में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तथा अपनी सरकार का गठन किया| 1923 में यह कानून (एसेरोबो कानून) पारित हुआ कि जिस दल को चुनाव में सर्वाधिक सीटें प्राप्त होंगी उसका दो-तिहाई बहुमत मान लिया जाएगा| अध्यादेशों के द्वारा शासन तथा यह भी आदेश जारी किया गया कि प्रधानमंत्री राजा के प्रति उत्तरदायी होगा ना कि संसद के प्रति | विपक्षी दलों पर प्रतिबंध ; पार्टी के भीतर तथा बाहर विरोधियों की निर्ममतापूर्वक हत्याएं; अख़बारों पर कठोर प्रतिबंध ; आर्थिक क्षेत्र में निगमित राज्य की अवधारणा ; सभी व्यवसायों को 22 भागों में विभाजित किया गया और प्रत्येक व्यवसाय से संबंधित एक संगठन जिसमें उद्योगपति व श्रमिकों के प्रतिनिधि के साथ-साथ फासीवादी कार्यकर्ता भी होते थें| हड़तालों को प्रतिबंधित किया गया और उद्योगपतियों को राष्ट्र के लिए आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन के निर्देश दिए गयें| निगमित राज्य में श्रमिकों के हितों का भी ध्यान रखा गया जैसे- न्यूनतम मजदूरी, साप्ताहिक छुटी, मनोरंजन की सुविधाएँ आदि| सामाजिक क्षेत्र में शिक्षा पर राजकीय नियंत्रण, प्रत्येक स्तर पर सैनिक शिक्षा तथा "मुसोलिनी हमेशा सही है" जैसे विचारों को महत्व| हिटलर के प्रभाव में 1930 के दशक के अंतिम वर्षों में यहूदी विरोधी नीति का पालन; धार्मिक क्षेत्र में 1929 में पोप से समझौता तथा 1871 में पोप को हुए नुकसान की भरपाई की गयी| पोप ने इटली को मान्यता प्रदान की| विदेश नीति के क्षेत्र में मुसोलिनी ने आक्रामक नीति अपनाई| फ्यूम बंदरगाह पर कब्ज़ा किया तथा थोड़े समय के लिए कोर्फु पर भी नियंत्रण स्थापित किया| हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ने के उद्देश्य से अपेक्षाकृत संयम बरतना प्रारंभ किया लेकिन विभिन्न कारणों से 1935 से पुनः आक्रामक नीति का पालन जैसे- 1935 में इथियोपिया पर कब्ज़ा; 1936 में हिटलर के साथ रोम-बर्लिन धुरी नामक समझौता; इसी वर्ष स्पेन के गृहयुद्ध में फासीवादी सरकार के समर्थन में सैन्य अभियान में शामिल हुआ और 1939 में अल्बानिया पर भी कब्ज़ा किया| हिटलर के साथ सैन्य सहयोग को लेकर एक स्टील पैक्ट हुआ|
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भारत शासन अधिनियम, 1858की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the salient features of the Government of India Act, 1858. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत शासन अधिनियम, 1858 की पृष्ठभूमि का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत शासन अधिनियम, 1858 की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- कम्पनी के शासन के विरुद्ध आंदोलन एवं 1857 के विद्रोह एवं असंतोष के कारण जन्मा यह अधिनियम भारत से ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन को समाप्त करने में महत्वपूर्ण रहा। कम्पनी काभ्रष्टाचार एवं क्रूरतापूर्ण शासन अपने चरम पर पहुँच गया था जिससेभारत के साथ साथ ब्रिटेन में भी कम्पनी के शासन के विरुद्ध आवाज उठने लगी थी, इसीलिए चार्टर एक्ट, 1853 में भी कंपनी के शासन की कोई निश्चित अवधि भी तय नहीं की गई थी। भारत शासन अधिनियम, 1858 की प्रमुख विशेषताएं:- इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी को समाप्त कर दिया गया। ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया तथाभारत के शासन कोसीधेब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया। इसे क्राउन का शासन भी कहा जाता था। इस समय विक्टोरिया ब्रिटेन की महारानी थीं। ब्रिटेन की सरकार द्वारा किये जाने वाले सभी कार्य सम्राट के नाम पर किये जाते थे। ब्रिटेन का सर्वोच्च निकाय ब्रिटिश संसद थी जिसके प्रति ब्रिटेन की सरकार उत्तरदायी थी। चूँकि ब्रिटेन की सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी थी अतः भारत के लिए भी सर्वोच्च निकाय ब्रिटेन की संसद ही थी। इस अधिनियम द्वारा भारत सचिव नामक एकपद सृजित किया गया।भारत सचिव को भारत की सरकार का कार्यभार सौंपा गया। भारत सचिवब्रिटेन की सरकार के एक केबिनेटमंत्री हुआ करता था। इसे परामर्श देने के लिएएक 15 सदस्यीय परिषद के गठन का प्रस्ताव किया गया। इस अधिनियम द्वारा भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा। वायसरॉय काअर्थ था-सम्राट का प्रतिनिधि। महारानी विक्टोरिया द्वारा एक घोषणा की गयी। इसउद्घोषणा में सभी भारतीय राजाओं के अधिकारों के सम्मान देने कावादा किया गया और भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार पर रोक लगा दी गयी। भारतीय राजाओं को भी यह विश्वास दिलाया गया की उनकी प्रतिष्ठा,अधिकार और गरिमा का सम्मान किया जायेगा और उनके अधीनस्थ क्षेत्रों पर किसी तरह का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। इस अधिनियम मेंलोगों के प्राचीन अधिकारों व परम्पराओं आदि के सम्मान और न्याय,सद्भाव व धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करने का वादा किया गया। इसमें घोषित किया गया कि प्रत्येक व्यक्ति ,जाति और धर्म के भेदभाव के बिना,केवल अपनी योग्यता और शिक्षा के आधार पर प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश पाने का हक़दार होगा। निष्कर्षतः यह स्पष्ट था किअवसर की समानता की जो बात उद्घोषणा में की गयी थी उसे लागू नहीं किया गया। भारत की प्राचीन परम्पराओं के प्रति सम्मान के नाम पर ब्रिटिशों ने सामाजिक बुराइयों को संरक्षण देने की नीति को ही अपनाया। 1858 ई. के बाद भारतीयों के हितों को पुनः ब्रिटेन के हितों के अधीनस्थ बना दिया गया। ब्रिटेन व अन्य साम्राज्यवादी ताकतों के संघर्ष में भारत का उपयोग ब्रिटेन के आर्थिक हितों की पूर्ति के रूप में किया गया। भारत के संसाधनों का प्रयोग विश्व के अन्य भागों में ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा अन्य देशों के विरुद्ध चलाये गए महंगे युद्धों की पूर्ति हेतु हीकिया गया।
##Question:भारत शासन अधिनियम, 1858की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the salient features of the Government of India Act, 1858. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत शासन अधिनियम, 1858 की पृष्ठभूमि का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत शासन अधिनियम, 1858 की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- कम्पनी के शासन के विरुद्ध आंदोलन एवं 1857 के विद्रोह एवं असंतोष के कारण जन्मा यह अधिनियम भारत से ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन को समाप्त करने में महत्वपूर्ण रहा। कम्पनी काभ्रष्टाचार एवं क्रूरतापूर्ण शासन अपने चरम पर पहुँच गया था जिससेभारत के साथ साथ ब्रिटेन में भी कम्पनी के शासन के विरुद्ध आवाज उठने लगी थी, इसीलिए चार्टर एक्ट, 1853 में भी कंपनी के शासन की कोई निश्चित अवधि भी तय नहीं की गई थी। भारत शासन अधिनियम, 1858 की प्रमुख विशेषताएं:- इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी को समाप्त कर दिया गया। ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया तथाभारत के शासन कोसीधेब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया। इसे क्राउन का शासन भी कहा जाता था। इस समय विक्टोरिया ब्रिटेन की महारानी थीं। ब्रिटेन की सरकार द्वारा किये जाने वाले सभी कार्य सम्राट के नाम पर किये जाते थे। ब्रिटेन का सर्वोच्च निकाय ब्रिटिश संसद थी जिसके प्रति ब्रिटेन की सरकार उत्तरदायी थी। चूँकि ब्रिटेन की सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी थी अतः भारत के लिए भी सर्वोच्च निकाय ब्रिटेन की संसद ही थी। इस अधिनियम द्वारा भारत सचिव नामक एकपद सृजित किया गया।भारत सचिव को भारत की सरकार का कार्यभार सौंपा गया। भारत सचिवब्रिटेन की सरकार के एक केबिनेटमंत्री हुआ करता था। इसे परामर्श देने के लिएएक 15 सदस्यीय परिषद के गठन का प्रस्ताव किया गया। इस अधिनियम द्वारा भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा। वायसरॉय काअर्थ था-सम्राट का प्रतिनिधि। महारानी विक्टोरिया द्वारा एक घोषणा की गयी। इसउद्घोषणा में सभी भारतीय राजाओं के अधिकारों के सम्मान देने कावादा किया गया और भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार पर रोक लगा दी गयी। भारतीय राजाओं को भी यह विश्वास दिलाया गया की उनकी प्रतिष्ठा,अधिकार और गरिमा का सम्मान किया जायेगा और उनके अधीनस्थ क्षेत्रों पर किसी तरह का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा। इस अधिनियम मेंलोगों के प्राचीन अधिकारों व परम्पराओं आदि के सम्मान और न्याय,सद्भाव व धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करने का वादा किया गया। इसमें घोषित किया गया कि प्रत्येक व्यक्ति ,जाति और धर्म के भेदभाव के बिना,केवल अपनी योग्यता और शिक्षा के आधार पर प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश पाने का हक़दार होगा। निष्कर्षतः यह स्पष्ट था किअवसर की समानता की जो बात उद्घोषणा में की गयी थी उसे लागू नहीं किया गया। भारत की प्राचीन परम्पराओं के प्रति सम्मान के नाम पर ब्रिटिशों ने सामाजिक बुराइयों को संरक्षण देने की नीति को ही अपनाया। 1858 ई. के बाद भारतीयों के हितों को पुनः ब्रिटेन के हितों के अधीनस्थ बना दिया गया। ब्रिटेन व अन्य साम्राज्यवादी ताकतों के संघर्ष में भारत का उपयोग ब्रिटेन के आर्थिक हितों की पूर्ति के रूप में किया गया। भारत के संसाधनों का प्रयोग विश्व के अन्य भागों में ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा अन्य देशों के विरुद्ध चलाये गए महंगे युद्धों की पूर्ति हेतु हीकिया गया।
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The French Revolution is a result of the political, social and economic situation of France at that time.Discuss. (200 words)
Approach: - Brief introduction about the French Revolution Bring out Political, Social and Economical Causes separately Conclusion Answer:- The French Revolution proved to be a defining moment in history as it finished the primitive sovereign autocracy, outdated regulations, and communal disparity. Origin of the French revolution is the interplay of many social, economic and political causes. Political Factors:- The autocratic form of the government was prevalent in France. The kings regarded themselves as "Representatives of God on Earth" and ruled over their subjects without any check or restraint. No judicial inquiry was essential for the imprisonment of an individual as the will of the king was considered to be the ultimate goal. Persons like Voltaire and Mirabeau became the victims of the authority because they had different views than the head of the state Appointment of officers and their termination was the sole right, Since, the king was the absolute authority, he had not called any meeting of the Estates-General for the last 175 years. People began to lose their faith in the king because of widespread chaos and mismanagement of resources. They wanted to end once and for all the absolute power of the king. Social Factors:- The French society was mainly divided into two classes: (i) the privileged(nobles, feudal lords and the higher clergy), and (ii) the unprivileged(peasants, tenants, laborers, artisans,). No special privilege was granted to the unprivileged classes but they had to bear the burden of heavy taxes. Thus their life left much to be desired Clergy and Nobles also used to raise various taxes from the commoners while they themselves were freed from all taxation. Their domesticated animals were free to graze in any field of the peasants and they had no right to oust them. There was a rift between the higher and lower strata of society. Hence, common people were waiting for an appropriate opportunity to raise voice against their exploiters. Economic Factors:- Louis XVI was fond of waging wars and took an active part in many wars. It led to an increase in the national debt beyond the limit. He also spent a huge amount over the construction of the royal mansion. In 1789 the Estates-General was summoned to decide the financial issue of equal taxation on all the classes.But, it couldn’t find any viable solutions as the situation has been deteriorated beyond the limit. Inequality in taxes had created dissatisfaction and dejection among the masses. Moreover, the method of raising revenue was also faulty. The revenue was raised by the contractors who used to collect more than taxes than which was allowed. Moreover, they deposited in the royal treasury only a part of it and thus appropriated a good amount for their own use. The interplay of all these factors led to the French revolution and overthrow of the King. New ideals of Liberty, Equality, and Fraternity were generated that shaped the land of Europe and as well the world. French Revolution also proved to the source of inspiration for other revolutions around the world like the American Revolution.
##Question:The French Revolution is a result of the political, social and economic situation of France at that time.Discuss. (200 words)##Answer:Approach: - Brief introduction about the French Revolution Bring out Political, Social and Economical Causes separately Conclusion Answer:- The French Revolution proved to be a defining moment in history as it finished the primitive sovereign autocracy, outdated regulations, and communal disparity. Origin of the French revolution is the interplay of many social, economic and political causes. Political Factors:- The autocratic form of the government was prevalent in France. The kings regarded themselves as "Representatives of God on Earth" and ruled over their subjects without any check or restraint. No judicial inquiry was essential for the imprisonment of an individual as the will of the king was considered to be the ultimate goal. Persons like Voltaire and Mirabeau became the victims of the authority because they had different views than the head of the state Appointment of officers and their termination was the sole right, Since, the king was the absolute authority, he had not called any meeting of the Estates-General for the last 175 years. People began to lose their faith in the king because of widespread chaos and mismanagement of resources. They wanted to end once and for all the absolute power of the king. Social Factors:- The French society was mainly divided into two classes: (i) the privileged(nobles, feudal lords and the higher clergy), and (ii) the unprivileged(peasants, tenants, laborers, artisans,). No special privilege was granted to the unprivileged classes but they had to bear the burden of heavy taxes. Thus their life left much to be desired Clergy and Nobles also used to raise various taxes from the commoners while they themselves were freed from all taxation. Their domesticated animals were free to graze in any field of the peasants and they had no right to oust them. There was a rift between the higher and lower strata of society. Hence, common people were waiting for an appropriate opportunity to raise voice against their exploiters. Economic Factors:- Louis XVI was fond of waging wars and took an active part in many wars. It led to an increase in the national debt beyond the limit. He also spent a huge amount over the construction of the royal mansion. In 1789 the Estates-General was summoned to decide the financial issue of equal taxation on all the classes.But, it couldn’t find any viable solutions as the situation has been deteriorated beyond the limit. Inequality in taxes had created dissatisfaction and dejection among the masses. Moreover, the method of raising revenue was also faulty. The revenue was raised by the contractors who used to collect more than taxes than which was allowed. Moreover, they deposited in the royal treasury only a part of it and thus appropriated a good amount for their own use. The interplay of all these factors led to the French revolution and overthrow of the King. New ideals of Liberty, Equality, and Fraternity were generated that shaped the land of Europe and as well the world. French Revolution also proved to the source of inspiration for other revolutions around the world like the American Revolution.
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एक ओर जहाँ हिटलर द्वारा जर्मनी में व्यवहार में लाये जाने वाले नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के सिद्धांतों में व्यापक समानताएं मौजूद थी तो वहीँ दोनों के मध्य कई असमानताएं भी विद्यमान थीं| कथन को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) While there were wide similarities between the nazism practiced by Hitler in Germany and the principles of Mussolini"s Fascism in Italy, there were also many dissimilarities between the two. Explain the statement. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच - हिटलर (नाजीवाद) तथा मुसोलिनी(फासीवाद) के उदय की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर आरंभ कीजिए| पहले भाग में, हिटलर द्वारा जर्मनी में व्यवहार में लाये जाने वाले नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के सिद्धांतों में विद्यमान व्यापक समानताओं का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, नाजीवाद तथा फासीवाद में अंतरों को रेखांकित कीजिए| निष्कर्षतः, एक संतुलित निष्कर्ष(दोनों ही कैसे द्वितीय विश्वयुद्ध का एक प्रमुख कारण बना) के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - फ़ासीवाद कोई विचारधारा नहीं बल्कि एक प्रकार की कार्ययोजना है जिसमें अवसर मिलने पर सत्ता पर नियंत्रण और केन्द्रीकरण किया जाता है| इसकी सामान्य विशेषताएं निम्न हैं -लोकतंत्र विरोधी; कार्यपालिका में शक्ति का केन्द्रीकरण, विरोधी दलों पर प्रतिबन्ध, चुनाव प्रक्रिया में फेरबदल, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबन्ध, संगठन का महत्त्व, सर्वसत्तावादी अर्थात जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को नियंत्रित करने का प्रयास, उग्रराष्ट्रवाद, युद्ध समर्थक, शान्ति विरोधी कार्ययोजना आदि| नाजीवाद भी एक तरह की फासीवादी विचारधारा ही है| प्रथम विश्वयुद्ध पश्चात पेरिस सम्मलेन से निराशा, प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव, राष्ट्रवादियों में असंतोष, साम्यवाद का प्रसार, राजनीतिक अस्थिरता, हीगल का दर्शन और मुसोलिनी की योग्यता जैसे कारकों से इटली में फासीवाद का उदय हुआ| वहीँ दूसरी तरफ, जर्मनी में नाजीवाद के उदय के कारणों के अंतर्गत वर्साय की संधि से असंतोष, आर्थिक संकट के दौरान हिटलर की लोकप्रियता बढ़ना जैसे- 1919-23 के बीच आर्थिक अस्थिरता के माहौल में नाजीवादी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ना; पुनः, महामंदी(1929-32) के दौरान नाजीवादी दल को जनसमर्थन बढ़ना; 1932 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना; साम्यवादी विचारधारा का बढ़ताप्रभाव, राजनीतिक दलों की विफलता; वाईमर गणतंत्र की कमजोरी आदि शामिल हैं| हिटलर द्वारा व्यवहार में लाए जाने वाले नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के सिद्धांतों में निम्नलिखित समानताएँ थी ---> राष्ट्रवाद के पुनर्जन्म के लिए दोनों ही सिद्धांतों में चरम राष्ट्रवाद पर बल दिया जाता था| अधिनायकवादी सरकार, राज्य की सर्वोच्चता और एकल पार्टी प्रणाली अन्य समान विशेषताएँ थीं| आर्थिक आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय नीति के रूप में प्रयोग किया गया (इससे बेरोजगारी कम करने के उद्देश्य में सहायता प्राप्त होगी) | युद्ध का गुणगान, देश की सैन्य शक्ति के निर्माण पर ध्यान देना और राष्ट्र की महानता के पुनर्निर्माण के लिए युद्ध को एक उपकरण के रूप में प्रयोग करने की धारणा रखना आवश्यक रूप से साम्यवाद विरोधी राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सभी वर्गों के मध्य एकता तथा समाज के अधिकांश वर्गों को कुछ न कुछ आश्वासन जैसे मुद्दों को आधार बनाकर सामाजिक आधार का विस्तार सुव्यवस्थित प्रचार के माध्यम से नेता के व्यक्तित्व को प्रोत्साहित करना मुसोलिनी की तरह हिटलर भी कुशल वक्ता तथा अच्छा संगठनकर्ता - समकालीन परिस्थितियों में दोनों ने एक मजबूत सरकार तथा राष्ट्रीय सम्मान देने का वादा किया| नाजीवाद और फासीवाद में अंतर ---> नाजीवाद की तुलना में फासीवाद को अस्पष्ट कहा जा सकता है क्योंकि नाजीवाद द्वारा स्वीकृत सिद्धांतों में अधिक स्पष्टता है| यहूदियों के प्रति नीति के सम्बन्ध में - इटली का फासीवाद 1938 तक यहूदी विरोधी नहीं था| इसके बाद ही मुसोलिनी ने हिटलर की यहूदी विरोधी नीति को अपनाया था| जर्मनी में नाजीवाद का प्रसार इटली के फासीवाद से अधिक गहरा और व्यापक था| आर्थिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के प्रति जर्मन नाजी व्यवस्था अधिक दक्ष और सफल थी और हिटलर बेरोजगारी को समाप्त करने में सफल रहा था| इसके विपरीत इटली में बेरोजगारी में वृद्धि हुई और यह आर्थिक आत्मनिर्भरता की प्राप्ति में विफल रहा| उत्पीड़न के मामले में नाजी अधिक क्रूर थे और काफी सीमा तक उन्होंने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया था| यहूदियों को व्यवस्थित रूप से मौत के घाट उतारने के लिए हिटलर ने यातना शिविरों की स्थापना की और यहाँ तक कि पोलैंड की गैर-यहूदी जनसंख्या को भी इन यातना शिविरों में भेजा गया| शिविरों में लोगों से अवैतनिक श्रम कराया जाता था और उन्हें भोजन से वंचित रखा जाता था| बहुत लोग भूख से मर गये और बहुतों को जहरीले गैस के कक्षों में भेजा गया| इसके विपरीत इटली में इतने बड़े स्तर पर कोई अत्याचार नहीं हुए| मुसोलिनी चर्च के प्रति अपनी नीति में अधिक सफल रहा| 1929 में राजनीतिक क्षेत्र से हटने के लिए उसने पोप के साथ एक समझौता किया और उसके बदले में उसने पोप को धार्मिक क्षेत्र में स्वतंत्रता दी| दूसरी ओर, हिटलर इस प्रकार की कूटनीति के लिए अधीर था और यह समाज में चर्च का कोई भी प्रभाव नहीं चाहता था| चर्च के प्रति हिटलर ने बहुत ही कठोर नीति का पालन किया और चर्च को दबाने के नाजी प्रयासों में चर्च के कई सदस्यों को मार डाला गया| हिटलर और मुसोलिनी की संवैधानिक स्थितियाँ भी भिन्न थीं| इटली में राजशाही अभी भी अस्तित्व में थी और राजा ने 1943 में मुसोलिनी को बर्खास्त करने का आदेश देकर उसके राज्य का अंत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| इसके विपरीत जर्मनी में हिटलर से ऊँची कोई भी सत्ता नहीं थी जो उसे संवैधानिक रूप से पदच्युत या गिरफ्तार कर सके| उपरोक्त असमानताओं के बावजूद दोनों विचारधाराएँ मुख्यतः फासीवादी मानी जा सकती हैं जिसका परिणाम दुनिया को एक और विभिषक विश्वयुद्ध के रूप में देखने को मिला| दोनों विश्वयुद्धों के बीच इटली, जर्मनी तथा जापान में फासीवादी शक्तियों का उदय हुआ जिसका महत्वपूर्ण कारण पेरिस सम्मलेन तो था ही इसके अलावा, इन राष्ट्रों में लोकतंत्र की जड़ों का कमजोर होना, आर्थिक संकट, साम्यवादी विचारधारा का प्रसार जैसे अन्य कारण भी थें| फासीवादी शक्तियों के द्वारा अपने स्वार्थों के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन, युद्ध का महिमामंडन तथा युद्ध का वातावरण निर्मित किया गया तथा फासीवादी शक्तियों के आक्रामक नीति से ही द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआ त हुई| जैसे - इटली के द्वारा इथोपिया(1935) एवं अल्बानिया(1939) पर आक्रमण; ऑस्ट्रिया का जर्मनी में विलय (1938); चेकोस्लोवाकिया का विलय तथा पोलैंड पर आक्रमण(1939) तथा युद्ध की शुरुआत|
##Question:एक ओर जहाँ हिटलर द्वारा जर्मनी में व्यवहार में लाये जाने वाले नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के सिद्धांतों में व्यापक समानताएं मौजूद थी तो वहीँ दोनों के मध्य कई असमानताएं भी विद्यमान थीं| कथन को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) While there were wide similarities between the nazism practiced by Hitler in Germany and the principles of Mussolini"s Fascism in Italy, there were also many dissimilarities between the two. Explain the statement. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - हिटलर (नाजीवाद) तथा मुसोलिनी(फासीवाद) के उदय की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर आरंभ कीजिए| पहले भाग में, हिटलर द्वारा जर्मनी में व्यवहार में लाये जाने वाले नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के सिद्धांतों में विद्यमान व्यापक समानताओं का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, नाजीवाद तथा फासीवाद में अंतरों को रेखांकित कीजिए| निष्कर्षतः, एक संतुलित निष्कर्ष(दोनों ही कैसे द्वितीय विश्वयुद्ध का एक प्रमुख कारण बना) के साथ उत्तर समाप्त कीजिए| उत्तर - फ़ासीवाद कोई विचारधारा नहीं बल्कि एक प्रकार की कार्ययोजना है जिसमें अवसर मिलने पर सत्ता पर नियंत्रण और केन्द्रीकरण किया जाता है| इसकी सामान्य विशेषताएं निम्न हैं -लोकतंत्र विरोधी; कार्यपालिका में शक्ति का केन्द्रीकरण, विरोधी दलों पर प्रतिबन्ध, चुनाव प्रक्रिया में फेरबदल, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबन्ध, संगठन का महत्त्व, सर्वसत्तावादी अर्थात जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को नियंत्रित करने का प्रयास, उग्रराष्ट्रवाद, युद्ध समर्थक, शान्ति विरोधी कार्ययोजना आदि| नाजीवाद भी एक तरह की फासीवादी विचारधारा ही है| प्रथम विश्वयुद्ध पश्चात पेरिस सम्मलेन से निराशा, प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव, राष्ट्रवादियों में असंतोष, साम्यवाद का प्रसार, राजनीतिक अस्थिरता, हीगल का दर्शन और मुसोलिनी की योग्यता जैसे कारकों से इटली में फासीवाद का उदय हुआ| वहीँ दूसरी तरफ, जर्मनी में नाजीवाद के उदय के कारणों के अंतर्गत वर्साय की संधि से असंतोष, आर्थिक संकट के दौरान हिटलर की लोकप्रियता बढ़ना जैसे- 1919-23 के बीच आर्थिक अस्थिरता के माहौल में नाजीवादी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ना; पुनः, महामंदी(1929-32) के दौरान नाजीवादी दल को जनसमर्थन बढ़ना; 1932 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना; साम्यवादी विचारधारा का बढ़ताप्रभाव, राजनीतिक दलों की विफलता; वाईमर गणतंत्र की कमजोरी आदि शामिल हैं| हिटलर द्वारा व्यवहार में लाए जाने वाले नाजीवाद और इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के सिद्धांतों में निम्नलिखित समानताएँ थी ---> राष्ट्रवाद के पुनर्जन्म के लिए दोनों ही सिद्धांतों में चरम राष्ट्रवाद पर बल दिया जाता था| अधिनायकवादी सरकार, राज्य की सर्वोच्चता और एकल पार्टी प्रणाली अन्य समान विशेषताएँ थीं| आर्थिक आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय नीति के रूप में प्रयोग किया गया (इससे बेरोजगारी कम करने के उद्देश्य में सहायता प्राप्त होगी) | युद्ध का गुणगान, देश की सैन्य शक्ति के निर्माण पर ध्यान देना और राष्ट्र की महानता के पुनर्निर्माण के लिए युद्ध को एक उपकरण के रूप में प्रयोग करने की धारणा रखना आवश्यक रूप से साम्यवाद विरोधी राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सभी वर्गों के मध्य एकता तथा समाज के अधिकांश वर्गों को कुछ न कुछ आश्वासन जैसे मुद्दों को आधार बनाकर सामाजिक आधार का विस्तार सुव्यवस्थित प्रचार के माध्यम से नेता के व्यक्तित्व को प्रोत्साहित करना मुसोलिनी की तरह हिटलर भी कुशल वक्ता तथा अच्छा संगठनकर्ता - समकालीन परिस्थितियों में दोनों ने एक मजबूत सरकार तथा राष्ट्रीय सम्मान देने का वादा किया| नाजीवाद और फासीवाद में अंतर ---> नाजीवाद की तुलना में फासीवाद को अस्पष्ट कहा जा सकता है क्योंकि नाजीवाद द्वारा स्वीकृत सिद्धांतों में अधिक स्पष्टता है| यहूदियों के प्रति नीति के सम्बन्ध में - इटली का फासीवाद 1938 तक यहूदी विरोधी नहीं था| इसके बाद ही मुसोलिनी ने हिटलर की यहूदी विरोधी नीति को अपनाया था| जर्मनी में नाजीवाद का प्रसार इटली के फासीवाद से अधिक गहरा और व्यापक था| आर्थिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के प्रति जर्मन नाजी व्यवस्था अधिक दक्ष और सफल थी और हिटलर बेरोजगारी को समाप्त करने में सफल रहा था| इसके विपरीत इटली में बेरोजगारी में वृद्धि हुई और यह आर्थिक आत्मनिर्भरता की प्राप्ति में विफल रहा| उत्पीड़न के मामले में नाजी अधिक क्रूर थे और काफी सीमा तक उन्होंने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया था| यहूदियों को व्यवस्थित रूप से मौत के घाट उतारने के लिए हिटलर ने यातना शिविरों की स्थापना की और यहाँ तक कि पोलैंड की गैर-यहूदी जनसंख्या को भी इन यातना शिविरों में भेजा गया| शिविरों में लोगों से अवैतनिक श्रम कराया जाता था और उन्हें भोजन से वंचित रखा जाता था| बहुत लोग भूख से मर गये और बहुतों को जहरीले गैस के कक्षों में भेजा गया| इसके विपरीत इटली में इतने बड़े स्तर पर कोई अत्याचार नहीं हुए| मुसोलिनी चर्च के प्रति अपनी नीति में अधिक सफल रहा| 1929 में राजनीतिक क्षेत्र से हटने के लिए उसने पोप के साथ एक समझौता किया और उसके बदले में उसने पोप को धार्मिक क्षेत्र में स्वतंत्रता दी| दूसरी ओर, हिटलर इस प्रकार की कूटनीति के लिए अधीर था और यह समाज में चर्च का कोई भी प्रभाव नहीं चाहता था| चर्च के प्रति हिटलर ने बहुत ही कठोर नीति का पालन किया और चर्च को दबाने के नाजी प्रयासों में चर्च के कई सदस्यों को मार डाला गया| हिटलर और मुसोलिनी की संवैधानिक स्थितियाँ भी भिन्न थीं| इटली में राजशाही अभी भी अस्तित्व में थी और राजा ने 1943 में मुसोलिनी को बर्खास्त करने का आदेश देकर उसके राज्य का अंत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| इसके विपरीत जर्मनी में हिटलर से ऊँची कोई भी सत्ता नहीं थी जो उसे संवैधानिक रूप से पदच्युत या गिरफ्तार कर सके| उपरोक्त असमानताओं के बावजूद दोनों विचारधाराएँ मुख्यतः फासीवादी मानी जा सकती हैं जिसका परिणाम दुनिया को एक और विभिषक विश्वयुद्ध के रूप में देखने को मिला| दोनों विश्वयुद्धों के बीच इटली, जर्मनी तथा जापान में फासीवादी शक्तियों का उदय हुआ जिसका महत्वपूर्ण कारण पेरिस सम्मलेन तो था ही इसके अलावा, इन राष्ट्रों में लोकतंत्र की जड़ों का कमजोर होना, आर्थिक संकट, साम्यवादी विचारधारा का प्रसार जैसे अन्य कारण भी थें| फासीवादी शक्तियों के द्वारा अपने स्वार्थों के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन, युद्ध का महिमामंडन तथा युद्ध का वातावरण निर्मित किया गया तथा फासीवादी शक्तियों के आक्रामक नीति से ही द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआ त हुई| जैसे - इटली के द्वारा इथोपिया(1935) एवं अल्बानिया(1939) पर आक्रमण; ऑस्ट्रिया का जर्मनी में विलय (1938); चेकोस्लोवाकिया का विलय तथा पोलैंड पर आक्रमण(1939) तथा युद्ध की शुरुआत|
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समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । (150-200 शब्द , अंक-10) Give a brief introduction to the political regionalization of the sea and critically examine its importance. (150-200 words, Marks-10)
दृष्टिकोण: संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इससे संबंधित प्रमुख चुनौतियों की चर्चा कीजिए । कुछ सुझावों के साथ संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : संयुक्त राष्ट्र की समुद्री क़ानून संधि ( UNCLOS) द्वारा वर्ष 1982 में समुद्र का राजनैतिक क्षेत्रीयकरण का कार्य किया गया । वर्ष 1994 में गयाना इस कानून पर हस्ताक्षर करने वाला 60वां देश बना और इसी के साथ यह कानून अंतराष्ट्रीय रूप से प्रभावी हुआ । इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों को चार भागों में बांटा गया जो निम्न हैं : प्रादेशिक जल क्षेत्र: किसी राष्ट्र के तट से 12 समुद्री मील के भीतर का क्षेत्र उस राष्ट्र का प्रादेशिक जल क्षेत्र माना जाता है। इसमें संबंधित राष्ट्र अपने क़ानून बना सकता है । संलग्न क्षेत्र: क्षेत्रीय जल से और 12 समुद्री मील आगे तक (यानि तट से 24 समुद्री मील आगे तक) का क्षेत्र संलग्न क्षेत्र कहलाता है । राष्ट्रों को अधिकार है कि वह चार पहलुओं पर अपने क़ानून लागू कर सकता है - प्रदूषण, कर (लगान), सीमाशुल्क और अप्रवासन। अनन्य आर्थिक क्षेत्र: राष्ट्र के तट अर्थात बेसलाइन से 200 समुद्री मील तक का क्षेत्र अनन्य आर्थिक क्षेत्र कहलाता है । इस क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों पर संबंधित राष्ट्र का अनन्य अधिकार होता है तथापि इस क्षेत्र से विदेशी नौकाएँ और विमान खुली छूट के साथ निकल सकते हैं। साथ ही यहाँ विदेशी राष्ट्रों और कम्पनियों को संचार के साधन लगाने का भी अधिकार होता है। उच्च समुद्र या खुला समुद्र: 200 समुद्री मील से आगे का क्षेत्र उच्च समुद्र या खुला समुद्र कहलाता है । इसमें किसी भी राष्ट्र का कोई निजी अधिकार नहीं होता है । महत्व : इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों में विवाद को कम करने का प्रयास किया गया । अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा व विवाद को कम करने के दृष्टिकोण से भी यह संधि महत्वपूर्ण है । छोटे राष्ट्रों के अधिकार सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण । आर्थिक संसाधनों के दोहन व समुद्री संचार के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण । सीमाएँ: अमेरिका जैसे कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रों द्वारा अब तक इस संधि की पुष्टि नहीं की गयी है । चीन संधि के कई प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन करता है तथापि कोई विशेष अनुशासनात्मक कार्यवाही इसके विरुद्ध नहीं की गयी है । कई राष्ट्रों द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने समुद्री अधिकारों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है , जो भविष्य में विवाद को बढ़ावा देगा । यह भी इस अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी चुनौती है । जलवायु परिवर्तन की बढ़ती समस्या भी इस कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी समस्या है । उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र का कानून एक बेहतर प्रयास होने के बावजूद भी कई सीमाओं से युक्त है । विशेषकर बड़े व शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा या तो इसे मान्यता नहीं प्रदान किया गया है या इसके प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया जाता है । वैश्विक शांति के लिए यह आवश्यक है कि UNCLOS के प्रावधानों का सभी राष्ट्रों द्वारा सम्मान किया जाए ।
##Question:समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । (150-200 शब्द , अंक-10) Give a brief introduction to the political regionalization of the sea and critically examine its importance. (150-200 words, Marks-10)##Answer:दृष्टिकोण: संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इससे संबंधित प्रमुख चुनौतियों की चर्चा कीजिए । कुछ सुझावों के साथ संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : संयुक्त राष्ट्र की समुद्री क़ानून संधि ( UNCLOS) द्वारा वर्ष 1982 में समुद्र का राजनैतिक क्षेत्रीयकरण का कार्य किया गया । वर्ष 1994 में गयाना इस कानून पर हस्ताक्षर करने वाला 60वां देश बना और इसी के साथ यह कानून अंतराष्ट्रीय रूप से प्रभावी हुआ । इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों को चार भागों में बांटा गया जो निम्न हैं : प्रादेशिक जल क्षेत्र: किसी राष्ट्र के तट से 12 समुद्री मील के भीतर का क्षेत्र उस राष्ट्र का प्रादेशिक जल क्षेत्र माना जाता है। इसमें संबंधित राष्ट्र अपने क़ानून बना सकता है । संलग्न क्षेत्र: क्षेत्रीय जल से और 12 समुद्री मील आगे तक (यानि तट से 24 समुद्री मील आगे तक) का क्षेत्र संलग्न क्षेत्र कहलाता है । राष्ट्रों को अधिकार है कि वह चार पहलुओं पर अपने क़ानून लागू कर सकता है - प्रदूषण, कर (लगान), सीमाशुल्क और अप्रवासन। अनन्य आर्थिक क्षेत्र: राष्ट्र के तट अर्थात बेसलाइन से 200 समुद्री मील तक का क्षेत्र अनन्य आर्थिक क्षेत्र कहलाता है । इस क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों पर संबंधित राष्ट्र का अनन्य अधिकार होता है तथापि इस क्षेत्र से विदेशी नौकाएँ और विमान खुली छूट के साथ निकल सकते हैं। साथ ही यहाँ विदेशी राष्ट्रों और कम्पनियों को संचार के साधन लगाने का भी अधिकार होता है। उच्च समुद्र या खुला समुद्र: 200 समुद्री मील से आगे का क्षेत्र उच्च समुद्र या खुला समुद्र कहलाता है । इसमें किसी भी राष्ट्र का कोई निजी अधिकार नहीं होता है । महत्व : इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों में विवाद को कम करने का प्रयास किया गया । अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा व विवाद को कम करने के दृष्टिकोण से भी यह संधि महत्वपूर्ण है । छोटे राष्ट्रों के अधिकार सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण । आर्थिक संसाधनों के दोहन व समुद्री संचार के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण । सीमाएँ: अमेरिका जैसे कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रों द्वारा अब तक इस संधि की पुष्टि नहीं की गयी है । चीन संधि के कई प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन करता है तथापि कोई विशेष अनुशासनात्मक कार्यवाही इसके विरुद्ध नहीं की गयी है । कई राष्ट्रों द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने समुद्री अधिकारों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है , जो भविष्य में विवाद को बढ़ावा देगा । यह भी इस अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी चुनौती है । जलवायु परिवर्तन की बढ़ती समस्या भी इस कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी समस्या है । उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र का कानून एक बेहतर प्रयास होने के बावजूद भी कई सीमाओं से युक्त है । विशेषकर बड़े व शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा या तो इसे मान्यता नहीं प्रदान किया गया है या इसके प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया जाता है । वैश्विक शांति के लिए यह आवश्यक है कि UNCLOS के प्रावधानों का सभी राष्ट्रों द्वारा सम्मान किया जाए ।
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बजटीय नीति एवं इसके विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट करते हुए इसके अंतर्गत शामिल विभिन्न घटकों का उल्लेख कीजिये। (150-200 शब्द) Explain the budgetary policy and its various types, mention the various components covered under it. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में बजटीय नीति के बारे में लिखिए। इसके बाद विभिन्न प्रकारों को लिखिए। अंत में घटकों के अंतर्गत राजस्व-पूंजी प्राप्ति व व्यय के बारे में लिखिए। बजट प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित आय और व्यय का विवरण है। बजटीय नीति के अंतर्गत सरकार के कराधान व व्यय निर्णयों से संबन्धित विस्तृत जानकारी होती है। इसे राजकोषीय नीति भी कहा जाता है। बजटीय नीति के प्रकार: तटस्थ : जब आय और व्यय समान होता है। विस्तारित: जब सरकार का व्यय उसके आय से अधिक होता है संकुचित: जहां आय व्यय से ज्यादा होती है। समान्यतः यह विकसित देशों में पायी जाती है। बजट के विभिन्न घटक:- प्राप्तियां: राजस्व प्राप्तियां: कर राजस्व प्राप्तियां: GST, निगम कर, आयकर,एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी । गैर कर राजस्व प्राप्तियां: PSUs का लाभ, ब्याज प्राप्तियां, आर्थिक सेवाओं से लाभ जैसे रेलवे, डाक दंड/फाइन,दान अनुदान एवं उपहार । पूंजीगत प्राप्तियां: विनिवेश, वाह्य एवं आंतरिक उधारी, परिसंपत्ति, ऋण वसूली, मूलधन की वापसी व्यय : राजस्व व्यय:इसके सामान्तया दीर्घकालिक प्रभाव नहीं होते।ब्याज भुगतान, वेतन एवं पेंशन, प्रतिरक्षा व्यय, प्रशासनिक व्यय,सब्सिडी, कल्याण भुगतान जैसे वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृति इत्यादि।दान, अनुदान एवं उपहार, संपत्ति के रखरखाव पर व्यय इत्यादि । पूंजीगत व्यय: इसमेंपरिसम्पत्ति एवं देनदारियों पर प्रभाव पड़ता है।परिसंपत्तियां:-आधारिक सरंचना पर व्यय,परिसंपत्ति का क्रय, राष्ट्रीयकरण, ऋण प्रदान करना, निवेश ।
##Question:बजटीय नीति एवं इसके विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट करते हुए इसके अंतर्गत शामिल विभिन्न घटकों का उल्लेख कीजिये। (150-200 शब्द) Explain the budgetary policy and its various types, mention the various components covered under it. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में बजटीय नीति के बारे में लिखिए। इसके बाद विभिन्न प्रकारों को लिखिए। अंत में घटकों के अंतर्गत राजस्व-पूंजी प्राप्ति व व्यय के बारे में लिखिए। बजट प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित आय और व्यय का विवरण है। बजटीय नीति के अंतर्गत सरकार के कराधान व व्यय निर्णयों से संबन्धित विस्तृत जानकारी होती है। इसे राजकोषीय नीति भी कहा जाता है। बजटीय नीति के प्रकार: तटस्थ : जब आय और व्यय समान होता है। विस्तारित: जब सरकार का व्यय उसके आय से अधिक होता है संकुचित: जहां आय व्यय से ज्यादा होती है। समान्यतः यह विकसित देशों में पायी जाती है। बजट के विभिन्न घटक:- प्राप्तियां: राजस्व प्राप्तियां: कर राजस्व प्राप्तियां: GST, निगम कर, आयकर,एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी । गैर कर राजस्व प्राप्तियां: PSUs का लाभ, ब्याज प्राप्तियां, आर्थिक सेवाओं से लाभ जैसे रेलवे, डाक दंड/फाइन,दान अनुदान एवं उपहार । पूंजीगत प्राप्तियां: विनिवेश, वाह्य एवं आंतरिक उधारी, परिसंपत्ति, ऋण वसूली, मूलधन की वापसी व्यय : राजस्व व्यय:इसके सामान्तया दीर्घकालिक प्रभाव नहीं होते।ब्याज भुगतान, वेतन एवं पेंशन, प्रतिरक्षा व्यय, प्रशासनिक व्यय,सब्सिडी, कल्याण भुगतान जैसे वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृति इत्यादि।दान, अनुदान एवं उपहार, संपत्ति के रखरखाव पर व्यय इत्यादि । पूंजीगत व्यय: इसमेंपरिसम्पत्ति एवं देनदारियों पर प्रभाव पड़ता है।परिसंपत्तियां:-आधारिक सरंचना पर व्यय,परिसंपत्ति का क्रय, राष्ट्रीयकरण, ऋण प्रदान करना, निवेश ।
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19वीं सदी का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन अपने प्रकृति/स्वरूप में व्यापक अर्थों को समाहित किए हुए था | उपरोक्त कथन का विश्लेषण कीजिए | (150-200 शब्द/10 अंक) The Socio-Religious Reform Movements of the 19th century contained wide meanings in its nature/stance. Analyze the above statement. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- 19वीं सदी के सामाजिक स्थिति का संक्षिप्त परिचय देते हुए एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारणों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के व्यापक प्रकृति/स्वरूप का बिंदुबार उल्लेख कीजिए| सामाजिक सुधार आंदोलनों के योगदान एवं सीमाओं को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- 19वीं सदी में संस्कार तथा धर्म आधारित जटिल वर्ण व्यवस्था एवं जातीय अभिमान ने भारतीय समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में बाँट रखा था| टु कड़ों में बंटे होने से समाज निष्क्रिय तथा शक्तिहीन हो चुका था| इसके अतिरिक्त कई अन्य प्रकार के सामाजिक नियंत्रण, अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, अंध नियतिवाद, छुआछूत जैसे कारणों से समाज जड़ बन चुका था| महिलाओं में सती-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या शिशु हत्या, विधवा पुनर्विवाह का वर्जित होना आदि चिंताजनक समस्याएं विद्यमान थीं| इसी संदर्भ में 19वीं सदी में सामाजिक तथा धार्मिक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ| इसके प्रसार के मुख्य कारणों में आधुनिक पश्चिमी विचारों तथा शिक्षा का प्रभाव, मध्यम वर्ग में बौद्धिक जाग्रति का उदय, औपनिवेशिक शासन तथा ईसाई मिशनरियों का प्रभाव; संचार तथा यातायात साधनों का बढ़ना जैसे कारक शामिल किए जा सकते हैं| ये सुधार आंदोलन बंगाल से प्रारंभ होकर पूरे देश में फ़ैल गए तथा भारतीय राष्ट्रवाद की आरंभिक पृष्ठभूमि को तैयार करने में इसने एक अहम् भूमिका निभाई| 19वीं सदीके सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की प्रकृति/स्वरूप 19वीं सदी में भारतीय सुधारकों के द्वारा समाज एवं धर्म के क्षेत्र में सुधार की दिशा में किए गए प्रयास भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है| क्षेत्र एवं काल की भिन्नताओं के बावजूद सभी धर्मों में सुधार के लिए कदम उठाए गएँ हैं| जैसे- बंगाल में राजा राम मोहन राय तथा ब्रह्म समाज , यंग बंगाल आंदोलन, ईश्वर चंद्र विद्यासागर; उत्तर भारत में दयानंद सरस्वती तथा आर्य समाज; रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद; पश्चिमी भारत में एम.जी.रानाडे तथा प्रार्थना समाज ; थियोसोफिकल सोसाइटी; मुस्लिम सुधार आंदोलन - वहाबी, अहमदिया, अलीगढ़ आंदोलन, देवबंद; सिख सुधार आंदोलन- कूका, निरंकारी, सिंह सभा, अकाली; पारसी सुधार आंदोलन; ज्योतिबा फूले तथा सत्यशोधक समाज; नारायण गुरू; जस्टिस आंदोलन; आत्मसम्मान आंदोलन; आदि| सुधार आंदोलन की मुख्यतः दो धाराएँ थीं- सुधारवादी/संश्लेषणवादी तथापुनरुत्थानवादी ; प्रायः सभी सुधारकों का लक्ष्य सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों को दूर कर एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था और अंततः एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का आधार तैयार करके अप्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय चेतना का प्रसार तथा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जागरूकता इत्यादि क़दमों को प्रोत्साहन देना था| सुधारकों ने मुख्यतः सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में सुधारों पर बल दिया| सामाजिक क्षेत्र में भी जाति-प्रथा, महिलाओं से संबंधित कुरूतियों तथा शिक्षा पर सर्वाधिक बल था| धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म जैसे मुद्दों से अधिक पुरोहितवाद, कर्मकांडों इत्यादि को निशाना बनाया गया| धर्म को इसलिए भी महत्व दिया गया क्योंकि सामाजिक कुरूतियों से इसका गहरा संबंध था| धार्मिक सार्वभौमवादतथातर्कबुद्धिवा दसुधार आंदोलन की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं थीं| सुधारकों ने संगठित तरीके से इन समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठायी तथा इसके लिए विभिन्न संगठनों की स्थापना की गयी| लक्ष्य, कार्यक्रम, कार्यप्रणाली इत्यादि का निर्धारण भी किया गया| सुधारकों ने लोकतांत्रिक शैली को महत्व दिया जैसे- लोगों को जागरूक करना, शास्त्रार्थ करना, प्रेस का उपयोग, सरकार से कानूनों के लिए आग्रह, समाजसेवा इत्यादि| सुधार आंदोलनों का प्रसार मुख्यतः शहरों में देखा गया लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर| आर्य समाज जैसे आंदोलन का प्रभाव व्यापक तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भी महसूस किया गया| सुधारकों की पृष्ठभूमि मुख्यतः मध्यवर्गीय एवं शहरी थी लेकिन इन्होने जो मुद्दे उठायें उसका संबंध समाज के सभी वर्गों से था मुख्यतः वंचित एवं कमजोर वर्गों से| 19वीं सदी के उतरार्ध में सुधार आंदोलनों की प्रकृति में बदलाव हुआ और सीधे तौर पर राष्ट्रीय चेतना से जुड़ने लगा एवं अंतिम दशक तक इन मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन जैसे प्रयास भी प्रारंभ हुए| इन आंदोलनों ने सही अर्थों में आधुनिक भारत की बुनियाद रखी| समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, पंथनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण जैसे विचारों को आधार बनाकर सुधारों की ओर कदम उठाएं|यही विचार राष्ट्रीय आंदोलन तथा आधुनिक भारत की बुनियाद हैं| सुधार आंदोलनों का महत्व- सामाजिक जड़ता को समाप्त कर प्रगति का संदेश; आधुनिक शिक्षा का प्रसार; आधुनिक विचारों का प्रसार; महिला मुक्ति के दृष्टिकोण से; धार्मिक क्षेत्र में- धर्म का सरलीकरण; धार्मिक सहिष्णुता; राजनीतिक क्षेत्र में-लोकतांत्रिक मूल्यों एवं शैली का प्रसार; राष्ट्रीय चेतना पर भी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभाव जैसे- आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों के साथ-साथ राजनीतिक नीतियों की भी आलोचना प्रारंभ हुयी| सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण ने स्वदेशी एवं स्वराज की भावनाओं को मजबूत किया| सुधारों के लिए प्रेस का उपयोग किया गया और राजनीतिक चेतना का यह सबसे महत्वपूर्ण हथियार बना| 19वीं सदी के अंतिम दशकों में दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने लोगों में उत्साह का संचार किया और कांग्रेस के गरमदलीय नेताओं पर इसका प्रभाव भी दिखा| दादाभाई नौरोजी, एमजी रानाडे जैसे सुधारकों ने समाज सुधार के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रीय तौर पर भाग लिया| इन सुधारकों ने प्रत्येक प्रकार की असमानता पर प्रहार कर ना केवल सामाजिक एकता को मजबूत किया बल्कि राष्ट्रवाद का आधार भी तैयार किया| हालाँकि संकीर्ण सामाजिक आधार; आंदोलन को ग्रामीण भारत तक नहीं पहुंचा पाना जैसी सीमाओं से जातिवाद, सांप्रदायिकताएवं सामाजिक भेदभाव जैसी कुरूतियों का पूर्ण सफाया नहीं हो पाया|
##Question:19वीं सदी का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन अपने प्रकृति/स्वरूप में व्यापक अर्थों को समाहित किए हुए था | उपरोक्त कथन का विश्लेषण कीजिए | (150-200 शब्द/10 अंक) The Socio-Religious Reform Movements of the 19th century contained wide meanings in its nature/stance. Analyze the above statement. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- 19वीं सदी के सामाजिक स्थिति का संक्षिप्त परिचय देते हुए एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारणों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के व्यापक प्रकृति/स्वरूप का बिंदुबार उल्लेख कीजिए| सामाजिक सुधार आंदोलनों के योगदान एवं सीमाओं को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- 19वीं सदी में संस्कार तथा धर्म आधारित जटिल वर्ण व्यवस्था एवं जातीय अभिमान ने भारतीय समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में बाँट रखा था| टु कड़ों में बंटे होने से समाज निष्क्रिय तथा शक्तिहीन हो चुका था| इसके अतिरिक्त कई अन्य प्रकार के सामाजिक नियंत्रण, अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, अंध नियतिवाद, छुआछूत जैसे कारणों से समाज जड़ बन चुका था| महिलाओं में सती-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या शिशु हत्या, विधवा पुनर्विवाह का वर्जित होना आदि चिंताजनक समस्याएं विद्यमान थीं| इसी संदर्भ में 19वीं सदी में सामाजिक तथा धार्मिक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ| इसके प्रसार के मुख्य कारणों में आधुनिक पश्चिमी विचारों तथा शिक्षा का प्रभाव, मध्यम वर्ग में बौद्धिक जाग्रति का उदय, औपनिवेशिक शासन तथा ईसाई मिशनरियों का प्रभाव; संचार तथा यातायात साधनों का बढ़ना जैसे कारक शामिल किए जा सकते हैं| ये सुधार आंदोलन बंगाल से प्रारंभ होकर पूरे देश में फ़ैल गए तथा भारतीय राष्ट्रवाद की आरंभिक पृष्ठभूमि को तैयार करने में इसने एक अहम् भूमिका निभाई| 19वीं सदीके सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की प्रकृति/स्वरूप 19वीं सदी में भारतीय सुधारकों के द्वारा समाज एवं धर्म के क्षेत्र में सुधार की दिशा में किए गए प्रयास भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है| क्षेत्र एवं काल की भिन्नताओं के बावजूद सभी धर्मों में सुधार के लिए कदम उठाए गएँ हैं| जैसे- बंगाल में राजा राम मोहन राय तथा ब्रह्म समाज , यंग बंगाल आंदोलन, ईश्वर चंद्र विद्यासागर; उत्तर भारत में दयानंद सरस्वती तथा आर्य समाज; रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद; पश्चिमी भारत में एम.जी.रानाडे तथा प्रार्थना समाज ; थियोसोफिकल सोसाइटी; मुस्लिम सुधार आंदोलन - वहाबी, अहमदिया, अलीगढ़ आंदोलन, देवबंद; सिख सुधार आंदोलन- कूका, निरंकारी, सिंह सभा, अकाली; पारसी सुधार आंदोलन; ज्योतिबा फूले तथा सत्यशोधक समाज; नारायण गुरू; जस्टिस आंदोलन; आत्मसम्मान आंदोलन; आदि| सुधार आंदोलन की मुख्यतः दो धाराएँ थीं- सुधारवादी/संश्लेषणवादी तथापुनरुत्थानवादी ; प्रायः सभी सुधारकों का लक्ष्य सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों को दूर कर एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था और अंततः एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का आधार तैयार करके अप्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय चेतना का प्रसार तथा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जागरूकता इत्यादि क़दमों को प्रोत्साहन देना था| सुधारकों ने मुख्यतः सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में सुधारों पर बल दिया| सामाजिक क्षेत्र में भी जाति-प्रथा, महिलाओं से संबंधित कुरूतियों तथा शिक्षा पर सर्वाधिक बल था| धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म जैसे मुद्दों से अधिक पुरोहितवाद, कर्मकांडों इत्यादि को निशाना बनाया गया| धर्म को इसलिए भी महत्व दिया गया क्योंकि सामाजिक कुरूतियों से इसका गहरा संबंध था| धार्मिक सार्वभौमवादतथातर्कबुद्धिवा दसुधार आंदोलन की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं थीं| सुधारकों ने संगठित तरीके से इन समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठायी तथा इसके लिए विभिन्न संगठनों की स्थापना की गयी| लक्ष्य, कार्यक्रम, कार्यप्रणाली इत्यादि का निर्धारण भी किया गया| सुधारकों ने लोकतांत्रिक शैली को महत्व दिया जैसे- लोगों को जागरूक करना, शास्त्रार्थ करना, प्रेस का उपयोग, सरकार से कानूनों के लिए आग्रह, समाजसेवा इत्यादि| सुधार आंदोलनों का प्रसार मुख्यतः शहरों में देखा गया लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर| आर्य समाज जैसे आंदोलन का प्रभाव व्यापक तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भी महसूस किया गया| सुधारकों की पृष्ठभूमि मुख्यतः मध्यवर्गीय एवं शहरी थी लेकिन इन्होने जो मुद्दे उठायें उसका संबंध समाज के सभी वर्गों से था मुख्यतः वंचित एवं कमजोर वर्गों से| 19वीं सदी के उतरार्ध में सुधार आंदोलनों की प्रकृति में बदलाव हुआ और सीधे तौर पर राष्ट्रीय चेतना से जुड़ने लगा एवं अंतिम दशक तक इन मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन जैसे प्रयास भी प्रारंभ हुए| इन आंदोलनों ने सही अर्थों में आधुनिक भारत की बुनियाद रखी| समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, पंथनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण जैसे विचारों को आधार बनाकर सुधारों की ओर कदम उठाएं|यही विचार राष्ट्रीय आंदोलन तथा आधुनिक भारत की बुनियाद हैं| सुधार आंदोलनों का महत्व- सामाजिक जड़ता को समाप्त कर प्रगति का संदेश; आधुनिक शिक्षा का प्रसार; आधुनिक विचारों का प्रसार; महिला मुक्ति के दृष्टिकोण से; धार्मिक क्षेत्र में- धर्म का सरलीकरण; धार्मिक सहिष्णुता; राजनीतिक क्षेत्र में-लोकतांत्रिक मूल्यों एवं शैली का प्रसार; राष्ट्रीय चेतना पर भी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभाव जैसे- आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों के साथ-साथ राजनीतिक नीतियों की भी आलोचना प्रारंभ हुयी| सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण ने स्वदेशी एवं स्वराज की भावनाओं को मजबूत किया| सुधारों के लिए प्रेस का उपयोग किया गया और राजनीतिक चेतना का यह सबसे महत्वपूर्ण हथियार बना| 19वीं सदी के अंतिम दशकों में दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने लोगों में उत्साह का संचार किया और कांग्रेस के गरमदलीय नेताओं पर इसका प्रभाव भी दिखा| दादाभाई नौरोजी, एमजी रानाडे जैसे सुधारकों ने समाज सुधार के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रीय तौर पर भाग लिया| इन सुधारकों ने प्रत्येक प्रकार की असमानता पर प्रहार कर ना केवल सामाजिक एकता को मजबूत किया बल्कि राष्ट्रवाद का आधार भी तैयार किया| हालाँकि संकीर्ण सामाजिक आधार; आंदोलन को ग्रामीण भारत तक नहीं पहुंचा पाना जैसी सीमाओं से जातिवाद, सांप्रदायिकताएवं सामाजिक भेदभाव जैसी कुरूतियों का पूर्ण सफाया नहीं हो पाया|
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मानसून से आप क्या समझते हैं? मानसून के सन्दर्भ में दी गयी प्रमुख व्याख्याओं का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by monsoon? Describe the major explanations given in the context of monsoon. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मानसून को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में मानसून के सन्दर्भ में दी गयी व्याख्याओं का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में व्याख्याओं की सीमा बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मानसून एक कालिक पवन है जो मौसम के अनुरूप अपनी दिशा परिवर्तित करती है|सर्दी में यह स्थल से समुद्र की ओर चलती है, इस समय इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है, इसको लौटता/शीतकालीन मानसून कहते हैं| गर्मी में यह समुद्र से स्थल की ओर(तटवर्ती) चलती है इस समय इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर होती है, इसे ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं, मूलतः इसे ही मानसून के रूप में जाना जाता है|सर्दियों में चलने वाली यह पवन सामान्य व्यापारिक पवन है लेकिनगर्मी में चलने वाली मानसूनी पवन, अक्षांशीय विस्तार के दृष्टिकोण से असामान्य है| विभिन्न विद्वानों के द्वारा मानसून के अभियांत्रिकी को व्याख्यायित करने का प्रयास किया गया है| अरब विद्वानों की व्याख्या · अरब विद्वानों का मानना है कि यह तापमान में परिवर्तन के कारण विकसित पवन तंत्र है · अरबी विद्वानों के अनुसार मानसून को स्थलीय और जलीय समीर का वृहत रूप माना जा सकता है · ग्रीष्म काल में जब भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी पश्चिमी भाग में अधिक तापमान के कारण निम्न वायुदाब का निर्माण होता है तो सागर के ऊपर निर्मित उच्च वायुदाब से पवन इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर चलने लगती है और तटवर्ती होने के कारण वर्षा कराती है · इसके विपरीत शीत काल में दाब तंत्र के स्थानान्तरण के कारण पवन, स्थल से समुद्र की ओर चलती है जो सुदूरवर्ती होने के कारण वर्षा की संभावना को कम कर देती है| · इस प्रकार सेग्रीष्म कालीन समीर और शीत कालीन समीर में हम जलीय समीर तथा स्थल समीर का एक रूप देखते हैं| हेडली की व्याख्या · इस व्याख्या के द्वारा सर्वप्रथम मानसून तंत्र को वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचलन का भाग माना गया · इस व्याख्या के अनुसार मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के परिणाम है · जब उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्मकाल का आरम्भ होता है तब ITCZ(विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी ) उत्तर की ओर खिसकती है · विश्व में प्रत्येक स्थान पर ये विस्थापन सामान्य होता है जो लगभग 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक पहुचता है जबकि हिन्द महासागर के ऊपर ये 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक पहुच जाता है · इसका कारण भारतीय उपमहाद्वीप की अवस्थिति है जो न तो विषुवत रेखा के बहुत निकट है और न ही बहुत दूर है · ITCZ के विस्थापन के साथ ही प्रचलित पवन का गंतव्य स्थान भी बदलता है · ITCZ व्यापारिक पवन का अभिसरण क्षेत्र है, इस विस्थापन के साथ दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवन विषुवत रेखा को पार को करते हुए अपने नए गंतव्य स्थान पर पहुचती है · अधिकतम दूरी के कारण हिन्द महासागर में कोरियालिस बल का इस पवन पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है जिसके परिणाम स्वरुप उत्तरी हिन्द महासागर में ये दाहिने मुड़ते हुए दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में चलने लगती हैइसे ही दक्षिण पश्चिमी मानसून कहते हैं · शीत काल के समय में ITCZ धीरे धीरे विषुवत रेखा की ओर खिसकते हुए दक्षिणी भाग में चला जाता है और उत्तरी गोलार्ध की सामान्य व्यापारिक पवन पुनः स्थापित हो जाती है जिसे हम उत्तरी पूरी मानसून अथवा लौटता हुआ मानसून या शीतकालीन मानसून कहते हैं · इस व्याख्या के अनुसार मानसून तंत्र व्यापारिक पवन का ही एक बदला हुआ रूप है अर्थात उत्तरी पूर्वी मानसून उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवन है जबकि दक्षिणी पश्चिमी मानसून, दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन है · इस प्रकार यह व्याख्या मानसून को निश्चित वैश्विक परिसंचलन का एक भाग बना देता है यहाँ यह स्पष्ट होता है कि उपरोक्त दोनों व्याख्याओं द्वारा तापमान में परिवर्तन को मानसून का प्रमुख कारण माना गया है| किन्तु उपरोक्त दोनों व्याख्याओं की सीमा यह है कि यदि तापमान में परिवर्तन निश्चित है तो मानसून(परिणाम) में इतनी अधिक अनिश्चितता नहीं हो सकती हैजबकि व्यावहारिक रूप से मानसून में अनिश्चितता देखी जाती है| इसके साथ ही उपरोक्त दोनों व्याख्याएं केवल धरातलीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या ही करते हैं इन व्याख्याओं में वायुमंडलीय परिवर्तनों पर ध्यान नहीं दिया गया है|
##Question:मानसून से आप क्या समझते हैं? मानसून के सन्दर्भ में दी गयी प्रमुख व्याख्याओं का वर्णन कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by monsoon? Describe the major explanations given in the context of monsoon. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मानसून को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में मानसून के सन्दर्भ में दी गयी व्याख्याओं का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में व्याख्याओं की सीमा बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मानसून एक कालिक पवन है जो मौसम के अनुरूप अपनी दिशा परिवर्तित करती है|सर्दी में यह स्थल से समुद्र की ओर चलती है, इस समय इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है, इसको लौटता/शीतकालीन मानसून कहते हैं| गर्मी में यह समुद्र से स्थल की ओर(तटवर्ती) चलती है इस समय इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर होती है, इसे ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं, मूलतः इसे ही मानसून के रूप में जाना जाता है|सर्दियों में चलने वाली यह पवन सामान्य व्यापारिक पवन है लेकिनगर्मी में चलने वाली मानसूनी पवन, अक्षांशीय विस्तार के दृष्टिकोण से असामान्य है| विभिन्न विद्वानों के द्वारा मानसून के अभियांत्रिकी को व्याख्यायित करने का प्रयास किया गया है| अरब विद्वानों की व्याख्या · अरब विद्वानों का मानना है कि यह तापमान में परिवर्तन के कारण विकसित पवन तंत्र है · अरबी विद्वानों के अनुसार मानसून को स्थलीय और जलीय समीर का वृहत रूप माना जा सकता है · ग्रीष्म काल में जब भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी पश्चिमी भाग में अधिक तापमान के कारण निम्न वायुदाब का निर्माण होता है तो सागर के ऊपर निर्मित उच्च वायुदाब से पवन इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर चलने लगती है और तटवर्ती होने के कारण वर्षा कराती है · इसके विपरीत शीत काल में दाब तंत्र के स्थानान्तरण के कारण पवन, स्थल से समुद्र की ओर चलती है जो सुदूरवर्ती होने के कारण वर्षा की संभावना को कम कर देती है| · इस प्रकार सेग्रीष्म कालीन समीर और शीत कालीन समीर में हम जलीय समीर तथा स्थल समीर का एक रूप देखते हैं| हेडली की व्याख्या · इस व्याख्या के द्वारा सर्वप्रथम मानसून तंत्र को वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचलन का भाग माना गया · इस व्याख्या के अनुसार मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के परिणाम है · जब उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्मकाल का आरम्भ होता है तब ITCZ(विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी ) उत्तर की ओर खिसकती है · विश्व में प्रत्येक स्थान पर ये विस्थापन सामान्य होता है जो लगभग 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक पहुचता है जबकि हिन्द महासागर के ऊपर ये 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक पहुच जाता है · इसका कारण भारतीय उपमहाद्वीप की अवस्थिति है जो न तो विषुवत रेखा के बहुत निकट है और न ही बहुत दूर है · ITCZ के विस्थापन के साथ ही प्रचलित पवन का गंतव्य स्थान भी बदलता है · ITCZ व्यापारिक पवन का अभिसरण क्षेत्र है, इस विस्थापन के साथ दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवन विषुवत रेखा को पार को करते हुए अपने नए गंतव्य स्थान पर पहुचती है · अधिकतम दूरी के कारण हिन्द महासागर में कोरियालिस बल का इस पवन पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है जिसके परिणाम स्वरुप उत्तरी हिन्द महासागर में ये दाहिने मुड़ते हुए दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में चलने लगती हैइसे ही दक्षिण पश्चिमी मानसून कहते हैं · शीत काल के समय में ITCZ धीरे धीरे विषुवत रेखा की ओर खिसकते हुए दक्षिणी भाग में चला जाता है और उत्तरी गोलार्ध की सामान्य व्यापारिक पवन पुनः स्थापित हो जाती है जिसे हम उत्तरी पूरी मानसून अथवा लौटता हुआ मानसून या शीतकालीन मानसून कहते हैं · इस व्याख्या के अनुसार मानसून तंत्र व्यापारिक पवन का ही एक बदला हुआ रूप है अर्थात उत्तरी पूर्वी मानसून उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवन है जबकि दक्षिणी पश्चिमी मानसून, दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन है · इस प्रकार यह व्याख्या मानसून को निश्चित वैश्विक परिसंचलन का एक भाग बना देता है यहाँ यह स्पष्ट होता है कि उपरोक्त दोनों व्याख्याओं द्वारा तापमान में परिवर्तन को मानसून का प्रमुख कारण माना गया है| किन्तु उपरोक्त दोनों व्याख्याओं की सीमा यह है कि यदि तापमान में परिवर्तन निश्चित है तो मानसून(परिणाम) में इतनी अधिक अनिश्चितता नहीं हो सकती हैजबकि व्यावहारिक रूप से मानसून में अनिश्चितता देखी जाती है| इसके साथ ही उपरोक्त दोनों व्याख्याएं केवल धरातलीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या ही करते हैं इन व्याख्याओं में वायुमंडलीय परिवर्तनों पर ध्यान नहीं दिया गया है|
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19वीं सदी का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन अपने प्रकृति/स्वरूप में व्यापक अर्थों को समाहित किए हुए था| उपरोक्त कथन का विश्लेषण कीजिए| (150-200 शब्द) The Socio-Religious Reform Movements of the 19th century contained wide meanings in its nature/stance. Analyze the above statement. (150-200 words)
एप्रोच- 19वीं सदी के सामाजिक स्थिति का संक्षिप्त परिचय देते हुए एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारणों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के व्यापक प्रकृति/स्वरूप का बिंदुबार उल्लेख कीजिए| सामाजिक सुधार आंदोलनों के योगदान एवं सीमाओं को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- 19वीं सदी में संस्कार तथा धर्म आधारित जटिल वर्ण व्यवस्था एवं जातीय अभिमान ने भारतीय समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में बाँट रखा था| टुकड़ों में बंटे होने से समाज निष्क्रिय तथा शक्तिहीन हो चुका था| इसके अतिरिक्त कई अन्य प्रकार के सामाजिक नियंत्रण, अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, अंध नियतिवाद, छुआछूत जैसे कारणों से समाज जड़ बन चुका था| महिलाओं में सती-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या शिशु हत्या, विधवा पुनर्विवाह का वर्जित होना आदि चिंताजनक समस्याएं विद्यमान थीं| इसी संदर्भ में 19वीं सदी में सामाजिक तथा धार्मिक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ| इसके प्रसार के मुख्य कारणों में आधुनिक पश्चिमी विचारों तथा शिक्षा का प्रभाव, मध्यम वर्ग में बौद्धिक जाग्रति का उदय, औपनिवेशिक शासन तथा ईसाई मिशनरियों का प्रभाव; संचार तथा यातायात साधनों का बढ़ना जैसे कारक शामिल किए जा सकते हैं| ये सुधार आंदोलन बंगाल से प्रारंभ होकर पूरे देश में फ़ैल गए तथा भारतीय राष्ट्रवाद की आरंभिक पृष्ठभूमि को तैयार करने में इसने एक अहम् भूमिका निभाई| 19वीं सदीके सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की प्रकृति/स्वरूप- 19वीं सदी में भारतीय सुधारकों के द्वारा समाज एवं धर्म के क्षेत्र में सुधार की दिशा में किए गए प्रयास भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है| क्षेत्र एवं काल की भिन्नताओं के बावजूद सभी धर्मों में सुधार के लिए कदम उठाए गएँ हैं| जैसे- बंगाल में राजा राम मोहन राय तथा ब्रह्म समाज , यंग बंगाल आंदोलन, ईश्वर चंद्र विद्यासागर; उत्तर भारत में दयानंद सरस्वती तथा आर्य समाज; रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद; पश्चिमी भारत में एम.जी.रानाडे तथा प्रार्थना समाज ; थियोसोफिकल सोसाइटी; मुस्लिम सुधार आंदोलन - वहाबी, अहमदिया, अलीगढ़ आंदोलन, देवबंद; सिख सुधार आंदोलन -कूका, निरंकारी, सिंह सभा, अकाली; पारसी सुधार आंदोलन; ज्योतिबा फूले तथा सत्यशोधक समाज ;नारायण गुरू; जस्टिस आंदोलन; आत्मसम्मान आंदोलन; आदि| सुधार आंदोलन की मुख्यतः दो धाराएँ थीं- सुधारवादी/संश्लेषणवादी तथापुनरुत्थानवादी ; प्रायः सभी सुधारकों का लक्ष्य सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों को दूर कर एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था और अंततः एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का आधार तैयार करके अप्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय चेतना का प्रसार तथा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जागरूकता इत्यादि क़दमों को प्रोत्साहन देना था| सुधारकों ने मुख्यतः सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में सुधारों पर बल दिया| सामाजिक क्षेत्र में भी जाति-प्रथा, महिलाओं से संबंधित कुरूतियों तथा शिक्षा पर सर्वाधिक बल था| धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म जैसे मुद्दों से अधिक पुरोहितवाद, कर्मकांडों इत्यादि को निशाना बनाया गया| धर्म को इसलिए भी महत्व दिया गया क्योंकि सामाजिक कुरूतियों से इसका गहरा संबंध था| धार्मिक सार्वभौमवादतथातर्कबुद्धिवाद सुधार आंदोलन की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं थीं| सुधारकों ने संगठित तरीके से इन समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठायी तथा इसके लिए विभिन्न संगठनों की स्थापना की गयी| लक्ष्य, कार्यक्रम, कार्यप्रणाली इत्यादि का निर्धारण भी किया गया| सुधारकों ने लोकतांत्रिक शैली को महत्व दिया जैसे- लोगों को जागरूक करना, शास्त्रार्थ करना, प्रेस का उपयोग, सरकार से कानूनों के लिए आग्रह, समाजसेवा इत्यादि| सुधार आंदोलनों का प्रसार मुख्यतः शहरों में देखा गया लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर| आर्य समाज जैसे आंदोलन का प्रभाव व्यापक तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भी महसूस किया गया| सुधारकों की पृष्ठभूमि मुख्यतः मध्यवर्गीय एवं शहरी थी लेकिन इन्होने जो मुद्दे उठायें उसका संबंध समाज के सभी वर्गों से था मुख्यतः वंचित एवं कमजोर वर्गों से| 19वीं सदी के उतरार्ध में सुधार आंदोलनों की प्रकृति में बदलाव हुआ और सीधे तौर परराष्ट्रीय चेतना से जुड़ने लगा एवं अंतिम दशक तक इन मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन जैसे प्रयास भी प्रारंभ हुए| इन आंदोलनों ने सही अर्थों में आधुनिक भारत की बुनियाद रखी| समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, पंथनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण जैसे विचारों को आधार बनाकर सुधारों की ओर कदम उठाएं|यही विचार राष्ट्रीय आंदोलन तथा आधुनिक भारत की बुनियाद हैं| सुधार आंदोलनों का महत्व- सामाजिक जड़ता को समाप्त कर प्रगति का संदेश; आधुनिक शिक्षा का प्रसार; आधुनिक विचारों का प्रसार; महिला मुक्ति के दृष्टिकोण से; धार्मिक क्षेत्र में- धर्म का सरलीकरण; धार्मिक सहिष्णुता; राजनीतिक क्षेत्र में-लोकतांत्रिक मूल्यों एवं शैली का प्रसार; राष्ट्रीय चेतना पर भी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभाव जैसे- आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों के साथ-साथ राजनीतिक नीतियों की भी आलोचना प्रारंभ हुयी| सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण ने स्वदेशी एवं स्वराज की भावनाओं को मजबूत किया| सुधारों के लिए प्रेस का उपयोग किया गया और राजनीतिक चेतना का यह सबसे महत्वपूर्ण हथियार बना| 19वीं सदी के अंतिम दशकों में दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने लोगों में उत्साह का संचार किया और कांग्रेस के गरमदलीय नेताओं पर इसका प्रभाव भी दिखा| दादाभाई नौरोजी, एमजी रानाडे जैसे सुधारकों ने समाज सुधार के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रीय तौर पर भाग लिया| इन सुधारकों ने प्रत्येक प्रकार की असमानता पर प्रहार कर ना केवल सामाजिक एकता को मजबूत किया बल्कि राष्ट्रवाद का आधार भी तैयार किया| हालाँकि संकीर्ण सामाजिक आधार; आंदोलन को ग्रामीण भारत तक नहीं पहुंचा पाना जैसी सीमाओं से जातिवाद, सांप्रदायिकताएवं सामाजिक भेदभाव जैसी कुरूतियों का पूर्ण सफाया नहीं हो पाया|
##Question:19वीं सदी का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन अपने प्रकृति/स्वरूप में व्यापक अर्थों को समाहित किए हुए था| उपरोक्त कथन का विश्लेषण कीजिए| (150-200 शब्द) The Socio-Religious Reform Movements of the 19th century contained wide meanings in its nature/stance. Analyze the above statement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- 19वीं सदी के सामाजिक स्थिति का संक्षिप्त परिचय देते हुए एवं सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के उदय के कारणों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के व्यापक प्रकृति/स्वरूप का बिंदुबार उल्लेख कीजिए| सामाजिक सुधार आंदोलनों के योगदान एवं सीमाओं को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- 19वीं सदी में संस्कार तथा धर्म आधारित जटिल वर्ण व्यवस्था एवं जातीय अभिमान ने भारतीय समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में बाँट रखा था| टुकड़ों में बंटे होने से समाज निष्क्रिय तथा शक्तिहीन हो चुका था| इसके अतिरिक्त कई अन्य प्रकार के सामाजिक नियंत्रण, अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, अंध नियतिवाद, छुआछूत जैसे कारणों से समाज जड़ बन चुका था| महिलाओं में सती-प्रथा, बाल-विवाह, कन्या शिशु हत्या, विधवा पुनर्विवाह का वर्जित होना आदि चिंताजनक समस्याएं विद्यमान थीं| इसी संदर्भ में 19वीं सदी में सामाजिक तथा धार्मिक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ| इसके प्रसार के मुख्य कारणों में आधुनिक पश्चिमी विचारों तथा शिक्षा का प्रभाव, मध्यम वर्ग में बौद्धिक जाग्रति का उदय, औपनिवेशिक शासन तथा ईसाई मिशनरियों का प्रभाव; संचार तथा यातायात साधनों का बढ़ना जैसे कारक शामिल किए जा सकते हैं| ये सुधार आंदोलन बंगाल से प्रारंभ होकर पूरे देश में फ़ैल गए तथा भारतीय राष्ट्रवाद की आरंभिक पृष्ठभूमि को तैयार करने में इसने एक अहम् भूमिका निभाई| 19वीं सदीके सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की प्रकृति/स्वरूप- 19वीं सदी में भारतीय सुधारकों के द्वारा समाज एवं धर्म के क्षेत्र में सुधार की दिशा में किए गए प्रयास भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है| क्षेत्र एवं काल की भिन्नताओं के बावजूद सभी धर्मों में सुधार के लिए कदम उठाए गएँ हैं| जैसे- बंगाल में राजा राम मोहन राय तथा ब्रह्म समाज , यंग बंगाल आंदोलन, ईश्वर चंद्र विद्यासागर; उत्तर भारत में दयानंद सरस्वती तथा आर्य समाज; रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद; पश्चिमी भारत में एम.जी.रानाडे तथा प्रार्थना समाज ; थियोसोफिकल सोसाइटी; मुस्लिम सुधार आंदोलन - वहाबी, अहमदिया, अलीगढ़ आंदोलन, देवबंद; सिख सुधार आंदोलन -कूका, निरंकारी, सिंह सभा, अकाली; पारसी सुधार आंदोलन; ज्योतिबा फूले तथा सत्यशोधक समाज ;नारायण गुरू; जस्टिस आंदोलन; आत्मसम्मान आंदोलन; आदि| सुधार आंदोलन की मुख्यतः दो धाराएँ थीं- सुधारवादी/संश्लेषणवादी तथापुनरुत्थानवादी ; प्रायः सभी सुधारकों का लक्ष्य सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों को दूर कर एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था और अंततः एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का आधार तैयार करके अप्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय चेतना का प्रसार तथा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जागरूकता इत्यादि क़दमों को प्रोत्साहन देना था| सुधारकों ने मुख्यतः सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में सुधारों पर बल दिया| सामाजिक क्षेत्र में भी जाति-प्रथा, महिलाओं से संबंधित कुरूतियों तथा शिक्षा पर सर्वाधिक बल था| धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म जैसे मुद्दों से अधिक पुरोहितवाद, कर्मकांडों इत्यादि को निशाना बनाया गया| धर्म को इसलिए भी महत्व दिया गया क्योंकि सामाजिक कुरूतियों से इसका गहरा संबंध था| धार्मिक सार्वभौमवादतथातर्कबुद्धिवाद सुधार आंदोलन की दो महत्वपूर्ण विशेषताएं थीं| सुधारकों ने संगठित तरीके से इन समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठायी तथा इसके लिए विभिन्न संगठनों की स्थापना की गयी| लक्ष्य, कार्यक्रम, कार्यप्रणाली इत्यादि का निर्धारण भी किया गया| सुधारकों ने लोकतांत्रिक शैली को महत्व दिया जैसे- लोगों को जागरूक करना, शास्त्रार्थ करना, प्रेस का उपयोग, सरकार से कानूनों के लिए आग्रह, समाजसेवा इत्यादि| सुधार आंदोलनों का प्रसार मुख्यतः शहरों में देखा गया लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर| आर्य समाज जैसे आंदोलन का प्रभाव व्यापक तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भी महसूस किया गया| सुधारकों की पृष्ठभूमि मुख्यतः मध्यवर्गीय एवं शहरी थी लेकिन इन्होने जो मुद्दे उठायें उसका संबंध समाज के सभी वर्गों से था मुख्यतः वंचित एवं कमजोर वर्गों से| 19वीं सदी के उतरार्ध में सुधार आंदोलनों की प्रकृति में बदलाव हुआ और सीधे तौर परराष्ट्रीय चेतना से जुड़ने लगा एवं अंतिम दशक तक इन मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन जैसे प्रयास भी प्रारंभ हुए| इन आंदोलनों ने सही अर्थों में आधुनिक भारत की बुनियाद रखी| समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, पंथनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण जैसे विचारों को आधार बनाकर सुधारों की ओर कदम उठाएं|यही विचार राष्ट्रीय आंदोलन तथा आधुनिक भारत की बुनियाद हैं| सुधार आंदोलनों का महत्व- सामाजिक जड़ता को समाप्त कर प्रगति का संदेश; आधुनिक शिक्षा का प्रसार; आधुनिक विचारों का प्रसार; महिला मुक्ति के दृष्टिकोण से; धार्मिक क्षेत्र में- धर्म का सरलीकरण; धार्मिक सहिष्णुता; राजनीतिक क्षेत्र में-लोकतांत्रिक मूल्यों एवं शैली का प्रसार; राष्ट्रीय चेतना पर भी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभाव जैसे- आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण सामाजिक-धार्मिक कुरूतियों के साथ-साथ राजनीतिक नीतियों की भी आलोचना प्रारंभ हुयी| सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण ने स्वदेशी एवं स्वराज की भावनाओं को मजबूत किया| सुधारों के लिए प्रेस का उपयोग किया गया और राजनीतिक चेतना का यह सबसे महत्वपूर्ण हथियार बना| 19वीं सदी के अंतिम दशकों में दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने लोगों में उत्साह का संचार किया और कांग्रेस के गरमदलीय नेताओं पर इसका प्रभाव भी दिखा| दादाभाई नौरोजी, एमजी रानाडे जैसे सुधारकों ने समाज सुधार के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रीय तौर पर भाग लिया| इन सुधारकों ने प्रत्येक प्रकार की असमानता पर प्रहार कर ना केवल सामाजिक एकता को मजबूत किया बल्कि राष्ट्रवाद का आधार भी तैयार किया| हालाँकि संकीर्ण सामाजिक आधार; आंदोलन को ग्रामीण भारत तक नहीं पहुंचा पाना जैसी सीमाओं से जातिवाद, सांप्रदायिकताएवं सामाजिक भेदभाव जैसी कुरूतियों का पूर्ण सफाया नहीं हो पाया|
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The crucial position accorded to the Speaker in the Indian legislature makes it imperative to protect them from undue political pressures and incentives. Comment. (150 words/10 Marks)
Approach: 1. Write in brief about Speaker"s office in India. 2. In detail talk about the role of the speaker and how it is crucial for sustaining democracy in true sense. 3.Critically analyze the need to protect the same from undue political pressure. 4. Way forward. Answer Speaker is the head of the Lok Sabha and guardian of the power and privileges of the house, its principal spokesperson and hisdecision in various parliamentary matters is final.India’s first Prime Minister Pt. Jawahar Lal Nehru had said that in a parliamentary democracy, the Speaker represents the dignity and the freedom of the House and because the House represents the country, the speaker in a way becomes the symbol of the country’s freedom and liberty. The role of the speaker in the Lok-sabha is crucial as according to the Constitution of India, a Speaker is vested with immense administrative and discretionary powers, some of which are enumerated below: The Speaker conducts business in Lok Sabha by ensuring discipline and decorum among members. S/he guards the rights and privileges of the members of Lok Sabha, deciding who should speak at what time, the questions to be asked, the order of proceedings to be followed, among others. A Speaker uses his/her power to vote, in order to resolve a deadlock. The Speaker decides the agenda that must be discussed in a meeting of the Members of the Parliament. Hecan also disqualify a Member of Parliament from the House on grounds of defection. S/he is given the pivotal power to decide whether any Bill is a Money Bill. Except for the no-confidence motion, all other motions which come before the House come only after the Speaker permits them. Role indeciding on granting recognition to the Leader of the Opposition in the Lok Sabha. The Speaker has under his or her jurisdiction, a number of Parliamentary Committees. Apart from these, there are various other roles making the role of the same as pivotal. Thus in order to ensure the power is not being misused by the same, as he continues the membership of the political party and there are chances of abuse of power in favor of the ruling party. Thus there is a need to protect the office of the same from undue pressure and ensuring neutrality. There were various issues which depict the misuse of the position by speaker: Terming the Aadhar bill as money bill raised the eyebrow of opposition parties, questioned the neutrality of office. In the case of Karnataka and MadhyaPradesh by not accepting the resignation of MLAs, thus ruling in favor of the government. Not accepting the no-confidence motion initially against the government. However, the constitution hasincorporated some aspect of independence to the office of the speaker: Security of tenure as he can be removed on the resolution passed by absolute majority. His salary is charged on the consolidated fund of India. He can not vote in the first instance but has a casting vote. Apart from these various other suggestions to improve the role of the samewhich makes it imperative to protect them from undue political pressures and incentives. The office of the speaker must be politically neutral. as in Ireland and the UK. The quasi-judicial nature of the speaker needs proper checks and also there may be some independent tribunal to adjudicate the matter related to the parliament. Effective checks must be there to ensure preventing any abuse of power. In addition to this, what is required is a strong character with fortitude and a sense of impartiality, to bring on democracy through its role and preventing it from coming under the influence of anyone.
##Question:The crucial position accorded to the Speaker in the Indian legislature makes it imperative to protect them from undue political pressures and incentives. Comment. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: 1. Write in brief about Speaker"s office in India. 2. In detail talk about the role of the speaker and how it is crucial for sustaining democracy in true sense. 3.Critically analyze the need to protect the same from undue political pressure. 4. Way forward. Answer Speaker is the head of the Lok Sabha and guardian of the power and privileges of the house, its principal spokesperson and hisdecision in various parliamentary matters is final.India’s first Prime Minister Pt. Jawahar Lal Nehru had said that in a parliamentary democracy, the Speaker represents the dignity and the freedom of the House and because the House represents the country, the speaker in a way becomes the symbol of the country’s freedom and liberty. The role of the speaker in the Lok-sabha is crucial as according to the Constitution of India, a Speaker is vested with immense administrative and discretionary powers, some of which are enumerated below: The Speaker conducts business in Lok Sabha by ensuring discipline and decorum among members. S/he guards the rights and privileges of the members of Lok Sabha, deciding who should speak at what time, the questions to be asked, the order of proceedings to be followed, among others. A Speaker uses his/her power to vote, in order to resolve a deadlock. The Speaker decides the agenda that must be discussed in a meeting of the Members of the Parliament. Hecan also disqualify a Member of Parliament from the House on grounds of defection. S/he is given the pivotal power to decide whether any Bill is a Money Bill. Except for the no-confidence motion, all other motions which come before the House come only after the Speaker permits them. Role indeciding on granting recognition to the Leader of the Opposition in the Lok Sabha. The Speaker has under his or her jurisdiction, a number of Parliamentary Committees. Apart from these, there are various other roles making the role of the same as pivotal. Thus in order to ensure the power is not being misused by the same, as he continues the membership of the political party and there are chances of abuse of power in favor of the ruling party. Thus there is a need to protect the office of the same from undue pressure and ensuring neutrality. There were various issues which depict the misuse of the position by speaker: Terming the Aadhar bill as money bill raised the eyebrow of opposition parties, questioned the neutrality of office. In the case of Karnataka and MadhyaPradesh by not accepting the resignation of MLAs, thus ruling in favor of the government. Not accepting the no-confidence motion initially against the government. However, the constitution hasincorporated some aspect of independence to the office of the speaker: Security of tenure as he can be removed on the resolution passed by absolute majority. His salary is charged on the consolidated fund of India. He can not vote in the first instance but has a casting vote. Apart from these various other suggestions to improve the role of the samewhich makes it imperative to protect them from undue political pressures and incentives. The office of the speaker must be politically neutral. as in Ireland and the UK. The quasi-judicial nature of the speaker needs proper checks and also there may be some independent tribunal to adjudicate the matter related to the parliament. Effective checks must be there to ensure preventing any abuse of power. In addition to this, what is required is a strong character with fortitude and a sense of impartiality, to bring on democracy through its role and preventing it from coming under the influence of anyone.
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महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द, अंक- 10) Briefly discuss the various factors affecting oceanic salinity. (150-200 words, Marks - 10 )
दृष्टिकोण : महासागरीय लवणता की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिंदुवार चर्चा कीजिए। संक्षिप्त भूमिका लिखिए । उत्तर: महासागरीय जल विभिन्न प्रकार के लवणों का मिश्रण है । सागरीय जल के भार एवं उसमें घुले हुए पदार्थों के भार के अनुपात को सागरीय लवणता कहते हैं । सामान्य रूप में समुद्री लवणता को प्रति हजार ग्राम जल में स्थित लवण की मात्रा या ppt के रूप में दर्शाया जाता है । महासागरों की औसत लवणता 35 0% होती है । महासगरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक : वाष्पीकरण: महासागरों के सतह के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण पर निर्भर करती है । लवणता का वाष्पीकरण की क्रिया से सीधा संबंध है । जहाँ वाष्पीकरण की मात्रा अधिक होगी वहाँ पर लवणता की मात्रा में वृद्धि होगी । तापमान : तापमान वाष्पीकरण को प्रभावित करता है और इस रूप में यह लवणता को प्रभावित करता है । अधिक तापमान अधिक वाष्पीकरण और परिणामस्वरूप अधिक लवणता । स्वच्छ जल की आपूर्ति : महासागरों में स्वच्छ जल की लगातार पूर्ति होते रहने पर लवणता की मात्रा कम होती है । उदाहरण के लिए वर्षण की अधिकता वाले क्षेत्रों में स्वच्छ जल की आपूर्ति के कारण लवणता कम हो जाती है । इसी प्रकार हिम के पिघलने तथा तथा तटीय क्षेत्रों में नदियों के द्वारा लाये गए जल के कारण भी लवणता में कमी आती है । पवन: पवन भी जल को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित कर लवणता के पुनर्वितरण को प्रभावित करती है । महासागरीय धाराएँ : महासागरीय धाराएँ भी लवणता को प्रभावित करती हैं । भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली धाराएँ अपने साथ अधिक लवणता वाला जल ले जाती है । जबकि ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली धाराएँ अपने साथ कम लवणता वाला जल ले जाती है । इस प्रकार महासागरीय धाराएँ लवणता के वितरण में भी परिवर्तन लाती है । महासागरीय जल की लवणता , तापमान एवं घनत्व परस्पर संबन्धित होते हैं । इसलिए तापमान अथवा घनत्व में किसी भी प्रकार का परिवर्तन किसी क्षेत्र की लवणता को सीधे प्रभावित करता है ।
##Question:महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए।(150-200 शब्द, अंक- 10) Briefly discuss the various factors affecting oceanic salinity. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण : महासागरीय लवणता की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिंदुवार चर्चा कीजिए। संक्षिप्त भूमिका लिखिए । उत्तर: महासागरीय जल विभिन्न प्रकार के लवणों का मिश्रण है । सागरीय जल के भार एवं उसमें घुले हुए पदार्थों के भार के अनुपात को सागरीय लवणता कहते हैं । सामान्य रूप में समुद्री लवणता को प्रति हजार ग्राम जल में स्थित लवण की मात्रा या ppt के रूप में दर्शाया जाता है । महासागरों की औसत लवणता 35 0% होती है । महासगरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक : वाष्पीकरण: महासागरों के सतह के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण पर निर्भर करती है । लवणता का वाष्पीकरण की क्रिया से सीधा संबंध है । जहाँ वाष्पीकरण की मात्रा अधिक होगी वहाँ पर लवणता की मात्रा में वृद्धि होगी । तापमान : तापमान वाष्पीकरण को प्रभावित करता है और इस रूप में यह लवणता को प्रभावित करता है । अधिक तापमान अधिक वाष्पीकरण और परिणामस्वरूप अधिक लवणता । स्वच्छ जल की आपूर्ति : महासागरों में स्वच्छ जल की लगातार पूर्ति होते रहने पर लवणता की मात्रा कम होती है । उदाहरण के लिए वर्षण की अधिकता वाले क्षेत्रों में स्वच्छ जल की आपूर्ति के कारण लवणता कम हो जाती है । इसी प्रकार हिम के पिघलने तथा तथा तटीय क्षेत्रों में नदियों के द्वारा लाये गए जल के कारण भी लवणता में कमी आती है । पवन: पवन भी जल को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित कर लवणता के पुनर्वितरण को प्रभावित करती है । महासागरीय धाराएँ : महासागरीय धाराएँ भी लवणता को प्रभावित करती हैं । भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली धाराएँ अपने साथ अधिक लवणता वाला जल ले जाती है । जबकि ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली धाराएँ अपने साथ कम लवणता वाला जल ले जाती है । इस प्रकार महासागरीय धाराएँ लवणता के वितरण में भी परिवर्तन लाती है । महासागरीय जल की लवणता , तापमान एवं घनत्व परस्पर संबन्धित होते हैं । इसलिए तापमान अथवा घनत्व में किसी भी प्रकार का परिवर्तन किसी क्षेत्र की लवणता को सीधे प्रभावित करता है ।
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राजकोषीय व राजस्व घाटे की अवधारणा स्पष्ट करते हुए टिप्पणी कीजिए कि राजकोषीय घाटे की अपेक्षा राजस्व घाटे में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अधिक हानिकारक होगी। (150-200 शब्द) Explaining the concept of fiscal and revenue deficit, comment that the increase in revenue deficit will be more harmful to the Indian economy than the fiscal deficit. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: राजकोषीय और राजस्व घाटे का विवरण देते हुए उत्तर अरम्म्भ कीजिए। इसके बाद दूसरे कथन को स्पष्ट करने के लिए तर्क प्रस्तुत कीजिए। निष्कर्ष में संतुलित मत रखते हुए दोनों घाटों को कम करने के लिए सुझाव दीजिए। राजकोषीय घाटा: इसका आशय सरकार के कुल व्यय और कुल प्राप्तियों के मध्य अंतर से है। राजकोषीय घाटा: कुल व्यय-(राजस्व प्राप्तियाँ+ देयताओं का सृजन नहीं करने वाली पूंजीगत प्राप्तियाँ) राजकोषीय घाटे में राजस्व घाटा सम्मिलित होता है। इस घाटे का वित्तपोषण ऋणों के माध्यम से किया जाता है। यह सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय स्थिति एवं अर्थव्यवस्था की स्थिरता का निर्धारण करने वाला महत्वपूर्ण चर है। राजस्व घाटा: जब राजस्व प्राप्तियों की तुलना में राजस्व व्यय अधिक हो तो राजस्व घाटे की स्थिति उत्पन्न होती है। राजस्व घाटा: राजस्व प्राप्ति- राजस्व व्यय यदि अर्थव्यवस्था में राजस्व घाटे की स्थिति उत्पन्न होती है तो इसका आशय है कि सरकार कि बचत में कमी हो रही है। इससे विकास की दर धीमी होती है तथा सामाजिक कल्याण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गौरतलब है कि सरकार घाटे की बजट व्यवस्था अपनाती है है। इसका कारण है कि सरकार के आय उसके व्यय से कम हैं। इस संदर्भ में जो प्रमुख घाटे देखे जाते हैं उसका अध्ययन राजस्व और राजकोषीय घाटे के रूप में किया जाता है। हालांकि यह सही है कि घाटा किसी भी रूप में हो वह अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगा परंतु यदि दोनों घटकों का विशेल्शन किया जाया तो स्पष्ट होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राजस्व घाटा राजकोषीय घाटे की तुलना में अधिक हानिकारक होता है। इसे इस रूप में समझ सकते हैं: राजस्व घाटे में वृद्धि से किसी भी प्रकार की पूंजी का निर्माण नहीं होता है। जब राजस्व व्यय अधिक होता है तो इसका अर्थ है की सरकार ने अपने दैनिक कार्यों के लिए अधिक व्यय किया है जैसे- वेतन, सब्सिडी आदि। राजस्व जे रूप में कम प्राप्ति भी राजस्व घाटे में वृद्धि करती है इसका अर्थ हुआ कि कर के रूप में प्राप्त होने वाला राजस्व बहुत कम है। राजकोषीय घाटे में राजस्व के साथ साथ पूंजीगत व्यय भी शामिल होता है। पूंजीगत व्यय से नई-नई पूंजी का निर्माण होता है। जो कि किसी न किसी रूप में अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होता है। राजस्व घाटे में अधिक वृद्धि सरकार के ऊपर प्रत्यक्ष बोझ डालती है। जबकि राजकोषीय घाटे में वृद्धि सरकार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं करती है। जो व्यय होता है उससे आय भी प्राप्त होती है। इस प्रकार उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है कि राजकोषीय घाटे कि तुलना में राजस्व घाटा अधिक हानिकारक होता है। राजस्व घाटे में कमी करने के लिए कर संरचना को अधिक तार्किक बनाने की आवश्यकता है। सरकारी व्यय में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास किया जाए। इसके साथ ही राजकोषीय नीति में सुधार के लिए एन. के सिंह की सिफ़ारिशों को लागू किया जाना चाहिए।
##Question:राजकोषीय व राजस्व घाटे की अवधारणा स्पष्ट करते हुए टिप्पणी कीजिए कि राजकोषीय घाटे की अपेक्षा राजस्व घाटे में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अधिक हानिकारक होगी। (150-200 शब्द) Explaining the concept of fiscal and revenue deficit, comment that the increase in revenue deficit will be more harmful to the Indian economy than the fiscal deficit. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: राजकोषीय और राजस्व घाटे का विवरण देते हुए उत्तर अरम्म्भ कीजिए। इसके बाद दूसरे कथन को स्पष्ट करने के लिए तर्क प्रस्तुत कीजिए। निष्कर्ष में संतुलित मत रखते हुए दोनों घाटों को कम करने के लिए सुझाव दीजिए। राजकोषीय घाटा: इसका आशय सरकार के कुल व्यय और कुल प्राप्तियों के मध्य अंतर से है। राजकोषीय घाटा: कुल व्यय-(राजस्व प्राप्तियाँ+ देयताओं का सृजन नहीं करने वाली पूंजीगत प्राप्तियाँ) राजकोषीय घाटे में राजस्व घाटा सम्मिलित होता है। इस घाटे का वित्तपोषण ऋणों के माध्यम से किया जाता है। यह सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय स्थिति एवं अर्थव्यवस्था की स्थिरता का निर्धारण करने वाला महत्वपूर्ण चर है। राजस्व घाटा: जब राजस्व प्राप्तियों की तुलना में राजस्व व्यय अधिक हो तो राजस्व घाटे की स्थिति उत्पन्न होती है। राजस्व घाटा: राजस्व प्राप्ति- राजस्व व्यय यदि अर्थव्यवस्था में राजस्व घाटे की स्थिति उत्पन्न होती है तो इसका आशय है कि सरकार कि बचत में कमी हो रही है। इससे विकास की दर धीमी होती है तथा सामाजिक कल्याण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गौरतलब है कि सरकार घाटे की बजट व्यवस्था अपनाती है है। इसका कारण है कि सरकार के आय उसके व्यय से कम हैं। इस संदर्भ में जो प्रमुख घाटे देखे जाते हैं उसका अध्ययन राजस्व और राजकोषीय घाटे के रूप में किया जाता है। हालांकि यह सही है कि घाटा किसी भी रूप में हो वह अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगा परंतु यदि दोनों घटकों का विशेल्शन किया जाया तो स्पष्ट होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राजस्व घाटा राजकोषीय घाटे की तुलना में अधिक हानिकारक होता है। इसे इस रूप में समझ सकते हैं: राजस्व घाटे में वृद्धि से किसी भी प्रकार की पूंजी का निर्माण नहीं होता है। जब राजस्व व्यय अधिक होता है तो इसका अर्थ है की सरकार ने अपने दैनिक कार्यों के लिए अधिक व्यय किया है जैसे- वेतन, सब्सिडी आदि। राजस्व जे रूप में कम प्राप्ति भी राजस्व घाटे में वृद्धि करती है इसका अर्थ हुआ कि कर के रूप में प्राप्त होने वाला राजस्व बहुत कम है। राजकोषीय घाटे में राजस्व के साथ साथ पूंजीगत व्यय भी शामिल होता है। पूंजीगत व्यय से नई-नई पूंजी का निर्माण होता है। जो कि किसी न किसी रूप में अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होता है। राजस्व घाटे में अधिक वृद्धि सरकार के ऊपर प्रत्यक्ष बोझ डालती है। जबकि राजकोषीय घाटे में वृद्धि सरकार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं करती है। जो व्यय होता है उससे आय भी प्राप्त होती है। इस प्रकार उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है कि राजकोषीय घाटे कि तुलना में राजस्व घाटा अधिक हानिकारक होता है। राजस्व घाटे में कमी करने के लिए कर संरचना को अधिक तार्किक बनाने की आवश्यकता है। सरकारी व्यय में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास किया जाए। इसके साथ ही राजकोषीय नीति में सुधार के लिए एन. के सिंह की सिफ़ारिशों को लागू किया जाना चाहिए।
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भारत परिषदअधिनियम, 1909के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the main provisions of the Indian councilAct, 1909. (150-200 शब्द)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत परिषद अधिनियम, 1909 की पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्यभाग मेंभारत परिषद अधिनियम, 1909 के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में इस अधिनियम की उपयोगिता कोनिष्कर्ष के रूप मेंलिखिए। उत्तर:- भारत-परिषद् अधिनियम, 1892से राष्ट्रवादियों में असंतोष व्याप्त था एवं सुधारों के प्रति विलंब का कॉंग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा था। राष्ट्रीय नेता ब्रिटिश सरकार से निरंतर सुधारों की मांग कर रहे थे। साथ ही, बंगाल-विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन पहला देशव्यापी जन-आंदोलन था और आंदोलन के दौरान स्वशासन की मांग की गयी। इसके साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियां भी बढ़ रही थी औरस्वदेशी आंदोलन के समय सरकार ने संवैधानिक सुधारों का आश्वासन भीदिया था। इसी पृष्ठभूमि में भारत-परिषद् अधिनियम, 1909 को लाया गया। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान:- केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान-परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गईतथा प्रांतीय विधान-परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत बनाये रखा गया। केन्द्रीय विधानमंडल में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 69 की गईजिसमें 37 सरकारी तथा 32 गैर-सरकारी थें। वायसराय परिषद् में दो अस्थायी सदस्य भी शामिल किए गए। पहली बार एक भारतीय सदस्य भी शामिल किया गया। सरकारी सदस्यों में 9 पदेन तथा 28 वायसराय द्वारा मनोनीत होने थे। 32 गैर-सरकारी सदस्यों में से 5 वायसराय द्वारा मनोनीत तथा 27 निर्वाचित सदस्य होने थे। अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी। हालांकि अभी भी मनोनीत सदस्यों का बहुमत बनाये रखा गया। सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी जैसे- पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया, बजट के कुछ मदों पर अधिकार दिया गया। अभी भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन तथा निर्वाचन के लिए संपति संबंधी योग्यताएं निर्धारित थीं।परोक्ष निर्वाचन का प्रावधान किया गया। अर्थात प्रांतीय परिषदों में जिला बोर्ड, विश्वविद्यालयों के सिनेट, व्यापारिक संघों के प्रतिनिधि निर्वाचित होकर आ सकते थे। धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय को पृथक निर्वाचन की सुविधा दी गयी तथा संपति संबंधी योग्यताएं भी रखीं गयी। अतः इस अधिनियम के माध्यम सेपहली बार चुनाव-प्रणाली के सिद्धांत को मान्यता मिली तथावायसराय परिषद् मेंपहली बार किसी भारतीय को सदस्यबनाया गया। अतिरिक्त सदस्यों तथा निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि सेकेंद्रीय विधायी परिषद् में राष्ट्रीय नेतृत्व की भागीदारी भी बढ़ी। लेकिन इन सुधारोंने भारतीय राष्ट्रवादियों विशेषकर नरमपंथियों को अत्यधिक निराश किया। इन सुधारों से भारतीय राजनीतिक समस्याओं का कोई समाधान नहीं किया जा सकता था।
##Question:भारत परिषदअधिनियम, 1909के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the main provisions of the Indian councilAct, 1909. (150-200 शब्द)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत परिषद अधिनियम, 1909 की पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्यभाग मेंभारत परिषद अधिनियम, 1909 के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में इस अधिनियम की उपयोगिता कोनिष्कर्ष के रूप मेंलिखिए। उत्तर:- भारत-परिषद् अधिनियम, 1892से राष्ट्रवादियों में असंतोष व्याप्त था एवं सुधारों के प्रति विलंब का कॉंग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा था। राष्ट्रीय नेता ब्रिटिश सरकार से निरंतर सुधारों की मांग कर रहे थे। साथ ही, बंगाल-विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन पहला देशव्यापी जन-आंदोलन था और आंदोलन के दौरान स्वशासन की मांग की गयी। इसके साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियां भी बढ़ रही थी औरस्वदेशी आंदोलन के समय सरकार ने संवैधानिक सुधारों का आश्वासन भीदिया था। इसी पृष्ठभूमि में भारत-परिषद् अधिनियम, 1909 को लाया गया। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान:- केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान-परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गईतथा प्रांतीय विधान-परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत बनाये रखा गया। केन्द्रीय विधानमंडल में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 69 की गईजिसमें 37 सरकारी तथा 32 गैर-सरकारी थें। वायसराय परिषद् में दो अस्थायी सदस्य भी शामिल किए गए। पहली बार एक भारतीय सदस्य भी शामिल किया गया। सरकारी सदस्यों में 9 पदेन तथा 28 वायसराय द्वारा मनोनीत होने थे। 32 गैर-सरकारी सदस्यों में से 5 वायसराय द्वारा मनोनीत तथा 27 निर्वाचित सदस्य होने थे। अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी। हालांकि अभी भी मनोनीत सदस्यों का बहुमत बनाये रखा गया। सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी जैसे- पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया, बजट के कुछ मदों पर अधिकार दिया गया। अभी भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन तथा निर्वाचन के लिए संपति संबंधी योग्यताएं निर्धारित थीं।परोक्ष निर्वाचन का प्रावधान किया गया। अर्थात प्रांतीय परिषदों में जिला बोर्ड, विश्वविद्यालयों के सिनेट, व्यापारिक संघों के प्रतिनिधि निर्वाचित होकर आ सकते थे। धर्म के आधार पर मुस्लिम समुदाय को पृथक निर्वाचन की सुविधा दी गयी तथा संपति संबंधी योग्यताएं भी रखीं गयी। अतः इस अधिनियम के माध्यम सेपहली बार चुनाव-प्रणाली के सिद्धांत को मान्यता मिली तथावायसराय परिषद् मेंपहली बार किसी भारतीय को सदस्यबनाया गया। अतिरिक्त सदस्यों तथा निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि सेकेंद्रीय विधायी परिषद् में राष्ट्रीय नेतृत्व की भागीदारी भी बढ़ी। लेकिन इन सुधारोंने भारतीय राष्ट्रवादियों विशेषकर नरमपंथियों को अत्यधिक निराश किया। इन सुधारों से भारतीय राजनीतिक समस्याओं का कोई समाधान नहीं किया जा सकता था।
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India has a space vision and mission objectives but does not have a holistic space policy. Discuss briefly the need for having a space policy. Mention important features of space activities bill, 2017. (150 words)
Approach:- Write a brief introduction to the vision of the space programme in India. Enumerate some need for space policy in India. Write down key features of the space activities bill. Answer:- India’s space programme has been set up with a vision to harness space technology for national development while pursuing space science research and planetary exploration. It is spearheaded by ISRO which has established its name amongst other space agencies for its cost-effective yet successful missions such as the Mangalyan which was a success in its maiden attempt. With the success of space missions, the role has expanded which warrants the formulation of space policy. Need for a space policy :- Regulation by means of state laws like in USA or Russia for the ever-expanding role of private players in the space sector such as outsourcing manufacturing of satellites, communication technology etc. Controlling of space activities by individuals and private entities. The further imposition of penal provision for any inconsistency with the law. With the expansion of the space sector, the number of labs and human resources employed has increased. A policy is needed for securing these centres. Space is one of the global commons and there is a need to pool our resources together. A space policy will facilitate the collaboration of Indian scientist to work in advanced research globally. To provide a framework and guideline for transfer of technology, intellectual property rights etc. The growing concern related to the issue of Space debris and the damages caused by such debris created by us and assessment of damages and compensation owned. A cogent and up to date guideline will lead to the smooth functioning of multilateral interfaces between various agencies related to the space programme. Features of the Space activities bill:- This will apply to every citizen of India and to all the sectors engaged in any space activity in India or outside India. A non-transferable licence shall be provided by the Central Government to any person carrying out commercial space activity. The Central Government will formulate the appropriate mechanism for licencing, eligibility criteria, and fees for the licence. The government will maintain a register of all space objects and develop more space activity plans for the country. It will provide professional and technical support for commercial space activity and regulate the procedures for conduct and operation of space activity. It will ensure safety requirements and supervise the conduct of every space activity of India and investigate any incident or accident in connection with the operation of space activity. It will share details about the pricing of products created by space activity and technology with any person or any agency in a prescribed manner. If any person undertakes any commercial space activity without authorisation they shall be punished with imprisonment up to 3 years or fined more than ₹1 crore or both. The drafting of the bill was done with the help of various stakeholders such as general public, law firms, space experts, scientists and it holistically covers the present need of regulating the space sector. The drafting of the bill was done with the help of various stakeholders such as general public, law firms, space experts, scientists and it holistically covers the present need of regulating the space sector.
##Question:India has a space vision and mission objectives but does not have a holistic space policy. Discuss briefly the need for having a space policy. Mention important features of space activities bill, 2017. (150 words)##Answer:Approach:- Write a brief introduction to the vision of the space programme in India. Enumerate some need for space policy in India. Write down key features of the space activities bill. Answer:- India’s space programme has been set up with a vision to harness space technology for national development while pursuing space science research and planetary exploration. It is spearheaded by ISRO which has established its name amongst other space agencies for its cost-effective yet successful missions such as the Mangalyan which was a success in its maiden attempt. With the success of space missions, the role has expanded which warrants the formulation of space policy. Need for a space policy :- Regulation by means of state laws like in USA or Russia for the ever-expanding role of private players in the space sector such as outsourcing manufacturing of satellites, communication technology etc. Controlling of space activities by individuals and private entities. The further imposition of penal provision for any inconsistency with the law. With the expansion of the space sector, the number of labs and human resources employed has increased. A policy is needed for securing these centres. Space is one of the global commons and there is a need to pool our resources together. A space policy will facilitate the collaboration of Indian scientist to work in advanced research globally. To provide a framework and guideline for transfer of technology, intellectual property rights etc. The growing concern related to the issue of Space debris and the damages caused by such debris created by us and assessment of damages and compensation owned. A cogent and up to date guideline will lead to the smooth functioning of multilateral interfaces between various agencies related to the space programme. Features of the Space activities bill:- This will apply to every citizen of India and to all the sectors engaged in any space activity in India or outside India. A non-transferable licence shall be provided by the Central Government to any person carrying out commercial space activity. The Central Government will formulate the appropriate mechanism for licencing, eligibility criteria, and fees for the licence. The government will maintain a register of all space objects and develop more space activity plans for the country. It will provide professional and technical support for commercial space activity and regulate the procedures for conduct and operation of space activity. It will ensure safety requirements and supervise the conduct of every space activity of India and investigate any incident or accident in connection with the operation of space activity. It will share details about the pricing of products created by space activity and technology with any person or any agency in a prescribed manner. If any person undertakes any commercial space activity without authorisation they shall be punished with imprisonment up to 3 years or fined more than ₹1 crore or both. The drafting of the bill was done with the help of various stakeholders such as general public, law firms, space experts, scientists and it holistically covers the present need of regulating the space sector. The drafting of the bill was done with the help of various stakeholders such as general public, law firms, space experts, scientists and it holistically covers the present need of regulating the space sector.
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द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। साथ ही 1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) After World War II, mention those reasons that have prepared the background of the Cold War. Also, discuss the factors that reduce the stress of the Cold War after 1953. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में शीत युद्ध का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। इसके बाद,1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- 1945-1991 केकाल के दौरानअमेरिका तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में विचारधारा एवं नेतृत्व को लेकरराजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में टकराव एवं प्रतिस्पर्धा के रूप में शीत युद्ध को परिभाषित किया जा सकता है। रूस के नेतृत्व में साम्यवादी और अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवादी देश दो खेमों में बंट गए थे। इन दोनों गुटों में आपसी प्रत्यक्ष युद्ध कभी नहीं हुआ लेकिन संघर्ष एवं तनाव की स्थिति बनी रही। शीत युद्ध के लक्षण दूसरे विश्व युद्ध के प्रारंभ से ही दिखने लगे थे। दोनों महाशक्तियां अपने अपने संकीर्ण स्वार्थों को लेकर युद्ध लड़ रही थी। रूस एवं अमेरिका के पारस्परिक मतभेदों ने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की जिन्हेनिम्नलिखत कारणों से समझा जा सकता है- याल्टा सम्मेलन-सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना। पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा को लेकर टकराव की स्थिति। परस्पर अविश्वास-1939 पूर्व(प्रथम विश्वयुद्ध से साम्यवादी रूस का अलग होना, फासीवादी शक्तियों के तुष्टीकरण से रूस में संदेह आदि) तथा 1939-45(जर्मनी-रूस अनाक्रमण समझौता, पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ की मजबूत स्थिति,हिटलर के रूस आक्रमण के समय द्वितीय फ्रंट का ना खोलना आदि) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियां।1945 एवं 1946 की परिस्थितियों नेशीत युद्ध को सतह पर उभारने का कार्य किया जैसे स्टालिन एवं चर्चिल के कथन,1947 में ट्रूमैन डॉक्ट्रिन इत्यादि। पोटसडम सम्मेलन- पोलैंड तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में चुनाव को लेकर साम्यवादी रूस से तनाव बढ़ना। अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने की घटना को रूस द्वारा अपने विरुद्ध माना जाना। 1946 के दौरानपूर्वी यूरोपीय देशों पर सोवियत संघ द्वारा पकड़ मजबूत करना, साथ ही यूनान एवं तुर्की में भी साम्यवाद एवं लोकतांत्रिक शक्तियों में संघर्ष। 1948-49 में बर्लिन नाकेबंदी के साथ शीत युद्ध को लेकर जो भी संशय था वह छंट गया और यह स्पष्ट हो गया की दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर गई है। 1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारक:- 1953-1962 का दूसराचरण :-इसचरण को शीत युगीन तनावों को कम करने और तनाव को बढ़ानेदोनों ही दृष्टिकोण से जाना जाता है तनाव को कम करने में कुछ कारकों की भूमिका थी जैसे 1953 में स्टालिन की मृत्यु तथा ख़्रुश्चेव के द्वारा पूंजीवादी देशों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात करना। अमेरिका ने सिनेटर मैकार्थी को साम्यवादी विरोधी नीतियों के लिए जाना जाता था, इसका भी अमेरिकी राजनीती पर प्रभाव कम हुआ। दोनों ही गुट युद्ध के विनाशक स्वरूप को समझ रहे थे और आर्थिक दबाव भी महशूस कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में तनाव को कम करने के कुछ कदम उठाये गए जैसे- USSR के द्वारा फ़िनलैंड से सैनिक अड्डों को हटाना, UNO में 16 राष्ट्रों के प्रवेश पर से वीटो को हटाना,ऑस्ट्रिया के एकीकरण पर इन शर्तों के साथ सहमत होना कि जर्मनी में उसका विलय नहीं होगा। 1953 में कोरिया के मुद्दे पर समझौता,1954 में वियतनाम के मुद्दे पर समझौता इत्यादि। हालाँकि इस चरण में कुछतनाव बढ़ाने वाले उदाहरण भी थे जैसे,1955 में वार्सा पैक्ट पर समझौता, 1961 में बर्लिन दीवार का निर्माण, 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट इत्यादि। 1963-1969 का तीसरा चरण: (तनाव शैथिल्य):- अमेरिका और USSR के बीच हॉटलाइन की स्थापना। 1963 में PTBT की स्थापना। 1967 में नाभिकीय बमके प्रसार को रोकने तथा नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को लेकर एनपीटी हुई। 1972 में अमेरिका एवं USSR के बीच SALT-1 नामक समझौता हुआ। पहली बार शस्त्रों की संख्या को सीमित करने के लिए दोनों महशक्तियों में सहमति बनी। 1975 में हेलसिंकी सम्मेलन हुआ। यूरोपीय देशों की सीमाओं को बनाये रखने पर सहमति हुई। और साम्यवादी देशों में मानवाधिकारों के सम्मान पर सहमति बनी। इसी वर्ष वियतनाम में गृहयुद्ध समाप्त हुआ। 1970 के दशक में अमेरिका एवं चीन के संबंधों में उत्तरोत्तर सुधार हुआ। हालाँकि इस चरण में भी तनाव को बढ़ाने वाली कुछ घटनाएं हुई जैसे वियतनाम गृहयुद्ध, अरब- इजरायल युद्ध, भारत- बांग्लादेश युद्ध इत्यादि। 1979-1991 काचौथा चरण:- 1987-INF संधि:-पहली बार शस्त्रों की संख्या में कटौती को लेकर समझौता हुआ। 1988 में USSR ने अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलाया तथा पूर्वी यूरोप में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया। 1989 में बर्लिन की दीवार तोड़ दी गई और 1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ। वार्सा पैक्ट को समाप्त कर दिया गया दिसंबर 1991 में USSR के विघटन के साथ एक गुट का अंत हो गया।1945-1991 के काल को शीत युद्ध का काल कहते हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में 1945 से पूर्व तथा 1991 के पश्चात भी शीत युद्ध जैसी विशेषताएं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में देखी जा सकती हैं।
##Question:द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। साथ ही 1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) After World War II, mention those reasons that have prepared the background of the Cold War. Also, discuss the factors that reduce the stress of the Cold War after 1953. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में शीत युद्ध का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। इसके बाद,1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारकों पर भी चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- 1945-1991 केकाल के दौरानअमेरिका तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में विचारधारा एवं नेतृत्व को लेकरराजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में टकराव एवं प्रतिस्पर्धा के रूप में शीत युद्ध को परिभाषित किया जा सकता है। रूस के नेतृत्व में साम्यवादी और अमेरिका के नेतृत्व में पूंजीवादी देश दो खेमों में बंट गए थे। इन दोनों गुटों में आपसी प्रत्यक्ष युद्ध कभी नहीं हुआ लेकिन संघर्ष एवं तनाव की स्थिति बनी रही। शीत युद्ध के लक्षण दूसरे विश्व युद्ध के प्रारंभ से ही दिखने लगे थे। दोनों महाशक्तियां अपने अपने संकीर्ण स्वार्थों को लेकर युद्ध लड़ रही थी। रूस एवं अमेरिका के पारस्परिक मतभेदों ने शीत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की जिन्हेनिम्नलिखत कारणों से समझा जा सकता है- याल्टा सम्मेलन-सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना। पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा को लेकर टकराव की स्थिति। परस्पर अविश्वास-1939 पूर्व(प्रथम विश्वयुद्ध से साम्यवादी रूस का अलग होना, फासीवादी शक्तियों के तुष्टीकरण से रूस में संदेह आदि) तथा 1939-45(जर्मनी-रूस अनाक्रमण समझौता, पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ की मजबूत स्थिति,हिटलर के रूस आक्रमण के समय द्वितीय फ्रंट का ना खोलना आदि) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियां।1945 एवं 1946 की परिस्थितियों नेशीत युद्ध को सतह पर उभारने का कार्य किया जैसे स्टालिन एवं चर्चिल के कथन,1947 में ट्रूमैन डॉक्ट्रिन इत्यादि। पोटसडम सम्मेलन- पोलैंड तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में चुनाव को लेकर साम्यवादी रूस से तनाव बढ़ना। अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने की घटना को रूस द्वारा अपने विरुद्ध माना जाना। 1946 के दौरानपूर्वी यूरोपीय देशों पर सोवियत संघ द्वारा पकड़ मजबूत करना, साथ ही यूनान एवं तुर्की में भी साम्यवाद एवं लोकतांत्रिक शक्तियों में संघर्ष। 1948-49 में बर्लिन नाकेबंदी के साथ शीत युद्ध को लेकर जो भी संशय था वह छंट गया और यह स्पष्ट हो गया की दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर गई है। 1953 के बाद शीत युद्ध के तनाव को कम करने वाले कारक:- 1953-1962 का दूसराचरण :-इसचरण को शीत युगीन तनावों को कम करने और तनाव को बढ़ानेदोनों ही दृष्टिकोण से जाना जाता है तनाव को कम करने में कुछ कारकों की भूमिका थी जैसे 1953 में स्टालिन की मृत्यु तथा ख़्रुश्चेव के द्वारा पूंजीवादी देशों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात करना। अमेरिका ने सिनेटर मैकार्थी को साम्यवादी विरोधी नीतियों के लिए जाना जाता था, इसका भी अमेरिकी राजनीती पर प्रभाव कम हुआ। दोनों ही गुट युद्ध के विनाशक स्वरूप को समझ रहे थे और आर्थिक दबाव भी महशूस कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में तनाव को कम करने के कुछ कदम उठाये गए जैसे- USSR के द्वारा फ़िनलैंड से सैनिक अड्डों को हटाना, UNO में 16 राष्ट्रों के प्रवेश पर से वीटो को हटाना,ऑस्ट्रिया के एकीकरण पर इन शर्तों के साथ सहमत होना कि जर्मनी में उसका विलय नहीं होगा। 1953 में कोरिया के मुद्दे पर समझौता,1954 में वियतनाम के मुद्दे पर समझौता इत्यादि। हालाँकि इस चरण में कुछतनाव बढ़ाने वाले उदाहरण भी थे जैसे,1955 में वार्सा पैक्ट पर समझौता, 1961 में बर्लिन दीवार का निर्माण, 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट इत्यादि। 1963-1969 का तीसरा चरण: (तनाव शैथिल्य):- अमेरिका और USSR के बीच हॉटलाइन की स्थापना। 1963 में PTBT की स्थापना। 1967 में नाभिकीय बमके प्रसार को रोकने तथा नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को लेकर एनपीटी हुई। 1972 में अमेरिका एवं USSR के बीच SALT-1 नामक समझौता हुआ। पहली बार शस्त्रों की संख्या को सीमित करने के लिए दोनों महशक्तियों में सहमति बनी। 1975 में हेलसिंकी सम्मेलन हुआ। यूरोपीय देशों की सीमाओं को बनाये रखने पर सहमति हुई। और साम्यवादी देशों में मानवाधिकारों के सम्मान पर सहमति बनी। इसी वर्ष वियतनाम में गृहयुद्ध समाप्त हुआ। 1970 के दशक में अमेरिका एवं चीन के संबंधों में उत्तरोत्तर सुधार हुआ। हालाँकि इस चरण में भी तनाव को बढ़ाने वाली कुछ घटनाएं हुई जैसे वियतनाम गृहयुद्ध, अरब- इजरायल युद्ध, भारत- बांग्लादेश युद्ध इत्यादि। 1979-1991 काचौथा चरण:- 1987-INF संधि:-पहली बार शस्त्रों की संख्या में कटौती को लेकर समझौता हुआ। 1988 में USSR ने अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलाया तथा पूर्वी यूरोप में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया। 1989 में बर्लिन की दीवार तोड़ दी गई और 1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ। वार्सा पैक्ट को समाप्त कर दिया गया दिसंबर 1991 में USSR के विघटन के साथ एक गुट का अंत हो गया।1945-1991 के काल को शीत युद्ध का काल कहते हैं लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में 1945 से पूर्व तथा 1991 के पश्चात भी शीत युद्ध जैसी विशेषताएं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में देखी जा सकती हैं।
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द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विउपनिवेशीकरण के उत्तरदायी कारणों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इस प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) Mention the responsible reasons for de-colonization after the second World War. Also, mention the challenges posed during this process.(150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, विउपनिवेशीकरण का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात विउपनिवेशीकरण के कारणों का उल्लेख कीजिये | अंत में इस प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के संदर्भ मेंविउपनिवेशीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। 1945 से 1975 के बीच अधिकांशतः उपनिवेशों को आज़ादी मिली। विउपनिवेशीकरण के कारण: किसी भी देश की स्वतंत्रता में राष्ट्रीय आंदोलन का मत्वपूर्ण महत्व रहा है। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय चेतना के उदय में भिन्नताएं हो सकती हैं फिर भी कुछ सामान्य कारकों में सभी देशों में राष्ट्रीय चेतना एवं आंदोलन को प्रभावित किया। हितों का टकराव रहा। पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार एवं आधुनिक विचारों का प्रभाव रहा। प्रेस की भूमिका से जागरूकता। साम्राज्यवादी शक्तियों की नस्लीय नीति। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में उपनिवेशों की जनता की भागीदारी के कारण। 1917 के पश्चात विशेषकर एशिया के देशों में साम्यवादी विचारधारा का प्रसार हुआ। प्रायः सभी देशों में राष्ट्रीय आंदोलन की हिंसक व अहिंसक धाराएं, भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिंसक धाराओं का प्रभाव अधिक। द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव-साम्राज्यवादी शक्तियों की सैनिक व आर्थिक स्थिति कमजोर | एशियाई उपनिवेशों पर जापान का नियंत्रण इससे भी साम्राज्यवादीदेशों का सैनिक व आर्थिक आधार कमजोर हुआ। जापान की सफलता ने विशेषकर एशियाई राष्ट्रवादियों में उत्साह का संचार किया | विश्व युद्ध में उपनिवेशों के सैनिकों ने भी भाग लिया। इनमें राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ तथा साम्राज्यवादी शक्तियों की अपराज्यता सम्बन्धी मिथकता को नज़दीक से टूटता हुआ देखा। ब्रिटेन एवं अमेरिका ने अटलांटिक चार्टर के माध्यम से आत्मनिर्णय के अधिकारों का समर्थन किया। इससे भी राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहन मिला। विउपनिवेशीकरण में उत्पन्न चुनौतियाँ : राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्यतः दो धाराओं में विभाजित होना तथा प्रायः दोनों में टकराव(विशेषकर एशिया में) शीत युद्ध एवं महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने भी विउपनिवेशीकरण को प्रभावित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा उपनिवेशों पर किसी न किसी प्रकार से नियंत्रण बनाये रखने की कोशिश। भौगोलिक चुनौतियां जैसी कैरिबियन द्वीप समूह, मलेसिया इत्यादि देशों को एक सूत्र में पिरोना एक बड़ी चुनौती थी। सामाजिक तनाव जैसे भारत में धर्म के नाम पर टकराव, सायप्रस में ईसाई व इस्लाम धर्म तथा यूनान व तुर्की के बीच टकराव, अफ़्रीकी समाज में जनजातीय टकराव और जहां श्वेत आबादी अधिक थी वहां श्वेतों एवं अश्वेतों में टकराव इत्यादि। इस प्रकार विभिन्न बाधाओं के बावजूद विउपनिवेशीकरण जारी रहा।
##Question:द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विउपनिवेशीकरण के उत्तरदायी कारणों का उल्लेख कीजिये | साथ ही इस प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न चुनौतियों का भी उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) Mention the responsible reasons for de-colonization after the second World War. Also, mention the challenges posed during this process.(150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, विउपनिवेशीकरण का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात विउपनिवेशीकरण के कारणों का उल्लेख कीजिये | अंत में इस प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियों की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के संदर्भ मेंविउपनिवेशीकरण शब्द का प्रयोग किया जाता है। 1945 से 1975 के बीच अधिकांशतः उपनिवेशों को आज़ादी मिली। विउपनिवेशीकरण के कारण: किसी भी देश की स्वतंत्रता में राष्ट्रीय आंदोलन का मत्वपूर्ण महत्व रहा है। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय चेतना के उदय में भिन्नताएं हो सकती हैं फिर भी कुछ सामान्य कारकों में सभी देशों में राष्ट्रीय चेतना एवं आंदोलन को प्रभावित किया। हितों का टकराव रहा। पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार एवं आधुनिक विचारों का प्रभाव रहा। प्रेस की भूमिका से जागरूकता। साम्राज्यवादी शक्तियों की नस्लीय नीति। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में उपनिवेशों की जनता की भागीदारी के कारण। 1917 के पश्चात विशेषकर एशिया के देशों में साम्यवादी विचारधारा का प्रसार हुआ। प्रायः सभी देशों में राष्ट्रीय आंदोलन की हिंसक व अहिंसक धाराएं, भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिंसक धाराओं का प्रभाव अधिक। द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव-साम्राज्यवादी शक्तियों की सैनिक व आर्थिक स्थिति कमजोर | एशियाई उपनिवेशों पर जापान का नियंत्रण इससे भी साम्राज्यवादीदेशों का सैनिक व आर्थिक आधार कमजोर हुआ। जापान की सफलता ने विशेषकर एशियाई राष्ट्रवादियों में उत्साह का संचार किया | विश्व युद्ध में उपनिवेशों के सैनिकों ने भी भाग लिया। इनमें राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ तथा साम्राज्यवादी शक्तियों की अपराज्यता सम्बन्धी मिथकता को नज़दीक से टूटता हुआ देखा। ब्रिटेन एवं अमेरिका ने अटलांटिक चार्टर के माध्यम से आत्मनिर्णय के अधिकारों का समर्थन किया। इससे भी राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहन मिला। विउपनिवेशीकरण में उत्पन्न चुनौतियाँ : राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्यतः दो धाराओं में विभाजित होना तथा प्रायः दोनों में टकराव(विशेषकर एशिया में) शीत युद्ध एवं महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने भी विउपनिवेशीकरण को प्रभावित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा उपनिवेशों पर किसी न किसी प्रकार से नियंत्रण बनाये रखने की कोशिश। भौगोलिक चुनौतियां जैसी कैरिबियन द्वीप समूह, मलेसिया इत्यादि देशों को एक सूत्र में पिरोना एक बड़ी चुनौती थी। सामाजिक तनाव जैसे भारत में धर्म के नाम पर टकराव, सायप्रस में ईसाई व इस्लाम धर्म तथा यूनान व तुर्की के बीच टकराव, अफ़्रीकी समाज में जनजातीय टकराव और जहां श्वेत आबादी अधिक थी वहां श्वेतों एवं अश्वेतों में टकराव इत्यादि। इस प्रकार विभिन्न बाधाओं के बावजूद विउपनिवेशीकरण जारी रहा।
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Discuss the need for the evolution of Neighbourhood First policy in India and throw light on the evolution of this policy in past few decades. (150 words/10 marks)
Approach:- Explain what it means by neighbourhood first policy. Write about the need for incorporating it in Foreign Policy. Discuss the evolution of neighbourhood first policy in India in the past few decades with examples. Answer:- Neighbourhood first policy refers to the policy where the nations in India’s periphery are given topmost priority. The policy has been adopted keeping in mind India’s growing regional and global aspirations which have been accompanied by doubts regarding its ability to influence favourable outcomes in its neighbourhood. More need to incorporate neighbourhood first policy:- A peaceful neighbourhood for economic prosperity- if we foster good relations with our neighbours the region will experience economic growth especially in the underdeveloped border area. More such markets on the line of India-Bangladesh border haat can be opened. To reduce the influence of external powers like China on our immediate neighbours. It will help promote our national security by building more trust with our neighbours. To deal with common challenges like climate change, earthquakes, tsunamis, terrorism etc. Disaster events do not distinguish between political boundaries like the Cyclone Fani. Similarly, terrorism or drug trafficking is also a collective challenge. It will also help us put pressure on Pakistan to stop state-sponsored terrorism in India. A greater role in neighbourhood lines with India’s objective of joining the global power table in institutions such UN security council, Nuclear Supplier’s group etc. A strong bond between neighbours will lead to social progress and cultural development as well. It will also give a boost to tourism and create interdependency. The importance of such a policy can be understood by the statements given by our past Prime ministers. Atal Bihari Vajpayee said that “You can change friends but not neighbours.” Similarly, our present PM Mr.Modi said, “A nation’s destiny is linked to its neighbourhood.” Evolution of neighbourhood first policy in the past few decades:- India realised the importance of its neighbours towards the last decade of the 20th century. The operation cactus by Indian armed forces in 1988 was to stop the coup d’etat in the Maldives. However, the first formal neighbourhood policy came a few years later by the name of the Gujral doctrine. Gujral doctrine came into existence due to the presence of two hostile nations in our neighbourhood. It gave 5 guiding principles with respect to neighbouring countries of Bangladesh, Bhutan, Maldives, Nepal and Sri Lanka. No reciprocity from its neighbours. India will give whatever it can without any expectation. No South Asian country will let its territory to be used against any country in the region. Respect the territorial integrity and sovereignty. Non-interference in domestic affairs. Disputes to be settled through peaceful bilateral negotiations. With changing need the Gujral doctrine evolved in the next decade under Dr Manmohan Singh who advocated the concept of soft border i.e. free trade, open communication etc. to create interdependence among the people living on both sides of the border as south Asia is a single geographic unit with shared cultural past. The neighbourhood first policy underwent further changes under Prime Minister Narendra Modi. The importance to neighbourhood first policy to the government can be seen with the invitation given to the head of state of neighbouring countries in the swearing-in ceremony. More willing to give diplomatic and political priority to India’s immediate neighbours and the Indian Ocean Region nations. For example, India accepted the UN tribunal award regarding the delimitation of the maritime boundary between India and Bangladesh. India will give support to its neighbouring countries if they need it in terms of funds, equipment, human resource development etc. Eg. Aid to Nepal after the earthquake in 2015. Improved connectivity for a free flow of goods, people and capital across the borders. Promote a model of India led regionalism with which its neighbours are comfortable. The present policy is nothing but giving more impetus to the principles laid down under the Gujral doctrine. In the time of declining multilateralism and increasing regionalism, the global threat of terrorism we need to have stronger ties with our neighbours for stability and prosperity.
##Question:Discuss the need for the evolution of Neighbourhood First policy in India and throw light on the evolution of this policy in past few decades. (150 words/10 marks)##Answer:Approach:- Explain what it means by neighbourhood first policy. Write about the need for incorporating it in Foreign Policy. Discuss the evolution of neighbourhood first policy in India in the past few decades with examples. Answer:- Neighbourhood first policy refers to the policy where the nations in India’s periphery are given topmost priority. The policy has been adopted keeping in mind India’s growing regional and global aspirations which have been accompanied by doubts regarding its ability to influence favourable outcomes in its neighbourhood. More need to incorporate neighbourhood first policy:- A peaceful neighbourhood for economic prosperity- if we foster good relations with our neighbours the region will experience economic growth especially in the underdeveloped border area. More such markets on the line of India-Bangladesh border haat can be opened. To reduce the influence of external powers like China on our immediate neighbours. It will help promote our national security by building more trust with our neighbours. To deal with common challenges like climate change, earthquakes, tsunamis, terrorism etc. Disaster events do not distinguish between political boundaries like the Cyclone Fani. Similarly, terrorism or drug trafficking is also a collective challenge. It will also help us put pressure on Pakistan to stop state-sponsored terrorism in India. A greater role in neighbourhood lines with India’s objective of joining the global power table in institutions such UN security council, Nuclear Supplier’s group etc. A strong bond between neighbours will lead to social progress and cultural development as well. It will also give a boost to tourism and create interdependency. The importance of such a policy can be understood by the statements given by our past Prime ministers. Atal Bihari Vajpayee said that “You can change friends but not neighbours.” Similarly, our present PM Mr.Modi said, “A nation’s destiny is linked to its neighbourhood.” Evolution of neighbourhood first policy in the past few decades:- India realised the importance of its neighbours towards the last decade of the 20th century. The operation cactus by Indian armed forces in 1988 was to stop the coup d’etat in the Maldives. However, the first formal neighbourhood policy came a few years later by the name of the Gujral doctrine. Gujral doctrine came into existence due to the presence of two hostile nations in our neighbourhood. It gave 5 guiding principles with respect to neighbouring countries of Bangladesh, Bhutan, Maldives, Nepal and Sri Lanka. No reciprocity from its neighbours. India will give whatever it can without any expectation. No South Asian country will let its territory to be used against any country in the region. Respect the territorial integrity and sovereignty. Non-interference in domestic affairs. Disputes to be settled through peaceful bilateral negotiations. With changing need the Gujral doctrine evolved in the next decade under Dr Manmohan Singh who advocated the concept of soft border i.e. free trade, open communication etc. to create interdependence among the people living on both sides of the border as south Asia is a single geographic unit with shared cultural past. The neighbourhood first policy underwent further changes under Prime Minister Narendra Modi. The importance to neighbourhood first policy to the government can be seen with the invitation given to the head of state of neighbouring countries in the swearing-in ceremony. More willing to give diplomatic and political priority to India’s immediate neighbours and the Indian Ocean Region nations. For example, India accepted the UN tribunal award regarding the delimitation of the maritime boundary between India and Bangladesh. India will give support to its neighbouring countries if they need it in terms of funds, equipment, human resource development etc. Eg. Aid to Nepal after the earthquake in 2015. Improved connectivity for a free flow of goods, people and capital across the borders. Promote a model of India led regionalism with which its neighbours are comfortable. The present policy is nothing but giving more impetus to the principles laid down under the Gujral doctrine. In the time of declining multilateralism and increasing regionalism, the global threat of terrorism we need to have stronger ties with our neighbours for stability and prosperity.
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अंग्रेजों की भेदभाव पूर्ण नीतियों तथा भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य हितों के टकराव ने ही नहीं बल्कि भारत में राष्ट्रवाद के उदय में अन्य अनेक कारकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Not only the discriminatory policies of the British and the conflict of interest between the Indians and the British, but many other factors also played an important role in the rise of nationalism in India. discuss. (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच - राष्ट्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि(19वीं) से उत्तर का प्रारंभ कर सकते हैं | भारतीय एवं ब्रिटिश हित के मध्य टकराव एवं अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीतियों का संक्षिप्त में परिचय देते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारणों को बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | अंत में भविष्य के राष्ट्रीय आन्दोलन पर इसके प्रभाव की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हितों का टकराव – भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था| ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा भारतीय समाज के हितों का टकराव| विभिन्न कारणों से मध्य वर्ग का उदय हुआ जैसे-उद्योगपति ,शिक्षक ,वकील आदि | इन वर्गों के हित साम्राज्यवादी हितों से मेल नहीं खाते थे क्योंकि शिक्षित वर्ग प्रशासन में उच्च पदों पर एवं विधानमंडलों में भी भागीदारी चाहता था | कुछ अंग्रेज गवर्नरों की प्रतिक्रियावादी व भेदभाव पूर्ण नीतियां - जैसे - सिविल सेवा में भारतीयों के साथ पक्षपात, इल्बर्ट बिल, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, आदि ने भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति द्वेष या विरोध का भाव पैदा किया , तथा राष्ट्रवाद के उदय में अपनी भूमिका निभाई | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारक राजनीतिक –प्रशासनिक एकीकरण – ब्रिटिश सरकार ने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ती के लिए न केवल भारत का राजनीतिक एकीकरण किया बल्कि एक समान प्रशासनिक ढांचा तथा एक जैसे कानूनों को भी लागू किया| समय के साथ समस्याओं का भी एकीकरण हुआ जैसे सम्पूर्ण भारत में एक सामान भू राजस्व प्रणाली लागू थी जिससे होने वाले नकारात्मक प्रभाव सामान थे जिसके विरुद्ध और राष्ट्रीय चेतना के उदय का कारण बना | रेलवे की भूमिका –परस्पर संपर्क में वृद्धि (नेता,संस्था एवं आम व्यक्ति के मध्य ) | भावनावात्मक एकीकरण को बल प्रदान किया क्योंकि लोगों की /राजनीतिक संस्थाओं गतिशीलता में वृद्धि हुई | सामाजिक –धार्मिक आन्दोलन – सुधारकों के द्वारा एक आलोचनात्मक चिंतन परंपरा का विकास हुआ जिसने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रश्न पूंछने व उनकी नीतियों का विश्लेषण करने की परम्परा को जन्म दिया | इसके द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय जाग्रति व चेतना का जन्म हुआ | शिक्षा पद्धत्ति एवं जागरूकता – आधुनिक शिक्षा व अंग्रेजी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका ; शिक्षा के प्रसार के साथ आधुनिक विचारों की भी भूमिका भी थी | शिक्षा के विकास के साथ आधुनिक बेरोजगारों की संख्या में भी वृद्धि हुई |इसी वर्ग ने संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों के विरोध में आवाज़ उठाना प्रारंभ किया | शिक्षा के प्रसार के साथ अंग्रेजी जानने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई ,राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं व संस्थाओं के मध्य समन्वय स्थापित करने ,सरकार के समक्ष आवाज़ उठाने एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रसिद्द बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी | प्रेस की भूमिका एवं आधुनिकता का प्रसार – आधुनिक विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका | प्रारंभिक चरण में संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों की आलोचना प्रारंभ की | इतिहास लेखन –एक तरफ साम्राज्यवादी इतिहास लेखन में विदेशी शासक के औचित्य को स्थापित करने का प्रयास किया गया वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रवादी लेखन में अतीत की उपलब्द्धियों को महत्त्व देकर राष्ट्रीय उर्जा का संचार किया गया | नस्लीय भेद –अंग्रेजों की नस्लीय भेद की नीति (सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश नहीं जैसे- होटल ,रेलवे एवं सरकारी नौकरियों के उच्च पदों पर प्रवेश पर रोक )के कारण भारतीयों में कहीं-न कहीं एक राष्ट्रीय अपमान का बोध हुआ जिसने राष्ट्र स्तर पर इसके विरोध में भावनाओं पर बल मिला | अंततः 1870 के दशक तक राष्ट्रवाद की यह भावना मुखर और क्षेत्रीय व्यापकता प्राप्त कर चूकी थी , जिसने एक राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रखने के लिए आधारशिला का निर्माण किया | इस राष्ट्रवादी भावना के उदय की जड़ें कहीं न कहीं भारतीय हितों के संरक्षण एवं अखिल भारतीय स्तर पर ब्रिटिश विरोध की भावना से सम्बंधित थी | इसके सर्वप्रमुख प्रमाण कांग्रेस जैसे अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण के रूप में देखे गए जिनके द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन में एक संगठित प्रयास किये गए और साथ ही साथ जनता को राजनीतिक रूप से जागृत करने का प्रयास किया जाता रहा |
##Question:अंग्रेजों की भेदभाव पूर्ण नीतियों तथा भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य हितों के टकराव ने ही नहीं बल्कि भारत में राष्ट्रवाद के उदय में अन्य अनेक कारकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Not only the discriminatory policies of the British and the conflict of interest between the Indians and the British, but many other factors also played an important role in the rise of nationalism in India. discuss. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच - राष्ट्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि(19वीं) से उत्तर का प्रारंभ कर सकते हैं | भारतीय एवं ब्रिटिश हित के मध्य टकराव एवं अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीतियों का संक्षिप्त में परिचय देते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारणों को बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | अंत में भविष्य के राष्ट्रीय आन्दोलन पर इसके प्रभाव की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हितों का टकराव – भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था| ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा भारतीय समाज के हितों का टकराव| विभिन्न कारणों से मध्य वर्ग का उदय हुआ जैसे-उद्योगपति ,शिक्षक ,वकील आदि | इन वर्गों के हित साम्राज्यवादी हितों से मेल नहीं खाते थे क्योंकि शिक्षित वर्ग प्रशासन में उच्च पदों पर एवं विधानमंडलों में भी भागीदारी चाहता था | कुछ अंग्रेज गवर्नरों की प्रतिक्रियावादी व भेदभाव पूर्ण नीतियां - जैसे - सिविल सेवा में भारतीयों के साथ पक्षपात, इल्बर्ट बिल, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, आदि ने भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति द्वेष या विरोध का भाव पैदा किया , तथा राष्ट्रवाद के उदय में अपनी भूमिका निभाई | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारक राजनीतिक –प्रशासनिक एकीकरण – ब्रिटिश सरकार ने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ती के लिए न केवल भारत का राजनीतिक एकीकरण किया बल्कि एक समान प्रशासनिक ढांचा तथा एक जैसे कानूनों को भी लागू किया| समय के साथ समस्याओं का भी एकीकरण हुआ जैसे सम्पूर्ण भारत में एक सामान भू राजस्व प्रणाली लागू थी जिससे होने वाले नकारात्मक प्रभाव सामान थे जिसके विरुद्ध और राष्ट्रीय चेतना के उदय का कारण बना | रेलवे की भूमिका –परस्पर संपर्क में वृद्धि (नेता,संस्था एवं आम व्यक्ति के मध्य ) | भावनावात्मक एकीकरण को बल प्रदान किया क्योंकि लोगों की /राजनीतिक संस्थाओं गतिशीलता में वृद्धि हुई | सामाजिक –धार्मिक आन्दोलन – सुधारकों के द्वारा एक आलोचनात्मक चिंतन परंपरा का विकास हुआ जिसने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रश्न पूंछने व उनकी नीतियों का विश्लेषण करने की परम्परा को जन्म दिया | इसके द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय जाग्रति व चेतना का जन्म हुआ | शिक्षा पद्धत्ति एवं जागरूकता – आधुनिक शिक्षा व अंग्रेजी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका ; शिक्षा के प्रसार के साथ आधुनिक विचारों की भी भूमिका भी थी | शिक्षा के विकास के साथ आधुनिक बेरोजगारों की संख्या में भी वृद्धि हुई |इसी वर्ग ने संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों के विरोध में आवाज़ उठाना प्रारंभ किया | शिक्षा के प्रसार के साथ अंग्रेजी जानने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई ,राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं व संस्थाओं के मध्य समन्वय स्थापित करने ,सरकार के समक्ष आवाज़ उठाने एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रसिद्द बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी | प्रेस की भूमिका एवं आधुनिकता का प्रसार – आधुनिक विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका | प्रारंभिक चरण में संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों की आलोचना प्रारंभ की | इतिहास लेखन –एक तरफ साम्राज्यवादी इतिहास लेखन में विदेशी शासक के औचित्य को स्थापित करने का प्रयास किया गया वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रवादी लेखन में अतीत की उपलब्द्धियों को महत्त्व देकर राष्ट्रीय उर्जा का संचार किया गया | नस्लीय भेद –अंग्रेजों की नस्लीय भेद की नीति (सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश नहीं जैसे- होटल ,रेलवे एवं सरकारी नौकरियों के उच्च पदों पर प्रवेश पर रोक )के कारण भारतीयों में कहीं-न कहीं एक राष्ट्रीय अपमान का बोध हुआ जिसने राष्ट्र स्तर पर इसके विरोध में भावनाओं पर बल मिला | अंततः 1870 के दशक तक राष्ट्रवाद की यह भावना मुखर और क्षेत्रीय व्यापकता प्राप्त कर चूकी थी , जिसने एक राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रखने के लिए आधारशिला का निर्माण किया | इस राष्ट्रवादी भावना के उदय की जड़ें कहीं न कहीं भारतीय हितों के संरक्षण एवं अखिल भारतीय स्तर पर ब्रिटिश विरोध की भावना से सम्बंधित थी | इसके सर्वप्रमुख प्रमाण कांग्रेस जैसे अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण के रूप में देखे गए जिनके द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन में एक संगठित प्रयास किये गए और साथ ही साथ जनता को राजनीतिक रूप से जागृत करने का प्रयास किया जाता रहा |
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विगत कुछ वर्षों में भारत एवं बांग्लादेश के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये गए हैं| संगत उदाहरणों के साथ कथन को स्पष्ट कीजिये| (10 अंक;150 से 200 शब्द) Important dimensions of cooperation between India and Bangladesh have been established in the last few years. Explain the statement with relevant examples. (10 marks; 150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों का सक्षिप्त परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में सहयोग के महत्वपूर्ण आयामों को बताते हुए कथन को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में कुछ चुनौतियों और उपायों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| दोनों देशों के मध्य विभिन्न विवादों के होते हुए भी भारत और बांग्लादेश सहयोग के नए स्थापित करने में सफल रहे हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है| पारस्परिक सहयोग के आयाम बांग्लादेश(BD) एक LDC है, यह एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है अतः सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है| यहाँ धान की तीन फसलें उत्पादित की जाती हैं अतः पानी की आवश्यकता बहुत अधिक है| भारत ने इस आवश्यकता को समझते हुए 1996 में 30 वर्ष के लिए फरक्का समझौता किया| जब सबसे कम पानी रहेगा तब भी भारत गंगा में पर्याप्त जल उपलब्ध कराएगा| भारत का यह निर्णय गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट, इसके अंतर्गत एन्क्लेवों का हस्तांतरण किया गया| एन्क्लेव दुसरे देश के भौगोलिक क्षेत्र से घिरे हुए स्वदेशी क्षेत्र होते हैं| ये सभी एन्क्लेव रंगपुर (BD) एवं कूच बिहार(भारत) रियासतों/जमींदारी के अंतर्गत थे| भारत सरकार द्वारा 2011 में पुनः यह समझौता किया गया| इसमें भारत ने अपनी 10हजार एकड़ भूमि अधिक दी है (आंतरिक शान्ति एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से) यह कदम गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है समुद्री सीमा विवाद-इस विवाद के केंद्र में हरिभंगा नदी है| दोनों देशों द्वारा हरिभंगा नदी के बहाव का अलग अलग क्षेत्र माना जाता है| इसी बहाव के आधार पर समुद्री सीमा का निर्धारण होगा, इसी कारण विवाद था| अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के निर्णय के आधार पर भारत ने 18हजार किमी का क्षेत्र BD को दे दिया गया|यह समझौता भी गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है| दोनों देशों ने क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है| दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग के दो सन्गठन हैं यथा सार्क एवं बिम्सटेक|सार्क अभी निष्क्रिय स्थिति है|भारत इस समय बिम्सटेक को अधिक महत्त्व दे रहा है यह आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग के लिए बनाया गया है(1997)|इसमें भारत नेपाल भूटान श्रीलंका एवं ब्नाग्लादेश के साथ ही म्यांमार एवं थाईलैंड सदस्य राष्ट्र हैं| NE राज्यों के विकास के लिए भारत बांग्लादेश के साथ कनेक्टिविटी स्थापित करना आवश्यक है| इस सन्दर्भ में असम से बांग्लादेश को ऊर्जा पाइप लाइन शुरू कर दी गयी है| राष्ट्रीय जल मार्ग 1 को आगे बढ़ा कर बांग्लादेश तक ले जाने की योजना लायी गयी है, इससे दोनों के मध्य होने वाले व्यापार की लागत में कमी आएगी| त्रिपुरा एवं मिजोरम तक जाने के लिए कोलकाता ढाका रेलमार्ग को आगे बढाते हुए इसे अगरतला तक ले जाने की योजना है| इसी तरह विभिन्न कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है| आर्थिक सहयोग-BD ऊर्जा की चुनौती का सामना कर रहा है अतः भारत BD को अपने ऊर्जा ग्रिड से जोड़ रहा है| भारत रूपपुर में नाभिकीय ऊर्जा केंद्र का विकास कर रहा है|BD में चल रही रेल मार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाओं में कुल निवेश भारत द्वारा किया जा रहा है| भारत यह सहयोगलाइन ऑफ़ क्रेडिट के माध्यम से कर रहा है सुरक्षा सहयोग-BD में भारत विरोधी शक्तियों की उपस्थिति हैइसके साथ ही NE राज्यों के उग्रवादियों को बांग्लादेश से सहायता मिलती थी|अतः भारत-बांग्लादेश ने प्रत्यर्पण की संधि की है जिससे आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई है|भारत-बांग्लादेश के मध्य साइबर सुरक्षा के लिए समझौता ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है इससे ISIS के विस्तार पर नियंत्रण, वित्तीय जालसाजी आदि पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा| रोहिंग्या मामला-BD में लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं और माना जाता है कि लगभग 40 हजार रोहिंग्या भारत में आ चुके हैं| भारत ने नकारात्मक आसूचना के आधार पर रोहिंग्या को शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया हैभारत इस मामले मे ओपरेशन इंसानियत के माध्यम से BD का सहयोग कर रहा है, इस सहयोग में शरणार्थी प्रबंधन एवं राहत कार्यों के लिए सहायता उपलब्ध कराई जा रही है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग-यह सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी का एक भाग है इसके माध्यम से दोनों देशों के मध्यट्रैक 2 डिप्लोमेसी को बल दिया जा सकेगा| इसके अंतर्गत शेख मुजीबुर्रहमान पर आधारित फिल्म का निर्माण किया जा रहा है| दोनों देशों में रविन्द्रनाथ टैगोर पर आधारित कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है|नेशनल नॉलेज नेटवर्क का बांग्लादेश तक विस्तार किया जा रहा है इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत-बांग्लादेश ने आपसी सम्बन्धों को विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से निरंतर मजबूत किया है| किन्तु इसके साथ ही भारत बांग्लादेश के मध्य तीस्ता विवाद,तिपाईमुख परियोजना सम्बन्धी विवाद, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर आदि मुद्दों के साथ ही चीन के साथ बांग्लादेश कि घनिष्ठता भारत के समक्ष चुनौतियां पेश करते हैं| भारत को सहयोग के विभिन्न आयामों पर कार्य करते हुए इन मुद्दों के समाधान का भी प्रयास करना चाहिए|
##Question:विगत कुछ वर्षों में भारत एवं बांग्लादेश के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये गए हैं| संगत उदाहरणों के साथ कथन को स्पष्ट कीजिये| (10 अंक;150 से 200 शब्द) Important dimensions of cooperation between India and Bangladesh have been established in the last few years. Explain the statement with relevant examples. (10 marks; 150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों का सक्षिप्त परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में सहयोग के महत्वपूर्ण आयामों को बताते हुए कथन को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में कुछ चुनौतियों और उपायों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| दोनों देशों के मध्य विभिन्न विवादों के होते हुए भी भारत और बांग्लादेश सहयोग के नए स्थापित करने में सफल रहे हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है| पारस्परिक सहयोग के आयाम बांग्लादेश(BD) एक LDC है, यह एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है अतः सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है| यहाँ धान की तीन फसलें उत्पादित की जाती हैं अतः पानी की आवश्यकता बहुत अधिक है| भारत ने इस आवश्यकता को समझते हुए 1996 में 30 वर्ष के लिए फरक्का समझौता किया| जब सबसे कम पानी रहेगा तब भी भारत गंगा में पर्याप्त जल उपलब्ध कराएगा| भारत का यह निर्णय गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट, इसके अंतर्गत एन्क्लेवों का हस्तांतरण किया गया| एन्क्लेव दुसरे देश के भौगोलिक क्षेत्र से घिरे हुए स्वदेशी क्षेत्र होते हैं| ये सभी एन्क्लेव रंगपुर (BD) एवं कूच बिहार(भारत) रियासतों/जमींदारी के अंतर्गत थे| भारत सरकार द्वारा 2011 में पुनः यह समझौता किया गया| इसमें भारत ने अपनी 10हजार एकड़ भूमि अधिक दी है (आंतरिक शान्ति एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से) यह कदम गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है समुद्री सीमा विवाद-इस विवाद के केंद्र में हरिभंगा नदी है| दोनों देशों द्वारा हरिभंगा नदी के बहाव का अलग अलग क्षेत्र माना जाता है| इसी बहाव के आधार पर समुद्री सीमा का निर्धारण होगा, इसी कारण विवाद था| अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के निर्णय के आधार पर भारत ने 18हजार किमी का क्षेत्र BD को दे दिया गया|यह समझौता भी गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है| दोनों देशों ने क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है| दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग के दो सन्गठन हैं यथा सार्क एवं बिम्सटेक|सार्क अभी निष्क्रिय स्थिति है|भारत इस समय बिम्सटेक को अधिक महत्त्व दे रहा है यह आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग के लिए बनाया गया है(1997)|इसमें भारत नेपाल भूटान श्रीलंका एवं ब्नाग्लादेश के साथ ही म्यांमार एवं थाईलैंड सदस्य राष्ट्र हैं| NE राज्यों के विकास के लिए भारत बांग्लादेश के साथ कनेक्टिविटी स्थापित करना आवश्यक है| इस सन्दर्भ में असम से बांग्लादेश को ऊर्जा पाइप लाइन शुरू कर दी गयी है| राष्ट्रीय जल मार्ग 1 को आगे बढ़ा कर बांग्लादेश तक ले जाने की योजना लायी गयी है, इससे दोनों के मध्य होने वाले व्यापार की लागत में कमी आएगी| त्रिपुरा एवं मिजोरम तक जाने के लिए कोलकाता ढाका रेलमार्ग को आगे बढाते हुए इसे अगरतला तक ले जाने की योजना है| इसी तरह विभिन्न कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है| आर्थिक सहयोग-BD ऊर्जा की चुनौती का सामना कर रहा है अतः भारत BD को अपने ऊर्जा ग्रिड से जोड़ रहा है| भारत रूपपुर में नाभिकीय ऊर्जा केंद्र का विकास कर रहा है|BD में चल रही रेल मार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाओं में कुल निवेश भारत द्वारा किया जा रहा है| भारत यह सहयोगलाइन ऑफ़ क्रेडिट के माध्यम से कर रहा है सुरक्षा सहयोग-BD में भारत विरोधी शक्तियों की उपस्थिति हैइसके साथ ही NE राज्यों के उग्रवादियों को बांग्लादेश से सहायता मिलती थी|अतः भारत-बांग्लादेश ने प्रत्यर्पण की संधि की है जिससे आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई है|भारत-बांग्लादेश के मध्य साइबर सुरक्षा के लिए समझौता ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है इससे ISIS के विस्तार पर नियंत्रण, वित्तीय जालसाजी आदि पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा| रोहिंग्या मामला-BD में लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं और माना जाता है कि लगभग 40 हजार रोहिंग्या भारत में आ चुके हैं| भारत ने नकारात्मक आसूचना के आधार पर रोहिंग्या को शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया हैभारत इस मामले मे ओपरेशन इंसानियत के माध्यम से BD का सहयोग कर रहा है, इस सहयोग में शरणार्थी प्रबंधन एवं राहत कार्यों के लिए सहायता उपलब्ध कराई जा रही है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग-यह सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी का एक भाग है इसके माध्यम से दोनों देशों के मध्यट्रैक 2 डिप्लोमेसी को बल दिया जा सकेगा| इसके अंतर्गत शेख मुजीबुर्रहमान पर आधारित फिल्म का निर्माण किया जा रहा है| दोनों देशों में रविन्द्रनाथ टैगोर पर आधारित कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है|नेशनल नॉलेज नेटवर्क का बांग्लादेश तक विस्तार किया जा रहा है इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत-बांग्लादेश ने आपसी सम्बन्धों को विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से निरंतर मजबूत किया है| किन्तु इसके साथ ही भारत बांग्लादेश के मध्य तीस्ता विवाद,तिपाईमुख परियोजना सम्बन्धी विवाद, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर आदि मुद्दों के साथ ही चीन के साथ बांग्लादेश कि घनिष्ठता भारत के समक्ष चुनौतियां पेश करते हैं| भारत को सहयोग के विभिन्न आयामों पर कार्य करते हुए इन मुद्दों के समाधान का भी प्रयास करना चाहिए|
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विगत कुछ वर्षों में भारत एवं बांग्लादेश के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये गए हैं| संगत उदाहरणों के साथ कथन को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Important dimensions of cooperation between India and Bangladesh have been established in the last few years. Explain the statement with relevant examples. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों का सक्षिप्त परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में सहयोग के महत्वपूर्ण आयामों को बताते हुए कथन को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में कुछ चुनौतियों और उपायों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| दोनों देशों के मध्य विभिन्न विवादों के होते हुए भी भारत और बांग्लादेश सहयोग के नए स्थापित करने में सफल रहे हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है| पारस्परिक सहयोग के आयाम बांग्लादेश(BD) एक LDC है, यह एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है अतः सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है| यहाँ धान की तीन फसलें उत्पादित की जाती हैं अतः पानी की आवश्यकता बहुत अधिक है| भारत ने इस आवश्यकता को समझते हुए 1996 में 30 वर्ष के लिए फरक्का समझौता किया| जब सबसे कम पानी रहेगा तब भी भारत गंगा में पर्याप्त जल उपलब्ध कराएगा| भारत का यह निर्णय गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट, इसके अंतर्गत एन्क्लेवों का हस्तांतरण किया गया| एन्क्लेव दुसरे देश के भौगोलिक क्षेत्र से घिरे हुए स्वदेशी क्षेत्र होते हैं| ये सभी एन्क्लेव रंगपुर (BD) एवं कूच बिहार(भारत) रियासतों/जमींदारी के अंतर्गत थे| भारत सरकार द्वारा 2011 में पुनः यह समझौता किया गया| इसमें भारत ने अपनी 10हजार एकड़ भूमि अधिक दी है (आंतरिक शान्ति एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से) यह कदम गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है समुद्री सीमा विवाद-इस विवाद के केंद्र में हरिभंगा नदी है| दोनों देशों द्वारा हरिभंगा नदी के बहाव का अलग अलग क्षेत्र माना जाता है| इसी बहाव के आधार पर समुद्री सीमा का निर्धारण होगा, इसी कारण विवाद था| अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के निर्णय के आधार पर भारत ने 18हजार किमी का क्षेत्र BD को दे दिया गया|यह समझौता भी गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है| दोनों देशों ने क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है| दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग के दो सन्गठन हैं यथा सार्क एवं बिम्सटेक|सार्क अभी निष्क्रिय स्थिति है|भारत इस समय बिम्सटेक को अधिक महत्त्व दे रहा है यह आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग के लिए बनाया गया है(1997)|इसमें भारत नेपाल भूटान श्रीलंका एवं ब्नाग्लादेश के साथ ही म्यांमार एवं थाईलैंड सदस्य राष्ट्र हैं| NE राज्यों के विकास के लिए भारत बांग्लादेश के साथ कनेक्टिविटी स्थापित करना आवश्यक है| इस सन्दर्भ में असम से बांग्लादेश को ऊर्जा पाइप लाइन शुरू कर दी गयी है| राष्ट्रीय जल मार्ग 1 को आगे बढ़ा कर बांग्लादेश तक ले जाने की योजना लायी गयी है, इससे दोनों के मध्य होने वाले व्यापार की लागत में कमी आएगी| त्रिपुरा एवं मिजोरम तक जाने के लिए कोलकाता ढाका रेलमार्ग को आगे बढाते हुए इसे अगरतला तक ले जाने की योजना है| इसी तरह विभिन्न कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है| आर्थिक सहयोग-BD ऊर्जा की चुनौती का सामना कर रहा है अतः भारत BD को अपने ऊर्जा ग्रिड से जोड़ रहा है| भारत रूपपुर में नाभिकीय ऊर्जा केंद्र का विकास कर रहा है|BD में चल रही रेल मार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाओं में कुल निवेश भारत द्वारा किया जा रहा है| भारत यह सहयोगलाइन ऑफ़ क्रेडिट के माध्यम से कर रहा है सुरक्षा सहयोग-BD में भारत विरोधी शक्तियों की उपस्थिति हैइसके साथ ही NE राज्यों के उग्रवादियों को बांग्लादेश से सहायता मिलती थी|अतः भारत-बांग्लादेश ने प्रत्यर्पण की संधि की है जिससे आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई है|भारत-बांग्लादेश के मध्य साइबर सुरक्षा के लिए समझौता ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है इससे ISIS के विस्तार पर नियंत्रण, वित्तीय जालसाजी आदि पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा| रोहिंग्या मामला-BD में लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं और माना जाता है कि लगभग 40 हजार रोहिंग्या भारत में आ चुके हैं| भारत ने नकारात्मक आसूचना के आधार पर रोहिंग्या को शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया हैभारत इस मामले मे ओपरेशन इंसानियत के माध्यम से BD का सहयोग कर रहा है, इस सहयोग में शरणार्थी प्रबंधन एवं राहत कार्यों के लिए सहायता उपलब्ध कराई जा रही है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग-यह सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी का एक भाग है इसके माध्यम से दोनों देशों के मध्यट्रैक 2 डिप्लोमेसी को बल दिया जा सकेगा| इसके अंतर्गत शेख मुजीबुर्रहमान पर आधारित फिल्म का निर्माण किया जा रहा है| दोनों देशों में रविन्द्रनाथ टैगोर पर आधारित कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है|नेशनल नॉलेज नेटवर्क का बांग्लादेश तक विस्तार किया जा रहा है इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत-बांग्लादेश ने आपसी सम्बन्धों को विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से निरंतर मजबूत किया है| किन्तु इसके साथ ही भारत बांग्लादेश के मध्य तीस्ता विवाद,तिपाईमुख परियोजना सम्बन्धी विवाद, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर आदि मुद्दों के साथ ही चीन के साथ बांग्लादेश कि घनिष्ठता भारत के समक्ष चुनौतियां पेश करते हैं| भारत को सहयोग के विभिन्न आयामों पर कार्य करते हुए इन मुद्दों के समाधान का भी प्रयास करना चाहिए|
##Question:विगत कुछ वर्षों में भारत एवं बांग्लादेश के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये गए हैं| संगत उदाहरणों के साथ कथन को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Important dimensions of cooperation between India and Bangladesh have been established in the last few years. Explain the statement with relevant examples. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों का सक्षिप्त परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में सहयोग के महत्वपूर्ण आयामों को बताते हुए कथन को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में कुछ चुनौतियों और उपायों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही उसको एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला प्रथम देश भारत प्रथम राष्ट्र था| उसके बाद से ही भारत एवं बांग्ला देश के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की स्थापना हुई| तब से ले कर भारत बांग्लादेश सम्बन्ध उतार-चढाव युक्त रहे हैं| दोनों देशों के मध्य विभिन्न विवादों के होते हुए भी भारत और बांग्लादेश सहयोग के नए स्थापित करने में सफल रहे हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझा जा सकता है| पारस्परिक सहयोग के आयाम बांग्लादेश(BD) एक LDC है, यह एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है अतः सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता है| यहाँ धान की तीन फसलें उत्पादित की जाती हैं अतः पानी की आवश्यकता बहुत अधिक है| भारत ने इस आवश्यकता को समझते हुए 1996 में 30 वर्ष के लिए फरक्का समझौता किया| जब सबसे कम पानी रहेगा तब भी भारत गंगा में पर्याप्त जल उपलब्ध कराएगा| भारत का यह निर्णय गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट, इसके अंतर्गत एन्क्लेवों का हस्तांतरण किया गया| एन्क्लेव दुसरे देश के भौगोलिक क्षेत्र से घिरे हुए स्वदेशी क्षेत्र होते हैं| ये सभी एन्क्लेव रंगपुर (BD) एवं कूच बिहार(भारत) रियासतों/जमींदारी के अंतर्गत थे| भारत सरकार द्वारा 2011 में पुनः यह समझौता किया गया| इसमें भारत ने अपनी 10हजार एकड़ भूमि अधिक दी है (आंतरिक शान्ति एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से) यह कदम गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है समुद्री सीमा विवाद-इस विवाद के केंद्र में हरिभंगा नदी है| दोनों देशों द्वारा हरिभंगा नदी के बहाव का अलग अलग क्षेत्र माना जाता है| इसी बहाव के आधार पर समुद्री सीमा का निर्धारण होगा, इसी कारण विवाद था| अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के निर्णय के आधार पर भारत ने 18हजार किमी का क्षेत्र BD को दे दिया गया|यह समझौता भी गुजराल सिद्धांत के अनुरूप है| दोनों देशों ने क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है| दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग के दो सन्गठन हैं यथा सार्क एवं बिम्सटेक|सार्क अभी निष्क्रिय स्थिति है|भारत इस समय बिम्सटेक को अधिक महत्त्व दे रहा है यह आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग के लिए बनाया गया है(1997)|इसमें भारत नेपाल भूटान श्रीलंका एवं ब्नाग्लादेश के साथ ही म्यांमार एवं थाईलैंड सदस्य राष्ट्र हैं| NE राज्यों के विकास के लिए भारत बांग्लादेश के साथ कनेक्टिविटी स्थापित करना आवश्यक है| इस सन्दर्भ में असम से बांग्लादेश को ऊर्जा पाइप लाइन शुरू कर दी गयी है| राष्ट्रीय जल मार्ग 1 को आगे बढ़ा कर बांग्लादेश तक ले जाने की योजना लायी गयी है, इससे दोनों के मध्य होने वाले व्यापार की लागत में कमी आएगी| त्रिपुरा एवं मिजोरम तक जाने के लिए कोलकाता ढाका रेलमार्ग को आगे बढाते हुए इसे अगरतला तक ले जाने की योजना है| इसी तरह विभिन्न कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है| आर्थिक सहयोग-BD ऊर्जा की चुनौती का सामना कर रहा है अतः भारत BD को अपने ऊर्जा ग्रिड से जोड़ रहा है| भारत रूपपुर में नाभिकीय ऊर्जा केंद्र का विकास कर रहा है|BD में चल रही रेल मार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाओं में कुल निवेश भारत द्वारा किया जा रहा है| भारत यह सहयोगलाइन ऑफ़ क्रेडिट के माध्यम से कर रहा है सुरक्षा सहयोग-BD में भारत विरोधी शक्तियों की उपस्थिति हैइसके साथ ही NE राज्यों के उग्रवादियों को बांग्लादेश से सहायता मिलती थी|अतः भारत-बांग्लादेश ने प्रत्यर्पण की संधि की है जिससे आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई है|भारत-बांग्लादेश के मध्य साइबर सुरक्षा के लिए समझौता ज्ञापन प्रस्तुत किया गया है इससे ISIS के विस्तार पर नियंत्रण, वित्तीय जालसाजी आदि पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा| रोहिंग्या मामला-BD में लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं और माना जाता है कि लगभग 40 हजार रोहिंग्या भारत में आ चुके हैं| भारत ने नकारात्मक आसूचना के आधार पर रोहिंग्या को शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया हैभारत इस मामले मे ओपरेशन इंसानियत के माध्यम से BD का सहयोग कर रहा है, इस सहयोग में शरणार्थी प्रबंधन एवं राहत कार्यों के लिए सहायता उपलब्ध कराई जा रही है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग-यह सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी का एक भाग है इसके माध्यम से दोनों देशों के मध्यट्रैक 2 डिप्लोमेसी को बल दिया जा सकेगा| इसके अंतर्गत शेख मुजीबुर्रहमान पर आधारित फिल्म का निर्माण किया जा रहा है| दोनों देशों में रविन्द्रनाथ टैगोर पर आधारित कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है|नेशनल नॉलेज नेटवर्क का बांग्लादेश तक विस्तार किया जा रहा है इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत-बांग्लादेश ने आपसी सम्बन्धों को विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से निरंतर मजबूत किया है| किन्तु इसके साथ ही भारत बांग्लादेश के मध्य तीस्ता विवाद,तिपाईमुख परियोजना सम्बन्धी विवाद, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर आदि मुद्दों के साथ ही चीन के साथ बांग्लादेश कि घनिष्ठता भारत के समक्ष चुनौतियां पेश करते हैं| भारत को सहयोग के विभिन्न आयामों पर कार्य करते हुए इन मुद्दों के समाधान का भी प्रयास करना चाहिए|
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अंग्रेजों की भेदभाव पूर्ण नीतियां तथा भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य हितों के टकराव ने, राष्ट्रवाद के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इस कथन के आलोक में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के अन्य कारणों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) The discriminatory policies of the British and the conflict of the interests between the Indians and the British, played an important role in the rise of nationalism. In the light of this statement, underline the other reasons for the rise of nationalism in India. (150-200 words)
एप्रोच - राष्ट्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि(19वीं) से उत्तर का प्रारंभ कर सकते हैं | भारतीय एवं ब्रिटिश हित के मध्य टकराव एवं अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीतियों का संक्षिप्त में परिचय देते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारणों को बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | अंत में भविष्य के राष्ट्रीय आन्दोलन पर इसके प्रभाव की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हितों का टकराव – भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था| ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा भारतीय समाज के हितों का टकराव| विभिन्न कारणों से मध्य वर्ग का उदय हुआ जैसे-उद्योगपति ,शिक्षक ,वकील आदि | इन वर्गों के हित साम्राज्यवादी हितों से मेल नहीं खाते थे क्योंकि शिक्षित वर्ग प्रशासन में उच्च पदों पर एवं विधानमंडलों में भी भागीदारी चाहता था | कुछ अंग्रेज गवर्नरों की प्रतिक्रियावादी व भेदभाव पूर्ण नीतियां -जैसे - सिविल सेवा में भारतीयों के साथ पक्षपात, इल्बर्ट बिल, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, आदि ने भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति द्वेष या विरोध का भाव पैदा किया , तथा राष्ट्रवाद के उदय में अपनी भूमिका निभाई | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारण राजनीतिक –प्रशासनिक एकीकरण – ब्रिटिश सरकार ने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ती के लिए न केवल भारत का राजनीतिक एकीकरण किया बल्कि एक समान प्रशासनिक ढांचा तथा एक जैसे कानूनों को भी लागू किया| समय के साथ समस्याओं का भी एकीकरण हुआ जैसे सम्पूर्ण भारत में एक सामान भू राजस्व प्रणाली लागू थी जिससे होने वाले नकारात्मक प्रभाव सामान थे जिसके विरुद्ध और राष्ट्रीय चेतना के उदय का कारण बना | रेलवे की भूमिका –परस्पर संपर्क में वृद्धि (नेता,संस्था एवं आम व्यक्ति के मध्य ) | भावनावात्मक एकीकरण को बल प्रदान किया क्योंकि लोगों की /राजनीतिक संस्थाओं गतिशीलता में वृद्धि हुई | सामाजिक –धार्मिक आन्दोलन – सुधारकों के द्वारा एक आलोचनात्मक चिंतन परंपरा का विकास हुआ जिसने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रश्न पूंछने व उनकी नीतियों का विश्लेषण करने की परम्परा को जन्म दिया | इसके द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय जाग्रति व चेतना का जन्म हुआ | शिक्षा पद्धत्ति एवं जागरूकता – आधुनिक शिक्षा व अंग्रेजी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका ; शिक्षा के प्रसार के साथ आधुनिक विचारों की भी भूमिका भी थी | शिक्षा के विकास के साथ आधुनिक बेरोजगारों की संख्या में भी वृद्धि हुई |इसी वर्ग ने संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों के विरोध में आवाज़ उठाना प्रारंभ किया | शिक्षा के प्रसार के साथ अंग्रेजी जानने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई ,राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं व संस्थाओं के मध्य समन्वय स्थापित करने ,सरकार के समक्ष आवाज़ उठाने एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रसिद्द बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी | प्रेस की भूमिका एवं आधुनिकता का प्रसार – आधुनिक विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका | प्रारंभिक चरण में संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों की आलोचना प्रारंभ की | इतिहास लेखन –एक तरफ साम्राज्यवादी इतिहास लेखन में विदेशी शासक के औचित्य को स्थापित करने का प्रयास किया गया वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रवादी लेखन में अतीत की उपलब्द्धियों को महत्त्व देकर राष्ट्रीय उर्जा का संचार किया गया | नस्लीय भेद –अंग्रेजों की नस्लीय भेद की नीति (सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश नहीं जैसे- होटल ,रेलवे एवं सरकारी नौकरियों के उच्च पदों पर प्रवेश पर रोक )के कारण भारतीयों में कहीं-न कहीं एक राष्ट्रीय अपमान का बोध हुआ जिसने राष्ट्र स्तर पर इसके विरोध में भावनाओं पर बल मिला | अंततः 1870 के दशक तक राष्ट्रवाद की यह भावना मुखर और क्षेत्रीय व्यापकता प्राप्त कर चूकी थी , जिसने एक राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रखने के लिए आधारशिला का निर्माण किया | इस राष्ट्रवादी भावना के उदय की जड़ें कहीं न कहीं भारतीय हितों के संरक्षण एवं अखिल भारतीय स्तर पर ब्रिटिश विरोध की भावना से सम्बंधित थी | इसके सर्वप्रमुख प्रमाण कांग्रेस जैसे अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण के रूप में देखे गए जिनके द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन में एक संगठित प्रयास किये गए और साथ ही साथ जनता को राजनीतिक रूप से जागृत करने का प्रयास किया जाता रहा |
##Question:अंग्रेजों की भेदभाव पूर्ण नीतियां तथा भारतीयों और अंग्रेजों के मध्य हितों के टकराव ने, राष्ट्रवाद के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इस कथन के आलोक में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के अन्य कारणों को भी रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) The discriminatory policies of the British and the conflict of the interests between the Indians and the British, played an important role in the rise of nationalism. In the light of this statement, underline the other reasons for the rise of nationalism in India. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - राष्ट्रवाद के उदय की पृष्ठभूमि(19वीं) से उत्तर का प्रारंभ कर सकते हैं | भारतीय एवं ब्रिटिश हित के मध्य टकराव एवं अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीतियों का संक्षिप्त में परिचय देते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारणों को बताते हुए उत्तर को आगे बढाइये | अंत में भविष्य के राष्ट्रीय आन्दोलन पर इसके प्रभाव की चर्चा करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - हितों का टकराव – भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था| ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा भारतीय समाज के हितों का टकराव| विभिन्न कारणों से मध्य वर्ग का उदय हुआ जैसे-उद्योगपति ,शिक्षक ,वकील आदि | इन वर्गों के हित साम्राज्यवादी हितों से मेल नहीं खाते थे क्योंकि शिक्षित वर्ग प्रशासन में उच्च पदों पर एवं विधानमंडलों में भी भागीदारी चाहता था | कुछ अंग्रेज गवर्नरों की प्रतिक्रियावादी व भेदभाव पूर्ण नीतियां -जैसे - सिविल सेवा में भारतीयों के साथ पक्षपात, इल्बर्ट बिल, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, आदि ने भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति द्वेष या विरोध का भाव पैदा किया , तथा राष्ट्रवाद के उदय में अपनी भूमिका निभाई | राष्ट्रवाद के उदय के लिए अन्य महत्वपूर्ण कारण राजनीतिक –प्रशासनिक एकीकरण – ब्रिटिश सरकार ने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ती के लिए न केवल भारत का राजनीतिक एकीकरण किया बल्कि एक समान प्रशासनिक ढांचा तथा एक जैसे कानूनों को भी लागू किया| समय के साथ समस्याओं का भी एकीकरण हुआ जैसे सम्पूर्ण भारत में एक सामान भू राजस्व प्रणाली लागू थी जिससे होने वाले नकारात्मक प्रभाव सामान थे जिसके विरुद्ध और राष्ट्रीय चेतना के उदय का कारण बना | रेलवे की भूमिका –परस्पर संपर्क में वृद्धि (नेता,संस्था एवं आम व्यक्ति के मध्य ) | भावनावात्मक एकीकरण को बल प्रदान किया क्योंकि लोगों की /राजनीतिक संस्थाओं गतिशीलता में वृद्धि हुई | सामाजिक –धार्मिक आन्दोलन – सुधारकों के द्वारा एक आलोचनात्मक चिंतन परंपरा का विकास हुआ जिसने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रश्न पूंछने व उनकी नीतियों का विश्लेषण करने की परम्परा को जन्म दिया | इसके द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय जाग्रति व चेतना का जन्म हुआ | शिक्षा पद्धत्ति एवं जागरूकता – आधुनिक शिक्षा व अंग्रेजी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका ; शिक्षा के प्रसार के साथ आधुनिक विचारों की भी भूमिका भी थी | शिक्षा के विकास के साथ आधुनिक बेरोजगारों की संख्या में भी वृद्धि हुई |इसी वर्ग ने संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों के विरोध में आवाज़ उठाना प्रारंभ किया | शिक्षा के प्रसार के साथ अंग्रेजी जानने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई ,राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं व संस्थाओं के मध्य समन्वय स्थापित करने ,सरकार के समक्ष आवाज़ उठाने एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रसिद्द बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी | प्रेस की भूमिका एवं आधुनिकता का प्रसार – आधुनिक विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका | प्रारंभिक चरण में संगठन एवं वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों की आलोचना प्रारंभ की | इतिहास लेखन –एक तरफ साम्राज्यवादी इतिहास लेखन में विदेशी शासक के औचित्य को स्थापित करने का प्रयास किया गया वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रवादी लेखन में अतीत की उपलब्द्धियों को महत्त्व देकर राष्ट्रीय उर्जा का संचार किया गया | नस्लीय भेद –अंग्रेजों की नस्लीय भेद की नीति (सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश नहीं जैसे- होटल ,रेलवे एवं सरकारी नौकरियों के उच्च पदों पर प्रवेश पर रोक )के कारण भारतीयों में कहीं-न कहीं एक राष्ट्रीय अपमान का बोध हुआ जिसने राष्ट्र स्तर पर इसके विरोध में भावनाओं पर बल मिला | अंततः 1870 के दशक तक राष्ट्रवाद की यह भावना मुखर और क्षेत्रीय व्यापकता प्राप्त कर चूकी थी , जिसने एक राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रखने के लिए आधारशिला का निर्माण किया | इस राष्ट्रवादी भावना के उदय की जड़ें कहीं न कहीं भारतीय हितों के संरक्षण एवं अखिल भारतीय स्तर पर ब्रिटिश विरोध की भावना से सम्बंधित थी | इसके सर्वप्रमुख प्रमाण कांग्रेस जैसे अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण के रूप में देखे गए जिनके द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन में एक संगठित प्रयास किये गए और साथ ही साथ जनता को राजनीतिक रूप से जागृत करने का प्रयास किया जाता रहा |
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उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में चुनौतियाँ उपस्थित कर रहे हैं । साथ ही इनसे निपटने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिए । (10अंक/150-200 शब्द ) Discuss the issues that present challenges in the path of India-Bangladesh relations. Also, give some suggestions to deal with them. (10 marks/150-200 words)
दृष्टिकोण: भारत-बांग्लादेश संबंधों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । बिन्दुवार रूप में उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में चुनौती उत्पन्न कर रहे हैं । इन चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव दीजिये । उत्तर: दक्षिण एशिया में भारत और बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में उभर कर सामने आए हैं । पिछला एक दशक भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण रहा है । इस दौरान कई पुराने विवादों को सुलझाया गया और साथ ही सहयोग के कई क्षेत्रों को भी बढ़ावा मिला । उदाहरण के रूप में हम भारत-बांग्लादेश एंक्लेव समझौता, फेनी ब्रिज, कोलकाता-ढाका रेल , बांग्लादेश के लिए लाइन ऑफ क्रेडिट आदि की चर्चा कर सकते हैं । परंतु अभी भी कुछ ऐसे मुद्दे विधमान है जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं । इस संदर्भ में हम निम्नलिखित की चर्चा कर सकते हैं : 1. नदी जल विवाद : तीस्ता नदी जल विवाद: तीस्ता नदी के जल के बंटवारे को लेकर अभी तक भारत व बांग्लादेश के बीच कोई स्पष्ट व मान्य समझौता नहीं हो पाया है । भविष्य में भी यह भारत और बांग्लादेश के संबंधों को प्रतिकूल रूप में प्रभावित कर सकता है । तिपाइमुख परियोजना : तिपाइमुख बराक नदी पर प्रस्तावित एक बांध है जिसको लेकर बांग्लादेश की आपत्तियाँ हैं । इसी प्रकार गंगा नदी जल के बंटवारे को लेकर भी कुछ विवाद है जो भविष्य में और चुनौती उपस्थित कर सकता है । 2. असम में NRC का मुद्दा : अवैध प्रवासन का मुद्दा असम की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है । हालिया NRC में जिन 40 लाख लोगों को अवैध बंगलादेशी नागरिक बताया गया है , बांग्लादेश उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होगा । साथ ही यह द्विपक्षीय संबंधों में तनाव भी उत्पन्न करेगा । 3. सीमा प्रबंधन : ड्रग तस्करी व अवैध व्यापार तथा घुसपैठ के कारण भारत व बांग्लादेश के बीच सीमा प्रबंधन सदैव एक विवादित व चुनौतिपूर्ण विषय रहा है जो आगे भी संबंधों को नकारात्मक रूप में प्रभावित कर सकता है । 4. उग्रवादी समूहों की भूमिका : HUJI, HUJI-B, जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों द्वारा बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया जाता रहा है । 5. चीन की भूमिका : बांग्लादेश चीन को भारत के विरुद्ध संतुलनकारी शक्ति के रूप में प्रयोग करता है । यह बेहद सूक्ष्म संतुलन पर आधारित है । भविष्य में बांग्लादेश में यदि कोई भारत विरोधी गुट सत्ता में आता है तो वह चीन कार्ड का प्रयोग भारत के विरुद्ध कर सकता है जो भारतीय हितों के लिए प्रतिकूल होगा । 6. रोहिङ्ग्या संकट : रोहिङ्ग्या शरणार्थी संकट भी भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में एक बड़ी चुनौती उत्पन्न कर रहा है । इन मुद्दों के समाधान हेतु सुझाव : नदी जल विवाद को निपटाने हेतु भारत सिंधु जल समझौता की तर्ज पर बांग्लादेश के साथ भी संधि कर सकता है । भारत को गुज़राल सिद्धांत के अनुरूप समझौता कर बांग्लादेश के साथ संबंधों में विश्वास को बढ़ावा देना चाहिए । NRC जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई एकतरफा निर्णय देने से पूर्व बांग्लादेश के साथ समझौता व बातचीत किया जाना आवश्यक । साथ ही इस मुद्दे पर नेताओं की अनावश्यक बयानबाजी को भी सीमित किया जाना चाहिए । बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकी का प्रयोग किया जा सकता है । साथ ही छिद्रित सीमा वाले अन्य देशों के बेहतर प्रबंधन से भी सीखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त बांग्लादेश व भारतीय सीमा सुरक्षा बल के बीच बेहतर सहयोग को बड़वा देना इस दिशा में एक अच्छा कदम होगा । भारत को बांग्लादेश के आंतरिक राजनीति से दूर रहना चाहिए तथा दूसरे विपक्षी दलों के साथ भी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए तैयार रहना चाहिए । चीन के प्रभाव को सीमित करने के लिए बांग्लादेश के लाइन ऑफ क्रेडिट को बढ़ाना चाहिए तथा अन्य रियायतों के माध्यम से चीन के प्रभाव को कम करना चाहिए । रोहिङ्ग्या संकट के लिए ऑपरेशन इंसानियत तथा अन्य इसी प्रकार के कदमों को बढ़ावा देना चाहिए । साथ ही बांग्लादेश के साथ मिलकर समस्या के मूल समाधान के लिए म्यांमार के साथ सहयोग व दबाव की रणनीति भी अपनायी जा सकती है । बांग्लादेश वर्तमान में दक्षिण एशिया में भारत का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है , इसलिए भारत को उन बातों से बचना चाहिए जो भारत-बांग्लादेश संबंधों को दुष्प्रभावित कर सकते हैं ।
##Question:उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में चुनौतियाँ उपस्थित कर रहे हैं । साथ ही इनसे निपटने के लिए कुछ सुझाव भी दीजिए । (10अंक/150-200 शब्द ) Discuss the issues that present challenges in the path of India-Bangladesh relations. Also, give some suggestions to deal with them. (10 marks/150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: भारत-बांग्लादेश संबंधों की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । बिन्दुवार रूप में उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में चुनौती उत्पन्न कर रहे हैं । इन चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव दीजिये । उत्तर: दक्षिण एशिया में भारत और बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में उभर कर सामने आए हैं । पिछला एक दशक भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण रहा है । इस दौरान कई पुराने विवादों को सुलझाया गया और साथ ही सहयोग के कई क्षेत्रों को भी बढ़ावा मिला । उदाहरण के रूप में हम भारत-बांग्लादेश एंक्लेव समझौता, फेनी ब्रिज, कोलकाता-ढाका रेल , बांग्लादेश के लिए लाइन ऑफ क्रेडिट आदि की चर्चा कर सकते हैं । परंतु अभी भी कुछ ऐसे मुद्दे विधमान है जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं । इस संदर्भ में हम निम्नलिखित की चर्चा कर सकते हैं : 1. नदी जल विवाद : तीस्ता नदी जल विवाद: तीस्ता नदी के जल के बंटवारे को लेकर अभी तक भारत व बांग्लादेश के बीच कोई स्पष्ट व मान्य समझौता नहीं हो पाया है । भविष्य में भी यह भारत और बांग्लादेश के संबंधों को प्रतिकूल रूप में प्रभावित कर सकता है । तिपाइमुख परियोजना : तिपाइमुख बराक नदी पर प्रस्तावित एक बांध है जिसको लेकर बांग्लादेश की आपत्तियाँ हैं । इसी प्रकार गंगा नदी जल के बंटवारे को लेकर भी कुछ विवाद है जो भविष्य में और चुनौती उपस्थित कर सकता है । 2. असम में NRC का मुद्दा : अवैध प्रवासन का मुद्दा असम की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है । हालिया NRC में जिन 40 लाख लोगों को अवैध बंगलादेशी नागरिक बताया गया है , बांग्लादेश उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होगा । साथ ही यह द्विपक्षीय संबंधों में तनाव भी उत्पन्न करेगा । 3. सीमा प्रबंधन : ड्रग तस्करी व अवैध व्यापार तथा घुसपैठ के कारण भारत व बांग्लादेश के बीच सीमा प्रबंधन सदैव एक विवादित व चुनौतिपूर्ण विषय रहा है जो आगे भी संबंधों को नकारात्मक रूप में प्रभावित कर सकता है । 4. उग्रवादी समूहों की भूमिका : HUJI, HUJI-B, जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों द्वारा बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया जाता रहा है । 5. चीन की भूमिका : बांग्लादेश चीन को भारत के विरुद्ध संतुलनकारी शक्ति के रूप में प्रयोग करता है । यह बेहद सूक्ष्म संतुलन पर आधारित है । भविष्य में बांग्लादेश में यदि कोई भारत विरोधी गुट सत्ता में आता है तो वह चीन कार्ड का प्रयोग भारत के विरुद्ध कर सकता है जो भारतीय हितों के लिए प्रतिकूल होगा । 6. रोहिङ्ग्या संकट : रोहिङ्ग्या शरणार्थी संकट भी भारत-बांग्लादेश संबंधों के मार्ग में एक बड़ी चुनौती उत्पन्न कर रहा है । इन मुद्दों के समाधान हेतु सुझाव : नदी जल विवाद को निपटाने हेतु भारत सिंधु जल समझौता की तर्ज पर बांग्लादेश के साथ भी संधि कर सकता है । भारत को गुज़राल सिद्धांत के अनुरूप समझौता कर बांग्लादेश के साथ संबंधों में विश्वास को बढ़ावा देना चाहिए । NRC जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई एकतरफा निर्णय देने से पूर्व बांग्लादेश के साथ समझौता व बातचीत किया जाना आवश्यक । साथ ही इस मुद्दे पर नेताओं की अनावश्यक बयानबाजी को भी सीमित किया जाना चाहिए । बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकी का प्रयोग किया जा सकता है । साथ ही छिद्रित सीमा वाले अन्य देशों के बेहतर प्रबंधन से भी सीखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त बांग्लादेश व भारतीय सीमा सुरक्षा बल के बीच बेहतर सहयोग को बड़वा देना इस दिशा में एक अच्छा कदम होगा । भारत को बांग्लादेश के आंतरिक राजनीति से दूर रहना चाहिए तथा दूसरे विपक्षी दलों के साथ भी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए तैयार रहना चाहिए । चीन के प्रभाव को सीमित करने के लिए बांग्लादेश के लाइन ऑफ क्रेडिट को बढ़ाना चाहिए तथा अन्य रियायतों के माध्यम से चीन के प्रभाव को कम करना चाहिए । रोहिङ्ग्या संकट के लिए ऑपरेशन इंसानियत तथा अन्य इसी प्रकार के कदमों को बढ़ावा देना चाहिए । साथ ही बांग्लादेश के साथ मिलकर समस्या के मूल समाधान के लिए म्यांमार के साथ सहयोग व दबाव की रणनीति भी अपनायी जा सकती है । बांग्लादेश वर्तमान में दक्षिण एशिया में भारत का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है , इसलिए भारत को उन बातों से बचना चाहिए जो भारत-बांग्लादेश संबंधों को दुष्प्रभावित कर सकते हैं ।
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सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द) What do you understand by Integrity? Briefly Describe the various dimensions of the relationship between Integrity and Public Servants. (150-200 Words)
एप्रोच- पहले भाग में, सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्द इन्टिजर(Integer) से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थ ईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतोंका गुण रखने वाला व्यक्ति होता है| सत्यनिष्ठा को कार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतताकी अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एक गुणात्मक अवधारणा है अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है| भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एक परिपूर्ण अवधारणा है जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानि व्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा | सत्यनिष्ठा गैर-समझौता एवं गैर-चयनित होता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है | सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो| पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयाम सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में महत्वपूर्ण योगदान होता है| नोलन समिति द्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है| सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)है अतः यह मूल्यों का एकीकरण है जोलोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारालोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार परकिया जाता है| यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपने कर्तव्यों के निर्वहन मेंसंवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वको जन्म देती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारासरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहींकिया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि लोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करना चाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक को ईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक में पेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमान होती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)है अतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना आदि| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु 1962 में संथानम समिति का गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य को भ्रष्टाचार निवारक समिति के रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर 1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठन किया गया जिसे 2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जा दिया गया|
##Question:सत्यनिष्ठा से आप क्या समझते हैं? सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द) What do you understand by Integrity? Briefly Describe the various dimensions of the relationship between Integrity and Public Servants. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच- पहले भाग में, सत्यनिष्ठा को परिभाषित करते हुए उसका संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अगले भाग में, सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| उत्तर- सत्यनिष्ठा या इंटेग्रिटी लैटिन शब्द इन्टिजर(Integer) से बना है जिसका अर्थ संपूर्ण या पूर्ण होता है| नीतिशास्त्र में सत्यनिष्ठ होने का अर्थ ईमानदारी तथा अपरिवर्तनशील दृढ नैतिक सिद्धांतोंका गुण रखने वाला व्यक्ति होता है| सत्यनिष्ठा को कार्यों, मूल्यों, पद्धतियों, उपायों, सिद्धांतों, अपेक्षाओं और परिणामों के साथ सामंजस्य या संगतताकी अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जाता है| यह एक गुणात्मक अवधारणा है अतःमात्रात्मक तरीके से सत्यनिष्ठा को परिभाषित किया जाना संभव नहींहै| सत्यनिष्ठा व्यक्तव्य, विचार एवं क्रियाशीलता पर केंद्रित होता है| भ्रष्टाचार सत्यनिष्ठा का एक आयाम है या अधिक से अधिक एक महत्वपूर्ण आयाम है परंतु एकमात्र आयाम नहीं है| सत्यनिष्ठा एक परिपूर्ण अवधारणा है जिससे इसका आंशिक/सापेक्षिक मापन/विश्लेषण किया जाना संभव नहीं है| अतः सत्यनिष्ठा को लेकर दो ही प्रकार की स्थिति हो सकती है यानि व्यक्ति या तो सत्यनिष्ठ होगा या नहीं होगा | सत्यनिष्ठा गैर-समझौता एवं गैर-चयनित होता है| बिना ज्ञान के सत्यनिष्ठा कमजोर एवं निरर्थक है परंतु बिना सत्यनिष्ठा के ज्ञान खतरनाक है | सत्यनिष्ठा यह अपेक्षा करता है व्यक्ति निजी एवं सार्वजनिक जीवन में एकरूप हो| पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी भी प्रलोभन या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा के अनुरूप ही अनुक्रिया करता है| सत्यनिष्ठा तथा लोकसेवकों के मध्य संबंधों के विभिन्न आयाम सत्यनिष्ठा का लोकसेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में महत्वपूर्ण योगदान होता है| नोलन समिति द्वारा सिविल सेवकों के लिए सत्यनिष्ठा को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है - " सार्वजनिक पदधारकों को स्वंय को बाहरी व्यक्तियों या संगठनों के प्रति किसी भी वितीय या अन्य दायित्व के अधीन नहीं रखना चाहिए जो उन्हें उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निष्पादन को प्रभावित करे|" एक लोकसेवक का व्यवहार लोकसेवक की तरह होना चाहिए एवं इसमे किसी प्रकार की कमी सत्यनिष्ठा की कमी को दर्शाती है| अतः लोकसेवकों को उनके कार्यों के उचित निष्पादन हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| लोकसेवकों में विभिन्न मानवीय तथा पेशेवर मूल्यों का होना बेहद जरुरी है| सत्यनिष्ठा लोकसेवकों केमूल्यों का मूल्य(Values)है अतः यह मूल्यों का एकीकरण है जोलोकसेवकों को नैतिक रूप से सही कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती है| केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के द्वारालोकसेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि विधिक प्रावधानों के साथ-साथ आचार संहिता(कोड ऑफ़ कंडक्ट) का अनुपालन भी किया जाये|सत्यनिष्ठा के माध्यम से ही लोकसेवकों के द्वारालोकनिधि या लोक संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग, कार्यकुशलता एवं मितव्ययिता के आधार परकिया जाता है| यह लोकसेवकों को उनके द्वाराअपने कर्तव्यों के निर्वहन मेंसंवेदनशीलता एवं उत्तरदायित्वको जन्म देती है एवं यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवकों का कर्तव्य पूर्णतः जनहित की भावना से प्रेरित हो| सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि लोकसेवक के द्वारासरकारी पद का दुरूपयोग निजी हितों के लिए नहींकिया जाना चाहिए| वह किसी ऐसे उपहार या फायदों को प्राप्त ना करे जो उसके व्यक्तिगत निर्णय या सत्यनिष्ठा के साथ कोई समझौता के रूप में प्रतीत हो| सत्यनिष्ठा के द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि लोकसेवक के द्वारा बिना प्राधिकार के किसी भी सरकारी सूचनाओं को उजागर नहीं करना चाहिए| यह प्रतिबंध लोकसेवकों के सेवानिवृति के उपरांत भी लागू होता है| लोकसेवक को ईमानदार होने हेतु उनमें सत्यनिष्ठा का होना बेहद जरुरी है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक के द्वारा मंत्रियों या किसी अन्य को जानबूझकर गुमराह नहीं करना चाहिए| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक अपने निजी हितों के लिए किसी भी अन्य से प्रभावित नहीं होता है| एक सत्यनिष्ठ लोकसेवक में पेशेवर मूल्यों के साथ-साथ दक्षता भी विद्यमान होती है| सत्यनिष्ठामूल्यों का मूल्य(Values)है अतः लोकसेवकों के आधारभूत निर्णयों में निम्न बुनियादी मूल्यों को शामिलकरने हेतु सत्यनिष्ठा का अहम् योगदान है| जैसे- भेदभावरहित तथा निष्पक्षता, गैर-तरफदारी, समर्पण, सहिष्णुता, सहानुभूति एवं संवेदना आदि| भारत सरकार के द्वारा सत्यनिष्ठा को प्रोत्साहित करने हेतु 1962 में संथानम समिति का गठन किया गया परंतु इसके औपचारिक उद्देश्य को भ्रष्टाचार निवारक समिति के रूप में परिभाषित किया गया| इस समिति की अनुशंसा के आधार पर 1964 में कार्यकारी निर्णय के द्वाराकेन्द्रीय सतर्कता आयोगका गठन किया गया जिसे 2003 के विधि के द्वारा वैधानिक दर्जा दिया गया|
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What is the Industrial revolution? Also, enumerate the reasons why the industrial revolution first took place in England. (150 words/10 marks)
Approach · Explain Industrial revolution as Intro · Write the reasons of Industrial Revolutions started in Britain first · As conclusion write impacts of Industrial Revolution in brief. Answer: The Industrial Revolution was a period when new sources of energy, such as coal and steam, were used to power new machines designed to reduce human labor and increase production. The move to a more industrial society forever changed the face of labor. This process began inBritainin the 18th century and from there spread to other parts of the world. There were several factors that combined to make Great Britain an ideal place for industrialization: The Agricultural Revolution of the 18th century created a favourable climate for industrialization. By increasing food production, the British population could be fed at lower prices with less effort than ever before. The surplus of food meant that British families could use the money they saved to purchase manufactured goods. The population increase in Britain and the exodus of farmers from rural to urban areas in search of wage-labor created a ready pool of workers for the new industries. Britain had financial institutions in place, such as a central bank, to finance new factories. The profits Britain had enjoyed due to booming cotton and trade industries allowed investors to support the construction of factories. British entrepreneurs interested in taking risks to make profits were leading the charge of industrialization. The English revolutions of the 17th century had fostered a spirit of economic prosperity. Early industrial entrepreneurs were willing to take risks on the chance that they would reap financial rewards later. During the 18th century, British entrepreneurs sought an efficient system of transportation. Recognizing the need to move goods and resources, new networks of canals and roads were built beginning in 1760. However, railroads quickly surpassed other modes of transportation. Britain"s merchant marine could transport goods to foreign markets. Britain had a vast supply of mineral resources used to run industrial machines, such as coal. Since Britain is a relatively small country, these resources could be transported quickly and at a reasonable cost. New Inventions in the 18th century, Britain"s cotton industry charged ahead of many other countries. With James Hargreaves" invention of the spinning Jenny in 1764, yarn could be produced in greater quantities. In 1787, Edmund Cartwright"s power loom revolutionized the speed of cloth weaving. In the 1760s, the steam engine (developed by James Watt) further transformed the cotton industry. The British government passed laws that protected private property and placed few restrictions on private business owners. Lastly, Great Britain"s colonial empire created a ready supply of consumers to purchase its manufactured goods. Industrial Revolution had a great impact on the lives of people. Workers acquired new and distinctive skills, and their relation to their tasks shifted; instead of being craftsmen working with hand tools, they became machine operators, subject to factory discipline. The emergence of new patterns of authority, growth of cities, the development of working-class movements, and cultural transformations of a broad order were witnessed. Also there was a psychological change felt i.e. confidence in the ability to use resources and to master nature was heightened.
##Question:What is the Industrial revolution? Also, enumerate the reasons why the industrial revolution first took place in England. (150 words/10 marks)##Answer:Approach · Explain Industrial revolution as Intro · Write the reasons of Industrial Revolutions started in Britain first · As conclusion write impacts of Industrial Revolution in brief. Answer: The Industrial Revolution was a period when new sources of energy, such as coal and steam, were used to power new machines designed to reduce human labor and increase production. The move to a more industrial society forever changed the face of labor. This process began inBritainin the 18th century and from there spread to other parts of the world. There were several factors that combined to make Great Britain an ideal place for industrialization: The Agricultural Revolution of the 18th century created a favourable climate for industrialization. By increasing food production, the British population could be fed at lower prices with less effort than ever before. The surplus of food meant that British families could use the money they saved to purchase manufactured goods. The population increase in Britain and the exodus of farmers from rural to urban areas in search of wage-labor created a ready pool of workers for the new industries. Britain had financial institutions in place, such as a central bank, to finance new factories. The profits Britain had enjoyed due to booming cotton and trade industries allowed investors to support the construction of factories. British entrepreneurs interested in taking risks to make profits were leading the charge of industrialization. The English revolutions of the 17th century had fostered a spirit of economic prosperity. Early industrial entrepreneurs were willing to take risks on the chance that they would reap financial rewards later. During the 18th century, British entrepreneurs sought an efficient system of transportation. Recognizing the need to move goods and resources, new networks of canals and roads were built beginning in 1760. However, railroads quickly surpassed other modes of transportation. Britain"s merchant marine could transport goods to foreign markets. Britain had a vast supply of mineral resources used to run industrial machines, such as coal. Since Britain is a relatively small country, these resources could be transported quickly and at a reasonable cost. New Inventions in the 18th century, Britain"s cotton industry charged ahead of many other countries. With James Hargreaves" invention of the spinning Jenny in 1764, yarn could be produced in greater quantities. In 1787, Edmund Cartwright"s power loom revolutionized the speed of cloth weaving. In the 1760s, the steam engine (developed by James Watt) further transformed the cotton industry. The British government passed laws that protected private property and placed few restrictions on private business owners. Lastly, Great Britain"s colonial empire created a ready supply of consumers to purchase its manufactured goods. Industrial Revolution had a great impact on the lives of people. Workers acquired new and distinctive skills, and their relation to their tasks shifted; instead of being craftsmen working with hand tools, they became machine operators, subject to factory discipline. The emergence of new patterns of authority, growth of cities, the development of working-class movements, and cultural transformations of a broad order were witnessed. Also there was a psychological change felt i.e. confidence in the ability to use resources and to master nature was heightened.
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भारत के लिए भूटान के महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द/10 अंक) Explain the importance of Bhutan for India. Also discuss the dimensions of mutual cooperation between the two countries (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत भूटान सम्बन्धों के स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के लिए भूटान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां बताते हुए समाधान की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है अर्थात महाशक्तियों को अलग करता है| इसी कारण भूटान लम्बे समय तक तटस्थ देश बना रहा| चीन में कम्युनिज्म के आने के बाद, चीन आक्रामक विस्तार की नीति पर चल रहा थाइसी कारण भूटान को अपनी संप्रभुता का भय होने लगा भूटान को अपनी संप्रभुता की सुरक्षा हेतु एक मित्र राष्ट्र की आवश्यकता थी अतःभूटान का भारत की ओर झुकाव बढ़ा| 1950 में भारत और भूटान के मध्य एक शान्ति और मित्रता की संधि की गयी| यह संधि ही भारत भूटान सम्बन्धों का मूलाधार है| इस संधि के माध्यम से जहाँ भारत ने भारत-भूटान सीमा को पोरस सीमा बना दिया और वहां के नागरिकों को अनेक छूटे दी हैं वहीँ भूटान द्वारा यह प्रतिबद्धता स्वीकार की गयी कि भूटान अपनी रक्षा नीति एवं विदेश नीति के निर्धारण में भारतीय हितों को प्रभावित नहीं होने देगा| इस तरह दोनों देशों के मध्य परमपरागत रूप से बेहतर सम्बन्ध रहे हैं| भारत के लिए भूटान का महत्त्व · भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों और चीन के साथ भूटान की सीमा लगती है अतः भारत के लिए भूटान का एक महत्वपूर्ण सामरिक महत्त्व है · भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है · भूटान सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट स्थित है अतः भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक रणनीतिक स्थिति में है · चुम्बी घाटी और डोकलाम भारत-चीन-भूटान के संगम पर स्थित है अतः भारत एवं भूटान की अखंडता के दृष्टि से महत्वपूर्ण है · उत्तर पूर्वी राज्यों में उग्रवाद पर नियन्त्रण स्थापित करने में भूटान का सहयोग भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा · इसके साथ ही भूटान के प्राकृतिक संसाधन है जैसे जल विद्युत् की सम्भावनाएं| भूटान की 70 % आय पनबिजली से आती है इसमें भारत कामहत्वपूर्ण सहयोग है| · इस तरह स्पष्ट होता है कि भूटान, भारत की अखंडता, रक्षा, आंतरिक सुरक्षा आदि के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में है अतः भारत और भूटान ने पारस्परिक सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये हैं सहयोग के आयाम रक्षा एवं प्रतिरक्षा सहयोग · बोडो/ULFA ने भूटान के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण कैम्पों को स्थापित किया था, वर्ष2003 में रॉयल गार्ड ऑफ़ भूटान ने ऑपरेशन क्लीन आल के माध्यम से इन कैम्पों को उजाड़ दिया है, इसी तरह भारत की BSF द्वारा भूटान चीन सीमा की सुरक्षा करती है · 2007 में भारत-भूटान संधि में बदलाव किये गए हैं किन्तु इस बात पर सहमति बनी है कि एक दुसरे के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षित करने का प्रयास करेंगे| उदाहरणार्थ 2016 में भूटान के निवेदन पर भारत ने डोकलाम में भूटान का सहयोग किया, अर्थात संधि में संशोधन के बाद भी संधि की प्रतिबद्धताओं पर दोनों देश बने हुए हैं| विकास में सहयोग · भारत, भूटान का महत्वपूर्ण विकासात्मक सहयोगी राष्ट्र है| भूटान की पहली 2 FYP में भारत द्वारा 100% फंडिंग की गयी है उसके बाद भी भूटान की आगामी सभी FYPs में भारत ने औसतन 30 % की फंडिंग की गयी है| · वर्ष 2013 से 2018 के मध्य में भारत ने 7 हजार करोड़ की फंडिंग की गयी है जिसे बजटीय सहायता, अवसंरचना निवेश, विशेष आर्थिक पॅकेज, विभिन्न सब्सिडियों के माध्यम से दिया गया है · भारत तकनीकी एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से भूटान का आधुनिकीकरण करता रहा है · 2017 में भारत भूटान के मध्य मुक्त व्यापार समझौता किया गया है, इसमें भूटान के निर्यात से शुल्कों को हटा लिया गया है, इससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा क्योंकि भूटान की अर्थव्यवस्था अभी मंदी के दौर से गुजर रही है ऊर्जा सहयोग · भूटान में जलविद्युत की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं अतः इस महत्त्व को देखते हुए भारत ने भूटान में पनबिजली के विकास के लिए अनेक प्रयास किये हैं| · भारत द्वारा चुखा, ताला एवं करिछु जलविद्युत परियोजनाओं को पूर्ण कर लिया है(6 हजार मेगावाट) जबकि पुनतसांग्छु जैसी परियोजनाए पूर्ण होने वाली हैं (6 हजार मेगावाट) · उत्तरी भूटान के खुलंचु में भारत द्वारा एक अन्य परियोजना प्रस्तावित की गयी है, इसका भारत के लिए भूराजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व हैइससे भूटान के उत्तरी भाग का भी विकास होगा और सापेक्षिक वंचना की भावना को बलवती होने से रोका जा सकेगा अतः भारत यहाँ संतुलित विकास नीति पर चल रहा है · भूटान के साथ भारत द्वारा ऊर्जा खरीद समझौता किया गया है जिसमें भूटान को सम्पूर्ण अतिरिक्त ऊर्जा खरीद की गारंटी दी गयी है| भूटान के सम्पूर्ण राजस्व का लगभग 47 % भारत को ऊर्जा के विक्रय से प्राप्त होता है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग · भारत द्वारा भूटान के विभिन्न संस्थानों को वित्तीय सहायतादी जाती है|ट्रैक 2 कूटनीति के विकास के लिए नेहरु वांगचुक सांस्कृतिक केंद्र का विकासकिया जा रहा है| भारत के विश्वविद्यालयों में भूटानी छात्रों के लिए सीटें आरक्षित की गयी हैं · भूटान एक हिमालयी राज्य है अतः सतत हिमालय के लिए भारत में चल रहे नेशनल मिशन ऑन सस्टनेबल डेवलपमेंट ऑफ़ हिमालय के अंतर्गत दी जाने वाली राशि में भूटान को हिस्सा दिया जाता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत एवं भूटान ने पारस्परिक सहयोग के अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं किन्तु दोनों के सम्बन्धों में चिंता के बिंदु भी हैं जैसे पर्यावरण प्रभाव का ट्रक देते हुए भूटान का BBIN से निकल जाना, भारत द्वारा भूटान में विकसित परियोजनाओं के लंबित हो जाने के कारण इनकी की लागत बढ़ जाती है इसके परिणामस्वरुप भूटान के बढ़ते कर्ज और उसके ब्याज का मुद्दा जिसके कारण भूटान में भारत की आलोचना की जाती है| भूटान के कुछ समूहों का यह मानना कि भारत भूटान के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है इसी तरह भूटान का यह मानना कि भारत द्वारा ऊर्जा का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है| उपरोक्त मुद्दे भारत भूटान सम्बन्धों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं अतः भारत द्वारा BBIN के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना, पंचशील सिद्धांत का अनुपालन, भूटान के सभी राजनीतिक दलों के साथ सहयोगात्मक व्यवहार, ऊर्जा निर्यात टैरिफ का न्यायोचित निर्धारण, परियोजनाओं की समय पर आपूर्ति, भूटान के कर्जे की रीस्ट्रक्चरिंग करना आदि उपायों के माध्यम से भूटान की चिंताओं का समाधान करना चाहिए|
##Question:भारत के लिए भूटान के महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द/10 अंक) Explain the importance of Bhutan for India. Also discuss the dimensions of mutual cooperation between the two countries (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत भूटान सम्बन्धों के स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के लिए भूटान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां बताते हुए समाधान की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है अर्थात महाशक्तियों को अलग करता है| इसी कारण भूटान लम्बे समय तक तटस्थ देश बना रहा| चीन में कम्युनिज्म के आने के बाद, चीन आक्रामक विस्तार की नीति पर चल रहा थाइसी कारण भूटान को अपनी संप्रभुता का भय होने लगा भूटान को अपनी संप्रभुता की सुरक्षा हेतु एक मित्र राष्ट्र की आवश्यकता थी अतःभूटान का भारत की ओर झुकाव बढ़ा| 1950 में भारत और भूटान के मध्य एक शान्ति और मित्रता की संधि की गयी| यह संधि ही भारत भूटान सम्बन्धों का मूलाधार है| इस संधि के माध्यम से जहाँ भारत ने भारत-भूटान सीमा को पोरस सीमा बना दिया और वहां के नागरिकों को अनेक छूटे दी हैं वहीँ भूटान द्वारा यह प्रतिबद्धता स्वीकार की गयी कि भूटान अपनी रक्षा नीति एवं विदेश नीति के निर्धारण में भारतीय हितों को प्रभावित नहीं होने देगा| इस तरह दोनों देशों के मध्य परमपरागत रूप से बेहतर सम्बन्ध रहे हैं| भारत के लिए भूटान का महत्त्व · भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों और चीन के साथ भूटान की सीमा लगती है अतः भारत के लिए भूटान का एक महत्वपूर्ण सामरिक महत्त्व है · भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है · भूटान सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट स्थित है अतः भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक रणनीतिक स्थिति में है · चुम्बी घाटी और डोकलाम भारत-चीन-भूटान के संगम पर स्थित है अतः भारत एवं भूटान की अखंडता के दृष्टि से महत्वपूर्ण है · उत्तर पूर्वी राज्यों में उग्रवाद पर नियन्त्रण स्थापित करने में भूटान का सहयोग भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा · इसके साथ ही भूटान के प्राकृतिक संसाधन है जैसे जल विद्युत् की सम्भावनाएं| भूटान की 70 % आय पनबिजली से आती है इसमें भारत कामहत्वपूर्ण सहयोग है| · इस तरह स्पष्ट होता है कि भूटान, भारत की अखंडता, रक्षा, आंतरिक सुरक्षा आदि के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में है अतः भारत और भूटान ने पारस्परिक सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये हैं सहयोग के आयाम रक्षा एवं प्रतिरक्षा सहयोग · बोडो/ULFA ने भूटान के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण कैम्पों को स्थापित किया था, वर्ष2003 में रॉयल गार्ड ऑफ़ भूटान ने ऑपरेशन क्लीन आल के माध्यम से इन कैम्पों को उजाड़ दिया है, इसी तरह भारत की BSF द्वारा भूटान चीन सीमा की सुरक्षा करती है · 2007 में भारत-भूटान संधि में बदलाव किये गए हैं किन्तु इस बात पर सहमति बनी है कि एक दुसरे के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षित करने का प्रयास करेंगे| उदाहरणार्थ 2016 में भूटान के निवेदन पर भारत ने डोकलाम में भूटान का सहयोग किया, अर्थात संधि में संशोधन के बाद भी संधि की प्रतिबद्धताओं पर दोनों देश बने हुए हैं| विकास में सहयोग · भारत, भूटान का महत्वपूर्ण विकासात्मक सहयोगी राष्ट्र है| भूटान की पहली 2 FYP में भारत द्वारा 100% फंडिंग की गयी है उसके बाद भी भूटान की आगामी सभी FYPs में भारत ने औसतन 30 % की फंडिंग की गयी है| · वर्ष 2013 से 2018 के मध्य में भारत ने 7 हजार करोड़ की फंडिंग की गयी है जिसे बजटीय सहायता, अवसंरचना निवेश, विशेष आर्थिक पॅकेज, विभिन्न सब्सिडियों के माध्यम से दिया गया है · भारत तकनीकी एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से भूटान का आधुनिकीकरण करता रहा है · 2017 में भारत भूटान के मध्य मुक्त व्यापार समझौता किया गया है, इसमें भूटान के निर्यात से शुल्कों को हटा लिया गया है, इससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा क्योंकि भूटान की अर्थव्यवस्था अभी मंदी के दौर से गुजर रही है ऊर्जा सहयोग · भूटान में जलविद्युत की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं अतः इस महत्त्व को देखते हुए भारत ने भूटान में पनबिजली के विकास के लिए अनेक प्रयास किये हैं| · भारत द्वारा चुखा, ताला एवं करिछु जलविद्युत परियोजनाओं को पूर्ण कर लिया है(6 हजार मेगावाट) जबकि पुनतसांग्छु जैसी परियोजनाए पूर्ण होने वाली हैं (6 हजार मेगावाट) · उत्तरी भूटान के खुलंचु में भारत द्वारा एक अन्य परियोजना प्रस्तावित की गयी है, इसका भारत के लिए भूराजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व हैइससे भूटान के उत्तरी भाग का भी विकास होगा और सापेक्षिक वंचना की भावना को बलवती होने से रोका जा सकेगा अतः भारत यहाँ संतुलित विकास नीति पर चल रहा है · भूटान के साथ भारत द्वारा ऊर्जा खरीद समझौता किया गया है जिसमें भूटान को सम्पूर्ण अतिरिक्त ऊर्जा खरीद की गारंटी दी गयी है| भूटान के सम्पूर्ण राजस्व का लगभग 47 % भारत को ऊर्जा के विक्रय से प्राप्त होता है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग · भारत द्वारा भूटान के विभिन्न संस्थानों को वित्तीय सहायतादी जाती है|ट्रैक 2 कूटनीति के विकास के लिए नेहरु वांगचुक सांस्कृतिक केंद्र का विकासकिया जा रहा है| भारत के विश्वविद्यालयों में भूटानी छात्रों के लिए सीटें आरक्षित की गयी हैं · भूटान एक हिमालयी राज्य है अतः सतत हिमालय के लिए भारत में चल रहे नेशनल मिशन ऑन सस्टनेबल डेवलपमेंट ऑफ़ हिमालय के अंतर्गत दी जाने वाली राशि में भूटान को हिस्सा दिया जाता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत एवं भूटान ने पारस्परिक सहयोग के अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं किन्तु दोनों के सम्बन्धों में चिंता के बिंदु भी हैं जैसे पर्यावरण प्रभाव का ट्रक देते हुए भूटान का BBIN से निकल जाना, भारत द्वारा भूटान में विकसित परियोजनाओं के लंबित हो जाने के कारण इनकी की लागत बढ़ जाती है इसके परिणामस्वरुप भूटान के बढ़ते कर्ज और उसके ब्याज का मुद्दा जिसके कारण भूटान में भारत की आलोचना की जाती है| भूटान के कुछ समूहों का यह मानना कि भारत भूटान के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है इसी तरह भूटान का यह मानना कि भारत द्वारा ऊर्जा का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है| उपरोक्त मुद्दे भारत भूटान सम्बन्धों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं अतः भारत द्वारा BBIN के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना, पंचशील सिद्धांत का अनुपालन, भूटान के सभी राजनीतिक दलों के साथ सहयोगात्मक व्यवहार, ऊर्जा निर्यात टैरिफ का न्यायोचित निर्धारण, परियोजनाओं की समय पर आपूर्ति, भूटान के कर्जे की रीस्ट्रक्चरिंग करना आदि उपायों के माध्यम से भूटान की चिंताओं का समाधान करना चाहिए|
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"प्रशासनिक आवश्यकता को कारण बताकर किया गया बंगाल विभाजन, वास्तव में राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने का एक तरीका था |" इस कथन के आलोक में बंगाल विभाजन के कारण व परिणाम का संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द;10 अंक) The partition of Bengal, citing administrative necessity as a reason, was in fact a way of stopping the growing influence of nationalism. In the light of this statement, briefly describe the cause and consequence of Bengal Partition. (150-200 words; 10 Makrs)
एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजी साम्राज्यवादिता और और कर्जन के बारे में सामान्य परिचय देते हुए बंगाल विभाजन के पीछे उसके तर्क को बताइए | इसके पश्चात बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण का उल्लेख कीजिये | अंत में बंगाल विभाजन के परिणाम को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिस समय बंगाल विभाजन हुआ उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवादिता अपने चरम पर थी परन्तु बंगाल में कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गयीं जिसके कारण बंगाल विभाजन करना कर्जन ने आवश्यक समझा | उस समय कांग्रेस के अधिवेशन कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हो चुके थे ,जिसके कारण लोगों में राष्ट्रवाद की चेतना का विकास काफी हद तक हो चुका था | इसी राष्ट्रवादी चेतना के उदय के कारण ब्रिटिश सरकार के मन में भय था कि कहीं कांग्रेस उनके खिलाफ 1857 जैसी क्रांति न प्रारंभ कर दे | अंग्रेजों को ये भी लग रहा था कि इस समय यदि क्रांति शुरू हुई तो उसे दबाना बहुत ही कठिन हो सकता है | अतः ऐसी पारिस्थिति उत्पन्न होने के कारण कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा कर दी | कर्जन द्वारा बंग-भंग के पीछे दिए गए कुछ कारण- बंगाल प्रेसिडेंसी बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | इसमें पूर्वी और पश्चिमी बंगाल सहित बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे | बंगाल की जनसँख्या उस समय लगभग 8 करोड़ थी | बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्थाएं सुचारू रूप से नहीं चल पा रही हैं क्योंकि यह बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण - 1903 में बंगाल का दौरा करने तथा वहां की जनता में राष्ट्रवाद की प्रबल भावना को देखकर कर्जन ने बंगाल के विभाजन की योजना बनायी | बंगाल विभाजन का मुख्य उद्देश्य हिन्दू-मुसलामानों में फूट डालना तथा बंगाल में बढ़ती हुई राष्ट्रवादी भावनाओं को रोकना था | कर्जन के बंगाल विभाजन का मुख्य कारण प्रशासनिक नहीं राजनीतिक था | उस समय बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जाग्रति थी जिसे दबाने के लिए लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर उसे हिन्दू और मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्र को दो भागों में बाँटने और आपस में लड़ाने की नीति अपनाई | बंगाल विभाजन का प्रस्ताव - 3 दिसम्बर 1903 को ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव रखा गया और 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा की गई | विभाजन के बाद बंगाल पूर्वी व पश्चिम बंगाल में बंट गया |पूर्वी बंगाल में असम , चिटगांव ,ढाका को शामिल किया गया ,इसका मुख्यालय ढाका में था | पश्चिम बंगाल में बिहार ,उड़ीसा और पश्चिम बंगाल शामिल था |यहाँ की राजधानी कलकत्ता थी | बंगाल विभाजन का परिणाम - बंगाल विभाजन के विरोध में बंगाल में अनेक बैठकें हुई , सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ,कृष्ण कुमार मित्र व पृथ्वी चन्द्र राय जैसे बंगाल के नेताओं ने बंगाली, हितवादी व संजीवनी जैसे अख़बारों द्वारा विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की | राष्ट्रवादियों ने बंगाल विभाजन के विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा की तथा बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया | 16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंगाल विभाजन की योजना को लागू कर दिया | इसे शोक दिवस के रूप में मनाया गया | बंगाल विभाजन के विरोध में कई जगहों पर जनसभाओं का आयोजन किया गया | बंगाल विभाजन को मुस्लिमों ने अपने हित में सोचकर स्वीकार कर लिया | उन्हें शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में अवसर दिखाई देने लगे | पश्चिम बंगाल ने इस विभाजन को अस्वीकार कर दिया | भारत में राष्ट्रीयता की भावना ओर प्रबल हुई | 1911 में विभाजन को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया गया | निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि बंगाल विभाजन को जिस उद्देश्य से लागू किया गया वह उसे पूरा करने में समर्थ नहीं हुआ अपितु इसका विपरीत प्रभाव राष्ट्रवादी विचारधारा के विकास के रूप में हुआ | अतः बंगाल विभाजन ने राष्ट्रवाद की ऐसी विचारधारा को जन्म दिया ,जिसका प्रभाव आगे के आन्दोलनों में दृष्टिगोचर होता है |
##Question:"प्रशासनिक आवश्यकता को कारण बताकर किया गया बंगाल विभाजन, वास्तव में राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने का एक तरीका था |" इस कथन के आलोक में बंगाल विभाजन के कारण व परिणाम का संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द;10 अंक) The partition of Bengal, citing administrative necessity as a reason, was in fact a way of stopping the growing influence of nationalism. In the light of this statement, briefly describe the cause and consequence of Bengal Partition. (150-200 words; 10 Makrs)##Answer:एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजी साम्राज्यवादिता और और कर्जन के बारे में सामान्य परिचय देते हुए बंगाल विभाजन के पीछे उसके तर्क को बताइए | इसके पश्चात बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण का उल्लेख कीजिये | अंत में बंगाल विभाजन के परिणाम को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिस समय बंगाल विभाजन हुआ उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवादिता अपने चरम पर थी परन्तु बंगाल में कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गयीं जिसके कारण बंगाल विभाजन करना कर्जन ने आवश्यक समझा | उस समय कांग्रेस के अधिवेशन कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हो चुके थे ,जिसके कारण लोगों में राष्ट्रवाद की चेतना का विकास काफी हद तक हो चुका था | इसी राष्ट्रवादी चेतना के उदय के कारण ब्रिटिश सरकार के मन में भय था कि कहीं कांग्रेस उनके खिलाफ 1857 जैसी क्रांति न प्रारंभ कर दे | अंग्रेजों को ये भी लग रहा था कि इस समय यदि क्रांति शुरू हुई तो उसे दबाना बहुत ही कठिन हो सकता है | अतः ऐसी पारिस्थिति उत्पन्न होने के कारण कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा कर दी | कर्जन द्वारा बंग-भंग के पीछे दिए गए कुछ कारण- बंगाल प्रेसिडेंसी बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | इसमें पूर्वी और पश्चिमी बंगाल सहित बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे | बंगाल की जनसँख्या उस समय लगभग 8 करोड़ थी | बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्थाएं सुचारू रूप से नहीं चल पा रही हैं क्योंकि यह बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण - 1903 में बंगाल का दौरा करने तथा वहां की जनता में राष्ट्रवाद की प्रबल भावना को देखकर कर्जन ने बंगाल के विभाजन की योजना बनायी | बंगाल विभाजन का मुख्य उद्देश्य हिन्दू-मुसलामानों में फूट डालना तथा बंगाल में बढ़ती हुई राष्ट्रवादी भावनाओं को रोकना था | कर्जन के बंगाल विभाजन का मुख्य कारण प्रशासनिक नहीं राजनीतिक था | उस समय बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जाग्रति थी जिसे दबाने के लिए लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर उसे हिन्दू और मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्र को दो भागों में बाँटने और आपस में लड़ाने की नीति अपनाई | बंगाल विभाजन का प्रस्ताव - 3 दिसम्बर 1903 को ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव रखा गया और 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा की गई | विभाजन के बाद बंगाल पूर्वी व पश्चिम बंगाल में बंट गया |पूर्वी बंगाल में असम , चिटगांव ,ढाका को शामिल किया गया ,इसका मुख्यालय ढाका में था | पश्चिम बंगाल में बिहार ,उड़ीसा और पश्चिम बंगाल शामिल था |यहाँ की राजधानी कलकत्ता थी | बंगाल विभाजन का परिणाम - बंगाल विभाजन के विरोध में बंगाल में अनेक बैठकें हुई , सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ,कृष्ण कुमार मित्र व पृथ्वी चन्द्र राय जैसे बंगाल के नेताओं ने बंगाली, हितवादी व संजीवनी जैसे अख़बारों द्वारा विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की | राष्ट्रवादियों ने बंगाल विभाजन के विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा की तथा बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया | 16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंगाल विभाजन की योजना को लागू कर दिया | इसे शोक दिवस के रूप में मनाया गया | बंगाल विभाजन के विरोध में कई जगहों पर जनसभाओं का आयोजन किया गया | बंगाल विभाजन को मुस्लिमों ने अपने हित में सोचकर स्वीकार कर लिया | उन्हें शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में अवसर दिखाई देने लगे | पश्चिम बंगाल ने इस विभाजन को अस्वीकार कर दिया | भारत में राष्ट्रीयता की भावना ओर प्रबल हुई | 1911 में विभाजन को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया गया | निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि बंगाल विभाजन को जिस उद्देश्य से लागू किया गया वह उसे पूरा करने में समर्थ नहीं हुआ अपितु इसका विपरीत प्रभाव राष्ट्रवादी विचारधारा के विकास के रूप में हुआ | अतः बंगाल विभाजन ने राष्ट्रवाद की ऐसी विचारधारा को जन्म दिया ,जिसका प्रभाव आगे के आन्दोलनों में दृष्टिगोचर होता है |
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भारत के लिए भूटान के महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द) Explain the importance of Bhutan for India. Also discuss the dimensions of mutual cooperation between the two countries (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत भूटान सम्बन्धों के स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के लिए भूटान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां बताते हुए समाधान की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है अर्थात महाशक्तियों को अलग करता है| इसी कारण भूटान लम्बे समय तक तटस्थ देश बना रहा| चीन में कम्युनिज्म के आने के बाद, चीन आक्रामक विस्तार की नीति पर चल रहा थाइसी कारण भूटान को अपनी संप्रभुता का भय होने लगा भूटान को अपनी संप्रभुता की सुरक्षा हेतु एक मित्र राष्ट्र की आवश्यकता थी अतःभूटान का भारत की ओर झुकाव बढ़ा| 1950 में भारत और भूटान के मध्य एक शान्ति और मित्रता की संधि की गयी| यह संधि ही भारत भूटान सम्बन्धों का मूलाधार है| इस संधि के माध्यम से जहाँ भारत ने भारत-भूटान सीमा को पोरस सीमा बना दिया और वहां के नागरिकों को अनेक छूटे दी हैं वहीँ भूटान द्वारा यह प्रतिबद्धता स्वीकार की गयी कि भूटान अपनी रक्षा नीति एवं विदेश नीति के निर्धारण में भारतीय हितों को प्रभावित नहीं होने देगा| इस तरह दोनों देशों के मध्य परमपरागत रूप से बेहतर सम्बन्ध रहे हैं| भारत के लिए भूटान का महत्त्व · भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों और चीन के साथ भूटान की सीमा लगती है अतः भारत के लिए भूटान का एक महत्वपूर्ण सामरिक महत्त्व है · भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है · भूटान सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट स्थित है अतः भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक रणनीतिक स्थिति में है · चुम्बी घाटी और डोकलाम भारत-चीन-भूटान के संगम पर स्थित है अतः भारत एवं भूटान की अखंडता के दृष्टि से महत्वपूर्ण है · उत्तर पूर्वी राज्यों में उग्रवाद पर नियन्त्रण स्थापित करने में भूटान का सहयोग भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा · इसके साथ ही भूटान के प्राकृतिक संसाधन है जैसे जल विद्युत् की सम्भावनाएं| भूटान की 70 % आय पनबिजली से आती है इसमें भारत कामहत्वपूर्ण सहयोग है| · इस तरह स्पष्ट होता है कि भूटान, भारत की अखंडता, रक्षा, आंतरिक सुरक्षा आदि के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में है अतः भारत और भूटान ने पारस्परिक सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये हैं सहयोग के आयाम रक्षा एवं प्रतिरक्षा सहयोग · बोडो/ULFA ने भूटान के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण कैम्पों को स्थापित किया था, वर्ष2003 में रॉयल गार्ड ऑफ़ भूटान ने ऑपरेशन क्लीन आल के माध्यम से इन कैम्पों को उजाड़ दिया है, इसी तरह भारत की BSF द्वारा भूटान चीन सीमा की सुरक्षा करती है · 2007 में भारत-भूटान संधि में बदलाव किये गए हैं किन्तु इस बात पर सहमति बनी है कि एक दुसरे के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षित करने का प्रयास करेंगे| उदाहरणार्थ 2016 में भूटान के निवेदन पर भारत ने डोकलाम में भूटान का सहयोग किया, अर्थात संधि में संशोधन के बाद भी संधि की प्रतिबद्धताओं पर दोनों देश बने हुए हैं| विकास में सहयोग · भारत, भूटान का महत्वपूर्ण विकासात्मक सहयोगी राष्ट्र है| भूटान की पहली 2 FYP में भारत द्वारा 100% फंडिंग की गयी है उसके बाद भी भूटान की आगामी सभी FYPs में भारत ने औसतन 30 % की फंडिंग की गयी है| · वर्ष 2013 से 2018 के मध्य में भारत ने 7 हजार करोड़ की फंडिंग की गयी है जिसे बजटीय सहायता, अवसंरचना निवेश, विशेष आर्थिक पॅकेज, विभिन्न सब्सिडियों के माध्यम से दिया गया है · भारत तकनीकी एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से भूटान का आधुनिकीकरण करता रहा है · 2017 में भारत भूटान के मध्य मुक्त व्यापार समझौता किया गया है, इसमें भूटान के निर्यात से शुल्कों को हटा लिया गया है, इससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा क्योंकि भूटान की अर्थव्यवस्था अभी मंदी के दौर से गुजर रही है ऊर्जा सहयोग · भूटान में जलविद्युत की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं अतः इस महत्त्व को देखते हुए भारत ने भूटान में पनबिजली के विकास के लिए अनेक प्रयास किये हैं| · भारत द्वारा चुखा, ताला एवं करिछु जलविद्युत परियोजनाओं को पूर्ण कर लिया है(6 हजार मेगावाट) जबकि पुनतसांग्छु जैसी परियोजनाए पूर्ण होने वाली हैं (6 हजार मेगावाट) · उत्तरी भूटान के खुलंचु में भारत द्वारा एक अन्य परियोजना प्रस्तावित की गयी है, इसका भारत के लिए भूराजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व हैइससे भूटान के उत्तरी भाग का भी विकास होगा और सापेक्षिक वंचना की भावना को बलवती होने से रोका जा सकेगा अतः भारत यहाँ संतुलित विकास नीति पर चल रहा है · भूटान के साथ भारत द्वारा ऊर्जा खरीद समझौता किया गया है जिसमें भूटान को सम्पूर्ण अतिरिक्त ऊर्जा खरीद की गारंटी दी गयी है| भूटान के सम्पूर्ण राजस्व का लगभग 47 % भारत को ऊर्जा के विक्रय से प्राप्त होता है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग · भारत द्वारा भूटान के विभिन्न संस्थानों को वित्तीय सहायतादी जाती है|ट्रैक 2 कूटनीति के विकास के लिए नेहरु वांगचुक सांस्कृतिक केंद्र का विकासकिया जा रहा है| भारत के विश्वविद्यालयों में भूटानी छात्रों के लिए सीटें आरक्षित की गयी हैं · भूटान एक हिमालयी राज्य है अतः सतत हिमालय के लिए भारत में चल रहे नेशनल मिशन ऑन सस्टनेबल डेवलपमेंट ऑफ़ हिमालय के अंतर्गत दी जाने वाली राशि में भूटान को हिस्सा दिया जाता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत एवं भूटान ने पारस्परिक सहयोग के अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं किन्तु दोनों के सम्बन्धों में चिंता के बिंदु भी हैं जैसे पर्यावरण प्रभाव का ट्रक देते हुए भूटान का BBIN से निकल जाना, भारत द्वारा भूटान में विकसित परियोजनाओं के लंबित हो जाने के कारण इनकी की लागत बढ़ जाती है इसके परिणामस्वरुप भूटान के बढ़ते कर्ज और उसके ब्याज का मुद्दा जिसके कारण भूटान में भारत की आलोचना की जाती है| भूटान के कुछ समूहों का यह मानना कि भारत भूटान के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है इसी तरह भूटान का यह मानना कि भारत द्वारा ऊर्जा का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है| उपरोक्त मुद्दे भारत भूटान सम्बन्धों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं अतः भारत द्वारा BBIN के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना, पंचशील सिद्धांत का अनुपालन, भूटान के सभी राजनीतिक दलों के साथ सहयोगात्मक व्यवहार, ऊर्जा निर्यात टैरिफ का न्यायोचित निर्धारण, परियोजनाओं की समय पर आपूर्ति, भूटान के कर्जे की रीस्ट्रक्चरिंग करना आदि उपायों के माध्यम से भूटान की चिंताओं का समाधान करना चाहिए|
##Question:भारत के लिए भूटान के महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही दोनों देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द) Explain the importance of Bhutan for India. Also discuss the dimensions of mutual cooperation between the two countries (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत भूटान सम्बन्धों के स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के लिए भूटान के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में सहयोग के आयामों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां बताते हुए समाधान की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है अर्थात महाशक्तियों को अलग करता है| इसी कारण भूटान लम्बे समय तक तटस्थ देश बना रहा| चीन में कम्युनिज्म के आने के बाद, चीन आक्रामक विस्तार की नीति पर चल रहा थाइसी कारण भूटान को अपनी संप्रभुता का भय होने लगा भूटान को अपनी संप्रभुता की सुरक्षा हेतु एक मित्र राष्ट्र की आवश्यकता थी अतःभूटान का भारत की ओर झुकाव बढ़ा| 1950 में भारत और भूटान के मध्य एक शान्ति और मित्रता की संधि की गयी| यह संधि ही भारत भूटान सम्बन्धों का मूलाधार है| इस संधि के माध्यम से जहाँ भारत ने भारत-भूटान सीमा को पोरस सीमा बना दिया और वहां के नागरिकों को अनेक छूटे दी हैं वहीँ भूटान द्वारा यह प्रतिबद्धता स्वीकार की गयी कि भूटान अपनी रक्षा नीति एवं विदेश नीति के निर्धारण में भारतीय हितों को प्रभावित नहीं होने देगा| इस तरह दोनों देशों के मध्य परमपरागत रूप से बेहतर सम्बन्ध रहे हैं| भारत के लिए भूटान का महत्त्व · भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों और चीन के साथ भूटान की सीमा लगती है अतः भारत के लिए भूटान का एक महत्वपूर्ण सामरिक महत्त्व है · भूटान की सीमा चीन और भारत दोनों से लगती हैअर्थात यह एक बफर राज्य की स्थिति में है · भूटान सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट स्थित है अतः भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक रणनीतिक स्थिति में है · चुम्बी घाटी और डोकलाम भारत-चीन-भूटान के संगम पर स्थित है अतः भारत एवं भूटान की अखंडता के दृष्टि से महत्वपूर्ण है · उत्तर पूर्वी राज्यों में उग्रवाद पर नियन्त्रण स्थापित करने में भूटान का सहयोग भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा · इसके साथ ही भूटान के प्राकृतिक संसाधन है जैसे जल विद्युत् की सम्भावनाएं| भूटान की 70 % आय पनबिजली से आती है इसमें भारत कामहत्वपूर्ण सहयोग है| · इस तरह स्पष्ट होता है कि भूटान, भारत की अखंडता, रक्षा, आंतरिक सुरक्षा आदि के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में है अतः भारत और भूटान ने पारस्परिक सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये हैं सहयोग के आयाम रक्षा एवं प्रतिरक्षा सहयोग · बोडो/ULFA ने भूटान के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण कैम्पों को स्थापित किया था, वर्ष2003 में रॉयल गार्ड ऑफ़ भूटान ने ऑपरेशन क्लीन आल के माध्यम से इन कैम्पों को उजाड़ दिया है, इसी तरह भारत की BSF द्वारा भूटान चीन सीमा की सुरक्षा करती है · 2007 में भारत-भूटान संधि में बदलाव किये गए हैं किन्तु इस बात पर सहमति बनी है कि एक दुसरे के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षित करने का प्रयास करेंगे| उदाहरणार्थ 2016 में भूटान के निवेदन पर भारत ने डोकलाम में भूटान का सहयोग किया, अर्थात संधि में संशोधन के बाद भी संधि की प्रतिबद्धताओं पर दोनों देश बने हुए हैं| विकास में सहयोग · भारत, भूटान का महत्वपूर्ण विकासात्मक सहयोगी राष्ट्र है| भूटान की पहली 2 FYP में भारत द्वारा 100% फंडिंग की गयी है उसके बाद भी भूटान की आगामी सभी FYPs में भारत ने औसतन 30 % की फंडिंग की गयी है| · वर्ष 2013 से 2018 के मध्य में भारत ने 7 हजार करोड़ की फंडिंग की गयी है जिसे बजटीय सहायता, अवसंरचना निवेश, विशेष आर्थिक पॅकेज, विभिन्न सब्सिडियों के माध्यम से दिया गया है · भारत तकनीकी एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से भूटान का आधुनिकीकरण करता रहा है · 2017 में भारत भूटान के मध्य मुक्त व्यापार समझौता किया गया है, इसमें भूटान के निर्यात से शुल्कों को हटा लिया गया है, इससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा क्योंकि भूटान की अर्थव्यवस्था अभी मंदी के दौर से गुजर रही है ऊर्जा सहयोग · भूटान में जलविद्युत की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं अतः इस महत्त्व को देखते हुए भारत ने भूटान में पनबिजली के विकास के लिए अनेक प्रयास किये हैं| · भारत द्वारा चुखा, ताला एवं करिछु जलविद्युत परियोजनाओं को पूर्ण कर लिया है(6 हजार मेगावाट) जबकि पुनतसांग्छु जैसी परियोजनाए पूर्ण होने वाली हैं (6 हजार मेगावाट) · उत्तरी भूटान के खुलंचु में भारत द्वारा एक अन्य परियोजना प्रस्तावित की गयी है, इसका भारत के लिए भूराजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व हैइससे भूटान के उत्तरी भाग का भी विकास होगा और सापेक्षिक वंचना की भावना को बलवती होने से रोका जा सकेगा अतः भारत यहाँ संतुलित विकास नीति पर चल रहा है · भूटान के साथ भारत द्वारा ऊर्जा खरीद समझौता किया गया है जिसमें भूटान को सम्पूर्ण अतिरिक्त ऊर्जा खरीद की गारंटी दी गयी है| भूटान के सम्पूर्ण राजस्व का लगभग 47 % भारत को ऊर्जा के विक्रय से प्राप्त होता है सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग · भारत द्वारा भूटान के विभिन्न संस्थानों को वित्तीय सहायतादी जाती है|ट्रैक 2 कूटनीति के विकास के लिए नेहरु वांगचुक सांस्कृतिक केंद्र का विकासकिया जा रहा है| भारत के विश्वविद्यालयों में भूटानी छात्रों के लिए सीटें आरक्षित की गयी हैं · भूटान एक हिमालयी राज्य है अतः सतत हिमालय के लिए भारत में चल रहे नेशनल मिशन ऑन सस्टनेबल डेवलपमेंट ऑफ़ हिमालय के अंतर्गत दी जाने वाली राशि में भूटान को हिस्सा दिया जाता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत एवं भूटान ने पारस्परिक सहयोग के अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं किन्तु दोनों के सम्बन्धों में चिंता के बिंदु भी हैं जैसे पर्यावरण प्रभाव का ट्रक देते हुए भूटान का BBIN से निकल जाना, भारत द्वारा भूटान में विकसित परियोजनाओं के लंबित हो जाने के कारण इनकी की लागत बढ़ जाती है इसके परिणामस्वरुप भूटान के बढ़ते कर्ज और उसके ब्याज का मुद्दा जिसके कारण भूटान में भारत की आलोचना की जाती है| भूटान के कुछ समूहों का यह मानना कि भारत भूटान के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है इसी तरह भूटान का यह मानना कि भारत द्वारा ऊर्जा का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है| उपरोक्त मुद्दे भारत भूटान सम्बन्धों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं अतः भारत द्वारा BBIN के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना, पंचशील सिद्धांत का अनुपालन, भूटान के सभी राजनीतिक दलों के साथ सहयोगात्मक व्यवहार, ऊर्जा निर्यात टैरिफ का न्यायोचित निर्धारण, परियोजनाओं की समय पर आपूर्ति, भूटान के कर्जे की रीस्ट्रक्चरिंग करना आदि उपायों के माध्यम से भूटान की चिंताओं का समाधान करना चाहिए|
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"प्रशासनिक आवश्यकता को कारण बताकर किया गया बंगाल विभाजन, वास्तव में राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने का एक तरीका था |" इस कथन के आलोक में बंगाल विभाजन के कारण व परिणाम का संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) The partition of Bengal, citing administrative necessity as a reason, was in fact a way of stopping the growing influence of nationalism. In the light of this statement, briefly describe the cause and consequence of Bengal Partition. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजी साम्राज्यवादिता और और कर्जन के बारे में सामान्य परिचय देते हुए बंगाल विभाजन के पीछे उसके तर्क को बताइए | इसके पश्चात बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण का उल्लेख कीजिये | अंत में बंगाल विभाजन के परिणाम को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिस समय बंगाल विभाजन हुआ उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवादिता अपने चरम पर थी परन्तु बंगाल में कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गयीं जिसके कारण बंगाल विभाजन करना कर्जन ने आवश्यक समझा | उस समय कांग्रेस के अधिवेशन कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हो चुके थे ,जिसके कारण लोगों में राष्ट्रवाद की चेतना का विकास काफी हद तक हो चुका था | इसी राष्ट्रवादी चेतना के उदय के कारण ब्रिटिश सरकार के मन में भय था कि कहीं कांग्रेस उनके खिलाफ 1857 जैसी क्रांति न प्रारंभ कर दे | अंग्रेजों को ये भी लग रहा था कि इस समय यदि क्रांति शुरू हुई तो उसे दबाना बहुत ही कठिन हो सकता है | अतः ऐसी पारिस्थिति उत्पन्न होने के कारण कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा कर दी | कर्जन द्वारा बंग-भंग के पीछे दिए गए कुछ कारण- बंगाल प्रेसिडेंसी बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | इसमें पूर्वी और पश्चिमी बंगाल सहित बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे | बंगाल की जनसँख्या उस समय लगभग 8 करोड़ थी | बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्थाएं सुचारू रूप से नहीं चल पा रही हैं क्योंकि यह बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण - 1903 में बंगाल का दौरा करने तथा वहां की जनता में राष्ट्रवाद की प्रबल भावना को देखकर कर्जन ने बंगाल के विभाजन की योजना बनायी | बंगाल विभाजन का मुख्य उद्देश्य हिन्दू-मुसलामानों में फूट डालना तथा बंगाल में बढ़ती हुई राष्ट्रवादी भावनाओं को रोकना था | कर्जन के बंगाल विभाजन का मुख्य कारण प्रशासनिक नहीं राजनीतिक था | उस समय बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जाग्रति थी जिसे दबाने के लिए लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर उसे हिन्दू और मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्र को दो भागों में बाँटने और आपस में लड़ाने की नीति अपनाई | बंगाल विभाजन का प्रस्ताव - 3 दिसम्बर 1903 को ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव रखा गया और 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा की गई | विभाजन के बाद बंगाल पूर्वी व पश्चिम बंगाल में बंट गया |पूर्वी बंगाल में असम , चिटगांव ,ढाका को शामिल किया गया ,इसका मुख्यालय ढाका में था | पश्चिम बंगाल में बिहार ,उड़ीसा और पश्चिम बंगाल शामिल था |यहाँ की राजधानी कलकत्ता थी | बंगाल विभाजन का परिणाम - बंगाल विभाजन के विरोध में बंगाल में अनेक बैठकें हुई , सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ,कृष्ण कुमार मित्र व पृथ्वी चन्द्र राय जैसे बंगाल के नेताओं ने बंगाली, हितवादी व संजीवनी जैसे अख़बारों द्वारा विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की | राष्ट्रवादियों ने बंगाल विभाजन के विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा की तथा बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया | 16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंगाल विभाजन की योजना को लागू कर दिया | इसे शोक दिवस के रूप में मनाया गया | बंगाल विभाजन के विरोध में कई जगहों पर जनसभाओं का आयोजन किया गया | बंगाल विभाजन को मुस्लिमों ने अपने हित में सोचकर स्वीकार कर लिया | उन्हें शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में अवसर दिखाई देने लगे | पश्चिम बंगाल ने इस विभाजन को अस्वीकार कर दिया | भारत में राष्ट्रीयता की भावना ओर प्रबल हुई | 1911 में विभाजन को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया गया | निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि बंगाल विभाजन को जिस उद्देश्य से लागू किया गया वह उसे पूरा करने में समर्थ नहीं हुआ अपितु इसका विपरीत प्रभाव राष्ट्रवादी विचारधारा के विकास के रूप में हुआ | अतः बंगाल विभाजन ने राष्ट्रवाद की ऐसी विचारधारा को जन्म दिया ,जिसका प्रभाव आगे के आन्दोलनों में दृष्टिगोचर होता है |
##Question:"प्रशासनिक आवश्यकता को कारण बताकर किया गया बंगाल विभाजन, वास्तव में राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने का एक तरीका था |" इस कथन के आलोक में बंगाल विभाजन के कारण व परिणाम का संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) The partition of Bengal, citing administrative necessity as a reason, was in fact a way of stopping the growing influence of nationalism. In the light of this statement, briefly describe the cause and consequence of Bengal Partition. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में अंग्रेजी साम्राज्यवादिता और और कर्जन के बारे में सामान्य परिचय देते हुए बंगाल विभाजन के पीछे उसके तर्क को बताइए | इसके पश्चात बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण का उल्लेख कीजिये | अंत में बंगाल विभाजन के परिणाम को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिस समय बंगाल विभाजन हुआ उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवादिता अपने चरम पर थी परन्तु बंगाल में कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गयीं जिसके कारण बंगाल विभाजन करना कर्जन ने आवश्यक समझा | उस समय कांग्रेस के अधिवेशन कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हो चुके थे ,जिसके कारण लोगों में राष्ट्रवाद की चेतना का विकास काफी हद तक हो चुका था | इसी राष्ट्रवादी चेतना के उदय के कारण ब्रिटिश सरकार के मन में भय था कि कहीं कांग्रेस उनके खिलाफ 1857 जैसी क्रांति न प्रारंभ कर दे | अंग्रेजों को ये भी लग रहा था कि इस समय यदि क्रांति शुरू हुई तो उसे दबाना बहुत ही कठिन हो सकता है | अतः ऐसी पारिस्थिति उत्पन्न होने के कारण कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा कर दी | कर्जन द्वारा बंग-भंग के पीछे दिए गए कुछ कारण- बंगाल प्रेसिडेंसी बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | इसमें पूर्वी और पश्चिमी बंगाल सहित बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे | बंगाल की जनसँख्या उस समय लगभग 8 करोड़ थी | बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्थाएं सुचारू रूप से नहीं चल पा रही हैं क्योंकि यह बहुत बड़ी प्रेसीडेंसी है | बंगाल विभाजन के वास्तविक कारण - 1903 में बंगाल का दौरा करने तथा वहां की जनता में राष्ट्रवाद की प्रबल भावना को देखकर कर्जन ने बंगाल के विभाजन की योजना बनायी | बंगाल विभाजन का मुख्य उद्देश्य हिन्दू-मुसलामानों में फूट डालना तथा बंगाल में बढ़ती हुई राष्ट्रवादी भावनाओं को रोकना था | कर्जन के बंगाल विभाजन का मुख्य कारण प्रशासनिक नहीं राजनीतिक था | उस समय बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जाग्रति थी जिसे दबाने के लिए लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर उसे हिन्दू और मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्र को दो भागों में बाँटने और आपस में लड़ाने की नीति अपनाई | बंगाल विभाजन का प्रस्ताव - 3 दिसम्बर 1903 को ब्रिटिश संसद में प्रस्ताव रखा गया और 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा की गई | विभाजन के बाद बंगाल पूर्वी व पश्चिम बंगाल में बंट गया |पूर्वी बंगाल में असम , चिटगांव ,ढाका को शामिल किया गया ,इसका मुख्यालय ढाका में था | पश्चिम बंगाल में बिहार ,उड़ीसा और पश्चिम बंगाल शामिल था |यहाँ की राजधानी कलकत्ता थी | बंगाल विभाजन का परिणाम - बंगाल विभाजन के विरोध में बंगाल में अनेक बैठकें हुई , सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ,कृष्ण कुमार मित्र व पृथ्वी चन्द्र राय जैसे बंगाल के नेताओं ने बंगाली, हितवादी व संजीवनी जैसे अख़बारों द्वारा विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की | राष्ट्रवादियों ने बंगाल विभाजन के विरोध में 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा की तथा बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया | 16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंगाल विभाजन की योजना को लागू कर दिया | इसे शोक दिवस के रूप में मनाया गया | बंगाल विभाजन के विरोध में कई जगहों पर जनसभाओं का आयोजन किया गया | बंगाल विभाजन को मुस्लिमों ने अपने हित में सोचकर स्वीकार कर लिया | उन्हें शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में अवसर दिखाई देने लगे | पश्चिम बंगाल ने इस विभाजन को अस्वीकार कर दिया | भारत में राष्ट्रीयता की भावना ओर प्रबल हुई | 1911 में विभाजन को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया गया | निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि बंगाल विभाजन को जिस उद्देश्य से लागू किया गया वह उसे पूरा करने में समर्थ नहीं हुआ अपितु इसका विपरीत प्रभाव राष्ट्रवादी विचारधारा के विकास के रूप में हुआ | अतः बंगाल विभाजन ने राष्ट्रवाद की ऐसी विचारधारा को जन्म दिया ,जिसका प्रभाव आगे के आन्दोलनों में दृष्टिगोचर होता है |
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तालिबान शांति वार्ता में विभिन्न महाशक्तियों की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए इस संबंध में भारतीय दृष्टिकोण की भी चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द) In brief remarks on the role of various superpowers in the Taliban peace talks, also discuss the Indian viewpoint in this regard. (150-200 words)
दृष्टिकोण : तालिबान शांति वार्ता का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । तालिबान शांति वार्ता में विभिन्न महाशक्तियों के स्वार्थ व भूमिका की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । तालिबान शांति वार्ता के प्रति भारत के दृष्टिकोण की चर्चा कीजिये । अफ़गानिस्तान में शांति स्थापना के संदर्भ में तालिबान शांति वार्ता की संभावनाओं को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : अफ़गानिस्तान में पिछले लगभग दो दशकों से अमेरिका व तालिबान संघर्षरत हैं परंतु फिर भी अमेरिका तालिबान को निर्णायक रूप से पराजित कर पाने में असफल रहा है और वर्तमान में लगभग 50% अफ़गानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है । ऐसे में और अधिक लंबे समय तक अमेरिका का अफ़गानिस्तान में बने रह पाना काफी कठिन है । यही वह पृष्टभूमि है जिसने तालिबान शांति वार्ता के लिए आधार तैयार किया । अमेरिका अफ़गानिस्तान से कुछ सम्मानजनक तरीके से बाहर आना चाहता है और अपने व अपने मित्रों पर तालिबान के आतंकवादी हमलों के खतरों को समाप्त करना चाहता है । वर्तमान में अमेरिका की स्थिति ऐसी नहीं रह गयी है कि वह लंबे समय तक अफगानिस्तान मे रूक पाए । ट्रंप अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी चाहते हैं । तालिबान के प्रतिनिधियों से क़तर में हुई हालिया बैठक में अमेरिका ने अफगानिस्तान की भूमि का अमेरिका व उसके सहयोगी राष्ट्रों के विरुद्ध आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने से रोकने के लिए तालिबान की सहमति प्राप्त की है। दूसरी ओर रूस विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों चीन , ईरान आदि के साथ मिलकर तालिबान से वार्ता करने के लिए प्रयासरत है । रूस की चिंता है कि अमेरिका अफगानिस्तान को तालिबान के भरोसे छोड़ कर बाहर निकल रहा है, जो भविष्य में अफगानिस्तान सहित पूरे क्षेत्र की शांति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है । यह रूस व उसके मित्रों के हितों के लिए प्रतिकूल है । ऐसी स्थिति में रूस अलग से तालिबान से समझौता व वार्ता कर रहा है । रूस व अमेरिका द्वारा तालिबान से इस प्रकार की संधि वार्ता निश्चित रूप से तालिबान के आत्मविश्वास को और अधिक बढ़ाएगा , जो अफगानिस्तान में लोकतंत्र की संभावनाओं को अत्यधिक कमजोर करेगा । यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अफगानिस्तान के भविष्य निर्धारण से संबंधित इस वार्ता में अफगानिस्तान की सरकार की कोई भूमिका नहीं है और उसे इस शांति वार्ता से बाहर रखा गया है । तालिबान द्वारा अफगानिस्तान की सरकार को मान्यता नहीं दिया जाता है और अमेरिका की वर्तमान नीति से तालिबान की इस धारणा को और बल मिलेगा । यह अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया के दृष्टिकोण से बेहद चिंतनीय विषय है । तालिबान शांति वार्ता के संबंध में भारतीय दृष्टिकोण बेहद स्पष्ट है कि भारत आधिकारिक रूप से किसी भी आतंकी संगठन से बात नहीं करेगा । भारत अफगानिस्तान की सरकार को वहाँ का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है और अफगानिस्तान के भविष्य के फैसले लेने में उसकी भागीदारी को महत्वपूर्ण मानता है । वर्तमान में अफगानिस्तान की शांति के लिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्रों को एक मंच पर आकर वार्ता को आगे बढ़ाना चाहिए । विशेषकर अमेरिका व रूस को साथ मिलकर तालिबान पर दबाव बनाना चाहिए कि वह हिंसा का मार्ग त्याग कर अफगानिस्तान कि सरकार के साथ सहयोग करे । साथ ही तालिबान शांति वार्ता में अफगानी सरकार के प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाना चाहिए । एक समग्र दृष्टिकोण, जिसमें सभी हितधारकों कि भूमिका हो , के माध्यम से ही अफगानिस्तान व वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित कि जा सकती है ।
##Question:तालिबान शांति वार्ता में विभिन्न महाशक्तियों की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए इस संबंध में भारतीय दृष्टिकोण की भी चर्चा कीजिए । (150-200 शब्द) In brief remarks on the role of various superpowers in the Taliban peace talks, also discuss the Indian viewpoint in this regard. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : तालिबान शांति वार्ता का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । तालिबान शांति वार्ता में विभिन्न महाशक्तियों के स्वार्थ व भूमिका की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । तालिबान शांति वार्ता के प्रति भारत के दृष्टिकोण की चर्चा कीजिये । अफ़गानिस्तान में शांति स्थापना के संदर्भ में तालिबान शांति वार्ता की संभावनाओं को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : अफ़गानिस्तान में पिछले लगभग दो दशकों से अमेरिका व तालिबान संघर्षरत हैं परंतु फिर भी अमेरिका तालिबान को निर्णायक रूप से पराजित कर पाने में असफल रहा है और वर्तमान में लगभग 50% अफ़गानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है । ऐसे में और अधिक लंबे समय तक अमेरिका का अफ़गानिस्तान में बने रह पाना काफी कठिन है । यही वह पृष्टभूमि है जिसने तालिबान शांति वार्ता के लिए आधार तैयार किया । अमेरिका अफ़गानिस्तान से कुछ सम्मानजनक तरीके से बाहर आना चाहता है और अपने व अपने मित्रों पर तालिबान के आतंकवादी हमलों के खतरों को समाप्त करना चाहता है । वर्तमान में अमेरिका की स्थिति ऐसी नहीं रह गयी है कि वह लंबे समय तक अफगानिस्तान मे रूक पाए । ट्रंप अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी चाहते हैं । तालिबान के प्रतिनिधियों से क़तर में हुई हालिया बैठक में अमेरिका ने अफगानिस्तान की भूमि का अमेरिका व उसके सहयोगी राष्ट्रों के विरुद्ध आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने से रोकने के लिए तालिबान की सहमति प्राप्त की है। दूसरी ओर रूस विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों चीन , ईरान आदि के साथ मिलकर तालिबान से वार्ता करने के लिए प्रयासरत है । रूस की चिंता है कि अमेरिका अफगानिस्तान को तालिबान के भरोसे छोड़ कर बाहर निकल रहा है, जो भविष्य में अफगानिस्तान सहित पूरे क्षेत्र की शांति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है । यह रूस व उसके मित्रों के हितों के लिए प्रतिकूल है । ऐसी स्थिति में रूस अलग से तालिबान से समझौता व वार्ता कर रहा है । रूस व अमेरिका द्वारा तालिबान से इस प्रकार की संधि वार्ता निश्चित रूप से तालिबान के आत्मविश्वास को और अधिक बढ़ाएगा , जो अफगानिस्तान में लोकतंत्र की संभावनाओं को अत्यधिक कमजोर करेगा । यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अफगानिस्तान के भविष्य निर्धारण से संबंधित इस वार्ता में अफगानिस्तान की सरकार की कोई भूमिका नहीं है और उसे इस शांति वार्ता से बाहर रखा गया है । तालिबान द्वारा अफगानिस्तान की सरकार को मान्यता नहीं दिया जाता है और अमेरिका की वर्तमान नीति से तालिबान की इस धारणा को और बल मिलेगा । यह अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया के दृष्टिकोण से बेहद चिंतनीय विषय है । तालिबान शांति वार्ता के संबंध में भारतीय दृष्टिकोण बेहद स्पष्ट है कि भारत आधिकारिक रूप से किसी भी आतंकी संगठन से बात नहीं करेगा । भारत अफगानिस्तान की सरकार को वहाँ का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है और अफगानिस्तान के भविष्य के फैसले लेने में उसकी भागीदारी को महत्वपूर्ण मानता है । वर्तमान में अफगानिस्तान की शांति के लिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्रों को एक मंच पर आकर वार्ता को आगे बढ़ाना चाहिए । विशेषकर अमेरिका व रूस को साथ मिलकर तालिबान पर दबाव बनाना चाहिए कि वह हिंसा का मार्ग त्याग कर अफगानिस्तान कि सरकार के साथ सहयोग करे । साथ ही तालिबान शांति वार्ता में अफगानी सरकार के प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाना चाहिए । एक समग्र दृष्टिकोण, जिसमें सभी हितधारकों कि भूमिका हो , के माध्यम से ही अफगानिस्तान व वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित कि जा सकती है ।
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लोकसेवकों की तटस्थता का आकलन किन मानकों के आधार पर किया जा सकता है? साथ ही, लोकसेवकों में तटस्थता के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को भी स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) On what parameters, the Neutrality of public servants can be assessed? Also, explain the positive and negative effects ofNeutrality among public servants. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- लोकसेवकों के संदर्भ में, तटस्थता को संक्षिप्ततः बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, उन मानकों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार परलोकसेवकों की तटस्थता का आकलन किया जा सकता है| अगले भाग में,लोकसेवकों में तटस्थता के सकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| अंतिम भाग में,लोकसेवकों में तटस्थता के नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| उत्तर- तटस्थता का आशय भेदभावरहित एवं गैर-तरफदारी व्यवहार से है| अर्थात सबके प्रति लोकसेवकों के समान व्यवहार से तटस्थता का आकलन किया जाता है| अतः लोकसेवक का व्यवहार बिना किसी पक्षपात के या पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वस्तुनिष्ठ(Objective) मानकों के आधार पर निर्धारित होनी चाहिए| अतः यह लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा का मूल आयाम है | तटस्थता का तात्पर्य, लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अनामिता(Anonymity) के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति, राजनीतिक दलों के प्रति) समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवकों की तटस्थता का आकलन इसका परिक्षण दो स्तरों पर किया जा सकता है- जनता के स्तर पर तथा राजनीतिक दलों के स्तर पर| जनता के प्रति लोकसेवकों के व्यवहार में समानता का होना समान परिस्थितियों के महत्व पर आधारित है| अतः परिस्थितियों में असमानता होने पर लोकसेवकों के व्यवहार में असमानता होनी चाहिए ताकि सबके प्रति समानता को प्राप्त किया जा सके| यह सरकार के द्वारा किए जाने वाले सकारात्मक भेदभाव को विधिक एवं नैतिक दोनों प्रकारों से उचित मानती है| सकारात्मक भेदभाव विधि के समक्ष समान संरक्षण के सिद्धांत के अनुकूल है| लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक स्तर पर भी भेदभावरहित व्यवस्था को बनाए रखा जाना आवश्यक है एवं इस उद्देश्य से लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी नहीं दी जानी चाहिए जो कि गैर-तरफदारी के मूल्य को दर्शाती है| अतः राजनीतिक भेदभावरहित एवं गैर-तरफदारी सम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है| तटस्थता का आशय यह है कि किसी भी सतारूढ़ पार्टी के प्रति लोकसेवकों की प्रतिबद्धता उस दल के राजनीतिक विचारधारा के प्रति नहीं होनी चाहिए ताकि लोकसेवक प्रत्येक सतारूढ़ राजनीतिक दल के प्रति न्यायपूर्ण तरीके से कार्य कर सकें| लोकसेवकों की तटस्थता इस बात की मांग करती है कि लोकसेवक आचरण संहिता के अनुरूप प्रत्येक सतारूढ़ राजनीतिक दल को अपने अधिकतम क्षमता के अनुसार सेवाएँ प्रदान करे | लोकसेवक मंत्रियों के विश्वास को प्राप्त करे एवं उसी प्रकार का विश्वास/संबंध आगामी मंत्रियों के साथ भी स्थापित कर पाए| लोकसेवकों की तटस्थता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों के राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाए| दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना जबकि नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक को प्रतिबद्ध होना| व्यवहारिकता में नीति राजनीति पर दलीय राजनीति के प्रभाव का होना जरुरी है अतः नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक की प्रतिबद्धता अंततः दलीय राजनीति के प्रति वचनबद्धता को भी दर्शाती है जिसे रोकने हेतु लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है| लोकसेवकों की तटस्थता एकगुणवत अवधारणा है अतः वास्तविक आकलन किया जाना कठिन है किंतु कुछ हद तक, कुछ मानकों के आधार पर इसका आकलन संभव है जैसे- राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच के अंतर की मात्रा(उच्चतर मात्रा); दैनिक प्रशासनिक कार्यों में राजनीति के हस्तक्षेप की मात्रा(निम्नतर मात्रा); नीति निर्माण की प्रक्रिया में प्रशासन के योगदान की मात्रा(निम्नतर मात्रा); लोकसेवकों के निष्पक्ष कार्यप्रणाली में जनता के विश्वास की मात्रा(उच्चतर मात्रा); तटस्थता के सकारात्मक प्रभाव- यह लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति में जनविश्वसनीयता को प्रोत्साहित करती है| किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों को लोकसेवकों के वफ़ादारी में विश्वास को प्रोत्साहित करती है| यह लोकसेवकों के उच्चतर मनोबल को प्रोत्साहित करता है क्योंकि लोकसेवकों की पदोन्नति, पदस्थापना, तबादला तथा अन्य सेवा-शर्तें राजनीतिक मानकों पर आधारित ना होकर योग्यता पर आधारित होगा| यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकने में सहायक सिद्ध होती है जो कि भ्रष्टाचार के रोकथाम की दिशा में कारगर सिद्ध होता है| लोकसेवकों का तटस्थ होना उसमें जनसेवा की भावना को विकसित करती है| मंत्री तथा सचिव के बीच के संबंध को अधिक सुचारू बनाना; लोकसेवकों की तटस्थता संसदीय शासन प्रणाली की अनिवार्यता को दर्शाती है| तटस्थता लो कसेवकों की कार्यकुशलता एवं प्रभावकारिता को प्रोत्साहित करने में सहायक सिद्ध होता है| तटस्थता के नकारात्मक प्रभाव- सरकार/शासन में किसी भी प्रकार की लापरवाही होने पर किसी भी प्रकार के दायित्व को निर्धारित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| यह वि कासीय अनिवार्यताओं में बाधाओं/प्रतिरोध को उत्पन करता है| लोकसेवकों के द्वारा यथास्थिति को बनाए रखने पर बल दिया जाता है जो कि सुधारात्मक प्रयासों एवं नवाचार की प्रवृति को हतोत्साहित करती है| तटस्थता लोकसेवकों को अतिसक्रिय होने से रोकता है| तटस्थता लोकसेवकों के मनोबल को हतोत्साहित करती है| वर्तमान समय में लोकसेवकों के प्रतिबद्धता के मूल्य पर भी विशिष्ट बल दिया जा रहा है| अतः लोकसेवकों के तटस्थ होने के साथ-साथ प्रतिबद्धता के होने से नैतिक दुविधा का जन्म होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि तटस्थता लोकसेवा के लिए अनिवार्य है तथापि इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं| इसके बाद भी सुचारू शासन-प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए तटस्थता अपरिहार्य है|
##Question:लोकसेवकों की तटस्थता का आकलन किन मानकों के आधार पर किया जा सकता है? साथ ही, लोकसेवकों में तटस्थता के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों को भी स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) On what parameters, the Neutrality of public servants can be assessed? Also, explain the positive and negative effects ofNeutrality among public servants. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- लोकसेवकों के संदर्भ में, तटस्थता को संक्षिप्ततः बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, उन मानकों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार परलोकसेवकों की तटस्थता का आकलन किया जा सकता है| अगले भाग में,लोकसेवकों में तटस्थता के सकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| अंतिम भाग में,लोकसेवकों में तटस्थता के नकारात्मक प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| उत्तर- तटस्थता का आशय भेदभावरहित एवं गैर-तरफदारी व्यवहार से है| अर्थात सबके प्रति लोकसेवकों के समान व्यवहार से तटस्थता का आकलन किया जाता है| अतः लोकसेवक का व्यवहार बिना किसी पक्षपात के या पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वस्तुनिष्ठ(Objective) मानकों के आधार पर निर्धारित होनी चाहिए| अतः यह लोकसेवकों के सत्यनिष्ठा का मूल आयाम है | तटस्थता का तात्पर्य, लोकसेवकों को किसी भी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रति वचनबद्ध नहीं होने से है| तटस्थ लोकसेवक की 3 मौलिक विशेषताएं होती हैं यथा भेदभावरहितता, गैर-तरफदारी एवं अनामिता| एक तटस्थ लोकसेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अनामिता(Anonymity) के मूल्य का भी अनुपालन करे यानी सरकार की नीतियों के साथ किसी भी लोकसेवक के नाम को प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित नहीं किया जाए| भेदभावरहित होने का आशय सबके प्रति(आम जनता के प्रति, राजनीतिक दलों के प्रति) समान व्यवहार से है| जबकि गैर-तरफदारी का आशय लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने से है| लोकसेवकों की तटस्थता का आकलन इसका परिक्षण दो स्तरों पर किया जा सकता है- जनता के स्तर पर तथा राजनीतिक दलों के स्तर पर| जनता के प्रति लोकसेवकों के व्यवहार में समानता का होना समान परिस्थितियों के महत्व पर आधारित है| अतः परिस्थितियों में असमानता होने पर लोकसेवकों के व्यवहार में असमानता होनी चाहिए ताकि सबके प्रति समानता को प्राप्त किया जा सके| यह सरकार के द्वारा किए जाने वाले सकारात्मक भेदभाव को विधिक एवं नैतिक दोनों प्रकारों से उचित मानती है| सकारात्मक भेदभाव विधि के समक्ष समान संरक्षण के सिद्धांत के अनुकूल है| लोकसेवकों के द्वारा राजनीतिक स्तर पर भी भेदभावरहित व्यवस्था को बनाए रखा जाना आवश्यक है एवं इस उद्देश्य से लोकसेवकों को राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी नहीं दी जानी चाहिए जो कि गैर-तरफदारी के मूल्य को दर्शाती है| अतः राजनीतिक भेदभावरहित एवं गैर-तरफदारी सम्मिलित रूप से लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य को दर्शाती है| तटस्थता का आशय यह है कि किसी भी सतारूढ़ पार्टी के प्रति लोकसेवकों की प्रतिबद्धता उस दल के राजनीतिक विचारधारा के प्रति नहीं होनी चाहिए ताकि लोकसेवक प्रत्येक सतारूढ़ राजनीतिक दल के प्रति न्यायपूर्ण तरीके से कार्य कर सकें| लोकसेवकों की तटस्थता इस बात की मांग करती है कि लोकसेवक आचरण संहिता के अनुरूप प्रत्येक सतारूढ़ राजनीतिक दल को अपने अधिकतम क्षमता के अनुसार सेवाएँ प्रदान करे | लोकसेवक मंत्रियों के विश्वास को प्राप्त करे एवं उसी प्रकार का विश्वास/संबंध आगामी मंत्रियों के साथ भी स्थापित कर पाए| लोकसेवकों की तटस्थता को प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि लोकसेवकों के राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाए| दलीय राजनीति के प्रति लोकसेवक को तटस्थ होना जबकि नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक को प्रतिबद्ध होना| व्यवहारिकता में नीति राजनीति पर दलीय राजनीति के प्रभाव का होना जरुरी है अतः नीति राजनीति के प्रति लोकसेवक की प्रतिबद्धता अंततः दलीय राजनीति के प्रति वचनबद्धता को भी दर्शाती है जिसे रोकने हेतु लोकसेवकों के तटस्थता के मूल्य पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है| लोकसेवकों की तटस्थता एकगुणवत अवधारणा है अतः वास्तविक आकलन किया जाना कठिन है किंतु कुछ हद तक, कुछ मानकों के आधार पर इसका आकलन संभव है जैसे- राजनीतिक कार्यपालिका एवं प्रशासनिक कार्यपालिका के बीच के अंतर की मात्रा(उच्चतर मात्रा); दैनिक प्रशासनिक कार्यों में राजनीति के हस्तक्षेप की मात्रा(निम्नतर मात्रा); नीति निर्माण की प्रक्रिया में प्रशासन के योगदान की मात्रा(निम्नतर मात्रा); लोकसेवकों के निष्पक्ष कार्यप्रणाली में जनता के विश्वास की मात्रा(उच्चतर मात्रा); तटस्थता के सकारात्मक प्रभाव- यह लोकसेवकों के गैर-राजनीतिक प्रकृति में जनविश्वसनीयता को प्रोत्साहित करती है| किसी भी राजनीतिक दल के मंत्रियों को लोकसेवकों के वफ़ादारी में विश्वास को प्रोत्साहित करती है| यह लोकसेवकों के उच्चतर मनोबल को प्रोत्साहित करता है क्योंकि लोकसेवकों की पदोन्नति, पदस्थापना, तबादला तथा अन्य सेवा-शर्तें राजनीतिक मानकों पर आधारित ना होकर योग्यता पर आधारित होगा| यह लोकसेवकों के राजनीतिकरण को रोकने में सहायक सिद्ध होती है जो कि भ्रष्टाचार के रोकथाम की दिशा में कारगर सिद्ध होता है| लोकसेवकों का तटस्थ होना उसमें जनसेवा की भावना को विकसित करती है| मंत्री तथा सचिव के बीच के संबंध को अधिक सुचारू बनाना; लोकसेवकों की तटस्थता संसदीय शासन प्रणाली की अनिवार्यता को दर्शाती है| तटस्थता लो कसेवकों की कार्यकुशलता एवं प्रभावकारिता को प्रोत्साहित करने में सहायक सिद्ध होता है| तटस्थता के नकारात्मक प्रभाव- सरकार/शासन में किसी भी प्रकार की लापरवाही होने पर किसी भी प्रकार के दायित्व को निर्धारित किया जाना संभव नहीं हो पाता है| यह वि कासीय अनिवार्यताओं में बाधाओं/प्रतिरोध को उत्पन करता है| लोकसेवकों के द्वारा यथास्थिति को बनाए रखने पर बल दिया जाता है जो कि सुधारात्मक प्रयासों एवं नवाचार की प्रवृति को हतोत्साहित करती है| तटस्थता लोकसेवकों को अतिसक्रिय होने से रोकता है| तटस्थता लोकसेवकों के मनोबल को हतोत्साहित करती है| वर्तमान समय में लोकसेवकों के प्रतिबद्धता के मूल्य पर भी विशिष्ट बल दिया जा रहा है| अतः लोकसेवकों के तटस्थ होने के साथ-साथ प्रतिबद्धता के होने से नैतिक दुविधा का जन्म होता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि तटस्थता लोकसेवा के लिए अनिवार्य है तथापि इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं| इसके बाद भी सुचारू शासन-प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए तटस्थता अपरिहार्य है|
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The Russian Revolution brought an end to monarchial rule and established a new system of administration. Discuss the causes which led to the Russian revolution. (150 words / 10 marks)
Brief Approach: In introduction Briefly write about the Russian revolution. Discuss the causes of the Russian revolution. Briefly conclude your answer with the impact of it. Answer : The twentieth-century witnessed one of the most explosive political events in the form of the Russian Revolution of 1917. The violent revolution ended the Romanov dynasty and centuries of Russian monarchial rule. During the Russian Revolution, the Bolsheviks, led by leftist revolutionary Vladimir Lenin, seized power and destroyed the tradition of Tsarist rule. The Bolsheviks would later become the Communist Party of the Soviet Union. Causes of the Russian revolution: The weaknessesof Tsar Nicholas II: The ruler of Russia was Tsar Nicholas II. He was an absolute monarch, meaning that he had total power in Russia. He used his secret police, the Okhrana, to persecute opponents. Books and newspapers were censored. The Church supported the Tsar – the ‘Little Father of the Russian people’. Nicholas II ruled a vast country that was almost medieval in comparison to other countries. The Tsar’s undemocratic government was a major cause of the revolution. Failure of the Duma: In 1905 Russia lost a war with Japan. This defeat caused strikes in the Russian cities, the Tsar nearly lost control. Nicholas II offered to call a Duma, or parliament, with free elections. This was accepted by the demonstrators. When the Duma met, it began to criticise the Tsar and demanded changes. Nicholas II did not like this at all. The Duma was dismissed and new elections, controlled by the Tsar, were called. It became clear that the Duma would be shut down if it criticised the Tsar. As long as the Tsar had control of the army, his power could not be broken. The discontent of the Workers: Industrialisation began much later in Russia than in Western Europe. Huge iron foundries, textile factories and engineering firms were set up. Most were owned by the government or foreigners and were located in big cities such as St Petersburg or Moscow. By 1900 20% of Russians were workers living in cities. Working conditions in the new industrial towns were hard. The pay was very low. Although strikes and demonstrations were illegal, they often took place. Strikers were frequently shot by the Tsar’s soldiers or secret police. The discontent of the Peasants: Russia was a rural society with over 90% of the people being poor peasants. most farmers were in absolute poverty. Agriculture was in desperate need of modernisation. In contrast, a small number of upper-class people held most of the wealth and power. This aristocracy had large townhouses and country estates. Russian failures in the First World War: In the first few months of the First World War, Russia fought better than had been expected. Russian forces attacked Germany and Austria-Hungary in 1914 and were only pushed back after fierce fighting at the battle of Tannenberg. In 1915, Tsar Nicholas II assumed personal command of the Russian armed forces. This was a risky policy; any defeats would be blamed on him. As it turned out the Tsar was a poor commander. The Russian army lost confidence in the Tsar after a string of serious defeats. The Russian soldiers, poorly trained and equipped, lacking in basic items such as rifles and ammunition, suffered from lowering morale. Thousands of men deserted. Without the support of the army, the Tsar’s position became increasingly precarious. Rasputin and Scandal: While Tsar Nicholas II was absent commanding Russian forces during the First World War, he left the day to day running of Russia in the control of his wife Tsarina Alexandra. Alexandra came increasingly under the influence of Gregory Rasputin, a ‘holy man’ who appeared to be able to heal the haemophilia of Prince Alexis, the heir to the throne. Rasputin used his power to win effective control of the Russian government. But this aroused envy and he was murdered in 1916. Rasputin’s influence undermined the prestige of the royal family. The opposition of the Communists: The Communists believed in the ideas of Karl Marx. Marx claimed that history is all about the struggles between the classes. He claimed that the capitalist system was unfair because the factory owners (bourgeois) made profits from the toils of the workers (proletariat). Marx predicted that the proletariat would violently overthrow the bosses and take control of the country on behalf of the people. The Russian Communists were divided into the Bolsheviks led by Lenin and the Mensheviks led by Trotsky. Lenin believed that the small party of Bolsheviks should seize power and control Russia on behalf of the people. Before 1917 Lenin and many of the other Communist leaders were in exile abroad, plotting to bring about a revolution in Russia. In October 1917, Lenin led an armed uprising against the Monarchy and established a new system of administration.He took control of Russia and turn it into a communist country.
##Question:The Russian Revolution brought an end to monarchial rule and established a new system of administration. Discuss the causes which led to the Russian revolution. (150 words / 10 marks)##Answer:Brief Approach: In introduction Briefly write about the Russian revolution. Discuss the causes of the Russian revolution. Briefly conclude your answer with the impact of it. Answer : The twentieth-century witnessed one of the most explosive political events in the form of the Russian Revolution of 1917. The violent revolution ended the Romanov dynasty and centuries of Russian monarchial rule. During the Russian Revolution, the Bolsheviks, led by leftist revolutionary Vladimir Lenin, seized power and destroyed the tradition of Tsarist rule. The Bolsheviks would later become the Communist Party of the Soviet Union. Causes of the Russian revolution: The weaknessesof Tsar Nicholas II: The ruler of Russia was Tsar Nicholas II. He was an absolute monarch, meaning that he had total power in Russia. He used his secret police, the Okhrana, to persecute opponents. Books and newspapers were censored. The Church supported the Tsar – the ‘Little Father of the Russian people’. Nicholas II ruled a vast country that was almost medieval in comparison to other countries. The Tsar’s undemocratic government was a major cause of the revolution. Failure of the Duma: In 1905 Russia lost a war with Japan. This defeat caused strikes in the Russian cities, the Tsar nearly lost control. Nicholas II offered to call a Duma, or parliament, with free elections. This was accepted by the demonstrators. When the Duma met, it began to criticise the Tsar and demanded changes. Nicholas II did not like this at all. The Duma was dismissed and new elections, controlled by the Tsar, were called. It became clear that the Duma would be shut down if it criticised the Tsar. As long as the Tsar had control of the army, his power could not be broken. The discontent of the Workers: Industrialisation began much later in Russia than in Western Europe. Huge iron foundries, textile factories and engineering firms were set up. Most were owned by the government or foreigners and were located in big cities such as St Petersburg or Moscow. By 1900 20% of Russians were workers living in cities. Working conditions in the new industrial towns were hard. The pay was very low. Although strikes and demonstrations were illegal, they often took place. Strikers were frequently shot by the Tsar’s soldiers or secret police. The discontent of the Peasants: Russia was a rural society with over 90% of the people being poor peasants. most farmers were in absolute poverty. Agriculture was in desperate need of modernisation. In contrast, a small number of upper-class people held most of the wealth and power. This aristocracy had large townhouses and country estates. Russian failures in the First World War: In the first few months of the First World War, Russia fought better than had been expected. Russian forces attacked Germany and Austria-Hungary in 1914 and were only pushed back after fierce fighting at the battle of Tannenberg. In 1915, Tsar Nicholas II assumed personal command of the Russian armed forces. This was a risky policy; any defeats would be blamed on him. As it turned out the Tsar was a poor commander. The Russian army lost confidence in the Tsar after a string of serious defeats. The Russian soldiers, poorly trained and equipped, lacking in basic items such as rifles and ammunition, suffered from lowering morale. Thousands of men deserted. Without the support of the army, the Tsar’s position became increasingly precarious. Rasputin and Scandal: While Tsar Nicholas II was absent commanding Russian forces during the First World War, he left the day to day running of Russia in the control of his wife Tsarina Alexandra. Alexandra came increasingly under the influence of Gregory Rasputin, a ‘holy man’ who appeared to be able to heal the haemophilia of Prince Alexis, the heir to the throne. Rasputin used his power to win effective control of the Russian government. But this aroused envy and he was murdered in 1916. Rasputin’s influence undermined the prestige of the royal family. The opposition of the Communists: The Communists believed in the ideas of Karl Marx. Marx claimed that history is all about the struggles between the classes. He claimed that the capitalist system was unfair because the factory owners (bourgeois) made profits from the toils of the workers (proletariat). Marx predicted that the proletariat would violently overthrow the bosses and take control of the country on behalf of the people. The Russian Communists were divided into the Bolsheviks led by Lenin and the Mensheviks led by Trotsky. Lenin believed that the small party of Bolsheviks should seize power and control Russia on behalf of the people. Before 1917 Lenin and many of the other Communist leaders were in exile abroad, plotting to bring about a revolution in Russia. In October 1917, Lenin led an armed uprising against the Monarchy and established a new system of administration.He took control of Russia and turn it into a communist country.
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परंपरागत रूप से भारत व नेपाल एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं तथापि हाल के दशक में बेहतर संबंधों के मार्ग में कई चुनौतियाँ उत्पन्न हुई है । टिप्पणी कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक ) Traditionally India and Nepal have been an important ally, however in the recent decade many challenges have arisen in the path of better relations.comment. (150-200 words/10 marks)
दृष्टिकोण : दक्षिण एशिया में भारत के एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में नेपाल के महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । हाल के दिनों में भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों की बिंदुबार चर्चा कीजिये । सम्बन्धों को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझावों को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत व नेपाल सांस्कृतिक व ऐतिहासिक रूप से प्राचीन काल से ही जुड़े रहे हैं । आज़ादी के बाद से भारत व नेपाल के औपचारिक सम्बन्धों में काफी बढ़ोतरी हुई है । भारत व चीन के बीच एक बफ़र क्षेत्र के रूप में नेपाल का महत्व सर्वविदित है । भारत व नेपाल कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं । भारतीय फर्म नेपाल में सबसे बड़े निवेशक हैं । नेपाल का किसी तीसरे देश के साथ व्यापार का 98% भारत के माध्यम से होता है । भारत नेपाल को लगभग 100% पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है । इसी प्रकार भारतीय सेना में लगभग 30 हज़ार गोरखा शामिल हैं और भारत ने नेपाल के लिए खुले द्वार की नीति अपनायी है । इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया में नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है परंतु हाल के वर्षों में भारत व नेपाल के बीच बेहतर सम्बन्धों के मार्ग में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई है जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं : - नेपाल में पिछले लगभग एक दशक से संवैधानिक संकट की स्थिति रही है । साथ ही उससे पूर्व माओवादी क्रांति के कारण काफी आंतरिक अशांति रही है । इन सभी मामलों में नेपाल द्वारा लगातार भारत पर आरोप लगया जाता रहा है कि वह नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है । वर्ष 2015 में बने नेपाली संविधान को लेकर मधेशीयों की आपत्तियाँ थी जिसके बाद उन्होने नेपाल- भारत सीमा की नाकाबंदी कर दी । इससे नेपाल में आवश्यक वस्तुओं की कमी हुई और इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया गया । हाल के वर्षों में नेपाल व चीन की नज़दीकियाँ काफी बढ़ी है । पिछले चार वर्षों मे नेपाल व चीन के बीच 36 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं । साथ ही चीन नेपाल को अपने चार पोर्ट व्यापार करने के लिए उपलब्ध करा रहा है । इतना ही नहीं चीन निरंतर नेपाल में अवसंरचना विकास के कार्यों में संलग्न है । नेपाल में चीन की ऐसी उपस्थिती भारतीय हितों के प्रतिकूल है । 1950 के भारत नेपाल मैत्री संधि के कुछ प्रावधानों को लेकर नेपाली राजनीतिक दलों द्वारा नेपाल में भारत विरोधी भावना को बढ़ावा दिया जाता है । भारत व नेपाल BIMSTEC में एक महत्वपूर्ण सहयोगी हैं तथपि नेपाल द्वारा हाल ही में बिम्स्टेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास से बाहर आना भारत के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है । इसके अतिरिक्त नदी जल विवाद तथा विमुद्रीकरण के बाद भारतीय रुपये को लेकर चिंताएँ आदि भी भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में महत्वपूर्ण बाधा के रूप में उभर कर सामने आया है । भारत व नेपाल ऐसे पड़ोसी हैं जिनके हित परस्पर जुड़े हैं । ऐसे में दोनों पारंपरिक सहयोगियों को आगे बढ़कर सम्बन्धों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए । एक ओर भारत को जहां पंचशील व गुजराल डॉक्ट्रिन का अनुसरण करते हुए नेपाल के प्रति सहयोगी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए वहीं नेपाल को भी भारतीय चिंताओं के प्रति सजग रहना चाहिए । एक सहयोगी दृष्टिकोण दोनों राष्ट्रों के विकास के लिए अति आवश्यक है ।
##Question:परंपरागत रूप से भारत व नेपाल एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं तथापि हाल के दशक में बेहतर संबंधों के मार्ग में कई चुनौतियाँ उत्पन्न हुई है । टिप्पणी कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक ) Traditionally India and Nepal have been an important ally, however in the recent decade many challenges have arisen in the path of better relations.comment. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : दक्षिण एशिया में भारत के एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में नेपाल के महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । हाल के दिनों में भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों की बिंदुबार चर्चा कीजिये । सम्बन्धों को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझावों को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत व नेपाल सांस्कृतिक व ऐतिहासिक रूप से प्राचीन काल से ही जुड़े रहे हैं । आज़ादी के बाद से भारत व नेपाल के औपचारिक सम्बन्धों में काफी बढ़ोतरी हुई है । भारत व चीन के बीच एक बफ़र क्षेत्र के रूप में नेपाल का महत्व सर्वविदित है । भारत व नेपाल कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं । भारतीय फर्म नेपाल में सबसे बड़े निवेशक हैं । नेपाल का किसी तीसरे देश के साथ व्यापार का 98% भारत के माध्यम से होता है । भारत नेपाल को लगभग 100% पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है । इसी प्रकार भारतीय सेना में लगभग 30 हज़ार गोरखा शामिल हैं और भारत ने नेपाल के लिए खुले द्वार की नीति अपनायी है । इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया में नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है परंतु हाल के वर्षों में भारत व नेपाल के बीच बेहतर सम्बन्धों के मार्ग में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई है जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं : - नेपाल में पिछले लगभग एक दशक से संवैधानिक संकट की स्थिति रही है । साथ ही उससे पूर्व माओवादी क्रांति के कारण काफी आंतरिक अशांति रही है । इन सभी मामलों में नेपाल द्वारा लगातार भारत पर आरोप लगया जाता रहा है कि वह नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है । वर्ष 2015 में बने नेपाली संविधान को लेकर मधेशीयों की आपत्तियाँ थी जिसके बाद उन्होने नेपाल- भारत सीमा की नाकाबंदी कर दी । इससे नेपाल में आवश्यक वस्तुओं की कमी हुई और इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया गया । हाल के वर्षों में नेपाल व चीन की नज़दीकियाँ काफी बढ़ी है । पिछले चार वर्षों मे नेपाल व चीन के बीच 36 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं । साथ ही चीन नेपाल को अपने चार पोर्ट व्यापार करने के लिए उपलब्ध करा रहा है । इतना ही नहीं चीन निरंतर नेपाल में अवसंरचना विकास के कार्यों में संलग्न है । नेपाल में चीन की ऐसी उपस्थिती भारतीय हितों के प्रतिकूल है । 1950 के भारत नेपाल मैत्री संधि के कुछ प्रावधानों को लेकर नेपाली राजनीतिक दलों द्वारा नेपाल में भारत विरोधी भावना को बढ़ावा दिया जाता है । भारत व नेपाल BIMSTEC में एक महत्वपूर्ण सहयोगी हैं तथपि नेपाल द्वारा हाल ही में बिम्स्टेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास से बाहर आना भारत के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है । इसके अतिरिक्त नदी जल विवाद तथा विमुद्रीकरण के बाद भारतीय रुपये को लेकर चिंताएँ आदि भी भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में महत्वपूर्ण बाधा के रूप में उभर कर सामने आया है । भारत व नेपाल ऐसे पड़ोसी हैं जिनके हित परस्पर जुड़े हैं । ऐसे में दोनों पारंपरिक सहयोगियों को आगे बढ़कर सम्बन्धों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए । एक ओर भारत को जहां पंचशील व गुजराल डॉक्ट्रिन का अनुसरण करते हुए नेपाल के प्रति सहयोगी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए वहीं नेपाल को भी भारतीय चिंताओं के प्रति सजग रहना चाहिए । एक सहयोगी दृष्टिकोण दोनों राष्ट्रों के विकास के लिए अति आवश्यक है ।
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परंपरागत रूप से भारत व नेपाल एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं तथापि हाल के दशक में बेहतर संबंधों के मार्ग में कई चुनौतियाँ उत्पन्न हुई है । टिप्पणी कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10 ) Traditionally India and Nepal have been an important ally, however in the recent decade many challenges have arisen in the path of better relations.comment. (150-200 words , Marks - 10 )
दृष्टिकोण : दक्षिण एशिया में भारत के एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में नेपाल के महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । हाल के दिनों में भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों की बिंदुबार चर्चा कीजिये । सम्बन्धों को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझावों को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत व नेपाल सांस्कृतिक व ऐतिहासिक रूप से प्राचीन काल से ही जुड़े रहे हैं । आज़ादी के बाद से भारत व नेपाल के औपचारिक सम्बन्धों में काफी बढ़ोतरी हुई है । भारत व चीन के बीच एक बफ़र क्षेत्र के रूप में नेपाल का महत्व सर्वविदित है । भारत व नेपाल कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं । भारतीय फर्म नेपाल में सबसे बड़े निवेशक हैं । नेपाल का किसी तीसरे देश के साथ व्यापार का 98% भारत के माध्यम से होता है । भारत नेपाल को लगभग 100% पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है । इसी प्रकार भारतीय सेना में लगभग 30 हज़ार गोरखा शामिल हैं और भारत ने नेपाल के लिए खुले द्वार की नीति अपनायी है । इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया में नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है परंतु हाल के वर्षों में भारत व नेपाल के बीच बेहतर सम्बन्धों के मार्ग में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई है जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं : - नेपाल में पिछले लगभग एक दशक से संवैधानिक संकट की स्थिति रही है । साथ ही उससे पूर्व माओवादी क्रांति के कारण काफी आंतरिक अशांति रही है । इन सभी मामलों में नेपाल द्वारा लगातार भारत पर आरोप लगया जाता रहा है कि वह नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है । वर्ष 2015 में बने नेपाली संविधान को लेकर मधेशीयों की आपत्तियाँ थी जिसके बाद उन्होने नेपाल- भारत सीमा की नाकाबंदी कर दी । इससे नेपाल में आवश्यक वस्तुओं की कमी हुई और इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया गया । हाल के वर्षों में नेपाल व चीन की नज़दीकियाँ काफी बढ़ी है । पिछले चार वर्षों मे नेपाल व चीन के बीच 36 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं । साथ ही चीन नेपाल को अपने चार पोर्ट व्यापार करने के लिए उपलब्ध करा रहा है । इतना ही नहीं चीन निरंतर नेपाल में अवसंरचना विकास के कार्यों में संलग्न है । नेपाल में चीन की ऐसी उपस्थिती भारतीय हितों के प्रतिकूल है । 1950 के भारत नेपाल मैत्री संधि के कुछ प्रावधानों को लेकर नेपाली राजनीतिक दलों द्वारा नेपाल में भारत विरोधी भावना को बढ़ावा दिया जाता है । भारत व नेपाल BIMSTEC में एक महत्वपूर्ण सहयोगी हैं तथपि नेपाल द्वारा हाल ही में बिम्स्टेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास से बाहर आना भारत के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है । इसके अतिरिक्त नदी जल विवाद तथा विमुद्रीकरण के बाद भारतीय रुपये को लेकर चिंताएँ आदि भी भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में महत्वपूर्ण बाधा के रूप में उभर कर सामने आया है । भारत व नेपाल ऐसे पड़ोसी हैं जिनके हित परस्पर जुड़े हैं । ऐसे में दोनों पारंपरिक सहयोगियों को आगे बढ़कर सम्बन्धों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए । एक ओर भारत को जहां पंचशील व गुजराल डॉक्ट्रिन का अनुसरण करते हुए नेपाल के प्रति सहयोगी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए वहीं नेपाल को भी भारतीय चिंताओं के प्रति सजग रहना चाहिए । एक सहयोगी दृष्टिकोण दोनों राष्ट्रों के विकास के लिए अति आवश्यक है ।
##Question:परंपरागत रूप से भारत व नेपाल एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं तथापि हाल के दशक में बेहतर संबंधों के मार्ग में कई चुनौतियाँ उत्पन्न हुई है । टिप्पणी कीजिए। (150-200 शब्द , अंक -10 ) Traditionally India and Nepal have been an important ally, however in the recent decade many challenges have arisen in the path of better relations.comment. (150-200 words , Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण : दक्षिण एशिया में भारत के एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में नेपाल के महत्व की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । हाल के दिनों में भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों की बिंदुबार चर्चा कीजिये । सम्बन्धों को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझावों को बताते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत व नेपाल सांस्कृतिक व ऐतिहासिक रूप से प्राचीन काल से ही जुड़े रहे हैं । आज़ादी के बाद से भारत व नेपाल के औपचारिक सम्बन्धों में काफी बढ़ोतरी हुई है । भारत व चीन के बीच एक बफ़र क्षेत्र के रूप में नेपाल का महत्व सर्वविदित है । भारत व नेपाल कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं । भारतीय फर्म नेपाल में सबसे बड़े निवेशक हैं । नेपाल का किसी तीसरे देश के साथ व्यापार का 98% भारत के माध्यम से होता है । भारत नेपाल को लगभग 100% पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है । इसी प्रकार भारतीय सेना में लगभग 30 हज़ार गोरखा शामिल हैं और भारत ने नेपाल के लिए खुले द्वार की नीति अपनायी है । इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया में नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है परंतु हाल के वर्षों में भारत व नेपाल के बीच बेहतर सम्बन्धों के मार्ग में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई है जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं : - नेपाल में पिछले लगभग एक दशक से संवैधानिक संकट की स्थिति रही है । साथ ही उससे पूर्व माओवादी क्रांति के कारण काफी आंतरिक अशांति रही है । इन सभी मामलों में नेपाल द्वारा लगातार भारत पर आरोप लगया जाता रहा है कि वह नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है । वर्ष 2015 में बने नेपाली संविधान को लेकर मधेशीयों की आपत्तियाँ थी जिसके बाद उन्होने नेपाल- भारत सीमा की नाकाबंदी कर दी । इससे नेपाल में आवश्यक वस्तुओं की कमी हुई और इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया गया । हाल के वर्षों में नेपाल व चीन की नज़दीकियाँ काफी बढ़ी है । पिछले चार वर्षों मे नेपाल व चीन के बीच 36 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं । साथ ही चीन नेपाल को अपने चार पोर्ट व्यापार करने के लिए उपलब्ध करा रहा है । इतना ही नहीं चीन निरंतर नेपाल में अवसंरचना विकास के कार्यों में संलग्न है । नेपाल में चीन की ऐसी उपस्थिती भारतीय हितों के प्रतिकूल है । 1950 के भारत नेपाल मैत्री संधि के कुछ प्रावधानों को लेकर नेपाली राजनीतिक दलों द्वारा नेपाल में भारत विरोधी भावना को बढ़ावा दिया जाता है । भारत व नेपाल BIMSTEC में एक महत्वपूर्ण सहयोगी हैं तथपि नेपाल द्वारा हाल ही में बिम्स्टेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास से बाहर आना भारत के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है । इसके अतिरिक्त नदी जल विवाद तथा विमुद्रीकरण के बाद भारतीय रुपये को लेकर चिंताएँ आदि भी भारत नेपाल सम्बन्धों के मार्ग में महत्वपूर्ण बाधा के रूप में उभर कर सामने आया है । भारत व नेपाल ऐसे पड़ोसी हैं जिनके हित परस्पर जुड़े हैं । ऐसे में दोनों पारंपरिक सहयोगियों को आगे बढ़कर सम्बन्धों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए । एक ओर भारत को जहां पंचशील व गुजराल डॉक्ट्रिन का अनुसरण करते हुए नेपाल के प्रति सहयोगी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए वहीं नेपाल को भी भारतीय चिंताओं के प्रति सजग रहना चाहिए । एक सहयोगी दृष्टिकोण दोनों राष्ट्रों के विकास के लिए अति आवश्यक है ।
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भारत शासन अधिनियम, 1935 के मुख्यप्रावधानोंका उल्लेख कीजिए। साथ ही समझाइए कि कैसे इस अधिनयम ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए आधार प्रदान किया? (150-200शब्द) Mention the major provisions of the Government of India Act, 1935. Also, explain how this act provided the basis for the constitution of independent India? (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत शासन अधिनियम, 1935 की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में इस अधिनियम केमुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए तथा साथ ही समझाइए कि कैसे इस अधिनयम ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए आधार प्रदान किया। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- साइमन कमीशन की रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलनों के पश्चातभारत शासन अधिनियम 1935 को लाया गया। इसके साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी के लिए विवश किया और एक पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन के संदर्भ में इस अधिनियम की पृष्ठभूमि का निर्माण हुआ। भारत शासन अधिनियम, 1935 के मुख्य प्रावधान:- इसमें अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान था। इस संघ में राज्य और रियासतों को एक इकाई की तरह माना गया। पहली बार ब्रिटिश प्रांतो को 50 विषय स्वतंत्र रूप से दिया गए। जिन पर कानून बना सकते थे। केंद्र में गवर्नर जनरल को निर्वाचित भारतीय मंत्रियों एवं मनोनीत पार्षदों की सहायता से ब्रिटिश भारत का शासन चलाना था। विभिन्न विषयों को तीन भागों में बांटा गया- संघीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। इसके अतिरक्त अवशिष्ट शक्तियां वायसराय को दी गयी इस अधिनियम के माध्यम से प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी गयी तथा प्रांतीय स्वायत्तता का शुभारम्भ किया गवर्नर को राज्य विधान परिषदों के लिए उत्तरदायी मंत्रियों की सलाह पर काम करना आवश्यक था। हालांकि 1939 में इसे समाप्त कर दिया गया। केंद्र में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ किया गया। इसके अंतर्गत संघीय विषयों स्थानांतरित और आरक्षित विषयों में विभक्त करना था। इस अधिनियम के माध्यम से मताधिकार का विस्तार किया गया। लन्दन में भारत राज्य सचिव को परामर्श देने के लिए 1858 में जिस परिषद् का गठन किया गया था। अब उसे भंग किया गया। ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता स्थापित अर्थात अपनी मर्जी के अनुरूप कोई भी संशोधन कर सकता था। बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग करने के लिए एक अधिनियम पारित , ताकि ब्रिटिश शासन , भारत राज्य क्षेत्र पर अधिक ध्यान दे सके। संघ और संघीय इकाइयों अथात ब्रिटिश प्रांतों के बीच उपजे विवाद को हल करने के लिए एक फेडरल कोर्ट के गठन का प्रस्ताव किया गया था इसे ही आज सुप्रीम कोर्ट कहते है। 1929 में यंग हिल्टन समिति का गठन किया गया, जिसकी सिफारिश पर 1935 में वायसरॉयकी कार्यकारी परिषद् में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम पारित किया था और उसे केंद्रीय बैंक का दर्जा दिया था। भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश काल में संवैधानिक सुधारों कि दिशा में एक महत्वपूर्ण आयाम था। हालांकि इस अधिनियम के कई प्रावधान लागू नहीं हुए परंतु स्वतंत्र भारत के संविधान में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। भारतीय संविधान में लगभग 200 ऐसे प्रावधान हैं जो सीधे तौर पर इस अधिनियम से लिए गए हैं। इसमें से कुछ प्रावधान इस प्रकार हैं: संसदीय मूलक प्रणाली एवंसंसदीय प्रक्रिया प्रांतीय स्वायत्तता औरकेंद्र राज्य सम्बन्ध अमेरिका और ब्रिटेन के बीच का शासकीय ढांचा जिसे अर्द्ध संघीय ढांचा भी कहते हैं। राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था अखिल भारतीय सेवाओं की सरंचना संघीय अदालत के रूप में सर्वोच्च न्यायालय का गठन नागरिकता संबंधी कुछ उपबंध निर्वाचन प्रणाली व निर्वाचन आयोग अटोर्नी जनरल की व्यवस्था राज्यों के लिए अलग संविधान की व्यवस्था नहीं लेखा परीक्षण की व्यवस्था व महालेखा परीक्षक का पद लोक सेवा आयोग की व्यवस्था व सिविल सेवकों की भर्ती प्रणाली हाई कोर्ट व अधीनस्थ अदालतों के सम्बन्ध प्रांतीय राज्यपालों की नियुक्ति व उसको प्राप्त विवेकीय शक्तियां निष्कर्षतः इस अधिनियम में अनेक सकारात्मक प्रावधान होने के बावजूद भी यह अपने उद्देश्यों में पूर्णतः सफल नहीं हो सका। हालांकि इस अधिनियम की विशेषताओं को व्यापक रूप से हमारे संविधान में स्वीकार किया गया।
##Question:भारत शासन अधिनियम, 1935 के मुख्यप्रावधानोंका उल्लेख कीजिए। साथ ही समझाइए कि कैसे इस अधिनयम ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए आधार प्रदान किया? (150-200शब्द) Mention the major provisions of the Government of India Act, 1935. Also, explain how this act provided the basis for the constitution of independent India? (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंभारत शासन अधिनियम, 1935 की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में इस अधिनियम केमुख्य प्रावधानों का उल्लेख कीजिए तथा साथ ही समझाइए कि कैसे इस अधिनयम ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए आधार प्रदान किया। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- साइमन कमीशन की रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलनों के पश्चातभारत शासन अधिनियम 1935 को लाया गया। इसके साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी के लिए विवश किया और एक पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन के संदर्भ में इस अधिनियम की पृष्ठभूमि का निर्माण हुआ। भारत शासन अधिनियम, 1935 के मुख्य प्रावधान:- इसमें अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान था। इस संघ में राज्य और रियासतों को एक इकाई की तरह माना गया। पहली बार ब्रिटिश प्रांतो को 50 विषय स्वतंत्र रूप से दिया गए। जिन पर कानून बना सकते थे। केंद्र में गवर्नर जनरल को निर्वाचित भारतीय मंत्रियों एवं मनोनीत पार्षदों की सहायता से ब्रिटिश भारत का शासन चलाना था। विभिन्न विषयों को तीन भागों में बांटा गया- संघीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। इसके अतिरक्त अवशिष्ट शक्तियां वायसराय को दी गयी इस अधिनियम के माध्यम से प्रांतों में द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी गयी तथा प्रांतीय स्वायत्तता का शुभारम्भ किया गवर्नर को राज्य विधान परिषदों के लिए उत्तरदायी मंत्रियों की सलाह पर काम करना आवश्यक था। हालांकि 1939 में इसे समाप्त कर दिया गया। केंद्र में द्वैध शासन प्रणाली का शुभारंभ किया गया। इसके अंतर्गत संघीय विषयों स्थानांतरित और आरक्षित विषयों में विभक्त करना था। इस अधिनियम के माध्यम से मताधिकार का विस्तार किया गया। लन्दन में भारत राज्य सचिव को परामर्श देने के लिए 1858 में जिस परिषद् का गठन किया गया था। अब उसे भंग किया गया। ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता स्थापित अर्थात अपनी मर्जी के अनुरूप कोई भी संशोधन कर सकता था। बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग करने के लिए एक अधिनियम पारित , ताकि ब्रिटिश शासन , भारत राज्य क्षेत्र पर अधिक ध्यान दे सके। संघ और संघीय इकाइयों अथात ब्रिटिश प्रांतों के बीच उपजे विवाद को हल करने के लिए एक फेडरल कोर्ट के गठन का प्रस्ताव किया गया था इसे ही आज सुप्रीम कोर्ट कहते है। 1929 में यंग हिल्टन समिति का गठन किया गया, जिसकी सिफारिश पर 1935 में वायसरॉयकी कार्यकारी परिषद् में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम पारित किया था और उसे केंद्रीय बैंक का दर्जा दिया था। भारत शासन अधिनियम, 1935 ब्रिटिश काल में संवैधानिक सुधारों कि दिशा में एक महत्वपूर्ण आयाम था। हालांकि इस अधिनियम के कई प्रावधान लागू नहीं हुए परंतु स्वतंत्र भारत के संविधान में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। भारतीय संविधान में लगभग 200 ऐसे प्रावधान हैं जो सीधे तौर पर इस अधिनियम से लिए गए हैं। इसमें से कुछ प्रावधान इस प्रकार हैं: संसदीय मूलक प्रणाली एवंसंसदीय प्रक्रिया प्रांतीय स्वायत्तता औरकेंद्र राज्य सम्बन्ध अमेरिका और ब्रिटेन के बीच का शासकीय ढांचा जिसे अर्द्ध संघीय ढांचा भी कहते हैं। राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था अखिल भारतीय सेवाओं की सरंचना संघीय अदालत के रूप में सर्वोच्च न्यायालय का गठन नागरिकता संबंधी कुछ उपबंध निर्वाचन प्रणाली व निर्वाचन आयोग अटोर्नी जनरल की व्यवस्था राज्यों के लिए अलग संविधान की व्यवस्था नहीं लेखा परीक्षण की व्यवस्था व महालेखा परीक्षक का पद लोक सेवा आयोग की व्यवस्था व सिविल सेवकों की भर्ती प्रणाली हाई कोर्ट व अधीनस्थ अदालतों के सम्बन्ध प्रांतीय राज्यपालों की नियुक्ति व उसको प्राप्त विवेकीय शक्तियां निष्कर्षतः इस अधिनियम में अनेक सकारात्मक प्रावधान होने के बावजूद भी यह अपने उद्देश्यों में पूर्णतः सफल नहीं हो सका। हालांकि इस अधिनियम की विशेषताओं को व्यापक रूप से हमारे संविधान में स्वीकार किया गया।
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राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? इसकी समीक्षा के लिए गठित एन. के. सिंह समिति की सिफ़ारिशों का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) What are the salient features of the Fiscal Responsibility and Budget Management Act, 2003? Mention the recommendations of N. K. Singh committee formed for its review. (150- 200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताओं को लिखिए। एफ़आरबीएम अधिनियम की संक्षित्प पृष्ठभूमि लिखिए। एन. के. सिंह समिति की सिफ़ारिशों का उल्लेख कीजिए। राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 को वस्तुतः केंद्र सरकार के ऋण और राजकोषीय घाटे के स्तर को सीमित करने व राजकोषीय स्थिरता को को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पारित किया गया था। इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं: प्रत्येक वर्ष सरकार राजस्व घाटे को 0.5 % तक कम करेगी और 2008-09 तक इसे समाप्त किया जाएगा। प्रत्येक वर्ष राजकोषीय घाटे को 0.3%तक कम करेगी और इसे 2008-09 तक 3% के स्तर पर लाया जाएगा। केंद्र सरकार की कुल देयता में प्रतिवर्ष 9% से अधिक वृद्धि नहीं होनी चाहिए। केंद्र सरकार समग्र रूप से जीडीपी के 0.5% से अधिक के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और राज्य सरकारों द्वारा लिए गए ऋणों की गारंटी नहीं देगी। केंद्र सरकार बजट दस्तावेजों के साथ तीन और दस्तावेज़ मैक्रोइकोनोमिक फ्रेमवर्कस्टेटमेंट, मध्यावधि राजकोषीय नीति विवरण और राजकोषीय नीति विवरण प्रस्तुत करेगी। ] एन. के सिंह समिति की सिफ़ारिशें: सरकार के राजकोषीय घाटे को कम कर 31 मार्च, 2020 तक जीडीपी के 3% तक, 2020-20 तक 2.8% और 2023 तक 2.5% के स्तर तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए। जीडीपी के परिप्रेक्ष्य में राजस्व घाटे में प्रतिवर्ष 0.25 % प्रतिशत की निरंतर कमी की जाए। जिसे 2023 तक 0.8% तक कम करना है। सामान्य सरकारी ऋण के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 60% के बराबर एक माध्यम अवधि की सीमा को अपनाना, जिसे वित्तीय वर्ष 2023 तक प्राप्त किया जाएगा। निर्दिष्ट सीमा के भीतर केंद्र के लिए 40% की सीमा और राज्यों के लिए शेष 20% राशि को निर्धारित किया जाना चाहिए। बहुल-वर्षीय राजकोषीय पूर्वानुमान तैयार करने, राजकोषीय रणनीति आदि में परिवर्तन की सिफ़ारिश करने के लिए एक राजकोषीय परिषद का गठन करना चाहिए। इस्केप क्लाज संबंधी प्रावधान अर्थात यदि किसी वर्ष राजकोषीय लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सके तो इसमें छुट प्रदान किया जा सकता है।
##Question:राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? इसकी समीक्षा के लिए गठित एन. के. सिंह समिति की सिफ़ारिशों का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) What are the salient features of the Fiscal Responsibility and Budget Management Act, 2003? Mention the recommendations of N. K. Singh committee formed for its review. (150- 200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताओं को लिखिए। एफ़आरबीएम अधिनियम की संक्षित्प पृष्ठभूमि लिखिए। एन. के. सिंह समिति की सिफ़ारिशों का उल्लेख कीजिए। राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 को वस्तुतः केंद्र सरकार के ऋण और राजकोषीय घाटे के स्तर को सीमित करने व राजकोषीय स्थिरता को को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पारित किया गया था। इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं: प्रत्येक वर्ष सरकार राजस्व घाटे को 0.5 % तक कम करेगी और 2008-09 तक इसे समाप्त किया जाएगा। प्रत्येक वर्ष राजकोषीय घाटे को 0.3%तक कम करेगी और इसे 2008-09 तक 3% के स्तर पर लाया जाएगा। केंद्र सरकार की कुल देयता में प्रतिवर्ष 9% से अधिक वृद्धि नहीं होनी चाहिए। केंद्र सरकार समग्र रूप से जीडीपी के 0.5% से अधिक के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और राज्य सरकारों द्वारा लिए गए ऋणों की गारंटी नहीं देगी। केंद्र सरकार बजट दस्तावेजों के साथ तीन और दस्तावेज़ मैक्रोइकोनोमिक फ्रेमवर्कस्टेटमेंट, मध्यावधि राजकोषीय नीति विवरण और राजकोषीय नीति विवरण प्रस्तुत करेगी। ] एन. के सिंह समिति की सिफ़ारिशें: सरकार के राजकोषीय घाटे को कम कर 31 मार्च, 2020 तक जीडीपी के 3% तक, 2020-20 तक 2.8% और 2023 तक 2.5% के स्तर तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए। जीडीपी के परिप्रेक्ष्य में राजस्व घाटे में प्रतिवर्ष 0.25 % प्रतिशत की निरंतर कमी की जाए। जिसे 2023 तक 0.8% तक कम करना है। सामान्य सरकारी ऋण के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 60% के बराबर एक माध्यम अवधि की सीमा को अपनाना, जिसे वित्तीय वर्ष 2023 तक प्राप्त किया जाएगा। निर्दिष्ट सीमा के भीतर केंद्र के लिए 40% की सीमा और राज्यों के लिए शेष 20% राशि को निर्धारित किया जाना चाहिए। बहुल-वर्षीय राजकोषीय पूर्वानुमान तैयार करने, राजकोषीय रणनीति आदि में परिवर्तन की सिफ़ारिश करने के लिए एक राजकोषीय परिषद का गठन करना चाहिए। इस्केप क्लाज संबंधी प्रावधान अर्थात यदि किसी वर्ष राजकोषीय लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सके तो इसमें छुट प्रदान किया जा सकता है।
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हाल के दशकों में भारत नेपाल संबंधों की प्रगति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Critically examine the progress of Indo-Nepal relations in recent decades. (150-200 words/10 marks)
दृष्टिकोण: भारत नेपाल संबंधों के पृष्टभूमि की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । हाल के दिनों में भारत नेपाल संबंधों की प्रगति की दिशा की चर्चा कीजिये । भारत नेपाल संबंधों में हालिया उत्पन्न नकारात्मक बिन्दुओं की चर्चा कीजिये । भारत नेपाल संबंधों में सुधार के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर : दक्षिण एशिया में भारत व नेपाल एक नैसर्गिक मित्र हैं । भौगोलिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक कारक भारत व नेपाल को पारंपरिक सहयोगी के रूप में विकसित करते हैं । आज़ादी के बाद से भारत व नेपाल के औपचारिक सम्बन्धों में काफी बढ़ोतरी हुई है । भारत व नेपाल कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं । भारतीय फर्म नेपाल में सबसे बड़े निवेशक हैं । नेपाल का किसी तीसरे देश के साथ व्यापार का 98% भारत के माध्यम से होता है । भारत नेपाल को लगभग 100% पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है । इसी प्रकार भारतीय सेना में लगभग 30 हज़ार गोरखा शामिल हैं और भारत ने नेपाल के लिए खुले द्वार की नीति अपनायी है । इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया में नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है परंतु हाल के दशकों में बेहतर भारत-नेपाल संबंधों के मार्ग में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई है । पिछले लगभग दो दशकों से नेपाल आंतरिक उथल-पुथल की दौर से गुजर रहा है । माओवादी आंदोलन, राजशाही व संवैधानिक संकट आदि के कारण नेपाल काफी अशांत रहा है और भारत की भूमिका को लेकर नेपाल द्वारा लगातार आरोप लगाया जाता रहा है कि भारत, नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है । हाल के दिनों में नेपाल-भारत संबंध में निम्नलिखित बिन्दुओं पर काफी असहमति व विवाद रहा है : 21वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में भारत द्वारा नेपाली माओवादी पार्टी को दिये गए समर्थन का नेपाल के अन्य राजनीतिक दलों द्वारा काफी विरोध किया गया । वर्ष 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत के मीडिया की भूमिका को लेकर नेपाल में काफी नकारात्मक छवि विकसित हुई । वर्ष 2015 में ही नए नेपाली संविधान को लेकर मधेशी लोगों के विरोध व उसके बाद की नाकाबंदी को लेकर नेपाल द्वारा भारत पर आरोप लगाया गया कि भारत द्वारा जानबूझकर इस नाकाबंदी को बढ़ावा दिया गया और नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया जा रहा है । यही वह पृष्टभूमि है जिसमें नेपाल-भारत के हालिया संबंधों को देखा जा सकता है । हाल के वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में चीन कारक बेहद महत्वपूर्ण हो गया है । नेपाल निरंतर चीन की ओर झुकता जा रहा है , इसका प्रमाण हमें इस बात से भी मिलता है कि पिछले चार वर्षों के अंदर ही चीन व नेपाल के बीच 36 समझौते हुए हैं । इतना ही नहीं चीन निरंतर नेपाल में अवसंरचनात्मक विकास में काफी निवेश कर रहा है । चीन का नेपाल में बढ़ता प्रभाव भारत-नेपाल संबंधों की दशा व दिशा को नकारात्मक रूप में प्रभावित कर रहा है । ऐसा नहीं है कि हाल के वर्षों में नेपाल के साथ भारत के संबंधों में केवल चिंताएँ ही उभर कर सामने आयी हैं , सहयोग के भी कई क्षेत्रों में सहमति बनी है । उदाहरण के लिए भारत-नेपाल BBIN नेटवर्क में सहयोगी हैं , इसी प्रकार बिम्स्टेक में भी दोनों देश सहयोग कर रहे हैं । फिर भारत-नेपाल सूर्य-किरण युद्धाभ्यास के माध्यम से भी निरंतर सहयोग कर रहे हैं । वर्ष 2015 की समस्या के बाद संबंधों को पुनः बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है । नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री के पी ओली नें प्रधानमंत्री पद संभालकर सबसे पहले भारत का दौरा किया। उनके इस दौरे से दोनों देशों के बीच सम्बन्ध और भी मजबूत हुए हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह नेपाल के महत्व को समझे और अपने "बिग ब्रदर" वाली छवि को बदलते हुए गुज़राल ड़ाक्टरिन के अनुरूप नेपाल के साथ संबंधों को बढ़ावा दे । साथ ही नेपाल को भी भारतीय चिंताओं का समाधान करना आवश्यक है ।
##Question:हाल के दशकों में भारत नेपाल संबंधों की प्रगति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Critically examine the progress of Indo-Nepal relations in recent decades. (150-200 words/10 marks)##Answer: दृष्टिकोण: भारत नेपाल संबंधों के पृष्टभूमि की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । हाल के दिनों में भारत नेपाल संबंधों की प्रगति की दिशा की चर्चा कीजिये । भारत नेपाल संबंधों में हालिया उत्पन्न नकारात्मक बिन्दुओं की चर्चा कीजिये । भारत नेपाल संबंधों में सुधार के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर : दक्षिण एशिया में भारत व नेपाल एक नैसर्गिक मित्र हैं । भौगोलिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक कारक भारत व नेपाल को पारंपरिक सहयोगी के रूप में विकसित करते हैं । आज़ादी के बाद से भारत व नेपाल के औपचारिक सम्बन्धों में काफी बढ़ोतरी हुई है । भारत व नेपाल कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं । भारतीय फर्म नेपाल में सबसे बड़े निवेशक हैं । नेपाल का किसी तीसरे देश के साथ व्यापार का 98% भारत के माध्यम से होता है । भारत नेपाल को लगभग 100% पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है । इसी प्रकार भारतीय सेना में लगभग 30 हज़ार गोरखा शामिल हैं और भारत ने नेपाल के लिए खुले द्वार की नीति अपनायी है । इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया में नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है परंतु हाल के दशकों में बेहतर भारत-नेपाल संबंधों के मार्ग में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई है । पिछले लगभग दो दशकों से नेपाल आंतरिक उथल-पुथल की दौर से गुजर रहा है । माओवादी आंदोलन, राजशाही व संवैधानिक संकट आदि के कारण नेपाल काफी अशांत रहा है और भारत की भूमिका को लेकर नेपाल द्वारा लगातार आरोप लगाया जाता रहा है कि भारत, नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है । हाल के दिनों में नेपाल-भारत संबंध में निम्नलिखित बिन्दुओं पर काफी असहमति व विवाद रहा है : 21वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में भारत द्वारा नेपाली माओवादी पार्टी को दिये गए समर्थन का नेपाल के अन्य राजनीतिक दलों द्वारा काफी विरोध किया गया । वर्ष 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत के मीडिया की भूमिका को लेकर नेपाल में काफी नकारात्मक छवि विकसित हुई । वर्ष 2015 में ही नए नेपाली संविधान को लेकर मधेशी लोगों के विरोध व उसके बाद की नाकाबंदी को लेकर नेपाल द्वारा भारत पर आरोप लगाया गया कि भारत द्वारा जानबूझकर इस नाकाबंदी को बढ़ावा दिया गया और नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया जा रहा है । यही वह पृष्टभूमि है जिसमें नेपाल-भारत के हालिया संबंधों को देखा जा सकता है । हाल के वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में चीन कारक बेहद महत्वपूर्ण हो गया है । नेपाल निरंतर चीन की ओर झुकता जा रहा है , इसका प्रमाण हमें इस बात से भी मिलता है कि पिछले चार वर्षों के अंदर ही चीन व नेपाल के बीच 36 समझौते हुए हैं । इतना ही नहीं चीन निरंतर नेपाल में अवसंरचनात्मक विकास में काफी निवेश कर रहा है । चीन का नेपाल में बढ़ता प्रभाव भारत-नेपाल संबंधों की दशा व दिशा को नकारात्मक रूप में प्रभावित कर रहा है । ऐसा नहीं है कि हाल के वर्षों में नेपाल के साथ भारत के संबंधों में केवल चिंताएँ ही उभर कर सामने आयी हैं , सहयोग के भी कई क्षेत्रों में सहमति बनी है । उदाहरण के लिए भारत-नेपाल BBIN नेटवर्क में सहयोगी हैं , इसी प्रकार बिम्स्टेक में भी दोनों देश सहयोग कर रहे हैं । फिर भारत-नेपाल सूर्य-किरण युद्धाभ्यास के माध्यम से भी निरंतर सहयोग कर रहे हैं । वर्ष 2015 की समस्या के बाद संबंधों को पुनः बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है । नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री के पी ओली नें प्रधानमंत्री पद संभालकर सबसे पहले भारत का दौरा किया। उनके इस दौरे से दोनों देशों के बीच सम्बन्ध और भी मजबूत हुए हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह नेपाल के महत्व को समझे और अपने "बिग ब्रदर" वाली छवि को बदलते हुए गुज़राल ड़ाक्टरिन के अनुरूप नेपाल के साथ संबंधों को बढ़ावा दे । साथ ही नेपाल को भी भारतीय चिंताओं का समाधान करना आवश्यक है ।
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Why is the iron and steel plant located in Bhilai? (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -FACTORS DETERMINING THE LOCATION OF THE IRON AND STEEL PLANT IN BHILAI -CONCLUSION ANSWER:- Alfred Weber suggested three main factors determining the location of industries viz. type of resource (iron and steel plants utilize weight losing raw materials), availability of labour and the vicinity to other industries for their backward and forward linkages (agglomeration economies). Based on these factors, the reasons behind the location of the iron and steel plant in Bhilai can be traced to the following factors. 1. LOCATIONAL TRIANGLE Weight losing raw materials must be situated near the source of the raw materials, rather than to the markets. Therefore, due to the vicinity to the key raw materials, the locational triangle is situated in Bhilai. (Diagram should be drawn here) 2. ISODOPANE It is the imaginary line connecting places with an equal cost of labour. As per Alfred Weber, labour should neither be hired from very nearby regions, where the demand of labour is too high (and hence cost high), nor from too far, where the company would have to spend more on transportation and other overhead expenditure. The critical isodopane, from where labour must be hired lies somewhere in between. (Diagram should be drawn here) For the Bhilai steel plant, the critical isodopane falls within the vicinity of Bihar, Chhattisgarh, Jharkhand etc. from where very cheap labour is available. 3. AGGLOMERATION ECONOMIES When a number of industries are located in one place, they have the advantage of backward and forward linkages. That is why industries tend to agglomerate in one place. Since a number of industries are located in and around Bhilai, hence, the cost of production of iron and steel is very less (due to the backward and forward linkages). Hence, there is more profit. Therefore, the decision of the government to locate the iron and steel industry in the Chotanagpur region is a very good and geographically/ economically sound decision.
##Question:Why is the iron and steel plant located in Bhilai? (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -FACTORS DETERMINING THE LOCATION OF THE IRON AND STEEL PLANT IN BHILAI -CONCLUSION ANSWER:- Alfred Weber suggested three main factors determining the location of industries viz. type of resource (iron and steel plants utilize weight losing raw materials), availability of labour and the vicinity to other industries for their backward and forward linkages (agglomeration economies). Based on these factors, the reasons behind the location of the iron and steel plant in Bhilai can be traced to the following factors. 1. LOCATIONAL TRIANGLE Weight losing raw materials must be situated near the source of the raw materials, rather than to the markets. Therefore, due to the vicinity to the key raw materials, the locational triangle is situated in Bhilai. (Diagram should be drawn here) 2. ISODOPANE It is the imaginary line connecting places with an equal cost of labour. As per Alfred Weber, labour should neither be hired from very nearby regions, where the demand of labour is too high (and hence cost high), nor from too far, where the company would have to spend more on transportation and other overhead expenditure. The critical isodopane, from where labour must be hired lies somewhere in between. (Diagram should be drawn here) For the Bhilai steel plant, the critical isodopane falls within the vicinity of Bihar, Chhattisgarh, Jharkhand etc. from where very cheap labour is available. 3. AGGLOMERATION ECONOMIES When a number of industries are located in one place, they have the advantage of backward and forward linkages. That is why industries tend to agglomerate in one place. Since a number of industries are located in and around Bhilai, hence, the cost of production of iron and steel is very less (due to the backward and forward linkages). Hence, there is more profit. Therefore, the decision of the government to locate the iron and steel industry in the Chotanagpur region is a very good and geographically/ economically sound decision.
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एलनीनो और जेट धाराओं के भारतीय मानसून पर पड़ने वाले प्रभाव को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the effect of Al-nino and jet streams on Indian monsoon. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मानसून को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मानसून पर जेट धाराओं के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में मानसून पर एलनिनो के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 4- दोनों अवधारणाओं का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मानसून एक कालिक पवन है जो मौसम के अनुरूप अपनी दिशा परिवर्तित करती है|सर्दी में यह स्थल से समुद्र की ओर चलती है, इस समय इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है, इसको लौटता/शीतकालीन मानसून कहते हैं| गर्मी में यह समुद्र से स्थल की ओर(तटवर्ती) चलती है इस समय इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर होती है, इसे ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं, मूलतः इसे ही मानसून के रूप में जाना जाता है|सर्दियों में चलने वाली यह पवन सामान्य व्यापारिक पवन है लेकिनगर्मी में चलने वाली मानसूनी पवन, अक्षांशीय विस्तार के दृष्टिकोण से असामान्य है| विभिन्न विद्वानों के द्वारा मानसून के अभियांत्रिकी को व्याख्यायित करने का प्रयास किया गया है| जेट धारा सिद्धांत का आरम्भ भारत के प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता कोटेश्वरम से होता है जो 1973 के भारत रूस संयुक्त अभ्यास मोनेक्स (मानसून एक्सपीडिशन) में अपने चरम पर पहुचता है| इसके अतिरक्त जेट धारा सिद्धांत के विकास में जापानी भूगोलवेत्ता YT फौन की भूमिका भी मानी जाती है| इस सिद्धांत का महत्त्व यह है कि इसमें मानसून के उपरी तंत्र/अंग को भी परिभाषित किया गया है जिससे मानसून तंत्र को पूर्णता प्राप्त होती है| जेट धाराएं मानसून पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं उपोष्ण कटिबन्धीय पछुआ जेट धारा मानसून का जेट धाराओं से प्रत्यक्ष सम्बन्ध हैजिसमें सर्वप्रथम उपोष्ण कटिबन्धीय पछुआ जेट धारा की भूमिका सामने आती है शीत काल में ये भूमध्य सागर से चल कर भारत की ओर आती है,हिमालय तक आते आते यह दो भागों में बट जाती है क्योंकि हिमालय के ऊपर इसकी उपस्थिति के लिए जलवायविक अनुकूलता का अभाव होता है इसकी उत्तरी धारा तिब्बत के पठार के ऊपर से गुजरता है जबकि दक्षिणी भाग भारत के उत्तरी मैदान के ऊपर प्रवाहित होती है ग्रीष्मकाल के आगमन तक वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचलन के सभी अंग उत्तरी ध्रुव की ओर संचलित/विस्थापित हो जाते हैं जो वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण का परिणाम होता है परन्तु यह जेट धारा हिमालय तथा तिब्बत पठार की उपस्थिति के कारण उत्तरी मैदान पर ही अटक जाती है अर्थात सारे अवयवों की तरह जेट धारा का विस्थापन धीरे धीरे न हो कर आकस्मिक/अचानक होता है| इसकी उपस्थिति मानसून पवन को ऊपरी अंग प्रदान करने नहीं देती हैअर्थात मानसून का आगमन रोके रखती है जिससे मानसून तन्त्र पर अत्यधिक दबाव विकसित हो जाता है जेट धारा के विस्थापन के बाद मानसून के उपरी अंग का निर्माण होता है जो मानसून तन्त्र को पूर्ण करते हुए इसको सतत बनाता है तथा अतिरिक्त दबाव मानसून के फटने का कारण बनता है जैसे ही इस जेट धारा की उत्तरी मैदान के ऊपर फिर से स्थापना होती है मानसून का प्रस्थान आरम्भ हो जाता है अर्थात दक्षिणी पश्चिमी मानसून की अवधि इसी जेट धारा के प्रस्थान तथा आगमन तक सीमित हो जाती है अतः स्पष्ट है कि उपरोक्त जेट धारा का सीधा सम्बन्ध मानसून के आगमन तथा उसके फटने से है| उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा भी दक्षिणी पश्चिमी मानसून के संचालन को प्रभावित करती है पछुआ जेट धारा के विस्थापन के बाद दक्षिणी पश्चिमी मानसून पवने भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से ऊपर उठते हुए दक्षिण की ओर संचलित होती है यह कोरियोलिस बल के कारण अपने दाहिने मुड़ते हुए लगभग पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है यह दक्षिणी पश्चिमी मानसून का उपरी अंग होता है जो भारतीय उपमहाद्वीप से शुष्क पवन को ले जाती हुए निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ाती है तथा अफ्रिका के पूर्वी तट पर अवतालित होकर उच्च वायुदाब को सशक्त करती है मानसून पर एल नीनो का प्रभाव एलनीनो एक अपवाद के रूप में चलने वाली गर्म जलधारा है| यह दक्षिणी अमेरिका के पेरू तट पर अचानक से प्रकट होती है| इस स्थान पर सामान्य रूप से पेरू/हम्बोल्ट नामक ठंडी जलधारा पायी जाती है| इसकी अवधि तथा पुनरागमन की अनिश्चितता इसकी व्याख्या को जटिल बना देता है एल नीनो के समय ही दक्षिणी प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवन की दिशा परिवर्तित हो जाती है जिसे हम दक्षिणी दोलन भी कहते हैं| वैज्ञानिक अभी यह स्थापित नहीं कर पाए हैं कि इनमें से कारण कौन है और परिणाम कौन है|इसके सामूहिक प्रभाव को ENSO प्रभाव कहते हैं एलनीनो वर्षों में दक्षिणी प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवन की दिशा परिवर्तित हो जाती है अतः भारतीय मानसून कमजोर हो जाता है इसी प्रकार एल नीनो वर्षों में विकसित नकारात्मक हिन्द महासागर द्विध्रुव की स्थिति में ग्रीष्मकालीन पवनें मेडागास्कर से ऑस्ट्रेलिया की ओर चलती हैं जो मानसून पर ऋणात्मक प्रभाव डालता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जेट धाराओं का मानसून के आगमन, उसकी सततता, उसकी अवधि, शक्ति तथा वर्षा की मात्रा से सीधा सम्बन्ध है| जबकि एलनीनो की उपस्थिति भारतीय मानसून को कमजोर करती है|
##Question:एलनीनो और जेट धाराओं के भारतीय मानसून पर पड़ने वाले प्रभाव को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the effect of Al-nino and jet streams on Indian monsoon. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मानसून को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में मानसून पर जेट धाराओं के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में मानसून पर एलनिनो के प्रभाव को स्पष्ट कीजिये 4- दोनों अवधारणाओं का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मानसून एक कालिक पवन है जो मौसम के अनुरूप अपनी दिशा परिवर्तित करती है|सर्दी में यह स्थल से समुद्र की ओर चलती है, इस समय इसकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर होती है, इसको लौटता/शीतकालीन मानसून कहते हैं| गर्मी में यह समुद्र से स्थल की ओर(तटवर्ती) चलती है इस समय इसकी दिशा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर होती है, इसे ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं, मूलतः इसे ही मानसून के रूप में जाना जाता है|सर्दियों में चलने वाली यह पवन सामान्य व्यापारिक पवन है लेकिनगर्मी में चलने वाली मानसूनी पवन, अक्षांशीय विस्तार के दृष्टिकोण से असामान्य है| विभिन्न विद्वानों के द्वारा मानसून के अभियांत्रिकी को व्याख्यायित करने का प्रयास किया गया है| जेट धारा सिद्धांत का आरम्भ भारत के प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता कोटेश्वरम से होता है जो 1973 के भारत रूस संयुक्त अभ्यास मोनेक्स (मानसून एक्सपीडिशन) में अपने चरम पर पहुचता है| इसके अतिरक्त जेट धारा सिद्धांत के विकास में जापानी भूगोलवेत्ता YT फौन की भूमिका भी मानी जाती है| इस सिद्धांत का महत्त्व यह है कि इसमें मानसून के उपरी तंत्र/अंग को भी परिभाषित किया गया है जिससे मानसून तंत्र को पूर्णता प्राप्त होती है| जेट धाराएं मानसून पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं उपोष्ण कटिबन्धीय पछुआ जेट धारा मानसून का जेट धाराओं से प्रत्यक्ष सम्बन्ध हैजिसमें सर्वप्रथम उपोष्ण कटिबन्धीय पछुआ जेट धारा की भूमिका सामने आती है शीत काल में ये भूमध्य सागर से चल कर भारत की ओर आती है,हिमालय तक आते आते यह दो भागों में बट जाती है क्योंकि हिमालय के ऊपर इसकी उपस्थिति के लिए जलवायविक अनुकूलता का अभाव होता है इसकी उत्तरी धारा तिब्बत के पठार के ऊपर से गुजरता है जबकि दक्षिणी भाग भारत के उत्तरी मैदान के ऊपर प्रवाहित होती है ग्रीष्मकाल के आगमन तक वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचलन के सभी अंग उत्तरी ध्रुव की ओर संचलित/विस्थापित हो जाते हैं जो वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण का परिणाम होता है परन्तु यह जेट धारा हिमालय तथा तिब्बत पठार की उपस्थिति के कारण उत्तरी मैदान पर ही अटक जाती है अर्थात सारे अवयवों की तरह जेट धारा का विस्थापन धीरे धीरे न हो कर आकस्मिक/अचानक होता है| इसकी उपस्थिति मानसून पवन को ऊपरी अंग प्रदान करने नहीं देती हैअर्थात मानसून का आगमन रोके रखती है जिससे मानसून तन्त्र पर अत्यधिक दबाव विकसित हो जाता है जेट धारा के विस्थापन के बाद मानसून के उपरी अंग का निर्माण होता है जो मानसून तन्त्र को पूर्ण करते हुए इसको सतत बनाता है तथा अतिरिक्त दबाव मानसून के फटने का कारण बनता है जैसे ही इस जेट धारा की उत्तरी मैदान के ऊपर फिर से स्थापना होती है मानसून का प्रस्थान आरम्भ हो जाता है अर्थात दक्षिणी पश्चिमी मानसून की अवधि इसी जेट धारा के प्रस्थान तथा आगमन तक सीमित हो जाती है अतः स्पष्ट है कि उपरोक्त जेट धारा का सीधा सम्बन्ध मानसून के आगमन तथा उसके फटने से है| उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा भी दक्षिणी पश्चिमी मानसून के संचालन को प्रभावित करती है पछुआ जेट धारा के विस्थापन के बाद दक्षिणी पश्चिमी मानसून पवने भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से ऊपर उठते हुए दक्षिण की ओर संचलित होती है यह कोरियोलिस बल के कारण अपने दाहिने मुड़ते हुए लगभग पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है यह दक्षिणी पश्चिमी मानसून का उपरी अंग होता है जो भारतीय उपमहाद्वीप से शुष्क पवन को ले जाती हुए निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ाती है तथा अफ्रिका के पूर्वी तट पर अवतालित होकर उच्च वायुदाब को सशक्त करती है मानसून पर एल नीनो का प्रभाव एलनीनो एक अपवाद के रूप में चलने वाली गर्म जलधारा है| यह दक्षिणी अमेरिका के पेरू तट पर अचानक से प्रकट होती है| इस स्थान पर सामान्य रूप से पेरू/हम्बोल्ट नामक ठंडी जलधारा पायी जाती है| इसकी अवधि तथा पुनरागमन की अनिश्चितता इसकी व्याख्या को जटिल बना देता है एल नीनो के समय ही दक्षिणी प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवन की दिशा परिवर्तित हो जाती है जिसे हम दक्षिणी दोलन भी कहते हैं| वैज्ञानिक अभी यह स्थापित नहीं कर पाए हैं कि इनमें से कारण कौन है और परिणाम कौन है|इसके सामूहिक प्रभाव को ENSO प्रभाव कहते हैं एलनीनो वर्षों में दक्षिणी प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवन की दिशा परिवर्तित हो जाती है अतः भारतीय मानसून कमजोर हो जाता है इसी प्रकार एल नीनो वर्षों में विकसित नकारात्मक हिन्द महासागर द्विध्रुव की स्थिति में ग्रीष्मकालीन पवनें मेडागास्कर से ऑस्ट्रेलिया की ओर चलती हैं जो मानसून पर ऋणात्मक प्रभाव डालता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जेट धाराओं का मानसून के आगमन, उसकी सततता, उसकी अवधि, शक्ति तथा वर्षा की मात्रा से सीधा सम्बन्ध है| जबकि एलनीनो की उपस्थिति भारतीय मानसून को कमजोर करती है|
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सरक्रीक क्षेत्र में सीमा प्रबंधन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती हमेशा रही है किंतु वर्तमान में इस क्षेत्र की बढ़ रही प्रासंगिकता को देखते हुए भारत सरक्रीक सीमा प्रबंधन में अपनी सक्रियता को प्रेरित कर रहा है| टिप्पणी कीजिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Border management in the Sir Creek region has always been a major challenge for India, but increasing relevance of the region at present, India ispromptingits activism in Sir Creek border management. Comment (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच- सरक्रीक क्षेत्र को संक्षिप्त मानचित्र में दर्शाते हुए उस क्षेत्र में सीमा प्रबंधन की चुनौतियों को संक्षिप्तता से बताईए| अगले भाग में,सरक्रीकक्षेत्र की वर्तमान समय में बढ़ रही प्रासंगिकता को बताईए| भारत द्वारा सरक्रीक सीमा प्रबंधन में सक्रीय रूप से बढ़ती भूमिका को कुछ तथ्यों के साथ प्रस्तुत कीजिए| निष्कर्षतः उपरोक्त संदर्भ में अपने सुझावों को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- सरक्रीक क्षेत्र भारत के गुजरात एवं पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मध्य 96 किलोमीटर लंबी एस्चुयरी क्षेत्र है| इस विवाद की जड़ में आज़ादी पूर्व बंबई सरकार का एक निर्णय था| आज़ादी से पहले बंबई प्रेसिडेंसी में ही कच्छ तथा सिंध प्रोविंस शामिल थें| सरक्रीक(तत्कालीन वाणगंगा क्षेत्र) पर दोनों के मध्य विवाद होने पर 1914 में बंबई प्रेसिडेंसी को मध्यस्थता करनी पड़ी थी|1914 में बंबई सरकार के एक निर्णय के दो विरोधाभासी अनुच्छेदों के प्रावधान के कारण भारत एवं पाकिस्तान सरक्रीक के हिस्से पर अपनी दावेदारी जताते हैं| इस निर्णय के अनुच्छेद 9 में कहा गया था किकच्छ एवं सिंध के बीच की सीमा क्रीक के पूर्व में है जिसका तात्पर्य है कि यह क्रीक सिंध से संबंधित है| अतः यह पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में आता है| वहीं दूसरी ओर, अनुच्छेद 10 में कहा गया है कि चूँकि सर क्रीक वर्षभर नौगम्य/जहाजों के चलने योग्य है अतः अंतरराष्ट्रीय कानून एवं थालवेग के सिद्धांत के अनुसार यह सीमा नौगम्य चैनल के बीच से तय की जा सकती है| इसका अर्थ यह हुआ कि इसे सिंध एवं कच्छ के बीच विभाजित किया गया है अर्थात भारत एवं पाकिस्तान के मध्य| यही भारत के दावे का आधार है जिसकी 1925 केएक मानचित्र से भी पुष्टि होती है| सरक्रीक क्षेत्र में सीमा-प्रबंधन की चुनौतियाँ दोनों देशों के मध्य सीमा अस्पष्टता; दलदली भूमि से सीमा पर नजर रखने में कठिनाई; जल-स्तर का बढ़ना-घटना; गर्मी एवं आर्द्रता से युक्त मौसम की वजह से सीमारक्षकों की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ; आतंकवादी एवं नशीले पदार्थों के तस्करों द्वारा इस क्षेत्र को प्रयोग में लाना; सरक्रीक क्षेत्र का महत्व तथा वर्तमान में बढ़ रही प्रासंगिकता मत्स्यन - सरक्रीक क्षेत्र भारत व पाकिस्तान दोनों देश के मछुआरों के लिए मछली पकड़ने का एक बड़ा स्थान है| सर क्रीक को एशिया के सबसे बड़े मत्स्यन क्षेत्रों में से एक माना जाता है| अत्यधिक मछलियों की लालसा में उनकी नौकाएं सीमाओं के आर-पार चली जाती हैं तथा दूसरे देश के सीमारक्षकों के द्वारा पकड़ ली जाती हैं| हाइड्रोकार्बन की उपलब्धता -दोनों देशों के लिए इसक्षेत्र पर विवाद में उलझने का एक महत्वपूर्ण कारण समुद्र के नीचे प्रचुर मात्रा में तेल एवं गैस का संभावित संकेंद्रण है| हालांकि विवादों के कारण इसका वर्तमान में उपयोग नहीं हो पा रहा है| सामरिक सुरक्षा तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दें - सरक्रीक क्षेत्र की भौतिक अवस्थिति में भी हाल के समय में परिवर्तन आया है| नवंबर 2008 में मुंबई आतंकवादी हमले के बाद से समुद्री सुरक्षा की चिंताएं भी बढ़ी है जिसमें आतंकवादियों ने सरक्रीक से दूर मछली पकड़ने के लिए उपयोग होने वाली एक भारतीय जहाज कुबेर पर कब्जा कर लिया था तथा मुंबई में हमला करने के लिए इसका उपयोग किया था| नशीली दवाओं की तस्करी- सरक्रीक के विवादित समुद्री क्षेत्र में टेलीफोन वार्तालापों से इस क्षेत्र में नशीली दवाओं के उत्पादक संघों के सक्रिय होने का संकेत मिलता है| यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सक्रिय नशीली दवाओं के व्यापार केंद्र के रूप में भी एक हो सकता है| भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह को सुरक्षित करने हेतु भी यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है| ग्वादर बंदरगाह में चीन की बढ़ती भूमिका तथा अरब सागर में चीन के बढ़ रहे हस्तक्षेप को देखते हुए भी सरक्रीक क्षेत्र की महता और ज्यादा बढ़ जाती है| भारत द्वारा सरक्रीक सीमा प्रबंधन में सक्रीय रूप से बढ़ती भूमिका के पक्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार के नेतृत्व में आरंभ होने वाले भारत-पाकिस्तान समग्र वार्ता के दौरान यह महत्वपूर्ण विषयों में से एक था| सर क्रीक के संदर्भ में दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ता भी हुई है तथा दोनों देशों ने संयुक्त सर्वेक्षण भी किया है| साथ ही, अपने संबंधित स्थितियों को दिखाते हुए दोनों देशों ने मानचित्रों का आदान प्रदान भी किया है| भारत वर्ष 2015 के बाद से यहाँ संरचनात्मक विकास को बढ़ावा दे रहा है| BSF जवानों के आवागमन हेतु रोड, रेल की सुविधाएँ और संचार हेतु फ़ोन लिंक्स बढ़ाये जा रहे हैं| यहाँ लगभग 50 नए हेलिपैड बनाने की योजना है और एक त्वरित लैंडिंग एयरपोर्ट बनाया जा रहा है| सैनिकों के संतुष्टि स्तर को मजबूत करने के लिए गेस्टहाउस बनाए जा रहे हैं| बॉर्डर पर ऑब्जरवेशन पोस्ट रूम बनाए जा रहें हैं ताकि सैनिकों को लू जैसी समस्याओं से मुक्त रखा जाए| वर्ष 2015 में यह घोषणा की गयी थी कि आधुनिक मानवरहित हवाई वाहन तथा ऑल टेरन वाहन शीघ्र ही सुरक्षा बलों को उपलब्ध करवाए जायेंगे ताकि वे दलदली भूमि की निगरानी में अधिक सक्षम हो पाएं| सीमा प्रबंधन तथा आतंरिक सुरक्षा की दृष्टि से होने वाले सम्मेलनों को सीमावर्ती क्षेत्रों में आयोजित किया जा रहा है | जुलाई 2018 में कच्छ में शीर्ष पुलिस अधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया गया जिसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ सीबीआई, आईबी, बीएसएफ, सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बल भी उपस्थित रहें| इस सम्मेलन का उद्देश्य आइएस के विस्तार को रोकना और भारतीय मुसलमानों तक इसकी पहुँच को बढ़ने से रोकना था| सरक्रीक क्षेत्र के आर्थिक, सामरिक तथा रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत को और ज्यादा प्रो-एक्टिव रहने की आवश्यकता है| इस मुद्दे के अभी भी अनसुलझा रहने के कारण भारत को यहाँ सीमा-प्रबंधन में नवीनतम उपायों को शामिल करना होगा जैसे- रिमोट सेंसिंग का उपयोग; उपग्रहों का उपयोग; क्षेत्र की मौसमी स्थितियों को देखते हुए एक स्थानीय रणनीति बनाना आदि|
##Question:सरक्रीक क्षेत्र में सीमा प्रबंधन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती हमेशा रही है किंतु वर्तमान में इस क्षेत्र की बढ़ रही प्रासंगिकता को देखते हुए भारत सरक्रीक सीमा प्रबंधन में अपनी सक्रियता को प्रेरित कर रहा है| टिप्पणी कीजिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Border management in the Sir Creek region has always been a major challenge for India, but increasing relevance of the region at present, India ispromptingits activism in Sir Creek border management. Comment (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- सरक्रीक क्षेत्र को संक्षिप्त मानचित्र में दर्शाते हुए उस क्षेत्र में सीमा प्रबंधन की चुनौतियों को संक्षिप्तता से बताईए| अगले भाग में,सरक्रीकक्षेत्र की वर्तमान समय में बढ़ रही प्रासंगिकता को बताईए| भारत द्वारा सरक्रीक सीमा प्रबंधन में सक्रीय रूप से बढ़ती भूमिका को कुछ तथ्यों के साथ प्रस्तुत कीजिए| निष्कर्षतः उपरोक्त संदर्भ में अपने सुझावों को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- सरक्रीक क्षेत्र भारत के गुजरात एवं पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मध्य 96 किलोमीटर लंबी एस्चुयरी क्षेत्र है| इस विवाद की जड़ में आज़ादी पूर्व बंबई सरकार का एक निर्णय था| आज़ादी से पहले बंबई प्रेसिडेंसी में ही कच्छ तथा सिंध प्रोविंस शामिल थें| सरक्रीक(तत्कालीन वाणगंगा क्षेत्र) पर दोनों के मध्य विवाद होने पर 1914 में बंबई प्रेसिडेंसी को मध्यस्थता करनी पड़ी थी|1914 में बंबई सरकार के एक निर्णय के दो विरोधाभासी अनुच्छेदों के प्रावधान के कारण भारत एवं पाकिस्तान सरक्रीक के हिस्से पर अपनी दावेदारी जताते हैं| इस निर्णय के अनुच्छेद 9 में कहा गया था किकच्छ एवं सिंध के बीच की सीमा क्रीक के पूर्व में है जिसका तात्पर्य है कि यह क्रीक सिंध से संबंधित है| अतः यह पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में आता है| वहीं दूसरी ओर, अनुच्छेद 10 में कहा गया है कि चूँकि सर क्रीक वर्षभर नौगम्य/जहाजों के चलने योग्य है अतः अंतरराष्ट्रीय कानून एवं थालवेग के सिद्धांत के अनुसार यह सीमा नौगम्य चैनल के बीच से तय की जा सकती है| इसका अर्थ यह हुआ कि इसे सिंध एवं कच्छ के बीच विभाजित किया गया है अर्थात भारत एवं पाकिस्तान के मध्य| यही भारत के दावे का आधार है जिसकी 1925 केएक मानचित्र से भी पुष्टि होती है| सरक्रीक क्षेत्र में सीमा-प्रबंधन की चुनौतियाँ दोनों देशों के मध्य सीमा अस्पष्टता; दलदली भूमि से सीमा पर नजर रखने में कठिनाई; जल-स्तर का बढ़ना-घटना; गर्मी एवं आर्द्रता से युक्त मौसम की वजह से सीमारक्षकों की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ; आतंकवादी एवं नशीले पदार्थों के तस्करों द्वारा इस क्षेत्र को प्रयोग में लाना; सरक्रीक क्षेत्र का महत्व तथा वर्तमान में बढ़ रही प्रासंगिकता मत्स्यन - सरक्रीक क्षेत्र भारत व पाकिस्तान दोनों देश के मछुआरों के लिए मछली पकड़ने का एक बड़ा स्थान है| सर क्रीक को एशिया के सबसे बड़े मत्स्यन क्षेत्रों में से एक माना जाता है| अत्यधिक मछलियों की लालसा में उनकी नौकाएं सीमाओं के आर-पार चली जाती हैं तथा दूसरे देश के सीमारक्षकों के द्वारा पकड़ ली जाती हैं| हाइड्रोकार्बन की उपलब्धता -दोनों देशों के लिए इसक्षेत्र पर विवाद में उलझने का एक महत्वपूर्ण कारण समुद्र के नीचे प्रचुर मात्रा में तेल एवं गैस का संभावित संकेंद्रण है| हालांकि विवादों के कारण इसका वर्तमान में उपयोग नहीं हो पा रहा है| सामरिक सुरक्षा तथा सुरक्षा संबंधी मुद्दें - सरक्रीक क्षेत्र की भौतिक अवस्थिति में भी हाल के समय में परिवर्तन आया है| नवंबर 2008 में मुंबई आतंकवादी हमले के बाद से समुद्री सुरक्षा की चिंताएं भी बढ़ी है जिसमें आतंकवादियों ने सरक्रीक से दूर मछली पकड़ने के लिए उपयोग होने वाली एक भारतीय जहाज कुबेर पर कब्जा कर लिया था तथा मुंबई में हमला करने के लिए इसका उपयोग किया था| नशीली दवाओं की तस्करी- सरक्रीक के विवादित समुद्री क्षेत्र में टेलीफोन वार्तालापों से इस क्षेत्र में नशीली दवाओं के उत्पादक संघों के सक्रिय होने का संकेत मिलता है| यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सक्रिय नशीली दवाओं के व्यापार केंद्र के रूप में भी एक हो सकता है| भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह को सुरक्षित करने हेतु भी यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है| ग्वादर बंदरगाह में चीन की बढ़ती भूमिका तथा अरब सागर में चीन के बढ़ रहे हस्तक्षेप को देखते हुए भी सरक्रीक क्षेत्र की महता और ज्यादा बढ़ जाती है| भारत द्वारा सरक्रीक सीमा प्रबंधन में सक्रीय रूप से बढ़ती भूमिका के पक्ष 2004 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार के नेतृत्व में आरंभ होने वाले भारत-पाकिस्तान समग्र वार्ता के दौरान यह महत्वपूर्ण विषयों में से एक था| सर क्रीक के संदर्भ में दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ता भी हुई है तथा दोनों देशों ने संयुक्त सर्वेक्षण भी किया है| साथ ही, अपने संबंधित स्थितियों को दिखाते हुए दोनों देशों ने मानचित्रों का आदान प्रदान भी किया है| भारत वर्ष 2015 के बाद से यहाँ संरचनात्मक विकास को बढ़ावा दे रहा है| BSF जवानों के आवागमन हेतु रोड, रेल की सुविधाएँ और संचार हेतु फ़ोन लिंक्स बढ़ाये जा रहे हैं| यहाँ लगभग 50 नए हेलिपैड बनाने की योजना है और एक त्वरित लैंडिंग एयरपोर्ट बनाया जा रहा है| सैनिकों के संतुष्टि स्तर को मजबूत करने के लिए गेस्टहाउस बनाए जा रहे हैं| बॉर्डर पर ऑब्जरवेशन पोस्ट रूम बनाए जा रहें हैं ताकि सैनिकों को लू जैसी समस्याओं से मुक्त रखा जाए| वर्ष 2015 में यह घोषणा की गयी थी कि आधुनिक मानवरहित हवाई वाहन तथा ऑल टेरन वाहन शीघ्र ही सुरक्षा बलों को उपलब्ध करवाए जायेंगे ताकि वे दलदली भूमि की निगरानी में अधिक सक्षम हो पाएं| सीमा प्रबंधन तथा आतंरिक सुरक्षा की दृष्टि से होने वाले सम्मेलनों को सीमावर्ती क्षेत्रों में आयोजित किया जा रहा है | जुलाई 2018 में कच्छ में शीर्ष पुलिस अधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया गया जिसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ सीबीआई, आईबी, बीएसएफ, सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बल भी उपस्थित रहें| इस सम्मेलन का उद्देश्य आइएस के विस्तार को रोकना और भारतीय मुसलमानों तक इसकी पहुँच को बढ़ने से रोकना था| सरक्रीक क्षेत्र के आर्थिक, सामरिक तथा रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत को और ज्यादा प्रो-एक्टिव रहने की आवश्यकता है| इस मुद्दे के अभी भी अनसुलझा रहने के कारण भारत को यहाँ सीमा-प्रबंधन में नवीनतम उपायों को शामिल करना होगा जैसे- रिमोट सेंसिंग का उपयोग; उपग्रहों का उपयोग; क्षेत्र की मौसमी स्थितियों को देखते हुए एक स्थानीय रणनीति बनाना आदि|
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रमुख विशेषताओंका विस्तृत उल्लेखकीजिए। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describe in detail the main featuresof the Preamble of the Indian Constitution. (150-200 words, Marks - 10 )
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भारतीय संविधान कीप्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान कीप्रस्तावना इसका एक संक्षिप्त परिचय है। यह भारतीयसंविधान सभा द्वारा अपनाए गए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है।भारतीय प्रस्तावना का संबंध उसके उद्देश्यों, लक्ष्यों , आदर्शों और उसके आधारभूत सिद्धान्तों से है। संविधान सभा के सदस्य पंडित ठाकुरदास भार्गव ने प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रमुख विशेषताएं:- शक्ति का स्रोत: प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति ग्रहण करता है। यह भारत की प्रकृति को स्पष्ट करती है: यह घोषणा करती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक विशेषताओं वाला देश है। इसमें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान है जैसे, प्रस्तावना में समाजवादी शब्द का प्रयोग ,भारत में सामाजिक असामनता दूर करते हुए विभिन्न वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाना है। इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(b) व 39(c) में देख सकते है। पंथनिरपेक्षता को मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद 25 से 28 में अंतर्निहित धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में देखाजा सकता है। सामाजिक न्याय से तात्पर्य जाति, लिंग, मूलवंश आदि आधारों पर भेदभाव को समाप्त करने से है जिन्हें अनुच्छेद 14,17,18 व 46 में देखा जा सकता है। आर्थिक न्याय को लागू करने हेतु तथा असमानता को कम करने के प्रयास अनुच्छेद 15, 16व 39 के प्रावधानों में अंतर्निहित है। राजनीतिक न्याय को स्थापित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 ,19 तथा 41 में विशेष परिलक्षित किया गया है। प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों की व्याख्या करती है जैसे- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा लोगों के साथ भेदभाव न करना बंधुत्व की भावना, एकता अखंडता को बनाए रखना। प्रस्तावना संविधान लागू होने की तिथि 26 नवम्बर, 1949 का उल्लेख करती है। प्रस्तावना संविधान को लागू करने के लिए दिशा प्रदान करता है। इसमें संशोधन भीकिया जा सकता है परंतु इसकी मूल विशेषताओं में बदलाव नहीं होनेचाहिए। अतः यहसंविधान के दर्शन व मार्गदर्शक के रूप में भूमिका निभाती है।
##Question:भारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रमुख विशेषताओंका विस्तृत उल्लेखकीजिए। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Describe in detail the main featuresof the Preamble of the Indian Constitution. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भारतीय संविधान कीप्रस्तावना का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान कीप्रस्तावना इसका एक संक्षिप्त परिचय है। यह भारतीयसंविधान सभा द्वारा अपनाए गए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है।भारतीय प्रस्तावना का संबंध उसके उद्देश्यों, लक्ष्यों , आदर्शों और उसके आधारभूत सिद्धान्तों से है। संविधान सभा के सदस्य पंडित ठाकुरदास भार्गव ने प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना की प्रमुख विशेषताएं:- शक्ति का स्रोत: प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति ग्रहण करता है। यह भारत की प्रकृति को स्पष्ट करती है: यह घोषणा करती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक विशेषताओं वाला देश है। इसमें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान है जैसे, प्रस्तावना में समाजवादी शब्द का प्रयोग ,भारत में सामाजिक असामनता दूर करते हुए विभिन्न वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाना है। इसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(b) व 39(c) में देख सकते है। पंथनिरपेक्षता को मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद 25 से 28 में अंतर्निहित धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में देखाजा सकता है। सामाजिक न्याय से तात्पर्य जाति, लिंग, मूलवंश आदि आधारों पर भेदभाव को समाप्त करने से है जिन्हें अनुच्छेद 14,17,18 व 46 में देखा जा सकता है। आर्थिक न्याय को लागू करने हेतु तथा असमानता को कम करने के प्रयास अनुच्छेद 15, 16व 39 के प्रावधानों में अंतर्निहित है। राजनीतिक न्याय को स्थापित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 ,19 तथा 41 में विशेष परिलक्षित किया गया है। प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों की व्याख्या करती है जैसे- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा लोगों के साथ भेदभाव न करना बंधुत्व की भावना, एकता अखंडता को बनाए रखना। प्रस्तावना संविधान लागू होने की तिथि 26 नवम्बर, 1949 का उल्लेख करती है। प्रस्तावना संविधान को लागू करने के लिए दिशा प्रदान करता है। इसमें संशोधन भीकिया जा सकता है परंतु इसकी मूल विशेषताओं में बदलाव नहीं होनेचाहिए। अतः यहसंविधान के दर्शन व मार्गदर्शक के रूप में भूमिका निभाती है।
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महासागरीय धाराओं से आप क्या समझते हैं? महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए? (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Ocean Currents? Briefly describe the factors affecting Ocean Currents? (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- महासागरीय धाराओं को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं के बारे में संक्षिप्तता से बताईए| साथ ही, विश्व का मानचित्र बनाते हुए विभिन्न धाराओं को उसमें दर्शाईये| अगले भाग में,महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| उत्तर- जल का एक विशाल समूह जो एक निश्चित मार्ग एवं दिशा में लंबी दूरी तय करता है , उसेमहासागरीय धारा कहते हैं| ये धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के समान होती हैं| धाराओं की पहचान उनके प्रवाह से होती हैं| सामान्यतः धाराएँ सतह के निकट सर्वाधिक शक्तिशाली होती हैं तथा वहां उसकी गति 5 नॉट सेअधिक होती है| गहराई में धाराओं की गति धीमी हो जाती है जो कि 0.5 नॉट से भी कम होती है|सागरीय धारा कावर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है जैसे- गहराई के आधार पर(धरातलीय; अर्द्धतलीय; सागरीय नितल;); तापमान के आधार पर या गति के आधार पर| NOTE- विश्व का मानचित्र बनाते हुए विभिन्न धाराओं को उसमें दर्शाईये| सागरीय धारा को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक महासागरीय धाराएँ दो प्रकार के बलों के द्वारा प्रभावित होती हैं- प्राथमिक बल - इनसे जल की गति प्रारंभ होती है| तापमान तथा सौर ऊर्जा का प्रभाव- सौर ऊर्जा से गर्म होकर जल फैलता हैतथा उसका घनत्व कम होता है| इसके विपरीत कम तापमान की वजह से जल ठंडा होता है जिससे उसका घनत्व ज्यादा हो जाता है| यही कारण है कि विषुवत वृत के पास महासागरीय जल का स्तर मध्य अक्षांशों के अपेक्षा 8 सेंटीमीटर अधिक ऊंचा होता है| इसके कारण बहुत कम प्रवणता उत्पन्न होती है तथा जल का बहाव ढालसे नीचे की तरफ होता है| पवनों का प्रभाव -महासागर केसतह पर बहने वाली वायु जल को गतिमान करती है| इस क्रम में वायु एवं पानी की सतह के बीच उत्पन्न होने वाला घर्षण बल जल की गति को प्रभावित करता है| इसमें सु दूरवर्ती तथा तटवर्ती दोनों प्रकार की पवनों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है| गुरुत्वाकर्षण के कारण जल नीचे बैठता है और यह एकत्रित जल दाब प्रवणता में भिन्नता लाता है| कोरियोलिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में जल घड़ी के सुई की दिशा में गति करता है और दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी के सुई के विपरीत दिशा में प्रवाहित होता है| उनके चारों और बहाव को वलय(Gyres) कहा जाता है| इसके कारण सभी महासागरीय बेसिनोंमें वृहद वृत्ताकार धाराएं उत्पन्न होती हैं| लवणता तथा पानी का घनत्व- पानी के घनत्व में अंतर महासागरीय जल धाराओं के ऊर्ध्वाधर गति को प्रभावित करता है| अधिक खारा जल निम्न खारे जल की अपेक्षा ज्यादा सघन होता है तथा इसी प्रकार ठंडा जल गर्म जल की अपेक्षा अधिक सघन होता है| सघन जल नीचे बैठता है हल्के जल की प्रवृति ऊपर उठने की होती है| ठंडे जल वाली महासागरीय धाराएं तब उत्पन्न होती हैं जब ध्रुवों के पास वाले जल नीचे बैठते हैं एवं धीरे-धीरे विषुवत वृत्त की ओर गति करते हैं| गर्म जलधाराएं विषुवत वृत्त से सतह के साथ होते हुए ध्रुवों की ओर जाती है और ठंडे जल का स्थान लेती हैं| इसी प्रकारकम लवणता से अधिक लवणता की तरफ जल का प्रवाह होता है| द्वितीयक बल - इनसे धाराओं का प्रवाह नियंत्रित होता है| तटीय आकृति की वजह से महासागरीय धाराओं का प्रवाह नियंत्रण; सागर नितल के उच्चावच का प्रभाव उनकी गति तथा बहाव को नियंत्रित करता है| क्षेत्रीय स्तर पर वायुदाब अंतराल भी सागरीय धारा को प्रभावित करता है|
##Question:महासागरीय धाराओं से आप क्या समझते हैं? महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए? (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Ocean Currents? Briefly describe the factors affecting Ocean Currents? (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- महासागरीय धाराओं को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं के बारे में संक्षिप्तता से बताईए| साथ ही, विश्व का मानचित्र बनाते हुए विभिन्न धाराओं को उसमें दर्शाईये| अगले भाग में,महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए| उत्तर- जल का एक विशाल समूह जो एक निश्चित मार्ग एवं दिशा में लंबी दूरी तय करता है , उसेमहासागरीय धारा कहते हैं| ये धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के समान होती हैं| धाराओं की पहचान उनके प्रवाह से होती हैं| सामान्यतः धाराएँ सतह के निकट सर्वाधिक शक्तिशाली होती हैं तथा वहां उसकी गति 5 नॉट सेअधिक होती है| गहराई में धाराओं की गति धीमी हो जाती है जो कि 0.5 नॉट से भी कम होती है|सागरीय धारा कावर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है जैसे- गहराई के आधार पर(धरातलीय; अर्द्धतलीय; सागरीय नितल;); तापमान के आधार पर या गति के आधार पर| NOTE- विश्व का मानचित्र बनाते हुए विभिन्न धाराओं को उसमें दर्शाईये| सागरीय धारा को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक महासागरीय धाराएँ दो प्रकार के बलों के द्वारा प्रभावित होती हैं- प्राथमिक बल - इनसे जल की गति प्रारंभ होती है| तापमान तथा सौर ऊर्जा का प्रभाव- सौर ऊर्जा से गर्म होकर जल फैलता हैतथा उसका घनत्व कम होता है| इसके विपरीत कम तापमान की वजह से जल ठंडा होता है जिससे उसका घनत्व ज्यादा हो जाता है| यही कारण है कि विषुवत वृत के पास महासागरीय जल का स्तर मध्य अक्षांशों के अपेक्षा 8 सेंटीमीटर अधिक ऊंचा होता है| इसके कारण बहुत कम प्रवणता उत्पन्न होती है तथा जल का बहाव ढालसे नीचे की तरफ होता है| पवनों का प्रभाव -महासागर केसतह पर बहने वाली वायु जल को गतिमान करती है| इस क्रम में वायु एवं पानी की सतह के बीच उत्पन्न होने वाला घर्षण बल जल की गति को प्रभावित करता है| इसमें सु दूरवर्ती तथा तटवर्ती दोनों प्रकार की पवनों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है| गुरुत्वाकर्षण के कारण जल नीचे बैठता है और यह एकत्रित जल दाब प्रवणता में भिन्नता लाता है| कोरियोलिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में जल घड़ी के सुई की दिशा में गति करता है और दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी के सुई के विपरीत दिशा में प्रवाहित होता है| उनके चारों और बहाव को वलय(Gyres) कहा जाता है| इसके कारण सभी महासागरीय बेसिनोंमें वृहद वृत्ताकार धाराएं उत्पन्न होती हैं| लवणता तथा पानी का घनत्व- पानी के घनत्व में अंतर महासागरीय जल धाराओं के ऊर्ध्वाधर गति को प्रभावित करता है| अधिक खारा जल निम्न खारे जल की अपेक्षा ज्यादा सघन होता है तथा इसी प्रकार ठंडा जल गर्म जल की अपेक्षा अधिक सघन होता है| सघन जल नीचे बैठता है हल्के जल की प्रवृति ऊपर उठने की होती है| ठंडे जल वाली महासागरीय धाराएं तब उत्पन्न होती हैं जब ध्रुवों के पास वाले जल नीचे बैठते हैं एवं धीरे-धीरे विषुवत वृत्त की ओर गति करते हैं| गर्म जलधाराएं विषुवत वृत्त से सतह के साथ होते हुए ध्रुवों की ओर जाती है और ठंडे जल का स्थान लेती हैं| इसी प्रकारकम लवणता से अधिक लवणता की तरफ जल का प्रवाह होता है| द्वितीयक बल - इनसे धाराओं का प्रवाह नियंत्रित होता है| तटीय आकृति की वजह से महासागरीय धाराओं का प्रवाह नियंत्रण; सागर नितल के उच्चावच का प्रभाव उनकी गति तथा बहाव को नियंत्रित करता है| क्षेत्रीय स्तर पर वायुदाब अंतराल भी सागरीय धारा को प्रभावित करता है|
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आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और विकास में अन्योन्याश्रित संबंध है। सतत विकास लक्ष्यों, सेंड़ाई फ्रेमवर्क और जलवायु परिवर्तन के लिए हुए पेरिस समझौते के आलोक में इस दिशा में किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिए। (200-250 शब्द, 15 अंक) There is an interdependent relationship between disaster management, environmental protection and development. Discuss the efforts made in this direction in the light of Sustainable Development Goals, Sendai Framework and Paris Agreement for Climate Change. (200-250 words, 15 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहि उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया · इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है · आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए · इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन · सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं · आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास · आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| · 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| · इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क · यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है · मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए · आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना · प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना · इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं · इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है · इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है · यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क · यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| · यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना · इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
##Question:आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और विकास में अन्योन्याश्रित संबंध है। सतत विकास लक्ष्यों, सेंड़ाई फ्रेमवर्क और जलवायु परिवर्तन के लिए हुए पेरिस समझौते के आलोक में इस दिशा में किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिए। (200-250 शब्द, 15 अंक) There is an interdependent relationship between disaster management, environmental protection and development. Discuss the efforts made in this direction in the light of Sustainable Development Goals, Sendai Framework and Paris Agreement for Climate Change. (200-250 words, 15 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहि उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया · इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है · आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए · इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन · सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं · आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास · आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| · 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| · इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क · यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है · मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए · आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना · प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना · इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं · इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है · इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है · यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क · यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| · यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना · इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
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Clarifying the difference between crisis and disaster, explain the different stages of disaster management. Along with this, clarify the importance of Hugo and Sendai Framework in the context of disaster management (150 to 200 words/10 marks).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहि उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया · इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है · आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए · इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन · सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं · आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास · आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| · 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| · इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क · यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है · मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए · आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना · प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना · इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं · इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है · इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है · यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क · यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| · यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना · इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
##Question:Clarifying the difference between crisis and disaster, explain the different stages of disaster management. Along with this, clarify the importance of Hugo and Sendai Framework in the context of disaster management (150 to 200 words/10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहि उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया · इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है · आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए · इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन · सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं · आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास · आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| · 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| · इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क · यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है · मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए · आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना · प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना · इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं · इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है · इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है · यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क · यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| · यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना · इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
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संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट करते हुए आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही, आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट कीजिये |(10 अंक; 150 से 200 शब्द) Clarifying the difference between crisis and disaster, explain the different stages of disaster management. Along with this, clarify the importance of Hugo and Sendai Framework in the context of disaster management (10 marks; 150 to 200 words).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहि उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया · इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है · आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए · इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन · सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं · आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास · आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| · 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| · इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क · यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है · मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए · आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना · प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना · इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं · इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है · इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है · यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क · यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| · यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना · इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
##Question:संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट करते हुए आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही, आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट कीजिये |(10 अंक; 150 से 200 शब्द) Clarifying the difference between crisis and disaster, explain the different stages of disaster management. Along with this, clarify the importance of Hugo and Sendai Framework in the context of disaster management (10 marks; 150 to 200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहि उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया · इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है · आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए · इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन · सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं · आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास · आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| · 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| · इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क · यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है · मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए · आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना · प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना · इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं · इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है · इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है · यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क · यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| · यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना · इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
46,550
संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट करते हुए आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट कीजिये |(10 अंक; 150 से 200 शब्द) Clarifying the difference between crisis and disaster, explain the different stages of disaster management. Along with this, clarify the importance of Hugo and Sendai Framework in the context of disaster management (10 अंक; 150 to 200 words).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है टाक विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
##Question:संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट करते हुए आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट कीजिये |(10 अंक; 150 से 200 शब्द) Clarifying the difference between crisis and disaster, explain the different stages of disaster management. Along with this, clarify the importance of Hugo and Sendai Framework in the context of disaster management (10 अंक; 150 to 200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संकट एवं आपदा में अंतर स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये 3- अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये संकट एक भौगोलिक-भौतिक प्रघटना होती है जो कि एक जोखिम पूर्ण स्थिति होती है और आपदा में परिवर्तित हो सकती है|संकट, आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| संकट से दूरी सुभेद्यता के स्तर का निर्धारण करती है| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं| सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है| इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है| जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं| आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन) इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे आपदा के समय:प्रतिक्रिया इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था| इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं ह्यूगो फ्रेमवर्क यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है सेन्डाई फ्रेमवर्क यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना| यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है टाक विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके|
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State the financial sector reform measures initiated by the government on the basis of the recommendations of the FSLRC. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE FINANCIAL SECTOR REFORM MEASURES SUGGESTED BY THE FSLRC ALONG WITH THE GOVERNMENT’S MOVE ON EACH RECOMMENDATION -CONCLUSION ANSWER: Most of the recommendations currently being implemented by the government are on the basis of the Financial Sector Legislative Recommendations Commission (FSLRC). This commission was headed by Justice B. N. Srikrishna. It was set up in 2011 and gave the report in 2013. Most of the reforms of the financial sector are on the basis of this commission’s recommendations only. At least 5-6 bodies that have been set up in the last 5 years are based on this committee’s recommendations. However, as the recommendations are drastic, it will take at least a decade i.e. 5 more years for implementing the other reforms that it suggested. REFORMS SUGGESTED BY THE FSLRC AND THE ACTION TAKEN ON IT 1) CONSOLIDATION OF LAWS- IFC Most of the financial sector laws should be replaced by a single principle-based sector-neutral law viz. Indian Financial code. We have more than 70 laws like the Banking Regulations Act, RBI Act etc.. Most of these laws should be abolished and be replaced by 1 law. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government did move forward with this recommendation and came up with a draft IFC in 2015. However, it was scrapped due to certain controversial issues like MPC, powers of RBI to be reduced etc. Therefore, the bill never got introduced in Parliament. 2) MERGER OF REGULATORS Various regulators like SEBI, FMC, IRDAI, PFRDA and PFRD should be merged into a single regulator viz. Unified Financial Agency (UFA) [This should not include RBI- minimum regulators like RBI should remain]. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has already started on the path of such merger. For example, the FMC does not exist anymore and its functions have been merged with the functions of SEBI. This is desirable as now banks, insurance companies, mutual funds are not limited to their sectors, and have entered the domains of the others. For example, banks have become universal banks. Therefore, different regulators would come into conflict with each other. It will reduce the scope of gaps (like NSEL crisis), overlaps (tussle between IRDAI and SEBI), inconsistencies, regulatory arbitrage (taking undue advantage of difference in regulations by not adhering to any of the directions) etc. in the financial sector regulations. The scope of such problems has increased in the context of the intermingling of financial services. For example, universal banks, and hybrid financial products like ULIP. Therefore, a single regulator is desirable. 2.1) Also, ease of doing business would improve 2.2) It is in consonance with the unity of command principle of management- 1 person should receive the command from 1 superior only. 3) FINANCIAL INSTITUTIONS- EXPANSION AND DIVERSIFICATION Expansion and diversification of activities will enable them to achieve economies of scale (benefits of large scale production) and economies of scope (benefits of diversification). More regulators would affect the diversification of activities, due to an increase in compliance cost. 4) INSTITUTIONS The financial sector should be regulated by the following 7 institutions: 4.1) RBI- There should be no change in functions- regulation of banks, payment systems and monetary policy should remain under the RBI. 4.2) UFA- SEBI, FMC, IRDAI and PFRDA- should be replaced by a UFA to regulate all non-banking FIs. 4.3) FRA- Currently, there is an ombudsman for the banking and insurance sector (performs grievance redressal). There should be a Financial Redress Agency (FRA) for grievance redressal of all the financial products related to consumer grievances. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has released a discussion paper on FRA in 2016. But not further steps were taken after the public comments. (The bill was to be introduced, but probably it will be introduced in the IFC). 4.4) FSAT- SAT is only an appellate against the decisions of the SEBI. Therefore, there should be a Financial Sector Appellate Tribunal (FSAT) to hear appeals against the decisions of regulators like RBI, UFA and FRA. 4.5) RESOLUTION CORPORATION- was suggested to deal with the distressed financial institutions. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- Government took up the FRDA (Foreign Resolution and Deposit Insurance)bill with RC as the main focus. The bill was later dropped due to political issues. 4.6) PDMA- Should be set up to manage the public debt. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has set up the PDMC. It announced that it will set up the PDMA by 2018 but it has not been set up yet. It means that the government is moving in this direction. 4.7) FSDC (Financial Stability and Development Council)- It recommended that it should be statutory body. It was established in 2010, on the recommendations of the G-20 (in the contest of the American financial crisis). It is an apex body related to the financial sector reforms and development. It is headed by the finance ministers. Selected secretaries and heads of regulators like RBI governors, SEBI chairman etc. are its members. Its functions are the coordination among regulators. For example, the tussle between SEBI and IRDAI regarding regulation of ULIP was solved by this body. Also, assessment of systemic risk (i.e. risk to the financial system), financial sector regulation, reform and development are its other recommendations. MINOR RECOMMENDATIONS- 5) FINANCIAL DATA MANAGEMENT CENTRE- should be established to collect and collate data from various FIs and regulators. It will standardize the norms of data collection, analyze data and prepare reports to facilitate FSDC in decision making. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government did introduce a bill, but certain issues cropped up due to which it could not go through. It is still therefore, still in the process. A committee known as Ajay Tyagi Committee has been set up for this, and the government is moving forward on the basis of this committee. 6) ACCOUNTABILITY AND AUTONOMY- of the regulators should be enhanced. The FSLRC recommended for how to make the regulators more accountable and transparent. For example, by releasing the minutes of the meetings etc. Also, the process of appointment and removal of members should be made more independent and government discretion should reduce here. The members and chairmen should be ineligible for government posts so as to remove any vested interests. 7) MPC- A 7 member MPC should be established. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has already established a 6 member MPC. The government is moving forward with these recommendations. However, these recommendations could not be adopted in the short-term. It will take some years, and the reforms are on the anvil. The approach of the FSLRC is strategically different from the present Indian laws and is organized around the individual sectors of finance.
##Question:State the financial sector reform measures initiated by the government on the basis of the recommendations of the FSLRC. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE FINANCIAL SECTOR REFORM MEASURES SUGGESTED BY THE FSLRC ALONG WITH THE GOVERNMENT’S MOVE ON EACH RECOMMENDATION -CONCLUSION ANSWER: Most of the recommendations currently being implemented by the government are on the basis of the Financial Sector Legislative Recommendations Commission (FSLRC). This commission was headed by Justice B. N. Srikrishna. It was set up in 2011 and gave the report in 2013. Most of the reforms of the financial sector are on the basis of this commission’s recommendations only. At least 5-6 bodies that have been set up in the last 5 years are based on this committee’s recommendations. However, as the recommendations are drastic, it will take at least a decade i.e. 5 more years for implementing the other reforms that it suggested. REFORMS SUGGESTED BY THE FSLRC AND THE ACTION TAKEN ON IT 1) CONSOLIDATION OF LAWS- IFC Most of the financial sector laws should be replaced by a single principle-based sector-neutral law viz. Indian Financial code. We have more than 70 laws like the Banking Regulations Act, RBI Act etc.. Most of these laws should be abolished and be replaced by 1 law. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government did move forward with this recommendation and came up with a draft IFC in 2015. However, it was scrapped due to certain controversial issues like MPC, powers of RBI to be reduced etc. Therefore, the bill never got introduced in Parliament. 2) MERGER OF REGULATORS Various regulators like SEBI, FMC, IRDAI, PFRDA and PFRD should be merged into a single regulator viz. Unified Financial Agency (UFA) [This should not include RBI- minimum regulators like RBI should remain]. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has already started on the path of such merger. For example, the FMC does not exist anymore and its functions have been merged with the functions of SEBI. This is desirable as now banks, insurance companies, mutual funds are not limited to their sectors, and have entered the domains of the others. For example, banks have become universal banks. Therefore, different regulators would come into conflict with each other. It will reduce the scope of gaps (like NSEL crisis), overlaps (tussle between IRDAI and SEBI), inconsistencies, regulatory arbitrage (taking undue advantage of difference in regulations by not adhering to any of the directions) etc. in the financial sector regulations. The scope of such problems has increased in the context of the intermingling of financial services. For example, universal banks, and hybrid financial products like ULIP. Therefore, a single regulator is desirable. 2.1) Also, ease of doing business would improve 2.2) It is in consonance with the unity of command principle of management- 1 person should receive the command from 1 superior only. 3) FINANCIAL INSTITUTIONS- EXPANSION AND DIVERSIFICATION Expansion and diversification of activities will enable them to achieve economies of scale (benefits of large scale production) and economies of scope (benefits of diversification). More regulators would affect the diversification of activities, due to an increase in compliance cost. 4) INSTITUTIONS The financial sector should be regulated by the following 7 institutions: 4.1) RBI- There should be no change in functions- regulation of banks, payment systems and monetary policy should remain under the RBI. 4.2) UFA- SEBI, FMC, IRDAI and PFRDA- should be replaced by a UFA to regulate all non-banking FIs. 4.3) FRA- Currently, there is an ombudsman for the banking and insurance sector (performs grievance redressal). There should be a Financial Redress Agency (FRA) for grievance redressal of all the financial products related to consumer grievances. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has released a discussion paper on FRA in 2016. But not further steps were taken after the public comments. (The bill was to be introduced, but probably it will be introduced in the IFC). 4.4) FSAT- SAT is only an appellate against the decisions of the SEBI. Therefore, there should be a Financial Sector Appellate Tribunal (FSAT) to hear appeals against the decisions of regulators like RBI, UFA and FRA. 4.5) RESOLUTION CORPORATION- was suggested to deal with the distressed financial institutions. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- Government took up the FRDA (Foreign Resolution and Deposit Insurance)bill with RC as the main focus. The bill was later dropped due to political issues. 4.6) PDMA- Should be set up to manage the public debt. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has set up the PDMC. It announced that it will set up the PDMA by 2018 but it has not been set up yet. It means that the government is moving in this direction. 4.7) FSDC (Financial Stability and Development Council)- It recommended that it should be statutory body. It was established in 2010, on the recommendations of the G-20 (in the contest of the American financial crisis). It is an apex body related to the financial sector reforms and development. It is headed by the finance ministers. Selected secretaries and heads of regulators like RBI governors, SEBI chairman etc. are its members. Its functions are the coordination among regulators. For example, the tussle between SEBI and IRDAI regarding regulation of ULIP was solved by this body. Also, assessment of systemic risk (i.e. risk to the financial system), financial sector regulation, reform and development are its other recommendations. MINOR RECOMMENDATIONS- 5) FINANCIAL DATA MANAGEMENT CENTRE- should be established to collect and collate data from various FIs and regulators. It will standardize the norms of data collection, analyze data and prepare reports to facilitate FSDC in decision making. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government did introduce a bill, but certain issues cropped up due to which it could not go through. It is still therefore, still in the process. A committee known as Ajay Tyagi Committee has been set up for this, and the government is moving forward on the basis of this committee. 6) ACCOUNTABILITY AND AUTONOMY- of the regulators should be enhanced. The FSLRC recommended for how to make the regulators more accountable and transparent. For example, by releasing the minutes of the meetings etc. Also, the process of appointment and removal of members should be made more independent and government discretion should reduce here. The members and chairmen should be ineligible for government posts so as to remove any vested interests. 7) MPC- A 7 member MPC should be established. STEP TAKEN BY THE GOVERNMENT- The government has already established a 6 member MPC. The government is moving forward with these recommendations. However, these recommendations could not be adopted in the short-term. It will take some years, and the reforms are on the anvil. The approach of the FSLRC is strategically different from the present Indian laws and is organized around the individual sectors of finance.
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भारतीय समाज की विशेषताओं का सविस्तार वर्णन कीजिए। (150- 200 शब्द) Describe in detail the features of Indian society. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये। मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये। अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं। भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है। इसमें कई धर्म, जाति, भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं। उनकी संस्कृतियां अलग हैं, लोक-व्यवहार अलग हैं। भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं: भारतीय समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है जिसकी अधिकाँश जनसंख्या कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर निर्भर है। भारतीय समाज में सामाजिक असमानता हेतु जाति आधारित सामाजिक संस्था विद्यमान है जो समकालीन भारत में परिवर्तित हो रही है। भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी पायी जाती है। भारतीय समाज का एक बड़ा समुदाय जनजातीय समुदाय है जो तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है। भारतीय समाज में परंपरा एवं आधुनिकता में एक सामंजस्य दिखाई देता है, इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं। परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है। सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना, जनेऊ के साथ टाई धारण करना। भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक संस्थानों के मध्य एक परस्पर सामंजस्य एवं संतुलन दिखाई देता है, जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करता है। सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना। भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय, बहु-भाषाई, बहु धार्मिक एवं भौगोलिक क्षेत्रीय विविधता वाला समाज है किन्तु इनमें विविधता में एकता भी दिखाई देती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है।
##Question:भारतीय समाज की विशेषताओं का सविस्तार वर्णन कीजिए। (150- 200 शब्द) Describe in detail the features of Indian society. (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये। मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये। अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये। समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं। भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है। इसमें कई धर्म, जाति, भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं। उनकी संस्कृतियां अलग हैं, लोक-व्यवहार अलग हैं। भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं: भारतीय समाज मुख्यतः एक ग्रामीण समाज है जिसकी अधिकाँश जनसंख्या कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर निर्भर है। भारतीय समाज में सामाजिक असमानता हेतु जाति आधारित सामाजिक संस्था विद्यमान है जो समकालीन भारत में परिवर्तित हो रही है। भारतीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी पायी जाती है। भारतीय समाज का एक बड़ा समुदाय जनजातीय समुदाय है जो तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है। भारतीय समाज में परंपरा एवं आधुनिकता में एक सामंजस्य दिखाई देता है, इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं। परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है। सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना, जनेऊ के साथ टाई धारण करना। भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक संस्थानों के मध्य एक परस्पर सामंजस्य एवं संतुलन दिखाई देता है, जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करता है। सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना। भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय, बहु-भाषाई, बहु धार्मिक एवं भौगोलिक क्षेत्रीय विविधता वाला समाज है किन्तु इनमें विविधता में एकता भी दिखाई देती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है।
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Shed light on the Sudan type of climate. (150 words)
BRIEF APPROACH: INTRODUCTION CHARACTERISTICS OF THE SUDAN TYPE OF CLIMATE CONCLUSION Comment upon comparison with India ANSWER- Sudan type climate is the other name for Savannah type of climate/ climatic zone. It is also known as Parkland climate . It is found in the continental interiors- It is the transition area between the thick jungles and deserts. 1) TEMPERATURE High temperatures of more than 45 degrees Celsius are experienced in these areas. 2) AREAS Kenya, Tanzania, Uganda, Nigeria, NW Australia, Malawi, Niger, Sudan etc. experience such type of climate. 3) PRECIPITATION Since this region lies in the continental interiors, hence it experiences moderate rainfall. Therefore, one cannot find rich and luxurious growth of trees here. 4) BUSHWALES The land is dominated by grass. Therefore, these areas are also called Tropical Grasslands. Trees do exist (though not continuously) with umbrella-shaped canopies. This type of vegetation is called Bushwales. 5) FLORA Both short grass (till 6 feet) and long grass (till 12 feet) is found here. Baobabs and Elephanta gras s (more than 15 feet height) are important tree and grass species found here. 6) FAUNA All tall and huge animals; carnivores and herbivores are found here. Hyenas, jaguars, tigers, lions, cheetah, lynx, deer, antelopes, rabbits, zebras, bisons, wild pigs, boar, wild dogs 7) IMPORTANCE- BIG GAME COUNTRY/ HUNTERS" PARADISE This is due to the fact that tall grass is found, where a variety of animals can hide. These animals’ skin also resembles the colour of the grass. This promotes the culture of natural hunting among animals. Therefore, it is called a big game country. 8) TRIBES 8.1) Houzas of Nigeria -They are agriculturists and relatively developed. They grow crops such as maize, bajra, jowar (sorghum). 8.2) Masais - They are found in East Africa in Uganda, Tanzania etc. They are nomadic tribes. They are great lovers of cattle- The more the cattle they possess, the more is their ascribed status. They also drink the blood of the cattle along with milk. 8.3) Kikuyu - This is also a nomadic tribe. 9) DISEASE The disease called Ngana i.e. sleeping sickness due to the Tsetse fly is found in such regions. This disease is vaccine-preventable. The Savannah type of climate is found in India as well- for example, in the Deccan interiors, which experiences continentality.
##Question:Shed light on the Sudan type of climate. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: INTRODUCTION CHARACTERISTICS OF THE SUDAN TYPE OF CLIMATE CONCLUSION Comment upon comparison with India ANSWER- Sudan type climate is the other name for Savannah type of climate/ climatic zone. It is also known as Parkland climate . It is found in the continental interiors- It is the transition area between the thick jungles and deserts. 1) TEMPERATURE High temperatures of more than 45 degrees Celsius are experienced in these areas. 2) AREAS Kenya, Tanzania, Uganda, Nigeria, NW Australia, Malawi, Niger, Sudan etc. experience such type of climate. 3) PRECIPITATION Since this region lies in the continental interiors, hence it experiences moderate rainfall. Therefore, one cannot find rich and luxurious growth of trees here. 4) BUSHWALES The land is dominated by grass. Therefore, these areas are also called Tropical Grasslands. Trees do exist (though not continuously) with umbrella-shaped canopies. This type of vegetation is called Bushwales. 5) FLORA Both short grass (till 6 feet) and long grass (till 12 feet) is found here. Baobabs and Elephanta gras s (more than 15 feet height) are important tree and grass species found here. 6) FAUNA All tall and huge animals; carnivores and herbivores are found here. Hyenas, jaguars, tigers, lions, cheetah, lynx, deer, antelopes, rabbits, zebras, bisons, wild pigs, boar, wild dogs 7) IMPORTANCE- BIG GAME COUNTRY/ HUNTERS" PARADISE This is due to the fact that tall grass is found, where a variety of animals can hide. These animals’ skin also resembles the colour of the grass. This promotes the culture of natural hunting among animals. Therefore, it is called a big game country. 8) TRIBES 8.1) Houzas of Nigeria -They are agriculturists and relatively developed. They grow crops such as maize, bajra, jowar (sorghum). 8.2) Masais - They are found in East Africa in Uganda, Tanzania etc. They are nomadic tribes. They are great lovers of cattle- The more the cattle they possess, the more is their ascribed status. They also drink the blood of the cattle along with milk. 8.3) Kikuyu - This is also a nomadic tribe. 9) DISEASE The disease called Ngana i.e. sleeping sickness due to the Tsetse fly is found in such regions. This disease is vaccine-preventable. The Savannah type of climate is found in India as well- for example, in the Deccan interiors, which experiences continentality.
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भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के प्रमुख क्षेत्रों का परिचय देते हुए, बेहतर सीमा प्रबंधन की रणनीति के मुख्य तत्वों की चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द/ 10 अंक ) While discussing the major areas of border dispute between India and China, discuss the key elements of the strategy of better border management. (150-200 words/ 10 Marks)
दृष्टिकोण: दक्षिण एशिया में सीमा विवाद का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत व चीन के बीच विवादित सीमा क्षेत्र की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । बेहतर सीमा प्रबंधन के प्रमुख तत्वों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर : दक्षिण एशिया में सीमा विवाद एक प्रमुख समस्या है और इसकी जड़ें औपनिवेशिक शासन में ढूँढी जा सकती है । भारत चीन के बीच सीमा का निर्धारण मैकमोहन रेखा के द्वारा किया गया है तथापि चीन द्वारा इसे मानने से इंकार किया जाता रहा है । वर्ष 1962 में चीन द्वारा इस सीमा का उल्लंघन किया गया और भारत पर आक्रमण कर एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया गया । भारत चीन के बीच सीमा विवाद को तीन मुख्य भागों में बाँट कर देखा जा सकता है: पश्चिमी क्षेत्र: इसके अंतर्गत लद्दाख से उत्तराखंड तक का क्षेत्र आता है । इस क्षेत्र में सबसे प्रमुख विवादित क्षेत्र अक्साई चिन का है । भारत के लद्दाख व चीन के झिंझियांग प्रांत के बीच अवस्थित यह क्षेत्र मानव निवास विहीन है तथापि सामरिक दृष्टिकोण से इसका महत्व है और 1962 से यह चीन के कब्जे में है । इस क्षेत्र में अन्य प्रमुख विवादित क्षेत्र चुमार व दौलत वेग है । मध्य क्षेत्र : इसके अंतर्गत सिक्किम के आसपास का क्षेत्र है । इस क्षेत्र में अधिक विवाद नहीं है और अधिकांश विवादों को सुलझा लिया गया है । पूर्वी क्षेत्र : इसके अंतर्गत कई क्षेत्र हैं जहां चीन समय समय पर अपना दावा करता रहता है । प्रमुख विवादित क्षेत्रों में हम तिब्बत का विवाद , केर्न 5 का विवाद , तवांग का क्षेत्र , डोकलाम व अरुणाचल प्रदेश की चर्चा कर सकते हैं । चीन इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहता है और समय-समय पर विवाद को जन्म देता है । हालिया विवाद के रूप में हम डोकलाम व तवांग का उदाहरण देख सकते हैं । एक बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है : संरचनात्मक विकास : सीमावर्ती क्षेत्रों में संरचनात्मक विकास यथा: सड़क, पुल , हवाई अड्डा, संचार के साधन आदि का विकास अति आवश्यक है ताकि सीमा तक तीव्रता में पहुंचा जा सके । इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक सेवाओं की भी विकास आवश्यक है जिससे कि इन क्षेत्रों के लोगों तक विकास की पहुँच बनाई जा सके । सैन्य तीव्रता में वृद्धि : सीमा क्षेत्र में किसी भी अवैध गतिविधि को रोकने के लिए सैन्य बलों की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए । साथ ही सेना की आसान व तीव्र आवाजाही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए । राष्ट्रीयता का विकास : सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देना आवश्यक है जिससे कि इन क्षेत्रों के लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके ताकि वे किसी अलगाववादी गतिविधियों में शामिल न हो । राजनीतिक वार्ताओं की घनिष्ठता: पड़ोसी राष्ट्रों के साथ सीमा विवाद व तनाव को कम करने के लिए निरंतर राजनीतिक वार्ताओं के माध्यम से प्रयासरत रहना चाहिए । भारत चीन के संदर्भ में हम हालिया वुहान वार्ता को इसी प्रकार के एक प्रयास के रूप में देख सकते हैं । इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि सीमा विवाद की जटिल समस्या से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण कि आवश्यकता है जिसमें उपरोक्त सभी तत्वों को समाहित किया जाना चाहिए ।
##Question:भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के प्रमुख क्षेत्रों का परिचय देते हुए, बेहतर सीमा प्रबंधन की रणनीति के मुख्य तत्वों की चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द/ 10 अंक ) While discussing the major areas of border dispute between India and China, discuss the key elements of the strategy of better border management. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: दक्षिण एशिया में सीमा विवाद का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत व चीन के बीच विवादित सीमा क्षेत्र की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । बेहतर सीमा प्रबंधन के प्रमुख तत्वों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर : दक्षिण एशिया में सीमा विवाद एक प्रमुख समस्या है और इसकी जड़ें औपनिवेशिक शासन में ढूँढी जा सकती है । भारत चीन के बीच सीमा का निर्धारण मैकमोहन रेखा के द्वारा किया गया है तथापि चीन द्वारा इसे मानने से इंकार किया जाता रहा है । वर्ष 1962 में चीन द्वारा इस सीमा का उल्लंघन किया गया और भारत पर आक्रमण कर एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया गया । भारत चीन के बीच सीमा विवाद को तीन मुख्य भागों में बाँट कर देखा जा सकता है: पश्चिमी क्षेत्र: इसके अंतर्गत लद्दाख से उत्तराखंड तक का क्षेत्र आता है । इस क्षेत्र में सबसे प्रमुख विवादित क्षेत्र अक्साई चिन का है । भारत के लद्दाख व चीन के झिंझियांग प्रांत के बीच अवस्थित यह क्षेत्र मानव निवास विहीन है तथापि सामरिक दृष्टिकोण से इसका महत्व है और 1962 से यह चीन के कब्जे में है । इस क्षेत्र में अन्य प्रमुख विवादित क्षेत्र चुमार व दौलत वेग है । मध्य क्षेत्र : इसके अंतर्गत सिक्किम के आसपास का क्षेत्र है । इस क्षेत्र में अधिक विवाद नहीं है और अधिकांश विवादों को सुलझा लिया गया है । पूर्वी क्षेत्र : इसके अंतर्गत कई क्षेत्र हैं जहां चीन समय समय पर अपना दावा करता रहता है । प्रमुख विवादित क्षेत्रों में हम तिब्बत का विवाद , केर्न 5 का विवाद , तवांग का क्षेत्र , डोकलाम व अरुणाचल प्रदेश की चर्चा कर सकते हैं । चीन इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहता है और समय-समय पर विवाद को जन्म देता है । हालिया विवाद के रूप में हम डोकलाम व तवांग का उदाहरण देख सकते हैं । एक बेहतर सीमा प्रबंधन के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है : संरचनात्मक विकास : सीमावर्ती क्षेत्रों में संरचनात्मक विकास यथा: सड़क, पुल , हवाई अड्डा, संचार के साधन आदि का विकास अति आवश्यक है ताकि सीमा तक तीव्रता में पहुंचा जा सके । इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सामाजिक सेवाओं की भी विकास आवश्यक है जिससे कि इन क्षेत्रों के लोगों तक विकास की पहुँच बनाई जा सके । सैन्य तीव्रता में वृद्धि : सीमा क्षेत्र में किसी भी अवैध गतिविधि को रोकने के लिए सैन्य बलों की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए । साथ ही सेना की आसान व तीव्र आवाजाही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए । राष्ट्रीयता का विकास : सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देना आवश्यक है जिससे कि इन क्षेत्रों के लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके ताकि वे किसी अलगाववादी गतिविधियों में शामिल न हो । राजनीतिक वार्ताओं की घनिष्ठता: पड़ोसी राष्ट्रों के साथ सीमा विवाद व तनाव को कम करने के लिए निरंतर राजनीतिक वार्ताओं के माध्यम से प्रयासरत रहना चाहिए । भारत चीन के संदर्भ में हम हालिया वुहान वार्ता को इसी प्रकार के एक प्रयास के रूप में देख सकते हैं । इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि सीमा विवाद की जटिल समस्या से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण कि आवश्यकता है जिसमें उपरोक्त सभी तत्वों को समाहित किया जाना चाहिए ।
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हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्यअंतर को स्पष्ट कीजिए।(150-200 शब्द) Explain the difference between the Himalayan and the peninsular drainage system. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम भुमिका में अपवाह तंत्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में हिमालयी अपवह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्य अंतर का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जलप्रवाह को अपवाह कहा जाता है। ये निश्चित वाहिकाएं मिलकर एक सम्पूर्ण जाल का निर्माणकरती हैं जिसे अपवाह प्रणाली कहा जाता है। यह नदी एवं नदी की सहायक नदियों का एक एकीकृत तंत्र है जो सतहके जल को संग्रहित कर समुद्र में प्रवाहित करता है। कोई भी अपवाह प्रणाली भू-वैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति तथा सरंचना, स्थलाकृति, ढाल, बहते जल की मात्रा और बहाव की अवधि का परिणाम होती हैं। हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्य अंतर:- हिमालयी अपवाह तंत्र की उत्पत्ति हिमालय पर्वत श्रेणियों से होती है जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की नदियाँ प्रायद्वीपीय पठारों एवं मध्य उच्च भूमियोंसे निकलती हैं। हिमालयी अपवाह तंत्र मेंनदियाँ प्रायः पूर्ववर्ती अपवाह प्रणाली का अनुसरण करती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र मेंनदियाँ अनुवर्ती अपवाह तंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। हिमालय अपवाह तंत्रकी नदियाँ बारहमासी होती हैं तथा हिमनद व वर्षा से जल प्राप्त करती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र कीनदियाँ मौसमी होती हैं और प्रायः मानसून में प्रवाहित होती हैं। हिमालयी अपावह तंत्र कीनदियाँ अपने विकास क्रम में नवीन हैं और नवीन वलित पर्वतों के मध्य प्रवाहित होती हैं ये क्रियाशील हैं और घाटियों को गहरा करती हैंजैसे सिंधु, ब्रह्मपुत्र, गंगा इत्यादि,जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ प्रौढ़ावस्था में हैं और प्रायद्वीपीय पठारों से होकर प्रवाहित होती हैं तथा ये प्रवणित परिच्छेदिका वाली प्रौढ़ नदियां हैं, जो अपने आधार तल तक पहुँच जाती हैं जैसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा इत्यादि। हिमालयी अपवाह तंत्र कीनदियों के बेसिन और जलग्रहण क्षेत्र प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र कीनदियों की तुलना में काफी विस्तृत होते हैं। हिमालयी अपावह तंत्र की नदियों का लम्बा मार्ग, उबड़ खाबड़ पर्वतों से होकर गुजरना, मैदानों में जलमार्ग बदलना एवं विसर्प बनाना इत्यादि इनकी प्रकृति है, जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की नदियां सुसमायोजित घाटियों के साथ निश्चित मार्ग का अनुसरण करती हैं। अतः स्पष्ट है कि दोनों अपवाह तंत्रों में भिन्नता होने के बावजूद भारत के लिए दोनों हीअपवाह तंत्र इसकी जीवन रेखा हैं।दोनों अपवाह तंत्रों में भिन्नता, भारत को भौगोलिक विविधता प्रदान करती है।
##Question:हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्यअंतर को स्पष्ट कीजिए।(150-200 शब्द) Explain the difference between the Himalayan and the peninsular drainage system. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भुमिका में अपवाह तंत्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में हिमालयी अपवह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्य अंतर का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जलप्रवाह को अपवाह कहा जाता है। ये निश्चित वाहिकाएं मिलकर एक सम्पूर्ण जाल का निर्माणकरती हैं जिसे अपवाह प्रणाली कहा जाता है। यह नदी एवं नदी की सहायक नदियों का एक एकीकृत तंत्र है जो सतहके जल को संग्रहित कर समुद्र में प्रवाहित करता है। कोई भी अपवाह प्रणाली भू-वैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति तथा सरंचना, स्थलाकृति, ढाल, बहते जल की मात्रा और बहाव की अवधि का परिणाम होती हैं। हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के मध्य अंतर:- हिमालयी अपवाह तंत्र की उत्पत्ति हिमालय पर्वत श्रेणियों से होती है जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की नदियाँ प्रायद्वीपीय पठारों एवं मध्य उच्च भूमियोंसे निकलती हैं। हिमालयी अपवाह तंत्र मेंनदियाँ प्रायः पूर्ववर्ती अपवाह प्रणाली का अनुसरण करती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र मेंनदियाँ अनुवर्ती अपवाह तंत्र का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। हिमालय अपवाह तंत्रकी नदियाँ बारहमासी होती हैं तथा हिमनद व वर्षा से जल प्राप्त करती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र कीनदियाँ मौसमी होती हैं और प्रायः मानसून में प्रवाहित होती हैं। हिमालयी अपावह तंत्र कीनदियाँ अपने विकास क्रम में नवीन हैं और नवीन वलित पर्वतों के मध्य प्रवाहित होती हैं ये क्रियाशील हैं और घाटियों को गहरा करती हैंजैसे सिंधु, ब्रह्मपुत्र, गंगा इत्यादि,जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ प्रौढ़ावस्था में हैं और प्रायद्वीपीय पठारों से होकर प्रवाहित होती हैं तथा ये प्रवणित परिच्छेदिका वाली प्रौढ़ नदियां हैं, जो अपने आधार तल तक पहुँच जाती हैं जैसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा इत्यादि। हिमालयी अपवाह तंत्र कीनदियों के बेसिन और जलग्रहण क्षेत्र प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र कीनदियों की तुलना में काफी विस्तृत होते हैं। हिमालयी अपावह तंत्र की नदियों का लम्बा मार्ग, उबड़ खाबड़ पर्वतों से होकर गुजरना, मैदानों में जलमार्ग बदलना एवं विसर्प बनाना इत्यादि इनकी प्रकृति है, जबकि प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र की नदियां सुसमायोजित घाटियों के साथ निश्चित मार्ग का अनुसरण करती हैं। अतः स्पष्ट है कि दोनों अपवाह तंत्रों में भिन्नता होने के बावजूद भारत के लिए दोनों हीअपवाह तंत्र इसकी जीवन रेखा हैं।दोनों अपवाह तंत्रों में भिन्नता, भारत को भौगोलिक विविधता प्रदान करती है।
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ज्वार के महत्व का वर्णन करते हुए, ज्वार के परिमाण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द; अंक-10 ) Describe the importance of tides. Also, mention the factors affecting the magnitude of tides. (150-200 Words; Marks-10 )
एप्रोच- ज्वार को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| NOTE- यहाँ ज्वार से संबंधित चित्र (जहाँ भी आवश्यक हो) जरूर उत्तर में रहना चाहिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,ज्वार के महत्व का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,ज्वार के परिमाण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए| उत्तर- चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण समुद्री जल में(समुद्रतल) आए उतार-चढ़ाव कोज्वार कहा जाता है| साथ ही, ज्वारभाटा की उत्पति का दूसरा कारक अपकेंद्रीय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है| गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर किसी स्थान पर ज्वारभाटा की उत्पति हेतु उत्तरदायी हैं| दो ज्वार के बीच का समय 12 घंटे 26 मिनट होता है तथा ज्वार एवं भाटा के बीच का अंतराल 6 घंटे 13 मिनट होता है| ज्वार का महत्व/प्रभाव चूँकि पृथ्वी, चंद्रमा तथा सूर्य की स्थिति ज्वार की उत्पति का कारण हैं तथा इनकी स्थिति के सही ज्ञान से ज्वारों का पुर्वानुमान लगाया जा सकता है| यह नौसंचालकों एवं मछुआरों को उनके कार्य संबंधी योजनाओं में मदद करता है| नौसंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्व है| ज्वार की ऊंचाई बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, खासकर नदियों के किनारे वाले पोताश्रय पर एवं ज्वारनदमुख के भीतर, जहाँ प्रवेश द्वार पर छिछले रोधिका होते हैं, जो कि नौकाओं तथा जहाजों को बंदरगाह में प्रवेश करने से रोकते हैं| बड़े जहाज उच्च ज्वार के दौरान उथले समुद्र के बंदरगाह में प्रवेश करते हैं और वे उच्च ज्वार के समय ही वापस जाते हैं| ज्वारीय पत्तन का निर्माण - ज्वार-भाटे के कारण ही हुगली तथा टेम्स नदियों पर क्रमशः कोलकाता तथा लंदन महत्वपूर्ण बंदरगाह हैं| ज्वारीय धाराओं की क्रियाशीलता के कारण नदियों के मुहाने तथा ज्वारनदमुख अवसादों से मुक्त रहते हैं| वापस लौटता हुआ ज्वार तथा नदी की धारा अवसाद तथा प्रदूषित जल को खुले समुद्र में बहाकर ले जाती है| ज्वारीय ऊर्जा का प्रयोग विद्युत् शक्ति उत्पन करने के लिये भी किया जाता है| नमकीन ज्वारीय जल का प्रवाह, विशेष रूप से ठंडे देश के तटों के साथ, शीतलन की प्रक्रिया को रोक देता है और बंदरगाहों को आइस-बाउंड होने से बचाता है| उच्च ज्वार तथा लघु ज्वार की गति के द्वारा मत्स्य उद्योग को भी मदद मिलती है| मछली पकड़ने वाले नाविक लघु ज्वार के साथ खुले समुद्र में मछली पकड़ने जाते हैं और उच्च ज्वार के साथ सुरक्षित तट पर लौट आते हैं| तटीय जल द्वारा निर्मित स्थलाकृति का सीमांकन; ज्वारीय वन; पोषक तत्वों की आपूर्ति और स्थानांतरण; सागरीय जल का मिश्रण; ज्वार के परिमाण को प्रभावित करने वाले कारक पृथ्वी, चंद्रमा तथा सूर्य की सापेक्षिक स्थिति - तीनों पिंड एक ही दिशा में हो तब ज्वारीय उभार अधिकतम होगा (वृहद ज्वार) तथा भाटा की ऊंचाई काफी कम होगी| ऐसा महीने में दो बार होता है- पूर्णिमा के समय तथा अमावास्या के समय| चंद्रमा तथा सूर्य पृथ्वी के सापेक्ष लंबबत अवस्थित हो तो सूर्य एवं चंद्रमा के गुरुत्व बल एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करते हैं| चंद्रमा का आकर्षण सूर्य के दोगुने से अधिक होते हुए भी, यह बल सूर्य केगुरुत्वाकर्षण के समक्ष धूमिल हो जाता है| ऐसी स्थिति को निम्न ज्वार कहा जाता है तथा इसमें भाटा की ऊंचाई अधिक होती है| तट की आकृति - तटों के पास ज्वारनदएवं खाड़ियों की आकृतियाँ भी ज्वारभाटाओं के तीव्रता को प्रभावित करते हैं| शंक्वाकार खाड़ी ज्वार के परिमाण को आश्चर्यजनक तरीके से बदल देता है| जब तट सपाट होगा तो ज्वार की ऊंचाई कम होगी| आड़े-तिरझे तट पर ज्वार की ऊंचाई ज्यादा होगी| जहाँ महाद्वीपीय मग्नतट अपेक्षाकृत विस्तृत हैं वहां ज्वारीय उभार अधिक ऊंचाई वाले होते हैं| जब ये ज्वारीय उभार मध्य महासागरीय द्वीपों से टकराते हैं तो इनकी ऊंचाई में अंतर आ जाता है| अक्षांशीय स्थिति - चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल 28.5 N से 28.5 S के बीच अधिकतम होता है| यदि अन्य स्थितियों को स्थिर माना जाए तो ज्वार की अधिकतम ऊंचाई इसी क्षेत्र में होगी| चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी- महीने में एक बार जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है तो असामान्य रूप से उच्च एवं निम्न ज्वार उत्पन होता है| इस दौरान ज्वारीय क्रम सामान्य से अधिक होता है| दो सप्ताह के बाद जब चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता है तब चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल सीमित होता है एवं ज्वार-भाटा के क्रम उनकी औसत ऊंचाई से कम होते हैं| सूर्य तथा पृथ्वी के बीच की दूरी- जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है(प्रत्येक साल 3 जनवरी के आसपास) तो उच्च एवं निम्न ज्वारों के क्रम भी असामान्य रूप से अधिक न्यून होते हैं| जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है(प्रत्येक वर्ष 4 जुलाई के आसपास) तो ज्वार के क्रम औसत की अपेक्षा बहुत कम होते हैं|
##Question:ज्वार के महत्व का वर्णन करते हुए, ज्वार के परिमाण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द; अंक-10 ) Describe the importance of tides. Also, mention the factors affecting the magnitude of tides. (150-200 Words; Marks-10 )##Answer:एप्रोच- ज्वार को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| NOTE- यहाँ ज्वार से संबंधित चित्र (जहाँ भी आवश्यक हो) जरूर उत्तर में रहना चाहिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,ज्वार के महत्व का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,ज्वार के परिमाण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए| उत्तर- चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण समुद्री जल में(समुद्रतल) आए उतार-चढ़ाव कोज्वार कहा जाता है| साथ ही, ज्वारभाटा की उत्पति का दूसरा कारक अपकेंद्रीय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है| गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर किसी स्थान पर ज्वारभाटा की उत्पति हेतु उत्तरदायी हैं| दो ज्वार के बीच का समय 12 घंटे 26 मिनट होता है तथा ज्वार एवं भाटा के बीच का अंतराल 6 घंटे 13 मिनट होता है| ज्वार का महत्व/प्रभाव चूँकि पृथ्वी, चंद्रमा तथा सूर्य की स्थिति ज्वार की उत्पति का कारण हैं तथा इनकी स्थिति के सही ज्ञान से ज्वारों का पुर्वानुमान लगाया जा सकता है| यह नौसंचालकों एवं मछुआरों को उनके कार्य संबंधी योजनाओं में मदद करता है| नौसंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्व है| ज्वार की ऊंचाई बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, खासकर नदियों के किनारे वाले पोताश्रय पर एवं ज्वारनदमुख के भीतर, जहाँ प्रवेश द्वार पर छिछले रोधिका होते हैं, जो कि नौकाओं तथा जहाजों को बंदरगाह में प्रवेश करने से रोकते हैं| बड़े जहाज उच्च ज्वार के दौरान उथले समुद्र के बंदरगाह में प्रवेश करते हैं और वे उच्च ज्वार के समय ही वापस जाते हैं| ज्वारीय पत्तन का निर्माण - ज्वार-भाटे के कारण ही हुगली तथा टेम्स नदियों पर क्रमशः कोलकाता तथा लंदन महत्वपूर्ण बंदरगाह हैं| ज्वारीय धाराओं की क्रियाशीलता के कारण नदियों के मुहाने तथा ज्वारनदमुख अवसादों से मुक्त रहते हैं| वापस लौटता हुआ ज्वार तथा नदी की धारा अवसाद तथा प्रदूषित जल को खुले समुद्र में बहाकर ले जाती है| ज्वारीय ऊर्जा का प्रयोग विद्युत् शक्ति उत्पन करने के लिये भी किया जाता है| नमकीन ज्वारीय जल का प्रवाह, विशेष रूप से ठंडे देश के तटों के साथ, शीतलन की प्रक्रिया को रोक देता है और बंदरगाहों को आइस-बाउंड होने से बचाता है| उच्च ज्वार तथा लघु ज्वार की गति के द्वारा मत्स्य उद्योग को भी मदद मिलती है| मछली पकड़ने वाले नाविक लघु ज्वार के साथ खुले समुद्र में मछली पकड़ने जाते हैं और उच्च ज्वार के साथ सुरक्षित तट पर लौट आते हैं| तटीय जल द्वारा निर्मित स्थलाकृति का सीमांकन; ज्वारीय वन; पोषक तत्वों की आपूर्ति और स्थानांतरण; सागरीय जल का मिश्रण; ज्वार के परिमाण को प्रभावित करने वाले कारक पृथ्वी, चंद्रमा तथा सूर्य की सापेक्षिक स्थिति - तीनों पिंड एक ही दिशा में हो तब ज्वारीय उभार अधिकतम होगा (वृहद ज्वार) तथा भाटा की ऊंचाई काफी कम होगी| ऐसा महीने में दो बार होता है- पूर्णिमा के समय तथा अमावास्या के समय| चंद्रमा तथा सूर्य पृथ्वी के सापेक्ष लंबबत अवस्थित हो तो सूर्य एवं चंद्रमा के गुरुत्व बल एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करते हैं| चंद्रमा का आकर्षण सूर्य के दोगुने से अधिक होते हुए भी, यह बल सूर्य केगुरुत्वाकर्षण के समक्ष धूमिल हो जाता है| ऐसी स्थिति को निम्न ज्वार कहा जाता है तथा इसमें भाटा की ऊंचाई अधिक होती है| तट की आकृति - तटों के पास ज्वारनदएवं खाड़ियों की आकृतियाँ भी ज्वारभाटाओं के तीव्रता को प्रभावित करते हैं| शंक्वाकार खाड़ी ज्वार के परिमाण को आश्चर्यजनक तरीके से बदल देता है| जब तट सपाट होगा तो ज्वार की ऊंचाई कम होगी| आड़े-तिरझे तट पर ज्वार की ऊंचाई ज्यादा होगी| जहाँ महाद्वीपीय मग्नतट अपेक्षाकृत विस्तृत हैं वहां ज्वारीय उभार अधिक ऊंचाई वाले होते हैं| जब ये ज्वारीय उभार मध्य महासागरीय द्वीपों से टकराते हैं तो इनकी ऊंचाई में अंतर आ जाता है| अक्षांशीय स्थिति - चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल 28.5 N से 28.5 S के बीच अधिकतम होता है| यदि अन्य स्थितियों को स्थिर माना जाए तो ज्वार की अधिकतम ऊंचाई इसी क्षेत्र में होगी| चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी- महीने में एक बार जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है तो असामान्य रूप से उच्च एवं निम्न ज्वार उत्पन होता है| इस दौरान ज्वारीय क्रम सामान्य से अधिक होता है| दो सप्ताह के बाद जब चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता है तब चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल सीमित होता है एवं ज्वार-भाटा के क्रम उनकी औसत ऊंचाई से कम होते हैं| सूर्य तथा पृथ्वी के बीच की दूरी- जब पृथ्वी सूर्य के निकटतम होती है(प्रत्येक साल 3 जनवरी के आसपास) तो उच्च एवं निम्न ज्वारों के क्रम भी असामान्य रूप से अधिक न्यून होते हैं| जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है(प्रत्येक वर्ष 4 जुलाई के आसपास) तो ज्वार के क्रम औसत की अपेक्षा बहुत कम होते हैं|
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वायुदाब की अवधारणा का परिचय प्रदान करते हुए इसके क्षैतिज तथ उर्ध्वाधर वितरण की व्याख्या कीजिए। ( 150 शब्द, 10 अंक ) Give an introduction to the concept of air pressure and explain its horizontal and vertical distribution. (150 words; 10 marks)
दृष्टिकोण: सर्वप्रथम वायुदाब को परिभाषित कीजिए तत्पश्चात वायुदाब की विशेषताएँ लिखिए वायुदाब का क्षैतिज तथा उर्ध्वाधर वितरण संबंधी बिंदु लिखिए अंत में यथोचित निष्कर्ष लिखिए उत्तर पृथ्वी की सतह पर वायु स्तम्भ द्वारा दबाव डाला जाता है। माध्य समुद्रतल से वायुमंडल की अंतिम सीमा तक एक इकाई क्षेत्रफल के वायु स्तम्भ के भार को वायुमंडलीय दाब कहते हैं। वायुदाब को मापने की इकाई मिलीबार तथा पास्कल हैं । सामान्य दशा में समुद्र तल पर वायु दाब पारे के 76 सेन्टीमीटर अथवा 760 मिलीमीटर ऊँचे स्तम्भ द्वारा पड़ने वाले दाब के बराबर होता है। वायुदाब को मापने के लिए पारद वायुदाबमापी (Mercury barometer) एवं निर्द्रव बैरोमीट र (Aneroid barometer)। ऋतु मानचित्रों में वायुदाब का क्षैतिज वितरण समदाब रेखाओं के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाएँ सागर तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली कल्पित रेखाएँ होती हैं। वायुदाब में परिवर्तन के द्वारा ही पवनों की उत्पत्ति, वेग एवं दिशा निर्धारित होती है। पवन सदैव उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है। पवनों का वेग दाब प्रवणता की तीव्रता पर निर्भर करता है दाब प्रवणता जितनी अधिक होती है, पवन की गति भी उतनी ही अधिक होती है। वायुदाब का उर्ध्वाधर वितरण: ऊँचाई के साथ वायुदाब में सदैव कमी आती है लेकिन इसके घटने की दर एकसमान नहीं होती है। यह दर वायु के घनत्व, पवन संचार, पृथ्वी के घूर्णन, तापमान, जलवाष्प की मात्रा तथा गुरुत्वाकर्षण शक्ति जैसे परिवर्तनशील कारकों पर निर्भर करती है। धरातल के निकट वायु के घनत्व में कमी आने के कारण वायुमंडलीय दाब ऊँचाई के साथ तीव्रता से घटता है लेकिन अधिक ऊँचाई पर इसकी ह्रास दर में कमी आ जाती है। निम्न वायुमंडल में वायुदाब की ह्रास दर प्रत्येक 10 मीटर की ऊँचाई पर 1 मिलीबार होती है। समुद्र तल से लगभग 5 किमी की ऊँचाई पर वायुदाब की मात्रा, समुद्रतल पर वायुदाब की तुलना में लगभग आधी हो जाती है। ऊर्ध्वाधर दाब प्रवणता क्षैतिज दाब प्रवणता की अपेक्षा अधिक होती है। ऊर्ध्वाधर दाब प्रवणता अधिक होने के बावजूद शक्तिशाली ऊर्ध्वाधर पवनों का अनुभव किया जाता हैं क्योंकि यह विपरीत दिशा में कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल से प्रतिसंतुलित हो जाती है। वायुदाब का क्षैतिज वितरण: वायुमंडलीय दाब के अक्षांशीय वितरण को वायुदाब का क्षैतिज वितरण कहते हैं। इसकी मुख्य विशेषता इसका क्षेत्रीय चरित्र है जिसके कारण वायुदाब कटिबंधों का निर्माण होता है। क्षैतिज वितरण को समदाब रेखाओं की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है । उत्तरी गोलार्ध में वायुदाब के वितरण में मौसमी विरोधाभास अधिक स्पष्टतया दृष्टिगोचर होते हैं तथा दक्षिणी गोलार्ध में सभी स्थानों पर वायुदाब के औसत वितरण में कम भिन्नता दिखाई देती है। यह अन्तर दोनों गोलार्धो में स्थल तथा जल के असमान वितरण के कारण उत्पन्न होता है। पृथ्वी के धरातल पर चार मुख्य वायुदाब कटिबंध है। यथा विषुवतीय या भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध, उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंध, उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध तथा ध्रुवीय उच्च-वायुदाब कटिबंध । उत्तरी गोलार्ध में वायुदाब के वितरण में मौसमी विरोधाभास अधिक स्पष्टता से दृष्टिगोचर होते हैं तथा दक्षिणी गोलार्ध में सभी स्थानों पर वायुदाब के औसत वितरण में कम भिन्नता दिखाई देती है। यह अन्तर दोनों गोलार्धी में स्थल तथा जल के असमान वितरण के कारण उत्पन्न होता है। दक्षिणी गोलार्ध में महासागरीय भागों की अधिकता के कारण तापमान और वायुदाब दोनों में अधिक समता होती है। वायु दाब का मानव जीवन में अत्यधिक महत्व है जैसे वाहनों के टायरों में हवा से लेकर मानसून के उत्पत्ति आदि के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
##Question:वायुदाब की अवधारणा का परिचय प्रदान करते हुए इसके क्षैतिज तथ उर्ध्वाधर वितरण की व्याख्या कीजिए। ( 150 शब्द, 10 अंक ) Give an introduction to the concept of air pressure and explain its horizontal and vertical distribution. (150 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: सर्वप्रथम वायुदाब को परिभाषित कीजिए तत्पश्चात वायुदाब की विशेषताएँ लिखिए वायुदाब का क्षैतिज तथा उर्ध्वाधर वितरण संबंधी बिंदु लिखिए अंत में यथोचित निष्कर्ष लिखिए उत्तर पृथ्वी की सतह पर वायु स्तम्भ द्वारा दबाव डाला जाता है। माध्य समुद्रतल से वायुमंडल की अंतिम सीमा तक एक इकाई क्षेत्रफल के वायु स्तम्भ के भार को वायुमंडलीय दाब कहते हैं। वायुदाब को मापने की इकाई मिलीबार तथा पास्कल हैं । सामान्य दशा में समुद्र तल पर वायु दाब पारे के 76 सेन्टीमीटर अथवा 760 मिलीमीटर ऊँचे स्तम्भ द्वारा पड़ने वाले दाब के बराबर होता है। वायुदाब को मापने के लिए पारद वायुदाबमापी (Mercury barometer) एवं निर्द्रव बैरोमीट र (Aneroid barometer)। ऋतु मानचित्रों में वायुदाब का क्षैतिज वितरण समदाब रेखाओं के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाएँ सागर तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली कल्पित रेखाएँ होती हैं। वायुदाब में परिवर्तन के द्वारा ही पवनों की उत्पत्ति, वेग एवं दिशा निर्धारित होती है। पवन सदैव उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है। पवनों का वेग दाब प्रवणता की तीव्रता पर निर्भर करता है दाब प्रवणता जितनी अधिक होती है, पवन की गति भी उतनी ही अधिक होती है। वायुदाब का उर्ध्वाधर वितरण: ऊँचाई के साथ वायुदाब में सदैव कमी आती है लेकिन इसके घटने की दर एकसमान नहीं होती है। यह दर वायु के घनत्व, पवन संचार, पृथ्वी के घूर्णन, तापमान, जलवाष्प की मात्रा तथा गुरुत्वाकर्षण शक्ति जैसे परिवर्तनशील कारकों पर निर्भर करती है। धरातल के निकट वायु के घनत्व में कमी आने के कारण वायुमंडलीय दाब ऊँचाई के साथ तीव्रता से घटता है लेकिन अधिक ऊँचाई पर इसकी ह्रास दर में कमी आ जाती है। निम्न वायुमंडल में वायुदाब की ह्रास दर प्रत्येक 10 मीटर की ऊँचाई पर 1 मिलीबार होती है। समुद्र तल से लगभग 5 किमी की ऊँचाई पर वायुदाब की मात्रा, समुद्रतल पर वायुदाब की तुलना में लगभग आधी हो जाती है। ऊर्ध्वाधर दाब प्रवणता क्षैतिज दाब प्रवणता की अपेक्षा अधिक होती है। ऊर्ध्वाधर दाब प्रवणता अधिक होने के बावजूद शक्तिशाली ऊर्ध्वाधर पवनों का अनुभव किया जाता हैं क्योंकि यह विपरीत दिशा में कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल से प्रतिसंतुलित हो जाती है। वायुदाब का क्षैतिज वितरण: वायुमंडलीय दाब के अक्षांशीय वितरण को वायुदाब का क्षैतिज वितरण कहते हैं। इसकी मुख्य विशेषता इसका क्षेत्रीय चरित्र है जिसके कारण वायुदाब कटिबंधों का निर्माण होता है। क्षैतिज वितरण को समदाब रेखाओं की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है । उत्तरी गोलार्ध में वायुदाब के वितरण में मौसमी विरोधाभास अधिक स्पष्टतया दृष्टिगोचर होते हैं तथा दक्षिणी गोलार्ध में सभी स्थानों पर वायुदाब के औसत वितरण में कम भिन्नता दिखाई देती है। यह अन्तर दोनों गोलार्धो में स्थल तथा जल के असमान वितरण के कारण उत्पन्न होता है। पृथ्वी के धरातल पर चार मुख्य वायुदाब कटिबंध है। यथा विषुवतीय या भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध, उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंध, उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध तथा ध्रुवीय उच्च-वायुदाब कटिबंध । उत्तरी गोलार्ध में वायुदाब के वितरण में मौसमी विरोधाभास अधिक स्पष्टता से दृष्टिगोचर होते हैं तथा दक्षिणी गोलार्ध में सभी स्थानों पर वायुदाब के औसत वितरण में कम भिन्नता दिखाई देती है। यह अन्तर दोनों गोलार्धी में स्थल तथा जल के असमान वितरण के कारण उत्पन्न होता है। दक्षिणी गोलार्ध में महासागरीय भागों की अधिकता के कारण तापमान और वायुदाब दोनों में अधिक समता होती है। वायु दाब का मानव जीवन में अत्यधिक महत्व है जैसे वाहनों के टायरों में हवा से लेकर मानसून के उत्पत्ति आदि के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
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मृदा - परिच्छेदिका से आप क्या समझते हैं? साथ ही, मृदा के संस्तरों का वर्गीकरण करते हुए उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by soil profile? Also, classify soil profile and describe their characteristics. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में, मृदा परिच्छेदिका को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं को संक्षिप्तता से बताइए| अगले भाग में, मृदा संस्तर को बताते हुए, विभिन्न प्रकार के मृदा संस्तरों का उल्लेख कीजिए तथा उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए| इसमें विभिन्न संस्तरों को दर्शाते हुए चित्र/डायग्राम को दिखाना अनिवार्य होना चाहिए | उत्तर- भूतल तथा उसके नीचे स्थित आधारी शैल के ऊपरी भाग के मध्य स्थित समस्त मृदा मंडल के लंबवत स्तरों को सामूहिक रूप से मृदा परिच्छेदिका(Soil Profile) कहते हैं| मृदा परिच्छेदिका मृदा के संघटकों के लंबवत वितरण का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी निम्न विशेषताएं होती है- मृदा परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर सामान्यतः जैविक पदार्थों, जीवित जीवो की संख्या, जीवित जीवो के कार्यकलापों आदि में क्रमशः कमी होती जाती है| मिट्टियों में स्थित वायु की मात्रा गहराई के साथ कम होती जाती है| ऊपर से नीचे जाने पर खनिजों की संख्या तथा उनके प्रकारों में वृद्धि होती जाती है| मृदा परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर मृदा में स्थित जल/नमी की मात्रा में वृद्धि या कमी की कोई निश्चित प्रवृत्ति नहीं होती है क्योंकि विभिन्न गहराइयों पर मृदा में स्थित जल की मात्रा में पर्याप्त उतार-चढ़ाव होता रहता है| मृदा परिच्छेदिका में मृदा संघटकों की विभिन्न विशेषताओं एवं गुणों में गहराई के साथ होने वाले परिवर्तन सामान्य, सरल, क्रमिक तथा समान नहीं होते हैं क्योंकि कई जैविक प्रक्रियाएं तथा जीवित जीव मृदा परिच्छेदिका में पदार्थों का नीचे से ऊपर तथा ऊपर से नीचे तक परिवहन, वितरण तथा पुनर्वितरण करते रहते हैं| इसके कारण मृदा की परिच्छेदिका की विभिन्न गहराइयों पर मिट्टियों के विभिन्न गुणों तथा विशेषताओं के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव आ जाता है| मृदा संस्तर(Soil Horizons) मृदा परिच्छेदिका में भौतिक एवं रासायनिक संगठन, जैविकतत्वों, मृदा संरचना आदि की विशिष्ट विशेषताओं वाले स्तरों या संस्तरों या उपमंडलों को मृदा संस्तर कहते हैं| एक मृदा परिच्छेदिका के विभिन्न संस्तरों की भौतिक, रासायनिक, जैविक, अजैविक एवं संरचनात्मक विशेषताओं में पर्याप्त अंतर होता है| इन संस्तरों के विकास में क्षेत्र विशेष की जलवायु, वनस्पति, जंतु तथा उच्चावच एवं इनमें होने वाली आंतरिक प्रक्रियाओं का प्रमुख हाथ होता है| विभिन्न प्रकार के मृदा संस्तर जैविक संस्तर/कार्बनिक संस्तर/"O" लेयर -किसी भी मृदा परिच्छेदिका का सबसे ऊपरी स्तर जैविक संस्तर/कार्बनिक संस्तर कहलाता है| इसके अंतर्गत जीवित या मृत जैविक पदार्थों की बहुलता होती है| इन जैविक संस्तरोंका पौधों एवं जंतुओं से प्राप्त जैविक पदार्थों के संचयन से निर्माण होता है| इसके ऊपरी भाग का निर्माण मौलिक वनस्पति के पदार्थों द्वारा होता है जिसमें ताजे पत्तियों का ढेर या आंशिक रूप से विघटित पत्तियों के ढेर शामिल होते हैं| इसके निचले भाग में पौधों एवं जंतुओं के परिवर्तित अवशेष शामिल होते हैं जिसमें पौधों एवं जंतुओं के मृत भागों कावियोजन तथा महीनीकरणद्वारा रूपांतरण होता है| इन वियोजित जैविक पदार्थों को ह्यूमस भी कहा जाता है| हालांकि "O" लेयर में ह्यूमस के अपघटन की प्रक्रिया नहीं होती है| ह्यूमस निर्माण की प्रक्रिया को ही ह्यूमसीकरण कहते हैं| "A" संस्तर -यह सबसे ऊपरी परत है जहां पौधों की वृद्धि के लिए अनिवार्य जैविक पदार्थों का खनिज पदार्थों, पोषक तत्वों एवं जल से संयोग होता है| इस परत में जलवायु तथा वनस्पति दशाओं में भिन्नता के कारण जैविक संसाधनों की मात्रा में भिन्नता होती है| इस परत के ऊपरी भाग में ह्यूमस की प्रधानता होती है जबकि निचले भाग में जैव-तत्वों की अधिकता होती है| इसके निचले भाग में जल के द्वारा ह्यूमस का स्थानांतरण होता है इसलिए इसे अपवहन क्षेत्र(Eluviation Zone) कहा जाता है| "B"संस्तर- यह "A" संस्तरतथा "B" संस्तर के मध्य संक्रमण क्षेत्र होता है जिसे नीचेतथा ऊपरदोनोंसंस्तरों से पदार्थों की प्राप्ति होती है| इसे उप-मृदा भी कहा जाता है| इनमें कुछ जैविक पदार्थ होते हैं परंतु खनिज पदार्थ का अपक्षय स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है| इसके निचले भाग में कोलाइड बहुत अधिक मात्रा में होते हैं| इससंस्तर में खनिजों खासकर सिलिकेट, मृतिका खनिज तथा जैविक पदार्थों का सर्वाधिकविनिक्षेपण होता है| इसी कारण से इससंस्तर को विनिक्षेपण मंडल(illuviation Zone) कहा जाता है| "C" संस्तर - "C" संस्तर की रचना ढीली एवं मूल चट्टानों से होती है| यह आधारशैल के अपशिष्ट पदार्थों से बने हुए ढीले तथा असंगठित पदार्थ होते हैं| यह परत मृदा निर्माण की प्रक्रिया में प्रथम अवस्था होती है और अंततः ऊपर की दो परतें इसी से बनती हैं| इस संस्तर की विशेषताएं आधारशैल की विशेषताओं पर निर्भर करती है| "D" या "R" संस्तर - इन 3 संस्तरों के नीचे एक चट्टान होती है जिसे जनक अथवा आधारी चट्टान कहा जाता है| मिट्टियों के नीचे स्थित संगठित, दृढ़ एवं कठोर आधारशैल के मंडल को "D" या "R" संस्तर कहा जाता है| NOTE- मृदा संस्तरों को वर्गीकृत करते हुए अनिवार्यतः चित्र/डायग्राम दीजिए|
##Question:मृदा - परिच्छेदिका से आप क्या समझते हैं? साथ ही, मृदा के संस्तरों का वर्गीकरण करते हुए उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by soil profile? Also, classify soil profile and describe their characteristics. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में, मृदा परिच्छेदिका को परिभाषित करते हुए उसकी विशेषताओं को संक्षिप्तता से बताइए| अगले भाग में, मृदा संस्तर को बताते हुए, विभिन्न प्रकार के मृदा संस्तरों का उल्लेख कीजिए तथा उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए| इसमें विभिन्न संस्तरों को दर्शाते हुए चित्र/डायग्राम को दिखाना अनिवार्य होना चाहिए | उत्तर- भूतल तथा उसके नीचे स्थित आधारी शैल के ऊपरी भाग के मध्य स्थित समस्त मृदा मंडल के लंबवत स्तरों को सामूहिक रूप से मृदा परिच्छेदिका(Soil Profile) कहते हैं| मृदा परिच्छेदिका मृदा के संघटकों के लंबवत वितरण का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी निम्न विशेषताएं होती है- मृदा परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर सामान्यतः जैविक पदार्थों, जीवित जीवो की संख्या, जीवित जीवो के कार्यकलापों आदि में क्रमशः कमी होती जाती है| मिट्टियों में स्थित वायु की मात्रा गहराई के साथ कम होती जाती है| ऊपर से नीचे जाने पर खनिजों की संख्या तथा उनके प्रकारों में वृद्धि होती जाती है| मृदा परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर मृदा में स्थित जल/नमी की मात्रा में वृद्धि या कमी की कोई निश्चित प्रवृत्ति नहीं होती है क्योंकि विभिन्न गहराइयों पर मृदा में स्थित जल की मात्रा में पर्याप्त उतार-चढ़ाव होता रहता है| मृदा परिच्छेदिका में मृदा संघटकों की विभिन्न विशेषताओं एवं गुणों में गहराई के साथ होने वाले परिवर्तन सामान्य, सरल, क्रमिक तथा समान नहीं होते हैं क्योंकि कई जैविक प्रक्रियाएं तथा जीवित जीव मृदा परिच्छेदिका में पदार्थों का नीचे से ऊपर तथा ऊपर से नीचे तक परिवहन, वितरण तथा पुनर्वितरण करते रहते हैं| इसके कारण मृदा की परिच्छेदिका की विभिन्न गहराइयों पर मिट्टियों के विभिन्न गुणों तथा विशेषताओं के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव आ जाता है| मृदा संस्तर(Soil Horizons) मृदा परिच्छेदिका में भौतिक एवं रासायनिक संगठन, जैविकतत्वों, मृदा संरचना आदि की विशिष्ट विशेषताओं वाले स्तरों या संस्तरों या उपमंडलों को मृदा संस्तर कहते हैं| एक मृदा परिच्छेदिका के विभिन्न संस्तरों की भौतिक, रासायनिक, जैविक, अजैविक एवं संरचनात्मक विशेषताओं में पर्याप्त अंतर होता है| इन संस्तरों के विकास में क्षेत्र विशेष की जलवायु, वनस्पति, जंतु तथा उच्चावच एवं इनमें होने वाली आंतरिक प्रक्रियाओं का प्रमुख हाथ होता है| विभिन्न प्रकार के मृदा संस्तर जैविक संस्तर/कार्बनिक संस्तर/"O" लेयर -किसी भी मृदा परिच्छेदिका का सबसे ऊपरी स्तर जैविक संस्तर/कार्बनिक संस्तर कहलाता है| इसके अंतर्गत जीवित या मृत जैविक पदार्थों की बहुलता होती है| इन जैविक संस्तरोंका पौधों एवं जंतुओं से प्राप्त जैविक पदार्थों के संचयन से निर्माण होता है| इसके ऊपरी भाग का निर्माण मौलिक वनस्पति के पदार्थों द्वारा होता है जिसमें ताजे पत्तियों का ढेर या आंशिक रूप से विघटित पत्तियों के ढेर शामिल होते हैं| इसके निचले भाग में पौधों एवं जंतुओं के परिवर्तित अवशेष शामिल होते हैं जिसमें पौधों एवं जंतुओं के मृत भागों कावियोजन तथा महीनीकरणद्वारा रूपांतरण होता है| इन वियोजित जैविक पदार्थों को ह्यूमस भी कहा जाता है| हालांकि "O" लेयर में ह्यूमस के अपघटन की प्रक्रिया नहीं होती है| ह्यूमस निर्माण की प्रक्रिया को ही ह्यूमसीकरण कहते हैं| "A" संस्तर -यह सबसे ऊपरी परत है जहां पौधों की वृद्धि के लिए अनिवार्य जैविक पदार्थों का खनिज पदार्थों, पोषक तत्वों एवं जल से संयोग होता है| इस परत में जलवायु तथा वनस्पति दशाओं में भिन्नता के कारण जैविक संसाधनों की मात्रा में भिन्नता होती है| इस परत के ऊपरी भाग में ह्यूमस की प्रधानता होती है जबकि निचले भाग में जैव-तत्वों की अधिकता होती है| इसके निचले भाग में जल के द्वारा ह्यूमस का स्थानांतरण होता है इसलिए इसे अपवहन क्षेत्र(Eluviation Zone) कहा जाता है| "B"संस्तर- यह "A" संस्तरतथा "B" संस्तर के मध्य संक्रमण क्षेत्र होता है जिसे नीचेतथा ऊपरदोनोंसंस्तरों से पदार्थों की प्राप्ति होती है| इसे उप-मृदा भी कहा जाता है| इनमें कुछ जैविक पदार्थ होते हैं परंतु खनिज पदार्थ का अपक्षय स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है| इसके निचले भाग में कोलाइड बहुत अधिक मात्रा में होते हैं| इससंस्तर में खनिजों खासकर सिलिकेट, मृतिका खनिज तथा जैविक पदार्थों का सर्वाधिकविनिक्षेपण होता है| इसी कारण से इससंस्तर को विनिक्षेपण मंडल(illuviation Zone) कहा जाता है| "C" संस्तर - "C" संस्तर की रचना ढीली एवं मूल चट्टानों से होती है| यह आधारशैल के अपशिष्ट पदार्थों से बने हुए ढीले तथा असंगठित पदार्थ होते हैं| यह परत मृदा निर्माण की प्रक्रिया में प्रथम अवस्था होती है और अंततः ऊपर की दो परतें इसी से बनती हैं| इस संस्तर की विशेषताएं आधारशैल की विशेषताओं पर निर्भर करती है| "D" या "R" संस्तर - इन 3 संस्तरों के नीचे एक चट्टान होती है जिसे जनक अथवा आधारी चट्टान कहा जाता है| मिट्टियों के नीचे स्थित संगठित, दृढ़ एवं कठोर आधारशैल के मंडल को "D" या "R" संस्तर कहा जाता है| NOTE- मृदा संस्तरों को वर्गीकृत करते हुए अनिवार्यतः चित्र/डायग्राम दीजिए|
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जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की बदलती हुई प्रकृति की चर्चा करते हुए सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डालिए । (150 - 200 शब्द, 10 अंक) Discussing the changing nature of terrorism in Jammu and Kashmir, highlight the efforts being made by the government to deal with it. (150 - 200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में इसकी बदलती प्रकृति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग मे सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जम्मू कश्मीर में 1990 के प्रारंभ से आतंकवादी गतिविधियां तेज होना शुरू हुई थीं। आतंकवादी गतिविधियों से तात्पर्य ऐसी गतिविधियों से है जो एक विशेष विचारधारा से प्रभावित होकर, भारतीय संविधान के विरुद्ध , सशस्त्र और हिंसात्मक तरीके से सरकार और जनता के अंदर डर पैदा करके सरकार के सामने अपने हितों को मनवाने का प्रयास करते हैं । वर्तमान में आतंकवाद सिर्फ भारत की ही नही, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है । हालांकि भारत के संदर्भ में आतंकवाद एक विदेशी राज्य प्रायोजित आतंकवाद है । जिसके अंतर्गत पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन भारत में आतंकी गतिविधियो को अंजाम देते हैं । भारत में 1993 के सीरियल बॉम्ब ब्लास्ट , 2000-01 के बॉम्ब ब्लास्ट , 2008 का मुंबई हमला आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद के परिवर्तित होने प्रकृति को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की प्रकृति में परिवर्तन · 1947 के बाद पाकिस्तान ने भारत से प्रत्यक्ष युद्ध की शुरुवात की जोकि 1948 , 1965 , 1971 और 1999 के युद्ध के रूप में दिखाई देते हैं । · हालांकि 1990 के बाद से ही छद्म युद्ध की शुरुवात हुई जिसमे उसने प्रत्यक्ष युद्ध की रणनीति को छोड़ दिया और प्रशिक्षित आतंकवादी समूहो के माध्यम से छद्म युद्ध प्रारम्भ किया । · 1990-95 तक जेकेएलएफ़ के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद का प्रसार किया जाता है । · 1995-2007 तक शेष भारत में आंतरिक आतंकवाद को बढ़ावा जिसमे 2001 का भारतीय संसद पर हमला भी शामिल हैं । · कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास जिसके तहत पाकिस्तान सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर की जनता के साथ अत्याचार होने का जूठा प्रोपगैंडा फैलता है । · 2008 के बाद से सेना पर पत्थर फेकने जैसी कार्यवाही की शुरुवात को भी पाकिस्तान द्वारा ही प्रोत्साहित किया गया । जिसमे बेरोजगार युवाओं को कुछ पैसे के बदले सेना पर पत्थर फेकने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । · 2013 के पश्चात आतंकवाद पोपुलर डोमेन में आ गया। जिसमे कश्मीर में मारे गए आतंकवादियों को कश्मीर का हीरो बताकर, युवाओं को भटकाना और आतंकवादी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना शामिल था । · 2016 के पश्चात से भारत के आंतरिक क्षेत्रो से आतंकवाद का उन्मूलन के प्रयास किए जा रहे है, जिसमे काफी हद तक सफलता मिल चुकी है और वर्तमान में यह सिर्फ कश्मीर में ही सिमट कर रह गया है । हालांकि इस संदर्भ में सरकार द्वारा अनेक प्रयास किया गए है और लगातार इस दिशा में किए जा रहे हैं । जो निम्नलिखित हैं :- · विकासौंमुख कार्यक्रम जिसमे हिमायत योजना, भारत दर्शन योजना, उम्मीद कार्यक्रम आदि · पाकिस्तान पर दबाव बनाना ( अमेरिकी वित्त में कमी, बलूचिस्तान मुद्दा, अफगानिस्तान सहयोग · आधुनिकीकरण को बढ़ावा जिसके तहत रोजगार, शिक्षा, शहरीकरण, गत्यात्मकता, समृद्धि दर आदि को बढ़ावा · राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना आदि को जागृत करने का प्रयास · सैन्य सशक्तता के अंतर्गत सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम · अलगाववादी नेताओं पर नियंत्रण, बहावी विचारधारा, अलगाववाद और धार्मिक चरमपंथ पर रोक · गुजराल सिद्धान्त पर पुर्नविचार होना चाहिए · सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए · अनुच्छेद 370 और 35 / ए की समाप्ति उपरोक्त उपायों द्वारा सरकार कश्मीर में फैले अलगाववाद और आतंकवाद से निपटने के प्रयास कर रही है । जिसमे विकास और शक्ति दोनों का आनुपातिक समावेश शामिल है । साथ ही सरकार ने आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टोलेरेन्स की नीति को अपनाया है ।
##Question:जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की बदलती हुई प्रकृति की चर्चा करते हुए सरकार द्वारा इससे निपटने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डालिए । (150 - 200 शब्द, 10 अंक) Discussing the changing nature of terrorism in Jammu and Kashmir, highlight the efforts being made by the government to deal with it. (150 - 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में इसकी बदलती प्रकृति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग मे सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जम्मू कश्मीर में 1990 के प्रारंभ से आतंकवादी गतिविधियां तेज होना शुरू हुई थीं। आतंकवादी गतिविधियों से तात्पर्य ऐसी गतिविधियों से है जो एक विशेष विचारधारा से प्रभावित होकर, भारतीय संविधान के विरुद्ध , सशस्त्र और हिंसात्मक तरीके से सरकार और जनता के अंदर डर पैदा करके सरकार के सामने अपने हितों को मनवाने का प्रयास करते हैं । वर्तमान में आतंकवाद सिर्फ भारत की ही नही, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है । हालांकि भारत के संदर्भ में आतंकवाद एक विदेशी राज्य प्रायोजित आतंकवाद है । जिसके अंतर्गत पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन भारत में आतंकी गतिविधियो को अंजाम देते हैं । भारत में 1993 के सीरियल बॉम्ब ब्लास्ट , 2000-01 के बॉम्ब ब्लास्ट , 2008 का मुंबई हमला आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद के परिवर्तित होने प्रकृति को हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की प्रकृति में परिवर्तन · 1947 के बाद पाकिस्तान ने भारत से प्रत्यक्ष युद्ध की शुरुवात की जोकि 1948 , 1965 , 1971 और 1999 के युद्ध के रूप में दिखाई देते हैं । · हालांकि 1990 के बाद से ही छद्म युद्ध की शुरुवात हुई जिसमे उसने प्रत्यक्ष युद्ध की रणनीति को छोड़ दिया और प्रशिक्षित आतंकवादी समूहो के माध्यम से छद्म युद्ध प्रारम्भ किया । · 1990-95 तक जेकेएलएफ़ के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा जम्मू- कश्मीर में आतंकवाद का प्रसार किया जाता है । · 1995-2007 तक शेष भारत में आंतरिक आतंकवाद को बढ़ावा जिसमे 2001 का भारतीय संसद पर हमला भी शामिल हैं । · कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास जिसके तहत पाकिस्तान सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर की जनता के साथ अत्याचार होने का जूठा प्रोपगैंडा फैलता है । · 2008 के बाद से सेना पर पत्थर फेकने जैसी कार्यवाही की शुरुवात को भी पाकिस्तान द्वारा ही प्रोत्साहित किया गया । जिसमे बेरोजगार युवाओं को कुछ पैसे के बदले सेना पर पत्थर फेकने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । · 2013 के पश्चात आतंकवाद पोपुलर डोमेन में आ गया। जिसमे कश्मीर में मारे गए आतंकवादियों को कश्मीर का हीरो बताकर, युवाओं को भटकाना और आतंकवादी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना शामिल था । · 2016 के पश्चात से भारत के आंतरिक क्षेत्रो से आतंकवाद का उन्मूलन के प्रयास किए जा रहे है, जिसमे काफी हद तक सफलता मिल चुकी है और वर्तमान में यह सिर्फ कश्मीर में ही सिमट कर रह गया है । हालांकि इस संदर्भ में सरकार द्वारा अनेक प्रयास किया गए है और लगातार इस दिशा में किए जा रहे हैं । जो निम्नलिखित हैं :- · विकासौंमुख कार्यक्रम जिसमे हिमायत योजना, भारत दर्शन योजना, उम्मीद कार्यक्रम आदि · पाकिस्तान पर दबाव बनाना ( अमेरिकी वित्त में कमी, बलूचिस्तान मुद्दा, अफगानिस्तान सहयोग · आधुनिकीकरण को बढ़ावा जिसके तहत रोजगार, शिक्षा, शहरीकरण, गत्यात्मकता, समृद्धि दर आदि को बढ़ावा · राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना आदि को जागृत करने का प्रयास · सैन्य सशक्तता के अंतर्गत सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम · अलगाववादी नेताओं पर नियंत्रण, बहावी विचारधारा, अलगाववाद और धार्मिक चरमपंथ पर रोक · गुजराल सिद्धान्त पर पुर्नविचार होना चाहिए · सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए · अनुच्छेद 370 और 35 / ए की समाप्ति उपरोक्त उपायों द्वारा सरकार कश्मीर में फैले अलगाववाद और आतंकवाद से निपटने के प्रयास कर रही है । जिसमे विकास और शक्ति दोनों का आनुपातिक समावेश शामिल है । साथ ही सरकार ने आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टोलेरेन्स की नीति को अपनाया है ।
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