Question
stringlengths
0
3.53k
Answer
stringlengths
1
12.2k
prompt
stringlengths
21
12.4k
__index_level_0__
int64
5
88.1k
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रथम चरण में क्रांतिकारी गतिविधियाँ न केवल भारत बल्कि उसके बाहर भी दिखाई देती हैं| चर्चा कीजिये| ( 150-200 शब्द/10 अंक) In the first phase of revolutionary nationalism, revolutionary activities are visible not only in India but also outside it. Discuss (150-200 words / 10 marks)
एप्रोच - भूमिका में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात क्रांतिकारियों की कार्यप्रणाली को बताइए | पुनः विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी आन्दोलन के अभियान और आन्दोलन की चर्चा कीजिये | अंत में संक्षेप में इसके प्रभाव को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 20वीं शताब्दी के पूर्वाह्ण में भारत में उग्रवाद के साथ-साथ उग्र क्रांतिवाद का भी विकास हुआ | क्रांतिकारी आन्दोलन के भी मुख्यतः वही कारण थे जो उग्रवाद के थे ,उग्र राष्ट्रवादियों का ही एक दल क्रांतिकारी के रूप में उभरा अंतर केवल इतना था कि उग्र क्रन्तिकारी शीघ्र परिणाम चाहते थे | साधनों के विषय में उनका मानना था कि पाश्चात्य साम्राज्यवाद को केवल पश्चिमी हिंसक साधनों से ही समाप्त किया जा सकता है , इसलिए इन लोगों ने बन्दूक व पिस्तौल का प्रयोग किया | उन्होंने आयरलैंड से प्रेरणा ली | यह आन्दोलन दो चरणों में हुआ | क्रांतिकारियों की कार्य प्रणाली - पत्रों के माध्यम से शिक्षितों में दासता के प्रति घृणा उत्पन्न करना | बम बनाना , बन्दूक आदि चोरी से उपलब्ध करना तथा विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना | चंदा, दान तथा क्रांतिकारी डकैतियों द्वारा व्यय के लिए धन का प्रबंध करना | महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी अभियान - आतंकवाद की लहर सबसे पहले महाराष्ट्र से चली और शीघ्र ही इसने समूचे भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया | प्रथम क्रन्तिकारी संगठन चापेकर बंधुओं द्वारा स्थापित किया गया ,इसका नाम "व्यायाम मंडल" था | इस गुट के द्वारा रैंड एवं एमहर्स्ट की हत्या कर दी गयी | बाद में इन दोनों को फांसी दे दी गयी | सावरकर ने 1904 में नासिक में मित्र मेला संघ की स्थापना की जो बाद में अभिनव भारत संगठन के नाम से चर्चित हुआ | जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन की हत्या के आरोप में इन लोगों पर नासिक षड्यंत्र केस चलाया गया | दामोदर सावरकर को काला पानी की सजा दी गयी | बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन - बंगाल में पी .मित्रा ने एक गुप्त क्रान्तिकारी सभा अनुशीलन समिति का गठन किया | 1905 में बारीन्द्र कुमार घोष ने भवानी मंदिर नामक पुस्तिका प्रकाशित कर क्रान्तिकारी आन्दोलन को बढ़ावा दिया | युगांतर व संध्या नामक पत्रिकाओं द्वारा अंग्रेज विरोधी विचार फैलाये | लेफ्टिनेंट गवर्नर सर वैम्फील्ड फुलेर की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में खुदीराम बॉस व प्रफुल्ल चाकी पकडे गए | अवैध हथियार रखने के आरोप में अरबिंद घोष व बारीन्द्र घोष पर अलीगढ़ का मुकदमा बना | पंजाब तथा दिल्ली में आतंकवादी गतिविधियाँ - 1912 में दिल्ली में हार्डिंग पर बम फेंका गया ,जिसके आरोप में अमीरचंद व बसंत विश्वास को फांसी दे दी गयी | रासबिहारी बॉस भागकर जापान चले गए वहीँ से क्रान्तिकारी गतिविधियाँ संचालित करते रहे | अन्य गतिविधियाँ - मद्रास में क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन विपिन चन्द्र पाल कर रहे थे | विदेश में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंडियन होमेरुल सोसाइटी की स्थापना की | लन्दन में इंडिया हाउस की स्थापना की | लन्दन में ही मदन लाल धींगरा ने कर्जन वायिली को गोली मार दी | धींगरा को फांसी दे दी गयी | सैन फ्रांसिस्को में ग़दर पार्टी की स्थापना की गयी | पंजाब में प्रसिद्धकामागाटामारू काण्ड घटित हुआ | भारत सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए कानून बनाये जैसे - विस्फोटक पदार्थ कानून - 1908 समाचार पत्र अधनियम - 1910 भारत रक्षा अधिनियम - 1915 इस प्रकार 1919 -20 तक सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों को नियंत्रित कर लिया | क्रन्तिकारी राष्ट्रवाद का प्रभाव - यदि हम क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में विचार करें तो यह मानना पड़ेगा कि देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले , हँसते हुए फंसी पर चढ़ने वाले तथा जेलों में यातनाएं सहने वाले क्रांतिकारियों ने भारत के युवकों में जागृति फैलाने और साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष में जुट जाने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , वह किसी से कम नहीं है | क्रांतिकारियों ने भारत में एक नयी चेतना का संचार किया | स्वदेशी आन्दोलन के पश्चात उत्पन्न राजनैतिक शून्यता को भरने का प्रयास इन आन्दोलनों ने किया | अहिंसक मार्ग के साथ-साथ हिंसक आन्दोलन का एक वैकल्पिक मार्ग भी क्रांतिकारियों ने प्रस्तुत किया | क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की अपराजेयता संबंधी मिथक को तोडा | युवाओं में उर्जा का संचार हुआ व क्रांतिकारियों के बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया | आदि
##Question:क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रथम चरण में क्रांतिकारी गतिविधियाँ न केवल भारत बल्कि उसके बाहर भी दिखाई देती हैं| चर्चा कीजिये| ( 150-200 शब्द/10 अंक) In the first phase of revolutionary nationalism, revolutionary activities are visible not only in India but also outside it. Discuss (150-200 words / 10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात क्रांतिकारियों की कार्यप्रणाली को बताइए | पुनः विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी आन्दोलन के अभियान और आन्दोलन की चर्चा कीजिये | अंत में संक्षेप में इसके प्रभाव को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 20वीं शताब्दी के पूर्वाह्ण में भारत में उग्रवाद के साथ-साथ उग्र क्रांतिवाद का भी विकास हुआ | क्रांतिकारी आन्दोलन के भी मुख्यतः वही कारण थे जो उग्रवाद के थे ,उग्र राष्ट्रवादियों का ही एक दल क्रांतिकारी के रूप में उभरा अंतर केवल इतना था कि उग्र क्रन्तिकारी शीघ्र परिणाम चाहते थे | साधनों के विषय में उनका मानना था कि पाश्चात्य साम्राज्यवाद को केवल पश्चिमी हिंसक साधनों से ही समाप्त किया जा सकता है , इसलिए इन लोगों ने बन्दूक व पिस्तौल का प्रयोग किया | उन्होंने आयरलैंड से प्रेरणा ली | यह आन्दोलन दो चरणों में हुआ | क्रांतिकारियों की कार्य प्रणाली - पत्रों के माध्यम से शिक्षितों में दासता के प्रति घृणा उत्पन्न करना | बम बनाना , बन्दूक आदि चोरी से उपलब्ध करना तथा विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना | चंदा, दान तथा क्रांतिकारी डकैतियों द्वारा व्यय के लिए धन का प्रबंध करना | महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी अभियान - आतंकवाद की लहर सबसे पहले महाराष्ट्र से चली और शीघ्र ही इसने समूचे भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया | प्रथम क्रन्तिकारी संगठन चापेकर बंधुओं द्वारा स्थापित किया गया ,इसका नाम "व्यायाम मंडल" था | इस गुट के द्वारा रैंड एवं एमहर्स्ट की हत्या कर दी गयी | बाद में इन दोनों को फांसी दे दी गयी | सावरकर ने 1904 में नासिक में मित्र मेला संघ की स्थापना की जो बाद में अभिनव भारत संगठन के नाम से चर्चित हुआ | जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन की हत्या के आरोप में इन लोगों पर नासिक षड्यंत्र केस चलाया गया | दामोदर सावरकर को काला पानी की सजा दी गयी | बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन - बंगाल में पी .मित्रा ने एक गुप्त क्रान्तिकारी सभा अनुशीलन समिति का गठन किया | 1905 में बारीन्द्र कुमार घोष ने भवानी मंदिर नामक पुस्तिका प्रकाशित कर क्रान्तिकारी आन्दोलन को बढ़ावा दिया | युगांतर व संध्या नामक पत्रिकाओं द्वारा अंग्रेज विरोधी विचार फैलाये | लेफ्टिनेंट गवर्नर सर वैम्फील्ड फुलेर की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में खुदीराम बॉस व प्रफुल्ल चाकी पकडे गए | अवैध हथियार रखने के आरोप में अरबिंद घोष व बारीन्द्र घोष पर अलीगढ़ का मुकदमा बना | पंजाब तथा दिल्ली में आतंकवादी गतिविधियाँ - 1912 में दिल्ली में हार्डिंग पर बम फेंका गया ,जिसके आरोप में अमीरचंद व बसंत विश्वास को फांसी दे दी गयी | रासबिहारी बॉस भागकर जापान चले गए वहीँ से क्रान्तिकारी गतिविधियाँ संचालित करते रहे | अन्य गतिविधियाँ - मद्रास में क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन विपिन चन्द्र पाल कर रहे थे | विदेश में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंडियन होमेरुल सोसाइटी की स्थापना की | लन्दन में इंडिया हाउस की स्थापना की | लन्दन में ही मदन लाल धींगरा ने कर्जन वायिली को गोली मार दी | धींगरा को फांसी दे दी गयी | सैन फ्रांसिस्को में ग़दर पार्टी की स्थापना की गयी | पंजाब में प्रसिद्धकामागाटामारू काण्ड घटित हुआ | भारत सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए कानून बनाये जैसे - विस्फोटक पदार्थ कानून - 1908 समाचार पत्र अधनियम - 1910 भारत रक्षा अधिनियम - 1915 इस प्रकार 1919 -20 तक सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों को नियंत्रित कर लिया | क्रन्तिकारी राष्ट्रवाद का प्रभाव - यदि हम क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में विचार करें तो यह मानना पड़ेगा कि देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले , हँसते हुए फंसी पर चढ़ने वाले तथा जेलों में यातनाएं सहने वाले क्रांतिकारियों ने भारत के युवकों में जागृति फैलाने और साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष में जुट जाने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , वह किसी से कम नहीं है | क्रांतिकारियों ने भारत में एक नयी चेतना का संचार किया | स्वदेशी आन्दोलन के पश्चात उत्पन्न राजनैतिक शून्यता को भरने का प्रयास इन आन्दोलनों ने किया | अहिंसक मार्ग के साथ-साथ हिंसक आन्दोलन का एक वैकल्पिक मार्ग भी क्रांतिकारियों ने प्रस्तुत किया | क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की अपराजेयता संबंधी मिथक को तोडा | युवाओं में उर्जा का संचार हुआ व क्रांतिकारियों के बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया | आदि
46,646
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रथम चरण की मुख्य प्रवृतियों एवं उसके प्रभावों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द ) Discuss the main trends and its effects of the first phase of revolutionary nationalism. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात क्रांतिकारियों की कार्यप्रणाली को बताइए | पुनः विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी आन्दोलन के अभियान और आन्दोलन की चर्चा कीजिये | अंत में संक्षेप में इसके प्रभाव को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 20वीं शताब्दी के पूर्वाह्ण में भारत में उग्रवाद के साथ-साथ उग्र क्रांतिवाद का भी विकास हुआ | क्रांतिकारी आन्दोलन के भी मुख्यतः वही कारण थे जो उग्रवाद के थे ,उग्र राष्ट्रवादियों का ही एक दल क्रांतिकारी के रूप में उभरा अंतर केवल इतना था कि उग्र क्रन्तिकारी शीग्र परिणाम चाहते थे | साधनों के विषय में उनका मानना था कि पाश्चात्य साम्राज्यवाद को केवल पश्चिमी हिंसक साधनों से ही समाप्त किया जा सकता है , इसलिए इन लोगों ने बन्दूक व पिस्तौल का प्रयोग किया | उन्होंने आयरलैंड से प्रेरणा ली | यह आन्दोलन दो चरणों में हुआ | क्रांतिकारियों की कार्य प्रणाली - पत्रों के माध्यम से शिक्षितों में दासता के प्रति घृणा उत्पन्न करना | बम बनाना , बन्दूक आदि चोरी से उपलब्ध करना तथा विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना | चंदा, दान तथा क्रांतिकारी डकैतियों द्वारा व्यय के लिए धन का प्रबंध करना | महाराष्ट्र में क्रन्तिकारी अभियान- आतंकवाद की लहर सबसे पहले महाराष्ट्र से चली और शीघ्र ही इसने समूचे भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया | प्रथम क्रन्तिकारी संगठन चापेकर बंधुओं द्वारा स्थापित किया गया ,इसका नाम "व्यायाम मंडल" था | इस गट के द्वारा रैंड एवं एमहर्स्ट की हत्या कर दी गयी | बाद में इन दोनों को फांसी दे दी गयी | सावरकर ने 1904 में नासिक में मित्र मेला संघ की स्थापना की जो बाद में अभिनव भारत संगठन के नाम से चर्चित हुआ | जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन की हत्या के आरोप में इन लोगों पर नासिक षड्यंत्र केस चलाया गया | दामोदर सावरकर को काला पानी की सजा दी गयी | बंगाल में क्रन्तिकारी आन्दोलन - बंगाल में पी .मित्रा ने एक गुप्त क्रन्तिकारी सभा अनुशीलन समिति का गठन किया | 1905 में बारीन्द्र कुमार घोष ने भवानी मंदिर नामक पुस्तिका प्रकाशित कर क्रन्तिकारी आन्दोलन को बढ़ावा दिया | युगांतर व संध्या नामक पत्रिकाओं द्वारा अंग्रेज विरोधी विचार फैलाये | लेफ्टिनेंट गवर्नर सर वैम्फील्ड फुलेर की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में खुदीराम बोसे व प्रफुल्ल चाकी पकडे गए | अवैध हथियार रखने के आरोप में अरबिंद घोष व बारीन्द्र घोष पर अलीगढ़ का मुकदमा बना | पंजाब तथा दिल्ली में आतंकवादी गतिविधियाँ - 1912 में दिल्ली में हार्डिंग पर बम फेंका गया ,जिसके आरोप में अमीरचंद व बसंत विश्वास को फांसी दे दी गयी | रासबिहारी बोसे भागकर जापान चले गए वहीँ से क्रन्तिकारी गतिविधियाँ संचालित करते रहे | अन्य गतिविधियाँ - मद्रास में क्रन्तिकारी गतिविधियों का संचालन विपिन चन्द्र पल कर रहे थे | विदेश में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंडियन होमेरुल सोसाइटी की स्थापना की | लन्दन में इंडिया हाउस की स्थापना की लन्दन में ही मदन लाल धींगरा ने कर्जन वायिली को गोली मार दी | धींगरा को फांसी दे दी गयी | सैन फ्रांसिस्को में ग़दर पार्टी की स्थापना की गयी | पंजाब में प्रसिद्ध कामागाटामारू काण्ड घटित हुआ | भारत सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए कानून बनाये जैसे - विस्फोटक पदार्थ कानून - 1908 समाचार पात्र अधनियम - 1910 भारत रक्षा अधिनियम - 1915 इस प्रकार 1919 -20 तक सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों को नियंत्रित कर लिया | क्रन्तिकारी राष्ट्रवाद का प्रभाव - यदि हम क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में विचार करें तो यह मानना पड़ेगा कि देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले , हँसते हुए फंसी पर चढ़ने वाले तथा जेलों में यातनाएं सहने वाले क्रांतिकारियों ने भारत के युवकों में जागृति फैलाने और साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष में जुट जाने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , वह किसी से कम नहीं है | क्रांतिकारियों ने भारत में एक नयी चेतना का संचार किया | स्वदेशी आन्दोलन के पश्चात उत्पन्न राजनैतिक शून्यता को भरने का प्रयास इन आन्दोलनों ने किया | अहिंसक मार्ग के साथ-साथ हिंसक आन्दोलन का एक वैकल्पिक मार्ग भी क्रांतिकारियों ने प्रस्तुत किया | क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की अपराजेयता संबंधी मिथक को तोडा | युवाओं में उर्जा का संचार हुआ व क्रांतिकारियों के बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया | आदि
##Question:क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रथम चरण की मुख्य प्रवृतियों एवं उसके प्रभावों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द ) Discuss the main trends and its effects of the first phase of revolutionary nationalism. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात क्रांतिकारियों की कार्यप्रणाली को बताइए | पुनः विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी आन्दोलन के अभियान और आन्दोलन की चर्चा कीजिये | अंत में संक्षेप में इसके प्रभाव को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - 20वीं शताब्दी के पूर्वाह्ण में भारत में उग्रवाद के साथ-साथ उग्र क्रांतिवाद का भी विकास हुआ | क्रांतिकारी आन्दोलन के भी मुख्यतः वही कारण थे जो उग्रवाद के थे ,उग्र राष्ट्रवादियों का ही एक दल क्रांतिकारी के रूप में उभरा अंतर केवल इतना था कि उग्र क्रन्तिकारी शीग्र परिणाम चाहते थे | साधनों के विषय में उनका मानना था कि पाश्चात्य साम्राज्यवाद को केवल पश्चिमी हिंसक साधनों से ही समाप्त किया जा सकता है , इसलिए इन लोगों ने बन्दूक व पिस्तौल का प्रयोग किया | उन्होंने आयरलैंड से प्रेरणा ली | यह आन्दोलन दो चरणों में हुआ | क्रांतिकारियों की कार्य प्रणाली - पत्रों के माध्यम से शिक्षितों में दासता के प्रति घृणा उत्पन्न करना | बम बनाना , बन्दूक आदि चोरी से उपलब्ध करना तथा विदेशों से शस्त्र प्राप्त करना | चंदा, दान तथा क्रांतिकारी डकैतियों द्वारा व्यय के लिए धन का प्रबंध करना | महाराष्ट्र में क्रन्तिकारी अभियान- आतंकवाद की लहर सबसे पहले महाराष्ट्र से चली और शीघ्र ही इसने समूचे भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया | प्रथम क्रन्तिकारी संगठन चापेकर बंधुओं द्वारा स्थापित किया गया ,इसका नाम "व्यायाम मंडल" था | इस गट के द्वारा रैंड एवं एमहर्स्ट की हत्या कर दी गयी | बाद में इन दोनों को फांसी दे दी गयी | सावरकर ने 1904 में नासिक में मित्र मेला संघ की स्थापना की जो बाद में अभिनव भारत संगठन के नाम से चर्चित हुआ | जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन की हत्या के आरोप में इन लोगों पर नासिक षड्यंत्र केस चलाया गया | दामोदर सावरकर को काला पानी की सजा दी गयी | बंगाल में क्रन्तिकारी आन्दोलन - बंगाल में पी .मित्रा ने एक गुप्त क्रन्तिकारी सभा अनुशीलन समिति का गठन किया | 1905 में बारीन्द्र कुमार घोष ने भवानी मंदिर नामक पुस्तिका प्रकाशित कर क्रन्तिकारी आन्दोलन को बढ़ावा दिया | युगांतर व संध्या नामक पत्रिकाओं द्वारा अंग्रेज विरोधी विचार फैलाये | लेफ्टिनेंट गवर्नर सर वैम्फील्ड फुलेर की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में खुदीराम बोसे व प्रफुल्ल चाकी पकडे गए | अवैध हथियार रखने के आरोप में अरबिंद घोष व बारीन्द्र घोष पर अलीगढ़ का मुकदमा बना | पंजाब तथा दिल्ली में आतंकवादी गतिविधियाँ - 1912 में दिल्ली में हार्डिंग पर बम फेंका गया ,जिसके आरोप में अमीरचंद व बसंत विश्वास को फांसी दे दी गयी | रासबिहारी बोसे भागकर जापान चले गए वहीँ से क्रन्तिकारी गतिविधियाँ संचालित करते रहे | अन्य गतिविधियाँ - मद्रास में क्रन्तिकारी गतिविधियों का संचालन विपिन चन्द्र पल कर रहे थे | विदेश में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंडियन होमेरुल सोसाइटी की स्थापना की | लन्दन में इंडिया हाउस की स्थापना की लन्दन में ही मदन लाल धींगरा ने कर्जन वायिली को गोली मार दी | धींगरा को फांसी दे दी गयी | सैन फ्रांसिस्को में ग़दर पार्टी की स्थापना की गयी | पंजाब में प्रसिद्ध कामागाटामारू काण्ड घटित हुआ | भारत सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए कानून बनाये जैसे - विस्फोटक पदार्थ कानून - 1908 समाचार पात्र अधनियम - 1910 भारत रक्षा अधिनियम - 1915 इस प्रकार 1919 -20 तक सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों को नियंत्रित कर लिया | क्रन्तिकारी राष्ट्रवाद का प्रभाव - यदि हम क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में विचार करें तो यह मानना पड़ेगा कि देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले , हँसते हुए फंसी पर चढ़ने वाले तथा जेलों में यातनाएं सहने वाले क्रांतिकारियों ने भारत के युवकों में जागृति फैलाने और साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष में जुट जाने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , वह किसी से कम नहीं है | क्रांतिकारियों ने भारत में एक नयी चेतना का संचार किया | स्वदेशी आन्दोलन के पश्चात उत्पन्न राजनैतिक शून्यता को भरने का प्रयास इन आन्दोलनों ने किया | अहिंसक मार्ग के साथ-साथ हिंसक आन्दोलन का एक वैकल्पिक मार्ग भी क्रांतिकारियों ने प्रस्तुत किया | क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की अपराजेयता संबंधी मिथक को तोडा | युवाओं में उर्जा का संचार हुआ व क्रांतिकारियों के बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया | आदि
46,651
नैतिक दुविधा से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इससे सम्बंधित विरोधाभासी मूल्यों को स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by ethical dilemma ? Also,explain the contradictory values related to this (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच - नैतिक दुविधा की अवधारणा को विस्तार से बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात इससे सम्बंधित विरोधाभासी मूल्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में विरोधाभासी मूल्यों को उदहारण द्वारा स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नैतिक दुविधा वह दुविधा है , जिसमे किसी नैतिक निर्णय को लेकर व्यक्ति संकट में हो | दुविधा वहां होती है जहाँ हमें दो या अधिक विकल्पों के बीच किसी न किसी विकल्प को चुनना ही होता है और उपलब्ध विकल्पों में से कोई भी सटीक पर्याप्त या संतोषप्रद नहीं होता | जब दुविधा में विद्यमान विकल्पों की प्रकृति नैतिक-अनैतिक की हो तो यही दुविधा तो है , किन्तु नैतिक दुविधा नहीं है | इसके विपरीत एक महिला , जिसके ससुर भी बीमार है और बच्चा भी बीमार है और वह किसी एक का ही अच्छा इलाज करा सकती है , यह नैतिक दुविधा है | नैतिक दुविधाएं व्यक्तिगत -सामाजिक जीवन में भी होती है | सरकारी कार्यालयों में भी और निजी संस्थानों में भी व्यक्तिगत जीवन में दुविधाएं प्रायः इसी बात को लेकर होती है कि हम अपने परिचितों , मित्रों और रिश्तेदारों में किसे प्राथमिकताएँ दे जैसे- पत्नी को प्राथमिकता दे या मान को , संतान की ज़रूरतों को , बच्चों की स्वतंत्रता की मांग को महत्त्व देन या समाज की आलोचनाओं पर दें इत्यादि | विरोधाभासी मूल्य सरकारी कार्यालय में भिन्न तरह की दुविधाएं होती हैं जैसे यदि किसी कर्मचारी ने रिश्वत ली है तो नियम कहता है कि उसे निलंबित या बर्खास्त किया जाय जबकि दूसरी ओर तथ्य यह है कि उसे निलंबित या बर्खास्त किया जाय जबकि दूसरी ओर तथ्य यह है कि उसके बूढ़े माता-पिता और स्कूल जाने वाले बच्चे उसी की नौकरी पर निर्भर है | इसी प्रकार यदि कार्यालय में शेष सदस्य भ्रष्टाचार में लिप्त है और व्यक्ति खुद भ्रष्ट नहीं है तो दुविधा यह है कि वह उनकी गतिविधियों की जानकारी वरिष्ठ सदस्यों तक पहुंचाए या शांत रहे | जानकारी नहीं पहुंचाने में निहित है कि वह मौन रहते हुए भ्रष्टाचार के होने में सहायक है और जानकारी पहुंचाने में खतरा ही कि उसके कई नजदीकी मित्र नौकरी से हाथ धो बैठेंगे और उनके परिवारों को आर्थिक संकट झेलना होगा | ऐसी ही एक दुविधा राजनैतिक तटस्थता बनाम राजनैतिक साझेदारी की है , सत्तारूढ़ दल से गहरा सम्बन्ध होने पर अच्छे स्थान पर नियुक्ति मिल सकती है , जो परिवार के लिए फायदे मंद है किन्तु सिविल सेवा के मूल्य के विरुद्ध है | यदि व्यक्ति सिविल सेवा के मूल्यों के अनुरूप तटस्थ रहे तो ख़राब नियुक्ति मिलने का भय रहता है |
##Question:नैतिक दुविधा से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इससे सम्बंधित विरोधाभासी मूल्यों को स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by ethical dilemma ? Also,explain the contradictory values related to this (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - नैतिक दुविधा की अवधारणा को विस्तार से बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात इससे सम्बंधित विरोधाभासी मूल्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में विरोधाभासी मूल्यों को उदहारण द्वारा स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नैतिक दुविधा वह दुविधा है , जिसमे किसी नैतिक निर्णय को लेकर व्यक्ति संकट में हो | दुविधा वहां होती है जहाँ हमें दो या अधिक विकल्पों के बीच किसी न किसी विकल्प को चुनना ही होता है और उपलब्ध विकल्पों में से कोई भी सटीक पर्याप्त या संतोषप्रद नहीं होता | जब दुविधा में विद्यमान विकल्पों की प्रकृति नैतिक-अनैतिक की हो तो यही दुविधा तो है , किन्तु नैतिक दुविधा नहीं है | इसके विपरीत एक महिला , जिसके ससुर भी बीमार है और बच्चा भी बीमार है और वह किसी एक का ही अच्छा इलाज करा सकती है , यह नैतिक दुविधा है | नैतिक दुविधाएं व्यक्तिगत -सामाजिक जीवन में भी होती है | सरकारी कार्यालयों में भी और निजी संस्थानों में भी व्यक्तिगत जीवन में दुविधाएं प्रायः इसी बात को लेकर होती है कि हम अपने परिचितों , मित्रों और रिश्तेदारों में किसे प्राथमिकताएँ दे जैसे- पत्नी को प्राथमिकता दे या मान को , संतान की ज़रूरतों को , बच्चों की स्वतंत्रता की मांग को महत्त्व देन या समाज की आलोचनाओं पर दें इत्यादि | विरोधाभासी मूल्य सरकारी कार्यालय में भिन्न तरह की दुविधाएं होती हैं जैसे यदि किसी कर्मचारी ने रिश्वत ली है तो नियम कहता है कि उसे निलंबित या बर्खास्त किया जाय जबकि दूसरी ओर तथ्य यह है कि उसे निलंबित या बर्खास्त किया जाय जबकि दूसरी ओर तथ्य यह है कि उसके बूढ़े माता-पिता और स्कूल जाने वाले बच्चे उसी की नौकरी पर निर्भर है | इसी प्रकार यदि कार्यालय में शेष सदस्य भ्रष्टाचार में लिप्त है और व्यक्ति खुद भ्रष्ट नहीं है तो दुविधा यह है कि वह उनकी गतिविधियों की जानकारी वरिष्ठ सदस्यों तक पहुंचाए या शांत रहे | जानकारी नहीं पहुंचाने में निहित है कि वह मौन रहते हुए भ्रष्टाचार के होने में सहायक है और जानकारी पहुंचाने में खतरा ही कि उसके कई नजदीकी मित्र नौकरी से हाथ धो बैठेंगे और उनके परिवारों को आर्थिक संकट झेलना होगा | ऐसी ही एक दुविधा राजनैतिक तटस्थता बनाम राजनैतिक साझेदारी की है , सत्तारूढ़ दल से गहरा सम्बन्ध होने पर अच्छे स्थान पर नियुक्ति मिल सकती है , जो परिवार के लिए फायदे मंद है किन्तु सिविल सेवा के मूल्य के विरुद्ध है | यदि व्यक्ति सिविल सेवा के मूल्यों के अनुरूप तटस्थ रहे तो ख़राब नियुक्ति मिलने का भय रहता है |
46,654
यदि आप बद्रीनाथ से ओमकारेश्वर तक की यात्रा सीधी रेखा में करते हैं तो आपके रास्ते में आने वाली प्रमुख स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए? (150-200 शब्द; 10 अंक) If you travel from badrinath to omkareshwar in a straight line, describe the major topography that comes your way? (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच- बद्रीनाथ तथा ओमकारेश्वर की भौतिक अवस्थिति को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| NOTE- यहाँ पर संबंधित क्षेत्र को दर्शाते हुए भारत का छोटा मानचित्र जरूर देना चाहिए| मुख्य भाग में, बद्रीनाथ से ओमकारेश्वर तक के सीधे मार्ग में आने वाली प्रमुख स्थलाकृतियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| उत्तर- बद्रीनाथ हिमाचल प्रदेश के चमोली जिले में समुद्रतल से लगभग 3100 मीटर की ऊंचाई पर वृहद हिमालय के दक्षिण भाग में अवस्थित है| वहीँ, ओमकारेश्वर मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीचोबीच मंदाथा नदीद्वीप पर भ्रंश घाटी में अवस्थित भगवान् शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है| NOTE- यहाँयहाँ पर संबंधित क्षेत्र को दर्शाते हुएएवं दोनों स्थानों को सीधी रेखा से मिलाते हुए भारत का छोटा मानचित्र बनाये| बद्रीनाथ से ओमकारेश्वर तक के सीधे मार्ग में आने वाली प्रमुख स्थलाकृतियां- हिमालय- वृहद हिमालय तथा लघु हिमालय के बीच V आकर की घाटियाँ, गॉर्ज आदि- वलन, भ्रंश तथा क्षेपण से इनका निर्माण; मुख्य केंद्रीय क्षेप(Main Central Thrust-MCT) द्वारा एक दूसरे से विलगित; लघु/मध्य हिमालय(नाग-टिब्बा) - मियोसीन काल में हुए हिमालय निर्माण तथा प्रोत्थान से इसका उद्भव; जीवाश्मरहित अवसादी/रूपांतरित चट्टानों से बनी आकृतियाँ; लघु हिमालय तथा शिवालिक के मध्य मध्य सीमांत क्षेत्र(Main Boundary Thrust-MBT); अनुदैर्ध्य घाटियाँ(दून ); शिवालिक/बाह्य हिमालय - तीखे भ्रंश से युक्त चौड़े बेसिन; बलुआ पत्थर, मृतिका आदि से निर्माण; शिवालिक तथा मैदान के बीच हिमालयन अग्र भ्रंश(HFF) भाबर - शिवालिक गिरिपाद के समानांतर 8-10 किमी चौड़ी पट्टी; पर्वत श्रेणियों से बाहर निकलने के बाद नदियों द्वारा बड़े-बड़े शैल एवं गोलाश्म लाना; मंद ढ़ाल की वजह से अवसादों का विस्तृत क्षेत्रों में फैलकर निम्न से ऊँचे आकर में निक्षेपण (जलोढ़ पंख) ; जलोढ़ पंख की वजह से नदियों द्वारा विभिन्न वितरिकाओं का निर्माण ; तराई क्षेत्र - भाबर की लुप्त नदियाँ इस क्षेत्र में प्रकट; बारीक कणों वाले जलोढ़ से बना हुआ वनों से युक्त दलदली क्षेत्र; उत्तरी भारत का बांगर तथा खादर युक्त मैदान - सैंकड़ों किलोमीटर तक उच्चावच में भिन्नता नहीं तथा समरूपता ; नदियाँ, नदियों की मृत भुजाएं, तटबंधों, बीहड़ों का कहीं-कहीं दिखना ; पुराने जलोढ़ों से निर्मित विशाल मैदानों की उच्च भूमि(बांगर); नदियों के धाराओं के दोनों तरफ तथा बाढ़ के मैदानों में नयेजलोढ़ों से निर्मित खादर; मैदान की औसत जलोढ़ गहराई 1300-1400 मीटर; गंगा-यमुना का मैदान - नदियों द्वारा बहाकर लाए गये जलोढ़ निक्षेपों से निर्माण ; आकृतिविहीन उर्वर जलोढ़ मैदान जिनका उद्भव मुख्यतः हिमालय एवं विंध्य से आने वाली नदियों के अवसादों के निक्षेपण प्रक्रिया से; उपरी गंगा के मैदान के अंतर्गत गंगा-यमुना दोआब; रोहिलखंड का मैदान ; मैदानों में ही नदियों के सहारे प्राकृतिक नदी तटबंधों का निर्माण ; नदियों की प्रौढावस्था में बनने वाली अपरदनी तथा निक्षेपण स्थलाकृतियां जैसे- बालू-रोधिका, विसर्प, गोखुर झीलें, गुंफित नदियाँ आदि; प्रायद्वीपीय पठार - मध्य उच्च भूभाग - उत्तर में उत्तरी मैदान तथा दक्षिण में विन्ध्याचल श्रेणी के मध्य; महाद्वीपीय तथा प्राचीनतम पठार का उदाहरण; चंबल की उत्खात भूमि तथा बीहड़ ; मालवा पठार - अपने आसपास के क्षेत्रों से ऊँची भूमि; सपाट किंतु विस्तृत शिखर; छोटी-छोटी पहाड़ियों की श्रृंखलाएं ; नदियों की कम गहरी घाटियाँ; विंध्य श्रेणी - गंगा के मैदान तथा दक्कन के पठार के बीच एक विभाजक रेखा; लाल बलुआ पत्थर की प्रधानता; अवसादी निक्षेपों की भी बहुलता; क्षिप्तिकाओं तथा जलप्रपातों का विकास ; नर्मदा भ्रंश तथा रिफ्ट घाटी - हिमालय निर्माण के समय उत्तरी भारतीय भूखंड के अवतलन के फलस्वरूप इसका निर्माण; भ्रंश के कारण स्थलीय सतह पर निर्मित खड़े ढ़ाल वाले किनारे (भ्रंश-कगार) ; नर्मदा भ्रंश घाटी के बाद हम सतपुड़ा श्रेणी की अवस्थिति को पाते हैं|
##Question:यदि आप बद्रीनाथ से ओमकारेश्वर तक की यात्रा सीधी रेखा में करते हैं तो आपके रास्ते में आने वाली प्रमुख स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए? (150-200 शब्द; 10 अंक) If you travel from badrinath to omkareshwar in a straight line, describe the major topography that comes your way? (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- बद्रीनाथ तथा ओमकारेश्वर की भौतिक अवस्थिति को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| NOTE- यहाँ पर संबंधित क्षेत्र को दर्शाते हुए भारत का छोटा मानचित्र जरूर देना चाहिए| मुख्य भाग में, बद्रीनाथ से ओमकारेश्वर तक के सीधे मार्ग में आने वाली प्रमुख स्थलाकृतियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| उत्तर- बद्रीनाथ हिमाचल प्रदेश के चमोली जिले में समुद्रतल से लगभग 3100 मीटर की ऊंचाई पर वृहद हिमालय के दक्षिण भाग में अवस्थित है| वहीँ, ओमकारेश्वर मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीचोबीच मंदाथा नदीद्वीप पर भ्रंश घाटी में अवस्थित भगवान् शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है| NOTE- यहाँयहाँ पर संबंधित क्षेत्र को दर्शाते हुएएवं दोनों स्थानों को सीधी रेखा से मिलाते हुए भारत का छोटा मानचित्र बनाये| बद्रीनाथ से ओमकारेश्वर तक के सीधे मार्ग में आने वाली प्रमुख स्थलाकृतियां- हिमालय- वृहद हिमालय तथा लघु हिमालय के बीच V आकर की घाटियाँ, गॉर्ज आदि- वलन, भ्रंश तथा क्षेपण से इनका निर्माण; मुख्य केंद्रीय क्षेप(Main Central Thrust-MCT) द्वारा एक दूसरे से विलगित; लघु/मध्य हिमालय(नाग-टिब्बा) - मियोसीन काल में हुए हिमालय निर्माण तथा प्रोत्थान से इसका उद्भव; जीवाश्मरहित अवसादी/रूपांतरित चट्टानों से बनी आकृतियाँ; लघु हिमालय तथा शिवालिक के मध्य मध्य सीमांत क्षेत्र(Main Boundary Thrust-MBT); अनुदैर्ध्य घाटियाँ(दून ); शिवालिक/बाह्य हिमालय - तीखे भ्रंश से युक्त चौड़े बेसिन; बलुआ पत्थर, मृतिका आदि से निर्माण; शिवालिक तथा मैदान के बीच हिमालयन अग्र भ्रंश(HFF) भाबर - शिवालिक गिरिपाद के समानांतर 8-10 किमी चौड़ी पट्टी; पर्वत श्रेणियों से बाहर निकलने के बाद नदियों द्वारा बड़े-बड़े शैल एवं गोलाश्म लाना; मंद ढ़ाल की वजह से अवसादों का विस्तृत क्षेत्रों में फैलकर निम्न से ऊँचे आकर में निक्षेपण (जलोढ़ पंख) ; जलोढ़ पंख की वजह से नदियों द्वारा विभिन्न वितरिकाओं का निर्माण ; तराई क्षेत्र - भाबर की लुप्त नदियाँ इस क्षेत्र में प्रकट; बारीक कणों वाले जलोढ़ से बना हुआ वनों से युक्त दलदली क्षेत्र; उत्तरी भारत का बांगर तथा खादर युक्त मैदान - सैंकड़ों किलोमीटर तक उच्चावच में भिन्नता नहीं तथा समरूपता ; नदियाँ, नदियों की मृत भुजाएं, तटबंधों, बीहड़ों का कहीं-कहीं दिखना ; पुराने जलोढ़ों से निर्मित विशाल मैदानों की उच्च भूमि(बांगर); नदियों के धाराओं के दोनों तरफ तथा बाढ़ के मैदानों में नयेजलोढ़ों से निर्मित खादर; मैदान की औसत जलोढ़ गहराई 1300-1400 मीटर; गंगा-यमुना का मैदान - नदियों द्वारा बहाकर लाए गये जलोढ़ निक्षेपों से निर्माण ; आकृतिविहीन उर्वर जलोढ़ मैदान जिनका उद्भव मुख्यतः हिमालय एवं विंध्य से आने वाली नदियों के अवसादों के निक्षेपण प्रक्रिया से; उपरी गंगा के मैदान के अंतर्गत गंगा-यमुना दोआब; रोहिलखंड का मैदान ; मैदानों में ही नदियों के सहारे प्राकृतिक नदी तटबंधों का निर्माण ; नदियों की प्रौढावस्था में बनने वाली अपरदनी तथा निक्षेपण स्थलाकृतियां जैसे- बालू-रोधिका, विसर्प, गोखुर झीलें, गुंफित नदियाँ आदि; प्रायद्वीपीय पठार - मध्य उच्च भूभाग - उत्तर में उत्तरी मैदान तथा दक्षिण में विन्ध्याचल श्रेणी के मध्य; महाद्वीपीय तथा प्राचीनतम पठार का उदाहरण; चंबल की उत्खात भूमि तथा बीहड़ ; मालवा पठार - अपने आसपास के क्षेत्रों से ऊँची भूमि; सपाट किंतु विस्तृत शिखर; छोटी-छोटी पहाड़ियों की श्रृंखलाएं ; नदियों की कम गहरी घाटियाँ; विंध्य श्रेणी - गंगा के मैदान तथा दक्कन के पठार के बीच एक विभाजक रेखा; लाल बलुआ पत्थर की प्रधानता; अवसादी निक्षेपों की भी बहुलता; क्षिप्तिकाओं तथा जलप्रपातों का विकास ; नर्मदा भ्रंश तथा रिफ्ट घाटी - हिमालय निर्माण के समय उत्तरी भारतीय भूखंड के अवतलन के फलस्वरूप इसका निर्माण; भ्रंश के कारण स्थलीय सतह पर निर्मित खड़े ढ़ाल वाले किनारे (भ्रंश-कगार) ; नर्मदा भ्रंश घाटी के बाद हम सतपुड़ा श्रेणी की अवस्थिति को पाते हैं|
46,655
भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए, इस संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द/10 अंक) While highlighting the reasons for the rising floods in India, discuss the strategy that can be created under Sendai Framework in this context. (150 - 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकनअनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
##Question:भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए, इस संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द/10 अंक) While highlighting the reasons for the rising floods in India, discuss the strategy that can be created under Sendai Framework in this context. (150 - 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकनअनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
46,660
भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए , इस संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द) Highlighting the reasons for the rising floods in India, Discussing the strategy that can be created under Sendai Framework in this context,. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
##Question:भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए , इस संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द) Highlighting the reasons for the rising floods in India, Discussing the strategy that can be created under Sendai Framework in this context,. (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
46,674
भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए , इस संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द) Highlighting the reasons for the rising floods in India, Discussing the strategy that can be created under Sendai Framework in this context,. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
##Question:भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए , इस संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द) Highlighting the reasons for the rising floods in India, Discussing the strategy that can be created under Sendai Framework in this context,. (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
46,675
भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए, इस संदर्भ मेंसेन्डाईफ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये। (150- 200 शब्द; 10 Marks) Highlighting the reasons for the rising floods in India, Discussing the strategy that can be created under Sendai Framework in this context. (150 - 200 Words; 10 Marks)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
##Question:भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए, इस संदर्भ मेंसेन्डाईफ्रेमवर्क के अंतर्गत बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये। (150- 200 शब्द; 10 Marks) Highlighting the reasons for the rising floods in India, Discussing the strategy that can be created under Sendai Framework in this context. (150 - 200 Words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में बाढ़ को संक्षिप्त में समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में भारत में बाढ़ के कारणों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सेंडई फ्रेमवर्क के अनुसार बनाए जा सकने वाली रणनीति की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में बाढ़ के नियंत्रण के संदर्भ में निष्कर्ष की चर्चा कीजिये । उत्तर :- जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर प्रवाहित होने लगता है, तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्यतः यह घटना अचानक और तीव्र होती है ।भारत में बढ़ते बाढ़ के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- · आर्द्रभूमि और तालाबों का अतिक्रमण · जल निकासी और बेहतर सीवरेज का अभाव · अनिश्चित तथा भारी मानसूनी वर्षा । · चक्रवात व तेज पवन । · मैदानी भारत में नदी घाटी के उथले तथा विस्तृत होने से तेजी से जल का फैलाव। · नदियों के टेढ़े-मेढ़े मार्ग तथा उनका मार्ग परिवर्तन भी बाढ़ लाता है । · स्रोत क्षेत्र में तीव्र ढ़ाल का होना । · नदी स्रोत क्षेत्र से वनों की कटाई जल बहाव को तीव्र करता है, जो मैदानी भाग में आकर फैल जाता है। · नदी की तली में अपरदित पदार्थों का जमाव इसकी जल धारण की क्षमता को कम कर देता है। अतः अतिरिक्त पानी बाढ़ लाता है । · ग्रीष्मकाल में हिम का पिघलना । · नदी तटबन्ध का टूट जाना । · अवैज्ञानिक नियोजन भी बाढ़ का प्रमुख कारण है । कई बाढ़ग्रस्त नदियों पर बाँध बनाकर एक क्षेत्र को तो बचा लिया जाता है। परंतु दूसरे क्षेत्र में यह जल अपना प्रभाव दिखाता है। बाढ़ नियंत्रण (प्रबंधन ) के संदर्भ में सेंडई फ्रेमवर्क, रिस्क रीडक्सन पर ज़ोर देता है । जिसके तहत बाढ़ नियंत्रण के संदर्भ में विभिन्न बिन्दुओ पर कार्य किया जाना चाहिए :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन, निगरानी, पूर्वानुमान, प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना बाढ़ की घोषणा करना खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय – बाढ़ प्रबंधन के लिए छोटे-छोटे डैम निर्माण, उसका प्रबंधन और समय समय पर उसकी औडिटिंग गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण, कुशल सिंचाई नीति, कृषि ऋण आदि। क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, बाढ़ प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन आदि को बढ़ावा देना । सामाजिक आवास योजनाओं का प्रभावी प्रबंधन जलमार्ग और जल निकासी की बेहतर प्रभावी नदियों की डिसिल्टिंग का प्रबंधन उपरोक्त बिन्दुओ के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा सैंडई फ्रेमवर्क के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है ताकि रिस्क के खतरे को कम किया जा सके । साथ ही सुभेद्य वर्ग की क्षमता विकास के साथ-साथ कृषि आधारित आय का विविधीकरण, प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन आदि जैसे कार्यो पर भी ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक है ।
46,676
जेंडर बजटिंग से आप क्या समझते हैं? भारत के संदर्भ में महिला सशक्तिकरण के लिए इसकी आवश्यकता पर चर्चा कीजिये। ( 150-200 शब्द) What do you understand by gender budgeting? Discuss the need of it for women empowerment in the Indian context. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: जेंडर बजटिंग को परिभाषित करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद महिला सशक्तिकरण के लिए इसकी आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। जेंडर बजटिंग का आशय बजटीय आवंटन एवं उनके क्रियान्वयन को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने से है जिसमें नीति निर्माण से लेकर परिणाम प्राप्ति तक जेंडर बजट को एक दृष्टिकोण बनाया जाता है। जेंडर बजट अलग से बजट की प्रक्रिया नहीं है परंतु सभी हितधारकों को समेकित करते हुए महिलाओं को अधिकतम लाभ पहुँचाने का एक प्रयास है। जेंडर बजटिंग के निम्नलिखित चार मुख्य आयाम हैं: स्रोतों एवं बजटीय आवंटन को महिलाओं के संदर्भ में आनुपातिक रूप से वितरित किये जाने को सुनिश्चित करना जेंडर बजट सेल इत्यादि माध्यमों से यह सुनिश्चित करना कि लाभार्थी उनके संदर्भ में बनायी जा रही नीतियों से परिचित हों तथा आवश्यक सिविल सोसाइटियों को इस दिशा में मार्गदर्शन एवं क्षमता निर्माण बजट को जेंडर परिप्रेक्ष्य से विश्लेषित करते हुए लेखापरीक्षण की सुविधा जेंडर बजटिंग के अंतर्गत विभिन्न हितधारकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की सुविधा भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्क: महिलाएं, भारत की जनसंख्या का 48% हिस्सा हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसरों आदि जैसे कई सामाजिक संकेतकों पर पुरुषों से पीछे हैं। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे रिपोर्टों के माध्यम से भी भारत में महिलाओं की बदहाल स्थिति को समझा जा सकता है। जेंडर बजटिंगमहिला सशक्तिकरण कोप्राप्त करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि विकास का लाभ महिलाओं तक भी समान रूप से पहुँच सके। बजट आवंटन के पैटर्न के माध्यम से संसाधनों का आवंटन पुरुषों और महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करता है। सरकार जिस तरह से संसाधनों का आवंटन करती है, उसमें लैंगिक असमानताओं को बदलने की क्षमता है। इसे देखते हुए, जेंडर बजटिंग कोलैंगिंक संतुलन को प्राप्त करने के लिए एक उपकरण के रूप मेंसमझा जा सकता है। पर्याप्त संसाधन आवंटन पर बल देकर महिलाओं के लिए नीतिगत प्रतिबद्धता और आवंटन के बीच अंतर को संबोधित करना संभव हो सकता है। लैंगिक संतुलन को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों को लागू करने हेतु प्रोत्साहन को बढ़ावा देना तथा उनके निगरानी एवं मूल्यांकन को भी जेंडर बजटिंग के माध्यम से प्राप्त करना संभव है| महिलाओं की आर्थिक समानता को सुनिश्चित करने हेतुसरकारी बजट की प्रभावशीलता, दक्षता, जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार लाने में जेंडर बजटिंग अहम् रोल अदा कर सकता है। सरकार द्वारा महिलाओं के हित में चलाये जा रहे कार्यक्रमों की आधिकारिक मूल्यांकन तथा वास्तविक मूल्यांकनसे उसकी तुलना को सुनिश्चित करने हेतु। इस प्रकार विवरण से स्पष्ट है कि महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से ही जेंडर बजटिंग को प्रचलन में लाया गया है। अगर जेंडर बजटिंग के विभिन्न आयामों को प्रभावी रूप से ईमानदारी पूर्वक लागू किया जाये तो आधी आबादी के हितों को बेहतर तरीके से लागू करने में यह एक प्रभावी उपकरण सिद्ध हो सकता है।
##Question:जेंडर बजटिंग से आप क्या समझते हैं? भारत के संदर्भ में महिला सशक्तिकरण के लिए इसकी आवश्यकता पर चर्चा कीजिये। ( 150-200 शब्द) What do you understand by gender budgeting? Discuss the need of it for women empowerment in the Indian context. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: जेंडर बजटिंग को परिभाषित करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद महिला सशक्तिकरण के लिए इसकी आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। जेंडर बजटिंग का आशय बजटीय आवंटन एवं उनके क्रियान्वयन को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने से है जिसमें नीति निर्माण से लेकर परिणाम प्राप्ति तक जेंडर बजट को एक दृष्टिकोण बनाया जाता है। जेंडर बजट अलग से बजट की प्रक्रिया नहीं है परंतु सभी हितधारकों को समेकित करते हुए महिलाओं को अधिकतम लाभ पहुँचाने का एक प्रयास है। जेंडर बजटिंग के निम्नलिखित चार मुख्य आयाम हैं: स्रोतों एवं बजटीय आवंटन को महिलाओं के संदर्भ में आनुपातिक रूप से वितरित किये जाने को सुनिश्चित करना जेंडर बजट सेल इत्यादि माध्यमों से यह सुनिश्चित करना कि लाभार्थी उनके संदर्भ में बनायी जा रही नीतियों से परिचित हों तथा आवश्यक सिविल सोसाइटियों को इस दिशा में मार्गदर्शन एवं क्षमता निर्माण बजट को जेंडर परिप्रेक्ष्य से विश्लेषित करते हुए लेखापरीक्षण की सुविधा जेंडर बजटिंग के अंतर्गत विभिन्न हितधारकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की सुविधा भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए जेंडर बजटिंग की आवश्यकता के पक्ष में तर्क: महिलाएं, भारत की जनसंख्या का 48% हिस्सा हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसरों आदि जैसे कई सामाजिक संकेतकों पर पुरुषों से पीछे हैं। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे रिपोर्टों के माध्यम से भी भारत में महिलाओं की बदहाल स्थिति को समझा जा सकता है। जेंडर बजटिंगमहिला सशक्तिकरण कोप्राप्त करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि विकास का लाभ महिलाओं तक भी समान रूप से पहुँच सके। बजट आवंटन के पैटर्न के माध्यम से संसाधनों का आवंटन पुरुषों और महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करता है। सरकार जिस तरह से संसाधनों का आवंटन करती है, उसमें लैंगिक असमानताओं को बदलने की क्षमता है। इसे देखते हुए, जेंडर बजटिंग कोलैंगिंक संतुलन को प्राप्त करने के लिए एक उपकरण के रूप मेंसमझा जा सकता है। पर्याप्त संसाधन आवंटन पर बल देकर महिलाओं के लिए नीतिगत प्रतिबद्धता और आवंटन के बीच अंतर को संबोधित करना संभव हो सकता है। लैंगिक संतुलन को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों को लागू करने हेतु प्रोत्साहन को बढ़ावा देना तथा उनके निगरानी एवं मूल्यांकन को भी जेंडर बजटिंग के माध्यम से प्राप्त करना संभव है| महिलाओं की आर्थिक समानता को सुनिश्चित करने हेतुसरकारी बजट की प्रभावशीलता, दक्षता, जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार लाने में जेंडर बजटिंग अहम् रोल अदा कर सकता है। सरकार द्वारा महिलाओं के हित में चलाये जा रहे कार्यक्रमों की आधिकारिक मूल्यांकन तथा वास्तविक मूल्यांकनसे उसकी तुलना को सुनिश्चित करने हेतु। इस प्रकार विवरण से स्पष्ट है कि महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से ही जेंडर बजटिंग को प्रचलन में लाया गया है। अगर जेंडर बजटिंग के विभिन्न आयामों को प्रभावी रूप से ईमानदारी पूर्वक लागू किया जाये तो आधी आबादी के हितों को बेहतर तरीके से लागू करने में यह एक प्रभावी उपकरण सिद्ध हो सकता है।
46,679
प्राकृतिक वनस्पति के विकास तथा वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए| साथ ही, आर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Mention the factors that affect the growth and distribution of Natural Vegetation. Also, Describe the characteristics of Humid Tropical Evergreen Vegetation. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- प्राकृतिक वनस्पति को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, प्राकृतिक वनस्पति के विकास तथा वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, आर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए| NOTE- इस प्रश्न में, विश्व तथा भारत का छोटा मैप बनाकरआर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति के क्षेत्र को दिखाना ज्यादा प्रभावी रहेगा| उत्तर- प्राकृतिक वनस्पति प्रकृति के महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक हैं| प्राकृतिक वनस्पति से तात्पर्य पौधों की विभिन्न जातियों के समूह से है जो किसी विशिष्ट पर्यावरण में एक दूसरे के साहचर्य में विकसित होती हैं| यह मानवीय सहायता के बिना खुद से वन्य एवं प्राकृतिक अवस्था में उगते हैं| दूसरे शब्दों में, जब वनस्पति लंबे समय तक बिना किसी बाहरी मानवीय हस्तक्षेप के वहां पाई जाने वाली जलवायविक परिस्थितियों में स्वतः विकास करती है तो उसे प्राकृतिक वनस्पति कहा जाता है| प्राकृतिक वनस्पति के विकास तथा वितरण को प्रभावित करने वाले कारक तापमान - एक पौधे को अपने विकास के लिए एक न्यूनतम लगभग 6 डिग्री सेल्सियस मासिक औसत तापमान की आवश्यकता होती है| इससे कम तापमान या अत्यधिक तापमान(30 डिग्री सेल्सियस से अधिक) पर पौधे नष्ट होने लगते हैं| तापमान की भिन्नता वनस्पतियों के आकार-प्रकार में भी परिवर्तन का कारण बनती है| इसका स्पष्ट उदाहरण भारत के विभिन्न भागों में देखा जा सकता है जैसे- अरुणाचल प्रदेश व असम दोनों राज्यों में अत्यधिक वर्षा होती है किंतु अरुणाचल प्रदेश में तापमान कम रहने के कारण वहां की वनस्पति के आकार-प्रकार में असम की वनस्पति से अंतर पाया जाता है| साथ ही, तापमान द्वारा वनों के प्रकार तथा लकड़ी की गुणवता भी प्रभावित होती है| वर्षा - यह वनस्पतियों के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक है| विभिन्न पौधों हेतु वर्षा की भिन्न-भिन्न मात्रा की आवश्यकता होती है| वर्षा की उपलब्धता के अनुसार वनस्पति के स्वरूप में भी परिवर्तन होने लगता है| वर्षा की मात्रा में कमी आने के साथ वनस्पति की सघनता, जैव भार एवं जैव विविधता में भी कमी आती जाती है| मृदा - मृदा के प्रकार एवं उसकी अपनी अलग विशेषता का भी वनस्पति पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है| जैसे- भारत में काली मृदा के क्षेत्रों की वनस्पति जलोढ़ मृदा के क्षेत्रों की वनस्पति से भिन्न होती है| इसी प्रकार रेतीली मृदा में भी विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है| धरातलीय स्वरूप तथा ढ़ाल की प्रवृति - धरातलीय स्वरूप भी वनस्पतियों को प्रभावित करता है| हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा एवं तापमान का वनस्पति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है| यहाँ ऊंचाई तथा तापमान ने वनस्पति के स्वरूप को निर्धारित किया है| जलवायु और धरातलीय स्वरूप में अंतर होने के कारण भारत में उष्ण और शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों ही प्रकार की वनस्पति पाई जाती है| सूर्य का प्रकाश - सूर्य का प्रकाश पौधों की वृद्धि में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो कि प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया हेतु आवश्यक है| वाष्पीकरण का प्रभाव; अन्य जीवों की उपस्थिति; मानव हस्तक्षेप का प्रभाव; आर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति ये उष्णकटिबंधीय वर्षा वन होते हैं जो उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहां अल्पकालिक शुष्क ऋतु, वार्षिक वर्षा 250 सेंटीमीटर से अधिक एवं वर्ष भर आर्द्रता 77% के लगभग होती है| यहां वार्षिक तापमान 22 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है| यह वनस्पति विषुवतीय वनस्पति के समान सघन होती है और वर्ष भर हरी-भरी रहती है| इन वनों में प्रति इकाई क्षेत्र पर पेड़-पौधों एवं लताओं की अत्यंत गहन और सघन परत होती है| यहां भूमि के नजदीक झाड़ियां और लताएं होती है एवं इनके ऊपर छोटे कद वाले पेड़ तथा सबसे ऊपर लम्बे वृक्ष होते हैं| इन वनों का वाणिज्यिक उपयोग संभव नहीं हो पाता है| इन पेड़ों की लकड़ी अधिक कठोर एवं भारी होती है और मिश्रित रूप में पाई जाती है जिसके कारण इन्हें काटने एवं ले जाने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है| अतः ये वन लकड़ी उद्योग के लिए आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं होते हैं| इन वनों की शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता भी सर्वाधिक होती है| यहाँ पाए जाने वाले वृक्षों में सिनकोना, महोगनी, रोजवुड, आर्किड, आबूनस, बाँस और ताड़ प्रमुख हैं| चूँकि, इन पेड़ों के पत्ते झड़ने, फूल आने और फल लगने का समय अलग-अलग है इसलिए यह वर्ष भर हरे-भरे दिखाई देते हैं जिसकी वजह से इन्हें सदाबहार वन कहा जाता है| भारत में इस प्रकार की वनस्पति का विकास पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर, केरल, कर्नाटक, उत्तर पूर्वी पहाड़ियों तथा अंडमान एवं निकोबार दीप समूह में हुआ है|
##Question:प्राकृतिक वनस्पति के विकास तथा वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए| साथ ही, आर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Mention the factors that affect the growth and distribution of Natural Vegetation. Also, Describe the characteristics of Humid Tropical Evergreen Vegetation. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- प्राकृतिक वनस्पति को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, प्राकृतिक वनस्पति के विकास तथा वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, आर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए| NOTE- इस प्रश्न में, विश्व तथा भारत का छोटा मैप बनाकरआर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति के क्षेत्र को दिखाना ज्यादा प्रभावी रहेगा| उत्तर- प्राकृतिक वनस्पति प्रकृति के महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक हैं| प्राकृतिक वनस्पति से तात्पर्य पौधों की विभिन्न जातियों के समूह से है जो किसी विशिष्ट पर्यावरण में एक दूसरे के साहचर्य में विकसित होती हैं| यह मानवीय सहायता के बिना खुद से वन्य एवं प्राकृतिक अवस्था में उगते हैं| दूसरे शब्दों में, जब वनस्पति लंबे समय तक बिना किसी बाहरी मानवीय हस्तक्षेप के वहां पाई जाने वाली जलवायविक परिस्थितियों में स्वतः विकास करती है तो उसे प्राकृतिक वनस्पति कहा जाता है| प्राकृतिक वनस्पति के विकास तथा वितरण को प्रभावित करने वाले कारक तापमान - एक पौधे को अपने विकास के लिए एक न्यूनतम लगभग 6 डिग्री सेल्सियस मासिक औसत तापमान की आवश्यकता होती है| इससे कम तापमान या अत्यधिक तापमान(30 डिग्री सेल्सियस से अधिक) पर पौधे नष्ट होने लगते हैं| तापमान की भिन्नता वनस्पतियों के आकार-प्रकार में भी परिवर्तन का कारण बनती है| इसका स्पष्ट उदाहरण भारत के विभिन्न भागों में देखा जा सकता है जैसे- अरुणाचल प्रदेश व असम दोनों राज्यों में अत्यधिक वर्षा होती है किंतु अरुणाचल प्रदेश में तापमान कम रहने के कारण वहां की वनस्पति के आकार-प्रकार में असम की वनस्पति से अंतर पाया जाता है| साथ ही, तापमान द्वारा वनों के प्रकार तथा लकड़ी की गुणवता भी प्रभावित होती है| वर्षा - यह वनस्पतियों के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक है| विभिन्न पौधों हेतु वर्षा की भिन्न-भिन्न मात्रा की आवश्यकता होती है| वर्षा की उपलब्धता के अनुसार वनस्पति के स्वरूप में भी परिवर्तन होने लगता है| वर्षा की मात्रा में कमी आने के साथ वनस्पति की सघनता, जैव भार एवं जैव विविधता में भी कमी आती जाती है| मृदा - मृदा के प्रकार एवं उसकी अपनी अलग विशेषता का भी वनस्पति पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है| जैसे- भारत में काली मृदा के क्षेत्रों की वनस्पति जलोढ़ मृदा के क्षेत्रों की वनस्पति से भिन्न होती है| इसी प्रकार रेतीली मृदा में भी विभिन्न प्रकार की वनस्पति पाई जाती है| धरातलीय स्वरूप तथा ढ़ाल की प्रवृति - धरातलीय स्वरूप भी वनस्पतियों को प्रभावित करता है| हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा एवं तापमान का वनस्पति पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है| यहाँ ऊंचाई तथा तापमान ने वनस्पति के स्वरूप को निर्धारित किया है| जलवायु और धरातलीय स्वरूप में अंतर होने के कारण भारत में उष्ण और शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों ही प्रकार की वनस्पति पाई जाती है| सूर्य का प्रकाश - सूर्य का प्रकाश पौधों की वृद्धि में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो कि प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया हेतु आवश्यक है| वाष्पीकरण का प्रभाव; अन्य जीवों की उपस्थिति; मानव हस्तक्षेप का प्रभाव; आर्द्र उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनस्पति ये उष्णकटिबंधीय वर्षा वन होते हैं जो उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहां अल्पकालिक शुष्क ऋतु, वार्षिक वर्षा 250 सेंटीमीटर से अधिक एवं वर्ष भर आर्द्रता 77% के लगभग होती है| यहां वार्षिक तापमान 22 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है| यह वनस्पति विषुवतीय वनस्पति के समान सघन होती है और वर्ष भर हरी-भरी रहती है| इन वनों में प्रति इकाई क्षेत्र पर पेड़-पौधों एवं लताओं की अत्यंत गहन और सघन परत होती है| यहां भूमि के नजदीक झाड़ियां और लताएं होती है एवं इनके ऊपर छोटे कद वाले पेड़ तथा सबसे ऊपर लम्बे वृक्ष होते हैं| इन वनों का वाणिज्यिक उपयोग संभव नहीं हो पाता है| इन पेड़ों की लकड़ी अधिक कठोर एवं भारी होती है और मिश्रित रूप में पाई जाती है जिसके कारण इन्हें काटने एवं ले जाने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है| अतः ये वन लकड़ी उद्योग के लिए आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं होते हैं| इन वनों की शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता भी सर्वाधिक होती है| यहाँ पाए जाने वाले वृक्षों में सिनकोना, महोगनी, रोजवुड, आर्किड, आबूनस, बाँस और ताड़ प्रमुख हैं| चूँकि, इन पेड़ों के पत्ते झड़ने, फूल आने और फल लगने का समय अलग-अलग है इसलिए यह वर्ष भर हरे-भरे दिखाई देते हैं जिसकी वजह से इन्हें सदाबहार वन कहा जाता है| भारत में इस प्रकार की वनस्पति का विकास पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर, केरल, कर्नाटक, उत्तर पूर्वी पहाड़ियों तथा अंडमान एवं निकोबार दीप समूह में हुआ है|
46,690
जम्मू कश्मीर में विद्यमान अलगाववाद और आतंकवाद के उन्मूलन को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 370 और 35 / ए का उन्मूलन कहाँ तक तर्कसंगत होगा ? ( 150 - 200 शब्द ) To what extent would the elimination of Articles 370 and 35 / A be reasonable in view of the elimination of separatism and terrorism existing in Jammu and Kashmir? (150 - 200 words)
जम्मू कश्मीर में विद्यमान अलगाववाद और आतंकवाद के उन्मूलन को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 370 और 35 / ए का उन्मूलन कहाँ तक तर्कसंगत होगा ? ( 150 - 200 शब्द ) To what extent would the elimination of Articles 370 and 35 / A be reasonable in view of the elimination of separatism and terrorism existing in Jammu and Kashmir? (150 - 200 words) दृष्टिकोण :- · भूमिका में जम्मू- कश्मीर में फैले अलगाववाद और आतंकवाद की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में इनसे उत्पन्न समस्याओं की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये विशेषकर 370 / ए और 35/ए की समाप्ती के संदर्भ में । · उत्तर के अंत में निष्कर्ष में अन्य उपायों की भी चर्चा कीजिये । उत्तर :- जम्मू कश्मीर में अलगाववादी भावनाओ तथा आतंकवादी गतिविधियों का प्रचार- प्रसार मुख्यतः पाकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित लोगों द्वारा किया जाता है । 1990 के प्रारंभ से आतंकवादी गतिविधियां तेज होना शुरू हुई थीं। आतंकवादी गतिविधियों से तात्पर्य ऐसी गतिविधियों से है जो एक विशेष विचारधारा से प्रभावित होकर, भारतीय संविधान के विरुद्ध , सशस्त्र और हिंसात्मक तरीके से सरकार और जनता के अंदर डर पैदा करके सरकार के सामने अपने हितों को मनवाने का प्रयास करते हैं । वर्तमान में आतंकवाद सिर्फ भारत की ही नही, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि भारत के संदर्भ में आतंकवाद एक विदेशी राज्य प्रायोजित आतंकवाद है । जिसके अंतर्गत पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन भारत में आतंकी गतिविधियो को अंजाम देते हैं । भारत में 1993 के सीरियल बॉम्ब ब्लास्ट , 2000-01 के बॉम्ब ब्लास्ट , 2008 का मुंबई हमला आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । इसके साथ ही पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के अलगाववादियों को वित्तीय मदद उपलब्ध कारवाई जाती है , जिसकी मदद से वे युवाओं को बरगलाने में कभी – कभी सफल हो जाते हैं । इन अलगाववादी और आतंकवादी गतिविधियों के कारण जम्मू –कश्मीर मे निम्नलिखित समस्यायेँ उत्पन्न हो गई हैं : - · देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरा · निवेश और उद्योगों के विकास में बाधक · रोजगार के अवसरों की समस्या · कानून और व्यवस्था की समस्या तथा उस पर अतिरिक्त खर्च · राजनीतिक स्थिरता और राजनीतिक व्यवस्था सशक्तिकरण में बाधक · सामाजिक समभाव और समरसता में बाधक सरकार द्वारा अलगाववाद और आतंकवाद की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विकास परक कार्यों के साथ – साथ शक्ति के आनुपातिक प्रयोग दोनों पर बल दिया जाता है । यहाँ शक्ति के आनुपातिक प्रयोग से तात्पर्य अपस्फ़ा कानून के तहत सशस्त्र बलों को तलाशी और पूछ-ताछ के अधिकार प्रदान करना , नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ को रोकना , आतंकवादियों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करना आदि शामिल हैं । इसके साथ ही कश्मीर में समान्यतः यह देखा जाता है कि आतंकी अभियानों के दौरान यहाँ के भटके युवा द्वारा सेना पर पत्थर आदि फेकने की घटनाएँ सामने आ रही थी । साथ ही स्थानीय पोलिस राज्यसरकार के अंतर्गत होने के कारण ऐसी घटनाओ पर प्रभावी लगाम नही लग पा रहा था । साथ ही अनुच्छेद 370 / ए और 35/ ए जैसे संवैधानिक प्रावधान जम्मू – कश्मीर को भारत का एक पूर्ण राज्य बनने में बाधक था । जोकि जम्मू – कश्मीर के लिए अलग संविधान , अलग झण्डा और कानून व्यवस्था के नियमों का प्रावधान करता था । साथ ही अनुच्छेद 35 / ए वहाँ की सामाजिक विविधता में बाधक था , जिसके कारण शेष भारत का कोई भी नागरिक जम्मू – कश्मीर में स्थायी निवासी नही हो सकता था । ये सभी प्रावधान वहाँ के लोगों में अलगाव की भावना बढ़ाने और शेष देश के साथ उनके एकीकरण में समस्या उत्पन्न करते थे । उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए सरकार द्वारा हाल ही में अनुच्छेद 370 /ए और 35 / ए को समाप्त कर दिया गया । साथ ही जम्मू – कश्मीर को एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में परिवर्तित कर दिया गया ।साथ ही वह दिल्ली जैसे केंद्र शासित प्रदेश की तरह विधान सभा का भी प्रावधान किया है , ताकि जन प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता के लिए कल्याणकारी योजनाओ को बढ़ावा दिया जा सके । इन प्रावधानों के साथ ही केंद्र सरकार आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में स्थानीय पोलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियो में आपसी समन्वय और सहयोग को बढ़ावा दे सकेगा । जिससे आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था को बेहतर किया जा सकेगा । क्योकि आर्थिक विकास के लिए उस क्षेत्र में शांति और कानून व्यवस्था का होना पहली प्राथमिक शर्त है । इसके साथ ही सरकार को कुछ अन्य विकास परक कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित किए जाने के साथ – साथ कुछ अन्य कदम भी उठाएँ जाने की आवश्यकता है । जैसे :- विकास परक कार्यक्रमों जैसे हिमायत योजना, भारत दर्शन योजना, उम्मीद कार्यक्रम आदि का प्रभावी क्रियान्वयन । पाकिस्तान पर दबाव बनाना ( अमेरिकी वित्त में कमी, बलूचिस्तान मुद्दा, अफगानिस्तान सहयोग आदि ) आधुनिकीकरण को बढ़ावा जिसके तहत रोजगार, शिक्षा, शहरीकरण, गत्यात्मकता, समृद्धि दर आदि को बढ़ावा राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना आदि को जागृत करने का प्रयास सैन्य सशक्तता के अंतर्गत सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम अलगाववादी नेताओं पर नियंत्रण, बहावी विचारधारा, अलगाववाद और धार्मिक चरमपंथ पर रोक गुजराल सिद्धान्त पर पुर्नविचार होना चाहिए सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए उपरोक्त उपायों द्वारा सरकार कश्मीर में फैले अलगाववाद और आतंकवाद से निपटने के प्रयास कर रही है । जिसमे विकास और शक्ति दोनों का आनुपातिक समावेश शामिल है । साथ ही सरकार ने आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टोलेरेन्स की नीति को अपनाया है ।
##Question:जम्मू कश्मीर में विद्यमान अलगाववाद और आतंकवाद के उन्मूलन को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 370 और 35 / ए का उन्मूलन कहाँ तक तर्कसंगत होगा ? ( 150 - 200 शब्द ) To what extent would the elimination of Articles 370 and 35 / A be reasonable in view of the elimination of separatism and terrorism existing in Jammu and Kashmir? (150 - 200 words)##Answer:जम्मू कश्मीर में विद्यमान अलगाववाद और आतंकवाद के उन्मूलन को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 370 और 35 / ए का उन्मूलन कहाँ तक तर्कसंगत होगा ? ( 150 - 200 शब्द ) To what extent would the elimination of Articles 370 and 35 / A be reasonable in view of the elimination of separatism and terrorism existing in Jammu and Kashmir? (150 - 200 words) दृष्टिकोण :- · भूमिका में जम्मू- कश्मीर में फैले अलगाववाद और आतंकवाद की चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में इनसे उत्पन्न समस्याओं की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये विशेषकर 370 / ए और 35/ए की समाप्ती के संदर्भ में । · उत्तर के अंत में निष्कर्ष में अन्य उपायों की भी चर्चा कीजिये । उत्तर :- जम्मू कश्मीर में अलगाववादी भावनाओ तथा आतंकवादी गतिविधियों का प्रचार- प्रसार मुख्यतः पाकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित लोगों द्वारा किया जाता है । 1990 के प्रारंभ से आतंकवादी गतिविधियां तेज होना शुरू हुई थीं। आतंकवादी गतिविधियों से तात्पर्य ऐसी गतिविधियों से है जो एक विशेष विचारधारा से प्रभावित होकर, भारतीय संविधान के विरुद्ध , सशस्त्र और हिंसात्मक तरीके से सरकार और जनता के अंदर डर पैदा करके सरकार के सामने अपने हितों को मनवाने का प्रयास करते हैं । वर्तमान में आतंकवाद सिर्फ भारत की ही नही, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि भारत के संदर्भ में आतंकवाद एक विदेशी राज्य प्रायोजित आतंकवाद है । जिसके अंतर्गत पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन भारत में आतंकी गतिविधियो को अंजाम देते हैं । भारत में 1993 के सीरियल बॉम्ब ब्लास्ट , 2000-01 के बॉम्ब ब्लास्ट , 2008 का मुंबई हमला आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । इसके साथ ही पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के अलगाववादियों को वित्तीय मदद उपलब्ध कारवाई जाती है , जिसकी मदद से वे युवाओं को बरगलाने में कभी – कभी सफल हो जाते हैं । इन अलगाववादी और आतंकवादी गतिविधियों के कारण जम्मू –कश्मीर मे निम्नलिखित समस्यायेँ उत्पन्न हो गई हैं : - · देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरा · निवेश और उद्योगों के विकास में बाधक · रोजगार के अवसरों की समस्या · कानून और व्यवस्था की समस्या तथा उस पर अतिरिक्त खर्च · राजनीतिक स्थिरता और राजनीतिक व्यवस्था सशक्तिकरण में बाधक · सामाजिक समभाव और समरसता में बाधक सरकार द्वारा अलगाववाद और आतंकवाद की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विकास परक कार्यों के साथ – साथ शक्ति के आनुपातिक प्रयोग दोनों पर बल दिया जाता है । यहाँ शक्ति के आनुपातिक प्रयोग से तात्पर्य अपस्फ़ा कानून के तहत सशस्त्र बलों को तलाशी और पूछ-ताछ के अधिकार प्रदान करना , नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ को रोकना , आतंकवादियों के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही करना आदि शामिल हैं । इसके साथ ही कश्मीर में समान्यतः यह देखा जाता है कि आतंकी अभियानों के दौरान यहाँ के भटके युवा द्वारा सेना पर पत्थर आदि फेकने की घटनाएँ सामने आ रही थी । साथ ही स्थानीय पोलिस राज्यसरकार के अंतर्गत होने के कारण ऐसी घटनाओ पर प्रभावी लगाम नही लग पा रहा था । साथ ही अनुच्छेद 370 / ए और 35/ ए जैसे संवैधानिक प्रावधान जम्मू – कश्मीर को भारत का एक पूर्ण राज्य बनने में बाधक था । जोकि जम्मू – कश्मीर के लिए अलग संविधान , अलग झण्डा और कानून व्यवस्था के नियमों का प्रावधान करता था । साथ ही अनुच्छेद 35 / ए वहाँ की सामाजिक विविधता में बाधक था , जिसके कारण शेष भारत का कोई भी नागरिक जम्मू – कश्मीर में स्थायी निवासी नही हो सकता था । ये सभी प्रावधान वहाँ के लोगों में अलगाव की भावना बढ़ाने और शेष देश के साथ उनके एकीकरण में समस्या उत्पन्न करते थे । उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए सरकार द्वारा हाल ही में अनुच्छेद 370 /ए और 35 / ए को समाप्त कर दिया गया । साथ ही जम्मू – कश्मीर को एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में परिवर्तित कर दिया गया ।साथ ही वह दिल्ली जैसे केंद्र शासित प्रदेश की तरह विधान सभा का भी प्रावधान किया है , ताकि जन प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता के लिए कल्याणकारी योजनाओ को बढ़ावा दिया जा सके । इन प्रावधानों के साथ ही केंद्र सरकार आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में स्थानीय पोलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियो में आपसी समन्वय और सहयोग को बढ़ावा दे सकेगा । जिससे आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था को बेहतर किया जा सकेगा । क्योकि आर्थिक विकास के लिए उस क्षेत्र में शांति और कानून व्यवस्था का होना पहली प्राथमिक शर्त है । इसके साथ ही सरकार को कुछ अन्य विकास परक कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित किए जाने के साथ – साथ कुछ अन्य कदम भी उठाएँ जाने की आवश्यकता है । जैसे :- विकास परक कार्यक्रमों जैसे हिमायत योजना, भारत दर्शन योजना, उम्मीद कार्यक्रम आदि का प्रभावी क्रियान्वयन । पाकिस्तान पर दबाव बनाना ( अमेरिकी वित्त में कमी, बलूचिस्तान मुद्दा, अफगानिस्तान सहयोग आदि ) आधुनिकीकरण को बढ़ावा जिसके तहत रोजगार, शिक्षा, शहरीकरण, गत्यात्मकता, समृद्धि दर आदि को बढ़ावा राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना आदि को जागृत करने का प्रयास सैन्य सशक्तता के अंतर्गत सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम अलगाववादी नेताओं पर नियंत्रण, बहावी विचारधारा, अलगाववाद और धार्मिक चरमपंथ पर रोक गुजराल सिद्धान्त पर पुर्नविचार होना चाहिए सोशल मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए उपरोक्त उपायों द्वारा सरकार कश्मीर में फैले अलगाववाद और आतंकवाद से निपटने के प्रयास कर रही है । जिसमे विकास और शक्ति दोनों का आनुपातिक समावेश शामिल है । साथ ही सरकार ने आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टोलेरेन्स की नीति को अपनाया है ।
46,693
भारत में गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षिप्त परिचय देते हुए, राष्ट्रीय आन्दोलन में इनके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a brief introduction of Gandhiji"s early movements in India, underline their importance in the national movement. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में गांधीजी के भारत आगमन का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | तदोपरांत इन आन्दोलनों के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के लम्बे प्रवास के बाद , जो लगभग 20 वर्ष था , भारत में एक राष्ट्रवादी , सिद्धांतवादी और आयोजक के रूप में उन्हें बहुत सम्मान दिया | उन्हें गोपालकृष्ण गोखले द्वारा आमंत्रित किया गया था , जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे | महात्मा गाँधी के भारत लौटने पर , गोखले ने उन्हें भारत में मौजूदा राजनीतिक स्थिति और उस समय के सामाजिक मुद्दों से परिचित कराया एवं उन्हें निर्देशित किया | भारत में गांधीजी द्वारा प्रारंभ किये गए आन्दोलन - 1.1917 का चंपारण सत्याग्रह - यह महात्मा गाँधी द्वारा प्रेरित पहला सत्याग्रह आन्दोलन था और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में एक बड़ा विद्रोह था | इस आन्दोलन ने गाँधी जी के ब्रिटिश आगमन को चिन्हित किया | इस आन्दोलन में अंग्रेज बागान मालिकों के नियमों के अनुसार चंपारण के किसानों का अपनी जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य था | इसे ही तिनकठिया पद्धति कहते थे | गाँधी जी ने किसानों से बातचीत कर के एक रिपोर्ट तैयार की और 1919 में गन चंपारण कृषक क़ानून पारित हो गया | 2. अहमदाबाद सत्याग्रह 1918 -प्लेग बोनस को लेकर पूंजीपतियों एवं मजदूर वर्ग के मध्य विवाद था | मजदूर बढ़ी मजदूरी का 50% बनाये रखना चाहते थे तथा पूंजीपति 20% देने को तैयार थे | गांधी जी ने मध्यस्थता में 35% की मांग की पूंजीपतियों द्वारा इंकार करने पर गांधी जी ने अनशन किया | बाद में पूंजीपति मान गए | 3. खेड़ा सत्याग्रह 1919 - प्राकृतिक कारणों से फसलों का नुकसान जैसे सूखे के कारण , भू - राजस्व कानून में यह प्रावधान था कि यदि उपज 25% से कम हो तो सरकार भू राजस्व नहीं वसूलेगी | गाँधी जी ने कर न देने को कहा | सरकार ने भी यह गुप्त आदेश जारी किया कि जो सक्षम न हो , उनसे भू-राजस्व नहीं लिया जाएगा | राष्ट्रीय आन्दोलन में इन आन्दोलनों का महत्त्व - इन मुद्दों को महत्व देने से गाँधी जी की छवि एक जननेता के रूप में मजबूत हुयी | इन आन्दोलनों के दौरान गाँधीवादी सत्याग्रह के विभिन्न तरीके भारतीय भूमि पर आजमाए गए जैसे कर न देना , अनशन करना , आदेश न मानना इत्यादि | आन्दोलनों के दौरान युवा नेताओं का सहयोग जो आगे चलकर गाँधीवादी नेता के रूप में चर्चित हुए जैसे सरदार पटेल इत्यादि | इन वर्गों को महत्त्व देने से यह संकेत मिला कि राष्ट्रीय आन्दोलनों में ग्रामीण भारत एवं आम लोगों की भूमिका निर्णायक होगी | गाँधी जी की अखिल भारतीय नेता के रूप में पहचान और मजबूत हुई | गाँधीवादी विचारधारा से भारतीय समाज में नयी क्रांति का संचार हुआ और इस विचारधारा का प्रभाव स्वतंत्रता के पश्चात् भी देखा जा सकता है | गाँधी जी का योगदान न केवल उल्लेखनीय है बल्कि अनुकरणीय भी है | उन्होंने स्वतंत्रता के मूल्य को महसूस कराया तथा सत्याग्रह को सर्वोत्तम व अचूक हथियार का दर्जा दिया और उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को काट दिया है और लोगों से भी काटने का आवाह्न किया है | भारत के लोग करोड़ों की संख्या में सबसे आगे आये और अंततः 1947 में भारत अंग्रेजों के शासन से सदा के लिए मुक्त हो गया |
##Question:भारत में गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षिप्त परिचय देते हुए, राष्ट्रीय आन्दोलन में इनके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a brief introduction of Gandhiji"s early movements in India, underline their importance in the national movement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में गांधीजी के भारत आगमन का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | तदोपरांत इन आन्दोलनों के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के लम्बे प्रवास के बाद , जो लगभग 20 वर्ष था , भारत में एक राष्ट्रवादी , सिद्धांतवादी और आयोजक के रूप में उन्हें बहुत सम्मान दिया | उन्हें गोपालकृष्ण गोखले द्वारा आमंत्रित किया गया था , जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे | महात्मा गाँधी के भारत लौटने पर , गोखले ने उन्हें भारत में मौजूदा राजनीतिक स्थिति और उस समय के सामाजिक मुद्दों से परिचित कराया एवं उन्हें निर्देशित किया | भारत में गांधीजी द्वारा प्रारंभ किये गए आन्दोलन - 1.1917 का चंपारण सत्याग्रह - यह महात्मा गाँधी द्वारा प्रेरित पहला सत्याग्रह आन्दोलन था और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में एक बड़ा विद्रोह था | इस आन्दोलन ने गाँधी जी के ब्रिटिश आगमन को चिन्हित किया | इस आन्दोलन में अंग्रेज बागान मालिकों के नियमों के अनुसार चंपारण के किसानों का अपनी जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य था | इसे ही तिनकठिया पद्धति कहते थे | गाँधी जी ने किसानों से बातचीत कर के एक रिपोर्ट तैयार की और 1919 में गन चंपारण कृषक क़ानून पारित हो गया | 2. अहमदाबाद सत्याग्रह 1918 -प्लेग बोनस को लेकर पूंजीपतियों एवं मजदूर वर्ग के मध्य विवाद था | मजदूर बढ़ी मजदूरी का 50% बनाये रखना चाहते थे तथा पूंजीपति 20% देने को तैयार थे | गांधी जी ने मध्यस्थता में 35% की मांग की पूंजीपतियों द्वारा इंकार करने पर गांधी जी ने अनशन किया | बाद में पूंजीपति मान गए | 3. खेड़ा सत्याग्रह 1919 - प्राकृतिक कारणों से फसलों का नुकसान जैसे सूखे के कारण , भू - राजस्व कानून में यह प्रावधान था कि यदि उपज 25% से कम हो तो सरकार भू राजस्व नहीं वसूलेगी | गाँधी जी ने कर न देने को कहा | सरकार ने भी यह गुप्त आदेश जारी किया कि जो सक्षम न हो , उनसे भू-राजस्व नहीं लिया जाएगा | राष्ट्रीय आन्दोलन में इन आन्दोलनों का महत्त्व - इन मुद्दों को महत्व देने से गाँधी जी की छवि एक जननेता के रूप में मजबूत हुयी | इन आन्दोलनों के दौरान गाँधीवादी सत्याग्रह के विभिन्न तरीके भारतीय भूमि पर आजमाए गए जैसे कर न देना , अनशन करना , आदेश न मानना इत्यादि | आन्दोलनों के दौरान युवा नेताओं का सहयोग जो आगे चलकर गाँधीवादी नेता के रूप में चर्चित हुए जैसे सरदार पटेल इत्यादि | इन वर्गों को महत्त्व देने से यह संकेत मिला कि राष्ट्रीय आन्दोलनों में ग्रामीण भारत एवं आम लोगों की भूमिका निर्णायक होगी | गाँधी जी की अखिल भारतीय नेता के रूप में पहचान और मजबूत हुई | गाँधीवादी विचारधारा से भारतीय समाज में नयी क्रांति का संचार हुआ और इस विचारधारा का प्रभाव स्वतंत्रता के पश्चात् भी देखा जा सकता है | गाँधी जी का योगदान न केवल उल्लेखनीय है बल्कि अनुकरणीय भी है | उन्होंने स्वतंत्रता के मूल्य को महसूस कराया तथा सत्याग्रह को सर्वोत्तम व अचूक हथियार का दर्जा दिया और उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को काट दिया है और लोगों से भी काटने का आवाह्न किया है | भारत के लोग करोड़ों की संख्या में सबसे आगे आये और अंततः 1947 में भारत अंग्रेजों के शासन से सदा के लिए मुक्त हो गया |
46,695
भारत में गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षिप्त परिचय देते हुए, राष्ट्रीय आन्दोलन में इनके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a brief introduction of Gandhiji"s early movements in India, underline its importance in the national movement. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में गांधीजी के भारत आगमन का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | तदोपरांत इन आन्दोलनों के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के लम्बे प्रवास के बाद , जो लगभग 20 वर्ष था , भारत में एक राष्ट्रवादी , सिद्धांतवादी और आयोजक के रूप में उन्हें बहुत सम्मान दिया | उन्हें गोपालकृष्ण गोखले द्वारा आमंत्रित किया गया था , जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे | महात्मा गाँधी के भारत लौटने पर , गोखले ने उन्हें भारत में मौजूदा राजनीतिक स्थिति और उस समय के सामाजिक मुद्दों से परिचित कराया एवं उन्हें निर्देशित किया | भारत में गांधीजी द्वारा प्रारंभ किये गए आन्दोलन - 1. 1917 का चंपारण सत्याग्रह - यह महात्मा गाँधी द्वारा प्रेरित पहला सत्याग्रह आन्दोलन था और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में एक बड़ा विद्रोह था | इस आन्दोलन ने गाँधी जी के ब्रिटिश आगमन को चिन्हित किया | इस आन्दोलन में अंग्रेज बागान मालिकों के नियमों के अनुसार चंपारण के किसानों का अपनी जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य था | इसे ही तिनकठिया पद्धति कहते थे | गाँधी जी ने किसानों से बातचीत कर के एक रिपोर्ट तैयार की और 1919 में गन चंपारण कृषक क़ानून पारित हो गया | 2. अहमदाबाद सत्याग्रह 1918 - प्लेग बोनस को लेकर पूंजीपतियों एवं मजदूर वर्ग के मध्य विवाद था | मजदूर बढ़ी मजदूरी का 50% बनाये रखना चाहते थे तथा पूंजीपति 20% देने को तैयार थे | गांधी जी ने मध्यस्थता में 35% की मांग की पूंजीपतियों द्वारा इंकार करने पर गांधी जी ने अनशन किया | बाद में पूंजीपति मान गए | 3. खेड़ा सत्याग्रह 1919 - प्राकृतिक कारणों से फसलों का नुकसान जैसे सूखे के कारण , भू - राजस्व कानून में यह प्रावधान था कि यदि उपज 25% से कम हो तो सरकार भू राजस्व नहीं वसूलेगी | गाँधी जी ने कर न देने को कहा | सरकार ने भी यह गुप्त आदेश जारी किया कि जो सक्षम न हो , उनसे भू-राजस्व नहीं लिया जाएगा | राष्ट्रीय आन्दोलन में इन आन्दोलनों का महत्त्व - इन मुद्दों को महत्व देने से गाँधी जी की छवि एक जननेता के रूप में मजबूत हुयी | इन आन्दोलनों के दौरान गाँधीवादी सत्याग्रह के विभिन्न तरीके भारतीय भूमि पर आजमाए गए जैसे कर न देना , अनशन करना , आदेश न मानना इत्यादि | आन्दोलनों के दौरान युवा नेताओं का सहयोग जो आगे चलकर गाँधीवादी नेता के रूप में चर्चित हुए जैसे सरदार पटेल इत्यादि | इन वर्गों को महत्त्व देने से यह संकेत मिला कि राष्ट्रीय आन्दोलनों में ग्रामीण भारत एवं आम लोगों की भूमिका निर्णायक होगी | गाँधी जी की अखिल भारतीय नेता के रूप में पहचान और मजबूत हुई | गाँधीवादी विचारधारा से भारतीय समाज में नयी क्रांति का संचार हुआ और इस विचारधारा का प्रभाव स्वतंत्रता के पश्चात् भी देखा जा सकता है | गाँधी जी का योगदान न केवल उल्लेखनीय है बल्कि अनुकरणीय भी है | उन्होंने स्वतंत्रता के मूल्य को महसूस कराया तथा सत्याग्रह को सर्वोत्तम व अचूक हथियार का दर्जा दिया और उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को काट दिया है और लोगों से भी काटने का आवाह्न किया है | भारत के लोग करोड़ों की संख्या में सबसे आगे आये और अंततः 1947 में भारत अंग्रेजों के शासन से सदा के लिए मुक्त हो गया |
##Question:भारत में गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षिप्त परिचय देते हुए, राष्ट्रीय आन्दोलन में इनके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a brief introduction of Gandhiji"s early movements in India, underline its importance in the national movement. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में गांधीजी के भारत आगमन का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके बाद गांधीजी के प्रारंभिक आन्दोलनों का संक्षेप में वर्णन कीजिये | तदोपरांत इन आन्दोलनों के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के लम्बे प्रवास के बाद , जो लगभग 20 वर्ष था , भारत में एक राष्ट्रवादी , सिद्धांतवादी और आयोजक के रूप में उन्हें बहुत सम्मान दिया | उन्हें गोपालकृष्ण गोखले द्वारा आमंत्रित किया गया था , जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे | महात्मा गाँधी के भारत लौटने पर , गोखले ने उन्हें भारत में मौजूदा राजनीतिक स्थिति और उस समय के सामाजिक मुद्दों से परिचित कराया एवं उन्हें निर्देशित किया | भारत में गांधीजी द्वारा प्रारंभ किये गए आन्दोलन - 1. 1917 का चंपारण सत्याग्रह - यह महात्मा गाँधी द्वारा प्रेरित पहला सत्याग्रह आन्दोलन था और भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में एक बड़ा विद्रोह था | इस आन्दोलन ने गाँधी जी के ब्रिटिश आगमन को चिन्हित किया | इस आन्दोलन में अंग्रेज बागान मालिकों के नियमों के अनुसार चंपारण के किसानों का अपनी जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य था | इसे ही तिनकठिया पद्धति कहते थे | गाँधी जी ने किसानों से बातचीत कर के एक रिपोर्ट तैयार की और 1919 में गन चंपारण कृषक क़ानून पारित हो गया | 2. अहमदाबाद सत्याग्रह 1918 - प्लेग बोनस को लेकर पूंजीपतियों एवं मजदूर वर्ग के मध्य विवाद था | मजदूर बढ़ी मजदूरी का 50% बनाये रखना चाहते थे तथा पूंजीपति 20% देने को तैयार थे | गांधी जी ने मध्यस्थता में 35% की मांग की पूंजीपतियों द्वारा इंकार करने पर गांधी जी ने अनशन किया | बाद में पूंजीपति मान गए | 3. खेड़ा सत्याग्रह 1919 - प्राकृतिक कारणों से फसलों का नुकसान जैसे सूखे के कारण , भू - राजस्व कानून में यह प्रावधान था कि यदि उपज 25% से कम हो तो सरकार भू राजस्व नहीं वसूलेगी | गाँधी जी ने कर न देने को कहा | सरकार ने भी यह गुप्त आदेश जारी किया कि जो सक्षम न हो , उनसे भू-राजस्व नहीं लिया जाएगा | राष्ट्रीय आन्दोलन में इन आन्दोलनों का महत्त्व - इन मुद्दों को महत्व देने से गाँधी जी की छवि एक जननेता के रूप में मजबूत हुयी | इन आन्दोलनों के दौरान गाँधीवादी सत्याग्रह के विभिन्न तरीके भारतीय भूमि पर आजमाए गए जैसे कर न देना , अनशन करना , आदेश न मानना इत्यादि | आन्दोलनों के दौरान युवा नेताओं का सहयोग जो आगे चलकर गाँधीवादी नेता के रूप में चर्चित हुए जैसे सरदार पटेल इत्यादि | इन वर्गों को महत्त्व देने से यह संकेत मिला कि राष्ट्रीय आन्दोलनों में ग्रामीण भारत एवं आम लोगों की भूमिका निर्णायक होगी | गाँधी जी की अखिल भारतीय नेता के रूप में पहचान और मजबूत हुई | गाँधीवादी विचारधारा से भारतीय समाज में नयी क्रांति का संचार हुआ और इस विचारधारा का प्रभाव स्वतंत्रता के पश्चात् भी देखा जा सकता है | गाँधी जी का योगदान न केवल उल्लेखनीय है बल्कि अनुकरणीय भी है | उन्होंने स्वतंत्रता के मूल्य को महसूस कराया तथा सत्याग्रह को सर्वोत्तम व अचूक हथियार का दर्जा दिया और उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को काट दिया है और लोगों से भी काटने का आवाह्न किया है | भारत के लोग करोड़ों की संख्या में सबसे आगे आये और अंततः 1947 में भारत अंग्रेजों के शासन से सदा के लिए मुक्त हो गया |
46,706
सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
##Question:सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words) ##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
46,711
लोकसेवकों के आचरण संहिता और नीतिपरक संहिता से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इस संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक आयोग की संस्तुतियों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the code of conduct and code of ethics of public servants? Also, discuss the recommendations of the Second Administrative Commission in this context. (150-200 Words/10 Marks)
एप्रोच - लोकसेवकों के के लिए महत्वपूर्ण संहिता का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात लोकसेवकों के आचरण संहिता का विस्तारपूर्वक परिचय दीजिये | अंत में लोकसेवकों के लिए नीतिपरक संहिता का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोकसेवकों में ईमानदारी , जवाबदेही और प्रशासनिक कुशलता सुनिश्चित करने के लिए आचरण संहिता के साथ-साथ नीतिपरक संहिता की भी ज़रुरत होती है | दोनों का उद्देश्य राजनीतिक तटस्थता बनाये रखना , कार्य संस्कृति का विकास करना , भ्रष्टाचार को कम करके सुशासन का मार्ग स्पष्ट करना है | दोनों पूरक हैं , भूतकाल का आचार नियम , भविष्य का आचरण नियम हो जाता है | जैसे - बाल मजदूरी निषेध अधिनियम में अब संशोधन करके 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू नौकर के रूप में न रखें , संशोधन के बाद यह एक आचरण नियम (कोड ऑफ कंडक्ट ) हो गया अर्थात पहले यह बाध्यकारी नहीं था , अब बाध्यकारी हो गया | इन समानताओं के होते हुए भी आचरण नियम और नीतिपरक संहिता में कुछ अंतरों को स्पष्ट किया जा सकता है - आचरण संहिता लोक सेवकों के कार्यों एवं व्यवहार को निर्देशित करने वाले मार्गदर्शक सिद्धांतों का संग्रह है जबकि नीतिपरक संहिता आदर्शात्मक सिद्धांतों का समूह है , जो लोकसेवकों को नैतिक आधारों पर निर्णय निर्माण करते हैं अर्थात लोकसेवक सही गलत में अंतर समझकर उसका निर्णयों में उपयोग कर सकें | आचरण संहिताएँ विधिक रूप से बाध्यकारी होती है, इनके उल्लंघन पर दण्ड का प्रावधान किया जाता है जबकि नैतिक संहिताओं में नैतिक बाध्यता होती है लेकिन विधिक नहीं | अतः इनके उल्लंघन पर दंड का प्रावधान नहीं है | आचरण संहिता का प्रत्यक्ष सम्बन्ध लोकसेवकों के व्यवहार से है जबकि नैतिक संहिता उन मामलों में दिशा देने का कार्य करती है , जहाँ कोई विशेष नियम न हो | कार्य संचालन की संहिता मौन था अस्पष्ट होती है | आचरण नियमों में यह स्पष्ट वर्णन होता है कि क्या करना है , क्या नहीं करना है ?(बाध्यकारी रूप में ) जबकि नैतिक संहिता में यह स्पष्ट वर्णन नहीं होता कि क्या करना हा, क्या नहीं? आचरण संहिता - के. संथानम समिति की सिफारिश पर केन्द्रीय सिविल सेवायें (आचरण ) नियमावली 1964 अधिसूचित की गयी | इसके अंतर्गत भारत में लोकसेवक से सम्बंधित निम्नलिखित आचरण नियमों का उल्लेख किया गया है - लोकसेवकों को हमेशा अपने कर्तव्यों का पालन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करनी चाहिए | लोकसेवकों को न तो किसी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेना चाहिए , ना ही किसी राजनीतिक दल का सदस्य होना चाहिए | उन्हें राजनीतिक उद्देश्यों के लिए संचालित की जाने वाली किसी कोश में धनराशी नहीं देनी चाहिए | उन्हें सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना नहीं करनी चाहिए | विवाह , जन्मदिवस या किसी उत्सव में लोकसेवक को 1000 रूपए से अधिक की भेंट प्राप्त हो तो इसका विवरण शीघ्र सरकार को देना चाहिए | लोकसेवक या उसके परिवार के कोई भी सदस्य सट्टेबाजी नहीं कर सकते | लोकसेवक अपने विभाग में किसी नजदीकी रिश्तेदार को नियुक्त नहीं कर सकता | लोकसेवक को जनता में इस तरह का आचरण करना चाहिए जिससे यह न लगे कि पंथ निरपेक्षता के विरुद्ध है | नीतिपरक संहिता - भारत में सिविल सेवकों के लिए कोई नैतिक आचार संहिता निर्धारित नहीं की जा सकी है | 2006 के सिविल सेवा विधेयक (अभी विचाराधीन है ) में अवश्य कुछ मूल्यों को शामिल किया गया है , जो नैतिक आचार संहिता को विकसित कर सकते हैं , ये मूल्य निम्नलिखित हैं - संविधान की प्रस्तावना में निहित विभिन्न आदर्शों में निष्ठा रखें सुशासन के लिए निर्णय लेने में जवाबदेही और पारदर्शिता हो | उच्चतम नैतिक मानक का अनुरक्षण | खर्च में मितव्ययिता और अपव्यय में बचाव |
##Question:लोकसेवकों के आचरण संहिता और नीतिपरक संहिता से आप क्या समझते हैं ? साथ ही इस संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक आयोग की संस्तुतियों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the code of conduct and code of ethics of public servants? Also, discuss the recommendations of the Second Administrative Commission in this context. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - लोकसेवकों के के लिए महत्वपूर्ण संहिता का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात लोकसेवकों के आचरण संहिता का विस्तारपूर्वक परिचय दीजिये | अंत में लोकसेवकों के लिए नीतिपरक संहिता का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोकसेवकों में ईमानदारी , जवाबदेही और प्रशासनिक कुशलता सुनिश्चित करने के लिए आचरण संहिता के साथ-साथ नीतिपरक संहिता की भी ज़रुरत होती है | दोनों का उद्देश्य राजनीतिक तटस्थता बनाये रखना , कार्य संस्कृति का विकास करना , भ्रष्टाचार को कम करके सुशासन का मार्ग स्पष्ट करना है | दोनों पूरक हैं , भूतकाल का आचार नियम , भविष्य का आचरण नियम हो जाता है | जैसे - बाल मजदूरी निषेध अधिनियम में अब संशोधन करके 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू नौकर के रूप में न रखें , संशोधन के बाद यह एक आचरण नियम (कोड ऑफ कंडक्ट ) हो गया अर्थात पहले यह बाध्यकारी नहीं था , अब बाध्यकारी हो गया | इन समानताओं के होते हुए भी आचरण नियम और नीतिपरक संहिता में कुछ अंतरों को स्पष्ट किया जा सकता है - आचरण संहिता लोक सेवकों के कार्यों एवं व्यवहार को निर्देशित करने वाले मार्गदर्शक सिद्धांतों का संग्रह है जबकि नीतिपरक संहिता आदर्शात्मक सिद्धांतों का समूह है , जो लोकसेवकों को नैतिक आधारों पर निर्णय निर्माण करते हैं अर्थात लोकसेवक सही गलत में अंतर समझकर उसका निर्णयों में उपयोग कर सकें | आचरण संहिताएँ विधिक रूप से बाध्यकारी होती है, इनके उल्लंघन पर दण्ड का प्रावधान किया जाता है जबकि नैतिक संहिताओं में नैतिक बाध्यता होती है लेकिन विधिक नहीं | अतः इनके उल्लंघन पर दंड का प्रावधान नहीं है | आचरण संहिता का प्रत्यक्ष सम्बन्ध लोकसेवकों के व्यवहार से है जबकि नैतिक संहिता उन मामलों में दिशा देने का कार्य करती है , जहाँ कोई विशेष नियम न हो | कार्य संचालन की संहिता मौन था अस्पष्ट होती है | आचरण नियमों में यह स्पष्ट वर्णन होता है कि क्या करना है , क्या नहीं करना है ?(बाध्यकारी रूप में ) जबकि नैतिक संहिता में यह स्पष्ट वर्णन नहीं होता कि क्या करना हा, क्या नहीं? आचरण संहिता - के. संथानम समिति की सिफारिश पर केन्द्रीय सिविल सेवायें (आचरण ) नियमावली 1964 अधिसूचित की गयी | इसके अंतर्गत भारत में लोकसेवक से सम्बंधित निम्नलिखित आचरण नियमों का उल्लेख किया गया है - लोकसेवकों को हमेशा अपने कर्तव्यों का पालन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करनी चाहिए | लोकसेवकों को न तो किसी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेना चाहिए , ना ही किसी राजनीतिक दल का सदस्य होना चाहिए | उन्हें राजनीतिक उद्देश्यों के लिए संचालित की जाने वाली किसी कोश में धनराशी नहीं देनी चाहिए | उन्हें सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना नहीं करनी चाहिए | विवाह , जन्मदिवस या किसी उत्सव में लोकसेवक को 1000 रूपए से अधिक की भेंट प्राप्त हो तो इसका विवरण शीघ्र सरकार को देना चाहिए | लोकसेवक या उसके परिवार के कोई भी सदस्य सट्टेबाजी नहीं कर सकते | लोकसेवक अपने विभाग में किसी नजदीकी रिश्तेदार को नियुक्त नहीं कर सकता | लोकसेवक को जनता में इस तरह का आचरण करना चाहिए जिससे यह न लगे कि पंथ निरपेक्षता के विरुद्ध है | नीतिपरक संहिता - भारत में सिविल सेवकों के लिए कोई नैतिक आचार संहिता निर्धारित नहीं की जा सकी है | 2006 के सिविल सेवा विधेयक (अभी विचाराधीन है ) में अवश्य कुछ मूल्यों को शामिल किया गया है , जो नैतिक आचार संहिता को विकसित कर सकते हैं , ये मूल्य निम्नलिखित हैं - संविधान की प्रस्तावना में निहित विभिन्न आदर्शों में निष्ठा रखें सुशासन के लिए निर्णय लेने में जवाबदेही और पारदर्शिता हो | उच्चतम नैतिक मानक का अनुरक्षण | खर्च में मितव्ययिता और अपव्यय में बचाव |
46,713
दक्कन के पठार की उत्पति का परिचय दीजिए| साथ ही, दक्कन के पठार की प्रमुख भौतिक विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए| (150-200 शब्द) Describethe origin of Deccan Plateau. Also,BrieflyDescribethe major physical features of the Deccan Plateau. (150-200 words)
एप्रोच- दक्कन के पठार की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| (NOTE- दक्कन के पठार को मानचित्र में अवश्य दर्शाना होगा) | अगले भाग में,दक्कन के पठार की उत्पति का परिचय दीजिए| अंतिम भाग में,दक्कन के पठार की प्रमुख भौतिक विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए| उत्तर- दक्कन का पठार प्रायद्वीपीय भारत के विशाल पठार का सबसे बड़ा क्षेत्र है| यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक त्रिभुजाकार पठार है जिसके पश्चिम में पश्चिमी घाट, पूर्व में पूर्वी घाट और उत्तर में सतपुड़ा, मैकाल और महादेव पहाड़ियां अवस्थित हैं| NOTE- यहाँ पर दक्कन के पठार को मानचित्र में अवश्य दिखाईये| दक्कन के पठार की उत्पति क्रीटेशियस काल में जब भारतीय प्लेट अफ्रीका के पास अवस्थित रीयूनियन द्वीप/ हॉटस्पॉट के ऊपर से गुजर रहा था तब लावा का उदगार प्रारंभ हुआ; यह क्रिया मेसोजोइक युग के अंतिम काल में प्रारंभ हुयी तथा दरारों के माध्यम से लावा के उद्गार के फलस्वरूप दक्कन ट्रैप का निर्माण प्रारंभ हुआ| इनके निर्माण का कालक्रीटेशस से लेकर इयोसीन काल तक का माना जाता है| क्रीटेशस प्रणाली भारत की विस्तृत प्रणाली है| इस काल में गोंडवानालैंड में दरार पड़ी और इसके टूटे हुए हिस्से एक दूसरे से अलग होने लगे| इस दौरान उच्च स्तरीय लावा(बेसाल्ट) का उद्गार हुआ जिससे दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ| लावा के निरंतर प्रवाह के फलस्वरूप सीढ़ीनुमा आकृति की स्थलाकृति का विकास होने के कारण इसको ट्रैप कहते हैं| यह संरचना बेसाल्ट एवं डोलोराइट चट्टानों से निर्मित है| सागर द्वारा भूभाग का अतिक्रमण(नर्मदा घाटी और कोरोमंडल तट का) और अति लावा प्रवाह से दक्कन ट्रैप का निर्माण, इस काल की दो महत्वपूर्ण घटनाएं थी| इस प्रणाली में मैग्मा का "ग्रैबो" और ग्रेनाइट रूपों में अंतर्भेदन भी हुआ| तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियों के फलस्वरूप दक्कन लावा लगभग 5 लाख वर्गकिमी क्षेत्र में फैला हुआ है जिसका विस्तार गुजरात के कच्छ और काठियावाड़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के मालवा पठार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तरी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर-पश्चिम कर्नाटक तक है| दक्कन के पठार की प्रमुख भौतिक विशेषताएं लावा की गहराई पूरब से पश्चिम की ओर जाने पर बढ़ती जाती है जो इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि प्रायद्वीपीय पठार की ढ़ाल पहले पश्चिम की ओर रही होगी| दक्कन ट्रैप के लावा पठार की अधिकतम मोटाई(लगभग 3000 मीटर) मुंबई तट के सहारे मिलती है जहाँ से पूरब तथा दक्षिण दिशाओं में यह मोटाई घटती जाती है| उत्तर पश्चिमी भाग में लावा की मोटाई सर्वाधिक 2000 मीटर तक है पश्चिम से पूर्व एवं दक्षिण की ओर मोटाई में कमी आती जाती है नागपुर में मोटाई लावा की 15 मीटर है जबकि जबलपुर में 6 मीटर है लावा के पठार होने के कारण ये धात्विक खनिज के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र नहीं है परंतु कठोर एवं लगभग समतल होने के कारण अपरदन की क्रिया में क्षेत्रीय अंतर काफी अधिक है| पहले से अवस्थित छोटे-मोटे गर्त में नदियों के बहाव के कारण वह गहरा होता गया है जो आज के समय में नदी घाटी के रूप में दिखाई पड़ता है| बीच के अवशेष भाग अपेक्षाकृत ऊँचे होने की वजह से पर्वत का भ्रम देते हैं परंतु यह पर्वत नहीं है जैसे- अजंता श्रेणी; हरीशचंद्र बालाघाट श्रेणी आदि| दक्कन ट्रैप की आग्नेय चट्टानें कालांतरित में विखंडित होकर काली मृदा में परिवर्तित होती गयीं जिससे आज यह क्षेत्र काली मिट्टी/रेगुर का क्षेत्र है| दक्कन ट्रैप में पाताली चट्टानों "ग्रैबो" और ग्रेनाइट के रूप में स्पष्ट अंतर्भेदन दिखता है| दक्कन ट्रैप के बेसाल्ट का आज सड़क और भवन निर्माण में उपयोग होता है| दक्कन के पठार में स्फटिक, क्वार्ट्ज जैसे रत्नों के अतिरिक्त सिलिका, खनिज कार्नेलियन पाए जाते हैं| इसके अतिरिक्त इसमें बॉक्साइट, मैग्नेटाइट तथा बहुमूल्य पत्थर भी पाए जाते हैं|
##Question:दक्कन के पठार की उत्पति का परिचय दीजिए| साथ ही, दक्कन के पठार की प्रमुख भौतिक विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए| (150-200 शब्द) Describethe origin of Deccan Plateau. Also,BrieflyDescribethe major physical features of the Deccan Plateau. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- दक्कन के पठार की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| (NOTE- दक्कन के पठार को मानचित्र में अवश्य दर्शाना होगा) | अगले भाग में,दक्कन के पठार की उत्पति का परिचय दीजिए| अंतिम भाग में,दक्कन के पठार की प्रमुख भौतिक विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए| उत्तर- दक्कन का पठार प्रायद्वीपीय भारत के विशाल पठार का सबसे बड़ा क्षेत्र है| यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक त्रिभुजाकार पठार है जिसके पश्चिम में पश्चिमी घाट, पूर्व में पूर्वी घाट और उत्तर में सतपुड़ा, मैकाल और महादेव पहाड़ियां अवस्थित हैं| NOTE- यहाँ पर दक्कन के पठार को मानचित्र में अवश्य दिखाईये| दक्कन के पठार की उत्पति क्रीटेशियस काल में जब भारतीय प्लेट अफ्रीका के पास अवस्थित रीयूनियन द्वीप/ हॉटस्पॉट के ऊपर से गुजर रहा था तब लावा का उदगार प्रारंभ हुआ; यह क्रिया मेसोजोइक युग के अंतिम काल में प्रारंभ हुयी तथा दरारों के माध्यम से लावा के उद्गार के फलस्वरूप दक्कन ट्रैप का निर्माण प्रारंभ हुआ| इनके निर्माण का कालक्रीटेशस से लेकर इयोसीन काल तक का माना जाता है| क्रीटेशस प्रणाली भारत की विस्तृत प्रणाली है| इस काल में गोंडवानालैंड में दरार पड़ी और इसके टूटे हुए हिस्से एक दूसरे से अलग होने लगे| इस दौरान उच्च स्तरीय लावा(बेसाल्ट) का उद्गार हुआ जिससे दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ| लावा के निरंतर प्रवाह के फलस्वरूप सीढ़ीनुमा आकृति की स्थलाकृति का विकास होने के कारण इसको ट्रैप कहते हैं| यह संरचना बेसाल्ट एवं डोलोराइट चट्टानों से निर्मित है| सागर द्वारा भूभाग का अतिक्रमण(नर्मदा घाटी और कोरोमंडल तट का) और अति लावा प्रवाह से दक्कन ट्रैप का निर्माण, इस काल की दो महत्वपूर्ण घटनाएं थी| इस प्रणाली में मैग्मा का "ग्रैबो" और ग्रेनाइट रूपों में अंतर्भेदन भी हुआ| तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियों के फलस्वरूप दक्कन लावा लगभग 5 लाख वर्गकिमी क्षेत्र में फैला हुआ है जिसका विस्तार गुजरात के कच्छ और काठियावाड़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के मालवा पठार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तरी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर-पश्चिम कर्नाटक तक है| दक्कन के पठार की प्रमुख भौतिक विशेषताएं लावा की गहराई पूरब से पश्चिम की ओर जाने पर बढ़ती जाती है जो इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि प्रायद्वीपीय पठार की ढ़ाल पहले पश्चिम की ओर रही होगी| दक्कन ट्रैप के लावा पठार की अधिकतम मोटाई(लगभग 3000 मीटर) मुंबई तट के सहारे मिलती है जहाँ से पूरब तथा दक्षिण दिशाओं में यह मोटाई घटती जाती है| उत्तर पश्चिमी भाग में लावा की मोटाई सर्वाधिक 2000 मीटर तक है पश्चिम से पूर्व एवं दक्षिण की ओर मोटाई में कमी आती जाती है नागपुर में मोटाई लावा की 15 मीटर है जबकि जबलपुर में 6 मीटर है लावा के पठार होने के कारण ये धात्विक खनिज के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र नहीं है परंतु कठोर एवं लगभग समतल होने के कारण अपरदन की क्रिया में क्षेत्रीय अंतर काफी अधिक है| पहले से अवस्थित छोटे-मोटे गर्त में नदियों के बहाव के कारण वह गहरा होता गया है जो आज के समय में नदी घाटी के रूप में दिखाई पड़ता है| बीच के अवशेष भाग अपेक्षाकृत ऊँचे होने की वजह से पर्वत का भ्रम देते हैं परंतु यह पर्वत नहीं है जैसे- अजंता श्रेणी; हरीशचंद्र बालाघाट श्रेणी आदि| दक्कन ट्रैप की आग्नेय चट्टानें कालांतरित में विखंडित होकर काली मृदा में परिवर्तित होती गयीं जिससे आज यह क्षेत्र काली मिट्टी/रेगुर का क्षेत्र है| दक्कन ट्रैप में पाताली चट्टानों "ग्रैबो" और ग्रेनाइट के रूप में स्पष्ट अंतर्भेदन दिखता है| दक्कन ट्रैप के बेसाल्ट का आज सड़क और भवन निर्माण में उपयोग होता है| दक्कन के पठार में स्फटिक, क्वार्ट्ज जैसे रत्नों के अतिरिक्त सिलिका, खनिज कार्नेलियन पाए जाते हैं| इसके अतिरिक्त इसमें बॉक्साइट, मैग्नेटाइट तथा बहुमूल्य पत्थर भी पाए जाते हैं|
46,725
सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
##Question:सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words) ##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
46,734
सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
##Question:सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words) ##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
46,735
सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
##Question:सूखा और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए , सरकार द्वारा इसके प्रभाव को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150- 200 शब्द ) Highlighting the drought and its types, Discussing the efforts being made by the government to reduce its impact. (150 - 200 words) ##Answer:दृष्टिकोण :- · भूमिका में सूखा को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग मे सूखा के प्रकार की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत का 42 % क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र में आता है। सूखा से तात्पर्य वर्षा की मात्रा में एक निश्चित मानदंड से कमी का होना है। जिसमे अलग- अलग मानदंडों को आधार पर सूखे को अलग- अलग रूप कैटेगरी में बाटा गया है । जिसको निम्न प्रकार से समझा जा सकता है :- 1. मेट्रोलाजिकल सूखा - जब किसी भी करण से बारिश ही कम मात्रा में हो । 2. कृषि सूखा – जब वर्षा की मात्रा, कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त न हो, जिससे कृषि प्रभावित होती है । 3. हाइड्रोलोजिकल सूखा:- जब वर्षा की मात्रा अपर्याप्त हो तथा भूजल रीचार्ज पर्याप्त न होने के करण, भूजल स्तर (ग्राउंड वॉटर लेवल ) कम होता जाता है। 4. सामाजिक - आर्थिक सूखा :- जब सूखे की वजह से खाद्य पदार्थो की कमी हो जाए, जिसके कारण समाज में सामाजिक समस्याएँ यथा पलायन, संघर्ष, अव्यवस्था आदि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। साथ ही आर्थिक स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई, विकासदर में कमी आदि परिदृश्य उत्पन्न हो जाते हैं । 5. एकोलोजिकल सूखा - पर्यावरण के पेड़- पौधो और अन्य जीवो के लिए पर्याप्त जल का अभाव हो जाता है । भारत में सरकार द्वारा सूखा नियंत्र के संदर्भ में अनेक प्रयास किए गए हैं । जिनको हम निम्नलिखित बिन्दुओ से समझ सकते हैं :- प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना तकनीकी प्रयोग द्वारा सूखा पूर्वानुमान लगाना किसानों की आय स्त्रोतों को बढ़ाना और कृषि का विविधिकरण डेसर्ट डेव्लपमेंट प्रोग्राम-पेड़ , पौधो को लगाना, तालाब आदि को विकसित करना सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम - drought prone area programme वॉटरशेड अप्रोच- बांध , जल संरक्षण को बढ़ावा , सिचाई परियोजनाओ को पूर्ण करना एम्प्लोयेमेंट जेनेरेशन प्रोग्राम जैसे अंतयोदया कार्यक्रम , राजीव गांधी रोजगार कार्यक्रम आदि । अंतर मंत्रालयी सहयोग और डाटा शेयरिंग जिससे बेहतर सूखा नीति बनाई जा सके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ( नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्तर मैनेजमेंट ) द्वारा इस संदर्भ में शोध इसके साथ ही सरकार द्वारा सूखा प्रबंधन के संदर्भ में सैंडई फ्रेमवर्क के अंतर्गत भी नीति निर्माण पर ज़ोर दिया जा रहा है। जो निम्नलिखित बिन्दुओ पर ज़ोर देता है :- क्षेत्रो की सुभेद्यता की मैपिंग करना, प्रभावित जनसंख्या का आकलन ( आपदा पहचान ) आकलन , निगरानी , पूर्वानुमान , प्रारम्भिक चेतावनी जारी करना सूखा घोषणा खतरे की जोखिम सुभेद्यता और क्षमता मूल्यांकन अनुसंधान अंतर मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा संरचनात्मक उपाय - भंडारण, गैर संरचनात्मक उपाय - मितिगेशन उपाय, जन जागरूकता, नीति निर्माण , कुशल सिंचाई नीति , कृषि ऋण आदि क्षमता विकास- प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास, सूखा प्रबंधन योजना, जागरूकता बढ़ाना, महिला सशक्तिकरण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन उपरोक्त उपायों को अपनाकर सूखा का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है । इस संदर्भ में सरकार द्वारा सूखा को प्रमुख आपदा मानते हुआ, सेंडई फ्रेमवर्क को ध्यान में रखते 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण किया गया है ।
46,736
Point out the main provisions of the Central Civil Services Code of Conduct 1964 and their practical limitations. Discuss the recommendations submitted by the Second Administrative Reform Commission towards reforms in this (200 words)
Approach - 1. Introduction – briefly explain code of conduct. 2. Body – discuss the main provisions of code of conduct and provide their practical limitation. Discuss the 2nd ARC recommendations for the same. 3. Give conclusion accordingly. Answer- "Code of Conduct" is "principles, values, standards, or rules of behaviour that guide the decisions, procedures and systems of an organization in a way that contributes to the welfare of its key stakeholders, and respects the rights of all constituents affected by its operations. Main provisions – 1. Every Government servant shall at all times-- (i) maintain absolute integrity; (ii) maintain devotion to duty; and (iii) do nothing which is unbecoming of a Government servant. 2. Every Government servant holding a supervisory post shall take all possible steps to ensure the integrity and devotion to duty of all Government servants for the time being under his control and authority. 3. No Government servant shall in the performance of his official duties, act in a discourteous manner. 4. Every Government servant shall, at all times- act in accordance with the Government"s policies regarding age of marriage, preservation of environment, protection of wildlife and cultural heritage. 5. No Government servant shall indulge in any act of sexual harassment of any woman at any work place. Limitations of COC 1. The COC for civil servant had been designed in 1964 and with passage of time the amendments have been done but such amendment are not in accordance with contemporary roles and responsibilities of civil servant and therefore COC is considered impractical. 2. In most of the areas COC is prohibitive in nature and does not provide proactive guidelines for civil servants to deal with a particular situation. 3. Provisions under COC is itself ambiguous in nature hence compliance become difficult. 4. In some cases Legal provisions have also been incorporated Under COC and this amounts to duplication of provisions and make COC more bulky. 5. When some of the action of government servant are considered to be unethical how the previous sanction of the government make that ethical is itself a point of concern and therefore the need of time is to make the COC more substantive, Comprehensive, Precise, Pragmatic and Practical. Second ARC has recommended a comprehensive COC. The COC should be designed at 3 levels namely. At the apex level it should deal with the values the values ethical standards to be followed by civil servants such values should incorporate- 1. Commitment to the constitution. 2. Highest standard of probity and, integrity and conduct. 3. Non-partisan and impartiality. 4. Objectivity 5. Commitment to the concerns of the citizen and public good. 6. Empathy for vulnerable and weaker sections of the society. At the second level there should be a code of ethics dealing with the broad principles governing the behaviour of a civil servant the code of ethics should emphasize the importance of – 1. Integrity 2. Impartiality 3. Commitment to public service 4. Open accountability 5. Devotion to duty 6. Behaviour in terms of being a role model At the 3rd level there should be COC dealing with specific guidelines to regulate the conduct of civil servants. Such a COC should provide a list of both acceptable and unacceptable behaviour more precise and unambiguous manner. According to the 2nd ARC the values and code of ethics should be provided statutory sense by incorporating under the proposed public service bill 2007. It is apparent that COC is a device to encourage debates of ethics and to improve how members deal with the ethical dilemmas, prejudices and grey areas that are encountered in everyday work. It is necessary to remove the ambiguities of the COC with the help of 2nd ARC recommendation.
##Question:Point out the main provisions of the Central Civil Services Code of Conduct 1964 and their practical limitations. Discuss the recommendations submitted by the Second Administrative Reform Commission towards reforms in this (200 words)##Answer:Approach - 1. Introduction – briefly explain code of conduct. 2. Body – discuss the main provisions of code of conduct and provide their practical limitation. Discuss the 2nd ARC recommendations for the same. 3. Give conclusion accordingly. Answer- "Code of Conduct" is "principles, values, standards, or rules of behaviour that guide the decisions, procedures and systems of an organization in a way that contributes to the welfare of its key stakeholders, and respects the rights of all constituents affected by its operations. Main provisions – 1. Every Government servant shall at all times-- (i) maintain absolute integrity; (ii) maintain devotion to duty; and (iii) do nothing which is unbecoming of a Government servant. 2. Every Government servant holding a supervisory post shall take all possible steps to ensure the integrity and devotion to duty of all Government servants for the time being under his control and authority. 3. No Government servant shall in the performance of his official duties, act in a discourteous manner. 4. Every Government servant shall, at all times- act in accordance with the Government"s policies regarding age of marriage, preservation of environment, protection of wildlife and cultural heritage. 5. No Government servant shall indulge in any act of sexual harassment of any woman at any work place. Limitations of COC 1. The COC for civil servant had been designed in 1964 and with passage of time the amendments have been done but such amendment are not in accordance with contemporary roles and responsibilities of civil servant and therefore COC is considered impractical. 2. In most of the areas COC is prohibitive in nature and does not provide proactive guidelines for civil servants to deal with a particular situation. 3. Provisions under COC is itself ambiguous in nature hence compliance become difficult. 4. In some cases Legal provisions have also been incorporated Under COC and this amounts to duplication of provisions and make COC more bulky. 5. When some of the action of government servant are considered to be unethical how the previous sanction of the government make that ethical is itself a point of concern and therefore the need of time is to make the COC more substantive, Comprehensive, Precise, Pragmatic and Practical. Second ARC has recommended a comprehensive COC. The COC should be designed at 3 levels namely. At the apex level it should deal with the values the values ethical standards to be followed by civil servants such values should incorporate- 1. Commitment to the constitution. 2. Highest standard of probity and, integrity and conduct. 3. Non-partisan and impartiality. 4. Objectivity 5. Commitment to the concerns of the citizen and public good. 6. Empathy for vulnerable and weaker sections of the society. At the second level there should be a code of ethics dealing with the broad principles governing the behaviour of a civil servant the code of ethics should emphasize the importance of – 1. Integrity 2. Impartiality 3. Commitment to public service 4. Open accountability 5. Devotion to duty 6. Behaviour in terms of being a role model At the 3rd level there should be COC dealing with specific guidelines to regulate the conduct of civil servants. Such a COC should provide a list of both acceptable and unacceptable behaviour more precise and unambiguous manner. According to the 2nd ARC the values and code of ethics should be provided statutory sense by incorporating under the proposed public service bill 2007. It is apparent that COC is a device to encourage debates of ethics and to improve how members deal with the ethical dilemmas, prejudices and grey areas that are encountered in everyday work. It is necessary to remove the ambiguities of the COC with the help of 2nd ARC recommendation.
46,743
जन-भागीदारी और हिन्दू-मुस्लिम एकता की दृष्टि से असहयोग आन्दोलन अभूतपूर्व था | इस कथन के सन्दर्भ में असहयोग आन्दोलन का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) The non-cooperation movement was unprecedented in terms of public participation and Hindu-Muslim unity. Analyze the non-cooperation movement in the context of this statement. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में असहयोग आन्दोलन में जन-भागीदारी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात असहयोग आन्दोलन का विश्लेषणकरते हुए तथा आन्दोलन कार्यक्रमों और चौरी -चौरा घटना का जिक्र करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में गांधीजी तथा असहयोग आन्दोलन का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- स्वदेशी आन्दोलन में जो व्यापक भागीदारी व हिन्दू -मुस्लिम एकता की थोड़ी बहुत कमी देखी गयी थी , असहयोग आन्दोलन ने न केवल इन कमियों को पूरा किया बल्कि एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया | यह पहला अवसर था जब राष्ट्रीयता ने गांवों , कस्बों एवं स्चूलों को अपने प्रभाव में ले लिया | बड़े पैमाने पर मुसलमानों की भागीदारी और साम्प्रदायिक एकता इस आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी | मुसलमानों की भागीदारी ने ही इस आन्दोलन को जन आन्दोलन का स्वरुप दिया | असहयोग आन्दोलन को ठीक प्रकार से निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है - असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व गाँधी जी कर रहे थे | उन्होंने कैसर-ए -हिन्द की उपाधि लौटा दी जबकि जमनालाल बजाज ने राय बहादुर की उपाधि लौटा दी | बहुत से विद्यार्थियों ने स्कूलों का बहिष्कार कर राष्ट्रिय संस्थानों में प्रवेश लिया | मोतीलाल नेहरु , चितरंजन दस , राजेंद्र प्रसाद जैसे वकीलों ने वकालत छोड़ दी | विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर उनकी होली जलाई गयी | स्वदेशी सूती वस्त्रों के लिए लोगों ने चरखा चलाना प्रारंभ किया | शराब की दुकानों पर औरतों द्वारा धरना दिया गया | इस आन्दोलन के दौरान कशी विद्यापीठ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय , तिलक महाविद्यापीठ , गुजरात विद्यापीठ जैसे संस्थानों की स्थापना हुई | मिदनापुर के किसानों ने यूनियन बोर्ड को टैक्स देना बंद कर दिया और असं के चाय बागान मजदूरों ने हड़ताल की | सरकार ने कांग्रेस को गैर-क़ानूनी संस्था घोषित कर दिया | इस बीच 5 फरवरी 1922 ई. के रात को संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नमक स्थान पर पुलिस कर्मियों के दुर्व्यवहार से क्रुद्ध भीड़ पुलिस पर हमला बोल दिया , जिस पर पुलिस ने गोली चला दी | भीड़ हिंसक हो गयी ओर उन्होंने 22 पुलिस कर्मियों को मार डाला | गाँधी जी इस घटना से बहुत आहत हुए और 12 फरवरी को बारडोली सभा की बैठक में आन्दोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी | मोतीलाल नेहरु, सुभाषचंद्र बोस , जवाहरलाल नेहरु , चितरंजन दास व अली बंधुओं ने इसकी कड़ी आलोचना की | 10 मार्च 1922 को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया और न्यायाधीश ब्रूमफील्ड ने इन्हें आन्दोलन भड़काने के आरोप में 6 वर्ष की सजा सुनाई | यद्यपि कि असहयोग आन्दोलन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा, किन्तु इस आन्दोलन से कांग्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन में जन-समूह का नेतृत्व करने वाली संस्था बन गयी | इसके साथ ही गाँधी जी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जन नेता मिला | अन्तः भारतीयों को यह विश्वास होने लगा कि गाँधी जी के नेतृत्व में देश को स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त होगी |
##Question:जन-भागीदारी और हिन्दू-मुस्लिम एकता की दृष्टि से असहयोग आन्दोलन अभूतपूर्व था | इस कथन के सन्दर्भ में असहयोग आन्दोलन का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) The non-cooperation movement was unprecedented in terms of public participation and Hindu-Muslim unity. Analyze the non-cooperation movement in the context of this statement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में असहयोग आन्दोलन में जन-भागीदारी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात असहयोग आन्दोलन का विश्लेषणकरते हुए तथा आन्दोलन कार्यक्रमों और चौरी -चौरा घटना का जिक्र करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में गांधीजी तथा असहयोग आन्दोलन का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- स्वदेशी आन्दोलन में जो व्यापक भागीदारी व हिन्दू -मुस्लिम एकता की थोड़ी बहुत कमी देखी गयी थी , असहयोग आन्दोलन ने न केवल इन कमियों को पूरा किया बल्कि एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया | यह पहला अवसर था जब राष्ट्रीयता ने गांवों , कस्बों एवं स्चूलों को अपने प्रभाव में ले लिया | बड़े पैमाने पर मुसलमानों की भागीदारी और साम्प्रदायिक एकता इस आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी | मुसलमानों की भागीदारी ने ही इस आन्दोलन को जन आन्दोलन का स्वरुप दिया | असहयोग आन्दोलन को ठीक प्रकार से निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है - असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व गाँधी जी कर रहे थे | उन्होंने कैसर-ए -हिन्द की उपाधि लौटा दी जबकि जमनालाल बजाज ने राय बहादुर की उपाधि लौटा दी | बहुत से विद्यार्थियों ने स्कूलों का बहिष्कार कर राष्ट्रिय संस्थानों में प्रवेश लिया | मोतीलाल नेहरु , चितरंजन दस , राजेंद्र प्रसाद जैसे वकीलों ने वकालत छोड़ दी | विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर उनकी होली जलाई गयी | स्वदेशी सूती वस्त्रों के लिए लोगों ने चरखा चलाना प्रारंभ किया | शराब की दुकानों पर औरतों द्वारा धरना दिया गया | इस आन्दोलन के दौरान कशी विद्यापीठ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय , तिलक महाविद्यापीठ , गुजरात विद्यापीठ जैसे संस्थानों की स्थापना हुई | मिदनापुर के किसानों ने यूनियन बोर्ड को टैक्स देना बंद कर दिया और असं के चाय बागान मजदूरों ने हड़ताल की | सरकार ने कांग्रेस को गैर-क़ानूनी संस्था घोषित कर दिया | इस बीच 5 फरवरी 1922 ई. के रात को संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नमक स्थान पर पुलिस कर्मियों के दुर्व्यवहार से क्रुद्ध भीड़ पुलिस पर हमला बोल दिया , जिस पर पुलिस ने गोली चला दी | भीड़ हिंसक हो गयी ओर उन्होंने 22 पुलिस कर्मियों को मार डाला | गाँधी जी इस घटना से बहुत आहत हुए और 12 फरवरी को बारडोली सभा की बैठक में आन्दोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी | मोतीलाल नेहरु, सुभाषचंद्र बोस , जवाहरलाल नेहरु , चितरंजन दास व अली बंधुओं ने इसकी कड़ी आलोचना की | 10 मार्च 1922 को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया और न्यायाधीश ब्रूमफील्ड ने इन्हें आन्दोलन भड़काने के आरोप में 6 वर्ष की सजा सुनाई | यद्यपि कि असहयोग आन्दोलन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा, किन्तु इस आन्दोलन से कांग्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन में जन-समूह का नेतृत्व करने वाली संस्था बन गयी | इसके साथ ही गाँधी जी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जन नेता मिला | अन्तः भारतीयों को यह विश्वास होने लगा कि गाँधी जी के नेतृत्व में देश को स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त होगी |
46,863
हरित क्रांति की जहाँ कई उपलब्धियाँ रही हैं वहीँ इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए हैं| टिप्पणी कीजिए| (150-200 शब्द/10 अंक) While there have been many achievements of the Green Revolution But its negative effects have also been seen. Comment (150-200 words/10 marks)
एप्रोच- हरितक्रांति को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| उत्तर के पहले भाग में, हरित क्रांति की उपलब्धियों का जिक्र कीजिए| अगले भाग में, हरित क्रांति के दुष्प्रभावों/नकारात्मक पक्षों का वर्णन कीजिए| दोनों आयामों के संदर्भ में एक संतुलित निष्कर्ष देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- हरित क्रांति शब्द का अभिप्राय विकासशील देशों में खाद्यानोंकी कमी कोदूर करने के लिए कृषि क्षेत्र में लाए गए परिवर्तन से है| हरित क्रांति के द्वारा पौधों में विशेष सुधार किए गए तथा अनाज के नए बीजों के विकास एवं विसरण के माध्यम से उच्च उत्पादक फसल प्रजातियों का विकास किया गया| नॉर्मन बोरलॉग को हरित क्रांति का जनक माना जाता है जबकि भारत में हरित क्रांति के जनक के रूप में श्री एम.एस. स्वामीनाथन को माना जाता है| अनाजों के नए किस्म, अनुसंधान कार्य तथा पौधों पर केंद्रित प्रजनन का परिणाम हरित क्रांति है| हरित क्रांति की उपलब्धियां देश में कृषि उत्पादन में वृद्धि हुयी तथाउच्च उत्पादक फसल जातियों के वितरण के कारण ग्रामीण परिस्थिति में परिवर्तन आया| उन क्षेत्रों में जहां हरित क्रांति सफल रही है(जैसे- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के मैदानी जिलों में) वहां किसान जीवन-निर्वाह अर्थव्यवस्था से बाजार अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर हुए थें| इससे किसानों की समग्र समृद्धि हुयी| मुख्य खाद्य फसलों के मामले में भारत आत्मनिर्भर हो गया| खाद्यानों के आयात पर निर्भरता घटी तथा भारत कुछ खाद्यानों का निर्यातक बन गया। कृषि में निवेश बढ़ा क्योंकि किसानों के पास अधिशेष धन उपलब्ध था। इससे कृषि आधारित उद्योगों जैसे बीज, कीटनाशक, मशीन आदि का विकास हुआ। किसानों के जीवन स्तर में सुधार हुआ और उपभोक्ता वस्तु उद्योगों को ग्रामीण क्षेत्रों में नया बाजार मिला। निवेश के कारण कृषि प्रसंस्करण उद्योगों में सुधार तथा ग्रामीण रोजगार में भी सुधार हुआ| गेहूं, चावल, मकई तथा बाजरे के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई| दो फसल वाले क्षेत्रों में वृद्धि हुई इस तरह भारतीय कृषि के तीव्रीकरण में वृद्धि हुई| हरित क्रांति के दुष्प्रभाव/नकारात्मक पक्ष मृदा की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव- चावल तथा गेहूंकी अत्यधिक खेती से मृदा का अनुर्वर होना क्योंकि ये दोनों फसलें उर्वरताहारी हैं| मृदा की उर्वरता को पुनः प्राप्त करने के लिए किसान पहले खेतों कोपरती छोड़ते थेंपरंतु अब परती नहीं छोड़ने से मृदा के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव हुआ| कुछ कृषिभूमियों के जलमग्न होने की वजह से लवणीयता एवं क्षारीयता की समस्या ; असंतुलित फसल चक्र - पहले एक ही खेत में एक संतुलित फसल चक्र को अपनाया जाता था जिससे मृदा की उर्वरता कायम रहती थी जैसे- गेहूं के बाद चना या दलहन की किस्म को बोना| बीजों की पारंपरिक किस्मों की विलुप्तता; दलहन तथा तिलहन के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव -लेग्युमिनस फसल के अंतर्गत क्षेत्र का घटना; कृषि उत्पादन में स्थायित्व या घटने की प्रवृति; व्यक्तिगत आय में असमानता -हरित क्रांति के कारण किसानों के बीच आय की असमानता बढ़ी है| क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रोंके किसान जहां इसका ज्यादा लाभ उठाने में सक्षम रहे हैं वहीं पूर्वी राज्यों में इसका प्रभाव कम पड़ा है| अंतःप्रादेशिक असमानता- हरित क्रांति के क्षेत्रों में भी इसका लाभ समान रूप से नहीं वितरित हो पाया है| इसका लाभ बड़े एवं प्रगतिशील किसानों को अधिक हुआ है| छोटे तथा उपांत किसानों को देर से इन बीजों/तकनीकों को अपनाने के कारण ज्यादा लाभ नहीं हो पाया है| भूमि उपयोग में परिवर्तन ; कृषि के मशीनीकरण के कारण रोजगार में कमी तथाग्रामीण बेरोजगारी का बढ़ना जिससे कृषि-श्रमिकों का विस्थापन एवं प्रवसन में वृद्धि ; अत्यधिक प्रवसन के कारण नगर की समस्या में निरंतर वृद्धि हुयी| परंपरागत जजमानी प्रथा खत्म हो गई है फलस्वरुप नाई, लोहार, बढ़ई जैसे परंपरागत ग्रामीण वर्गों का नगरीय क्षेत्रों की ओर प्रवसन; ग्रामीण समाज का ध्रुवीकरण- बड़े तथा छोटे किसानों के बीच संघर्ष; काश्तकार तथा भूस्वामी के बीच संघर्ष; सामाजिक असमानता- बड़े किसानों को जल्दी फायदा होने से उनके पोषण, आवास, शिक्षा, सफाई तथा स्वास्थ्य में सुधार आया| छोटे परिवार, आराम तथा सुख साधन की वस्तुओं के उपयोग में वृद्धि हुई तथा अचल संपत्ति में भी वृद्धि हुई| बड़े किसानों के पास बेहतर जीवन-प्रत्याशा थी तथा वे धनीहोते चले गएँ| इसके विपरीत छोटे किसानों पर उपरोक्त सभी कारकों का नकारात्मक प्रभाव पड़ा जैसे- अचल संपति का घटना; जीवन स्तर में गिरावट; गरीबी आदि| इससे सामाजिक तनाव में बढ़ोतरी हुयी| लैंगिक असमानता; पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव- मृदा, जल, वायु, ध्वनि प्रदूषण; जल संसाधन पर दुष्प्रभाव -अत्यधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों को उगाने से जलस्तर नीचे जाना; जैसे- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में चावल तथा गेहूं के कारण भूजल स्तर का काफी नीचे जाना; आर्द्रभुमियों का ह्रास; हरित क्रांति के इन्हीं उपरोक्त दुष्प्रभावों को देखते हुए आज द्वितीय हरित क्रांति की ओर बल दिया जा रहा है ताकि उपरोक्त समस्याओं का समाधान किया जा सके|हालांकि हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने में मदद की है फिर भी बेहतर सिंचाई, उर्वरकों और रसायनों के इष्टतम उपयोग की आवश्यकता है। साथ ही, अतीत में पैदा हुई सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करने के लिए अधिक फसलों और क्षेत्रों को हरित क्रांति के तहत लाने की जरूरत है।
##Question:हरित क्रांति की जहाँ कई उपलब्धियाँ रही हैं वहीँ इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी दृष्टिगोचर हुए हैं| टिप्पणी कीजिए| (150-200 शब्द/10 अंक) While there have been many achievements of the Green Revolution But its negative effects have also been seen. Comment (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच- हरितक्रांति को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| उत्तर के पहले भाग में, हरित क्रांति की उपलब्धियों का जिक्र कीजिए| अगले भाग में, हरित क्रांति के दुष्प्रभावों/नकारात्मक पक्षों का वर्णन कीजिए| दोनों आयामों के संदर्भ में एक संतुलित निष्कर्ष देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- हरित क्रांति शब्द का अभिप्राय विकासशील देशों में खाद्यानोंकी कमी कोदूर करने के लिए कृषि क्षेत्र में लाए गए परिवर्तन से है| हरित क्रांति के द्वारा पौधों में विशेष सुधार किए गए तथा अनाज के नए बीजों के विकास एवं विसरण के माध्यम से उच्च उत्पादक फसल प्रजातियों का विकास किया गया| नॉर्मन बोरलॉग को हरित क्रांति का जनक माना जाता है जबकि भारत में हरित क्रांति के जनक के रूप में श्री एम.एस. स्वामीनाथन को माना जाता है| अनाजों के नए किस्म, अनुसंधान कार्य तथा पौधों पर केंद्रित प्रजनन का परिणाम हरित क्रांति है| हरित क्रांति की उपलब्धियां देश में कृषि उत्पादन में वृद्धि हुयी तथाउच्च उत्पादक फसल जातियों के वितरण के कारण ग्रामीण परिस्थिति में परिवर्तन आया| उन क्षेत्रों में जहां हरित क्रांति सफल रही है(जैसे- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के मैदानी जिलों में) वहां किसान जीवन-निर्वाह अर्थव्यवस्था से बाजार अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर हुए थें| इससे किसानों की समग्र समृद्धि हुयी| मुख्य खाद्य फसलों के मामले में भारत आत्मनिर्भर हो गया| खाद्यानों के आयात पर निर्भरता घटी तथा भारत कुछ खाद्यानों का निर्यातक बन गया। कृषि में निवेश बढ़ा क्योंकि किसानों के पास अधिशेष धन उपलब्ध था। इससे कृषि आधारित उद्योगों जैसे बीज, कीटनाशक, मशीन आदि का विकास हुआ। किसानों के जीवन स्तर में सुधार हुआ और उपभोक्ता वस्तु उद्योगों को ग्रामीण क्षेत्रों में नया बाजार मिला। निवेश के कारण कृषि प्रसंस्करण उद्योगों में सुधार तथा ग्रामीण रोजगार में भी सुधार हुआ| गेहूं, चावल, मकई तथा बाजरे के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई| दो फसल वाले क्षेत्रों में वृद्धि हुई इस तरह भारतीय कृषि के तीव्रीकरण में वृद्धि हुई| हरित क्रांति के दुष्प्रभाव/नकारात्मक पक्ष मृदा की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव- चावल तथा गेहूंकी अत्यधिक खेती से मृदा का अनुर्वर होना क्योंकि ये दोनों फसलें उर्वरताहारी हैं| मृदा की उर्वरता को पुनः प्राप्त करने के लिए किसान पहले खेतों कोपरती छोड़ते थेंपरंतु अब परती नहीं छोड़ने से मृदा के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव हुआ| कुछ कृषिभूमियों के जलमग्न होने की वजह से लवणीयता एवं क्षारीयता की समस्या ; असंतुलित फसल चक्र - पहले एक ही खेत में एक संतुलित फसल चक्र को अपनाया जाता था जिससे मृदा की उर्वरता कायम रहती थी जैसे- गेहूं के बाद चना या दलहन की किस्म को बोना| बीजों की पारंपरिक किस्मों की विलुप्तता; दलहन तथा तिलहन के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव -लेग्युमिनस फसल के अंतर्गत क्षेत्र का घटना; कृषि उत्पादन में स्थायित्व या घटने की प्रवृति; व्यक्तिगत आय में असमानता -हरित क्रांति के कारण किसानों के बीच आय की असमानता बढ़ी है| क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रोंके किसान जहां इसका ज्यादा लाभ उठाने में सक्षम रहे हैं वहीं पूर्वी राज्यों में इसका प्रभाव कम पड़ा है| अंतःप्रादेशिक असमानता- हरित क्रांति के क्षेत्रों में भी इसका लाभ समान रूप से नहीं वितरित हो पाया है| इसका लाभ बड़े एवं प्रगतिशील किसानों को अधिक हुआ है| छोटे तथा उपांत किसानों को देर से इन बीजों/तकनीकों को अपनाने के कारण ज्यादा लाभ नहीं हो पाया है| भूमि उपयोग में परिवर्तन ; कृषि के मशीनीकरण के कारण रोजगार में कमी तथाग्रामीण बेरोजगारी का बढ़ना जिससे कृषि-श्रमिकों का विस्थापन एवं प्रवसन में वृद्धि ; अत्यधिक प्रवसन के कारण नगर की समस्या में निरंतर वृद्धि हुयी| परंपरागत जजमानी प्रथा खत्म हो गई है फलस्वरुप नाई, लोहार, बढ़ई जैसे परंपरागत ग्रामीण वर्गों का नगरीय क्षेत्रों की ओर प्रवसन; ग्रामीण समाज का ध्रुवीकरण- बड़े तथा छोटे किसानों के बीच संघर्ष; काश्तकार तथा भूस्वामी के बीच संघर्ष; सामाजिक असमानता- बड़े किसानों को जल्दी फायदा होने से उनके पोषण, आवास, शिक्षा, सफाई तथा स्वास्थ्य में सुधार आया| छोटे परिवार, आराम तथा सुख साधन की वस्तुओं के उपयोग में वृद्धि हुई तथा अचल संपत्ति में भी वृद्धि हुई| बड़े किसानों के पास बेहतर जीवन-प्रत्याशा थी तथा वे धनीहोते चले गएँ| इसके विपरीत छोटे किसानों पर उपरोक्त सभी कारकों का नकारात्मक प्रभाव पड़ा जैसे- अचल संपति का घटना; जीवन स्तर में गिरावट; गरीबी आदि| इससे सामाजिक तनाव में बढ़ोतरी हुयी| लैंगिक असमानता; पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव- मृदा, जल, वायु, ध्वनि प्रदूषण; जल संसाधन पर दुष्प्रभाव -अत्यधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों को उगाने से जलस्तर नीचे जाना; जैसे- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में चावल तथा गेहूं के कारण भूजल स्तर का काफी नीचे जाना; आर्द्रभुमियों का ह्रास; हरित क्रांति के इन्हीं उपरोक्त दुष्प्रभावों को देखते हुए आज द्वितीय हरित क्रांति की ओर बल दिया जा रहा है ताकि उपरोक्त समस्याओं का समाधान किया जा सके|हालांकि हरित क्रांति ने खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने में मदद की है फिर भी बेहतर सिंचाई, उर्वरकों और रसायनों के इष्टतम उपयोग की आवश्यकता है। साथ ही, अतीत में पैदा हुई सामाजिक-आर्थिक असमानता को कम करने के लिए अधिक फसलों और क्षेत्रों को हरित क्रांति के तहत लाने की जरूरत है।
46,865
अनुच्छेद 370 के तहतजम्मू कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्थिति, किस प्रकार भारतीय संघ के साथ संबंध निर्धारित करती है? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) How does the special status ofthe state of Jammu and Kashmir under Article 370 determine the relationship with the Indian Union? Discuss (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में अनुच्छेद 370 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,जम्मू कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्थिति के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कर स्पष्ट कीजिए कियहविशेष स्थितिकिस प्रकार भारतीय संघ के साथ संबंध निर्धारित करती है। अंत में जम्मू कश्मीर राज्य की वर्तमान स्थिति का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- अनुच्छेद 370 का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग 21 में उल्लेख है। इस अनुच्छेद की तीन उपधाराएँ हैं;370(1) भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार देतीहै कि वह जम्मू कश्मीर की सरकार/विधानसभा से परामर्श करके संघ की अधिकारिता का विस्तार कर सकतीहै।370(2) के अनुसारभारत के राष्ट्रपति और जम्मू कश्मीर के संविधान के निर्माण हेतु गठित (निर्वाचित) संविधान सभा के बीच जिन विषयों के प्रशासन पर सहमति बनेगी उनसे संबंधित प्रस्ताव राज्य विधान सभा के पटल पर रखने होंगे। 370(03) के अनुसारभारत का राष्ट्रपति जम्मू कश्मीर संविधान सभा से परामर्श करने के पश्चात अनुच्छेद 370 में आवश्यक संशोधन कर सकता है। साथ ही वह 370 को समाप्त घोषित कर सकता है। जम्मू कश्मीर राज्य में विशेष स्थिति के कारण जो उपबंध वहां लागु होते हैं वे अन्य राज्यों में लागू नहीं होते। इस प्रकार यह भारतीय संघ के साथ एक विशेष प्रकार का संबंध निर्धारित करता था जिन्हें हम निम्नलिखित प्रावधानों से समझ सकते हैं- इसकी विशेष स्थिति के कारण अन्य राज्यों के विपरीत भारतीय संविधान के सभी उपबंध जम्मू कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होते थे। यह भारतीय संघ का एकमात्र ऐसा राज्य था जिसका अपना अलग राज्य का संविधान था। इसका अपना स्वयं का अलग संविधान था जिससे इसका प्रशासन चलाया जाता था। भारतीय संविधान का भाग-6 के प्रावधानजम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होते थे। इस भाग के अंतर्गत राज्य की परिभाषा में जम्मू कश्मीर राज्य शामिल नहीं है। संसद राज्यों के सम्बन्ध में संघ सूचीमें उल्लेखित अधिकतर विषयों तथा समवर्ती सूची में उल्लिखित काफी विषयों पर कानून बना सकती थी परन्तु अधिकांश अवशिष्ट शक्तियां राज्य विधानमंडल के पास थीं। संविधान का भाग 4 राज्यों के निदेशक तत्वों से संबंधित तथा भाग 4 क मूल कर्त्तव्यों से संबंधित जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होते थे।यहाँ तक मौलिक अधिकार भी राज्य में सीमित समय तक लागू थे। हालाँकि भारतीय संविधान के भाग 21 में कुछ अन्य राज्य भी विशेष स्थिति का लाभ उठा रहे हैं किन्तु बहुत ही कम मामलों में जबकि दूसरी और जम्मू कश्मीर राज्य की स्थिति इस संदर्भ में अतुलनीय थी। अनुच्छेद 365 का प्रयोग कर केंद्र राज्य के संविधान को निलंबित नहीं कर सकता था हालाँकि 356 वहाँ प्रभावी थी। जम्मू कश्मीर के लिए वहां 6 माह तक के लिए गवर्नर शासन की व्यवस्था रही है। इस दौरान वहां की विधानसभा भांग नहीं की जाती थी ताकि कोई दल बहुमत के आधार पर वहां सरकार बनासके। यदि ऐसा नहींहुआ तभी राष्ट्रपति शासन लगाने की व्यवस्था थी। अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आंतरिक अशांति के आधार पर राज्य में राष्ट्रीय आपात लागू नहीं किया जा सकता था तथा न हीअनुच्छेद 360 के अंतर्गत राज्य में वित्तीय आपात लागू किया जा सकता था। संसद द्वारा पारित निवारक निरोध नियम राज्य पर अपने आप लागू नहीं होता था औरराज्य की पृथकदंड संहितातथादंड प्रक्रिया संहिता थी। हालाँकि अभी अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के बाद स्थिति बदल गई है।जम्मू-कश्मीर राज्य को 2 केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) बनाने का बिल संसद से पारित होगया है। अब इस बिल पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और सरकारी गजट नोटिफिकेशन के बाद दोनों प्रदेशों के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर विधान परिषद को भंग और समाप्त कर दिया जाएगा।अब इसे केंद्रशासित प्रदेशोंमें बदल दिया गया है। एक लदाख और दूसरा जम्मू कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश बन गया है। अब इसकी विशेष स्थिति का कोई अधिक प्रभाव नहीं है और प्रायः अन्य बाकी राज्यों की तरह ही इसकी स्थिति हो गई है।
##Question:अनुच्छेद 370 के तहतजम्मू कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्थिति, किस प्रकार भारतीय संघ के साथ संबंध निर्धारित करती है? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) How does the special status ofthe state of Jammu and Kashmir under Article 370 determine the relationship with the Indian Union? Discuss (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में अनुच्छेद 370 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,जम्मू कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्थिति के मुख्य प्रावधानों का उल्लेख कर स्पष्ट कीजिए कियहविशेष स्थितिकिस प्रकार भारतीय संघ के साथ संबंध निर्धारित करती है। अंत में जम्मू कश्मीर राज्य की वर्तमान स्थिति का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- अनुच्छेद 370 का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग 21 में उल्लेख है। इस अनुच्छेद की तीन उपधाराएँ हैं;370(1) भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार देतीहै कि वह जम्मू कश्मीर की सरकार/विधानसभा से परामर्श करके संघ की अधिकारिता का विस्तार कर सकतीहै।370(2) के अनुसारभारत के राष्ट्रपति और जम्मू कश्मीर के संविधान के निर्माण हेतु गठित (निर्वाचित) संविधान सभा के बीच जिन विषयों के प्रशासन पर सहमति बनेगी उनसे संबंधित प्रस्ताव राज्य विधान सभा के पटल पर रखने होंगे। 370(03) के अनुसारभारत का राष्ट्रपति जम्मू कश्मीर संविधान सभा से परामर्श करने के पश्चात अनुच्छेद 370 में आवश्यक संशोधन कर सकता है। साथ ही वह 370 को समाप्त घोषित कर सकता है। जम्मू कश्मीर राज्य में विशेष स्थिति के कारण जो उपबंध वहां लागु होते हैं वे अन्य राज्यों में लागू नहीं होते। इस प्रकार यह भारतीय संघ के साथ एक विशेष प्रकार का संबंध निर्धारित करता था जिन्हें हम निम्नलिखित प्रावधानों से समझ सकते हैं- इसकी विशेष स्थिति के कारण अन्य राज्यों के विपरीत भारतीय संविधान के सभी उपबंध जम्मू कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होते थे। यह भारतीय संघ का एकमात्र ऐसा राज्य था जिसका अपना अलग राज्य का संविधान था। इसका अपना स्वयं का अलग संविधान था जिससे इसका प्रशासन चलाया जाता था। भारतीय संविधान का भाग-6 के प्रावधानजम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होते थे। इस भाग के अंतर्गत राज्य की परिभाषा में जम्मू कश्मीर राज्य शामिल नहीं है। संसद राज्यों के सम्बन्ध में संघ सूचीमें उल्लेखित अधिकतर विषयों तथा समवर्ती सूची में उल्लिखित काफी विषयों पर कानून बना सकती थी परन्तु अधिकांश अवशिष्ट शक्तियां राज्य विधानमंडल के पास थीं। संविधान का भाग 4 राज्यों के निदेशक तत्वों से संबंधित तथा भाग 4 क मूल कर्त्तव्यों से संबंधित जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होते थे।यहाँ तक मौलिक अधिकार भी राज्य में सीमित समय तक लागू थे। हालाँकि भारतीय संविधान के भाग 21 में कुछ अन्य राज्य भी विशेष स्थिति का लाभ उठा रहे हैं किन्तु बहुत ही कम मामलों में जबकि दूसरी और जम्मू कश्मीर राज्य की स्थिति इस संदर्भ में अतुलनीय थी। अनुच्छेद 365 का प्रयोग कर केंद्र राज्य के संविधान को निलंबित नहीं कर सकता था हालाँकि 356 वहाँ प्रभावी थी। जम्मू कश्मीर के लिए वहां 6 माह तक के लिए गवर्नर शासन की व्यवस्था रही है। इस दौरान वहां की विधानसभा भांग नहीं की जाती थी ताकि कोई दल बहुमत के आधार पर वहां सरकार बनासके। यदि ऐसा नहींहुआ तभी राष्ट्रपति शासन लगाने की व्यवस्था थी। अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आंतरिक अशांति के आधार पर राज्य में राष्ट्रीय आपात लागू नहीं किया जा सकता था तथा न हीअनुच्छेद 360 के अंतर्गत राज्य में वित्तीय आपात लागू किया जा सकता था। संसद द्वारा पारित निवारक निरोध नियम राज्य पर अपने आप लागू नहीं होता था औरराज्य की पृथकदंड संहितातथादंड प्रक्रिया संहिता थी। हालाँकि अभी अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के बाद स्थिति बदल गई है।जम्मू-कश्मीर राज्य को 2 केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) बनाने का बिल संसद से पारित होगया है। अब इस बिल पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और सरकारी गजट नोटिफिकेशन के बाद दोनों प्रदेशों के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर विधान परिषद को भंग और समाप्त कर दिया जाएगा।अब इसे केंद्रशासित प्रदेशोंमें बदल दिया गया है। एक लदाख और दूसरा जम्मू कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश बन गया है। अब इसकी विशेष स्थिति का कोई अधिक प्रभाव नहीं है और प्रायः अन्य बाकी राज्यों की तरह ही इसकी स्थिति हो गई है।
46,868
पूर्वोत्तर में उग्रवाद की समस्या महज एक विकासात्मक असंतोष की समस्या नहीं है। टिप्पणी कीजिये। (150- 200 शब्द/10 अंक) The problem of insurgency in the Northeast is not just a problem of developmental discontent. Comment. (150 - 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण · भूमिका में पूर्वोत्तर के उग्रवाद को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में उग्रवाद के कारणों को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंतिम भाग में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत के समस्त उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में 100 से भी अधिक जनजातीय समूह निवास करते हैं जो अपनी विभिन्न भाषाओं एवं रीति-रीवाजों, समृद्ध एवं विस्तृत सांस्कृतिक धरोहर के साथ जीवन निर्वाह करते हैं। आजादी के पूर्व उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के इन आदिवासियों का अन्य भारतीय क्षेत्र के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक तथा व्यावसायिक संबंध नही के बराबर थे। प्रारंभिक तौर पर एक ही राज्य असम तथा एक केंद्र शासित क्षेत्र (नेफा- नॉर्थ-ईस्ट प्रंटियर एजेंसी) था, जिसमें पूरा उत्तर-पूर्व शामिल था। बाद में नेफा को अरुणाचल प्रदेश नाम दे दिया गया, जिसे 1987 में एक अलग राज्य का दर्जा दिया गया। नेफा का विकास देश के अन्य भागों के साथ सहज एवं शांतिपूर्ण रूप से हुआ जबकि असम में प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्र के अंदर आदिवासी क्षेत्रों में कई समस्याएँ पनपने लगीं। इसकी शुरुआत 50 के दशक में नागालैंड में फिजो द्वारा विद्रोह का झंडा खड़ा करने के साथ हुई जो बाद में मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय तक फैल गई। वर्तमान में इसी तरह की घटनाएँ असम के निचले क्षेत्र तथा कर्बी आंगलोंग के क्षेत्रों में होती रही हैं। बोडो क्षेत्र में आदिवासी तथा गैर-आदिवासी लोगों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ रही है। मेघालय में गारो अलगाववाद जारी है तथा मणिपुर में गैर-मणिपुरी लोगों को ज्यादा क्षति पहुँचाई जाती है। पूर्वोत्तर उग्रवाद के कारण :- दुर्गम जटिल भौगोलिक संरचना जिसमे कहीं घाटी , नदी , पहाड़ी जैसी दुर्गम भौगोलिक संरचना । अंतरराष्ट्रीय सीमाएं जिसमे पड़ोसी देशो के साथ प्रभावी निगरानी प्रणाली का अभाव अवैध प्रवसन जिसमे म्यनमार , बांग्लादेश आदि पड़ोसी देशो से अवैध प्रवसन इसका प्रमुख उदाहरण है । विभिन्न जनजतियों के बीच श्रेष्टता की भावना और उनमे आपसी संघर्ष जोकि सशस्त्र संघर्ष मे परिवर्तित हो जाता है । सरकारी संस्थानो में भ्रष्टाचार जोकि जन सुविधाओं के सुगम पहुँच में बाधा उत्पन्न करता है और जन-असंतोष को बढ़ता है । आधारभूत बुनियादी सुविधाओं का अभाव जोकि बेरोजगारी और मूलभूत अवश्यकताओं से लोगों को वंचित करती है । राजनीतिक - उग्रवादी गठजोड़ पृथकता और सांस्कृतिक भिन्नता आदिवासी समुदायों में योग्य तथा दूरदर्शी नेतृत्व का अभाव। देश के अन्य लोगों तथा अन्य भागों से कटे होने की भावना। उपरोक्त बिन्दुओ से स्पष्ट है कि पूर्वोत्तर का अलगाववाद और उग्रवाद सिर्फ विकासात्मक असंतोष न होकर अन्य कारणों का भी परिणाम है । हालांकि सरकार द्वारा इस प्रकार की अव्यवस्था को रोकने के लिए अनेक कदम उठाएँ गए है । जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- आनुपातिक शक्ति का प्रयोग वार्ता और संवाद सावधानी पूर्वक राजनीतिक स्वायत्तता का प्रायोजन आतंकवाद के प्रति जीरो टोलरेंस की नीति आदिवासियों की संस्कृति का संरक्षण अवैध प्रवसन पर रोक विकास परक योजनाओं का संचालन पूर्वोत्तर राज्य प्राकृतिक संसाधनो से सम्पन्न क्षेत्र है । इसके साथ ही यह भारत की आंतरिक सुरक्षा और बाह्य सुरक्षा दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहाँ पर शांति और विकास के वातावरण के बिना भारत का पूर्ण विकास संभव नही है ।
##Question:पूर्वोत्तर में उग्रवाद की समस्या महज एक विकासात्मक असंतोष की समस्या नहीं है। टिप्पणी कीजिये। (150- 200 शब्द/10 अंक) The problem of insurgency in the Northeast is not just a problem of developmental discontent. Comment. (150 - 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में पूर्वोत्तर के उग्रवाद को समझाइए । · उत्तर के दूसरे भाग में उग्रवाद के कारणों को समझाइए । · उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा इस दिशा में किए गए प्रयासों की चर्चा कीजिये । · अंतिम भाग में एक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- भारत के समस्त उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में 100 से भी अधिक जनजातीय समूह निवास करते हैं जो अपनी विभिन्न भाषाओं एवं रीति-रीवाजों, समृद्ध एवं विस्तृत सांस्कृतिक धरोहर के साथ जीवन निर्वाह करते हैं। आजादी के पूर्व उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के इन आदिवासियों का अन्य भारतीय क्षेत्र के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक तथा व्यावसायिक संबंध नही के बराबर थे। प्रारंभिक तौर पर एक ही राज्य असम तथा एक केंद्र शासित क्षेत्र (नेफा- नॉर्थ-ईस्ट प्रंटियर एजेंसी) था, जिसमें पूरा उत्तर-पूर्व शामिल था। बाद में नेफा को अरुणाचल प्रदेश नाम दे दिया गया, जिसे 1987 में एक अलग राज्य का दर्जा दिया गया। नेफा का विकास देश के अन्य भागों के साथ सहज एवं शांतिपूर्ण रूप से हुआ जबकि असम में प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्र के अंदर आदिवासी क्षेत्रों में कई समस्याएँ पनपने लगीं। इसकी शुरुआत 50 के दशक में नागालैंड में फिजो द्वारा विद्रोह का झंडा खड़ा करने के साथ हुई जो बाद में मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय तक फैल गई। वर्तमान में इसी तरह की घटनाएँ असम के निचले क्षेत्र तथा कर्बी आंगलोंग के क्षेत्रों में होती रही हैं। बोडो क्षेत्र में आदिवासी तथा गैर-आदिवासी लोगों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ रही है। मेघालय में गारो अलगाववाद जारी है तथा मणिपुर में गैर-मणिपुरी लोगों को ज्यादा क्षति पहुँचाई जाती है। पूर्वोत्तर उग्रवाद के कारण :- दुर्गम जटिल भौगोलिक संरचना जिसमे कहीं घाटी , नदी , पहाड़ी जैसी दुर्गम भौगोलिक संरचना । अंतरराष्ट्रीय सीमाएं जिसमे पड़ोसी देशो के साथ प्रभावी निगरानी प्रणाली का अभाव अवैध प्रवसन जिसमे म्यनमार , बांग्लादेश आदि पड़ोसी देशो से अवैध प्रवसन इसका प्रमुख उदाहरण है । विभिन्न जनजतियों के बीच श्रेष्टता की भावना और उनमे आपसी संघर्ष जोकि सशस्त्र संघर्ष मे परिवर्तित हो जाता है । सरकारी संस्थानो में भ्रष्टाचार जोकि जन सुविधाओं के सुगम पहुँच में बाधा उत्पन्न करता है और जन-असंतोष को बढ़ता है । आधारभूत बुनियादी सुविधाओं का अभाव जोकि बेरोजगारी और मूलभूत अवश्यकताओं से लोगों को वंचित करती है । राजनीतिक - उग्रवादी गठजोड़ पृथकता और सांस्कृतिक भिन्नता आदिवासी समुदायों में योग्य तथा दूरदर्शी नेतृत्व का अभाव। देश के अन्य लोगों तथा अन्य भागों से कटे होने की भावना। उपरोक्त बिन्दुओ से स्पष्ट है कि पूर्वोत्तर का अलगाववाद और उग्रवाद सिर्फ विकासात्मक असंतोष न होकर अन्य कारणों का भी परिणाम है । हालांकि सरकार द्वारा इस प्रकार की अव्यवस्था को रोकने के लिए अनेक कदम उठाएँ गए है । जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- आनुपातिक शक्ति का प्रयोग वार्ता और संवाद सावधानी पूर्वक राजनीतिक स्वायत्तता का प्रायोजन आतंकवाद के प्रति जीरो टोलरेंस की नीति आदिवासियों की संस्कृति का संरक्षण अवैध प्रवसन पर रोक विकास परक योजनाओं का संचालन पूर्वोत्तर राज्य प्राकृतिक संसाधनो से सम्पन्न क्षेत्र है । इसके साथ ही यह भारत की आंतरिक सुरक्षा और बाह्य सुरक्षा दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहाँ पर शांति और विकास के वातावरण के बिना भारत का पूर्ण विकास संभव नही है ।
46,870
जन-भागीदारी और हिन्दू-मुस्लिम एकता की दृष्टि से असहयोग आन्दोलन अभूतपूर्व था | इस कथन के सन्दर्भ में असहयोग आन्दोलन का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) The non-cooperation movement was unprecedented in terms of public participation and Hindu-Muslim unity. Analyze the non-cooperation movement in the context of this statement. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में असहयोग आन्दोलन में जन-भागीदारी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात असहयोग आन्दोलन का विश्लेषणकरते हुए तथा आन्दोलन कार्यक्रमों और चौरी -चौरा घटना का जिक्र करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में गांधीजी तथा असहयोग आन्दोलन का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- स्वदेशी आन्दोलन में जो व्यापक भागीदारी व हिन्दू -मुस्लिम एकता की थोड़ी बहुत कमी देखी गयी थी , असहयोग आन्दोलन ने न केवल इन कमियों को पूरा किया बल्कि एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया | यह पहला अवसर था जब राष्ट्रीयता ने गांवों , कस्बों एवं स्चूलों को अपने प्रभाव में ले लिया | बड़े पैमाने पर मुसलमानों की भागीदारी और साम्प्रदायिक एकता इस आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी | मुसलमानों की भागीदारी ने ही इस आन्दोलन को जन आन्दोलन का स्वरुप दिया | असहयोग आन्दोलन को ठीक प्रकार से निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है - असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व गाँधी जी कर रहे थे | उन्होंने कैसर-ए -हिन्द की उपाधि लौटा दी जबकि जमनालाल बजाज ने राय बहादुर की उपाधि लौटा दी | बहुत से विद्यार्थियों ने स्कूलों का बहिष्कार कर राष्ट्रिय संस्थानों में प्रवेश लिया | मोतीलाल नेहरु , चितरंजन दस , राजेंद्र प्रसाद जैसे वकीलों ने वकालत छोड़ दी | विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर उनकी होली जलाई गयी | स्वदेशी सूती वस्त्रों के लिए लोगों ने चरखा चलाना प्रारंभ किया | शराब की दुकानों पर औरतों द्वारा धरना दिया गया | इस आन्दोलन के दौरान कशी विद्यापीठ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय , तिलक महाविद्यापीठ , गुजरात विद्यापीठ जैसे संस्थानों की स्थापना हुई | मिदनापुर के किसानों ने यूनियन बोर्ड को टैक्स देना बंद कर दिया और असं के चाय बागान मजदूरों ने हड़ताल की | सरकार ने कांग्रेस को गैर-क़ानूनी संस्था घोषित कर दिया | इस बीच 5 फरवरी 1922 ई. के रात को संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नमक स्थान पर पुलिस कर्मियों के दुर्व्यवहार से क्रुद्ध भीड़ पुलिस पर हमला बोल दिया , जिस पर पुलिस ने गोली चला दी | भीड़ हिंसक हो गयी ओर उन्होंने 22 पुलिस कर्मियों को मार डाला | गाँधी जी इस घटना से बहुत आहत हुए और 12 फरवरी को बारडोली सभा की बैठक में आन्दोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी | मोतीलाल नेहरु, सुभाषचंद्र बोस , जवाहरलाल नेहरु , चितरंजन दास व अली बंधुओं ने इसकी कड़ी आलोचना की | 10 मार्च 1922 को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया और न्यायाधीश ब्रूमफील्ड ने इन्हें आन्दोलन भड़काने के आरोप में 6 वर्ष की सजा सुनाई | यद्यपि कि असहयोग आन्दोलन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा, किन्तु इस आन्दोलन से कांग्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन में जन-समूह का नेतृत्व करने वाली संस्था बन गयी | इसके साथ ही गाँधी जी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जन नेता मिला | अन्तः भारतीयों को यह विश्वास होने लगा कि गाँधी जी के नेतृत्व में देश को स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त होगी |
##Question:जन-भागीदारी और हिन्दू-मुस्लिम एकता की दृष्टि से असहयोग आन्दोलन अभूतपूर्व था | इस कथन के सन्दर्भ में असहयोग आन्दोलन का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) The non-cooperation movement was unprecedented in terms of public participation and Hindu-Muslim unity. Analyze the non-cooperation movement in the context of this statement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में असहयोग आन्दोलन में जन-भागीदारी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का वर्णन करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात असहयोग आन्दोलन का विश्लेषणकरते हुए तथा आन्दोलन कार्यक्रमों और चौरी -चौरा घटना का जिक्र करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में गांधीजी तथा असहयोग आन्दोलन का महत्व बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- स्वदेशी आन्दोलन में जो व्यापक भागीदारी व हिन्दू -मुस्लिम एकता की थोड़ी बहुत कमी देखी गयी थी , असहयोग आन्दोलन ने न केवल इन कमियों को पूरा किया बल्कि एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया | यह पहला अवसर था जब राष्ट्रीयता ने गांवों , कस्बों एवं स्चूलों को अपने प्रभाव में ले लिया | बड़े पैमाने पर मुसलमानों की भागीदारी और साम्प्रदायिक एकता इस आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी | मुसलमानों की भागीदारी ने ही इस आन्दोलन को जन आन्दोलन का स्वरुप दिया | असहयोग आन्दोलन को ठीक प्रकार से निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है - असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व गाँधी जी कर रहे थे | उन्होंने कैसर-ए -हिन्द की उपाधि लौटा दी जबकि जमनालाल बजाज ने राय बहादुर की उपाधि लौटा दी | बहुत से विद्यार्थियों ने स्कूलों का बहिष्कार कर राष्ट्रिय संस्थानों में प्रवेश लिया | मोतीलाल नेहरु , चितरंजन दस , राजेंद्र प्रसाद जैसे वकीलों ने वकालत छोड़ दी | विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर उनकी होली जलाई गयी | स्वदेशी सूती वस्त्रों के लिए लोगों ने चरखा चलाना प्रारंभ किया | शराब की दुकानों पर औरतों द्वारा धरना दिया गया | इस आन्दोलन के दौरान कशी विद्यापीठ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय , तिलक महाविद्यापीठ , गुजरात विद्यापीठ जैसे संस्थानों की स्थापना हुई | मिदनापुर के किसानों ने यूनियन बोर्ड को टैक्स देना बंद कर दिया और असं के चाय बागान मजदूरों ने हड़ताल की | सरकार ने कांग्रेस को गैर-क़ानूनी संस्था घोषित कर दिया | इस बीच 5 फरवरी 1922 ई. के रात को संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नमक स्थान पर पुलिस कर्मियों के दुर्व्यवहार से क्रुद्ध भीड़ पुलिस पर हमला बोल दिया , जिस पर पुलिस ने गोली चला दी | भीड़ हिंसक हो गयी ओर उन्होंने 22 पुलिस कर्मियों को मार डाला | गाँधी जी इस घटना से बहुत आहत हुए और 12 फरवरी को बारडोली सभा की बैठक में आन्दोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी | मोतीलाल नेहरु, सुभाषचंद्र बोस , जवाहरलाल नेहरु , चितरंजन दास व अली बंधुओं ने इसकी कड़ी आलोचना की | 10 मार्च 1922 को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया और न्यायाधीश ब्रूमफील्ड ने इन्हें आन्दोलन भड़काने के आरोप में 6 वर्ष की सजा सुनाई | यद्यपि कि असहयोग आन्दोलन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं रहा, किन्तु इस आन्दोलन से कांग्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन में जन-समूह का नेतृत्व करने वाली संस्था बन गयी | इसके साथ ही गाँधी जी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जन नेता मिला | अन्तः भारतीयों को यह विश्वास होने लगा कि गाँधी जी के नेतृत्व में देश को स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त होगी |
46,876
साइमन आयोग के गठन के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसी परिप्रेक्ष्य में नेहरु रिपोर्ट के मुख्य प्रावधानों को भी बताइए | (150-200 शब्द) Clarify the objectives of formation of Simon Commission. Also explain the main provisions of the Nehru Report , in this perspective. (150-200 words)
एप्रोच :- भूमिका में संक्षेप में साइमन कमीशन और उसके उद्देश्यों का उल्लेख कीजिये। उत्तर के पहले भाग मे नेहरू रिपोर्ट की चर्चा कीजिये और उसके लाने के पीछे कारणो को भी बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में नेहरू रिपोर्ट के प्रावधानों को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष में नेहरू रिपोर्ट के महत्व को बताइये । उत्तर :- सन 1927 ब्रिटिश संसद सदस्य सर जॉन साइमन के नेतृत्व में साइमन आयोग का गठन किया गया था , हालांकि इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे तथा सभी ब्रिटिश नागरिक थे , इसमे किसी भी भारतीय को शमिल नही किया गया । जिसके कारण इसका सम्पूर्ण भारत में लगभग सभी भारतीय नेताओ द्वारा विरोध किया गया। साइमन आयोग के गठन के निम्नलिखित उद्देश्य थे – 1919 के भारत परिषद अंधिनियम की समीक्षा करना और आगामी सुधारों के लिए सलाह देना । इसका समय पूर्ण गठन का कारण इंग्लैंड के चुनाव में लैबर पार्टी की जीत की संभावनाथी । इसके साथ ही भारत में बढ़ते सांप्रदायिक दंगेइस आयोग के लिए अनुकूल समय था क्योकि समाज में राष्ट्रीय एकता का अभाव था और लोग आपस में लड़ रहे थे । उपरोक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर साइमन आयोग का गठन किया गया , जिसका सम्पूर्ण भारत में विरोध हुआ । जिसके कारण भारत सचिव लार्ड बकेंनहेड ने भारतीयो को आपसी सहमति से कोई सर्वमान्य रिपोर्ट तैयार करने को कहा , जिसके पश्चात मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में 1928 में नेहरू रिपोर्ट तैयार की गई । नेहरू रिपोर्ट के महत्वपूर्ण प्रस्ताव निम्नलिखित थे– भारत को डोमेनियन स्टेटस का दर्जा दिये जाने की मांग की गयी , जो की अन्य राष्ट्र मण्डल देशो की तरह अपने ज्यादातर मामलों में स्वतंत्र होगा । वायसराय को भारत का संवैधानिक प्रमुख बनाना जो की भारत में ब्रिटिश क्राउन के बराबर होगा । भारत को परिसंघ बनाना जिसमे केंद्र तथा प्रान्तों के स्तर पर उत्तरदायी सरकारका गठन करना । केंद्र में दो सदनीय व्यवस्था जिसमे मंत्रालय विधायिका के प्रति उत्तरदायी । केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियाँ होंगी। पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन। विधान मंडलों में जनसंख्या के अनुपात में अल्पसंख्यकों को आरक्षण। सिंध व उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत को पूर्ण राज्य कर दर्जा। महिलाओ को समानता प्रदान करने संबंधी प्रावधान । धार्मिक स्वतंत्रता सहित 19 अधिकारों की मांग , वयस्क मताधिकार भी। नेहरू रिपोर्ट के अगर उपरोक्त प्रावधानों को गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि इन ज्यादातर प्रावधानों को संविधान के माध्यम से अपनाया गया है तथा ये प्रावधान भारत जैसे सफल लोकतंत्र की नीव हैं । जैसे दो सदनीय व्यवस्था, कार्य पालिका का विधायका के प्रति उत्तरदायी होना , वयस्क मताधिकार , केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियों का प्रावधान आदि । इन्ही सभी विशेषताओ के कारण नेहरू रिपोर्ट को भारतीय संविधान का पूर्वगामी माना जाता है , जिसमे आरंभिक संविधान की झलक देखी जा सकती है ।
##Question:साइमन आयोग के गठन के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसी परिप्रेक्ष्य में नेहरु रिपोर्ट के मुख्य प्रावधानों को भी बताइए | (150-200 शब्द) Clarify the objectives of formation of Simon Commission. Also explain the main provisions of the Nehru Report , in this perspective. (150-200 words)##Answer:एप्रोच :- भूमिका में संक्षेप में साइमन कमीशन और उसके उद्देश्यों का उल्लेख कीजिये। उत्तर के पहले भाग मे नेहरू रिपोर्ट की चर्चा कीजिये और उसके लाने के पीछे कारणो को भी बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में नेहरू रिपोर्ट के प्रावधानों को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष में नेहरू रिपोर्ट के महत्व को बताइये । उत्तर :- सन 1927 ब्रिटिश संसद सदस्य सर जॉन साइमन के नेतृत्व में साइमन आयोग का गठन किया गया था , हालांकि इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे तथा सभी ब्रिटिश नागरिक थे , इसमे किसी भी भारतीय को शमिल नही किया गया । जिसके कारण इसका सम्पूर्ण भारत में लगभग सभी भारतीय नेताओ द्वारा विरोध किया गया। साइमन आयोग के गठन के निम्नलिखित उद्देश्य थे – 1919 के भारत परिषद अंधिनियम की समीक्षा करना और आगामी सुधारों के लिए सलाह देना । इसका समय पूर्ण गठन का कारण इंग्लैंड के चुनाव में लैबर पार्टी की जीत की संभावनाथी । इसके साथ ही भारत में बढ़ते सांप्रदायिक दंगेइस आयोग के लिए अनुकूल समय था क्योकि समाज में राष्ट्रीय एकता का अभाव था और लोग आपस में लड़ रहे थे । उपरोक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर साइमन आयोग का गठन किया गया , जिसका सम्पूर्ण भारत में विरोध हुआ । जिसके कारण भारत सचिव लार्ड बकेंनहेड ने भारतीयो को आपसी सहमति से कोई सर्वमान्य रिपोर्ट तैयार करने को कहा , जिसके पश्चात मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में 1928 में नेहरू रिपोर्ट तैयार की गई । नेहरू रिपोर्ट के महत्वपूर्ण प्रस्ताव निम्नलिखित थे– भारत को डोमेनियन स्टेटस का दर्जा दिये जाने की मांग की गयी , जो की अन्य राष्ट्र मण्डल देशो की तरह अपने ज्यादातर मामलों में स्वतंत्र होगा । वायसराय को भारत का संवैधानिक प्रमुख बनाना जो की भारत में ब्रिटिश क्राउन के बराबर होगा । भारत को परिसंघ बनाना जिसमे केंद्र तथा प्रान्तों के स्तर पर उत्तरदायी सरकारका गठन करना । केंद्र में दो सदनीय व्यवस्था जिसमे मंत्रालय विधायिका के प्रति उत्तरदायी । केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियाँ होंगी। पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन। विधान मंडलों में जनसंख्या के अनुपात में अल्पसंख्यकों को आरक्षण। सिंध व उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत को पूर्ण राज्य कर दर्जा। महिलाओ को समानता प्रदान करने संबंधी प्रावधान । धार्मिक स्वतंत्रता सहित 19 अधिकारों की मांग , वयस्क मताधिकार भी। नेहरू रिपोर्ट के अगर उपरोक्त प्रावधानों को गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि इन ज्यादातर प्रावधानों को संविधान के माध्यम से अपनाया गया है तथा ये प्रावधान भारत जैसे सफल लोकतंत्र की नीव हैं । जैसे दो सदनीय व्यवस्था, कार्य पालिका का विधायका के प्रति उत्तरदायी होना , वयस्क मताधिकार , केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियों का प्रावधान आदि । इन्ही सभी विशेषताओ के कारण नेहरू रिपोर्ट को भारतीय संविधान का पूर्वगामी माना जाता है , जिसमे आरंभिक संविधान की झलक देखी जा सकती है ।
46,897
भारत में नक्सलवाद का एक परिवर्तनशील स्वरुप देखा गया है जो विभिन्न चरणों में अपने उद्देश्य व स्वरुप में लगातार बदलता रहा है। इस कथन की व्याख्या करते हुए नक्सलवाद के नियंत्रण के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रमुख पहलों की चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द, अंक - 10 ) A transformative form of Naxalism has been observed in India which has been continuously changing in its purpose and form at different stages. Explain this statement and discuss the major initiatives being taken by the government to control Naxalism. (150 - 200 words , Marks - 10 )
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में नक्सलवाद के बारे में लिखिए उत्तर के प्रथम भाग में नक्सलवाद के विकास के विभिन्न चरणों को लिखिए। इसके बाद सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लिखिए। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए नक्सलवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसका उद्देश्य सरकारी व्यवस्था का विरोध करते हुए गरीबों की सहायता का कार्य करना। हालांकि इसे नकारात्मक संदर्भ में लिया जाता है क्योंकि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नक्सलवाद हिंसा को प्रोत्साहित करती है और शासन प्रणाली का विरोध करने के लिए अनुचित तरीके अपनाती है। भारत में नक्सलवाद के विकास के विभिन्न चरण एवं प्रकृति: प्रथम चरण: 1967 -71 ;बंगाल के नक्सलबारी से उत्पत्ति सामाजिक –आर्थिक व राजनीतिक कृषक संघर्ष को एक सशस्त्र संघर्ष में परिवर्तित करने वाला कारक वैचारिक व सैधांतिक आधार प्रदान करना (माओवाद और लेनिनवाद ) द्वितीय चरण MCC का गठन तत्कालीन बिहार,आंध्र प्रदेश 1976 से 1995 तक तृतीय चरण 2004 से 2010 तक नक्सलवाद का एकीकरण नक्सलवाद का क्षेत्र विस्तार (छत्तीसगढ़,झारखण्ड,ओडिशा एवं बिहार राज्य इससे मुख्य रूप से प्रभावित ) गृह मंत्रालय के अनुसार ,वर्ष 2016 में 10 राज्यों के 106 जिलें LWE से प्रभावित हैं सरकार के द्वारा एक अनुमित आंकड़े के अनुसार 40000पूर्णकालिक कैडरों का अनुमान है आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में मुख्य बाधा नगरीकृत होना प्रारंभ चतुर्थ चरण 2010 से 2017 वैचारिक स्तर से भटकाव उग्रवादी तत्वों की अधिकता एवं सरकार विरोध कर अपने प्रभाव में वृद्धि करना नगरीय क्षेत्रों में सक्रियता में वृद्धि स्थानीय स्तर पर व्याप्त विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में शामिल होना जैसे- विस्थापन एवं पुनर्वास का विरोध ,खनन का विरोध ,भूमि अधिग्रहण का विरोध आदि आतंकवाद के साथ संपर्क नक्सलवाद के प्रसिद्धि में प्रसार राजनीति और नक्सलवाद के मध्य अवैध संबंध LWE के नियंत्रण के लिए किये गए प्रमुख पहल विकासात्मक पहल एकीकृत एक्शन प्लान (IAP) सुरक्षा संबंधी व्यय योजना (SRI) विशिष्ट मूलभूत योजना – RRP-I- सड़क कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 8 राज्यों में प्रारंभ सिविक एक्शन प्लान – सशस्त्र सुरक्षा बलों एवं जनता के मध्य दूरियों को ख़त्म करने हेतु जिसका मूल उद्येश्य नैतिक पुलिसिंग का निर्माण करना होता है | अत्याधुनिक पुलिस स्टेशन का निर्माण रोशनी योजना प्रभावित राज्यों को अतिरिक्त वित्तीय सहायता समाधान सशक्त कार्यवाही पुलिस स्टेशन एवं पुलिस व्यवस्था का सुद्रीढीकरण नक्सल विरोधी अभियान नक्सल नियंत्रित भूभाग पर कब्ज़ा नक्सलियों के वित्तीयन को बंद करना भारत में वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सरकार ने व्यापक प्रयास किया है। इसके व्यापक प्रभाव पड़ा है। पिछले पाँच वर्षों में नक्सली घटनाओं में काफी कमी है।
##Question:भारत में नक्सलवाद का एक परिवर्तनशील स्वरुप देखा गया है जो विभिन्न चरणों में अपने उद्देश्य व स्वरुप में लगातार बदलता रहा है। इस कथन की व्याख्या करते हुए नक्सलवाद के नियंत्रण के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रमुख पहलों की चर्चा कीजिए। (150- 200 शब्द, अंक - 10 ) A transformative form of Naxalism has been observed in India which has been continuously changing in its purpose and form at different stages. Explain this statement and discuss the major initiatives being taken by the government to control Naxalism. (150 - 200 words , Marks - 10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में नक्सलवाद के बारे में लिखिए उत्तर के प्रथम भाग में नक्सलवाद के विकास के विभिन्न चरणों को लिखिए। इसके बाद सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लिखिए। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए नक्सलवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसका उद्देश्य सरकारी व्यवस्था का विरोध करते हुए गरीबों की सहायता का कार्य करना। हालांकि इसे नकारात्मक संदर्भ में लिया जाता है क्योंकि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नक्सलवाद हिंसा को प्रोत्साहित करती है और शासन प्रणाली का विरोध करने के लिए अनुचित तरीके अपनाती है। भारत में नक्सलवाद के विकास के विभिन्न चरण एवं प्रकृति: प्रथम चरण: 1967 -71 ;बंगाल के नक्सलबारी से उत्पत्ति सामाजिक –आर्थिक व राजनीतिक कृषक संघर्ष को एक सशस्त्र संघर्ष में परिवर्तित करने वाला कारक वैचारिक व सैधांतिक आधार प्रदान करना (माओवाद और लेनिनवाद ) द्वितीय चरण MCC का गठन तत्कालीन बिहार,आंध्र प्रदेश 1976 से 1995 तक तृतीय चरण 2004 से 2010 तक नक्सलवाद का एकीकरण नक्सलवाद का क्षेत्र विस्तार (छत्तीसगढ़,झारखण्ड,ओडिशा एवं बिहार राज्य इससे मुख्य रूप से प्रभावित ) गृह मंत्रालय के अनुसार ,वर्ष 2016 में 10 राज्यों के 106 जिलें LWE से प्रभावित हैं सरकार के द्वारा एक अनुमित आंकड़े के अनुसार 40000पूर्णकालिक कैडरों का अनुमान है आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में मुख्य बाधा नगरीकृत होना प्रारंभ चतुर्थ चरण 2010 से 2017 वैचारिक स्तर से भटकाव उग्रवादी तत्वों की अधिकता एवं सरकार विरोध कर अपने प्रभाव में वृद्धि करना नगरीय क्षेत्रों में सक्रियता में वृद्धि स्थानीय स्तर पर व्याप्त विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में शामिल होना जैसे- विस्थापन एवं पुनर्वास का विरोध ,खनन का विरोध ,भूमि अधिग्रहण का विरोध आदि आतंकवाद के साथ संपर्क नक्सलवाद के प्रसिद्धि में प्रसार राजनीति और नक्सलवाद के मध्य अवैध संबंध LWE के नियंत्रण के लिए किये गए प्रमुख पहल विकासात्मक पहल एकीकृत एक्शन प्लान (IAP) सुरक्षा संबंधी व्यय योजना (SRI) विशिष्ट मूलभूत योजना – RRP-I- सड़क कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 8 राज्यों में प्रारंभ सिविक एक्शन प्लान – सशस्त्र सुरक्षा बलों एवं जनता के मध्य दूरियों को ख़त्म करने हेतु जिसका मूल उद्येश्य नैतिक पुलिसिंग का निर्माण करना होता है | अत्याधुनिक पुलिस स्टेशन का निर्माण रोशनी योजना प्रभावित राज्यों को अतिरिक्त वित्तीय सहायता समाधान सशक्त कार्यवाही पुलिस स्टेशन एवं पुलिस व्यवस्था का सुद्रीढीकरण नक्सल विरोधी अभियान नक्सल नियंत्रित भूभाग पर कब्ज़ा नक्सलियों के वित्तीयन को बंद करना भारत में वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सरकार ने व्यापक प्रयास किया है। इसके व्यापक प्रभाव पड़ा है। पिछले पाँच वर्षों में नक्सली घटनाओं में काफी कमी है।
46,902
भारत में लौह इस्पात उद्योगों की अवस्थिति और अवस्थिति के निर्धारक कारकों पर प्रकाश डालिए | हाल के वर्षों में इसमे परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी जा रही है, स्पष्ट कीजिये |( 150 - 200 शब्द) Highlight the location of iron and steel industries in India and the determinant factors of its location . In recent years, the trend of change in it is being observed, elusidate. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण भूमिका में उद्योग को परिभाषित करते हुए, भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में भारत में लौह इस्पात उद्योग संकुलों की स्थिति स्पष्ट करते हुए लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में हाल के वर्षों में इनकी अवस्थित में परिवर्तन के कारकों को समझाइए । संकुलों के विकेंद्रीकरण के लाभों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर :- उद्योगसे आशय ऐसी उच्च आर्थिक क्रियाओं से है, जिनका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके संवर्द्धन से होता है। उद्योग, संसाधनों के मूल्य संवर्धन एवं श्रम की उत्पादकता में सुनिश्चित करते हैं | लौह इस्पात उद्योगको किसी देश के अर्थिक विकास की धुरी माना जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है|भारतमें इसका सबसे पहला बड़े पैमाने का कारख़ाना1907में झारखंडराज्य में में साकची नामक स्थान परजमशेदजी टाटाद्वारा स्थापित किया गया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इस पर काफ़ी ध्यान दिया गया | सामान्य तौर पर किसी भी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में कच्चा माल, जलापूर्ति, ऊर्जा, श्रम, परिवहन की उपलब्धता, सरकार की नीति, बाजार से निकटता आदि कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| भारत में लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति को अनेक कारकों ने सुनिश्चित किया है | इन्ही कारकों के आधार पर लौह इस्पात उद्योग का भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार हुआ है| इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- भारत के छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग को शामिल करते हुए एक अर्धचन्द्राकार प्रदेश है जिसे छोटानागपुर के पठार के रूप में जाना जाता है| यहाँ लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक सभी कच्चे माल यथा लौह अयस्क, कोयला, चूना पत्थर, डोलोमाईट, मैंगनीज, आदि की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग संकुल का विकास हुआ है| इस क्षेत्र में बोकारो, दुर्गापुर, भिलाई और राउरकेला में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किये गये हैं| इसी तरह कर्नाटक में स्थापित विश्वेश्वरैया इस्पात उद्योग का आधार बाबा बुदन की पहाड़ी में स्थित कुद्रेमुख खान से निकलने वाला लौह अयस्क है| इसे जोग जलप्रपात से उर्जा और भद्रावती नदी से जल की आपूर्ति होती है| परिवहन की सहज उपलब्धता किसी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक होता है| टाटा इस्पात उद्योग मुंबई-कोलकाता रेलवे लाइन के समीप स्थित है| इसके अतिरिक्त सुवर्ण रेखा नदी से प्राप्त जल, निकटस्थ खानों से लौह अयस्क और कोयले की उपस्थिति ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| राउरकेला इस्पात संयंत्र उत्तरी उड़ीसा में स्थित है| इसे हीराकुंड परियोजना से ऊर्जा और कोइल नदी से जल की आपूर्ति होती है| यहाँ क्योझर से प्राप्त लौह अयस्क का उपयोग किया जाता है| भिलाई इस्पात संयंत्र की अवस्थिति को छोटा नागपुर पठार से प्राप्त कच्चा माल तथा कोरबा से ऊर्जा और विशाखापट्टनम बंदरगाह से निकटता ने निर्धारित किया है| छोटा नागपुर से प्राप्त कच्चेमाल ने बोकारो और दुर्गापुर में अवस्थिति को निर्धारित किया है| इन्हें दामोदर घाटी कार्पोरेशन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है| तमिलनाडु में स्थित सेलम इस्पात उद्योग की अवस्थिति को क्षेत्र में उपलब्ध लिग्नाईट कोयले ने निर्धारित किया है| इन कारकों के अतिरिक्त इनकी स्थिति एवं विकास में विदेशी सहयोग, स्थानीय क्षेत्रों से सस्ते श्रम की आपूर्ति, सार्वजनिक निवेश की उपलब्धता, सहज परिवहन की उपलब्धता और भारत के बड़े बाजार जैसे कारकों ने भी भूमिका निभायी है| लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग माना जाता है| परंपरागत रूप से इनकी स्थापना में उपरोक्त कारकों पर ही बल दिया जाता था| जिसके कारण इनका विकास कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही हुआ है| उदारीकरण के बाद के वर्षों में लौह-इस्पात उद्योग में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है| वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास, परम्परागत कारकों की अनुपलब्धता के बावजूद औद्योगिक केन्द्रों और बाजारों के समीप हो रहा है| इस विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारकों ने सुनिश्चित किया है- तकनीकी विकास से अब प्रति इकाई उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो गयी है अतः ऊर्जा संयंत्रों के निकट स्थापना की बाधा उत्पन्न नही होती है, इसके साथ ही उर्जा के वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता ने स्थापना को और सहज बनाया है| मशीनीकरण और ऑटोमेशन के बढ़ने से सस्ते श्रम की उपलब्धता भी आवश्यक कारक नहीं रह गया है| वर्तमान में प्रायः मिनी स्टील प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। मिनी स्टील प्लांटों की स्थापना में कम पूँजी, कम निवेश, भूमिअधिग्रहण की कम आवश्यकताहोती है| इस कारण उद्योगपति इस ओर आकर्षित हुए हैं| मिनी स्टील प्लांटों में अधिकांशतः स्क्रैप आयरन का प्रयोग किया जाता है जिसकी उपलब्धता शहरों में अधिक होती है, स्क्रैप आयरन के प्रयोग से लौह प्रसंस्करण लागत में कमी, ऊर्जा अथवा कोयले की आवश्यकता कम होती है| अर्थात कुल लागत में कमी आती है जिससे लाभ बढ़ता है| इससे निवेशकों को प्रोत्साहनमिलता है| उपरोक्त कारकों ने लौह इस्पात उद्योग के विकेंद्रीकरण अथवा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| वितरण की यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय आर्थिक असमानता में कमी लाने में सहायक होगा तथा लौह-इस्पात क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी बाजार के निर्माण में सहायक होगा|।
##Question:भारत में लौह इस्पात उद्योगों की अवस्थिति और अवस्थिति के निर्धारक कारकों पर प्रकाश डालिए | हाल के वर्षों में इसमे परिवर्तन की प्रवृत्ति देखी जा रही है, स्पष्ट कीजिये |( 150 - 200 शब्द) Highlight the location of iron and steel industries in India and the determinant factors of its location . In recent years, the trend of change in it is being observed, elusidate. (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में उद्योग को परिभाषित करते हुए, भारत में लौह इस्पात उद्योग के विकास की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में भारत में लौह इस्पात उद्योग संकुलों की स्थिति स्पष्ट करते हुए लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों की चर्चा कीजिये । उत्तर के तीसरे भाग में हाल के वर्षों में इनकी अवस्थित में परिवर्तन के कारकों को समझाइए । संकुलों के विकेंद्रीकरण के लाभों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर :- उद्योगसे आशय ऐसी उच्च आर्थिक क्रियाओं से है, जिनका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उनके संवर्द्धन से होता है। उद्योग, संसाधनों के मूल्य संवर्धन एवं श्रम की उत्पादकता में सुनिश्चित करते हैं | लौह इस्पात उद्योगको किसी देश के अर्थिक विकास की धुरी माना जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों के विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है|भारतमें इसका सबसे पहला बड़े पैमाने का कारख़ाना1907में झारखंडराज्य में में साकची नामक स्थान परजमशेदजी टाटाद्वारा स्थापित किया गया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत इस पर काफ़ी ध्यान दिया गया | सामान्य तौर पर किसी भी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में कच्चा माल, जलापूर्ति, ऊर्जा, श्रम, परिवहन की उपलब्धता, सरकार की नीति, बाजार से निकटता आदि कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| भारत में लौह इस्पात उद्योग की अवस्थिति को अनेक कारकों ने सुनिश्चित किया है | इन्ही कारकों के आधार पर लौह इस्पात उद्योग का भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार हुआ है| इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं- भारत के छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग को शामिल करते हुए एक अर्धचन्द्राकार प्रदेश है जिसे छोटानागपुर के पठार के रूप में जाना जाता है| यहाँ लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक सभी कच्चे माल यथा लौह अयस्क, कोयला, चूना पत्थर, डोलोमाईट, मैंगनीज, आदि की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग संकुल का विकास हुआ है| इस क्षेत्र में बोकारो, दुर्गापुर, भिलाई और राउरकेला में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किये गये हैं| इसी तरह कर्नाटक में स्थापित विश्वेश्वरैया इस्पात उद्योग का आधार बाबा बुदन की पहाड़ी में स्थित कुद्रेमुख खान से निकलने वाला लौह अयस्क है| इसे जोग जलप्रपात से उर्जा और भद्रावती नदी से जल की आपूर्ति होती है| परिवहन की सहज उपलब्धता किसी उद्योग की अवस्थिति के निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक होता है| टाटा इस्पात उद्योग मुंबई-कोलकाता रेलवे लाइन के समीप स्थित है| इसके अतिरिक्त सुवर्ण रेखा नदी से प्राप्त जल, निकटस्थ खानों से लौह अयस्क और कोयले की उपस्थिति ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| राउरकेला इस्पात संयंत्र उत्तरी उड़ीसा में स्थित है| इसे हीराकुंड परियोजना से ऊर्जा और कोइल नदी से जल की आपूर्ति होती है| यहाँ क्योझर से प्राप्त लौह अयस्क का उपयोग किया जाता है| भिलाई इस्पात संयंत्र की अवस्थिति को छोटा नागपुर पठार से प्राप्त कच्चा माल तथा कोरबा से ऊर्जा और विशाखापट्टनम बंदरगाह से निकटता ने निर्धारित किया है| छोटा नागपुर से प्राप्त कच्चेमाल ने बोकारो और दुर्गापुर में अवस्थिति को निर्धारित किया है| इन्हें दामोदर घाटी कार्पोरेशन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है| तमिलनाडु में स्थित सेलम इस्पात उद्योग की अवस्थिति को क्षेत्र में उपलब्ध लिग्नाईट कोयले ने निर्धारित किया है| इन कारकों के अतिरिक्त इनकी स्थिति एवं विकास में विदेशी सहयोग, स्थानीय क्षेत्रों से सस्ते श्रम की आपूर्ति, सार्वजनिक निवेश की उपलब्धता, सहज परिवहन की उपलब्धता और भारत के बड़े बाजार जैसे कारकों ने भी भूमिका निभायी है| लौह-इस्पात उद्योग एक भारी उद्योग माना जाता है| परंपरागत रूप से इनकी स्थापना में उपरोक्त कारकों पर ही बल दिया जाता था| जिसके कारण इनका विकास कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही हुआ है| उदारीकरण के बाद के वर्षों में लौह-इस्पात उद्योग में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति देखी जा सकती है| वर्तमान में लौह-इस्पात उद्योग का विकास, परम्परागत कारकों की अनुपलब्धता के बावजूद औद्योगिक केन्द्रों और बाजारों के समीप हो रहा है| इस विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को निम्नलिखित कारकों ने सुनिश्चित किया है- तकनीकी विकास से अब प्रति इकाई उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता कम हो गयी है अतः ऊर्जा संयंत्रों के निकट स्थापना की बाधा उत्पन्न नही होती है, इसके साथ ही उर्जा के वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता ने स्थापना को और सहज बनाया है| मशीनीकरण और ऑटोमेशन के बढ़ने से सस्ते श्रम की उपलब्धता भी आवश्यक कारक नहीं रह गया है| वर्तमान में प्रायः मिनी स्टील प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। मिनी स्टील प्लांटों की स्थापना में कम पूँजी, कम निवेश, भूमिअधिग्रहण की कम आवश्यकताहोती है| इस कारण उद्योगपति इस ओर आकर्षित हुए हैं| मिनी स्टील प्लांटों में अधिकांशतः स्क्रैप आयरन का प्रयोग किया जाता है जिसकी उपलब्धता शहरों में अधिक होती है, स्क्रैप आयरन के प्रयोग से लौह प्रसंस्करण लागत में कमी, ऊर्जा अथवा कोयले की आवश्यकता कम होती है| अर्थात कुल लागत में कमी आती है जिससे लाभ बढ़ता है| इससे निवेशकों को प्रोत्साहनमिलता है| उपरोक्त कारकों ने लौह इस्पात उद्योग के विकेंद्रीकरण अथवा वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| वितरण की यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय आर्थिक असमानता में कमी लाने में सहायक होगा तथा लौह-इस्पात क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी बाजार के निर्माण में सहायक होगा|।
46,903
लोकसेवकों की नैतिक जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में विभिन्न प्रकार की बाधाओं की चर्चा करते हुए इसे दूर करने हेतु उपयुक्त उपायों को भी बताइए | (150-200 शब्द) While discussing various types of obstacles towrads ensuring ethical accountability of public servants, also mention suitable measures to overcome it. (150-200 words)
एप्रोच- भूमिका में लोकसेवकों की जवाबदेही का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | पुनः जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं को को बताइए | अंत में इन बाधाओं को दूर करने के उपाय को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए | उत्तर - जवाबदेहिता का अर्थ है कि किसी सिविल सेवक ने अपनी शक्तियों तथा विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए जो कृत्य किये हैं उन कृत्यों के विधिक और नैतिक औचित्य की व्याख्या करने में यदि सक्षम नहीं होता तो उसे समुचित दंड का भागी होना होगा | उससे जिस व्याख्या की अपेक्षा की जाती है उसमे निहित है कि उसके कृत्य में विवेकशीलता , उपयुक्तता , शुचिता , विधिकता जैसे तत्व उपस्थित रहें | यदि ये तत्व उपस्थित हैं तो गलती से होने वाली भूल पर दंड नहीं दिया जायेगा किन्तु यदि ये तत्व अनुपस्थित हैं तो उसे दंड भुगतना होगा | जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में बाधाएं - लोक सेवकों की अपने विशिष्ट कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञता का होना | लोक सेवकों का पूर्णकालीन होना | समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों के कार्यों में अधिक जटिलता एवं विस्तारीकरण का होना | लोकसेवकों की जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु विधिक दायित्व के साथ-साथ नैतिक दायित्व भी | लोक सेवकों का संगठन के प्रति वफादार होने के कारण शासन प्रणाली की खामियों को उजागर करने पर विशेष बल नहीं | सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर लोकसेवकों का महत्वपूर्ण सूचनाओं पर नियंत्रण, जोकि आम जनता की पहुँच से बाहर | लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के निम्नलिखित उपाय- सुनिश्चित सोपानक्रम होना चाहिए , जिसमें सभी पदों की शक्तियां और उत्तरदायित्व स्पष्टतः परिभाषित हो | जहाँ-जहाँ संभव हो प्रशासनिक एकाधिकार ख़त्म करके सीमित या मुक्त प्रतिस्पर्धा शुरू की जानी चाहिए क्योंकि प्रतिस्पर्धा स्वतः जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है | पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट या लोकसेवा गारंटी अधिनियम के तहत प्रशासन को कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए , ताकि वे निर्भयतापूर्वक लोकहित में निर्णय कर सकें | किसी कार्य या परियोजना के सन्दर्भ में सभी अधिकारियों में स्पष्ट कार्य विभाजन हो | संदेह की गुन्जाइश नहीं रहनी चाहिए | जिम्मेदारी को निभाने की प्रतिबद्धता और निष्पादन के आधार पर समुचित पुरस्कारों तथा दंडों की वस्तुनिष्ठ व्यवस्था हो | सूचना के अधिकार का समुचित क्रियान्वयन | सिटिजन चार्टर की व्यवस्था | भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कारवाई होनी चाहिए ताकि सभी कर्मचारियों के पास भ्रष्ट न होने की स्पष्ट वजह हो |
##Question:लोकसेवकों की नैतिक जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने की दिशा में विभिन्न प्रकार की बाधाओं की चर्चा करते हुए इसे दूर करने हेतु उपयुक्त उपायों को भी बताइए | (150-200 शब्द) While discussing various types of obstacles towrads ensuring ethical accountability of public servants, also mention suitable measures to overcome it. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भूमिका में लोकसेवकों की जवाबदेही का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | पुनः जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं को को बताइए | अंत में इन बाधाओं को दूर करने के उपाय को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए | उत्तर - जवाबदेहिता का अर्थ है कि किसी सिविल सेवक ने अपनी शक्तियों तथा विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए जो कृत्य किये हैं उन कृत्यों के विधिक और नैतिक औचित्य की व्याख्या करने में यदि सक्षम नहीं होता तो उसे समुचित दंड का भागी होना होगा | उससे जिस व्याख्या की अपेक्षा की जाती है उसमे निहित है कि उसके कृत्य में विवेकशीलता , उपयुक्तता , शुचिता , विधिकता जैसे तत्व उपस्थित रहें | यदि ये तत्व उपस्थित हैं तो गलती से होने वाली भूल पर दंड नहीं दिया जायेगा किन्तु यदि ये तत्व अनुपस्थित हैं तो उसे दंड भुगतना होगा | जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने में बाधाएं - लोक सेवकों की अपने विशिष्ट कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञता का होना | लोक सेवकों का पूर्णकालीन होना | समय के परिवर्तन के साथ लोकसेवकों के कार्यों में अधिक जटिलता एवं विस्तारीकरण का होना | लोकसेवकों की जवाबदेहिता को सुनिश्चित करने हेतु विधिक दायित्व के साथ-साथ नैतिक दायित्व भी | लोक सेवकों का संगठन के प्रति वफादार होने के कारण शासन प्रणाली की खामियों को उजागर करने पर विशेष बल नहीं | सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर लोकसेवकों का महत्वपूर्ण सूचनाओं पर नियंत्रण, जोकि आम जनता की पहुँच से बाहर | लोक सेवकों की व्यक्तिगत और सामूहिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के निम्नलिखित उपाय- सुनिश्चित सोपानक्रम होना चाहिए , जिसमें सभी पदों की शक्तियां और उत्तरदायित्व स्पष्टतः परिभाषित हो | जहाँ-जहाँ संभव हो प्रशासनिक एकाधिकार ख़त्म करके सीमित या मुक्त प्रतिस्पर्धा शुरू की जानी चाहिए क्योंकि प्रतिस्पर्धा स्वतः जवाबदेहिता सुनिश्चित करती है | पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट या लोकसेवा गारंटी अधिनियम के तहत प्रशासन को कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए , ताकि वे निर्भयतापूर्वक लोकहित में निर्णय कर सकें | किसी कार्य या परियोजना के सन्दर्भ में सभी अधिकारियों में स्पष्ट कार्य विभाजन हो | संदेह की गुन्जाइश नहीं रहनी चाहिए | जिम्मेदारी को निभाने की प्रतिबद्धता और निष्पादन के आधार पर समुचित पुरस्कारों तथा दंडों की वस्तुनिष्ठ व्यवस्था हो | सूचना के अधिकार का समुचित क्रियान्वयन | सिटिजन चार्टर की व्यवस्था | भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध कठोर और त्वरित कारवाई होनी चाहिए ताकि सभी कर्मचारियों के पास भ्रष्ट न होने की स्पष्ट वजह हो |
46,905
साइमन आयोग के गठन के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसी परिप्रेक्ष्य में नेहरु रिपोर्ट के मुख्य प्रावधानों को भी बताइए | (150-200 शब्द/10 अंक) Clarify the objectives of the formation of the Simon Commission. Also explain the main provisions of the Nehru Report, in this perspective. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच :- भूमिका में संक्षेप में साइमन कमीशन और उसके उद्देश्यों का उल्लेख कीजिये। उत्तर के पहले भाग मे नेहरू रिपोर्ट की चर्चा कीजिये और उसके लाने के पीछे कारणो को भी बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में नेहरू रिपोर्ट के प्रावधानों को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष में नेहरू रिपोर्ट के महत्व को बताइये । उत्तर :- सन 1927 ब्रिटिश संसद सदस्य सर जॉन साइमन के नेतृत्व में साइमन आयोग का गठन किया गया था , हालांकि इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे तथा सभी ब्रिटिश नागरिक थे , इसमे किसी भी भारतीय को शमिल नही किया गया । जिसके कारण इसका सम्पूर्ण भारत में लगभग सभी भारतीय नेताओ द्वारा विरोध किया गया। साइमन आयोग के गठन के निम्नलिखित उद्देश्य थे – 1919 के भारत परिषद अंधिनियम की समीक्षा करना और आगामी सुधारों के लिए सलाह देना । इसका समय पूर्ण गठन का कारण इंग्लैंड के चुनाव में लैबर पार्टी की जीत की संभावनाथी । इसके साथ ही भारत में बढ़ते सांप्रदायिक दंगेइस आयोग के लिए अनुकूल समय था क्योकि समाज में राष्ट्रीय एकता का अभाव था और लोग आपस में लड़ रहे थे । उपरोक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर साइमन आयोग का गठन किया गया , जिसका सम्पूर्ण भारत में विरोध हुआ । जिसके कारण भारत सचिव लार्ड बकेंनहेड ने भारतीयो को आपसी सहमति से कोई सर्वमान्य रिपोर्ट तैयार करने को कहा , जिसके पश्चात मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में 1928 में नेहरू रिपोर्ट तैयार की गई । नेहरू रिपोर्ट के महत्वपूर्ण प्रस्ताव निम्नलिखित थे – भारत को डोमेनियन स्टेटस का दर्जा दिये जाने की मांग की गयी , जो की अन्य राष्ट्र मण्डल देशो की तरह अपने ज्यादातर मामलों में स्वतंत्र होगा । वायसराय को भारत का संवैधानिक प्रमुख बनाना जो की भारत में ब्रिटिश क्राउन के बराबर होगा । भारत को परिसंघ बनाना जिसमे केंद्र तथा प्रान्तों के स्तर पर उत्तरदायी सरकारका गठन करना । केंद्र में दो सदनीय व्यवस्था जिसमे मंत्रालय विधायिका के प्रति उत्तरदायी । केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियाँ होंगी। पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन। विधान मंडलों में जनसंख्या के अनुपात में अल्पसंख्यकों को आरक्षण। सिंध व उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत को पूर्ण राज्य कर दर्जा। महिलाओ को समानता प्रदान करने संबंधी प्रावधान । धार्मिक स्वतंत्रता सहित 19 अधिकारों की मांग , वयस्क मताधिकार भी। नेहरू रिपोर्ट के अगर उपरोक्त प्रावधानों को गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि इन ज्यादातर प्रावधानों को संविधान के माध्यम से अपनाया गया है तथा ये प्रावधान भारत जैसे सफल लोकतंत्र की नीव हैं । जैसे दो सदनीय व्यवस्था, कार्य पालिका का विधायका के प्रति उत्तरदायी होना , वयस्क मताधिकार , केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियों का प्रावधान आदि । इन्ही सभी विशेषताओ के कारण नेहरू रिपोर्ट को भारतीय संविधान का पूर्वगामी माना जाता है , जिसमे आरंभिक संविधान की झलक देखी जा सकती है ।
##Question:साइमन आयोग के गठन के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इसी परिप्रेक्ष्य में नेहरु रिपोर्ट के मुख्य प्रावधानों को भी बताइए | (150-200 शब्द/10 अंक) Clarify the objectives of the formation of the Simon Commission. Also explain the main provisions of the Nehru Report, in this perspective. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच :- भूमिका में संक्षेप में साइमन कमीशन और उसके उद्देश्यों का उल्लेख कीजिये। उत्तर के पहले भाग मे नेहरू रिपोर्ट की चर्चा कीजिये और उसके लाने के पीछे कारणो को भी बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में नेहरू रिपोर्ट के प्रावधानों को बताइये । उत्तर के अंतिम भाग में निष्कर्ष में नेहरू रिपोर्ट के महत्व को बताइये । उत्तर :- सन 1927 ब्रिटिश संसद सदस्य सर जॉन साइमन के नेतृत्व में साइमन आयोग का गठन किया गया था , हालांकि इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे तथा सभी ब्रिटिश नागरिक थे , इसमे किसी भी भारतीय को शमिल नही किया गया । जिसके कारण इसका सम्पूर्ण भारत में लगभग सभी भारतीय नेताओ द्वारा विरोध किया गया। साइमन आयोग के गठन के निम्नलिखित उद्देश्य थे – 1919 के भारत परिषद अंधिनियम की समीक्षा करना और आगामी सुधारों के लिए सलाह देना । इसका समय पूर्ण गठन का कारण इंग्लैंड के चुनाव में लैबर पार्टी की जीत की संभावनाथी । इसके साथ ही भारत में बढ़ते सांप्रदायिक दंगेइस आयोग के लिए अनुकूल समय था क्योकि समाज में राष्ट्रीय एकता का अभाव था और लोग आपस में लड़ रहे थे । उपरोक्त उद्देश्यों को ध्यान में रखकर साइमन आयोग का गठन किया गया , जिसका सम्पूर्ण भारत में विरोध हुआ । जिसके कारण भारत सचिव लार्ड बकेंनहेड ने भारतीयो को आपसी सहमति से कोई सर्वमान्य रिपोर्ट तैयार करने को कहा , जिसके पश्चात मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में 1928 में नेहरू रिपोर्ट तैयार की गई । नेहरू रिपोर्ट के महत्वपूर्ण प्रस्ताव निम्नलिखित थे – भारत को डोमेनियन स्टेटस का दर्जा दिये जाने की मांग की गयी , जो की अन्य राष्ट्र मण्डल देशो की तरह अपने ज्यादातर मामलों में स्वतंत्र होगा । वायसराय को भारत का संवैधानिक प्रमुख बनाना जो की भारत में ब्रिटिश क्राउन के बराबर होगा । भारत को परिसंघ बनाना जिसमे केंद्र तथा प्रान्तों के स्तर पर उत्तरदायी सरकारका गठन करना । केंद्र में दो सदनीय व्यवस्था जिसमे मंत्रालय विधायिका के प्रति उत्तरदायी । केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियाँ होंगी। पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन। विधान मंडलों में जनसंख्या के अनुपात में अल्पसंख्यकों को आरक्षण। सिंध व उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत को पूर्ण राज्य कर दर्जा। महिलाओ को समानता प्रदान करने संबंधी प्रावधान । धार्मिक स्वतंत्रता सहित 19 अधिकारों की मांग , वयस्क मताधिकार भी। नेहरू रिपोर्ट के अगर उपरोक्त प्रावधानों को गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि इन ज्यादातर प्रावधानों को संविधान के माध्यम से अपनाया गया है तथा ये प्रावधान भारत जैसे सफल लोकतंत्र की नीव हैं । जैसे दो सदनीय व्यवस्था, कार्य पालिका का विधायका के प्रति उत्तरदायी होना , वयस्क मताधिकार , केंद्र के पास अवशिष्ट शक्तियों का प्रावधान आदि । इन्ही सभी विशेषताओ के कारण नेहरू रिपोर्ट को भारतीय संविधान का पूर्वगामी माना जाता है , जिसमे आरंभिक संविधान की झलक देखी जा सकती है ।
46,906
संविधान की 5वीं व 6 वीं अनुसूची में उल्लेखित प्रावधानों एवं उनकी प्रमुखविशेषताओं की चर्चाकीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the provisions mentioned in the 5th and 6th Schedule of the Constitution and their salient features. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंसंविधान की 5वीं व 6 वीं अनुसूची का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंसंविधान की 5वीं व 6 वीं अनुसूची में उल्लेखित प्रावधानों एवं उनकी प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान की पांचवीं अनुसूची में राज्यों के अनुसूचित क्षेत्र व जनजातीय प्रशासन व नियंत्रण के बारे में चर्चा की गई है। संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत पांचवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रावधान हैं।इन राज्यों में असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम शामिल नहीं है। दूसरी और संविधान की छठी अनुसूची में चार उत्तरी पूर्वी राज्योंअसम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के प्रशासन के संबंध में व्यवस्था की गई है। पांचवीं अनुसूची के मुख्य प्रावधान एवं उनकी प्रमुख विशेषताएं:- पांचवीं अनुसूची के तहत किसी भी क्षेत्र को "अनुसूचित क्षेत्र" के रूप में घोषित करने के लिए निम्नलिखित मानदंड हैं चूँकि ये मानदंड भारत के संविधान में नहीं लिखे गए हैं लेकिन वे अच्छी तरह से स्थापित हो गए हैं: जनजातीय आबादी की प्रधानता, क्षेत्र की सघनता और उचित आकार, एक व्यवहार्य प्रशासनिक इकाई जैसे जिला, ब्लॉक या तालुक, और पड़ोसी क्षेत्रों की तुलना में क्षेत्र का आर्थिक पिछड़ापन एक राज्य के संबंध में "अनुसूचित क्षेत्रों" का विनिर्देश, उस राज्य के राज्यपाल के साथ परामर्श के बाद राष्ट्रपति के एक अधिसूचित आदेश द्वारा होता है। राष्ट्रपति सम्बंधितराज्य के राज्यपाल के परामर्श से राज्य में किसी भी अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्र में वृद्धि कर सकते हैं; और किसी भी राज्य के संबंध में उन क्षेत्रों को पुनर्परिभाषित करने के लिए नए आदेश दे सकते हैं जिसे अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया जाना है। इन क्षेत्रों मेंकिसी भी परिवर्तन, वृद्धि, कमी, नए क्षेत्रों का समावेश या "अनुसूचित क्षेत्रों" से संबंधित किसी भी आदेश को रद्द करने के मामले में भी इसी प्रकारलागू होता है। केंद्र व राज्य की कार्यकारी शक्तियों के संदर्भ में राज्य की कार्यकारी शक्तियां अनुसूची क्षेत्रों पर भी लागू होती हैं। इस संदर्भ में राज्यपाल पर यह विशेष जिम्मेदारी होती है कि वह राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट पेश करें। जिन क्षेत्रों को अनुसूचित घोषित किया जाता है उनसे सम्बंधितराज्यपाल अनुसूची 5 के अंतर्गत उस राज्य में एक आदिवासी सलाहकारी परिषद गठित करते हैं। इस परिषद में 20 सदस्य होते हैं जिनमें तीन चौथाई आदिवासी होने चाहिए। यदि उस राज्य की विधानसभा में इतनी संख्या में आदिवासी प्रतिनिधि निर्वाचित किये गए हैं तो पहले उनको प्रमुखता दी जाती है। राज्यपाल को यह अधिकार भी होता है कि वह संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून को लागू न करें या कुछ परिवर्तन एवं अपवादों के साथ उसे लागू करे। वर्तमान में, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित), छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान में अनुसूचित क्षेत्र घोषित किए गए हैं। अनुसूची 6 के अंतर्गत विशेष उपबंध एवं इनकी मुख्य विशेषताएं:- जनजाति क्षेत्रों में एक स्वशासी जिलों का प्रावधान।यदि किसी स्वशासी ज़िले में भिन्न-भिन्न अनुसूचित जनजातियां हैं तो राज्यपाल, लोक अधिसूचना द्वारा, ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों को, जिनमें वे बसे हुए हैं, स्वशासी प्रदेशों में विभाजित कर सकेगा।इसने बढ़ा याघटा सकता है या नाम का भी परिवर्तन कर सकता है। अनुसूचित क्षेत्रों के विपरीत इन चार राज्यों के प्रायः प्रत्येक जिलों/उप संभागों पर एक स्वायत्त आदिवासी परिषद का गठन किया जाता है और इन चार राज्यों के राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वह इन चार आदिवासी स्वायत्त परिषदों से परामर्श करके इन क्षेत्रों के विकास एवं प्रशासन संबंधी नियम बनाये। असम राज्यपाल को शेष तीन राज्यों की तुलना में अधिक विवेकीयशक्तियां प्राप्त हैं जैसे राज्य में खनिज के केंद्र द्वारा प्रदत रॉयल्टी के वितरण के संदर्भ में। ज़िला परिषदों और प्रादेशिक परिषदों को विधि बनाने कीशक्ति प्रदान करना। वे भूमि, वन, नहर इत्यादि विषयों से संबंधित विधि बना सकती हैं। स्वशासी प्रदेश की प्रादेशिक परिषदउस राज्य के किसी न्यायालय का अप वर्जन करके ग्राम परिषदों या न्यायालयों का गठन कर सकेगी और उपुयक्त व्यक्तियों को ऐसी ग्राम परिषद के सदस्य या ऐसे न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी नियुक्त कर सकेगी। कुछ वादों, मामलों और अपराधों के विचारण के लिए प्रादेशिक परिषद और ज़िला परिषदों को शक्तियांका प्रदान किया जाना इत्यादि। इस प्रकारसंविधान की 5वीं व 6ठीअनुसूची में उल्लेखित प्रावधान सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े आदिम आदिवासियों या जनजातियों के लिए विशेष व्यवस्था करते हैं जिनका विशेष महत्व है।
##Question:संविधान की 5वीं व 6 वीं अनुसूची में उल्लेखित प्रावधानों एवं उनकी प्रमुखविशेषताओं की चर्चाकीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the provisions mentioned in the 5th and 6th Schedule of the Constitution and their salient features. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका मेंसंविधान की 5वीं व 6 वीं अनुसूची का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंसंविधान की 5वीं व 6 वीं अनुसूची में उल्लेखित प्रावधानों एवं उनकी प्रमुख विशेषताओं की चर्चा कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान की पांचवीं अनुसूची में राज्यों के अनुसूचित क्षेत्र व जनजातीय प्रशासन व नियंत्रण के बारे में चर्चा की गई है। संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत पांचवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रावधान हैं।इन राज्यों में असम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम शामिल नहीं है। दूसरी और संविधान की छठी अनुसूची में चार उत्तरी पूर्वी राज्योंअसम, मेघालय, त्रिपुरा एवं मिज़ोरम के प्रशासन के संबंध में व्यवस्था की गई है। पांचवीं अनुसूची के मुख्य प्रावधान एवं उनकी प्रमुख विशेषताएं:- पांचवीं अनुसूची के तहत किसी भी क्षेत्र को "अनुसूचित क्षेत्र" के रूप में घोषित करने के लिए निम्नलिखित मानदंड हैं चूँकि ये मानदंड भारत के संविधान में नहीं लिखे गए हैं लेकिन वे अच्छी तरह से स्थापित हो गए हैं: जनजातीय आबादी की प्रधानता, क्षेत्र की सघनता और उचित आकार, एक व्यवहार्य प्रशासनिक इकाई जैसे जिला, ब्लॉक या तालुक, और पड़ोसी क्षेत्रों की तुलना में क्षेत्र का आर्थिक पिछड़ापन एक राज्य के संबंध में "अनुसूचित क्षेत्रों" का विनिर्देश, उस राज्य के राज्यपाल के साथ परामर्श के बाद राष्ट्रपति के एक अधिसूचित आदेश द्वारा होता है। राष्ट्रपति सम्बंधितराज्य के राज्यपाल के परामर्श से राज्य में किसी भी अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्र में वृद्धि कर सकते हैं; और किसी भी राज्य के संबंध में उन क्षेत्रों को पुनर्परिभाषित करने के लिए नए आदेश दे सकते हैं जिसे अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया जाना है। इन क्षेत्रों मेंकिसी भी परिवर्तन, वृद्धि, कमी, नए क्षेत्रों का समावेश या "अनुसूचित क्षेत्रों" से संबंधित किसी भी आदेश को रद्द करने के मामले में भी इसी प्रकारलागू होता है। केंद्र व राज्य की कार्यकारी शक्तियों के संदर्भ में राज्य की कार्यकारी शक्तियां अनुसूची क्षेत्रों पर भी लागू होती हैं। इस संदर्भ में राज्यपाल पर यह विशेष जिम्मेदारी होती है कि वह राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट पेश करें। जिन क्षेत्रों को अनुसूचित घोषित किया जाता है उनसे सम्बंधितराज्यपाल अनुसूची 5 के अंतर्गत उस राज्य में एक आदिवासी सलाहकारी परिषद गठित करते हैं। इस परिषद में 20 सदस्य होते हैं जिनमें तीन चौथाई आदिवासी होने चाहिए। यदि उस राज्य की विधानसभा में इतनी संख्या में आदिवासी प्रतिनिधि निर्वाचित किये गए हैं तो पहले उनको प्रमुखता दी जाती है। राज्यपाल को यह अधिकार भी होता है कि वह संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून को लागू न करें या कुछ परिवर्तन एवं अपवादों के साथ उसे लागू करे। वर्तमान में, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित), छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान में अनुसूचित क्षेत्र घोषित किए गए हैं। अनुसूची 6 के अंतर्गत विशेष उपबंध एवं इनकी मुख्य विशेषताएं:- जनजाति क्षेत्रों में एक स्वशासी जिलों का प्रावधान।यदि किसी स्वशासी ज़िले में भिन्न-भिन्न अनुसूचित जनजातियां हैं तो राज्यपाल, लोक अधिसूचना द्वारा, ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों को, जिनमें वे बसे हुए हैं, स्वशासी प्रदेशों में विभाजित कर सकेगा।इसने बढ़ा याघटा सकता है या नाम का भी परिवर्तन कर सकता है। अनुसूचित क्षेत्रों के विपरीत इन चार राज्यों के प्रायः प्रत्येक जिलों/उप संभागों पर एक स्वायत्त आदिवासी परिषद का गठन किया जाता है और इन चार राज्यों के राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वह इन चार आदिवासी स्वायत्त परिषदों से परामर्श करके इन क्षेत्रों के विकास एवं प्रशासन संबंधी नियम बनाये। असम राज्यपाल को शेष तीन राज्यों की तुलना में अधिक विवेकीयशक्तियां प्राप्त हैं जैसे राज्य में खनिज के केंद्र द्वारा प्रदत रॉयल्टी के वितरण के संदर्भ में। ज़िला परिषदों और प्रादेशिक परिषदों को विधि बनाने कीशक्ति प्रदान करना। वे भूमि, वन, नहर इत्यादि विषयों से संबंधित विधि बना सकती हैं। स्वशासी प्रदेश की प्रादेशिक परिषदउस राज्य के किसी न्यायालय का अप वर्जन करके ग्राम परिषदों या न्यायालयों का गठन कर सकेगी और उपुयक्त व्यक्तियों को ऐसी ग्राम परिषद के सदस्य या ऐसे न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी नियुक्त कर सकेगी। कुछ वादों, मामलों और अपराधों के विचारण के लिए प्रादेशिक परिषद और ज़िला परिषदों को शक्तियांका प्रदान किया जाना इत्यादि। इस प्रकारसंविधान की 5वीं व 6ठीअनुसूची में उल्लेखित प्रावधान सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े आदिम आदिवासियों या जनजातियों के लिए विशेष व्यवस्था करते हैं जिनका विशेष महत्व है।
46,910
मानसून को समझाते हुए, भारत के संदर्भ में इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये।( 10 अंक /150 - 200 शब्द) Explaining the monsoon, describe its salient features in the context of India. ( 10 marks /150 - 200 words)
दृष्टिकोण · भूमिका में मानसून की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में मानसूनी जलवायु और उसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त चर्चा । · उत्तर के तीसरे भाग में मानसून की विशेषताओं की चर्चा कीजिये । उत्तर :- मानसून अरबी भाषा का शब्द है। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरब व्यापारी इस शब्द का प्रयोग करते थे। भारत में मानसून उन हवाओं को कहते हैं जो हवाएं जून से सितंबर के गरमी के दिनों में दक्षिण-पश्चिम दिशा से और नवंबर से मार्च के सर्दी के दिनों में उत्तर-पूर्वी दिशा से बहती हैं। ग्रीष्मकाल में मानसून हवाएं सागर से स्थल की ओर एवं शीतकाल में स्थल से सागर की ओर चला करती है। दिशा बदलने के कारण प्रथम को दक्षिण पश्चिम मानसून एवं द्वितीय को उत्तर पूर्वी मानसून या लौटता मानसून कहते हैं। ये मानसून हवाएं इतनी प्रबल होती हैं कि इनके प्रभाव से उत्तरी हिंद महासागर में सागरीय धारा प्रवाहित होने लगती है तथा इन हवाओं की दिशा के साथ उक्त सागरीय धारा भी इन हवाओं की दिशा में अपनी दिशा बदल लेती हैं। इस प्रकार सागरीय धाराओं का वर्ष में दो बार दिशा बदलना केवल हिंद महासागर में होता है। विश्व के किसी महासागर में इस प्रकार की घटना नहीं होती। मानसून हवाओं के नाम पर उत्तरी हिंद महासागर की इस धारा को मानसून धारा कहते हैं। भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधी मानसूनी जलवायु है । जिसमे मानसून कालिक पवन का सूचक है । भारत की जलवायु को हिमालय की उपस्थिति, प्रायद्वीपीय पठार की आकृति, हिन्द महासागर की दोनों तरफ अवस्थिति आदि कारक इसकी जलवायु को प्रभावित करते हैं । भारतीय मानसून की विशेषताओं को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- आगमन और प्रस्थान की अनिश्चितता भारत में आगमन 20 मई के करीब ( अंडमान निकोबार में ) दक्षिण भारत में आगमन 1 जून के करीब पूरे भारत में आगमन 20 जुलाई प्रस्थान ( लौटता हुआ मानसून ) 1 सितंबर से और इसका अंत 1 दिसंबर तक दक्षिणी पश्चिमी मानसून की अवधि सामान्य तौर से दक्षिण से उत्तर की ओर और पूर्व से पश्चिमी की ओर बढ़ने पर घटती जाती है जिस क्षेत्र में अवधि बड़ी होती है वह वर्षा की मात्रा अधिक होती है । मानसून विच्छेद ( break in mansoon ) विच्छेद की अवधि तथा बारंबारता में क्षेत्रीय अंतराल जो वर्षा की वितरण को प्रभावित करने वाला दूसरा सबसे बड़ा कारक इसकी अनिश्चितता मानसून को अनिश्चित बनाती है । मानसून का फटना मानसून के आगमन के साथ मालबार तथा कोंकण तट पर कई दिनो तक निरंतर वर्षा होती रहती है । फिर उसके बाद सामान्य स्थिति आती है अर्थात मानसून विच्छेद के साथ वर्षा होती है । मानसून के फटने का संबंध मानसून तंत्र में उपस्थित अतिरिक्त दबाव से है । जो फटने के रूप में प्रदर्शित होता है । जिसका संबंध उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेटधारा के उतरायन और दक्षिणायन से संबन्धित है । वर्षा की मात्रा में अनिश्चितता औसत वर्षा 177 cm उपरोक्त कारक भारतीय मानसून को एक अद्वितीय विशेषता प्रदान करते हैं । साथ- साथ इसकी अनिश्चित प्रकृति भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत हद तक अनिश्चितता को उत्पन्न करती है ।
##Question:मानसून को समझाते हुए, भारत के संदर्भ में इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिये।( 10 अंक /150 - 200 शब्द) Explaining the monsoon, describe its salient features in the context of India. ( 10 marks /150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में मानसून की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में मानसूनी जलवायु और उसको प्रभावित करने वाले कारकों की संक्षिप्त चर्चा । · उत्तर के तीसरे भाग में मानसून की विशेषताओं की चर्चा कीजिये । उत्तर :- मानसून अरबी भाषा का शब्द है। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरब व्यापारी इस शब्द का प्रयोग करते थे। भारत में मानसून उन हवाओं को कहते हैं जो हवाएं जून से सितंबर के गरमी के दिनों में दक्षिण-पश्चिम दिशा से और नवंबर से मार्च के सर्दी के दिनों में उत्तर-पूर्वी दिशा से बहती हैं। ग्रीष्मकाल में मानसून हवाएं सागर से स्थल की ओर एवं शीतकाल में स्थल से सागर की ओर चला करती है। दिशा बदलने के कारण प्रथम को दक्षिण पश्चिम मानसून एवं द्वितीय को उत्तर पूर्वी मानसून या लौटता मानसून कहते हैं। ये मानसून हवाएं इतनी प्रबल होती हैं कि इनके प्रभाव से उत्तरी हिंद महासागर में सागरीय धारा प्रवाहित होने लगती है तथा इन हवाओं की दिशा के साथ उक्त सागरीय धारा भी इन हवाओं की दिशा में अपनी दिशा बदल लेती हैं। इस प्रकार सागरीय धाराओं का वर्ष में दो बार दिशा बदलना केवल हिंद महासागर में होता है। विश्व के किसी महासागर में इस प्रकार की घटना नहीं होती। मानसून हवाओं के नाम पर उत्तरी हिंद महासागर की इस धारा को मानसून धारा कहते हैं। भारत की जलवायु उष्ण कटिबंधी मानसूनी जलवायु है । जिसमे मानसून कालिक पवन का सूचक है । भारत की जलवायु को हिमालय की उपस्थिति, प्रायद्वीपीय पठार की आकृति, हिन्द महासागर की दोनों तरफ अवस्थिति आदि कारक इसकी जलवायु को प्रभावित करते हैं । भारतीय मानसून की विशेषताओं को निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है :- आगमन और प्रस्थान की अनिश्चितता भारत में आगमन 20 मई के करीब ( अंडमान निकोबार में ) दक्षिण भारत में आगमन 1 जून के करीब पूरे भारत में आगमन 20 जुलाई प्रस्थान ( लौटता हुआ मानसून ) 1 सितंबर से और इसका अंत 1 दिसंबर तक दक्षिणी पश्चिमी मानसून की अवधि सामान्य तौर से दक्षिण से उत्तर की ओर और पूर्व से पश्चिमी की ओर बढ़ने पर घटती जाती है जिस क्षेत्र में अवधि बड़ी होती है वह वर्षा की मात्रा अधिक होती है । मानसून विच्छेद ( break in mansoon ) विच्छेद की अवधि तथा बारंबारता में क्षेत्रीय अंतराल जो वर्षा की वितरण को प्रभावित करने वाला दूसरा सबसे बड़ा कारक इसकी अनिश्चितता मानसून को अनिश्चित बनाती है । मानसून का फटना मानसून के आगमन के साथ मालबार तथा कोंकण तट पर कई दिनो तक निरंतर वर्षा होती रहती है । फिर उसके बाद सामान्य स्थिति आती है अर्थात मानसून विच्छेद के साथ वर्षा होती है । मानसून के फटने का संबंध मानसून तंत्र में उपस्थित अतिरिक्त दबाव से है । जो फटने के रूप में प्रदर्शित होता है । जिसका संबंध उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेटधारा के उतरायन और दक्षिणायन से संबन्धित है । वर्षा की मात्रा में अनिश्चितता औसत वर्षा 177 cm उपरोक्त कारक भारतीय मानसून को एक अद्वितीय विशेषता प्रदान करते हैं । साथ- साथ इसकी अनिश्चित प्रकृति भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत हद तक अनिश्चितता को उत्पन्न करती है ।
46,918
भारत में ग्रामीण समाज के विकास को बाधित करने वाले प्रमुख कारकों की व्याख्या कीजिए। इसके साथ ही इनके समाधान के लिए किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिए।(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the major factors that inhibit the development of rural society in India. Also mention the efforts made for their solution. (150-200 words; 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में ग्रामीण समाज का संक्षिप्त परिचय दीजिए। विकास को बाधित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए। इन समस्याओं के समाधान के लिए उपायों का उल्लेख कीजिए। निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। ग्रामीण समाज से तात्पर्य उस समाज से है जो कृषि आधारित व अवसंरचनात्मक स्तर पर परंपरागत हो। भारतीय ग्रामीण समाज में भी इन प्रवृतियों का समावेश पाया जाता है। भारत में उसकी कुल जनसंख्या का लगभग आधे से अधिक जनसंख्या कृषि पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है और 2011 के जनगणना के अनुसार भारत के लगभग 68 % जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण समाज के विकास को बाधित करने वाले कारक: जमीनी स्तर पर योजनाओं का लाभ न पहुंचाना जिसमें पंचायती राज व्यवस्था का प्रभावी न होना कृषि आधारित व्यवसाय पर निर्भरता जिससे आय स्तर में अधिक सुधार नहीं हुआ है। ऐसे समाज में शिक्षा का निम्न स्तर। शिक्षा संबंधी अवसंरचनात्मक सुविधाओं का अभाव स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी सामाजिक रूढ़िवादिता का बोलबाला- भ्रूण हत्या, महिलाओं को बढ़ने के कम अवसर प्राप्त होना। यातायात साधनों का कम विकास। सरकार द्वारा ग्रामीण विकास के लिए किए जा रहे प्रयास 20 सूत्रीय कार्यक्रम, स्वर्ण जयंती रोजगार योजना पंचायती राज व्यवस्था, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना गरीबी हटाओ कार्यक्रम , दीन दयाल ग्रामीण ज्योति योजना इन्दिरा आवास योजना ( प्रधान मंत्री ग्रामीण आवास योजना )सांसद आदर्श ग्राम योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन ( NHRM ), सर्व शिक्षा अभियान , मिड डे मील योजना आदि भारत की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। कृषि पर निर्भरता ने गावों के महत्व को बढ़ा दिया है। हालांकि आधारभूत सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इसमें सुधार के लिए सरकार ने स्वतन्त्रता के बाद से ही व्यापक प्रयास किया है। इसके साथ ही वर्तमान में पंचायती राज व्यवस्था में सुधार के माध्यम से और प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं।
##Question:भारत में ग्रामीण समाज के विकास को बाधित करने वाले प्रमुख कारकों की व्याख्या कीजिए। इसके साथ ही इनके समाधान के लिए किये गए प्रयासों का उल्लेख कीजिए।(150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the major factors that inhibit the development of rural society in India. Also mention the efforts made for their solution. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में ग्रामीण समाज का संक्षिप्त परिचय दीजिए। विकास को बाधित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए। इन समस्याओं के समाधान के लिए उपायों का उल्लेख कीजिए। निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। ग्रामीण समाज से तात्पर्य उस समाज से है जो कृषि आधारित व अवसंरचनात्मक स्तर पर परंपरागत हो। भारतीय ग्रामीण समाज में भी इन प्रवृतियों का समावेश पाया जाता है। भारत में उसकी कुल जनसंख्या का लगभग आधे से अधिक जनसंख्या कृषि पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है और 2011 के जनगणना के अनुसार भारत के लगभग 68 % जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण समाज के विकास को बाधित करने वाले कारक: जमीनी स्तर पर योजनाओं का लाभ न पहुंचाना जिसमें पंचायती राज व्यवस्था का प्रभावी न होना कृषि आधारित व्यवसाय पर निर्भरता जिससे आय स्तर में अधिक सुधार नहीं हुआ है। ऐसे समाज में शिक्षा का निम्न स्तर। शिक्षा संबंधी अवसंरचनात्मक सुविधाओं का अभाव स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी सामाजिक रूढ़िवादिता का बोलबाला- भ्रूण हत्या, महिलाओं को बढ़ने के कम अवसर प्राप्त होना। यातायात साधनों का कम विकास। सरकार द्वारा ग्रामीण विकास के लिए किए जा रहे प्रयास 20 सूत्रीय कार्यक्रम, स्वर्ण जयंती रोजगार योजना पंचायती राज व्यवस्था, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना गरीबी हटाओ कार्यक्रम , दीन दयाल ग्रामीण ज्योति योजना इन्दिरा आवास योजना ( प्रधान मंत्री ग्रामीण आवास योजना )सांसद आदर्श ग्राम योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन ( NHRM ), सर्व शिक्षा अभियान , मिड डे मील योजना आदि भारत की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। कृषि पर निर्भरता ने गावों के महत्व को बढ़ा दिया है। हालांकि आधारभूत सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इसमें सुधार के लिए सरकार ने स्वतन्त्रता के बाद से ही व्यापक प्रयास किया है। इसके साथ ही वर्तमान में पंचायती राज व्यवस्था में सुधार के माध्यम से और प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं।
46,919
What do you understand by geomorphology? Highlight the types of earth movements. (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - IMPORTANCE OF THE STUDY OF GEOMORPHOLOGY - THE TYPES OF EARTH MOVEMENTS -CONCLUSION ANSWER:- Geomorphology may be defined as the scientific study of the surface features of the Earth. The type of landforms, their origin and development, along with the nature and mechanism of geomorphological processes which evolves the landforms are studied in geomorphology. The Himalayas can be cited as an example for such changes- That how an erstwhile non-mountainous region has got converted to a mountainous region. THE IMPORTANCE OF THIS STUDY 1) DISASTER MAP OF INDIA AND THE WORLD It helps find out the frequent disaster happening sites. Geomorphology helps in preparing the disaster atlas of the world. 2) STUDY OF MINERALS It thus helps industrialization by discovering minerals and their extraction. 3) DESIGN ENGINEERING This means the knowledge of favorable locations for the construction of dams and hydro-electric projects. 4) CRITICAL INFRASTRUCTURE It aids the construction of tunnels (example- in the Shivalik region), flyovers, dams etc. 5) MINING AND CONSTRUCTION The extraction of important minerals helps in the industrial development of the nation. 6) URBANIZATION For example, if a city is constructed on a fault line, then it will have to be re-constructed many times. Example-San Francisco. 7) RURAL DEVELOPMENT Development should be such that flooding is avoided. For this one needs to know where the rivers and streams accumulate and are close to the river bed. Construction over such sites leads to blockage of the flow of streams, ultimately leading to flooding at these places, and drought like conditions in the other areas. Thus, geomorphology can help in the proper planning and development of the rural areas THE TYPES OF EARTH MOVEMENTS The geomorphological changes on the surface of the Earth are on account of factors called Earth movements. All Earth movements are due to certain forces: 1) ENDOGENIC These forces act from the inner layers of the Earth, and are relief creating features. 1.1) DIASTROHIC CHANGES They are slow but continuous changes, such that the changes cannot be perceived by the human eye. These are further of two types: EPEIROGENIC- These are continent building forces and act vertically over the land/ lithosphere. They cause the submergence and emergence of land. For example, Dwarka in the Kathiawar peninsula is getting submerged under the Arabian sea. (Diagram should be drawn here) OROGENIC- These are mountain building forces and act horizontally towards the center. [TENSIONAL FORCE-is when the horizontal force acts away from the center (faulting). For example, the San Andreas Fault line- San Francisco is a city on this fault (in California)] (Diagram should be drawn here) 1.2) CATASTROPHIC CHANGES These are sudden but not continuous changes. For example- earthquakes, volcanoes etc. There is a sudden release of stress energy here. 2) EXOGENIC These are external forces caused due to sunlight, rain, winds etc. They causereduction in relief. At any location on the surface of the Earth, both the endogenic and exogenic forces will be at work. However, one type will dominate over the other at any given location. For example, plains are where the exogenic forces are dominant. The actions of such forces against each other cause the undulations in the land.
##Question:What do you understand by geomorphology? Highlight the types of earth movements. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - IMPORTANCE OF THE STUDY OF GEOMORPHOLOGY - THE TYPES OF EARTH MOVEMENTS -CONCLUSION ANSWER:- Geomorphology may be defined as the scientific study of the surface features of the Earth. The type of landforms, their origin and development, along with the nature and mechanism of geomorphological processes which evolves the landforms are studied in geomorphology. The Himalayas can be cited as an example for such changes- That how an erstwhile non-mountainous region has got converted to a mountainous region. THE IMPORTANCE OF THIS STUDY 1) DISASTER MAP OF INDIA AND THE WORLD It helps find out the frequent disaster happening sites. Geomorphology helps in preparing the disaster atlas of the world. 2) STUDY OF MINERALS It thus helps industrialization by discovering minerals and their extraction. 3) DESIGN ENGINEERING This means the knowledge of favorable locations for the construction of dams and hydro-electric projects. 4) CRITICAL INFRASTRUCTURE It aids the construction of tunnels (example- in the Shivalik region), flyovers, dams etc. 5) MINING AND CONSTRUCTION The extraction of important minerals helps in the industrial development of the nation. 6) URBANIZATION For example, if a city is constructed on a fault line, then it will have to be re-constructed many times. Example-San Francisco. 7) RURAL DEVELOPMENT Development should be such that flooding is avoided. For this one needs to know where the rivers and streams accumulate and are close to the river bed. Construction over such sites leads to blockage of the flow of streams, ultimately leading to flooding at these places, and drought like conditions in the other areas. Thus, geomorphology can help in the proper planning and development of the rural areas THE TYPES OF EARTH MOVEMENTS The geomorphological changes on the surface of the Earth are on account of factors called Earth movements. All Earth movements are due to certain forces: 1) ENDOGENIC These forces act from the inner layers of the Earth, and are relief creating features. 1.1) DIASTROHIC CHANGES They are slow but continuous changes, such that the changes cannot be perceived by the human eye. These are further of two types: EPEIROGENIC- These are continent building forces and act vertically over the land/ lithosphere. They cause the submergence and emergence of land. For example, Dwarka in the Kathiawar peninsula is getting submerged under the Arabian sea. (Diagram should be drawn here) OROGENIC- These are mountain building forces and act horizontally towards the center. [TENSIONAL FORCE-is when the horizontal force acts away from the center (faulting). For example, the San Andreas Fault line- San Francisco is a city on this fault (in California)] (Diagram should be drawn here) 1.2) CATASTROPHIC CHANGES These are sudden but not continuous changes. For example- earthquakes, volcanoes etc. There is a sudden release of stress energy here. 2) EXOGENIC These are external forces caused due to sunlight, rain, winds etc. They causereduction in relief. At any location on the surface of the Earth, both the endogenic and exogenic forces will be at work. However, one type will dominate over the other at any given location. For example, plains are where the exogenic forces are dominant. The actions of such forces against each other cause the undulations in the land.
46,936
"विशेष श्रेणी राज्य" का दर्जा प्राप्त करने की प्रमुख शर्तों का उल्लेख कीजिए।साथ हीवर्तमान संदर्भ में इस प्रावधान के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the key conditions for attaining "Special Category State" status. Also, discuss the implications of this provision in the present context. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम,भूमिका में विशेष श्रेणी के राज्यों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्प्श्चात, मुख्य भाग में"विशेष श्रेणी राज्य" का दर्जा प्राप्त करने की प्रमुख शर्तों का उल्लेख कीजिए। साथ ही वर्तमान संदर्भ में इस प्रावधान के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- विशेष श्रेणी के राज्य की अवधारणा पहली बार 1969 में गाडगिल फार्मूले के आधार पर 5वें वित्त आयोग द्वारा लागू की गयी थी। वर्तमान में इसमें कुल 11 राज्य शामिल हैं जिसमे उत्तर भारत के 8 राज्य व अन्य 3 राज्यों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड शामिल हैं। गौरतलब है की विशेष श्रेणी के अंतर्गत आने वाले राज्यों को केन्द्रीय सहायता में प्राथमिकता दी जाती है जैसे कि केन्द्रीय क्षेत्र कि योजनाओं में 90% व्यय का वहन केंद्र करता है, करों के भुगतान में छूट, वित्तीय अनुदान में अन्य राज्यों के मुक़ाबले अत्यधिक धन प्रदान किया जाना आदि। हालांकि विशेष श्रेणी का दर्जा प्राप्त करने के लिए कुछ निश्चित मानदंड निर्धारित किए गए हैं,यह दर्जा उन्हीं राज्यों को दिया जाता है जो निम्नलिखित में से अधिकांश शर्तें पूरी करते हों- उस राज्य की भौगोलिक स्थिति। वहां की जनसँख्या बिखरी हुई हो अर्थात जनसँख्या घनत्व कम हो। वहाँ आदिवासी लोगों की संख्या अधिक हो। वह राज्य सीमावर्ती राज्य हो और रणनीतिक तथा सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हो इत्यादि। आर्थिक पिछड़ापन होना। वित्तीय संसाधनों के स्रोत का न होना इत्यादि। ध्यातव्य है कि विशेष श्रेणी के राज्यों को प्राप्त लाभों को देखते हुए विभिन्न राज्य इस श्रेणी के अंतगर्त आने के लिए कई तर्क देते हैं। इसी कारण इस प्रावधान के समक्ष अनेक मुद्दे उत्पन्न हो गए हैं। इसके समाधान के रूप राज्य व केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लक्ष्यों को साधने का भी प्रयास करते हैं। हाल ही में आंध्रप्रदेश का उदाहरण प्रमुख है। अतः वर्तमान संदर्भ में इसके निहितार्थों को इस प्रकार से समझ सकते हैं: चुनावों के समय विशेष श्रेणी का दर्जा देने हेतु लोकलुभावन वादे ऐसी मांगों में वृद्धि करते हैं। बिहार, छतीसगढ़ तथा राजस्थान जैसे राज्य विशेष श्रेणी के दर्जे की मांग कर चुके हैं। 14वें वित्त आयोग द्वारा प्रभावी रूप से विशेष श्रेणी के दर्जे को समाप्त कर दिया है। जिसके कारण विवाद में और वृद्धि भी हुईहै। रघुराम राजन पैनल ने इस व्यवस्था को खत्म करने की सिफ़ारिश की थी। उनका मानना था कि इसके निर्धारण का मानदंड, संसाधनों का वितरण आदि सही नहीं हैं। राज्यों को वित्तीय सहायता देने के लिए उपलब्ध डाटा का अभाव भी इस व्यवस्था को अप्रभावी बनाता है। ये अनुशंसाएं योजना आयोग कि सिफ़ारिशों पर आधारित थीं। यह अस्पष्ट, भेदभावपूर्ण व अतार्किक माना जाता है। जिसके कारण ही विवादों में वृद्धि हो रही है। इस व्यवस्था के सकारात्मक प्रभावों को भी देखने की आवश्यकता है जैसे इसके माध्यम से उत्तर-पूर्व के राज्यों में विकास परियोजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावी रूप से हो रहा है। समग्रता में यह कहा जा सकता है कि विशेष श्रेणी के राज्यों की अवधारणा राजनीतिक-आर्थिक व भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण व आवश्यक है। हालांकि वर्तमान संदर्भ में इसके निहितार्थों को देखते हुए केंद्र सरकार को स्वतंत्र निर्णय लेने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में 14 वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करना सकारात्मक कदम होगा क्योंकि इससे राज्यों को प्रपट होने वाले लाभ में वृद्धि की गयी है। इसके अतिरिक्त रघुराम राजन पैनल की सिफ़ारिशों पर भी गौर करने की आवश्यकता है।
##Question:"विशेष श्रेणी राज्य" का दर्जा प्राप्त करने की प्रमुख शर्तों का उल्लेख कीजिए।साथ हीवर्तमान संदर्भ में इस प्रावधान के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the key conditions for attaining "Special Category State" status. Also, discuss the implications of this provision in the present context. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,भूमिका में विशेष श्रेणी के राज्यों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्प्श्चात, मुख्य भाग में"विशेष श्रेणी राज्य" का दर्जा प्राप्त करने की प्रमुख शर्तों का उल्लेख कीजिए। साथ ही वर्तमान संदर्भ में इस प्रावधान के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। अंत में निष्कर्षतः एक या दो पंक्तियाँ लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- विशेष श्रेणी के राज्य की अवधारणा पहली बार 1969 में गाडगिल फार्मूले के आधार पर 5वें वित्त आयोग द्वारा लागू की गयी थी। वर्तमान में इसमें कुल 11 राज्य शामिल हैं जिसमे उत्तर भारत के 8 राज्य व अन्य 3 राज्यों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड शामिल हैं। गौरतलब है की विशेष श्रेणी के अंतर्गत आने वाले राज्यों को केन्द्रीय सहायता में प्राथमिकता दी जाती है जैसे कि केन्द्रीय क्षेत्र कि योजनाओं में 90% व्यय का वहन केंद्र करता है, करों के भुगतान में छूट, वित्तीय अनुदान में अन्य राज्यों के मुक़ाबले अत्यधिक धन प्रदान किया जाना आदि। हालांकि विशेष श्रेणी का दर्जा प्राप्त करने के लिए कुछ निश्चित मानदंड निर्धारित किए गए हैं,यह दर्जा उन्हीं राज्यों को दिया जाता है जो निम्नलिखित में से अधिकांश शर्तें पूरी करते हों- उस राज्य की भौगोलिक स्थिति। वहां की जनसँख्या बिखरी हुई हो अर्थात जनसँख्या घनत्व कम हो। वहाँ आदिवासी लोगों की संख्या अधिक हो। वह राज्य सीमावर्ती राज्य हो और रणनीतिक तथा सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हो इत्यादि। आर्थिक पिछड़ापन होना। वित्तीय संसाधनों के स्रोत का न होना इत्यादि। ध्यातव्य है कि विशेष श्रेणी के राज्यों को प्राप्त लाभों को देखते हुए विभिन्न राज्य इस श्रेणी के अंतगर्त आने के लिए कई तर्क देते हैं। इसी कारण इस प्रावधान के समक्ष अनेक मुद्दे उत्पन्न हो गए हैं। इसके समाधान के रूप राज्य व केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लक्ष्यों को साधने का भी प्रयास करते हैं। हाल ही में आंध्रप्रदेश का उदाहरण प्रमुख है। अतः वर्तमान संदर्भ में इसके निहितार्थों को इस प्रकार से समझ सकते हैं: चुनावों के समय विशेष श्रेणी का दर्जा देने हेतु लोकलुभावन वादे ऐसी मांगों में वृद्धि करते हैं। बिहार, छतीसगढ़ तथा राजस्थान जैसे राज्य विशेष श्रेणी के दर्जे की मांग कर चुके हैं। 14वें वित्त आयोग द्वारा प्रभावी रूप से विशेष श्रेणी के दर्जे को समाप्त कर दिया है। जिसके कारण विवाद में और वृद्धि भी हुईहै। रघुराम राजन पैनल ने इस व्यवस्था को खत्म करने की सिफ़ारिश की थी। उनका मानना था कि इसके निर्धारण का मानदंड, संसाधनों का वितरण आदि सही नहीं हैं। राज्यों को वित्तीय सहायता देने के लिए उपलब्ध डाटा का अभाव भी इस व्यवस्था को अप्रभावी बनाता है। ये अनुशंसाएं योजना आयोग कि सिफ़ारिशों पर आधारित थीं। यह अस्पष्ट, भेदभावपूर्ण व अतार्किक माना जाता है। जिसके कारण ही विवादों में वृद्धि हो रही है। इस व्यवस्था के सकारात्मक प्रभावों को भी देखने की आवश्यकता है जैसे इसके माध्यम से उत्तर-पूर्व के राज्यों में विकास परियोजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावी रूप से हो रहा है। समग्रता में यह कहा जा सकता है कि विशेष श्रेणी के राज्यों की अवधारणा राजनीतिक-आर्थिक व भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण व आवश्यक है। हालांकि वर्तमान संदर्भ में इसके निहितार्थों को देखते हुए केंद्र सरकार को स्वतंत्र निर्णय लेने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में 14 वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करना सकारात्मक कदम होगा क्योंकि इससे राज्यों को प्रपट होने वाले लाभ में वृद्धि की गयी है। इसके अतिरिक्त रघुराम राजन पैनल की सिफ़ारिशों पर भी गौर करने की आवश्यकता है।
46,937
संगठित अपराध से आप क्या समझते हैं ? संगठित अपराध व आतंकवाद के अंतर्संबंधों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by organized crime? Briefly discuss the interrelations of organized crime and terrorism. (150-200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण : संगठित अपराध को परिभाषित करते हुए कुछ उदाहरणों के माध्यम से इसे समझाइए। संगठित अपराध व आतंकवाद के अंतर्संबंधों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । संगठित अपराध को नियंत्रित करने के कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा संगठित अपराध को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि, ऐसा अपराध जिसमें तीन या अधिक लोगों की संलग्नता हो , जो कुछ समय से सक्रिय हो तथा जिसमें न्यूनतम 3 वर्ष या अधिक की सजा का प्रावधान हो और साथ ही अपराध का मुख्य उद्देश आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो, संगठित अपराध कहलाता है । संगठित अपराध को हम परंपरागत व गैर-परंपरागत की श्रेणी में बाँट कर देख सकते हैं । परंपरागत संगठित अपराध में हम वैश्यावृति, डकैती ,अवैध शराब का व्यापार , फिरौती , अपहरण , अवैध खनन आदि की चर्चा कर सकते हैं । जबकि गैर-परंपरागत संगठित अपराध में हम मादक पदार्थों की तस्करी , मनी लॉन्ड्रिंग , खेल में सट्टा , हथियारों की तस्करी , महिलाओं , बच्चों व अंग-प्रत्यांगों की तस्करी आदि की चर्चा की जा सकती है । संगठित अपराध व आतंकवाद के बीच संबंध : वर्तमान वैश्वीकृत व्यवस्था में आतंकवाद का स्वरूप वैश्विक होता जा रहा है और उनका प्रभावी नेटवर्क स्थापित हो गया है । ऐसे में संगठित अपराध व आतंकवाद के बीच एक मजबूत गठज़ोर स्थापित होता जा रहा है । इनके बीच के अंतर्संबंधों को निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : आतंकवादियों को अपने संगठन व विचारों के प्रसार के लिए धन की आवश्यकता होती है इसलिए आतंकवादियों द्वारा अपने संगठन को वित्तीय मदद प्रदान करने के लिए संगठित अपराध जैसे- मादक पदार्थों की तस्करी, जाली नोट का व्यापार , अनुबंधित हत्या ,जबरन धन ऐंठना आदि में संलग्नता दर्शाई जाती है । आतंकवादी समूह अवैध तरीके से संचित धन को वैध बनाने के लिए संगठित अपराधियों के साथ साँठ-गांठ कर मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होते हैं । आतंकवादी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हथियारों, गोला-बारूद आदि की प्राप्ति संगठित अपराधियों के माध्यम से करते हैं । दोनों के द्वारा एक ही नेटवर्क का प्रयोग किया जाता है ,अर्थात यातायात व संचार के लिए आतंकवादी संगठित अपराधी पर निर्भर होते हैं जबकि संगठित अपराधी अपनी सुरक्षा के लिए आतंकवादी पर निर्भर होते हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में आतंकवाद व संगठित अपराध का बढ़ता गठजोड़ वैश्विक शांति व सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आया है । आज आवश्यकता है कि आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिए उसके आर्थिक स्रोतों को सीमित किया जाए । साथ ही इनके नेटवर्क को भी ध्वस्त किया जाए । इसके लिए आवश्यक है कि हम संगठित अपराध पर सख्त नियंत्रण स्थापित करें क्योंकि संगठित अपराध आतंकवाद के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक स्रोत व नेटवर्क के रूप में कार्य करता है ।
##Question:संगठित अपराध से आप क्या समझते हैं ? संगठित अपराध व आतंकवाद के अंतर्संबंधों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिये । (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by organized crime? Briefly discuss the interrelations of organized crime and terrorism. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : संगठित अपराध को परिभाषित करते हुए कुछ उदाहरणों के माध्यम से इसे समझाइए। संगठित अपराध व आतंकवाद के अंतर्संबंधों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । संगठित अपराध को नियंत्रित करने के कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा संगठित अपराध को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि, ऐसा अपराध जिसमें तीन या अधिक लोगों की संलग्नता हो , जो कुछ समय से सक्रिय हो तथा जिसमें न्यूनतम 3 वर्ष या अधिक की सजा का प्रावधान हो और साथ ही अपराध का मुख्य उद्देश आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो, संगठित अपराध कहलाता है । संगठित अपराध को हम परंपरागत व गैर-परंपरागत की श्रेणी में बाँट कर देख सकते हैं । परंपरागत संगठित अपराध में हम वैश्यावृति, डकैती ,अवैध शराब का व्यापार , फिरौती , अपहरण , अवैध खनन आदि की चर्चा कर सकते हैं । जबकि गैर-परंपरागत संगठित अपराध में हम मादक पदार्थों की तस्करी , मनी लॉन्ड्रिंग , खेल में सट्टा , हथियारों की तस्करी , महिलाओं , बच्चों व अंग-प्रत्यांगों की तस्करी आदि की चर्चा की जा सकती है । संगठित अपराध व आतंकवाद के बीच संबंध : वर्तमान वैश्वीकृत व्यवस्था में आतंकवाद का स्वरूप वैश्विक होता जा रहा है और उनका प्रभावी नेटवर्क स्थापित हो गया है । ऐसे में संगठित अपराध व आतंकवाद के बीच एक मजबूत गठज़ोर स्थापित होता जा रहा है । इनके बीच के अंतर्संबंधों को निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : आतंकवादियों को अपने संगठन व विचारों के प्रसार के लिए धन की आवश्यकता होती है इसलिए आतंकवादियों द्वारा अपने संगठन को वित्तीय मदद प्रदान करने के लिए संगठित अपराध जैसे- मादक पदार्थों की तस्करी, जाली नोट का व्यापार , अनुबंधित हत्या ,जबरन धन ऐंठना आदि में संलग्नता दर्शाई जाती है । आतंकवादी समूह अवैध तरीके से संचित धन को वैध बनाने के लिए संगठित अपराधियों के साथ साँठ-गांठ कर मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होते हैं । आतंकवादी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हथियारों, गोला-बारूद आदि की प्राप्ति संगठित अपराधियों के माध्यम से करते हैं । दोनों के द्वारा एक ही नेटवर्क का प्रयोग किया जाता है ,अर्थात यातायात व संचार के लिए आतंकवादी संगठित अपराधी पर निर्भर होते हैं जबकि संगठित अपराधी अपनी सुरक्षा के लिए आतंकवादी पर निर्भर होते हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में आतंकवाद व संगठित अपराध का बढ़ता गठजोड़ वैश्विक शांति व सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आया है । आज आवश्यकता है कि आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिए उसके आर्थिक स्रोतों को सीमित किया जाए । साथ ही इनके नेटवर्क को भी ध्वस्त किया जाए । इसके लिए आवश्यक है कि हम संगठित अपराध पर सख्त नियंत्रण स्थापित करें क्योंकि संगठित अपराध आतंकवाद के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक स्रोत व नेटवर्क के रूप में कार्य करता है ।
46,943
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सामान्य परिचय देते हुए, यह बताइए कि इसमें नमक ही केन्द्रीय मुद्दा क्यों था ? साथ ही इस आन्दोलन की प्रकृति पर भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a general introduction to the Civil Disobedience movement, explain why salt was the central issue in it? Also, discuss the nature of this movement. (150-200 words/ 10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में सविनय अवज्ञा आंदोलन का सामान्य परिचय देते उत्तर की शुरुआत कीजिये | उत्तर के प्रथम भाग में नमक को ही केंद्रीय ( मुख्य ) विषय के रूप में चुने जाने के कारणो को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में सविनय अवज्ञा आंदोलन के की प्रकृति के बारे में चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में शुरू किया गया एक प्रभावी अहिंसात्मक आंदोलन था । इस आंदोलन की शुरुआत करने के पीछे अनेक कारण थे ,जैसे वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारतीय जनता महंगाई से परेशान थी , परिस्थितियाँ आंदोलन के अनुकूल ,साइमन आयोग का समय पूर्व गठन और उसमे एक भी भारतीय सदस्य का न होना, ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधी जी की 11 सूत्रीय मांगो को नकार दिया जाना , गांधी जी पर कांग्रेस का एक बड़ा आंदोलन शुरू करने का दबाव आदि प्रमुख कारण थे। गांधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन में नमक कानून को ही आंदोलन का केंद्र बनाए जाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण थे। जैसे नमक के घरेलू उपयोग की वस्तु है , जिससे सम्पूर्ण भारत की जनता जुड़ी हुई थी और यही एक मुद्दा था जो सभी वर्गो और संप्रदायों को एक सूत्र में बाधकर आंदोलन को मजबूत बना सकता है । जिससे आंदोलन का आधार व्यापक बन सकता था। दूसरा समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता के कारण उस समय कुछ दूसरे मुद्दे पर समाज के आपस में बटने की संभावना ज्यादा थी ,साथ ही किसान , मजदूर , महिला , शहरी , ग्रामीण और विभिन्न सम्प्रदायों को एक साथ लाने में जितना कारगर घरेलू मुद्दा हो सकता था , उतना प्रभावी शायद ही कोई हो सकता था।इसके साथ ही आर्थिक मंदी के मार से भारतीय जनता परेशान थी और नमक जैसे अतिआवश्यक और प्राथमिक वस्तु के निर्माण पर सरकार का एकाधिकार और उस पर उच्च कर की दर भारतीय जनता के शोषण की पराकाष्ठा को दिखाता है । इन्ही सभी कारणों से गांधी जी ने अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से ( असहयोग आंदोलन जिसमे कहीं न कहीं सांप्रदायिकता का पक्ष भी शामिल था ) सीख लेते हुए एक व्यापक आधार वाले मुद्दे के रूप में नमक कानून का चुनाव किया गया। इसके साथ ही आंदोलन की प्रकृति को भी निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है - आंदोलन का लक्ष्य पूर्ण स्वराज था और इसमें राजनीति स्वतन्त्रता के साथ- साथ 1931 में कराची अधिवेशन में नागरिक अधिकारों और सामाजिक आर्थिक न्याय को भी लक्ष्य के रूप में रखा । सामाजिक आधार की दृष्टिकोण से भी यह आंदोलन पूर्ववर्ती आंदोलनो से भिन्न था । अब तक के आंदोलनो में सर्वाधिक भागीदारी किसानों की देखी गई । जबकि इसमे पूंजीपतियों की भी प्रभावी भागीदारी रही । छात्रों और महिलाओं की भी व्यापक भागीदारी देखी जा सकती थी ।हालांकि मुस्लिम समुदाय की असहयोग की तुलना में कम भागीदारी रही ।किन्तु उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में सीमांत गांधी ( अब्दुल गफ्फार खान ) के द्वारा लाल कुर्ती आंदोलन चलाया गया जोकि सविनय अवज्ञा का ही भाग था । विभिन्न शहरों में मजदूरों की भी सक्रिय भूमिका देखी गई । पहली बार कश्मीर ,अलवर रियासतों की जनता ने भी आंदोलन में भाग लिया । उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत मे चन्द्र मोहन सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया । आंध्रा, गुजरात आदि क्षेत्रो के जनजाति समाज की भागीदारी भी देखी जा सकती थी | प्रसार की दृष्टि से भी असहयोग का अगला चरण साबित हुआ , सीमांत क्षेत्रो की भागीदारी ( पेशावर) भी बढ़ी | इस आंदोलन में एक निश्चित कार्यक्रम की घोषणाकी गई जिसमे आंदोलन को अहिंसात्मक रखना और नमक कानून का उल्लंघन करने के साथ साथ जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी देना भी शामिल था । कांग्रेस द्वारा पारित कार्यक्रमो से यह स्पष्ट था कि असहयोग की तुलना में यह आंदोलन ज्यादा व्यापक और आक्रामक था। कार्यक्रम में जन सहभागिता से संबन्धित मुद्दों को ज्यादा महत्व दिया गया , खासकर उन मुद्दो पर जहा परस्पर टकराव न हो । गांधीवादी रणनीति के अनुरूप रचनात्मक कार्यो का भी महत्व बना रहा , हालांकि आंदोलन के दूसरे चरण में हरिजन उत्थान कार्यक्रम को ज्यादा महत्व दिया | जन आंदोलन की सीमाएं , सरकार की कठोर नीति आदि कारणों से आंदोलन को 1933 में आंदोलन को स्थगित किया गया । सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने प्रकृति में व्यापक होने के साथ साथ अपने विस्तार क्षेत्र में भी बड़ा था । इसकी प्रकृति की व्यापकता में नमक कानून के उल्लंघन के साथ साथ , शराब और ताड़ी के दुकानों पर धरना देना , मध्य भारत में चौकीदारी कर का बहिष्कार , जहा फसल बर्बाद हो गई हो वहाँ लगान जैसे करो का बहिष्कार शामिल था। इसके साथ ही रचनात्मक कार्यो को बढ़ावा गांधीवादी रणनीति के अनुकूल था। जिसके कारण इस आंदोलन ने आगे होने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए एक व्यापक जन आधार और जन चेतना का प्रसार किया ।
##Question:सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सामान्य परिचय देते हुए, यह बताइए कि इसमें नमक ही केन्द्रीय मुद्दा क्यों था ? साथ ही इस आन्दोलन की प्रकृति पर भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a general introduction to the Civil Disobedience movement, explain why salt was the central issue in it? Also, discuss the nature of this movement. (150-200 words/ 10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सविनय अवज्ञा आंदोलन का सामान्य परिचय देते उत्तर की शुरुआत कीजिये | उत्तर के प्रथम भाग में नमक को ही केंद्रीय ( मुख्य ) विषय के रूप में चुने जाने के कारणो को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में सविनय अवज्ञा आंदोलन के की प्रकृति के बारे में चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में शुरू किया गया एक प्रभावी अहिंसात्मक आंदोलन था । इस आंदोलन की शुरुआत करने के पीछे अनेक कारण थे ,जैसे वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारतीय जनता महंगाई से परेशान थी , परिस्थितियाँ आंदोलन के अनुकूल ,साइमन आयोग का समय पूर्व गठन और उसमे एक भी भारतीय सदस्य का न होना, ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधी जी की 11 सूत्रीय मांगो को नकार दिया जाना , गांधी जी पर कांग्रेस का एक बड़ा आंदोलन शुरू करने का दबाव आदि प्रमुख कारण थे। गांधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन में नमक कानून को ही आंदोलन का केंद्र बनाए जाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण थे। जैसे नमक के घरेलू उपयोग की वस्तु है , जिससे सम्पूर्ण भारत की जनता जुड़ी हुई थी और यही एक मुद्दा था जो सभी वर्गो और संप्रदायों को एक सूत्र में बाधकर आंदोलन को मजबूत बना सकता है । जिससे आंदोलन का आधार व्यापक बन सकता था। दूसरा समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता के कारण उस समय कुछ दूसरे मुद्दे पर समाज के आपस में बटने की संभावना ज्यादा थी ,साथ ही किसान , मजदूर , महिला , शहरी , ग्रामीण और विभिन्न सम्प्रदायों को एक साथ लाने में जितना कारगर घरेलू मुद्दा हो सकता था , उतना प्रभावी शायद ही कोई हो सकता था।इसके साथ ही आर्थिक मंदी के मार से भारतीय जनता परेशान थी और नमक जैसे अतिआवश्यक और प्राथमिक वस्तु के निर्माण पर सरकार का एकाधिकार और उस पर उच्च कर की दर भारतीय जनता के शोषण की पराकाष्ठा को दिखाता है । इन्ही सभी कारणों से गांधी जी ने अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से ( असहयोग आंदोलन जिसमे कहीं न कहीं सांप्रदायिकता का पक्ष भी शामिल था ) सीख लेते हुए एक व्यापक आधार वाले मुद्दे के रूप में नमक कानून का चुनाव किया गया। इसके साथ ही आंदोलन की प्रकृति को भी निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है - आंदोलन का लक्ष्य पूर्ण स्वराज था और इसमें राजनीति स्वतन्त्रता के साथ- साथ 1931 में कराची अधिवेशन में नागरिक अधिकारों और सामाजिक आर्थिक न्याय को भी लक्ष्य के रूप में रखा । सामाजिक आधार की दृष्टिकोण से भी यह आंदोलन पूर्ववर्ती आंदोलनो से भिन्न था । अब तक के आंदोलनो में सर्वाधिक भागीदारी किसानों की देखी गई । जबकि इसमे पूंजीपतियों की भी प्रभावी भागीदारी रही । छात्रों और महिलाओं की भी व्यापक भागीदारी देखी जा सकती थी ।हालांकि मुस्लिम समुदाय की असहयोग की तुलना में कम भागीदारी रही ।किन्तु उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में सीमांत गांधी ( अब्दुल गफ्फार खान ) के द्वारा लाल कुर्ती आंदोलन चलाया गया जोकि सविनय अवज्ञा का ही भाग था । विभिन्न शहरों में मजदूरों की भी सक्रिय भूमिका देखी गई । पहली बार कश्मीर ,अलवर रियासतों की जनता ने भी आंदोलन में भाग लिया । उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत मे चन्द्र मोहन सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया । आंध्रा, गुजरात आदि क्षेत्रो के जनजाति समाज की भागीदारी भी देखी जा सकती थी | प्रसार की दृष्टि से भी असहयोग का अगला चरण साबित हुआ , सीमांत क्षेत्रो की भागीदारी ( पेशावर) भी बढ़ी | इस आंदोलन में एक निश्चित कार्यक्रम की घोषणाकी गई जिसमे आंदोलन को अहिंसात्मक रखना और नमक कानून का उल्लंघन करने के साथ साथ जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी देना भी शामिल था । कांग्रेस द्वारा पारित कार्यक्रमो से यह स्पष्ट था कि असहयोग की तुलना में यह आंदोलन ज्यादा व्यापक और आक्रामक था। कार्यक्रम में जन सहभागिता से संबन्धित मुद्दों को ज्यादा महत्व दिया गया , खासकर उन मुद्दो पर जहा परस्पर टकराव न हो । गांधीवादी रणनीति के अनुरूप रचनात्मक कार्यो का भी महत्व बना रहा , हालांकि आंदोलन के दूसरे चरण में हरिजन उत्थान कार्यक्रम को ज्यादा महत्व दिया | जन आंदोलन की सीमाएं , सरकार की कठोर नीति आदि कारणों से आंदोलन को 1933 में आंदोलन को स्थगित किया गया । सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने प्रकृति में व्यापक होने के साथ साथ अपने विस्तार क्षेत्र में भी बड़ा था । इसकी प्रकृति की व्यापकता में नमक कानून के उल्लंघन के साथ साथ , शराब और ताड़ी के दुकानों पर धरना देना , मध्य भारत में चौकीदारी कर का बहिष्कार , जहा फसल बर्बाद हो गई हो वहाँ लगान जैसे करो का बहिष्कार शामिल था। इसके साथ ही रचनात्मक कार्यो को बढ़ावा गांधीवादी रणनीति के अनुकूल था। जिसके कारण इस आंदोलन ने आगे होने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए एक व्यापक जन आधार और जन चेतना का प्रसार किया ।
46,945
भारत में जनसांख्यिकी लाभांश का समय जनसांख्यिकी आपदा का सूचक भी हो सकता है , इससे आप कहाँ तक सहमत हैं ? ( 150 - 200 शब्द ) Demographic dividend time in India can also be an indicator of demographic disaster, how far do you agree with it ? (150 - 200 words)
दृष्टिकोण · भूमिका में जनसांख्यिकी लाभांश को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में जनसांख्यिकी लाभांश के लाभों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणामों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- जनसांख्यिकीय लाभांश अथवा जनांकिकीय लाभ (Demographic dividend) अर्थव्यवस्था में मानव संसाधन के सकारात्मक और सतत विकास को दर्शाता है। यह जनसंख्या ढाँचे में बढ़ती युवा एवं कार्यशील जनसंख्या (15 वर्ष से 64 वर्ष आयु वर्ग) तथा घटते आश्रितता अनुपात के परिणामस्वरूप उत्पादन में बड़ी मात्रा के सृजन को प्रदर्शित करता है। भारत वर्तमान में युवाओं का देश है और अगले 20 वर्षों तक रहेगा। जनसांख्यिकीय आँकड़ों के अनुसार आज लगभग 60 प्रतिशत भारतीय 15-64 वर्ष के हैं और लगभग कुल जनसंख्या का 35% जिसमे 15-34 वर्ष के हैं, अर्थात् सबसे अधिक उत्पादक आयु अर्थात् लगभग 42 करोड़ युवा कुछ कर सकने की भौतिक क्षमता रखते हैं। जनसांख्यिकीय लाभांश के लाभ :- विश्व बैंक के अनुसार जनसांख्यिकीय लाभांश का आर्थिक विकास को तीव्र करने में निम्नलिखित छह तरीके से योगदान देता है:- 1. ज्यादा लोगों के कामकाजी उम्र के होने यानी श्रमबल बढ़ने के कारण देश में क्रियाशील जनसंख्या में वृद्धि होती है, जो आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है। वर्तमान में ज़्यादातर विकसित राष्ट्र इसके लाभ से वंचित हैं । 2. बच्चों पर व्यय से लेकर भौतिक व मानवीय जरूरत की चीजों में निवेश के लिए संसाधनों के अलग-अलग इस्तेमाल के साथ साथ संसाधनों का महतम उपयोग सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है । 3. कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, महिला सशक्तिकरण के साथ- साथ आर्थिक विकास में सहयोग तथा कार्यशील जनसंख्या में वृद्धि में सहायक होती है। 4. बचत दर में वृद्धि के कारण, क्योंकि कामकाजी आयु के दौरान ही प्रमुख तौर पर बचत होती है। जोकि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के लिए निवेश का स्त्रोत बनता है । 5. अवकाश प्राप्ति की लंबी अवधि के लिए बचत करने से बचत को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता है। जो आगे चलकर जनसंख्या संक्रमण के चौथे चरण में नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में सहायक होता है। 6. मध्यम वर्गीय समाज में बड़े पैमाने पर आये बदलावों के कारण इस समाज के युवा भी शिक्षा, गृह स्वामित्व, बेहतर आर्थिक सुरक्षा और अधिक टिकाऊ वस्तुओं में निवेश करना प्रारम्भ कर दिया है। जिसका फायदा अर्थव्यवस्था को मिलेगा । उपरोक्त लाभ तभी प्राप्त हो सकते हैं, जब जनसंख्या को प्रभावी तरीके से शिक्षित करने के साथ- साथ वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार प्रशिक्षित भी किया जाए। क्योकि बढ़ती जनसंख्या दोधारी तलवार की तरह है जिसके अपने फायदे और नुकसान दोनों है ।अगर यह शिक्षित और प्रशिक्षित है तो वरदान है अन्यथा यह अभिश्राप भी बन सकती है । बढ़ती जनसंख्या की विकरालता का सीधा प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है जिसका जनसंख्या आधिक्य से संतुलन न बैठा पाने की वजह से विभिन्न तरह की आपदाओं की शुरुवात होती है। इसके अलावा स्वाभाविक रूप से जनसंख्या में वृद्धि का दबाव संसाधनों और अवसरों की उपलब्धता पर भी पड़ता है और इस कारक को ध्यान में रखकर योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में अत्यधिक जनसंख्या विकास के प्रयासों के लिये बड़ी चुनौती बन जाती है। अधिक आबादी का सबसे अधिक दबाव खाद्य उपलब्धता पर होता है। इसके अलावा जलवायु-परिवर्तन, प्रदूषण और मानसून की अनिश्चितता जैसे कारक भी मौजूद हैं। देश की बढती आबादी का दबाव शहरों पर बढ़ रहा है और वहाँ जीवन-स्तर और विकास सुविधाओं के मामले में कई प्रकार की समस्यायेँ सामने आ रही हैं। उपरोक्त चुनौतियों और समस्याओं के संदर्भ में यह अतिआवश्यक है कि भारत अपनी बढ़ती जनसंख्या के कौशल विकास पर ध्यान दे तथा अर्थव्यवस्था के सतत विकास और जनसांख्यिक लाभांश के लिए प्रयास करे ।
##Question:भारत में जनसांख्यिकी लाभांश का समय जनसांख्यिकी आपदा का सूचक भी हो सकता है , इससे आप कहाँ तक सहमत हैं ? ( 150 - 200 शब्द ) Demographic dividend time in India can also be an indicator of demographic disaster, how far do you agree with it ? (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में जनसांख्यिकी लाभांश को परिभाषित कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में जनसांख्यिकी लाभांश के लाभों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणामों की चर्चा कीजिये । · उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- जनसांख्यिकीय लाभांश अथवा जनांकिकीय लाभ (Demographic dividend) अर्थव्यवस्था में मानव संसाधन के सकारात्मक और सतत विकास को दर्शाता है। यह जनसंख्या ढाँचे में बढ़ती युवा एवं कार्यशील जनसंख्या (15 वर्ष से 64 वर्ष आयु वर्ग) तथा घटते आश्रितता अनुपात के परिणामस्वरूप उत्पादन में बड़ी मात्रा के सृजन को प्रदर्शित करता है। भारत वर्तमान में युवाओं का देश है और अगले 20 वर्षों तक रहेगा। जनसांख्यिकीय आँकड़ों के अनुसार आज लगभग 60 प्रतिशत भारतीय 15-64 वर्ष के हैं और लगभग कुल जनसंख्या का 35% जिसमे 15-34 वर्ष के हैं, अर्थात् सबसे अधिक उत्पादक आयु अर्थात् लगभग 42 करोड़ युवा कुछ कर सकने की भौतिक क्षमता रखते हैं। जनसांख्यिकीय लाभांश के लाभ :- विश्व बैंक के अनुसार जनसांख्यिकीय लाभांश का आर्थिक विकास को तीव्र करने में निम्नलिखित छह तरीके से योगदान देता है:- 1. ज्यादा लोगों के कामकाजी उम्र के होने यानी श्रमबल बढ़ने के कारण देश में क्रियाशील जनसंख्या में वृद्धि होती है, जो आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है। वर्तमान में ज़्यादातर विकसित राष्ट्र इसके लाभ से वंचित हैं । 2. बच्चों पर व्यय से लेकर भौतिक व मानवीय जरूरत की चीजों में निवेश के लिए संसाधनों के अलग-अलग इस्तेमाल के साथ साथ संसाधनों का महतम उपयोग सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है । 3. कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, महिला सशक्तिकरण के साथ- साथ आर्थिक विकास में सहयोग तथा कार्यशील जनसंख्या में वृद्धि में सहायक होती है। 4. बचत दर में वृद्धि के कारण, क्योंकि कामकाजी आयु के दौरान ही प्रमुख तौर पर बचत होती है। जोकि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के लिए निवेश का स्त्रोत बनता है । 5. अवकाश प्राप्ति की लंबी अवधि के लिए बचत करने से बचत को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलता है। जो आगे चलकर जनसंख्या संक्रमण के चौथे चरण में नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में सहायक होता है। 6. मध्यम वर्गीय समाज में बड़े पैमाने पर आये बदलावों के कारण इस समाज के युवा भी शिक्षा, गृह स्वामित्व, बेहतर आर्थिक सुरक्षा और अधिक टिकाऊ वस्तुओं में निवेश करना प्रारम्भ कर दिया है। जिसका फायदा अर्थव्यवस्था को मिलेगा । उपरोक्त लाभ तभी प्राप्त हो सकते हैं, जब जनसंख्या को प्रभावी तरीके से शिक्षित करने के साथ- साथ वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार प्रशिक्षित भी किया जाए। क्योकि बढ़ती जनसंख्या दोधारी तलवार की तरह है जिसके अपने फायदे और नुकसान दोनों है ।अगर यह शिक्षित और प्रशिक्षित है तो वरदान है अन्यथा यह अभिश्राप भी बन सकती है । बढ़ती जनसंख्या की विकरालता का सीधा प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है जिसका जनसंख्या आधिक्य से संतुलन न बैठा पाने की वजह से विभिन्न तरह की आपदाओं की शुरुवात होती है। इसके अलावा स्वाभाविक रूप से जनसंख्या में वृद्धि का दबाव संसाधनों और अवसरों की उपलब्धता पर भी पड़ता है और इस कारक को ध्यान में रखकर योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में अत्यधिक जनसंख्या विकास के प्रयासों के लिये बड़ी चुनौती बन जाती है। अधिक आबादी का सबसे अधिक दबाव खाद्य उपलब्धता पर होता है। इसके अलावा जलवायु-परिवर्तन, प्रदूषण और मानसून की अनिश्चितता जैसे कारक भी मौजूद हैं। देश की बढती आबादी का दबाव शहरों पर बढ़ रहा है और वहाँ जीवन-स्तर और विकास सुविधाओं के मामले में कई प्रकार की समस्यायेँ सामने आ रही हैं। उपरोक्त चुनौतियों और समस्याओं के संदर्भ में यह अतिआवश्यक है कि भारत अपनी बढ़ती जनसंख्या के कौशल विकास पर ध्यान दे तथा अर्थव्यवस्था के सतत विकास और जनसांख्यिक लाभांश के लिए प्रयास करे ।
46,949
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सामान्य परिचय देते हुए, यह बताइए कि इसमें नमक ही केन्द्रीय मुद्दा क्यों था ? साथ ही इस इस आन्दोलन की प्रकृति पर भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the Civil Disobedience movement, explain why salt was the central issue in it ? Also discuss the nature of this movement. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में सविनय अवज्ञा आंदोलन का सामान्य परिचय देते उत्तर की शुरुआत कीजिये | उत्तर के प्रथम भाग में नमक को ही केंद्रीय ( मुख्य ) विषय के रूप में चुने जाने के कारणो को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में सविनय अवज्ञा आंदोलन के की प्रकृति के बारे में चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में शुरू किया गया एक प्रभावी अहिंसात्मक आंदोलन था । इस आंदोलन की शुरुआत करने के पीछे अनेक कारण थे ,जैसे वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारतीय जनता महंगाई से परेशान थी , परिस्थितियाँ आंदोलन के अनुकूल ,साइमन आयोग का समय पूर्व गठन और उसमे एक भी भारतीय सदस्य का न होना, ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधी जी की 11 सूत्रीय मांगो को नकार दिया जाना , गांधी जी पर कांग्रेस का एक बड़ा आंदोलन शुरू करने का दबाव आदि प्रमुख कारण थे। गांधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन में नमक को हीआंदोलन का केंद्र बनाए जाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण थे। जैसे नमक के घरेलू उपयोग की वस्तु है , जिससे सम्पूर्ण भारत की जनता जुड़ी हुई थी और यही एक मुद्दा था जो सभी वर्गो और संप्रदायों को एक सूत्र में बाधकर आंदोलन को मजबूत बना सकता है । जिससे आंदोलन का आधार व्यापक बन सकता था। दूसरा समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता के कारण उस समय कुछ दूसरे मुद्दे पर समाज के आपस में बटने की संभावना ज्यादा थी ,साथ ही किसान , मजदूर , महिला , शहरी , ग्रामीण और विभिन्न सम्प्रदायों को एक साथ लाने में जितना कारगर घरेलू मुद्दा हो सकता था , उतना प्रभावी शायद ही कोई हो सकता था।इसके साथ ही आर्थिक मंदी के मार से भारतीय जनता परेशान थी और नमक जैसे अतिआवश्यक और प्राथमिक वस्तु के निर्माण पर सरकार का एकाधिकार और उस पर उच्च कर की दर भारतीय जनता के शोषण की पराकाष्ठा को दिखाता है । इन्ही सभी कारणों से गांधी जी ने अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से ( असहयोग आंदोलन जिसमे कहीं न कहीं सांप्रदायिकता का पक्ष भी शामिल था ) सीख लेते हुए एक व्यापक आधार वाले मुद्दे के रूप में नमक कानून का चुनाव किया गया। इसके साथ ही आंदोलन कीप्रकृति को भी निम्न बिन्दुओं द्वारा समझाजा सकता है - आंदोलन का लक्ष्य पूर्ण स्वराज था और इसमें राजनीति स्वतन्त्रता के साथ- साथ 1931 में कराची अधिवेशन में नागरिक अधिकारों और सामाजिक आर्थिक न्याय को भी लक्ष्य के रूप में रखा । सामाजिक आधार की दृष्टिकोण से भी यह आंदोलन पूर्ववर्ती आंदोलनो से भिन्न था । अब तक के आंदोलनो में सर्वाधिक भागीदारी किसानों की देखी गई । जबकि इसमे पूंजीपतियों की भी प्रभावी भागीदारी रही । छात्रों और महिलाओं की भी व्यापक भागीदारी देखी जा सकती थी ।हालांकि मुस्लिम समुदाय की असहयोग की तुलना में कम भागीदारी रही ।किन्तु उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में सीमांत गांधी ( अब्दुल गफ्फार खान ) के द्वारा लाल कुर्ती आंदोलन चलाया गया जोकि सविनय अवज्ञा का ही भाग था । विभिन्न शहरों में मजदूरों की भी सक्रिय भूमिका देखी गई । पहली बार कश्मीर ,अलवर रियासतों की जनता ने भी आंदोलन में भाग लिया । उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत मे चन्द्र मोहन सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया । आंध्रा, गुजरात आदि क्षेत्रो के जनजाति समाज की भागीदारी भी देखी जा सकती थी | प्रसार की दृष्टि से भी असहयोग का अगला चरण साबित हुआ , सीमांत क्षेत्रो की भागीदारी ( पेशावर) भी बढ़ी | इस आंदोलन में एक निश्चित कार्यक्रम की घोषणाकी गई जिसमे आंदोलन को अहिंसात्मक रखना और नमक कानून का उल्लंघन करने के साथ साथ जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी देना भी शामिल था । कांग्रेस द्वारा पारित कार्यक्रमो से यह स्पष्ट था कि असहयोग की तुलना में यह आंदोलन ज्यादा व्यापक और आक्रामक था। कार्यक्रम में जन सहभागिता से संबन्धित मुद्दों को ज्यादा महत्व दिया गया , खासकर उन मुद्दो पर जहा परस्पर टकराव न हो । गांधीवादी रणनीति के अनुरूप रचनात्मक कार्यो का भी महत्व बना रहा , हालांकि आंदोलन के दूसरे चरण में हरिजन उत्थान कार्यक्रम को ज्यादा महत्व दिया | जन आंदोलन की सीमाएं , सरकार की कठोर नीति आदि कारणों से आंदोलन को 1933 में आंदोलन को स्थगित किया गया । सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने प्रकृति में व्यापक होने के साथ साथ अपने विस्तार क्षेत्र में भी बड़ा था । इसकी प्रकृति की व्यापकता में नमक कानून के उल्लंघन के साथ साथ , शराब और ताड़ी के दुकानों पर धरना देना , मध्य भारत में चौकीदारी कर का बहिष्कार , जहा फसल बर्बाद हो गई हो वहाँ लगान जैसे करो का बहिष्कार शामिल था। इसके साथ ही रचनात्मक कार्यो को बढ़ावा गांधीवादी रणनीति के अनुकूल था। जिसके कारण इस आंदोलन ने आगे होने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए एक व्यापक जन आधार और जन चेतना का प्रसार किया ।
##Question:सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सामान्य परिचय देते हुए, यह बताइए कि इसमें नमक ही केन्द्रीय मुद्दा क्यों था ? साथ ही इस इस आन्दोलन की प्रकृति पर भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the Civil Disobedience movement, explain why salt was the central issue in it ? Also discuss the nature of this movement. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में सविनय अवज्ञा आंदोलन का सामान्य परिचय देते उत्तर की शुरुआत कीजिये | उत्तर के प्रथम भाग में नमक को ही केंद्रीय ( मुख्य ) विषय के रूप में चुने जाने के कारणो को बताइये । उत्तर के दूसरे भाग में सविनय अवज्ञा आंदोलन के की प्रकृति के बारे में चर्चा कीजिये । उत्तर के अंतिम भाग में सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में शुरू किया गया एक प्रभावी अहिंसात्मक आंदोलन था । इस आंदोलन की शुरुआत करने के पीछे अनेक कारण थे ,जैसे वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारतीय जनता महंगाई से परेशान थी , परिस्थितियाँ आंदोलन के अनुकूल ,साइमन आयोग का समय पूर्व गठन और उसमे एक भी भारतीय सदस्य का न होना, ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधी जी की 11 सूत्रीय मांगो को नकार दिया जाना , गांधी जी पर कांग्रेस का एक बड़ा आंदोलन शुरू करने का दबाव आदि प्रमुख कारण थे। गांधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन में नमक को हीआंदोलन का केंद्र बनाए जाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण थे। जैसे नमक के घरेलू उपयोग की वस्तु है , जिससे सम्पूर्ण भारत की जनता जुड़ी हुई थी और यही एक मुद्दा था जो सभी वर्गो और संप्रदायों को एक सूत्र में बाधकर आंदोलन को मजबूत बना सकता है । जिससे आंदोलन का आधार व्यापक बन सकता था। दूसरा समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता के कारण उस समय कुछ दूसरे मुद्दे पर समाज के आपस में बटने की संभावना ज्यादा थी ,साथ ही किसान , मजदूर , महिला , शहरी , ग्रामीण और विभिन्न सम्प्रदायों को एक साथ लाने में जितना कारगर घरेलू मुद्दा हो सकता था , उतना प्रभावी शायद ही कोई हो सकता था।इसके साथ ही आर्थिक मंदी के मार से भारतीय जनता परेशान थी और नमक जैसे अतिआवश्यक और प्राथमिक वस्तु के निर्माण पर सरकार का एकाधिकार और उस पर उच्च कर की दर भारतीय जनता के शोषण की पराकाष्ठा को दिखाता है । इन्ही सभी कारणों से गांधी जी ने अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से ( असहयोग आंदोलन जिसमे कहीं न कहीं सांप्रदायिकता का पक्ष भी शामिल था ) सीख लेते हुए एक व्यापक आधार वाले मुद्दे के रूप में नमक कानून का चुनाव किया गया। इसके साथ ही आंदोलन कीप्रकृति को भी निम्न बिन्दुओं द्वारा समझाजा सकता है - आंदोलन का लक्ष्य पूर्ण स्वराज था और इसमें राजनीति स्वतन्त्रता के साथ- साथ 1931 में कराची अधिवेशन में नागरिक अधिकारों और सामाजिक आर्थिक न्याय को भी लक्ष्य के रूप में रखा । सामाजिक आधार की दृष्टिकोण से भी यह आंदोलन पूर्ववर्ती आंदोलनो से भिन्न था । अब तक के आंदोलनो में सर्वाधिक भागीदारी किसानों की देखी गई । जबकि इसमे पूंजीपतियों की भी प्रभावी भागीदारी रही । छात्रों और महिलाओं की भी व्यापक भागीदारी देखी जा सकती थी ।हालांकि मुस्लिम समुदाय की असहयोग की तुलना में कम भागीदारी रही ।किन्तु उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में सीमांत गांधी ( अब्दुल गफ्फार खान ) के द्वारा लाल कुर्ती आंदोलन चलाया गया जोकि सविनय अवज्ञा का ही भाग था । विभिन्न शहरों में मजदूरों की भी सक्रिय भूमिका देखी गई । पहली बार कश्मीर ,अलवर रियासतों की जनता ने भी आंदोलन में भाग लिया । उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत मे चन्द्र मोहन सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया । आंध्रा, गुजरात आदि क्षेत्रो के जनजाति समाज की भागीदारी भी देखी जा सकती थी | प्रसार की दृष्टि से भी असहयोग का अगला चरण साबित हुआ , सीमांत क्षेत्रो की भागीदारी ( पेशावर) भी बढ़ी | इस आंदोलन में एक निश्चित कार्यक्रम की घोषणाकी गई जिसमे आंदोलन को अहिंसात्मक रखना और नमक कानून का उल्लंघन करने के साथ साथ जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी देना भी शामिल था । कांग्रेस द्वारा पारित कार्यक्रमो से यह स्पष्ट था कि असहयोग की तुलना में यह आंदोलन ज्यादा व्यापक और आक्रामक था। कार्यक्रम में जन सहभागिता से संबन्धित मुद्दों को ज्यादा महत्व दिया गया , खासकर उन मुद्दो पर जहा परस्पर टकराव न हो । गांधीवादी रणनीति के अनुरूप रचनात्मक कार्यो का भी महत्व बना रहा , हालांकि आंदोलन के दूसरे चरण में हरिजन उत्थान कार्यक्रम को ज्यादा महत्व दिया | जन आंदोलन की सीमाएं , सरकार की कठोर नीति आदि कारणों से आंदोलन को 1933 में आंदोलन को स्थगित किया गया । सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने प्रकृति में व्यापक होने के साथ साथ अपने विस्तार क्षेत्र में भी बड़ा था । इसकी प्रकृति की व्यापकता में नमक कानून के उल्लंघन के साथ साथ , शराब और ताड़ी के दुकानों पर धरना देना , मध्य भारत में चौकीदारी कर का बहिष्कार , जहा फसल बर्बाद हो गई हो वहाँ लगान जैसे करो का बहिष्कार शामिल था। इसके साथ ही रचनात्मक कार्यो को बढ़ावा गांधीवादी रणनीति के अनुकूल था। जिसके कारण इस आंदोलन ने आगे होने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए एक व्यापक जन आधार और जन चेतना का प्रसार किया ।
46,956
निगम सामाजिक दायित्व पर विशेष बल देते हुए, निगम शासन के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Special emphasising on corporate social responsibility, discuss the various aspects of corporate governance. (150-200 words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निगम सामाजिक दायित्व के बारे बताते हुए कीजिये | पुनः इसके विभिन्न आयामों को विस्तार से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये उत्तर - कारपोरेट गवर्नेंस या CSR का तात्पर्य नैतिकता आधारित शासन से है | किसी भी संगठन को चाहे वह लोक संगठन हो या निजी संगठन उसका काम-काज नैतिकता के आधार पर ही संचालित होना चाहिए या उसे अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना चाहिए | जिसके अंतर्गत कई विशेषताओं पर ध्यान दिया जाता है जैसे - 1. नैतिक तत्वों की उपस्थिति 2.कम्पनी के प्रशासक, शेयरधारक, ग्राहक तथा समाज सभी को लाभ 3. गाँधी जी के न्यासिता सिद्धांत के अनुरूप 4. आर्थिक व सामाजिक लक्ष्यों के मध्य संतुलन निगम शासन के विभिन्न आयामों को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है - कम्पनी के स्वामित्व व प्रबंधन में भेद होना चाहिए | प्रबंधन ऐसे दक्ष हाथों में होना चाहिए जो इस क्षेत्र में विशेषज्ञ हो | प्रबंधन के केंद्र में व्यक्ति की नहीं बल्कि संस्थानिक्रित व्यवस्थाओं की भूमिका होनी चाहिए | विभिन्न पदों के अनुसार अधिकारों और कर्तव्यों का निश्चित व स्पष्ट विभाजन होना चाहिए | कम्पनी के कार्यकलाप से सम्बंधित नियम-विनियम और प्रक्रियाएं लिखित रूप में संहिताबद्ध होनी चाहिए तथा सभी हितधारकों को उपलब्ध होनी चाहिए | प्रबंधन व कर्मचारियों के बीच विरोध का नहीं बल्कि सहभागिता का सम्बन्ध होना चाहिए | कर्मचारियों को यह विश्वास होना चाहिए कि उन्हें उनकी म्हणत , प्रतिबद्धता और नवाचार का पुरस्कार मिलेगा तथा किसी अतार्किक वजह से उन्हें नुकसान नहीं झेलना पड़ेगा | कम्पनी का उद्देश्य सिर्फ शेयरधारकों के लिए अधिकतम लाभ कमाना नहीं होना चाहिए बल्कि उसे सभी हितधारकों के हितों के प्रति ज़िम्मेदार होना चाहिए | हितधारक हित शेयरधारक लाभांश सरकार कर समुदाय CSR उपभोक्ता / ग्राहक गुणवत्ता पर्यावरण स्वच्छता उपरोक्त सारणी द्वारा CSR को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है |
##Question:निगम सामाजिक दायित्व पर विशेष बल देते हुए, निगम शासन के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Special emphasising on corporate social responsibility, discuss the various aspects of corporate governance. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत निगम सामाजिक दायित्व के बारे बताते हुए कीजिये | पुनः इसके विभिन्न आयामों को विस्तार से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये उत्तर - कारपोरेट गवर्नेंस या CSR का तात्पर्य नैतिकता आधारित शासन से है | किसी भी संगठन को चाहे वह लोक संगठन हो या निजी संगठन उसका काम-काज नैतिकता के आधार पर ही संचालित होना चाहिए या उसे अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना चाहिए | जिसके अंतर्गत कई विशेषताओं पर ध्यान दिया जाता है जैसे - 1. नैतिक तत्वों की उपस्थिति 2.कम्पनी के प्रशासक, शेयरधारक, ग्राहक तथा समाज सभी को लाभ 3. गाँधी जी के न्यासिता सिद्धांत के अनुरूप 4. आर्थिक व सामाजिक लक्ष्यों के मध्य संतुलन निगम शासन के विभिन्न आयामों को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है - कम्पनी के स्वामित्व व प्रबंधन में भेद होना चाहिए | प्रबंधन ऐसे दक्ष हाथों में होना चाहिए जो इस क्षेत्र में विशेषज्ञ हो | प्रबंधन के केंद्र में व्यक्ति की नहीं बल्कि संस्थानिक्रित व्यवस्थाओं की भूमिका होनी चाहिए | विभिन्न पदों के अनुसार अधिकारों और कर्तव्यों का निश्चित व स्पष्ट विभाजन होना चाहिए | कम्पनी के कार्यकलाप से सम्बंधित नियम-विनियम और प्रक्रियाएं लिखित रूप में संहिताबद्ध होनी चाहिए तथा सभी हितधारकों को उपलब्ध होनी चाहिए | प्रबंधन व कर्मचारियों के बीच विरोध का नहीं बल्कि सहभागिता का सम्बन्ध होना चाहिए | कर्मचारियों को यह विश्वास होना चाहिए कि उन्हें उनकी म्हणत , प्रतिबद्धता और नवाचार का पुरस्कार मिलेगा तथा किसी अतार्किक वजह से उन्हें नुकसान नहीं झेलना पड़ेगा | कम्पनी का उद्देश्य सिर्फ शेयरधारकों के लिए अधिकतम लाभ कमाना नहीं होना चाहिए बल्कि उसे सभी हितधारकों के हितों के प्रति ज़िम्मेदार होना चाहिए | हितधारक हित शेयरधारक लाभांश सरकार कर समुदाय CSR उपभोक्ता / ग्राहक गुणवत्ता पर्यावरण स्वच्छता उपरोक्त सारणी द्वारा CSR को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है |
46,959
How can nano science and technology help protect the environment? Discuss briefly the Indian initiatives in developing nano technology products for sustainable management of the environment (150 words)
BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT - THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT (Writing both the positive and negative issues would provide a balanced answer- However, since the negative aspects have not been asked as such, it has been provided with less weightage) - THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL II OTHER INITIATIVES III INTERNATIONAL COLLABORATIONS - CONCLUSION SOURCES USED: 1) https://iasscore.in/upsc-prelims/nano-its-applications-govt-initiative 2) https://www.understandingnano.com/environmental-nanotechnology.html 3) https://www.civilserviceindia.com/subject/General-Studies/notes/awareness-in-the-fields-of-nano-technology.html ANSWER:- Nanotechnology refers to the study of matter at a miniature level at the Nanoscale. 1 Nano meter equals one billionth of a meter. Thus, Nanotechnology facilitates research on particles less than one billionth of a meter in diameter. The properties of atoms and molecules greatly differ at the Nanoscale. Therefore, Nanotechnology manipulates single atoms to discover new properties and then uses these properties to create improved devices and systems. Today, from agriculture to aerospace research, nanotechnology’s impact is being felt in every field. HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT Nanotechnology is being used in several applications to improve the environment. This includes cleaning up existing pollution, improving manufacturing methods to reduce the generation of new pollution, and making alternative energy sources more cost-effective. 1) POLLUTION It can help in generating less pollution during the manufacture of materials. 1.1) Using Nano-technology solar cells, which generate electricity at a competitive cost, can be produced. 1.2) Increasing the electricity generated by windmills.Blades that are stronger and lower weight can be built using nanotechnology. Therefore, the amount of electricity generated by each windmill is greater. 1.3) Cleaning up organic chemicals polluting groundwater. Iron nanoparticles can be effective in cleaning up the organic solvents that pollute groundwater. The iron nanoparticles disperse throughout the water-body and decompose the organic solvents. This method would be more effective and would cost significantly lesser than treatment methods that require the water to be pumped out of the ground. 2) CLEAN AIR New nanotechnology-enabled sensors and solutions are able to detect, identify, filter out and neutralize the harmful chemical or biological agents in the air and soil. 2.1) Many air filters have nanotechnology-based filters that allow “mechanical filtration” in which the fibre material creates Nano-scale pores that trap particles larger than the size of the pores. They also may contain charcoal layers that remove odours. 2.2) Gold Nano-particles can be utilized for clearing volatile organic compounds (VOCs) from the air. 3) CLEANING UP THE OIL SPILLS Photo-catalytic copper tungsten oxide nanoparticles can be used to decompose the oil into biodegradable compounds. The nanoparticles make the technology much useful for cleaning up the oil spills. 2.1) Researchers have developed a nano-fabric “paper towel,” woven from tiny wires of potassium manganese oxide. This can absorb 20 times its weight in oil for cleanup applications. 4) CLEAN ENERGY The development of more effective energy-producing, energy-absorbing, and energy storage products in smaller and more efficient devices is possible with the development of nanotechnology. For example smaller fuel cells, solar cells etc. can be built, which be more effective. 4.1) Nano-technology can help in reducing the cost of fuel cells. 4.2) Using graphene layers to increase the binding energy of hydrogen to the graphene surface in a fuel tank results in a higher amount of hydrogen storage and a lighter weight fuel tank. This could help in the development of practical hydrogen-fueled cars. 4.3) Nanoelectronics technology has been used to build solar cells that are highly efficient and cheaper than the conventional ones. 5) SUSTAINABLE ENERGY Solar panels incorporating nanotechnology are more efficient than the standard designs converting sunlight to electricity. Therefore, Nano-technology promises inexpensive solar power in the future. Nanostructured solar cells are cheaper to manufacture and easier to install. 5.1) More efficient lighting systems with significantly reduced energy consumption, lighter and stronger vehicle chassis materials for the transportation sector etc. are being developed using Nano-technology. 6) CLEAN WATER Nanotechnology could help meet the need for affordable, clean drinking water through rapid, low-cost detection of impurities in and filtration and purification of water. 5.1) GROUNDWATER- Nanoparticles can be used to clean industrial water pollutants in the groundwater at a much lower cost than methods requiring the pumping of water out of the ground for treatment. THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT Though the Nano-technological processes have positive many positive impacts on the environment, yet there are certain negative impacts of nanotechnology on the environment. 1) There can be increased toxicological affluence on the environment due to the unclear shape, size, and chemical compositions of some of the nanotechnology products. 2) Nanoparticles have higher surface areas than bulk materials. This can cause more destruction to the human body and environment compared to the bulk particles. 3) Development of Nanotechnology can increase the risks to health. Nano-particles can get into the body through the skin, lungs and digestive system, thus creating free radicals that can cause cell damage. Once Nano-particles are in the bloodstream, they will be able to cross the blood-brain barrier. Thus, scientist and researchers are more worried about these the potential risk to society due to nanoparticles at the global level. THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL 1) NANO MISSION OF INDIA It is an umbrella programme for capacity building, envisaging the overall development of this field of research.The objectives of this Mission are: (i)Basic Research Promotion–Funding of basic research by individual scientists and/or groups of scientists and the creation of centres of excellence. (ii) Infrastructure Development for Nano Science & Technology Research–Investigations on the Nanoscale requires expensive equipment. For optimal use of expensive and sophisticated facilities, it is proposed to establish a chain of shared facilities across the country. (iii) NanoApplications andTechnology Development Programmes- The Mission proposes to promote application-oriented R&D Projects, establish NanoApplications andTechnology Development Centers etc. Special efforts would be taken to involve the industrial sector directly or through Public-Private Partnership (PPP) ventures. (iv) Human Resource Development–The Mission shall focus on providing effective education and training to researchers via M.Sc./M.Tech. Programmes, creation of national and overseas post-doctoral fellowships etc. 2) The Nanotechnology Initiative Programme of the Department of Information Technology was started in 2004 with a focus on nano-electronics. II OTHER INITIATIVES 1) Centres of Excellence in Nanoelectronics Two nanoelectronics centres have been established at IIT Bombay and IISc, Bangalore. These centres are concentrating on the development of nano-systems for healthcare and environmental monitoring etc. 2) IIT DELHI- Non-silicon based nanofabrication and nanoscales devices A largeproject has been initiated recentlyat IIT Delhi for creating a centre of nanoelectronics to primarily working on non-silicon based nanotechnology. 3) Nano-metrology- at the National Physical Laboratory In the area of nanotechnology, the challenges include measurement of nano dimensions, nano electrical properties etc. To meet this requirement, calibration facilities have been developed and established to serve as a national facility. 4) Other Initiatives- Facility for the growth and characterization of Single-Wall Carbon Nanotubes at Jamia Millia Islamia University, New Delhi, Nano Science and Technology Initiative (NSTI), The Nano Science and Technology Mission (NSTM) etc. are some of the other important initiatives. III INTERNATIONAL COLLABORATIONS 1) Initiatives for joint R&D have figured prominently with Indian institutes engaging in projects in the US, EU, Japan, Taiwan and Russia. 2) The S&T departments of Brazil, South Africa and India have embarked on a tri-lateral initiative to developed collaborative programmes in several common areas of interest, with nano technology being one of them. 3) Science and Technology Initiatives with Indian Diaspora –for encouraging networking in this field. 4) The International Science and Technology Directorate (ISAD) of the (CSIR) Council of Science and Industrial Research aims to strengthen cooperation between CSIR and international institutions, which has facilitated workshops and collaborative projects with international partners like South Africa, France, South Korea, China, Japan in the area of Nanoscience and technology. 5) Euro-India Net has been set up between the EU and India to encourage collaborations between their scientists. 6) A memorandum of understanding has been signed between India and UNESCO to establish a Regional Centre for Education and Training in Biotechnology, where one of the focus areas is Nano-biotechnology. To summarize, nanotechnology is highly beneficial in today"s technology-driven society. It is can be used across all the other science fields, such as chemistry, biology, physics, materials science, and engineering. Nanotechnology will continue to develop, advantageous to civilization and improve the environment in numerous ways.
##Question:How can nano science and technology help protect the environment? Discuss briefly the Indian initiatives in developing nano technology products for sustainable management of the environment (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT - THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT (Writing both the positive and negative issues would provide a balanced answer- However, since the negative aspects have not been asked as such, it has been provided with less weightage) - THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL II OTHER INITIATIVES III INTERNATIONAL COLLABORATIONS - CONCLUSION SOURCES USED: 1) https://iasscore.in/upsc-prelims/nano-its-applications-govt-initiative 2) https://www.understandingnano.com/environmental-nanotechnology.html 3) https://www.civilserviceindia.com/subject/General-Studies/notes/awareness-in-the-fields-of-nano-technology.html ANSWER:- Nanotechnology refers to the study of matter at a miniature level at the Nanoscale. 1 Nano meter equals one billionth of a meter. Thus, Nanotechnology facilitates research on particles less than one billionth of a meter in diameter. The properties of atoms and molecules greatly differ at the Nanoscale. Therefore, Nanotechnology manipulates single atoms to discover new properties and then uses these properties to create improved devices and systems. Today, from agriculture to aerospace research, nanotechnology’s impact is being felt in every field. HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT Nanotechnology is being used in several applications to improve the environment. This includes cleaning up existing pollution, improving manufacturing methods to reduce the generation of new pollution, and making alternative energy sources more cost-effective. 1) POLLUTION It can help in generating less pollution during the manufacture of materials. 1.1) Using Nano-technology solar cells, which generate electricity at a competitive cost, can be produced. 1.2) Increasing the electricity generated by windmills.Blades that are stronger and lower weight can be built using nanotechnology. Therefore, the amount of electricity generated by each windmill is greater. 1.3) Cleaning up organic chemicals polluting groundwater. Iron nanoparticles can be effective in cleaning up the organic solvents that pollute groundwater. The iron nanoparticles disperse throughout the water-body and decompose the organic solvents. This method would be more effective and would cost significantly lesser than treatment methods that require the water to be pumped out of the ground. 2) CLEAN AIR New nanotechnology-enabled sensors and solutions are able to detect, identify, filter out and neutralize the harmful chemical or biological agents in the air and soil. 2.1) Many air filters have nanotechnology-based filters that allow “mechanical filtration” in which the fibre material creates Nano-scale pores that trap particles larger than the size of the pores. They also may contain charcoal layers that remove odours. 2.2) Gold Nano-particles can be utilized for clearing volatile organic compounds (VOCs) from the air. 3) CLEANING UP THE OIL SPILLS Photo-catalytic copper tungsten oxide nanoparticles can be used to decompose the oil into biodegradable compounds. The nanoparticles make the technology much useful for cleaning up the oil spills. 2.1) Researchers have developed a nano-fabric “paper towel,” woven from tiny wires of potassium manganese oxide. This can absorb 20 times its weight in oil for cleanup applications. 4) CLEAN ENERGY The development of more effective energy-producing, energy-absorbing, and energy storage products in smaller and more efficient devices is possible with the development of nanotechnology. For example smaller fuel cells, solar cells etc. can be built, which be more effective. 4.1) Nano-technology can help in reducing the cost of fuel cells. 4.2) Using graphene layers to increase the binding energy of hydrogen to the graphene surface in a fuel tank results in a higher amount of hydrogen storage and a lighter weight fuel tank. This could help in the development of practical hydrogen-fueled cars. 4.3) Nanoelectronics technology has been used to build solar cells that are highly efficient and cheaper than the conventional ones. 5) SUSTAINABLE ENERGY Solar panels incorporating nanotechnology are more efficient than the standard designs converting sunlight to electricity. Therefore, Nano-technology promises inexpensive solar power in the future. Nanostructured solar cells are cheaper to manufacture and easier to install. 5.1) More efficient lighting systems with significantly reduced energy consumption, lighter and stronger vehicle chassis materials for the transportation sector etc. are being developed using Nano-technology. 6) CLEAN WATER Nanotechnology could help meet the need for affordable, clean drinking water through rapid, low-cost detection of impurities in and filtration and purification of water. 5.1) GROUNDWATER- Nanoparticles can be used to clean industrial water pollutants in the groundwater at a much lower cost than methods requiring the pumping of water out of the ground for treatment. THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT Though the Nano-technological processes have positive many positive impacts on the environment, yet there are certain negative impacts of nanotechnology on the environment. 1) There can be increased toxicological affluence on the environment due to the unclear shape, size, and chemical compositions of some of the nanotechnology products. 2) Nanoparticles have higher surface areas than bulk materials. This can cause more destruction to the human body and environment compared to the bulk particles. 3) Development of Nanotechnology can increase the risks to health. Nano-particles can get into the body through the skin, lungs and digestive system, thus creating free radicals that can cause cell damage. Once Nano-particles are in the bloodstream, they will be able to cross the blood-brain barrier. Thus, scientist and researchers are more worried about these the potential risk to society due to nanoparticles at the global level. THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL 1) NANO MISSION OF INDIA It is an umbrella programme for capacity building, envisaging the overall development of this field of research.The objectives of this Mission are: (i)Basic Research Promotion–Funding of basic research by individual scientists and/or groups of scientists and the creation of centres of excellence. (ii) Infrastructure Development for Nano Science & Technology Research–Investigations on the Nanoscale requires expensive equipment. For optimal use of expensive and sophisticated facilities, it is proposed to establish a chain of shared facilities across the country. (iii) NanoApplications andTechnology Development Programmes- The Mission proposes to promote application-oriented R&D Projects, establish NanoApplications andTechnology Development Centers etc. Special efforts would be taken to involve the industrial sector directly or through Public-Private Partnership (PPP) ventures. (iv) Human Resource Development–The Mission shall focus on providing effective education and training to researchers via M.Sc./M.Tech. Programmes, creation of national and overseas post-doctoral fellowships etc. 2) The Nanotechnology Initiative Programme of the Department of Information Technology was started in 2004 with a focus on nano-electronics. II OTHER INITIATIVES 1) Centres of Excellence in Nanoelectronics Two nanoelectronics centres have been established at IIT Bombay and IISc, Bangalore. These centres are concentrating on the development of nano-systems for healthcare and environmental monitoring etc. 2) IIT DELHI- Non-silicon based nanofabrication and nanoscales devices A largeproject has been initiated recentlyat IIT Delhi for creating a centre of nanoelectronics to primarily working on non-silicon based nanotechnology. 3) Nano-metrology- at the National Physical Laboratory In the area of nanotechnology, the challenges include measurement of nano dimensions, nano electrical properties etc. To meet this requirement, calibration facilities have been developed and established to serve as a national facility. 4) Other Initiatives- Facility for the growth and characterization of Single-Wall Carbon Nanotubes at Jamia Millia Islamia University, New Delhi, Nano Science and Technology Initiative (NSTI), The Nano Science and Technology Mission (NSTM) etc. are some of the other important initiatives. III INTERNATIONAL COLLABORATIONS 1) Initiatives for joint R&D have figured prominently with Indian institutes engaging in projects in the US, EU, Japan, Taiwan and Russia. 2) The S&T departments of Brazil, South Africa and India have embarked on a tri-lateral initiative to developed collaborative programmes in several common areas of interest, with nano technology being one of them. 3) Science and Technology Initiatives with Indian Diaspora –for encouraging networking in this field. 4) The International Science and Technology Directorate (ISAD) of the (CSIR) Council of Science and Industrial Research aims to strengthen cooperation between CSIR and international institutions, which has facilitated workshops and collaborative projects with international partners like South Africa, France, South Korea, China, Japan in the area of Nanoscience and technology. 5) Euro-India Net has been set up between the EU and India to encourage collaborations between their scientists. 6) A memorandum of understanding has been signed between India and UNESCO to establish a Regional Centre for Education and Training in Biotechnology, where one of the focus areas is Nano-biotechnology. To summarize, nanotechnology is highly beneficial in today"s technology-driven society. It is can be used across all the other science fields, such as chemistry, biology, physics, materials science, and engineering. Nanotechnology will continue to develop, advantageous to civilization and improve the environment in numerous ways.
46,964
संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150-200शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150-200 words) (10 marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, संक्षेप मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा को समझाइये। तत्पश्चात, विभिन्न तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास के द्वारासंस्कृतिकरणऔर पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की गई। इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मेंनिचली यामध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षेत्रीय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपाश्चात्यीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। अतः आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
##Question:संस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण से आप क्या समझते हैं?स्पष्ट कीजिएकि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया? (150-200शब्द) What do you understand bySanskritization and Westernization? Elucidate, how Sanskritization and Westernization impacted the caste system in contemporary Indian society? (150-200 words) (10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, संक्षेप मेंएम श्रीनिवास द्वारा दी गईसंस्कृतिकरण और पाश्चात्यीकरण की अवधारणा को समझाइये। तत्पश्चात, विभिन्न तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये कि किस प्रकार से संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण ने समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को प्रभावित किया है । अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास के द्वारासंस्कृतिकरणऔर पाश्चात्यीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की गई। इनके अनुसार,”संस्कृतिकरण की प्रक्रिया मेंनिचली यामध्यम हिन्दू जाति या जनजाति या कोई अन्य समूह, अपनी प्रथाओं, रीतियों और जीवनशैली को उच्च जातियों(ब्राह्मण, क्षेत्रीय इत्यादि) की दिशा में बदल लेते हैं। प्रायः ऐसे परिवर्तन के साथ ही वे जातिव्यवस्था में उस स्थिति से उच्चतर स्थिति के दावेदार भी बन जाते हैं, जो कि परम्परागत रूप से स्थानीय समुदाय उन्हें प्रदान करता आया हो ।“ पाश्चात्यीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा, खानपान, पहनावे की शैलियों, भोजन करने के तरीकों, इत्यादि में परिवर्तन देखा जा सकता है जहां इस परिवर्तन की प्रेरणा जाति व्यवस्था न होकर पश्चमी दुनिया की संस्कृति होती है । हालांकि यह परिवर्तन प्राय सर्वप्रथम उच्च जातियों में देखने को मिलता है जिन्हे निचली जातियों ने संस्कृतिकरण के जरिये अपनाया । यह परिवर्तन ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के शासन की शुरुआत से दिखाई देता है । संस्कृतिकरण व पाश्चात्यीकरण का समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था पर प्रभाव:- संस्कृतिकरण, सांस्कृतिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया को इंगित करता है जो भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में हो रही है। कर्नाटक के कूर्ग जिले में एम एन श्रीनिवास ने अपने अध्ययन में पाया कि जाति पदानुक्रम में अपना स्थान बढ़ाने के लिए निम्नजातियों ने कुछ उच्च जातियों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को अपनाया है। ब्राह्मणों और कुछ लोगों ने उन चीजों को छोड़ दिया जिन्हें उच्च जातियों द्वारा अपवित्र माना जाता था। उदाहरण के लिए उन्होंने मांस खाना, शराब पीना और अपने देवताओं को पशुबलि देना छोड़ दिया। उन्होंने पोशाक, भोजन और अनुष्ठानों के मामलों में ब्राह्मणों की नकल की। इसके द्वारा वे एक पीढ़ी के भीतर जातियों के पदानुक्रम में उच्च पदों का दावा कर सकते थे। संस्कृतीकरण आमतौर पर उन समूहों में हुआ है जिन्होंने राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का आनंद लिया है, लेकिन अनुष्ठान रैंकिंग में उच्च स्थान पर नहीं थे। एम एन श्रीनिवास के अनुसारपाश्चात्यीकरण भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। औपनिवेशिक भारत में पश्चिमीकरण का प्रभाव कुलीन वर्ग पर था क्योंकि वे अंग्रेजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष विषयों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों और अन्य जातियों ने अदालतों में सीखने की परम्परा व विज्ञान की परम्परा के स्थान पर अंग्रजी माध्यम में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को अपनाया । शिक्षा की नई प्रणाली द्वारा भारतीय समाज में एक और बदलाव यह आया है कि स्कूलों को, पारम्परिक स्कूलों के विपरीत सभी प्रकार के जातियों के लिए खोल दिए गए। पारम्परिक स्कूल केवल उच्च जाती के बच्चों तक ही सीमित थे और ज्यादातर पारम्परिक ज्ञान को प्रसारित करते थे। अतः आज भी चाहे सिनेमा हो, खानपान हो, पहनावा हो या फिर व्यवसाय हो,संस्कृतिकरण और पश्चमीकरणविभिन्न स्तर पर भारतीय समाज में जाती व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
46,965
मानसून से क्या तात्पर्य है ? इसकी उत्पत्ति के संबंध में हेडली द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त और उसकी आलोचनाओं की चर्चा कीजिये ।( 150 - 200 शब्द) What does monsoon mean? Discuss the theories and criticisms propounded by Headley in relation to its origin. (150 - 200 words)
दृष्टिकोण · भूमिका में मानसून की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में मानसून की उत्पत्ति के संदर्भ में हेल्ली के सिद्धान्त की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में इस सिद्धान्त की आलोचना के बिन्दुओ का उल्लेख कीजिये । उत्तर :- मानसून अरबी भाषा का शब्द है। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरब व्यापारी इस शब्द का प्रयोग करते थे। भारत में मानसून उन हवाओं को कहते हैं जो हवाएं जून से सितंबर के गरमी के दिनों में दक्षिण-पश्चिम दिशा से और नवंबर से मार्च के सर्दी के दिनों में उत्तर-पूर्वी दिशा से बहती हैं। ग्रीष्मकाल में मानसून हवाएं सागर से स्थल की ओर एवं शीतकाल में स्थल से सागर की ओर चला करती है। दिशा बदलने के कारण प्रथम को दक्षिण पश्चिम मानसून एवं द्वितीय को उत्तर पूर्वी मानसून या लौटता मानसून कहते हैं। मानसून के संदर्भ में हेल्ली की व्याख्या :- हेल्ली ने मानसून संचालन को वैश्विक वायु मंडलीय परिसंचलन के साथ जोड़ कर देखा और मानसून को इसका अभिन्न अंग माना। इस व्याख्या के अनुसार शीतकालीन मानसून उतरी गोलार्द्ध की सामान्य व्यापारिक पवन है जो उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की दिशा में बहती है। जबकि ग्रीष्म कालीन मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण का परिणाम हैं। उत्तरी गोलार्द्ध के ग्रीष्म काल में आईटीसीज़ेड धीरे- धीरे विषुवत रेखा से उत्तर की ओर दोलन करता है। जो एक सामान्य बात है, लेकिन उत्तरी हिन्द महासागर के ऊपर भारतीय उपमहाद्वीप की विशेष स्थिति के कारण आईटीसीज़ेड का अपवाद के रूप में अधिकतम स्थानांतरण होता है। सामान्य विचलन अधिकतम 10 डिग्री तक होता है जबकि भारतीय महाद्वीप में यह लगभग 25 डिग्री तक दोलन करता है। परिणाम स्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवन अपने नए गंतव्य स्थान तक पहुचने की कोशिश में विषुवत रेखा को पार कर दाहिनी ओर मुड़ती है और हिन्द महासागर में यह दक्षिण की ओर संचालित होती है । इसी पवन को दक्षिणी पश्चिमी मानसून कहते है। अर्थात हेडली के अनुसार मानसून व्यापारिक पवन का ही एक अलग रूप है। अर्थात शीतकालीन मानसून उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवन और ग्रीष्म कालीन मानसून दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन का बदला रूप है । हालांकि हेल्ली द्वारा प्रतिपदित यह सिद्धान्त मानसून की अनिश्चितता , उसकी तीव्रतता में कमी और अधिकता आदि को समझने में असफल हुआ । जिसके कारण आगे चलकर पूर्वी जेट स्ट्रीम और आधुनिक वायु दाब सिद्धान्त ( air mass theory ) का प्रतिपादन किया गया ।
##Question:मानसून से क्या तात्पर्य है ? इसकी उत्पत्ति के संबंध में हेडली द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त और उसकी आलोचनाओं की चर्चा कीजिये ।( 150 - 200 शब्द) What does monsoon mean? Discuss the theories and criticisms propounded by Headley in relation to its origin. (150 - 200 words)##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में मानसून की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में मानसून की उत्पत्ति के संदर्भ में हेल्ली के सिद्धान्त की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में इस सिद्धान्त की आलोचना के बिन्दुओ का उल्लेख कीजिये । उत्तर :- मानसून अरबी भाषा का शब्द है। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरब व्यापारी इस शब्द का प्रयोग करते थे। भारत में मानसून उन हवाओं को कहते हैं जो हवाएं जून से सितंबर के गरमी के दिनों में दक्षिण-पश्चिम दिशा से और नवंबर से मार्च के सर्दी के दिनों में उत्तर-पूर्वी दिशा से बहती हैं। ग्रीष्मकाल में मानसून हवाएं सागर से स्थल की ओर एवं शीतकाल में स्थल से सागर की ओर चला करती है। दिशा बदलने के कारण प्रथम को दक्षिण पश्चिम मानसून एवं द्वितीय को उत्तर पूर्वी मानसून या लौटता मानसून कहते हैं। मानसून के संदर्भ में हेल्ली की व्याख्या :- हेल्ली ने मानसून संचालन को वैश्विक वायु मंडलीय परिसंचलन के साथ जोड़ कर देखा और मानसून को इसका अभिन्न अंग माना। इस व्याख्या के अनुसार शीतकालीन मानसून उतरी गोलार्द्ध की सामान्य व्यापारिक पवन है जो उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की दिशा में बहती है। जबकि ग्रीष्म कालीन मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण का परिणाम हैं। उत्तरी गोलार्द्ध के ग्रीष्म काल में आईटीसीज़ेड धीरे- धीरे विषुवत रेखा से उत्तर की ओर दोलन करता है। जो एक सामान्य बात है, लेकिन उत्तरी हिन्द महासागर के ऊपर भारतीय उपमहाद्वीप की विशेष स्थिति के कारण आईटीसीज़ेड का अपवाद के रूप में अधिकतम स्थानांतरण होता है। सामान्य विचलन अधिकतम 10 डिग्री तक होता है जबकि भारतीय महाद्वीप में यह लगभग 25 डिग्री तक दोलन करता है। परिणाम स्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवन अपने नए गंतव्य स्थान तक पहुचने की कोशिश में विषुवत रेखा को पार कर दाहिनी ओर मुड़ती है और हिन्द महासागर में यह दक्षिण की ओर संचालित होती है । इसी पवन को दक्षिणी पश्चिमी मानसून कहते है। अर्थात हेडली के अनुसार मानसून व्यापारिक पवन का ही एक अलग रूप है। अर्थात शीतकालीन मानसून उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवन और ग्रीष्म कालीन मानसून दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन का बदला रूप है । हालांकि हेल्ली द्वारा प्रतिपदित यह सिद्धान्त मानसून की अनिश्चितता , उसकी तीव्रतता में कमी और अधिकता आदि को समझने में असफल हुआ । जिसके कारण आगे चलकर पूर्वी जेट स्ट्रीम और आधुनिक वायु दाब सिद्धान्त ( air mass theory ) का प्रतिपादन किया गया ।
46,969
How can nano science and technology help protect the environment? Discuss briefly the Indian initiatives in developing nano technology products for sustainable management of the environment (150 words)
BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT -THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT (Writing both the positive and negative issues would provide a balanced answer- However, since the negative aspects have not been asked as such, it has been provided with less weightage) - THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL II OTHER INITIATIVES III INTERNATIONAL COLLABORATIONS - CONCLUSION SOURCES USED: 1)https://iasscore.in/upsc-prelims/nano-its-applications-govt-initiative 2)https://www.understandingnano.com/environmental-nanotechnology.html 3)https://www.civilserviceindia.com/subject/General-Studies/notes/awareness-in-the-fields-of-nano-technology.html ANSWER:- Nanotechnology refers to the study of matter at a miniature level at the Nanoscale. 1 Nano meter equals one billionth of a meter. Thus, Nanotechnology facilitates research on particles less than one billionth of a meter in diameter. The properties of atoms and molecules greatly differ at the Nanoscale. Therefore, Nanotechnology manipulates single atoms to discover new properties and then uses these properties to create improved devices and systems. Today, from agriculture to aerospace research, nanotechnology’s impact is being felt in every field. HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT Nanotechnology is being used in several applications to improve the environment. This includes cleaning up existing pollution, improving manufacturing methods to reduce the generation of new pollution, and making alternative energy sources more cost-effective. 1) POLLUTION It can help in generating less pollution during the manufacture of materials. 1.1) Using Nano-technology solar cells, which generate electricity at a competitive cost, can be produced. 1.2) Increasing the electricity generated by windmills.Blades that are stronger and lower weight can be built using nanotechnology. Therefore, the amount of electricity generated by each windmill is greater. 1.3) Cleaning up organic chemicals polluting groundwater. Iron nanoparticles can be effective in cleaning up the organic solvents that pollute groundwater. The iron nanoparticles disperse throughout the water-body and decompose the organic solvents. This method would be more effective and would cost significantly lesser than treatment methods that require the water to be pumped out of the ground. 2) CLEAN AIR New nanotechnology-enabled sensors and solutions are able to detect, identify, filter out and neutralize the harmful chemical or biological agents in the air and soil. 2.1) Many air filters have nanotechnology-based filters that allow “mechanical filtration” in which the fibre material creates Nano-scale pores that trap particles larger than the size of the pores. They also may contain charcoal layers that remove odours. 2.2) Gold Nano-particles can be utilized for clearing volatile organic compounds (VOCs) from the air. 3) CLEANING UP THE OIL SPILLS Photo-catalytic copper tungsten oxide nanoparticles can be used to decompose the oil into biodegradable compounds. The nanoparticles make the technology much useful for cleaning up the oil spills. 2.1) Researchers have developed a nano-fabric “paper towel,” woven from tiny wires of potassium manganese oxide. This can absorb 20 times its weight in oil for cleanup applications. 4) CLEAN ENERGY The development of more effective energy-producing, energy-absorbing, and energy storage products in smaller and more efficient devices is possible with the development of nanotechnology. For example smaller fuel cells, solar cells etc. can be built, which be more effective. 4.1) Nano-technology can help in reducing the cost of fuel cells. 4.2) Using graphene layers to increase the binding energy of hydrogen to the graphene surface in a fuel tank results in a higher amount of hydrogen storage and a lighter weight fuel tank. This could help in the development of practical hydrogen-fueled cars. 4.3) Nanoelectronics technology has been used to build solar cells that are highly efficient and cheaper than the conventional ones. 5) SUSTAINABLE ENERGY Solar panels incorporating nanotechnology are more efficient than the standard designs converting sunlight to electricity. Therefore, Nano-technology promises inexpensive solar power in the future. Nanostructured solar cells are cheaper to manufacture and easier to install. 5.1) More efficient lighting systems with significantly reduced energy consumption, lighter and stronger vehicle chassis materials for the transportation sector etc. are being developed using Nano-technology. 6) CLEAN WATER Nanotechnology could help meet the need for affordable, clean drinking water through rapid, low-cost detection of impurities in and filtration and purification of water. 5.1) GROUNDWATER- Nanoparticles can be used to clean industrial water pollutants in the groundwater at a much lower cost than methods requiring the pumping of water out of the ground for treatment. THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT Though the Nano-technological processes have positive many positive impacts on the environment, yet there are certain negative impacts of nanotechnology on the environment. 1) There can be increased toxicological affluence on the environment due to the unclear shape, size, and chemical compositions of some of the nanotechnology products. 2) Nanoparticles have higher surface areas than bulk materials. This can cause more destruction to the human body and environment compared to the bulk particles. 3) Development of Nanotechnology can increase the risks to health. Nano-particles can get into the body through the skin, lungs and digestive system, thus creating free radicals that can cause cell damage. Once Nano-particles are in the bloodstream, they will be able to cross the blood-brain barrier. Thus, scientist and researchers are more worried about these the potential risk to society due to nanoparticles at the global level. THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL 1) NANO MISSION OF INDIA It is an umbrella programme for capacity building, envisaging the overall development of this field of research.The objectives of this Mission are: (i)Basic Research Promotion–Funding of basic research by individual scientists and/or groups of scientists and the creation of centres of excellence. (ii) Infrastructure Development for Nano Science & Technology Research–Investigations on the Nanoscale requires expensive equipment. For optimal use of expensive and sophisticated facilities, it is proposed to establish a chain of shared facilities across the country. (iii) NanoApplications andTechnology Development Programmes- The Mission proposes to promote application-oriented R&D Projects, establish NanoApplications andTechnology Development Centers etc. Special efforts would be taken to involve the industrial sector directly or through Public-Private Partnership (PPP) ventures. (iv) Human Resource Development–The Mission shall focus on providing effective education and training to researchers via M.Sc./M.Tech. Programmes, creation of national and overseas post-doctoral fellowships etc. 2) The Nanotechnology Initiative Programme of the Department of Information Technology was started in 2004 with a focus on nano-electronics. II OTHER INITIATIVES 1) Centres of Excellence in Nanoelectronics Two nanoelectronics centres have been established at IIT Bombay and IISc, Bangalore. These centres are concentrating on the development of nano-systems for healthcare and environmental monitoring etc. 2) IIT DELHI- Non-silicon based nanofabrication and nanoscales devices A largeproject has been initiated recentlyat IIT Delhi for creating a centre of nanoelectronics to primarily working on non-silicon based nanotechnology. 3) Nano-metrology- at the National Physical Laboratory In the area of nanotechnology, the challenges include measurement of nano dimensions, nano electrical properties etc. To meet this requirement, calibration facilities have been developed and established to serve as a national facility. 4) Other Initiatives- Facility for the growth and characterization of Single-Wall Carbon Nanotubes at Jamia Millia Islamia University, New Delhi, Nano Science and Technology Initiative (NSTI), The Nano Science and Technology Mission (NSTM) etc. are some of the other important initiatives. III INTERNATIONAL COLLABORATIONS 1) Initiatives for joint R&D have figured prominently with Indian institutes engaging in projects in the US, EU, Japan, Taiwan and Russia. 2) The S&T departments of Brazil, South Africa and India have embarked on a tri-lateral initiative to developed collaborative programmes in several common areas of interest, with nano technology being one of them. 3) Science and Technology Initiatives with Indian Diaspora –for encouraging networking in this field. 4) The International Science and Technology Directorate (ISAD) of the (CSIR) Council of Science and Industrial Research aims to strengthen cooperation between CSIR and international institutions, which has facilitated workshops and collaborative projects with international partners like South Africa, France, South Korea, China, Japan in the area of Nanoscience and technology. 5) Euro-India Net has been set up between the EU and India to encourage collaborations between their scientists. 6) A memorandum of understanding has been signed between India and UNESCO to establish a Regional Centre for Education and Training in Biotechnology, where one of the focus areas is Nano-biotechnology. To summarize, nanotechnology is highly beneficial in today"s technology-driven society. It is can be used across all the other science fields, such as chemistry, biology, physics, materials science, and engineering. Nanotechnology will continue to develop, advantageous to civilization and improve the environment in numerous ways.
##Question:How can nano science and technology help protect the environment? Discuss briefly the Indian initiatives in developing nano technology products for sustainable management of the environment (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: - INTRODUCTION - HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT -THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT (Writing both the positive and negative issues would provide a balanced answer- However, since the negative aspects have not been asked as such, it has been provided with less weightage) - THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL II OTHER INITIATIVES III INTERNATIONAL COLLABORATIONS - CONCLUSION SOURCES USED: 1)https://iasscore.in/upsc-prelims/nano-its-applications-govt-initiative 2)https://www.understandingnano.com/environmental-nanotechnology.html 3)https://www.civilserviceindia.com/subject/General-Studies/notes/awareness-in-the-fields-of-nano-technology.html ANSWER:- Nanotechnology refers to the study of matter at a miniature level at the Nanoscale. 1 Nano meter equals one billionth of a meter. Thus, Nanotechnology facilitates research on particles less than one billionth of a meter in diameter. The properties of atoms and molecules greatly differ at the Nanoscale. Therefore, Nanotechnology manipulates single atoms to discover new properties and then uses these properties to create improved devices and systems. Today, from agriculture to aerospace research, nanotechnology’s impact is being felt in every field. HOW NANOSCIENCE AND TECHNOLOGY CAN HELP PROTECT THE ENVIRONMENT Nanotechnology is being used in several applications to improve the environment. This includes cleaning up existing pollution, improving manufacturing methods to reduce the generation of new pollution, and making alternative energy sources more cost-effective. 1) POLLUTION It can help in generating less pollution during the manufacture of materials. 1.1) Using Nano-technology solar cells, which generate electricity at a competitive cost, can be produced. 1.2) Increasing the electricity generated by windmills.Blades that are stronger and lower weight can be built using nanotechnology. Therefore, the amount of electricity generated by each windmill is greater. 1.3) Cleaning up organic chemicals polluting groundwater. Iron nanoparticles can be effective in cleaning up the organic solvents that pollute groundwater. The iron nanoparticles disperse throughout the water-body and decompose the organic solvents. This method would be more effective and would cost significantly lesser than treatment methods that require the water to be pumped out of the ground. 2) CLEAN AIR New nanotechnology-enabled sensors and solutions are able to detect, identify, filter out and neutralize the harmful chemical or biological agents in the air and soil. 2.1) Many air filters have nanotechnology-based filters that allow “mechanical filtration” in which the fibre material creates Nano-scale pores that trap particles larger than the size of the pores. They also may contain charcoal layers that remove odours. 2.2) Gold Nano-particles can be utilized for clearing volatile organic compounds (VOCs) from the air. 3) CLEANING UP THE OIL SPILLS Photo-catalytic copper tungsten oxide nanoparticles can be used to decompose the oil into biodegradable compounds. The nanoparticles make the technology much useful for cleaning up the oil spills. 2.1) Researchers have developed a nano-fabric “paper towel,” woven from tiny wires of potassium manganese oxide. This can absorb 20 times its weight in oil for cleanup applications. 4) CLEAN ENERGY The development of more effective energy-producing, energy-absorbing, and energy storage products in smaller and more efficient devices is possible with the development of nanotechnology. For example smaller fuel cells, solar cells etc. can be built, which be more effective. 4.1) Nano-technology can help in reducing the cost of fuel cells. 4.2) Using graphene layers to increase the binding energy of hydrogen to the graphene surface in a fuel tank results in a higher amount of hydrogen storage and a lighter weight fuel tank. This could help in the development of practical hydrogen-fueled cars. 4.3) Nanoelectronics technology has been used to build solar cells that are highly efficient and cheaper than the conventional ones. 5) SUSTAINABLE ENERGY Solar panels incorporating nanotechnology are more efficient than the standard designs converting sunlight to electricity. Therefore, Nano-technology promises inexpensive solar power in the future. Nanostructured solar cells are cheaper to manufacture and easier to install. 5.1) More efficient lighting systems with significantly reduced energy consumption, lighter and stronger vehicle chassis materials for the transportation sector etc. are being developed using Nano-technology. 6) CLEAN WATER Nanotechnology could help meet the need for affordable, clean drinking water through rapid, low-cost detection of impurities in and filtration and purification of water. 5.1) GROUNDWATER- Nanoparticles can be used to clean industrial water pollutants in the groundwater at a much lower cost than methods requiring the pumping of water out of the ground for treatment. THE NEGATIVE IMPACTS OF NANO-TECHNOLOGY ON THE ENVIRONMENT Though the Nano-technological processes have positive many positive impacts on the environment, yet there are certain negative impacts of nanotechnology on the environment. 1) There can be increased toxicological affluence on the environment due to the unclear shape, size, and chemical compositions of some of the nanotechnology products. 2) Nanoparticles have higher surface areas than bulk materials. This can cause more destruction to the human body and environment compared to the bulk particles. 3) Development of Nanotechnology can increase the risks to health. Nano-particles can get into the body through the skin, lungs and digestive system, thus creating free radicals that can cause cell damage. Once Nano-particles are in the bloodstream, they will be able to cross the blood-brain barrier. Thus, scientist and researchers are more worried about these the potential risk to society due to nanoparticles at the global level. THE INDIAN INITIATIVES IN DEVELOPING NANOTECHNOLOGY PRODUCTS I INITIATIVES AT THE GOVERNMENT LEVEL 1) NANO MISSION OF INDIA It is an umbrella programme for capacity building, envisaging the overall development of this field of research.The objectives of this Mission are: (i)Basic Research Promotion–Funding of basic research by individual scientists and/or groups of scientists and the creation of centres of excellence. (ii) Infrastructure Development for Nano Science & Technology Research–Investigations on the Nanoscale requires expensive equipment. For optimal use of expensive and sophisticated facilities, it is proposed to establish a chain of shared facilities across the country. (iii) NanoApplications andTechnology Development Programmes- The Mission proposes to promote application-oriented R&D Projects, establish NanoApplications andTechnology Development Centers etc. Special efforts would be taken to involve the industrial sector directly or through Public-Private Partnership (PPP) ventures. (iv) Human Resource Development–The Mission shall focus on providing effective education and training to researchers via M.Sc./M.Tech. Programmes, creation of national and overseas post-doctoral fellowships etc. 2) The Nanotechnology Initiative Programme of the Department of Information Technology was started in 2004 with a focus on nano-electronics. II OTHER INITIATIVES 1) Centres of Excellence in Nanoelectronics Two nanoelectronics centres have been established at IIT Bombay and IISc, Bangalore. These centres are concentrating on the development of nano-systems for healthcare and environmental monitoring etc. 2) IIT DELHI- Non-silicon based nanofabrication and nanoscales devices A largeproject has been initiated recentlyat IIT Delhi for creating a centre of nanoelectronics to primarily working on non-silicon based nanotechnology. 3) Nano-metrology- at the National Physical Laboratory In the area of nanotechnology, the challenges include measurement of nano dimensions, nano electrical properties etc. To meet this requirement, calibration facilities have been developed and established to serve as a national facility. 4) Other Initiatives- Facility for the growth and characterization of Single-Wall Carbon Nanotubes at Jamia Millia Islamia University, New Delhi, Nano Science and Technology Initiative (NSTI), The Nano Science and Technology Mission (NSTM) etc. are some of the other important initiatives. III INTERNATIONAL COLLABORATIONS 1) Initiatives for joint R&D have figured prominently with Indian institutes engaging in projects in the US, EU, Japan, Taiwan and Russia. 2) The S&T departments of Brazil, South Africa and India have embarked on a tri-lateral initiative to developed collaborative programmes in several common areas of interest, with nano technology being one of them. 3) Science and Technology Initiatives with Indian Diaspora –for encouraging networking in this field. 4) The International Science and Technology Directorate (ISAD) of the (CSIR) Council of Science and Industrial Research aims to strengthen cooperation between CSIR and international institutions, which has facilitated workshops and collaborative projects with international partners like South Africa, France, South Korea, China, Japan in the area of Nanoscience and technology. 5) Euro-India Net has been set up between the EU and India to encourage collaborations between their scientists. 6) A memorandum of understanding has been signed between India and UNESCO to establish a Regional Centre for Education and Training in Biotechnology, where one of the focus areas is Nano-biotechnology. To summarize, nanotechnology is highly beneficial in today"s technology-driven society. It is can be used across all the other science fields, such as chemistry, biology, physics, materials science, and engineering. Nanotechnology will continue to develop, advantageous to civilization and improve the environment in numerous ways.
46,975
What do you understand by endogenic forces, Also briefly mention Various types of Endogenic forces?(150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -In Introduction briefly define Endogenic Forces - In the body try to highlight types of Endigenic forces -Conclude accordingly ANSWER: The geomorphological changes on the surface of the Earth are on account of factors called Earth movements. All Earth"s movements are due to certain forces, endogenic and exogenic. Endogenic forces are those forces, which act from the inner layers of the Earth, and are relief-creating features. THE TYPES OF ENDOGENIC FORCES DIASTROPHIC CHANGES They are slow but continuous changes, such that the changes cannot be perceived by the human eye. There are further of two types: 1) EPEIROGENIC- These are continent-building forces and act vertically over the land/ lithosphere. They cause the submergence and emergence of land. (Diagram should be drawn here) RADIAL FORCES- is the force that acts perpendicular to the radius of the Earth: SUBSIDENCE OF LAND: When forces act vertically downwards, the land gets subside. For example, Dwarka is submerged under the Arabian Sea. EMERGENCE OF LAND: When forces act vertically upwards, the land emerges. For example, there is an emergence of land on the eastern side of peninsular India. Therefore, deltas formed due to the lower velocity of the river there. (Thus, all deltas are formed on the eastern coast of the peninsula). For example, the Sunderbans delta is the largest delta in the world. 2) OROGENIC- These are mountain-building forces and act horizontally towards the centre. Such action leads to compression and the resultant elevation of the land. The mountains so formed are called fold mountains. For example, the Himalayas, Rockies (N America), Andes (S America), and Alps (Europe)(Diagram should be drawn here) 3) TENSIONAL FORCE- this is when the horizontal force acts away from the centre (faulting). These forces create ruptures, fractures and faults. The fracture develops and the fracture line is called a fault line. This extends to an extended fault line. For example, the San Andreas Fault line [San Francisco is a city on this fault (in California), Narmada, Tapi etc. Graben- This happens when the block of land moves downwards. Valleys are thus formed like the Black Forest of Germany. The Sunrays never fall straight in the graben valley, hence, the area looks dark and is named the black forest. Horst- Is formed when the broken block of land moves up. Thus, block mountains are formed. Examples, are the Vindhyas and Satpuras, Vosges mountains. (2-3 diagrams need to be drawn here) II CATASTROPHIC CHANGES These are sudden but not continuous changes. For example- earthquakes, volcanoes etc. There is a sudden release of stress energy here. Conclusion: At any location on the surface of the Earth, both the endogenic and exogenic forces will be at work. However, one type will dominate over the other at any given location. For example, plains exist where the exogenic forces are dominant. The actions of such forces against each other cause the undulation in the land.
##Question:What do you understand by endogenic forces, Also briefly mention Various types of Endogenic forces?(150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -In Introduction briefly define Endogenic Forces - In the body try to highlight types of Endigenic forces -Conclude accordingly ANSWER: The geomorphological changes on the surface of the Earth are on account of factors called Earth movements. All Earth"s movements are due to certain forces, endogenic and exogenic. Endogenic forces are those forces, which act from the inner layers of the Earth, and are relief-creating features. THE TYPES OF ENDOGENIC FORCES DIASTROPHIC CHANGES They are slow but continuous changes, such that the changes cannot be perceived by the human eye. There are further of two types: 1) EPEIROGENIC- These are continent-building forces and act vertically over the land/ lithosphere. They cause the submergence and emergence of land. (Diagram should be drawn here) RADIAL FORCES- is the force that acts perpendicular to the radius of the Earth: SUBSIDENCE OF LAND: When forces act vertically downwards, the land gets subside. For example, Dwarka is submerged under the Arabian Sea. EMERGENCE OF LAND: When forces act vertically upwards, the land emerges. For example, there is an emergence of land on the eastern side of peninsular India. Therefore, deltas formed due to the lower velocity of the river there. (Thus, all deltas are formed on the eastern coast of the peninsula). For example, the Sunderbans delta is the largest delta in the world. 2) OROGENIC- These are mountain-building forces and act horizontally towards the centre. Such action leads to compression and the resultant elevation of the land. The mountains so formed are called fold mountains. For example, the Himalayas, Rockies (N America), Andes (S America), and Alps (Europe)(Diagram should be drawn here) 3) TENSIONAL FORCE- this is when the horizontal force acts away from the centre (faulting). These forces create ruptures, fractures and faults. The fracture develops and the fracture line is called a fault line. This extends to an extended fault line. For example, the San Andreas Fault line [San Francisco is a city on this fault (in California), Narmada, Tapi etc. Graben- This happens when the block of land moves downwards. Valleys are thus formed like the Black Forest of Germany. The Sunrays never fall straight in the graben valley, hence, the area looks dark and is named the black forest. Horst- Is formed when the broken block of land moves up. Thus, block mountains are formed. Examples, are the Vindhyas and Satpuras, Vosges mountains. (2-3 diagrams need to be drawn here) II CATASTROPHIC CHANGES These are sudden but not continuous changes. For example- earthquakes, volcanoes etc. There is a sudden release of stress energy here. Conclusion: At any location on the surface of the Earth, both the endogenic and exogenic forces will be at work. However, one type will dominate over the other at any given location. For example, plains exist where the exogenic forces are dominant. The actions of such forces against each other cause the undulation in the land.
46,982
राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथ के उदय के कारणों की संक्षेप में चर्चा करते हुए ,कांग्रेस पर इसके प्रभाव का वर्णन कीजिये।(10 अंक/150-200 शब्द) Briefly discuss the reasons for the rise of the Left wing in the national movement, describe its impact on the Congress.(10 marks/150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में वामपंथी आन्दोलन का सामान्य परिचय देते उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात वामपंथ के उदय के कारणों का संछिप्त परिचय दीजिये | पुनः वामपंथ का कांग्रेस पर प्रभाव का वर्णन कीजिये तथा इसके साथ ही उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में वामपंथी विचारधारा प्रथम विश्व युद्ध के बाद राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के कारण उभरी और यह अनिवार्य रूप से राष्ट्रवादी आन्दोलन के साथ संलग्न हो गयी | 20वीं शताब्दी का इतिहास कई कारणों से महत्वपूर्ण रहा | इसी दौरान जहाँ एक ओर राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतीयों ने अपनी सक्रिय भूमिका निभायी वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न राजनीतिक धाराओं का क्रिस्तालिकरण भी हुआ | भारत में वामपंथी आन्दोलन का विकास दो विचारधाराओं में देखा जा सकता है , पहला साम्यवाद जिसे रूस के कामिन्टर्न का समर्थन प्राप्त था , दूसरा कांग्रेस सोशलिस्ट जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था | वामपंथ के उदय के निम्नलिखित कारण रहे - आधुनिकउद्योगों एवं परिवहन के साधनों के विकासक्रम में आधुनिक मजदूरों का उदय तथा मजदूरों की दयनीय दशा जैसे - रेलवे , सड़कें , मजदूरी इत्यादि | लोग मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित थे | रूसी क्रान्ति और वैश्विक स्तर पर फैली आर्थिक मंदी जैसे कारणों ने भारत में वामपंथी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में मदद की | असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले बहुत से नौजवान इस आन्दोलन के परिणामों गांधीवादी नीतियों , विचारों और वैकल्पिक स्वराज्यवादी कार्यक्रमों से भी संतुष्ट नहीं थे यही कारण था कि इन लोगों ने समाजवाद की तरफ रुख किया | देश में फैली राजनीतिक , आर्थिक और सामाजिक बुराइयों के चलते भी लोगों का ध्यान समाजवाद की तरफ गया | परन्तु इन सबके ऊपर जवाहर लाल नेहरु ऐसे व्यक्ति थे , जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को समाजवादी दृष्टि प्रदान की और भारत में समाजवाद और समाजवादी विचारों के प्रतीक बन गए और घोषणा की कि यदि आम आदमी को आर्थिक मुक्ति हासिल होती है , तभी राजनैतिक मुक्ति सार्थक हो सकती है | इस प्रकार नेहरु ने युवा राष्ट्रवादियों की एक समूची पीढ़ी को मोड़ा और समाजवादी विचारों को आत्मसात करने में उनकी मदद की | कांग्रेस पर वामपंथ का प्रभाव - कांग्रेस के लक्ष्य के पुनर्निर्धारण में नेहरु , सुभाष चन्द्र बोस जैसे समाजवादी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही | 1931 में कर्न्ची में पारित प्रस्तावों पर भी समाजवादी विचारधारा का प्रभाव देखा गया | 1936 में फैजपुर अधिवेशन में भी किसानों से सम्बंधित प्रस्ताव पारित किये गए | 1938 में राष्ट्रीय योजना का गठन जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में किया गया | कांग्रेस की रणनीति को भी समाजवादियों ने प्रभावित किया जैसे - समाजवादी निरंतर संघर्ष करना चाहते थे | सरकार से किसी भी प्रकार की बातचीत या समझौते के विरुद्ध थे , ये संवैधानिक राजनीति के पक्ष में थे | सविनय अवज्ञा आन्दोलन , भारत छोडो आन्दोलन तथा 1945 -47 के बीच के सभी आन्दोलनों में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी | राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथियों को भारतीय समाज और राजनीति पर बुनियादी प्रभाव डालने में सफलता मिली , इन्हीं के प्रयासों से देश में अनेक किसान एवं मजदूर संगठन बने तथा मार्क्सवादी एवं साम्यवादी विचार का प्रचार-प्रसार हुआ |
##Question:राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथ के उदय के कारणों की संक्षेप में चर्चा करते हुए ,कांग्रेस पर इसके प्रभाव का वर्णन कीजिये।(10 अंक/150-200 शब्द) Briefly discuss the reasons for the rise of the Left wing in the national movement, describe its impact on the Congress.(10 marks/150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में वामपंथी आन्दोलन का सामान्य परिचय देते उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात वामपंथ के उदय के कारणों का संछिप्त परिचय दीजिये | पुनः वामपंथ का कांग्रेस पर प्रभाव का वर्णन कीजिये तथा इसके साथ ही उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारत में वामपंथी विचारधारा प्रथम विश्व युद्ध के बाद राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के कारण उभरी और यह अनिवार्य रूप से राष्ट्रवादी आन्दोलन के साथ संलग्न हो गयी | 20वीं शताब्दी का इतिहास कई कारणों से महत्वपूर्ण रहा | इसी दौरान जहाँ एक ओर राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतीयों ने अपनी सक्रिय भूमिका निभायी वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न राजनीतिक धाराओं का क्रिस्तालिकरण भी हुआ | भारत में वामपंथी आन्दोलन का विकास दो विचारधाराओं में देखा जा सकता है , पहला साम्यवाद जिसे रूस के कामिन्टर्न का समर्थन प्राप्त था , दूसरा कांग्रेस सोशलिस्ट जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था | वामपंथ के उदय के निम्नलिखित कारण रहे - आधुनिकउद्योगों एवं परिवहन के साधनों के विकासक्रम में आधुनिक मजदूरों का उदय तथा मजदूरों की दयनीय दशा जैसे - रेलवे , सड़कें , मजदूरी इत्यादि | लोग मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित थे | रूसी क्रान्ति और वैश्विक स्तर पर फैली आर्थिक मंदी जैसे कारणों ने भारत में वामपंथी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में मदद की | असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले बहुत से नौजवान इस आन्दोलन के परिणामों गांधीवादी नीतियों , विचारों और वैकल्पिक स्वराज्यवादी कार्यक्रमों से भी संतुष्ट नहीं थे यही कारण था कि इन लोगों ने समाजवाद की तरफ रुख किया | देश में फैली राजनीतिक , आर्थिक और सामाजिक बुराइयों के चलते भी लोगों का ध्यान समाजवाद की तरफ गया | परन्तु इन सबके ऊपर जवाहर लाल नेहरु ऐसे व्यक्ति थे , जिन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को समाजवादी दृष्टि प्रदान की और भारत में समाजवाद और समाजवादी विचारों के प्रतीक बन गए और घोषणा की कि यदि आम आदमी को आर्थिक मुक्ति हासिल होती है , तभी राजनैतिक मुक्ति सार्थक हो सकती है | इस प्रकार नेहरु ने युवा राष्ट्रवादियों की एक समूची पीढ़ी को मोड़ा और समाजवादी विचारों को आत्मसात करने में उनकी मदद की | कांग्रेस पर वामपंथ का प्रभाव - कांग्रेस के लक्ष्य के पुनर्निर्धारण में नेहरु , सुभाष चन्द्र बोस जैसे समाजवादी नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही | 1931 में कर्न्ची में पारित प्रस्तावों पर भी समाजवादी विचारधारा का प्रभाव देखा गया | 1936 में फैजपुर अधिवेशन में भी किसानों से सम्बंधित प्रस्ताव पारित किये गए | 1938 में राष्ट्रीय योजना का गठन जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में किया गया | कांग्रेस की रणनीति को भी समाजवादियों ने प्रभावित किया जैसे - समाजवादी निरंतर संघर्ष करना चाहते थे | सरकार से किसी भी प्रकार की बातचीत या समझौते के विरुद्ध थे , ये संवैधानिक राजनीति के पक्ष में थे | सविनय अवज्ञा आन्दोलन , भारत छोडो आन्दोलन तथा 1945 -47 के बीच के सभी आन्दोलनों में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी | राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथियों को भारतीय समाज और राजनीति पर बुनियादी प्रभाव डालने में सफलता मिली , इन्हीं के प्रयासों से देश में अनेक किसान एवं मजदूर संगठन बने तथा मार्क्सवादी एवं साम्यवादी विचार का प्रचार-प्रसार हुआ |
46,986
भारत के लिए मादक पदार्थों के तस्करी की समस्या पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द, अंक - 10 ) Briefly comment on the problem of drug trafficking for India. (150-200 words , marks - 10 )
दृष्टिकोण: कुछ आंकड़ों की मदद से भारत में मादक पदार्थों की तस्करी की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । मादक पदार्थों की तस्करी के लिए भारत की सुभेधता के कारणों की चर्चा कीजिये । मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय क्यों है । मादक पदार्थों की तस्करी के प्रभावी नियंत्रण के लिए कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है । वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है । जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है । इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है । दूसरा भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है । मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है । साथ ही यह हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न करता है । मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है । पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । इतना ही नहीं पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं । NCB लगातार इस दिशा में प्रयासरत है । वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है ।बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
##Question:भारत के लिए मादक पदार्थों के तस्करी की समस्या पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द, अंक - 10 ) Briefly comment on the problem of drug trafficking for India. (150-200 words , marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण: कुछ आंकड़ों की मदद से भारत में मादक पदार्थों की तस्करी की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । मादक पदार्थों की तस्करी के लिए भारत की सुभेधता के कारणों की चर्चा कीजिये । मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय क्यों है । मादक पदार्थों की तस्करी के प्रभावी नियंत्रण के लिए कुछ सुझावों के साथ निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक प्रमुख केंद्र है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भांग, गांजा जैसे पारंपरिक मादक पदार्थों से लेकर ट्रामाडोल ( tramadol ) व मेथमफेटामाइन ( methamphetamin ) जैसे सिंथेटिक व डिजाइनर ड्रग्स सभी का अवैध व्यापार भारत में काफी फल-फूल रहा है । भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का मुख्य कारण भारत की अवस्थिति तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में छिद्रिल सीमा की मौजूदगी है । वस्तुतः भारत विश्व के दो प्रमुख मादक पदार्थों को उत्पादित करने वाले क्षेत्रों के बीच अवस्थित है । जहां पूर्व में गोल्डेन ट्राइऐंगल के रूप में थायलैंड, लाओस व म्यांमार जैसे मादक पदार्थों के उत्पादक क्षेत्र हैं, वहीं पश्चिम में गोल्डेन क्रेसेंट के रूप में पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व ईरान का क्षेत्र आता है । इन उत्पादक क्षेत्रों के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार है । दूसरा भारत के पड़ोसी राष्ट्रों की मदद से आसानी से भारत में मादक पदार्थों का अवैध व्यापार चलाया जाता है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में छिद्रिल सीमा व सीमा प्रबंधन की समस्या के कारण भी मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है । मादक पदार्थों की तस्करी भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है । नशे की चपेट में आकर युवाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है और इसका स्पष्ट प्रमाण हमें पंजाब व पूर्वोत्तर के राज्यों में देखने को मिलता है । साथ ही यह हमारी आंतरिक सुरक्षा के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न करता है । मादक पदार्थों की तस्करी व आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है । पूर्वोत्तर में अलगाववाद व आतंकवाद के लिए यह धन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में कार्य करता है । इतना ही नहीं पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भी मादक पदार्थों के तस्करी की भूमिका को देखा जा सकता है । मादक पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को देखते हुए सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं । NCB लगातार इस दिशा में प्रयासरत है । वर्ष 2016 में सरकार द्वारा NCORD का गठन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है ।बेहतर सीमा प्रबंधन भी मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक आवश्यक शर्त है और भारत सरकार निरंतर इस ओर ध्यान से रही है तथापि इस समस्या को और गंभीरता के साथ संबोधित किए जाने की आवश्यकता है ।
46,988
भारतके विभिन्न भागों में होने वालीवर्षा के वितरण की सकारण चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the distribution of rainfall with its reasonsin different parts of India. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिकामें भारत में होने वाली वर्षा का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत के विभिन्न भागों में होने वाली वर्षा के वितरण की सकारण चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत में औसत वर्षा 125 सेंटीमीटर होती है। जिसमें 75 प्रतिशत दक्षिणी-पश्चमी मानसून,13 प्रतिशत उत्तरी-पूर्वी मानसून,10 प्रतिशत मानसून पूर्व स्थानीय चक्रवातों द्वारा तथा 2 प्रतिशत पश्चिमी विक्षोभ के कारण होती है। पश्चिमी घाट व उत्तरी-पूर्वी भारत 400 सेंटीमीटर वर्षा प्राप्त करते हैं।जबकि राजस्थान का पश्चिमी भाग 60 सेंटीमीटर तथा इससे सटे गुजरात, हरियाणा व पंजाब भी थोड़ी कमवर्षा ही प्राप्त करते हैं। भारत में होने वाली वर्षा को निम्नलिखित भागों में बाँट सकते हैं- ग्रीष्मकालीन वर्षा:- मानसून पूर्व:- यह मानसून से पूर्व होने वाली वर्षा है जो देश के विभिन्न स्थानीय क्षेत्रों में होती है जैसे, आम्र वृष्टि महाराष्ट्र एवं गोवा में, चेरी ब्लॉसम कर्नाटक में, काल बैसाखी पश्चमी बंगाल व ओडिशा में। चक्रवात वर्षा:- यह मानसून पूर्व स्थानीयचक्रवात के द्वारा होने वाली वर्षाहै। यहपूर्वी तट पर अधिक तथापश्चमी तट पर कम होती है। ग्रीष्मकालीन दक्षिण पश्चिम मानसून से होने वाली वर्षा, जिसे दो शाखाओं में वर्गीकृत किया जाता है जैसे- अरब सागरीय शाखा बंगाल की खाड़ी की शाखा अरब सागरीय शाखाके वर्षण का निर्धारण मुख्य रूप कुछ विशेष भू-आकृतिक विविधताओं से निर्देशित होताहै जैसे कि पश्चिमी घाट की अवस्थिति- दक्षिण पश्चिम मानसून के लिए भौतिक अवरोध एवं पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर वर्षा परन्तु पश्चिमी घाट के पूर्व में जाते –जाते ये पवनें शुष्क हो जाती हैं। इससे इस ढाल पर वृष्टि छाया प्रदेश का निर्माण होता है। नर्मदा ,ताप्ती भ्रंश घाटी – मुंबई के उत्तर से दक्षिण पश्चिम मानसून पवन इन भ्रंश घटी में प्रवेश कर मध्य भारत के पठार तक पहुँच जाती है जैसे कि- छोटानागपुर का पठार। अरावली की उत्तर दक्षिण दिशा – इससे दक्षिण पश्चिम पवन इसके समानांतर चली जाती है तथा ये पवनें पंजाब में जाकर बंगाल की खाड़ी की शाखा से जाकर मिलती है। बंगाल की खाड़ीकी शाखा – अराकान योमा के पर्वत से टकराकर उत्तर पूर्व में वर्षा। गारो, खासी पहाड़ियों से टकराकर इनके दक्षिण ढाल पर वर्षा एवं उसके दक्षिण में वृष्टि छाया प्रदेश का निर्माण। गंगा के मैदान में हिमालय के साथ –साथ पंजाब तक प्रवेश। शीत कालीन वर्षा– उत्तर पूर्वी मानसून पवनों से जिन्हें लौटताहुआमानसून कहते हैं। इसमें पवनें मूलतः शुष्क होतीहैं (स्थलीय पवनें) परन्तु बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरने पर नमी युक्त हो जाती हैं एवं तमिलनाडु तट पर पूर्वी घाट की अवस्थिति के कारण उससे टकराकर वर्षा करती है। इस प्रकार भारत में तमिलनाडु तट पर शीत कालीन वर्षा होती है। अतः मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक विविधता एवं धरातलीय पवन संचरण का परिणाम हैं परन्तु ऊपरीवायुमंडल में व्याप्त जेट स्ट्रीम की स्थिति एवं मानसून गर्त की अवस्थिति में होने वाले परिवर्तनों की भी मुख्य भूमिका है। फिर भी उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक विविधता एवं पवन संचरण के द्वारा ही मानसून वर्षा के आधारभूत स्वरुप का निर्धारण किया जाता है।
##Question:भारतके विभिन्न भागों में होने वालीवर्षा के वितरण की सकारण चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Discuss the distribution of rainfall with its reasonsin different parts of India. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिकामें भारत में होने वाली वर्षा का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंभारत के विभिन्न भागों में होने वाली वर्षा के वितरण की सकारण चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत में औसत वर्षा 125 सेंटीमीटर होती है। जिसमें 75 प्रतिशत दक्षिणी-पश्चमी मानसून,13 प्रतिशत उत्तरी-पूर्वी मानसून,10 प्रतिशत मानसून पूर्व स्थानीय चक्रवातों द्वारा तथा 2 प्रतिशत पश्चिमी विक्षोभ के कारण होती है। पश्चिमी घाट व उत्तरी-पूर्वी भारत 400 सेंटीमीटर वर्षा प्राप्त करते हैं।जबकि राजस्थान का पश्चिमी भाग 60 सेंटीमीटर तथा इससे सटे गुजरात, हरियाणा व पंजाब भी थोड़ी कमवर्षा ही प्राप्त करते हैं। भारत में होने वाली वर्षा को निम्नलिखित भागों में बाँट सकते हैं- ग्रीष्मकालीन वर्षा:- मानसून पूर्व:- यह मानसून से पूर्व होने वाली वर्षा है जो देश के विभिन्न स्थानीय क्षेत्रों में होती है जैसे, आम्र वृष्टि महाराष्ट्र एवं गोवा में, चेरी ब्लॉसम कर्नाटक में, काल बैसाखी पश्चमी बंगाल व ओडिशा में। चक्रवात वर्षा:- यह मानसून पूर्व स्थानीयचक्रवात के द्वारा होने वाली वर्षाहै। यहपूर्वी तट पर अधिक तथापश्चमी तट पर कम होती है। ग्रीष्मकालीन दक्षिण पश्चिम मानसून से होने वाली वर्षा, जिसे दो शाखाओं में वर्गीकृत किया जाता है जैसे- अरब सागरीय शाखा बंगाल की खाड़ी की शाखा अरब सागरीय शाखाके वर्षण का निर्धारण मुख्य रूप कुछ विशेष भू-आकृतिक विविधताओं से निर्देशित होताहै जैसे कि पश्चिमी घाट की अवस्थिति- दक्षिण पश्चिम मानसून के लिए भौतिक अवरोध एवं पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर वर्षा परन्तु पश्चिमी घाट के पूर्व में जाते –जाते ये पवनें शुष्क हो जाती हैं। इससे इस ढाल पर वृष्टि छाया प्रदेश का निर्माण होता है। नर्मदा ,ताप्ती भ्रंश घाटी – मुंबई के उत्तर से दक्षिण पश्चिम मानसून पवन इन भ्रंश घटी में प्रवेश कर मध्य भारत के पठार तक पहुँच जाती है जैसे कि- छोटानागपुर का पठार। अरावली की उत्तर दक्षिण दिशा – इससे दक्षिण पश्चिम पवन इसके समानांतर चली जाती है तथा ये पवनें पंजाब में जाकर बंगाल की खाड़ी की शाखा से जाकर मिलती है। बंगाल की खाड़ीकी शाखा – अराकान योमा के पर्वत से टकराकर उत्तर पूर्व में वर्षा। गारो, खासी पहाड़ियों से टकराकर इनके दक्षिण ढाल पर वर्षा एवं उसके दक्षिण में वृष्टि छाया प्रदेश का निर्माण। गंगा के मैदान में हिमालय के साथ –साथ पंजाब तक प्रवेश। शीत कालीन वर्षा– उत्तर पूर्वी मानसून पवनों से जिन्हें लौटताहुआमानसून कहते हैं। इसमें पवनें मूलतः शुष्क होतीहैं (स्थलीय पवनें) परन्तु बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरने पर नमी युक्त हो जाती हैं एवं तमिलनाडु तट पर पूर्वी घाट की अवस्थिति के कारण उससे टकराकर वर्षा करती है। इस प्रकार भारत में तमिलनाडु तट पर शीत कालीन वर्षा होती है। अतः मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक विविधता एवं धरातलीय पवन संचरण का परिणाम हैं परन्तु ऊपरीवायुमंडल में व्याप्त जेट स्ट्रीम की स्थिति एवं मानसून गर्त की अवस्थिति में होने वाले परिवर्तनों की भी मुख्य भूमिका है। फिर भी उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक विविधता एवं पवन संचरण के द्वारा ही मानसून वर्षा के आधारभूत स्वरुप का निर्धारण किया जाता है।
47,009
India"s Africa policy has oscillated between passive and reluctantly reactive at best. Do you witness a new trend in India-Africa relations? Substantiate. (10 marks/150 words)
Approach:- Give a brief Historical background of India-Africa relations. Bring out the points that show the oscillation between the passive and reluctantly reactive policy. Bring out the Reasons for these new trends in their relations. Conclude your answer based on the above analysis. Answer:- India and Africa share a rich history of cultural, economic, and political interactions, rooted in the spirit of developing together as equals. Indeed, India-Africa ties may yet redefine the contours of the international order along more egalitarian lines. However, despite robust engagement for over 70 years, the Indian government has not had a clear, long-term strategy for its relations with the continent. Relations between India and Africa- Passive Policy:- Strategic apathy toward the continent was obvious on many fronts. Indian leaders seldom travelled to African nations and very rarely did they feature in conversations surrounding New Delhi’s foreign policy ambitions. The narrative of India’s contemporary relationship with Africa is dominated by the historicity of their interactions — the century-old trade partnerships, socio-cultural linkages built by a thriving diaspora, nationalist movements during the Nehruvian era that supported anti-imperial struggles and shifting geopolitical tides with the Non-Alignment Movement (NAM). With government institutions and businesses working in separate silos, India has no coordinated Africa policy nor does there seem to be an avenue where the strengths of both actors can be leveraged. Reluctantly Reactive policy:- Acombination of factors has led to an infusion of energy in this otherwise jaded relationship. Most important was the economic growth of the continent that is estimated to be 3.2% in 2018. It also houses six of the world’s fastest-growing economies — the World Bank estimates Ethiopia will grow at 8.2%, Ghana 8.3%, Cote d’Ivoire 7.2%, Djibouti 7%, Senegal 6.9%, and Tanzania 6.8% in 2018-19. Several African countries have been providing incentives to attract foreign investors and partners in growth while the government in New Delhi has been actively lobbying for support for its bid for a seat at the UNSC. Additionally, the increasing influence of other powers in the continent, especially China’s hyperactive engagement, has nudged New Delhi toward a rethink. The third India-Africa Forum Summit in 2015, where New Delhi hosted delegates from most African nations (after cancelling the original dates due to the Ebola outbreak). The tempo set with the summit has been carried forward and sustained to a large degree. President Kovind’s first overseas visit since taking office was to Djibouti and Ethiopia in October 2017. Similarly, when PM Modi stopped by Mozambique during his four-nation tour of Africa, he was the first Indian PM in 34 years to visit the country. When Vice-President Hamid Ansari visited Rwanda in February 2017, he became the first Indian leader to visit the country. Currently, India’s forte in the continent has been developmental initiatives — such as Indian Technical and Economic Cooperation, Team 9, and Pan Africa e-network, among others — aimed at building institutional and human capacity as well as enabling skills and knowledge transfer. A close examination of recent speeches and joint statements reflect a conscious attempt at evoking morality to reflect an “alternate model of development” by using terms such as “win-win cooperation” to describe New Delhi’s approach to Africa. One of the new trends in this relationship has also been the role played by sub-national organizations and State governments that have been crafting independent relationships with African counterparts. For example, Kerala is planning on importing cashew from African countries for its processing plants that are running low on the raw material. Similarly, Ethiopia and South Africa are working with Kudumbashree, a self-help group movement created by the Government of Kerala aimed at eradicating poverty and empowering women, to find ways to localize and adapt the model in their respective countries. Guiding Principles for India-Africa engagement, as articulated by PM Modi during his Uganda visit, and addressed to the African nations. Reasons for Recent Trends:- The economic transformation of Africa:- in 2018 the GDP growth rate of the entire continent is 3.2%, Africa has 6 of the fastest growing economies of the world with an avg annual GDP growth rate of 6-6.5 % China acquiring a military base in horn of Africa, growing radicalization in Africa, presence of non-state actors, such as Boko Haram in Nigeria, increasing religious fundamentalism has forced India to look at Africa from beyond the economic angle Increasing engagement of other powers (EU, USA, JAPAN) have also institutionalized their relations with Africa, has nudged New Delhi’s engagement with Africa Conclusion:- Africa which was once referred to as the dark continent has been transformed into the continent of hope.
##Question:India"s Africa policy has oscillated between passive and reluctantly reactive at best. Do you witness a new trend in India-Africa relations? Substantiate. (10 marks/150 words)##Answer:Approach:- Give a brief Historical background of India-Africa relations. Bring out the points that show the oscillation between the passive and reluctantly reactive policy. Bring out the Reasons for these new trends in their relations. Conclude your answer based on the above analysis. Answer:- India and Africa share a rich history of cultural, economic, and political interactions, rooted in the spirit of developing together as equals. Indeed, India-Africa ties may yet redefine the contours of the international order along more egalitarian lines. However, despite robust engagement for over 70 years, the Indian government has not had a clear, long-term strategy for its relations with the continent. Relations between India and Africa- Passive Policy:- Strategic apathy toward the continent was obvious on many fronts. Indian leaders seldom travelled to African nations and very rarely did they feature in conversations surrounding New Delhi’s foreign policy ambitions. The narrative of India’s contemporary relationship with Africa is dominated by the historicity of their interactions — the century-old trade partnerships, socio-cultural linkages built by a thriving diaspora, nationalist movements during the Nehruvian era that supported anti-imperial struggles and shifting geopolitical tides with the Non-Alignment Movement (NAM). With government institutions and businesses working in separate silos, India has no coordinated Africa policy nor does there seem to be an avenue where the strengths of both actors can be leveraged. Reluctantly Reactive policy:- Acombination of factors has led to an infusion of energy in this otherwise jaded relationship. Most important was the economic growth of the continent that is estimated to be 3.2% in 2018. It also houses six of the world’s fastest-growing economies — the World Bank estimates Ethiopia will grow at 8.2%, Ghana 8.3%, Cote d’Ivoire 7.2%, Djibouti 7%, Senegal 6.9%, and Tanzania 6.8% in 2018-19. Several African countries have been providing incentives to attract foreign investors and partners in growth while the government in New Delhi has been actively lobbying for support for its bid for a seat at the UNSC. Additionally, the increasing influence of other powers in the continent, especially China’s hyperactive engagement, has nudged New Delhi toward a rethink. The third India-Africa Forum Summit in 2015, where New Delhi hosted delegates from most African nations (after cancelling the original dates due to the Ebola outbreak). The tempo set with the summit has been carried forward and sustained to a large degree. President Kovind’s first overseas visit since taking office was to Djibouti and Ethiopia in October 2017. Similarly, when PM Modi stopped by Mozambique during his four-nation tour of Africa, he was the first Indian PM in 34 years to visit the country. When Vice-President Hamid Ansari visited Rwanda in February 2017, he became the first Indian leader to visit the country. Currently, India’s forte in the continent has been developmental initiatives — such as Indian Technical and Economic Cooperation, Team 9, and Pan Africa e-network, among others — aimed at building institutional and human capacity as well as enabling skills and knowledge transfer. A close examination of recent speeches and joint statements reflect a conscious attempt at evoking morality to reflect an “alternate model of development” by using terms such as “win-win cooperation” to describe New Delhi’s approach to Africa. One of the new trends in this relationship has also been the role played by sub-national organizations and State governments that have been crafting independent relationships with African counterparts. For example, Kerala is planning on importing cashew from African countries for its processing plants that are running low on the raw material. Similarly, Ethiopia and South Africa are working with Kudumbashree, a self-help group movement created by the Government of Kerala aimed at eradicating poverty and empowering women, to find ways to localize and adapt the model in their respective countries. Guiding Principles for India-Africa engagement, as articulated by PM Modi during his Uganda visit, and addressed to the African nations. Reasons for Recent Trends:- The economic transformation of Africa:- in 2018 the GDP growth rate of the entire continent is 3.2%, Africa has 6 of the fastest growing economies of the world with an avg annual GDP growth rate of 6-6.5 % China acquiring a military base in horn of Africa, growing radicalization in Africa, presence of non-state actors, such as Boko Haram in Nigeria, increasing religious fundamentalism has forced India to look at Africa from beyond the economic angle Increasing engagement of other powers (EU, USA, JAPAN) have also institutionalized their relations with Africa, has nudged New Delhi’s engagement with Africa Conclusion:- Africa which was once referred to as the dark continent has been transformed into the continent of hope.
47,010
भारतीय तटरक्षक बल का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारतीय समुद्र की सुरक्षा में इसके महत्व की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a brief introduction of the Indian Coast Guard, discuss its importance in protecting the Indian sea. (150-200 words/10Marks)
दृष्टिकोण: भारतीय तटरक्षक बल की स्थापना व इसके अधिदेश की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । भारतीय तटरक्षक बल के कार्यों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । भारतीय समुद्र की सुरक्षा के संदर्भ भारतीय तटरक्षक बल के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । उत्तर : भारतीय तटरक्षक बल एक सशस्त्र बल है जो भारत के समुद्री हितों की रक्षा करता है और समुद्री कानून को लागू करता है। इसका क्षेत्राधिकार भारत के क्षेत्रीय जल से लेकर अनन्य आर्थिक क्षेत्र तक होता है । भारतीय तटरक्षक बल की स्थापना शांतिकाल में भारतीय समुद्र की सुरक्षा करने के उद्देश्य से 18 अगस्‍त 1978 को एक स्‍वतंत्र सशस्‍त्र बल के रूप में संसद द्वारा तटरक्षक अधिनियम,1978 के अंतर्गत की गई। यह रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है । भारतीय तटरक्षक बल के कार्य : तटीय सुरक्षा - भारतीय तटरक्षक बल के महानिदेशक तटीय कमान के कमांडर होते हैं और तटीय सुरक्षा से संबंधित सभी मामलों में केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समग्र समन्वय के लिए जिम्मेदार हैं। कृत्रिम द्वीपों, अपतटीय टर्मिनलों और अन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और संरक्षण । समुद्र में मछुआरों को संरक्षण और सहायता । प्रदूषण नियंत्रण सहित समुद्री पारिस्थितिकी व पर्यावरण का सुरक्षा और संरक्षण । युद्ध व शत्रुता के दौरान भारतीय नौसेना के परिचालन नियंत्रण के तहत राष्ट्रीय रक्षा के कार्यों में भी संलग्नता । भारतीय समुद्र की सुरक्षा के संदर्भ में भारतीय तटरक्षक बल का महत्व : भारत की 7500 किमी. लंबी तटरेखा भारत को एक बड़ा अनन्य आर्थिक क्षेत्र प्रदान करता है , ऐसे में राष्ट्र के आर्थिक हितों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारतीय तटरक्षक बल काफी महत्वपूर्ण है । तस्करी व समुद्री लुटेरों से निपटने में भी भारतीय तरक्षक बल का महत्व काफी अधिक है । भारत की बड़ी समुद्री सीमा भारत को आतंकवाद के खतरे के प्रति भी सुभेध बनाती है ऐसे में आतंकवाद से सुरक्षा के संदर्भ में भी भारतीय तटरक्षक बल का महत्व है । अपतटीय सुरक्षा समन्वय के संदर्भ में भी भारतीय तरक्षक बल की भूमिका महत्वपूर्ण है । इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय समुद्र की सुरक्षा के संदर्भ में भारतीय तटरक्षक बल भारतीय नौ-सेना के एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप कार्य करता है ।
##Question:भारतीय तटरक्षक बल का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारतीय समुद्र की सुरक्षा में इसके महत्व की चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) While giving a brief introduction of the Indian Coast Guard, discuss its importance in protecting the Indian sea. (150-200 words/10Marks)##Answer:दृष्टिकोण: भारतीय तटरक्षक बल की स्थापना व इसके अधिदेश की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । भारतीय तटरक्षक बल के कार्यों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । भारतीय समुद्र की सुरक्षा के संदर्भ भारतीय तटरक्षक बल के महत्व की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । उत्तर : भारतीय तटरक्षक बल एक सशस्त्र बल है जो भारत के समुद्री हितों की रक्षा करता है और समुद्री कानून को लागू करता है। इसका क्षेत्राधिकार भारत के क्षेत्रीय जल से लेकर अनन्य आर्थिक क्षेत्र तक होता है । भारतीय तटरक्षक बल की स्थापना शांतिकाल में भारतीय समुद्र की सुरक्षा करने के उद्देश्य से 18 अगस्‍त 1978 को एक स्‍वतंत्र सशस्‍त्र बल के रूप में संसद द्वारा तटरक्षक अधिनियम,1978 के अंतर्गत की गई। यह रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है । भारतीय तटरक्षक बल के कार्य : तटीय सुरक्षा - भारतीय तटरक्षक बल के महानिदेशक तटीय कमान के कमांडर होते हैं और तटीय सुरक्षा से संबंधित सभी मामलों में केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समग्र समन्वय के लिए जिम्मेदार हैं। कृत्रिम द्वीपों, अपतटीय टर्मिनलों और अन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और संरक्षण । समुद्र में मछुआरों को संरक्षण और सहायता । प्रदूषण नियंत्रण सहित समुद्री पारिस्थितिकी व पर्यावरण का सुरक्षा और संरक्षण । युद्ध व शत्रुता के दौरान भारतीय नौसेना के परिचालन नियंत्रण के तहत राष्ट्रीय रक्षा के कार्यों में भी संलग्नता । भारतीय समुद्र की सुरक्षा के संदर्भ में भारतीय तटरक्षक बल का महत्व : भारत की 7500 किमी. लंबी तटरेखा भारत को एक बड़ा अनन्य आर्थिक क्षेत्र प्रदान करता है , ऐसे में राष्ट्र के आर्थिक हितों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारतीय तटरक्षक बल काफी महत्वपूर्ण है । तस्करी व समुद्री लुटेरों से निपटने में भी भारतीय तरक्षक बल का महत्व काफी अधिक है । भारत की बड़ी समुद्री सीमा भारत को आतंकवाद के खतरे के प्रति भी सुभेध बनाती है ऐसे में आतंकवाद से सुरक्षा के संदर्भ में भी भारतीय तटरक्षक बल का महत्व है । अपतटीय सुरक्षा समन्वय के संदर्भ में भी भारतीय तरक्षक बल की भूमिका महत्वपूर्ण है । इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय समुद्र की सुरक्षा के संदर्भ में भारतीय तटरक्षक बल भारतीय नौ-सेना के एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप कार्य करता है ।
47,019
Life on Earth has evolved from single cell organisms to multicellular organims, elucidate briefly. Also write the chain of lifewith focus on humans. (150 words)
Brief Approach:- Discussbrieflly about evolution from Prokaryotes to Eukaryotes. Includesome events and features which resulted in the evolution. Write down the chain of life (taxonomy) of modern Humans. Answer:- (The discussion was very brief as it was ecology class and also the lecture was only 1 hour 20 minutes long) Unicellular organisms or the Prokaryotes were the first to evolve around 3.8 billion years ago. These were simple organisms which were able to utilize sulphur, ammonia etc. and could survive in extreme conditions. Bacteria such as the cyanobacteria evolved which could perform Photosynthesis. As the concentration of oxygen increased in the atmosphere, bacteria such as the mitochondria came to existence which utilizes the atmospheric oxygen to produce energy. With further evolution, mitochondria developed a symbiotic relationship with the Prokaryotes and eventually, they became a cell organelle in the multicellular organisms or the Eukaryotes. This process took over a million years. The evidence to support his theory stems out from the fact that the mitochondria have its own independent DNA known as the mtDNA. The prokaryotes reproduce by the process of Mitosis while the Eukaryotes evolve through the process of Meiosis . The multicellular organisms also undergo the process of Apoptosis or internal cell death. These differences led to further evolution and division among the Eukaryotes. Chain of Life:- Chain of life starts with life and can be classified as follows. Domain – These are of two types, Prokaryotes and Eukaryotes. Humans come under the Eukaryotes. Kingdom – Two classification Animals and Plants, and humans fall under the kingdom Animal. Phylum – Humans evolved under the Phylum Chordata which are characterised with the presence of a tail. Class – Humans fall under the class Mammalia which are characterized by hairy body and give birth to child directly. Order – Humans come under Primates. Primates are those in which hands and legs are differentiated. Eg. Rotating hands due to development of shoulders. They also have significant intelligence. Family – Humans are under the family Hominidae or Apes. The organisms under this family have the ability to walk upright. Genus – Homo or man. This is where all Humans fall under such as the extinct Homo habilis, Homo erectus. Species – Homosapiens is the species of the modern man or the thinking man. Thus we see the chain of evolution from the earliest single cellular organism to the modern man as we know it.
##Question:Life on Earth has evolved from single cell organisms to multicellular organims, elucidate briefly. Also write the chain of lifewith focus on humans. (150 words)##Answer:Brief Approach:- Discussbrieflly about evolution from Prokaryotes to Eukaryotes. Includesome events and features which resulted in the evolution. Write down the chain of life (taxonomy) of modern Humans. Answer:- (The discussion was very brief as it was ecology class and also the lecture was only 1 hour 20 minutes long) Unicellular organisms or the Prokaryotes were the first to evolve around 3.8 billion years ago. These were simple organisms which were able to utilize sulphur, ammonia etc. and could survive in extreme conditions. Bacteria such as the cyanobacteria evolved which could perform Photosynthesis. As the concentration of oxygen increased in the atmosphere, bacteria such as the mitochondria came to existence which utilizes the atmospheric oxygen to produce energy. With further evolution, mitochondria developed a symbiotic relationship with the Prokaryotes and eventually, they became a cell organelle in the multicellular organisms or the Eukaryotes. This process took over a million years. The evidence to support his theory stems out from the fact that the mitochondria have its own independent DNA known as the mtDNA. The prokaryotes reproduce by the process of Mitosis while the Eukaryotes evolve through the process of Meiosis . The multicellular organisms also undergo the process of Apoptosis or internal cell death. These differences led to further evolution and division among the Eukaryotes. Chain of Life:- Chain of life starts with life and can be classified as follows. Domain – These are of two types, Prokaryotes and Eukaryotes. Humans come under the Eukaryotes. Kingdom – Two classification Animals and Plants, and humans fall under the kingdom Animal. Phylum – Humans evolved under the Phylum Chordata which are characterised with the presence of a tail. Class – Humans fall under the class Mammalia which are characterized by hairy body and give birth to child directly. Order – Humans come under Primates. Primates are those in which hands and legs are differentiated. Eg. Rotating hands due to development of shoulders. They also have significant intelligence. Family – Humans are under the family Hominidae or Apes. The organisms under this family have the ability to walk upright. Genus – Homo or man. This is where all Humans fall under such as the extinct Homo habilis, Homo erectus. Species – Homosapiens is the species of the modern man or the thinking man. Thus we see the chain of evolution from the earliest single cellular organism to the modern man as we know it.
47,022
Even after 100 years of its proclamation the effects of Balfour declaration continue to resonate in the Arab-Israeli conflict. Comment. (150 words/10 marks)
Approach: In The introduction briefly explain the Balfour Declaration. Explain the context surrounding the declaration and its consequences Highlight the relevance of the Declaration in the present context. Answer: On 2 November 1917, British foreign secretary Arthur Balfour wrote to Walter Rothschild, a leading figure in the British Jewish community, expressing the government’s support for a Jewish homeland in Palestine. Comprising a single paragraph, the text became known as the Balfour Declaration. Balfour declaration has to be seen in the light of multiple promises and agreements involving the imperial powers: In July 1915, Henry McMohan, Britain’s representative in Cairo, made an approach to the Arabs through Hussein Bin Ali, the Sharif of Mecca. In a series of ten letters exchanged in the following six months, Britain agreed to recognize Arab independence after the war in exchange for Arab help in fighting the Ottomans. In 1916, the British and the French had secretly negotiated the Sykes-Picot agreement through which they sought to divide the Arabian parts under the Ottoman Empire into spheres of influence. The British had the responsibility for Palestine under that. The Balfour Declaration and the Sykes-Picot agreement left scope for ambiguities, leading to differing interpretations and subsequent conflicts. Relevance of the Declaration in the present context. The current Arab-Israel conflict emanates primarily from the fact that the British (and allied powers) retracted on their commitments to the Arabs for their participation in the war against the Ottoman Empire and made conflicting promises to the Zionist leadership for a homeland in Palestine. Arabs blamed the British for encouraging Zionist immigration and ignoring the rights of the Palestinian Arabs, resulting in their statelessness. On the other hand, Jews cite their religious claims, war financing, statelessness before the establishment of Israel and historical persecution to justify their settlement in that area. Much of the history of the area since that time has been marred by a conflict between Jews (later the state of Israel) on one side and Palestinians and Israel’s Arab neighbours, on the other. The region’s political life has been dominated by the conflict, including full-scale regional wars in 1948, 1967, and 1973, and many smaller-scale conflicts including the 1956 invasion of Egypt and the Lebanon wars of 1982 and 2006. Recently the Palestinians asked Britain to tender an apology for the Balfour Declaration. According to them, the declaration and its subsequent ratification by the League of Nations betrayed the principle of self-determination it was meant to uphold, and thus led to the Arab-Israel conflict and a century of Palestinian suffering. Conclusion Thus even after a century, the importance of the Balfour Declaration and the policies that accompanied it cannot be overstated in the context of the Arab-Israel conflict.
##Question:Even after 100 years of its proclamation the effects of Balfour declaration continue to resonate in the Arab-Israeli conflict. Comment. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: In The introduction briefly explain the Balfour Declaration. Explain the context surrounding the declaration and its consequences Highlight the relevance of the Declaration in the present context. Answer: On 2 November 1917, British foreign secretary Arthur Balfour wrote to Walter Rothschild, a leading figure in the British Jewish community, expressing the government’s support for a Jewish homeland in Palestine. Comprising a single paragraph, the text became known as the Balfour Declaration. Balfour declaration has to be seen in the light of multiple promises and agreements involving the imperial powers: In July 1915, Henry McMohan, Britain’s representative in Cairo, made an approach to the Arabs through Hussein Bin Ali, the Sharif of Mecca. In a series of ten letters exchanged in the following six months, Britain agreed to recognize Arab independence after the war in exchange for Arab help in fighting the Ottomans. In 1916, the British and the French had secretly negotiated the Sykes-Picot agreement through which they sought to divide the Arabian parts under the Ottoman Empire into spheres of influence. The British had the responsibility for Palestine under that. The Balfour Declaration and the Sykes-Picot agreement left scope for ambiguities, leading to differing interpretations and subsequent conflicts. Relevance of the Declaration in the present context. The current Arab-Israel conflict emanates primarily from the fact that the British (and allied powers) retracted on their commitments to the Arabs for their participation in the war against the Ottoman Empire and made conflicting promises to the Zionist leadership for a homeland in Palestine. Arabs blamed the British for encouraging Zionist immigration and ignoring the rights of the Palestinian Arabs, resulting in their statelessness. On the other hand, Jews cite their religious claims, war financing, statelessness before the establishment of Israel and historical persecution to justify their settlement in that area. Much of the history of the area since that time has been marred by a conflict between Jews (later the state of Israel) on one side and Palestinians and Israel’s Arab neighbours, on the other. The region’s political life has been dominated by the conflict, including full-scale regional wars in 1948, 1967, and 1973, and many smaller-scale conflicts including the 1956 invasion of Egypt and the Lebanon wars of 1982 and 2006. Recently the Palestinians asked Britain to tender an apology for the Balfour Declaration. According to them, the declaration and its subsequent ratification by the League of Nations betrayed the principle of self-determination it was meant to uphold, and thus led to the Arab-Israel conflict and a century of Palestinian suffering. Conclusion Thus even after a century, the importance of the Balfour Declaration and the policies that accompanied it cannot be overstated in the context of the Arab-Israel conflict.
47,025
भारत के आसूचना तंत्र पर प्रकाश डालिए और वर्तमान खतरों के प्रति इसकी अनुकूलता का विश्लेषण कीजिये । ( 150 - 200 शब्द, 10 अंक ) Highlight India"s intelligence system and analyze their adaptability to current threats . ( 150 - 200 words, 10 marks )
दृष्टिकोण · भूमिका में भारत के आसूचना तंत्र का परिचय दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में इन तंत्रों के महत्व की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में इनके समक्ष विद्यमान चुनौतियों का वर्णन कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- आसूचना को राष्ट्रीय सुरक्षा से संबन्धित अथवा राष्ट्रीय रणनीतियों के निर्माण को प्रभावित करने वाली सूचनाओं के संग्रह, संयोजन, विश्लेषण और मूल्यांकन के रूप में देखा जाता है।भारत में आसूचना गतिविधियां विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों द्वारा सम्पन्न की जाती है ।जैसे रिसर्च एंड एनालिसिस विंग्स , इंटेलिजेंस ब्यूरो, नरोकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो आदि ।आसूचना के संदर्भ में इस आसूचना तंत्र के अंतर्गत विभिन्न एजेंसियां कार्य करती हैं । जिनमे रॉ ( RAW ) देश के बाहर रहकर राष्ट्रीय सुरक्षा से संबन्धित सूचनाएँ एकत्र करती है । खुफिया ब्यूरो ( आईबी ) जोकि भारत की सबसे पुरानी एजेंसी है, देश के अंदर आंतरिक सुरक्षा से संबन्धित सूचना एकत्र करती है । वहीं राष्ट्रीय जांच एजेंसी ( एनआईए ) जिसका गठन 2008 में मुंबई आतंकी घटना के बाद हुआ था, आंतरिक आतंकवाद निरोधी और जांच से संबन्धित कार्य करती है। मल्टी एजेंसी सेंटर ( मैक ) का गठन दैनिक कार्यों से संबन्धित खुफिया सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड ( नेटग्रिड )की स्थापना सभी सूचनाओं का एक जगह संग्रहण करने के लिए, राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन का गठनआंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में साइबर खतरों से संबन्धित डाटा संग्रहण करने के लिए वित्तीय आसूचना इकाई भारत ( एफ़आईयू - आईएनडी ) का गठन वित्तीय मामलों की संबन्धित सूचना एकत्र करने के लिए राजस्व आसूचना निदेशालय ( डीआरआई ) का गठन आंतरिक राजस्व से संबन्धित सूचनाएँ एकत्र करना स्वापक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो ( एनसीबी ) का गठन नारोकोटिक्स (मादक) पदार्थों के नियंत्रण हेतु, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल आपदाओं के संदर्भ सूचना , बचाव आदि से संबन्धित कार्य हेतु केन्द्रीय अन्वेंषण ब्यूरो भ्रष्टाचार और अपराध निरोधी संबंधी कार्य हेतु प्रवर्तन निदेशालय धन शोधन से संबन्धित मामले हेतु कार्य करती हैं । हालांकि उपरोक्त कार्यों के विभाजन के बावजूद , भारतीय आसूचना एजेंसियों के समक्ष अनेक चुनौतियाँ है , जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ के माध्यम से समझा जा सकता है :- विभिन्न एजेंसियों के माध्यम समन्वय का अभाव पाया जाता है । जैसे कारगिल समीक्षा समिति द्वारा आईबी और रॉ के मध्य विशेष रूप से सीमा पर समन्वय की कमी का उल्लेख किया गया है , जबकि देश के सुरक्षा के संदर्भ में दोनों की क्षमताओं को विशेष रूप से एकीकृत किया गया था । अप्रासंगिक प्रशिक्षण :- विभिन्न आसूचना एजेंसियों के प्रभावी प्रशिक्षण का अभाव एक सामान्य कमी है जो समय- समय पर दिखाई देती है । 2008 के आतंकी हमले की समीक्षा समिति ने इस संदर्भ में सुझाव भी प्रस्तुत किए हैं । राज्य बनाम केंद्र का विवाद :- विभिन्न आसूचना एजेंसियों के नियमन कारी निकायों में अंतर होना इनकी कार्य दक्षता को प्रभावित करता है । स्थानीय आसूचना तंत्र, राज्य सरकार के अधीन जबकि आईबी जैसी आसूचना तंत्र केंद्र सरकार के अधीन कार्य करती है । राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय का अभाव की एक चुनौती है । औपनिवेशिक बोझ :- भारतीय आसूचना प्रणाली , औपनिवेशिक विरासत प्रणाली के अनुसार ही कार्य करती है । जिसमे आज भी नौकरशाही संबंधी बाधायेँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं । वैधानिक प्रावधानों का अभाव :- विभिन्न प्रावधानों के अभाव के कारण गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं । क्योकि सभी खुफिया गतिविधियां, कार्यकारी निर्देशों के अंतर्गत संचालित की जाती हैं । कुछ गतिविधियों में लक्षित देश के स्थानीय कानूनों का उल्लंघन भी शामिल हो सकता है । उपरोक्त चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा इस संदर्भ एक वैधानिक चार्टर का निर्माण , विभिन्न एजेंसियों के मध्य समन्वय, एकीकृत आसूचना तंत्र और प्रौद्योगिकी उन्नयन जैसे कदमों पर कार्य करने की अवश्यकता है ।
##Question:भारत के आसूचना तंत्र पर प्रकाश डालिए और वर्तमान खतरों के प्रति इसकी अनुकूलता का विश्लेषण कीजिये । ( 150 - 200 शब्द, 10 अंक ) Highlight India"s intelligence system and analyze their adaptability to current threats . ( 150 - 200 words, 10 marks )##Answer:दृष्टिकोण · भूमिका में भारत के आसूचना तंत्र का परिचय दीजिये । · उत्तर के दूसरे भाग में इन तंत्रों के महत्व की चर्चा कीजिये । · उत्तर के तीसरे भाग में इनके समक्ष विद्यमान चुनौतियों का वर्णन कीजिये । · उत्तर के अंतिम भाग में एक सकारात्मक निष्कर्ष दीजिये । उत्तर :- आसूचना को राष्ट्रीय सुरक्षा से संबन्धित अथवा राष्ट्रीय रणनीतियों के निर्माण को प्रभावित करने वाली सूचनाओं के संग्रह, संयोजन, विश्लेषण और मूल्यांकन के रूप में देखा जाता है।भारत में आसूचना गतिविधियां विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों द्वारा सम्पन्न की जाती है ।जैसे रिसर्च एंड एनालिसिस विंग्स , इंटेलिजेंस ब्यूरो, नरोकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो आदि ।आसूचना के संदर्भ में इस आसूचना तंत्र के अंतर्गत विभिन्न एजेंसियां कार्य करती हैं । जिनमे रॉ ( RAW ) देश के बाहर रहकर राष्ट्रीय सुरक्षा से संबन्धित सूचनाएँ एकत्र करती है । खुफिया ब्यूरो ( आईबी ) जोकि भारत की सबसे पुरानी एजेंसी है, देश के अंदर आंतरिक सुरक्षा से संबन्धित सूचना एकत्र करती है । वहीं राष्ट्रीय जांच एजेंसी ( एनआईए ) जिसका गठन 2008 में मुंबई आतंकी घटना के बाद हुआ था, आंतरिक आतंकवाद निरोधी और जांच से संबन्धित कार्य करती है। मल्टी एजेंसी सेंटर ( मैक ) का गठन दैनिक कार्यों से संबन्धित खुफिया सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड ( नेटग्रिड )की स्थापना सभी सूचनाओं का एक जगह संग्रहण करने के लिए, राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन का गठनआंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में साइबर खतरों से संबन्धित डाटा संग्रहण करने के लिए वित्तीय आसूचना इकाई भारत ( एफ़आईयू - आईएनडी ) का गठन वित्तीय मामलों की संबन्धित सूचना एकत्र करने के लिए राजस्व आसूचना निदेशालय ( डीआरआई ) का गठन आंतरिक राजस्व से संबन्धित सूचनाएँ एकत्र करना स्वापक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो ( एनसीबी ) का गठन नारोकोटिक्स (मादक) पदार्थों के नियंत्रण हेतु, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल आपदाओं के संदर्भ सूचना , बचाव आदि से संबन्धित कार्य हेतु केन्द्रीय अन्वेंषण ब्यूरो भ्रष्टाचार और अपराध निरोधी संबंधी कार्य हेतु प्रवर्तन निदेशालय धन शोधन से संबन्धित मामले हेतु कार्य करती हैं । हालांकि उपरोक्त कार्यों के विभाजन के बावजूद , भारतीय आसूचना एजेंसियों के समक्ष अनेक चुनौतियाँ है , जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ के माध्यम से समझा जा सकता है :- विभिन्न एजेंसियों के माध्यम समन्वय का अभाव पाया जाता है । जैसे कारगिल समीक्षा समिति द्वारा आईबी और रॉ के मध्य विशेष रूप से सीमा पर समन्वय की कमी का उल्लेख किया गया है , जबकि देश के सुरक्षा के संदर्भ में दोनों की क्षमताओं को विशेष रूप से एकीकृत किया गया था । अप्रासंगिक प्रशिक्षण :- विभिन्न आसूचना एजेंसियों के प्रभावी प्रशिक्षण का अभाव एक सामान्य कमी है जो समय- समय पर दिखाई देती है । 2008 के आतंकी हमले की समीक्षा समिति ने इस संदर्भ में सुझाव भी प्रस्तुत किए हैं । राज्य बनाम केंद्र का विवाद :- विभिन्न आसूचना एजेंसियों के नियमन कारी निकायों में अंतर होना इनकी कार्य दक्षता को प्रभावित करता है । स्थानीय आसूचना तंत्र, राज्य सरकार के अधीन जबकि आईबी जैसी आसूचना तंत्र केंद्र सरकार के अधीन कार्य करती है । राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय का अभाव की एक चुनौती है । औपनिवेशिक बोझ :- भारतीय आसूचना प्रणाली , औपनिवेशिक विरासत प्रणाली के अनुसार ही कार्य करती है । जिसमे आज भी नौकरशाही संबंधी बाधायेँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं । वैधानिक प्रावधानों का अभाव :- विभिन्न प्रावधानों के अभाव के कारण गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं । क्योकि सभी खुफिया गतिविधियां, कार्यकारी निर्देशों के अंतर्गत संचालित की जाती हैं । कुछ गतिविधियों में लक्षित देश के स्थानीय कानूनों का उल्लंघन भी शामिल हो सकता है । उपरोक्त चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा इस संदर्भ एक वैधानिक चार्टर का निर्माण , विभिन्न एजेंसियों के मध्य समन्वय, एकीकृत आसूचना तंत्र और प्रौद्योगिकी उन्नयन जैसे कदमों पर कार्य करने की अवश्यकता है ।
47,030
1937 के प्रांतीय चुनावों और उसके परिणामों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) Briefly describe the provincial elections of 1937 and its results, underline its importance in the Indian freedom struggle. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में 1935 के एक्ट और उसके आधार पर 1937 के चुनाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में 1937 के चुनावो में कांग्रेस की स्थिति और उसके परिणाम की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में 1937 के चुनावो का बताइये । उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का अंत कीजिये । उत्तर - 1935 में भारतीय शासन अधिनियम, ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया , जिसके तहत केंद्र में द्वैत शासन प्रणाली लागू की गई और प्रांतो में उत्तरदायी सरकार के गठन का प्रावधान किया गया , हालांकि यहा भी निर्णायक शक्ति प्रांतीय गवर्नर के पास ही थी ।1935 के अधिनियम के तहत ही 1937 के प्रांतीय चुनावो का आयोजन किया गया , जिसमे भाग लेने को लेकर कांग्रेस में आपसी विवाद बना हुआ था ।लेकिन अंततः कांग्रेस ने भी चुनाव में भाग लिया और भारी सफलता हासिल की । कांग्रेस ने कुल 1585 असेंबली सीटो में से 711 सीटें जीती और 11 में से 5 प्रांतो में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई । पाँच प्रांतो में मद्रास , बिहार , उड़ीसा , मध्य प्रांत व संयुक्त प्रांत शामिल थे , साथ ही बॉम्बे में भी कांग्रेस को लगभग बहुमत प्राप्त हुआ । आगे चलकर कांग्रेस ने कुछ राजनीतिक सहयोगीयो के साथ पश्चिमोत्तर प्रांत और असम में भी सरकार बनाया । हालांकि पंजाब , बंगाल और सिंध प्रांत में कांग्रेस को बहुमत नही प्राप्त हुआ ।इस प्रकार कुल 11 प्रांतो में से कांग्रेस ने कुल 8 प्रांतो में सरकार बनाया। 1937 के चुनाव हालांकि भारतीय राजनीति में प्रांतीय स्तर पर पूर्णत: उतरदायी सरकार बनाने में तो कामयाब नही हुआ लेकिन , भारतीय नेताओ को आगे संभालने वाली ज़िम्मेदारी की एक रूप रेखा देने में अवश्य ही सफल हुआ । 1937 के चुनावो के महत्वको हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते है ;- कांग्रेस अल्पसंख्यक लोगों का प्रतिनिधित्व नही करती , बल्कि अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व का सूचक है । मंत्रिमंडलों के प्रशासनिक कार्यों ने इस भ्रांति को तोड़ दिया कि भारतीय शासन करने में सक्षम नहीं है। सांप्रदायिक दंगे ब्रिटिश सरकार की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है और भारतीय मंत्रिमंडल ने सांप्रदायिकता को रोकने के सार्थक एवं सफल प्रयास किये। कांग्रेस के कार्यों से लोगों में स्वदेशी सरकार के प्रति ललक पैदा हुई । यह धरणा सिद्ध हो गयी की मौलिक सामाजिक संक्रमण के लिए भारतीय स्व-शासन आवश्यक है। मंत्रिमंडलों ने भारतीयों के सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये। अंग्रेजी नौकरशाही के मनोबल में कमी आ गयी। कांग्रेस के संसदीय कार्यों ने तब के विरोधी तत्वों पर अंकुश लगाया जैसे-जमींदार इत्यादि। लोगों को एक ऐसा खाका खीचने में मदद मिली जैसे कि उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो। उपरोक्त से स्पष्ट है कि 1937 की प्रांतीय चुनावो ने अल्प समय के लिए ही किन्तु , भारतीयों को एक उतरदायित्व पूर्ण कार्य करने का अवसर दिया । जिससे वे आगे आने वाले उत्तरदायित्वों को प्रभावी तरीके से निभाने में सक्षम हो सके । कांग्रेस मंत्रिमंडल ने 28 महीनों के अल्पकाल की अवधि के बाद ही, भारतीयो की बिना अनुमति के उनको द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के कारण अक्तूबर 1939 में अपने मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया ।
##Question:1937 के प्रांतीय चुनावों और उसके परिणामों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द) Briefly describe the provincial elections of 1937 and its results, underline its importance in the Indian freedom struggle. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में 1935 के एक्ट और उसके आधार पर 1937 के चुनाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में 1937 के चुनावो में कांग्रेस की स्थिति और उसके परिणाम की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में 1937 के चुनावो का बताइये । उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का अंत कीजिये । उत्तर - 1935 में भारतीय शासन अधिनियम, ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया , जिसके तहत केंद्र में द्वैत शासन प्रणाली लागू की गई और प्रांतो में उत्तरदायी सरकार के गठन का प्रावधान किया गया , हालांकि यहा भी निर्णायक शक्ति प्रांतीय गवर्नर के पास ही थी ।1935 के अधिनियम के तहत ही 1937 के प्रांतीय चुनावो का आयोजन किया गया , जिसमे भाग लेने को लेकर कांग्रेस में आपसी विवाद बना हुआ था ।लेकिन अंततः कांग्रेस ने भी चुनाव में भाग लिया और भारी सफलता हासिल की । कांग्रेस ने कुल 1585 असेंबली सीटो में से 711 सीटें जीती और 11 में से 5 प्रांतो में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई । पाँच प्रांतो में मद्रास , बिहार , उड़ीसा , मध्य प्रांत व संयुक्त प्रांत शामिल थे , साथ ही बॉम्बे में भी कांग्रेस को लगभग बहुमत प्राप्त हुआ । आगे चलकर कांग्रेस ने कुछ राजनीतिक सहयोगीयो के साथ पश्चिमोत्तर प्रांत और असम में भी सरकार बनाया । हालांकि पंजाब , बंगाल और सिंध प्रांत में कांग्रेस को बहुमत नही प्राप्त हुआ ।इस प्रकार कुल 11 प्रांतो में से कांग्रेस ने कुल 8 प्रांतो में सरकार बनाया। 1937 के चुनाव हालांकि भारतीय राजनीति में प्रांतीय स्तर पर पूर्णत: उतरदायी सरकार बनाने में तो कामयाब नही हुआ लेकिन , भारतीय नेताओ को आगे संभालने वाली ज़िम्मेदारी की एक रूप रेखा देने में अवश्य ही सफल हुआ । 1937 के चुनावो के महत्वको हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते है ;- कांग्रेस अल्पसंख्यक लोगों का प्रतिनिधित्व नही करती , बल्कि अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व का सूचक है । मंत्रिमंडलों के प्रशासनिक कार्यों ने इस भ्रांति को तोड़ दिया कि भारतीय शासन करने में सक्षम नहीं है। सांप्रदायिक दंगे ब्रिटिश सरकार की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है और भारतीय मंत्रिमंडल ने सांप्रदायिकता को रोकने के सार्थक एवं सफल प्रयास किये। कांग्रेस के कार्यों से लोगों में स्वदेशी सरकार के प्रति ललक पैदा हुई । यह धरणा सिद्ध हो गयी की मौलिक सामाजिक संक्रमण के लिए भारतीय स्व-शासन आवश्यक है। मंत्रिमंडलों ने भारतीयों के सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये। अंग्रेजी नौकरशाही के मनोबल में कमी आ गयी। कांग्रेस के संसदीय कार्यों ने तब के विरोधी तत्वों पर अंकुश लगाया जैसे-जमींदार इत्यादि। लोगों को एक ऐसा खाका खीचने में मदद मिली जैसे कि उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो। उपरोक्त से स्पष्ट है कि 1937 की प्रांतीय चुनावो ने अल्प समय के लिए ही किन्तु , भारतीयों को एक उतरदायित्व पूर्ण कार्य करने का अवसर दिया । जिससे वे आगे आने वाले उत्तरदायित्वों को प्रभावी तरीके से निभाने में सक्षम हो सके । कांग्रेस मंत्रिमंडल ने 28 महीनों के अल्पकाल की अवधि के बाद ही, भारतीयो की बिना अनुमति के उनको द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के कारण अक्तूबर 1939 में अपने मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया ।
47,035
What do you understand by the term "autonomy of the RBI"? Commenting upon the threats to the autonomy of the RBI, state the pros and cons of the same.(150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - REGARDING THE AUTONOMY OF THE RBI ASPECTS OF AUTONOMY - PROS OF AUTONOMY - CONS OF AUTONOMY - THE THREATS TO THE AUTONOMY OF THE RBI- THE INSTANCES OF QUESTION MARK ON THE RBI’s AUTONOMY -CONCLUSION ANSWER:- The Reserve Bank of India (RBI) was established as per the RBI Act, 1934. Section 7 of this act gives power to the government to give directions to the RBI. Hence, the government has major control over this body. (This government recently threatened that it would use this act). REGARDING THE AUTONOMY OF THE RBI Autonomy means freedom from the control of the government. As shown above (Section 7 of the RBI Act), the RBI does not have complete autonomy. RBI is a semi-autonomous body. Generally, the government does not intervene in the monetary policy (MP) decisions of the RBI, except in case of major decisions. ASPECTS OF AUTONOMY: 1) INSTRUMENT AUTONOMY It refers to the autonomy concerning the instruments used to achieve the monetary policy- the CRR, SLR etc. 2) GOAL AUTONOMY It refers to the autonomy to decide the objectives of the MP (growth, inflation or balance). 3) GENERAL AUTONOMY By autonomy, one generally means instrument autonomy. 4) ANALYSIS OF AUTONOMY Instrument autonomy is desirable. The goal of the RBI should be set by the government . Therefore, the RBI must not have goal autonomy. Instrument autonomy (regarding how to achieve the monetary policy goals ) should be decided by experts/ the RBI . So, the RBI should have instrument autonomy. Overall, as far as possible maximum autonomy should be there with the RBI. PROS OF AUTONOMY If the RBI is autonomous, then monetary policy will not be influenced by political considerations. For example, before elections, the government would want the RBI to reduce interest rates i.e. increase the money supply. This is not desirable as there is a short term trade-off between growth and inflation rate. CONS OF AUTONOMY 1) AFFECTS COORDINATION It weakens the coordination between monetary policy (which is under RBI) and fiscal policy (under the Finance Ministry of the government). 2) RBI LACKS POLITICAL MANDATE The Central bank lacks the political mandate i.e. the RBI is not accountable to the public like the government is. THE THREATS TO THE AUTONOMY OF THE RBI- THE INSTANCES OF QUESTION MARK ON THE RBI’s AUTONOMY 1) Draft IFC (2015) The government tried to reduce the powers of the RBI in the Indian money market and foreign exchange market. 2) DEMONETIZATION The government did not consult the RBI, hence many problems were faced. (The RBI governor said that they were consulted, however, if they would have been consulted then the government would not have faced so many problems as it did- therefore, the question was that whether they were consulted or directed). 3) THREAT TO INVOKE SECTION 7 Last year, the government threatened the RBI to invoke section 7 of the RBI act if it did not transfer the excess reserves to the government. 4) PROMPT CORRECTIVE ACTION The RBI wanted the removal of restrictions concerning lending under PCA (prompt corrective action) by the banks. Lending leads to inflation- this instrument can be utilized when necessary and liquidity with the NBFCs could increase. 5) APPOINTMENT OF BOARD MEMBERS Non-experts are being appointed as board members. The resignation of Urjit Patel and such issues also pertain to the questions over the threat to the instrument autonomy on the RBI. Recently, the Reserve Bank of India (RBI) has approved the transfer of a record Rs. 1.76 lakh crore dividend and surplus reserves to the government.
##Question:What do you understand by the term "autonomy of the RBI"? Commenting upon the threats to the autonomy of the RBI, state the pros and cons of the same.(150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - REGARDING THE AUTONOMY OF THE RBI ASPECTS OF AUTONOMY - PROS OF AUTONOMY - CONS OF AUTONOMY - THE THREATS TO THE AUTONOMY OF THE RBI- THE INSTANCES OF QUESTION MARK ON THE RBI’s AUTONOMY -CONCLUSION ANSWER:- The Reserve Bank of India (RBI) was established as per the RBI Act, 1934. Section 7 of this act gives power to the government to give directions to the RBI. Hence, the government has major control over this body. (This government recently threatened that it would use this act). REGARDING THE AUTONOMY OF THE RBI Autonomy means freedom from the control of the government. As shown above (Section 7 of the RBI Act), the RBI does not have complete autonomy. RBI is a semi-autonomous body. Generally, the government does not intervene in the monetary policy (MP) decisions of the RBI, except in case of major decisions. ASPECTS OF AUTONOMY: 1) INSTRUMENT AUTONOMY It refers to the autonomy concerning the instruments used to achieve the monetary policy- the CRR, SLR etc. 2) GOAL AUTONOMY It refers to the autonomy to decide the objectives of the MP (growth, inflation or balance). 3) GENERAL AUTONOMY By autonomy, one generally means instrument autonomy. 4) ANALYSIS OF AUTONOMY Instrument autonomy is desirable. The goal of the RBI should be set by the government . Therefore, the RBI must not have goal autonomy. Instrument autonomy (regarding how to achieve the monetary policy goals ) should be decided by experts/ the RBI . So, the RBI should have instrument autonomy. Overall, as far as possible maximum autonomy should be there with the RBI. PROS OF AUTONOMY If the RBI is autonomous, then monetary policy will not be influenced by political considerations. For example, before elections, the government would want the RBI to reduce interest rates i.e. increase the money supply. This is not desirable as there is a short term trade-off between growth and inflation rate. CONS OF AUTONOMY 1) AFFECTS COORDINATION It weakens the coordination between monetary policy (which is under RBI) and fiscal policy (under the Finance Ministry of the government). 2) RBI LACKS POLITICAL MANDATE The Central bank lacks the political mandate i.e. the RBI is not accountable to the public like the government is. THE THREATS TO THE AUTONOMY OF THE RBI- THE INSTANCES OF QUESTION MARK ON THE RBI’s AUTONOMY 1) Draft IFC (2015) The government tried to reduce the powers of the RBI in the Indian money market and foreign exchange market. 2) DEMONETIZATION The government did not consult the RBI, hence many problems were faced. (The RBI governor said that they were consulted, however, if they would have been consulted then the government would not have faced so many problems as it did- therefore, the question was that whether they were consulted or directed). 3) THREAT TO INVOKE SECTION 7 Last year, the government threatened the RBI to invoke section 7 of the RBI act if it did not transfer the excess reserves to the government. 4) PROMPT CORRECTIVE ACTION The RBI wanted the removal of restrictions concerning lending under PCA (prompt corrective action) by the banks. Lending leads to inflation- this instrument can be utilized when necessary and liquidity with the NBFCs could increase. 5) APPOINTMENT OF BOARD MEMBERS Non-experts are being appointed as board members. The resignation of Urjit Patel and such issues also pertain to the questions over the threat to the instrument autonomy on the RBI. Recently, the Reserve Bank of India (RBI) has approved the transfer of a record Rs. 1.76 lakh crore dividend and surplus reserves to the government.
47,039
1937 के प्रांतीय चुनावों और उसके परिणामों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While Briefly describing the provincial elections of 1937 and its results, underline its importance in the Indian freedom struggle. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में 1935 के एक्ट और उसके आधार पर 1937 के चुनाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में 1937 के चुनावो में कांग्रेस की स्थिति और उसके परिणाम की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में 1937 के चुनावो का महत्व बताइये । उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का अंत कीजिये । उत्तर - 1935 में भारतीय शासन अधिनियम , ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया , जिसके तहत केंद्र में द्वैत शासन प्रणाली लागू की गई और प्रांतो में उत्तरदायी सरकार के गठन का प्रावधान किया गया , हालांकि यहा भी निर्णायक शक्ति प्रांतीय गवर्नर के पास ही थी ।1935 के अधिनियम के तहत ही 1937 के प्रांतीय चुनावो का आयोजन किया गया , जिसमे भाग लेने को लेकर कांग्रेस में आपसी विवाद बना हुआ था ।लेकिन अंततः कांग्रेस ने भी चुनाव में भाग लिया और भारी सफलता हासिल की । कांग्रेस ने कुल 1585 असेंबली सीटो में से 711 सीटें जीती और 11 में से 5 प्रांतो में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई । पाँच प्रांतो में मद्रास , बिहार , उड़ीसा , मध्य प्रांत व संयुक्त प्रांत शामिल थे , साथ ही बॉम्बे में भी कांग्रेस को लगभग बहुमत प्राप्त हुआ । आगे चलकर कांग्रेस ने कुछ राजनीतिक सहयोगीयो के साथ पश्चिमोत्तर प्रांत और असम में भी सरकार बनाया । हालांकि पंजाब , बंगाल और सिंध प्रांत में कांग्रेस को बहुमत नही प्राप्त हुआ ।इस प्रकार कुल 11 प्रांतो में से कांग्रेस ने कुल 8 प्रांतो में सरकार बनाया। 1937 के चुनाव हालांकि भारतीय राजनीति में प्रांतीय स्तर पर पूर्णत: उतरदायी सरकार बनाने में तो कामयाब नही हुआ लेकिन , भारतीय नेताओ को आगे संभालने वाली ज़िम्मेदारी की एक रूप रेखा देने में अवश्य ही सफल हुआ । 1937 के चुनावो के महत्व को हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते है ;- कांग्रेस अल्पसंख्यक लोगों का प्रतिनिधित्व नही करती , बल्कि अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व का सूचक है । मंत्रिमंडलों के प्रशासनिक कार्यों ने इस भ्रांति को तोड़ दिया कि भारतीय शासन करने में सक्षम नहीं है। सांप्रदायिक दंगे ब्रिटिश सरकार की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है और भारतीय मंत्रिमंडल ने सांप्रदायिकता को रोकने के सार्थक एवं सफल प्रयास किये। कांग्रेस के कार्यों से लोगों में स्वदेशी सरकार के प्रति ललक पैदा हुई । यह धरणा सिद्ध हो गयी की मौलिक सामाजिक संक्रमण के लिए भारतीय स्व-शासन आवश्यक है। मंत्रिमंडलों ने भारतीयों के सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये। अंग्रेजी नौकरशाही के मनोबल में कमी आ गयी। कांग्रेस के संसदीय कार्यों ने तब के विरोधी तत्वों पर अंकुश लगाया जैसे-जमींदार इत्यादि। लोगों को एक ऐसा खाका खीचने में मदद मिली जैसे कि उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो। उपरोक्त से स्पष्ट है कि 1937 की प्रांतीय चुनावो ने अल्प समय के लिए ही किन्तु , भारतीयोको एक उतरदायित्व पूर्ण कार्य करने का अवसर दिया । जिससे वे आगे आने वाले उत्तरदायित्वों को प्रभावी तरीके से निभाने में सक्षम हो सके । कांग्रेस मंत्रिमंडल ने 28 महीनों के अल्पकाल की अवधि के बाद ही, भारतीयो की बिना अनुमति के उनको द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के कारण अक्तूबर 1939 में अपने मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया ।
##Question:1937 के प्रांतीय चुनावों और उसके परिणामों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसके महत्व को रेखांकित कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While Briefly describing the provincial elections of 1937 and its results, underline its importance in the Indian freedom struggle. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में 1935 के एक्ट और उसके आधार पर 1937 के चुनाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिये । उत्तर के पहले भाग में 1937 के चुनावो में कांग्रेस की स्थिति और उसके परिणाम की चर्चा कीजिये । उत्तर के दूसरे भाग में 1937 के चुनावो का महत्व बताइये । उत्तर के अंत में एक सकारात्मक निष्कर्ष देते हुए उत्तर का अंत कीजिये । उत्तर - 1935 में भारतीय शासन अधिनियम , ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया , जिसके तहत केंद्र में द्वैत शासन प्रणाली लागू की गई और प्रांतो में उत्तरदायी सरकार के गठन का प्रावधान किया गया , हालांकि यहा भी निर्णायक शक्ति प्रांतीय गवर्नर के पास ही थी ।1935 के अधिनियम के तहत ही 1937 के प्रांतीय चुनावो का आयोजन किया गया , जिसमे भाग लेने को लेकर कांग्रेस में आपसी विवाद बना हुआ था ।लेकिन अंततः कांग्रेस ने भी चुनाव में भाग लिया और भारी सफलता हासिल की । कांग्रेस ने कुल 1585 असेंबली सीटो में से 711 सीटें जीती और 11 में से 5 प्रांतो में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई । पाँच प्रांतो में मद्रास , बिहार , उड़ीसा , मध्य प्रांत व संयुक्त प्रांत शामिल थे , साथ ही बॉम्बे में भी कांग्रेस को लगभग बहुमत प्राप्त हुआ । आगे चलकर कांग्रेस ने कुछ राजनीतिक सहयोगीयो के साथ पश्चिमोत्तर प्रांत और असम में भी सरकार बनाया । हालांकि पंजाब , बंगाल और सिंध प्रांत में कांग्रेस को बहुमत नही प्राप्त हुआ ।इस प्रकार कुल 11 प्रांतो में से कांग्रेस ने कुल 8 प्रांतो में सरकार बनाया। 1937 के चुनाव हालांकि भारतीय राजनीति में प्रांतीय स्तर पर पूर्णत: उतरदायी सरकार बनाने में तो कामयाब नही हुआ लेकिन , भारतीय नेताओ को आगे संभालने वाली ज़िम्मेदारी की एक रूप रेखा देने में अवश्य ही सफल हुआ । 1937 के चुनावो के महत्व को हम निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते है ;- कांग्रेस अल्पसंख्यक लोगों का प्रतिनिधित्व नही करती , बल्कि अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व का सूचक है । मंत्रिमंडलों के प्रशासनिक कार्यों ने इस भ्रांति को तोड़ दिया कि भारतीय शासन करने में सक्षम नहीं है। सांप्रदायिक दंगे ब्रिटिश सरकार की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है और भारतीय मंत्रिमंडल ने सांप्रदायिकता को रोकने के सार्थक एवं सफल प्रयास किये। कांग्रेस के कार्यों से लोगों में स्वदेशी सरकार के प्रति ललक पैदा हुई । यह धरणा सिद्ध हो गयी की मौलिक सामाजिक संक्रमण के लिए भारतीय स्व-शासन आवश्यक है। मंत्रिमंडलों ने भारतीयों के सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये। अंग्रेजी नौकरशाही के मनोबल में कमी आ गयी। कांग्रेस के संसदीय कार्यों ने तब के विरोधी तत्वों पर अंकुश लगाया जैसे-जमींदार इत्यादि। लोगों को एक ऐसा खाका खीचने में मदद मिली जैसे कि उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो। उपरोक्त से स्पष्ट है कि 1937 की प्रांतीय चुनावो ने अल्प समय के लिए ही किन्तु , भारतीयोको एक उतरदायित्व पूर्ण कार्य करने का अवसर दिया । जिससे वे आगे आने वाले उत्तरदायित्वों को प्रभावी तरीके से निभाने में सक्षम हो सके । कांग्रेस मंत्रिमंडल ने 28 महीनों के अल्पकाल की अवधि के बाद ही, भारतीयो की बिना अनुमति के उनको द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के कारण अक्तूबर 1939 में अपने मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया ।
47,044
संविधान की मूल संरचना से आप क्या समझते हैं? विभिन्न मामलों के आलोक मेंइस सिद्धान्त के क्रमिक विकास पर प्रकाशडालिए। (150-200 शब्द) What do you understand by the basic structure of the constitution? In the context of various cases highlightthe evolution of this doctrine. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, संविधान की मूल सरंचना का संक्षिप्त परिचय कीजिए। तत्प्श्चात, विभिन्न मामलों का उल्लेख करते हुएइस सिद्धान्त के क्रमिक विकास को समझाइये। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानन्द भारती मामले में आधारभूत संरचना का सिद्धान्त स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर सीमाएं आरोपित करना है ताकि संविधान की आधारिक संरचना में कोई परिवर्तन न किया जा सके। वस्तुतः ये मौलिक प्रावधान और सिद्धान्त संविधान की भावना की रक्षा के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हैं। इस सिद्दांत के अनुसार संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है परन्तु संविधान की कुछ आधारभूत विशेषताएं हैं जिनके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। आधारभूत संरचना के अंतर्गत कुछ प्रमुख विशेषताएँ शामिल हैं जैसे,संसदीय प्रणाली, न्यायपालिका की स्वतन्त्रता, न्यायिक समीक्षा, विधि का शासन, शक्तियों का पृथक्करण, धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव इत्यादि। आधारभूत संरचना के सिद्धान्त के क्रमिक विकास को निम्नलिखित मामलों के संदर्भ से समझा जा सकता है:- शंकरी प्रसाद वाद, 1951: यह मामलातब सामने आया जब संपत्ति के अधिकार को प्रथम बार संशोधन अधिनियम के माध्यम से मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया था। इसके द्वारा यह निर्धारित किया गया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के माध्यम से मौलिक अधिकारों में संशोधन करने कि शक्ति प्राप्त है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति के अंतर्गत ही मूल अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति में निहित है। गोलकनाथ वाद, 1967: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को उलटते हुए कहा कि मूल अधिकार में संशोधन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संविधान संशोधन अधिनियम अनुच्छेद 13 की सीमा में आता है। 24वां संविधान संशोधन अधिनियम:- अधिनियम ने मौलिक अधिकारों सहित संविधान में कोई भी परिवर्तन करने के लिए संसद को पूर्ण शक्ति दे दी थी। इसने यह भी सुनिश्चत किया गया कि सभी संवैधानिक संशोधन बिलों पर राष्ट्रपति की सहमति जरूरी होगी। केशवानंद भारती मामला, 1973: न्यायालय ने गोलकनाथ मामले में दिये गए निर्णय को उलटते हुए कहा कि मूल अधिकार में संशोधन किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 24 वें संविधान संशोधन अधिनियम की वैधता को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट नेकहा कि संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की शक्ति है लेकिन ऐसा करते समय संविधान का मूल ढांचा बना रहना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी संरचना की कोई भी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी। यह कहा कि "संविधान के मूल ढांचे को एक संवैधानिक संशोधन द्वारा भी निरस्त नहीं किया जा सकता है"। मिनर्वा मिल्स वाद, 1980: यह मामला 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम से संबन्धित है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय दिया था कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत प्रदान कि गयी शक्ति असीमित नहीं बल्कि सीमित है। इसके साथ ही न्यायिक समीक्षा भी आधारित संरचना का भाग है इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है। यह सिद्धान्त निरंतर विकसित हो रहा है तथा न्यायपालिका ने अपने उत्तरवर्ती निर्णयों के माध्यम से आधारिक संरचना के क्षेत्र को और अधिक विस्तृत किया है।
##Question:संविधान की मूल संरचना से आप क्या समझते हैं? विभिन्न मामलों के आलोक मेंइस सिद्धान्त के क्रमिक विकास पर प्रकाशडालिए। (150-200 शब्द) What do you understand by the basic structure of the constitution? In the context of various cases highlightthe evolution of this doctrine. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, संविधान की मूल सरंचना का संक्षिप्त परिचय कीजिए। तत्प्श्चात, विभिन्न मामलों का उल्लेख करते हुएइस सिद्धान्त के क्रमिक विकास को समझाइये। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानन्द भारती मामले में आधारभूत संरचना का सिद्धान्त स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर सीमाएं आरोपित करना है ताकि संविधान की आधारिक संरचना में कोई परिवर्तन न किया जा सके। वस्तुतः ये मौलिक प्रावधान और सिद्धान्त संविधान की भावना की रक्षा के लिए स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हैं। इस सिद्दांत के अनुसार संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है परन्तु संविधान की कुछ आधारभूत विशेषताएं हैं जिनके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। आधारभूत संरचना के अंतर्गत कुछ प्रमुख विशेषताएँ शामिल हैं जैसे,संसदीय प्रणाली, न्यायपालिका की स्वतन्त्रता, न्यायिक समीक्षा, विधि का शासन, शक्तियों का पृथक्करण, धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव इत्यादि। आधारभूत संरचना के सिद्धान्त के क्रमिक विकास को निम्नलिखित मामलों के संदर्भ से समझा जा सकता है:- शंकरी प्रसाद वाद, 1951: यह मामलातब सामने आया जब संपत्ति के अधिकार को प्रथम बार संशोधन अधिनियम के माध्यम से मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया था। इसके द्वारा यह निर्धारित किया गया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के माध्यम से मौलिक अधिकारों में संशोधन करने कि शक्ति प्राप्त है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति के अंतर्गत ही मूल अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति में निहित है। गोलकनाथ वाद, 1967: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को उलटते हुए कहा कि मूल अधिकार में संशोधन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संविधान संशोधन अधिनियम अनुच्छेद 13 की सीमा में आता है। 24वां संविधान संशोधन अधिनियम:- अधिनियम ने मौलिक अधिकारों सहित संविधान में कोई भी परिवर्तन करने के लिए संसद को पूर्ण शक्ति दे दी थी। इसने यह भी सुनिश्चत किया गया कि सभी संवैधानिक संशोधन बिलों पर राष्ट्रपति की सहमति जरूरी होगी। केशवानंद भारती मामला, 1973: न्यायालय ने गोलकनाथ मामले में दिये गए निर्णय को उलटते हुए कहा कि मूल अधिकार में संशोधन किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 24 वें संविधान संशोधन अधिनियम की वैधता को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट नेकहा कि संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की शक्ति है लेकिन ऐसा करते समय संविधान का मूल ढांचा बना रहना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी संरचना की कोई भी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी। यह कहा कि "संविधान के मूल ढांचे को एक संवैधानिक संशोधन द्वारा भी निरस्त नहीं किया जा सकता है"। मिनर्वा मिल्स वाद, 1980: यह मामला 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम से संबन्धित है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय दिया था कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत प्रदान कि गयी शक्ति असीमित नहीं बल्कि सीमित है। इसके साथ ही न्यायिक समीक्षा भी आधारित संरचना का भाग है इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है। यह सिद्धान्त निरंतर विकसित हो रहा है तथा न्यायपालिका ने अपने उत्तरवर्ती निर्णयों के माध्यम से आधारिक संरचना के क्षेत्र को और अधिक विस्तृत किया है।
47,045
स्वतन्त्रता पश्चात भारतीय समाज में समांगीकरण की प्रक्रिया ने जाति व्यवस्था की कठोरता को कम किया। इस कथन को स्पष्ट करते हुए जाति व्यवस्था के निर्मूलन के लिए अन्य सुझाव दीजिए। (150-200 शब्द) The process of integration in Indian society after independence reduced the rigidity of the caste system. Explain this statement and give other suggestions for the elimination of the caste system. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में समांगीकरण प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। उत्तर के प्रथम भाग में जाति व्यवस्था को कम करने में समांगीकरण प्रक्रिया के योगदान को लिखिए। इसके बाद जाति व्यवस्था के निर्मूलन के लिए अन्य सुझाव दीजिए। जाति में समांगीकरण से आशय है विभिन्न जातियों का एक दूसरे से संपर्क होना। इसके अंतर्गत जाति की पारंपरिक व्यवस्था में ऐसे घटकों का आगमन हो जाता है जिससे उन्हे एक दूसरे की आवश्यकताओं को समझने में आसानी होती है। इसने जाति व्यवस्था की कठोरता को कम करने में निम्नलिखित प्रकार से योगदान दिया: स्वतन्त्रता पश्चात जाति व्यवस्था की परंपरागत प्रणाली में बदलाव देखने को मिला। समांगीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना आदि के विकास से लोगों को अधिकार और स्वतन्त्रता के अवसर प्राप्त होने लगे। संवैधानिक अधिकारों ने इसे और बढ़ावा दिया। शिक्षा संकायों में विभिन्न जातियों का प्रवेश प्रारम्भ हुआ। आरक्षण के प्रावधान ने अधिकारों से अवगत कराया इसके कारण समांगीकरण को और बढ़ावा मिला शिक्षा, सार्वभौमिक मताधिकार ने राजनीतिक रूप से पहचान को महत्व प्रदान किया। समांगीकरण की प्रक्रिया ने समाज में अंतरजातीय विवाह को बढ़ाव दिया। इससे उंच-नीच की भावना को खत्म करने में योगदान दिया। जाति व्यवस्था निर्मूलन हेतु अन्य सुझाव: जाति आधारित कुरुतियों की समाप्ति जैसे- अस्पृश्यता, उंच-नीच की भावना अस्पृश्यता विरोधी कानून का कड़ाई से पालन वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास जिसके अंतर्गत रूढ़िवादी, अंधविश्वासों को समाप्त करना आरक्षण व्यवस्था को तार्किक बनाते हुए लाभार्थियों के पहचान को प्रभावी बनाना। सकारात्मक भेदभाव को लागू करते हुए सरकारी योजनाओं के लाभ को पहुंचाना। ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसर सृजित करना जिससे कमजोर वर्गों की आय में वृद्धि हो फलस्वरूप जीवन स्तर में सुधार होगा। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन। असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना।
##Question:स्वतन्त्रता पश्चात भारतीय समाज में समांगीकरण की प्रक्रिया ने जाति व्यवस्था की कठोरता को कम किया। इस कथन को स्पष्ट करते हुए जाति व्यवस्था के निर्मूलन के लिए अन्य सुझाव दीजिए। (150-200 शब्द) The process of integration in Indian society after independence reduced the rigidity of the caste system. Explain this statement and give other suggestions for the elimination of the caste system. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में समांगीकरण प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए। उत्तर के प्रथम भाग में जाति व्यवस्था को कम करने में समांगीकरण प्रक्रिया के योगदान को लिखिए। इसके बाद जाति व्यवस्था के निर्मूलन के लिए अन्य सुझाव दीजिए। जाति में समांगीकरण से आशय है विभिन्न जातियों का एक दूसरे से संपर्क होना। इसके अंतर्गत जाति की पारंपरिक व्यवस्था में ऐसे घटकों का आगमन हो जाता है जिससे उन्हे एक दूसरे की आवश्यकताओं को समझने में आसानी होती है। इसने जाति व्यवस्था की कठोरता को कम करने में निम्नलिखित प्रकार से योगदान दिया: स्वतन्त्रता पश्चात जाति व्यवस्था की परंपरागत प्रणाली में बदलाव देखने को मिला। समांगीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना आदि के विकास से लोगों को अधिकार और स्वतन्त्रता के अवसर प्राप्त होने लगे। संवैधानिक अधिकारों ने इसे और बढ़ावा दिया। शिक्षा संकायों में विभिन्न जातियों का प्रवेश प्रारम्भ हुआ। आरक्षण के प्रावधान ने अधिकारों से अवगत कराया इसके कारण समांगीकरण को और बढ़ावा मिला शिक्षा, सार्वभौमिक मताधिकार ने राजनीतिक रूप से पहचान को महत्व प्रदान किया। समांगीकरण की प्रक्रिया ने समाज में अंतरजातीय विवाह को बढ़ाव दिया। इससे उंच-नीच की भावना को खत्म करने में योगदान दिया। जाति व्यवस्था निर्मूलन हेतु अन्य सुझाव: जाति आधारित कुरुतियों की समाप्ति जैसे- अस्पृश्यता, उंच-नीच की भावना अस्पृश्यता विरोधी कानून का कड़ाई से पालन वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास जिसके अंतर्गत रूढ़िवादी, अंधविश्वासों को समाप्त करना आरक्षण व्यवस्था को तार्किक बनाते हुए लाभार्थियों के पहचान को प्रभावी बनाना। सकारात्मक भेदभाव को लागू करते हुए सरकारी योजनाओं के लाभ को पहुंचाना। ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसर सृजित करना जिससे कमजोर वर्गों की आय में वृद्धि हो फलस्वरूप जीवन स्तर में सुधार होगा। न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन। असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना।
47,054
Discuss Kautilya"s perspective on ethical governance with its contemporary relevance? (10 Marks/150 words)
Approach 1. Give a proper introduction. 2. Body - Highlight the importance of Kautilya"s perspective on ethical/good governance. 3. Concludewith showing similarities in Modern values and Kautilya"s perspective. Answer The perspective of Kautilya regarding good governance/ ethical governance pertains to the system of the monarchy but its application is equally valid in the terms of the democratic political system. According to Kautilya, the king should be considered to be the servant of the state and therefore it should be guided with the value system of the public and thereby the king should follow the preferences or the wishes of the public, the public service values in the present scenario deals with the public expectations from a civil servant. No individuality in King / Civil servant - The king should merge his individuality with his duties and responsibilities this indicates the importance of dedication to public services. In order to ensure public welfare, there must be a properly guided administration and this administration should be committed to the cause of the public and to make this possible the public officials should behave like a servant and not like a master. This perspective of Kautilya indicates the importance of integrity on the part of the public officials. Discipline - There must be a disciplined life of the king and the ministers with the code of conduct so that king and the ministers can become a role model for the society and therefore Kautilya give importance to the inculcation of moral values at the higher levels of govt. so ultimately such values get transmitted to the lower levels of the government. Law and order- Law and order were considered to be the prime responsibility of the king and for the protection of life and liberty of the individuals and this requires a conducive environment in the society and with respect to this, there must be the proper maintenance of law and order. Even in the present scenario the prime responsibility of govt. is considered to be the maintenance of law and order. It is through Dandaniti- the science of law enforcement that the state secures its legitimacy and right to govern. Welfare and protection: of the people is the main function of the state. " In the happiness of his subject lies the king"s happiness; in their welfare his welfare." Corruption - There must be the fixation of salary and allowances for the king and public servants In order to prevent corruption, both preventive and punitive measures should be adopted for this. Transfer - In order to improve the quality of the working of the government, there must be a reshuffling of the ministers that is to say bad minister should be replaced with good ministers and less good should be replaced with better ones. The transfer was considered to be a means to prevent corruption in the working of govt. at the same time, he also gives importance to the stability of tenure so as to gain the advantage of experiences of employees. Qualitiesrequired for King / civil servant - The king should have the qualities of leadership, intellect, energy as well as good moral conduct. There should be a demarcation or segregation between the public resources/activities/agenda and private resources/agenda/activities so that the public officials can go for optimal utilization of the public fund for the sake of public interest this becomes important to promote integrity among the working of public officials. Public finance - Kautilya was the first political theorist to realise the importance of wealth as the foundation of a righteous state: Dharmasya moolam artha, Arthasya moolam rajyam." All state activities depend first on the treasury, therefore a King should devote its best attention to it." While emphasising the need for wealth collection, Kautilya underlines the point that the principle of equity in taxation should be followed. Kautilya advocated an activist state which the developing world is in dire needs. Accounts and Audit : Kautilya alike present CGA and CAG, appointed account and audit officers for the maintenance and audit of the accounts separately. It brought transparency and accountability in governance . Law and Justice: Ultimate source of all law is "dharma". A judge is called "dharmashastra". Judges will discharge their duties objectively and impartially so that they may earn the trust and affection of the people. This is quite relevant in the present scenarios as well. Kautilya"s Arhthashastra, therefore, provides great insights into ethical governance. His is always the sane, moderate and balanced view, He placed great emphasis on the welfare of the people. His practical advice is rooted in dharma and therefore holds significant contemporary relevance.
##Question:Discuss Kautilya"s perspective on ethical governance with its contemporary relevance? (10 Marks/150 words)##Answer:Approach 1. Give a proper introduction. 2. Body - Highlight the importance of Kautilya"s perspective on ethical/good governance. 3. Concludewith showing similarities in Modern values and Kautilya"s perspective. Answer The perspective of Kautilya regarding good governance/ ethical governance pertains to the system of the monarchy but its application is equally valid in the terms of the democratic political system. According to Kautilya, the king should be considered to be the servant of the state and therefore it should be guided with the value system of the public and thereby the king should follow the preferences or the wishes of the public, the public service values in the present scenario deals with the public expectations from a civil servant. No individuality in King / Civil servant - The king should merge his individuality with his duties and responsibilities this indicates the importance of dedication to public services. In order to ensure public welfare, there must be a properly guided administration and this administration should be committed to the cause of the public and to make this possible the public officials should behave like a servant and not like a master. This perspective of Kautilya indicates the importance of integrity on the part of the public officials. Discipline - There must be a disciplined life of the king and the ministers with the code of conduct so that king and the ministers can become a role model for the society and therefore Kautilya give importance to the inculcation of moral values at the higher levels of govt. so ultimately such values get transmitted to the lower levels of the government. Law and order- Law and order were considered to be the prime responsibility of the king and for the protection of life and liberty of the individuals and this requires a conducive environment in the society and with respect to this, there must be the proper maintenance of law and order. Even in the present scenario the prime responsibility of govt. is considered to be the maintenance of law and order. It is through Dandaniti- the science of law enforcement that the state secures its legitimacy and right to govern. Welfare and protection: of the people is the main function of the state. " In the happiness of his subject lies the king"s happiness; in their welfare his welfare." Corruption - There must be the fixation of salary and allowances for the king and public servants In order to prevent corruption, both preventive and punitive measures should be adopted for this. Transfer - In order to improve the quality of the working of the government, there must be a reshuffling of the ministers that is to say bad minister should be replaced with good ministers and less good should be replaced with better ones. The transfer was considered to be a means to prevent corruption in the working of govt. at the same time, he also gives importance to the stability of tenure so as to gain the advantage of experiences of employees. Qualitiesrequired for King / civil servant - The king should have the qualities of leadership, intellect, energy as well as good moral conduct. There should be a demarcation or segregation between the public resources/activities/agenda and private resources/agenda/activities so that the public officials can go for optimal utilization of the public fund for the sake of public interest this becomes important to promote integrity among the working of public officials. Public finance - Kautilya was the first political theorist to realise the importance of wealth as the foundation of a righteous state: Dharmasya moolam artha, Arthasya moolam rajyam." All state activities depend first on the treasury, therefore a King should devote its best attention to it." While emphasising the need for wealth collection, Kautilya underlines the point that the principle of equity in taxation should be followed. Kautilya advocated an activist state which the developing world is in dire needs. Accounts and Audit : Kautilya alike present CGA and CAG, appointed account and audit officers for the maintenance and audit of the accounts separately. It brought transparency and accountability in governance . Law and Justice: Ultimate source of all law is "dharma". A judge is called "dharmashastra". Judges will discharge their duties objectively and impartially so that they may earn the trust and affection of the people. This is quite relevant in the present scenarios as well. Kautilya"s Arhthashastra, therefore, provides great insights into ethical governance. His is always the sane, moderate and balanced view, He placed great emphasis on the welfare of the people. His practical advice is rooted in dharma and therefore holds significant contemporary relevance.
47,055
साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए, इसके उदय के कारणों को संक्षेप में बताइए | साथ ही चर्चा कीजिये कि " भारत का विभाजन, साम्प्रदायिकता के विकास का परिणाम था |" (150-200 शब्द) While defining communalism, briefly explain the reasons for its rise. Also discuss that "the partition of India was the result of the development of communalism. (150-200 words)
एप्रोच - भूमिका में साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए इसके उदय के कारणों की संक्षेप में जानकारी दीजिये | प्रथम भाग में विभाजन तक साम्प्रदायिकता के विकास की जानकारी दीजिये | दूसरे भाग में विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि दीजिये | साम्प्रदायिकता के चरमोत्कर्ष के रूप में विभाजन की जानकारी के साथ निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - तात्विक रूप में साम्प्रदायिकता धर्म का राजनीतिक व्यापार है| अर्थात धर्म का राजनीतिक रूप से उपयोग करना साम्प्रदायिकता होती है| साम्प्रदायिकता की विचारधारा में एक ही समूह या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों के हित समान होते हैं| साम्प्रदायिकता की विचारधारा का मानना है कि बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के हितों से भिन्न हैं| अपने चरम रूप में यह विचारधारा मानती है कि विभिन्न धर्मो या समुदायों के हित एक दूसरे से भिन्न होने के साथ ही साथ एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। अर्थात दो विभिन्न समुदाय एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के हित से टकराते हैं। उदय के कारण - औपनिवेशिक काल में भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ | उभरते मध्यवर्ग के बीच की प्रतिद्वंद्विता, विभाजक ब्रिटिश नीतियाँ | सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के पश्च प्रभाव आदि कारकों ने साम्प्रदायिकता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | विभिन्न कारकों ने साम्प्रदायिकता के विकास को सुनिश्चित किया जिसके चरमोत्कर्ष के रूप में भारत को विभाजन का सामना करना पड़ा, आदि | विभाजन तक साम्प्रदायिकता का विकास साम्प्रदायिकता का विकास 19वीं सदी अंतिम दशकों से शुरू होता है | इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक भूमिका निभायी| ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के विरुद्ध सक्रिय करने का प्रयास किया उदाहरणार्थ सर सैय्यद अहमद खान को कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित करना | 20वीं सदी के आरंभिक चरण में ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति को महत्व दिया| इस संदर्भ में बंगाल विभाजन, मुस्लिम लीग की स्थापना में ब्रिटिश सरकार की भूमिका को देख सकते हैं, 1909 के अधिनियम में पृथक निर्वाचन का प्रावधान कर ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान कर दी | 20 वीं सदी के दूसरे दशक से प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक संगठनों की स्थापना का क्रम शुरू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिकता के विकास को एक नवीन चरण में पहुचा दिया| इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा, अकाली दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिकाओं को देखा जा सकता है 1916 का लखनऊ समझौता अनेक मायनों में प्रगतिशील था लेकिन इसने साम्प्रदायिक शक्तियों को मान्यता प्रदान कर दी|कांग्रेस ने इसके द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। समझौते में यह निहित था कि भारत विभिन्न समुदायों का देश है तथा हित भिन्न-भिन्न हैं। कालांतर में इसके हानिकारक नतीजे निकले | खिलाफत आन्दोलन का आधार साम्प्रदायिक था| इसी समय स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्यसमाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसका उद्देश्य इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाना था। मुसलमानों ने इनके विरोध में तंजीम और तबलीग आंदोलन चलाये।इससे साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी | 1928 में नेहरु रिपोर्ट के विरोध में जिन्ना के 14 सूत्री मांगों का प्रस्तुत किया जाना और इस अवसर पर मुस्लिम लीग से समझौता करने की कोशिश करते हुये कांग्रेस नेतृत्व से हुई अनेक गलतियों ने साम्प्रदायिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध उदार दृष्टिकोण जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य कांग्रेस के सदस्य हो सकते थे, साम्प्रदायिक नेताओं से वार्ता की रणनीति, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अभियान न चलानाआदि | 1935 तक साम्प्रदायिक संगठनों की अधिकाँश मांगें सरकार ने मान ली थी इस संदर्भ में जिन्ना की 14 सूत्री मांगों को स्वीकार करना उल्लेखनीय है | इसी समय सरकार के द्वारा सांप्रदायिक संगठनों को किसी न किसी रूप में खुला समर्थन देना शुरू किया जैसे अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मलेन आदि में देखा जा सकता है | 1945 तक साम्प्रदायिक संगठनों के जनाधार का भी विस्तार हुआ और सम्प्रदायवाद एक संगठित जन-आंदोलन के रूप में प्रारंभ हो गया, जिसका मुख्य आधार समाज का मध्य एवं उच्च वर्ग था। अब लीग के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरी मजबूती के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा और भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी | 1945 से 1947 के मध्य पाकिस्तान की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में अंतरिम सरकार एवं प्रांतीय सरकारें विफल रही| ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई| इसके साथ ही रियासतों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग, अलग सिक्ख राज्य की मांग जैसी गतिविधियों के कारण परिस्थितियाँ अत्यंत ही गंभीर थीं | इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दो ही विकल्प थे- प्रथम साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखना, इसमें देश के अनेक टुकड़ों में विघटन का खतरा था | द्वितीय- पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता की आग से लोगों को बचाना तथा जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक एकता व अखंडता को बनाये रखना | दूसरा विकल्प यद्यपि दुखद अवश्य था लेकिन राष्ट्र हित में इसी विकल्प को महत्त्व दिया गया|इस तरह से साप्रदायिकता का चरमोत्कर्ष भारत के विभाजन के रूप में देखा जा सकता है |
##Question:साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए, इसके उदय के कारणों को संक्षेप में बताइए | साथ ही चर्चा कीजिये कि " भारत का विभाजन, साम्प्रदायिकता के विकास का परिणाम था |" (150-200 शब्द) While defining communalism, briefly explain the reasons for its rise. Also discuss that "the partition of India was the result of the development of communalism. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए इसके उदय के कारणों की संक्षेप में जानकारी दीजिये | प्रथम भाग में विभाजन तक साम्प्रदायिकता के विकास की जानकारी दीजिये | दूसरे भाग में विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि दीजिये | साम्प्रदायिकता के चरमोत्कर्ष के रूप में विभाजन की जानकारी के साथ निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - तात्विक रूप में साम्प्रदायिकता धर्म का राजनीतिक व्यापार है| अर्थात धर्म का राजनीतिक रूप से उपयोग करना साम्प्रदायिकता होती है| साम्प्रदायिकता की विचारधारा में एक ही समूह या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों के हित समान होते हैं| साम्प्रदायिकता की विचारधारा का मानना है कि बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के हितों से भिन्न हैं| अपने चरम रूप में यह विचारधारा मानती है कि विभिन्न धर्मो या समुदायों के हित एक दूसरे से भिन्न होने के साथ ही साथ एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। अर्थात दो विभिन्न समुदाय एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के हित से टकराते हैं। उदय के कारण - औपनिवेशिक काल में भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ | उभरते मध्यवर्ग के बीच की प्रतिद्वंद्विता, विभाजक ब्रिटिश नीतियाँ | सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के पश्च प्रभाव आदि कारकों ने साम्प्रदायिकता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | विभिन्न कारकों ने साम्प्रदायिकता के विकास को सुनिश्चित किया जिसके चरमोत्कर्ष के रूप में भारत को विभाजन का सामना करना पड़ा, आदि | विभाजन तक साम्प्रदायिकता का विकास साम्प्रदायिकता का विकास 19वीं सदी अंतिम दशकों से शुरू होता है | इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक भूमिका निभायी| ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के विरुद्ध सक्रिय करने का प्रयास किया उदाहरणार्थ सर सैय्यद अहमद खान को कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित करना | 20वीं सदी के आरंभिक चरण में ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति को महत्व दिया| इस संदर्भ में बंगाल विभाजन, मुस्लिम लीग की स्थापना में ब्रिटिश सरकार की भूमिका को देख सकते हैं, 1909 के अधिनियम में पृथक निर्वाचन का प्रावधान कर ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान कर दी | 20 वीं सदी के दूसरे दशक से प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक संगठनों की स्थापना का क्रम शुरू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिकता के विकास को एक नवीन चरण में पहुचा दिया| इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा, अकाली दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिकाओं को देखा जा सकता है 1916 का लखनऊ समझौता अनेक मायनों में प्रगतिशील था लेकिन इसने साम्प्रदायिक शक्तियों को मान्यता प्रदान कर दी|कांग्रेस ने इसके द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। समझौते में यह निहित था कि भारत विभिन्न समुदायों का देश है तथा हित भिन्न-भिन्न हैं। कालांतर में इसके हानिकारक नतीजे निकले | खिलाफत आन्दोलन का आधार साम्प्रदायिक था| इसी समय स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्यसमाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसका उद्देश्य इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाना था। मुसलमानों ने इनके विरोध में तंजीम और तबलीग आंदोलन चलाये।इससे साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी | 1928 में नेहरु रिपोर्ट के विरोध में जिन्ना के 14 सूत्री मांगों का प्रस्तुत किया जाना और इस अवसर पर मुस्लिम लीग से समझौता करने की कोशिश करते हुये कांग्रेस नेतृत्व से हुई अनेक गलतियों ने साम्प्रदायिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध उदार दृष्टिकोण जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य कांग्रेस के सदस्य हो सकते थे, साम्प्रदायिक नेताओं से वार्ता की रणनीति, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अभियान न चलानाआदि | 1935 तक साम्प्रदायिक संगठनों की अधिकाँश मांगें सरकार ने मान ली थी इस संदर्भ में जिन्ना की 14 सूत्री मांगों को स्वीकार करना उल्लेखनीय है | इसी समय सरकार के द्वारा सांप्रदायिक संगठनों को किसी न किसी रूप में खुला समर्थन देना शुरू किया जैसे अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मलेन आदि में देखा जा सकता है | 1945 तक साम्प्रदायिक संगठनों के जनाधार का भी विस्तार हुआ और सम्प्रदायवाद एक संगठित जन-आंदोलन के रूप में प्रारंभ हो गया, जिसका मुख्य आधार समाज का मध्य एवं उच्च वर्ग था। अब लीग के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरी मजबूती के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा और भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी | 1945 से 1947 के मध्य पाकिस्तान की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में अंतरिम सरकार एवं प्रांतीय सरकारें विफल रही| ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई| इसके साथ ही रियासतों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग, अलग सिक्ख राज्य की मांग जैसी गतिविधियों के कारण परिस्थितियाँ अत्यंत ही गंभीर थीं | इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दो ही विकल्प थे- प्रथम साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखना, इसमें देश के अनेक टुकड़ों में विघटन का खतरा था | द्वितीय- पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता की आग से लोगों को बचाना तथा जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक एकता व अखंडता को बनाये रखना | दूसरा विकल्प यद्यपि दुखद अवश्य था लेकिन राष्ट्र हित में इसी विकल्प को महत्त्व दिया गया|इस तरह से साप्रदायिकता का चरमोत्कर्ष भारत के विभाजन के रूप में देखा जा सकता है |
47,065
भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये |(150 से 200 शब्द/10 अंक) Explain the importance of Maldives in the context of India. Also list the cooperation made by India in Maldives. (150 to 200 words/10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत मालदीव सम्बन्धों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में सहयोग के अन्य आयामों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मालदीव हिन्द महासागर में लगभग 1200 द्वीप से युक्त एक द्वीपीय राष्ट्र है| भारत ने मालदीव के साथ अपने कूटनीतिक सम्बन्ध 1996 में स्थापित किये| मालदीव में आंतरिक अशांति के समय मालदीव की मांग पर भारत द्वारा वहां ऑपरेशन कैक्टस किया गया था, उसके बाद 1996 से लेकर 2008 तक मालदीव भारत प्रथम की नीति पर चल रहा था| इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के कारण मालदीव में भारत का प्रभाव कम होता गया था| किन्तु वर्ष 2018 से सम्बन्धों में पुनः सुधार होने लगे हैं| हिन्द महासागर में भारतीय हितों को देखते हुए मालदीव एक महत्वपूर्ण राष्ट्र है| भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व · मालदीव एक सामरिक लोकेशन पर स्थित है, इसमें लगभग 1200 द्वीप है इनमें बहुत से द्वीपों पर मानव आवास नहीं है अतः इनको किसी देश को लीज पर दिया जा सकता है , जिससे भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं| · हिन्दमहासागर में भारत एक बड़ी शक्ति है किन्तु यदि मालदीव किसी देश को अपने द्वीप लीज पर देता है तो हिन्द महासागर का सैन्यीकरण होने लगेगा जिससे भारत के हित प्रभावित होंगे| · हिंद महासागर में चीन को प्रतिसंतुलित करने सन्दर्भ में मालदीव महत्वपूर्ण है ,मालदीव के माध्यम से भारत शांत हिन्द महासागर की संकल्पना पर आगे बढ़ सकता है| · मालदीव का EEZ बहुत बड़ा है जिसकी सुरक्षा वह स्वयं नहीं कर सकता है अतः भारत को नेट सिक्यूरिटी प्रोवाइडर होना पडेगा अन्यथा चीन का महत्त्व बढेगा| इसी प्रकार मालदीव का ऋण ढांचा चीन के पक्ष में है अतः भारत को आर्थिक सहयोग करना होगा| · मालदीव सार्क का सदस्य है, यदि भारत को सार्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है तो उसे मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता होगी | · हिन्द महासागर में अपना प्रभाव बेहतर बनाए रखने के लिए मालदीव के साथ सम्बन्धों को बेहतर बनाए रखना आवश्यक है · यामीन के समय में मालदीव में चीन एवं पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ा है और कट्टरपंथ मजबूत हुआ था जिससे भारतीय सुरक्षा के प्रति चुनौती उत्पन्न होती है, अतः बढ़ते कट्टरपंथ को रोकना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा · भारत मालदीव के मध्य नृजातीय, सांस्कृतिक सम्बन्ध है, भारत के लगभग 25हजार लोग मालदीव में काम करते हैं अतः वहां की कुल जनसंख्या के लगभग 10 % आकार वाले डायस्पोरा की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है · भारत के भुगतान संतुलन को संतुलित रखने में मालदीव भारत के लिए महत्वपूर्ण है| मालदीव समुद्री व्यापार मार्ग पर स्थित है अतः यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है · मालदीव का विशाल EEZ ब्लू अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है अतः भारत को अपेक्षित तकनीकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा| सहयोग के आयाम · 2015 में कूटनीतिक रिश्तों को स्थापित हुए 50 वर्ष हो गए हैं| मालदीव के महत्त्व को देखते हुए भारत ने निरंतर एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभायी है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं · मालदीव में भारत ने अनेकों विकासात्मक परियोजनाएं चला रखी हैं जैसे इंडिया गाँधी अस्पताल, हुलहुल माले में हाउसिंग प्रोजेक्ट आदि · भारत ने मालदीव कोरियायती दरों पर 1.4 बिलियन डॉलर का आर्थिक सहयोग दिया है · मालदीव के लिए भारत निरंतर एक खाद्य आपूर्तिकर्ता राष्ट्र रहा है · युक्रेन संकट के दौरान भारत ने मालदीव के छात्रों को युक्रेन से बाहर निकाला · 2014 के जल संकट के दौरान ने भारत द्वारा मालदीव में जलापूर्ति की गयी है · मालदीव के तटीय जल की निगरानी के लिए भारतीय नौसेना के हेलीकाप्टर दिए गए हैं · मालदीव के जल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वहां के अनेक द्वीपों में भारतीय रडार लगाए गए हैं · अभी हाल ही में सोलेह के भारत आगमन पर भारत द्वारा विभिन्न सहयोग किये गए हैं यथा हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में भारत द्वारा सहयोग दिया जाएगा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग बढाया जा रहा है, मालदीव के साथ कार्गो सेवाओं को बढाया जाएगा इससे दोनों के मध्य व्यापार बढेगा, कस्टम सम्बन्धी सेवाओं का विस्तार किया जाएगा इसके साथ ही वाणिज्यिक सेवाओं में लगे हुए जलयानों से सम्बन्धित आंकड़ों को साझा किया जाएगा, इससे भारत को हिंद महासागर के ट्रैफिक का अनुमान लगाने में आसानी होगी, इसी के माध्यम से सैन्य जलयानों की गतिविधियों पर भी नजर रखा जा सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत ने गुजराल सिद्धांत का अनुकरण करते हुए मालदीव के साथ सहयोग के महत्वपूर्ण मानदंड स्थापित किये हैं फिर भी भारत के लिए मालदीव को कट्टरपंथ से मुक्त एवं राजनीतिक रूप से स्थिर एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करना आवश्यक है ताकि हिंद महासागर में भारत के राष्ट्रीय हित सुरक्षित रह सकें|
##Question:भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये |(150 से 200 शब्द/10 अंक) Explain the importance of Maldives in the context of India. Also list the cooperation made by India in Maldives. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत मालदीव सम्बन्धों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में सहयोग के अन्य आयामों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मालदीव हिन्द महासागर में लगभग 1200 द्वीप से युक्त एक द्वीपीय राष्ट्र है| भारत ने मालदीव के साथ अपने कूटनीतिक सम्बन्ध 1996 में स्थापित किये| मालदीव में आंतरिक अशांति के समय मालदीव की मांग पर भारत द्वारा वहां ऑपरेशन कैक्टस किया गया था, उसके बाद 1996 से लेकर 2008 तक मालदीव भारत प्रथम की नीति पर चल रहा था| इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के कारण मालदीव में भारत का प्रभाव कम होता गया था| किन्तु वर्ष 2018 से सम्बन्धों में पुनः सुधार होने लगे हैं| हिन्द महासागर में भारतीय हितों को देखते हुए मालदीव एक महत्वपूर्ण राष्ट्र है| भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व · मालदीव एक सामरिक लोकेशन पर स्थित है, इसमें लगभग 1200 द्वीप है इनमें बहुत से द्वीपों पर मानव आवास नहीं है अतः इनको किसी देश को लीज पर दिया जा सकता है , जिससे भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं| · हिन्दमहासागर में भारत एक बड़ी शक्ति है किन्तु यदि मालदीव किसी देश को अपने द्वीप लीज पर देता है तो हिन्द महासागर का सैन्यीकरण होने लगेगा जिससे भारत के हित प्रभावित होंगे| · हिंद महासागर में चीन को प्रतिसंतुलित करने सन्दर्भ में मालदीव महत्वपूर्ण है ,मालदीव के माध्यम से भारत शांत हिन्द महासागर की संकल्पना पर आगे बढ़ सकता है| · मालदीव का EEZ बहुत बड़ा है जिसकी सुरक्षा वह स्वयं नहीं कर सकता है अतः भारत को नेट सिक्यूरिटी प्रोवाइडर होना पडेगा अन्यथा चीन का महत्त्व बढेगा| इसी प्रकार मालदीव का ऋण ढांचा चीन के पक्ष में है अतः भारत को आर्थिक सहयोग करना होगा| · मालदीव सार्क का सदस्य है, यदि भारत को सार्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है तो उसे मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता होगी | · हिन्द महासागर में अपना प्रभाव बेहतर बनाए रखने के लिए मालदीव के साथ सम्बन्धों को बेहतर बनाए रखना आवश्यक है · यामीन के समय में मालदीव में चीन एवं पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ा है और कट्टरपंथ मजबूत हुआ था जिससे भारतीय सुरक्षा के प्रति चुनौती उत्पन्न होती है, अतः बढ़ते कट्टरपंथ को रोकना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा · भारत मालदीव के मध्य नृजातीय, सांस्कृतिक सम्बन्ध है, भारत के लगभग 25हजार लोग मालदीव में काम करते हैं अतः वहां की कुल जनसंख्या के लगभग 10 % आकार वाले डायस्पोरा की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है · भारत के भुगतान संतुलन को संतुलित रखने में मालदीव भारत के लिए महत्वपूर्ण है| मालदीव समुद्री व्यापार मार्ग पर स्थित है अतः यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है · मालदीव का विशाल EEZ ब्लू अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है अतः भारत को अपेक्षित तकनीकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा| सहयोग के आयाम · 2015 में कूटनीतिक रिश्तों को स्थापित हुए 50 वर्ष हो गए हैं| मालदीव के महत्त्व को देखते हुए भारत ने निरंतर एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभायी है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं · मालदीव में भारत ने अनेकों विकासात्मक परियोजनाएं चला रखी हैं जैसे इंडिया गाँधी अस्पताल, हुलहुल माले में हाउसिंग प्रोजेक्ट आदि · भारत ने मालदीव कोरियायती दरों पर 1.4 बिलियन डॉलर का आर्थिक सहयोग दिया है · मालदीव के लिए भारत निरंतर एक खाद्य आपूर्तिकर्ता राष्ट्र रहा है · युक्रेन संकट के दौरान भारत ने मालदीव के छात्रों को युक्रेन से बाहर निकाला · 2014 के जल संकट के दौरान ने भारत द्वारा मालदीव में जलापूर्ति की गयी है · मालदीव के तटीय जल की निगरानी के लिए भारतीय नौसेना के हेलीकाप्टर दिए गए हैं · मालदीव के जल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वहां के अनेक द्वीपों में भारतीय रडार लगाए गए हैं · अभी हाल ही में सोलेह के भारत आगमन पर भारत द्वारा विभिन्न सहयोग किये गए हैं यथा हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में भारत द्वारा सहयोग दिया जाएगा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग बढाया जा रहा है, मालदीव के साथ कार्गो सेवाओं को बढाया जाएगा इससे दोनों के मध्य व्यापार बढेगा, कस्टम सम्बन्धी सेवाओं का विस्तार किया जाएगा इसके साथ ही वाणिज्यिक सेवाओं में लगे हुए जलयानों से सम्बन्धित आंकड़ों को साझा किया जाएगा, इससे भारत को हिंद महासागर के ट्रैफिक का अनुमान लगाने में आसानी होगी, इसी के माध्यम से सैन्य जलयानों की गतिविधियों पर भी नजर रखा जा सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत ने गुजराल सिद्धांत का अनुकरण करते हुए मालदीव के साथ सहयोग के महत्वपूर्ण मानदंड स्थापित किये हैं फिर भी भारत के लिए मालदीव को कट्टरपंथ से मुक्त एवं राजनीतिक रूप से स्थिर एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करना आवश्यक है ताकि हिंद महासागर में भारत के राष्ट्रीय हित सुरक्षित रह सकें|
47,067
भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये |(150 से 200 शब्द) Explain the importance of Maldives in the context of India. Also list the cooperation made by India in Maldives. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत मालदीव सम्बन्धों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में सहयोग के अन्य आयामों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मालदीव हिन्द महासागर में लगभग 1200 द्वीप से युक्त एक द्वीपीय राष्ट्र है| भारत ने मालदीव के साथ अपने कूटनीतिक सम्बन्ध 1996 में स्थापित किये| मालदीव में आंतरिक अशांति के समय मालदीव की मांग पर भारत द्वारा वहां ऑपरेशन कैक्टस किया गया था, उसके बाद 1996 से लेकर 2008 तक मालदीव भारत प्रथम की नीति पर चल रहा था| इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के कारण मालदीव में भारत का प्रभाव कम होता गया था| किन्तु वर्ष 2018 से सम्बन्धों में पुनः सुधार होने लगे हैं| हिन्द महासागर में भारतीय हितों को देखते हुए मालदीव एक महत्वपूर्ण राष्ट्र है| भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व · मालदीव एक सामरिक लोकेशन पर स्थित है, इसमें लगभग 1200 द्वीप है इनमें बहुत से द्वीपों पर मानव आवास नहीं है अतः इनको किसी देश को लीज पर दिया जा सकता है , जिससे भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं| · हिन्दमहासागर में भारत एक बड़ी शक्ति है किन्तु यदि मालदीव किसी देश को अपने द्वीप लीज पर देता है तो हिन्द महासागर का सैन्यीकरण होने लगेगा जिससे भारत के हित प्रभावित होंगे| · हिंद महासागर में चीन को प्रतिसंतुलित करने सन्दर्भ में मालदीव महत्वपूर्ण है ,मालदीव के माध्यम से भारत शांत हिन्द महासागर की संकल्पना पर आगे बढ़ सकता है| · मालदीव का EEZ बहुत बड़ा है जिसकी सुरक्षा वह स्वयं नहीं कर सकता है अतः भारत को नेट सिक्यूरिटी प्रोवाइडर होना पडेगा अन्यथा चीन का महत्त्व बढेगा| इसी प्रकार मालदीव का ऋण ढांचा चीन के पक्ष में है अतः भारत को आर्थिक सहयोग करना होगा| · मालदीव सार्क का सदस्य है, यदि भारत को सार्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है तो उसे मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता होगी | · हिन्द महासागर में अपना प्रभाव बेहतर बनाए रखने के लिए मालदीव के साथ सम्बन्धों को बेहतर बनाए रखना आवश्यक है · यामीन के समय में मालदीव में चीन एवं पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ा है और कट्टरपंथ मजबूत हुआ था जिससे भारतीय सुरक्षा के प्रति चुनौती उत्पन्न होती है, अतः बढ़ते कट्टरपंथ को रोकना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा · भारत मालदीव के मध्य नृजातीय, सांस्कृतिक सम्बन्ध है, भारत के लगभग 25हजार लोग मालदीव में काम करते हैं अतः वहां की कुल जनसंख्या के लगभग 10 % आकार वाले डायस्पोरा की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है · भारत के भुगतान संतुलन को संतुलित रखने में मालदीव भारत के लिए महत्वपूर्ण है| मालदीव समुद्री व्यापार मार्ग पर स्थित है अतः यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है · मालदीव का विशाल EEZ ब्लू अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है अतः भारत को अपेक्षित तकनीकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा| सहयोग के आयाम · 2015 में कूटनीतिक रिश्तों को स्थापित हुए 50 वर्ष हो गए हैं| मालदीव के महत्त्व को देखते हुए भारत ने निरंतर एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभायी है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं · मालदीव में भारत ने अनेकों विकासात्मक परियोजनाएं चला रखी हैं जैसे इंडिया गाँधी अस्पताल, हुलहुल माले में हाउसिंग प्रोजेक्ट आदि · भारत ने मालदीव कोरियायती दरों पर 1.4 बिलियन डॉलर का आर्थिक सहयोग दिया है · मालदीव के लिए भारत निरंतर एक खाद्य आपूर्तिकर्ता राष्ट्र रहा है · युक्रेन संकट के दौरान भारत ने मालदीव के छात्रों को युक्रेन से बाहर निकाला · 2014 के जल संकट के दौरान ने भारत द्वारा मालदीव में जलापूर्ति की गयी है · मालदीव के तटीय जल की निगरानी के लिए भारतीय नौसेना के हेलीकाप्टर दिए गए हैं · मालदीव के जल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वहां के अनेक द्वीपों में भारतीय रडार लगाए गए हैं · अभी हाल ही में सोलेह के भारत आगमन पर भारत द्वारा विभिन्न सहयोग किये गए हैं यथा हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में भारत द्वारा सहयोग दिया जाएगा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग बढाया जा रहा है, मालदीव के साथ कार्गो सेवाओं को बढाया जाएगा इससे दोनों के मध्य व्यापार बढेगा, कस्टम सम्बन्धी सेवाओं का विस्तार किया जाएगा इसके साथ ही वाणिज्यिक सेवाओं में लगे हुए जलयानों से सम्बन्धित आंकड़ों को साझा किया जाएगा, इससे भारत को हिंद महासागर के ट्रैफिक का अनुमान लगाने में आसानी होगी, इसी के माध्यम से सैन्य जलयानों की गतिविधियों पर भी नजर रखा जा सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत ने गुजराल सिद्धांत का अनुकरण करते हुए मालदीव के साथ सहयोग के महत्वपूर्ण मानदंड स्थापित किये हैं फिर भी भारत के लिए मालदीव को कट्टरपंथ से मुक्त एवं राजनीतिक रूप से स्थिर एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करना आवश्यक है ताकि हिंद महासागर में भारत के राष्ट्रीय हित सुरक्षित रह सकें|
##Question:भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये |(150 से 200 शब्द) Explain the importance of Maldives in the context of India. Also list the cooperation made by India in Maldives. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत मालदीव सम्बन्धों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत द्वारा मालदीव में किये गए सहयोग को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में सहयोग के अन्य आयामों को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मालदीव हिन्द महासागर में लगभग 1200 द्वीप से युक्त एक द्वीपीय राष्ट्र है| भारत ने मालदीव के साथ अपने कूटनीतिक सम्बन्ध 1996 में स्थापित किये| मालदीव में आंतरिक अशांति के समय मालदीव की मांग पर भारत द्वारा वहां ऑपरेशन कैक्टस किया गया था, उसके बाद 1996 से लेकर 2008 तक मालदीव भारत प्रथम की नीति पर चल रहा था| इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के कारण मालदीव में भारत का प्रभाव कम होता गया था| किन्तु वर्ष 2018 से सम्बन्धों में पुनः सुधार होने लगे हैं| हिन्द महासागर में भारतीय हितों को देखते हुए मालदीव एक महत्वपूर्ण राष्ट्र है| भारत के सन्दर्भ में मालदीव का महत्त्व · मालदीव एक सामरिक लोकेशन पर स्थित है, इसमें लगभग 1200 द्वीप है इनमें बहुत से द्वीपों पर मानव आवास नहीं है अतः इनको किसी देश को लीज पर दिया जा सकता है , जिससे भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं| · हिन्दमहासागर में भारत एक बड़ी शक्ति है किन्तु यदि मालदीव किसी देश को अपने द्वीप लीज पर देता है तो हिन्द महासागर का सैन्यीकरण होने लगेगा जिससे भारत के हित प्रभावित होंगे| · हिंद महासागर में चीन को प्रतिसंतुलित करने सन्दर्भ में मालदीव महत्वपूर्ण है ,मालदीव के माध्यम से भारत शांत हिन्द महासागर की संकल्पना पर आगे बढ़ सकता है| · मालदीव का EEZ बहुत बड़ा है जिसकी सुरक्षा वह स्वयं नहीं कर सकता है अतः भारत को नेट सिक्यूरिटी प्रोवाइडर होना पडेगा अन्यथा चीन का महत्त्व बढेगा| इसी प्रकार मालदीव का ऋण ढांचा चीन के पक्ष में है अतः भारत को आर्थिक सहयोग करना होगा| · मालदीव सार्क का सदस्य है, यदि भारत को सार्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है तो उसे मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता होगी | · हिन्द महासागर में अपना प्रभाव बेहतर बनाए रखने के लिए मालदीव के साथ सम्बन्धों को बेहतर बनाए रखना आवश्यक है · यामीन के समय में मालदीव में चीन एवं पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ा है और कट्टरपंथ मजबूत हुआ था जिससे भारतीय सुरक्षा के प्रति चुनौती उत्पन्न होती है, अतः बढ़ते कट्टरपंथ को रोकना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा · भारत मालदीव के मध्य नृजातीय, सांस्कृतिक सम्बन्ध है, भारत के लगभग 25हजार लोग मालदीव में काम करते हैं अतः वहां की कुल जनसंख्या के लगभग 10 % आकार वाले डायस्पोरा की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है · भारत के भुगतान संतुलन को संतुलित रखने में मालदीव भारत के लिए महत्वपूर्ण है| मालदीव समुद्री व्यापार मार्ग पर स्थित है अतः यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है · मालदीव का विशाल EEZ ब्लू अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है अतः भारत को अपेक्षित तकनीकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा| सहयोग के आयाम · 2015 में कूटनीतिक रिश्तों को स्थापित हुए 50 वर्ष हो गए हैं| मालदीव के महत्त्व को देखते हुए भारत ने निरंतर एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभायी है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं · मालदीव में भारत ने अनेकों विकासात्मक परियोजनाएं चला रखी हैं जैसे इंडिया गाँधी अस्पताल, हुलहुल माले में हाउसिंग प्रोजेक्ट आदि · भारत ने मालदीव कोरियायती दरों पर 1.4 बिलियन डॉलर का आर्थिक सहयोग दिया है · मालदीव के लिए भारत निरंतर एक खाद्य आपूर्तिकर्ता राष्ट्र रहा है · युक्रेन संकट के दौरान भारत ने मालदीव के छात्रों को युक्रेन से बाहर निकाला · 2014 के जल संकट के दौरान ने भारत द्वारा मालदीव में जलापूर्ति की गयी है · मालदीव के तटीय जल की निगरानी के लिए भारतीय नौसेना के हेलीकाप्टर दिए गए हैं · मालदीव के जल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वहां के अनेक द्वीपों में भारतीय रडार लगाए गए हैं · अभी हाल ही में सोलेह के भारत आगमन पर भारत द्वारा विभिन्न सहयोग किये गए हैं यथा हाइड्रोग्राफी के क्षेत्र में भारत द्वारा सहयोग दिया जाएगा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग बढाया जा रहा है, मालदीव के साथ कार्गो सेवाओं को बढाया जाएगा इससे दोनों के मध्य व्यापार बढेगा, कस्टम सम्बन्धी सेवाओं का विस्तार किया जाएगा इसके साथ ही वाणिज्यिक सेवाओं में लगे हुए जलयानों से सम्बन्धित आंकड़ों को साझा किया जाएगा, इससे भारत को हिंद महासागर के ट्रैफिक का अनुमान लगाने में आसानी होगी, इसी के माध्यम से सैन्य जलयानों की गतिविधियों पर भी नजर रखा जा सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत ने गुजराल सिद्धांत का अनुकरण करते हुए मालदीव के साथ सहयोग के महत्वपूर्ण मानदंड स्थापित किये हैं फिर भी भारत के लिए मालदीव को कट्टरपंथ से मुक्त एवं राजनीतिक रूप से स्थिर एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करना आवश्यक है ताकि हिंद महासागर में भारत के राष्ट्रीय हित सुरक्षित रह सकें|
47,160
साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए, भारत में इसके उदय के कारणों को संक्षेप में बताइए | साथ ही चर्चा कीजिये कि " भारत का विभाजन, साम्प्रदायिकता के विकास का परिणाम था |" (150-200 शब्द, 10 अंक) While defining communalism, briefly explain the reasons for its rise in India. Also discuss that "the partition of India was the result of the development of communalism." (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच - भूमिका में साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए इसके उदय के कारणों की संक्षेप में जानकारी दीजिये | प्रथम भाग में विभाजन तक साम्प्रदायिकता के विकास की जानकारी दीजिये | दूसरे भाग में विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि दीजिये | साम्प्रदायिकता के चरमोत्कर्ष के रूप में विभाजन की जानकारी के साथ निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - तात्विक रूप में साम्प्रदायिकता धर्म का राजनीतिक व्यापार है| अर्थात धर्म का राजनीतिक रूप से उपयोग करना साम्प्रदायिकता होती है| साम्प्रदायिकता की विचारधारा में एक ही समूह या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों के हित समान होते हैं| साम्प्रदायिकता की विचारधारा का मानना है कि बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के हितों से भिन्न हैं| अपने चरम रूप में यह विचारधारा मानती है कि विभिन्न धर्मो या समुदायों के हित एक दूसरे से भिन्न होने के साथ ही साथ एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। अर्थात दो विभिन्न समुदाय एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के हित से टकराते हैं। उदय के कारण - औपनिवेशिक काल में भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ | उभरते मध्यवर्ग के बीच की प्रतिद्वंद्विता, विभाजक ब्रिटिश नीतियाँ | सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के पश्च प्रभाव आदि कारकों ने साम्प्रदायिकता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | विभिन्न कारकों ने साम्प्रदायिकता के विकास को सुनिश्चित किया जिसके चरमोत्कर्ष के रूप में भारत को विभाजन का सामना करना पड़ा, आदि | विभाजन तक साम्प्रदायिकता का विकास साम्प्रदायिकता का विकास 19वीं सदी अंतिम दशकों से शुरू होता है | इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक भूमिका निभायी| ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के विरुद्ध सक्रिय करने का प्रयास किया उदाहरणार्थ सर सैय्यद अहमद खान को कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित करना | 20वीं सदी के आरंभिक चरण में ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति को महत्व दिया| इस संदर्भ में बंगाल विभाजन, मुस्लिम लीग की स्थापना में ब्रिटिश सरकार की भूमिका को देख सकते हैं | 1909 के अधिनियम में पृथक निर्वाचन का प्रावधान कर ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान कर दी | 20 वीं सदी के दूसरे दशक से प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक संगठनों की स्थापना का क्रम शुरू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिकता के विकास को एक नवीन चरण में पहुचा दिया| इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा, अकाली दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिकाओं को देखा जा सकता है| 1916 का लखनऊ समझौता अनेक मायनों में प्रगतिशील था लेकिन इसने साम्प्रदायिक शक्तियों को मान्यता प्रदान कर दी|कांग्रेस ने इसके द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। समझौते में यह निहित था कि भारत विभिन्न समुदायों का देश है तथा हित भिन्न-भिन्न हैं। कालांतर में इसके हानिकारक नतीजे निकले | खिलाफत आन्दोलन का आधार साम्प्रदायिक था| इसी समय स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्यसमाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसका उद्देश्य इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाना था। मुसलमानों ने इनके विरोध में तंजीम और तबलीग आंदोलन चलाये।इससे साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी | 1928 में नेहरु रिपोर्ट के विरोध में जिन्ना के 14 सूत्री मांगों का प्रस्तुत किया जाना और इस अवसर पर मुस्लिम लीग से समझौता करने की कोशिश करते हुये कांग्रेस नेतृत्व से हुई अनेक गलतियों ने साम्प्रदायिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध उदार दृष्टिकोण जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य कांग्रेस के सदस्य हो सकते थे, साम्प्रदायिक नेताओं से वार्ता की रणनीति, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अभियान न चलानाआदि | 1935 तक साम्प्रदायिक संगठनों की अधिकाँश मांगें सरकार ने मान ली थी इस संदर्भ में जिन्ना की 14 सूत्री मांगों को स्वीकार करना उल्लेखनीय है | इसी समय सरकार के द्वारा सांप्रदायिक संगठनों को किसी न किसी रूप में खुला समर्थन देना शुरू किया जैसे अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मलेन आदि में देखा जा सकता है | 1945 तक साम्प्रदायिक संगठनों के जनाधार का भी विस्तार हुआ और सम्प्रदायवाद एक संगठित जन-आंदोलन के रूप में प्रारंभ हो गया, जिसका मुख्य आधार समाज का मध्य एवं उच्च वर्ग था। अब लीग के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरी मजबूती के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा और भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी | 1945 से 1947 के मध्य पाकिस्तान की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में अंतरिम सरकार एवं प्रांतीय सरकारें विफल रही| ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई| इसके साथ ही रियासतों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग, अलग सिक्ख राज्य की मांग जैसी गतिविधियों के कारण परिस्थितियाँ अत्यंत ही गंभीर थीं | इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दो ही विकल्प थे- प्रथम- साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखना, इसमें देश के अनेक टुकड़ों में विघटन का खतरा था | द्वितीय- पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता की आग से लोगों को बचाना तथा जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक एकता व अखंडता को बनाये रखना | दूसरा विकल्प यद्यपि दुखद अवश्य था लेकिन राष्ट्र हित में इसी विकल्प को महत्त्व दिया गया|इस तरह से साप्रदायिकता का चरमोत्कर्ष भारत के विभाजन के रूप में देखा जा सकता है |
##Question:साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए, भारत में इसके उदय के कारणों को संक्षेप में बताइए | साथ ही चर्चा कीजिये कि " भारत का विभाजन, साम्प्रदायिकता के विकास का परिणाम था |" (150-200 शब्द, 10 अंक) While defining communalism, briefly explain the reasons for its rise in India. Also discuss that "the partition of India was the result of the development of communalism." (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए इसके उदय के कारणों की संक्षेप में जानकारी दीजिये | प्रथम भाग में विभाजन तक साम्प्रदायिकता के विकास की जानकारी दीजिये | दूसरे भाग में विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि दीजिये | साम्प्रदायिकता के चरमोत्कर्ष के रूप में विभाजन की जानकारी के साथ निष्कर्ष लिखिए | उत्तर - तात्विक रूप में साम्प्रदायिकता धर्म का राजनीतिक व्यापार है| अर्थात धर्म का राजनीतिक रूप से उपयोग करना साम्प्रदायिकता होती है| साम्प्रदायिकता की विचारधारा में एक ही समूह या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी लोगों के हित समान होते हैं| साम्प्रदायिकता की विचारधारा का मानना है कि बहुभाषी समाज में एक धर्म के अनुयायियों के हित अन्य किसी भी धर्म के अनुयायियों के हितों से भिन्न हैं| अपने चरम रूप में यह विचारधारा मानती है कि विभिन्न धर्मो या समुदायों के हित एक दूसरे से भिन्न होने के साथ ही साथ एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। अर्थात दो विभिन्न समुदाय एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के हित से टकराते हैं। उदय के कारण - औपनिवेशिक काल में भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ | उभरते मध्यवर्ग के बीच की प्रतिद्वंद्विता, विभाजक ब्रिटिश नीतियाँ | सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों के पश्च प्रभाव आदि कारकों ने साम्प्रदायिकता के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | विभिन्न कारकों ने साम्प्रदायिकता के विकास को सुनिश्चित किया जिसके चरमोत्कर्ष के रूप में भारत को विभाजन का सामना करना पड़ा, आदि | विभाजन तक साम्प्रदायिकता का विकास साम्प्रदायिकता का विकास 19वीं सदी अंतिम दशकों से शुरू होता है | इस संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने प्रारम्भिक भूमिका निभायी| ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के विरुद्ध सक्रिय करने का प्रयास किया उदाहरणार्थ सर सैय्यद अहमद खान को कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाने के लिए प्रोत्साहित करना | 20वीं सदी के आरंभिक चरण में ब्रिटिश सरकार ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति को महत्व दिया| इस संदर्भ में बंगाल विभाजन, मुस्लिम लीग की स्थापना में ब्रिटिश सरकार की भूमिका को देख सकते हैं | 1909 के अधिनियम में पृथक निर्वाचन का प्रावधान कर ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान कर दी | 20 वीं सदी के दूसरे दशक से प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक संगठनों की स्थापना का क्रम शुरू होता है जिन्होंने साम्प्रदायिकता के विकास को एक नवीन चरण में पहुचा दिया| इस सन्दर्भ में हिन्दू महासभा, अकाली दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिकाओं को देखा जा सकता है| 1916 का लखनऊ समझौता अनेक मायनों में प्रगतिशील था लेकिन इसने साम्प्रदायिक शक्तियों को मान्यता प्रदान कर दी|कांग्रेस ने इसके द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया। समझौते में यह निहित था कि भारत विभिन्न समुदायों का देश है तथा हित भिन्न-भिन्न हैं। कालांतर में इसके हानिकारक नतीजे निकले | खिलाफत आन्दोलन का आधार साम्प्रदायिक था| इसी समय स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में आर्यसमाज ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसका उद्देश्य इस्लाम धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाना था। मुसलमानों ने इनके विरोध में तंजीम और तबलीग आंदोलन चलाये।इससे साम्प्रदायिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी | 1928 में नेहरु रिपोर्ट के विरोध में जिन्ना के 14 सूत्री मांगों का प्रस्तुत किया जाना और इस अवसर पर मुस्लिम लीग से समझौता करने की कोशिश करते हुये कांग्रेस नेतृत्व से हुई अनेक गलतियों ने साम्प्रदायिकता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध उदार दृष्टिकोण जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य कांग्रेस के सदस्य हो सकते थे, साम्प्रदायिक नेताओं से वार्ता की रणनीति, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अभियान न चलानाआदि | 1935 तक साम्प्रदायिक संगठनों की अधिकाँश मांगें सरकार ने मान ली थी इस संदर्भ में जिन्ना की 14 सूत्री मांगों को स्वीकार करना उल्लेखनीय है | इसी समय सरकार के द्वारा सांप्रदायिक संगठनों को किसी न किसी रूप में खुला समर्थन देना शुरू किया जैसे अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, शिमला सम्मलेन आदि में देखा जा सकता है | 1945 तक साम्प्रदायिक संगठनों के जनाधार का भी विस्तार हुआ और सम्प्रदायवाद एक संगठित जन-आंदोलन के रूप में प्रारंभ हो गया, जिसका मुख्य आधार समाज का मध्य एवं उच्च वर्ग था। अब लीग के द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरी मजबूती के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा और भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि निर्मित होने लगी | 1945 से 1947 के मध्य पाकिस्तान की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में अंतरिम सरकार एवं प्रांतीय सरकारें विफल रही| ब्रिटिश सरकार ने भी दंगों को रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई| इसके साथ ही रियासतों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग, अलग सिक्ख राज्य की मांग जैसी गतिविधियों के कारण परिस्थितियाँ अत्यंत ही गंभीर थीं | इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दो ही विकल्प थे- प्रथम- साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखना, इसमें देश के अनेक टुकड़ों में विघटन का खतरा था | द्वितीय- पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता की आग से लोगों को बचाना तथा जहाँ तक संभव हो अधिक से अधिक एकता व अखंडता को बनाये रखना | दूसरा विकल्प यद्यपि दुखद अवश्य था लेकिन राष्ट्र हित में इसी विकल्प को महत्त्व दिया गया|इस तरह से साप्रदायिकता का चरमोत्कर्ष भारत के विभाजन के रूप में देखा जा सकता है |
47,163
अपवाह प्रणाली(Drainage System) से आप क्या समझते हैं? साथ ही, समझाईए कि हिमालयी नदियाँ किस प्रकार प्रायद्वीपीय नदियों से भिन्न हैं? ( 10 अंक /150-200 शब्द) What do you understand by Drainage System? Also, explain how Himalayan Rivers are different from Peninsular Rivers? (10 Marks /150-200 words)
एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में, अपवाह प्रणाली को समझाते हुए विभिन्न अपवाह प्रणालियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए| अगले भाग में, यह समझाइए कि हिमालयी नदियां किस प्रकार प्रायद्वीपीय नदियों से भिन्न हैं अर्थात हिमालयी नदियां तथा प्रायद्वीपीय नदियों के मध्य तुलना कीजिए| उत्तर- निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जल प्रवाह को अपवाह कहते हैं तथा इन्हीं वाहिकाओं का संपूर्ण जाल "अपवाह प्रणाली" कहलाता है| यह नदी एवं उसकी सहायक नदियों का एकीकृत तंत्र है जो सतह के जल को संग्रहित कर समुद्र में प्रवाहित करता है| किसी भी प्रदेश की अपवाह प्रणाली वहां की भूवैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति एवं संरचना, स्थलाकृति, ढ़ाल, बहते हुए जल की मात्रा एवं बहाव की अवधि का परिणाम होती है| सामान्यतः अपवाह प्रणाली को दो रूपों में विभाजित किया जाता है- क्रमबद्ध(Sequent) अपवाह प्रणाली -ढ़ालों केअनुरूप प्रवाहित होने वाली नदियों को क्रमबद्ध अपवाह कहते हैं| इनमें अनुवर्ती(Consequent), परवर्ती(Subsequent), प्रतिअनुवर्ती(Obsequent) तथा नवानुवर्ती(Resequent) नदियाँ शामिल होते हैं| अक्रमबद्ध(Insequent) अपवाह प्रणाली- जो नदियां क्षेत्रीय ढाल के प्रतिकूल तथा भूवैज्ञानिक संरचना के आर-पार प्रवाहित होती है उन्हें अक्रमबद्ध नदी कहा जाता है| इनमें भूसंरचना और अपवाह प्रणाली में सामंजस्य का अभाव होता है|इनमें पूर्ववर्ती(Antecedent) अपवाह प्रणाली तथाअध्यारोपित(Superimposed) अपवाह प्रणाली शामिल हैं| भारतीय अपवाह तंत्र मुख्य रूप से उपमहाद्वीप की स्थलाकृतिक बनावट द्वारा नियंत्रित होता है| उद्गम के आधार पर भारतीय अपवाह तंत्र को दो भागों में बांटा जा सकता है- हिमालयी अपवाह तंत्र तथा प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र| हिमालय से निकलने वाली नदियां तथा प्रायद्वीपीय भाग से निकलने वाली नदियां प्राथमिक तौर पर दोनों क्षेत्रों के जलवायु और उच्चावच में अंतर का परिणाम है| हिमालयी नदियां तथा प्रायद्वीपीय नदियों के मध्य तुलना उद्गम स्थल के आधार पर- जहां हिमालय नदियां ग्लेशियर से ढके हिमालय पर्वत से निकलती है वही प्रायद्वीपीय नदियां प्रायद्वीपीय पठार एवं मध्य-उच्च भूमि के विभिन्न भागों से निकलती है| दोनों के भूगार्भिक संरचना में अंतर एवं ढ़ाल तथा चट्टान की प्रकृति में भिन्नता की वजह; प्रवाह की प्रवृत्ति- हिमालय नदियां बारहमासी होती हैं एवं हिमनदतथा वर्षा से जल की प्राप्ति करती हैं| वही प्रायद्वीपीय नदियां मौसमी होती है तथा ज्यादातर मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती हैं| अपवाह के प्रकार- हिमालय नदियां पूर्ववर्ती एवं अनुवर्ती अपवाह प्रणाली के उदाहरण है तथा मैदानी भागों मेंवे वृक्षाकारीय अपवाह प्रतिरूप बनाती है|वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियांअध्यारोपित एवं पुनर्युवनित नदियाँ है जोअरीय एवं आयताकार अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं| नदी की प्रकृति- हिमालयीनदियां लंबा मार्ग तय करती है जिसमें वे उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरतीहैं तथाशीर्ष अपरदन एवं नदी अपहरण के अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करती हैं| हिमालय नदियां मैदानों में जलमार्ग बदलती हैं तथा विसर्प का भी निर्माण करती हैं| वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियां सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे एवं निश्चित मार्ग का अनुसरण करती है| भाभर, तराई, खादर, बांगर आदि का हिमालयी नदीतंत्र में विकास वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; गुंफित सरिता, नदी-विसर्पण, गोखुर झील आदि हिमालयी नदीतंत्र में वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; जल ग्रहण क्षेत्र- हिमालयी नदियां विशाल द्रोणी के जल ग्रहण क्षेत्रों के उदाहरणहैं वही प्रायद्वीपीय नदियां अपेक्षाकृत छोटी द्रोणी के उदाहरण हैं| ढ़ाल की तीव्रता- हिमालयी नदियाँ तेज ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं वहीँ प्रायद्वीपीय नदियाँ मंद ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं| इसकी वजह से हिमालयी नदियों की अवसादों को ढ़ोने की क्षमता प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है|साथ ही, अवसादों की मात्रा भी हिमालयी नदियों में प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है| नदी की आयु- हिमालय नदियां युवा एवं क्रियाशील हैं एवं अपने तेज रफ्तार से घाटियों को गहरा करते जा रही हैं वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्रवणित परिच्छेदिका वालीप्रौढ़ नदियां है जो अपने आधार तल तक पहुंच गई है| साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में नर्म अवसादी चट्टानों की वजह से भी हिमालयी नदियों की कटाव शक्ति तीव्र होती है वहीँ प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में कठोर चट्टानों की वजह से प्रायद्वीपीय नदियों की कटाव शक्ति कम होती है| सिंचाई- हिमालय नदियां मैदानी भागों और नहर प्रणाली के माध्यम से बहती है वही प्रायद्वीपीय नदियां असमतल पठारी भागों के ऊपर बहती हैं तथा नहर केवल डेल्टा प्रदेशों में ही अवस्थित हैं| जल विद्युत- पूर्वोत्तर क्षेत्र में हिमालय नदियों के द्वारा जल विद्युत की संभावित क्षमता अधिक है वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्राकृतिक जलप्रपातों केमाध्यम से विद्युत उत्पादन में सहायक हैं|
##Question:अपवाह प्रणाली(Drainage System) से आप क्या समझते हैं? साथ ही, समझाईए कि हिमालयी नदियाँ किस प्रकार प्रायद्वीपीय नदियों से भिन्न हैं? ( 10 अंक /150-200 शब्द) What do you understand by Drainage System? Also, explain how Himalayan Rivers are different from Peninsular Rivers? (10 Marks /150-200 words)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में, अपवाह प्रणाली को समझाते हुए विभिन्न अपवाह प्रणालियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए| अगले भाग में, यह समझाइए कि हिमालयी नदियां किस प्रकार प्रायद्वीपीय नदियों से भिन्न हैं अर्थात हिमालयी नदियां तथा प्रायद्वीपीय नदियों के मध्य तुलना कीजिए| उत्तर- निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जल प्रवाह को अपवाह कहते हैं तथा इन्हीं वाहिकाओं का संपूर्ण जाल "अपवाह प्रणाली" कहलाता है| यह नदी एवं उसकी सहायक नदियों का एकीकृत तंत्र है जो सतह के जल को संग्रहित कर समुद्र में प्रवाहित करता है| किसी भी प्रदेश की अपवाह प्रणाली वहां की भूवैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति एवं संरचना, स्थलाकृति, ढ़ाल, बहते हुए जल की मात्रा एवं बहाव की अवधि का परिणाम होती है| सामान्यतः अपवाह प्रणाली को दो रूपों में विभाजित किया जाता है- क्रमबद्ध(Sequent) अपवाह प्रणाली -ढ़ालों केअनुरूप प्रवाहित होने वाली नदियों को क्रमबद्ध अपवाह कहते हैं| इनमें अनुवर्ती(Consequent), परवर्ती(Subsequent), प्रतिअनुवर्ती(Obsequent) तथा नवानुवर्ती(Resequent) नदियाँ शामिल होते हैं| अक्रमबद्ध(Insequent) अपवाह प्रणाली- जो नदियां क्षेत्रीय ढाल के प्रतिकूल तथा भूवैज्ञानिक संरचना के आर-पार प्रवाहित होती है उन्हें अक्रमबद्ध नदी कहा जाता है| इनमें भूसंरचना और अपवाह प्रणाली में सामंजस्य का अभाव होता है|इनमें पूर्ववर्ती(Antecedent) अपवाह प्रणाली तथाअध्यारोपित(Superimposed) अपवाह प्रणाली शामिल हैं| भारतीय अपवाह तंत्र मुख्य रूप से उपमहाद्वीप की स्थलाकृतिक बनावट द्वारा नियंत्रित होता है| उद्गम के आधार पर भारतीय अपवाह तंत्र को दो भागों में बांटा जा सकता है- हिमालयी अपवाह तंत्र तथा प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र| हिमालय से निकलने वाली नदियां तथा प्रायद्वीपीय भाग से निकलने वाली नदियां प्राथमिक तौर पर दोनों क्षेत्रों के जलवायु और उच्चावच में अंतर का परिणाम है| हिमालयी नदियां तथा प्रायद्वीपीय नदियों के मध्य तुलना उद्गम स्थल के आधार पर- जहां हिमालय नदियां ग्लेशियर से ढके हिमालय पर्वत से निकलती है वही प्रायद्वीपीय नदियां प्रायद्वीपीय पठार एवं मध्य-उच्च भूमि के विभिन्न भागों से निकलती है| दोनों के भूगार्भिक संरचना में अंतर एवं ढ़ाल तथा चट्टान की प्रकृति में भिन्नता की वजह; प्रवाह की प्रवृत्ति- हिमालय नदियां बारहमासी होती हैं एवं हिमनदतथा वर्षा से जल की प्राप्ति करती हैं| वही प्रायद्वीपीय नदियां मौसमी होती है तथा ज्यादातर मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहती हैं| अपवाह के प्रकार- हिमालय नदियां पूर्ववर्ती एवं अनुवर्ती अपवाह प्रणाली के उदाहरण है तथा मैदानी भागों मेंवे वृक्षाकारीय अपवाह प्रतिरूप बनाती है|वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियांअध्यारोपित एवं पुनर्युवनित नदियाँ है जोअरीय एवं आयताकार अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं| नदी की प्रकृति- हिमालयीनदियां लंबा मार्ग तय करती है जिसमें वे उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरतीहैं तथाशीर्ष अपरदन एवं नदी अपहरण के अनेकों उदाहरण प्रस्तुत करती हैं| हिमालय नदियां मैदानों में जलमार्ग बदलती हैं तथा विसर्प का भी निर्माण करती हैं| वहीँ, प्रायद्वीपीय नदियां सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे एवं निश्चित मार्ग का अनुसरण करती है| भाभर, तराई, खादर, बांगर आदि का हिमालयी नदीतंत्र में विकास वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; गुंफित सरिता, नदी-विसर्पण, गोखुर झील आदि हिमालयी नदीतंत्र में वहीँ प्रायद्वीपीय नदीतंत्र में अनुपस्थित; जल ग्रहण क्षेत्र- हिमालयी नदियां विशाल द्रोणी के जल ग्रहण क्षेत्रों के उदाहरणहैं वही प्रायद्वीपीय नदियां अपेक्षाकृत छोटी द्रोणी के उदाहरण हैं| ढ़ाल की तीव्रता- हिमालयी नदियाँ तेज ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं वहीँ प्रायद्वीपीय नदियाँ मंद ढ़ाल के क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं| इसकी वजह से हिमालयी नदियों की अवसादों को ढ़ोने की क्षमता प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है|साथ ही, अवसादों की मात्रा भी हिमालयी नदियों में प्रायद्वीपीय नदियों के मुकाबले ज्यादा होती है| नदी की आयु- हिमालय नदियां युवा एवं क्रियाशील हैं एवं अपने तेज रफ्तार से घाटियों को गहरा करते जा रही हैं वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्रवणित परिच्छेदिका वालीप्रौढ़ नदियां है जो अपने आधार तल तक पहुंच गई है| साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में नर्म अवसादी चट्टानों की वजह से भी हिमालयी नदियों की कटाव शक्ति तीव्र होती है वहीँ प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में कठोर चट्टानों की वजह से प्रायद्वीपीय नदियों की कटाव शक्ति कम होती है| सिंचाई- हिमालय नदियां मैदानी भागों और नहर प्रणाली के माध्यम से बहती है वही प्रायद्वीपीय नदियां असमतल पठारी भागों के ऊपर बहती हैं तथा नहर केवल डेल्टा प्रदेशों में ही अवस्थित हैं| जल विद्युत- पूर्वोत्तर क्षेत्र में हिमालय नदियों के द्वारा जल विद्युत की संभावित क्षमता अधिक है वहीं प्रायद्वीपीय नदियां प्राकृतिक जलप्रपातों केमाध्यम से विद्युत उत्पादन में सहायक हैं|
47,167
अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दों को समझाते हुए सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Explaining the issues related to Scheduled Tribes, discuss the efforts of the government in this direction. (150-200 words)
दृष्टिकोण भूमिका में अनुसूचित जनजाति का संक्षिप्त परिचयदीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इनसे जुड़े मुद्दो को बताइये । उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़ापन जनजाति समाज से संबन्धित मुद्दो में प्रमुख मुद्दे जल ,जमीन और जंगल को लेकर है। जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है: ब्रिटिश उपनिवेशवाद के फलस्वरूप इन जनजाति समूहो का तेजी से विस्थापन प्रारम्भ हुआ क्योकि ये अधिकांशतः उन क्षेत्रो में पाये जाते थे , जहां पर प्राकृतिक स्त्रोत के भंडार थे । परियोजनाओ की स्थापना के साथ ही इनके पुनर्वास की कोई प्रभावी व्यवस्था नही की जाती है । जिससे इनके अंदर असंतोष उत्पन्न होता है । वर्तमान समय में हो रहे जंगलो के विनाश ने जंगली जानवरो के साथ साथ इन वनवासी समुदाय को भी जंगल से बाहर रहने वाले मानव समुदाय के संपर्क में आने को मजबूर किया है , जिससे इनके और मुख्य धारा के लोगों के बीच कोन्फ़्लिक्त बढ़ता जा रहा है । प्रकृति संसाधनो के दोहन के कारण इनको अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है और यही क्रम आज भी जारी है तथा विभिन्न विकासपरक परियोजनाओ के कारण इनको जमीनो का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया जाता है । विस्थापन के साथ साथ इनमे अपनी संस्कृति के क्षरण के कारण भी असंतोष उत्पन्न होता है । भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास: सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा (PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को छात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं। अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
##Question:अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दों को समझाते हुए सरकार द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासो की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Explaining the issues related to Scheduled Tribes, discuss the efforts of the government in this direction. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में अनुसूचित जनजाति का संक्षिप्त परिचयदीजिए। उत्तर के दूसरे भाग में इनसे जुड़े मुद्दो को बताइये । उत्तर के तीसरे भाग में सरकार द्वारा उनके सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयासों की चर्चाकीजिए। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । जनजातीय समूहों से तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने उन समूहों से है जो एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखते हैं तथा परम्परागत आय स्रोतों द्वारा निम्न आय वर्ग के जीविकोपार्जन में सम्मिलित हैं।अनुच्छेद 342 के अंतर्गत आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का समावेश करते हुए उपरोक्त लिखित परिभाषा प्रतिपादित की गई जिसे इन समूहों के समाज कल्याण हेतु प्रयोग किया जाए।इन समुदायों की आवश्यक विशेषताएं हैं:- आदिम लक्षण भौगोलिक अलगाव भिन्न संस्कृति बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क की शर्म आर्थिक रूप से पिछड़ापन जनजाति समाज से संबन्धित मुद्दो में प्रमुख मुद्दे जल ,जमीन और जंगल को लेकर है। जिनको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है: ब्रिटिश उपनिवेशवाद के फलस्वरूप इन जनजाति समूहो का तेजी से विस्थापन प्रारम्भ हुआ क्योकि ये अधिकांशतः उन क्षेत्रो में पाये जाते थे , जहां पर प्राकृतिक स्त्रोत के भंडार थे । परियोजनाओ की स्थापना के साथ ही इनके पुनर्वास की कोई प्रभावी व्यवस्था नही की जाती है । जिससे इनके अंदर असंतोष उत्पन्न होता है । वर्तमान समय में हो रहे जंगलो के विनाश ने जंगली जानवरो के साथ साथ इन वनवासी समुदाय को भी जंगल से बाहर रहने वाले मानव समुदाय के संपर्क में आने को मजबूर किया है , जिससे इनके और मुख्य धारा के लोगों के बीच कोन्फ़्लिक्त बढ़ता जा रहा है । प्रकृति संसाधनो के दोहन के कारण इनको अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है और यही क्रम आज भी जारी है तथा विभिन्न विकासपरक परियोजनाओ के कारण इनको जमीनो का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया जाता है । विस्थापन के साथ साथ इनमे अपनी संस्कृति के क्षरण के कारण भी असंतोष उत्पन्न होता है । भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सशक्तीकरण हेतु किये गए प्रयास: सविंधान की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है। अनुसूची 6 मेंअसम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे। 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।वर्ष 1996 में पेसा (PESA) कानूनके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज सस्थाओं का एक्सटेंशन। पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक ट्राइबल उप प्लान बनाते हुए आनुपातिक धन आवंटन की प्रक्रिया लायी गई जिससे जहाँ इन जनजातीय समूहों का सांद्रण हो वहां पर अधिक धन आवंटन सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1986-87 में ट्राईफेड के अंतर्गत उन सभी गैर सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जो जनजातीय समूहों के विकास की दिशा में कार्यरत हों। साथ ही उन्हें तकनीकी सहायता इत्यादि देते हुए रोजगार के विकल्प बढ़ाये जा रहे है। वर्ष 1989 में SC/ST एक्ट के अंतर्गत इन जनजातीय समूहों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक प्रताड़ना को दंडनीय अपराध माना गया है। वर्ष 1992 में ट्राइबल हाट परियोजना द्वारा इन जनजातीय समूहों को स्वरोजगार के विकल्प दिए जा रहे हैं। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत मेधावी क्षात्रों को छात्रवृति एवं प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निशुल्क सुविधाएँ भी उपलब्ध कराइ जा रहीं हैं। अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। वर्ष 2006 में फारेस्ट राइट एक्ट के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया कि किसी क्षेत्र विशेष में पाई जाने वाले जनजातियों का उस क्षेत्र पर उनका पहला स्वामित्व है। यदि वे इसका उपयोग गैर व्यवसाय जीविकोपार्जन हेतु कर रहे हों और यदि किसी भी कारणों से वे वंचित किये जाते हैं तो आवश्यक मुवावजा देते हुए उनके पुनर्स्थापन के प्रयास भी किये जायें। वर्ष 2013 में ऑपरेशन रोशनी के अंतर्गत विशेषकरनक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति समूहो के युवाओं के रोजगार के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2015 में वनबंधु कल्याण योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इन जनजातीय समूहों के संदर्भ में एक नई राजनीतिक चुनौती भी सामने आ रही है जहाँ पर नक्सलवाद के अंतर्गत यह जनजातीय समूह आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का हिस्सा बन गए हैं परंतु इस संदर्भ में यह समझना अनिवार्य है कि वे स्वयं शोषित हो रहे हैं अतः रोजगार इत्यादि के साधनों द्वारा इन जनजातीय समूहों को वामपंथी चरम की तरफ जाने से रोका जाए साथ ही जहां आवश्यक हो वहां दंडात्मक कार्यवाही करते हुए कानून व्यवस्था स्थापित की जाए।
47,171
What do you understand by Subsidy? Explain the necessity of subsidy in agriculture and also discuss the issues of subsidies. (150 words, 10 marks)
Approach- Explain the meaning of subsidy. State the need for subsidies in India. Highlight the issues related to direct and indirect subsidies In conclusion, end the answer by giving your suggestions/way forward in this regard. Answer: Subsidies are a type of transfer payment from the govt which is a one-sided payment where there is no change of goods and services in return. Need for subsidies in Agriculture: To increase the application of inputs that will increase production thereby providing a marketable surplus and ensuring food security in the country. Subsidization of inputs can positively influence the acceptance of new technology. Subsidies can help guard against price fluctuations for instance an increase in production can lead to an increase in supply that can depress the market prices causing farmer distress and also disincentivizing further production which can create shortages in the market. Price support can help in this scenario. Input subsidies can have a moderating effect on food prices thereby keeping food inflation in check Farm subsidies can cushion the pain of structural transformation where the decline in the income share of agriculture is faster than the decline in employment share which creates a substantial disparity in worker income across sectors. Types of Subsidies - Direct and Indirect subsidies (student can describe them via flow diagram) in a line Issues of Indirect subsidies- They are market-distorting as there are two prices for one product which creates an incentive for leakage, fraud, and diversion. Most of the indirect subsidies are cornered by rich and influential farmers thereby defeating the objective of the subsidy. The govt incurs a significant cost in administering and monitoring the supply chain of the subsidized products, the timing of delivery of products is of prime importance in agriculture, therefore the govt needs to ensure that subsidized products reach the farmer at the right time. Indirect subsidies provide less freedom to the beneficiaries as the benefit is linked to the product. Issues of Direct Subsidies - Identification of beneficiaries - in the absence of complete and updated land records the identification of farmers becomes a challenge. Further, the database can have both inclusion and exclusion errors. Inclusion errors are those where ineligible persons are included, and exclusion errors are those where eligible persons are excluded. Financial inclusion and literacy- The govt needs to ensure easy access to banks and the banking system and provide financial literacy so that farmers are not cheated The end use of the transfer cannot be controlled as the beneficiary may utilize the money as per their own wishes. If the transfer is not linked to inflation the real value delivered to the beneficiary would reduce over a period of time. A robust supply chain of the product has to be maintained to ensure regular and timely availability. Despite all the ill effects of subsidies, they cannot be eliminated from many sectors (food, fertilizers, electricity, etc.) and will have to focus more on the upliftment of the concerned sectors/classes rather than subsidies. At the same time, there is also a need as to how the subsidy should be delivered to the targeted sections in the right way. Initiatives like DBT and JAM are commendable in this regard. Therefore, Direct subsidies are more efficient and need to be implemented after addressing these challenges.
##Question:What do you understand by Subsidy? Explain the necessity of subsidy in agriculture and also discuss the issues of subsidies. (150 words, 10 marks)##Answer:Approach- Explain the meaning of subsidy. State the need for subsidies in India. Highlight the issues related to direct and indirect subsidies In conclusion, end the answer by giving your suggestions/way forward in this regard. Answer: Subsidies are a type of transfer payment from the govt which is a one-sided payment where there is no change of goods and services in return. Need for subsidies in Agriculture: To increase the application of inputs that will increase production thereby providing a marketable surplus and ensuring food security in the country. Subsidization of inputs can positively influence the acceptance of new technology. Subsidies can help guard against price fluctuations for instance an increase in production can lead to an increase in supply that can depress the market prices causing farmer distress and also disincentivizing further production which can create shortages in the market. Price support can help in this scenario. Input subsidies can have a moderating effect on food prices thereby keeping food inflation in check Farm subsidies can cushion the pain of structural transformation where the decline in the income share of agriculture is faster than the decline in employment share which creates a substantial disparity in worker income across sectors. Types of Subsidies - Direct and Indirect subsidies (student can describe them via flow diagram) in a line Issues of Indirect subsidies- They are market-distorting as there are two prices for one product which creates an incentive for leakage, fraud, and diversion. Most of the indirect subsidies are cornered by rich and influential farmers thereby defeating the objective of the subsidy. The govt incurs a significant cost in administering and monitoring the supply chain of the subsidized products, the timing of delivery of products is of prime importance in agriculture, therefore the govt needs to ensure that subsidized products reach the farmer at the right time. Indirect subsidies provide less freedom to the beneficiaries as the benefit is linked to the product. Issues of Direct Subsidies - Identification of beneficiaries - in the absence of complete and updated land records the identification of farmers becomes a challenge. Further, the database can have both inclusion and exclusion errors. Inclusion errors are those where ineligible persons are included, and exclusion errors are those where eligible persons are excluded. Financial inclusion and literacy- The govt needs to ensure easy access to banks and the banking system and provide financial literacy so that farmers are not cheated The end use of the transfer cannot be controlled as the beneficiary may utilize the money as per their own wishes. If the transfer is not linked to inflation the real value delivered to the beneficiary would reduce over a period of time. A robust supply chain of the product has to be maintained to ensure regular and timely availability. Despite all the ill effects of subsidies, they cannot be eliminated from many sectors (food, fertilizers, electricity, etc.) and will have to focus more on the upliftment of the concerned sectors/classes rather than subsidies. At the same time, there is also a need as to how the subsidy should be delivered to the targeted sections in the right way. Initiatives like DBT and JAM are commendable in this regard. Therefore, Direct subsidies are more efficient and need to be implemented after addressing these challenges.
47,183
Dismantling of administered price mechanism for fuels is being deemed as a significant piece of economic reform. Analyze. Discuss how the recently introduced dynamic fuel pricing can prove to be beneficial for both the OMCs and the consumers. (200 words)
Approach: Begin with a brief introduction about the administered price mechanism. Then, write about the benefits of the initiative (dismantling of APM) for Indian economy as a whole. Then explain recently introduced dynamic fuel pricing. Further give arguments for the benefits of dynamic price mechanism to OMCs and consumers. Answer: Administered price mechanism (APM) for fuels denotes that the price of fuel was set by the dictates of government rather than the market forces, that is, the prices were either administered or subsidized. Dismantling of APM is deemed to be beneficial for Indian economy because: It will lead to an efficient allocation of a scarce resource that was being overused by the consumers due to lower prices. The burden on the state fiscal accounts will also be reduced as higher imports of crude oil at higher prices due to increased demand need not be subsidised by state. The idea of providing returns on a cost-plus formula to OMCs was not encouraging to encourage efficiency in production because it was not at all profit-motivated. Under APM, state-run fuel retailers used to revise rates on the 1st and the 16th of every month, based on average international price in preceding fortnight and the currency exchange rate. In dynamic fuel pricing , retail selling prices of petrol and diesel will be revised daily. It would link daily sales at all their petrol pumps with the international prices of crude oil. Benefits of Dynamic Fuel Pricing for OMCs: Oil companies would be free to take independent decisions based on import parity and market forces in the pricing of petroleum products rather than being governed by the dictates of the government. Due to the reining in of speculative market forces, the impact of increasing/decreasing prices on the working capital of companies and dealers would be minimised. It ensures that OMCs do not lose out for an entire fortnight in the event of a sharp rise in crude prices as they will be able to immediately pass on the price hike to the customers. Benefits of Dynamic Fuel Pricing for customers: The move will take the economy towards greater transparency in fuel pricing and free pricing of petrol and diesel. It will ensure that the benefits of even the smallest change in international oil prices can be passed down the line to the dealers and the consumers. Besides the move will remove big leaps in rates that need to be effected at the end of the fortnight. Consumers will be more aligned with market dynamics as India will be following the practice of the most advanced markets. This will also lead to public sector OMCs offering competitive prices. Not only, it will improve the competitiveness of the economy overall, but also it would incentivise in the oil sector. The introduction of dynamic pricing will definitely bring consumers on a better footing as it will make the demand elasticity of the consumers reflected well in the markets. This will be possible as the price and sales data will be available in public for the market participants to reflect the same. However, there are certain obstacles to be overcome like updating prices in unautomated petrol pumps and staying the course on hardening of oil prices.
##Question:Dismantling of administered price mechanism for fuels is being deemed as a significant piece of economic reform. Analyze. Discuss how the recently introduced dynamic fuel pricing can prove to be beneficial for both the OMCs and the consumers. (200 words)##Answer:Approach: Begin with a brief introduction about the administered price mechanism. Then, write about the benefits of the initiative (dismantling of APM) for Indian economy as a whole. Then explain recently introduced dynamic fuel pricing. Further give arguments for the benefits of dynamic price mechanism to OMCs and consumers. Answer: Administered price mechanism (APM) for fuels denotes that the price of fuel was set by the dictates of government rather than the market forces, that is, the prices were either administered or subsidized. Dismantling of APM is deemed to be beneficial for Indian economy because: It will lead to an efficient allocation of a scarce resource that was being overused by the consumers due to lower prices. The burden on the state fiscal accounts will also be reduced as higher imports of crude oil at higher prices due to increased demand need not be subsidised by state. The idea of providing returns on a cost-plus formula to OMCs was not encouraging to encourage efficiency in production because it was not at all profit-motivated. Under APM, state-run fuel retailers used to revise rates on the 1st and the 16th of every month, based on average international price in preceding fortnight and the currency exchange rate. In dynamic fuel pricing , retail selling prices of petrol and diesel will be revised daily. It would link daily sales at all their petrol pumps with the international prices of crude oil. Benefits of Dynamic Fuel Pricing for OMCs: Oil companies would be free to take independent decisions based on import parity and market forces in the pricing of petroleum products rather than being governed by the dictates of the government. Due to the reining in of speculative market forces, the impact of increasing/decreasing prices on the working capital of companies and dealers would be minimised. It ensures that OMCs do not lose out for an entire fortnight in the event of a sharp rise in crude prices as they will be able to immediately pass on the price hike to the customers. Benefits of Dynamic Fuel Pricing for customers: The move will take the economy towards greater transparency in fuel pricing and free pricing of petrol and diesel. It will ensure that the benefits of even the smallest change in international oil prices can be passed down the line to the dealers and the consumers. Besides the move will remove big leaps in rates that need to be effected at the end of the fortnight. Consumers will be more aligned with market dynamics as India will be following the practice of the most advanced markets. This will also lead to public sector OMCs offering competitive prices. Not only, it will improve the competitiveness of the economy overall, but also it would incentivise in the oil sector. The introduction of dynamic pricing will definitely bring consumers on a better footing as it will make the demand elasticity of the consumers reflected well in the markets. This will be possible as the price and sales data will be available in public for the market participants to reflect the same. However, there are certain obstacles to be overcome like updating prices in unautomated petrol pumps and staying the course on hardening of oil prices.
47,185
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासतों का उल्लेख करते हुए आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इनकी भूमिका पर प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द) Citing political, economic and social legacies of the Indian national movement, highlight their role in the process of modern nation building. (150-200 words)
एप्रोच - प्रस्तावना में राष्ट्रीय आन्दोलन में उत्पन्न मूल्यों के प्रेरक तत्वों या विचारकों के योगदान की भूमिका की चर्चा कीजिये | राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासत का उल्लेख कीजिये | उपरोक्त विरासतों के आधार पर विकसित आधुनिक राष्ट्र निर्माण के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इन विरासतों को वर्त्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली से जोड़ते हुए चर्चा कीजिये | उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वराज की प्राप्ति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी मुख्य रूप से शामिल किया गया था जिसमे गाँधी, अम्बेडकर जैसे कुछ महान विचारकों और उनके विचारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी| इसी आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कुछ आधुनिक मूल्यों को विकसित किये गए जिसने स्वतंत्रता पश्चात के भारत के लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र को पोषित करने का कार्य किया | स्वतंत्रता काल में राष्ट्रीय विरासत राजनीति में राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | योग्य नेतृत्व -कांग्रेस के भीतर एवं उसके बाहर | आधुनिक विचारों का प्रभाव - स्वतंत्रता , समानता ,लोकतंत्र आदि | भावनात्मक रूप से एकता | विविधता को सम्मान -धर्म ,क्षेत्र,जाति के आधार पर | अल्पसंख्यकों की सुरक्षा | विदेश नीति से सम्बंधित कुछ प्रमुख सिद्धांत जैसे- स्वतंत्र विदेश नीति ,रंगभेद,साम्राज्यवाद का विरोध | आर्थिक क्षेत्र में सरकार की आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण जैसे-कृषि,परिवहन आदि | कांग्रेस के द्वारा नियोजन समिति का गठन तथा बॉम्बे प्लान के द्वारा भी आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों का भी ढांचा तैयार किया गया |आर्थिक क्षेत्र में जो भी नीतियाँ बनी वह राष्ट्रीय आन्दोलन के अनुभवों और विरासत से प्रभावित थी | सामाजिक क्षेत्र बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति | शिक्षा विशेषकर वैज्ञानिक शिक्षा पर राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा प्रारंभ से ही बल | समाज के सभी वर्गों का उत्थान विशेषकर वंचित तबकों को विशेष महत्त्व दिए जाने पर सहमति | राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया 1947से पूर्व,ब्रिटिश राज की भूमिका से जहाँ राष्ट्र के राजनीतिक,प्रशासनिक , आर्थिक और भौगोलिक एकीकरण को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना का एकीकरण और इसके साथ ही भावनात्मक रूप से जुडाव हुआ जिसने वास्तविक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मुख्य रूप से बढ़ावा दिया | वैचारिक विविधता को पहचान -विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों व नेताओं को संविधान सभा में शामिल किया जाना जैसे- अम्बेडकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि | कानून के शासन की स्थापना पर बल – इसके द्वारा संविधान का निर्माण कर व्यक्ति के मूल अधिकार,गरिमा पूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के साथ-साथ एकता और अखंडता को स्थापित करने में सहायक थे | योग्य नेतृत्व -अपेक्षाकृत योग्य राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | अखिल भारतीय सेवा - राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्ष नौकरशाही तंत्र की राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने में मुख्य भूमिका रही है| नौकरशाही ने भारत में एक राष्ट्र की भावना को मजबूत कर एकता और अखंडता के स्वर को मजबूत किया | साथ ही स्वतंत्रता काल में अलगाववाद के स्वर पर नियंत्रण करते हुए केन्द्रीय नीतियों को एकसमान तरीके से क्रियान्वयन करने में नौकरशाही ने मुख्य भूमिका निभाई है जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का मुख्य अंग है| सेना की भूमिका - स्वतंत्रता काल में अलगाववादी तत्व व साम्प्रदायिकता के स्वर मजबूत थे जिसके नियंत्रण में सेना की भूमिका देखि गयी जैसे- कश्मीर में कबीलाई आक्रमण के समय , बंगाल में हुए दंगों के दौरान आदि | इन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य के हिंदुस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना और आपदा कार्यों में सेना की मुख्य भूमिका रही | राष्ट्र की भावना - राष्ट्र गान,राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान तथा आधार पर भावनात्मक जुड़ावजो राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में ही आम आदमी के व्यवहार में लाये जा चुके थे | इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में विकसित आधारिक मूल्यों ने स्वतंत्र भारत में जनता एवं सरकार दोनों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य किया जो वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली की प्रमुख शक्ति है|
##Question:भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासतों का उल्लेख करते हुए आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इनकी भूमिका पर प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द) Citing political, economic and social legacies of the Indian national movement, highlight their role in the process of modern nation building. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - प्रस्तावना में राष्ट्रीय आन्दोलन में उत्पन्न मूल्यों के प्रेरक तत्वों या विचारकों के योगदान की भूमिका की चर्चा कीजिये | राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासत का उल्लेख कीजिये | उपरोक्त विरासतों के आधार पर विकसित आधुनिक राष्ट्र निर्माण के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इन विरासतों को वर्त्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली से जोड़ते हुए चर्चा कीजिये | उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वराज की प्राप्ति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी मुख्य रूप से शामिल किया गया था जिसमे गाँधी, अम्बेडकर जैसे कुछ महान विचारकों और उनके विचारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी| इसी आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कुछ आधुनिक मूल्यों को विकसित किये गए जिसने स्वतंत्रता पश्चात के भारत के लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र को पोषित करने का कार्य किया | स्वतंत्रता काल में राष्ट्रीय विरासत राजनीति में राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | योग्य नेतृत्व -कांग्रेस के भीतर एवं उसके बाहर | आधुनिक विचारों का प्रभाव - स्वतंत्रता , समानता ,लोकतंत्र आदि | भावनात्मक रूप से एकता | विविधता को सम्मान -धर्म ,क्षेत्र,जाति के आधार पर | अल्पसंख्यकों की सुरक्षा | विदेश नीति से सम्बंधित कुछ प्रमुख सिद्धांत जैसे- स्वतंत्र विदेश नीति ,रंगभेद,साम्राज्यवाद का विरोध | आर्थिक क्षेत्र में सरकार की आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण जैसे-कृषि,परिवहन आदि | कांग्रेस के द्वारा नियोजन समिति का गठन तथा बॉम्बे प्लान के द्वारा भी आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों का भी ढांचा तैयार किया गया |आर्थिक क्षेत्र में जो भी नीतियाँ बनी वह राष्ट्रीय आन्दोलन के अनुभवों और विरासत से प्रभावित थी | सामाजिक क्षेत्र बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति | शिक्षा विशेषकर वैज्ञानिक शिक्षा पर राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा प्रारंभ से ही बल | समाज के सभी वर्गों का उत्थान विशेषकर वंचित तबकों को विशेष महत्त्व दिए जाने पर सहमति | राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया 1947से पूर्व,ब्रिटिश राज की भूमिका से जहाँ राष्ट्र के राजनीतिक,प्रशासनिक , आर्थिक और भौगोलिक एकीकरण को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना का एकीकरण और इसके साथ ही भावनात्मक रूप से जुडाव हुआ जिसने वास्तविक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मुख्य रूप से बढ़ावा दिया | वैचारिक विविधता को पहचान -विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों व नेताओं को संविधान सभा में शामिल किया जाना जैसे- अम्बेडकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि | कानून के शासन की स्थापना पर बल – इसके द्वारा संविधान का निर्माण कर व्यक्ति के मूल अधिकार,गरिमा पूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के साथ-साथ एकता और अखंडता को स्थापित करने में सहायक थे | योग्य नेतृत्व -अपेक्षाकृत योग्य राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | अखिल भारतीय सेवा - राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्ष नौकरशाही तंत्र की राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने में मुख्य भूमिका रही है| नौकरशाही ने भारत में एक राष्ट्र की भावना को मजबूत कर एकता और अखंडता के स्वर को मजबूत किया | साथ ही स्वतंत्रता काल में अलगाववाद के स्वर पर नियंत्रण करते हुए केन्द्रीय नीतियों को एकसमान तरीके से क्रियान्वयन करने में नौकरशाही ने मुख्य भूमिका निभाई है जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का मुख्य अंग है| सेना की भूमिका - स्वतंत्रता काल में अलगाववादी तत्व व साम्प्रदायिकता के स्वर मजबूत थे जिसके नियंत्रण में सेना की भूमिका देखि गयी जैसे- कश्मीर में कबीलाई आक्रमण के समय , बंगाल में हुए दंगों के दौरान आदि | इन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य के हिंदुस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना और आपदा कार्यों में सेना की मुख्य भूमिका रही | राष्ट्र की भावना - राष्ट्र गान,राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान तथा आधार पर भावनात्मक जुड़ावजो राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में ही आम आदमी के व्यवहार में लाये जा चुके थे | इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में विकसित आधारिक मूल्यों ने स्वतंत्र भारत में जनता एवं सरकार दोनों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य किया जो वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली की प्रमुख शक्ति है|
47,188
What do you understand by climate Justice? How it is different from climate ethics? Discuss their significance. (200 words)
Approach: · Introduction- Explain the term climate justice(CJ) · Main Body -Describe the term Climate ethics(CE) Highlight the difference between Climate Justice and Climate Ethics Discuss the significance of Climate Justice and Climate ethics · Conclusion – Importance of CJ and CE in lives of people briefly. Answer : Climate justiceis a term used for framingglobal warmingas anethicalandpoliticalissue, rather than one that is purely environmental or physical in nature. This is done by relating theeffects of climate changeto concepts ofjustice, particularlyenvironmental justiceandsocial justiceand by examining issues such asequality,human rights,collective rights, and the historical responsibilities forclimate change. A fundamental proposition of climate justice is that those who are least responsible for climate change suffer its gravest consequences. Climate Ethics on the other hand speaks of the societal responsibility to leave behind a climatic condition equivalent to what we inherited for our future generations. This term is important to get developing and underdeveloped countries to also take responsibilities.Climate ethicsis an area of research that focuses on the ethical dimensions of climate change (also known asglobal warming), and concepts such asclimate justice. Differences between Climate Justice and Climate Ethics: 1. While CJ requires developed countries to take initiatives for mitigating climate change, occuring basically due to historical exploitation of ecosystem by them, CE obliges all to contribute towards the cause. 2. CJ refers to the past context while CE has futuristic perspective. 3. CJ advocates for individual and community rights, CE calls for duties, responsibilities and obligations of individuals, organisations and nations towards the environment. 4. CE is an umbrella term, in fact, a complete new discipline in itself, encompassing CJ, Environmental Mores, environmentally-benign Social Values and Inter-generational Legacies. Significance of CJ & CE: 1) They mandate for technology transfer and aids and finance from developed to developing world. 2) When realised properly, it will reduce the consumption pattern of developed countries 3) They justifies "common but differentiated responsibilities based on respective capabilities” (CBDR-RC) principle. 4) They obligate conservational efforts by all, besides putting the onus of mitigation on developed ones. In all, the two terms have given credence to equity in climate talks - no matter what the size of economy or weight of country is - as well as have strengthened the environmental governance. Human-induced climate change raises many profoundethicalquestions, yet manybelieve that these ethical issues have not been addressed adequately in climate change policy debates or in the scientific and economic literature on climate change
##Question:What do you understand by climate Justice? How it is different from climate ethics? Discuss their significance. (200 words)##Answer:Approach: · Introduction- Explain the term climate justice(CJ) · Main Body -Describe the term Climate ethics(CE) Highlight the difference between Climate Justice and Climate Ethics Discuss the significance of Climate Justice and Climate ethics · Conclusion – Importance of CJ and CE in lives of people briefly. Answer : Climate justiceis a term used for framingglobal warmingas anethicalandpoliticalissue, rather than one that is purely environmental or physical in nature. This is done by relating theeffects of climate changeto concepts ofjustice, particularlyenvironmental justiceandsocial justiceand by examining issues such asequality,human rights,collective rights, and the historical responsibilities forclimate change. A fundamental proposition of climate justice is that those who are least responsible for climate change suffer its gravest consequences. Climate Ethics on the other hand speaks of the societal responsibility to leave behind a climatic condition equivalent to what we inherited for our future generations. This term is important to get developing and underdeveloped countries to also take responsibilities.Climate ethicsis an area of research that focuses on the ethical dimensions of climate change (also known asglobal warming), and concepts such asclimate justice. Differences between Climate Justice and Climate Ethics: 1. While CJ requires developed countries to take initiatives for mitigating climate change, occuring basically due to historical exploitation of ecosystem by them, CE obliges all to contribute towards the cause. 2. CJ refers to the past context while CE has futuristic perspective. 3. CJ advocates for individual and community rights, CE calls for duties, responsibilities and obligations of individuals, organisations and nations towards the environment. 4. CE is an umbrella term, in fact, a complete new discipline in itself, encompassing CJ, Environmental Mores, environmentally-benign Social Values and Inter-generational Legacies. Significance of CJ & CE: 1) They mandate for technology transfer and aids and finance from developed to developing world. 2) When realised properly, it will reduce the consumption pattern of developed countries 3) They justifies "common but differentiated responsibilities based on respective capabilities” (CBDR-RC) principle. 4) They obligate conservational efforts by all, besides putting the onus of mitigation on developed ones. In all, the two terms have given credence to equity in climate talks - no matter what the size of economy or weight of country is - as well as have strengthened the environmental governance. Human-induced climate change raises many profoundethicalquestions, yet manybelieve that these ethical issues have not been addressed adequately in climate change policy debates or in the scientific and economic literature on climate change
47,194
विश्व औरभारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर के आर्थिक-सामरिक महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) Clarify the economic-strategic importance of the Indian Ocean from the perspective of the world and India. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में हिन्द महासागर के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में विश्व के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग भारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां और भारत की रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है · विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| · हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है · भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि · हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा · इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| · जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं| · वर्ष 2005 के बाद अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जबकि चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे हिंद महासागर पर चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| भारत के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · भारतीय प्रायद्वीप हिंद महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है| भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं| · भारत के नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, इन राज्यों के विकास के लिए हिंद महासागर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा अतः तटीय राज्यों को अपनी संभावनाओं की तलाश करनी होगी · हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है| · भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है · कोई बाह्य क्षेत्रीय शक्ति यदि हिंद महासागर में अपना प्रभाव क्षेत्र बनाती है तो यह भारत के लिए सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा, जैसे चीन द्वारा मालदीव से द्वीप लीज पर लेना, ग्वादर का विकास, हमबनटोटा का विकास आदि| · हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| · आपदाओं की दृष्टि से भी हिंद महासागर महत्वपूर्ण स्थिति में है, इस क्षेत्र में चक्रवात, सुखा तथा सुनामी प्रवण क्षेत्र है जिससे हिंदमहासागरीय देश सुभेद्य स्थिति में है, अतः राहत के लिए किसी अन्य देश पर इनकी निर्भरता बढे उसके पहले भारत के लिए आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अपनी क्षमताओं को बढ़ाना आवश्यक है| चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, समुद्री सिल्क रूट जैसी परियोजनाएं भारत के लिए चुनौती उत्पन्न करती हैं| पायरेसी की समस्या, आतंकी आक्रमण, क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा, मादक पदार्थ, मानव एवं हथियारों की तस्करी आदि गतिविधियाँ भारत के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करती हैं| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| इस सन्दर्भ में वर्ष2015 में भारत ने अपनी एक सुस्पष्ट मेरीटाइम सुरक्षा रणनीति की घोषणा की है| इसके साथ ही प्रोजेक्ट मौसम, सार्क सेटेलाइट, अर्ली वार्निंग सिस्टम,एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर, सागर परियोजना, नौसैनिक अभ्यासों की श्रृंखला, LEMOA जैसे द्विपक्षीय समझौते तथा बिम्सटेक क्षेत्रीय मंचों स्थापना के माध्यम से भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र की चुनौतियों से निपटते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है|
##Question:विश्व औरभारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर के आर्थिक-सामरिक महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) Clarify the economic-strategic importance of the Indian Ocean from the perspective of the world and India. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में हिन्द महासागर के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में विश्व के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग भारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां और भारत की रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है · विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| · हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है · भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि · हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा · इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| · जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं| · वर्ष 2005 के बाद अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जबकि चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे हिंद महासागर पर चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| भारत के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · भारतीय प्रायद्वीप हिंद महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है| भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं| · भारत के नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, इन राज्यों के विकास के लिए हिंद महासागर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा अतः तटीय राज्यों को अपनी संभावनाओं की तलाश करनी होगी · हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है| · भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है · कोई बाह्य क्षेत्रीय शक्ति यदि हिंद महासागर में अपना प्रभाव क्षेत्र बनाती है तो यह भारत के लिए सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा, जैसे चीन द्वारा मालदीव से द्वीप लीज पर लेना, ग्वादर का विकास, हमबनटोटा का विकास आदि| · हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| · आपदाओं की दृष्टि से भी हिंद महासागर महत्वपूर्ण स्थिति में है, इस क्षेत्र में चक्रवात, सुखा तथा सुनामी प्रवण क्षेत्र है जिससे हिंदमहासागरीय देश सुभेद्य स्थिति में है, अतः राहत के लिए किसी अन्य देश पर इनकी निर्भरता बढे उसके पहले भारत के लिए आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अपनी क्षमताओं को बढ़ाना आवश्यक है| चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, समुद्री सिल्क रूट जैसी परियोजनाएं भारत के लिए चुनौती उत्पन्न करती हैं| पायरेसी की समस्या, आतंकी आक्रमण, क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा, मादक पदार्थ, मानव एवं हथियारों की तस्करी आदि गतिविधियाँ भारत के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करती हैं| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| इस सन्दर्भ में वर्ष2015 में भारत ने अपनी एक सुस्पष्ट मेरीटाइम सुरक्षा रणनीति की घोषणा की है| इसके साथ ही प्रोजेक्ट मौसम, सार्क सेटेलाइट, अर्ली वार्निंग सिस्टम,एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर, सागर परियोजना, नौसैनिक अभ्यासों की श्रृंखला, LEMOA जैसे द्विपक्षीय समझौते तथा बिम्सटेक क्षेत्रीय मंचों स्थापना के माध्यम से भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र की चुनौतियों से निपटते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है|
47,195
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासतों का उल्लेख करते हुए आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इनकी भूमिका पर प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द) Citing political, economic and social legacies of the Indian national movement, highlight their role in the process of modern nation building. (150-200 words)
एप्रोच - प्रस्तावना में राष्ट्रीय आन्दोलन में उत्पन्न मूल्यों के प्रेरक तत्वों या विचारकों के योगदान की भूमिका की चर्चा कीजिये | राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासत का उल्लेख कीजिये | उपरोक्त विरासतों के आधार पर विकसित आधुनिक राष्ट्र निर्माण के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इन विरासतों को वर्त्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली से जोड़ते हुए चर्चा कीजिये | उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वराज की प्राप्ति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी मुख्य रूप से शामिल किया गया था जिसमे गाँधी, अम्बेडकर जैसे कुछ महान विचारकों और उनके विचारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी| इसी आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कुछ आधुनिक मूल्यों को विकसित किये गए जिसने स्वतंत्रता पश्चात के भारत के लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र को पोषित करने का कार्य किया | स्वतंत्रता काल में राष्ट्रीय विरासत राजनीति में राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | योग्य नेतृत्व -कांग्रेस के भीतर एवं उसके बाहर | आधुनिक विचारों का प्रभाव - स्वतंत्रता , समानता ,लोकतंत्र आदि | भावनात्मक रूप से एकता | विविधता को सम्मान -धर्म ,क्षेत्र,जाति के आधार पर | अल्पसंख्यकों की सुरक्षा | विदेश नीति से सम्बंधित कुछ प्रमुख सिद्धांत जैसे- स्वतंत्र विदेश नीति ,रंगभेद,साम्राज्यवाद का विरोध | आर्थिक क्षेत्र में सरकार की आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण जैसे-कृषि,परिवहन आदि | कांग्रेस के द्वारा नियोजन समिति का गठन तथा बॉम्बे प्लान के द्वारा भी आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों का भी ढांचा तैयार किया गया |आर्थिक क्षेत्र में जो भी नीतियाँ बनी वह राष्ट्रीय आन्दोलन के अनुभवों और विरासत से प्रभावित थी | सामाजिक क्षेत्र बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति | शिक्षा विशेषकर वैज्ञानिक शिक्षा पर राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा प्रारंभ से ही बल | समाज के सभी वर्गों का उत्थान विशेषकर वंचित तबकों को विशेष महत्त्व दिए जाने पर सहमति | राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया 1947से पूर्व,ब्रिटिश राज की भूमिका से जहाँ राष्ट्र के राजनीतिक,प्रशासनिक , आर्थिक और भौगोलिक एकीकरण को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना का एकीकरण और इसके साथ ही भावनात्मक रूप से जुडाव हुआ जिसने वास्तविक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मुख्य रूप से बढ़ावा दिया | वैचारिक विविधता को पहचान -विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों व नेताओं को संविधान सभा में शामिल किया जाना जैसे- अम्बेडकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि | कानून के शासन की स्थापना पर बल – इसके द्वारा संविधान का निर्माण कर व्यक्ति के मूल अधिकार,गरिमा पूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के साथ-साथ एकता और अखंडता को स्थापित करने में सहायक थे | योग्य नेतृत्व -अपेक्षाकृत योग्य राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | अखिल भारतीय सेवा - राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्ष नौकरशाही तंत्र की राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने में मुख्य भूमिका रही है| नौकरशाही ने भारत में एक राष्ट्र की भावना को मजबूत कर एकता और अखंडता के स्वर को मजबूत किया | साथ ही स्वतंत्रता काल में अलगाववाद के स्वर पर नियंत्रण करते हुए केन्द्रीय नीतियों को एकसमान तरीके से क्रियान्वयन करने में नौकरशाही ने मुख्य भूमिका निभाई है जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का मुख्य अंग है| सेना की भूमिका - स्वतंत्रता काल में अलगाववादी तत्व व साम्प्रदायिकता के स्वर मजबूत थे जिसके नियंत्रण में सेना की भूमिका देखि गयी जैसे- कश्मीर में कबीलाई आक्रमण के समय , बंगाल में हुए दंगों के दौरान आदि | इन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य के हिंदुस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना और आपदा कार्यों में सेना की मुख्य भूमिका रही | राष्ट्र की भावना - राष्ट्र गान,राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान तथा आधार पर भावनात्मक जुड़ावजो राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में ही आम आदमी के व्यवहार में लाये जा चुके थे | इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में विकसित आधारिक मूल्यों ने स्वतंत्र भारत में जनता एवं सरकार दोनों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य किया जो वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली की प्रमुख शक्ति है|
##Question:भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासतों का उल्लेख करते हुए आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में इनकी भूमिका पर प्रकाश डालिए | (150-200 शब्द) Citing political, economic and social legacies of the Indian national movement, highlight their role in the process of modern nation building. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - प्रस्तावना में राष्ट्रीय आन्दोलन में उत्पन्न मूल्यों के प्रेरक तत्वों या विचारकों के योगदान की भूमिका की चर्चा कीजिये | राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रमुख राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विरासत का उल्लेख कीजिये | उपरोक्त विरासतों के आधार पर विकसित आधुनिक राष्ट्र निर्माण के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इन विरासतों को वर्त्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली से जोड़ते हुए चर्चा कीजिये | उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वराज की प्राप्ति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी मुख्य रूप से शामिल किया गया था जिसमे गाँधी, अम्बेडकर जैसे कुछ महान विचारकों और उनके विचारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी| इसी आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कुछ आधुनिक मूल्यों को विकसित किये गए जिसने स्वतंत्रता पश्चात के भारत के लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र को पोषित करने का कार्य किया | स्वतंत्रता काल में राष्ट्रीय विरासत राजनीति में राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | योग्य नेतृत्व -कांग्रेस के भीतर एवं उसके बाहर | आधुनिक विचारों का प्रभाव - स्वतंत्रता , समानता ,लोकतंत्र आदि | भावनात्मक रूप से एकता | विविधता को सम्मान -धर्म ,क्षेत्र,जाति के आधार पर | अल्पसंख्यकों की सुरक्षा | विदेश नीति से सम्बंधित कुछ प्रमुख सिद्धांत जैसे- स्वतंत्र विदेश नीति ,रंगभेद,साम्राज्यवाद का विरोध | आर्थिक क्षेत्र में सरकार की आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण जैसे-कृषि,परिवहन आदि | कांग्रेस के द्वारा नियोजन समिति का गठन तथा बॉम्बे प्लान के द्वारा भी आर्थिक विकास सम्बन्धी नीतियों का भी ढांचा तैयार किया गया |आर्थिक क्षेत्र में जो भी नीतियाँ बनी वह राष्ट्रीय आन्दोलन के अनुभवों और विरासत से प्रभावित थी | सामाजिक क्षेत्र बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति | शिक्षा विशेषकर वैज्ञानिक शिक्षा पर राष्ट्रीय नेताओं के द्वारा प्रारंभ से ही बल | समाज के सभी वर्गों का उत्थान विशेषकर वंचित तबकों को विशेष महत्त्व दिए जाने पर सहमति | राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया 1947से पूर्व,ब्रिटिश राज की भूमिका से जहाँ राष्ट्र के राजनीतिक,प्रशासनिक , आर्थिक और भौगोलिक एकीकरण को बढ़ावा मिला वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना का एकीकरण और इसके साथ ही भावनात्मक रूप से जुडाव हुआ जिसने वास्तविक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को मुख्य रूप से बढ़ावा दिया | वैचारिक विविधता को पहचान -विभिन्न विचारधाराओं के विद्वानों व नेताओं को संविधान सभा में शामिल किया जाना जैसे- अम्बेडकर ,श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि | कानून के शासन की स्थापना पर बल – इसके द्वारा संविधान का निर्माण कर व्यक्ति के मूल अधिकार,गरिमा पूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के साथ-साथ एकता और अखंडता को स्थापित करने में सहायक थे | योग्य नेतृत्व -अपेक्षाकृत योग्य राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दलों का अखिल भारतीय दृष्टिकोण | अखिल भारतीय सेवा - राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले दक्ष नौकरशाही तंत्र की राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने में मुख्य भूमिका रही है| नौकरशाही ने भारत में एक राष्ट्र की भावना को मजबूत कर एकता और अखंडता के स्वर को मजबूत किया | साथ ही स्वतंत्रता काल में अलगाववाद के स्वर पर नियंत्रण करते हुए केन्द्रीय नीतियों को एकसमान तरीके से क्रियान्वयन करने में नौकरशाही ने मुख्य भूमिका निभाई है जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का मुख्य अंग है| सेना की भूमिका - स्वतंत्रता काल में अलगाववादी तत्व व साम्प्रदायिकता के स्वर मजबूत थे जिसके नियंत्रण में सेना की भूमिका देखि गयी जैसे- कश्मीर में कबीलाई आक्रमण के समय , बंगाल में हुए दंगों के दौरान आदि | इन्हीं अनुभवों के आधार पर भविष्य के हिंदुस्तान में शांति प्रक्रिया की स्थापना और आपदा कार्यों में सेना की मुख्य भूमिका रही | राष्ट्र की भावना - राष्ट्र गान,राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान तथा आधार पर भावनात्मक जुड़ावजो राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में ही आम आदमी के व्यवहार में लाये जा चुके थे | इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में विकसित आधारिक मूल्यों ने स्वतंत्र भारत में जनता एवं सरकार दोनों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य किया जो वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली की प्रमुख शक्ति है|
47,196
What is meant by the NationalRegister of Citizens (NRC)? Discuss the various challenges and concerns related to it. (200 words/10 marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम,राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,NRC से सम्बंधित विभिन्न चुनौतियों एवं चिंताओं की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में आगे की राह सुझाते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), 1951 में भारतीय नागरिकों के नामों का उल्लेख है। NRC को 1951 की जनगणना के बादकेवल एक बार प्रकाशित किया गया है।यह प्रत्येक गाँव में एक क्रम में घरों या होल्डिंग्स को दर्शाता है और प्रत्येक घर मेंरहने वाले व्यक्तियों की संख्या और नामों को दर्शाता है।इसका उदेश्य बांग्लादेश से अवैध आप्रवासन के मुद्दे से निपटने के लिए 1985 के असम समझौते को निगमित करना है। इसे समय-समय पर अपडेट किया जाता है। हालांकि असम में विभिन्न राजनीतिक तनावों जैसे 1980 के असम आंदोलन के कारण इसे अपडेट नहीं किया जा सका। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने में चुनौतियां एवं चिंताएं: इसे अपडेट करने कीप्रक्रिया की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं क्योंकि यह प्रारूप अवैध प्रवासियों की संख्या को प्रदर्शित नहीं करता है। इसमें राजनीतिक लाभ लेने का भी प्रयास किया जा रहा है। नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6ए पर असमानता और भेदभाव के आधार पर प्रश्न उठाए गए हैं। उच्चतम न्यायालय में भी यह मुद्दा लंबित है। संशोधन विधेयक में हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन आदि धर्मों से संबन्धित अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिए पात्र माना गया है। यह एनआरसी को अपडेट करने के उद्देश्य को पूरा करने में अवरोधक है। इसमें शामिल करने के लिए आवश्यक डॉक्युमेंट्स 1971 के पूर्व के हैं। लोगों के पास इसकी उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की जा सकती है। इसके अभाव में भारतीय लोग भी एनआरसी में शामिल होने से छुट सकते हैं। यह कदम भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है। इनका निर्वासन मानवीय संकट उत्पन्न कर सकता है। एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। जिन लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं होते हैं उन्हे राष्ट्रीयता का प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ता है। निष्कर्षतः असम आंदोलन राज्य की जनसांख्यिकी, सांस्कृतिक पहलुओं की रक्षा के लिए व्यापक रूप से प्रसारित हुआ। इसका परिणाम असम समझौते के रूप में देखा जा सकता है। जिसने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट की पृष्ठभूमि तैयार किया। वर्तमान में इसे अपडेट करने में विद्यमान चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार की जवाबदेही, उच्चतम न्यायालय हस्तक्षेप आवश्यक है। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन की कमियों को भी दूर किया जाए।
##Question:What is meant by the NationalRegister of Citizens (NRC)? Discuss the various challenges and concerns related to it. (200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,NRC से सम्बंधित विभिन्न चुनौतियों एवं चिंताओं की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में आगे की राह सुझाते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), 1951 में भारतीय नागरिकों के नामों का उल्लेख है। NRC को 1951 की जनगणना के बादकेवल एक बार प्रकाशित किया गया है।यह प्रत्येक गाँव में एक क्रम में घरों या होल्डिंग्स को दर्शाता है और प्रत्येक घर मेंरहने वाले व्यक्तियों की संख्या और नामों को दर्शाता है।इसका उदेश्य बांग्लादेश से अवैध आप्रवासन के मुद्दे से निपटने के लिए 1985 के असम समझौते को निगमित करना है। इसे समय-समय पर अपडेट किया जाता है। हालांकि असम में विभिन्न राजनीतिक तनावों जैसे 1980 के असम आंदोलन के कारण इसे अपडेट नहीं किया जा सका। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने में चुनौतियां एवं चिंताएं: इसे अपडेट करने कीप्रक्रिया की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं क्योंकि यह प्रारूप अवैध प्रवासियों की संख्या को प्रदर्शित नहीं करता है। इसमें राजनीतिक लाभ लेने का भी प्रयास किया जा रहा है। नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 6ए पर असमानता और भेदभाव के आधार पर प्रश्न उठाए गए हैं। उच्चतम न्यायालय में भी यह मुद्दा लंबित है। संशोधन विधेयक में हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन आदि धर्मों से संबन्धित अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिए पात्र माना गया है। यह एनआरसी को अपडेट करने के उद्देश्य को पूरा करने में अवरोधक है। इसमें शामिल करने के लिए आवश्यक डॉक्युमेंट्स 1971 के पूर्व के हैं। लोगों के पास इसकी उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की जा सकती है। इसके अभाव में भारतीय लोग भी एनआरसी में शामिल होने से छुट सकते हैं। यह कदम भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है। इनका निर्वासन मानवीय संकट उत्पन्न कर सकता है। एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। जिन लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं होते हैं उन्हे राष्ट्रीयता का प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ता है। निष्कर्षतः असम आंदोलन राज्य की जनसांख्यिकी, सांस्कृतिक पहलुओं की रक्षा के लिए व्यापक रूप से प्रसारित हुआ। इसका परिणाम असम समझौते के रूप में देखा जा सकता है। जिसने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट की पृष्ठभूमि तैयार किया। वर्तमान में इसे अपडेट करने में विद्यमान चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार की जवाबदेही, उच्चतम न्यायालय हस्तक्षेप आवश्यक है। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन की कमियों को भी दूर किया जाए।
47,200
What do you understand by climate Justice? How it is different from climate ethics? Discuss their significance. (150 words) 10 marks
Approach: · Explain the term climate justice as Intro · Describe the term Climate ethics · Highlight the difference between Climate Justice and Climate Ethics · Discuss the significance of Climate Justice and Climate ethics Answer: Climate justice is a term used for framingglobal warmingas anethicalandpoliticalissue, rather than one that is purely environmental or physical in nature. This is done by relating theeffects of climate changeto concepts ofjustice, particularlyenvironmental justiceandsocial justiceand by examining issues such asequality,human rights,collective rights, and the historical responsibilities forclimate change. A fundamental proposition of climate justice is that those who are least responsible for climate change suffer its gravest consequences. Prime Minister Narendra Modirecently stressed the need for climate justice to protect the nature saying the people from poor and marginalized sections are the ultimate victims of climate injustice. Climate Ethics, on the other hand, speaks of the societal responsibility to leave behind a climatic condition equivalent to what we inherited for our future generations. This term is important to get developing and underdeveloped countries to also take responsibilities.Climate ethicsis an area of research that focuses on the ethical dimensions of climate change (also known asglobal warming), and concepts such asclimate justice. Human-induced climate change raises many profoundethicalquestions, yet it is believed that these ethical issues have not been addressed adequately in climate change policy debates or in the scientific and economic literature on climate change Differences between Climate Justice (CJ) and Climate Ethics (CE): 1. While Climate Justice requires developed countries to take initiatives for mitigating climate change, occurring basically due to historical exploitation of the ecosystem by them, Climate Ethics obliges all to contribute towards the cause. 2. Climate Justice refers to the past context while Climate Ethics has a futuristic perspective. 3. Climate Justice advocates for individual and community rights, Climate Ethics calls for duties, responsibilities and obligations of individuals, organisations and nations towards the environment. Climate Ethics is an umbrella term, in fact, a completely new discipline in itself, encompassing Climate Justice, Environmental Mores, environmentally-benign Social Values and Inter-generational Legacies. Significance of Climate Justice & Climate Ethics: 1) It mandates for technology transfer and aids and finance from developed countries to the developing countries. 2) When realised properly, it will reduce the consumption pattern of developed countries 3) It justifies "common but differentiated responsibilities based on respective capabilities" (CBDR-RC) principle. 4) It obligates conservation efforts by all, besides putting the onus of mitigation on developed ones. In all, the two terms have given credence to equity in climate talks irrespective of the size of economy or weight of the country. CJ and CE have the potential to strengthen environmental governance.
##Question:What do you understand by climate Justice? How it is different from climate ethics? Discuss their significance. (150 words) 10 marks##Answer:Approach: · Explain the term climate justice as Intro · Describe the term Climate ethics · Highlight the difference between Climate Justice and Climate Ethics · Discuss the significance of Climate Justice and Climate ethics Answer: Climate justice is a term used for framingglobal warmingas anethicalandpoliticalissue, rather than one that is purely environmental or physical in nature. This is done by relating theeffects of climate changeto concepts ofjustice, particularlyenvironmental justiceandsocial justiceand by examining issues such asequality,human rights,collective rights, and the historical responsibilities forclimate change. A fundamental proposition of climate justice is that those who are least responsible for climate change suffer its gravest consequences. Prime Minister Narendra Modirecently stressed the need for climate justice to protect the nature saying the people from poor and marginalized sections are the ultimate victims of climate injustice. Climate Ethics, on the other hand, speaks of the societal responsibility to leave behind a climatic condition equivalent to what we inherited for our future generations. This term is important to get developing and underdeveloped countries to also take responsibilities.Climate ethicsis an area of research that focuses on the ethical dimensions of climate change (also known asglobal warming), and concepts such asclimate justice. Human-induced climate change raises many profoundethicalquestions, yet it is believed that these ethical issues have not been addressed adequately in climate change policy debates or in the scientific and economic literature on climate change Differences between Climate Justice (CJ) and Climate Ethics (CE): 1. While Climate Justice requires developed countries to take initiatives for mitigating climate change, occurring basically due to historical exploitation of the ecosystem by them, Climate Ethics obliges all to contribute towards the cause. 2. Climate Justice refers to the past context while Climate Ethics has a futuristic perspective. 3. Climate Justice advocates for individual and community rights, Climate Ethics calls for duties, responsibilities and obligations of individuals, organisations and nations towards the environment. Climate Ethics is an umbrella term, in fact, a completely new discipline in itself, encompassing Climate Justice, Environmental Mores, environmentally-benign Social Values and Inter-generational Legacies. Significance of Climate Justice & Climate Ethics: 1) It mandates for technology transfer and aids and finance from developed countries to the developing countries. 2) When realised properly, it will reduce the consumption pattern of developed countries 3) It justifies "common but differentiated responsibilities based on respective capabilities" (CBDR-RC) principle. 4) It obligates conservation efforts by all, besides putting the onus of mitigation on developed ones. In all, the two terms have given credence to equity in climate talks irrespective of the size of economy or weight of the country. CJ and CE have the potential to strengthen environmental governance.
47,207
विश्व औरभारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर के आर्थिक-सामरिक महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Clarify the economic-strategic importance of the Indian Ocean from the perspective of the world and India. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में हिन्द महासागर के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में विश्व के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग भारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां और भारत की रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है · विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| · हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है · भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि · हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा · इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| · जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं| · वर्ष 2005 के बाद अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जबकि चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे हिंद महासागर पर चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| भारत के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · भारतीय प्रायद्वीप हिंद महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है| भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं| · भारत के नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, इन राज्यों के विकास के लिए हिंद महासागर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा अतः तटीय राज्यों को अपनी संभावनाओं की तलाश करनी होगी · हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है| · भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है · कोई बाह्य क्षेत्रीय शक्ति यदि हिंद महासागर में अपना प्रभाव क्षेत्र बनाती है तो यह भारत के लिए सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा, जैसे चीन द्वारा मालदीव से द्वीप लीज पर लेना, ग्वादर का विकास, हमबनटोटा का विकास आदि| · हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| · आपदाओं की दृष्टि से भी हिंद महासागर महत्वपूर्ण स्थिति में है, इस क्षेत्र में चक्रवात, सुखा तथा सुनामी प्रवण क्षेत्र है जिससे हिंदमहासागरीय देश सुभेद्य स्थिति में है, अतः राहत के लिए किसी अन्य देश पर इनकी निर्भरता बढे उसके पहले भारत के लिए आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अपनी क्षमताओं को बढ़ाना आवश्यक है| चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, समुद्री सिल्क रूट जैसी परियोजनाएं भारत के लिए चुनौती उत्पन्न करती हैं| पायरेसी की समस्या, आतंकी आक्रमण, क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा, मादक पदार्थ, मानव एवं हथियारों की तस्करी आदि गतिविधियाँ भारत के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करती हैं| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| इस सन्दर्भ में वर्ष2015 में भारत ने अपनी एक सुस्पष्ट मेरीटाइम सुरक्षा रणनीति की घोषणा की है| इसके साथ ही प्रोजेक्ट मौसम, सार्क सेटेलाइट, अर्ली वार्निंग सिस्टम,एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर, सागर परियोजना, नौसैनिक अभ्यासों की श्रृंखला, LEMOA जैसे द्विपक्षीय समझौते तथा बिम्सटेक क्षेत्रीय मंचों स्थापना के माध्यम से भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र की चुनौतियों से निपटते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है|
##Question:विश्व औरभारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर के आर्थिक-सामरिक महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Clarify the economic-strategic importance of the Indian Ocean from the perspective of the world and India. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में हिन्द महासागर के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में विश्व के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग भारत के दृष्टिकोण से हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कुछ चुनौतियां और भारत की रणनीति बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| विश्व के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · हिंद महासागर क्षेत्र के किनारों पर विश्व की 1/3 जनसंख्या रहती है, अर्थात यह एक बड़ा बाजार है · विश्व का 80 % तेल व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न जलडमरूमध्यों से होता है जिन देशों का प्रभाव जलडमरूमध्यों(चोक पॉइंट्स)पर होगा वे भविष्व में तेल व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं और इसके माध्यम से विश्व पर कूटनीतिक प्रभाव दाल सकते हैं|जैसे अभी इरान ने प्रतिबंधों की प्रतिक्रिया में हर्मुज से तेल व्यापार को रोक दिया है| · हिंद महासागर किनारों पर स्थित विभिन्न देशों में उभरते विवादों ने इस क्षेत्र का सैन्यीकरण किया है जैसे इरान-इराक, सूडान विवाद, सोमालिया की पायरेसी की समस्या से निपटने के लिए 84 देशों द्वारा हिंद महासागर को ग्रिड के रूप में विभाजित कर लिया है और सैन्य उपस्थिति बनी हुई है · भारत एवं चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा है अतः दोनों देश हिंद महासागर के देशों में अपनी बढ़त के प्रयास में है जैसे भारत द्वारा चाबहार, श्रीलंका, मालदीव में प्रतिस्पर्धा, बिम्सटेक आदि · हिंद महासागर ब्लू इकॉनमी, मत्स्य उद्योग, PMN आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है| सिशेल्स एवं मारीशस ने ब्लू इकॉनमी की ओर जाने की घोषणा की है| इन दोनों देशों के समक्ष जलवायु परिवर्तन के कारण डूबने का ख़तरा है, जबकि इनकी स्थिति बहुत सामरिक है अतः इन देशों द्वारा बारगेनिंग की जाती है, ब्लू इकॉनमी के लिए आवश्यक तकनीकी से युक्त राष्ट्र ही इन देशों के हितों के अनुरूप होगा · इस क्षेत्र में मत्स्ययन उद्योग का अपर्याप्त दोहन हुआ है| अतः मारीशस एवं सेशेल्स के लिए इसकी संभावनाए बहुत अधिक हैं| मीना कुमारी समिति की अनुशंसा इसी संभावना के दोहन के अनुरूप है| · जलवायु परिवर्तन से कोरल्स की समाप्ति एवं डूबने के खतरे को लेकर इन द्वीपीय राष्ट्रों ने एक संगठन बनाया गया है और विश्व के साथ बारगेनिंग की जा रही है| आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की समस्या उत्पन्न होगी, यदि कोई देश इनका उपयोग अपनी विदेश नीति में करेगा तो नयी कूनीतिक चुनौतियां उत्पन्न होने की संभावनाएं हैं| · वर्ष 2005 के बाद अमेरिका एशिया पेसिफिक पर अपना फोकस बढ़ा रहा है जिससे यहाँ एक पॉवर वैक्यूम बनता जा रहा है जबकि चीन इस क्षेत्र में आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी की नीति पर चल रहा है(चेक बुक डिप्लोमेसी) जैसे हमबनटोटा, मालदीव, ग्वादर आदि में निवेश| इससे हिंद महासागर पर चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है| भारत के लिए हिंद महासागर का महत्त्व · भारतीय प्रायद्वीप हिंद महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करता है| भारत का EEZ लगभग 18 लाख वर्ग किमी है, यह भारत के लिए संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है यहाँ से जीवाश्म ईंधन, रेयर अर्थ पदार्थ, PMN आदि प्राप्त किये जा सकते हैं| · भारत के नौ राज्यों की सीमा तटवर्ती है, इन राज्यों के विकास के लिए हिंद महासागर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा अतः तटीय राज्यों को अपनी संभावनाओं की तलाश करनी होगी · हिंद महासगर भारत को विश्व के साथ एक कनेक्टिविटी प्रदान करता है, यह भारत को विश्व से जोड़ता है, वर्तमान में भारत का 97 % व्यापार हिन्द महासागर के माध्यम से होता है| · भारत को विकसित होने के लिए विश्व के साथ जुड़ना होगा और जल परिवहन सबसे सस्ता परिवहन होता है, भारत का ऊर्जा आयात समुद्र के रास्ते होता है अर्थात ऊर्जा सुरक्षा के लिए हिंद महासागरको शांत क्षेत्र होना आवश्यक है · कोई बाह्य क्षेत्रीय शक्ति यदि हिंद महासागर में अपना प्रभाव क्षेत्र बनाती है तो यह भारत के लिए सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा, जैसे चीन द्वारा मालदीव से द्वीप लीज पर लेना, ग्वादर का विकास, हमबनटोटा का विकास आदि| · हिंद महासागर में होने वाली पायरेसी के कारण निर्यातित वस्तुओं की बीमे का खर्च, सुरक्षा का व्यय बढ़ जाता है जिससे भारत में मुद्रास्फीति की स्थिति और प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट आती है अतः पायरेसी को समाप्त करना आवश्यक है| · आपदाओं की दृष्टि से भी हिंद महासागर महत्वपूर्ण स्थिति में है, इस क्षेत्र में चक्रवात, सुखा तथा सुनामी प्रवण क्षेत्र है जिससे हिंदमहासागरीय देश सुभेद्य स्थिति में है, अतः राहत के लिए किसी अन्य देश पर इनकी निर्भरता बढे उसके पहले भारत के लिए आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अपनी क्षमताओं को बढ़ाना आवश्यक है| चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, समुद्री सिल्क रूट जैसी परियोजनाएं भारत के लिए चुनौती उत्पन्न करती हैं| पायरेसी की समस्या, आतंकी आक्रमण, क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा, मादक पदार्थ, मानव एवं हथियारों की तस्करी आदि गतिविधियाँ भारत के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करती हैं| भारत की स्वतंत्रता के बाद से भारतीय विदेश नीति शांत, स्थिर हिंद महासागर की स्थापना के लिए प्रयासरत है, इसका उपयोग शान्ति एवं विकास के लिए होना चाहिये| हिंद महासागर क्षेत्र से भारत सबसे बड़ा देश है अतः भारत को अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इसकी सुरक्षा के लिए अन्तराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए| इस सन्दर्भ में वर्ष2015 में भारत ने अपनी एक सुस्पष्ट मेरीटाइम सुरक्षा रणनीति की घोषणा की है| इसके साथ ही प्रोजेक्ट मौसम, सार्क सेटेलाइट, अर्ली वार्निंग सिस्टम,एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर, सागर परियोजना, नौसैनिक अभ्यासों की श्रृंखला, LEMOA जैसे द्विपक्षीय समझौते तथा बिम्सटेक क्षेत्रीय मंचों स्थापना के माध्यम से भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र की चुनौतियों से निपटते हुए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है|
47,214
Explain the major and minor movements of the earth. Discuss the effects of minor movements of earth. (150 words) (10 Marks)
Approach: Introduce by Briefly explaining the major movement of the Earth Briefly explain the minor movement of the Earth Discuss the impacts of minor movements of the earth Answer : Our earth has important major and minor movements the major ones are: the Rotation of the Earth around its axis, which takes about 24 hours to finish. This Rotation is the cause of days and nights. The second is the Revolution around the Sun. One revolution takes 365 ¼ days or one year. whereas the minor movements comprise of Milankovitch cycle which is a cyclical movement related to Earths orbit around the sun, Eccentricity it is simply the shape of the earth orbit around the sun this constantly fluctuating, orbital shape ranges between more or less elliptical, Axial tilt it is the angle between the planets rotational axis and its orbital axis it is about 23.5 degrees, and Precession under which earth wobbles just slightly as it spins on its axis when a spinning top begins to slow down. Impacts of the minor movements of the Earth Axial tilt angle affects climate largely by determining which parts will get more sunlight during different stages of the earth Axial tilt increases the seasonal contrast so that winters are colder and summers are warmer in both hemispheres. According to Milankovitch theory these three cycles combine to affect the amount of solar heat that’s incident on the earth surface and subsequently influence climate patterns The earth orbit undergoes a cyclical change from less eccentric to more eccentric and back one complete cycle for this kind of variation lasts for about 100,000 year Due to Precession and tilting regions near the poles experience very long nights and very long days at certain times of the year The position of the earth in its orbit around the sun at the Solstices, equinoxes or other time defined relative to seasons, slowly changes after around 26,000 years this change amounts to a full year. The magnitude of the Earths tilt, as opposed to its orientation also changes slowly over time
##Question:Explain the major and minor movements of the earth. Discuss the effects of minor movements of earth. (150 words) (10 Marks)##Answer:Approach: Introduce by Briefly explaining the major movement of the Earth Briefly explain the minor movement of the Earth Discuss the impacts of minor movements of the earth Answer : Our earth has important major and minor movements the major ones are: the Rotation of the Earth around its axis, which takes about 24 hours to finish. This Rotation is the cause of days and nights. The second is the Revolution around the Sun. One revolution takes 365 ¼ days or one year. whereas the minor movements comprise of Milankovitch cycle which is a cyclical movement related to Earths orbit around the sun, Eccentricity it is simply the shape of the earth orbit around the sun this constantly fluctuating, orbital shape ranges between more or less elliptical, Axial tilt it is the angle between the planets rotational axis and its orbital axis it is about 23.5 degrees, and Precession under which earth wobbles just slightly as it spins on its axis when a spinning top begins to slow down. Impacts of the minor movements of the Earth Axial tilt angle affects climate largely by determining which parts will get more sunlight during different stages of the earth Axial tilt increases the seasonal contrast so that winters are colder and summers are warmer in both hemispheres. According to Milankovitch theory these three cycles combine to affect the amount of solar heat that’s incident on the earth surface and subsequently influence climate patterns The earth orbit undergoes a cyclical change from less eccentric to more eccentric and back one complete cycle for this kind of variation lasts for about 100,000 year Due to Precession and tilting regions near the poles experience very long nights and very long days at certain times of the year The position of the earth in its orbit around the sun at the Solstices, equinoxes or other time defined relative to seasons, slowly changes after around 26,000 years this change amounts to a full year. The magnitude of the Earths tilt, as opposed to its orientation also changes slowly over time
47,296
हिंद महासागर के लिए भारत की रणनीति के रूप में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर परियोजना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही भारत के लिए इसके संभावित लाभों को सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Clarify the importance of the Asia Africa Growth Corridor Project as India"s strategy for the Indian Ocean. Also, list its potential benefits for India. (150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत के सन्दर्भ में हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बारे में बताते हुए इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत के लिए एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संकल्पना के तौर पर स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| हिंद महासागर क्षेत्र में भारत भारत के आर्थिक-सामरिक हित हैं| इसी सन्दर्भ में हिंद महासागर के लिए भारत की एक स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा रहती है| भारत ने हिंद महासागर में अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए विविध पहलें की हैं, आशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर इन्ही में से एक है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर · भारत जापान के मध्य सहयोग समझौता है जो एशिया अफ्रीका के सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है| यह मांग आधारित समझौता है इसका आधार शोषण नहीं बल्कि पारस्परिक सहयोग है| · दोनों देशों ने निवेश प्राप्तकर्ता देशों में चार आयामों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट की है यथा क्षमता(उद्योगों की स्थापना) और कौशल विकास(चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है), बुनियादी ढांचे का विकास(OBOR को संतुलित करने के लिए) एवं संस्थागत कनेक्टिविटी(अंतरमंत्रालयी, अंतरविभागीय कनेक्टिविटी), विकास और सहयोग परियोजना(मांग आधारित विकास) तथा पीपल टू पीपल साझेदारी · स्वास्थ्य एवं औषधि उद्योग, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन तथा कौशल विकास को भारत एवं जापान ने इस समझौते के प्राथमिकता क्षेत्र में रखा है| ये सभी क्षेत्रक अफ्रीका की आवश्यकता के अनुरूप हैं तथा मांगजनित हैं| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का रणनीतिक महत्त्व · इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एशिया अफ्रिका के हिंद महासागरीय देशों में निवेश करेंगे और निवेश के माध्यम से चीन की चेक बुक डिप्लोमेसी को प्रतिसंतुलित करेंगे| · यह चीन के मॉडल से अलग है क्योंकि चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है जिससे उन राष्ट्रों में रोजगार का सृजन नहीं हो पाता, चीन पर्यावरणीय पहलू को भी नजरअंदाज करता है, चीन अपने निवेश के माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है, चीन ने अपने प्रोजेक्ट्स का ब्लूप्रिंट प्रकाशित नहीं करता है जिससे उन प्रोजेक्ट्स में देशों की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पाती, चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है| · चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है जबकि सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन की सुरक्षा भारत एवं जापान की प्राथमिकता है · चीन का OBOR दोनों देशों के हितों को प्रभावित करता है, एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर OBOR को संतुलित करने का एक माध्यम है · इस समझौते के माध्यम से भारत और चीन मिलकर हिन्दमहासागर में चीन और उसकी OBOR जैसी परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित कर सकेंगे · मलक्का डिलेमा(दुविधा) से निकलने के लिए चीन CPEC, मलेशिया में क्रा कैनाल एवं इंडोनेशिया में रेल मार्ग विकास पर कार्य कर रहा है| चीन द्वारा क्रा कैनाल का प्रस्ताव, आसियान के देशों के आपसी मित्रता(सॉलिडेरिटी) को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है अतः आसियान के देश भी यही चाहते हैं कि OBOR को काउंटर करने के लिए जापान एवं भारत को आगे आना चाहिए| इसी लिए आसियान देशों से एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का स्वागत किया है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का लाभ · इससे समुद्री व्यापार का विकास होगा इससे जहाँ एक ओर लागत में कमी आएगी वहीँ कार्बन फूटप्रिंट में कमी आएगी · एशिया अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, इससे एशिया अफ्रीका का एक यूनियन बन सकता है · सामूहिक रूप से वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक ब्लाक के रूप में उभर सकेगा · सामाजिक आर्थिक विकास की परियोजनाओं के माध्यम से P2P संपर्क बढेगा, इस सन्दर्भ में भारत द्वारा सोलर मम्मी जैसी पहले जन सम्पर्क बढाने में उपयोगी होंगी| इससे जहाँ एक ओर सशक्तिकरण होगा वहीँ भारत के लिए गुडविल बनाने में आसानी होगी · भारत की ACT EAST POLICY और जापान की गुणवत्ता बुनियादी ढाँचे के लिए विस्तारित साझेदारी(सहयोगात्मक निवेश की नीति, जैसे DMRC फ्रेट कॉरिडोर आदि में निवेश) नीतियों के बीच एक अभिसरण क्षेत्र है · इस समझौते में यह प्रतिबद्धता प्रकट की गयी है आकांक्षी देश अपनी आवश्यकता को समझ कर अपनी मांग स्पष्ट करेगा तब उसी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा अर्थात यह एक लोकतांत्रिक मॉडल है · चीन की अर्थव्यवस्था इस समय ढलान पर है और यह भारत के लिए एक मौक़ा है, AAGC इस सन्दर्भ में भारत के लिए कुंजी का काम कर सकता है · AAGC के माध्यम से भारत अपने व्यापार का विस्तार कर सकेगा इससे विश्व व्यापार में भारत अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा सकेगा और भुगतान संतुलन को संतुलित कर सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया अफ्रिका ग्रोथ कॉरिडोर का आर्थिक सामरिक महत्त्व है और यह विभिन्न अर्थों में भारत के ल्लिये लाभदायी संकल्पना है|
##Question:हिंद महासागर के लिए भारत की रणनीति के रूप में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर परियोजना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही भारत के लिए इसके संभावित लाभों को सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Clarify the importance of the Asia Africa Growth Corridor Project as India"s strategy for the Indian Ocean. Also, list its potential benefits for India. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत के सन्दर्भ में हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बारे में बताते हुए इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत के लिए एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संकल्पना के तौर पर स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| हिंद महासागर क्षेत्र में भारत भारत के आर्थिक-सामरिक हित हैं| इसी सन्दर्भ में हिंद महासागर के लिए भारत की एक स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा रहती है| भारत ने हिंद महासागर में अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए विविध पहलें की हैं, आशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर इन्ही में से एक है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर · भारत जापान के मध्य सहयोग समझौता है जो एशिया अफ्रीका के सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है| यह मांग आधारित समझौता है इसका आधार शोषण नहीं बल्कि पारस्परिक सहयोग है| · दोनों देशों ने निवेश प्राप्तकर्ता देशों में चार आयामों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट की है यथा क्षमता(उद्योगों की स्थापना) और कौशल विकास(चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है), बुनियादी ढांचे का विकास(OBOR को संतुलित करने के लिए) एवं संस्थागत कनेक्टिविटी(अंतरमंत्रालयी, अंतरविभागीय कनेक्टिविटी), विकास और सहयोग परियोजना(मांग आधारित विकास) तथा पीपल टू पीपल साझेदारी · स्वास्थ्य एवं औषधि उद्योग, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन तथा कौशल विकास को भारत एवं जापान ने इस समझौते के प्राथमिकता क्षेत्र में रखा है| ये सभी क्षेत्रक अफ्रीका की आवश्यकता के अनुरूप हैं तथा मांगजनित हैं| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का रणनीतिक महत्त्व · इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एशिया अफ्रिका के हिंद महासागरीय देशों में निवेश करेंगे और निवेश के माध्यम से चीन की चेक बुक डिप्लोमेसी को प्रतिसंतुलित करेंगे| · यह चीन के मॉडल से अलग है क्योंकि चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है जिससे उन राष्ट्रों में रोजगार का सृजन नहीं हो पाता, चीन पर्यावरणीय पहलू को भी नजरअंदाज करता है, चीन अपने निवेश के माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है, चीन ने अपने प्रोजेक्ट्स का ब्लूप्रिंट प्रकाशित नहीं करता है जिससे उन प्रोजेक्ट्स में देशों की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पाती, चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है| · चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है जबकि सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन की सुरक्षा भारत एवं जापान की प्राथमिकता है · चीन का OBOR दोनों देशों के हितों को प्रभावित करता है, एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर OBOR को संतुलित करने का एक माध्यम है · इस समझौते के माध्यम से भारत और चीन मिलकर हिन्दमहासागर में चीन और उसकी OBOR जैसी परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित कर सकेंगे · मलक्का डिलेमा(दुविधा) से निकलने के लिए चीन CPEC, मलेशिया में क्रा कैनाल एवं इंडोनेशिया में रेल मार्ग विकास पर कार्य कर रहा है| चीन द्वारा क्रा कैनाल का प्रस्ताव, आसियान के देशों के आपसी मित्रता(सॉलिडेरिटी) को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है अतः आसियान के देश भी यही चाहते हैं कि OBOR को काउंटर करने के लिए जापान एवं भारत को आगे आना चाहिए| इसी लिए आसियान देशों से एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का स्वागत किया है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का लाभ · इससे समुद्री व्यापार का विकास होगा इससे जहाँ एक ओर लागत में कमी आएगी वहीँ कार्बन फूटप्रिंट में कमी आएगी · एशिया अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, इससे एशिया अफ्रीका का एक यूनियन बन सकता है · सामूहिक रूप से वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक ब्लाक के रूप में उभर सकेगा · सामाजिक आर्थिक विकास की परियोजनाओं के माध्यम से P2P संपर्क बढेगा, इस सन्दर्भ में भारत द्वारा सोलर मम्मी जैसी पहले जन सम्पर्क बढाने में उपयोगी होंगी| इससे जहाँ एक ओर सशक्तिकरण होगा वहीँ भारत के लिए गुडविल बनाने में आसानी होगी · भारत की ACT EAST POLICY और जापान की गुणवत्ता बुनियादी ढाँचे के लिए विस्तारित साझेदारी(सहयोगात्मक निवेश की नीति, जैसे DMRC फ्रेट कॉरिडोर आदि में निवेश) नीतियों के बीच एक अभिसरण क्षेत्र है · इस समझौते में यह प्रतिबद्धता प्रकट की गयी है आकांक्षी देश अपनी आवश्यकता को समझ कर अपनी मांग स्पष्ट करेगा तब उसी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा अर्थात यह एक लोकतांत्रिक मॉडल है · चीन की अर्थव्यवस्था इस समय ढलान पर है और यह भारत के लिए एक मौक़ा है, AAGC इस सन्दर्भ में भारत के लिए कुंजी का काम कर सकता है · AAGC के माध्यम से भारत अपने व्यापार का विस्तार कर सकेगा इससे विश्व व्यापार में भारत अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा सकेगा और भुगतान संतुलन को संतुलित कर सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया अफ्रिका ग्रोथ कॉरिडोर का आर्थिक सामरिक महत्त्व है और यह विभिन्न अर्थों में भारत के ल्लिये लाभदायी संकल्पना है|
47,302
स्वतंत्रता पश्चात भारत के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये | साथ ही यह भी बताइए कि इन चुनौतियों का समाधान किस प्रकार किया गया ? (150-200 शब्द) Analyze the political challenges faced by India after independence. Also explain how these challenges were solved ? (150-200 words)
एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन चुनौतियों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंतहो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की | हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँभी विद्यमान थी - धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ | जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास करना एक बड़ी चुनौती थी | शरणार्थियों के राहत एवं पुनर्वास के लिए राहत व पुनर्वास विभाग की स्थापना की गयी | शहर में बड़ी मात्रा में कैंप शिविर बने | 1951 तक पश्चिमी पकिस्तान के शरणार्थियों की समस्या का समाधान हो चुका था | सीमा का निर्धारण एक बड़ी समस्या थी | कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण तथा उसका संचालन | विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना | साम्प्रदायिकता से अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा था , जिससे निपटने के लिए सरकार ने पुलिस , सेना का भी सहारा लिया | देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण के लिए विलय पत्र पर हस्ताक्षर , जबरन पुलिस कार्यवाही , जनमत संग्रह का सहारा लिया गया | पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण करना भी एक चुनौती थी | संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना भी एक चुनौती थी | भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन | राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण | गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन | सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन | एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण | विभिन्न राज्यों में भाषा सम्बन्धी विवाद शुरू हुए | इसके निवारण के लिए जे.वी.पी समिति , धर समिति का गठन किया गया तथा प्रशासनिक एकता को ध्यान में रखते हुए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया | समाधान - शरणार्थी संकट से सरकार कुशलतापूर्वक निपटारा किया | पश्चिम भारत में आसानी से 1950 तक इस कार्य को कर लिया गया जबकि पूर्वी भारत में अभी तक ये समस्या बनी हुई है | स्वतंत्रता के पश्चात साम्प्रदायिकता का कठोरता पूर्वक दमन किया गया | रेडियो अखबारों के माध्यम से इस पर प्रहार किया गया तथा अनेक संगठनों को अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया | कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया गया तथा जब उन्होंने संविधान के प्रति आस्था व्यक्त की तथा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का निर्णय लिए तभी प्रतिबन्ध को हटाया गया | देशी रियासतों के विलय में सरदार पटेल की महती भूमिका रही है | वे रियासतों को प्रलोभन तथा धमकी के माध्यम से भारतीय संघ में सम्मिलित किये | भाषा सम्बन्धी विवाद को भी त्रिभाषा सूत्र से समाप्त किया गया | इस प्रकार धीरे-धीरे कर के क्रमशः एक -एक समस्याओं का समाधान किया गया |
##Question:स्वतंत्रता पश्चात भारत के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये | साथ ही यह भी बताइए कि इन चुनौतियों का समाधान किस प्रकार किया गया ? (150-200 शब्द) Analyze the political challenges faced by India after independence. Also explain how these challenges were solved ? (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन चुनौतियों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंतहो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की | हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँभी विद्यमान थी - धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ | जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास करना एक बड़ी चुनौती थी | शरणार्थियों के राहत एवं पुनर्वास के लिए राहत व पुनर्वास विभाग की स्थापना की गयी | शहर में बड़ी मात्रा में कैंप शिविर बने | 1951 तक पश्चिमी पकिस्तान के शरणार्थियों की समस्या का समाधान हो चुका था | सीमा का निर्धारण एक बड़ी समस्या थी | कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण तथा उसका संचालन | विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना | साम्प्रदायिकता से अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा था , जिससे निपटने के लिए सरकार ने पुलिस , सेना का भी सहारा लिया | देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण के लिए विलय पत्र पर हस्ताक्षर , जबरन पुलिस कार्यवाही , जनमत संग्रह का सहारा लिया गया | पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण करना भी एक चुनौती थी | संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना भी एक चुनौती थी | भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन | राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण | गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन | सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन | एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण | विभिन्न राज्यों में भाषा सम्बन्धी विवाद शुरू हुए | इसके निवारण के लिए जे.वी.पी समिति , धर समिति का गठन किया गया तथा प्रशासनिक एकता को ध्यान में रखते हुए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया | समाधान - शरणार्थी संकट से सरकार कुशलतापूर्वक निपटारा किया | पश्चिम भारत में आसानी से 1950 तक इस कार्य को कर लिया गया जबकि पूर्वी भारत में अभी तक ये समस्या बनी हुई है | स्वतंत्रता के पश्चात साम्प्रदायिकता का कठोरता पूर्वक दमन किया गया | रेडियो अखबारों के माध्यम से इस पर प्रहार किया गया तथा अनेक संगठनों को अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया | कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया गया तथा जब उन्होंने संविधान के प्रति आस्था व्यक्त की तथा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का निर्णय लिए तभी प्रतिबन्ध को हटाया गया | देशी रियासतों के विलय में सरदार पटेल की महती भूमिका रही है | वे रियासतों को प्रलोभन तथा धमकी के माध्यम से भारतीय संघ में सम्मिलित किये | भाषा सम्बन्धी विवाद को भी त्रिभाषा सूत्र से समाप्त किया गया | इस प्रकार धीरे-धीरे कर के क्रमशः एक -एक समस्याओं का समाधान किया गया |
47,308
मौलिक अधिकारों को परिभाषितकीजिए। साथ ही भारत, ब्रिटेन और अमेरिका मेंप्राप्त मौलिक अधिकारों की स्थिति कीतुलना कीजिए। (150-200 शब्द) Define Fundamental Rights. Also, compare the status of fundamental rights availablein India, Britain and America. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम,मौलिक अधिकारों को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में प्राप्त मौलिक अधिकारों की स्थिति की तुलना कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत का संविधान मौलिक अधिकार प्रदान करता है। देश के विशाल आकार और विविधता, विकासशील तथा संप्रभुता संपन्न धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा तथा पूर्व में औपनिवेशिक राष्ट्र के रूप में इसके इतिहास के परिणामस्वरूप भारत में मूलाधिकारोंकी स्थिति एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसलिएमूल संविधान में सात मौलिक अधिकारों के वर्गीकरण कोस्थान दिया गयापरन्तु वर्तमान में छः ही मौलिक अधिकार वर्गीकृत हैं। इस वर्गीकरण में बहुत सारे मौलिक अधिकार निहित हैं। मौलिकअधिकार भारत के संविधान के तीसरे भाग में वर्णित भारतीय नागरिकों को प्रदान किए गए वे अधिकार हैं जो सामान्य स्थिति में सरकार द्वारा सीमित नहीं किए जा सकते हैं और जिनकी सुरक्षा का प्रहरी सर्वोच्च न्यायालय है। ये अधिकार सभी भारतीय नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं जैसे सभी भारत के लोग, भारतीय नागरिक के रूप में शान्ति के साथ समान रूप से जीवन व्यापन कर सकते हैं। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका मेंमौलिकअधिकारों की स्थिति: एक तुलना:- भारत:- भारत में मौलिक अधिकारों कोसंविधान सभा द्वारा संविधान के भाग तीन में शामिल किया गया है। ये किसके विरुद्ध हैं?:- कार्यपालिका, विधयिका, अधीनस्थ अदालतें, अधिकरण के विरुद्ध उपलब्ध हैं। सरंक्षणकर्ता कौन हैं?:- भारत में मूलाधिकारों का सरंक्षणकर्तासर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय को बनायागया है। किसे उपलब्ध हैं?:- भारत में अनुच्छेद 15, 16, 19, 18(2), 29 केवल भारत के नागरिकों को उपलब्ध हैं जबकिअनुच्छेद 14, 20, 21, 22,23,24-28, 30 का कुछ भाग, 32 भारत राज्य क्षेत्र मेंनिवास करने वाले सभी लोगों को उपलब्ध हैं। ब्रिटेन:- ब्रिटेन में मूलाधिकारसंसद के द्वारा बनाये गए कानून हीहोते हैं, न कि भारत की तरह अलग से लिखित। ये किसके विरुद्ध हैं?:- ब्रिटेन में येकेवल कार्यपालिका के विरुद्ध ही उपलब्ध हैं। सरंक्षणकर्ता कौन है?:- संसद के विरुद्ध कोई भी अदालतमौलिकअधिकारों के उल्लंघन के मामलों में कोई नोटिस जारी नहीं करतीक्योंकि संसद के द्वारा बनाये गए कानून ही यहाँ मौलिकअधिकारहैं। ब्रिटेन में ये किसे उपलब्ध होंगें? इसके वर्गीकरण काअधिकार यहाँ कीसंसद को दिया गया है। अमेरिका:- अमेरिका में मूलाधिकारबिल ऑफ़ राइट्स के रूप में उपलब्ध हैं। ये किसके विरुद्ध हैं?:- अमेरिका में मूलाधिकार भारत एवं ब्रिटेनके विपरीतकेवल कार्यपालिका एवं विधायिका के विरुद्ध उपलब्ध हैं। सरंक्षणकर्ता कौन है?:- अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षणकर्ता है जिसे फ़ेडरल कोर्ट भी कहते हैं। किसे उपलब्ध हैं?: यहाँ संघ और राज्य की अलग अलग नागरिकता का प्रावधान होने के कारण ये अधिकारराज्यवार अलग अलग उपलब्ध हैं। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका तीनों जगह मौलिक अधिकारों की महत्ता है। लोकतांत्रिक देश होने के कारण इनकी विभिन्न क्षेत्रों में जैसेसामाजिक, आर्थिक, या व्यक्तिक रूप से अत्यधिक प्रासंगिता है।
##Question:मौलिक अधिकारों को परिभाषितकीजिए। साथ ही भारत, ब्रिटेन और अमेरिका मेंप्राप्त मौलिक अधिकारों की स्थिति कीतुलना कीजिए। (150-200 शब्द) Define Fundamental Rights. Also, compare the status of fundamental rights availablein India, Britain and America. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,मौलिक अधिकारों को परिभाषित कीजिए। तत्पश्चात, भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में प्राप्त मौलिक अधिकारों की स्थिति की तुलना कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत का संविधान मौलिक अधिकार प्रदान करता है। देश के विशाल आकार और विविधता, विकासशील तथा संप्रभुता संपन्न धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा तथा पूर्व में औपनिवेशिक राष्ट्र के रूप में इसके इतिहास के परिणामस्वरूप भारत में मूलाधिकारोंकी स्थिति एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसलिएमूल संविधान में सात मौलिक अधिकारों के वर्गीकरण कोस्थान दिया गयापरन्तु वर्तमान में छः ही मौलिक अधिकार वर्गीकृत हैं। इस वर्गीकरण में बहुत सारे मौलिक अधिकार निहित हैं। मौलिकअधिकार भारत के संविधान के तीसरे भाग में वर्णित भारतीय नागरिकों को प्रदान किए गए वे अधिकार हैं जो सामान्य स्थिति में सरकार द्वारा सीमित नहीं किए जा सकते हैं और जिनकी सुरक्षा का प्रहरी सर्वोच्च न्यायालय है। ये अधिकार सभी भारतीय नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं जैसे सभी भारत के लोग, भारतीय नागरिक के रूप में शान्ति के साथ समान रूप से जीवन व्यापन कर सकते हैं। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका मेंमौलिकअधिकारों की स्थिति: एक तुलना:- भारत:- भारत में मौलिक अधिकारों कोसंविधान सभा द्वारा संविधान के भाग तीन में शामिल किया गया है। ये किसके विरुद्ध हैं?:- कार्यपालिका, विधयिका, अधीनस्थ अदालतें, अधिकरण के विरुद्ध उपलब्ध हैं। सरंक्षणकर्ता कौन हैं?:- भारत में मूलाधिकारों का सरंक्षणकर्तासर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय को बनायागया है। किसे उपलब्ध हैं?:- भारत में अनुच्छेद 15, 16, 19, 18(2), 29 केवल भारत के नागरिकों को उपलब्ध हैं जबकिअनुच्छेद 14, 20, 21, 22,23,24-28, 30 का कुछ भाग, 32 भारत राज्य क्षेत्र मेंनिवास करने वाले सभी लोगों को उपलब्ध हैं। ब्रिटेन:- ब्रिटेन में मूलाधिकारसंसद के द्वारा बनाये गए कानून हीहोते हैं, न कि भारत की तरह अलग से लिखित। ये किसके विरुद्ध हैं?:- ब्रिटेन में येकेवल कार्यपालिका के विरुद्ध ही उपलब्ध हैं। सरंक्षणकर्ता कौन है?:- संसद के विरुद्ध कोई भी अदालतमौलिकअधिकारों के उल्लंघन के मामलों में कोई नोटिस जारी नहीं करतीक्योंकि संसद के द्वारा बनाये गए कानून ही यहाँ मौलिकअधिकारहैं। ब्रिटेन में ये किसे उपलब्ध होंगें? इसके वर्गीकरण काअधिकार यहाँ कीसंसद को दिया गया है। अमेरिका:- अमेरिका में मूलाधिकारबिल ऑफ़ राइट्स के रूप में उपलब्ध हैं। ये किसके विरुद्ध हैं?:- अमेरिका में मूलाधिकार भारत एवं ब्रिटेनके विपरीतकेवल कार्यपालिका एवं विधायिका के विरुद्ध उपलब्ध हैं। सरंक्षणकर्ता कौन है?:- अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षणकर्ता है जिसे फ़ेडरल कोर्ट भी कहते हैं। किसे उपलब्ध हैं?: यहाँ संघ और राज्य की अलग अलग नागरिकता का प्रावधान होने के कारण ये अधिकारराज्यवार अलग अलग उपलब्ध हैं। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका तीनों जगह मौलिक अधिकारों की महत्ता है। लोकतांत्रिक देश होने के कारण इनकी विभिन्न क्षेत्रों में जैसेसामाजिक, आर्थिक, या व्यक्तिक रूप से अत्यधिक प्रासंगिता है।
47,311
हिंद महासागर के लिए भारत की रणनीति के रूप में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर परियोजना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये | साथ ही भारत के लिए इसके संभावित लाभों को सूचीबद्ध कीजिये | (150 से 200 शब्द/10 अंक) Clarify the importance of the Asia Africa Growth Corridor Project as India"s strategy for the Indian Ocean. Also, list its potential benefits for India. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत के सन्दर्भ में हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बारे में बताते हुए इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत के लिए एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संकल्पना के तौर पर स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| हिंद महासागर क्षेत्र में भारत भारत के आर्थिक-सामरिक हित हैं| इसी सन्दर्भ में हिंद महासागर के लिए भारत की एक स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा रहती है| भारत ने हिंद महासागर में अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए विविध पहलें की हैं, आशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर इन्ही में से एक है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर एवं उसका महत्त्व · भारत जापान के मध्य सहयोग समझौता है जो एशिया अफ्रीका के सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है| यह मांग आधारित समझौता है इसका आधार शोषण नहीं बल्कि पारस्परिक सहयोग है| · दोनों देशों ने निवेश प्राप्तकर्ता देशों में चार आयामों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट की है यथा क्षमता(उद्योगों की स्थापना) और कौशल विकास(चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है), बुनियादी ढांचे का विकास(OBOR को संतुलित करने के लिए) एवं संस्थागत कनेक्टिविटी(अंतरमंत्रालयी, अंतरविभागीय कनेक्टिविटी), विकास और सहयोग परियोजना(मांग आधारित विकास) तथा पीपल टू पीपल साझेदारी · स्वास्थ्य एवं औषधि उद्योग, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन तथा कौशल विकास को भारत एवं जापान ने इस समझौते के प्राथमिकता क्षेत्र में रखा है| ये सभी क्षेत्रक अफ्रीका की आवश्यकता के अनुरूप हैं तथा मांगजनित हैं| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का रणनीतिक महत्त्व · इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एशिया अफ्रिका के हिंद महासागरीय देशों में निवेश करेंगे और निवेश के माध्यम से चीन की चेक बुक डिप्लोमेसी को प्रतिसंतुलित करेंगे| · यह चीन के मॉडल से अलग है क्योंकि चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है जिससे उन राष्ट्रों में रोजगार का सृजन नहीं हो पाता, चीन पर्यावरणीय पहलू को भी नजरअंदाज करता है, चीन अपने निवेश के माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है, चीन ने अपने प्रोजेक्ट्स का ब्लूप्रिंट प्रकाशित नहीं करता है जिससे उन प्रोजेक्ट्स में देशों की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पाती, चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है| · चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है जबकि सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन की सुरक्षा भारत एवं जापान की प्राथमिकता है · चीन का OBOR दोनों देशों के हितों को प्रभावित करता है, एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर OBOR को संतुलित करने का एक माध्यम है · इस समझौते के माध्यम से भारत और चीन मिलकर हिन्दमहासागर में चीन और उसकी OBOR जैसी परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित कर सकेंगे · मलक्का डिलेमा(दुविधा) से निकलने के लिए चीन CPEC, मलेशिया में क्रा कैनाल एवं इंडोनेशिया में रेल मार्ग विकास पर कार्य कर रहा है| चीन द्वारा क्रा कैनाल का प्रस्ताव, आसियान के देशों के आपसी मित्रता(सॉलिडेरिटी) को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है अतः आसियान के देश भी यही चाहते हैं कि OBOR को काउंटर करने के लिए जापान एवं भारत को आगे आना चाहिए| इसी लिए आसियान देशों से एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का स्वागत किया है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का लाभ · इससे समुद्री व्यापार का विकास होगा इससे जहाँ एक ओर लागत में कमी आएगी वहीँ कार्बन फूटप्रिंट में कमी आएगी · एशिया अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, इससे एशिया अफ्रीका का एक यूनियन बन सकता है · सामूहिक रूप से वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक ब्लाक के रूप में उभर सकेगा · सामाजिक आर्थिक विकास की परियोजनाओं के माध्यम से P2P संपर्क बढेगा, इस सन्दर्भ में भारत द्वारा सोलर मम्मी जैसी पहले जन सम्पर्क बढाने में उपयोगी होंगी| इससे जहाँ एक ओर सशक्तिकरण होगा वहीँ भारत के लिए गुडविल बनाने में आसानी होगी · भारत की ACT EAST POLICY और जापान की गुणवत्ता बुनियादी ढाँचे के लिए विस्तारित साझेदारी(सहयोगात्मक निवेश की नीति, जैसे DMRC फ्रेट कॉरिडोर आदि में निवेश) नीतियों के बीच एक अभिसरण क्षेत्र है · इस समझौते में यह प्रतिबद्धता प्रकट की गयी है आकांक्षी देश अपनी आवश्यकता को समझ कर अपनी मांग स्पष्ट करेगा तब उसी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा अर्थात यह एक लोकतांत्रिक मॉडल है · चीन की अर्थव्यवस्था इस समय ढलान पर है और यह भारत के लिए एक मौक़ा है, AAGC इस सन्दर्भ में भारत के लिए कुंजी का काम कर सकता है · AAGC के माध्यम से भारत अपने व्यापार का विस्तार कर सकेगा इससे विश्व व्यापार में भारत अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा सकेगा और भुगतान संतुलन को संतुलित कर सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया अफ्रिका ग्रोथ कॉरिडोर का आर्थिक सामरिक महत्त्व है और यह विभिन्न अर्थों में भारत के ल्लिये लाभदायी संकल्पना है|
##Question:हिंद महासागर के लिए भारत की रणनीति के रूप में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर परियोजना के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये | साथ ही भारत के लिए इसके संभावित लाभों को सूचीबद्ध कीजिये | (150 से 200 शब्द/10 अंक) Clarify the importance of the Asia Africa Growth Corridor Project as India"s strategy for the Indian Ocean. Also, list its potential benefits for India. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत के सन्दर्भ में हिंद महासागर का महत्त्व स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर बारे में बताते हुए इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत के लिए एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर के लाभों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण संकल्पना के तौर पर स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समुद्र है| उत्तर में यहभारतीय उपमहाद्वीपसे, पश्चिम में अफ्रीका, पूर्व मेंहिन्दचीन औरऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण मेंदक्षिण ध्रुवीय महासागरसे घिरा हुआ है| विश्व में केवल यही एक महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर पडा है| इसका विशाल आकार एवं रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय प्रायद्वीप का तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा होना इसे वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाते हैं| हिंद महासागर क्षेत्र में भारत भारत के आर्थिक-सामरिक हित हैं| इसी सन्दर्भ में हिंद महासागर के लिए भारत की एक स्पष्ट रणनीति की अपेक्षा रहती है| भारत ने हिंद महासागर में अपनी सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए विविध पहलें की हैं, आशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर इन्ही में से एक है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर एवं उसका महत्त्व · भारत जापान के मध्य सहयोग समझौता है जो एशिया अफ्रीका के सामाजिक आर्थिक विकास के उद्देश्य से किया गया है| यह मांग आधारित समझौता है इसका आधार शोषण नहीं बल्कि पारस्परिक सहयोग है| · दोनों देशों ने निवेश प्राप्तकर्ता देशों में चार आयामों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट की है यथा क्षमता(उद्योगों की स्थापना) और कौशल विकास(चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है), बुनियादी ढांचे का विकास(OBOR को संतुलित करने के लिए) एवं संस्थागत कनेक्टिविटी(अंतरमंत्रालयी, अंतरविभागीय कनेक्टिविटी), विकास और सहयोग परियोजना(मांग आधारित विकास) तथा पीपल टू पीपल साझेदारी · स्वास्थ्य एवं औषधि उद्योग, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, आपदा प्रबंधन तथा कौशल विकास को भारत एवं जापान ने इस समझौते के प्राथमिकता क्षेत्र में रखा है| ये सभी क्षेत्रक अफ्रीका की आवश्यकता के अनुरूप हैं तथा मांगजनित हैं| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का रणनीतिक महत्त्व · इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एशिया अफ्रिका के हिंद महासागरीय देशों में निवेश करेंगे और निवेश के माध्यम से चीन की चेक बुक डिप्लोमेसी को प्रतिसंतुलित करेंगे| · यह चीन के मॉडल से अलग है क्योंकि चीन जहाँ भी निवेश करता है वहां अपने श्रमिक भेजता है जिससे उन राष्ट्रों में रोजगार का सृजन नहीं हो पाता, चीन पर्यावरणीय पहलू को भी नजरअंदाज करता है, चीन अपने निवेश के माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है, चीन ने अपने प्रोजेक्ट्स का ब्लूप्रिंट प्रकाशित नहीं करता है जिससे उन प्रोजेक्ट्स में देशों की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित नहीं हो पाती, चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है| · चीन अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों को नहीं मानता है जबकि सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन की सुरक्षा भारत एवं जापान की प्राथमिकता है · चीन का OBOR दोनों देशों के हितों को प्रभावित करता है, एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर OBOR को संतुलित करने का एक माध्यम है · इस समझौते के माध्यम से भारत और चीन मिलकर हिन्दमहासागर में चीन और उसकी OBOR जैसी परियोजनाओं को प्रतिसंतुलित कर सकेंगे · मलक्का डिलेमा(दुविधा) से निकलने के लिए चीन CPEC, मलेशिया में क्रा कैनाल एवं इंडोनेशिया में रेल मार्ग विकास पर कार्य कर रहा है| चीन द्वारा क्रा कैनाल का प्रस्ताव, आसियान के देशों के आपसी मित्रता(सॉलिडेरिटी) को प्रभावित करने वाला प्रस्ताव है अतः आसियान के देश भी यही चाहते हैं कि OBOR को काउंटर करने के लिए जापान एवं भारत को आगे आना चाहिए| इसी लिए आसियान देशों से एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का स्वागत किया है| एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का लाभ · इससे समुद्री व्यापार का विकास होगा इससे जहाँ एक ओर लागत में कमी आएगी वहीँ कार्बन फूटप्रिंट में कमी आएगी · एशिया अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, इससे एशिया अफ्रीका का एक यूनियन बन सकता है · सामूहिक रूप से वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक ब्लाक के रूप में उभर सकेगा · सामाजिक आर्थिक विकास की परियोजनाओं के माध्यम से P2P संपर्क बढेगा, इस सन्दर्भ में भारत द्वारा सोलर मम्मी जैसी पहले जन सम्पर्क बढाने में उपयोगी होंगी| इससे जहाँ एक ओर सशक्तिकरण होगा वहीँ भारत के लिए गुडविल बनाने में आसानी होगी · भारत की ACT EAST POLICY और जापान की गुणवत्ता बुनियादी ढाँचे के लिए विस्तारित साझेदारी(सहयोगात्मक निवेश की नीति, जैसे DMRC फ्रेट कॉरिडोर आदि में निवेश) नीतियों के बीच एक अभिसरण क्षेत्र है · इस समझौते में यह प्रतिबद्धता प्रकट की गयी है आकांक्षी देश अपनी आवश्यकता को समझ कर अपनी मांग स्पष्ट करेगा तब उसी क्षेत्र में निवेश किया जाएगा अर्थात यह एक लोकतांत्रिक मॉडल है · चीन की अर्थव्यवस्था इस समय ढलान पर है और यह भारत के लिए एक मौक़ा है, AAGC इस सन्दर्भ में भारत के लिए कुंजी का काम कर सकता है · AAGC के माध्यम से भारत अपने व्यापार का विस्तार कर सकेगा इससे विश्व व्यापार में भारत अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा सकेगा और भुगतान संतुलन को संतुलित कर सकेगा| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया अफ्रिका ग्रोथ कॉरिडोर का आर्थिक सामरिक महत्त्व है और यह विभिन्न अर्थों में भारत के ल्लिये लाभदायी संकल्पना है|
47,314
स्वतंत्रता पश्चात भारत के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये | साथ ही यह भी बताइए कि इन चुनौतियों का समाधान किस प्रकार किया गया ? (150-200 शब्द) Analyze the political challenges faced by India after independence. Also explain how these challenges were solved ? (150-200 words)
एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन चुनौतियों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंतहो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँभी विद्यमान थी - धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ | जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास करना एक बड़ी चुनौती थी | शरणार्थियों के राहत एवं पुनर्वास के लिए राहत व पुनर्वास विभाग की स्थापना की गयी | शहर में बड़ी मात्रा में कैंप शिविर बने | 1951 तक पश्चिमी पकिस्तान के शरणार्थियों की समस्या का समाधान हो चुका था | सीमा का निर्धारण एक बड़ी समस्या थी | कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण तथा उसका संचालन | विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना | साम्प्रदायिकता से अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा था , जिससे निपटने के लिए सरकार ने पुलिस , सेना का भी सहारा लिया | देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण के लिए विलय पत्र पर हस्ताक्षर , जबरन पुलिस कार्यवाही , जनमत संग्रह का सहारा लिया गया | पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण करना भी एक चुनौती थी | संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना भी एक चुनौती थी | भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन | राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण | गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन | सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन | एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण | विभिन्न राज्यों में भाषा सम्बन्धी विवाद शुरू हुए | इसके निवारण के लिए जे.वी.पी समिति , धर समिति का गठन किया गया तथा प्रशासनिक एकता को ध्यान में रखते हुए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया | समाधान - शरणार्थी संकट से सरकार कुशलतापूर्वक निपटारा किया | पश्चिम भारत में आसानी से 1950 तक इस कार्य को कर लिया गया जबकि पूर्वी भारत में अभी तक ये समस्या बनी हुई है | स्वतंत्रता के पश्चात साम्प्रदायिकता का कठोरता पूर्वक दमन किया गया | रेडियो अखबारों के माध्यम से इस पर प्रहार किया गया तथा अनेक संगठनों को अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया | कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया गया तथा जब उन्होंने संविधान के प्रति आस्था व्यक्त की तथा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का निर्णय लिए तभी प्रतिबन्ध को हटाया गया | देशी रियासतों के विलय में सरदार पटेल की महती भूमिका रही है | वे रियासतों को प्रलोभन तथा धमकी के माध्यम से भारतीय संघ में सम्मिलित किये | भाषा सम्बन्धी विवाद को भी त्रिभाषा सूत्र से समाप्त किया गया | इस प्रकार धीरे-धीरे कर के क्रमशः एक -एक समस्याओं का समाधान किया गया |
##Question:स्वतंत्रता पश्चात भारत के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये | साथ ही यह भी बताइए कि इन चुनौतियों का समाधान किस प्रकार किया गया ? (150-200 शब्द) Analyze the political challenges faced by India after independence. Also explain how these challenges were solved ? (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति तथा भारत विभाजन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में,तत्कालीन भारत के समक्ष उत्पन चुनौतियों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | निष्कर्षतः, विभाजन से उत्पन परिणामों तथा नवस्वतंत्र भारत द्वारा उसे निपटने के प्रयासों को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- एक लंबे स्वतंत्रता आंदोलन तथा अन्य कारणों के परिणामस्वरूप15 अगस्त,1947 को भारत से अंग्रेजी साम्राज्य का अंतहो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की| हालांकि यह स्वतंत्रता हमें देश के विभाजन की कीमत पर प्राप्त हुयी थी| कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी नेताओं के तमाम प्रयासों के बावजूदमुस्लिम लीग तथा जिन्ना की हठधर्मिता ने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्तकिया तथा पाकिस्तान के रूप में भारत के साथ ही एक नएराष्ट्र का जन्म हुआ|नवस्वतंत्रभारत के समक्ष विभाजन से उत्पन समस्याओं के साथ-साथ अन्य समस्याएं तथा चुनौतियाँभी विद्यमान थी - धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों का निर्माणएक जटिल मुद्दा था क्योंकि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर धार्मिक अंतर स्पष्ट नहीं था जैसे- पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान का संदर्भ | जनसँख्या का विस्थापन तथा पाकिस्तान से आये 60 लाख शरणार्थियों का पुनर्वास करना एक बड़ी चुनौती थी | शरणार्थियों के राहत एवं पुनर्वास के लिए राहत व पुनर्वास विभाग की स्थापना की गयी | शहर में बड़ी मात्रा में कैंप शिविर बने | 1951 तक पश्चिमी पकिस्तान के शरणार्थियों की समस्या का समाधान हो चुका था | सीमा का निर्धारण एक बड़ी समस्या थी | कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण तथा उसका संचालन | विस्थापन के साथ चल रहे सांप्रदायिक दंगो पर नियंत्रण तथा अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव उत्पन करना | साम्प्रदायिकता से अलगाववाद को बढ़ावा मिल रहा था , जिससे निपटने के लिए सरकार ने पुलिस , सेना का भी सहारा लिया | देशी रियासतों का विलय तथा क्षेत्रीय एवं प्रशासनिक एकीकरण के लिए विलय पत्र पर हस्ताक्षर , जबरन पुलिस कार्यवाही , जनमत संग्रह का सहारा लिया गया | पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार तथा कम्युनिस्ट विद्रोहों पर नियंत्रण करना भी एक चुनौती थी | संविधान के निर्माण के साथ-साथ प्रतिनिधिमूलक जनवाद तथा नागरिक स्वतंत्रता पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना भी एक चुनौती थी | भूमि सुधारके माध्यम से अर्ध-सामंती कृषि व्यवस्था का उन्मूलन | राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन तथा राष्ट्र का सुदृढ़ीकरण | गरीबी निवारण तथा नियोजन प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन | सामाजिक अन्याय, असमानता तथा शोषण का उन्मूलन | एकस्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण | विभिन्न राज्यों में भाषा सम्बन्धी विवाद शुरू हुए | इसके निवारण के लिए जे.वी.पी समिति , धर समिति का गठन किया गया तथा प्रशासनिक एकता को ध्यान में रखते हुए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया | समाधान - शरणार्थी संकट से सरकार कुशलतापूर्वक निपटारा किया | पश्चिम भारत में आसानी से 1950 तक इस कार्य को कर लिया गया जबकि पूर्वी भारत में अभी तक ये समस्या बनी हुई है | स्वतंत्रता के पश्चात साम्प्रदायिकता का कठोरता पूर्वक दमन किया गया | रेडियो अखबारों के माध्यम से इस पर प्रहार किया गया तथा अनेक संगठनों को अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया | कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया गया तथा जब उन्होंने संविधान के प्रति आस्था व्यक्त की तथा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का निर्णय लिए तभी प्रतिबन्ध को हटाया गया | देशी रियासतों के विलय में सरदार पटेल की महती भूमिका रही है | वे रियासतों को प्रलोभन तथा धमकी के माध्यम से भारतीय संघ में सम्मिलित किये | भाषा सम्बन्धी विवाद को भी त्रिभाषा सूत्र से समाप्त किया गया | इस प्रकार धीरे-धीरे कर के क्रमशः एक -एक समस्याओं का समाधान किया गया |
47,318
मृदा संरक्षण के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए| साथ ही, मृदा संरक्षण हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe various measures of soil conservation. Also, give some suggestions for soil conservation. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच- मृदा अवकर्षण एवं मृदा अपरदन की गंभीरता को बताते हुए एवं मृदा संरक्षण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, मृदा संरक्षण के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए| अगले भाग में, मृदा संरक्षण हेतु कुछ अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिए| निष्कर्षतः, कुछ सरकारी प्रयासों को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- मृदा की उर्वरता में ह्रास तथा मृदा के आवरण का विनाश आज के समय में एक गंभीर समस्या बनती जा रही है| प्रतिवर्ष भारत में मृदा निम्नीकरण की वजह से लाखों टन मृदा एवं उसके पोषक तत्वों का ह्रास होता है जिसका दुष्प्रभाव हमारी राष्ट्रीय उत्पादकता पर भी पड़ता है| मृदा संरक्षण एक विधि है जिसमें मिट्टी की उर्वरता बनाई रखी जाती है, मिट्टी के अपरदन और अपक्षय को रोका जाता है तथा मिट्टी की निम्नीकृत दशाओं को सुधारा जाता है| मृदा संरक्षण या प्रबंधन कोई एकल और सटीक प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसका संबंध वैसे सभी क्रियाकलापों से हैं जिसका प्रयोग करके मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने के साथ-साथ मृदा में सुधार के भी प्रयास किए जाते हैं| यदि मृदा अपरदन और मृदा अपक्षय मानव द्वारा प्रभावित होता है तो स्पष्टतः मानव द्वारा इसे नियंत्रित भी किया जा सकता है| मृदा अपरदन की दर मूल रूप से दोषपूर्ण पद्धतियों से और ज्यादा बढ़ती है| जैसे- भारत में उर्वरकों का अत्यधिक मात्रा में उपयोग; अधिक ढालप्रवणता वाली भूमि का उपयोग कृषि के लिए करना; अतिचारण; स्थानांतरण कृषि आदि| मृदा संरक्षण के विभिन्न उपाय- संरचनात्मक/यांत्रिक उपाय- समोच्चरेखीय जुताई- पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल की दिशा के समरूप ऊपर-नीचे जुताई नहीं की जानी चाहिए बल्कि समोच्च रेखा के अनुरूप सीढ़ीदार जुताई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| यह मृदा अपरदन को नियंत्रित करने में सहायक होता है| मेडबंदी - समोच्च रेखा के अनुरूपमेड बनाकर जल को प्रवाह को कम करना जिससे मृदा अपरदन के साथ-साथ वायु के तेज प्रवाह से होने वाले अपरदन को रोकने में भी सहायता; मृदा समतलीकरण- इससे जल का प्रवाह एवं वायु के तेज गति का प्रभाव कम होता है| पत्थर के मेड/अवरोधक बनाना - नलिका अथवा रील अपरदन में जल के तेज बहाव को कम करने के लिए पत्थर के मेड़ अथवा अवरोधक बनाए जाते हैं| इसके द्वारा नलिका अपरदन को नियंत्रित किया जाता है तथा मृदा के क्षय को भी रोका जाता है| बेसिन लिस्टिंग - इसके अंतर्गत ढालो पर नियमित अंतराल के बाद छोटे-छोटे बेसिन/गर्तों का निर्माण किया जाता है| इससे जल प्रवाह को नियंत्रित किया जाना संभव हो पाता है जो ढालों पर जल तथा मृदा दोनों के संरक्षण में सहायक होता है| वृक्षों की रक्षा मेखला बनाना- स्वस्थ तथा अर्ध शुष्क क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि पर बालू के टीलों के प्रसार को रोकने में यह पद्धति सहायक होती है जिससे मरुस्थलीकरण को रोकने का एक प्रभावी उपाय में मिलता है| जैविक उपाय - फसल चक्र- इस पद्धति के अंतर्गत विभिन्न फसलों को चक्रीय क्रम में पैदा किया जाता है| इसमें प्रमुखतःमुख्य फसलों के बाद दलहन को बोयाजाता है जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है| साथ ही साथ परती नहीं छोड़ने से वायु द्वारा अपरदन में भी कमी आती है| मल्चिंग- इसके अंतर्गत खेतों में फसल कटाई के बाद फसल अवशेष की पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जाता है| इससे मृदा का संस्तर सुरक्षित रहता है तथा मृदा उपजाऊ बनी रहती है| हरी खाद का प्रयोग- इससे विभिन्न जैविक तत्वों का मृदा में प्रवेश होता है तथा खेतों की उर्वरता बढ़ती है| कृषि वानिकी- खेत के चारों तरफक्यारियों में दो या तीन पंक्तियों में एक निश्चित दूरी पर फसलों के साथ बीजों को रोपित करने से मृदा अपरदन को कम किया जा सकता है| मिश्रित खेती; वृक्षारोपण; इसके अतिरिक्त नियमित वानिकी, नियंत्रित चराई, आवरण फसलें उगाना, लवणीय तथा क्षारीय मृदाओं का पुनरुद्धार आदि अन्य उपचार के माध्यम से भी मृदा के गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है| मृदा संरक्षण हेतु कुछ अन्य उपाय- बड़ी नदियों की सहायक नदियों पर बाढ़ और मृदा अपरदन नियंत्रण हेतु छोटे बांधों का निर्माण ; धरातलीय और लंबवत अपवाह के विस्तार द्वारा जलमग्नता की समस्या का समाधान करना; मरुस्थलीय क्षेत्रों में वायु-विच्छेदों और सुरक्षा पेटियों का निर्माण करना; वैज्ञानिक विधियों(जिप्सम आदि का प्रयोग) कर क्षारीय मिट्टियों का पुनरुद्धार करना; वनस्पति रहित क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देना; खाद के रूप में गोबर और वनस्पति के उपयोग को लोकप्रिय बनाना; मानव अपशेष तथा नगरीय कचरे को खाद में परिवर्तित करना ; वैज्ञानिक शस्य आवर्तन और परती छोड़कर मृदा उर्वरता का संरक्षण करना; अवनालिकाओं का भराव एवं ढलवां सतह के सहारे वेदिकाओं का निर्माण करना; बीहड़ क्षेत्रों का समतलीकरण और इन क्षेत्रों में मिट्टी को बांधने वाले पौधों का रोपण करना; झूम कृषि क्षेत्रों का आधुनिक स्थाई कृषि क्षेत्रों में परिवर्तन ; शुष्क और पहाड़ी क्षेत्रों में वृक्षारोपण करना और अत्यधिक पशु चारण पर प्रतिबंध; कृषि की नई तकनीकों को अपनाना; भारत सरकार द्वारा स्थापित केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड द्वारा देश के विभिन्न भागों में मृदा संरक्षण के लिए योजनाएं बनाई गई हैं| साथ ही, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, जैविक कृषि को बढ़ावा देने पर राष्ट्रीय परियोजना, मनरेगा, मृदा और भूमि उपयोग संरक्षण केंद्र, मृदा जांच प्रयोगशालाएं आदि के माध्यम से भी मृदा संरक्षण तथा प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है|
##Question:मृदा संरक्षण के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए| साथ ही, मृदा संरक्षण हेतु कुछ सुझाव प्रस्तुत कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Describe various measures of soil conservation. Also, give some suggestions for soil conservation. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच- मृदा अवकर्षण एवं मृदा अपरदन की गंभीरता को बताते हुए एवं मृदा संरक्षण को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, मृदा संरक्षण के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए| अगले भाग में, मृदा संरक्षण हेतु कुछ अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिए| निष्कर्षतः, कुछ सरकारी प्रयासों को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- मृदा की उर्वरता में ह्रास तथा मृदा के आवरण का विनाश आज के समय में एक गंभीर समस्या बनती जा रही है| प्रतिवर्ष भारत में मृदा निम्नीकरण की वजह से लाखों टन मृदा एवं उसके पोषक तत्वों का ह्रास होता है जिसका दुष्प्रभाव हमारी राष्ट्रीय उत्पादकता पर भी पड़ता है| मृदा संरक्षण एक विधि है जिसमें मिट्टी की उर्वरता बनाई रखी जाती है, मिट्टी के अपरदन और अपक्षय को रोका जाता है तथा मिट्टी की निम्नीकृत दशाओं को सुधारा जाता है| मृदा संरक्षण या प्रबंधन कोई एकल और सटीक प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसका संबंध वैसे सभी क्रियाकलापों से हैं जिसका प्रयोग करके मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने के साथ-साथ मृदा में सुधार के भी प्रयास किए जाते हैं| यदि मृदा अपरदन और मृदा अपक्षय मानव द्वारा प्रभावित होता है तो स्पष्टतः मानव द्वारा इसे नियंत्रित भी किया जा सकता है| मृदा अपरदन की दर मूल रूप से दोषपूर्ण पद्धतियों से और ज्यादा बढ़ती है| जैसे- भारत में उर्वरकों का अत्यधिक मात्रा में उपयोग; अधिक ढालप्रवणता वाली भूमि का उपयोग कृषि के लिए करना; अतिचारण; स्थानांतरण कृषि आदि| मृदा संरक्षण के विभिन्न उपाय- संरचनात्मक/यांत्रिक उपाय- समोच्चरेखीय जुताई- पर्वतीय क्षेत्रों में ढाल की दिशा के समरूप ऊपर-नीचे जुताई नहीं की जानी चाहिए बल्कि समोच्च रेखा के अनुरूप सीढ़ीदार जुताई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| यह मृदा अपरदन को नियंत्रित करने में सहायक होता है| मेडबंदी - समोच्च रेखा के अनुरूपमेड बनाकर जल को प्रवाह को कम करना जिससे मृदा अपरदन के साथ-साथ वायु के तेज प्रवाह से होने वाले अपरदन को रोकने में भी सहायता; मृदा समतलीकरण- इससे जल का प्रवाह एवं वायु के तेज गति का प्रभाव कम होता है| पत्थर के मेड/अवरोधक बनाना - नलिका अथवा रील अपरदन में जल के तेज बहाव को कम करने के लिए पत्थर के मेड़ अथवा अवरोधक बनाए जाते हैं| इसके द्वारा नलिका अपरदन को नियंत्रित किया जाता है तथा मृदा के क्षय को भी रोका जाता है| बेसिन लिस्टिंग - इसके अंतर्गत ढालो पर नियमित अंतराल के बाद छोटे-छोटे बेसिन/गर्तों का निर्माण किया जाता है| इससे जल प्रवाह को नियंत्रित किया जाना संभव हो पाता है जो ढालों पर जल तथा मृदा दोनों के संरक्षण में सहायक होता है| वृक्षों की रक्षा मेखला बनाना- स्वस्थ तथा अर्ध शुष्क क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि पर बालू के टीलों के प्रसार को रोकने में यह पद्धति सहायक होती है जिससे मरुस्थलीकरण को रोकने का एक प्रभावी उपाय में मिलता है| जैविक उपाय - फसल चक्र- इस पद्धति के अंतर्गत विभिन्न फसलों को चक्रीय क्रम में पैदा किया जाता है| इसमें प्रमुखतःमुख्य फसलों के बाद दलहन को बोयाजाता है जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है| साथ ही साथ परती नहीं छोड़ने से वायु द्वारा अपरदन में भी कमी आती है| मल्चिंग- इसके अंतर्गत खेतों में फसल कटाई के बाद फसल अवशेष की पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जाता है| इससे मृदा का संस्तर सुरक्षित रहता है तथा मृदा उपजाऊ बनी रहती है| हरी खाद का प्रयोग- इससे विभिन्न जैविक तत्वों का मृदा में प्रवेश होता है तथा खेतों की उर्वरता बढ़ती है| कृषि वानिकी- खेत के चारों तरफक्यारियों में दो या तीन पंक्तियों में एक निश्चित दूरी पर फसलों के साथ बीजों को रोपित करने से मृदा अपरदन को कम किया जा सकता है| मिश्रित खेती; वृक्षारोपण; इसके अतिरिक्त नियमित वानिकी, नियंत्रित चराई, आवरण फसलें उगाना, लवणीय तथा क्षारीय मृदाओं का पुनरुद्धार आदि अन्य उपचार के माध्यम से भी मृदा के गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है| मृदा संरक्षण हेतु कुछ अन्य उपाय- बड़ी नदियों की सहायक नदियों पर बाढ़ और मृदा अपरदन नियंत्रण हेतु छोटे बांधों का निर्माण ; धरातलीय और लंबवत अपवाह के विस्तार द्वारा जलमग्नता की समस्या का समाधान करना; मरुस्थलीय क्षेत्रों में वायु-विच्छेदों और सुरक्षा पेटियों का निर्माण करना; वैज्ञानिक विधियों(जिप्सम आदि का प्रयोग) कर क्षारीय मिट्टियों का पुनरुद्धार करना; वनस्पति रहित क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देना; खाद के रूप में गोबर और वनस्पति के उपयोग को लोकप्रिय बनाना; मानव अपशेष तथा नगरीय कचरे को खाद में परिवर्तित करना ; वैज्ञानिक शस्य आवर्तन और परती छोड़कर मृदा उर्वरता का संरक्षण करना; अवनालिकाओं का भराव एवं ढलवां सतह के सहारे वेदिकाओं का निर्माण करना; बीहड़ क्षेत्रों का समतलीकरण और इन क्षेत्रों में मिट्टी को बांधने वाले पौधों का रोपण करना; झूम कृषि क्षेत्रों का आधुनिक स्थाई कृषि क्षेत्रों में परिवर्तन ; शुष्क और पहाड़ी क्षेत्रों में वृक्षारोपण करना और अत्यधिक पशु चारण पर प्रतिबंध; कृषि की नई तकनीकों को अपनाना; भारत सरकार द्वारा स्थापित केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड द्वारा देश के विभिन्न भागों में मृदा संरक्षण के लिए योजनाएं बनाई गई हैं| साथ ही, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, जैविक कृषि को बढ़ावा देने पर राष्ट्रीय परियोजना, मनरेगा, मृदा और भूमि उपयोग संरक्षण केंद्र, मृदा जांच प्रयोगशालाएं आदि के माध्यम से भी मृदा संरक्षण तथा प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है|
47,322
पूंजी बाजार के विभिन्न साधनों का उल्लेख करते हुए म्यूचुअल फ़ंड, मसाला बॉन्ड व व्युत्पन्न बाजार पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Citing various means of capital markets explain in detail the mutual funds, masala bonds and derivative market. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पूंजी बाजार को परिभाषित कीजिए। इसके बाद पूंजी बाजार के विभिन्न साधनों का उल्लेख कीजिए। म्यूचुअल फ़ंड, मसाला बॉन्ड, व्युत्पन्न बाजार के बारे में लिखिए। पूंजी बाजार वित्तीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह दीर्घकालिक फंड का बाजार है जिसमें अंशपत्रों तथा ऋण के माध्यम से पूंजी की उगाही सम्मिलित है। पूंजी बाजार का मुख्य कार्य उन क्षेत्रों से है जहां बचत आधिक्य है, इस बचत को उन क्षेत्रों तक पहुंचाना जहां मांग अधिक है। पूंजी बाजार के साधन: पूंजी बाजार को दो भागों में बांटा जाता है: प्राथमिक बाजार और द्वितीयक बाजार। इसमें निम्नलिखित साधन प्रयोग किए जाते हैं: घरेलू कंपनियों द्वारा निर्गमित समता अंश इसमें आईपीओ, राइट इशू तथा बोनस इशू आते हैं। विदेशी वाणिज्यिक उधारी, ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट के माध्यम से निर्गमित अंश पोर्टफोलियो निवेश एनआरआई जमा शेयर ऋणपत्र डेरिवेटिव्स म्यूचुअल फ़ंड: म्यूचुअल फ़ंड एक निवेश वित्तीय मध्यस्थ है जो छोटे निवेशकों की बचत का गतिशीलन करता हैं। इससे प्राप्त बचतों को अनुभव तथा कुशलता के साथ संतुलित व विविधिकृत पोर्टफोलियो में विनियोजित करता है जिसके करना सम्पूर्ण रूप में जोखिम में कमी लाता है। गौरतलब है कि अधिकांश निवेशकों में पूंजी बाजार की जटिलताओं को समझने की क्षमता नहीं होती है। शेयर के मूल्यों में होने वाले परिवर्तन तथा इसके कारण उत्पन्न पूंजी हानि की संभावना के कारण उत्पन्न जोखिम के दर से भी भी निवेशक शेयर में निवेश नहीं करते। इस समस्या के समाधान के रूप में म्यूचुअल फ़ंड का महत्व है।म्यूचुअल फ़ंड से प्राप्त किसी भी आय पर आयकर नहीं देना पड़ता है। हालांकि लाभांश वितरण कर देना पड़ता है। मसाला बॉन्ड: भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहर पूंजी बाज़ारों में पेश किए गए ऋण उपकरण हैं भारतीय रुपए में अंकित होते हैं। घरेलू बाजार में बॉन्ड द्वारा जुटाई गई मुद्रा को रुपए में बदला जाता है। यह विदेशों से वित्तीय संग्रहण का एक महत्वपूर्ण साधन है। व्युत्पन्न बाजार: किसी ऋण साधन से उत्पन्न व्युत्पन्न प्रतिभूतियाँ, शेयर, जोखिम साधन आदि से उत्पन्न प्रतिभूतियाँ होती हैं। इसका स्वयं का मूल्य नहीं होता बल्कि जिस साधन से व्युत्पन्न होती हैं उसके मूल्य से प्रभावित होती हैं। इसके माध्यम से विदेशों से वित्त आकर्षित करने में सरलता होती हैं। विभिन्न प्रकार के पूंजी का एक दूसरे में बदलाव करके व्यापार में लगाया जा सकता है। जोखिम में कमी होती है।
##Question:पूंजी बाजार के विभिन्न साधनों का उल्लेख करते हुए म्यूचुअल फ़ंड, मसाला बॉन्ड व व्युत्पन्न बाजार पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Citing various means of capital markets explain in detail the mutual funds, masala bonds and derivative market. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में पूंजी बाजार को परिभाषित कीजिए। इसके बाद पूंजी बाजार के विभिन्न साधनों का उल्लेख कीजिए। म्यूचुअल फ़ंड, मसाला बॉन्ड, व्युत्पन्न बाजार के बारे में लिखिए। पूंजी बाजार वित्तीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह दीर्घकालिक फंड का बाजार है जिसमें अंशपत्रों तथा ऋण के माध्यम से पूंजी की उगाही सम्मिलित है। पूंजी बाजार का मुख्य कार्य उन क्षेत्रों से है जहां बचत आधिक्य है, इस बचत को उन क्षेत्रों तक पहुंचाना जहां मांग अधिक है। पूंजी बाजार के साधन: पूंजी बाजार को दो भागों में बांटा जाता है: प्राथमिक बाजार और द्वितीयक बाजार। इसमें निम्नलिखित साधन प्रयोग किए जाते हैं: घरेलू कंपनियों द्वारा निर्गमित समता अंश इसमें आईपीओ, राइट इशू तथा बोनस इशू आते हैं। विदेशी वाणिज्यिक उधारी, ग्लोबल डिपोजिटरी रिसीट के माध्यम से निर्गमित अंश पोर्टफोलियो निवेश एनआरआई जमा शेयर ऋणपत्र डेरिवेटिव्स म्यूचुअल फ़ंड: म्यूचुअल फ़ंड एक निवेश वित्तीय मध्यस्थ है जो छोटे निवेशकों की बचत का गतिशीलन करता हैं। इससे प्राप्त बचतों को अनुभव तथा कुशलता के साथ संतुलित व विविधिकृत पोर्टफोलियो में विनियोजित करता है जिसके करना सम्पूर्ण रूप में जोखिम में कमी लाता है। गौरतलब है कि अधिकांश निवेशकों में पूंजी बाजार की जटिलताओं को समझने की क्षमता नहीं होती है। शेयर के मूल्यों में होने वाले परिवर्तन तथा इसके कारण उत्पन्न पूंजी हानि की संभावना के कारण उत्पन्न जोखिम के दर से भी भी निवेशक शेयर में निवेश नहीं करते। इस समस्या के समाधान के रूप में म्यूचुअल फ़ंड का महत्व है।म्यूचुअल फ़ंड से प्राप्त किसी भी आय पर आयकर नहीं देना पड़ता है। हालांकि लाभांश वितरण कर देना पड़ता है। मसाला बॉन्ड: भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहर पूंजी बाज़ारों में पेश किए गए ऋण उपकरण हैं भारतीय रुपए में अंकित होते हैं। घरेलू बाजार में बॉन्ड द्वारा जुटाई गई मुद्रा को रुपए में बदला जाता है। यह विदेशों से वित्तीय संग्रहण का एक महत्वपूर्ण साधन है। व्युत्पन्न बाजार: किसी ऋण साधन से उत्पन्न व्युत्पन्न प्रतिभूतियाँ, शेयर, जोखिम साधन आदि से उत्पन्न प्रतिभूतियाँ होती हैं। इसका स्वयं का मूल्य नहीं होता बल्कि जिस साधन से व्युत्पन्न होती हैं उसके मूल्य से प्रभावित होती हैं। इसके माध्यम से विदेशों से वित्त आकर्षित करने में सरलता होती हैं। विभिन्न प्रकार के पूंजी का एक दूसरे में बदलाव करके व्यापार में लगाया जा सकता है। जोखिम में कमी होती है।
47,325
भारत की आजादी के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र के एकीकरण की प्रक्रिया में आने वाली वाली प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | साथ ही स्वतंत्रता पश्चात इसके पुनर्गठन की प्रक्रिया को भी संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द) Underline the major challenges faced in the process of integration of Northeast region after independence of India. Also briefly explain the process of its reorganization after independence. (150-200 words)
एप्रोच नवस्वतंत्र भारत में पूर्वोतर क्षेत्र की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | अगले भाग में, पूर्वोतर क्षेत्र के एकीकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दर्शाईये | अंतिम भाग में, इन चुनौतियों से पार पाते हुए उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये | उत्तर- 19वीं सदी में राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वोतर क्षेत्र में 3 प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी - असम को प्रान्त का दर्जा या बंगाल प्रांत के भाग के रूप में प्रशासन; असम के पर्वतीय क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण; मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि रियासतों में अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन कुछ स्वायत्तता|स्वतंत्रता के समय मणिपुर तथा त्रिपुरा को छोड़कर संपूर्ण पूर्वोतर क्षेत्र असम मेंशामिल था| सांस्कृतिक एवं जनजातीय विविधता असम के मैदानी भागों को छोड़कर सभी पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक तौर पर विद्यमान थी| पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान मैदानी भाग में रहने वाले असमिया तथा बंगाली भाषी लोगों से काफी अलग थी| साथ ही,पूर्वोतर क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित विशिष्ट चुनौतियाँविद्यमान थी- भौगोलिक तथा नृजातीय विविधता -भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर क्षेत्र का अलगाव तथा नृजातीयता, भाषा, सामाजिक संगठन तथा आर्थिक विकास के स्तरों पर व्यापक विविधता | पारंपरिक समाजों की बहुलताजिसने एकल राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के कार्य को कठिन बनाया| शेष भारत से सांस्कृतिक अलगाव -जनजातियों के विशिष्ट पहचान तथा यहां पाए जाने वाले नृजातीय समूह के उप राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने शेष भारत से अलगाव को बढ़ावा दिया| लगभग हर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति में विभिन्नता मौजूद थी| उदाहरणस्वरूप- पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों के मध्य व्याप्त वैमनस्य की भावना | भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कम जुडावकी वजह से पूर्वोत्तर के मूल निवासियों में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का अभाव देखने को मिलता है| अंग्रेजों द्वारा पृथक्करण और शोषण की नीतिका अनुसरण | पूर्वोत्तर राज्य के जनजातीय लोगों का शेष भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन से अलगाव था उसपर से जनजातीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों तक ही सीमित था जो सामान्यतः उनके दृष्टिकोण को भारत विरोधी बनाने की कोशिश करते रहते थे| उग्रवादी समूहों द्वारा निभाई गई भूमिकाजिन्होंने भारतीय संघ में क्षेत्रों का विलय का विरोध किया | अन्य देशों का प्रभावजैसे मिजोनेता बर्मा में शामिल होना चाहते थे | पहचान का मुद्दा- व्यापक पैमाने पर प्रवासन के कारण स्थानीय निवासियों के मध्य पहचान खोने का संकट; जैसे - पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के कारण असम के स्थानीय लोगों के मन में संदेह | आज़ादी पश्चातविविध कारणों से पर्वतीय तथा मैदानी लोगों के बीच तनाव का बढ़नाजैसे -प्रशासनिक उपेक्षा; अपेक्षित आर्थिक सहायता ना मिलना; संकट के दौरान राहत-कार्यों में विलंब इत्यादि | उपरोक्त वजहों के कारण पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण की प्रक्रिया बाकी भारतीय क्षेत्रों के मुकाबले अधिक जटिल थी | स्वतंत्रता पश्चात उत्तर-पूर्वी भारत का पुनर्गठन पूर्वोत्तर के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम1948 में उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को नेफा नाम से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेशबनाया गया जिसे1987 में अलग अरुणाचल प्रदेश राज्यके रूप में मान्यता दी गई | असम सरकार के भेदभावपूर्णरवैये की वजह से जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष बड़ा तथा अलग राज्य के मुद्दे जोर पकड़ने लगे | इस संदर्भ में 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों द्वाराऑल पार्टी हील लीडर कॉन्फ्रेंसबनाया गया तथा असमिया भाषा के मुद्दे पर व्यापक विरोध-प्रदर्शन, हड़ताल आदि करना चालू कर दिया गया| अंततः1969 में संविधान संशोधन के माध्यम से असम के अंदर मेघालय राज्यका निर्माण हुआ | 1972 में पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुनर्गठनके रूप में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा मणिपुर एवं त्रिपुरा के केंद्र शासित प्रदेशों को भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया| इस प्रकार,असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा का पुनर्गठन हुआएवं जटिलता सिर्फ नागालैंडएवं मिजोरम में ही बची | मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी समूहों द्वारा हिंसक मार्ग अपनाया गया| परंतु सेना द्वारा इस समस्या को प्रभावशाली ढंग से सुलझाया गया एवं1986 में मिजो नेशनल फ्रंट तथा भारत सरकार के मध्य शांति समझौतेके फलस्वरूप1987 में अलग मिजोरम राज्य का गठनहुआ | उसी प्रकार, नगालैंड के अलगाववादियों ने भी भारत संघ में एकीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया परंतु भारत सरकार द्वारा अलगाववाद तथा पृथकतावाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया| लंबी चली वार्ताओं एवं सैनिक कार्यवाहियों के बाद1963 में अलग नागालैंड राज्यअस्तित्व में आया | इस प्रकार आधुनिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वरूप में आया जिसके एकीकरण में जनजातीय विविधता तथा भाषा का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था| हालांकि, अभी भी जनजातीय क्षेत्रों से स्वायत्तता एवं आजादी की मांग यदा-कदा उठती रहती है परंतु उनका जमीनी आधार काफी कम हो चुका है |
##Question:भारत की आजादी के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र के एकीकरण की प्रक्रिया में आने वाली वाली प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | साथ ही स्वतंत्रता पश्चात इसके पुनर्गठन की प्रक्रिया को भी संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द) Underline the major challenges faced in the process of integration of Northeast region after independence of India. Also briefly explain the process of its reorganization after independence. (150-200 words)##Answer:एप्रोच नवस्वतंत्र भारत में पूर्वोतर क्षेत्र की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | अगले भाग में, पूर्वोतर क्षेत्र के एकीकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दर्शाईये | अंतिम भाग में, इन चुनौतियों से पार पाते हुए उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये | उत्तर- 19वीं सदी में राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वोतर क्षेत्र में 3 प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी - असम को प्रान्त का दर्जा या बंगाल प्रांत के भाग के रूप में प्रशासन; असम के पर्वतीय क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण; मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि रियासतों में अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन कुछ स्वायत्तता|स्वतंत्रता के समय मणिपुर तथा त्रिपुरा को छोड़कर संपूर्ण पूर्वोतर क्षेत्र असम मेंशामिल था| सांस्कृतिक एवं जनजातीय विविधता असम के मैदानी भागों को छोड़कर सभी पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक तौर पर विद्यमान थी| पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान मैदानी भाग में रहने वाले असमिया तथा बंगाली भाषी लोगों से काफी अलग थी| साथ ही,पूर्वोतर क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित विशिष्ट चुनौतियाँविद्यमान थी- भौगोलिक तथा नृजातीय विविधता -भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर क्षेत्र का अलगाव तथा नृजातीयता, भाषा, सामाजिक संगठन तथा आर्थिक विकास के स्तरों पर व्यापक विविधता | पारंपरिक समाजों की बहुलताजिसने एकल राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के कार्य को कठिन बनाया| शेष भारत से सांस्कृतिक अलगाव -जनजातियों के विशिष्ट पहचान तथा यहां पाए जाने वाले नृजातीय समूह के उप राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने शेष भारत से अलगाव को बढ़ावा दिया| लगभग हर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति में विभिन्नता मौजूद थी| उदाहरणस्वरूप- पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों के मध्य व्याप्त वैमनस्य की भावना | भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कम जुडावकी वजह से पूर्वोत्तर के मूल निवासियों में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का अभाव देखने को मिलता है| अंग्रेजों द्वारा पृथक्करण और शोषण की नीतिका अनुसरण | पूर्वोत्तर राज्य के जनजातीय लोगों का शेष भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन से अलगाव था उसपर से जनजातीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों तक ही सीमित था जो सामान्यतः उनके दृष्टिकोण को भारत विरोधी बनाने की कोशिश करते रहते थे| उग्रवादी समूहों द्वारा निभाई गई भूमिकाजिन्होंने भारतीय संघ में क्षेत्रों का विलय का विरोध किया | अन्य देशों का प्रभावजैसे मिजोनेता बर्मा में शामिल होना चाहते थे | पहचान का मुद्दा- व्यापक पैमाने पर प्रवासन के कारण स्थानीय निवासियों के मध्य पहचान खोने का संकट; जैसे - पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के कारण असम के स्थानीय लोगों के मन में संदेह | आज़ादी पश्चातविविध कारणों से पर्वतीय तथा मैदानी लोगों के बीच तनाव का बढ़नाजैसे -प्रशासनिक उपेक्षा; अपेक्षित आर्थिक सहायता ना मिलना; संकट के दौरान राहत-कार्यों में विलंब इत्यादि | उपरोक्त वजहों के कारण पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण की प्रक्रिया बाकी भारतीय क्षेत्रों के मुकाबले अधिक जटिल थी | स्वतंत्रता पश्चात उत्तर-पूर्वी भारत का पुनर्गठन पूर्वोत्तर के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम1948 में उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को नेफा नाम से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेशबनाया गया जिसे1987 में अलग अरुणाचल प्रदेश राज्यके रूप में मान्यता दी गई | असम सरकार के भेदभावपूर्णरवैये की वजह से जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष बड़ा तथा अलग राज्य के मुद्दे जोर पकड़ने लगे | इस संदर्भ में 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों द्वाराऑल पार्टी हील लीडर कॉन्फ्रेंसबनाया गया तथा असमिया भाषा के मुद्दे पर व्यापक विरोध-प्रदर्शन, हड़ताल आदि करना चालू कर दिया गया| अंततः1969 में संविधान संशोधन के माध्यम से असम के अंदर मेघालय राज्यका निर्माण हुआ | 1972 में पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुनर्गठनके रूप में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा मणिपुर एवं त्रिपुरा के केंद्र शासित प्रदेशों को भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया| इस प्रकार,असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा का पुनर्गठन हुआएवं जटिलता सिर्फ नागालैंडएवं मिजोरम में ही बची | मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी समूहों द्वारा हिंसक मार्ग अपनाया गया| परंतु सेना द्वारा इस समस्या को प्रभावशाली ढंग से सुलझाया गया एवं1986 में मिजो नेशनल फ्रंट तथा भारत सरकार के मध्य शांति समझौतेके फलस्वरूप1987 में अलग मिजोरम राज्य का गठनहुआ | उसी प्रकार, नगालैंड के अलगाववादियों ने भी भारत संघ में एकीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया परंतु भारत सरकार द्वारा अलगाववाद तथा पृथकतावाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया| लंबी चली वार्ताओं एवं सैनिक कार्यवाहियों के बाद1963 में अलग नागालैंड राज्यअस्तित्व में आया | इस प्रकार आधुनिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वरूप में आया जिसके एकीकरण में जनजातीय विविधता तथा भाषा का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था| हालांकि, अभी भी जनजातीय क्षेत्रों से स्वायत्तता एवं आजादी की मांग यदा-कदा उठती रहती है परंतु उनका जमीनी आधार काफी कम हो चुका है |
47,330
अनुच्छेद 14 के संबंध में विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए। इसमें निहित अपवादों का भी उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Differentiate between equality before law and equal protection of laws. Also, mention exceptions vested in it. (150-200 words)
एप्रोच: भूमिका में समानता के अधिकार का संक्षिप्त परिचय दीजिए। इसके बाद दोनों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए। मुख्य भाग के दूसरे खंड में समता के अपवादों को लिखिए निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 तहत समानता के अधिकार का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह नागरिक हो या विदेशी दोनों को विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण का अधिकार प्राप्त होगा। विधि के समक्ष समता व विधियों के समान संरक्षण में अंतर: विधि के समक्ष समता विधियों के समान संरक्षण में अंतर 1.यह विचार ब्रिटिश मूल का है। 1. इसे अमेरिका के संविधान से लिया गया है 2.किसी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति 2. विधियों द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों और अध्यारोपित दायित्वों दोनों में समान परिस्थितियों के अंतर्गत व्यवहार समता। 3.साधारण विधि या साधारण विधि न्यायालय के तहत सभी 3. समान विधि के अंतर्गत सभी व्यक्तियों के लिए समान नियम व्यक्तियों के लिए समान व्यवहार 4.कोई व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं। 4. बिना भेदभाव के समान के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। 5.नकारात्मक संदर्भ में 5. सकारात्मक संदर्भ में विधि के समक्ष समता के अपवाद: अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति व राज्यपाल को निम्न शक्तियाँ प्राप्त हैं:उनकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही प्रारम्भ नहीं की जा सकती है। गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं की जा सकती संसद व विधानमण्डल के सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार: सदन में रखे गए किसी मत के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है। विदेशी शासक, राजदूत आदि को दीवानी एवं फ़ौजदारी मुकदमों से मुक्ति। संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उनकी एजेंसियों को भी कूटनीतिक मुक्ति प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 31(ग ) अनुच्छेद 14 का अपवाद है। इस प्रकार भारत के संविधान में विधि के समक्ष समता व विधियों के समान संरक्षण दोनों अधिकारों को शामिल किया गया है। हालांकि दोनों में अंतर है तथा विधि के समक्ष समता के संबंध में कुछ अपवाद भी दिये गए हैं परंतु दोनों का उद्देश्य विधि, न्याय और अवसर की समानता है।
##Question:अनुच्छेद 14 के संबंध में विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए। इसमें निहित अपवादों का भी उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Differentiate between equality before law and equal protection of laws. Also, mention exceptions vested in it. (150-200 words)##Answer:एप्रोच: भूमिका में समानता के अधिकार का संक्षिप्त परिचय दीजिए। इसके बाद दोनों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए। मुख्य भाग के दूसरे खंड में समता के अपवादों को लिखिए निष्कर्ष में उत्तर का संक्षिप्त सारांश लिखिए। संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 तहत समानता के अधिकार का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह नागरिक हो या विदेशी दोनों को विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण का अधिकार प्राप्त होगा। विधि के समक्ष समता व विधियों के समान संरक्षण में अंतर: विधि के समक्ष समता विधियों के समान संरक्षण में अंतर 1.यह विचार ब्रिटिश मूल का है। 1. इसे अमेरिका के संविधान से लिया गया है 2.किसी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति 2. विधियों द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों और अध्यारोपित दायित्वों दोनों में समान परिस्थितियों के अंतर्गत व्यवहार समता। 3.साधारण विधि या साधारण विधि न्यायालय के तहत सभी 3. समान विधि के अंतर्गत सभी व्यक्तियों के लिए समान नियम व्यक्तियों के लिए समान व्यवहार 4.कोई व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं। 4. बिना भेदभाव के समान के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। 5.नकारात्मक संदर्भ में 5. सकारात्मक संदर्भ में विधि के समक्ष समता के अपवाद: अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति व राज्यपाल को निम्न शक्तियाँ प्राप्त हैं:उनकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही प्रारम्भ नहीं की जा सकती है। गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं की जा सकती संसद व विधानमण्डल के सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार: सदन में रखे गए किसी मत के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है। विदेशी शासक, राजदूत आदि को दीवानी एवं फ़ौजदारी मुकदमों से मुक्ति। संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उनकी एजेंसियों को भी कूटनीतिक मुक्ति प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 31(ग ) अनुच्छेद 14 का अपवाद है। इस प्रकार भारत के संविधान में विधि के समक्ष समता व विधियों के समान संरक्षण दोनों अधिकारों को शामिल किया गया है। हालांकि दोनों में अंतर है तथा विधि के समक्ष समता के संबंध में कुछ अपवाद भी दिये गए हैं परंतु दोनों का उद्देश्य विधि, न्याय और अवसर की समानता है।
47,333
भारत की आजादी के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र के एकीकरण की प्रक्रिया में आने वाली वाली प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | साथ ही स्वतंत्रता पश्चात इसके पुनर्गठन की प्रक्रिया को भी संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द) Underline the major challenges faced in the process of integration of Northeast region after independence of India. Also briefly explain the process of its reorganization after independence. (150-200 words)
एप्रोच नवस्वतंत्र भारत में पूर्वोतर क्षेत्र की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | अगले भाग में, पूर्वोतर क्षेत्र के एकीकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दर्शाईये | अंतिम भाग में, इन चुनौतियों से पार पाते हुए उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये | उत्तर- 19वीं सदी में राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वोतर क्षेत्र में 3 प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी - असम को प्रान्त का दर्जा या बंगाल प्रांत के भाग के रूप में प्रशासन; असम के पर्वतीय क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण; मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि रियासतों में अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन कुछ स्वायत्तता|स्वतंत्रता के समय मणिपुर तथा त्रिपुरा को छोड़कर संपूर्ण पूर्वोतर क्षेत्र असम मेंशामिल था| सांस्कृतिक एवं जनजातीय विविधता असम के मैदानी भागों को छोड़कर सभी पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक तौर पर विद्यमान थी| पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान मैदानी भाग में रहने वाले असमिया तथा बंगाली भाषी लोगों से काफी अलग थी| साथ ही,पूर्वोतर क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित विशिष्ट चुनौतियाँविद्यमान थी- भौगोलिक तथा नृजातीय विविधता -भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर क्षेत्र का अलगाव तथा नृजातीयता, भाषा, सामाजिक संगठन तथा आर्थिक विकास के स्तरों पर व्यापक विविधता | पारंपरिक समाजों की बहुलताजिसने एकल राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के कार्य को कठिन बनाया| शेष भारत से सांस्कृतिक अलगाव- जनजातियों के विशिष्ट पहचान तथा यहां पाए जाने वाले नृजातीय समूह के उप राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने शेष भारत से अलगाव को बढ़ावा दिया| लगभग हर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति में विभिन्नता मौजूद थी| उदाहरणस्वरूप- पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों के मध्य व्याप्त वैमनस्य की भावना | भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कम जुडावकी वजह से पूर्वोत्तर के मूल निवासियों में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का अभाव देखने को मिलता है| अंग्रेजों द्वारा पृथक्करण और शोषण की नीतिका अनुसरण | पूर्वोत्तर राज्य के जनजातीय लोगों का शेष भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन से अलगाव था उसपर से जनजातीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों तक ही सीमित था जो सामान्यतः उनके दृष्टिकोण को भारत विरोधी बनाने की कोशिश करते रहते थे| उग्रवादी समूहों द्वारा निभाई गई भूमिकाजिन्होंने भारतीय संघ में क्षेत्रों का विलय का विरोध किया | अन्य देशों का प्रभावजैसे मिजोनेता बर्मा में शामिल होना चाहते थे | पहचान का मुद्दा- व्यापक पैमाने पर प्रवासन के कारण स्थानीय निवासियों के मध्य पहचान खोने का संकट; जैसे - पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के कारण असम के स्थानीय लोगों के मन में संदेह | आज़ादी पश्चातविविध कारणों से पर्वतीय तथा मैदानी लोगों के बीच तनाव का बढ़नाजैसे -प्रशासनिक उपेक्षा; अपेक्षित आर्थिक सहायता ना मिलना; संकट के दौरान राहत-कार्यों में विलंब इत्यादि | उपरोक्त वजहों के कारण पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण की प्रक्रिया बाकी भारतीय क्षेत्रों के मुकाबले अधिक जटिल थी | स्वतंत्रता पश्चात उत्तर-पूर्वी भारत का पुनर्गठन पूर्वोत्तर के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम1948 में उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को नेफा नाम से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेशबनाया गया जिसे1987 में अलग अरुणाचल प्रदेश राज्यके रूप में मान्यता दी गई | असम सरकार के भेदभावपूर्णरवैये की वजह से जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष बड़ा तथा अलग राज्य के मुद्दे जोर पकड़ने लगे | इस संदर्भ में 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों द्वाराऑल पार्टी हील लीडर कॉन्फ्रेंसबनाया गया तथा असमिया भाषा के मुद्दे पर व्यापक विरोध-प्रदर्शन, हड़ताल आदि करना चालू कर दिया गया| अंततः1969 में संविधान संशोधन के माध्यम से असम के अंदर मेघालय राज्यका निर्माण हुआ | 1972 में पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुनर्गठनके रूप में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा मणिपुर एवं त्रिपुरा के केंद्र शासित प्रदेशों को भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया| इस प्रकार,असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा का पुनर्गठन हुआएवं जटिलता सिर्फ नागालैंडएवं मिजोरम में ही बची | मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी समूहों द्वारा हिंसक मार्ग अपनाया गया| परंतु सेना द्वारा इस समस्या को प्रभावशाली ढंग से सुलझाया गया एवं1986 में मिजो नेशनल फ्रंट तथा भारत सरकार के मध्य शांति समझौतेके फलस्वरूप1987 में अलग मिजोरम राज्य का गठनहुआ | उसी प्रकार, नगालैंड के अलगाववादियों ने भी भारत संघ में एकीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया परंतु भारत सरकार द्वारा अलगाववाद तथा पृथकतावाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया| लंबी चली वार्ताओं एवं सैनिक कार्यवाहियों के बाद1963 में अलग नागालैंड राज्यअस्तित्व में आया | इस प्रकार आधुनिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वरूप में आया जिसके एकीकरण में जनजातीय विविधता तथा भाषा का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था| हालांकि, अभी भी जनजातीय क्षेत्रों से स्वायत्तता एवं आजादी की मांग यदा-कदा उठती रहती है परंतु उनका जमीनी आधार काफी कम हो चुका है |
##Question:भारत की आजादी के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र के एकीकरण की प्रक्रिया में आने वाली वाली प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिये | साथ ही स्वतंत्रता पश्चात इसके पुनर्गठन की प्रक्रिया को भी संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द) Underline the major challenges faced in the process of integration of Northeast region after independence of India. Also briefly explain the process of its reorganization after independence. (150-200 words)##Answer:एप्रोच नवस्वतंत्र भारत में पूर्वोतर क्षेत्र की पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये | अगले भाग में, पूर्वोतर क्षेत्र के एकीकरण के समक्ष आने वाली चुनौतियों को दर्शाईये | अंतिम भाग में, इन चुनौतियों से पार पाते हुए उत्तर-पूर्वी भारत के पुनर्गठन का विवरण दीजिये | उत्तर- 19वीं सदी में राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वोतर क्षेत्र में 3 प्रकार की व्यवस्था विद्यमान थी - असम को प्रान्त का दर्जा या बंगाल प्रांत के भाग के रूप में प्रशासन; असम के पर्वतीय क्षेत्रों पर केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण; मणिपुर,त्रिपुरा इत्यादि रियासतों में अंग्रेजों के नियंत्रण के अधीन कुछ स्वायत्तता|स्वतंत्रता के समय मणिपुर तथा त्रिपुरा को छोड़कर संपूर्ण पूर्वोतर क्षेत्र असम मेंशामिल था| सांस्कृतिक एवं जनजातीय विविधता असम के मैदानी भागों को छोड़कर सभी पर्वतीय क्षेत्रों में व्यापक तौर पर विद्यमान थी| पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान मैदानी भाग में रहने वाले असमिया तथा बंगाली भाषी लोगों से काफी अलग थी| साथ ही,पूर्वोतर क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित विशिष्ट चुनौतियाँविद्यमान थी- भौगोलिक तथा नृजातीय विविधता -भारत की मुख्य भूमि से पूर्वोत्तर क्षेत्र का अलगाव तथा नृजातीयता, भाषा, सामाजिक संगठन तथा आर्थिक विकास के स्तरों पर व्यापक विविधता | पारंपरिक समाजों की बहुलताजिसने एकल राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के कार्य को कठिन बनाया| शेष भारत से सांस्कृतिक अलगाव- जनजातियों के विशिष्ट पहचान तथा यहां पाए जाने वाले नृजातीय समूह के उप राष्ट्रीय आकांक्षाओं ने शेष भारत से अलगाव को बढ़ावा दिया| लगभग हर जनजाति की भाषा एवं संस्कृति में विभिन्नता मौजूद थी| उदाहरणस्वरूप- पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों के मध्य व्याप्त वैमनस्य की भावना | भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कम जुडावकी वजह से पूर्वोत्तर के मूल निवासियों में राष्ट्रीयता और एकता की भावना का अभाव देखने को मिलता है| अंग्रेजों द्वारा पृथक्करण और शोषण की नीतिका अनुसरण | पूर्वोत्तर राज्य के जनजातीय लोगों का शेष भारत के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन से अलगाव था उसपर से जनजातीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क मुख्यतः अंग्रेज अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों तक ही सीमित था जो सामान्यतः उनके दृष्टिकोण को भारत विरोधी बनाने की कोशिश करते रहते थे| उग्रवादी समूहों द्वारा निभाई गई भूमिकाजिन्होंने भारतीय संघ में क्षेत्रों का विलय का विरोध किया | अन्य देशों का प्रभावजैसे मिजोनेता बर्मा में शामिल होना चाहते थे | पहचान का मुद्दा- व्यापक पैमाने पर प्रवासन के कारण स्थानीय निवासियों के मध्य पहचान खोने का संकट; जैसे - पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में आने वाले प्रवासियों के कारण असम के स्थानीय लोगों के मन में संदेह | आज़ादी पश्चातविविध कारणों से पर्वतीय तथा मैदानी लोगों के बीच तनाव का बढ़नाजैसे -प्रशासनिक उपेक्षा; अपेक्षित आर्थिक सहायता ना मिलना; संकट के दौरान राहत-कार्यों में विलंब इत्यादि | उपरोक्त वजहों के कारण पूर्वोत्तर भारत के एकीकरण की प्रक्रिया बाकी भारतीय क्षेत्रों के मुकाबले अधिक जटिल थी | स्वतंत्रता पश्चात उत्तर-पूर्वी भारत का पुनर्गठन पूर्वोत्तर के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम1948 में उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को नेफा नाम से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेशबनाया गया जिसे1987 में अलग अरुणाचल प्रदेश राज्यके रूप में मान्यता दी गई | असम सरकार के भेदभावपूर्णरवैये की वजह से जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष बड़ा तथा अलग राज्य के मुद्दे जोर पकड़ने लगे | इस संदर्भ में 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों के जनजातीय लोगों द्वाराऑल पार्टी हील लीडर कॉन्फ्रेंसबनाया गया तथा असमिया भाषा के मुद्दे पर व्यापक विरोध-प्रदर्शन, हड़ताल आदि करना चालू कर दिया गया| अंततः1969 में संविधान संशोधन के माध्यम से असम के अंदर मेघालय राज्यका निर्माण हुआ | 1972 में पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पुनर्गठनके रूप में मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा मणिपुर एवं त्रिपुरा के केंद्र शासित प्रदेशों को भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया| इस प्रकार,असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा का पुनर्गठन हुआएवं जटिलता सिर्फ नागालैंडएवं मिजोरम में ही बची | मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी समूहों द्वारा हिंसक मार्ग अपनाया गया| परंतु सेना द्वारा इस समस्या को प्रभावशाली ढंग से सुलझाया गया एवं1986 में मिजो नेशनल फ्रंट तथा भारत सरकार के मध्य शांति समझौतेके फलस्वरूप1987 में अलग मिजोरम राज्य का गठनहुआ | उसी प्रकार, नगालैंड के अलगाववादियों ने भी भारत संघ में एकीकरण की प्रक्रिया का विरोध किया परंतु भारत सरकार द्वारा अलगाववाद तथा पृथकतावाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया| लंबी चली वार्ताओं एवं सैनिक कार्यवाहियों के बाद1963 में अलग नागालैंड राज्यअस्तित्व में आया | इस प्रकार आधुनिक रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र स्वरूप में आया जिसके एकीकरण में जनजातीय विविधता तथा भाषा का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण था| हालांकि, अभी भी जनजातीय क्षेत्रों से स्वायत्तता एवं आजादी की मांग यदा-कदा उठती रहती है परंतु उनका जमीनी आधार काफी कम हो चुका है |
47,337
लुक ईस्ट एवं एक्ट ईस्ट नीतियों में अंतर स्पष्ट करते हुए भारत के सन्दर्भ में आसियान क्षेत्र के महत्त्व को रेखांकित कीजिये |(150 से 200 शब्द/10अंक) Clarifying the difference between Look East and Act East policies,Underline the importance of ASEAN in the context of India. (150 to 200 words/10 marks).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृष्ठभूमि बताते हुए लुक ईस्ट नीति की चर्चा कीजिये 2- प्रथम खंड में नीति का विकास स्पष्ट करते हुए एक्ट ईस्ट नीति को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में भारत के सन्दर्भ में आसियान के महत्त्व को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में चुनौतियां और उनका समाधान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1990 के दशक में भारत भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था| इसी समय 1991 में सोवियत संघ का विघटन, अतः अब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नए मित्रों की तलाश थी, भारत ने उन देशों की ओर देखता है जो LPG मॉडल पर चल रहे थे, इसमें भारत का ध्यान आसियान देशों की तरफ जाता है| अतः आसियान के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के लिए लुक ईस्ट नीति लायी गयी| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना , पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास करना, दक्षिण पूर्वी एशिया से भारत की कनेक्टीविटी बढ़ाना, सामरिक सुरक्षा तथा व्यापार संस्कृति आदि का विकास करना लुक ईस्ट नीति के उद्देश्य थे | वर्ष 2003 तक हमारा फोकस आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करने औरबाजार, पूँजी तथा तकनीकी सहयोग आदि पर केन्द्रित था| 2003-2012 के काल में में सम्बन्धों में विविधता लायी गयी इस चरण में सामरिक सम्बन्ध भी बनाने के प्रयास किये गए|अर्थात अब लुक ईस्ट नीति का स्वरुप बदल गया था अतः भारत ने अपनी नीति का नवीनीकरण किया औरइसके बाद 2014 में एक्ट ईस्ट पालिसी लायी गयी| इसमें सम्बन्धों को आसियान के साथ ही आगे बढ़ते हुए +6 के देश और अन्य द्वीपीय राष्ट्रों तक विस्तृत करने की नीति अपनाई गयी है| इस तरह से एक्ट ईस्ट पालिसी एक बहुआयामी नीति है इसमें आर्थिक सामरिक सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सहयोग आदि सभी आयामों को शामिल किया गया है| भारत के लिए आसियान का महत्त्व भारतीय डायस्पोरा की उपस्थिति · भारतीय डायस्पोरा आसियान के सभी देशों में उपस्थित है लेकिन कोई भी डायस्पोरा राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं है · इस क्षेत्र में डायस्पोरा के समक्ष विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे म्यामार के रोहिंग्या संकट, फिलिपीन्स में 2018 में ISIS के भय से आपातकाल लगाया जाना, लाओस और कम्बोडिया के मध्य अशांति आदि मुद्दे डायस्पोरा के हितों के विपरीत हैं| अतः यदि भारत को अपने डायस्पोरा को सुरक्षित रखना है तो आसियान देशों में स्थिरता का बने रहना आवश्यक है| इसके साथ ही डायस्पोरा की भूमिका को बढाने की आवश्यकता है| आर्थिक महत्त्व · सार्क निष्क्रिय स्थिति में है अतः भारत का व्यापार पूर्वी देशों यथा जापान चीन दक्षिण कोरिया तथा आसियान की ओर शिफ्ट कर रहा है, अतः आसियान भारत के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है · भारत आसियान की अर्थव्यवस्था यूरोपियन यूनियन के लगभग बराबर है अतः आपसी व्यापार को बढाया जाए तो भारत आसियान दोनों लाभ की स्थिति में होंगे ऊर्जा के लिए महत्त्व · भारत का 70 % ऊर्जा आयात पश्चिम एशिया से होता है जबकि पश्चिम एशिया के अधिकाँश देश अस्थिर हैं · इसके कारण भारत के समक्ष ऊर्जा असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होती है अतः भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता है| · आसियान में ब्रूनेई, वियतनाम, मलेशिया आदि ऊर्जा संपन्न देश हैंइस सन्दर्भ में आसियान के ऊर्जा संपन्न देशों के साथ सम्बन्ध मजबूत करने की आवश्यकता है दक्षिण चीन सागर का पहलू · यहाँ ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता है, वियतनाम और चीन के मध्य एक विवादित क्षेत्र है · भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वियतनाम में OVL के माध्यम से निवेश किया हुआ है दूसरी ओर CPEC के माध्यम से चीन भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती पेश कर रहा है| · अतः यह क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा के साथ ही सामरिक हितों के अनुरूप है सामरिक दृष्टिकोण से · हिंद महासागर एवं प्रशांत के मध्य जुड़ाव बिंदु क्षेत्र है| मलक्का जल संधि एवं अन्य जल डमरूमध्य में उत्पन्न कोई भी बाधा भारत के प्रभाव क्षेत्र को कम कर सकते हैं क्योंकि भारत इन्ही के माध्यम से प्रशांत के देशों के साथ सम्बन्ध बना सकता है · दक्षिणी चीन सागर में आसियान के विभिन्न देश चीन के साथ विवाद की स्थिति में हैं(शत्रु का शत्रु मित्र होता है), यह विवाद भारत के लिए एक अवसर है| अतः वियतनाम, फिलिपीन्स आदि के साथ भारत का सहयोग बढ़ सकता है · इस क्षेत्र में चीन के प्रतिसंतुलन के क्रम में भारत US सम्बन्ध मजबूत हो सकते हैं क्योंकि US हिंद महासागर से इंडो प्रशांत क्षेत्र की ओर पॉवर शिफ्ट कर रहा है · इसके अतिरक्त थिएटर ऑफ़ वार जो चीन ने अरुणाचल एवं अन्य भारतीय क्षेत्रों में बना रखा है उसे शिफ्ट करके दक्षिणी चीन सागर ले जाने से भारत के सामरिक हित सुरक्षित होंगे |क्वाड इसी रणनीति का हिस्सा है · यदि भारत इस नीति का क्रियान्वयन कर सका तो स्वयं चीन का भी दृष्टिकोण बदलेगा और इसीलिए निकट भविष्य में चीन भारत के साथ सहयोग की नीति पर चल सकता है भारतीय राज्यों की दृष्टि से · भारत की मुख्य भूमि से उत्तर पूर्वी राज्यों का जुड़ाव कम है| अतः यदि चीन, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ सहयोग की स्थिति बनती है तो उत्तर पूर्वी राज्यों का विकास हो सकेगा · तटीय राज्य आसियान के निकट हैं अतः आसियान के साथ बेहतर सम्बन्ध इन राज्यों के विकास को सुनिश्चित करेगा स्वास्थ्य/बीमारियों का पहलू · निपाह वायरस की शुरुआत मलेशिया में हुई थी, यदि मलेशिया समय पर भारत को सूचित कर देता तो भारत के पोल्ट्री पर लगने वाला बैन रुक सकता है · इसी तरह कि अन्या भावी समस्याओं को होने से रोकने के लिए भारत आसियान के मध्य सम्बन्ध को मजबूत करने की आवश्यकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि आसियान भारत के लिए विभिन्न संदर्भों में महत्वपूर्ण है किन्तु कनेक्टीविटी की कमी , आसियान के विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव, भारतीय डायस्पोरा राजनीतिक निष्क्रियता, कुछ देशों द्वारा सहयोग में विचलन आदि कारणों से भारत उपरोक्त संभावनाओं का पर्याप्त दोहन नहीं कर पा रहा है| भारत को तकनीकी उन्नतीकरण, उपग्रह प्रणाली में सहयोग, निवेश के क्षेत्रों में विस्तार, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, परियोजनाओं को त्वरित रूप से पूर्ण करना, सम्मलेन स्तरीय बैठकों में भारतीय हितों को साधने का प्रयास किया जाना चाहिए|
##Question:लुक ईस्ट एवं एक्ट ईस्ट नीतियों में अंतर स्पष्ट करते हुए भारत के सन्दर्भ में आसियान क्षेत्र के महत्त्व को रेखांकित कीजिये |(150 से 200 शब्द/10अंक) Clarifying the difference between Look East and Act East policies,Underline the importance of ASEAN in the context of India. (150 to 200 words/10 marks).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृष्ठभूमि बताते हुए लुक ईस्ट नीति की चर्चा कीजिये 2- प्रथम खंड में नीति का विकास स्पष्ट करते हुए एक्ट ईस्ट नीति को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में भारत के सन्दर्भ में आसियान के महत्त्व को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में चुनौतियां और उनका समाधान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1990 के दशक में भारत भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था| इसी समय 1991 में सोवियत संघ का विघटन, अतः अब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नए मित्रों की तलाश थी, भारत ने उन देशों की ओर देखता है जो LPG मॉडल पर चल रहे थे, इसमें भारत का ध्यान आसियान देशों की तरफ जाता है| अतः आसियान के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के लिए लुक ईस्ट नीति लायी गयी| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना , पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास करना, दक्षिण पूर्वी एशिया से भारत की कनेक्टीविटी बढ़ाना, सामरिक सुरक्षा तथा व्यापार संस्कृति आदि का विकास करना लुक ईस्ट नीति के उद्देश्य थे | वर्ष 2003 तक हमारा फोकस आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करने औरबाजार, पूँजी तथा तकनीकी सहयोग आदि पर केन्द्रित था| 2003-2012 के काल में में सम्बन्धों में विविधता लायी गयी इस चरण में सामरिक सम्बन्ध भी बनाने के प्रयास किये गए|अर्थात अब लुक ईस्ट नीति का स्वरुप बदल गया था अतः भारत ने अपनी नीति का नवीनीकरण किया औरइसके बाद 2014 में एक्ट ईस्ट पालिसी लायी गयी| इसमें सम्बन्धों को आसियान के साथ ही आगे बढ़ते हुए +6 के देश और अन्य द्वीपीय राष्ट्रों तक विस्तृत करने की नीति अपनाई गयी है| इस तरह से एक्ट ईस्ट पालिसी एक बहुआयामी नीति है इसमें आर्थिक सामरिक सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सहयोग आदि सभी आयामों को शामिल किया गया है| भारत के लिए आसियान का महत्त्व भारतीय डायस्पोरा की उपस्थिति · भारतीय डायस्पोरा आसियान के सभी देशों में उपस्थित है लेकिन कोई भी डायस्पोरा राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं है · इस क्षेत्र में डायस्पोरा के समक्ष विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे म्यामार के रोहिंग्या संकट, फिलिपीन्स में 2018 में ISIS के भय से आपातकाल लगाया जाना, लाओस और कम्बोडिया के मध्य अशांति आदि मुद्दे डायस्पोरा के हितों के विपरीत हैं| अतः यदि भारत को अपने डायस्पोरा को सुरक्षित रखना है तो आसियान देशों में स्थिरता का बने रहना आवश्यक है| इसके साथ ही डायस्पोरा की भूमिका को बढाने की आवश्यकता है| आर्थिक महत्त्व · सार्क निष्क्रिय स्थिति में है अतः भारत का व्यापार पूर्वी देशों यथा जापान चीन दक्षिण कोरिया तथा आसियान की ओर शिफ्ट कर रहा है, अतः आसियान भारत के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है · भारत आसियान की अर्थव्यवस्था यूरोपियन यूनियन के लगभग बराबर है अतः आपसी व्यापार को बढाया जाए तो भारत आसियान दोनों लाभ की स्थिति में होंगे ऊर्जा के लिए महत्त्व · भारत का 70 % ऊर्जा आयात पश्चिम एशिया से होता है जबकि पश्चिम एशिया के अधिकाँश देश अस्थिर हैं · इसके कारण भारत के समक्ष ऊर्जा असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होती है अतः भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता है| · आसियान में ब्रूनेई, वियतनाम, मलेशिया आदि ऊर्जा संपन्न देश हैंइस सन्दर्भ में आसियान के ऊर्जा संपन्न देशों के साथ सम्बन्ध मजबूत करने की आवश्यकता है दक्षिण चीन सागर का पहलू · यहाँ ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता है, वियतनाम और चीन के मध्य एक विवादित क्षेत्र है · भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वियतनाम में OVL के माध्यम से निवेश किया हुआ है दूसरी ओर CPEC के माध्यम से चीन भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती पेश कर रहा है| · अतः यह क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा के साथ ही सामरिक हितों के अनुरूप है सामरिक दृष्टिकोण से · हिंद महासागर एवं प्रशांत के मध्य जुड़ाव बिंदु क्षेत्र है| मलक्का जल संधि एवं अन्य जल डमरूमध्य में उत्पन्न कोई भी बाधा भारत के प्रभाव क्षेत्र को कम कर सकते हैं क्योंकि भारत इन्ही के माध्यम से प्रशांत के देशों के साथ सम्बन्ध बना सकता है · दक्षिणी चीन सागर में आसियान के विभिन्न देश चीन के साथ विवाद की स्थिति में हैं(शत्रु का शत्रु मित्र होता है), यह विवाद भारत के लिए एक अवसर है| अतः वियतनाम, फिलिपीन्स आदि के साथ भारत का सहयोग बढ़ सकता है · इस क्षेत्र में चीन के प्रतिसंतुलन के क्रम में भारत US सम्बन्ध मजबूत हो सकते हैं क्योंकि US हिंद महासागर से इंडो प्रशांत क्षेत्र की ओर पॉवर शिफ्ट कर रहा है · इसके अतिरक्त थिएटर ऑफ़ वार जो चीन ने अरुणाचल एवं अन्य भारतीय क्षेत्रों में बना रखा है उसे शिफ्ट करके दक्षिणी चीन सागर ले जाने से भारत के सामरिक हित सुरक्षित होंगे |क्वाड इसी रणनीति का हिस्सा है · यदि भारत इस नीति का क्रियान्वयन कर सका तो स्वयं चीन का भी दृष्टिकोण बदलेगा और इसीलिए निकट भविष्य में चीन भारत के साथ सहयोग की नीति पर चल सकता है भारतीय राज्यों की दृष्टि से · भारत की मुख्य भूमि से उत्तर पूर्वी राज्यों का जुड़ाव कम है| अतः यदि चीन, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ सहयोग की स्थिति बनती है तो उत्तर पूर्वी राज्यों का विकास हो सकेगा · तटीय राज्य आसियान के निकट हैं अतः आसियान के साथ बेहतर सम्बन्ध इन राज्यों के विकास को सुनिश्चित करेगा स्वास्थ्य/बीमारियों का पहलू · निपाह वायरस की शुरुआत मलेशिया में हुई थी, यदि मलेशिया समय पर भारत को सूचित कर देता तो भारत के पोल्ट्री पर लगने वाला बैन रुक सकता है · इसी तरह कि अन्या भावी समस्याओं को होने से रोकने के लिए भारत आसियान के मध्य सम्बन्ध को मजबूत करने की आवश्यकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि आसियान भारत के लिए विभिन्न संदर्भों में महत्वपूर्ण है किन्तु कनेक्टीविटी की कमी , आसियान के विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव, भारतीय डायस्पोरा राजनीतिक निष्क्रियता, कुछ देशों द्वारा सहयोग में विचलन आदि कारणों से भारत उपरोक्त संभावनाओं का पर्याप्त दोहन नहीं कर पा रहा है| भारत को तकनीकी उन्नतीकरण, उपग्रह प्रणाली में सहयोग, निवेश के क्षेत्रों में विस्तार, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, परियोजनाओं को त्वरित रूप से पूर्ण करना, सम्मलेन स्तरीय बैठकों में भारतीय हितों को साधने का प्रयास किया जाना चाहिए|
47,338
लुक ईस्ट एवं एक्ट ईस्ट नीतियों में अंतर स्पष्ट करते हुए भारत के सन्दर्भ में आसियान के महत्त्व को रेखांकित कीजिये |(150 से 200 शब्द) Clarifying the difference between Look East and Act East policies,Underline the importance of ASEAN in the context of India. (150 to 200 words).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृष्ठभूमि बताते हुए लुक ईस्ट नीति की चर्चा कीजिये 2- प्रथम खंड में नीति का विकास स्पष्ट करते हुए एक्ट ईस्ट नीति को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में भारत के सन्दर्भ में आसियान के महत्त्व को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में चुनौतियां और उनका समाधान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1990 के दशक में भारत भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था| इसी समय 1991 में सोवियत संघ का विघटन, अतः अब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नए मित्रों की तलाश थी, भारत ने उन देशों की ओर देखता है जो LPG मॉडल पर चल रहे थे, इसमें भारत का ध्यान आसियान देशों की तरफ जाता है| अतः आसियान के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के लिए लुक ईस्ट नीति लायी गयी| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना , पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास करना, दक्षिण पूर्वी एशिया से भारत की कनेक्टीविटी बढ़ाना, सामरिक सुरक्षा तथा व्यापार संस्कृति आदि का विकास करना लुक ईस्ट नीति के उद्देश्य थे | वर्ष 2003 तक हमारा फोकस आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करने औरबाजार, पूँजी तथा तकनीकी सहयोग आदि पर केन्द्रित था| 2003-2012 के काल में में सम्बन्धों में विविधता लायी गयी इस चरण में सामरिक सम्बन्ध भी बनाने के प्रयास किये गए|अर्थात अब लुक ईस्ट नीति का स्वरुप बदल गया था अतः भारत ने अपनी नीति का नवीनीकरण किया औरइसके बाद 2014 में एक्ट ईस्ट पालिसी लायी गयी| इसमें सम्बन्धों को आसियान के साथ ही आगे बढ़ते हुए +6 के देश और अन्य द्वीपीय राष्ट्रों तक विस्तृत करने की नीति अपनाई गयी है| इस तरह से एक्ट ईस्ट पालिसी एक बहुआयामी नीति है इसमें आर्थिक सामरिक सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सहयोग आदि सभी आयामों को शामिल किया गया है| भारत के लिए आसियान का महत्त्व भारतीय डायस्पोरा की उपस्थिति · भारतीय डायस्पोरा आसियान के सभी देशों में उपस्थित है लेकिन कोई भी डायस्पोरा राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं है · इस क्षेत्र में डायस्पोरा के समक्ष विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे म्यामार के रोहिंग्या संकट, फिलिपीन्स में 2018 में ISIS के भय से आपातकाल लगाया जाना, लाओस और कम्बोडिया के मध्य अशांति आदि मुद्दे डायस्पोरा के हितों के विपरीत हैं| अतः यदि भारत को अपने डायस्पोरा को सुरक्षित रखना है तो आसियान देशों में स्थिरता का बने रहना आवश्यक है| इसके साथ ही डायस्पोरा की भूमिका को बढाने की आवश्यकता है| आर्थिक महत्त्व · सार्क निष्क्रिय स्थिति में है अतः भारत का व्यापार पूर्वी देशों यथा जापान चीन दक्षिण कोरिया तथा आसियान की ओर शिफ्ट कर रहा है, अतः आसियान भारत के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है · भारत आसियान की अर्थव्यवस्था यूरोपियन यूनियन के लगभग बराबर है अतः आपसी व्यापार को बढाया जाए तो भारत आसियान दोनों लाभ की स्थिति में होंगे ऊर्जा के लिए महत्त्व · भारत का 70 % ऊर्जा आयात पश्चिम एशिया से होता है जबकि पश्चिम एशिया के अधिकाँश देश अस्थिर हैं · इसके कारण भारत के समक्ष ऊर्जा असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होती है अतः भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता है| · आसियान में ब्रूनेई, वियतनाम, मलेशिया आदि ऊर्जा संपन्न देश हैंइस सन्दर्भ में आसियान के ऊर्जा संपन्न देशों के साथ सम्बन्ध मजबूत करने की आवश्यकता है दक्षिण चीन सागर का पहलू · यहाँ ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता है, वियतनाम और चीन के मध्य एक विवादित क्षेत्र है · भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वियतनाम में OVL के माध्यम से निवेश किया हुआ है दूसरी ओर CPEC के माध्यम से चीन भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती पेश कर रहा है| · अतः यह क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा के साथ ही सामरिक हितों के अनुरूप है सामरिक दृष्टिकोण से · हिंद महासागर एवं प्रशांत के मध्य जुड़ाव बिंदु क्षेत्र है| मलक्का जल संधि एवं अन्य जल डमरूमध्य में उत्पन्न कोई भी बाधा भारत के प्रभाव क्षेत्र को कम कर सकते हैं क्योंकि भारत इन्ही के माध्यम से प्रशांत के देशों के साथ सम्बन्ध बना सकता है · दक्षिणी चीन सागर में आसियान के विभिन्न देश चीन के साथ विवाद की स्थिति में हैं(शत्रु का शत्रु मित्र होता है), यह विवाद भारत के लिए एक अवसर है| अतः वियतनाम, फिलिपीन्स आदि के साथ भारत का सहयोग बढ़ सकता है · इस क्षेत्र में चीन के प्रतिसंतुलन के क्रम में भारत US सम्बन्ध मजबूत हो सकते हैं क्योंकि US हिंद महासागर से इंडो प्रशांत क्षेत्र की ओर पॉवर शिफ्ट कर रहा है · इसके अतिरक्त थिएटर ऑफ़ वार जो चीन ने अरुणाचल एवं अन्य भारतीय क्षेत्रों में बना रखा है उसे शिफ्ट करके दक्षिणी चीन सागर ले जाने से भारत के सामरिक हित सुरक्षित होंगे |क्वाड इसी रणनीति का हिस्सा है · यदि भारत इस नीति का क्रियान्वयन कर सका तो स्वयं चीन का भी दृष्टिकोण बदलेगा और इसीलिए निकट भविष्य में चीन भारत के साथ सहयोग की नीति पर चल सकता है भारतीय राज्यों की दृष्टि से · भारत की मुख्य भूमि से उत्तर पूर्वी राज्यों का जुड़ाव कम है| अतः यदि चीन, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ सहयोग की स्थिति बनती है तो उत्तर पूर्वी राज्यों का विकास हो सकेगा · तटीय राज्य आसियान के निकट हैं अतः आसियान के साथ बेहतर सम्बन्ध इन राज्यों के विकास को सुनिश्चित करेगा स्वास्थ्य/बीमारियों का पहलू · निपाह वायरस की शुरुआत मलेशिया में हुई थी, यदि मलेशिया समय पर भारत को सूचित कर देता तो भारत के पोल्ट्री पर लगने वाला बैन रुक सकता है · इसी तरह कि अन्या भावी समस्याओं को होने से रोकने के लिए भारत आसियान के मध्य सम्बन्ध को मजबूत करने की आवश्यकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि आसियान भारत के लिए विभिन्न संदर्भों में महत्वपूर्ण है किन्तु कनेक्टीविटी की कमी , आसियान के विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव, भारतीय डायस्पोरा राजनीतिक निष्क्रियता, कुछ देशों द्वारा सहयोग में विचलन आदि कारणों से भारत उपरोक्त संभावनाओं का पर्याप्त दोहन नहीं कर पा रहा है| भारत को तकनीकी उन्नतीकरण, उपग्रह प्रणाली में सहयोग, निवेश के क्षेत्रों में विस्तार, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, परियोजनाओं को त्वरित रूप से पूर्ण करना, सम्मलेन स्तरीय बैठकों में भारतीय हितों को साधने का प्रयास किया जाना चाहिए|
##Question:लुक ईस्ट एवं एक्ट ईस्ट नीतियों में अंतर स्पष्ट करते हुए भारत के सन्दर्भ में आसियान के महत्त्व को रेखांकित कीजिये |(150 से 200 शब्द) Clarifying the difference between Look East and Act East policies,Underline the importance of ASEAN in the context of India. (150 to 200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पृष्ठभूमि बताते हुए लुक ईस्ट नीति की चर्चा कीजिये 2- प्रथम खंड में नीति का विकास स्पष्ट करते हुए एक्ट ईस्ट नीति को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे खंड में भारत के सन्दर्भ में आसियान के महत्त्व को रेखांकित कीजिये 4- अंतिम में चुनौतियां और उनका समाधान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1990 के दशक में भारत भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था| इसी समय 1991 में सोवियत संघ का विघटन, अतः अब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नए मित्रों की तलाश थी, भारत ने उन देशों की ओर देखता है जो LPG मॉडल पर चल रहे थे, इसमें भारत का ध्यान आसियान देशों की तरफ जाता है| अतः आसियान के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापना के लिए लुक ईस्ट नीति लायी गयी| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना , पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास करना, दक्षिण पूर्वी एशिया से भारत की कनेक्टीविटी बढ़ाना, सामरिक सुरक्षा तथा व्यापार संस्कृति आदि का विकास करना लुक ईस्ट नीति के उद्देश्य थे | वर्ष 2003 तक हमारा फोकस आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करने औरबाजार, पूँजी तथा तकनीकी सहयोग आदि पर केन्द्रित था| 2003-2012 के काल में में सम्बन्धों में विविधता लायी गयी इस चरण में सामरिक सम्बन्ध भी बनाने के प्रयास किये गए|अर्थात अब लुक ईस्ट नीति का स्वरुप बदल गया था अतः भारत ने अपनी नीति का नवीनीकरण किया औरइसके बाद 2014 में एक्ट ईस्ट पालिसी लायी गयी| इसमें सम्बन्धों को आसियान के साथ ही आगे बढ़ते हुए +6 के देश और अन्य द्वीपीय राष्ट्रों तक विस्तृत करने की नीति अपनाई गयी है| इस तरह से एक्ट ईस्ट पालिसी एक बहुआयामी नीति है इसमें आर्थिक सामरिक सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सहयोग आदि सभी आयामों को शामिल किया गया है| भारत के लिए आसियान का महत्त्व भारतीय डायस्पोरा की उपस्थिति · भारतीय डायस्पोरा आसियान के सभी देशों में उपस्थित है लेकिन कोई भी डायस्पोरा राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं है · इस क्षेत्र में डायस्पोरा के समक्ष विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे म्यामार के रोहिंग्या संकट, फिलिपीन्स में 2018 में ISIS के भय से आपातकाल लगाया जाना, लाओस और कम्बोडिया के मध्य अशांति आदि मुद्दे डायस्पोरा के हितों के विपरीत हैं| अतः यदि भारत को अपने डायस्पोरा को सुरक्षित रखना है तो आसियान देशों में स्थिरता का बने रहना आवश्यक है| इसके साथ ही डायस्पोरा की भूमिका को बढाने की आवश्यकता है| आर्थिक महत्त्व · सार्क निष्क्रिय स्थिति में है अतः भारत का व्यापार पूर्वी देशों यथा जापान चीन दक्षिण कोरिया तथा आसियान की ओर शिफ्ट कर रहा है, अतः आसियान भारत के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है · भारत आसियान की अर्थव्यवस्था यूरोपियन यूनियन के लगभग बराबर है अतः आपसी व्यापार को बढाया जाए तो भारत आसियान दोनों लाभ की स्थिति में होंगे ऊर्जा के लिए महत्त्व · भारत का 70 % ऊर्जा आयात पश्चिम एशिया से होता है जबकि पश्चिम एशिया के अधिकाँश देश अस्थिर हैं · इसके कारण भारत के समक्ष ऊर्जा असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होती है अतः भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आवश्यकता है| · आसियान में ब्रूनेई, वियतनाम, मलेशिया आदि ऊर्जा संपन्न देश हैंइस सन्दर्भ में आसियान के ऊर्जा संपन्न देशों के साथ सम्बन्ध मजबूत करने की आवश्यकता है दक्षिण चीन सागर का पहलू · यहाँ ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता है, वियतनाम और चीन के मध्य एक विवादित क्षेत्र है · भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वियतनाम में OVL के माध्यम से निवेश किया हुआ है दूसरी ओर CPEC के माध्यम से चीन भारत की संप्रभुता के लिए चुनौती पेश कर रहा है| · अतः यह क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा के साथ ही सामरिक हितों के अनुरूप है सामरिक दृष्टिकोण से · हिंद महासागर एवं प्रशांत के मध्य जुड़ाव बिंदु क्षेत्र है| मलक्का जल संधि एवं अन्य जल डमरूमध्य में उत्पन्न कोई भी बाधा भारत के प्रभाव क्षेत्र को कम कर सकते हैं क्योंकि भारत इन्ही के माध्यम से प्रशांत के देशों के साथ सम्बन्ध बना सकता है · दक्षिणी चीन सागर में आसियान के विभिन्न देश चीन के साथ विवाद की स्थिति में हैं(शत्रु का शत्रु मित्र होता है), यह विवाद भारत के लिए एक अवसर है| अतः वियतनाम, फिलिपीन्स आदि के साथ भारत का सहयोग बढ़ सकता है · इस क्षेत्र में चीन के प्रतिसंतुलन के क्रम में भारत US सम्बन्ध मजबूत हो सकते हैं क्योंकि US हिंद महासागर से इंडो प्रशांत क्षेत्र की ओर पॉवर शिफ्ट कर रहा है · इसके अतिरक्त थिएटर ऑफ़ वार जो चीन ने अरुणाचल एवं अन्य भारतीय क्षेत्रों में बना रखा है उसे शिफ्ट करके दक्षिणी चीन सागर ले जाने से भारत के सामरिक हित सुरक्षित होंगे |क्वाड इसी रणनीति का हिस्सा है · यदि भारत इस नीति का क्रियान्वयन कर सका तो स्वयं चीन का भी दृष्टिकोण बदलेगा और इसीलिए निकट भविष्य में चीन भारत के साथ सहयोग की नीति पर चल सकता है भारतीय राज्यों की दृष्टि से · भारत की मुख्य भूमि से उत्तर पूर्वी राज्यों का जुड़ाव कम है| अतः यदि चीन, म्यांमार और बांग्लादेश के साथ सहयोग की स्थिति बनती है तो उत्तर पूर्वी राज्यों का विकास हो सकेगा · तटीय राज्य आसियान के निकट हैं अतः आसियान के साथ बेहतर सम्बन्ध इन राज्यों के विकास को सुनिश्चित करेगा स्वास्थ्य/बीमारियों का पहलू · निपाह वायरस की शुरुआत मलेशिया में हुई थी, यदि मलेशिया समय पर भारत को सूचित कर देता तो भारत के पोल्ट्री पर लगने वाला बैन रुक सकता है · इसी तरह कि अन्या भावी समस्याओं को होने से रोकने के लिए भारत आसियान के मध्य सम्बन्ध को मजबूत करने की आवश्यकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि आसियान भारत के लिए विभिन्न संदर्भों में महत्वपूर्ण है किन्तु कनेक्टीविटी की कमी , आसियान के विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव, भारतीय डायस्पोरा राजनीतिक निष्क्रियता, कुछ देशों द्वारा सहयोग में विचलन आदि कारणों से भारत उपरोक्त संभावनाओं का पर्याप्त दोहन नहीं कर पा रहा है| भारत को तकनीकी उन्नतीकरण, उपग्रह प्रणाली में सहयोग, निवेश के क्षेत्रों में विस्तार, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, परियोजनाओं को त्वरित रूप से पूर्ण करना, सम्मलेन स्तरीय बैठकों में भारतीय हितों को साधने का प्रयास किया जाना चाहिए|
47,342
नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए, इसके सारतत्व को भी समझाइए। (150-200 शब्द/10 अंक) While explaining the meaning of Ethics, discuss its essance. (150-200 Words/10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नीतिशास्त्र के सारतत्व की व्याख्या करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है | आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है | नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है | नीतिशास्त्र के सारतत्व- नीतिशास्त्र का मूलभूत तत्व इस विचारधारा पर आधारित है कि व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है | एक सामाजिक प्राणी के रूप में नीतिशास्त्र मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ के सन्दर्भ में मानकों पर बल देती है | इसके साथ-साथ नीतिशास्त्र प्रस्तावित मानकों की मान्यता या सत्यता का भी परीक्षण करती है | नीतिशास्त्र का महत्व मानवीय सह-सम्बन्ध से है, अतः नीतिशास्त्र कभी भी शून्य में संचालित नहीं हो सकता | व्यक्ति संस्कृति या सामाजिक मूल्यों से सिर्फ प्रभावित न होकर इसे प्रभावित भी करता है | मानवीय मूल्यों के विकसित होने में प्राकृतिक एवं पर्यावरण इन दोनों का प्रभाव देखने को मिलता है | पर्यावरण का सम्बन्ध सामाजीकरण की प्रक्रिया से जिसके अंतर्गत -परिवार की भूमिका का एक विशेष महत्व है - परिवार को सामाजिक प्रणाली की मूल इकाई मानी गयी है | अतः नैतिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में माता-पिता का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है | व्यक्ति के सामाजिक प्राणी होने के कारण यह स्वाभाविक है कि सामाजिक मूल्यों का प्रभाव मानवीय मूल्यों पर पड़ता है | मानवीय मूल्यों को विकसित करने की दिशा में शैक्षणिक संस्थानों का एक विशेष महत्व है क्योंकि समाज के साथ व्यक्ति का प्रथम औपचारिक सम्पर्क विद्यालय के साथ ही होता है | सरकार के द्वारा निर्धारित शिक्षा नीति में भी मूल्यों के विकास पर विशेष बल दिया जाता है | NCERT के द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा के अंतर्गत भी नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया- 2005 मानवीय मूल्यों के विकास की दिशा में महान नेताओं, सुधारकों एवं प्रशासकों के जीवन एवं उपदेशों से भी मानवीय मूल्यों का विकास किया जाता है | नीतिशास्त्र का संचालन, सन्दर्भ से प्रभावित होता है | अतः किसी भी एक सन्दर्भ में नीतिशास्त्र का सन्दर्भ एक होगा | नीतिशास्त्र का संचालन विभिन्न स्तरों पर होता है एवं प्रत्येक स्तर का नीतिशास्त्र एक-दूसरे को प्रभावित करता है | नीतिशास्त्र न्याय की भावना पर आधारित होता है | नीतिशास्त्र औपचारिक विधि एवं नियमावली से आगे जाता है, अतः विधि की तुलना में नीतिशास्त्र अधिक व्यापक होता है | नीतिशास्त्र उत्तरदायित्व की भावना से प्रभावित होता है नाकि सिर्फ बाहरी जवाबदेहिता से | अतः नीतिशास्त्र का सम्बन्ध आतंरिक पक्ष से है | नीतिशास्त्र का आधार व्यक्ति की विवेकशीलता या बुद्धिमत्ता है | नीतिशास्त्र समाजीकरण की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है |
##Question:नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए, इसके सारतत्व को भी समझाइए। (150-200 शब्द/10 अंक) While explaining the meaning of Ethics, discuss its essance. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत नीतिशास्त्र के आशय को स्पष्ट करते हुए कीजिये | इसके पश्चात नीतिशास्त्र के सारतत्व की व्याख्या करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - नीतिशास्त्र का आशय मानवीय आचरण के आदर्शात्मक विज्ञान से है | आदर्शात्मक विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ से सम्बन्धित निर्णय को प्राप्त किये जाने से है | नीतिशास्त्र मानवीय आचरण का आकलन नैतिक मानकों के आधार पर करता है| अतः नीतिशास्त्र ऐसे मानकों या नियमों या परम्पराओं से भी सम्बन्धित है जिसके आधार पर मानवीय आचरण को उचित या अनुचित/शुभ या अशुभ होने की संज्ञा दी जा सकती है| नीतिशास्त्र ऐसे मानवीय आचरण के आकलन पर आधारित है जो कि व्यक्ति के ऐच्छिक क्रियाशीलता से सम्बन्धित हो अर्थात यदि व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होता तो उस क्रियाशीलता को अन्य प्रकार से भी किया गया होता| इस प्रकार नीतिशास्त्र, नैतिक मानकों की सत्यता या मान्यता से भी सम्बन्धित होता है | नीतिशास्त्र के सारतत्व- नीतिशास्त्र का मूलभूत तत्व इस विचारधारा पर आधारित है कि व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है | एक सामाजिक प्राणी के रूप में नीतिशास्त्र मानवीय आचरण के उचित या अनुचित, शुभ या अशुभ के सन्दर्भ में मानकों पर बल देती है | इसके साथ-साथ नीतिशास्त्र प्रस्तावित मानकों की मान्यता या सत्यता का भी परीक्षण करती है | नीतिशास्त्र का महत्व मानवीय सह-सम्बन्ध से है, अतः नीतिशास्त्र कभी भी शून्य में संचालित नहीं हो सकता | व्यक्ति संस्कृति या सामाजिक मूल्यों से सिर्फ प्रभावित न होकर इसे प्रभावित भी करता है | मानवीय मूल्यों के विकसित होने में प्राकृतिक एवं पर्यावरण इन दोनों का प्रभाव देखने को मिलता है | पर्यावरण का सम्बन्ध सामाजीकरण की प्रक्रिया से जिसके अंतर्गत -परिवार की भूमिका का एक विशेष महत्व है - परिवार को सामाजिक प्रणाली की मूल इकाई मानी गयी है | अतः नैतिक मूल्यों को विकसित करने की दिशा में माता-पिता का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है | व्यक्ति के सामाजिक प्राणी होने के कारण यह स्वाभाविक है कि सामाजिक मूल्यों का प्रभाव मानवीय मूल्यों पर पड़ता है | मानवीय मूल्यों को विकसित करने की दिशा में शैक्षणिक संस्थानों का एक विशेष महत्व है क्योंकि समाज के साथ व्यक्ति का प्रथम औपचारिक सम्पर्क विद्यालय के साथ ही होता है | सरकार के द्वारा निर्धारित शिक्षा नीति में भी मूल्यों के विकास पर विशेष बल दिया जाता है | NCERT के द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा के अंतर्गत भी नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया- 2005 मानवीय मूल्यों के विकास की दिशा में महान नेताओं, सुधारकों एवं प्रशासकों के जीवन एवं उपदेशों से भी मानवीय मूल्यों का विकास किया जाता है | नीतिशास्त्र का संचालन, सन्दर्भ से प्रभावित होता है | अतः किसी भी एक सन्दर्भ में नीतिशास्त्र का सन्दर्भ एक होगा | नीतिशास्त्र का संचालन विभिन्न स्तरों पर होता है एवं प्रत्येक स्तर का नीतिशास्त्र एक-दूसरे को प्रभावित करता है | नीतिशास्त्र न्याय की भावना पर आधारित होता है | नीतिशास्त्र औपचारिक विधि एवं नियमावली से आगे जाता है, अतः विधि की तुलना में नीतिशास्त्र अधिक व्यापक होता है | नीतिशास्त्र उत्तरदायित्व की भावना से प्रभावित होता है नाकि सिर्फ बाहरी जवाबदेहिता से | अतः नीतिशास्त्र का सम्बन्ध आतंरिक पक्ष से है | नीतिशास्त्र का आधार व्यक्ति की विवेकशीलता या बुद्धिमत्ता है | नीतिशास्त्र समाजीकरण की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है |
47,346
What is Big Data Analytics ? Discuss its applications in Pubic Policy. (150 words/10 Marks)
Approach: Introduction: Briefly discuss the concept of Big Data Analytics. Body: Discuss different applications of Big Data Analytics in public policy. Conclusion: Briefly conclude by giving the adoption of Big Data Analysis by the Indian government. Model Answer: Big data analytics is the use of advanced analytic techniques against very large, diverse data sets that include structured, semi-structured and unstructured data, from different sources, and in different sizes from terabytes to zettabytes to draw conclusions about the information they contain, with the aid of specialized systems and software. Applications of Public Policy in Big Data Analytics: The government can make quick decisions without compromising the quality of those decisions as big data analytics reduce the time frame that is traditionally required to create, assess and implement policy. It enables all users to work efficiently to find information, make informed decisions, and have better service delivery. Better choices in government translate to enhanced services to its citizens. It allows for a free flow of information, improves transparency, and build trust with their citizens. This transparency allows citizens to monitor the effect of the government’s expenditure and compel the government to spend wisely. It helps the government in eradicating fraud. Also, organizations can remove internal waste by identifying discrepancies. It can help the government in uncovering crimes and other illegal activities that pose a security threat in society. It also assists local and state governments to work jointly in reducing criminal activities in the society. Government agencies that can consolidate their data and analysis tools will immensely reduce infrastructure and operational costs. It can be used to respond to hazardous natural disasters, detect health issues, prevent water scarcity problems, and coordinate thousands of displaced people. In this direction, the government of India has used Big Data Analytics to catch tax evaders in 2017 by rolling out a platform completely based on big data analytics known as the Project Insight to make this happen. Since the Indian government is aiming to have a more significant digital transformation, Big Data Analytics is expected to play a critical role in modernizing the provision of services to the citizenry.
##Question:What is Big Data Analytics ? Discuss its applications in Pubic Policy. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduction: Briefly discuss the concept of Big Data Analytics. Body: Discuss different applications of Big Data Analytics in public policy. Conclusion: Briefly conclude by giving the adoption of Big Data Analysis by the Indian government. Model Answer: Big data analytics is the use of advanced analytic techniques against very large, diverse data sets that include structured, semi-structured and unstructured data, from different sources, and in different sizes from terabytes to zettabytes to draw conclusions about the information they contain, with the aid of specialized systems and software. Applications of Public Policy in Big Data Analytics: The government can make quick decisions without compromising the quality of those decisions as big data analytics reduce the time frame that is traditionally required to create, assess and implement policy. It enables all users to work efficiently to find information, make informed decisions, and have better service delivery. Better choices in government translate to enhanced services to its citizens. It allows for a free flow of information, improves transparency, and build trust with their citizens. This transparency allows citizens to monitor the effect of the government’s expenditure and compel the government to spend wisely. It helps the government in eradicating fraud. Also, organizations can remove internal waste by identifying discrepancies. It can help the government in uncovering crimes and other illegal activities that pose a security threat in society. It also assists local and state governments to work jointly in reducing criminal activities in the society. Government agencies that can consolidate their data and analysis tools will immensely reduce infrastructure and operational costs. It can be used to respond to hazardous natural disasters, detect health issues, prevent water scarcity problems, and coordinate thousands of displaced people. In this direction, the government of India has used Big Data Analytics to catch tax evaders in 2017 by rolling out a platform completely based on big data analytics known as the Project Insight to make this happen. Since the Indian government is aiming to have a more significant digital transformation, Big Data Analytics is expected to play a critical role in modernizing the provision of services to the citizenry.
47,357
नेहरु काल में भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों एवं उपलब्धियों का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly evaluate the principles and achievments of Indian foreign policy in Nehru era. (150-200 words; 10 अंक)
एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नेहरु के समय के विदेश नीति के आधार को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात उस समय के विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत को संक्षेप में बताइए | पुनः इसके बाद इस नीति नीति में कुछ सीमायें भी थी, उसका भी वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की कुछ प्राथमिकताएं जैसे कि राष्ट्र का आर्थिक विकास , राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना , विदेशी मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को बनाए रखना एवं विश्व शांति थी | किसी भी स्वाभिमानी और शांतिप्रिय देश के लिए ऐसी नीति बनाना स्वाभाविक भी होता है | भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की घटनाएं , घरेलू आवश्यकताओं तथा महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे व्यक्तियों ,आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी | भारत की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत -नेहरु जी के विदेश नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे , जैसे - क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता दोनों नीतियों के दबाव से स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाना | पंचशील का सिद्धांत अपनाना | अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना | उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन | निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना | सॉफ्ट पॉवर का प्रयोग करना | भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा | यद्यपि भारतीय विदेश नीति जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों पर आधारित रही परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी रहीं जो निम्नलिखित हैं कश्मीर समस्या- NAM की नीति का पालन करते हुए कश्मीर की समस्या को समाधान के लिए यू एन के समक्ष रखना परन्तु अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के कारण इस समस्या का समाधान न हो पाना | भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्ध - इन दोनों युद्धों के पश्चात् NAM के सदस्यों द्वारा इन युद्धों का विरोध नहीं करना और न ही चीन एवं पाकिस्तान का खुलकर विरोध करना | यू एन एस सी की सदस्यता न लेना - गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने आदर्शवाद के कारण यू एन एस सी जैसी शक्तिशाली संस्था की सदस्यता नहीं ग्रहण की | इन सभी सीमाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति में वर्तमान समय तक पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी विचारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य उपस्थिति रही है |भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है | उदाहरण - अमेरिका द्वारा इराक पर युद्ध की आलोचना ,यू एन एस सी में सुधार का पुरजोर समर्थन करना इत्यादि | चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने पूरी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ के हिंदी-चीनी भाई-भाई-का नारा भी दिया था | वर्तमान में भी उनकी नीतियों की निरंतरता भारतीय विदेश नीति में देखी जा सकती है |
##Question:नेहरु काल में भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों एवं उपलब्धियों का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly evaluate the principles and achievments of Indian foreign policy in Nehru era. (150-200 words; 10 अंक)##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नेहरु के समय के विदेश नीति के आधार को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात उस समय के विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत को संक्षेप में बताइए | पुनः इसके बाद इस नीति नीति में कुछ सीमायें भी थी, उसका भी वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की कुछ प्राथमिकताएं जैसे कि राष्ट्र का आर्थिक विकास , राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना , विदेशी मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को बनाए रखना एवं विश्व शांति थी | किसी भी स्वाभिमानी और शांतिप्रिय देश के लिए ऐसी नीति बनाना स्वाभाविक भी होता है | भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की घटनाएं , घरेलू आवश्यकताओं तथा महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे व्यक्तियों ,आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी | भारत की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत -नेहरु जी के विदेश नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे , जैसे - क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता दोनों नीतियों के दबाव से स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाना | पंचशील का सिद्धांत अपनाना | अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना | उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन | निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना | सॉफ्ट पॉवर का प्रयोग करना | भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा | यद्यपि भारतीय विदेश नीति जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों पर आधारित रही परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी रहीं जो निम्नलिखित हैं कश्मीर समस्या- NAM की नीति का पालन करते हुए कश्मीर की समस्या को समाधान के लिए यू एन के समक्ष रखना परन्तु अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के कारण इस समस्या का समाधान न हो पाना | भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्ध - इन दोनों युद्धों के पश्चात् NAM के सदस्यों द्वारा इन युद्धों का विरोध नहीं करना और न ही चीन एवं पाकिस्तान का खुलकर विरोध करना | यू एन एस सी की सदस्यता न लेना - गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने आदर्शवाद के कारण यू एन एस सी जैसी शक्तिशाली संस्था की सदस्यता नहीं ग्रहण की | इन सभी सीमाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति में वर्तमान समय तक पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी विचारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य उपस्थिति रही है |भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है | उदाहरण - अमेरिका द्वारा इराक पर युद्ध की आलोचना ,यू एन एस सी में सुधार का पुरजोर समर्थन करना इत्यादि | चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने पूरी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ के हिंदी-चीनी भाई-भाई-का नारा भी दिया था | वर्तमान में भी उनकी नीतियों की निरंतरता भारतीय विदेश नीति में देखी जा सकती है |
47,363
क्वाड्रीलेटरल सिक्यूरिटी डायलाग(QUAD) से आप क्या समझते हैं| इसके गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये| QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) What do you understand by quadrilateral securitydialogue (QUAD)? Explain the reasons for its formation. List the possible consequences of India"s membership in QUAD. (150 to 200 words/10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में क्वाड की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में क्वाड के गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में इसके लाभों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये क्वाड(quadrilateral Security dialogue) एक सुरक्षा सहयोग संगठन है| इस में ऐसे देश शामिल हैं जिनको चीन द्वारा चुनौती मिल रही है| इसमें चार देश हैं यथा अमेरिका जापान ऑस्ट्रेलिया एवं भारत| 2004 में सुनामी में लगभग सम्पूर्ण पूर्वी एशिया प्रभावित हुआ था इस समय भारत अकेला देश था जिसने एक साथ सभी प्रभावित देशों में आपदा प्रबंधन का काम किया था अतः इस बात को विश्व स्तर पर सराहा गया| इस आपदा प्रबंधन में भारत से प्रभावित हो कर जापान एवं अमेरिका भी आपदा प्रबंधन के लिए आगे आये थे| भारत की इसी क्षमता से प्रभावित होकर 2006 में जापान के राष्ट्रप्रमुख सिंजो अबे ने एक सहयोगी समूह के रूप में क्वाड की संकल्पना प्रस्तुत की| 2007 में ऑस्ट्रलिया इस समूह से निकल गया था इसके बाद क्वाड की मीटिंग नहीं हुई थीलेकिन 2018 में सिंगापुर में हुए क्वाड के तीसरे सम्मलेन में ऑस्ट्रेलिया पुनः क्वाड में वापस आया अतः यह संगठन पुनः चर्चा में है|आतंकवाद एवं उसके प्रसार पर रोक, समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए व्यापार वाणिज्य का विस्तार, स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना, पाकिस्तान की गतिविधियों को संतुलित करना, इंडो प्रशांत के छोटे देशों को सहयोग प्रदान करना एवं उनका सशक्तिकरण करना(सामूहिक आवाज बन रहा है) OBOR, मेरीटाइम सिल्क रूट , आसियान देशों की सोलिडेरिटी को तोड़ने का प्रयास, डोकलाम विवाद आदि के माध्यम से चीन के आक्रामक उभार को नियंत्रित करनाक्वाड के उद्देश्य माने जाते हैं | यह संगठन इसके सभी सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों के समक्ष चुनौतियों के कारण गठित किया गया था| क्वाड के गठन के कारण भारत की चिंताएं · क्वाड में केवल भारत NSG का सदस्य नहीं है, भारत सदस्यता के लिए प्रयासरत है किन्तु चीन भारत को सदस्यता देने का विरोध करता है, अतः भारत इसके लिए रणनीतिक प्रयास कर रहा है · पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का चीन द्वारा समर्थन दिया जाता है| UN में आतंकवाद सम्बन्धी भारतीय प्रयासों का चीन द्वारा वीटो किया जाता रहा है · इसके साथ ही चीन पाकिस्तान सैन्य सहयोग का निरंतर विकसित होते जाना भारतीय हितों के विरुद्ध है · CPEC भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है · सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को चीन विवादित करता रहता है जिससे भारत की अखंडता प्रभावित होती है · OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की नीति आदि के माध्यम से चीन हिंद महासागर में भारतीय हितों को चुनौती दी जाती है अमेरिका की चिंता · चीन एशियाई देशों में निरंतर अपना प्रभाव बढाता जा रहा है, इससे अमेरिकी प्रभाव कमजोर होता है · दक्षिण चीन सागर में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों को चीन द्वारा परेशान किया जा रहा है · चीन एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है(चीन ने 2025 तक अपने 10 क्षेत्रकों को मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा है जिसका आधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक होगी) जो भी देश नवाचार प्रेरित अर्थव्यवस्था हो जाएगा वह वैश्विक शक्ति बन जाएगा अतः अमेरिका चीन को उलझाए रखना चाहता है| जापान की चिंताएं · सेनाकूकू द्वीप विवाद जापान की संप्रभुता को चुनौती देता है · उत्तरी कोरिया का मिसाइल एवं नाभिकीय कार्यक्रम चीन के सहयोग से चल रहा है|चीन उत्तरी कोरिया का कभी भी दुरूपयोग कर सकता है| · उत्तरी कोरिया द्वारा जापान के ऊपर सेदागी गयी दो मिसाइलों में चीन का हाथ माना जाता है| अतः जापान के समक्ष सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है · जापान का प्रयास है कि उत्तरी कोरिया का नाभिकीय कार्यक्रम किसी भी तरह रूक जाए, इससे चीन का प्रभाव कम हो जाएगा ऑस्ट्रेलिया की चिंताएं · ऑस्ट्रलिया में विदेशियों द्वारा राजनीतिक फंडिंग की जा सकती हैपरिणाम स्वरुप पिछले 15 सालों में चीन ने ऑस्ट्रेलिया में बड़ा निवेश किया है इसके माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है · इससे ऑस्ट्रलिया की राजनीति प्रभावित होती है अतः ऑस्ट्रेलिया चीन के इस निवेश को कम करते हुए स्रोतों में विविधता लाना चाहता है · स्रोत की विविधता से ऑस्ट्रलिया की राजनीति चीन के दबाव से मुक्त हो सकेगी, इसीलिए ऑस्ट्रेलिया 2018 में क्वाड में सम्मिलित हो गया| भारत की सदस्यता के संभावित परिणाम सकारात्मक पहलू आसियान के दृष्टिकोण में आ रहा परिवर्तन भारत को एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है, भारत की ओर झुकाव के बढ़ने से चीन आइसोलेट होगा अमेरिका द्वारा चीनी आयात पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है जिसके कारण चीन कि अर्थव्यवस्था स्लो डाउन की ओर है, वहां से निकलने वाला FDI भारत की ओर आ सकता है| क्वाड यदि सफल रहता है तो भविष्य में इसमें नए देश शामिल होते जायेंगे और चीन आइसोलेट होता जाएगा आसियान के अनुसार भारत चीन को प्रतिसंतुलित कर सकता है, विश्व के बड़े देशों के साथ सहयोग के माध्यम सेभारत की भूमिका बढ़ेगी, चारों देशों में सुरक्षा के मुद्दे को लेकर आपसी समझ का विस्तार होगा और भविष्य में बेहतर सहयोग की संभावना बढ़ेगी चारों देशों के एक दूसरे के हितों की सुरक्षा के साथ साथ विकास पर कार्य कर सकेंगे भारत की इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ेगी क्वाड भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी के अनुरूप है इससे चीन की आक्रामक नीतियों में बदलाव की संभावना है जिससे चीन शांतिपूर्ण विकास की ओर जा सकता है पूर्वी एशिया में अपने हितों को भारत साध सकेगा अमेरिका जापान एवं ऑस्ट्रलिया के साथ सहयोग के निरंतर बढ़ने की संभावना एक दूसरे के बाजार तक पहुच से तीव्र आर्थिक विकास हो सकेगा चीन के OBOR को प्रतिसंतुलित करने में सहयोग प्राप्त होगा अफगानिस्तान-पाकिस्तान में अमेरिकी नीति को भारतीय हितों के अनुरूप आकार दिया जा सकेगा क्योंकि भारत अमेरिकी हितों के अनुरूप सहयोग दे रहा है नकारात्मक पहलू QUAD में चीन, रूस, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया जैसे देश शामिल नहीं हैं अतः QUAD के कारण क्षेत्र में हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है क्वाड के रास्ते पर आगे बढ़ने के कारण भारत चीन के सम्बन्ध प्रभावित हो सकते हैं यह अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करने जैसा है क्योंकि भारत एक गुट निरपेक्ष देश है इससे इंडो पेसिफिक क्षेत्र में सैन्यीकरण बढेगा US-चीन विवाद में भारत को घसीटे जाने की संभावना है क्वाड, भारत-रूस सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है क्योंकि रूस को लगेगा की भारत सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर झुक गया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि क्वाड में सदस्यता भारत के लिए सकारात्मक-नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणाम उत्पन्न कर सकती है| अतः भारत को यहाँ स्मार्ट पॉवर कूटनीति को अपनाने की आवश्यकता है| चीन और रूस के साथ अपने सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए भारत ने क्वाड के सिंगापुर सम्मलेन में यह प्रतिबद्धता स्पष्ट की कि भारत द्वारा कहा गया है कि क्वाड का उपयोग असैन्य/नागरिक मुद्दों के लिए किया जाएगा| भारत को इस प्रकार संतुलित दृष्टिकोण के साथ क्वाड की सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए|
##Question:क्वाड्रीलेटरल सिक्यूरिटी डायलाग(QUAD) से आप क्या समझते हैं| इसके गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये| QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) What do you understand by quadrilateral securitydialogue (QUAD)? Explain the reasons for its formation. List the possible consequences of India"s membership in QUAD. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में क्वाड की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में क्वाड के गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में इसके लाभों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये क्वाड(quadrilateral Security dialogue) एक सुरक्षा सहयोग संगठन है| इस में ऐसे देश शामिल हैं जिनको चीन द्वारा चुनौती मिल रही है| इसमें चार देश हैं यथा अमेरिका जापान ऑस्ट्रेलिया एवं भारत| 2004 में सुनामी में लगभग सम्पूर्ण पूर्वी एशिया प्रभावित हुआ था इस समय भारत अकेला देश था जिसने एक साथ सभी प्रभावित देशों में आपदा प्रबंधन का काम किया था अतः इस बात को विश्व स्तर पर सराहा गया| इस आपदा प्रबंधन में भारत से प्रभावित हो कर जापान एवं अमेरिका भी आपदा प्रबंधन के लिए आगे आये थे| भारत की इसी क्षमता से प्रभावित होकर 2006 में जापान के राष्ट्रप्रमुख सिंजो अबे ने एक सहयोगी समूह के रूप में क्वाड की संकल्पना प्रस्तुत की| 2007 में ऑस्ट्रलिया इस समूह से निकल गया था इसके बाद क्वाड की मीटिंग नहीं हुई थीलेकिन 2018 में सिंगापुर में हुए क्वाड के तीसरे सम्मलेन में ऑस्ट्रेलिया पुनः क्वाड में वापस आया अतः यह संगठन पुनः चर्चा में है|आतंकवाद एवं उसके प्रसार पर रोक, समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए व्यापार वाणिज्य का विस्तार, स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना, पाकिस्तान की गतिविधियों को संतुलित करना, इंडो प्रशांत के छोटे देशों को सहयोग प्रदान करना एवं उनका सशक्तिकरण करना(सामूहिक आवाज बन रहा है) OBOR, मेरीटाइम सिल्क रूट , आसियान देशों की सोलिडेरिटी को तोड़ने का प्रयास, डोकलाम विवाद आदि के माध्यम से चीन के आक्रामक उभार को नियंत्रित करनाक्वाड के उद्देश्य माने जाते हैं | यह संगठन इसके सभी सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों के समक्ष चुनौतियों के कारण गठित किया गया था| क्वाड के गठन के कारण भारत की चिंताएं · क्वाड में केवल भारत NSG का सदस्य नहीं है, भारत सदस्यता के लिए प्रयासरत है किन्तु चीन भारत को सदस्यता देने का विरोध करता है, अतः भारत इसके लिए रणनीतिक प्रयास कर रहा है · पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का चीन द्वारा समर्थन दिया जाता है| UN में आतंकवाद सम्बन्धी भारतीय प्रयासों का चीन द्वारा वीटो किया जाता रहा है · इसके साथ ही चीन पाकिस्तान सैन्य सहयोग का निरंतर विकसित होते जाना भारतीय हितों के विरुद्ध है · CPEC भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है · सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को चीन विवादित करता रहता है जिससे भारत की अखंडता प्रभावित होती है · OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की नीति आदि के माध्यम से चीन हिंद महासागर में भारतीय हितों को चुनौती दी जाती है अमेरिका की चिंता · चीन एशियाई देशों में निरंतर अपना प्रभाव बढाता जा रहा है, इससे अमेरिकी प्रभाव कमजोर होता है · दक्षिण चीन सागर में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों को चीन द्वारा परेशान किया जा रहा है · चीन एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है(चीन ने 2025 तक अपने 10 क्षेत्रकों को मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा है जिसका आधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक होगी) जो भी देश नवाचार प्रेरित अर्थव्यवस्था हो जाएगा वह वैश्विक शक्ति बन जाएगा अतः अमेरिका चीन को उलझाए रखना चाहता है| जापान की चिंताएं · सेनाकूकू द्वीप विवाद जापान की संप्रभुता को चुनौती देता है · उत्तरी कोरिया का मिसाइल एवं नाभिकीय कार्यक्रम चीन के सहयोग से चल रहा है|चीन उत्तरी कोरिया का कभी भी दुरूपयोग कर सकता है| · उत्तरी कोरिया द्वारा जापान के ऊपर सेदागी गयी दो मिसाइलों में चीन का हाथ माना जाता है| अतः जापान के समक्ष सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है · जापान का प्रयास है कि उत्तरी कोरिया का नाभिकीय कार्यक्रम किसी भी तरह रूक जाए, इससे चीन का प्रभाव कम हो जाएगा ऑस्ट्रेलिया की चिंताएं · ऑस्ट्रलिया में विदेशियों द्वारा राजनीतिक फंडिंग की जा सकती हैपरिणाम स्वरुप पिछले 15 सालों में चीन ने ऑस्ट्रेलिया में बड़ा निवेश किया है इसके माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है · इससे ऑस्ट्रलिया की राजनीति प्रभावित होती है अतः ऑस्ट्रेलिया चीन के इस निवेश को कम करते हुए स्रोतों में विविधता लाना चाहता है · स्रोत की विविधता से ऑस्ट्रलिया की राजनीति चीन के दबाव से मुक्त हो सकेगी, इसीलिए ऑस्ट्रेलिया 2018 में क्वाड में सम्मिलित हो गया| भारत की सदस्यता के संभावित परिणाम सकारात्मक पहलू आसियान के दृष्टिकोण में आ रहा परिवर्तन भारत को एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है, भारत की ओर झुकाव के बढ़ने से चीन आइसोलेट होगा अमेरिका द्वारा चीनी आयात पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है जिसके कारण चीन कि अर्थव्यवस्था स्लो डाउन की ओर है, वहां से निकलने वाला FDI भारत की ओर आ सकता है| क्वाड यदि सफल रहता है तो भविष्य में इसमें नए देश शामिल होते जायेंगे और चीन आइसोलेट होता जाएगा आसियान के अनुसार भारत चीन को प्रतिसंतुलित कर सकता है, विश्व के बड़े देशों के साथ सहयोग के माध्यम सेभारत की भूमिका बढ़ेगी, चारों देशों में सुरक्षा के मुद्दे को लेकर आपसी समझ का विस्तार होगा और भविष्य में बेहतर सहयोग की संभावना बढ़ेगी चारों देशों के एक दूसरे के हितों की सुरक्षा के साथ साथ विकास पर कार्य कर सकेंगे भारत की इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ेगी क्वाड भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी के अनुरूप है इससे चीन की आक्रामक नीतियों में बदलाव की संभावना है जिससे चीन शांतिपूर्ण विकास की ओर जा सकता है पूर्वी एशिया में अपने हितों को भारत साध सकेगा अमेरिका जापान एवं ऑस्ट्रलिया के साथ सहयोग के निरंतर बढ़ने की संभावना एक दूसरे के बाजार तक पहुच से तीव्र आर्थिक विकास हो सकेगा चीन के OBOR को प्रतिसंतुलित करने में सहयोग प्राप्त होगा अफगानिस्तान-पाकिस्तान में अमेरिकी नीति को भारतीय हितों के अनुरूप आकार दिया जा सकेगा क्योंकि भारत अमेरिकी हितों के अनुरूप सहयोग दे रहा है नकारात्मक पहलू QUAD में चीन, रूस, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया जैसे देश शामिल नहीं हैं अतः QUAD के कारण क्षेत्र में हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है क्वाड के रास्ते पर आगे बढ़ने के कारण भारत चीन के सम्बन्ध प्रभावित हो सकते हैं यह अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करने जैसा है क्योंकि भारत एक गुट निरपेक्ष देश है इससे इंडो पेसिफिक क्षेत्र में सैन्यीकरण बढेगा US-चीन विवाद में भारत को घसीटे जाने की संभावना है क्वाड, भारत-रूस सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है क्योंकि रूस को लगेगा की भारत सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर झुक गया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि क्वाड में सदस्यता भारत के लिए सकारात्मक-नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणाम उत्पन्न कर सकती है| अतः भारत को यहाँ स्मार्ट पॉवर कूटनीति को अपनाने की आवश्यकता है| चीन और रूस के साथ अपने सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए भारत ने क्वाड के सिंगापुर सम्मलेन में यह प्रतिबद्धता स्पष्ट की कि भारत द्वारा कहा गया है कि क्वाड का उपयोग असैन्य/नागरिक मुद्दों के लिए किया जाएगा| भारत को इस प्रकार संतुलित दृष्टिकोण के साथ क्वाड की सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए|
47,373
नेहरु काल में भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों एवं उपलब्धियों का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द) Briefly evaluate the principles and achievments of Indian foreign policy in Nehru era. (150-200 words)
एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नेहरु के समय के विदेश नीति के आधार को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात उस समय के विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत को संक्षेप में बताइए | पुनः इसके बाद इस नीति नीति में कुछ सीमायें भी थी, उसका भी वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टि के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की कुछ प्राथमिकताएं जैसे कि राष्ट्र का आर्थिक विकास , राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना , विदेशी मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को बनाए रखना एवं विश्व शांति थी | किसी भी स्वाभिमानी और शांतिप्रिय देश के लिए ऐसी नीति बनाना स्वाभाविक भी होता है | भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की घटनाएं , घरेलू आवश्यकताओं तथा महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे व्यक्तियों ,आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी | भारत की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत -नेहरु जी के विदेश नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे , जैसे - क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता दोनों नीतियों के दबाव से स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाना | पंचशील का सिद्धांत अपनाना अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना | उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना | सॉफ्ट पॉवर का प्रयोग करना | भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा | यद्यपि भारतीय विदेश नीति जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों पर आधारित रही परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी रहीं जो निम्नलिखित हैं कश्मीर समस्या- NAM की नीति का पालन करते हुए कश्मीर की समस्या को समाधान के लिए यू एन के समक्ष रखना परन्तु अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के कारण इस समस्या का समाधान न हो पाना | भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्ध - इन दोनों युद्धों के पश्चात् NAM के सदस्यों द्वारा इन युद्धों का विरोध नहीं करना और न ही चीन एवं पाकिस्तान का खुलकर विरोध करना | यू एन एस सी की सदस्यता न लेना - गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने आदर्शवाद के कारण यू एन एस सी जैसी शक्तिशाली संस्था की सदस्यता नहीं ग्रहण की | इन सभी सीमाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति में वर्तमान समय तक पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी विचारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य उपस्थिति रही है |भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है | उदाहरण - अमेरिका द्वारा इराक पर युद्ध की आलोचना ,यू एन एस सी में सुधार का पुरजोर समर्थन करना इत्यादि | चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने पूरी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ के हिंदी-चीनी भाई-भाई-का नारा भी दिया था | वर्तमान में भी उनकी नीतियों की निरंतरता भारतीय विदेश नीति में देखी जा सकती है |
##Question:नेहरु काल में भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों एवं उपलब्धियों का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिये | (150-200 शब्द) Briefly evaluate the principles and achievments of Indian foreign policy in Nehru era. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- उत्तर की शुरुआत नेहरु के समय के विदेश नीति के आधार को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात उस समय के विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत को संक्षेप में बताइए | पुनः इसके बाद इस नीति नीति में कुछ सीमायें भी थी, उसका भी वर्णन कीजिये | अंत में सकारात्मक दृष्टि के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की कुछ प्राथमिकताएं जैसे कि राष्ट्र का आर्थिक विकास , राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखना , विदेशी मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को बनाए रखना एवं विश्व शांति थी | किसी भी स्वाभिमानी और शांतिप्रिय देश के लिए ऐसी नीति बनाना स्वाभाविक भी होता है | भारत की विदेश नीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की घटनाएं , घरेलू आवश्यकताओं तथा महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे व्यक्तियों ,आदि कई कारकों का सम्मिलित परिणाम थी | भारत की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धांत -नेहरु जी के विदेश नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे , जैसे - क्षेत्रीय अखंडता और विदेश नीति की स्वतंत्रता दोनों नीतियों के दबाव से स्वतंत्रता हेतु गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाना | पंचशील का सिद्धांत अपनाना अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना | उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना | सॉफ्ट पॉवर का प्रयोग करना | भारतीय डायस्पोरा के हितों की सुरक्षा | यद्यपि भारतीय विदेश नीति जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों पर आधारित रही परन्तु इसकी कुछ सीमायें भी रहीं जो निम्नलिखित हैं कश्मीर समस्या- NAM की नीति का पालन करते हुए कश्मीर की समस्या को समाधान के लिए यू एन के समक्ष रखना परन्तु अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य बढ़ते सहयोग के कारण इस समस्या का समाधान न हो पाना | भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्ध - इन दोनों युद्धों के पश्चात् NAM के सदस्यों द्वारा इन युद्धों का विरोध नहीं करना और न ही चीन एवं पाकिस्तान का खुलकर विरोध करना | यू एन एस सी की सदस्यता न लेना - गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने आदर्शवाद के कारण यू एन एस सी जैसी शक्तिशाली संस्था की सदस्यता नहीं ग्रहण की | इन सभी सीमाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति में वर्तमान समय तक पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता जैसे आदर्शवादी विचारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य उपस्थिति रही है |भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है | उदाहरण - अमेरिका द्वारा इराक पर युद्ध की आलोचना ,यू एन एस सी में सुधार का पुरजोर समर्थन करना इत्यादि | चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने पूरी ईमानदारी से की थी और पंचशील के सिद्धांत के साथ-साथ के हिंदी-चीनी भाई-भाई-का नारा भी दिया था | वर्तमान में भी उनकी नीतियों की निरंतरता भारतीय विदेश नीति में देखी जा सकती है |
47,377
क्वाड्रीलेटरल सिक्यूरिटी डायलाग(QUAD) से आप क्या समझते हैं| इसके गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये| QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) What do you understand by quadrilateral security dialogue (QUAD)? Explain the reasons for its formation. List the possible consequences of India"s membership in QUAD. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में क्वाड की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में क्वाड के गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में इसके लाभों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये क्वाड(quadrilateral Security dialogue) एक सुरक्षा सहयोग संगठन है| इस में ऐसे देश शामिल हैं जिनको चीन द्वारा चुनौती मिल रही है| इसमें चार देश हैं यथा अमेरिका जापान ऑस्ट्रेलिया एवं भारत| 2004 में सुनामी में लगभग सम्पूर्ण पूर्वी एशिया प्रभावित हुआ था इस समय भारत अकेला देश था जिसने एक साथ सभी प्रभावित देशों में आपदा प्रबंधन का काम किया था अतः इस बात को विश्व स्तर पर सराहा गया| इस आपदा प्रबंधन में भारत से प्रभावित हो कर जापान एवं अमेरिका भी आपदा प्रबंधन के लिए आगे आये थे| भारत की इसी क्षमता से प्रभावित होकर 2006 में जापान के राष्ट्रप्रमुख सिंजो अबे ने एक सहयोगी समूह के रूप में क्वाड की संकल्पना प्रस्तुत की| 2007 में ऑस्ट्रलिया इस समूह से निकल गया था इसके बाद क्वाड की मीटिंग नहीं हुई थीलेकिन 2018 में सिंगापुर में हुए क्वाड के तीसरे सम्मलेन में ऑस्ट्रेलिया पुनः क्वाड में वापस आया अतः यह संगठन पुनः चर्चा में है|आतंकवाद एवं उसके प्रसार पर रोक, समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए व्यापार वाणिज्य का विस्तार, स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना, पाकिस्तान की गतिविधियों को संतुलित करना, इंडो प्रशांत के छोटे देशों को सहयोग प्रदान करना एवं उनका सशक्तिकरण करना(सामूहिक आवाज बन रहा है) OBOR, मेरीटाइम सिल्क रूट , आसियान देशों की सोलिडेरिटी को तोड़ने का प्रयास, डोकलाम विवाद आदि के माध्यम से चीन के आक्रामक उभार को नियंत्रित करनाक्वाड के उद्देश्य माने जाते हैं | यह संगठन इसके सभी सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों के समक्ष चुनौतियों के कारण गठित किया गया था| क्वाड के गठन के कारण भारत की चिंताएं · क्वाड में केवल भारत NSG का सदस्य नहीं है, भारत सदस्यता के लिए प्रयासरत है किन्तु चीन भारत को सदस्यता देने का विरोध करता है, अतः भारत इसके लिए रणनीतिक प्रयास कर रहा है · पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का चीन द्वारा समर्थन दिया जाता है| UN में आतंकवाद सम्बन्धी भारतीय प्रयासों का चीन द्वारा वीटो किया जाता रहा है · इसके साथ ही चीन पाकिस्तान सैन्य सहयोग का निरंतर विकसित होते जाना भारतीय हितों के विरुद्ध है · CPEC भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है · सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को चीन विवादित करता रहता है जिससे भारत की अखंडता प्रभावित होती है · OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की नीति आदि के माध्यम से चीन हिंद महासागर में भारतीय हितों को चुनौती दी जाती है अमेरिका की चिंता · चीन एशियाई देशों में निरंतर अपना प्रभाव बढाता जा रहा है, इससे अमेरिकी प्रभाव कमजोर होता है · दक्षिण चीन सागर में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों को चीन द्वारा परेशान किया जा रहा है · चीन एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है(चीन ने 2025 तक अपने 10 क्षेत्रकों को मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा है जिसका आधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक होगी) जो भी देश नवाचार प्रेरित अर्थव्यवस्था हो जाएगा वह वैश्विक शक्ति बन जाएगा अतः अमेरिका चीन को उलझाए रखना चाहता है| जापान की चिंताएं · सेनाकूकू द्वीप विवाद जापान की संप्रभुता को चुनौती देता है · उत्तरी कोरिया का मिसाइल एवं नाभिकीय कार्यक्रम चीन के सहयोग से चल रहा है|चीन उत्तरी कोरिया का कभी भी दुरूपयोग कर सकता है| · उत्तरी कोरिया द्वारा जापान के ऊपर सेदागी गयी दो मिसाइलों में चीन का हाथ माना जाता है| अतः जापान के समक्ष सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है · जापान का प्रयास है कि उत्तरी कोरिया का नाभिकीय कार्यक्रम किसी भी तरह रूक जाए, इससे चीन का प्रभाव कम हो जाएगा ऑस्ट्रेलिया की चिंताएं · ऑस्ट्रलिया में विदेशियों द्वारा राजनीतिक फंडिंग की जा सकती हैपरिणाम स्वरुप पिछले 15 सालों में चीन ने ऑस्ट्रेलिया में बड़ा निवेश किया है इसके माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है · इससे ऑस्ट्रलिया की राजनीति प्रभावित होती है अतः ऑस्ट्रेलिया चीन के इस निवेश को कम करते हुए स्रोतों में विविधता लाना चाहता है · स्रोत की विविधता से ऑस्ट्रलिया की राजनीति चीन के दबाव से मुक्त हो सकेगी, इसीलिए ऑस्ट्रेलिया 2018 में क्वाड में सम्मिलित हो गया| भारत की सदस्यता के संभावित परिणाम सकारात्मक पहलू आसियान के दृष्टिकोण में आ रहा परिवर्तन भारत को एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है, भारत की ओर झुकाव के बढ़ने से चीन आइसोलेट होगा अमेरिका द्वारा चीनी आयात पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है जिसके कारण चीन कि अर्थव्यवस्था स्लो डाउन की ओर है, वहां से निकलने वाला FDI भारत की ओर आ सकता है| क्वाड यदि सफल रहता है तो भविष्य में इसमें नए देश शामिल होते जायेंगे और चीन आइसोलेट होता जाएगा आसियान के अनुसार भारत चीन को प्रतिसंतुलित कर सकता है, विश्व के बड़े देशों के साथ सहयोग के माध्यम सेभारत की भूमिका बढ़ेगी, चारों देशों में सुरक्षा के मुद्दे को लेकर आपसी समझ का विस्तार होगा और भविष्य में बेहतर सहयोग की संभावना बढ़ेगी चारों देशों के एक दूसरे के हितों की सुरक्षा के साथ साथ विकास पर कार्य कर सकेंगे भारत की इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ेगी क्वाड भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी के अनुरूप है इससे चीन की आक्रामक नीतियों में बदलाव की संभावना है जिससे चीन शांतिपूर्ण विकास की ओर जा सकता है पूर्वी एशिया में अपने हितों को भारत साध सकेगा अमेरिका जापान एवं ऑस्ट्रलिया के साथ सहयोग के निरंतर बढ़ने की संभावना एक दूसरे के बाजार तक पहुच से तीव्र आर्थिक विकास हो सकेगा चीन के OBOR को प्रतिसंतुलित करने में सहयोग प्राप्त होगा अफगानिस्तान-पाकिस्तान में अमेरिकी नीति को भारतीय हितों के अनुरूप आकार दिया जा सकेगा क्योंकि भारत अमेरिकी हितों के अनुरूप सहयोग दे रहा है नकारात्मक पहलू QUAD में चीन, रूस, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया जैसे देश शामिल नहीं हैं अतः QUAD के कारण क्षेत्र में हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है क्वाड के रास्ते पर आगे बढ़ने के कारण भारत चीन के सम्बन्ध प्रभावित हो सकते हैं यह अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करने जैसा है क्योंकि भारत एक गुट निरपेक्ष देश है इससे इंडो पेसिफिक क्षेत्र में सैन्यीकरण बढेगा US-चीन विवाद में भारत को घसीटे जाने की संभावना है क्वाड, भारत-रूस सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है क्योंकि रूस को लगेगा की भारत सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर झुक गया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि क्वाड में सदस्यता भारत के लिए सकारात्मक-नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणाम उत्पन्न कर सकती है| अतः भारत को यहाँ स्मार्ट पॉवर कूटनीति को अपनाने की आवश्यकता है| चीन और रूस के साथ अपने सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए भारत ने क्वाड के सिंगापुर सम्मलेन में यह प्रतिबद्धता स्पष्ट की कि भारत द्वारा कहा गया है कि क्वाड का उपयोग असैन्य/नागरिक मुद्दों के लिए किया जाएगा| भारत को इस प्रकार संतुलित दृष्टिकोण के साथ क्वाड की सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए|
##Question:क्वाड्रीलेटरल सिक्यूरिटी डायलाग(QUAD) से आप क्या समझते हैं| इसके गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये| QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) What do you understand by quadrilateral security dialogue (QUAD)? Explain the reasons for its formation. List the possible consequences of India"s membership in QUAD. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में क्वाड की संकल्पना को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में क्वाड के गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में QUAD में भारत की सदस्यता के संभावित परिणामों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में इसके लाभों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये क्वाड(quadrilateral Security dialogue) एक सुरक्षा सहयोग संगठन है| इस में ऐसे देश शामिल हैं जिनको चीन द्वारा चुनौती मिल रही है| इसमें चार देश हैं यथा अमेरिका जापान ऑस्ट्रेलिया एवं भारत| 2004 में सुनामी में लगभग सम्पूर्ण पूर्वी एशिया प्रभावित हुआ था इस समय भारत अकेला देश था जिसने एक साथ सभी प्रभावित देशों में आपदा प्रबंधन का काम किया था अतः इस बात को विश्व स्तर पर सराहा गया| इस आपदा प्रबंधन में भारत से प्रभावित हो कर जापान एवं अमेरिका भी आपदा प्रबंधन के लिए आगे आये थे| भारत की इसी क्षमता से प्रभावित होकर 2006 में जापान के राष्ट्रप्रमुख सिंजो अबे ने एक सहयोगी समूह के रूप में क्वाड की संकल्पना प्रस्तुत की| 2007 में ऑस्ट्रलिया इस समूह से निकल गया था इसके बाद क्वाड की मीटिंग नहीं हुई थीलेकिन 2018 में सिंगापुर में हुए क्वाड के तीसरे सम्मलेन में ऑस्ट्रेलिया पुनः क्वाड में वापस आया अतः यह संगठन पुनः चर्चा में है|आतंकवाद एवं उसके प्रसार पर रोक, समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए व्यापार वाणिज्य का विस्तार, स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना, पाकिस्तान की गतिविधियों को संतुलित करना, इंडो प्रशांत के छोटे देशों को सहयोग प्रदान करना एवं उनका सशक्तिकरण करना(सामूहिक आवाज बन रहा है) OBOR, मेरीटाइम सिल्क रूट , आसियान देशों की सोलिडेरिटी को तोड़ने का प्रयास, डोकलाम विवाद आदि के माध्यम से चीन के आक्रामक उभार को नियंत्रित करनाक्वाड के उद्देश्य माने जाते हैं | यह संगठन इसके सभी सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों के समक्ष चुनौतियों के कारण गठित किया गया था| क्वाड के गठन के कारण भारत की चिंताएं · क्वाड में केवल भारत NSG का सदस्य नहीं है, भारत सदस्यता के लिए प्रयासरत है किन्तु चीन भारत को सदस्यता देने का विरोध करता है, अतः भारत इसके लिए रणनीतिक प्रयास कर रहा है · पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का चीन द्वारा समर्थन दिया जाता है| UN में आतंकवाद सम्बन्धी भारतीय प्रयासों का चीन द्वारा वीटो किया जाता रहा है · इसके साथ ही चीन पाकिस्तान सैन्य सहयोग का निरंतर विकसित होते जाना भारतीय हितों के विरुद्ध है · CPEC भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है · सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को चीन विवादित करता रहता है जिससे भारत की अखंडता प्रभावित होती है · OBOR, स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की नीति आदि के माध्यम से चीन हिंद महासागर में भारतीय हितों को चुनौती दी जाती है अमेरिका की चिंता · चीन एशियाई देशों में निरंतर अपना प्रभाव बढाता जा रहा है, इससे अमेरिकी प्रभाव कमजोर होता है · दक्षिण चीन सागर में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों को चीन द्वारा परेशान किया जा रहा है · चीन एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है(चीन ने 2025 तक अपने 10 क्षेत्रकों को मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा है जिसका आधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक होगी) जो भी देश नवाचार प्रेरित अर्थव्यवस्था हो जाएगा वह वैश्विक शक्ति बन जाएगा अतः अमेरिका चीन को उलझाए रखना चाहता है| जापान की चिंताएं · सेनाकूकू द्वीप विवाद जापान की संप्रभुता को चुनौती देता है · उत्तरी कोरिया का मिसाइल एवं नाभिकीय कार्यक्रम चीन के सहयोग से चल रहा है|चीन उत्तरी कोरिया का कभी भी दुरूपयोग कर सकता है| · उत्तरी कोरिया द्वारा जापान के ऊपर सेदागी गयी दो मिसाइलों में चीन का हाथ माना जाता है| अतः जापान के समक्ष सुरक्षा चुनौती उत्पन्न होती है · जापान का प्रयास है कि उत्तरी कोरिया का नाभिकीय कार्यक्रम किसी भी तरह रूक जाए, इससे चीन का प्रभाव कम हो जाएगा ऑस्ट्रेलिया की चिंताएं · ऑस्ट्रलिया में विदेशियों द्वारा राजनीतिक फंडिंग की जा सकती हैपरिणाम स्वरुप पिछले 15 सालों में चीन ने ऑस्ट्रेलिया में बड़ा निवेश किया है इसके माध्यम से चेक बुक डिप्लोमेसी करता है · इससे ऑस्ट्रलिया की राजनीति प्रभावित होती है अतः ऑस्ट्रेलिया चीन के इस निवेश को कम करते हुए स्रोतों में विविधता लाना चाहता है · स्रोत की विविधता से ऑस्ट्रलिया की राजनीति चीन के दबाव से मुक्त हो सकेगी, इसीलिए ऑस्ट्रेलिया 2018 में क्वाड में सम्मिलित हो गया| भारत की सदस्यता के संभावित परिणाम सकारात्मक पहलू आसियान के दृष्टिकोण में आ रहा परिवर्तन भारत को एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है, भारत की ओर झुकाव के बढ़ने से चीन आइसोलेट होगा अमेरिका द्वारा चीनी आयात पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है जिसके कारण चीन कि अर्थव्यवस्था स्लो डाउन की ओर है, वहां से निकलने वाला FDI भारत की ओर आ सकता है| क्वाड यदि सफल रहता है तो भविष्य में इसमें नए देश शामिल होते जायेंगे और चीन आइसोलेट होता जाएगा आसियान के अनुसार भारत चीन को प्रतिसंतुलित कर सकता है, विश्व के बड़े देशों के साथ सहयोग के माध्यम सेभारत की भूमिका बढ़ेगी, चारों देशों में सुरक्षा के मुद्दे को लेकर आपसी समझ का विस्तार होगा और भविष्य में बेहतर सहयोग की संभावना बढ़ेगी चारों देशों के एक दूसरे के हितों की सुरक्षा के साथ साथ विकास पर कार्य कर सकेंगे भारत की इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ेगी क्वाड भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी के अनुरूप है इससे चीन की आक्रामक नीतियों में बदलाव की संभावना है जिससे चीन शांतिपूर्ण विकास की ओर जा सकता है पूर्वी एशिया में अपने हितों को भारत साध सकेगा अमेरिका जापान एवं ऑस्ट्रलिया के साथ सहयोग के निरंतर बढ़ने की संभावना एक दूसरे के बाजार तक पहुच से तीव्र आर्थिक विकास हो सकेगा चीन के OBOR को प्रतिसंतुलित करने में सहयोग प्राप्त होगा अफगानिस्तान-पाकिस्तान में अमेरिकी नीति को भारतीय हितों के अनुरूप आकार दिया जा सकेगा क्योंकि भारत अमेरिकी हितों के अनुरूप सहयोग दे रहा है नकारात्मक पहलू QUAD में चीन, रूस, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया जैसे देश शामिल नहीं हैं अतः QUAD के कारण क्षेत्र में हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है क्वाड के रास्ते पर आगे बढ़ने के कारण भारत चीन के सम्बन्ध प्रभावित हो सकते हैं यह अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करने जैसा है क्योंकि भारत एक गुट निरपेक्ष देश है इससे इंडो पेसिफिक क्षेत्र में सैन्यीकरण बढेगा US-चीन विवाद में भारत को घसीटे जाने की संभावना है क्वाड, भारत-रूस सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है क्योंकि रूस को लगेगा की भारत सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर झुक गया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि क्वाड में सदस्यता भारत के लिए सकारात्मक-नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणाम उत्पन्न कर सकती है| अतः भारत को यहाँ स्मार्ट पॉवर कूटनीति को अपनाने की आवश्यकता है| चीन और रूस के साथ अपने सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए भारत ने क्वाड के सिंगापुर सम्मलेन में यह प्रतिबद्धता स्पष्ट की कि भारत द्वारा कहा गया है कि क्वाड का उपयोग असैन्य/नागरिक मुद्दों के लिए किया जाएगा| भारत को इस प्रकार संतुलित दृष्टिकोण के साथ क्वाड की सदस्यता ग्रहण करनी चाहिए|
47,383
मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों के पश्चात आरक्षण व्यवस्था पर विकसित हो रही नीति के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय और सरकार के निर्णयों का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द, अंक -10 ) Describe Supreme court and government decisions in the context of evolving policy on the reservation after Mandal Commission"s recommendations. (150-200 words , marks - 10 )
एप्रोच:- भूमिका में मण्डल आयोग का संदर्भ देते हुए आरक्षण व्यवस्था में नए प्रावधानों को लिखिए। इसके पश्चात क्रमिक रूप से उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप व सरकार की नीतियों का वर्णन कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर:- गौरतलब है कि 1979 में गठित मण्डल आयोग ने सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की। 1990 में सरकार ने इन सिफ़ारिशों को लागू कर दिया। इसके पश्चात आरक्षण व्यवस्था में अनेक नए आयाम जुड़ते गए जिसका कारण उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप तथा सरकार की नीतियाँ रहीं। आरक्षण व्यवस्था पर विकसित हो रही नीति:- सरकार द्वारा मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के पश्चात सर्वप्रथम इंदिरा साहनी वाद में इस व्यवस्था का परीक्षण उच्चतम न्यायालय द्वारा किया गया। जिसमें इस व्यवस्था को बनाए रखने की बात की। हालांकि क्रीमीलेयर संबंधी नए मानदंड तय किए। प्रोन्नति में आरक्षण को अस्वीकार कर दिया। प्रोन्नति में कोई विशेष आरक्षण केवल 5 वर्षों तक लागू हो सकता है। केवल कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोडकर कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके बाद 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1955 द्वारा अनुच्छेद 16 (4ए) जोड़ा गया जिसने सरकार को प्रोन्नति में आरक्षण प्रदान करने हेतु सक्षम बनाया। पुनः 2001 में 85 वें संशोधन द्वारा एससी/एसटी को प्रोन्नति प्रदान करने हेतु परिणामी वरिष्ठता की व्यवस्था करता है। एम. नागराज बनाम भारत संघ वाद (2006) में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि सरकार प्रोन्नति से संबन्धित मामलों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करना चाहती है तो उसे क्रीमी लेयर से संबन्धित लोगों को पृथक करने की आवश्यकता है। इसके प्रत्युत्तर में संसद द्वारा एससी/एसटी में से क्रीमी लेयर को पृथक करने की शर्त पर को समाप्त करने हेतु 117वां संविधान संशोधन विधेयक, 2012 में प्रस्तुत किया गया जो अभी तक लंबित है। हाल ही में 103वें संविधान संशोधन के माध्यम आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% की आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी गई है। इस प्रकार सामाजिक न्याय को स्थापित करने के लिए आरक्षण व्यवस्था में मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के पश्चात एक नया मोड़ आया। इसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा तो साथ में विधायिका ने भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए नए-नए प्रावधान लागू किए। इस व्यवस्था के वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु और सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है जो राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित न हो।
##Question:मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों के पश्चात आरक्षण व्यवस्था पर विकसित हो रही नीति के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय और सरकार के निर्णयों का वर्णन कीजिए। (150-200 शब्द, अंक -10 ) Describe Supreme court and government decisions in the context of evolving policy on the reservation after Mandal Commission"s recommendations. (150-200 words , marks - 10 )##Answer:एप्रोच:- भूमिका में मण्डल आयोग का संदर्भ देते हुए आरक्षण व्यवस्था में नए प्रावधानों को लिखिए। इसके पश्चात क्रमिक रूप से उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप व सरकार की नीतियों का वर्णन कीजिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर:- गौरतलब है कि 1979 में गठित मण्डल आयोग ने सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की। 1990 में सरकार ने इन सिफ़ारिशों को लागू कर दिया। इसके पश्चात आरक्षण व्यवस्था में अनेक नए आयाम जुड़ते गए जिसका कारण उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप तथा सरकार की नीतियाँ रहीं। आरक्षण व्यवस्था पर विकसित हो रही नीति:- सरकार द्वारा मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के पश्चात सर्वप्रथम इंदिरा साहनी वाद में इस व्यवस्था का परीक्षण उच्चतम न्यायालय द्वारा किया गया। जिसमें इस व्यवस्था को बनाए रखने की बात की। हालांकि क्रीमीलेयर संबंधी नए मानदंड तय किए। प्रोन्नति में आरक्षण को अस्वीकार कर दिया। प्रोन्नति में कोई विशेष आरक्षण केवल 5 वर्षों तक लागू हो सकता है। केवल कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोडकर कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके बाद 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1955 द्वारा अनुच्छेद 16 (4ए) जोड़ा गया जिसने सरकार को प्रोन्नति में आरक्षण प्रदान करने हेतु सक्षम बनाया। पुनः 2001 में 85 वें संशोधन द्वारा एससी/एसटी को प्रोन्नति प्रदान करने हेतु परिणामी वरिष्ठता की व्यवस्था करता है। एम. नागराज बनाम भारत संघ वाद (2006) में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि सरकार प्रोन्नति से संबन्धित मामलों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करना चाहती है तो उसे क्रीमी लेयर से संबन्धित लोगों को पृथक करने की आवश्यकता है। इसके प्रत्युत्तर में संसद द्वारा एससी/एसटी में से क्रीमी लेयर को पृथक करने की शर्त पर को समाप्त करने हेतु 117वां संविधान संशोधन विधेयक, 2012 में प्रस्तुत किया गया जो अभी तक लंबित है। हाल ही में 103वें संविधान संशोधन के माध्यम आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% की आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी गई है। इस प्रकार सामाजिक न्याय को स्थापित करने के लिए आरक्षण व्यवस्था में मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के पश्चात एक नया मोड़ आया। इसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा तो साथ में विधायिका ने भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए नए-नए प्रावधान लागू किए। इस व्यवस्था के वास्तविक उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु और सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है जो राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित न हो।
47,384
भारतीय कृषि निम्न उत्पादकता की समस्या के अलावा कई अन्य व्यापक समस्याओं से ग्रसित है| कथन का विश्लेषण कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Apart from the problem of Low Productivity, Agriculture in India suffers from many other widespread problems. Analyze the statement. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान समस्याओं की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारतीय कृषि की समस्या के रूप में निम्न उत्पादकता का वर्णन कीजिए| अगले भाग में, भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान अन्य व्यापक समस्याओं का वर्णन कीजिए| निष्कर्षतः, उपरोक्त संदर्भ में कृषि सुधार की भावी दिशा को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- कृषि पारिस्थितिकी तथा विभिन्न प्रदेशों के ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार भारतीय कृषि की समस्याएं भी विभिन्न प्रकार की हैं| देश की अधिकतर कृषि समस्याएं सर्वव्यापी हैं जिनमें भौतिक बाधाओं से लेकर संस्थागत अवरोध तक शामिल हैं| यह अनाज केंद्रित, क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित तथा भूमि-जल-उर्वरक जैसे इनपुट पर आधारित हो चुकी है| इसकी पृष्ठभूमि में तीव्र औद्योगीकरण भूमि की उपलब्धता को प्रभावित कर रहा है, जलवायु परिवर्तन जल की उपलब्धता को प्रभावित कर रहा है एवं भोजन संबंधी आदतों में परिवर्तन प्रोटीन उपभोग को बढ़ा रहा है| अभी देश का कुल खाद्यान उत्पादन 250 मिलियन टन है जो 1947 में 50 मिलियन टन था हालांकि जनसँख्या के दबाव को देखते हुए आगामी कुछ वर्षों में इसे 400 मिलियन टन हो जाने का अनुमान है| भारतीय कृषि की समस्या के रूप में निम्न उत्पादकता- भारतीय कृषि की उत्पादकता एक बड़ी चिंता का विषय है| भारत में अधिकतर फसलों जैसे- चावल, गेहूं, कपास और तिलहन की प्रति हेक्टेयर पैदावार विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है| भूमि संसाधनों पर अत्यधिक दबाव के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में भारत में श्रम उत्पादकता भी बहुत कम है| भारतीय कृषि द्वारा सामना की जाने वाली कुछ अन्य प्रमुख समस्याएं मानसून पर निर्भरता- भारतीय कृषि की सबसे बड़ी समस्या मानसून पर निर्भरता है| भारत में कृषि क्षेत्र का लगभग 45% भाग ही सिंचित है| शेष कृषि क्षेत्र में फसलों का उत्पादन प्रत्यक्ष रूप से वर्षा पर निर्भर है| चूँकि, भारत में वर्षा अनिश्चित और अनियमित है, अतः इसे सूखे एवं बाढ़ दोनों ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है| साथ ही जलवायु परिवर्तन के इस दौर में वर्षा की अनिश्चितता और बढ़ती जा रही है जिससे सूखा एवं बाढ़ एक नियमित परिघटना बन चुकी है| कृषि की पुरानी पद्धति- भारतीय किसान पुरानी तकनीकों का उपयोग करते हैं| अधिकांश कृषि कार्यों को शारीरिक और पारंपरिक उपकरणों का उपयोग करके संचालित किया जाता है जिससे किसानों की उत्पादन क्षमता घटती है| वित्तीय संसाधनों की कमी तथा ऋणग्रस्तता - सीमांत तथा छोटे किसानों की कृषि बचत बहुत कम है अतः वे सघन एवं संसाधन दृष्टिकोण से की जाने वाली कृषि में निवेश करने में असमर्थ हैं| कृषि से कम होती आय, मूल्यों की अनिश्चितता तथा फसलों के खराब होने से वे कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं| भूमि सुधारों के प्रति लंबित दृष्टिकोण - भूमि सुधारों के पूरी तरीके से लागू ना होने के कारण भूमि का असमान वितरण जारी है जिससे कृषि विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है| उचित भूमि रिकॉर्ड का ना होना भी किसानों को शोषण के प्रति सुभेद्द बनाता है| छोटे खेत तथा विखंडित जोत - भारत में छोटे एवं किसान सीमांत किसानों की संख्या अधिक है| 60% से अधिक किसानों के पास 1 हेक्टेयर से छोटी जोत है तथा लगभग 40% किसानों की जोतों का आकार तो 0.5 हेक्टेयर से भी कम है| बढ़ती जनसंख्या के कारण इन जोतों का आकार और भी कम होते जा रहा है| इसके अतिरिक्त भारत में अधिकभूजोत बिखरे हुए हैं| विखंडित एवं छोटेभूजोतों के कारण कृषि आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी है| कृषि के वाणिज्यीकरण का अभाव - अधिकांश किसान फसलों की पैदावार अपने उपभोग के लिए करते हैं| साथ ही इन किसानों के पास इतनी जमीन भी नहीं होती है कि अपनी जरूरतों से अधिक उत्पादन कर सकें| ज्यादातर किसान जो फसल की खेती करते हैं वो उनके परिवार की खपत के लिए होती है| व्यापक मौसमी बेरोजगारी - कृषि क्षेत्रों में खासकर असिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मौसमी बेरोजगारी पाई जाती है | कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण - सिंचाई तथा कृषि विकास की दोषपूर्ण नीतियों से उत्पन्न हुई समस्याओं में भूमि संसाधनों का निम्नीकरण सबसे गंभीर समस्या है| उर्वर भूमि का एक बड़ा भाग वायु अपरदन, निर्वनीकरण, अत्यधिक चराई, रसायनों के अत्यधिक प्रयोग और असामयिक वर्षा के कारण मृदा क्षरण की समस्या से ग्रसित है| सिंचित क्षेत्रों मेंकृषिभूमि का एक बड़ा भाग जलमग्न है जिससे लवणीयता एवं क्षारीयता की समस्या मृदा की उर्वरताको क्षीण करते जा रही है| उचित विपणन व्यवस्था का अभाव जिससे अधिकांश किसान अपने कृषि उत्पाद को स्थानीय व्यापारी या बिचौलियों को सस्तेमूल्य पर बेचने को मजबूर हैं| आधारभूत ढांचे का पिछड़ापन और जल संसाधनों का कूप्रबंधन ; कृषि साख की समस्या - सरकार के तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी अधिकांश किसान अपनी साख संबंधी आवश्यकताओं के लिए असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है जहां ब्याज की दर 60% से लेकर 150% तक है| कृषि विविधीकरण का अभाव - सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति के कारण खाद्यान्न फसलों का उत्पादन अत्यधिक होता है जिससे फल, उद्यान और बगीचों का कुल कृषि भूमि में हिस्सा बहुत कम है| अनुसंधान एवं विकास कार्यों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाना तथा अनुसंधानों को खेत तक पहुंचाने में विफलता; गरीबी और अशिक्षा जिससे सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी आम किसानों तक नहीं पहुंच पाना; कृषि आपदा(बाढ़, सुखा आदि) के कारण उत्पादन में कमी; हरितक्रांति का सभी क्षेत्रों में विस्तार नहीं ; इन समस्याओं को देखते हुए हमें कृषि सुधारों की ओर कदम बढ़ाना होगा जिसके लिए सार्वजनिक निवेश की मात्रा में वृद्धि करनी होगी| साथ ही, जल प्रबंधन के साथ-साथ आधारभूत ढांचे के विस्तार एवं विकास को बढ़ावा देना होगा; विपणन तथा भंडारण से संबंधित समस्याओं को समाधान करना होगा; कृषि साख के सांगठनिक ढांचे का विस्तार करना होगा तथा कृषि के विविधीकरण पर जोर देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति की समीक्षा करनी होगी|
##Question:भारतीय कृषि निम्न उत्पादकता की समस्या के अलावा कई अन्य व्यापक समस्याओं से ग्रसित है| कथन का विश्लेषण कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Apart from the problem of Low Productivity, Agriculture in India suffers from many other widespread problems. Analyze the statement. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान समस्याओं की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारतीय कृषि की समस्या के रूप में निम्न उत्पादकता का वर्णन कीजिए| अगले भाग में, भारतीय कृषि के समक्ष विद्यमान अन्य व्यापक समस्याओं का वर्णन कीजिए| निष्कर्षतः, उपरोक्त संदर्भ में कृषि सुधार की भावी दिशा को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- कृषि पारिस्थितिकी तथा विभिन्न प्रदेशों के ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार भारतीय कृषि की समस्याएं भी विभिन्न प्रकार की हैं| देश की अधिकतर कृषि समस्याएं सर्वव्यापी हैं जिनमें भौतिक बाधाओं से लेकर संस्थागत अवरोध तक शामिल हैं| यह अनाज केंद्रित, क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित तथा भूमि-जल-उर्वरक जैसे इनपुट पर आधारित हो चुकी है| इसकी पृष्ठभूमि में तीव्र औद्योगीकरण भूमि की उपलब्धता को प्रभावित कर रहा है, जलवायु परिवर्तन जल की उपलब्धता को प्रभावित कर रहा है एवं भोजन संबंधी आदतों में परिवर्तन प्रोटीन उपभोग को बढ़ा रहा है| अभी देश का कुल खाद्यान उत्पादन 250 मिलियन टन है जो 1947 में 50 मिलियन टन था हालांकि जनसँख्या के दबाव को देखते हुए आगामी कुछ वर्षों में इसे 400 मिलियन टन हो जाने का अनुमान है| भारतीय कृषि की समस्या के रूप में निम्न उत्पादकता- भारतीय कृषि की उत्पादकता एक बड़ी चिंता का विषय है| भारत में अधिकतर फसलों जैसे- चावल, गेहूं, कपास और तिलहन की प्रति हेक्टेयर पैदावार विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है| भूमि संसाधनों पर अत्यधिक दबाव के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में भारत में श्रम उत्पादकता भी बहुत कम है| भारतीय कृषि द्वारा सामना की जाने वाली कुछ अन्य प्रमुख समस्याएं मानसून पर निर्भरता- भारतीय कृषि की सबसे बड़ी समस्या मानसून पर निर्भरता है| भारत में कृषि क्षेत्र का लगभग 45% भाग ही सिंचित है| शेष कृषि क्षेत्र में फसलों का उत्पादन प्रत्यक्ष रूप से वर्षा पर निर्भर है| चूँकि, भारत में वर्षा अनिश्चित और अनियमित है, अतः इसे सूखे एवं बाढ़ दोनों ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है| साथ ही जलवायु परिवर्तन के इस दौर में वर्षा की अनिश्चितता और बढ़ती जा रही है जिससे सूखा एवं बाढ़ एक नियमित परिघटना बन चुकी है| कृषि की पुरानी पद्धति- भारतीय किसान पुरानी तकनीकों का उपयोग करते हैं| अधिकांश कृषि कार्यों को शारीरिक और पारंपरिक उपकरणों का उपयोग करके संचालित किया जाता है जिससे किसानों की उत्पादन क्षमता घटती है| वित्तीय संसाधनों की कमी तथा ऋणग्रस्तता - सीमांत तथा छोटे किसानों की कृषि बचत बहुत कम है अतः वे सघन एवं संसाधन दृष्टिकोण से की जाने वाली कृषि में निवेश करने में असमर्थ हैं| कृषि से कम होती आय, मूल्यों की अनिश्चितता तथा फसलों के खराब होने से वे कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं| भूमि सुधारों के प्रति लंबित दृष्टिकोण - भूमि सुधारों के पूरी तरीके से लागू ना होने के कारण भूमि का असमान वितरण जारी है जिससे कृषि विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है| उचित भूमि रिकॉर्ड का ना होना भी किसानों को शोषण के प्रति सुभेद्द बनाता है| छोटे खेत तथा विखंडित जोत - भारत में छोटे एवं किसान सीमांत किसानों की संख्या अधिक है| 60% से अधिक किसानों के पास 1 हेक्टेयर से छोटी जोत है तथा लगभग 40% किसानों की जोतों का आकार तो 0.5 हेक्टेयर से भी कम है| बढ़ती जनसंख्या के कारण इन जोतों का आकार और भी कम होते जा रहा है| इसके अतिरिक्त भारत में अधिकभूजोत बिखरे हुए हैं| विखंडित एवं छोटेभूजोतों के कारण कृषि आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी है| कृषि के वाणिज्यीकरण का अभाव - अधिकांश किसान फसलों की पैदावार अपने उपभोग के लिए करते हैं| साथ ही इन किसानों के पास इतनी जमीन भी नहीं होती है कि अपनी जरूरतों से अधिक उत्पादन कर सकें| ज्यादातर किसान जो फसल की खेती करते हैं वो उनके परिवार की खपत के लिए होती है| व्यापक मौसमी बेरोजगारी - कृषि क्षेत्रों में खासकर असिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मौसमी बेरोजगारी पाई जाती है | कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण - सिंचाई तथा कृषि विकास की दोषपूर्ण नीतियों से उत्पन्न हुई समस्याओं में भूमि संसाधनों का निम्नीकरण सबसे गंभीर समस्या है| उर्वर भूमि का एक बड़ा भाग वायु अपरदन, निर्वनीकरण, अत्यधिक चराई, रसायनों के अत्यधिक प्रयोग और असामयिक वर्षा के कारण मृदा क्षरण की समस्या से ग्रसित है| सिंचित क्षेत्रों मेंकृषिभूमि का एक बड़ा भाग जलमग्न है जिससे लवणीयता एवं क्षारीयता की समस्या मृदा की उर्वरताको क्षीण करते जा रही है| उचित विपणन व्यवस्था का अभाव जिससे अधिकांश किसान अपने कृषि उत्पाद को स्थानीय व्यापारी या बिचौलियों को सस्तेमूल्य पर बेचने को मजबूर हैं| आधारभूत ढांचे का पिछड़ापन और जल संसाधनों का कूप्रबंधन ; कृषि साख की समस्या - सरकार के तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी अधिकांश किसान अपनी साख संबंधी आवश्यकताओं के लिए असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है जहां ब्याज की दर 60% से लेकर 150% तक है| कृषि विविधीकरण का अभाव - सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति के कारण खाद्यान्न फसलों का उत्पादन अत्यधिक होता है जिससे फल, उद्यान और बगीचों का कुल कृषि भूमि में हिस्सा बहुत कम है| अनुसंधान एवं विकास कार्यों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाना तथा अनुसंधानों को खेत तक पहुंचाने में विफलता; गरीबी और अशिक्षा जिससे सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी आम किसानों तक नहीं पहुंच पाना; कृषि आपदा(बाढ़, सुखा आदि) के कारण उत्पादन में कमी; हरितक्रांति का सभी क्षेत्रों में विस्तार नहीं ; इन समस्याओं को देखते हुए हमें कृषि सुधारों की ओर कदम बढ़ाना होगा जिसके लिए सार्वजनिक निवेश की मात्रा में वृद्धि करनी होगी| साथ ही, जल प्रबंधन के साथ-साथ आधारभूत ढांचे के विस्तार एवं विकास को बढ़ावा देना होगा; विपणन तथा भंडारण से संबंधित समस्याओं को समाधान करना होगा; कृषि साख के सांगठनिक ढांचे का विस्तार करना होगा तथा कृषि के विविधीकरण पर जोर देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति की समीक्षा करनी होगी|
47,392
What do you understand by the ecosystem? Briefly discuss the classification of ecosystem-based on i)terrestrial and aquatic and ii) natural and manmade. Illustrate your answer with the help of examples. (150 Words)/10 Marks)
Approach:- Explain the term ecosystem Write down its component with examples Write downthe classification of ecosystem with examples. Answer:- An ecosystem is defined as the functional unit of nature, where living organisms interact among themselves and also with the surrounding physical environment. Ecosystem varies greatly in size from a small pond to a large forest or a sea.The term was coined by Arthur Tansley in 1935. Component of Ecosystem: Ecosystem can be classified into abiotic and biotic components. Abiotic or the non-living component, which forms the environment, can be further classified under Physical – These are driving factors like Temperature, sunlight etc. Inorganic –Non carbon based chemical elements like Water, oxygen etc. Organic – Carbon based chemical elements like Proteins etc. Biotic or living component of the ecosystem Autotrophs – Primary producers like plants, produce food directly. Eg. Trees, Shrubs. Heterotrophs – Derive food from animals or plants. Eg. Tiger, Deer. Saprotrophs – Decomposers who breakdown the complex organic matter. Eg. Fungi, Bacteria. Classification of Ecosystem:- Ecosystem can be classified on basis of a) Natural and manmade. b) Terrestrial and aquatic. a) Natural Ecosystems – These are ecosystems found in nature. They are formed through years of succession process arising out due to interaction of biotic and abiotic components of ecosystem and usually have high biodiversity of both flora and fauna. They are self-sustaining in nature. Eg. Pristine forests, tundra region etc. Manmade Ecosystem – These are ecosystems created by man to emulate certain features of natural ecosystems. They are sustained by human efforts. These ecosystems have low species diversity. Eg. Farm fields, Aquariums etc. b) Terrestrial Ecosystems – These ecosystems are primarily based on land. They can be further subdivided into Forest – It is an area with tree cover, the density of which may vary from very dense to sparse. It houses huge amount of plant and animal biodiversity. They can be further classified into tropical evergreen, temperate deciduous etc. type of forests. Eg. Amazon forest. Desert – Areas with very little or no precipitation and extreme weather making living condition hostile for both animal and plants. They can be classified into hot and cold desert. Eg. Thar desert, Ladakh area. Grassland – An area where vegetation is dominated by grasses and other non-woody plants. They are home of wildlife like lions. Eg. Steppe, Bugyals in India. Mountain – These are high altitude regions dominated by cold climate and are home of unique flora and fauna like alpine forests. Eg. Himalayas, Nilgiris etc. Aquatic Ecosystems – There are ecosystems primarily based on water, they can be further subdivided into Wetland – Ecosystem which is flooded by water all-round the year or seasonally. They are highly productive ecosystems supporting wide array of biodiversity. They can be both manmade and natural. Eg. Harike wetland, East Kolkata westland etc. Marine – They are the largest aquatic ecosystems on earth ad are featured by high salt content. They include mangroves, deltas etc. Eg. Sunderbans delta, Bhitarkanika etc. Riverine – These are flowing, freshwater ecosystem characterised by low salt content. They include rivers and streams. Eg. Ganga, Godavari etc. Coral reef – These are specialized underwater ecosystem characterized by reef-building corals. They are source of many ecosystem services such as fisheries, coastline protection. Eg. Great Barrier Reef.
##Question:What do you understand by the ecosystem? Briefly discuss the classification of ecosystem-based on i)terrestrial and aquatic and ii) natural and manmade. Illustrate your answer with the help of examples. (150 Words)/10 Marks)##Answer:Approach:- Explain the term ecosystem Write down its component with examples Write downthe classification of ecosystem with examples. Answer:- An ecosystem is defined as the functional unit of nature, where living organisms interact among themselves and also with the surrounding physical environment. Ecosystem varies greatly in size from a small pond to a large forest or a sea.The term was coined by Arthur Tansley in 1935. Component of Ecosystem: Ecosystem can be classified into abiotic and biotic components. Abiotic or the non-living component, which forms the environment, can be further classified under Physical – These are driving factors like Temperature, sunlight etc. Inorganic –Non carbon based chemical elements like Water, oxygen etc. Organic – Carbon based chemical elements like Proteins etc. Biotic or living component of the ecosystem Autotrophs – Primary producers like plants, produce food directly. Eg. Trees, Shrubs. Heterotrophs – Derive food from animals or plants. Eg. Tiger, Deer. Saprotrophs – Decomposers who breakdown the complex organic matter. Eg. Fungi, Bacteria. Classification of Ecosystem:- Ecosystem can be classified on basis of a) Natural and manmade. b) Terrestrial and aquatic. a) Natural Ecosystems – These are ecosystems found in nature. They are formed through years of succession process arising out due to interaction of biotic and abiotic components of ecosystem and usually have high biodiversity of both flora and fauna. They are self-sustaining in nature. Eg. Pristine forests, tundra region etc. Manmade Ecosystem – These are ecosystems created by man to emulate certain features of natural ecosystems. They are sustained by human efforts. These ecosystems have low species diversity. Eg. Farm fields, Aquariums etc. b) Terrestrial Ecosystems – These ecosystems are primarily based on land. They can be further subdivided into Forest – It is an area with tree cover, the density of which may vary from very dense to sparse. It houses huge amount of plant and animal biodiversity. They can be further classified into tropical evergreen, temperate deciduous etc. type of forests. Eg. Amazon forest. Desert – Areas with very little or no precipitation and extreme weather making living condition hostile for both animal and plants. They can be classified into hot and cold desert. Eg. Thar desert, Ladakh area. Grassland – An area where vegetation is dominated by grasses and other non-woody plants. They are home of wildlife like lions. Eg. Steppe, Bugyals in India. Mountain – These are high altitude regions dominated by cold climate and are home of unique flora and fauna like alpine forests. Eg. Himalayas, Nilgiris etc. Aquatic Ecosystems – There are ecosystems primarily based on water, they can be further subdivided into Wetland – Ecosystem which is flooded by water all-round the year or seasonally. They are highly productive ecosystems supporting wide array of biodiversity. They can be both manmade and natural. Eg. Harike wetland, East Kolkata westland etc. Marine – They are the largest aquatic ecosystems on earth ad are featured by high salt content. They include mangroves, deltas etc. Eg. Sunderbans delta, Bhitarkanika etc. Riverine – These are flowing, freshwater ecosystem characterised by low salt content. They include rivers and streams. Eg. Ganga, Godavari etc. Coral reef – These are specialized underwater ecosystem characterized by reef-building corals. They are source of many ecosystem services such as fisheries, coastline protection. Eg. Great Barrier Reef.
47,397
Why is there growing debate on social, economic, environmental, and political aspects of the use of Nuclear Technology worldwide? Discuss the various aspects of this debate. (150 words /10 marks)
Approach Write an introduction to nuclear technology. Throw light on the expanding use of this technology. Discuss the positive and the negatives of nuclear technology related to the mention aspects. Answer: Nuclear technology is derived from reactions involving atomic nuclei. They have been classified as fission or fusion reactions i.e. a heavier nucleus break downs into smaller or two small nuclei fusing together to form a heavier nucleus. Such reactions release huge energy, creates new radioisotopes etc. The application of Nuclear technology has been growing both in volume and the areas of use such as - Power generation – from its inception in 1950s nuclear power generation provides 11% of the world’s electricity. In India, they contribute 6780 MW of power. Medicine – The use in the medical sector has expanded into domains such as cancer treatment, thyroid gland treatment. Similarly, they are used in other sectors such as the food processing industry, creating high yield variety etc. This expanding nature of nuclear technology and the experiences we have had from the disasters at Chernobyl and Fukashima have created an apprehensive environment leading to a debate on its utilization. (The below part has been dictated by sir in class.) Positives of Nuclear Technology:- Social It helps provide energy which is necessary to maintain a good standard of living of people. Further through high yield variety of crops, it will increase farmer incomes who are often committing suicide due to agricultural distress. The waste of food will reduce as it also helps in food preservation. Eg. Litchi’s shelf life can increase from 4 days to 60 days. Medical usage of nuclear technology also helps prevents untimely death. Economic It helps provide energy security which contributes to infrastructure development. Increase in farm income by use of high yield variety crops and food preservation will lead to more consumption, thus giving our economy a much-needed boost. Environmental It is a cleaner fuel in terms that it does not lead to greenhouse gas emission or impact the ecology negatively caused by big hydroelectric projects. Eg. Tehri hydroelectric project. Political Will help attain self-reliance in energy. Nuclear technology is a high-end technology and thus require collaboration between nations leading to good ties between nations. Negatives of Nuclear Technology Social It requires huge tracts of land which leads to issues such as a land acquisition. Similarly, the people displaced due to the project needs to be rehabilitated which is often not effective. Economic Nuclear technology is very expensive- from reactors to land acquisition. Transfer of Technology from foreign nations, the firm is also expensive. Need of skilled labour as one error may lead to a huge mishap. Environmental Nuclear waste produced from nuclear technology application needs to be handled effectively otherwise it may contaminate the water and soil around it. Political Nuclear technology has led to an arms race between the nation, threatening the peace. Eg. India and Pakistan arms race, USA and USSR in cold war era etc. There is the issue of nuclear proliferation. Eg. North Korea has acquired nuclear weapon technology. Further, there is also risk of terrorist organization possessing such weapon technology. Every technology has its associated risks and rewards. It is up to us how we utilize them to extract maximum benefit without threatening world peace and the environment.
##Question:Why is there growing debate on social, economic, environmental, and political aspects of the use of Nuclear Technology worldwide? Discuss the various aspects of this debate. (150 words /10 marks)##Answer:Approach Write an introduction to nuclear technology. Throw light on the expanding use of this technology. Discuss the positive and the negatives of nuclear technology related to the mention aspects. Answer: Nuclear technology is derived from reactions involving atomic nuclei. They have been classified as fission or fusion reactions i.e. a heavier nucleus break downs into smaller or two small nuclei fusing together to form a heavier nucleus. Such reactions release huge energy, creates new radioisotopes etc. The application of Nuclear technology has been growing both in volume and the areas of use such as - Power generation – from its inception in 1950s nuclear power generation provides 11% of the world’s electricity. In India, they contribute 6780 MW of power. Medicine – The use in the medical sector has expanded into domains such as cancer treatment, thyroid gland treatment. Similarly, they are used in other sectors such as the food processing industry, creating high yield variety etc. This expanding nature of nuclear technology and the experiences we have had from the disasters at Chernobyl and Fukashima have created an apprehensive environment leading to a debate on its utilization. (The below part has been dictated by sir in class.) Positives of Nuclear Technology:- Social It helps provide energy which is necessary to maintain a good standard of living of people. Further through high yield variety of crops, it will increase farmer incomes who are often committing suicide due to agricultural distress. The waste of food will reduce as it also helps in food preservation. Eg. Litchi’s shelf life can increase from 4 days to 60 days. Medical usage of nuclear technology also helps prevents untimely death. Economic It helps provide energy security which contributes to infrastructure development. Increase in farm income by use of high yield variety crops and food preservation will lead to more consumption, thus giving our economy a much-needed boost. Environmental It is a cleaner fuel in terms that it does not lead to greenhouse gas emission or impact the ecology negatively caused by big hydroelectric projects. Eg. Tehri hydroelectric project. Political Will help attain self-reliance in energy. Nuclear technology is a high-end technology and thus require collaboration between nations leading to good ties between nations. Negatives of Nuclear Technology Social It requires huge tracts of land which leads to issues such as a land acquisition. Similarly, the people displaced due to the project needs to be rehabilitated which is often not effective. Economic Nuclear technology is very expensive- from reactors to land acquisition. Transfer of Technology from foreign nations, the firm is also expensive. Need of skilled labour as one error may lead to a huge mishap. Environmental Nuclear waste produced from nuclear technology application needs to be handled effectively otherwise it may contaminate the water and soil around it. Political Nuclear technology has led to an arms race between the nation, threatening the peace. Eg. India and Pakistan arms race, USA and USSR in cold war era etc. There is the issue of nuclear proliferation. Eg. North Korea has acquired nuclear weapon technology. Further, there is also risk of terrorist organization possessing such weapon technology. Every technology has its associated risks and rewards. It is up to us how we utilize them to extract maximum benefit without threatening world peace and the environment.
47,406
संयुक्त व्यापक कार्य योजना(JCPOA) से आप क्या समझते हैं ? अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों की चर्चा करते हुए विश्व और भारत पर इसका संभावित प्रभाव स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) What do you understand by the Joint Comprehensive Plan OfAction (JCPOA)?By referring to the reasons for America"s exit, explain its possible impact on the world and India. (150 to 200 words/10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में JCPOA के बारे में प्रमुख सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम खंड में अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों कि चर्चा कीजिये 3- द्वितीय खंड में विश्व और भारत पर इसके संभावित प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में इस सन्दर्भ में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| ईरान की इस्लामिक क्रान्ति के पूर्व ईरान के तेल क्षेत्रों पर पश्चिमी शक्तियों का वर्चस्व था | पश्चिमी हितों को बनाए रखने के लिए 1967 से ईरान को US के माध्यम से एटम फॉर पीस के रूप में सहायता प्राप्त हो रही थी1979 में ईरानी क्रान्ति के कारण यह सहयोग रोक दिया गया| 1984 में ईरान, ईराक युद्ध के कारण इरान के समक्ष सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, अतः ईरान द्वारा परमाणु बम का विकास शुरूकिया गया| 1992 में नाभिकीय कार्यक्रम रोकने के लिए ईरान को CIA द्वारा वार्निंग दी गयी और इसके बाद 2002 से 2015 तक US ने ईरान पर प्रतिबन्ध आरोपित कर रखे थे| 2015 में P5+1 के साथ ईरान का नाभिकीय समझौता(संयुक्त व्यापक कार्य योजना/JCPOA) और 2016 में ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया| 2017 में इस समझौते से US निकल गया, इसके बाद ईरान-US में तनाव बढ़ता गया| JCPOA क्या है · संयुक्त व्यापक कार्य योजना 2015 में P5+1( सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्य एवं जर्मनी) के साथ ईरान का नाभिकीय समझौता है · इस मुख्य बिंदु यह था कि US द्वारा प्रतिबन्ध हटाने पर इरान परमाणु हथियारों का विकास नही करेगा · ईरान युरेनियम को 3 % से अधिक संवर्धित नहीं करेगा और सेंट्रीफ्यूज की संख्या करनी पड़ेगी तथा प्लूटोनियम का संवर्धन कम करना होगाइसकी निगरानी IAEA द्वारा की जायेगी, ईरान ने इन शर्तों को अपनी स्वीकृति दी थी · इस समझौते में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम के बारे में कोई भी शर्त नहीं रखी गयी थी JCPOA से अमेरिका की निकासी · ईरान के मिसाइल प्रोग्राम के कारण अमेरिका ने इस समझौते से निकासी की घोषणा की है · ट्रम्प के अनुसार IAEA इरान पर निगरानी रखने में प्रयाप्त रूप से सक्षम नहीं है · इजराइल द्वारा प्रारम्भ से ही JCPOA का विरोध किया जा रहा था और सऊदी अरब द्वारा अमेरिका की निकासी का समर्थन किया गया है अर्थात अमेरिका अपनी निकासी के माध्यम से इन्ही दोनों देशों के हितों को साधने का प्रयास कर रहा है · ध्यातव्य है कि अमेरिका के अतिरिक्त संधि (JCPOA)के अन्य सभी पक्षकारों द्वारा ईरान का समर्थन| ईरान द्वारा प्रतिबंधों के आरोपण की स्थिति में नाभिकीय कार्यक्रम आगे बढाने की धमकी दी गयी है| इसके विश्व और भारत पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है विश्व पर प्रभाव · इससे विश्व पर नाभिकीय संकट बढ़ा है · ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होगा · संकट गहराने से युद्ध की स्थिति उत्पन्न होगी जिससे तेल के दाम बढ़ेंगे और ऊर्जा प्रेरित अर्थव्यवस्थाओं का विकास बाधित होगा · ईरान की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडेगा अतः ईरान में अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे पश्चिम एशिया कि स्थिति और बिगड़ेगी · इससे रूस, चीन के साथ अमेरिका के सम्बन्ध और बिगड़ेंगेऔर नवशीत युद्ध की संभावना बन सकती है · US के मित्र राष्ट्रों के साथ US के सम्बन्ध बिगड़ेंगे क्योंकि संधि के शेष देश संधि की शर्तों के पक्ष में हैं भारत पर प्रभाव · भारत के लिए ईरान तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता राष्ट्र है, अतः भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है · ईरान के साथ सम्बन्ध बिगड़ने से अफगानिस्तान पर भारतीय प्रभाव कम होगा · ईरान में अस्थिरता उत्पन्न होने पर भारत को अपना निवेश कम करना होगा इससे भारत को चाबहार के माध्यम से प्राप्त सामरिक बढ़त प्रभावित होगी · भारत के समक्ष सऊदी अरब, इजराइल एवं इरान के मध्य संतुलन स्थापना की समस्या · यहाँ एक संभावित युद्ध की स्थिति उत्पन होगी जिससे भारतीय हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि JCPOA से US का निकलना और ईरान पर US द्वारा प्रतिबंधों का आरोपण विश्व और भारत को अनेक दृष्टियों से प्रभावित करेगा| इसका प्रभाव नकारात्मक ही होगा| अतः भारत को स्मार्ट कूटनीति का सहारा लेना चाहिए वहीँ US को एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के कारण ऐसे समझौतों की शर्तों और मानक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए ताकि विश्व को एक नए संकट से बचाया जा सके|
##Question:संयुक्त व्यापक कार्य योजना(JCPOA) से आप क्या समझते हैं ? अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों की चर्चा करते हुए विश्व और भारत पर इसका संभावित प्रभाव स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) What do you understand by the Joint Comprehensive Plan OfAction (JCPOA)?By referring to the reasons for America"s exit, explain its possible impact on the world and India. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में JCPOA के बारे में प्रमुख सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम खंड में अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों कि चर्चा कीजिये 3- द्वितीय खंड में विश्व और भारत पर इसके संभावित प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में इस सन्दर्भ में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| ईरान की इस्लामिक क्रान्ति के पूर्व ईरान के तेल क्षेत्रों पर पश्चिमी शक्तियों का वर्चस्व था | पश्चिमी हितों को बनाए रखने के लिए 1967 से ईरान को US के माध्यम से एटम फॉर पीस के रूप में सहायता प्राप्त हो रही थी1979 में ईरानी क्रान्ति के कारण यह सहयोग रोक दिया गया| 1984 में ईरान, ईराक युद्ध के कारण इरान के समक्ष सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, अतः ईरान द्वारा परमाणु बम का विकास शुरूकिया गया| 1992 में नाभिकीय कार्यक्रम रोकने के लिए ईरान को CIA द्वारा वार्निंग दी गयी और इसके बाद 2002 से 2015 तक US ने ईरान पर प्रतिबन्ध आरोपित कर रखे थे| 2015 में P5+1 के साथ ईरान का नाभिकीय समझौता(संयुक्त व्यापक कार्य योजना/JCPOA) और 2016 में ईरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया| 2017 में इस समझौते से US निकल गया, इसके बाद ईरान-US में तनाव बढ़ता गया| JCPOA क्या है · संयुक्त व्यापक कार्य योजना 2015 में P5+1( सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्य एवं जर्मनी) के साथ ईरान का नाभिकीय समझौता है · इस मुख्य बिंदु यह था कि US द्वारा प्रतिबन्ध हटाने पर इरान परमाणु हथियारों का विकास नही करेगा · ईरान युरेनियम को 3 % से अधिक संवर्धित नहीं करेगा और सेंट्रीफ्यूज की संख्या करनी पड़ेगी तथा प्लूटोनियम का संवर्धन कम करना होगाइसकी निगरानी IAEA द्वारा की जायेगी, ईरान ने इन शर्तों को अपनी स्वीकृति दी थी · इस समझौते में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम के बारे में कोई भी शर्त नहीं रखी गयी थी JCPOA से अमेरिका की निकासी · ईरान के मिसाइल प्रोग्राम के कारण अमेरिका ने इस समझौते से निकासी की घोषणा की है · ट्रम्प के अनुसार IAEA इरान पर निगरानी रखने में प्रयाप्त रूप से सक्षम नहीं है · इजराइल द्वारा प्रारम्भ से ही JCPOA का विरोध किया जा रहा था और सऊदी अरब द्वारा अमेरिका की निकासी का समर्थन किया गया है अर्थात अमेरिका अपनी निकासी के माध्यम से इन्ही दोनों देशों के हितों को साधने का प्रयास कर रहा है · ध्यातव्य है कि अमेरिका के अतिरिक्त संधि (JCPOA)के अन्य सभी पक्षकारों द्वारा ईरान का समर्थन| ईरान द्वारा प्रतिबंधों के आरोपण की स्थिति में नाभिकीय कार्यक्रम आगे बढाने की धमकी दी गयी है| इसके विश्व और भारत पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है विश्व पर प्रभाव · इससे विश्व पर नाभिकीय संकट बढ़ा है · ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होगा · संकट गहराने से युद्ध की स्थिति उत्पन्न होगी जिससे तेल के दाम बढ़ेंगे और ऊर्जा प्रेरित अर्थव्यवस्थाओं का विकास बाधित होगा · ईरान की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडेगा अतः ईरान में अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे पश्चिम एशिया कि स्थिति और बिगड़ेगी · इससे रूस, चीन के साथ अमेरिका के सम्बन्ध और बिगड़ेंगेऔर नवशीत युद्ध की संभावना बन सकती है · US के मित्र राष्ट्रों के साथ US के सम्बन्ध बिगड़ेंगे क्योंकि संधि के शेष देश संधि की शर्तों के पक्ष में हैं भारत पर प्रभाव · भारत के लिए ईरान तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता राष्ट्र है, अतः भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है · ईरान के साथ सम्बन्ध बिगड़ने से अफगानिस्तान पर भारतीय प्रभाव कम होगा · ईरान में अस्थिरता उत्पन्न होने पर भारत को अपना निवेश कम करना होगा इससे भारत को चाबहार के माध्यम से प्राप्त सामरिक बढ़त प्रभावित होगी · भारत के समक्ष सऊदी अरब, इजराइल एवं इरान के मध्य संतुलन स्थापना की समस्या · यहाँ एक संभावित युद्ध की स्थिति उत्पन होगी जिससे भारतीय हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि JCPOA से US का निकलना और ईरान पर US द्वारा प्रतिबंधों का आरोपण विश्व और भारत को अनेक दृष्टियों से प्रभावित करेगा| इसका प्रभाव नकारात्मक ही होगा| अतः भारत को स्मार्ट कूटनीति का सहारा लेना चाहिए वहीँ US को एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के कारण ऐसे समझौतों की शर्तों और मानक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए ताकि विश्व को एक नए संकट से बचाया जा सके|
47,418
संयुक्त व्यापक कार्य योजना(JCPOA) से आप क्या समझते हैं ? अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों की चर्चा करते हुए विश्व और भारत पर इसका संभावित प्रभाव स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by the Joint Comprehensive Plan OfAction (JCPOA)? By referring to the reasons for America"s exit, explain its impact on the world and India. (150 to 200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में JCPOA के बारे में प्रमुख सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम खंड में अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों कि चर्चा कीजिये 3- द्वितीय खंड में विश्व और भारत पर इसके संभावित प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में इस सन्दर्भ में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| इरान की इस्लामिक क्रान्ति के पूर्व ईरान के तेल क्षेत्रों पर पश्चिमी शक्तियों का वर्चस्व था | पश्चिमी हितों को बनाए रखने के लिए 1967 से ईरान को US के माध्यम से एटम फॉर पीस के रूप में सहायता प्राप्त हो रही थी1979 में ईरानी क्रान्ति के कारण यह सहयोग रोक दिया गया| 1984 में ईरान ईराक युद्ध के कारण इरान के समक्ष सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, अतः ईरान द्वारा परमाणु बम का विकास शुरूकिया गया| 1992 में नाभिकीय कार्यक्रम रोकने के लिए इरान को CIA द्वारा वार्निंग दी गयी और इसके बाद 2002 से 2015 तक US ने ईरान पर प्रतिबन्ध आरोपित कर रखे थे| 2015 में P5+1 के साथ इरान का नाभिकीय समझौता(संयुक्त व्यापक कार्य योजना/JCPOA) और 2016 में इरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया| 2017 में इस समझौते से US निकल गया, इसके बाद इरान-US में तनाव बढ़ता गया| JCPOA क्या है · संयुक्त व्यापक कार्य योजना 2015 में P5+1( सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्य एवं जर्मनी) के साथ इरान का नाभिकीय समझौता है · इस मुख्य बिंदु यह था कि US द्वारा प्रतिबन्ध हटाने पर इरान परमाणु हथियारों का विकास नही करेगा · इरान युरेनियम को 3 % से अधिक संवर्धित नहीं करेगा और सेंट्रीफ्यूज की संख्या करनी पड़ेगी तथा प्लूटोनियम का संवर्धन कम करना होगाइसकी निगरानी IAEA द्वारा की जायेगी, इरान ने इन शर्तों को अपनी स्वीकृति दी थी · इस समझौते में इरान के मिसाइल कार्यक्रम के बारे में कोई भी शर्त नहीं रखी गयी थी JCPOA से अमेरिका की निकासी · इरान के मिसाइल प्रोग्राम के कारण अमेरिका ने इस समझौते से निकासी की घोषणा की है · ट्रम्प के अनुसार IAEA इरान पर निगरानी रखने में प्रयाप्त रूप से सक्षम नहीं है · इजराइल द्वारा प्रारम्भ से ही JCPOA का विरोध किया जा रहा था और सऊदी अरब द्वारा अमेरिका की निकासी का समर्थन किया गया है अर्थात अमेरिका अपनी निकासी के माध्यम से इन्ही दोनों देशों के हितों को साधने का प्रयास कर रहा है · ध्यातव्य है कि अमेरिका के अतिरिक्त संधि (JCPOA)के अन्य सभी पक्षकारों द्वारा ईरान का समर्थन| ईरान द्वारा प्रतिबंधों के आरोपण की स्थिति में नाभिकीय कार्यक्रम आगे बढाने की धमकी दी गयी है| इसके विश्व और भारत पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है विश्व पर प्रभाव · इससे विश्व पर नाभिकीय संकट बढ़ा है · ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होगा · संकट गहराने से युद्ध की स्थिति उत्पन्न होगी जिससे तेल के दाम बढ़ेंगे और ऊर्जा प्रेरित अर्थव्यवस्थाओं का विकास बाधित होगा · इरान की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडेगा अतः ईरान में अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे पश्चिम एशिया कि स्थिति और बिगड़ेगी · इससे रूस चीन के साथ अमेरिका के सम्बन्ध और बिगड़ेंगेऔर नवशीत युद्ध की संभावना बन सकती है · US के मित्र राष्ट्रों के साथ US के सम्बन्ध बिगड़ेंगे क्योंकि संधि के शेष देश संधि की शर्तों के पक्ष में हैं भारत पर प्रभाव · भारत के लिए इरान तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता राष्ट्र है, अतः भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है · इरान के साथ सम्बन्ध बिगड़ने से अफगानिस्तान पर भारतीय प्रभाव कम होगा · इरान में अस्थिरता उत्पन्न होने पर भारत को अपना निवेश कम करना होगा इससे भारत को चाबहार के माध्यम से प्राप्त सामरिक बढ़त प्रभावित होगी · भारत के समक्ष सऊदी अरब, इजराइल एवं इरान के मध्य संतुलन स्थापना की समस्या · यहाँ एक संभावित युद्ध की स्थिति उत्पन होगी जिससे भारतीय हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि JCPOA से US का निकलना और इरान पर US द्वारा प्रतिबंधों का आरोपण विश्व और भारत को अनेक दृष्टियों से प्रभावित करेगा| इसका प्रभाव नकारात्मक ही होगा| अतः भारत को स्मार्ट कूटनीति का सहारा लेना चाहिए वहीँ US को एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के कारण ऐसे समझौतों की शर्तों और मानक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए ताकि विश्व को एक नए संकट से बचाया जा सके|
##Question:संयुक्त व्यापक कार्य योजना(JCPOA) से आप क्या समझते हैं ? अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों की चर्चा करते हुए विश्व और भारत पर इसका संभावित प्रभाव स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by the Joint Comprehensive Plan OfAction (JCPOA)? By referring to the reasons for America"s exit, explain its impact on the world and India. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में JCPOA के बारे में प्रमुख सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम खंड में अमेरिका के इससे बाहर हटने के कारणों कि चर्चा कीजिये 3- द्वितीय खंड में विश्व और भारत पर इसके संभावित प्रभावों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में इस सन्दर्भ में कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| इरान की इस्लामिक क्रान्ति के पूर्व ईरान के तेल क्षेत्रों पर पश्चिमी शक्तियों का वर्चस्व था | पश्चिमी हितों को बनाए रखने के लिए 1967 से ईरान को US के माध्यम से एटम फॉर पीस के रूप में सहायता प्राप्त हो रही थी1979 में ईरानी क्रान्ति के कारण यह सहयोग रोक दिया गया| 1984 में ईरान ईराक युद्ध के कारण इरान के समक्ष सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, अतः ईरान द्वारा परमाणु बम का विकास शुरूकिया गया| 1992 में नाभिकीय कार्यक्रम रोकने के लिए इरान को CIA द्वारा वार्निंग दी गयी और इसके बाद 2002 से 2015 तक US ने ईरान पर प्रतिबन्ध आरोपित कर रखे थे| 2015 में P5+1 के साथ इरान का नाभिकीय समझौता(संयुक्त व्यापक कार्य योजना/JCPOA) और 2016 में इरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया| 2017 में इस समझौते से US निकल गया, इसके बाद इरान-US में तनाव बढ़ता गया| JCPOA क्या है · संयुक्त व्यापक कार्य योजना 2015 में P5+1( सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्य एवं जर्मनी) के साथ इरान का नाभिकीय समझौता है · इस मुख्य बिंदु यह था कि US द्वारा प्रतिबन्ध हटाने पर इरान परमाणु हथियारों का विकास नही करेगा · इरान युरेनियम को 3 % से अधिक संवर्धित नहीं करेगा और सेंट्रीफ्यूज की संख्या करनी पड़ेगी तथा प्लूटोनियम का संवर्धन कम करना होगाइसकी निगरानी IAEA द्वारा की जायेगी, इरान ने इन शर्तों को अपनी स्वीकृति दी थी · इस समझौते में इरान के मिसाइल कार्यक्रम के बारे में कोई भी शर्त नहीं रखी गयी थी JCPOA से अमेरिका की निकासी · इरान के मिसाइल प्रोग्राम के कारण अमेरिका ने इस समझौते से निकासी की घोषणा की है · ट्रम्प के अनुसार IAEA इरान पर निगरानी रखने में प्रयाप्त रूप से सक्षम नहीं है · इजराइल द्वारा प्रारम्भ से ही JCPOA का विरोध किया जा रहा था और सऊदी अरब द्वारा अमेरिका की निकासी का समर्थन किया गया है अर्थात अमेरिका अपनी निकासी के माध्यम से इन्ही दोनों देशों के हितों को साधने का प्रयास कर रहा है · ध्यातव्य है कि अमेरिका के अतिरिक्त संधि (JCPOA)के अन्य सभी पक्षकारों द्वारा ईरान का समर्थन| ईरान द्वारा प्रतिबंधों के आरोपण की स्थिति में नाभिकीय कार्यक्रम आगे बढाने की धमकी दी गयी है| इसके विश्व और भारत पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है विश्व पर प्रभाव · इससे विश्व पर नाभिकीय संकट बढ़ा है · ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होगा · संकट गहराने से युद्ध की स्थिति उत्पन्न होगी जिससे तेल के दाम बढ़ेंगे और ऊर्जा प्रेरित अर्थव्यवस्थाओं का विकास बाधित होगा · इरान की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पडेगा अतः ईरान में अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे पश्चिम एशिया कि स्थिति और बिगड़ेगी · इससे रूस चीन के साथ अमेरिका के सम्बन्ध और बिगड़ेंगेऔर नवशीत युद्ध की संभावना बन सकती है · US के मित्र राष्ट्रों के साथ US के सम्बन्ध बिगड़ेंगे क्योंकि संधि के शेष देश संधि की शर्तों के पक्ष में हैं भारत पर प्रभाव · भारत के लिए इरान तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता राष्ट्र है, अतः भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है · इरान के साथ सम्बन्ध बिगड़ने से अफगानिस्तान पर भारतीय प्रभाव कम होगा · इरान में अस्थिरता उत्पन्न होने पर भारत को अपना निवेश कम करना होगा इससे भारत को चाबहार के माध्यम से प्राप्त सामरिक बढ़त प्रभावित होगी · भारत के समक्ष सऊदी अरब, इजराइल एवं इरान के मध्य संतुलन स्थापना की समस्या · यहाँ एक संभावित युद्ध की स्थिति उत्पन होगी जिससे भारतीय हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड सकता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि JCPOA से US का निकलना और इरान पर US द्वारा प्रतिबंधों का आरोपण विश्व और भारत को अनेक दृष्टियों से प्रभावित करेगा| इसका प्रभाव नकारात्मक ही होगा| अतः भारत को स्मार्ट कूटनीति का सहारा लेना चाहिए वहीँ US को एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के कारण ऐसे समझौतों की शर्तों और मानक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए ताकि विश्व को एक नए संकट से बचाया जा सके|
47,419
वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शामिल विभिन्न अधिकारों का उल्लेख कीजिए। ऐसा तर्क क्यों दिया जाता है कि यह स्वतन्त्रता पूर्ण नहीं है? (150-200 शब्द, 10 अंक) Mention different rights under freedom of expression and speech. Why is it argued that this freedom is not absolute? (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच:- भूमिका में अनुच्छेद 19 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में शामिल विभिन्न अधिकारों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद उन आधारों के बारे में बताएं जिसके आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अंत में संक्षेप मेंनिष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- स्वतन्त्रता के अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1) में वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को शामिल किया गया है। यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इसके अंतर्गत कई अधिकार शामिल हैं: अपने या किसी अन्य के विचारों को प्रसारित करने का अधिकार। प्रेस की स्वतन्त्रता व्यावसायिक विज्ञापन की स्वतन्त्रता फोन टैपिंग के विरुद्ध अधिकार सरकारी गतिविधियों की जानकारी का अधिकार प्रदर्शन के विरुद्ध अधिकार शांति का अधिकार प्रसारित करने का अधिकार गौरतलब है कि प्रत्येक नागरिक को राज्य के विरुद्ध यह अधिकार प्राप्त है परंतु यह स्वंतंत्रता पूर्ण नहीं है। राज्य इस स्वतन्त्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। संविधान ने राज्य को यह शक्ति दी है कि वह समुदाय के व्यापक हितों की दृष्टि से आवश्यक युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है। इसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: इस अधिकार के तहत यह स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती कि कोई न्यायालय की अवमानना करे। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब वाह्य दबाव से मुक्त रहे। संविधान ने राष्ट्र की एकता और अखंडता के आधार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध आरोपित किए हैं। वाक एवं अभिव्यक्ति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि सुरक्षा, एकता और अखंडता को धूमिल करे। वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से व्यक्ति को यह अनुज्ञा नहीं मिलती है है कि वह अवैध या अनैतिक कार्य करे। इसमें राज्य के खिलाफ विद्रोह और भ्रष्टाचार, महिलाओं के साथ भेदभाव आदि पर भी प्रतिबंध है। इन अधिकारों को पूर्ण न स्वीकार करने का एक आधार यह भी है कि विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बना रहे। मीडिया, लेख आदि के माध्यम से विदेशी नीतियों की आलोचना की जा सकती है परंतु मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों में किसी प्रकार की बाधा आने पर इसका विनियमन किया जा सकता है। वाक एवं अभिव्यक्ति के माध्यम से किसी को भड़काने, अस्थरिता पैदा करने जिससे राज्य, संस्था, व्यक्ति की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो तब भी इस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तहत नागरिकों को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं जो किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि इन अधिकारों का दुरुपयोग रोकने के लिए उचित प्रावधान किए गए हैं। कोई व्यक्ति अपने भाषण के अधिकार का प्रयोग इस तरह नहीं कर सकता कि उससे किसी अन्य व्यक्ति के किसी ऐसे ही अधिकार का अतिक्रमण हो।
##Question:वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शामिल विभिन्न अधिकारों का उल्लेख कीजिए। ऐसा तर्क क्यों दिया जाता है कि यह स्वतन्त्रता पूर्ण नहीं है? (150-200 शब्द, 10 अंक) Mention different rights under freedom of expression and speech. Why is it argued that this freedom is not absolute? (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में अनुच्छेद 19 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में शामिल विभिन्न अधिकारों का उल्लेख कीजिए। इसके बाद उन आधारों के बारे में बताएं जिसके आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अंत में संक्षेप मेंनिष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- स्वतन्त्रता के अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1) में वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को शामिल किया गया है। यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इसके अंतर्गत कई अधिकार शामिल हैं: अपने या किसी अन्य के विचारों को प्रसारित करने का अधिकार। प्रेस की स्वतन्त्रता व्यावसायिक विज्ञापन की स्वतन्त्रता फोन टैपिंग के विरुद्ध अधिकार सरकारी गतिविधियों की जानकारी का अधिकार प्रदर्शन के विरुद्ध अधिकार शांति का अधिकार प्रसारित करने का अधिकार गौरतलब है कि प्रत्येक नागरिक को राज्य के विरुद्ध यह अधिकार प्राप्त है परंतु यह स्वंतंत्रता पूर्ण नहीं है। राज्य इस स्वतन्त्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। संविधान ने राज्य को यह शक्ति दी है कि वह समुदाय के व्यापक हितों की दृष्टि से आवश्यक युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है। इसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: इस अधिकार के तहत यह स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती कि कोई न्यायालय की अवमानना करे। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब वाह्य दबाव से मुक्त रहे। संविधान ने राष्ट्र की एकता और अखंडता के आधार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध आरोपित किए हैं। वाक एवं अभिव्यक्ति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि सुरक्षा, एकता और अखंडता को धूमिल करे। वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से व्यक्ति को यह अनुज्ञा नहीं मिलती है है कि वह अवैध या अनैतिक कार्य करे। इसमें राज्य के खिलाफ विद्रोह और भ्रष्टाचार, महिलाओं के साथ भेदभाव आदि पर भी प्रतिबंध है। इन अधिकारों को पूर्ण न स्वीकार करने का एक आधार यह भी है कि विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बना रहे। मीडिया, लेख आदि के माध्यम से विदेशी नीतियों की आलोचना की जा सकती है परंतु मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों में किसी प्रकार की बाधा आने पर इसका विनियमन किया जा सकता है। वाक एवं अभिव्यक्ति के माध्यम से किसी को भड़काने, अस्थरिता पैदा करने जिससे राज्य, संस्था, व्यक्ति की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो तब भी इस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तहत नागरिकों को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं जो किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि इन अधिकारों का दुरुपयोग रोकने के लिए उचित प्रावधान किए गए हैं। कोई व्यक्ति अपने भाषण के अधिकार का प्रयोग इस तरह नहीं कर सकता कि उससे किसी अन्य व्यक्ति के किसी ऐसे ही अधिकार का अतिक्रमण हो।
47,422