Question
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राष्ट्रीय सुरक्षा से आप क्या समझते हैं? साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द, अंक -10 ) What do you understand by National Security? Also, Describe various Principles of National Security. (150-200 Words, Marks - 10 )
एप्रोच- राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित करते हुए तथा भारत के संदर्भ में इसे जोड़ते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए| निष्कर्षतः, भारत द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए तथा इस संदर्भ में, सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- अबतक संजोए गए मूल्यों की सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है| किसी राष्ट्र के आधुनिक स्वरुप में आने में सैकड़ों वर्षों का समय लगता है जिसमें वह विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों से गुजरता है| इस विकास प्रक्रिया में वह निरंतर नए-नए सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों को समाहित करते जाता है| साथ ही, अपने ऐतिहासिक मूल्यों तथा विरासत को भी निरंतर रूप से आने वाली पीढ़ियों को देने हेतु संजोकर रखता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत बाह्य सुरक्षा तथा आतंरिक परिस्थितियों से सुरक्षा को रखा जा सकता है| भारत केविशेषसंदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों को हम निन्न बिन्दुओं से समझ सकते हैं- बाह्य सुरक्षा वैश्विक परिस्थितियों से सुरक्षा; परिधीय परिस्थितियों से सुरक्षा-सीमा प्रबंधन; जातीय समस्या; शरणार्थी समस्या; छोटे पड़ोसी राज्यों का भारत के प्रति दृष्टिकोण; आतंरिक सुरक्षा आतंकवाद -आतंरिक आतंकवाद; जम्मू & कश्मीर में आतंकवाद; उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद; नक्सलवाद; प्रतिक्रियावादी आतंकवाद; अपराध - संगठित अपराध; तस्करी; मनी-लॉन्डरिंग; काला धन; विकास बनाम उग्रवाद; संचार नेटवर्क तथा उससे जुड़े खतरे; क्षेत्रीय सुरक्षा -आक्रामक सुरक्षा बनाम सुरक्षात्मक स्थिति; सामूहिक सुरक्षा उपरोक्त आयामों के संदर्भ में भारत द्वारा उठाए गए विभिन्न क़दमों को हम राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत रख सकते हैं| राष्ट्रीयसुरक्षा का राष्ट्रीय हित से काफी नजदीकी रिश्ता है| राष्ट्रीय हित के अंतर्गत किसी भी संप्रभुसंपन्न राष्ट्र की वे अभिलाषाएं रखी जा सकती हैं जिन्हें वह किसी अन्य राष्ट्र के सापेक्ष में प्राप्त करना चाहता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांत- यथार्थवादी - इस सिद्धांत के मूल में निम्न अवधारणा है- मानव स्वभाव मूलतः आक्रामक, ईर्ष्यालु, और महत्वाकांक्षी होता है| ऐसी स्थिति में वो विस्तार करना चाहता है जिसके लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करे और तत्पश्चात अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करे|यथार्थवादी सिद्धांत को भी हम दो भागों में बाँट सकते हैं- सुरक्षात्मक यथार्थवाद- इसके अनुसार कोई राष्ट्र केवल उतनी ही सुरक्षा-शक्ति प्राप्त करना चाहेगा जिससे वह अपनी सुरक्षा कर सके| शक्ति साध्य भी हो सकती है तथा साधन भी | कमजोर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य होती है तथा उसी के अनुरूप वह अपने राष्ट्रीयसुरक्षा के विभिन्न उपायों को अपनाता है| आक्रामक यथार्थवादी-ताकतवर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य ना होकर साधन होती है |अमेरिका के लिए शक्ति साधन है तथा उस शक्ति का प्रयोग करके वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा मिसाइल कवच से सुनिश्चित करने के बाद दुनिया मेंअपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है| 2000 के बाद अपनी रणनीति को बदलकर उसने संघर्षरत राष्ट्रों के मध्य हस्तक्षेप किया जैसे- ईराक पर आक्रमण| हाइड्रोकार्बन पर आधिपत्य को लेकर; व्यापार तथा दोहन को लेकर उसने मध्य एशिया में तथा अफगानिस्तान में प्रवेश किया| इसी के अनुरूप उसने राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु सिद्धांतों को बनाया| वहीँ दूसरे आयाम के रूप में हम उत्तर कोरिया को देख सकते हैं| हाइड्रोजन बम होने के बावजूद भी आर्थिक तथा सामरिक रूप से कमजोरहोने से विश्व के राष्ट्रों पर उसका कोई खास प्रभाव नहीं है| आदर्शवादी/उदारवादी- इसमेंसुरक्षा को मजबूत करने के लिए मानवीय मूल्यों पर बलदिया जाता है इसमें ऐसे नियमों को प्रोत्साहन दिया जाता है जिससे आपसी संघर्ष ही उत्पन ना हो| इसमें संयुक्त राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के आयाम ढूंढे जाते हैं ताकि राष्ट्रों के मध्य संघर्ष नहीं हो ताकि सभी राष्ट्रों का फोकस सामाजिक तथा आर्थिक विकास की ओर हो| इसमें ऐसी संरचनाएं विकसित करने पर जोर दिया जाता है जिससे पूरी दुनिया के राष्ट्र नियमित तौर पर आपसी सौहाद्र को बढ़ावा दे सकें| इसमें वैश्विक संरचना, नियमों, मूल्यों, और मान्यताओं के विकास को प्रोत्साहित किया जाता है जिससे राष्ट्रीय संघर्षों को कमजोर किया जा सके| शुरुआत में भारत की नीतियाँ भी आदर्शवादी सिद्धांतों को ज्यादा बढ़ावा देती थी जिसके उदाहरण के रूप में हम निम्न आयामों को देख सकते हैं- कश्मीर मामलों पर फॉरवर्ड पोजीशन में रहते हुए भी उसे संयुक्तराष्ट्र ले जाना; तिब्बत पर चीन के रुख को देखते हुए भी चीन के साथ पंचशील का सिद्धांत; पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के बावजूद भी सिंधु जल समझौता जैस उदारवादी कदम आदि| नारीवादी - आधुनिक समय के इस दृष्टिकोण के अनुसार महिलाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में ज्यादा महत्व दिया गया है| राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों में महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष बराबरी का दर्जा देना इस सिद्धांत का मूल है| आलोचनात्मक सिद्धांत ; मानवीय सिद्धांत - राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मानवीय मूल्यों पर भी उतना ही जोर देना; पर्यावरण - आज जलवायु परिवर्तन तथा वैश्विक तापन के इस दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरण के विभिन्न आयामों का भी महत्वपूर्ण स्थान हो गया है| इस दिशा में यूरोपीय देश काफी आगे हैं जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरणीय मूल्यों तथा उसके संरक्षण को भी एक मानक के तौर पर मान्यता दी जाती है| हीट-स्ट्रेस सिद्धांत ; कोई भी राष्ट्र अपनी आतंरिक तथा बाह्य परिस्थितियों के अनुसार उपरोक्त में से कोई/एक से ज्यादा सिद्धांत अपनाता है| भारत द्वारा भी विभिन्न समय में अलग-अलग सिद्धांतों को अपनाया गया है| भारत को शीतयुद्ध के दौर में महाशक्तियों द्वारा अपने पाले में लाने का प्रयास किया गया था| साथ ही,भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा भी आरंभिक तौर पर महाशक्तियों के द्वारा प्रभावित की गयी थी|
##Question:राष्ट्रीय सुरक्षा से आप क्या समझते हैं? साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द, अंक -10 ) What do you understand by National Security? Also, Describe various Principles of National Security. (150-200 Words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच- राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित करते हुए तथा भारत के संदर्भ में इसे जोड़ते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| अगले भाग में, राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए| निष्कर्षतः, भारत द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए तथा इस संदर्भ में, सुझाव देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- अबतक संजोए गए मूल्यों की सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है| किसी राष्ट्र के आधुनिक स्वरुप में आने में सैकड़ों वर्षों का समय लगता है जिसमें वह विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों से गुजरता है| इस विकास प्रक्रिया में वह निरंतर नए-नए सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों को समाहित करते जाता है| साथ ही, अपने ऐतिहासिक मूल्यों तथा विरासत को भी निरंतर रूप से आने वाली पीढ़ियों को देने हेतु संजोकर रखता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत बाह्य सुरक्षा तथा आतंरिक परिस्थितियों से सुरक्षा को रखा जा सकता है| भारत केविशेषसंदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों को हम निन्न बिन्दुओं से समझ सकते हैं- बाह्य सुरक्षा वैश्विक परिस्थितियों से सुरक्षा; परिधीय परिस्थितियों से सुरक्षा-सीमा प्रबंधन; जातीय समस्या; शरणार्थी समस्या; छोटे पड़ोसी राज्यों का भारत के प्रति दृष्टिकोण; आतंरिक सुरक्षा आतंकवाद -आतंरिक आतंकवाद; जम्मू & कश्मीर में आतंकवाद; उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद; नक्सलवाद; प्रतिक्रियावादी आतंकवाद; अपराध - संगठित अपराध; तस्करी; मनी-लॉन्डरिंग; काला धन; विकास बनाम उग्रवाद; संचार नेटवर्क तथा उससे जुड़े खतरे; क्षेत्रीय सुरक्षा -आक्रामक सुरक्षा बनाम सुरक्षात्मक स्थिति; सामूहिक सुरक्षा उपरोक्त आयामों के संदर्भ में भारत द्वारा उठाए गए विभिन्न क़दमों को हम राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत रख सकते हैं| राष्ट्रीयसुरक्षा का राष्ट्रीय हित से काफी नजदीकी रिश्ता है| राष्ट्रीय हित के अंतर्गत किसी भी संप्रभुसंपन्न राष्ट्र की वे अभिलाषाएं रखी जा सकती हैं जिन्हें वह किसी अन्य राष्ट्र के सापेक्ष में प्राप्त करना चाहता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न सिद्धांत- यथार्थवादी - इस सिद्धांत के मूल में निम्न अवधारणा है- मानव स्वभाव मूलतः आक्रामक, ईर्ष्यालु, और महत्वाकांक्षी होता है| ऐसी स्थिति में वो विस्तार करना चाहता है जिसके लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करे और तत्पश्चात अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करे|यथार्थवादी सिद्धांत को भी हम दो भागों में बाँट सकते हैं- सुरक्षात्मक यथार्थवाद- इसके अनुसार कोई राष्ट्र केवल उतनी ही सुरक्षा-शक्ति प्राप्त करना चाहेगा जिससे वह अपनी सुरक्षा कर सके| शक्ति साध्य भी हो सकती है तथा साधन भी | कमजोर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य होती है तथा उसी के अनुरूप वह अपने राष्ट्रीयसुरक्षा के विभिन्न उपायों को अपनाता है| आक्रामक यथार्थवादी-ताकतवर राष्ट्रों के लिए शक्ति साध्य ना होकर साधन होती है |अमेरिका के लिए शक्ति साधन है तथा उस शक्ति का प्रयोग करके वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा मिसाइल कवच से सुनिश्चित करने के बाद दुनिया मेंअपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है| 2000 के बाद अपनी रणनीति को बदलकर उसने संघर्षरत राष्ट्रों के मध्य हस्तक्षेप किया जैसे- ईराक पर आक्रमण| हाइड्रोकार्बन पर आधिपत्य को लेकर; व्यापार तथा दोहन को लेकर उसने मध्य एशिया में तथा अफगानिस्तान में प्रवेश किया| इसी के अनुरूप उसने राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु सिद्धांतों को बनाया| वहीँ दूसरे आयाम के रूप में हम उत्तर कोरिया को देख सकते हैं| हाइड्रोजन बम होने के बावजूद भी आर्थिक तथा सामरिक रूप से कमजोरहोने से विश्व के राष्ट्रों पर उसका कोई खास प्रभाव नहीं है| आदर्शवादी/उदारवादी- इसमेंसुरक्षा को मजबूत करने के लिए मानवीय मूल्यों पर बलदिया जाता है इसमें ऐसे नियमों को प्रोत्साहन दिया जाता है जिससे आपसी संघर्ष ही उत्पन ना हो| इसमें संयुक्त राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के आयाम ढूंढे जाते हैं ताकि राष्ट्रों के मध्य संघर्ष नहीं हो ताकि सभी राष्ट्रों का फोकस सामाजिक तथा आर्थिक विकास की ओर हो| इसमें ऐसी संरचनाएं विकसित करने पर जोर दिया जाता है जिससे पूरी दुनिया के राष्ट्र नियमित तौर पर आपसी सौहाद्र को बढ़ावा दे सकें| इसमें वैश्विक संरचना, नियमों, मूल्यों, और मान्यताओं के विकास को प्रोत्साहित किया जाता है जिससे राष्ट्रीय संघर्षों को कमजोर किया जा सके| शुरुआत में भारत की नीतियाँ भी आदर्शवादी सिद्धांतों को ज्यादा बढ़ावा देती थी जिसके उदाहरण के रूप में हम निम्न आयामों को देख सकते हैं- कश्मीर मामलों पर फॉरवर्ड पोजीशन में रहते हुए भी उसे संयुक्तराष्ट्र ले जाना; तिब्बत पर चीन के रुख को देखते हुए भी चीन के साथ पंचशील का सिद्धांत; पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के बावजूद भी सिंधु जल समझौता जैस उदारवादी कदम आदि| नारीवादी - आधुनिक समय के इस दृष्टिकोण के अनुसार महिलाओं की भागीदारी को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में ज्यादा महत्व दिया गया है| राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न आयामों में महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष बराबरी का दर्जा देना इस सिद्धांत का मूल है| आलोचनात्मक सिद्धांत ; मानवीय सिद्धांत - राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मानवीय मूल्यों पर भी उतना ही जोर देना; पर्यावरण - आज जलवायु परिवर्तन तथा वैश्विक तापन के इस दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरण के विभिन्न आयामों का भी महत्वपूर्ण स्थान हो गया है| इस दिशा में यूरोपीय देश काफी आगे हैं जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को तय करते समय पर्यावरणीय मूल्यों तथा उसके संरक्षण को भी एक मानक के तौर पर मान्यता दी जाती है| हीट-स्ट्रेस सिद्धांत ; कोई भी राष्ट्र अपनी आतंरिक तथा बाह्य परिस्थितियों के अनुसार उपरोक्त में से कोई/एक से ज्यादा सिद्धांत अपनाता है| भारत द्वारा भी विभिन्न समय में अलग-अलग सिद्धांतों को अपनाया गया है| भारत को शीतयुद्ध के दौर में महाशक्तियों द्वारा अपने पाले में लाने का प्रयास किया गया था| साथ ही,भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा भी आरंभिक तौर पर महाशक्तियों के द्वारा प्रभावित की गयी थी|
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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही भारत में विदेशी निवेश के लिए उपलब्ध विभिन्न मार्गों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the concept of foreign direct investment (FDI) and foreign portfolio investment(FPI). Along with this, give details of various routes available for foreign investment in India. (150-200 words; 10 marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विदेशी निवेश के महत्व को लिखिए। उत्तर के पहले भाग में एफ़डीआई, एफ़पीआई के बारे में लिखिए। इसके पश्चात विदेशी निवेश के लिए उपलब्ध विभिन्न मार्गों का विवरण दीजिए। भारत जैसे देश में संसाधनों के कुशल उपयोग हेतु विदेशी निवेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल हमारे आयात से उत्पन्न असंतुलन को संतुलित करता है बल्कि आंतरिक रूप से पूंजी निर्माण के लिए आधार प्रदान करता है। भारत जैसे देश में आर्थिक संवृद्धि के लिए वस्तुओं और सेवाओं का वैश्विक विनिमय अति आवश्यक है। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई): किसी भी विदेशी व्यक्ति, संस्था द्वारा भारत में 10% से अधिक का इक्विटि निवेश एफ़डीआई के अंतर्गत शामिल होगा। एफ़डीआई किसी भी कंपनी, संगठन में स्वामित्व का अधिकार प्रदान करता है। इसके माध्यम से विदेशी कंपनियाँ भारत में अपनी सहायक कंपनियाँ भी स्थापित करती हैं। जिसमें स्वामित्व और संचालन संबंधी सम्पूर्ण अधिकार मूल कंपनी के पास आ जाता है। तीन प्रकार के निवेश शामिल किए जाते हैं: इक्विटि अंतर्वाह, पुनर्निवेश, अन्य पूंजी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश(एफ़पीआई): इसके अंतर्गत सेबी के तहत पंजीकृत मार्ग से आने वाला निवेश शामिल होता है। एडीआर और जीडीआर, एनआरआई के माध्यम से निवेश किया जाता है। NRIs के द्वारा एफ़पीआई में निवेश के संबंध में निम्नलिखित शर्ते हैं: भारतीय कंपनियों में एफ़पीआई के संबंध में दिये गए प्रतिबंधों के अनुसार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक निवेश योजना के अंतर्गत किसी एक कंपनी के अधिकतम 10% शेयर खरीद सकता है सारे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अधिकतम 24% शेयर खरीद सकते हैं। NRIs व्यक्तिगत रूप से 5% और सारे NRIs मिलकर 10% तक शेयर का क्रय कर सकते हैं। 10% की सीमा को बढ़ाया जा सकता है यदि कंपनी सामान्य वार्षिक बैठक में 75% से प्रस्ताव पारित करे। विदेशी निवेश के विभिन्न मार्ग: स्वचालित मार्ग: इसके माध्यम से जो विदेशी निवेश प्राप्त होता है उसके लिए सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है। विदेशी निवेशक को शेयर निर्गत होने के 30 दिन के भीतर आरबीआई की क्षेत्रीय शाखा को सूचित करना पड़ता है। सरकारी मार्ग: इस मार्ग से किए जाने वाले निवेश के अंतर्गत वित्त मंत्रालय द्वारा अनुमोदन के पश्चात एफ़डीआई प्रस्तावों पर विचार किया जाता है। वर्तमान में सुविधा पोर्टल बनाया गया है जिस पर निवेशक आवेदन आकर सकते हैं। ऐसे विदेशी निवेश जो उत्तर-पूर्वी भारत से संबन्धित होता है तथा भारत की सुरक्षा आदि को प्रभावित करने वाला है इसके लिए गृह मंत्रालय से अनुमति आवश्यक है।
##Question:प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही भारत में विदेशी निवेश के लिए उपलब्ध विभिन्न मार्गों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the concept of foreign direct investment (FDI) and foreign portfolio investment(FPI). Along with this, give details of various routes available for foreign investment in India. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विदेशी निवेश के महत्व को लिखिए। उत्तर के पहले भाग में एफ़डीआई, एफ़पीआई के बारे में लिखिए। इसके पश्चात विदेशी निवेश के लिए उपलब्ध विभिन्न मार्गों का विवरण दीजिए। भारत जैसे देश में संसाधनों के कुशल उपयोग हेतु विदेशी निवेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल हमारे आयात से उत्पन्न असंतुलन को संतुलित करता है बल्कि आंतरिक रूप से पूंजी निर्माण के लिए आधार प्रदान करता है। भारत जैसे देश में आर्थिक संवृद्धि के लिए वस्तुओं और सेवाओं का वैश्विक विनिमय अति आवश्यक है। विदेशों से पूंजी के प्रवाह का एक माध्यम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। इसके अंतर्गत विदेशी कम्पनी दूसरे देश में नयी कम्पनी विकसित करती हैं या अपनी सहायक कम्पनी खोलती है जिसमे दोनों ही, नियंत्रण और प्रबंधन कम्पनी का होता है। इसमें निवेशित पूंजी के प्रयोग पर निवेशक का नियंत्रण बना रहता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई): किसी भी विदेशी व्यक्ति, संस्था द्वारा भारत में 10% से अधिक का इक्विटि निवेश एफ़डीआई के अंतर्गत शामिल होगा। एफ़डीआई किसी भी कंपनी, संगठन में स्वामित्व का अधिकार प्रदान करता है। इसके माध्यम से विदेशी कंपनियाँ भारत में अपनी सहायक कंपनियाँ भी स्थापित करती हैं। जिसमें स्वामित्व और संचालन संबंधी सम्पूर्ण अधिकार मूल कंपनी के पास आ जाता है। तीन प्रकार के निवेश शामिल किए जाते हैं: इक्विटि अंतर्वाह, पुनर्निवेश, अन्य पूंजी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश(एफ़पीआई): इसके अंतर्गत सेबी के तहत पंजीकृत मार्ग से आने वाला निवेश शामिल होता है। एडीआर और जीडीआर, एनआरआई के माध्यम से निवेश किया जाता है। NRIs के द्वारा एफ़पीआई में निवेश के संबंध में निम्नलिखित शर्ते हैं: भारतीय कंपनियों में एफ़पीआई के संबंध में दिये गए प्रतिबंधों के अनुसार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक निवेश योजना के अंतर्गत किसी एक कंपनी के अधिकतम 10% शेयर खरीद सकता है सारे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अधिकतम 24% शेयर खरीद सकते हैं। NRIs व्यक्तिगत रूप से 5% और सारे NRIs मिलकर 10% तक शेयर का क्रय कर सकते हैं। 10% की सीमा को बढ़ाया जा सकता है यदि कंपनी सामान्य वार्षिक बैठक में 75% से प्रस्ताव पारित करे। विदेशी निवेश के विभिन्न मार्ग: स्वचालित मार्ग: इसके माध्यम से जो विदेशी निवेश प्राप्त होता है उसके लिए सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है। विदेशी निवेशक को शेयर निर्गत होने के 30 दिन के भीतर आरबीआई की क्षेत्रीय शाखा को सूचित करना पड़ता है। सरकारी मार्ग: इस मार्ग से किए जाने वाले निवेश के अंतर्गत वित्त मंत्रालय द्वारा अनुमोदन के पश्चात एफ़डीआई प्रस्तावों पर विचार किया जाता है। वर्तमान में सुविधा पोर्टल बनाया गया है जिस पर निवेशक आवेदन आकर सकते हैं। ऐसे विदेशी निवेश जो उत्तर-पूर्वी भारत से संबन्धित होता है तथा भारत की सुरक्षा आदि को प्रभावित करने वाला है इसके लिए गृह मंत्रालय से अनुमति आवश्यक है।
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क्या आप इस बात से सहमत हैं कि राष्ट्रपति संसद का एक भाग है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Do you agree that the President is a part of parliament ? Present the argument in favour of your answer. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में राष्ट्रपति का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति के संसद के अंग होने के पक्ष में विभिन्न तर्क प्रस्तुत कीजिये | अंत में संसद के अभिन्न अंग के रूप में राष्ट्रपति को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारतीय संविधान में ब्रिटिश प्रणाली को अपनाया गया है | ब्रिटिश संसद , हाउस ऑफ लॉर्ड्स ( उच्च सदन ) , हाउस ऑफ कॉमन्स (निम्न सदन ) और क्राउन से मिलकर बनी है | ब्रिटिश क्राउन के सामान ही भारत का राष्ट्रपति भी दोनों सदनों में से किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है | हालाँकि वह संसद का अभिन्न अंग होता है | इस सन्दर्भ में कई तर्क दिए जा सकते हैं , जो निम्नलिखित हैं - संसद के द्वारा पारित विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक राष्ट्रपति उस विधेयक पर सहमति न प्रदान कर दे | राष्ट्रपति की सहमति के बाद ही विधेयक अधिनियम या कानून बनता है | किसी भी विधेयक पर राष्ट्रपति सहमति देने से मना भी कर सकता है | राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार हेतु भेज सकता है | परन्तु पुनर्विचार के उपरान्त राष्ट्रपति उस विधेयक पर सहमति देने से मन नहीं कर सकता है | संसद के द्वारा पारित विधेयक पर राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया जल्द से जल्द प्रस्तुत करना | संसद के सत्र को बुलाना ,सत्रावसान करना एवं लोकसभा को भंग करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है | राष्ट्रपति संसद को सन्देश भेजने का अधिकारी होता है | राष्ट्रपति संसद के समक्ष अभिभाषण प्रस्तुत करने का अधिकार रखता है | परन्तु दो अवसरों पर राष्ट्रपति का अभिभाषण अनिवार्य है - 1. प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र में 2. नयी लोकसभा के गठन के उपरांत यदि एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व न हो तो ,लोकसभा में दो एंग्लो-इंडियन समुदाय के व्यक्तियों को राष्ट्रपति मनोनीत करता है | राष्ट्रपति के द्वारा ही राज्यसभा में विशेष ज्ञान / व्यवहारिक अनुभव के आधार पर 12 व्यक्तियों को( साहित्य, विज्ञानं , कला एवं समाज सेवा के क्षेत्र से ) मनोनीत किया जाता है | राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है , जब संसद का सत्र न चल रहा हो | यद्यपि राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होते हुए भी वह विधेयक पर सहमति देने के साथ-साथ उसको संसद के सन्दर्भ में बहुल एवं विविध विधायिकी शक्तियां प्राप्त हैं | इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रपति संसद की गतिविधियों में भले ही प्रत्यक्ष रूप से भाग न लेता हो लेकिन राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है , क्योंकि भारत की राजनीति संसदीय शासन प्रणाली की विचारधारा पर आधारित है |
##Question:क्या आप इस बात से सहमत हैं कि राष्ट्रपति संसद का एक भाग है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Do you agree that the President is a part of parliament ? Present the argument in favour of your answer. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में राष्ट्रपति का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति के संसद के अंग होने के पक्ष में विभिन्न तर्क प्रस्तुत कीजिये | अंत में संसद के अभिन्न अंग के रूप में राष्ट्रपति को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - भारतीय संविधान में ब्रिटिश प्रणाली को अपनाया गया है | ब्रिटिश संसद , हाउस ऑफ लॉर्ड्स ( उच्च सदन ) , हाउस ऑफ कॉमन्स (निम्न सदन ) और क्राउन से मिलकर बनी है | ब्रिटिश क्राउन के सामान ही भारत का राष्ट्रपति भी दोनों सदनों में से किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है | हालाँकि वह संसद का अभिन्न अंग होता है | इस सन्दर्भ में कई तर्क दिए जा सकते हैं , जो निम्नलिखित हैं - संसद के द्वारा पारित विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक राष्ट्रपति उस विधेयक पर सहमति न प्रदान कर दे | राष्ट्रपति की सहमति के बाद ही विधेयक अधिनियम या कानून बनता है | किसी भी विधेयक पर राष्ट्रपति सहमति देने से मना भी कर सकता है | राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार हेतु भेज सकता है | परन्तु पुनर्विचार के उपरान्त राष्ट्रपति उस विधेयक पर सहमति देने से मन नहीं कर सकता है | संसद के द्वारा पारित विधेयक पर राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया जल्द से जल्द प्रस्तुत करना | संसद के सत्र को बुलाना ,सत्रावसान करना एवं लोकसभा को भंग करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है | राष्ट्रपति संसद को सन्देश भेजने का अधिकारी होता है | राष्ट्रपति संसद के समक्ष अभिभाषण प्रस्तुत करने का अधिकार रखता है | परन्तु दो अवसरों पर राष्ट्रपति का अभिभाषण अनिवार्य है - 1. प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र में 2. नयी लोकसभा के गठन के उपरांत यदि एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व न हो तो ,लोकसभा में दो एंग्लो-इंडियन समुदाय के व्यक्तियों को राष्ट्रपति मनोनीत करता है | राष्ट्रपति के द्वारा ही राज्यसभा में विशेष ज्ञान / व्यवहारिक अनुभव के आधार पर 12 व्यक्तियों को( साहित्य, विज्ञानं , कला एवं समाज सेवा के क्षेत्र से ) मनोनीत किया जाता है | राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है , जब संसद का सत्र न चल रहा हो | यद्यपि राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होते हुए भी वह विधेयक पर सहमति देने के साथ-साथ उसको संसद के सन्दर्भ में बहुल एवं विविध विधायिकी शक्तियां प्राप्त हैं | इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रपति संसद की गतिविधियों में भले ही प्रत्यक्ष रूप से भाग न लेता हो लेकिन राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है , क्योंकि भारत की राजनीति संसदीय शासन प्रणाली की विचारधारा पर आधारित है |
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संविधान केअनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राप्त प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का वर्णन कीजिए। साथ ही इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त अधिकार में हो रहे विस्तार पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Describe the life and personal libertyavailableunder Article 21 of the Constitution. Also, discuss the expansion in the rights provided by this article. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम अनुच्छेद 21 का वर्णनकीजिए । इसके बाद न्यायालय के प्रमुख निर्णयों पर चर्चा करते हुए अनुच्छेद 21 में हो रहे विस्तार को बताइए। अंत में संतुलित विचार व्यक्त करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर:- अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा विहित प्रक्रिया का कठोरता से और श्रद्धा पूर्वक पालन किया गया हो। गौरतलब है कि अनुच्छेद 21 विधान मण्डल कि शक्तियों पर परिसीमा के रूप में नहीं है।यह व्यक्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध मनमाने एवं अवैध कार्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। परंतु मेनका मामले के पहले तक न्यायालय का इस संबंध में विपरीत मत था। इसी के बाद न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णयों ने इस अनुच्छेद में विस्तार किया। इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है: गोपालन मामला : इसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था दी गयी कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध ही सुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के। अर्थात राज्य राज्य इस स्वतन्त्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है। मेनका गांधी वाद : उच्चतम न्यायालय ने गोपालन मामले में दिये गए अपने निर्णय को बदल दिया। अतः न्यायालय ने व्यवस्था दी कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता को उचित एवं न्यायपूर्ण मामले के आधार पर रोका जा सकता है। इसमें अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में अनेक अधिकारों की घोषणा की: निजता का अधिकार स्वास्थ्य का अधिकार हिरासत में शोषण के विरुद्ध अधिकार नाज फ़ाउंडेशन वाद, 2009: अनुच्छेद 21 में प्राप्त निजता, सम्मान के साथ जीने के अधिकार, चयन के अधिकार के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को वैध माना। नवजोत जौहर वाद: उच्चतम न्यायालय ने आईपीसी की धारा 377 पर रोक लगा दी तथा समलैंगिकता को वैध माना। इस प्रकार मेनका गांधी वाद में विस्तृत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को और संवैधानिक मजबूती प्रदान किया। के पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ वाद: इस मामले में न्यायालय ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार घोषित किया। गौरतलब है की इसके पूर्व एम. पी शर्मा व खड़ग सिंह वाद में निजता को मूल अधिकार मानने से अस्वीकार किया गया था। कॉमन काज बनाम भारत संघ वाद : लिविंग विल एवं पैसिव यूथेनेसिया को वैध माना गया। उपरोक्त चर्चा स्पष्ट है कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने अनेक नए अधिकारों को शामिल किया। इसमें प्रमुख रूप से निजता के अधिकार, चयन की स्वतन्त्रता का व्यापक महत्व है।हालांकि निजता के अधिकार के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय कई संभावनाओं को उत्पन्न करता है जिसमें जिसमें सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष विद्यमान हैं। जहां एक ओर यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का विस्तार, गरिमा सुनिश्चित करता है, डेटा की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी तय करता है तो वहीं दूसरी ओर अनेक चिंताएँ भी हैं जैसे- सूचना के अधिकार और निजता के बीच असंतुलन, सरकारी योजनाओं जैसे आधार संबंधी मामले आदि। इस प्रकार संविधान के व्याख्याता के रूप में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णय अनुच्छेद 21 को अत्यधिक प्रभावी रूप देते हैं। हालांकि इस संबंध में शक्ति के पृथक्करण के सिद्धान्त को कम नहीं करना चाहिए। वर्तमान परिदृश्य में इन अधिकारों में और विस्तार की संभावना बनी रहेगी। कार्यपालिका को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
##Question:संविधान केअनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राप्त प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का वर्णन कीजिए। साथ ही इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त अधिकार में हो रहे विस्तार पर चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Describe the life and personal libertyavailableunder Article 21 of the Constitution. Also, discuss the expansion in the rights provided by this article. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम अनुच्छेद 21 का वर्णनकीजिए । इसके बाद न्यायालय के प्रमुख निर्णयों पर चर्चा करते हुए अनुच्छेद 21 में हो रहे विस्तार को बताइए। अंत में संतुलित विचार व्यक्त करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर:- अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है। इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा विहित प्रक्रिया का कठोरता से और श्रद्धा पूर्वक पालन किया गया हो। गौरतलब है कि अनुच्छेद 21 विधान मण्डल कि शक्तियों पर परिसीमा के रूप में नहीं है।यह व्यक्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध मनमाने एवं अवैध कार्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। परंतु मेनका मामले के पहले तक न्यायालय का इस संबंध में विपरीत मत था। इसी के बाद न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णयों ने इस अनुच्छेद में विस्तार किया। इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है: गोपालन मामला : इसमें उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें व्यवस्था दी गयी कि अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध ही सुरक्षा के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के। अर्थात राज्य राज्य इस स्वतन्त्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है। मेनका गांधी वाद : उच्चतम न्यायालय ने गोपालन मामले में दिये गए अपने निर्णय को बदल दिया। अतः न्यायालय ने व्यवस्था दी कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता को उचित एवं न्यायपूर्ण मामले के आधार पर रोका जा सकता है। इसमें अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में अनेक अधिकारों की घोषणा की: निजता का अधिकार स्वास्थ्य का अधिकार हिरासत में शोषण के विरुद्ध अधिकार नाज फ़ाउंडेशन वाद, 2009: अनुच्छेद 21 में प्राप्त निजता, सम्मान के साथ जीने के अधिकार, चयन के अधिकार के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को वैध माना। नवजोत जौहर वाद: उच्चतम न्यायालय ने आईपीसी की धारा 377 पर रोक लगा दी तथा समलैंगिकता को वैध माना। इस प्रकार मेनका गांधी वाद में विस्तृत्त प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को और संवैधानिक मजबूती प्रदान किया। के पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ वाद: इस मामले में न्यायालय ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार घोषित किया। गौरतलब है की इसके पूर्व एम. पी शर्मा व खड़ग सिंह वाद में निजता को मूल अधिकार मानने से अस्वीकार किया गया था। कॉमन काज बनाम भारत संघ वाद : लिविंग विल एवं पैसिव यूथेनेसिया को वैध माना गया। उपरोक्त चर्चा स्पष्ट है कि प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या में उच्चतम न्यायालय ने अनेक नए अधिकारों को शामिल किया। इसमें प्रमुख रूप से निजता के अधिकार, चयन की स्वतन्त्रता का व्यापक महत्व है।हालांकि निजता के अधिकार के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय कई संभावनाओं को उत्पन्न करता है जिसमें जिसमें सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष विद्यमान हैं। जहां एक ओर यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का विस्तार, गरिमा सुनिश्चित करता है, डेटा की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी तय करता है तो वहीं दूसरी ओर अनेक चिंताएँ भी हैं जैसे- सूचना के अधिकार और निजता के बीच असंतुलन, सरकारी योजनाओं जैसे आधार संबंधी मामले आदि। इस प्रकार संविधान के व्याख्याता के रूप में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए विभिन्न निर्णय अनुच्छेद 21 को अत्यधिक प्रभावी रूप देते हैं। हालांकि इस संबंध में शक्ति के पृथक्करण के सिद्धान्त को कम नहीं करना चाहिए। वर्तमान परिदृश्य में इन अधिकारों में और विस्तार की संभावना बनी रहेगी। कार्यपालिका को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
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“India should state that it is a responsible nuclear power and would not use it irresponsibly, instead of declaring an NFU doctrine”. Do you think India needs to reconsider its nuclear policy? Critically comment. (200 words)
India had always advocated a ‘no first use’ (NFU) nuclear doctrine based on credible minimum deterrence. Thus India’s nuclear weapons are solely for deterrence and we pursue a policy of ‘retaliation only’. No first use (NFU) refers to a pledge or a policy by a nuclear power not to use nuclear weapons as a means of warfare unless first attacked by an adversary using nuclear weapons. Earlier, the concept had also been applied to chemical and biological warfare. India first adopted a “No first use” policy after its second nuclear tests, Pokhran-II, in 1998. Why India should retain this policy? 1. Adopting a no-first use policy enables India to keep the nuclear threshold high, especially as Pakistan tries to lower the threshold by developing tactical nuclear weapons, the Hatf-9 with 60km range. 2. It must also be noted that India is not bordered by just one nuclear weapon state. China adopts a no-first use policy and, in spite of calls for Beijing to revise its no-first use doctrine, it is unlikely to do so. Hence, if New Delhi gave up its no-first use doctrine, it could give Beijing a chance to adopt a first strike policy and shift blame on India. 3. In fact, India’s adoption of a first strike policy would be an easy excuse for China to give up its no-first use doctrine against the United States and Russia as well. 4. Moreover, India has always promoted herself as a responsible nuclear weapon state. Hence, a first strike policy would severely damage India’s reputation as a responsible nuclear weapon state. This means that while India would not be resilient to any nuclear attack by its adversaries, at the same time, it will not act as a villain who tries to bully its adversaries by threatening to strike first. 5. Also, it is India’s no first use doctrine that has enabled both Pakistan and India to keep their nuclear arsenal in a de-mated posture rather than a ready deterrent posture. This means nuclear warheads are not mated with the delivery systems. This reduces the chances of nuclear terrorism in Pakistan and also reduces the likelihood of an accidental launch of a nuclear weapon. A first strike policy by India may not have allowed Pakistan to keep their nuclear arsenal in a de-mated posture. 6. There is also the issue of ballistic missile defense being developed by India which is highly destabilizing in nature and hence, New Delhi would continue to resort to using its no-first use doctrine in order to prevent instability in the South Asian region. A first-strike policy, coupled with a ballistic missile defense system, could provoke Pakistan to launch a nuclear pre-emptive strike against India. 7. By adopting a no-first use doctrine, India has also made it evident that nuclear weapons are indeed the weapons of last resort. Abandoning this doctrine would make it evident that India considers the option of using nuclear weapons in the initial phases of the conflict. In fact, India’s nuclear strategy is dependent on punitive retaliation. This strategy itself acts as deterrence against Pakistan. Way ahead: 1. A policy enunciated by a nation is a confirmation of the nation’s preparation for countering its expected threats as also its commitment to international obligations and regulations. There cannot be a policy against one country and a different one against another. India’s nuclear policy, like that of other nations, is based on its strategic threat perceptions. 2. India has always projected herself as the firm supporter of nuclear disarmament. She has been the only state to call for a Nuclear Weapons Convention that would ban and eliminate nuclear weapons. However, it is India’s no-first use stance that enables India to vouch for a nuclear weapons free world. 3. Therefore, India’s strategy of maintaining a ‘minimum credible deterrent’ should be married successfully with its no first use doctrine. Instead of focusing on adopting a first strike policy, India must work towards strengthening its counter strike and second strike capability. 4. As India seeks to establish its credentials in the international comity as a responsible nation and a growing economic power, it should also project the same by means of its nuclear doctrine. At the same time, India must take the effort of making its neighbors believe in its nuclear doctrine through effective confidence
##Question:“India should state that it is a responsible nuclear power and would not use it irresponsibly, instead of declaring an NFU doctrine”. Do you think India needs to reconsider its nuclear policy? Critically comment. (200 words)##Answer:India had always advocated a ‘no first use’ (NFU) nuclear doctrine based on credible minimum deterrence. Thus India’s nuclear weapons are solely for deterrence and we pursue a policy of ‘retaliation only’. No first use (NFU) refers to a pledge or a policy by a nuclear power not to use nuclear weapons as a means of warfare unless first attacked by an adversary using nuclear weapons. Earlier, the concept had also been applied to chemical and biological warfare. India first adopted a “No first use” policy after its second nuclear tests, Pokhran-II, in 1998. Why India should retain this policy? 1. Adopting a no-first use policy enables India to keep the nuclear threshold high, especially as Pakistan tries to lower the threshold by developing tactical nuclear weapons, the Hatf-9 with 60km range. 2. It must also be noted that India is not bordered by just one nuclear weapon state. China adopts a no-first use policy and, in spite of calls for Beijing to revise its no-first use doctrine, it is unlikely to do so. Hence, if New Delhi gave up its no-first use doctrine, it could give Beijing a chance to adopt a first strike policy and shift blame on India. 3. In fact, India’s adoption of a first strike policy would be an easy excuse for China to give up its no-first use doctrine against the United States and Russia as well. 4. Moreover, India has always promoted herself as a responsible nuclear weapon state. Hence, a first strike policy would severely damage India’s reputation as a responsible nuclear weapon state. This means that while India would not be resilient to any nuclear attack by its adversaries, at the same time, it will not act as a villain who tries to bully its adversaries by threatening to strike first. 5. Also, it is India’s no first use doctrine that has enabled both Pakistan and India to keep their nuclear arsenal in a de-mated posture rather than a ready deterrent posture. This means nuclear warheads are not mated with the delivery systems. This reduces the chances of nuclear terrorism in Pakistan and also reduces the likelihood of an accidental launch of a nuclear weapon. A first strike policy by India may not have allowed Pakistan to keep their nuclear arsenal in a de-mated posture. 6. There is also the issue of ballistic missile defense being developed by India which is highly destabilizing in nature and hence, New Delhi would continue to resort to using its no-first use doctrine in order to prevent instability in the South Asian region. A first-strike policy, coupled with a ballistic missile defense system, could provoke Pakistan to launch a nuclear pre-emptive strike against India. 7. By adopting a no-first use doctrine, India has also made it evident that nuclear weapons are indeed the weapons of last resort. Abandoning this doctrine would make it evident that India considers the option of using nuclear weapons in the initial phases of the conflict. In fact, India’s nuclear strategy is dependent on punitive retaliation. This strategy itself acts as deterrence against Pakistan. Way ahead: 1. A policy enunciated by a nation is a confirmation of the nation’s preparation for countering its expected threats as also its commitment to international obligations and regulations. There cannot be a policy against one country and a different one against another. India’s nuclear policy, like that of other nations, is based on its strategic threat perceptions. 2. India has always projected herself as the firm supporter of nuclear disarmament. She has been the only state to call for a Nuclear Weapons Convention that would ban and eliminate nuclear weapons. However, it is India’s no-first use stance that enables India to vouch for a nuclear weapons free world. 3. Therefore, India’s strategy of maintaining a ‘minimum credible deterrent’ should be married successfully with its no first use doctrine. Instead of focusing on adopting a first strike policy, India must work towards strengthening its counter strike and second strike capability. 4. As India seeks to establish its credentials in the international comity as a responsible nation and a growing economic power, it should also project the same by means of its nuclear doctrine. At the same time, India must take the effort of making its neighbors believe in its nuclear doctrine through effective confidence
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उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द, अंक-10 ) Describe the factors affecting the Location of Industries. (150-200 words, marks -10 )
एप्रोच- विनिर्माण उद्योग तथा उद्योगों की अवस्थिति की संक्षिप्त पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में, उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए| उत्तर- विनिर्माण प्राथमिक उत्पादों के प्रसंस्करण द्वारा उन्हें अधिक परिष्कृत और अधिक उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है| इसमें हम प्राथमिक उत्पादों को अत्यधिक मूल्यवान, उपयोगी एवं उपभोगयोग्य बनाते हैं| इस प्रक्रिया में मशीनों, औजारों एवं श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है| औद्योगिक विकास को आधुनिक आर्थिक विकास की आवश्यक शर्त के तौर पर माना जाता है|उद्योग की अवस्थिति कई कारकों द्वारा प्रभावित होती है| इनका सापेक्षिक महत्व समय तथा स्थान के साथ बदल जाता है| इन कारकों को दो व्यापक श्रेणियों में बांटा जा सकता है- भौगोलिक कारक तथा गैर-भौगोलिक कारक| भौगोलिक कारक- कच्चा माल - उद्योगों की अवस्थिति में कच्चे माल की उपलब्धता एवं अवस्थिति का व्यापक महत्व है| भारह्रास उद्योग या परिवहन लागत अधिक वाले उद्योगों या जल्द ख़राब होने वाले कच्चे माल का उपयोग करने वाले उद्योगों को कच्चे माल के क्षेत्र में अवस्थित होना चाहिए वहीँ वेट-गेनिंग उद्योगों को बाजार के आधार पर अवस्थित होना चाहिए| जैसे- चीनी उद्योग, लुगदी उद्योग, तांबा प्रगलन एवं पिग आयरन उद्योग आदि कच्चे माल के स्रोत के नजदीक| यातायात व्यय - कच्चे माल को उत्पादन क्षेत्र से फैक्ट्री तक लाने एवं तैयार माल को फैक्ट्री से बाजार तक ले जाने के लिए सस्ते एवं कुशल परिवहन साधनों का होना आवश्यक है| यही कारण है कि सड़क, रेलवे जंक्शन, बंदरगाहों के निकट औद्योगिक केंद्र विकसित होते हैं| संचार- उचित औद्योगिक विकास के लिए अच्छी तरह से विकसित संचार सुविधाओं की भी आवश्यकता होती है| जैसे डाक; टेलीफोन आदि का विकास| श्रम - अवस्थिति के संदर्भ में उद्योग का महत्व उसकी मोबिलिटी पर निर्भर करता है| यदि मजदुर गतिशील हो तो अवस्थिति को प्रभावित नहीं कर पाता है परंतु यदि गतिशीलता कम हो तो औद्योगिक अवस्थिति को एक बड़े कारक के रूप में प्रभावित करता है| यातायात तथा दूरसंचार साधन विकसित होने से अंतःदेशीय गतिशीलता काफी बढ़ रही है परंतु अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता आज भी बहुत कम है| सस्ता एवं कुशल श्रम की उपलब्धता कई उद्योगों के लिए पूर्व निर्धारित शर्त है| श्रम की आपूर्ति बड़ी संख्या में उपलब्ध होनी चाहिए और उन्हें आवश्यकतानुसार कौशल तथा तकनीकी विशेषज्ञता भी प्राप्त होनी चाहिए| हल्की उपभोक्ता सामग्री और कृषि आधारित उद्योगों को श्रम की आपूर्ति की बहुत अधिक आवश्यकता होती है| कुशल कारीगर बनाम अकुशल कारीगर- अकुशल कारीगर यदि गतिशील है तो कुशल कारीगर की गतिशीलता कम होगी| यदि अकुशल कारीगर गतिशील नहीं है तो कुशल कारीगर को गतिशील होना होगा| उदारीकरण के बाद कुशल कारीगर अवस्थिति को अधिक प्रभावित करते हैं जबकि उसके पहले जबतक यातायात अथवा दूरसंचार विकसित नहीं था तबतक अकुशल कारीगर कुशल कारीगर से अधिक प्रभावित करता था| आईसोडोपन तथा क्रिटिकलआईसोडोपन -शहर केंद्र से दूर जाने पर मजदूरी दर में कमी आती है परंतु यातायात व्यय बढ़ने लगता है| मजदूरी दर के कारण उद्योगों का विकेंद्रीकरण या विस्थापन क्रिटिकल आईसोडेपन के बाहर नहीं होता है| शक्ति/ऊर्जा के स्रोत/बिजली की उपलब्धता -उद्योगों की अवस्थिति के लिए ऊर्जा की नियमित आपूर्ति एक पूर्व आवश्यकता है| उर्जा के तीन महत्वपूर्ण परंपरागत स्रोत कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस और जल विद्युत हैं| अधिकांश उद्योगों को ऊर्जा स्रोतों के आसपास स्थापित किया जाता है| उदाहरण के लिए- एलुमिनियम और कृत्रिम नाइट्रोजन निर्माण उद्योगों की स्थापना ऊर्जा स्रोतों के निकट ही की जाती है क्योंकि यह शक्ति गहन उद्योग हैं जिन्हें बड़ी मात्रा में विद्युत् की आवश्यकता होती है;जमशेदपुर का लौह इस्पात केंद्र झरिया तथा रानीगंज की कोयला खदानों के निकट स्थित है आदि| बाजार- तैयार माल/विनिर्मित वस्तुओं के त्वरित निष्पादन के लिए बाजार का आसपास होना अनिवार्य है| यह परिवहन लागत को कम करने में मदद करता है तथा उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर उत्पादों की प्राप्ति में सहायक होता है| भारी मशीन, मशीन के औजार, भारी रसायन वाले उद्योगों की स्थापना उच्च मांग वाले क्षेत्रों के निकट की जाती है क्योंकि वे बाजार अभिमुख होते हैं| सूती वस्त्र उद्योग जिसमें शुद्ध कच्चे माल(सूत) का उपयोग होता है, वे प्रायः बड़े नगरीय केन्द्रों के निकट ही स्थापित किए जाते हैं| पेट्रोलियम शोधनशालाओं की स्थापना भी बाजारों के निकट की जाती है| स्थान- पर्याप्त परिवहन सुविधाओं से युक्त समतल भूमि; कारखानों के निर्माण के लिए बड़े क्षेत्र की आवश्यकता आदि जरूरतें औद्योगिक अवस्थिति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है|साथ ही, शहरी क्षेत्रों में भूमि की बढ़ती कीमत के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी उद्योग स्थापित करने की प्रवृत्ति देखी गई है| जल की उपलब्धता; पत्तन तक पहुँच; जलवायविक स्थिति -स्थान विशेष की जलवायु औद्योगिक कच्चे माल, इसके प्रसंस्करण या तैयार माल के साथ-साथ श्रमिकों के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालती है जैसे अधिकतर सूती वस्त्र उद्योग आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में स्थापित होते हैं क्योंकि आर्द्रता के कारण सूत टूटता नहीं है| गैर भौगोलिक कारक सरकारी नीतियाँ - राजकोषीय नीति तथा मौद्रिक नीति; नियम तथा कानून; राजनैतिक स्थिरता ; विनियमन - क्षेत्रीयअसमानताओं को कम करने, वायु और जल प्रदूषण को समाप्त करने तथा बड़े शहरों में अत्यधिक उद्योग क्लस्टरिंग से बचाव के लिए भविष्य में उद्योगों के वितरण की योजना बनाने में सरकारी नीतियां एक महत्वपूर्ण कारक बन गई है| ऐसे क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ती है जहां सरकार की नीतियां उद्योग अनुकूल परिवेश को बढ़ावा देती है| पूंजी -आधुनिक उद्योग पूंजी गहन होते हैं जिनमें अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होती है जो आमतौर पर शहरी केंद्रों में उपलब्ध होती है| इसलिए कई शहर देश के प्रमुख उद्योगों के लिए केंद्र के रूप में जाने जाते हैं| सामाजिक स्थिति - कानून एवं व्यवस्था; कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी; शिक्षा का स्तर; समाज में महिलाओं का स्तर; कार्य-नैतिकता(Work-Ethics); औद्योगिक जड़त्व- बहुत से उद्योग आरंभिक सुविधाओं के समाप्त हो जाने पर भी एक निश्चित अवस्थिति पर बनेरहना चाहते हैं| बैंकिंग तथा बीमा की सुविधाएं- बेहतर बैंकिंग सुविधा वाले क्षेत्र में उद्योग की स्थापना हेतु अनुकूल स्थितियां होती है|
##Question:उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए| (150-200 शब्द, अंक-10 ) Describe the factors affecting the Location of Industries. (150-200 words, marks -10 )##Answer:एप्रोच- विनिर्माण उद्योग तथा उद्योगों की अवस्थिति की संक्षिप्त पृष्ठभूमि को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग में, उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का वर्णन कीजिए| उत्तर- विनिर्माण प्राथमिक उत्पादों के प्रसंस्करण द्वारा उन्हें अधिक परिष्कृत और अधिक उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है| इसमें हम प्राथमिक उत्पादों को अत्यधिक मूल्यवान, उपयोगी एवं उपभोगयोग्य बनाते हैं| इस प्रक्रिया में मशीनों, औजारों एवं श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है| औद्योगिक विकास को आधुनिक आर्थिक विकास की आवश्यक शर्त के तौर पर माना जाता है|उद्योग की अवस्थिति कई कारकों द्वारा प्रभावित होती है| इनका सापेक्षिक महत्व समय तथा स्थान के साथ बदल जाता है| इन कारकों को दो व्यापक श्रेणियों में बांटा जा सकता है- भौगोलिक कारक तथा गैर-भौगोलिक कारक| भौगोलिक कारक- कच्चा माल - उद्योगों की अवस्थिति में कच्चे माल की उपलब्धता एवं अवस्थिति का व्यापक महत्व है| भारह्रास उद्योग या परिवहन लागत अधिक वाले उद्योगों या जल्द ख़राब होने वाले कच्चे माल का उपयोग करने वाले उद्योगों को कच्चे माल के क्षेत्र में अवस्थित होना चाहिए वहीँ वेट-गेनिंग उद्योगों को बाजार के आधार पर अवस्थित होना चाहिए| जैसे- चीनी उद्योग, लुगदी उद्योग, तांबा प्रगलन एवं पिग आयरन उद्योग आदि कच्चे माल के स्रोत के नजदीक| यातायात व्यय - कच्चे माल को उत्पादन क्षेत्र से फैक्ट्री तक लाने एवं तैयार माल को फैक्ट्री से बाजार तक ले जाने के लिए सस्ते एवं कुशल परिवहन साधनों का होना आवश्यक है| यही कारण है कि सड़क, रेलवे जंक्शन, बंदरगाहों के निकट औद्योगिक केंद्र विकसित होते हैं| संचार- उचित औद्योगिक विकास के लिए अच्छी तरह से विकसित संचार सुविधाओं की भी आवश्यकता होती है| जैसे डाक; टेलीफोन आदि का विकास| श्रम - अवस्थिति के संदर्भ में उद्योग का महत्व उसकी मोबिलिटी पर निर्भर करता है| यदि मजदुर गतिशील हो तो अवस्थिति को प्रभावित नहीं कर पाता है परंतु यदि गतिशीलता कम हो तो औद्योगिक अवस्थिति को एक बड़े कारक के रूप में प्रभावित करता है| यातायात तथा दूरसंचार साधन विकसित होने से अंतःदेशीय गतिशीलता काफी बढ़ रही है परंतु अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता आज भी बहुत कम है| सस्ता एवं कुशल श्रम की उपलब्धता कई उद्योगों के लिए पूर्व निर्धारित शर्त है| श्रम की आपूर्ति बड़ी संख्या में उपलब्ध होनी चाहिए और उन्हें आवश्यकतानुसार कौशल तथा तकनीकी विशेषज्ञता भी प्राप्त होनी चाहिए| हल्की उपभोक्ता सामग्री और कृषि आधारित उद्योगों को श्रम की आपूर्ति की बहुत अधिक आवश्यकता होती है| कुशल कारीगर बनाम अकुशल कारीगर- अकुशल कारीगर यदि गतिशील है तो कुशल कारीगर की गतिशीलता कम होगी| यदि अकुशल कारीगर गतिशील नहीं है तो कुशल कारीगर को गतिशील होना होगा| उदारीकरण के बाद कुशल कारीगर अवस्थिति को अधिक प्रभावित करते हैं जबकि उसके पहले जबतक यातायात अथवा दूरसंचार विकसित नहीं था तबतक अकुशल कारीगर कुशल कारीगर से अधिक प्रभावित करता था| आईसोडोपन तथा क्रिटिकलआईसोडोपन -शहर केंद्र से दूर जाने पर मजदूरी दर में कमी आती है परंतु यातायात व्यय बढ़ने लगता है| मजदूरी दर के कारण उद्योगों का विकेंद्रीकरण या विस्थापन क्रिटिकल आईसोडेपन के बाहर नहीं होता है| शक्ति/ऊर्जा के स्रोत/बिजली की उपलब्धता -उद्योगों की अवस्थिति के लिए ऊर्जा की नियमित आपूर्ति एक पूर्व आवश्यकता है| उर्जा के तीन महत्वपूर्ण परंपरागत स्रोत कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस और जल विद्युत हैं| अधिकांश उद्योगों को ऊर्जा स्रोतों के आसपास स्थापित किया जाता है| उदाहरण के लिए- एलुमिनियम और कृत्रिम नाइट्रोजन निर्माण उद्योगों की स्थापना ऊर्जा स्रोतों के निकट ही की जाती है क्योंकि यह शक्ति गहन उद्योग हैं जिन्हें बड़ी मात्रा में विद्युत् की आवश्यकता होती है;जमशेदपुर का लौह इस्पात केंद्र झरिया तथा रानीगंज की कोयला खदानों के निकट स्थित है आदि| बाजार- तैयार माल/विनिर्मित वस्तुओं के त्वरित निष्पादन के लिए बाजार का आसपास होना अनिवार्य है| यह परिवहन लागत को कम करने में मदद करता है तथा उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर उत्पादों की प्राप्ति में सहायक होता है| भारी मशीन, मशीन के औजार, भारी रसायन वाले उद्योगों की स्थापना उच्च मांग वाले क्षेत्रों के निकट की जाती है क्योंकि वे बाजार अभिमुख होते हैं| सूती वस्त्र उद्योग जिसमें शुद्ध कच्चे माल(सूत) का उपयोग होता है, वे प्रायः बड़े नगरीय केन्द्रों के निकट ही स्थापित किए जाते हैं| पेट्रोलियम शोधनशालाओं की स्थापना भी बाजारों के निकट की जाती है| स्थान- पर्याप्त परिवहन सुविधाओं से युक्त समतल भूमि; कारखानों के निर्माण के लिए बड़े क्षेत्र की आवश्यकता आदि जरूरतें औद्योगिक अवस्थिति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है|साथ ही, शहरी क्षेत्रों में भूमि की बढ़ती कीमत के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी उद्योग स्थापित करने की प्रवृत्ति देखी गई है| जल की उपलब्धता; पत्तन तक पहुँच; जलवायविक स्थिति -स्थान विशेष की जलवायु औद्योगिक कच्चे माल, इसके प्रसंस्करण या तैयार माल के साथ-साथ श्रमिकों के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालती है जैसे अधिकतर सूती वस्त्र उद्योग आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में स्थापित होते हैं क्योंकि आर्द्रता के कारण सूत टूटता नहीं है| गैर भौगोलिक कारक सरकारी नीतियाँ - राजकोषीय नीति तथा मौद्रिक नीति; नियम तथा कानून; राजनैतिक स्थिरता ; विनियमन - क्षेत्रीयअसमानताओं को कम करने, वायु और जल प्रदूषण को समाप्त करने तथा बड़े शहरों में अत्यधिक उद्योग क्लस्टरिंग से बचाव के लिए भविष्य में उद्योगों के वितरण की योजना बनाने में सरकारी नीतियां एक महत्वपूर्ण कारक बन गई है| ऐसे क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ती है जहां सरकार की नीतियां उद्योग अनुकूल परिवेश को बढ़ावा देती है| पूंजी -आधुनिक उद्योग पूंजी गहन होते हैं जिनमें अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होती है जो आमतौर पर शहरी केंद्रों में उपलब्ध होती है| इसलिए कई शहर देश के प्रमुख उद्योगों के लिए केंद्र के रूप में जाने जाते हैं| सामाजिक स्थिति - कानून एवं व्यवस्था; कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी; शिक्षा का स्तर; समाज में महिलाओं का स्तर; कार्य-नैतिकता(Work-Ethics); औद्योगिक जड़त्व- बहुत से उद्योग आरंभिक सुविधाओं के समाप्त हो जाने पर भी एक निश्चित अवस्थिति पर बनेरहना चाहते हैं| बैंकिंग तथा बीमा की सुविधाएं- बेहतर बैंकिंग सुविधा वाले क्षेत्र में उद्योग की स्थापना हेतु अनुकूल स्थितियां होती है|
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आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों को बताते हुए, इस सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क के महत्व की संक्षेप में चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Describing various stages of disaster management, briefly discuss the importance of the Hyogo and Sendai framework in this context. (150-200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण भूमिका आपदा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये | अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - , आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं | सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है | इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है | जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं | आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है | प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन)| इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है | इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए | उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे | आपदा के समय:प्रतिक्रिया इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है | आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए | इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है | आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं | आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है | संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं | 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था | इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं | ह्यूगो फ्रेमवर्क यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है | मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए | आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना | प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना | इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं | इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है | इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है | यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है | सेन्डाई फ्रेमवर्क यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना | यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना | इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके |
##Question:आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों को बताते हुए, इस सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क के महत्व की संक्षेप में चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Describing various stages of disaster management, briefly discuss the importance of the Hyogo and Sendai framework in this context. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका आपदा को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात आपदा प्रबंधन के विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिये | अंतिम में आपदा प्रबन्धन के सन्दर्भ में ह्यूगो एवं सेन्डाई फ्रेमवर्क का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - , आपदा का रूप तभी ग्रहण करता है जब वह सुभेद्य वर्गों और भौतिक संस्थापनाओं को प्रभावित करता है| जोखिम, संकट पर निर्भर करता है, यदि संकट छोटा है तो जोखिम कम होगा जबकि संकट के बड़े होने पर जोखिम अधिक होगा| जोखिम का निर्धारण आयुवर्ग, सामाजिक क्षमता के आधार पर भी होता है| जिस वर्ग को अधिक जोखिम होगा वह अधिक सुभेद्य होगा| सुभेद्यता का निर्धारण इस आधार पर होता है कि उस संकट से निपटने के लिए कितने प्रयास किये गए हैं | सुभेद्यता का स्तर, पर्यावरण के साथ सामंजस्य, राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा आर्थिक स्थिति आदि कारकों पर निर्भर करता है | इस तरह से किसी संकट के प्रति वृद्ध, महिलाओं एवं बच्चों की सुभेद्यता सबसे अधिक होती है | जोखिम को कम करने के लिए सुभेद्यता के प्रत्येक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता होती है| सुभेद्यता को कम करने के लिए किये गए प्रयास ही आपदा प्रबंधन कहलाते हैं | आपदा प्रबंधन के स्तर आपदा पूर्व तैयारी:मिटीगेशन इस चरण में आपदा को रोकने के प्रयास किये जाते हैं, वस्तुतः केवल मानव जनित आपदाओं को ही रोका जा सकता है | प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता है, इनके केवल प्रभाव को कम किया जा सकता है (मिटीगेशन)| इस चरण में अग्रसक्रिय होते हुए जोखिम का विश्लेषण, इसमें बड़े जोखिमों की, सुभेद्य वर्गों की और जोखिम प्रभावित क्षेत्रों का स्पष्टीकरण किया जाता है | इसके आधार पर भू उपयोग योजना का निर्माण किया जाता है तथा अगले चरण में जन क्षमताओं का विकास, जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए | उड़ीसा में 1999 एवं 2013 में अब तक के तीव्र चक्रवात आये थे दुसरे चक्रवात में जान माल की हानि अपेक्षाकृत कम थी, इसका कारण यह था कि 2013 में मिटिगेशन के सन्दर्भ में पर्याप्त कार्य किये जा चुके थे | आपदा के समय:प्रतिक्रिया इस चरण में राहत कार्यों का प्रबंधन किया जाएगा इसके साथ ही खाद्य आपूर्ति, पेय जलापूर्ति आदि को सुनिश्चित किया जाता है | आपदा के समय राहत कार्य किये जायेंगे, राहत कार्यों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के उत्तरदायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए | इस चरण में स्थानीय समुदाय का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि क्षेत्र से उनका परिचय अधिक होता है अतः इस चरण में अधिकतम जन भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होता है | आपदा पश्चात:रिहैबिलिटेशन सामाजिक आर्थिक संरचना ध्वस्त हो चुकी होती हैं जिसके कारण सामाजिक आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैंअतः इस चरण में रिहैबिलिटेशन के लिए प्रयास किये जाते हैं | आपदा के बाद पुनर्स्थापना के प्रयास किये जाते हैं इसके लिए संघ राज्यों दोनों के सहयोग से सामाजिक आर्थिक विकास किया जाता है | संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए प्रयास आपदा प्रबंधन के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं | 1989 में UN द्वारा जन जागरूकता के लिए 1990 से लेकर 2000 तक के काल को आपदा प्रबंधन दशक घोषित किया गया| इसके लिए1994 में योकोहोमा प्रोटोकाल बनाया गया था | इसके बाद एक निर्धारित निर्देशावली के निर्माण के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये गए हैं | ह्यूगो फ्रेमवर्क यह आपदा जोखिम में कमी लाने को एक प्राथमिकता के रूप में घोषित करता है | मजबूत संस्थागत आधार के आधार पर क्रियान्वयन के लिए आपदा जोखिम में कमी को राष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राथमिकता के रूप में सुनिश्चित किया जाए | आपदा जोखिमों की पहचान, आकलन और निगरानी करते हुए अर्ली वार्निंग तंत्र का विकास सुनिश्चित करना | प्रत्येक स्तर पर रेसिलिएंस विकसित करने तथा एक सुरक्षा संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा ज्ञान एवं नवाचार का उपयोग सुनिश्चित करना | इसके अंतर्गत आपदा पूर्व स्तर पर जोखिम में कमी लाने के लिए प्रयास किये गए हैं | इसमें बॉटम अप दृष्टिकोण अपनाया गया है और विभिन्न वर्गों को उनकी तैयारी के आधार पर उत्तदायित्व सौंपने की बात करता है | इस फ्रेमवर्क में सतत विकास के साथ हीविकास को आपदा के साथ समायोजित करने की बात की गयी है | यह प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिये सुस्पष्ट तैयारी एवं तत्परता को सुनिश्चित करने की मांग करता है | सेन्डाई फ्रेमवर्क यह फ्रेमवर्क अपनी चार प्राथमिकताएं घोषित करता है यथा आपदा जोखिमों की पहचान, आपदा प्रशासन को सुदृश करना, आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए आवश्यक निवेश एवं प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र का विकास करना | यह फ्रेमवर्क अपने 7 लक्ष्यों की घोषणा करता है यथा मृतकों एवंपीड़ितों की संख्या में, आर्थिक नुकसान में कमी लाना तथा सहायक सेवाओं और आवश्यक अवसंरचना को होने वाले नुकसान में कमी लाना | इसके साथ ही आपदा जोखिम में कमी लाने पर बल, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, संकटों के प्रति बेहतर एवं बहुआयामी अर्ली वार्निंग सिस्टम का विकास करना आदि लक्ष्यों को निर्धारित करता है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ह्यूगो एवं सेंदाई फ्रेमवर्क आपदा प्रबंधन को एक सुगठित स्वरुप देने और अन्तराष्ट्रीय नीतियों में एकरूपता लाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं| आपदा प्रबंधन को और सार्थक और प्रभावी रूप देने के लिए सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के साथ समायोजित करना आवश्यक है ताकि विकास और सुरक्षा एक साथ सुनिश्चित की जा सके |
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Define Mantle Plume and explain its role in plate tectonics. (150 words/10 marks)
Approach : Introduce an answer by defining Mantle Plumes. Explain more about Mantle Plumes from the perspective of plate tectonics. Answer : Mantle plumes are areas in the asthenosphere from where hot magma rises towards the surface. A hot spot is a resultant area above the surface due to coming out of the mantle plume through small regional cracks developed during the process.The resulting landforms depend on the nature of magma whether acidic or basaltic as well as the source of the magma i.e.- below the continental crust or oceanic crust. Mantle plume rising below the oceanic plate Basaltic magma is less explosive and results in Shield volcano which is gentle mounds.However, acidic magma is highly viscous hence they cannot flow fast and generally solidifies near to the vent only thus forming an island.Island arcs are formed due to movement of the lithospheric plate where the island formed moves farther but the plume remains at its original position. The continuously rising magma results in the formation of the second island and likewise third, fourth, fifth and so on until the hotspot remains active. Also, due to erosional forces over the islands give a result to seamounts which are mountains of oceans. The best example to understand these landforms are -Hawaiian Islands, Midway, Emperor seamount chain and together they form island arc. Mantle plume rising below the continental plate Basaltic magma coming from below the continental crust result in fissure eruptions. They form sheets of solidified lava which over a period of time result in Basaltic lava plateau. These eruptions are also called flood basalts. Examples- Deccan lava plateau, Columbia Snake plateau. Hot spots are yet another evidence to support plate tectonics. Mantle plumes are one of the mechanisms for the movement of plates. As the mantle plumes diverge beneath the plates they exert an extensional force. This extensional force causes the plates to be stretched and finally to be ruptured. The convection currents thus carry the plates with themselves. This was the way Africa got ruptured and it is moving away in two different directions along the East African Rift Valley. It is also a second way that Earth loses heat and helps stratification of Earth on the basis of density.
##Question:Define Mantle Plume and explain its role in plate tectonics. (150 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by defining Mantle Plumes. Explain more about Mantle Plumes from the perspective of plate tectonics. Answer : Mantle plumes are areas in the asthenosphere from where hot magma rises towards the surface. A hot spot is a resultant area above the surface due to coming out of the mantle plume through small regional cracks developed during the process.The resulting landforms depend on the nature of magma whether acidic or basaltic as well as the source of the magma i.e.- below the continental crust or oceanic crust. Mantle plume rising below the oceanic plate Basaltic magma is less explosive and results in Shield volcano which is gentle mounds.However, acidic magma is highly viscous hence they cannot flow fast and generally solidifies near to the vent only thus forming an island.Island arcs are formed due to movement of the lithospheric plate where the island formed moves farther but the plume remains at its original position. The continuously rising magma results in the formation of the second island and likewise third, fourth, fifth and so on until the hotspot remains active. Also, due to erosional forces over the islands give a result to seamounts which are mountains of oceans. The best example to understand these landforms are -Hawaiian Islands, Midway, Emperor seamount chain and together they form island arc. Mantle plume rising below the continental plate Basaltic magma coming from below the continental crust result in fissure eruptions. They form sheets of solidified lava which over a period of time result in Basaltic lava plateau. These eruptions are also called flood basalts. Examples- Deccan lava plateau, Columbia Snake plateau. Hot spots are yet another evidence to support plate tectonics. Mantle plumes are one of the mechanisms for the movement of plates. As the mantle plumes diverge beneath the plates they exert an extensional force. This extensional force causes the plates to be stretched and finally to be ruptured. The convection currents thus carry the plates with themselves. This was the way Africa got ruptured and it is moving away in two different directions along the East African Rift Valley. It is also a second way that Earth loses heat and helps stratification of Earth on the basis of density.
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Briefly enumerate the features of Dravida style of temple architecture. Also discuss various substyles of it.(150 words/10marks)
Approach- List the features of the Dravida style of temple architecture. Briefly give the account of the substyle of Dravida architecture. Dravida temple architecture Pallava rulers initiated rock-cut cave architecture in South India which gave rise to the Dravida style of temple in South India. Features- 1. Vimana- the inclined tower is the foremost manifestation of Dravida temple. 2. Gopuram- Dravida temple always has high enclosure walls, intervened by gateways known as Gopuram. 3. Narta Mandap- Inside the premise, Narta Mandap is created for the classical dance performance. 4. Ardha Mandap- Starting porch of Mandap is known as Ardha Mandap, in which often Dhwaja is erected. 5. Antaral- Garbhgriha is connected through a narrow passage known as Antaral. 6. Pushkaram- stepped water tank is a necessary feature of Dravida. 7. Ground plan- Generally temples follow a crucified ground plan and some of the temples also follow the Panchayatan style like Nagara. 8. On the entrance of Garbhagriha a sculpture of Dwarpal is created. 9. Ex- Brihadeshwara temple-Thanjore,Airateshwar temple- Thanjore Substyle of Dravida style Vijayanagar temple- 1. Majority of the temples in Vijayanagar style was created by Krishna dev Raya 2. It is noted for a very high enclosure wall. 3. Amman Shrine - A second Garbhagriha is known as Amman Shrine dedicated to the chief wife of the main deity. 4. Kalyan Mantapam- It was created inside the premise of the temple which was meant for marriage. 5. Mahanavami Dibba- It was created by Krishnadev Raya in Humpi which is rectangular upraised platform meant for sacrifice or performance of Yajna (for from temple) 6. Ex- Veerbhardra temple- Lepakshi, Virupaksha temple- Hampi, Thousand pillar temple- Lepakshi Nayaka Temple- 1. This style is popular in and around Madurai 2. They continued the Amman shrine concept from Viajaynagar period. 3. It is noted for large no. of Gopuram and large no. of Vimana. 4. Parakram - It is noted for huge corridor known as Parakram. 5. Brahma Pushkaram (water tank)- It is present inside the premise of the temple. 6. Ex- Meenakshi(Sundareshwar) temple- Madurai, Srirangnathswami temple- Srirangam. Dravida style of temple architecture has great significance. These temples are still usedfor religious festivals and also act as tourist destinations.
##Question:Briefly enumerate the features of Dravida style of temple architecture. Also discuss various substyles of it.(150 words/10marks)##Answer:Approach- List the features of the Dravida style of temple architecture. Briefly give the account of the substyle of Dravida architecture. Dravida temple architecture Pallava rulers initiated rock-cut cave architecture in South India which gave rise to the Dravida style of temple in South India. Features- 1. Vimana- the inclined tower is the foremost manifestation of Dravida temple. 2. Gopuram- Dravida temple always has high enclosure walls, intervened by gateways known as Gopuram. 3. Narta Mandap- Inside the premise, Narta Mandap is created for the classical dance performance. 4. Ardha Mandap- Starting porch of Mandap is known as Ardha Mandap, in which often Dhwaja is erected. 5. Antaral- Garbhgriha is connected through a narrow passage known as Antaral. 6. Pushkaram- stepped water tank is a necessary feature of Dravida. 7. Ground plan- Generally temples follow a crucified ground plan and some of the temples also follow the Panchayatan style like Nagara. 8. On the entrance of Garbhagriha a sculpture of Dwarpal is created. 9. Ex- Brihadeshwara temple-Thanjore,Airateshwar temple- Thanjore Substyle of Dravida style Vijayanagar temple- 1. Majority of the temples in Vijayanagar style was created by Krishna dev Raya 2. It is noted for a very high enclosure wall. 3. Amman Shrine - A second Garbhagriha is known as Amman Shrine dedicated to the chief wife of the main deity. 4. Kalyan Mantapam- It was created inside the premise of the temple which was meant for marriage. 5. Mahanavami Dibba- It was created by Krishnadev Raya in Humpi which is rectangular upraised platform meant for sacrifice or performance of Yajna (for from temple) 6. Ex- Veerbhardra temple- Lepakshi, Virupaksha temple- Hampi, Thousand pillar temple- Lepakshi Nayaka Temple- 1. This style is popular in and around Madurai 2. They continued the Amman shrine concept from Viajaynagar period. 3. It is noted for large no. of Gopuram and large no. of Vimana. 4. Parakram - It is noted for huge corridor known as Parakram. 5. Brahma Pushkaram (water tank)- It is present inside the premise of the temple. 6. Ex- Meenakshi(Sundareshwar) temple- Madurai, Srirangnathswami temple- Srirangam. Dravida style of temple architecture has great significance. These temples are still usedfor religious festivals and also act as tourist destinations.
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भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को उदाहरणों के साथ सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द) List the main features of Indian society with examples. (150-200 Words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं| भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है| इसमें कई धर्म,जाति,भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं. उनकी संस्कृतियां अलग हैं,लोक-व्यवहार अलग हैं| भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं भारतीय समाज मूलतः एक ग्रामीण समाज है| जनगणना 2011 के अनुसार 68.85 % जनसंख्या ग्रामीण है तथा कुल जनसंख्या का 49.5 % भाग कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर आश्रित है भारतीय समाज में स्तरीकरण के संदर्भ में एक अति विशिष्ट जाति व्यवस्था पायी जाती है| जो स्वयं में निरंतर एवं परिवर्तित हो रही है| भारतीय समाज में एक बड़ा समूह जनजातीय लोगों का है| जनगणना 2011 के अनुसार 8.6 % जनसंख्या जनजातीय है जो स्वयं में 704 अनुसूचित जनजातियों को समेकित करता है, जिसमें से 75 आदिम जनजातियाँ(PVTGs) हैं| जनजातीय समुदाय तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है भारतीय समाज मुख्यतः एक पित्रसत्तात्मक समाज है, यद्यपि मातृसत्तात्मकता के भी उदाहरण देखने को मिलते हैं जैसे खासी समुदाय में, केरल के नायर, कर्नाटक में हो समाज इत्यादि | परन्तु भारतीय समाज नारी सशक्तिकरण की दिशा में भी प्रयासरत है भारतीय समाज में धार्मिक विविधता भाषाई विविधता, नृजातीय विविधता एवं भौगोलिक विविधता का समागम दिखाई पड़ता है, यह विविधता में एकता भारतीय समाज को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है विविधतापूर्ण भारतीय समाज की सफलताएं सिद्ध करती हैं कि विविधता स्वयं में चुनौती नहीं है बल्कि उसके प्रति अपनाया गया दृष्टिकोण चुनौतीपूर्ण हो सकता है| यदि दृष्टिकोण विविधता के विरुद्ध है तो यह समाज की उत्तरजीविता के लिए संकटकारी होगा| भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक सम्बन्धों में एक समरसता/संतुलन दिखता है जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करते हैं, इससे समाज में एक नैतिक व्यवस्था बनी रहती है सामाजिक पूँजी का तात्पर्य किसी समाज में व्यक्तियों में बेहतर सामाजिक सम्बन्ध एवं परस्पर विश्वास के कारण उत्पन्न होने वाले संभावित लाभों से है| भारत में विवाहों में दिया जाने वाला शगुन एक सामाजिक पूँजी का उदाहरण है| आज सामाजिक पूँजी के ह्रास के कारण पारस्परिक सहयोग में कमी आ रही है| भारतीय समाज में संस्कृति/परम्परा(निरन्तरता) एवं आधुनिकता(परिवर्तन) का प्रभावशाली सामंजस्य दिखाई पड़ता है| जो दोनों स्रोतों से समाज को लाभान्वित कर सकता है| इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं जैसे सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना, जनेऊ के साथ टाई धारण करना)| प्रायः भारत समाज में परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है|
##Question:भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को उदाहरणों के साथ सूचीबद्ध कीजिये| (150-200 शब्द) List the main features of Indian society with examples. (150-200 Words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज का परिचय दीजिये 2- मुख्य भाग में भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये 3- अंतिम में विविधता में एकता की उपस्थिति के साथ उत्तर समाप्त कीजिये समाजएक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं| मानवीय क्रियाकलाप में आचरण,सामाजिक सुरक्षाऔर निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं| भारतीय समाज दुनिया के सबसे जटिल समाजों में एक है| इसमें कई धर्म,जाति,भाषा, नस्ल के लोग बिलकुल अलग-अलग तरह के भौगोलिक भू-भाग में रहते हैं. उनकी संस्कृतियां अलग हैं,लोक-व्यवहार अलग हैं| भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताएं भारतीय समाज मूलतः एक ग्रामीण समाज है| जनगणना 2011 के अनुसार 68.85 % जनसंख्या ग्रामीण है तथा कुल जनसंख्या का 49.5 % भाग कृषि आधारित जीविकोपार्जन पर आश्रित है भारतीय समाज में स्तरीकरण के संदर्भ में एक अति विशिष्ट जाति व्यवस्था पायी जाती है| जो स्वयं में निरंतर एवं परिवर्तित हो रही है| भारतीय समाज में एक बड़ा समूह जनजातीय लोगों का है| जनगणना 2011 के अनुसार 8.6 % जनसंख्या जनजातीय है जो स्वयं में 704 अनुसूचित जनजातियों को समेकित करता है, जिसमें से 75 आदिम जनजातियाँ(PVTGs) हैं| जनजातीय समुदाय तेजी से हो रहे विकास में विभिन्न स्तरों पर शोषित भी हो रहा है भारतीय समाज मुख्यतः एक पित्रसत्तात्मक समाज है, यद्यपि मातृसत्तात्मकता के भी उदाहरण देखने को मिलते हैं जैसे खासी समुदाय में, केरल के नायर, कर्नाटक में हो समाज इत्यादि | परन्तु भारतीय समाज नारी सशक्तिकरण की दिशा में भी प्रयासरत है भारतीय समाज में धार्मिक विविधता भाषाई विविधता, नृजातीय विविधता एवं भौगोलिक विविधता का समागम दिखाई पड़ता है, यह विविधता में एकता भारतीय समाज को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है विविधतापूर्ण भारतीय समाज की सफलताएं सिद्ध करती हैं कि विविधता स्वयं में चुनौती नहीं है बल्कि उसके प्रति अपनाया गया दृष्टिकोण चुनौतीपूर्ण हो सकता है| यदि दृष्टिकोण विविधता के विरुद्ध है तो यह समाज की उत्तरजीविता के लिए संकटकारी होगा| भारतीय समाज में व्यक्तिवाद एवं सामाजिक सम्बन्धों में एक समरसता/संतुलन दिखता है जो इस समाज को एक सामाजिक पूँजी प्रदान करते हैं, इससे समाज में एक नैतिक व्यवस्था बनी रहती है सामाजिक पूँजी का तात्पर्य किसी समाज में व्यक्तियों में बेहतर सामाजिक सम्बन्ध एवं परस्पर विश्वास के कारण उत्पन्न होने वाले संभावित लाभों से है| भारत में विवाहों में दिया जाने वाला शगुन एक सामाजिक पूँजी का उदाहरण है| आज सामाजिक पूँजी के ह्रास के कारण पारस्परिक सहयोग में कमी आ रही है| भारतीय समाज में संस्कृति/परम्परा(निरन्तरता) एवं आधुनिकता(परिवर्तन) का प्रभावशाली सामंजस्य दिखाई पड़ता है| जो दोनों स्रोतों से समाज को लाभान्वित कर सकता है| इसके साथ ही रुढिवादिता एवं आधुनिकता में एक द्वंद्व भी देखे जा रहे हैं जैसे सोशल मीडिया पर सूर्य नमस्कार का प्रचार करना, जनेऊ के साथ टाई धारण करना)| प्रायः भारत समाज में परिवर्तनीयता को परंपरागत रूप से स्वीकार्यता प्राप्त है| इस प्रकार स्पष्ट होता है भारतीय समाज विविधता में एकता से युक्त एक ऐसा समाज है जो निरन्तरता एवं परिवर्तन के गुणों से युक्त है|
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द ) Critically discussthe right of religious freedom received under Article 25 of the Indian constitution. (150-200 words)
एप्रोच :- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की भारत में आवश्यकता बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लिखिये। तत्पश्चात युक्तियुक्त निर्बंधनों को स्पष्टकीजिये। अंत में संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर:- भारत में विभिन्न धर्मों, पंथों को मानने वाले निवास करते है तथा अपने धर्म के अनुसार मान्यताओं का पालन करते है. ऐसे में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने तथा सामाजिक भ्रातत्व बढ़ाने हेतु धर्म की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत शामिल किया गया है। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद 25 - 25 (1)- अंत:करण की स्वतंत्रता, धर्म को मानने, उसके आचरण करने, उसके प्रसार प्रचार की स्वतंत्रता 25 (2)- राज्य किसी आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक या लौकिक क्रियाकलाप को विनियमित करने के लिए कानून बना सकता है सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए तथा हिन्दू मंदिरों अथवा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने के सम्बन्ध में राज्य कानून बना सकता है, यद्यपि ये अधिकार स्वयं मेंपूर्ण नहीं हैलोक स्वास्थ्य, नैतिकता व स्वास्थ्य आदि युक्तियुक्त निर्बंधन के तहत इन्हे सीमित किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है जिन्हे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते है जैसे :- राज्य, अजान, भजन के लिए लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है गाय संरक्षण या किसी पशु के संरक्षण के नाम पर किसी समुदाय के व्यक्ति को प्रताड़ित करना या मोब लिंचिंग करना गंभीर अपराध। यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण ही पुजारी होने का दावा।किसी अन्य जाति का भी कोई व्यक्ति, मंदिर का पुजारी बन सकता है। बकरीद के अवसर पर बकरे की बलि, इस्लाम का मूल भाग नहीं है यदि कोई धार्मिक संस्था अपने कल्याणकारी कार्यों को करने में विफल रहती है तो राज्य उसका अधिग्रहण कर सकता है हिन्दू धर्म में बहु विवाह, हिन्दू धर्म का आवश्यक अंग नहीं है अत : राज्य इसे रोकने के लिए कानून बना सकता है प्रचार प्रसार का कदाचित यह अर्थ नहीं हुआ कि दूसरों को झांचा देकर, डरा धमकाकर, लालच देकर उसका धर्म परिवर्तन किया जाये। राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की स्थापना नहीं कर सकता,किन्तु अगर उसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय ने स्थापित किया है तो राज्य उसे वित्तीय सहायता देने से मना नहीं कर सकता। संविधान में धर्म को परिभाषित नहीं किया गया है, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर हिन्दू धर्म विश्वास वाद 1951 में धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा है कि यह व्यक्तियों व समुदायों के निजी आस्था का विषय है। जो ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी, नास्तिक कुछ भी हो सकता है। इसके अनुयायी कुछ विशिष्ट नैतिक संहिता का अनुसरण करते है, जो विभिन्न प्रकार के समारोह, कर्मकांड, पूजा पद्द्ति के रूप में दिखाई पड़ती है।भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश D S Thakur के अनुसार धर्म, व्यक्ति और उसकी परम सत्ता के बीच एक संचार माध्यम है, जो उसके आचरण को विनियमित करता है, इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है। इसप्रकार सामाजिक कल्याण व धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाते हुए ही इनका पालन करना उचित होगा।
##Question:भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द ) Critically discussthe right of religious freedom received under Article 25 of the Indian constitution. (150-200 words)##Answer:एप्रोच :- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की भारत में आवश्यकता बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लिखिये। तत्पश्चात युक्तियुक्त निर्बंधनों को स्पष्टकीजिये। अंत में संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर:- भारत में विभिन्न धर्मों, पंथों को मानने वाले निवास करते है तथा अपने धर्म के अनुसार मान्यताओं का पालन करते है. ऐसे में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने तथा सामाजिक भ्रातत्व बढ़ाने हेतु धर्म की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत शामिल किया गया है। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद 25 - 25 (1)- अंत:करण की स्वतंत्रता, धर्म को मानने, उसके आचरण करने, उसके प्रसार प्रचार की स्वतंत्रता 25 (2)- राज्य किसी आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक या लौकिक क्रियाकलाप को विनियमित करने के लिए कानून बना सकता है सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए तथा हिन्दू मंदिरों अथवा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने के सम्बन्ध में राज्य कानून बना सकता है, यद्यपि ये अधिकार स्वयं मेंपूर्ण नहीं हैलोक स्वास्थ्य, नैतिकता व स्वास्थ्य आदि युक्तियुक्त निर्बंधन के तहत इन्हे सीमित किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है जिन्हे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते है जैसे :- राज्य, अजान, भजन के लिए लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है गाय संरक्षण या किसी पशु के संरक्षण के नाम पर किसी समुदाय के व्यक्ति को प्रताड़ित करना या मोब लिंचिंग करना गंभीर अपराध। यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण ही पुजारी होने का दावा।किसी अन्य जाति का भी कोई व्यक्ति, मंदिर का पुजारी बन सकता है। बकरीद के अवसर पर बकरे की बलि, इस्लाम का मूल भाग नहीं है यदि कोई धार्मिक संस्था अपने कल्याणकारी कार्यों को करने में विफल रहती है तो राज्य उसका अधिग्रहण कर सकता है हिन्दू धर्म में बहु विवाह, हिन्दू धर्म का आवश्यक अंग नहीं है अत : राज्य इसे रोकने के लिए कानून बना सकता है प्रचार प्रसार का कदाचित यह अर्थ नहीं हुआ कि दूसरों को झांचा देकर, डरा धमकाकर, लालच देकर उसका धर्म परिवर्तन किया जाये। राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की स्थापना नहीं कर सकता,किन्तु अगर उसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय ने स्थापित किया है तो राज्य उसे वित्तीय सहायता देने से मना नहीं कर सकता। संविधान में धर्म को परिभाषित नहीं किया गया है, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर हिन्दू धर्म विश्वास वाद 1951 में धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा है कि यह व्यक्तियों व समुदायों के निजी आस्था का विषय है। जो ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी, नास्तिक कुछ भी हो सकता है। इसके अनुयायी कुछ विशिष्ट नैतिक संहिता का अनुसरण करते है, जो विभिन्न प्रकार के समारोह, कर्मकांड, पूजा पद्द्ति के रूप में दिखाई पड़ती है।भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश D S Thakur के अनुसार धर्म, व्यक्ति और उसकी परम सत्ता के बीच एक संचार माध्यम है, जो उसके आचरण को विनियमित करता है, इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है। इसप्रकार सामाजिक कल्याण व धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाते हुए ही इनका पालन करना उचित होगा।
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भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के वितरण को दर्शाते हुए उनकी अवस्थिति के निर्धारक कारकों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Locate the iron and steel industries in India and mention the determinant factors of their location. (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच- लौह एवं इस्पात उद्योग की महता तथा भारत में उसके इतिहास को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में लोहा एवं इस्पात उद्योग के वितरण को दर्शाइए| (नोट- यहां पर भारत का मानचित्र बनाकर प्रमुख लौह तथा इस्पात केंद्रों को दर्शाना जरूर चाहिए|) मुख्य भाग के अगले हिस्से में, लौह तथा इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों का भारत के संदर्भ में उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, लौह-इस्पात उद्योग की समस्याओं को संक्षिप्त रूप से लिखते हुए वर्तमान ट्रेंड्स से उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- लौह-इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है| लौह-इस्पात अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में काम आता है| अतः अन्य उद्योगों के विकास के लिए लौह एवं इस्पात उद्योग का विकास आवश्यक है| भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के विकास ने देश के औद्योगिक विकास को तीव्र गति प्रदान की है| उद्योगों के लगभग सभी क्षेत्र अपनी मूल आधारिक अवसंरचना के लिए मुख्य रूप से लौह एवं इस्पात उद्योग पर ही निर्भर रहते हैं| भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग का इतिहास 4000 वर्ष पुराना है जिसकी पुष्टि कुतुबमीनार के लौह स्तंभ से की जा सकती है| आधुनिक रूप में 1874 में बंगाल आयरन वर्क्स द्वारा लौह एवं इस्पात उद्योग की आधारशिला रखी गई थी परंतु वास्तविक प्रगति 1907 में जमशेदपुर में टाटा द्वारा फैक्ट्री स्थापित करने से हुई| दूसरी पंचवर्षीय योजना(1956-1961) में लौह-इस्पात उद्योग ने काफी प्रगति की| इस दौरान देश में कई सारे एकीकृत लौह एवं इस्पात संयंत्र की स्थापना की गई| भारत में लौह इस्पात उद्योग का वितरण भारत में छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के भागों को समाविष्ट करते हुए एक अर्धचंद्राकार प्रदेश है जो कि उच्च कोटि के लौह-अयस्क, अच्छे गुणवत्ता वाले कोकिंग कोयला और अन्य संपूरकों से समृद्ध है| नोट- यहां पर सबसे पहले एक भारत का मानचित्र बनाकर प्रमुख केंद्रों को दर्शाना चाहिए| भारत में 12 मुख्य लौह एवं इस्पात संयंत्र हैं| टिस्को को छोड़कर सभी बड़े एकीकृत संयंत्र सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं| सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत अधिकतर संयत्रों का पर्यवेक्षण भारतीय इस्पात प्राधिकरण(सेल) के द्वारा किया जाता है| भारत के प्रमुख इस्पात संयंत्र एवं उनकी अवस्थिति - टाटा लौह एवं इस्पात कंपनी - जमशेदपुर; स्वर्णरेखा एवं खरकई नदी के संगम पर; लौह-अयस्क- मयूरभंज, नवामंडी; कोकिंग कोल- झरिया, बोकारो; इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड(इस्को )- तीन संयंत्र -बर्नपुर, हीरापुर तथा कुल्टी; लौह-अयस्क- गोवा से; कोयला- झरिया एवं रामनगर; भद्रावती लौह एवं इस्पात संयंत्र - लौह-अयस्क- बाबा बुदन पहाड़ी; भिलाई लौह एवं इस्पात संयंत्र - छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में रूस के सहयोग से; लौह-अयस्क- दल्ली राजहरा की खानों से; कोयला- कोरबा, बोकारो एवं झरिया; राउरकेला लौह एवं इस्पात संयंत्र- उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले में जर्मनी के सहयोग से; लौह अयस्क- मयूरभंज; कोयला- बोकारो, झरिया, तालचर तथा कोरबा; दुर्गापुर इस्पात संयंत्र - ब्रिटेन के सहयोग से दुर्गापुर शहर में; कोयला- रानीगंज; लौह-अयस्क- सिंहभूम; बोकारो इस्पात संयंत्र - सोवियत संघ की मदद से स्थापित; लौह अयस्क- क्योंझार जिले से; कोयला- झरिया, बोकारो; सलेम इस्पात संयंत्र; विजयनगर इस्पात संयंत्र - हॉस्पेट के निकट कर्नाटक के बेल्लारी जिले में; विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र - एकमात्र इस्पात संयंत्र जो तटीय क्षेत्र में अवस्थित; टाईतारी इस्पात संयत्र; डोलवी इस्पात संयंत्र; टाटा स्टील, कलिंगनगर; पास्को, पारादीप; इसके अलावा भारत में बहुत सारे लघु इस्पात संयंत्र हैं जिसकी क्षमता 10000 टन से लेकर 5 लाख टन के बीच है| स्क्रैपलोहे की बढ़ती मात्रा एवं इस्पात की मांग के चलते ये शहरी क्षेत्रों के निकट अवस्थित है| इनमें कम निवेश की आवश्यकता होती है तथा उत्पादन खर्च भी कम होता है| लौह एवं इस्पात उद्योगों की अवस्थिति के निर्धारक कारक लौह एवं इस्पात उद्योग के लिए लौह-अयस्क, मैंगनीज, चूना पत्थर, ईंधन, कोकिंग कोल तथा अग्निसह मिट्टी(Fire Clay) आवश्यक है| इन संयंत्रों में बड़ी मात्रा में कोयला तथा लौह खनिज की खपत होती है फलस्वरूप येसंयंत्र या तो कोयले की खानों के निकट अवस्थित है या लौह-अयस्क के भंडार के निकट अवस्थित है| इस उद्योग के लिए आवश्यक कच्चे माल छोटानागपुर पठार में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं| लौह-अयस्क के प्रगलन के लिए आवश्यक कच्चे माल के मामले में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल धनी राज्य हैं| भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग मुख्य रूप से कच्चे माल की सुविधा वाले क्षेत्रों में ही केंद्रित हैं| इस उद्योग में प्रयोग होने वाला कच्चा माल कोयला, लौह-अयस्क, चूना-पत्थर, मैंगनीज आदि भारी एवं कम मूल्य का होता है| अतः इसे दूर से लाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प नहीं है| 1 टन इस्पात के निर्माण के लिए 2 टन लौह-अयस्क, 2 टन कोयला, 0.5 टन चूना पत्थर एवं 0.5 टन अन्य कच्चे माल जैसे- मैंगनीज, डोलामाईट आदि की आवश्यकता होती है| यही कारण है कि भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण में कोयले की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण है| इसके बाद लौह-अयस्क की उपलब्धता का स्थान आता है| परिवहन सुविधा - भारत में रेल मार्ग कोयले एवं लौह-अयस्क वाले क्षेत्रों को जोड़ने का कार्य करते हैं| रे ल लौह-अयस्क वाले क्षेत्रों के कारखानों के लिए कोयला ले जाती है एवं वापसी में लौह अयस्क लाती है| इस प्रकार कोयला एवं लौह-अयस्क क्षेत्रों में परस्पर आदान-प्रदान के कारण दोनों ही क्षेत्रों में लौह एवं इस्पात के कारखाने की स्थापना की जाती है| इसके अतिरिक्त, लौह एवं कोयला क्षेत्रों के मध्य भी इस उद्योग का स्थानीकरण देखने को मिलता है| भारत में सदैव लौह-इस्पात उद्योग का स्थानीयकरण न्यूनतम परिवहन लागत के सिद्धांत का पालन करता है| कोयला क्षेत्रों में स्थित लौह-इस्पात संयंत्र - बर्नपुर-हीरापुर-कुल्टी; दुर्गापुर; बोकारो; लौह-अयस्क क्षेत्रों में स्थित लौह-इस्पात संयंत्र - भिलाई; राउरकेला; भद्रावती; सेलम; विजयनगर; कोयला एवं लौह-अयस्क के मध्य स्थित केंद्र - जमशेदपुर; तटीय क्षेत्रों में स्थित संयंत्र - विशाखापट्टनम; लौह एवं इस्पात उद्योग अधिक निवेश की जरुरत, अप्रचलित मशीनरी, सार्वजनिक कारखानों की अकुशलता एवं कुप्रबंधन; नियंत्रित मूल्य; लघु इस्पात संयंत्रों का घाटे में चलना; अच्छे इंधन तथा कोकिंग कोल की कमी,उत्पादित माल की गुणवत्ता में कमी तथाअंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याओं से ग्रसित है| इस्पात मंत्रालय इन समस्याओं को दूर करने हेतु प्रयासरत है तथा भारत के आर्थिक विकास में इस उद्योग की महती भूमिका को देखते हुए इसकी सभी समस्याओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है|
##Question:भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के वितरण को दर्शाते हुए उनकी अवस्थिति के निर्धारक कारकों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द, 10 अंक) Locate the iron and steel industries in India and mention the determinant factors of their location. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- लौह एवं इस्पात उद्योग की महता तथा भारत में उसके इतिहास को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, भारत में लोहा एवं इस्पात उद्योग के वितरण को दर्शाइए| (नोट- यहां पर भारत का मानचित्र बनाकर प्रमुख लौह तथा इस्पात केंद्रों को दर्शाना जरूर चाहिए|) मुख्य भाग के अगले हिस्से में, लौह तथा इस्पात उद्योग की अवस्थिति के निर्धारक कारकों का भारत के संदर्भ में उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, लौह-इस्पात उद्योग की समस्याओं को संक्षिप्त रूप से लिखते हुए वर्तमान ट्रेंड्स से उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- लौह-इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है| लौह-इस्पात अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में काम आता है| अतः अन्य उद्योगों के विकास के लिए लौह एवं इस्पात उद्योग का विकास आवश्यक है| भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के विकास ने देश के औद्योगिक विकास को तीव्र गति प्रदान की है| उद्योगों के लगभग सभी क्षेत्र अपनी मूल आधारिक अवसंरचना के लिए मुख्य रूप से लौह एवं इस्पात उद्योग पर ही निर्भर रहते हैं| भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग का इतिहास 4000 वर्ष पुराना है जिसकी पुष्टि कुतुबमीनार के लौह स्तंभ से की जा सकती है| आधुनिक रूप में 1874 में बंगाल आयरन वर्क्स द्वारा लौह एवं इस्पात उद्योग की आधारशिला रखी गई थी परंतु वास्तविक प्रगति 1907 में जमशेदपुर में टाटा द्वारा फैक्ट्री स्थापित करने से हुई| दूसरी पंचवर्षीय योजना(1956-1961) में लौह-इस्पात उद्योग ने काफी प्रगति की| इस दौरान देश में कई सारे एकीकृत लौह एवं इस्पात संयंत्र की स्थापना की गई| भारत में लौह इस्पात उद्योग का वितरण भारत में छत्तीसगढ़, उत्तरी उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के भागों को समाविष्ट करते हुए एक अर्धचंद्राकार प्रदेश है जो कि उच्च कोटि के लौह-अयस्क, अच्छे गुणवत्ता वाले कोकिंग कोयला और अन्य संपूरकों से समृद्ध है| नोट- यहां पर सबसे पहले एक भारत का मानचित्र बनाकर प्रमुख केंद्रों को दर्शाना चाहिए| भारत में 12 मुख्य लौह एवं इस्पात संयंत्र हैं| टिस्को को छोड़कर सभी बड़े एकीकृत संयंत्र सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं| सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत अधिकतर संयत्रों का पर्यवेक्षण भारतीय इस्पात प्राधिकरण(सेल) के द्वारा किया जाता है| भारत के प्रमुख इस्पात संयंत्र एवं उनकी अवस्थिति - टाटा लौह एवं इस्पात कंपनी - जमशेदपुर; स्वर्णरेखा एवं खरकई नदी के संगम पर; लौह-अयस्क- मयूरभंज, नवामंडी; कोकिंग कोल- झरिया, बोकारो; इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड(इस्को )- तीन संयंत्र -बर्नपुर, हीरापुर तथा कुल्टी; लौह-अयस्क- गोवा से; कोयला- झरिया एवं रामनगर; भद्रावती लौह एवं इस्पात संयंत्र - लौह-अयस्क- बाबा बुदन पहाड़ी; भिलाई लौह एवं इस्पात संयंत्र - छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में रूस के सहयोग से; लौह-अयस्क- दल्ली राजहरा की खानों से; कोयला- कोरबा, बोकारो एवं झरिया; राउरकेला लौह एवं इस्पात संयंत्र- उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले में जर्मनी के सहयोग से; लौह अयस्क- मयूरभंज; कोयला- बोकारो, झरिया, तालचर तथा कोरबा; दुर्गापुर इस्पात संयंत्र - ब्रिटेन के सहयोग से दुर्गापुर शहर में; कोयला- रानीगंज; लौह-अयस्क- सिंहभूम; बोकारो इस्पात संयंत्र - सोवियत संघ की मदद से स्थापित; लौह अयस्क- क्योंझार जिले से; कोयला- झरिया, बोकारो; सलेम इस्पात संयंत्र; विजयनगर इस्पात संयंत्र - हॉस्पेट के निकट कर्नाटक के बेल्लारी जिले में; विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र - एकमात्र इस्पात संयंत्र जो तटीय क्षेत्र में अवस्थित; टाईतारी इस्पात संयत्र; डोलवी इस्पात संयंत्र; टाटा स्टील, कलिंगनगर; पास्को, पारादीप; इसके अलावा भारत में बहुत सारे लघु इस्पात संयंत्र हैं जिसकी क्षमता 10000 टन से लेकर 5 लाख टन के बीच है| स्क्रैपलोहे की बढ़ती मात्रा एवं इस्पात की मांग के चलते ये शहरी क्षेत्रों के निकट अवस्थित है| इनमें कम निवेश की आवश्यकता होती है तथा उत्पादन खर्च भी कम होता है| लौह एवं इस्पात उद्योगों की अवस्थिति के निर्धारक कारक लौह एवं इस्पात उद्योग के लिए लौह-अयस्क, मैंगनीज, चूना पत्थर, ईंधन, कोकिंग कोल तथा अग्निसह मिट्टी(Fire Clay) आवश्यक है| इन संयंत्रों में बड़ी मात्रा में कोयला तथा लौह खनिज की खपत होती है फलस्वरूप येसंयंत्र या तो कोयले की खानों के निकट अवस्थित है या लौह-अयस्क के भंडार के निकट अवस्थित है| इस उद्योग के लिए आवश्यक कच्चे माल छोटानागपुर पठार में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं| लौह-अयस्क के प्रगलन के लिए आवश्यक कच्चे माल के मामले में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल धनी राज्य हैं| भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग मुख्य रूप से कच्चे माल की सुविधा वाले क्षेत्रों में ही केंद्रित हैं| इस उद्योग में प्रयोग होने वाला कच्चा माल कोयला, लौह-अयस्क, चूना-पत्थर, मैंगनीज आदि भारी एवं कम मूल्य का होता है| अतः इसे दूर से लाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प नहीं है| 1 टन इस्पात के निर्माण के लिए 2 टन लौह-अयस्क, 2 टन कोयला, 0.5 टन चूना पत्थर एवं 0.5 टन अन्य कच्चे माल जैसे- मैंगनीज, डोलामाईट आदि की आवश्यकता होती है| यही कारण है कि भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण में कोयले की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण है| इसके बाद लौह-अयस्क की उपलब्धता का स्थान आता है| परिवहन सुविधा - भारत में रेल मार्ग कोयले एवं लौह-अयस्क वाले क्षेत्रों को जोड़ने का कार्य करते हैं| रे ल लौह-अयस्क वाले क्षेत्रों के कारखानों के लिए कोयला ले जाती है एवं वापसी में लौह अयस्क लाती है| इस प्रकार कोयला एवं लौह-अयस्क क्षेत्रों में परस्पर आदान-प्रदान के कारण दोनों ही क्षेत्रों में लौह एवं इस्पात के कारखाने की स्थापना की जाती है| इसके अतिरिक्त, लौह एवं कोयला क्षेत्रों के मध्य भी इस उद्योग का स्थानीकरण देखने को मिलता है| भारत में सदैव लौह-इस्पात उद्योग का स्थानीयकरण न्यूनतम परिवहन लागत के सिद्धांत का पालन करता है| कोयला क्षेत्रों में स्थित लौह-इस्पात संयंत्र - बर्नपुर-हीरापुर-कुल्टी; दुर्गापुर; बोकारो; लौह-अयस्क क्षेत्रों में स्थित लौह-इस्पात संयंत्र - भिलाई; राउरकेला; भद्रावती; सेलम; विजयनगर; कोयला एवं लौह-अयस्क के मध्य स्थित केंद्र - जमशेदपुर; तटीय क्षेत्रों में स्थित संयंत्र - विशाखापट्टनम; लौह एवं इस्पात उद्योग अधिक निवेश की जरुरत, अप्रचलित मशीनरी, सार्वजनिक कारखानों की अकुशलता एवं कुप्रबंधन; नियंत्रित मूल्य; लघु इस्पात संयंत्रों का घाटे में चलना; अच्छे इंधन तथा कोकिंग कोल की कमी,उत्पादित माल की गुणवत्ता में कमी तथाअंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याओं से ग्रसित है| इस्पात मंत्रालय इन समस्याओं को दूर करने हेतु प्रयासरत है तथा भारत के आर्थिक विकास में इस उद्योग की महती भूमिका को देखते हुए इसकी सभी समस्याओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है|
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महिलाओं के स्वास्थ्य एवं रोजगार से संबन्धित मुद्दों का उल्लेख करते हुए सरकार द्वारा इस संबंध में किए जा रहे प्रयासों का वर्णन कीजिए। (150-250 शब्द) Mention issues related to women"s health and employment and describe the efforts being made by the government in this regard. (150–250 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महिलाओं की स्थिति का विवरण दीजिए। इसके बाद प्रथम भाग में स्वास्थ्य एवं रोजगार से संबन्धित मुद्दों का उल्लेख कीजिए। मुद्दों के समाधान के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का वर्णन कीजिए। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। भारत में महिलाओं की आबादी लगभग पचास प्रतिशत है फिर भी पुरुषों के मुक़ाबले प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। लैन्सेट रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक तीसरी महिला में कैल्सियम, आइरन तत्वों की कमी पाई जाती है। महिलाओं के स्वास्थ्य एवं रोजगार संबंधी मुद्दे: स्वास्थ्य संबंधी: कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या: आंकड़ों के अनुसार विगत 20 वर्षों में भारत में लगभग 10 मिलियन महिलाओं ने गर्भपात कराया है। महिलाओं के संबंध में घरेलू हिंसा महिलाओं को उचित पोषण स्तर प्राप्त न होना खुले में शौच के कारण परंपरागत रूप से खाने बनाने के लिए चूल्हे का प्रयोग करने से वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है। रोजगार संबंधी: श्रम बल में कम भागीदारी पुरुषों के मुक़ाबले कम भागीदारी कार्यस्थल पर यौन शोषण उच्च पदों पर नियुक्ति कम होना रोजगार के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ सरकार द्वारा इस संबंध में किए जा रहे प्रयास: सरकार द्वारा महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के संबंध में सुधार के लिए सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे हैं: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ : भ्रूण ह्त्या, शिशु हत्या आदि समस्याओं के समाधान एवं साक्षारता में वृद्धि के लिए सरकार द्वारा किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना : गर्भवती महिलाओं को श्रम हानी के रूप में प्रोत्साहन देने के लिए। राष्ट्रीय पोषण मिशन : स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए इसे लागू किया जा रहा है। स्वधार योजना राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण योजना रोजगार संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए भी कई महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं: मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम: इसके अंतर्गत 26 हफ्ते का सवैतनिक अवकाश प्रदान करने की व्यवस्था की गयी है। शॉर्ट स्टे योजना सरकारी नौकरियों में आरक्षण: विभिन्न राज्यों एवं केंद्र सरकार के अंतर्गत रोजगार संबंधी सुगमता के लिए प्रयास किया जा रहा है। महिला संबंधी स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार प्रयास कर रही है। भारतीय समाज में महिलाओं को स्वास्थ्य एवं रोजगार के संबंध में वर्तमान में भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि सरकार ने इस संबंध में तीव्र प्रयास किया है। जिससे सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। पारिवारिक व्यवस्था में बदलाव हुआ है। महिलाएं भी आधुनिक रोजगार में भागीदार बन रही हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है।
##Question:महिलाओं के स्वास्थ्य एवं रोजगार से संबन्धित मुद्दों का उल्लेख करते हुए सरकार द्वारा इस संबंध में किए जा रहे प्रयासों का वर्णन कीजिए। (150-250 शब्द) Mention issues related to women"s health and employment and describe the efforts being made by the government in this regard. (150–250 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महिलाओं की स्थिति का विवरण दीजिए। इसके बाद प्रथम भाग में स्वास्थ्य एवं रोजगार से संबन्धित मुद्दों का उल्लेख कीजिए। मुद्दों के समाधान के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का वर्णन कीजिए। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। भारत में महिलाओं की आबादी लगभग पचास प्रतिशत है फिर भी पुरुषों के मुक़ाबले प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। लैन्सेट रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक तीसरी महिला में कैल्सियम, आइरन तत्वों की कमी पाई जाती है। महिलाओं के स्वास्थ्य एवं रोजगार संबंधी मुद्दे: स्वास्थ्य संबंधी: कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या: आंकड़ों के अनुसार विगत 20 वर्षों में भारत में लगभग 10 मिलियन महिलाओं ने गर्भपात कराया है। महिलाओं के संबंध में घरेलू हिंसा महिलाओं को उचित पोषण स्तर प्राप्त न होना खुले में शौच के कारण परंपरागत रूप से खाने बनाने के लिए चूल्हे का प्रयोग करने से वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है। रोजगार संबंधी: श्रम बल में कम भागीदारी पुरुषों के मुक़ाबले कम भागीदारी कार्यस्थल पर यौन शोषण उच्च पदों पर नियुक्ति कम होना रोजगार के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ सरकार द्वारा इस संबंध में किए जा रहे प्रयास: सरकार द्वारा महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के संबंध में सुधार के लिए सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए जा रहे हैं: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ : भ्रूण ह्त्या, शिशु हत्या आदि समस्याओं के समाधान एवं साक्षारता में वृद्धि के लिए सरकार द्वारा किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना : गर्भवती महिलाओं को श्रम हानी के रूप में प्रोत्साहन देने के लिए। राष्ट्रीय पोषण मिशन : स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए इसे लागू किया जा रहा है। स्वधार योजना राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण योजना रोजगार संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए भी कई महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं: मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम: इसके अंतर्गत 26 हफ्ते का सवैतनिक अवकाश प्रदान करने की व्यवस्था की गयी है। शॉर्ट स्टे योजना सरकारी नौकरियों में आरक्षण: विभिन्न राज्यों एवं केंद्र सरकार के अंतर्गत रोजगार संबंधी सुगमता के लिए प्रयास किया जा रहा है। महिला संबंधी स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार प्रयास कर रही है। भारतीय समाज में महिलाओं को स्वास्थ्य एवं रोजगार के संबंध में वर्तमान में भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि सरकार ने इस संबंध में तीव्र प्रयास किया है। जिससे सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। पारिवारिक व्यवस्था में बदलाव हुआ है। महिलाएं भी आधुनिक रोजगार में भागीदार बन रही हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है।
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Recently, Universal Basic Income (UBI) was proposed as means to eliminate poverty. Critically examine the suitability of the proposal. (10 Marks/ 150 Words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CONCEPT OF FISCAL DEFICIT - THE IMPLICATIONS OF FISCAL DEFICIT POSITIVE IMPACTS NEGATIVE IMPACTS - MEASURES TO REDUCE SUCH DEFICIT -CONCLUSION ANSWER: There are 6 types of budgetary deficits. Fiscal deficit (FD) is the most composite (usually largest) of budgetary deficits in India. CONCEPT OF FISCAL DEFICIT 1) MEANING It measures the total borrowings of the government from all sources during a financial year. 2) DEFINITION It is defined as the excess of the total expenditure of the government over its total receipts, other than borrowings, during a financial year. 3) FORMULA FISCAL DEFICIT = TOTAL EXPENDITURE - TOTAL RECEIPT [EXCEPT BORROWINGS] = TOTAL EXPENDITURE - [REVENUE RECEIPTS + NON-DEBT CREATING CAPITAL ASSETS] 4) FRBMA, 2003 As per this act, the government had to reduce FD to 3% of GDP or less by 2008. However, the act has been amended several times. This year, the target for FD has been stated to be 3.3% of GDP. In 2008, the FD increased to 6% from 3% of GDP- now it is gradually reducing. THE IMPLICATIONS OF FISCAL DEFICIT Its impact on economic development depends upon the use that these borrowed funds have been subject to ADVERSE IMPACT OF FISCAL DEFICIT: 1) INCREASES PUBLIC DEBT It increases the future interest liabilities of the government. This in turn adversely affects developmental expenditure. 2) CREATES INFLATION This is because it increases aggregate demand in the economy. (More or less all deficits are inflationary) 3) VULNERABILITY A very high FD raises the vulnerability of the economy to economic shocks because it reduces the capacity of the government to intervene in the economy in the form of bailouts, fiscal stimulus etc. 4) CROWDING OUT This term means the adverse effect on private investment due to the increase in interest rate (as a result of higher FD). It adversely affects capital formation-The demand for funds goes up, hence interest rate goes up. Bond supply increases hence bond prices decrease and thus the interest rate increases. Another way of looking at this is that the government borrows more leaving less for the private sector. FAVOURABLE IMPACTS OF FISCAL DEFICIT 1) CROWDING IN Government expenditure, especially on infrastructure, encourages private investment. (It is opposite to crowding out). If the government spends money more effectively then crowding in is possible. 2) KEEPS THE ECONOMY GOING The deficit in a limited/ contained manner acts as an oil to the economy. It creates infrastructure, ensures contract enforcement through law and order, ensures investment during the downturns etc. That is why it is never desirable that the fiscal deficit in an economy be zero. MEASURES TO REDUCE SUCH DEFICIT I MEASURES TO REDUCE EXPENDITURE 1) BIMAL JALAN COMMITTEE (EXPENDITURE MANAGEMENT COMMISSION), 2014 It suggested austerity measures such as reducing expenditure on general administration like five-star hotel meetings by government servants, avoiding business class travel, avoiding foreign delegations (to adopt video conferencing), food subsidies and DBT (direct benefit transfers). 2) OTHER MEASURES (already taken) The NPS (National Pension Scheme) is being implemented since 2004. 3) QUALITY OF EXPENDITURE The government must focus on the quality of expenditure- It must switch from consumption to investment expenditure rather than reduce expenditure. II MEASURES TOINCREASEREVENUE RECEIPTS 1) TAX REFORMS This area should be given the main focus. Many reforms have already been initiated in this light. 2) NON-TAX/ OTHER REFORMS PSU reforms, reforms of departmental undertakings (like railways etc.) should be made so that there is no burden upon the government. 3) NON-DEBT RECEIPTS Disinvestment (major share is from this source in the non-debt type/ category), sale of idle land (as per the Vijay Kelkar committee) should be done. For example, the railways sold some land as per this committee’s recommendations. The main focus of the government should be on increasing revenue receipts , rather than reducing expenditure. This is because there is practically not much scope for reducing the government’s expenditure. Capital expenditure is too low, so that needs to be increased. In day-day (revenue) expenditure, there is not much scope for reduction. In revenue receipts, the main focus should be upon tax reforms . Regarding reducing the non-debt creating capital receipts, it is not desirable/ effective to increase the same. This because, though it would reduce the fiscal deficit, yet if either one borrows or sells assets (disinvestment), it practically has the same negative effect- If you are borrowing, you are increasing your future liabilities, and if you sell your assets, you are losing your future source of income.
##Question:Recently, Universal Basic Income (UBI) was proposed as means to eliminate poverty. Critically examine the suitability of the proposal. (10 Marks/ 150 Words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CONCEPT OF FISCAL DEFICIT - THE IMPLICATIONS OF FISCAL DEFICIT POSITIVE IMPACTS NEGATIVE IMPACTS - MEASURES TO REDUCE SUCH DEFICIT -CONCLUSION ANSWER: There are 6 types of budgetary deficits. Fiscal deficit (FD) is the most composite (usually largest) of budgetary deficits in India. CONCEPT OF FISCAL DEFICIT 1) MEANING It measures the total borrowings of the government from all sources during a financial year. 2) DEFINITION It is defined as the excess of the total expenditure of the government over its total receipts, other than borrowings, during a financial year. 3) FORMULA FISCAL DEFICIT = TOTAL EXPENDITURE - TOTAL RECEIPT [EXCEPT BORROWINGS] = TOTAL EXPENDITURE - [REVENUE RECEIPTS + NON-DEBT CREATING CAPITAL ASSETS] 4) FRBMA, 2003 As per this act, the government had to reduce FD to 3% of GDP or less by 2008. However, the act has been amended several times. This year, the target for FD has been stated to be 3.3% of GDP. In 2008, the FD increased to 6% from 3% of GDP- now it is gradually reducing. THE IMPLICATIONS OF FISCAL DEFICIT Its impact on economic development depends upon the use that these borrowed funds have been subject to ADVERSE IMPACT OF FISCAL DEFICIT: 1) INCREASES PUBLIC DEBT It increases the future interest liabilities of the government. This in turn adversely affects developmental expenditure. 2) CREATES INFLATION This is because it increases aggregate demand in the economy. (More or less all deficits are inflationary) 3) VULNERABILITY A very high FD raises the vulnerability of the economy to economic shocks because it reduces the capacity of the government to intervene in the economy in the form of bailouts, fiscal stimulus etc. 4) CROWDING OUT This term means the adverse effect on private investment due to the increase in interest rate (as a result of higher FD). It adversely affects capital formation-The demand for funds goes up, hence interest rate goes up. Bond supply increases hence bond prices decrease and thus the interest rate increases. Another way of looking at this is that the government borrows more leaving less for the private sector. FAVOURABLE IMPACTS OF FISCAL DEFICIT 1) CROWDING IN Government expenditure, especially on infrastructure, encourages private investment. (It is opposite to crowding out). If the government spends money more effectively then crowding in is possible. 2) KEEPS THE ECONOMY GOING The deficit in a limited/ contained manner acts as an oil to the economy. It creates infrastructure, ensures contract enforcement through law and order, ensures investment during the downturns etc. That is why it is never desirable that the fiscal deficit in an economy be zero. MEASURES TO REDUCE SUCH DEFICIT I MEASURES TO REDUCE EXPENDITURE 1) BIMAL JALAN COMMITTEE (EXPENDITURE MANAGEMENT COMMISSION), 2014 It suggested austerity measures such as reducing expenditure on general administration like five-star hotel meetings by government servants, avoiding business class travel, avoiding foreign delegations (to adopt video conferencing), food subsidies and DBT (direct benefit transfers). 2) OTHER MEASURES (already taken) The NPS (National Pension Scheme) is being implemented since 2004. 3) QUALITY OF EXPENDITURE The government must focus on the quality of expenditure- It must switch from consumption to investment expenditure rather than reduce expenditure. II MEASURES TOINCREASEREVENUE RECEIPTS 1) TAX REFORMS This area should be given the main focus. Many reforms have already been initiated in this light. 2) NON-TAX/ OTHER REFORMS PSU reforms, reforms of departmental undertakings (like railways etc.) should be made so that there is no burden upon the government. 3) NON-DEBT RECEIPTS Disinvestment (major share is from this source in the non-debt type/ category), sale of idle land (as per the Vijay Kelkar committee) should be done. For example, the railways sold some land as per this committee’s recommendations. The main focus of the government should be on increasing revenue receipts , rather than reducing expenditure. This is because there is practically not much scope for reducing the government’s expenditure. Capital expenditure is too low, so that needs to be increased. In day-day (revenue) expenditure, there is not much scope for reduction. In revenue receipts, the main focus should be upon tax reforms . Regarding reducing the non-debt creating capital receipts, it is not desirable/ effective to increase the same. This because, though it would reduce the fiscal deficit, yet if either one borrows or sells assets (disinvestment), it practically has the same negative effect- If you are borrowing, you are increasing your future liabilities, and if you sell your assets, you are losing your future source of income.
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स्वतंत्रता पश्चात ग्रामीण उत्थान के लिए की गयी सरकारी पहलों को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पडा था| अतः इस सन्दर्भ में सरकार के दृष्टिकोण में बदलाव आ रहा है| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक) After Independence, Government initiatives for rural uplift had faced various challenges. Therefore,there is a change in the approach of the government, in this context. Explain (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में ग्रामीण समाज की स्थिति स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में ग्रामीण उत्थान के लिए की गयी सरकारी पहलों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में सरकारी पहलों द्वारा सामना की गयी विभिन्न चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- ग्रामीण समाज के उत्थान के सन्दर्भ में सरकार के दृष्टिकोण में आ रहे बदलावों को स्पष्ट कीजिये| 5- अंतिम में बदलावों के सकारात्मक के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत में स्तरीकृत जमींदारी का विकास हुआ इससे करों का बोझ निरन्तर बढ़ता गया, मानसून के कमजोर होने अथवा अकाल की स्थिति में भी कर वसूला जाता था अतः साहूकार के रूप में एक अन्य परजीवी वर्ग का विकास हुआ| इसके कारण कृषि निवेश में कमी आई और भूमि उपज में गिरावट आई जिसके परिणाम स्वरुप आय के स्रोतों में कमी आई| इसके साथ ही करों का बोझ, ऋणों का बोझ और चक्रवृद्धि ब्याज के बोझ भारतीय समाज के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न किया|जब समाज समृद्ध होता है तो वह अपने निम्नतम वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करता है किन्तु यदि समाज कमजोर स्थिति में है तब समाज के निम्नवर्ग का शोषण होता है| आर्थिक अस्थिरता एवं अनिश्चितता के कारण रुढिवादिता का विस्तार होता है| अतः उपरोक्त आर्थिक संकट के उपोत्पाद के रूप में भारत में सामाजिक विघटन, अंधविश्वास, रुढिवादिता, साम्प्रदायिकता, कमजोर वर्गों का उत्पीडन आदि समस्याओं का जन्म हुआ| और इस प्रकार अंग्रेजों ने भारतीय ग्रामीण समाज को व्यवस्थित रूप से तोड़ दिया| स्वतंत्रता के समय भारतीय ग्रामीण समाज आय के सीमित स्रोत, जमींदारी, निम्न ग्रामीण अवसंरचना, निम्न वित्तीय समावेशन, साहूकारी व्यवस्था जैसी समस्याओं तथा अस्पृश्यता जैसी विभिन्न सामाजिक कुरीतियों से ग्रसित था अतः स्वतंत्रता पश्चात भारत सरकार ने ग्रामीण समाज के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किये| स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण समाज उत्थान के प्रयास o स्वतंत्रता के बाद प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण समाज के पुनरुत्थान को सुनिश्चित करने हेतु सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी गयी o कृषि का आधुनिकीकरण तथा उत्पादन क्षमता को बढ़ाना, सामुदायिक भावनाओं को प्रेरित करते हुए आधुनिकता सुनिश्चित करना, सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के मुख्य उद्देश्य थे o परन्तु इन सामुदायिक विकास कार्यक्रमों से यथोचित लाभ नहीं हुएइसके मुख्य कारण नीतियों के अनुपालन सम्बन्धित रहे| o कालान्तर में ग्रामीण समाज के विकास के संदर्भ में अनेकों नीतियाँ बनायी गयीं जिसमें हरित क्रान्ति, सहकारिता को प्रोत्साहन, समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम(IRDP), प्रधानमंत्री 20 सूत्री कार्यक्रम, CAPART, इंदिरा आवास योजना, फसल बीमा योजना, जवाहर रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना, मध्यान्ह भोजन योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्व शिक्षा अभियान, राजीवगांधी विद्युतीकरण परियोजना/दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, मनरेगा, NRHM, आजीविका(NRLM), PM कृषि सिंचाई योजना, संपदा योजना, PM सांसद आदर्श ग्राम योजना, आयुष्मान इत्यादि प्रमुख हैं|परन्तु इन सब कार्यक्रमों के बावजूद जमीनी स्तर पर इन नीतियों के अनुपालन में विभिन्न चुनौतियां पायी गयीं नीतियों के अनुपालन की चुनौतियां o अवसंरचनात्मक स्तर पर मूलभूत अवसंरचना का अभाव जिसमें पक्की सड़कें, बेहतर माल ढुलाई व्यवस्था, कृषि आधारित उद्योगों की कमी, विद्युत् आपूर्ति एवं अन्न भंडारण के साधनों का अभाव इत्यादि प्रमुख हैं o राजनीतिक स्तर पर, पंचायतीराज व्यवस्था का सुसंगठित न होना, ग्रामीण पुनरुत्थान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, जाति-धर्म एवं लिंग के आधार पर समाज में पृथक्करण की समस्या o आर्थिक स्तर पर, बजटीय आवंटन में अनुशासनहीनता तथा आवंटन के उचित प्रबंधन का अभाव o सांस्कृतिक स्तर पर नकारात्मक दृष्टिकोण की बहुलता तथा प्रशासनिक-राजनीतिक स्तर पर व्याप्त पूर्वाग्रह एवं पक्षपातपूर्ण रवैये आदि मुख्य अवरोधक हैं| o उपरोक्त के अतिरिक्त ग्रामीण आवश्यकताओं का अपर्याप्त अध्ययन, क्रियान्वयन के स्तर पर समानुभूति और दृष्टिकोण की कमी होना, o प्रत्येक क्षेत्र में सभी स्तरों पर मध्यस्थों की उपस्थिति जिसके कारण सब्सिडी का ग्रामीण नागरिकों तक न पहुँच पाना o समर्थन मूल्य के राजनीतिकरण के द्वारा उनकी प्रासंगिकता कम करना आदि चुनौतियों के कारण उपरोक्त नीतियां/योजनायें आंशिक सफलता ही प्राप्त कर सकीं| अतः निकट वर्षों में, भारत सरकार की ग्रामीण उत्थान सम्बन्धी नीतियों के दृष्टिकोण में बदलाव स्पष्ट होते हैं सरकार के दृष्टिकोण में बदलाव o नीतियों के क्रियान्वयन सम्बन्धी पूर्ववर्ती चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, इनके समाधान हेतु वर्ष 2004 में तात्कालिक राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम ने PURA(प्रोवाइडिंग अर्बन एमेनिटीज इन रूरल एरिया) की संकल्पना प्रस्तुत की| यह संकल्पना एक समावेशी संकल्पना है जिसमें ग्रामीण समाज की सभी आवश्यकताओं को संदर्भित किया गया है| o PURA अंतर्गत 12 मुख्य उद्देश्यों के द्वारा अवसंरचनात्मक जैसे शिक्षा स्वास्थ्य, सड़क आदि, राजनीतिक जिसके अंतर्गत पंचायत को प्रोत्साहन, आर्थिक जैसे उचित कौशल प्रबंधन, बेहतर बजटीय आवंटन तथा सांस्कृतिक जिसमें धर्मनिरपेक्षता एवं सहभागिता को प्रोत्साहित करना इत्यादि प्रमुख लक्ष्य रखे गए| o उत्पादन एवं मूल्यों में वृद्धि किन्तु कृषक आय में गिरावट के विरोधाभास को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2011 में DBT एवं 2014-15 में JAM की परिकल्पना द्वारा आर्थिक सहयोग को और अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाने के प्रयास भी किये जा रहे हैं ताकि सरकार का सहयोग ग्रामीण समाज तक सुचारू रूप से पहुच सके| o PM सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत उपरोक्त सभी नीतियों का ग्रामीण संदर्भ में अनुपालन करने के मानक हेतु आदर्श ग्राम भी बनाये जा रहे हैं| सरकार के दृष्टिकोण में आय रहे बदलाव सरकारी नीतियों को समग्र बनाने में सहायक हैं| इसमें नीतिगत, क्रियान्वयन एवं परिणाम आधारित दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है जिसके निकट भविष्य में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं|
##Question:स्वतंत्रता पश्चात ग्रामीण उत्थान के लिए की गयी सरकारी पहलों को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पडा था| अतः इस सन्दर्भ में सरकार के दृष्टिकोण में बदलाव आ रहा है| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक) After Independence, Government initiatives for rural uplift had faced various challenges. Therefore,there is a change in the approach of the government, in this context. Explain (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में ग्रामीण समाज की स्थिति स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में ग्रामीण उत्थान के लिए की गयी सरकारी पहलों को सूचीबद्ध कीजिये 3- दुसरे भाग में सरकारी पहलों द्वारा सामना की गयी विभिन्न चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- ग्रामीण समाज के उत्थान के सन्दर्भ में सरकार के दृष्टिकोण में आ रहे बदलावों को स्पष्ट कीजिये| 5- अंतिम में बदलावों के सकारात्मक के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत में स्तरीकृत जमींदारी का विकास हुआ इससे करों का बोझ निरन्तर बढ़ता गया, मानसून के कमजोर होने अथवा अकाल की स्थिति में भी कर वसूला जाता था अतः साहूकार के रूप में एक अन्य परजीवी वर्ग का विकास हुआ| इसके कारण कृषि निवेश में कमी आई और भूमि उपज में गिरावट आई जिसके परिणाम स्वरुप आय के स्रोतों में कमी आई| इसके साथ ही करों का बोझ, ऋणों का बोझ और चक्रवृद्धि ब्याज के बोझ भारतीय समाज के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न किया|जब समाज समृद्ध होता है तो वह अपने निम्नतम वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करता है किन्तु यदि समाज कमजोर स्थिति में है तब समाज के निम्नवर्ग का शोषण होता है| आर्थिक अस्थिरता एवं अनिश्चितता के कारण रुढिवादिता का विस्तार होता है| अतः उपरोक्त आर्थिक संकट के उपोत्पाद के रूप में भारत में सामाजिक विघटन, अंधविश्वास, रुढिवादिता, साम्प्रदायिकता, कमजोर वर्गों का उत्पीडन आदि समस्याओं का जन्म हुआ| और इस प्रकार अंग्रेजों ने भारतीय ग्रामीण समाज को व्यवस्थित रूप से तोड़ दिया| स्वतंत्रता के समय भारतीय ग्रामीण समाज आय के सीमित स्रोत, जमींदारी, निम्न ग्रामीण अवसंरचना, निम्न वित्तीय समावेशन, साहूकारी व्यवस्था जैसी समस्याओं तथा अस्पृश्यता जैसी विभिन्न सामाजिक कुरीतियों से ग्रसित था अतः स्वतंत्रता पश्चात भारत सरकार ने ग्रामीण समाज के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किये| स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण समाज उत्थान के प्रयास o स्वतंत्रता के बाद प्रथम पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण समाज के पुनरुत्थान को सुनिश्चित करने हेतु सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी गयी o कृषि का आधुनिकीकरण तथा उत्पादन क्षमता को बढ़ाना, सामुदायिक भावनाओं को प्रेरित करते हुए आधुनिकता सुनिश्चित करना, सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के मुख्य उद्देश्य थे o परन्तु इन सामुदायिक विकास कार्यक्रमों से यथोचित लाभ नहीं हुएइसके मुख्य कारण नीतियों के अनुपालन सम्बन्धित रहे| o कालान्तर में ग्रामीण समाज के विकास के संदर्भ में अनेकों नीतियाँ बनायी गयीं जिसमें हरित क्रान्ति, सहकारिता को प्रोत्साहन, समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम(IRDP), प्रधानमंत्री 20 सूत्री कार्यक्रम, CAPART, इंदिरा आवास योजना, फसल बीमा योजना, जवाहर रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना, मध्यान्ह भोजन योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्व शिक्षा अभियान, राजीवगांधी विद्युतीकरण परियोजना/दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, मनरेगा, NRHM, आजीविका(NRLM), PM कृषि सिंचाई योजना, संपदा योजना, PM सांसद आदर्श ग्राम योजना, आयुष्मान इत्यादि प्रमुख हैं|परन्तु इन सब कार्यक्रमों के बावजूद जमीनी स्तर पर इन नीतियों के अनुपालन में विभिन्न चुनौतियां पायी गयीं नीतियों के अनुपालन की चुनौतियां o अवसंरचनात्मक स्तर पर मूलभूत अवसंरचना का अभाव जिसमें पक्की सड़कें, बेहतर माल ढुलाई व्यवस्था, कृषि आधारित उद्योगों की कमी, विद्युत् आपूर्ति एवं अन्न भंडारण के साधनों का अभाव इत्यादि प्रमुख हैं o राजनीतिक स्तर पर, पंचायतीराज व्यवस्था का सुसंगठित न होना, ग्रामीण पुनरुत्थान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, जाति-धर्म एवं लिंग के आधार पर समाज में पृथक्करण की समस्या o आर्थिक स्तर पर, बजटीय आवंटन में अनुशासनहीनता तथा आवंटन के उचित प्रबंधन का अभाव o सांस्कृतिक स्तर पर नकारात्मक दृष्टिकोण की बहुलता तथा प्रशासनिक-राजनीतिक स्तर पर व्याप्त पूर्वाग्रह एवं पक्षपातपूर्ण रवैये आदि मुख्य अवरोधक हैं| o उपरोक्त के अतिरिक्त ग्रामीण आवश्यकताओं का अपर्याप्त अध्ययन, क्रियान्वयन के स्तर पर समानुभूति और दृष्टिकोण की कमी होना, o प्रत्येक क्षेत्र में सभी स्तरों पर मध्यस्थों की उपस्थिति जिसके कारण सब्सिडी का ग्रामीण नागरिकों तक न पहुँच पाना o समर्थन मूल्य के राजनीतिकरण के द्वारा उनकी प्रासंगिकता कम करना आदि चुनौतियों के कारण उपरोक्त नीतियां/योजनायें आंशिक सफलता ही प्राप्त कर सकीं| अतः निकट वर्षों में, भारत सरकार की ग्रामीण उत्थान सम्बन्धी नीतियों के दृष्टिकोण में बदलाव स्पष्ट होते हैं सरकार के दृष्टिकोण में बदलाव o नीतियों के क्रियान्वयन सम्बन्धी पूर्ववर्ती चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, इनके समाधान हेतु वर्ष 2004 में तात्कालिक राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम ने PURA(प्रोवाइडिंग अर्बन एमेनिटीज इन रूरल एरिया) की संकल्पना प्रस्तुत की| यह संकल्पना एक समावेशी संकल्पना है जिसमें ग्रामीण समाज की सभी आवश्यकताओं को संदर्भित किया गया है| o PURA अंतर्गत 12 मुख्य उद्देश्यों के द्वारा अवसंरचनात्मक जैसे शिक्षा स्वास्थ्य, सड़क आदि, राजनीतिक जिसके अंतर्गत पंचायत को प्रोत्साहन, आर्थिक जैसे उचित कौशल प्रबंधन, बेहतर बजटीय आवंटन तथा सांस्कृतिक जिसमें धर्मनिरपेक्षता एवं सहभागिता को प्रोत्साहित करना इत्यादि प्रमुख लक्ष्य रखे गए| o उत्पादन एवं मूल्यों में वृद्धि किन्तु कृषक आय में गिरावट के विरोधाभास को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2011 में DBT एवं 2014-15 में JAM की परिकल्पना द्वारा आर्थिक सहयोग को और अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाने के प्रयास भी किये जा रहे हैं ताकि सरकार का सहयोग ग्रामीण समाज तक सुचारू रूप से पहुच सके| o PM सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत उपरोक्त सभी नीतियों का ग्रामीण संदर्भ में अनुपालन करने के मानक हेतु आदर्श ग्राम भी बनाये जा रहे हैं| सरकार के दृष्टिकोण में आय रहे बदलाव सरकारी नीतियों को समग्र बनाने में सहायक हैं| इसमें नीतिगत, क्रियान्वयन एवं परिणाम आधारित दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है जिसके निकट भविष्य में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं|
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भारतीय संविधान में उल्लेखित विभिन्न सांस्कृतिक व शैक्षणिक मौलिक अधिकारों की चर्चा कीजिए। इसके साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the various cultural and educational fundamental rights mentioned in the Indian Constitution. Along with this, explain the views of the Supreme Court on various aspects of minority educational institutions. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच:- भूमिका में अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए। तत्पश्चात, संविधान में दिए गए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की चर्चा कीजिए। इसके बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिए। अंत में संक्षेप मेंइन अधिकारों स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान भारतीय अल्पसंख्यक वर्ग शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा करता है ताकि इन अल्पसंख्यक वर्गों की विशिष्टताओं को संरक्षित रखा जा सके और भारतीय सांस्कृतिक विविधता का अनुरक्षण किया जा सके। इसीलिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा करते हैं। अनुच्छेद 29 द्वारा प्रदत्त अधिकार:- अनुच्छेद 29(1) के अनुसार भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी पृथक भाषा, लिपि तथा संस्कृति को परिरक्षित रखने अथवा मूल रूप में बचा कर रखने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 29(2) के अनुसार यदि कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान राज्य से वित्तीय सहायता लेता है तो वह दूसरे सम्प्रदाय के विद्यार्थियों को भी अपने यहाँ प्रवेश देने से मना नही कर सकता। अनुच्छेद 30 द्वारा प्रदत्त अधिकार:- अनुच्छेद 30(1) भारत में निवास करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने पसंद की शिक्षा संस्था स्थापित करने और उसके प्रशासन का अधिकार होगा। अनुच्छेद 30(2) राज्य उपरोक्त संस्था को अनुदान देने में इस आधार पर पर कोई भेदभाव नहीं कर सकेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक के नियंत्रण में है। अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचार:- सेंट स्टीफेन बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय 1992 में SC ने फैसला दिया (TMA पाई वाद 2002 के साथ) कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान न केवल अपने समुदाय के विद्यार्थियों के लिए सीटें आरक्षित कर सकते हैं बल्कि उनके चयन के मानक भी कम कर सकते हैं। TMA पाई वाद 2002 में SC ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय का निर्धारण राज्य के आधार पर किया जाना चाहिए न की सम्पूर्ण भारत के आधार पर| SC के अनुसार यदि धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक किसी राज्य कि कुल जनसंख्या के 50%से कम हैं तो उन्हें उस राज्य में अल्पसंख्यक माना जा सकता है। PA इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद 2005 तथा TMA पाई वाद 2002 में SC ने अल्पसंख्यकों को दो श्रेणी में रखा यथा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक। सर्वोच्च न्यायालय ने TMA पाई वाद 2002 में यह स्पष्ट कर दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भले ही वे अल्प संख्यक के नियंत्रण में क्यों न हों, प्रतिभा को शिक्षण कार्यों में महत्त्व दिया जाए। न्यायालय के अनुसार अल्प संख्यक प्रबंध या कार्यकारी बोर्ड सुशासन के लिए उत्तरदाई है न की कुशासन के लिए स्वतंत्र है। अतः यदि इन शिक्षण संस्थानों के कैंपस में पढाई लिखाई का परिवेश बिगड़ रहा हो तो राज्य इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। उपरोक्त मुकदमों में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों और शिक्षनेत्तर कर्मियों की भर्ती में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का कार्यकारी बोर्ड चयन की शर्तें तय कर सकता है| UGC इसमें दखल नहीं दे सकता| हालांकि यदि कार्यकारी बोर्ड शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा की अनदेखी करता है तो ऐसी स्थिति में UGC हस्तक्षेप कर सकता है। मलंकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज बनाम टी जोस 2007 के मुकदमें में SC ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यकों को कर सम्बन्धी कानून या आपराधिक कानूनों से कोई छूट नहीं मिली हुई है। ये कानून जिस प्रकार दूसरे समुदाय पर लागू होते हैं उसी प्रकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर भी लागू होंगे। सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त विचारों को देखते हुए स्पष्ट होता है कि अल्पसंख्यकों को उपरोक्त संरक्षण उन्हें बहुसंख्यकों के बराबर लाने के लिए दिया गया है न कि उन्हें बहुसंख्यकों पर प्राथमिकता देने के लिए दिया गया है। इन अधिकारों के माध्यम से उन्हें बहुसंख्यक प्रभाव से संरक्षित रखने का प्रयास किया गया है ताकि भारतीय संस्कृति की विविधता अक्षुण्ण बनी रहे। इन्हें विशिष्ट अधिकार के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिए।
##Question:भारतीय संविधान में उल्लेखित विभिन्न सांस्कृतिक व शैक्षणिक मौलिक अधिकारों की चर्चा कीजिए। इसके साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the various cultural and educational fundamental rights mentioned in the Indian Constitution. Along with this, explain the views of the Supreme Court on various aspects of minority educational institutions. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए। तत्पश्चात, संविधान में दिए गए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की चर्चा कीजिए। इसके बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को स्पष्ट कीजिए। अंत में संक्षेप मेंइन अधिकारों स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान भारतीय अल्पसंख्यक वर्ग शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा करता है ताकि इन अल्पसंख्यक वर्गों की विशिष्टताओं को संरक्षित रखा जा सके और भारतीय सांस्कृतिक विविधता का अनुरक्षण किया जा सके। इसीलिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक अधिकारों की घोषणा करते हैं। अनुच्छेद 29 द्वारा प्रदत्त अधिकार:- अनुच्छेद 29(1) के अनुसार भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी पृथक भाषा, लिपि तथा संस्कृति को परिरक्षित रखने अथवा मूल रूप में बचा कर रखने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 29(2) के अनुसार यदि कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान राज्य से वित्तीय सहायता लेता है तो वह दूसरे सम्प्रदाय के विद्यार्थियों को भी अपने यहाँ प्रवेश देने से मना नही कर सकता। अनुच्छेद 30 द्वारा प्रदत्त अधिकार:- अनुच्छेद 30(1) भारत में निवास करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने पसंद की शिक्षा संस्था स्थापित करने और उसके प्रशासन का अधिकार होगा। अनुच्छेद 30(2) राज्य उपरोक्त संस्था को अनुदान देने में इस आधार पर पर कोई भेदभाव नहीं कर सकेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक के नियंत्रण में है। अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विभिन्न पहलुओं पर सर्वोच्च न्यायालय के विचार:- सेंट स्टीफेन बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय 1992 में SC ने फैसला दिया (TMA पाई वाद 2002 के साथ) कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान न केवल अपने समुदाय के विद्यार्थियों के लिए सीटें आरक्षित कर सकते हैं बल्कि उनके चयन के मानक भी कम कर सकते हैं। TMA पाई वाद 2002 में SC ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय का निर्धारण राज्य के आधार पर किया जाना चाहिए न की सम्पूर्ण भारत के आधार पर| SC के अनुसार यदि धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक किसी राज्य कि कुल जनसंख्या के 50%से कम हैं तो उन्हें उस राज्य में अल्पसंख्यक माना जा सकता है। PA इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद 2005 तथा TMA पाई वाद 2002 में SC ने अल्पसंख्यकों को दो श्रेणी में रखा यथा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक। सर्वोच्च न्यायालय ने TMA पाई वाद 2002 में यह स्पष्ट कर दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भले ही वे अल्प संख्यक के नियंत्रण में क्यों न हों, प्रतिभा को शिक्षण कार्यों में महत्त्व दिया जाए। न्यायालय के अनुसार अल्प संख्यक प्रबंध या कार्यकारी बोर्ड सुशासन के लिए उत्तरदाई है न की कुशासन के लिए स्वतंत्र है। अतः यदि इन शिक्षण संस्थानों के कैंपस में पढाई लिखाई का परिवेश बिगड़ रहा हो तो राज्य इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। उपरोक्त मुकदमों में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों और शिक्षनेत्तर कर्मियों की भर्ती में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का कार्यकारी बोर्ड चयन की शर्तें तय कर सकता है| UGC इसमें दखल नहीं दे सकता| हालांकि यदि कार्यकारी बोर्ड शिक्षकों की नियुक्ति में प्रतिभा की अनदेखी करता है तो ऐसी स्थिति में UGC हस्तक्षेप कर सकता है। मलंकारा सीरियन कैथोलिक कॉलेज बनाम टी जोस 2007 के मुकदमें में SC ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यकों को कर सम्बन्धी कानून या आपराधिक कानूनों से कोई छूट नहीं मिली हुई है। ये कानून जिस प्रकार दूसरे समुदाय पर लागू होते हैं उसी प्रकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर भी लागू होंगे। सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त विचारों को देखते हुए स्पष्ट होता है कि अल्पसंख्यकों को उपरोक्त संरक्षण उन्हें बहुसंख्यकों के बराबर लाने के लिए दिया गया है न कि उन्हें बहुसंख्यकों पर प्राथमिकता देने के लिए दिया गया है। इन अधिकारों के माध्यम से उन्हें बहुसंख्यक प्रभाव से संरक्षित रखने का प्रयास किया गया है ताकि भारतीय संस्कृति की विविधता अक्षुण्ण बनी रहे। इन्हें विशिष्ट अधिकार के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिए।
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हालाँकि कई कारणों से स्वराज पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली परंतु फिर भी स्वराजियों की उपलब्धियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। चर्चा कीजिए। (10 अंक; 150-200 शब्द) Although the Swaraj Party did not get the expected success due to many reasons, yet the achievements of the Swaraji"s cannot be ignored. Discuss. (10 marks; 150-200 words)
एप्रोच- स्वराज पार्टी गठन की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, स्वराजियों की उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, स्वराजियों की कमजोरियों को दर्शाते हुए उसके पराभव के कारणों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, इनकी सीमित सफलता तथा पराभव के संदर्भ में अपने विचार देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- असहयोग आंदोलन के स्थगन ने कांग्रेस के भीतर निराशा का वातावरण पैदा कर दिया था| कांग्रेस का एक खेमा जिसका नेतृत्व सीआर दास, मोतीलाल नेहरू जैसे नेता कर रहे थे, उनका मत था कि राष्ट्रवादी आंदोलनकारी विधान परिषदों का बहिष्कार बंद कर दें| इनका विचार था कि वह असहयोग को विधान परिषदों तक ले जाकर सरकारी प्रस्तावों का विरोध करेंगे तथा सरकारी मशीनरी के कार्यों में रुकावट डालने का प्रयास करेंगे| जो लोग विधान परिषदों में प्रवेश की वकालत कर रहे थे उन्हें स्वराजी या परिवर्तन समर्थक के नाम से जाना गया जबकि जो विधान परिषदों में प्रवेश के पक्षधर नहीं थे तथा स्वराजियों के प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे, उन्हें परिवर्तन विरोधी कहा गया| परिवर्तन विरोधियों में बल्लभ भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सी राजगोपालाचारी आदि प्रमुख थे| इनका तर्क था कि संसदीय कार्यों में संलग्न होने से रचनात्मक कार्यों की उपेक्षा होगी| 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में विधान परिषद के मुद्दे पर मतभेद हुआ तथा उसके बाद सीआर दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी का गठन किया| 1923 में संपन्न हुए चुनावों में स्वराजियों को उल्लेखनीय सफलता मिली| केंद्रीय धारा सभा की 101 निर्वाचित सीटों में से उन्हें 42 में सफलता प्राप्त हुई तथा मध्य प्रांत में भी स्पष्ट बहुमत मिला| स्वराजियों की उपलब्धियां स्वराजियों ने 1924 की शुरुआत में 70 सदस्यों के साथ एक गठबंधन तैयार किया तथा सरकार से तुरंत संवैधानिक प्रगति से संबंधित प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया की उम्मीद की| गठबंधन के सहयोगियों के साथ मिलकर कई बार सरकार के विरुद्ध मतदान करना यहां तक कि बजट संबंधी मांगों पर सरकार के विरुद्ध मतदान करना तथा स्थगन प्रस्ताव पारित करना ; स्वशासन, नागरिक स्वतंत्रता तथा औद्योगिकरण के समर्थन में उन्होंने सशक्त भाषण दिए| उन्होंने विधानमंडलों में सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों के विरुद्ध जोरदार प्रदर्शन किया| 1925 में विट्ठल भाई पटेल को केंद्रीय विधान परिषद का अध्यक्ष चुना जाना; रंगाचटियार ने कौंसिल में गवर्नर जनरल से भारत की प्रादेशिक स्वायत्तता एवं संप्रभुता की प्राप्ति हेतु 1919 के अधिनियम में संशोधन की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया| पूर्ण उत्तरदायी सरकार की योजना की सिफारिश हेतु मोतीलाल नेहरू ने गोलमेज कांफ्रेंस के समर्थन में एक संशोधन पेश किया जो विधानमंडल से बहुमत में पारित हुआ| 1850 के राष्ट्रीय कैदी अधिनियम; 1867 के सीमांत अत्याचार अधिनियम तथा 1921 के राष्ट्रद्रोही गोष्टी निरोधक अधिनियम को भंग करने के लिए बिल प्रस्तुत किया जाना जिसमें एक को छोड़कर सारे बिल का पारित होना; भारत में मिलिट्री कॉलेज की स्थापना की मांग से संबंधित प्रस्ताव पर सरकार को हराना; सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि- 1928 में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक पर सरकार की पराजय ; स्वराजियों की कमजोरियां वे विधानमंडल के भीतर अपने जुझारू संघर्ष तथा विधानमंडल के बाहर के राजनीतिक संघर्ष/गांधीवादी कार्यक्रमों के मध्य समन्वय स्थापित नहीं कर पाए| व्यवधानवादी राजनीति की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं| टकराववादी विचारधारा के कारण स्वराजी लोकप्रिय तो हुए परंतु प्रभावी नहीं हो पाए| विधानमंडलों की शक्तियों एवं विशेषाधिकारों का पूर्ण उपयोग करने में असफल रहे; सहयोगी घटकों का भी हमेशा और हर अवसर पर साथ नहीं प्राप्त कर सकें; जमींदार, किसान, पूंजीपति और मजदूर एकता की दुहाई देना परंतु उनके हित आपस में टकरा रहे थे| स्वराज पार्टी के अंदर सांप्रदायिक तत्वों के उभार को रोकने में असफलता; हिंदू महासभा एवं जिन्ना की पार्टी के साथ स्वराज पार्टी का गठबंधन टूटना ; स्वराज दल के कुछ नेता सरकार से सहयोग करना चाहते थें; जैसे- लाला लाजपत राय, मदनमोहन मालवीय आदि; इन्हें प्रत्युतरवादी भी कहा गया|कुछ प्रांतों में स्वराजी नेता सरकार से सहयोग भी करने लगें थें| उपरोक्त कमजोरियों के अलावा स्वराज पार्टी के पराभव के निम्न कारण हैं - 1925 में उनके सर्वमान्य नेता चितरंजन दास की मृत्यु; असहयोग से सहयोग की नीति जिससे स्वराजियों पर जनता का विश्वास उठ जाना; स्वराज्य दल में मतभेद - सरकार के प्रति सहयोग अथवा असहयोग के मुद्दे पर; 1926 के निर्वाचन में स्वराजियों को उतनी सफलता नहीं मिल पाना जिससे पार्टी को बहुत बड़ा धक्का लगा; हिंदूवादी दल की स्थापना - पंडित मदन मोहन मालवीय तथा लाला लाजपत राय जैसे प्रत्युतरवादियों ने हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए कांग्रेस से हटकर एक नया दल बनाया| इस निर्णय से कांग्रेस के साथ-साथ स्वराज पार्टी को भी गहरा धक्का लगा| हालांकि स्वराज्य पार्टी को उतनी उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल पाई लेकिन फिर भी स्वराजियों की गतिविधियों ने एक ऐसे समय में राजनीतिक निर्वात को भरा जब राष्ट्रीय आंदोलन असहयोग आंदोलन के स्थगित होने के बाद धीरे-धीरे अपनासामर्थ्य खोता जा रहा था | राष्ट्रीय आंदोलन के समक्ष राजनीतिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी तथा इस समय में स्वराजियों ने एक आशा की नई किरण दिखाई| संसदीय राजनीति से संबंधित संचालन के अनुभव आगे भी उपयोगी सिद्ध हुआ|
##Question:हालाँकि कई कारणों से स्वराज पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली परंतु फिर भी स्वराजियों की उपलब्धियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। चर्चा कीजिए। (10 अंक; 150-200 शब्द) Although the Swaraj Party did not get the expected success due to many reasons, yet the achievements of the Swaraji"s cannot be ignored. Discuss. (10 marks; 150-200 words)##Answer:एप्रोच- स्वराज पार्टी गठन की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, स्वराजियों की उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए| अगले भाग में, स्वराजियों की कमजोरियों को दर्शाते हुए उसके पराभव के कारणों का उल्लेख कीजिए| निष्कर्षतः, इनकी सीमित सफलता तथा पराभव के संदर्भ में अपने विचार देते हुए उत्तर का समापन कीजिए| उत्तर- असहयोग आंदोलन के स्थगन ने कांग्रेस के भीतर निराशा का वातावरण पैदा कर दिया था| कांग्रेस का एक खेमा जिसका नेतृत्व सीआर दास, मोतीलाल नेहरू जैसे नेता कर रहे थे, उनका मत था कि राष्ट्रवादी आंदोलनकारी विधान परिषदों का बहिष्कार बंद कर दें| इनका विचार था कि वह असहयोग को विधान परिषदों तक ले जाकर सरकारी प्रस्तावों का विरोध करेंगे तथा सरकारी मशीनरी के कार्यों में रुकावट डालने का प्रयास करेंगे| जो लोग विधान परिषदों में प्रवेश की वकालत कर रहे थे उन्हें स्वराजी या परिवर्तन समर्थक के नाम से जाना गया जबकि जो विधान परिषदों में प्रवेश के पक्षधर नहीं थे तथा स्वराजियों के प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे, उन्हें परिवर्तन विरोधी कहा गया| परिवर्तन विरोधियों में बल्लभ भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सी राजगोपालाचारी आदि प्रमुख थे| इनका तर्क था कि संसदीय कार्यों में संलग्न होने से रचनात्मक कार्यों की उपेक्षा होगी| 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में विधान परिषद के मुद्दे पर मतभेद हुआ तथा उसके बाद सीआर दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी का गठन किया| 1923 में संपन्न हुए चुनावों में स्वराजियों को उल्लेखनीय सफलता मिली| केंद्रीय धारा सभा की 101 निर्वाचित सीटों में से उन्हें 42 में सफलता प्राप्त हुई तथा मध्य प्रांत में भी स्पष्ट बहुमत मिला| स्वराजियों की उपलब्धियां स्वराजियों ने 1924 की शुरुआत में 70 सदस्यों के साथ एक गठबंधन तैयार किया तथा सरकार से तुरंत संवैधानिक प्रगति से संबंधित प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया की उम्मीद की| गठबंधन के सहयोगियों के साथ मिलकर कई बार सरकार के विरुद्ध मतदान करना यहां तक कि बजट संबंधी मांगों पर सरकार के विरुद्ध मतदान करना तथा स्थगन प्रस्ताव पारित करना ; स्वशासन, नागरिक स्वतंत्रता तथा औद्योगिकरण के समर्थन में उन्होंने सशक्त भाषण दिए| उन्होंने विधानमंडलों में सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों के विरुद्ध जोरदार प्रदर्शन किया| 1925 में विट्ठल भाई पटेल को केंद्रीय विधान परिषद का अध्यक्ष चुना जाना; रंगाचटियार ने कौंसिल में गवर्नर जनरल से भारत की प्रादेशिक स्वायत्तता एवं संप्रभुता की प्राप्ति हेतु 1919 के अधिनियम में संशोधन की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया| पूर्ण उत्तरदायी सरकार की योजना की सिफारिश हेतु मोतीलाल नेहरू ने गोलमेज कांफ्रेंस के समर्थन में एक संशोधन पेश किया जो विधानमंडल से बहुमत में पारित हुआ| 1850 के राष्ट्रीय कैदी अधिनियम; 1867 के सीमांत अत्याचार अधिनियम तथा 1921 के राष्ट्रद्रोही गोष्टी निरोधक अधिनियम को भंग करने के लिए बिल प्रस्तुत किया जाना जिसमें एक को छोड़कर सारे बिल का पारित होना; भारत में मिलिट्री कॉलेज की स्थापना की मांग से संबंधित प्रस्ताव पर सरकार को हराना; सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि- 1928 में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक पर सरकार की पराजय ; स्वराजियों की कमजोरियां वे विधानमंडल के भीतर अपने जुझारू संघर्ष तथा विधानमंडल के बाहर के राजनीतिक संघर्ष/गांधीवादी कार्यक्रमों के मध्य समन्वय स्थापित नहीं कर पाए| व्यवधानवादी राजनीति की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं| टकराववादी विचारधारा के कारण स्वराजी लोकप्रिय तो हुए परंतु प्रभावी नहीं हो पाए| विधानमंडलों की शक्तियों एवं विशेषाधिकारों का पूर्ण उपयोग करने में असफल रहे; सहयोगी घटकों का भी हमेशा और हर अवसर पर साथ नहीं प्राप्त कर सकें; जमींदार, किसान, पूंजीपति और मजदूर एकता की दुहाई देना परंतु उनके हित आपस में टकरा रहे थे| स्वराज पार्टी के अंदर सांप्रदायिक तत्वों के उभार को रोकने में असफलता; हिंदू महासभा एवं जिन्ना की पार्टी के साथ स्वराज पार्टी का गठबंधन टूटना ; स्वराज दल के कुछ नेता सरकार से सहयोग करना चाहते थें; जैसे- लाला लाजपत राय, मदनमोहन मालवीय आदि; इन्हें प्रत्युतरवादी भी कहा गया|कुछ प्रांतों में स्वराजी नेता सरकार से सहयोग भी करने लगें थें| उपरोक्त कमजोरियों के अलावा स्वराज पार्टी के पराभव के निम्न कारण हैं - 1925 में उनके सर्वमान्य नेता चितरंजन दास की मृत्यु; असहयोग से सहयोग की नीति जिससे स्वराजियों पर जनता का विश्वास उठ जाना; स्वराज्य दल में मतभेद - सरकार के प्रति सहयोग अथवा असहयोग के मुद्दे पर; 1926 के निर्वाचन में स्वराजियों को उतनी सफलता नहीं मिल पाना जिससे पार्टी को बहुत बड़ा धक्का लगा; हिंदूवादी दल की स्थापना - पंडित मदन मोहन मालवीय तथा लाला लाजपत राय जैसे प्रत्युतरवादियों ने हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए कांग्रेस से हटकर एक नया दल बनाया| इस निर्णय से कांग्रेस के साथ-साथ स्वराज पार्टी को भी गहरा धक्का लगा| हालांकि स्वराज्य पार्टी को उतनी उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल पाई लेकिन फिर भी स्वराजियों की गतिविधियों ने एक ऐसे समय में राजनीतिक निर्वात को भरा जब राष्ट्रीय आंदोलन असहयोग आंदोलन के स्थगित होने के बाद धीरे-धीरे अपनासामर्थ्य खोता जा रहा था | राष्ट्रीय आंदोलन के समक्ष राजनीतिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी तथा इस समय में स्वराजियों ने एक आशा की नई किरण दिखाई| संसदीय राजनीति से संबंधित संचालन के अनुभव आगे भी उपयोगी सिद्ध हुआ|
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Bring out the challenges of NDMA and provide suggestions to tackle the same. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CHALLENGES AND SUGGESTIONS AS PER CAG AND THE P.K. MISHRA COMMITTEE (TO REVIEW THE FUNCTIONING OF DISASTER MANAGEMENT ACT, 2005) - THE SUGGESTIONS TO TACKLE THE CHALLENGES (WAY FORWARD) (No conclusion provided as the way forward has specifically been discussed above) ANSWER:- Starting from the UN developments in the 1990s, a Disaster Management Cell was created under the Ministry of agriculture. But understanding the limitations of the ministry of agriculture to handle disasters (especially post 1999 super cyclone) and a high-powered committee under JC Panth was set up to review the disaster management mechanism in India, which was mostly the traditional conventional post-disaster approach to disaster management. Based on the committee’s recommendation, in 2002, the DM division was shifted under the Ministry of Home Affairs, and in 2005, the National Disaster Management Act, 2005 was enacted based upon a developmental holistic approach to disaster management. CHALLENGES AND SUGGESTIONS AS PER CAG AND THE P.K. MISHRA COMMITTEE (TO REVIEW THE FUNCTIONING OF DISASTER MANAGEMENT ACT, 2005) 1) NO PROVISION TO MAKE THE NDMA GUIDELINES BINDING The NDMA guidelines currently do not have a binding force. Hence, these should be made binding. 2) NO MAJOR PROJECT COMPLETED BY THE NDMA As yet, not even a single major project has been completed by the NDMA. 3) NDMF (NATIONAL DISASTER MITIGATION FUND) This fund has not been created as yet. NDMF, as mitigation is a development activity, and the money for the same is supposed to be allocated through the budget. 3.1) As a result, the Mitigation experts are missing at the ground level 4) CRITICAL COMMUNICATION SYSTEMS NOT DEPLOYED There are serious connectivity issues, which end up in a lot of time getting consumed and casualties being witnessed in the time period. 5) NATIONAL DISASTER RELIEF FORCE This force has a shortage of manpower and infrastructure. The SDRF and NDRF are not sufficient in number- 12 battalions of 1149 people each, are deployed at different places in the country 6) STAFFING ISSUES Over and above the already existing issues, the National Executive Committee’s (NEC) secretariat is deployed with their own problems and staff Hence, NDMA"s power remains de-jure rather than de-facto THE SUGGESTIONS TO TACKLE THE CHALLENGES 1) NATIONAL DATABASE FOR DATA MANAGEMENT CAG suggested that the DEPARTMENT OF SPACE should ensure this. 2) DAMS MANAGEMENT CAG suggested that the Ministry of water resource must prepare an emergency action plan for major dams. These are not available as yet- the Kerala water floods could have been avoided if this was done 3) RESTRUCTURING OF NDMA The Mishra committee suggested that the NDRF needs re-structuring, 4) SEPARATION OF ROLES Mishra committee suggested there should be a separation of roles of the MHA and NDMA. 5) FUNCTIONAL BODIES Mishra committee suggested that the SDMA AND SDRF should be made as fully functional bodies.
##Question:Bring out the challenges of NDMA and provide suggestions to tackle the same. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CHALLENGES AND SUGGESTIONS AS PER CAG AND THE P.K. MISHRA COMMITTEE (TO REVIEW THE FUNCTIONING OF DISASTER MANAGEMENT ACT, 2005) - THE SUGGESTIONS TO TACKLE THE CHALLENGES (WAY FORWARD) (No conclusion provided as the way forward has specifically been discussed above) ANSWER:- Starting from the UN developments in the 1990s, a Disaster Management Cell was created under the Ministry of agriculture. But understanding the limitations of the ministry of agriculture to handle disasters (especially post 1999 super cyclone) and a high-powered committee under JC Panth was set up to review the disaster management mechanism in India, which was mostly the traditional conventional post-disaster approach to disaster management. Based on the committee’s recommendation, in 2002, the DM division was shifted under the Ministry of Home Affairs, and in 2005, the National Disaster Management Act, 2005 was enacted based upon a developmental holistic approach to disaster management. CHALLENGES AND SUGGESTIONS AS PER CAG AND THE P.K. MISHRA COMMITTEE (TO REVIEW THE FUNCTIONING OF DISASTER MANAGEMENT ACT, 2005) 1) NO PROVISION TO MAKE THE NDMA GUIDELINES BINDING The NDMA guidelines currently do not have a binding force. Hence, these should be made binding. 2) NO MAJOR PROJECT COMPLETED BY THE NDMA As yet, not even a single major project has been completed by the NDMA. 3) NDMF (NATIONAL DISASTER MITIGATION FUND) This fund has not been created as yet. NDMF, as mitigation is a development activity, and the money for the same is supposed to be allocated through the budget. 3.1) As a result, the Mitigation experts are missing at the ground level 4) CRITICAL COMMUNICATION SYSTEMS NOT DEPLOYED There are serious connectivity issues, which end up in a lot of time getting consumed and casualties being witnessed in the time period. 5) NATIONAL DISASTER RELIEF FORCE This force has a shortage of manpower and infrastructure. The SDRF and NDRF are not sufficient in number- 12 battalions of 1149 people each, are deployed at different places in the country 6) STAFFING ISSUES Over and above the already existing issues, the National Executive Committee’s (NEC) secretariat is deployed with their own problems and staff Hence, NDMA"s power remains de-jure rather than de-facto THE SUGGESTIONS TO TACKLE THE CHALLENGES 1) NATIONAL DATABASE FOR DATA MANAGEMENT CAG suggested that the DEPARTMENT OF SPACE should ensure this. 2) DAMS MANAGEMENT CAG suggested that the Ministry of water resource must prepare an emergency action plan for major dams. These are not available as yet- the Kerala water floods could have been avoided if this was done 3) RESTRUCTURING OF NDMA The Mishra committee suggested that the NDRF needs re-structuring, 4) SEPARATION OF ROLES Mishra committee suggested there should be a separation of roles of the MHA and NDMA. 5) FUNCTIONAL BODIES Mishra committee suggested that the SDMA AND SDRF should be made as fully functional bodies.
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भारत में विवाह एवं परिवार व्यवस्था में परिवर्तन के लक्षणों को स्पष्ट कीजिए। क्या पिछले कुछ दशकों के दौरान निर्मित कानूनों ने इन परिवर्तनों में उत्प्रेरक का कार्य किया है? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the signs of change in marriage and family system in India. Have laws made during the last few decades acted as a catalyst in these changes? Discuss (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विवाह एवं परिवार व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर के प्रथम भाग में लक्षणों को लिखिए। इसके बाद उन प्रमुख क़ानूनों का विवरण दीजिए जिसने परिवर्तन में योगदान दिया है। संतुलित रूप से निष्कर्ष लिखिए। विवाह तथा पारिवारिक संस्थाएं भारतीय समाज के मूल मूल्यों के धरोहर हैं। इन संस्थानों को अब भी संतानोत्पत्ति के सामाजिक रूप से मान्यताप्राप्त माध्यम के रूप में देखा जाता है। हम इन संस्थाओं में पितृसत्तात्मक मूल्यों तथा सामंतवादी पूर्वाग्रहों का प्रभाव देख सकते हैं। तथापि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों तथा क़ानूनों के प्रभाव के कारण इन संस्थाओं में भी बहुत से परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। विवाह एवं सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन के लक्षण: आधुनिक उद्योगों ने परिवार के आर्थिक कार्य -अधिकार को कम कर दिया है अतः संयुक्त पारिवारिक संरचना को एकल पारिवारिक संरचना से प्रतिस्थापित करने में सहायता की है। अधिक शिक्षित होने तथा कार्य करने के कारण परिवार में महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है। पारिवारिक मुद्दों में उनकी बात को भी महत्व प्रदान किया जा रहा है। विवाह में विस्तृत रिवाजों को या तो टाल दिया जाता है या उन्हे छोटा कर दिया जाता है। न्यायालयी विवाहों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। शहरों में तलाक, विवाह पूर्व शारीरिक संबंध आदि लक्षण दिखाई दे रहे हैं। साथी के चयन में काम तथा वेतन को पारिवारिक पृष्ठभूमि, जाति या धर्म की अपेक्षा अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। गौरतलब है कि विवाह एवं पारिवारिक व्यवस्था में जो बदलाव हो रहे हैं उनके पीछे अनेक कारक जिम्मेदार हैं। समाज में बढ़ती जागरूकता, शिक्षा, स्वतन्त्रता, वैश्वीकरण आदि के कारण नए रूप सामने आ रहे हैं। इन कारकों के पीछे क़ानूनों का बहुत बड़ा योगदान है। नए नियमों व क़ानूनों ने बदलावों को आधार प्रदान किया है और इन्हे वैधानिक रूप प्रदान किया है। इसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: दहेज निषेध अधिनियम ने महिलाओं को सशक्त करने में भूमिका निभाई है। इसके कारण पीड़ितों को न्याय की सुनिश्चितता के प्रति आशावादी प्रकृति का विकास हुआ है। वहीं दूसरी ओर इस प्रकार के कार्यों को बढ़ावा देने वालों में डर की भावना उत्पन्न हुई है। घरेलू हिंसा के संबंध में कानून ने महिलाओं की अधिकारों से अवगत कराया। घर-परिवार में हो रहे हिंसा को रोकने के लिए वे स्वयं सशक्त हुई हैं। इससे परिवार में महिलाओं को भी बराबर का अवसर मिलने लगा है। हिन्दू विवाह अधिनियम, तीन तलाक के संबंध में नए नियमों ने विवाह एवं परिवार व्यवस्था में बदलाव को प्रेरित किया है। इन क़ानूनों ने पुरुष एवं स्त्री दोनों को एक बुरे विवाह से बाहर निकलने के लिए के विकल्प प्रदान किए हैं। जिसे वे पूर्व में केवल सामाजिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए ढोया करते थे। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम ने पैतृक संपत्ति में अधिकार प्रदान किया है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति पहले से ज्यादा सशक्त हुई है। हालांकि इन परिवर्तनों के बावजूद विवाह एवं परिवार के मूल्य अब भी सुरक्षित हैं, आपसी अनुराग और निष्ठा एवं समर्पण को आज भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
##Question:भारत में विवाह एवं परिवार व्यवस्था में परिवर्तन के लक्षणों को स्पष्ट कीजिए। क्या पिछले कुछ दशकों के दौरान निर्मित कानूनों ने इन परिवर्तनों में उत्प्रेरक का कार्य किया है? चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the signs of change in marriage and family system in India. Have laws made during the last few decades acted as a catalyst in these changes? Discuss (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में विवाह एवं परिवार व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण दीजिए। उत्तर के प्रथम भाग में लक्षणों को लिखिए। इसके बाद उन प्रमुख क़ानूनों का विवरण दीजिए जिसने परिवर्तन में योगदान दिया है। संतुलित रूप से निष्कर्ष लिखिए। विवाह तथा पारिवारिक संस्थाएं भारतीय समाज के मूल मूल्यों के धरोहर हैं। इन संस्थानों को अब भी संतानोत्पत्ति के सामाजिक रूप से मान्यताप्राप्त माध्यम के रूप में देखा जाता है। हम इन संस्थाओं में पितृसत्तात्मक मूल्यों तथा सामंतवादी पूर्वाग्रहों का प्रभाव देख सकते हैं। तथापि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों तथा क़ानूनों के प्रभाव के कारण इन संस्थाओं में भी बहुत से परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। विवाह एवं सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन के लक्षण: आधुनिक उद्योगों ने परिवार के आर्थिक कार्य -अधिकार को कम कर दिया है अतः संयुक्त पारिवारिक संरचना को एकल पारिवारिक संरचना से प्रतिस्थापित करने में सहायता की है। अधिक शिक्षित होने तथा कार्य करने के कारण परिवार में महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है। पारिवारिक मुद्दों में उनकी बात को भी महत्व प्रदान किया जा रहा है। विवाह में विस्तृत रिवाजों को या तो टाल दिया जाता है या उन्हे छोटा कर दिया जाता है। न्यायालयी विवाहों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। शहरों में तलाक, विवाह पूर्व शारीरिक संबंध आदि लक्षण दिखाई दे रहे हैं। साथी के चयन में काम तथा वेतन को पारिवारिक पृष्ठभूमि, जाति या धर्म की अपेक्षा अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। गौरतलब है कि विवाह एवं पारिवारिक व्यवस्था में जो बदलाव हो रहे हैं उनके पीछे अनेक कारक जिम्मेदार हैं। समाज में बढ़ती जागरूकता, शिक्षा, स्वतन्त्रता, वैश्वीकरण आदि के कारण नए रूप सामने आ रहे हैं। इन कारकों के पीछे क़ानूनों का बहुत बड़ा योगदान है। नए नियमों व क़ानूनों ने बदलावों को आधार प्रदान किया है और इन्हे वैधानिक रूप प्रदान किया है। इसे निम्न प्रकार से समझ सकते हैं: दहेज निषेध अधिनियम ने महिलाओं को सशक्त करने में भूमिका निभाई है। इसके कारण पीड़ितों को न्याय की सुनिश्चितता के प्रति आशावादी प्रकृति का विकास हुआ है। वहीं दूसरी ओर इस प्रकार के कार्यों को बढ़ावा देने वालों में डर की भावना उत्पन्न हुई है। घरेलू हिंसा के संबंध में कानून ने महिलाओं की अधिकारों से अवगत कराया। घर-परिवार में हो रहे हिंसा को रोकने के लिए वे स्वयं सशक्त हुई हैं। इससे परिवार में महिलाओं को भी बराबर का अवसर मिलने लगा है। हिन्दू विवाह अधिनियम, तीन तलाक के संबंध में नए नियमों ने विवाह एवं परिवार व्यवस्था में बदलाव को प्रेरित किया है। इन क़ानूनों ने पुरुष एवं स्त्री दोनों को एक बुरे विवाह से बाहर निकलने के लिए के विकल्प प्रदान किए हैं। जिसे वे पूर्व में केवल सामाजिक दायित्वों की पूर्ति करने के लिए ढोया करते थे। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम ने पैतृक संपत्ति में अधिकार प्रदान किया है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति पहले से ज्यादा सशक्त हुई है। हालांकि इन परिवर्तनों के बावजूद विवाह एवं परिवार के मूल्य अब भी सुरक्षित हैं, आपसी अनुराग और निष्ठा एवं समर्पण को आज भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
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Explain about Extrusive and Intrusive rocks. (200 words)
APPROACH Introduction: Define rocks Body: Mention various types of rocks Conclusion: Give uses and future prospects in the research of rocks ANSWER :A rock is any naturally occurring solid mass or aggregate of minerals or mineraloid matter. It is categorized by the minerals included its chemical composition and the way in which it is formed. On the basis of its origin, it is classified as igneous, sedimentary and metamorphic rocks. And on the basis of its location, it is classified as intrusive and extrusive igneous rocks. Extrusive igneous rocks: When the magma erupts and solidifies on the surface of the Earth, it is called extrusive igneous rock.Some cool so quickly that they form an amorphous glass. These types of rocks are also called volcanic rocks. Examples of extrusive igneous rocks includeandesite,basalt,dacite,obsidian,pumice,rhyolite,scoria, andtuff. Intrusive igneous rocks: When magmacrystallizes below Earth"s surface, it leads to the formation of intrusive igneous rocks. The slow cooling that occurs there allows large crystals to form. Examples of intrusive igneous rocksarediorite,gabbro,granite,pegmatite, andperidotite. Intrusive rocks are further classified into the following types: Plutonic intrusive igneous rocks - These are those intrusive rocks that get cooled in the Earth"s crust. Hypabyssal intrusive igneous rocks - They are also called asintermediate igneous rocks. It is asubvolcanic rock. It is an intrusive igneous rock that is emplaced at medium to shallow depths (>2 km) within the crust and has intermediate grain size andits texture is in between that of volcanic rocks and plutonic rocks. The lava that cools within the crustal portions assumes different forms. These forms are called intrusive forms: Batholiths - A large body of magmatic material that cools in the deeper depth of the crust develops in the form of large domes. They appear on the surface only after the denudational processes remove the overlying materials. They cover large areas, and at times, assume depth that may be several km. These are granitic bodies. Batholiths are the cooled portion of magma chambers. Laccoliths - These are large dome-shaped intrusive bodies with a level base and connected by a pipe-like conduit from below. It resembles the surface volcanic domes of a composite volcano, only these are located at deeper depths. It can be regarded as the localized source of lava that finds its way to the surface. The Karnataka plateau is spotted with domal hills of granite rocks. Most of these, now exfoliated, are examples of laccoliths or batholiths. Lapolith -As and when the lava moves upwards, a portion of the same may tend to move in a horizontal direction wherever it finds a weak plane. It may get rested in different forms. In case it develops into a saucer shape, concave to the sky body, it is called lapolith. Phacolith - A wavy mass of intrusive rocks, at times, is found at the base of synclines or at the top of the anticline in the folded igneous country. Such wavy materials have a definite conduit to source beneath in the form of magma chambers (subsequently developed as batholiths). These are called the phacoliths. Sills - The near-horizontal bodies of the intrusive igneous rocks are called sill or sheet, depending on the thickness of the material. The thinner ones are called sheets while the thick horizontal deposits are called sills. Dykes - When the lava makes its way through cracks and the fissures developed in the land, it solidifies almost perpendicular to the ground. It gets cooled in the same position to develop a wall-like structure. Such structures are called dykes. These are the most commonly found intrusive forms in the western Maharashtra area. These are considered the feeders for the eruptions that led to the development of the Deccan traps. These rocks are very much useful in our day to day life. From talc to the floor of our houses, rocks are present everywhere. Research in the field of petrology has provided us the details of rocks. Further research is being carried out to have better insights into details of rocks. NOTE : A diagram needs to be given to illustrate the above-mentioned rocks. REFERENCE: FUNDAMENTALS OF PHYSICAL GEOGRAPHY NCERT
##Question:Explain about Extrusive and Intrusive rocks. (200 words)##Answer:APPROACH Introduction: Define rocks Body: Mention various types of rocks Conclusion: Give uses and future prospects in the research of rocks ANSWER :A rock is any naturally occurring solid mass or aggregate of minerals or mineraloid matter. It is categorized by the minerals included its chemical composition and the way in which it is formed. On the basis of its origin, it is classified as igneous, sedimentary and metamorphic rocks. And on the basis of its location, it is classified as intrusive and extrusive igneous rocks. Extrusive igneous rocks: When the magma erupts and solidifies on the surface of the Earth, it is called extrusive igneous rock.Some cool so quickly that they form an amorphous glass. These types of rocks are also called volcanic rocks. Examples of extrusive igneous rocks includeandesite,basalt,dacite,obsidian,pumice,rhyolite,scoria, andtuff. Intrusive igneous rocks: When magmacrystallizes below Earth"s surface, it leads to the formation of intrusive igneous rocks. The slow cooling that occurs there allows large crystals to form. Examples of intrusive igneous rocksarediorite,gabbro,granite,pegmatite, andperidotite. Intrusive rocks are further classified into the following types: Plutonic intrusive igneous rocks - These are those intrusive rocks that get cooled in the Earth"s crust. Hypabyssal intrusive igneous rocks - They are also called asintermediate igneous rocks. It is asubvolcanic rock. It is an intrusive igneous rock that is emplaced at medium to shallow depths (>2 km) within the crust and has intermediate grain size andits texture is in between that of volcanic rocks and plutonic rocks. The lava that cools within the crustal portions assumes different forms. These forms are called intrusive forms: Batholiths - A large body of magmatic material that cools in the deeper depth of the crust develops in the form of large domes. They appear on the surface only after the denudational processes remove the overlying materials. They cover large areas, and at times, assume depth that may be several km. These are granitic bodies. Batholiths are the cooled portion of magma chambers. Laccoliths - These are large dome-shaped intrusive bodies with a level base and connected by a pipe-like conduit from below. It resembles the surface volcanic domes of a composite volcano, only these are located at deeper depths. It can be regarded as the localized source of lava that finds its way to the surface. The Karnataka plateau is spotted with domal hills of granite rocks. Most of these, now exfoliated, are examples of laccoliths or batholiths. Lapolith -As and when the lava moves upwards, a portion of the same may tend to move in a horizontal direction wherever it finds a weak plane. It may get rested in different forms. In case it develops into a saucer shape, concave to the sky body, it is called lapolith. Phacolith - A wavy mass of intrusive rocks, at times, is found at the base of synclines or at the top of the anticline in the folded igneous country. Such wavy materials have a definite conduit to source beneath in the form of magma chambers (subsequently developed as batholiths). These are called the phacoliths. Sills - The near-horizontal bodies of the intrusive igneous rocks are called sill or sheet, depending on the thickness of the material. The thinner ones are called sheets while the thick horizontal deposits are called sills. Dykes - When the lava makes its way through cracks and the fissures developed in the land, it solidifies almost perpendicular to the ground. It gets cooled in the same position to develop a wall-like structure. Such structures are called dykes. These are the most commonly found intrusive forms in the western Maharashtra area. These are considered the feeders for the eruptions that led to the development of the Deccan traps. These rocks are very much useful in our day to day life. From talc to the floor of our houses, rocks are present everywhere. Research in the field of petrology has provided us the details of rocks. Further research is being carried out to have better insights into details of rocks. NOTE : A diagram needs to be given to illustrate the above-mentioned rocks. REFERENCE: FUNDAMENTALS OF PHYSICAL GEOGRAPHY NCERT
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भारत में जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास की चर्चा करते हुए, इसकी स्वीकार्यता के कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Discussing the historical development of the caste system in India, list the factors of its acceptance. (150 to 200 words, Marks-10 )
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जाति व्यवस्था को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत मेंजाति व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में जाति व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारकों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के सन्दर्भ में उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक समाज में व्याप्त विभेदों के आधार पर समाज के वर्गों को अलग-अलग प्रकार से श्रेणीबद्ध किया जाता है, जिसके फलस्वरूप असामनता एवं वंचन की स्थिति स्थापित होती है| भारतीय संदर्भ में यह सामाजिक स्तरीकरण जाति व्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ता है| जाति व्यवस्था से तात्पर्य उस श्रेणीबद्धता से है जिसके आधार पर विभिन्न समुदायों के जीवन अवसर सुनिश्चित होते हैं| यद्यपि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति वैदिक काल में स्वीकृत की जाती है किन्तु कालखंड में यह लगातार परिवर्तित होती रही| जाति व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास इतिहासकारों का यह मत है कि वर्ण व्यवस्था का जन्म वैदिक काल में हुआ था जो प्रारम्भ में नृजातीय तथा कर्म आधारित थी परन्तु उत्तर वैदिक काल तक आते आते यह जन्म-आधारित विशिष्टता बन गयी जिसकी धार्मिक स्वीकृति ऋग्वेद के 10 वें मंडल में दिखाई देती है| प्राचीन भारत में यह जाति व्यवस्था तथा इस पर आधारित श्रम विभाजन अति सुदृढ़ था परन्तु श्रीनिवास का यह मत है कि मध्य कालीन भारत में धार्मिक घटकों का प्रभाव कम होने के कारण जाति व्यवस्था में कुछ परिवर्तन भी हुए जैसे संरचनात्मक स्तर पर हुई सामाजिक गतिशीलता(सामाजिक स्थिति में बदलाव) के परिणाम स्वरुप जाति व्यवस्था में गतिशीलता के प्रयास भी किये गए जिसे श्रीनिवास नेसंस्कृतिकरणकहा है||संस्कृतिकरण से तात्पर्य यह है कि सामाजिक गतिशीलता हेतु निम्न जाति के लोगों ने उच्च जातियों की जीवन शैली को अपनाने के प्रयास किये| ब्रिटिश काल में जातिव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन दिखाई देने प्रारम्भ हुए| श्रीनिवास के अनुसार इसके निम्नलिखित दो मुख्य घटक थे यथाब्रिटिश काल में जाति आधारित श्रेणीबद्धता पर ही प्रश्न चिन्ह उठाये गए तथा उसे समता द्वारा क्षैतिज करने की बात शुरू हुई| ब्रिटिश काल में नए श्रम विभाजन ने जाति आधारित श्रम विभाजन की प्रासंगिकता को कम किया श्रीनिवास ने यह भी पाया कि ब्रिटिश काल में सामाजिक गतिशीलता हेतु पश्चिमीकरण की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई इसके अंतर्गत पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर सामाजिक गतिशीलता के प्रयास किये गए श्रीनिवास के अनुसार पश्चिमीकरण एवं आधुनिकीकरण के मिले जुले परिणाम ने 20 वीं सदी के प्रारम्भ में अस्पृश्यता के बहाने जाति व्यवस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह उठाये स्वतंत्रता के बाद जाति व्यवस्था में परिवर्तन के चार महत्वपूर्ण कारण हैं यथाअनुच्छेद 15 एवं 17 जैसे मूल अधिकारों ने जाति आधारित भेदभाव को अस्वीकृत किया,राजनीतिक आरक्षण के परिणाम स्वरुप राजनीतिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया का आरम्भ होना और राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, सरकार द्वारा गरीबी हटाने एवं कल्याण हेतु किये जा रहे प्रयास ने भी जाति आधारित भेदभाव को कमजोर किया, इनके अतिरिक्त नयी राजनीतिक प्रक्रिया में राजनीतिक संचेतना के परिणाम स्वरुप वोट बैंक राजनीति प्रारम्भ हुई| वर्तमान में यह स्थिति बनी हुई है| जाति व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारक प्रसिद्द समाजशास्त्रियों के अनुसार जाति की स्वीकार्यता का आधार धार्मिक सन्दर्भों में पवित्र-अपवित्र की परिकल्पना से स्वीकार किया गया है जमीनी स्तर पर यह जाति व्यवस्था धार्मिक कारक, जिसके अंतर्गत पाप-पुण्य आधारित धर्म कर्म का सिद्धांत तथा पवित्र-अपवित्र की परिकल्पना के आधार पर जाति को श्रेणीबद्ध किया जाता है जिसमें ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र को क्रमशः श्रेणीबद्ध किया गया सामाजिक संरचनात्मक घटक, जिसमें धन, शक्ति एवं प्रतिष्ठा के सन्दर्भ में भूमि उपलब्धता/अधिकार जनसंख्या एवं शिक्षा के मानकों द्वारा दिए गए क्षेत्र में जनसंख्या आधारित श्रेणीबद्धता जाति को प्रदर्शित करती है| यह माना जाता है कि किसी दिए गए स्थान विशेष में उपरोक्त दोनों घटकों का मिला जुला स्वरुप जाति व्यवस्था को सुनिश्चित करता है|किसी क्षेत्र में जो जाति इस श्रेणीबद्धता में सर्वोपरि होती है उन्हें प्रभावी जाति कहा जाता है| समकालीन सन्दर्भों में आरक्षण की राजनीति, राजनीति का जातिकरण एवं जातियों का राजनीतिकरण, सामूहिक अस्मिता की भावना आदि कारकों ने जाति व्यवस्था को स्वीकार्य बनाए रखा है| फिर भी जातीय बंधन अपेक्षाकृत रूप से कम हुए हैं| अतः यह कहा जा सकता है कि 21 वीं सदी में यह जाति व्यवस्था एक दोराहे पर खड़ी है जहाँ इसे यह निर्धारित करना होगा अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए जाति को पूर्णतः समाप्त किया जाए और यदि ऐसा है तो जाति आधारित विवाह के विरोध में अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए तथा जाति आधारित आरक्षण प्रणाली को नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संशोधित किया जाए जिसमें जाति एक घटक हो न कि एक मात्र घटक| वहीं दूसरी ओर गांधीवादी दृष्टिकोण को मानते हुए जाति आधारित कुरीतियों को समाप्त करना है तो इस सन्दर्भ में कठोर कानून बनाए जाएँ एवं समाजीकरण की प्रक्रिया को बदला जाए| ताकि एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सके|
##Question:भारत में जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास की चर्चा करते हुए, इसकी स्वीकार्यता के कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Discussing the historical development of the caste system in India, list the factors of its acceptance. (150 to 200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जाति व्यवस्था को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत मेंजाति व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में जाति व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारकों को सूचीबद्ध कीजिये 4- अंतिम में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के सन्दर्भ में उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रत्येक समाज में व्याप्त विभेदों के आधार पर समाज के वर्गों को अलग-अलग प्रकार से श्रेणीबद्ध किया जाता है, जिसके फलस्वरूप असामनता एवं वंचन की स्थिति स्थापित होती है| भारतीय संदर्भ में यह सामाजिक स्तरीकरण जाति व्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ता है| जाति व्यवस्था से तात्पर्य उस श्रेणीबद्धता से है जिसके आधार पर विभिन्न समुदायों के जीवन अवसर सुनिश्चित होते हैं| यद्यपि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति वैदिक काल में स्वीकृत की जाती है किन्तु कालखंड में यह लगातार परिवर्तित होती रही| जाति व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास इतिहासकारों का यह मत है कि वर्ण व्यवस्था का जन्म वैदिक काल में हुआ था जो प्रारम्भ में नृजातीय तथा कर्म आधारित थी परन्तु उत्तर वैदिक काल तक आते आते यह जन्म-आधारित विशिष्टता बन गयी जिसकी धार्मिक स्वीकृति ऋग्वेद के 10 वें मंडल में दिखाई देती है| प्राचीन भारत में यह जाति व्यवस्था तथा इस पर आधारित श्रम विभाजन अति सुदृढ़ था परन्तु श्रीनिवास का यह मत है कि मध्य कालीन भारत में धार्मिक घटकों का प्रभाव कम होने के कारण जाति व्यवस्था में कुछ परिवर्तन भी हुए जैसे संरचनात्मक स्तर पर हुई सामाजिक गतिशीलता(सामाजिक स्थिति में बदलाव) के परिणाम स्वरुप जाति व्यवस्था में गतिशीलता के प्रयास भी किये गए जिसे श्रीनिवास नेसंस्कृतिकरणकहा है||संस्कृतिकरण से तात्पर्य यह है कि सामाजिक गतिशीलता हेतु निम्न जाति के लोगों ने उच्च जातियों की जीवन शैली को अपनाने के प्रयास किये| ब्रिटिश काल में जातिव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन दिखाई देने प्रारम्भ हुए| श्रीनिवास के अनुसार इसके निम्नलिखित दो मुख्य घटक थे यथाब्रिटिश काल में जाति आधारित श्रेणीबद्धता पर ही प्रश्न चिन्ह उठाये गए तथा उसे समता द्वारा क्षैतिज करने की बात शुरू हुई| ब्रिटिश काल में नए श्रम विभाजन ने जाति आधारित श्रम विभाजन की प्रासंगिकता को कम किया श्रीनिवास ने यह भी पाया कि ब्रिटिश काल में सामाजिक गतिशीलता हेतु पश्चिमीकरण की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई इसके अंतर्गत पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर सामाजिक गतिशीलता के प्रयास किये गए श्रीनिवास के अनुसार पश्चिमीकरण एवं आधुनिकीकरण के मिले जुले परिणाम ने 20 वीं सदी के प्रारम्भ में अस्पृश्यता के बहाने जाति व्यवस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह उठाये स्वतंत्रता के बाद जाति व्यवस्था में परिवर्तन के चार महत्वपूर्ण कारण हैं यथाअनुच्छेद 15 एवं 17 जैसे मूल अधिकारों ने जाति आधारित भेदभाव को अस्वीकृत किया,राजनीतिक आरक्षण के परिणाम स्वरुप राजनीतिक सशक्तिकरण की प्रक्रिया का आरम्भ होना और राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, सरकार द्वारा गरीबी हटाने एवं कल्याण हेतु किये जा रहे प्रयास ने भी जाति आधारित भेदभाव को कमजोर किया, इनके अतिरिक्त नयी राजनीतिक प्रक्रिया में राजनीतिक संचेतना के परिणाम स्वरुप वोट बैंक राजनीति प्रारम्भ हुई| वर्तमान में यह स्थिति बनी हुई है| जाति व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारक प्रसिद्द समाजशास्त्रियों के अनुसार जाति की स्वीकार्यता का आधार धार्मिक सन्दर्भों में पवित्र-अपवित्र की परिकल्पना से स्वीकार किया गया है जमीनी स्तर पर यह जाति व्यवस्था धार्मिक कारक, जिसके अंतर्गत पाप-पुण्य आधारित धर्म कर्म का सिद्धांत तथा पवित्र-अपवित्र की परिकल्पना के आधार पर जाति को श्रेणीबद्ध किया जाता है जिसमें ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र को क्रमशः श्रेणीबद्ध किया गया सामाजिक संरचनात्मक घटक, जिसमें धन, शक्ति एवं प्रतिष्ठा के सन्दर्भ में भूमि उपलब्धता/अधिकार जनसंख्या एवं शिक्षा के मानकों द्वारा दिए गए क्षेत्र में जनसंख्या आधारित श्रेणीबद्धता जाति को प्रदर्शित करती है| यह माना जाता है कि किसी दिए गए स्थान विशेष में उपरोक्त दोनों घटकों का मिला जुला स्वरुप जाति व्यवस्था को सुनिश्चित करता है|किसी क्षेत्र में जो जाति इस श्रेणीबद्धता में सर्वोपरि होती है उन्हें प्रभावी जाति कहा जाता है| समकालीन सन्दर्भों में आरक्षण की राजनीति, राजनीति का जातिकरण एवं जातियों का राजनीतिकरण, सामूहिक अस्मिता की भावना आदि कारकों ने जाति व्यवस्था को स्वीकार्य बनाए रखा है| फिर भी जातीय बंधन अपेक्षाकृत रूप से कम हुए हैं| अतः यह कहा जा सकता है कि 21 वीं सदी में यह जाति व्यवस्था एक दोराहे पर खड़ी है जहाँ इसे यह निर्धारित करना होगा अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए जाति को पूर्णतः समाप्त किया जाए और यदि ऐसा है तो जाति आधारित विवाह के विरोध में अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाए तथा जाति आधारित आरक्षण प्रणाली को नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संशोधित किया जाए जिसमें जाति एक घटक हो न कि एक मात्र घटक| वहीं दूसरी ओर गांधीवादी दृष्टिकोण को मानते हुए जाति आधारित कुरीतियों को समाप्त करना है तो इस सन्दर्भ में कठोर कानून बनाए जाएँ एवं समाजीकरण की प्रक्रिया को बदला जाए| ताकि एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सके|
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राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों की तुलना करते हुए, इसमें समानताओं तथा भिन्नताओं की चर्चा संक्षेप में कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While comparing the powers of the president and the Governor, briefly discuss the similarities and differences in it. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के पद का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में समानताओं का उल्लेख कीजिए। इसके बादराष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- संविधान के भाग पांच केअनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का उल्लेख है जिसका प्रमुख राष्ट्रपति को माना गया है। ऐसी ही व्यवस्था संघ की इकाइयों के लिएसंविधान में राज्यपाल के संदर्भ में उल्लेखित है। संविधान के छठें भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्यकार्यपालिका का वर्णन है, जिसका मुखिया राज्यपाल होता है। राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर भी कार्य करता है। इस तरह राज्यपाल की भूमिका दोहरी होती है। समानताएँ:- राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों को संवैधानिक प्रमुखों का दर्जा प्राप्त है। उनके नाम पर सभी कार्यकारी निर्णय लिए जाते हैं हालाँकि दोनों ही स्तर परवास्तविक शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है। सभी साधारण / मनी बिल को पारित किए जाने से पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल कीसहमति प्राप्त करनी होती है। दोनों के पास अध्यादेशों को लागू करने की शक्तियां हैं। सभी धन विधेयकों को लोकसभा में राष्ट्रपति और राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व सिफारिश के साथ हीपेश किया जा सकता है। भिन्नताएं:- राज्य में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ, संघ में राष्ट्रपति की तुलना में व्यापक हैं। राज्यपाल किसी को दोषी ठहराए जाने पर मौत की सजा कोक्षमा नहीं कर सकता, हालांकि वह इस तरह की सजा को कम कर सकता है। केवल राष्ट्रपति के पास ही मौत की सजा पाए व्यक्ति को क्षमा करने की शक्ति है। राष्ट्रपति लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामित कर सकता है वहीँराज्यपाल राज्य विधानमंडल में एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सदस्य को नामित कर सकता है। राष्ट्रपति ने राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित करता है वहीँराज्यों में जहाँ भी द्विसदनीय विधायिकाएँ मौजूद हैं, राज्यपाल राज्य विधान परिषद के 1/6 सदस्यों को नामित करता है। केवल राष्ट्रपति ही युद्ध या शांति की घोषणा कर सकते हैं, राज्यपाल के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है। केवल राष्ट्रपति ही किसी व्यक्ति को मार्शल लॉ के तहत दंडित कर सकते हैं, राज्यपाल को ऐसी शक्तियां नहीं दी गई। इस प्रकार दोनों ही पदों की शक्तियों में समानताएं एवं भिन्नताएं होते हुए भी दोनोंकी अपनी अपनी विशेषताएं एवं महत्व है।
##Question:राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों की तुलना करते हुए, इसमें समानताओं तथा भिन्नताओं की चर्चा संक्षेप में कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While comparing the powers of the president and the Governor, briefly discuss the similarities and differences in it. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के पद का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में समानताओं का उल्लेख कीजिए। इसके बादराष्ट्रपति एवं राज्यपाल की शक्तियों में भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए। उत्तर:- संविधान के भाग पांच केअनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का उल्लेख है जिसका प्रमुख राष्ट्रपति को माना गया है। ऐसी ही व्यवस्था संघ की इकाइयों के लिएसंविधान में राज्यपाल के संदर्भ में उल्लेखित है। संविधान के छठें भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्यकार्यपालिका का वर्णन है, जिसका मुखिया राज्यपाल होता है। राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर भी कार्य करता है। इस तरह राज्यपाल की भूमिका दोहरी होती है। समानताएँ:- राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों को संवैधानिक प्रमुखों का दर्जा प्राप्त है। उनके नाम पर सभी कार्यकारी निर्णय लिए जाते हैं हालाँकि दोनों ही स्तर परवास्तविक शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है। सभी साधारण / मनी बिल को पारित किए जाने से पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल कीसहमति प्राप्त करनी होती है। दोनों के पास अध्यादेशों को लागू करने की शक्तियां हैं। सभी धन विधेयकों को लोकसभा में राष्ट्रपति और राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व सिफारिश के साथ हीपेश किया जा सकता है। भिन्नताएं:- राज्य में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ, संघ में राष्ट्रपति की तुलना में व्यापक हैं। राज्यपाल किसी को दोषी ठहराए जाने पर मौत की सजा कोक्षमा नहीं कर सकता, हालांकि वह इस तरह की सजा को कम कर सकता है। केवल राष्ट्रपति के पास ही मौत की सजा पाए व्यक्ति को क्षमा करने की शक्ति है। राष्ट्रपति लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामित कर सकता है वहीँराज्यपाल राज्य विधानमंडल में एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक सदस्य को नामित कर सकता है। राष्ट्रपति ने राज्यसभा में 12 सदस्यों को नामित करता है वहीँराज्यों में जहाँ भी द्विसदनीय विधायिकाएँ मौजूद हैं, राज्यपाल राज्य विधान परिषद के 1/6 सदस्यों को नामित करता है। केवल राष्ट्रपति ही युद्ध या शांति की घोषणा कर सकते हैं, राज्यपाल के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है। केवल राष्ट्रपति ही किसी व्यक्ति को मार्शल लॉ के तहत दंडित कर सकते हैं, राज्यपाल को ऐसी शक्तियां नहीं दी गई। इस प्रकार दोनों ही पदों की शक्तियों में समानताएं एवं भिन्नताएं होते हुए भी दोनोंकी अपनी अपनी विशेषताएं एवं महत्व है।
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संवैधानिक उपचारों से आप क्या समझते हैं? संविधान का अनुच्छेद 32 कैसे संवैधानिक उपचारों की व्यवस्था करता है? (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by constitutional remedies? How does Article 32 of the Constitution provide for constitutional remedies? (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, संवैधानिक उपचारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचार प्रदान करने लिए प्रलेखों की व्यवस्था की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप मेंइन प्रलेखों के महत्व का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान का अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचार का अधिकार प्रदान करता है। यह मूलाधिकारों के संबंध डॉ अम्बेडकर के शब्दों में, " अनुच्छेद 32 संविधान का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है, इस अनुच्छेद के बिना संविधान अर्थविहीन है, यह संविधान की हृदय और आत्मा है।" संवैधानिक उपचार, संविधान के भाग तीन में दिए गए मूलाधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय हैं, ये उपचारमौलिक अधिकारों के उल्लंघन परसीधे सुप्रीम कोर्ट में जाने की व्यवस्था करते हैं। इनके बिना मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना चुनौतीपूर्ण एवं लगभग असंभव है। संवैधानिक उपचार प्रदान करने के लिए निम्नलिखित रिटों के तहत उपचार की व्यवस्था है:- बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus):- हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) का अर्थ है कि "आपके पास शरीर होना चाहिए"। यहरिट एक अदालत के समक्ष एक ऐसे आदमी को पेश करने के लिए जारी की जाती है जिसे हिरासत में या जेल में रखा गया है और हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया है और यदि यह पाया जाता है कि हिरासत में अवैध तरीके से रखा गया है तो कोर्ट ऐसे व्यक्ति को रिहा करा देती है। रिट का उद्देश्य अपराधी को दंडित करने का नहीं होता लेकिन अवैध तरीके से हिरासत में लिए गये व्यक्ति को रिहा कराना होता है। यह एकमात्र ऐसा प्रलेख जो निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी जारी किया जाता है। इस प्रकार यहराज्य और निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। परमादेश (Mandamus):- परमादेश का अर्थ है "हमारा आदेश है " यह कानूनी रूप से कार्य करने और गैर कानूनी कार्य के अंजाम से बचने के लिए, एक आदेश के रूप में एक न्यायिक उपाय है। इस रिट को जारी करने का आदेश उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा तब किया जाता है जब सरकार, अदालत, निगम या अधिकरण या लोक प्राधिकरण सार्वजनिक को निभा पाने में अक्षम होते हैं। किसी सार्वजनिक इकाई, अधीनस्थ न्यायालयों, प्राधिकरणों के विरुद्ध जारी किया जाता है। लेकिन इसेनिम्नलिखित स्थितियों में जारी नहीं किया जा सकता; जहाँ पर अधिकारी के पास कोई कार्य करने का विवेकीय अधिकार है। निजी व्यक्तियों के विरुद्ध राष्ट्रपति तथा राज्यपाल, हाई कोर्ट और उसके मुख्य न्यायधीश के विरुद्ध प्रत्यायोजित कानून बनाने वाले अधिकारी विरुद्ध इत्यादि प्रतिषेध(Prohibition):- प्रतिषेध का अर्थ होता है"रोकना।"जब कोई निचली अदालत या एक अर्ध न्यायिक निकाय एक विशेष मामले में अपने अधिकार क्षेत्र में प्रदतअधिकारों को अतिक्रमित कर किसी भी मुक़दमें की सुनवाई करती है तो सुप्रीम कोर्ट या अन्य कोई भी उच्च न्यायालय द्वारा रिट जारी की जाती है। भारत में, प्रतिषेधको मनमाने प्रशासनिक कार्यों से व्यक्ति की रक्षा के लिए जारी किया जाता है। यह रिट केवल अधीनस्थ अदालतों या अधिकरणों के मामलों में लागू होती है, यहप्रशासनिक प्राधिकरणों के विरुद्ध उपलब्ध नहीं है। उत्प्रेषण (Certiorari):- उत्प्रेषण का अर्थ होता है,""प्रमाणित होना" या "सूचना देना" ऐसे विभिन्न प्रकार के आधार हैं जिसके आधार पर उत्प्रेषण की रिट जारी की जाती है जैसे,अधिकार क्षेत्र का अभाव, न्याय क्षेत्र का दुरूपयोग, अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग, समान न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन इत्यादि। यहअधीनस्थ न्यायलयों या प्रशासनिक अधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती है। अधिकार पृच्छा (Quo warranto):- इसका अर्थ होता है"किस अधिकार द्वारा" इस प्रलेख कोनिम्नलिखित स्थितियों में जारी किया जा सकता है जैसे, पद सरकारी हो, कानून के जरिये पद सृजित किया गया हो याचिकाकृता पीड़ित व्यक्ति हो हालाँकि दूसरे व्यक्ति भी याचिका दे सकते हैं। जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिसका वह हकदार नहीं है तब न्यायालय अधिकार पृच्छा को जारी कर सकता है और व्यक्ति को उस पद पर कार्य करने से रोक देता है। अतः उपरोक्त प्रलेखों द्वारा सुप्रीम कोर्टमौलिक अधिकारों की सुरक्षा एवं गारंटी देता है।इन प्रलेखों के बिना संवैधानिक उपचारों की घोषणा अर्थहीन, तर्कहीन एवं शक्तिविहीन है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इन अधिकारों का गारंटर बनाया गया है।
##Question:संवैधानिक उपचारों से आप क्या समझते हैं? संविधान का अनुच्छेद 32 कैसे संवैधानिक उपचारों की व्यवस्था करता है? (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by constitutional remedies? How does Article 32 of the Constitution provide for constitutional remedies? (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, संवैधानिक उपचारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचार प्रदान करने लिए प्रलेखों की व्यवस्था की चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप मेंइन प्रलेखों के महत्व का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान का अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचार का अधिकार प्रदान करता है। यह मूलाधिकारों के संबंध डॉ अम्बेडकर के शब्दों में, " अनुच्छेद 32 संविधान का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है, इस अनुच्छेद के बिना संविधान अर्थविहीन है, यह संविधान की हृदय और आत्मा है।" संवैधानिक उपचार, संविधान के भाग तीन में दिए गए मूलाधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय हैं, ये उपचारमौलिक अधिकारों के उल्लंघन परसीधे सुप्रीम कोर्ट में जाने की व्यवस्था करते हैं। इनके बिना मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना चुनौतीपूर्ण एवं लगभग असंभव है। संवैधानिक उपचार प्रदान करने के लिए निम्नलिखित रिटों के तहत उपचार की व्यवस्था है:- बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus):- हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) का अर्थ है कि "आपके पास शरीर होना चाहिए"। यहरिट एक अदालत के समक्ष एक ऐसे आदमी को पेश करने के लिए जारी की जाती है जिसे हिरासत में या जेल में रखा गया है और हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया है और यदि यह पाया जाता है कि हिरासत में अवैध तरीके से रखा गया है तो कोर्ट ऐसे व्यक्ति को रिहा करा देती है। रिट का उद्देश्य अपराधी को दंडित करने का नहीं होता लेकिन अवैध तरीके से हिरासत में लिए गये व्यक्ति को रिहा कराना होता है। यह एकमात्र ऐसा प्रलेख जो निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी जारी किया जाता है। इस प्रकार यहराज्य और निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। परमादेश (Mandamus):- परमादेश का अर्थ है "हमारा आदेश है " यह कानूनी रूप से कार्य करने और गैर कानूनी कार्य के अंजाम से बचने के लिए, एक आदेश के रूप में एक न्यायिक उपाय है। इस रिट को जारी करने का आदेश उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा तब किया जाता है जब सरकार, अदालत, निगम या अधिकरण या लोक प्राधिकरण सार्वजनिक को निभा पाने में अक्षम होते हैं। किसी सार्वजनिक इकाई, अधीनस्थ न्यायालयों, प्राधिकरणों के विरुद्ध जारी किया जाता है। लेकिन इसेनिम्नलिखित स्थितियों में जारी नहीं किया जा सकता; जहाँ पर अधिकारी के पास कोई कार्य करने का विवेकीय अधिकार है। निजी व्यक्तियों के विरुद्ध राष्ट्रपति तथा राज्यपाल, हाई कोर्ट और उसके मुख्य न्यायधीश के विरुद्ध प्रत्यायोजित कानून बनाने वाले अधिकारी विरुद्ध इत्यादि प्रतिषेध(Prohibition):- प्रतिषेध का अर्थ होता है"रोकना।"जब कोई निचली अदालत या एक अर्ध न्यायिक निकाय एक विशेष मामले में अपने अधिकार क्षेत्र में प्रदतअधिकारों को अतिक्रमित कर किसी भी मुक़दमें की सुनवाई करती है तो सुप्रीम कोर्ट या अन्य कोई भी उच्च न्यायालय द्वारा रिट जारी की जाती है। भारत में, प्रतिषेधको मनमाने प्रशासनिक कार्यों से व्यक्ति की रक्षा के लिए जारी किया जाता है। यह रिट केवल अधीनस्थ अदालतों या अधिकरणों के मामलों में लागू होती है, यहप्रशासनिक प्राधिकरणों के विरुद्ध उपलब्ध नहीं है। उत्प्रेषण (Certiorari):- उत्प्रेषण का अर्थ होता है,""प्रमाणित होना" या "सूचना देना" ऐसे विभिन्न प्रकार के आधार हैं जिसके आधार पर उत्प्रेषण की रिट जारी की जाती है जैसे,अधिकार क्षेत्र का अभाव, न्याय क्षेत्र का दुरूपयोग, अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग, समान न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन इत्यादि। यहअधीनस्थ न्यायलयों या प्रशासनिक अधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती है। अधिकार पृच्छा (Quo warranto):- इसका अर्थ होता है"किस अधिकार द्वारा" इस प्रलेख कोनिम्नलिखित स्थितियों में जारी किया जा सकता है जैसे, पद सरकारी हो, कानून के जरिये पद सृजित किया गया हो याचिकाकृता पीड़ित व्यक्ति हो हालाँकि दूसरे व्यक्ति भी याचिका दे सकते हैं। जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिसका वह हकदार नहीं है तब न्यायालय अधिकार पृच्छा को जारी कर सकता है और व्यक्ति को उस पद पर कार्य करने से रोक देता है। अतः उपरोक्त प्रलेखों द्वारा सुप्रीम कोर्टमौलिक अधिकारों की सुरक्षा एवं गारंटी देता है।इन प्रलेखों के बिना संवैधानिक उपचारों की घोषणा अर्थहीन, तर्कहीन एवं शक्तिविहीन है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इन अधिकारों का गारंटर बनाया गया है।
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सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभ हेतु उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिए| साथ ही, इस आंदोलन की प्रकृति की चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) List the factors responsible for the start of the civil disobedience movement. Also, discuss the nature of this movement. (150-200 words; 10 Words)
एप्रोच- सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभ हेतु उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिए| अगले भाग में,सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रकृति की चर्चा कीजिए| उत्तर- साइमन कमीशन के गठन से उत्पन्न परिस्थितियां , कांग्रेस का कलकता अधिवेशन(1928), 1929 में गांधीजी का पूरे देश का दौरा , लॉर्ड इरविन की घोषणा, दिल्ली घोषणा पत्र(नवंबर 1929) आदि की पृष्ठभूमि में दिसंबर 1929 में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ| इसमें पूर्ण स्वराज्य की मांग तथा स्वतंत्रता दिवस मनाना जैसे कार्यक्रमों के साथ-साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने का भी निर्णय हुआ| भारत में स्वतंत्रता के लिए बदलते परिवेश तथा कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने की अनुमति के बाद गांधीजी ने यंग इंडिया में एक लेख प्रकाशित कर वायसराय इरविन के सामने 11 सूत्रीय मांगें रखीं | 31 जनवरी 1930 तक मांगों के ना पूरा होने की स्थिति में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन चालू करने की धमकी दी| फ़रवरी 1930 तक सरकार से कोई सकारात्मक उत्तर ना मिलने के बाद गांधीजी ने नमक पर कर के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए दांडी मार्च(12 मार्च-6 अप्रैल 1930) के माध्यम से नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत की| सविनय अवज्ञा आंदोलन(1930-34) प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारक- संघर्ष-तैयारी-संघर्ष का अगला चरण; असहयोग आंदोलन, साइमन विरोधी आंदोलन, नेहरू रिपोर्ट आदि गतिविधियों से एक रचनात्मक उत्साह का वातावरण निर्मित होना; परिवर्तन समर्थकों तथा परिवर्तन विरोधियों की गतिविधियों का भी कांग्रेस के राजनीतिक आधार को व्यापक बनाने तथा संगठन को सशक्त बनाने में योगदान; 20वीं सदी के तीसरे दशक में राजनीतिक सक्रियता को बनाये रखने में वामपंथियों एवं क्रांतिकारियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका ; इस दशक में कांग्रेस के भीतर तथा बाहर वामपंथ का विस्तार होना; किसानों, मजदूरों एवं छात्रों के बीच इस विचारधारा का तेजी से लोकप्रिय होना; भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रति युवाओं का आकर्षण भी बढ़ा; इस पृष्ठभूमि में सरकार का संवैधानिक सुधारों के प्रति प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण अपनाना तथा राष्ट्रीय मांगों की उपेक्षा करना; महामंदी के कारण परिस्थितियां भी आंदोलन के अनुकूल; उपरोक्त कारकों को ध्यान में रखते हुए तथा नमक का मुद्दे के रूप में चयन करते हुए आंदोलन को प्रारंभ किया गया| नमक का चयन इसलिए गया था कि इस मुद्दे में टकराव की गुंजाइश नहीं थी; यह समाज के सभी वर्गों से संबंधित मुद्दा था तथा गरीबों के लिए नमक कर की समाप्ति एक राहत भरा कदम हो सकता था| आंदोलन के दौरान मुख्य कार्यक्रम के रूप में असहयोग आंदोलन की तरह यहाँ भी विध्वंसात्मक एवं रचनात्मक कार्यक्रम पर ध्यान दिया गया| विध्वंसात्मक कार्यों में विधानमंडल तथा नौकरी से त्यागपत्र; नमक कर का विरोध; किसानों को कर न देने के लिए कहना; शराब की दुकानों पर धरना आदि कदम उठाये गए| सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रकृति असहयोग की तरह गांधीवादी रणनीति से संबंधित सभी महत्वपूर्ण विशेषताएं जैसे- आंदोलन को प्रारंभ करने एवं वापस लेने की औपचारिक घोषणा, निश्चित कार्यक्रम के अनुसार आंदोलन का संचालन, सरकार से वार्ता, आंदोलन को प्रत्येक स्थिति में अहिंसात्मक रखना आदि; कांग्रेस के नेतृत्व में यह पहला आंदोलन था जहाँ अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गयी थी| इतना ही नहीं, 1931 में कराची अधिवेशन में आर्थिक नीतियाँ, मूल-अधिकार तथा किसानों एवं मजदूरों के संदर्भ में भी कांग्रेस ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया| क्षेत्रीय दृष्टिकोण से देखें तो असहयोग की तुलना में इसका अधिक प्रसार देखा गया| शहरों एवं गाँवों के साथ-साथ कुछ रियासतों की भी भागीदारी भी आंदोलन में देखी गयी; जैसे- कश्मीर- शेख अब्दुल्ला; अलवर- के.एम.अशरफ; उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खां एवं उत्तर-पूर्वी भारत में रानी गिडनैल्यू आदि ने भी आंदोलन को क्षेत्रीय दृष्टिकोण से पूर्णता प्रदान की| सामाजिक आधार के दृष्टिकोण से भी यह आंदोलन अबतक के सभी आंदोलनों से व्यापक था| किसानों, महिलाओं, छात्रों की सर्वाधिक भागीदारी आंदोलन में देखी गयी| पूंजीपतियों ने भी खुलकर आंदोलन का समर्थन किया| देशी रियासतों में राष्ट्रवाद के स्वर , सेना में राष्ट्रीय चेतना की गूंज आदि अभिलक्षण; बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी की भागीदारी आंदोलन के विशिष्ट अभिलक्षण हैं| असहयोग की तुलना में मुस्लिम समुदाय की कम भागीदारी ; गुजरात में बच्चे एवं बच्चियों के लिए क्रमशः वानर तथा मंजीरी सेना का गठन; अन्य गांधीवादी आन्दोलनों की तरह यह आंदोलन भी संगठित एवं अहिंसात्मक था| अधिक से अधिक लोगों को आंदोलन से जोड़ने के लिए ना केवल मुद्दों के चयन में सावधानी बरती गयी जैसे- नमक, शराब, भूराजस्व इत्यादि से संबंधित मुद्दे बल्कि प्रभातभेरी जैसे तरीके भी अपनाए गए| सविनय अवज्ञा के कार्यक्रम भी असहयोग की तुलना में अपेक्षाकृत आक्रामक थें जैसे- कानूनों के उल्लंघन पर इसमें बल दिया गया| इतना ही नहीं, सरकार के आर्थिक हितों पर भी चोट की गयी| रचनात्मक कार्यों को पहले की तरह ही महत्व दिया गया लेकिन आंदोलन के दूसरे चरण में रचनात्मक कार्यों में हरिजन उत्थान कार्यक्रम को सर्वाधिक महत्व दिया गया| हालाँकि सरकार की दमनात्मक नीति, राजनीतिक दाँवपेंच(गाँधी-इरविन पैक्ट; गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन; कम्युनल अवार्ड आदि) , गांधीवादी रणनीति इत्यादि कारणों से ना केवल आंदोलन कमजोर हुआ बल्कि 1934 में गांधीजी ने इसे औपचारिक तौर पर वापस ले लिया|
##Question:सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभ हेतु उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिए| साथ ही, इस आंदोलन की प्रकृति की चर्चा कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) List the factors responsible for the start of the civil disobedience movement. Also, discuss the nature of this movement. (150-200 words; 10 Words)##Answer:एप्रोच- सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि से उत्तर का प्रारंभ कीजिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभ हेतु उत्तरदायी कारकों को सूचीबद्ध कीजिए| अगले भाग में,सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रकृति की चर्चा कीजिए| उत्तर- साइमन कमीशन के गठन से उत्पन्न परिस्थितियां , कांग्रेस का कलकता अधिवेशन(1928), 1929 में गांधीजी का पूरे देश का दौरा , लॉर्ड इरविन की घोषणा, दिल्ली घोषणा पत्र(नवंबर 1929) आदि की पृष्ठभूमि में दिसंबर 1929 में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ| इसमें पूर्ण स्वराज्य की मांग तथा स्वतंत्रता दिवस मनाना जैसे कार्यक्रमों के साथ-साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने का भी निर्णय हुआ| भारत में स्वतंत्रता के लिए बदलते परिवेश तथा कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने की अनुमति के बाद गांधीजी ने यंग इंडिया में एक लेख प्रकाशित कर वायसराय इरविन के सामने 11 सूत्रीय मांगें रखीं | 31 जनवरी 1930 तक मांगों के ना पूरा होने की स्थिति में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन चालू करने की धमकी दी| फ़रवरी 1930 तक सरकार से कोई सकारात्मक उत्तर ना मिलने के बाद गांधीजी ने नमक पर कर के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए दांडी मार्च(12 मार्च-6 अप्रैल 1930) के माध्यम से नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत की| सविनय अवज्ञा आंदोलन(1930-34) प्रारंभ होने के उत्तरदायी कारक- संघर्ष-तैयारी-संघर्ष का अगला चरण; असहयोग आंदोलन, साइमन विरोधी आंदोलन, नेहरू रिपोर्ट आदि गतिविधियों से एक रचनात्मक उत्साह का वातावरण निर्मित होना; परिवर्तन समर्थकों तथा परिवर्तन विरोधियों की गतिविधियों का भी कांग्रेस के राजनीतिक आधार को व्यापक बनाने तथा संगठन को सशक्त बनाने में योगदान; 20वीं सदी के तीसरे दशक में राजनीतिक सक्रियता को बनाये रखने में वामपंथियों एवं क्रांतिकारियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका ; इस दशक में कांग्रेस के भीतर तथा बाहर वामपंथ का विस्तार होना; किसानों, मजदूरों एवं छात्रों के बीच इस विचारधारा का तेजी से लोकप्रिय होना; भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रति युवाओं का आकर्षण भी बढ़ा; इस पृष्ठभूमि में सरकार का संवैधानिक सुधारों के प्रति प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण अपनाना तथा राष्ट्रीय मांगों की उपेक्षा करना; महामंदी के कारण परिस्थितियां भी आंदोलन के अनुकूल; उपरोक्त कारकों को ध्यान में रखते हुए तथा नमक का मुद्दे के रूप में चयन करते हुए आंदोलन को प्रारंभ किया गया| नमक का चयन इसलिए गया था कि इस मुद्दे में टकराव की गुंजाइश नहीं थी; यह समाज के सभी वर्गों से संबंधित मुद्दा था तथा गरीबों के लिए नमक कर की समाप्ति एक राहत भरा कदम हो सकता था| आंदोलन के दौरान मुख्य कार्यक्रम के रूप में असहयोग आंदोलन की तरह यहाँ भी विध्वंसात्मक एवं रचनात्मक कार्यक्रम पर ध्यान दिया गया| विध्वंसात्मक कार्यों में विधानमंडल तथा नौकरी से त्यागपत्र; नमक कर का विरोध; किसानों को कर न देने के लिए कहना; शराब की दुकानों पर धरना आदि कदम उठाये गए| सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रकृति असहयोग की तरह गांधीवादी रणनीति से संबंधित सभी महत्वपूर्ण विशेषताएं जैसे- आंदोलन को प्रारंभ करने एवं वापस लेने की औपचारिक घोषणा, निश्चित कार्यक्रम के अनुसार आंदोलन का संचालन, सरकार से वार्ता, आंदोलन को प्रत्येक स्थिति में अहिंसात्मक रखना आदि; कांग्रेस के नेतृत्व में यह पहला आंदोलन था जहाँ अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गयी थी| इतना ही नहीं, 1931 में कराची अधिवेशन में आर्थिक नीतियाँ, मूल-अधिकार तथा किसानों एवं मजदूरों के संदर्भ में भी कांग्रेस ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया| क्षेत्रीय दृष्टिकोण से देखें तो असहयोग की तुलना में इसका अधिक प्रसार देखा गया| शहरों एवं गाँवों के साथ-साथ कुछ रियासतों की भी भागीदारी भी आंदोलन में देखी गयी; जैसे- कश्मीर- शेख अब्दुल्ला; अलवर- के.एम.अशरफ; उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खां एवं उत्तर-पूर्वी भारत में रानी गिडनैल्यू आदि ने भी आंदोलन को क्षेत्रीय दृष्टिकोण से पूर्णता प्रदान की| सामाजिक आधार के दृष्टिकोण से भी यह आंदोलन अबतक के सभी आंदोलनों से व्यापक था| किसानों, महिलाओं, छात्रों की सर्वाधिक भागीदारी आंदोलन में देखी गयी| पूंजीपतियों ने भी खुलकर आंदोलन का समर्थन किया| देशी रियासतों में राष्ट्रवाद के स्वर , सेना में राष्ट्रीय चेतना की गूंज आदि अभिलक्षण; बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी की भागीदारी आंदोलन के विशिष्ट अभिलक्षण हैं| असहयोग की तुलना में मुस्लिम समुदाय की कम भागीदारी ; गुजरात में बच्चे एवं बच्चियों के लिए क्रमशः वानर तथा मंजीरी सेना का गठन; अन्य गांधीवादी आन्दोलनों की तरह यह आंदोलन भी संगठित एवं अहिंसात्मक था| अधिक से अधिक लोगों को आंदोलन से जोड़ने के लिए ना केवल मुद्दों के चयन में सावधानी बरती गयी जैसे- नमक, शराब, भूराजस्व इत्यादि से संबंधित मुद्दे बल्कि प्रभातभेरी जैसे तरीके भी अपनाए गए| सविनय अवज्ञा के कार्यक्रम भी असहयोग की तुलना में अपेक्षाकृत आक्रामक थें जैसे- कानूनों के उल्लंघन पर इसमें बल दिया गया| इतना ही नहीं, सरकार के आर्थिक हितों पर भी चोट की गयी| रचनात्मक कार्यों को पहले की तरह ही महत्व दिया गया लेकिन आंदोलन के दूसरे चरण में रचनात्मक कार्यों में हरिजन उत्थान कार्यक्रम को सर्वाधिक महत्व दिया गया| हालाँकि सरकार की दमनात्मक नीति, राजनीतिक दाँवपेंच(गाँधी-इरविन पैक्ट; गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन; कम्युनल अवार्ड आदि) , गांधीवादी रणनीति इत्यादि कारणों से ना केवल आंदोलन कमजोर हुआ बल्कि 1934 में गांधीजी ने इसे औपचारिक तौर पर वापस ले लिया|
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भारतीय समाज में विविधता के विभिन्न तत्वों का संक्षिप्त विवरण देते हुए धार्मिक विविधता की प्रकृति की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Give a brief description of various elements of diversity in Indian society and explain the nature of religious diversity. (150-200 words; 10 marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भारतीय समाज की विविधता के बारे में लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में विविधता के विभिन्न तत्वों को लिखिए। इसके बाद भारत में धार्मिक विविधता की प्रकृति लिखिए। सारांश रुप में निष्कर्ष लिखिए। भारत सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में एक बहुल समाज है। विभिन्न जातियों और समुदाय के लोगों की संस्कृतियों धर्मों और भाषाओं के व्यापक समन्वय ने कई विदेशी आक्रमणों के बावजूद इसकी एकता और सामंजस्य को बनाए रखा है। भारतीय समाज की विविधता विश्व में किसी भी देश की तुलना में व्यापक और अद्वितीय है। भारत में विविधता के तत्व: धार्मिक विविधता भाषाई विविधता नृजातीय विविधता जातीय विविधता सांस्कृतिक विविधता भौगोलिक विविधता भारत में धार्मिक विविधता की प्रकृति: भारत अनेक धर्मों का उद्गम स्थल है जैसे- हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन विभिन्न धर्म एक दूसरे से स्वतंत्र अपनी पहचान रखते हैं। इन्हे संविधान ने अधिकार प्रदान किया है। धार्मिक विविधता में क्षेत्रीय विषमता विद्यमान है। कुछ क्षेत्रों में कोई धर्म सघन रूप से है तो ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां जनसंख्या बहुत कम है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या, शिक्षा संबंधी अंतर विद्यमान है। भारत में धार्मिक सहिष्णुता सभी धर्मों का अद्वितीय लक्षण है। सभी धर्मों में महिलाओं की स्थिति एक समान नहीं है। समान्यतः ईसाई धर्म में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी है तो इस्लाम में तुलनात्मक रूप से दयनीय स्थिति है। भारत में त्योहारों एवं परम्पराओं का निर्धारण धर्म के आधार पर ही होता है। प्रत्येक धर्म की अपनी विशेष मान्यता है। वे स्वतंत्र रूप से इसका निर्वहन करते हैं। धार्मिक विविधता ने देश की एकता को सुदृढ़ किया है तो कहीं न कहीं एकता को कमजोर करने में भी योगदान दिया है। क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने में भी धार्मिक विविधता एक कारक है। निष्कर्षतः भारत को विविधता में एकता के रूप में जाना जाता है। जिसमें धार्मिक विविधता एक अद्वितीय पहचान है। यह भारत को पंथनिरपेक्ष बनाता है। सभी धर्मों में सहिष्णुता मूल रूप से विद्यमान है। संविधान ने इसे और सुदृढ़ करने का प्रयास किया है।
##Question:भारतीय समाज में विविधता के विभिन्न तत्वों का संक्षिप्त विवरण देते हुए धार्मिक विविधता की प्रकृति की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Give a brief description of various elements of diversity in Indian society and explain the nature of religious diversity. (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भारतीय समाज की विविधता के बारे में लिखिए। उत्तर के प्रथम भाग में विविधता के विभिन्न तत्वों को लिखिए। इसके बाद भारत में धार्मिक विविधता की प्रकृति लिखिए। सारांश रुप में निष्कर्ष लिखिए। भारत सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में एक बहुल समाज है। विभिन्न जातियों और समुदाय के लोगों की संस्कृतियों धर्मों और भाषाओं के व्यापक समन्वय ने कई विदेशी आक्रमणों के बावजूद इसकी एकता और सामंजस्य को बनाए रखा है। भारतीय समाज की विविधता विश्व में किसी भी देश की तुलना में व्यापक और अद्वितीय है। भारत में विविधता के तत्व: धार्मिक विविधता भाषाई विविधता नृजातीय विविधता जातीय विविधता सांस्कृतिक विविधता भौगोलिक विविधता भारत में धार्मिक विविधता की प्रकृति: भारत अनेक धर्मों का उद्गम स्थल है जैसे- हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन विभिन्न धर्म एक दूसरे से स्वतंत्र अपनी पहचान रखते हैं। इन्हे संविधान ने अधिकार प्रदान किया है। धार्मिक विविधता में क्षेत्रीय विषमता विद्यमान है। कुछ क्षेत्रों में कोई धर्म सघन रूप से है तो ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां जनसंख्या बहुत कम है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या, शिक्षा संबंधी अंतर विद्यमान है। भारत में धार्मिक सहिष्णुता सभी धर्मों का अद्वितीय लक्षण है। सभी धर्मों में महिलाओं की स्थिति एक समान नहीं है। समान्यतः ईसाई धर्म में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी है तो इस्लाम में तुलनात्मक रूप से दयनीय स्थिति है। भारत में त्योहारों एवं परम्पराओं का निर्धारण धर्म के आधार पर ही होता है। प्रत्येक धर्म की अपनी विशेष मान्यता है। वे स्वतंत्र रूप से इसका निर्वहन करते हैं। धार्मिक विविधता ने देश की एकता को सुदृढ़ किया है तो कहीं न कहीं एकता को कमजोर करने में भी योगदान दिया है। क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने में भी धार्मिक विविधता एक कारक है। निष्कर्षतः भारत को विविधता में एकता के रूप में जाना जाता है। जिसमें धार्मिक विविधता एक अद्वितीय पहचान है। यह भारत को पंथनिरपेक्ष बनाता है। सभी धर्मों में सहिष्णुता मूल रूप से विद्यमान है। संविधान ने इसे और सुदृढ़ करने का प्रयास किया है।
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Briefly discuss the evolution of the Kathak dance and also explain its features. (150 words/10 Marks).
Approach Introduce answer with kathak basics In the Body try to highlight its features. Conclude with significance in contemporary times Answer Kathak started from Kathakar i.e.story telling tradition of the Braj area whereby the proponents were reciting stories from Ramayan, Mahabharat, and Puranas and they were also performing on these themes. Slowly it became popular as a religious dance. With the arrival of the Mughals, it received huge impetus and the religious dance form was transformed into court dance. It also resulted in Persian influence in Kathak. In modern times, Kathak received global recognition due to the efforts of Leela Sokhey Features- Persian influences are reflected in the costumes of females. Costume of males is known as Angrakha, which is a cotton towel and Dhoti. Usually, dancers take a turn and jump in the air which leads to the creation of Pireouttes. Pireouttes provides further elegance to Kathak. As compared to other classical forms there is no bent position in Kathak. Instead, full foot contact with the dance floor is of utmost importance. Ankle bells are also the necessary feature of Kathak from which music is created. Many times dancers interact with the audience. The element of recital in Kathak- Toda, Tukda, Adavus, That, Kramalaya, Padhant, Jugalbandi and Gat bhaav Jugalbandi is the most popular play of the Kathak in which the dancer and musician compete with each other. Kathak is the only classical form where the Gharana system exists. The Gharana system in dance is based on the emphasization of a particular part of the dance. Famous Gharana of Kathak includes- Lucknow- it emphasizes on expression, it came into Prominence due to the efforts of Nawab Wazid Ali Shah. Banaras- it emphasizes symmetry, it came to prominence under Jankiprasad Jaipur- emphasizes rhythm. It came to prominence under Bhanuji. In the beginning, Dhrupad classical music was used but later with the arrival of Mughals Thumari, Tarana and Ghazal were also introduced. Famous proponents- Birju Maharaj, Lachu Maharaj, Lady Sitara Devi, Damyanti Joshi Conclusion Kathak is a very unique classical dance. It not only has religious and spiritual significance but also offers livelihood sources to many such as artisans etc and has significance in Indian Bollywood Industry.
##Question:Briefly discuss the evolution of the Kathak dance and also explain its features. (150 words/10 Marks).##Answer:Approach Introduce answer with kathak basics In the Body try to highlight its features. Conclude with significance in contemporary times Answer Kathak started from Kathakar i.e.story telling tradition of the Braj area whereby the proponents were reciting stories from Ramayan, Mahabharat, and Puranas and they were also performing on these themes. Slowly it became popular as a religious dance. With the arrival of the Mughals, it received huge impetus and the religious dance form was transformed into court dance. It also resulted in Persian influence in Kathak. In modern times, Kathak received global recognition due to the efforts of Leela Sokhey Features- Persian influences are reflected in the costumes of females. Costume of males is known as Angrakha, which is a cotton towel and Dhoti. Usually, dancers take a turn and jump in the air which leads to the creation of Pireouttes. Pireouttes provides further elegance to Kathak. As compared to other classical forms there is no bent position in Kathak. Instead, full foot contact with the dance floor is of utmost importance. Ankle bells are also the necessary feature of Kathak from which music is created. Many times dancers interact with the audience. The element of recital in Kathak- Toda, Tukda, Adavus, That, Kramalaya, Padhant, Jugalbandi and Gat bhaav Jugalbandi is the most popular play of the Kathak in which the dancer and musician compete with each other. Kathak is the only classical form where the Gharana system exists. The Gharana system in dance is based on the emphasization of a particular part of the dance. Famous Gharana of Kathak includes- Lucknow- it emphasizes on expression, it came into Prominence due to the efforts of Nawab Wazid Ali Shah. Banaras- it emphasizes symmetry, it came to prominence under Jankiprasad Jaipur- emphasizes rhythm. It came to prominence under Bhanuji. In the beginning, Dhrupad classical music was used but later with the arrival of Mughals Thumari, Tarana and Ghazal were also introduced. Famous proponents- Birju Maharaj, Lachu Maharaj, Lady Sitara Devi, Damyanti Joshi Conclusion Kathak is a very unique classical dance. It not only has religious and spiritual significance but also offers livelihood sources to many such as artisans etc and has significance in Indian Bollywood Industry.
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प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों को बताते हुए ,गठबंधन सरकार में इसकी भूमिका एवं स्थिति की संक्षेप में विवेचना कीजिये | (150-200 शब्द) Describing the Prime Minister"s special powers, briefly discuss his role and position in coalition government.(150-200 words)
एप्रोच _ प्रधानमंत्री की संवैधानिक स्थिति बताइए | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार क्या-क्या हैं , इसका चर्चा करना है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों पर गठबंधन का क्या प्रभाव पड़ेगा , इसका वर्णन करना है | उत्तर - भारत में सरकार एवं शासन की वेस्टमिन्स्टर प्रणाली अथवा ब्रिटेन के प्रारूप का अनुगमन किया गया है | प्रधानमंत्री के अधिकांश कार्य ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर की भाँति संसदीय परम्पराओं पर ही आधारित हैं |प्रधानमंत्री "समकक्षों में प्रथम" "सरकार का प्रमुख" "मंत्रिपरिषद के निर्माण ,जीवन और मृत्यु का केंद्रबिंदु" है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों में निम्नलिखित प्रमुख हैं- - मंत्रियों की नियुक्ति, मंत्रालय का आबंटन,बैठकों की अध्यक्षता ,समन्वय एवं मंत्रियों को पदच्युत करना | - राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद के मध्य संवाद की प्रमुख कड़ी के रूप में | - महान्यायवादी, संघ लोक सेवा आयोग ,चुनाव आयोग जैसे कई अन्य संस्थाओं में नियुक्ति हेतु राष्ट्रपति को सलाह देना | - संसद के सत्र आहूत करने एवं सत्रावसान करने ,संसद के पटल पर नीतियों की घोषणा करना | - जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हुए जनकल्याण हेतु नीति निर्माण करना | - देश की आतंरिक शासन नीतियों का निर्माण | - देश की विदेश नीति का संचालन करना | - केंद्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता | इस प्रकार प्रधानमंत्री केन्द्रीय मंत्री परिषद का केंद्र बिंदु है और जनता की इच्छाओं को प्रतिबिंबित करने वाला स्तम्भ है , किन्तु गठबंधन सरकार में कुछ कारणों से उसकी शक्तियां व्यावहारिक रूप से सीमित हो जाती हैं | इसके प्रमुख कारण निम्न हैं - 1. गठबंधन से पूर्व ही पद प्राप्त करने का समझौता करने से अपनी इच्छा से मंत्री नियुक्त करने की शक्ति सीमित हो जाती है | 2. गठबंधन पूर्व साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय करने से नीति निर्माण में प्रधानमंत्री की स्वतंत्रता नहीं रह पाती | 3. स्पष्ट बहुमत प्राप्त प्रधनामंत्री लोकसभा को नियंत्रित करता है किन्तु गठबंधन सरकार का प्रधानमंत्री लोकसभा द्वारा नियंत्रित होता है| इस प्रकार गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका नीति निर्माता और निर्णायक की नहीं रहती अपितु उसकी स्थिति एक प्रबंधक के समान हो जाती है | फिर भी प्रधानमंत्री अपने कृत्रित्व और व्यक्तित्व से गठबन्धन सरकार में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है |
##Question:प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों को बताते हुए ,गठबंधन सरकार में इसकी भूमिका एवं स्थिति की संक्षेप में विवेचना कीजिये | (150-200 शब्द) Describing the Prime Minister"s special powers, briefly discuss his role and position in coalition government.(150-200 words)##Answer:एप्रोच _ प्रधानमंत्री की संवैधानिक स्थिति बताइए | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार क्या-क्या हैं , इसका चर्चा करना है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों पर गठबंधन का क्या प्रभाव पड़ेगा , इसका वर्णन करना है | उत्तर - भारत में सरकार एवं शासन की वेस्टमिन्स्टर प्रणाली अथवा ब्रिटेन के प्रारूप का अनुगमन किया गया है | प्रधानमंत्री के अधिकांश कार्य ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर की भाँति संसदीय परम्पराओं पर ही आधारित हैं |प्रधानमंत्री "समकक्षों में प्रथम" "सरकार का प्रमुख" "मंत्रिपरिषद के निर्माण ,जीवन और मृत्यु का केंद्रबिंदु" है | प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों में निम्नलिखित प्रमुख हैं- - मंत्रियों की नियुक्ति, मंत्रालय का आबंटन,बैठकों की अध्यक्षता ,समन्वय एवं मंत्रियों को पदच्युत करना | - राष्ट्रपति एवं मंत्रिपरिषद के मध्य संवाद की प्रमुख कड़ी के रूप में | - महान्यायवादी, संघ लोक सेवा आयोग ,चुनाव आयोग जैसे कई अन्य संस्थाओं में नियुक्ति हेतु राष्ट्रपति को सलाह देना | - संसद के सत्र आहूत करने एवं सत्रावसान करने ,संसद के पटल पर नीतियों की घोषणा करना | - जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हुए जनकल्याण हेतु नीति निर्माण करना | - देश की आतंरिक शासन नीतियों का निर्माण | - देश की विदेश नीति का संचालन करना | - केंद्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता | इस प्रकार प्रधानमंत्री केन्द्रीय मंत्री परिषद का केंद्र बिंदु है और जनता की इच्छाओं को प्रतिबिंबित करने वाला स्तम्भ है , किन्तु गठबंधन सरकार में कुछ कारणों से उसकी शक्तियां व्यावहारिक रूप से सीमित हो जाती हैं | इसके प्रमुख कारण निम्न हैं - 1. गठबंधन से पूर्व ही पद प्राप्त करने का समझौता करने से अपनी इच्छा से मंत्री नियुक्त करने की शक्ति सीमित हो जाती है | 2. गठबंधन पूर्व साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय करने से नीति निर्माण में प्रधानमंत्री की स्वतंत्रता नहीं रह पाती | 3. स्पष्ट बहुमत प्राप्त प्रधनामंत्री लोकसभा को नियंत्रित करता है किन्तु गठबंधन सरकार का प्रधानमंत्री लोकसभा द्वारा नियंत्रित होता है| इस प्रकार गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका नीति निर्माता और निर्णायक की नहीं रहती अपितु उसकी स्थिति एक प्रबंधक के समान हो जाती है | फिर भी प्रधानमंत्री अपने कृत्रित्व और व्यक्तित्व से गठबन्धन सरकार में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है |
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राज्य के नीति निर्देशक तत्वों से आप क्या समझते है? इन तत्वों की प्रकृति एवं उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) What do you understand by the Directive Principles of State Policy? Discuss in detail the nature and objectives of these elements. (150-200 words, Marks-10 )
एप्रोच;- सर्वप्रथम, राज्य के नीति निदेशक तत्वों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, इन तत्वों की प्रकृति एवं उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा कीजिए। अंत में इन तत्वों के महत्व का संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद-36 से 51 तक में शामिल किया गया है ।इन तत्वों को आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। ग्रेनविल ऑस्टिन ने इन तत्वों को संविधान की मूल आत्मा कहा है। हालाँकि ये तत्व मूलाधिकार कीतरह राज्य के लिए नकारात्मक नहीं है परन्तु ये राज्य के लिए सकारात्मक हैं अर्थात राज्य इन्हें अपने कानून, नीति निर्माण बनातेसमय ध्यान में रखता है। नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति:- अनुच्छेद 37 में निदेशक तत्वों की प्रकृति का उल्लेख किया गया है। इस अनुच्छेद अनुसारनिदेशक तत्व वाद योग्य नहीं हैं अर्थात इन्हें लागू करवाने के लिए न्यायलय नहीं जाया जा सकता फिर भी शासन सचांलन में ये बहुत महत्वपूर्ण होंगे। नीति निर्देशक तत्व बाध्यकारी नहीं हैं अर्थात यदि राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहता है तो कोई भी इसके विरुद्ध न्यायालय नहीं जा सकता है। नीति निर्देशक तत्वों की स्वीकृति राजनीतिक जो ठोस संवैधानिक और नैतिक दायित्वों पर आधारित है । अतः नीति निदेशक तत्वों का कार्यान्वयन राज्य की इच्छा पर निर्भर नहीं है बल्कि यह उनका दायित्व है कि वह इन तत्वों को लागू करने की इच्छा शक्ति प्रदर्शित करे एवं व्यवहार में इन्हे रूपांतरित करे यदि राज्य ऐसा नहीं करता तो, उच्चत्तर अदालते राज्य के उदासीन व्यवहार पर टिप्पणी कर सकती हैं। नीति निदेशक तत्वों के उद्देश्य:- इन तत्वों काउद्देश्य न्याय में उच्च आदर्श बनायेरखना, स्वतंत्रता एवं समानता की भावना बनाये रखना है। इनका उद्देश्य लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है न कि पुलिस राज्य की स्थापना करना है अर्थात आर्थिक एवंसामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना की इनका उद्देश्य है। इन तत्वों के उद्देश्य इनके विभिन्न अनुच्छेदों में परिलक्षित होतेहै जैसे; अनुच्छेद 38 के तहत राज्यकल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा, जिससे नागरिक को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा। अनुच्छेद 39 (क) सामान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता, समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था करना। अनुच्छेद 39 (ख) सार्वजनिक धन का स्वामित्व तथा नियंत्रण इस प्रकार करना ताकि सार्वजनिक हित का सर्वोत्तम साधन हो सके। अनुछेद-41 के अनुपालन मेंरोजगार गारंटी योजना को लागू किया गया । अनुच्छेद-46 के अनुपालन मेंसमाज के कमजोर वर्ग के बच्चों जैसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों इत्यादि के बच्चो को छात्रवृति प्रदान करना। अनुच्छेद-42 के तहत सरकारी नौकरी में कार्यरत गर्भवती माताओं को भुगतान के साथ लाभ प्रदान करना अर्थात मातृत्व लाभ देना इत्यादि। अतः ये तत्व शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । सरकार या विधायिका कानून व नीति बनाते समय इन तत्वों को ध्यान में रखती है । डॉ अंबेडकर के अनुसार कोई भी सरकार इन तत्वों की अनदेखी नही कर सकती और यदि ऐसा करती है तो अगले चुनाव में जनता के सामने उस सरकार को जवाब देना पड़ेगा।
##Question:राज्य के नीति निर्देशक तत्वों से आप क्या समझते है? इन तत्वों की प्रकृति एवं उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10) What do you understand by the Directive Principles of State Policy? Discuss in detail the nature and objectives of these elements. (150-200 words, Marks-10 )##Answer:एप्रोच;- सर्वप्रथम, राज्य के नीति निदेशक तत्वों का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, इन तत्वों की प्रकृति एवं उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा कीजिए। अंत में इन तत्वों के महत्व का संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद-36 से 51 तक में शामिल किया गया है ।इन तत्वों को आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। ग्रेनविल ऑस्टिन ने इन तत्वों को संविधान की मूल आत्मा कहा है। हालाँकि ये तत्व मूलाधिकार कीतरह राज्य के लिए नकारात्मक नहीं है परन्तु ये राज्य के लिए सकारात्मक हैं अर्थात राज्य इन्हें अपने कानून, नीति निर्माण बनातेसमय ध्यान में रखता है। नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति:- अनुच्छेद 37 में निदेशक तत्वों की प्रकृति का उल्लेख किया गया है। इस अनुच्छेद अनुसारनिदेशक तत्व वाद योग्य नहीं हैं अर्थात इन्हें लागू करवाने के लिए न्यायलय नहीं जाया जा सकता फिर भी शासन सचांलन में ये बहुत महत्वपूर्ण होंगे। नीति निर्देशक तत्व बाध्यकारी नहीं हैं अर्थात यदि राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहता है तो कोई भी इसके विरुद्ध न्यायालय नहीं जा सकता है। नीति निर्देशक तत्वों की स्वीकृति राजनीतिक जो ठोस संवैधानिक और नैतिक दायित्वों पर आधारित है । अतः नीति निदेशक तत्वों का कार्यान्वयन राज्य की इच्छा पर निर्भर नहीं है बल्कि यह उनका दायित्व है कि वह इन तत्वों को लागू करने की इच्छा शक्ति प्रदर्शित करे एवं व्यवहार में इन्हे रूपांतरित करे यदि राज्य ऐसा नहीं करता तो, उच्चत्तर अदालते राज्य के उदासीन व्यवहार पर टिप्पणी कर सकती हैं। नीति निदेशक तत्वों के उद्देश्य:- इन तत्वों काउद्देश्य न्याय में उच्च आदर्श बनायेरखना, स्वतंत्रता एवं समानता की भावना बनाये रखना है। इनका उद्देश्य लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है न कि पुलिस राज्य की स्थापना करना है अर्थात आर्थिक एवंसामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना की इनका उद्देश्य है। इन तत्वों के उद्देश्य इनके विभिन्न अनुच्छेदों में परिलक्षित होतेहै जैसे; अनुच्छेद 38 के तहत राज्यकल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा, जिससे नागरिक को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा। अनुच्छेद 39 (क) सामान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता, समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था करना। अनुच्छेद 39 (ख) सार्वजनिक धन का स्वामित्व तथा नियंत्रण इस प्रकार करना ताकि सार्वजनिक हित का सर्वोत्तम साधन हो सके। अनुछेद-41 के अनुपालन मेंरोजगार गारंटी योजना को लागू किया गया । अनुच्छेद-46 के अनुपालन मेंसमाज के कमजोर वर्ग के बच्चों जैसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों इत्यादि के बच्चो को छात्रवृति प्रदान करना। अनुच्छेद-42 के तहत सरकारी नौकरी में कार्यरत गर्भवती माताओं को भुगतान के साथ लाभ प्रदान करना अर्थात मातृत्व लाभ देना इत्यादि। अतः ये तत्व शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । सरकार या विधायिका कानून व नीति बनाते समय इन तत्वों को ध्यान में रखती है । डॉ अंबेडकर के अनुसार कोई भी सरकार इन तत्वों की अनदेखी नही कर सकती और यदि ऐसा करती है तो अगले चुनाव में जनता के सामने उस सरकार को जवाब देना पड़ेगा।
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यद्यपि इजराइल के साथ भारत केसम्बन्ध परंपरागत नहीं है किन्तु निकट वर्षों में दोनों के मध्य बहुआयामी सहयोग की प्रवृत्ति देखी जा रही है| स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द/10 अंक) Although India"s relationship with Israel is not traditional, But the trend of multi-dimensional cooperation between the two is seen in the near years. Clarify (150 to 200 words/ 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में 1992 से पूर्व की स्थिति और उसके कारक 2- प्रथम भाग में सम्बन्धों की शुरुआत एवं उसके कारक 3- दुसरे भाग में निकट वर्षों में सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आने के कारक & सहयोगात्मक पहलों को बताइए 4- अंतिम में सम्बन्धों कि चुनौतियों के बाद भी सहयोग के बढ़ने को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुदूर पश्चिम एशिया में इजराइल एक राष्ट्र के रूप में मई 1948 में आस्तित्व में आया| एक राष्ट्र के रूप में इजराइल को भारत ने 1950 में मान्यता दे दी थी किन्तु भारत एवं इजराइल के मध्य राजनयिक संबंधों की शुरुआत 1992 में हुई| 1950 से लेकर 1992 के मध्य दोनों देशों में पारस्परिक सहयोग के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं लेकिन कूटनीतिक संबधों में विलंबित स्थापना के अनेक कारक थे|यह आदर्शवादी विदेश नीति का काल था, इस दौर में भारतीय विदेश नीति फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देती थी| दूसरे भारत एक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र था जबकि इजराइल को पश्चिमी राष्ट्रों का सहयोग प्राप्त था, इसके साथ ही भारत समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव से युक्त राष्ट्र था| इन्ही कारकों ने भारत-इजराइल सम्बन्ध को राजनयिक स्तर तक पहुचने से रोक रखा था| 1990 के दशक में विश्व व्यवस्था में परिवर्तन आया | सोवियत संघ, जो कि भारत का परंपरागत एवं प्रमुख सहयोगी राष्ट्र था विभाजित हो गया,यहाँ शीत युद्ध की समाप्ति होती है | इसी समय भारत संप्रभु ऋण संकट अथवा भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था | इन परिस्थितियों में भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं में परिवर्तन आया | अब भारत को नए एवं सक्षम मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता थी जो आवश्यकता पड़ने पर भारत को आर्थिक एवं सामरिक सहयोग दे सकें | इसी पृष्ठभूमि में भारत इजराइल के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की शुरुआत हुई | सुधार के आयाम · 1992 के बाद भारत ने दोनों राष्ट्रों को समान महत्त्व देने की नीति अपनाई है किन्तु भारत ने अब डीहाईफनेशन की नीति अपना ली है अर्थात अब भारत भारतीय हितों के अनुरूप निर्णयन करने लगा है न कि किसी अन्य राष्ट्र के दृष्टिकोण से| · अब भारत का यह मानना है कि इजराइल-फिलिस्तीन विवाद उनका आन्तरिक मामला है अतः भारत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता · इजराइल के महत्त्व को देखते हुए भारतीय कूटनीति का झुकाव इजराइल की ओर दिखाई देता है किन्तु वस्तुतः भारत समान दूरी की नीति पर चल रहा है · अब UN में इजराइल-फिलिस्तीन विवादपर लाये गए किसी भी प्रस्ताव पर भारत तटस्थता की नीति अपना रहा है और इस प्रकार सम्बन्धों में संतुलन स्थापना के प्रयास करता है · भारत येरुशलम को इजराइल की राजधानी नहीं मानता किन्तु इसका विरोध भी नहीं कर रहा है · उपरोक्त नीति पर चलते हुए विगत तीन दशकों में भारत-इजराइल के मध्य सहयोग निरंतर बढ़ता ही गया है |भारत की आवश्यकतायें और उनकी पूर्ति में इजराइल का सक्षम होना निरंतर बढ़ती सहयोगात्मक प्रवृत्ति का मुख्य कारक है| इसे निम्नलिखित पहलों के माध्यम से समझा जा सकता है विज्ञान के क्षेत्र में · हाल ही में भारतीय PM की इजराइल यात्रा हुई है, इस यात्रा का बहुत प्रचार नहीं किया गया है| इस यात्रा में 7 समझौते किये गए हैं यथा · विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग करते हुए दोनों देशों ने 40 मिलयन डॉलर का फंड बनाया है| यह नवाचार के क्षेत्र में निधियन करेगा · भारत-इजराइल ने तकनीक के क्षेत्र में सहयोग सम्बन्ध मजबूत किये हैं| इस संदर्भ में एटॉमिक क्लॉक के विकास में हो रहा सहयोग महत्वपूर्ण है| इसमें नैनों सेकंड्स तक की गणना की जा सकेगी, इसका प्रयोग नाभिकीय और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में किया जा सकेगा| · इसरो और इजराइल के मध्य जिओ लियो (ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क) समझौता हुआ है| यह समझौता दोनों देशों के उपग्रह से प्राप्त सूचनाओं को साझा करने में सहायक होगा पानी के संदर्भ में · भारत के अधिकाँश बड़े शहर जल संकट का सामान कर रहे हैं| जबकि जल प्रबन्धन के क्षेत्र में इजराइल ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं| · इजराइल जीरो वेस्टेज देश है क्योंकि इजराइल ने जल पुनर्चक्रण की सस्ती तकनीक पर बहुत काम किया है| अतः दोनों देशों के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित हो सकते हैं · इजराइल एक मरुस्थली देश है और निम्न वर्षा वाला देश है अतः इजराइल ने सूक्ष्म सिंचाई के क्षेत्र में बेहतर कार्य किया है| जबकि भारत में जल प्रबंधन की क्षमता कमजोर है| · इस सन्दर्भ में दोनों देशों के मध्य जल अलवणीकरण/पुनर्चक्रण की तकनीक, सूक्ष्म सिचाई तकनीकों का विकास के लिए समझौता किया गया है| ये पहलें नमामि गंगे तथा प्रति बूंद अधिक फसल आदि पहलों के लिए उपयोगी हैं कृषि क्षेत्र में सहयोग · कृषि सहयोग तीन चरणों में हो रहा है| ये सहयोग बागवानी, उत्पादकता में वृद्धि और शुष्क कृषि का विकास आदि संदर्भों में हो रहा है| · इजराइल ने हाइड्रोफोनिक्स (जल कृषि) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं यह भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है · कृषि शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार सुनिश्चित करने के लिए दोनों देशों ने एक दूसरे के कृषि वैज्ञानिकों की विजिट बढाई हैं आतंकवाद & कट्टरपंथ के संदर्भ में · भारत और इजराइल दोनों आतंकवाद के पीड़ित देश हैं किन्तु इजराइल ने बेहतर सीमा प्रबंधन के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखा है अतः भारत इस क्षेत्र में इजराइल की रणनीतियों को अपना सकता है, इसके साथ ही दोनों देश UN में एक दूसरे के सहयोगी बन सकते हैं| · भारत-इजराइल के मध्य आसूचना सहयोग, UN में आतंकवाद के संदर्भ में दोनों एक दूसरे का परस्पर सहयोग करते हैं| इजराइल आतंकवाद के नियंत्रण में भारत का सामरिक एवं तकनीकी सहयोग कर रहा है| सुरक्षा के संदर्भ में · रूस और अमेरिका के बाद इजरायल हमारा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश हैं। इजरायल सबसे ज्यादा हथियार भारत को बेचता है।इजराइल अपने कुल निर्यात का 40 प्रतिशत भारत को बेचता है । · इजरायल भारत को पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने में तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहा है · बराक मिसाइल, स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल,हेरॉन यूएवी आदि की आपूर्ति| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि भारत-इजराइल सम्बन्धों को सीमित व्यापारिक सम्बन्ध, निवेश की कमी, कनेक्टीविटी की कमी, भारत द्वारा परंपरागत रूप से फिलिस्तीन का पक्ष लेना, छोटा डायस्पोरा समूह आदि चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| फिर भी सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ ही विज्ञान-तकनीकी और सामरिक आवश्यकताओं के संदर्भों में भी इजराइल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी राष्ट्र बनते जा रहे हैं| भारत को दोनों देशों के मध्य सम्बन्धों को निरंतर सुदृढ़ करते हुए सहयोग के नए आयामों की खोज करते रहना चाहिए |
##Question:यद्यपि इजराइल के साथ भारत केसम्बन्ध परंपरागत नहीं है किन्तु निकट वर्षों में दोनों के मध्य बहुआयामी सहयोग की प्रवृत्ति देखी जा रही है| स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द/10 अंक) Although India"s relationship with Israel is not traditional, But the trend of multi-dimensional cooperation between the two is seen in the near years. Clarify (150 to 200 words/ 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में 1992 से पूर्व की स्थिति और उसके कारक 2- प्रथम भाग में सम्बन्धों की शुरुआत एवं उसके कारक 3- दुसरे भाग में निकट वर्षों में सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आने के कारक & सहयोगात्मक पहलों को बताइए 4- अंतिम में सम्बन्धों कि चुनौतियों के बाद भी सहयोग के बढ़ने को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुदूर पश्चिम एशिया में इजराइल एक राष्ट्र के रूप में मई 1948 में आस्तित्व में आया| एक राष्ट्र के रूप में इजराइल को भारत ने 1950 में मान्यता दे दी थी किन्तु भारत एवं इजराइल के मध्य राजनयिक संबंधों की शुरुआत 1992 में हुई| 1950 से लेकर 1992 के मध्य दोनों देशों में पारस्परिक सहयोग के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं लेकिन कूटनीतिक संबधों में विलंबित स्थापना के अनेक कारक थे|यह आदर्शवादी विदेश नीति का काल था, इस दौर में भारतीय विदेश नीति फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देती थी| दूसरे भारत एक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र था जबकि इजराइल को पश्चिमी राष्ट्रों का सहयोग प्राप्त था, इसके साथ ही भारत समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव से युक्त राष्ट्र था| इन्ही कारकों ने भारत-इजराइल सम्बन्ध को राजनयिक स्तर तक पहुचने से रोक रखा था| 1990 के दशक में विश्व व्यवस्था में परिवर्तन आया | सोवियत संघ, जो कि भारत का परंपरागत एवं प्रमुख सहयोगी राष्ट्र था विभाजित हो गया,यहाँ शीत युद्ध की समाप्ति होती है | इसी समय भारत संप्रभु ऋण संकट अथवा भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था | इन परिस्थितियों में भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं में परिवर्तन आया | अब भारत को नए एवं सक्षम मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता थी जो आवश्यकता पड़ने पर भारत को आर्थिक एवं सामरिक सहयोग दे सकें | इसी पृष्ठभूमि में भारत इजराइल के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की शुरुआत हुई | सुधार के आयाम · 1992 के बाद भारत ने दोनों राष्ट्रों को समान महत्त्व देने की नीति अपनाई है किन्तु भारत ने अब डीहाईफनेशन की नीति अपना ली है अर्थात अब भारत भारतीय हितों के अनुरूप निर्णयन करने लगा है न कि किसी अन्य राष्ट्र के दृष्टिकोण से| · अब भारत का यह मानना है कि इजराइल-फिलिस्तीन विवाद उनका आन्तरिक मामला है अतः भारत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता · इजराइल के महत्त्व को देखते हुए भारतीय कूटनीति का झुकाव इजराइल की ओर दिखाई देता है किन्तु वस्तुतः भारत समान दूरी की नीति पर चल रहा है · अब UN में इजराइल-फिलिस्तीन विवादपर लाये गए किसी भी प्रस्ताव पर भारत तटस्थता की नीति अपना रहा है और इस प्रकार सम्बन्धों में संतुलन स्थापना के प्रयास करता है · भारत येरुशलम को इजराइल की राजधानी नहीं मानता किन्तु इसका विरोध भी नहीं कर रहा है · उपरोक्त नीति पर चलते हुए विगत तीन दशकों में भारत-इजराइल के मध्य सहयोग निरंतर बढ़ता ही गया है |भारत की आवश्यकतायें और उनकी पूर्ति में इजराइल का सक्षम होना निरंतर बढ़ती सहयोगात्मक प्रवृत्ति का मुख्य कारक है| इसे निम्नलिखित पहलों के माध्यम से समझा जा सकता है विज्ञान के क्षेत्र में · हाल ही में भारतीय PM की इजराइल यात्रा हुई है, इस यात्रा का बहुत प्रचार नहीं किया गया है| इस यात्रा में 7 समझौते किये गए हैं यथा · विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग करते हुए दोनों देशों ने 40 मिलयन डॉलर का फंड बनाया है| यह नवाचार के क्षेत्र में निधियन करेगा · भारत-इजराइल ने तकनीक के क्षेत्र में सहयोग सम्बन्ध मजबूत किये हैं| इस संदर्भ में एटॉमिक क्लॉक के विकास में हो रहा सहयोग महत्वपूर्ण है| इसमें नैनों सेकंड्स तक की गणना की जा सकेगी, इसका प्रयोग नाभिकीय और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में किया जा सकेगा| · इसरो और इजराइल के मध्य जिओ लियो (ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क) समझौता हुआ है| यह समझौता दोनों देशों के उपग्रह से प्राप्त सूचनाओं को साझा करने में सहायक होगा पानी के संदर्भ में · भारत के अधिकाँश बड़े शहर जल संकट का सामान कर रहे हैं| जबकि जल प्रबन्धन के क्षेत्र में इजराइल ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं| · इजराइल जीरो वेस्टेज देश है क्योंकि इजराइल ने जल पुनर्चक्रण की सस्ती तकनीक पर बहुत काम किया है| अतः दोनों देशों के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित हो सकते हैं · इजराइल एक मरुस्थली देश है और निम्न वर्षा वाला देश है अतः इजराइल ने सूक्ष्म सिंचाई के क्षेत्र में बेहतर कार्य किया है| जबकि भारत में जल प्रबंधन की क्षमता कमजोर है| · इस सन्दर्भ में दोनों देशों के मध्य जल अलवणीकरण/पुनर्चक्रण की तकनीक, सूक्ष्म सिचाई तकनीकों का विकास के लिए समझौता किया गया है| ये पहलें नमामि गंगे तथा प्रति बूंद अधिक फसल आदि पहलों के लिए उपयोगी हैं कृषि क्षेत्र में सहयोग · कृषि सहयोग तीन चरणों में हो रहा है| ये सहयोग बागवानी, उत्पादकता में वृद्धि और शुष्क कृषि का विकास आदि संदर्भों में हो रहा है| · इजराइल ने हाइड्रोफोनिक्स (जल कृषि) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं यह भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है · कृषि शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार सुनिश्चित करने के लिए दोनों देशों ने एक दूसरे के कृषि वैज्ञानिकों की विजिट बढाई हैं आतंकवाद & कट्टरपंथ के संदर्भ में · भारत और इजराइल दोनों आतंकवाद के पीड़ित देश हैं किन्तु इजराइल ने बेहतर सीमा प्रबंधन के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखा है अतः भारत इस क्षेत्र में इजराइल की रणनीतियों को अपना सकता है, इसके साथ ही दोनों देश UN में एक दूसरे के सहयोगी बन सकते हैं| · भारत-इजराइल के मध्य आसूचना सहयोग, UN में आतंकवाद के संदर्भ में दोनों एक दूसरे का परस्पर सहयोग करते हैं| इजराइल आतंकवाद के नियंत्रण में भारत का सामरिक एवं तकनीकी सहयोग कर रहा है| सुरक्षा के संदर्भ में · रूस और अमेरिका के बाद इजरायल हमारा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश हैं। इजरायल सबसे ज्यादा हथियार भारत को बेचता है।इजराइल अपने कुल निर्यात का 40 प्रतिशत भारत को बेचता है । · इजरायल भारत को पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने में तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहा है · बराक मिसाइल, स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल,हेरॉन यूएवी आदि की आपूर्ति| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि भारत-इजराइल सम्बन्धों को सीमित व्यापारिक सम्बन्ध, निवेश की कमी, कनेक्टीविटी की कमी, भारत द्वारा परंपरागत रूप से फिलिस्तीन का पक्ष लेना, छोटा डायस्पोरा समूह आदि चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| फिर भी सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ ही विज्ञान-तकनीकी और सामरिक आवश्यकताओं के संदर्भों में भी इजराइल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी राष्ट्र बनते जा रहे हैं| भारत को दोनों देशों के मध्य सम्बन्धों को निरंतर सुदृढ़ करते हुए सहयोग के नए आयामों की खोज करते रहना चाहिए |
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यद्यपि इजराइल के साथ भारत केसम्बन्ध परंपरागत नहीं है किन्तु निकट वर्षों में दोनों के मध्य बहुआयामी सहयोग की प्रवृत्ति देखी जा रही है| स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द) Although India"s relationship with Israel is not traditional, But the trend of multi-dimensional cooperation between the two is seen in the near years. Clarify (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में 1992 से पूर्व की स्थिति और उसके कारक 2- प्रथम भाग में सम्बन्धों की शुरुआत एवं उसके कारक 3- दुसरे भाग में निकट वर्षों में सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आने के कारक & सहयोगात्मक पहलों को बताइए 4- अंतिम में सम्बन्धों कि चुनौतियों के बाद भी सहयोग के बढ़ने को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुदूर पश्चिम एशिया में इजराइल एक राष्ट्र के रूप में मई 1948 में आस्तित्व में आया| एक राष्ट्र के रूप में इजराइल को भारत ने 1950 में मान्यता दे दी थी किन्तु भारत एवं इजराइल के मध्य राजनयिक संबंधों की शुरुआत 1992 में हुई| 1950 से लेकर 1992 के मध्य दोनों देशों में पारस्परिक सहयोग के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं लेकिन कूटनीतिक संबधों में विलंबित स्थापना के अनेक कारक थे|यह आदर्शवादी विदेश नीति का काल था, इस दौर में भारतीय विदेश नीति फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देती थी| दूसरे भारत एक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र था जबकि इजराइल को पश्चिमी राष्ट्रों का सहयोग प्राप्त था, इसके साथ ही भारत समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव से युक्त राष्ट्र था| इन्ही कारकों ने भारत-इजराइल सम्बन्ध को राजनयिक स्तर तक पहुचने से रोक रखा था| 1990 के दशक में विश्व व्यवस्था में परिवर्तन आया | सोवियत संघ, जो कि भारत का परंपरागत एवं प्रमुख सहयोगी राष्ट्र था विभाजित हो गया,यहाँ शीत युद्ध की समाप्ति होती है | इसी समय भारत संप्रभु ऋण संकट अथवा भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था | इन परिस्थितियों में भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं में परिवर्तन आया | अब भारत को नए एवं सक्षम मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता थी जो आवश्यकता पड़ने पर भारत को आर्थिक एवं सामरिक सहयोग दे सकें | इसी पृष्ठभूमि में भारत इजराइल के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की शुरुआत हुई | सुधार के आयाम · 1992 के बाद भारत ने दोनों राष्ट्रों को समान महत्त्व देने की नीति अपनाई है किन्तु भारत ने अब डीहाईफनेशन की नीति अपना ली है अर्थात अब भारत भारतीय हितों के अनुरूप निर्णयन करने लगा है न कि किसी अन्य राष्ट्र के दृष्टिकोण से| · अब भारत का यह मानना है कि इजराइल-फिलिस्तीन विवाद उनका आन्तरिक मामला है अतः भारत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता · इजराइल के महत्त्व को देखते हुए भारतीय कूटनीति का झुकाव इजराइल की ओर दिखाई देता है किन्तु वस्तुतः भारत समान दूरी की नीति पर चल रहा है · अब UN में इजराइल-फिलिस्तीन विवादपर लाये गए किसी भी प्रस्ताव पर भारत तटस्थता की नीति अपना रहा है और इस प्रकार सम्बन्धों में संतुलन स्थापना के प्रयास करता है · भारत येरुशलम को इजराइल की राजधानी नहीं मानता किन्तु इसका विरोध भी नहीं कर रहा है · उपरोक्त नीति पर चलते हुए विगत तीन दशकों में भारत-इजराइल के मध्य सहयोग निरंतर बढ़ता ही गया है |भारत की आवश्यकतायें और उनकी पूर्ति में इजराइल का सक्षम होना निरंतर बढ़ती सहयोगात्मक प्रवृत्ति का मुख्य कारक है| इसे निम्नलिखित पहलों के माध्यम से समझा जा सकता है विज्ञान के क्षेत्र में · हाल ही में भारतीय PM की इजराइल यात्रा हुई है, इस यात्रा का बहुत प्रचार नहीं किया गया है| इस यात्रा में 7 समझौते किये गए हैं यथा · विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग करते हुए दोनों देशों ने 40 मिलयन डॉलर का फंड बनाया है| यह नवाचार के क्षेत्र में निधियन करेगा · भारत-इजराइल ने तकनीक के क्षेत्र में सहयोग सम्बन्ध मजबूत किये हैं| इस संदर्भ में एटॉमिक क्लॉक के विकास में हो रहा सहयोग महत्वपूर्ण है| इसमें नैनों सेकंड्स तक की गणना की जा सकेगी, इसका प्रयोग नाभिकीय और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में किया जा सकेगा| · इसरो और इजराइल के मध्य जिओ लियो (ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क) समझौता हुआ है| यह समझौता दोनों देशों के उपग्रह से प्राप्त सूचनाओं को साझा करने में सहायक होगा पानी के संदर्भ में · भारत के अधिकाँश बड़े शहर जल संकट का सामान कर रहे हैं| जबकि जल प्रबन्धन के क्षेत्र में इजराइल ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं| · इजराइल जीरो वेस्टेज देश है क्योंकि इजराइल ने जल पुनर्चक्रण की सस्ती तकनीक पर बहुत काम किया है| अतः दोनों देशों के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित हो सकते हैं · इजराइल एक मरुस्थली देश है और निम्न वर्षा वाला देश है अतः इजराइल ने सूक्ष्म सिंचाई के क्षेत्र में बेहतर कार्य किया है| जबकि भारत में जल प्रबंधन की क्षमता कमजोर है| · इस सन्दर्भ में दोनों देशों के मध्य जल अलवणीकरण/पुनर्चक्रण की तकनीक, सूक्ष्म सिचाई तकनीकों का विकास के लिए समझौता किया गया है| ये पहलें नमामि गंगे तथा प्रति बूंद अधिक फसल आदि पहलों के लिए उपयोगी हैं कृषि क्षेत्र में सहयोग · कृषि सहयोग तीन चरणों में हो रहा है| ये सहयोग बागवानी, उत्पादकता में वृद्धि और शुष्क कृषि का विकास आदि संदर्भों में हो रहा है| · इजराइल ने हाइड्रोफोनिक्स (जल कृषि) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं यह भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है · कृषि शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार सुनिश्चित करने के लिए दोनों देशों ने एक दूसरे के कृषि वैज्ञानिकों की विजिट बढाई हैं आतंकवाद & कट्टरपंथ के संदर्भ में · भारत और इजराइल दोनों आतंकवाद के पीड़ित देश हैं किन्तु इजराइल ने बेहतर सीमा प्रबंधन के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखा है अतः भारत इस क्षेत्र में इजराइल की रणनीतियों को अपना सकता है, इसके साथ ही दोनों देश UN में एक दूसरे के सहयोगी बन सकते हैं| · भारत-इजराइल के मध्य आसूचना सहयोग, UN में आतंकवाद के संदर्भ में दोनों एक दूसरे का परस्पर सहयोग करते हैं| इजराइल आतंकवाद के नियंत्रण में भारत का सामरिक एवं तकनीकी सहयोग कर रहा है| सुरक्षा के संदर्भ में · रूस और अमेरिका के बाद इजरायल हमारा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश हैं। इजरायल सबसे ज्यादा हथियार भारत को बेचता है।इजराइल अपने कुल निर्यात का 40 प्रतिशत भारत को बेचता है । · इजरायल भारत को पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने में तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहा है · बराक मिसाइल, स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल,हेरॉन यूएवी आदि की आपूर्ति| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि भारत-इजराइल सम्बन्धों को सीमित व्यापारिक सम्बन्ध, निवेश की कमी, कनेक्टीविटी की कमी, भारत द्वारा परंपरागत रूप से फिलिस्तीन का पक्ष लेना, छोटा डायस्पोरा समूह आदि चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| फिर भी सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ ही विज्ञान-तकनीकी और सामरिक आवश्यकताओं के संदर्भों में भी इजराइल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी राष्ट्र बनते जा रहे हैं| भारत को दोनों देशों के मध्य सम्बन्धों को निरंतर सुदृढ़ करते हुए सहयोग के नए आयामों की खोज करते रहना चाहिए |
##Question:यद्यपि इजराइल के साथ भारत केसम्बन्ध परंपरागत नहीं है किन्तु निकट वर्षों में दोनों के मध्य बहुआयामी सहयोग की प्रवृत्ति देखी जा रही है| स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द) Although India"s relationship with Israel is not traditional, But the trend of multi-dimensional cooperation between the two is seen in the near years. Clarify (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में 1992 से पूर्व की स्थिति और उसके कारक 2- प्रथम भाग में सम्बन्धों की शुरुआत एवं उसके कारक 3- दुसरे भाग में निकट वर्षों में सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आने के कारक & सहयोगात्मक पहलों को बताइए 4- अंतिम में सम्बन्धों कि चुनौतियों के बाद भी सहयोग के बढ़ने को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुदूर पश्चिम एशिया में इजराइल एक राष्ट्र के रूप में मई 1948 में आस्तित्व में आया| एक राष्ट्र के रूप में इजराइल को भारत ने 1950 में मान्यता दे दी थी किन्तु भारत एवं इजराइल के मध्य राजनयिक संबंधों की शुरुआत 1992 में हुई| 1950 से लेकर 1992 के मध्य दोनों देशों में पारस्परिक सहयोग के कई उदाहरण देखे जा सकते हैं लेकिन कूटनीतिक संबधों में विलंबित स्थापना के अनेक कारक थे|यह आदर्शवादी विदेश नीति का काल था, इस दौर में भारतीय विदेश नीति फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देती थी| दूसरे भारत एक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र था जबकि इजराइल को पश्चिमी राष्ट्रों का सहयोग प्राप्त था, इसके साथ ही भारत समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव से युक्त राष्ट्र था| इन्ही कारकों ने भारत-इजराइल सम्बन्ध को राजनयिक स्तर तक पहुचने से रोक रखा था| 1990 के दशक में विश्व व्यवस्था में परिवर्तन आया | सोवियत संघ, जो कि भारत का परंपरागत एवं प्रमुख सहयोगी राष्ट्र था विभाजित हो गया,यहाँ शीत युद्ध की समाप्ति होती है | इसी समय भारत संप्रभु ऋण संकट अथवा भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था | इन परिस्थितियों में भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं में परिवर्तन आया | अब भारत को नए एवं सक्षम मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता थी जो आवश्यकता पड़ने पर भारत को आर्थिक एवं सामरिक सहयोग दे सकें | इसी पृष्ठभूमि में भारत इजराइल के मध्य कूटनीतिक सम्बन्धों की शुरुआत हुई | सुधार के आयाम · 1992 के बाद भारत ने दोनों राष्ट्रों को समान महत्त्व देने की नीति अपनाई है किन्तु भारत ने अब डीहाईफनेशन की नीति अपना ली है अर्थात अब भारत भारतीय हितों के अनुरूप निर्णयन करने लगा है न कि किसी अन्य राष्ट्र के दृष्टिकोण से| · अब भारत का यह मानना है कि इजराइल-फिलिस्तीन विवाद उनका आन्तरिक मामला है अतः भारत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता · इजराइल के महत्त्व को देखते हुए भारतीय कूटनीति का झुकाव इजराइल की ओर दिखाई देता है किन्तु वस्तुतः भारत समान दूरी की नीति पर चल रहा है · अब UN में इजराइल-फिलिस्तीन विवादपर लाये गए किसी भी प्रस्ताव पर भारत तटस्थता की नीति अपना रहा है और इस प्रकार सम्बन्धों में संतुलन स्थापना के प्रयास करता है · भारत येरुशलम को इजराइल की राजधानी नहीं मानता किन्तु इसका विरोध भी नहीं कर रहा है · उपरोक्त नीति पर चलते हुए विगत तीन दशकों में भारत-इजराइल के मध्य सहयोग निरंतर बढ़ता ही गया है |भारत की आवश्यकतायें और उनकी पूर्ति में इजराइल का सक्षम होना निरंतर बढ़ती सहयोगात्मक प्रवृत्ति का मुख्य कारक है| इसे निम्नलिखित पहलों के माध्यम से समझा जा सकता है विज्ञान के क्षेत्र में · हाल ही में भारतीय PM की इजराइल यात्रा हुई है, इस यात्रा का बहुत प्रचार नहीं किया गया है| इस यात्रा में 7 समझौते किये गए हैं यथा · विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग करते हुए दोनों देशों ने 40 मिलयन डॉलर का फंड बनाया है| यह नवाचार के क्षेत्र में निधियन करेगा · भारत-इजराइल ने तकनीक के क्षेत्र में सहयोग सम्बन्ध मजबूत किये हैं| इस संदर्भ में एटॉमिक क्लॉक के विकास में हो रहा सहयोग महत्वपूर्ण है| इसमें नैनों सेकंड्स तक की गणना की जा सकेगी, इसका प्रयोग नाभिकीय और अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में किया जा सकेगा| · इसरो और इजराइल के मध्य जिओ लियो (ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क) समझौता हुआ है| यह समझौता दोनों देशों के उपग्रह से प्राप्त सूचनाओं को साझा करने में सहायक होगा पानी के संदर्भ में · भारत के अधिकाँश बड़े शहर जल संकट का सामान कर रहे हैं| जबकि जल प्रबन्धन के क्षेत्र में इजराइल ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं| · इजराइल जीरो वेस्टेज देश है क्योंकि इजराइल ने जल पुनर्चक्रण की सस्ती तकनीक पर बहुत काम किया है| अतः दोनों देशों के मध्य सहयोग के महत्वपूर्ण आयाम स्थापित हो सकते हैं · इजराइल एक मरुस्थली देश है और निम्न वर्षा वाला देश है अतः इजराइल ने सूक्ष्म सिंचाई के क्षेत्र में बेहतर कार्य किया है| जबकि भारत में जल प्रबंधन की क्षमता कमजोर है| · इस सन्दर्भ में दोनों देशों के मध्य जल अलवणीकरण/पुनर्चक्रण की तकनीक, सूक्ष्म सिचाई तकनीकों का विकास के लिए समझौता किया गया है| ये पहलें नमामि गंगे तथा प्रति बूंद अधिक फसल आदि पहलों के लिए उपयोगी हैं कृषि क्षेत्र में सहयोग · कृषि सहयोग तीन चरणों में हो रहा है| ये सहयोग बागवानी, उत्पादकता में वृद्धि और शुष्क कृषि का विकास आदि संदर्भों में हो रहा है| · इजराइल ने हाइड्रोफोनिक्स (जल कृषि) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं यह भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है · कृषि शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार सुनिश्चित करने के लिए दोनों देशों ने एक दूसरे के कृषि वैज्ञानिकों की विजिट बढाई हैं आतंकवाद & कट्टरपंथ के संदर्भ में · भारत और इजराइल दोनों आतंकवाद के पीड़ित देश हैं किन्तु इजराइल ने बेहतर सीमा प्रबंधन के माध्यम से स्वयं को सुरक्षित रखा है अतः भारत इस क्षेत्र में इजराइल की रणनीतियों को अपना सकता है, इसके साथ ही दोनों देश UN में एक दूसरे के सहयोगी बन सकते हैं| · भारत-इजराइल के मध्य आसूचना सहयोग, UN में आतंकवाद के संदर्भ में दोनों एक दूसरे का परस्पर सहयोग करते हैं| इजराइल आतंकवाद के नियंत्रण में भारत का सामरिक एवं तकनीकी सहयोग कर रहा है| सुरक्षा के संदर्भ में · रूस और अमेरिका के बाद इजरायल हमारा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश हैं। इजरायल सबसे ज्यादा हथियार भारत को बेचता है।इजराइल अपने कुल निर्यात का 40 प्रतिशत भारत को बेचता है । · इजरायल भारत को पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने में तकनीकी सहायता उपलब्ध करा रहा है · बराक मिसाइल, स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल,हेरॉन यूएवी आदि की आपूर्ति| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि यद्यपि भारत-इजराइल सम्बन्धों को सीमित व्यापारिक सम्बन्ध, निवेश की कमी, कनेक्टीविटी की कमी, भारत द्वारा परंपरागत रूप से फिलिस्तीन का पक्ष लेना, छोटा डायस्पोरा समूह आदि चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| फिर भी सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के साथ ही विज्ञान-तकनीकी और सामरिक आवश्यकताओं के संदर्भों में भी इजराइल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी राष्ट्र बनते जा रहे हैं| भारत को दोनों देशों के मध्य सम्बन्धों को निरंतर सुदृढ़ करते हुए सहयोग के नए आयामों की खोज करते रहना चाहिए |
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में वामपंथ के विकास को दर्शाते हुए कांग्रेस में इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द) Showthe Development ofSocialist/Communist Ideology in Indian National Congress and Explaintheir effects in Congress. (150-200 words)
एप्रोच- भारत में वामपंथी आंदोलन के विकास की धाराओं को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में वामपंथ के विकास को दर्शायिये| अंतिम भाग में, वामपंथ के फलस्वरूप कांग्रेस में पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिये| निष्कर्षतः, स्वतंत्रता पश्चात भी नीतियों में समाजवादी विचारधारा के प्रसार को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- सामान्यतः समाजवादी तथा साम्यवादी विचारधाराओं के संदर्भ में वामपंथी शब्द का प्रयोग किया जाता है| भारत में वामपंथी आंदोलन का विकास दो विचारधाराओं में देखा जा सकता है- पहला, साम्यवाद(जिसे रूस के कामिंटर्न का समर्थन प्राप्त था) तथा दूसरा, कांग्रेस सोशलिस्ट(जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था)| मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों, रूसी क्रांति तथा प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की दयनीय आर्थिक दशाओं के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों के उदय ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक खेमे पर प्रभाव डाला तथा जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं को विशेष रूप से प्रेरित किया| साथ ही, भारतीय साम्यवादी दल तथा ऑल इंडिया वर्कर्स एंड पीजेंटस पार्टी जैसे साम्यवादी दलों के गठन का भी कांग्रेस पर व्यापक प्रभाव पड़ा| कांग्रेस में वामपंथ का विकास नरमदलीय नेताओं का भी समाजवादी विचारकों से संपर्क ; जैसे- दादाभाई नौरोजी का हिंडमैन नामक समाजवादी से संपर्क; नरमदलीय चरण में किसानों तथा मजदूरों के मुद्दों को भी उठाया गया| गरमदलीय चरण में लाल-बाल-पाल जैसे नेता भी मजदूरों की समस्याओं में रूचि ले रहे थें| प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मजदूरों की दयनीय दशा तथा रूसी क्रांति के कारण समाजवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा| असहयोग आंदोलन के पश्चात बड़ी संख्या में युवाओं का रूझान इस विचारधारा की ओर जिसमें नेहरू एवं सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं की अहम् भूमिका थी| जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस के साथ मिलकर समाज के आर्थिक ढांचे को समाजवादी रूप देने तथा पूर्ण स्वराज की प्राप्ति हेतु इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग का गठन किया| 1925 में भारतीय मार्क्सवादी पार्टी की स्थापना; इसके सदस्य कांग्रेस के भी सदस्य थें| 1934 में कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन; इसका उद्देश्य- कांग्रेस के अंतर्गत रहकर ही साम्राज्यविरोधी तत्वों को उनके तत्कालीन पूंजीवादी नेतृत्व से पृथक करना और संगठन को वामपंथ की ओर प्रेरित करना; क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से प्रेरित युवाओं के प्रति भी कांग्रेस में सहानुभूति बढ़ना; कांग्रेस में वामपंथ का प्रभाव 1929 में कांग्रेस का लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य निर्धारित करने में; कांग्रेस के कार्यक्रम को भी समय-समय पर इसने प्रभावित किया जैसे- 1931 के कराची अधिवेशन मेंमौलिक अधिकार तथा आर्थिक नीति को लेकर पारित प्रस्ताव; 1936 में कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन जिसमें किसानों से संबंधित प्रस्ताव पारित होना; साथ ही, यहाँसमाजवादियों के दबाव में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में जनता के सामाजिक तथा आर्थिक कठिनाइयों से संबंधित धाराओं को शामिल किया गया| 1938 में राष्ट्रीय योजना समिति का गठन; कांग्रेस संगठन पर भी समाजवादियों की पकड़ मजबूत हुयी जैसे- 3 बार जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस की अध्यक्षता की तो 2 बार सुभाषचंद्र बोस ने; कांग्रेस की रणनीति पर भी इसका प्रभाव जैसे- सरकार से किसी भी प्रकार से बातचीत का विरोध; संवैधानिक राजनीति का विरोध; आंदोलन को निरंतर जारी रखना; सरकार पर किसी भी खतरे को अवसर के रूप में देखना; आवश्यकता पड़ने पर आज़ादी के लिए हथियार उठाना जैसे कदम| 1930-40 के दशक में विभिन्न आंदोलनों में इनकी अहम् भूमिका जैसे- सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन आदि में; वामपंथी तथा समाजवादी विचारधारा का संविधान निर्माण तथा भारत की विदेश नीति और आज़ादी के पश्चात नेहरू की नीतियों में भी विशेष प्रभाव दिखा|
##Question:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में वामपंथ के विकास को दर्शाते हुए कांग्रेस में इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिए| (150-200 शब्द) Showthe Development ofSocialist/Communist Ideology in Indian National Congress and Explaintheir effects in Congress. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- भारत में वामपंथी आंदोलन के विकास की धाराओं को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में वामपंथ के विकास को दर्शायिये| अंतिम भाग में, वामपंथ के फलस्वरूप कांग्रेस में पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट कीजिये| निष्कर्षतः, स्वतंत्रता पश्चात भी नीतियों में समाजवादी विचारधारा के प्रसार को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- सामान्यतः समाजवादी तथा साम्यवादी विचारधाराओं के संदर्भ में वामपंथी शब्द का प्रयोग किया जाता है| भारत में वामपंथी आंदोलन का विकास दो विचारधाराओं में देखा जा सकता है- पहला, साम्यवाद(जिसे रूस के कामिंटर्न का समर्थन प्राप्त था) तथा दूसरा, कांग्रेस सोशलिस्ट(जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था)| मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों, रूसी क्रांति तथा प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की दयनीय आर्थिक दशाओं के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों के उदय ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक खेमे पर प्रभाव डाला तथा जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं को विशेष रूप से प्रेरित किया| साथ ही, भारतीय साम्यवादी दल तथा ऑल इंडिया वर्कर्स एंड पीजेंटस पार्टी जैसे साम्यवादी दलों के गठन का भी कांग्रेस पर व्यापक प्रभाव पड़ा| कांग्रेस में वामपंथ का विकास नरमदलीय नेताओं का भी समाजवादी विचारकों से संपर्क ; जैसे- दादाभाई नौरोजी का हिंडमैन नामक समाजवादी से संपर्क; नरमदलीय चरण में किसानों तथा मजदूरों के मुद्दों को भी उठाया गया| गरमदलीय चरण में लाल-बाल-पाल जैसे नेता भी मजदूरों की समस्याओं में रूचि ले रहे थें| प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मजदूरों की दयनीय दशा तथा रूसी क्रांति के कारण समाजवादी विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा| असहयोग आंदोलन के पश्चात बड़ी संख्या में युवाओं का रूझान इस विचारधारा की ओर जिसमें नेहरू एवं सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं की अहम् भूमिका थी| जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस के साथ मिलकर समाज के आर्थिक ढांचे को समाजवादी रूप देने तथा पूर्ण स्वराज की प्राप्ति हेतु इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग का गठन किया| 1925 में भारतीय मार्क्सवादी पार्टी की स्थापना; इसके सदस्य कांग्रेस के भी सदस्य थें| 1934 में कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन; इसका उद्देश्य- कांग्रेस के अंतर्गत रहकर ही साम्राज्यविरोधी तत्वों को उनके तत्कालीन पूंजीवादी नेतृत्व से पृथक करना और संगठन को वामपंथ की ओर प्रेरित करना; क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से प्रेरित युवाओं के प्रति भी कांग्रेस में सहानुभूति बढ़ना; कांग्रेस में वामपंथ का प्रभाव 1929 में कांग्रेस का लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य निर्धारित करने में; कांग्रेस के कार्यक्रम को भी समय-समय पर इसने प्रभावित किया जैसे- 1931 के कराची अधिवेशन मेंमौलिक अधिकार तथा आर्थिक नीति को लेकर पारित प्रस्ताव; 1936 में कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन जिसमें किसानों से संबंधित प्रस्ताव पारित होना; साथ ही, यहाँसमाजवादियों के दबाव में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में जनता के सामाजिक तथा आर्थिक कठिनाइयों से संबंधित धाराओं को शामिल किया गया| 1938 में राष्ट्रीय योजना समिति का गठन; कांग्रेस संगठन पर भी समाजवादियों की पकड़ मजबूत हुयी जैसे- 3 बार जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस की अध्यक्षता की तो 2 बार सुभाषचंद्र बोस ने; कांग्रेस की रणनीति पर भी इसका प्रभाव जैसे- सरकार से किसी भी प्रकार से बातचीत का विरोध; संवैधानिक राजनीति का विरोध; आंदोलन को निरंतर जारी रखना; सरकार पर किसी भी खतरे को अवसर के रूप में देखना; आवश्यकता पड़ने पर आज़ादी के लिए हथियार उठाना जैसे कदम| 1930-40 के दशक में विभिन्न आंदोलनों में इनकी अहम् भूमिका जैसे- सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन आदि में; वामपंथी तथा समाजवादी विचारधारा का संविधान निर्माण तथा भारत की विदेश नीति और आज़ादी के पश्चात नेहरू की नीतियों में भी विशेष प्रभाव दिखा|
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भारत में धर्मनिरपेक्षता राज्य एवं धर्म के कठोर पृथक्करण के बजाय सभी धर्मों के प्रति समान आदर के विचार पर आधारित है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Secularism in India is based on the idea of equal respect for all religions rather than strict separation of state and religion. Critically discuss (150-200 word)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में धर्मनिरपेक्षता के बारे में लिखिए। इसके बाद पाश्चात्य संदर्भ में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसके बाद तर्क प्रस्तुत कीजिए कि भारतीय पंथनिरपेक्षता सभी धर्मों के समान आदर के विचार पर आधारित है संतुलित दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। पंथनिरपेक्षता एक ऐसे समाज का निर्माण का प्रयास करती है जो अंतर-धार्मिक तथा अन्तः-धार्मिक प्रभुत्व से मुक्त है। यह धर्मों के भीतर स्वतन्त्रता तथा धर्मों के मध्य एवं उनके भीतर, समानता को प्रोत्साहित करती है। पंथनिरपेक्षता कि पाश्चात्य अवधारणा धर्म और राज्य के परस्परिक अपवर्जन पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य धर्म के मामले में और धर्म राज्य के मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है। उदाहरण के लिए राज्य धार्मिक समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान नहीं कर सकता है। इसी प्रकार कोई धार्मिक संस्थान किसी महिला के पादरी बनने पर लोक लगता है तो राज्य इस संबंध में कुछ खास नहीं कर सकता है। पाश्चात्य पंथनिरपेक्षता के विपरीत भारतीय पंथनिरपेक्षता कठोर पृथक्करण पर आधारित नहीं है। भारत में राज्य निम्नलिखित आदर्शों को सुनिश्चित करने हेतु धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है: एक धार्मिक समुदाय दूसरे समुदाय पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए सरकार द्वारा 6 धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है। वे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 तथा 30 के तहत अल्पसंख्यक से संबन्धित अधिकारों का लाभ उठाते हैं। समान धार्मिक समुदाय के कुछ सदस्य अन्य सदस्यों पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकते। उदाहरण स्वरूप भारतीय संविधान निचली जातियों के धर्म आधारित अपवर्जन तथा भेदभाव को समाप्त करने हेतु अस्पृश्यता को प्रतिबंधित करता है। धार्मिक त्योहारों को प्रोत्साहित किया जाता है जैसे मानसरोवर व हज यात्रा के लिए प्रोत्साहन। धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के लिए सकारात्मक भेदभाव। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पाश्चात्य से आधारभूत रूप से भिन्न है क्योंकि यह गहन धार्मिक विविधता तथा सहिष्णुता की भावना के संदर्भ से उत्पन्न हुई है जो पाश्चात्य आधुनिक विचारों एवं राष्ट्रवाद के आगमन से पूर्वा घटित हुई थी। पाश्चात्य अवधारणा के विपरीत भारत में राज्य किसी विशेष धर्म को प्रवर्तित नहीं करता और न ही व्यक्तियों की धार्मिक स्वतन्त्रता का अतिक्रमण करता है। भारत में राज्य धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखता है। इसका अर्थ हुआ कि राज्य द्वारा धार्मिक मामलों में किया गया कोई भी हस्तक्षेप संविधान में निर्धारित आदर्शों पर आधारित होना चाहिए। यही कारण है कि सरकारी कार्यालय जैसे कि न्यायालय पुलिस स्टेशन इत्यादि द्वारा किसी भी धर्म को प्रदर्शित या प्रोत्साहित किया जाना अपेक्षित नहीं है। इस प्रकार भारतीय पंथनिरपेक्षता ने धार्मिक समानता के अनुसरण में बहुत ही प्रगतिशील नीति को अंगीकृत किया है। यह इसे या तो पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता की भांति धर्म से पृथक होने या आवश्यकतानुसार इसके साथ संलग्न होने की अनुमति प्रदान करती है।
##Question:भारत में धर्मनिरपेक्षता राज्य एवं धर्म के कठोर पृथक्करण के बजाय सभी धर्मों के प्रति समान आदर के विचार पर आधारित है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Secularism in India is based on the idea of equal respect for all religions rather than strict separation of state and religion. Critically discuss (150-200 word)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में धर्मनिरपेक्षता के बारे में लिखिए। इसके बाद पाश्चात्य संदर्भ में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसके बाद तर्क प्रस्तुत कीजिए कि भारतीय पंथनिरपेक्षता सभी धर्मों के समान आदर के विचार पर आधारित है संतुलित दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। पंथनिरपेक्षता एक ऐसे समाज का निर्माण का प्रयास करती है जो अंतर-धार्मिक तथा अन्तः-धार्मिक प्रभुत्व से मुक्त है। यह धर्मों के भीतर स्वतन्त्रता तथा धर्मों के मध्य एवं उनके भीतर, समानता को प्रोत्साहित करती है। पंथनिरपेक्षता कि पाश्चात्य अवधारणा धर्म और राज्य के परस्परिक अपवर्जन पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य धर्म के मामले में और धर्म राज्य के मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है। उदाहरण के लिए राज्य धार्मिक समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान नहीं कर सकता है। इसी प्रकार कोई धार्मिक संस्थान किसी महिला के पादरी बनने पर लोक लगता है तो राज्य इस संबंध में कुछ खास नहीं कर सकता है। पाश्चात्य पंथनिरपेक्षता के विपरीत भारतीय पंथनिरपेक्षता कठोर पृथक्करण पर आधारित नहीं है। भारत में राज्य निम्नलिखित आदर्शों को सुनिश्चित करने हेतु धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है: एक धार्मिक समुदाय दूसरे समुदाय पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए सरकार द्वारा 6 धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है। वे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 तथा 30 के तहत अल्पसंख्यक से संबन्धित अधिकारों का लाभ उठाते हैं। समान धार्मिक समुदाय के कुछ सदस्य अन्य सदस्यों पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकते। उदाहरण स्वरूप भारतीय संविधान निचली जातियों के धर्म आधारित अपवर्जन तथा भेदभाव को समाप्त करने हेतु अस्पृश्यता को प्रतिबंधित करता है। धार्मिक त्योहारों को प्रोत्साहित किया जाता है जैसे मानसरोवर व हज यात्रा के लिए प्रोत्साहन। धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के लिए सकारात्मक भेदभाव। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पाश्चात्य से आधारभूत रूप से भिन्न है क्योंकि यह गहन धार्मिक विविधता तथा सहिष्णुता की भावना के संदर्भ से उत्पन्न हुई है जो पाश्चात्य आधुनिक विचारों एवं राष्ट्रवाद के आगमन से पूर्वा घटित हुई थी। पाश्चात्य अवधारणा के विपरीत भारत में राज्य किसी विशेष धर्म को प्रवर्तित नहीं करता और न ही व्यक्तियों की धार्मिक स्वतन्त्रता का अतिक्रमण करता है। भारत में राज्य धर्म से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखता है। इसका अर्थ हुआ कि राज्य द्वारा धार्मिक मामलों में किया गया कोई भी हस्तक्षेप संविधान में निर्धारित आदर्शों पर आधारित होना चाहिए। यही कारण है कि सरकारी कार्यालय जैसे कि न्यायालय पुलिस स्टेशन इत्यादि द्वारा किसी भी धर्म को प्रदर्शित या प्रोत्साहित किया जाना अपेक्षित नहीं है। इस प्रकार भारतीय पंथनिरपेक्षता ने धार्मिक समानता के अनुसरण में बहुत ही प्रगतिशील नीति को अंगीकृत किया है। यह इसे या तो पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता की भांति धर्म से पृथक होने या आवश्यकतानुसार इसके साथ संलग्न होने की अनुमति प्रदान करती है।
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Explain Biogeochemical Cycles and discuss their significance with the help of examples. (150 words/10 marks)
Approach:- Explain what you understand by Biogeochemical cycles. Discuss a biogeochemical cycle briefly with help of a diagram. Write down their significance Answer:- A biogeochemical cycle is a closed circular pathway by which the nutrients move through both biotic and abiotic components of the ecosystem and are thus recycled. It thus provides a link between the lithosphere, atmosphere, and hydrosphere through various chemicals in the biosphere . Biogeochemical cycles are classified into two types:- Gaseous – These are faster and the reservoir is mainly atmosphere. Eg. Carbon cycle, water cycle, nitrogen etc. Sedimentary – These are slower and reservoirs are rocks in the earth. Eg. Sulphur cycle, Phosphorous cycle etc. (A diagram of any biogeochemical cycle explaining the process involved eg. Water cycle – precipitation, evaporation & transpiration, condensation etc.) Significance of Biogeochemical cycles:- The chemicals available on earth are limited and it is these chemicals which need to be recycled time and again through the biogeochemical cycles to produce nutrients and micronutrients which sustain life on Earth. They regulate the flow of chemicals across the various layers of the biosphere through processes like absorption, chemical reactions etc. Eg. Sulphur form sulphates checking its release in the atmosphere in form of Sulphur dioxide. It links one organism of the ecosystem to another, living organisms to non-living organisms and non-living components to create dependence upon each other. Eg. the Carbon cycle is needed for photosynthesis, and this carbon is also stored in organic material. These processes tend to restore balance in the ecosystem by trying to eliminate the excess any chemical present. They further facilitate the storage of elements in natural reservoirs. Eg. Nitrogen is stored in the soil, carbon sequestration. They are also responsible for the transport of chemicals from one place to another. Eg. Water evaporates from oceans and seas and then causes rains in the interior of land sustaining life. Human activities have caused disruption in these biogeochemical cycles by activities such as deforestation, excess carbon dioxide emissions, and unsustainable mining activity leading to an increase in extreme events on earth. We need to ensure that the balance is restored by incorporating the principles of sustainable development.
##Question:Explain Biogeochemical Cycles and discuss their significance with the help of examples. (150 words/10 marks)##Answer:Approach:- Explain what you understand by Biogeochemical cycles. Discuss a biogeochemical cycle briefly with help of a diagram. Write down their significance Answer:- A biogeochemical cycle is a closed circular pathway by which the nutrients move through both biotic and abiotic components of the ecosystem and are thus recycled. It thus provides a link between the lithosphere, atmosphere, and hydrosphere through various chemicals in the biosphere . Biogeochemical cycles are classified into two types:- Gaseous – These are faster and the reservoir is mainly atmosphere. Eg. Carbon cycle, water cycle, nitrogen etc. Sedimentary – These are slower and reservoirs are rocks in the earth. Eg. Sulphur cycle, Phosphorous cycle etc. (A diagram of any biogeochemical cycle explaining the process involved eg. Water cycle – precipitation, evaporation & transpiration, condensation etc.) Significance of Biogeochemical cycles:- The chemicals available on earth are limited and it is these chemicals which need to be recycled time and again through the biogeochemical cycles to produce nutrients and micronutrients which sustain life on Earth. They regulate the flow of chemicals across the various layers of the biosphere through processes like absorption, chemical reactions etc. Eg. Sulphur form sulphates checking its release in the atmosphere in form of Sulphur dioxide. It links one organism of the ecosystem to another, living organisms to non-living organisms and non-living components to create dependence upon each other. Eg. the Carbon cycle is needed for photosynthesis, and this carbon is also stored in organic material. These processes tend to restore balance in the ecosystem by trying to eliminate the excess any chemical present. They further facilitate the storage of elements in natural reservoirs. Eg. Nitrogen is stored in the soil, carbon sequestration. They are also responsible for the transport of chemicals from one place to another. Eg. Water evaporates from oceans and seas and then causes rains in the interior of land sustaining life. Human activities have caused disruption in these biogeochemical cycles by activities such as deforestation, excess carbon dioxide emissions, and unsustainable mining activity leading to an increase in extreme events on earth. We need to ensure that the balance is restored by incorporating the principles of sustainable development.
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How Small Hydro Project differ from Multi Purpose River project? What are advantages and disadvantages of SHP ? (150 words)
(Approach and most of the Content was provided by the faculty) Approach:- Explain what is run of the river project Compare it with river valley project Discuss its advantages and disadvantages Answer:- Electricity is a necessary to improve the Human Development Index of any nation. It becomes imperative for the government to invest in infrastructure related to power generation. Hydroelectric project is an important component of electricity production in India, especially because India has a huge hydroelectric potential. Run of the river projects are small scale hydroelectric projects, producing less power, that does not rely on water storage but utilizes the flow of the river to turn a bulb turbine to produce electricity eg. Dharasu project on Bhagirathi river. Sometimes an amount of the river water is diverted through pipes to run the turbine and it is later merged with the river. (Student should draw a diagram here – sir drew in class) River Valley Projects on other hand uses dam to store the water. The water stored in the dam is then used to run the turbine. They are large scale projects such as the Damodar Valley projects and they have huge environmental impact compared to run of the river projects. The amount of electricity generated is huge in such project. Advantages of Run of the River Projects:- Ecological Forests are not submerged as no reservoir is needed Aquatic life, migratory birds etc. are less impacted since there is no dam. There are no seismological disturbances observed such one around Tehri Dam project. Social There is no need of rehabilitating people living in the vicinity of such projects. The livelihood of local community dependent of the environment is least impacted. Economic These projects since provide electricity in the vicinity also reduce the transmission and distribution losses. It provides additional livelihood opportunities to the local people in such projects. Disadvantages of Run of the River Projects:- The output of electricity generated is less (2-25 MW) compared to River valley projects. These projects often times may be seasonal depending upon the flow of the river. There is some environment impact, especially since these projects are constructed in ecological sensitive areas of Himalayas. The approval process is very complex and stringent. With growing concerns of climate change it is important that we move away from carbon based electricity generation to cleaner technology. Run of the river projects ticks the right boxes – neither is it based on carbon fuels nor does it have huge environmental impact like huge multipurpose river valley projects.
##Question:How Small Hydro Project differ from Multi Purpose River project? What are advantages and disadvantages of SHP ? (150 words)##Answer:(Approach and most of the Content was provided by the faculty) Approach:- Explain what is run of the river project Compare it with river valley project Discuss its advantages and disadvantages Answer:- Electricity is a necessary to improve the Human Development Index of any nation. It becomes imperative for the government to invest in infrastructure related to power generation. Hydroelectric project is an important component of electricity production in India, especially because India has a huge hydroelectric potential. Run of the river projects are small scale hydroelectric projects, producing less power, that does not rely on water storage but utilizes the flow of the river to turn a bulb turbine to produce electricity eg. Dharasu project on Bhagirathi river. Sometimes an amount of the river water is diverted through pipes to run the turbine and it is later merged with the river. (Student should draw a diagram here – sir drew in class) River Valley Projects on other hand uses dam to store the water. The water stored in the dam is then used to run the turbine. They are large scale projects such as the Damodar Valley projects and they have huge environmental impact compared to run of the river projects. The amount of electricity generated is huge in such project. Advantages of Run of the River Projects:- Ecological Forests are not submerged as no reservoir is needed Aquatic life, migratory birds etc. are less impacted since there is no dam. There are no seismological disturbances observed such one around Tehri Dam project. Social There is no need of rehabilitating people living in the vicinity of such projects. The livelihood of local community dependent of the environment is least impacted. Economic These projects since provide electricity in the vicinity also reduce the transmission and distribution losses. It provides additional livelihood opportunities to the local people in such projects. Disadvantages of Run of the River Projects:- The output of electricity generated is less (2-25 MW) compared to River valley projects. These projects often times may be seasonal depending upon the flow of the river. There is some environment impact, especially since these projects are constructed in ecological sensitive areas of Himalayas. The approval process is very complex and stringent. With growing concerns of climate change it is important that we move away from carbon based electricity generation to cleaner technology. Run of the river projects ticks the right boxes – neither is it based on carbon fuels nor does it have huge environmental impact like huge multipurpose river valley projects.
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Information and Communication Technology has evolved manifold in the 21st century. In this regard discuss the evolution of the mobile technology and also enumerate some of their applications. (150 words/10 Marks)
Approach:- Discuss briefly about various Information and Communication technology evolved in the 21st century. Write briefly about the features of mobile technology from 1G to 5G. Discuss their application in present context. Answer:- Information and Communication Technology (ICT) refers to all such technologies which are related to telecommunications, broadcasting of media, network bases control and monitoring systems. The term is a convergence of communication networks with computer networks. ICT technology have gained huge momentum in the 21st century with the advent of a digital revolution backed by increasing penetration of internet and mobile communication technology. Some of the recent developments are:- Bluetooth – High speed low powered wireless technology, utilizing radio waves to link phones, computers etc. It has a range of approximately 10 meters. LiFi - It utilizes visible light for communication purposes. It supports very high speed transmissions. WiMax and WiFi – Wireless broadband technology using radio waves developed to connect small area (Wifi) or a large area (WiMax) to provide communication facility. NFC – It is a short range, high frequency wireless communication technology enabling exchange of data between devices not more than 10 cm apart. Evolution of mobile network technology:- 1G – First wireless communication technology. It allowed voice calls and very low data carrying capacity (2Kbps). The network however was low on security. 2G – It was a digital version of 1G technology, allowed text messaging service and the data speed was limited to 64 Kbps. 3G – It is a digital broadband technology, allowing high speed data up to 2Mbps, GPS, Mobile TV and video conferencing. However the power consumption was high in this network. 4G – Very high speed network (1Gbps), implemented IP services. It allowed support for VoLTE for better audio quality. 5G – It allows cell densification, low signal traffic, augmented reality, very high data transfer speed (1Gbps+). It will also reduce the ping in wireless network. It will be adopted by 2020 as per the government roadmap. Mobile technology has brought forth a digital revolution in the country. The applications are manifold spread across multitudes of sector. It allows for dissemination of information with respect to weather related events, government schemes and programmes for welfare of people such as Kilkari app etc. It has brought people closer by virtue of high quality video calls especially for people who have migrated out. It has empowered the rural population by giving them access to services digitally saving time and money. Eg. Umang app. Access to Mobile TV allows for entertainment of people. It has led to a greater penetration of banking services to unbanked regions of the country improving financial inclusion. Eg. BHIM, UPI etc. Mobile and associated technology supports many industry and business giving employment opportunity to many people such as various apps developed by young entrepreneurs eg. Ola, Swiggy etc. Linking of mobile technology with public delivery system by virtue of JAM trinity has led to efficient service delivery to the citizens. Political parties use such platforms to educate people about their election manifesto thus enabling them to make informed choices. Every technology is associated with both positive and negative. The menace of fake news, cyber bullying has also increased due to use of mobile technology. We must use it judiciously such that it allows for a holistic socio-economic development.
##Question:Information and Communication Technology has evolved manifold in the 21st century. In this regard discuss the evolution of the mobile technology and also enumerate some of their applications. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach:- Discuss briefly about various Information and Communication technology evolved in the 21st century. Write briefly about the features of mobile technology from 1G to 5G. Discuss their application in present context. Answer:- Information and Communication Technology (ICT) refers to all such technologies which are related to telecommunications, broadcasting of media, network bases control and monitoring systems. The term is a convergence of communication networks with computer networks. ICT technology have gained huge momentum in the 21st century with the advent of a digital revolution backed by increasing penetration of internet and mobile communication technology. Some of the recent developments are:- Bluetooth – High speed low powered wireless technology, utilizing radio waves to link phones, computers etc. It has a range of approximately 10 meters. LiFi - It utilizes visible light for communication purposes. It supports very high speed transmissions. WiMax and WiFi – Wireless broadband technology using radio waves developed to connect small area (Wifi) or a large area (WiMax) to provide communication facility. NFC – It is a short range, high frequency wireless communication technology enabling exchange of data between devices not more than 10 cm apart. Evolution of mobile network technology:- 1G – First wireless communication technology. It allowed voice calls and very low data carrying capacity (2Kbps). The network however was low on security. 2G – It was a digital version of 1G technology, allowed text messaging service and the data speed was limited to 64 Kbps. 3G – It is a digital broadband technology, allowing high speed data up to 2Mbps, GPS, Mobile TV and video conferencing. However the power consumption was high in this network. 4G – Very high speed network (1Gbps), implemented IP services. It allowed support for VoLTE for better audio quality. 5G – It allows cell densification, low signal traffic, augmented reality, very high data transfer speed (1Gbps+). It will also reduce the ping in wireless network. It will be adopted by 2020 as per the government roadmap. Mobile technology has brought forth a digital revolution in the country. The applications are manifold spread across multitudes of sector. It allows for dissemination of information with respect to weather related events, government schemes and programmes for welfare of people such as Kilkari app etc. It has brought people closer by virtue of high quality video calls especially for people who have migrated out. It has empowered the rural population by giving them access to services digitally saving time and money. Eg. Umang app. Access to Mobile TV allows for entertainment of people. It has led to a greater penetration of banking services to unbanked regions of the country improving financial inclusion. Eg. BHIM, UPI etc. Mobile and associated technology supports many industry and business giving employment opportunity to many people such as various apps developed by young entrepreneurs eg. Ola, Swiggy etc. Linking of mobile technology with public delivery system by virtue of JAM trinity has led to efficient service delivery to the citizens. Political parties use such platforms to educate people about their election manifesto thus enabling them to make informed choices. Every technology is associated with both positive and negative. The menace of fake news, cyber bullying has also increased due to use of mobile technology. We must use it judiciously such that it allows for a holistic socio-economic development.
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Trace the linkages between India and South East Asia from ancient times to the current era by identifying the key markers of their closeness. (150 words |10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE LINKAGE BETWEEN INDIA AND SOUTH EAST ASIA DURING ANCIENT TIMES - POST INDEPENDENCE -THE CURRENT ERA- THE KEY MARKERS IN THEIR CLOSENESS ·I ASEAN and ASEAN CENTRED INSTITUTIONS ·II THE LOOK EAST POLICY AND THE ACT EAST POLICY -CONCLUSION ANSWER:- By South East Asia (SEA), we mean the Indian Ocean and Pacific Ocean as linked entities. The framework here is the Indo-Pacific region. In geographical terms, the area covers the countries of India, the ASEAN nations, the east coast of Africa and the west coast of USA (California), Japan, South Korea, Australia, FIPIC countries. (China is not a part of it). India has both land and maritime boundary with SEA. SEA refers to India"s extended neighbourhood. The solutions here are to be based on rules and order. We ultimately want to convert it SEA into an immediate neighbourhood. THE LINKAGE BETWEEN INDIA AND SOUTH EAST ASIA DURING ANCIENT TIMES 1) CULTURE: We share cultural linkages right from historical times. Hinduism and Buddhism spread from India to these countries. 2) GEOGRAPHICAL PROXIMITY: This also led to connections during the historical eras. 3) MONSOONS- BALI FESTIVAL: The Bali festival is celebrated in Odisha, which is related to the monsoon winds. It is celebrated from ancient times. 4) BRITISH COLONIALISM: The Britishers ruled India and some parts of SEA like the Malay peninsula. This meant that some institutions are common, Indian workers were taken to work in the rubber plantations there (hence, significant Indian diaspora is present there) etc. 5) LINKAGES DURING THE FREEDOM STRUGGLE: Freedom fighters like Subhash Chandra Bose had their bases in this region. 6) COMMON ASPIRATIONS: Common aspirations like de-colonisation also linked these areas. POST INDEPENDENCE 1) DIFFERENCES: India adopted the non-alignment policy, but SEA was largely under the umbrella of the USA. Hence, both the areas largely ignored each other. 1.1) However, the Bandung Conference, where the NAM (Non-alignment Movement) was adopted happened in Indonesia itself. 2) THE END OF THE COLD WAR: With the end of the cold war, India gradually started focusing on SEA- the Look East Policy, which evolved into the Act East Policy (both the policies focus on South E Asia). THE CURRENT ERA- THE KEY MARKERS IN THEIR CLOSENESS I ASEAN and ASEAN CENTRED INSTITUTIONS They help build the basis of our engagement with SEA. ORGANISATIONS ASSOCIATED WITH ASEAN/THE ASEAN CENTRED INSTITUTIONS 1)ARF: It has 27 members of the Indo-Pacific region.Its main purpose is dialogue/ official consultation. It deals with peace and security, stability issues (any issue which can affect the region) It has no permanent structure- with meetings every year 1.1) The first meeting was held in 1994 in Thailand. It involves in Track 1 (i.e. official talks) and Track 2 (non-official talks) diplomacy. Decisions are made through consensus. 2) EAST ASIA SUMMIT (EAS): It was established in 2005. It consists of 10 + 8 countries (ASEAN + 8). The non-ASEAN members are Australia, China, India, Japan, New Zealand, South korea, Russia and the US. It is a leaders" forum- heads of states and heads of governments meet up.. The purpose is strategic dialogue on political, security and economic issues. It basically addresses issues of regional concern.India participates every year in the meetings. Every year, a meeting of the EAS takes place on the sidelines of ASEAN 3) ASEAN + 3: It was started in 1997 for dialogue purposes. It includes the ASEAN members along with the three countries of China, Japan and South Korea. II THE LOOK EAST POLICY AND THE ACT EAST POLICY These policies specifically mark the closeness of relationship and ties. 1)THE LOOK EAST POLICY: It originated in 1991 under Prime Minister Narsimha Rao and the finance minister, Manmohan Singh jee in the background of the collapse of USSR, the 1st Gulf War and the resultant BoP crisis, suggesting the need for long-term solutions. 1.1) The objective was: Active and closer engagement with countries of South East Asia. (The first set of focus countries were the ASEAN countries (particularly- Myanmar, Singapore, Thaliand, Indonesia and Malaysia). 1.2) The focus was: economic cooperation. There was need for new partners and an increased share in global trade. So, the first phase was of trade and economic linkages 1.3) Facilitative factors- The SEA countries- have complementarities with India, they opened up their economy, had cultural ties. Also, we had no contentions with these countries. Many of these countries (Malaysia, Singapore, Thailand) had become relatively successful economies. 1.4) Success/ Development of relations-India became a sectoral level dialogue partner in 1992 of ASEAN and in 2002, became a sectoral level partner. It led to a 4-fold increase in trade between India and ASEAN in the 1st decade of the Look East Policy. There was deepening and widening economic engagement. 1.5) Further developments: More institutional arrangements were made with ASEAN. In 2010, an FTA was signed in goods. In 2011 and 12, trade figures reached $78.9 bn So, the 2 way flows of investments expanded. 2) LOOK EAST 2.0- (Late 2000 to 2014): New dimension were added to the LEP. It involved looking at the Look East through the North East- So, a domestic dimension was added to the LEP Trade and connectivity was established with SEA and NE. Thus, various projects were launched like the Mekong Ganga cooperation, BCIM corridor, Kaladan projects etc. 3)ACT EAST POLICY (2014): It is a dynamic and action oriented version of the LEP The policy extends the meaning of the East- i.e. having better relations with Japan, South Korea, Australia i.e. countries of the Asia Pacific region. 3.1) The elements of continuity: It builds on the ideas of the LEP such as energizing BIMSTEC, people to people connectivity etc. 3.2) The elements of change: There is more focus on implementation, institutionalisation, more stress on political aspects. It is more action oriented. Politically, also there have been more number of high-level visits. Further, there are more institutional mechanisms for dialogue and cooperation. There are some new areas of cooperation as well like space, science and technology. The strategic aspect is the security and stability of the region. These policies and the evolution of these policies have been brought out in the wake of strategic and security concernsin the manner of the rise and assertiveness of China.
##Question:Trace the linkages between India and South East Asia from ancient times to the current era by identifying the key markers of their closeness. (150 words |10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - THE LINKAGE BETWEEN INDIA AND SOUTH EAST ASIA DURING ANCIENT TIMES - POST INDEPENDENCE -THE CURRENT ERA- THE KEY MARKERS IN THEIR CLOSENESS ·I ASEAN and ASEAN CENTRED INSTITUTIONS ·II THE LOOK EAST POLICY AND THE ACT EAST POLICY -CONCLUSION ANSWER:- By South East Asia (SEA), we mean the Indian Ocean and Pacific Ocean as linked entities. The framework here is the Indo-Pacific region. In geographical terms, the area covers the countries of India, the ASEAN nations, the east coast of Africa and the west coast of USA (California), Japan, South Korea, Australia, FIPIC countries. (China is not a part of it). India has both land and maritime boundary with SEA. SEA refers to India"s extended neighbourhood. The solutions here are to be based on rules and order. We ultimately want to convert it SEA into an immediate neighbourhood. THE LINKAGE BETWEEN INDIA AND SOUTH EAST ASIA DURING ANCIENT TIMES 1) CULTURE: We share cultural linkages right from historical times. Hinduism and Buddhism spread from India to these countries. 2) GEOGRAPHICAL PROXIMITY: This also led to connections during the historical eras. 3) MONSOONS- BALI FESTIVAL: The Bali festival is celebrated in Odisha, which is related to the monsoon winds. It is celebrated from ancient times. 4) BRITISH COLONIALISM: The Britishers ruled India and some parts of SEA like the Malay peninsula. This meant that some institutions are common, Indian workers were taken to work in the rubber plantations there (hence, significant Indian diaspora is present there) etc. 5) LINKAGES DURING THE FREEDOM STRUGGLE: Freedom fighters like Subhash Chandra Bose had their bases in this region. 6) COMMON ASPIRATIONS: Common aspirations like de-colonisation also linked these areas. POST INDEPENDENCE 1) DIFFERENCES: India adopted the non-alignment policy, but SEA was largely under the umbrella of the USA. Hence, both the areas largely ignored each other. 1.1) However, the Bandung Conference, where the NAM (Non-alignment Movement) was adopted happened in Indonesia itself. 2) THE END OF THE COLD WAR: With the end of the cold war, India gradually started focusing on SEA- the Look East Policy, which evolved into the Act East Policy (both the policies focus on South E Asia). THE CURRENT ERA- THE KEY MARKERS IN THEIR CLOSENESS I ASEAN and ASEAN CENTRED INSTITUTIONS They help build the basis of our engagement with SEA. ORGANISATIONS ASSOCIATED WITH ASEAN/THE ASEAN CENTRED INSTITUTIONS 1)ARF: It has 27 members of the Indo-Pacific region.Its main purpose is dialogue/ official consultation. It deals with peace and security, stability issues (any issue which can affect the region) It has no permanent structure- with meetings every year 1.1) The first meeting was held in 1994 in Thailand. It involves in Track 1 (i.e. official talks) and Track 2 (non-official talks) diplomacy. Decisions are made through consensus. 2) EAST ASIA SUMMIT (EAS): It was established in 2005. It consists of 10 + 8 countries (ASEAN + 8). The non-ASEAN members are Australia, China, India, Japan, New Zealand, South korea, Russia and the US. It is a leaders" forum- heads of states and heads of governments meet up.. The purpose is strategic dialogue on political, security and economic issues. It basically addresses issues of regional concern.India participates every year in the meetings. Every year, a meeting of the EAS takes place on the sidelines of ASEAN 3) ASEAN + 3: It was started in 1997 for dialogue purposes. It includes the ASEAN members along with the three countries of China, Japan and South Korea. II THE LOOK EAST POLICY AND THE ACT EAST POLICY These policies specifically mark the closeness of relationship and ties. 1)THE LOOK EAST POLICY: It originated in 1991 under Prime Minister Narsimha Rao and the finance minister, Manmohan Singh jee in the background of the collapse of USSR, the 1st Gulf War and the resultant BoP crisis, suggesting the need for long-term solutions. 1.1) The objective was: Active and closer engagement with countries of South East Asia. (The first set of focus countries were the ASEAN countries (particularly- Myanmar, Singapore, Thaliand, Indonesia and Malaysia). 1.2) The focus was: economic cooperation. There was need for new partners and an increased share in global trade. So, the first phase was of trade and economic linkages 1.3) Facilitative factors- The SEA countries- have complementarities with India, they opened up their economy, had cultural ties. Also, we had no contentions with these countries. Many of these countries (Malaysia, Singapore, Thailand) had become relatively successful economies. 1.4) Success/ Development of relations-India became a sectoral level dialogue partner in 1992 of ASEAN and in 2002, became a sectoral level partner. It led to a 4-fold increase in trade between India and ASEAN in the 1st decade of the Look East Policy. There was deepening and widening economic engagement. 1.5) Further developments: More institutional arrangements were made with ASEAN. In 2010, an FTA was signed in goods. In 2011 and 12, trade figures reached $78.9 bn So, the 2 way flows of investments expanded. 2) LOOK EAST 2.0- (Late 2000 to 2014): New dimension were added to the LEP. It involved looking at the Look East through the North East- So, a domestic dimension was added to the LEP Trade and connectivity was established with SEA and NE. Thus, various projects were launched like the Mekong Ganga cooperation, BCIM corridor, Kaladan projects etc. 3)ACT EAST POLICY (2014): It is a dynamic and action oriented version of the LEP The policy extends the meaning of the East- i.e. having better relations with Japan, South Korea, Australia i.e. countries of the Asia Pacific region. 3.1) The elements of continuity: It builds on the ideas of the LEP such as energizing BIMSTEC, people to people connectivity etc. 3.2) The elements of change: There is more focus on implementation, institutionalisation, more stress on political aspects. It is more action oriented. Politically, also there have been more number of high-level visits. Further, there are more institutional mechanisms for dialogue and cooperation. There are some new areas of cooperation as well like space, science and technology. The strategic aspect is the security and stability of the region. These policies and the evolution of these policies have been brought out in the wake of strategic and security concernsin the manner of the rise and assertiveness of China.
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Q. Explain the origin of the Himalayas and also discuss the different phases of Himalayan formation. (150 words/ 10 marks)
Approach Brief introduction about the Himalayas. Mention the origin of the Himalayan mountains. Mention the various phases of the formation of the Himalayas. Conclude accordingly. Answer The Himalayas are a mountain range in Asia separating the plains of the Indian subcontinent from the Tibetan Plateau. The range has some of the planet"s highest peaks, including the highest, Mount Everest. Origin of Himalayas: India was part of Gondwana land after the splitting of Pangea. Indian plate got separated from Gondwana land and started to move towards the Eurasian plate around 140 million years ago. Initially, the condition was ocean-continent convergence during which the oceanic plate below the Tethys sea was subducting below the continental plate of Eurasia resulting in the formation of mountains of China and Tibetian plateau. When the entire oceanic plate was completely subducted, the continental-continental collision between the Indian and Eurasian plates started. The very high compression due to the continent-continent collision resulted in the sediments of the Tethys sea being squeezed, crust, and formation of a series of folds called the Himalayas. The Himalayas were formed in 3 different phases: 1st phase: it happened 12-70 Million years ago. the 1st phase of compression created the Great Himalayas. 2nd phase: it happened 30-25 Million years ago. the 2nd phase of compression created the Middle Himalayas. 3rd phase: it happened 25-2 Million years ago. the 3rd phase of compression created the Shivalik. The Himalayas are relatively very young mountains and are still growing. they play a very important role in the life of people of the Indian- subcontinent as some of the major rivers originate in the Himalayan region.
##Question:Q. Explain the origin of the Himalayas and also discuss the different phases of Himalayan formation. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach Brief introduction about the Himalayas. Mention the origin of the Himalayan mountains. Mention the various phases of the formation of the Himalayas. Conclude accordingly. Answer The Himalayas are a mountain range in Asia separating the plains of the Indian subcontinent from the Tibetan Plateau. The range has some of the planet"s highest peaks, including the highest, Mount Everest. Origin of Himalayas: India was part of Gondwana land after the splitting of Pangea. Indian plate got separated from Gondwana land and started to move towards the Eurasian plate around 140 million years ago. Initially, the condition was ocean-continent convergence during which the oceanic plate below the Tethys sea was subducting below the continental plate of Eurasia resulting in the formation of mountains of China and Tibetian plateau. When the entire oceanic plate was completely subducted, the continental-continental collision between the Indian and Eurasian plates started. The very high compression due to the continent-continent collision resulted in the sediments of the Tethys sea being squeezed, crust, and formation of a series of folds called the Himalayas. The Himalayas were formed in 3 different phases: 1st phase: it happened 12-70 Million years ago. the 1st phase of compression created the Great Himalayas. 2nd phase: it happened 30-25 Million years ago. the 2nd phase of compression created the Middle Himalayas. 3rd phase: it happened 25-2 Million years ago. the 3rd phase of compression created the Shivalik. The Himalayas are relatively very young mountains and are still growing. they play a very important role in the life of people of the Indian- subcontinent as some of the major rivers originate in the Himalayan region.
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संसद में बजटीय प्रक्रिया के विभिन्न चरणों को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इस प्रक्रिया के अंतर्गत शामिल विनियोजन विधेयक की चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/ 10 अंक) Clarify the different phases of the budgetary process in parliament. Also, discuss the appropriation bill included under this process. (150-200 Words/ 10 Marks)
एप्रोच :- भूमिका में बजट को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात बजट के विभिन्न चरणों को लिखिए। पुनः विनियोजन विधेयक को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में संगत निष्कर्ष के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर प्रारूप:- संविधान के अनुच्छेद 112 में वार्षिक वित्तीय विवरण के नाम से बजट का उल्लेख है। इसमें वित्तीय वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्त किया और खर्च का विवरण होता है। बजट के विभिन्न चरण :- बजट का प्रस्तुतीकरण -आम बजट पेश करते समय वित्त मंत्री सदन में जो भाषण देता है उसे बजट भाषण देते हैं लोकसभा में भाषण के अंत में मंत्री बजट प्रस्तुत करता है इसे बाद में राज्यसभा में पेश किया जाता है। आम बहस: - बजट पर दोनों सदन 3 से 4 दिन तक बहस करते हैं इस चरण में लोकसभा इसके पूरे या आंशिक भाग पर चर्चा कर सकती है इससे संबंधित प्रश्नों को उठाया जा सकता है।इसके अंत में वित्त मंत्री को अधिकार है कि उसका जवाब दे। विभागीय समितियों द्वारा जांच : - बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन 3 या 4 हफ़्तों के लिए स्थगित हो जाता है इस अंतराल के दौरान संसद की स्थाई समिति अनुदान की मांग आदि की विस्तार से पड़ताल करती है और एक रिपोर्ट तैयार करती है इन रिपोर्टों को दोनों सदनों में विचारार्थ जाता है। अनुदान की मांग पर मतदान :- विभागीय स्थाई समितियों के आलोक में लोकसभा में अनुदान की मांगों के लिए मतदान होता है मांगे मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती हैं पूर्ण मतदान के उपरांत एक मांग अनुदान बन जाती है। विनियोग विधेयक का पारित होना :- भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के जरिए धन की निकासी हेतु विनियोग विधेयक पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक का पारित होना :- यह भारत सरकार के उस वर्ष के लिए वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं। विनियोजन विधेयक :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के सिवा धन की निकासी नहीं होगी अर्थात भारत की विधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक को पुरः स्थापित किया जाता है जिससे कि लोकसभा में मत द्वारा दिए गए अनुदान और भारत की संचित निधि पर भारित व्यय के लिए धन की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। विनियोजन विधेयक के लागू होने तक सरकार ,भारत की संचित निधि से कोई दान आहरित नहीं कर सकती है। इस प्रकार बजट की यह प्रक्रिया, नीतिगत कार्यों हेतु धन के निकास को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करती है।
##Question:संसद में बजटीय प्रक्रिया के विभिन्न चरणों को स्पष्ट कीजिये | साथ ही इस प्रक्रिया के अंतर्गत शामिल विनियोजन विधेयक की चर्चा कीजिये | (150-200शब्द/ 10 अंक) Clarify the different phases of the budgetary process in parliament. Also, discuss the appropriation bill included under this process. (150-200 Words/ 10 Marks)##Answer:एप्रोच :- भूमिका में बजट को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात बजट के विभिन्न चरणों को लिखिए। पुनः विनियोजन विधेयक को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में संगत निष्कर्ष के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर प्रारूप:- संविधान के अनुच्छेद 112 में वार्षिक वित्तीय विवरण के नाम से बजट का उल्लेख है। इसमें वित्तीय वर्ष के दौरान भारत सरकार के अनुमानित प्राप्त किया और खर्च का विवरण होता है। बजट के विभिन्न चरण :- बजट का प्रस्तुतीकरण -आम बजट पेश करते समय वित्त मंत्री सदन में जो भाषण देता है उसे बजट भाषण देते हैं लोकसभा में भाषण के अंत में मंत्री बजट प्रस्तुत करता है इसे बाद में राज्यसभा में पेश किया जाता है। आम बहस: - बजट पर दोनों सदन 3 से 4 दिन तक बहस करते हैं इस चरण में लोकसभा इसके पूरे या आंशिक भाग पर चर्चा कर सकती है इससे संबंधित प्रश्नों को उठाया जा सकता है।इसके अंत में वित्त मंत्री को अधिकार है कि उसका जवाब दे। विभागीय समितियों द्वारा जांच : - बजट पर आम बहस पूरी होने के बाद सदन 3 या 4 हफ़्तों के लिए स्थगित हो जाता है इस अंतराल के दौरान संसद की स्थाई समिति अनुदान की मांग आदि की विस्तार से पड़ताल करती है और एक रिपोर्ट तैयार करती है इन रिपोर्टों को दोनों सदनों में विचारार्थ जाता है। अनुदान की मांग पर मतदान :- विभागीय स्थाई समितियों के आलोक में लोकसभा में अनुदान की मांगों के लिए मतदान होता है मांगे मंत्रालयवार प्रस्तुत की जाती हैं पूर्ण मतदान के उपरांत एक मांग अनुदान बन जाती है। विनियोग विधेयक का पारित होना :- भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के जरिए धन की निकासी हेतु विनियोग विधेयक पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक का पारित होना :- यह भारत सरकार के उस वर्ष के लिए वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी करने के लिए पुरः स्थापित किया जाता है। वित्त विधेयक में विनियोग विधेयक के विपरीत संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं। विनियोजन विधेयक :- संविधान में व्यवस्था की गई है कि भारत की संचित निधि से विधि सम्मत विनियोग के सिवा धन की निकासी नहीं होगी अर्थात भारत की विधि से विनियोग के लिए एक विनियोग विधेयक को पुरः स्थापित किया जाता है जिससे कि लोकसभा में मत द्वारा दिए गए अनुदान और भारत की संचित निधि पर भारित व्यय के लिए धन की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। विनियोजन विधेयक के लागू होने तक सरकार ,भारत की संचित निधि से कोई दान आहरित नहीं कर सकती है। इस प्रकार बजट की यह प्रक्रिया, नीतिगत कार्यों हेतु धन के निकास को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करती है।
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संविधान संशोधन के औचित्य को बताते हुए, इसकी प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explaining the rationale for the constitutional amendment, also clarify its process. (150-200 words, marks -10 )
एप्रोच - भूमिका में संविधान संशोधन का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात संविधान संशोधन के औचित्य को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में संविधान संशोधन की प्रक्रिया को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- समय के परिवर्तन के साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियां बदलती रहती हैं, परिस्थितियों में बदलाव के अनुरूप संविधान में संशोधन होना आवश्यक हो जाता है | किसी विधेयक में परिवर्तन, सुधार अथवा उसे निर्दोष बनाने की प्रक्रिया को संशोधन कहते हैं | सभा या समिति के प्रस्ताव के शोधन की क्रिया के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | संविधान संशोधन का औचित्य- संशोधन, संविधान को गतिशीलता प्रदान करती है | भारत में संघ एवं राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन में परस्पर निर्भरता होने के कारण समय -समय पर विवादों का होना स्वाभाविक है, जिसके समाधान की प्रक्रिया में संशोधन का विशेष महत्व है | भारत में शक्ति का पृथक्करण सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप विवादों के उत्पन्न होने की संभावनाएं बनी रहती हैं | इसके समाधान हेतु संशोधन का होना स्वाभाविक है | DPSP के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हेतु भी संविधान का संशोधन होना स्वाभाविक हो जाता है | वर्तमान समय में अब तक लगभग कुल 103 संविधान संशोधन किये जा चुके है, यह अपने आप में सिद्ध करता है कि संविधान संशोधन होना समय के साथ स्वाभाविक है | इस प्रकार संविधान संशोधन प्रगतिशील और सामायिक होता है | संविधान संशोधन की प्रक्रिया - भारतीय संविधान में डॉ अम्बेडकर के विचारानुसार संशोधन की तीन विधायी प्रक्रियायें मौजूद हैं - 1- संसद के साधारण बहुमत से 2- संसद के दो- तिहाई बहुमत से 3- राज्य के विधानमंडल की स्वीकृति से जब सदन में उपस्थित होकर वोट देने वाले सदस्यों का 50% से अधिक किसी विषय के पक्ष में मतदान होता है तो उसे साधारण बहुमत कहते हैं | यदि विधेयक प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों की संख्या के बहुमत तथा उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो उसे राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति से संशोधन हो जाता है | यदि संविधान में संशोधन विधेयक संसद के सभी सदस्यों के बहुमत या संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत से पारित हो जाए, तो कम से कम 50% राज्यों के विधानामंडलों द्वारा पुष्टिकरण का प्रस्ताव पारित होने पर ही वह राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है | अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संविधान की कार्यवाही के आधार पर प्राप्त व्यवहारिकों को संविधान में समाहित करने हेतु संशोधन का होना आवश्यक है |
##Question:संविधान संशोधन के औचित्य को बताते हुए, इसकी प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिये | (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explaining the rationale for the constitutional amendment, also clarify its process. (150-200 words, marks -10 )##Answer:एप्रोच - भूमिका में संविधान संशोधन का सामान्य परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात संविधान संशोधन के औचित्य को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में संविधान संशोधन की प्रक्रिया को बताते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- समय के परिवर्तन के साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियां बदलती रहती हैं, परिस्थितियों में बदलाव के अनुरूप संविधान में संशोधन होना आवश्यक हो जाता है | किसी विधेयक में परिवर्तन, सुधार अथवा उसे निर्दोष बनाने की प्रक्रिया को संशोधन कहते हैं | सभा या समिति के प्रस्ताव के शोधन की क्रिया के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है | संविधान संशोधन का औचित्य- संशोधन, संविधान को गतिशीलता प्रदान करती है | भारत में संघ एवं राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन में परस्पर निर्भरता होने के कारण समय -समय पर विवादों का होना स्वाभाविक है, जिसके समाधान की प्रक्रिया में संशोधन का विशेष महत्व है | भारत में शक्ति का पृथक्करण सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप विवादों के उत्पन्न होने की संभावनाएं बनी रहती हैं | इसके समाधान हेतु संशोधन का होना स्वाभाविक है | DPSP के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हेतु भी संविधान का संशोधन होना स्वाभाविक हो जाता है | वर्तमान समय में अब तक लगभग कुल 103 संविधान संशोधन किये जा चुके है, यह अपने आप में सिद्ध करता है कि संविधान संशोधन होना समय के साथ स्वाभाविक है | इस प्रकार संविधान संशोधन प्रगतिशील और सामायिक होता है | संविधान संशोधन की प्रक्रिया - भारतीय संविधान में डॉ अम्बेडकर के विचारानुसार संशोधन की तीन विधायी प्रक्रियायें मौजूद हैं - 1- संसद के साधारण बहुमत से 2- संसद के दो- तिहाई बहुमत से 3- राज्य के विधानमंडल की स्वीकृति से जब सदन में उपस्थित होकर वोट देने वाले सदस्यों का 50% से अधिक किसी विषय के पक्ष में मतदान होता है तो उसे साधारण बहुमत कहते हैं | यदि विधेयक प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों की संख्या के बहुमत तथा उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो उसे राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति से संशोधन हो जाता है | यदि संविधान में संशोधन विधेयक संसद के सभी सदस्यों के बहुमत या संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत से पारित हो जाए, तो कम से कम 50% राज्यों के विधानामंडलों द्वारा पुष्टिकरण का प्रस्ताव पारित होने पर ही वह राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है | अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संविधान की कार्यवाही के आधार पर प्राप्त व्यवहारिकों को संविधान में समाहित करने हेतु संशोधन का होना आवश्यक है |
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Explain the differences between the jagirdari and iqtadari systems. State in what ways are they different from feudalism. (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE DIFFERENCES HAVE BEEN SHOWN BY STATING THE DISTINGUISHING ASPECTS OF EACH SYSTEM ANSWER:- One of the main causes of the decline of the Mughals was the mansabdari and jagirdari crisis. The feudal system is the basis for understanding all these issues- It developed in the medieval ages. Land was central to feudalism, as it was to the jagirdari and iqtadari systems also to quite some extent. THE FEUDAL SYSTEM/ FEUDALISM The Satvahanas started a practice, where the sovereign king started making many land donations to the Brahmanas and the priestly classes. The donatees also got some rights with the land, making them the sovereign rulers in the area- [This was because proprietary (ownership), hereditary and sovereign rights were given]. In the Satavahana and other inscriptions, we find specific commands from the kings to their descendants to not revoke such land grants. The distinguishing features of this system were:- 1) DECENTRALIZED SYSTEM It created a decentralized system. This led to the creation of local pockets of power, hence, a decentralized system. There was the erosion of the royal power, of the economic base of the state, decline of the royal institutions like the bureaucracy, the army etc. These people imitated the kings and gave their lands to others in a similar manner. Hence, a hierarchy got created, based upon the quantity of land possessed. This is called feudal hierarchy. 2) HIERARCHY- NOT MERIT BASED The feudal, economic, social status depended upon the quantity of land possessed. So, feudal hierarchy is based upon possession of land and having some sovereign rights. 3) HEREDITARY TRENDS The hierarchy was hereditary in feudalism. 4) PROPRIETARY, SOVEREIGN AND HEREDITARY RIGHTS These rights were given in this system, and not in iqtadari or the jagirdari system. 5) PAYMENT: AS LAND GRANTS Payments were made as land grants. 6) PERSON IS IMPORTANT In this system, the persons grew powerful, rather than the office. The office was not important. So, duties and responsibilities were attached to the person rather than an office. 7) DECENTRALIZED SYSTEM There were some local leaders resisting the force of the king, and forcing him to concede certain rights. So, finally, there was a fragmented political system, where power was exercised by the local magnets. Now, the authority of the king was reducing, with reducing resources at his disposal, so the king came to depend upon his vassals for warfare. So, it was an extreme form of decentralization. IQTADARI SYSTEM- TERRITORIAL ASSIGNMENTS With the establishment of the Delhi Sultanate, a system called the iqtadari system got developed. The iqtadari system was about the division of the conquest. Iqtadars were politicians, bureaucrats etc.- they assisted the kings everywhere- in administration, battles, politics etc. They were the nobility class. The iqtadars were associated with the sultan due to personal loyalties, dynastic loyalties etc. due to the patronage they received. So, they had a conventional basis of relationship with the sultan. There always competition between the nobles and the sultans. Some of the distinguishing features of this system were: 1) NOT A HOMOGENOUS GROUP The people here belonged to different areas, they belonged to different races etc. They also were aware and conscious of their distinct identities, and struggled for a greater say and control over the sultans. 2) DIVISION OF CONQUEST There were two types of areas: 2.1) KHALISA The income of this area would go directly to the khalisa (treasury) and the king was directly responsible for the administration of these areas. The king was also responsible for other issues like law and order etc. 2.2) IQTAS These were the remaining areas. The iqta areas were divided among the nobility. Those nobles who received iqtas were called iqtadars. The bigger iqtadars were called amirs/ walis/ muqtis. [The small iqtadars, given land for subsistence mainly and with not much responsibility towards the state, were not generally called iqtadars. They were the people who received something in the form of patronage, and their iqtas were generally made part of the larger iqtas.] 3) NO RIGHTS They did not enjoy any proprietary rights, sovereign rights etc. So, it was different from the feudal system. 4) DUTIES They performed some duties in their areas like law and order, defence (including external invasion and internal revolts), general (i.e. civil) and military administration- for this they also maintained civil and military establishments etc. 5) SOVEREIGNTY BELONGED TO THE SULTAN For example, they appropriated taxes imposed by the sultan. The imposition of taxes is a sovereign function. So, it is evident that the sovereignty did not belong to the iqtadars. 6) FAWAZIL They were empowered to spend their resources, but after meeting the cost of civil and military expenditure and the expeditions involving defence (cost of suppressing the revolts, external invasions) and meeting law and order. So, whatever was left after meeting such expenditure was called the fawazil and was deposited into the central treasury. 7) DIRECT RESPONSIBILITY TO THE SULTAN So, they were accountable for their acts and omissions. 8) CENTRALIZED SYSTEM As compared to the feudal system, this system was not a decentralized one. The sultan kept a close watch over the activities of the iqtadars. 8.1) The division of conquest was about territory- it was only a territorial assignment. Also, the scale was minor as compared to the feudal systems. 8.2) No rights were created with this assignment of land. 9) NO HEREDITARY RIGHTS Hence, this system differs from the feudal system. 10) NO PROPRIETARY RIGHTS Hence, this system differs from the feudal system. 11) NO SOVEREIGN RIGHTS Hence, this system differs from the feudal system. 12) TRANSFERABILITY The nobles could be transferred from 1 iqta to another. 13) IMPERSONATION Their office was important rather than their personal self. Hence, the system differed from the feudal system. 14) THE HIERARCHY WAS NOT WELL DEFINED Hence, the system was different from jagirdari system. ABOUT THE JAGIRDARI SYSTEM- REVENUE ASSIGNMENT In the mansabdari system, those mansabdars who were paid via cash were called naqdi mansabdars, while those who were paid via revenue assignments were called jagirdars. 1) MERIT BASED SYSTEM In this system, ranks were assigned to the nobles. Hence, it differed from the feudal system completely, and also from the iqtadari system , which depended to a greater degree upon the personal relationship with the king. 1.1) The rank decided the status, salaries, allowances and responsibilities. 1.2) Ranks were given based on the display of strength, skills and valour observed by the king was the basis for assigning such ranks. 2) NOT HEREDITARY Ranks were not hereditary. Ranks were given on the basis of field experiences and the skills displayed. At times, it also depended upon the family background. 2.1) Abul Fazl, says that there were 66 ranks in total, of which 33 were operational (means ranks assigned to a nob le). 3) NO PROPRIETARY OR SOVEREIGN RIGHTS No such rights were given. 4) CLEAR-CUT HIERARCHY There was a well-defined hierarchy, as it was based on the rank. 5) MAINTENANCE OF TROOPS Troops i.e. cavalry were maintained because medieval states were military states. Troops were of 2 types- Nim Sawar (1 rider with 1 horse), Pukhta Sawar (1 rider with 2 horses). The cost of maintaining the troops was borne by the state. So, this cost was based upon whether he was maintaining nim sawar or pukhtar (Also, the number of horses to be maintained depended upon the rank of the nobles) 6) SALARY FROM JAGIR In the jagirdari system, the jagirdar was only assigned the revenue of an area, which would be considered as his salary. Jama meant the estimated revenue, while Hasil the realised revenue. The hasil depended upon many local factors, local resistance etc. ( In the iqtadari system, the iqtadars were assigned the territory) 7) RESPONSIBILITY SEPARATED FROM THE TERRITORY GIVEN FOR INCOME They were not responsible for maintaining law and order, defence, general administration of the area assigned for the revenue. Hence, it was different from the iqtadari system. They were only responsible for the revenue of the area, which was assigned to them, as they rendered certain services to the state. (The salary/ jagir was given as per the rank). 8) CHECKS AND BALANCES They were not assigned the revenue of the area, for which they were assigned the responsibility of (i.e. revenue was from a different area and the responsibilities were of a different area), so as to check the power of the nobles. 9) TRANSFERS The transfer of jagirs was possible. Transfers were not to be preferred to places, where the gap between jama and hasil was more. 10) DUALITY OF RANKS Akbar made it a dual-rank; Zat rank indicated the status, salary and allowances;, while the Sawar rank denoted the responsibilities. Europeans feudalism meant a set of reciprocal legal and military obligations among the warrior nobility, revolving around the concept of lords, vassals, and fiefs. However, in India, the system gradually developed from the beginning of the land grants. The Satavahanas were the 1st rulers in India to initiate the practice of granting lands to the priestly class- Brahmins and Buddhist monks in lieu of their service – this was the beginning of land grants in India, which led to the beginning of feudatory tendencies in India. (Earlier the people giving their priestly services were given gold coins, gifts etc. but were never given land). So this practice of distributing land led to the beginning of feudalism. When the Guptas granted more land, it led to the creation of feudatories known as Samanthas. The Indian form of feudalismbecame well defined and mature- explicit in the grants made from about 1000 AD and got well recognised in the administrative systems of the Turks.
##Question:Explain the differences between the jagirdari and iqtadari systems. State in what ways are they different from feudalism. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE DIFFERENCES HAVE BEEN SHOWN BY STATING THE DISTINGUISHING ASPECTS OF EACH SYSTEM ANSWER:- One of the main causes of the decline of the Mughals was the mansabdari and jagirdari crisis. The feudal system is the basis for understanding all these issues- It developed in the medieval ages. Land was central to feudalism, as it was to the jagirdari and iqtadari systems also to quite some extent. THE FEUDAL SYSTEM/ FEUDALISM The Satvahanas started a practice, where the sovereign king started making many land donations to the Brahmanas and the priestly classes. The donatees also got some rights with the land, making them the sovereign rulers in the area- [This was because proprietary (ownership), hereditary and sovereign rights were given]. In the Satavahana and other inscriptions, we find specific commands from the kings to their descendants to not revoke such land grants. The distinguishing features of this system were:- 1) DECENTRALIZED SYSTEM It created a decentralized system. This led to the creation of local pockets of power, hence, a decentralized system. There was the erosion of the royal power, of the economic base of the state, decline of the royal institutions like the bureaucracy, the army etc. These people imitated the kings and gave their lands to others in a similar manner. Hence, a hierarchy got created, based upon the quantity of land possessed. This is called feudal hierarchy. 2) HIERARCHY- NOT MERIT BASED The feudal, economic, social status depended upon the quantity of land possessed. So, feudal hierarchy is based upon possession of land and having some sovereign rights. 3) HEREDITARY TRENDS The hierarchy was hereditary in feudalism. 4) PROPRIETARY, SOVEREIGN AND HEREDITARY RIGHTS These rights were given in this system, and not in iqtadari or the jagirdari system. 5) PAYMENT: AS LAND GRANTS Payments were made as land grants. 6) PERSON IS IMPORTANT In this system, the persons grew powerful, rather than the office. The office was not important. So, duties and responsibilities were attached to the person rather than an office. 7) DECENTRALIZED SYSTEM There were some local leaders resisting the force of the king, and forcing him to concede certain rights. So, finally, there was a fragmented political system, where power was exercised by the local magnets. Now, the authority of the king was reducing, with reducing resources at his disposal, so the king came to depend upon his vassals for warfare. So, it was an extreme form of decentralization. IQTADARI SYSTEM- TERRITORIAL ASSIGNMENTS With the establishment of the Delhi Sultanate, a system called the iqtadari system got developed. The iqtadari system was about the division of the conquest. Iqtadars were politicians, bureaucrats etc.- they assisted the kings everywhere- in administration, battles, politics etc. They were the nobility class. The iqtadars were associated with the sultan due to personal loyalties, dynastic loyalties etc. due to the patronage they received. So, they had a conventional basis of relationship with the sultan. There always competition between the nobles and the sultans. Some of the distinguishing features of this system were: 1) NOT A HOMOGENOUS GROUP The people here belonged to different areas, they belonged to different races etc. They also were aware and conscious of their distinct identities, and struggled for a greater say and control over the sultans. 2) DIVISION OF CONQUEST There were two types of areas: 2.1) KHALISA The income of this area would go directly to the khalisa (treasury) and the king was directly responsible for the administration of these areas. The king was also responsible for other issues like law and order etc. 2.2) IQTAS These were the remaining areas. The iqta areas were divided among the nobility. Those nobles who received iqtas were called iqtadars. The bigger iqtadars were called amirs/ walis/ muqtis. [The small iqtadars, given land for subsistence mainly and with not much responsibility towards the state, were not generally called iqtadars. They were the people who received something in the form of patronage, and their iqtas were generally made part of the larger iqtas.] 3) NO RIGHTS They did not enjoy any proprietary rights, sovereign rights etc. So, it was different from the feudal system. 4) DUTIES They performed some duties in their areas like law and order, defence (including external invasion and internal revolts), general (i.e. civil) and military administration- for this they also maintained civil and military establishments etc. 5) SOVEREIGNTY BELONGED TO THE SULTAN For example, they appropriated taxes imposed by the sultan. The imposition of taxes is a sovereign function. So, it is evident that the sovereignty did not belong to the iqtadars. 6) FAWAZIL They were empowered to spend their resources, but after meeting the cost of civil and military expenditure and the expeditions involving defence (cost of suppressing the revolts, external invasions) and meeting law and order. So, whatever was left after meeting such expenditure was called the fawazil and was deposited into the central treasury. 7) DIRECT RESPONSIBILITY TO THE SULTAN So, they were accountable for their acts and omissions. 8) CENTRALIZED SYSTEM As compared to the feudal system, this system was not a decentralized one. The sultan kept a close watch over the activities of the iqtadars. 8.1) The division of conquest was about territory- it was only a territorial assignment. Also, the scale was minor as compared to the feudal systems. 8.2) No rights were created with this assignment of land. 9) NO HEREDITARY RIGHTS Hence, this system differs from the feudal system. 10) NO PROPRIETARY RIGHTS Hence, this system differs from the feudal system. 11) NO SOVEREIGN RIGHTS Hence, this system differs from the feudal system. 12) TRANSFERABILITY The nobles could be transferred from 1 iqta to another. 13) IMPERSONATION Their office was important rather than their personal self. Hence, the system differed from the feudal system. 14) THE HIERARCHY WAS NOT WELL DEFINED Hence, the system was different from jagirdari system. ABOUT THE JAGIRDARI SYSTEM- REVENUE ASSIGNMENT In the mansabdari system, those mansabdars who were paid via cash were called naqdi mansabdars, while those who were paid via revenue assignments were called jagirdars. 1) MERIT BASED SYSTEM In this system, ranks were assigned to the nobles. Hence, it differed from the feudal system completely, and also from the iqtadari system , which depended to a greater degree upon the personal relationship with the king. 1.1) The rank decided the status, salaries, allowances and responsibilities. 1.2) Ranks were given based on the display of strength, skills and valour observed by the king was the basis for assigning such ranks. 2) NOT HEREDITARY Ranks were not hereditary. Ranks were given on the basis of field experiences and the skills displayed. At times, it also depended upon the family background. 2.1) Abul Fazl, says that there were 66 ranks in total, of which 33 were operational (means ranks assigned to a nob le). 3) NO PROPRIETARY OR SOVEREIGN RIGHTS No such rights were given. 4) CLEAR-CUT HIERARCHY There was a well-defined hierarchy, as it was based on the rank. 5) MAINTENANCE OF TROOPS Troops i.e. cavalry were maintained because medieval states were military states. Troops were of 2 types- Nim Sawar (1 rider with 1 horse), Pukhta Sawar (1 rider with 2 horses). The cost of maintaining the troops was borne by the state. So, this cost was based upon whether he was maintaining nim sawar or pukhtar (Also, the number of horses to be maintained depended upon the rank of the nobles) 6) SALARY FROM JAGIR In the jagirdari system, the jagirdar was only assigned the revenue of an area, which would be considered as his salary. Jama meant the estimated revenue, while Hasil the realised revenue. The hasil depended upon many local factors, local resistance etc. ( In the iqtadari system, the iqtadars were assigned the territory) 7) RESPONSIBILITY SEPARATED FROM THE TERRITORY GIVEN FOR INCOME They were not responsible for maintaining law and order, defence, general administration of the area assigned for the revenue. Hence, it was different from the iqtadari system. They were only responsible for the revenue of the area, which was assigned to them, as they rendered certain services to the state. (The salary/ jagir was given as per the rank). 8) CHECKS AND BALANCES They were not assigned the revenue of the area, for which they were assigned the responsibility of (i.e. revenue was from a different area and the responsibilities were of a different area), so as to check the power of the nobles. 9) TRANSFERS The transfer of jagirs was possible. Transfers were not to be preferred to places, where the gap between jama and hasil was more. 10) DUALITY OF RANKS Akbar made it a dual-rank; Zat rank indicated the status, salary and allowances;, while the Sawar rank denoted the responsibilities. Europeans feudalism meant a set of reciprocal legal and military obligations among the warrior nobility, revolving around the concept of lords, vassals, and fiefs. However, in India, the system gradually developed from the beginning of the land grants. The Satavahanas were the 1st rulers in India to initiate the practice of granting lands to the priestly class- Brahmins and Buddhist monks in lieu of their service – this was the beginning of land grants in India, which led to the beginning of feudatory tendencies in India. (Earlier the people giving their priestly services were given gold coins, gifts etc. but were never given land). So this practice of distributing land led to the beginning of feudalism. When the Guptas granted more land, it led to the creation of feudatories known as Samanthas. The Indian form of feudalismbecame well defined and mature- explicit in the grants made from about 1000 AD and got well recognised in the administrative systems of the Turks.
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भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही, प्रभावकारिता के संदर्भ में इस सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) Explain the nuclear policy of India. Along with this, In terms of its efficacy critically examin the policy. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में परमाणु सिद्धांत की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये 3- दुसरे खंड में सिद्धांत के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे खंड में सिद्धांत के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में औचित्यपूर्ण एवं लाभदायी नीति के रूप में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत चीन युद्ध के बाद ही चीन द्वारा 1964 में अपना नाभिकीय परीक्षण किया गया था| चीन से संभावित नाभिकीय हमले के विरुद्ध भारत द्वारा वैश्विक शक्तियों से सहायता मांगने पर भी सहायता नही प्राप्त हुई| अतः इसके एक साल बाद भारत ने अपना नाभिकीय क्रायक्रम शुरू किया था| 1974 में NPT की शर्तों को भेदभावपूर्ण मानते हुए भारत ने अपना प्रथम नाभिकीय परीक्षण किया जिसके प्रत्युत्तर में अमेरिका ने भारत पर प्रतिबन्ध आरोपित किये| 1975 में भारत को नाभिकीय इंधन तक पहुचने से रोकने के लिए NSG की स्थापना की गयी, इसके माध्यम से भारत को अलग थलग करने की नीति अपनाई गयी| हालांकि CTBT (परीक्षण पर प्रतिबन्ध) आज तक अस्तित्व में नहीं आया है किन्तु CTBT के प्रभाव आने के भय से उसके पहले ही मई 1998 में भारत ने पोखरण में अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कर लिया| भारत वैश्विक संधियों को मान्यता नहीं दे रहा था जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की नकारात्मक छवि बन सकती थी| अतः वर्ष 2003 में भारत ने अपनी परमाणु सिद्धांत की घोषणा की| भारत का परमाणु सिद्धांत भारत के परमाणु हथियार, नाभिकीय प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं है बल्कि भारत केवल अपनी न्यूनतम निवारक क्षमता को बनाए रखना चाहता है, ध्यातव्य है कि यहाँ न्यूनतम शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है भारत अपने परमाणु हथियारों का पहली बार किसी के विरुद्ध प्रयोग नही करेगा, किन्तु यदि भारत पर छोटे से छोटा नाभिकीय हमला होगा(टैक्टिकल न्यूक्लियर वीपन) तो भारत सम्पूर्ण विनाश की नीति पर चलेगा| यह सिद्धांत नाभिकीय युद्ध की संभावना को समाप्त करता है नाभिकीय हथियारों का प्रयोग भारत उन पर कभी नही करेगा जो नाभिकीय हथियार संपन्न नही है, यदि भारत पर नाभिकीय-रासायनिक-जैविक हमला किया गया तो भारत परमाणु हथियारों का प्रयोग करेगा| इससे दक्षिण एशिया में भय मुक्त वातावरण बनाने में सहायता मिली है भारत में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नागरिक नियंत्रण(नाभिकीय कमांड अथॉरिटी) में होगा कई विद्वान इस सिद्धांत को आदर्शात्मक मानते हैं और इसकी व्यावहारिकता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं| इनके तर्कों को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं विपक्ष में तर्क यह सरकार द्वारा देश को संकट में डालने के जैसा है क्योंकि यह सिद्धांत स्वयं सामने वाले को नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की इजाजत देता है, यदि बड़ा नाभिकीय हमला हुआ तो संभव है कि हम नाभिकीय हथियारों का प्रयोग करने की स्थिति में नहीं हों सामने से होने वाले पहले हमले के विरुद्ध भारत को बचाने के लिए महंगी एयर डिफेन्स प्रणाली की स्थापना आवश्यक होगी,क्योंकि युद्ध होने की स्थिति में इस एयर डिफेन्स प्रणाली को त्वरित आधार पर स्थापित करना कठिन होगा अभी हाल ही में ज्ञात हुआ है कि पाकिस्तान ने छोटे परमाणु हथियारों का विकास कर लिया है अतः भारत को ऐसे हथियारों से हुए हमले का जवाब देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए| इस नीति को गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों तक ही सीमित रखा जा सकता है| ताकि परमाणु शक्ति संपन्न देशों द्वारा आक्रमण की स्थिति में भारत प्रतिक्रियात्मक कार्यवाई करने में सक्षम हो सके| इन तर्कों का विरोध करते हुए विभिन्न विद्वान् इस सिद्धांत को उपयोगी एवं प्रभावशील मानते हुए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं पक्ष में तर्क यह अन्य सैन्य प्रयासों की आवश्यकता को कम करने वाला सिद्धांत है, इससे भारत को एकमुश्त सुरक्षा प्राप्ति होती है इस सिद्धांत के कारण भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति संपन्न देश के रूप में पहचान मिली है इस सिद्धांत के कारण भारत स्वयं की सुरक्षा के साथ ही साथ शत्रु पर हमला न करने का दबाव भी बनाता है, इससे आक्रमणकारी हतोत्साहित होगा यह सिद्धांत नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की संभावना को रोकता है और इस प्रकार संभावित युद्धों को पारंपरिक बने रहने का अवसर देता है यह टैक्टिकल नाभिकीय हथियारों के हमले तक को कवर करने वाला सिद्धांत है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सिद्धांत के विपक्ष में अधिकाँश तर्क संभावना आधारित हैं जबकि नाभिकीय युद्धों का न होना, नाभिकीय अस्त्रों को रखने की प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति, अत्यंत तनाव की स्थिति होने के बाद भी नाभिकीय अस्त्रों का प्रयोग न होना, दक्षिण एशिया में भयमुक्त वातावरण की उपस्थिति भारत के परमाणु सिद्धांत की सफलता को इंगित करता है| अतः बड़े संकट की स्थिति में ही इस सिद्धांत में परिवर्तन किया जा सकता है|
##Question:भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही, प्रभावकारिता के संदर्भ में इस सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये| (150 से 200 शब्द/10अंक) Explain the nuclear policy of India. Along with this, In terms of its efficacy critically examin the policy. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में परमाणु सिद्धांत की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये 3- दुसरे खंड में सिद्धांत के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे खंड में सिद्धांत के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में औचित्यपूर्ण एवं लाभदायी नीति के रूप में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत चीन युद्ध के बाद ही चीन द्वारा 1964 में अपना नाभिकीय परीक्षण किया गया था| चीन से संभावित नाभिकीय हमले के विरुद्ध भारत द्वारा वैश्विक शक्तियों से सहायता मांगने पर भी सहायता नही प्राप्त हुई| अतः इसके एक साल बाद भारत ने अपना नाभिकीय क्रायक्रम शुरू किया था| 1974 में NPT की शर्तों को भेदभावपूर्ण मानते हुए भारत ने अपना प्रथम नाभिकीय परीक्षण किया जिसके प्रत्युत्तर में अमेरिका ने भारत पर प्रतिबन्ध आरोपित किये| 1975 में भारत को नाभिकीय इंधन तक पहुचने से रोकने के लिए NSG की स्थापना की गयी, इसके माध्यम से भारत को अलग थलग करने की नीति अपनाई गयी| हालांकि CTBT (परीक्षण पर प्रतिबन्ध) आज तक अस्तित्व में नहीं आया है किन्तु CTBT के प्रभाव आने के भय से उसके पहले ही मई 1998 में भारत ने पोखरण में अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कर लिया| भारत वैश्विक संधियों को मान्यता नहीं दे रहा था जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की नकारात्मक छवि बन सकती थी| अतः वर्ष 2003 में भारत ने अपनी परमाणु सिद्धांत की घोषणा की| भारत का परमाणु सिद्धांत भारत के परमाणु हथियार, नाभिकीय प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं है बल्कि भारत केवल अपनी न्यूनतम निवारक क्षमता को बनाए रखना चाहता है, ध्यातव्य है कि यहाँ न्यूनतम शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है भारत अपने परमाणु हथियारों का पहली बार किसी के विरुद्ध प्रयोग नही करेगा, किन्तु यदि भारत पर छोटे से छोटा नाभिकीय हमला होगा(टैक्टिकल न्यूक्लियर वीपन) तो भारत सम्पूर्ण विनाश की नीति पर चलेगा| यह सिद्धांत नाभिकीय युद्ध की संभावना को समाप्त करता है नाभिकीय हथियारों का प्रयोग भारत उन पर कभी नही करेगा जो नाभिकीय हथियार संपन्न नही है, यदि भारत पर नाभिकीय-रासायनिक-जैविक हमला किया गया तो भारत परमाणु हथियारों का प्रयोग करेगा| इससे दक्षिण एशिया में भय मुक्त वातावरण बनाने में सहायता मिली है भारत में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नागरिक नियंत्रण(नाभिकीय कमांड अथॉरिटी) में होगा कई विद्वान इस सिद्धांत को आदर्शात्मक मानते हैं और इसकी व्यावहारिकता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं| इनके तर्कों को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं विपक्ष में तर्क यह सरकार द्वारा देश को संकट में डालने के जैसा है क्योंकि यह सिद्धांत स्वयं सामने वाले को नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की इजाजत देता है, यदि बड़ा नाभिकीय हमला हुआ तो संभव है कि हम नाभिकीय हथियारों का प्रयोग करने की स्थिति में नहीं हों सामने से होने वाले पहले हमले के विरुद्ध भारत को बचाने के लिए महंगी एयर डिफेन्स प्रणाली की स्थापना आवश्यक होगी,क्योंकि युद्ध होने की स्थिति में इस एयर डिफेन्स प्रणाली को त्वरित आधार पर स्थापित करना कठिन होगा अभी हाल ही में ज्ञात हुआ है कि पाकिस्तान ने छोटे परमाणु हथियारों का विकास कर लिया है अतः भारत को ऐसे हथियारों से हुए हमले का जवाब देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए| इस नीति को गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों तक ही सीमित रखा जा सकता है| ताकि परमाणु शक्ति संपन्न देशों द्वारा आक्रमण की स्थिति में भारत प्रतिक्रियात्मक कार्यवाई करने में सक्षम हो सके| इन तर्कों का विरोध करते हुए विभिन्न विद्वान् इस सिद्धांत को उपयोगी एवं प्रभावशील मानते हुए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं पक्ष में तर्क यह अन्य सैन्य प्रयासों की आवश्यकता को कम करने वाला सिद्धांत है, इससे भारत को एकमुश्त सुरक्षा प्राप्ति होती है इस सिद्धांत के कारण भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति संपन्न देश के रूप में पहचान मिली है इस सिद्धांत के कारण भारत स्वयं की सुरक्षा के साथ ही साथ शत्रु पर हमला न करने का दबाव भी बनाता है, इससे आक्रमणकारी हतोत्साहित होगा यह सिद्धांत नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की संभावना को रोकता है और इस प्रकार संभावित युद्धों को पारंपरिक बने रहने का अवसर देता है यह टैक्टिकल नाभिकीय हथियारों के हमले तक को कवर करने वाला सिद्धांत है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सिद्धांत के विपक्ष में अधिकाँश तर्क संभावना आधारित हैं जबकि नाभिकीय युद्धों का न होना, नाभिकीय अस्त्रों को रखने की प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति, अत्यंत तनाव की स्थिति होने के बाद भी नाभिकीय अस्त्रों का प्रयोग न होना, दक्षिण एशिया में भयमुक्त वातावरण की उपस्थिति भारत के परमाणु सिद्धांत की सफलता को इंगित करता है| अतः बड़े संकट की स्थिति में ही इस सिद्धांत में परिवर्तन किया जा सकता है|
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राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इसके साथ ही उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिए जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है।(150-200 शब्द/10 अंक) Briefly discuss the constitutional provisions that define the relation of the President and the Council of Ministers. Along with that, also clarify the circumstances when the President is not obliged to consult the Council of Ministers. (150-200 words/10 marks).
एप्रोच:- राष्ट्रपति की भूमिका को बताते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिये। राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को लिखिए। उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिये जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है। अंत में संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर:- भारतीय संविधान केअनुच्छेद 53 (1) में स्पष्ट किया गया है किसंघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जो उसे सीधे अथवा अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम से संचालित करेगा। राष्ट्रपति के नाम से ही संघ के सभी कार्य संचालित किये जातेहै। राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधान:- अनुच्छेद 74 (1) - केंद्र में एक मंत्रिपरिषद, जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होगा और वह राष्ट्रपति को संघ के शासन संचालनमें सहायता वपरामर्श देगा। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा इसमें एक नया वाक्य जोड़ा गया - "और राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा"। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा इसमें एक औरनया वाक्य - "और राष्ट्रपति उपरोक्त परामर्श को एक बार पुनर्विचार के लिए वापिस कर सकेगा"। अनुच्छेद 75 (1)- प्रधान मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा, जबकि मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति करेगा अनुच्छेद 75 (2) - राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त, मंत्री अपने पद पर बने रहेंगे, इसका अर्थ यह कि मंत्री व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होंगे। अनुच्छेद 75 (3) -केंद्रीय मंत्रिपरिषद, लोकसभाके प्रति सामूहिक रूप सेउत्तरदायी होगी ऐसी परिस्थितियां, जब राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं होती - यदि पदासीन प्रधानमंत्री की सहसा मृत्यु हो जाये, तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत भंग हो जाएगी।, ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अपने विवेक से किसी नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर मंत्रीपरिषद् की संरचना करनी होगी, जिससे संवैधानिक संकट से बचा जा सके। यदि प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे देता है तो तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत: भंग हो जाएगी। यदि लोकसभा के आमचुनाव के पश्चात किसी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिले तो राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी ऐसे नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर देगा जो उसकी दृष्टि में स्थायी सरकार देने में सक्षम हों यदि किसी प्रधानमंत्री के दल अथवा उसकी सरकार के विरुद्ध अर्थात उसकी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत कर रखा है और PM को लगता है कि वह अपनी सरकार बचाने में सफल नहीं हो पायेगा, तो इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए वह राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने की सिफारिश करता है, किन्तु राष्ट्रपति ऐसी स्थिति में उसका परामर्श मानने को बाध्य नहीं है, बल्कि वह वैकल्पिक सरकार के गठन का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 103 (2)- यदि संसद के किसी सदस्य की निरर्हता का कोई प्रश्न हो, तो राष्ट्रपति,निर्वाचन आयोग के परामर्श पर कार्य करेगा। अनुच्छेद 217 (2 ) के अनुसार हाई कोर्ट के जज की आयु को लेकर कोई विवाद हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायधीश के परामर्श के अनुरूप कार्य करेगा। इस प्रकार संविधान में संसदीय व्यवस्था के अनुरूप प्रधानमंत्री को प्राथमिकता दी गयी है, किन्तु इसके बाद भी संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति के पास ऐसी कई शक्तियां होती है, जिनका उपयोग वह स्वतंत्र पूर्वक कर सकता है।
##Question:राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। इसके साथ ही उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिए जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है।(150-200 शब्द/10 अंक) Briefly discuss the constitutional provisions that define the relation of the President and the Council of Ministers. Along with that, also clarify the circumstances when the President is not obliged to consult the Council of Ministers. (150-200 words/10 marks).##Answer:एप्रोच:- राष्ट्रपति की भूमिका को बताते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिये। राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को लिखिए। उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट कीजिये जब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह लेने को बाध्य नहीं है। अंत में संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर:- भारतीय संविधान केअनुच्छेद 53 (1) में स्पष्ट किया गया है किसंघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जो उसे सीधे अथवा अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम से संचालित करेगा। राष्ट्रपति के नाम से ही संघ के सभी कार्य संचालित किये जातेहै। राष्ट्रपति व मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधान:- अनुच्छेद 74 (1) - केंद्र में एक मंत्रिपरिषद, जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होगा और वह राष्ट्रपति को संघ के शासन संचालनमें सहायता वपरामर्श देगा। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा इसमें एक नया वाक्य जोड़ा गया - "और राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा"। 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा इसमें एक औरनया वाक्य - "और राष्ट्रपति उपरोक्त परामर्श को एक बार पुनर्विचार के लिए वापिस कर सकेगा"। अनुच्छेद 75 (1)- प्रधान मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा, जबकि मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति करेगा अनुच्छेद 75 (2) - राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त, मंत्री अपने पद पर बने रहेंगे, इसका अर्थ यह कि मंत्री व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होंगे। अनुच्छेद 75 (3) -केंद्रीय मंत्रिपरिषद, लोकसभाके प्रति सामूहिक रूप सेउत्तरदायी होगी ऐसी परिस्थितियां, जब राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं होती - यदि पदासीन प्रधानमंत्री की सहसा मृत्यु हो जाये, तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत भंग हो जाएगी।, ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अपने विवेक से किसी नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर मंत्रीपरिषद् की संरचना करनी होगी, जिससे संवैधानिक संकट से बचा जा सके। यदि प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे देता है तो तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिपरिषद स्वत: भंग हो जाएगी। यदि लोकसभा के आमचुनाव के पश्चात किसी दल को स्पष्ट बहुमत ना मिले तो राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी ऐसे नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर देगा जो उसकी दृष्टि में स्थायी सरकार देने में सक्षम हों यदि किसी प्रधानमंत्री के दल अथवा उसकी सरकार के विरुद्ध अर्थात उसकी मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत कर रखा है और PM को लगता है कि वह अपनी सरकार बचाने में सफल नहीं हो पायेगा, तो इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए वह राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने की सिफारिश करता है, किन्तु राष्ट्रपति ऐसी स्थिति में उसका परामर्श मानने को बाध्य नहीं है, बल्कि वह वैकल्पिक सरकार के गठन का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 103 (2)- यदि संसद के किसी सदस्य की निरर्हता का कोई प्रश्न हो, तो राष्ट्रपति,निर्वाचन आयोग के परामर्श पर कार्य करेगा। अनुच्छेद 217 (2 ) के अनुसार हाई कोर्ट के जज की आयु को लेकर कोई विवाद हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायधीश के परामर्श के अनुरूप कार्य करेगा। इस प्रकार संविधान में संसदीय व्यवस्था के अनुरूप प्रधानमंत्री को प्राथमिकता दी गयी है, किन्तु इसके बाद भी संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति के पास ऐसी कई शक्तियां होती है, जिनका उपयोग वह स्वतंत्र पूर्वक कर सकता है।
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भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही, प्रभावकारिता के संदर्भ में इस सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये| (150 से 200 शब्द) Explain the nuclear policy of India. Along with this, In terms of its efficacy critically examin the policy. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में परमाणु सिद्धांत की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये 3- दुसरे खंड में सिद्धांत के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे खंड में सिद्धांत के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में औचित्यपूर्ण एवं लाभदायी नीति के रूप में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत चीन युद्ध के बाद ही चीन द्वारा 1964 में अपना नाभिकीय परीक्षण किया गया था| चीन से संभावित नाभिकीय हमले के विरुद्ध भारत द्वारा वैश्विक शक्तियों से सहायता मांगने पर भी सहायता नही प्राप्त हुई| अतः इसके एक साल बाद भारत ने अपना नाभिकीय क्रायक्रम शुरू किया था| 1974 में NPT की शर्तों को भेदभावपूर्ण मानते हुए भारत ने अपना प्रथम नाभिकीय परीक्षण किया जिसके प्रत्युत्तर में अमेरिका ने भारत पर प्रतिबन्ध आरोपित किये| 1975 में भारत को नाभिकीय इंधन तक पहुचने से रोकने के लिए NSG की स्थापना की गयी, इसके माध्यम से भारत को अलग थलग करने की नीति अपनाई गयी| हालांकि CTBT (परीक्षण पर प्रतिबन्ध) आज तक अस्तित्व में नहीं आया है किन्तु CTBT के प्रभाव आने के भय से उसके पहले ही मई 1998 में भारत ने पोखरण में अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कर लिया| भारत वैश्विक संधियों को मान्यता नहीं दे रहा था जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की नकारात्मक छवि बन सकती थी| अतः वर्ष 2003 में भारत ने अपनी परमाणु सिद्धांत की घोषणा की| भारत का परमाणु सिद्धांत भारत के परमाणु हथियार, नाभिकीय प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं है बल्कि भारत केवल अपनी न्यूनतम निवारक क्षमता को बनाए रखना चाहता है, ध्यातव्य है कि यहाँ न्यूनतम शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है भारत अपने परमाणु हथियारों का पहली बार किसी के विरुद्ध प्रयोग नही करेगा, किन्तु यदि भारत पर छोटे से छोटा नाभिकीय हमला होगा(टैक्टिकल न्यूक्लियर वीपन) तो भारत सम्पूर्ण विनाश की नीति पर चलेगा| यह सिद्धांत नाभिकीय युद्ध की संभावना को समाप्त करता है नाभिकीय हथियारों का प्रयोग भारत उन पर कभी नही करेगा जो नाभिकीय हथियार संपन्न नही है, यदि भारत पर नाभिकीय-रासायनिक-जैविक हमला किया गया तो भारत परमाणु हथियारों का प्रयोग करेगा| इससे दक्षिण एशिया में भय मुक्त वातावरण बनाने में सहायता मिली है भारत में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नागरिक नियंत्रण(नाभिकीय कमांड अथॉरिटी) में होगा कई विद्वान इस सिद्धांत को आदर्शात्मक मानते हैं और इसकी व्यावहारिकता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं| इनके तर्कों को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं विपक्ष में तर्क यह सरकार द्वारा देश को संकट में डालने के जैसा है क्योंकि यह सिद्धांत स्वयं सामने वाले को नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की इजाजत देता है, यदि बड़ा नाभिकीय हमला हुआ तो संभव है कि हम नाभिकीय हथियारों का प्रयोग करने की स्थिति में नहीं हों सामने से होने वाले पहले हमले के विरुद्ध भारत को बचाने के लिए महंगी एयर डिफेन्स प्रणाली की स्थापना आवश्यक होगी,क्योंकि युद्ध होने की स्थिति में इस एयर डिफेन्स प्रणाली को त्वरित आधार पर स्थापित करना कठिन होगा अभी हाल ही में ज्ञात हुआ है कि पाकिस्तान ने छोटे परमाणु हथियारों का विकास कर लिया है अतः भारत को ऐसे हथियारों से हुए हमले का जवाब देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए| इस नीति को गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों तक ही सीमित रखा जा सकता है| ताकि परमाणु शक्ति संपन्न देशों द्वारा आक्रमण की स्थिति में भारत प्रतिक्रियात्मक कार्यवाई करने में सक्षम हो सके| इन तर्कों का विरोध करते हुए विभिन्न विद्वान् इस सिद्धांत को उपयोगी एवं प्रभावशील मानते हुए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं पक्ष में तर्क यह अन्य सैन्य प्रयासों की आवश्यकता को कम करने वाला सिद्धांत है, इससे भारत को एकमुश्त सुरक्षा प्राप्ति होती है इस सिद्धांत के कारण भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति संपन्न देश के रूप में पहचान मिली है इस सिद्धांत के कारण भारत स्वयं की सुरक्षा के साथ ही साथ शत्रु पर हमला न करने का दबाव भी बनाता है, इससे आक्रमणकारी हतोत्साहित होगा यह सिद्धांत नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की संभावना को रोकता है और इस प्रकार संभावित युद्धों को पारंपरिक बने रहने का अवसर देता है यह टैक्टिकल नाभिकीय हथियारों के हमले तक को कवर करने वाला सिद्धांत है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सिद्धांत के विपक्ष में अधिकाँश तर्क संभावना आधारित हैं जबकि नाभिकीय युद्धों का न होना, नाभिकीय अस्त्रों को रखने की प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति, अत्यंत तनाव की स्थिति होने के बाद भी नाभिकीय अस्त्रों का प्रयोग न होना, दक्षिण एशिया में भयमुक्त वातावरण की उपस्थिति भारत के परमाणु सिद्धांत की सफलता को इंगित करता है| अतः बड़े संकट की स्थिति में ही इस सिद्धांत में परिवर्तन किया जा सकता है|
##Question:भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये| इसके साथ ही, प्रभावकारिता के संदर्भ में इस सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये| (150 से 200 शब्द) Explain the nuclear policy of India. Along with this, In terms of its efficacy critically examin the policy. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में परमाणु सिद्धांत की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में भारत के परमाणु सिद्धांत की व्याख्या कीजिये 3- दुसरे खंड में सिद्धांत के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 4- तीसरे खंड में सिद्धांत के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये 5- अंतिम में औचित्यपूर्ण एवं लाभदायी नीति के रूप में बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत चीन युद्ध के बाद ही चीन द्वारा 1964 में अपना नाभिकीय परीक्षण किया गया था| चीन से संभावित नाभिकीय हमले के विरुद्ध भारत द्वारा वैश्विक शक्तियों से सहायता मांगने पर भी सहायता नही प्राप्त हुई| अतः इसके एक साल बाद भारत ने अपना नाभिकीय क्रायक्रम शुरू किया था| 1974 में NPT की शर्तों को भेदभावपूर्ण मानते हुए भारत ने अपना प्रथम नाभिकीय परीक्षण किया जिसके प्रत्युत्तर में अमेरिका ने भारत पर प्रतिबन्ध आरोपित किये| 1975 में भारत को नाभिकीय इंधन तक पहुचने से रोकने के लिए NSG की स्थापना की गयी, इसके माध्यम से भारत को अलग थलग करने की नीति अपनाई गयी| हालांकि CTBT (परीक्षण पर प्रतिबन्ध) आज तक अस्तित्व में नहीं आया है किन्तु CTBT के प्रभाव आने के भय से उसके पहले ही मई 1998 में भारत ने पोखरण में अपना दूसरा परमाणु परीक्षण कर लिया| भारत वैश्विक संधियों को मान्यता नहीं दे रहा था जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की नकारात्मक छवि बन सकती थी| अतः वर्ष 2003 में भारत ने अपनी परमाणु सिद्धांत की घोषणा की| भारत का परमाणु सिद्धांत भारत के परमाणु हथियार, नाभिकीय प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं है बल्कि भारत केवल अपनी न्यूनतम निवारक क्षमता को बनाए रखना चाहता है, ध्यातव्य है कि यहाँ न्यूनतम शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है भारत अपने परमाणु हथियारों का पहली बार किसी के विरुद्ध प्रयोग नही करेगा, किन्तु यदि भारत पर छोटे से छोटा नाभिकीय हमला होगा(टैक्टिकल न्यूक्लियर वीपन) तो भारत सम्पूर्ण विनाश की नीति पर चलेगा| यह सिद्धांत नाभिकीय युद्ध की संभावना को समाप्त करता है नाभिकीय हथियारों का प्रयोग भारत उन पर कभी नही करेगा जो नाभिकीय हथियार संपन्न नही है, यदि भारत पर नाभिकीय-रासायनिक-जैविक हमला किया गया तो भारत परमाणु हथियारों का प्रयोग करेगा| इससे दक्षिण एशिया में भय मुक्त वातावरण बनाने में सहायता मिली है भारत में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग नागरिक नियंत्रण(नाभिकीय कमांड अथॉरिटी) में होगा कई विद्वान इस सिद्धांत को आदर्शात्मक मानते हैं और इसकी व्यावहारिकता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं| इनके तर्कों को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं विपक्ष में तर्क यह सरकार द्वारा देश को संकट में डालने के जैसा है क्योंकि यह सिद्धांत स्वयं सामने वाले को नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की इजाजत देता है, यदि बड़ा नाभिकीय हमला हुआ तो संभव है कि हम नाभिकीय हथियारों का प्रयोग करने की स्थिति में नहीं हों सामने से होने वाले पहले हमले के विरुद्ध भारत को बचाने के लिए महंगी एयर डिफेन्स प्रणाली की स्थापना आवश्यक होगी,क्योंकि युद्ध होने की स्थिति में इस एयर डिफेन्स प्रणाली को त्वरित आधार पर स्थापित करना कठिन होगा अभी हाल ही में ज्ञात हुआ है कि पाकिस्तान ने छोटे परमाणु हथियारों का विकास कर लिया है अतः भारत को ऐसे हथियारों से हुए हमले का जवाब देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए| इस नीति को गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों तक ही सीमित रखा जा सकता है| ताकि परमाणु शक्ति संपन्न देशों द्वारा आक्रमण की स्थिति में भारत प्रतिक्रियात्मक कार्यवाई करने में सक्षम हो सके| इन तर्कों का विरोध करते हुए विभिन्न विद्वान् इस सिद्धांत को उपयोगी एवं प्रभावशील मानते हुए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं पक्ष में तर्क यह अन्य सैन्य प्रयासों की आवश्यकता को कम करने वाला सिद्धांत है, इससे भारत को एकमुश्त सुरक्षा प्राप्ति होती है इस सिद्धांत के कारण भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार नाभिकीय शक्ति संपन्न देश के रूप में पहचान मिली है इस सिद्धांत के कारण भारत स्वयं की सुरक्षा के साथ ही साथ शत्रु पर हमला न करने का दबाव भी बनाता है, इससे आक्रमणकारी हतोत्साहित होगा यह सिद्धांत नाभिकीय हथियारों के प्रयोग की संभावना को रोकता है और इस प्रकार संभावित युद्धों को पारंपरिक बने रहने का अवसर देता है यह टैक्टिकल नाभिकीय हथियारों के हमले तक को कवर करने वाला सिद्धांत है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सिद्धांत के विपक्ष में अधिकाँश तर्क संभावना आधारित हैं जबकि नाभिकीय युद्धों का न होना, नाभिकीय अस्त्रों को रखने की प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति, अत्यंत तनाव की स्थिति होने के बाद भी नाभिकीय अस्त्रों का प्रयोग न होना, दक्षिण एशिया में भयमुक्त वातावरण की उपस्थिति भारत के परमाणु सिद्धांत की सफलता को इंगित करता है| अतः बड़े संकट की स्थिति में ही इस सिद्धांत में परिवर्तन किया जा सकता है|
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समकालीन मुद्दों के प्रकाश में भारतीय समाज की विविधता में एकता पर आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) In light of contemporary issues critically discuss unity in diversity of Indian society. (150-200 words ; 10 Marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। इस एकता के संदर्भ में मौजूद चुनौतियों की चर्चा कीजिये। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का हैजिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8, अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं , जिसको निम्नलिखित समकालीन उदाहरणों से से समझा जा सकता है इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांशों में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। जैसे- उत्तरपूर्वी भारत में अलग देश की मांग, गोरखालैंड आदि राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने अपने हितों की पूर्ति के लिए एकता को बाधित किया है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। ऑक्सफाम रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 1% लोगों के पास कुल संपत्ति का 73 % है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। जनजातीय क्षेत्रों में आक्रोश, नक्सलवाद का बढ़ता प्रभाव आदि | निष्कर्षतः यह कहाजा सकता है कि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
##Question:समकालीन मुद्दों के प्रकाश में भारतीय समाज की विविधता में एकता पर आलोचनात्मक चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) In light of contemporary issues critically discuss unity in diversity of Indian society. (150-200 words ; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भारतीय समाज में विविधता में एकता का संक्षिप्त परिचय दीजिए। भारत में विविधता में एकता को प्रोत्साहित करने वाले घटकों का उल्लेख कीजिए। इस एकता के संदर्भ में मौजूद चुनौतियों की चर्चा कीजिये। अंत में एक संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिये । भारतीय समाज स्वयं में एक विविध समाज है जो इसे एक विलक्षणता प्रदान करता है। इस विविधता के चार प्रमुख सांस्कृतिक तत्व हैं- भौगोलिक विविधता, बहुधार्मिकता, बहुभाषाई एवं बहुनृजातीय समाज।किसी समाज के लिए यह अति अनिवार्य है कि समाज के सभी घटकों एवं समुदायों के बीच में परस्पर सौहार्द एवं एकजुटता हो। यह सौहार्द या तो "एक जैसा" होने जी वजह से आता है या विविधता के बावजूद भी परस्पर स्नेह से आता है। भारतीय संदर्भ में विविधता में एकता का स्वरूप परस्पर सौहार्द से जन्मा एकजुटता का हैजिसको निम्नलिखित घटक प्रोत्साहित करते हैं- सरंचनात्त्मक स्तर पर एक नागरिकता की पहचान,साथ ही सविंधान के विभिन्न स्रोतों द्वारा जैसे अनुसूची 8, अनुच्छेद 29 इत्यादि द्वारा एक राष्ट्र की परिकल्पना को सांकेतिक विधानों जैसे राष्ट्रगान इत्यादि द्वारा प्रोत्साहित किया जाना। राजनैतिक स्तर पर एक जैसी अधिशासनात्मक व्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचा समाज में एकता को प्रोत्साहित करता है। आर्थिक स्तर पर एक जैसी कर व्यवस्था, नीति आयोग एवं वित्त आयोग जैसे संस्थान इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रेरित करते हैं। सांस्कृतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता एवं सामाजिक न्याय, नैतिक मूल्यों का एकीकरण इत्यादि राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करते हैं। पर्यावरणीय स्तर पर मानसून द्वारा निर्धारित हो रही खेती स्वयं में एक होने का भाव देती हैं। विविधता में एकता के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं , जिसको निम्नलिखित समकालीन उदाहरणों से से समझा जा सकता है इस एकता के लिए प्रमुख चुनौतियों में मुख्य घटक यह है कि विविधता के कारण लाभांशों में असमानता हो, या सरंचनात्मक स्तर पर इसका प्रभाव क्षेत्रवाद उप राष्ट्रवाद एवं अलगाववाद इत्यादि संदर्भों में देखा जा सकता है। जैसे- उत्तरपूर्वी भारत में अलग देश की मांग, गोरखालैंड आदि राजनैतिक स्तर पर यदि लोकतान्त्रिक कमी के कारण जन्मा अविश्वास एकता के लिए चुनौती होता है। विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने अपने हितों की पूर्ति के लिए एकता को बाधित किया है। आर्थिक स्तर पर व्यक्तियों एवं प्रदेशों में बढ़ती आर्थिक असमानता तथा इससे जन्मा सामाजिक भेदभाव एकता के लिए चुनौती है। ऑक्सफाम रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 1% लोगों के पास कुल संपत्ति का 73 % है। नैतिक सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता एवं बढ़ता पश्चमीकरण तथा नैतिक मूल्यों का पतन प्रमुख चुनौतियां हैं। प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित वितरण तथा उससे जन्मा क्षोभ राष्टीय एकता के लिए मुख्य चुनौतियां हैं। जनजातीय क्षेत्रों में आक्रोश, नक्सलवाद का बढ़ता प्रभाव आदि | निष्कर्षतः यह कहाजा सकता है कि भारतीय विविधता में एकता को अनेकों घटक चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूदहज़ारों वर्षों की यह संस्कृति एवं समाज वर्तमान तक विभिन्न तत्वों के मध्य सामंजस्य के सूत्र पिरोये हुए है और इन चुनौतियों का समाधान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समातमूलक संवैधानिक दर्शन में परिलक्षित होता है। भारतीय समाज में हालाँकि आज़ादी के पश्चात सामाजिक एकजुटता के संदर्भमें बहुत कार्य किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकि है।
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डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के द्वारा ना सिर्फ समाज सुधार के क्षेत्र में व्यापक कार्य किये गये थें अपितु उन्होंने राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी| चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Dr. Bhimrao Ambedkar not only did extensive work in the field of Social Reforms, But he also played an important role in the Political and Economic Field. Discuss (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के द्वारा समाज सुधार के क्षेत्र में किये गये कार्यों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में,डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के द्वारा राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में निभाई गयी भूमिका का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, स्वतंत्र भारत के संदर्भ में,डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की भूमिका को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- डॉ भीमराव अंबेडकर एक प्रख्यात न्यायविद, समाज सुधारक, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिज्ञ थे जिन्हें भारतीय संविधान के पिता के रूप में भी जाना जाता है| उनका जन्म 1891 में महू में हुआ था| उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भारत में पूरी की तथा उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु कोलंबिया विश्वविद्यालय(अमेरिका) एवं ब्रिटेन के लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में भी अध्ययन किया| उन्होंने छुआछूत, जातीय प्रतिबंध, दलितों और अन्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया जिसके लिए उन्हें 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया| समाज सुधार के क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर के किए गए कार्य- उन्होंने प्रारंभ से ही दलितों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के साथ हो रहे अन्याय, रूढ़िवादी हिंदू समाज के असमान व्यवहार, छुआछूत तथा जातीय भेदभाव का विरोध किया| अपनी आत्मकथा "वेटिंग फॉरए वीजा " में स्वंय के साथ हुए छुआछूत संबंधित घटनाओं का वर्णन किया जो आज भी कोलंबिया विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है| साउथबोरो कमेटी(भारत सरकार अधिनियम 1919 से संबंधित) के समक्ष दलितों एवं पिछड़ों के उत्थान हेतु राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र एवं शैक्षणिक तथा सरकार के अधीन उच्च सेवाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए आरक्षण की मांग की| दलित वर्गों में शिक्षा के प्रसार एवं सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए "बहिष्कृत हितकारिणी सभा" का गठन; दलित शोषण का विरोध एवं आंदोलन में निरंतरता बनाए रखने के लिए मूकनायक, बहिष्कृत भारत आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन ; 1927 में महाड में सार्वजनिक तालाब के पानी का प्रयोग कर छुआछूत के विरुद्ध सक्रिय रूप से अभियान का आरंभ; 25 दिसंबर 1927 को हजारों अनुयायियों के साथ सामूहिक रूप से मनुस्मृति जलाना ; जाति व्यवस्था एवं हिंदू रूढ़िवादिता की कड़ी आलोचना करते हुए 1936 में "जाति का विनाश" नामक पुस्तक का प्रकाशन करके समस्त बुराईयों की जड़ में जाति व्यवस्था को रखना; "शूद्र कौन थे" में शूद्र कौन कहलाते थे, कहां से आए थे, किन कारणों से वे दरिद्र स्थिति में पहुंचे थे जैसे अनसुलझे प्रश्नों की तार्किक रूप से व्याख्या; 1930 में नासिक में कालाराम मंदिर में प्रवेश हेतु सत्याग्रह ; राजनीतिक क्षेत्र मेंडॉक्टर अंबेडकर- बंबई विधान परिषद में मनोनीत किए जाने से राजनीतिक पटल पर अवतरण; लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में दलितों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्वकर्ता के रूप में सरकार द्वारा नामांकित किया जाना; उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर ही दलितों एवं अछूतों के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था का प्रावधान किया जाना (सांप्रदायिक पंचाट/कम्युनल अवार्ड) ; 1930 में डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन तथा 1942 में अनुसूचित जाति संघ नामक राजनीतिक दल की स्थापना; विधानसभा के अंदर एवं बाहर श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु 1936 में इंडियन लेबर पार्टी का गठन ; वायसराय की रक्षा सलाहकार समिति में सदस्य तथा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में भूमिका ; स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के साथ संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष ; कश्मीर की विशेष स्थिति हेतु अनुच्छेद 370 का विरोध तथा भारतीय समाज में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिलाने के लिए समान नागरिक संहिता लागू कराने का भरसक प्रयास; आर्थिक क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर- अर्थशास्त्र में विदेश से डॉक्टरेट डिग्री धारण करने वाले प्रथम भारतीय; दक्षिण एशिया क्षेत्र में अर्थशास्त्र में दो बार डॉक्टरेट डिग्री धारण करने वाले प्रथम भारतीय; उनके द्वारा कोलंबिया विश्वविद्यालय तथा लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में किया गया अधिकतर शोध कार्य आर्थिक क्षेत्र से ही संबंधित था| ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन एवं वित्त नामक शोध में कपास, रेशम, नील, नमक चाय एवं अफीम पर कंपनी के एकाधिकार से वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका का अध्ययन; रूपए की समस्या: इसकी उत्पति तथा समाधान - रुपया-पाउंड स्टर्लिंग के मध्य विनिमय असंतुलन तथा इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों का अध्ययन; ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का उद्भव नामक शोधपत्र में केंद्रीय वित्त का प्रांतीय विकेंद्रीकरण होने तक का क्रमानुसार अध्ययन; हिल्टन यंग कमीशन ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना के लिए ब्रिटिश सरकार को संस्तुति देने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित सभी पहलुओं को समझने के लिए एकमात्र भारतीय डॉक्टर अंबेडकर से विचार विमर्श किया था| 1951 में डॉक्टर अंबेडकर के प्रयासों से ही भारतीय वित्त आयोग की स्थापना ; अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए बाजार आधारित अर्थव्यवस्था पर बल; आर्थिक विकास में महिलाओं के समान अधिकारों पर बल देने तथा लैंगिक भेदभाव को कम करने के लिए समान कार्य हेतु सामान्य वेतन जैसे प्रावधानों को संविधान में शामिल करना; वायसराय की कार्यकारिणी में सदस्य रहते हुए श्रमिकों की कार्यविधि प्रतिदिन 12 घंटे से कम करके 8 घंटे करना आदि; सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक क्षेत्रों मेंउपरोक्त योगदानों तथा संविधानसभा के ड्राफ्ट कमिटी के चेयरमैन रहते हुए उनकी भूमिका को देखते हुएडॉक्टर अंबेडकर के योगदान को समझा जा सकता है| उनके महान कार्यों के बदौलत ही आज उन्हें कई वर्गों द्वारा भगवान् का दर्जा दिया जाता है|
##Question:डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के द्वारा ना सिर्फ समाज सुधार के क्षेत्र में व्यापक कार्य किये गये थें अपितु उन्होंने राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी| चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Dr. Bhimrao Ambedkar not only did extensive work in the field of Social Reforms, But he also played an important role in the Political and Economic Field. Discuss (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के द्वारा समाज सुधार के क्षेत्र में किये गये कार्यों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में,डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के द्वारा राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में निभाई गयी भूमिका का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, स्वतंत्र भारत के संदर्भ में,डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की भूमिका को दर्शाते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- डॉ भीमराव अंबेडकर एक प्रख्यात न्यायविद, समाज सुधारक, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिज्ञ थे जिन्हें भारतीय संविधान के पिता के रूप में भी जाना जाता है| उनका जन्म 1891 में महू में हुआ था| उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भारत में पूरी की तथा उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु कोलंबिया विश्वविद्यालय(अमेरिका) एवं ब्रिटेन के लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में भी अध्ययन किया| उन्होंने छुआछूत, जातीय प्रतिबंध, दलितों और अन्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया जिसके लिए उन्हें 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया| समाज सुधार के क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर के किए गए कार्य- उन्होंने प्रारंभ से ही दलितों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के साथ हो रहे अन्याय, रूढ़िवादी हिंदू समाज के असमान व्यवहार, छुआछूत तथा जातीय भेदभाव का विरोध किया| अपनी आत्मकथा "वेटिंग फॉरए वीजा " में स्वंय के साथ हुए छुआछूत संबंधित घटनाओं का वर्णन किया जो आज भी कोलंबिया विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है| साउथबोरो कमेटी(भारत सरकार अधिनियम 1919 से संबंधित) के समक्ष दलितों एवं पिछड़ों के उत्थान हेतु राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र एवं शैक्षणिक तथा सरकार के अधीन उच्च सेवाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए आरक्षण की मांग की| दलित वर्गों में शिक्षा के प्रसार एवं सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए "बहिष्कृत हितकारिणी सभा" का गठन; दलित शोषण का विरोध एवं आंदोलन में निरंतरता बनाए रखने के लिए मूकनायक, बहिष्कृत भारत आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन ; 1927 में महाड में सार्वजनिक तालाब के पानी का प्रयोग कर छुआछूत के विरुद्ध सक्रिय रूप से अभियान का आरंभ; 25 दिसंबर 1927 को हजारों अनुयायियों के साथ सामूहिक रूप से मनुस्मृति जलाना ; जाति व्यवस्था एवं हिंदू रूढ़िवादिता की कड़ी आलोचना करते हुए 1936 में "जाति का विनाश" नामक पुस्तक का प्रकाशन करके समस्त बुराईयों की जड़ में जाति व्यवस्था को रखना; "शूद्र कौन थे" में शूद्र कौन कहलाते थे, कहां से आए थे, किन कारणों से वे दरिद्र स्थिति में पहुंचे थे जैसे अनसुलझे प्रश्नों की तार्किक रूप से व्याख्या; 1930 में नासिक में कालाराम मंदिर में प्रवेश हेतु सत्याग्रह ; राजनीतिक क्षेत्र मेंडॉक्टर अंबेडकर- बंबई विधान परिषद में मनोनीत किए जाने से राजनीतिक पटल पर अवतरण; लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में दलितों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्वकर्ता के रूप में सरकार द्वारा नामांकित किया जाना; उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर ही दलितों एवं अछूतों के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था का प्रावधान किया जाना (सांप्रदायिक पंचाट/कम्युनल अवार्ड) ; 1930 में डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन तथा 1942 में अनुसूचित जाति संघ नामक राजनीतिक दल की स्थापना; विधानसभा के अंदर एवं बाहर श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु 1936 में इंडियन लेबर पार्टी का गठन ; वायसराय की रक्षा सलाहकार समिति में सदस्य तथा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में भूमिका ; स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के साथ संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष ; कश्मीर की विशेष स्थिति हेतु अनुच्छेद 370 का विरोध तथा भारतीय समाज में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिलाने के लिए समान नागरिक संहिता लागू कराने का भरसक प्रयास; आर्थिक क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर- अर्थशास्त्र में विदेश से डॉक्टरेट डिग्री धारण करने वाले प्रथम भारतीय; दक्षिण एशिया क्षेत्र में अर्थशास्त्र में दो बार डॉक्टरेट डिग्री धारण करने वाले प्रथम भारतीय; उनके द्वारा कोलंबिया विश्वविद्यालय तथा लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में किया गया अधिकतर शोध कार्य आर्थिक क्षेत्र से ही संबंधित था| ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन एवं वित्त नामक शोध में कपास, रेशम, नील, नमक चाय एवं अफीम पर कंपनी के एकाधिकार से वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका का अध्ययन; रूपए की समस्या: इसकी उत्पति तथा समाधान - रुपया-पाउंड स्टर्लिंग के मध्य विनिमय असंतुलन तथा इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों का अध्ययन; ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का उद्भव नामक शोधपत्र में केंद्रीय वित्त का प्रांतीय विकेंद्रीकरण होने तक का क्रमानुसार अध्ययन; हिल्टन यंग कमीशन ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना के लिए ब्रिटिश सरकार को संस्तुति देने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित सभी पहलुओं को समझने के लिए एकमात्र भारतीय डॉक्टर अंबेडकर से विचार विमर्श किया था| 1951 में डॉक्टर अंबेडकर के प्रयासों से ही भारतीय वित्त आयोग की स्थापना ; अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए बाजार आधारित अर्थव्यवस्था पर बल; आर्थिक विकास में महिलाओं के समान अधिकारों पर बल देने तथा लैंगिक भेदभाव को कम करने के लिए समान कार्य हेतु सामान्य वेतन जैसे प्रावधानों को संविधान में शामिल करना; वायसराय की कार्यकारिणी में सदस्य रहते हुए श्रमिकों की कार्यविधि प्रतिदिन 12 घंटे से कम करके 8 घंटे करना आदि; सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक क्षेत्रों मेंउपरोक्त योगदानों तथा संविधानसभा के ड्राफ्ट कमिटी के चेयरमैन रहते हुए उनकी भूमिका को देखते हुएडॉक्टर अंबेडकर के योगदान को समझा जा सकता है| उनके महान कार्यों के बदौलत ही आज उन्हें कई वर्गों द्वारा भगवान् का दर्जा दिया जाता है|
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State the salient features of the Charter Acts of 1813 and 1833. (150 words/10 Marks)
BRIEF APPROACH -INTRODUCTION - THE SALIENT FEATURES OF THE CHARTER ACT OF 1813 - THE SALIENT FEATURES OF CHARTER ACT OF 1833 -CONCLUSION ANSWER:- In order to fundamentally understand the charter acts, one must understand certain principles- The utilitarians believed in the concept of maximum happiness (welfare) for the maximum number of people. For them, utility was to be established or determined on the basis of the capacity to ensure maximum happiness to the maximum number of people. They accepted the role of both the individual and the state. They opined that the individuals must have the freedomto fulfill their enlightened self-interest whereas the state can bring about positive changes through legislative interventions. Then there were the evangelicals , who wanted to spread Christianity in India with the aim of civilizing the country. The liberals wanted some rights for the Indians within the British Empire. In this light we can now study the salient features of the charter acts: THE CHARTER ACT OF 1813 1) END OF THE MONOPOLY OF THE EIC It ended such monopoly, except for its monopoly in trade in tea and trade with China. 2) DECLARATION OF THE SOVEREIGNTY OF THE CROWN It declared such sovereignty of the crown on the company"s Indian territories. However, the company retained the right to rule on behalf of the crown for the next 20 years 3) EXTENSION OF THE REMAINING TRADE PRIVILEGES This was effected for the next 20 years 4) CHRISTIAN MISSIONARIES ALLOWED They were allowed in the company"s territories in India. This was mainly effected due to the efforts of the evangelicals like William Wilberforce and Charles Grant (it was due to their influence on the Parliament that such restrictions on the Christian missionaries were removed) 5) PROPERTY RIGHTS The British subjects/ residents were allowed to acquire and own property in India and to conduct their business activities (free trade). Thus, the act enabled the British subjects to come to India to take advantage of the Indian market 6) ALLOCATION OF MONEY FOR EDUCATION An allocation of an annual sum of Rs. 1 lakh was made for the promotion of education among the natives. CHARTER ACT OF 1833 1) COMPLETE ABOLITION OF THE MONOPOLY OF THE COMPANY Now the company was transformed into a purely administrative and political concern. The shareholders of the companies were to receive their dividends out of the Indian revenues. 2) DECLARATION OF THE SOVEREIGNTY OF THE CROWN This was done on the Indian territories in more clear terms. The company was left with the right to rule India on behalf of the crown for the next 20 years The racial provision of the Act of 1793 was set aside and now a declaration was made that all the subjects including Indians are entitled to any post within the Empire without any discrimination related to their caste, creed and place of birth (not gender- gender rights were not considered in England at this time) 3) INTRODUCTION OF A COMPLETELY CENTRALIZED SYSTEM This was done wrt the administration in India in political, administrative and even financial matters/ subjects. Now, the Governor-General of Bengal was designated as the governor-general of India and Lord William Bentinck, who had been serving as the last governor-general of Bengal ,was appointed as the 1st governor-general of India IMPLICATION OF THIS: 3.1) The GG of India in council was given the right to legislate with respect to all the territories of the company. 3.2) He was also empowered to impose taxes throughout the company"s territories and absolute control on the state finances 4) LAW MEMBER In order to facilitate the GG in council in its law-making processes, an additional member known as the law member, was added to the council, which had now taken the form of the imperial legislature in India The law member was to participate in its proceedings only when it transacted its legislative business Macaulay was made the 1st law member 5) PROVISION FOR THE CODIFICATION OF INDIAN LAWS This led to the 1st law commission of India under the chairmanship of Lord Macaulay Thus, through the charter Act of 1833, the executive functions and the legislative functions of the imperial council i.e. the GG of India in Council, came to be separated and a separate Indian legislature came to exist. It is, for this reason, it is said that the Act of 1833 contained the seeds of the modern Indian legislatures.
##Question:State the salient features of the Charter Acts of 1813 and 1833. (150 words/10 Marks)##Answer:BRIEF APPROACH -INTRODUCTION - THE SALIENT FEATURES OF THE CHARTER ACT OF 1813 - THE SALIENT FEATURES OF CHARTER ACT OF 1833 -CONCLUSION ANSWER:- In order to fundamentally understand the charter acts, one must understand certain principles- The utilitarians believed in the concept of maximum happiness (welfare) for the maximum number of people. For them, utility was to be established or determined on the basis of the capacity to ensure maximum happiness to the maximum number of people. They accepted the role of both the individual and the state. They opined that the individuals must have the freedomto fulfill their enlightened self-interest whereas the state can bring about positive changes through legislative interventions. Then there were the evangelicals , who wanted to spread Christianity in India with the aim of civilizing the country. The liberals wanted some rights for the Indians within the British Empire. In this light we can now study the salient features of the charter acts: THE CHARTER ACT OF 1813 1) END OF THE MONOPOLY OF THE EIC It ended such monopoly, except for its monopoly in trade in tea and trade with China. 2) DECLARATION OF THE SOVEREIGNTY OF THE CROWN It declared such sovereignty of the crown on the company"s Indian territories. However, the company retained the right to rule on behalf of the crown for the next 20 years 3) EXTENSION OF THE REMAINING TRADE PRIVILEGES This was effected for the next 20 years 4) CHRISTIAN MISSIONARIES ALLOWED They were allowed in the company"s territories in India. This was mainly effected due to the efforts of the evangelicals like William Wilberforce and Charles Grant (it was due to their influence on the Parliament that such restrictions on the Christian missionaries were removed) 5) PROPERTY RIGHTS The British subjects/ residents were allowed to acquire and own property in India and to conduct their business activities (free trade). Thus, the act enabled the British subjects to come to India to take advantage of the Indian market 6) ALLOCATION OF MONEY FOR EDUCATION An allocation of an annual sum of Rs. 1 lakh was made for the promotion of education among the natives. CHARTER ACT OF 1833 1) COMPLETE ABOLITION OF THE MONOPOLY OF THE COMPANY Now the company was transformed into a purely administrative and political concern. The shareholders of the companies were to receive their dividends out of the Indian revenues. 2) DECLARATION OF THE SOVEREIGNTY OF THE CROWN This was done on the Indian territories in more clear terms. The company was left with the right to rule India on behalf of the crown for the next 20 years The racial provision of the Act of 1793 was set aside and now a declaration was made that all the subjects including Indians are entitled to any post within the Empire without any discrimination related to their caste, creed and place of birth (not gender- gender rights were not considered in England at this time) 3) INTRODUCTION OF A COMPLETELY CENTRALIZED SYSTEM This was done wrt the administration in India in political, administrative and even financial matters/ subjects. Now, the Governor-General of Bengal was designated as the governor-general of India and Lord William Bentinck, who had been serving as the last governor-general of Bengal ,was appointed as the 1st governor-general of India IMPLICATION OF THIS: 3.1) The GG of India in council was given the right to legislate with respect to all the territories of the company. 3.2) He was also empowered to impose taxes throughout the company"s territories and absolute control on the state finances 4) LAW MEMBER In order to facilitate the GG in council in its law-making processes, an additional member known as the law member, was added to the council, which had now taken the form of the imperial legislature in India The law member was to participate in its proceedings only when it transacted its legislative business Macaulay was made the 1st law member 5) PROVISION FOR THE CODIFICATION OF INDIAN LAWS This led to the 1st law commission of India under the chairmanship of Lord Macaulay Thus, through the charter Act of 1833, the executive functions and the legislative functions of the imperial council i.e. the GG of India in Council, came to be separated and a separate Indian legislature came to exist. It is, for this reason, it is said that the Act of 1833 contained the seeds of the modern Indian legislatures.
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भारत के विशेष सन्दर्भ में जनजातीय समुदाय से आप क्या समझते हैं? भारत में जनजातीय समुदाय के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द ; 10 अंक) What do you understand by the tribal community in the special context of India? Discuss the efforts made for the upliftment of tribal community in India. (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में नृजाति, प्रजाति, आदिवासी, जनजाति आदि को परिभाषित कीजिये| 2- प्रथम भाग में भारत के विशेष सन्दर्भ में जनजातीय समुदाय को परिभाषित कीजिये 3- मुख्य भाग में भारत में जनजातीय समुदाय के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में प्रयासों की स्थिति एवं उनका समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नृजाति (Race) शारीरिक बनावट के आधार पर, स्वयं द्वारा या किसी अन्य के द्वारा, जब किसी समूह को अन्य से पृथक किया जाता है तब उसे नृजाति कहते हैं| जब यह विभेद किसी स्थान विशेष में रहने वाले समूह (विशिष्ट संस्कृति) के आधार पर किया जाता है तब उसे प्रजाति(Ethenic) कहते हैं| किसी एक क्षेत्र विशेष के लोग, जिनकी सांस्कृतिक पहचान हो एवं कम से कम एक नृजातीय लक्षण वाले जनसमूहों को जनजाति(Tribes) कहते हैं| किसी क्षेत्र में प्राचीन काल से रह रहे परंपरागत आय स्रोतों वाले जन समूह को आदिवासी(Ab-origins)कहा जाता है| भारतीय संदर्भ में जनजातीय समाज · भारतीय समाज के सन्दर्भ में जनजातीय समूहों को निम्नलिखित दो दृष्टिकोण में परिभाषित किया जाता है · आर्थिक सन्दर्भों में उन्हें परम्परागत स्रोतों से जीविकोपार्जन करने वाले समुदाय, जिनमें पूँजी की सोच का अभाव होता है के रूप में जाना जाता है · सांस्कृतिक सन्दर्भ में वे अपनी विलक्षण सांस्कृतिक पहचान लिए एक क्षेत्र विशेष में रहने वाले जन समूहों के रूप में देखे जाते हैं · भारतीय संदर्भ में उपरोक्त दोनों परिभाषाओं को समेकित करते हुए अनुच्छेद 342 में इन जनजातीय समूहों के हितों के सन्दर्भ प्रस्तुत किये गए हैं| · जनगणना 2011 के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का 8.6 % भाग जनजातीय समूहों का है जिसमें कुल मिला कर 705 जनजातीय समूह अनुसूचित हैं जिनमें से 75 समुदायों को आदिम जनजाति(PVTG) के रूप में चिन्हित किया गया है · ऐसी जनजातियाँ जो भारत सरकार के गजट में सुरक्षात्मक भेदभाव द्वारा सर्वांगीण विकास हेतु संदर्भित हैं उन्हें अनुसूचित जनजाति कहा जाता है · उड़ीसा से अधिकतम जनजातियाँ(63) अनुसूचित हैं, मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की अधिकतम जनसंख्या है| दिल्ली पंजाब हरियाणा और चंडीगढ़ में कोई जनजाति नही पायी जाती है| किरुलर जनजाति पुदुचेरी में पायी जाती है| जनजातियों की जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है, साक्षरता दर बहुत कम है स्वतंत्रता के बाद किये गए प्रयास · स्वतंत्रता पश्चात जनजातीय समुदायों की संस्कृति का संरक्षण करते हुए उनके कल्याण और उनको मुख्य धारा में लाने के विभिन्न प्रयास किये गए हैं जो निम्नलिखित हैं · स्वतंत्रता के बाद नेहरु जी ने एल्विन को जनजातीय समूहों के कल्याण हेतु बनाए गए निकाय का अध्यक्ष नियुक्त किया| नेहरु एल्विन पंचशील सिद्धांत के अंतर्गत जहाँ एक ओर अनुसूचित क्षेत्रों को रेखांकित करते हुए इन जनजातियों को क्षेत्रीय संप्रभुता प्रदान की गयीवहीँ दूसरी ओर इन्हें मुख्य धारा में लाने हेतु हर संभव प्रयास किये जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया · धर समिति की रिपोर्टों के आधार पर पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक जनजातीय उप योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गयी|इसके अंतर्गत जिन क्षेत्रों में इन जनजातीय समूहों का अधिक सांद्रण रहा है उस पूरे क्षेत्र को विकसित करना| जिन राज्यों में ये जनजातीय समूह एक जिले विशेष में संकेंद्रित हों वहां जिला स्तरीय विकास कार्यक्रम तथा जहाँ आवश्यक हो वहां व्यक्तिगत स्तर पर सहयोग द्वारा जनजातीय समूह के लोक कल्याण को सुनिश्चित किया जा रहा है|अनुच्छेद 275 (1) में इस सन्दर्भ में अनुदान की व्यवस्था की गयी है| · वर्ष 1986-87 में TRIFED नामक संस्था द्वारा जनजातीय समूहों को आवश्यक वित्तीय एवं तकनीकी सहायता सिविल सोसाइटी एवं NGO के माध्यम से सुलभ कराया जा रहा है · वर्ष 1989 में SC-ST कानून के अंतर्गत, जनजातियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार का शारीरिक-सामाजिक अथवा मानसिक प्रताड़ना एक दंडनीय अपराध माना गया है · वर्ष 1992 में स्वरोजगार के विकल्पों को बढाने हेतु ट्राइबल हाट ( जैसे दिल्ली हाट) की प्रस्तावना दी गयी जिसके अंतर्गत इन जनजातीय समूहों को अपने लघु उद्योग एवं हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार उपलब्ध कराये जा रहे हैं · इसके साथ ही मेधावी छात्रों को स्कालरशिप तथा प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निःशुल्क आवासीय कोचिंग की सुविधा भी सुनिश्चित कराई जा रही है · वर्ष 1996 में पंचायती राज व्यवस्था को अनुसूचित क्षेत्रों में भी विस्तारित करने के लिए PESA अधिनियम लाया गया है| इससे सामाजिक सशक्तिकरण को तेजी मिल रही है| · वर्ष 1999 में एक अलग मंत्रालय बनाते हुए जनजातियों के हित के लिए बनायी जा रही नीतियों एवं उनके अनुपालन को त्वरित किया जा रहा है · वर्ष 2006 में माननीय SC के आदेशानुसार किसी क्षेत्र में पाए जा रहे आदिवासी/वनवासी उस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदाओं के प्रथम स्वामी होंगे बशर्ते वे इन स्रोतों का वाणिज्यिक प्रयोग न कर रहे हों · यदि किसी भी कारण से जनजातीय समूह वनों से विस्थापित किये जाते हैं तो उन्हें उपयुक्त आर्थिक मुआवजा भी दिया जाना चाहिए · वर्ष 2013 में ऑपरेशन रौशनी के माध्यम से जनजातीय युवाओं के लिए विशेषकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 50 हजार से अधिक रोजगार सृजित किये जा रहे हैं इसके साथ ही · नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में MNREGA के अंतर्गत 150 दिनों का रोजगार दिया जा रहा है · वर्ष 2015 में वन बंधू कल्याण योजना के अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार डिजिटलीकरण जैसे उद्देश्यों को प्रमुखता देते हुए 13 प्रमुख उद्देश्यों को रेखांकित किया गया है जिससे इन जनजातीय समूहों को मुख्य धारा में जोड़ा जा सके| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जनजातीय उत्थान के संदर्भ में भारत सरकार द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| यद्यपि इन प्रयासों को पर्याप्त सफलता नहीं प्राप्त हुई है क्योंकि जनजातीय समुदायों में गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन, असंतोष आदि चुनौतियां बनी हुई हैं| अतः सरकार को अपने प्रयासों में तत्परता लाते हुए कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है|
##Question:भारत के विशेष सन्दर्भ में जनजातीय समुदाय से आप क्या समझते हैं? भारत में जनजातीय समुदाय के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द ; 10 अंक) What do you understand by the tribal community in the special context of India? Discuss the efforts made for the upliftment of tribal community in India. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नृजाति, प्रजाति, आदिवासी, जनजाति आदि को परिभाषित कीजिये| 2- प्रथम भाग में भारत के विशेष सन्दर्भ में जनजातीय समुदाय को परिभाषित कीजिये 3- मुख्य भाग में भारत में जनजातीय समुदाय के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में प्रयासों की स्थिति एवं उनका समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये नृजाति (Race) शारीरिक बनावट के आधार पर, स्वयं द्वारा या किसी अन्य के द्वारा, जब किसी समूह को अन्य से पृथक किया जाता है तब उसे नृजाति कहते हैं| जब यह विभेद किसी स्थान विशेष में रहने वाले समूह (विशिष्ट संस्कृति) के आधार पर किया जाता है तब उसे प्रजाति(Ethenic) कहते हैं| किसी एक क्षेत्र विशेष के लोग, जिनकी सांस्कृतिक पहचान हो एवं कम से कम एक नृजातीय लक्षण वाले जनसमूहों को जनजाति(Tribes) कहते हैं| किसी क्षेत्र में प्राचीन काल से रह रहे परंपरागत आय स्रोतों वाले जन समूह को आदिवासी(Ab-origins)कहा जाता है| भारतीय संदर्भ में जनजातीय समाज · भारतीय समाज के सन्दर्भ में जनजातीय समूहों को निम्नलिखित दो दृष्टिकोण में परिभाषित किया जाता है · आर्थिक सन्दर्भों में उन्हें परम्परागत स्रोतों से जीविकोपार्जन करने वाले समुदाय, जिनमें पूँजी की सोच का अभाव होता है के रूप में जाना जाता है · सांस्कृतिक सन्दर्भ में वे अपनी विलक्षण सांस्कृतिक पहचान लिए एक क्षेत्र विशेष में रहने वाले जन समूहों के रूप में देखे जाते हैं · भारतीय संदर्भ में उपरोक्त दोनों परिभाषाओं को समेकित करते हुए अनुच्छेद 342 में इन जनजातीय समूहों के हितों के सन्दर्भ प्रस्तुत किये गए हैं| · जनगणना 2011 के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का 8.6 % भाग जनजातीय समूहों का है जिसमें कुल मिला कर 705 जनजातीय समूह अनुसूचित हैं जिनमें से 75 समुदायों को आदिम जनजाति(PVTG) के रूप में चिन्हित किया गया है · ऐसी जनजातियाँ जो भारत सरकार के गजट में सुरक्षात्मक भेदभाव द्वारा सर्वांगीण विकास हेतु संदर्भित हैं उन्हें अनुसूचित जनजाति कहा जाता है · उड़ीसा से अधिकतम जनजातियाँ(63) अनुसूचित हैं, मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की अधिकतम जनसंख्या है| दिल्ली पंजाब हरियाणा और चंडीगढ़ में कोई जनजाति नही पायी जाती है| किरुलर जनजाति पुदुचेरी में पायी जाती है| जनजातियों की जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है, साक्षरता दर बहुत कम है स्वतंत्रता के बाद किये गए प्रयास · स्वतंत्रता पश्चात जनजातीय समुदायों की संस्कृति का संरक्षण करते हुए उनके कल्याण और उनको मुख्य धारा में लाने के विभिन्न प्रयास किये गए हैं जो निम्नलिखित हैं · स्वतंत्रता के बाद नेहरु जी ने एल्विन को जनजातीय समूहों के कल्याण हेतु बनाए गए निकाय का अध्यक्ष नियुक्त किया| नेहरु एल्विन पंचशील सिद्धांत के अंतर्गत जहाँ एक ओर अनुसूचित क्षेत्रों को रेखांकित करते हुए इन जनजातियों को क्षेत्रीय संप्रभुता प्रदान की गयीवहीँ दूसरी ओर इन्हें मुख्य धारा में लाने हेतु हर संभव प्रयास किये जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया · धर समिति की रिपोर्टों के आधार पर पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक जनजातीय उप योजना की परिकल्पना प्रस्तुत की गयी|इसके अंतर्गत जिन क्षेत्रों में इन जनजातीय समूहों का अधिक सांद्रण रहा है उस पूरे क्षेत्र को विकसित करना| जिन राज्यों में ये जनजातीय समूह एक जिले विशेष में संकेंद्रित हों वहां जिला स्तरीय विकास कार्यक्रम तथा जहाँ आवश्यक हो वहां व्यक्तिगत स्तर पर सहयोग द्वारा जनजातीय समूह के लोक कल्याण को सुनिश्चित किया जा रहा है|अनुच्छेद 275 (1) में इस सन्दर्भ में अनुदान की व्यवस्था की गयी है| · वर्ष 1986-87 में TRIFED नामक संस्था द्वारा जनजातीय समूहों को आवश्यक वित्तीय एवं तकनीकी सहायता सिविल सोसाइटी एवं NGO के माध्यम से सुलभ कराया जा रहा है · वर्ष 1989 में SC-ST कानून के अंतर्गत, जनजातियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार का शारीरिक-सामाजिक अथवा मानसिक प्रताड़ना एक दंडनीय अपराध माना गया है · वर्ष 1992 में स्वरोजगार के विकल्पों को बढाने हेतु ट्राइबल हाट ( जैसे दिल्ली हाट) की प्रस्तावना दी गयी जिसके अंतर्गत इन जनजातीय समूहों को अपने लघु उद्योग एवं हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार उपलब्ध कराये जा रहे हैं · इसके साथ ही मेधावी छात्रों को स्कालरशिप तथा प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निःशुल्क आवासीय कोचिंग की सुविधा भी सुनिश्चित कराई जा रही है · वर्ष 1996 में पंचायती राज व्यवस्था को अनुसूचित क्षेत्रों में भी विस्तारित करने के लिए PESA अधिनियम लाया गया है| इससे सामाजिक सशक्तिकरण को तेजी मिल रही है| · वर्ष 1999 में एक अलग मंत्रालय बनाते हुए जनजातियों के हित के लिए बनायी जा रही नीतियों एवं उनके अनुपालन को त्वरित किया जा रहा है · वर्ष 2006 में माननीय SC के आदेशानुसार किसी क्षेत्र में पाए जा रहे आदिवासी/वनवासी उस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदाओं के प्रथम स्वामी होंगे बशर्ते वे इन स्रोतों का वाणिज्यिक प्रयोग न कर रहे हों · यदि किसी भी कारण से जनजातीय समूह वनों से विस्थापित किये जाते हैं तो उन्हें उपयुक्त आर्थिक मुआवजा भी दिया जाना चाहिए · वर्ष 2013 में ऑपरेशन रौशनी के माध्यम से जनजातीय युवाओं के लिए विशेषकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 50 हजार से अधिक रोजगार सृजित किये जा रहे हैं इसके साथ ही · नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में MNREGA के अंतर्गत 150 दिनों का रोजगार दिया जा रहा है · वर्ष 2015 में वन बंधू कल्याण योजना के अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार डिजिटलीकरण जैसे उद्देश्यों को प्रमुखता देते हुए 13 प्रमुख उद्देश्यों को रेखांकित किया गया है जिससे इन जनजातीय समूहों को मुख्य धारा में जोड़ा जा सके| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जनजातीय उत्थान के संदर्भ में भारत सरकार द्वारा महत्वपूर्ण प्रयास किये गए हैं| यद्यपि इन प्रयासों को पर्याप्त सफलता नहीं प्राप्त हुई है क्योंकि जनजातीय समुदायों में गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन, असंतोष आदि चुनौतियां बनी हुई हैं| अतः सरकार को अपने प्रयासों में तत्परता लाते हुए कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है|
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भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की तुलना कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक ) Explain the role of the post of President and Governor in Indian democracy. Also, compare the discretionary powers of the President and the Governor. (150-200 words/10 marks)
एप्रोच:- भूमिका में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद का संदर्भ दीजिए। तत्पश्चात, इन पदों की भूमिका स्पष्ट कीजिये। अंत में विवेकाधीन शक्तियों की तुलना करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर:- संविधान के भाग V के अनुच्छेद 52 से 78 तक में संघ की कार्यपालिका का वर्णन है। कार्यपालिका में राष्ट्रपति शामिल होता है। वह भारत का राज्य प्रमुख, प्रथम नागरिक होता है। इसी प्रकार राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल को शामिल किया जाता है, वह राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति की भूमिका : संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। वह संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है। मृत्युदंड के संबंध में क्षमादान करने की शक्ति राष्ट्रपति को विशेष स्थान प्रदान करती है। धनविधेयक को प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। राज्यपाल की भूमिका : राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होती हैं। संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राज्यपाल मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश राज्यपाल ही करता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ: राष्ट्रपति के पास कोई संवैधानिक विवेक स्वतंत्रता नहीं है परंतु उसके पास कुछ परिस्थितिजन्य विवेक स्वतन्त्रता हैं जैसे: लोकसभा में किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत न होने पर वह प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। विश्वास मत सिद्ध न कर पाने पर मंत्रिमंडल को विघटित कर सकता है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति के विपरीत राज्यपाल को संवैधानिक और परिस्थितिजन्य शक्तियाँ प्राप्त हैं: राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करना। राष्ट्रपति के विचारार्थ किसी विधेयक को आरक्षित करना राज्य के विधानपरिषद एवं प्रशासनिक मामलों में मुख्यमंत्री से जानकारी से प्राप्त करना विधानसभा चुनाव में किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति के मामले में मंत्रिपरिषद के अल्पमत में आने पर राज्य विधानसभा को विघटित करना। इस प्रकार भारतीय लोकतन्त्र में संसदीय व्यवस्था के बावजूद भी राष्ट्रपति व राज्यपाल का पद महत्वपूर्ण है। दोनों प्रमुखों की कार्यकारी, न्यायिक आदि शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं परंतु राज्यपाल को इस मामले में अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त है।
##Question:भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की भूमिका स्पष्ट कीजिए। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की तुलना कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक ) Explain the role of the post of President and Governor in Indian democracy. Also, compare the discretionary powers of the President and the Governor. (150-200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद का संदर्भ दीजिए। तत्पश्चात, इन पदों की भूमिका स्पष्ट कीजिये। अंत में विवेकाधीन शक्तियों की तुलना करते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर:- संविधान के भाग V के अनुच्छेद 52 से 78 तक में संघ की कार्यपालिका का वर्णन है। कार्यपालिका में राष्ट्रपति शामिल होता है। वह भारत का राज्य प्रमुख, प्रथम नागरिक होता है। इसी प्रकार राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल को शामिल किया जाता है, वह राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति की भूमिका : संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। वह संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है। मृत्युदंड के संबंध में क्षमादान करने की शक्ति राष्ट्रपति को विशेष स्थान प्रदान करती है। धनविधेयक को प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। राज्यपाल की भूमिका : राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ राज्यपाल में निहित होती हैं। संविधान सम्मत कार्य सीधे उसके द्वारा या उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा सम्पन्न होंगे। राज्यपाल मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश राज्यपाल ही करता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ: राष्ट्रपति के पास कोई संवैधानिक विवेक स्वतंत्रता नहीं है परंतु उसके पास कुछ परिस्थितिजन्य विवेक स्वतन्त्रता हैं जैसे: लोकसभा में किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत न होने पर वह प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। विश्वास मत सिद्ध न कर पाने पर मंत्रिमंडल को विघटित कर सकता है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति के विपरीत राज्यपाल को संवैधानिक और परिस्थितिजन्य शक्तियाँ प्राप्त हैं: राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करना। राष्ट्रपति के विचारार्थ किसी विधेयक को आरक्षित करना राज्य के विधानपरिषद एवं प्रशासनिक मामलों में मुख्यमंत्री से जानकारी से प्राप्त करना विधानसभा चुनाव में किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति के मामले में मंत्रिपरिषद के अल्पमत में आने पर राज्य विधानसभा को विघटित करना। इस प्रकार भारतीय लोकतन्त्र में संसदीय व्यवस्था के बावजूद भी राष्ट्रपति व राज्यपाल का पद महत्वपूर्ण है। दोनों प्रमुखों की कार्यकारी, न्यायिक आदि शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं परंतु राज्यपाल को इस मामले में अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त है।
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Enumerate the forces dominant in Youth stage of river? Also, discuss the landforms associated with youthful stage of river? (150 Words/10 Marks)
APPROACH: Introduction: Mention about landforms created by running water. Body: Firstly mention the forces dominant in the Youthful stage of the river. In the second part, mention the landforms associated with the youthful stage of the river. Conclusion : ANSWER : Landforms are created by various process, which involves an endogenic and exogenic process. Running water is an exogenic agent which creates various landform in various stages of its travel, i.e. youthful, mature and old stage. Youthful stage is that stage which is the 1st stage and the river is having an immense force to create various landforms.Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and youthful rivers flowing over steep gradients. Forces dominant during the youthful stage of a river: High Velocity: Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and high velocity. Steep gradients: This increases the potential energy of water and enhances the erosional features. High Erosion: With time, stream channels over steep gradients turn gentler due to continued erosion. Deposition : Eroded materials get transported because of flow of the river. Landforms associated with youthful stage of the river: V-shaped valley - Valleys start as small and narrow rills; the rills will gradually develop into long and wide gullies; the gullies will further deepen, widen and lengthen to give rise to valleys. Gorge - A gorge is a deep valley with very steep to straight sides and Canyon - A canyon is characterized by steep step-like side slopes and may be as deep as a gorge. A gorge is almost equal in width at its top as well as its bottom. In contrast, a canyon is wider at its top than at its bottom. In fact, a canyon is a variant of the gorge. Valley types depend upon the type and structure of rocks in which they form. For example, canyons commonly form in horizontal bedded sedimentary rocks and gorges form in hard rocks. Potholes - Over the rocky beds of hill-streams more or less circular depressions called potholes form because of stream erosion aided by the abrasion of rock fragments. Once a small and shallow depression forms, pebbles and boulders get collected in those depressions and get rotated by flowing water and consequently the depressions grow in dimensions. A series of such depressions eventually join and the stream valley gets deepened. Plunge Pools - At the foot of waterfalls also, large potholes, quite deep and wide, form because of the sheer impact of water and rotation of boulders. Such large and deep holes at the base of waterfalls are called plunge pools. These pools also help in the deepening of valleys. Waterfalls - Waterfalls are transitory like any other landform and will recede gradually and bring the floor of the valley above waterfalls to the level below. After the youth stage, the river forms various landforms in the mature and old stage. In these stages erosion is the dominant feature, landforms are like meanders, flood plains, delta, etc. Note : A diagram of landform will be appreciated. Reference : NCERT
##Question:Enumerate the forces dominant in Youth stage of river? Also, discuss the landforms associated with youthful stage of river? (150 Words/10 Marks)##Answer:APPROACH: Introduction: Mention about landforms created by running water. Body: Firstly mention the forces dominant in the Youthful stage of the river. In the second part, mention the landforms associated with the youthful stage of the river. Conclusion : ANSWER : Landforms are created by various process, which involves an endogenic and exogenic process. Running water is an exogenic agent which creates various landform in various stages of its travel, i.e. youthful, mature and old stage. Youthful stage is that stage which is the 1st stage and the river is having an immense force to create various landforms.Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and youthful rivers flowing over steep gradients. Forces dominant during the youthful stage of a river: High Velocity: Most of the erosional landforms made by running water are associated with vigorous and high velocity. Steep gradients: This increases the potential energy of water and enhances the erosional features. High Erosion: With time, stream channels over steep gradients turn gentler due to continued erosion. Deposition : Eroded materials get transported because of flow of the river. Landforms associated with youthful stage of the river: V-shaped valley - Valleys start as small and narrow rills; the rills will gradually develop into long and wide gullies; the gullies will further deepen, widen and lengthen to give rise to valleys. Gorge - A gorge is a deep valley with very steep to straight sides and Canyon - A canyon is characterized by steep step-like side slopes and may be as deep as a gorge. A gorge is almost equal in width at its top as well as its bottom. In contrast, a canyon is wider at its top than at its bottom. In fact, a canyon is a variant of the gorge. Valley types depend upon the type and structure of rocks in which they form. For example, canyons commonly form in horizontal bedded sedimentary rocks and gorges form in hard rocks. Potholes - Over the rocky beds of hill-streams more or less circular depressions called potholes form because of stream erosion aided by the abrasion of rock fragments. Once a small and shallow depression forms, pebbles and boulders get collected in those depressions and get rotated by flowing water and consequently the depressions grow in dimensions. A series of such depressions eventually join and the stream valley gets deepened. Plunge Pools - At the foot of waterfalls also, large potholes, quite deep and wide, form because of the sheer impact of water and rotation of boulders. Such large and deep holes at the base of waterfalls are called plunge pools. These pools also help in the deepening of valleys. Waterfalls - Waterfalls are transitory like any other landform and will recede gradually and bring the floor of the valley above waterfalls to the level below. After the youth stage, the river forms various landforms in the mature and old stage. In these stages erosion is the dominant feature, landforms are like meanders, flood plains, delta, etc. Note : A diagram of landform will be appreciated. Reference : NCERT
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दल-बदल विरोधी कानून से आप क्या समझते हैं? साथ ही भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून की विशेषताओं का संक्षेप में चर्चा कीजिए | (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by anti-defection law? Also, brieflydiscuss the characteristics of anti-defection law under the Tenth Schedule of the Indian Constitution. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में दल- बदल कानून के बारे में वर्णन कीजिये | इसके बाद दल-बदल कानून के उपबंधो की चर्चा कीजिये | दल-बदल कानून के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये | दल- बदल कानून के नकारात्मक पक्ष की भी चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इसके कमियों को बताते हुए समाधान भी बताइए | उत्तर - भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से "दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा लाया गया है| इसके अनुसार सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल- परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में प्रावधान किया गया है| 10 वीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों तथा विधायकों की निरहर्ताओं से सम्बंधित उपबंध अग्रलिखित है- राजनीतिक दलों के सदस्य-किसी राजनीतिक दल का सदस्य निम्न परिस्थितियों में सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य माना जाएगा यदि - वह स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दे | यदि व्यक्ति अपने राजनीतिक दल के विपक्ष में मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा उसे 15 दिन के भीतर क्षमादान न मिला हो| निर्दलीय सदस्य- निर्दलीयसदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | मनोनीत सदस्य -मनोनीत सदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता निम्न दो परिस्थितियों में लागू नहीं होती - 1- दल-विभाजन की स्थिति में 2- यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी चुना जाता है संविधान की 10वीं अनुसूची की रूपरेखा राजनीतिक दल-परिवर्तन के दोषों तथा दुष्प्रभावों , जो कि पद के प्रलोभन तथा भौतिक पदार्थों के प्रलोभन अथवा इसी प्रकार के अन्य प्रलोभनों से प्रेरित होती है, पर रोक लगाने के लिए की गयी है | इसका उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना तथा असैद्धान्तिक और अनैतिक दल-परिवर्तन पर रोक लगाना है | यद्यपि दल-विरोधी कानून ने देश के राजनीतिक जीवन में एक नए युग का सूत्रपात किया फिर भी इसके क्रियाकलापों में कुछ कमियां रह गयी और यह दल-परिवर्तन को बहुत प्रभावी तरीके से रोक नहीं पाया | इसमें कुछ नकारात्मक पक्षों को देखा जा सकता है - यह कानून असहमति तथा दल-परिवर्तन के बीच अंतर को नहीं बता पाया | इसने छिटपुट दल-परिवर्तन पर रोक लगाई किन्तु बड़े पैमाने पर होने वाले दल-परिवर्तन को कानूनी रूप दिया | यह किसी विधायक द्वारा विधानमंडल के बाहर किये गए उसके क्रियाकलापों हेतु उसके निष्कासन की व्यवस्था नहीं करता है | इसका निर्दलीय व निर्देशित सदस्यों में भेदभाव अतार्किक ही है | उपर्युक्त कमियों के बावजूद भी दल-बदल विरोधी कानून अपने आप में प्रमुख स्थान रखती है , जरूरत इसके सही क्रियान्वयन की और नियमों के अनुपालन की | दल-बदल विरोधी कानून को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक उपबंधों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवाना अनिवार्य है |
##Question:दल-बदल विरोधी कानून से आप क्या समझते हैं? साथ ही भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून की विशेषताओं का संक्षेप में चर्चा कीजिए | (150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by anti-defection law? Also, brieflydiscuss the characteristics of anti-defection law under the Tenth Schedule of the Indian Constitution. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में दल- बदल कानून के बारे में वर्णन कीजिये | इसके बाद दल-बदल कानून के उपबंधो की चर्चा कीजिये | दल-बदल कानून के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिये | दल- बदल कानून के नकारात्मक पक्ष की भी चर्चा कीजिये | निष्कर्ष में इसके कमियों को बताते हुए समाधान भी बताइए | उत्तर - भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से "दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा लाया गया है| इसके अनुसार सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल- परिवर्तन के आधार पर निरहर्ता के बारे में प्रावधान किया गया है| 10 वीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों तथा विधायकों की निरहर्ताओं से सम्बंधित उपबंध अग्रलिखित है- राजनीतिक दलों के सदस्य-किसी राजनीतिक दल का सदस्य निम्न परिस्थितियों में सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य माना जाएगा यदि - वह स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दे | यदि व्यक्ति अपने राजनीतिक दल के विपक्ष में मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा उसे 15 दिन के भीतर क्षमादान न मिला हो| निर्दलीय सदस्य- निर्दलीयसदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | मनोनीत सदस्य -मनोनीत सदस्य सदन की सदस्यता हेतु अयोग्य होगा यदि वह सदन की सदस्यता धारण करने के 6 माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले | दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता निम्न दो परिस्थितियों में लागू नहीं होती - 1- दल-विभाजन की स्थिति में 2- यदि कोई सदस्य पीठासीन अधिकारी चुना जाता है संविधान की 10वीं अनुसूची की रूपरेखा राजनीतिक दल-परिवर्तन के दोषों तथा दुष्प्रभावों , जो कि पद के प्रलोभन तथा भौतिक पदार्थों के प्रलोभन अथवा इसी प्रकार के अन्य प्रलोभनों से प्रेरित होती है, पर रोक लगाने के लिए की गयी है | इसका उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना तथा असैद्धान्तिक और अनैतिक दल-परिवर्तन पर रोक लगाना है | यद्यपि दल-विरोधी कानून ने देश के राजनीतिक जीवन में एक नए युग का सूत्रपात किया फिर भी इसके क्रियाकलापों में कुछ कमियां रह गयी और यह दल-परिवर्तन को बहुत प्रभावी तरीके से रोक नहीं पाया | इसमें कुछ नकारात्मक पक्षों को देखा जा सकता है - यह कानून असहमति तथा दल-परिवर्तन के बीच अंतर को नहीं बता पाया | इसने छिटपुट दल-परिवर्तन पर रोक लगाई किन्तु बड़े पैमाने पर होने वाले दल-परिवर्तन को कानूनी रूप दिया | यह किसी विधायक द्वारा विधानमंडल के बाहर किये गए उसके क्रियाकलापों हेतु उसके निष्कासन की व्यवस्था नहीं करता है | इसका निर्दलीय व निर्देशित सदस्यों में भेदभाव अतार्किक ही है | उपर्युक्त कमियों के बावजूद भी दल-बदल विरोधी कानून अपने आप में प्रमुख स्थान रखती है , जरूरत इसके सही क्रियान्वयन की और नियमों के अनुपालन की | दल-बदल विरोधी कानून को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक उपबंधों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवाना अनिवार्य है |
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पितृसत्तात्मकता को परिभाषित कीजिये? साथ ही इसकी उत्पत्ति के समाजशास्त्रीय आधार को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द ) Define patriarchy? Also, explain the sociological basis of its origin. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में जेंडर भूमिका को परिभाषित करते हुए पितृसत्तावाद की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में पितृसत्तात्मकता को उसके प्रकारों सहित परिभाषित कीजिये 3- दुसरे खंड में पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति के समाजशास्त्रीय आधार को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में पितृसत्तात्मकता के समापन की आवश्यकता को सपष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान होती है वहीँ जेंडर एक व्यक्ति की सामाजिक पहचान होती है| जेंडर की अवधारणा के अंतर्गत विकास के क्रम में पुरुषों में पुरुषत्व एवं महिलाओं में नारीत्व की भावना का समाजीकरण किया जाता है जिससे वे जेंडर भूमिका को समझ सकें तथा यथानुसार सामाजिक व्यवहार करें| जेंडर भूमिका से तात्पर्य, जेंडर आधारित श्रम विभाजन से है जिसमें पितृसत्तात्मकता के कारण महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है| पितृसत्तात्मकता की अवधारणा अतः पित्रसत्तात्मकता से तात्पर्य ऐसे सामाजिक संस्थान से है जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से उच्च मानते हुए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सन्दर्भों में वरीयता दी जाती है| सामाजिक विकास के क्रम में विभिन्न कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे गए जबकि महिलायें बोझ मानी गयीं जिसके फलस्वरूप आर्थिक असमानता प्रारम्भ हुई| कालान्तर में पितृवंशात्मक विश्वास के सन्दर्भ में शिक्षा एवं धर्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तिकरण करते हुए महिलाओं को सांस्कृतिक स्तर पर असमान व्यवहार को स्वीकृति दी गयीइन दोनों के परिणाम स्वरुप राजनीतिक क्रम में भी महिलाओं को निम्न समझते हुए निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया|इन सबका मिला जुला परिणाम पितृसत्तात्मकता को जन्म देता है| · यह पितृसत्तात्मकतादो प्रकार की हो सकती है यथा सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताएवं व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता · सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत सामान्यतः पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ माने जाते हैं एवं सामाजिक श्रेणीबद्धता में उन्हें उच्च स्थान दिया जाता है · व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत जहाँ परिचित महिलाओं के सन्दर्भ में पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है · भारतीय परिप्रेक्ष्य में विगत कुछ दशकों में व्यक्तिगत पित्रसत्तात्मकता में तो कमी आई है लेकिन सार्वजनिक पित्रसत्तात्मकता में वृद्धि हुई है इसका मुख्य कारण महिलाओं का रोजगार के लिए मुख्य धारा में अंशधारिता का बढना है जिससे सार्वजनिक स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति का बढनाहै| इसके साथ ही सोशल मीडिया आदि ने भी सार्वजनिक सम्प्रेषण के माध्यम बढाए हैं पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति की समाजशास्त्रीय व्याख्या · पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति के सन्दर्भ में यह समझा जाता है कि तात्कालिक समाज के अवसंरचनात्मक एवं आर्थिक घटकों के परिणाम स्वरुप इस संस्थान की उत्पत्ति हुई · प्रारम्भिक समाजों में एक जैविक श्रम विभाजन द्वारा जहाँ महिलाओं का काम बच्चों के जन्म देने एवं उनके लालन-पालन करने तक सीमित कर दिया गया था वहीँ पुरुषों का कार्य कृषि इत्यादि द्वारा भोजन एवं आय के स्रोतों का प्रबंध करना था · परन्तु पुरुषों के कार्यों को वरीयता देते हुए उन्हें स्रोत समझा गया वहीँ महिलाओं के कार्य को एक जैविक प्रक्रिया माना गया जिसके परिणाम स्वरुप महिलायें पुरुषों पर निर्भर मानी गयीं| क्रमशः कृषि आधारित आय एवं संपत्ति का श्रेय पुरुषों को दिया गया · अतः कालान्तर में पितृवंशात्मक विशवास हेतु यह अनिवार्य हो गया कि महिलाओं के जीवन गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि महिलायें लैंगिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में अपने चरित्र को वरीयता दें| · यह नियंत्रण या तो बाह्य घटकों द्वारा किया जा सकता था या फिर यह भी संभव था कि समाजीकरण एवं सामाजिक स्तर पर लगातार अनुनयन/दबाव द्वारा उनके अंदर इस सन्दर्भ में स्वनियंत्रण की भावना को जन्म दिया जाए · इसके साथ ही यह भी अनिवार्य था कि राजनीतिक स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता से उन्हें वंचित रखा जाए जिससे वे पुरुषों पर उपरोक्त संदर्भों में निर्भर रहेंइन सबके परिणामस्वरुप पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति हुई| पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर इसके साथ ही घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां, कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दोहरे उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण जैसी चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं| अतः समाज को समतामूलक बनाने के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है|
##Question:पितृसत्तात्मकता को परिभाषित कीजिये? साथ ही इसकी उत्पत्ति के समाजशास्त्रीय आधार को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द ) Define patriarchy? Also, explain the sociological basis of its origin. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में जेंडर भूमिका को परिभाषित करते हुए पितृसत्तावाद की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में पितृसत्तात्मकता को उसके प्रकारों सहित परिभाषित कीजिये 3- दुसरे खंड में पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति के समाजशास्त्रीय आधार को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में पितृसत्तात्मकता के समापन की आवश्यकता को सपष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये लिंग किसी व्यक्ति की जैविक पहचान होती है वहीँ जेंडर एक व्यक्ति की सामाजिक पहचान होती है| जेंडर की अवधारणा के अंतर्गत विकास के क्रम में पुरुषों में पुरुषत्व एवं महिलाओं में नारीत्व की भावना का समाजीकरण किया जाता है जिससे वे जेंडर भूमिका को समझ सकें तथा यथानुसार सामाजिक व्यवहार करें| जेंडर भूमिका से तात्पर्य, जेंडर आधारित श्रम विभाजन से है जिसमें पितृसत्तात्मकता के कारण महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है| पितृसत्तात्मकता की अवधारणा अतः पित्रसत्तात्मकता से तात्पर्य ऐसे सामाजिक संस्थान से है जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से उच्च मानते हुए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सन्दर्भों में वरीयता दी जाती है| सामाजिक विकास के क्रम में विभिन्न कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे गए जबकि महिलायें बोझ मानी गयीं जिसके फलस्वरूप आर्थिक असमानता प्रारम्भ हुई| कालान्तर में पितृवंशात्मक विश्वास के सन्दर्भ में शिक्षा एवं धर्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तिकरण करते हुए महिलाओं को सांस्कृतिक स्तर पर असमान व्यवहार को स्वीकृति दी गयीइन दोनों के परिणाम स्वरुप राजनीतिक क्रम में भी महिलाओं को निम्न समझते हुए निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया|इन सबका मिला जुला परिणाम पितृसत्तात्मकता को जन्म देता है| · यह पितृसत्तात्मकतादो प्रकार की हो सकती है यथा सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताएवं व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकता · सार्वजनिक पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत सामान्यतः पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ माने जाते हैं एवं सामाजिक श्रेणीबद्धता में उन्हें उच्च स्थान दिया जाता है · व्यक्तिगत पितृसत्तात्मकताके अंतर्गत जहाँ परिचित महिलाओं के सन्दर्भ में पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ असमान व्यवहार किया जाता है · भारतीय परिप्रेक्ष्य में विगत कुछ दशकों में व्यक्तिगत पित्रसत्तात्मकता में तो कमी आई है लेकिन सार्वजनिक पित्रसत्तात्मकता में वृद्धि हुई है इसका मुख्य कारण महिलाओं का रोजगार के लिए मुख्य धारा में अंशधारिता का बढना है जिससे सार्वजनिक स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति का बढनाहै| इसके साथ ही सोशल मीडिया आदि ने भी सार्वजनिक सम्प्रेषण के माध्यम बढाए हैं पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति की समाजशास्त्रीय व्याख्या · पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति के सन्दर्भ में यह समझा जाता है कि तात्कालिक समाज के अवसंरचनात्मक एवं आर्थिक घटकों के परिणाम स्वरुप इस संस्थान की उत्पत्ति हुई · प्रारम्भिक समाजों में एक जैविक श्रम विभाजन द्वारा जहाँ महिलाओं का काम बच्चों के जन्म देने एवं उनके लालन-पालन करने तक सीमित कर दिया गया था वहीँ पुरुषों का कार्य कृषि इत्यादि द्वारा भोजन एवं आय के स्रोतों का प्रबंध करना था · परन्तु पुरुषों के कार्यों को वरीयता देते हुए उन्हें स्रोत समझा गया वहीँ महिलाओं के कार्य को एक जैविक प्रक्रिया माना गया जिसके परिणाम स्वरुप महिलायें पुरुषों पर निर्भर मानी गयीं| क्रमशः कृषि आधारित आय एवं संपत्ति का श्रेय पुरुषों को दिया गया · अतः कालान्तर में पितृवंशात्मक विशवास हेतु यह अनिवार्य हो गया कि महिलाओं के जीवन गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि महिलायें लैंगिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में अपने चरित्र को वरीयता दें| · यह नियंत्रण या तो बाह्य घटकों द्वारा किया जा सकता था या फिर यह भी संभव था कि समाजीकरण एवं सामाजिक स्तर पर लगातार अनुनयन/दबाव द्वारा उनके अंदर इस सन्दर्भ में स्वनियंत्रण की भावना को जन्म दिया जाए · इसके साथ ही यह भी अनिवार्य था कि राजनीतिक स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता से उन्हें वंचित रखा जाए जिससे वे पुरुषों पर उपरोक्त संदर्भों में निर्भर रहेंइन सबके परिणामस्वरुप पितृसत्तात्मकता की उत्पत्ति हुई| पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर इसके साथ ही घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां, कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दोहरे उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण जैसी चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं| अतः समाज को समतामूलक बनाने के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है|
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राष्ट्रपति की कार्यकारी, न्यायिक और विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the executive, judicial and legislative powers of the President. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका मेंराष्ट्रपति के पद का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रपति की कार्यकारी, न्यायिक और विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 53 (1) में स्पष्ट किया गया है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जो उसे सीधे अथवा अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम से संचालित करेगा।राष्ट्रपति को संविधान में विभिन्न शक्तियां सौंपी गई है। इन शक्तियों के इर्द-गिर्द ही राष्ट्रपति औपचारिक रूप से अपने कार्यों एवं कर्तव्यों का निर्वाह करता है। राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियाँ:- प्रशासन संबंधी दायित्व:- भारत सरकार के सभी शासन-प्रशासन सम्बन्धी कार्य राष्ट्रपति के ही नाम पर ही संचालित किये जाते हैं।वह केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार तथा उसके मंत्रियों के लिए नियम बना सकता है। वह अपने आदेश तथा अन्य अनुदेश की वैधता के सम्बन्ध में भी नियम बना सकता है। उसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दों और मंत्री परिषद की कार्यवाही के बारे में सुचना प्राप्त करने का अधिकार है। राष्ट्रपति को केंद्र शासित प्रदेशो एवं अनुसूचित जातिएवं जनजाति क्षेत्रो की प्रशासन की शक्तियाँ भींप्राप्त है। इस सम्बन्ध में वह भारत के किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित जाति एवंजनजाति क्षेत्र घोषित कर सकता है। वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से केंद्र शासित प्रदेशो का प्रशासन भीसंभालता है। नियुक्ति संबंधित दायित्व:- राष्ट्रपति पर संघ के अंदर आने वाले विभिन्न पदों से संबंधित नियुक्ति का दायित्व भी संभालता है। जैसे, वह प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है, भारत के महान्याय वादी की नियुक्ति करता है, भारत के महानियंत्रक एवं लेखापरीक्षक की नियुक्ति, मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदयों की नियुक्ति, वित्त आयोग के अध्यक्ष व सदयों की नियुक्ति, राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति, अंतराज्यीय परिषद की नियुक्ति,अनुसूचित जाति या जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आयोग की नियुक्ति इत्यादि। न्यायिक और विधायी शक्तियां:- न्यायिक शक्तियां:- वह भारत के किसी भी दोषी की सजा को निलम्बित, माफ़, राहत और परिवर्तित कर सकता है। अपने निर्णय, कार्य एवं दायित्वों के संबंध में वह किसी विधि या तथ्य पर उच्चतम न्यायालय से सलाह प्राप्त कर सकता है परन्तु वह उस सलाह को मानने के लिए बाध्य नही है। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश एवंउच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी करता है। विधायी शक्तियां:- कुछ विधेयकों को प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति ली जानी आवश्यक है। उदाहरण के लिए- धन विधेयक, राज्य की सीमा में परिवर्तन या नए राज्य के निर्माण संबंधी विधेयक इत्यादि। जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाता है तो वह सहमति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की सहमति मिलने के उपरांत वह विधेयक कानून बन जाता है। राज्य विधयिका के संबंध में बात करें तो जब कोई विधेयक राज्य विधयिका में पारित हो जाती है तो उसे राज्यपाल के पास सहमति के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल की सहमति मिलने के साथ ही वह विधेयक कानून बन जाता है। जब संसद सत्र न चल रहा हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। वह राज्य सभा में 12 सदस्यों को तथा लोकसभा में 2 सदस्यों का मनोनयन कर सकता है। संसद बैठक एवं सत्र के सम्बन्ध में तथापीठासीन अधिकारी के संबंध में भी राष्ट्रपति को शक्तियां प्रदान की गई है। इस प्रकार स्पष्ट है किभारत के राष्ट्रपति को अनेक प्रकार की औपचारिक शक्तियां प्राप्त हैंजैसे किकार्यकारी, विधायी, न्यायिकइत्यादि।
##Question:राष्ट्रपति की कार्यकारी, न्यायिक और विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द) Mention the executive, judicial and legislative powers of the President. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम भूमिका मेंराष्ट्रपति के पद का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रपति की कार्यकारी, न्यायिक और विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 53 (1) में स्पष्ट किया गया है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जो उसे सीधे अथवा अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम से संचालित करेगा।राष्ट्रपति को संविधान में विभिन्न शक्तियां सौंपी गई है। इन शक्तियों के इर्द-गिर्द ही राष्ट्रपति औपचारिक रूप से अपने कार्यों एवं कर्तव्यों का निर्वाह करता है। राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियाँ:- प्रशासन संबंधी दायित्व:- भारत सरकार के सभी शासन-प्रशासन सम्बन्धी कार्य राष्ट्रपति के ही नाम पर ही संचालित किये जाते हैं।वह केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार तथा उसके मंत्रियों के लिए नियम बना सकता है। वह अपने आदेश तथा अन्य अनुदेश की वैधता के सम्बन्ध में भी नियम बना सकता है। उसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दों और मंत्री परिषद की कार्यवाही के बारे में सुचना प्राप्त करने का अधिकार है। राष्ट्रपति को केंद्र शासित प्रदेशो एवं अनुसूचित जातिएवं जनजाति क्षेत्रो की प्रशासन की शक्तियाँ भींप्राप्त है। इस सम्बन्ध में वह भारत के किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित जाति एवंजनजाति क्षेत्र घोषित कर सकता है। वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से केंद्र शासित प्रदेशो का प्रशासन भीसंभालता है। नियुक्ति संबंधित दायित्व:- राष्ट्रपति पर संघ के अंदर आने वाले विभिन्न पदों से संबंधित नियुक्ति का दायित्व भी संभालता है। जैसे, वह प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है, भारत के महान्याय वादी की नियुक्ति करता है, भारत के महानियंत्रक एवं लेखापरीक्षक की नियुक्ति, मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदयों की नियुक्ति, वित्त आयोग के अध्यक्ष व सदयों की नियुक्ति, राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति, अंतराज्यीय परिषद की नियुक्ति,अनुसूचित जाति या जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आयोग की नियुक्ति इत्यादि। न्यायिक और विधायी शक्तियां:- न्यायिक शक्तियां:- वह भारत के किसी भी दोषी की सजा को निलम्बित, माफ़, राहत और परिवर्तित कर सकता है। अपने निर्णय, कार्य एवं दायित्वों के संबंध में वह किसी विधि या तथ्य पर उच्चतम न्यायालय से सलाह प्राप्त कर सकता है परन्तु वह उस सलाह को मानने के लिए बाध्य नही है। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश एवंउच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी करता है। विधायी शक्तियां:- कुछ विधेयकों को प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति ली जानी आवश्यक है। उदाहरण के लिए- धन विधेयक, राज्य की सीमा में परिवर्तन या नए राज्य के निर्माण संबंधी विधेयक इत्यादि। जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाता है तो वह सहमति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की सहमति मिलने के उपरांत वह विधेयक कानून बन जाता है। राज्य विधयिका के संबंध में बात करें तो जब कोई विधेयक राज्य विधयिका में पारित हो जाती है तो उसे राज्यपाल के पास सहमति के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल की सहमति मिलने के साथ ही वह विधेयक कानून बन जाता है। जब संसद सत्र न चल रहा हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। वह राज्य सभा में 12 सदस्यों को तथा लोकसभा में 2 सदस्यों का मनोनयन कर सकता है। संसद बैठक एवं सत्र के सम्बन्ध में तथापीठासीन अधिकारी के संबंध में भी राष्ट्रपति को शक्तियां प्रदान की गई है। इस प्रकार स्पष्ट है किभारत के राष्ट्रपति को अनेक प्रकार की औपचारिक शक्तियां प्राप्त हैंजैसे किकार्यकारी, विधायी, न्यायिकइत्यादि।
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सांप्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? ब्रिटिश भारत के समय सांप्रदायिकता के विकास के कारणों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by Communalism? Mention the reasons for the development of Communalism in British India with examples. (150-200 Words, Marks- 10 )
एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में सांप्रदायिकता को परिभाषित कीजिये तथा भारत में उसके विकास की पृष्ठभूमि को बताईये| अगले भाग में,ब्रिटिश भारत के समय सांप्रदायिकता के विकास के कारणों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, सांप्रदायिकता को भारत-विभाजन से जोड़ते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- सांप्रदायिकता एक आधुनिक विचारधारा और राजनीतिक प्रवृत्ति है जिसके अनुसार एक धर्म के अनुयायी व्यक्तियों के सांसारिक हित अर्थात राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक हित एक जैसे ही होते हैं और किसी अन्य धर्म का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों के सांसारिक हितों से भिन्न होते हैं | इस विचारधारा के अनुसार अन्य समुदाय या धर्म के व्यक्तियों के हित आपके हित के विरोधी होते हैं तथा सभी को अपने हितों के लिए धार्मिक आधार पर संगठित होना चाहिए| सांप्रदायिकता तब अपने चरम पर पहुंच जाती है जब हम मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्म/अनुयायियों/समुदायों के हित एक दूसरे के परस्पर विरोधी हैं| हालांकि कुछ विचारक भारत में सांप्रदायिकता का मूल मध्यकाल में खोजते हैं जिनके अनुसार मध्यकालीन समाज में मुस्लिम शासकों की नीतियों के फलस्वरुप सांप्रदायिक भेदभाव का जन्म हुआ| परंतु ज्यादातर विचारकों के अनुसार भारत में 19वीं सदी से पहले सांप्रदायिकता का कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देखा गया था| 1857 के विद्रोह में अंग्रेजो के खिलाफ हिंदू, मुस्लिम तथा अन्य समुदायों ने मिलकर संघर्ष किया जिसके बाद अंग्रेजों ने मुसलमानों को संदेह की दृष्टि से देखा एवं नीतियों को मुसलमानों के विरुद्ध में रखा| 1870 के बाद से ही ब्रिटिश अधिकारियों ने तेजी से बढ़ते भारतीय राष्ट्रवाद का सामना करने के लिए "फूट डालो, राज करो" की नीति को चुना जिसके बाद भारत में सांप्रदायिकता के विकास के लक्षण देखे जा सकते हैं| सामाजिक तथा आर्थिक कारण - भारत के आर्थिक पिछड़ापन तथा भयावह बेरोजगारी ने अंग्रेजों को सांप्रदायिकता को उभारने में मदद की| मुसलमानों में आधुनिक राजनीतिक चेतना के विकास की प्रक्रिया धीमी थी तथा उन पर परंपरागत प्रतिक्रियावादी कारक ज्यादा हावी थें| प्रारंभ में अंग्रेजों ने मुसलमानों के प्रति दमन तथा भेदभाव की नीति अपनाई| शिक्षा में अंग्रेजी भाषा के प्रसार से अरबी तथा फारसी भाषाएँ पिछड़ गई जिससे मुस्लिम समाज में इसका प्रतिकूल प्रभाव हुआ|साथ ही, धीरे-धीरे सरकारी सेवाओं में इनकी संख्या भी घटते चलती गयी| इन सम्मिलित कारकों का प्रभाव सांप्रदायिकता के उभार के रूप में सामने आया| अंग्रेजों की फूट डालो, राज करो नीति - 1857 के विद्रोह और बहावी आंदोलन के पश्चात सरकार मुसलमानों को शंकालु नजर से देखने लग गई| 1870 के बाद मुसलमानों के प्रति दमन की नीति को त्याग कर उनमें चेतना का प्रसार किया गया तथा आरक्षण, सरकारी समर्थन देकर उन्हें उभारने का प्रयत्न किया गया ताकि राष्ट्रवादियों के खिलाफ हथियार के तौर पर उनका प्रयोग हो सके| सर सैयद अहमद खान जिनका दृष्टिकोण प्रारंभ में राष्ट्रवादी एवं सुधारवादी था परंतु बाद में उन्होंने औपनिवेशिक शासन का समर्थन तथा कांग्रेस का विरोध करना चालू कर दिया| उन्होंने यह भी प्रचार करना शुरू किया किचूँकि हिंदू संख्या में बहुमत में है इसलिए ब्रिटिश शासन के निर्बल होने या समाप्त हो जाने की स्थिति में हिंदुओं का मुसलमानों पर दबदबा कायम हो जाएगा| भारतीय इतिहास लेखन द्वारा सांप्रदायिकता को बढ़ावा - अंग्रेज इतिहासकारों ने हिंदू-मुस्लिम फूट को बढ़ावा देने तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को सुदृढ़ करने के लिए भारतीय इतिहास की गलत व्याख्या की| उन्होंने प्राचीन भारत को हिंदू काल तथा मध्यकालीन भारत को मुस्लिम काल की संज्ञा दी जिसका अनुसरण बाद में भारतीय इतिहासकारों ने भी किया| सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का पार्श्व प्रभाव- 19वीं शताब्दी में हिंदू तथा मुस्लिम दोनों सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलनों ने स्वंय को अपने समुदाय के लोगों तक ही सीमित रखा जिससे देश विभिन्न समुदायों में विभक्त हो गया| कुछ सुधारों जैसे बहावी आंदोलन, हिंदुओं में शुद्धि आंदोलन आदि के कारण धर्म का उग्रवादी चरित्र जगजाहिर हुआ तथासांप्रदायिकता को प्रोत्साहन मिला| इन सुधारों में सांस्कृतिक विरासत के धार्मिक तथा दार्शनिक पहलुओं पर एकांकी ज्यादा बल दिया जाता था|धर्म सुधार आंदोलन के समय ही विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच धार्मिक दंगों ने भी सांप्रदायिकता को प्रोत्साहित किया जैसे 1923-24 के दौरान उत्तर भारत के अनेक शहरों में सांप्रदायिक दंगे हुए| उग्र राष्ट्रवाद का पार्श्व प्रभाव- उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा पर धीरे-धीरे हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा हावी होने लगी तथा राष्ट्रीय आंदोलनों में भी धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग होने लगा था जैसे- तिलक के गणपति एवं शिवाजी उत्सव तथा गौ हत्या के विरुद्ध अभियान ने मुस्लिमों के मन में शंकाओं को जन्म दिया| भारत माता तथा राष्ट्रवाद की धर्म के रूप में अरविंद घोष की अवधारणाएं, गंगा स्नान के पश्चात बंग-भंग आंदोलन प्रारंभ करना, क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों द्वारा देवी काली या भवानी के सम्मुख शपथ लेने जैसी घटनाओं ने मुस्लिम समुदाय के धार्मिक भावनाओं को आहत किया| साथ ही, क्रांतिकारियों द्वारा शिवाजी एवं महाराणा प्रताप की औरंगजेब तथा अकबर के विरूद्ध संघर्ष को धार्मिक संघर्ष रूप में महिमामंडित करना भी भूल थी| कांग्रेस के कुछ निर्णय का अप्रत्यक्ष प्रभाव- कांग्रेस ने लखनऊ(1916) में मुस्लिम लीग के साथ समझौता किया तथा खिलाफत आंदोलन का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिक प्रभाव जाहिर हुआ| सांप्रदायिक प्रतिक्रिया- मुस्लिम लीग के गठन के पश्चात हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संस्थाओं के गठन से भी लोगों द्वारा सांप्रदायिक प्रतिक्रिया हुई| इन संगठन हिंदू राष्ट्र, हिंदू हितों की वकालत की जिससे मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई एवं सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला| 1909 में मार्ले-मिंटो सुधारों द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली भारत में सांप्रदायिकता के विकास में एक बड़ा योगदान करती है| 1932 के कम्युनल अवार्ड/सांप्रदायिक पंचाट का प्रभाव; 1937 के प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग के कमजोर प्रदर्शन ने भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया तथा मार्च 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन ने सांप्रदायिकता की चरम परिणति के रूप में भारत के बंटवारे की मांग की| सांप्रदायिकता के विकास ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दशा एवं दिशा दोनों पर गहरा आघात किया| इसने न केवल आंदोलन को कमजोर किया बल्कि इसके अंतिम परिणति के रूप में देश की विभाजन की भी भयानक घटना हुई| आज भी भारत में बढ़ती सांप्रदायिकता की जड़ों में इन्हीं घटनाओं का प्रभाव देखा जा सकता है|
##Question:सांप्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? ब्रिटिश भारत के समय सांप्रदायिकता के विकास के कारणों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by Communalism? Mention the reasons for the development of Communalism in British India with examples. (150-200 Words, Marks- 10 )##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में सांप्रदायिकता को परिभाषित कीजिये तथा भारत में उसके विकास की पृष्ठभूमि को बताईये| अगले भाग में,ब्रिटिश भारत के समय सांप्रदायिकता के विकास के कारणों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, सांप्रदायिकता को भारत-विभाजन से जोड़ते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- सांप्रदायिकता एक आधुनिक विचारधारा और राजनीतिक प्रवृत्ति है जिसके अनुसार एक धर्म के अनुयायी व्यक्तियों के सांसारिक हित अर्थात राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक हित एक जैसे ही होते हैं और किसी अन्य धर्म का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों के सांसारिक हितों से भिन्न होते हैं | इस विचारधारा के अनुसार अन्य समुदाय या धर्म के व्यक्तियों के हित आपके हित के विरोधी होते हैं तथा सभी को अपने हितों के लिए धार्मिक आधार पर संगठित होना चाहिए| सांप्रदायिकता तब अपने चरम पर पहुंच जाती है जब हम मान लिया जाता है कि विभिन्न धर्म/अनुयायियों/समुदायों के हित एक दूसरे के परस्पर विरोधी हैं| हालांकि कुछ विचारक भारत में सांप्रदायिकता का मूल मध्यकाल में खोजते हैं जिनके अनुसार मध्यकालीन समाज में मुस्लिम शासकों की नीतियों के फलस्वरुप सांप्रदायिक भेदभाव का जन्म हुआ| परंतु ज्यादातर विचारकों के अनुसार भारत में 19वीं सदी से पहले सांप्रदायिकता का कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देखा गया था| 1857 के विद्रोह में अंग्रेजो के खिलाफ हिंदू, मुस्लिम तथा अन्य समुदायों ने मिलकर संघर्ष किया जिसके बाद अंग्रेजों ने मुसलमानों को संदेह की दृष्टि से देखा एवं नीतियों को मुसलमानों के विरुद्ध में रखा| 1870 के बाद से ही ब्रिटिश अधिकारियों ने तेजी से बढ़ते भारतीय राष्ट्रवाद का सामना करने के लिए "फूट डालो, राज करो" की नीति को चुना जिसके बाद भारत में सांप्रदायिकता के विकास के लक्षण देखे जा सकते हैं| सामाजिक तथा आर्थिक कारण - भारत के आर्थिक पिछड़ापन तथा भयावह बेरोजगारी ने अंग्रेजों को सांप्रदायिकता को उभारने में मदद की| मुसलमानों में आधुनिक राजनीतिक चेतना के विकास की प्रक्रिया धीमी थी तथा उन पर परंपरागत प्रतिक्रियावादी कारक ज्यादा हावी थें| प्रारंभ में अंग्रेजों ने मुसलमानों के प्रति दमन तथा भेदभाव की नीति अपनाई| शिक्षा में अंग्रेजी भाषा के प्रसार से अरबी तथा फारसी भाषाएँ पिछड़ गई जिससे मुस्लिम समाज में इसका प्रतिकूल प्रभाव हुआ|साथ ही, धीरे-धीरे सरकारी सेवाओं में इनकी संख्या भी घटते चलती गयी| इन सम्मिलित कारकों का प्रभाव सांप्रदायिकता के उभार के रूप में सामने आया| अंग्रेजों की फूट डालो, राज करो नीति - 1857 के विद्रोह और बहावी आंदोलन के पश्चात सरकार मुसलमानों को शंकालु नजर से देखने लग गई| 1870 के बाद मुसलमानों के प्रति दमन की नीति को त्याग कर उनमें चेतना का प्रसार किया गया तथा आरक्षण, सरकारी समर्थन देकर उन्हें उभारने का प्रयत्न किया गया ताकि राष्ट्रवादियों के खिलाफ हथियार के तौर पर उनका प्रयोग हो सके| सर सैयद अहमद खान जिनका दृष्टिकोण प्रारंभ में राष्ट्रवादी एवं सुधारवादी था परंतु बाद में उन्होंने औपनिवेशिक शासन का समर्थन तथा कांग्रेस का विरोध करना चालू कर दिया| उन्होंने यह भी प्रचार करना शुरू किया किचूँकि हिंदू संख्या में बहुमत में है इसलिए ब्रिटिश शासन के निर्बल होने या समाप्त हो जाने की स्थिति में हिंदुओं का मुसलमानों पर दबदबा कायम हो जाएगा| भारतीय इतिहास लेखन द्वारा सांप्रदायिकता को बढ़ावा - अंग्रेज इतिहासकारों ने हिंदू-मुस्लिम फूट को बढ़ावा देने तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को सुदृढ़ करने के लिए भारतीय इतिहास की गलत व्याख्या की| उन्होंने प्राचीन भारत को हिंदू काल तथा मध्यकालीन भारत को मुस्लिम काल की संज्ञा दी जिसका अनुसरण बाद में भारतीय इतिहासकारों ने भी किया| सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का पार्श्व प्रभाव- 19वीं शताब्दी में हिंदू तथा मुस्लिम दोनों सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलनों ने स्वंय को अपने समुदाय के लोगों तक ही सीमित रखा जिससे देश विभिन्न समुदायों में विभक्त हो गया| कुछ सुधारों जैसे बहावी आंदोलन, हिंदुओं में शुद्धि आंदोलन आदि के कारण धर्म का उग्रवादी चरित्र जगजाहिर हुआ तथासांप्रदायिकता को प्रोत्साहन मिला| इन सुधारों में सांस्कृतिक विरासत के धार्मिक तथा दार्शनिक पहलुओं पर एकांकी ज्यादा बल दिया जाता था|धर्म सुधार आंदोलन के समय ही विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच धार्मिक दंगों ने भी सांप्रदायिकता को प्रोत्साहित किया जैसे 1923-24 के दौरान उत्तर भारत के अनेक शहरों में सांप्रदायिक दंगे हुए| उग्र राष्ट्रवाद का पार्श्व प्रभाव- उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा पर धीरे-धीरे हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा हावी होने लगी तथा राष्ट्रीय आंदोलनों में भी धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग होने लगा था जैसे- तिलक के गणपति एवं शिवाजी उत्सव तथा गौ हत्या के विरुद्ध अभियान ने मुस्लिमों के मन में शंकाओं को जन्म दिया| भारत माता तथा राष्ट्रवाद की धर्म के रूप में अरविंद घोष की अवधारणाएं, गंगा स्नान के पश्चात बंग-भंग आंदोलन प्रारंभ करना, क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों द्वारा देवी काली या भवानी के सम्मुख शपथ लेने जैसी घटनाओं ने मुस्लिम समुदाय के धार्मिक भावनाओं को आहत किया| साथ ही, क्रांतिकारियों द्वारा शिवाजी एवं महाराणा प्रताप की औरंगजेब तथा अकबर के विरूद्ध संघर्ष को धार्मिक संघर्ष रूप में महिमामंडित करना भी भूल थी| कांग्रेस के कुछ निर्णय का अप्रत्यक्ष प्रभाव- कांग्रेस ने लखनऊ(1916) में मुस्लिम लीग के साथ समझौता किया तथा खिलाफत आंदोलन का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिक प्रभाव जाहिर हुआ| सांप्रदायिक प्रतिक्रिया- मुस्लिम लीग के गठन के पश्चात हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संस्थाओं के गठन से भी लोगों द्वारा सांप्रदायिक प्रतिक्रिया हुई| इन संगठन हिंदू राष्ट्र, हिंदू हितों की वकालत की जिससे मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई एवं सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला| 1909 में मार्ले-मिंटो सुधारों द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली भारत में सांप्रदायिकता के विकास में एक बड़ा योगदान करती है| 1932 के कम्युनल अवार्ड/सांप्रदायिक पंचाट का प्रभाव; 1937 के प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग के कमजोर प्रदर्शन ने भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया तथा मार्च 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन ने सांप्रदायिकता की चरम परिणति के रूप में भारत के बंटवारे की मांग की| सांप्रदायिकता के विकास ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दशा एवं दिशा दोनों पर गहरा आघात किया| इसने न केवल आंदोलन को कमजोर किया बल्कि इसके अंतिम परिणति के रूप में देश की विभाजन की भी भयानक घटना हुई| आज भी भारत में बढ़ती सांप्रदायिकता की जड़ों में इन्हीं घटनाओं का प्रभाव देखा जा सकता है|
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भारत में, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही बेहतर महिला स्वास्थ्य की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) In India, explain the position of women in the context of education, health, and skills. Along with this, Discuss the steps taken by the government towards better women"s health. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में पितृसत्तावाद और उसके प्रभाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत में, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिये| 3- दुसरे भाग में बेहतर महिला स्वास्थ्य की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये 4- सकारात्मक दिशा में उठाये गये क़दमों के रूप में स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पित्रसत्तात्मकता से तात्पर्य ऐसे सामाजिक संस्थान से है जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से उच्च मानते हुए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सन्दर्भों में वरीयता दी जाती है| सामाजिक विकास के क्रम में विभिन्न कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे गए जबकि महिलायें बोझ मानी गयीं जिसके फलस्वरूप आर्थिक असमानता प्रारम्भ हुई| कालान्तर में पितृवंशात्मक विश्वास के सन्दर्भ में शिक्षा एवं धर्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तिकरण करते हुए महिलाओं को सांस्कृतिक स्तर पर असमान व्यवहार को स्वीकृति दी गयीइन दोनों के परिणाम स्वरुप राजनीतिक क्रम में भी महिलाओं को निम्न समझते हुए निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया|इन सबका मिला जुला परिणाम पितृसत्तात्मकता को जन्म देता है| पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर इसके साथ ही घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां, कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दोहरे उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण जैसी चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं| इससे महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई है शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति शिक्षा के सन्दर्भ में यद्यपि प्रथम(NGO) कि रिपोर्ट प्रारम्भिक शिक्षा के आंकड़ों को महिला सशक्तिकरण के पक्ष में बता रही है जहाँ पर प्रारम्भिक शिक्षा में 96 % स्कूल पंजीकरण पाया जा रहा है परन्तु चिंताजनक स्थिति यह है कि 5 वीं कक्षा के बाद स्कूल उपस्थिति में बालिकाओं के सन्दर्भ में 60 % से अधिक की गिरावट दर्ज की जा रही है इसके साथ ही कौशल प्रशिक्षण में महिलाओं की प्रतिशतता चिंताजनक है|NSO के आंकड़ों के अनुसार भारत में 83 % महिलायें या तो अकुशल हैं अथवा अल्प कौशल प्रशिक्षण वाली हैं जिसका दुष्परिणाम निकलता है कि इनके लिए आय के स्रोत सीमित हो जाते हैं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम आयरन जैसे पोषक तत्वों की कमी है जिसका दुष्परिणाम उनके प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ रहा है साथ ही गर्भवती एवं स्तनपान करा रही महिलाओं में पोषण तत्वों की कमी भी चिंता का विषय है लैंसेट ने यह भी पाया कि संस्थागत प्रसवों की संख्या उपयुक्त न होने के कारण शिशु एवं मातृत्व मृत्युदर भी अधिक मात्रा में पाया जा रहा है| उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई है| भारतीय संविधान स्वयं में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता को समझते हुए अनुच्छेद 15, 19, 21, 39, 41, 42 एवं 51 A में महिला सशक्तिकरण के सन्दर्भ का समावेश करता है| अतः सरकार ने बेहतर महिला स्वास्थ्य के प्राथिमिकता देते हुए अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किये हैं भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास भारत में वर्ष 2000 में एक राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति बनायी गयी जिसके अंतर्गत महिलाओं के सर्वांगीण विकास का प्रारूप तैयार किया गया|इस नीति को वर्ष 2017 में इस नीति को संशोधित करके राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन का रूप दे दिया गया राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं पोषण, रोजगार परक शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण, सुरक्षा,वंचित महिलाओं हेतु सुरक्षात्मक भेदभाव, मीडिया संवेदीकरण एवं जेंडर बजटिंग मुख्य उद्देश्य रखे गए स्वास्थ्य एवं पोषण के सन्दर्भ में पहली स्कीम के रूप में राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम शुरू किया गया, वर्तमान में इस कार्यक्रम को सबला कार्यक्रम कहा जाता है |इसके अंतर्गत 11 से 18 वर्ष की किशोरियों को आशा के सहयोग से कैल्शियम एवं आयरन टेबलेट्स की निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित करनी है| 2014 के बाद से इसमें गैर-पोषण सम्बन्धी घटकों यथा कौशल प्रशिक्षण, सैनेटरी की उपलब्धता को भी शामिल किया गया जननी सुरक्षा योजना/JSY के अंतर्गतसंस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, टीकाकरण एवं पोषण सुनिश्चित करना इस योजना के मुख्य उद्देश्य रखे गए जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रमके अंतर्गत संस्थागत प्रसव एवं अन्य सुविधाओं को सभी महिलाओं को पहले 2 बच्चों तक निःशुल्क उपलब्ध कराने का उद्देश्य रखा गया है प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना के अंतर्गत 6 हजार रूपये की आर्थिक सहायता (3 किश्तों में) तथा हर महीने की 9 तारीख को विशेष कैम्पों द्वारा गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच करने उद्देश्य रखा गया है| मदर एवं चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम स्कीम के अंतर्गत डिजिटलीकृत डाटा द्वारा गर्भवती महिलाओं, उनके टीकाकरण, संस्थागत प्रसव एवं नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य का फालोअप किया जा रहा है| राष्ट्रीय पोषण मिशन के अंतर्गत विश्व बैंक के सहयोग से भारत सरकार के विभिन्न विभागों एवं मंत्रालयों द्वारा चलाई जा रही पोषण सम्बन्धी कार्यक्रम जो गर्भवती महिलाओं एवं शिशु स्वास्थ्य से संदर्भित हैं को एकीकृत करते हुए त्वरित गति से पोषण सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं| विश्व बैंक से 50 % की आर्थिक सहायता द्वारा तीन वर्षों के अंदर कुपोषण में कमी लाने के प्रयास किये जा रहे हैं| इस सन्दर्भ में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को जिम्मेदारी दी गयी है| 1994 में PNDT अधिनियम लाया गया जिसे 2003 में बदल कर PCPNDT अधिनियम कर दिया गया| इसके माध्यम से गर्भ पूर्व लिंग जांच को दंडनीय अपराध बना दिया गया ताकि गिरते लिंगानुपात में सुधार लाया जा सके| इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढाओ आदि पहल शुरू की गयी है बेटी बचाओ बेटी पढाओ पहल, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एकीकृत तत्वाधान में चालाया जा रहा है| उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि महिला सशक्तिकरण के सन्दर्भ में भारत सरकार ने गंभीरतापूर्वक अनेक प्रयास किये हैं| और इन प्रयासों की उपलब्धि के रूप में समकालीन महिला सशक्तिकरण की स्थिति को देखा जा सकता है| पूर्णतः समतामूलक समाज के निर्माण के लिए इन पहलों, नीतियों, कार्यक्रमों एवं मिशनों को तत्परता से क्रियान्वित करने की आवश्यकता है|
##Question:भारत में, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही बेहतर महिला स्वास्थ्य की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) In India, explain the position of women in the context of education, health, and skills. Along with this, Discuss the steps taken by the government towards better women"s health. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में पितृसत्तावाद और उसके प्रभाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिये 2- प्रथम भाग में भारत में, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिये| 3- दुसरे भाग में बेहतर महिला स्वास्थ्य की दिशा में सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये 4- सकारात्मक दिशा में उठाये गये क़दमों के रूप में स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पित्रसत्तात्मकता से तात्पर्य ऐसे सामाजिक संस्थान से है जिसके अंतर्गत पुरुषों को महिलाओं से उच्च मानते हुए आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सन्दर्भों में वरीयता दी जाती है| सामाजिक विकास के क्रम में विभिन्न कारणों से पुरुष आय के स्रोत समझे गए जबकि महिलायें बोझ मानी गयीं जिसके फलस्वरूप आर्थिक असमानता प्रारम्भ हुई| कालान्तर में पितृवंशात्मक विश्वास के सन्दर्भ में शिक्षा एवं धर्म के माध्यम से सामाजिक सशक्तिकरण करते हुए महिलाओं को सांस्कृतिक स्तर पर असमान व्यवहार को स्वीकृति दी गयीइन दोनों के परिणाम स्वरुप राजनीतिक क्रम में भी महिलाओं को निम्न समझते हुए निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया|इन सबका मिला जुला परिणाम पितृसत्तात्मकता को जन्म देता है| पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर इसके साथ ही घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां, कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दोहरे उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण जैसी चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं| इससे महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई है शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति शिक्षा के सन्दर्भ में यद्यपि प्रथम(NGO) कि रिपोर्ट प्रारम्भिक शिक्षा के आंकड़ों को महिला सशक्तिकरण के पक्ष में बता रही है जहाँ पर प्रारम्भिक शिक्षा में 96 % स्कूल पंजीकरण पाया जा रहा है परन्तु चिंताजनक स्थिति यह है कि 5 वीं कक्षा के बाद स्कूल उपस्थिति में बालिकाओं के सन्दर्भ में 60 % से अधिक की गिरावट दर्ज की जा रही है इसके साथ ही कौशल प्रशिक्षण में महिलाओं की प्रतिशतता चिंताजनक है|NSO के आंकड़ों के अनुसार भारत में 83 % महिलायें या तो अकुशल हैं अथवा अल्प कौशल प्रशिक्षण वाली हैं जिसका दुष्परिणाम निकलता है कि इनके लिए आय के स्रोत सीमित हो जाते हैं स्वास्थ्य के सन्दर्भ में लैंसेट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर तीसरी किशोरी में कैल्शियम आयरन जैसे पोषक तत्वों की कमी है जिसका दुष्परिणाम उनके प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ रहा है साथ ही गर्भवती एवं स्तनपान करा रही महिलाओं में पोषण तत्वों की कमी भी चिंता का विषय है लैंसेट ने यह भी पाया कि संस्थागत प्रसवों की संख्या उपयुक्त न होने के कारण शिशु एवं मातृत्व मृत्युदर भी अधिक मात्रा में पाया जा रहा है| उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई है| भारतीय संविधान स्वयं में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता को समझते हुए अनुच्छेद 15, 19, 21, 39, 41, 42 एवं 51 A में महिला सशक्तिकरण के सन्दर्भ का समावेश करता है| अतः सरकार ने बेहतर महिला स्वास्थ्य के प्राथिमिकता देते हुए अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किये हैं भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास भारत में वर्ष 2000 में एक राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति बनायी गयी जिसके अंतर्गत महिलाओं के सर्वांगीण विकास का प्रारूप तैयार किया गया|इस नीति को वर्ष 2017 में इस नीति को संशोधित करके राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन का रूप दे दिया गया राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं पोषण, रोजगार परक शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण, सुरक्षा,वंचित महिलाओं हेतु सुरक्षात्मक भेदभाव, मीडिया संवेदीकरण एवं जेंडर बजटिंग मुख्य उद्देश्य रखे गए स्वास्थ्य एवं पोषण के सन्दर्भ में पहली स्कीम के रूप में राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण कार्यक्रम शुरू किया गया, वर्तमान में इस कार्यक्रम को सबला कार्यक्रम कहा जाता है |इसके अंतर्गत 11 से 18 वर्ष की किशोरियों को आशा के सहयोग से कैल्शियम एवं आयरन टेबलेट्स की निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित करनी है| 2014 के बाद से इसमें गैर-पोषण सम्बन्धी घटकों यथा कौशल प्रशिक्षण, सैनेटरी की उपलब्धता को भी शामिल किया गया जननी सुरक्षा योजना/JSY के अंतर्गतसंस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, टीकाकरण एवं पोषण सुनिश्चित करना इस योजना के मुख्य उद्देश्य रखे गए जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रमके अंतर्गत संस्थागत प्रसव एवं अन्य सुविधाओं को सभी महिलाओं को पहले 2 बच्चों तक निःशुल्क उपलब्ध कराने का उद्देश्य रखा गया है प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना के अंतर्गत 6 हजार रूपये की आर्थिक सहायता (3 किश्तों में) तथा हर महीने की 9 तारीख को विशेष कैम्पों द्वारा गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच करने उद्देश्य रखा गया है| मदर एवं चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम स्कीम के अंतर्गत डिजिटलीकृत डाटा द्वारा गर्भवती महिलाओं, उनके टीकाकरण, संस्थागत प्रसव एवं नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य का फालोअप किया जा रहा है| राष्ट्रीय पोषण मिशन के अंतर्गत विश्व बैंक के सहयोग से भारत सरकार के विभिन्न विभागों एवं मंत्रालयों द्वारा चलाई जा रही पोषण सम्बन्धी कार्यक्रम जो गर्भवती महिलाओं एवं शिशु स्वास्थ्य से संदर्भित हैं को एकीकृत करते हुए त्वरित गति से पोषण सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं| विश्व बैंक से 50 % की आर्थिक सहायता द्वारा तीन वर्षों के अंदर कुपोषण में कमी लाने के प्रयास किये जा रहे हैं| इस सन्दर्भ में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को जिम्मेदारी दी गयी है| 1994 में PNDT अधिनियम लाया गया जिसे 2003 में बदल कर PCPNDT अधिनियम कर दिया गया| इसके माध्यम से गर्भ पूर्व लिंग जांच को दंडनीय अपराध बना दिया गया ताकि गिरते लिंगानुपात में सुधार लाया जा सके| इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढाओ आदि पहल शुरू की गयी है बेटी बचाओ बेटी पढाओ पहल, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एकीकृत तत्वाधान में चालाया जा रहा है| उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि महिला सशक्तिकरण के सन्दर्भ में भारत सरकार ने गंभीरतापूर्वक अनेक प्रयास किये हैं| और इन प्रयासों की उपलब्धि के रूप में समकालीन महिला सशक्तिकरण की स्थिति को देखा जा सकता है| पूर्णतः समतामूलक समाज के निर्माण के लिए इन पहलों, नीतियों, कार्यक्रमों एवं मिशनों को तत्परता से क्रियान्वित करने की आवश्यकता है|
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संविधान में दिए गए आपातकालीन प्रावधानों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। साथ ही राष्ट्रीय आपात एवं राज्य के आपात में अंतर को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Briefly mention the emergency provisions given in the constitution. Also, explain the difference between national emergency and state emergency. (150-200 words, marks -10 )
एप्रोच:- सर्वप्रथम, संविधान में दिए गए आपातकालीन प्रावधानों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रीय आपात एवं राज्य के आपात में अंतर को स्पष्ट कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान के अनुच्छेद 352 से 360 में आपातकालीन प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपपतकाल, अनुच्छेद 356 में राज्य का आपातकाल या राष्ट्रपति शासन एवं अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल का उल्लेख किया गया है।अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोहके आधार पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है।इस स्थिति में केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र पूरे देश पर स्थापित होता है और राज्य सरकारों को कानून व व्यवस्था के पोषण, सुरक्षा और वित्त सम्बन्धी मामलों में वही करना होता है जो केंद्र सरकार निर्देशित करती है। जब कोई राज्य सरकार संविधान प्रदत्त उपबन्धों के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो केंद्र सरकार उस राज्य सरकार को बर्खास्त कर वहां का शासन सीधे अपने हाथ में ले लेती हैं। अनुच्छेद 356 के अंतर्गत इसे राज्य का आपात याराष्ट्रपति शासन कहते हैं।जब देश की वितीय स्थिति गंभीर रूप से अस्थिर हो जाए और देश की वित्तीय साख पर कलंक लगने की आशंका हो तो राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 360 के अंतर्गत पूरे देश में वित्तीय आपातकाल लागू किया जा सकता है। राष्ट्रीय आपात एवं राज्य के आपात में अंतर:- राष्ट्रीय आपात को युद्ध, बाह्य आक्रमण व सशत्र विद्रोह से उत्पन्न आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया जाता है जबकि राष्ट्रपतिशासन को लागू करने का कोई निश्चित आधार नहीं है। केवल संवैधानिक तंत्र की विफलता का उल्लेख है जिसे उस राज्य के राज्यपाल द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अपने अनुसार परिभाषित करती है। राष्ट्रीय आपात को समूचे भारत राज्य क्षेत्र अथवा भारत के किसी एक हिस्से में भी लगाया जा सकता है, जबकिराष्ट्रपति शासन संबंधित राज्य के सम्पूर्ण क्षेत्र में लागू किया जाता है। राष्ट्रीय आपात के लागू होने से राज्य सरकारों पर कोई असर नहीं होता अर्थात सरकारों का विघटन नहीं होता है, जबकि राष्ट्रपति शासन काप्रमुख उद्देश्य राज्य सरकार को बर्खास्त करना होता है किन्तु सम्बन्धित राज्य की विधानसभा को भंग करना इसका प्रमुख उद्देश्य नहीं होता है, विधानसभा को जीवित निलंबन(Suspended Animation) की अवस्था में रखा जा सकता है। राष्ट्रीय आपात लागू होने परकेंद्र एवं राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन निलंबित हो जाता है और एकात्मक सरकार की स्थापना हो जाती है।जबकि राष्टपति शासन के दौरान केवल संबंधित राज्य के कानून, नियम इत्यादि केंद्र सरकार के अधीन हो जाते हैं। राष्ट्रीय आपात के दौरान भाग 3 के अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर शेष सभी मौलिक अधिकार निलंबित किये जा सकते हैं।जबकिराष्ट्रपति शासन के दौरान किसी भी मौलिक अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय आपात अनिश्चित काल तक के लिए लगाया जा सकता है। इसे संसद के दोनों सदनों द्वाराविशेष बहुमत सेसमर्थन देना आवश्यक होता है(संकल्प पारित करना आवश्यक होता है। राष्ट्रीय आपात को उद्घोषणा की तिथि से 30 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना अनिवार्य होता है, जबकि राष्ट्रपति शासन को अधिकतम 3 वर्ष के लिए लगाया जा सकता है। इसेसाधारण बहुमत से संसद स्वीकृत कर सकती है। इसे उद्घोषणा की तिथि से 60 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्टीय आपात कोराष्ट्रपति कैबिनेट की सिफारिश पर ही लागू करने की घोषणा कर सकता है, जबकि राष्ट्रपति शासनलागू करने के लिए कैबिनेट की सिफारिश का कोई उल्लेख नहीं है, इसके लिए केंद्र सरकार की सिफारिश पर्याप्त होती है। राष्टीय आपात केअंतर्गत राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास होता है, जबकि राष्ट्रपति शासन केअंतर्गत राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद अपने अतिरिक्त किसी अन्य पदाधिकारी जैसे राष्ट्रपति या राज्यपाल को भी दे सकती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जहाँ राष्ट्रीय आपात, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सन्दर्भ में महत्वपूर्व व्यवस्था है जबकि देश के राज्यों में शासन को संविधान के अनुरूप बनाए रखने में राष्ट्रपति शासन एक संविधान प्रदत्त प्रभावी व्यवस्था है किन्तु दोनों के मध्य विभिन्न आधारों पर महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं।
##Question:संविधान में दिए गए आपातकालीन प्रावधानों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। साथ ही राष्ट्रीय आपात एवं राज्य के आपात में अंतर को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Briefly mention the emergency provisions given in the constitution. Also, explain the difference between national emergency and state emergency. (150-200 words, marks -10 )##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, संविधान में दिए गए आपातकालीन प्रावधानों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रीय आपात एवं राज्य के आपात में अंतर को स्पष्ट कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- संविधान के अनुच्छेद 352 से 360 में आपातकालीन प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपपतकाल, अनुच्छेद 356 में राज्य का आपातकाल या राष्ट्रपति शासन एवं अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल का उल्लेख किया गया है।अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोहके आधार पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है।इस स्थिति में केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र पूरे देश पर स्थापित होता है और राज्य सरकारों को कानून व व्यवस्था के पोषण, सुरक्षा और वित्त सम्बन्धी मामलों में वही करना होता है जो केंद्र सरकार निर्देशित करती है। जब कोई राज्य सरकार संविधान प्रदत्त उपबन्धों के अनुरूप कार्य नहीं करती हैं तो केंद्र सरकार उस राज्य सरकार को बर्खास्त कर वहां का शासन सीधे अपने हाथ में ले लेती हैं। अनुच्छेद 356 के अंतर्गत इसे राज्य का आपात याराष्ट्रपति शासन कहते हैं।जब देश की वितीय स्थिति गंभीर रूप से अस्थिर हो जाए और देश की वित्तीय साख पर कलंक लगने की आशंका हो तो राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 360 के अंतर्गत पूरे देश में वित्तीय आपातकाल लागू किया जा सकता है। राष्ट्रीय आपात एवं राज्य के आपात में अंतर:- राष्ट्रीय आपात को युद्ध, बाह्य आक्रमण व सशत्र विद्रोह से उत्पन्न आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया जाता है जबकि राष्ट्रपतिशासन को लागू करने का कोई निश्चित आधार नहीं है। केवल संवैधानिक तंत्र की विफलता का उल्लेख है जिसे उस राज्य के राज्यपाल द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार अपने अनुसार परिभाषित करती है। राष्ट्रीय आपात को समूचे भारत राज्य क्षेत्र अथवा भारत के किसी एक हिस्से में भी लगाया जा सकता है, जबकिराष्ट्रपति शासन संबंधित राज्य के सम्पूर्ण क्षेत्र में लागू किया जाता है। राष्ट्रीय आपात के लागू होने से राज्य सरकारों पर कोई असर नहीं होता अर्थात सरकारों का विघटन नहीं होता है, जबकि राष्ट्रपति शासन काप्रमुख उद्देश्य राज्य सरकार को बर्खास्त करना होता है किन्तु सम्बन्धित राज्य की विधानसभा को भंग करना इसका प्रमुख उद्देश्य नहीं होता है, विधानसभा को जीवित निलंबन(Suspended Animation) की अवस्था में रखा जा सकता है। राष्ट्रीय आपात लागू होने परकेंद्र एवं राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन निलंबित हो जाता है और एकात्मक सरकार की स्थापना हो जाती है।जबकि राष्टपति शासन के दौरान केवल संबंधित राज्य के कानून, नियम इत्यादि केंद्र सरकार के अधीन हो जाते हैं। राष्ट्रीय आपात के दौरान भाग 3 के अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर शेष सभी मौलिक अधिकार निलंबित किये जा सकते हैं।जबकिराष्ट्रपति शासन के दौरान किसी भी मौलिक अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय आपात अनिश्चित काल तक के लिए लगाया जा सकता है। इसे संसद के दोनों सदनों द्वाराविशेष बहुमत सेसमर्थन देना आवश्यक होता है(संकल्प पारित करना आवश्यक होता है। राष्ट्रीय आपात को उद्घोषणा की तिथि से 30 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना अनिवार्य होता है, जबकि राष्ट्रपति शासन को अधिकतम 3 वर्ष के लिए लगाया जा सकता है। इसेसाधारण बहुमत से संसद स्वीकृत कर सकती है। इसे उद्घोषणा की तिथि से 60 दिन के भीतर संसद द्वारा स्वीकृत किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्टीय आपात कोराष्ट्रपति कैबिनेट की सिफारिश पर ही लागू करने की घोषणा कर सकता है, जबकि राष्ट्रपति शासनलागू करने के लिए कैबिनेट की सिफारिश का कोई उल्लेख नहीं है, इसके लिए केंद्र सरकार की सिफारिश पर्याप्त होती है। राष्टीय आपात केअंतर्गत राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास होता है, जबकि राष्ट्रपति शासन केअंतर्गत राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद अपने अतिरिक्त किसी अन्य पदाधिकारी जैसे राष्ट्रपति या राज्यपाल को भी दे सकती है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि जहाँ राष्ट्रीय आपात, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सन्दर्भ में महत्वपूर्व व्यवस्था है जबकि देश के राज्यों में शासन को संविधान के अनुरूप बनाए रखने में राष्ट्रपति शासन एक संविधान प्रदत्त प्रभावी व्यवस्था है किन्तु दोनों के मध्य विभिन्न आधारों पर महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं।
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Statethe important recommendations of the 14th Finance Commission, while shedding light on the implication it has upon promoting cooperative federalism in the country. (150 words)
-INTRODUCTION - RECOMMENDATIONS OF THE 14th FINANCE COMMISSION OF INDIA - IMPLICATIONS OF THE RECOMMENDATIONS - ON PROMOTING COOPERATIVE FEDERALISM - ON PROMOTING COMPETITIVE FEDERALISM - CONCLUSION ANSWER:- Article 280 provides for the Finance Commission of India. The President of India appoints FC every 5th year. The 14th Finance Commission has been constituted for the period from 1st April, 2015 to 31st March, 2020. RECOMMENDATIONS OF THE 14th FINANCE COMMISSION OF INDIA 1) INCREASED DEVOLUTION TO STATES The share of states in the central pool of shareable taxes should be increased from 32% to 42%. This is a drastic and unprecedented increase. For example, the previous increase in such devolution was seen from 29% to a small increase of 30.5 % earlier. 2) REDUCING GRANTS PLAN/ DISCRETIONARYTRANSFERS The centre should compensate its revenues for the higher tax devolution to states byreducing other transfers likegrants andplan/ discretionary transfers for the centrally sponsored schemes (CSS). This is because, in grants and CSS, the states do not have much flexibility. So by changing the type of flow rather than fund flow, the states would get more autonomy. 3) GRANTS OF ABOUT Rs. 2,00,000 CRORES The centre should providethis money only to the 11 states. Earlier such grant was provided for all the states. This was also recommended, so that the overall grants could be reduced. The commission did not recommend any sector specific grants. 4) HORIZONTAL DEVOLUTION The share of each state in the state"s share of taxes should be based upon the following criteria: 4.1) POPULATION: as per the 1971 census, a 17.5% weightage was suggested and for the 2011 census, a 10% weightage was suggested. 4.2) AREA- 15% weightage suggested 4.3) INCOME DISTANCE- 50% weight was suggested. Here, the per capita income was to be measured. 4.4) FOREST COVER- 7.5% weightage and it is a new parameter. This was suggested because, if a state has more forests it is forgoing development, so it must be compensated. 5) CRITERIA Fiscal discipline should be taken as a criteria. So states which will reduce more deficit will get more transfers. 5.1) UP got most of the funds due to its high population, huge area, more income distance, and less weightage has given to forests in the criteria. Bihar got the 2nd highest amount of funds. The least was given to Sikkim (approximately 0.4%) IMPLICATIONS OF THE RECOMMENDATIONS I IT IS LANDMARK IN PROMOTING COOPERATIVE FEDERALISM Cooperative federalism means cordial relations (coordination) between the centre and the states and among the states as well. REASONS WHY THE RECOMMENDATIONS PROMOTE COOPERATIVE FEDERALISM: 1) INCREASE IN FUNDS TRANSFER There is a somewhat increase in funds (though it is not substantial increase). 2) INCREASE IN AUTONOMY The autonomy to states has definitely increased i.e. with respect to the usage of funds. 3) REDUCED CONTENTIONS Planned transfers like Centrally Sponsored Schemes (CSS) led to grudges among the states, as the design of the scheme was that of the centre. So, contentions would reduce. For example, the CSS followed a 1 size fits all approach – The Beti Bachao Beti Padhao scheme is not very relevant for Kerala. II PROMOTION OF COMPETITIVE FEDERALISM 1) DESIGN AND IMPLEMENTATION OF SCHEMES There would now be a competition among the states in designing and implementing the developmental programmes. This as states can now design and implement their own programmes. 1.1) CENTRALLY SPONSORED SCHEMES- In this, the funding is shared- i.e. it is partially by the centre and partially by the states. After the 14th FC recommendations, the centre"s contribution has decreased here and the numbers of CSS decreased. 2) ACCOUNTABILITY Hence,accountabilitywould increase. Earlier, the states had the excuse like they were having to implement outdated schemes imposed by the centre, but there would not be any such excuse anymore. 3) COMPARISON AMONG STATES There will also be comparisons between the states- For example, in which state is water management improving etc. Now, the 15th Finance Commission has also been constituted for the period from 1st April, 2020 to 31st March, 2025. The 15th Finance Commission has come under controversy due to the alleged decision to consider 2011 census for determining the population of the state. (The more the population, the more the funds they would receive from the center). Thus, if this recommendation is implemented it would result in the southern states being further penalized. The report of the 15th Finance Commission is expected in 2019.
##Question:Statethe important recommendations of the 14th Finance Commission, while shedding light on the implication it has upon promoting cooperative federalism in the country. (150 words)##Answer:-INTRODUCTION - RECOMMENDATIONS OF THE 14th FINANCE COMMISSION OF INDIA - IMPLICATIONS OF THE RECOMMENDATIONS - ON PROMOTING COOPERATIVE FEDERALISM - ON PROMOTING COMPETITIVE FEDERALISM - CONCLUSION ANSWER:- Article 280 provides for the Finance Commission of India. The President of India appoints FC every 5th year. The 14th Finance Commission has been constituted for the period from 1st April, 2015 to 31st March, 2020. RECOMMENDATIONS OF THE 14th FINANCE COMMISSION OF INDIA 1) INCREASED DEVOLUTION TO STATES The share of states in the central pool of shareable taxes should be increased from 32% to 42%. This is a drastic and unprecedented increase. For example, the previous increase in such devolution was seen from 29% to a small increase of 30.5 % earlier. 2) REDUCING GRANTS PLAN/ DISCRETIONARYTRANSFERS The centre should compensate its revenues for the higher tax devolution to states byreducing other transfers likegrants andplan/ discretionary transfers for the centrally sponsored schemes (CSS). This is because, in grants and CSS, the states do not have much flexibility. So by changing the type of flow rather than fund flow, the states would get more autonomy. 3) GRANTS OF ABOUT Rs. 2,00,000 CRORES The centre should providethis money only to the 11 states. Earlier such grant was provided for all the states. This was also recommended, so that the overall grants could be reduced. The commission did not recommend any sector specific grants. 4) HORIZONTAL DEVOLUTION The share of each state in the state"s share of taxes should be based upon the following criteria: 4.1) POPULATION: as per the 1971 census, a 17.5% weightage was suggested and for the 2011 census, a 10% weightage was suggested. 4.2) AREA- 15% weightage suggested 4.3) INCOME DISTANCE- 50% weight was suggested. Here, the per capita income was to be measured. 4.4) FOREST COVER- 7.5% weightage and it is a new parameter. This was suggested because, if a state has more forests it is forgoing development, so it must be compensated. 5) CRITERIA Fiscal discipline should be taken as a criteria. So states which will reduce more deficit will get more transfers. 5.1) UP got most of the funds due to its high population, huge area, more income distance, and less weightage has given to forests in the criteria. Bihar got the 2nd highest amount of funds. The least was given to Sikkim (approximately 0.4%) IMPLICATIONS OF THE RECOMMENDATIONS I IT IS LANDMARK IN PROMOTING COOPERATIVE FEDERALISM Cooperative federalism means cordial relations (coordination) between the centre and the states and among the states as well. REASONS WHY THE RECOMMENDATIONS PROMOTE COOPERATIVE FEDERALISM: 1) INCREASE IN FUNDS TRANSFER There is a somewhat increase in funds (though it is not substantial increase). 2) INCREASE IN AUTONOMY The autonomy to states has definitely increased i.e. with respect to the usage of funds. 3) REDUCED CONTENTIONS Planned transfers like Centrally Sponsored Schemes (CSS) led to grudges among the states, as the design of the scheme was that of the centre. So, contentions would reduce. For example, the CSS followed a 1 size fits all approach – The Beti Bachao Beti Padhao scheme is not very relevant for Kerala. II PROMOTION OF COMPETITIVE FEDERALISM 1) DESIGN AND IMPLEMENTATION OF SCHEMES There would now be a competition among the states in designing and implementing the developmental programmes. This as states can now design and implement their own programmes. 1.1) CENTRALLY SPONSORED SCHEMES- In this, the funding is shared- i.e. it is partially by the centre and partially by the states. After the 14th FC recommendations, the centre"s contribution has decreased here and the numbers of CSS decreased. 2) ACCOUNTABILITY Hence,accountabilitywould increase. Earlier, the states had the excuse like they were having to implement outdated schemes imposed by the centre, but there would not be any such excuse anymore. 3) COMPARISON AMONG STATES There will also be comparisons between the states- For example, in which state is water management improving etc. Now, the 15th Finance Commission has also been constituted for the period from 1st April, 2020 to 31st March, 2025. The 15th Finance Commission has come under controversy due to the alleged decision to consider 2011 census for determining the population of the state. (The more the population, the more the funds they would receive from the center). Thus, if this recommendation is implemented it would result in the southern states being further penalized. The report of the 15th Finance Commission is expected in 2019.
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Why NHRC is called as paper tiger? Sugest ways to empower NHRC. (200 Words)
APPROACH: Introduction: Body: Conclusion: ANSWER:
##Question:Why NHRC is called as paper tiger? Sugest ways to empower NHRC. (200 Words)##Answer:APPROACH: Introduction: Body: Conclusion: ANSWER:
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स्थानीय सरकार की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को बताते हुए , बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) While Explaining the historical background of local government , discuss the recommendations of Balwant Rai Mehta Committee. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत स्थानीय सरकार के ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को विस्तार से बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात बलवंत राय मेहता की सिफ़ारिशों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इस समिति के महत्व को बताते हुए सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्थानीय सरकार की अवधारणा भारत में प्राचीन समय से विद्यमान है | वैदिक काल में सभा और समिति, मौर्य काल में राजुका नामक अधिकारी जो क्षेत्रीय स्तर पर होता था तथा चोल काल में स्थानीय स्वशासन का अभूतपूर्व उदहारण मिलता है | 1882 में लार्ड रिपन के द्वारा सत्ता के विकेंद्रीकरण पर एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, यह प्रस्ताव 1870 में मेयो द्वारा वित्तीय शक्तियों के हस्तांतरण के प्रस्ताव पर आधारित था | लार्ड रिपन को स्थानीय सरकार का जनक माना जाता है | गांधी जी पंचायती राज के सशक्तीकरण के समर्थक थे | इस सन्दर्भ में उनके विचारों के परिणाम स्वरुप ही हमारे संविधान के भाग-4 में पंचायतों के गठन का प्रावधान शामिल है | अनुच्छेद -40 के अनुसार पंचायतों के गठन का उत्तरदायित्व राज्यों का है | राज्य उन्हें आवश्यक शक्तियां तथा अधिकार प्रदान करेंगे ताकि वे सरकार की इकाई के रूप में कार्य करने में सक्षम हो सकें | परन्तु यह अनुच्छेद पंचायतों के गठन के लिए दिशा -निर्देश नहीं देता है | प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत देश के सर्वांगीण विकास विकास को प्रोत्साहित करने हेतु 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गयी तथा 1957 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की समीक्षा हेतु बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया | समिति ने नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट सौंपी और लोकतान्त्रिक विकेंद्रीकरण की योजना की सिफारिश की जो कि अंतिम रूप से पंचायती राज के रूप में जाना गया | बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें - तीन स्तरीय पंचायती राज पद्धति की स्थापना - गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद | प्रखंड को विकास एवं नियोजन कीमानी जाती है समिति के द्वारा | पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को सलाहकारी समन्वयकारी और पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए | जिला परिषद का अध्यक्ष, जिलाधिकारी होना चाहिए | इन निकायों में शक्ति तथा उत्तरदायित्व का वास्तविक स्थानांतरण होना चाहिए | इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिए ताकि ये अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को सम्पादित करने में समर्थ हो सकें | भविष्य में अधिकारों के और अधिक प्रत्यायोजन के लिए एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए | समिति ने ग्राम स्तर की पंचायतों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव की सिफारिश की | राजस्थान, भारत में पंचायती राज स्थापित करने वाला पहला राज्य था | जिसका आरम्भ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले से किया गया | उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में पंचायती राज की अवधारणा अति प्राचीन है तथा आधुनिक स्वशासन में गाँधी जी के विचारों को समाहित किया गया है | पंचायती राज के विकास में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों ने अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
##Question:स्थानीय सरकार की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को बताते हुए , बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) While Explaining the historical background of local government , discuss the recommendations of Balwant Rai Mehta Committee. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत स्थानीय सरकार के ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को विस्तार से बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात बलवंत राय मेहता की सिफ़ारिशों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इस समिति के महत्व को बताते हुए सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्थानीय सरकार की अवधारणा भारत में प्राचीन समय से विद्यमान है | वैदिक काल में सभा और समिति, मौर्य काल में राजुका नामक अधिकारी जो क्षेत्रीय स्तर पर होता था तथा चोल काल में स्थानीय स्वशासन का अभूतपूर्व उदहारण मिलता है | 1882 में लार्ड रिपन के द्वारा सत्ता के विकेंद्रीकरण पर एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, यह प्रस्ताव 1870 में मेयो द्वारा वित्तीय शक्तियों के हस्तांतरण के प्रस्ताव पर आधारित था | लार्ड रिपन को स्थानीय सरकार का जनक माना जाता है | गांधी जी पंचायती राज के सशक्तीकरण के समर्थक थे | इस सन्दर्भ में उनके विचारों के परिणाम स्वरुप ही हमारे संविधान के भाग-4 में पंचायतों के गठन का प्रावधान शामिल है | अनुच्छेद -40 के अनुसार पंचायतों के गठन का उत्तरदायित्व राज्यों का है | राज्य उन्हें आवश्यक शक्तियां तथा अधिकार प्रदान करेंगे ताकि वे सरकार की इकाई के रूप में कार्य करने में सक्षम हो सकें | परन्तु यह अनुच्छेद पंचायतों के गठन के लिए दिशा -निर्देश नहीं देता है | प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत देश के सर्वांगीण विकास विकास को प्रोत्साहित करने हेतु 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गयी तथा 1957 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की समीक्षा हेतु बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया | समिति ने नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट सौंपी और लोकतान्त्रिक विकेंद्रीकरण की योजना की सिफारिश की जो कि अंतिम रूप से पंचायती राज के रूप में जाना गया | बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें - तीन स्तरीय पंचायती राज पद्धति की स्थापना - गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद | प्रखंड को विकास एवं नियोजन कीमानी जाती है समिति के द्वारा | पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को सलाहकारी समन्वयकारी और पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए | जिला परिषद का अध्यक्ष, जिलाधिकारी होना चाहिए | इन निकायों में शक्ति तथा उत्तरदायित्व का वास्तविक स्थानांतरण होना चाहिए | इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिए ताकि ये अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को सम्पादित करने में समर्थ हो सकें | भविष्य में अधिकारों के और अधिक प्रत्यायोजन के लिए एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए | समिति ने ग्राम स्तर की पंचायतों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव की सिफारिश की | राजस्थान, भारत में पंचायती राज स्थापित करने वाला पहला राज्य था | जिसका आरम्भ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले से किया गया | उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में पंचायती राज की अवधारणा अति प्राचीन है तथा आधुनिक स्वशासन में गाँधी जी के विचारों को समाहित किया गया है | पंचायती राज के विकास में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों ने अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
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जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिगानुपात की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही इसमें सुधार हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) According to Census 2011, clarify the trend of sex ratio in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India to improve it. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में लिंगानुपात को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिगानुपात की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में लिंगानुपात में सुधार हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में लिंगानुपात में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रति एक हज़ार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को लिंगानुपात के रूप में जाना जाता है| लिंगानुपात, प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या के रूप में, समय की एक भी बिंदु पर एक समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच व्याप्त समानता की सीमा को मापने के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक सूचक है| भारत एक पितृसत्तात्मक समाज है अतः में लिंगानुपात प्रायः महिलाओं को प्रतिकूल बना रहा है जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिगानुपात की प्रवृत्ति · 2011 की जनगणना यद्यपि सामान्य लिंगानुपात के आंकड़ों को संशोधित करती दिखती है| 15वीं जनसंख्या के प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले दस वर्षों में भारत का कुल लिंगानुपात 933 से बढ़कर 943 हो गया है, जो वर्ष 1961 के बाद सर्वाधिक है| · परन्तु इसके ठीक विपरीत शिशु लिंगानुपात (0 से 6 वर्ष तक) में गिरावट दर्ज की गयी, जो 2001 में 927 था जो घट कर 914 हो गया| ये स्वतंत्र भारत का सबसे निचला स्तर है. · यदि लिंगानुपात के आंकड़ों को और ध्यान से देखा जाए तो समृद्ध क्षेत्रों का लिंगानुपात कम दिखाई पड़ता है, STs का लिंगानुपात (990) SCs के लिंगानुपात(949) से बहुत अधिक है तथा सामान्य वर्गों का लिंगानुपात 903 SCs के लिंगानुपात से कम है · ये सभी आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि पितृसत्तात्मक समाज जब आर्थिक समृद्ध हो रहा है तो उससे जन्मा पुत्र मोह भ्रूण लिंग परीक्षण जैसी तकनीकों का दुरुपयोग करते हुए भ्रूण हत्याएं कर रहा है विधिक प्रयास · 1990 के दशक में वैज्ञानिक पद्धतियों जैसे अमीनोसेंटोसिस, डोपलर 4.0 अल्ट्रासाउंड तथा कृत्रिम गर्भाधान(IVF) आदि तकनीकों द्वारा लिंग चयन की प्रक्रिया में तेजी आई जो इस घटते लिंगानुपात के लिए उत्तरदायी है · यद्यपि इन तकनीकों का दुरुपयोग रोकने हेतु वर्ष 1994 में भ्रूण लिंग परीक्षण निरोधक (PNDT) कानून बनाया गया जिसे वर्ष 2003 में संशोधित करते हुए प्रसव पूर्व लिंग चयन तथा लिंग परीक्षण कानून (PCPNDT) कानून में बदल दिया गया| · इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार से लिंग चयन या लिंग निरिक्षण को एक दंडनीय अपराध के रूप में सूचित किया गया है| · इसके साथ ही यह कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि ऐसे सभी चिकित्सालयों एवं पैथोलॉजी केन्द्रों जहाँ यह सुविधा उपलब्ध है, को पंजीकरण करवाना अनिवार्य है ताकि उनका नियमन किया जा सके| · परन्तु उपरोक्त लिखित आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि इस कानून का सही अनुपालन नही हो रहा है| बेटी बचाओ बेटी पढाओ कार्यक्रम · चूँकि उपलब्ध कानूनों का उचित अनुपालन नहीं किया जा रहा है| अतः लिंगानुपात को सुधारने हेतु वर्ष 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढाओ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया| · इसके अंतर्गत इस कानून को और अधिक प्रभावी रूप से लागू करने तथा शिक्षा सुलभ कराने द्वारा बालिकाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को समाप्त करने के प्रयास किये जा रहे हैं| · कार्यक्रम के प्रथम चरण में 100 जिले, द्वितीय चरण में 61 अन्य जिले और वर्तमान में अखिल भारतीय होते हुए सभी 642 जिलों में यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है · इसमें तीन मंत्रालय (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय )एक साथ समन्वय करते हुए इसका क्रियान्वयन कर रहे हैं| लिंगानुपात कम होने से आगामी समाज विभिन्न नकारात्मक प्रभावों का सामना कर सकता है| इसके कारण एक संख्यात्मक लैंगिक अंतराल बनेगा जिसके कारण संतुलन बिगड़ सकता है और महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की दर बढ़ सकती है| अतः बेटी बचाओं बेटी पढाओ जैसी पहलों की आवश्यकता है ताकि इस मुहिम से आम नागरिकों को भी जोड़ा जा सके|
##Question:जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिगानुपात की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही इसमें सुधार हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) According to Census 2011, clarify the trend of sex ratio in India. Along with this, discuss the efforts made by the Government of India to improve it. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में लिंगानुपात को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिगानुपात की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में लिंगानुपात में सुधार हेतु भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में लिंगानुपात में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये प्रति एक हज़ार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को लिंगानुपात के रूप में जाना जाता है| लिंगानुपात, प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या के रूप में, समय की एक भी बिंदु पर एक समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच व्याप्त समानता की सीमा को मापने के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक सूचक है| भारत एक पितृसत्तात्मक समाज है अतः में लिंगानुपात प्रायः महिलाओं को प्रतिकूल बना रहा है जनगणना 2011 के अनुसार भारत में लिगानुपात की प्रवृत्ति · 2011 की जनगणना यद्यपि सामान्य लिंगानुपात के आंकड़ों को संशोधित करती दिखती है| 15वीं जनसंख्या के प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले दस वर्षों में भारत का कुल लिंगानुपात 933 से बढ़कर 943 हो गया है, जो वर्ष 1961 के बाद सर्वाधिक है| · परन्तु इसके ठीक विपरीत शिशु लिंगानुपात (0 से 6 वर्ष तक) में गिरावट दर्ज की गयी, जो 2001 में 927 था जो घट कर 914 हो गया| ये स्वतंत्र भारत का सबसे निचला स्तर है. · यदि लिंगानुपात के आंकड़ों को और ध्यान से देखा जाए तो समृद्ध क्षेत्रों का लिंगानुपात कम दिखाई पड़ता है, STs का लिंगानुपात (990) SCs के लिंगानुपात(949) से बहुत अधिक है तथा सामान्य वर्गों का लिंगानुपात 903 SCs के लिंगानुपात से कम है · ये सभी आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि पितृसत्तात्मक समाज जब आर्थिक समृद्ध हो रहा है तो उससे जन्मा पुत्र मोह भ्रूण लिंग परीक्षण जैसी तकनीकों का दुरुपयोग करते हुए भ्रूण हत्याएं कर रहा है विधिक प्रयास · 1990 के दशक में वैज्ञानिक पद्धतियों जैसे अमीनोसेंटोसिस, डोपलर 4.0 अल्ट्रासाउंड तथा कृत्रिम गर्भाधान(IVF) आदि तकनीकों द्वारा लिंग चयन की प्रक्रिया में तेजी आई जो इस घटते लिंगानुपात के लिए उत्तरदायी है · यद्यपि इन तकनीकों का दुरुपयोग रोकने हेतु वर्ष 1994 में भ्रूण लिंग परीक्षण निरोधक (PNDT) कानून बनाया गया जिसे वर्ष 2003 में संशोधित करते हुए प्रसव पूर्व लिंग चयन तथा लिंग परीक्षण कानून (PCPNDT) कानून में बदल दिया गया| · इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार से लिंग चयन या लिंग निरिक्षण को एक दंडनीय अपराध के रूप में सूचित किया गया है| · इसके साथ ही यह कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि ऐसे सभी चिकित्सालयों एवं पैथोलॉजी केन्द्रों जहाँ यह सुविधा उपलब्ध है, को पंजीकरण करवाना अनिवार्य है ताकि उनका नियमन किया जा सके| · परन्तु उपरोक्त लिखित आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि इस कानून का सही अनुपालन नही हो रहा है| बेटी बचाओ बेटी पढाओ कार्यक्रम · चूँकि उपलब्ध कानूनों का उचित अनुपालन नहीं किया जा रहा है| अतः लिंगानुपात को सुधारने हेतु वर्ष 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढाओ कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया| · इसके अंतर्गत इस कानून को और अधिक प्रभावी रूप से लागू करने तथा शिक्षा सुलभ कराने द्वारा बालिकाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण को समाप्त करने के प्रयास किये जा रहे हैं| · कार्यक्रम के प्रथम चरण में 100 जिले, द्वितीय चरण में 61 अन्य जिले और वर्तमान में अखिल भारतीय होते हुए सभी 642 जिलों में यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है · इसमें तीन मंत्रालय (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय )एक साथ समन्वय करते हुए इसका क्रियान्वयन कर रहे हैं| लिंगानुपात कम होने से आगामी समाज विभिन्न नकारात्मक प्रभावों का सामना कर सकता है| इसके कारण एक संख्यात्मक लैंगिक अंतराल बनेगा जिसके कारण संतुलन बिगड़ सकता है और महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की दर बढ़ सकती है| अतः बेटी बचाओं बेटी पढाओ जैसी पहलों की आवश्यकता है ताकि इस मुहिम से आम नागरिकों को भी जोड़ा जा सके|
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कर्नाटक युद्धों की चर्चा करते हुए, भारत में ब्रिटिश विस्तार में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(150 से 200 शब्द/10 अंक) While discussing the Carnatic Wars, Explain their importance in the British expansion in India. (150 to 200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में 18 वीं सदी के भारत की स्थिति स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में कर्नाटक युद्धों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत में ब्रिटिश विस्तार में कर्नाटक युद्धों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 18 वीं सदी के दौरान मराठों का लगभग सभी प्रमुख भारतीय राज्यों के साथ संघर्ष चल रहा था| जिन राज्यों की सीमाएं परस्पर जुडी हुई थी उनमे भी प्रायः तनावपूर्ण सम्बन्ध थे| दूसरे शब्दों में तत्कालीन भारतीय राज्यों में राजनीतिक एकता की कमी थी| विभिन्न राज्यों के अन्दर सत्ता पर कब्जे के लिए उत्तराधिकार का संघर्ष चल रहा था| प्रायः सभी दरबारों में अधिकारियों के मध्य गुटबंदी की स्थिति को देखा जा सकता है| अपेक्षाकृत कमजोर या परम्परागत सैन्य व्यवस्था, पैदल सेना, घुड़सवार, हाथी सेना पर विशेष बल था| उत्तर पश्चिम से नादिरशाह (1739) एवं अहमद शाह अब्दाली (1748-67 के मध्य विभिन्न अभियान) के द्वारा भारत पर आक्रमण तथा उत्तर पश्चिम एवं उत्तर भारत में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी| यूरोपियन व्यापारिक कम्पनियाँ विशेषकर ब्रिटिश एवं फ्रांसीसी कंपनियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा विभिन्न राज्यों में अस्थिरता का कारण बनी हुई थी और ये कम्पनियां आपस में युद्धरत थीं| इसी क्रम में दोनों के मध्य तीन कर्नाटक युद्ध हुए| कर्नाटक युद्ध प्रथम कर्नाटक युद्ध अंग्रेजो और फ्रांसीसियों के मध्य प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746 से 48) के हुआ इसका प्रमुख कारण अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों की महात्वाकांक्षा थी ऑस्ट्रिया में उत्तराधिकार का युद्ध और इसको लेकर ब्रिटेन एवं फ्रांस में संघर्ष की स्थिति थी 1748 में एक्स ला शापेल की संधि के द्वारा प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त हो गया यूरोप में संधि के कारण भारत में भी यह युद्ध रोक दिया गया 1746 में फ्रांसीसियों ने कर्नाटक के नवाब को सेंट थोमे या अड्यार के युद्ध में पराजित कर दिया था फ्रांसीसी सेना ने नवाब की विशाल सेना को पराजित किया इससे फ्रांसीसियों की महत्वाकांक्षा बढ़ी द्वितीय कर्नाटक युद्ध यह युद्ध दोनों कंपनियों के मध्य 1749 से 1754 के मध्य लड़ा गया दोनों कंपनियों की महत्वाकांक्षा तथा हैदराबाद एवं कर्नाटक में उत्तराधिकार का युद्ध इस युद्ध का प्रमुख कारण था हैदराबाद में नासिरजंग(अंग्रेज समर्थन) बनाम मुजफ्फर जंग जबकि कर्नाटक में अन्वारुद्दीन(अंग्रेज समर्थन) एवं चांदा साहिब के मध्य उत्तराधिकार युद्ध चल रहा था 1749 में अम्बूर की लड़ाई में फ्रांसीसियों की जीत हुई किन्तु शीघ्र ही क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई अंतत हैदराबाद पर फ्रांसीसियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव तथा कर्नाटक पर अंग्रेजों का अप्रत्यक्ष प्रभाव स्थापित हुआ 1754 में फ्रांसीसियों ने डुप्ले को फ्रांस वापस बुला लिया 1755 में पोंडिचेरी की संधि के द्वारा यह युद्ध समाप्त हो गया तृतीय कर्नाटक युद्ध दोनों कंपनियों की महत्वाकांक्षा एवं ब्रिटेन एवं फ्रांस के मध्य सप्त वर्षीय युद्ध के कारण यह युद्ध 1758 से 1763 के मध्य हुआ 1760 में वांडीवाश की लड़ाई में ब्रिटिश सेनापति आयरकूट ने फ्रेंच गवर्नर लाली को पराजित किया वांडीवाश की लड़ाई निर्णायक मानी जाती है अर्थात इसके बाद फ्रांसीसी कभी अंग्रेजों से प्रत्यक्षतः संघर्ष नही किया 1763 में पेरिस की संधि के द्वारा युद्ध औपचारिक तौर पर समाप्त हुआ इस संधि में फ्रांसीसियों ने यह वादा किया कि वे भारत में किलेबंदी नही करेंगे और सेना नहीं रखेंगे तथा केवल व्यापार करेंगे कर्नाटक युद्धों का भारत में ब्रिटिश विस्तार के दृष्टिकोण से महत्त्व अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों के रूप में अपने एक महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी को रास्ते से हटायाहालांकि अप्रत्यक्ष तौर पर फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों का आगे भी विरोध किया अंग्रेजों ने इस तथ्य को भलीभांति समझा कि भारतीयों में राजनीतिक एकता की कमी है और इसका लाभ उठाया जा सकता है भारतीय सैनिक भी यूरोपीय सैनिकों की तरह ही योग्य हैं| यदि उन्हें आधुनिक तरीके से प्रशिक्षित किया जाए और आधुनिक हथियारों से लैस किया जाए यह अनुभव भी भारत में साम्राज्य विस्तार में अत्यंत ही उपयोगी रहा आधुनिक हथियारों से लैश एवं प्रशिक्षित ब्रिटिश सेना भारतीय शासकों को चुनौती दे सकती है इस सन्दर्भ में भी अंग्रेजों का आत्म विशवास बढ़ा भारतीय राज्यों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से अंग्रेजों पर निर्भर बनाना और अधिकाधिक आर्थिक फायदे प्राप्त करने की रणनीति अपनाई जा सकती है | कर्नाटक युद्धों में प्राप्त अनुभवों की प्रथम प्रयोगशाला बंगाल साबित हुआ जिसमें अंग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई| इसी प्रकार अपने अनुभवों के आधार पर जल्दी ही अंग्रेजों ने भारत के महत्वपूर्ण हिस्से पर अपनी सत्ता स्थापित करने में सफलता अर्जित की| अतः कहा जा सकता है कि भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना में कर्नाटक युद्धों से प्राप्त अनुभवों की महत्वपूर्ण भूमिका थी|
##Question:कर्नाटक युद्धों की चर्चा करते हुए, भारत में ब्रिटिश विस्तार में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये|(150 से 200 शब्द/10 अंक) While discussing the Carnatic Wars, Explain their importance in the British expansion in India. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में 18 वीं सदी के भारत की स्थिति स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में कर्नाटक युद्धों की चर्चा कीजिये 3- दूसरे भाग में भारत में ब्रिटिश विस्तार में कर्नाटक युद्धों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 18 वीं सदी के दौरान मराठों का लगभग सभी प्रमुख भारतीय राज्यों के साथ संघर्ष चल रहा था| जिन राज्यों की सीमाएं परस्पर जुडी हुई थी उनमे भी प्रायः तनावपूर्ण सम्बन्ध थे| दूसरे शब्दों में तत्कालीन भारतीय राज्यों में राजनीतिक एकता की कमी थी| विभिन्न राज्यों के अन्दर सत्ता पर कब्जे के लिए उत्तराधिकार का संघर्ष चल रहा था| प्रायः सभी दरबारों में अधिकारियों के मध्य गुटबंदी की स्थिति को देखा जा सकता है| अपेक्षाकृत कमजोर या परम्परागत सैन्य व्यवस्था, पैदल सेना, घुड़सवार, हाथी सेना पर विशेष बल था| उत्तर पश्चिम से नादिरशाह (1739) एवं अहमद शाह अब्दाली (1748-67 के मध्य विभिन्न अभियान) के द्वारा भारत पर आक्रमण तथा उत्तर पश्चिम एवं उत्तर भारत में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी| यूरोपियन व्यापारिक कम्पनियाँ विशेषकर ब्रिटिश एवं फ्रांसीसी कंपनियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा विभिन्न राज्यों में अस्थिरता का कारण बनी हुई थी और ये कम्पनियां आपस में युद्धरत थीं| इसी क्रम में दोनों के मध्य तीन कर्नाटक युद्ध हुए| कर्नाटक युद्ध प्रथम कर्नाटक युद्ध अंग्रेजो और फ्रांसीसियों के मध्य प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746 से 48) के हुआ इसका प्रमुख कारण अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों की महात्वाकांक्षा थी ऑस्ट्रिया में उत्तराधिकार का युद्ध और इसको लेकर ब्रिटेन एवं फ्रांस में संघर्ष की स्थिति थी 1748 में एक्स ला शापेल की संधि के द्वारा प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त हो गया यूरोप में संधि के कारण भारत में भी यह युद्ध रोक दिया गया 1746 में फ्रांसीसियों ने कर्नाटक के नवाब को सेंट थोमे या अड्यार के युद्ध में पराजित कर दिया था फ्रांसीसी सेना ने नवाब की विशाल सेना को पराजित किया इससे फ्रांसीसियों की महत्वाकांक्षा बढ़ी द्वितीय कर्नाटक युद्ध यह युद्ध दोनों कंपनियों के मध्य 1749 से 1754 के मध्य लड़ा गया दोनों कंपनियों की महत्वाकांक्षा तथा हैदराबाद एवं कर्नाटक में उत्तराधिकार का युद्ध इस युद्ध का प्रमुख कारण था हैदराबाद में नासिरजंग(अंग्रेज समर्थन) बनाम मुजफ्फर जंग जबकि कर्नाटक में अन्वारुद्दीन(अंग्रेज समर्थन) एवं चांदा साहिब के मध्य उत्तराधिकार युद्ध चल रहा था 1749 में अम्बूर की लड़ाई में फ्रांसीसियों की जीत हुई किन्तु शीघ्र ही क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई अंतत हैदराबाद पर फ्रांसीसियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव तथा कर्नाटक पर अंग्रेजों का अप्रत्यक्ष प्रभाव स्थापित हुआ 1754 में फ्रांसीसियों ने डुप्ले को फ्रांस वापस बुला लिया 1755 में पोंडिचेरी की संधि के द्वारा यह युद्ध समाप्त हो गया तृतीय कर्नाटक युद्ध दोनों कंपनियों की महत्वाकांक्षा एवं ब्रिटेन एवं फ्रांस के मध्य सप्त वर्षीय युद्ध के कारण यह युद्ध 1758 से 1763 के मध्य हुआ 1760 में वांडीवाश की लड़ाई में ब्रिटिश सेनापति आयरकूट ने फ्रेंच गवर्नर लाली को पराजित किया वांडीवाश की लड़ाई निर्णायक मानी जाती है अर्थात इसके बाद फ्रांसीसी कभी अंग्रेजों से प्रत्यक्षतः संघर्ष नही किया 1763 में पेरिस की संधि के द्वारा युद्ध औपचारिक तौर पर समाप्त हुआ इस संधि में फ्रांसीसियों ने यह वादा किया कि वे भारत में किलेबंदी नही करेंगे और सेना नहीं रखेंगे तथा केवल व्यापार करेंगे कर्नाटक युद्धों का भारत में ब्रिटिश विस्तार के दृष्टिकोण से महत्त्व अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों के रूप में अपने एक महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी को रास्ते से हटायाहालांकि अप्रत्यक्ष तौर पर फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों का आगे भी विरोध किया अंग्रेजों ने इस तथ्य को भलीभांति समझा कि भारतीयों में राजनीतिक एकता की कमी है और इसका लाभ उठाया जा सकता है भारतीय सैनिक भी यूरोपीय सैनिकों की तरह ही योग्य हैं| यदि उन्हें आधुनिक तरीके से प्रशिक्षित किया जाए और आधुनिक हथियारों से लैस किया जाए यह अनुभव भी भारत में साम्राज्य विस्तार में अत्यंत ही उपयोगी रहा आधुनिक हथियारों से लैश एवं प्रशिक्षित ब्रिटिश सेना भारतीय शासकों को चुनौती दे सकती है इस सन्दर्भ में भी अंग्रेजों का आत्म विशवास बढ़ा भारतीय राज्यों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से अंग्रेजों पर निर्भर बनाना और अधिकाधिक आर्थिक फायदे प्राप्त करने की रणनीति अपनाई जा सकती है | कर्नाटक युद्धों में प्राप्त अनुभवों की प्रथम प्रयोगशाला बंगाल साबित हुआ जिसमें अंग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई| इसी प्रकार अपने अनुभवों के आधार पर जल्दी ही अंग्रेजों ने भारत के महत्वपूर्ण हिस्से पर अपनी सत्ता स्थापित करने में सफलता अर्जित की| अतः कहा जा सकता है कि भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना में कर्नाटक युद्धों से प्राप्त अनुभवों की महत्वपूर्ण भूमिका थी|
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भारत चीन के मध्य विवादित सीमा क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए सीमा-प्रबंधन में बाधाओं को स्पष्ट कीजिये| साथ ही, भारत-चीन सीमा प्रबंधन के संदर्भ में कुछ अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the disputed border areas between india and china and explain the obstacles in border management in these areas. Also, give some suggestions regarding indo-china border management. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच- भारत-चीन के मध्य विद्यमान लंबी भौगोलिक सीमा को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| (NOTE- यहाँ पर संबंधित क्षेत्र का मैप देना प्रभावी कदम रहेगा|) अगले भाग में, भारत तथा चीन के मध्य विद्यमान विभिन्न विवादित सीमा क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, भारत चीन सीमा प्रबंधन में आने वाली बाधाओं को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, भारत चीन सीमा प्रबंधन के संदर्भ में अपने कुछ सुझावों को प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- भारत और चीन 3488 किमी लंबी सीमा साझा करते हैं जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल-प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम तथा अरूणाचल प्रदेश को स्पर्श करती है| 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे से पहले तक दोनों के बीच कभी भी उभयनिष्ठ सीमा नहीं थी| 1954 से ही चीन ने जम्मूकश्मीर के अक्साई चिन, उत्तराखंड के कुछ इलाकों तथा पूरे अरूणाचल प्रदेश पर अपना दावा पेश करना शुरू कर दिया था तथा 1962 के युद्ध के पश्चात लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर अवैध रूप से कब्ज़ा भी कर लिया है| भारत-चीन के मध्य विवादित सीमाक्षेत्र - पश्चिमी क्षेत्र- अक्साई चिन - जॉनसन लाइन को चीन द्वारा मान्यता ना देना; इस क्षेत्र पर चीन का अवैध कब्ज़ा; सियाचिन ग्लेशियर के पास दौलतबेग ओल्डी एयरपोर्ट को लेकर 2013 में गतिरोध; डेमचोक-चुमार क्षेत्र - आये दिन चीन द्वारा हस्तक्षेप; पश्चिमी क्षेत्रों में कुछ झीलों को लेकर मुद्दा ; मध्य क्षेत्र में ज्यादा समस्या नहीं; पूर्वी क्षेत्र- चीन द्वारा भारत के संदर्भ में मैकमोहन रेखा को ना मानना ; तिब्बत के क्षेत्र को विस्तार भारतीय क्षेत्रों तक करना तथा पूरे अरूणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत के रूप में बोलकर अवैध दावा; सिक्किम के ऊपर फिंगर एरिया; नाथुला तथा डोका ला- कैलाश मानसरोवर यात्रा को कभी कभी रोकना; डोकलाम पठार पर चीनी कब्जे की मंशा; चीन द्वारा शुरू से ही डोकलाम पठार पर कब्ज़ा करने की मंशा ताकि वह चिकेन नेक के ज्यादा नजदीक आ सके; जकारलुंग तथा पासामलंग के क्षेत्र के बदले डोकलाम का पैकेज डील; तवांग को लेकर विवाद - चीन द्वारा पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र बताना; बौद्ध धर्म के केंद्र के चलते कब्जे का तर्क; तवांग के एरिया में दलाईलामा का जन्मस्थान होना; भारत-चीन सीमा प्रबंधन में बाधाएं भारत द्वारा सीमाई क्षेत्रों में कम अवसंरचनात्मक विकास तथा अपर्याप्त बुनियादी ढांचा ; चीन द्वारा सीमाई क्षेत्रों में तीव्र विकास जिससे युद्ध की समय चीनी सीमा पर तीव्र आवाजाही संभव; भौगोलिक स्थलाकृतियों की जटिलता जिससे परिवहन तथा विकास कार्यक्रमों में मुश्किलों का सामना; नृजातीय भिन्नता जिससे राष्ट्रवाद की भावना का विकास करना मुश्किल; पूर्वोत्तर क्षेत्र में समाजीकरण की प्रकृति शेष भारत में हुए समाजीकरण से भिन्न; पूर्वोत्तर कबीलाई प्रभाव तथा ईसाई मिशनरियों का प्रभाव; पूर्वोतर में उग्रवादियों का प्रभाव; पश्चिमी क्षेत्र में पाकिस्तान और चीन की लामबंदी का असर; पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चिन पर कब्ज़ा तथा सीमा क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के मध्य विद्यामान अस्पष्टता ; सीमाई क्षेत्रों में तस्करी तथा उग्रवादियों की आवाजाही; चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का पीओके से गुजरना तथा इससे भारत की संप्रभुता को चीन द्वारा चुनौती; नदी जल को लेकर दोनों देशों में मध्य विवाद; भारत-चीन सीमा प्रबंधन के संदर्भ में सुझाव तथा आगे की राह- भारत द्वारा प्र भावी सीमा प्रबंधन की आवश्यकता - विवादित क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना; भारत द्वारा उस क्षेत्र में संरचनात्मक विकास ; क्विक लैंडिंग एयरपोर्ट; भारत के प्रति निष्ठा तथा राष्ट्रीय चेतना का विकास ; मानवीय, सामाजिक तथा शैक्षिक स्तर को सुधारने की कोशिश; भारत द्वारा सीमा प्रबंधन में भाषाई समस्याको गंभीरता से लेना; भाषा-संगम योजना के माध्यम से पूरे देश में; आठवीं अनुसूची की शेष सभी भाषाओँ को स्कूलों में सिखाना; सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ाना; राजनीतिक सहयोग तथा वार्ताओं के माध्यम से घनिष्ठता को बढ़ावा देना; सैन्य तीव्रता मे वृद्धि; चीन के प्रति नीतिगत परिवर्तन - चीन को रोकने हेतु अपनी नीतियों में परिवर्तन ताकि तनाव में कमी तथा अवसंरचना विकास को प्रोत्साहन; उपरोक्त क़दमों के साथ-साथ भारत चीन के संदर्भ में अपनी नीति को परिवर्तित भी कर रहा है जैसे-व्यापार को बढ़ावा जिससे युद्ध रोकने में सहायता; चीन सीमा के विकास में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना खासकर जापान का सहयोग; भारत द्वारा चीन के शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों के प्रति भेदभाव का मुद्दा उठाना; आदि| कम तनाव के समय संरचनात्मक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है|
##Question:भारत चीन के मध्य विवादित सीमा क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए सीमा-प्रबंधन में बाधाओं को स्पष्ट कीजिये| साथ ही, भारत-चीन सीमा प्रबंधन के संदर्भ में कुछ अपने सुझाव प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the disputed border areas between india and china and explain the obstacles in border management in these areas. Also, give some suggestions regarding indo-china border management. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत-चीन के मध्य विद्यमान लंबी भौगोलिक सीमा को दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| (NOTE- यहाँ पर संबंधित क्षेत्र का मैप देना प्रभावी कदम रहेगा|) अगले भाग में, भारत तथा चीन के मध्य विद्यमान विभिन्न विवादित सीमा क्षेत्रों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, भारत चीन सीमा प्रबंधन में आने वाली बाधाओं को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में, भारत चीन सीमा प्रबंधन के संदर्भ में अपने कुछ सुझावों को प्रस्तुत कीजिये| उत्तर- भारत और चीन 3488 किमी लंबी सीमा साझा करते हैं जो जम्मू-कश्मीर, हिमाचल-प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम तथा अरूणाचल प्रदेश को स्पर्श करती है| 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे से पहले तक दोनों के बीच कभी भी उभयनिष्ठ सीमा नहीं थी| 1954 से ही चीन ने जम्मूकश्मीर के अक्साई चिन, उत्तराखंड के कुछ इलाकों तथा पूरे अरूणाचल प्रदेश पर अपना दावा पेश करना शुरू कर दिया था तथा 1962 के युद्ध के पश्चात लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर अवैध रूप से कब्ज़ा भी कर लिया है| भारत-चीन के मध्य विवादित सीमाक्षेत्र - पश्चिमी क्षेत्र- अक्साई चिन - जॉनसन लाइन को चीन द्वारा मान्यता ना देना; इस क्षेत्र पर चीन का अवैध कब्ज़ा; सियाचिन ग्लेशियर के पास दौलतबेग ओल्डी एयरपोर्ट को लेकर 2013 में गतिरोध; डेमचोक-चुमार क्षेत्र - आये दिन चीन द्वारा हस्तक्षेप; पश्चिमी क्षेत्रों में कुछ झीलों को लेकर मुद्दा ; मध्य क्षेत्र में ज्यादा समस्या नहीं; पूर्वी क्षेत्र- चीन द्वारा भारत के संदर्भ में मैकमोहन रेखा को ना मानना ; तिब्बत के क्षेत्र को विस्तार भारतीय क्षेत्रों तक करना तथा पूरे अरूणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत के रूप में बोलकर अवैध दावा; सिक्किम के ऊपर फिंगर एरिया; नाथुला तथा डोका ला- कैलाश मानसरोवर यात्रा को कभी कभी रोकना; डोकलाम पठार पर चीनी कब्जे की मंशा; चीन द्वारा शुरू से ही डोकलाम पठार पर कब्ज़ा करने की मंशा ताकि वह चिकेन नेक के ज्यादा नजदीक आ सके; जकारलुंग तथा पासामलंग के क्षेत्र के बदले डोकलाम का पैकेज डील; तवांग को लेकर विवाद - चीन द्वारा पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र बताना; बौद्ध धर्म के केंद्र के चलते कब्जे का तर्क; तवांग के एरिया में दलाईलामा का जन्मस्थान होना; भारत-चीन सीमा प्रबंधन में बाधाएं भारत द्वारा सीमाई क्षेत्रों में कम अवसंरचनात्मक विकास तथा अपर्याप्त बुनियादी ढांचा ; चीन द्वारा सीमाई क्षेत्रों में तीव्र विकास जिससे युद्ध की समय चीनी सीमा पर तीव्र आवाजाही संभव; भौगोलिक स्थलाकृतियों की जटिलता जिससे परिवहन तथा विकास कार्यक्रमों में मुश्किलों का सामना; नृजातीय भिन्नता जिससे राष्ट्रवाद की भावना का विकास करना मुश्किल; पूर्वोत्तर क्षेत्र में समाजीकरण की प्रकृति शेष भारत में हुए समाजीकरण से भिन्न; पूर्वोत्तर कबीलाई प्रभाव तथा ईसाई मिशनरियों का प्रभाव; पूर्वोतर में उग्रवादियों का प्रभाव; पश्चिमी क्षेत्र में पाकिस्तान और चीन की लामबंदी का असर; पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चिन पर कब्ज़ा तथा सीमा क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के मध्य विद्यामान अस्पष्टता ; सीमाई क्षेत्रों में तस्करी तथा उग्रवादियों की आवाजाही; चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का पीओके से गुजरना तथा इससे भारत की संप्रभुता को चीन द्वारा चुनौती; नदी जल को लेकर दोनों देशों में मध्य विवाद; भारत-चीन सीमा प्रबंधन के संदर्भ में सुझाव तथा आगे की राह- भारत द्वारा प्र भावी सीमा प्रबंधन की आवश्यकता - विवादित क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना; भारत द्वारा उस क्षेत्र में संरचनात्मक विकास ; क्विक लैंडिंग एयरपोर्ट; भारत के प्रति निष्ठा तथा राष्ट्रीय चेतना का विकास ; मानवीय, सामाजिक तथा शैक्षिक स्तर को सुधारने की कोशिश; भारत द्वारा सीमा प्रबंधन में भाषाई समस्याको गंभीरता से लेना; भाषा-संगम योजना के माध्यम से पूरे देश में; आठवीं अनुसूची की शेष सभी भाषाओँ को स्कूलों में सिखाना; सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ाना; राजनीतिक सहयोग तथा वार्ताओं के माध्यम से घनिष्ठता को बढ़ावा देना; सैन्य तीव्रता मे वृद्धि; चीन के प्रति नीतिगत परिवर्तन - चीन को रोकने हेतु अपनी नीतियों में परिवर्तन ताकि तनाव में कमी तथा अवसंरचना विकास को प्रोत्साहन; उपरोक्त क़दमों के साथ-साथ भारत चीन के संदर्भ में अपनी नीति को परिवर्तित भी कर रहा है जैसे-व्यापार को बढ़ावा जिससे युद्ध रोकने में सहायता; चीन सीमा के विकास में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना खासकर जापान का सहयोग; भारत द्वारा चीन के शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों के प्रति भेदभाव का मुद्दा उठाना; आदि| कम तनाव के समय संरचनात्मक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है|
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लाभ के पद से आप क्या समझते हैं? इस पद के विवादित होने एवं न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने में निभाई गई भूमिका के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by the office of profit? Discuss the office of profit in the context of its disputed role and the role played in resolving the dispute by the judiciary. (150-200 words; Marks)
एप्रोच:- सर्वप्रथम,लाभ के पद का कापरिचय दीजिए। तत्पश्चात, इस पद से सम्बंधित विभिन्न विवादों का उल्लेख कीजिए तथा इसमें न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने के प्रयासों की भूमिका का उल्लेख कीजिए। अंत में एक निष्पक्ष निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, किसी भी विधायक द्वारा सरकार में ऐसे ‘लाभ के पद’ को हासिल नहीं किया जा सकता है जिसमें सरकारी भत्ते या अन्य शक्तियाँ मिलती हैं।अगर कोई सांसद/विधायक किसी लाभ के पद पर आसीन पाया जाता है तो संसद या संबंधित विधानसभा में उसकी सदस्यता को अयोग्य करार दिया जा सकता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद 102(1)(क) तथा अनुच्छेद 191(1)(क) में लाभ के पद का उल्लेख किया गया है, किंतु लाभ के पद को परिभाषित नहीं किया गया है। अनुच्छेद 103 के अनुसार जब लाभ के पद का प्रश्न आये तो राष्ट्रपति, चुनाव आयोग की राय के अनुसार निर्णय लेगा। इसी संदर्भ में हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त संसदीय सचिवों को लाभ के पद का उल्लंघन मानते हुए राष्ट्रपति ने उनकी सदस्यता ख़ारिज कर दी थी। लाभ के पद के संदर्भ में भारत में कोई स्थापित प्रक्रिया नहीं है ऐसे में न्यायालय की भूमिका उल्लेखनीय हो जाती है। विभिन्न वाद में न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप किया गया है एवं निर्णय दिए गए है जैसे- मौलाना अब्दुल शकुर बनाम रिखब चंद,1958 :- सुप्रीम कोर्ट ने लाभ के पद को परिभाषित किया और कुछ शर्ते भी बताई जैसे- क्या सम्बंधित लाभ के पद के लाभार्थी को कार्यालय में नियुक्त करने की शक्ति सरकार के पास है। क्या सरकार उस नियुक्त लाभार्थी की नियुक्ति को अपनी विवेकीय शक्तियों का प्रयोग कर हटा सकती है। क्या उसे सरकार के राजस्व से पारितोषिक भुगतान हो रहा है। प्रद्युत बारदोलाई मामला, 2001:- इस केस में लाभ के पद की जाँच के पांच टेस्ट बताये है- क्या नियुक्ति सरकार द्वारा की गई है ? क्या सरकार नियुक्त व्यक्ति को पद से हटा सकती है ? क्या सरकार पारितोषिक का भुगतान करती है? नियुक्त व्यक्ति के कार्य क्या हैं? क्या वह सरकार के लिए कार्य करता है और क्या उन कार्यों पर सरकार का किसी प्रकार का कोई नियंत्रण है ? गुरु गोबिंद बनाम शंकरी प्रसाद घोषाल,1964:- इस केस में कहा गया कि कोई व्यक्ति लाभ का पद धारण करता है इसका टेस्ट प्रत्येक मामले को अलग से उसके तथ्योंकी जाँच करने पर निर्भर करेगा। जया बच्चन मामला,2006 :- इस मामले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा किराज्य के अधीन किसी भी ऐसे पद को लाभ का पद माना जायेगा जिस पद पर आसीन व्यक्ति सरकारी खजाने से पैसा निकालने और उसे खर्च करने के लिए अधिकृत हो, भले ही वास्तव में वह ऐसा न कर रहा हो। स्पष्ट है कि लाभ के पद के संदर्भ में न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है फिर भी इस संदर्भ में एक सुस्पष्ट नियम का अभाव देखा गया है। इस संदर्भ में इंग्लॅण्ड में प्रचलित प्रथा का अनुपालन अनुकरणीय हो सकता है। वहां किसी भी पद को सृजित करने के साथही नियम भी बना दिए जाते है कि जो पद सृजित हुआ है वह लाभ का पद होगा कि नहीं।
##Question:लाभ के पद से आप क्या समझते हैं? इस पद के विवादित होने एवं न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने में निभाई गई भूमिका के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by the office of profit? Discuss the office of profit in the context of its disputed role and the role played in resolving the dispute by the judiciary. (150-200 words; Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम,लाभ के पद का कापरिचय दीजिए। तत्पश्चात, इस पद से सम्बंधित विभिन्न विवादों का उल्लेख कीजिए तथा इसमें न्यायपालिका द्वारा विवाद को निपटाने के प्रयासों की भूमिका का उल्लेख कीजिए। अंत में एक निष्पक्ष निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, किसी भी विधायक द्वारा सरकार में ऐसे ‘लाभ के पद’ को हासिल नहीं किया जा सकता है जिसमें सरकारी भत्ते या अन्य शक्तियाँ मिलती हैं।अगर कोई सांसद/विधायक किसी लाभ के पद पर आसीन पाया जाता है तो संसद या संबंधित विधानसभा में उसकी सदस्यता को अयोग्य करार दिया जा सकता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद 102(1)(क) तथा अनुच्छेद 191(1)(क) में लाभ के पद का उल्लेख किया गया है, किंतु लाभ के पद को परिभाषित नहीं किया गया है। अनुच्छेद 103 के अनुसार जब लाभ के पद का प्रश्न आये तो राष्ट्रपति, चुनाव आयोग की राय के अनुसार निर्णय लेगा। इसी संदर्भ में हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त संसदीय सचिवों को लाभ के पद का उल्लंघन मानते हुए राष्ट्रपति ने उनकी सदस्यता ख़ारिज कर दी थी। लाभ के पद के संदर्भ में भारत में कोई स्थापित प्रक्रिया नहीं है ऐसे में न्यायालय की भूमिका उल्लेखनीय हो जाती है। विभिन्न वाद में न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप किया गया है एवं निर्णय दिए गए है जैसे- मौलाना अब्दुल शकुर बनाम रिखब चंद,1958 :- सुप्रीम कोर्ट ने लाभ के पद को परिभाषित किया और कुछ शर्ते भी बताई जैसे- क्या सम्बंधित लाभ के पद के लाभार्थी को कार्यालय में नियुक्त करने की शक्ति सरकार के पास है। क्या सरकार उस नियुक्त लाभार्थी की नियुक्ति को अपनी विवेकीय शक्तियों का प्रयोग कर हटा सकती है। क्या उसे सरकार के राजस्व से पारितोषिक भुगतान हो रहा है। प्रद्युत बारदोलाई मामला, 2001:- इस केस में लाभ के पद की जाँच के पांच टेस्ट बताये है- क्या नियुक्ति सरकार द्वारा की गई है ? क्या सरकार नियुक्त व्यक्ति को पद से हटा सकती है ? क्या सरकार पारितोषिक का भुगतान करती है? नियुक्त व्यक्ति के कार्य क्या हैं? क्या वह सरकार के लिए कार्य करता है और क्या उन कार्यों पर सरकार का किसी प्रकार का कोई नियंत्रण है ? गुरु गोबिंद बनाम शंकरी प्रसाद घोषाल,1964:- इस केस में कहा गया कि कोई व्यक्ति लाभ का पद धारण करता है इसका टेस्ट प्रत्येक मामले को अलग से उसके तथ्योंकी जाँच करने पर निर्भर करेगा। जया बच्चन मामला,2006 :- इस मामले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा किराज्य के अधीन किसी भी ऐसे पद को लाभ का पद माना जायेगा जिस पद पर आसीन व्यक्ति सरकारी खजाने से पैसा निकालने और उसे खर्च करने के लिए अधिकृत हो, भले ही वास्तव में वह ऐसा न कर रहा हो। स्पष्ट है कि लाभ के पद के संदर्भ में न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है फिर भी इस संदर्भ में एक सुस्पष्ट नियम का अभाव देखा गया है। इस संदर्भ में इंग्लॅण्ड में प्रचलित प्रथा का अनुपालन अनुकरणीय हो सकता है। वहां किसी भी पद को सृजित करने के साथही नियम भी बना दिए जाते है कि जो पद सृजित हुआ है वह लाभ का पद होगा कि नहीं।
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महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रमुख प्रयासों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द) Discuss the major efforts made by the Government of India for the protection of women. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में महिलाओं के समक्ष सुरक्षा चुनौतियों के बारे में चर्चा कीजिये 2- मुख्य भाग में महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रमुख प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- प्रयासों के दुरूपयोग का सन्दर्भ एवं उसका समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर इसके साथ ही घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां, कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दोहरे उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण जैसी चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं| अतः समाज को समतामूलक बनाने के लिए तथा महिला सशक्तिकरण के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है को देखते हुए भारत सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए अनेक प्रयास किये हैं| महिलाओं की सुरक्षा हेतु विधिक प्रयास दहेज़ निरोधक कानून 1961 इस कानून के अंतर्गत दहेज़ लेना एवं देना दोनों अपराध हैं परन्तु दहेज़ शब्द को सुव्यवस्थित तरीके से परिभाषित न करने के कारण इस कानून का उचित अनुपालन नहीं हो पार रहा है दहेज़ वह सामाजिक कुरीति अभी भी बनी हुई है जिसके कारण बालिकाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण तथा गैर-सुमेलित विवाह जैसी समस्याएं समाज में पायी जा रही हैं महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून 1986 (2012 में संशोधित) इस कानून के अंतर्गत बिना स्वीकृति के महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण प्रिंट या डिजिटल दोनों सन्दर्भों में एक दंडनीय अपराध है महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा का कानून इस कानून के अंतर्गत घरेलू हिंसा से तात्पर्य शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक हिंसा जो दिए गए परिवार की महिलाओं को संदर्भित हों, एक दंडनीय अपराध है इसके साथ ही इस कानून में संशोधन करते हुए कालान्तर निम्नलिखित 3 बातों का समावेश किया गया है यथा घरेलू हिंसा के सन्दर्भ तलाक के बाद भी प्रभावी होंगे वयस्क पुरुष शब्द को हटाते हुए इस कानून में महिलाओं को भी इस कानून के अंतर्गत दोषी माना जा सकता है वर्ष 2019 में उच्चतम न्यायालय के निर्णयानुसार घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के जीविकोपार्जन का सन्दर्भ संयुक्त परिवार में पति के भाई को भी जिम्मेदार समझता है| इस सन्दर्भ में IPC 498A के अंतर्गत दहेज़ के कारण घरेलू हिंसा एक संज्ञेय दंडनीय अपराध है कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन निरोधक एवं नियम कानून 2013 कार्यालयों को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने हेतु इस कानून के अंतर्गत उस कार्यालय के प्रमुख की जिम्मेदारी होगी कि वे ऐसे संदर्भों हेतु मध्यस्थ (यदि 10 से अधिक कर्मचारी हों) या स्थानीय मध्यस्थता केन्द्रों पर पंजीकरण सुनिश्चित करें| ऐसे किसी भी मामले को पहले मध्यस्थ को भेजा जाना आवश्यक होगा| आपत्ति की स्थिति में प्रत्येक पक्ष न्यायालय जाने हेतु स्वतंत्र होगा| स्वाधार केंद्र भारतीय समाज में वंचित महिलाओं हेतु वर्ष 2007 में उज्ज्वला स्कीम के अंतर्गत स्वाधार केन्द्रों को स्थापित किया गया इनका मुख्य उद्देश्य ऐसी वंचित महिलाओं को आवास की सुविधा प्रदान करना, कौशल प्रशिक्षण के द्वारा रोजगार के विकल्प प्रस्तुत करना जिससे वे मुख्य धारा में पुनः सम्मिलित हो सकें, के प्रयास किये जा रहे हैंवर्तमान में 220 से अधिक स्वाधार केंद्र हैं इन वंचित महिलाओं में मुख्यतः सेक्स वर्कर्स, विधवाएं, भिक्षावृत्ति में इत्यादि प्रमुख हैं इस प्रकार देखते हैं कि भारत सरकार ने विधिक रूप से महिलाओं को सुरक्षा देने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है| निकट कुछ वर्षों में इन कानूनों के उल्लंघन या दुरुपयोग की प्रवृत्ति देखी जा रही है| अतः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही एक समतामूलक सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए इन कानूनों के बेहतर एवं प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है|
##Question:महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रमुख प्रयासों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द) Discuss the major efforts made by the Government of India for the protection of women. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में महिलाओं के समक्ष सुरक्षा चुनौतियों के बारे में चर्चा कीजिये 2- मुख्य भाग में महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार द्वारा किये गए प्रमुख प्रयासों की चर्चा कीजिये 3- प्रयासों के दुरूपयोग का सन्दर्भ एवं उसका समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पितृसत्तात्मकता का भारतीय समाज पर नकारात्मक प्रभाव पडा है| इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार आदि के सन्दर्भ में असमान जीवन अवसर इसके साथ ही घरेलू हिंसा, दहेज़ एवं लिंग आधारित गर्भपात जैसी कुरीतियां, कामकाजी महिलाओं के सन्दर्भ में दोहरे उत्तरदायित्वों का निर्धारण तथा सार्वजनिक सन्दर्भों में महिलाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण जैसी चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं| अतः समाज को समतामूलक बनाने के लिए तथा महिला सशक्तिकरण के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है को देखते हुए भारत सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए अनेक प्रयास किये हैं| महिलाओं की सुरक्षा हेतु विधिक प्रयास दहेज़ निरोधक कानून 1961 इस कानून के अंतर्गत दहेज़ लेना एवं देना दोनों अपराध हैं परन्तु दहेज़ शब्द को सुव्यवस्थित तरीके से परिभाषित न करने के कारण इस कानून का उचित अनुपालन नहीं हो पार रहा है दहेज़ वह सामाजिक कुरीति अभी भी बनी हुई है जिसके कारण बालिकाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण तथा गैर-सुमेलित विवाह जैसी समस्याएं समाज में पायी जा रही हैं महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून 1986 (2012 में संशोधित) इस कानून के अंतर्गत बिना स्वीकृति के महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण प्रिंट या डिजिटल दोनों सन्दर्भों में एक दंडनीय अपराध है महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा का कानून इस कानून के अंतर्गत घरेलू हिंसा से तात्पर्य शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक हिंसा जो दिए गए परिवार की महिलाओं को संदर्भित हों, एक दंडनीय अपराध है इसके साथ ही इस कानून में संशोधन करते हुए कालान्तर निम्नलिखित 3 बातों का समावेश किया गया है यथा घरेलू हिंसा के सन्दर्भ तलाक के बाद भी प्रभावी होंगे वयस्क पुरुष शब्द को हटाते हुए इस कानून में महिलाओं को भी इस कानून के अंतर्गत दोषी माना जा सकता है वर्ष 2019 में उच्चतम न्यायालय के निर्णयानुसार घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के जीविकोपार्जन का सन्दर्भ संयुक्त परिवार में पति के भाई को भी जिम्मेदार समझता है| इस सन्दर्भ में IPC 498A के अंतर्गत दहेज़ के कारण घरेलू हिंसा एक संज्ञेय दंडनीय अपराध है कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन निरोधक एवं नियम कानून 2013 कार्यालयों को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने हेतु इस कानून के अंतर्गत उस कार्यालय के प्रमुख की जिम्मेदारी होगी कि वे ऐसे संदर्भों हेतु मध्यस्थ (यदि 10 से अधिक कर्मचारी हों) या स्थानीय मध्यस्थता केन्द्रों पर पंजीकरण सुनिश्चित करें| ऐसे किसी भी मामले को पहले मध्यस्थ को भेजा जाना आवश्यक होगा| आपत्ति की स्थिति में प्रत्येक पक्ष न्यायालय जाने हेतु स्वतंत्र होगा| स्वाधार केंद्र भारतीय समाज में वंचित महिलाओं हेतु वर्ष 2007 में उज्ज्वला स्कीम के अंतर्गत स्वाधार केन्द्रों को स्थापित किया गया इनका मुख्य उद्देश्य ऐसी वंचित महिलाओं को आवास की सुविधा प्रदान करना, कौशल प्रशिक्षण के द्वारा रोजगार के विकल्प प्रस्तुत करना जिससे वे मुख्य धारा में पुनः सम्मिलित हो सकें, के प्रयास किये जा रहे हैंवर्तमान में 220 से अधिक स्वाधार केंद्र हैं इन वंचित महिलाओं में मुख्यतः सेक्स वर्कर्स, विधवाएं, भिक्षावृत्ति में इत्यादि प्रमुख हैं इस प्रकार देखते हैं कि भारत सरकार ने विधिक रूप से महिलाओं को सुरक्षा देने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है| निकट कुछ वर्षों में इन कानूनों के उल्लंघन या दुरुपयोग की प्रवृत्ति देखी जा रही है| अतः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही एक समतामूलक सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए इन कानूनों के बेहतर एवं प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है|
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Discuss the factors which contributed to Industrial Revolution in England. Explain how this Industrial revolution contributed to Colonialism.(10 marks/150 words)
(First world history class of the batch, sir only gave an overview of the course, so the answer to the question will be very basic. The idea of the question was to see if the student can connect the various events.) Approach:- Explain what one means by the Industrial Revolution. Write down the reasons for Industrial revolution in England. Connect industrial revolution with Colonialism. Compare the term Colonialism and Imperialism. Answer:- Industrial revolution refers to the period of development in the latter half of the 18th century that transformed largely rural, agrarian societies in Europe to industrialized, urban ones. Its key feature was a focus on mass production with the help of machines. Reason for Industrial Revolution in England:- Movement such as Renaissance and Reformation led to coming of new thought and age of reason and discovery which contributed to Industrial Revolution. London had become a major financial area, thus there was the availability of Capital. Eg. London stock exchange established in 1770s. Political stability in the region coupled with rise of democracy which supports capitalism. Technological advancements - the development of Power loom shifted the textile industry from handcrafted products to machine made products. Similarly, the smelting of Iron ore using coke was discovered increasing quality and decreasing cost. Development of Road and Rail networks – promoted transport of goods at cheaper rate. Industrial Revolution and Colonialism:- The need for raw material due to increased production drove these industrialized nations. Eg. Cotton plantation in India for textile industry in England. The colonized regions also acted as market for the finished good produced in Europe thus there was a race to colonize new areas. Demand for cheap labour was satisfied through slave trade possible by means of subjugation of the other nation. Eg. Colonization of Africa, bonded labour in India etc. Colonialism vs Imperialism Colonialism refers to the practice of setting up colonies or settlements by a country in the territory of another country for political or economic benefit while Imperialism refers to the idea of influencing or controlling other countries through military, economic force or any other force. The practice of colonialism gave way to imperialistic ideas as at first settlements for trade purpose were established which encouraged the colonizing countries to assert dominance over their policies especially with regard to economic policies. These imperialistic tendencies triggered a race to acquire colonies across the globe which was a major cause of the World Wars in the 20th century.
##Question:Discuss the factors which contributed to Industrial Revolution in England. Explain how this Industrial revolution contributed to Colonialism.(10 marks/150 words)##Answer:(First world history class of the batch, sir only gave an overview of the course, so the answer to the question will be very basic. The idea of the question was to see if the student can connect the various events.) Approach:- Explain what one means by the Industrial Revolution. Write down the reasons for Industrial revolution in England. Connect industrial revolution with Colonialism. Compare the term Colonialism and Imperialism. Answer:- Industrial revolution refers to the period of development in the latter half of the 18th century that transformed largely rural, agrarian societies in Europe to industrialized, urban ones. Its key feature was a focus on mass production with the help of machines. Reason for Industrial Revolution in England:- Movement such as Renaissance and Reformation led to coming of new thought and age of reason and discovery which contributed to Industrial Revolution. London had become a major financial area, thus there was the availability of Capital. Eg. London stock exchange established in 1770s. Political stability in the region coupled with rise of democracy which supports capitalism. Technological advancements - the development of Power loom shifted the textile industry from handcrafted products to machine made products. Similarly, the smelting of Iron ore using coke was discovered increasing quality and decreasing cost. Development of Road and Rail networks – promoted transport of goods at cheaper rate. Industrial Revolution and Colonialism:- The need for raw material due to increased production drove these industrialized nations. Eg. Cotton plantation in India for textile industry in England. The colonized regions also acted as market for the finished good produced in Europe thus there was a race to colonize new areas. Demand for cheap labour was satisfied through slave trade possible by means of subjugation of the other nation. Eg. Colonization of Africa, bonded labour in India etc. Colonialism vs Imperialism Colonialism refers to the practice of setting up colonies or settlements by a country in the territory of another country for political or economic benefit while Imperialism refers to the idea of influencing or controlling other countries through military, economic force or any other force. The practice of colonialism gave way to imperialistic ideas as at first settlements for trade purpose were established which encouraged the colonizing countries to assert dominance over their policies especially with regard to economic policies. These imperialistic tendencies triggered a race to acquire colonies across the globe which was a major cause of the World Wars in the 20th century.
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प्लासी की लड़ाई के कारणों एवं परिणामों की चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द) Discuss the causes and consequences of the Battle of Plassey. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण भूमिका में प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये प्रथम भाग में प्लासी के युद्ध के कारणों को स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में प्लासी के युद्ध के परिणामों की चर्चा कीजिये| अंतिम में प्लासी की लड़ाई का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में ब्रिटिश राजनीतिक सता का आरंभ 1757 के प्लासी युद्ध से माना जाता है जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराया था| कर्नाटक युद्धों में फ्रांसीसियों को हराने से उत्साहित अंग्रेजों ने अपने अनुभवों का बेहतर इस्तेमाल इस युद्ध में किया| बंगाल तब भारत का सबसे धनी तथा उपजाऊ प्रांत था| साथ ही, इससे कंपनी तथा उसके कर्मचारियों के लाभदायक हित भी जुड़े हुए थें|कंपनी 1717 में मुग़ल सम्राट के द्वारा मिले शाही फरमान का प्रयोग कर अवैध व्यापारकर रही थी जिससे बंगाल के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँच रहा था|इसी पृष्ठभूमि मेंसिराजुद्दौला ने 1756 में कासिमबाजार तथा कलकता को अपने नियंत्रण मेंले लिया तथा अंग्रेजों को फुल्टा नामक द्वीप पर शरण लेनी पड़ी| तत्पश्चात मद्रास से आयेवाटसन तथा क्लाईव के नेतृत्व में नौसैनिक सहायताके द्वारा अंग्रेजों ने वापस सिराजुद्दौला को चुनौती दी तथा कलकता को वापस जीतलिया| हालाँकि दोनों पक्षों के मध्य जल्द हीप्लासी में 23 जून,1757को एक और निर्णायक युद्ध हुआ| प्लासी के युद्ध के कारण अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा, 1717 के फरमान(आदेश) के दुरूपयोगको लेकर विवाद- फर्रुख्सियार के द्वारा दिए गए दस्तक के अधिकार से बंगाल के राजस्व को हानि पहुँचना तथा इसका दुरूपयोग कर कंपनी के कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार पर भी कर न चुकाना जिससे नवाब का क्रोधित होना; सिराजुद्दौला की संप्रभुता को चुनौती- द्वितीय कर्नाटक युद्ध से उत्साहित होकर अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला की सता को चुनौती दी जैसे- भारतीय वस्तुओं पर कलकता में कर लगाना, नवाब के मना करने के बावजूद कलकता की किलेबंदी करना, नवाब के विरोधियों को संरक्षण इत्यादि| इसे सिराज ने अपनी संप्रभुता के उल्लंघन के रूप लिया| सिराजुद्दौला की प्रतिक्रिया- सिराजुद्दौला ने जून,1756 में कासिमबाजार एवं कलकता पर नियंत्रण स्थापित किया तथा ब्रिटिश अधिकारियों को फुल्टा द्वीप में शरण लेनी पड़ी| सिराजुद्दौला ने कलकता की जिम्मेदारी मानिकचंद नामक अधिकारी को सौंपी जिसके द्वारा विश्वासघात किया गया| काल-कोठरी(ब्लैक-होल) की घटना- हौलबेल ने इस घटना का जिक्र किया| हालाँकि ऐतिहासिक तौर पर यह प्रमाणित नहीं हो पाया है फिर भी इसने सिराजुद्दौला से प्रतिशोध के लिए अंग्रेजों को एकजुट किया| कलकता पर अंग्रेजों का नियंत्रण- जनवरी 1757 में क्लाईव के नेतृत्व में कलकता पर अंग्रेजों का पुनः नियंत्रण स्थापित हुआ| सिराजुद्दौला ने तात्कालिक तौर पर अंग्रेजों की संप्रभुता को स्वीकार किया| हालाँकि मज़बूरी में नवाब ने अंग्रेजों की सारी मांगें मान ली थी पर अंग्रेज उसकी जगह अपने किसी विश्वासपात्र को गद्दी पर बैठाना चाहते थें| क्लाईव के द्वारा षड़यंत्र- क्लाईव ने नवाब को हटाने की योजना बनाई| इस षड़यंत्र में मुख्य सेनापति मीरजाफर के साथ-साथ कई अन्य अधिकारी व बड़े व्यापारी भी शामिल थें| योजना के अनुसार ही प्लासी नामक स्थान पर दोनों की सेना में टकराव हुआ तथा कुछ ही घंटों में अंग्रेजों की जीत हो गई| प्लासी के युद्ध के परिणाम राजनीतिक परिणाम पूर्व(बंगाल, उड़ीसा) मेंराजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय हो गया बंगाल के नवाब की राजनीतिक स्थिति का कमजोर होना जिससे बंगाल के राजनीतिक प्रशासन पर अंग्रेजों का प्रभाव जैसे - नवाब के अधिकारियों की नियुक्ति में हस्तक्षेप आदि| अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा बढ़ी तथा इसका असर अन्य भारतीय क्षेत्रों में राजनीतिक दखल के रूप में देखने को मिला| आर्थिक परिणाम अंग्रेजों को एक बड़ी राशि मुआवजे के रूप में; 24 परगना की जमींदारी तथा उपहार के रूप में भी एक अच्छी-खासी रकम अंग्रेजों ने ली| बंगाल के समृद्ध संसाधनों तक पहुँच का लाभ अंग्रेजों ने तृतीय कर्नाटक युद्ध तथा उत्तर भारत मेंअभी अपने क्षेत्र विस्तार में किया| कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार पर भी मुक्त व्यापार की सुविधा दी गई| अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी नेफ्रांसीसी तथा डच कंपनियों को कमजोर बनाकर बंगाल के व्यापार तथा वाणिज्य पर एकाधिकारप्राप्त कर लिया| प्लासी के लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनीकेवल एक वाणिज्यिक निकाय ना होकर सैन्य कंपनीके रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया| अब इसके पास एक बहुत बड़ा भूभाग था जिसे एक प्रशिक्षित सेना के माध्यम से ही सुरक्षित रखा जा सकता था| इसके फलस्वरूप कंपनी सैन्य-सुदृढ़ीकरण की ओर बढ़ती चली गई तथाभारत के विभिन्न भागों में इसका राजनीतिक दखल एवं प्रभुत्व बढ़ताचला गया|
##Question:प्लासी की लड़ाई के कारणों एवं परिणामों की चर्चा कीजिये |(150 से 200 शब्द) Discuss the causes and consequences of the Battle of Plassey. (150 to 200 words)##Answer: दृष्टिकोण भूमिका में प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि को स्पष्ट कीजिये प्रथम भाग में प्लासी के युद्ध के कारणों को स्पष्ट कीजिये| दूसरे भाग में प्लासी के युद्ध के परिणामों की चर्चा कीजिये| अंतिम में प्लासी की लड़ाई का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में ब्रिटिश राजनीतिक सता का आरंभ 1757 के प्लासी युद्ध से माना जाता है जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराया था| कर्नाटक युद्धों में फ्रांसीसियों को हराने से उत्साहित अंग्रेजों ने अपने अनुभवों का बेहतर इस्तेमाल इस युद्ध में किया| बंगाल तब भारत का सबसे धनी तथा उपजाऊ प्रांत था| साथ ही, इससे कंपनी तथा उसके कर्मचारियों के लाभदायक हित भी जुड़े हुए थें|कंपनी 1717 में मुग़ल सम्राट के द्वारा मिले शाही फरमान का प्रयोग कर अवैध व्यापारकर रही थी जिससे बंगाल के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँच रहा था|इसी पृष्ठभूमि मेंसिराजुद्दौला ने 1756 में कासिमबाजार तथा कलकता को अपने नियंत्रण मेंले लिया तथा अंग्रेजों को फुल्टा नामक द्वीप पर शरण लेनी पड़ी| तत्पश्चात मद्रास से आयेवाटसन तथा क्लाईव के नेतृत्व में नौसैनिक सहायताके द्वारा अंग्रेजों ने वापस सिराजुद्दौला को चुनौती दी तथा कलकता को वापस जीतलिया| हालाँकि दोनों पक्षों के मध्य जल्द हीप्लासी में 23 जून,1757को एक और निर्णायक युद्ध हुआ| प्लासी के युद्ध के कारण अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा, 1717 के फरमान(आदेश) के दुरूपयोगको लेकर विवाद- फर्रुख्सियार के द्वारा दिए गए दस्तक के अधिकार से बंगाल के राजस्व को हानि पहुँचना तथा इसका दुरूपयोग कर कंपनी के कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार पर भी कर न चुकाना जिससे नवाब का क्रोधित होना; सिराजुद्दौला की संप्रभुता को चुनौती- द्वितीय कर्नाटक युद्ध से उत्साहित होकर अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला की सता को चुनौती दी जैसे- भारतीय वस्तुओं पर कलकता में कर लगाना, नवाब के मना करने के बावजूद कलकता की किलेबंदी करना, नवाब के विरोधियों को संरक्षण इत्यादि| इसे सिराज ने अपनी संप्रभुता के उल्लंघन के रूप लिया| सिराजुद्दौला की प्रतिक्रिया- सिराजुद्दौला ने जून,1756 में कासिमबाजार एवं कलकता पर नियंत्रण स्थापित किया तथा ब्रिटिश अधिकारियों को फुल्टा द्वीप में शरण लेनी पड़ी| सिराजुद्दौला ने कलकता की जिम्मेदारी मानिकचंद नामक अधिकारी को सौंपी जिसके द्वारा विश्वासघात किया गया| काल-कोठरी(ब्लैक-होल) की घटना- हौलबेल ने इस घटना का जिक्र किया| हालाँकि ऐतिहासिक तौर पर यह प्रमाणित नहीं हो पाया है फिर भी इसने सिराजुद्दौला से प्रतिशोध के लिए अंग्रेजों को एकजुट किया| कलकता पर अंग्रेजों का नियंत्रण- जनवरी 1757 में क्लाईव के नेतृत्व में कलकता पर अंग्रेजों का पुनः नियंत्रण स्थापित हुआ| सिराजुद्दौला ने तात्कालिक तौर पर अंग्रेजों की संप्रभुता को स्वीकार किया| हालाँकि मज़बूरी में नवाब ने अंग्रेजों की सारी मांगें मान ली थी पर अंग्रेज उसकी जगह अपने किसी विश्वासपात्र को गद्दी पर बैठाना चाहते थें| क्लाईव के द्वारा षड़यंत्र- क्लाईव ने नवाब को हटाने की योजना बनाई| इस षड़यंत्र में मुख्य सेनापति मीरजाफर के साथ-साथ कई अन्य अधिकारी व बड़े व्यापारी भी शामिल थें| योजना के अनुसार ही प्लासी नामक स्थान पर दोनों की सेना में टकराव हुआ तथा कुछ ही घंटों में अंग्रेजों की जीत हो गई| प्लासी के युद्ध के परिणाम राजनीतिक परिणाम पूर्व(बंगाल, उड़ीसा) मेंराजनीतिक शक्ति के रूप में अंग्रेजों का उदय हो गया बंगाल के नवाब की राजनीतिक स्थिति का कमजोर होना जिससे बंगाल के राजनीतिक प्रशासन पर अंग्रेजों का प्रभाव जैसे - नवाब के अधिकारियों की नियुक्ति में हस्तक्षेप आदि| अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा बढ़ी तथा इसका असर अन्य भारतीय क्षेत्रों में राजनीतिक दखल के रूप में देखने को मिला| आर्थिक परिणाम अंग्रेजों को एक बड़ी राशि मुआवजे के रूप में; 24 परगना की जमींदारी तथा उपहार के रूप में भी एक अच्छी-खासी रकम अंग्रेजों ने ली| बंगाल के समृद्ध संसाधनों तक पहुँच का लाभ अंग्रेजों ने तृतीय कर्नाटक युद्ध तथा उत्तर भारत मेंअभी अपने क्षेत्र विस्तार में किया| कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार पर भी मुक्त व्यापार की सुविधा दी गई| अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी नेफ्रांसीसी तथा डच कंपनियों को कमजोर बनाकर बंगाल के व्यापार तथा वाणिज्य पर एकाधिकारप्राप्त कर लिया| प्लासी के लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनीकेवल एक वाणिज्यिक निकाय ना होकर सैन्य कंपनीके रूप में भी खुद को स्थापित कर लिया| अब इसके पास एक बहुत बड़ा भूभाग था जिसे एक प्रशिक्षित सेना के माध्यम से ही सुरक्षित रखा जा सकता था| इसके फलस्वरूप कंपनी सैन्य-सुदृढ़ीकरण की ओर बढ़ती चली गई तथाभारत के विभिन्न भागों में इसका राजनीतिक दखल एवं प्रभुत्व बढ़ताचला गया|
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जम्मू कश्मीर में आतंकवाद का उन्मूलन भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है| आपकी नजर में इसके लिए भारत सरकार द्वारा की जा रही सैन्य कार्यवाही कहाँ तक तर्कसंगत है? (150-200 शब्द/10 अंक) The Elimination of Terrorism in Jammu and Kashmir remains the most important aspect for India"s Internal Security. To what extent, The military actions taken by the Government of India is reasonable for this, in your view? (150-200 words/ 10 marks)
एप्रोच- जम्मूकश्मीर में आतंकवाद की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को भारत की आतंरिक सुरक्षा के समक्ष गंभीर खतरे के रूप में रेखांकित करते हुए आतंरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु आतंकवाद के उन्मूलन की महत्ता को स्पष्ट कीजिये| आतंकवाद के उन्मूलन हेतु सैन्य कार्यवाहियों का उदाहरण देते हुए उनका औचित्य सिद्ध कीजिये| सैन्य कार्यवाहियों के साथ अन्य प्रयासों की भी भूमिका को महत्व देते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- जम्मूकश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप तथा सीमापारीय आतंकवाद वहां आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है| कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे, 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में घटित कुछ राजनैतिक कारणों आदि के फलस्वरूप वहां आतंकवाद की जड़ें फैलीं थीं जिसका व्यापक प्रभाव अभी तक देखा जाता है| साथ ही, जम्मूकश्मीर में आतंकवाद के आंतरिक आयामों में धर्म और क्षेत्र के साथ-साथ बहु-नृजातीयता, बहु-सांस्कृतिक तथा राजनैतिक मुद्दें, अलगाववादी तथा चरमपंथी जैसे कारकों का भी अहम् रोल है| जम्मूकश्मीर में आतंकवाद तथा भारत की आंतरिक सुरक्षा भारत की आंतरिक सुरक्षा पर सबसे गंभीर खतरा कश्मीर में सक्रीय तथा पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों/व्यक्तियों से है| ये ना सिर्फ वहां सुरक्षाबलों पर हिंसक तथा बर्बर हमलें करते हैं अपितु देश के अन्य हिस्सों में भी हिंसक तथा गंभीर आतंकवादी घटनाओं में संलिप्त पाए जाते हैं| भारत को आंतरिक दृष्टि से कमजोर करने हेतु पाकिस्तान छद्म युद्ध का सहारा लेकर आतंकवादियों एवं अलगाववादियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सहायता देता है| देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले आतंकवादी घटनाओं में से अधिकतर के तार जम्मूकश्मीर में सक्रीय या उससे संबंधित संगठनों/व्यक्तियों से जुड़ते हैं जो भारत की आंतरिक सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में देखा जा सकता है| जैसे-कोयंबतूर में रथयात्रा पर हमला; 2000 में लाल किला पर हमला; 2001 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला; 2001 संसद पर हमला; मुम्बई में 2003 में हमला; यूपी के विभिन्न शहरों पर हमला; हमलों में ज्यादातर राजनीतिक तथा न्यायिक संस्थाओं एवं उससे जुड़े व्यक्तियों पर हमला आदि| कश्मीरी पंडितों तथा सिखों का घाटी से पलायन जिससे जनसांख्यिकी परिवर्तन की मंशा एवं हिंसात्मक गतिविधियों में वृद्धि; 2008-12 के मध्य दुष्प्रचार; लामबंदी तथा हिंसा के माध्यम से आतंकवादी गतिविधियों को प्रोत्साहन; पत्थरबाजी; अलगाववादियों को प्रोत्साहन तथा पत्थरबाजों के माध्यम से आतंकवादी गतिविधियों का प्रोत्साहन; 2013-16- अफजल गुरू को बढ़ावा तथा ज्यादा प्रोत्साहित करना; बुरहान वानी की मृत्यु के बाद जनसमर्थन; पॉपुलर डोमेन में प्रोत्साहन; 2016 से अबतक- सैनिक क्षेत्रों पर हमला- उरी, पठानकोट, पुलवामा आदि; उपरोक्त आयामों के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि आंतरिक सुरक्षा हेतु जम्मूकश्मीर से आतंकवाद का उन्मूलन एक महत्वपूर्ण शर्त है| आतंकवाद के उन्मूलन हेतु सैन्य कार्यवाहियां तथा इनका औचित्य- बुलेट, पैलेट तथा गिरफ्तारी की नीति; सशक्त सैन्य कार्यवाही- ऑपरेशन रक्षक(जून 1980); ऑपरेशन सर्पविनाश(2003); ऑपरेशन काउंटडाउन(2016); ऑपरेशन ऑलआउट(2017); सर्जिकल स्ट्राइक(2016); एयर स्ट्राइक(फ़रवरी, 2019) ; आतंकवाद उन्मूलन हेतु भारत सरकार की कठोर एवं सशक्त सैन्य कार्यवाहियों का व्यापक प्रभाव पड़ा है तथा घाटी से ज्यादातर बड़े आतंकवादियों का सफाया कर दिया गया है| एक सशक्त सैन्य कार्यवाही ना सिर्फ आतंकवादियों के मन में डर का माहौल पैदा करती है अपितु उनके पनाहगारों, स्लीपर-सेलों तथा अलगाववादियों के मध्य भी खौफ निर्मित करती है| इससे सरकार को विकासात्मक कार्यों को तीव्रता से लागू करने में मदद मिलती है तथा जनता के मन में भारत के प्रति निष्ठा ककी भावना का विकास तेजी से होता है| हालाँकि सैन्य प्रयासों के साथ-साथ निम्नलिखित अन्य क़दमों की भी प्रमुख भूमिका महत्वपूर्ण है - विकासोन्मुखी कार्यक्रम- 2004 में PMIP; रेल नेटवर्क; प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम; उड़ान तथा उम्मीद कार्यक्रम; हिमायत; जुड़ाव के लिए भारत-दर्शन; अंतर्राष्ट्रीय दबाव; अफ-पाक नीति से पाक-अफ नीति; मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करना; अमेरिका का सहयोग; अफगान कूटनीति- 2011 से सामरिक भागीदारी सहयोग के तहत सैनिकों की ट्रेनिंग; 2015 से बलूच कूटनीति; अलगाववादियों पर शिकंजा; हाउस अरेस्ट; गिरफ्तारी; क्षेत्रीय दलों की अलगाववादी प्रवृतियों पर नियंत्रण; खातों पर रोक; नीतियों को क्रियान्वित करने में आ रही बाधाओं का उन्मूलन करने हेतु हालिया समय में अनुच्छेद 370 तथा अनुच्छेद 35(A) का उन्मूलन कर दिया गया है ताकि जम्मूकश्मीर से आतंकवाद को ख़त्म करने में भारत सरकार और गंभीर प्रयास को प्रोत्स्साहित कर सके|
##Question:जम्मू कश्मीर में आतंकवाद का उन्मूलन भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है| आपकी नजर में इसके लिए भारत सरकार द्वारा की जा रही सैन्य कार्यवाही कहाँ तक तर्कसंगत है? (150-200 शब्द/10 अंक) The Elimination of Terrorism in Jammu and Kashmir remains the most important aspect for India"s Internal Security. To what extent, The military actions taken by the Government of India is reasonable for this, in your view? (150-200 words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच- जम्मूकश्मीर में आतंकवाद की पृष्ठभूमि को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को भारत की आतंरिक सुरक्षा के समक्ष गंभीर खतरे के रूप में रेखांकित करते हुए आतंरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु आतंकवाद के उन्मूलन की महत्ता को स्पष्ट कीजिये| आतंकवाद के उन्मूलन हेतु सैन्य कार्यवाहियों का उदाहरण देते हुए उनका औचित्य सिद्ध कीजिये| सैन्य कार्यवाहियों के साथ अन्य प्रयासों की भी भूमिका को महत्व देते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- जम्मूकश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप तथा सीमापारीय आतंकवाद वहां आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है| कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे, 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में घटित कुछ राजनैतिक कारणों आदि के फलस्वरूप वहां आतंकवाद की जड़ें फैलीं थीं जिसका व्यापक प्रभाव अभी तक देखा जाता है| साथ ही, जम्मूकश्मीर में आतंकवाद के आंतरिक आयामों में धर्म और क्षेत्र के साथ-साथ बहु-नृजातीयता, बहु-सांस्कृतिक तथा राजनैतिक मुद्दें, अलगाववादी तथा चरमपंथी जैसे कारकों का भी अहम् रोल है| जम्मूकश्मीर में आतंकवाद तथा भारत की आंतरिक सुरक्षा भारत की आंतरिक सुरक्षा पर सबसे गंभीर खतरा कश्मीर में सक्रीय तथा पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों/व्यक्तियों से है| ये ना सिर्फ वहां सुरक्षाबलों पर हिंसक तथा बर्बर हमलें करते हैं अपितु देश के अन्य हिस्सों में भी हिंसक तथा गंभीर आतंकवादी घटनाओं में संलिप्त पाए जाते हैं| भारत को आंतरिक दृष्टि से कमजोर करने हेतु पाकिस्तान छद्म युद्ध का सहारा लेकर आतंकवादियों एवं अलगाववादियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सहायता देता है| देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले आतंकवादी घटनाओं में से अधिकतर के तार जम्मूकश्मीर में सक्रीय या उससे संबंधित संगठनों/व्यक्तियों से जुड़ते हैं जो भारत की आंतरिक सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में देखा जा सकता है| जैसे-कोयंबतूर में रथयात्रा पर हमला; 2000 में लाल किला पर हमला; 2001 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला; 2001 संसद पर हमला; मुम्बई में 2003 में हमला; यूपी के विभिन्न शहरों पर हमला; हमलों में ज्यादातर राजनीतिक तथा न्यायिक संस्थाओं एवं उससे जुड़े व्यक्तियों पर हमला आदि| कश्मीरी पंडितों तथा सिखों का घाटी से पलायन जिससे जनसांख्यिकी परिवर्तन की मंशा एवं हिंसात्मक गतिविधियों में वृद्धि; 2008-12 के मध्य दुष्प्रचार; लामबंदी तथा हिंसा के माध्यम से आतंकवादी गतिविधियों को प्रोत्साहन; पत्थरबाजी; अलगाववादियों को प्रोत्साहन तथा पत्थरबाजों के माध्यम से आतंकवादी गतिविधियों का प्रोत्साहन; 2013-16- अफजल गुरू को बढ़ावा तथा ज्यादा प्रोत्साहित करना; बुरहान वानी की मृत्यु के बाद जनसमर्थन; पॉपुलर डोमेन में प्रोत्साहन; 2016 से अबतक- सैनिक क्षेत्रों पर हमला- उरी, पठानकोट, पुलवामा आदि; उपरोक्त आयामों के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि आंतरिक सुरक्षा हेतु जम्मूकश्मीर से आतंकवाद का उन्मूलन एक महत्वपूर्ण शर्त है| आतंकवाद के उन्मूलन हेतु सैन्य कार्यवाहियां तथा इनका औचित्य- बुलेट, पैलेट तथा गिरफ्तारी की नीति; सशक्त सैन्य कार्यवाही- ऑपरेशन रक्षक(जून 1980); ऑपरेशन सर्पविनाश(2003); ऑपरेशन काउंटडाउन(2016); ऑपरेशन ऑलआउट(2017); सर्जिकल स्ट्राइक(2016); एयर स्ट्राइक(फ़रवरी, 2019) ; आतंकवाद उन्मूलन हेतु भारत सरकार की कठोर एवं सशक्त सैन्य कार्यवाहियों का व्यापक प्रभाव पड़ा है तथा घाटी से ज्यादातर बड़े आतंकवादियों का सफाया कर दिया गया है| एक सशक्त सैन्य कार्यवाही ना सिर्फ आतंकवादियों के मन में डर का माहौल पैदा करती है अपितु उनके पनाहगारों, स्लीपर-सेलों तथा अलगाववादियों के मध्य भी खौफ निर्मित करती है| इससे सरकार को विकासात्मक कार्यों को तीव्रता से लागू करने में मदद मिलती है तथा जनता के मन में भारत के प्रति निष्ठा ककी भावना का विकास तेजी से होता है| हालाँकि सैन्य प्रयासों के साथ-साथ निम्नलिखित अन्य क़दमों की भी प्रमुख भूमिका महत्वपूर्ण है - विकासोन्मुखी कार्यक्रम- 2004 में PMIP; रेल नेटवर्क; प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम; उड़ान तथा उम्मीद कार्यक्रम; हिमायत; जुड़ाव के लिए भारत-दर्शन; अंतर्राष्ट्रीय दबाव; अफ-पाक नीति से पाक-अफ नीति; मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करना; अमेरिका का सहयोग; अफगान कूटनीति- 2011 से सामरिक भागीदारी सहयोग के तहत सैनिकों की ट्रेनिंग; 2015 से बलूच कूटनीति; अलगाववादियों पर शिकंजा; हाउस अरेस्ट; गिरफ्तारी; क्षेत्रीय दलों की अलगाववादी प्रवृतियों पर नियंत्रण; खातों पर रोक; नीतियों को क्रियान्वित करने में आ रही बाधाओं का उन्मूलन करने हेतु हालिया समय में अनुच्छेद 370 तथा अनुच्छेद 35(A) का उन्मूलन कर दिया गया है ताकि जम्मूकश्मीर से आतंकवाद को ख़त्म करने में भारत सरकार और गंभीर प्रयास को प्रोत्स्साहित कर सके|
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While biodiversity conservation is a key challenge that the world must tackle collectively, there is also the need to step up the conservation efforts at National level.In this contextdiscuss some of the global and national area based efforts employed for biodiversity conservation. (250 words/15 marks)
Approach:- In introduction some evidences of loss of biodiversity can be mentioned with reference to the sixt mass extinction i.e. the Anthropocene. Discuss the challenges associated with conserving biodiversity briefly. Write down global and national area based efforts to address the challenge associated with biodiversity conservation. Answer:- Biodiversity refers to variability among the living organisms. It is essential to the ecosystem services such as provisioning, regulating. There have been instances of mass extinctions due to natural causes on earth which has destroyed considerable number of species. However the current mass extinction event (6th) called the anthropocene is the outcome of human activities which has accelerated the extinction rate considerably eg. the mass coral bleaching across the Great Barrier Reef. Reasons leading to threat to biodiversity:- (needs to be brief as challenges have not been asked directly) Habitat destruction – It is a major threat to biodiversity. Activities such as deforestation, building huge dams contribute to habitat destruction. Introduction of Invasive Species – These species wipe out the local variety by starving them off nutrients eg. Lantana camara. Genetic Pollution – Relates to gene flow from invasive wild species to the native population. Overexploitation of Resources – Overexploitation of resources has degraded the ecosystem quality. Environmental Pollution –Pollution reduces the ecosystem’s ability to perform its functions which also contributes to ecosystem degradation resulting into loss of biodiversity. Global Efforts for Biodiversity Conservation:- United Nation Convention on Biological Diversity – Set up in 1993 with the objective to keep a check on loss of biodiversity by contributing to conservation efforts. UNESCO Man and Biosphere programme – In-situ method for biodiversity conservation and scientific research. Key Biodiversity Area – Defined by the IUCN to pin point areas where conservation efforts needs to be focussed. Ramsar Convention – Set up with the objective of conserving wetlands of importance. Mission Blue – A project to conserve the marine ecosystem and thus saving the biodiversity there. There are other programmes such as designating 17 countries as Megadiverse countries, the idea of biodiversity hotspots identifying regions with very high species diversity to conserve them. Further there are some region focussed initiative such as Mangrove for future programme focussed in Asia. National Efforts for Biodiversity Conservation:- At national level India has legal enactment to designate an area as National Park, Wildlife Sanctuary, Tiger reserves, Biosphere reserves, conservation forest etc. They offer varying level of protection depending upon the necessity. We are a signatory to the Ramsar convention and have framed rules for wetlands at central and state level. Coastal zone regulation rules to ensure that coastal ecosystem is not degraded. Similarly we have also demarcated some regions as marine protected areas. Concept of Ecosensitive zones where human activity is restricted under the Environment Protection Act. The concept of Sacred groves/lakes, where the local community takes effort for conservation is an integral part of our culture. India apart from this has a forest policy that has the objective of 33% forest cover, we follow the REDD+ initiative. The achievements of India’s conservation efforts can be seen from the fact that tiger count has increased 33% as from 2014 as per the latest tiger census.
##Question:While biodiversity conservation is a key challenge that the world must tackle collectively, there is also the need to step up the conservation efforts at National level.In this contextdiscuss some of the global and national area based efforts employed for biodiversity conservation. (250 words/15 marks)##Answer:Approach:- In introduction some evidences of loss of biodiversity can be mentioned with reference to the sixt mass extinction i.e. the Anthropocene. Discuss the challenges associated with conserving biodiversity briefly. Write down global and national area based efforts to address the challenge associated with biodiversity conservation. Answer:- Biodiversity refers to variability among the living organisms. It is essential to the ecosystem services such as provisioning, regulating. There have been instances of mass extinctions due to natural causes on earth which has destroyed considerable number of species. However the current mass extinction event (6th) called the anthropocene is the outcome of human activities which has accelerated the extinction rate considerably eg. the mass coral bleaching across the Great Barrier Reef. Reasons leading to threat to biodiversity:- (needs to be brief as challenges have not been asked directly) Habitat destruction – It is a major threat to biodiversity. Activities such as deforestation, building huge dams contribute to habitat destruction. Introduction of Invasive Species – These species wipe out the local variety by starving them off nutrients eg. Lantana camara. Genetic Pollution – Relates to gene flow from invasive wild species to the native population. Overexploitation of Resources – Overexploitation of resources has degraded the ecosystem quality. Environmental Pollution –Pollution reduces the ecosystem’s ability to perform its functions which also contributes to ecosystem degradation resulting into loss of biodiversity. Global Efforts for Biodiversity Conservation:- United Nation Convention on Biological Diversity – Set up in 1993 with the objective to keep a check on loss of biodiversity by contributing to conservation efforts. UNESCO Man and Biosphere programme – In-situ method for biodiversity conservation and scientific research. Key Biodiversity Area – Defined by the IUCN to pin point areas where conservation efforts needs to be focussed. Ramsar Convention – Set up with the objective of conserving wetlands of importance. Mission Blue – A project to conserve the marine ecosystem and thus saving the biodiversity there. There are other programmes such as designating 17 countries as Megadiverse countries, the idea of biodiversity hotspots identifying regions with very high species diversity to conserve them. Further there are some region focussed initiative such as Mangrove for future programme focussed in Asia. National Efforts for Biodiversity Conservation:- At national level India has legal enactment to designate an area as National Park, Wildlife Sanctuary, Tiger reserves, Biosphere reserves, conservation forest etc. They offer varying level of protection depending upon the necessity. We are a signatory to the Ramsar convention and have framed rules for wetlands at central and state level. Coastal zone regulation rules to ensure that coastal ecosystem is not degraded. Similarly we have also demarcated some regions as marine protected areas. Concept of Ecosensitive zones where human activity is restricted under the Environment Protection Act. The concept of Sacred groves/lakes, where the local community takes effort for conservation is an integral part of our culture. India apart from this has a forest policy that has the objective of 33% forest cover, we follow the REDD+ initiative. The achievements of India’s conservation efforts can be seen from the fact that tiger count has increased 33% as from 2014 as per the latest tiger census.
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What were the major reasons for the American revolution? Highlighting the major events that led to the American war of Independence, analyze its impact. (15 marks/250 words)
Approach:- Write down the reasons behind American Revolution. Discuss the major events which happened. Enumerate the impact of American Revolution with respect to political structure. Answer:- American Revolution was the revolutionary war waged by the 13 American colonies against the British government between the periods of 1765-1783 A.D. The seeds for it were sown in the Seven Year Global war in which the British fought against the French. Reasons for American Revolution:- Mercantile Capitalism – Low import duty on products from England and high tariff on exports. Proclamation of 1763 – It restricted the expansion of the colonies beyond the Appalachian mountain. Role of Intellectuals – Enlightened thinkers like Hobbe and Locke gave theories of social contract, liberty and purpose of government which awakened the masses. Recovery of expenditure of War – Britain asked the colonies to pay the expenses for the 7 year war. No Representation in British Parliament and in deciding economic policies related to the colonies left the people from the colonies frustrated. It gave way to the slogan of “No taxation without representation.” Developments Leading up to American War of Independence:- Stamp Act 1765 was passed by Britain which became a subject of protests for the colonies and led to trade embargo on British imports. Boston Tea Party was the result of Tea act which granted British east India company monopoly on sales of tea in American colonies. Philadelphia Congress of 1774 was organized to oppose the intolerable acts of British Parliament. Attack by Britain – The demands put forth in the Philadelphia congress was not acceptable to the British and they decided to attack the colonies. Declaration of Independence – in 1776 the American colonies declared their independence which also summarized the political philosophy such as all men are born equal. These developments paved the way for the American war of Independence, which eventually came to end with the signing of Treaty of Paris in 1783 and the development and adoption of US constitution. Impact on political structure:- It discarded the notion of kings and US was to be a republic in which the head of the state is elected. It ended the special privileges of certain class of citizen by adopting the concepts of all men are born equal. It ended the tax on property which earlier was the foundation of economy. All this coupled together led to French Revolution and contributed to the growth of the spirit of Nationalism leading to German and Italian unification. American Constitution which is the product of American Revolution is the foundation of many modern democratic Constitutions coming up including the Indian Constitution. Its influence can be seen clearly in the Fundamental rights, the Preamble and the idea of an elected head of the state.
##Question:What were the major reasons for the American revolution? Highlighting the major events that led to the American war of Independence, analyze its impact. (15 marks/250 words)##Answer: Approach:- Write down the reasons behind American Revolution. Discuss the major events which happened. Enumerate the impact of American Revolution with respect to political structure. Answer:- American Revolution was the revolutionary war waged by the 13 American colonies against the British government between the periods of 1765-1783 A.D. The seeds for it were sown in the Seven Year Global war in which the British fought against the French. Reasons for American Revolution:- Mercantile Capitalism – Low import duty on products from England and high tariff on exports. Proclamation of 1763 – It restricted the expansion of the colonies beyond the Appalachian mountain. Role of Intellectuals – Enlightened thinkers like Hobbe and Locke gave theories of social contract, liberty and purpose of government which awakened the masses. Recovery of expenditure of War – Britain asked the colonies to pay the expenses for the 7 year war. No Representation in British Parliament and in deciding economic policies related to the colonies left the people from the colonies frustrated. It gave way to the slogan of “No taxation without representation.” Developments Leading up to American War of Independence:- Stamp Act 1765 was passed by Britain which became a subject of protests for the colonies and led to trade embargo on British imports. Boston Tea Party was the result of Tea act which granted British east India company monopoly on sales of tea in American colonies. Philadelphia Congress of 1774 was organized to oppose the intolerable acts of British Parliament. Attack by Britain – The demands put forth in the Philadelphia congress was not acceptable to the British and they decided to attack the colonies. Declaration of Independence – in 1776 the American colonies declared their independence which also summarized the political philosophy such as all men are born equal. These developments paved the way for the American war of Independence, which eventually came to end with the signing of Treaty of Paris in 1783 and the development and adoption of US constitution. Impact on political structure:- It discarded the notion of kings and US was to be a republic in which the head of the state is elected. It ended the special privileges of certain class of citizen by adopting the concepts of all men are born equal. It ended the tax on property which earlier was the foundation of economy. All this coupled together led to French Revolution and contributed to the growth of the spirit of Nationalism leading to German and Italian unification. American Constitution which is the product of American Revolution is the foundation of many modern democratic Constitutions coming up including the Indian Constitution. Its influence can be seen clearly in the Fundamental rights, the Preamble and the idea of an elected head of the state.
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विगत दो दशकों में सुरक्षा एवं सामरिक सन्दर्भों में भारत-अमेरिका सहयोग निरंतर बढ़ता गया है| स्पष्ट कीजिये |(150 से 200 शब्द/ 10 अंक) In the last two decades, India-US cooperation in security and strategic contexts has steadily increased. Explain. (150 to 200 words/ 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत अमेरिका सम्बन्धों की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में भारत-अमेरिका सुरक्षात्मक एवं सामरिक सहयोग की पहलों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में दोनों के सम्बन्धों की चुनौतियों और उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत की स्वतंत्रता के बाद से लेकर 1990 के दशक तक भारत-अमेरिका सम्बन्ध उतार चढ़ाव भरे रहे हैं| कश्मीर का मुद्दा, बग़दाद पैक्ट, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन, बांग्लादेश की स्वतंत्रता आदि कारकों ने भारत अमेरिका सम्बन्धों को मजबूत नहीं होने दिया था| भारत द्वारा 1990 में LPG मॉडल अपनाने, USSR के विघटन, तालिबान के उदय आदि कारकों ने भारत अमेरिका के मध्य सम्बन्धों को मजबूत किया है| इसके बाद से भारत और अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक सहयोग बढ़ता गया है| सामरिक सहयोग · भारत अमेरिका रक्षा सहयोग के तीन आयाम हैं यथा LEMOA, CISMOA एवं BECA · पिवोट ऑफ़ एशिया पालिसी (यह वस्तुतः एशिया पेसिफिक नीति है ) इसी नीति को ट्रम्प ने 2016 में इंडो-पेसिफिक की नीति के रूप में संबोधित किया है| इस नीति के माध्यम से अमेरिका भारत के सहयोग से अपने हितों की सुरक्षा करने का प्रयास कर रहा है · इसके अतिरिक्त मालाबार अभ्यास, क्वाड के माध्यम से सामरिक सहयोग बना हुआ है · US के सहयोग से भारत MTCR, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप एवं वासेनार का सदस्य बन गया है, इन समूहों का सदस्य चीन नही है|NSG में भारत की सदस्यता के सन्दर्भ में चीन के साथ सौदेबाजी में सहायक होगा डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव · भारत अमेरिका के मध्य वर्ष 2012 में डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव आरम्भ किया गया है · इस पहल के अंतर्गत दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से रक्षा उत्पादन किया जाएगा · LEMOA के माध्यम से दोनों देश एक दूसरे के नौसैनिक अड्डों का पारपरिक उपयोग कर सकेंगे, यह ब्लू अर्थव्यवस्था बनने में सहायक होगा, LEMOA का यह अर्थ नहीं है कि भारत US की युद्ध नीति का विरोध नहीं कर सकता है · दोनों देशों के मध्य CISMOA संचार-सूचना सुरक्षा सहमति समझौता हुआ है यह नौवहन आदि में भारत के लिए सहायक होगा · BECA अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हुआ है, इस के माध्यम से भारत को यह बताना पडेगा कि US द्वारा दी गयी आधुनिक तकनीकों को भारत ने कहाँ कहाँ प्रयुक्त किया है, डिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट · अभी हाल ही में US की सीनेट नेडिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट कानून पारित किया है और यह प्रावधान किया है कि भारत को सुरक्षा के सन्दर्भ में इजराइल एवं अन्य नाटो देशों के जैसा दर्जा दिया जाए| अर्थातUS, भारत को उसी तरह सहयोग करेगा जैसा वह नाटो देशों के साथ करता है · इस स्टेटस से भारत को रक्षा क्षेत्र में शोध एवं विकास,बेहतर समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में सहयोग मिलेगा, · भारत के समक्ष युद्द जैसी स्थिति में अमेरिका से मदद प्राप्त होगी · यह अधिनियम भारत को युरेनियम एंटी टैंक राउंड्स को खरीदने के लिए भारत को सक्षम बनाता है · इस एक्ट के माध्यम से दोनों के सहयोग के संदर्भ में कोई अस्पष्टता नहीं आएगी · यह अधिनियम भारत को पाकिस्तान पर बढ़त प्रदान करता है| यह एक्ट भारत के बढ़ते वैश्विक कद का सूचक है| यह अधिनियम भारत पर किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धताएं नहीं हैं अर्थात भारत को किसी भी प्रकार का वित्तपोषण आदि नहीं करना पडेगा · यह अधिनियम भारत को सामरिक रूप से स्वायत्त रखते हुए भारत को नाटो लाइक स्टेटस दर्जा प्रदान करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विगत दो दशकों में भारत एवं अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक मामलों में सहयोग बढ़ता गया है किन्तु इसके साथ ही दोनों के मध्य पेटेंट विवाद, H1B वीसा विवाद, जलवायु के मुद्दे पर विरोधी मत, CAATSA JCPOA जैसे मुद्दे बने हुए हैं| दोनों को एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखते हुए इन मुद्दों को शीघ्रातिशीघ्र समाधानित करने का प्रयास करना चाहिए|
##Question:विगत दो दशकों में सुरक्षा एवं सामरिक सन्दर्भों में भारत-अमेरिका सहयोग निरंतर बढ़ता गया है| स्पष्ट कीजिये |(150 से 200 शब्द/ 10 अंक) In the last two decades, India-US cooperation in security and strategic contexts has steadily increased. Explain. (150 to 200 words/ 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारत अमेरिका सम्बन्धों की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में भारत-अमेरिका सुरक्षात्मक एवं सामरिक सहयोग की पहलों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में दोनों के सम्बन्धों की चुनौतियों और उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत की स्वतंत्रता के बाद से लेकर 1990 के दशक तक भारत-अमेरिका सम्बन्ध उतार चढ़ाव भरे रहे हैं| कश्मीर का मुद्दा, बग़दाद पैक्ट, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन, बांग्लादेश की स्वतंत्रता आदि कारकों ने भारत अमेरिका सम्बन्धों को मजबूत नहीं होने दिया था| भारत द्वारा 1990 में LPG मॉडल अपनाने, USSR के विघटन, तालिबान के उदय आदि कारकों ने भारत अमेरिका के मध्य सम्बन्धों को मजबूत किया है| इसके बाद से भारत और अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक सहयोग बढ़ता गया है| सामरिक सहयोग · भारत अमेरिका रक्षा सहयोग के तीन आयाम हैं यथा LEMOA, CISMOA एवं BECA · पिवोट ऑफ़ एशिया पालिसी (यह वस्तुतः एशिया पेसिफिक नीति है ) इसी नीति को ट्रम्प ने 2016 में इंडो-पेसिफिक की नीति के रूप में संबोधित किया है| इस नीति के माध्यम से अमेरिका भारत के सहयोग से अपने हितों की सुरक्षा करने का प्रयास कर रहा है · इसके अतिरिक्त मालाबार अभ्यास, क्वाड के माध्यम से सामरिक सहयोग बना हुआ है · US के सहयोग से भारत MTCR, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप एवं वासेनार का सदस्य बन गया है, इन समूहों का सदस्य चीन नही है|NSG में भारत की सदस्यता के सन्दर्भ में चीन के साथ सौदेबाजी में सहायक होगा डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव · भारत अमेरिका के मध्य वर्ष 2012 में डिफेन्स टेक्नोलॉजी एवं ट्रेड इनिशिएटिव आरम्भ किया गया है · इस पहल के अंतर्गत दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से रक्षा उत्पादन किया जाएगा · LEMOA के माध्यम से दोनों देश एक दूसरे के नौसैनिक अड्डों का पारपरिक उपयोग कर सकेंगे, यह ब्लू अर्थव्यवस्था बनने में सहायक होगा, LEMOA का यह अर्थ नहीं है कि भारत US की युद्ध नीति का विरोध नहीं कर सकता है · दोनों देशों के मध्य CISMOA संचार-सूचना सुरक्षा सहमति समझौता हुआ है यह नौवहन आदि में भारत के लिए सहायक होगा · BECA अभी तक हस्ताक्षरित नहीं हुआ है, इस के माध्यम से भारत को यह बताना पडेगा कि US द्वारा दी गयी आधुनिक तकनीकों को भारत ने कहाँ कहाँ प्रयुक्त किया है, डिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट · अभी हाल ही में US की सीनेट नेडिफेन्स ऑथराईजेशन एक्ट कानून पारित किया है और यह प्रावधान किया है कि भारत को सुरक्षा के सन्दर्भ में इजराइल एवं अन्य नाटो देशों के जैसा दर्जा दिया जाए| अर्थातUS, भारत को उसी तरह सहयोग करेगा जैसा वह नाटो देशों के साथ करता है · इस स्टेटस से भारत को रक्षा क्षेत्र में शोध एवं विकास,बेहतर समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में सहयोग मिलेगा, · भारत के समक्ष युद्द जैसी स्थिति में अमेरिका से मदद प्राप्त होगी · यह अधिनियम भारत को युरेनियम एंटी टैंक राउंड्स को खरीदने के लिए भारत को सक्षम बनाता है · इस एक्ट के माध्यम से दोनों के सहयोग के संदर्भ में कोई अस्पष्टता नहीं आएगी · यह अधिनियम भारत को पाकिस्तान पर बढ़त प्रदान करता है| यह एक्ट भारत के बढ़ते वैश्विक कद का सूचक है| यह अधिनियम भारत पर किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धताएं नहीं हैं अर्थात भारत को किसी भी प्रकार का वित्तपोषण आदि नहीं करना पडेगा · यह अधिनियम भारत को सामरिक रूप से स्वायत्त रखते हुए भारत को नाटो लाइक स्टेटस दर्जा प्रदान करता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि विगत दो दशकों में भारत एवं अमेरिका के मध्य सुरक्षा एवं सामरिक मामलों में सहयोग बढ़ता गया है किन्तु इसके साथ ही दोनों के मध्य पेटेंट विवाद, H1B वीसा विवाद, जलवायु के मुद्दे पर विरोधी मत, CAATSA JCPOA जैसे मुद्दे बने हुए हैं| दोनों को एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखते हुए इन मुद्दों को शीघ्रातिशीघ्र समाधानित करने का प्रयास करना चाहिए|
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परिवार संस्थान को परिभाषित करते हुए इसके स्वरुप में निरन्तरता एवं परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये | इसके साथ ही प्रभावी समाजीकरण में इनकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द) Define the family institution and explain the continuity and changes in its form. Also, explain their role in effective socialization (150 to 200 words).
दृष्टिकोण 1- भूमिका में परिवार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में परिवार के स्वरुप में निरन्तरता एवं परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में प्रभावी समाजीकरण में इनकी भूमिका को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये परिवार वह सामाजिक संस्था है जिसमें विवाह, रक्त या गोत्र आधारित सम्बन्धों द्वारा परस्पर अधिकारों एवं कर्तव्यों को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक जीवन को संभव बनाया जाता है| यही कारण है कि परिवार को समाज का सूक्ष्म रूप की संज्ञा दी जाती है|यह परिवार सत्तात्मकता के आधार पर पितृसत्तात्मक, मातृसत्तात्मक या भ्रात्यसत्तात्मक हो सकते हैं| वंश आधारित सामाजिक पहचान के आधार पर पितृवन्शात्मक, मातृवंशात्मक या भ्रात्रवंशात्मक या स्थान पर पितृस्थानिक, मातृस्थानिक एवं भ्रात्रस्थानिक हो सकते हैं| निरन्तरता एवं परिवर्तन · संरचना के आधार पर परिवारों को एकल परिवार या संयुक्त परिवारों में विभक्त किया जा सकता है · एकल परिवार से तात्पर्य पति पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चों के परिवार से है वहीँ संयुक्त परिवार से तात्पर्य विवाह इत्यादि माध्यमों से एकल परिवार के विस्तारण से है · समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के अनुसार एकल परिवारों में एवं संयुक्त परिवारों में एक चक्रीय व्यवस्था दिखाई पड़ती है जिसके कारण मूलतः आर्थिक हैं · औद्योगीकरण से पूर्व परंपरागत समाजों में परिवार आय के स्रोत होते थे अतः संयुक्त परिवारों की तरफ झुकाव अधिक होता था · परन्तु औद्योगीकरण के पश्चात जहाँ एक ओर परिवार के मुख्य प्रकार्यों की प्रभाविता कम हुई वहीँ साथ ही परिवार केवल व्यय के स्रोत बनते प्रतीत हुए अतः एकल परिवारों की ओर झुकाव बढ़ा, · 21 वीं सदी में तेजी से बदल रहे समाज में उत्पन्न सामाजिक असुरक्षा तथा भावनात्मक स्तर पर सुरक्षा की आवश्यकता ने पुनः संयुक्त परिवारों की ओर झुकाव को बढाया है| · इस नए क्रम में बीन-पोल (आवश्यकता के अनुसार आकार लेने वाला) परिवारों का प्रचलन बढ़ा है, यहाँ पर वे भले एक साथ न रहते हों परन्तु सोशल मीडिया, बेहतर यातायात व्यवस्था के फलस्वरूप भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं · ये नए परिवार पहले से अधिक लोकतांत्रिक होते हुए आर्थिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं समाजीकरण में भूमिका · इस सामाजिक संस्थान के रूप में परिवार के मुख्य प्रकार्य संतान उत्पत्ति एवं उनकी देखरेख, आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक सहयोग तथा श्रम विभाजन, सामाजिक नियंत्रण एवं सामाजिक स्तरीकरण, भावनात्मक सुरक्षा, प्रभावी समाजीकरणआदि हैं| · किसी भी समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह अति अनिवार्य होता है कि समाज के नियमों के प्रति ज्ञान एवं विश्वास स्थापित हो, यह तभी संभव है जबकि इन सन्दर्भों में उनका प्रभावी समाजीकरण किया गया हो · परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया में सामान्य शिष्टाचार के साथ ही अनुशासन, नियमों का अनुपालन, प्रारम्भिक अभिवृत्ति का निर्माण, बेहतर निर्णयन, सामान्य नैतिक नियम आदि को सिखाने में महत्वपूर्ण होता है · यही कारण है कि परिवार को विशेष कर प्रारम्भिक आयु में तथा वयस्कता के समय एक अति महत्वपूर्ण सामाजिक घटक माना गया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि परिवार की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ रहे हैं लेकिन बच्चों के प्रभावी समाजीकरण में परिवार अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है| समकालीन अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान बेहतर समाजीकरण को माना जाता है अतः परिवार इस रूप में महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था बना रहेगा|
##Question:परिवार संस्थान को परिभाषित करते हुए इसके स्वरुप में निरन्तरता एवं परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये | इसके साथ ही प्रभावी समाजीकरण में इनकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द) Define the family institution and explain the continuity and changes in its form. Also, explain their role in effective socialization (150 to 200 words).##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में परिवार को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम खंड में परिवार के स्वरुप में निरन्तरता एवं परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में प्रभावी समाजीकरण में इनकी भूमिका को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये परिवार वह सामाजिक संस्था है जिसमें विवाह, रक्त या गोत्र आधारित सम्बन्धों द्वारा परस्पर अधिकारों एवं कर्तव्यों को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक जीवन को संभव बनाया जाता है| यही कारण है कि परिवार को समाज का सूक्ष्म रूप की संज्ञा दी जाती है|यह परिवार सत्तात्मकता के आधार पर पितृसत्तात्मक, मातृसत्तात्मक या भ्रात्यसत्तात्मक हो सकते हैं| वंश आधारित सामाजिक पहचान के आधार पर पितृवन्शात्मक, मातृवंशात्मक या भ्रात्रवंशात्मक या स्थान पर पितृस्थानिक, मातृस्थानिक एवं भ्रात्रस्थानिक हो सकते हैं| निरन्तरता एवं परिवर्तन · संरचना के आधार पर परिवारों को एकल परिवार या संयुक्त परिवारों में विभक्त किया जा सकता है · एकल परिवार से तात्पर्य पति पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चों के परिवार से है वहीँ संयुक्त परिवार से तात्पर्य विवाह इत्यादि माध्यमों से एकल परिवार के विस्तारण से है · समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के अनुसार एकल परिवारों में एवं संयुक्त परिवारों में एक चक्रीय व्यवस्था दिखाई पड़ती है जिसके कारण मूलतः आर्थिक हैं · औद्योगीकरण से पूर्व परंपरागत समाजों में परिवार आय के स्रोत होते थे अतः संयुक्त परिवारों की तरफ झुकाव अधिक होता था · परन्तु औद्योगीकरण के पश्चात जहाँ एक ओर परिवार के मुख्य प्रकार्यों की प्रभाविता कम हुई वहीँ साथ ही परिवार केवल व्यय के स्रोत बनते प्रतीत हुए अतः एकल परिवारों की ओर झुकाव बढ़ा, · 21 वीं सदी में तेजी से बदल रहे समाज में उत्पन्न सामाजिक असुरक्षा तथा भावनात्मक स्तर पर सुरक्षा की आवश्यकता ने पुनः संयुक्त परिवारों की ओर झुकाव को बढाया है| · इस नए क्रम में बीन-पोल (आवश्यकता के अनुसार आकार लेने वाला) परिवारों का प्रचलन बढ़ा है, यहाँ पर वे भले एक साथ न रहते हों परन्तु सोशल मीडिया, बेहतर यातायात व्यवस्था के फलस्वरूप भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं · ये नए परिवार पहले से अधिक लोकतांत्रिक होते हुए आर्थिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं समाजीकरण में भूमिका · इस सामाजिक संस्थान के रूप में परिवार के मुख्य प्रकार्य संतान उत्पत्ति एवं उनकी देखरेख, आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक सहयोग तथा श्रम विभाजन, सामाजिक नियंत्रण एवं सामाजिक स्तरीकरण, भावनात्मक सुरक्षा, प्रभावी समाजीकरणआदि हैं| · किसी भी समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह अति अनिवार्य होता है कि समाज के नियमों के प्रति ज्ञान एवं विश्वास स्थापित हो, यह तभी संभव है जबकि इन सन्दर्भों में उनका प्रभावी समाजीकरण किया गया हो · परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया में सामान्य शिष्टाचार के साथ ही अनुशासन, नियमों का अनुपालन, प्रारम्भिक अभिवृत्ति का निर्माण, बेहतर निर्णयन, सामान्य नैतिक नियम आदि को सिखाने में महत्वपूर्ण होता है · यही कारण है कि परिवार को विशेष कर प्रारम्भिक आयु में तथा वयस्कता के समय एक अति महत्वपूर्ण सामाजिक घटक माना गया है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि परिवार की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ रहे हैं लेकिन बच्चों के प्रभावी समाजीकरण में परिवार अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है| समकालीन अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान बेहतर समाजीकरण को माना जाता है अतः परिवार इस रूप में महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था बना रहेगा|
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संसद में विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में विभिन्न प्रकार के विधेयकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। इसके साथ ही साधारण विधेयक एवं संविधान संशोधन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) Briefly describe different types of bills in the context of legislative process in parliament. Also, clarify the difference in the ordinary bill and constitution amendment bill. (150- 200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसद में प्रस्तुत विधेयकों का परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिये। साधारण एवं संविधान संशोधन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिये। विधायी प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में सम्पन्न होती है। प्रत्येक सदन में विधेयक विभिन्न चरणों से गुजरता है। संसद में प्रस्तुत होने वाले विधेयकों को निम्न चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: साधारण विधेयक: वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी विषयों से सम्बद्ध विधेयक साधारण विधेयक कहलाते हैं। धन विधेयक: ये विधेयक वित्तीय विषयों जैसे -करारोपण, लोक व्यय इत्यादि से संबन्धित होते हैं। वित्त विधेयक: ये विधेयक भी वित्तीय विषयों से ही संबन्धित होते हैं परंतु धन विधेयक से भिन्न होते हैं। संविधान संशोधन विधेयक: ये विधेयक संविधान उपबंधों में संशोधन से संबन्धित होते हैं। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जाता है। साधारण विधेयक एवं संविधान संशोधन विधेयक में अंतर: संविधान संशोधन विधेयक अनुच्छेद 368 के अंतर्गत एक संशोधन माना जाता है। जबकि साधारण विधेयक में ऐसा नहीं है। साधारण विधेयक के विपरीत संविधान संशोधन विधेयक में संयुक्त बैठक जैसी व्यवस्था नहीं है। संविधान संशोधन विधेयक केवल केंद्र सरकार प्रस्तुत करती है जबकि साधारण विधेयक राज्य विधायिका में भी प्रस्तुत किया जा सकता है। साधारण विधेयक के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती है। साधारण विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित करवाने की आवश्यकता होती है जबकि संविधान संशोधन विधेयक के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभा की भी सहमति आवश्यक होती है।
##Question:संसद में विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में विभिन्न प्रकार के विधेयकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। इसके साथ ही साधारण विधेयक एवं संविधान संशोधन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) Briefly describe different types of bills in the context of legislative process in parliament. Also, clarify the difference in the ordinary bill and constitution amendment bill. (150- 200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसद में प्रस्तुत विधेयकों का परिचय देते हुए उत्तर आरंभ कीजिये। साधारण एवं संविधान संशोधन विधेयक में अंतर स्पष्ट कीजिये। विधायी प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में सम्पन्न होती है। प्रत्येक सदन में विधेयक विभिन्न चरणों से गुजरता है। संसद में प्रस्तुत होने वाले विधेयकों को निम्न चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: साधारण विधेयक: वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी विषयों से सम्बद्ध विधेयक साधारण विधेयक कहलाते हैं। धन विधेयक: ये विधेयक वित्तीय विषयों जैसे -करारोपण, लोक व्यय इत्यादि से संबन्धित होते हैं। वित्त विधेयक: ये विधेयक भी वित्तीय विषयों से ही संबन्धित होते हैं परंतु धन विधेयक से भिन्न होते हैं। संविधान संशोधन विधेयक: ये विधेयक संविधान उपबंधों में संशोधन से संबन्धित होते हैं। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जाता है। साधारण विधेयक एवं संविधान संशोधन विधेयक में अंतर: संविधान संशोधन विधेयक अनुच्छेद 368 के अंतर्गत एक संशोधन माना जाता है। जबकि साधारण विधेयक में ऐसा नहीं है। साधारण विधेयक के विपरीत संविधान संशोधन विधेयक में संयुक्त बैठक जैसी व्यवस्था नहीं है। संविधान संशोधन विधेयक केवल केंद्र सरकार प्रस्तुत करती है जबकि साधारण विधेयक राज्य विधायिका में भी प्रस्तुत किया जा सकता है। साधारण विधेयक के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती है। साधारण विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित करवाने की आवश्यकता होती है जबकि संविधान संशोधन विधेयक के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभा की भी सहमति आवश्यक होती है।
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सहायक संधि क्या है ? इसके प्रावधानों और इससे अंग्रेजों को प्राप्त लाभों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) What is the subsidiary alliance? Discuss its provisions and the benefits received by the British. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में सहायक संधि को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सहायक संधियों के प्रावधानों की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में सहायक संधि से अंग्रेजों के प्राप्त लागों की चर्चा कीजिये 4- साम्राज्य विस्तार के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण प्रणाली होने का सन्दर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में सहायक संधि का जनक डुप्ले को माना जाता है जबकि अंग्रेजों की तरफ से सर्वप्रथम क्लाइव ने अवध के साथ सहायक संधि की| भारत में विस्तार के क्रम में सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारतीय राज्यों को अंग्रेजों पर निर्भर बनाने के सन्दर्भ में मुख्यतःसहायक संधि प्रणाली कीचर्चा होती है| संधियों के प्रावधान संधिकर्ता राज्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी अंग्रेजों पर होगी इसके प्रतिफल में एक संप्रभुता युक्त भूभाग अंग्रेजो को दिया गया प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट रखने का प्रावधान किया गया यह रेजिडेंट आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा ऐसा प्रावधान किया गया संधिकर्ता राज्यों की विदेश नीति कम्पनी के द्वारा संचालित होगी कम्पनी की अनुमति के बिना निर्भर राज्य किसी यूरोपियन या अमेरिकन को अपनी सेवा में नहीं रखेंगे सहायक संधि से अंग्रेजों को लाभ साम्राज्य विस्तार में सहजता हुई और बड़े साम्राज्य का निर्माण हुआ निर्भर राज्यों के आंतरिक मामलों पर रेजिडेंट के माध्यम से नियंत्रण स्थापित हुआ विदेश नीति पर नियंत्रण स्थापित कर निर्भर राज्यों को ब्रिटिश विरोधी गठबन्धन बनाने से रोका, इतना ही नहीं यूरोप एवं अमेरिका के सभावित शत्रुओं से भी अंग्रेजों ने इन्हें अलग रखाभारतीय प्रजा एवं अन्य राज्यों के विरुद्ध अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए इनका उपयोग किया प्रायः संप्रभुता युक्त भू भाग के रूप में आर्थिक एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थानों पर नियंत्रण किया गया भारतीय राजस्व के आधार पर ही अंग्रेज एक विशाल सेना का गठन करने में सफल रहे इस सेना के माध्यम से भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार एवं सुरक्षा सुनिश्चित की गयी अंतत: अधिकांशतः निर्भर राज्यों का भी आगे चल कर ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया वेलेजली ने भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए इस सहायक संधि प्रणाली का सर्वाधिक प्रयोग किया और भारतीय राज्यों से सुरक्षा के बदले धन न लेकर संप्रभुता युक्त भू-भाग लेना प्रारम्भ किया| वेलेजली ने हैदराबाद(1798 एवं 1799)मैसूर, तंजौर,अवध, पेशवा(मराठा), भोसले, सिंधिया इत्यादि राज्यों से सहायक संधि हुई| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सहायक संधि प्रणाली ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया|
##Question:सहायक संधि क्या है ? इसके प्रावधानों और इससे अंग्रेजों को प्राप्त लाभों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) What is the subsidiary alliance? Discuss its provisions and the benefits received by the British. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सहायक संधि को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सहायक संधियों के प्रावधानों की चर्चा कीजिये 3- दुसरे भाग में सहायक संधि से अंग्रेजों के प्राप्त लागों की चर्चा कीजिये 4- साम्राज्य विस्तार के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण प्रणाली होने का सन्दर्भ देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भारत में सहायक संधि का जनक डुप्ले को माना जाता है जबकि अंग्रेजों की तरफ से सर्वप्रथम क्लाइव ने अवध के साथ सहायक संधि की| भारत में विस्तार के क्रम में सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारतीय राज्यों को अंग्रेजों पर निर्भर बनाने के सन्दर्भ में मुख्यतःसहायक संधि प्रणाली कीचर्चा होती है| संधियों के प्रावधान संधिकर्ता राज्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी अंग्रेजों पर होगी इसके प्रतिफल में एक संप्रभुता युक्त भूभाग अंग्रेजो को दिया गया प्रत्येक राज्य में एक ब्रिटिश रेजिडेंट रखने का प्रावधान किया गया यह रेजिडेंट आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा ऐसा प्रावधान किया गया संधिकर्ता राज्यों की विदेश नीति कम्पनी के द्वारा संचालित होगी कम्पनी की अनुमति के बिना निर्भर राज्य किसी यूरोपियन या अमेरिकन को अपनी सेवा में नहीं रखेंगे सहायक संधि से अंग्रेजों को लाभ साम्राज्य विस्तार में सहजता हुई और बड़े साम्राज्य का निर्माण हुआ निर्भर राज्यों के आंतरिक मामलों पर रेजिडेंट के माध्यम से नियंत्रण स्थापित हुआ विदेश नीति पर नियंत्रण स्थापित कर निर्भर राज्यों को ब्रिटिश विरोधी गठबन्धन बनाने से रोका, इतना ही नहीं यूरोप एवं अमेरिका के सभावित शत्रुओं से भी अंग्रेजों ने इन्हें अलग रखाभारतीय प्रजा एवं अन्य राज्यों के विरुद्ध अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए इनका उपयोग किया प्रायः संप्रभुता युक्त भू भाग के रूप में आर्थिक एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थानों पर नियंत्रण किया गया भारतीय राजस्व के आधार पर ही अंग्रेज एक विशाल सेना का गठन करने में सफल रहे इस सेना के माध्यम से भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार एवं सुरक्षा सुनिश्चित की गयी अंतत: अधिकांशतः निर्भर राज्यों का भी आगे चल कर ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया वेलेजली ने भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए इस सहायक संधि प्रणाली का सर्वाधिक प्रयोग किया और भारतीय राज्यों से सुरक्षा के बदले धन न लेकर संप्रभुता युक्त भू-भाग लेना प्रारम्भ किया| वेलेजली ने हैदराबाद(1798 एवं 1799)मैसूर, तंजौर,अवध, पेशवा(मराठा), भोसले, सिंधिया इत्यादि राज्यों से सहायक संधि हुई| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सहायक संधि प्रणाली ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया|
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जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के उन्मूलन में भारतीय नीति/उठाये जा रहे क़दमों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिये| साथ ही, वहां आतंकवाद के उन्मूलन हेतु कुछ सुझाव दीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the Obstacles in the implementation of Indian Policy/Steps being taken in the elimination of Terrorism in Jammu and Kashmir. Also, Give some Suggestions for Eradication of Terrorism in context of Jammu and Kashmir. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- जम्मूकश्मीर में आतंकवाद की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के उन्मूलन में भारतीय नीति/उठाये जा रहे क़दमों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, इन नीतियों/क़दमोंके क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,वहां आतंकवाद के उन्मूलन हेतु कुछ सुझाव दीजिये| उत्तर- जम्मूकश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप तथा सीमापारीय आतंकवाद वहां आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है| कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे, 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में घटित कुछ राजनैतिक कारणों आदि के फलस्वरूप वहां आतंकवाद की जड़ें फैलीं थीं जिसका व्यापक प्रभाव अभी तक देखा जाता है| साथ ही, जम्मूकश्मीर में आतंकवाद के आंतरिक आयामों में धर्म और क्षेत्र के साथ-साथ बहु-नृजातीयता, बहु-सांस्कृतिक तथा राजनैतिक मुद्दें , अलगाववादी तथा चरमपंथी जैसे कारकों का भी अहम् रोल है| आतंकवाद उन्मूलन में भारतीय नीति/उठाये जा रहे कदम- अनुच्छेद 370 तथा 35(A) का उन्मूलन; चरमपंथ का उन्मूलन; गजवा-ए-हिंद, वहाबी विचारधारा का प्रसार को रोकना; आतंकवाद के उन्मूलन हेतु सैन्य कार्यवाहियां - बुलेट, पैलेट तथा गिरफ्तारी की नीति; सशक्त सैन्य कार्यवाही- ऑपरेशन रक्षक(जून 1980); ऑपरेशन सर्पविनाश(2003); ऑपरेशन काउंटडाउन(2016); ऑपरेशन ऑलआउट(2017); सर्जिकल स्ट्राइक(2016); एयर स्ट्राइक(फ़रवरी, 2019) ; विकासोन्मुखी कार्यक्रम - 2004 में PMIP; रेल नेटवर्क; प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम; उड़ान तथा उम्मीद कार्यक्रम; हिमायत; जुड़ाव के लिए भारत-दर्शन; अंतर्राष्ट्रीय दबाव; अफ-पाक नीति से पाक-अफ नीति; मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करना; अमेरिका का सहयोग; अफगान कूटनीति तथा बलूच कूटनीति से दबाव बनाने की नीति; अलगाववादियों पर शिकंजा; हाउस अरेस्ट; गिरफ्तारी; क्षेत्रीय दलों की अलगाववादी प्रवृतियों पर नियंत्रण; खातों पर रोक; भारतीय नीति/उठाये जा रहे कदमोंके क्रियान्वयन में आने वालीबाधाएं- अलगाववादियों की मौजूदगी तथा उनका प्रभाव कम करने की चुनौती; अनुच्छेद 370 तथा 35(A) का उन्मूलन के पश्चात स्थिरीकरण और सक्रीय क्रियान्वयन की आवश्यकता; लोगों के बीच मतांतर; गुजराल डॉक्ट्रिन को छोड़ना; सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार; मानवीय पक्ष के साथ आतंकवाद विरोधी अभियानों का संचालन; आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों के पुनर्वास का मुद्दा; कश्मीरी पंडितों तथा अन्य विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास का मुद्दा; कट्टरपंथी तत्वों के प्रति आम जनता तथा युवाओं के मन में सहानुभूति को रोकने की चुनौती; आतंकवाद उन्मूलन हेतु कुछ सुझाव- राज्य तथा गैर-राज्य कर्ताओं के मध्य निरंतर वार्ता; नीतियों एवं कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन; कश्मीर में राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया जाना; वहाबी विचारधारा के शैक्षिक केंद्रों पर भी राज्य का नियमन होना; सिंधु जलसंधि की पुनर्समीक्षा जैसे क़दमों से पाकिस्तान पर दबाव का निर्माण; अलगाववादियों पर पूर्ण नियंत्रण; पाकिस्तान के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय दबाव की निरंतरता तथा तीव्रता में वृद्धि करना; आर्थिक दबाव को बढ़ाना; कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास; विसैन्यीकरण को प्रोत्साहन; युवाओं को रचनात्मक कार्यों में लगाना;
##Question:जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के उन्मूलन में भारतीय नीति/उठाये जा रहे क़दमों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिये| साथ ही, वहां आतंकवाद के उन्मूलन हेतु कुछ सुझाव दीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention the Obstacles in the implementation of Indian Policy/Steps being taken in the elimination of Terrorism in Jammu and Kashmir. Also, Give some Suggestions for Eradication of Terrorism in context of Jammu and Kashmir. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- जम्मूकश्मीर में आतंकवाद की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के उन्मूलन में भारतीय नीति/उठाये जा रहे क़दमों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, इन नीतियों/क़दमोंके क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,वहां आतंकवाद के उन्मूलन हेतु कुछ सुझाव दीजिये| उत्तर- जम्मूकश्मीर में पाकिस्तानी हस्तक्षेप तथा सीमापारीय आतंकवाद वहां आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है| कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे, 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में घटित कुछ राजनैतिक कारणों आदि के फलस्वरूप वहां आतंकवाद की जड़ें फैलीं थीं जिसका व्यापक प्रभाव अभी तक देखा जाता है| साथ ही, जम्मूकश्मीर में आतंकवाद के आंतरिक आयामों में धर्म और क्षेत्र के साथ-साथ बहु-नृजातीयता, बहु-सांस्कृतिक तथा राजनैतिक मुद्दें , अलगाववादी तथा चरमपंथी जैसे कारकों का भी अहम् रोल है| आतंकवाद उन्मूलन में भारतीय नीति/उठाये जा रहे कदम- अनुच्छेद 370 तथा 35(A) का उन्मूलन; चरमपंथ का उन्मूलन; गजवा-ए-हिंद, वहाबी विचारधारा का प्रसार को रोकना; आतंकवाद के उन्मूलन हेतु सैन्य कार्यवाहियां - बुलेट, पैलेट तथा गिरफ्तारी की नीति; सशक्त सैन्य कार्यवाही- ऑपरेशन रक्षक(जून 1980); ऑपरेशन सर्पविनाश(2003); ऑपरेशन काउंटडाउन(2016); ऑपरेशन ऑलआउट(2017); सर्जिकल स्ट्राइक(2016); एयर स्ट्राइक(फ़रवरी, 2019) ; विकासोन्मुखी कार्यक्रम - 2004 में PMIP; रेल नेटवर्क; प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम; उड़ान तथा उम्मीद कार्यक्रम; हिमायत; जुड़ाव के लिए भारत-दर्शन; अंतर्राष्ट्रीय दबाव; अफ-पाक नीति से पाक-अफ नीति; मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करना; अमेरिका का सहयोग; अफगान कूटनीति तथा बलूच कूटनीति से दबाव बनाने की नीति; अलगाववादियों पर शिकंजा; हाउस अरेस्ट; गिरफ्तारी; क्षेत्रीय दलों की अलगाववादी प्रवृतियों पर नियंत्रण; खातों पर रोक; भारतीय नीति/उठाये जा रहे कदमोंके क्रियान्वयन में आने वालीबाधाएं- अलगाववादियों की मौजूदगी तथा उनका प्रभाव कम करने की चुनौती; अनुच्छेद 370 तथा 35(A) का उन्मूलन के पश्चात स्थिरीकरण और सक्रीय क्रियान्वयन की आवश्यकता; लोगों के बीच मतांतर; गुजराल डॉक्ट्रिन को छोड़ना; सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार; मानवीय पक्ष के साथ आतंकवाद विरोधी अभियानों का संचालन; आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों के पुनर्वास का मुद्दा; कश्मीरी पंडितों तथा अन्य विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास का मुद्दा; कट्टरपंथी तत्वों के प्रति आम जनता तथा युवाओं के मन में सहानुभूति को रोकने की चुनौती; आतंकवाद उन्मूलन हेतु कुछ सुझाव- राज्य तथा गैर-राज्य कर्ताओं के मध्य निरंतर वार्ता; नीतियों एवं कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन; कश्मीर में राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया जाना; वहाबी विचारधारा के शैक्षिक केंद्रों पर भी राज्य का नियमन होना; सिंधु जलसंधि की पुनर्समीक्षा जैसे क़दमों से पाकिस्तान पर दबाव का निर्माण; अलगाववादियों पर पूर्ण नियंत्रण; पाकिस्तान के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय दबाव की निरंतरता तथा तीव्रता में वृद्धि करना; आर्थिक दबाव को बढ़ाना; कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास; विसैन्यीकरण को प्रोत्साहन; युवाओं को रचनात्मक कार्यों में लगाना;
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भारत में गरीबी और विकासात्मक मुद्दे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस कथन की व्याख्या करते हुए गरीबी के आकलन लिए गठित विभिन्न समितियों के निष्कर्षों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (150-200 शब्द) Poverty and developmental issues in India are interlinked. Explain this statement and give a brief description of the findings of various committees constituted for the assessment of poverty. (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में गरीबी को परिभाषित कर सकते हैं। उत्तर के प्रथम भाग में पहले कथन की व्याख्या कीजिए। इसके बाद विभिन्न समितियों का उदाहरण देते हुए निष्कर्षों को लिखिए। गरीबी से आशय जीवन की कुछ निर्दिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति से वंचित रहने से है। गरीबी को आय व मानव गरीबी के रूप में आकलित किया जाता है। आय का निम्न स्तर आय गरीबी का एक कारण माना जाता है। मानव गरीबी से आशय है एक सार्थक जीवन जीने से वंचित रहना। भारत के संदर्भ में यदि सामाजिक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो अपता चलता है की गरीबी ने विकास को बाधित किया है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं: भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अधिकांश जनसंख्या की आय निम्न है। ग्रामीण गरीबी का यह एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसे में विकास के अवसरों का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरकार का अधिकांश व्यय सार्वजनिक व्यय के रूप में होता है। इसलिए उन मुद्दों पर कम ध्यान दिया जाता है जो विकास को बढ़ावा दे सके। आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति पर अधिक केन्द्रित रहने से उद्योगों को आवश्यकतानुसार महत्व नहीं दिया गया है। इसके कारण विकास तो प्रभावित हुआ ही है साथ में गरीबी भी बढ़ी है। गरीबी ने ग्रामीण जनसंख्या को उनके अधिकारों से वंचित किया है। ऐसे में विकास के लिए जो प्रयास किया भी जा रहा है उसका लाभ उन लोगों तक नहीं पहुँच रहा है। आर्थिक संवृद्धि का केन्द्रीकरण आर्थिक असमानता को बढ़ावा देता है। निर्धनता में वृद्धि के लिए यह कारक भी जिम्मेदार है। गरीबी के आकलन के लिए गठित विभिन्न समितियों के निष्कर्ष: तेंदुलर समिति: गरीबी रेखा का निर्धारण बुनियादी आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी संरचना, स्वच्छ वातावरण आदि के आधार पर होगा। समिति ने ग्रामीण क्षेत्र के लिए 446.68 रुपया प्रति व्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्र के लिए इसे 578.80 रुपया मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग रखा। इनके अनुसार 2004-05 में ग्रामीण जनसंख्या का 41.8% तथा शहरी जनसंख्या का 25.7% गरीबी रेखा के नीचे था। सम्पूर्ण गरीबी का प्रतिशत 37.2% था। रंगराजन समिति: ग्रामीण क्षेत्र के लिए 972 रुपया एवं शहरी क्षेत्र के लिए 1407 रुपया प्रतिव्यक्ति मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा के रूप में परिभाषित किया गया। 2011-12 के लिए अखिल भारत स्तर पर गरीबी अनुपात 29.5% का अनुमान लगाया गया। ग्रामीण जनसंख्या का 30.5% तथा शहरी जनसंख्या का 26.4% गरीबी रेखा से नीचे था। सक्सेना समिति: सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना बनाने की सिफ़ारिश गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या अधिक कर दी जानी चाहिए।
##Question:भारत में गरीबी और विकासात्मक मुद्दे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस कथन की व्याख्या करते हुए गरीबी के आकलन लिए गठित विभिन्न समितियों के निष्कर्षों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (150-200 शब्द) Poverty and developmental issues in India are interlinked. Explain this statement and give a brief description of the findings of various committees constituted for the assessment of poverty. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में गरीबी को परिभाषित कर सकते हैं। उत्तर के प्रथम भाग में पहले कथन की व्याख्या कीजिए। इसके बाद विभिन्न समितियों का उदाहरण देते हुए निष्कर्षों को लिखिए। गरीबी से आशय जीवन की कुछ निर्दिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति से वंचित रहने से है। गरीबी को आय व मानव गरीबी के रूप में आकलित किया जाता है। आय का निम्न स्तर आय गरीबी का एक कारण माना जाता है। मानव गरीबी से आशय है एक सार्थक जीवन जीने से वंचित रहना। भारत के संदर्भ में यदि सामाजिक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो अपता चलता है की गरीबी ने विकास को बाधित किया है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं: भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अधिकांश जनसंख्या की आय निम्न है। ग्रामीण गरीबी का यह एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसे में विकास के अवसरों का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरकार का अधिकांश व्यय सार्वजनिक व्यय के रूप में होता है। इसलिए उन मुद्दों पर कम ध्यान दिया जाता है जो विकास को बढ़ावा दे सके। आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति पर अधिक केन्द्रित रहने से उद्योगों को आवश्यकतानुसार महत्व नहीं दिया गया है। इसके कारण विकास तो प्रभावित हुआ ही है साथ में गरीबी भी बढ़ी है। गरीबी ने ग्रामीण जनसंख्या को उनके अधिकारों से वंचित किया है। ऐसे में विकास के लिए जो प्रयास किया भी जा रहा है उसका लाभ उन लोगों तक नहीं पहुँच रहा है। आर्थिक संवृद्धि का केन्द्रीकरण आर्थिक असमानता को बढ़ावा देता है। निर्धनता में वृद्धि के लिए यह कारक भी जिम्मेदार है। गरीबी के आकलन के लिए गठित विभिन्न समितियों के निष्कर्ष: तेंदुलर समिति: गरीबी रेखा का निर्धारण बुनियादी आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी संरचना, स्वच्छ वातावरण आदि के आधार पर होगा। समिति ने ग्रामीण क्षेत्र के लिए 446.68 रुपया प्रति व्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्र के लिए इसे 578.80 रुपया मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग रखा। इनके अनुसार 2004-05 में ग्रामीण जनसंख्या का 41.8% तथा शहरी जनसंख्या का 25.7% गरीबी रेखा के नीचे था। सम्पूर्ण गरीबी का प्रतिशत 37.2% था। रंगराजन समिति: ग्रामीण क्षेत्र के लिए 972 रुपया एवं शहरी क्षेत्र के लिए 1407 रुपया प्रतिव्यक्ति मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा के रूप में परिभाषित किया गया। 2011-12 के लिए अखिल भारत स्तर पर गरीबी अनुपात 29.5% का अनुमान लगाया गया। ग्रामीण जनसंख्या का 30.5% तथा शहरी जनसंख्या का 26.4% गरीबी रेखा से नीचे था। सक्सेना समिति: सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना बनाने की सिफ़ारिश गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या अधिक कर दी जानी चाहिए।
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India"s Manufacturing sector did not grow as expected. In this regard highlights the favorable circumstances present in India to support Industrial growth. Also, Elaborate on the challenges to industrial growth. Suggest the way forward. (250 words/15 marks)
Approach: • Briefly explain about the Industrial Growth as Intro • Highlight the Opportunities for the Indian Industry in the current economic scenario: • Write about Challenges to Industrial Growth • Way forward Answer Despite being one the fastest growing economies, the striking aspect of India’s recent growth has been the dynamism of the service sector. While, manufacturing has been much less robust, contrary to the experience in other emerging market countries, where manufacturing has grown much faster than GDP. The industrial sector performance during 2018-19 has improved as compared to 2017-18. The growth of industry real Gross Value Added (GVA) was higher at 6.9 per cent in 2018-19 as compared to 5.9 per cent in 2017- 18. Opportunities for the Indian Industry in the current economic scenario : India continues to be a low-cost economy. India has a relatively higher proportion of the youth population. India is continuously rated as a top investment destination. FDI inflow helps to not only meet the gap in domestic savings but also facilitate benefits in terms of managerial and technological skills. India continues to have a dominating position in the IT sector. Its dominance at present is in software services. It can avail the opportunity of having dominance in hardware as well. A tax reform, GST will turn India into one common market for producers and consumers. It will also probably bring an end to the practice of cherry-picking by the industries which were enjoyed by them on account of area-based exemptions offered by the State Governments and build up a uniform business environment across the country. Challenges to Industrial Growth • Inadequate infrastructure: Physical infrastructure in India suffers from substantial deficits in terms of capacities as well as efficiencies. • Restrictive labour laws: It discourages employers from hiring workers on a regular basis. It has probably also led to entrepreneurs choosing to stay away from labour-intensive sectors. • Complicated business environment: which adversely affects competitiveness of manufacturing. • Slow technology adoption: this has led to low productivity and higher costs adding to the disadvantage of Indian products in international markets. • Low productivity: Productivity as measured by value-added per worker and average wages in manufacturing in India is only one-third of that in China. • Challenges for trade: challenges of stagnant/shrinking global demand, tough competition from cheap imports (China) and rising protectionist tendencies around the world. • Inadequate expenditure on R&D and innovation is also to be understood that these factors work in tandem to increase costs of goods and services. They are strongly entwined, one feeds into another thereby exacerbating the disadvantages. The nexus needs to be broken at more than one link to ensure that the spin-off is in the positive direction. Way Forward: Research and Development: The R&D in industrial sector needs to be institutionalised and greater connect with universities/IITs needs to be explored by industries • IPR Framework- It must ensure that no higher IP standards of protection may be agreed to other than those included in TRIPS. • National Manufacturing Policy - It should be reoriented to promote smart manufacturing whereby zero emission, zero incident, zero-defect manufacturing becomes the order of the day. -Revisit Technology Acquisition and Development Fund (TADF) framework to facilitate smooth induction of smarter industrial processes and sustainable practices in our manufacturing sector to make it smart and ready to enter the Fourth Industrial Revolution. -Revive the investments in capital goods industries. • MSME Sector - Access to information, simplification of loan procedures and interest subvention should be enabled for timely and affordable credit to MSMEs • Labour and Industrial growth- Reduction and simplification of the plethora of laws existing in the labour sector.
##Question:India"s Manufacturing sector did not grow as expected. In this regard highlights the favorable circumstances present in India to support Industrial growth. Also, Elaborate on the challenges to industrial growth. Suggest the way forward. (250 words/15 marks)##Answer:Approach: • Briefly explain about the Industrial Growth as Intro • Highlight the Opportunities for the Indian Industry in the current economic scenario: • Write about Challenges to Industrial Growth • Way forward Answer Despite being one the fastest growing economies, the striking aspect of India’s recent growth has been the dynamism of the service sector. While, manufacturing has been much less robust, contrary to the experience in other emerging market countries, where manufacturing has grown much faster than GDP. The industrial sector performance during 2018-19 has improved as compared to 2017-18. The growth of industry real Gross Value Added (GVA) was higher at 6.9 per cent in 2018-19 as compared to 5.9 per cent in 2017- 18. Opportunities for the Indian Industry in the current economic scenario : India continues to be a low-cost economy. India has a relatively higher proportion of the youth population. India is continuously rated as a top investment destination. FDI inflow helps to not only meet the gap in domestic savings but also facilitate benefits in terms of managerial and technological skills. India continues to have a dominating position in the IT sector. Its dominance at present is in software services. It can avail the opportunity of having dominance in hardware as well. A tax reform, GST will turn India into one common market for producers and consumers. It will also probably bring an end to the practice of cherry-picking by the industries which were enjoyed by them on account of area-based exemptions offered by the State Governments and build up a uniform business environment across the country. Challenges to Industrial Growth • Inadequate infrastructure: Physical infrastructure in India suffers from substantial deficits in terms of capacities as well as efficiencies. • Restrictive labour laws: It discourages employers from hiring workers on a regular basis. It has probably also led to entrepreneurs choosing to stay away from labour-intensive sectors. • Complicated business environment: which adversely affects competitiveness of manufacturing. • Slow technology adoption: this has led to low productivity and higher costs adding to the disadvantage of Indian products in international markets. • Low productivity: Productivity as measured by value-added per worker and average wages in manufacturing in India is only one-third of that in China. • Challenges for trade: challenges of stagnant/shrinking global demand, tough competition from cheap imports (China) and rising protectionist tendencies around the world. • Inadequate expenditure on R&D and innovation is also to be understood that these factors work in tandem to increase costs of goods and services. They are strongly entwined, one feeds into another thereby exacerbating the disadvantages. The nexus needs to be broken at more than one link to ensure that the spin-off is in the positive direction. Way Forward: Research and Development: The R&D in industrial sector needs to be institutionalised and greater connect with universities/IITs needs to be explored by industries • IPR Framework- It must ensure that no higher IP standards of protection may be agreed to other than those included in TRIPS. • National Manufacturing Policy - It should be reoriented to promote smart manufacturing whereby zero emission, zero incident, zero-defect manufacturing becomes the order of the day. -Revisit Technology Acquisition and Development Fund (TADF) framework to facilitate smooth induction of smarter industrial processes and sustainable practices in our manufacturing sector to make it smart and ready to enter the Fourth Industrial Revolution. -Revive the investments in capital goods industries. • MSME Sector - Access to information, simplification of loan procedures and interest subvention should be enabled for timely and affordable credit to MSMEs • Labour and Industrial growth- Reduction and simplification of the plethora of laws existing in the labour sector.
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धर्म, पन्थ एवं सम्प्रदाय से आप क्या समझते हैं? भारत में धार्मिक विविधता की स्थिति स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द, 10 अंक) what do you understand of Religion, Sect and Cult. clarify the status of religious diersity in India. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज के बारे में बताइये 2- प्रथम भाग में धर्म, पन्थ एवं सम्प्रदाय को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में भारत में धार्मिक विविधता की स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| किसी भी समाज की संस्कृति से तात्पर्य उन सभी घटकों के एकीकरण से होता है जो दिए गए समाज के सामाजिक जीवन को संभव बनाते हैं| इस संस्कृति के भौतिक(मूर्त) एवं वैचारिक(अमूर्त) एवं घटक हो सकते हैं| यह संस्कृति कई सांस्कृतिक विन्यास से मिल कर बनी होती है| सांस्कृतिक विन्यास कई सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बना होता है|भारतीय समाज स्वयं में एक अति विविध समाज है| भारतीय संदर्भ में समाज की विविधता को चार सांस्कृतिकतत्वों में देखा जा सकता है यथा नृजातीय, धार्मिक, भाषाई तथा भौगोलिक विविधता से उत्पन्न सामाजिक विन्यास विविधता| भारतीय समाज में अनेक धर्मों की उपाथिति देखने को मिलती है| धर्म, सम्प्रदाय एवं पंथ से तात्पर्य · धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह की उस विचारधारा से है जिसमें किसी दिए गए सन्दर्भ में आस्था रखते हुये जीवन के लक्ष्यों एवं उसकी सार्थकता को सिद्ध किया जाता है · यह धर्म व्यक्तिगत स्तर पर तथा सामुदायिक स्तर पर अलग अलग हो सकते हैं · व्यक्तिगत स्तर पर धर्म के निम्नलिखित तीन प्रकार्य हैं यथा o जीवन की अनिश्चितताओं से उत्पन्न तनाव का प्रबंधन o जीवन की सार्थकता को स्थापित करना एवं o जीवन में अनसुलझे प्रश्नों हेतु विकल्प सुनिश्चित करना · वहीँ दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर धर्म से तात्पर्य दिए गए समाज की आस्था से है जो सम्प्रदाय, पंथ एवं धर्म के सन्दर्भ में हो सकते हैं · सम्प्रदाय से तात्पर्य एक ऐसे छोटे धार्मिक समूह से है जिसके प्रति मुख्य धारा का एक नकारात्मक दृष्टिकोण होता है · पंथ से तात्पर्य एक ऐसे धार्मिक समूह से है जिसकी मुख्यधारा में स्वीकार्यता होती है · धर्म से तात्पर्य सापेक्षिक स्तर में बड़े रीति रिवाजों एवं विचारधाराओं से सुसज्जित व्यवस्था क्रम से है उपरोक्त परिभाषाओं के अनुरूप देखा जाए तो भारत बहुधार्मिक, अनेक सम्प्रदायों एवं पंथों से युक्त विविधतापूर्ण समाज है|अर्थात भारत वर्ष में हजारों सम्प्रदाय एवं पंथ पाए जाते हैं जिन्हें जनगणना 2011 में मुख्य धार्मिक समुदायों में बाटा गया है जिसमें हिन्दू (79.8 %) इस्लाम (14.2 %) इसाई (2.3%) सिख (1.7 %) बौद्ध (0.77 %) जैन (0.37 %) तथा अन्य धर्म (0.9 % )हैं| यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। ईद, क्रिसमस, दिवाली जैसी विविध परंपराएँ और त्यौहार जीवन जीने का एक अनूठा तरीका प्रदान करते हैं। इस विविधता से समृद्ध संगीत, नृत्य, कला और साहित्य का भी विकास होता है| धार्मिक असहिष्णुता के वर्तमान युग में भारत अंतर्राष्ट्रीय समाज के लिये एक आदर्श माना जा सकता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम ’का भारतीय मूल्य दुनिया को शांति और समृद्धि की ओर ले जा सकता है|
##Question:धर्म, पन्थ एवं सम्प्रदाय से आप क्या समझते हैं? भारत में धार्मिक विविधता की स्थिति स्पष्ट कीजिये (150 से 200 शब्द, 10 अंक) what do you understand of Religion, Sect and Cult. clarify the status of religious diersity in India. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भारतीय समाज के बारे में बताइये 2- प्रथम भाग में धर्म, पन्थ एवं सम्प्रदाय को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में भारत में धार्मिक विविधता की स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| किसी भी समाज की संस्कृति से तात्पर्य उन सभी घटकों के एकीकरण से होता है जो दिए गए समाज के सामाजिक जीवन को संभव बनाते हैं| इस संस्कृति के भौतिक(मूर्त) एवं वैचारिक(अमूर्त) एवं घटक हो सकते हैं| यह संस्कृति कई सांस्कृतिक विन्यास से मिल कर बनी होती है| सांस्कृतिक विन्यास कई सांस्कृतिक तत्वों से मिल कर बना होता है|भारतीय समाज स्वयं में एक अति विविध समाज है| भारतीय संदर्भ में समाज की विविधता को चार सांस्कृतिकतत्वों में देखा जा सकता है यथा नृजातीय, धार्मिक, भाषाई तथा भौगोलिक विविधता से उत्पन्न सामाजिक विन्यास विविधता| भारतीय समाज में अनेक धर्मों की उपाथिति देखने को मिलती है| धर्म, सम्प्रदाय एवं पंथ से तात्पर्य · धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूह की उस विचारधारा से है जिसमें किसी दिए गए सन्दर्भ में आस्था रखते हुये जीवन के लक्ष्यों एवं उसकी सार्थकता को सिद्ध किया जाता है · यह धर्म व्यक्तिगत स्तर पर तथा सामुदायिक स्तर पर अलग अलग हो सकते हैं · व्यक्तिगत स्तर पर धर्म के निम्नलिखित तीन प्रकार्य हैं यथा o जीवन की अनिश्चितताओं से उत्पन्न तनाव का प्रबंधन o जीवन की सार्थकता को स्थापित करना एवं o जीवन में अनसुलझे प्रश्नों हेतु विकल्प सुनिश्चित करना · वहीँ दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर धर्म से तात्पर्य दिए गए समाज की आस्था से है जो सम्प्रदाय, पंथ एवं धर्म के सन्दर्भ में हो सकते हैं · सम्प्रदाय से तात्पर्य एक ऐसे छोटे धार्मिक समूह से है जिसके प्रति मुख्य धारा का एक नकारात्मक दृष्टिकोण होता है · पंथ से तात्पर्य एक ऐसे धार्मिक समूह से है जिसकी मुख्यधारा में स्वीकार्यता होती है · धर्म से तात्पर्य सापेक्षिक स्तर में बड़े रीति रिवाजों एवं विचारधाराओं से सुसज्जित व्यवस्था क्रम से है उपरोक्त परिभाषाओं के अनुरूप देखा जाए तो भारत बहुधार्मिक, अनेक सम्प्रदायों एवं पंथों से युक्त विविधतापूर्ण समाज है|अर्थात भारत वर्ष में हजारों सम्प्रदाय एवं पंथ पाए जाते हैं जिन्हें जनगणना 2011 में मुख्य धार्मिक समुदायों में बाटा गया है जिसमें हिन्दू (79.8 %) इस्लाम (14.2 %) इसाई (2.3%) सिख (1.7 %) बौद्ध (0.77 %) जैन (0.37 %) तथा अन्य धर्म (0.9 % )हैं| यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। ईद, क्रिसमस, दिवाली जैसी विविध परंपराएँ और त्यौहार जीवन जीने का एक अनूठा तरीका प्रदान करते हैं। इस विविधता से समृद्ध संगीत, नृत्य, कला और साहित्य का भी विकास होता है| धार्मिक असहिष्णुता के वर्तमान युग में भारत अंतर्राष्ट्रीय समाज के लिये एक आदर्श माना जा सकता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम ’का भारतीय मूल्य दुनिया को शांति और समृद्धि की ओर ले जा सकता है|
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पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| साथ ही,पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Underline the Common Reasons responsible for Insurgent Activities in Northeast India. Also, Write DownIndia"s policy on eradication of extremism in the Northeast. (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच- पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर को प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- स्वतंत्रता पश्चात अधिकांश पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य के अंतर्गत शामिल था एवं नृजातीय वर्गों द्वारा की जाने वाली विभिन्न हिंसक/अहिंसक गतिविधियों के फलस्वरूप इस क्षेत्र को जातीय तथा जनजातीय आधार पर छोटे राज्यों में संगठित किया गया था| पूर्वोत्तर की जातियां/जनजातियाँ दक्षिण एशिया की तुलना में दक्षिण-पूर्व एशिया से नृजातीय, भाषाई तथा सांस्कृतिक रूपों में अधिक निकटता से जुड़ी हुयी है| साथ ही, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में परिसीमन के दौरान नृजातीय तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी की गयी थी| इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में असंतोष का जन्म हुआ तथा उग्रवादी एवं विप्लववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला| पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद के सामान्य कारण कठिन भौगोलिक स्थिति तथा दुर्गम पहाड़ियां जिसकी वजह से उग्रवादियों को छिपने का ठिकाना तथा सुरक्षाबलों को निरोधक कार्रवाई करने में मुश्किलों का सामना; निम्नस्तरीय परिवहन एवं संचार संपर्क; विदेशी सीमाओं से जुड़ाव के कारण हथियारों की आसान उपलब्धता; उग्रवादियों की सीमापारीय आवाजाही आसान; पड़ोसी देशों/उनके समूहों द्वारा राजनीतिक, नैतिक, सैन्य, आर्थिक, क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन; राष्ट्रीयकृत नेताओं का अभाव जिससे भारत से जुड़ाव को कम प्रोत्साहन; राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही में भ्रष्टाचार जिससे विकास योजनाओं का उचित लाभ सभी क्षेत्रों/वर्गों तक पर्याप्त नहीं पहुँच पाना; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो पाना जिससे आम जनता में आक्रोश के साथ-साथ उग्रवादियों/अलगाववादियों द्वारा असंतोष को भड़काने में सहायता; उग्रवादियों को राजनीति में आने की प्रवृति जिससे राजनीति का उग्रवादीकरण ; सांस्कृतिक भिन्नता - उनका रहन, सहन, खानपान आदि में व्यापक विविधता जिससे स्वंय उनके बीच भी सामासिक सामंजस्य का अभाव; जनसामान्य का समर्थन - उग्रवादियों द्वारा किसी विशिष्ट नृजातीय समूह/समुदाय के जुड़ाव से जनसामान्य में इनकी वैधता; उपरोक्त कारणों की वजह से उग्रवादी समूहों तथा उनके द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों में तेजी देखी जाती रही है| इन समूहों द्वारा की जाने वाली मांगों में भी व्यापक अंतर है जैसे- कुछ मामलों में संप्रभु राज्य की मांग तो कुछ मामलों में संबंधित क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग या फिर केवल बेहतर आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग| अलग-अलग मांगो के अनुरूप संबंधित क्षेत्र में उग्रवाद उन्मूलन पर सरकार का दृष्टिकोण भी विविध है| पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति- पूर्वोत्तर क्षेत्र का उग्रवाद पूर्वोत्तर में विद्यामान जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के साथ भिन्न भिन्न परिस्थितियों पर आधारित है| जैसे- नागालैंड में नागालिम के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग;मेघालय में गारो, ख़ासी और जयंतिया पहाड़ों में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संघर्ष; मणिपुर मेंमैती, कूकी और नागा जनजातियों के बीच संघर्ष; मिजोरम मेंजातीय और धार्मिक संघर्ष; असम मेंबांग्लादेश अप्रवासियों और कार्बी आंगलोंग में विद्यमान गरीबी के कारण उग्रवाद आदि| इस प्रकार विद्यमान विविधताओं ने उत्तर-पूर्वी उग्रवाद को अत्यधिक हिंसात्मक और जटिल बना दिया है जिसके उन्मूलन के लिए भारत सरकार ने अपनी नीति को तीन आधारों पर विकसित किया है- मार्गदर्शी सिद्धांत - शक्ति की आनुपातिकता तथा बल का आनुपातिक प्रयोग; अफ़स्पा का संयमित तथा उचित प्रयोग; संवाद और वार्ता; राजनीतिक स्वायत्तता; हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस; अवैध अप्रवासन के प्रति कठोर नीति; सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति(SRE); पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण; पूर्वोत्तर राज्यों में हेलिकॉप्टर सेवाओं तथा अन्य परिवहन सुविधाओं का विकास; संगठित योजना - एनआरसी लागू किया जाना; ऐसे दलों के साथ वार्ता जो हिंसा को छोड़ चूका है; पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के समर्पण तथा उनके पुनर्वास हेतु योजना; विकासोन्मुखी कार्यक्रम- संरचनात्मक विकास; राजनीतिक संरचनात्मक विकास - पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण; राजनीतिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण; उनके अंदर सामाजिक सुदृढ़ता या सामाजिक संयोजन का निर्माण; निवेश तथा संवर्धन नीति, जापान का सहयोग; सीमा क्षेत्र विकास परियोजना; पहाड़ी क्षेत्र विकास परियोजना; पूर्वोत्तर राज्यों में सिविक एक्शन प्रोग्राम; आदि; उपरोक्त आधारों पर सरकार द्वारा पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन हेतु गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं| साथ ही, हमें आसूचना तंत्र की मजबूती, वैकल्पिक संघर्ष समाधान; शिकायतों का तटस्थ मूल्यांकन तथा उनका समाधान; विरोध, असहमति, प्रदर्शन एवं चर्चा हेतु फोरम का निर्माण जैसे आयामों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है|
##Question:पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| साथ ही,पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Underline the Common Reasons responsible for Insurgent Activities in Northeast India. Also, Write DownIndia"s policy on eradication of extremism in the Northeast. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर को प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों के पीछे उत्तरदायी सामान्य कारणों को रेखांकित कीजिये| अंतिम भाग में, पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति को स्पष्ट कीजिये| उत्तर- स्वतंत्रता पश्चात अधिकांश पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य के अंतर्गत शामिल था एवं नृजातीय वर्गों द्वारा की जाने वाली विभिन्न हिंसक/अहिंसक गतिविधियों के फलस्वरूप इस क्षेत्र को जातीय तथा जनजातीय आधार पर छोटे राज्यों में संगठित किया गया था| पूर्वोत्तर की जातियां/जनजातियाँ दक्षिण एशिया की तुलना में दक्षिण-पूर्व एशिया से नृजातीय, भाषाई तथा सांस्कृतिक रूपों में अधिक निकटता से जुड़ी हुयी है| साथ ही, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में परिसीमन के दौरान नृजातीय तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी की गयी थी| इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में असंतोष का जन्म हुआ तथा उग्रवादी एवं विप्लववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला| पूर्वोत्तर क्षेत्र में उग्रवाद के सामान्य कारण कठिन भौगोलिक स्थिति तथा दुर्गम पहाड़ियां जिसकी वजह से उग्रवादियों को छिपने का ठिकाना तथा सुरक्षाबलों को निरोधक कार्रवाई करने में मुश्किलों का सामना; निम्नस्तरीय परिवहन एवं संचार संपर्क; विदेशी सीमाओं से जुड़ाव के कारण हथियारों की आसान उपलब्धता; उग्रवादियों की सीमापारीय आवाजाही आसान; पड़ोसी देशों/उनके समूहों द्वारा राजनीतिक, नैतिक, सैन्य, आर्थिक, क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन; राष्ट्रीयकृत नेताओं का अभाव जिससे भारत से जुड़ाव को कम प्रोत्साहन; राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही में भ्रष्टाचार जिससे विकास योजनाओं का उचित लाभ सभी क्षेत्रों/वर्गों तक पर्याप्त नहीं पहुँच पाना; मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो पाना जिससे आम जनता में आक्रोश के साथ-साथ उग्रवादियों/अलगाववादियों द्वारा असंतोष को भड़काने में सहायता; उग्रवादियों को राजनीति में आने की प्रवृति जिससे राजनीति का उग्रवादीकरण ; सांस्कृतिक भिन्नता - उनका रहन, सहन, खानपान आदि में व्यापक विविधता जिससे स्वंय उनके बीच भी सामासिक सामंजस्य का अभाव; जनसामान्य का समर्थन - उग्रवादियों द्वारा किसी विशिष्ट नृजातीय समूह/समुदाय के जुड़ाव से जनसामान्य में इनकी वैधता; उपरोक्त कारणों की वजह से उग्रवादी समूहों तथा उनके द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों में तेजी देखी जाती रही है| इन समूहों द्वारा की जाने वाली मांगों में भी व्यापक अंतर है जैसे- कुछ मामलों में संप्रभु राज्य की मांग तो कुछ मामलों में संबंधित क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग या फिर केवल बेहतर आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मांग| अलग-अलग मांगो के अनुरूप संबंधित क्षेत्र में उग्रवाद उन्मूलन पर सरकार का दृष्टिकोण भी विविध है| पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन पर भारत की नीति- पूर्वोत्तर क्षेत्र का उग्रवाद पूर्वोत्तर में विद्यामान जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के साथ भिन्न भिन्न परिस्थितियों पर आधारित है| जैसे- नागालैंड में नागालिम के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग;मेघालय में गारो, ख़ासी और जयंतिया पहाड़ों में रहने वाले लोगों के बीच आपसी संघर्ष; मणिपुर मेंमैती, कूकी और नागा जनजातियों के बीच संघर्ष; मिजोरम मेंजातीय और धार्मिक संघर्ष; असम मेंबांग्लादेश अप्रवासियों और कार्बी आंगलोंग में विद्यमान गरीबी के कारण उग्रवाद आदि| इस प्रकार विद्यमान विविधताओं ने उत्तर-पूर्वी उग्रवाद को अत्यधिक हिंसात्मक और जटिल बना दिया है जिसके उन्मूलन के लिए भारत सरकार ने अपनी नीति को तीन आधारों पर विकसित किया है- मार्गदर्शी सिद्धांत - शक्ति की आनुपातिकता तथा बल का आनुपातिक प्रयोग; अफ़स्पा का संयमित तथा उचित प्रयोग; संवाद और वार्ता; राजनीतिक स्वायत्तता; हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस; अवैध अप्रवासन के प्रति कठोर नीति; सुरक्षा संबंधी व्यय की प्रतिपूर्ति(SRE); पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण; पूर्वोत्तर राज्यों में हेलिकॉप्टर सेवाओं तथा अन्य परिवहन सुविधाओं का विकास; संगठित योजना - एनआरसी लागू किया जाना; ऐसे दलों के साथ वार्ता जो हिंसा को छोड़ चूका है; पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के समर्पण तथा उनके पुनर्वास हेतु योजना; विकासोन्मुखी कार्यक्रम- संरचनात्मक विकास; राजनीतिक संरचनात्मक विकास - पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण; राजनीतिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण; उनके अंदर सामाजिक सुदृढ़ता या सामाजिक संयोजन का निर्माण; निवेश तथा संवर्धन नीति, जापान का सहयोग; सीमा क्षेत्र विकास परियोजना; पहाड़ी क्षेत्र विकास परियोजना; पूर्वोत्तर राज्यों में सिविक एक्शन प्रोग्राम; आदि; उपरोक्त आधारों पर सरकार द्वारा पूर्वोत्तर में उग्रवाद उन्मूलन हेतु गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं| साथ ही, हमें आसूचना तंत्र की मजबूती, वैकल्पिक संघर्ष समाधान; शिकायतों का तटस्थ मूल्यांकन तथा उनका समाधान; विरोध, असहमति, प्रदर्शन एवं चर्चा हेतु फोरम का निर्माण जैसे आयामों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है|
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"भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार की दृष्टि से डलहौजी की भूमिका सभी ब्रिटिश प्रशासकों में अद्वितीय रही है" । टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द/ 10 अंक ) "Dalhousie"s role in the expansion of the British Empire in India has been unique among all British administrators". Comment ( 150-200 words/ 10 marks )
दृष्टिकोण: डलहौजी का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार में विभिन्न गवर्नर जनरल के योगदानों को दर्शाएँ । डलहौजी की तुलना अन्य गवर्नर-जनरल से करते हुए दर्शाएँ कि डलहौजी द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार कम समय में काफी अधिक किया गया । उत्तर : डलहौजी भारत के गवर्नर जनरल के रूप में 1848 से 1856 तक भारत में रहा । उसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य निर्माण व साम्राज्य विस्तार में अद्वितीय भूमिका निभाई । उसके 8 वर्षों के शासन काल में भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य में 2/3 की वृद्धि हुई । क्लाइव, वेलेजली , लॉर्ड हेस्टिंग्स जैसे अनेक साम्राज्यवादी ब्रिटिश प्रशासकों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वाह किया तथापि डलहौजी का योगदान सबसे अधिक व विशिष्ट रहा है । डलहौजी ने साम्राज्य विस्तार के उपकरण के रूप में कई साधनों का प्रयोग किया और साम्राज्य विस्तार की हर संभावना का भरपूर दोहन किया, जैसे- जहां एक ओर उसने पंजाब, पेगु या लोअर बर्मा, जैसे क्षेत्रों पर अधिकार के लिए युद्ध की नीति का सहारा लिया । वहीं गोद निषेध की नीति को अपनाकर उसने एक बड़े क्षेत्र को काफी आसानी से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया । इसके तहत उसने सतारा , नागपुर, झाँसी आदि क्षेत्रों को हड़पकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया । फिर उसने कुशासन के नाम पर अवध का विलय साम्राज्य में कर लिया और साथ ही उसने कपास उत्पादक बरार के क्षेत्र को निज़ाम से हड़प कर साम्राज्य में मिला लिया । इस प्रकार हम देखते हैं कि डलहौजी ने अलग-अलग प्रकार की नीतियों को अपनाकर साम्राज्य विस्तार की हर संभावना का दोहन किया और इस दृष्टि में वह अपने पूर्ववर्ती व अनुवर्ती सभी में विशिष्ट व अद्वितीय हो जाता है । डलहौजी के विपरीत अन्य प्रशासकों के द्वारा केवल सीमित रूप में ही साम्राज्य विस्तार के उपकरणों को अपनाया गया था । इसी संदर्भ में विद्वानों ने कहा है कि " डलहौजी ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के नक़्शे को इस रूप में परिवर्तित किया जो किसी युद्ध के माध्यम से संभव नहीं था । " यह कथन अपने आप में डलहौजी कि भूमिका व महत्व को दर्शाता है ।
##Question:"भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार की दृष्टि से डलहौजी की भूमिका सभी ब्रिटिश प्रशासकों में अद्वितीय रही है" । टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द/ 10 अंक ) "Dalhousie"s role in the expansion of the British Empire in India has been unique among all British administrators". Comment ( 150-200 words/ 10 marks )##Answer:दृष्टिकोण: डलहौजी का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार में विभिन्न गवर्नर जनरल के योगदानों को दर्शाएँ । डलहौजी की तुलना अन्य गवर्नर-जनरल से करते हुए दर्शाएँ कि डलहौजी द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार कम समय में काफी अधिक किया गया । उत्तर : डलहौजी भारत के गवर्नर जनरल के रूप में 1848 से 1856 तक भारत में रहा । उसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य निर्माण व साम्राज्य विस्तार में अद्वितीय भूमिका निभाई । उसके 8 वर्षों के शासन काल में भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य में 2/3 की वृद्धि हुई । क्लाइव, वेलेजली , लॉर्ड हेस्टिंग्स जैसे अनेक साम्राज्यवादी ब्रिटिश प्रशासकों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वाह किया तथापि डलहौजी का योगदान सबसे अधिक व विशिष्ट रहा है । डलहौजी ने साम्राज्य विस्तार के उपकरण के रूप में कई साधनों का प्रयोग किया और साम्राज्य विस्तार की हर संभावना का भरपूर दोहन किया, जैसे- जहां एक ओर उसने पंजाब, पेगु या लोअर बर्मा, जैसे क्षेत्रों पर अधिकार के लिए युद्ध की नीति का सहारा लिया । वहीं गोद निषेध की नीति को अपनाकर उसने एक बड़े क्षेत्र को काफी आसानी से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया । इसके तहत उसने सतारा , नागपुर, झाँसी आदि क्षेत्रों को हड़पकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया । फिर उसने कुशासन के नाम पर अवध का विलय साम्राज्य में कर लिया और साथ ही उसने कपास उत्पादक बरार के क्षेत्र को निज़ाम से हड़प कर साम्राज्य में मिला लिया । इस प्रकार हम देखते हैं कि डलहौजी ने अलग-अलग प्रकार की नीतियों को अपनाकर साम्राज्य विस्तार की हर संभावना का दोहन किया और इस दृष्टि में वह अपने पूर्ववर्ती व अनुवर्ती सभी में विशिष्ट व अद्वितीय हो जाता है । डलहौजी के विपरीत अन्य प्रशासकों के द्वारा केवल सीमित रूप में ही साम्राज्य विस्तार के उपकरणों को अपनाया गया था । इसी संदर्भ में विद्वानों ने कहा है कि " डलहौजी ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के नक़्शे को इस रूप में परिवर्तित किया जो किसी युद्ध के माध्यम से संभव नहीं था । " यह कथन अपने आप में डलहौजी कि भूमिका व महत्व को दर्शाता है ।
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MSMEs play a major role in the Indian economy however there still remains challenges in their efficient functioning. Discuss. (150 words/ 10 marks)
Approach: Define MSMEs Explain how they play important role important for Indian Economy Explain the challenges faced by them Conclude accordingly Answer: The Micro Small & Medium Enterprises (MSMEs) are defined in terms of their annual turnover where recently the government brought an amendment to the MSME Act of 2006. Accordingly to Section 7 of the Act the new definition of MSMEs are: A micro enterprise: annual turnover does not exceed five crore rupees A small enterprise: annual turnover is more than five crore rupees but does not exceed Rs 75 crore A medium enterprise: annual turnover is more than 75 crore rupees but does not exceed Rs 250 crore Role in Indian Economy: MSMEs play a major role in Indian economy as they have low investment requirements, operational flexibility and the capacity to develop appropriate indigenous technology so they have the power to propel India to new heights. Their contribution to GDP, employment generation, financial inclusion, exports, etc helps them in being the facilitator in instilling high economic growth in the country. MSME is the second-largest employment generating sector after the agriculture sector. It provides 80% of jobs in the industry with just 20% of the investment. It also contributes around 31% of the nation’s GDP and approx 45% and 34% share of the overall exports and manufacturing output. Challenges faced by MSMEs in India: Despite a plethora of government schemes, the MSME sector faces problems like: 1. Access to capital – About 40% of the small enterprises depend on the informal sources of credit. 2. Lack of improved technology is making them less productive and less competitive as compared to imported products and services. 3. Deficiencies in basic infrastructural facilities like water, power supply, road/rail, and telephone connectivity, etc. 4. Getting multiple statutory clearances related to power, environment, labour becomes difficult. 5. Other challenges include - Availability of raw material & skilled labour etc. Although the government has initiated many programmes for the efficient functioning of MSMEs likeUdyami Mitra Portal,MSME Samadhaan,MSME Sambandh,Prime Minister Employment Generation Programme etc. but since there is limited awareness about the different support programmes amongst the target beneficiaries, there is a need to develop a better communication strategy andinvolvement of stakeholders at the allstage to achieve the desired economic growth where the country aims to become a 5 trillion economy in the coming five years.
##Question:MSMEs play a major role in the Indian economy however there still remains challenges in their efficient functioning. Discuss. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach: Define MSMEs Explain how they play important role important for Indian Economy Explain the challenges faced by them Conclude accordingly Answer: The Micro Small & Medium Enterprises (MSMEs) are defined in terms of their annual turnover where recently the government brought an amendment to the MSME Act of 2006. Accordingly to Section 7 of the Act the new definition of MSMEs are: A micro enterprise: annual turnover does not exceed five crore rupees A small enterprise: annual turnover is more than five crore rupees but does not exceed Rs 75 crore A medium enterprise: annual turnover is more than 75 crore rupees but does not exceed Rs 250 crore Role in Indian Economy: MSMEs play a major role in Indian economy as they have low investment requirements, operational flexibility and the capacity to develop appropriate indigenous technology so they have the power to propel India to new heights. Their contribution to GDP, employment generation, financial inclusion, exports, etc helps them in being the facilitator in instilling high economic growth in the country. MSME is the second-largest employment generating sector after the agriculture sector. It provides 80% of jobs in the industry with just 20% of the investment. It also contributes around 31% of the nation’s GDP and approx 45% and 34% share of the overall exports and manufacturing output. Challenges faced by MSMEs in India: Despite a plethora of government schemes, the MSME sector faces problems like: 1. Access to capital – About 40% of the small enterprises depend on the informal sources of credit. 2. Lack of improved technology is making them less productive and less competitive as compared to imported products and services. 3. Deficiencies in basic infrastructural facilities like water, power supply, road/rail, and telephone connectivity, etc. 4. Getting multiple statutory clearances related to power, environment, labour becomes difficult. 5. Other challenges include - Availability of raw material & skilled labour etc. Although the government has initiated many programmes for the efficient functioning of MSMEs likeUdyami Mitra Portal,MSME Samadhaan,MSME Sambandh,Prime Minister Employment Generation Programme etc. but since there is limited awareness about the different support programmes amongst the target beneficiaries, there is a need to develop a better communication strategy andinvolvement of stakeholders at the allstage to achieve the desired economic growth where the country aims to become a 5 trillion economy in the coming five years.
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Q. Define the term "unemployment" and discuss the different approaches used to measure unemployment in India. (150 words/10 marks)
Approach- 1. Define unemployment and related term like labor force. 2. Explain the approaches adopted by NSSO for unemployment measurement. 3. Conclude with methods used and issues related to the Principal status approach. Answer- Unemployment - It is a situation where a person willing to work and fails to find a job that earns them a living. The unemployment rate measures the number of people actively looking for a job as a percentage of the labor force. Labor Force - NSSO defines the labor force as an “economically active population”. An economically active person is one who is engaged in some economic activity or seeks to engage himself/herself in some economic activity. NSSO Surveys on employment and unemployment- There are 4 steps: 1. Collection of data 2. Assembling of data 3. Analysis 4. Publication NSSO uses 3 approaches to measure employment and unemployment: 1. Usual activity status approach . (usual status/principal status)- the activity status is determined on the basis of a reference period of 1 year. The status of activity on which a person has spent a relatively long time in the preceding 365 days prior to the date of the survey is considered as usual principal activity status. Usual principal subsidiary status UPSS- is a more inclusive measure as it seeks to identify ‘workers’ out of those who were classified as” unemployed” or outside the “labor force”. It is quite likely that a person who was classified as being outside the labor force because he/she spent a majority of time neither seeking nor available for work, might have worked for a minor time period during the reference year. To capture such status, the subsidiary status concept was devised. 2. Current weekly status(CWS) approach- It uses the 7 preceding days of the survey as the reference period. A person is considered to be employed if he/she is pursuing any gainful activity for at least one day in a reference week. 3. Current daily status(CDS)- It measures a person’s availability to work or actual working status for each day in the reference week is considered as employed for the full day if he has worked for more than half a day on that day. The unemployment rate is determined by using all 3 approaches. It is usually found out that unemployment under the principal status approach is less as compared to the other two. The primary reason is the seasonality of unemployment in the Indian economy which leads to a situation in which most people may be able to find work for some part in the preceding year but may not find work for any part in the preceding week. The longer the reference period the smaller is the rate of unemployment usually.
##Question:Q. Define the term "unemployment" and discuss the different approaches used to measure unemployment in India. (150 words/10 marks)##Answer:Approach- 1. Define unemployment and related term like labor force. 2. Explain the approaches adopted by NSSO for unemployment measurement. 3. Conclude with methods used and issues related to the Principal status approach. Answer- Unemployment - It is a situation where a person willing to work and fails to find a job that earns them a living. The unemployment rate measures the number of people actively looking for a job as a percentage of the labor force. Labor Force - NSSO defines the labor force as an “economically active population”. An economically active person is one who is engaged in some economic activity or seeks to engage himself/herself in some economic activity. NSSO Surveys on employment and unemployment- There are 4 steps: 1. Collection of data 2. Assembling of data 3. Analysis 4. Publication NSSO uses 3 approaches to measure employment and unemployment: 1. Usual activity status approach . (usual status/principal status)- the activity status is determined on the basis of a reference period of 1 year. The status of activity on which a person has spent a relatively long time in the preceding 365 days prior to the date of the survey is considered as usual principal activity status. Usual principal subsidiary status UPSS- is a more inclusive measure as it seeks to identify ‘workers’ out of those who were classified as” unemployed” or outside the “labor force”. It is quite likely that a person who was classified as being outside the labor force because he/she spent a majority of time neither seeking nor available for work, might have worked for a minor time period during the reference year. To capture such status, the subsidiary status concept was devised. 2. Current weekly status(CWS) approach- It uses the 7 preceding days of the survey as the reference period. A person is considered to be employed if he/she is pursuing any gainful activity for at least one day in a reference week. 3. Current daily status(CDS)- It measures a person’s availability to work or actual working status for each day in the reference week is considered as employed for the full day if he has worked for more than half a day on that day. The unemployment rate is determined by using all 3 approaches. It is usually found out that unemployment under the principal status approach is less as compared to the other two. The primary reason is the seasonality of unemployment in the Indian economy which leads to a situation in which most people may be able to find work for some part in the preceding year but may not find work for any part in the preceding week. The longer the reference period the smaller is the rate of unemployment usually.
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कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में संसदीय वित्तीयसमितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस सन्दर्भ में लोक लेखा समिति के कार्यों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Parliamentary Financial Committees play an important role in establishing parliamentary control over the executive. Critically examinethe worksof the Public Accounts Committee in this context. (150-200 words; 10 Marks)
एप्रोच:- भूमिका में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण की जानकारी दीजिये। प्रथम भाग में लोक लेखा समिति(PAC) की संक्षिप्त सूचना दीजिये। दूसरे भाग में समिति के कार्य बताते हुए कार्यों का मूल्यांकन कीजिये। अंत में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये। उत्तर:- कार्यों की अधिकता और समयाभाव के कारण विधायिका प्रदत्त विधायन के द्वारा कार्यपालिका के माध्यम से सामान्य प्रशासन का संचालन करती है। कार्यपालिका निर्धारित अनुबंधों के अनुरूप कार्य करती रहे इसके लिए कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण आवश्यक होता है। भारतीय संसद द्वारा कार्यपालिका पर वित्तीय नियन्त्रण स्थापित करने के लिए बजटीय प्रक्रिया तथा संसदीय समितियों का उपयोग करती है| संसदीय समिति से तात्‍पर्य उस समिति से है, जो संसद के सदनों द्वारा नियुक्‍त या निर्वाचित की जाती है| संसदीय समितियों में संसद की वितीय समितियां कार्यपालिका पर संसद के वित्तीय नियंत्रण को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान करती हैं| वित्तीय समितियों में लोकलेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजानिक उपक्रम समिति विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारत में लोक लेखा समिति की स्थापना सर्वप्रथम 1921 में 1919 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत हुई थी और तब से ही अस्तित्व में है। वर्तमान में इसके 22 सदस्य हैं (15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा से)| इन सदस्यों का चुनाव प्रत्येक वर्ष एकल हस्तांतरणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार सांसदों में से किया जाता है। इन सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष होता है । कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता। इसके निम्नलिखित कार्य होते हैं- सरकार ने विभिन्न मदों पर जो खर्च किया है अथवा लोक सभा के द्वारा प्रदत्त अधिकार के आधार पर भारत की समेकिन/संचित निधि पर जो विनियोग किया है उसका परीक्षण करना(यह कैग की रिपोर्ट पर आधारित होता है) यह समिति इस बात का भी परिक्षण करती है कि विधिक रूप से जो धन जिस मद के लिए आवंटित किया गया था, उसी पर खर्च किया गया है या नहीं पुनःविनियोजन का परीक्षण करना इसके साथ ही लेखा कथन जिसमें सरकार की आय और व्यय दोनों का ब्योरा रहता है(सरकारी निगमों, व्यापार इत्यादि) का परीक्षण करना यह सरकार के लेखा कथन जिसमें स्वायत्त तथा अर्ध-स्वायत्त निकायों के आय व्यय के ब्योरे का परीक्षण करना(स्वायत्त निकाय अथवा अर्ध-स्वायत्त निकाय में प्रायः विनियामक संस्थाएं आती हैं जैसे TRAI,IRDA आदि) यह राष्ट्रपति के निर्देशानुसार सरकार के स्टॉक तथा स्टोर की प्राप्तियों एवं व्यय के लेखा परीक्षण पर भी विचार करती है और इस प्रकार लोक लेखा समिति कार्यपालिका पर विधायिका के वित्तीय नियंत्रण को सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाती है किन्तु समिति की कुछ सीमाएं भी हैं जो निम्नलिखित हैं- यह समिति कैग की रिपोर्ट का परीक्षण करती है जिसे पोस्ट मार्टम लेखा कहते हैं इस समिति की अधिकाँश बैठकें अकेले में होती हैं अर्थात जनता और प्रेस को इससे दूर रखा जाता है यह मंत्रालयों अथवा विभागों के आंतरिक प्रशासन से सम्बन्धित कोई मामले नही देख सकती। लोक लेखा समिति की ये सीमाएं इसकी प्रभाविता को कमजोर करती हैं| फिर भी लोकलेखा समिति करदाताओं और सरकार के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाती है। यदि इस समिति को सरकार के किसी लेन-देन पर कोई शक है तो वहकिसी भी मंत्रीको समिति के समक्ष बुला कर उससे प्रश्न पूछ सकती है,यह समिति सरकारी फाइलों को मंगा कर उनका परीक्षण कर सकती है।समिति आवश्यकता के अनुसार गवाहों को बुला सकती है और उनसे प्रश्न पूछ सकती है। इस प्रकार संसद की यही एक मात्र ऐसी समिति है जिसे अर्द्ध-न्यायिक निकाय का दर्जा प्राप्त है|इस तरह PAC को व्यापक अधिदेश प्राप्त हैं जिनके माध्यम से यह कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
##Question:कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापित करने में संसदीय वित्तीयसमितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस सन्दर्भ में लोक लेखा समिति के कार्यों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Parliamentary Financial Committees play an important role in establishing parliamentary control over the executive. Critically examinethe worksof the Public Accounts Committee in this context. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- भूमिका में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण की जानकारी दीजिये। प्रथम भाग में लोक लेखा समिति(PAC) की संक्षिप्त सूचना दीजिये। दूसरे भाग में समिति के कार्य बताते हुए कार्यों का मूल्यांकन कीजिये। अंत में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये। उत्तर:- कार्यों की अधिकता और समयाभाव के कारण विधायिका प्रदत्त विधायन के द्वारा कार्यपालिका के माध्यम से सामान्य प्रशासन का संचालन करती है। कार्यपालिका निर्धारित अनुबंधों के अनुरूप कार्य करती रहे इसके लिए कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण आवश्यक होता है। भारतीय संसद द्वारा कार्यपालिका पर वित्तीय नियन्त्रण स्थापित करने के लिए बजटीय प्रक्रिया तथा संसदीय समितियों का उपयोग करती है| संसदीय समिति से तात्‍पर्य उस समिति से है, जो संसद के सदनों द्वारा नियुक्‍त या निर्वाचित की जाती है| संसदीय समितियों में संसद की वितीय समितियां कार्यपालिका पर संसद के वित्तीय नियंत्रण को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान करती हैं| वित्तीय समितियों में लोकलेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजानिक उपक्रम समिति विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारत में लोक लेखा समिति की स्थापना सर्वप्रथम 1921 में 1919 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत हुई थी और तब से ही अस्तित्व में है। वर्तमान में इसके 22 सदस्य हैं (15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा से)| इन सदस्यों का चुनाव प्रत्येक वर्ष एकल हस्तांतरणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार सांसदों में से किया जाता है। इन सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष होता है । कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता। इसके निम्नलिखित कार्य होते हैं- सरकार ने विभिन्न मदों पर जो खर्च किया है अथवा लोक सभा के द्वारा प्रदत्त अधिकार के आधार पर भारत की समेकिन/संचित निधि पर जो विनियोग किया है उसका परीक्षण करना(यह कैग की रिपोर्ट पर आधारित होता है) यह समिति इस बात का भी परिक्षण करती है कि विधिक रूप से जो धन जिस मद के लिए आवंटित किया गया था, उसी पर खर्च किया गया है या नहीं पुनःविनियोजन का परीक्षण करना इसके साथ ही लेखा कथन जिसमें सरकार की आय और व्यय दोनों का ब्योरा रहता है(सरकारी निगमों, व्यापार इत्यादि) का परीक्षण करना यह सरकार के लेखा कथन जिसमें स्वायत्त तथा अर्ध-स्वायत्त निकायों के आय व्यय के ब्योरे का परीक्षण करना(स्वायत्त निकाय अथवा अर्ध-स्वायत्त निकाय में प्रायः विनियामक संस्थाएं आती हैं जैसे TRAI,IRDA आदि) यह राष्ट्रपति के निर्देशानुसार सरकार के स्टॉक तथा स्टोर की प्राप्तियों एवं व्यय के लेखा परीक्षण पर भी विचार करती है और इस प्रकार लोक लेखा समिति कार्यपालिका पर विधायिका के वित्तीय नियंत्रण को सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाती है किन्तु समिति की कुछ सीमाएं भी हैं जो निम्नलिखित हैं- यह समिति कैग की रिपोर्ट का परीक्षण करती है जिसे पोस्ट मार्टम लेखा कहते हैं इस समिति की अधिकाँश बैठकें अकेले में होती हैं अर्थात जनता और प्रेस को इससे दूर रखा जाता है यह मंत्रालयों अथवा विभागों के आंतरिक प्रशासन से सम्बन्धित कोई मामले नही देख सकती। लोक लेखा समिति की ये सीमाएं इसकी प्रभाविता को कमजोर करती हैं| फिर भी लोकलेखा समिति करदाताओं और सरकार के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाती है। यदि इस समिति को सरकार के किसी लेन-देन पर कोई शक है तो वहकिसी भी मंत्रीको समिति के समक्ष बुला कर उससे प्रश्न पूछ सकती है,यह समिति सरकारी फाइलों को मंगा कर उनका परीक्षण कर सकती है।समिति आवश्यकता के अनुसार गवाहों को बुला सकती है और उनसे प्रश्न पूछ सकती है। इस प्रकार संसद की यही एक मात्र ऐसी समिति है जिसे अर्द्ध-न्यायिक निकाय का दर्जा प्राप्त है|इस तरह PAC को व्यापक अधिदेश प्राप्त हैं जिनके माध्यम से यह कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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Ancient India saw the rise of two important religions, Jainism and Buddhism, as a result of religious reforms opposing the Vedic religion, but these reforms were led by Kshatriyas and not by the oppressed classes like Shudras. Analyse (150 words/10 Marks)
Approach: 1. Introduce by discussing the rise of Jainism and Buddhism religion in a brief manner. 2. Discuss how kshatriyas led to opposition to the Vedic religion by giving rise to Buddhism and Jainism religion and how these reforms were not led by Shudras. 3. Also Discuss other factors which led to the rise of these two religions. 4. Conclude by highlighting in brief, the philosophy of these two religions. Answer: "The sixth century BC marked an important stage in Indian history as far as the development of new religions is concerned. In this period, we notice a growing resentment of the ritualistic orthodox ideas of the Brahmanas. The spiritual unrest and intellectual stimulation led to the rise of various heterodox religious movements. Of these movements, Jainism and Buddhism were the most important and they developed into the most potent well organised popular religious reform movements. Post-Vedic society was clearly divided into four varnas: Brahmanas, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras. Each varna was assigned a well-defined function. Though varna was based on birth, the two higher varnas captured power, prestige and privileges at the cost of the two lower varnas. The Brahmanas, who were allotted the functions of priests and teachers, claimed the highest status in society. They demanded several privileges, including those of receiving gifts and exemption from taxation and punishment. The next in the hierarchy were the Kshatriyas who lived on the taxes collected from the cultivators. The third category thrived on agriculture, cattle breeding and trade. They were the main taxpayers. The Shudras formed the lowest rung of the social order and were meant to serve the upper three castes as domestic slaves, agricultural labourers etc. in post-Vedic times. They were the downtrodden class because of the varna. This varna-divided society generated frustration among the adversely affected people. The Vaishyas and the Shudras were not satisfied with the division of society on the basis of birth but we do not have evidence of their open resistance. The reaction came in strongly from the Kshatriya class because Mahavir and Buddha both belonged to the Kshatriya clan. However, the real cause of the rise of these new religions lies in the spread of a new agrarian economy in eastern India. The primary factor that revolutionized the material life of the people around 700 BC in eastern UP and Bihar was the beginning of the use of iron. Iron implements were made and used for agricultural purposes which resulted in the enhancement of agricultural land and its production. Increased agricultural production led to the growth of trade and commerce. It resulted in the growth of cities where the population of traders and artisans was concentrated. It required changes in society and certain well-entrenched traditions. The Vaishyas, having accumulated wealth and property, were gaining higher social status. The trading and commercial communities i.e. Vaishyas wanted their private property to be secure and social and religious sanctions for foreign trade and sea-travelling which, by then, was not sanctioned by the Vedic religion. These economic conditions necessitated changes in society as well. Kshatriyas took advantage of utilizing this opportunity to gain more importance and abolish the supremacy of the priestly class. That is why the preceptors of both Jainism and Buddhism, which came forward as reform movements and later became the most popular religious movements, were Kshatriya princes. On the basis of the support that they acquired from Vaishyas and Shudras, the Kshatriyas opposed the supremacy of the Brahmanas, the prevalence of the caste system, the complexities of rituals and sacrifices and desired change in caste according to Karma and not according to birth. Both these religious sects, therefore, provided grounds to bring about changes in the social and economic setup. It was for this reason that Jainism discarded agriculture but did not protest against trade and Buddhism exhibited favourable opinion towards sea voyages."
##Question:Ancient India saw the rise of two important religions, Jainism and Buddhism, as a result of religious reforms opposing the Vedic religion, but these reforms were led by Kshatriyas and not by the oppressed classes like Shudras. Analyse (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: 1. Introduce by discussing the rise of Jainism and Buddhism religion in a brief manner. 2. Discuss how kshatriyas led to opposition to the Vedic religion by giving rise to Buddhism and Jainism religion and how these reforms were not led by Shudras. 3. Also Discuss other factors which led to the rise of these two religions. 4. Conclude by highlighting in brief, the philosophy of these two religions. Answer: "The sixth century BC marked an important stage in Indian history as far as the development of new religions is concerned. In this period, we notice a growing resentment of the ritualistic orthodox ideas of the Brahmanas. The spiritual unrest and intellectual stimulation led to the rise of various heterodox religious movements. Of these movements, Jainism and Buddhism were the most important and they developed into the most potent well organised popular religious reform movements. Post-Vedic society was clearly divided into four varnas: Brahmanas, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras. Each varna was assigned a well-defined function. Though varna was based on birth, the two higher varnas captured power, prestige and privileges at the cost of the two lower varnas. The Brahmanas, who were allotted the functions of priests and teachers, claimed the highest status in society. They demanded several privileges, including those of receiving gifts and exemption from taxation and punishment. The next in the hierarchy were the Kshatriyas who lived on the taxes collected from the cultivators. The third category thrived on agriculture, cattle breeding and trade. They were the main taxpayers. The Shudras formed the lowest rung of the social order and were meant to serve the upper three castes as domestic slaves, agricultural labourers etc. in post-Vedic times. They were the downtrodden class because of the varna. This varna-divided society generated frustration among the adversely affected people. The Vaishyas and the Shudras were not satisfied with the division of society on the basis of birth but we do not have evidence of their open resistance. The reaction came in strongly from the Kshatriya class because Mahavir and Buddha both belonged to the Kshatriya clan. However, the real cause of the rise of these new religions lies in the spread of a new agrarian economy in eastern India. The primary factor that revolutionized the material life of the people around 700 BC in eastern UP and Bihar was the beginning of the use of iron. Iron implements were made and used for agricultural purposes which resulted in the enhancement of agricultural land and its production. Increased agricultural production led to the growth of trade and commerce. It resulted in the growth of cities where the population of traders and artisans was concentrated. It required changes in society and certain well-entrenched traditions. The Vaishyas, having accumulated wealth and property, were gaining higher social status. The trading and commercial communities i.e. Vaishyas wanted their private property to be secure and social and religious sanctions for foreign trade and sea-travelling which, by then, was not sanctioned by the Vedic religion. These economic conditions necessitated changes in society as well. Kshatriyas took advantage of utilizing this opportunity to gain more importance and abolish the supremacy of the priestly class. That is why the preceptors of both Jainism and Buddhism, which came forward as reform movements and later became the most popular religious movements, were Kshatriya princes. On the basis of the support that they acquired from Vaishyas and Shudras, the Kshatriyas opposed the supremacy of the Brahmanas, the prevalence of the caste system, the complexities of rituals and sacrifices and desired change in caste according to Karma and not according to birth. Both these religious sects, therefore, provided grounds to bring about changes in the social and economic setup. It was for this reason that Jainism discarded agriculture but did not protest against trade and Buddhism exhibited favourable opinion towards sea voyages."
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गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए। साथ ही NGOs काउत्तरदायित्व तय करने मेंसरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) highlight various issues related to non-governmental organizations (NGOs). Also, discuss the role of government in fixingthe accountability ofNGOs. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में NGOs का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए।साथ ही NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशनयानी गैर सरकारी संगठन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समस्याओं और विकास की गतिविधियों को बढावा देना होता है। इस फील्ड में महिला समस्या, बाल विकास, मानवाधिकार, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, शिक्षा इत्यादि से संबंधित स्वैच्छिक कार्य किये जाते हैं। गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दे:- खातों का हिसाब:-सीबीआई के अनुसार भारत में केवल 8 से 10 प्रतिशत NGOs ही अपने एकाउंट्स को फाइल करते हैं। इसलिए इनमें पारदर्शिता की कमी है। धन के दुरुपयोग का आरोप:-किसी क़ानूनी नियामकीय ढांचे के अभावके कारण NGOs की गतिविधियों को आशंका की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार मनीलॉन्ड्रिंग और गैर-क़ानूनी गतिविधियों में भी पैसा लगाने का आरोप लगता है। FCRA:-फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट NGOs को विदेशी धन प्राप्त करने की आज्ञा देता है लेकिन NGOs पर FCRA के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं। अभी हाल ही में सरकार द्वारा 20,000 NGOs को विदेशी धन लेने से रोका गया। वेस्टेड इंटरेस्ट:-विभिन्न NGOs पर, विभिन्न परियोजनाओं पर प्रदर्शन से सम्बंधित वेस्टेड इंटरेस्ट के आरोप भी लगते हैं कि वे जनता के हित में कार्य नहीं करते। जल्लिकट्टु एवं कुडनकुलम परमाणु परियोजना के विरोध प्रदर्शनों पर यही आरोप लगे थे। हालाँकि प्रथम, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट जैसे NGOs ने सामाजिक एवं विकास के पहलुओं पर अपना प्रशंसनीय योगदान दिया है। NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका:- भारत सरकार द्वारा वित्तीय अनुदान को आसान बनाने हेतु ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ई-गवर्नेंस के अंतर्गत NGO दर्पण पोर्टल बनाया है। इन NGOs के नियमन हेतु यह अपेक्षित है कि वे न सिर्फ स्वयं ही इंटरनल ऑडिट करते हों जिसकी एक प्रतिलिपि संबंधित अधिकारियों को फॉरवर्ड की जाये। साथ ही यदि आवश्यक हुआ तो शासन द्वारा भी उनका ऑडिट कराया जा सकता है। ये गैर सरकारी संगठन सोशल ऑडिट के अंतर्गत आते हैं जिसमें कोई भी नागरिक इनके क्रियान्वयन, बजटीय आवंटन इत्यादि संदर्भों परप्रश्न उठा सकता है। अतः NGOs की पारदर्शिता की दिशा में यह अच्छा कदम है। उपरोक्त समस्याओं केसमाधान के लिए योजना आयोग ने अपनी 11वीं एवं 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक स्वतंत्रराष्ट्रीय प्रमाणन एजेंसी के गठन का सुझाव दिया। इस एजेंसी के मैंडेट में NGOsकी रेटिंग्स जारी करना, जिससे इनमे पारदर्शिता एवं धन जुटाने में मदद मिले एवं वेस्टेड इंटरेस्ट को कम करने में भी यह एजेंसी सहायक सिद्ध हो, शामिल था। हालाँकि एजेंसी को रैंक देने की समस्या का सामना करना पड़सकता है जैसे विभिन्न NGOs के कार्यों की प्रकृति भिन्न भिन्न होती है एवं उनके ग्राउंड पर कार्य भी बहुत ही अलग किस्म के हो सकते हैं जैसे एक पेड़ लगाने वाले NGO से रिसर्च करने वाले NGO से तुलना करना एवं रेटिंग प्रदान करना अव्यवहारिक सिद्ध होगाइत्यादि। अतः इन समस्याओं के बावजूद एक स्वतंत्र प्रमाणन एजेंसी रैंकिंग सिस्टम को तैयार कर मददगार साबित हो सकती है। सरकारी कार्यों के विकल्प के तौर पर NGOs की भूमिका को प्रमोट करने से लायक NGOs को स्वीकृति मिलेगी एवं फर्जी NGOs स्वतः समाप्त हो जायेंगे।
##Question:गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए। साथ ही NGOs काउत्तरदायित्व तय करने मेंसरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) highlight various issues related to non-governmental organizations (NGOs). Also, discuss the role of government in fixingthe accountability ofNGOs. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में NGOs का संक्षिप्त परिचय दीजिए। तत्पश्चात, गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की पहचान कीजिए।साथ ही NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका की भी चर्चा कीजिए। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- नॉन गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशनयानी गैर सरकारी संगठन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समस्याओं और विकास की गतिविधियों को बढावा देना होता है। इस फील्ड में महिला समस्या, बाल विकास, मानवाधिकार, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, शिक्षा इत्यादि से संबंधित स्वैच्छिक कार्य किये जाते हैं। गैर सरकारी संगठनों (NGOs) से संबंधित विभिन्न मुद्दे:- खातों का हिसाब:-सीबीआई के अनुसार भारत में केवल 8 से 10 प्रतिशत NGOs ही अपने एकाउंट्स को फाइल करते हैं। इसलिए इनमें पारदर्शिता की कमी है। धन के दुरुपयोग का आरोप:-किसी क़ानूनी नियामकीय ढांचे के अभावके कारण NGOs की गतिविधियों को आशंका की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार मनीलॉन्ड्रिंग और गैर-क़ानूनी गतिविधियों में भी पैसा लगाने का आरोप लगता है। FCRA:-फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट NGOs को विदेशी धन प्राप्त करने की आज्ञा देता है लेकिन NGOs पर FCRA के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं। अभी हाल ही में सरकार द्वारा 20,000 NGOs को विदेशी धन लेने से रोका गया। वेस्टेड इंटरेस्ट:-विभिन्न NGOs पर, विभिन्न परियोजनाओं पर प्रदर्शन से सम्बंधित वेस्टेड इंटरेस्ट के आरोप भी लगते हैं कि वे जनता के हित में कार्य नहीं करते। जल्लिकट्टु एवं कुडनकुलम परमाणु परियोजना के विरोध प्रदर्शनों पर यही आरोप लगे थे। हालाँकि प्रथम, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट जैसे NGOs ने सामाजिक एवं विकास के पहलुओं पर अपना प्रशंसनीय योगदान दिया है। NGOs का उत्तरदायित्व तय करने में सरकार की भूमिका:- भारत सरकार द्वारा वित्तीय अनुदान को आसान बनाने हेतु ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ई-गवर्नेंस के अंतर्गत NGO दर्पण पोर्टल बनाया है। इन NGOs के नियमन हेतु यह अपेक्षित है कि वे न सिर्फ स्वयं ही इंटरनल ऑडिट करते हों जिसकी एक प्रतिलिपि संबंधित अधिकारियों को फॉरवर्ड की जाये। साथ ही यदि आवश्यक हुआ तो शासन द्वारा भी उनका ऑडिट कराया जा सकता है। ये गैर सरकारी संगठन सोशल ऑडिट के अंतर्गत आते हैं जिसमें कोई भी नागरिक इनके क्रियान्वयन, बजटीय आवंटन इत्यादि संदर्भों परप्रश्न उठा सकता है। अतः NGOs की पारदर्शिता की दिशा में यह अच्छा कदम है। उपरोक्त समस्याओं केसमाधान के लिए योजना आयोग ने अपनी 11वीं एवं 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक स्वतंत्रराष्ट्रीय प्रमाणन एजेंसी के गठन का सुझाव दिया। इस एजेंसी के मैंडेट में NGOsकी रेटिंग्स जारी करना, जिससे इनमे पारदर्शिता एवं धन जुटाने में मदद मिले एवं वेस्टेड इंटरेस्ट को कम करने में भी यह एजेंसी सहायक सिद्ध हो, शामिल था। हालाँकि एजेंसी को रैंक देने की समस्या का सामना करना पड़सकता है जैसे विभिन्न NGOs के कार्यों की प्रकृति भिन्न भिन्न होती है एवं उनके ग्राउंड पर कार्य भी बहुत ही अलग किस्म के हो सकते हैं जैसे एक पेड़ लगाने वाले NGO से रिसर्च करने वाले NGO से तुलना करना एवं रेटिंग प्रदान करना अव्यवहारिक सिद्ध होगाइत्यादि। अतः इन समस्याओं के बावजूद एक स्वतंत्र प्रमाणन एजेंसी रैंकिंग सिस्टम को तैयार कर मददगार साबित हो सकती है। सरकारी कार्यों के विकल्प के तौर पर NGOs की भूमिका को प्रमोट करने से लायक NGOs को स्वीकृति मिलेगी एवं फर्जी NGOs स्वतः समाप्त हो जायेंगे।
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भारत में नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद(LWE) के विकास के विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| साथ ही, वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्यों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Briefly describe the various stages of development of Left Wing Extremism(LWE)/Naxalism in India. Also, underline the objectives of Left Wing Extremism(LWE)/Naxalism. (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच- भारत में वामपंथी उग्रवाद के उत्पति के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत में वामपंथी उग्रवाद/ नक्सलवाद के विकास के विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में,वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्यों को रेखांकित कीजिये| वामपंथी उग्रवाद को ख़त्म करने की आवश्यकता तथा भारत सरकार के द्वारा उठाये गये नीतियों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत में वामपंथी उग्रवाद का मूल भारत में औपनिवेशिक शासन के विभिन्न चरणों के दौरान प्रस्फुटित विविध वामपंथी/साम्यवादी राजनीतिक आंदोलनों , श्रमिक एवं कृषक असंतोष, क्रांतिकारी व्यक्तित्वों तथा जनजातीय विद्रोहों में निहित है| चीन में माओ की सफलता से अत्यधिक प्रेरित होकर उग्रवादी साम्यवादियों ने बंगाल के कुछ क्षेत्रों में 1970 के दशक में सशस्त्र संघर्ष प्रारंभ कर दिया था| 25 मई, 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव में एक पुलिस फायरिंग की घटना के पश्चात राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक कृषक आंदोलन एक संगठित सशस्त्र आंदोलन में परिवर्तित हो गया| भारत में वामपंथी उग्रवाद के विकास के विभिन्न चरण- नक्सलबाड़ी चरण- पश्चिम बंगाल केनक्सलवाड़ी से(1967) चारू मजूमदार का उदय; जंगल संथाल तथा कानू सान्याल जैसे उग्र चरमपंथी साम्यवादी नेताओं का उदय; जमींदारों से भूमि का बलपूर्वक अधिग्रहण; अखिल भारतीय समन्वय समिति(कलकता),AICCCR , 1968 में गठन; 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का गठन; वृहद स्तर पर श्रमिकों, निर्धन किसानों आदि का समर्थन नहीं प्राप्त कर पाना तथा प्रथम चरण(1967-72) पार्वतीपुरम केस के साथ समाप्त हो जाना; द्वितीय चरण(1976-95)- असंख्य छोटे समूहों तथा उपसमूहों के विभाजन तथा क्षेत्रीय प्रसार; मध्यप्रदेश तथा आंध्रप्रदेश में पीपुल्सवार ग्रुप ; बिहार में एमसीसीआई(MCCI); तृतीय चरण(2004-2010)- देश में फैले हुए सभी अतिवादी वामपंथी संगठनों में एकीकरण की अवस्था ; 2003 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) का उदय; नेपाल के माओवादियों से जुड़ाव- पशुपति से तिरूपति तक नक्सलवाद का एकीकरण; 2004 से 2010 तक नक्सलवाद का क्षेत्र विस्तार (छत्तीसगढ़,झारखण्ड,ओडिशा एवं बिहार राज्य इससे मुख्य रूप से प्रभावित )| आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में मुख्य बाधा नगरीकृत होना प्रारंभ चौथा चरण(2010-अबतक)- सशक्त हिंसा के साथ भटकाव; वैचारिक स्तर से भटकाव; उग्रवादी तत्वों की अधिकता एवं सरकार का विरोध कर अपने प्रभाव में वृद्धि करना; नगरीय क्षेत्रों में सक्रियता में वृद्धि; स्थानीय स्तर पर व्याप्त विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में शामिल होना जैसे- विस्थापन एवं पुनर्वास का विरोध ,खनन का विरोध ,भूमि अधिग्रहण का विरोध आदि| आतंकवादियों के साथ संपर्क; नक्सलवाद के वैचारिक प्रसार में बढ़ोतरी; राजनीति और नक्सलवाद के मध्य अवैध संबंध ; गृह मंत्रालय के अनुसार ,वर्ष 2016 में 10 राज्यों के 106 जिलें LWE से प्रभावित हैं| सरकार के द्वारा एक अनुमित आंकड़े के अनुसार 40000 पूर्णकालिक कैडरों का अनुमान है| वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्य- वामपंथी उग्रवाद का मुख्य उद्देश्य पीपुल्स रिवोल्यूशनरी स्टेट की स्थापना करना है जिसे नेपाल सीमा से मध्य भारत होते हुए दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तारित रेड कॉरिडोर की स्थापना के माध्यम से प्राप्त किया जाना है| (नोट- यहाँ रेड कॉरिडोर का छोटा मानचित्र देना ज्यादा प्रभावी रहेगा) ये सरकार की वैधता को समाप्त करके अपना प्रभुत्व स्थापित करने की मंशा रखते हैं| सरकार के अन्दर रिक्तता पैदा करना तथा सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करना; राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेने की लालशा के साथ ये भारत के लोकतांत्रिक पहचान को ख़त्म करने का सपना देखते हैं| इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु ये अपने प्रभाववृद्धि को बढ़ाने हेतु व्यापक क़दमों को उठाते हैं| वामपंथी उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा हेतु बहुत ही गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है| हालिया कुछ समय में नक्सलवादी घटनाओं की तीव्रता में वृद्धि हुयी है जिसके कारण ना सिर्फ सुरक्षाबलों पर हमले बढ़े हैं अपितु सरकारी संस्थानों तथा सार्वजनिक संरचनाओं के तोड़फोड़ से जनता के मन में भय का वातावरण भी निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है|माओवादी चरमपंथ को रोकने हेतुविकास कार्यक्रमों को लागू करने के पूर्व बेहतर कानून-व्यवस्था का निर्माण करना प्राथमिक तत्वहोना चाहिए| विकास कार्यों को सुरक्षाबलों के साथ समन्वित रूप से संपन्न किया जाना चाहिए| किसी क्षेत्र को सुरक्षाबलों द्वारा उग्रवाद मुक्त किये जाने के साथ ही उस क्षेत्र में प्रशासनिक गतिविधियों को तुरंत बहाल किया जाना चाहिए|
##Question:भारत में नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद(LWE) के विकास के विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| साथ ही, वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्यों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Briefly describe the various stages of development of Left Wing Extremism(LWE)/Naxalism in India. Also, underline the objectives of Left Wing Extremism(LWE)/Naxalism. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- भारत में वामपंथी उग्रवाद के उत्पति के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत में वामपंथी उग्रवाद/ नक्सलवाद के विकास के विभिन्न चरणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में,वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्यों को रेखांकित कीजिये| वामपंथी उग्रवाद को ख़त्म करने की आवश्यकता तथा भारत सरकार के द्वारा उठाये गये नीतियों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत में वामपंथी उग्रवाद का मूल भारत में औपनिवेशिक शासन के विभिन्न चरणों के दौरान प्रस्फुटित विविध वामपंथी/साम्यवादी राजनीतिक आंदोलनों , श्रमिक एवं कृषक असंतोष, क्रांतिकारी व्यक्तित्वों तथा जनजातीय विद्रोहों में निहित है| चीन में माओ की सफलता से अत्यधिक प्रेरित होकर उग्रवादी साम्यवादियों ने बंगाल के कुछ क्षेत्रों में 1970 के दशक में सशस्त्र संघर्ष प्रारंभ कर दिया था| 25 मई, 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव में एक पुलिस फायरिंग की घटना के पश्चात राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक कृषक आंदोलन एक संगठित सशस्त्र आंदोलन में परिवर्तित हो गया| भारत में वामपंथी उग्रवाद के विकास के विभिन्न चरण- नक्सलबाड़ी चरण- पश्चिम बंगाल केनक्सलवाड़ी से(1967) चारू मजूमदार का उदय; जंगल संथाल तथा कानू सान्याल जैसे उग्र चरमपंथी साम्यवादी नेताओं का उदय; जमींदारों से भूमि का बलपूर्वक अधिग्रहण; अखिल भारतीय समन्वय समिति(कलकता),AICCCR , 1968 में गठन; 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का गठन; वृहद स्तर पर श्रमिकों, निर्धन किसानों आदि का समर्थन नहीं प्राप्त कर पाना तथा प्रथम चरण(1967-72) पार्वतीपुरम केस के साथ समाप्त हो जाना; द्वितीय चरण(1976-95)- असंख्य छोटे समूहों तथा उपसमूहों के विभाजन तथा क्षेत्रीय प्रसार; मध्यप्रदेश तथा आंध्रप्रदेश में पीपुल्सवार ग्रुप ; बिहार में एमसीसीआई(MCCI); तृतीय चरण(2004-2010)- देश में फैले हुए सभी अतिवादी वामपंथी संगठनों में एकीकरण की अवस्था ; 2003 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) का उदय; नेपाल के माओवादियों से जुड़ाव- पशुपति से तिरूपति तक नक्सलवाद का एकीकरण; 2004 से 2010 तक नक्सलवाद का क्षेत्र विस्तार (छत्तीसगढ़,झारखण्ड,ओडिशा एवं बिहार राज्य इससे मुख्य रूप से प्रभावित )| आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में मुख्य बाधा नगरीकृत होना प्रारंभ चौथा चरण(2010-अबतक)- सशक्त हिंसा के साथ भटकाव; वैचारिक स्तर से भटकाव; उग्रवादी तत्वों की अधिकता एवं सरकार का विरोध कर अपने प्रभाव में वृद्धि करना; नगरीय क्षेत्रों में सक्रियता में वृद्धि; स्थानीय स्तर पर व्याप्त विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में शामिल होना जैसे- विस्थापन एवं पुनर्वास का विरोध ,खनन का विरोध ,भूमि अधिग्रहण का विरोध आदि| आतंकवादियों के साथ संपर्क; नक्सलवाद के वैचारिक प्रसार में बढ़ोतरी; राजनीति और नक्सलवाद के मध्य अवैध संबंध ; गृह मंत्रालय के अनुसार ,वर्ष 2016 में 10 राज्यों के 106 जिलें LWE से प्रभावित हैं| सरकार के द्वारा एक अनुमित आंकड़े के अनुसार 40000 पूर्णकालिक कैडरों का अनुमान है| वामपंथी उग्रवाद के उद्देश्य- वामपंथी उग्रवाद का मुख्य उद्देश्य पीपुल्स रिवोल्यूशनरी स्टेट की स्थापना करना है जिसे नेपाल सीमा से मध्य भारत होते हुए दक्षिण में कर्नाटक तक विस्तारित रेड कॉरिडोर की स्थापना के माध्यम से प्राप्त किया जाना है| (नोट- यहाँ रेड कॉरिडोर का छोटा मानचित्र देना ज्यादा प्रभावी रहेगा) ये सरकार की वैधता को समाप्त करके अपना प्रभुत्व स्थापित करने की मंशा रखते हैं| सरकार के अन्दर रिक्तता पैदा करना तथा सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करना; राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेने की लालशा के साथ ये भारत के लोकतांत्रिक पहचान को ख़त्म करने का सपना देखते हैं| इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु ये अपने प्रभाववृद्धि को बढ़ाने हेतु व्यापक क़दमों को उठाते हैं| वामपंथी उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा हेतु बहुत ही गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है| हालिया कुछ समय में नक्सलवादी घटनाओं की तीव्रता में वृद्धि हुयी है जिसके कारण ना सिर्फ सुरक्षाबलों पर हमले बढ़े हैं अपितु सरकारी संस्थानों तथा सार्वजनिक संरचनाओं के तोड़फोड़ से जनता के मन में भय का वातावरण भी निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है|माओवादी चरमपंथ को रोकने हेतुविकास कार्यक्रमों को लागू करने के पूर्व बेहतर कानून-व्यवस्था का निर्माण करना प्राथमिक तत्वहोना चाहिए| विकास कार्यों को सुरक्षाबलों के साथ समन्वित रूप से संपन्न किया जाना चाहिए| किसी क्षेत्र को सुरक्षाबलों द्वारा उग्रवाद मुक्त किये जाने के साथ ही उस क्षेत्र में प्रशासनिक गतिविधियों को तुरंत बहाल किया जाना चाहिए|
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वायुदाब पेटियों एवं प्रचलित पवनों के क्षेत्र में वर्षा के वितरण की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the distribution of rainfall into the ​​air pressure belts and prevailing wind regions. (150 to 200 words)
एप्रोच - भूमिका में वर्षा को परिभाषित कीजिये | मुख्य भाग में पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये | अंतिम में वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - वर्षा का सम्बन्ध जल संसाधन से है जिसका उत्तरजीविता के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है| वायुमंडल में उपस्थित वे कण जिनके अन्दर जल संघनन शक्ति हो उन्हें संघनन नाभिक कहते है| एकत्रित एवं संघनित पदार्थ के जमाव को बादल कहते है| जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन का वहन नहीं कर पाती तब बादलों के अन्दर उपस्थित पानी या हिम के कण पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, इसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तीन प्रकार की होती है यथा संवहनीय वर्षा, पर्वतीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा| इन्ही रूप में समस्त ग्लोब पर होने वाले वर्षण के वितरण को प्रचलित पवनों एवं वायुदाब पेटियों के अंतर्गत समझा जा सकता है| वर्षा का वितरण निम्न वायुदाब पेटियां इनमें वर्षा की संभावना अधिकतम क्योंकि यहाँ वायु का आरोहण होता है | आरोहण से वायु के तापमान में कमी होगी जिससे RH में वृद्धि होगी जिससे वायु संतृप्त होगी जिससे संघनन की सम्भावना बढ़ जायेगी जिससे बादल का निर्माण एवं वर्षण होगा | विषुवतीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है, यहाँ संवहनीय वर्षा होती है| यहाँ विश्व में अधिकतम मात्रा वर्षा इसी क्षेत्र में होती है, सालों भर वर्षा के कारण सदाबहार वन पाए जाते हैं | संवहनीय वर्षा होने के कारण वर्षा प्रायः शाम के समय होती है|दोपहर के बाद बादलों का जमाव होता है, इससे सापेक्षिक तापमान घट जाता है (बादल सौर प्रकाश को अवरोधित कर देता है) जबकि रात का तापमान सापेक्षिकरूप से बढ़ जाता है| अमेज़न नदी द्रोणी और कांगो नदी द्रोणी तथा इंडोनेशिया, मलेशिया आदि द्वीपीय समूह में इसी प्रकार की वर्षा होती है | उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में भी सालों भर वर्षा होगी किन्तु यहाँ वाताग्रीय वर्षा होती है | उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सर्दियों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि सर्दियों में वाताग्र तीव्र होते हैं | उच्च वायुदाब पेटियां इस क्षेत्र में वर्षा की संभावना न्यूनतम होती है क्योंकि यहाँ वायु का अवरोहण होता है | वायु का अवरोहण होने से वायु के तापमान में वृद्धि,जिससे RH की कमी आती है और संघनन की संभावना नही बन पाती,इससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरुप वर्षण नहीं हो पाता है | उपोष्ण कटिबंधीय एवं उपध्रुवीय कटिबंध क्षेत्र(उच्च वायुदाब पेटियां )में मरुस्थलों का विकास देखने को मिलता है क्योंकि यहाँ वर्षा कम होती है | अवरोहण के क्षेत्र में बादल नहीं बनते हैं किन्तु वायुदाब पेटियों के विस्थापन के कारण यहं कम मात्रा में वर्षा की संभावना बन जाती है | प्रचलित पवन क्षेत्र में वर्षा का वितरण तटवर्ती पवन(समुद्र से स्थल की ओर) वर्षा का आरोहण होने से वर्षा की संभावना होती है | सुदूरवर्ती पवन(स्थल से समुद्र की ओर) यहाँ वायु अवरोहित होती है अतः वर्षा कम होगी | व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में वितरण महाद्वीपीय भाग मेंपश्चिमी भाग में सुदूरवर्ती पवन होने के कारण वर्षा कम होती है और मरुस्थलों का निर्माण होता है | पूर्वी भाग में तटवर्ती पवन होने कारण पर्याप्त मात्रा में वर्षा की संभावना होती है | व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर वर्षा की कमी तथा अधिक वाष्पीकरण के कारण शुद्ध उष्ण मरुस्थल का निर्माण होता है | व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में उष्णकटिबन्धीय चक्रवात का निर्माण होता है जिससे वर्षा पूर्वी तट पर होती है लेकिन पश्चिमी तट पर लगभग नही होती है | पछुवा पवनों का क्षेत्र पश्चिमी तट परतटवर्ती पवन होने के कारणवर्षा की मात्रा अधिक होती है | पूर्वी तट परसुदूरवर्ती पवन होने कारणवर्षा की मात्रा कम होती है | पछुआ पवन के सुदूरवर्ती क्षेत्र में पछुवा पवन से वर्षा नहीं होती है परन्तु कम वाष्पीकरण के कारण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात से होने वाली वर्षा के कारण मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है | ध्रुवीय पूर्वा का क्षेत्र इस क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता की कमी होती है| अतः यहाँ वर्षा की कमी रहती है | उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर वर्षा के वितरण को वायु संचरण की दिशा, धरातलीय तापमान, वायु का आरोहण-अवरोहण, आर्द्रता की उपस्थिति आदि अनेक कारक प्रभावित करते हैं|
##Question:वायुदाब पेटियों एवं प्रचलित पवनों के क्षेत्र में वर्षा के वितरण की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the distribution of rainfall into the ​​air pressure belts and prevailing wind regions. (150 to 200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में वर्षा को परिभाषित कीजिये | मुख्य भाग में पृथ्वी पर वर्षा के वितरण का विश्लेषण कीजिये | अंतिम में वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - वर्षा का सम्बन्ध जल संसाधन से है जिसका उत्तरजीविता के सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है| वायुमंडल में उपस्थित वे कण जिनके अन्दर जल संघनन शक्ति हो उन्हें संघनन नाभिक कहते है| एकत्रित एवं संघनित पदार्थ के जमाव को बादल कहते है| जब बादलों के भीतर बहुत तेजी के साथ संघनन होने लगता है और हवा इन संगठित कणों के वजन का वहन नहीं कर पाती तब बादलों के अन्दर उपस्थित पानी या हिम के कण पृथ्वी पर गिरने लगते हैं, इसे वर्षा कहते हैं । वर्षा तीन प्रकार की होती है यथा संवहनीय वर्षा, पर्वतीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा| इन्ही रूप में समस्त ग्लोब पर होने वाले वर्षण के वितरण को प्रचलित पवनों एवं वायुदाब पेटियों के अंतर्गत समझा जा सकता है| वर्षा का वितरण निम्न वायुदाब पेटियां इनमें वर्षा की संभावना अधिकतम क्योंकि यहाँ वायु का आरोहण होता है | आरोहण से वायु के तापमान में कमी होगी जिससे RH में वृद्धि होगी जिससे वायु संतृप्त होगी जिससे संघनन की सम्भावना बढ़ जायेगी जिससे बादल का निर्माण एवं वर्षण होगा | विषुवतीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सालों भर वर्षा होती है, यहाँ संवहनीय वर्षा होती है| यहाँ विश्व में अधिकतम मात्रा वर्षा इसी क्षेत्र में होती है, सालों भर वर्षा के कारण सदाबहार वन पाए जाते हैं | संवहनीय वर्षा होने के कारण वर्षा प्रायः शाम के समय होती है|दोपहर के बाद बादलों का जमाव होता है, इससे सापेक्षिक तापमान घट जाता है (बादल सौर प्रकाश को अवरोधित कर देता है) जबकि रात का तापमान सापेक्षिकरूप से बढ़ जाता है| अमेज़न नदी द्रोणी और कांगो नदी द्रोणी तथा इंडोनेशिया, मलेशिया आदि द्वीपीय समूह में इसी प्रकार की वर्षा होती है | उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में भी सालों भर वर्षा होगी किन्तु यहाँ वाताग्रीय वर्षा होती है | उपध्रुवीय निम्न वायु दाब क्षेत्र में सर्दियों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि सर्दियों में वाताग्र तीव्र होते हैं | उच्च वायुदाब पेटियां इस क्षेत्र में वर्षा की संभावना न्यूनतम होती है क्योंकि यहाँ वायु का अवरोहण होता है | वायु का अवरोहण होने से वायु के तापमान में वृद्धि,जिससे RH की कमी आती है और संघनन की संभावना नही बन पाती,इससे बादलों का निर्माण नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरुप वर्षण नहीं हो पाता है | उपोष्ण कटिबंधीय एवं उपध्रुवीय कटिबंध क्षेत्र(उच्च वायुदाब पेटियां )में मरुस्थलों का विकास देखने को मिलता है क्योंकि यहाँ वर्षा कम होती है | अवरोहण के क्षेत्र में बादल नहीं बनते हैं किन्तु वायुदाब पेटियों के विस्थापन के कारण यहं कम मात्रा में वर्षा की संभावना बन जाती है | प्रचलित पवन क्षेत्र में वर्षा का वितरण तटवर्ती पवन(समुद्र से स्थल की ओर) वर्षा का आरोहण होने से वर्षा की संभावना होती है | सुदूरवर्ती पवन(स्थल से समुद्र की ओर) यहाँ वायु अवरोहित होती है अतः वर्षा कम होगी | व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में वितरण महाद्वीपीय भाग मेंपश्चिमी भाग में सुदूरवर्ती पवन होने के कारण वर्षा कम होती है और मरुस्थलों का निर्माण होता है | पूर्वी भाग में तटवर्ती पवन होने कारण पर्याप्त मात्रा में वर्षा की संभावना होती है | व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर वर्षा की कमी तथा अधिक वाष्पीकरण के कारण शुद्ध उष्ण मरुस्थल का निर्माण होता है | व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में उष्णकटिबन्धीय चक्रवात का निर्माण होता है जिससे वर्षा पूर्वी तट पर होती है लेकिन पश्चिमी तट पर लगभग नही होती है | पछुवा पवनों का क्षेत्र पश्चिमी तट परतटवर्ती पवन होने के कारणवर्षा की मात्रा अधिक होती है | पूर्वी तट परसुदूरवर्ती पवन होने कारणवर्षा की मात्रा कम होती है | पछुआ पवन के सुदूरवर्ती क्षेत्र में पछुवा पवन से वर्षा नहीं होती है परन्तु कम वाष्पीकरण के कारण तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात से होने वाली वर्षा के कारण मरुस्थलों का निर्माण नहीं होता है | ध्रुवीय पूर्वा का क्षेत्र इस क्षेत्र में विशिष्ट आर्द्रता की कमी होती है| अतः यहाँ वर्षा की कमी रहती है | उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर वर्षा के वितरण को वायु संचरण की दिशा, धरातलीय तापमान, वायु का आरोहण-अवरोहण, आर्द्रता की उपस्थिति आदि अनेक कारक प्रभावित करते हैं|
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Breifly explain the classical unemployment also discuss the solution provided by classical school. (150 words I 10 marks)
Approach- 1. Explain classical unemployment. 2.Discuss the solution provided by classical school. Answer- Classical unemployment: Classical unemployment, also known as wage rate unemployment, is caused when the wages are too high. It was predominant before 1930 when workers themselves were blamed for high wages, it is also known as real wage unemployment. Theprice at which the labor is available is the price that the potential employees seek for themselves in the labor market. This is the wage, on the other hand, the employers are usually ready to employ these people at a different wage, if wages demanded are more than wages offered, there would be more people who are seeking employment and fewer people who are demanded to be employed and hence there is unemployment. This occurs when wages are artificially kept above the equilibrium point i.e. the market-clearing wage. For example- powerful trade unions/ minimum wage acts could lead the wages to be above equilibrium leading to an excess supply of labor and hence unemployment. The classical solution to unemployment- Classical economists believe in Laissez-Faire i.e. minimum or no intervention of the government and so their solution to unemployment problems is also based on this. Classical economists believe that wages are sticky in the short run i.e. the employees do not adjust their wage expectations downwards in the short run. However in the long run, if the employment situation persists, employees will revise them downwards. This downward revision causes a decrease in the cost of factors of production and hence incentivizes the producers to produce more, ultimately increases the employment back to the maximum level. It can also be explained through the following steps- (Note- Aggregate demand and supply curve can be used to explain the solution) 1. Assume the economy is currently producing at the Full employment level at price p0. 2. Suppose the Aggregate Demand falls and the economy now produces lower output at a P1 price level. 3. Classical economists assume that wages will not revise in the short run and hence economy will keep on producing at this point. In the long run, wages revise downward and hence the following happens- 4. Aggregate Supply in the short run would now shift outward. This happens because lower wages lead to lower cost of production and hence more output would be produced by the suppliers. 5. Eventually the output increases and settles back at the point which is the full employment level of output at a lower price level of P2.
##Question:Breifly explain the classical unemployment also discuss the solution provided by classical school. (150 words I 10 marks)##Answer:Approach- 1. Explain classical unemployment. 2.Discuss the solution provided by classical school. Answer- Classical unemployment: Classical unemployment, also known as wage rate unemployment, is caused when the wages are too high. It was predominant before 1930 when workers themselves were blamed for high wages, it is also known as real wage unemployment. Theprice at which the labor is available is the price that the potential employees seek for themselves in the labor market. This is the wage, on the other hand, the employers are usually ready to employ these people at a different wage, if wages demanded are more than wages offered, there would be more people who are seeking employment and fewer people who are demanded to be employed and hence there is unemployment. This occurs when wages are artificially kept above the equilibrium point i.e. the market-clearing wage. For example- powerful trade unions/ minimum wage acts could lead the wages to be above equilibrium leading to an excess supply of labor and hence unemployment. The classical solution to unemployment- Classical economists believe in Laissez-Faire i.e. minimum or no intervention of the government and so their solution to unemployment problems is also based on this. Classical economists believe that wages are sticky in the short run i.e. the employees do not adjust their wage expectations downwards in the short run. However in the long run, if the employment situation persists, employees will revise them downwards. This downward revision causes a decrease in the cost of factors of production and hence incentivizes the producers to produce more, ultimately increases the employment back to the maximum level. It can also be explained through the following steps- (Note- Aggregate demand and supply curve can be used to explain the solution) 1. Assume the economy is currently producing at the Full employment level at price p0. 2. Suppose the Aggregate Demand falls and the economy now produces lower output at a P1 price level. 3. Classical economists assume that wages will not revise in the short run and hence economy will keep on producing at this point. In the long run, wages revise downward and hence the following happens- 4. Aggregate Supply in the short run would now shift outward. This happens because lower wages lead to lower cost of production and hence more output would be produced by the suppliers. 5. Eventually the output increases and settles back at the point which is the full employment level of output at a lower price level of P2.
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"राममोहन राय आधुनिक भारत के पहले चमकते सितारे थे।" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) "Rammohan Roy was the first shining star of modern India." Justify the statement with the help of relevant arguments. (150-200 words; 10 marks)
दृष्टिकोण : राममोहन राय का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । आधुनिक भारत के निर्माण में राममोहन राय के योगदान की चर्चा कीजिये । उत्तर : भारत में आधुनिक काल के निर्माण में 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आंदोलन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है और इस आंदोलन के अग्रणी नेतृत्वकर्ता केरूप में हम राजा राममोहन राय को देख सकते हैं । ।राममोहन राय का जन्म बंगाल के एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ । आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर उन्होने सामाजिक-धार्मिक बुराइयों के प्रति आवाज उठाई और धीरे-धीरे भारतीय आधुनिकता के अग्रदूत के रूप में सामने आए । राममोहन राय के मस्तिष्क पर प्रारम्भिक प्रभाव तात्कालिन सामाजिक बुराइयों के कारण पड़ा। सती प्रथा की अमानवीयता ने उन्हे अंदर तक झकझोर दिया और आगे वे इन सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के प्रति स्पष्ट रूप में मुखर होकर सामने आए । आधुनिक भारत के निर्माण में हम राममोहन राय के योगदान को निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में योगदान : राममोहन राय जाति प्रथा व छुआछूत के प्रबल विरोधी थे और उन्होने इन प्रथाओं की कठोर आलोचना की । राममोहन राय धार्मिक कर्मकांडों , पुरोहितवाद, बहुदेववाद, मूर्तिपूजा आदि के प्रबल विरोधी थे । वे एकेश्वरवाद व सभी धर्मों की अच्छाइयों में भरोसा रखते थे । इनके द्वारा महिलाओं में प्रचलित कुरीतियों यथा- सती प्रथा , बाल विवाह , विधवाओं की स्थिति आदि में सुधार का भरसक प्रयास किया गया । इन्हीं के प्रयत्नों से 1829 में सती प्रथा के खिलाफ कानून पास हुआ । शिक्षा व प्रेस के क्षेत्र में योगदान : राममोहन राय को भारतीय पत्रकारिता का भी अग्रदूत कहा जाता है । इनके द्वारा वेदों व उपनिषदों का अनुवाद किया गया । साथ ही कई पत्र-पत्रिकाओं का भी सम्पादन किया गया ।एकेश्वरवादियों को उपहार ,प्रिसेप्ट्स ऑफ जिसस , संवाद कौमुदी , मिरातूल अखबार , ब्रहमेनिकल पत्रिका आदि इनकी प्रमुख पुस्तक व पत्र-पत्रिकाओं में सम्मिलित है । आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में भी राममोहन राय का योगदान युगांतकारी रहा है । वे आधुनिक शिक्षा व महिला शिक्षा के समर्थकों में अग्रणी व्यक्तित्व रहे हैं । प्रशासनिक क्षेत्र में योगदान : इनके द्वारा उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का पृथक्करण तथा न्यायिक समता की मांग निरंतर की जाती रही । अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार : 1821 में नेपल्स में क्रान्ति की विफलता पर दुखी , 1823 में स्पेनिस अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज का आयोजन आदि इनके अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की समझ को दर्शाता है । उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजा राममोहन राय ने न केवल वैचारिक स्तर पर बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी आधुनिक भारत का शिलान्यास किया जिस पर आगे अन्य राष्ट्रीय नेताओं द्वारा आधुनिक भारत का भवन निर्मित हुआ । अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि राममोहन राय आधुनिक भारत के पहले चमकते हुए सितारे थे ।
##Question:"राममोहन राय आधुनिक भारत के पहले चमकते सितारे थे।" संगत तर्कों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) "Rammohan Roy was the first shining star of modern India." Justify the statement with the help of relevant arguments. (150-200 words; 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : राममोहन राय का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । आधुनिक भारत के निर्माण में राममोहन राय के योगदान की चर्चा कीजिये । उत्तर : भारत में आधुनिक काल के निर्माण में 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आंदोलन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है और इस आंदोलन के अग्रणी नेतृत्वकर्ता केरूप में हम राजा राममोहन राय को देख सकते हैं । ।राममोहन राय का जन्म बंगाल के एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ । आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर उन्होने सामाजिक-धार्मिक बुराइयों के प्रति आवाज उठाई और धीरे-धीरे भारतीय आधुनिकता के अग्रदूत के रूप में सामने आए । राममोहन राय के मस्तिष्क पर प्रारम्भिक प्रभाव तात्कालिन सामाजिक बुराइयों के कारण पड़ा। सती प्रथा की अमानवीयता ने उन्हे अंदर तक झकझोर दिया और आगे वे इन सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के प्रति स्पष्ट रूप में मुखर होकर सामने आए । आधुनिक भारत के निर्माण में हम राममोहन राय के योगदान को निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं : सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में योगदान : राममोहन राय जाति प्रथा व छुआछूत के प्रबल विरोधी थे और उन्होने इन प्रथाओं की कठोर आलोचना की । राममोहन राय धार्मिक कर्मकांडों , पुरोहितवाद, बहुदेववाद, मूर्तिपूजा आदि के प्रबल विरोधी थे । वे एकेश्वरवाद व सभी धर्मों की अच्छाइयों में भरोसा रखते थे । इनके द्वारा महिलाओं में प्रचलित कुरीतियों यथा- सती प्रथा , बाल विवाह , विधवाओं की स्थिति आदि में सुधार का भरसक प्रयास किया गया । इन्हीं के प्रयत्नों से 1829 में सती प्रथा के खिलाफ कानून पास हुआ । शिक्षा व प्रेस के क्षेत्र में योगदान : राममोहन राय को भारतीय पत्रकारिता का भी अग्रदूत कहा जाता है । इनके द्वारा वेदों व उपनिषदों का अनुवाद किया गया । साथ ही कई पत्र-पत्रिकाओं का भी सम्पादन किया गया ।एकेश्वरवादियों को उपहार ,प्रिसेप्ट्स ऑफ जिसस , संवाद कौमुदी , मिरातूल अखबार , ब्रहमेनिकल पत्रिका आदि इनकी प्रमुख पुस्तक व पत्र-पत्रिकाओं में सम्मिलित है । आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में भी राममोहन राय का योगदान युगांतकारी रहा है । वे आधुनिक शिक्षा व महिला शिक्षा के समर्थकों में अग्रणी व्यक्तित्व रहे हैं । प्रशासनिक क्षेत्र में योगदान : इनके द्वारा उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का पृथक्करण तथा न्यायिक समता की मांग निरंतर की जाती रही । अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार : 1821 में नेपल्स में क्रान्ति की विफलता पर दुखी , 1823 में स्पेनिस अमेरिका में राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता पर सार्वजनिक भोज का आयोजन आदि इनके अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की समझ को दर्शाता है । उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजा राममोहन राय ने न केवल वैचारिक स्तर पर बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी आधुनिक भारत का शिलान्यास किया जिस पर आगे अन्य राष्ट्रीय नेताओं द्वारा आधुनिक भारत का भवन निर्मित हुआ । अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि राममोहन राय आधुनिक भारत के पहले चमकते हुए सितारे थे ।
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राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दलों को मान्यता के लिएशर्तों का उल्लेख कीजिए। (10 अंक/150-200 शब्द) Mention the conditions for recognition to national and state-level parties. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में राजनीतिकदलों का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दलों को मान्यता के लिए शर्तों का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत का निर्वाचन आयोग, देश में चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक दलों को पंजीकृत करता है और चुनाव में उनके प्रदर्शन के आधार पर उनको राष्ट्रीय या प्रदेश स्तरीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता प्रदान करता है। चुनाव आयोगजिन राजनीतिक दलों को मान्यता देता है उनको कुछ विशेष अधिकार और सुविधाएँ भी देता है जैसे, पार्टी को चुनाव चिन्ह का आवंटन करना, निर्वाचन सूचियों को प्राप्त करने की सुविधा करना इत्यादि। राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता पाने के लिए शर्तें:- एक मान्यता प्राप्त पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तभी प्रदान किया जा सकता है यदि वह निम्नलिखित तीन में सेकिसी एक शर्तको पूरा करती है- यदि कोई पार्टी कम से कम 3 विभिन्न राज्यों को मिलाकर लोकसभा की 2% सीटें (2014 के चुनाव के अनुसार 11 सीटें) जीतती है या; यदि कोई पार्टी 4 लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा या विधान सभा चुनाव में चार राज्यों में 6% वोट प्राप्त करती है या; यदि कोई पार्टी चार या चार से अधिक राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी के रूप में मान्यता रखती है। राज्य स्तरीय दल की मान्यता पाने के लिए शर्तें:- एक पार्टी को राज्य स्तरीय दल का दर्जा तभी प्रदान किया जा सकता है यदि वह निम्नलिखित शर्तों में से कम से कमकिसी एक शर्तको पूरा करती है- यदिकोई पार्टी राज्य विधानसभा की कुल सीटों में से कम-से-कम 3% सीट या कम-से-कम 3 सीटें, जो भी ज्यादा हो प्राप्त करती है या; यदि कोई पार्टी लोकसभा के लिए उस राज्य के लिए आवंटित प्रत्येक 25 सीटों या उस संख्या की किसी भिन्न के पीछे कम से कम 1 सीट प्राप्त करती है या; यदि कोई पार्टी लोकसभा या राज्य विधानसभा के चुनाव में कुल वैध मतों में से कम से कम 6% मत प्राप्त करती है और साथ ही कम से कम 1 लोकसभा सीट या 2 विधानसभा सीट जीतती है या; एक अन्य मापदंड के अनुसार यदि कोई पार्टी लोकसभा या राज्य विधानसभा के आम चुनाव में किसी राज्य में एक भी सीट जीतने में विफल रहती है लेकिन वह उस राज्य में डाले गए कुल वैध मतों में से 8% मत प्राप्त करती है, तो उस राज्य में उस पार्टी को क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा दिया जा सकता है। अतः राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पार्टी के दर्जे के लिए भिन्न भिन्न मानदंड हैं। इस प्रकारआम चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर मान्यता प्राप्त दलों की संख्या बदलती रहती है।
##Question:राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दलों को मान्यता के लिएशर्तों का उल्लेख कीजिए। (10 अंक/150-200 शब्द) Mention the conditions for recognition to national and state-level parties. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में राजनीतिकदलों का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात,राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दलों को मान्यता के लिए शर्तों का उल्लेख कीजिए। अंत में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारत का निर्वाचन आयोग, देश में चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक दलों को पंजीकृत करता है और चुनाव में उनके प्रदर्शन के आधार पर उनको राष्ट्रीय या प्रदेश स्तरीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता प्रदान करता है। चुनाव आयोगजिन राजनीतिक दलों को मान्यता देता है उनको कुछ विशेष अधिकार और सुविधाएँ भी देता है जैसे, पार्टी को चुनाव चिन्ह का आवंटन करना, निर्वाचन सूचियों को प्राप्त करने की सुविधा करना इत्यादि। राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता पाने के लिए शर्तें:- एक मान्यता प्राप्त पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तभी प्रदान किया जा सकता है यदि वह निम्नलिखित तीन में सेकिसी एक शर्तको पूरा करती है- यदि कोई पार्टी कम से कम 3 विभिन्न राज्यों को मिलाकर लोकसभा की 2% सीटें (2014 के चुनाव के अनुसार 11 सीटें) जीतती है या; यदि कोई पार्टी 4 लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा या विधान सभा चुनाव में चार राज्यों में 6% वोट प्राप्त करती है या; यदि कोई पार्टी चार या चार से अधिक राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी के रूप में मान्यता रखती है। राज्य स्तरीय दल की मान्यता पाने के लिए शर्तें:- एक पार्टी को राज्य स्तरीय दल का दर्जा तभी प्रदान किया जा सकता है यदि वह निम्नलिखित शर्तों में से कम से कमकिसी एक शर्तको पूरा करती है- यदिकोई पार्टी राज्य विधानसभा की कुल सीटों में से कम-से-कम 3% सीट या कम-से-कम 3 सीटें, जो भी ज्यादा हो प्राप्त करती है या; यदि कोई पार्टी लोकसभा के लिए उस राज्य के लिए आवंटित प्रत्येक 25 सीटों या उस संख्या की किसी भिन्न के पीछे कम से कम 1 सीट प्राप्त करती है या; यदि कोई पार्टी लोकसभा या राज्य विधानसभा के चुनाव में कुल वैध मतों में से कम से कम 6% मत प्राप्त करती है और साथ ही कम से कम 1 लोकसभा सीट या 2 विधानसभा सीट जीतती है या; एक अन्य मापदंड के अनुसार यदि कोई पार्टी लोकसभा या राज्य विधानसभा के आम चुनाव में किसी राज्य में एक भी सीट जीतने में विफल रहती है लेकिन वह उस राज्य में डाले गए कुल वैध मतों में से 8% मत प्राप्त करती है, तो उस राज्य में उस पार्टी को क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा दिया जा सकता है। अतः राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पार्टी के दर्जे के लिए भिन्न भिन्न मानदंड हैं। इस प्रकारआम चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर मान्यता प्राप्त दलों की संख्या बदलती रहती है।
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19 वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए इनके महत्त्व की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द; 10 अंक ) Clarifying the nature of 19th century socio-religious reform movements, discuss their importance. (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि बताइये 2- प्रथम भाग में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों की प्रकृति को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों के महत्त्व की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में इनके दूरगामी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज धार्मिक अंधविश्वासों एवं सामाजिक कुरीतियों से जकड़ा हुआ था| पुरोहित, समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाये हुये थे तथा जनसामान्य पर विभिन्न कर्मकांडों तथा निरर्थक धार्मिक कृत्यों की सहायता से वर्चस्व स्थापित कर चुके थे|इसके अतिरिक्त सतीप्रथा, जातिवाद, छुआछूत बाल विवाह तथा विधवाओं की दयनीय स्थिति आदि कुरीतियाँ प्रचलित थीं| इस पृष्ठभूमि में तत्कालीन समाज के शिक्षित वर्गों ने सामाजिक धार्मिक सुधार के अनेक प्रयास किये| इन प्रयासों के अंतर्गत बृह्मसमाज, आर्य समाज, रहनुमाई मजदायन सभा, देव समाज, वेद समाज आदि प्रमुख हैं| सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन की प्रकृति · 19 वीं सदी में देश के अलग अलग हिस्सों में विभिन्न धर्मों में जैसे कि हिन्दू इस्लाम पारसी आदि सामाजिक धार्मिक जीवन में प्रबुद्ध भारतीयों के द्वारा सुधार का प्रयास आधुनिक भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है · इस सुधार आन्दोलनों का लक्ष्य सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों को दूर कर भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करना था · सुधारकों ने सामाजिक क्षेत्र में शिक्षा तथा महिलाओं की दशा में सुधार पर सर्वाधिक बल दियासुधारकों का मानना था कि समाज की आधी आबादी में दशा में सुधार के बिना तथा आधुनिक शिक्षा के विकास के बिना समाज का आधुनिकीकरण संभव नही है · धर्म सुधार के क्षेत्र में ईश्वर आत्मा मोक्ष इत्यादि मुद्दों की तुलना में अंधविश्वास, कर्मकांड, पुरोहितवाद जैसे मुद्दों पर अधिक बल दिया गया क्योंकि सामाजिक कुरीतियों को सींचने का काम कहीं न कहीं इन्ही मुद्दों के द्वारा किया जा रहा था · अधिकाँश सुधारक धार्मिक सार्वभौमवाद तथा तर्कबुद्धिवाद को महत्त्व देते थे|राम मोहन राय तर्क को सत्य की अंतिम कसौटी मानते थी| · सुधारकों ने सामाजिक धार्मिक सुधारों के लिए संगठित व संस्थागत प्रयास किये जैसे बृह्मसमाज, आर्य समाज इत्यादी संस्थाओं की स्थापना की गयी · सुधारों के लिए लोकतांत्रिक तरीकों पर बल दिया गया जैसे अखबारों व पुस्तकों के माध्यम से लोगों को जागरूक करना, वाद-विवाद का आयोजन, सरकार पर कानून बनाने के इए दबाव इत्यादि · इतना ही नहीं कुछ सुधारकों ने समाज सेवा को अत्यधिक महत्त्व दिया जैसे विवेकानंद, आर्य समाज आदि · सुधार आन्दोलनों का प्रसार मुख्यतः नगरीय समाज तक देखा गया हालांकि आर्य समाज जैसी संस्थाओं का ग्रामीण क्षेत्रों पर भी प्रभाव दिखा · सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलन को संचालित करने में शिक्षित एवं मध्य वर्ग की विशेष भूमिका थी लेकिन इनके प्रयासों का सम्बन्ध समाज के सभी वर्गों से था सुधार आंदोलनों का महत्त्व सामाजिक सन्दर्भ में · समाज में बदलाव की शुरुआत हुई, दूसरे शब्दों में जड़ता को समाप्त कर प्रगति का सन्देश दिया गया · विभिन्न प्रकार की असमानताओं पर प्रहार कर समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार के प्रयास किये गए · इनके प्रयासों ने महिलाओं की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया · आधुनिक शिक्षा एवं आधुनिक विचारों के प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान था धार्मिक क्षेत्र में · कर्मकांडो पर प्रहार करते हुए धर्म का सरलीकरण किया गया · धार्मिक सहिष्णुता को महत्त्व देकर सामाजिक-धार्मिक समन्वय तथा बहुलवादी संस्कृति का सम्मान किया गया · व्यक्ति एवं समाज को धर्म के कर्मकांड एवं अंधविश्वास से मुक्त करने का प्रयास किया गया राजनीतिक क्षेत्र में · सुधार आन्दोलनों के द्वारा लोकतांत्रिक विचारों का भारतीय समाज में बीजारोपण तथा सिंचित करने का कार्य किया गया · कानून की भूमिका या महत्त्व को स्वीकार किया गया दूसरे शब्दों में ये विधि के शासन का समर्थन करते थे · सामाजिक धार्मिक सुधारों के लिए प्रेस को माध्यम बनाया गया और आगे चल कर राष्ट्रीय चेतना के उदय में भी प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही| · वैश्विक गतिविधियों के साथ भारतीयों को जोड़ने का कार्य भी इन सुधारकों ने किया राष्ट्रीय चेतना के जागरण में · सुधारकों ने जिस आलोचनात्मक दृष्टिकोण का विकास किया उस दृष्टिकोण ने ही सरकारी नीतियों के आलोचनातमक विश्लेषण का मार्ग प्रशस्त किया और ब्रिटिश विरोधी भावना के उदय में इन विश्लेषणों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है · सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण के कारण भी स्वदेशी सरकार की अवधारणा धीरे धीरे लोकप्रिय हुई, · दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के क्रांतिकारी एवं गरमदलीय नेताओं को प्रभावित किया · महादेव गोविंद रानाडे, दादा भाई नौरोजी, लाजपत राय जैसे सुधारकों ने प्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रभावित किया| इस तरह स्पष्ट होता है कि 19वीं सदी के धार्मिक-सामाजिक आन्दोलनों ने आधुनिक भारत की आधारशिला निर्मित की किन्तु धार्मिक सामाजिक आंदोलन अनेक सीमाओं से भी युक्त थे| जैसे सुधारकों के प्रयासों बाद भी समाजिक धार्मिक कुरीतियाँ बनी रहीं| सुधारकों का प्रभाव केवल नगरों तथाशिक्षित मध्यवर्ग एवं उच्च वर्गों तक सीमित था| अधिकांशतः सुधारकों की आस्था सरकार में बनी रही| अधिकांशतः सुधारकों की गतिविधियाँ नगरों तक ही सीमित थी| पुनरुत्थान वादी सुधारकों की गतिविधियों से साम्प्रदायिक चेतना को प्रोत्साहन मिला तथा धर्मग्रंथों में प्रत्येक स्थिति में आस्था से गैर वैज्ञानिक चिंतन को भी प्रोत्साहन मिला| फिर भी 19 वीं सदी के अंत तक राष्ट्रीय स्तर पर सुधारों के प्रयास प्रारम्भ हो गए और 20 वीं सदी मेंसमाज सुधार आन्दोलन राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ जुड़ गया| समाज सुधार आन्दोलन ने आधुनिक विचारों के प्रसार एवं आधुनिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया की नीव रखी|
##Question:19 वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए इनके महत्त्व की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द; 10 अंक ) Clarifying the nature of 19th century socio-religious reform movements, discuss their importance. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि बताइये 2- प्रथम भाग में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों की प्रकृति को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों के महत्त्व की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में इनके दूरगामी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज धार्मिक अंधविश्वासों एवं सामाजिक कुरीतियों से जकड़ा हुआ था| पुरोहित, समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाये हुये थे तथा जनसामान्य पर विभिन्न कर्मकांडों तथा निरर्थक धार्मिक कृत्यों की सहायता से वर्चस्व स्थापित कर चुके थे|इसके अतिरिक्त सतीप्रथा, जातिवाद, छुआछूत बाल विवाह तथा विधवाओं की दयनीय स्थिति आदि कुरीतियाँ प्रचलित थीं| इस पृष्ठभूमि में तत्कालीन समाज के शिक्षित वर्गों ने सामाजिक धार्मिक सुधार के अनेक प्रयास किये| इन प्रयासों के अंतर्गत बृह्मसमाज, आर्य समाज, रहनुमाई मजदायन सभा, देव समाज, वेद समाज आदि प्रमुख हैं| सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन की प्रकृति · 19 वीं सदी में देश के अलग अलग हिस्सों में विभिन्न धर्मों में जैसे कि हिन्दू इस्लाम पारसी आदि सामाजिक धार्मिक जीवन में प्रबुद्ध भारतीयों के द्वारा सुधार का प्रयास आधुनिक भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है · इस सुधार आन्दोलनों का लक्ष्य सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों को दूर कर भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करना था · सुधारकों ने सामाजिक क्षेत्र में शिक्षा तथा महिलाओं की दशा में सुधार पर सर्वाधिक बल दियासुधारकों का मानना था कि समाज की आधी आबादी में दशा में सुधार के बिना तथा आधुनिक शिक्षा के विकास के बिना समाज का आधुनिकीकरण संभव नही है · धर्म सुधार के क्षेत्र में ईश्वर आत्मा मोक्ष इत्यादि मुद्दों की तुलना में अंधविश्वास, कर्मकांड, पुरोहितवाद जैसे मुद्दों पर अधिक बल दिया गया क्योंकि सामाजिक कुरीतियों को सींचने का काम कहीं न कहीं इन्ही मुद्दों के द्वारा किया जा रहा था · अधिकाँश सुधारक धार्मिक सार्वभौमवाद तथा तर्कबुद्धिवाद को महत्त्व देते थे|राम मोहन राय तर्क को सत्य की अंतिम कसौटी मानते थी| · सुधारकों ने सामाजिक धार्मिक सुधारों के लिए संगठित व संस्थागत प्रयास किये जैसे बृह्मसमाज, आर्य समाज इत्यादी संस्थाओं की स्थापना की गयी · सुधारों के लिए लोकतांत्रिक तरीकों पर बल दिया गया जैसे अखबारों व पुस्तकों के माध्यम से लोगों को जागरूक करना, वाद-विवाद का आयोजन, सरकार पर कानून बनाने के इए दबाव इत्यादि · इतना ही नहीं कुछ सुधारकों ने समाज सेवा को अत्यधिक महत्त्व दिया जैसे विवेकानंद, आर्य समाज आदि · सुधार आन्दोलनों का प्रसार मुख्यतः नगरीय समाज तक देखा गया हालांकि आर्य समाज जैसी संस्थाओं का ग्रामीण क्षेत्रों पर भी प्रभाव दिखा · सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलन को संचालित करने में शिक्षित एवं मध्य वर्ग की विशेष भूमिका थी लेकिन इनके प्रयासों का सम्बन्ध समाज के सभी वर्गों से था सुधार आंदोलनों का महत्त्व सामाजिक सन्दर्भ में · समाज में बदलाव की शुरुआत हुई, दूसरे शब्दों में जड़ता को समाप्त कर प्रगति का सन्देश दिया गया · विभिन्न प्रकार की असमानताओं पर प्रहार कर समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार के प्रयास किये गए · इनके प्रयासों ने महिलाओं की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया · आधुनिक शिक्षा एवं आधुनिक विचारों के प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान था धार्मिक क्षेत्र में · कर्मकांडो पर प्रहार करते हुए धर्म का सरलीकरण किया गया · धार्मिक सहिष्णुता को महत्त्व देकर सामाजिक-धार्मिक समन्वय तथा बहुलवादी संस्कृति का सम्मान किया गया · व्यक्ति एवं समाज को धर्म के कर्मकांड एवं अंधविश्वास से मुक्त करने का प्रयास किया गया राजनीतिक क्षेत्र में · सुधार आन्दोलनों के द्वारा लोकतांत्रिक विचारों का भारतीय समाज में बीजारोपण तथा सिंचित करने का कार्य किया गया · कानून की भूमिका या महत्त्व को स्वीकार किया गया दूसरे शब्दों में ये विधि के शासन का समर्थन करते थे · सामाजिक धार्मिक सुधारों के लिए प्रेस को माध्यम बनाया गया और आगे चल कर राष्ट्रीय चेतना के उदय में भी प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही| · वैश्विक गतिविधियों के साथ भारतीयों को जोड़ने का कार्य भी इन सुधारकों ने किया राष्ट्रीय चेतना के जागरण में · सुधारकों ने जिस आलोचनात्मक दृष्टिकोण का विकास किया उस दृष्टिकोण ने ही सरकारी नीतियों के आलोचनातमक विश्लेषण का मार्ग प्रशस्त किया और ब्रिटिश विरोधी भावना के उदय में इन विश्लेषणों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है · सरकार के असहयोगात्मक दृष्टिकोण के कारण भी स्वदेशी सरकार की अवधारणा धीरे धीरे लोकप्रिय हुई, · दयानंद सरस्वती, विवेकानंद जैसे सुधारकों ने बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के क्रांतिकारी एवं गरमदलीय नेताओं को प्रभावित किया · महादेव गोविंद रानाडे, दादा भाई नौरोजी, लाजपत राय जैसे सुधारकों ने प्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रभावित किया| इस तरह स्पष्ट होता है कि 19वीं सदी के धार्मिक-सामाजिक आन्दोलनों ने आधुनिक भारत की आधारशिला निर्मित की किन्तु धार्मिक सामाजिक आंदोलन अनेक सीमाओं से भी युक्त थे| जैसे सुधारकों के प्रयासों बाद भी समाजिक धार्मिक कुरीतियाँ बनी रहीं| सुधारकों का प्रभाव केवल नगरों तथाशिक्षित मध्यवर्ग एवं उच्च वर्गों तक सीमित था| अधिकांशतः सुधारकों की आस्था सरकार में बनी रही| अधिकांशतः सुधारकों की गतिविधियाँ नगरों तक ही सीमित थी| पुनरुत्थान वादी सुधारकों की गतिविधियों से साम्प्रदायिक चेतना को प्रोत्साहन मिला तथा धर्मग्रंथों में प्रत्येक स्थिति में आस्था से गैर वैज्ञानिक चिंतन को भी प्रोत्साहन मिला| फिर भी 19 वीं सदी के अंत तक राष्ट्रीय स्तर पर सुधारों के प्रयास प्रारम्भ हो गए और 20 वीं सदी मेंसमाज सुधार आन्दोलन राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ जुड़ गया| समाज सुधार आन्दोलन ने आधुनिक विचारों के प्रसार एवं आधुनिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया की नीव रखी|
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भारतीय संविधान में उच्चत्तमन्यायालय की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपबंधों का उल्लेख कीजिए।(150-200 शब्द) Mention the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the Supreme Court. (150-200 words)
एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में उच्चतम न्यायालय से संबंधितसंवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए संक्षेप मेंस्वतंत्र न्यायपालिका की महत्ता का उल्लेख कीजिए। तत्पचात, मुख्य भाग मेंभारतीय संविधान में उच्चत्तम न्यायालय की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपबंधों का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान के पांचवें भाग में अनुच्छेद 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय के गठन, न्यायक्षेत्र, स्वतंत्रता एवं शक्तियों इत्यादि का उल्लेख किया गया है। भारतीय संविधान स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था करता है। स्वतंत्र न्यायपालिका फ़ेडरल मुद्दों के समाधान एवं मूलाधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। इसके बिना नागरिकों के अधिकारों का कोई महत्व नहीं है इसीलिए संविधान निर्माताओं ने इसकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में विभिन्न उपबंध किये हैं। उच्चतम न्यायालय की स्वतंत्रतासे संबंधितविभिन्न उपबंध:- जजों की नियुक्ति:- उच्चतम न्यायालय में जजों की नियुक्ति स्वतंत्र कॉलेजियम से की जाती है जो कि कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र है यह न्यायिक कार्यों में राजनीतिक अहस्तक्षेप को सुनिश्चित करता है। कार्यकाल की सुरक्षा:- उच्चतम न्यायालय के जजों को कार्यकाल की सुरक्षा प्रदान की गई है। उन्हें संविधान में उल्लेखित प्रावधानों के जरिये राष्ट्रपति हटा सकता है। आज तक किसी भी न्यायाधीश को नहीं हटाया गया है। निश्चित सेवा शर्तें:- जजों के वेतन, भत्ते, विशेषाधिकार इत्यादि संसद द्वारा तय किये जाते हैं किंतु इन्हें वित्तीय आपातकाल के दौरान छोड़कर घटाया नहीं जा सकता। संचित निधि से व्यय:- उच्चतम न्यायालय के वेतन, भत्ते, खर्चे इत्यादि भारत की संचित निधि पर भारत होते हैं। अतः संसद द्वारा इन पर मतदान नहीं किया जा सकता। आचरण पर बहस पर प्रतिबंध:- न्यायधीशों के महाभियोग को छोड़कर संसद में जजों के आचरण पर बहस नहीं हो सकती। इससे न्यायपालिका या जज स्वतंत्र होकर निर्णय लेते हैं। उच्चतम न्यायालय के जजों के रिटायरमेंट के पश्चात देश की सभी अदालतों एवं प्राधिकरणों में वकालत करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। न्यायालय की अवमानना करने पर सुप्रीम कोर्ट के पास सिविल एवं क्रिमिनल दोनों प्रकार की अवमानना के सदर्भ में दंड देने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट को अपना स्टाफ नियुक्त करने के स्वतंत्रता है एवं इसे कार्यपालिका से पृथक रखा गया है इत्यादि। सुप्रीम कोर्ट संघीय न्यायालय के साथ साथ नागरिकों के मूल अधिकारों का गारंटर एवं संविधान का अभिभावक है। इसकी स्वतंत्रता निष्पक्ष न्याय प्रदान करने के लिए आवश्यक है।
##Question:भारतीय संविधान में उच्चत्तमन्यायालय की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपबंधों का उल्लेख कीजिए।(150-200 शब्द) Mention the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the Supreme Court. (150-200 words)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में उच्चतम न्यायालय से संबंधितसंवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए संक्षेप मेंस्वतंत्र न्यायपालिका की महत्ता का उल्लेख कीजिए। तत्पचात, मुख्य भाग मेंभारतीय संविधान में उच्चत्तम न्यायालय की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपबंधों का उल्लेख कीजिए। अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- भारतीय संविधान के पांचवें भाग में अनुच्छेद 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय के गठन, न्यायक्षेत्र, स्वतंत्रता एवं शक्तियों इत्यादि का उल्लेख किया गया है। भारतीय संविधान स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था करता है। स्वतंत्र न्यायपालिका फ़ेडरल मुद्दों के समाधान एवं मूलाधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। इसके बिना नागरिकों के अधिकारों का कोई महत्व नहीं है इसीलिए संविधान निर्माताओं ने इसकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में विभिन्न उपबंध किये हैं। उच्चतम न्यायालय की स्वतंत्रतासे संबंधितविभिन्न उपबंध:- जजों की नियुक्ति:- उच्चतम न्यायालय में जजों की नियुक्ति स्वतंत्र कॉलेजियम से की जाती है जो कि कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र है यह न्यायिक कार्यों में राजनीतिक अहस्तक्षेप को सुनिश्चित करता है। कार्यकाल की सुरक्षा:- उच्चतम न्यायालय के जजों को कार्यकाल की सुरक्षा प्रदान की गई है। उन्हें संविधान में उल्लेखित प्रावधानों के जरिये राष्ट्रपति हटा सकता है। आज तक किसी भी न्यायाधीश को नहीं हटाया गया है। निश्चित सेवा शर्तें:- जजों के वेतन, भत्ते, विशेषाधिकार इत्यादि संसद द्वारा तय किये जाते हैं किंतु इन्हें वित्तीय आपातकाल के दौरान छोड़कर घटाया नहीं जा सकता। संचित निधि से व्यय:- उच्चतम न्यायालय के वेतन, भत्ते, खर्चे इत्यादि भारत की संचित निधि पर भारत होते हैं। अतः संसद द्वारा इन पर मतदान नहीं किया जा सकता। आचरण पर बहस पर प्रतिबंध:- न्यायधीशों के महाभियोग को छोड़कर संसद में जजों के आचरण पर बहस नहीं हो सकती। इससे न्यायपालिका या जज स्वतंत्र होकर निर्णय लेते हैं। उच्चतम न्यायालय के जजों के रिटायरमेंट के पश्चात देश की सभी अदालतों एवं प्राधिकरणों में वकालत करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। न्यायालय की अवमानना करने पर सुप्रीम कोर्ट के पास सिविल एवं क्रिमिनल दोनों प्रकार की अवमानना के सदर्भ में दंड देने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट को अपना स्टाफ नियुक्त करने के स्वतंत्रता है एवं इसे कार्यपालिका से पृथक रखा गया है इत्यादि। सुप्रीम कोर्ट संघीय न्यायालय के साथ साथ नागरिकों के मूल अधिकारों का गारंटर एवं संविधान का अभिभावक है। इसकी स्वतंत्रता निष्पक्ष न्याय प्रदान करने के लिए आवश्यक है।
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1858 के भारत सरकार अधिनियम के द्वारा प्रस्तुत विभिन्न परिवर्तनों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the various changes introduced by the Government of India Act of 1858. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में अधिनियम के बारे में संक्षेप में सूचित कीजिये 2- मुख्य भाग में अधिनियम के द्वारा प्रस्तुत परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये अगस्त 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया| इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन का नियंत्रण ब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया|इसके साथ ही इस अधिनियम के माध्यम से शासन एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन प्रस्तुत किये गए| इन परिवर्तनों को निम्निखित रूप में समझा जा सकता है विधायिका की संरचना में बदलाव · इसे 1853 में स्थापित संरचना में बनाए रखा गया अर्थात केन्द्रीय विधायिका में अधिकतम 10 सदस्य हो सकते थे · इन सदस्यों में 4 मंत्री हो सकते थे शेष को अतिरिक्त सदस्य के रूप में जाना जाता था केन्द्रीय प्रशासन में बदलाव · 1784 से चली आ रही व्यवस्था जिसके अंतर्गत भारत में अंग्रेजी शासन चलाने का दायित्व निदेशक मंडल एवं नियंत्रक मंडल के ऊपर था, इनको समाप्त कर दिया गया · इन दोनों मंडलों की जगह भारत राज्य सचिव नामक एक नया पद सृजित किया गया · भारत में ब्रिटिश प्रशासन के मामले मेंभारत राज्य सचिव को सर्वोच्च पदाधिकारी होना था · वास्तव में यह ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था जिसे लन्दन कार्यालय में ही बैठना होता था · भारत राज्य सचिव को परामर्श देने के लिए एक 15 सदस्यीय परिषद् का गठन किया जाना था · इस परिषद् में 8 सदस्य ब्रिटिश क्राउन द्वारा मनोनीत किये जाने थे जबकि शेष 7 सदस्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के पूर्व निदेशकों द्वारा निर्वाचित किये जाने थे · भारत राज्य सचिव जो प्रायः ब्रिटेन का गृहमंत्री होता था वह ब्रिटेन के निचले सदन कॉमन सभा के प्रति उत्तरदायी होना था · किन्तु व्यवहार में वह इतना शक्तिशाली बन कर उभरा कि न तो वह परिषद् के परामर्श को मानता था और न ही सदन के प्रति जवाबदेह रह गया · अब भारत में ICS अधिकारियों की नियुक्तिभारत राज्य सचिव के नाम से होनी थी · ICS के कर्मचारीभारत राज्य सचिव के प्रसाद पर्यंत अपने पद पर बने रह सकते थे, अर्थातभारत राज्य सचिव जब तक चाहता था तभी तक ICS अधिकारी अपने पद पर रह सकता था गवर्नर जनरल की स्थिति में बदलाव · भारत में ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल को अब दोहरी भूमिका निभानी थी · एक यह कि वह भारतीय प्रशासन के मामले में भारत में सर्वोच्च पदाधिकारी होना था हालांकि वह लन्दन में बठेभारत राज्य सचिव के प्रति उत्तरदायी भी था · गवर्नर जनरल की दूसरी भूमिका यह थी कि उसे अब ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करना था इसी सन्दर्भ में उसे वायसराय कहा जाना था · ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए उसे भारत के रजवाड़ों से ब्रिटिश साम्राज्ञी विक्टोरिया की हैसियत के साथ बात करनी थी इसे पैरामाउंटसी कहा जाता है · इसका अर्थ यह हुआ कि यदि भारत के रजवाड़े किसी जिद पर अड़े हुए हों तो अंततः उन्हें वायसराय की बात माननी ही होगी प्रांतीय एवं जिला प्रशासन में बदलाव · इस अधिनियम के अंतर्गत ब्रिटिश प्रान्तों के गवर्नरों के अधिकार बढ़ा दिए गए जैसे वे ICS की तर्ज पर प्रांतीय सिविल सेवा के अंतर्गत लोकसेवकों का चयन कर सकते थे · जिला कलकटर की भूमिका पहले से अधिक बढ़ा दी गयी · अब जिला कलेक्टर, राजस्व वसूली और कानून तथा व्यवस्था के पोषण के साथ ही साथ अपने जिले में अन्य क्रिया कलापों पर भी नियंत्रण रख सकता था इसके साथ ही अब वह मजिस्ट्रेट के रूप में सामान्य प्रशासन और राजस्व के मामलों में जज की भूमिका निभा सकता था| · जिला कलेक्टर को कुछ न्यायिक शक्तियां भी प्रदान की गयीं अर्थात वह आज की व्यवस्था के विपरीत न्यायाधीश की भूमिका भी निभा सकता था उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 1858 के भारत सरकार अधिनियम के माध्यम से न केवल भारत में बल्कि ब्रिटेन की शासन संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव किये गए| इनमें से अधिकाँश परिवर्तन भारत की स्वतंत्रता के समय तक बने रहे|
##Question:1858 के भारत सरकार अधिनियम के द्वारा प्रस्तुत विभिन्न परिवर्तनों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Discuss the various changes introduced by the Government of India Act of 1858. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अधिनियम के बारे में संक्षेप में सूचित कीजिये 2- मुख्य भाग में अधिनियम के द्वारा प्रस्तुत परिवर्तनों की चर्चा कीजिये 3- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये अगस्त 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया| इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन का नियंत्रण ब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया|इसके साथ ही इस अधिनियम के माध्यम से शासन एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन प्रस्तुत किये गए| इन परिवर्तनों को निम्निखित रूप में समझा जा सकता है विधायिका की संरचना में बदलाव · इसे 1853 में स्थापित संरचना में बनाए रखा गया अर्थात केन्द्रीय विधायिका में अधिकतम 10 सदस्य हो सकते थे · इन सदस्यों में 4 मंत्री हो सकते थे शेष को अतिरिक्त सदस्य के रूप में जाना जाता था केन्द्रीय प्रशासन में बदलाव · 1784 से चली आ रही व्यवस्था जिसके अंतर्गत भारत में अंग्रेजी शासन चलाने का दायित्व निदेशक मंडल एवं नियंत्रक मंडल के ऊपर था, इनको समाप्त कर दिया गया · इन दोनों मंडलों की जगह भारत राज्य सचिव नामक एक नया पद सृजित किया गया · भारत में ब्रिटिश प्रशासन के मामले मेंभारत राज्य सचिव को सर्वोच्च पदाधिकारी होना था · वास्तव में यह ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था जिसे लन्दन कार्यालय में ही बैठना होता था · भारत राज्य सचिव को परामर्श देने के लिए एक 15 सदस्यीय परिषद् का गठन किया जाना था · इस परिषद् में 8 सदस्य ब्रिटिश क्राउन द्वारा मनोनीत किये जाने थे जबकि शेष 7 सदस्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के पूर्व निदेशकों द्वारा निर्वाचित किये जाने थे · भारत राज्य सचिव जो प्रायः ब्रिटेन का गृहमंत्री होता था वह ब्रिटेन के निचले सदन कॉमन सभा के प्रति उत्तरदायी होना था · किन्तु व्यवहार में वह इतना शक्तिशाली बन कर उभरा कि न तो वह परिषद् के परामर्श को मानता था और न ही सदन के प्रति जवाबदेह रह गया · अब भारत में ICS अधिकारियों की नियुक्तिभारत राज्य सचिव के नाम से होनी थी · ICS के कर्मचारीभारत राज्य सचिव के प्रसाद पर्यंत अपने पद पर बने रह सकते थे, अर्थातभारत राज्य सचिव जब तक चाहता था तभी तक ICS अधिकारी अपने पद पर रह सकता था गवर्नर जनरल की स्थिति में बदलाव · भारत में ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल को अब दोहरी भूमिका निभानी थी · एक यह कि वह भारतीय प्रशासन के मामले में भारत में सर्वोच्च पदाधिकारी होना था हालांकि वह लन्दन में बठेभारत राज्य सचिव के प्रति उत्तरदायी भी था · गवर्नर जनरल की दूसरी भूमिका यह थी कि उसे अब ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करना था इसी सन्दर्भ में उसे वायसराय कहा जाना था · ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए उसे भारत के रजवाड़ों से ब्रिटिश साम्राज्ञी विक्टोरिया की हैसियत के साथ बात करनी थी इसे पैरामाउंटसी कहा जाता है · इसका अर्थ यह हुआ कि यदि भारत के रजवाड़े किसी जिद पर अड़े हुए हों तो अंततः उन्हें वायसराय की बात माननी ही होगी प्रांतीय एवं जिला प्रशासन में बदलाव · इस अधिनियम के अंतर्गत ब्रिटिश प्रान्तों के गवर्नरों के अधिकार बढ़ा दिए गए जैसे वे ICS की तर्ज पर प्रांतीय सिविल सेवा के अंतर्गत लोकसेवकों का चयन कर सकते थे · जिला कलकटर की भूमिका पहले से अधिक बढ़ा दी गयी · अब जिला कलेक्टर, राजस्व वसूली और कानून तथा व्यवस्था के पोषण के साथ ही साथ अपने जिले में अन्य क्रिया कलापों पर भी नियंत्रण रख सकता था इसके साथ ही अब वह मजिस्ट्रेट के रूप में सामान्य प्रशासन और राजस्व के मामलों में जज की भूमिका निभा सकता था| · जिला कलेक्टर को कुछ न्यायिक शक्तियां भी प्रदान की गयीं अर्थात वह आज की व्यवस्था के विपरीत न्यायाधीश की भूमिका भी निभा सकता था उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 1858 के भारत सरकार अधिनियम के माध्यम से न केवल भारत में बल्कि ब्रिटेन की शासन संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव किये गए| इनमें से अधिकाँश परिवर्तन भारत की स्वतंत्रता के समय तक बने रहे|
48,005
Critically examine the problems in the present system of minimum wages in India & suggest remedies. (200 words)
Approach- 1. Introduce the definition of minimum wage and law enacted in India. 2. Explain the issues with the Minimum Wages Act in India. 3. List the remedies that can be incorporated in a minimum wage system in India. 4. Conclude with the forward-looking approach. Answer- According to the International Labour Organization (ILO), Minimum wage is the minimum amount of remuneration that an employer is legally required to pay to the worker. It’s usually expressed in amount per day or per hour. India was one of the first developing countries to introduce minimum wages with the enactment of the Minimum Wages Act way back in 1948. The act protects both regular and casual workers. Issues- 1. Coverage- There are nearly 429 scheduled employments and 1915 scheduled job categories for unskilled workers. This massive expansion in job categories and wage rates has led to major variations not only across states but also within states. 2. Lack of uniform criteria- The notified lowest minimum wage rate varies from rs. 115 in Nagaland to rs. 538 in Delhi. The main justification for persisting with different levels of minimum wages(rather than a national minimum wage) across states is that they reflect different levels of economic development. However, the data show that some of the lowest minimum wages for unskilled workers notified by the more advanced and industrialized states. 3. Minimum Wages Act does not cover all wage workers- As one in every three wage workers in India is not protected by it. Some major vulnerable categories such as domestic workers- are presently covered only in 18 states and UTs. Further, the revision of minimum wage rates has often been delayed. 4. Presence of gender discrimination- For instance, women dominate in the category of domestic workers while men dominate in the category of security guards. while both these occupations fall within the category of unskilled workers, the minimum wage rate for domestic workers within a state is consistently lower than that for the minimum wage rates for security guards. 5. Compliance- There is a trend of increasing compliance but there is a gender gap in compliance. Compliance levels are higher for regular wage workers when compared to casual wage earners. Remedies- This year"s economic survey has suggested the following measures to tackle issues regarding minimum wage 1. Simplification and Rationalisation- of minimum wages as proposed under the Code on Wages Bill should be taken ahead. It should also subsume all the different definitions of wages in different Labor acts existing currently. 2. Setting a National Floor Level Minimum Wage- by the Central Government that can vary across the 5 geographical regions. Accordingly, the states can fix the minimum wages, which should not be less than the “floor wage.” 3.Criteria for setting minimum wage- Code on Wages Bill should consider fixing minimum wages based on either of the two factors viz; (i) the skill category i.e unskilled, semi-skilled; and (ii) the geographical region, or else both. This key change would substantially reduce the minimum wages in the country. 4. Coverage- The proposed Code on Wages Bill should extend the applicability of minimum wages to all employments/ workers in all sectors and should cover both the organized as well as the unorganized sector. 5. Regular adjustment- A national-level dashboard needs to be set up by the Ministry of Labor & Employment, which shows the date of the last revision in the minimum wage adjunct to the mandated period. This would enable the dissemination of information and increased transparency in the system. 6. Role of technology- Technology can help in making information available in a simple and clear manner. The use of a variety of online, mobile phone and networking technologies has the potential to facilitate the collection and analysis of labour statistics, assist with the dissemination of information about labour laws and policies, reduce cost and improve transparency. 7. Grievance redressal- including an easy to remember the toll-free number for complaints and culture of swift action on them should be established. India is witnessing a period of demographic dividend. But, even if the youth is equipped with vocational skillsbut unable to find well-paying jobs, then such circumstances will breed social unrest and perpetuate social injustice.SDG Goal #8 requires India to promote full and productive employment and decent work for all. Therefore, establishing an effective minimum wage system is important for sustainable development and inclusive growth.
##Question:Critically examine the problems in the present system of minimum wages in India & suggest remedies. (200 words)##Answer:Approach- 1. Introduce the definition of minimum wage and law enacted in India. 2. Explain the issues with the Minimum Wages Act in India. 3. List the remedies that can be incorporated in a minimum wage system in India. 4. Conclude with the forward-looking approach. Answer- According to the International Labour Organization (ILO), Minimum wage is the minimum amount of remuneration that an employer is legally required to pay to the worker. It’s usually expressed in amount per day or per hour. India was one of the first developing countries to introduce minimum wages with the enactment of the Minimum Wages Act way back in 1948. The act protects both regular and casual workers. Issues- 1. Coverage- There are nearly 429 scheduled employments and 1915 scheduled job categories for unskilled workers. This massive expansion in job categories and wage rates has led to major variations not only across states but also within states. 2. Lack of uniform criteria- The notified lowest minimum wage rate varies from rs. 115 in Nagaland to rs. 538 in Delhi. The main justification for persisting with different levels of minimum wages(rather than a national minimum wage) across states is that they reflect different levels of economic development. However, the data show that some of the lowest minimum wages for unskilled workers notified by the more advanced and industrialized states. 3. Minimum Wages Act does not cover all wage workers- As one in every three wage workers in India is not protected by it. Some major vulnerable categories such as domestic workers- are presently covered only in 18 states and UTs. Further, the revision of minimum wage rates has often been delayed. 4. Presence of gender discrimination- For instance, women dominate in the category of domestic workers while men dominate in the category of security guards. while both these occupations fall within the category of unskilled workers, the minimum wage rate for domestic workers within a state is consistently lower than that for the minimum wage rates for security guards. 5. Compliance- There is a trend of increasing compliance but there is a gender gap in compliance. Compliance levels are higher for regular wage workers when compared to casual wage earners. Remedies- This year"s economic survey has suggested the following measures to tackle issues regarding minimum wage 1. Simplification and Rationalisation- of minimum wages as proposed under the Code on Wages Bill should be taken ahead. It should also subsume all the different definitions of wages in different Labor acts existing currently. 2. Setting a National Floor Level Minimum Wage- by the Central Government that can vary across the 5 geographical regions. Accordingly, the states can fix the minimum wages, which should not be less than the “floor wage.” 3.Criteria for setting minimum wage- Code on Wages Bill should consider fixing minimum wages based on either of the two factors viz; (i) the skill category i.e unskilled, semi-skilled; and (ii) the geographical region, or else both. This key change would substantially reduce the minimum wages in the country. 4. Coverage- The proposed Code on Wages Bill should extend the applicability of minimum wages to all employments/ workers in all sectors and should cover both the organized as well as the unorganized sector. 5. Regular adjustment- A national-level dashboard needs to be set up by the Ministry of Labor & Employment, which shows the date of the last revision in the minimum wage adjunct to the mandated period. This would enable the dissemination of information and increased transparency in the system. 6. Role of technology- Technology can help in making information available in a simple and clear manner. The use of a variety of online, mobile phone and networking technologies has the potential to facilitate the collection and analysis of labour statistics, assist with the dissemination of information about labour laws and policies, reduce cost and improve transparency. 7. Grievance redressal- including an easy to remember the toll-free number for complaints and culture of swift action on them should be established. India is witnessing a period of demographic dividend. But, even if the youth is equipped with vocational skillsbut unable to find well-paying jobs, then such circumstances will breed social unrest and perpetuate social injustice.SDG Goal #8 requires India to promote full and productive employment and decent work for all. Therefore, establishing an effective minimum wage system is important for sustainable development and inclusive growth.
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पृथ्वी की गतियों तथा अक्ष पर झुकाव को स्पष्ट करते हुए इसके परिणामों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While clarifying the movements and tilting of earth, discuss its result. (150-200 Words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: सौरमंडल में पृथ्वी का संदर्भ देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। पृथ्वी की दोनों गतियों तथा अक्षीय झुकाव का विवरण दीजिए। पृथ्वी की गतियों व झुकाव के कारण प्रभाव की व्यख्या कीजिए। उत्तर - सौरमंडल में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा के साथ एक विशेष संबंध है। पृथ्वी एक विशिष्ट ग्रह है क्योंकि वहाँ जीवन विद्यमान है।पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है तथा अपनी धूरी पर भी घूर्णन करती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन और रात, मौसम परिवर्तन, ज्वार, ग्रहण आदि घटनाएँ घटित होती हैं। पृथ्वी की गतियाँ: पृथ्वी का परिभ्रमण ::पृथ्वी के अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमने को पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण कहते हैं। इसे दैनिक गति भी कहते हैं। एक समय पर पृथ्वी का केवल एक ही भाग सूर्य की किरणों के सम्मुख होता है और वहाँ दिन का अनुभव होता है। पृथ्वी का परिक्रमण:जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हुए एक सम्पूर्ण परिक्रमा में 1 वर्ष का समय लेती है। अक्ष पर झुकाव :पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी की गतियों तथा अक्षीय झुकाव के परिणाम इस प्रकार हैं - दिन और रात का छोटा व बड़ा होना :यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न हुई होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते। इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें और बड़ी और दिन छोटे होते हैं | विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात बराबर होते हैं इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है। 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है। इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है। ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है जिसे परिक्रमण कहते हैं इसके कारण ऋतु परिवर्तनहोता है जिसमें निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं:21 जून की स्थिति: इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ता है। इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात 23 सितंबर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है। 22 दिसम्बर : इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को शीत अयनांत कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लंबी तथा रात छोटी होती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है। 21 मार्च व 23 सितंबर की स्थिति : इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु के समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव कहते हैं। 21 मार्च को बसंत विषुव एवं 23 सितंबर की स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
##Question:पृथ्वी की गतियों तथा अक्ष पर झुकाव को स्पष्ट करते हुए इसके परिणामों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While clarifying the movements and tilting of earth, discuss its result. (150-200 Words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: सौरमंडल में पृथ्वी का संदर्भ देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। पृथ्वी की दोनों गतियों तथा अक्षीय झुकाव का विवरण दीजिए। पृथ्वी की गतियों व झुकाव के कारण प्रभाव की व्यख्या कीजिए। उत्तर - सौरमंडल में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा के साथ एक विशेष संबंध है। पृथ्वी एक विशिष्ट ग्रह है क्योंकि वहाँ जीवन विद्यमान है।पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है तथा अपनी धूरी पर भी घूर्णन करती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन और रात, मौसम परिवर्तन, ज्वार, ग्रहण आदि घटनाएँ घटित होती हैं। पृथ्वी की गतियाँ: पृथ्वी का परिभ्रमण ::पृथ्वी के अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमने को पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण कहते हैं। इसे दैनिक गति भी कहते हैं। एक समय पर पृथ्वी का केवल एक ही भाग सूर्य की किरणों के सम्मुख होता है और वहाँ दिन का अनुभव होता है। पृथ्वी का परिक्रमण:जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हुए एक सम्पूर्ण परिक्रमा में 1 वर्ष का समय लेती है। अक्ष पर झुकाव :पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी की गतियों तथा अक्षीय झुकाव के परिणाम इस प्रकार हैं - दिन और रात का छोटा व बड़ा होना :यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न हुई होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते। इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें और बड़ी और दिन छोटे होते हैं | विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात बराबर होते हैं इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है। 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है। इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है। ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है जिसे परिक्रमण कहते हैं इसके कारण ऋतु परिवर्तनहोता है जिसमें निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं:21 जून की स्थिति: इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ता है। इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात 23 सितंबर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है। 22 दिसम्बर : इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को शीत अयनांत कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लंबी तथा रात छोटी होती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है। 21 मार्च व 23 सितंबर की स्थिति : इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु के समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव कहते हैं। 21 मार्च को बसंत विषुव एवं 23 सितंबर की स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
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19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का संक्षिप्त में वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly Describe the reasons for the rise of Nationalism in India in the late 19th Century. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- 19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में,19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का संक्षिप्त में वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः, इस राष्ट्रवाद के उदय के फलस्वरूप कांग्रेस पूर्व संस्थाओं तथा कांग्रेस के उदय को दर्शायिये| उत्तर- भारत में औपनिवेशिक शासन के कारण कई समस्यायों का जन्म हुआ था जैसे- पारंपरिक आत्मनिर्भर भारत का आर्थिक दोहन, औपनिवेशिक नीतियों से सांस्कृतिक एवं सामाजिक हीनभावना का जन्म आदि| भारत में राष्ट्रवाद का उदय कुछ उपनिवेशी नीतियों द्वारा तथा कुछ औपनिवेशिक नीतियों के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप हुआ| हालाँकि व्यापक दृष्टि से देखें तो यह किसी एक कारण या परिस्थिति से उत्पन ना होकर विभिन्न कारकों का सम्मिलित प्रतिफल था जैसे- फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप विश्व स्तर पर राष्ट्रवादी चेतना एवं आत्म-विश्वास की भावना का प्रसार; भारतीय पुनर्जागरण; अंग्रेजों द्वारा भारत में आधुनिकता को बढ़ावा; ब्रिटिश नीतियों के विरूद्ध भारतीय आक्रोश आदि| 19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण ब्रिटिश एवं भारतीय हितों में टकराव भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था|भारतीय शिक्षित वर्ग, उद्योगपति, किसान, श्रमिक इत्यादि वर्ग भारत में ब्रिटिश शासन को अशुभ मानते थे| भारतवासियों ने देश के आर्थिक पिछड़ेपनको उपनिवेशी शासन का परिणाम माना| भारतीयों का यह मानना था कि जबतक देश में विदेशी शासन रहेगा तब तक लोगों के आर्थिक हितों पर कुठाराघात होते रहेगा| इस सोच ने ही आधुनिक राष्ट्रवाद के विकास में अहम् योगदान दिया| ब्रिटिश सरकार ने औपनिवेशिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भारत की प्राकृतिक सीमा तक साम्राज्य का प्रसार किया| इसी क्रम में सम्पूर्ण भारत में राजनीतिक-प्रशासनिक एकीकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली, इससे समस्याओं का भी एकीकरण हुआ और साझा शत्रु के रूप में अंग्रेजों को देखा जाने लगा| भारत में 19 वीं सदी में प्रारम्भ हुए सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों का प्रभाव - इन आंदोलनकारियों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक एकता तथा राष्ट्रवाद के सिद्धांतों पर जोर दिया| सुधार आंदोलनों ने देशवासियों के मन में यह साहस जगाया कि भारतीय भी अंग्रेजी शासन के विरूद्ध संघर्ष कर सकते हैं| यातायात तथा संचार के साधनों तथा रेलवे की भूमिका जिससे राजनीतिक एवं सामाजिक संपर्क को बढ़ावा मिला| आधुनिक शिक्षा के साथ आधुनिक विचारों के प्रसार ने भी राष्ट्रीय चेतना के उदय में योगदान दिया| समानता, स्वतंत्रता, तर्कबुद्धिवाद जैसे विचारों से प्रभावित होकर प्रबुद्ध भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के औचित्य पर प्रश्न उठाये| शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा ने भी राष्ट्रीय चेतना के उदय तथा विकास को नेतृत्व के स्तर पर तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक गति प्रदान की| प्रेस एवं साहित्य ने भी 19वीं सदी के उतरार्ध में राष्ट्रीय भावनाओं को उभारा; एक तरफ प्रेस ने सरकारी नीतियों की आलोचना तथा सुधारों की मांग कर लोगों को जागरूक किया तो दूसरी तरफ भारतेंदु हरिश्चंद्र, बंकिमचंद्र जैसे लेखकों ने आम लोगों की भाषा में सरकार के शोषणकारी चरित्र को उजागर किया| इतिहास लेखन ने भी राष्ट्रीय चेतना को प्रभावित किया| एक तरफ साम्राज्यवादी लेखन ने राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करने का कार्य किया जैसे- प्राचीन काल को हिंदू काल तथा मध्यकाल को मुस्लिम काल के रूप में चित्रित किया जाना| दूसरी तरफ प्रतिक्रियास्वरूप राष्ट्रवादी इतिहास लेखन ने शिवाजी, महाराणा प्रताप, अशोक, समुद्रगुप्त इत्यादि के उपलब्धियों को प्रस्तुत कर गौरव की उपलब्धि करवायी| मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का उत्थान जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को सभी चरण में अपना नेतृत्व प्रदान किया| ब्रिटिश सरकार की नस्लीय नीति ने भी एक प्रकार से राष्ट्रीय अपमान की भावना को जन्म दिया| प्रशासनिक सेवा, सेना, न्यायपालिका, शिक्षा, परिवहन के साधन इत्यादि में कानून बनाकर भेदभाव किया जाता था| विभिन्न क्षेत्रों में रंग के आधार पर हमारे साथ भेदभाव किया गया| अंग्रेजों की जातीय अहंकारिता तथा प्रतिक्रियावादी नीतियों ने भारतीयों के मन में घोर घृणा पैदा हो गयी| वायसराय लिटन(1876-80) तथा रिपन(1880-84) के कार्यकाल से संबंधित कुछ घटनाओं ने 1870-80 के दशक में राष्ट्रीय चेतना को व्यापक तौर पर प्रभावित किया| 1877 में दिल्ली दरबार का आयोजन तथा ब्रिटेन के क्राउन को भारत का क्राउन घोषित किया गया| इसपर करोड़ों रूपये खर्च किये गये एवं इस समय देश के कुछ भागों में अकाल आया हुआ था| 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, शस्त्र अधिनियम तथा सिविल सेवा में प्रवेश की अधिकतम उम्र घटाकर 19 वर्ष की गयी| इन कानूनों के विरूद्ध इंडियन एसोसिएशन नामक संस्था ने देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाया| लिटन के कार्यकाल में ही दूसरा अफगान युद्ध; रिपन के कार्यकाल में 1882-83 में इल्बर्ट बिल लाया गया| इसके अंतर्गत भारतीय न्यायाधीश ग्रामीण क्षेत्रों में फ़ौजदारी मामलों में अंग्रेजों को सजा दे सकते थें| इसका अंग्रेजों ने विरोध किया और बिल को संशोधित करना पड़ा| भारतीय अख़बारों में उपरोक्त मुद्दों पर विशेष चर्चा हुयी और अखिल भारतीय संगठन की स्थापना के प्रयासों को गति मिली| इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन, ईस्ट इंडिया एसोसिएशन, इंडियन लीग, इंडियन एसोसिएशन ऑफ कलकता, पूना सार्वजनिक सभा, मद्रास नेटिव एसोसिएशन जैसे संगठनों का उदय हुआ| इन्ही प्रक्रियाओं के प्रतिफल/आगामी कदम के रूप में 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ जिसके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन को एक नयी दिशा तथा संस्थागत आधार मिला|
##Question:19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का संक्षिप्त में वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Briefly Describe the reasons for the rise of Nationalism in India in the late 19th Century. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- 19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में,19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का संक्षिप्त में वर्णन कीजिये| निष्कर्षतः, इस राष्ट्रवाद के उदय के फलस्वरूप कांग्रेस पूर्व संस्थाओं तथा कांग्रेस के उदय को दर्शायिये| उत्तर- भारत में औपनिवेशिक शासन के कारण कई समस्यायों का जन्म हुआ था जैसे- पारंपरिक आत्मनिर्भर भारत का आर्थिक दोहन, औपनिवेशिक नीतियों से सांस्कृतिक एवं सामाजिक हीनभावना का जन्म आदि| भारत में राष्ट्रवाद का उदय कुछ उपनिवेशी नीतियों द्वारा तथा कुछ औपनिवेशिक नीतियों के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप हुआ| हालाँकि व्यापक दृष्टि से देखें तो यह किसी एक कारण या परिस्थिति से उत्पन ना होकर विभिन्न कारकों का सम्मिलित प्रतिफल था जैसे- फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप विश्व स्तर पर राष्ट्रवादी चेतना एवं आत्म-विश्वास की भावना का प्रसार; भारतीय पुनर्जागरण; अंग्रेजों द्वारा भारत में आधुनिकता को बढ़ावा; ब्रिटिश नीतियों के विरूद्ध भारतीय आक्रोश आदि| 19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण ब्रिटिश एवं भारतीय हितों में टकराव भारत में राष्ट्रीय चेतना के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण था|भारतीय शिक्षित वर्ग, उद्योगपति, किसान, श्रमिक इत्यादि वर्ग भारत में ब्रिटिश शासन को अशुभ मानते थे| भारतवासियों ने देश के आर्थिक पिछड़ेपनको उपनिवेशी शासन का परिणाम माना| भारतीयों का यह मानना था कि जबतक देश में विदेशी शासन रहेगा तब तक लोगों के आर्थिक हितों पर कुठाराघात होते रहेगा| इस सोच ने ही आधुनिक राष्ट्रवाद के विकास में अहम् योगदान दिया| ब्रिटिश सरकार ने औपनिवेशिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भारत की प्राकृतिक सीमा तक साम्राज्य का प्रसार किया| इसी क्रम में सम्पूर्ण भारत में राजनीतिक-प्रशासनिक एकीकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली, इससे समस्याओं का भी एकीकरण हुआ और साझा शत्रु के रूप में अंग्रेजों को देखा जाने लगा| भारत में 19 वीं सदी में प्रारम्भ हुए सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों का प्रभाव - इन आंदोलनकारियों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक एकता तथा राष्ट्रवाद के सिद्धांतों पर जोर दिया| सुधार आंदोलनों ने देशवासियों के मन में यह साहस जगाया कि भारतीय भी अंग्रेजी शासन के विरूद्ध संघर्ष कर सकते हैं| यातायात तथा संचार के साधनों तथा रेलवे की भूमिका जिससे राजनीतिक एवं सामाजिक संपर्क को बढ़ावा मिला| आधुनिक शिक्षा के साथ आधुनिक विचारों के प्रसार ने भी राष्ट्रीय चेतना के उदय में योगदान दिया| समानता, स्वतंत्रता, तर्कबुद्धिवाद जैसे विचारों से प्रभावित होकर प्रबुद्ध भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के औचित्य पर प्रश्न उठाये| शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा ने भी राष्ट्रीय चेतना के उदय तथा विकास को नेतृत्व के स्तर पर तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक गति प्रदान की| प्रेस एवं साहित्य ने भी 19वीं सदी के उतरार्ध में राष्ट्रीय भावनाओं को उभारा; एक तरफ प्रेस ने सरकारी नीतियों की आलोचना तथा सुधारों की मांग कर लोगों को जागरूक किया तो दूसरी तरफ भारतेंदु हरिश्चंद्र, बंकिमचंद्र जैसे लेखकों ने आम लोगों की भाषा में सरकार के शोषणकारी चरित्र को उजागर किया| इतिहास लेखन ने भी राष्ट्रीय चेतना को प्रभावित किया| एक तरफ साम्राज्यवादी लेखन ने राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करने का कार्य किया जैसे- प्राचीन काल को हिंदू काल तथा मध्यकाल को मुस्लिम काल के रूप में चित्रित किया जाना| दूसरी तरफ प्रतिक्रियास्वरूप राष्ट्रवादी इतिहास लेखन ने शिवाजी, महाराणा प्रताप, अशोक, समुद्रगुप्त इत्यादि के उपलब्धियों को प्रस्तुत कर गौरव की उपलब्धि करवायी| मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का उत्थान जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को सभी चरण में अपना नेतृत्व प्रदान किया| ब्रिटिश सरकार की नस्लीय नीति ने भी एक प्रकार से राष्ट्रीय अपमान की भावना को जन्म दिया| प्रशासनिक सेवा, सेना, न्यायपालिका, शिक्षा, परिवहन के साधन इत्यादि में कानून बनाकर भेदभाव किया जाता था| विभिन्न क्षेत्रों में रंग के आधार पर हमारे साथ भेदभाव किया गया| अंग्रेजों की जातीय अहंकारिता तथा प्रतिक्रियावादी नीतियों ने भारतीयों के मन में घोर घृणा पैदा हो गयी| वायसराय लिटन(1876-80) तथा रिपन(1880-84) के कार्यकाल से संबंधित कुछ घटनाओं ने 1870-80 के दशक में राष्ट्रीय चेतना को व्यापक तौर पर प्रभावित किया| 1877 में दिल्ली दरबार का आयोजन तथा ब्रिटेन के क्राउन को भारत का क्राउन घोषित किया गया| इसपर करोड़ों रूपये खर्च किये गये एवं इस समय देश के कुछ भागों में अकाल आया हुआ था| 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, शस्त्र अधिनियम तथा सिविल सेवा में प्रवेश की अधिकतम उम्र घटाकर 19 वर्ष की गयी| इन कानूनों के विरूद्ध इंडियन एसोसिएशन नामक संस्था ने देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाया| लिटन के कार्यकाल में ही दूसरा अफगान युद्ध; रिपन के कार्यकाल में 1882-83 में इल्बर्ट बिल लाया गया| इसके अंतर्गत भारतीय न्यायाधीश ग्रामीण क्षेत्रों में फ़ौजदारी मामलों में अंग्रेजों को सजा दे सकते थें| इसका अंग्रेजों ने विरोध किया और बिल को संशोधित करना पड़ा| भारतीय अख़बारों में उपरोक्त मुद्दों पर विशेष चर्चा हुयी और अखिल भारतीय संगठन की स्थापना के प्रयासों को गति मिली| इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन, ईस्ट इंडिया एसोसिएशन, इंडियन लीग, इंडियन एसोसिएशन ऑफ कलकता, पूना सार्वजनिक सभा, मद्रास नेटिव एसोसिएशन जैसे संगठनों का उदय हुआ| इन्ही प्रक्रियाओं के प्रतिफल/आगामी कदम के रूप में 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ जिसके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन को एक नयी दिशा तथा संस्थागत आधार मिला|
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पृथ्वी की गतियों तथा अक्ष पर झुकाव को स्पष्ट करते हुए इसके परिणामों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While clarifying the movements and tilting of earth, discuss its result. (150-200 Words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: सौरमंडल में पृथ्वी का संदर्भ देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। पृथ्वी की दोनों गतियों तथा अक्षीय झुकाव का विवरण दीजिए। पृथ्वी की गतियों व झुकाव के कारण- प्रभाव की व्यख्या कीजिए। उत्तर - सौरमंडल में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा के साथ एक विशेष संबंध है। पृथ्वी एक विशिष्ट ग्रह है क्योंकि वहाँ जीवन विद्यमान है।पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है तथा अपनी धूरी पर भी घूर्णन करती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन और रात, मौसम परिवर्तन, ज्वार, ग्रहण आदि घटनाएँ घटित होती हैं। पृथ्वी की गतियाँ: पृथ्वी का परिभ्रमण ::पृथ्वी के अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमने को पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण कहते हैं। इसे दैनिक गति भी कहते हैं। एक समय पर पृथ्वी का केवल एक ही भाग सूर्य की किरणों के सम्मुख होता है और वहाँ दिन का अनुभव होता है। पृथ्वी का परिक्रमण :जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हुए एक सम्पूर्ण परिक्रमा में 1 वर्ष का समय लेती है। अक्ष पर झुकाव :पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी की गतियों तथा अक्षीय झुकाव के परिणाम इस प्रकार हैं- दिन और रात का छोटा व बड़ा होना :यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न हुई होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते। इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें और बड़ी और दिन छोटे होते हैं | विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात बराबर होते हैं इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है। 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है। इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है। ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है जिसे परिक्रमण कहते हैं इसके कारण ऋतु परिवर्तनहोता है जिसमें निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं:21 जून की स्थिति: इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ता है। इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात 23 सितंबर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है। 22 दिसम्बर : इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को शीत अयनांत कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लंबी तथा रात छोटी होती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है। 21 मार्च व 23 सितंबर की स्थिति : इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु के समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव कहते हैं। 21 मार्च को बसंत विषुव एवं 23 सितंबर की स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
##Question:पृथ्वी की गतियों तथा अक्ष पर झुकाव को स्पष्ट करते हुए इसके परिणामों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While clarifying the movements and tilting of earth, discuss its result. (150-200 Words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: सौरमंडल में पृथ्वी का संदर्भ देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। पृथ्वी की दोनों गतियों तथा अक्षीय झुकाव का विवरण दीजिए। पृथ्वी की गतियों व झुकाव के कारण- प्रभाव की व्यख्या कीजिए। उत्तर - सौरमंडल में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा के साथ एक विशेष संबंध है। पृथ्वी एक विशिष्ट ग्रह है क्योंकि वहाँ जीवन विद्यमान है।पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है तथा अपनी धूरी पर भी घूर्णन करती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन और रात, मौसम परिवर्तन, ज्वार, ग्रहण आदि घटनाएँ घटित होती हैं। पृथ्वी की गतियाँ: पृथ्वी का परिभ्रमण ::पृथ्वी के अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमने को पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण कहते हैं। इसे दैनिक गति भी कहते हैं। एक समय पर पृथ्वी का केवल एक ही भाग सूर्य की किरणों के सम्मुख होता है और वहाँ दिन का अनुभव होता है। पृथ्वी का परिक्रमण :जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हुए एक सम्पूर्ण परिक्रमा में 1 वर्ष का समय लेती है। अक्ष पर झुकाव :पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी की गतियों तथा अक्षीय झुकाव के परिणाम इस प्रकार हैं- दिन और रात का छोटा व बड़ा होना :यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न हुई होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते। इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें और बड़ी और दिन छोटे होते हैं | विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात बराबर होते हैं इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है। 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है। इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है। ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है जिसे परिक्रमण कहते हैं इसके कारण ऋतु परिवर्तनहोता है जिसमें निम्न स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं:21 जून की स्थिति: इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ता है। इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत कहते हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात 23 सितंबर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है। 22 दिसम्बर : इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को शीत अयनांत कहते हैं। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लंबी तथा रात छोटी होती है। 22 दिसम्बर के उपरांत 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है। 21 मार्च व 23 सितंबर की स्थिति : इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु के समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव कहते हैं। 21 मार्च को बसंत विषुव एवं 23 सितंबर की स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
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न्यायिक सक्रियतावाद की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये ? क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि वर्त्तमान समय में न्यायिक सक्रियता के नाम पर न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया जा रहा है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Explain the concept of judicial activism? Do you agree with the idea that in the name of judicial activism in the current time, the judiciary is interfering in the domain of the executive? Give arguement in favour of your answer. (150-200 word, Marks - 10 )
एप्रोच: न्यायिक सक्रियता के बारे में बताते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। दूसरे भाग के उत्तर के लिए कोई एक पक्ष लेते हुए अपने विचार रखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। उत्तर:- यह एक न्यायिक सिद्धान्त है जो न्यायाधीशों को प्रगतिशील और नहीं सामाजिक नीति के पक्ष में न्यायिक अधिकारी निर्णयों का सख्ती से पालन करने के लिए प्रेरित करता है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनैतिक व्यवस्था से अपनाया गाया है। इस उपकरण के माध्यम से विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानूनों के साथ-साथ कार्यपालिका के कार्यों की भी जांच की जाती है और उन्हे संविधान के अनुरूप अधिक संगत बनाने के लिए संशोधन का सुझाव दिया जाता है। भारत में जनहित याचिका के आरंभ के माध्यम से न्यायिक सक्रियता को स्थापित किया गया। गौरतलब है कि वर्तमान समय में न्यायपालिका द्वारा न्यायिक सक्रियता का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है। जिससे ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिससे प्रतीत हो रहा है कि न्यायपालिका की यह सक्रियता कार्यपालिका के लिए अतिक्रमण है। हालांकि वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो न्यायिक सक्रियता प्रयोग न्यायपालिका अपने दायरे में रहकर ही कर रही है जैसे कि: ऐसे विषय जिस पर कार्यपालिका कोई सख्त नियम नहीं बना पाती क्योंकि राजनीतिक नुकसान होने का भय रहता है। ऐसे में न्यायपालिका द्वारा इस साधन का प्रयोग सार्थक है जैसे- राष्ट्रीय राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब बिक्री पर प्रतिबंध सरकार को उसके कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए भी इसका प्रयोग किया गया है जैसे- बाल श्रम को रोकने के लिए हस्तक्षेप महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गयी है। सरकार द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने में असफल रहने पर न्यायपालिका ने कुछ कठोर कदम उठाए हैं जैसे- दिल्ली में डीजल वाहनों पर प्रतिबंध। खेल में पारदर्शिता लाने के लिए बीसीसीआई के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए हालिया हस्तक्षेप स्वीकार्य हैं। भीड़ हिंसा को रोकने में असफल रहे राज्य सरकारों को स्पष्ट कानून बनाने के लिए निर्देश दिये गए हैं। बच्चों के प्रति हिंसा को रोकने के लिय पोक्सो अधिनियम में बदलाव और फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना। इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हाल ही में न्यायिक सक्रियता को सकारात्मक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया गया है। हालांकि कई ऐसे मुद्दे हैं जहां न्यायिक अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न हुई। अतः शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कार्यपालिका और न्यायपलिका को आपसी समन्वय से कार्यों का संचालन करना चाहिए। कार्यपालिका को जनता के हित में कार्य करना चाहिए तो न्यायपालिका को न्यायिक सक्रियता को एक सार्थक साधन के रूप में प्रयोग करने के लिए संवैधानिक दायरे में रहना चाहिए।
##Question:न्यायिक सक्रियतावाद की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये ? क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि वर्त्तमान समय में न्यायिक सक्रियता के नाम पर न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया जा रहा है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Explain the concept of judicial activism? Do you agree with the idea that in the name of judicial activism in the current time, the judiciary is interfering in the domain of the executive? Give arguement in favour of your answer. (150-200 word, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच: न्यायिक सक्रियता के बारे में बताते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। दूसरे भाग के उत्तर के लिए कोई एक पक्ष लेते हुए अपने विचार रखिए। निष्कर्ष में सुझाव दीजिए। उत्तर:- यह एक न्यायिक सिद्धान्त है जो न्यायाधीशों को प्रगतिशील और नहीं सामाजिक नीति के पक्ष में न्यायिक अधिकारी निर्णयों का सख्ती से पालन करने के लिए प्रेरित करता है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनैतिक व्यवस्था से अपनाया गाया है। इस उपकरण के माध्यम से विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानूनों के साथ-साथ कार्यपालिका के कार्यों की भी जांच की जाती है और उन्हे संविधान के अनुरूप अधिक संगत बनाने के लिए संशोधन का सुझाव दिया जाता है। भारत में जनहित याचिका के आरंभ के माध्यम से न्यायिक सक्रियता को स्थापित किया गया। गौरतलब है कि वर्तमान समय में न्यायपालिका द्वारा न्यायिक सक्रियता का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है। जिससे ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिससे प्रतीत हो रहा है कि न्यायपालिका की यह सक्रियता कार्यपालिका के लिए अतिक्रमण है। हालांकि वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो न्यायिक सक्रियता प्रयोग न्यायपालिका अपने दायरे में रहकर ही कर रही है जैसे कि: ऐसे विषय जिस पर कार्यपालिका कोई सख्त नियम नहीं बना पाती क्योंकि राजनीतिक नुकसान होने का भय रहता है। ऐसे में न्यायपालिका द्वारा इस साधन का प्रयोग सार्थक है जैसे- राष्ट्रीय राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब बिक्री पर प्रतिबंध सरकार को उसके कार्यों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए भी इसका प्रयोग किया गया है जैसे- बाल श्रम को रोकने के लिए हस्तक्षेप महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गयी है। सरकार द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने में असफल रहने पर न्यायपालिका ने कुछ कठोर कदम उठाए हैं जैसे- दिल्ली में डीजल वाहनों पर प्रतिबंध। खेल में पारदर्शिता लाने के लिए बीसीसीआई के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए हालिया हस्तक्षेप स्वीकार्य हैं। भीड़ हिंसा को रोकने में असफल रहे राज्य सरकारों को स्पष्ट कानून बनाने के लिए निर्देश दिये गए हैं। बच्चों के प्रति हिंसा को रोकने के लिय पोक्सो अधिनियम में बदलाव और फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना। इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हाल ही में न्यायिक सक्रियता को सकारात्मक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया गया है। हालांकि कई ऐसे मुद्दे हैं जहां न्यायिक अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न हुई। अतः शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कार्यपालिका और न्यायपलिका को आपसी समन्वय से कार्यों का संचालन करना चाहिए। कार्यपालिका को जनता के हित में कार्य करना चाहिए तो न्यायपालिका को न्यायिक सक्रियता को एक सार्थक साधन के रूप में प्रयोग करने के लिए संवैधानिक दायरे में रहना चाहिए।
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भारत शासन अधिनियम 1935 के द्वारा संघीय विधायिका एवं केन्द्रीय सरकार में किये गए परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Explain the changes made by the Government of India Act 1935 in the federal legislature and the central government. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में अधिनियम केपारित होने की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में अधिनियम द्वारा प्रस्तुत परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में स्वरुप एवं महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत सरकार अधिनियम 1935के पारित होने से पूर्व इससें साइमन आयोग रिपोर्ट, नेहरू समिति की रिपोर्ट, ब्रिटेनमें सम्पन्न तीनगोलमेज सम्मेलनोंमें हुये कुछ विचार-विमर्शों से सहायता ली गयी| अन्ततः इस रिपोर्ट के आधार पर1935ई. का अधिनियम पारित हुआ।भारत सरकार अधिनियम 1935 के साथ साथ जिसमें 321 धाराएं एवं 10 अनुसूचियां थींबर्मा को भारत से अलग करने के लिए बर्मा सरकार अधिनियम भी पारित किया गया था| बर्मा सरकार अधिनियम के अंतर्गत 159 धाराएं एवं 6 अनुसूचियां रखी गयी थीं| इसने न केवल केन्द्रीय विधायिका बल्कि केन्द्रीय सरकार एवं प्रांतीय विधानमंडलों के स्वरुप में बदलाव किया| केन्द्रीय विधानमंडल में परिवर्तन · इस अधिनियम के अंतर्गत संघीय सभा में कुल 375 सदस्य रखे गए थे जिसमें 250 सदस्य निर्वाचित होने थे एवं शेष 125 सदस्य देशी रियासतों से मनोनीत होने थे · राज्य परिषद् में 260 सदस्य रखे गए जिसमें 156 सदस्य निर्वाचित होने थे जबकि 104 सदस्य · राज्य परिषद् को ऊपरी सदन जबकि संघीय सभा को निचले सदन का नाम दिया गया| · यह व्यवस्था की गयी की उपरी सदन अब स्थायी सदन होगा|इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक 3 वर्ष पर सेवा निवृत्त होंगे जिससे की 9 वर्ष में इसका पूर्णतः नवीनीकरण हो जाना था अर्थात अब इस सदन को भंग नहीं किया जा सकता था · संघीय सभा में निर्वाचन पहले की तरह ही होना था अर्थात महिलाओं को मताधिकार नहीं दिया गया था · ऊपरी सदन का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होना था (सीधे जनता द्वारा) जबकि निचले सदन का चुनाव अप्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से होना था(प्रांतीय विधान सभाओं के द्वारा) · गवर्नर जनरल निचले सदन को समय से पहले भी भंग कर सकता था · इस अधिनियम के अंतर्गत दोनों सदनों में केवल रजवाड़ों को प्रतिनिधि मनोनीत करने का अधिकार दिया गया था, अब गवर्नर जनरल के पास यह अधिकार नहीं रहना था केन्द्रीय सरकार में परिवर्तन · इस अधिनियम के अंतर्गत प्रान्तों से डाईआर्की की व्यवस्था हटा कर उसे केंद्र में लागू किया गया · इसका अर्थ यह हुआ कि अब केंद्र में गवर्नर जनरल के पास सभी प्रमुख विषय रहने थे जबकि चुने हुए मंत्रियों के पास केवल नगण्य अथवा तुच्छ विषय ही रहने ही थे,हालांकि केंद्र में यह प्रावधान कभी प्रभावी हो ही नहीं पाया था · इसके अंतर्गत गवर्नर जनरल को भारत सहित बर्मा पर भी ब्रिटिश सम्राट एवं साम्राज्य के हित में शासन का पूर्ण अधिकार दिया गया था · अब गवर्नर जनरल को 3 प्रकार से कार्य करना था यथा मंत्रियों के परामर्श से जिसे वह मानने से इनकार लार सकता था, अपने सलाह कारों के परामर्श से जिसे वह पुनः मानने से इनकार कर सकता था एवं विशेष उत्तरदायित्व के अंतर्गत जिसका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा करना था| विशेष उत्तरदायित्व के मामलों में उसे स्वविवेक से निर्णय लेने थे · भारत शासन अधिनियम की धारा 91 के अंतर्गत गवर्नर जनरल को यह अधिकार भी दिया गया था कि वह अपनी समझ से प्रांतीय सरकारों को बर्खाश्त कर उनका शासन सीधे अपने हाथ में ले सकता था (वर्तमान की राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के अनुरूप) इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत शासन अधिनियम में केन्द्रीय सरकार को अधिक अधिकार दे दिए गए थे अतः पंडित जवाहर लाल नेहरूने इसे "अनेक ब्रेकों वाली परन्तु इन्जन रहित मशीन" की संज्ञा दी।मदन मोहन मालवीयने इसे "बाह्य रूप से जनतंत्रवादी एवं अन्दर से खोखला" कहा।चक्रवर्ती राजगोपालाचारीने इसे "द्वैध शासन पद्धतिसे भी बुरा एवं बिल्कुल अस्वीकृत" बताया गया किन्तु फिर भी यह अधिनियम भारतीय संविधान का प्रमुख आधार बना|
##Question:भारत शासन अधिनियम 1935 के द्वारा संघीय विधायिका एवं केन्द्रीय सरकार में किये गए परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द) Explain the changes made by the Government of India Act 1935 in the federal legislature and the central government. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अधिनियम केपारित होने की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में अधिनियम द्वारा प्रस्तुत परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में स्वरुप एवं महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये भारत सरकार अधिनियम 1935के पारित होने से पूर्व इससें साइमन आयोग रिपोर्ट, नेहरू समिति की रिपोर्ट, ब्रिटेनमें सम्पन्न तीनगोलमेज सम्मेलनोंमें हुये कुछ विचार-विमर्शों से सहायता ली गयी| अन्ततः इस रिपोर्ट के आधार पर1935ई. का अधिनियम पारित हुआ।भारत सरकार अधिनियम 1935 के साथ साथ जिसमें 321 धाराएं एवं 10 अनुसूचियां थींबर्मा को भारत से अलग करने के लिए बर्मा सरकार अधिनियम भी पारित किया गया था| बर्मा सरकार अधिनियम के अंतर्गत 159 धाराएं एवं 6 अनुसूचियां रखी गयी थीं| इसने न केवल केन्द्रीय विधायिका बल्कि केन्द्रीय सरकार एवं प्रांतीय विधानमंडलों के स्वरुप में बदलाव किया| केन्द्रीय विधानमंडल में परिवर्तन · इस अधिनियम के अंतर्गत संघीय सभा में कुल 375 सदस्य रखे गए थे जिसमें 250 सदस्य निर्वाचित होने थे एवं शेष 125 सदस्य देशी रियासतों से मनोनीत होने थे · राज्य परिषद् में 260 सदस्य रखे गए जिसमें 156 सदस्य निर्वाचित होने थे जबकि 104 सदस्य · राज्य परिषद् को ऊपरी सदन जबकि संघीय सभा को निचले सदन का नाम दिया गया| · यह व्यवस्था की गयी की उपरी सदन अब स्थायी सदन होगा|इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक 3 वर्ष पर सेवा निवृत्त होंगे जिससे की 9 वर्ष में इसका पूर्णतः नवीनीकरण हो जाना था अर्थात अब इस सदन को भंग नहीं किया जा सकता था · संघीय सभा में निर्वाचन पहले की तरह ही होना था अर्थात महिलाओं को मताधिकार नहीं दिया गया था · ऊपरी सदन का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होना था (सीधे जनता द्वारा) जबकि निचले सदन का चुनाव अप्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से होना था(प्रांतीय विधान सभाओं के द्वारा) · गवर्नर जनरल निचले सदन को समय से पहले भी भंग कर सकता था · इस अधिनियम के अंतर्गत दोनों सदनों में केवल रजवाड़ों को प्रतिनिधि मनोनीत करने का अधिकार दिया गया था, अब गवर्नर जनरल के पास यह अधिकार नहीं रहना था केन्द्रीय सरकार में परिवर्तन · इस अधिनियम के अंतर्गत प्रान्तों से डाईआर्की की व्यवस्था हटा कर उसे केंद्र में लागू किया गया · इसका अर्थ यह हुआ कि अब केंद्र में गवर्नर जनरल के पास सभी प्रमुख विषय रहने थे जबकि चुने हुए मंत्रियों के पास केवल नगण्य अथवा तुच्छ विषय ही रहने ही थे,हालांकि केंद्र में यह प्रावधान कभी प्रभावी हो ही नहीं पाया था · इसके अंतर्गत गवर्नर जनरल को भारत सहित बर्मा पर भी ब्रिटिश सम्राट एवं साम्राज्य के हित में शासन का पूर्ण अधिकार दिया गया था · अब गवर्नर जनरल को 3 प्रकार से कार्य करना था यथा मंत्रियों के परामर्श से जिसे वह मानने से इनकार लार सकता था, अपने सलाह कारों के परामर्श से जिसे वह पुनः मानने से इनकार कर सकता था एवं विशेष उत्तरदायित्व के अंतर्गत जिसका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा करना था| विशेष उत्तरदायित्व के मामलों में उसे स्वविवेक से निर्णय लेने थे · भारत शासन अधिनियम की धारा 91 के अंतर्गत गवर्नर जनरल को यह अधिकार भी दिया गया था कि वह अपनी समझ से प्रांतीय सरकारों को बर्खाश्त कर उनका शासन सीधे अपने हाथ में ले सकता था (वर्तमान की राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था के अनुरूप) इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत शासन अधिनियम में केन्द्रीय सरकार को अधिक अधिकार दे दिए गए थे अतः पंडित जवाहर लाल नेहरूने इसे "अनेक ब्रेकों वाली परन्तु इन्जन रहित मशीन" की संज्ञा दी।मदन मोहन मालवीयने इसे "बाह्य रूप से जनतंत्रवादी एवं अन्दर से खोखला" कहा।चक्रवर्ती राजगोपालाचारीने इसे "द्वैध शासन पद्धतिसे भी बुरा एवं बिल्कुल अस्वीकृत" बताया गया किन्तु फिर भी यह अधिनियम भारतीय संविधान का प्रमुख आधार बना|
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अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की व्याख्या कीजिये | साथ ही इस सिद्धांत की पुष्टि के लिए दिए गए तर्कों और साक्ष्यों को प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the continental drift theory of Alfred Wegner. Also, present the given arguments and evidence to confirm this theory. (150-200 Words, 10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | इस संबंध में दिये गए तर्कों का भी संक्षिप्त में वर्णन करते हुए उत्तर का अगला भाग लिखिए | उत्तर - अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। लौरेंसिया और अंगारालैंड को टेथिस सागर कहा जाता था। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। सिद्धांत के पक्ष में दिए गए तर्क जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति : गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं : ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षेप : घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म :ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है | यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
##Question:अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की व्याख्या कीजिये | साथ ही इस सिद्धांत की पुष्टि के लिए दिए गए तर्कों और साक्ष्यों को प्रस्तुत कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the continental drift theory of Alfred Wegner. Also, present the given arguments and evidence to confirm this theory. (150-200 Words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | इस संबंध में दिये गए तर्कों का भी संक्षिप्त में वर्णन करते हुए उत्तर का अगला भाग लिखिए | उत्तर - अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। लौरेंसिया और अंगारालैंड को टेथिस सागर कहा जाता था। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। सिद्धांत के पक्ष में दिए गए तर्क जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति : गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं : ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षेप : घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म :ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है | यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
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महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इसके सम्बन्ध में दिए गए प्रमाणों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explaining the concept of continental drift theory, present the details of the evidences given in this regards. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच - भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | इस संबंध में दिये गए तर्कों का भी संक्षिप्त में वर्णन करते हुए उत्तर का अगला भाग लिखिए | उत्तर - अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। सिद्धांत के पक्ष में दिए गए तर्क जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति : गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं : ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षे प: घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म :ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है | यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
##Question:महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इसके सम्बन्ध में दिए गए प्रमाणों का विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explaining the concept of continental drift theory, present the details of the evidences given in this regards. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | इस संबंध में दिये गए तर्कों का भी संक्षिप्त में वर्णन करते हुए उत्तर का अगला भाग लिखिए | उत्तर - अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। सिद्धांत के पक्ष में दिए गए तर्क जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति : गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं : ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षे प: घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म :ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है | यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
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मुद्रा मूल्यह्रास से आप क्या समझते हैं? व्याख्या कीजिए कि किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास का क्या प्रभाव पड़ता है? (150-200 शब्द) What do you understand by currency depreciation? Explain what is the effect of depreciation on an economy? (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में मूल्यह्रास को परिभाषित कीजिए। इसके बाद अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को भी लिखिए। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। जब देश की मुद्रा बाजार कारकों के कारण डॉलर की तुलना में कमजोर होती जाती है तो इसे मूल्यह्रास कहते हैं। मूल्यह्रास परिवर्तनशील विनिमय दर वाले देश में घटित होती है। देश की अर्थव्यवस्था पर मुद्रा के मूल्यह्रास का प्रभाव: निर्यात पर प्रभाव: मूल्यह्रास के कारण डॉलर के सापेक्ष उस मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है। इसके कारण भारतीय निर्यातों की मात्रात्मक मांग में वृद्धि होती है। आयात पर प्रभाव: अन्य देशों से आयात महंगा हो जाता है। व्यापार संतुलन पर प्रभाव: निर्यात की मात्रा में वृद्धि और आयात में कमी के कारण व्यापार घाटे में कमी की संभावना होती है। घरेलू उत्पादित वस्तुओं की निवल मांग में वृद्धि होती है। वस्तुओं के मूल्य और मुद्रास्फीति में और वृद्धि होगी। यदि कुल निर्यात कुल आयात से अधिक है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक होता है। जिससे जीडीपी में वृद्धि है और राष्ट्रिय आय में वृद्धि होती है। उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है कि मूल्यह्रास का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ता है। मूल्यह्रास का लाभ प्राप्त करने के लिए देश की आर्थिक परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिए कि उत्पादन में वृद्धि की जा सके। जिससे निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। विनिर्माण के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभावों को प्रेरित करती है।
##Question:मुद्रा मूल्यह्रास से आप क्या समझते हैं? व्याख्या कीजिए कि किसी अर्थव्यवस्था पर मूल्यह्रास का क्या प्रभाव पड़ता है? (150-200 शब्द) What do you understand by currency depreciation? Explain what is the effect of depreciation on an economy? (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में मूल्यह्रास को परिभाषित कीजिए। इसके बाद अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को भी लिखिए। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिए। जब देश की मुद्रा बाजार कारकों के कारण डॉलर की तुलना में कमजोर होती जाती है तो इसे मूल्यह्रास कहते हैं। मूल्यह्रास परिवर्तनशील विनिमय दर वाले देश में घटित होती है। देश की अर्थव्यवस्था पर मुद्रा के मूल्यह्रास का प्रभाव: निर्यात पर प्रभाव: मूल्यह्रास के कारण डॉलर के सापेक्ष उस मुद्रा के मूल्य में गिरावट आती है। इसके कारण भारतीय निर्यातों की मात्रात्मक मांग में वृद्धि होती है। आयात पर प्रभाव: अन्य देशों से आयात महंगा हो जाता है। व्यापार संतुलन पर प्रभाव: निर्यात की मात्रा में वृद्धि और आयात में कमी के कारण व्यापार घाटे में कमी की संभावना होती है। घरेलू उत्पादित वस्तुओं की निवल मांग में वृद्धि होती है। वस्तुओं के मूल्य और मुद्रास्फीति में और वृद्धि होगी। यदि कुल निर्यात कुल आयात से अधिक है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक होता है। जिससे जीडीपी में वृद्धि है और राष्ट्रिय आय में वृद्धि होती है। उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है कि मूल्यह्रास का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ता है। मूल्यह्रास का लाभ प्राप्त करने के लिए देश की आर्थिक परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिए कि उत्पादन में वृद्धि की जा सके। जिससे निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। विनिर्माण के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ मूल्यह्रास के नकारात्मक प्रभावों को प्रेरित करती है।
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