Question
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क्या कारण था कि तत्कालीन समय में बौद्ध धर्म इतना लोकप्रिय हुआ? साथ ही उन कारणों का भी उल्लेख कीजिये जो भारत में बौद्ध धर्म के पतन के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं | (150-200 शब्द; 10 अंक) What was the reason that Buddhism became so popular at the time? Also mention the reasons which are considered responsible for the decline of buddhism in India. (150–200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- बौद्ध धर्म के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, उन कारणों का उल्लेख कीजिये जिसके कारण समकालीन समय में बौद्ध धर्म इतना लोकप्रिय हुआ था| अंतिम भाग में,बौद्ध धर्म के पतन के कारणों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, बौद्ध धर्म के प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए वर्तमान समय में भी इसकी प्रासंगिकता को अतिसंक्षिप्त रूप से बताईये| उत्तर- वैदिकोत्तर काल में समाज स्पष्टतः चार वर्णों में विभाजित था- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र| शूद्रों की दयनीय सामाजिक स्थिति, नगरों के उद्भव से वैश्यों का ऊपर उठता स्तर एवं उनके द्वारा ऐसे धर्म की खोज जिसमें उनकी सामाजिक स्थिति ब्राहमण धर्म से बेहतर हो, विविध विशेषाधिकारों का दावा करने वाले ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध क्षत्रियों का खड़ा होना आदि कारणों से ईसा पूर्व छठी सदी के उतरार्ध में मध्य गंगा के मैदान में बौद्ध धर्म, जैन धर्म जैसे नए धर्मों का उदय हुआ| बौद्ध धर्म के लोकप्रियता के कारण धर्म का सरलीकरण तथा ब्राहमण धर्म में प्रचलित पुरोहितवाद एवं कर्मकांडों का विरोध; वर्ण व्यवस्था की निंदा जिससे समाज के निम्न वर्गों का व्यापक समर्थन; संघ में स्त्रियों को भी प्रवेश का अधिकार; ब्राहमण धर्म की तुलना में अधिक उदार तथा अधिक जनतांत्रिक; मगध का व्यापक समर्थन क्योंकि कट्टर ब्राहमणों द्वारा मगध को नीच माना जाना; बुद्ध का राजपरिवार से संबंधित होना; समकालीन राज्यों/शासकों का समर्थन जैसे- मगध, कोशल आदि का समर्थन; यहाँ तक कि बुद्ध के पश्चात भी अशोक, कनिष्क, हर्षवर्धन इत्यादि शासकों ने इसे संरक्षण प्रदान किया| अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने से इसको व्यापक लाभ पहुंचा| समय-समय पर बौद्ध संगीति के माध्यम से शिक्षाओं का संकलन तथा विवादों का निराकरण; बुद्ध के धर्मोपदेश/प्रचार की शैली जैसे- तार्किक तरीके से अपनी बातों को कहना, धैर्य रखना, उपदेशों में संशोधन करना, भलाई से बुराई को भगाने तथा प्रेम से घृणा को भगाना आदि; आमलोगों की भाषाओँ में उपदेश जैसे- जनसाधारण की भाषा पालि को अपनाना; बुद्ध के पश्चात कई विद्वानों ने भी बुद्ध की शिक्षाओं पर पुस्तकें लिखी जैसे- बुद्धघोष, बुद्धदत, धर्मपाल आदि; बौद्ध धर्म का प्रसार तो काफी तेजी से हुआ एवं अशोक के काल में यह अपने चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा परंतु जल्द ही इसका पतन होना भी प्रारंभ हो गया| 1 2वीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म भारत से लुप्त सा हो गया था| बौद्ध धर्म के पतन के कारण समय के साथ बौद्ध धर्म में ऊन बुराईयों का प्रवेश जिसके विरूद्ध महात्मा बुद्ध ने आवाज उठायी थी जैसे- अंधविश्वास, कर्मकांड, पुरोहितवाद आदि का बौद्ध धर्म में प्रवेश; बौद्ध धर्म का विभिन्न उपसंप्रदायों में विभाजन; बौद्ध विहारों का विलासिता का केंद्र बन जाना; गुप्तकाल तक महायान बौद्ध धर्म एवं हिंदू धर्म के बीच अंतर करना मुश्किल; गुप्तकाल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान तथा भक्ति तथा अहिंसा पर बल; राजकीय संरक्षण में कमी तथा कुछ शासकों का बौद्ध धर्म विरोधी दृष्टिकोण जैसे- बंगाल के शासक शशांक ने बोधिवृक्ष को कटवा दिया था; बौद्ध मठ की ख्याति धन-संपदा के केंद्र के रूप में तथा पूर्व मध्यकाल में तुर्क आक्रमणकारियों ने इसे निशाना बनाया; जल्द ही पतन होने के बावजूद बौद्ध धर्म का योगदानधर्म;स्थापत्यकला- स्तूप, चैत्य, विहार; मूर्तिकला- गांधार, मथुरा; चित्रकला- अजंता;भाषा एवं साहित्य;सामाजिक क्षेत्र में- अहिंसा, दया, मित्रता, समानता जैसे विचारों को लोकप्रिय बनाना; आदि में व्यापक रूप से देखा गया जो आज भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए हुए है जैसे-राजनीतिक क्षेत्र में अहिंसा, मित्रता जैसे विचारों का राजनीतिक महत्व भी है तथा इस रास्ते पर चलकर भारत तथा विश्व की कई महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है|
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##Question:क्या कारण था कि तत्कालीन समय में बौद्ध धर्म इतना लोकप्रिय हुआ? साथ ही उन कारणों का भी उल्लेख कीजिये जो भारत में बौद्ध धर्म के पतन के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं | (150-200 शब्द; 10 अंक) What was the reason that Buddhism became so popular at the time? Also mention the reasons which are considered responsible for the decline of buddhism in India. (150–200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- बौद्ध धर्म के उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, उन कारणों का उल्लेख कीजिये जिसके कारण समकालीन समय में बौद्ध धर्म इतना लोकप्रिय हुआ था| अंतिम भाग में,बौद्ध धर्म के पतन के कारणों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, बौद्ध धर्म के प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए वर्तमान समय में भी इसकी प्रासंगिकता को अतिसंक्षिप्त रूप से बताईये| उत्तर- वैदिकोत्तर काल में समाज स्पष्टतः चार वर्णों में विभाजित था- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र| शूद्रों की दयनीय सामाजिक स्थिति, नगरों के उद्भव से वैश्यों का ऊपर उठता स्तर एवं उनके द्वारा ऐसे धर्म की खोज जिसमें उनकी सामाजिक स्थिति ब्राहमण धर्म से बेहतर हो, विविध विशेषाधिकारों का दावा करने वाले ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध क्षत्रियों का खड़ा होना आदि कारणों से ईसा पूर्व छठी सदी के उतरार्ध में मध्य गंगा के मैदान में बौद्ध धर्म, जैन धर्म जैसे नए धर्मों का उदय हुआ| बौद्ध धर्म के लोकप्रियता के कारण धर्म का सरलीकरण तथा ब्राहमण धर्म में प्रचलित पुरोहितवाद एवं कर्मकांडों का विरोध; वर्ण व्यवस्था की निंदा जिससे समाज के निम्न वर्गों का व्यापक समर्थन; संघ में स्त्रियों को भी प्रवेश का अधिकार; ब्राहमण धर्म की तुलना में अधिक उदार तथा अधिक जनतांत्रिक; मगध का व्यापक समर्थन क्योंकि कट्टर ब्राहमणों द्वारा मगध को नीच माना जाना; बुद्ध का राजपरिवार से संबंधित होना; समकालीन राज्यों/शासकों का समर्थन जैसे- मगध, कोशल आदि का समर्थन; यहाँ तक कि बुद्ध के पश्चात भी अशोक, कनिष्क, हर्षवर्धन इत्यादि शासकों ने इसे संरक्षण प्रदान किया| अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने से इसको व्यापक लाभ पहुंचा| समय-समय पर बौद्ध संगीति के माध्यम से शिक्षाओं का संकलन तथा विवादों का निराकरण; बुद्ध के धर्मोपदेश/प्रचार की शैली जैसे- तार्किक तरीके से अपनी बातों को कहना, धैर्य रखना, उपदेशों में संशोधन करना, भलाई से बुराई को भगाने तथा प्रेम से घृणा को भगाना आदि; आमलोगों की भाषाओँ में उपदेश जैसे- जनसाधारण की भाषा पालि को अपनाना; बुद्ध के पश्चात कई विद्वानों ने भी बुद्ध की शिक्षाओं पर पुस्तकें लिखी जैसे- बुद्धघोष, बुद्धदत, धर्मपाल आदि; बौद्ध धर्म का प्रसार तो काफी तेजी से हुआ एवं अशोक के काल में यह अपने चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा परंतु जल्द ही इसका पतन होना भी प्रारंभ हो गया| 1 2वीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म भारत से लुप्त सा हो गया था| बौद्ध धर्म के पतन के कारण समय के साथ बौद्ध धर्म में ऊन बुराईयों का प्रवेश जिसके विरूद्ध महात्मा बुद्ध ने आवाज उठायी थी जैसे- अंधविश्वास, कर्मकांड, पुरोहितवाद आदि का बौद्ध धर्म में प्रवेश; बौद्ध धर्म का विभिन्न उपसंप्रदायों में विभाजन; बौद्ध विहारों का विलासिता का केंद्र बन जाना; गुप्तकाल तक महायान बौद्ध धर्म एवं हिंदू धर्म के बीच अंतर करना मुश्किल; गुप्तकाल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान तथा भक्ति तथा अहिंसा पर बल; राजकीय संरक्षण में कमी तथा कुछ शासकों का बौद्ध धर्म विरोधी दृष्टिकोण जैसे- बंगाल के शासक शशांक ने बोधिवृक्ष को कटवा दिया था; बौद्ध मठ की ख्याति धन-संपदा के केंद्र के रूप में तथा पूर्व मध्यकाल में तुर्क आक्रमणकारियों ने इसे निशाना बनाया; जल्द ही पतन होने के बावजूद बौद्ध धर्म का योगदानधर्म;स्थापत्यकला- स्तूप, चैत्य, विहार; मूर्तिकला- गांधार, मथुरा; चित्रकला- अजंता;भाषा एवं साहित्य;सामाजिक क्षेत्र में- अहिंसा, दया, मित्रता, समानता जैसे विचारों को लोकप्रिय बनाना; आदि में व्यापक रूप से देखा गया जो आज भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए हुए है जैसे-राजनीतिक क्षेत्र में अहिंसा, मित्रता जैसे विचारों का राजनीतिक महत्व भी है तथा इस रास्ते पर चलकर भारत तथा विश्व की कई महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है|
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वर्तमान संदर्भों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत सोशल मीडिया की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। (150 - 200 शब्द ) Analyze the role of social media under the right to freedom of expression in current contexts. (150 - 200 words)
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एप्रोच : अभिव्यक्ति के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुरूप बताते हुए भूमिका दीजिये। सोशल मीडिया की भूमिका के क्रम में सकारात्मक व् नकारात्मक पक्षों का वर्णन कीजिये। सुझावात्मक निष्कर्ष लिखिए। उत्तर प्रारूप : भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान किया गया है। वाक् एवं अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता प्रेस को भी उपलब्ध है और वर्तमान में सोशल मीडिया , लोगों का एक दूसरे से जुड़ाव हेतु तकनीकी आधारित प्रचलित माध्यम है। सोशल मीडिया के सकारात्मक पक्ष : सामाजिक बुराईयों व् कुरीतियों पर प्रहार करने हेतु माध्यम सरकार व् समाज के मध्य संचार खाई को कम करने में सहायक। चुनाव में विभिन्न दलों द्वारा मतदाताओं तक पहुँच स्थापित करने में। महिलाओं के प्रति होने वाले भेदभाव व अपराधों के प्रति आवाज मुखर करने में। सेल्फी विथ डॉटर , मी टू जैसे आंदोलन आदि इसके प्रमुख उदाहरण है। सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रयोग व् पक्ष : सोशल मीडिया निम्नलिखित माध्यम से किसी समाचार या घटना को तोड़ मरोड़ के रूप में प्रस्तुत करती है , इसे दुष्प्रचार की श्रेणी में रखते है। इकोचैम्बर पोलराइजेशन तथा हाइपर पार्टीजनशिप किसी भ्रामक सूचना को वायरल करना और अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाना तोड़ मरोड़ कर सूचना के मूल स्वरुप को बदल देना माइक्रो टार्गेटिंग व व्यवहार में रूपांतरण असहिष्णुता तथा नफरत फ़ैलाने वाले भाषण तथा समुदायों के मध्य विलगाव पैदा करना किसी सूचना को सरकारी स्रोंतों पर आधारित बताकर इस तरह प्रस्तुत करना कि वह आधिकारिक तौर पर सही हो। राजनीतिक स्वार्थ के लिए सोशल मीडिया का उपयोग। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि सोशल मीडिया का विनियमन वर्तमान की आवश्यकता है ,जिससे इससे लाभों को बढ़ाकर नकारात्मक पक्ष को सीमित रखा जा सके.
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##Question:वर्तमान संदर्भों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत सोशल मीडिया की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। (150 - 200 शब्द ) Analyze the role of social media under the right to freedom of expression in current contexts. (150 - 200 words)##Answer:एप्रोच : अभिव्यक्ति के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुरूप बताते हुए भूमिका दीजिये। सोशल मीडिया की भूमिका के क्रम में सकारात्मक व् नकारात्मक पक्षों का वर्णन कीजिये। सुझावात्मक निष्कर्ष लिखिए। उत्तर प्रारूप : भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रदान किया गया है। वाक् एवं अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता प्रेस को भी उपलब्ध है और वर्तमान में सोशल मीडिया , लोगों का एक दूसरे से जुड़ाव हेतु तकनीकी आधारित प्रचलित माध्यम है। सोशल मीडिया के सकारात्मक पक्ष : सामाजिक बुराईयों व् कुरीतियों पर प्रहार करने हेतु माध्यम सरकार व् समाज के मध्य संचार खाई को कम करने में सहायक। चुनाव में विभिन्न दलों द्वारा मतदाताओं तक पहुँच स्थापित करने में। महिलाओं के प्रति होने वाले भेदभाव व अपराधों के प्रति आवाज मुखर करने में। सेल्फी विथ डॉटर , मी टू जैसे आंदोलन आदि इसके प्रमुख उदाहरण है। सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रयोग व् पक्ष : सोशल मीडिया निम्नलिखित माध्यम से किसी समाचार या घटना को तोड़ मरोड़ के रूप में प्रस्तुत करती है , इसे दुष्प्रचार की श्रेणी में रखते है। इकोचैम्बर पोलराइजेशन तथा हाइपर पार्टीजनशिप किसी भ्रामक सूचना को वायरल करना और अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाना तोड़ मरोड़ कर सूचना के मूल स्वरुप को बदल देना माइक्रो टार्गेटिंग व व्यवहार में रूपांतरण असहिष्णुता तथा नफरत फ़ैलाने वाले भाषण तथा समुदायों के मध्य विलगाव पैदा करना किसी सूचना को सरकारी स्रोंतों पर आधारित बताकर इस तरह प्रस्तुत करना कि वह आधिकारिक तौर पर सही हो। राजनीतिक स्वार्थ के लिए सोशल मीडिया का उपयोग। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि सोशल मीडिया का विनियमन वर्तमान की आवश्यकता है ,जिससे इससे लाभों को बढ़ाकर नकारात्मक पक्ष को सीमित रखा जा सके.
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स्वतंत्र भारत में जनजातीय एकीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) Make brief remarks on tribal integration in independent India. (150-200 words, Marks-10 )
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दृष्टिकोण: भूमिका में भारत की जनजातियों से सम्बंधित पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिये| जनजातीय एकीकरण हेतु उठाए गए कुछ प्रमुख कदमों की चर्चा कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: जनजातियाँ वह मानव समुदाय हैं जो एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, अलग रीति-रिवाज, अलग भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सरल अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज तथा सामान्य से देवी-देवता होते हैं। ये प्रायः प्रकृति पूजकहोते हैं। जनजातीय एकीकरण हेतु उठाए गए प्रमुख कदम: विभिन्न समितियों का गठन: एल्विन समिति (1959) का गठन सभी जनजातीय विकास कार्यक्रमों के लिये बुनियादी प्रशासनिक इकाई ‘बहु-उद्देश्यीय विकास खंड’ (मल्टी-पर्पज डेवलपमेंट ब्लॉक) के कार्यकरण की जाँच के लिये किया गया था। यू.एन. ढेबर आयोग का गठन वर्ष 1960 में जनजातीय क्षेत्रों में भूमि अलगाव के मुद्दे सहित जनजातीय समूहों की समग्र स्थिति को संबोधित करने के लिये किया गया था। लोकुर समिति (1965) का गठन अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के मानदंड पर विचार करने के लिये किया गया था। समिति ने उनकी पहचान के लिये पाँच मानदंडों - आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और पिछड़ापन - की सिफारिश की। शीलू ओ समिति, 1966 ने एल्विन समिति की ही तरह जनजातीय विकास और कल्याण के मुद्दे को संबोधित किया। भूरिया समिति (1991) की सिफारिशों ने पेसा अधिनियम (PESA Act), 1996 के अधिनियमित होने का मार्ग प्रशस्त किया। वर्ष 2013 मेंप्रो. वर्जिनियस शाशा की अध्यक्षता मेंएक उच्चस्तरीय समिति (HLC) का गठन किया। समिति को जनजातीय समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य स्थिति की जाँच करने और उनमें सुधार के लिये उपयुक्त हस्तक्षेपकारी उपायों की सिफारिश करने का कार्यभार सौंपा संवैधानिक एवं वैधानिक प्रयास: स्वतंत्रता के उपरांत, वर्ष 1950 में संविधान (अनुच्छेद 342) के अंगीकरण के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान जनजातियों के रूप में चिह्नित व दर्ज समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में पुन: वर्गीकृत किया गया। जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियाँ संख्यात्मक रूप से प्रभावी हैं, उनके लिये संविधान में पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के रूप में दो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया है। संविधान के अंतर्गत ‘पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्र’ (Fifth Schedule Areas) ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुसूचित क्षेत्र घोषित करे। वर्तमान में 10 राज्यों - आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में पाँचवीं अनुसूची के तहत क्षेत्र विद्यमान हैं। पाँचवीं अनुसूची के प्रावधानों को ‘पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996’ के रूप में और विधिक व प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण प्रदान किया गया, ताकि लोकतंत्र और आगे बढ़े। छठी अनुसूची के क्षेत्र (Sixth Schedule areas) कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जो पूर्ववर्ती असम और अन्य जनजातीय बहुल क्षेत्रों में भारत सरकार अधिनियम, 1935 से पहले तक बाहर रखे गए थे तथा बाद में अलग राज्य बने। अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (FRA), 2006. छठी अनुसूची के अलावा, पूर्वोत्तर राज्यों पर अनुच्छेद 371A (नागालैंड), अनुच्छेद 371C (मणिपुर), अनुच्छेद 371G (मिज़ोरम) जैसे अन्य संवैधानिक प्रावधान भी लागू हैं। भारत में जनजातीय एकीकरण मुख्य रूप से जवाहर लाल नेहरु के विचारों से प्रभावित रहा जिसके तहत जनजातियों का विकास तो किया जाना था किन्तु विकास उनकी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही होना था| इसी सन्दर्भ में नेहरु ने जनजातीय पंचशील सिद्धान्त का प्रतिपादन किया एवं उसे जनजातीय विकास व एकीकरण का मुख्य आधार बनाया गया |
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##Question:स्वतंत्र भारत में जनजातीय एकीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द, अंक-10 ) Make brief remarks on tribal integration in independent India. (150-200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में भारत की जनजातियों से सम्बंधित पृष्ठभूमि का उल्लेख कीजिये| जनजातीय एकीकरण हेतु उठाए गए कुछ प्रमुख कदमों की चर्चा कीजिए| संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: जनजातियाँ वह मानव समुदाय हैं जो एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, अलग रीति-रिवाज, अलग भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सरल अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज तथा सामान्य से देवी-देवता होते हैं। ये प्रायः प्रकृति पूजकहोते हैं। जनजातीय एकीकरण हेतु उठाए गए प्रमुख कदम: विभिन्न समितियों का गठन: एल्विन समिति (1959) का गठन सभी जनजातीय विकास कार्यक्रमों के लिये बुनियादी प्रशासनिक इकाई ‘बहु-उद्देश्यीय विकास खंड’ (मल्टी-पर्पज डेवलपमेंट ब्लॉक) के कार्यकरण की जाँच के लिये किया गया था। यू.एन. ढेबर आयोग का गठन वर्ष 1960 में जनजातीय क्षेत्रों में भूमि अलगाव के मुद्दे सहित जनजातीय समूहों की समग्र स्थिति को संबोधित करने के लिये किया गया था। लोकुर समिति (1965) का गठन अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के मानदंड पर विचार करने के लिये किया गया था। समिति ने उनकी पहचान के लिये पाँच मानदंडों - आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और पिछड़ापन - की सिफारिश की। शीलू ओ समिति, 1966 ने एल्विन समिति की ही तरह जनजातीय विकास और कल्याण के मुद्दे को संबोधित किया। भूरिया समिति (1991) की सिफारिशों ने पेसा अधिनियम (PESA Act), 1996 के अधिनियमित होने का मार्ग प्रशस्त किया। वर्ष 2013 मेंप्रो. वर्जिनियस शाशा की अध्यक्षता मेंएक उच्चस्तरीय समिति (HLC) का गठन किया। समिति को जनजातीय समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य स्थिति की जाँच करने और उनमें सुधार के लिये उपयुक्त हस्तक्षेपकारी उपायों की सिफारिश करने का कार्यभार सौंपा संवैधानिक एवं वैधानिक प्रयास: स्वतंत्रता के उपरांत, वर्ष 1950 में संविधान (अनुच्छेद 342) के अंगीकरण के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान जनजातियों के रूप में चिह्नित व दर्ज समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में पुन: वर्गीकृत किया गया। जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियाँ संख्यात्मक रूप से प्रभावी हैं, उनके लिये संविधान में पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के रूप में दो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया है। संविधान के अंतर्गत ‘पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्र’ (Fifth Schedule Areas) ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुसूचित क्षेत्र घोषित करे। वर्तमान में 10 राज्यों - आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में पाँचवीं अनुसूची के तहत क्षेत्र विद्यमान हैं। पाँचवीं अनुसूची के प्रावधानों को ‘पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996’ के रूप में और विधिक व प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण प्रदान किया गया, ताकि लोकतंत्र और आगे बढ़े। छठी अनुसूची के क्षेत्र (Sixth Schedule areas) कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जो पूर्ववर्ती असम और अन्य जनजातीय बहुल क्षेत्रों में भारत सरकार अधिनियम, 1935 से पहले तक बाहर रखे गए थे तथा बाद में अलग राज्य बने। अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (FRA), 2006. छठी अनुसूची के अलावा, पूर्वोत्तर राज्यों पर अनुच्छेद 371A (नागालैंड), अनुच्छेद 371C (मणिपुर), अनुच्छेद 371G (मिज़ोरम) जैसे अन्य संवैधानिक प्रावधान भी लागू हैं। भारत में जनजातीय एकीकरण मुख्य रूप से जवाहर लाल नेहरु के विचारों से प्रभावित रहा जिसके तहत जनजातियों का विकास तो किया जाना था किन्तु विकास उनकी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही होना था| इसी सन्दर्भ में नेहरु ने जनजातीय पंचशील सिद्धान्त का प्रतिपादन किया एवं उसे जनजातीय विकास व एकीकरण का मुख्य आधार बनाया गया |
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The Rajya Sabha is not merely a secondary house rather than a second house in the Indian Parliamentary system. Critically analyze the statement. (150 words/ 10 marks)
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Approach : Introduction: Briefly explain Parliament Central Body: 1. Highlight the powers of Rajya Sabha which are equal to Lok Sabha. 2. List the circumstances where Rajya Sabha are not having equal power to Lok Sabha. Conclusion: Highlight the inevitability of Rajya Sabha Answer : Parliament has two houses one Lok Sabha and the second Rajya Sabha. Rajya Sabha has been created on the principle of equality between two houses which can be seen in the following points except for a few circumstances.Both houses have equal powers in the following ways- Passing of ordinary bills, constitutional amendments bill, a financial bill involving expenditure from the Consolidated Fund of India and election and impeachment of the president. Making recommendation to the President for the removal of Chief Justice and judges of Supreme Court and high courts, chief election commissioner and comptroller and auditor general. Approval of ordinances issued by the president and also of all three types of emergencies. Consideration of the reports of the constitutional bodies like Finance Commission, Union Public Service Commission, comptroller and auditor general, etc. Enlargement of the jurisdiction of the Supreme Court and the Union Public Service Commission. By seeing the above-mentioned provisions it is clear that Rajya Sabha is as crucial as Lok Sabha and it is the second house for carrying out many constitutional duties. It is not the secondary house. But there are variousinstances where Rajya Sabha doesn’t have equal power with Lok Sabha- Regarding all aspects of a Money, Bill Rajya Sabha has no power as Lok Sabha can reject all the recommendation of Rajya Sabha and pass money bill also Speaker of Lok Sabha decides which bill is a money bill. The Speaker of Lok Sabha presides over the joint sitting of both the Houses. RajyaSabha can only discuss the budget but cannot vote on the demands for grants (which is the exclusive privilege of the Lok Sabha). A resolution for the discontinuance of the national emergency can be passed only by the LokSabha and not by the Rajya Sabha. A Chamber not Concerned with Government Formation: The Government of the day is collectively responsible to the House of People, the directly elected House. Rajya Sabha being an indirectly elected House has no role in the making or unmaking of the Government. It also can pass No-Confidence Motion. But same time as Rajya Sabha was designed for the purpose of representing the interests of States but there have been various instances in contemporary functioning of parliament that this role has been questioned. It can be seen by the following analysis - As a Second Chamber, it has the mandate to secure a second sober look at hasty legislation. RajyaSabha had recommended changes in the Bills passed by LokSabha and those changes were, in fact, carried out eventually. Among some of the important Bills revised are the Income Tax Amendment) Bill, 1961 and the National Honour Bill, 1971 wherein some substantial amendments suggested by the RajyaSabha were accepted by the LokSabha. But recently in various cases, it has been seen changes suggested are ignored by Lok Sabha as in the case of Financial Bill 2016, etc. As a Federal Chamber- As Rajya Sabha was to represent states but the problem has been exacerbated by the Kuldip Nayar judgment which removed the requirement of domicile. It has now been misinterpreted for political expediency. As the recent Rajya Sabha elections show, we now have MPs who are representing a State to which they do not belong. Many instances when the ruling party does not enjoy a majority in Rajya Sabha have passed legislation bypassing Rajya Sabha. It was done recently in the case of the Aadhaar bill which was introduced as a money bill. It actually violates the constitution, as according to the definition of money bill given under article 110, Aadhar bill didn’t meet criteria to be declared as a money bill. Also, the speaker is sole decision-maker whether a bill is a money bill or not and also his decision is beyond judicial review this has exacerbated the situation and allowed bypassing Rajya Sabha. This way it can be said clearly that Rajya Sabha plays a significant role in the parliamentary democratic framework of the country. It should be allowed to fulfill its role and function as it was desired by our constitutional makers. It should not be allowed to be diluted as the secondary chamber and regarding this necessary reform should be done.
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##Question:The Rajya Sabha is not merely a secondary house rather than a second house in the Indian Parliamentary system. Critically analyze the statement. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach : Introduction: Briefly explain Parliament Central Body: 1. Highlight the powers of Rajya Sabha which are equal to Lok Sabha. 2. List the circumstances where Rajya Sabha are not having equal power to Lok Sabha. Conclusion: Highlight the inevitability of Rajya Sabha Answer : Parliament has two houses one Lok Sabha and the second Rajya Sabha. Rajya Sabha has been created on the principle of equality between two houses which can be seen in the following points except for a few circumstances.Both houses have equal powers in the following ways- Passing of ordinary bills, constitutional amendments bill, a financial bill involving expenditure from the Consolidated Fund of India and election and impeachment of the president. Making recommendation to the President for the removal of Chief Justice and judges of Supreme Court and high courts, chief election commissioner and comptroller and auditor general. Approval of ordinances issued by the president and also of all three types of emergencies. Consideration of the reports of the constitutional bodies like Finance Commission, Union Public Service Commission, comptroller and auditor general, etc. Enlargement of the jurisdiction of the Supreme Court and the Union Public Service Commission. By seeing the above-mentioned provisions it is clear that Rajya Sabha is as crucial as Lok Sabha and it is the second house for carrying out many constitutional duties. It is not the secondary house. But there are variousinstances where Rajya Sabha doesn’t have equal power with Lok Sabha- Regarding all aspects of a Money, Bill Rajya Sabha has no power as Lok Sabha can reject all the recommendation of Rajya Sabha and pass money bill also Speaker of Lok Sabha decides which bill is a money bill. The Speaker of Lok Sabha presides over the joint sitting of both the Houses. RajyaSabha can only discuss the budget but cannot vote on the demands for grants (which is the exclusive privilege of the Lok Sabha). A resolution for the discontinuance of the national emergency can be passed only by the LokSabha and not by the Rajya Sabha. A Chamber not Concerned with Government Formation: The Government of the day is collectively responsible to the House of People, the directly elected House. Rajya Sabha being an indirectly elected House has no role in the making or unmaking of the Government. It also can pass No-Confidence Motion. But same time as Rajya Sabha was designed for the purpose of representing the interests of States but there have been various instances in contemporary functioning of parliament that this role has been questioned. It can be seen by the following analysis - As a Second Chamber, it has the mandate to secure a second sober look at hasty legislation. RajyaSabha had recommended changes in the Bills passed by LokSabha and those changes were, in fact, carried out eventually. Among some of the important Bills revised are the Income Tax Amendment) Bill, 1961 and the National Honour Bill, 1971 wherein some substantial amendments suggested by the RajyaSabha were accepted by the LokSabha. But recently in various cases, it has been seen changes suggested are ignored by Lok Sabha as in the case of Financial Bill 2016, etc. As a Federal Chamber- As Rajya Sabha was to represent states but the problem has been exacerbated by the Kuldip Nayar judgment which removed the requirement of domicile. It has now been misinterpreted for political expediency. As the recent Rajya Sabha elections show, we now have MPs who are representing a State to which they do not belong. Many instances when the ruling party does not enjoy a majority in Rajya Sabha have passed legislation bypassing Rajya Sabha. It was done recently in the case of the Aadhaar bill which was introduced as a money bill. It actually violates the constitution, as according to the definition of money bill given under article 110, Aadhar bill didn’t meet criteria to be declared as a money bill. Also, the speaker is sole decision-maker whether a bill is a money bill or not and also his decision is beyond judicial review this has exacerbated the situation and allowed bypassing Rajya Sabha. This way it can be said clearly that Rajya Sabha plays a significant role in the parliamentary democratic framework of the country. It should be allowed to fulfill its role and function as it was desired by our constitutional makers. It should not be allowed to be diluted as the secondary chamber and regarding this necessary reform should be done.
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महिला सशक्तिकरण के लिए किए जा रहे प्रमुख राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द, 10 अंक ) Discuss the major national and international efforts being made for women"s empowerment. (150-200 words, 10 words)
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दृष्टिकोण: भूमिका में महिला सशक्तिकरण को स्पष्ट कीजिए | महिला सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे राष्ट्रीय प्रयासों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए | महिला सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए | संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए | उत्तर: साधारणतया महिला सशक्तिकरण से तात्पर्य अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना व सक्षम बनाना है । लैंगिक समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपाय करने की शक्ति भी प्रदान करता है। महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम: भारतीय संविधान में लैंगिक समानता का प्रावधान किया गया है । यथा - अनु. 15, अनु. 21, अनु. 41 । भारत में वर्ष 2000-01 में महिला सशक्तिकरण की नीति का अनुपालन । वर्ष 2013 में राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन प्रारंभ जिसमें वर्ष 2017 में संशोधन । जेंडर बजटिंग की शुरुआत । भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों की पुष्टि की है। भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए कई विशिष्ट कानून निर्मित किए गए हैं : अनैतिक यातायात (रोकथाम) अधिनियम, 1956 । मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 । गर्भावस्था अधिनियम का अंत, 1971 । सती (रोकथाम) अधिनियम, 1987 । बाल विवाह का निषेध अधिनियम, 2006 । PCPNDT एक्ट , 1994 । कार्यस्थल पर महिलाओं की यौन उत्पीड़न (रोकथाम और संरक्षण) अधिनियम, 2013 । उपर्युक्त कानून जो न केवल महिलाओं को विशिष्ट कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं बल्कि उन्हें सुरक्षा और सशक्तिकरण की भावना भी प्रदान करते हैं । नौवीं पंचवर्षीय योजना से लगातार प्रतिबद्धताओं एवं महिलाओं के सशक्तीकरण से संबंधित अन्य सेक्टोरल नीतियों को भी ध्यान में रखा गया है। राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017 की शुरुआत , जो महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार,समान पारिश्रमिक एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकने में सक्षम बनाने के लिए केंद्रित । महिला सशक्तिकरण हेतु अंतर्राष्ट्रीय प्रयास: वर्ष 1986 का नैरोबी अधिवेशन के अंतर्गत महिला सशक्तिकरण की परिभाषा । वर्ष 1995 में बीजिंग अधिवेशन के अंतर्गत एशिया-प्रशांत देशों में महिला सशक्तिकरण को त्वरित करने हेतु अतिरिक्त प्रयास की बात । महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन (सीडीएडब्ल्यू) पर सम्मेलन, 1993 । मैक्सिको प्लान ऑफ एक्शन (1975) । यूएनजीए सत्र द्वारा अपनाया गया परिणाम दस्तावेज, 21वीं शताब्दी के लिए लैंगिक समानता, विकास, शांति और आगे की कार्रवाइयों को लागू करने के लिए "बीजिंग घोषणापत्र"। इन सभी को भारत के द्वारा उचित अनुवर्ती कार्रवाई के लिए पूर्ण रूप से समर्थन दिया गया है। इन सभी विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं, कानूनों और नीतियों के बावजूद महिलाओं की स्थिति में अभी भी संतोषजनक रूप से सुधार नहीं हुआ है। महिलाओं से संबंधित विभिन्न समस्याएं अभी भी समाज में मौजूद हैं।अभी भी महिलाओं का विभिन्न तरीके से शोषण बढ़ रहा है । दहेज-प्रथा अभी भी काफी प्रचलित है । महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के कई मामले देखने और सुनने को मिलते रहते हैं । कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ अन्य जघन्य यौन अपराध भी बढें हैं। यद्यपि हाल के दशकों में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में महत्वपूर्ण तरीके से सुधार हुआ है तथापि अभी भी कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है तभी हम के लैंगिक भेदभाव से मुक्त समाज के निर्माण की ओर मजबूती से कदम बढ़ा पाएंगे ।
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##Question:महिला सशक्तिकरण के लिए किए जा रहे प्रमुख राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द, 10 अंक ) Discuss the major national and international efforts being made for women"s empowerment. (150-200 words, 10 words)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में महिला सशक्तिकरण को स्पष्ट कीजिए | महिला सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे राष्ट्रीय प्रयासों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए | महिला सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए | संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए | उत्तर: साधारणतया महिला सशक्तिकरण से तात्पर्य अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना व सक्षम बनाना है । लैंगिक समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव के उपाय करने की शक्ति भी प्रदान करता है। महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम: भारतीय संविधान में लैंगिक समानता का प्रावधान किया गया है । यथा - अनु. 15, अनु. 21, अनु. 41 । भारत में वर्ष 2000-01 में महिला सशक्तिकरण की नीति का अनुपालन । वर्ष 2013 में राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन प्रारंभ जिसमें वर्ष 2017 में संशोधन । जेंडर बजटिंग की शुरुआत । भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों की पुष्टि की है। भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए कई विशिष्ट कानून निर्मित किए गए हैं : अनैतिक यातायात (रोकथाम) अधिनियम, 1956 । मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 । गर्भावस्था अधिनियम का अंत, 1971 । सती (रोकथाम) अधिनियम, 1987 । बाल विवाह का निषेध अधिनियम, 2006 । PCPNDT एक्ट , 1994 । कार्यस्थल पर महिलाओं की यौन उत्पीड़न (रोकथाम और संरक्षण) अधिनियम, 2013 । उपर्युक्त कानून जो न केवल महिलाओं को विशिष्ट कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं बल्कि उन्हें सुरक्षा और सशक्तिकरण की भावना भी प्रदान करते हैं । नौवीं पंचवर्षीय योजना से लगातार प्रतिबद्धताओं एवं महिलाओं के सशक्तीकरण से संबंधित अन्य सेक्टोरल नीतियों को भी ध्यान में रखा गया है। राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण मिशन-2017 की शुरुआत , जो महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार,समान पारिश्रमिक एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकने में सक्षम बनाने के लिए केंद्रित । महिला सशक्तिकरण हेतु अंतर्राष्ट्रीय प्रयास: वर्ष 1986 का नैरोबी अधिवेशन के अंतर्गत महिला सशक्तिकरण की परिभाषा । वर्ष 1995 में बीजिंग अधिवेशन के अंतर्गत एशिया-प्रशांत देशों में महिला सशक्तिकरण को त्वरित करने हेतु अतिरिक्त प्रयास की बात । महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन (सीडीएडब्ल्यू) पर सम्मेलन, 1993 । मैक्सिको प्लान ऑफ एक्शन (1975) । यूएनजीए सत्र द्वारा अपनाया गया परिणाम दस्तावेज, 21वीं शताब्दी के लिए लैंगिक समानता, विकास, शांति और आगे की कार्रवाइयों को लागू करने के लिए "बीजिंग घोषणापत्र"। इन सभी को भारत के द्वारा उचित अनुवर्ती कार्रवाई के लिए पूर्ण रूप से समर्थन दिया गया है। इन सभी विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं, कानूनों और नीतियों के बावजूद महिलाओं की स्थिति में अभी भी संतोषजनक रूप से सुधार नहीं हुआ है। महिलाओं से संबंधित विभिन्न समस्याएं अभी भी समाज में मौजूद हैं।अभी भी महिलाओं का विभिन्न तरीके से शोषण बढ़ रहा है । दहेज-प्रथा अभी भी काफी प्रचलित है । महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के कई मामले देखने और सुनने को मिलते रहते हैं । कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ अन्य जघन्य यौन अपराध भी बढें हैं। यद्यपि हाल के दशकों में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में महत्वपूर्ण तरीके से सुधार हुआ है तथापि अभी भी कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है तभी हम के लैंगिक भेदभाव से मुक्त समाज के निर्माण की ओर मजबूती से कदम बढ़ा पाएंगे ।
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भूगर्भ की जानकारी के स्रोतों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। साथ ही समझाइये कि भूकंप के दौरान पृथ्वी में कम्पन्न क्यों होता है?(150-200 शब्द) Briefly mention the sources of geological information. Also explain why the Earth vibrates during an earthquake? (150-200 शब्द)
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दृष्टिकोण : भूगर्भ की जानकारी के विभिन्न प्रत्यक्ष स्रोतों की संक्षिप्त चर्चाकीजिये । भूगर्भ की जानकारी के विभिन्न अप्रत्यक्ष स्रोतों की संक्षिप्तचर्चा कीजिये । भूकंप के दौरान पृथ्वी में कंपन के कारणों की चर्चा कीजिये । उत्तर : पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अधिकतर जानकारीअप्रत्यक्ष स्रोतों से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है तथापि कुछ प्रत्यक्षस्रोत भी आंतरिक संरचना पर प्रकाश डालते हैं । प्रत्यक्ष स्रोत : प्रत्यक्ष स्रोतों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध मेंहमारा ज्ञान बेहद सीमित है । अभी तक ऐसे किसी उपकरण काआविष्कार नहीं किया जा सका है जिसके माध्यम से पृथ्वी कीआंतरिक संरचना का अवलोकन प्रत्यक्ष रूप से किया जा सके ।प्रत्यक्ष स्रोतों के रूप में हम निम्नलिखित की गणना कर सकते हैं : खनन : डीप ओशन ड्रिलिंग प्रोजेक्ट और इंट्रीगेटेड ओशनड्रिलिंग प्रोजेक्ट परियोजनाओं के माध्यम से पृथ्वी में गहरीड्रिलिंग कर विभिन्न गहराइयों से सामग्री एकत्र की गयी । इनएकत्रित सामग्रियों के विश्लेषण के माध्यम से काफी उपयोगीजानकारी प्राप्त हुई । ज्वालामुखी उद्गार : यह प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य प्रमुखस्रोत है इससे हमें पृथ्वी के आंतरिक भागों में पायी जाने वालीसामग्री की संरचना व उसकी विशेषताओं के संबंध में जानकारीप्राप्त होती है । अप्रत्यक्ष स्रोत: पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में हमारा ज्ञान मुख्य रूप सेअप्रत्यक्ष प्रमाणों पर आधारित है । अप्रत्यक्ष स्रोतों के रूप में हमनिम्नलिखित की गणना कर सकते हैं : अप्राकृतिक स्रोत : इसके अंतर्गत हम तापमान , दबाव व घनत्वकी गणना कर सकते हैं । प्राकृतिक स्रोत : इसके अंतर्गत ज्वालामुखी उद्गार , भूकंप वउल्काओं की गणना की जा सकती है । भूकंप के दौरान पृथ्वी का कंपन : पृथ्वी के आंतरिक भागों में संचलन के कारण भूकंप की उत्पत्ति होतीहै । इस संचलन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के आंतरिक भागों में ठीकउसी प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती हैं जिस प्रकार तालाब के शांत जलमें पत्थर का टुकड़ा फेंकने से वृताकार लहरें केंद्र से चारों तरफ बाहरकी ओर प्रवाहित होती हैं ।अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति ऊपरी मेंटल में होती है । भूगार्भीक तरंगेंभूकंप के केंद्र से ऊर्जा निर्मुक्त होने के कारण उत्पन्न होती हैं औरपृथ्वी के आंतरिक भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती है ।भूगार्भिग तरंगों एवं धरातलीय शैलों के बीच अन्योन्य क्रिया के कारणनयी तरंगे उत्पन्न होती हैं जिन्हें धरातलीय तरंग कहा जाता है । येतरंगे धरातल के साथ-साथ चलती है तथा पृथ्वी के प्लेटों में कंपनउत्पन्न करती हैं ।ये तरंगें पहले से मौजूद पृथ्वी के फ़ाल्ट में कंपनपैदा करने का कार्य करती है । भूकंप के दौरान सर्वाधिक विनाश तथाजान-माल की क्षति इसी तरंग के कारण होती है
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##Question:भूगर्भ की जानकारी के स्रोतों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। साथ ही समझाइये कि भूकंप के दौरान पृथ्वी में कम्पन्न क्यों होता है?(150-200 शब्द) Briefly mention the sources of geological information. Also explain why the Earth vibrates during an earthquake? (150-200 शब्द)##Answer:दृष्टिकोण : भूगर्भ की जानकारी के विभिन्न प्रत्यक्ष स्रोतों की संक्षिप्त चर्चाकीजिये । भूगर्भ की जानकारी के विभिन्न अप्रत्यक्ष स्रोतों की संक्षिप्तचर्चा कीजिये । भूकंप के दौरान पृथ्वी में कंपन के कारणों की चर्चा कीजिये । उत्तर : पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अधिकतर जानकारीअप्रत्यक्ष स्रोतों से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है तथापि कुछ प्रत्यक्षस्रोत भी आंतरिक संरचना पर प्रकाश डालते हैं । प्रत्यक्ष स्रोत : प्रत्यक्ष स्रोतों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध मेंहमारा ज्ञान बेहद सीमित है । अभी तक ऐसे किसी उपकरण काआविष्कार नहीं किया जा सका है जिसके माध्यम से पृथ्वी कीआंतरिक संरचना का अवलोकन प्रत्यक्ष रूप से किया जा सके ।प्रत्यक्ष स्रोतों के रूप में हम निम्नलिखित की गणना कर सकते हैं : खनन : डीप ओशन ड्रिलिंग प्रोजेक्ट और इंट्रीगेटेड ओशनड्रिलिंग प्रोजेक्ट परियोजनाओं के माध्यम से पृथ्वी में गहरीड्रिलिंग कर विभिन्न गहराइयों से सामग्री एकत्र की गयी । इनएकत्रित सामग्रियों के विश्लेषण के माध्यम से काफी उपयोगीजानकारी प्राप्त हुई । ज्वालामुखी उद्गार : यह प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य प्रमुखस्रोत है इससे हमें पृथ्वी के आंतरिक भागों में पायी जाने वालीसामग्री की संरचना व उसकी विशेषताओं के संबंध में जानकारीप्राप्त होती है । अप्रत्यक्ष स्रोत: पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में हमारा ज्ञान मुख्य रूप सेअप्रत्यक्ष प्रमाणों पर आधारित है । अप्रत्यक्ष स्रोतों के रूप में हमनिम्नलिखित की गणना कर सकते हैं : अप्राकृतिक स्रोत : इसके अंतर्गत हम तापमान , दबाव व घनत्वकी गणना कर सकते हैं । प्राकृतिक स्रोत : इसके अंतर्गत ज्वालामुखी उद्गार , भूकंप वउल्काओं की गणना की जा सकती है । भूकंप के दौरान पृथ्वी का कंपन : पृथ्वी के आंतरिक भागों में संचलन के कारण भूकंप की उत्पत्ति होतीहै । इस संचलन के परिणामस्वरूप पृथ्वी के आंतरिक भागों में ठीकउसी प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती हैं जिस प्रकार तालाब के शांत जलमें पत्थर का टुकड़ा फेंकने से वृताकार लहरें केंद्र से चारों तरफ बाहरकी ओर प्रवाहित होती हैं ।अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति ऊपरी मेंटल में होती है । भूगार्भीक तरंगेंभूकंप के केंद्र से ऊर्जा निर्मुक्त होने के कारण उत्पन्न होती हैं औरपृथ्वी के आंतरिक भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती है ।भूगार्भिग तरंगों एवं धरातलीय शैलों के बीच अन्योन्य क्रिया के कारणनयी तरंगे उत्पन्न होती हैं जिन्हें धरातलीय तरंग कहा जाता है । येतरंगे धरातल के साथ-साथ चलती है तथा पृथ्वी के प्लेटों में कंपनउत्पन्न करती हैं ।ये तरंगें पहले से मौजूद पृथ्वी के फ़ाल्ट में कंपनपैदा करने का कार्य करती है । भूकंप के दौरान सर्वाधिक विनाश तथाजान-माल की क्षति इसी तरंग के कारण होती है
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स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? इस संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव दर्शाते हुए विभिन्न मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये| (150 -200 शब्द; 10 अंक ) What challenges did India face in shaping foreign policy in the early years of Post Independence? In this context, mention the effect of Heritage of the National Movement and Mention various Guiding Principles. (150 -200 words; 10 Maks)
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एप्रोच - पहले भाग में,स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, विदेश नीति पर राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव तथा विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों को बताईये| वर्तमान में इन सिद्धांतों का प्रभाव बताते हुए निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप - भारत की स्वतंत्रता के समय वैश्विक स्तर पर विभिन्न समस्याएं मौजूद थी- द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव(शीतयुद्ध); संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना तथा विऔपनिवेशीकरण की प्रक्रिया आदि| साथ ही, भारत के समक्ष ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में बहुत सारी चुनौतियाँ विद्यमान थी| ऐसे में, स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को, भारत के आकार तथा संस्कृति के अनुरूप एक स्वतंत्र स्थान तथा आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने की आवश्यकता ने निर्देशित किया| स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियां शीत युद्ध के संदर्भ मेंमहाशक्तियों से संबंधों का निर्धारण करने की चुनौतीक्योंकि कोई एक देश से हमारी निकटता दूसरे देश के साथ हमारे संबंधों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता था| पड़ोसी देशों(विशेषकर पाकिस्तान एवं चीन) से संबंधों का निर्धारण; अंतर्राष्ट्रीय संगठनों(जैसे - गैट, संयुक्तराष्ट्र, विश्व बैंक आदि) के परिप्रेक्ष्य में भारत का दृष्टिकोण; विदेश नीति के सिद्धांतों एवं क्रियान्वयन संबंधी आधारभूत ढांचों का निर्माण; सैनिक एवं आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण; भारत की विदेश नीति तथा राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ जारी विश्वव्यापी संघर्ष का एक भाग था| स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष ने कई एशियाई और अफ़्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलनों को प्रेरित किया था| साथ ही, भारत के विशाल आकार, अवस्थिति और शक्ति की संभाव्यता के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने वैश्विक मामलों में, खासकर एशियाई मामलों पर, भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की परिकल्पना की| साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोधजैसे -1927 में ब्रुसेल्स सम्मेलन में भारत की भागीदारी; चीन पर जापानी आक्रमण के दौरान जापानी वस्तुओं का बहिष्कार; आज़ादी से पूर्व नई दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आदि| फासीवाद का विरोध; रंगभेद का विरोध; राष्ट्रीय आंदोलन पर दोनों विचारधाराओं(उदारवादी एवं साम्यवादी) के प्रभाव के कारण स्वाभाविक रूप से विदेश नीति प्रभावित; अंतर्राष्ट्रीय विवादों का लोकतांत्रिक तरीके से समाधान,युद्ध का विरोध; विदेश नीति को मार्गदर्शित करने वाले सिद्धांत गुटनिरपेक्षता- दोनों गुटों से दूरी बनाये रखते हुए मुद्दों के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति का पालन; पंचशील का सिद्धांत- आक्रमण नहीं; आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं; अखंडता का सम्मान; समानता पर आधारित संबंध; शांतिपूर्ण सहअस्तित्व; 1954 में सर्वप्रथम चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के स्तर पर इस सिद्धांत को आगे लाया गया| वर्तमान सन्दर्भों में उपयुक्त सन्दर्भ भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व है। इन्हें दक्षिण -दक्षिण सहयोग ,अल्पविकसित देशों को आर्थिक सामाजिक सहायता तथा गुजराल सिद्धांत में भली भांति देखा जा सकता है।
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##Question:स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? इस संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव दर्शाते हुए विभिन्न मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लेख कीजिये| (150 -200 शब्द; 10 अंक ) What challenges did India face in shaping foreign policy in the early years of Post Independence? In this context, mention the effect of Heritage of the National Movement and Mention various Guiding Principles. (150 -200 words; 10 Maks)##Answer:एप्रोच - पहले भाग में,स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में, विदेश नीति पर राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत का प्रभाव तथा विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों को बताईये| वर्तमान में इन सिद्धांतों का प्रभाव बताते हुए निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप - भारत की स्वतंत्रता के समय वैश्विक स्तर पर विभिन्न समस्याएं मौजूद थी- द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव(शीतयुद्ध); संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना तथा विऔपनिवेशीकरण की प्रक्रिया आदि| साथ ही, भारत के समक्ष ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में बहुत सारी चुनौतियाँ विद्यमान थी| ऐसे में, स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को, भारत के आकार तथा संस्कृति के अनुरूप एक स्वतंत्र स्थान तथा आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने की आवश्यकता ने निर्देशित किया| स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक वर्षों में भारत की विदेश नीति को आकार देने में आने वाली चुनौतियां शीत युद्ध के संदर्भ मेंमहाशक्तियों से संबंधों का निर्धारण करने की चुनौतीक्योंकि कोई एक देश से हमारी निकटता दूसरे देश के साथ हमारे संबंधों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता था| पड़ोसी देशों(विशेषकर पाकिस्तान एवं चीन) से संबंधों का निर्धारण; अंतर्राष्ट्रीय संगठनों(जैसे - गैट, संयुक्तराष्ट्र, विश्व बैंक आदि) के परिप्रेक्ष्य में भारत का दृष्टिकोण; विदेश नीति के सिद्धांतों एवं क्रियान्वयन संबंधी आधारभूत ढांचों का निर्माण; सैनिक एवं आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण; भारत की विदेश नीति तथा राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ जारी विश्वव्यापी संघर्ष का एक भाग था| स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष ने कई एशियाई और अफ़्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलनों को प्रेरित किया था| साथ ही, भारत के विशाल आकार, अवस्थिति और शक्ति की संभाव्यता के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने वैश्विक मामलों में, खासकर एशियाई मामलों पर, भारत की महत्वपूर्ण भूमिका की परिकल्पना की| साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोधजैसे -1927 में ब्रुसेल्स सम्मेलन में भारत की भागीदारी; चीन पर जापानी आक्रमण के दौरान जापानी वस्तुओं का बहिष्कार; आज़ादी से पूर्व नई दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आदि| फासीवाद का विरोध; रंगभेद का विरोध; राष्ट्रीय आंदोलन पर दोनों विचारधाराओं(उदारवादी एवं साम्यवादी) के प्रभाव के कारण स्वाभाविक रूप से विदेश नीति प्रभावित; अंतर्राष्ट्रीय विवादों का लोकतांत्रिक तरीके से समाधान,युद्ध का विरोध; विदेश नीति को मार्गदर्शित करने वाले सिद्धांत गुटनिरपेक्षता- दोनों गुटों से दूरी बनाये रखते हुए मुद्दों के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति का पालन; पंचशील का सिद्धांत- आक्रमण नहीं; आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं; अखंडता का सम्मान; समानता पर आधारित संबंध; शांतिपूर्ण सहअस्तित्व; 1954 में सर्वप्रथम चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के स्तर पर इस सिद्धांत को आगे लाया गया| वर्तमान सन्दर्भों में उपयुक्त सन्दर्भ भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व है। इन्हें दक्षिण -दक्षिण सहयोग ,अल्पविकसित देशों को आर्थिक सामाजिक सहायता तथा गुजराल सिद्धांत में भली भांति देखा जा सकता है।
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वायुमंडलीय आर्द्रता को परिभाषित कीजिये। साथ ही, सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को संक्षेप में बताइए। (150-200 शब्द;10 अंक) Define atmospheric humidity. Also, summerize the importance of relative humidity. (150-200 Words;10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वायुमंडलीय आर्द्रता को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात सापेक्षिक आर्द्रता को बताइए | अंत में सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वायुमंडलीय आर्द्रता - किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं | वायु की आर्द्रता का मापन वायु के प्रतिघन सेंटीमीटर आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा के द्वारा किया जाता है | आर्द्रता के मापन के लिए आर्द्रतामापी का उपयोग किया जाता है | आर्द्रता का जलवायु विज्ञान में सर्वाधिक महत्व है, क्योंकि इसी पर वर्षं के विभिन्न रूप एवं वायुमंडलीय विक्षोभ इत्यादि मौसम संबंधी घटनाएं आधारित होती हैं | मात्रात्मक दृष्टि से वायुमंडल की आर्द्रता को निरपेक्ष आर्द्रता, सापेक्षिक आर्द्रता तथा विशिष्ट आर्द्रता के रूप में व्यक्त किया जाता है | वायु की आर्द्रता सामर्थ्य - किसी निश्चित तापमान पर वायु में निश्चित आयतन पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता को वायु की आर्द्रता सामर्थ्य कहते हैं | वायु का आर्द्रता सामर्थ्य उसके तापमान पर निर्भर करता है | वायु का तापमान जितना अधिक होगा उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता उतनी ही अधिक ही अधिक होगी | इस कारण शीतकाल की अपेक्षा ग्रीष्मकाल में तथा रात्री की अपेक्षा दिन के समय वायु की की आर्द्रता सामर्थ्य अधिक होती है | भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर आर्द्रता सामर्थ्य में कमी होती जाती है | सापेक्षिक आर्द्रता - किसी निश्चित वायुदाब और तापमान पर वायु के निश्चित आयतन में उपस्थित जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) एवं उसी वायुदाब और तापमान पर उसी आयतन की वायु की आर्द्रता सामर्थ्य के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं | इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है | सामान्यतः आर्द्रता सामर्थ्य, तापमान के समानुपाती होता है | इस कारण तापमान एवं सापेक्षिक आर्द्रता में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है | सापेक्षिक आर्द्रता में परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है | यदि तापमान सामान रहे और वायु में जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि हो जाए तो इसके सापेक्षिक आर्द्रता भी बढ़ जायेगी | जब वायु के तापमान में वृद्धि होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य में भी वृद्धि हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है | यदि वायु के तापमान में कमी होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य की क्षमता कम हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ने लगती है | सापेक्षिक आर्द्रता का महत्व - जलवायु के निर्धारण में सापेक्षिक आर्द्रता का अत्यधिक महत्व है | सापेक्षिक आर्द्रता का उच्च प्रतिशत रहने पर वर्षा की संभावना रहती है जबकि कम प्रतिशत होने पर मौसम शुष्क होता है | वाष्पीकरण की मात्रा एवं दर पर सापेक्षिक आर्द्रता का भी प्रभाव पड़ता है | सापेक्षिक आर्द्रता के 60 प्रतिशत से अधिक तथा कम -दोनों स्थितियों में स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है | यही कारण है कि अधिक सापेक्षिक आर्द्रता युक्त विषुवतरेखीय प्रदेश तथा न्यून सापेक्षिक आर्द्रता वाले ऊष्ण कटिबंधीय मरूस्थलीय प्रदेश स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल होते हैं | सापेक्षिक आर्द्रता का वस्तुओं के स्थायित्व, विद्युत यंत्रों, रेडियो आदि पर परभाव होता है |
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##Question:वायुमंडलीय आर्द्रता को परिभाषित कीजिये। साथ ही, सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को संक्षेप में बताइए। (150-200 शब्द;10 अंक) Define atmospheric humidity. Also, summerize the importance of relative humidity. (150-200 Words;10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वायुमंडलीय आर्द्रता को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात सापेक्षिक आर्द्रता को बताइए | अंत में सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वायुमंडलीय आर्द्रता - किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं | वायु की आर्द्रता का मापन वायु के प्रतिघन सेंटीमीटर आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा के द्वारा किया जाता है | आर्द्रता के मापन के लिए आर्द्रतामापी का उपयोग किया जाता है | आर्द्रता का जलवायु विज्ञान में सर्वाधिक महत्व है, क्योंकि इसी पर वर्षं के विभिन्न रूप एवं वायुमंडलीय विक्षोभ इत्यादि मौसम संबंधी घटनाएं आधारित होती हैं | मात्रात्मक दृष्टि से वायुमंडल की आर्द्रता को निरपेक्ष आर्द्रता, सापेक्षिक आर्द्रता तथा विशिष्ट आर्द्रता के रूप में व्यक्त किया जाता है | वायु की आर्द्रता सामर्थ्य - किसी निश्चित तापमान पर वायु में निश्चित आयतन पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता को वायु की आर्द्रता सामर्थ्य कहते हैं | वायु का आर्द्रता सामर्थ्य उसके तापमान पर निर्भर करता है | वायु का तापमान जितना अधिक होगा उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता उतनी ही अधिक ही अधिक होगी | इस कारण शीतकाल की अपेक्षा ग्रीष्मकाल में तथा रात्री की अपेक्षा दिन के समय वायु की की आर्द्रता सामर्थ्य अधिक होती है | भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर आर्द्रता सामर्थ्य में कमी होती जाती है | सापेक्षिक आर्द्रता - किसी निश्चित वायुदाब और तापमान पर वायु के निश्चित आयतन में उपस्थित जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) एवं उसी वायुदाब और तापमान पर उसी आयतन की वायु की आर्द्रता सामर्थ्य के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं | इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है | सामान्यतः आर्द्रता सामर्थ्य, तापमान के समानुपाती होता है | इस कारण तापमान एवं सापेक्षिक आर्द्रता में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है | सापेक्षिक आर्द्रता में परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है | यदि तापमान सामान रहे और वायु में जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि हो जाए तो इसके सापेक्षिक आर्द्रता भी बढ़ जायेगी | जब वायु के तापमान में वृद्धि होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य में भी वृद्धि हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है | यदि वायु के तापमान में कमी होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य की क्षमता कम हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ने लगती है | सापेक्षिक आर्द्रता का महत्व - जलवायु के निर्धारण में सापेक्षिक आर्द्रता का अत्यधिक महत्व है | सापेक्षिक आर्द्रता का उच्च प्रतिशत रहने पर वर्षा की संभावना रहती है जबकि कम प्रतिशत होने पर मौसम शुष्क होता है | वाष्पीकरण की मात्रा एवं दर पर सापेक्षिक आर्द्रता का भी प्रभाव पड़ता है | सापेक्षिक आर्द्रता के 60 प्रतिशत से अधिक तथा कम -दोनों स्थितियों में स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है | यही कारण है कि अधिक सापेक्षिक आर्द्रता युक्त विषुवतरेखीय प्रदेश तथा न्यून सापेक्षिक आर्द्रता वाले ऊष्ण कटिबंधीय मरूस्थलीय प्रदेश स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल होते हैं | सापेक्षिक आर्द्रता का वस्तुओं के स्थायित्व, विद्युत यंत्रों, रेडियो आदि पर परभाव होता है |
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वायुमंडलीय आर्द्रता को परिभाषित कीजिए। साथ ही सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द; 10 अंक) Define atmospheric humidity. Also summerize the importance of relative humidity. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वायुमंडलीय आर्द्रता को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात सापेक्षिक आर्द्रता को बताइए | अंत में सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वायुमंडलीय आर्द्रता - किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं | वायु की आर्द्रता का मापन वायु के प्रतिघन सेंटीमीटर आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा के द्वारा किया जाता है | आर्द्रता के मापन के लिए आर्द्रतामापी का उपयोग किया जाता है | आर्द्रता का जलवायु विज्ञान में सर्वाधिक महत्व है, क्योंकि इसी पर वर्षं के विभिन्न रूप एवं वायुमंडलीय विक्षोभ इत्यादि मौसम संबंधी घटनाएं आधारित होती हैं | मात्रात्मक दृष्टि से वायुमंडल की आर्द्रता को निरपेक्ष आर्द्रता, सापेक्षिक आर्द्रता तथा विशिष्ट आर्द्रता के रूप में व्यक्त किया जाता है | वायु की आर्द्रता सामर्थ्य - किसी निश्चित तापमान पर वायु में निश्चित आयतन पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता को वायु की आर्द्रता सामर्थ्य कहते हैं | वायु का आर्द्रता सामर्थ्य उसके तापमान पर निर्भर करता है | वायु का तापमान जितना अधिक होगा उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता उतनी ही अधिक ही अधिक होगी | इस कारण शीतकाल की अपेक्षा ग्रीष्मकाल में तथा रात्री की अपेक्षा दिन के समय वायु की की आर्द्रता सामर्थ्य अधिक होती है | भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर आर्द्रता सामर्थ्य में कमी होती जाती है | सापेक्षिक आर्द्रता - किसी निश्चित वायुदाब और तापमान पर वायु के निश्चित आयतन में उपस्थित जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) एवं उसी वायुदाब और तापमान पर उसी आयतन की वायु की आर्द्रता सामर्थ्य के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं | इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है | सामान्यतः आर्द्रता सामर्थ्य, तापमान के समानुपाती होता है | इस कारण तापमान एवं सापेक्षिक आर्द्रता में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है | सापेक्षिक आर्द्रता में परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है | यदि तापमान सामान रहे और वायु में जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि हो जाए तो इसके सापेक्षिक आर्द्रता भी बढ़ जायेगी | जब वायु के तापमान में वृद्धि होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य में भी वृद्धि हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है | यदि वायु के तापमान में कमी होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य की क्षमता कम हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ने लगती है | सापेक्षिक आर्द्रता का महत्व - जलवायु के निर्धारण में सापेक्षिक आर्द्रता का अत्यधिक महत्व है | सापेक्षिक आर्द्रता का उच्च प्रतिशत रहने पर वर्षा की संभावना रहती है जबकि कम प्रतिशत होने पर मौसम शुष्क होता है | वाष्पीकरण की मात्रा एवं दर पर सापेक्षिक आर्द्रता का भी प्रभाव पड़ता है | सापेक्षिक आर्द्रता के 60 प्रतिशत से अधिक तथा कम -दोनों स्थितियों में स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है | यही कारण है कि अधिक सापेक्षिक आर्द्रता युक्त विषुवतरेखीय प्रदेश तथा न्यून सापेक्षिक आर्द्रता वाले ऊष्ण कटिबंधीय मरूस्थलीय प्रदेश स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल होते हैं | सापेक्षिक आर्द्रता का वस्तुओं के स्थायित्व, विद्युत यंत्रों, रेडियो आदि पर परभाव होता है |
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##Question:वायुमंडलीय आर्द्रता को परिभाषित कीजिए। साथ ही सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द; 10 अंक) Define atmospheric humidity. Also summerize the importance of relative humidity. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत वायुमंडलीय आर्द्रता को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात सापेक्षिक आर्द्रता को बताइए | अंत में सापेक्षिक आर्द्रता के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - वायुमंडलीय आर्द्रता - किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं | वायु की आर्द्रता का मापन वायु के प्रतिघन सेंटीमीटर आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा के द्वारा किया जाता है | आर्द्रता के मापन के लिए आर्द्रतामापी का उपयोग किया जाता है | आर्द्रता का जलवायु विज्ञान में सर्वाधिक महत्व है, क्योंकि इसी पर वर्षं के विभिन्न रूप एवं वायुमंडलीय विक्षोभ इत्यादि मौसम संबंधी घटनाएं आधारित होती हैं | मात्रात्मक दृष्टि से वायुमंडल की आर्द्रता को निरपेक्ष आर्द्रता, सापेक्षिक आर्द्रता तथा विशिष्ट आर्द्रता के रूप में व्यक्त किया जाता है | वायु की आर्द्रता सामर्थ्य - किसी निश्चित तापमान पर वायु में निश्चित आयतन पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता को वायु की आर्द्रता सामर्थ्य कहते हैं | वायु का आर्द्रता सामर्थ्य उसके तापमान पर निर्भर करता है | वायु का तापमान जितना अधिक होगा उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता उतनी ही अधिक ही अधिक होगी | इस कारण शीतकाल की अपेक्षा ग्रीष्मकाल में तथा रात्री की अपेक्षा दिन के समय वायु की की आर्द्रता सामर्थ्य अधिक होती है | भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर आर्द्रता सामर्थ्य में कमी होती जाती है | सापेक्षिक आर्द्रता - किसी निश्चित वायुदाब और तापमान पर वायु के निश्चित आयतन में उपस्थित जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) एवं उसी वायुदाब और तापमान पर उसी आयतन की वायु की आर्द्रता सामर्थ्य के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं | इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है | सामान्यतः आर्द्रता सामर्थ्य, तापमान के समानुपाती होता है | इस कारण तापमान एवं सापेक्षिक आर्द्रता में व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है | सापेक्षिक आर्द्रता में परिवर्तन तीन प्रकार से हो सकता है | यदि तापमान सामान रहे और वायु में जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि हो जाए तो इसके सापेक्षिक आर्द्रता भी बढ़ जायेगी | जब वायु के तापमान में वृद्धि होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य में भी वृद्धि हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है | यदि वायु के तापमान में कमी होती है तो इसके आर्द्रता सामर्थ्य की क्षमता कम हो जाती है और सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ने लगती है | सापेक्षिक आर्द्रता का महत्व - जलवायु के निर्धारण में सापेक्षिक आर्द्रता का अत्यधिक महत्व है | सापेक्षिक आर्द्रता का उच्च प्रतिशत रहने पर वर्षा की संभावना रहती है जबकि कम प्रतिशत होने पर मौसम शुष्क होता है | वाष्पीकरण की मात्रा एवं दर पर सापेक्षिक आर्द्रता का भी प्रभाव पड़ता है | सापेक्षिक आर्द्रता के 60 प्रतिशत से अधिक तथा कम -दोनों स्थितियों में स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है | यही कारण है कि अधिक सापेक्षिक आर्द्रता युक्त विषुवतरेखीय प्रदेश तथा न्यून सापेक्षिक आर्द्रता वाले ऊष्ण कटिबंधीय मरूस्थलीय प्रदेश स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल होते हैं | सापेक्षिक आर्द्रता का वस्तुओं के स्थायित्व, विद्युत यंत्रों, रेडियो आदि पर परभाव होता है |
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भूकम्पीय तरंगों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। ये तरंगें पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में किस प्रकार सहायता करती हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention characteristics of seismic waves. How they help in understanding interior structure of the earth. (150-200 words; 10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूकंपीय तरंगों के बारे में लिखते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन तरंगों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिए कि इन तरंगों से पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में किस प्रकार जानकारी मिलती है। उत्तर - पृथ्वी के आंतरिक भाग में संचल के कारण भूकंप की उत्पत्ति होती है। इसके कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं। जिसे P, S व L तरंगों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। भूकंपीय तरंगों की विशेषताएँ: P तरंगें: इसे प्राथमिक अथवा अनुदैर्ध्य तरंग कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के समांतर होता है। ये सबसे तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं। ये तरंगें ठोस, द्रव और गैस तीनों प्रकार के प्रदार्थ से संचलित हो सकती हैं। S तरंगें: इन्हें अनुप्रस्थ तरंगें कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के लम्बवत होता है। इनकी गति प्राथमिक तरंगों की अपेक्षा कम होती है। ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही संचालित हो पाती हैं। धरातलीय तरंगें: इनकी गति तीनों तरंगों में सबसे कम होती है। ये पृथ्वी के धरातलीय भाग में ही संचालित होती हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में जानकारी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों स्रोतों से प्राप्त होती है। प्रत्यक्ष स्रोत के अंतर्गत ज्वालामुखी उद्गार, खनन आदि सम्मिलित हैं जबकि अप्रत्यक्ष स्रोत में तापमान, उल्कापिंड, भूकंपीय तरंगें आते हैं।भूकंपीय तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है कम घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग कम होता है।इन तरंगों के व्यवहार के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के आंतरिक भागों में अलग-अलग घनत्व की एक बहुस्तरीय संरचना पायी जाती है। भूकंपीय तरंगों की मदद से परतों की सटीक अवस्थिति, उनकी गहराई, मोटाई और अन्य भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इसके साथ ही तरंगों द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र के माध्यम से आंतरिक संरचना को समझना आसान हो गया है। पृथ्वी के भूपटल पर स्थित वह स्थान जहां कोई तरंग नहीं पहुँचती भूकंपीय छाया क्षेत्र कहलाता है। यदि पृथ्वी सम्पूर्ण रूप से समजातीय होती या एक जैसे पदार्थों से मिलकर बनी होती तो भूकंपीय तरंगें सीधी रेखा में एक समान गति से गमन करतीं। लेकिन वास्तव में अंतरतम की ओर जाने पर इन तरंगों का परावर्तन और अपवर्तन भी दृष्टिगोचर होता है। इसी कारण से छाया क्षेत्र का निर्माण होता है। S तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 103 डिग्री कोणीय दूरी के बाद नहीं होता है। इससे पता चलता है कि पृथ्वी का वाह्य कोर तरल या अर्द्ध तरल अवस्था में है। P तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 143 डिग्री और 103 डिग्री की कोणीय दूरी के बीच नहीं किया जाता है, जो यह इंगित करता है कि पृथ्वी के कोर की भौतिक अवस्था घनत्व और संरचना भिन्न है। S तरंगों का छाया क्षेत्र P तरंगों की तुलना में अधिक होता है।
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##Question:भूकम्पीय तरंगों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। ये तरंगें पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में किस प्रकार सहायता करती हैं? (150-200 शब्द; 10 अंक) Mention characteristics of seismic waves. How they help in understanding interior structure of the earth. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूकंपीय तरंगों के बारे में लिखते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इन तरंगों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। इसके बाद स्पष्ट कीजिए कि इन तरंगों से पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में किस प्रकार जानकारी मिलती है। उत्तर - पृथ्वी के आंतरिक भाग में संचल के कारण भूकंप की उत्पत्ति होती है। इसके कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं। जिसे P, S व L तरंगों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। भूकंपीय तरंगों की विशेषताएँ: P तरंगें: इसे प्राथमिक अथवा अनुदैर्ध्य तरंग कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के समांतर होता है। ये सबसे तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं। ये तरंगें ठोस, द्रव और गैस तीनों प्रकार के प्रदार्थ से संचलित हो सकती हैं। S तरंगें: इन्हें अनुप्रस्थ तरंगें कहा जाता है। इसके प्रभाव में कणों का कंपन तरंग की गति की दिशा के लम्बवत होता है। इनकी गति प्राथमिक तरंगों की अपेक्षा कम होती है। ये तरंगें केवल ठोस माध्यम से ही संचालित हो पाती हैं। धरातलीय तरंगें: इनकी गति तीनों तरंगों में सबसे कम होती है। ये पृथ्वी के धरातलीय भाग में ही संचालित होती हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में जानकारी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों स्रोतों से प्राप्त होती है। प्रत्यक्ष स्रोत के अंतर्गत ज्वालामुखी उद्गार, खनन आदि सम्मिलित हैं जबकि अप्रत्यक्ष स्रोत में तापमान, उल्कापिंड, भूकंपीय तरंगें आते हैं।भूकंपीय तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है कम घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग कम होता है।इन तरंगों के व्यवहार के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के आंतरिक भागों में अलग-अलग घनत्व की एक बहुस्तरीय संरचना पायी जाती है। भूकंपीय तरंगों की मदद से परतों की सटीक अवस्थिति, उनकी गहराई, मोटाई और अन्य भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इसके साथ ही तरंगों द्वारा निर्मित छाया क्षेत्र के माध्यम से आंतरिक संरचना को समझना आसान हो गया है। पृथ्वी के भूपटल पर स्थित वह स्थान जहां कोई तरंग नहीं पहुँचती भूकंपीय छाया क्षेत्र कहलाता है। यदि पृथ्वी सम्पूर्ण रूप से समजातीय होती या एक जैसे पदार्थों से मिलकर बनी होती तो भूकंपीय तरंगें सीधी रेखा में एक समान गति से गमन करतीं। लेकिन वास्तव में अंतरतम की ओर जाने पर इन तरंगों का परावर्तन और अपवर्तन भी दृष्टिगोचर होता है। इसी कारण से छाया क्षेत्र का निर्माण होता है। S तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 103 डिग्री कोणीय दूरी के बाद नहीं होता है। इससे पता चलता है कि पृथ्वी का वाह्य कोर तरल या अर्द्ध तरल अवस्था में है। P तरंगों का अंकन पृथ्वी के केंद्र से 143 डिग्री और 103 डिग्री की कोणीय दूरी के बीच नहीं किया जाता है, जो यह इंगित करता है कि पृथ्वी के कोर की भौतिक अवस्था घनत्व और संरचना भिन्न है। S तरंगों का छाया क्षेत्र P तरंगों की तुलना में अधिक होता है।
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It was the British rule and its direct and indirect consequences which helped in the development of nationalist movement in India. Elucidate(200 words)
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Approach 1. Introduce the answer by briefly mentioning the British conquest of the Indian sub-continent. 2. Then highlight the direct Consequenceswhich helped in the development of the nationalist movement in India. 3. Followed by dwelling into indirect Consequences. 4. Conclude accordingly. Answer Since India was a colony its interests were subservient to those of the British. Hence, British policies were aimed at subjugating India. However, these policies also led to a churning among Indians that was not seen before. The growth of nationalism was a consequence of British rule. Direct Consequences 1. The agrarian policies led to the government taking away large part of peasant’s produce as land revenue, while artisan or handicraftsman saw that the foreign regime had helped foreign competition ruin him and had done nothing to rehabilitate him. 2. Curb on basic freedoms and the use of repressive laws led to resentment and hate against foreign rule. 3. The racial treatment meted out to Indians including the rulers and intelligentsia and discrimination against Indians led to the rise of nationalist feelings. 4. British officials and writers declared Indians unfit for democracy or self-government. This led to demands for administrative and legislative reforms. Indirect Consequences 1. The spread of education and modern thoughts led to the rise of intelligentsia which used its newly acquired modern knowledge to understand the sad economic and political condition of the country. They found that British policies in India, guided by British capitalists at home, were keeping the country economically backward. 2. Indian capitalist class was slow in developing national political consciousness. But its growth was severely checked by the trade, tariff, taxation, and transport policies of the government. 3. Workers in modern factories, mines, and plantations found that the government sided with the foreign capitalists and government machinery was freely used against them. 4. The spread of western thoughts like rational, secular, democratic outlook appalled and aroused every thinking and self-respecting Indian. People started emulating the contemporary nationalist movements across the world like the American and French revolution, the defeat of Russia by Ethiopia, the rise of Japan. 5. Uniform and modern systems of government, railways, telegraph and a unified postal system unified India administratively. All this had brought the different parts of the country together and promoted mutual contact among the people, especially among the leaders. Conclusion As a result of these factors, people all over the country realized that they were suffering at the hands of a common enemy. These feelings united people from different classes and sections of society, who sank their mutual differences to unite.
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##Question:It was the British rule and its direct and indirect consequences which helped in the development of nationalist movement in India. Elucidate(200 words)##Answer:Approach 1. Introduce the answer by briefly mentioning the British conquest of the Indian sub-continent. 2. Then highlight the direct Consequenceswhich helped in the development of the nationalist movement in India. 3. Followed by dwelling into indirect Consequences. 4. Conclude accordingly. Answer Since India was a colony its interests were subservient to those of the British. Hence, British policies were aimed at subjugating India. However, these policies also led to a churning among Indians that was not seen before. The growth of nationalism was a consequence of British rule. Direct Consequences 1. The agrarian policies led to the government taking away large part of peasant’s produce as land revenue, while artisan or handicraftsman saw that the foreign regime had helped foreign competition ruin him and had done nothing to rehabilitate him. 2. Curb on basic freedoms and the use of repressive laws led to resentment and hate against foreign rule. 3. The racial treatment meted out to Indians including the rulers and intelligentsia and discrimination against Indians led to the rise of nationalist feelings. 4. British officials and writers declared Indians unfit for democracy or self-government. This led to demands for administrative and legislative reforms. Indirect Consequences 1. The spread of education and modern thoughts led to the rise of intelligentsia which used its newly acquired modern knowledge to understand the sad economic and political condition of the country. They found that British policies in India, guided by British capitalists at home, were keeping the country economically backward. 2. Indian capitalist class was slow in developing national political consciousness. But its growth was severely checked by the trade, tariff, taxation, and transport policies of the government. 3. Workers in modern factories, mines, and plantations found that the government sided with the foreign capitalists and government machinery was freely used against them. 4. The spread of western thoughts like rational, secular, democratic outlook appalled and aroused every thinking and self-respecting Indian. People started emulating the contemporary nationalist movements across the world like the American and French revolution, the defeat of Russia by Ethiopia, the rise of Japan. 5. Uniform and modern systems of government, railways, telegraph and a unified postal system unified India administratively. All this had brought the different parts of the country together and promoted mutual contact among the people, especially among the leaders. Conclusion As a result of these factors, people all over the country realized that they were suffering at the hands of a common enemy. These feelings united people from different classes and sections of society, who sank their mutual differences to unite.
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हम ब्रिटिश भारत की दी गयी प्रशासनिक व्यवस्था को ढो रहे हैं , समय है कि उसको परिवर्तित किया जाए । टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द ) We are carrying out the given administrative system of British India, it is time to change it. Please comment (150-200 words)
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दृष्टिकोण : भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में ब्रिटिश तत्वों की चर्चा करते हुए इससे संबंधित समस्याओं को दर्शाइए । इसमें सुधार के कुछ उपाय सुझाते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : आधुनिक भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल के दौरान हुई । विभिन्न चार्टर अधिनियम व भारत शासन अधिनियम के माध्यम से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का आधार निर्मित हुआ । 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट , 1784 का पीट्स इंडिया एक्ट ,1813, 1833 तथा 1853 का चार्टर अधिनियम आदि के माध्यम से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की दिशा निर्धारित हुई । भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव 1860 में मैकाले द्वारा निर्मित भारतीय दंड संहिता के द्वारा हुआ , यह वर्तमान में भी भारत विधि व्यवस्था का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है ।इसी प्रकार भारतीय
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##Question:हम ब्रिटिश भारत की दी गयी प्रशासनिक व्यवस्था को ढो रहे हैं , समय है कि उसको परिवर्तित किया जाए । टिप्पणी कीजिये । ( 150-200 शब्द ) We are carrying out the given administrative system of British India, it is time to change it. Please comment (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में ब्रिटिश तत्वों की चर्चा करते हुए इससे संबंधित समस्याओं को दर्शाइए । इसमें सुधार के कुछ उपाय सुझाते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : आधुनिक भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल के दौरान हुई । विभिन्न चार्टर अधिनियम व भारत शासन अधिनियम के माध्यम से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का आधार निर्मित हुआ । 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट , 1784 का पीट्स इंडिया एक्ट ,1813, 1833 तथा 1853 का चार्टर अधिनियम आदि के माध्यम से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की दिशा निर्धारित हुई । भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव 1860 में मैकाले द्वारा निर्मित भारतीय दंड संहिता के द्वारा हुआ , यह वर्तमान में भी भारत विधि व्यवस्था का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है ।इसी प्रकार भारतीय
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What do you understand by food security? What are the problems associated with food security? Briefly discuss the government’s different initiatives for providing food security. (250words/15marks)
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Approach : Define food security in an introductory part. HIghlight problems associated with food security. Discuss the government’s different initiatives for providing food security. Answer : "Food security is a situation that exists when all people, at all times, have physical, social and economic access to sufficient, safe and nutritious food that meets their dietary needs and food preferences for an active and healthy life”. Problems (1) There has been a gradual shift from cultivation of food crops to cultivation of fruits, vegetables, oilseeds, and crops which act also as industrial raw materials. This had led to the reduction in net sown area under cereals, millets and pulses. (2) The use of more and more land for construction of factories, warehouses and shelters has reduced the land under cultivation and now fertile land for farming is no longer available. (3) The productivity of land has started showing a declining trend. Fertilizers, pesticides and insecticides, which once showed dramatic results, are now being held responsible for reducing the fertility of the soil. (4) Corruption lies at different stages (5) Wastage for food grains while transportation and storage (6) Lack of empathy among lower bureaucracy for food security schemes to implement Them in true letter spirit 7. Inadequate sanitation conditions ensure that children suffer from gastrointestinal problems that prevent them from absorbing nutrition from the food they eat. 8. Lack of knowledge about nutrition is an important impediment towards ensuring nutrition among children. Even Rich families have been found out to be having malnourished children. Government’s initiatives for providing food security • Government of India set up a special agency — Food Corporation of India (FCI). The agency is responsible for the execution of food policies of the Central Government. FCI purchases food grains on pre-determined rates (fixed by the government in advance). This price is known as Minimum Support Price. • The system through which FCI makes the food grains available to the poor society is known as the Public Distribution System (PDS). The ration shops in most localities, villages, towns, and cities serve as channels and facilitate this distribution system. • Food intervention programmes since the 1970s. The programmes are as follows − o Public Distribution System (PDS) for food grains (though it was already existing, the execution of responsibilities was strengthened further). o Integrated Child Development Services (ICDS). • Food-for-Work (FFW). • National Food Security Act (NFSA), 2013 It is passed with an objective to provide for food and nutritional security in human life cycle approach, by ensuring access to adequate quantity of quality food at affordable prices to people to live a life with dignity. The Act provides for coverage of up to 75% of the rural population and up to 50% of the urban population for receiving subsidized foodgrains under Targeted Public Distribution System (TPDS), thus covering about two-thirds of the population. The eligible persons will be entitled to receive 5 Kgs of foodgrains per person per month at subsidised prices of Rs. 3/2/1 per Kg for rice/wheat/coarse grains. The existing Antyodaya Anna Yojana (AAY) households, which constitute the poorest of the poor, will continue to receive 35 Kgs of foodgrains per household per month. Despite having surplus food production, India has one-third of hungry people who are lacking food security. The problem lies in affordability and accessibility due to poor implementation of the abovementioned initiatives due to corruption, inadequate coverage, ghost beneficiaries, leakages etc. These can be overcome by overhauling the delivery system with help of Aadhar, Jan Dhan and Mobile application and providing employment opportunity to people with help of schemes such National livelihood mission and MNREGA etc. Following model examples like that of Chhattisgarh PDS is advisable".
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##Question:What do you understand by food security? What are the problems associated with food security? Briefly discuss the government’s different initiatives for providing food security. (250words/15marks)##Answer:Approach : Define food security in an introductory part. HIghlight problems associated with food security. Discuss the government’s different initiatives for providing food security. Answer : "Food security is a situation that exists when all people, at all times, have physical, social and economic access to sufficient, safe and nutritious food that meets their dietary needs and food preferences for an active and healthy life”. Problems (1) There has been a gradual shift from cultivation of food crops to cultivation of fruits, vegetables, oilseeds, and crops which act also as industrial raw materials. This had led to the reduction in net sown area under cereals, millets and pulses. (2) The use of more and more land for construction of factories, warehouses and shelters has reduced the land under cultivation and now fertile land for farming is no longer available. (3) The productivity of land has started showing a declining trend. Fertilizers, pesticides and insecticides, which once showed dramatic results, are now being held responsible for reducing the fertility of the soil. (4) Corruption lies at different stages (5) Wastage for food grains while transportation and storage (6) Lack of empathy among lower bureaucracy for food security schemes to implement Them in true letter spirit 7. Inadequate sanitation conditions ensure that children suffer from gastrointestinal problems that prevent them from absorbing nutrition from the food they eat. 8. Lack of knowledge about nutrition is an important impediment towards ensuring nutrition among children. Even Rich families have been found out to be having malnourished children. Government’s initiatives for providing food security • Government of India set up a special agency — Food Corporation of India (FCI). The agency is responsible for the execution of food policies of the Central Government. FCI purchases food grains on pre-determined rates (fixed by the government in advance). This price is known as Minimum Support Price. • The system through which FCI makes the food grains available to the poor society is known as the Public Distribution System (PDS). The ration shops in most localities, villages, towns, and cities serve as channels and facilitate this distribution system. • Food intervention programmes since the 1970s. The programmes are as follows − o Public Distribution System (PDS) for food grains (though it was already existing, the execution of responsibilities was strengthened further). o Integrated Child Development Services (ICDS). • Food-for-Work (FFW). • National Food Security Act (NFSA), 2013 It is passed with an objective to provide for food and nutritional security in human life cycle approach, by ensuring access to adequate quantity of quality food at affordable prices to people to live a life with dignity. The Act provides for coverage of up to 75% of the rural population and up to 50% of the urban population for receiving subsidized foodgrains under Targeted Public Distribution System (TPDS), thus covering about two-thirds of the population. The eligible persons will be entitled to receive 5 Kgs of foodgrains per person per month at subsidised prices of Rs. 3/2/1 per Kg for rice/wheat/coarse grains. The existing Antyodaya Anna Yojana (AAY) households, which constitute the poorest of the poor, will continue to receive 35 Kgs of foodgrains per household per month. Despite having surplus food production, India has one-third of hungry people who are lacking food security. The problem lies in affordability and accessibility due to poor implementation of the abovementioned initiatives due to corruption, inadequate coverage, ghost beneficiaries, leakages etc. These can be overcome by overhauling the delivery system with help of Aadhar, Jan Dhan and Mobile application and providing employment opportunity to people with help of schemes such National livelihood mission and MNREGA etc. Following model examples like that of Chhattisgarh PDS is advisable".
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अखिल भारतीय सेवाओं की प्रमुख समस्याओं की चर्चा करते हुए कुछ सुधार के उपाय सुझाएँ । ( 150-200 शब्द ) Suggest some reform measures by referring to the major problems of All India Services. (150-200 words)
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दृष्टिकोण : अखिल भारतीय सेवाओं की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । आखिल भारतीय सेवाओं की प्रमुख समस्याओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इन समस्याओं को दूर करने हेतु सुधार के कुछ उपाय सुझाइए । उत्तर : अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 1951 के द्वारा स्वतंत्र भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा व भारतीय पुलिस सेवा नामक दो अखिल भारतीय सेवाओं ( AIS ) की शुरुआत की गयी । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन संबंधी प्रावधान है । वर्ष 1961 में भारतीय वन सेवा नामक तीसरे अखिल भारतीय सेवा का सृजन किया गया । इस प्रकार वर्तमान में तीन अखिल भारतीय सेवाएं हैं । अखिल भारतीय सेवाओं को भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ की संज्ञा दी जाती है । राष्ट्र की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्र भारत में प्रशासन के सुचारु संचालन में निश्चित रूप से अखिल भारतीय सेवाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथापि यह निम्नलिखित समस्याओंसे ग्रस्त है : जवाबदेही का अभाव । भ्रष्टाचार । विशेषज्ञता का अभाव । पदोन्नति से संबंधित मुद्दे । संवैधानिक संरक्षण ( अनुच्छेद 311 ) बेहतर प्रशिक्षण का अभाव । इन समस्याओं में सुधार के लिए निम्न कदमों को उठाया जाना प्रासंगिक हो सकता है : लेटरल इंट्री के प्रावधान के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एंट्री । अनुच्छेद 311 को हटाना । प्रशिक्षण को सामयिक जरूरतों के अनुरूप बनाना । पदोन्नति हेतु 360* अप्रोच को अपनाना व प्रदर्शन आधारित पदोन्नति की व्यवस्था । कार्यकाल की सुनिश्चितता । प्रदर्शन आधारित पदोन्नति । हाल ही में सरकार द्वारा इनमें से कुछ कदमों को अपनाने हेतु प्रयास शुरू किए गए हैं , जो सरहनीय कदम है ।
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##Question:अखिल भारतीय सेवाओं की प्रमुख समस्याओं की चर्चा करते हुए कुछ सुधार के उपाय सुझाएँ । ( 150-200 शब्द ) Suggest some reform measures by referring to the major problems of All India Services. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : अखिल भारतीय सेवाओं की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । आखिल भारतीय सेवाओं की प्रमुख समस्याओं की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इन समस्याओं को दूर करने हेतु सुधार के कुछ उपाय सुझाइए । उत्तर : अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 1951 के द्वारा स्वतंत्र भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा व भारतीय पुलिस सेवा नामक दो अखिल भारतीय सेवाओं ( AIS ) की शुरुआत की गयी । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन संबंधी प्रावधान है । वर्ष 1961 में भारतीय वन सेवा नामक तीसरे अखिल भारतीय सेवा का सृजन किया गया । इस प्रकार वर्तमान में तीन अखिल भारतीय सेवाएं हैं । अखिल भारतीय सेवाओं को भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ की संज्ञा दी जाती है । राष्ट्र की एकता व अखंडता तथा स्वतंत्र भारत में प्रशासन के सुचारु संचालन में निश्चित रूप से अखिल भारतीय सेवाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथापि यह निम्नलिखित समस्याओंसे ग्रस्त है : जवाबदेही का अभाव । भ्रष्टाचार । विशेषज्ञता का अभाव । पदोन्नति से संबंधित मुद्दे । संवैधानिक संरक्षण ( अनुच्छेद 311 ) बेहतर प्रशिक्षण का अभाव । इन समस्याओं में सुधार के लिए निम्न कदमों को उठाया जाना प्रासंगिक हो सकता है : लेटरल इंट्री के प्रावधान के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एंट्री । अनुच्छेद 311 को हटाना । प्रशिक्षण को सामयिक जरूरतों के अनुरूप बनाना । पदोन्नति हेतु 360* अप्रोच को अपनाना व प्रदर्शन आधारित पदोन्नति की व्यवस्था । कार्यकाल की सुनिश्चितता । प्रदर्शन आधारित पदोन्नति । हाल ही में सरकार द्वारा इनमें से कुछ कदमों को अपनाने हेतु प्रयास शुरू किए गए हैं , जो सरहनीय कदम है ।
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स्पष्ट कीजिये कि किसी भी स्थलाकृति का भौतिक रूप अन्तर्जात और बहिर्जात बलों का परिणाम होता है। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Explain that the physical form of any topography is the result of endogenous and exogenous forces. (150-200 words, अंक-10 )
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भू-आकृतिक प्रक्रम को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद कथन को स्पष्ट करने के लिए अन्तर्जात और बहिर्जात बलों द्वारा निर्मित विभिन्न स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए। धरातलीय पदार्थों पर अन्तर्जात एवं बहिर्जात बलों द्वारा भौतिक तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भू-पटल के विन्यास में हुए परिवर्तनों को भू-आकृतिक कहते हैं। इन बलों के कारण पृथ्वी के स्थलाकृति का भौतिक रूप निर्धारित होता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं। अन्तर्जात बल भ-पटल पर असमानताओं को सृजित करते हैं जबकि बहिर्जात बल समतल स्थापक बल होते हैं। बहिर्जात तत्व जैसे वायु, जल, हिम धरातलीय पदार्थों के अपरदन आता परिवहन करने में सक्षम हैं। आकस्मिक बल जैसे ज्वालामुखी और भूकंप वाह्य स्थल रूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अन्तर्जात बलों के अंतर्गत महाद्वीप निर्माणकारी बल स्थल और समुद्री भाग के निर्माण में सहायक होता है। मोड़दार पर्वत का निर्माण संपीडनात्मक बल के कारण होता है। तनाव बल के कारण भ्रंश, दरार तथा चटकनें पड़ जाती हैं। हिमालय, एंडीज़ वलित पर्वतों का निर्माण इसी प्रकार हुआ है। अपरदन के कारण पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक हस्तांतरण होता है। इससे पर्पटी से पदार्थ टूटकर अन्य स्थानों पर जाते हैं। इन बलों के कारण निम्नलिखित प्रमुख स्थलाकृतियों का निर्माण होता है: भ्रंश घाटी, रैम्प घाटी ब्लॉक पर्वत, हॉर्स्ट पर्वत U व V आकार की घाटी नदी विसर्प, गुंफित नदी स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट हिमोढ़ , एस्कर
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##Question:स्पष्ट कीजिये कि किसी भी स्थलाकृति का भौतिक रूप अन्तर्जात और बहिर्जात बलों का परिणाम होता है। (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Explain that the physical form of any topography is the result of endogenous and exogenous forces. (150-200 words, अंक-10 )##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भू-आकृतिक प्रक्रम को स्पष्ट कीजिए। इसके बाद कथन को स्पष्ट करने के लिए अन्तर्जात और बहिर्जात बलों द्वारा निर्मित विभिन्न स्थलाकृतियों का वर्णन कीजिए। धरातलीय पदार्थों पर अन्तर्जात एवं बहिर्जात बलों द्वारा भौतिक तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भू-पटल के विन्यास में हुए परिवर्तनों को भू-आकृतिक कहते हैं। इन बलों के कारण पृथ्वी के स्थलाकृति का भौतिक रूप निर्धारित होता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं। अन्तर्जात बल भ-पटल पर असमानताओं को सृजित करते हैं जबकि बहिर्जात बल समतल स्थापक बल होते हैं। बहिर्जात तत्व जैसे वायु, जल, हिम धरातलीय पदार्थों के अपरदन आता परिवहन करने में सक्षम हैं। आकस्मिक बल जैसे ज्वालामुखी और भूकंप वाह्य स्थल रूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अन्तर्जात बलों के अंतर्गत महाद्वीप निर्माणकारी बल स्थल और समुद्री भाग के निर्माण में सहायक होता है। मोड़दार पर्वत का निर्माण संपीडनात्मक बल के कारण होता है। तनाव बल के कारण भ्रंश, दरार तथा चटकनें पड़ जाती हैं। हिमालय, एंडीज़ वलित पर्वतों का निर्माण इसी प्रकार हुआ है। अपरदन के कारण पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक हस्तांतरण होता है। इससे पर्पटी से पदार्थ टूटकर अन्य स्थानों पर जाते हैं। इन बलों के कारण निम्नलिखित प्रमुख स्थलाकृतियों का निर्माण होता है: भ्रंश घाटी, रैम्प घाटी ब्लॉक पर्वत, हॉर्स्ट पर्वत U व V आकार की घाटी नदी विसर्प, गुंफित नदी स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट हिमोढ़ , एस्कर
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भारतीयसंविधान के अनुच्छेद 22 के संदर्भ में, निवारक तथा निरोध क़ानूनों के पक्ष में तर्कों का उल्लेख कीजिये?निवारक-निरोध के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्राप्त अधिकार असीमित नहीं हैं क्योंकि इस संदर्भ में सुरक्षात्मक उपाय भी किए गए हैं| स्पष्ट कीजिये| ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) With reference to Article 22 of the Indian Constitution, Present arguments in favor ofprevention and detention laws?The powers obtained by law enforcement agencies underthese laws are not unlimited as protective measures have also been taken in this context.(150-200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण : निवारण-निरोध क़ानूनों का संक्षिप्त परिचय देते संक्षिप्त भूमिका लिखिए । भारतीय संविधान के उन अनुच्छेदों की चर्चा कीजिये जो निवारण-निरोध का आधार प्रदान करता है । भारतीय संविधान में इसे शामिल किए जाने के तर्काधारों की चर्चा कीजिये । निवारण-निरोध के दुरुपयोग को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : निवारण-निरोध को ऐसे क़ानूनों के रूप में जाना जाता है जिसके तहत अपराध पूर्व ही अपराध की रोकथाम के लिए संभावित अपराधी को हिरासत में लिया जाता है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 का दूसरा भाग निवारण-निरोध के लिए आधार प्रदान करता है । भारत विश्व का शायद इकलौता लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसके संविधान के अंतरिम भाग में निवारण-निरोध संबंधी कानून की पूरी व्यवस्थाएं हो तथापि यदि हम भारतीय संविधान निर्माण के समय की परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो हम इसका तर्काधार समझ सकते हैं । निवारण-निरोध के पक्ष में हम निम्न तर्कों को देख सकते हैं - भारत को आजादी के साथ विभाजन का भी दंश झेलना पड़ा था इसलिए राष्ट्र की एकता-अखंडता को दुष्प्रभावित करने वाले कारकों को नियंत्रित करने के लिए संविधान में कुछ निवारक प्रावधान की व्यवस्था की गयी । भारत में आतंकवाद , अलगाववाद, व नक्सलवाद की समस्या भी इस प्रकार के निवारण-निरोध कानून के लिए आधार प्रदान करता है । दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति व चीन-पाकिस्तान धुरी भी भारत के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न करता है और राष्ट्र की एकता व अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए कुछ कठोर प्रावधानों की आवश्यकता रही है । साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निवारण-निरोध के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्राप्त अधिकार असीमित नहीं हैं इसके संबंध में निम्न सुरक्षात्मक उपाय भी किए गए हैं- व्यक्ति की हिरासत तीन माह से ज्यादा बढ़ाई नहीं जा सकती है जब तक कि सलाहकार बोर्ड इस बारे में उचित कारण न बताए और इस सलाहकार बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे । सामान्यतः निरोध का आधार संबन्धित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए तथापि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना आवश्यक नहीं है । निरोध वाले व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह निरोध के आदेश के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन करे । इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि एक नवोदित राष्ट्र के रूप में भारत की अपनी कुछ चिंताओं के कारण संविधान में निवारण-निरोध का प्रावधान किया गया परंतु यह असीमित नहीं हैं और इसके साथ निरोध वाले व्यक्ति को भी कुछ अधिकार प्रदान किए गए हैं ।
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##Question:भारतीयसंविधान के अनुच्छेद 22 के संदर्भ में, निवारक तथा निरोध क़ानूनों के पक्ष में तर्कों का उल्लेख कीजिये?निवारक-निरोध के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्राप्त अधिकार असीमित नहीं हैं क्योंकि इस संदर्भ में सुरक्षात्मक उपाय भी किए गए हैं| स्पष्ट कीजिये| ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) With reference to Article 22 of the Indian Constitution, Present arguments in favor ofprevention and detention laws?The powers obtained by law enforcement agencies underthese laws are not unlimited as protective measures have also been taken in this context.(150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : निवारण-निरोध क़ानूनों का संक्षिप्त परिचय देते संक्षिप्त भूमिका लिखिए । भारतीय संविधान के उन अनुच्छेदों की चर्चा कीजिये जो निवारण-निरोध का आधार प्रदान करता है । भारतीय संविधान में इसे शामिल किए जाने के तर्काधारों की चर्चा कीजिये । निवारण-निरोध के दुरुपयोग को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की चर्चा करते हुए संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : निवारण-निरोध को ऐसे क़ानूनों के रूप में जाना जाता है जिसके तहत अपराध पूर्व ही अपराध की रोकथाम के लिए संभावित अपराधी को हिरासत में लिया जाता है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 का दूसरा भाग निवारण-निरोध के लिए आधार प्रदान करता है । भारत विश्व का शायद इकलौता लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसके संविधान के अंतरिम भाग में निवारण-निरोध संबंधी कानून की पूरी व्यवस्थाएं हो तथापि यदि हम भारतीय संविधान निर्माण के समय की परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो हम इसका तर्काधार समझ सकते हैं । निवारण-निरोध के पक्ष में हम निम्न तर्कों को देख सकते हैं - भारत को आजादी के साथ विभाजन का भी दंश झेलना पड़ा था इसलिए राष्ट्र की एकता-अखंडता को दुष्प्रभावित करने वाले कारकों को नियंत्रित करने के लिए संविधान में कुछ निवारक प्रावधान की व्यवस्था की गयी । भारत में आतंकवाद , अलगाववाद, व नक्सलवाद की समस्या भी इस प्रकार के निवारण-निरोध कानून के लिए आधार प्रदान करता है । दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति व चीन-पाकिस्तान धुरी भी भारत के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न करता है और राष्ट्र की एकता व अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए कुछ कठोर प्रावधानों की आवश्यकता रही है । साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निवारण-निरोध के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्राप्त अधिकार असीमित नहीं हैं इसके संबंध में निम्न सुरक्षात्मक उपाय भी किए गए हैं- व्यक्ति की हिरासत तीन माह से ज्यादा बढ़ाई नहीं जा सकती है जब तक कि सलाहकार बोर्ड इस बारे में उचित कारण न बताए और इस सलाहकार बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे । सामान्यतः निरोध का आधार संबन्धित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए तथापि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना आवश्यक नहीं है । निरोध वाले व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह निरोध के आदेश के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन करे । इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि एक नवोदित राष्ट्र के रूप में भारत की अपनी कुछ चिंताओं के कारण संविधान में निवारण-निरोध का प्रावधान किया गया परंतु यह असीमित नहीं हैं और इसके साथ निरोध वाले व्यक्ति को भी कुछ अधिकार प्रदान किए गए हैं ।
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स्थानीय सरकार की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को बताते हुए , बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While Explaining the historical background of local government , discuss the recommendations of Balwant Rai Mehta Committee. (150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत स्थानीय सरकार के ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को विस्तार से बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात बलवंत राय मेहता की सिफ़ारिशों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इस समिति के महत्व को बताते हुए सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्थानीय सरकार की अवधारणा भारत में प्राचीन समय से विद्यमान है | वैदिक काल में सभा और समिति, मौर्य काल में राजुका नामक अधिकारी जो क्षेत्रीय स्तर पर होता था तथा चोल काल में स्थानीय स्वशासन का अभूतपूर्व उदहारण मिलता है | 1882 में लार्ड रिपन के द्वारा सत्ता के विकेंद्रीकरण पर एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, यह प्रस्ताव 1870 में मेयो द्वारा वित्तीय शक्तियों के हस्तांतरण के प्रस्ताव पर आधारित था | लार्ड रिपन को स्थानीय सरकार का जनक माना जाता है | गांधी जी पंचायती राज के सशक्तीकरण के समर्थक थे | इस सन्दर्भ में उनके विचारों के परिणाम स्वरुप ही हमारे संविधान के भाग-4 में पंचायतों के गठन का प्रावधान शामिल है | अनुच्छेद -40 के अनुसार पंचायतों के गठन का उत्तरदायित्व राज्यों का है | राज्य उन्हें आवश्यक शक्तियां तथा अधिकार प्रदान करेंगे ताकि वे सरकार की इकाई के रूप में कार्य करने में सक्षम हो सकें | परन्तु यह अनुच्छेद पंचायतों के गठन के लिए दिशा -निर्देश नहीं देता है | प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत देश के सर्वांगीण विकास विकास को प्रोत्साहित करने हेतु 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गयी तथा 1957 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की समीक्षा हेतु बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया | समिति ने नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट सौंपी और लोकतान्त्रिक विकेंद्रीकरण की योजना की सिफारिश की जो कि अंतिम रूप से पंचायती राज के रूप में जाना गया | बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें - तीन स्तरीय पंचायती राज पद्धति की स्थापना - गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद | प्रखंड को विकास एवं नियोजन कीमानी जाती है समिति के द्वारा | पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को सलाहकारी समन्वयकारी और पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए | जिला परिषद का अध्यक्ष, जिलाधिकारी होना चाहिए | इन निकायों में शक्ति तथा उत्तरदायित्व का वास्तविक स्थानांतरण होना चाहिए | इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिए ताकि ये अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को सम्पादित करने में समर्थ हो सकें | भविष्य में अधिकारों के और अधिक प्रत्यायोजन के लिए एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए | समिति ने ग्राम स्तर की पंचायतों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव की सिफारिश की | राजस्थान, भारत में पंचायती राज स्थापित करने वाला पहला राज्य था | जिसका आरम्भ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले से किया गया | उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में पंचायती राज की अवधारणा अति प्राचीन है तथा आधुनिक स्वशासन में गाँधी जी के विचारों को समाहित किया गया है | पंचायती राज के विकास में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों ने अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
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##Question:स्थानीय सरकार की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को बताते हुए , बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While Explaining the historical background of local government , discuss the recommendations of Balwant Rai Mehta Committee. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत स्थानीय सरकार के ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि को विस्तार से बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात बलवंत राय मेहता की सिफ़ारिशों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इस समिति के महत्व को बताते हुए सकारत्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - स्थानीय सरकार की अवधारणा भारत में प्राचीन समय से विद्यमान है | वैदिक काल में सभा और समिति, मौर्य काल में राजुका नामक अधिकारी जो क्षेत्रीय स्तर पर होता था तथा चोल काल में स्थानीय स्वशासन का अभूतपूर्व उदहारण मिलता है | 1882 में लार्ड रिपन के द्वारा सत्ता के विकेंद्रीकरण पर एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, यह प्रस्ताव 1870 में मेयो द्वारा वित्तीय शक्तियों के हस्तांतरण के प्रस्ताव पर आधारित था | लार्ड रिपन को स्थानीय सरकार का जनक माना जाता है | गांधी जी पंचायती राज के सशक्तीकरण के समर्थक थे | इस सन्दर्भ में उनके विचारों के परिणाम स्वरुप ही हमारे संविधान के भाग-4 में पंचायतों के गठन का प्रावधान शामिल है | अनुच्छेद -40 के अनुसार पंचायतों के गठन का उत्तरदायित्व राज्यों का है | राज्य उन्हें आवश्यक शक्तियां तथा अधिकार प्रदान करेंगे ताकि वे सरकार की इकाई के रूप में कार्य करने में सक्षम हो सकें | परन्तु यह अनुच्छेद पंचायतों के गठन के लिए दिशा -निर्देश नहीं देता है | प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत देश के सर्वांगीण विकास विकास को प्रोत्साहित करने हेतु 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गयी तथा 1957 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की समीक्षा हेतु बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया | समिति ने नवम्बर 1957 को अपनी रिपोर्ट सौंपी और लोकतान्त्रिक विकेंद्रीकरण की योजना की सिफारिश की जो कि अंतिम रूप से पंचायती राज के रूप में जाना गया | बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें - तीन स्तरीय पंचायती राज पद्धति की स्थापना - गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद | प्रखंड को विकास एवं नियोजन कीमानी जाती है समिति के द्वारा | पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को सलाहकारी समन्वयकारी और पर्यवेक्षण निकाय होना चाहिए | जिला परिषद का अध्यक्ष, जिलाधिकारी होना चाहिए | इन निकायों में शक्ति तथा उत्तरदायित्व का वास्तविक स्थानांतरण होना चाहिए | इन निकायों को पर्याप्त स्रोत मिलने चाहिए ताकि ये अपने कार्यों और जिम्मेदारियों को सम्पादित करने में समर्थ हो सकें | भविष्य में अधिकारों के और अधिक प्रत्यायोजन के लिए एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए | समिति ने ग्राम स्तर की पंचायतों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव की सिफारिश की | राजस्थान, भारत में पंचायती राज स्थापित करने वाला पहला राज्य था | जिसका आरम्भ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले से किया गया | उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में पंचायती राज की अवधारणा अति प्राचीन है तथा आधुनिक स्वशासन में गाँधी जी के विचारों को समाहित किया गया है | पंचायती राज के विकास में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों ने अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
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एक प्रकार की चट्टान को दूसरे प्रकार में परिवर्तित किया जा सकता है। इस कथन को उपयुक्त आरेख के साथ समझाइए और विभिन्न प्रकार की चट्टानों की विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) One type of rock can be transformed into another. Explain this statement with suitable diagram and also mention characterstics of different types of rocks. (150-200 words, 10 marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में चट्टानों के बारे में लिखिए। इसके बाद चट्टानों में होने वाले रूपान्तरण को लिखिए। दूसरे भाग में चट्टानों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। चट्टान का निर्माण एक या एक से अधिक खनिज से मिलकर होता है तथा इसमें खनिज घटकों की कोई निश्चित रासायनिक संरचना नहीं होती है। चट्टानों को उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित चट्टानों में विभाजित किया जाता है। गौरतलब है कि आग्नेय चट्टान को प्राथमिक चट्टान कहा जाता है जिससे अन्य चट्टानों का विकास हुआ है। इसके साथ यह भी सत्य है कि प्रत्येक चट्टान एक दूसरे में परिवर्तित हो सकता है। अर्थात आग्नेय से अवसादी, अवसादी से कायांतरित पुनः आग्नेय चट्टान में रूपान्तरण। इसे इस आरेख से समझ सकते हैं। **यहाँ चट्टानों के रूपान्तरण संबंधी आरेख बनाया जाना चाहिए। उदाहरण: ग्रेनाइट- नीस शेल- स्लेट चूना पत्थर- संगमरमर कोयला- ग्रेफ़ाइट चट्टानों की विशेषताएँ: आग्नेय चट्टान: कठोर होती हैं जिससे अपक्षय का प्रभाव कम होता है। ये जीवाश्म रहित हैं तथा इसमें परतें नहीं पायी जाती हैं। आग्नेय चट्टानें रवेदार व दानेदार होती हैं। अधिकांश आग्नेय चट्टानें सिलिकेट खनिज से मिलकर बनी होती हैं। अवसादी चट्टान: जीवाश्म व परतें पायी जाती हैं। इसमें रवे अनुपस्थित रहते हैं इनमें संधियाँ और जोड़ पाये जाते हैं। कायांतरित चट्टान: जीवाश्म का प्रायः अभाव रहता है इनका आपेक्षित घनत्व अधिक होता है परतों का अभाव रहता है तथा चट्टानों के मध्य रिक्त स्थान नहीं रहते हैं।
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##Question:एक प्रकार की चट्टान को दूसरे प्रकार में परिवर्तित किया जा सकता है। इस कथन को उपयुक्त आरेख के साथ समझाइए और विभिन्न प्रकार की चट्टानों की विशेषताओं का भी उल्लेख कीजिए। (150-200 शब्द, 10 अंक) One type of rock can be transformed into another. Explain this statement with suitable diagram and also mention characterstics of different types of rocks. (150-200 words, 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में चट्टानों के बारे में लिखिए। इसके बाद चट्टानों में होने वाले रूपान्तरण को लिखिए। दूसरे भाग में चट्टानों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। चट्टान का निर्माण एक या एक से अधिक खनिज से मिलकर होता है तथा इसमें खनिज घटकों की कोई निश्चित रासायनिक संरचना नहीं होती है। चट्टानों को उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित चट्टानों में विभाजित किया जाता है। गौरतलब है कि आग्नेय चट्टान को प्राथमिक चट्टान कहा जाता है जिससे अन्य चट्टानों का विकास हुआ है। इसके साथ यह भी सत्य है कि प्रत्येक चट्टान एक दूसरे में परिवर्तित हो सकता है। अर्थात आग्नेय से अवसादी, अवसादी से कायांतरित पुनः आग्नेय चट्टान में रूपान्तरण। इसे इस आरेख से समझ सकते हैं। **यहाँ चट्टानों के रूपान्तरण संबंधी आरेख बनाया जाना चाहिए। उदाहरण: ग्रेनाइट- नीस शेल- स्लेट चूना पत्थर- संगमरमर कोयला- ग्रेफ़ाइट चट्टानों की विशेषताएँ: आग्नेय चट्टान: कठोर होती हैं जिससे अपक्षय का प्रभाव कम होता है। ये जीवाश्म रहित हैं तथा इसमें परतें नहीं पायी जाती हैं। आग्नेय चट्टानें रवेदार व दानेदार होती हैं। अधिकांश आग्नेय चट्टानें सिलिकेट खनिज से मिलकर बनी होती हैं। अवसादी चट्टान: जीवाश्म व परतें पायी जाती हैं। इसमें रवे अनुपस्थित रहते हैं इनमें संधियाँ और जोड़ पाये जाते हैं। कायांतरित चट्टान: जीवाश्म का प्रायः अभाव रहता है इनका आपेक्षित घनत्व अधिक होता है परतों का अभाव रहता है तथा चट्टानों के मध्य रिक्त स्थान नहीं रहते हैं।
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Bring out the federal features of Indian system?(10 Marks/150 words)
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Approach Introduce the answer by briefly explaining/defining the term federalism? Then highlight the main Federal features of Indian Constitution Conclude accordingly, one can conclude highlighting that India has certain unitary features and thus can be termed as Quas-federal in nature. Answer Federalism is a set- up in which there is a well- defined division of powers between centre and states. Both levels of government have full authority in their defined sphere. The American constitution is considered the best example of federalism. Indian constitution also provides for federal set-up The main federal features of the Indian Constitution are as follows: 1. Written Constitution: The Indian Constitution is a written document containing 395 Articles and 12 schedules, and therefore, fulfils this basic requirement of a federal government. In fact, the Indian Constitution is the most elaborate Constitution of the world. 2. The supremacy of the Constitution: India’s Constitution is also supreme and not the hand-made of either the Centre or of the States. If for any reason any organ of the State dares to violate any provision of the Constitution, the courts of laws are there to ensure that dignity of the Constitution is upheld at all costs. 3. Rigid Constitution: The supremacy of the Constitution can be maintained only if the method of its amendment is rigid. Provisions concerning Union-States relations (federal structure) can only be amended by a Special majority of the Parliament plus ratification by more than half of the States. 4. Division of Powers: In a federation, there should be a clear division of powers so that the States and the centre are required to enact and legislate within their respective sphere of activity and none violates its limits and tries to encroach upon the functions of others. This requisite is evident in the Indian Constitution. The Seventh Schedule contains three Legislative Lists which enumerate subjects of administration, viz., Union, State and Concurrent Legislative Lists. 5. Independent Judiciary: Independent Judiciary is important in a federation to maintain the supremacy of the constitution (through Judicial review) and to settle the disputes between the Centre and the states or between the states. The Indian Constitution establishes an independent judiciary headed by the Supreme Court for above purposes by ensuring the security of tenure to judges, fixed service conditions, power of Judicial review etc. 6. Bicameral Legislature: A bicameral system is considered essential in a federation because it is in the Upper House alone that the units can be given equal representation. The Constitution of India also provides for a bicameral Legislature at the Centre consisting of Lok Sabha and Rajya Sabha. While the Lok Sabha consists of the elected representatives of people, the Rajya Sabha mainly consists of representatives elected by the State Legislative Assemblies. Conclusion Thus Indian Constitution provides for a federal setup, though there are certain unitary aspects also like Strong centre, Emergency provisions etc and so India can be termed as Quasi-federal in nature.
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##Question:Bring out the federal features of Indian system?(10 Marks/150 words)##Answer:Approach Introduce the answer by briefly explaining/defining the term federalism? Then highlight the main Federal features of Indian Constitution Conclude accordingly, one can conclude highlighting that India has certain unitary features and thus can be termed as Quas-federal in nature. Answer Federalism is a set- up in which there is a well- defined division of powers between centre and states. Both levels of government have full authority in their defined sphere. The American constitution is considered the best example of federalism. Indian constitution also provides for federal set-up The main federal features of the Indian Constitution are as follows: 1. Written Constitution: The Indian Constitution is a written document containing 395 Articles and 12 schedules, and therefore, fulfils this basic requirement of a federal government. In fact, the Indian Constitution is the most elaborate Constitution of the world. 2. The supremacy of the Constitution: India’s Constitution is also supreme and not the hand-made of either the Centre or of the States. If for any reason any organ of the State dares to violate any provision of the Constitution, the courts of laws are there to ensure that dignity of the Constitution is upheld at all costs. 3. Rigid Constitution: The supremacy of the Constitution can be maintained only if the method of its amendment is rigid. Provisions concerning Union-States relations (federal structure) can only be amended by a Special majority of the Parliament plus ratification by more than half of the States. 4. Division of Powers: In a federation, there should be a clear division of powers so that the States and the centre are required to enact and legislate within their respective sphere of activity and none violates its limits and tries to encroach upon the functions of others. This requisite is evident in the Indian Constitution. The Seventh Schedule contains three Legislative Lists which enumerate subjects of administration, viz., Union, State and Concurrent Legislative Lists. 5. Independent Judiciary: Independent Judiciary is important in a federation to maintain the supremacy of the constitution (through Judicial review) and to settle the disputes between the Centre and the states or between the states. The Indian Constitution establishes an independent judiciary headed by the Supreme Court for above purposes by ensuring the security of tenure to judges, fixed service conditions, power of Judicial review etc. 6. Bicameral Legislature: A bicameral system is considered essential in a federation because it is in the Upper House alone that the units can be given equal representation. The Constitution of India also provides for a bicameral Legislature at the Centre consisting of Lok Sabha and Rajya Sabha. While the Lok Sabha consists of the elected representatives of people, the Rajya Sabha mainly consists of representatives elected by the State Legislative Assemblies. Conclusion Thus Indian Constitution provides for a federal setup, though there are certain unitary aspects also like Strong centre, Emergency provisions etc and so India can be termed as Quasi-federal in nature.
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जनता के प्रति सरकार की जबावदेही स्थापित करने में लोक लेखा समिति की भूमिका की विवेचना कीजिये। (150 -200शब्द ) Discuss the role of Public Accounts Committee in establishing government accountability towards the public. (150 -200 words)
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एप्रोच : लोक लेखा समिति के गठनको बताते हुए प्रारंभ कीजिये। जनता के प्रति सरकार कीजबावदेही स्थापित करने में इसके महत्त्व / भूमिका को लिखिए। लोक लेखा समिति की सीमाओं को बताइये। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप : वित्तीय जबावदेही सुनिश्चित करने हेतु संसद के सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व केसिद्धांत के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत के माध्यम से लोक लेखा समिति के सदस्यों का चुनाव किया जाता है। वर्तमान में इसमें 22 सदस्य होतेहै , जिसमे से 15 सदस्य लोक सभा से तथा 7 सदस्य राज्यसभा से होते है। जनता के प्रति सरकार की जबावदेही स्थापित करने में इसकीभूमिका: यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा राष्ट्रपति को सौंपी गयी रिपोर्ट या वार्षिक प्रतिवेदनों की जांच करती है , जिससे सरकार की वित्तीय जबावदेही निर्धारित किया जाना आसान होता है। यह समिति सार्वजानिक व्यय में तकनीकीअनियमितताकी जांच मात्र क़ानूनी या औपचारिक दृष्टिकोण से ही नहीं करती है बल्कि अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर विवेक व उपयुक्तता को भी सन्दर्भ में लेती है। इस जांच प्रक्रिया में विभिन्न व्ययों की आवश्यकता व् प्रगति पर भी चर्चा होती है , जिससे सरकार पर जबावदेही बढ़ती है। यह सी. ए. जी. की भूमिका को भी सशक्त करता है। यह संबंधित मंत्रालय या विभाग द्वारा की गई फिजूलखर्ची या उचित नियंत्रण के अभाव में निरनुमोदन के रूप में अपनी राय भी व्यक्त कर सकती है, या उसकी निंदा भी कर सकती है। सीमाएं : यह लेखा के शव परीक्षण जैसाकार्य करती है क्यूंकि तब तक खर्च हो चुकाहोता है। इसकी अनुशंसाएं परामर्श जैसे होती है , मंत्रालयों पर बाध्यकारी नहीं होती है। इसके पास विभागों के खर्च को रोकने की शक्ति नहीं है। यह दिन प्रतिदिन के प्रशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। यह कोई कार्यकारी निकाय नहीं है , इसलिए आदेश जारी नहीं कर सकती है। इसके निष्कर्षों पर संसद ही कोई निर्णय ले सकती है। वास्तव में लोक लेखा समिति , संसद के पास कार्यपालिका को जनता व संसद के प्रति जबावदेह बनाने का प्रभावी उपकरण है। इसकी उपयुक्तता को और बेहतर करने हेतु प्रयास किया जाना चाहिए कि खर्च के मध्य में जांच की शक्ति हो तथा इसकी अनुशंसाओं को ना मानने परकार्यपालिका द्वारा उपयुक्त कारण प्रस्तुत किया जाये।
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##Question:जनता के प्रति सरकार की जबावदेही स्थापित करने में लोक लेखा समिति की भूमिका की विवेचना कीजिये। (150 -200शब्द ) Discuss the role of Public Accounts Committee in establishing government accountability towards the public. (150 -200 words)##Answer:एप्रोच : लोक लेखा समिति के गठनको बताते हुए प्रारंभ कीजिये। जनता के प्रति सरकार कीजबावदेही स्थापित करने में इसके महत्त्व / भूमिका को लिखिए। लोक लेखा समिति की सीमाओं को बताइये। सुझावात्मक निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप : वित्तीय जबावदेही सुनिश्चित करने हेतु संसद के सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व केसिद्धांत के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत के माध्यम से लोक लेखा समिति के सदस्यों का चुनाव किया जाता है। वर्तमान में इसमें 22 सदस्य होतेहै , जिसमे से 15 सदस्य लोक सभा से तथा 7 सदस्य राज्यसभा से होते है। जनता के प्रति सरकार की जबावदेही स्थापित करने में इसकीभूमिका: यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा राष्ट्रपति को सौंपी गयी रिपोर्ट या वार्षिक प्रतिवेदनों की जांच करती है , जिससे सरकार की वित्तीय जबावदेही निर्धारित किया जाना आसान होता है। यह समिति सार्वजानिक व्यय में तकनीकीअनियमितताकी जांच मात्र क़ानूनी या औपचारिक दृष्टिकोण से ही नहीं करती है बल्कि अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर विवेक व उपयुक्तता को भी सन्दर्भ में लेती है। इस जांच प्रक्रिया में विभिन्न व्ययों की आवश्यकता व् प्रगति पर भी चर्चा होती है , जिससे सरकार पर जबावदेही बढ़ती है। यह सी. ए. जी. की भूमिका को भी सशक्त करता है। यह संबंधित मंत्रालय या विभाग द्वारा की गई फिजूलखर्ची या उचित नियंत्रण के अभाव में निरनुमोदन के रूप में अपनी राय भी व्यक्त कर सकती है, या उसकी निंदा भी कर सकती है। सीमाएं : यह लेखा के शव परीक्षण जैसाकार्य करती है क्यूंकि तब तक खर्च हो चुकाहोता है। इसकी अनुशंसाएं परामर्श जैसे होती है , मंत्रालयों पर बाध्यकारी नहीं होती है। इसके पास विभागों के खर्च को रोकने की शक्ति नहीं है। यह दिन प्रतिदिन के प्रशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। यह कोई कार्यकारी निकाय नहीं है , इसलिए आदेश जारी नहीं कर सकती है। इसके निष्कर्षों पर संसद ही कोई निर्णय ले सकती है। वास्तव में लोक लेखा समिति , संसद के पास कार्यपालिका को जनता व संसद के प्रति जबावदेह बनाने का प्रभावी उपकरण है। इसकी उपयुक्तता को और बेहतर करने हेतु प्रयास किया जाना चाहिए कि खर्च के मध्य में जांच की शक्ति हो तथा इसकी अनुशंसाओं को ना मानने परकार्यपालिका द्वारा उपयुक्त कारण प्रस्तुत किया जाये।
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पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 के मूल उद्देश्यों की चर्चा करते हुए, इससे सम्बंधित समस्यायों को संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द) While discussing the basic objectives of Panchayat Extention to Scheduled Areas Act 1996, briefly explain the problems related to it.(150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत पेसा अधिनियम का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात पेसा अधिनियम के उद्देश्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में पेसा अधिनियम में मौजूद समस्याओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - यह कानून भारत सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों के लिए निर्मित किया गया है | यह क्षेत्र 73 वें संविधान संशोधन में शामिल नहीं हैं | यह विशेष अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों में भाग -9 के प्रावधानों को लागू करता है | PESA इन क्षेत्रों में सत्ता के विकेंद्रीकरण को ग्राम सभा स्तर तक ले जाता है | इस अधिनियम में ग्राम सभा को भूमि अधिग्रहण के सम्बन्ध में परामर्श प्रदान करने, लघु वन उत्पादों के स्वामित्व से लेकर खनिज के पट्टे प्रदान करने के सम्बन्ध में परामर्श आदि करने तक की विस्तृत शक्तियां प्रदान की गयी हैं | संसद ने इसी क्रमपंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्र तक विस्तारित ) अधिनियम 1996 पारित किया जिसका मूल उद्देश्य जनजाति, आदिवासी को स्वायत्तता प्रदान करते हुए पारंपरिक परिपाटी के अनुरूप प्रशासनिक एवं स्थानीय जनजातीय ढांचा तैयार करना था | इसके कुछ उद्देश्य भी हैं - लघु जल निकायों की योजना | लघु खनिज के खनन पट्टे एवं लाइसेंस की अनुमति | लघु वन उत्पादों के उपभोग पर शक्ति | भूमि सुधार में परामर्श देने की शक्ति | जनजातीय लोगों की परंपरा, पहचान एवं संस्कृति बनाए रखने के लिए कानून बनाने की शक्ति | ऋण उपलब्ध करवाने की शक्ति | पंचायत उपबंध लागू करवाने के लिए ग्राम सभा का गठन | PESA- 1996 अपने मूल उद्देश्य 2011 जनगणना के अनुसार भारत की जनसँख्या के 8.6% लोगों को उनकी परंपरा- संस्कृति को बिना हानि पहुंचाएं उनके विकास एवं जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाया गया था, परन्तु कुछ समस्याओं के कारण यह अधिक सफल न सका | जिसके अनेक कारण परिलक्षित होते हैं - पांचवीं अनुसूची में वर्णित जनजातीय सलाहकारी परिषद जिसका उद्देश्य राज्य सरकार को जनजातीय मामलों में अधिक शक्ति प्रदान करना है | यह परिषद गैर राजनीतिक संस्था है, परन्तु राज्य सरकार की नीतियों का विरोध नहीं किया | राज्यपाल भी अपने सम्बन्ध मधुर बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री से जनजातीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते | अधिनियम लागू होने के बावजूद राज्य सरकारें इससे सम्बंधित नियम नहीं बना पायी | राज्य विधायिका को परंपरा के अनुरूप कानून बनाने थे , परन्तु इस उद्देश्य में भी अक्षम रही | इसमें वर्णित कुछ शब्दों की परिभाषा अस्पष्ट है, जैसे - लघु जल निकाय, लघु खनिज, आदि | इस प्रकार हम देखते हैं पेसा अधिनियम में व्यावहारिक समस्याओं के होने के साथ ही साथ कुछ सैद्धांतिक कमियां मौजूद थी |
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##Question:पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 के मूल उद्देश्यों की चर्चा करते हुए, इससे सम्बंधित समस्यायों को संक्षेप में बताइए | (150-200 शब्द) While discussing the basic objectives of Panchayat Extention to Scheduled Areas Act 1996, briefly explain the problems related to it.(150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत पेसा अधिनियम का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात पेसा अधिनियम के उद्देश्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में पेसा अधिनियम में मौजूद समस्याओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - यह कानून भारत सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों के लिए निर्मित किया गया है | यह क्षेत्र 73 वें संविधान संशोधन में शामिल नहीं हैं | यह विशेष अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों में भाग -9 के प्रावधानों को लागू करता है | PESA इन क्षेत्रों में सत्ता के विकेंद्रीकरण को ग्राम सभा स्तर तक ले जाता है | इस अधिनियम में ग्राम सभा को भूमि अधिग्रहण के सम्बन्ध में परामर्श प्रदान करने, लघु वन उत्पादों के स्वामित्व से लेकर खनिज के पट्टे प्रदान करने के सम्बन्ध में परामर्श आदि करने तक की विस्तृत शक्तियां प्रदान की गयी हैं | संसद ने इसी क्रमपंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्र तक विस्तारित ) अधिनियम 1996 पारित किया जिसका मूल उद्देश्य जनजाति, आदिवासी को स्वायत्तता प्रदान करते हुए पारंपरिक परिपाटी के अनुरूप प्रशासनिक एवं स्थानीय जनजातीय ढांचा तैयार करना था | इसके कुछ उद्देश्य भी हैं - लघु जल निकायों की योजना | लघु खनिज के खनन पट्टे एवं लाइसेंस की अनुमति | लघु वन उत्पादों के उपभोग पर शक्ति | भूमि सुधार में परामर्श देने की शक्ति | जनजातीय लोगों की परंपरा, पहचान एवं संस्कृति बनाए रखने के लिए कानून बनाने की शक्ति | ऋण उपलब्ध करवाने की शक्ति | पंचायत उपबंध लागू करवाने के लिए ग्राम सभा का गठन | PESA- 1996 अपने मूल उद्देश्य 2011 जनगणना के अनुसार भारत की जनसँख्या के 8.6% लोगों को उनकी परंपरा- संस्कृति को बिना हानि पहुंचाएं उनके विकास एवं जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाया गया था, परन्तु कुछ समस्याओं के कारण यह अधिक सफल न सका | जिसके अनेक कारण परिलक्षित होते हैं - पांचवीं अनुसूची में वर्णित जनजातीय सलाहकारी परिषद जिसका उद्देश्य राज्य सरकार को जनजातीय मामलों में अधिक शक्ति प्रदान करना है | यह परिषद गैर राजनीतिक संस्था है, परन्तु राज्य सरकार की नीतियों का विरोध नहीं किया | राज्यपाल भी अपने सम्बन्ध मधुर बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री से जनजातीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते | अधिनियम लागू होने के बावजूद राज्य सरकारें इससे सम्बंधित नियम नहीं बना पायी | राज्य विधायिका को परंपरा के अनुरूप कानून बनाने थे , परन्तु इस उद्देश्य में भी अक्षम रही | इसमें वर्णित कुछ शब्दों की परिभाषा अस्पष्ट है, जैसे - लघु जल निकाय, लघु खनिज, आदि | इस प्रकार हम देखते हैं पेसा अधिनियम में व्यावहारिक समस्याओं के होने के साथ ही साथ कुछ सैद्धांतिक कमियां मौजूद थी |
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साम्प्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? साथ ही व्याख्या कीजिये कि साम्प्रदायिकता, धार्मिकता से किस प्रकार संबंधित है? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by communalism? Also, explain how communalism is related to religiosity? (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में साम्प्रदायिकता का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में साम्प्रदायिकता एवं धार्मिकता के मध्य संबंध को समझाइये। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- कृष्णदत्त भट्ट के अनुसार" अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य समुदायों के प्रति उदासीनता , उपेक्षा , हेयदृष्टि, घृणा , विरोध एवं आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है , जिसका आधार वास्तविक अथवा काल्पनिक है कि उक्त सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट करने या हमें जानमाल की क्षति पहुचाने के लिए कटिबद्ध है। " उपर्युक्त परिभाषा से निम्नलिखित विचार स्पष्ट हो जाते है; साम्प्रदायिकता के मूल में ये भावना रहती है कि मेरा धर्म, मेरा मत , मेरा विश्वाससर्वश्रेष्ठ है , इसे सर्वोपरि रहना चाहिए। साम्प्रदायिकता में अन्य धर्मों के प्रति घृणा ,विरोध , संघर्ष की भावना पायी जाती है। साम्प्रदायिकता का आधार यह काल्पनिक या वास्तविक भय है कि अन्य सम्प्रदाय मेरे सम्प्रदाय व संस्कृति को नष्ट कर देंगे। साम्प्रदायिकता अतिवादी प्रकृति की होती है तथा इसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती है। धार्मिकता एवंसाम्प्रदायिकता दोनों धर्म से जुड़े हैं लेकिन दोनों अवधारणाओं की प्रकृति भिन्न भिन्न है जैसे; अपने धर्ममें गहरी आस्था रखना ”साम्प्रदायिकता” नहीं है। धर्मकी आजादी तो हर मनुष्य का एक मौलिक अधिकार है। भारत के संविधान ने इस अधिकार को स्वीकारा है। साम्प्रदायिकता का अर्थ है, ”धर्मका हौवा खडा करके लोगों की भावनाओं को भड़काना और ‘राष्ट्रीयता’ के बजाए ‘मजहबी उन्माद’ फैलाना।” किसी धर्म विशेष के नियमों तथा मानदंडों का अंतर्मन से पालन करना तथा उसके आदर्शों को जीवन व्यवहार में लाना धार्मिकता है , वहीँ किसी धर्म विशेष के मानदंडों का पालन करते हुए अन्य समुदायों को निकृष्ट समझना साम्प्रदायिकता है। एक विचारधारा के रूप में धार्मिकता अहिंसा, सामूहिक अस्तित्व ,भाईचारा , प्रेम ,करुणा आदि का समर्थन करती है , जबकि विचारधारा के रूप में साम्प्रदायिकता नस्लवाद तथा फासीवाद से मिलती-जुलती है। धार्मिकता विशुद्ध रूप से मूल धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्रेरित होती है , जबकि साम्प्रदायिकता धर्म के बजाय राजनीति से अधिक प्रेरित होती है। धार्मिकता सम्पूर्ण मानव समाज के एकीकरण की बात करती है, वहीँ साम्प्रदायिकता समुदाय विशेष के हित को ही सर्वोपरि मानकर सामाजिक विघटन का कारण बनती है। धार्मिकता की चरम स्थिति सर्वधर्म-संभव , वैश्विक शान्ति , मानव मात्र का कल्याण है , वहीँ साम्प्रदायिकता की चरण परिणति हिंसा , नर-संहार व दंगों के रूप में दिखाई पड़ता है। स्वतंत्र भारत में कई ऐसे धार्मिक मुद्दे रहे हैं , जो धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ते गए। उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि का मुद्दा प्रकृति से तो पूर्णतः धार्मिक नज़र आता है, परन्तु बाबरी विध्वंस के बाद लम्बे समय से दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है।आज भी राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में धर्म के आधार पर भेदभाव किये जाते हैं ।राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल धर्म एवं सम्प्रदाय को राजनीतिक सफलता के लिए एक साधन के रूप मे अपनाते रहे है।अत: राष्ट्रीय नेताओं पर यह दायित्व है कि वे समुदाय के सीमित तथा राष्ट्र के बृहत्तर हितो के मध्य सन्तुलन स्थापित करें तथा समुदाय को राष्ट्र में बदलें ।
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##Question:साम्प्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? साथ ही व्याख्या कीजिये कि साम्प्रदायिकता, धार्मिकता से किस प्रकार संबंधित है? (150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by communalism? Also, explain how communalism is related to religiosity? (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच:- सर्वप्रथम, भूमिका में साम्प्रदायिकता का संक्षेप में परिचय दीजिए। तत्पश्चात, मुख्य भाग में साम्प्रदायिकता एवं धार्मिकता के मध्य संबंध को समझाइये। अंत में संक्षेप में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए। उत्तर:- कृष्णदत्त भट्ट के अनुसार" अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य समुदायों के प्रति उदासीनता , उपेक्षा , हेयदृष्टि, घृणा , विरोध एवं आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है , जिसका आधार वास्तविक अथवा काल्पनिक है कि उक्त सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट करने या हमें जानमाल की क्षति पहुचाने के लिए कटिबद्ध है। " उपर्युक्त परिभाषा से निम्नलिखित विचार स्पष्ट हो जाते है; साम्प्रदायिकता के मूल में ये भावना रहती है कि मेरा धर्म, मेरा मत , मेरा विश्वाससर्वश्रेष्ठ है , इसे सर्वोपरि रहना चाहिए। साम्प्रदायिकता में अन्य धर्मों के प्रति घृणा ,विरोध , संघर्ष की भावना पायी जाती है। साम्प्रदायिकता का आधार यह काल्पनिक या वास्तविक भय है कि अन्य सम्प्रदाय मेरे सम्प्रदाय व संस्कृति को नष्ट कर देंगे। साम्प्रदायिकता अतिवादी प्रकृति की होती है तथा इसमें समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती है। धार्मिकता एवंसाम्प्रदायिकता दोनों धर्म से जुड़े हैं लेकिन दोनों अवधारणाओं की प्रकृति भिन्न भिन्न है जैसे; अपने धर्ममें गहरी आस्था रखना ”साम्प्रदायिकता” नहीं है। धर्मकी आजादी तो हर मनुष्य का एक मौलिक अधिकार है। भारत के संविधान ने इस अधिकार को स्वीकारा है। साम्प्रदायिकता का अर्थ है, ”धर्मका हौवा खडा करके लोगों की भावनाओं को भड़काना और ‘राष्ट्रीयता’ के बजाए ‘मजहबी उन्माद’ फैलाना।” किसी धर्म विशेष के नियमों तथा मानदंडों का अंतर्मन से पालन करना तथा उसके आदर्शों को जीवन व्यवहार में लाना धार्मिकता है , वहीँ किसी धर्म विशेष के मानदंडों का पालन करते हुए अन्य समुदायों को निकृष्ट समझना साम्प्रदायिकता है। एक विचारधारा के रूप में धार्मिकता अहिंसा, सामूहिक अस्तित्व ,भाईचारा , प्रेम ,करुणा आदि का समर्थन करती है , जबकि विचारधारा के रूप में साम्प्रदायिकता नस्लवाद तथा फासीवाद से मिलती-जुलती है। धार्मिकता विशुद्ध रूप से मूल धार्मिक सिद्धांतों द्वारा प्रेरित होती है , जबकि साम्प्रदायिकता धर्म के बजाय राजनीति से अधिक प्रेरित होती है। धार्मिकता सम्पूर्ण मानव समाज के एकीकरण की बात करती है, वहीँ साम्प्रदायिकता समुदाय विशेष के हित को ही सर्वोपरि मानकर सामाजिक विघटन का कारण बनती है। धार्मिकता की चरम स्थिति सर्वधर्म-संभव , वैश्विक शान्ति , मानव मात्र का कल्याण है , वहीँ साम्प्रदायिकता की चरण परिणति हिंसा , नर-संहार व दंगों के रूप में दिखाई पड़ता है। स्वतंत्र भारत में कई ऐसे धार्मिक मुद्दे रहे हैं , जो धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ते गए। उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि का मुद्दा प्रकृति से तो पूर्णतः धार्मिक नज़र आता है, परन्तु बाबरी विध्वंस के बाद लम्बे समय से दो सम्प्रदायों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है।आज भी राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में धर्म के आधार पर भेदभाव किये जाते हैं ।राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल धर्म एवं सम्प्रदाय को राजनीतिक सफलता के लिए एक साधन के रूप मे अपनाते रहे है।अत: राष्ट्रीय नेताओं पर यह दायित्व है कि वे समुदाय के सीमित तथा राष्ट्र के बृहत्तर हितो के मध्य सन्तुलन स्थापित करें तथा समुदाय को राष्ट्र में बदलें ।
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कांग्रेस मेंगरमपंथी राष्ट्रवाद का उदय विभिन्न कारणों का परिणाम था| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक - 10 ) The rise of the extremist nationalism in Congress was the result of various reasons. Explain (150 to 200 words, Marks - 10 )
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में गरमपंथी राष्ट्रवाद को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में राष्ट्रीय आन्दोलन में गरमपंथी राष्ट्रवाद के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्वउदारवादी नेताओंके द्वारा किया गया था | वर्ष 1905 ई. से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा चरण प्रारम्भ होता है, जिसेगरमपंथी राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाती है| गरमपंथी राष्ट्रवादी प्रार्थना के बदले संघर्ष के मार्ग का आह्वान करते थे | बाल गंगाधर तिलक, लाल लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल एवं अरविन्द घोष प्रमुख गरमपंथी नेता थे| गरम दल के नेताओं का मानना था कि सरकार पर दबाव डालकर ही अधिकारों को पाया जा सकता है| गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के पीछे अनेक कारण उत्तरदायी थे| गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के उत्तरदायी कारण सरकार से निराशा विभिन्न कारणों से सरकारी नीतियों के विरुद्ध राष्ट्रवादियों में असंतोष दिखाई पड़ते हैं जैसे नरमदलीय नेताओं की संवैधानिक राजनीति को सरकार के द्वारा महत्त्व न दिया जाना इतना ही नहीं सरकार कई मुद्दों को लेकर प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण भी अपना रही थी जैसे 1904 में प्रेस को नियंत्रित करने के लिए कानून, कलकत्ता विश्वविद्यालय एवं कलकत्ता नगर निगम पर सरकारी नियंत्रण में वृद्धि आदि इसके अतिरिक्त 1890 के दशक में एक अकाल के दौरान लाखो की संख्या में लोगों का मारा जाना, सरकार ने राहत कार्यों की उपेक्षा की तथा महाराष्ट्र में प्लेग के दौरान सरकारी कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के भी साक्ष्य मिलते हैं नरमदलीय नेतृत्व से निराशा नरमदलीय कार्यशैली से असंतोष कांग्रेस एवं अखिल भारतीय स्तर पर गरमदलीय नेताओं के उदय का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण था इस कार्यशैली के कारण सरकार पर प्रभावी तरीके से दबाव नहीं बनाया जा सका सरकार के प्रति उदारवादी नेताओं की आस्था से भी राष्ट्रवादियों में असंतोष था इतना ही नहीं युवाओं तथा आम लोगों को आंदोलित न कर पाने के कारण भी इनके प्रति निराशा का भाव बढ़ता गया शिक्षा का प्रसार 19 वीं सदी के अंत तक सरकारी एवं व्यक्तिगत प्रयासों से शिक्षा का अपेक्षाकृत व्यापक प्रसार हुआ इसके साथ ही शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में भी वृद्धि हुई चूँकि इन युवाओं पर आधुनिक विचारों का प्रभाव था तथा बेरोजगारी के कारण असंतोष भी था अतः इनका झुकाव उग्रराष्ट्रवाद की ओर बढ़ता गया सुधारकों की भूमिका 19वीं सदी के उत्तरार्ध में दयानंद सरस्वती तथा विवेकानंद जैसे सुधारकों के लेखों, विचारों एवं गतिविधियों ने स्वदेशी संस्कृति के प्रति गौरव का एहसास कराया आत्म विश्वास एवं ऊर्जा का संचार भी किया युवाओं पर इनका विशेष प्रभाव देखा गया अंतर्राष्ट्रीय कारक 1890 के पश्चात जापान का तेजी से आधुनिक राष्ट्र के रूप में उदय हुआ और 1905 में जापान ने रूस को पराजित किया इस घटना ने राष्ट्रवादियों को प्रेरित एवं उत्साहित किया कि जापान जैसा छोटा राष्ट्र आत्मनिर्भर हो सकता है तथा बड़ी शक्तियों को चुनौती दे सकता है तो भारत हम भी एक जुट हो कर ऐसा कर सकते हैं इसी प्रकार 1896 में इथियोपिया के द्वारा इटली को पराजित किये जाने की घटना ने राष्ट्रवादियों को उत्साहित किया गरमदलीय नेताओं की उपस्थिति एवं गतिविधियाँ कांग्रेस की स्थापना के समय से ही गरमदलीय नेताओं की उपस्थिति तथा देश के अलग अलग हिस्सों में उनके द्वारा अपनाए जाने वाले उग्र तरीकों को देख सकते हैं जैसे 1890 के दशक में तिलक ने महाराष्ट्र में कर न देने का आन्दोलन चलाया, इसी प्रकार पंजाब में लाजपत राय तथा बंगाल में अरविन्द घोष व विपिनचंद्र पाल सक्रिय थे इन नेताओंकी कार्यशैली के कारण युवाओं का इनके प्रति झुकाव बढ़ता गया इसी के साथ राष्ट्रीय आन्दोलन में गरमदलीय युग की शुरुआत हुई| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के पीछे विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कारक उत्तरदायी थे| गरमपंथी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आन्दोलन के मध्यवर्गीय चरित्र को जनांदोलन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इसके साथ ही राष्ट्रीय आन्दोलन को बहिष्कार जैसे उग्र उपकरणों से सुसज्जित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी|
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##Question:कांग्रेस मेंगरमपंथी राष्ट्रवाद का उदय विभिन्न कारणों का परिणाम था| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक - 10 ) The rise of the extremist nationalism in Congress was the result of various reasons. Explain (150 to 200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में गरमपंथी राष्ट्रवाद को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिये 3- अंतिम में राष्ट्रीय आन्दोलन में गरमपंथी राष्ट्रवाद के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| 1885 से 1905 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्वउदारवादी नेताओंके द्वारा किया गया था | वर्ष 1905 ई. से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा चरण प्रारम्भ होता है, जिसेगरमपंथी राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाती है| गरमपंथी राष्ट्रवादी प्रार्थना के बदले संघर्ष के मार्ग का आह्वान करते थे | बाल गंगाधर तिलक, लाल लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल एवं अरविन्द घोष प्रमुख गरमपंथी नेता थे| गरम दल के नेताओं का मानना था कि सरकार पर दबाव डालकर ही अधिकारों को पाया जा सकता है| गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के पीछे अनेक कारण उत्तरदायी थे| गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के उत्तरदायी कारण सरकार से निराशा विभिन्न कारणों से सरकारी नीतियों के विरुद्ध राष्ट्रवादियों में असंतोष दिखाई पड़ते हैं जैसे नरमदलीय नेताओं की संवैधानिक राजनीति को सरकार के द्वारा महत्त्व न दिया जाना इतना ही नहीं सरकार कई मुद्दों को लेकर प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण भी अपना रही थी जैसे 1904 में प्रेस को नियंत्रित करने के लिए कानून, कलकत्ता विश्वविद्यालय एवं कलकत्ता नगर निगम पर सरकारी नियंत्रण में वृद्धि आदि इसके अतिरिक्त 1890 के दशक में एक अकाल के दौरान लाखो की संख्या में लोगों का मारा जाना, सरकार ने राहत कार्यों की उपेक्षा की तथा महाराष्ट्र में प्लेग के दौरान सरकारी कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के भी साक्ष्य मिलते हैं नरमदलीय नेतृत्व से निराशा नरमदलीय कार्यशैली से असंतोष कांग्रेस एवं अखिल भारतीय स्तर पर गरमदलीय नेताओं के उदय का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण था इस कार्यशैली के कारण सरकार पर प्रभावी तरीके से दबाव नहीं बनाया जा सका सरकार के प्रति उदारवादी नेताओं की आस्था से भी राष्ट्रवादियों में असंतोष था इतना ही नहीं युवाओं तथा आम लोगों को आंदोलित न कर पाने के कारण भी इनके प्रति निराशा का भाव बढ़ता गया शिक्षा का प्रसार 19 वीं सदी के अंत तक सरकारी एवं व्यक्तिगत प्रयासों से शिक्षा का अपेक्षाकृत व्यापक प्रसार हुआ इसके साथ ही शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में भी वृद्धि हुई चूँकि इन युवाओं पर आधुनिक विचारों का प्रभाव था तथा बेरोजगारी के कारण असंतोष भी था अतः इनका झुकाव उग्रराष्ट्रवाद की ओर बढ़ता गया सुधारकों की भूमिका 19वीं सदी के उत्तरार्ध में दयानंद सरस्वती तथा विवेकानंद जैसे सुधारकों के लेखों, विचारों एवं गतिविधियों ने स्वदेशी संस्कृति के प्रति गौरव का एहसास कराया आत्म विश्वास एवं ऊर्जा का संचार भी किया युवाओं पर इनका विशेष प्रभाव देखा गया अंतर्राष्ट्रीय कारक 1890 के पश्चात जापान का तेजी से आधुनिक राष्ट्र के रूप में उदय हुआ और 1905 में जापान ने रूस को पराजित किया इस घटना ने राष्ट्रवादियों को प्रेरित एवं उत्साहित किया कि जापान जैसा छोटा राष्ट्र आत्मनिर्भर हो सकता है तथा बड़ी शक्तियों को चुनौती दे सकता है तो भारत हम भी एक जुट हो कर ऐसा कर सकते हैं इसी प्रकार 1896 में इथियोपिया के द्वारा इटली को पराजित किये जाने की घटना ने राष्ट्रवादियों को उत्साहित किया गरमदलीय नेताओं की उपस्थिति एवं गतिविधियाँ कांग्रेस की स्थापना के समय से ही गरमदलीय नेताओं की उपस्थिति तथा देश के अलग अलग हिस्सों में उनके द्वारा अपनाए जाने वाले उग्र तरीकों को देख सकते हैं जैसे 1890 के दशक में तिलक ने महाराष्ट्र में कर न देने का आन्दोलन चलाया, इसी प्रकार पंजाब में लाजपत राय तथा बंगाल में अरविन्द घोष व विपिनचंद्र पाल सक्रिय थे इन नेताओंकी कार्यशैली के कारण युवाओं का इनके प्रति झुकाव बढ़ता गया इसी के साथ राष्ट्रीय आन्दोलन में गरमदलीय युग की शुरुआत हुई| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरमपंथी राष्ट्रवाद के उदय के पीछे विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कारक उत्तरदायी थे| गरमपंथी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय आन्दोलन के मध्यवर्गीय चरित्र को जनांदोलन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| इसके साथ ही राष्ट्रीय आन्दोलन को बहिष्कार जैसे उग्र उपकरणों से सुसज्जित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी|
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लोकसभा किन-किन मामलों में राज्यसभा से ज्यादा शक्तियां रखती हैं? साथ ही, राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द , अंक - 10 ) In which cases the Lok Sabha has more powers than the Rajya Sabha? Also, Mention the specific powers of the Rajya Sabha. (150-200 words, Marks- 10)
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एप्रोच- संसद के अभिन्न अंग के रूप में लोकसभा तथा राज्यसभा की सम्मिलित भूमिका के संदर्भ में कुछ उदाहरणों के साथ संक्षिप्त रूप से पृष्ठभूमि लिखिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, उन मामलों का उल्लेख कीजिये जब लोकसभा राज्यसभा के मुकाबले ज्यादा अधिकार रखती है| अंतिम भाग में,राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- संविधान ने ज्यादातर विषयों के संदर्भ में संसद के दोनों सदनों को समान अधिकार प्रदान किये हैं जैसे- सामान्य विधेयकों पर विचार विमर्श तथा उन्हें पारित करना; राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का चुनाव, महाभियोग आदि| हालाँकि निम्न मामलों में लोकसभा को राज्यसभा के मुकाबले ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं- धन विधेयक तथा वित्त विधेयक(1) को केवल लोकसभा में पुरःस्थापित किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं| राज्यसभा द्वारा धन विधेयक को अस्वीकृत/संशोधित नहीं किया जा सकता है| कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, यह प्रमाणित करने की अंतिम शक्ति लोकसभा अध्यक्ष के पास; दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा; राज्यसभा केवल बजट पर चर्चा कर सकती है, उसके अनुदान की मांगों पर मतदान नहीं कर सकती| राष्ट्रीय आपातकाल की समाप्ति के लिए संकल्प को लोकसभा द्वारा ही पारित कराया जा सकता है, राज्यसभा द्वारा नहीं| राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को नहीं हटा सकती है| मंत्रिपरिषद राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है| वह केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है| हालाँकि, संविधान में भारत के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए राज्यसभा को कुछ विशिष्ट शक्तियां सौंपी गयी हैं- राज्यों के मामले पर कानून(अनुच्छेद 249) - राज्यसभा द्वारा उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प द्वारा राष्ट्रीय हित में आवश्यक राज्य सूची के विषयों पर भी भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने हेतु संघीय विधायिका को स्वीकृति; अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन(अनुच्छेद 312) -राज्यसभा द्वारा उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प से संघ या राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन के लिए उपबंध; उपराष्ट्रपति को हटाने संबंधित प्रस्ताव का आरंभ; उपरोक्त अधिकार विशिष्ट रूप से सिर्फ राज्यसभा को ही प्राप्त हैं क्योंकि राज्यसभा एक संघीय सदन है तथा वह राज्यों की आकांक्षाओं तथा उनके हितों के प्रति सदैव संवेदनशील तथा प्रतिबद्ध रहती है| इस प्रक्रिया में यह देश के संघीय ढाँचे को मजबूती प्रदान करती है तथा राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करती है| साथ ही, लोकसभा से हड़बड़ी में स्वीकृत विधयकों पर यह विचार-विमर्श कर कानूनों को और प्रभावी बनाने में भी अपना बहुमूल्य योगदान देती है|
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##Question:लोकसभा किन-किन मामलों में राज्यसभा से ज्यादा शक्तियां रखती हैं? साथ ही, राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द , अंक - 10 ) In which cases the Lok Sabha has more powers than the Rajya Sabha? Also, Mention the specific powers of the Rajya Sabha. (150-200 words, Marks- 10)##Answer:एप्रोच- संसद के अभिन्न अंग के रूप में लोकसभा तथा राज्यसभा की सम्मिलित भूमिका के संदर्भ में कुछ उदाहरणों के साथ संक्षिप्त रूप से पृष्ठभूमि लिखिए| मुख्य भाग के पहले हिस्से में, उन मामलों का उल्लेख कीजिये जब लोकसभा राज्यसभा के मुकाबले ज्यादा अधिकार रखती है| अंतिम भाग में,राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियों का उल्लेख कीजिये| उत्तर- संविधान ने ज्यादातर विषयों के संदर्भ में संसद के दोनों सदनों को समान अधिकार प्रदान किये हैं जैसे- सामान्य विधेयकों पर विचार विमर्श तथा उन्हें पारित करना; राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति का चुनाव, महाभियोग आदि| हालाँकि निम्न मामलों में लोकसभा को राज्यसभा के मुकाबले ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं- धन विधेयक तथा वित्त विधेयक(1) को केवल लोकसभा में पुरःस्थापित किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं| राज्यसभा द्वारा धन विधेयक को अस्वीकृत/संशोधित नहीं किया जा सकता है| कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, यह प्रमाणित करने की अंतिम शक्ति लोकसभा अध्यक्ष के पास; दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा; राज्यसभा केवल बजट पर चर्चा कर सकती है, उसके अनुदान की मांगों पर मतदान नहीं कर सकती| राष्ट्रीय आपातकाल की समाप्ति के लिए संकल्प को लोकसभा द्वारा ही पारित कराया जा सकता है, राज्यसभा द्वारा नहीं| राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को नहीं हटा सकती है| मंत्रिपरिषद राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है| वह केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है| हालाँकि, संविधान में भारत के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए राज्यसभा को कुछ विशिष्ट शक्तियां सौंपी गयी हैं- राज्यों के मामले पर कानून(अनुच्छेद 249) - राज्यसभा द्वारा उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प द्वारा राष्ट्रीय हित में आवश्यक राज्य सूची के विषयों पर भी भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने हेतु संघीय विधायिका को स्वीकृति; अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन(अनुच्छेद 312) -राज्यसभा द्वारा उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प से संघ या राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन के लिए उपबंध; उपराष्ट्रपति को हटाने संबंधित प्रस्ताव का आरंभ; उपरोक्त अधिकार विशिष्ट रूप से सिर्फ राज्यसभा को ही प्राप्त हैं क्योंकि राज्यसभा एक संघीय सदन है तथा वह राज्यों की आकांक्षाओं तथा उनके हितों के प्रति सदैव संवेदनशील तथा प्रतिबद्ध रहती है| इस प्रक्रिया में यह देश के संघीय ढाँचे को मजबूती प्रदान करती है तथा राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करती है| साथ ही, लोकसभा से हड़बड़ी में स्वीकृत विधयकों पर यह विचार-विमर्श कर कानूनों को और प्रभावी बनाने में भी अपना बहुमूल्य योगदान देती है|
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सुशासन की स्थापना में जन भागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। भारत में जनभागीदारी के विकास में बाधक कारकों को स्पष्ट करते हुए भागीदारी बढाने के लिए सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of public participation in the establishment of good governance. Clarifying the obstructing factors in the development of public participation in India,Discuss the steps taken by the government to increase participation. (150 to 200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन और भागीदारी के अंतर्संबंध को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में जनभागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में बाधक कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये 5- अंतिम में भारत में जनभागीदारी के विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता, दक्षता और जन भागीदारी को शामिल किया जाता है| शासन तंत्र में जनता की भागीदारी को जनभागीदारी कहते हैं| भागीदारी लोकतंत्र का प्राण है,भागीदारी जितनी अधिक होगी प्रशासन उतना ही सुशासन की और बढेगा| शासन में जनभागीदारी का विकास क्रमिक रूप से होता है| सुशासन का प्रमुख उद्देश्य निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी को बढ़ाना है| जनभागदारी का महत्त्व लोकतंत्र के विकास और उसकी मजबूती के लिए तथा शासन को जनोंन्मुख बनाने के लिए भागीदारी आवश्यक है यह शासन प्रशासन पर जन नियंत्रण स्थापित करने में सहायक है| भागीदारी से प्रतिपुष्टि(फीडबेक) की संस्कृति का विकास होगा| फीडबैक से सतत विकास सुनिश्चित होगा भागीदारी से आत्मनिर्भरता आएगी इससे सरकार का आर्थिक बोझ कम होता जाएगा जैसे सरकारी योजनाओं में भागीदारी करने पर स्थानीय कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं होगी, स्वच्छ भारत अभियान की सफलता भागीदारी पर ही निर्भर है यह सामाजिक परिवर्तन में सहायक है जैसे भागीदारी के कारण ट्रिपल तलाक पर चेतना निर्माण में सहजता हुई और इसका विरोध नहीं हो पाया भागीदारी से तीव्र एवं सकारात्मक दिशा में प्रशासनिक परिवर्तन भी सुनिश्चित होता है भागीदारी बढाने में बाधायें नागरिक चेतना(अधिकारों और दायित्वों के प्रति) का अभाव अभिजात्यवर्गीय/सामंतवादी सोच, इसे प्रभावित कर पाना मुश्किल होता है| यदि अभिजात्यवर्ग में संचरण की गति अधिक है तो इन्हें प्रभावित किया जा सकता है| 1980 के बाद यह संचरण बढ़ा है इससे सामाजिक अभिजात्यवर्ग में वृद्धि हुई और इन्हें प्रभावित करना अपेक्षाकृत रूप से सहज था| किन्तु यदि सामाजिक अभिजात्यवर्ग को स्थायी बना दिया जाएगा तो वे स्वयं को प्राकृतिक अभिजात्य समझने लगेंगे इसीलिए सरकारों को बदलते रहना चाहिए जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के आधार पर समाज में अलगाव है| इससे सामूहिक चेतना का विकास नहीं हो पाता है| अलगाव युक्त चेतना से युक्त भागीदारी वस्तुतः नकारात्मक भागीदारी होती है भारत में बिचौलियेपन का प्रभाव का बना होना जैसे भ्रष्टाचार, आचार संहिता के निम्न मानक तथा व्यापक मानकों का अभाव आदि के कारण भारत में भागीदारी बाधित होती है| किन्तु सुशासन के सन्दर्भ में जनभागीदारी के महत्त्व को देखते हुए भारत सरकार ने जनभागीदारी को बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत सरकार जन भागीदारी बढाने के लिए प्रयासरत है इसमें भारतीय न्यायपालिका एवं निर्वाचन आयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है SC ने निर्णय दिया था कि प्रत्याशियों के बारे में जानकारी लेना नागरिकों का अधिकार है| इसी तरह एक अन्य निर्णय में कहा गया कि प्रत्येक प्रत्याशी अपने उपर चल रहे मुकदमों को मतदाताओं को बताएगा न्यायालय ने नौकरशाही में स्थायित्व लाने के भी प्रयास किये हैं जैसे त्वरित स्थानान्तरण पर रोक के निर्देश आदि चुनाव आयोग, नौकरशाही में तटस्थता के भाव के विकास के लिए प्रयास कर रहा है| आचारसंहिता की घोषणा के बाद नौकरशाही निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में आ जाती है इस महीने के कर्मचारी नामक पहल(2014) गृह मंत्रालय द्वारा चलाई गयी है| इससे नौकरशाही का उत्साहवर्धन होता है और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी आईडिया बॉक्स नामक पहल से भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं अभी हाल ही में आरम्भ की गयी mygov नामक साईट इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है भारत में 1980 के पूर्व प्रतिनिधियात्मक भागीदारी का दौर था| किन्तु 1980 के बाद बहुदलीय स्थिति का दौर आया,इस चरण में राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के साथ भागीदारी बढ़ी किन्तु राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के कारण राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हुई| वर्ष 2000 के बाद विमर्शी लोकतंत्र(नीति निर्माण में विमर्श) का चरण आया| इस चरण में विचारों के समावेश करने और उनमें समन्वय स्थापना के प्रयास किये गए और एक दुसरे के प्रति समझ बढाने का प्रयास किया गया जिससे UPA और NDA जैसी अवधारणायें सामने आयीं| वर्ष 2010 के बाद के चुनावों में चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| वर्तमान में फेसबुक, ट्विटर mygov आदि प्लेटफॉर्म्स की मदद से निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं|
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##Question:सुशासन की स्थापना में जन भागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। भारत में जनभागीदारी के विकास में बाधक कारकों को स्पष्ट करते हुए भागीदारी बढाने के लिए सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये। (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain the importance of public participation in the establishment of good governance. Clarifying the obstructing factors in the development of public participation in India,Discuss the steps taken by the government to increase participation. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन और भागीदारी के अंतर्संबंध को स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में जनभागीदारी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में बाधक कारकों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की चर्चा कीजिये 5- अंतिम में भारत में जनभागीदारी के विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता, दक्षता और जन भागीदारी को शामिल किया जाता है| शासन तंत्र में जनता की भागीदारी को जनभागीदारी कहते हैं| भागीदारी लोकतंत्र का प्राण है,भागीदारी जितनी अधिक होगी प्रशासन उतना ही सुशासन की और बढेगा| शासन में जनभागीदारी का विकास क्रमिक रूप से होता है| सुशासन का प्रमुख उद्देश्य निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी को बढ़ाना है| जनभागदारी का महत्त्व लोकतंत्र के विकास और उसकी मजबूती के लिए तथा शासन को जनोंन्मुख बनाने के लिए भागीदारी आवश्यक है यह शासन प्रशासन पर जन नियंत्रण स्थापित करने में सहायक है| भागीदारी से प्रतिपुष्टि(फीडबेक) की संस्कृति का विकास होगा| फीडबैक से सतत विकास सुनिश्चित होगा भागीदारी से आत्मनिर्भरता आएगी इससे सरकार का आर्थिक बोझ कम होता जाएगा जैसे सरकारी योजनाओं में भागीदारी करने पर स्थानीय कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं होगी, स्वच्छ भारत अभियान की सफलता भागीदारी पर ही निर्भर है यह सामाजिक परिवर्तन में सहायक है जैसे भागीदारी के कारण ट्रिपल तलाक पर चेतना निर्माण में सहजता हुई और इसका विरोध नहीं हो पाया भागीदारी से तीव्र एवं सकारात्मक दिशा में प्रशासनिक परिवर्तन भी सुनिश्चित होता है भागीदारी बढाने में बाधायें नागरिक चेतना(अधिकारों और दायित्वों के प्रति) का अभाव अभिजात्यवर्गीय/सामंतवादी सोच, इसे प्रभावित कर पाना मुश्किल होता है| यदि अभिजात्यवर्ग में संचरण की गति अधिक है तो इन्हें प्रभावित किया जा सकता है| 1980 के बाद यह संचरण बढ़ा है इससे सामाजिक अभिजात्यवर्ग में वृद्धि हुई और इन्हें प्रभावित करना अपेक्षाकृत रूप से सहज था| किन्तु यदि सामाजिक अभिजात्यवर्ग को स्थायी बना दिया जाएगा तो वे स्वयं को प्राकृतिक अभिजात्य समझने लगेंगे इसीलिए सरकारों को बदलते रहना चाहिए जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के आधार पर समाज में अलगाव है| इससे सामूहिक चेतना का विकास नहीं हो पाता है| अलगाव युक्त चेतना से युक्त भागीदारी वस्तुतः नकारात्मक भागीदारी होती है भारत में बिचौलियेपन का प्रभाव का बना होना जैसे भ्रष्टाचार, आचार संहिता के निम्न मानक तथा व्यापक मानकों का अभाव आदि के कारण भारत में भागीदारी बाधित होती है| किन्तु सुशासन के सन्दर्भ में जनभागीदारी के महत्त्व को देखते हुए भारत सरकार ने जनभागीदारी को बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| सरकार द्वारा उठाये गए कदम भारत सरकार जन भागीदारी बढाने के लिए प्रयासरत है इसमें भारतीय न्यायपालिका एवं निर्वाचन आयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है SC ने निर्णय दिया था कि प्रत्याशियों के बारे में जानकारी लेना नागरिकों का अधिकार है| इसी तरह एक अन्य निर्णय में कहा गया कि प्रत्येक प्रत्याशी अपने उपर चल रहे मुकदमों को मतदाताओं को बताएगा न्यायालय ने नौकरशाही में स्थायित्व लाने के भी प्रयास किये हैं जैसे त्वरित स्थानान्तरण पर रोक के निर्देश आदि चुनाव आयोग, नौकरशाही में तटस्थता के भाव के विकास के लिए प्रयास कर रहा है| आचारसंहिता की घोषणा के बाद नौकरशाही निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में आ जाती है इस महीने के कर्मचारी नामक पहल(2014) गृह मंत्रालय द्वारा चलाई गयी है| इससे नौकरशाही का उत्साहवर्धन होता है और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी आईडिया बॉक्स नामक पहल से भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं अभी हाल ही में आरम्भ की गयी mygov नामक साईट इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है भारत में 1980 के पूर्व प्रतिनिधियात्मक भागीदारी का दौर था| किन्तु 1980 के बाद बहुदलीय स्थिति का दौर आया,इस चरण में राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के साथ भागीदारी बढ़ी किन्तु राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के कारण राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हुई| वर्ष 2000 के बाद विमर्शी लोकतंत्र(नीति निर्माण में विमर्श) का चरण आया| इस चरण में विचारों के समावेश करने और उनमें समन्वय स्थापना के प्रयास किये गए और एक दुसरे के प्रति समझ बढाने का प्रयास किया गया जिससे UPA और NDA जैसी अवधारणायें सामने आयीं| वर्ष 2010 के बाद के चुनावों में चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| वर्तमान में फेसबुक, ट्विटर mygov आदि प्लेटफॉर्म्स की मदद से निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं|
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लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के एक ही समय मेंचुनाव, चुनाव -प्रसार की अवधि और व्यय को तो सीमित कर देंगे, परन्तु ऐसा करने से लोगों के प्रति सरकार की जबावदेही कम हो जाएगी। चर्चा कीजिये। (150 -200 शब्द ) The elections of the Lok Sabha and the state legislature in sync will limit election-time duration and expenditure, but doing so will reduce the government"s responsiveness to the people. Discuss (150 -200 words)
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एप्रोच : लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के ही समय में चुनाव कराने की आवश्यकता को बताते हुए भूमिका दीजिये। लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के ही समय में चुनाव कराने के लाभों को लिखिए। इसके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों को बताइये। सुझावात्मक व संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप : चुनावों को लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। अगर हम देश में होने वाले चुनावों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि हर वर्ष किसी-न-किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। चुनावों की इस निरंतरता के कारण देश लगातारचुनावी मोडमें बना रहता है। इससे न केवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ भी पड़ता है। निश्चित ही ऐसी परिस्थतियों में ‘एक देश-एक चुनाव’ विचार पहली नज़र में अच्छा प्रतीत होता है, पर यह व्यावहारिक है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। बेशक बार-बार होने वाले चुनावों के बजाय एक स्थायित्व वाली सरकार बेहतर होती है, लेकिन इसके लिये सबसे ज़रूरी है आम सहमति का होना और यह कार्य बेहद मुश्किल है। एक देश-एक चुनाव के लाभ : ‘एक देश-एक चुनाव’ से सार्वजनिक धन की बचत होगी, प्रशासनिक सेटअप और सुरक्षा बलों पर भार कम होगा, सरकार की नीतियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और यह भी सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाय विकासात्मक गतिविधियों में लगी रहे। मतदाता सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर परख सकेंगे। इसके अलावा, मतदाताओं के लिये यह तय करने में आसानी होगी कि किस राजनीतिक दल ने क्या वादे किये थे और वह उन पर कितना खरा उतरा। सत्ता चला रहे राजनीतिज्ञों के लिये यह देखना भी ज़रूरी है कि बार-बार चुनाव होते रहने से शासन-प्रशासन में जो व्यवधान आ जाते हैं, उनको दूर किया जाए। प्रायः यह देखा जाता है कि किसी विशेष विधानसभा चुनाव में अल्पकालिक राजनीतिक लाभ उठाने के लिये सत्तारूढ़ राजनेता ऐसे कठोर दीर्घकालिक निर्णय लेने से बचते हैं, जो अंततः देश को लंबे समय में मदद कर सकता है। पाँच साल में एक बार चुनाव कराने से सभी हितधारकों यानी राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, अर्द्धसैनिक बलों, नागरिकों को इसकी तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकता है। इसके समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ: इसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को समन्वित करने की है, ताकि दोनों का चुनाव निश्चित समय के भीतर हो सके। राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के साथ समन्वित करने के लिये राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को तदनुसार घटाया और बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके लिये कुछ संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी: अनुच्छेद 83:इसमें कहा गया है कि लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष का होगा। अनुच्छेद 85:यह राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 172:इसमें कहा गया है कि विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष का होगा। अनुच्छेद 174:यह राज्य के राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 356:यह केंद्र सरकार को राज्य में संवैधानिक मशीनरी की विफलता के मद्देनज़र राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार देता है। इनके अलावाजनप्रतिनिधित्वअधिनियमके साथ-साथ संबंधितसंसदीय प्रक्रियामें भी संशोधन करना होगा। ‘एक देश-एक चुनाव’ के लिये सभी राजनीतिक दलों को राज़ी करना आसान काम नहीं है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की आवधारणा देश के संघात्मक ढाँचे के विपरीत सिद्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त चुनाव में बड़ी मात्रा में खर्च होने वाला धन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कारणों में सबसे ऊपर है। ऐसे में चुनाव की बारंबारता में रोक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मज़बूत कदम साबित हो सकता है। लॉजिस्टिक संबंधी चुनौतियाँ वर्तमान में मतदान करने के लिये प्रत्येक मतदान केंद्र पर एक EVM का उपयोग एक VVPAT मशीन के साथ किया जा रहा है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। अतिरिक्त मतदान कर्मियों के साथ बेहतर और चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होगी और यह काम केंद्रीय पुलिस बलों की संख्या बढ़ाए बिना करना संभव नहीं है। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में EVM और VVPAT मशीनों को सुरक्षित रखना भी एक बड़ी चुनौती होगा, क्योंकि निर्वाचन आयोग को वर्तमान में ही इन्हें सुरक्षित रखने की समस्या से जूझना पड़ रहा है। यह सही है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी राजस्व और समय की बचत होगी तथा नीति निर्णयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी। इसके साथ हीविश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हर समय चुनावी चक्रव्यूह में घिरा हुआ नजर आता है। देश को चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिये एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है। इसके तहत जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार, कालेधन पर रोक, राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक, लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल है.
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##Question:लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के एक ही समय मेंचुनाव, चुनाव -प्रसार की अवधि और व्यय को तो सीमित कर देंगे, परन्तु ऐसा करने से लोगों के प्रति सरकार की जबावदेही कम हो जाएगी। चर्चा कीजिये। (150 -200 शब्द ) The elections of the Lok Sabha and the state legislature in sync will limit election-time duration and expenditure, but doing so will reduce the government"s responsiveness to the people. Discuss (150 -200 words)##Answer:एप्रोच : लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के ही समय में चुनाव कराने की आवश्यकता को बताते हुए भूमिका दीजिये। लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के ही समय में चुनाव कराने के लाभों को लिखिए। इसके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों को बताइये। सुझावात्मक व संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप : चुनावों को लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। अगर हम देश में होने वाले चुनावों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि हर वर्ष किसी-न-किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। चुनावों की इस निरंतरता के कारण देश लगातारचुनावी मोडमें बना रहता है। इससे न केवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ भी पड़ता है। निश्चित ही ऐसी परिस्थतियों में ‘एक देश-एक चुनाव’ विचार पहली नज़र में अच्छा प्रतीत होता है, पर यह व्यावहारिक है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। बेशक बार-बार होने वाले चुनावों के बजाय एक स्थायित्व वाली सरकार बेहतर होती है, लेकिन इसके लिये सबसे ज़रूरी है आम सहमति का होना और यह कार्य बेहद मुश्किल है। एक देश-एक चुनाव के लाभ : ‘एक देश-एक चुनाव’ से सार्वजनिक धन की बचत होगी, प्रशासनिक सेटअप और सुरक्षा बलों पर भार कम होगा, सरकार की नीतियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और यह भी सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाय विकासात्मक गतिविधियों में लगी रहे। मतदाता सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर परख सकेंगे। इसके अलावा, मतदाताओं के लिये यह तय करने में आसानी होगी कि किस राजनीतिक दल ने क्या वादे किये थे और वह उन पर कितना खरा उतरा। सत्ता चला रहे राजनीतिज्ञों के लिये यह देखना भी ज़रूरी है कि बार-बार चुनाव होते रहने से शासन-प्रशासन में जो व्यवधान आ जाते हैं, उनको दूर किया जाए। प्रायः यह देखा जाता है कि किसी विशेष विधानसभा चुनाव में अल्पकालिक राजनीतिक लाभ उठाने के लिये सत्तारूढ़ राजनेता ऐसे कठोर दीर्घकालिक निर्णय लेने से बचते हैं, जो अंततः देश को लंबे समय में मदद कर सकता है। पाँच साल में एक बार चुनाव कराने से सभी हितधारकों यानी राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, अर्द्धसैनिक बलों, नागरिकों को इसकी तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकता है। इसके समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ: इसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को समन्वित करने की है, ताकि दोनों का चुनाव निश्चित समय के भीतर हो सके। राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के साथ समन्वित करने के लिये राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को तदनुसार घटाया और बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके लिये कुछ संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी: अनुच्छेद 83:इसमें कहा गया है कि लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष का होगा। अनुच्छेद 85:यह राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 172:इसमें कहा गया है कि विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष का होगा। अनुच्छेद 174:यह राज्य के राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 356:यह केंद्र सरकार को राज्य में संवैधानिक मशीनरी की विफलता के मद्देनज़र राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार देता है। इनके अलावाजनप्रतिनिधित्वअधिनियमके साथ-साथ संबंधितसंसदीय प्रक्रियामें भी संशोधन करना होगा। ‘एक देश-एक चुनाव’ के लिये सभी राजनीतिक दलों को राज़ी करना आसान काम नहीं है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की आवधारणा देश के संघात्मक ढाँचे के विपरीत सिद्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त चुनाव में बड़ी मात्रा में खर्च होने वाला धन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कारणों में सबसे ऊपर है। ऐसे में चुनाव की बारंबारता में रोक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मज़बूत कदम साबित हो सकता है। लॉजिस्टिक संबंधी चुनौतियाँ वर्तमान में मतदान करने के लिये प्रत्येक मतदान केंद्र पर एक EVM का उपयोग एक VVPAT मशीन के साथ किया जा रहा है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। अतिरिक्त मतदान कर्मियों के साथ बेहतर और चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होगी और यह काम केंद्रीय पुलिस बलों की संख्या बढ़ाए बिना करना संभव नहीं है। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में EVM और VVPAT मशीनों को सुरक्षित रखना भी एक बड़ी चुनौती होगा, क्योंकि निर्वाचन आयोग को वर्तमान में ही इन्हें सुरक्षित रखने की समस्या से जूझना पड़ रहा है। यह सही है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी राजस्व और समय की बचत होगी तथा नीति निर्णयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी। इसके साथ हीविश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हर समय चुनावी चक्रव्यूह में घिरा हुआ नजर आता है। देश को चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिये एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है। इसके तहत जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार, कालेधन पर रोक, राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक, लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल है.
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संसदीय विशेषाधिकारों का वर्णन कीजिये। इसी संबंध में स्पष्ट कीजिये कि विशेषाधिकारों का हनन, सदन की अवमानना से किस प्रकार पृथक है ? (150 -200 शब्द/10 अंक ) Describe parliamentary privileges. In this context, explain how the violation of privileges is different from contempt of the House. (150 -200 words/10 marks)
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एप्रोच: संसदीय विशेषाधिकारों को परिभाषित करते हुए प्रारम्भ कीजिये। विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना स्पष्ट कीजिये कीजिये। विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना में भिन्नता को बताते हुए तुलना कीजिये। उत्तर प्रारूप : संसदीय विशेषाधिकार, विशेष अधिकार , उन्मुक्तियाँ व छूटें है जो संसद के दोनों सदनों , इसकी समितियों ,इसके सदस्यों को प्राप्त होते है। यह इनके कार्यों की स्वतंत्रता तथा प्रभाविकता के लिए आवश्यक होते है। इन अधिकारों के बिना सदन ना तो अपनी स्वायत्ता , महानता तथा सम्मान को संभाल सकता है और ना ही अपने सदस्यों को, किसी भी संसदीय उत्तरदायित्वों के निर्वहन से सुरक्षा प्रदान करता है। संविधान ने संसदीय अधिकार उन व्यक्तियों को भी दिए है जो संसद के सदनों या इसकी किसी भी समिति में बोलते या हिस्सा लेते है। इनमें भारत के महान्यायवादी व केंद्रीय मंत्री शामिल है। विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना : जब कोई व्यक्ति या प्राधिकारी किसी संसद सदस्य की व्यक्तिगत और संयुक्त क्षमता में इसके विशेषाधिकारों , अधिकारों व उन्मुक्तियों का अपमान या उन पर आक्रमण करता है तो इसे विशेषाधिकार हनन कहा जाता है और यह सदन द्वारा दण्डनीय है। इसी तरह जबकिसी भी तरह का कृत्य या चूक , जो सदन या इसके सदस्यों या अधिकारीयों के कार्य संपादन में बाधा डाले , जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सदन की मर्यादा ,शक्ति तथा सम्मान के विपरीत हो, को सदन की अवमानना माना जाता है विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना में तुलना : सामान्य रूप से इन्हें एक दूसरे से समान समझा जा सकता है तथा विशेषाधिकार हनन , सदन की अवमानना हो सकती है इसी प्रकार सदन की अवमानना में विशेषाधिकार हनन शामिल हो सकता है , किन्तु सदन की अवमानना के अर्थ का व्यापक प्रभावहोताहै। विशेषाधिकार हनन के बिना भी सदन की अवमानना हो सकती है इसी प्रकार ऐसे कृत्य जो किसी विशिष्ट विशेषाधिकार का हनन नहीं है परन्तु वे सदन की मर्यादा और प्राधिकार के विरुद्ध सदन की अवमानना हो सकते है। जैसे सदन के विधायी आदेश को ना मानना विशेषाधिकार का हनन नहीं है , किन्तु सदन की अवमानना के लिए दण्डित किया जा सकता है। इसी प्रकार विशेषाधिकार हनन की स्थिति में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया जाताहै जोकिसी मंत्री द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित है यह किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है , जब सदस्य द्वारा महसूस किया जाता है की सही तथ्यों को प्रकट नहीं किया गया। या गलत सूचना देकर किसी मंत्री ने सदन या सदन के एक से अधिक सदस्यों के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है इसका उद्देश्य सम्बंधित मंत्री की निंदा करना है।
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##Question:संसदीय विशेषाधिकारों का वर्णन कीजिये। इसी संबंध में स्पष्ट कीजिये कि विशेषाधिकारों का हनन, सदन की अवमानना से किस प्रकार पृथक है ? (150 -200 शब्द/10 अंक ) Describe parliamentary privileges. In this context, explain how the violation of privileges is different from contempt of the House. (150 -200 words/10 marks)##Answer:एप्रोच: संसदीय विशेषाधिकारों को परिभाषित करते हुए प्रारम्भ कीजिये। विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना स्पष्ट कीजिये कीजिये। विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना में भिन्नता को बताते हुए तुलना कीजिये। उत्तर प्रारूप : संसदीय विशेषाधिकार, विशेष अधिकार , उन्मुक्तियाँ व छूटें है जो संसद के दोनों सदनों , इसकी समितियों ,इसके सदस्यों को प्राप्त होते है। यह इनके कार्यों की स्वतंत्रता तथा प्रभाविकता के लिए आवश्यक होते है। इन अधिकारों के बिना सदन ना तो अपनी स्वायत्ता , महानता तथा सम्मान को संभाल सकता है और ना ही अपने सदस्यों को, किसी भी संसदीय उत्तरदायित्वों के निर्वहन से सुरक्षा प्रदान करता है। संविधान ने संसदीय अधिकार उन व्यक्तियों को भी दिए है जो संसद के सदनों या इसकी किसी भी समिति में बोलते या हिस्सा लेते है। इनमें भारत के महान्यायवादी व केंद्रीय मंत्री शामिल है। विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना : जब कोई व्यक्ति या प्राधिकारी किसी संसद सदस्य की व्यक्तिगत और संयुक्त क्षमता में इसके विशेषाधिकारों , अधिकारों व उन्मुक्तियों का अपमान या उन पर आक्रमण करता है तो इसे विशेषाधिकार हनन कहा जाता है और यह सदन द्वारा दण्डनीय है। इसी तरह जबकिसी भी तरह का कृत्य या चूक , जो सदन या इसके सदस्यों या अधिकारीयों के कार्य संपादन में बाधा डाले , जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सदन की मर्यादा ,शक्ति तथा सम्मान के विपरीत हो, को सदन की अवमानना माना जाता है विशेषाधिकारों का हनन व सदन की अवमानना में तुलना : सामान्य रूप से इन्हें एक दूसरे से समान समझा जा सकता है तथा विशेषाधिकार हनन , सदन की अवमानना हो सकती है इसी प्रकार सदन की अवमानना में विशेषाधिकार हनन शामिल हो सकता है , किन्तु सदन की अवमानना के अर्थ का व्यापक प्रभावहोताहै। विशेषाधिकार हनन के बिना भी सदन की अवमानना हो सकती है इसी प्रकार ऐसे कृत्य जो किसी विशिष्ट विशेषाधिकार का हनन नहीं है परन्तु वे सदन की मर्यादा और प्राधिकार के विरुद्ध सदन की अवमानना हो सकते है। जैसे सदन के विधायी आदेश को ना मानना विशेषाधिकार का हनन नहीं है , किन्तु सदन की अवमानना के लिए दण्डित किया जा सकता है। इसी प्रकार विशेषाधिकार हनन की स्थिति में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया जाताहै जोकिसी मंत्री द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित है यह किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है , जब सदस्य द्वारा महसूस किया जाता है की सही तथ्यों को प्रकट नहीं किया गया। या गलत सूचना देकर किसी मंत्री ने सदन या सदन के एक से अधिक सदस्यों के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है इसका उद्देश्य सम्बंधित मंत्री की निंदा करना है।
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भारत में स्वतंत्रता पश्चात सामाजिक न्याय का दृष्टिकोण निरंतर रूप से विकसित होता गया है| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) In India, the approach to social justice has been continuously developed after independence. Explain (150 to 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सामाजिक न्याय को परिभाषित कीजिये| 2- मुख्य भाग में सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण के विकास के तीनों चरणों के विकास को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में सामाजिक न्याय की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जॉन रोल्स के अनुसार न्याय से तात्पर्य व्यक्ति को समय रहते वह पुरुस्कार या दंड सुनिश्चित करना है, जिसका वह उत्तराधिकारी हो।इसके निम्नलिखित 3 घटक होते हैयथा विधि शासन सुनिश्चित होना, ना सिर्फ कृत्य अपितु भावनाओं को भी संदर्भित करते हुए पुरुस्कार या दंड सुनिश्चित करनातथा बिना किसी पूर्वाग्रह के साक्ष्यों एवं तथ्यों के आधार पर सभी पक्षों की बात सुनते हुए निर्णय लेनायदि सामाजिक प्रक्रिया में इन सभी घटकों को समावेशित किया जाये तो सामाजिक न्याय की प्रक्रिया का जन्म होता है| भारतीय परिप्रेक्ष्य में जिस प्रकार से सामाजिक न्याय को क्रियान्वित करने के प्रयास किये गए उस आधार पर इन्हें तीन चरणों में बाटा जाता है| प्रथम चरण (1947 से 1991) प्रथम चरण वर्ष 1947 से वर्ष 1991 तक चला| इस कालखंड में समाजवादी दृष्टिकोण के साथ सामाजिक न्याय की जिम्मेदारी पूर्णरूपेण सरकार और शासन व्यवस्था की थी प्रथम चरण में नौकरशाही को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देते हुए न केवल आर्थिक प्रगति के लक्ष्य निर्धारित किये गए बल्कि बल्कि इसके साथ ही लोक कल्याण को भी शासन व्यवस्था की ही जिम्मेदारी समझी गयी शासन व्यवस्था के संदर्भ में नेहरु का दृष्टिकोण लेनिन से प्रेरित था, लेनिन का यह मानना था कि समाजवाद हेतु यह अनिवार्य है कि व्यावसायिक गतिविधियों के मूलस्तम्भ स्टील रेलवे कोयला एवं विद्युत् आपूर्ति सदैव राज्य के नियंत्रण में होने चाहिए जिसकी जिम्मेदारी लेनिन ने रेड आर्मी को सौंपी थी| भारतीय संदर्भ में नेहरु जी भी इस मत के पक्षधर थे यही कारण है कि इन स्रोतों के नियंत्रण की जिम्मेदारी नौकरशाही के कन्धों पर रखी गयी| इस चरण में आय के स्रोतों का अभाव, बढ़ते कर्ज, शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार, बढ़ता वितीय घाटा एवं राजकोषीय घाटा ऐसे मुख्य कारण रहे जिसकी वजह से आर्थिक प्रगति की दर भी धीमी रही तथा लोक कल्याण के सन्दर्भ में भी संतोषजनक परिणाम न आ सके| द्वितीय चरण (उदारीकरण का काल) इस चरण में निजीकरण उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के माध्यम से सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में एक नया दृष्टिकोण अपनाया गया आर्थिक प्रगति हेतु लाइसेंस राज को समाप्त करते हुए निजी उपक्रमों को प्रगति की जिम्मेदारी सौपी गयी तथा शासन व्यवस्था ने अपना पूरा ध्यान लोक कल्याण की और उन्मुख किया इस कालखंड में अवसंरचनात्मक सुधारों के साथ साथ बढ़ते भ्रष्टाचार के प्रति चिंता जताते हुए प्रशासनिक सुधारों की बात की गयी इस चरण में जनसहभागिता बढाने की आवश्यकता महसूस की गयी| तृतीय चरण (विकास उद्योग का काल) इस चरण में अधिशासन के सन्दर्भ में एक नए दृष्टिकोण के साथ गवर्नमेंट से गवर्नेंस की तरफ प्रयास किये गए विश्व बैंक की 1992 की परिभाषा के अनुसार "गवर्नेंस से तात्पर्य सिविल सोसाइटियों को प्रोत्साहित करते हुए शासन व्यवस्था का क्रियान्वयन करना है" इस चरण में आर्थिक प्रगति एवं लोककल्याण दोनों संदर्भों में शासन व्यवस्था का प्रबंधकीयदृष्टिकोण अपनाते हुए जनसहभागिता को बढाया गया जिसे विकास उद्योग की संज्ञा दी गयी| विकास उद्योग से तात्पर्य उन सभी घटकों के मिलेजुले स्वरुप से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लोक कल्याण को प्रथम उद्देश्य मानते हों यही वह दौर था जिसमें एक नए दृष्टिकोण की नौकरशाही की आवश्यकता को समझते हुए उनके चयन की प्रक्रिया एवं ट्रेनिंग प्रक्रिया में संरचनात्मक परिवर्तन किये गए इसके साथ ही नागरिक सशक्तिकरण हेतु सोशल ऑडिट, सूचना का अधिकार, नागरिक घोषणापत्र आदि उपकरणों को भी मजबूत किया गया इस चरण में जनसहभागिता बढाने के लिए विश्व बैंक के मानकों को स्वीकार करते हुए सिविल सोसाइटियों को प्रोत्साहित किया गया इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत में सामाजिक न्याय की संकल्पना क्रमिक रूप से विकसित होती गयी है| हाल ही में प्रकाशित ऑक्सफेम इंडिया रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत में शीर्ष 1 % लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 58% है यह भारत में आय असामनता का भयावह चित्र प्रस्तुत करती है , इसके साथ ही भारत में लगभग 21 %जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। ऐसे में इस असामनता एवं गरीबी को दूर करने हेतु सामाजिक न्याय की संकल्पना अति महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान कीप्रस्तावना में भी सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने पर बल दिया है, जिसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों द्वारा सुनिश्चित किये जाने का प्रयास किया जा रहा है| वर्तमान में संविधान के उपरोक्त उद्देश्यों को विकास उद्योगों के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है|
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##Question:भारत में स्वतंत्रता पश्चात सामाजिक न्याय का दृष्टिकोण निरंतर रूप से विकसित होता गया है| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) In India, the approach to social justice has been continuously developed after independence. Explain (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सामाजिक न्याय को परिभाषित कीजिये| 2- मुख्य भाग में सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण के विकास के तीनों चरणों के विकास को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में सामाजिक न्याय की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| जॉन रोल्स के अनुसार न्याय से तात्पर्य व्यक्ति को समय रहते वह पुरुस्कार या दंड सुनिश्चित करना है, जिसका वह उत्तराधिकारी हो।इसके निम्नलिखित 3 घटक होते हैयथा विधि शासन सुनिश्चित होना, ना सिर्फ कृत्य अपितु भावनाओं को भी संदर्भित करते हुए पुरुस्कार या दंड सुनिश्चित करनातथा बिना किसी पूर्वाग्रह के साक्ष्यों एवं तथ्यों के आधार पर सभी पक्षों की बात सुनते हुए निर्णय लेनायदि सामाजिक प्रक्रिया में इन सभी घटकों को समावेशित किया जाये तो सामाजिक न्याय की प्रक्रिया का जन्म होता है| भारतीय परिप्रेक्ष्य में जिस प्रकार से सामाजिक न्याय को क्रियान्वित करने के प्रयास किये गए उस आधार पर इन्हें तीन चरणों में बाटा जाता है| प्रथम चरण (1947 से 1991) प्रथम चरण वर्ष 1947 से वर्ष 1991 तक चला| इस कालखंड में समाजवादी दृष्टिकोण के साथ सामाजिक न्याय की जिम्मेदारी पूर्णरूपेण सरकार और शासन व्यवस्था की थी प्रथम चरण में नौकरशाही को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देते हुए न केवल आर्थिक प्रगति के लक्ष्य निर्धारित किये गए बल्कि बल्कि इसके साथ ही लोक कल्याण को भी शासन व्यवस्था की ही जिम्मेदारी समझी गयी शासन व्यवस्था के संदर्भ में नेहरु का दृष्टिकोण लेनिन से प्रेरित था, लेनिन का यह मानना था कि समाजवाद हेतु यह अनिवार्य है कि व्यावसायिक गतिविधियों के मूलस्तम्भ स्टील रेलवे कोयला एवं विद्युत् आपूर्ति सदैव राज्य के नियंत्रण में होने चाहिए जिसकी जिम्मेदारी लेनिन ने रेड आर्मी को सौंपी थी| भारतीय संदर्भ में नेहरु जी भी इस मत के पक्षधर थे यही कारण है कि इन स्रोतों के नियंत्रण की जिम्मेदारी नौकरशाही के कन्धों पर रखी गयी| इस चरण में आय के स्रोतों का अभाव, बढ़ते कर्ज, शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार, बढ़ता वितीय घाटा एवं राजकोषीय घाटा ऐसे मुख्य कारण रहे जिसकी वजह से आर्थिक प्रगति की दर भी धीमी रही तथा लोक कल्याण के सन्दर्भ में भी संतोषजनक परिणाम न आ सके| द्वितीय चरण (उदारीकरण का काल) इस चरण में निजीकरण उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के माध्यम से सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में एक नया दृष्टिकोण अपनाया गया आर्थिक प्रगति हेतु लाइसेंस राज को समाप्त करते हुए निजी उपक्रमों को प्रगति की जिम्मेदारी सौपी गयी तथा शासन व्यवस्था ने अपना पूरा ध्यान लोक कल्याण की और उन्मुख किया इस कालखंड में अवसंरचनात्मक सुधारों के साथ साथ बढ़ते भ्रष्टाचार के प्रति चिंता जताते हुए प्रशासनिक सुधारों की बात की गयी इस चरण में जनसहभागिता बढाने की आवश्यकता महसूस की गयी| तृतीय चरण (विकास उद्योग का काल) इस चरण में अधिशासन के सन्दर्भ में एक नए दृष्टिकोण के साथ गवर्नमेंट से गवर्नेंस की तरफ प्रयास किये गए विश्व बैंक की 1992 की परिभाषा के अनुसार "गवर्नेंस से तात्पर्य सिविल सोसाइटियों को प्रोत्साहित करते हुए शासन व्यवस्था का क्रियान्वयन करना है" इस चरण में आर्थिक प्रगति एवं लोककल्याण दोनों संदर्भों में शासन व्यवस्था का प्रबंधकीयदृष्टिकोण अपनाते हुए जनसहभागिता को बढाया गया जिसे विकास उद्योग की संज्ञा दी गयी| विकास उद्योग से तात्पर्य उन सभी घटकों के मिलेजुले स्वरुप से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लोक कल्याण को प्रथम उद्देश्य मानते हों यही वह दौर था जिसमें एक नए दृष्टिकोण की नौकरशाही की आवश्यकता को समझते हुए उनके चयन की प्रक्रिया एवं ट्रेनिंग प्रक्रिया में संरचनात्मक परिवर्तन किये गए इसके साथ ही नागरिक सशक्तिकरण हेतु सोशल ऑडिट, सूचना का अधिकार, नागरिक घोषणापत्र आदि उपकरणों को भी मजबूत किया गया इस चरण में जनसहभागिता बढाने के लिए विश्व बैंक के मानकों को स्वीकार करते हुए सिविल सोसाइटियों को प्रोत्साहित किया गया इस तरह से स्पष्ट होता है कि भारत में सामाजिक न्याय की संकल्पना क्रमिक रूप से विकसित होती गयी है| हाल ही में प्रकाशित ऑक्सफेम इंडिया रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत में शीर्ष 1 % लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 58% है यह भारत में आय असामनता का भयावह चित्र प्रस्तुत करती है , इसके साथ ही भारत में लगभग 21 %जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। ऐसे में इस असामनता एवं गरीबी को दूर करने हेतु सामाजिक न्याय की संकल्पना अति महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान कीप्रस्तावना में भी सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने पर बल दिया है, जिसे राज्य के नीति निर्देशक तत्वों द्वारा सुनिश्चित किये जाने का प्रयास किया जा रहा है| वर्तमान में संविधान के उपरोक्त उद्देश्यों को विकास उद्योगों के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है|
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जिला योजना समिति के गठन तथा कार्यों की चर्चा कीजिये। साथ ही इससे सम्बंधित समस्याओं का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये। (150-200 शब्द, अंक - 10) Discuss the formation and functions of the District Planning Committee. Also, briefly mention the problems related to it. (150-200 Words, Marks - 10 )
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत जिला योजना समिति के गठन को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात जिला योजना समिति के कार्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इसकी समस्याओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिला योजना समिति का गठन प्रत्येक राज्य में जिला के स्तर पर किया जाता है | अतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा या मान्यता प्राप्त है | जिला योजना समिति के दो मौलिक दायित्व हैं - 1 - जिला में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के द्वारा तैयार की गयी योजनाओं का समेकन करना तथा सम्पूर्ण जिला के लिए प्रारूप विकास योजना को तैयार करना | जिला योजना समिति का गठन अधिक प्रजातान्त्रिक विचारधारा पर आधारित है, क्योंकि जिला पंचायत एवं नगरपालिकाओं से निर्वाचित सदस्यों की संख्या जिला में ग्रामीण एवं शहरी जनसँख्या के अनुपात पर आधारित है | जिला योजना समिति के कार्य - जिला योजना समिति कार्य, स्थानों को भरने की रीति, इसकी संरचना एवं अध्यक्ष के चुने जाने की रीति का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाता है | जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है - 1- पंचायतों/नगरपालिकाओं के समान हित के विषयों पर 2- वित्तीय एवं अन्य संसाधनों की उपलब्धता की मात्रा एवं प्रकार पर जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय उन संसाधनों एवं संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जाता है, जो राज्यपाल के द्वारा निर्देशित हों | जिला योजना समिति के माध्यम स्थान नियोजन की प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है | ताकि विकेन्द्रित योजना के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके | यह जन सशक्तिकरण को प्राप्त करने में भी सहायक सिद्ध होती है | जिला विकास योजना के निर्माण के दौरान जिला योजना समिति, नगरपालिका तथा पंचायतों के बीच साझे विषयों जैसे- जल संचयन, प्राकृतिक संसाधन, अवसंरचनाओं का विकास तथा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखा जाता है | जिला योजना समितियों से सम्बंधित समस्याएं - ज्यादातर राज्यों में ये समितियां बस औपचारिक तौर पर कार्य रही हैं, न ही इनको सुदृढ़ किया गया है और न ही उचित क्रियान्वयन | पर्याप्त धन दिए जाने के बाद भी कई राज्यों ने जिला योजना का निर्माण नहीं किया है | पंचायतों को दिया गया धन उनकी विधायी शक्तियों से मेल नहीं खाता है जबकि जिला एवं राज्य बजट एक-दूसरे से अलग नहीं हैं | कुछ राज्यों ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं से धन प्राप्त करने के लिए अपने राज्य में इस योजना की शुरुआत नहीं की, जिससे धन के प्रवाह में कमी आयी है | सामान्यतः इन समितियों द्वारा तैयार योजनायें क्रियान्वित नहीं हो पाती जो कि चयनित सदस्यों द्वारा अस्थायी तौर पर सुझायी जाती है | निष्कर्षतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा दिया गया है, इसके कारण नियोजन समिति का स्वरुप बदल गया है |
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##Question:जिला योजना समिति के गठन तथा कार्यों की चर्चा कीजिये। साथ ही इससे सम्बंधित समस्याओं का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये। (150-200 शब्द, अंक - 10) Discuss the formation and functions of the District Planning Committee. Also, briefly mention the problems related to it. (150-200 Words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत जिला योजना समिति के गठन को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात जिला योजना समिति के कार्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इसकी समस्याओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिला योजना समिति का गठन प्रत्येक राज्य में जिला के स्तर पर किया जाता है | अतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा या मान्यता प्राप्त है | जिला योजना समिति के दो मौलिक दायित्व हैं - 1 - जिला में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के द्वारा तैयार की गयी योजनाओं का समेकन करना तथा सम्पूर्ण जिला के लिए प्रारूप विकास योजना को तैयार करना | जिला योजना समिति का गठन अधिक प्रजातान्त्रिक विचारधारा पर आधारित है, क्योंकि जिला पंचायत एवं नगरपालिकाओं से निर्वाचित सदस्यों की संख्या जिला में ग्रामीण एवं शहरी जनसँख्या के अनुपात पर आधारित है | जिला योजना समिति के कार्य - जिला योजना समिति कार्य, स्थानों को भरने की रीति, इसकी संरचना एवं अध्यक्ष के चुने जाने की रीति का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाता है | जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है - 1- पंचायतों/नगरपालिकाओं के समान हित के विषयों पर 2- वित्तीय एवं अन्य संसाधनों की उपलब्धता की मात्रा एवं प्रकार पर जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय उन संसाधनों एवं संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जाता है, जो राज्यपाल के द्वारा निर्देशित हों | जिला योजना समिति के माध्यम स्थान नियोजन की प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है | ताकि विकेन्द्रित योजना के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके | यह जन सशक्तिकरण को प्राप्त करने में भी सहायक सिद्ध होती है | जिला विकास योजना के निर्माण के दौरान जिला योजना समिति, नगरपालिका तथा पंचायतों के बीच साझे विषयों जैसे- जल संचयन, प्राकृतिक संसाधन, अवसंरचनाओं का विकास तथा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखा जाता है | जिला योजना समितियों से सम्बंधित समस्याएं - ज्यादातर राज्यों में ये समितियां बस औपचारिक तौर पर कार्य रही हैं, न ही इनको सुदृढ़ किया गया है और न ही उचित क्रियान्वयन | पर्याप्त धन दिए जाने के बाद भी कई राज्यों ने जिला योजना का निर्माण नहीं किया है | पंचायतों को दिया गया धन उनकी विधायी शक्तियों से मेल नहीं खाता है जबकि जिला एवं राज्य बजट एक-दूसरे से अलग नहीं हैं | कुछ राज्यों ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं से धन प्राप्त करने के लिए अपने राज्य में इस योजना की शुरुआत नहीं की, जिससे धन के प्रवाह में कमी आयी है | सामान्यतः इन समितियों द्वारा तैयार योजनायें क्रियान्वित नहीं हो पाती जो कि चयनित सदस्यों द्वारा अस्थायी तौर पर सुझायी जाती है | निष्कर्षतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा दिया गया है, इसके कारण नियोजन समिति का स्वरुप बदल गया है |
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जिला योजना समिति के गठन तथा कार्यों की चर्चा कीजिये | साथ ही इससे सम्बंधित समस्याओं का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) Discuss the formation and functions of the District Planning Committee. Also, briefly mention the problems related to it. (150-200 Words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत जिला योजना समिति के गठन को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात जिला योजना समिति के कार्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इसकी समस्याओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिला योजना समिति का गठन प्रत्येक राज्य में जिला के स्तर पर किया जाता है | अतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा या मान्यता प्राप्त है | जिला योजन समिति के दो मौलिक दायित्व हैं - 1 - जिला में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के द्वारा तैयार की गयी योजनाओं का समेकन करना तथा सम्पूर्ण जिला के लिए प्रारूप विकास योजना को तैयार करना | जिला योजना समिति का गठन अधिक प्रजातान्त्रिक विचारधारा पर आधारित है, क्योंकि जिला पंचायत एवं नगरपालिकाओं से निर्वाचित सदस्यों की संख्या जिला में ग्रामीण एवं शहरी जनसँख्या के अनुपात पर आधारित है | जिला योजना समिति के कार्य - जिला योजना समिति कार्य, स्थानों को भरने की रीति, इसकी संरचना एवं अध्यक्ष के चुने जाने की रीति का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाता है | जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है - 1- पंचायतों/नगरपालिकाओं के समान हित के विषयों पर 2- वित्तीय एवं अन्य संसाधनों की उपलब्धता की मात्रा एवं प्रकार पर जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय उन संसाधनों एवं संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जाता है, जो राज्यपाल के द्वारा निर्देशित हों | जिला योजना समिति के माध्यम स्थान नियोजन की प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है | ताकि विकेन्द्रित योजना के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके | यह जन सशक्तिकरण को प्राप्त करने में भी सहायक सिद्ध होती है | जिला विकास योजना के निर्माण के दौरान जिला योजना समिति, नगरपालिका तथा पंचायतों के बीच साझे विषयों जैसे- जल संचयन, प्राकृतिक संसाधन, अवसंरचनाओं का विकास तथा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखा जाता है | जिला योजना समितियों से सम्बंधित समस्याएं - ज्यादातर राज्यों में ये समितियां बस औपचारिक तौर पर कार्य रही हैं, न ही इनको सुदृढ़ किया गया है और न ही उचित क्रियान्वयन | पर्याप्त धन दिए जाने के बाद भी कई राज्यों ने जिला योजना का निर्माण नहीं किया है | पंचायतों को दिया गया धन उनकी विधायी शक्तियों से मेल नहीं खाता है जबकि जिला एवं राज्य बजट एक-दूसरे से अलग नहीं हैं | कुछ राज्यों ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं से धन प्राप्त करने के लिए अपने राज्य में इस योजना की शुरुआत नहीं की, जिससे धन के प्रवाह में कमी आयी है | सामान्यतः इन समितियों द्वारा तैयार योजनायें क्रियान्वित नहीं हो पाती जो कि चयनित सदस्यों द्वारा अस्थायी तौर पर सुझायी जाती है | निष्कर्षतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा दिया गया है, इसके कारण नियोजन समिति का स्वरुप बदल गया है |
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##Question:जिला योजना समिति के गठन तथा कार्यों की चर्चा कीजिये | साथ ही इससे सम्बंधित समस्याओं का भी संक्षेप में उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द) Discuss the formation and functions of the District Planning Committee. Also, briefly mention the problems related to it. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत जिला योजना समिति के गठन को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात जिला योजना समिति के कार्यों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में इसकी समस्याओं को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - जिला योजना समिति का गठन प्रत्येक राज्य में जिला के स्तर पर किया जाता है | अतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा या मान्यता प्राप्त है | जिला योजन समिति के दो मौलिक दायित्व हैं - 1 - जिला में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के द्वारा तैयार की गयी योजनाओं का समेकन करना तथा सम्पूर्ण जिला के लिए प्रारूप विकास योजना को तैयार करना | जिला योजना समिति का गठन अधिक प्रजातान्त्रिक विचारधारा पर आधारित है, क्योंकि जिला पंचायत एवं नगरपालिकाओं से निर्वाचित सदस्यों की संख्या जिला में ग्रामीण एवं शहरी जनसँख्या के अनुपात पर आधारित है | जिला योजना समिति के कार्य - जिला योजना समिति कार्य, स्थानों को भरने की रीति, इसकी संरचना एवं अध्यक्ष के चुने जाने की रीति का निर्धारण राज्य विधानमंडल के द्वारा किया जाता है | जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है - 1- पंचायतों/नगरपालिकाओं के समान हित के विषयों पर 2- वित्तीय एवं अन्य संसाधनों की उपलब्धता की मात्रा एवं प्रकार पर जिला योजना समिति के द्वारा प्रारूप विकास योजना को तैयार करते समय उन संसाधनों एवं संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जाता है, जो राज्यपाल के द्वारा निर्देशित हों | जिला योजना समिति के माध्यम स्थान नियोजन की प्रक्रिया में जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है | ताकि विकेन्द्रित योजना के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके | यह जन सशक्तिकरण को प्राप्त करने में भी सहायक सिद्ध होती है | जिला विकास योजना के निर्माण के दौरान जिला योजना समिति, नगरपालिका तथा पंचायतों के बीच साझे विषयों जैसे- जल संचयन, प्राकृतिक संसाधन, अवसंरचनाओं का विकास तथा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखा जाता है | जिला योजना समितियों से सम्बंधित समस्याएं - ज्यादातर राज्यों में ये समितियां बस औपचारिक तौर पर कार्य रही हैं, न ही इनको सुदृढ़ किया गया है और न ही उचित क्रियान्वयन | पर्याप्त धन दिए जाने के बाद भी कई राज्यों ने जिला योजना का निर्माण नहीं किया है | पंचायतों को दिया गया धन उनकी विधायी शक्तियों से मेल नहीं खाता है जबकि जिला एवं राज्य बजट एक-दूसरे से अलग नहीं हैं | कुछ राज्यों ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं से धन प्राप्त करने के लिए अपने राज्य में इस योजना की शुरुआत नहीं की, जिससे धन के प्रवाह में कमी आयी है | सामान्यतः इन समितियों द्वारा तैयार योजनायें क्रियान्वित नहीं हो पाती जो कि चयनित सदस्यों द्वारा अस्थायी तौर पर सुझायी जाती है | निष्कर्षतः जिला योजना समिति को संवैधानिक दर्जा दिया गया है, इसके कारण नियोजन समिति का स्वरुप बदल गया है |
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निकट वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न अधिकारों को अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अंतर्गत शामिल किया है| इस सन्दर्भ में घोषित अधिकारों और सम्बन्धित वादों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द) In the near years, the Supreme Court has included various rights under the life and personal freedom conferred by Article 21. In this context, discuss the declared rights and related cases. (150 to 200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में निकट वर्षों में घोषित अधिकारों और सम्बन्धित मुकदमों की जानकारी दीजिये 3- अंतिम में विस्तार के महत्त्व के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है| इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं| इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का कठोरता से और निष्ठापूर्वक पालन किया गया हो| ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 21 विधान मण्डल की शक्तियों पर परिसीमा के रूप में नहीं है| यह व्यक्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध मनमाने एवं अवैध कार्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है| विगत दशकों में प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार होता गया है| इस विस्तार का आधार उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए न्यायिक निर्णय हैं| उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए अपने विभिन्न निर्णयों ने इस अनुच्छेद का विस्तार किया गया है| इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है| निकट वर्षों में उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत घोषित अधिकार नारी सम्मान और मर्यादा का अधिकार, प्रत्येक महिला को सम्मान और मर्यादा के साथ जीने का अधिकार है और समाज को उनके प्रति इसी प्रकार आचरण करना चाहिए| इसी सन्दर्भ में अरुमुगम शेरवई बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में SC ने खाप पंचायतों को जड़ से नष्ट करने का सुझाव दिया क्योंकि ये महिलाओं की स्वतंत्रता में बाधक हैं| महिलाओं की गरिमा को स्थापित करते हुए इंडिपेंडेंट थॉट नामक एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर SC ने वर्ष 2018 में यह व्यवस्था दी कि यदि किसी की पत्नी की आयु 18 वर्ष (पहले यह आयु 15 वर्ष थी) से कम है तो उसके साथ स्थापित किया गया शारीरिक सम्बन्ध बलात्कार माना जाएगा, और पत्नी के ना चाहते हुए भी उसके पति के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकेगी| बाल विवाह रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है निजता का अधिकार एवं आधारकार्ड सम्बन्धी दिशा निर्देश का मामला| KS पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 का भाग माना, और यह व्यवस्था दी कि आयकर दाखिले(ITR), सब्सिडी की दावेदारी और पासपोर्ट को छोड़कर किसी अन्य मामलें में आधार कार्ड की अनिवार्यता नहीं होगी उदाहरणार्थ किसी संचार ओपरेटर सर सिम कार्ड लेने और बैंक में खाता खोलने के लिए, IIT प्रवेश परीक्षा के लिए आधार अनिवार्य नहीं होगा लिविंग विल एवं पैसिव यूथेनेशिया का अधिकार , कॉमनकॉज की एक याचिका पर SC ने अपने द्वारा पूर्व में इस मुकदमें में दिए गए फैसले को स्पष्ट करते हुए वर्ष 2018 में लिविंग विल पर आधारित पैसिव यूथेनेसिया को मान्यता प्रदान कर दी, यह प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा जिला कलेक्टर की निगरानी में ही किया जा सकेगा| इसके साथ ही SC ने लिविंग विल को परिभाषित करते हुए इस सन्दर्भ में अपने दिशा निर्देश जारी किये गए हैं| ट्रिपल तलाक के विरुद्ध अधिकार , शायराबानो तथा अन्य बनाम भारत संघ 2017 के एक मुकदमें में SC ने ट्रिपल तलाक को गैर-जरुरी बताया| 3:2 के बहुमत से SC की संविधान पीठ ने इसे कुरआन का हिस्सा नहीं माना और सरकार को निर्देश दिया कि वह संसद से इस कुप्रथा को रोकने के लिए कानून बनवाये LGBT के अधिकार, नवजोत सिंह जौहर बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन 2013 में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को पलटते हुए LGBTQI को स्वतंत्रता दे दी किन्तु यह स्वतंत्रता स्वेच्छा से किये गए लैंगिक पसंद तक सीमित होगी साथ ही यह केवल वयस्कों पर लागू होगी अन्यथा इसे अप्राकृतिक यौनाचार माना जाएगा जो कि अपराध की श्रेणी में आयेगा किन्नर समुदाय के अधिकारों को मान्यता देते हुए वर्ष 2013 में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण वाद में SC ने किन्नर समुदाय को तृतीय लिंग की श्रेणी में रखने का आदेश दिया जिसे मतदाता सूची में भी अंकित जाना था| इस प्रकार देखते हैं कि अनुच्छेद 21 के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी व्याख्या को निरंतर विस्तृत किया है| व्याख्या में यह विस्तार सार्थक मानव जीवन की दिशा में जीने के लिए आवश्यक अधिकारों की घोषणा का आधार है|
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##Question:निकट वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न अधिकारों को अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अंतर्गत शामिल किया है| इस सन्दर्भ में घोषित अधिकारों और सम्बन्धित वादों की चर्चा कीजिये | (150 से 200 शब्द) In the near years, the Supreme Court has included various rights under the life and personal freedom conferred by Article 21. In this context, discuss the declared rights and related cases. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में निकट वर्षों में घोषित अधिकारों और सम्बन्धित मुकदमों की जानकारी दीजिये 3- अंतिम में विस्तार के महत्त्व के सन्दर्भ में निष्कर्ष दीजिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख किया गया है| इसके तहत यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं| इसका अर्थ हुआ कि जब राज्य या उसका कोई अभिकर्ता किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करता है तो इस कार्यवाही का औचित्य तभी हो सकता है जब उस कार्यवाही के समर्थन में कोई विधि हो और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का कठोरता से और निष्ठापूर्वक पालन किया गया हो| ध्यातव्य है कि अनुच्छेद 21 विधान मण्डल की शक्तियों पर परिसीमा के रूप में नहीं है| यह व्यक्ति को कार्यपालिका के विरुद्ध मनमाने एवं अवैध कार्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है| विगत दशकों में प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार होता गया है| इस विस्तार का आधार उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए न्यायिक निर्णय हैं| उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए अपने विभिन्न निर्णयों ने इस अनुच्छेद का विस्तार किया गया है| इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है| निकट वर्षों में उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत घोषित अधिकार नारी सम्मान और मर्यादा का अधिकार, प्रत्येक महिला को सम्मान और मर्यादा के साथ जीने का अधिकार है और समाज को उनके प्रति इसी प्रकार आचरण करना चाहिए| इसी सन्दर्भ में अरुमुगम शेरवई बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में SC ने खाप पंचायतों को जड़ से नष्ट करने का सुझाव दिया क्योंकि ये महिलाओं की स्वतंत्रता में बाधक हैं| महिलाओं की गरिमा को स्थापित करते हुए इंडिपेंडेंट थॉट नामक एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर SC ने वर्ष 2018 में यह व्यवस्था दी कि यदि किसी की पत्नी की आयु 18 वर्ष (पहले यह आयु 15 वर्ष थी) से कम है तो उसके साथ स्थापित किया गया शारीरिक सम्बन्ध बलात्कार माना जाएगा, और पत्नी के ना चाहते हुए भी उसके पति के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकेगी| बाल विवाह रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है निजता का अधिकार एवं आधारकार्ड सम्बन्धी दिशा निर्देश का मामला| KS पुत्तुस्वामी बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 का भाग माना, और यह व्यवस्था दी कि आयकर दाखिले(ITR), सब्सिडी की दावेदारी और पासपोर्ट को छोड़कर किसी अन्य मामलें में आधार कार्ड की अनिवार्यता नहीं होगी उदाहरणार्थ किसी संचार ओपरेटर सर सिम कार्ड लेने और बैंक में खाता खोलने के लिए, IIT प्रवेश परीक्षा के लिए आधार अनिवार्य नहीं होगा लिविंग विल एवं पैसिव यूथेनेशिया का अधिकार , कॉमनकॉज की एक याचिका पर SC ने अपने द्वारा पूर्व में इस मुकदमें में दिए गए फैसले को स्पष्ट करते हुए वर्ष 2018 में लिविंग विल पर आधारित पैसिव यूथेनेसिया को मान्यता प्रदान कर दी, यह प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा जिला कलेक्टर की निगरानी में ही किया जा सकेगा| इसके साथ ही SC ने लिविंग विल को परिभाषित करते हुए इस सन्दर्भ में अपने दिशा निर्देश जारी किये गए हैं| ट्रिपल तलाक के विरुद्ध अधिकार , शायराबानो तथा अन्य बनाम भारत संघ 2017 के एक मुकदमें में SC ने ट्रिपल तलाक को गैर-जरुरी बताया| 3:2 के बहुमत से SC की संविधान पीठ ने इसे कुरआन का हिस्सा नहीं माना और सरकार को निर्देश दिया कि वह संसद से इस कुप्रथा को रोकने के लिए कानून बनवाये LGBT के अधिकार, नवजोत सिंह जौहर बनाम भारत संघ 2018 के मामले में SC ने सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन 2013 में दिए गए अपने पूर्व के फैसले को पलटते हुए LGBTQI को स्वतंत्रता दे दी किन्तु यह स्वतंत्रता स्वेच्छा से किये गए लैंगिक पसंद तक सीमित होगी साथ ही यह केवल वयस्कों पर लागू होगी अन्यथा इसे अप्राकृतिक यौनाचार माना जाएगा जो कि अपराध की श्रेणी में आयेगा किन्नर समुदाय के अधिकारों को मान्यता देते हुए वर्ष 2013 में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण वाद में SC ने किन्नर समुदाय को तृतीय लिंग की श्रेणी में रखने का आदेश दिया जिसे मतदाता सूची में भी अंकित जाना था| इस प्रकार देखते हैं कि अनुच्छेद 21 के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी व्याख्या को निरंतर विस्तृत किया है| व्याख्या में यह विस्तार सार्थक मानव जीवन की दिशा में जीने के लिए आवश्यक अधिकारों की घोषणा का आधार है|
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महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिला संगठनों की भूमिका का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा हेतु किये जा रहे कुछ प्रयासों का भी जिक्र कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) Briefly mention the role of women"s organizations towards women"s empowerment. Also, write down some efforts being made for the safety of women. (150-200 words/10 अंक)
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एप्रोच- महिला सशक्तिकरण को परिभाषित करते हुए एवं इसकी आवश्यकता को संक्षिप्त रूप से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, विभिन्न प्रकार के महिला संगठनों का उल्लेख करते हुए सशक्तिकरण की दिशा में उनकी भूमिकाओं का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,महिलाओं की सुरक्षा हेतु किये जा रहे कुछ प्रयासों का भी जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, इन प्रयासों के बावजूद महिलाओं की वर्तमान दशा के संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- महिलाएं, भारत की जनसंख्या का 48% हिस्सा हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसरों आदि जैसे कई सामाजिक संकेतकों पर पुरुषों से पीछे हैं। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे रिपोर्टों के माध्यम से भी भारत में महिलाओं की बदहाल स्थिति को समझा जा सकता है। महिला सशक्तिकरण का अर्थ सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक तथा अन्य आयामों पर महिलाओं को पुरूषों के समक्ष बराबर का अवसर तथा स्थान देने की कोशिश से है| सतत तथा समावेशी विकास सुनिश्चित करने तथा समाज में लैंगिक समानता हेतु महिला सशक्तिकरण एक अहम् कार्य है| विभिन्न प्रकार के महिला संगठन तथा सशक्तिकरण में उनकी भूमिका भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिला संगठनों का इतिहास यद्यपि ब्रिटिशकाल से ही दिखाई पड़ता है परंतु 1990 के दशक में इसमें तेजी आई| सैद्धांतिक रूप से महिला संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनों से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महिला सशक्तिकरण की दिशा में कार्यरत हों | इन्हें हम निम्नलिखित 3 प्रकारों में विभक्त कर सकते है- वे महिला संगठन जो सरकार का हिस्सा होते हुए महिला सशक्तिकरण की दिशा में कार्यरत हों;जैसे- राष्ट्रीय महिला आयोग(1992 से महिलाओं के हितों की रक्षा के संदर्भ में सक्रीय दबावसमूह की भूमिका निभा रहा है); ऑल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस(सभी महिलाओं को निःशुल्क क़ानूनी सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में कार्यरत है); राजकीय महिला आयोग आदि; वे महिला संगठन जो स्ववित्त पोषित या शासकीय सहायता या कॉर्पोरेट जगत से मिल रहे आर्थिक सहयोग द्वारा महिलाओं के आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक प्रगति की दिशा में कार्यरत हों| जैसे- SEWA (सेल्फ एम्पलॉयड वीमेन एसोसिएशन)- यह संस्थान महिलाओं को कौशल-प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहयोग द्वारा सशक्तिकृत कर रहा है| आपन समाचार - यह महिलाओं के संदर्भ में जागरूकता हेतु संकल्पित टीवी चैनल है जो सशक्तिकरण की दिशा में एक दबाव समूह की भूमिका भी निभा रहा है| गुलाबी गैंग - यह महिला संगठन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को ना सिर्फ आश्रय अपितु साथ ही रोजगार आदि के विकल्प द्वारा सशक्तिकृत करने के प्रयास कर रहा है| खादी ग्रामोद्योग - यह संगठन ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहायता सुलभ करवाता है तथा उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों हेतु बाजार भी उपलब्ध करवाता है| रेड रिबन ग्रुप - यह महिला संगठन HIV एवं गर्भनिरोधकों के संदर्भ में जागरूकता तथा सेक्स-वर्कर्स के पुनर्स्थापना की दिशा में कार्यरत है| भारतीय संदर्भ में 2007 में उज्जवला स्कीम के अंतर्गत ऐसी वंचित महिलाओं के बचाव एवं उनके पुनर्स्थापन हेतु अतिरिक्त प्रयास किये जाने की दिशा में कार्यरत है| वर्तमान में ऐसी वंचित महिलाओं हेतु करीब 220 स्वआधार केंद्र बनाए गए हैं| तथा इन्हें मुख्य महिला हेल्पलाइन से जोड़ा गया है| वे महिला संगठन जो महिला उद्यमिता के माध्यम से सार्वजनिक दृष्टिकोण को बदलने में सक्षम हैं| जैसे- छवि राजावत जो राजस्थान में पंचायती राज में आधारभूत परिवर्तन लाने में सफल रही हैं| महिलाओं की सुरक्षा हेतु किये जा रहे प्रयास दहेज़ निरोधक अधिनियम, 1961 - इसके अंतर्गत दहेज़ लेना एवं देना दोनों दंडनीय अपराध है| महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, 1986(2012 में संशोधित)- इस कानून के अंतर्गत प्रिंट/डिजिटल माध्यम में किसी भी प्रकार से महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण(बिना उनकी स्वीकृति के) एक दंडनीय अपराध है जिसमें प्रथम दृष्टया संबंधित व्यक्ति दोषी माने जायेंगे| महिलाओं की घरेलू हिंसा से रक्षा का कानून, 2005(संशोधित-2018) - इस कानून के अंतर्गत घरेलू हिंसा से तात्पर्य परिवार के अंदर किसी भी संदर्भित महिला के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक हिंसा से है जो एक दंडनीय अपराध है| 2018 में वयस्क पुरुष शब्द को हटाते हुए इस कानून को और विस्तारित किया गया है जिसके बाद अब तलाक के बाद भी घरेलू हिंसा का कानून प्रभावी रहेगा| विशाखा गाइडलाइन्स, 1997- नियोक्ता की जिम्मेदारी कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो; निष्पक्ष मध्यस्थ चयन या स्थानीय मध्यस्थ केन्द्रों पर रजिस्टरीकरण; कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन-उत्पीड़न(निवारण, प्रतिषेध तथा शिकायत निपटान) कानून, 2013- सरकारी तथा निजी एवं संगठित तथा असंगठित सभी क्षेत्रों में लागू; ऐसी घटनाओं के त्वरित रिपोर्टिंग हेतु शी-बॉक्स के अंतर्गत ऑनलाइन माध्यमों से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है| भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत विभिन्न प्रावधान; राष्ट्रीय महिला आयोग के द्वारा प्रयास; हालाँकि उपरोक्त प्रयासों के बावजूद महिलाएं अभी भी समाज में उतनी सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं| इनके पीछे कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दोषों को देखा जा सकता है| साथ ही, वर्तमान कानूनों/प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन ना हो पाना भी एक बड़ी समस्या है| आवश्यकता इस बात की है कि हम सामाजिक तौर पर महिलाओं के प्रति नकारात्मक रवैये को बदलना होगा तथा सरकार को भी व्यापक जनजागरूकता को प्रोत्साहित करते हुए उनके प्रति अपराधों को रोकने हेतु गंभीर प्रयास करने होंगे|
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##Question:महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिला संगठनों की भूमिका का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| साथ ही, महिलाओं की सुरक्षा हेतु किये जा रहे कुछ प्रयासों का भी जिक्र कीजिये| (150-200 शब्द/10 अंक) Briefly mention the role of women"s organizations towards women"s empowerment. Also, write down some efforts being made for the safety of women. (150-200 words/10 अंक)##Answer:एप्रोच- महिला सशक्तिकरण को परिभाषित करते हुए एवं इसकी आवश्यकता को संक्षिप्त रूप से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, विभिन्न प्रकार के महिला संगठनों का उल्लेख करते हुए सशक्तिकरण की दिशा में उनकी भूमिकाओं का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,महिलाओं की सुरक्षा हेतु किये जा रहे कुछ प्रयासों का भी जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, इन प्रयासों के बावजूद महिलाओं की वर्तमान दशा के संदर्भ में आगे की राह बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- महिलाएं, भारत की जनसंख्या का 48% हिस्सा हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक अवसरों आदि जैसे कई सामाजिक संकेतकों पर पुरुषों से पीछे हैं। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे रिपोर्टों के माध्यम से भी भारत में महिलाओं की बदहाल स्थिति को समझा जा सकता है। महिला सशक्तिकरण का अर्थ सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक तथा अन्य आयामों पर महिलाओं को पुरूषों के समक्ष बराबर का अवसर तथा स्थान देने की कोशिश से है| सतत तथा समावेशी विकास सुनिश्चित करने तथा समाज में लैंगिक समानता हेतु महिला सशक्तिकरण एक अहम् कार्य है| विभिन्न प्रकार के महिला संगठन तथा सशक्तिकरण में उनकी भूमिका भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिला संगठनों का इतिहास यद्यपि ब्रिटिशकाल से ही दिखाई पड़ता है परंतु 1990 के दशक में इसमें तेजी आई| सैद्धांतिक रूप से महिला संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनों से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महिला सशक्तिकरण की दिशा में कार्यरत हों | इन्हें हम निम्नलिखित 3 प्रकारों में विभक्त कर सकते है- वे महिला संगठन जो सरकार का हिस्सा होते हुए महिला सशक्तिकरण की दिशा में कार्यरत हों;जैसे- राष्ट्रीय महिला आयोग(1992 से महिलाओं के हितों की रक्षा के संदर्भ में सक्रीय दबावसमूह की भूमिका निभा रहा है); ऑल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस(सभी महिलाओं को निःशुल्क क़ानूनी सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में कार्यरत है); राजकीय महिला आयोग आदि; वे महिला संगठन जो स्ववित्त पोषित या शासकीय सहायता या कॉर्पोरेट जगत से मिल रहे आर्थिक सहयोग द्वारा महिलाओं के आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक प्रगति की दिशा में कार्यरत हों| जैसे- SEWA (सेल्फ एम्पलॉयड वीमेन एसोसिएशन)- यह संस्थान महिलाओं को कौशल-प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहयोग द्वारा सशक्तिकृत कर रहा है| आपन समाचार - यह महिलाओं के संदर्भ में जागरूकता हेतु संकल्पित टीवी चैनल है जो सशक्तिकरण की दिशा में एक दबाव समूह की भूमिका भी निभा रहा है| गुलाबी गैंग - यह महिला संगठन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को ना सिर्फ आश्रय अपितु साथ ही रोजगार आदि के विकल्प द्वारा सशक्तिकृत करने के प्रयास कर रहा है| खादी ग्रामोद्योग - यह संगठन ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहायता सुलभ करवाता है तथा उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों हेतु बाजार भी उपलब्ध करवाता है| रेड रिबन ग्रुप - यह महिला संगठन HIV एवं गर्भनिरोधकों के संदर्भ में जागरूकता तथा सेक्स-वर्कर्स के पुनर्स्थापना की दिशा में कार्यरत है| भारतीय संदर्भ में 2007 में उज्जवला स्कीम के अंतर्गत ऐसी वंचित महिलाओं के बचाव एवं उनके पुनर्स्थापन हेतु अतिरिक्त प्रयास किये जाने की दिशा में कार्यरत है| वर्तमान में ऐसी वंचित महिलाओं हेतु करीब 220 स्वआधार केंद्र बनाए गए हैं| तथा इन्हें मुख्य महिला हेल्पलाइन से जोड़ा गया है| वे महिला संगठन जो महिला उद्यमिता के माध्यम से सार्वजनिक दृष्टिकोण को बदलने में सक्षम हैं| जैसे- छवि राजावत जो राजस्थान में पंचायती राज में आधारभूत परिवर्तन लाने में सफल रही हैं| महिलाओं की सुरक्षा हेतु किये जा रहे प्रयास दहेज़ निरोधक अधिनियम, 1961 - इसके अंतर्गत दहेज़ लेना एवं देना दोनों दंडनीय अपराध है| महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण निरोधक कानून, 1986(2012 में संशोधित)- इस कानून के अंतर्गत प्रिंट/डिजिटल माध्यम में किसी भी प्रकार से महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण(बिना उनकी स्वीकृति के) एक दंडनीय अपराध है जिसमें प्रथम दृष्टया संबंधित व्यक्ति दोषी माने जायेंगे| महिलाओं की घरेलू हिंसा से रक्षा का कानून, 2005(संशोधित-2018) - इस कानून के अंतर्गत घरेलू हिंसा से तात्पर्य परिवार के अंदर किसी भी संदर्भित महिला के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक हिंसा से है जो एक दंडनीय अपराध है| 2018 में वयस्क पुरुष शब्द को हटाते हुए इस कानून को और विस्तारित किया गया है जिसके बाद अब तलाक के बाद भी घरेलू हिंसा का कानून प्रभावी रहेगा| विशाखा गाइडलाइन्स, 1997- नियोक्ता की जिम्मेदारी कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो; निष्पक्ष मध्यस्थ चयन या स्थानीय मध्यस्थ केन्द्रों पर रजिस्टरीकरण; कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन-उत्पीड़न(निवारण, प्रतिषेध तथा शिकायत निपटान) कानून, 2013- सरकारी तथा निजी एवं संगठित तथा असंगठित सभी क्षेत्रों में लागू; ऐसी घटनाओं के त्वरित रिपोर्टिंग हेतु शी-बॉक्स के अंतर्गत ऑनलाइन माध्यमों से भी शिकायत दर्ज की जा सकती है| भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत विभिन्न प्रावधान; राष्ट्रीय महिला आयोग के द्वारा प्रयास; हालाँकि उपरोक्त प्रयासों के बावजूद महिलाएं अभी भी समाज में उतनी सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं| इनके पीछे कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दोषों को देखा जा सकता है| साथ ही, वर्तमान कानूनों/प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन ना हो पाना भी एक बड़ी समस्या है| आवश्यकता इस बात की है कि हम सामाजिक तौर पर महिलाओं के प्रति नकारात्मक रवैये को बदलना होगा तथा सरकार को भी व्यापक जनजागरूकता को प्रोत्साहित करते हुए उनके प्रति अपराधों को रोकने हेतु गंभीर प्रयास करने होंगे|
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भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत प्राप्तधार्मिक स्वतंत्रता काअधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं है| उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में चर्चाकीजिये| (150 -200 शब्द; 10 अंक) The right to religious freedom obtained under the fundamental rights in the Indian Constitution is not absolute in itself. Discuss in the light of the decisions of the Supreme Court. (150 -200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच :- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की भारत में आवश्यकता बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लिखिये। युक्तियुक्त निर्बंधनों को स्पष्ट करते हुए उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को बताइये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत में विभिन्न धर्मों , पंथों को मानने वाले निवास करते है तथा अपने धर्म के अनुसार मान्यताओं का पालन करते है. ऐसे में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने तथा सामाजिक भ्रातत्व बढ़ाने हेतु धर्म की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत शामिल किया गया है। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद 25 - 25 (1 )- अंत:करण की स्वतंत्रता ,धर्म को मानने ,उसके आचरण करने ,उसके प्रसार प्रचार की स्वतंत्रता 25 (2 )- राज्य किसी आर्थिक, धार्मिक , राजनीतिक या लौकिक क्रियाकलाप को विनियमित करने के लिए कानून बना सकता है सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए तथा हिन्दू मंदिरों अथवा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने के सम्बन्ध में राज्य कानून बना सकता है , यद्यपि ये अधिकार स्वयं मेंपूर्ण नहीं हैलोक स्वास्थ्य , नैतिकता व स्वास्थ्य आदि युक्तियुक्त निर्बंधन के तहत इन्हे सीमित किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है जिन्हे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते है जैसे :- राज्य , अजान , भजन के लिए लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है गाय संरक्षण या किसी पशु के संरक्षण के नाम पर किसी समुदाय के व्यक्ति को प्रताड़ित करना या मोब लिंचिंग करना गंभीर अपराध। यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण ही पुजारी होने का दावा।किसी अन्य जाति का भी कोई व्यक्ति , मंदिर का पुजारी बन सकता है। बकरीद के अवसर पर बकरे की बलि , इस्लाम का मूल भाग नहीं है यदि कोई धार्मिक संस्था अपने कल्याणकारी कार्यों को करने में विफल रहती है तो राज्य उसका अधिग्रहण कर सकता है नरसु बनाम बॉम्बे राज्य 1953 -हिन्दू धर्म में बहु विवाह , हिन्दू धर्म का आवश्यक अंग नहीं है अत : राज्य इसे रोकने के लिए कानून बना सकता है प्रचार प्रसार का कदाचित यह अर्थ नहीं हुआ कि दूसरों को झांचा देकर , डरा धमकाकर , लालच देकर उसका धर्म परिवर्तन किया जाये। अजीज बाशा वाद- राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की स्थापना नहीं कर सकता,किन्तु अगर उसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय ने स्थापित किया है तो राज्य उसे वित्तीय सहायता देने से मना नहीं कर सकता। संविधान में धर्म को परिभाषित नहीं किया गया है , किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर हिन्दू धर्म विश्वास वाद 1951 में धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा है कि यह व्यक्तियों व समुदायों के निजी आस्था का विषय है। जो ईश्वरवादी , अनीश्वरवादी , नास्तिक कुछ भी हो सकता है। इसके अनुयायी कुछ विशिष्ट नैतिक संहिता का अनुसरण करते है , जो विभिन्न प्रकार के समारोह , कर्मकांड , पूजा पद्द्ति के रूप में दिखाई पड़ती है।भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश D S Thakur के अनुसार धर्म , व्यक्ति और उसकी परम सत्ता के बीच एक संचार माध्यम है , जो उसके आचरण को विनियमित करता है , इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है। इसप्रकार सामाजिक कल्याण व धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाते हुए ही इनका पालन करना उचित होगा।
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##Question:भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत प्राप्तधार्मिक स्वतंत्रता काअधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं है| उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में चर्चाकीजिये| (150 -200 शब्द; 10 अंक) The right to religious freedom obtained under the fundamental rights in the Indian Constitution is not absolute in itself. Discuss in the light of the decisions of the Supreme Court. (150 -200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच :- धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की भारत में आवश्यकता बताते हुए भूमिका दीजिये। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लिखिये। युक्तियुक्त निर्बंधनों को स्पष्ट करते हुए उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को बताइये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- भारत में विभिन्न धर्मों , पंथों को मानने वाले निवास करते है तथा अपने धर्म के अनुसार मान्यताओं का पालन करते है. ऐसे में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करने तथा सामाजिक भ्रातत्व बढ़ाने हेतु धर्म की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत शामिल किया गया है। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार : अनुच्छेद 25 - 25 (1 )- अंत:करण की स्वतंत्रता ,धर्म को मानने ,उसके आचरण करने ,उसके प्रसार प्रचार की स्वतंत्रता 25 (2 )- राज्य किसी आर्थिक, धार्मिक , राजनीतिक या लौकिक क्रियाकलाप को विनियमित करने के लिए कानून बना सकता है सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा किसी अन्य कल्याणकारी कार्य के लिए तथा हिन्दू मंदिरों अथवा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने के सम्बन्ध में राज्य कानून बना सकता है , यद्यपि ये अधिकार स्वयं मेंपूर्ण नहीं हैलोक स्वास्थ्य , नैतिकता व स्वास्थ्य आदि युक्तियुक्त निर्बंधन के तहत इन्हे सीमित किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है जिन्हे हम निम्नलिखित रूप से समझ सकते है जैसे :- राज्य , अजान , भजन के लिए लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है गाय संरक्षण या किसी पशु के संरक्षण के नाम पर किसी समुदाय के व्यक्ति को प्रताड़ित करना या मोब लिंचिंग करना गंभीर अपराध। यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण ही पुजारी होने का दावा।किसी अन्य जाति का भी कोई व्यक्ति , मंदिर का पुजारी बन सकता है। बकरीद के अवसर पर बकरे की बलि , इस्लाम का मूल भाग नहीं है यदि कोई धार्मिक संस्था अपने कल्याणकारी कार्यों को करने में विफल रहती है तो राज्य उसका अधिग्रहण कर सकता है नरसु बनाम बॉम्बे राज्य 1953 -हिन्दू धर्म में बहु विवाह , हिन्दू धर्म का आवश्यक अंग नहीं है अत : राज्य इसे रोकने के लिए कानून बना सकता है प्रचार प्रसार का कदाचित यह अर्थ नहीं हुआ कि दूसरों को झांचा देकर , डरा धमकाकर , लालच देकर उसका धर्म परिवर्तन किया जाये। अजीज बाशा वाद- राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान की स्थापना नहीं कर सकता,किन्तु अगर उसे किसी अल्पसंख्यक समुदाय ने स्थापित किया है तो राज्य उसे वित्तीय सहायता देने से मना नहीं कर सकता। संविधान में धर्म को परिभाषित नहीं किया गया है , किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर हिन्दू धर्म विश्वास वाद 1951 में धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा है कि यह व्यक्तियों व समुदायों के निजी आस्था का विषय है। जो ईश्वरवादी , अनीश्वरवादी , नास्तिक कुछ भी हो सकता है। इसके अनुयायी कुछ विशिष्ट नैतिक संहिता का अनुसरण करते है , जो विभिन्न प्रकार के समारोह , कर्मकांड , पूजा पद्द्ति के रूप में दिखाई पड़ती है।भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश D S Thakur के अनुसार धर्म , व्यक्ति और उसकी परम सत्ता के बीच एक संचार माध्यम है , जो उसके आचरण को विनियमित करता है , इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है। इसप्रकार सामाजिक कल्याण व धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाते हुए ही इनका पालन करना उचित होगा।
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स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में किये गए प्रावधानों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the need for an independent judiciary. Also discuss the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the judiciary. (150-200 words)
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एप्रोच - भूमिका में स्वतंत्र न्यायपालिका को परिभाषित करते हुए आवश्यकता स्पष्ट कीजिये | प्रथम भाग में न्यायिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में संवैधानिक उपबन्धों की चर्चा कीजिये | अंतिम में न्यापालिका की स्वतंत्रता का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यायपालिका जहाँ एक ओर व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करती है वहीँ उपलब्ध विधियों के आधार पर विवादों का समाधान करती है | न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इसके लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है | न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है की न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय अथवा भेदभाव के न्याय कर सकें| भारत में सर्वोच्च न्यायालय(SC) एवं उच्च न्यायालय(HC) को निर्भीक रूप से कानून की रक्षा करने और सम्बन्धित दायित्व का निर्वहन करने के लिए उन्हें कार्यपालिका एवं विधायिका की अनावश्यक दखल से मुक्त रखने की व्यवस्था की गयी है| इनमें कुछ संवैधानिक उपबन्ध हैं तो कुछ न्यायपालिका की व्याख्या पर आधारित हैं | संविधान में किये गए प्रावधान SC एवं HC के जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती है जिससे इस नियुक्ति में राजनीतिक दखल न हो | जजों द्वारा दिए गए निर्णय में यदि कोई दोष है तो भी इसे कदाचार नहीं माना जाएगा अर्थात इसके आधार पर जजों को दंडित नही किया जा सकता|अनुच्छेद 137 के अंतर्गत अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है और उसे पलट सकता है| वर्ष 2001 में हुर्रा बनाम हुर्रा मामलें में SC ने निदानकारी याचिका की व्यवस्था की अर्थात यदि SC की किसी पीठ ने अपने किसी निर्णय में कोई गलती कर दी है तो इस याचिका के माध्यम से इस न्यायालय की दूसरी पीठ इस गलती को सुधार सकती है | SC और HC के जज अपने पर पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नही रहते बल्कि वे संविधान के अंतर्गत प्राप्त उन्मुक्तियों के आधार पर अपने पद बने रहते हैं | इस सम्बन्ध में जज जांच अधिनियम 1968 को आधार बनाया जाता है जिसके अनुसार SC व HC के जज को अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत केवल 2 ही आरोप लगने की स्थिति में हटाया जा सकता है यथा सिद्ध कदाचार एवं शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता | जब किसी जज पर आरोप लगाया जाएगा तो उसे हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव को पहले संसद किसी सदन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा| यदि यह प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार होगा और यदि इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार किया जाएगा | एक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने के बाद जब यह अपने दूसरे सदन में प्रेषित किया जाएगा तो उस सदन में विचारार्थ स्वीकार किये जाने के पहले एक तीन सदस्यीय समिति इन आरोपों की जांच करेगी | इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज, किसी HC के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश और एक विधि वेत्ता होंगे| 2:1 के बहुमत से यदि यह समिति उपरोक्त आरोपों को सही पाती है तो उसके आधार पर दूसरे सदन में भी उपरोक्त प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित किया जाएगा| इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा| राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही उसी क्षण उक्त जज अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा| स्पष्ट है की जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और इसका उद्देश्य जजों को स्वतंत्रता प्रदान करना है | SC एवं HC के जजों के वेतन एवं भत्ते में वित्तीय आपात के अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में कटौती नही की जा सकती|पुनः इन जजों के वेतन और भत्ते तथा इनके कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन और भत्ते अनुच्छेद 112(3) के अंतर्गत भारित व्यय में रखे गए हैं अर्थात संसद इन पर मतदान नहीं कर सकती | अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार SC एवं HC के जजों के आचरण पर संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर कोई बहस नहीं की जा सकती है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया गया है| भारत में सरकार के अंगों में स्थापित संतुलन न्यापालिका की अक्षुण्ण स्वतंत्रता के कारण है|इस तरह न्यायपालिका भारत में विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इस प्रकार स्वतंत्र भारतीय न्यायपालिका अपने औचित्य को सिद्ध करती है |
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##Question:स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में किये गए प्रावधानों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the need for an independent judiciary. Also discuss the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the judiciary. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में स्वतंत्र न्यायपालिका को परिभाषित करते हुए आवश्यकता स्पष्ट कीजिये | प्रथम भाग में न्यायिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में संवैधानिक उपबन्धों की चर्चा कीजिये | अंतिम में न्यापालिका की स्वतंत्रता का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यायपालिका जहाँ एक ओर व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करती है वहीँ उपलब्ध विधियों के आधार पर विवादों का समाधान करती है | न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इसके लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है | न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है की न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय अथवा भेदभाव के न्याय कर सकें| भारत में सर्वोच्च न्यायालय(SC) एवं उच्च न्यायालय(HC) को निर्भीक रूप से कानून की रक्षा करने और सम्बन्धित दायित्व का निर्वहन करने के लिए उन्हें कार्यपालिका एवं विधायिका की अनावश्यक दखल से मुक्त रखने की व्यवस्था की गयी है| इनमें कुछ संवैधानिक उपबन्ध हैं तो कुछ न्यायपालिका की व्याख्या पर आधारित हैं | संविधान में किये गए प्रावधान SC एवं HC के जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती है जिससे इस नियुक्ति में राजनीतिक दखल न हो | जजों द्वारा दिए गए निर्णय में यदि कोई दोष है तो भी इसे कदाचार नहीं माना जाएगा अर्थात इसके आधार पर जजों को दंडित नही किया जा सकता|अनुच्छेद 137 के अंतर्गत अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है और उसे पलट सकता है| वर्ष 2001 में हुर्रा बनाम हुर्रा मामलें में SC ने निदानकारी याचिका की व्यवस्था की अर्थात यदि SC की किसी पीठ ने अपने किसी निर्णय में कोई गलती कर दी है तो इस याचिका के माध्यम से इस न्यायालय की दूसरी पीठ इस गलती को सुधार सकती है | SC और HC के जज अपने पर पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नही रहते बल्कि वे संविधान के अंतर्गत प्राप्त उन्मुक्तियों के आधार पर अपने पद बने रहते हैं | इस सम्बन्ध में जज जांच अधिनियम 1968 को आधार बनाया जाता है जिसके अनुसार SC व HC के जज को अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत केवल 2 ही आरोप लगने की स्थिति में हटाया जा सकता है यथा सिद्ध कदाचार एवं शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता | जब किसी जज पर आरोप लगाया जाएगा तो उसे हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव को पहले संसद किसी सदन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा| यदि यह प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार होगा और यदि इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार किया जाएगा | एक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने के बाद जब यह अपने दूसरे सदन में प्रेषित किया जाएगा तो उस सदन में विचारार्थ स्वीकार किये जाने के पहले एक तीन सदस्यीय समिति इन आरोपों की जांच करेगी | इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज, किसी HC के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश और एक विधि वेत्ता होंगे| 2:1 के बहुमत से यदि यह समिति उपरोक्त आरोपों को सही पाती है तो उसके आधार पर दूसरे सदन में भी उपरोक्त प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित किया जाएगा| इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा| राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही उसी क्षण उक्त जज अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा| स्पष्ट है की जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और इसका उद्देश्य जजों को स्वतंत्रता प्रदान करना है | SC एवं HC के जजों के वेतन एवं भत्ते में वित्तीय आपात के अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में कटौती नही की जा सकती|पुनः इन जजों के वेतन और भत्ते तथा इनके कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन और भत्ते अनुच्छेद 112(3) के अंतर्गत भारित व्यय में रखे गए हैं अर्थात संसद इन पर मतदान नहीं कर सकती | अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार SC एवं HC के जजों के आचरण पर संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर कोई बहस नहीं की जा सकती है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया गया है| भारत में सरकार के अंगों में स्थापित संतुलन न्यापालिका की अक्षुण्ण स्वतंत्रता के कारण है|इस तरह न्यायपालिका भारत में विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इस प्रकार स्वतंत्र भारतीय न्यायपालिका अपने औचित्य को सिद्ध करती है |
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जनसांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? जनसांख्यिकी की गणना में प्रयुक्त जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन सम्बन्धी टर्म्स/अवधारणाओं को परिभाषित कीजिये| (150-200 शब्द) What do you understand by Demography? Define the terms/conceptsrelated toBirth, Death and Migration used in calculating Demographics.(150-200 words)
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एप्रोच- जनसांख्यिकी को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में,जनसांख्यिकी की गणना में प्रयुक्त जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन सम्बन्धी टर्म्स/अवधारणाओं(जैसे-अशोधित जन्मदर(CBR); सामान्य प्रजनन दर(GFR); शिशु मृत्यु दर; मातृत्व मृत्युदर आदि) को परिभाषित कीजिये| उत्तर- जनसांख्यिकी या जनांकिकी जनसँख्या का सुव्यवस्थित अध्ययन है| यह ग्रीक शब्द "डेमोस" अर्थात जन(लोग) तथा "ग्राफीन" अर्थात वर्णन से मिलकर बना है जिसका अर्थ "लोगों के वर्णन से है"|जनसांख्यिकी के अंतर्गत जनसँख्या से संबंधित विभिन्न प्रवृतियों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जिसमें जनसँख्या के आकर में परिवर्तन; जन्म, मृत्यु, प्रवसन के प्रतिरूप/पैटर्न; तथा जनसँख्या की संरचना एवं संघटन (उनमें स्त्रियों, पुरूषों और विभिन्न आयुवर्गों के लोगों का अनुपात) को सम्मिलित किया जाता है| जनसांख्यिकी को हम आकारिकीजनसांख्यिकी (अधिकतर जनसँख्या के आकर अर्थात मात्रा का अध्ययन) तथा सामाजिक जनसांख्यिकी (जनसँख्या के सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक पक्षों पर विचार) अध्ययन करते हैं| जनसांख्यिकी से तात्पर्य किसी दिए गए क्षेत्र में वैज्ञानिक पद्धति से प्राकृतिक स्रोतों एवं जनसंख्या से सम्बन्धित आंकड़ों का संकलन एवं उनकी परस्पर निर्भरता को रेखांकित करने से है| इन आंकड़ों का उपयोग नीतियों के निर्माण में किया जाता है| जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन जनसांख्यिकी के प्रमुख घटक कहे जाते हैं| जन्म सम्बन्धी टर्म्स अशोधित जन्मदर(CBR) - किसी दिए गए वर्ष में कुल जन्मों की संख्या को उस वर्ष की मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर एक हजार से गुणा करने परअशोधित जन्मदरप्राप्त होती है| सामान्य प्रजनन दर(GFR) - किसी दिए गए वर्ष में कुल जन्मों की संख्या को दिए गए वर्ष की फिकेंड महिलाओं की मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर उसे 1 हजार से गुणा करने पर सामान्य प्रजनन दर(GFR) प्राप्त होती है| आयु विशेष प्रजनन दर(ASFR) - किसी दिए गए वर्ष में एक आयु विशेष की फिकेंड महिलाओं द्वारा कुल जन्मों की संख्या को उस वर्ष में उसी आयु विशेष की मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर एक हजार से गुणित कर आयु विशेष प्रजनन दर (ASFR) प्राप्त किया जाता है| कुल प्रजनन दर(TFR) - कुल प्रजनन दर आयु विशेष प्रजनन दर का माध्य होता है, तथा यदि किसी समाज का TFR 2 है तो उसे प्रतिस्थापन प्रजनन दर भी कहा जाता है| परन्तु नीतिगत स्तर पर इस आंकड़े को 2.1 रखा जाता है| मृत्यु सम्बन्धी टर्म्स आयु विशेष मृत्युदर - किसी दिए गए वर्ष में एक आयु विशेष में हुई कुल मौतों की संख्या को उसी वर्ष में उसी आयु विशेष की कुल जनसंख्या से विभाजित कर एक हजार से गुणा करने पर प्राप्त होता है| कारण विशेष मृत्युदर - किसी दिए गए वर्ष में किसी दिए गए कारण विशेष के कारण हुई कुल मौतों की संख्या को उसी दिए गए वर्ष में कुल मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर उसे 1 हजार से गुणित करने पर प्राप्त होता है| इसके आधार पर महामारी की गणना की जाती है| मातृत्व मृत्यु दर(MMR)- किसी दिए गए वर्ष में जन्म सम्बन्धी कारणों से होने वाली महिलाओं की मौतों की कुल संख्या को उसी दिए गए वर्ष में जीवित जन्मों की संख्या से विभाजित कर उसे 1 लाख से गुणित करने पर प्राप्त होती है| शिशु मृत्युदर - किसी दिए गए वर्ष कुल शिशु मौतों की संख्या को उसी वर्ष में कुल शिशु जन्मों की संख्या से विभाजित कर उसे एक हजार से गुणित करने पर प्राप्त होती है| प्रवसन सम्बन्धी परिभाषाएं प्रवसन से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूहों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर, जिसमें कम से कम दो प्रशासनिक इकाइयां सम्मिलित हों, के अल्पकालिक या दीर्घकालिक स्थानान्तरण से है| भारतीय सन्दर्भ में यह निम्नलिखित दो प्रकार का होता है- आंतरिक प्रवसन- यह चार प्रकार का होता है- ग्रामीण से ग्रामीण, ग्रामीण से शहर, शहर से शहर; शहर से ग्रामीण; भारत में सर्वाधिक प्रवसन ग्रामीण से ग्रामीण क्षेत्र की ओर होता है जिसका सबसे बड़ा कारण विवाह है| बाह्य प्रवसन- देश की परिसीमा से बाहर हो रहा हो तथा यह दो प्रकार का होता है- वैधानिकप्रवसन(अंतर्गमन एवं बहिर्गमन); अवैधानिक प्रवसन(घुसपैठ एवं मानव तस्करी आदि); उपरोक्त अवधारणाओं का उपयोग करते हुए जनसांख्यिकी सम्बन्धी आंकड़े तैयार किये जाते हैं| वर्तमान में जनसांख्यिकी के इन्ही आंकड़ों के आधार पर बेबी बूम, बेबी बर्स्ट एवं बेबी बैलेंस प्रकार की जनसंख्या नीतियाँ बनती हैं| इस प्रकार की नीतियां संसाधनों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए भविष्य में विकास के स्तर के आकलन में सहायता करती हैं|
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##Question:जनसांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? जनसांख्यिकी की गणना में प्रयुक्त जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन सम्बन्धी टर्म्स/अवधारणाओं को परिभाषित कीजिये| (150-200 शब्द) What do you understand by Demography? Define the terms/conceptsrelated toBirth, Death and Migration used in calculating Demographics.(150-200 words)##Answer:एप्रोच- जनसांख्यिकी को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में,जनसांख्यिकी की गणना में प्रयुक्त जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन सम्बन्धी टर्म्स/अवधारणाओं(जैसे-अशोधित जन्मदर(CBR); सामान्य प्रजनन दर(GFR); शिशु मृत्यु दर; मातृत्व मृत्युदर आदि) को परिभाषित कीजिये| उत्तर- जनसांख्यिकी या जनांकिकी जनसँख्या का सुव्यवस्थित अध्ययन है| यह ग्रीक शब्द "डेमोस" अर्थात जन(लोग) तथा "ग्राफीन" अर्थात वर्णन से मिलकर बना है जिसका अर्थ "लोगों के वर्णन से है"|जनसांख्यिकी के अंतर्गत जनसँख्या से संबंधित विभिन्न प्रवृतियों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जिसमें जनसँख्या के आकर में परिवर्तन; जन्म, मृत्यु, प्रवसन के प्रतिरूप/पैटर्न; तथा जनसँख्या की संरचना एवं संघटन (उनमें स्त्रियों, पुरूषों और विभिन्न आयुवर्गों के लोगों का अनुपात) को सम्मिलित किया जाता है| जनसांख्यिकी को हम आकारिकीजनसांख्यिकी (अधिकतर जनसँख्या के आकर अर्थात मात्रा का अध्ययन) तथा सामाजिक जनसांख्यिकी (जनसँख्या के सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक पक्षों पर विचार) अध्ययन करते हैं| जनसांख्यिकी से तात्पर्य किसी दिए गए क्षेत्र में वैज्ञानिक पद्धति से प्राकृतिक स्रोतों एवं जनसंख्या से सम्बन्धित आंकड़ों का संकलन एवं उनकी परस्पर निर्भरता को रेखांकित करने से है| इन आंकड़ों का उपयोग नीतियों के निर्माण में किया जाता है| जन्म, मृत्यु एवं प्रवसन जनसांख्यिकी के प्रमुख घटक कहे जाते हैं| जन्म सम्बन्धी टर्म्स अशोधित जन्मदर(CBR) - किसी दिए गए वर्ष में कुल जन्मों की संख्या को उस वर्ष की मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर एक हजार से गुणा करने परअशोधित जन्मदरप्राप्त होती है| सामान्य प्रजनन दर(GFR) - किसी दिए गए वर्ष में कुल जन्मों की संख्या को दिए गए वर्ष की फिकेंड महिलाओं की मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर उसे 1 हजार से गुणा करने पर सामान्य प्रजनन दर(GFR) प्राप्त होती है| आयु विशेष प्रजनन दर(ASFR) - किसी दिए गए वर्ष में एक आयु विशेष की फिकेंड महिलाओं द्वारा कुल जन्मों की संख्या को उस वर्ष में उसी आयु विशेष की मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर एक हजार से गुणित कर आयु विशेष प्रजनन दर (ASFR) प्राप्त किया जाता है| कुल प्रजनन दर(TFR) - कुल प्रजनन दर आयु विशेष प्रजनन दर का माध्य होता है, तथा यदि किसी समाज का TFR 2 है तो उसे प्रतिस्थापन प्रजनन दर भी कहा जाता है| परन्तु नीतिगत स्तर पर इस आंकड़े को 2.1 रखा जाता है| मृत्यु सम्बन्धी टर्म्स आयु विशेष मृत्युदर - किसी दिए गए वर्ष में एक आयु विशेष में हुई कुल मौतों की संख्या को उसी वर्ष में उसी आयु विशेष की कुल जनसंख्या से विभाजित कर एक हजार से गुणा करने पर प्राप्त होता है| कारण विशेष मृत्युदर - किसी दिए गए वर्ष में किसी दिए गए कारण विशेष के कारण हुई कुल मौतों की संख्या को उसी दिए गए वर्ष में कुल मध्यावधि जनसंख्या से विभाजित कर उसे 1 हजार से गुणित करने पर प्राप्त होता है| इसके आधार पर महामारी की गणना की जाती है| मातृत्व मृत्यु दर(MMR)- किसी दिए गए वर्ष में जन्म सम्बन्धी कारणों से होने वाली महिलाओं की मौतों की कुल संख्या को उसी दिए गए वर्ष में जीवित जन्मों की संख्या से विभाजित कर उसे 1 लाख से गुणित करने पर प्राप्त होती है| शिशु मृत्युदर - किसी दिए गए वर्ष कुल शिशु मौतों की संख्या को उसी वर्ष में कुल शिशु जन्मों की संख्या से विभाजित कर उसे एक हजार से गुणित करने पर प्राप्त होती है| प्रवसन सम्बन्धी परिभाषाएं प्रवसन से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समूहों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर, जिसमें कम से कम दो प्रशासनिक इकाइयां सम्मिलित हों, के अल्पकालिक या दीर्घकालिक स्थानान्तरण से है| भारतीय सन्दर्भ में यह निम्नलिखित दो प्रकार का होता है- आंतरिक प्रवसन- यह चार प्रकार का होता है- ग्रामीण से ग्रामीण, ग्रामीण से शहर, शहर से शहर; शहर से ग्रामीण; भारत में सर्वाधिक प्रवसन ग्रामीण से ग्रामीण क्षेत्र की ओर होता है जिसका सबसे बड़ा कारण विवाह है| बाह्य प्रवसन- देश की परिसीमा से बाहर हो रहा हो तथा यह दो प्रकार का होता है- वैधानिकप्रवसन(अंतर्गमन एवं बहिर्गमन); अवैधानिक प्रवसन(घुसपैठ एवं मानव तस्करी आदि); उपरोक्त अवधारणाओं का उपयोग करते हुए जनसांख्यिकी सम्बन्धी आंकड़े तैयार किये जाते हैं| वर्तमान में जनसांख्यिकी के इन्ही आंकड़ों के आधार पर बेबी बूम, बेबी बर्स्ट एवं बेबी बैलेंस प्रकार की जनसंख्या नीतियाँ बनती हैं| इस प्रकार की नीतियां संसाधनों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए भविष्य में विकास के स्तर के आकलन में सहायता करती हैं|
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आधुनिक समाज की जटिलताओं ने मात्र विधिबद्ध श्रम-विभाजित नौकरशाही की भूमिका को परिवर्तित करने की मांग की है| ऐसी स्थिति में आप किस प्रकार की नौकरशाही का सुझाव वर्तमान समाज को देना चाहेंगे?(150-200 शब्द/ 10 अंक) The complexities of modern society have merely sought to change the role of a legally labour-divided bureaucracy. In such a situation what kind of bureaucracy would you like to suggest to the present society? (150-200 words / 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैधानिक नौकरशाही और आधुनिक समाज का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में वैधानिक नौकरशाही की विशेषताएं स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में वैधानिक नौकरशाही की सीमाएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में लोकतांत्रिक नौकरशाही की प्रासंगिकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नौकरशाही का स्वरुप तत्कालीन समाज की प्रकृति से प्रभावित होता है| आधुनिक समाजों में आय अपेक्षाकृत अधिक होती है जिसका स्रोत संसाधनों का प्रसंस्करण एवं पुनरुत्पादन होता है| आधुनिक समाजों में उपयोगितावादी शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है| अतः शिक्षा यहाँ आय और व्यवसाय का आधार होती है| इन समाजों में प्रायः केंद्रीकृत नगरीकरण देखा जाता हैजहाँ प्रति व्यक्ति आय न्यून होती है| इन समाजों में विशेषज्ञता आधारित गत्यात्मकता होती है| अर्थात केवल अपने क्षेत्रों तक सीमित होती है| किन्तु यहाँ संवृद्धि दर अपेक्षाकृत अधिक होती है|अपनी कुछ विशेषताओं के कारण इन समाजों में वैधानिक नौकरशाही के आधार पर शासन किया जाता है| वैधानिक नौकरशाही की विशेषताएं इसमें संवर्ग का निर्धारण होता है|अर्थात प्रत्येक प्रशासक का एक निश्चित वर्ग होता है| इसी आधार पर प्रशासनिक पदसोपान का निर्धारण किया जाता है इसमें प्रशासनिक पद्सोपान स्वामी सेवक सम्बन्ध पर आधारित होता है किन्तु यह सम्बन्ध वैधानिक मामलों तक ही सीमित होता है वैधानिक नौकरशाही में कार्य विभाजन किया जाता है, इससे कार्यविशिष्टीकरण होता है और संरचना जटिल नहीं होने पाती वैधानिक नौकरशाही का एक अन्य चरित्र नियमबद्धता है| इसमें व्यक्ति कीव्यक्तिगत इच्छाएं और सम्बन्ध का कोई महत्त्व नहीं होता उत्तरदायित्वों के निर्धारण के लिए और जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के लिए आधिकारिक दस्तावेज का निर्माण वैधानिक नौकरशाही की एक अन्य विशेषता है वैधानिक नौकरशाही की बाधाएं लालफीताशाही, इसका जन्म अत्यधिक नियमबद्धता, नौकरशाही की बढती शक्ति आदि कारणों से हुआ है अत्यधिक नियमबद्धता के कारण वैधानिक नौकरशाही में रचनात्मकता के लिए स्थान नहीं होता है सभी कार्यों को अत्यधिक दस्तावेज आधारित बना दिया जाता है अतः प्रशासनिक कार्य निरंतर यांत्रिक होता जाता है वैधानिक नौकरशाही में व्यक्तिगत जिम्मेदारी का अभाव देखा जाता है जिसके कारण अपनेपन का अभाव पाया जाता है अतः असंवेदनशीलता की कमी देखी जाती है ये सभी बाधाएं मिलकर व्यक्ति का मशीनीकरण कर देती हैं| इससे सृजनात्मकता का ह्रास होता है और प्रशासन रूढ़िवादी और उदासीन होता जाता है वर्ष 2000 के पूर्व सत्ता के विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक मूल्यों के गुणात्मक विकास में वैधानिक नौकरशाही ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी किन्तु अत्यधिक नियमबद्धता और यांत्रिक प्रकृति के कारण वैधानिक नौकरशाही की समीक्षा की गयी| चूँकि समकालीन अध्ययन मेंलोकतंत्र को "जनता का, जनता के लिए औचित्यपूर्ण एवं उत्तरदायी शासन" के रूप में परिभाषित किया जाता है अतः वैधानिक नौकरशाही की जगह लोकतांत्रिक नौकरशाही अपनाने की बात की जाती है| लोकतांत्रिक नौकरशाही में लोकतांत्रिक मूल्य जैसे स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व आदि पर विशेष बल दिया जाता है| लोकतांत्रिकनौकरशाही औचित्यपूर्णता और उत्तरदायित्व के आधार पर संचालित होती है जो उत्तर आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप है|
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##Question:आधुनिक समाज की जटिलताओं ने मात्र विधिबद्ध श्रम-विभाजित नौकरशाही की भूमिका को परिवर्तित करने की मांग की है| ऐसी स्थिति में आप किस प्रकार की नौकरशाही का सुझाव वर्तमान समाज को देना चाहेंगे?(150-200 शब्द/ 10 अंक) The complexities of modern society have merely sought to change the role of a legally labour-divided bureaucracy. In such a situation what kind of bureaucracy would you like to suggest to the present society? (150-200 words / 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैधानिक नौकरशाही और आधुनिक समाज का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में वैधानिक नौकरशाही की विशेषताएं स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में वैधानिक नौकरशाही की सीमाएं स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में लोकतांत्रिक नौकरशाही की प्रासंगिकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नौकरशाही का स्वरुप तत्कालीन समाज की प्रकृति से प्रभावित होता है| आधुनिक समाजों में आय अपेक्षाकृत अधिक होती है जिसका स्रोत संसाधनों का प्रसंस्करण एवं पुनरुत्पादन होता है| आधुनिक समाजों में उपयोगितावादी शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है| अतः शिक्षा यहाँ आय और व्यवसाय का आधार होती है| इन समाजों में प्रायः केंद्रीकृत नगरीकरण देखा जाता हैजहाँ प्रति व्यक्ति आय न्यून होती है| इन समाजों में विशेषज्ञता आधारित गत्यात्मकता होती है| अर्थात केवल अपने क्षेत्रों तक सीमित होती है| किन्तु यहाँ संवृद्धि दर अपेक्षाकृत अधिक होती है|अपनी कुछ विशेषताओं के कारण इन समाजों में वैधानिक नौकरशाही के आधार पर शासन किया जाता है| वैधानिक नौकरशाही की विशेषताएं इसमें संवर्ग का निर्धारण होता है|अर्थात प्रत्येक प्रशासक का एक निश्चित वर्ग होता है| इसी आधार पर प्रशासनिक पदसोपान का निर्धारण किया जाता है इसमें प्रशासनिक पद्सोपान स्वामी सेवक सम्बन्ध पर आधारित होता है किन्तु यह सम्बन्ध वैधानिक मामलों तक ही सीमित होता है वैधानिक नौकरशाही में कार्य विभाजन किया जाता है, इससे कार्यविशिष्टीकरण होता है और संरचना जटिल नहीं होने पाती वैधानिक नौकरशाही का एक अन्य चरित्र नियमबद्धता है| इसमें व्यक्ति कीव्यक्तिगत इच्छाएं और सम्बन्ध का कोई महत्त्व नहीं होता उत्तरदायित्वों के निर्धारण के लिए और जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के लिए आधिकारिक दस्तावेज का निर्माण वैधानिक नौकरशाही की एक अन्य विशेषता है वैधानिक नौकरशाही की बाधाएं लालफीताशाही, इसका जन्म अत्यधिक नियमबद्धता, नौकरशाही की बढती शक्ति आदि कारणों से हुआ है अत्यधिक नियमबद्धता के कारण वैधानिक नौकरशाही में रचनात्मकता के लिए स्थान नहीं होता है सभी कार्यों को अत्यधिक दस्तावेज आधारित बना दिया जाता है अतः प्रशासनिक कार्य निरंतर यांत्रिक होता जाता है वैधानिक नौकरशाही में व्यक्तिगत जिम्मेदारी का अभाव देखा जाता है जिसके कारण अपनेपन का अभाव पाया जाता है अतः असंवेदनशीलता की कमी देखी जाती है ये सभी बाधाएं मिलकर व्यक्ति का मशीनीकरण कर देती हैं| इससे सृजनात्मकता का ह्रास होता है और प्रशासन रूढ़िवादी और उदासीन होता जाता है वर्ष 2000 के पूर्व सत्ता के विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक मूल्यों के गुणात्मक विकास में वैधानिक नौकरशाही ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी किन्तु अत्यधिक नियमबद्धता और यांत्रिक प्रकृति के कारण वैधानिक नौकरशाही की समीक्षा की गयी| चूँकि समकालीन अध्ययन मेंलोकतंत्र को "जनता का, जनता के लिए औचित्यपूर्ण एवं उत्तरदायी शासन" के रूप में परिभाषित किया जाता है अतः वैधानिक नौकरशाही की जगह लोकतांत्रिक नौकरशाही अपनाने की बात की जाती है| लोकतांत्रिक नौकरशाही में लोकतांत्रिक मूल्य जैसे स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व आदि पर विशेष बल दिया जाता है| लोकतांत्रिकनौकरशाही औचित्यपूर्णता और उत्तरदायित्व के आधार पर संचालित होती है जो उत्तर आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप है|
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स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में किये गए प्रावधानों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक- 10 ) Explain the need for an independent judiciary. Also discuss the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the judiciary. (150-200 words, Marks - 10 )
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एप्रोच - भूमिका में स्वतंत्र न्यायपालिका को परिभाषित करते हुए आवश्यकता स्पष्ट कीजिये | प्रथम भाग में न्यायिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में संवैधानिक उपबन्धों की चर्चा कीजिये | अंतिम में न्यापालिका की स्वतंत्रता का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यायपालिका जहाँ एक ओर व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करती है वहीँ उपलब्ध विधियों के आधार पर विवादों का समाधान करती है | न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इसके लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है | न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है की न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय अथवा भेदभाव के न्याय कर सकें| भारत में सर्वोच्च न्यायालय(SC) एवं उच्च न्यायालय(HC) को निर्भीक रूप से कानून की रक्षा करने और सम्बन्धित दायित्व का निर्वहन करने के लिए उन्हें कार्यपालिका एवं विधायिका की अनावश्यक दखल से मुक्त रखने की व्यवस्था की गयी है| इनमें कुछ संवैधानिक उपबन्ध हैं तो कुछ न्यायपालिका की व्याख्या पर आधारित हैं | संविधान में किये गए प्रावधान SC एवं HC के जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती है जिससे इस नियुक्ति में राजनीतिक दखल न हो | जजों द्वारा दिए गए निर्णय में यदि कोई दोष है तो भी इसे कदाचार नहीं माना जाएगा अर्थात इसके आधार पर जजों को दंडित नही किया जा सकता|अनुच्छेद 137 के अंतर्गत अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है और उसे पलट सकता है| वर्ष 2001 में हुर्रा बनाम हुर्रा मामलें में SC ने निदानकारी याचिका की व्यवस्था की अर्थात यदि SC की किसी पीठ ने अपने किसी निर्णय में कोई गलती कर दी है तो इस याचिका के माध्यम से इस न्यायालय की दूसरी पीठ इस गलती को सुधार सकती है | SC और HC के जज अपने पर पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नही रहते बल्कि वे संविधान के अंतर्गत प्राप्त उन्मुक्तियों के आधार पर अपने पद बने रहते हैं | इस सम्बन्ध में जज जांच अधिनियम 1968 को आधार बनाया जाता है जिसके अनुसार SC व HC के जज को अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत केवल 2 ही आरोप लगने की स्थिति में हटाया जा सकता है यथा सिद्ध कदाचार एवं शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता | जब किसी जज पर आरोप लगाया जाएगा तो उसे हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव को पहले संसद किसी सदन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा| यदि यह प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार होगा और यदि इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार किया जाएगा | एक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने के बाद जब यह अपने दूसरे सदन में प्रेषित किया जाएगा तो उस सदन में विचारार्थ स्वीकार किये जाने के पहले एक तीन सदस्यीय समिति इन आरोपों की जांच करेगी | इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज, किसी HC के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश और एक विधि वेत्ता होंगे| 2:1 के बहुमत से यदि यह समिति उपरोक्त आरोपों को सही पाती है तो उसके आधार पर दूसरे सदन में भी उपरोक्त प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित किया जाएगा| इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा| राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही उसी क्षण उक्त जज अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा| स्पष्ट है की जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और इसका उद्देश्य जजों को स्वतंत्रता प्रदान करना है | SC एवं HC के जजों के वेतन एवं भत्ते में वित्तीय आपात के अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में कटौती नही की जा सकती|पुनः इन जजों के वेतन और भत्ते तथा इनके कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन और भत्ते अनुच्छेद 112(3) के अंतर्गत भारित व्यय में रखे गए हैं अर्थात संसद इन पर मतदान नहीं कर सकती | अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार SC एवं HC के जजों के आचरण पर संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर कोई बहस नहीं की जा सकती है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया गया है| भारत में सरकार के अंगों में स्थापित संतुलन न्यापालिका की अक्षुण्ण स्वतंत्रता के कारण है|इस तरह न्यायपालिका भारत में विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इस प्रकार स्वतंत्र भारतीय न्यायपालिका अपने औचित्य को सिद्ध करती है |
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##Question:स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में किये गए प्रावधानों की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक- 10 ) Explain the need for an independent judiciary. Also discuss the provisions made in the Indian Constitution to ensure the independence of the judiciary. (150-200 words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच - भूमिका में स्वतंत्र न्यायपालिका को परिभाषित करते हुए आवश्यकता स्पष्ट कीजिये | प्रथम भाग में न्यायिक स्वतंत्रता के सन्दर्भ में संवैधानिक उपबन्धों की चर्चा कीजिये | अंतिम में न्यापालिका की स्वतंत्रता का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | उत्तर - न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि वह विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यायपालिका जहाँ एक ओर व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करती है वहीँ उपलब्ध विधियों के आधार पर विवादों का समाधान करती है | न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इसके लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है | न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है की न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त हो, सरकार के अन्य अंग न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करें ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय अथवा भेदभाव के न्याय कर सकें| भारत में सर्वोच्च न्यायालय(SC) एवं उच्च न्यायालय(HC) को निर्भीक रूप से कानून की रक्षा करने और सम्बन्धित दायित्व का निर्वहन करने के लिए उन्हें कार्यपालिका एवं विधायिका की अनावश्यक दखल से मुक्त रखने की व्यवस्था की गयी है| इनमें कुछ संवैधानिक उपबन्ध हैं तो कुछ न्यायपालिका की व्याख्या पर आधारित हैं | संविधान में किये गए प्रावधान SC एवं HC के जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती है जिससे इस नियुक्ति में राजनीतिक दखल न हो | जजों द्वारा दिए गए निर्णय में यदि कोई दोष है तो भी इसे कदाचार नहीं माना जाएगा अर्थात इसके आधार पर जजों को दंडित नही किया जा सकता|अनुच्छेद 137 के अंतर्गत अपने ही निर्णय की समीक्षा कर सकता है और उसे पलट सकता है| वर्ष 2001 में हुर्रा बनाम हुर्रा मामलें में SC ने निदानकारी याचिका की व्यवस्था की अर्थात यदि SC की किसी पीठ ने अपने किसी निर्णय में कोई गलती कर दी है तो इस याचिका के माध्यम से इस न्यायालय की दूसरी पीठ इस गलती को सुधार सकती है | SC और HC के जज अपने पर पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत नही रहते बल्कि वे संविधान के अंतर्गत प्राप्त उन्मुक्तियों के आधार पर अपने पद बने रहते हैं | इस सम्बन्ध में जज जांच अधिनियम 1968 को आधार बनाया जाता है जिसके अनुसार SC व HC के जज को अनुच्छेद 124(4) के अंतर्गत केवल 2 ही आरोप लगने की स्थिति में हटाया जा सकता है यथा सिद्ध कदाचार एवं शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता | जब किसी जज पर आरोप लगाया जाएगा तो उसे हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव को पहले संसद किसी सदन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा| यदि यह प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार होगा और यदि इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है तो उसके कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर से यह स्वीकार किया जाएगा | एक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने के बाद जब यह अपने दूसरे सदन में प्रेषित किया जाएगा तो उस सदन में विचारार्थ स्वीकार किये जाने के पहले एक तीन सदस्यीय समिति इन आरोपों की जांच करेगी | इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज, किसी HC के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश और एक विधि वेत्ता होंगे| 2:1 के बहुमत से यदि यह समिति उपरोक्त आरोपों को सही पाती है तो उसके आधार पर दूसरे सदन में भी उपरोक्त प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित किया जाएगा| इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा| राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही उसी क्षण उक्त जज अपने पद से हटा हुआ माना जाएगा| स्पष्ट है की जजों को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है और इसका उद्देश्य जजों को स्वतंत्रता प्रदान करना है | SC एवं HC के जजों के वेतन एवं भत्ते में वित्तीय आपात के अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में कटौती नही की जा सकती|पुनः इन जजों के वेतन और भत्ते तथा इनके कार्यालयों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन और भत्ते अनुच्छेद 112(3) के अंतर्गत भारित व्यय में रखे गए हैं अर्थात संसद इन पर मतदान नहीं कर सकती | अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार SC एवं HC के जजों के आचरण पर संसद या राज्य विधानमंडल के पटल पर कोई बहस नहीं की जा सकती है | इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से न्यायपालिका की स्वंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया गया है| भारत में सरकार के अंगों में स्थापित संतुलन न्यापालिका की अक्षुण्ण स्वतंत्रता के कारण है|इस तरह न्यायपालिका भारत में विधि के शासन की रक्षा और विधियों की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करती है| न्यापालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र के स्थान पर किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही न स्थापित होने पाए| इस प्रकार स्वतंत्र भारतीय न्यायपालिका अपने औचित्य को सिद्ध करती है |
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वैधानिक नौकरशाही से आप क्या समझते हैं? वैधानिक नौकरशाही की विशेषताओं का वर्णन करते हुए उसकी कमियों को उजागर कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Legal Bureaucracy? Describe the characteristics of the Legal Bureaucracy and highlight its shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)
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एप्रोच- नौकरशाही को परिभाषित करते हुए उत्तर प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, वैधानिक नौकरशाही का अर्थ बताईये| अगले भाग में,वैधानिक नौकरशाही की विशेषताओं का वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में,वैधानिक नौकरशाही कीकमियों को उजागर कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में लोकतांत्रिक नौकरशाही की भूमिका को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- शासन एक शासन दर्शन पर आधारित होता है तथा इन्हें संचालित करने के लिए नौकरशाही की आवश्यकता होती है| नौकरशाही शासन संचालन के लिए स्थायी अधिकारियों का एक ऐसा समूह/प्रशासनिक ढाँचा है जो सार्वजनिक नीतियों को क्रियान्वित करता है | नौकरशाही पेशेवर स्थायी अधिकारियों का निकाय है जो पूर्णकालिक अधिकारियों को गैर-राजनीतिक क्षमता में राज्य के नागरिक मामलों में नियोजित करता है| नौकरशाही कई प्रकार की होती है जैसे- पारंपरिक नौकरशाही;अभिभावक नौकरशाही;सरपरस्त नौकरशाही;अवार्ड नौकरशाही;वैधानिक नौकरशाही; लोकतांत्रिक नौकरशाही आदि| वैधानिक नौकरशाही ऐसी नौकरशाही जो नियमबद्धता, विधियों तथा कार्यकुशलता पर आधारित हो| वेबर के अनुसार यह प्रशासन की ऐसी प्रणाली है जिसमें कार्यों की एक विशेषज्ञत होती है तथा कार्यान्वयन के लिए निर्धारित उद्देश्य एवं योग्यता विद्यमान होती है| वैधानिक नौकरशाही में कार्यवाही के निश्चित नियम एवं पदों में सोपानीयता विद्यमान होती है| वैधानिक नौकरशाही की विशेषताएं- प्रशासनिक वर्ग -इसमें संवर्ग का निर्धारण होता है अर्थात प्रत्येक प्रशासक का एक निश्चित वर्ग होता है| इसी आधार पर प्रशासनिक पदसोपान का निर्धारण किया जाता है| पद सोपान व्यवस्था - अनुच्छेद 309(स्वामी एवं सेवक का सिद्धांत स्वीकार)के अनुसारप्रशासनिक पद्सोपान स्वामी सेवक सम्बन्ध पर आधारित होता है किन्तु यह सम्बन्ध वैधानिक मामलों तक ही सीमित होता है| वैधानिक पदानुक्रम ना कि सामाजिक पदानुक्रम; कार्यों का विभाजन -वैधानिक नौकरशाही में कार्य विभाजन किया जाता है| इससे कार्यविशिष्टीकरण होता है और संरचना जटिल नहीं होने पाती है| नियमबद्धता - आधिकारिक नियम; सामाजिक संबंधों की जगह नियमों पर आधारित व्यवस्था; सैद्धांतिक तौर पर व्यक्तिगत संबंधों का अभाव तथाव्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाएं और सम्बन्ध का कोई महत्त्व नहीं; आधिकारिक लेखाजोखा - उत्तरदायित्वों के निर्धारण के लिए और जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के लिए आधिकारिक दस्तावेज का निर्माण वैधानिक नौकरशाही की एक अन्य विशेषता है| वैधानिक नौकरशाही की कमियां- पेपरवर्क की संख्या में बढ़ोतरी; समय लगना; योजनाओं के कार्यान्वयन में विलंब; लालफीताशाही का स्वरूप -इसका जन्म अत्यधिक नियमबद्धता, नौकरशाही की बढ़ती शक्ति आदि कारणों से हुआ है| अनुत्तरदायी ; अनुच्छेद 77 के अनुसार मंत्री विधिक रूप से उत्तरदायी नहीं क्योंकि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर कार्य करेगा| अनुच्छेद 74- राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करेगा| इससे किसी की स्पष्ट उत्तरदायिता का अभाव; अपनेपन का अभाव- वैधानिक नौकरशाही में व्यक्तिगत जिम्मेदारी का अभाव देखा जाता है जिसके कारण अपनेपन का अभाव पाया जाता है| अतः संवेदनशीलता की कमी देखी जाती है| मशीनीकरण को बढ़ावा -सभी कार्यों को अत्यधिक दस्तावेज आधारित बना दिया जाता है अतः प्रशासनिक कार्य निरंतर यांत्रिक होता जाता है| रचनात्मकता को हतोत्साहन -अत्यधिक नियमबद्धता के कारण वैधानिक नौकरशाही में रचनात्मकता के लिए स्थान नहीं होता है| रूढ़िवादिता का जन्म -ये सभी बाधाएं मिलकर व्यक्ति का मशीनीकरण कर देती हैं| इससे सृजनात्मकता का ह्रास होता है और प्रशासन रूढ़िवादी और उदासीन होता जाता है| वर्ष 2000 के पूर्व सत्ता के विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक मूल्यों के गुणात्मक विकास में वैधानिक नौकरशाही ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी किन्तु अत्यधिक नियमबद्धता और यांत्रिक प्रकृति के कारण वैधानिक नौकरशाही की समीक्षा की गयी| चूँकि समकालीन अध्ययन में लोकतंत्र को "जनता का, जनता के लिए औचित्यपूर्ण एवं उत्तरदायी शासन" के रूप में परिभाषित किया जाता है अतः वैधानिक नौकरशाही की जगह लोकतांत्रिक नौकरशाही अपनाने की बात की जाती है| लोकतांत्रिक नौकरशाही में लोकतांत्रिक मूल्य जैसे स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व आदि पर विशेष बल दिया जाता है| लोकतांत्रिकनौकरशाही औचित्यपूर्णता और उत्तरदायित्व के आधार पर संचालित होती है जो उत्तर आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप है|
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##Question:वैधानिक नौकरशाही से आप क्या समझते हैं? वैधानिक नौकरशाही की विशेषताओं का वर्णन करते हुए उसकी कमियों को उजागर कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by Legal Bureaucracy? Describe the characteristics of the Legal Bureaucracy and highlight its shortcomings. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- नौकरशाही को परिभाषित करते हुए उत्तर प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, वैधानिक नौकरशाही का अर्थ बताईये| अगले भाग में,वैधानिक नौकरशाही की विशेषताओं का वर्णन कीजिये| अंतिम भाग में,वैधानिक नौकरशाही कीकमियों को उजागर कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में लोकतांत्रिक नौकरशाही की भूमिका को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- शासन एक शासन दर्शन पर आधारित होता है तथा इन्हें संचालित करने के लिए नौकरशाही की आवश्यकता होती है| नौकरशाही शासन संचालन के लिए स्थायी अधिकारियों का एक ऐसा समूह/प्रशासनिक ढाँचा है जो सार्वजनिक नीतियों को क्रियान्वित करता है | नौकरशाही पेशेवर स्थायी अधिकारियों का निकाय है जो पूर्णकालिक अधिकारियों को गैर-राजनीतिक क्षमता में राज्य के नागरिक मामलों में नियोजित करता है| नौकरशाही कई प्रकार की होती है जैसे- पारंपरिक नौकरशाही;अभिभावक नौकरशाही;सरपरस्त नौकरशाही;अवार्ड नौकरशाही;वैधानिक नौकरशाही; लोकतांत्रिक नौकरशाही आदि| वैधानिक नौकरशाही ऐसी नौकरशाही जो नियमबद्धता, विधियों तथा कार्यकुशलता पर आधारित हो| वेबर के अनुसार यह प्रशासन की ऐसी प्रणाली है जिसमें कार्यों की एक विशेषज्ञत होती है तथा कार्यान्वयन के लिए निर्धारित उद्देश्य एवं योग्यता विद्यमान होती है| वैधानिक नौकरशाही में कार्यवाही के निश्चित नियम एवं पदों में सोपानीयता विद्यमान होती है| वैधानिक नौकरशाही की विशेषताएं- प्रशासनिक वर्ग -इसमें संवर्ग का निर्धारण होता है अर्थात प्रत्येक प्रशासक का एक निश्चित वर्ग होता है| इसी आधार पर प्रशासनिक पदसोपान का निर्धारण किया जाता है| पद सोपान व्यवस्था - अनुच्छेद 309(स्वामी एवं सेवक का सिद्धांत स्वीकार)के अनुसारप्रशासनिक पद्सोपान स्वामी सेवक सम्बन्ध पर आधारित होता है किन्तु यह सम्बन्ध वैधानिक मामलों तक ही सीमित होता है| वैधानिक पदानुक्रम ना कि सामाजिक पदानुक्रम; कार्यों का विभाजन -वैधानिक नौकरशाही में कार्य विभाजन किया जाता है| इससे कार्यविशिष्टीकरण होता है और संरचना जटिल नहीं होने पाती है| नियमबद्धता - आधिकारिक नियम; सामाजिक संबंधों की जगह नियमों पर आधारित व्यवस्था; सैद्धांतिक तौर पर व्यक्तिगत संबंधों का अभाव तथाव्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाएं और सम्बन्ध का कोई महत्त्व नहीं; आधिकारिक लेखाजोखा - उत्तरदायित्वों के निर्धारण के लिए और जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के लिए आधिकारिक दस्तावेज का निर्माण वैधानिक नौकरशाही की एक अन्य विशेषता है| वैधानिक नौकरशाही की कमियां- पेपरवर्क की संख्या में बढ़ोतरी; समय लगना; योजनाओं के कार्यान्वयन में विलंब; लालफीताशाही का स्वरूप -इसका जन्म अत्यधिक नियमबद्धता, नौकरशाही की बढ़ती शक्ति आदि कारणों से हुआ है| अनुत्तरदायी ; अनुच्छेद 77 के अनुसार मंत्री विधिक रूप से उत्तरदायी नहीं क्योंकि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर कार्य करेगा| अनुच्छेद 74- राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करेगा| इससे किसी की स्पष्ट उत्तरदायिता का अभाव; अपनेपन का अभाव- वैधानिक नौकरशाही में व्यक्तिगत जिम्मेदारी का अभाव देखा जाता है जिसके कारण अपनेपन का अभाव पाया जाता है| अतः संवेदनशीलता की कमी देखी जाती है| मशीनीकरण को बढ़ावा -सभी कार्यों को अत्यधिक दस्तावेज आधारित बना दिया जाता है अतः प्रशासनिक कार्य निरंतर यांत्रिक होता जाता है| रचनात्मकता को हतोत्साहन -अत्यधिक नियमबद्धता के कारण वैधानिक नौकरशाही में रचनात्मकता के लिए स्थान नहीं होता है| रूढ़िवादिता का जन्म -ये सभी बाधाएं मिलकर व्यक्ति का मशीनीकरण कर देती हैं| इससे सृजनात्मकता का ह्रास होता है और प्रशासन रूढ़िवादी और उदासीन होता जाता है| वर्ष 2000 के पूर्व सत्ता के विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक मूल्यों के गुणात्मक विकास में वैधानिक नौकरशाही ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी किन्तु अत्यधिक नियमबद्धता और यांत्रिक प्रकृति के कारण वैधानिक नौकरशाही की समीक्षा की गयी| चूँकि समकालीन अध्ययन में लोकतंत्र को "जनता का, जनता के लिए औचित्यपूर्ण एवं उत्तरदायी शासन" के रूप में परिभाषित किया जाता है अतः वैधानिक नौकरशाही की जगह लोकतांत्रिक नौकरशाही अपनाने की बात की जाती है| लोकतांत्रिक नौकरशाही में लोकतांत्रिक मूल्य जैसे स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व आदि पर विशेष बल दिया जाता है| लोकतांत्रिकनौकरशाही औचित्यपूर्णता और उत्तरदायित्व के आधार पर संचालित होती है जो उत्तर आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप है|
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वर्तमान संदर्भ में सुशासन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए, सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Clarifying the need for good governance in current context , discuss various concepts related to good governance. (150 to 200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सुशासन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में विश्व बैंक की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ भागीदारी, सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता और दक्षता को शामिल किया जाता है| शासन का समाज के परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनशील होना चाहिए| वर्तमान में विभिन्न कारणों से उपरोक्त गुणों से युक्त सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की आवश्यकता शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है | शासन में सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है| शासन में उद्यमशीलता के विकास के लिए सुशासन की आवश्यकता है शासन में औपनिवेशिक चरित्र बना हुआ है जिसके कारण शासन में औपनिवेशिक अभिवृत्ति बनी हुई है अतः प्रशासन लोकप्रिय नहीं हो पाया है, सुशासन प्रशासन को लोकप्रिय बनाने में सहायक है शासन में पारदर्शिता का अभाव पाया जता है, शासन में पारदर्शिता लाने के लिए सुशासन की आवश्यकता है| संवैधानिक समीक्षा की उपयुक्त व्यवस्थाओं का अभाव पाया जाता है जिसके लिए सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की अवधारणायें सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा ऐसा शासन जो व्यक्तियों पर न्यूनतम प्रतिबन्ध आरोपित करते हुएव्यक्ति की विश्व दृष्टि को आगे बढाता है उसे सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा कहते हैं यह अवधारणा न्यूनतम शासन सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्रता, स्वायत्तता आदि मूल्यों को प्रोत्साहित करती है व्यक्तिवादी अवधारणा शासन के सुविधाप्रदाता स्वरुप का पक्षधर है अर्थात जहाँ कहीं असुविधा उत्पन्न हो सकती है शासन को उसका समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए सार्वजनिक नीति समग्र हितों पर आधारित होनी चाहिए यह अवधारणा कमजोरों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की बात नहीं करती, यह सर्वोत्तम की उत्तरजीविता पर आधारित सिद्धांत है यदि इस अवधारणा को अपनाया जाएगा तो विकास केवल उन लोगों तक सीमित होगा जिनका पहले से ही विकास हो चुका है सुशासन की कल्याणकारी अवधारणा व्यक्तिवादी व्यवस्था में व्यक्ति अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता को त्याग देता है अतःयह अवधारणा स्पष्ट करती है कि नैतिकता का अभाव, सम्पूर्ण अव्यवस्था का कारण है व्यक्तिवाद से धन संचय प्रोत्साहित होता है इससे समाज पतित होता जाता है अतः कल्याणकारी अवधारणा यह घोषित करती है कि सुशासन का उद्देश्य नैतिकता का विकास करना है जो शासन व्यवस्था नैतिकता का प्रसार करती है वह सुशासन कहलाती है श्रम की समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए यह अवधारणा पूर्ण रोजगार की मांग करती है यह अवधारणा, राज्य के दायित्व के निरंतर विकेंद्रीकरण की मांग करती है इसी क्रम में दायित्व को विकेंद्रीकृत करते हुए यह अवधारणा मांग करती है कि राज्य, सामाजिक दायित्व(CSR) की भावना का विकास करे इसी प्रकार राज्य को सृजनशील एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के मध्य भी सामाजिक दायित्व के विकास करना चाहिए राज्य को प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देना चाहिए अर्थात समाज के प्रत्येक वर्ग का सशक्तिकरण किया जाना चाहिए ताकि समाज को शोषण से मुक्त किया जा सके| प्रतिसंतुलनकारी शक्तियां एकाधिकारवाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं इससे समाज में प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है| सुशासन की समतावादी अवधारणा ऐसी अवधारणा जो समाज के अनुकूल हो, तर्क संगत हो तथा समानता एवं स्वतंत्रता में तर्कपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती हो उसे सुशासन की समतावादी अवधारणा कहते हैं| जॉन राल्स एवं मैकफर्सन इस अवधारणा से सम्बन्धित विचारक हैं| ऐसा शासन अच्छा शासन होगा जो उत्तरउदारवादी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था के मूल्यों को बढाते हुए सामाजिक न्याय में वृद्धि करता है| यहाँ व्यक्तिगत न्याय के साथ साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाते हैं| इसके लिए अवसरों का समान वितरण किया जाता है और समाज के पिछड़े वर्गों को अतिरिक्त सुविधा दी जाती है| जब समानता स्थापित हो जाए तो शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय को अपनाया जाना चाहिए, तब किसी को अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जायेगी सुशासन की गांधीवादी अवधारणा अपने आदर्शवादी सिद्धांत में गांधी जी मानते हैं कि आदर्श अहिंसक समाज में आत्म अनुशासन के कारण राज्य का अभाव होता है चूँकि अपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा आदर्श अहिंसक समाज का निर्माण नहीं हो सकता अतः एक अस्थायी एवं न्यूनतम राज्य होना चाहिए अतः प्रत्येक व्यावहारिक राज्य के लिए अनिवार्य है कि वह आदर्श अहिंसक समाज की मान्यताओं एवं मूल्यों को व्यावहारिक स्तर पर लाने का प्रयास करे| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सुशासन की विभिन्न अवधारणाओं में मिश्रित पहलुओं का समावेश किया गया है किन्तु समाज और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विश्व बैंक ने सुशासन को नवीनतम एवं समावेशी रूप में परिभाषित किया| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| ध्यातव्य है कि विश्व बैंक की अवधारणा के पहले सुशासन के लिए दो मानदंड माने जाते थे यथा, नीतियों का क्रियान्वयन (इसमें न्यायपालिका, विधायिका एवं अस्थायी कार्यपालिका को शामिल नहीं किया जाता था) तथाक्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि| इससे आगे बढ़ते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बेहतर एवं समावेशी नीतियों का निर्माण(लोकतांत्रिक प्रणाली), लोकतांत्रिक विधि से नीतियों का क्रियान्वयन, जनहित को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि को सुशासन कहते हैं| वर्तमान में सुशासन की विश्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा ही सर्वमान्य है|
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##Question:वर्तमान संदर्भ में सुशासन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए, सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Clarifying the need for good governance in current context , discuss various concepts related to good governance. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सुशासन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में विश्व बैंक की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ भागीदारी, सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता और दक्षता को शामिल किया जाता है| शासन का समाज के परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनशील होना चाहिए| वर्तमान में विभिन्न कारणों से उपरोक्त गुणों से युक्त सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की आवश्यकता शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है | शासन में सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है| शासन में उद्यमशीलता के विकास के लिए सुशासन की आवश्यकता है शासन में औपनिवेशिक चरित्र बना हुआ है जिसके कारण शासन में औपनिवेशिक अभिवृत्ति बनी हुई है अतः प्रशासन लोकप्रिय नहीं हो पाया है, सुशासन प्रशासन को लोकप्रिय बनाने में सहायक है शासन में पारदर्शिता का अभाव पाया जता है, शासन में पारदर्शिता लाने के लिए सुशासन की आवश्यकता है| संवैधानिक समीक्षा की उपयुक्त व्यवस्थाओं का अभाव पाया जाता है जिसके लिए सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की अवधारणायें सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा ऐसा शासन जो व्यक्तियों पर न्यूनतम प्रतिबन्ध आरोपित करते हुएव्यक्ति की विश्व दृष्टि को आगे बढाता है उसे सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा कहते हैं यह अवधारणा न्यूनतम शासन सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्रता, स्वायत्तता आदि मूल्यों को प्रोत्साहित करती है व्यक्तिवादी अवधारणा शासन के सुविधाप्रदाता स्वरुप का पक्षधर है अर्थात जहाँ कहीं असुविधा उत्पन्न हो सकती है शासन को उसका समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए सार्वजनिक नीति समग्र हितों पर आधारित होनी चाहिए यह अवधारणा कमजोरों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की बात नहीं करती, यह सर्वोत्तम की उत्तरजीविता पर आधारित सिद्धांत है यदि इस अवधारणा को अपनाया जाएगा तो विकास केवल उन लोगों तक सीमित होगा जिनका पहले से ही विकास हो चुका है सुशासन की कल्याणकारी अवधारणा व्यक्तिवादी व्यवस्था में व्यक्ति अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता को त्याग देता है अतःयह अवधारणा स्पष्ट करती है कि नैतिकता का अभाव, सम्पूर्ण अव्यवस्था का कारण है व्यक्तिवाद से धन संचय प्रोत्साहित होता है इससे समाज पतित होता जाता है अतः कल्याणकारी अवधारणा यह घोषित करती है कि सुशासन का उद्देश्य नैतिकता का विकास करना है जो शासन व्यवस्था नैतिकता का प्रसार करती है वह सुशासन कहलाती है श्रम की समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए यह अवधारणा पूर्ण रोजगार की मांग करती है यह अवधारणा, राज्य के दायित्व के निरंतर विकेंद्रीकरण की मांग करती है इसी क्रम में दायित्व को विकेंद्रीकृत करते हुए यह अवधारणा मांग करती है कि राज्य, सामाजिक दायित्व(CSR) की भावना का विकास करे इसी प्रकार राज्य को सृजनशील एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के मध्य भी सामाजिक दायित्व के विकास करना चाहिए राज्य को प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देना चाहिए अर्थात समाज के प्रत्येक वर्ग का सशक्तिकरण किया जाना चाहिए ताकि समाज को शोषण से मुक्त किया जा सके| प्रतिसंतुलनकारी शक्तियां एकाधिकारवाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं इससे समाज में प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है| सुशासन की समतावादी अवधारणा ऐसी अवधारणा जो समाज के अनुकूल हो, तर्क संगत हो तथा समानता एवं स्वतंत्रता में तर्कपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती हो उसे सुशासन की समतावादी अवधारणा कहते हैं| जॉन राल्स एवं मैकफर्सन इस अवधारणा से सम्बन्धित विचारक हैं| ऐसा शासन अच्छा शासन होगा जो उत्तरउदारवादी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था के मूल्यों को बढाते हुए सामाजिक न्याय में वृद्धि करता है| यहाँ व्यक्तिगत न्याय के साथ साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाते हैं| इसके लिए अवसरों का समान वितरण किया जाता है और समाज के पिछड़े वर्गों को अतिरिक्त सुविधा दी जाती है| जब समानता स्थापित हो जाए तो शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय को अपनाया जाना चाहिए, तब किसी को अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जायेगी सुशासन की गांधीवादी अवधारणा अपने आदर्शवादी सिद्धांत में गांधी जी मानते हैं कि आदर्श अहिंसक समाज में आत्म अनुशासन के कारण राज्य का अभाव होता है चूँकि अपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा आदर्श अहिंसक समाज का निर्माण नहीं हो सकता अतः एक अस्थायी एवं न्यूनतम राज्य होना चाहिए अतः प्रत्येक व्यावहारिक राज्य के लिए अनिवार्य है कि वह आदर्श अहिंसक समाज की मान्यताओं एवं मूल्यों को व्यावहारिक स्तर पर लाने का प्रयास करे| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सुशासन की विभिन्न अवधारणाओं में मिश्रित पहलुओं का समावेश किया गया है किन्तु समाज और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विश्व बैंक ने सुशासन को नवीनतम एवं समावेशी रूप में परिभाषित किया| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| ध्यातव्य है कि विश्व बैंक की अवधारणा के पहले सुशासन के लिए दो मानदंड माने जाते थे यथा, नीतियों का क्रियान्वयन (इसमें न्यायपालिका, विधायिका एवं अस्थायी कार्यपालिका को शामिल नहीं किया जाता था) तथाक्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि| इससे आगे बढ़ते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बेहतर एवं समावेशी नीतियों का निर्माण(लोकतांत्रिक प्रणाली), लोकतांत्रिक विधि से नीतियों का क्रियान्वयन, जनहित को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि को सुशासन कहते हैं| वर्तमान में सुशासन की विश्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा ही सर्वमान्य है|
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सुशासन को परिभाषित करते हुए इसकी आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सुशासन सम्बन्धी प्रमुख अवधारणाओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Defining good governance explain its need. Along with this, discuss the key concepts related to good governance. (150 to 200 words, Marks - 10 )
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सुशासन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में विश्व बैंक की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ भागीदारी, सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता और दक्षता को शामिल किया जाता है| शासन का समाज के परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनशील होना चाहिए| वर्तमान में विभिन्न कारणों से उपरोक्त गुणों से युक्त सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की आवश्यकता शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है | शासन में सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है| शासन में उद्यमशीलता के विकास के लिए सुशासन की आवश्यकता है शासन में औपनिवेशिक चरित्र बना हुआ है जिसके कारण शासन में औपनिवेशिक अभिवृत्ति बनी हुई है अतः प्रशासन लोकप्रिय नहीं हो पाया है, सुशासन प्रशासन को लोकप्रिय बनाने में सहायक है शासन में पारदर्शिता का अभाव पाया जता है, शासन में पारदर्शिता लाने के लिए सुशासन की आवश्यकता है| संवैधानिक समीक्षा की उपयुक्त व्यवस्थाओं का अभाव पाया जाता है जिसके लिए सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की अवधारणायें सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा ऐसा शासन जो व्यक्तियों पर न्यूनतम प्रतिबन्ध आरोपित करते हुएव्यक्ति की विश्व दृष्टि को आगे बढाता है उसे सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा कहते हैं यह अवधारणा न्यूनतम शासन सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्रता, स्वायत्तता आदि मूल्यों को प्रोत्साहित करती है व्यक्तिवादी अवधारणा शासन के सुविधाप्रदाता स्वरुप का पक्षधर है अर्थात जहाँ कहीं असुविधा उत्पन्न हो सकती है शासन को उसका समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए सार्वजनिक नीति समग्र हितों पर आधारित होनी चाहिए यह अवधारणा कमजोरों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की बात नहीं करती, यह सर्वोत्तम की उत्तरजीविता पर आधारित सिद्धांत है यदि इस अवधारणा को अपनाया जाएगा तो विकास केवल उन लोगों तक सीमित होगा जिनका पहले से ही विकास हो चुका है सुशासन की कल्याणकारी अवधारणा व्यक्तिवादी व्यवस्था में व्यक्ति अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता को त्याग देता है अतःयह अवधारणा स्पष्ट करती है कि नैतिकता का अभाव, सम्पूर्ण अव्यवस्था का कारण है व्यक्तिवाद से धन संचय प्रोत्साहित होता है इससे समाज पतित होता जाता है अतः कल्याणकारी अवधारणा यह घोषित करती है कि सुशासन का उद्देश्य नैतिकता का विकास करना है जो शासन व्यवस्था नैतिकता का प्रसार करती है वह सुशासन कहलाती है श्रम की समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए यह अवधारणा पूर्ण रोजगार की मांग करती है यह अवधारणा, राज्य के दायित्व के निरंतर विकेंद्रीकरण की मांग करती है इसी क्रम में दायित्व को विकेंद्रीकृत करते हुए यह अवधारणा मांग करती है कि राज्य, सामाजिक दायित्व(CSR) की भावना का विकास करे इसी प्रकार राज्य को सृजनशील एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के मध्य भी सामाजिक दायित्व के विकास करना चाहिए राज्य को प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देना चाहिए अर्थात समाज के प्रत्येक वर्ग का सशक्तिकरण किया जाना चाहिए ताकि समाज को शोषण से मुक्त किया जा सके| प्रतिसंतुलनकारी शक्तियां एकाधिकारवाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं इससे समाज में प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है| सुशासन की समतावादी अवधारणा ऐसी अवधारणा जो समाज के अनुकूल हो, तर्क संगत हो तथा समानता एवं स्वतंत्रता में तर्कपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती हो उसे सुशासन की समतावादी अवधारणा कहते हैं| जॉन राल्स एवं मैकफर्सन इस अवधारणा से सम्बन्धित विचारक हैं| ऐसा शासन अच्छा शासन होगा जो उत्तरउदारवादी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था के मूल्यों को बढाते हुए सामाजिक न्याय में वृद्धि करता है| यहाँ व्यक्तिगत न्याय के साथ साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाते हैं| इसके लिए अवसरों का समान वितरण किया जाता है और समाज के पिछड़े वर्गों को अतिरिक्त सुविधा दी जाती है| जब समानता स्थापित हो जाए तो शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय को अपनाया जाना चाहिए, तब किसी को अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जायेगी सुशासन की गांधीवादी अवधारणा अपने आदर्शवादी सिद्धांत में गांधी जी मानते हैं कि आदर्श अहिंसक समाज में आत्म अनुशासन के कारण राज्य का अभाव होता है चूँकि अपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा आदर्श अहिंसक समाज का निर्माण नहीं हो सकता अतः एक अस्थायी एवं न्यूनतम राज्य होना चाहिए अतः प्रत्येक व्यावहारिक राज्य के लिए अनिवार्य है कि वह आदर्श अहिंसक समाज की मान्यताओं एवं मूल्यों को व्यावहारिक स्तर पर लाने का प्रयास करे| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सुशासन की विभिन्न अवधारणाओं में मिश्रित पहलुओं का समावेश किया गया है किन्तु समाज और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विश्व बैंक ने सुशासन को नवीनतम एवं समावेशी रूप में परिभाषित किया| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| ध्यातव्य है कि विश्व बैंक की अवधारणा के पहले सुशासन के लिए दो मानदंड माने जाते थे यथा, नीतियों का क्रियान्वयन (इसमें न्यायपालिका, विधायिका एवं अस्थायी कार्यपालिका को शामिल नहीं किया जाता था) तथाक्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि| इससे आगे बढ़ते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बेहतर एवं समावेशी नीतियों का निर्माण(लोकतांत्रिक प्रणाली), लोकतांत्रिक विधि से नीतियों का क्रियान्वयन, जनहित को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि को सुशासन कहते हैं| वर्तमान में सुशासन की विश्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा ही सर्वमान्य है|
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##Question:सुशासन को परिभाषित करते हुए इसकी आवश्यकता स्पष्ट कीजिये| इसके साथ ही सुशासन सम्बन्धी प्रमुख अवधारणाओं की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द, अंक-10 ) Defining good governance explain its need. Along with this, discuss the key concepts related to good governance. (150 to 200 words, Marks - 10 )##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सुशासन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में सुशासन सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाओं की चर्चा कीजिये 4- अंतिम में विश्व बैंक की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ भागीदारी, सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता और दक्षता को शामिल किया जाता है| शासन का समाज के परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनशील होना चाहिए| वर्तमान में विभिन्न कारणों से उपरोक्त गुणों से युक्त सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की आवश्यकता शासन में लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार आदि की उपस्थिति है अतः कुशासन से मुक्ति के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है | शासन में सामाजिक अनुकूलता का अभाव पाया जाता है अतः शासन को सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप करने के लिए सुशासन की आवश्यकता होती है| शासन में उद्यमशीलता के विकास के लिए सुशासन की आवश्यकता है शासन में औपनिवेशिक चरित्र बना हुआ है जिसके कारण शासन में औपनिवेशिक अभिवृत्ति बनी हुई है अतः प्रशासन लोकप्रिय नहीं हो पाया है, सुशासन प्रशासन को लोकप्रिय बनाने में सहायक है शासन में पारदर्शिता का अभाव पाया जता है, शासन में पारदर्शिता लाने के लिए सुशासन की आवश्यकता है| संवैधानिक समीक्षा की उपयुक्त व्यवस्थाओं का अभाव पाया जाता है जिसके लिए सुशासन की आवश्यकता है| सुशासन की अवधारणायें सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा ऐसा शासन जो व्यक्तियों पर न्यूनतम प्रतिबन्ध आरोपित करते हुएव्यक्ति की विश्व दृष्टि को आगे बढाता है उसे सुशासन की व्यक्तिवादी अवधारणा कहते हैं यह अवधारणा न्यूनतम शासन सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्रता, स्वायत्तता आदि मूल्यों को प्रोत्साहित करती है व्यक्तिवादी अवधारणा शासन के सुविधाप्रदाता स्वरुप का पक्षधर है अर्थात जहाँ कहीं असुविधा उत्पन्न हो सकती है शासन को उसका समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए सार्वजनिक नीति समग्र हितों पर आधारित होनी चाहिए यह अवधारणा कमजोरों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की बात नहीं करती, यह सर्वोत्तम की उत्तरजीविता पर आधारित सिद्धांत है यदि इस अवधारणा को अपनाया जाएगा तो विकास केवल उन लोगों तक सीमित होगा जिनका पहले से ही विकास हो चुका है सुशासन की कल्याणकारी अवधारणा व्यक्तिवादी व्यवस्था में व्यक्ति अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता को त्याग देता है अतःयह अवधारणा स्पष्ट करती है कि नैतिकता का अभाव, सम्पूर्ण अव्यवस्था का कारण है व्यक्तिवाद से धन संचय प्रोत्साहित होता है इससे समाज पतित होता जाता है अतः कल्याणकारी अवधारणा यह घोषित करती है कि सुशासन का उद्देश्य नैतिकता का विकास करना है जो शासन व्यवस्था नैतिकता का प्रसार करती है वह सुशासन कहलाती है श्रम की समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए यह अवधारणा पूर्ण रोजगार की मांग करती है यह अवधारणा, राज्य के दायित्व के निरंतर विकेंद्रीकरण की मांग करती है इसी क्रम में दायित्व को विकेंद्रीकृत करते हुए यह अवधारणा मांग करती है कि राज्य, सामाजिक दायित्व(CSR) की भावना का विकास करे इसी प्रकार राज्य को सृजनशील एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के मध्य भी सामाजिक दायित्व के विकास करना चाहिए राज्य को प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देना चाहिए अर्थात समाज के प्रत्येक वर्ग का सशक्तिकरण किया जाना चाहिए ताकि समाज को शोषण से मुक्त किया जा सके| प्रतिसंतुलनकारी शक्तियां एकाधिकारवाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं इससे समाज में प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है| सुशासन की समतावादी अवधारणा ऐसी अवधारणा जो समाज के अनुकूल हो, तर्क संगत हो तथा समानता एवं स्वतंत्रता में तर्कपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती हो उसे सुशासन की समतावादी अवधारणा कहते हैं| जॉन राल्स एवं मैकफर्सन इस अवधारणा से सम्बन्धित विचारक हैं| ऐसा शासन अच्छा शासन होगा जो उत्तरउदारवादी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था के मूल्यों को बढाते हुए सामाजिक न्याय में वृद्धि करता है| यहाँ व्यक्तिगत न्याय के साथ साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के प्रयास किये जाते हैं| इसके लिए अवसरों का समान वितरण किया जाता है और समाज के पिछड़े वर्गों को अतिरिक्त सुविधा दी जाती है| जब समानता स्थापित हो जाए तो शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय को अपनाया जाना चाहिए, तब किसी को अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जायेगी सुशासन की गांधीवादी अवधारणा अपने आदर्शवादी सिद्धांत में गांधी जी मानते हैं कि आदर्श अहिंसक समाज में आत्म अनुशासन के कारण राज्य का अभाव होता है चूँकि अपूर्ण व्यक्तियों के द्वारा आदर्श अहिंसक समाज का निर्माण नहीं हो सकता अतः एक अस्थायी एवं न्यूनतम राज्य होना चाहिए अतः प्रत्येक व्यावहारिक राज्य के लिए अनिवार्य है कि वह आदर्श अहिंसक समाज की मान्यताओं एवं मूल्यों को व्यावहारिक स्तर पर लाने का प्रयास करे| उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सुशासन की विभिन्न अवधारणाओं में मिश्रित पहलुओं का समावेश किया गया है किन्तु समाज और अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए विश्व बैंक ने सुशासन को नवीनतम एवं समावेशी रूप में परिभाषित किया| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| ध्यातव्य है कि विश्व बैंक की अवधारणा के पहले सुशासन के लिए दो मानदंड माने जाते थे यथा, नीतियों का क्रियान्वयन (इसमें न्यायपालिका, विधायिका एवं अस्थायी कार्यपालिका को शामिल नहीं किया जाता था) तथाक्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि| इससे आगे बढ़ते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बेहतर एवं समावेशी नीतियों का निर्माण(लोकतांत्रिक प्रणाली), लोकतांत्रिक विधि से नीतियों का क्रियान्वयन, जनहित को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन की दक्षता में वृद्धि को सुशासन कहते हैं| वर्तमान में सुशासन की विश्व बैंक द्वारा दी गयी परिभाषा ही सर्वमान्य है|
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राष्ट्रीय विधि निर्माता के रूप में अकेले एक संसद-सदस्य की भूमिका अवनति की ओर है, जिसके फलस्वरूप वादविवादों की गुणता और उनके परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ भी चुका है। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Individual Parliamentarian"s role as the national law maker is on a decline, which in turn, has adversely impacted the quality of debates and their outcome. Discuss. (150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसद सदस्यों से संबन्धित आंकड़ें/तथ्य प्रस्तुत करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद सदस्यों की भूमिका अवनति पर है इसे स्पष्ट कीजिए। इसके बाद सदस्यों की भूमिका में अवनति के कारण प्रतिकूल प्रभावों को लिखिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारतीय संसद को दो भागों में बांटा गया है जिसमें उच्च सदन राज्यसभा व निम्न सदन लोकसभा है। बहुदलीय व्यवस्था होने के कारण इसमें सदस्य विभिन्न दलों से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि, शैक्षिक स्तर, संवेदनशीलता तथा विचारधारा में अंतर होता है। संसद सदस्यों की भूमिका अवनति की ओर: असोशिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार वर्तमान लोकसभा में लगभग 32% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। पचास प्रतिशत से अधिक सांसद जो पुनः चुनकर आते हैं उनकी संपत्ति में पहले की तुलना में अत्यधिक वृद्धि एक ही परिवार से कई सदस्यों का चुना जाना लाभ के पद जैसी स्थिति संसद की कार्यवाही स्थगित करना वादविवादों की गुणता और उसके परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव: आपराधिक प्रवृत्ति के संसद सदस्यों का शामिल होना लोकतन्त्र के मूल्यों को प्रभावित कर रहा है। इसके कारण संसदीय क्षेत्रों में उनके समर्थकों में आपराधिक भावना का विकास होता है। लोगों में विश्वास की कमी होती है। सदस्यों की संपत्ति में वृद्धि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। इस प्रकार के सदस्य संसद में चर्चा में भाग नहीं लेते हैं। सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के पास हो जाते हैं। इससे दीर्घकालीन नीतियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विपक्ष जब अपनी भूमिका सही से नहीं निष्पादित कर रहा हो तो सरकार केवल अपने हितों को ध्यान में रखकर ही कार्य करती है। जबकि वर्तमान सरकार चालीस प्रतिशत से कम लोगों का ही प्रतिनिधित्व करती है। लाभ के पद के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। हितों का टकराव, किसी विशेष राजनीतिक दल के विचारधारा को प्रसारित करने जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। राजनीतिक पहचान की प्रवृत्ति के कारण सदन में चर्चा के दौरान जनता के व्यापक हितों का ध्यान न रखकर अपने दल के विचारों को प्रसारित करना, व्यक्तिगत पहचान से प्रेरित होता है। अतः यह स्पष्ट है कि विगत कुछ वर्षों में सदस्यों की भूमिका में अवनति के कारण सदन की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। अतः इसके लिए आवश्यक है कि: सदन में उपस्थिति में वृद्धि हो। विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा की जाये। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि महत्वपूर्ण विधेयक स्थायी समिति के पास प्रेषित हों। भ्रष्टाचार जैसी समस्या से निपटने के लिए लोकपाल जैसे क़ानूनों का शीघ्रता से पालन किया जाए। छाया कैबिनेट जैसी व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
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##Question:राष्ट्रीय विधि निर्माता के रूप में अकेले एक संसद-सदस्य की भूमिका अवनति की ओर है, जिसके फलस्वरूप वादविवादों की गुणता और उनके परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ भी चुका है। चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Individual Parliamentarian"s role as the national law maker is on a decline, which in turn, has adversely impacted the quality of debates and their outcome. Discuss. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: संसद सदस्यों से संबन्धित आंकड़ें/तथ्य प्रस्तुत करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए। इसके बाद सदस्यों की भूमिका अवनति पर है इसे स्पष्ट कीजिए। इसके बाद सदस्यों की भूमिका में अवनति के कारण प्रतिकूल प्रभावों को लिखिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारतीय संसद को दो भागों में बांटा गया है जिसमें उच्च सदन राज्यसभा व निम्न सदन लोकसभा है। बहुदलीय व्यवस्था होने के कारण इसमें सदस्य विभिन्न दलों से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि, शैक्षिक स्तर, संवेदनशीलता तथा विचारधारा में अंतर होता है। संसद सदस्यों की भूमिका अवनति की ओर: असोशिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार वर्तमान लोकसभा में लगभग 32% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। पचास प्रतिशत से अधिक सांसद जो पुनः चुनकर आते हैं उनकी संपत्ति में पहले की तुलना में अत्यधिक वृद्धि एक ही परिवार से कई सदस्यों का चुना जाना लाभ के पद जैसी स्थिति संसद की कार्यवाही स्थगित करना वादविवादों की गुणता और उसके परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव: आपराधिक प्रवृत्ति के संसद सदस्यों का शामिल होना लोकतन्त्र के मूल्यों को प्रभावित कर रहा है। इसके कारण संसदीय क्षेत्रों में उनके समर्थकों में आपराधिक भावना का विकास होता है। लोगों में विश्वास की कमी होती है। सदस्यों की संपत्ति में वृद्धि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। इस प्रकार के सदस्य संसद में चर्चा में भाग नहीं लेते हैं। सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के पास हो जाते हैं। इससे दीर्घकालीन नीतियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विपक्ष जब अपनी भूमिका सही से नहीं निष्पादित कर रहा हो तो सरकार केवल अपने हितों को ध्यान में रखकर ही कार्य करती है। जबकि वर्तमान सरकार चालीस प्रतिशत से कम लोगों का ही प्रतिनिधित्व करती है। लाभ के पद के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। हितों का टकराव, किसी विशेष राजनीतिक दल के विचारधारा को प्रसारित करने जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। राजनीतिक पहचान की प्रवृत्ति के कारण सदन में चर्चा के दौरान जनता के व्यापक हितों का ध्यान न रखकर अपने दल के विचारों को प्रसारित करना, व्यक्तिगत पहचान से प्रेरित होता है। अतः यह स्पष्ट है कि विगत कुछ वर्षों में सदस्यों की भूमिका में अवनति के कारण सदन की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। अतः इसके लिए आवश्यक है कि: सदन में उपस्थिति में वृद्धि हो। विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा की जाये। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि महत्वपूर्ण विधेयक स्थायी समिति के पास प्रेषित हों। भ्रष्टाचार जैसी समस्या से निपटने के लिए लोकपाल जैसे क़ानूनों का शीघ्रता से पालन किया जाए। छाया कैबिनेट जैसी व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
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‘महाद्वीपीय विस्थापन’ के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं| इसके पक्ष में प्रमुख साक्ष्यों की विवेचना कीजिए | (150- 200 शब्द ) What do you understand by the continental drift theory ? Discuss the key evidence in its favor. (150- 200 words)
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एप्रोच : महाद्वीपीय विस्थापन केसिद्धांत परिभाषित करते हुए प्रारंभ कीजिए। इसके पक्ष में तर्कों को प्रस्तुत कीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- ‘महाद्वीपीय विस्थापन’ सिद्धांत का प्रतिपादन वेगनर द्वारा 1912 ईसवीं में किया गया था | उसके अनुसार कार्बोनिफेरस काल में विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे ,इसे पेंजिया कहा गया पेंजिया चारों और पेंथालासा विशाल महासागर से घिरा हुआ था | वेगनर का विचार था की SIAL से निर्मित महाद्वीप SIMA से निर्मित महासागर पर तैरताथा | कार्बोनिफेरस काल के अंत में पेंजिया ,अंगारालेंड (उत्तर ) तथा गोडवानालेंड (दक्षिण ) में विखंडित हो गया | अंगारालेंड का पुनः विखंडन उतर अमेरिका एवं यूरेशिया के रूप में हुआ तथा गोडवानालेंड का पुनः विखंडन दक्षिणी अमेरिका ,ऑस्ट्रेलिया ,अफ्रीका ,अंटार्कटिका तथा भारत के रूप में हुआ | वेगनर के अनुसार sima पर तेरते हुए महाद्वीपों पर दो भिन्न प्रकार की शक्तियों ने भिन्न दिशा में कार्य किया |जिसके फलस्वरूप महाद्वीपों का विस्थापन हुआ | विषुवतीय क्षेत्र में पृथ्वी की उभार के कारण अफ्रीका एवं भारत विषुवतीय रेखा की ओर विस्थापित हुए ,जिसके फलस्वरूप हिन्द महासागर का निर्माण हुआ | भारत व यूरेशिया के आपस में टकराने के कारण हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई | सूर्य तथा चन्द्र्मा की ज्वारीय शक्ति के कारण उत्तर अमरीका एवं दक्षिणी अमेरिका का पश्चिम की और विस्थापन हुआ इसके फलस्वरूप अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ | पश्चिमी किनारों पर sima द्वारा अवरोध के कारण रॉकी व एंडीज पर्वत की उत्पत्ति हुई| सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण :- दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी किनारो को अफ्रीका के पश्चिमी किनारे के साथ ठीक उसी प्रकार मिलाया जा सकता है ,जिस प्रकार वस्तु के दो टुकड़ो को आपस में मिलाया जा सकता है | इसे साम्य विस्थापन का सिद्धांत (jig –saw-fit) कहा जाया है ब्राज़ील एवं अफ्रीका की चट्टानों की संरचना में समानता पायी जाती है | उत्तर अमेरिका के पर्वतो (अपलेशियन पर्वत ) की संरचना एवं दिशा ब्रिटेन व Scandinavia के प्राचीन पर्वतो की संरचना एवं दिशा से मेल खाती है | अफ्रीका में गोल्ड के प्लेसर निक्षेप पाए जाते है ,जबकि यह मुलभुत चट्टानों का अभाव है | इस प्रकार की चट्टानें ब्राज़ील में पायी जाती है | ब्राज़ील ,अफ्रीका.भारत(दामोदर घाटी ) तथा ऑस्ट्रेलिया में हिमानी क्रिया के प्रमाण पाए जाते है जो की इनकी वर्तमान स्थति के आधार पर संभव नहीं है | उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट है महाद्वीपों का विस्थापन हुआ है परन्तु उस बल के कारण नहीं जिसकी कल्पना वेगनर ने की है |नवीनतम अध्ययन से पता चला है की स्थल मंडल दुर्बलमंडल पर तेर रहा है |स्थलमंडल अनेक टुकड़ो में बटा हुआ है जिन्हें प्लेट कहा जाता है | महाद्वीप व महासागर दोनों ही प्लेट के अंग है तथा प्लेटो के विस्थापन के कारण महाद्वीप व महासागर दोनों ही विस्थापित हो रहे है | इसके विस्थापन के लिये संवहन धाराओं को उतरदायी मन जाता है |
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##Question:‘महाद्वीपीय विस्थापन’ के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं| इसके पक्ष में प्रमुख साक्ष्यों की विवेचना कीजिए | (150- 200 शब्द ) What do you understand by the continental drift theory ? Discuss the key evidence in its favor. (150- 200 words)##Answer:एप्रोच : महाद्वीपीय विस्थापन केसिद्धांत परिभाषित करते हुए प्रारंभ कीजिए। इसके पक्ष में तर्कों को प्रस्तुत कीजिये। संतुलित निष्कर्ष दीजिये। उत्तर प्रारूप :- ‘महाद्वीपीय विस्थापन’ सिद्धांत का प्रतिपादन वेगनर द्वारा 1912 ईसवीं में किया गया था | उसके अनुसार कार्बोनिफेरस काल में विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे ,इसे पेंजिया कहा गया पेंजिया चारों और पेंथालासा विशाल महासागर से घिरा हुआ था | वेगनर का विचार था की SIAL से निर्मित महाद्वीप SIMA से निर्मित महासागर पर तैरताथा | कार्बोनिफेरस काल के अंत में पेंजिया ,अंगारालेंड (उत्तर ) तथा गोडवानालेंड (दक्षिण ) में विखंडित हो गया | अंगारालेंड का पुनः विखंडन उतर अमेरिका एवं यूरेशिया के रूप में हुआ तथा गोडवानालेंड का पुनः विखंडन दक्षिणी अमेरिका ,ऑस्ट्रेलिया ,अफ्रीका ,अंटार्कटिका तथा भारत के रूप में हुआ | वेगनर के अनुसार sima पर तेरते हुए महाद्वीपों पर दो भिन्न प्रकार की शक्तियों ने भिन्न दिशा में कार्य किया |जिसके फलस्वरूप महाद्वीपों का विस्थापन हुआ | विषुवतीय क्षेत्र में पृथ्वी की उभार के कारण अफ्रीका एवं भारत विषुवतीय रेखा की ओर विस्थापित हुए ,जिसके फलस्वरूप हिन्द महासागर का निर्माण हुआ | भारत व यूरेशिया के आपस में टकराने के कारण हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई | सूर्य तथा चन्द्र्मा की ज्वारीय शक्ति के कारण उत्तर अमरीका एवं दक्षिणी अमेरिका का पश्चिम की और विस्थापन हुआ इसके फलस्वरूप अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ | पश्चिमी किनारों पर sima द्वारा अवरोध के कारण रॉकी व एंडीज पर्वत की उत्पत्ति हुई| सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण :- दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी किनारो को अफ्रीका के पश्चिमी किनारे के साथ ठीक उसी प्रकार मिलाया जा सकता है ,जिस प्रकार वस्तु के दो टुकड़ो को आपस में मिलाया जा सकता है | इसे साम्य विस्थापन का सिद्धांत (jig –saw-fit) कहा जाया है ब्राज़ील एवं अफ्रीका की चट्टानों की संरचना में समानता पायी जाती है | उत्तर अमेरिका के पर्वतो (अपलेशियन पर्वत ) की संरचना एवं दिशा ब्रिटेन व Scandinavia के प्राचीन पर्वतो की संरचना एवं दिशा से मेल खाती है | अफ्रीका में गोल्ड के प्लेसर निक्षेप पाए जाते है ,जबकि यह मुलभुत चट्टानों का अभाव है | इस प्रकार की चट्टानें ब्राज़ील में पायी जाती है | ब्राज़ील ,अफ्रीका.भारत(दामोदर घाटी ) तथा ऑस्ट्रेलिया में हिमानी क्रिया के प्रमाण पाए जाते है जो की इनकी वर्तमान स्थति के आधार पर संभव नहीं है | उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट है महाद्वीपों का विस्थापन हुआ है परन्तु उस बल के कारण नहीं जिसकी कल्पना वेगनर ने की है |नवीनतम अध्ययन से पता चला है की स्थल मंडल दुर्बलमंडल पर तेर रहा है |स्थलमंडल अनेक टुकड़ो में बटा हुआ है जिन्हें प्लेट कहा जाता है | महाद्वीप व महासागर दोनों ही प्लेट के अंग है तथा प्लेटो के विस्थापन के कारण महाद्वीप व महासागर दोनों ही विस्थापित हो रहे है | इसके विस्थापन के लिये संवहन धाराओं को उतरदायी मन जाता है |
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"सुशासन की स्थापना में जनभागीदारी की अहम भूमिका होती है|" इस कथन को स्पष्ट करते हुए भारतीय संदर्भ में, जनभागीदारी में बाधाओं का उल्लेख कीजिये तथा जनभागीदारी बढ़ाने हेतु उठाये गये कुछ क़दमों का भी उल्लेख कीजिये। (150-200 शब्द) People"s participation plays an important role in establishing Good Governance." Explain this statement and mention some obstacles in public participation in the Indian context and steps taken to increase people participation. (150-200 words)
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एप्रोच- सुशासन की स्थापना में जनभागीदारी के महत्व को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,भारतीय संदर्भ में, जनभागीदारी में बाधाओं का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में,जनभागीदारी बढ़ाने हेतु उठाये गये कुछ क़दमों का भी उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः,भारत में जनभागीदारी के विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- विश्व बैंक के अनुसार, वैसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता, दक्षता और जन भागीदारी को शामिल किया जाता है| शासन तंत्र में जनता की भागीदारी को जनभागीदारी कहते हैं| भागीदारी लोकतंत्र का प्राण है| भागीदारी जितनी अधिक होगी प्रशासन उतना ही सुशासन की और बढेगा| शासन में जनभागीदारी का विकास क्रमिक रूप से होता है| सुशासन का प्रमुख उद्देश्य निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी को बढ़ाना है| जनभागदारी का महत्व लोकतंत्र के विकास और उसकी मजबूती के लिए तथा शासन को जनोंन्मुख बनाने के लिए भागीदारी आवश्यक है| यह शासन प्रशासन पर जन नियंत्रण स्थापित करने में सहायक है| भागीदारी से प्रतिपुष्टि(फीडबेक) की संस्कृति का विकास होगा| फीडबैक से सतत विकास सुनिश्चित होगा| भागीदारी से आत्मनिर्भरता आएगी इससे सरकार का आर्थिक बोझ कम होता जाएगा जैसे- सरकारी योजनाओं में भागीदारी करने पर स्थानीय कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं होगी; स्वच्छ भारत अभियान की सफलता भागीदारी पर ही निर्भर है| यह सामाजिक परिवर्तन में सहायक है जैसे- भागीदारी के कारण ट्रिपल तलाक पर चेतना निर्माण में सहजता हुई और इसका विरोध नहीं हो पाया| भागीदारी से तीव्र एवं सकारात्मक दिशा में प्रशासनिक परिवर्तन भी सुनिश्चित होता है| भागीदारी बढाने में बाधायें नागरिक चेतना(अधिकारों और दायित्वों के प्रति) का अभाव; अभिजात्यवर्गीय/सामंतवादी सोच- इसे प्रभावित कर पाना मुश्किल होता है| यदि अभिजात्यवर्ग में संचरण की गति अधिक है तो इन्हें प्रभावित किया जा सकता है| 1980 के बाद यह संचरण बढ़ा है तथा इससे सामाजिक अभिजात्यवर्ग में वृद्धि हुई और इन्हें प्रभावित करना अपेक्षाकृत रूप से सहज था| किन्तु यदि सामाजिक अभिजात्यवर्ग को स्थायी बना दिया जाएगा तो वे स्वयं को प्राकृतिक अभिजात्य समझने लगेंगे इसीलिए सरकारों को बदलते रहना चाहिए| जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के आधार पर समाज में अलगाव है| इससे सामूहिक चेतना का विकास नहीं हो पाता है| अलगाव युक्त चेतना से युक्त भागीदारी वस्तुतः नकारात्मक भागीदारी होती है भारत में बिचौलियेपन का प्रभाव का बना होना जैसे- भ्रष्टाचार; आचार संहिता के निम्न मानक तथा व्यापक मानकों का अभाव आदि के कारण भारत में भागीदारी बाधित होती है| किन्तु सुशासन के सन्दर्भ में जनभागीदारी के महत्त्व को देखते हुए भारत सरकार ने जनभागीदारी को बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| सरकार द्वारा उठाये गए कदम इसमें भारतीय न्यायपालिका एवं निर्वाचन आयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| SC ने निर्णय दिया था कि प्रत्याशियों के बारे में जानकारी लेना नागरिकों का अधिकार है| इसी तरह एक अन्य निर्णय में कहा गया कि प्रत्येक प्रत्याशी अपने उपर चल रहे मुकदमों को मतदाताओं को बताएगा| न्यायालय ने नौकरशाही में स्थायित्व लाने के भी प्रयास किये हैं जैसे- त्वरित स्थानान्तरण पर रोक के निर्देश आदि| चुनाव आयोग, नौकरशाही में तटस्थता के भाव के विकास के लिए प्रयास कर रहा है| आचारसंहिता की घोषणा के बाद नौकरशाही निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में आ जाती है| इस महीने का बेस्ट कर्मचारी(Employee of the Month) नामक पहल(2014) गृह मंत्रालय द्वारा चलाई गयी है| इससे नौकरशाही का उत्साहवर्धन होता है और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी| आईडिया एवं सुझाव बॉक्स पहल से भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं| अभी हाल ही में आरम्भ की गयी माई-गॉव(My-Gov) नामक साईट इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है| भारत में 1980 के पूर्व प्रतिनिधियात्मक भागीदारी का दौर था| किन्तु 1980 के बाद बहुदलीय स्थिति का दौर आया,इस चरण में राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के साथ भागीदारी बढ़ी किन्तु राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के कारण राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हुई| वर्ष 2000 के बाद विमर्शी लोकतंत्र(नीति निर्माण में विमर्श) का चरण आया| इस चरण में विचारों के समावेश करने और उनमें समन्वय स्थापना के प्रयास किये गए और एक दुसरे के प्रति समझ बढाने का प्रयास किया गया जिससे UPA और NDA जैसी अवधारणायें सामने आयीं| वर्ष 2010 के बाद के चुनावों में चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| वर्तमान में फेसबुक, ट्विटर mygov आदि प्लेटफॉर्म्स की मदद से निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं|
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##Question:"सुशासन की स्थापना में जनभागीदारी की अहम भूमिका होती है|" इस कथन को स्पष्ट करते हुए भारतीय संदर्भ में, जनभागीदारी में बाधाओं का उल्लेख कीजिये तथा जनभागीदारी बढ़ाने हेतु उठाये गये कुछ क़दमों का भी उल्लेख कीजिये। (150-200 शब्द) People"s participation plays an important role in establishing Good Governance." Explain this statement and mention some obstacles in public participation in the Indian context and steps taken to increase people participation. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- सुशासन की स्थापना में जनभागीदारी के महत्व को संक्षिप्तता से दर्शाते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,भारतीय संदर्भ में, जनभागीदारी में बाधाओं का उल्लेख कीजिये| अगले भाग में,जनभागीदारी बढ़ाने हेतु उठाये गये कुछ क़दमों का भी उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः,भारत में जनभागीदारी के विकास को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- विश्व बैंक के अनुसार, वैसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता, दक्षता और जन भागीदारी को शामिल किया जाता है| शासन तंत्र में जनता की भागीदारी को जनभागीदारी कहते हैं| भागीदारी लोकतंत्र का प्राण है| भागीदारी जितनी अधिक होगी प्रशासन उतना ही सुशासन की और बढेगा| शासन में जनभागीदारी का विकास क्रमिक रूप से होता है| सुशासन का प्रमुख उद्देश्य निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी को बढ़ाना है| जनभागदारी का महत्व लोकतंत्र के विकास और उसकी मजबूती के लिए तथा शासन को जनोंन्मुख बनाने के लिए भागीदारी आवश्यक है| यह शासन प्रशासन पर जन नियंत्रण स्थापित करने में सहायक है| भागीदारी से प्रतिपुष्टि(फीडबेक) की संस्कृति का विकास होगा| फीडबैक से सतत विकास सुनिश्चित होगा| भागीदारी से आत्मनिर्भरता आएगी इससे सरकार का आर्थिक बोझ कम होता जाएगा जैसे- सरकारी योजनाओं में भागीदारी करने पर स्थानीय कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं होगी; स्वच्छ भारत अभियान की सफलता भागीदारी पर ही निर्भर है| यह सामाजिक परिवर्तन में सहायक है जैसे- भागीदारी के कारण ट्रिपल तलाक पर चेतना निर्माण में सहजता हुई और इसका विरोध नहीं हो पाया| भागीदारी से तीव्र एवं सकारात्मक दिशा में प्रशासनिक परिवर्तन भी सुनिश्चित होता है| भागीदारी बढाने में बाधायें नागरिक चेतना(अधिकारों और दायित्वों के प्रति) का अभाव; अभिजात्यवर्गीय/सामंतवादी सोच- इसे प्रभावित कर पाना मुश्किल होता है| यदि अभिजात्यवर्ग में संचरण की गति अधिक है तो इन्हें प्रभावित किया जा सकता है| 1980 के बाद यह संचरण बढ़ा है तथा इससे सामाजिक अभिजात्यवर्ग में वृद्धि हुई और इन्हें प्रभावित करना अपेक्षाकृत रूप से सहज था| किन्तु यदि सामाजिक अभिजात्यवर्ग को स्थायी बना दिया जाएगा तो वे स्वयं को प्राकृतिक अभिजात्य समझने लगेंगे इसीलिए सरकारों को बदलते रहना चाहिए| जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के आधार पर समाज में अलगाव है| इससे सामूहिक चेतना का विकास नहीं हो पाता है| अलगाव युक्त चेतना से युक्त भागीदारी वस्तुतः नकारात्मक भागीदारी होती है भारत में बिचौलियेपन का प्रभाव का बना होना जैसे- भ्रष्टाचार; आचार संहिता के निम्न मानक तथा व्यापक मानकों का अभाव आदि के कारण भारत में भागीदारी बाधित होती है| किन्तु सुशासन के सन्दर्भ में जनभागीदारी के महत्त्व को देखते हुए भारत सरकार ने जनभागीदारी को बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| सरकार द्वारा उठाये गए कदम इसमें भारतीय न्यायपालिका एवं निर्वाचन आयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| SC ने निर्णय दिया था कि प्रत्याशियों के बारे में जानकारी लेना नागरिकों का अधिकार है| इसी तरह एक अन्य निर्णय में कहा गया कि प्रत्येक प्रत्याशी अपने उपर चल रहे मुकदमों को मतदाताओं को बताएगा| न्यायालय ने नौकरशाही में स्थायित्व लाने के भी प्रयास किये हैं जैसे- त्वरित स्थानान्तरण पर रोक के निर्देश आदि| चुनाव आयोग, नौकरशाही में तटस्थता के भाव के विकास के लिए प्रयास कर रहा है| आचारसंहिता की घोषणा के बाद नौकरशाही निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में आ जाती है| इस महीने का बेस्ट कर्मचारी(Employee of the Month) नामक पहल(2014) गृह मंत्रालय द्वारा चलाई गयी है| इससे नौकरशाही का उत्साहवर्धन होता है और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी| आईडिया एवं सुझाव बॉक्स पहल से भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं| अभी हाल ही में आरम्भ की गयी माई-गॉव(My-Gov) नामक साईट इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है| भारत में 1980 के पूर्व प्रतिनिधियात्मक भागीदारी का दौर था| किन्तु 1980 के बाद बहुदलीय स्थिति का दौर आया,इस चरण में राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के साथ भागीदारी बढ़ी किन्तु राजनीतिक चेतना के सीमित विकास के कारण राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हुई| वर्ष 2000 के बाद विमर्शी लोकतंत्र(नीति निर्माण में विमर्श) का चरण आया| इस चरण में विचारों के समावेश करने और उनमें समन्वय स्थापना के प्रयास किये गए और एक दुसरे के प्रति समझ बढाने का प्रयास किया गया जिससे UPA और NDA जैसी अवधारणायें सामने आयीं| वर्ष 2010 के बाद के चुनावों में चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढाने के लिए अनेक प्रयास किये हैं| वर्तमान में फेसबुक, ट्विटर mygov आदि प्लेटफॉर्म्स की मदद से निर्णय निर्माण के स्तर पर भागीदारी बढाने के प्रयास किये जा रहे हैं|
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महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की अवधारणा स्पष्ट करते हुए इसके संबंध में दिये गए प्रमाणों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द) Explaining the concept of continental drift theory describe the evidences given in this regard. (150-200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय दीजिए। इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन कीजिए। इस संबंध में दिये गए प्रमाणों का विवरण दीजिए सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। लौरेंसिया और अंगारालैंड को टेथिस सागर कहा जाता था। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। प्रमाण: जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति: गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं: ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षेप: घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म:ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है। यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
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##Question:महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की अवधारणा स्पष्ट करते हुए इसके संबंध में दिये गए प्रमाणों का विवरण दीजिए। (150-200 शब्द) Explaining the concept of continental drift theory describe the evidences given in this regard. (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में महाद्वीपीय सिद्धान्त का परिचय दीजिए। इस सिद्धान्त के अन्य पक्षों का वर्णन कीजिए। इस संबंध में दिये गए प्रमाणों का विवरण दीजिए सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। अल्फ्रेड वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त के माध्यम से वेगनर जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करना चाहते थे। भूमंडल पर अनेक ऐसे भूगर्भिक प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ज्ञात हुआ कि एक ही स्थान पर जलवायु में समय समय पर अनेक परिवर्तन हुए हैं। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के विषय में अध्ययन के संदर्भ में यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है। महाद्वीपीय सिद्धान्त: वेगनर के अनुसार, कार्बोनीफेरस युग में सभी महाद्वीप एक ही भूखंड के भाग थे। इसे पैंजिया कहा। यह एक विशाल महासागर से घिरा हुआ था जिसे पैथालासा कहा गया। पैंजिया को दो भागों में बांटा गया था जिसे लौरेंसिया तथा अंगारालैंड कहा गया। दोनों भागों को अलग करने वाले सागर को टेथिस कहा गया। लौरेंसिया और अंगारालैंड को टेथिस सागर कहा जाता था। पैंजिया विघटित होकर दो दिशाओं में संचलित हुआ। विषुवतीय रेखा की ओर संचलन पोलर फ्लीइंग बल, गुरुत्व बल तथा उत्पलावन बल के कारण हुआ। पश्चिम कोई ओर स्थानांतरण का मुख्य कारण ज्वारीय बल था। यह सूर्य और चंद्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है। वेगनर ने भूसंतुलन सिद्धान्त के आधार पर बताया कि महाद्वीपीय भाग सियाल जबकि महासागरीय भाग सीमा का बना हुआ है। प्रमाण: जिग-सा-फिट: अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अवस्थित महाद्वीपों अर्थात दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका के आमने-सामने की तटरेखा विशिष्ट साम्यता प्रदर्शित करती है। पुरा जलवायविक स्थिति: गोंडवाना श्रेणी के अवसादों के समरूप अवसाद दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पाये जाते हैं। हिमानी निक्षेपण से निर्मित अवसादी चट्टानों को टिलाइट कहते हैं जो गोंडवाना श्रेणी के आधारतल में काफी बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भूगर्भिक समानताएं: ब्राज़ील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी शैल समूहों की एक पट्टी विद्यमान है, जिनकी आयु एवं संरचना में पर्याप्त समानता पायी जाती है। प्लेसर निक्षेप: घाना तट पर विशाल स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा ब्राज़ील में स्वर्णयुक्त शिराओं का पाया जाना यह सिद्ध करता है कि घाना में विद्यमान स्वर्ण निक्षेप उस समय प्राप्त हुए होंगे जब ये दोनों महाद्वीप आपस में जुड़े थे। जीवाश्म:ग्लोसोप्टेरिस: यह वनस्पति गोंडवाना के सभी भूखंडों पर पायी जाती है। मेसोसारस : इनके जीवाश्म दक्षिणी अफ्रीका के दक्षिणी केप प्रांत और ब्राज़ील में इरावर शैल समूह में मिलते हैं। मार्सुपियल्स जीव गोंडवाना के विभिन्न भागों में पाया जाता है। यह स्पष्ट है कि वेगनर ने इस सिद्धान्त के माध्यम से भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में नए आयामों की खोज की । इस संबंध में दिये गए प्रमाण एक सीमा तक सही भी साबित हुए हालांकि कुछ अनुमानों और अपर्याप्त प्रमाणों के आधार पर इसकी आलोचना भी जाती है। आगे चलकर संवहनीय धारा सिद्धान्त, प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
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What is Imperialism? What were the causes behind the rise of imperialism? (10 marks/150 words)
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Approach- 1. Define Imperialism. 2. Enumerate the causes of the Imperialism linking various world events with the Imperialism. 3. Provide an appropriate conclusion. Answer - Imperialism is a state policy, or advocacy of extending power and dominion, especially by direct territorial acquisition or by gaining political and economic control of other areas. SoThe Age of Imperialism is typified by the colonization of the Americas and Asia between the 15th and 19th centuries, as well as the expansion of the United States, Japan, and the European powers during the late 19th and early 20th centuries. Causes of imperialism – Renaissance and Enlightenment – It helped to build scientific temper and a quest for knowledge which eventually leads to the discovery of the New World and routes to India and far east to China and Indonesia, this new knowledge was later used for propagation of Imperialism. American Revolution – It provided the fertile ground for the ideas for the establishment of a new nation which will eventually lead to acquiring more land on the western side of America, driving indigenous people into the hinterlands. Later after world wars, the USA also appeared as a major imperialist force. French revolution – The circumstances after the French revolution gave birth to the rise of Napoleon. He had been a major imperialist force of that time working in the garb of the spread of ideas of the French revolution (Liberty, Equality, and Fraternity). Nationalism – The idea of nationalism stoked the feeling of national pride and one way to show love and pride towards the motherland is to acquire more territory than the other European counterparts. The propaganda of Religion – The imperialists have been of the view that their religion is the best. Therefore, they have been sending their missionaries to backward countries in order to propagate their religion and to make them civilized. So in the name of religion imperialist tendencies grew. E.g. Crusades war, White man’s burden Theory. Diplomatic and strategic reasons – Many imperialist countries want to establish their empire because it helps them to gain influence in the diplomatic field. Sometimes certain nations are in need of places of strategic importance in other countries, and they establish their control over them. British had control over Gibraltar, Aden, Malta, and Cyprus because from a strategic point of view, these areas were very important. Capitalism and the Industrial Revolution – Industrial Revolution needed raw material for factories in Europe and a market for its finished product. The capitalist class of Europe had excess capital and it needed a safe place to invest their money. Colonies provided that safe place of investment and all that at the expense of native people. In the lieu of profit from investments and the market for finished product Capitalism and Industrialisation helped imperialism. Unification of Italy and Germany – Unification of Germany and Italy led to the entry of two more powers into the global stage. This feeds the race towards imperialism to gain more territory than the other European nation. This is evident from the Berlin Conference 1884. Modernization of Japan and then its industrial revolution has set its course on the lines of European powers. Japan acquired territory in many East Asian and South-East Asian countries such as Korea, China, etc. World wars were a direct result of imperial tendencies, and ideologies like Fascism, Nazism, Neo-Colonialism were also responsible for the same. With the change of the time, The causes behind the Imperialism also changed first during the time of Crusades war it was Religion then ideas of enlightenment, then new ideas like nationalism, then the need of mother country for trade and industrialization, and then the rise of new powers like Germany, Itlay, Japan, USA were the main reason behind the Imperialism.Hence the reasons for the Imperialism range from Politics, religion, Enlightenment, Economic, to Ethno-centrism.
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##Question:What is Imperialism? What were the causes behind the rise of imperialism? (10 marks/150 words)##Answer:Approach- 1. Define Imperialism. 2. Enumerate the causes of the Imperialism linking various world events with the Imperialism. 3. Provide an appropriate conclusion. Answer - Imperialism is a state policy, or advocacy of extending power and dominion, especially by direct territorial acquisition or by gaining political and economic control of other areas. SoThe Age of Imperialism is typified by the colonization of the Americas and Asia between the 15th and 19th centuries, as well as the expansion of the United States, Japan, and the European powers during the late 19th and early 20th centuries. Causes of imperialism – Renaissance and Enlightenment – It helped to build scientific temper and a quest for knowledge which eventually leads to the discovery of the New World and routes to India and far east to China and Indonesia, this new knowledge was later used for propagation of Imperialism. American Revolution – It provided the fertile ground for the ideas for the establishment of a new nation which will eventually lead to acquiring more land on the western side of America, driving indigenous people into the hinterlands. Later after world wars, the USA also appeared as a major imperialist force. French revolution – The circumstances after the French revolution gave birth to the rise of Napoleon. He had been a major imperialist force of that time working in the garb of the spread of ideas of the French revolution (Liberty, Equality, and Fraternity). Nationalism – The idea of nationalism stoked the feeling of national pride and one way to show love and pride towards the motherland is to acquire more territory than the other European counterparts. The propaganda of Religion – The imperialists have been of the view that their religion is the best. Therefore, they have been sending their missionaries to backward countries in order to propagate their religion and to make them civilized. So in the name of religion imperialist tendencies grew. E.g. Crusades war, White man’s burden Theory. Diplomatic and strategic reasons – Many imperialist countries want to establish their empire because it helps them to gain influence in the diplomatic field. Sometimes certain nations are in need of places of strategic importance in other countries, and they establish their control over them. British had control over Gibraltar, Aden, Malta, and Cyprus because from a strategic point of view, these areas were very important. Capitalism and the Industrial Revolution – Industrial Revolution needed raw material for factories in Europe and a market for its finished product. The capitalist class of Europe had excess capital and it needed a safe place to invest their money. Colonies provided that safe place of investment and all that at the expense of native people. In the lieu of profit from investments and the market for finished product Capitalism and Industrialisation helped imperialism. Unification of Italy and Germany – Unification of Germany and Italy led to the entry of two more powers into the global stage. This feeds the race towards imperialism to gain more territory than the other European nation. This is evident from the Berlin Conference 1884. Modernization of Japan and then its industrial revolution has set its course on the lines of European powers. Japan acquired territory in many East Asian and South-East Asian countries such as Korea, China, etc. World wars were a direct result of imperial tendencies, and ideologies like Fascism, Nazism, Neo-Colonialism were also responsible for the same. With the change of the time, The causes behind the Imperialism also changed first during the time of Crusades war it was Religion then ideas of enlightenment, then new ideas like nationalism, then the need of mother country for trade and industrialization, and then the rise of new powers like Germany, Itlay, Japan, USA were the main reason behind the Imperialism.Hence the reasons for the Imperialism range from Politics, religion, Enlightenment, Economic, to Ethno-centrism.
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पुनर्जागरण के आशय को स्पष्ट कीजिये | पुनर्जागरण के प्रसार के फलस्वरूप प्रगतिशील विचारों तथा मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित हुआ | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaninig of Renaissance. Progressive ideas and humanistic approach developed as a result of the spread of the Renaissance. Comment. (150-200 Words)
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एप्रोच - भूमिका में पुनर्जागरण को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि पुनर्जागरण ने किस सीमा तक प्रगतिशील विचारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित किया ? अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है फिर से जागना। इसका सीमित अर्थ में प्रयोग यूनान एवं रोमन सभ्यता के संदर्भ में किया जाता है। व्यापक रूप से इसका प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में चेतना, विकास, मानववाद से लिया जाता है। यह वह अवधि है जब विभिन्न यूरोपीय देशों ने एक लंबी अवधि के उपरांत मध्यकाल के अंधकार युग को त्याग कर आधुनिक युग में दस्तक दी। मानववादी दृष्टिकोण - यूरोप में यह पुनर्जागरण केवल गौरवपूर्ण अतीत की खोज एवं विश्लेषण तक ही सीमित नहीं था। इसने तत्कालीन धर्म, राजनीति, साहित्य, समाज, कला, विज्ञान, सांस्कृतिक क्षेत्रों में चिंतन को जन्म दिया। इस समय मानववादी दृष्टिकोण प्रबल रूप से सामने आया। इसके अंतर्गत मानव को ईश्वर की कृति माना गया और सम्पूर्ण गतिविधियां मानवहितों पर केन्द्रित हो गयी। मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति के कारण यह स्वीकार किया गया कि इसकी क्षमताओं को किसी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता है। पुनर्जागरण काल में धार्मिक अंधविश्वास तथा रूढ़िवादी पक्ष की आलोचना प्रारम्भ हुआ। तर्कवाद का प्रसार होने से धर्म एवं पोप के नियमों, सिद्धांतों को तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। प्रति धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म की आंतरिक कमियों को उजागर किया। कैथोलिक धर्म की सत्ता को चुनौती दी गयी। प्रगतिशील वैचारिक दृष्टिकोण - पुनर्जागरण काल में प्रगतिशील विचारों के प्रसार में साहित्य, कला का व्यापक प्रभाव पड़ा। साहित्य के माध्यम से यह प्रसारित किया गया कि मनुष्य के अधिकार और स्वतन्त्रता कितने महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर धर्म, पोप प्रतिबंध नहीं लगा सकते। इसके पूर्व लैटिन भाषा में साहित्य की रचना होती थी जिससे जो जन सामान्य की भाषा में नहीं होती थी। अब देशी भाषा में साहित्य की रचना हुई इससे अधिकतम लोग ज्ञान के वास्तविक रूप से अवगत हुए एवं स्वतंत्र तर्क बुद्धि का विकास हुआ। इसके साथ ही चित्रकला में मानवीय भाव एवं समवेदनाओं की अभिव्यक्ति की गयी। जैसे लियोनार्डो दा विंची की मोनालिसा की चित्रकला विश्व प्रसिद्ध हुई। इसी क्रम में सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भी व्यापक बदलाव हुए जिसने प्रगतिशील विचारों के प्रसार को और तीव्र कर दिया, जीवन स्तर में सुधार हुआ। जैसे -पुनर्जागरण के कारण राष्ट्र- राज्य की अवधारणा उत्पन्न हुई। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित हुए। कापरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से पोप की सत्ता को चुनौती दी। आधुनिक विज्ञान के इस युग ने न केवल मानव ज्ञान में वृद्धि की बल्कि अन्वेषण की ऐसी विधि भी प्रस्तुत की जिसका उपयोग दूसरे विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया गया। पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं में तार्किकता, मानवतावादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रगति आदि का विशेष महत्व है। इससे समस्त यूरोप में सामंतवाद के खंडहरों पर आधुनिकता का आविर्भाव हुआ। जिसने प्रगतिशील विचारों का प्रसार किया तथा मनवातावादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ।
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##Question:पुनर्जागरण के आशय को स्पष्ट कीजिये | पुनर्जागरण के प्रसार के फलस्वरूप प्रगतिशील विचारों तथा मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित हुआ | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaninig of Renaissance. Progressive ideas and humanistic approach developed as a result of the spread of the Renaissance. Comment. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में पुनर्जागरण को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि पुनर्जागरण ने किस सीमा तक प्रगतिशील विचारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित किया ? अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है फिर से जागना। इसका सीमित अर्थ में प्रयोग यूनान एवं रोमन सभ्यता के संदर्भ में किया जाता है। व्यापक रूप से इसका प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में चेतना, विकास, मानववाद से लिया जाता है। यह वह अवधि है जब विभिन्न यूरोपीय देशों ने एक लंबी अवधि के उपरांत मध्यकाल के अंधकार युग को त्याग कर आधुनिक युग में दस्तक दी। मानववादी दृष्टिकोण - यूरोप में यह पुनर्जागरण केवल गौरवपूर्ण अतीत की खोज एवं विश्लेषण तक ही सीमित नहीं था। इसने तत्कालीन धर्म, राजनीति, साहित्य, समाज, कला, विज्ञान, सांस्कृतिक क्षेत्रों में चिंतन को जन्म दिया। इस समय मानववादी दृष्टिकोण प्रबल रूप से सामने आया। इसके अंतर्गत मानव को ईश्वर की कृति माना गया और सम्पूर्ण गतिविधियां मानवहितों पर केन्द्रित हो गयी। मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति के कारण यह स्वीकार किया गया कि इसकी क्षमताओं को किसी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता है। पुनर्जागरण काल में धार्मिक अंधविश्वास तथा रूढ़िवादी पक्ष की आलोचना प्रारम्भ हुआ। तर्कवाद का प्रसार होने से धर्म एवं पोप के नियमों, सिद्धांतों को तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। प्रति धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म की आंतरिक कमियों को उजागर किया। कैथोलिक धर्म की सत्ता को चुनौती दी गयी। प्रगतिशील वैचारिक दृष्टिकोण - पुनर्जागरण काल में प्रगतिशील विचारों के प्रसार में साहित्य, कला का व्यापक प्रभाव पड़ा। साहित्य के माध्यम से यह प्रसारित किया गया कि मनुष्य के अधिकार और स्वतन्त्रता कितने महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर धर्म, पोप प्रतिबंध नहीं लगा सकते। इसके पूर्व लैटिन भाषा में साहित्य की रचना होती थी जिससे जो जन सामान्य की भाषा में नहीं होती थी। अब देशी भाषा में साहित्य की रचना हुई इससे अधिकतम लोग ज्ञान के वास्तविक रूप से अवगत हुए एवं स्वतंत्र तर्क बुद्धि का विकास हुआ। इसके साथ ही चित्रकला में मानवीय भाव एवं समवेदनाओं की अभिव्यक्ति की गयी। जैसे लियोनार्डो दा विंची की मोनालिसा की चित्रकला विश्व प्रसिद्ध हुई। इसी क्रम में सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भी व्यापक बदलाव हुए जिसने प्रगतिशील विचारों के प्रसार को और तीव्र कर दिया, जीवन स्तर में सुधार हुआ। जैसे -पुनर्जागरण के कारण राष्ट्र- राज्य की अवधारणा उत्पन्न हुई। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित हुए। कापरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से पोप की सत्ता को चुनौती दी। आधुनिक विज्ञान के इस युग ने न केवल मानव ज्ञान में वृद्धि की बल्कि अन्वेषण की ऐसी विधि भी प्रस्तुत की जिसका उपयोग दूसरे विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया गया। पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं में तार्किकता, मानवतावादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रगति आदि का विशेष महत्व है। इससे समस्त यूरोप में सामंतवाद के खंडहरों पर आधुनिकता का आविर्भाव हुआ। जिसने प्रगतिशील विचारों का प्रसार किया तथा मनवातावादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ।
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नागरिक घोषणापत्र को परिभाषित करते हुए सुशासन के सन्दर्भ में इनका महत्त्व स्पष्ट कीजिये| भारत में इनको प्रभावी बनाने के लिए किये गए उपायों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Define the Citizen Charters and explain its importance in the context of good governance. Discuss the measures taken to make them effective in India. (150 to 200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में नागरिक घोषणापत्रों को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सुशासन के सन्दर्भ में इनका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में इनकों प्रभावी बनाने के सन्दर्भ में सवोत्तम मॉडल की विशेषताओं का वर्णन कीजिये 4- अंतिम में प्रभाविता बढाने के लिए अपेक्षित उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नागरिक अधिकार पत्र एक सरकारी संस्था द्वारा नागरिकों के प्रति तय की गयी अपनी प्रतिबद्धताओं का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका सम्बन्ध नागरिकों को उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं से होता है| अधिकारपत्र में वे सभी मानदंड उल्लिखित होते हैं जिनपर सभी नागरिक सेवायें आधारित होती है| समग्रता में इसे अधिकारियों के आचरण का लेख कहा जा सकता है| नागरिक घोषणापत्र में यह सुनिश्चित किया जाता है कि सार्वजनिक सेवाएँ नागरिक केन्द्रित हों| नागरिक घोषणापत्रों का उद्देश्य नागरिकों एवं प्रशासन के मध्य एक सेतु का निर्माण करना और नागरिकों एवं प्रशासन के सम्बन्ध को सहज बनाते हुए प्रशासन तन्त्र को सरल एवं प्रभावी बनाना होता है| नागरिक घोषणापत्र का महत्त्व नागरिक घोषणापत्र नागरिक सेवाओं को व्यवस्थित एवं जनअनुकूल बनाने में उपयोगी होते हैं नागरिक घोषणापत्र लागू करने से समय रहते अपने लक्ष्य पूरे करना आवश्यक हो जाता है इससे अधिकारियों एवं कर्मचारियों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है नागरिक घोषणापत्र लागू होने से कर्मचारियों द्वारा अपने कार्यों को समय पर करने तथा परिणाम जल्दी पाने के लिये नवाचारों को अपनाने की प्रेरणा मिलती है| इससे प्रशासन का आधुनिकीकरण होता है| डिजिटलीकरण जैसे नवाचारों को बढाने से शासन में पारदर्शिता आती है, इस तरह नागरिक घोषणापत्र शासन को पारदर्शी बनाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण होते हैं नागरिक घोषणापत्र लागू करने से कार्य का दबाव बढ़ने के फलस्वरूप एक-दूसरे के सहयोग की अपेक्षा के चलते तन्त्र में सहयोग के मूल्य का विकास होता है नागरिक घोषणापत्र सेवाओं को संस्थान की प्रतिबद्धता के रूप में सूचीबद्ध करते हैं इस तरह से प्रशासन में अनुक्रियाशीलता एवं दक्षता बढाने के सन्दर्भ में नागरिक घोषणापत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं नागरिक घोषणापत्रों में संस्था और नागरिक दोनों के अधिकार एवं उत्तरदायित्व दोनों का स्पष्टीकरण किया जाता है इससे सेवा आपूर्ति/वितरण प्रणाली सरल एवं पारदर्शी हो जाती है| भारत में नागरिक अधिकारपत्र वर्ष 1996 में प्रभावी और अनुक्रियाशील शासन की स्थापना पर चर्चा प्रारम्भ हुई 1997 में मुख्यमंत्रियों के सम्मलेन में नागरिक घोषणापत्रों को जारी करने पर सहमति निर्मित हुई अब तक केंद्र सरकार में लगभग 200 जबकि समग्र रूप में लगभग 1300 नागरिक घोषणापत्र जारी किये जा चुके हैं इन घोषणापत्रों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सवोत्तम सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है सवोत्तम मॉडल के घटक यह नागरिक अधिकारपत्र पर आधारित हैं अतः इनका प्रथम घटक नागरिक अधिकारपत्र हैं दूसरा घटक मुद्दों और विवादों के समाधान तथा सुधार के लिए स्थापित की गयी उपचार प्रणालियाँ हैं जबकि तीसरा घटक प्रशासन की क्षमता का विस्तार करना है उपरोक्त तीनों घटकों की गुणवत्ता के लिए कसौटियां भी निर्धारित की गयी है, नागरिक अधिकारपत्र की गुणवत्ता की जांच के लिए उसके क्रियान्वयन का स्तर, क्रियान्वयन की निगरानी तथा क्रियान्वयन की समीक्षा का प्रावधान किया गया है उपचार प्रणालियों की गुणवत्ता की जांच के लिए पावती के वितरण का स्तर, उपचार एवं रोकथाम के उपाय प्रशासन की क्षमता के विस्तार के अंतर्गत सेवा आपूर्ति के मानक को अपनाया गया है| सेवा आपूर्ति की गुणवत्ता की जांच के लिए उपभोक्ता की संतुष्टि, कर्मचारी विकास एवं आवश्यक अवसंरचना की उपस्थिति के आधार पर की जाती है| इस प्रकार देखते हैं कि भारत में नागरिक घोषणापत्रों को प्रभावी बनाने के लिए सेवोत्तम मॉडल, उसके घटकों और घटकों की गुणवत्ता की जांच के लिए कसौटियों का निर्धारण किया गया है| फिर भी नागरिक घोषणापत्रों का सीमित क्रियान्वयन ही हो पा रहा है| अतः सेवाओं कीपरिभाषा और ग्राहक की पहचान, सेवा आपूर्ति के मानक एवं मानदंडों का निर्धारण, मानकों को पूरा करने की क्षमता का विकास, इनको पूरा करने के लिए प्रदर्शन की व्यवस्था, स्थापित मानकों के अंतर्गत इन प्रदर्शनों की निगरानी तथा सेवाओं के प्रभाव का स्वतंत्र तंत्र के द्वारा मूल्यांकन किया जाए| निगरानी एवं मूल्यांकन के आधार पर सेवाओं की गुणवत्ता में निरंतर सुधार किये जाना चाहिए ताकि नागरिक घोषणापत्रों के माध्यम से सुशासन की स्थापना की जा सके|
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##Question:नागरिक घोषणापत्र को परिभाषित करते हुए सुशासन के सन्दर्भ में इनका महत्त्व स्पष्ट कीजिये| भारत में इनको प्रभावी बनाने के लिए किये गए उपायों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द) Define the Citizen Charters and explain its importance in the context of good governance. Discuss the measures taken to make them effective in India. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नागरिक घोषणापत्रों को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सुशासन के सन्दर्भ में इनका महत्त्व स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में इनकों प्रभावी बनाने के सन्दर्भ में सवोत्तम मॉडल की विशेषताओं का वर्णन कीजिये 4- अंतिम में प्रभाविता बढाने के लिए अपेक्षित उपाय बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नागरिक अधिकार पत्र एक सरकारी संस्था द्वारा नागरिकों के प्रति तय की गयी अपनी प्रतिबद्धताओं का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका सम्बन्ध नागरिकों को उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं से होता है| अधिकारपत्र में वे सभी मानदंड उल्लिखित होते हैं जिनपर सभी नागरिक सेवायें आधारित होती है| समग्रता में इसे अधिकारियों के आचरण का लेख कहा जा सकता है| नागरिक घोषणापत्र में यह सुनिश्चित किया जाता है कि सार्वजनिक सेवाएँ नागरिक केन्द्रित हों| नागरिक घोषणापत्रों का उद्देश्य नागरिकों एवं प्रशासन के मध्य एक सेतु का निर्माण करना और नागरिकों एवं प्रशासन के सम्बन्ध को सहज बनाते हुए प्रशासन तन्त्र को सरल एवं प्रभावी बनाना होता है| नागरिक घोषणापत्र का महत्त्व नागरिक घोषणापत्र नागरिक सेवाओं को व्यवस्थित एवं जनअनुकूल बनाने में उपयोगी होते हैं नागरिक घोषणापत्र लागू करने से समय रहते अपने लक्ष्य पूरे करना आवश्यक हो जाता है इससे अधिकारियों एवं कर्मचारियों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है नागरिक घोषणापत्र लागू होने से कर्मचारियों द्वारा अपने कार्यों को समय पर करने तथा परिणाम जल्दी पाने के लिये नवाचारों को अपनाने की प्रेरणा मिलती है| इससे प्रशासन का आधुनिकीकरण होता है| डिजिटलीकरण जैसे नवाचारों को बढाने से शासन में पारदर्शिता आती है, इस तरह नागरिक घोषणापत्र शासन को पारदर्शी बनाने के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण होते हैं नागरिक घोषणापत्र लागू करने से कार्य का दबाव बढ़ने के फलस्वरूप एक-दूसरे के सहयोग की अपेक्षा के चलते तन्त्र में सहयोग के मूल्य का विकास होता है नागरिक घोषणापत्र सेवाओं को संस्थान की प्रतिबद्धता के रूप में सूचीबद्ध करते हैं इस तरह से प्रशासन में अनुक्रियाशीलता एवं दक्षता बढाने के सन्दर्भ में नागरिक घोषणापत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं नागरिक घोषणापत्रों में संस्था और नागरिक दोनों के अधिकार एवं उत्तरदायित्व दोनों का स्पष्टीकरण किया जाता है इससे सेवा आपूर्ति/वितरण प्रणाली सरल एवं पारदर्शी हो जाती है| भारत में नागरिक अधिकारपत्र वर्ष 1996 में प्रभावी और अनुक्रियाशील शासन की स्थापना पर चर्चा प्रारम्भ हुई 1997 में मुख्यमंत्रियों के सम्मलेन में नागरिक घोषणापत्रों को जारी करने पर सहमति निर्मित हुई अब तक केंद्र सरकार में लगभग 200 जबकि समग्र रूप में लगभग 1300 नागरिक घोषणापत्र जारी किये जा चुके हैं इन घोषणापत्रों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सवोत्तम सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है सवोत्तम मॉडल के घटक यह नागरिक अधिकारपत्र पर आधारित हैं अतः इनका प्रथम घटक नागरिक अधिकारपत्र हैं दूसरा घटक मुद्दों और विवादों के समाधान तथा सुधार के लिए स्थापित की गयी उपचार प्रणालियाँ हैं जबकि तीसरा घटक प्रशासन की क्षमता का विस्तार करना है उपरोक्त तीनों घटकों की गुणवत्ता के लिए कसौटियां भी निर्धारित की गयी है, नागरिक अधिकारपत्र की गुणवत्ता की जांच के लिए उसके क्रियान्वयन का स्तर, क्रियान्वयन की निगरानी तथा क्रियान्वयन की समीक्षा का प्रावधान किया गया है उपचार प्रणालियों की गुणवत्ता की जांच के लिए पावती के वितरण का स्तर, उपचार एवं रोकथाम के उपाय प्रशासन की क्षमता के विस्तार के अंतर्गत सेवा आपूर्ति के मानक को अपनाया गया है| सेवा आपूर्ति की गुणवत्ता की जांच के लिए उपभोक्ता की संतुष्टि, कर्मचारी विकास एवं आवश्यक अवसंरचना की उपस्थिति के आधार पर की जाती है| इस प्रकार देखते हैं कि भारत में नागरिक घोषणापत्रों को प्रभावी बनाने के लिए सेवोत्तम मॉडल, उसके घटकों और घटकों की गुणवत्ता की जांच के लिए कसौटियों का निर्धारण किया गया है| फिर भी नागरिक घोषणापत्रों का सीमित क्रियान्वयन ही हो पा रहा है| अतः सेवाओं कीपरिभाषा और ग्राहक की पहचान, सेवा आपूर्ति के मानक एवं मानदंडों का निर्धारण, मानकों को पूरा करने की क्षमता का विकास, इनको पूरा करने के लिए प्रदर्शन की व्यवस्था, स्थापित मानकों के अंतर्गत इन प्रदर्शनों की निगरानी तथा सेवाओं के प्रभाव का स्वतंत्र तंत्र के द्वारा मूल्यांकन किया जाए| निगरानी एवं मूल्यांकन के आधार पर सेवाओं की गुणवत्ता में निरंतर सुधार किये जाना चाहिए ताकि नागरिक घोषणापत्रों के माध्यम से सुशासन की स्थापना की जा सके|
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Critically analyze the MSP policy of the government. Provide some suggestions in this light. (10 marks/ 150 words)
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BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CRITICAL ANALYSIS OF THE MSP POLICY OF THE GOVERNMENT- THE PROBLEMS - REASONS WHY THE GOVERNMENT INCREASED THE MSP FOR THESE PRODUCTS TO SUCH A HUGE EXTENT - SHANTA KUMAR COMMITTEE RECOMMENDATIONS ON PRICE POLICY RECOMMENDATIONS ON PROCUREMENT - ARVIND SUBRAMANIYAM COMMITTEE -CONCLUSION ANSWER:- The government announces MSP and procurement prices for selected agricultural commodities. The need for MSP is the unstable/ volatile prices of agricultural commodities making the farmers vulnerable. The supply of such goods is inelastic- due to lack of storage and indebtedness (interest grows at a fast pact irrespective of price rise) and hence, the farmers have to sell at whatever price available. CRITICAL ANALYSIS OF THE MSP POLICY OF THE GOVERNMENT- THE PROBLEMS 1) MSP OF WHEAT AND RICE- INCREASED SIGNIFICANTLY It was even above the market price- State governments add their bonus- So, it is normally above the market price (MSP + bonus). Hence, the MSP serves as the procurement price (PP). It is undesirable because MSP should be below the market price. The MSP should not serve as the PP, as in MSP, the agricultural commodities are procured without a limit- it is like a car without brakes This has eliminated the need for a PP. 1.1) REPERCUSSIONS (a) Production of wheat and rice has increased. This leads to over procurement by the FCI and hence over-stocking. Currently, the FCI is holding almost double of the government"s stocking norms (on an average) This leads to wastage- due to the beyond capacity storage and the government"s money goes wasted. (b) REGIONAL DISPARITIES AND INCOME INEQUALITIES INCREASE This happens because these crops are only grown in selected areas. ( c) CROP ROTATION AND CROP DIVERSIFICATION WILL REDUCE (d) LOSS IN SOIL FERTILITY This is a major problem in Haryana and Punjab, where soil fertility is degrading (e) RESOURCE DEPLETION This happens as rice requires a lot of fertilizers. Both rice and wheat are highly resource-intensive, especially rice, which needs a lot of water **We use 2-5 times more water than China and Brazil for rice The Economic Survey used the term ‘water exporter’ of India due to export of water intensive agricultural products like rice The water table is also going down at a very fast pace. 2) ENVIRONMENTAL DEGRADATION This is happening, especially pollution- due to pesticides and fertilizers. 3) PRODUCTION OF OTHER CROPS WILL SOMEWHAT REDUCE Due to profit considerations and risk minimalisation wrt those products offering a lucrative MSP. 4) FOOD INFLATION To a certain extent, this (high and irrational MSPs) is the reason behind food inflation REASONS WHY THE GOVERNMENT INCREASED THE MSP FOR THESE PRODUCTS TO SUCH A HUGE EXTENT 1) INITIALLY TO ENSURE FOOD SECURITY And the step did help in this direction. 2) THE BONUS FURTHER AGGRAVATED THE ISSUE This led to the creation of further distortions. SHANTA KUMAR COMMITTEE The govt set up this committee RECOMMENDATIONS ON PRICE POLICY: 1) MSP ON PULSES AND OILSEEDS TO BE RATIONALISED/ INCREASED This is necessary to remove the skewed emphasis on the production of wheat and paddy by the farmers. 2) MSP POLICY LINKAGE TO TRADE POLICY The states’ MSP Policy should be linked with their trade policy to ensure that their imported prices are not be less than the MSPs. Example- if MSP for pulses = Rs. 40/ kg and imported pulses = Rs. 30/ kg- Then the people will keep on buying the imported prices and the MSP will not be effective. RECOMMENDATIONS ON PROCUREMENT: 3) THE FCI SHOULD DELEGATE ITS PROCUREMENT OPERATIONS TO THE STATE GOVERNMENTS As they have adequate infrastructure. And it should shift its procurement centres to the states where farmers suffer from distress sale at prices much below the MSP. Example- in Odisha and Bihar- some farmers there have excess production. But major procurement is done from Haryana, Punjab and Western UP. At other places, the farmers do not have access to the procurement centres of FCI. It is needed more in such states, like Odisha and Bihar- where farmers go for distress sales Now, where the need is more, there less procurement is taking place and where the need is less there more procurement is happening. In many states many farmers are not even aware of the MSP 4) LIMIT ON PROCUREMENT In case of bonus by the state government on top of the MSP, the FCI should not procure grains beyond the need of the state for its PDS/ OWS (Other Welfare Schemes- like MDMS, Antyodaya Yojana, ICDS etc.) The FCI should only buy as much as what is needed and for the bonus part- the states should buy it Example- in Haryana- if production of wheat is 30 MT and need of state is 10 MT- the FCI should only buy 10 MT andthe state should buy the restas it is only providing the bonus ARVIND SUBRAMANIYAM COMMITTEE- THE RECOMMENDATIONS 1) BUFFER STOCK OF PULSES OF 2 MT This was accepted and the government has provided for this. 2) THE CACP TO BE INSTRUCTED TO INCLUDE RISK AND EXTERNALITIES IN ITS MSP SETTING FRAMEWORK This was suggested so as to increase the production of pulses. It suggested that MSP should be based on risk as well (and not just bases on costs) In pulses and oilseeds, the risk is more- as they are grown in unirrigated areas. 2.1) The externalities in case of pulses are: (a) They fix the atmospheric N2 in the soil and hence reduce fertiliser consumption (of urea, which is a chemical fertiliser) (b) The soil becomes porous and well aerated. (c) They are less resource-intensive- Water and fertiliser usage is less. (d) Source of nutrition- pulses are a major source of proteins. Coarse grains- also have these benefits- They require less resources, and the value of nutrition is much more in coarse grains as compared to in wheat and rice. Hence, they have many health benefits- and hence, their production should be encouraged. Currently- there are 2 reasons for low production- demand side (The people dont like coarse grain- The solution is Food processing- like digestive biscuits etc.) as well as supply issues (as shown above). The government set up the MS Swaminathan Commission - the national commission on farmers, which gave its report in 2009. It suggested that the MSP should equal to 1.5 times the cost (i.e. more than 50% of costs)- here C2 costs were considered. The government accepted this recommendation- but the cost taken into account will be the A2 costs. [**C2 = A2 + FL+ 2 more things--> FL- family labour The 2 more things are: (i) Estimated rent of self-owned land (ii) Estimated interest on self-owned capital stock (like a tractor) So, C2 = the entire cost of production A2 = entire cost of production except for the implicit costs]
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##Question:Critically analyze the MSP policy of the government. Provide some suggestions in this light. (10 marks/ 150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION - CRITICAL ANALYSIS OF THE MSP POLICY OF THE GOVERNMENT- THE PROBLEMS - REASONS WHY THE GOVERNMENT INCREASED THE MSP FOR THESE PRODUCTS TO SUCH A HUGE EXTENT - SHANTA KUMAR COMMITTEE RECOMMENDATIONS ON PRICE POLICY RECOMMENDATIONS ON PROCUREMENT - ARVIND SUBRAMANIYAM COMMITTEE -CONCLUSION ANSWER:- The government announces MSP and procurement prices for selected agricultural commodities. The need for MSP is the unstable/ volatile prices of agricultural commodities making the farmers vulnerable. The supply of such goods is inelastic- due to lack of storage and indebtedness (interest grows at a fast pact irrespective of price rise) and hence, the farmers have to sell at whatever price available. CRITICAL ANALYSIS OF THE MSP POLICY OF THE GOVERNMENT- THE PROBLEMS 1) MSP OF WHEAT AND RICE- INCREASED SIGNIFICANTLY It was even above the market price- State governments add their bonus- So, it is normally above the market price (MSP + bonus). Hence, the MSP serves as the procurement price (PP). It is undesirable because MSP should be below the market price. The MSP should not serve as the PP, as in MSP, the agricultural commodities are procured without a limit- it is like a car without brakes This has eliminated the need for a PP. 1.1) REPERCUSSIONS (a) Production of wheat and rice has increased. This leads to over procurement by the FCI and hence over-stocking. Currently, the FCI is holding almost double of the government"s stocking norms (on an average) This leads to wastage- due to the beyond capacity storage and the government"s money goes wasted. (b) REGIONAL DISPARITIES AND INCOME INEQUALITIES INCREASE This happens because these crops are only grown in selected areas. ( c) CROP ROTATION AND CROP DIVERSIFICATION WILL REDUCE (d) LOSS IN SOIL FERTILITY This is a major problem in Haryana and Punjab, where soil fertility is degrading (e) RESOURCE DEPLETION This happens as rice requires a lot of fertilizers. Both rice and wheat are highly resource-intensive, especially rice, which needs a lot of water **We use 2-5 times more water than China and Brazil for rice The Economic Survey used the term ‘water exporter’ of India due to export of water intensive agricultural products like rice The water table is also going down at a very fast pace. 2) ENVIRONMENTAL DEGRADATION This is happening, especially pollution- due to pesticides and fertilizers. 3) PRODUCTION OF OTHER CROPS WILL SOMEWHAT REDUCE Due to profit considerations and risk minimalisation wrt those products offering a lucrative MSP. 4) FOOD INFLATION To a certain extent, this (high and irrational MSPs) is the reason behind food inflation REASONS WHY THE GOVERNMENT INCREASED THE MSP FOR THESE PRODUCTS TO SUCH A HUGE EXTENT 1) INITIALLY TO ENSURE FOOD SECURITY And the step did help in this direction. 2) THE BONUS FURTHER AGGRAVATED THE ISSUE This led to the creation of further distortions. SHANTA KUMAR COMMITTEE The govt set up this committee RECOMMENDATIONS ON PRICE POLICY: 1) MSP ON PULSES AND OILSEEDS TO BE RATIONALISED/ INCREASED This is necessary to remove the skewed emphasis on the production of wheat and paddy by the farmers. 2) MSP POLICY LINKAGE TO TRADE POLICY The states’ MSP Policy should be linked with their trade policy to ensure that their imported prices are not be less than the MSPs. Example- if MSP for pulses = Rs. 40/ kg and imported pulses = Rs. 30/ kg- Then the people will keep on buying the imported prices and the MSP will not be effective. RECOMMENDATIONS ON PROCUREMENT: 3) THE FCI SHOULD DELEGATE ITS PROCUREMENT OPERATIONS TO THE STATE GOVERNMENTS As they have adequate infrastructure. And it should shift its procurement centres to the states where farmers suffer from distress sale at prices much below the MSP. Example- in Odisha and Bihar- some farmers there have excess production. But major procurement is done from Haryana, Punjab and Western UP. At other places, the farmers do not have access to the procurement centres of FCI. It is needed more in such states, like Odisha and Bihar- where farmers go for distress sales Now, where the need is more, there less procurement is taking place and where the need is less there more procurement is happening. In many states many farmers are not even aware of the MSP 4) LIMIT ON PROCUREMENT In case of bonus by the state government on top of the MSP, the FCI should not procure grains beyond the need of the state for its PDS/ OWS (Other Welfare Schemes- like MDMS, Antyodaya Yojana, ICDS etc.) The FCI should only buy as much as what is needed and for the bonus part- the states should buy it Example- in Haryana- if production of wheat is 30 MT and need of state is 10 MT- the FCI should only buy 10 MT andthe state should buy the restas it is only providing the bonus ARVIND SUBRAMANIYAM COMMITTEE- THE RECOMMENDATIONS 1) BUFFER STOCK OF PULSES OF 2 MT This was accepted and the government has provided for this. 2) THE CACP TO BE INSTRUCTED TO INCLUDE RISK AND EXTERNALITIES IN ITS MSP SETTING FRAMEWORK This was suggested so as to increase the production of pulses. It suggested that MSP should be based on risk as well (and not just bases on costs) In pulses and oilseeds, the risk is more- as they are grown in unirrigated areas. 2.1) The externalities in case of pulses are: (a) They fix the atmospheric N2 in the soil and hence reduce fertiliser consumption (of urea, which is a chemical fertiliser) (b) The soil becomes porous and well aerated. (c) They are less resource-intensive- Water and fertiliser usage is less. (d) Source of nutrition- pulses are a major source of proteins. Coarse grains- also have these benefits- They require less resources, and the value of nutrition is much more in coarse grains as compared to in wheat and rice. Hence, they have many health benefits- and hence, their production should be encouraged. Currently- there are 2 reasons for low production- demand side (The people dont like coarse grain- The solution is Food processing- like digestive biscuits etc.) as well as supply issues (as shown above). The government set up the MS Swaminathan Commission - the national commission on farmers, which gave its report in 2009. It suggested that the MSP should equal to 1.5 times the cost (i.e. more than 50% of costs)- here C2 costs were considered. The government accepted this recommendation- but the cost taken into account will be the A2 costs. [**C2 = A2 + FL+ 2 more things--> FL- family labour The 2 more things are: (i) Estimated rent of self-owned land (ii) Estimated interest on self-owned capital stock (like a tractor) So, C2 = the entire cost of production A2 = entire cost of production except for the implicit costs]
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पुनर्जागरण के आशय को स्पष्ट कीजिये | पुनर्जागरण के प्रसार के फलस्वरूप प्रगतिशील विचारों तथा मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित हुआ | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaninig of Renaissance. Progressive ideas and humanistic approach developed as a result of the spread of the Renaissance. Comment. (150-200 Words)
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एप्रोच - भूमिका में पुनर्जागरण को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि पुनर्जागरण ने किस सीमा तक प्रगतिशील विचारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित किया ? अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है फिर से जागना। इसका सीमित अर्थ में प्रयोग यूनान एवं रोमन सभ्यता के संदर्भ में किया जाता है। व्यापक रूप से इसका प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में चेतना, विकास, मानववाद से लिया जाता है। यह वह अवधि है जब विभिन्न यूरोपीय देशों ने एक लंबी अवधि के उपरांत मध्यकाल के अंधकार युग को त्याग कर आधुनिक युग में दस्तक दी। मानववादी दृष्टिकोण - यूरोप में यह पुनर्जागरण केवल गौरवपूर्ण अतीत की खोज एवं विश्लेषण तक ही सीमित नहीं था। इसने तत्कालीन धर्म, राजनीति, साहित्य, समाज, कला, विज्ञान, सांस्कृतिक क्षेत्रों में चिंतन को जन्म दिया। इस समय मानववादी दृष्टिकोण प्रबल रूप से सामने आया। इसके अंतर्गत मानव को ईश्वर की कृति माना गया और सम्पूर्ण गतिविधियां मानवहितों पर केन्द्रित हो गयी। मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति के कारण यह स्वीकार किया गया कि इसकी क्षमताओं को किसी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता है। पुनर्जागरण काल में धार्मिक अंधविश्वास तथा रूढ़िवादी पक्ष की आलोचना प्रारम्भ हुआ। तर्कवाद का प्रसार होने से धर्म एवं पोप के नियमों, सिद्धांतों को तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। प्रति धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म की आंतरिक कमियों को उजागर किया। कैथोलिक धर्म की सत्ता को चुनौती दी गयी। प्रगतिशील वैचारिक दृष्टिकोण - पुनर्जागरण काल में प्रगतिशील विचारों के प्रसार में साहित्य, कला का व्यापक प्रभाव पड़ा। साहित्य के माध्यम से यह प्रसारित किया गया कि मनुष्य के अधिकार और स्वतन्त्रता कितने महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर धर्म, पोप प्रतिबंध नहीं लगा सकते। इसके पूर्व लैटिन भाषा में साहित्य की रचना होती थी जिससे जो जन सामान्य की भाषा में नहीं होती थी। अब देशी भाषा में साहित्य की रचना हुई इससे अधिकतम लोग ज्ञान के वास्तविक रूप से अवगत हुए एवं स्वतंत्र तर्क बुद्धि का विकास हुआ। इसके साथ ही चित्रकला में मानवीय भाव एवं समवेदनाओं की अभिव्यक्ति की गयी। जैसे लियोनार्डो दा विंची की मोनालिसा की चित्रकला विश्व प्रसिद्ध हुई। इसी क्रम में सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भी व्यापक बदलाव हुए जिसने प्रगतिशील विचारों के प्रसार को और तीव्र कर दिया, जीवन स्तर में सुधार हुआ। जैसे -पुनर्जागरण के कारण राष्ट्र- राज्य की अवधारणा उत्पन्न हुई। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित हुए। कापरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से पोप की सत्ता को चुनौती दी। आधुनिक विज्ञान के इस युग ने न केवल मानव ज्ञान में वृद्धि की बल्कि अन्वेषण की ऐसी विधि भी प्रस्तुत की जिसका उपयोग दूसरे विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया गया। पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं में तार्किकता, मानवतावादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रगति आदि का विशेष महत्व है। इससे समस्त यूरोप में सामंतवाद के खंडहरों पर आधुनिकता का आविर्भाव हुआ। जिसने प्रगतिशील विचारों का प्रसार किया तथा मनवातावादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ।
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##Question:पुनर्जागरण के आशय को स्पष्ट कीजिये | पुनर्जागरण के प्रसार के फलस्वरूप प्रगतिशील विचारों तथा मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित हुआ | टिप्पणी कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the meaninig of Renaissance. Progressive ideas and humanistic approach developed as a result of the spread of the Renaissance. Comment. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में पुनर्जागरण को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात स्पष्ट कीजिए कि पुनर्जागरण ने किस सीमा तक प्रगतिशील विचारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित किया ? अंत में सकरात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है फिर से जागना। इसका सीमित अर्थ में प्रयोग यूनान एवं रोमन सभ्यता के संदर्भ में किया जाता है। व्यापक रूप से इसका प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में चेतना, विकास, मानववाद से लिया जाता है। यह वह अवधि है जब विभिन्न यूरोपीय देशों ने एक लंबी अवधि के उपरांत मध्यकाल के अंधकार युग को त्याग कर आधुनिक युग में दस्तक दी। मानववादी दृष्टिकोण - यूरोप में यह पुनर्जागरण केवल गौरवपूर्ण अतीत की खोज एवं विश्लेषण तक ही सीमित नहीं था। इसने तत्कालीन धर्म, राजनीति, साहित्य, समाज, कला, विज्ञान, सांस्कृतिक क्षेत्रों में चिंतन को जन्म दिया। इस समय मानववादी दृष्टिकोण प्रबल रूप से सामने आया। इसके अंतर्गत मानव को ईश्वर की कृति माना गया और सम्पूर्ण गतिविधियां मानवहितों पर केन्द्रित हो गयी। मनुष्य को अपनी चिंतन शक्ति के कारण यह स्वीकार किया गया कि इसकी क्षमताओं को किसी रूप में सीमित नहीं किया जा सकता है। पुनर्जागरण काल में धार्मिक अंधविश्वास तथा रूढ़िवादी पक्ष की आलोचना प्रारम्भ हुआ। तर्कवाद का प्रसार होने से धर्म एवं पोप के नियमों, सिद्धांतों को तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। प्रति धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म की आंतरिक कमियों को उजागर किया। कैथोलिक धर्म की सत्ता को चुनौती दी गयी। प्रगतिशील वैचारिक दृष्टिकोण - पुनर्जागरण काल में प्रगतिशील विचारों के प्रसार में साहित्य, कला का व्यापक प्रभाव पड़ा। साहित्य के माध्यम से यह प्रसारित किया गया कि मनुष्य के अधिकार और स्वतन्त्रता कितने महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर धर्म, पोप प्रतिबंध नहीं लगा सकते। इसके पूर्व लैटिन भाषा में साहित्य की रचना होती थी जिससे जो जन सामान्य की भाषा में नहीं होती थी। अब देशी भाषा में साहित्य की रचना हुई इससे अधिकतम लोग ज्ञान के वास्तविक रूप से अवगत हुए एवं स्वतंत्र तर्क बुद्धि का विकास हुआ। इसके साथ ही चित्रकला में मानवीय भाव एवं समवेदनाओं की अभिव्यक्ति की गयी। जैसे लियोनार्डो दा विंची की मोनालिसा की चित्रकला विश्व प्रसिद्ध हुई। इसी क्रम में सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भी व्यापक बदलाव हुए जिसने प्रगतिशील विचारों के प्रसार को और तीव्र कर दिया, जीवन स्तर में सुधार हुआ। जैसे -पुनर्जागरण के कारण राष्ट्र- राज्य की अवधारणा उत्पन्न हुई। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित हुए। कापरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन आदि वैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांतों के माध्यम से पोप की सत्ता को चुनौती दी। आधुनिक विज्ञान के इस युग ने न केवल मानव ज्ञान में वृद्धि की बल्कि अन्वेषण की ऐसी विधि भी प्रस्तुत की जिसका उपयोग दूसरे विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया गया। पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं में तार्किकता, मानवतावादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रगति आदि का विशेष महत्व है। इससे समस्त यूरोप में सामंतवाद के खंडहरों पर आधुनिकता का आविर्भाव हुआ। जिसने प्रगतिशील विचारों का प्रसार किया तथा मनवातावादी दृष्टिकोण भी विकसित हुआ।
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सुशासन के संदर्भ में, अनुक्रियाशीलता के उद्देश्यों का वर्णन कीजिये| साथ ही,अनुक्रियाशीलता के संदर्भ में, बाधाओं को स्पष्ट करते हुए इस हेतु भारत सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) In the context of good governance, describe the objectives of responsiveness. Also, mention the obstacles and the steps taken by the government of india regarding responsiveness. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच- अनुक्रियाशीलता को परिभाषित करते हुए उत्तर का आरंभ कीजिये| अगले भाग में,सुशासन के संदर्भ में, अनुक्रियाशीलता के उद्देश्यों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,अनुक्रियाशीलता के संदर्भ में, बाधाओं को बिंदुबार स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में,अनुक्रियाशीलता हेतुभारत सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- अनुक्रियाशीलता का अर्थ समय पर शासन से जुड़े आयामों तथा सेवाओं/शिकायतों/सुझावों आदि के संदर्भ में सरकार या संगठन के त्वरित रुख तथा उसपर उठाये गये क़दमों से है| सुशासन के लिए यह आवश्यक होता है कि संस्थान और प्रक्रियाएं सभी हितधारकों को उचित समय अवधि में सेवा प्रदान करने का प्रयास करें| नागरिकों की शिकायतों का समाधान, नागरिक उन्मुख शासन व्यवस्था, नागरिकों के अनुकूल शासन व्यवस्था तथा सेवाओं को समय पर प्रदान किया जाना अनुक्रियात्मक शासन के मुख्य अवयव हैं| अनुक्रियाशीलता के उद्देश्य- समाज के मूल्यों का आधिकारिक आवंटन करना; आने वाले प्रतिसंभरण का उचित निदान किया जाना ताकि जनता की शिकायतों/सुझावों के संदर्भ में सरकार की त्वरित प्रक्रिया हो तथा सुशासन के मानदंडों को स्थापित करने में सहयोग किया जा सके| संगठन/सरकार स्वंय से समाज के अनुकूल मूल्यों का निर्धारण करें अर्थात शिकायतों से पहले ही सरकार/संगठन द्वारा खुद से सुधारात्मक क़दमों को उठाया जा सके एवं शासन व्यवस्था को ज्यादा अग्रगामी बनाने में सहयोग दिया जा सके| सरकार/संगठन स्वंय को दवाबों और संकटों से मुक्त रखे ताकि निष्पक्ष एवं तटस्थ तरीके से सुशासन हेतु प्रयासों को जारी रख सके| कार्यक्रमों/नीतियों/योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रेरित करे| निरंतरता को बनाए रखना; भारत सरकार द्वारा उठाये गये कदम- राष्ट्रीय सुशासन केंद्र; मंत्रालयों एवं संगठनों को विकेंद्रीकृत किया जाना ताकि जनता से प्राप्त शिकायतों/सुझावों का त्वरित गति से सटीक निराकरण में सहायता मिले| उपभोक्ताओं को जागरूक करना; अनुक्रियाशीलता की बाधाएं- हमारे देश की सामाजिक विविधता- जाति/संप्रदाय/क्षेत्र पर हमारे समाज का बंटा होना; अशिक्षा; राजनीतिक दलों की अवांछित मांगे; लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार; सुशासन के प्रति लचर रवैया; अनुक्रियाशीलता हेतु इन बाधाओं को पार करने के लिए आवश्यक है कि इसके मानदंड मानवीय मूल्यों पर आधारित हो; तर्कसंगत, बोधगम्य, फेयर, न्यायकल्प, युक्तियुक्त हो| साथ ही, विधियों को सरल बनाने की आवश्यकता भी है|
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##Question:सुशासन के संदर्भ में, अनुक्रियाशीलता के उद्देश्यों का वर्णन कीजिये| साथ ही,अनुक्रियाशीलता के संदर्भ में, बाधाओं को स्पष्ट करते हुए इस हेतु भारत सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का उल्लेख कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) In the context of good governance, describe the objectives of responsiveness. Also, mention the obstacles and the steps taken by the government of india regarding responsiveness. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- अनुक्रियाशीलता को परिभाषित करते हुए उत्तर का आरंभ कीजिये| अगले भाग में,सुशासन के संदर्भ में, अनुक्रियाशीलता के उद्देश्यों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में,अनुक्रियाशीलता के संदर्भ में, बाधाओं को बिंदुबार स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में,अनुक्रियाशीलता हेतुभारत सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- अनुक्रियाशीलता का अर्थ समय पर शासन से जुड़े आयामों तथा सेवाओं/शिकायतों/सुझावों आदि के संदर्भ में सरकार या संगठन के त्वरित रुख तथा उसपर उठाये गये क़दमों से है| सुशासन के लिए यह आवश्यक होता है कि संस्थान और प्रक्रियाएं सभी हितधारकों को उचित समय अवधि में सेवा प्रदान करने का प्रयास करें| नागरिकों की शिकायतों का समाधान, नागरिक उन्मुख शासन व्यवस्था, नागरिकों के अनुकूल शासन व्यवस्था तथा सेवाओं को समय पर प्रदान किया जाना अनुक्रियात्मक शासन के मुख्य अवयव हैं| अनुक्रियाशीलता के उद्देश्य- समाज के मूल्यों का आधिकारिक आवंटन करना; आने वाले प्रतिसंभरण का उचित निदान किया जाना ताकि जनता की शिकायतों/सुझावों के संदर्भ में सरकार की त्वरित प्रक्रिया हो तथा सुशासन के मानदंडों को स्थापित करने में सहयोग किया जा सके| संगठन/सरकार स्वंय से समाज के अनुकूल मूल्यों का निर्धारण करें अर्थात शिकायतों से पहले ही सरकार/संगठन द्वारा खुद से सुधारात्मक क़दमों को उठाया जा सके एवं शासन व्यवस्था को ज्यादा अग्रगामी बनाने में सहयोग दिया जा सके| सरकार/संगठन स्वंय को दवाबों और संकटों से मुक्त रखे ताकि निष्पक्ष एवं तटस्थ तरीके से सुशासन हेतु प्रयासों को जारी रख सके| कार्यक्रमों/नीतियों/योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रेरित करे| निरंतरता को बनाए रखना; भारत सरकार द्वारा उठाये गये कदम- राष्ट्रीय सुशासन केंद्र; मंत्रालयों एवं संगठनों को विकेंद्रीकृत किया जाना ताकि जनता से प्राप्त शिकायतों/सुझावों का त्वरित गति से सटीक निराकरण में सहायता मिले| उपभोक्ताओं को जागरूक करना; अनुक्रियाशीलता की बाधाएं- हमारे देश की सामाजिक विविधता- जाति/संप्रदाय/क्षेत्र पर हमारे समाज का बंटा होना; अशिक्षा; राजनीतिक दलों की अवांछित मांगे; लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार; सुशासन के प्रति लचर रवैया; अनुक्रियाशीलता हेतु इन बाधाओं को पार करने के लिए आवश्यक है कि इसके मानदंड मानवीय मूल्यों पर आधारित हो; तर्कसंगत, बोधगम्य, फेयर, न्यायकल्प, युक्तियुक्त हो| साथ ही, विधियों को सरल बनाने की आवश्यकता भी है|
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अनेक बाधाओं ने भारत में नागरिक अधिकार पत्रों को अप्रभावी बनाया है किन्तु विभिन्न उपायों से इन्हें प्रभावी बनाया जा सकता है| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Many obstacles have made the Citizens charter ineffective in India, But they can be made effective by various measures. Explain (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में नागरिक अधिकारपत्रों को परिभाषित करते हुए संक्षेप में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में नागरिक अधिकारपत्रों को अप्रभावी बनाने वाली बाधाओं को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इन्हें प्रभावी बनाने के उपायों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में किये गए प्रयासों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नागरिक अधिकार पत्र एक सरकारी संस्था द्वारा नागरिकों के प्रति तय की गयी अपनी प्रतिबद्धताओं का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका सम्बन्ध नागरिकों को उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं से होता है| अधिकारपत्र में वे सभी मानदंड उल्लिखित होते हैं जिनपर सभी नागरिक सेवायें आधारित होती है| समग्रता में इसे अधिकारियों के आचरण का लेख कहा जा सकता है| नागरिक घोषणापत्र में यह सुनिश्चित किया जाता है कि सार्वजनिक सेवाएँ नागरिक केन्द्रित हों| नागरिक घोषणापत्रों का उद्देश्य नागरिकों एवं प्रशासन के मध्य एक सेतु का निर्माण करना और नागरिकों एवं प्रशासन के सम्बन्ध को सहज बनाते हुए प्रशासन तन्त्र को सरल एवं प्रभावी बनाना होता है| नागरिक अधिकारपत्र शासन को उत्तरदायी एवं पारदर्शी बनाते हैं| ये नवाचार, आधुनिकीकरण तथा प्रशासनिक प्रतिबद्धता के विकास में सहायक होते हैं| इस तरह से ये सुशासन की स्थापना में महत्वपूर्ण हैं किन्तु अनेक बाधाओं के कारण ये नागरिक अधिकारपत्र अप्रभावी होते गए हैं| नागरिक अधिकारपत्रों के क्रियान्वयन में बाधाएं नागरिक अधिकारपत्र संविधान द्वारा समर्थित नहीं हैं, कानूनी समर्थन के अभाव के कारण ये केवल नैतिकता आधारित रह जाते हैं| केवल नैतिक स्वरुप होने के कारण इनमें बाध्यकारिता का अभाव है प्रशासनिक कर्मचारियों में स्वहित पर विशेष बल दिया जाता है प्रशासन में समन्वय एवं सहयोग की भावना में कमी नागरिक अधिकारपत्रों को बिना विमर्श के निर्मित किया जाता है इससे आम सहमति नहीं बन पाती है प्रशासन में सामाजिक पृष्ठभूमि के प्रति जागरूकता का अभाव है अतः डिजाइन किया गया नागरिक अधिकार पत्र प्रायः आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होता है| सामाजिक विविधता एवं संकीर्णताओं के कारण नागरिक अधिकारपत्रों का एकीकृत रूप लागू करने में चुनौतियां सामने आती हैं राजनीतिक मतैक्य का अभाव होने के कारण नागरिक अधिकारपत्रों का क्रियान्वयन उचित रूप से नहीं हो पाता सिटीजन चार्टर के क्रियान्वयन हेतु होने वाले खर्चों के लिए प्रत्येक कार्यालय स्वायत्त नहीं है नागरिक अधिकारपत्रों को प्रभावी बनाने के उपाय नागरिक अधिकार पत्र को सफल बनाने हेतु निम्नांकित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है नागरिक अधिकार पत्र सरकार की पहल शक्ति पर निर्भर करते हैं परन्तु नागरिक अधिकार पत्र नागरिक केन्द्रित है अतः नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों को निर्धारित करते समय नागरिकों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए ताकि नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधान नागरिकों की अपेक्षाओं के अनुरूप हों| यह परामर्श विशेष रूप से प्रभावित समूह के साथ किया जाना चाहिये ताकि चार्टर जन अपेक्षाओं की वास्तविकता पर आधारित हो नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों को सरलीकृत एवं गैर तकनीकी भाषा या शब्दों में प्रस्तुत किया जाना चाहए ताकि नागरिक अधिकार पत्र आम व्यक्तियों की समझ के अनुरूप हो नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में अनुशासन एवं शिष्टाचार जैसे पहलुओं पर भी बल दिया जाना आवश्यक है ताकि नागरिक नागरिक अधिकार पत्र के उपयोग हेतु प्रोत्साहित हो सकें नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में शिकायत निवारण तंत्र का उल्लेख होना चाहिए ताकि इसके अनुपालन को प्रभावी तरीके से सुनिश्चित किया जा सके परिवर्तनशील जन अपेक्षाओं के अनुरूप नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में यथोचित या आवश्यक परिवर्तनों का होना आवश्यक है नागरिक अधिकार पत्र कि सफलता हेतू इसका समुचित एवं व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाना चाहिए और इसका प्रदर्शन या डिस्प्ले ऐसे स्थान पर होना चाहिए जो कि आम व्यक्तियों की पहुँच में हो नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में कीमत के उचित मूल्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए नागरिक अधिकार पत्र को सफल बनाने हेतु एक प्रतिपुष्टि(फीडबैक) के तंत्र की उपस्थिति आवश्यक है ताकि फीडबैक के आधार पर नागरिक अधिकार पत्र को निरंतर रूप से बेहतर बनाया जा सके| उपरोक्त उपायों के माध्यम से सेवाओं की गुणवत्ता में निरंतर सुधार किये जाना चाहिए ताकि नागरिक घोषणापत्रों के माध्यम से सुशासन की स्थापना की जा सके| भारत में नागरिक घोषणापत्रों को प्रभावी बनाने के लिए सेवोत्तम मॉडल, उसके घटकों और घटकों की गुणवत्ता की जांच के लिए कसौटियों का निर्धारण किया गया है|
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##Question:अनेक बाधाओं ने भारत में नागरिक अधिकार पत्रों को अप्रभावी बनाया है किन्तु विभिन्न उपायों से इन्हें प्रभावी बनाया जा सकता है| स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Many obstacles have made the Citizens charter ineffective in India, But they can be made effective by various measures. Explain (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में नागरिक अधिकारपत्रों को परिभाषित करते हुए संक्षेप में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये| 2- प्रथम भाग में नागरिक अधिकारपत्रों को अप्रभावी बनाने वाली बाधाओं को स्पष्ट कीजिये 3- दूसरे भाग में इन्हें प्रभावी बनाने के उपायों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में किये गए प्रयासों को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| नागरिक अधिकार पत्र एक सरकारी संस्था द्वारा नागरिकों के प्रति तय की गयी अपनी प्रतिबद्धताओं का एक ऐसा दस्तावेज है जिसका सम्बन्ध नागरिकों को उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं से होता है| अधिकारपत्र में वे सभी मानदंड उल्लिखित होते हैं जिनपर सभी नागरिक सेवायें आधारित होती है| समग्रता में इसे अधिकारियों के आचरण का लेख कहा जा सकता है| नागरिक घोषणापत्र में यह सुनिश्चित किया जाता है कि सार्वजनिक सेवाएँ नागरिक केन्द्रित हों| नागरिक घोषणापत्रों का उद्देश्य नागरिकों एवं प्रशासन के मध्य एक सेतु का निर्माण करना और नागरिकों एवं प्रशासन के सम्बन्ध को सहज बनाते हुए प्रशासन तन्त्र को सरल एवं प्रभावी बनाना होता है| नागरिक अधिकारपत्र शासन को उत्तरदायी एवं पारदर्शी बनाते हैं| ये नवाचार, आधुनिकीकरण तथा प्रशासनिक प्रतिबद्धता के विकास में सहायक होते हैं| इस तरह से ये सुशासन की स्थापना में महत्वपूर्ण हैं किन्तु अनेक बाधाओं के कारण ये नागरिक अधिकारपत्र अप्रभावी होते गए हैं| नागरिक अधिकारपत्रों के क्रियान्वयन में बाधाएं नागरिक अधिकारपत्र संविधान द्वारा समर्थित नहीं हैं, कानूनी समर्थन के अभाव के कारण ये केवल नैतिकता आधारित रह जाते हैं| केवल नैतिक स्वरुप होने के कारण इनमें बाध्यकारिता का अभाव है प्रशासनिक कर्मचारियों में स्वहित पर विशेष बल दिया जाता है प्रशासन में समन्वय एवं सहयोग की भावना में कमी नागरिक अधिकारपत्रों को बिना विमर्श के निर्मित किया जाता है इससे आम सहमति नहीं बन पाती है प्रशासन में सामाजिक पृष्ठभूमि के प्रति जागरूकता का अभाव है अतः डिजाइन किया गया नागरिक अधिकार पत्र प्रायः आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होता है| सामाजिक विविधता एवं संकीर्णताओं के कारण नागरिक अधिकारपत्रों का एकीकृत रूप लागू करने में चुनौतियां सामने आती हैं राजनीतिक मतैक्य का अभाव होने के कारण नागरिक अधिकारपत्रों का क्रियान्वयन उचित रूप से नहीं हो पाता सिटीजन चार्टर के क्रियान्वयन हेतु होने वाले खर्चों के लिए प्रत्येक कार्यालय स्वायत्त नहीं है नागरिक अधिकारपत्रों को प्रभावी बनाने के उपाय नागरिक अधिकार पत्र को सफल बनाने हेतु निम्नांकित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है नागरिक अधिकार पत्र सरकार की पहल शक्ति पर निर्भर करते हैं परन्तु नागरिक अधिकार पत्र नागरिक केन्द्रित है अतः नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों को निर्धारित करते समय नागरिकों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए ताकि नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधान नागरिकों की अपेक्षाओं के अनुरूप हों| यह परामर्श विशेष रूप से प्रभावित समूह के साथ किया जाना चाहिये ताकि चार्टर जन अपेक्षाओं की वास्तविकता पर आधारित हो नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों को सरलीकृत एवं गैर तकनीकी भाषा या शब्दों में प्रस्तुत किया जाना चाहए ताकि नागरिक अधिकार पत्र आम व्यक्तियों की समझ के अनुरूप हो नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में अनुशासन एवं शिष्टाचार जैसे पहलुओं पर भी बल दिया जाना आवश्यक है ताकि नागरिक नागरिक अधिकार पत्र के उपयोग हेतु प्रोत्साहित हो सकें नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में शिकायत निवारण तंत्र का उल्लेख होना चाहिए ताकि इसके अनुपालन को प्रभावी तरीके से सुनिश्चित किया जा सके परिवर्तनशील जन अपेक्षाओं के अनुरूप नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में यथोचित या आवश्यक परिवर्तनों का होना आवश्यक है नागरिक अधिकार पत्र कि सफलता हेतू इसका समुचित एवं व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाना चाहिए और इसका प्रदर्शन या डिस्प्ले ऐसे स्थान पर होना चाहिए जो कि आम व्यक्तियों की पहुँच में हो नागरिक अधिकार पत्र के प्रावधानों में कीमत के उचित मूल्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए नागरिक अधिकार पत्र को सफल बनाने हेतु एक प्रतिपुष्टि(फीडबैक) के तंत्र की उपस्थिति आवश्यक है ताकि फीडबैक के आधार पर नागरिक अधिकार पत्र को निरंतर रूप से बेहतर बनाया जा सके| उपरोक्त उपायों के माध्यम से सेवाओं की गुणवत्ता में निरंतर सुधार किये जाना चाहिए ताकि नागरिक घोषणापत्रों के माध्यम से सुशासन की स्थापना की जा सके| भारत में नागरिक घोषणापत्रों को प्रभावी बनाने के लिए सेवोत्तम मॉडल, उसके घटकों और घटकों की गुणवत्ता की जांच के लिए कसौटियों का निर्धारण किया गया है|
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Discuss the challenges prevalent in USSR when Gorbachev came to power. Highlight the measures adopted by him to tackle these issues. (150 words/10 Marks)
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Approach:- Give a brief introduction regarding the prevalent political system. Write down the problems during the Gorbachev era. Mention the measures he adopted to tackle these problems. Answer:- The world was divided into two blocs Capitalism and Communism after the 2nd world war and there was intense rivalry amongst both the blocs which led to arms race, space race which incurred huge economic cost. Communism started faltering under this pressure and the technological and socio-economic advances of the west. Problems during Gorbachev Era 1. The soviet system became very bureaucratic and authoritative which made life difficult for the citizens. 2. Lack of democracy and absence of freedom of speech had stifled the masses who were looking for different way to express their views like cartoons and jokes. 3. The one party system had a very tight hold over all the institutions and was unaccountable to the people. 4. The 15 different republics in the Soviet Union had little control over their own affairs including cultural affair. Russia dominated the other Soviets and people from other region felt neglected. 5. While Soviet managed to keep up with US in arms race but its technology was lagging behind that of the west. The cost of invasions like in Afghanistan weakened the system. 6. There were food shortages and food had to be imported which also hurt the pride of the people there. 7. The economy was suffering due to lag in technology and over centralization. There was also shortage of some basic consumer goods. 8. The social indicators like health, education etc. were also behind the capitalist west. Gorbachev introduced the following measures to tackle with these problems 1. Glasnost i.e. openness and transparency in politics, cultural affairs with aim to mobilise public support for the reforms. Popular scrutiny and criticism of leaders was encouraged under it. 2. Perestroika i.e. restructuring. The economy underwent multitudes of changes such as competition amongst PSUs was introduced, new economic management, private businesses were allowed. All this led to semi-free market system in the Soviet. 3. Under perestroika political reforms like democracy within local soviets, democracy in factories i.e. election in factories for management posts were held. 4. Gorbachev also withdrew troops from Afghanistan. 5. The military expenditure was curbed and treaties were signed with the western countries like Paris treaty of 1990, START 1 treaty reduction and limitation of strategic offensive arms. The reform during the Gorbachev era faced opposition from both sides- those who wanted reforms but were dissatisfied with the pace of reforms and those who wanted the strict one party communist regime to continue. Ultimately all this led to disintegration of USSR and with it ended the cold war.
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##Question:Discuss the challenges prevalent in USSR when Gorbachev came to power. Highlight the measures adopted by him to tackle these issues. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach:- Give a brief introduction regarding the prevalent political system. Write down the problems during the Gorbachev era. Mention the measures he adopted to tackle these problems. Answer:- The world was divided into two blocs Capitalism and Communism after the 2nd world war and there was intense rivalry amongst both the blocs which led to arms race, space race which incurred huge economic cost. Communism started faltering under this pressure and the technological and socio-economic advances of the west. Problems during Gorbachev Era 1. The soviet system became very bureaucratic and authoritative which made life difficult for the citizens. 2. Lack of democracy and absence of freedom of speech had stifled the masses who were looking for different way to express their views like cartoons and jokes. 3. The one party system had a very tight hold over all the institutions and was unaccountable to the people. 4. The 15 different republics in the Soviet Union had little control over their own affairs including cultural affair. Russia dominated the other Soviets and people from other region felt neglected. 5. While Soviet managed to keep up with US in arms race but its technology was lagging behind that of the west. The cost of invasions like in Afghanistan weakened the system. 6. There were food shortages and food had to be imported which also hurt the pride of the people there. 7. The economy was suffering due to lag in technology and over centralization. There was also shortage of some basic consumer goods. 8. The social indicators like health, education etc. were also behind the capitalist west. Gorbachev introduced the following measures to tackle with these problems 1. Glasnost i.e. openness and transparency in politics, cultural affairs with aim to mobilise public support for the reforms. Popular scrutiny and criticism of leaders was encouraged under it. 2. Perestroika i.e. restructuring. The economy underwent multitudes of changes such as competition amongst PSUs was introduced, new economic management, private businesses were allowed. All this led to semi-free market system in the Soviet. 3. Under perestroika political reforms like democracy within local soviets, democracy in factories i.e. election in factories for management posts were held. 4. Gorbachev also withdrew troops from Afghanistan. 5. The military expenditure was curbed and treaties were signed with the western countries like Paris treaty of 1990, START 1 treaty reduction and limitation of strategic offensive arms. The reform during the Gorbachev era faced opposition from both sides- those who wanted reforms but were dissatisfied with the pace of reforms and those who wanted the strict one party communist regime to continue. Ultimately all this led to disintegration of USSR and with it ended the cold war.
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एप्रोच - उत्तर की शरुआत प्रबोधन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रबोधन के आर्थिक पक्षों या विचारों को बताइए | अंत में एडम स्मिथ के आर्थिक विचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रबोधन - पुनर्जागरण काल में विकसित हुई वैज्ञानिक चेतना ने तर्क और आलोचनात्मक दृष्टिकोण की प्रवृत्ति ने परिपक्वता प्राप्त कर कर ली | प्रबोधन काल की विशेषताओं ने विज्ञानवाद, तर्कवाद, प्रगतिवाद, दैववाद, सुखवाद ,आदि भौतिकवादी मान्यताओं को अपनाया | भौतिकवादी मान्यताओं में प्रबोधन काल के आर्थिक विचार भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जिनमे फीजियोक्रेट्स, एडम स्मिथ तथा रिकार्डो का प्रमुख स्थान है | आर्थिक विचार या पक्ष फीजियोक्रेट्स -इस शब्द का प्रयोग फ़्रांसिसी अर्थशास्त्रियों के लिए किया गया | जिन्होंने वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया | उन्होंने पहली बार मुक्त व्यापार की बात की | फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री मानते हैं कि राष्ट्रों की संपत्ति पूरी तरह से भूमि कृषि या भूमि विकास के मूल्य से ली गयी थी और कृषि उत्पादों की अत्यधिक कीमत होनी चाहिए | उनके सिद्धांत फ़्रांस में पैदा हुए और 18 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध के दौरान सबसे लोकप्रिय थे | फीजियोक्रेट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उत्पादक कार्य पर राष्ट्रीय धन के स्रोत के रूप में था | अर्थात राष्ट्रीय धन का उपयोग उत्पादन कार्यों में किया जाना चाहिए | एडम स्मिथ - एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के पिता के रूप में जाना जाता है | एडम स्मिथ की पुस्तक - वेल्थ ऑफ नेशंस में मुक्त व्यापार का समर्थन करते हुए वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया गया |इसने औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी व्यवस्था को आधार प्रदान किया | एडम स्मिथ के विचारों की प्रासंगिकता सोवियत संघ के विघटन के बाद और बढ़ी, आदि | एडम स्मिथ की कुछ प्रमुख मान्यताएं - श्रम ही मूल्य का उत्पादक है | इसके साथ ही एडम स्मिथ ने उत्पादन के तीन घटकों पूँजी स्टाक, श्रमशक्ति एवं भूमि को महत्वपूर्ण माना | उत्पादन के साधनों में श्रम का विशेष महत्व है, जो देश के वार्षिक उपभोग हेतु विविध वस्तु व सेवाओं का उत्पादन करता है | श्रम की उत्पादकता श्रम विभाजन से बढ़ाई जा सकती है, जिससे विशिष्टता का विकास होता है | मुक्त व्यापार की नीति तथा स्वस्थ प्रतियोगिता की बात सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने की | आर्थिक विकास की प्रक्रिया में एडम स्मिथ बचत व पूँजी संचय को आवश्यक मानते थे | आर्थिक व्यक्तिवाद - इसका सम्बन्ध न सिर्फ संपत्ति के अधिकार से है बल्कि उद्यम की स्वतंत्रता से भी है | एडम स्मिथ के बाद डेविड रिकार्डो का नाम उल्लेखनीय है, जिसे एडम स्मिथ के विचारों को परिष्कृत करने का श्रेय दिया जाता है |रिकार्डो के सिद्धांत के तहत विभिन्न मान्यताएं उभर कर सामने आती हैं जिनमे -लगान का सिद्धांत, तुलनात्मक लाभ, सीमान्त उपयोगिता का सिद्धांत, ह्रासमान का सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रबोधन की मान्यताओं या विचारों में आर्थिक पक्ष अपना प्रमुख स्थान रखता है - जिसका प्रभाव आज तक जारी है |
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##Question: ##Answer:एप्रोच - उत्तर की शरुआत प्रबोधन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रबोधन के आर्थिक पक्षों या विचारों को बताइए | अंत में एडम स्मिथ के आर्थिक विचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रबोधन - पुनर्जागरण काल में विकसित हुई वैज्ञानिक चेतना ने तर्क और आलोचनात्मक दृष्टिकोण की प्रवृत्ति ने परिपक्वता प्राप्त कर कर ली | प्रबोधन काल की विशेषताओं ने विज्ञानवाद, तर्कवाद, प्रगतिवाद, दैववाद, सुखवाद ,आदि भौतिकवादी मान्यताओं को अपनाया | भौतिकवादी मान्यताओं में प्रबोधन काल के आर्थिक विचार भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जिनमे फीजियोक्रेट्स, एडम स्मिथ तथा रिकार्डो का प्रमुख स्थान है | आर्थिक विचार या पक्ष फीजियोक्रेट्स -इस शब्द का प्रयोग फ़्रांसिसी अर्थशास्त्रियों के लिए किया गया | जिन्होंने वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया | उन्होंने पहली बार मुक्त व्यापार की बात की | फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री मानते हैं कि राष्ट्रों की संपत्ति पूरी तरह से भूमि कृषि या भूमि विकास के मूल्य से ली गयी थी और कृषि उत्पादों की अत्यधिक कीमत होनी चाहिए | उनके सिद्धांत फ़्रांस में पैदा हुए और 18 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध के दौरान सबसे लोकप्रिय थे | फीजियोक्रेट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उत्पादक कार्य पर राष्ट्रीय धन के स्रोत के रूप में था | अर्थात राष्ट्रीय धन का उपयोग उत्पादन कार्यों में किया जाना चाहिए | एडम स्मिथ - एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के पिता के रूप में जाना जाता है | एडम स्मिथ की पुस्तक - वेल्थ ऑफ नेशंस में मुक्त व्यापार का समर्थन करते हुए वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया गया |इसने औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी व्यवस्था को आधार प्रदान किया | एडम स्मिथ के विचारों की प्रासंगिकता सोवियत संघ के विघटन के बाद और बढ़ी, आदि | एडम स्मिथ की कुछ प्रमुख मान्यताएं - श्रम ही मूल्य का उत्पादक है | इसके साथ ही एडम स्मिथ ने उत्पादन के तीन घटकों पूँजी स्टाक, श्रमशक्ति एवं भूमि को महत्वपूर्ण माना | उत्पादन के साधनों में श्रम का विशेष महत्व है, जो देश के वार्षिक उपभोग हेतु विविध वस्तु व सेवाओं का उत्पादन करता है | श्रम की उत्पादकता श्रम विभाजन से बढ़ाई जा सकती है, जिससे विशिष्टता का विकास होता है | मुक्त व्यापार की नीति तथा स्वस्थ प्रतियोगिता की बात सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने की | आर्थिक विकास की प्रक्रिया में एडम स्मिथ बचत व पूँजी संचय को आवश्यक मानते थे | आर्थिक व्यक्तिवाद - इसका सम्बन्ध न सिर्फ संपत्ति के अधिकार से है बल्कि उद्यम की स्वतंत्रता से भी है | एडम स्मिथ के बाद डेविड रिकार्डो का नाम उल्लेखनीय है, जिसे एडम स्मिथ के विचारों को परिष्कृत करने का श्रेय दिया जाता है |रिकार्डो के सिद्धांत के तहत विभिन्न मान्यताएं उभर कर सामने आती हैं जिनमे -लगान का सिद्धांत, तुलनात्मक लाभ, सीमान्त उपयोगिता का सिद्धांत, ह्रासमान का सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रबोधन की मान्यताओं या विचारों में आर्थिक पक्ष अपना प्रमुख स्थान रखता है - जिसका प्रभाव आज तक जारी है |
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While discussing the economic aspects of the Enlightenment, also discuss the principles of Adam Smith. (150 Words/ 10 marks)
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एप्रोच - उत्तर की शरुआत प्रबोधन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रबोधन के आर्थिक पक्षों या विचारों को बताइए | अंत में एडम स्मिथ के आर्थिक विचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रबोधन -पुनर्जागरण काल में विकसित हुई वैज्ञानिक चेतना ने तर्क और आलोचनात्मक दृष्टिकोण की प्रवृत्ति ने परिपक्वता प्राप्त कर कर ली | प्रबोधन काल की विशेषताओं ने विज्ञानवाद, तर्कवाद, प्रगतिवाद, दैववाद, सुखवाद ,आदि भौतिकवादी मान्यताओं को अपनाया | भौतिकवादी मान्यताओं में प्रबोधन काल के आर्थिक विचार भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जिनमे फीजियोक्रेट्स, एडम स्मिथ तथा रिकार्डो का प्रमुख स्थान है | आर्थिक विचार या पक्ष फीजियोक्रेट्स -इस शब्द का प्रयोग फ़्रांसिसी अर्थशास्त्रियों के लिए किया गया | जिन्होंने वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया | उन्होंने पहली बार मुक्त व्यापार की बात की | फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री मानते हैं कि राष्ट्रों की संपत्ति पूरी तरह से भूमि कृषि या भूमि विकास के मूल्य से ली गयी थी और कृषि उत्पादों की अत्यधिक कीमत होनी चाहिए | उनके सिद्धांत फ़्रांस में पैदा हुए और 18 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध के दौरान सबसे लोकप्रिय थे | फीजियोक्रेट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उत्पादक कार्य पर राष्ट्रीय धन के स्रोत के रूप में था | अर्थात राष्ट्रीय धन का उपयोग उत्पादन कार्यों में किया जाना चाहिए | एडम स्मिथ -एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के पिता के रूप में जाना जाता है | एडम स्मिथ की पुस्तक -वेल्थ ऑफ नेशंसमें मुक्त व्यापार का समर्थन करते हुए वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया गया |इसने औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी व्यवस्था को आधार प्रदान किया | एडम स्मिथ के विचारों की प्रासंगिकता सोवियत संघ के विघटन के बाद और बढ़ी, आदि | एडम स्मिथ की कुछ प्रमुख मान्यताएं - श्रम ही मूल्य का उत्पादक है | इसके साथ ही एडम स्मिथ ने उत्पादन के तीन घटकों पूँजी स्टाक, श्रमशक्ति एवं भूमि को महत्वपूर्ण माना | उत्पादन के साधनों में श्रम का विशेष महत्व है, जो देश के वार्षिक उपभोग हेतु विविध वस्तु व सेवाओं का उत्पादन करता है | श्रम की उत्पादकता श्रम विभाजन से बढ़ाई जा सकती है, जिससे विशिष्टता का विकास होता है | मुक्त व्यापार की नीति तथा स्वस्थ प्रतियोगिता की बात सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने की | आर्थिक विकास की प्रक्रिया में एडम स्मिथ बचत व पूँजी संचय को आवश्यक मानते थे | आर्थिक व्यक्तिवाद - इसका सम्बन्ध न सिर्फ संपत्ति के अधिकार से है बल्कि उद्यम की स्वतंत्रता से भी है | एडम स्मिथ के बाद डेविड रिकार्डो का नाम उल्लेखनीय है, जिसे एडम स्मिथ के विचारों को परिष्कृत करने का श्रेय दिया जाता है |रिकार्डो के सिद्धांत के तहत विभिन्न मान्यताएं उभर कर सामने आती हैं जिनमे -लगान का सिद्धांत, तुलनात्मक लाभ, सीमान्त उपयोगिता का सिद्धांत, ह्रासमान का सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रबोधन की मान्यताओं या विचारों में आर्थिक पक्ष अपना प्रमुख स्थान रखता है - जिसका प्रभाव आज तक जारी है |
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##Question:While discussing the economic aspects of the Enlightenment, also discuss the principles of Adam Smith. (150 Words/ 10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शरुआत प्रबोधन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात प्रबोधन के आर्थिक पक्षों या विचारों को बताइए | अंत में एडम स्मिथ के आर्थिक विचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - प्रबोधन -पुनर्जागरण काल में विकसित हुई वैज्ञानिक चेतना ने तर्क और आलोचनात्मक दृष्टिकोण की प्रवृत्ति ने परिपक्वता प्राप्त कर कर ली | प्रबोधन काल की विशेषताओं ने विज्ञानवाद, तर्कवाद, प्रगतिवाद, दैववाद, सुखवाद ,आदि भौतिकवादी मान्यताओं को अपनाया | भौतिकवादी मान्यताओं में प्रबोधन काल के आर्थिक विचार भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, जिनमे फीजियोक्रेट्स, एडम स्मिथ तथा रिकार्डो का प्रमुख स्थान है | आर्थिक विचार या पक्ष फीजियोक्रेट्स -इस शब्द का प्रयोग फ़्रांसिसी अर्थशास्त्रियों के लिए किया गया | जिन्होंने वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया | उन्होंने पहली बार मुक्त व्यापार की बात की | फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री मानते हैं कि राष्ट्रों की संपत्ति पूरी तरह से भूमि कृषि या भूमि विकास के मूल्य से ली गयी थी और कृषि उत्पादों की अत्यधिक कीमत होनी चाहिए | उनके सिद्धांत फ़्रांस में पैदा हुए और 18 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध के दौरान सबसे लोकप्रिय थे | फीजियोक्रेट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उत्पादक कार्य पर राष्ट्रीय धन के स्रोत के रूप में था | अर्थात राष्ट्रीय धन का उपयोग उत्पादन कार्यों में किया जाना चाहिए | एडम स्मिथ -एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के पिता के रूप में जाना जाता है | एडम स्मिथ की पुस्तक -वेल्थ ऑफ नेशंसमें मुक्त व्यापार का समर्थन करते हुए वाणिज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया गया |इसने औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी व्यवस्था को आधार प्रदान किया | एडम स्मिथ के विचारों की प्रासंगिकता सोवियत संघ के विघटन के बाद और बढ़ी, आदि | एडम स्मिथ की कुछ प्रमुख मान्यताएं - श्रम ही मूल्य का उत्पादक है | इसके साथ ही एडम स्मिथ ने उत्पादन के तीन घटकों पूँजी स्टाक, श्रमशक्ति एवं भूमि को महत्वपूर्ण माना | उत्पादन के साधनों में श्रम का विशेष महत्व है, जो देश के वार्षिक उपभोग हेतु विविध वस्तु व सेवाओं का उत्पादन करता है | श्रम की उत्पादकता श्रम विभाजन से बढ़ाई जा सकती है, जिससे विशिष्टता का विकास होता है | मुक्त व्यापार की नीति तथा स्वस्थ प्रतियोगिता की बात सर्वप्रथम एडम स्मिथ ने की | आर्थिक विकास की प्रक्रिया में एडम स्मिथ बचत व पूँजी संचय को आवश्यक मानते थे | आर्थिक व्यक्तिवाद - इसका सम्बन्ध न सिर्फ संपत्ति के अधिकार से है बल्कि उद्यम की स्वतंत्रता से भी है | एडम स्मिथ के बाद डेविड रिकार्डो का नाम उल्लेखनीय है, जिसे एडम स्मिथ के विचारों को परिष्कृत करने का श्रेय दिया जाता है |रिकार्डो के सिद्धांत के तहत विभिन्न मान्यताएं उभर कर सामने आती हैं जिनमे -लगान का सिद्धांत, तुलनात्मक लाभ, सीमान्त उपयोगिता का सिद्धांत, ह्रासमान का सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रबोधन की मान्यताओं या विचारों में आर्थिक पक्ष अपना प्रमुख स्थान रखता है - जिसका प्रभाव आज तक जारी है |
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आज़ादी के बाद सरकार द्वारा ग्रामीण समाज के विकास हेतु चलाये गए कार्यक्रमों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए। (150-200 words) After independence, briefly discuss the programs undertaken by the government for the development of rural society. (150-200 words)
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दृष्टिकोण: भूमिका में भारत के ग्रामीण समाज से संबन्धित किसी आंकडे या तथ्यों को प्रस्तुत कीजिए। स्वतन्त्रता पश्चात ग्रामीण विकास की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को बताईए। संक्षेप में यह भी बताईए कि ये कार्यक्रमों क्यों असफल रह गए । निष्कर्ष में सुधारो को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए । जनगणना 2011 के अनुसार भारत की 68.85%जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इतनी बड़ी जनसख्या के विकास का तात्पर्य उनके सामाजिक बदलाओं के साथ उनको आर्थिक रूप से मजबूत बनाना भी है।बेरोजगारी के साथ साथ बिजली ,बेहतर अवसंरचना, शिक्षा, स्वस्थ्य,परिवहन आदि का अभाव ग्रामीण भारत की प्रमुख समस्या हैं। स्वतन्त्रता पश्चात ग्रामीण विकास हेतु उठाए गए कदम- जनसहभागिता के मध्यम से ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन देने हेतु 1952 में “सामुदायिक विकास कार्यक्रम” प्रारम्भ किया गया। ग्रामीण भारत के पुनर्निर्माण हेतु 1953 में “राष्ट्रीय विस्तार सेवा” प्रारम्भ किया गया। हरित क्रांति के बाद सरकार नें 1977 में ग्रामीण गरीबो को राहत देने के लिए “काम के बदले अनाज” योजना लागू की । गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाली लोगो के लिए 1985 में आवास सुविधा हेतु इन्दिरा आवास कार्यक्रम शुरू किया गया।" ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा सभी ग्रामीण क्षेत्रो में स्वच्छ पेयजल सुविधा प्रदान करने हेतु 1972 में “राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम” शुरू किया गया। रोजगार में सहायता देने तथा गरीबी निवारण हेतु 1999 में “स्वर्णजयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना” प्रारम्भ किया गया। एक व्यवस्थित सड़क अवसंरचना ढांचे के निर्माण हेतु 2000 में “प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना” लागू किया गया। केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम 1986 में शुरू किया गया । इसका उद्देश्य ग्रामीण जीवन की दशा में सुधार करना और ग्रामीण क्षेत्रो में महिलाओं को एकांत तथा सम्मान प्रदान करना । ग्रामीण क्षेत्रो में जीवीकोपार्जन सुनिश्चित करने हेतु 2005 में “मनरेगा” को लाया गया। इसके अलावा आजीविका, स्वजल धारा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना, सर्व शिक्षा अभियान आदि कई अन्य योजनाएँ चलायी गई । इन योजनाओं की असफलता के कारण – ग्रामीण लोगो में फैली अशिक्षा नें योजनाओ के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न किया।लोगो को योजनाओं की सही जानकारी नही मिलने से वे योजनाओं यीजनाओं का लाभ नही उठा सके। जनसंख्या की अधिकता ने भी ग्रामीण विकास में बाधा उत्पन्न किया । सरकारी कर्मचारियों में व्याप्त अयोग्यता के कारण भी वे ग्रामीण समस्याओं से पूरी तरह अवगत नही हो सके जिसके कारण वो कार्यक्रमों को सही तरीके से लागू नही करवा सके । इन योजनाओं में संसाधनो के पुनर्विवितरण का भी अभाव था। प्रशासनिक तटस्थता ने योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन में समस्या उत्पन्न किया। कार्यक्रमों की जटिलता तथा प्रशासनिक अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार भी योजनाओ की असफलता का एक मुख्य कारण रही। निष्कर्षतः हम कह सकतें हैं कि स्वतंत्र के बाद से ही विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओ के माध्यम से ग्रामीण विकास हेतु कई कार्यक्रम चलाये गए पर उचित निगरानी का अभाव एवं सीमित संसाधनो ने इनके प्रभावों को सीमित कर दिया इन्ही सभी बातों को ध्यान में रखकर सरकार वर्तमान में RTI, ई-गवर्नेंस, सम्पदा योजना, PURA की संकल्पना आदि नए माध्यमों द्वारा ग्रामीण विकास को गति दे रही है।
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##Question:आज़ादी के बाद सरकार द्वारा ग्रामीण समाज के विकास हेतु चलाये गए कार्यक्रमों पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए। (150-200 words) After independence, briefly discuss the programs undertaken by the government for the development of rural society. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में भारत के ग्रामीण समाज से संबन्धित किसी आंकडे या तथ्यों को प्रस्तुत कीजिए। स्वतन्त्रता पश्चात ग्रामीण विकास की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को बताईए। संक्षेप में यह भी बताईए कि ये कार्यक्रमों क्यों असफल रह गए । निष्कर्ष में सुधारो को बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिए । जनगणना 2011 के अनुसार भारत की 68.85%जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इतनी बड़ी जनसख्या के विकास का तात्पर्य उनके सामाजिक बदलाओं के साथ उनको आर्थिक रूप से मजबूत बनाना भी है।बेरोजगारी के साथ साथ बिजली ,बेहतर अवसंरचना, शिक्षा, स्वस्थ्य,परिवहन आदि का अभाव ग्रामीण भारत की प्रमुख समस्या हैं। स्वतन्त्रता पश्चात ग्रामीण विकास हेतु उठाए गए कदम- जनसहभागिता के मध्यम से ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन देने हेतु 1952 में “सामुदायिक विकास कार्यक्रम” प्रारम्भ किया गया। ग्रामीण भारत के पुनर्निर्माण हेतु 1953 में “राष्ट्रीय विस्तार सेवा” प्रारम्भ किया गया। हरित क्रांति के बाद सरकार नें 1977 में ग्रामीण गरीबो को राहत देने के लिए “काम के बदले अनाज” योजना लागू की । गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाली लोगो के लिए 1985 में आवास सुविधा हेतु इन्दिरा आवास कार्यक्रम शुरू किया गया।" ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा सभी ग्रामीण क्षेत्रो में स्वच्छ पेयजल सुविधा प्रदान करने हेतु 1972 में “राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम” शुरू किया गया। रोजगार में सहायता देने तथा गरीबी निवारण हेतु 1999 में “स्वर्णजयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना” प्रारम्भ किया गया। एक व्यवस्थित सड़क अवसंरचना ढांचे के निर्माण हेतु 2000 में “प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना” लागू किया गया। केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम 1986 में शुरू किया गया । इसका उद्देश्य ग्रामीण जीवन की दशा में सुधार करना और ग्रामीण क्षेत्रो में महिलाओं को एकांत तथा सम्मान प्रदान करना । ग्रामीण क्षेत्रो में जीवीकोपार्जन सुनिश्चित करने हेतु 2005 में “मनरेगा” को लाया गया। इसके अलावा आजीविका, स्वजल धारा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना, सर्व शिक्षा अभियान आदि कई अन्य योजनाएँ चलायी गई । इन योजनाओं की असफलता के कारण – ग्रामीण लोगो में फैली अशिक्षा नें योजनाओ के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न किया।लोगो को योजनाओं की सही जानकारी नही मिलने से वे योजनाओं यीजनाओं का लाभ नही उठा सके। जनसंख्या की अधिकता ने भी ग्रामीण विकास में बाधा उत्पन्न किया । सरकारी कर्मचारियों में व्याप्त अयोग्यता के कारण भी वे ग्रामीण समस्याओं से पूरी तरह अवगत नही हो सके जिसके कारण वो कार्यक्रमों को सही तरीके से लागू नही करवा सके । इन योजनाओं में संसाधनो के पुनर्विवितरण का भी अभाव था। प्रशासनिक तटस्थता ने योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन में समस्या उत्पन्न किया। कार्यक्रमों की जटिलता तथा प्रशासनिक अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार भी योजनाओ की असफलता का एक मुख्य कारण रही। निष्कर्षतः हम कह सकतें हैं कि स्वतंत्र के बाद से ही विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओ के माध्यम से ग्रामीण विकास हेतु कई कार्यक्रम चलाये गए पर उचित निगरानी का अभाव एवं सीमित संसाधनो ने इनके प्रभावों को सीमित कर दिया इन्ही सभी बातों को ध्यान में रखकर सरकार वर्तमान में RTI, ई-गवर्नेंस, सम्पदा योजना, PURA की संकल्पना आदि नए माध्यमों द्वारा ग्रामीण विकास को गति दे रही है।
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द्वीप समूहों के निर्माण प्रक्रियाको समझने में प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत का महत्त्व स्पष्ट कीजिये। (150 -200 शब्द ) Explain the importance of plate tectonic theory in understanding the formation process of islands. (150 -200 words)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण प्लेट विवर्तनिकी का परिचय देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। द्वीप निर्माण प्रक्रिया को समझाने के लिए महासागरीय-महासागरीय प्लेट अभिसरण पर चर्चा कीजिए। उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त एक एकीकृत अवधारणा है जो एक साथ सागर नितल प्रसरण, महाद्वीप्य विस्थापन, क्रस्ट की संरचनाओं और विश्व में ज्वालामुखी गतिविधियों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती है। विवर्तनिकी प्लेटें स्वतंत्र रूप से दुर्बलतामंडल पर उत्प्लावित हैं और क्षैतिज अवस्था में गतिमान हैं। प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में अधिक घनत्व वाली प्लेट कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपति हो जाती है। इसके अंतर्गत महासागरीय-महाद्वीपीय, महाद्वीपीय-महाद्वीपीय तथा महासागरीय- महासागरीय प्लेटों का अभिसरण शामिल है। इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी स्थलमंडल सात मुख्य और कुछ गौण प्लेटों में विभाजित है। मुख्य प्लेटें जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट, प्रशांत प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, यूरेशियन प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट। प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त के द्वारा द्वीप निर्माण की प्रक्रिया की व्याख्या महासागरीय-महासागरीय प्लेटों के अभिसरण द्वारा किया जाता है। जो इस प्रकार है: जब दोनों प्लेटें टकराती हैं तो अधिक घनत्व वाली प्लेट का कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है। जब ये प्लेटें गहराई में प्रवेश करती हैं, तो अत्यधिक ताप के कारण पिघलने लगती हैं और पिघला हुआ मैग्मा ज्वालामुखीय चट्टानों के रूप में ऊपर उठने लगता है। उत्पन्न संपीडन द्वारा द्वीप चापों पर पर्वतों का निर्माण होता है। द्वीप चाप मुख्यत: प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे तथा हिंद महासागर के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर विशेष रूप से पाए जाते हैं। ये द्वीपीय तोरण इस प्रकार प्रतीत होते हैं कि समुद्र के नितल से पर्वत की चोटी निकली हुई है। प्रत्येक चापों के किनारों पर गहरे महासागरीय गर्त पाये जाते हैं। क्षेपित प्लेट के पिघलने से ज्वालामुखी क्रियाएँ घटित होती हैं। इस स्थिति में ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है। प्रमुख उदाहरण है- जापान का द्वीपीय चाप, कुरील, एलूशियन द्वीप, फिलीपींस द्वीप, सुंडा आर्क
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##Question:द्वीप समूहों के निर्माण प्रक्रियाको समझने में प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत का महत्त्व स्पष्ट कीजिये। (150 -200 शब्द ) Explain the importance of plate tectonic theory in understanding the formation process of islands. (150 -200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण प्लेट विवर्तनिकी का परिचय देते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। द्वीप निर्माण प्रक्रिया को समझाने के लिए महासागरीय-महासागरीय प्लेट अभिसरण पर चर्चा कीजिए। उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त एक एकीकृत अवधारणा है जो एक साथ सागर नितल प्रसरण, महाद्वीप्य विस्थापन, क्रस्ट की संरचनाओं और विश्व में ज्वालामुखी गतिविधियों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती है। विवर्तनिकी प्लेटें स्वतंत्र रूप से दुर्बलतामंडल पर उत्प्लावित हैं और क्षैतिज अवस्था में गतिमान हैं। प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में अधिक घनत्व वाली प्लेट कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपति हो जाती है। इसके अंतर्गत महासागरीय-महाद्वीपीय, महाद्वीपीय-महाद्वीपीय तथा महासागरीय- महासागरीय प्लेटों का अभिसरण शामिल है। इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी स्थलमंडल सात मुख्य और कुछ गौण प्लेटों में विभाजित है। मुख्य प्लेटें जैसे- उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट, प्रशांत प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, यूरेशियन प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट। प्लेट टेक्टोनिक सिद्धान्त के द्वारा द्वीप निर्माण की प्रक्रिया की व्याख्या महासागरीय-महासागरीय प्लेटों के अभिसरण द्वारा किया जाता है। जो इस प्रकार है: जब दोनों प्लेटें टकराती हैं तो अधिक घनत्व वाली प्लेट का कम घनत्व वाली प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है। जब ये प्लेटें गहराई में प्रवेश करती हैं, तो अत्यधिक ताप के कारण पिघलने लगती हैं और पिघला हुआ मैग्मा ज्वालामुखीय चट्टानों के रूप में ऊपर उठने लगता है। उत्पन्न संपीडन द्वारा द्वीप चापों पर पर्वतों का निर्माण होता है। द्वीप चाप मुख्यत: प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे तथा हिंद महासागर के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर विशेष रूप से पाए जाते हैं। ये द्वीपीय तोरण इस प्रकार प्रतीत होते हैं कि समुद्र के नितल से पर्वत की चोटी निकली हुई है। प्रत्येक चापों के किनारों पर गहरे महासागरीय गर्त पाये जाते हैं। क्षेपित प्लेट के पिघलने से ज्वालामुखी क्रियाएँ घटित होती हैं। इस स्थिति में ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है। प्रमुख उदाहरण है- जापान का द्वीपीय चाप, कुरील, एलूशियन द्वीप, फिलीपींस द्वीप, सुंडा आर्क
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अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए ,अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explaining the economic reasons for the American Revolution, also dicuss the importance of the seven-year war in the American freedom struggle.
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी क्रांति का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में अमेरिकी क्रांति में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- अमेरिकी क्रांति - ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध , अमेरिकी लोगो का विरोध अमेरिकी क्रांति के रूप में फलित हुआ , जिसकी शुरुवात 1783 से पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1783 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया ।जो आधुनिक विश्व निर्माण के एक युगांतकारी घटना थी । जिसने विश्व के अन्य देशो को आधुनिक राष्ट्र निर्माण और लोकतन्त्र के मूल्यों से परिचित करवाया । हालांकि इस क्रांति के पीछे अनेक कारणो का योगदान है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है - आर्थिक कारण - 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । अमेरिका से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण तथा कपास, तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा । अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | उपनिवेशों के आयत-निर्यात या व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध | कुछ वस्तुओं का आयात सिर्फ ब्रिटेन से तथा कुछ वस्तुओं का निर्यात सिर्फ ब्रिटेन को किया जा सकता है | उपनिवेशों में उन वस्तुओं के निर्माण पर प्रतिबन्ध जिसके उत्पादन में इंग्लैण्ड की प्रधानता थी , जैसे- सूती वस्त्र इत्यादि | जहाजरानी अधिनियमों के माध्यम से उपनिवेशों के व्यापारिक गतिविधियों पर ब्रिटिश जहाज़ों का एकाधिकार | उपनिवेशों में आयात की जाने वाली वस्तुओं पर इंग्लैण्ड में शुल्क वसूली | दोषपूर्ण कर प्रणाली , आदि | सप्त वर्षीय युद्ध की भूमिका या महत्व इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | इस युद्ध ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था | सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया | कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट, शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। 1765 में मेसाचुसेट में 13 बस्तियों (उपनिवेशी राज्य ) की एक सभा जिसमे मांग की गई कि " प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। सप्तवर्षीय युद्ध ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध संघर्ष में फ़्रांस की सहायता सुनिश्चित की | जिसके बिना तत्कालीन परिस्थितयों में अमेरिकी स्वतंत्रता संघर्ष की सफलता संदिग्ध मानी जाती है | इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिकी क्रांति के घटित होने में आर्थिक व दोषपूर्ण कर प्रणाली तथा सप्तवर्षीय युद्ध अपना प्रमुख स्थान रखता है |
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##Question:अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए ,अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explaining the economic reasons for the American Revolution, also dicuss the importance of the seven-year war in the American freedom struggle.##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी क्रांति का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में अमेरिकी क्रांति में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- अमेरिकी क्रांति - ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध , अमेरिकी लोगो का विरोध अमेरिकी क्रांति के रूप में फलित हुआ , जिसकी शुरुवात 1783 से पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1783 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया ।जो आधुनिक विश्व निर्माण के एक युगांतकारी घटना थी । जिसने विश्व के अन्य देशो को आधुनिक राष्ट्र निर्माण और लोकतन्त्र के मूल्यों से परिचित करवाया । हालांकि इस क्रांति के पीछे अनेक कारणो का योगदान है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है - आर्थिक कारण - 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । अमेरिका से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण तथा कपास, तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा । अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | उपनिवेशों के आयत-निर्यात या व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध | कुछ वस्तुओं का आयात सिर्फ ब्रिटेन से तथा कुछ वस्तुओं का निर्यात सिर्फ ब्रिटेन को किया जा सकता है | उपनिवेशों में उन वस्तुओं के निर्माण पर प्रतिबन्ध जिसके उत्पादन में इंग्लैण्ड की प्रधानता थी , जैसे- सूती वस्त्र इत्यादि | जहाजरानी अधिनियमों के माध्यम से उपनिवेशों के व्यापारिक गतिविधियों पर ब्रिटिश जहाज़ों का एकाधिकार | उपनिवेशों में आयात की जाने वाली वस्तुओं पर इंग्लैण्ड में शुल्क वसूली | दोषपूर्ण कर प्रणाली , आदि | सप्त वर्षीय युद्ध की भूमिका या महत्व इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | इस युद्ध ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था | सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया | कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट, शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। 1765 में मेसाचुसेट में 13 बस्तियों (उपनिवेशी राज्य ) की एक सभा जिसमे मांग की गई कि " प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। सप्तवर्षीय युद्ध ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध संघर्ष में फ़्रांस की सहायता सुनिश्चित की | जिसके बिना तत्कालीन परिस्थितयों में अमेरिकी स्वतंत्रता संघर्ष की सफलता संदिग्ध मानी जाती है | इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिकी क्रांति के घटित होने में आर्थिक व दोषपूर्ण कर प्रणाली तथा सप्तवर्षीय युद्ध अपना प्रमुख स्थान रखता है |
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अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए ,अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explaining the economic reasons for the American Revolution, also dicuss the importance of the seven-year war in the American freedom struggle.
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी क्रांति का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में अमेरिकी क्रांति में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- अमेरिकी क्रांति - ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध , अमेरिकी लोगो का विरोध अमेरिकी क्रांति के रूप में फलित हुआ , जिसकी शुरुवात 1783 से पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1783 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया ।जो आधुनिक विश्व निर्माण के एक युगांतकारी घटना थी । जिसने विश्व के अन्य देशो को आधुनिक राष्ट्र निर्माण और लोकतन्त्र के मूल्यों से परिचित करवाया । हालांकि इस क्रांति के पीछे अनेक कारणो का योगदान है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है - आर्थिक कारण - 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । अमेरिका से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण तथा कपास, तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा । अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | उपनिवेशों के आयत-निर्यात या व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध | कुछ वस्तुओं का आयात सिर्फ ब्रिटेन से तथा कुछ वस्तुओं का निर्यात सिर्फ ब्रिटेन को किया जा सकता है | उपनिवेशों में उन वस्तुओं के निर्माण पर प्रतिबन्ध जिसके उत्पादन में इंग्लैण्ड की प्रधानता थी , जैसे- सूती वस्त्र इत्यादि | जहाजरानी अधिनियमों के माध्यम से उपनिवेशों के व्यापारिक गतिविधियों पर ब्रिटिश जहाज़ों का एकाधिकार | उपनिवेशों में आयात की जाने वाली वस्तुओं पर इंग्लैण्ड में शुल्क वसूली | दोषपूर्ण कर प्रणाली , आदि | सप्त वर्षीय युद्ध की भूमिका या महत्व इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | इस युद्ध ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था | सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया | कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट, शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। 1765 में मेसाचुसेट में 13 बस्तियों (उपनिवेशी राज्य ) की एक सभा जिसमे मांग की गई कि " प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। सप्तवर्षीय युद्ध ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध संघर्ष में फ़्रांस की सहायता सुनिश्चित की | जिसके बिना तत्कालीन परिस्थितयों में अमेरिकी स्वतंत्रता संघर्ष की सफलता संदिग्ध मानी जाती है | इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिकी क्रांति के घटित होने में आर्थिक व दोषपूर्ण कर प्रणाली तथा सप्तवर्षीय युद्ध अपना प्रमुख स्थान रखता है |
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##Question:अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए ,अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explaining the economic reasons for the American Revolution, also dicuss the importance of the seven-year war in the American freedom struggle.##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत अमेरिकी क्रांति का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात अमेरिकी क्रांति के आर्थिक कारणों को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में अमेरिकी क्रांति में सप्तवर्षीय युद्ध के महत्व को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर- अमेरिकी क्रांति - ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध , अमेरिकी लोगो का विरोध अमेरिकी क्रांति के रूप में फलित हुआ , जिसकी शुरुवात 1783 से पहले ही शुरू हो चुकी थी और 1783 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया ।जो आधुनिक विश्व निर्माण के एक युगांतकारी घटना थी । जिसने विश्व के अन्य देशो को आधुनिक राष्ट्र निर्माण और लोकतन्त्र के मूल्यों से परिचित करवाया । हालांकि इस क्रांति के पीछे अनेक कारणो का योगदान है , जिसको निम्नलिखित बिन्दुओ से समझा जा सकता है - आर्थिक कारण - 18 वीं सदी के उत्तरी अमेरिका के अधिकांशतः भूभाग पर ब्रिटेन का कब्जा ।जिससे यहाँ के अन्य यूरोपीय नागरिकों को संसाधनों के अधिकारों से वंचित कर दिया गया । अमेरिका से होने वाले व्यापार पर विभिन्न प्रकार का करारोपण तथा कपास, तम्बाकू आदि का निर्यात केवल ब्रिटेन को होगा । अमेरिका में एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का विकास शुरू हो गया था | उपनिवेशों के आयत-निर्यात या व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिबन्ध | कुछ वस्तुओं का आयात सिर्फ ब्रिटेन से तथा कुछ वस्तुओं का निर्यात सिर्फ ब्रिटेन को किया जा सकता है | उपनिवेशों में उन वस्तुओं के निर्माण पर प्रतिबन्ध जिसके उत्पादन में इंग्लैण्ड की प्रधानता थी , जैसे- सूती वस्त्र इत्यादि | जहाजरानी अधिनियमों के माध्यम से उपनिवेशों के व्यापारिक गतिविधियों पर ब्रिटिश जहाज़ों का एकाधिकार | उपनिवेशों में आयात की जाने वाली वस्तुओं पर इंग्लैण्ड में शुल्क वसूली | दोषपूर्ण कर प्रणाली , आदि | सप्त वर्षीय युद्ध की भूमिका या महत्व इस युद्ध ने उपनिवेशवासियों और मातृदेश के बीच करों से सम्बंधित विवाद को तीव्र कर दिया | इस युद्ध ब्रिटेन, फ्रांस के विरुद्ध विजयी हुआ था परन्तु इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया था | सप्त वर्षीय युद्ध के कारण ब्रिटिश व्यय में वृद्धि हुई। इसलिए आर्थिक राहत के दृष्टिकोण से अमेरिका में लागू कानूनों को कठोरता पूर्वक लागू करने का निर्णय लिया गया | कुछ नए कानून भी लागू किये गए। जैसे-स्टाम्प एक्ट, शुगर एक्ट, करेंसी एक्ट आदि। 1765 में मेसाचुसेट में 13 बस्तियों (उपनिवेशी राज्य ) की एक सभा जिसमे मांग की गई कि " प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। सप्तवर्षीय युद्ध ने इंग्लैण्ड के विरुद्ध संघर्ष में फ़्रांस की सहायता सुनिश्चित की | जिसके बिना तत्कालीन परिस्थितयों में अमेरिकी स्वतंत्रता संघर्ष की सफलता संदिग्ध मानी जाती है | इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिकी क्रांति के घटित होने में आर्थिक व दोषपूर्ण कर प्रणाली तथा सप्तवर्षीय युद्ध अपना प्रमुख स्थान रखता है |
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While discussing the economic aspects of the Enlightenment, also discuss the principles of Adam Smith. (150 Words/ 10 marks)
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Approach Introduction: Start with the intro of Adam smith Main body part: write down the points of discussing the economic aspects of the Enlightenment, also discuss the principles of Adam Smith. conclusion: Conclude accordingly. Answer: Adam Smith (1723—1790) is best remembered today as the celebrated author of The Wealth of Nations (1776), who defined the workings of market economies and defended principles of liberty. To his contemporaries, particularly his fellow thinkers of the Scottish Enlightenment, Smith was recognized first for his profoundly original contributions to moral philosophy and natural jurisprudence. Smith describes a moral vision that serves as the best guarantor of civility in a commercial society. This vision is based on the cultivation of virtue, the “bettering of our condition,” and permits individuals to overcome selfish impulses that many believe permeate the commercial culture. The necessary tools for the cultivation of virtue include impartiality, sympathy, and reason. Smith was well-aware of the potential risks involved in advocating commercial activity, should motivations for it be reduced to avarice or love of luxury. By developing what Griswold calls “an achievable notion of virtue” available to nearly all responsible individuals, Smith provides an innovative means for overcoming vulnerabilities in human nature that often lead to corruption and social disorder. Smith’s arguments in favor of the possibility of widespread moral and social improvement include the pursuit of such “fundamental goods” as reputation, health, and property. Furthermore, his moral vision extends ideas of aristocratic excellence to members of the merchant and trading classes of society. The principles mentioned above are standard tax principles, despite they being presented in 1776, they are still of very great importance since they present the fundamentals of every effective tax system. The taxation systems changed over the centuries. In ancient times they were mainly based on taxes paid in kind, then they evolved to payments in money. Taxation systems also became more and more complex, including tax relieves and introducing a variety of tax rates. Due to the growing number of international connections the issue of double taxation was raised. Nowadays, when the globalization process is inevitable, the transfer pricing issue and tax evasion are important topics. All this makes tax systems different from what they used to be, however, tax principles introduced by Adam Smith should still be applied. They are universal and whatever the tax system is it should represent those principles. Despite different economic circumstances the statement that the more simple the tax system is, the better it is, still stays true.
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##Question:While discussing the economic aspects of the Enlightenment, also discuss the principles of Adam Smith. (150 Words/ 10 marks)##Answer:Approach Introduction: Start with the intro of Adam smith Main body part: write down the points of discussing the economic aspects of the Enlightenment, also discuss the principles of Adam Smith. conclusion: Conclude accordingly. Answer: Adam Smith (1723—1790) is best remembered today as the celebrated author of The Wealth of Nations (1776), who defined the workings of market economies and defended principles of liberty. To his contemporaries, particularly his fellow thinkers of the Scottish Enlightenment, Smith was recognized first for his profoundly original contributions to moral philosophy and natural jurisprudence. Smith describes a moral vision that serves as the best guarantor of civility in a commercial society. This vision is based on the cultivation of virtue, the “bettering of our condition,” and permits individuals to overcome selfish impulses that many believe permeate the commercial culture. The necessary tools for the cultivation of virtue include impartiality, sympathy, and reason. Smith was well-aware of the potential risks involved in advocating commercial activity, should motivations for it be reduced to avarice or love of luxury. By developing what Griswold calls “an achievable notion of virtue” available to nearly all responsible individuals, Smith provides an innovative means for overcoming vulnerabilities in human nature that often lead to corruption and social disorder. Smith’s arguments in favor of the possibility of widespread moral and social improvement include the pursuit of such “fundamental goods” as reputation, health, and property. Furthermore, his moral vision extends ideas of aristocratic excellence to members of the merchant and trading classes of society. The principles mentioned above are standard tax principles, despite they being presented in 1776, they are still of very great importance since they present the fundamentals of every effective tax system. The taxation systems changed over the centuries. In ancient times they were mainly based on taxes paid in kind, then they evolved to payments in money. Taxation systems also became more and more complex, including tax relieves and introducing a variety of tax rates. Due to the growing number of international connections the issue of double taxation was raised. Nowadays, when the globalization process is inevitable, the transfer pricing issue and tax evasion are important topics. All this makes tax systems different from what they used to be, however, tax principles introduced by Adam Smith should still be applied. They are universal and whatever the tax system is it should represent those principles. Despite different economic circumstances the statement that the more simple the tax system is, the better it is, still stays true.
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फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया | इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द) The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution. Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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##Question:फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया | इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द) The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution. Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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"फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |" इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution." Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words/10 Marks)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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##Question:"फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ़्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |" इस कथन के आलोक में फ्रांसीसी क्रांति के सामाजिक कारणों की व्याख्या कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) "The resentment against the inequality prevalent in French society formed the basis of the French Revolution." Explain the social causes of the French Revolution in the light of this statement. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत फ़्रांस के समाज में व्याप्त असमानता ने कैसे असंतोष को जन्म दिया ? उसका परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण करते हुए उसमे शामिल असमानता के तत्वों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | अंत में इस असमानता से उपजे असंतोष ने क्रांति के लिए कारण पैदा किया, उसको बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - फ्रांसीसी समाज सामंतवादी ढाँचे पर आधारित था, जिसमे विशेषाधिकारों पर आधारित सामाजिक असमानता काफी गहरी थी | इस असमानता को फ्रांसीसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है | जिसने समानता के नारे को फ़्रांसीसी क्रांति का सबसे प्रमुख नारा बना दिया | यही कारण था कि फ़्रांसवासियों में सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के बाद नेपोलियन भी फ्रांसीसी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने में सफल रहा तथा फ्रांसीसी जनता ने उसके निरंकुश शासन को स्वीकार किया | फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभाजित था जिन्हें -प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्टेट के नाम से जाना जाता है | प्रथम स्टेट में- उच्च पादरी वर्ग , द्वितीय में - कुलीन वर्ग तथा तृतीय में सामान्य जनसाधारण वर्ग शामिल था | जनसँख्या की दृष्टि से प्रथम दो स्टेट्स कुल जनसँख्या के अल्पांश का प्रतिनिधित्व करते थे जबकि फ़्रांस की अधिकतम भूमि इन्ही के पास थी | राज्य तथा चर्च द्वारा प्रदत्त सेवा के अवसर भी इन्ही को उपलब्ध थे तथा राज्य एवं चर्च की सेवाओं में जनसाधारण का प्रतिनिधित्व प्रतिबंधित था | इससे सबसे अधिक असंतुष्ट तीसरे स्टेट का सबसे प्रगतिशील वर्ग "मध्यम वर्ग" था | फ़्रांस की सामंतवादी प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल में भी संख्या बल में भारी असमानता के बावजूद भी इन तीनों वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व था जोकि समानता के सिद्धांत के अनुकूल नहीं था | इसके अतिरिक्त स्टेट्स जनरल के निर्णयों में प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत मत का अधिकार नहीं था तथा मत वर्गीय आधार पर लिया जाता था , जिसमे प्रथम दो वर्ग प्रायः साथ रहते थे | फ्रांसीसी असमानता का एक महत्वपूर्ण पक्ष करों की असमानता भी है जिसने क्रांति के तात्कालिक पृष्ठिभूमि को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | प्रथम दो वर्ग सभी प्रकार के करों से मुक्त थे तथा उन्हें कर लगाने तथा वसूलने का अधिकार भी था | ये विशेषधिकार और भी असहनीय इसलिए थे क्योंकि सामंती वर्ग अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व से बहुत पहले वंचित कर दिया गया था परन्तु उनके विशेषाधिकारों को बने रहने दिया दिया गया | इससे उनकी सामन्ती क्षमता क्रांति के समय भी प्रभावित हुई | अतः इन सब को देखते हुए इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असमानता के विरुद्ध उपजे असंतोष ने फ्रांसीसी क्रांति का आधार तैयार किया |
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लोकतांत्रिक शासन के बहुआयामी उद्देश्यों/आयामों का सविस्तार वर्णन कीजिये | (150 से 200 शब्द/10 अंक) Describe in detail the multidimensional objectives of democratic governance. (150 to 200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में लोकतांत्रिक सुशासन को परिभाषित करते हुए इसके उद्देश्यों की शीर्षकवार चर्चा कीजिये 3- अंतिम में लोकतांत्रिक सुशासन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता, दक्षता और जन भागीदारी को शामिल किया जाता है| सुशासन के प्रमुख आयामों से लोकतांत्रिक सुशासन प्रमुख आयाम है| ऐसा शासन जो लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धांतों और मानदंडों को व्यावहारिकता प्रदान करता हो तथा उन्हें निरंतर उन्नत करते हुए मानव अधिकारों की देख रेख करता हो उसे लोकतांत्रिक सुशासन कहते हैं| लोकतांत्रिक सुशासन के उद्देश्य राजनीतिक उद्देश्य राजनीतिक दृष्टिकोण से लोकतांत्रिक सुशासन का उद्देश्य शक्तियों के पृथक्करण को सामाजिक हितों के अनुकूल बनाना तथा आवश्यकता होने पर पृथक्करण में समन्वय स्थापना की संभावना भी होनी चाहिए| ऐसा शासन जो जन विरोधी, तानाशाही हो उसके कृत्यों को जनता के सामने उजागर करना सत्ता के विकेंद्रीकरण को बढ़ाना राजनीतिक विविधता के लिए नवीन संरचनात्मक विकास करना जैसे राजनीतिक नवाचार सरकार की नीतियों को जनहितों के अनुकूल बनाना समय अवधि के आधार पर चुनाव सुनिश्चित करना जो स्वतंत्र पारदर्शी और इमानदार होंगे राज्य और इसके संस्थानों के अंदर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना सामाजिक उद्देश्य समाज में विद्यमान विभेदों को दूर कर सामाजिक समन्वय स्थापित करना सकारात्मक भेदभाव युक्त नीतियों के उपयोग के माध्यम से समाज में लैंगिक समानता स्थापित करना उत्तर आधुनिक मूल्यों का विकास जैसे पर्यावरण संरक्षण, जलवायु एवं मानवाधिकारों का संरक्षण आदि का प्रोत्साहन आर्थिक उद्देश्य तात्कालिक लाभ के स्थान पर स्थायीएवं दीर्घकालिक लाभों को सुनिश्चित करना प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देखा एकाधिकार की जगह प्रतिस्पर्धा की स्थिति का निर्माण करना रोजगार में सृजन करना और पूर्ण रोजगार की स्थिति को प्राप्त करना किसानों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य को निरंतर युक्तियुक्त्त बनाना, 2022 तक किसानों की आय को दोगुना किया जाय विधायी और कार्यपालकीय उद्देश्य रक्षा एवं सुरक्षा बलों की तटस्थता एवं गुणात्मकता सुनिश्चित करना राज्य और उसके संस्थानों की धर्मनिरपेक्ष पृवृत्ति को बनाए रखना मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना ऐसे कानूनों का निर्माण, विकास और क्रियान्वयन करना जो मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर सके एवं उसे जनहितों के अनुकूल बना सके न्यायिक उद्देश्य न्यायपालिका में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को बढ़ावा देना व्यक्तिगत के न्याय के साथ ही सामजिक न्याय को बढ़ावा देना न्याय प्रक्रिया को तीव्र करना एवं न्यायालय तक नागरिकों की पहुँच बढ़ाना लोकतांत्रिक सुशासन को आधार बना कर भारत सरकार ने न्यायिक क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं जैसे ई.कोर्ट का गठन, जुडीसियरी नेटग्रिड का निर्माण आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि किसी समाज में स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय की की स्थापना के लिए लोकतांत्रिक सुशासन महत्वपूर्ण रूप से आवश्यक है|
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##Question:लोकतांत्रिक शासन के बहुआयामी उद्देश्यों/आयामों का सविस्तार वर्णन कीजिये | (150 से 200 शब्द/10 अंक) Describe in detail the multidimensional objectives of democratic governance. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में सुशासन को परिभाषित कीजिये 2- मुख्य भाग में लोकतांत्रिक सुशासन को परिभाषित करते हुए इसके उद्देश्यों की शीर्षकवार चर्चा कीजिये 3- अंतिम में लोकतांत्रिक सुशासन की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| विश्व बैंक के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का ऐसा शासन जो जनहित के अनुकूल हो उसे सुशासन कहते हैं| सुशासन, प्रशासन का वह रूप है जिसमें विधि के शासन के साथ सहमतिमूलकता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता, समता एवं समावेशिता तथा प्रभाविता, दक्षता और जन भागीदारी को शामिल किया जाता है| सुशासन के प्रमुख आयामों से लोकतांत्रिक सुशासन प्रमुख आयाम है| ऐसा शासन जो लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धांतों और मानदंडों को व्यावहारिकता प्रदान करता हो तथा उन्हें निरंतर उन्नत करते हुए मानव अधिकारों की देख रेख करता हो उसे लोकतांत्रिक सुशासन कहते हैं| लोकतांत्रिक सुशासन के उद्देश्य राजनीतिक उद्देश्य राजनीतिक दृष्टिकोण से लोकतांत्रिक सुशासन का उद्देश्य शक्तियों के पृथक्करण को सामाजिक हितों के अनुकूल बनाना तथा आवश्यकता होने पर पृथक्करण में समन्वय स्थापना की संभावना भी होनी चाहिए| ऐसा शासन जो जन विरोधी, तानाशाही हो उसके कृत्यों को जनता के सामने उजागर करना सत्ता के विकेंद्रीकरण को बढ़ाना राजनीतिक विविधता के लिए नवीन संरचनात्मक विकास करना जैसे राजनीतिक नवाचार सरकार की नीतियों को जनहितों के अनुकूल बनाना समय अवधि के आधार पर चुनाव सुनिश्चित करना जो स्वतंत्र पारदर्शी और इमानदार होंगे राज्य और इसके संस्थानों के अंदर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना सामाजिक उद्देश्य समाज में विद्यमान विभेदों को दूर कर सामाजिक समन्वय स्थापित करना सकारात्मक भेदभाव युक्त नीतियों के उपयोग के माध्यम से समाज में लैंगिक समानता स्थापित करना उत्तर आधुनिक मूल्यों का विकास जैसे पर्यावरण संरक्षण, जलवायु एवं मानवाधिकारों का संरक्षण आदि का प्रोत्साहन आर्थिक उद्देश्य तात्कालिक लाभ के स्थान पर स्थायीएवं दीर्घकालिक लाभों को सुनिश्चित करना प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देखा एकाधिकार की जगह प्रतिस्पर्धा की स्थिति का निर्माण करना रोजगार में सृजन करना और पूर्ण रोजगार की स्थिति को प्राप्त करना किसानों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य को निरंतर युक्तियुक्त्त बनाना, 2022 तक किसानों की आय को दोगुना किया जाय विधायी और कार्यपालकीय उद्देश्य रक्षा एवं सुरक्षा बलों की तटस्थता एवं गुणात्मकता सुनिश्चित करना राज्य और उसके संस्थानों की धर्मनिरपेक्ष पृवृत्ति को बनाए रखना मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना ऐसे कानूनों का निर्माण, विकास और क्रियान्वयन करना जो मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर सके एवं उसे जनहितों के अनुकूल बना सके न्यायिक उद्देश्य न्यायपालिका में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को बढ़ावा देना व्यक्तिगत के न्याय के साथ ही सामजिक न्याय को बढ़ावा देना न्याय प्रक्रिया को तीव्र करना एवं न्यायालय तक नागरिकों की पहुँच बढ़ाना लोकतांत्रिक सुशासन को आधार बना कर भारत सरकार ने न्यायिक क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं जैसे ई.कोर्ट का गठन, जुडीसियरी नेटग्रिड का निर्माण आदि| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि किसी समाज में स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय की की स्थापना के लिए लोकतांत्रिक सुशासन महत्वपूर्ण रूप से आवश्यक है|
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The French revolution gave birth to revolutionary changes and affected almost all the revolutions around the world. In light of this statement discuss the significance of the French revolution. (150 words/10 marks)
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Approach 1.Introduction - Briefly explain the French Revolution. 2. Body - Give the significance of the French Revolution, and explain how does it shape revolutions and movements around the world? 3. Conclusion - Conclude with the help of connecting the overall ideas of the French revolution. Answer French revolution started in 1789 and the revolutionary development under different ideological impulses and under institutions, organizations and leaders continued at least for a decade till the rise of Napoleon 1799. Even the rise of Napoleon and his empire and the internal restructuring of France under him and external interventions made by him in the Socio-political life of other European countries are seen as the continuation of the revolutionary developments associated with the French revolution. Significance of the french revolution – 1. The spread of French culture – due to the political upheaval many people migrated to other countries which led to the diffusion of French culture. The French revolution also supplies modern political terminologies like – Bourgeoisie, Proletariat, left, right centre, etc. in the revolution we have also noticed the emergence of what is called the masses politics in the modern age and modern political parties with modern means of mobilization, These ideas spread to New and old world through literature and migration of men. 2. Effect on Europe - For nearly two decades after the French revolution the Italians had excellent codes of law, a fair system of taxation, a better economic situation, and more religious and intellectual toleration than they had known for centuries. Likewise, the same reforms were also seen in Switzerland. 3. Nationalism - French Revolution gave a great stimulus to the growth of modern nationalism. Napoleon became the heroic symbol of the nation’s glory. Even after the decline of Napoleon, the revolutionary ideals of the French revolution like equality, liberty, fraternity formed the basis for modern nationalism 4. Effect on German states -The influence of the French revolution was great on the hundreds of small German states. The chaos and barriers in a land divided and subdivided among many different petty principalities gave way to a rational, simplified, centralized system controlled by Paris and run by Napoleon"s relatives. 5. Haitian revolution - The Enlightenment ideals and the initiation of the French Revolution were enough to inspire the Haitian Revolution, which evolved into the most successful and comprehensive slave rebellion. In 1804 Haiti became a free nation of former slaves. 6. Movements in Latin America - As early as 1810, the term "liberal" was coined in Spanish politics to indicate supporters of the French Revolution. This usage passed to Latin America and animated the independence movement against Spain. In the nineteenth century "Liberalism" was the dominant element in Latin American political thought. 7. Constitutions of other nations - and the nation-state continued to inspire revolutionary developments not only in Europe but also in other parts of the world even today they can be seen as a source of inspiration of political activism across the world and movements for Socio-Economic restructuring they have been incorporated in almost all major constitutional experiments in the modern world. From the social point of view, the Revolution consisted in the suppression of what was called the feudal system, in the emancipation of the individual, in greater division of landed property, the abolition of the privileges of noble birth, the establishment of equality, the simplification of life. In intellectual terms, the immediate impact of the French Revolutionary ideas was nearly invisible, but there was a long-range influence on liberal ideas and the ideal of legal equality, as well as the notion of opposition to a tyrannical government. In this regard, the French Revolution brought such influential themes as constitutionalism, parliamentarians, individual liberty, legal equality, and the sense of ethnic nationalism. So the French Revolution differed from other revolutions in being not merely national, for it aimed at benefiting all humanity.
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##Question:The French revolution gave birth to revolutionary changes and affected almost all the revolutions around the world. In light of this statement discuss the significance of the French revolution. (150 words/10 marks)##Answer:Approach 1.Introduction - Briefly explain the French Revolution. 2. Body - Give the significance of the French Revolution, and explain how does it shape revolutions and movements around the world? 3. Conclusion - Conclude with the help of connecting the overall ideas of the French revolution. Answer French revolution started in 1789 and the revolutionary development under different ideological impulses and under institutions, organizations and leaders continued at least for a decade till the rise of Napoleon 1799. Even the rise of Napoleon and his empire and the internal restructuring of France under him and external interventions made by him in the Socio-political life of other European countries are seen as the continuation of the revolutionary developments associated with the French revolution. Significance of the french revolution – 1. The spread of French culture – due to the political upheaval many people migrated to other countries which led to the diffusion of French culture. The French revolution also supplies modern political terminologies like – Bourgeoisie, Proletariat, left, right centre, etc. in the revolution we have also noticed the emergence of what is called the masses politics in the modern age and modern political parties with modern means of mobilization, These ideas spread to New and old world through literature and migration of men. 2. Effect on Europe - For nearly two decades after the French revolution the Italians had excellent codes of law, a fair system of taxation, a better economic situation, and more religious and intellectual toleration than they had known for centuries. Likewise, the same reforms were also seen in Switzerland. 3. Nationalism - French Revolution gave a great stimulus to the growth of modern nationalism. Napoleon became the heroic symbol of the nation’s glory. Even after the decline of Napoleon, the revolutionary ideals of the French revolution like equality, liberty, fraternity formed the basis for modern nationalism 4. Effect on German states -The influence of the French revolution was great on the hundreds of small German states. The chaos and barriers in a land divided and subdivided among many different petty principalities gave way to a rational, simplified, centralized system controlled by Paris and run by Napoleon"s relatives. 5. Haitian revolution - The Enlightenment ideals and the initiation of the French Revolution were enough to inspire the Haitian Revolution, which evolved into the most successful and comprehensive slave rebellion. In 1804 Haiti became a free nation of former slaves. 6. Movements in Latin America - As early as 1810, the term "liberal" was coined in Spanish politics to indicate supporters of the French Revolution. This usage passed to Latin America and animated the independence movement against Spain. In the nineteenth century "Liberalism" was the dominant element in Latin American political thought. 7. Constitutions of other nations - and the nation-state continued to inspire revolutionary developments not only in Europe but also in other parts of the world even today they can be seen as a source of inspiration of political activism across the world and movements for Socio-Economic restructuring they have been incorporated in almost all major constitutional experiments in the modern world. From the social point of view, the Revolution consisted in the suppression of what was called the feudal system, in the emancipation of the individual, in greater division of landed property, the abolition of the privileges of noble birth, the establishment of equality, the simplification of life. In intellectual terms, the immediate impact of the French Revolutionary ideas was nearly invisible, but there was a long-range influence on liberal ideas and the ideal of legal equality, as well as the notion of opposition to a tyrannical government. In this regard, the French Revolution brought such influential themes as constitutionalism, parliamentarians, individual liberty, legal equality, and the sense of ethnic nationalism. So the French Revolution differed from other revolutions in being not merely national, for it aimed at benefiting all humanity.
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प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के आधार पर ज्वालामुखी तथा भूकंप के वैश्विक वितरण का वर्णन कीजिये। ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Describe the global distribution of volcanoes and earthquakes based on plate tectonics theory. (150-200 words; 10 marks )
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दृष्टिकोण: भूमिका में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये| प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के आधार पर ज्वालामुखी के वैश्विक वितरण का वर्णन कीजिये| प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के आधार पर भूकंप के वैश्विक वितरण को स्पष्ट कीजिये | संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: भौतिक भूगोल, भू-आकृति विज्ञान एवं भू-विज्ञान में प्लेट विवर्तनिकी का विचार नवीन है जिसके आधार पर महाद्वीपों व महासागरों की उत्पत्ति, ज्वालामुखी एवं भूकम्प की क्रिया तथा वलित पर्वतों के निर्माण आदि का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। सर्वप्रथम हैरी हेस ने 1960 में विभिन्न साक्ष्यों द्वारा प्रतिपादित किया कि महाद्वीप तथा महासागर विभिन्न प्लेटों पर टिके हैं। ज्वालामुखी का वैश्विक वितरण: लगभग 80% ज्वालामुखी गतिविधि उप-सीमा सीमाओं के साथ पाई जाती है। मध्य-महासागर फैलाने वाले केंद्र और महाद्वीपीय दरारें ज्वालामुखी गतिविधि का लगभग 15% हिस्सा हैं। बाकी इंट्रा-प्लेट ज्वालामुखी है। सर्कम-पैसिफिक रिंग ऑफ फायर: इस बेल्ट में अधिकांश उच्च ज्वालामुखी शंकु और ज्वालामुखी पर्वत पाए जाते हैं, जहां प्रशांत, नाज़का, कोकोस और जुआन डी फ़ुका प्लेटें सक्रिय सक्रियता से होती हैं। एक अच्छा उदाहरण सुमात्रा और जावा का ज्वालामुखी है, जो ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच के सबडक्शन ज़ोन पर स्थित है। मिड-अटलांटिक बेल्ट: मध्य-महासागरीय रिज के साथ विदर के विस्फोट के कुछ बेसाल्टिक ज्वालामुखी भी पाए जाते हैं, जहां सीफ्लोर फैल रहा है। मध्य-महाद्वीपीय बेल्ट: इसमें अल्पाइन पर्वत श्रृंखलाओं और भूमध्य सागर के ज्वालामुखी और पूर्वी अफ्रीका के गलती क्षेत्र में शामिल हैं। यहाँ ज्वालामुखी, अफ्रीकी, यूरेशियन और भारतीय प्लेटों के टकराने के कारण बनते हैं। इंट्रा-प्लेट ज्वालामुखी: किनारों से दूर प्लेटों के अंदरूनी हिस्सों में बिखरे हुए हैं। प्लेट की सीमाओं के बीच में, जहां मैग्मा पृथ्वी की सतह की कमजोरियों से बाहर निकलता है, वहां हॉट स्पॉट ज्वालामुखी भी कहा जाता है। हवाई द्वीप गर्म स्थान ज्वालामुखियों का एक उदाहरण है। भूकंप का वैश्विक वितरण: सर्कम-पैसिफिक बेल्ट: इसमें उत्तर और दक्षिण अमेरिका और पूर्वी एशिया के तटीय हाशिये के एपिकेटर शामिल हैं। इस बेल्ट में दुनिया के कुल भूकंप का 65% हिस्सा है। यह भूकंप की घटना के लिए चार आदर्श स्थितियों को प्रस्तुत करता है, जो निम्न हैं : a) अभिसरण प्लेट सीमाओं के अधीन क्षेत्र, b) महाद्वीपों और महासागरों का जंक्शन, c) युवा तह पहाड़ों का क्षेत्र और d) सक्रिय ज्वालामुखियों का क्षेत्र। मध्य-महाद्वीपीय बेल्ट: यह अल्पाइन-हिमालयन बेल्ट है जो प्लेट अभिसरण के क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय और अफ्रीकी प्लेटें यूरेशियन प्लेट के नीचे दब जाती हैं, जिससे आइसोस्टैटिक और फॉल्ट प्रेरित भूकंप आते हैं। पृथ्वी की कुल भूकंपीय घटनाओं का लगभग 21% इस बेल्ट में होता है। मिड-अटलांटिक बेल्ट: इसमें मध्य-अटलांटिक रिज के साथ स्थित रिजेंटर्स और रिज के पास के कई द्वीप शामिल हैं। यह बेल्ट मध्यम और उथले फोकस भूकंपों को रिकॉर्ड करती है। समुद्री तल का फैलाव, ज्वालामुखी विस्फोट के विखंडन प्रकार और परिवर्तन दोष क्षेत्र में भूकंप के कारण हैं। स्थिर क्रेटोनिक क्षेत्रों के साथ भूकंप : स्थिर क्रेटोनिक ज़ोन में भूकंप बहुत दुर्लभ होते हैं जिनमें कठोर प्रतिरोधी चट्टानें होती हैं लेकिन ऐसे भूकंप आते हैं जहां ये भूकंप दुर्लभ घटनाओं का परिणाम होते हैं जहां प्राचीन विलुप्त दोषों को फिर से सक्रिय किया गया है। जैसे, भुज भूकंप|
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##Question:प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के आधार पर ज्वालामुखी तथा भूकंप के वैश्विक वितरण का वर्णन कीजिये। ( 150-200 शब्द; 10 अंक ) Describe the global distribution of volcanoes and earthquakes based on plate tectonics theory. (150-200 words; 10 marks )##Answer:दृष्टिकोण: भूमिका में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये| प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के आधार पर ज्वालामुखी के वैश्विक वितरण का वर्णन कीजिये| प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के आधार पर भूकंप के वैश्विक वितरण को स्पष्ट कीजिये | संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: भौतिक भूगोल, भू-आकृति विज्ञान एवं भू-विज्ञान में प्लेट विवर्तनिकी का विचार नवीन है जिसके आधार पर महाद्वीपों व महासागरों की उत्पत्ति, ज्वालामुखी एवं भूकम्प की क्रिया तथा वलित पर्वतों के निर्माण आदि का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। सर्वप्रथम हैरी हेस ने 1960 में विभिन्न साक्ष्यों द्वारा प्रतिपादित किया कि महाद्वीप तथा महासागर विभिन्न प्लेटों पर टिके हैं। ज्वालामुखी का वैश्विक वितरण: लगभग 80% ज्वालामुखी गतिविधि उप-सीमा सीमाओं के साथ पाई जाती है। मध्य-महासागर फैलाने वाले केंद्र और महाद्वीपीय दरारें ज्वालामुखी गतिविधि का लगभग 15% हिस्सा हैं। बाकी इंट्रा-प्लेट ज्वालामुखी है। सर्कम-पैसिफिक रिंग ऑफ फायर: इस बेल्ट में अधिकांश उच्च ज्वालामुखी शंकु और ज्वालामुखी पर्वत पाए जाते हैं, जहां प्रशांत, नाज़का, कोकोस और जुआन डी फ़ुका प्लेटें सक्रिय सक्रियता से होती हैं। एक अच्छा उदाहरण सुमात्रा और जावा का ज्वालामुखी है, जो ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच के सबडक्शन ज़ोन पर स्थित है। मिड-अटलांटिक बेल्ट: मध्य-महासागरीय रिज के साथ विदर के विस्फोट के कुछ बेसाल्टिक ज्वालामुखी भी पाए जाते हैं, जहां सीफ्लोर फैल रहा है। मध्य-महाद्वीपीय बेल्ट: इसमें अल्पाइन पर्वत श्रृंखलाओं और भूमध्य सागर के ज्वालामुखी और पूर्वी अफ्रीका के गलती क्षेत्र में शामिल हैं। यहाँ ज्वालामुखी, अफ्रीकी, यूरेशियन और भारतीय प्लेटों के टकराने के कारण बनते हैं। इंट्रा-प्लेट ज्वालामुखी: किनारों से दूर प्लेटों के अंदरूनी हिस्सों में बिखरे हुए हैं। प्लेट की सीमाओं के बीच में, जहां मैग्मा पृथ्वी की सतह की कमजोरियों से बाहर निकलता है, वहां हॉट स्पॉट ज्वालामुखी भी कहा जाता है। हवाई द्वीप गर्म स्थान ज्वालामुखियों का एक उदाहरण है। भूकंप का वैश्विक वितरण: सर्कम-पैसिफिक बेल्ट: इसमें उत्तर और दक्षिण अमेरिका और पूर्वी एशिया के तटीय हाशिये के एपिकेटर शामिल हैं। इस बेल्ट में दुनिया के कुल भूकंप का 65% हिस्सा है। यह भूकंप की घटना के लिए चार आदर्श स्थितियों को प्रस्तुत करता है, जो निम्न हैं : a) अभिसरण प्लेट सीमाओं के अधीन क्षेत्र, b) महाद्वीपों और महासागरों का जंक्शन, c) युवा तह पहाड़ों का क्षेत्र और d) सक्रिय ज्वालामुखियों का क्षेत्र। मध्य-महाद्वीपीय बेल्ट: यह अल्पाइन-हिमालयन बेल्ट है जो प्लेट अभिसरण के क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय और अफ्रीकी प्लेटें यूरेशियन प्लेट के नीचे दब जाती हैं, जिससे आइसोस्टैटिक और फॉल्ट प्रेरित भूकंप आते हैं। पृथ्वी की कुल भूकंपीय घटनाओं का लगभग 21% इस बेल्ट में होता है। मिड-अटलांटिक बेल्ट: इसमें मध्य-अटलांटिक रिज के साथ स्थित रिजेंटर्स और रिज के पास के कई द्वीप शामिल हैं। यह बेल्ट मध्यम और उथले फोकस भूकंपों को रिकॉर्ड करती है। समुद्री तल का फैलाव, ज्वालामुखी विस्फोट के विखंडन प्रकार और परिवर्तन दोष क्षेत्र में भूकंप के कारण हैं। स्थिर क्रेटोनिक क्षेत्रों के साथ भूकंप : स्थिर क्रेटोनिक ज़ोन में भूकंप बहुत दुर्लभ होते हैं जिनमें कठोर प्रतिरोधी चट्टानें होती हैं लेकिन ऐसे भूकंप आते हैं जहां ये भूकंप दुर्लभ घटनाओं का परिणाम होते हैं जहां प्राचीन विलुप्त दोषों को फिर से सक्रिय किया गया है। जैसे, भुज भूकंप|
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राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Explain the process of impeachment of the President. Along with this, discuss the process of removing judges from the post. (150-200 Words, Marks - 10 )
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत राष्ट्रपति और न्यायधीशों पर की जाने वाली इस प्रक्रिया का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति पर महाभियोग प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - राष्ट्रपति एवं न्यायाधीश दो प्रमुख पद भारत की संवैधानिक स्थिति तथा उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं | जहाँ राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य का निर्वहन करता है, वहीँ न्यायाधीश एक स्वतंत्र तथा संवैधानिक पद है जो भारत के लोगों के अधिकारों का संरक्षणकर्ता है | राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया - यह एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 61 में किया गया है | महाभियोग प्रस्ताव की पहल संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ की जा सकती है | इस प्रस्ताव के पहल का समर्थन सदन के कुल सदस्य के कम से कम एक चौथाई सदस्यों द्वारा की जानी चाहिए | एवं 14 दिन पूर्व राष्ट्रपति को इस सन्दर्भ में सूचना भेजनी होगी | प्रस्तावित सदन में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद इसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है | जहाँ इसकी जांच पड़ताल , राष्ट्रपति द्वारा किये गए संविधान उल्लंघन को आधार बनाकर की जाती है | यदि सदन में आरोपों को सही पाया जाता है व इसे दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो इस तिथि से राष्ट्रपति को पद से हटना पड़ता है | न्यायधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया - संविधान के अनुच्छेद 124-A में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है तथा संविधान भाग-4 में कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को केवल संसद एक प्रक्रिया के तहत हटाया जा सकता है -जिसका मूल आधार केवल साबित कदाचार या असमर्थता होगी | इसी सन्दर्भ में एक जजेज इनक्वायरी अधिनियम 1968 में अधिनियमित की गयी | इस अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति को संबोधित किया जाता है तथा इसका प्रस्तुतीकरण लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन के समक्ष होना है | प्रस्ताव के समर्थन में लोकसभा के कम से कम 100 तथा राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों का होना अनिवार्य है | प्रस्ताव के समर्थन के बाद आरोपों की जांच हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है - जिसमे उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीशों में से कोई एक तथा ख्याति प्राप्त विधिवक्ता होंगे | आरोपों के सिद्ध हो जाने पर यह प्रस्ताव संसद के समक्ष प्रस्तुत होता है तथा विशेष बहुमत से राष्ट्रपति द्वारा उसी सत्र में न्यायाधीश को पद से हटा दिया जाता है | सर्वोच्च न्यायलय तथा उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश को आज तक उनके पद पद से हटाया नहीं गया है , हालांकि कुछ न्यायाधीशों के विरुद्ध पद से हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत पहले हो चुकी है |
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##Question:राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) Explain the process of impeachment of the President. Along with this, discuss the process of removing judges from the post. (150-200 Words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत राष्ट्रपति और न्यायधीशों पर की जाने वाली इस प्रक्रिया का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति पर महाभियोग प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - राष्ट्रपति एवं न्यायाधीश दो प्रमुख पद भारत की संवैधानिक स्थिति तथा उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं | जहाँ राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य का निर्वहन करता है, वहीँ न्यायाधीश एक स्वतंत्र तथा संवैधानिक पद है जो भारत के लोगों के अधिकारों का संरक्षणकर्ता है | राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया - यह एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 61 में किया गया है | महाभियोग प्रस्ताव की पहल संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ की जा सकती है | इस प्रस्ताव के पहल का समर्थन सदन के कुल सदस्य के कम से कम एक चौथाई सदस्यों द्वारा की जानी चाहिए | एवं 14 दिन पूर्व राष्ट्रपति को इस सन्दर्भ में सूचना भेजनी होगी | प्रस्तावित सदन में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद इसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है | जहाँ इसकी जांच पड़ताल , राष्ट्रपति द्वारा किये गए संविधान उल्लंघन को आधार बनाकर की जाती है | यदि सदन में आरोपों को सही पाया जाता है व इसे दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो इस तिथि से राष्ट्रपति को पद से हटना पड़ता है | न्यायधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया - संविधान के अनुच्छेद 124-A में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है तथा संविधान भाग-4 में कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को केवल संसद एक प्रक्रिया के तहत हटाया जा सकता है -जिसका मूल आधार केवल साबित कदाचार या असमर्थता होगी | इसी सन्दर्भ में एक जजेज इनक्वायरी अधिनियम 1968 में अधिनियमित की गयी | इस अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति को संबोधित किया जाता है तथा इसका प्रस्तुतीकरण लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन के समक्ष होना है | प्रस्ताव के समर्थन में लोकसभा के कम से कम 100 तथा राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों का होना अनिवार्य है | प्रस्ताव के समर्थन के बाद आरोपों की जांच हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है - जिसमे उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीशों में से कोई एक तथा ख्याति प्राप्त विधिवक्ता होंगे | आरोपों के सिद्ध हो जाने पर यह प्रस्ताव संसद के समक्ष प्रस्तुत होता है तथा विशेष बहुमत से राष्ट्रपति द्वारा उसी सत्र में न्यायाधीश को पद से हटा दिया जाता है | सर्वोच्च न्यायलय तथा उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश को आज तक उनके पद पद से हटाया नहीं गया है , हालांकि कुछ न्यायाधीशों के विरुद्ध पद से हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत पहले हो चुकी है |
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राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the process of impeachment of the President. Alongwith this, discuss the process of removing judges from the post. (150-200 Words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत राष्ट्रपति और न्यायधीशों पर की जाने वाली इस प्रक्रिया का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति पर महाभियोग प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - राष्ट्रपति एवं न्यायाधीश दो प्रमुख पद भारत की संवैधानिक स्थिति तथा उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं | जहाँ राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य का निर्वहन करता है, वहीँ न्यायाधीश एक स्वतंत्र तथा संवैधानिक पद है जो भारत के लोगों के अधिकारों का संरक्षणकर्ता है | राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया - यह एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है, जिसका उल्लेख संविधान केअनुच्छेद 61में किया गया है | महाभियोग प्रस्ताव की पहल संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ की जा सकती है | इस प्रस्ताव के पहल का समर्थन सदन के कुल सदस्य के कम से कम एक चौथाई सदस्यों द्वारा की जानी चाहिए | एवं 14 दिन पूर्व राष्ट्रपति को इस सन्दर्भ में सूचना भेजनी होगी | प्रस्तावित सदन में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद इसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है | जहाँ इसकी जांच पड़ताल , राष्ट्रपति द्वारा किये गए संविधान उल्लंघन को आधार बनाकर की जाती है | यदि सदन में आरोपों को सही पाया जाता है व इसे दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो इस तिथि से राष्ट्रपति को पद से हटना पड़ता है | न्यायधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया - संविधान के अनुच्छेद 124-A में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है तथा संविधान भाग-4 में कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को केवल संसद एक प्रक्रिया के तहत हटाया जा सकता है -जिसका मूल आधार केवल साबित कदाचार या असमर्थता होगी | इसी सन्दर्भ में एक जजेज इनक्वायरी अधिनियम 1968 में अधिनियमित की गयी | इस अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति को संबोधित किया जाता है तथा इसका प्रस्तुतीकरण लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन के समक्ष होना है | प्रस्ताव के समर्थन में लोकसभा के कम से कम 100 तथा राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों का होना अनिवार्य है | प्रस्ताव के समर्थन के बाद आरोपों की जांच हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है - जिसमे उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीशों में से कोई एक तथा ख्याति प्राप्त विधिवक्ता होंगे | आरोपों के सिद्ध हो जाने पर यह प्रस्ताव संसद के समक्ष प्रस्तुत होता है तथा विशेष बहुमत से राष्ट्रपति द्वारा उसी सत्र में न्यायाधीश को पद से हटा दिया जाता है | सर्वोच्च न्यायलय तथा उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश को आज तक उनके पद पद से हटाया नहीं गया है , हालांकि कुछ न्यायाधीशों के विरुद्ध पद से हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत पहले हो चुकी है |
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##Question:राष्ट्रपति के महाभियोग की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिये | साथ ही न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) Explain the process of impeachment of the President. Alongwith this, discuss the process of removing judges from the post. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत राष्ट्रपति और न्यायधीशों पर की जाने वाली इस प्रक्रिया का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात राष्ट्रपति पर महाभियोग प्रक्रिया को विस्तारपूर्वक बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - राष्ट्रपति एवं न्यायाधीश दो प्रमुख पद भारत की संवैधानिक स्थिति तथा उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं | जहाँ राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य का निर्वहन करता है, वहीँ न्यायाधीश एक स्वतंत्र तथा संवैधानिक पद है जो भारत के लोगों के अधिकारों का संरक्षणकर्ता है | राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया - यह एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है, जिसका उल्लेख संविधान केअनुच्छेद 61में किया गया है | महाभियोग प्रस्ताव की पहल संसद के किसी भी सदन में प्रारम्भ की जा सकती है | इस प्रस्ताव के पहल का समर्थन सदन के कुल सदस्य के कम से कम एक चौथाई सदस्यों द्वारा की जानी चाहिए | एवं 14 दिन पूर्व राष्ट्रपति को इस सन्दर्भ में सूचना भेजनी होगी | प्रस्तावित सदन में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद इसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है | जहाँ इसकी जांच पड़ताल , राष्ट्रपति द्वारा किये गए संविधान उल्लंघन को आधार बनाकर की जाती है | यदि सदन में आरोपों को सही पाया जाता है व इसे दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो इस तिथि से राष्ट्रपति को पद से हटना पड़ता है | न्यायधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया - संविधान के अनुच्छेद 124-A में न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख है तथा संविधान भाग-4 में कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को केवल संसद एक प्रक्रिया के तहत हटाया जा सकता है -जिसका मूल आधार केवल साबित कदाचार या असमर्थता होगी | इसी सन्दर्भ में एक जजेज इनक्वायरी अधिनियम 1968 में अधिनियमित की गयी | इस अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति को संबोधित किया जाता है तथा इसका प्रस्तुतीकरण लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन के समक्ष होना है | प्रस्ताव के समर्थन में लोकसभा के कम से कम 100 तथा राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों का होना अनिवार्य है | प्रस्ताव के समर्थन के बाद आरोपों की जांच हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है - जिसमे उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीशों में से कोई एक तथा ख्याति प्राप्त विधिवक्ता होंगे | आरोपों के सिद्ध हो जाने पर यह प्रस्ताव संसद के समक्ष प्रस्तुत होता है तथा विशेष बहुमत से राष्ट्रपति द्वारा उसी सत्र में न्यायाधीश को पद से हटा दिया जाता है | सर्वोच्च न्यायलय तथा उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश को आज तक उनके पद पद से हटाया नहीं गया है , हालांकि कुछ न्यायाधीशों के विरुद्ध पद से हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत पहले हो चुकी है |
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कॉर्पोरेट गवर्नेंस से आप क्या समझते हैं? इसके लाभों की चर्चा करते हए इसके क्रियान्वयन की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द,10 अंक) What do you understand by corporate governance? Discussing its benefits, clarify the challenges of its implementation. (150 to 200 words, 10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता एवं लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के क्रियान्वयन की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| निगम शासन अथवा कॉर्पोरेट गवर्नेंस का आशय ऐसी प्रथा या प्रक्रिया या प्रणाली या सिद्धांतों को निर्धारित किये जाने से है जो यह सुनिश्चित करे कि कम्पनी का शासन इस प्रकार से किया जाय जो सभी पक्षकारों के सर्वोत्तम हितों को प्राप्त कर सके| दूसरे शब्दों में ऐसा गवर्नेंस जिसके माध्यम से कॉर्पोरेट संस्थाओं के संचालन में विभिन्न हितधारकों के अधिकारों एवं जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाता है, जिसका उद्देश्य संसाधनों का इष्टतम उपयोग एवं हितधारकों की संपत्ति में वृद्धि करना होता है, उसे कॉर्पोरेट गवर्नेंस कहते हैं| इसके अनेक लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं कॉर्पोरेट गवर्नेंस का महत्त्व/लाभ जोखिम न्यूनीकरण में सहायक होगा क्योंकि यह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आदि की स्थापना के माध्यम से उद्यमियों को जोखिम लेने के लिए सक्षम बनाता है इससे शेयरधारक का मूल्य बढ़ता है| कॉर्पोरेट सुशासन की स्थापना से कम्पनी के प्रति निवेशकों का विश्वास बढ़ता है जिससे उसके शेयरों का मूल्य बढ़ता है आर्थिक मंदी की स्थिति में कॉर्पोरेट गवर्नेंस निगम की उत्तरजीविता बढाता है क्योंकि विश्वसनीयता के कारण निगमों के बाजार का विस्तार होता है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिकता का अनुपालन किया जाता है जिससे निगम में संगठनात्मक दक्षता आती है| कॉर्पोरेट, निगमों के विलय एवं उनके विकेंद्रीकरण को आसान बनाता है| फिर भी कॉर्पोरेट गवर्नेंस के क्रियान्वयन में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| क्रियान्वयन की चुनौतियाँ किसी भी कॉर्पोरेट में बड़े निवेशकों का एकाधिकारबना हुआ है और इसके कारण नीति निर्माण में बड़े निवेशकों का एकाधिकारहो जाता है| दूसरी और अंशधारकों की रक्षा के लिए उपयुक्त कानूनों की कमी के कारण अंशधारकों के हितों का समुचित संरक्षण नहीं हो पाता है| कॉर्पोरेट में मानवीय मूल्यों के प्रति उत्तरदायित्वबोध की कमी के कारण लोगों और संस्थाओं के अंदर भ्रष्टाचार के प्रति सहनशीलता की विद्यमानताहै भारत में कॉर्पोरेट जगत के विनियमन के लिए कानूनी प्रावधानों की कमी है जिसके कारण कॉर्पोरेट के प्रबंधन एवं क्रियान्वयन की समस्या उत्पन्न होती है| भारत के निजी क्षेत्र का समान रूप से विकास नहीं हुआ है,निजी स्तर पर कॉर्पोरेट जगत ने उद्योगों का विकास श्रमिकों की खपत को ध्यान में रख कर नहीं किया है कुशल श्रमिक नियोजित हो जाते हैं किन्तु अकुशल श्रमिकों का नियोजन नहीं हो पाता है शैक्षिक संस्थानों द्वारा कौशल विकास के सन्दर्भ में आवश्यक योगदान नहीं दिया गया है कॉर्पोरेट जगत में पारदर्शिता का अभाव है| इसके कारण भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न होती है| मानकों में गुणवत्ता का अभाव देखा जाता है| निगमों द्वारा खातों का निर्माण अव्यवस्थित रूप में किया जाता है जिससे अस्पष्टता उत्पन्न होती है| भारत में निगमों द्वारा खातों का प्रकटीकरण न करने पर बल दिया जा रहा है| जैसी मनी लांड्रिंग के लिए विभिन्न शैल कंपनियों का निर्माण किया गया है| इसके कारण धोखाधड़ी के मामलों की विद्यमानता बनी हुई है जो निवेशकों में विश्वास के अभाव को जन्म देती है छद्म कम्पनियों की अधिक संख्या के कारण सरकार द्वारा इनका पर्याप्त विनियमन नही हो पाता कॉर्पोरेट से अधिक अपेक्षा करना एवं उनके अनुकूल पर्यावरण को निर्मित न करना कॉर्पोरेट की उत्पादकता को कमजोर करता है| कॉर्पोरेट के अनुकूल सामाजिक संरचनाओं की कमी जैसे भौतिक अवसंरचना, व्यावसायिक शिक्षा संरचना का अभाव आदि के कारण कॉर्पोरेट गवर्नेंस की स्थापना चुनौतीपूर्ण हो जाती है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करने, निगम का औचित्यपूर्ण प्रबंधन करने, शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने, शेयरधारकों के आधिकारिक निर्धारण करने तथा निगम की विश्वसनीयता को निरंतर बढाने में सहायक होता है| इन गुणों के माध्यम से यह निगमों का सतत और समावेशी एवं दक्षतापूर्ण विकास करता है| कम्पनी या निगम के द्वारा समाज के सर्वांगीण विकास हेतु योगदान दिए जाते हैं जो कि कम्पनी या निगम पर समाज की निर्भरता को दर्शाती है| इसके साथ साथ कम्पनी या निगम को समाज के द्वारा विभिन्न प्रकार के संसाधन प्रदान किये जाते हैं जैसे मानवीय संसाधन, तकनीकी संसाधन एवं वित्तीय संसाधन| अतः ऐसे स्थिति में यह आवश्यक है कि कंपनी के द्वारा सामाजिक मूल्यों एवं नैतिकता का अनुपालन किया जाए|
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##Question:कॉर्पोरेट गवर्नेंस से आप क्या समझते हैं? इसके लाभों की चर्चा करते हए इसके क्रियान्वयन की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द,10 अंक) What do you understand by corporate governance? Discussing its benefits, clarify the challenges of its implementation. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता एवं लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के क्रियान्वयन की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| निगम शासन अथवा कॉर्पोरेट गवर्नेंस का आशय ऐसी प्रथा या प्रक्रिया या प्रणाली या सिद्धांतों को निर्धारित किये जाने से है जो यह सुनिश्चित करे कि कम्पनी का शासन इस प्रकार से किया जाय जो सभी पक्षकारों के सर्वोत्तम हितों को प्राप्त कर सके| दूसरे शब्दों में ऐसा गवर्नेंस जिसके माध्यम से कॉर्पोरेट संस्थाओं के संचालन में विभिन्न हितधारकों के अधिकारों एवं जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाता है, जिसका उद्देश्य संसाधनों का इष्टतम उपयोग एवं हितधारकों की संपत्ति में वृद्धि करना होता है, उसे कॉर्पोरेट गवर्नेंस कहते हैं| इसके अनेक लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं कॉर्पोरेट गवर्नेंस का महत्त्व/लाभ जोखिम न्यूनीकरण में सहायक होगा क्योंकि यह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आदि की स्थापना के माध्यम से उद्यमियों को जोखिम लेने के लिए सक्षम बनाता है इससे शेयरधारक का मूल्य बढ़ता है| कॉर्पोरेट सुशासन की स्थापना से कम्पनी के प्रति निवेशकों का विश्वास बढ़ता है जिससे उसके शेयरों का मूल्य बढ़ता है आर्थिक मंदी की स्थिति में कॉर्पोरेट गवर्नेंस निगम की उत्तरजीविता बढाता है क्योंकि विश्वसनीयता के कारण निगमों के बाजार का विस्तार होता है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिकता का अनुपालन किया जाता है जिससे निगम में संगठनात्मक दक्षता आती है| कॉर्पोरेट, निगमों के विलय एवं उनके विकेंद्रीकरण को आसान बनाता है| फिर भी कॉर्पोरेट गवर्नेंस के क्रियान्वयन में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| क्रियान्वयन की चुनौतियाँ किसी भी कॉर्पोरेट में बड़े निवेशकों का एकाधिकारबना हुआ है और इसके कारण नीति निर्माण में बड़े निवेशकों का एकाधिकारहो जाता है| दूसरी और अंशधारकों की रक्षा के लिए उपयुक्त कानूनों की कमी के कारण अंशधारकों के हितों का समुचित संरक्षण नहीं हो पाता है| कॉर्पोरेट में मानवीय मूल्यों के प्रति उत्तरदायित्वबोध की कमी के कारण लोगों और संस्थाओं के अंदर भ्रष्टाचार के प्रति सहनशीलता की विद्यमानताहै भारत में कॉर्पोरेट जगत के विनियमन के लिए कानूनी प्रावधानों की कमी है जिसके कारण कॉर्पोरेट के प्रबंधन एवं क्रियान्वयन की समस्या उत्पन्न होती है| भारत के निजी क्षेत्र का समान रूप से विकास नहीं हुआ है,निजी स्तर पर कॉर्पोरेट जगत ने उद्योगों का विकास श्रमिकों की खपत को ध्यान में रख कर नहीं किया है कुशल श्रमिक नियोजित हो जाते हैं किन्तु अकुशल श्रमिकों का नियोजन नहीं हो पाता है शैक्षिक संस्थानों द्वारा कौशल विकास के सन्दर्भ में आवश्यक योगदान नहीं दिया गया है कॉर्पोरेट जगत में पारदर्शिता का अभाव है| इसके कारण भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न होती है| मानकों में गुणवत्ता का अभाव देखा जाता है| निगमों द्वारा खातों का निर्माण अव्यवस्थित रूप में किया जाता है जिससे अस्पष्टता उत्पन्न होती है| भारत में निगमों द्वारा खातों का प्रकटीकरण न करने पर बल दिया जा रहा है| जैसी मनी लांड्रिंग के लिए विभिन्न शैल कंपनियों का निर्माण किया गया है| इसके कारण धोखाधड़ी के मामलों की विद्यमानता बनी हुई है जो निवेशकों में विश्वास के अभाव को जन्म देती है छद्म कम्पनियों की अधिक संख्या के कारण सरकार द्वारा इनका पर्याप्त विनियमन नही हो पाता कॉर्पोरेट से अधिक अपेक्षा करना एवं उनके अनुकूल पर्यावरण को निर्मित न करना कॉर्पोरेट की उत्पादकता को कमजोर करता है| कॉर्पोरेट के अनुकूल सामाजिक संरचनाओं की कमी जैसे भौतिक अवसंरचना, व्यावसायिक शिक्षा संरचना का अभाव आदि के कारण कॉर्पोरेट गवर्नेंस की स्थापना चुनौतीपूर्ण हो जाती है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करने, निगम का औचित्यपूर्ण प्रबंधन करने, शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने, शेयरधारकों के आधिकारिक निर्धारण करने तथा निगम की विश्वसनीयता को निरंतर बढाने में सहायक होता है| इन गुणों के माध्यम से यह निगमों का सतत और समावेशी एवं दक्षतापूर्ण विकास करता है| कम्पनी या निगम के द्वारा समाज के सर्वांगीण विकास हेतु योगदान दिए जाते हैं जो कि कम्पनी या निगम पर समाज की निर्भरता को दर्शाती है| इसके साथ साथ कम्पनी या निगम को समाज के द्वारा विभिन्न प्रकार के संसाधन प्रदान किये जाते हैं जैसे मानवीय संसाधन, तकनीकी संसाधन एवं वित्तीय संसाधन| अतः ऐसे स्थिति में यह आवश्यक है कि कंपनी के द्वारा सामाजिक मूल्यों एवं नैतिकता का अनुपालन किया जाए|
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लोकतांत्रिक सुशासन द्वारा किन उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है? इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में आने वाली चुनौतियों एवं सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What objectives can be achieved by democratic good governance? Mention the challenges and the efforts being made by the government in achieving these objectives. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- लोकतांत्रिक सुशासन को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,लोकतांत्रिक सुशासनके विभिन्न उद्देश्यों का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,लोकतांत्रिक सुशासन की स्थापना हेतु उठाये जा रहे कुछ कदमों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः,लोकतांत्रिक सुशासनके लक्ष्यों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- ऐसा शासन है जो लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धांतों, मानदंडों को व्यवहारिकता प्रदान करता हो तथा उन्हें निरंतर उन्नत करते हुए मानव अधिकारों की देखरेख करता हो उसे लोकतांत्रिक सुशासन कहते हैं| लोकतांत्रिक सुशासन के उद्देश्य राजनीतिक उद्देश्य शक्तियों के पृथक्करण को सामाजिक हितों के अनुकूल बनाना तथा आवश्यकता होने पर पृथक्करण के साथ शक्ति की समन्वयता; विधि के शासन को समाज के परिवर्तन के साथ सहयोजित करना; सरकार की नीतियों को जनहितों के अनुकूल बनाना; निरंतर ऐसी व्यवस्था करना ताकि लोगों की भागीदारी बढ़े तथा उसे वास्तविक बनाने का प्रयास किया जा रहा है; सत्ता का विकेंद्रीकरण करना; राजनीतिक विविधता के लिए नवीन संरचनात्मक विकास करना जैसे राजनीतिक नवाचार; राज्य और इसके संस्थानों के अंदर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना; सामाजिक उद्देश्य समाज में विद्यमान असमानता हटाकर सामाजिक समन्वय स्थापित करना; सकारात्मक भेदभाव युक्त नीतियों के उपयोग के माध्यम से समाज में लैंगिक समानता स्थापित करना; राष्ट्रीयता का विकास करना; उपराष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का परित्याग कर मानवीयता अनुकूल राष्ट्रीय हितों का विस्तार करना; उत्तर आधुनिक मूल्यों का विकास जैसे पर्यावरण संरक्षण, जलवायु एवं मानवाधिकारों का संरक्षण आदि का प्रोत्साहन; आर्थिक उद्देश्य तात्कालिक लाभ के स्थान पर स्थायी एवं दीर्घकालिक लाभों को सुनिश्चित करना; प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देकर एकाधिकार की जगह प्रतिस्पर्धा की स्थिति का निर्माण करना; रोजगार में सृजन करना और पूर्ण रोजगार की स्थिति को प्राप्त करना; किसानों को मिलने वाले समर्थन मूल्य को बढ़ाना; लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की गारंटी; विधायी, कार्यपालिकीय और न्यायपालिकीय उद्देश्य रक्षा और सुरक्षाबलों की निष्पक्षता एवं जीवनस्तर को मानवीय बनाया जाए; राज्य और उसके संस्थानों की पंथनिरपेक्ष प्रवृति को बढ़ाना; संघ बनाने, सम्मेलन करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया जाए; प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वास्तविक बनाने के लिए वास्तविक कानूनों/नियमों को लागू किया जाए; न्यायपालिका में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता बढ़ाने के उपबंध हों; उत्तर आधुनिक मूल्यों में वृद्धि के उपाय किये जाएँ; व्यक्तिगत के न्याय के साथ ही सामजिक न्याय को बढ़ावा देना; न्याय प्रक्रिया को तीव्र करना एवं न्यायालय तक नागरिकों की पहुँच बढ़ाना लोकतांत्रिक सुशासन की स्थापना हेतु उठाये जा रहे कुछ कदम भारत सरकार मानवता के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए सशक्त कानून बना रही है जिनमें UAPA जैसे कानून प्रमुख हैं| साथ ही, मानव अधिकारों के संरक्षण, सत्ता के विकेंद्रीकरण और नागरिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों को उत्तर आधुनिक मूल्यों के अनुकूल बनाया जा रहा है| एक शांतिपूर्ण और उत्पादक समाज प्रभावी राज्य संस्थाओं पर आधारित होता है जहाँ जनभागीदारी को महत्व प्राप्त किया जाता है| MyGov जैसे मंच इस दिशा में सक्रीय भूमिका निभा सकते हैं| शक्तियों के पृथक्करण एवं समन्वय के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का समेकन किया जा रहा है| इसके लिए भारत सरकारद्वारा सांसदों के क्षेत्रीय मंच, महिलाओं के लिए मंच, बहुउद्देशीय युवा मंच, सिविल सोसाइटी फोरम के गठन किये जा रहे हैं| संसाधनों के तर्कसंगत प्रबंधन और दोहन के लिए क्षेत्रीय पहलों को बढ़ावा दिया जा रहा है| लोकतांत्रिक सुशासन को विकसित करने एवं मजबूत करने के लिए पू री दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रोटोकॉल्स निर्धारित किये जा रहे हैं जैसे- ECWAS ने आर्थिक व्यापार, राष्ट्रीय सहयोग एवं आर्थिक लक्ष्यों के नियम निर्धारित किये हैं जिनका पालन क्षेत्र के सभी राष्ट्र करेंगे| भारत ने ब्रिक्स के अन्य देशों के साथ मिलकर ब्रिक्स लीगल फोरम का गठन किया है जिसका उद्देश्य संबद्ध राष्ट्रों के बीच न्यायिक सहयोग के लिए प्रोटॉकोल निर्धारित करना है| दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित कन्वेंशन ऑन द प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ द क्राइम ऑफ जेनोसाइड(CPTCG) को व्यापक बनाना; मई 2019 तक 150 देश इस प्रोटॉकोल को स्वीकार कर चुके हैं| प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन को रोकने के लिए ग्रेट लेक क्षेत्र में लुसाका घोषणापत्र और कॉमनवेल्थ राष्ट्रों ने चोगम सम्मेलन के तहत प्रोटोकॉल्स निर्धारित किये हैं| भारत ने राष्ट्रीय/निजी स्तर पर राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली का विकास किया है जो प्राकृतिक संसाधनों के दुरूपयोग और अवैध दोहन को रोकने के लिए सशक्त तरीके से कार्य करेगा| लोकतांत्रिक सुशासन को आधार बना कर भारत सरकार ने न्यायिक क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं जैसे ई-कोर्ट का गठन, जुडीसियरी नेटग्रिड का निर्माण आदि| उपरोक्त सभी कार्यों का उद्देश्य भावी लोकतंत्र का विकास करना है जिसके लिए दुनिया के अनेक सभ्य देश(स्वीडन, फ़िनलैंड, कनाडा, अमेरिका, भारत) में विधियों के निर्माण हेतु भविष्य की पीढ़ियों को आधार बनाकर कार्य करना आरंभ किया गया है| वेल्स द्वारा 2015 में वेल बीइंग फॉर फ्यूचर जनरेशन एक्ट के तहत पर्यावरण का संरक्षण एवं रोजगार योजनाओं को पर्यावरण एवं मानवीय हितों के अनुकूल रखते हुए न्यूनतम 30 वर्ष आगे(भविष्य) को देखकर विधियों का निर्माण किया जा रहा है| अमेरिका 7वीं पीढ़ी के सिद्धांत को निर्मित कर चूका है जिसका लक्ष्य 150 वर्ष भविष्य को देखकर नीतियों का निर्माण करना है| भारत भी इस क्षेत्र में अग्रसर है और राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली के तहत् खनन को रोकने, जंगलों को संरक्षित करने और वन संसाधन सूचना प्रणाली को मजबूत करने की ओर अग्रसर है|
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##Question:लोकतांत्रिक सुशासन द्वारा किन उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है? इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में आने वाली चुनौतियों एवं सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख कीजिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) What objectives can be achieved by democratic good governance? Mention the challenges and the efforts being made by the government in achieving these objectives. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- लोकतांत्रिक सुशासन को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में,लोकतांत्रिक सुशासनके विभिन्न उद्देश्यों का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,लोकतांत्रिक सुशासन की स्थापना हेतु उठाये जा रहे कुछ कदमों का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः,लोकतांत्रिक सुशासनके लक्ष्यों को संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- ऐसा शासन है जो लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धांतों, मानदंडों को व्यवहारिकता प्रदान करता हो तथा उन्हें निरंतर उन्नत करते हुए मानव अधिकारों की देखरेख करता हो उसे लोकतांत्रिक सुशासन कहते हैं| लोकतांत्रिक सुशासन के उद्देश्य राजनीतिक उद्देश्य शक्तियों के पृथक्करण को सामाजिक हितों के अनुकूल बनाना तथा आवश्यकता होने पर पृथक्करण के साथ शक्ति की समन्वयता; विधि के शासन को समाज के परिवर्तन के साथ सहयोजित करना; सरकार की नीतियों को जनहितों के अनुकूल बनाना; निरंतर ऐसी व्यवस्था करना ताकि लोगों की भागीदारी बढ़े तथा उसे वास्तविक बनाने का प्रयास किया जा रहा है; सत्ता का विकेंद्रीकरण करना; राजनीतिक विविधता के लिए नवीन संरचनात्मक विकास करना जैसे राजनीतिक नवाचार; राज्य और इसके संस्थानों के अंदर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना; सामाजिक उद्देश्य समाज में विद्यमान असमानता हटाकर सामाजिक समन्वय स्थापित करना; सकारात्मक भेदभाव युक्त नीतियों के उपयोग के माध्यम से समाज में लैंगिक समानता स्थापित करना; राष्ट्रीयता का विकास करना; उपराष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का परित्याग कर मानवीयता अनुकूल राष्ट्रीय हितों का विस्तार करना; उत्तर आधुनिक मूल्यों का विकास जैसे पर्यावरण संरक्षण, जलवायु एवं मानवाधिकारों का संरक्षण आदि का प्रोत्साहन; आर्थिक उद्देश्य तात्कालिक लाभ के स्थान पर स्थायी एवं दीर्घकालिक लाभों को सुनिश्चित करना; प्रतिसंतुलनकारी शक्तियों को बढ़ावा देकर एकाधिकार की जगह प्रतिस्पर्धा की स्थिति का निर्माण करना; रोजगार में सृजन करना और पूर्ण रोजगार की स्थिति को प्राप्त करना; किसानों को मिलने वाले समर्थन मूल्य को बढ़ाना; लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की गारंटी; विधायी, कार्यपालिकीय और न्यायपालिकीय उद्देश्य रक्षा और सुरक्षाबलों की निष्पक्षता एवं जीवनस्तर को मानवीय बनाया जाए; राज्य और उसके संस्थानों की पंथनिरपेक्ष प्रवृति को बढ़ाना; संघ बनाने, सम्मेलन करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया जाए; प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वास्तविक बनाने के लिए वास्तविक कानूनों/नियमों को लागू किया जाए; न्यायपालिका में उत्तरदायित्व और पारदर्शिता बढ़ाने के उपबंध हों; उत्तर आधुनिक मूल्यों में वृद्धि के उपाय किये जाएँ; व्यक्तिगत के न्याय के साथ ही सामजिक न्याय को बढ़ावा देना; न्याय प्रक्रिया को तीव्र करना एवं न्यायालय तक नागरिकों की पहुँच बढ़ाना लोकतांत्रिक सुशासन की स्थापना हेतु उठाये जा रहे कुछ कदम भारत सरकार मानवता के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए सशक्त कानून बना रही है जिनमें UAPA जैसे कानून प्रमुख हैं| साथ ही, मानव अधिकारों के संरक्षण, सत्ता के विकेंद्रीकरण और नागरिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों को उत्तर आधुनिक मूल्यों के अनुकूल बनाया जा रहा है| एक शांतिपूर्ण और उत्पादक समाज प्रभावी राज्य संस्थाओं पर आधारित होता है जहाँ जनभागीदारी को महत्व प्राप्त किया जाता है| MyGov जैसे मंच इस दिशा में सक्रीय भूमिका निभा सकते हैं| शक्तियों के पृथक्करण एवं समन्वय के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का समेकन किया जा रहा है| इसके लिए भारत सरकारद्वारा सांसदों के क्षेत्रीय मंच, महिलाओं के लिए मंच, बहुउद्देशीय युवा मंच, सिविल सोसाइटी फोरम के गठन किये जा रहे हैं| संसाधनों के तर्कसंगत प्रबंधन और दोहन के लिए क्षेत्रीय पहलों को बढ़ावा दिया जा रहा है| लोकतांत्रिक सुशासन को विकसित करने एवं मजबूत करने के लिए पू री दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रोटोकॉल्स निर्धारित किये जा रहे हैं जैसे- ECWAS ने आर्थिक व्यापार, राष्ट्रीय सहयोग एवं आर्थिक लक्ष्यों के नियम निर्धारित किये हैं जिनका पालन क्षेत्र के सभी राष्ट्र करेंगे| भारत ने ब्रिक्स के अन्य देशों के साथ मिलकर ब्रिक्स लीगल फोरम का गठन किया है जिसका उद्देश्य संबद्ध राष्ट्रों के बीच न्यायिक सहयोग के लिए प्रोटॉकोल निर्धारित करना है| दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित कन्वेंशन ऑन द प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट ऑफ द क्राइम ऑफ जेनोसाइड(CPTCG) को व्यापक बनाना; मई 2019 तक 150 देश इस प्रोटॉकोल को स्वीकार कर चुके हैं| प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन को रोकने के लिए ग्रेट लेक क्षेत्र में लुसाका घोषणापत्र और कॉमनवेल्थ राष्ट्रों ने चोगम सम्मेलन के तहत प्रोटोकॉल्स निर्धारित किये हैं| भारत ने राष्ट्रीय/निजी स्तर पर राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली का विकास किया है जो प्राकृतिक संसाधनों के दुरूपयोग और अवैध दोहन को रोकने के लिए सशक्त तरीके से कार्य करेगा| लोकतांत्रिक सुशासन को आधार बना कर भारत सरकार ने न्यायिक क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं जैसे ई-कोर्ट का गठन, जुडीसियरी नेटग्रिड का निर्माण आदि| उपरोक्त सभी कार्यों का उद्देश्य भावी लोकतंत्र का विकास करना है जिसके लिए दुनिया के अनेक सभ्य देश(स्वीडन, फ़िनलैंड, कनाडा, अमेरिका, भारत) में विधियों के निर्माण हेतु भविष्य की पीढ़ियों को आधार बनाकर कार्य करना आरंभ किया गया है| वेल्स द्वारा 2015 में वेल बीइंग फॉर फ्यूचर जनरेशन एक्ट के तहत पर्यावरण का संरक्षण एवं रोजगार योजनाओं को पर्यावरण एवं मानवीय हितों के अनुकूल रखते हुए न्यूनतम 30 वर्ष आगे(भविष्य) को देखकर विधियों का निर्माण किया जा रहा है| अमेरिका 7वीं पीढ़ी के सिद्धांत को निर्मित कर चूका है जिसका लक्ष्य 150 वर्ष भविष्य को देखकर नीतियों का निर्माण करना है| भारत भी इस क्षेत्र में अग्रसर है और राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली के तहत् खनन को रोकने, जंगलों को संरक्षित करने और वन संसाधन सूचना प्रणाली को मजबूत करने की ओर अग्रसर है|
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बहुस्तरीय शासन या मल्टीलेवल गवर्नेंस की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| साथ ही, मल्टीलेवल गवर्नेंस के लाभों का उल्लेख करते हुए इसको स्थापित करने में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the arguments in favor of the need for multilevel governance. Also, write down the benefits of multilevel governance and mention some obstacles faced in establishing it. (150-200 words; 10 marks)
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एप्रोच- बहुस्तरीय शासन या मल्टीलेवल गवर्नेंस का अर्थ स्पष्ट करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,बहुस्तरीय शासन या मल्टीलेवल गवर्नेंस की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| अगले भाग में,मल्टीलेवल गवर्नेंस के लाभों का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,मल्टीलेवल गवर्नेंस को स्थापित करने में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डालिए| उत्तर- मल्टी-लेवल गवर्नेंस शासन का ऐसा रूप हैजिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों,स्थानीय,क्षेत्रीय,गैर-राज्यीय कर्ताओं,सामुदायिक समूहों,निजी/कॉर्पोरेट निगमों, पॉलीसेंट्रिकगवर्नेंस,कोआपरेटिव गवर्नेंस एवं अंतर्राष्ट्रीय निकायों को साझा करके शासन का संचालन किया जाता है| मल्टी-लेवल गवर्नेंस कीआवश्यकता वैश्विक परिस्थितियों की परिवर्तनीयता-वैश्विक परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन हो रहा है अर्थात शक्तिशाली नयी प्रौद्योगिकियों एवं डिजिटल संस्कृति ने बहुस्तरीय शासन को आवश्यक बना दिया है| सार्वजनिक नीतियों के निर्माण,विकास,क्रियान्वयन और निगरानी में अकेले राज्य की संस्थाएँ असक्षम साबित हो रही हैं| सरकारों/सरकारी विभागों के पास शक्ति, संसाधन और संरचनाओं की कमी है|परिणामतः वे जिम्मेदारियों का निर्वहन करने एवं चुनौतियों का सामना करने में असक्षम साबित हो रही हैं| राज्य की संस्थाओं में विद्यमान अकुशलता एवं संसाधनों के अभाव के कारण आने वाली मांगों को समयानुसार समर्थन में परिवर्तित करने में असक्षम हैं| कई बार शासन करने से जुड़े मुद्दों को समझना और उनका प्रबंधन करना जटिल हो जाता है| फीडबैक के अनुरूप सेवाओं में आपूर्ति की समस्याआदि; मल्टी-लेवल गवर्नेंस के लाभ शासन का वैकल्पिक और अपेक्षाकृत अधिक लचीला प्रकार; अन्य स्तरों की भागीदारी से सार्वजनिक नीतियों के निर्माण, विकास और क्रियान्वयन के सकारात्मक एवं समाज अनुकूल परिणाम; सरकार द्वारा सामाजिक स्तरों के सहयोग से शक्ति तथा संसाधनों के वितरण को प्रभावी बनाया जा सकता है| इससे समाज के अभावग्रस्त वर्गों को शासन का भागीदार बनाने में सहायता प्रदान होगी| यह भारत में विद्यमान क्षेत्रीय विविधता के अनुकूल है क्योंकि इससे विकास को क्षेत्रीय स्तर तक पहुँचाया जा सकेगा और विकास की एक विस्तृत श्रृंखला का निर्माण किया जा सकेगा| इससे समाज में विद्यमान असंतोष, अव्यवस्थाओं को दूर किया जा सकेगा जैसे- विद्यमान सांप्रदायिकता का खात्मा करने में मदद; ट्रैक कूटनीति तथा पैरा कूटनीति को बढ़ावाजिससे आने वाले वैश्विक निवेश को उचित और अनुकूल रूप में समायोजित किया जा सकेगा| परिणामतः संवहनीय विकास, प्रतिस्पर्धा, नवाचार, नागरिकों के जीवनस्तर आदि को गुणात्मक बनाया जा सकेगा| संवहनीय विकास, प्रतिस्पर्धा, नवाचार, नागरिकों के जीवनस्तर आदि को गुणात्मक बनाया जा सकना; सहकारिता की प्रवृति को बढ़ावा जो वर्तमान भारत के एक बड़ी अनिवार्यता है| इसके द्वारा बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ावा,क्षेत्रीय सुधार,स्थानीय सार्वजनिक सेवा वितरण,सतत विकास,प्रतिस्पर्धा,नवाचार और नागरिकों के लिए बेहतर जीवन प्रदान किया जा सकेगा| मल्टी-लेवल गवर्नेंस को स्थापित करने में बाधाएं भारत में विद्यमान अशिक्षा; हितों में असमानता, असहमति की भावना; सीमाओं के पार से शासन में सहयोग प्राप्त करने के लिए बातचीत के निरंतर संसाधनों की प्रणाली का विकास नहीं हो सका है| यहाँ तक कि इंटरपोल की व्यवस्था को भी पूरी तरह व्यवहारिकता प्रदान नहीं हो सकी है| विद्यमान आतंकवाद, साईबर क्राइम द्वारा बहुस्तरीय शासन के माध्यम से देश की आतंरिक सुरक्षा पर बाधा; आवश्यक संस्थाकरण के अभाव में भागीदारी सापेक्षिक वंचना आदि; समाजमें अनेकों ऐसे नागरिक हैं जो सामाजिक हितों एवं जनकल्याण के लिए सरकार का सहयोग करना चाहते हैं किंतु सहयोग करने के लिए उपयुक्त मंचों का अभाव पाया जाता है| मल्टीलेवल गवर्नेंस के व्यापक लाभों को देखते हुए उपरोक्त बाधाओं के संदर्भ में कुछ उपायों को अपनाकर इन्हें दूर करने की आवश्यकता है ताकि शासन को सुशासन की दिशा में ज्यादा विस्तृत रूप से आगे बढ़ाया जा सके|
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##Question:बहुस्तरीय शासन या मल्टीलेवल गवर्नेंस की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| साथ ही, मल्टीलेवल गवर्नेंस के लाभों का उल्लेख करते हुए इसको स्थापित करने में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डालिए| (150-200 शब्द; 10 अंक) Explain the arguments in favor of the need for multilevel governance. Also, write down the benefits of multilevel governance and mention some obstacles faced in establishing it. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- बहुस्तरीय शासन या मल्टीलेवल गवर्नेंस का अर्थ स्पष्ट करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,बहुस्तरीय शासन या मल्टीलेवल गवर्नेंस की आवश्यकता के पक्ष में तर्कों को स्पष्ट कीजिये| अगले भाग में,मल्टीलेवल गवर्नेंस के लाभों का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,मल्टीलेवल गवर्नेंस को स्थापित करने में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डालिए| उत्तर- मल्टी-लेवल गवर्नेंस शासन का ऐसा रूप हैजिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों,स्थानीय,क्षेत्रीय,गैर-राज्यीय कर्ताओं,सामुदायिक समूहों,निजी/कॉर्पोरेट निगमों, पॉलीसेंट्रिकगवर्नेंस,कोआपरेटिव गवर्नेंस एवं अंतर्राष्ट्रीय निकायों को साझा करके शासन का संचालन किया जाता है| मल्टी-लेवल गवर्नेंस कीआवश्यकता वैश्विक परिस्थितियों की परिवर्तनीयता-वैश्विक परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन हो रहा है अर्थात शक्तिशाली नयी प्रौद्योगिकियों एवं डिजिटल संस्कृति ने बहुस्तरीय शासन को आवश्यक बना दिया है| सार्वजनिक नीतियों के निर्माण,विकास,क्रियान्वयन और निगरानी में अकेले राज्य की संस्थाएँ असक्षम साबित हो रही हैं| सरकारों/सरकारी विभागों के पास शक्ति, संसाधन और संरचनाओं की कमी है|परिणामतः वे जिम्मेदारियों का निर्वहन करने एवं चुनौतियों का सामना करने में असक्षम साबित हो रही हैं| राज्य की संस्थाओं में विद्यमान अकुशलता एवं संसाधनों के अभाव के कारण आने वाली मांगों को समयानुसार समर्थन में परिवर्तित करने में असक्षम हैं| कई बार शासन करने से जुड़े मुद्दों को समझना और उनका प्रबंधन करना जटिल हो जाता है| फीडबैक के अनुरूप सेवाओं में आपूर्ति की समस्याआदि; मल्टी-लेवल गवर्नेंस के लाभ शासन का वैकल्पिक और अपेक्षाकृत अधिक लचीला प्रकार; अन्य स्तरों की भागीदारी से सार्वजनिक नीतियों के निर्माण, विकास और क्रियान्वयन के सकारात्मक एवं समाज अनुकूल परिणाम; सरकार द्वारा सामाजिक स्तरों के सहयोग से शक्ति तथा संसाधनों के वितरण को प्रभावी बनाया जा सकता है| इससे समाज के अभावग्रस्त वर्गों को शासन का भागीदार बनाने में सहायता प्रदान होगी| यह भारत में विद्यमान क्षेत्रीय विविधता के अनुकूल है क्योंकि इससे विकास को क्षेत्रीय स्तर तक पहुँचाया जा सकेगा और विकास की एक विस्तृत श्रृंखला का निर्माण किया जा सकेगा| इससे समाज में विद्यमान असंतोष, अव्यवस्थाओं को दूर किया जा सकेगा जैसे- विद्यमान सांप्रदायिकता का खात्मा करने में मदद; ट्रैक कूटनीति तथा पैरा कूटनीति को बढ़ावाजिससे आने वाले वैश्विक निवेश को उचित और अनुकूल रूप में समायोजित किया जा सकेगा| परिणामतः संवहनीय विकास, प्रतिस्पर्धा, नवाचार, नागरिकों के जीवनस्तर आदि को गुणात्मक बनाया जा सकेगा| संवहनीय विकास, प्रतिस्पर्धा, नवाचार, नागरिकों के जीवनस्तर आदि को गुणात्मक बनाया जा सकना; सहकारिता की प्रवृति को बढ़ावा जो वर्तमान भारत के एक बड़ी अनिवार्यता है| इसके द्वारा बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ावा,क्षेत्रीय सुधार,स्थानीय सार्वजनिक सेवा वितरण,सतत विकास,प्रतिस्पर्धा,नवाचार और नागरिकों के लिए बेहतर जीवन प्रदान किया जा सकेगा| मल्टी-लेवल गवर्नेंस को स्थापित करने में बाधाएं भारत में विद्यमान अशिक्षा; हितों में असमानता, असहमति की भावना; सीमाओं के पार से शासन में सहयोग प्राप्त करने के लिए बातचीत के निरंतर संसाधनों की प्रणाली का विकास नहीं हो सका है| यहाँ तक कि इंटरपोल की व्यवस्था को भी पूरी तरह व्यवहारिकता प्रदान नहीं हो सकी है| विद्यमान आतंकवाद, साईबर क्राइम द्वारा बहुस्तरीय शासन के माध्यम से देश की आतंरिक सुरक्षा पर बाधा; आवश्यक संस्थाकरण के अभाव में भागीदारी सापेक्षिक वंचना आदि; समाजमें अनेकों ऐसे नागरिक हैं जो सामाजिक हितों एवं जनकल्याण के लिए सरकार का सहयोग करना चाहते हैं किंतु सहयोग करने के लिए उपयुक्त मंचों का अभाव पाया जाता है| मल्टीलेवल गवर्नेंस के व्यापक लाभों को देखते हुए उपरोक्त बाधाओं के संदर्भ में कुछ उपायों को अपनाकर इन्हें दूर करने की आवश्यकता है ताकि शासन को सुशासन की दिशा में ज्यादा विस्तृत रूप से आगे बढ़ाया जा सके|
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लोक अदालत व ग्राम न्यायालय के विशेष सन्दर्भ में, विगत वर्षों में न्यायिक क्षेत्र में किये जाने वाले विभिन्न नवाचारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) In the special context of Lok Adalat and Gram Nyayalaya, briefly discuss various innovations being done in the judicial area in the last years. (10 Marks/150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक अदालत को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात ग्राम न्यायालय के बारे में भी बताइए | अंत में अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक अदालत व ग्राम न्यायालय दोनों का गठन संविधान के अनुच्छेद 39 A के सन्दर्भ में किया गया है | और दोनों अदालते न्यायिक नवाचार का परिणाम हैं | लोक अदालत - इसका गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अंतर्गत किया गया, जिसका मौलिक उद्देश्य न्याय को व्यक्ति के द्वार तक पहुंचाने से है | लोक अदालत की न्यायिक प्रक्रिया को अधिक लचीला, सरल तथा अल्प लागत व व्यय वाला बनाया गया है, जिससे सम्बंधित न्याय को सुनिश्चित कर जन भागीदारी को बढाया जाय, लोगों की पहुँच सुनिश्चित की जाय | लोक अदालत का निर्णय दोनों पक्षों के समझौते पर आधारित है अतः न्यायिक प्रक्रिया का स्वरुप सरल एवं कम लागत का होता है | लोक अदालत दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई कर सकती है तथा लोक अदालत के निर्णय को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती | लोक अदालत एक वैकल्पिक विवाद निराकरण तंत्र है| ग्राम न्यायालय - ग्राम न्यायालय का गठन विधि आयोग की अनुशंषा पर ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के प्रावधानों के अंतर्गत किया गया है जो 2 अक्टूबर 2009 को लागू किया गया | ग्राम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय का निम्नतम स्तर है जिसका मूल उद्देश्य न्याय को जमीनी स्तर तक पहुँचाना है | ग्राम न्यायालय का प्रमुख न्यायाधिकारी (प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट) होता है जिसकी नियुक्ति उच्च न्यायालय की अनुशंषा पर राज्य सरकार द्वारा की जाती है | ग्राम न्यायालय दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों पर सुनवाई कर सकती है जिसमे दीवानी मामलों को जिला न्यायालय तथा फौजदारी मामलों को सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है | अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचार - मोबाइल न्यायालय -दूरस्थ व पिछड़े क्षेत्रों के लिए इसे बनया गया तथा इसका प्रयोग ग्राम न्यायालय भी करता है | त्वरित न्यायालय -जेल प्रशासन व्यय को कम करना , कैदियों को जल्द न्याय दिलाने व ऐसे मामले जिन्हें जल्द से जल्द निपटाना अनिवार्य हो , जैसे- बलात्कार इत्यादि | इसका गठन जिला न्यायालय के स्तर पर किया जाता है | ई -कोर्ट - ऐसे में सूचना संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का प्रयोग कर न्यायालय, पुलिस , जेल, फोरेंसिक को जोड़ा जाता है और आपराधिक मामले की सुनवाई की जाती है | परिवार न्यायालय - पारिवारिक संबंधी मुद्दे जैसे - तलाक, रख रखाव , बच्चों की कस्टडी जैसे संवेदनशील मुद्दों का निपटारा किया जाता है | वास्तव में उपरोक्त सभी लगभग जिला स्तर पर गठित न्यायलय हैं और इस स्तर पर ज्यादा मामले आते हैं , यदि इसको सही तरीके से संचालित किया जाए तो सुप्रीम कोर्ट अपने मूल उद्देश्य को सही तरीके से सुनिश्चित कर सकेगा |
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##Question:लोक अदालत व ग्राम न्यायालय के विशेष सन्दर्भ में, विगत वर्षों में न्यायिक क्षेत्र में किये जाने वाले विभिन्न नवाचारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, अंक - 10 ) In the special context of Lok Adalat and Gram Nyayalaya, briefly discuss various innovations being done in the judicial area in the last years. (10 Marks/150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक अदालत को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात ग्राम न्यायालय के बारे में भी बताइए | अंत में अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक अदालत व ग्राम न्यायालय दोनों का गठन संविधान के अनुच्छेद 39 A के सन्दर्भ में किया गया है | और दोनों अदालते न्यायिक नवाचार का परिणाम हैं | लोक अदालत - इसका गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अंतर्गत किया गया, जिसका मौलिक उद्देश्य न्याय को व्यक्ति के द्वार तक पहुंचाने से है | लोक अदालत की न्यायिक प्रक्रिया को अधिक लचीला, सरल तथा अल्प लागत व व्यय वाला बनाया गया है, जिससे सम्बंधित न्याय को सुनिश्चित कर जन भागीदारी को बढाया जाय, लोगों की पहुँच सुनिश्चित की जाय | लोक अदालत का निर्णय दोनों पक्षों के समझौते पर आधारित है अतः न्यायिक प्रक्रिया का स्वरुप सरल एवं कम लागत का होता है | लोक अदालत दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई कर सकती है तथा लोक अदालत के निर्णय को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती | लोक अदालत एक वैकल्पिक विवाद निराकरण तंत्र है| ग्राम न्यायालय - ग्राम न्यायालय का गठन विधि आयोग की अनुशंषा पर ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के प्रावधानों के अंतर्गत किया गया है जो 2 अक्टूबर 2009 को लागू किया गया | ग्राम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय का निम्नतम स्तर है जिसका मूल उद्देश्य न्याय को जमीनी स्तर तक पहुँचाना है | ग्राम न्यायालय का प्रमुख न्यायाधिकारी (प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट) होता है जिसकी नियुक्ति उच्च न्यायालय की अनुशंषा पर राज्य सरकार द्वारा की जाती है | ग्राम न्यायालय दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों पर सुनवाई कर सकती है जिसमे दीवानी मामलों को जिला न्यायालय तथा फौजदारी मामलों को सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है | अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचार - मोबाइल न्यायालय -दूरस्थ व पिछड़े क्षेत्रों के लिए इसे बनया गया तथा इसका प्रयोग ग्राम न्यायालय भी करता है | त्वरित न्यायालय -जेल प्रशासन व्यय को कम करना , कैदियों को जल्द न्याय दिलाने व ऐसे मामले जिन्हें जल्द से जल्द निपटाना अनिवार्य हो , जैसे- बलात्कार इत्यादि | इसका गठन जिला न्यायालय के स्तर पर किया जाता है | ई -कोर्ट - ऐसे में सूचना संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का प्रयोग कर न्यायालय, पुलिस , जेल, फोरेंसिक को जोड़ा जाता है और आपराधिक मामले की सुनवाई की जाती है | परिवार न्यायालय - पारिवारिक संबंधी मुद्दे जैसे - तलाक, रख रखाव , बच्चों की कस्टडी जैसे संवेदनशील मुद्दों का निपटारा किया जाता है | वास्तव में उपरोक्त सभी लगभग जिला स्तर पर गठित न्यायलय हैं और इस स्तर पर ज्यादा मामले आते हैं , यदि इसको सही तरीके से संचालित किया जाए तो सुप्रीम कोर्ट अपने मूल उद्देश्य को सही तरीके से सुनिश्चित कर सकेगा |
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पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का विश्लेषण कीजिये । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Analyze various factors that affect the distribution of temperature on the Earth. (150-200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण : पृथ्वी पर तापमान के वितरण की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : पृथ्वी पर सूर्य ताप का वितरण एकसमान नहीं होता है । किसी स्थान विशेष पर तापमान को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं । सामान्यतः पृथ्वी पर तापमान के वितरण को क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर रूप में दर्शाया जाता है । मानचित्र पर तापमान का क्षैतिज वितरण सामान्यतः समताप रेखाओं की सहायता से दर्शाया जाता है । पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं जिनमें प्रमुख को हम निम्न रूपों में देख सकते हैं : 1. अक्षांश : अक्षांश सौर किरण के आपतित कोण व दिन की लंबाई को प्रभावित करता है जिससे तीव्रता व ऊष्मा की मात्रा प्रभावित होती है । आपतन कोण तथा दिन की लंबाई का निर्धारन अक्षांश के अनुसार होता है इसलिए एक अक्षांश पर अवस्थित सूर्य- पृथ्वी संबंध समान होगा । यदि सौर प्रकाश को एक मात्र कारण माना जाए तो एक अक्षांश के सारे बिन्दुओं का तापमान समान होगा । समताप रेखाएँ अक्षांश के आसपास ही घूमती हैं क्योंकि सौर प्रकाश तापमान को प्रभावित करने वाला सर्वप्रमुख कारक है । 2. स्थल व जल का वितरण : समताप रेखा के विचलन का सर्वप्रमुख कारण स्थल व जल का वितरण है । दिन के समय में स्थलीय भाग में ऊर्जा का प्रवेश अपेक्षाकृत कम होने के कारण तापमान अधिक क्योंकि प्रति इकाई क्षेत्रफल में ऊर्जा की मात्रा अधिक । इसके विपरीत रात के समय स्थलीय भाग में ऊर्ध्वाधर दिशा में तापीय प्रवणता अधिक होने के कारण पार्थिव विकिरण अधिक इसके परिणाम स्वरूप तेजी से ठंढा होता है । स्थलीय क्षेत्र का ग्रीष्म ऋतु में औसत तापमान अधिक जबकि शीत ऋतु में औसत तापमान कम । यही कारण है कि ग्रीष्म काल में समताप रेखाएँ स्थल की ओर से चलते हुए ध्रुव की ओर मुड़ती हैं जबकि जलीय क्षेत्र से चलते हुए विषुवत रेखा की ओर मुड़ती हैं । शीत ऋतु में स्थिति इसके विपरीत होती है । दक्षिणी गोलार्द्ध में महाद्वीपीय भागों कि कमी के कारण , तापमान पर महासागरों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है । 3. समुद्र तल से ऊँचाई : सामान्यतः वायुमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में कमी होती है , इसे सामान्य पतन दर कहते हैं । समान्यतः 165 मीटर पर 1 डिग्री सेल्सियस की कमी होती है । ऊँचाई बढ़ने से वायुमंडलीय घनत्व में कमी आती है परिणामस्वरूप अवशोषित ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है । यही कारण है कि समान अक्षांश वाले अधिक ऊंचाई वाले स्थलों कि तुलना में कम ऊंचाई वाले स्थलों का तापमान अधिक होता है । 4. पवन तथा समुद्री धाराएँ : गर्म व ठंडी समुद्री जलधारा तथा गर्म व ठंडी पवनों की उपस्थिती के कारण भी स्थलीय तापमान प्रभावित होता है । इसका उदाहरण हम उत्तरी अटलांटिक महासागर में गल्फ स्ट्रीम की धारा के संदर्भ में देख सकते हैं । 5. समुद्र से दूरी : समुद्र से दूरी बढ़ने पर समुद्र का समकारी प्रभाव घटने लगता है । इसके परिणामस्वरूप तापमान ग्रीष्म काल में अधिक व शीत काल में कम हो जाता है । साथ ही वार्षिक तापांतर भी बढ़ता है । 6. धरातलीय प्रकृति : दैनिक तापांतर मरुस्थलीय क्षेत्र में अधिक। इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि पृथ्वी पर तापमान का वितरण उपरोक्त कारकों के सम्मिलित प्रभाव पर निर्भर करता है ।
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##Question:पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का विश्लेषण कीजिये । ( 150-200 शब्द/10 अंक ) Analyze various factors that affect the distribution of temperature on the Earth. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : पृथ्वी पर तापमान के वितरण की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : पृथ्वी पर सूर्य ताप का वितरण एकसमान नहीं होता है । किसी स्थान विशेष पर तापमान को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं । सामान्यतः पृथ्वी पर तापमान के वितरण को क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर रूप में दर्शाया जाता है । मानचित्र पर तापमान का क्षैतिज वितरण सामान्यतः समताप रेखाओं की सहायता से दर्शाया जाता है । पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं जिनमें प्रमुख को हम निम्न रूपों में देख सकते हैं : 1. अक्षांश : अक्षांश सौर किरण के आपतित कोण व दिन की लंबाई को प्रभावित करता है जिससे तीव्रता व ऊष्मा की मात्रा प्रभावित होती है । आपतन कोण तथा दिन की लंबाई का निर्धारन अक्षांश के अनुसार होता है इसलिए एक अक्षांश पर अवस्थित सूर्य- पृथ्वी संबंध समान होगा । यदि सौर प्रकाश को एक मात्र कारण माना जाए तो एक अक्षांश के सारे बिन्दुओं का तापमान समान होगा । समताप रेखाएँ अक्षांश के आसपास ही घूमती हैं क्योंकि सौर प्रकाश तापमान को प्रभावित करने वाला सर्वप्रमुख कारक है । 2. स्थल व जल का वितरण : समताप रेखा के विचलन का सर्वप्रमुख कारण स्थल व जल का वितरण है । दिन के समय में स्थलीय भाग में ऊर्जा का प्रवेश अपेक्षाकृत कम होने के कारण तापमान अधिक क्योंकि प्रति इकाई क्षेत्रफल में ऊर्जा की मात्रा अधिक । इसके विपरीत रात के समय स्थलीय भाग में ऊर्ध्वाधर दिशा में तापीय प्रवणता अधिक होने के कारण पार्थिव विकिरण अधिक इसके परिणाम स्वरूप तेजी से ठंढा होता है । स्थलीय क्षेत्र का ग्रीष्म ऋतु में औसत तापमान अधिक जबकि शीत ऋतु में औसत तापमान कम । यही कारण है कि ग्रीष्म काल में समताप रेखाएँ स्थल की ओर से चलते हुए ध्रुव की ओर मुड़ती हैं जबकि जलीय क्षेत्र से चलते हुए विषुवत रेखा की ओर मुड़ती हैं । शीत ऋतु में स्थिति इसके विपरीत होती है । दक्षिणी गोलार्द्ध में महाद्वीपीय भागों कि कमी के कारण , तापमान पर महासागरों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है । 3. समुद्र तल से ऊँचाई : सामान्यतः वायुमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान में कमी होती है , इसे सामान्य पतन दर कहते हैं । समान्यतः 165 मीटर पर 1 डिग्री सेल्सियस की कमी होती है । ऊँचाई बढ़ने से वायुमंडलीय घनत्व में कमी आती है परिणामस्वरूप अवशोषित ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है । यही कारण है कि समान अक्षांश वाले अधिक ऊंचाई वाले स्थलों कि तुलना में कम ऊंचाई वाले स्थलों का तापमान अधिक होता है । 4. पवन तथा समुद्री धाराएँ : गर्म व ठंडी समुद्री जलधारा तथा गर्म व ठंडी पवनों की उपस्थिती के कारण भी स्थलीय तापमान प्रभावित होता है । इसका उदाहरण हम उत्तरी अटलांटिक महासागर में गल्फ स्ट्रीम की धारा के संदर्भ में देख सकते हैं । 5. समुद्र से दूरी : समुद्र से दूरी बढ़ने पर समुद्र का समकारी प्रभाव घटने लगता है । इसके परिणामस्वरूप तापमान ग्रीष्म काल में अधिक व शीत काल में कम हो जाता है । साथ ही वार्षिक तापांतर भी बढ़ता है । 6. धरातलीय प्रकृति : दैनिक तापांतर मरुस्थलीय क्षेत्र में अधिक। इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि पृथ्वी पर तापमान का वितरण उपरोक्त कारकों के सम्मिलित प्रभाव पर निर्भर करता है ।
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लोक अदालत व ग्राम न्यायालय के विशेष सन्दर्भ में, विगत वर्षों में न्यायिक क्षेत्र में किये जाने वाले विभिन्न नवाचारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) In the special context of Lok Adalat and Gram Nyayalaya, briefly discuss various innovations being done in judicial area in the last years. (150-200 words)
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एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक अदालत को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात ग्राम न्यायालय के बारे में भी बताइए | अंत में अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक अदालत व ग्राम न्यायालय दोनों का गठन संविधान के अनुच्छेद 39 A के सन्दर्भ में किया गया है | और दोनों अदालते न्यायिक नवाचार का परिणाम हैं | लोक अदालत - इसका गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अंतर्गत किया गया, जिसका मौलिक उद्देश्य न्याय को व्यक्ति के द्वार तक पहुंचाने से है | लोक अदालत की न्यायिक प्रक्रिया को अधिक लचीला, सरल तथा अल्प लागत व व्यय वाला बनाया गया है, जिससे सम्बंधित न्याय को सुनिश्चित कर जन भागीदारी को बढाया जाय, लोगों की पहुँच सुनिश्चित की जाय | लोक अदालत का निर्णय दोनों पक्षों के समझौते पर आधारित है अतः न्यायिक प्रक्रिया का स्वरुप सरल एवं कम लागत का होता है | लोक अदालत दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई कर सकती है तथा लोक अदालत के निर्णय को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती | लोक अदालत एक वैकल्पिक विवाद निराकरण तंत्र है | ग्राम न्यायालय - ग्राम न्यायालय का गठन विधि आयोग की अनुशंषा पर ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के प्रावधानों के अंतर्गत किया गया है जो 2 अक्टूबर 2009 को लागू किया गया | ग्राम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय का निम्नतम स्तर है जिसका मूल उद्देश्य न्याय को जमीनी स्तर तक पहुँचाना है | ग्राम न्यायालय का प्रमुख न्यायाधिकारी (प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट) होता है जिसकी नियुक्ति उच्च न्यायालय की अनुशंषा पर राज्य सरकार द्वारा की जाती है | ग्राम न्यायालय दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों पर सुनवाई कर सकती है जिसमे दीवानी मामलों को जिला न्यायालय तथा फौजदारी मामलों को सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है | अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचार - मोबाइल न्यायालय - दूरस्थ व पिछड़े क्षेत्रों के लिए इसे बनया गया तथा इसका प्रयोग ग्राम न्यायालय भी करता है | त्वरित न्यायालय - जेल प्रशासन व्यय को कम करना , कैदियों को जल्द न्याय दिलाने व ऐसे मामले जिन्हें जल्द से जल्द निपटाना अनिवार्य हो , जैसे- बलात्कार इत्यादि | इसका गठन जिला न्यायालय के स्तर पर किया जाता है | ई -कोर्ट - ऐसे में सूचना संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का प्रयोग कर न्यायालय, पुलिस , जेल, फोरेंसिक को जोड़ा जाता है और आपराधिक मामले की सुनवाई की जाती है | परिवार न्यायालय - पारिवारिक संबंधी मुद्दे जैसे - तलाक, रख रखाव , बच्चों की कस्टडी जैसे संवेदनशील मुद्दों का निपटारा किया जाता है | वास्तव में उपरोक्त सभी लगभग जिला स्तर पर गठित न्यायलय हैं और इस स्तर पर ज्यादा मामले आते हैं , यदि इसको सही तरीके से संचालित किया जाए तो सुप्रीम कोर्ट अपने मूल उद्देश्य को सही तरीके से सुनिश्चित कर सकेगा |
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##Question:लोक अदालत व ग्राम न्यायालय के विशेष सन्दर्भ में, विगत वर्षों में न्यायिक क्षेत्र में किये जाने वाले विभिन्न नवाचारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) In the special context of Lok Adalat and Gram Nyayalaya, briefly discuss various innovations being done in judicial area in the last years. (150-200 words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत लोक अदालत को बताते हुए कीजिये | इसके पश्चात ग्राम न्यायालय के बारे में भी बताइए | अंत में अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचारों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - लोक अदालत व ग्राम न्यायालय दोनों का गठन संविधान के अनुच्छेद 39 A के सन्दर्भ में किया गया है | और दोनों अदालते न्यायिक नवाचार का परिणाम हैं | लोक अदालत - इसका गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अंतर्गत किया गया, जिसका मौलिक उद्देश्य न्याय को व्यक्ति के द्वार तक पहुंचाने से है | लोक अदालत की न्यायिक प्रक्रिया को अधिक लचीला, सरल तथा अल्प लागत व व्यय वाला बनाया गया है, जिससे सम्बंधित न्याय को सुनिश्चित कर जन भागीदारी को बढाया जाय, लोगों की पहुँच सुनिश्चित की जाय | लोक अदालत का निर्णय दोनों पक्षों के समझौते पर आधारित है अतः न्यायिक प्रक्रिया का स्वरुप सरल एवं कम लागत का होता है | लोक अदालत दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों की सुनवाई कर सकती है तथा लोक अदालत के निर्णय को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती | लोक अदालत एक वैकल्पिक विवाद निराकरण तंत्र है | ग्राम न्यायालय - ग्राम न्यायालय का गठन विधि आयोग की अनुशंषा पर ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के प्रावधानों के अंतर्गत किया गया है जो 2 अक्टूबर 2009 को लागू किया गया | ग्राम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय का निम्नतम स्तर है जिसका मूल उद्देश्य न्याय को जमीनी स्तर तक पहुँचाना है | ग्राम न्यायालय का प्रमुख न्यायाधिकारी (प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट) होता है जिसकी नियुक्ति उच्च न्यायालय की अनुशंषा पर राज्य सरकार द्वारा की जाती है | ग्राम न्यायालय दीवानी व फौजदारी दोनों मामलों पर सुनवाई कर सकती है जिसमे दीवानी मामलों को जिला न्यायालय तथा फौजदारी मामलों को सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है | अन्य विभिन्न प्रकार के नवाचार - मोबाइल न्यायालय - दूरस्थ व पिछड़े क्षेत्रों के लिए इसे बनया गया तथा इसका प्रयोग ग्राम न्यायालय भी करता है | त्वरित न्यायालय - जेल प्रशासन व्यय को कम करना , कैदियों को जल्द न्याय दिलाने व ऐसे मामले जिन्हें जल्द से जल्द निपटाना अनिवार्य हो , जैसे- बलात्कार इत्यादि | इसका गठन जिला न्यायालय के स्तर पर किया जाता है | ई -कोर्ट - ऐसे में सूचना संचार प्रौद्योगिकी (ICT) का प्रयोग कर न्यायालय, पुलिस , जेल, फोरेंसिक को जोड़ा जाता है और आपराधिक मामले की सुनवाई की जाती है | परिवार न्यायालय - पारिवारिक संबंधी मुद्दे जैसे - तलाक, रख रखाव , बच्चों की कस्टडी जैसे संवेदनशील मुद्दों का निपटारा किया जाता है | वास्तव में उपरोक्त सभी लगभग जिला स्तर पर गठित न्यायलय हैं और इस स्तर पर ज्यादा मामले आते हैं , यदि इसको सही तरीके से संचालित किया जाए तो सुप्रीम कोर्ट अपने मूल उद्देश्य को सही तरीके से सुनिश्चित कर सकेगा |
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कॉरर्पोरेट गवर्नेंस के लाभों पर विचार प्रकट कीजिए। इसमें उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को स्पष्ट करते हुए इन चुनौतियों को दूर करने हेतु कुछ उपायों को भी बताईए| (150 से 200 शब्द) Consider the benefits of corporate governance. Clarifying the challenges arising in it and suggest some measures to overcome these challenges.(150 TO 200 Words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता एवं लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के क्रियान्वयन की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में चुनौतियों से निपटने के लिए सुझाव दीजिये 5- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| निगम शासन अथवा कॉर्पोरेट गवर्नेंस का आशय ऐसी प्रथा या प्रक्रिया या प्रणाली या सिद्धांतों को निर्धारित किये जाने से है जो यह सुनिश्चित करे कि कम्पनी का शासन इस प्रकार से किया जाय जो सभी पक्षकारों के सर्वोत्तम हितों को प्राप्त कर सके| दूसरे शब्दों में ऐसा गवर्नेंस जिसके माध्यम से कॉर्पोरेट संस्थाओं के संचालन में विभिन्न हितधारकों के अधिकारों एवं जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाता है, जिसका उद्देश्य संसाधनों का इष्टतम उपयोग एवं हितधारकों की संपत्ति में वृद्धि करना होता है, उसे कॉर्पोरेट गवर्नेंस कहते हैं| इसके अनेक लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं कॉर्पोरेट गवर्नेंस का महत्त्व/लाभ जोखिम न्यूनीकरण में सहायक होगा क्योंकि यह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आदि की स्थापना के माध्यम से उद्यमियों को जोखिम लेने के लिए सक्षम बनाता है इससे शेयरधारक का मूल्य बढ़ता है| कॉर्पोरेट सुशासन की स्थापना से कम्पनी के प्रति निवेशकों का विश्वास बढ़ता है जिससे उसके शेयरों का मूल्य बढ़ता है आर्थिक मंदी की स्थिति में कॉर्पोरेट गवर्नेंस निगम की उत्तरजीविता बढाता है क्योंकि विश्वसनीयता के कारण निगमों के बाजार का विस्तार होता है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिकता का अनुपालन किया जाता है जिससे निगम में संगठनात्मक दक्षता आती है| कॉर्पोरेट, निगमों के विलय एवं उनके विकेंद्रीकरण को आसान बनाता है| क्रियान्वयन की चुनौतियाँ किसी भी कॉर्पोरेट में बड़े निवेशकों का एकाधिकारबना हुआ है और इसके कारण नीति निर्माण में बड़े निवेशकों का एकाधिकारहो जाता है| दूसरी और अंशधारकों की रक्षा के लिए उपयुक्त कानूनों की कमी के कारण अंशधारकों के हितों का समुचित संरक्षण नहीं हो पाता है| कॉर्पोरेट में मानवीय मूल्यों के प्रति उत्तरदायित्वबोध की कमी के कारण लोगों और संस्थाओं के अंदर भ्रष्टाचार के प्रति सहनशीलता की विद्यमानताहै भारत में कॉर्पोरेट जगत के विनियमन के लिए कानूनी प्रावधानों की कमी है जिसके कारण कॉर्पोरेट के प्रबंधन एवं क्रियान्वयन की समस्या उत्पन्न होती है| भारत के निजी क्षेत्र का समान रूप से विकास नहीं हुआ है,निजी स्तर पर कॉर्पोरेट जगत ने उद्योगों का विकास श्रमिकों की खपत को ध्यान में रख कर नहीं किया है कुशल श्रमिक नियोजित हो जाते हैं किन्तु अकुशल श्रमिकों का नियोजन नहीं हो पाता है शैक्षिक संस्थानों द्वारा कौशल विकास के सन्दर्भ में आवश्यक योगदान नहीं दिया गया है कॉर्पोरेट जगत में पारदर्शिता का अभाव है| इसके कारण भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न होती है| मानकों में गुणवत्ता का अभाव देखा जाता है| निगमों द्वारा खातों का निर्माण अव्यवस्थित रूप में किया जाता है जिससे अस्पष्टता उत्पन्न होती है| भारत में निगमों द्वारा खातों का प्रकटीकरण न करने पर बल दिया जा रहा है| जैसी मनी लांड्रिंग के लिए विभिन्न शैल कंपनियों का निर्माण किया गया है| इसके कारण धोखाधड़ी के मामलों की विद्यमानता बनी हुई है जो निवेशकों में विश्वास के अभाव को जन्म देती है छद्म कम्पनियों की अधिक संख्या के कारण सरकार द्वारा इनका पर्याप्त विनियमन नही हो पाता कॉर्पोरेट से अधिक अपेक्षा करना एवं उनके अनुकूल पर्यावरण को निर्मित न करना कॉर्पोरेट की उत्पादकता को कमजोर करता है| कॉर्पोरेट के अनुकूल सामाजिक संरचनाओं की कमी जैसे भौतिक अवसंरचना, व्यावसायिक शिक्षा संरचना का अभाव आदि के कारण कॉर्पोरेट गवर्नेंस की स्थापना चुनौतीपूर्ण हो जाती है| चुनौतियों को दूर करने हेतु सुझाव भारतीय कॉरर्पोरेट को विश्वास आधारित कॉरर्पोरेट में परिवर्तित करने के अवश्यकता है कंपनियों के मूल्यांकन के लिए मानदंडो का निर्धारण ,सामाजिक आचरण , सेवाप्रदर्शन, उत्पाद गुणवत्ता पर आधारित करने की आवश्यकता है भारत में कंपनियों के ऑडिट और लेखांकन के लिए उपयुक्त मशीनरी का निर्माण किया जाना चाहिए और CAG को कॉर्पोरेट जगत मे काम करने की स्वायतता मे वृद्धि करनी चाहिए कॉरर्पोरेट जगत को प्राप्त होने वाले ऋणों मे अनियमितता को दूर करने की लिए संवैधानिक स्तर पर एक व्यवस्था निर्मित करनी चाहिए जो उद्योगो को मिलने वाले ऋणों और वसूली प्रक्रिया का नियमन और नियंत्रण कर सके कॉर्पोरेट गवर्नेंस उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करने, निगम का औचित्यपूर्ण प्रबंधन करने, शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने, शेयरधारकों के आधिकारिक निर्धारण करने तथा निगम की विश्वसनीयता को निरंतर बढाने में सहायक होता है| इन गुणों के माध्यम से यह निगमों का सतत और समावेशी एवं दक्षतापूर्ण विकास करता है| कम्पनी या निगम के द्वारा समाज के सर्वांगीण विकास हेतु योगदान दिए जाते हैं जो कि कम्पनी या निगम पर समाज की निर्भरता को दर्शाती है| इसके साथ साथ कम्पनी या निगम को समाज के द्वारा विभिन्न प्रकार के संसाधन प्रदान किये जाते हैं जैसे मानवीय संसाधन, तकनीकी संसाधन एवं वित्तीय संसाधन| अतः ऐसे स्थिति में यह आवश्यक है कि कंपनी के द्वारा सामाजिक मूल्यों एवं नैतिकता का अनुपालन किया जाए|
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##Question:कॉरर्पोरेट गवर्नेंस के लाभों पर विचार प्रकट कीजिए। इसमें उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को स्पष्ट करते हुए इन चुनौतियों को दूर करने हेतु कुछ उपायों को भी बताईए| (150 से 200 शब्द) Consider the benefits of corporate governance. Clarifying the challenges arising in it and suggest some measures to overcome these challenges.(150 TO 200 Words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता एवं लाभों को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के क्रियान्वयन की चुनौतियों को स्पष्ट कीजिये 4- तीसरे भाग में चुनौतियों से निपटने के लिए सुझाव दीजिये 5- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| निगम शासन अथवा कॉर्पोरेट गवर्नेंस का आशय ऐसी प्रथा या प्रक्रिया या प्रणाली या सिद्धांतों को निर्धारित किये जाने से है जो यह सुनिश्चित करे कि कम्पनी का शासन इस प्रकार से किया जाय जो सभी पक्षकारों के सर्वोत्तम हितों को प्राप्त कर सके| दूसरे शब्दों में ऐसा गवर्नेंस जिसके माध्यम से कॉर्पोरेट संस्थाओं के संचालन में विभिन्न हितधारकों के अधिकारों एवं जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाता है, जिसका उद्देश्य संसाधनों का इष्टतम उपयोग एवं हितधारकों की संपत्ति में वृद्धि करना होता है, उसे कॉर्पोरेट गवर्नेंस कहते हैं| इसके अनेक लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं कॉर्पोरेट गवर्नेंस का महत्त्व/लाभ जोखिम न्यूनीकरण में सहायक होगा क्योंकि यह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आदि की स्थापना के माध्यम से उद्यमियों को जोखिम लेने के लिए सक्षम बनाता है इससे शेयरधारक का मूल्य बढ़ता है| कॉर्पोरेट सुशासन की स्थापना से कम्पनी के प्रति निवेशकों का विश्वास बढ़ता है जिससे उसके शेयरों का मूल्य बढ़ता है आर्थिक मंदी की स्थिति में कॉर्पोरेट गवर्नेंस निगम की उत्तरजीविता बढाता है क्योंकि विश्वसनीयता के कारण निगमों के बाजार का विस्तार होता है| कॉर्पोरेट गवर्नेंस में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिकता का अनुपालन किया जाता है जिससे निगम में संगठनात्मक दक्षता आती है| कॉर्पोरेट, निगमों के विलय एवं उनके विकेंद्रीकरण को आसान बनाता है| क्रियान्वयन की चुनौतियाँ किसी भी कॉर्पोरेट में बड़े निवेशकों का एकाधिकारबना हुआ है और इसके कारण नीति निर्माण में बड़े निवेशकों का एकाधिकारहो जाता है| दूसरी और अंशधारकों की रक्षा के लिए उपयुक्त कानूनों की कमी के कारण अंशधारकों के हितों का समुचित संरक्षण नहीं हो पाता है| कॉर्पोरेट में मानवीय मूल्यों के प्रति उत्तरदायित्वबोध की कमी के कारण लोगों और संस्थाओं के अंदर भ्रष्टाचार के प्रति सहनशीलता की विद्यमानताहै भारत में कॉर्पोरेट जगत के विनियमन के लिए कानूनी प्रावधानों की कमी है जिसके कारण कॉर्पोरेट के प्रबंधन एवं क्रियान्वयन की समस्या उत्पन्न होती है| भारत के निजी क्षेत्र का समान रूप से विकास नहीं हुआ है,निजी स्तर पर कॉर्पोरेट जगत ने उद्योगों का विकास श्रमिकों की खपत को ध्यान में रख कर नहीं किया है कुशल श्रमिक नियोजित हो जाते हैं किन्तु अकुशल श्रमिकों का नियोजन नहीं हो पाता है शैक्षिक संस्थानों द्वारा कौशल विकास के सन्दर्भ में आवश्यक योगदान नहीं दिया गया है कॉर्पोरेट जगत में पारदर्शिता का अभाव है| इसके कारण भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न होती है| मानकों में गुणवत्ता का अभाव देखा जाता है| निगमों द्वारा खातों का निर्माण अव्यवस्थित रूप में किया जाता है जिससे अस्पष्टता उत्पन्न होती है| भारत में निगमों द्वारा खातों का प्रकटीकरण न करने पर बल दिया जा रहा है| जैसी मनी लांड्रिंग के लिए विभिन्न शैल कंपनियों का निर्माण किया गया है| इसके कारण धोखाधड़ी के मामलों की विद्यमानता बनी हुई है जो निवेशकों में विश्वास के अभाव को जन्म देती है छद्म कम्पनियों की अधिक संख्या के कारण सरकार द्वारा इनका पर्याप्त विनियमन नही हो पाता कॉर्पोरेट से अधिक अपेक्षा करना एवं उनके अनुकूल पर्यावरण को निर्मित न करना कॉर्पोरेट की उत्पादकता को कमजोर करता है| कॉर्पोरेट के अनुकूल सामाजिक संरचनाओं की कमी जैसे भौतिक अवसंरचना, व्यावसायिक शिक्षा संरचना का अभाव आदि के कारण कॉर्पोरेट गवर्नेंस की स्थापना चुनौतीपूर्ण हो जाती है| चुनौतियों को दूर करने हेतु सुझाव भारतीय कॉरर्पोरेट को विश्वास आधारित कॉरर्पोरेट में परिवर्तित करने के अवश्यकता है कंपनियों के मूल्यांकन के लिए मानदंडो का निर्धारण ,सामाजिक आचरण , सेवाप्रदर्शन, उत्पाद गुणवत्ता पर आधारित करने की आवश्यकता है भारत में कंपनियों के ऑडिट और लेखांकन के लिए उपयुक्त मशीनरी का निर्माण किया जाना चाहिए और CAG को कॉर्पोरेट जगत मे काम करने की स्वायतता मे वृद्धि करनी चाहिए कॉरर्पोरेट जगत को प्राप्त होने वाले ऋणों मे अनियमितता को दूर करने की लिए संवैधानिक स्तर पर एक व्यवस्था निर्मित करनी चाहिए जो उद्योगो को मिलने वाले ऋणों और वसूली प्रक्रिया का नियमन और नियंत्रण कर सके कॉर्पोरेट गवर्नेंस उपयुक्त लक्ष्यों का निर्धारण करने, निगम का औचित्यपूर्ण प्रबंधन करने, शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने, शेयरधारकों के आधिकारिक निर्धारण करने तथा निगम की विश्वसनीयता को निरंतर बढाने में सहायक होता है| इन गुणों के माध्यम से यह निगमों का सतत और समावेशी एवं दक्षतापूर्ण विकास करता है| कम्पनी या निगम के द्वारा समाज के सर्वांगीण विकास हेतु योगदान दिए जाते हैं जो कि कम्पनी या निगम पर समाज की निर्भरता को दर्शाती है| इसके साथ साथ कम्पनी या निगम को समाज के द्वारा विभिन्न प्रकार के संसाधन प्रदान किये जाते हैं जैसे मानवीय संसाधन, तकनीकी संसाधन एवं वित्तीय संसाधन| अतः ऐसे स्थिति में यह आवश्यक है कि कंपनी के द्वारा सामाजिक मूल्यों एवं नैतिकता का अनुपालन किया जाए|
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तापमान व्युत्क्रम/प्रतिलोमन से आप क्या समझते हैं? इसके लिए अनुकूल परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए, मौसम और स्थानीय निवासियों पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by temperature inversion? Mention the favorable conditions for this and explain the effects on weather and local habitants. (150-200 words/10 Marks)
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संक्षिप्त दृष्टिकोण: तापमान व्युत्क्रम को परिभाषित कीजिए। इसके बाद इस घटना के लिए अनुकूल परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए। दूसरे भाग में पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए। समान्यतः तापमान ऊंचाई के साथ घटता है जिसे ह्रास दर कहते हैं लेकिन जब तापमान ऊंचाई के साथ बढ़ता है तो इसे तापमान व्युत्क्रमण कहा जाता है। तापमान व्युत्क्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ: शीत ऋतु की लंबी रातें शांत पवनें मरुस्थलीय क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्र की उपस्थिति वाताग्र निर्माण की अनुकूल परिस्थितियाँ मौसम और स्थानीय निवासियों पर पड़ने वाले प्रभाव: तापमान में कमी के कारण धुंध और कोहरे के कारण यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। यातायात समस्या से सामान्य कार्य प्रभावित होते हैं। दुर्घटनाएं बढ़ती हैं। तापमान व्युत्क्रमण के कारण वायुमंडल के निचले भाग में प्रदूषण में वृद्धि होती है क्योंकि वायु का संचलन नहीं हो पाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह परिघटना पाले से पौधों की रक्षा करती है। इस प्रकार यह परिघटना भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण है जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ते हैं।
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##Question:तापमान व्युत्क्रम/प्रतिलोमन से आप क्या समझते हैं? इसके लिए अनुकूल परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए, मौसम और स्थानीय निवासियों पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by temperature inversion? Mention the favorable conditions for this and explain the effects on weather and local habitants. (150-200 words/10 Marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: तापमान व्युत्क्रम को परिभाषित कीजिए। इसके बाद इस घटना के लिए अनुकूल परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए। दूसरे भाग में पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए। समान्यतः तापमान ऊंचाई के साथ घटता है जिसे ह्रास दर कहते हैं लेकिन जब तापमान ऊंचाई के साथ बढ़ता है तो इसे तापमान व्युत्क्रमण कहा जाता है। तापमान व्युत्क्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ: शीत ऋतु की लंबी रातें शांत पवनें मरुस्थलीय क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्र की उपस्थिति वाताग्र निर्माण की अनुकूल परिस्थितियाँ मौसम और स्थानीय निवासियों पर पड़ने वाले प्रभाव: तापमान में कमी के कारण धुंध और कोहरे के कारण यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। यातायात समस्या से सामान्य कार्य प्रभावित होते हैं। दुर्घटनाएं बढ़ती हैं। तापमान व्युत्क्रमण के कारण वायुमंडल के निचले भाग में प्रदूषण में वृद्धि होती है क्योंकि वायु का संचलन नहीं हो पाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह परिघटना पाले से पौधों की रक्षा करती है। इस प्रकार यह परिघटना भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण है जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ते हैं।
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ई-गवर्नेंस के विभिन्न प्रकारों को बताते हुए इसके उद्देश्यों को विस्तार से बताईए।(150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain the different types of e-governance and elaborate its objectives. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- ई-गवर्नेंस को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| उत्तर के मुख्य भाग में, ई-गवर्नेंस के विभिन्न प्रकारों को बताते हुए इसके उद्देश्यों को विस्तार से बताईए। उत्तर- विश्व बैंक के अनुसार, "ई-गवर्नेंस, सरकारी एजेंसियों द्वारा सूचना प्रौद्योगिकियों(जैसे- वाइड एरिया नेटवर्क; इंटरनेट; मोबाइल कंप्यूटिंग आदि) के उपयोग को संदर्भित करता है| इनमें वैसी प्रौद्योगिकियां आती हैं जो नागरिकों, व्यवसायों तथा सरकार की अन्य शाखाओं के साथ संबंधों को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं| अर्थात, ई-प्रशासन या ई-गवर्नेंसप्रौद्योगिकी के आधार पर किया गया ऐसा शासन है जो भिन्न-भिन्न संरचनाओं के बीच समन्वय को सुलभ बनाता है जिसमें इलेक्ट्रॉनिक एवं उच्च तकनीकी का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है| ये प्रौद्योगिकियां निम्न उद्देश्यों की पूर्ति कर सकती हैं- नागरिकों को सरकारी सेवाओं का बेहतर वितरण; व्यापार तथा उद्योग के साथ बेहतर अंतःक्रिया; सूचना तक पहुँच के माध्यम से नागरिकों का सशक्तिकरण; सरकारी सेवाओं का बेहतर प्रबंधन; भ्रष्टाचार में कमी तथा पारदर्शिता में वृद्धि; शासन व्यवस्था को SMART बनाना अर्थात सरल, नैतिक, उत्तरदायी, अनुक्रियाशील और पारदर्शी बनाना; अंतःक्रिया को सरल बनाना आदि; उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने "प्रोमोटिंग ई-गवर्नेंस- स्मार्ट वे फॉरवर्ड(2008)" नामक रिपोर्ट में ई-गवर्नेंस के 4 प्रतिमान सुनिश्चित किये- सरकार से नागरिक तक(G टू C मॉडल) - इस मॉडल का संबंध नागरिकों द्वारा साझा किये जाने वाले सरकारी सेवाओं से है| इसके तहत शासन तथा नागरिकों के बीच अंतःक्रिया स्थापित की जाती है| इस प्रतिमान का उद्देश्य मित्रवत शासन की स्थापना है ताकि सेवाओं का गुणवतामय आपूर्ति, उपलब्धता तथा पहुँच आदि को बढ़ाया जा सके| जैसे- ऑनलाइन बिलों का भुगतान; शिकायतों का ऑनलाइन निपटारा आदि| सरकार से व्यवसायी तक(G टू B मॉडल) -इस मॉडल के माध्यम से निजी क्षेत्र तथा सरकार के बीच संबंधों में मजबूती आती है| इसका उद्देश्य सरकार के साथ सौदेबाजी करते समय लालफीताशाही में कटौती करना, समय बचाना, कार्य संचालन लागत को घटाना तथा एक अधिक पारदर्शी व्यापारिक वातावरण का निर्माण करना होता है| यह प्रतिमान विनियमनात्मक और प्रोत्साहनात्मक को बढ़ावा देता है| जैसे- करों की उगाही; बिलों तथा पेनाल्टी का भुगतान; इज ऑफ़ डूइंग बिज़नस को बढ़ाना आदि| सरकार से सरकार तक(G टू G मॉडल) - इस प्रतिमान में सरकार के अंदर आतंरिक वार्तालाप को निर्धारित किया जाता है|ऐसी बहुत सीजानकारियां एवं सूचनाएं होती हैं जिन्हें विविध सरकारी एजेंसियों, विभागों तथा संगठनों के बीच साझा किये जाने की आवश्यकता होती है| जैसे-सरकारी दस्तावेजों का आदान-प्रदान तथा भंडारण; वित्तीय तथा बजट संबंधी कार्य आदि| इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य शासन की दक्षता, निष्पादन और निर्गत को बढ़ाना एवं समाज के हितों के अनुकूल बनाना होता है| यही कारण है कि इस प्रतिमान में अंतःक्रिया की क्षैतिज, उर्ध्वाधर और विकर्ण व्यवस्थाओं को महत्व दिया जाता है| सरकार से कर्मचारियों तक(G टू E मॉडल) - चूँकि सरकार सबसे बड़ी नियोक्ता होती है अतः किसी भी संगठन की तरह इसे भी अपने कर्मचारियों के साथ नियमित आधार पर वार्ता करनी होती है ताकि कर्मचारियों के द्वारा दायित्वों का निर्वहन उपयुक्त हो सके, उनके अंदर सुरक्षा की भावना विकसित हो सके और असंतोष की प्रवृति को रोका जा सके| यह प्रतिमान द्विमार्गी वार्ता पर आधारित होता है अर्थात अंतःक्रिया में तीव्रता, प्रभाविता एवं संतुष्टि का स्तर बढ़ना चाहिए| इसके तहत निम्न आयामआते हैं- विभिन्न सरकारी कार्यालयों में विभिन्न प्रकार के आंकड़ों को जमा किया जाना; कर्मचारियों द्वारा ऑनलाइन शिकायत दायर करना आदि| ई-गवर्नेंस के उपरोक्त सभी मॉडल्स के माध्यम से तीव्र, सुविधाजनक एवं लागत प्रभावी सेवा वितरण को सुलभ बनाया जाता है जिससे पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व को बढ़ावा मिलता है तथा भ्रष्टाचार में कमी आती है| यह शासन को अधिक विस्तारित करने के साथ-साथ सूचना के माध्यम से लोगों का सशक्तिकरण करता है तथा व्यापार एवं उद्योग के साथ इंटरफ़ेस में सुधार करता है|
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##Question:ई-गवर्नेंस के विभिन्न प्रकारों को बताते हुए इसके उद्देश्यों को विस्तार से बताईए।(150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain the different types of e-governance and elaborate its objectives. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- ई-गवर्नेंस को परिभाषित करते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| उत्तर के मुख्य भाग में, ई-गवर्नेंस के विभिन्न प्रकारों को बताते हुए इसके उद्देश्यों को विस्तार से बताईए। उत्तर- विश्व बैंक के अनुसार, "ई-गवर्नेंस, सरकारी एजेंसियों द्वारा सूचना प्रौद्योगिकियों(जैसे- वाइड एरिया नेटवर्क; इंटरनेट; मोबाइल कंप्यूटिंग आदि) के उपयोग को संदर्भित करता है| इनमें वैसी प्रौद्योगिकियां आती हैं जो नागरिकों, व्यवसायों तथा सरकार की अन्य शाखाओं के साथ संबंधों को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं| अर्थात, ई-प्रशासन या ई-गवर्नेंसप्रौद्योगिकी के आधार पर किया गया ऐसा शासन है जो भिन्न-भिन्न संरचनाओं के बीच समन्वय को सुलभ बनाता है जिसमें इलेक्ट्रॉनिक एवं उच्च तकनीकी का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है| ये प्रौद्योगिकियां निम्न उद्देश्यों की पूर्ति कर सकती हैं- नागरिकों को सरकारी सेवाओं का बेहतर वितरण; व्यापार तथा उद्योग के साथ बेहतर अंतःक्रिया; सूचना तक पहुँच के माध्यम से नागरिकों का सशक्तिकरण; सरकारी सेवाओं का बेहतर प्रबंधन; भ्रष्टाचार में कमी तथा पारदर्शिता में वृद्धि; शासन व्यवस्था को SMART बनाना अर्थात सरल, नैतिक, उत्तरदायी, अनुक्रियाशील और पारदर्शी बनाना; अंतःक्रिया को सरल बनाना आदि; उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने "प्रोमोटिंग ई-गवर्नेंस- स्मार्ट वे फॉरवर्ड(2008)" नामक रिपोर्ट में ई-गवर्नेंस के 4 प्रतिमान सुनिश्चित किये- सरकार से नागरिक तक(G टू C मॉडल) - इस मॉडल का संबंध नागरिकों द्वारा साझा किये जाने वाले सरकारी सेवाओं से है| इसके तहत शासन तथा नागरिकों के बीच अंतःक्रिया स्थापित की जाती है| इस प्रतिमान का उद्देश्य मित्रवत शासन की स्थापना है ताकि सेवाओं का गुणवतामय आपूर्ति, उपलब्धता तथा पहुँच आदि को बढ़ाया जा सके| जैसे- ऑनलाइन बिलों का भुगतान; शिकायतों का ऑनलाइन निपटारा आदि| सरकार से व्यवसायी तक(G टू B मॉडल) -इस मॉडल के माध्यम से निजी क्षेत्र तथा सरकार के बीच संबंधों में मजबूती आती है| इसका उद्देश्य सरकार के साथ सौदेबाजी करते समय लालफीताशाही में कटौती करना, समय बचाना, कार्य संचालन लागत को घटाना तथा एक अधिक पारदर्शी व्यापारिक वातावरण का निर्माण करना होता है| यह प्रतिमान विनियमनात्मक और प्रोत्साहनात्मक को बढ़ावा देता है| जैसे- करों की उगाही; बिलों तथा पेनाल्टी का भुगतान; इज ऑफ़ डूइंग बिज़नस को बढ़ाना आदि| सरकार से सरकार तक(G टू G मॉडल) - इस प्रतिमान में सरकार के अंदर आतंरिक वार्तालाप को निर्धारित किया जाता है|ऐसी बहुत सीजानकारियां एवं सूचनाएं होती हैं जिन्हें विविध सरकारी एजेंसियों, विभागों तथा संगठनों के बीच साझा किये जाने की आवश्यकता होती है| जैसे-सरकारी दस्तावेजों का आदान-प्रदान तथा भंडारण; वित्तीय तथा बजट संबंधी कार्य आदि| इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य शासन की दक्षता, निष्पादन और निर्गत को बढ़ाना एवं समाज के हितों के अनुकूल बनाना होता है| यही कारण है कि इस प्रतिमान में अंतःक्रिया की क्षैतिज, उर्ध्वाधर और विकर्ण व्यवस्थाओं को महत्व दिया जाता है| सरकार से कर्मचारियों तक(G टू E मॉडल) - चूँकि सरकार सबसे बड़ी नियोक्ता होती है अतः किसी भी संगठन की तरह इसे भी अपने कर्मचारियों के साथ नियमित आधार पर वार्ता करनी होती है ताकि कर्मचारियों के द्वारा दायित्वों का निर्वहन उपयुक्त हो सके, उनके अंदर सुरक्षा की भावना विकसित हो सके और असंतोष की प्रवृति को रोका जा सके| यह प्रतिमान द्विमार्गी वार्ता पर आधारित होता है अर्थात अंतःक्रिया में तीव्रता, प्रभाविता एवं संतुष्टि का स्तर बढ़ना चाहिए| इसके तहत निम्न आयामआते हैं- विभिन्न सरकारी कार्यालयों में विभिन्न प्रकार के आंकड़ों को जमा किया जाना; कर्मचारियों द्वारा ऑनलाइन शिकायत दायर करना आदि| ई-गवर्नेंस के उपरोक्त सभी मॉडल्स के माध्यम से तीव्र, सुविधाजनक एवं लागत प्रभावी सेवा वितरण को सुलभ बनाया जाता है जिससे पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व को बढ़ावा मिलता है तथा भ्रष्टाचार में कमी आती है| यह शासन को अधिक विस्तारित करने के साथ-साथ सूचना के माध्यम से लोगों का सशक्तिकरण करता है तथा व्यापार एवं उद्योग के साथ इंटरफ़ेस में सुधार करता है|
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समान नागरिक संहिता से आप क्या समझते है ? क्या आप मानते हैं कि समय आ गया है कि भारत में समान नागरिक संहिता को पूर्णतः अपनाया जाना चाहिए । ( 150-200 शब्द , अंक-10 ) What do you understand by Uniform Civil Code? Do you believe that the time has come that the Uniform Civil Code should be fully adopted in India. (150-200 words, Marks -10 )
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दृष्टिकोण: 1. भूमिका में समान नागरिक संहिता को स्पष्ट कीजिये| 2. समान नागरिक संहिता को पूर्णतः अपनाए जाने के पक्ष-विपक्ष की चर्चा कीजिए| 3. संतुलित निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: भारतीय संविधान के भाग 4 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व) के तहत अनुच्छेद 44 के अनुसार भारत के समस्त नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता होगी। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि, भारत के सभी धर्मों के नागरिकों के लिये एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून होना चाहिये। संविधान के संस्थापकों ने राज्य के नीति निदेशक तत्त्व के माध्यम से इसको लागू करने की ज़िम्मेदारी बाद की सरकारों को हस्तांतरित कर दी थी। समान नागरिकता संहिता के अंतर्गत व्यक्तिगत कानून, संपत्ति संबंधी कानून और विवाह, तलाक तथा गोद लेने से संबंधित कानूनों में मतभिन्नता है। समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क: भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन के माध्यम से धर्मनिरपेक्षता शब्द को प्रविष्ट किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान का उद्देश्य भारत के समस्त नागरिकों के साथ धार्मिक आधार पर किसी भी भेदभाव को समाप्त करना है लेकिन वर्तमान समय तक समान नागरिक संहिता के लागू न हो पाने के कारण भारत में एक बड़ा वर्ग अभी भी धार्मिक कानूनों की वजह से अपने अधिकारों से वंचित है। मूल अधिकारों मेंविधि के शासनकी अवधारणा विद्यमान है लेकिन इन्हीं अवधारणाओं के बीच लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियाँ भी व्याप्त हैं। विधि के शासन के अनुसार, सभी नागरिकों हेतु एक समान विधि होनी चाहिये लेकिन स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग अपने मूलभूत अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहा है। इस प्रकार समान नागरिक संहिता का लागू न होना एक प्रकार से विधि के शासन और संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन है। धार्मिक रुढ़ियों की वजह से समाज के किसी वर्ग के अधिकारों का हनन रोका जाना चाहिये साथ हीविधि के समक्ष समताकी अवधारणा के तहत सभी के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिये । वैश्वीकरण के वातावरण में महिलाओं की भूमिका समाज में महत्त्वपूर्ण हो गई है, इसलिये उनके अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता में किसी प्रकार की कमी उनके व्यक्तित्त्व तथा समाज के लिये अहितकर है। राजनीतिक लाभ के कारण कई बार सरकारें इन धार्मिक मुद्दों में छेड़छाड़ से बचती हैं इसलिये सरकारों को भी ऐसे मामलों को धार्मिक मुद्दों के बजाय व्यक्तिगत अधिकारों की दृष्टि से देखना चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वाराशाहबानो मामलेमें दिये गए निर्णय को तात्कालीन राजीव गांधी सरकार ने धार्मिक दबाव में आकर संसद के कानून के माध्यम से पलट दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति पर समान अधिकार और मंदिर प्रवेश के समान अधिकार जैसे न्यायिक निर्णयों के माध्यम से समाज में समता हेतु उल्लेखनीय प्रयास किया है इसलिये सरकार तथा न्यायालय को समान नागरिक संहिता को लागू करने के समग्र एवं गंभीर प्रयास करने चाहिये। समान नागरिक संहिता के विपक्ष में तर्क: समान नागरिक संहिता का मुद्दा किसी सामाजिक या व्यक्तिगत अधिकारों के मुद्दे से हटकर एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है, इसलिये जहाँ एक ओर कुछ राजनीतिक दल इस मामले के माध्यम से राजनीतिक तुष्टिकरण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई राजनीतिक दल इस मुद्दे के माध्यम से धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रयास कर रहे हैं। हिंदू या किसी और धर्म के मामलों में बदलाव उस धर्म के बहुसंख्यक समर्थन के बगैर नहीं किया गया है, इसलिये राजनीतिक तथा न्यायिक प्रक्रियाओं के साथ ही धार्मिक समूहों के स्तर पर मानसिक बदलाव का प्रयास किया जाना आवश्यक है। समासिक संस्कृति की विशेषता को भी वरीयता दी जानी चाहिये क्योंकि समाज में किसी धर्म के असंतुष्ट होने से अशांति की स्थिति बन सकती है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर विधि आयोग का पक्ष: पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा की जा रही कार्यवाहियों के मद्देनज़र विधि आयोग ने कहा कि महिला अधिकारों को वरीयता देना प्रत्येक धर्म और संस्थान का कर्तव्य होना चाहिये। विधि आयोग के अनुसार, समाज में असमानता की स्थिति उत्पन्न करने वाली समस्त रुढ़ियों की समीक्षा की जानी चाहिये। इसलिये सभी निजी कानूनी प्रक्रियाओं को संहिताबध्द करने की ज़रूरत है जिससे उनसे संबंधित पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी तथ्य सामने आ सकें। वैश्विक स्तर पर प्रचलित मानवाधिकारों की दृष्टिकोण से सर्वमान्य व्यक्तिगत कानूनों को वरीयता मिलनी चाहिये। लड़कों और लड़कियों की विवाह की 18 वर्ष की आयु को न्यूनतम मानक के रूप में तय करने की सिफारिश की गई जिससे समाज में समानता स्थापित की जा सके। समाज की प्रगति और सौहार्द्रता हेतु उस समाज में विद्यमान सभी पक्षों के बीच समानता का भाव होना अत्यंत आवश्यक है। इसलिये अपेक्षा की जाती है कि बदलती परिस्थितियों के मद्देनज़र समाज की संरचना में परिवर्तन होना चाहिये।
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##Question:समान नागरिक संहिता से आप क्या समझते है ? क्या आप मानते हैं कि समय आ गया है कि भारत में समान नागरिक संहिता को पूर्णतः अपनाया जाना चाहिए । ( 150-200 शब्द , अंक-10 ) What do you understand by Uniform Civil Code? Do you believe that the time has come that the Uniform Civil Code should be fully adopted in India. (150-200 words, Marks -10 )##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में समान नागरिक संहिता को स्पष्ट कीजिये| 2. समान नागरिक संहिता को पूर्णतः अपनाए जाने के पक्ष-विपक्ष की चर्चा कीजिए| 3. संतुलित निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: भारतीय संविधान के भाग 4 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व) के तहत अनुच्छेद 44 के अनुसार भारत के समस्त नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता होगी। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि, भारत के सभी धर्मों के नागरिकों के लिये एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून होना चाहिये। संविधान के संस्थापकों ने राज्य के नीति निदेशक तत्त्व के माध्यम से इसको लागू करने की ज़िम्मेदारी बाद की सरकारों को हस्तांतरित कर दी थी। समान नागरिकता संहिता के अंतर्गत व्यक्तिगत कानून, संपत्ति संबंधी कानून और विवाह, तलाक तथा गोद लेने से संबंधित कानूनों में मतभिन्नता है। समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क: भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संशोधन के माध्यम से धर्मनिरपेक्षता शब्द को प्रविष्ट किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान का उद्देश्य भारत के समस्त नागरिकों के साथ धार्मिक आधार पर किसी भी भेदभाव को समाप्त करना है लेकिन वर्तमान समय तक समान नागरिक संहिता के लागू न हो पाने के कारण भारत में एक बड़ा वर्ग अभी भी धार्मिक कानूनों की वजह से अपने अधिकारों से वंचित है। मूल अधिकारों मेंविधि के शासनकी अवधारणा विद्यमान है लेकिन इन्हीं अवधारणाओं के बीच लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियाँ भी व्याप्त हैं। विधि के शासन के अनुसार, सभी नागरिकों हेतु एक समान विधि होनी चाहिये लेकिन स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग अपने मूलभूत अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहा है। इस प्रकार समान नागरिक संहिता का लागू न होना एक प्रकार से विधि के शासन और संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन है। धार्मिक रुढ़ियों की वजह से समाज के किसी वर्ग के अधिकारों का हनन रोका जाना चाहिये साथ हीविधि के समक्ष समताकी अवधारणा के तहत सभी के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिये । वैश्वीकरण के वातावरण में महिलाओं की भूमिका समाज में महत्त्वपूर्ण हो गई है, इसलिये उनके अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता में किसी प्रकार की कमी उनके व्यक्तित्त्व तथा समाज के लिये अहितकर है। राजनीतिक लाभ के कारण कई बार सरकारें इन धार्मिक मुद्दों में छेड़छाड़ से बचती हैं इसलिये सरकारों को भी ऐसे मामलों को धार्मिक मुद्दों के बजाय व्यक्तिगत अधिकारों की दृष्टि से देखना चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय द्वाराशाहबानो मामलेमें दिये गए निर्णय को तात्कालीन राजीव गांधी सरकार ने धार्मिक दबाव में आकर संसद के कानून के माध्यम से पलट दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति पर समान अधिकार और मंदिर प्रवेश के समान अधिकार जैसे न्यायिक निर्णयों के माध्यम से समाज में समता हेतु उल्लेखनीय प्रयास किया है इसलिये सरकार तथा न्यायालय को समान नागरिक संहिता को लागू करने के समग्र एवं गंभीर प्रयास करने चाहिये। समान नागरिक संहिता के विपक्ष में तर्क: समान नागरिक संहिता का मुद्दा किसी सामाजिक या व्यक्तिगत अधिकारों के मुद्दे से हटकर एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है, इसलिये जहाँ एक ओर कुछ राजनीतिक दल इस मामले के माध्यम से राजनीतिक तुष्टिकरण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई राजनीतिक दल इस मुद्दे के माध्यम से धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रयास कर रहे हैं। हिंदू या किसी और धर्म के मामलों में बदलाव उस धर्म के बहुसंख्यक समर्थन के बगैर नहीं किया गया है, इसलिये राजनीतिक तथा न्यायिक प्रक्रियाओं के साथ ही धार्मिक समूहों के स्तर पर मानसिक बदलाव का प्रयास किया जाना आवश्यक है। समासिक संस्कृति की विशेषता को भी वरीयता दी जानी चाहिये क्योंकि समाज में किसी धर्म के असंतुष्ट होने से अशांति की स्थिति बन सकती है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर विधि आयोग का पक्ष: पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा की जा रही कार्यवाहियों के मद्देनज़र विधि आयोग ने कहा कि महिला अधिकारों को वरीयता देना प्रत्येक धर्म और संस्थान का कर्तव्य होना चाहिये। विधि आयोग के अनुसार, समाज में असमानता की स्थिति उत्पन्न करने वाली समस्त रुढ़ियों की समीक्षा की जानी चाहिये। इसलिये सभी निजी कानूनी प्रक्रियाओं को संहिताबध्द करने की ज़रूरत है जिससे उनसे संबंधित पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी तथ्य सामने आ सकें। वैश्विक स्तर पर प्रचलित मानवाधिकारों की दृष्टिकोण से सर्वमान्य व्यक्तिगत कानूनों को वरीयता मिलनी चाहिये। लड़कों और लड़कियों की विवाह की 18 वर्ष की आयु को न्यूनतम मानक के रूप में तय करने की सिफारिश की गई जिससे समाज में समानता स्थापित की जा सके। समाज की प्रगति और सौहार्द्रता हेतु उस समाज में विद्यमान सभी पक्षों के बीच समानता का भाव होना अत्यंत आवश्यक है। इसलिये अपेक्षा की जाती है कि बदलती परिस्थितियों के मद्देनज़र समाज की संरचना में परिवर्तन होना चाहिये।
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पुरापाषाण एवं मध्य पाषाण कालीन समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये | (150 से 200 शब्द; 10 अंक) Explain the cultural features of the Palaeolithic and Mesolithic societies. (150 to 200 words; 10 Marks)
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दृष्टिकोण- 1- भूमिका में पाषाणकालीन संस्कृति को समझने में सहायक स्रोतों की संक्षेप में जानकारी देते हुए पाषाणयुग के काल विभाजन की संक्षिप्त जानकारी दीजिये| 2- प्रथम भाग में पुरापाषाण एवं मध्य पाषाण कालीन समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 3- मानव उद्विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पाषाणकाल के इतिहास को जानने के लिए इतिहासकारों को केवल पुरातात्विक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि इस संदर्भ में लिखित अथवा साहित्यिक स्रोतों की अनुपस्थिति है| आदिमानव द्वारा प्रयुक्त उपकरणों, उनके निवास प्रारूप, उनकी भौगोलिक स्थिति और मानवीय गतिविधियों को प्रकट करने वाले स्रोतों के आधार पर ही आदिम जीवन और इतिहास का अंदाजा लगाया जाता है| इन्ही आधारों पर इतिहास में निरंतरता एवं परिवर्तन के तत्वों को समझने का प्रयास किया जाता है| उपरोक्त साक्ष्यों के माध्यम से ही पाषाण काल को तीन उपभागों में विभाजित किया गया है|इसमें से प्रथम चरण को पुरापाषाण काल के नाम से जाना जाता है| यह मानव उद्विकास के प्रारम्भिक चरण का प्रतिनिधित्व करता है| इसके बाद मध्यपाषाण काल आता है जिसमे मानव आदिम एवं विकसित अवस्था के मध्य अर्ध आदिम एवं अर्ध विकसित अवस्था में जीवन यापन कर रहा था| अंतिम में नवपाषाण काल में हम कमोबेश आधुनिक मानव जीवन की शुरूआत को देख सकते हैं| प्रयुक्त तकनीकों में परिवर्तन ने मनुष्य के जीवन को नये विकसित स्तर पर ला दिया था| पुरापाषाण युगीन सांस्कृतिक विशेषताएं पुरापाषाण काल का सम्बन्ध हिमयुग से है| अतः वातावरण का जीवन यापन के तौर-तरीकों पर प्रभाव देख सकते हैं| उपकरणों के आधार पर पुरापाषाण काल को भी तीन भागों में बांटा गया है|सबसे प्राचीन भाग को निम्नपुरापाषाण काल कहा जाता है, इसके बाद मध्यपुरा पाषाण काल एवं सबसे अंत में उच्चपुरापाषाण काल| निम्नपुरापाषाण काल में हैण्डएक्स, क्लेवर, चॉपर-चोपिंग, पेबुल आदि पत्थर के उपकरण मिलते हैं| ये उपकरण मूल पत्थरों से ही निर्मित हैं| अर्थात इस समय मानव का तकनीकी ज्ञान निम्नतम स्तर पर था| यद्यपि वह इन उपकरणों के प्रयोग और उनके महत्त्व को समझने लगा था| मध्य पुरापाषाण काल में ब्लेड, स्क्रेपर, बोर आदि पत्थरों से बने उपकरणों के साक्ष्य भी मिलते लगते हैं| ये उपकरण, पत्थरों के फ्लैक/शल्क से बनते थे| अर्थात मानव चीजों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करने लगा था| उच्चपुरापाषाण काल में ब्लेड एवं ब्युरिन के साक्ष्य मिलने लगते हैं| ये सभी उपकरण पत्थर के साथ-साथ जानवरों की हड्डियों से भी निर्मित किये गए हैं| अर्थात मानव ने विकल्पों के संदर्भ में उपयोगितावादिता का दृष्टिकोण अपनाया था| फिर भी आदिमानव इस चरण में शिकार एवं खाद्य संग्रह पर निर्भर था, पुरापाषाण काल से अपेक्षाकृत विशालकाय पशुओं एवं बड़े खुर व बालों वाले पशुओं के शिकार के साक्ष्य मिलते हैं| चूँकि इस चरण में आग के साक्ष्य नहीं मिलते हैं अतः प्रारम्भिक मानव कच्चे भोज्य पदार्थों का सेवन करता रहा होगा| इस दौर में कृषि एवं पशुपालन के साक्ष्य नहीं मिलते हैं अतः मानव केवल उपभोक्ता था न की उत्पादक| प्रारम्भिक चरण में उपकरणों में परिवर्तन के साक्ष्य वातावरण के साथ अनुकूलन एवं जीवन को बेहतर बनाने के प्रयास का उदाहरण प्रस्तुत करता है|मानव प्राकृतिक गुफाओं में वास करता था, उच्चपुरापाषाण काल में कृत्रिम गुफाओं तथा चित्रकला आदि के भी साक्ष्य मिलने लगते हैं| मध्य पाषाण युगीन सांस्कृतिक विशेषताएं दस हजार ईसा पूर्व के आस-पास वातावरण में व्यापक बदलाव के साक्ष्य मिलते हैं इस समय जलवायु अपेक्षाकृत रूप से गर्म हो गयी थी, इसका प्रभाव तत्कालीन मानव जीवन पर देखा जा सकता है मानव इस काल में भी उपभोक्ता ही बना रहा| शिकार एवं खाद्य संग्रह मानव की आजीविका के मुख्य आधार बने रहे किन्तु इसमें कई महत्वपूर्ण परिवर्तन भी दिखाई देते हैं आग के साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि भोजन को पका कर भी खाते रहे होंगे कई स्थलों से सिल बट्टे का भी साक्ष्य मिलता है इससे भी स्पष्ट होता है कि खानपान के तरीके में बदलाव आया था पशुओं के जीवाश्म तथा छोटे उपकरणों के आधार पर यह माना जाता है कि अपेक्षाकृत रूप से छोटे पशुओं का शिकार भी मानव द्वारा किया जाने लगा था हालांकि पशुपालन के साक्ष्य इस काल से मिलने लगते हैं लेकिन यह समकालीन जीवन की स्थायी विशेषता नहीं बन पायी थी बल्कि नवपाषाण काल से ही इसके नियमित प्रमाण मिलने लगते हैं इस काल में भीमबेटका व कई अन्य स्थलों से चित्रकला के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं| यह आदिमानव के कलात्मक रुझान के साथ साथ समकालीन समाज को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है जैसे विभिन्न क्षेत्रों से परिवार, शिकार, सामुदायिक जीवन, अंतिम संस्कार, संगीत तथा नृत्य आदि के प्रमाण मिलते हैं| यह सब मानव जीवन में बदलाव के द्योतक हैं| विभिन्न स्थलों से कृत्रिम आवास तथा शवाधान के साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं| इनसे जीवन में आये परिवर्तनों की जानकारी मिलती है उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि पुरापाषाण कालीन एवं मध्य पाषाण युगीन मानव का जीवन नितांत आदिम अवस्था का प्रतिनिधित्व करता था| यद्यपि मानव उद्विकास के प्रारम्भिक सोपान के रूप में तत्कालीन आदिम जीवन में आये परिवर्तनों ने ही निकट भविष्य में विकास के अगले चरणों को सुनिश्चित किया था |
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##Question:पुरापाषाण एवं मध्य पाषाण कालीन समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये | (150 से 200 शब्द; 10 अंक) Explain the cultural features of the Palaeolithic and Mesolithic societies. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में पाषाणकालीन संस्कृति को समझने में सहायक स्रोतों की संक्षेप में जानकारी देते हुए पाषाणयुग के काल विभाजन की संक्षिप्त जानकारी दीजिये| 2- प्रथम भाग में पुरापाषाण एवं मध्य पाषाण कालीन समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 3- मानव उद्विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये पाषाणकाल के इतिहास को जानने के लिए इतिहासकारों को केवल पुरातात्विक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि इस संदर्भ में लिखित अथवा साहित्यिक स्रोतों की अनुपस्थिति है| आदिमानव द्वारा प्रयुक्त उपकरणों, उनके निवास प्रारूप, उनकी भौगोलिक स्थिति और मानवीय गतिविधियों को प्रकट करने वाले स्रोतों के आधार पर ही आदिम जीवन और इतिहास का अंदाजा लगाया जाता है| इन्ही आधारों पर इतिहास में निरंतरता एवं परिवर्तन के तत्वों को समझने का प्रयास किया जाता है| उपरोक्त साक्ष्यों के माध्यम से ही पाषाण काल को तीन उपभागों में विभाजित किया गया है|इसमें से प्रथम चरण को पुरापाषाण काल के नाम से जाना जाता है| यह मानव उद्विकास के प्रारम्भिक चरण का प्रतिनिधित्व करता है| इसके बाद मध्यपाषाण काल आता है जिसमे मानव आदिम एवं विकसित अवस्था के मध्य अर्ध आदिम एवं अर्ध विकसित अवस्था में जीवन यापन कर रहा था| अंतिम में नवपाषाण काल में हम कमोबेश आधुनिक मानव जीवन की शुरूआत को देख सकते हैं| प्रयुक्त तकनीकों में परिवर्तन ने मनुष्य के जीवन को नये विकसित स्तर पर ला दिया था| पुरापाषाण युगीन सांस्कृतिक विशेषताएं पुरापाषाण काल का सम्बन्ध हिमयुग से है| अतः वातावरण का जीवन यापन के तौर-तरीकों पर प्रभाव देख सकते हैं| उपकरणों के आधार पर पुरापाषाण काल को भी तीन भागों में बांटा गया है|सबसे प्राचीन भाग को निम्नपुरापाषाण काल कहा जाता है, इसके बाद मध्यपुरा पाषाण काल एवं सबसे अंत में उच्चपुरापाषाण काल| निम्नपुरापाषाण काल में हैण्डएक्स, क्लेवर, चॉपर-चोपिंग, पेबुल आदि पत्थर के उपकरण मिलते हैं| ये उपकरण मूल पत्थरों से ही निर्मित हैं| अर्थात इस समय मानव का तकनीकी ज्ञान निम्नतम स्तर पर था| यद्यपि वह इन उपकरणों के प्रयोग और उनके महत्त्व को समझने लगा था| मध्य पुरापाषाण काल में ब्लेड, स्क्रेपर, बोर आदि पत्थरों से बने उपकरणों के साक्ष्य भी मिलते लगते हैं| ये उपकरण, पत्थरों के फ्लैक/शल्क से बनते थे| अर्थात मानव चीजों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करने लगा था| उच्चपुरापाषाण काल में ब्लेड एवं ब्युरिन के साक्ष्य मिलने लगते हैं| ये सभी उपकरण पत्थर के साथ-साथ जानवरों की हड्डियों से भी निर्मित किये गए हैं| अर्थात मानव ने विकल्पों के संदर्भ में उपयोगितावादिता का दृष्टिकोण अपनाया था| फिर भी आदिमानव इस चरण में शिकार एवं खाद्य संग्रह पर निर्भर था, पुरापाषाण काल से अपेक्षाकृत विशालकाय पशुओं एवं बड़े खुर व बालों वाले पशुओं के शिकार के साक्ष्य मिलते हैं| चूँकि इस चरण में आग के साक्ष्य नहीं मिलते हैं अतः प्रारम्भिक मानव कच्चे भोज्य पदार्थों का सेवन करता रहा होगा| इस दौर में कृषि एवं पशुपालन के साक्ष्य नहीं मिलते हैं अतः मानव केवल उपभोक्ता था न की उत्पादक| प्रारम्भिक चरण में उपकरणों में परिवर्तन के साक्ष्य वातावरण के साथ अनुकूलन एवं जीवन को बेहतर बनाने के प्रयास का उदाहरण प्रस्तुत करता है|मानव प्राकृतिक गुफाओं में वास करता था, उच्चपुरापाषाण काल में कृत्रिम गुफाओं तथा चित्रकला आदि के भी साक्ष्य मिलने लगते हैं| मध्य पाषाण युगीन सांस्कृतिक विशेषताएं दस हजार ईसा पूर्व के आस-पास वातावरण में व्यापक बदलाव के साक्ष्य मिलते हैं इस समय जलवायु अपेक्षाकृत रूप से गर्म हो गयी थी, इसका प्रभाव तत्कालीन मानव जीवन पर देखा जा सकता है मानव इस काल में भी उपभोक्ता ही बना रहा| शिकार एवं खाद्य संग्रह मानव की आजीविका के मुख्य आधार बने रहे किन्तु इसमें कई महत्वपूर्ण परिवर्तन भी दिखाई देते हैं आग के साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि भोजन को पका कर भी खाते रहे होंगे कई स्थलों से सिल बट्टे का भी साक्ष्य मिलता है इससे भी स्पष्ट होता है कि खानपान के तरीके में बदलाव आया था पशुओं के जीवाश्म तथा छोटे उपकरणों के आधार पर यह माना जाता है कि अपेक्षाकृत रूप से छोटे पशुओं का शिकार भी मानव द्वारा किया जाने लगा था हालांकि पशुपालन के साक्ष्य इस काल से मिलने लगते हैं लेकिन यह समकालीन जीवन की स्थायी विशेषता नहीं बन पायी थी बल्कि नवपाषाण काल से ही इसके नियमित प्रमाण मिलने लगते हैं इस काल में भीमबेटका व कई अन्य स्थलों से चित्रकला के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं| यह आदिमानव के कलात्मक रुझान के साथ साथ समकालीन समाज को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है जैसे विभिन्न क्षेत्रों से परिवार, शिकार, सामुदायिक जीवन, अंतिम संस्कार, संगीत तथा नृत्य आदि के प्रमाण मिलते हैं| यह सब मानव जीवन में बदलाव के द्योतक हैं| विभिन्न स्थलों से कृत्रिम आवास तथा शवाधान के साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं| इनसे जीवन में आये परिवर्तनों की जानकारी मिलती है उपरोक्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि पुरापाषाण कालीन एवं मध्य पाषाण युगीन मानव का जीवन नितांत आदिम अवस्था का प्रतिनिधित्व करता था| यद्यपि मानव उद्विकास के प्रारम्भिक सोपान के रूप में तत्कालीन आदिम जीवन में आये परिवर्तनों ने ही निकट भविष्य में विकास के अगले चरणों को सुनिश्चित किया था |
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उन्नत अर्थव्यवस्था ने हड़प्पा सभ्यता को नगरीकरण के स्तर तक पहुंचाया था| संगत उदाहरणों के साथ कथन की विवेचना कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The advanced economy brought the Harappan civilization to the level of urbanization. Discuss the statement with relevant examples. (150 to 200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण की सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में सैन्धव युगीन अर्थव्यवस्था की विशेषताएं एवं स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कथन का विश्लेषण करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में से एक थी |हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण को भारत की प्रथम नगरीय क्रान्ति के रूप में जाना जाता है| हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक प्रगति ने सैन्धव नगरों के विकास को सुनिश्चित किया था| प्रायः ये सभी नगर महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्रों, व्यापार-वाणिज्य के केन्द्रों,औद्योगिक बस्तियों अथवा व्यापारिक मार्गों के साथ विकसित हुए थे सैन्धव सभ्यता के पुरातत्विक अवशेष सभ्यता की आर्थिक प्रगति की सूचना देते हैं| प्रभावी नगर नियोजन से स्पष्ट होता है की सैन्धव लोग पर्याप्त रूप से संसाधन संपन्न थे| भवनों का निर्माण,आवासीय भवनों की सुविधाओं से भी स्पष्ट होता है कि अधिकांश लोगों का जीवन सामान्य रूप से समृद्ध था| इस आर्थिक प्रगति का आधार हड़प्पा सभ्यता की गतिशील अर्थव्यवस्था थी| सैन्धवयुगीन अर्थव्यवस्था के स्वरूप का अनुमान निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है- हड़प्पा सभ्यता में कृषि-पशुपालन के साक्ष्य विभिन्न नगरों से गेहूं,जौ,चावल आदि फसलों का साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, कालीबंगा से वैज्ञानिक आधार पर जुते हुए खेत का प्रमाण मिला है, धौलावीरा से विकसित जल प्रबंधन का साक्ष्य मिलता है| यह प्रबंध सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था| अर्थात पर्याप्त रूप से विकसित कृषि होती थी, कृषि के विकसित प्रारूप से प्राप्त उत्पादन अधिशेष ने ही हड़प्पा सभ्यता के विकास को सुनिश्चित किया था |इसके अतिरिक्त मुहरों पर पशुओं के अंकन से पशुपालन के संकेत मिलते हैं| शिल्पों का विकास कृषि के उत्पादन अधिशेष ने दैनिक आवश्यकताओं में गुणात्मक परिवर्तन किया, दैनिक आवश्यकताओं के आधार पर ही शिल्पकला का विकास हुआ, कांसे की प्रतिमा, सेलखड़ी की मुहरें,हाथीदांत की वस्तुएं, चाक पर बने हुए मृदभांड तथा सोने और चांदी के आभूषण ये स्पष्ट करते हैं कि शिल्पकारी पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी, कपास उत्पादन एवं कपड़ों का निर्माण भी किये जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | व्यापार-वाणिज्य सैन्धव सभ्यता से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, पश्चिम एशिआ क्षेत्र में पाए जाने वाले पत्थर हड़प्पा सभ्यता के नगरों से प्राप्त हुए हैं जो सैन्धव वासियों के बाह्य संपर्क की सूचना देते हैं, मेसोपोटामिया, मिस्र एवंफारस की खाड़ी के साथ सैन्धववासियों के सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध थे, खेतड़ी से विभिन्न नगरों को तांबे के निर्यात के साक्ष्य मिले हैं, लोथल से मिटटी की नाव एवं गोदीबाड़ा,सुत्कांगेंडोर, लोथल आदितटीय नगरों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि स्थल के अतिरिक्तजल मार्ग का प्रयोग का प्रयोग भी होता था, हड़प्पा सभ्यता से सिक्कों के साक्ष्य नहीं मिलते संभवतः यहाँ वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी| उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है की हड़प्पा सभ्यता कृषि से प्राप्त अधिशेष उत्पादन तथा विकसित व्यापार वाणिज्य के आधार पर विकसित अर्थव्यवस्था थी| इसके आधार पर ही हड़प्पा सभ्यता भारत के प्रथम नगरीकरण के रूप में स्थापित हो पायी थी |
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##Question:उन्नत अर्थव्यवस्था ने हड़प्पा सभ्यता को नगरीकरण के स्तर तक पहुंचाया था| संगत उदाहरणों के साथ कथन की विवेचना कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The advanced economy brought the Harappan civilization to the level of urbanization. Discuss the statement with relevant examples. (150 to 200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण की सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में सैन्धव युगीन अर्थव्यवस्था की विशेषताएं एवं स्वरुप को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में कथन का विश्लेषण करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीनतम नगरीय सभ्यताओं में से एक थी |हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण को भारत की प्रथम नगरीय क्रान्ति के रूप में जाना जाता है| हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक प्रगति ने सैन्धव नगरों के विकास को सुनिश्चित किया था| प्रायः ये सभी नगर महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्रों, व्यापार-वाणिज्य के केन्द्रों,औद्योगिक बस्तियों अथवा व्यापारिक मार्गों के साथ विकसित हुए थे सैन्धव सभ्यता के पुरातत्विक अवशेष सभ्यता की आर्थिक प्रगति की सूचना देते हैं| प्रभावी नगर नियोजन से स्पष्ट होता है की सैन्धव लोग पर्याप्त रूप से संसाधन संपन्न थे| भवनों का निर्माण,आवासीय भवनों की सुविधाओं से भी स्पष्ट होता है कि अधिकांश लोगों का जीवन सामान्य रूप से समृद्ध था| इस आर्थिक प्रगति का आधार हड़प्पा सभ्यता की गतिशील अर्थव्यवस्था थी| सैन्धवयुगीन अर्थव्यवस्था के स्वरूप का अनुमान निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है- हड़प्पा सभ्यता में कृषि-पशुपालन के साक्ष्य विभिन्न नगरों से गेहूं,जौ,चावल आदि फसलों का साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, कालीबंगा से वैज्ञानिक आधार पर जुते हुए खेत का प्रमाण मिला है, धौलावीरा से विकसित जल प्रबंधन का साक्ष्य मिलता है| यह प्रबंध सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था| अर्थात पर्याप्त रूप से विकसित कृषि होती थी, कृषि के विकसित प्रारूप से प्राप्त उत्पादन अधिशेष ने ही हड़प्पा सभ्यता के विकास को सुनिश्चित किया था |इसके अतिरिक्त मुहरों पर पशुओं के अंकन से पशुपालन के संकेत मिलते हैं| शिल्पों का विकास कृषि के उत्पादन अधिशेष ने दैनिक आवश्यकताओं में गुणात्मक परिवर्तन किया, दैनिक आवश्यकताओं के आधार पर ही शिल्पकला का विकास हुआ, कांसे की प्रतिमा, सेलखड़ी की मुहरें,हाथीदांत की वस्तुएं, चाक पर बने हुए मृदभांड तथा सोने और चांदी के आभूषण ये स्पष्ट करते हैं कि शिल्पकारी पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी, कपास उत्पादन एवं कपड़ों का निर्माण भी किये जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | व्यापार-वाणिज्य सैन्धव सभ्यता से आंतरिक एवं बाह्य व्यापार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, पश्चिम एशिआ क्षेत्र में पाए जाने वाले पत्थर हड़प्पा सभ्यता के नगरों से प्राप्त हुए हैं जो सैन्धव वासियों के बाह्य संपर्क की सूचना देते हैं, मेसोपोटामिया, मिस्र एवंफारस की खाड़ी के साथ सैन्धववासियों के सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध थे, खेतड़ी से विभिन्न नगरों को तांबे के निर्यात के साक्ष्य मिले हैं, लोथल से मिटटी की नाव एवं गोदीबाड़ा,सुत्कांगेंडोर, लोथल आदितटीय नगरों की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि स्थल के अतिरिक्तजल मार्ग का प्रयोग का प्रयोग भी होता था, हड़प्पा सभ्यता से सिक्कों के साक्ष्य नहीं मिलते संभवतः यहाँ वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी| उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है की हड़प्पा सभ्यता कृषि से प्राप्त अधिशेष उत्पादन तथा विकसित व्यापार वाणिज्य के आधार पर विकसित अर्थव्यवस्था थी| इसके आधार पर ही हड़प्पा सभ्यता भारत के प्रथम नगरीकरण के रूप में स्थापित हो पायी थी |
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What is "indigenisation"? How indigenisation can help in Socio-economic development? Discuss briefly. (150 words)
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Approach : Define indigenisation in brief in an introductory part. Highlight the importance of indigenisation from the perspective of socio-economic development. Answer : The term Indigenisation basically refers to replacing an imported item with one that is manufactured within the country. For example, the production of generic low-cost medicine in India is called indigenisation of technology. India is the world’s largest importer of defence equipment, with 60% of its requirements met from outside the country. This, in itself, translates into a great business opportunity for those building domestic capabilities in defence.It is the reason why Prime Minister Narendra Modi wants local defence production to be at the heart of the government’s Make in India campaign that seeks to promote manufacturing and attract foreign investment. Importance of indigenization of technology Reducing Fiscal Deficit - India is the second-largest arms importer in the world (after Saudi Arabia).Higher import dependency leads to increase in the fiscal deficit.Despite having the fifth largest defence budget in the world, India procures 60% of its weapon systems from foreign markets.India can export its indigenous defence technology and equipment to the neighbouring nations. Security Imperative - Indigenisation in defence is critical to national security also. It keeps intact the technological expertise and encourages spin-off technologies and innovation that often stem from it. Indigenisation is needed in order to avert the threats associated with the frequent ceasefire violations like that of the Uri, Pathankot and Pulwama attacks.India is surrounded by porous borders and hostile neighbours need to be self-sufficient and self-reliant in defence production. With the indigenisation of technology, well stability can be improved in border areas which can give a boost to the economic development of border areas. Employment generation - defence manufacturing will lead to the generation of satellites industries that in turn will pave the way for a generation of employment opportunities.As per government estimates, a reduction in 20-25% in defence-related imports could directly create an additional 100,000 to 120,000 highly skilled jobs in India.If we could raise the percentage of domestic procurement from 40% to 70% in the next five years, we would double the output in our defence industry. Strategic Capability - self-sufficient and self-reliant defence industry will place India among the top global powers.Nationalism and Patriotism can increase with indigenous production of defence equipment, that in turn will not only boost the trust and confidence of the Indian forces in specific and among citizens in general but will also strengthen a sense of integrity and sovereignty in them. Government measure:- A new defence procurement policy or DPP that accords priority to indigenously made defence products and boosts the Make in India initiative. The government has increased the level of foreign direct investment (FDI) in the defence sector to 49%. The centre has also liberalized the industrial licensing regime for Indian manufacturers. India has relaxed its offset policy, exempting foreign firms from obligations like a declaration of Indian offset partners’ name, amount of FDI and value of the equipment. India needs to develop a sound ecosystem where universities should supply skilled manpower to the industry. Industry players should invest adequately research and development. Armed forces should be connected well to the defence manufacturers. The govt needs to play a pivotal role in the development of such an ecosystem.
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##Question:What is "indigenisation"? How indigenisation can help in Socio-economic development? Discuss briefly. (150 words)##Answer:Approach : Define indigenisation in brief in an introductory part. Highlight the importance of indigenisation from the perspective of socio-economic development. Answer : The term Indigenisation basically refers to replacing an imported item with one that is manufactured within the country. For example, the production of generic low-cost medicine in India is called indigenisation of technology. India is the world’s largest importer of defence equipment, with 60% of its requirements met from outside the country. This, in itself, translates into a great business opportunity for those building domestic capabilities in defence.It is the reason why Prime Minister Narendra Modi wants local defence production to be at the heart of the government’s Make in India campaign that seeks to promote manufacturing and attract foreign investment. Importance of indigenization of technology Reducing Fiscal Deficit - India is the second-largest arms importer in the world (after Saudi Arabia).Higher import dependency leads to increase in the fiscal deficit.Despite having the fifth largest defence budget in the world, India procures 60% of its weapon systems from foreign markets.India can export its indigenous defence technology and equipment to the neighbouring nations. Security Imperative - Indigenisation in defence is critical to national security also. It keeps intact the technological expertise and encourages spin-off technologies and innovation that often stem from it. Indigenisation is needed in order to avert the threats associated with the frequent ceasefire violations like that of the Uri, Pathankot and Pulwama attacks.India is surrounded by porous borders and hostile neighbours need to be self-sufficient and self-reliant in defence production. With the indigenisation of technology, well stability can be improved in border areas which can give a boost to the economic development of border areas. Employment generation - defence manufacturing will lead to the generation of satellites industries that in turn will pave the way for a generation of employment opportunities.As per government estimates, a reduction in 20-25% in defence-related imports could directly create an additional 100,000 to 120,000 highly skilled jobs in India.If we could raise the percentage of domestic procurement from 40% to 70% in the next five years, we would double the output in our defence industry. Strategic Capability - self-sufficient and self-reliant defence industry will place India among the top global powers.Nationalism and Patriotism can increase with indigenous production of defence equipment, that in turn will not only boost the trust and confidence of the Indian forces in specific and among citizens in general but will also strengthen a sense of integrity and sovereignty in them. Government measure:- A new defence procurement policy or DPP that accords priority to indigenously made defence products and boosts the Make in India initiative. The government has increased the level of foreign direct investment (FDI) in the defence sector to 49%. The centre has also liberalized the industrial licensing regime for Indian manufacturers. India has relaxed its offset policy, exempting foreign firms from obligations like a declaration of Indian offset partners’ name, amount of FDI and value of the equipment. India needs to develop a sound ecosystem where universities should supply skilled manpower to the industry. Industry players should invest adequately research and development. Armed forces should be connected well to the defence manufacturers. The govt needs to play a pivotal role in the development of such an ecosystem.
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ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। ( 150-200 शब्द, 10 अंक) Critically examine the role of Panchayati Raj institutions in rural development. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण : पंचायती राज संस्थाओं की संवैधानिक पृष्ठभूमि से उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। इन संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका की बिंदुवत चर्चा कीजिये । कुछ सुझाओं की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए 73 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया है। इन संस्थाओं का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण विकास है। ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका: पंचायती राज का एक उद्देश्य सामाजिक और राजनीतिक विकास था। इन संस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका ने राजनीति में महिलाओं के समावेशन में वृद्धि की है। वर्तमान में महिलाओं की भूमिका 40% से अधिक है। निर्णय निर्माण तथा क्रियान्वयन को निचले स्तर तक पहुँचने में मदद मिली है जिससे जनता के शासन में विश्वास में वृद्धि हुई है। भागीदारीपूर्ण लोकतन्त्र की आधुनिक अवधारणा को साकार करने में मजबूती मिली है। विकास कार्यों का संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार हुआ है जिससे संसाधनों का आवंटन दक्षतापूर्ण हुआ है। योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में प्रभाविता का समावेश हुआ है। यथा पचायती राज व्यवस्था के कारण मनरेगा में भ्रस्टाचार में कमी आई है। शासन का फोकस स्थानीय समस्याओं पर अधिक हुआ है। नीति निर्माण के फीडबैक तंत्र में सुधार हुआ है। ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की वर्तमान चुनौतियाँ: संवैधानिक संस्था बना दिये जाने के बावजूद कई प्रावधानों का क्रियान्वयन समय पर नहीं किया जा रहा है जैसे- नियमित 5 वर्षों में चुनाव, राज्य वित्त आयोगों का गठन। पंचायती राज संस्थाएं वित्त की चुनौतियों से गुजर रहे हैं। इन्हे पर्याप्त कराधान शक्तियों का स्थानांतरण नहीं किया गया है। राज्य सरकारों द्वारा भी सीमित वित्त आवंटन किया गया है। ये संस्थाएं कुशल मानव संसाधन की कमी से जूझ रहे हैं। योजनाओं के क्रियान्वयन, लेखा परीक्षा, मोनिट्रिंग के लिए कुशल कार्यकर्मियों की कमी है। इन्हे नियुक्ति के अधिकार भी नहीं दिये गए हैं। आधुनिक संचार तकनीकों के प्रयोग हेतु अवसंरचना का अभाव है। कम्प्युटर, इंटरनेट, मोबाइल कनेक्टिविटी की समस्याओं से ग्रस्त हैं। पंच पति- सरपंच पति की अवधारणा महिलाओं की वास्तविक भूमिका को सीमित करती है। पंचायती राज संस्थाएं लोकतन्त्र को सुदृढ करने की दिशा में एतिहासिक कदम था। इसने न केवल महिलाओं की स्थिति में सुधार किया बल्कि सामाजिक व आर्थिक संकेतों में भी बेहतर परिणाम देखने को मिले। यद्यपि अभी भी कई चुनौतियों को दूर किए जाने की आवश्यकता है जिसके माध्यम से इनके अपेक्षित लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।
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##Question:ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। ( 150-200 शब्द, 10 अंक) Critically examine the role of Panchayati Raj institutions in rural development. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण : पंचायती राज संस्थाओं की संवैधानिक पृष्ठभूमि से उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। इन संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका की बिंदुवत चर्चा कीजिये । कुछ सुझाओं की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : भारत में लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए 73 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया है। इन संस्थाओं का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण विकास है। ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका: पंचायती राज का एक उद्देश्य सामाजिक और राजनीतिक विकास था। इन संस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती भूमिका ने राजनीति में महिलाओं के समावेशन में वृद्धि की है। वर्तमान में महिलाओं की भूमिका 40% से अधिक है। निर्णय निर्माण तथा क्रियान्वयन को निचले स्तर तक पहुँचने में मदद मिली है जिससे जनता के शासन में विश्वास में वृद्धि हुई है। भागीदारीपूर्ण लोकतन्त्र की आधुनिक अवधारणा को साकार करने में मजबूती मिली है। विकास कार्यों का संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार हुआ है जिससे संसाधनों का आवंटन दक्षतापूर्ण हुआ है। योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में प्रभाविता का समावेश हुआ है। यथा पचायती राज व्यवस्था के कारण मनरेगा में भ्रस्टाचार में कमी आई है। शासन का फोकस स्थानीय समस्याओं पर अधिक हुआ है। नीति निर्माण के फीडबैक तंत्र में सुधार हुआ है। ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की वर्तमान चुनौतियाँ: संवैधानिक संस्था बना दिये जाने के बावजूद कई प्रावधानों का क्रियान्वयन समय पर नहीं किया जा रहा है जैसे- नियमित 5 वर्षों में चुनाव, राज्य वित्त आयोगों का गठन। पंचायती राज संस्थाएं वित्त की चुनौतियों से गुजर रहे हैं। इन्हे पर्याप्त कराधान शक्तियों का स्थानांतरण नहीं किया गया है। राज्य सरकारों द्वारा भी सीमित वित्त आवंटन किया गया है। ये संस्थाएं कुशल मानव संसाधन की कमी से जूझ रहे हैं। योजनाओं के क्रियान्वयन, लेखा परीक्षा, मोनिट्रिंग के लिए कुशल कार्यकर्मियों की कमी है। इन्हे नियुक्ति के अधिकार भी नहीं दिये गए हैं। आधुनिक संचार तकनीकों के प्रयोग हेतु अवसंरचना का अभाव है। कम्प्युटर, इंटरनेट, मोबाइल कनेक्टिविटी की समस्याओं से ग्रस्त हैं। पंच पति- सरपंच पति की अवधारणा महिलाओं की वास्तविक भूमिका को सीमित करती है। पंचायती राज संस्थाएं लोकतन्त्र को सुदृढ करने की दिशा में एतिहासिक कदम था। इसने न केवल महिलाओं की स्थिति में सुधार किया बल्कि सामाजिक व आर्थिक संकेतों में भी बेहतर परिणाम देखने को मिले। यद्यपि अभी भी कई चुनौतियों को दूर किए जाने की आवश्यकता है जिसके माध्यम से इनके अपेक्षित लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।
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क्या नीति निदेशक तत्वों की अवादयोग्य प्रकृति इसमें न्यायालय के दखल को पूरी तरह वर्जित करती है । सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों के परिप्रेक्ष्य में इसकी समीक्षा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Does the unqualified nature of the Directive Principles completely exclude the interference of the court in this. Review it in the context of the important decisions of the Supreme Court. (150-200 words)
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दृष्टिकोण: 1. भूमिका में नीति निदेशक तत्वों सम्बन्धी प्रावधानों का उल्लेख कीजिये| 2. नीति निदेशक तत्वों की मुख्य विशेषताओं की संक्षेप में चर्चा कीजिए| 3. सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों के परिप्रेक्ष्य में इसकी समीक्षा कीजिये| 4. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों का उल्लेख संविधान के भाग 4 के अंतर्गत अनुच्छेद 36 से 51 तक वर्णित है। भारत के संविधान में यह विशेषता आयरलैंड के संविधान से ली गई है। इन्हें समाजवाद, गांधीवाद और उदारवाद से प्रेरित आदर्शों को प्राप्त करने के उद्देश्य से अंगीकार किया गया था| निदेशक तत्त्वों की विशेषताएँ: ये निदेशक तत्त्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण हैं। यद्यपि ये अपनी प्रकृति में न्यायोचित नहीं हैं, फिर भी ये किसी भी विधि की संवैधानिकता के निर्धारण में मददगार हैं। निदेशक तत्त्व राज्य के शासन में मूलभूत हैं। अर्थात् कानून बनाते समय राज्य द्वारा इन्हें लागू करने की अपेक्षा की जाती है। ये संविधान के प्रस्तावना में उल्लिखित समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे आदर्शों को स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण हैं। नीति निदेशक तत्वों के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले: जब राज्य डीपीएसपी को लागू करने का प्रयास करता है, तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संघर्ष हो सकता है| संसद ने अक्सर मौलिक अधिकारों पर राज्य और डीपीएसपी के वर्चस्व का दावा करने की कोशिश की, सर्वोच्च न्यायालय ने उचित निर्णय देकर संविधान में व्यक्ति के अधिकारों को बरकरार रखा है| चंपकम दोराईराजन केस (1952): न्यायालय का फैसला: सभी मौलिक अधिकार डीपीएसपी से ऊपर हैं| संसद की प्रतिक्रिया: संसद ने विभिन्न एफआर में संशोधन और संशोधन करके जवाब दिया जो डीपीएसपी के साथ संघर्ष में आ रहे थे| केरल शिक्षा विधेयक (1957): समन्वयकारी निर्वचन का सिद्धांत: केरल एजुकेशन बिल (1957) में सुप्रीम कोर्ट ने डीपीएसपी और मौलिक अधिकारों को लागू करते हुए संघर्ष की स्थिति से बचने के लिए समन्वयकारी निर्वचन (हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन) के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत के अनुसार, अदालत ने माना कि एक कानून की व्याख्या करते समय मूल अधिकार, डीपीएसपी और अदालतों के बीच कोई अंतर्निहित संघर्ष नहीं है, जहां तक संभव हो सके दोनों में सामंजस्य बनाने की कोशिश करनी चाहिए । गोलक नाथ केस (1967) न्यायालय का फैसला: मौलिक अधिकारों को समाप्त या पतला नहीं किया जा सकता है| संसद की प्रतिक्रिया: संसद ने संविधान के 25 वें संशोधन अधिनियम को लाकर फिर से जवाब दिया जिसमें भाग III में अनुच्छेद 31 सी डाला गया था| अनुच्छेद 31 सी में दो प्रावधान शामिल थे: यदि अनुच्छेद 39 (बी) और अनुच्छेद 39 (सी) में डीपीएसपी को प्रभाव देने के लिए एक कानून बनाया गया है और इस प्रक्रिया में, कानून अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31 का उल्लंघन करता है, तो कानून को असंवैधानिक और शून्य घोषित नहीं किया जा सकता; ऐसा कोई भी कानून जिसमें यह घोषणा है कि यह अनुच्छेद 39 (डी) और अनुच्छेद (डी) में उल्लेखित डीपीएसपी को प्रभावी करने के लिए है, की अदालत में पूछताछ नहीं की जाएगी| केशवनाथ भारती केस (1973) उपरोक्त संशोधन को केशवानंद भारती मामले (1973) में चुनौती दी गई थी कोर्ट का फैसला: संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती है। अनुच्छेद 31(सी) का दूसरा खंड असंवैधानिक और शून्य घोषित किया गया क्योंकि यह इस मामले में प्रस्तावित संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध था। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 31(सी) के पहले प्रावधान को बरकरार रखा। न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति संसद द्वारा समाप्त नहीं की जा सकती है| संसद की प्रतिक्रिया: संसद ने 1976 में 42 वां संशोधन अधिनियम लाया, जिसने संविधान के भाग IV में निर्दिष्ट किसी भी DPSPs को लागू करने के लिए किसी भी कानून को अपने दायरे में शामिल करके अनुच्छेद 31(सी) के उपरोक्त पहले प्रावधान का दायरा बढ़ाया गया| मिनर्वा मिल केस (1980) : कोर्ट का फैसला: अनुच्छेद 31 सी के तहत एक कानून की रक्षा तभी की जाएगी जब यह अनुच्छेद 39 बी और 39 सी में निर्देशों को लागू करने के लिए बनाया गया हो, न कि किसी अन्य डीपीएसपी द्वारा। मिनर्वा मिल्स केस (1980) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सभी DPSPs के विस्तार को असंवैधानिक और शून्य घोषित किया गया था| वर्तमान स्थिति यह है कि केवल अनुच्छेद 39(बी) और अनुच्छेद 39(सी) को अनुच्छेद 14, 19 पर वरीयता दी जा सकती है ना कि सभी नीति निर्देशक सिद्धांतों को|
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##Question:क्या नीति निदेशक तत्वों की अवादयोग्य प्रकृति इसमें न्यायालय के दखल को पूरी तरह वर्जित करती है । सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों के परिप्रेक्ष्य में इसकी समीक्षा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Does the unqualified nature of the Directive Principles completely exclude the interference of the court in this. Review it in the context of the important decisions of the Supreme Court. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में नीति निदेशक तत्वों सम्बन्धी प्रावधानों का उल्लेख कीजिये| 2. नीति निदेशक तत्वों की मुख्य विशेषताओं की संक्षेप में चर्चा कीजिए| 3. सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों के परिप्रेक्ष्य में इसकी समीक्षा कीजिये| 4. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों का उल्लेख संविधान के भाग 4 के अंतर्गत अनुच्छेद 36 से 51 तक वर्णित है। भारत के संविधान में यह विशेषता आयरलैंड के संविधान से ली गई है। इन्हें समाजवाद, गांधीवाद और उदारवाद से प्रेरित आदर्शों को प्राप्त करने के उद्देश्य से अंगीकार किया गया था| निदेशक तत्त्वों की विशेषताएँ: ये निदेशक तत्त्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण हैं। यद्यपि ये अपनी प्रकृति में न्यायोचित नहीं हैं, फिर भी ये किसी भी विधि की संवैधानिकता के निर्धारण में मददगार हैं। निदेशक तत्त्व राज्य के शासन में मूलभूत हैं। अर्थात् कानून बनाते समय राज्य द्वारा इन्हें लागू करने की अपेक्षा की जाती है। ये संविधान के प्रस्तावना में उल्लिखित समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे आदर्शों को स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण हैं। नीति निदेशक तत्वों के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले: जब राज्य डीपीएसपी को लागू करने का प्रयास करता है, तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों और डीपीएसपी के बीच संघर्ष हो सकता है| संसद ने अक्सर मौलिक अधिकारों पर राज्य और डीपीएसपी के वर्चस्व का दावा करने की कोशिश की, सर्वोच्च न्यायालय ने उचित निर्णय देकर संविधान में व्यक्ति के अधिकारों को बरकरार रखा है| चंपकम दोराईराजन केस (1952): न्यायालय का फैसला: सभी मौलिक अधिकार डीपीएसपी से ऊपर हैं| संसद की प्रतिक्रिया: संसद ने विभिन्न एफआर में संशोधन और संशोधन करके जवाब दिया जो डीपीएसपी के साथ संघर्ष में आ रहे थे| केरल शिक्षा विधेयक (1957): समन्वयकारी निर्वचन का सिद्धांत: केरल एजुकेशन बिल (1957) में सुप्रीम कोर्ट ने डीपीएसपी और मौलिक अधिकारों को लागू करते हुए संघर्ष की स्थिति से बचने के लिए समन्वयकारी निर्वचन (हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन) के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत के अनुसार, अदालत ने माना कि एक कानून की व्याख्या करते समय मूल अधिकार, डीपीएसपी और अदालतों के बीच कोई अंतर्निहित संघर्ष नहीं है, जहां तक संभव हो सके दोनों में सामंजस्य बनाने की कोशिश करनी चाहिए । गोलक नाथ केस (1967) न्यायालय का फैसला: मौलिक अधिकारों को समाप्त या पतला नहीं किया जा सकता है| संसद की प्रतिक्रिया: संसद ने संविधान के 25 वें संशोधन अधिनियम को लाकर फिर से जवाब दिया जिसमें भाग III में अनुच्छेद 31 सी डाला गया था| अनुच्छेद 31 सी में दो प्रावधान शामिल थे: यदि अनुच्छेद 39 (बी) और अनुच्छेद 39 (सी) में डीपीएसपी को प्रभाव देने के लिए एक कानून बनाया गया है और इस प्रक्रिया में, कानून अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31 का उल्लंघन करता है, तो कानून को असंवैधानिक और शून्य घोषित नहीं किया जा सकता; ऐसा कोई भी कानून जिसमें यह घोषणा है कि यह अनुच्छेद 39 (डी) और अनुच्छेद (डी) में उल्लेखित डीपीएसपी को प्रभावी करने के लिए है, की अदालत में पूछताछ नहीं की जाएगी| केशवनाथ भारती केस (1973) उपरोक्त संशोधन को केशवानंद भारती मामले (1973) में चुनौती दी गई थी कोर्ट का फैसला: संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती है। अनुच्छेद 31(सी) का दूसरा खंड असंवैधानिक और शून्य घोषित किया गया क्योंकि यह इस मामले में प्रस्तावित संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध था। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 31(सी) के पहले प्रावधान को बरकरार रखा। न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति संसद द्वारा समाप्त नहीं की जा सकती है| संसद की प्रतिक्रिया: संसद ने 1976 में 42 वां संशोधन अधिनियम लाया, जिसने संविधान के भाग IV में निर्दिष्ट किसी भी DPSPs को लागू करने के लिए किसी भी कानून को अपने दायरे में शामिल करके अनुच्छेद 31(सी) के उपरोक्त पहले प्रावधान का दायरा बढ़ाया गया| मिनर्वा मिल केस (1980) : कोर्ट का फैसला: अनुच्छेद 31 सी के तहत एक कानून की रक्षा तभी की जाएगी जब यह अनुच्छेद 39 बी और 39 सी में निर्देशों को लागू करने के लिए बनाया गया हो, न कि किसी अन्य डीपीएसपी द्वारा। मिनर्वा मिल्स केस (1980) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सभी DPSPs के विस्तार को असंवैधानिक और शून्य घोषित किया गया था| वर्तमान स्थिति यह है कि केवल अनुच्छेद 39(बी) और अनुच्छेद 39(सी) को अनुच्छेद 14, 19 पर वरीयता दी जा सकती है ना कि सभी नीति निर्देशक सिद्धांतों को|
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विश्व व्यापार संगठन के बारे में संक्षिप्त व्याख्या कीजिए। साथ ही, कृषि सब्सिडी के मुद्दें पर भारत से संबंधित विवाद का परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain briefly about the World Trade Organization. Also, examine the dispute related to India on the issues of agricultural subsidies. (150-200 words; 10 Marks )
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दृष्टिकोण – विश्व व्यापार संगठन की संक्षेप मे भूमिका कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार समझौते के बारे में लिखिए। इसके बाद भारत के साथ विवाद के मुद्दों का विवरण दीजिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। विश्व व्यापार संगठन विश्व में व्यापार संबंधी अवरोधों को दूर कर वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने वाला एकअंतर-सरकारी संगठन है। जिसकी स्थापना1995 में मारकेश संधिके तहत की गई थी। इसका मुख्यालयजेनेवामें है। वर्तमान में विश्व के 165 देश इसके सदस्य हैं। सदस्य देशों का मंत्रिस्तरीय सम्मलेन इसके निर्णयों के लिये सर्वोच्च निकाय है, जिसकी बैठक प्रत्येक दो वर्षों में आयोजित की जाती है। कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार समझौता: वर्ष 1994 से विश्व व्यापार समझौता कृषि क्षेत्र में लागू हुआ। यह समझौता कृषि क्षेत्र में निवेश और व्यापार के नियमों को वैश्विक स्तर पर संस्थाबद्ध किये जाने का प्रयास था। इसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर उत्पाद एवं व्यापार का निजीकरण करना था। विश्व व्यापार संगठन का तर्क यह था कि यदि देश अपने सुरक्षित अन्न भंडार की सीमा कम कर देते हैं या खत्म कर देते हैं तो इससे विश्व व्यापार उस दिशा की ओर मुड़ जाएगा, जहाँ माँग अधिक होगी। किसानों को विनियमित बाज़ारों से लाभ होगा और उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिलेगा। बाजार की स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा के कारण उपभोक्ताओं को भी सस्ते मूल्य पर खाद्य सामग्रियाँ प्राप्त होंगी। भारत के साथ विवाद के मुद्दे: विश्व व्यापार संगठन ने कृषि सब्सिडी का हिसाब भी गलत तरीके से किया हुआ है। इसकी गणना 1986-88 की कीमतों के आधार पर की जाती है। यदि वर्तमान कीमतों या वर्तमान लागत के आधार पर वे आकलन करेंगे तो जो सब्सिडी बहुत अधिक और राज्य पर बड़ा बोझ दिखाई दे रही है, वह वास्तव में बहुत कम रह जाएगी। भारत के संदर्भ मे न्यूनतम समर्थन मूल्य ही सरकारी अनाज के खरीद का आधार है। यदि इस आधार को ही डब्ल्यूटीओ ने ध्वस्त कर दिया तो न केवल किसानों के हितों को चोट पहुँचेगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा का भविष्य भी अधर में लटक जाएगा। हालाँकि कुछ संधियों के मद्देनज़र भारत को इस संबंध में कुछ रियायतें मिली हुई हैं लेकिन इन रियायतों की भी अपनी एक सीमा है और डब्ल्यूटीओ का कृषि समझौता खाद्य सुरक्षा नीति के विरुद्ध होने के साथ ही देश की नीति-निर्धारण की संप्रभुता में हस्तक्षेप भी है। सतत् तथा समावेशी विकास की अवधारणा को लागू करने के लिये यह आवश्यक है कि सभी देश अपने-अपने संकीर्ण हितों को छोड़ कर आगे बढ़ें और विकास तथा व्यापार के बीच सामंजस्य बनाते हुए स्थायी समाधान पर आएँ। इसके लिए विकसित देशों को भारत जैसे देशों के सामाजिक परिस्थिति का ध्यान रखना चाहिए साथ में विकासशील देशों को अपने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में सुधार के व्यापक प्रयास करना चाहिए।
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##Question:विश्व व्यापार संगठन के बारे में संक्षिप्त व्याख्या कीजिए। साथ ही, कृषि सब्सिडी के मुद्दें पर भारत से संबंधित विवाद का परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain briefly about the World Trade Organization. Also, examine the dispute related to India on the issues of agricultural subsidies. (150-200 words; 10 Marks )##Answer:दृष्टिकोण – विश्व व्यापार संगठन की संक्षेप मे भूमिका कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार समझौते के बारे में लिखिए। इसके बाद भारत के साथ विवाद के मुद्दों का विवरण दीजिए। सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। विश्व व्यापार संगठन विश्व में व्यापार संबंधी अवरोधों को दूर कर वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने वाला एकअंतर-सरकारी संगठन है। जिसकी स्थापना1995 में मारकेश संधिके तहत की गई थी। इसका मुख्यालयजेनेवामें है। वर्तमान में विश्व के 165 देश इसके सदस्य हैं। सदस्य देशों का मंत्रिस्तरीय सम्मलेन इसके निर्णयों के लिये सर्वोच्च निकाय है, जिसकी बैठक प्रत्येक दो वर्षों में आयोजित की जाती है। कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार समझौता: वर्ष 1994 से विश्व व्यापार समझौता कृषि क्षेत्र में लागू हुआ। यह समझौता कृषि क्षेत्र में निवेश और व्यापार के नियमों को वैश्विक स्तर पर संस्थाबद्ध किये जाने का प्रयास था। इसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर उत्पाद एवं व्यापार का निजीकरण करना था। विश्व व्यापार संगठन का तर्क यह था कि यदि देश अपने सुरक्षित अन्न भंडार की सीमा कम कर देते हैं या खत्म कर देते हैं तो इससे विश्व व्यापार उस दिशा की ओर मुड़ जाएगा, जहाँ माँग अधिक होगी। किसानों को विनियमित बाज़ारों से लाभ होगा और उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिलेगा। बाजार की स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा के कारण उपभोक्ताओं को भी सस्ते मूल्य पर खाद्य सामग्रियाँ प्राप्त होंगी। भारत के साथ विवाद के मुद्दे: विश्व व्यापार संगठन ने कृषि सब्सिडी का हिसाब भी गलत तरीके से किया हुआ है। इसकी गणना 1986-88 की कीमतों के आधार पर की जाती है। यदि वर्तमान कीमतों या वर्तमान लागत के आधार पर वे आकलन करेंगे तो जो सब्सिडी बहुत अधिक और राज्य पर बड़ा बोझ दिखाई दे रही है, वह वास्तव में बहुत कम रह जाएगी। भारत के संदर्भ मे न्यूनतम समर्थन मूल्य ही सरकारी अनाज के खरीद का आधार है। यदि इस आधार को ही डब्ल्यूटीओ ने ध्वस्त कर दिया तो न केवल किसानों के हितों को चोट पहुँचेगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा का भविष्य भी अधर में लटक जाएगा। हालाँकि कुछ संधियों के मद्देनज़र भारत को इस संबंध में कुछ रियायतें मिली हुई हैं लेकिन इन रियायतों की भी अपनी एक सीमा है और डब्ल्यूटीओ का कृषि समझौता खाद्य सुरक्षा नीति के विरुद्ध होने के साथ ही देश की नीति-निर्धारण की संप्रभुता में हस्तक्षेप भी है। सतत् तथा समावेशी विकास की अवधारणा को लागू करने के लिये यह आवश्यक है कि सभी देश अपने-अपने संकीर्ण हितों को छोड़ कर आगे बढ़ें और विकास तथा व्यापार के बीच सामंजस्य बनाते हुए स्थायी समाधान पर आएँ। इसके लिए विकसित देशों को भारत जैसे देशों के सामाजिक परिस्थिति का ध्यान रखना चाहिए साथ में विकासशील देशों को अपने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में सुधार के व्यापक प्रयास करना चाहिए।
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मौर्यकालीन प्रशासन का संक्षिप्त परिचय देते हुए यह बताईये कि मौर्य शासकों ने विशाल कर्मचारी वर्ग को क्यों रखा था? (150-200 शब्द; 10 अंक) Givea brief introduction of the Mauryan administration and Explain, why the Mauryan rulers kept a large number of Administrative Staffs. (150-200 Words; 10 Marks)
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एप्रोच- मौर्यकालीन प्रशासन तथा उसे जानने हेतु स्रोतों के संक्षिप्त परिचय से उत्तर प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, मौर्यकालीन प्रशासन के विभिन्न आयामों का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,यह बताईये कि मौर्य शासकों ने विशाल कर्मचारी वर्ग को क्यों रखा था| उत्तर- मौर्यकाल(322BC- 185BC) की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी विस्तृत प्रशासनिक व्यवस्था थी| भारत की(तथा शायद विश्व की) यह पहली ऐसी व्यवस्थित प्रशासन व्यवस्था थी जिसकी तुलना आज के आधुनिक प्रशासन व्यवस्था से की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| उनकी शासन व्यवस्था की विस्तृत झलक हमें मेगास्थनीज की पुस्तक "इंडिका" तथा कौटिल्य के "अर्थशास्त्र " में मिलती है| मौर्यकालीन प्रशासन केंद्र से लेकर ग्रामीण स्तर तक श्रेणीबद्ध प्रशासनिक ढांचे का साक्ष्य; राजा प्रशासन में सर्वेसर्वा था| कौटिल्य ने राज्य के 7 तत्वों में राजा को सबसे महत्वपूर्ण माना है| राजा की सहायता के लिए एक परिषद् गठित थी| हालाँकि राजा इस परिषद् की सलाह मानने को बाध्य नहीं था लेकिन ऊँचे अधिकारियों का चयन इस परिषद् के सदस्यों में से ही या इसके माध्यम से ही किया जाता था| साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त तथा हर एक प्रांत एक राजकुमार के जिम्में; प्रांत भी छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त; ग्रामांचल तथा नगरांचल दोनों के प्रशासन की व्यवस्था; मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र का प्रशासन छः समितियों के जिम्में; हर समिति में पांच-पांच सदस्य; केंद्रीय शासन के 2 दर्जन से अधिक विभाग जिनके द्वारा सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण; केंद्रीय स्तर पर श्रेणीबद्ध अधिकारियों के प्रमाण; प्रथम श्रेणी के अधिकारी को तीर्थ/महामात्य/अमात्य कहा जाना| जैसे- समाहर्ता- कर संग्रह करने वाला; सन्निधता- कोषाध्यक्ष आदि| अधिकारियों में दूसरी श्रेणी- अध्यक्षों की थी| कौटिल्य द्वारा 27 अध्यक्षों का उल्लेख जिसमें अधिकांशतः का संबंध आर्थिक गतिविधियों से;जैसे- सीताध्यक्ष- राजकीय भूमि पर कृषि का देखरेख करने वाला; अकाराध्यक्ष- खनन प्रमुख; शुल्काध्यक्ष- सीमाशुल्क; लक्षणाध्यक्ष- धातुओं की गुणवता की जाँच; पोतवाध्यक्ष- मापतौल आदि| प्राचीनकाल में सर्वाधिक संख्या में करों का आरोपण मौर्यकाल में ही दिखाई पड़ता है| वन, खान, शस्त्र आदि पर राज्य का अधिकार; कुशल गुप्तचर प्रशासन की भी जानकारी मिलती है| गूढ़पुरूष- संस्था- एक स्थान पर रहकर तथा संचर- स्थान बदलकर; मौर्यों ने एक विशाल सेना का गठन किया था तथा सैनिक प्रशासन के लिए 30 अधिकारियों की एक परिषद् थी जो 5-5 सदस्यों की 6 परिषदों में विभक्त; कौटिल्य ने सेना के 4 अंग तथा मेगास्थनीज ने सेना के 6 अंगों का उल्लेख किया है| केंद्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक श्रेणीबद्ध न्यायिक ढांचे का भी उल्लेख; फ़ौजदारी अदालत को कंटकशोधन तथा दीवानी अदालत को धर्मस्थीय कहा जाना; मौर्य शासकों द्वारा विशाल कर्मचारी वर्ग को रखे जाने के कारण मगध के राजाओं द्वारा अपनाई गयी उग्र सैनिक विजय की नीति के कारण अंग, वैशाली, काशी, कोशल, अवंती, कलिंग आदि भागों का मगध में विलय कर लिया गया था| इन सभी कारकों से जो सैनिक नियंत्रण स्थापित हुआ वह धीरे-धीरे जीवन के हर एक अंग पर दृष्टिगोचर हुआ| जनजीवन के हर एक क्षेत्र को अपने वश में रखने के लिए राज्य को विशाल अधिकारी वर्ग की आवश्यकता थी| यही कारण है कि प्राचीन इतिहास के किसी भी अन्य काल में हम इतने सारे अधिकारियों को नहीं पाते हैं जितना की मौर्यकाल में|
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##Question:मौर्यकालीन प्रशासन का संक्षिप्त परिचय देते हुए यह बताईये कि मौर्य शासकों ने विशाल कर्मचारी वर्ग को क्यों रखा था? (150-200 शब्द; 10 अंक) Givea brief introduction of the Mauryan administration and Explain, why the Mauryan rulers kept a large number of Administrative Staffs. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- मौर्यकालीन प्रशासन तथा उसे जानने हेतु स्रोतों के संक्षिप्त परिचय से उत्तर प्रारंभ कीजिये| अगले भाग में, मौर्यकालीन प्रशासन के विभिन्न आयामों का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,यह बताईये कि मौर्य शासकों ने विशाल कर्मचारी वर्ग को क्यों रखा था| उत्तर- मौर्यकाल(322BC- 185BC) की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी विस्तृत प्रशासनिक व्यवस्था थी| भारत की(तथा शायद विश्व की) यह पहली ऐसी व्यवस्थित प्रशासन व्यवस्था थी जिसकी तुलना आज के आधुनिक प्रशासन व्यवस्था से की जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| उनकी शासन व्यवस्था की विस्तृत झलक हमें मेगास्थनीज की पुस्तक "इंडिका" तथा कौटिल्य के "अर्थशास्त्र " में मिलती है| मौर्यकालीन प्रशासन केंद्र से लेकर ग्रामीण स्तर तक श्रेणीबद्ध प्रशासनिक ढांचे का साक्ष्य; राजा प्रशासन में सर्वेसर्वा था| कौटिल्य ने राज्य के 7 तत्वों में राजा को सबसे महत्वपूर्ण माना है| राजा की सहायता के लिए एक परिषद् गठित थी| हालाँकि राजा इस परिषद् की सलाह मानने को बाध्य नहीं था लेकिन ऊँचे अधिकारियों का चयन इस परिषद् के सदस्यों में से ही या इसके माध्यम से ही किया जाता था| साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त तथा हर एक प्रांत एक राजकुमार के जिम्में; प्रांत भी छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त; ग्रामांचल तथा नगरांचल दोनों के प्रशासन की व्यवस्था; मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र का प्रशासन छः समितियों के जिम्में; हर समिति में पांच-पांच सदस्य; केंद्रीय शासन के 2 दर्जन से अधिक विभाग जिनके द्वारा सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण; केंद्रीय स्तर पर श्रेणीबद्ध अधिकारियों के प्रमाण; प्रथम श्रेणी के अधिकारी को तीर्थ/महामात्य/अमात्य कहा जाना| जैसे- समाहर्ता- कर संग्रह करने वाला; सन्निधता- कोषाध्यक्ष आदि| अधिकारियों में दूसरी श्रेणी- अध्यक्षों की थी| कौटिल्य द्वारा 27 अध्यक्षों का उल्लेख जिसमें अधिकांशतः का संबंध आर्थिक गतिविधियों से;जैसे- सीताध्यक्ष- राजकीय भूमि पर कृषि का देखरेख करने वाला; अकाराध्यक्ष- खनन प्रमुख; शुल्काध्यक्ष- सीमाशुल्क; लक्षणाध्यक्ष- धातुओं की गुणवता की जाँच; पोतवाध्यक्ष- मापतौल आदि| प्राचीनकाल में सर्वाधिक संख्या में करों का आरोपण मौर्यकाल में ही दिखाई पड़ता है| वन, खान, शस्त्र आदि पर राज्य का अधिकार; कुशल गुप्तचर प्रशासन की भी जानकारी मिलती है| गूढ़पुरूष- संस्था- एक स्थान पर रहकर तथा संचर- स्थान बदलकर; मौर्यों ने एक विशाल सेना का गठन किया था तथा सैनिक प्रशासन के लिए 30 अधिकारियों की एक परिषद् थी जो 5-5 सदस्यों की 6 परिषदों में विभक्त; कौटिल्य ने सेना के 4 अंग तथा मेगास्थनीज ने सेना के 6 अंगों का उल्लेख किया है| केंद्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक श्रेणीबद्ध न्यायिक ढांचे का भी उल्लेख; फ़ौजदारी अदालत को कंटकशोधन तथा दीवानी अदालत को धर्मस्थीय कहा जाना; मौर्य शासकों द्वारा विशाल कर्मचारी वर्ग को रखे जाने के कारण मगध के राजाओं द्वारा अपनाई गयी उग्र सैनिक विजय की नीति के कारण अंग, वैशाली, काशी, कोशल, अवंती, कलिंग आदि भागों का मगध में विलय कर लिया गया था| इन सभी कारकों से जो सैनिक नियंत्रण स्थापित हुआ वह धीरे-धीरे जीवन के हर एक अंग पर दृष्टिगोचर हुआ| जनजीवन के हर एक क्षेत्र को अपने वश में रखने के लिए राज्य को विशाल अधिकारी वर्ग की आवश्यकता थी| यही कारण है कि प्राचीन इतिहास के किसी भी अन्य काल में हम इतने सारे अधिकारियों को नहीं पाते हैं जितना की मौर्यकाल में|
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गैर सरकारी संगठनों से आप क्या समझते हैं ? इनके वित्तपोषण एवं विनियमन की व्यवस्था को स्पष्ट करते हुये विकास उद्योग में इनकी भूमिका का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by NGOs? Analyze their role in the development industry by clarifying their financing and regulation arrangements. (150 to 200 words)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में गैर सरकारी संगठनों को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में इनके वित्तपोषण एवं विनियमन की व्यवस्था को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में विकास उद्योग में NGOs की भूमिका का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में सीमाएं एवं सावधानी स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये NGOs से तात्पर्य उन सभी समूहों एवं संगठनों से है जो सरकार का अंग न होते हुए भी सामाजिक न्याय एवं अधिशासन में सहयोगी होते हैं| गैर सरकारी संगठन एवं सिविल सोसाइटी के मध्य मूल भूत अंतर यह है कि जहाँ सिविल सोसाइटी किसी भी प्रकार के होते हुए एक मध्यस्थ का कार्य करती है, गैर सरकारी संगठनों की भूमिका सापेक्षिक रूप से अधिक सकारात्मक है| भारतीय परिप्रेक्ष्य में इन NGOs का इतिहास 1860 से प्रारम्भ माना जाता है जब तात्कालिक ब्रिटिश शासन व्यवस्था द्वारा सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम पारित किया गया| स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान इन संगठनों ने सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद न केवल इस कानून को जारी रखा गया बल्कि इसे और प्रभावी बनाते हुए स्रोतों को विस्तारित किया गया| वर्तमान में कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के अंतर्गत (वर्ष 2013 के संशोधन की धारा 8 के अंतर्गत) ट्रस्ट के माध्यम से भी संगठनों को पंजीकृत करवाया जा सकता है| NGOs के आर्थिक स्रोत इन संगठनों के आर्थिक स्रोत निम्नलिखित दो प्रकार से हो सकते हैं यथा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दी जा रही वित्तीय सहायता, वित्तपोषण तथा निजी उपक्रमों द्वारा सहायता जो CSR के अंतर्गत कॉर्पोरेट जगत से प्राप्त होती हो इसके अतिरिक्त व्यक्ति सहायताएं इसे प्रोत्साहित करने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 80G के अंतर्गत दानकर्ताओं को कर में छूट दिए जाने का प्रवाधान भी है, यदि संदर्भित NGO इस हेतु पात्र हो इसके अतिरक्त FCRA कानून की धारा 12 A के अंतर्गत वे अंतर्राष्ट्रीय के भी लाभार्थी हो सकते हैं इसके साथ ही ये संगठन स्वयं भी आय के स्रोत सृजित कर सकते हैं NGOs का नियमन इनके नियमन हेतु उनसे यह अपेक्षित है कि वे स्वयं अपना बैलेंस शीट बनाते हुए आंतरिक अंकेक्षण करें तथायदि आवश्यकता पड़े तो उनका बाह्य अंकेक्षण भी हो सकता है ये NGOs सामाजिक अंकेक्षण के अंतर्गत भी आते हैं परन्तु ये प्रभावी रूप से RTI के अंतर्गत नहीं आते हैं चूँकि NGOs व्यवसाय का रूप ग्रहण करते जा रहे हैं अतः हाल के दिनों में इन NGOs के विनियम के लिए नियामकों की मांग की जा रही है| इससे NGOs की गुणवत्ता बढ़ेगी जिससे इनके प्रति विश्वसनीयता बढ़ेगी| विकास उद्योग में NGOs की भूमिका विकास उद्योग मेंइन NGOs की भूमिका निम्न सन्दर्भों में देखी जा सकती है डेमोक्रेटिक डेफिसिट को कम करते हुए ये NGOs सामाजिक न्याय को लोगों तक सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रहे हैं यद्यपि उपरोक्त सन्दर्भ में गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह उठाये जा सकते हैं परन्तु मात्रात्मक सुलभता भी स्वयं में सहयोगी होती है OP निगम के अनुसार ये NGOs की सबसे बड़ी सफलता है कि इनके सहयोग के कारण लोगों का लोकतंत्र एवं शासन व्यवस्था में विशवास बना रहता है| ऐसा न होने की स्थिति में आंतरिक सुरक्षा की बड़ी चुनौतियाँ सामने आती है उदाहरणार्थ नक्सलवाद| ये NGOs उचित कौशल प्रशिक्षण एवं विकास उद्योगों में नवाचार संदर्भित शोधों में भी अति सहयोगी होते हैं| विकास उद्योग का एक अति अनिवार्य घटक नीतियों के सही दिशा में बनाए जाना है| NGOs इस दिशा में आवश्यक सुझाव प्रस्तुत करते हैं जो पालिसी ड्राफ्टिंग में सहयोगी होता है| हाल ही में mygov.in प्लेटफॉर्म के माध्यम से विभिन्न सन्दर्भों में ऐसे अति उपयोगी सुझाव प्रस्तुत किये गए हैं| 21वीं सदी में डिजिटलीकरण के कारण बढती असमानता को कम करने मेंइन NGOs का महत्वपूर्ण योगदान रहा है भारत सरकार इन NGOs के सहयोग से विभिन्न कॉमन सर्विस सेंटरों के द्वारा डिजिटल असमानता को कम करने का प्रयास कर रही है| 21वीं सदी में भारत में इन NGOs की एक नयी भूमिका दिख रही है जिसके अंतर्गत ये NGOs आंकड़ों, साक्ष्यों एवं इस सन्दर्भ में आवश्यक शोधों के आधार पर शासन को उचित एवं प्रभावी निर्णय लेने में सहयोग प्रदान कर रहे हैं|उदाहरणार्थ इंस्टिट्यूट ऑफ़ कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट, प्रयास NGO के द्वारा बाल अपराधों के सन्दर्भ में डाटा संग्रहण आदि| परन्तु ये NGOs संगठित अपराधों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो विशेषकर धनशोधन के सन्दर्भ में देखी जाती है| अतः यह अनिवार्य है कि विकास उद्योगों के हितार्थ इन NGOs को प्रोत्साहित किया जाए परन्तु साथ ही सिविल सोसाइटी नियामक आदि माध्यमों से इन पर नियंत्रण भी रखा जाए|
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##Question:गैर सरकारी संगठनों से आप क्या समझते हैं ? इनके वित्तपोषण एवं विनियमन की व्यवस्था को स्पष्ट करते हुये विकास उद्योग में इनकी भूमिका का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द) What do you understand by NGOs? Analyze their role in the development industry by clarifying their financing and regulation arrangements. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में गैर सरकारी संगठनों को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में इनके वित्तपोषण एवं विनियमन की व्यवस्था को स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में विकास उद्योग में NGOs की भूमिका का विश्लेषण कीजिये 4- अंतिम में सीमाएं एवं सावधानी स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये NGOs से तात्पर्य उन सभी समूहों एवं संगठनों से है जो सरकार का अंग न होते हुए भी सामाजिक न्याय एवं अधिशासन में सहयोगी होते हैं| गैर सरकारी संगठन एवं सिविल सोसाइटी के मध्य मूल भूत अंतर यह है कि जहाँ सिविल सोसाइटी किसी भी प्रकार के होते हुए एक मध्यस्थ का कार्य करती है, गैर सरकारी संगठनों की भूमिका सापेक्षिक रूप से अधिक सकारात्मक है| भारतीय परिप्रेक्ष्य में इन NGOs का इतिहास 1860 से प्रारम्भ माना जाता है जब तात्कालिक ब्रिटिश शासन व्यवस्था द्वारा सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम पारित किया गया| स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान इन संगठनों ने सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद न केवल इस कानून को जारी रखा गया बल्कि इसे और प्रभावी बनाते हुए स्रोतों को विस्तारित किया गया| वर्तमान में कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के अंतर्गत (वर्ष 2013 के संशोधन की धारा 8 के अंतर्गत) ट्रस्ट के माध्यम से भी संगठनों को पंजीकृत करवाया जा सकता है| NGOs के आर्थिक स्रोत इन संगठनों के आर्थिक स्रोत निम्नलिखित दो प्रकार से हो सकते हैं यथा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दी जा रही वित्तीय सहायता, वित्तपोषण तथा निजी उपक्रमों द्वारा सहायता जो CSR के अंतर्गत कॉर्पोरेट जगत से प्राप्त होती हो इसके अतिरिक्त व्यक्ति सहायताएं इसे प्रोत्साहित करने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 80G के अंतर्गत दानकर्ताओं को कर में छूट दिए जाने का प्रवाधान भी है, यदि संदर्भित NGO इस हेतु पात्र हो इसके अतिरक्त FCRA कानून की धारा 12 A के अंतर्गत वे अंतर्राष्ट्रीय के भी लाभार्थी हो सकते हैं इसके साथ ही ये संगठन स्वयं भी आय के स्रोत सृजित कर सकते हैं NGOs का नियमन इनके नियमन हेतु उनसे यह अपेक्षित है कि वे स्वयं अपना बैलेंस शीट बनाते हुए आंतरिक अंकेक्षण करें तथायदि आवश्यकता पड़े तो उनका बाह्य अंकेक्षण भी हो सकता है ये NGOs सामाजिक अंकेक्षण के अंतर्गत भी आते हैं परन्तु ये प्रभावी रूप से RTI के अंतर्गत नहीं आते हैं चूँकि NGOs व्यवसाय का रूप ग्रहण करते जा रहे हैं अतः हाल के दिनों में इन NGOs के विनियम के लिए नियामकों की मांग की जा रही है| इससे NGOs की गुणवत्ता बढ़ेगी जिससे इनके प्रति विश्वसनीयता बढ़ेगी| विकास उद्योग में NGOs की भूमिका विकास उद्योग मेंइन NGOs की भूमिका निम्न सन्दर्भों में देखी जा सकती है डेमोक्रेटिक डेफिसिट को कम करते हुए ये NGOs सामाजिक न्याय को लोगों तक सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रहे हैं यद्यपि उपरोक्त सन्दर्भ में गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह उठाये जा सकते हैं परन्तु मात्रात्मक सुलभता भी स्वयं में सहयोगी होती है OP निगम के अनुसार ये NGOs की सबसे बड़ी सफलता है कि इनके सहयोग के कारण लोगों का लोकतंत्र एवं शासन व्यवस्था में विशवास बना रहता है| ऐसा न होने की स्थिति में आंतरिक सुरक्षा की बड़ी चुनौतियाँ सामने आती है उदाहरणार्थ नक्सलवाद| ये NGOs उचित कौशल प्रशिक्षण एवं विकास उद्योगों में नवाचार संदर्भित शोधों में भी अति सहयोगी होते हैं| विकास उद्योग का एक अति अनिवार्य घटक नीतियों के सही दिशा में बनाए जाना है| NGOs इस दिशा में आवश्यक सुझाव प्रस्तुत करते हैं जो पालिसी ड्राफ्टिंग में सहयोगी होता है| हाल ही में mygov.in प्लेटफॉर्म के माध्यम से विभिन्न सन्दर्भों में ऐसे अति उपयोगी सुझाव प्रस्तुत किये गए हैं| 21वीं सदी में डिजिटलीकरण के कारण बढती असमानता को कम करने मेंइन NGOs का महत्वपूर्ण योगदान रहा है भारत सरकार इन NGOs के सहयोग से विभिन्न कॉमन सर्विस सेंटरों के द्वारा डिजिटल असमानता को कम करने का प्रयास कर रही है| 21वीं सदी में भारत में इन NGOs की एक नयी भूमिका दिख रही है जिसके अंतर्गत ये NGOs आंकड़ों, साक्ष्यों एवं इस सन्दर्भ में आवश्यक शोधों के आधार पर शासन को उचित एवं प्रभावी निर्णय लेने में सहयोग प्रदान कर रहे हैं|उदाहरणार्थ इंस्टिट्यूट ऑफ़ कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट, प्रयास NGO के द्वारा बाल अपराधों के सन्दर्भ में डाटा संग्रहण आदि| परन्तु ये NGOs संगठित अपराधों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो विशेषकर धनशोधन के सन्दर्भ में देखी जाती है| अतः यह अनिवार्य है कि विकास उद्योगों के हितार्थ इन NGOs को प्रोत्साहित किया जाए परन्तु साथ ही सिविल सोसाइटी नियामक आदि माध्यमों से इन पर नियंत्रण भी रखा जाए|
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पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ) 1996 का संक्षिप्त परिचय देते हुए , इसके महत्व की भी चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द, 10 अंक ) Give brief introduction of Panchayat Extension to Schedule Areas Act ( PESA )1996, also discuss its importance. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण: 1- भूमिका में स्थानीय शासन के बारे में जानकारी दीजिये| 2- प्रथम भाग में पेसा अधिनियम का संक्षिप्त परिचय दीजिये| 3-दूसरे भाग में पेसा के महत्व की चर्चा कीजिये| 4- संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर : स्थानीय स्वशासन एवं सत्ता के विकेंद्रीकरण के उद्देश्य से 1992 में 73वां संविधान संशोधन किया गया | यह संशोधन पाँचवी अनुसूची के राज्यों पर लागू नहीं होता है | इन राज्यों में स्थानीय स्वशासन की स्थापना के उद्देश्य से पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ),1996 लाया गया | पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ),1996 : यह अधिनियम संविधान की पांचवीं अनुसूची के राज्यों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति के प्रशासन और अनुसूचित क्षेत्रों के नियंत्रण से संबंधित है। "पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996" कुछ संशोधनों और अपवादों को छोड़कर संविधान के नौवें भागको,संविधान के अनुच्छेद244(1)के अंतर्गत अधिसूचित पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है। वर्तमान में, 10राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश,छत्तीसगढ़,गुजरात,हिमाचल प्रदेश,झारखंड,मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र,ओडिशा,राजस्थान और तेलंगाना में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मौजूद हैं| पेसा अधिनियम के अंतर्गत, आमतौर पर एक बस्ती या बस्तियों के समूह को मिलाकर एक गांव का गठन होता है, जिसमें एक समुदाय के लोग रहते हैं और अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों का प्रबंधन करते हैं। पेसा अधिनियम, के अंतर्गत उन सभी व्यक्तियों को लेकर हर गांव में एक ग्राम सभा होगी, जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं। पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ) 1996 का महत्व : पेसा का प्रभावी क्रियान्वयन न केवल विकास लाएगा बल्कि यह पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लोकतंत्र को और गहरा करेगा। इससे निर्णय लेने में लोगों की भागीदारी में वृद्धि होगी। पेसा आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करेगा| सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर बेहतर नियंत्रण होगा। पेसा से जनजातीय आबादी में गरीबी और बाहर पलायन कम हो जाएगा क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और प्रबंधन से उनकी आजीविका और आय में सुधार होगा। पेसा जनजातीय आबादी के शोषण को कम करेगा, क्योंकि वे ऋण देने,शराब की बिक्री खपत एवं गांव बाजारों का प्रबंधन करने में सक्षम होंगे। पेसा के प्रभावी कार्यान्वयन से भूमि के अवैध हस्तान्तरण पर रोक लगेगी और आदिवासियों की अवैध रूप से हस्तान्तरित जमीन को बहाल किया जा सकेगा| सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पेसा परंपराओं,रीति-रिवाजों और जनजातीय आबादी की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देगा। मादक द्रव्यों की बिक्री/खपत को विनियमित करना, लघु वनोपजों का स्वामित्व, भूमि हस्तान्तरण को रोकना और हस्तांतरित भूमि की बहाली, गांव बाजारों का प्रबंधन, अनुसूचित जनजाति को दिए जाने वाले ऋण पर नियंत्रण आदि अधिकार ग्रामसभा को मजबूत बनाते हैं जिससे कि स्थानीयता के संरक्षण में सहायता मिलेगी|
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##Question:पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ) 1996 का संक्षिप्त परिचय देते हुए , इसके महत्व की भी चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द, 10 अंक ) Give brief introduction of Panchayat Extension to Schedule Areas Act ( PESA )1996, also discuss its importance. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: 1- भूमिका में स्थानीय शासन के बारे में जानकारी दीजिये| 2- प्रथम भाग में पेसा अधिनियम का संक्षिप्त परिचय दीजिये| 3-दूसरे भाग में पेसा के महत्व की चर्चा कीजिये| 4- संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर : स्थानीय स्वशासन एवं सत्ता के विकेंद्रीकरण के उद्देश्य से 1992 में 73वां संविधान संशोधन किया गया | यह संशोधन पाँचवी अनुसूची के राज्यों पर लागू नहीं होता है | इन राज्यों में स्थानीय स्वशासन की स्थापना के उद्देश्य से पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ),1996 लाया गया | पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ),1996 : यह अधिनियम संविधान की पांचवीं अनुसूची के राज्यों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति के प्रशासन और अनुसूचित क्षेत्रों के नियंत्रण से संबंधित है। "पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996" कुछ संशोधनों और अपवादों को छोड़कर संविधान के नौवें भागको,संविधान के अनुच्छेद244(1)के अंतर्गत अधिसूचित पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है। वर्तमान में, 10राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश,छत्तीसगढ़,गुजरात,हिमाचल प्रदेश,झारखंड,मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र,ओडिशा,राजस्थान और तेलंगाना में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मौजूद हैं| पेसा अधिनियम के अंतर्गत, आमतौर पर एक बस्ती या बस्तियों के समूह को मिलाकर एक गांव का गठन होता है, जिसमें एक समुदाय के लोग रहते हैं और अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों का प्रबंधन करते हैं। पेसा अधिनियम, के अंतर्गत उन सभी व्यक्तियों को लेकर हर गांव में एक ग्राम सभा होगी, जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं। पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम (PESA ) 1996 का महत्व : पेसा का प्रभावी क्रियान्वयन न केवल विकास लाएगा बल्कि यह पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लोकतंत्र को और गहरा करेगा। इससे निर्णय लेने में लोगों की भागीदारी में वृद्धि होगी। पेसा आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करेगा| सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर बेहतर नियंत्रण होगा। पेसा से जनजातीय आबादी में गरीबी और बाहर पलायन कम हो जाएगा क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और प्रबंधन से उनकी आजीविका और आय में सुधार होगा। पेसा जनजातीय आबादी के शोषण को कम करेगा, क्योंकि वे ऋण देने,शराब की बिक्री खपत एवं गांव बाजारों का प्रबंधन करने में सक्षम होंगे। पेसा के प्रभावी कार्यान्वयन से भूमि के अवैध हस्तान्तरण पर रोक लगेगी और आदिवासियों की अवैध रूप से हस्तान्तरित जमीन को बहाल किया जा सकेगा| सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पेसा परंपराओं,रीति-रिवाजों और जनजातीय आबादी की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देगा। मादक द्रव्यों की बिक्री/खपत को विनियमित करना, लघु वनोपजों का स्वामित्व, भूमि हस्तान्तरण को रोकना और हस्तांतरित भूमि की बहाली, गांव बाजारों का प्रबंधन, अनुसूचित जनजाति को दिए जाने वाले ऋण पर नियंत्रण आदि अधिकार ग्रामसभा को मजबूत बनाते हैं जिससे कि स्थानीयता के संरक्षण में सहायता मिलेगी|
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Shed light on the Sudan type of climate. (150 words)
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BRIEF APPROACH:- INTRODUCTION CHARACTERISTICS OF THE SUDAN TYPE OF CLIMATE CONCLUSION Comment upon comparison with India ANSWER- Sudan type climate is the other name for Savannah type of climate/ climatic zone. It is also known as Parkland climate. It is found in the continental interiors- It is the transition area between the thick jungles and deserts. 1) TEMPERATURE High temperatures of more than 45 degrees Celsius are experienced in these areas. 2) AREAS Kenya, Tanzania, Uganda, Nigeria, NW Australia, Malawi, Niger, Sudan etc. experience such type of climate. 3) PRECIPITATION Since this region lies in the continental interiors, hence it experiences moderate rainfall. Therefore, one cannot find rich and luxurious growth of trees here. 4) BUSHWALES The land is dominated by grass. Therefore, these areas are also calledthe Tropical Grasslands. Trees do exist (though not continuously) with umbrella shaped canopies. This type of vegetation is called Bushwales. 5) FLORA Both short grass (till 6 feet) and long grass (till 12 feet) is found here. Baobabs and Elephanta grass (more than 15 feet height) are important tree and grass species found here. 6) FAUNA All tall and huge animals; carnivores and herbivores are found here. Hyenas, jaguars, tigers, lions, cheetah, lynx, deer, antelopes, rabbits, zebras, bisons, wild pigs, boar, wild dogs 7) IMPORTANCE- BIG GAME COUNTRY/ HUNTERS" PARADISE This is due to the fact that tall grass is found, where a variety of animals can hide. These animals’ skin also resembles the colour of the grass. This promotes the culture of natural hunting among the animals. Therefore, it is called the big game country. 8) TRIBES 8.1) Houzas of Nigeria- They are agriculturists and relatively developed. They grow crops such as maize, bajra, jowar (sorghum). 8.2) Masais- They are found in East Africa in Uganda, Tanzania etc. They are nomadic tribes. They are great lovers of cattle- The more the cattle they possess, the more is their ascribed status. They also drink the blood of the cattle along with milk. 8.3) Kikuyu- This is also a nomadic tribe. 9) DISEASE The disease called Ngana i.e. sleeping sickness due to the Tsetse fly is found in such regions. This disease is vaccine preventable. The Savannah type of climate is found in India as well- for example, in the Deccan interiors, which experiences continentality.
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##Question:Shed light on the Sudan type of climate. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH:- INTRODUCTION CHARACTERISTICS OF THE SUDAN TYPE OF CLIMATE CONCLUSION Comment upon comparison with India ANSWER- Sudan type climate is the other name for Savannah type of climate/ climatic zone. It is also known as Parkland climate. It is found in the continental interiors- It is the transition area between the thick jungles and deserts. 1) TEMPERATURE High temperatures of more than 45 degrees Celsius are experienced in these areas. 2) AREAS Kenya, Tanzania, Uganda, Nigeria, NW Australia, Malawi, Niger, Sudan etc. experience such type of climate. 3) PRECIPITATION Since this region lies in the continental interiors, hence it experiences moderate rainfall. Therefore, one cannot find rich and luxurious growth of trees here. 4) BUSHWALES The land is dominated by grass. Therefore, these areas are also calledthe Tropical Grasslands. Trees do exist (though not continuously) with umbrella shaped canopies. This type of vegetation is called Bushwales. 5) FLORA Both short grass (till 6 feet) and long grass (till 12 feet) is found here. Baobabs and Elephanta grass (more than 15 feet height) are important tree and grass species found here. 6) FAUNA All tall and huge animals; carnivores and herbivores are found here. Hyenas, jaguars, tigers, lions, cheetah, lynx, deer, antelopes, rabbits, zebras, bisons, wild pigs, boar, wild dogs 7) IMPORTANCE- BIG GAME COUNTRY/ HUNTERS" PARADISE This is due to the fact that tall grass is found, where a variety of animals can hide. These animals’ skin also resembles the colour of the grass. This promotes the culture of natural hunting among the animals. Therefore, it is called the big game country. 8) TRIBES 8.1) Houzas of Nigeria- They are agriculturists and relatively developed. They grow crops such as maize, bajra, jowar (sorghum). 8.2) Masais- They are found in East Africa in Uganda, Tanzania etc. They are nomadic tribes. They are great lovers of cattle- The more the cattle they possess, the more is their ascribed status. They also drink the blood of the cattle along with milk. 8.3) Kikuyu- This is also a nomadic tribe. 9) DISEASE The disease called Ngana i.e. sleeping sickness due to the Tsetse fly is found in such regions. This disease is vaccine preventable. The Savannah type of climate is found in India as well- for example, in the Deccan interiors, which experiences continentality.
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यद्यपि संविधान राष्ट्रपति को विवेकाधिकार नहीं देता है किन्तु राष्ट्रपति विभिन्न परिस्थितिजन्य निर्णय स्वयं लेता है| संगत तर्कों के साथ कथन का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Although the Constitution does not give discretion to the President, the President himself takes various circumstantial decisions. Analyze the statement with relevant arguments. (150 to 200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में संविधान में राष्ट्रपति पद के बारे में जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में विवेक प्रयोग के सन्दर्भ में राष्ट्रपति की स्थिति स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में राष्ट्रपति द्वारा परिस्थितिजन्य स्वनिर्णय की स्थितियों को स्पष्ट कीजिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार संघ की कार्यपालकीय शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी| अनुच्छेद 53(1) के अनुसार, संघ के प्रधान के रूप में राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोगसीधे या अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम सेसंचालित करेगा| अनुच्छेद 74(1) के अनुसार, केंद्र में एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका मुखिया प्रधानमन्त्री होगा| यह मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को संघ की प्रशासनिक कार्यवाहियों को निष्पादित करने में सहायता और परामर्श देगी| 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 74(1) में संशोधन कर यह व्यवस्था की गयी की राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा| विवेक प्रयोग के सन्दर्भ में राष्ट्रपति की स्थिति मंत्रिपरिषद से सम्बन्धित उपरोक्त उपबन्धों के परिप्रेक्ष्य में तथा पारस्परिक पार्थक्य के नियम के अनुसार राष्ट्रपति संघ का सांकेतिक अध्यक्ष होता है वह शासन व्यवस्था में कोई रिक्तता नहीं आने देता इसी दायित्व के अंतर्गत राष्ट्रपति यह सुनिश्चित करता है कि प्रधानमन्त्री का पद रिक्त न रहे| अतः स्पष्ट है कि शासन का वास्तविक अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होता है राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है| दुसरे शब्दों में राष्ट्रपति को कोई विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है| राष्ट्रपति द्वारा परिस्थितिजन्य स्वनिर्णय की स्थितियां यदि पदासीन प्रधानमंत्री की अचानक मृत्यु हो जाए तो उस समय की मंत्रिपरिषद तत्काल प्रभाव से भंग हो जाएगी| ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति किसी भी नेता कोअपने विवेक सेअगला प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है| यदि पदासीन प्रधानमंत्री अचानक अपना त्यागपत्र दे दे तो उस समय की मंत्रिपरिषद स्वतः भंग हो जायेगी|ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति अपने विवेक से किसी नेता को अगला प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है| यदि कोई पदासीन प्रधानमंत्री लोक सभा में अपना बहुमत खो चुका हो और फिर भी त्यागपत्र न दे रहा हो और इसी बीच उसे हटाने के लिए विरोधीदल अविश्वास प्रस्ताव ले आयें, और वह इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए राष्ट्रपति से लोकसभा भंग कर नए चुनाव कराने की सिफारिश करे तो राष्ट्रपति उसके परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं होगा| बल्कि वह वैकल्पिक सरकार गठित करने का प्रयास करेगा| राष्ट्रपति किसी प्रधानमन्त्री के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के मामले में तभी जांच का आदेश दे सकता है जब किसी नियमित अदालत ने प्रथम दृष्टया उसे दोषी पाया हो| जब चुनाव में किसी दल को बहुमत प्राप्त न हुआ हो और कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में न हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति किसी नेता की प्रधानमन्त्री के रूप में सशर्त नियुक्ति कर सकता है| अनुच्छेद 78 के अनुसार, राष्ट्रपति अपनी समझ से जब चाहे प्रधानमंत्री से संघ के शासकीय कार्यों और विधायन के प्रस्तावों के सम्बन्ध में जानकारी मांग सकता है| अनुच्छेद 103 की धारा 2 के अनुसार यदि किसी संसद सदस्य की सदस्यता समाप्त करने का कोई प्रश्न राष्ट्रपति के समक्ष आ जाए तो राष्ट्रपति इस सम्बन्ध मेंनिर्वाचन आयोग से परामर्श लेगा और उसी के अनुसार कार्यकरेगा अनुच्छेद 217(3) के अनुसार यदि HC के किसी जज की आयु को लेकर कोई विवाद खडा हो जाए तो वह इस सम्बन्ध में CJI से परामर्श लेगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा| इस प्रकार से स्पष्ट होता है कि यद्यपि संविधान राष्ट्रपति को विवेकाधिकार प्रदान नहीं करता है किन्तु विभिन्न परिस्थियों में राष्ट्रपति को स्वयं निर्णय लेने पड़ते हैं|
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##Question:यद्यपि संविधान राष्ट्रपति को विवेकाधिकार नहीं देता है किन्तु राष्ट्रपति विभिन्न परिस्थितिजन्य निर्णय स्वयं लेता है| संगत तर्कों के साथ कथन का विश्लेषण कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) Although the Constitution does not give discretion to the President, the President himself takes various circumstantial decisions. Analyze the statement with relevant arguments. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में संविधान में राष्ट्रपति पद के बारे में जानकारी दीजिये 2- प्रथम भाग में विवेक प्रयोग के सन्दर्भ में राष्ट्रपति की स्थिति स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में राष्ट्रपति द्वारा परिस्थितिजन्य स्वनिर्णय की स्थितियों को स्पष्ट कीजिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार संघ की कार्यपालकीय शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी| अनुच्छेद 53(1) के अनुसार, संघ के प्रधान के रूप में राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोगसीधे या अपने अधीनस्थ किसी कार्यालय के माध्यम सेसंचालित करेगा| अनुच्छेद 74(1) के अनुसार, केंद्र में एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका मुखिया प्रधानमन्त्री होगा| यह मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को संघ की प्रशासनिक कार्यवाहियों को निष्पादित करने में सहायता और परामर्श देगी| 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 74(1) में संशोधन कर यह व्यवस्था की गयी की राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा| विवेक प्रयोग के सन्दर्भ में राष्ट्रपति की स्थिति मंत्रिपरिषद से सम्बन्धित उपरोक्त उपबन्धों के परिप्रेक्ष्य में तथा पारस्परिक पार्थक्य के नियम के अनुसार राष्ट्रपति संघ का सांकेतिक अध्यक्ष होता है वह शासन व्यवस्था में कोई रिक्तता नहीं आने देता इसी दायित्व के अंतर्गत राष्ट्रपति यह सुनिश्चित करता है कि प्रधानमन्त्री का पद रिक्त न रहे| अतः स्पष्ट है कि शासन का वास्तविक अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होता है राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है| दुसरे शब्दों में राष्ट्रपति को कोई विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है| राष्ट्रपति द्वारा परिस्थितिजन्य स्वनिर्णय की स्थितियां यदि पदासीन प्रधानमंत्री की अचानक मृत्यु हो जाए तो उस समय की मंत्रिपरिषद तत्काल प्रभाव से भंग हो जाएगी| ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति किसी भी नेता कोअपने विवेक सेअगला प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है| यदि पदासीन प्रधानमंत्री अचानक अपना त्यागपत्र दे दे तो उस समय की मंत्रिपरिषद स्वतः भंग हो जायेगी|ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति अपने विवेक से किसी नेता को अगला प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है| यदि कोई पदासीन प्रधानमंत्री लोक सभा में अपना बहुमत खो चुका हो और फिर भी त्यागपत्र न दे रहा हो और इसी बीच उसे हटाने के लिए विरोधीदल अविश्वास प्रस्ताव ले आयें, और वह इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए राष्ट्रपति से लोकसभा भंग कर नए चुनाव कराने की सिफारिश करे तो राष्ट्रपति उसके परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं होगा| बल्कि वह वैकल्पिक सरकार गठित करने का प्रयास करेगा| राष्ट्रपति किसी प्रधानमन्त्री के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के मामले में तभी जांच का आदेश दे सकता है जब किसी नियमित अदालत ने प्रथम दृष्टया उसे दोषी पाया हो| जब चुनाव में किसी दल को बहुमत प्राप्त न हुआ हो और कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में न हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति किसी नेता की प्रधानमन्त्री के रूप में सशर्त नियुक्ति कर सकता है| अनुच्छेद 78 के अनुसार, राष्ट्रपति अपनी समझ से जब चाहे प्रधानमंत्री से संघ के शासकीय कार्यों और विधायन के प्रस्तावों के सम्बन्ध में जानकारी मांग सकता है| अनुच्छेद 103 की धारा 2 के अनुसार यदि किसी संसद सदस्य की सदस्यता समाप्त करने का कोई प्रश्न राष्ट्रपति के समक्ष आ जाए तो राष्ट्रपति इस सम्बन्ध मेंनिर्वाचन आयोग से परामर्श लेगा और उसी के अनुसार कार्यकरेगा अनुच्छेद 217(3) के अनुसार यदि HC के किसी जज की आयु को लेकर कोई विवाद खडा हो जाए तो वह इस सम्बन्ध में CJI से परामर्श लेगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा| इस प्रकार से स्पष्ट होता है कि यद्यपि संविधान राष्ट्रपति को विवेकाधिकार प्रदान नहीं करता है किन्तु विभिन्न परिस्थियों में राष्ट्रपति को स्वयं निर्णय लेने पड़ते हैं|
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भारतीय परिप्रेक्ष्य में विश्व बैंक की वर्तमान प्रासंगिकता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Critically examine the current relevance of the World Bank from an Indian perspective. (150-200 words/10 Marks)
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दृष्टिकोण: 1- भूमिका में विश्व बैंक समूह के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये| 2- प्रथम भाग में भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व बैंक की भूमिका को स्पष्ट कीजिये| 3-दूसरे भाग में भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में विश्व बैंक की सीमाओं की चर्चा कीजिये| 4- संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर : विश्व बैंक, दुनिया भर में विकासशील देशों के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसका मिशन है गरीबी से संघर्ष कर स्थायी परिणाम हासिल करना और लोगों को अपनी तथा अपने पर्यावरण के विकास हेतु सहायता देना है। विश्व बैंक दो विकास संस्थाओं का संगम है : अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (आईबीआरडी) और अंतर्राष्ट्रीय विकास एसोसिएशन (आईडीए)। इन दोनों संस्थाओं में 188 सदस्य देश शामिल है। विकासशील देशों को विविध उद्देश्यों के लिए कम ब्याज पर ऋण, ब्याज मुक्त उधारी और अनुदान प्रदान करती हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक प्रशासन, बुनियादी सुविधा क्षेत्र, वित्त एवं निजी क्षेत्र विकास, कृषि एवं पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में निवेश शामिल है। भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व बैंक की भूमिका: भारत में उपस्थिति: विश्व बैंक भारत में 1957 से उपस्थित है एवं भारत में इसके फोकस के क्षेत्र समावेशी संवृद्धि, स्वच्छ विकास एवं वैश्विक एकीकरण हैं| भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व बैंक मुख्यतः विभिन्न विकास परियोजनाओं को आरंभ कर एवं उनके लिए वित्त का प्रबंध कर सकारात्मक योगदान देती है| यथा- आंध्र प्रदेश स्वस्थ्य प्रणाली सुदृढीकरण परियोजना उत्तर प्रदेश कोर रोड नेटवर्क डेवलपमेंट प्रोजेक्ट इनोवेशन इन सोलर पावर एंड हाइब्रिड टेक्नोलॉजीज इंडिया राजस्थान राज्य राजमार्ग विकास कार्यक्रम इसके साथ ही विश्व बैंक आर्थिक संकट के समय ऋण उपलब्ध करा के भी भारत की मदद करता है| विश्व बैंक की सीमाएं: जिन परियोजनाओं के आधार पर यह वित्त उपलब्ध करती है, वे अनुमानों पर आधारित होती हैं- जिसमें शासन और अन्य संगठनों का समर्थन, बाजार की स्थिति, मानवीय और लाभ शामिल होते हैं। जोखिमों की पहचान करने और उन्हें कम करने के लिए योजनाओं की देखभाल की जाती है, और व्यापक "सुरक्षा उपाय" हैं - लेकिन स्थितियां बदल सकती हैं और अनुमान और धारणाएं गलत हो सकती हैं| वर्ल्ड बैंक के पास कुछ पात्रता शर्तें हैं जो देशों को ऋण प्राप्त करने के लिए निर्धारित हैं- जैसे सदस्यता और साख। धन प्रवाह को बनाए रखने की भी शर्तें हैं, उदाहरण के लिए; ऋण रद्द किए जा सकते हैं। कभी-कभी प्राप्तकर्ता देश अनुरोध रद्द कर देता है अगर उन्हें लगता है कि पैसा कहीं और खर्च किया जाता हैं| वस्तुतः विश्व बैंक विकासशील देशों के विकास में अहम भूमिका निभा रहा है; अपनी प्रभावशीलता में सुधार लाने के लिए आवश्यक है कि समय के साथ स्वयं के अधिदेश एवं संरचना में अनुकूल परिवर्तन करता रहे|
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##Question:भारतीय परिप्रेक्ष्य में विश्व बैंक की वर्तमान प्रासंगिकता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Critically examine the current relevance of the World Bank from an Indian perspective. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: 1- भूमिका में विश्व बैंक समूह के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिये| 2- प्रथम भाग में भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व बैंक की भूमिका को स्पष्ट कीजिये| 3-दूसरे भाग में भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में विश्व बैंक की सीमाओं की चर्चा कीजिये| 4- संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर : विश्व बैंक, दुनिया भर में विकासशील देशों के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसका मिशन है गरीबी से संघर्ष कर स्थायी परिणाम हासिल करना और लोगों को अपनी तथा अपने पर्यावरण के विकास हेतु सहायता देना है। विश्व बैंक दो विकास संस्थाओं का संगम है : अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (आईबीआरडी) और अंतर्राष्ट्रीय विकास एसोसिएशन (आईडीए)। इन दोनों संस्थाओं में 188 सदस्य देश शामिल है। विकासशील देशों को विविध उद्देश्यों के लिए कम ब्याज पर ऋण, ब्याज मुक्त उधारी और अनुदान प्रदान करती हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक प्रशासन, बुनियादी सुविधा क्षेत्र, वित्त एवं निजी क्षेत्र विकास, कृषि एवं पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में निवेश शामिल है। भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व बैंक की भूमिका: भारत में उपस्थिति: विश्व बैंक भारत में 1957 से उपस्थित है एवं भारत में इसके फोकस के क्षेत्र समावेशी संवृद्धि, स्वच्छ विकास एवं वैश्विक एकीकरण हैं| भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व बैंक मुख्यतः विभिन्न विकास परियोजनाओं को आरंभ कर एवं उनके लिए वित्त का प्रबंध कर सकारात्मक योगदान देती है| यथा- आंध्र प्रदेश स्वस्थ्य प्रणाली सुदृढीकरण परियोजना उत्तर प्रदेश कोर रोड नेटवर्क डेवलपमेंट प्रोजेक्ट इनोवेशन इन सोलर पावर एंड हाइब्रिड टेक्नोलॉजीज इंडिया राजस्थान राज्य राजमार्ग विकास कार्यक्रम इसके साथ ही विश्व बैंक आर्थिक संकट के समय ऋण उपलब्ध करा के भी भारत की मदद करता है| विश्व बैंक की सीमाएं: जिन परियोजनाओं के आधार पर यह वित्त उपलब्ध करती है, वे अनुमानों पर आधारित होती हैं- जिसमें शासन और अन्य संगठनों का समर्थन, बाजार की स्थिति, मानवीय और लाभ शामिल होते हैं। जोखिमों की पहचान करने और उन्हें कम करने के लिए योजनाओं की देखभाल की जाती है, और व्यापक "सुरक्षा उपाय" हैं - लेकिन स्थितियां बदल सकती हैं और अनुमान और धारणाएं गलत हो सकती हैं| वर्ल्ड बैंक के पास कुछ पात्रता शर्तें हैं जो देशों को ऋण प्राप्त करने के लिए निर्धारित हैं- जैसे सदस्यता और साख। धन प्रवाह को बनाए रखने की भी शर्तें हैं, उदाहरण के लिए; ऋण रद्द किए जा सकते हैं। कभी-कभी प्राप्तकर्ता देश अनुरोध रद्द कर देता है अगर उन्हें लगता है कि पैसा कहीं और खर्च किया जाता हैं| वस्तुतः विश्व बैंक विकासशील देशों के विकास में अहम भूमिका निभा रहा है; अपनी प्रभावशीलता में सुधार लाने के लिए आवश्यक है कि समय के साथ स्वयं के अधिदेश एवं संरचना में अनुकूल परिवर्तन करता रहे|
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धर्मनिरपेक्षता, धार्मिकता एवं सांप्रदायिकता की अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिये| साथ ही,सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एवं नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता के मध्य अंतरों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain the concepts of secularism, religiosity and communalism. Also, underline the differences between positive secularism and negative secularism. (150-200 words; 10 Marks)
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एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में,धर्मनिरपेक्षता, धार्मिकता एवं सांप्रदायिकता की अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में,सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एवं नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता के मध्य अंतरों को रेखांकित कीजिये उत्तर- धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समाज की आस्था एवं विचारधारा से है जो अस्तित्व को स्वीकार करते हुए सामाजिक जीवन को संभव बनाती है|व्यक्तिगत संदर्भों में धर्म के प्रमुख कार्य तनाव नियंत्रण; अनसुलझे प्रश्नों के समाधान तथा अस्तित्व की व्याख्या करना है| सामाजिक स्तर पर धर्म के 3 मुख्य कार्यसामाजिक पहचान,सामाजिक नियंत्रण तथासामाजिक भातृत्व को सुनिश्चित करना है| धर्मनिरपेक्षता -धर्मनिरपेक्षता से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समाज की सामाजिक संरचना एवं दर्शन तथा राजनीतिक चिंतन के मानवीय मूल्यों पर आधारित होते हुए धर्म के प्रति तटस्थता से है जो निम्न 2 प्रकार की हो सकती हैं- सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एवं नकारात्मकधर्मनिरपेक्षता| धार्मिकता - यह किसी व्यक्ति की धर्म के प्रति दृष्टिकोण को परिभाषित करती है|अतः, किसी व्यक्ति का आस्तिक या नास्तिक होना तथा धर्मनिरपेक्ष या सांप्रदायिक होना 2 स्वतंत्र घटक हैं|यह संभव है कि एक व्यक्ति आस्तिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष रहे तथा यह भी संभव है कि एक व्यक्ति नास्तिक होते हुए भी सांप्रदायिक हो जैसे- गांधीजी तथा जिन्ना; सांप्रदायिकता - किसी व्यक्ति/समूह की दूसरे धर्मों के जीवनशैली एवं जीवनदर्शन के संदर्भ में नकारात्मक दृष्टिकोण से है| इस विचारधारा के अनुसार एक धार्मिक समूह/संप्रदाय के राजनीतिक, सामाजिक या अन्य हित दूसरे धार्मिक समूह/संप्रदाय से भिन्न होते हैं तथा दोनों कभी भी मिलकर एक साथ नहीं रह सकते हैं| भारतीय परिप्रेक्ष्य में सांप्रदायिकता का प्रारंभ 1940 के दशक में प्रचलित हुए द्विराष्ट्र सिद्धांत से माना जाता है| यह निम्नलिखित 3 चरणों में स्थापित होता है- पूर्वाग्रह आधारित सामाजिक दूरी; सामाजिक दूरी से जन्मी संवादहीनता एवं संप्रेषण में कमी; संवादहीनतासे जन्मी भेदभाव की सोच जो हिंसात्मक रूप भी धारण कर सकती हो; सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता - यह एक ऐसी सोच है जिसके अंतर्गत सभी धर्मों के संरक्षण एवं संवर्धन को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक व्यवस्था मानवीय मूल्यों से प्रेरित हो रही होती है| ऐसे समाज में शासन स्वंय ही ऐसी व्यवस्थाएं बनाता है जिसके अंतर्गत सभी धर्मों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु विकल्प हों परंतु फिर भी, मुख्य शासन व्यवस्था निष्पक्ष रहती है| यहाँ यह समझना अनिवार्य है कि इस तरह की व्यवस्थाओं में संस्कृति के उन तत्वों को स्वीकार किया जा सकता है जिनका मूलाधिकारों से द्वंध ना हो|भारत, इटली जैसे देश सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैं| नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता - यह एक ऐसी सार्वजनिक सोच है जिसके अंतर्गत धर्म को व्यक्तियों या समुदायों का निजी अधिकार मानते हुए धार्मिक अधिकारों के बजाय मानव अधिकारों को वरीयता दी जाती है| ऐसी व्यवस्था में धर्म के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण पूर्णतयः तटस्थ होता होता है| अधिकांश यूरोपीय देश यद्यपि नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैंपरंतु हाल ही में फ़्रांस की शासन व्यवस्था ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को बेहतर विकल्प बताते हुए शासन व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन की बात कही है| उनका मुख्य तर्क यह था कि यदि संवैधानिक ढाँचा धर्मनिरपेक्षता को प्रोत्साहित करेगा तो धार्मिक अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना में कमी आयेगी|
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##Question:धर्मनिरपेक्षता, धार्मिकता एवं सांप्रदायिकता की अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिये| साथ ही,सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एवं नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता के मध्य अंतरों को रेखांकित कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक ) Explain the concepts of secularism, religiosity and communalism. Also, underline the differences between positive secularism and negative secularism. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर के पहले भाग में,धर्मनिरपेक्षता, धार्मिकता एवं सांप्रदायिकता की अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिये| अंतिम भाग में,सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एवं नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता के मध्य अंतरों को रेखांकित कीजिये उत्तर- धर्म से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समाज की आस्था एवं विचारधारा से है जो अस्तित्व को स्वीकार करते हुए सामाजिक जीवन को संभव बनाती है|व्यक्तिगत संदर्भों में धर्म के प्रमुख कार्य तनाव नियंत्रण; अनसुलझे प्रश्नों के समाधान तथा अस्तित्व की व्याख्या करना है| सामाजिक स्तर पर धर्म के 3 मुख्य कार्यसामाजिक पहचान,सामाजिक नियंत्रण तथासामाजिक भातृत्व को सुनिश्चित करना है| धर्मनिरपेक्षता -धर्मनिरपेक्षता से तात्पर्य किसी व्यक्ति या समाज की सामाजिक संरचना एवं दर्शन तथा राजनीतिक चिंतन के मानवीय मूल्यों पर आधारित होते हुए धर्म के प्रति तटस्थता से है जो निम्न 2 प्रकार की हो सकती हैं- सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता एवं नकारात्मकधर्मनिरपेक्षता| धार्मिकता - यह किसी व्यक्ति की धर्म के प्रति दृष्टिकोण को परिभाषित करती है|अतः, किसी व्यक्ति का आस्तिक या नास्तिक होना तथा धर्मनिरपेक्ष या सांप्रदायिक होना 2 स्वतंत्र घटक हैं|यह संभव है कि एक व्यक्ति आस्तिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष रहे तथा यह भी संभव है कि एक व्यक्ति नास्तिक होते हुए भी सांप्रदायिक हो जैसे- गांधीजी तथा जिन्ना; सांप्रदायिकता - किसी व्यक्ति/समूह की दूसरे धर्मों के जीवनशैली एवं जीवनदर्शन के संदर्भ में नकारात्मक दृष्टिकोण से है| इस विचारधारा के अनुसार एक धार्मिक समूह/संप्रदाय के राजनीतिक, सामाजिक या अन्य हित दूसरे धार्मिक समूह/संप्रदाय से भिन्न होते हैं तथा दोनों कभी भी मिलकर एक साथ नहीं रह सकते हैं| भारतीय परिप्रेक्ष्य में सांप्रदायिकता का प्रारंभ 1940 के दशक में प्रचलित हुए द्विराष्ट्र सिद्धांत से माना जाता है| यह निम्नलिखित 3 चरणों में स्थापित होता है- पूर्वाग्रह आधारित सामाजिक दूरी; सामाजिक दूरी से जन्मी संवादहीनता एवं संप्रेषण में कमी; संवादहीनतासे जन्मी भेदभाव की सोच जो हिंसात्मक रूप भी धारण कर सकती हो; सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता - यह एक ऐसी सोच है जिसके अंतर्गत सभी धर्मों के संरक्षण एवं संवर्धन को सुनिश्चित करते हुए सामाजिक व्यवस्था मानवीय मूल्यों से प्रेरित हो रही होती है| ऐसे समाज में शासन स्वंय ही ऐसी व्यवस्थाएं बनाता है जिसके अंतर्गत सभी धर्मों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु विकल्प हों परंतु फिर भी, मुख्य शासन व्यवस्था निष्पक्ष रहती है| यहाँ यह समझना अनिवार्य है कि इस तरह की व्यवस्थाओं में संस्कृति के उन तत्वों को स्वीकार किया जा सकता है जिनका मूलाधिकारों से द्वंध ना हो|भारत, इटली जैसे देश सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैं| नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता - यह एक ऐसी सार्वजनिक सोच है जिसके अंतर्गत धर्म को व्यक्तियों या समुदायों का निजी अधिकार मानते हुए धार्मिक अधिकारों के बजाय मानव अधिकारों को वरीयता दी जाती है| ऐसी व्यवस्था में धर्म के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण पूर्णतयः तटस्थ होता होता है| अधिकांश यूरोपीय देश यद्यपि नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैंपरंतु हाल ही में फ़्रांस की शासन व्यवस्था ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को बेहतर विकल्प बताते हुए शासन व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन की बात कही है| उनका मुख्य तर्क यह था कि यदि संवैधानिक ढाँचा धर्मनिरपेक्षता को प्रोत्साहित करेगा तो धार्मिक अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना में कमी आयेगी|
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उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से, हड़प्पा सभ्यता के कला और स्थापत्य के विभिन्न पहलुओं का परीक्षण कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Examine various aspects of Harappan civilization’s art and architecture through suitable examples. (150-200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता के बारे में सूचनायें दीजिये 2- मुख्य भाग में उपशीर्षकों के अंतर्गत नगर नियोजन, मूर्तिकला एवं चित्रकला का सोदाहरण विश्लेषण कीजिये| 3- अंतिम में सभ्यता के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हड़प्पा अथवा सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है | यह 2600 से 1900 ई.पू. के मध्य अपनी परिपक्व अवस्था में थी| हड़प्पा सभ्यता मुख्यतः उत्तर पूर्वी अफगानिस्तान, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान से लेकर भारत के उत्तरी क्षेत्र में विस्तृत थी| यह प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता की समकालीन सभ्यता थी| हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित पुरातात्विक स्थलों का सर्वाधिक संकेद्रण घग्घर/ हाकरा नदी घाटी में पाया गया है| हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरातात्विक स्रोतों से तत्कालीन कला एवं स्थापत्य के बारे में जानकारी मिलती है| हड़प्पा युगीन नगर स्थापत्य हड़प्पा सभ्यता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना थी| इस सभ्यता के अधिकाँश नगरों का नियोजन समरूप था| नगर प्रायः सड़कों के जाल से युक्त थे| प्रायः नगरों में पूर्व तथा पश्चिम की बसावट में अंतर दिखता है| जहाँ पश्चिमी भाग में दुर्ग अथवा गढ़ी संरचनाएं दिखती हैं वहीँ पूर्वी भाग सामान्य आवासीय क्षेत्र प्रतीत होता है|संभव है कि पश्चिमी भाग प्रशासनिक अथवा सार्वजानिक क्षेत्र रहा होगा| संभवतः पश्चिमी भाग में शासक वर्ग के लोग रहते थे| आज भी प्रशासनिक केंद्र तथा प्रशासकों के आवासीय स्थल प्रायः विशिष्ट क्षेत्रों में होते हैं| हड़प्पा सभ्यता के नगरों की एक प्रमुख विशेषता इनकी जल निकास प्रणाली थी| प्रत्येक घर से आने वाली नाली सड़क किनारे बनी हुई नालियों में खुलती थी| सभी नालियां पत्थरों से ढकी रहती थीं| नालियों में कहीं कहीं मेनहोल भी बनाये जाते थे| नालियों का निर्माण पक्की इंटों से किया जाता था| यह वर्तमान नगरीय जल प्रबन्धन की विशेषता बनी हुई है यहाँ की सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं| जिससे नगर अनेक आयताकार खण्डों में विभक्त हो जाता था| आज भी नगरीकरण का यह एक लोकप्रिय प्रारूप है| नगरीकरण के इस प्रारूप का महत्त्व सौन्दर्य के साथ सुरक्षा तथा प्रशासन के साथ संवाद के दृष्टिकोण से है सड़कों के दोनों ओर मकान बने होते थे| इन मकानों के दफ्वाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर नहीं बल्कि घर के पिछवाड़े की ओर खुलते थे | इन भवनों का प्रारूप बहुत सीमा तक आधुनिक भवनों की तरह ही था मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, राखीगढ़ी, लोथल, धौलावीरा, सुरकोटडा तथा कालीबंगा आदि सैन्धव सभ्यता के प्रमुख नगरीय केंद्र थे| इन नगरों का नियोजन सैन्धव सभ्यता के विकसित नगरीय सभ्यता होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है| हड़प्पा युगीन मूर्तिकला हड़प्पाई शहरों से पत्थर, धातु तथा मिटटी की मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैंहालांकि समकालीन सभ्यताओं की तुलना में पत्थरों एवं धातुओं की मूर्तियों के साक्ष्य कम मिलते हैं पत्थर की मूर्तियों के अधिकाँश साक्ष्य मोहनजोदड़ो से मिलते हैं और कुछ मूर्तियाँ हड़प्पा से प्राप्त हुई हैं हालांकि पत्थर की मूर्तियाँ संख्यात्मक रूप से कम हैं| नृत्यरत युवक का धड़(हड़प्पा), मोहनजोदड़ो से दाढ़ी युक्त एक पुरुष की मूर्ति आदि कुछ प्रमुख मूर्तियाँ हैं| धातु की मूर्तियों के निर्माण में द्रव मोम विधि (लॉस्ट वैक्स) का उपयोग किया जाता था| धातु की मूर्तियों में कांसे की नर्तकी (मोहनजोदड़ो) की मूर्ति सर्वाधिक रूप से प्रसिद्ध है|इसके अतिरिक्त धातु से निर्मित बैल व अन्य पशुओं की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं सौन्दर्य एवं संतुलित शारीरिक अनुपात इन मूर्तियों की महत्वपूर्ण विशेषता है| दुसरे शब्दों में ये मूर्तियाँ यथार्थवादी कला का प्रतिनिधित्व करती हैं| इसके साथ ही इन मूर्तियों की लागत अधिक रही होगी अतः ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि ये मूर्तियाँ कला के क्षेत्र में समाज के उच्च वर्गों के दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करती हैं हड़प्पा के विभिन्न शहरों से मिटटी की मूर्तियाँ भी बहुतायत में प्राप्त हुई हैं| इनमें पुरुषों की तुलना में महिलाओं की मूर्तियाँ अधिक हैं| पशुओं में कूबड़ वाले बैल की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या प्राप्त हुई हैं| इसके अतिरिक्त विभिन्न पशु-पक्षियों, खिलौने व हास्यबोध से सम्बन्धित मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैं इन मूर्तियों में पत्थर व धातु की मूर्तियों तरह कलात्मक सौन्दर्य नहीं है लेकिन समकालीन समाज के आम जनों के धार्मिक विश्वास एवं मनोरंजन के साधन को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं| मूर्तिकला की यह परम्परा किसी न किसी रूप में आज भी हमारे जीवन में विद्यमान है| हड़प्पा युगीन चित्रकला चित्रों को उकेरने में लाल रंग एवं काले रंग का अधिक उपयोग किया गया है हड़प्पाई चित्रों के अधिकांशतः प्रमाण बर्तनो से प्राप्त होते हैं| बर्तनों पर सर्वाधिक रूप से पेड़-पौधों का चित्रण किया गया जैसे पीपल, नीम आदि लोथल से प्राप्त चालाक लोमड़ी का चित्र, हड़प्पा से प्राप्त एक मछुआरे का चित्र आदि कुछ प्रमुख चित्र हैं| अर्थात चित्रों में प्रकृति के विभिन्न तत्वों को महत्त्व दिया गया है| बर्तनों पर चित्रों की परम्परा आगे भी जारी रही है| स्पष्ट होता है कि हड़प्पा सभ्यता, कला एवं स्थापत्य के सन्दर्भ में पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी| हड़प्पा युगीन कला एवं स्थापत्य के विभिन्न पहलू वर्तमान कला एवं स्थापत्य को निवेश प्रदान करते हैं| हड़प्पा युगीन सांस्कृतिक पहलू किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है|
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##Question:उपयुक्त उदाहरणों के माध्यम से, हड़प्पा सभ्यता के कला और स्थापत्य के विभिन्न पहलुओं का परीक्षण कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Examine various aspects of Harappan civilization’s art and architecture through suitable examples. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में हड़प्पा सभ्यता के बारे में सूचनायें दीजिये 2- मुख्य भाग में उपशीर्षकों के अंतर्गत नगर नियोजन, मूर्तिकला एवं चित्रकला का सोदाहरण विश्लेषण कीजिये| 3- अंतिम में सभ्यता के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| हड़प्पा अथवा सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है | यह 2600 से 1900 ई.पू. के मध्य अपनी परिपक्व अवस्था में थी| हड़प्पा सभ्यता मुख्यतः उत्तर पूर्वी अफगानिस्तान, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान से लेकर भारत के उत्तरी क्षेत्र में विस्तृत थी| यह प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता की समकालीन सभ्यता थी| हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित पुरातात्विक स्थलों का सर्वाधिक संकेद्रण घग्घर/ हाकरा नदी घाटी में पाया गया है| हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त पुरातात्विक स्रोतों से तत्कालीन कला एवं स्थापत्य के बारे में जानकारी मिलती है| हड़प्पा युगीन नगर स्थापत्य हड़प्पा सभ्यता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना थी| इस सभ्यता के अधिकाँश नगरों का नियोजन समरूप था| नगर प्रायः सड़कों के जाल से युक्त थे| प्रायः नगरों में पूर्व तथा पश्चिम की बसावट में अंतर दिखता है| जहाँ पश्चिमी भाग में दुर्ग अथवा गढ़ी संरचनाएं दिखती हैं वहीँ पूर्वी भाग सामान्य आवासीय क्षेत्र प्रतीत होता है|संभव है कि पश्चिमी भाग प्रशासनिक अथवा सार्वजानिक क्षेत्र रहा होगा| संभवतः पश्चिमी भाग में शासक वर्ग के लोग रहते थे| आज भी प्रशासनिक केंद्र तथा प्रशासकों के आवासीय स्थल प्रायः विशिष्ट क्षेत्रों में होते हैं| हड़प्पा सभ्यता के नगरों की एक प्रमुख विशेषता इनकी जल निकास प्रणाली थी| प्रत्येक घर से आने वाली नाली सड़क किनारे बनी हुई नालियों में खुलती थी| सभी नालियां पत्थरों से ढकी रहती थीं| नालियों में कहीं कहीं मेनहोल भी बनाये जाते थे| नालियों का निर्माण पक्की इंटों से किया जाता था| यह वर्तमान नगरीय जल प्रबन्धन की विशेषता बनी हुई है यहाँ की सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं| जिससे नगर अनेक आयताकार खण्डों में विभक्त हो जाता था| आज भी नगरीकरण का यह एक लोकप्रिय प्रारूप है| नगरीकरण के इस प्रारूप का महत्त्व सौन्दर्य के साथ सुरक्षा तथा प्रशासन के साथ संवाद के दृष्टिकोण से है सड़कों के दोनों ओर मकान बने होते थे| इन मकानों के दफ्वाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर नहीं बल्कि घर के पिछवाड़े की ओर खुलते थे | इन भवनों का प्रारूप बहुत सीमा तक आधुनिक भवनों की तरह ही था मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, राखीगढ़ी, लोथल, धौलावीरा, सुरकोटडा तथा कालीबंगा आदि सैन्धव सभ्यता के प्रमुख नगरीय केंद्र थे| इन नगरों का नियोजन सैन्धव सभ्यता के विकसित नगरीय सभ्यता होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है| हड़प्पा युगीन मूर्तिकला हड़प्पाई शहरों से पत्थर, धातु तथा मिटटी की मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैंहालांकि समकालीन सभ्यताओं की तुलना में पत्थरों एवं धातुओं की मूर्तियों के साक्ष्य कम मिलते हैं पत्थर की मूर्तियों के अधिकाँश साक्ष्य मोहनजोदड़ो से मिलते हैं और कुछ मूर्तियाँ हड़प्पा से प्राप्त हुई हैं हालांकि पत्थर की मूर्तियाँ संख्यात्मक रूप से कम हैं| नृत्यरत युवक का धड़(हड़प्पा), मोहनजोदड़ो से दाढ़ी युक्त एक पुरुष की मूर्ति आदि कुछ प्रमुख मूर्तियाँ हैं| धातु की मूर्तियों के निर्माण में द्रव मोम विधि (लॉस्ट वैक्स) का उपयोग किया जाता था| धातु की मूर्तियों में कांसे की नर्तकी (मोहनजोदड़ो) की मूर्ति सर्वाधिक रूप से प्रसिद्ध है|इसके अतिरिक्त धातु से निर्मित बैल व अन्य पशुओं की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं सौन्दर्य एवं संतुलित शारीरिक अनुपात इन मूर्तियों की महत्वपूर्ण विशेषता है| दुसरे शब्दों में ये मूर्तियाँ यथार्थवादी कला का प्रतिनिधित्व करती हैं| इसके साथ ही इन मूर्तियों की लागत अधिक रही होगी अतः ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि ये मूर्तियाँ कला के क्षेत्र में समाज के उच्च वर्गों के दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करती हैं हड़प्पा के विभिन्न शहरों से मिटटी की मूर्तियाँ भी बहुतायत में प्राप्त हुई हैं| इनमें पुरुषों की तुलना में महिलाओं की मूर्तियाँ अधिक हैं| पशुओं में कूबड़ वाले बैल की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या प्राप्त हुई हैं| इसके अतिरिक्त विभिन्न पशु-पक्षियों, खिलौने व हास्यबोध से सम्बन्धित मूर्तियों के साक्ष्य मिलते हैं इन मूर्तियों में पत्थर व धातु की मूर्तियों तरह कलात्मक सौन्दर्य नहीं है लेकिन समकालीन समाज के आम जनों के धार्मिक विश्वास एवं मनोरंजन के साधन को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं| मूर्तिकला की यह परम्परा किसी न किसी रूप में आज भी हमारे जीवन में विद्यमान है| हड़प्पा युगीन चित्रकला चित्रों को उकेरने में लाल रंग एवं काले रंग का अधिक उपयोग किया गया है हड़प्पाई चित्रों के अधिकांशतः प्रमाण बर्तनो से प्राप्त होते हैं| बर्तनों पर सर्वाधिक रूप से पेड़-पौधों का चित्रण किया गया जैसे पीपल, नीम आदि लोथल से प्राप्त चालाक लोमड़ी का चित्र, हड़प्पा से प्राप्त एक मछुआरे का चित्र आदि कुछ प्रमुख चित्र हैं| अर्थात चित्रों में प्रकृति के विभिन्न तत्वों को महत्त्व दिया गया है| बर्तनों पर चित्रों की परम्परा आगे भी जारी रही है| स्पष्ट होता है कि हड़प्पा सभ्यता, कला एवं स्थापत्य के सन्दर्भ में पर्याप्त रूप से विकसित अवस्था में थी| हड़प्पा युगीन कला एवं स्थापत्य के विभिन्न पहलू वर्तमान कला एवं स्थापत्य को निवेश प्रदान करते हैं| हड़प्पा युगीन सांस्कृतिक पहलू किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है|
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वैधानिक नौकरशाही के गुण-दोषों की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Discuss the merits and demerits of the legal bureaucracy. (150-200 words)
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दृष्टिकोण : नौकरशाही को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । वैधानिक नौकरशाही की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । वैधानिक नौकरशाही के गुणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । वैधानिक नौकरशाही के दोषों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : सामान्यतः नौकरशाही से तात्पर्य है शासन संचालन के लिए अधिकारियों का एक ऐसा समूह अथवा प्रशासनिक ढांचा, जो सार्वजनिक नीतियों, नियमों एवं क़ानूनों का के निर्माण व क्रियान्वयन से संबंधित होता है । नौकरशाही के क्रमिक विकास के क्रम में अलग-अलग प्रकार के नौकरशाही के स्वरूप
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##Question:वैधानिक नौकरशाही के गुण-दोषों की चर्चा कीजिये । ( 150-200 शब्द ) Discuss the merits and demerits of the legal bureaucracy. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : नौकरशाही को परिभाषित करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । वैधानिक नौकरशाही की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । वैधानिक नौकरशाही के गुणों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । वैधानिक नौकरशाही के दोषों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : सामान्यतः नौकरशाही से तात्पर्य है शासन संचालन के लिए अधिकारियों का एक ऐसा समूह अथवा प्रशासनिक ढांचा, जो सार्वजनिक नीतियों, नियमों एवं क़ानूनों का के निर्माण व क्रियान्वयन से संबंधित होता है । नौकरशाही के क्रमिक विकास के क्रम में अलग-अलग प्रकार के नौकरशाही के स्वरूप
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स्वदेशी आन्दोलन, राजनीतिक पहलुओं के साथ ही आर्थिक व सांस्कृतिक पहलुओं तक विस्तृत था| संगत तर्कों के साथ कथन को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The Swadeshi movement was extended to political aspects as well aseconomic and cultural aspects. Explain the statement with relevant arguments. (150 to 200 words/10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में स्वदेशी आन्दोलन के आरम्भ की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में विभिन्न उपशीर्षकों के अंतर्गत स्वदेशी आन्दोलन के प्रभाव क्षेत्रों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आन्दोलन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बंगाल विभाजन का विरोध करते हुए अगस्त 1905 में कलकत्ता के टाउनहॉल से बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन की औपचारिक शुरुआत हुई| 1857 के बाद राष्ट्रीय चेतना से युक्त यह पहला आन्दोलन था जिसका प्रसार अखिल भारतीय स्तर भारत के विभिन्न शहरों में देखा गया| इसके अंतर्गत विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ ही साथशैक्षणिक व न्यायिक संस्थाओं जैसी सरकारी संस्थाओं के बहिष्कार को लेकर देशव्यापी आन्दोलन चलाये गए| बहिष्कार के साथ ही साथ विभिन्न क्षेत्रों जैसे उद्योग, शिक्षा, भाषा, कला, राजनीति व प्रशासन आदिमें स्वदेशी पर बल दिया गया अतः आन्दोलन स्वरूपतः बहुआयामी हो गया जिसे निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझ सकते हैं| राजनीति व प्रशासन के क्षेत्र में 1905 में कांग्रेस के मंच से स्वशासन एवं 1906 में स्वराज की मांग की गयी| 1905 में कांग्रेस की बनारस में बैठक हुई थी जिसके अध्यक्ष गोपाल कृष्ण गोखले थे| 1906 में कलकत्ता में कांग्रेस की बैठक के अध्यक्ष नौरोजी थे| इसमें स्वराज की मांग की गयी |नरम दलीय नेताओं के लिए स्वशासन या स्वराज का आशय, प्रशासन तथा विधायिका में भारतीयों की भागीदारी में वृद्धि और अंतत ऑस्ट्रेलिया व कनाडा की तरह भारत को स्वायत्तता दिलाना था| गरमदलीय नेताओं के लिए स्वराज या स्वशासन के अर्थ अधिक व्यापक थे| अरविन्द घोष इसे स्वतंत्रता के रूप में देखते थे| हालांकि कई गरम दलीय नेता इससे सहमत नहीं थे| प्रशासनिक संस्थाओं के बहिष्कार के साथ विवादों के समाधान के लिए विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा वैकल्पिक अदालतों का गठन किया गया इसके साथ ही लोगो को आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत इत्यादि से सम्बन्धित प्रशिक्षण भी दिए गए इस संदर्भ में स्वदेश बांधव समिति या बारीसाल समिति की महत्वपूर्ण भूमिका थी, इसके संस्थापक अश्विनी कुमार दत्त थे उद्योग के क्षेत्र में उद्योग के क्षेत्र में साबुन, माचिस, कपड़ा, इत्यादि उद्योगों की स्थापना की गयी पीसी रॉय की बंगाल केमिकल फैक्ट्री एक सफल उदाहरण मानी जाती है तिलक ने स्वदेशी वस्तु प्रचारिणी सभा की स्थापना की चिदंबरम पिल्लई ने स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी की स्थापना की हालांकि बाद में पैसे व अनुभव की कमी के कारण अधिकांशतः उद्योग बंद हो गए लेकिन आदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार अत्यंत ही लोकप्रिय रहा शिक्षा के क्षेत्र में वैकल्पिक शिक्षा के लिए 1906 में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गयी जिसके प्रधानाचार्य अरविन्द घोष थे बंगाल में ही राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना की, इसका कार्य स्वदेशी भाषा का प्रसार, राष्ट्रीय विद्यालयों का विनियमन करना था तकनीकी शिक्षा के लिए बंगाल इंस्टिट्यूट की स्थापना की गयी, तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रों को जापान भेजने के लिए योगेश चन्द्र द्वारा एक समिति बनायी गयी सरकारी स्कूल से निकाले गए छात्रों के लिए कृष्ण कुमार मित्र ने एंटी सर्कुलर सोसाइटी बनायी भाषा के क्षेत्र में आन्दोलन के दौरान बांग्ला, मराठी, तेलगू तमिल आदि भाषाओं को अत्यधिक महत्त्व दिया गया रविन्द्रनाथ टैगोर ने आमार सोनार बांग्ला नामक गीत की रचना की जो वर्तमान में बांग्लादेश का राष्ट्रगान है वंदेमातरम् नामक गीत को विशेष लोकप्रियता मिली रजनीकांत सेन, सैयद अबू मुहम्मद, द्विजेन्द्र लाल इत्यादि साहित्यकारों ने भी बांग्ला साहित्य के विकास में योगदान दिया इस समय लोकगीत एवं लोककथाओं की भी रचना हुई जैसे दक्षिणारन्जन मजूमदार द्वाआ रचित लोककथाएं बहुत प्रसिद्द हुईं कला के क्षेत्र में कला के अंतर्गत मुख्यतः चित्रकला के क्षेत्र में अजन्ता एवं मुग़ल चित्र कला से प्रेरणा ग्रहण की गयी 1906 में इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरिएण्टल आर्ट्स की स्थापना की गयी रविन्द्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता कला सम्प्रदाय की स्थापना की इस समय अवीन्द्र नाथ टगोर एवं नंदलाल बोस इस समय के चर्चित चित्रकार थे इस प्रकार स्पष्ट होता है कि स्वदेशी आन्दोलन स्वरूपतः बहुआयामी था, यह राजनीतिक पहलू से आगे बढ़ते हुए आर्थिक सांस्कृतिक पहलुओं तक विस्तृत था |यद्यपि भारतीय पूंजीपति वर्ग इस आन्दोलन से तटस्थ था किन्तु आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता शहरों में बड़े पैमाने पर आम लोगों की भागीदारी के रूप में दिखाई पड़ती है| छात्रों, महिलाओं तथा मजदूरों की आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी| कुछ एक क्षेत्रों में अपवादस्वरुप ही सही लेकिनकिसानों की भी भागीदारी आन्दोलन में दिखाई पड़ती है| मुस्लिम समुदाय की भी सीमित भागीदारी थी| सरकार की दमनकारी नीति, फूट डालो एवं राज करो की नीति, नरम एवं गरम दल के मध्य मतभेद, जनांदोलन की सीमायें इत्यादि के कारण यह आन्दोलन कमजोर हुआ लेकिनभारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में स्वदेशी आन्दोलन ने एक नए अध्याय की शुरुआत की और स्वदेशी आन्दोलन में पहली बार एक राष्ट्र के रूप में भारत की एक प्रभावी उपस्थिति देखी जा सकती है|
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##Question:स्वदेशी आन्दोलन, राजनीतिक पहलुओं के साथ ही आर्थिक व सांस्कृतिक पहलुओं तक विस्तृत था| संगत तर्कों के साथ कथन को स्पष्ट कीजिये| (150 से 200 शब्द/10 अंक) The Swadeshi movement was extended to political aspects as well aseconomic and cultural aspects. Explain the statement with relevant arguments. (150 to 200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में स्वदेशी आन्दोलन के आरम्भ की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- मुख्य भाग में विभिन्न उपशीर्षकों के अंतर्गत स्वदेशी आन्दोलन के प्रभाव क्षेत्रों को स्पष्ट कीजिये 3- अंतिम में आन्दोलन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये बंगाल विभाजन का विरोध करते हुए अगस्त 1905 में कलकत्ता के टाउनहॉल से बहिष्कार एवं स्वदेशी आन्दोलन की औपचारिक शुरुआत हुई| 1857 के बाद राष्ट्रीय चेतना से युक्त यह पहला आन्दोलन था जिसका प्रसार अखिल भारतीय स्तर भारत के विभिन्न शहरों में देखा गया| इसके अंतर्गत विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ ही साथशैक्षणिक व न्यायिक संस्थाओं जैसी सरकारी संस्थाओं के बहिष्कार को लेकर देशव्यापी आन्दोलन चलाये गए| बहिष्कार के साथ ही साथ विभिन्न क्षेत्रों जैसे उद्योग, शिक्षा, भाषा, कला, राजनीति व प्रशासन आदिमें स्वदेशी पर बल दिया गया अतः आन्दोलन स्वरूपतः बहुआयामी हो गया जिसे निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझ सकते हैं| राजनीति व प्रशासन के क्षेत्र में 1905 में कांग्रेस के मंच से स्वशासन एवं 1906 में स्वराज की मांग की गयी| 1905 में कांग्रेस की बनारस में बैठक हुई थी जिसके अध्यक्ष गोपाल कृष्ण गोखले थे| 1906 में कलकत्ता में कांग्रेस की बैठक के अध्यक्ष नौरोजी थे| इसमें स्वराज की मांग की गयी |नरम दलीय नेताओं के लिए स्वशासन या स्वराज का आशय, प्रशासन तथा विधायिका में भारतीयों की भागीदारी में वृद्धि और अंतत ऑस्ट्रेलिया व कनाडा की तरह भारत को स्वायत्तता दिलाना था| गरमदलीय नेताओं के लिए स्वराज या स्वशासन के अर्थ अधिक व्यापक थे| अरविन्द घोष इसे स्वतंत्रता के रूप में देखते थे| हालांकि कई गरम दलीय नेता इससे सहमत नहीं थे| प्रशासनिक संस्थाओं के बहिष्कार के साथ विवादों के समाधान के लिए विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा वैकल्पिक अदालतों का गठन किया गया इसके साथ ही लोगो को आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत इत्यादि से सम्बन्धित प्रशिक्षण भी दिए गए इस संदर्भ में स्वदेश बांधव समिति या बारीसाल समिति की महत्वपूर्ण भूमिका थी, इसके संस्थापक अश्विनी कुमार दत्त थे उद्योग के क्षेत्र में उद्योग के क्षेत्र में साबुन, माचिस, कपड़ा, इत्यादि उद्योगों की स्थापना की गयी पीसी रॉय की बंगाल केमिकल फैक्ट्री एक सफल उदाहरण मानी जाती है तिलक ने स्वदेशी वस्तु प्रचारिणी सभा की स्थापना की चिदंबरम पिल्लई ने स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी की स्थापना की हालांकि बाद में पैसे व अनुभव की कमी के कारण अधिकांशतः उद्योग बंद हो गए लेकिन आदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार अत्यंत ही लोकप्रिय रहा शिक्षा के क्षेत्र में वैकल्पिक शिक्षा के लिए 1906 में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गयी जिसके प्रधानाचार्य अरविन्द घोष थे बंगाल में ही राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना की, इसका कार्य स्वदेशी भाषा का प्रसार, राष्ट्रीय विद्यालयों का विनियमन करना था तकनीकी शिक्षा के लिए बंगाल इंस्टिट्यूट की स्थापना की गयी, तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रों को जापान भेजने के लिए योगेश चन्द्र द्वारा एक समिति बनायी गयी सरकारी स्कूल से निकाले गए छात्रों के लिए कृष्ण कुमार मित्र ने एंटी सर्कुलर सोसाइटी बनायी भाषा के क्षेत्र में आन्दोलन के दौरान बांग्ला, मराठी, तेलगू तमिल आदि भाषाओं को अत्यधिक महत्त्व दिया गया रविन्द्रनाथ टैगोर ने आमार सोनार बांग्ला नामक गीत की रचना की जो वर्तमान में बांग्लादेश का राष्ट्रगान है वंदेमातरम् नामक गीत को विशेष लोकप्रियता मिली रजनीकांत सेन, सैयद अबू मुहम्मद, द्विजेन्द्र लाल इत्यादि साहित्यकारों ने भी बांग्ला साहित्य के विकास में योगदान दिया इस समय लोकगीत एवं लोककथाओं की भी रचना हुई जैसे दक्षिणारन्जन मजूमदार द्वाआ रचित लोककथाएं बहुत प्रसिद्द हुईं कला के क्षेत्र में कला के अंतर्गत मुख्यतः चित्रकला के क्षेत्र में अजन्ता एवं मुग़ल चित्र कला से प्रेरणा ग्रहण की गयी 1906 में इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरिएण्टल आर्ट्स की स्थापना की गयी रविन्द्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता कला सम्प्रदाय की स्थापना की इस समय अवीन्द्र नाथ टगोर एवं नंदलाल बोस इस समय के चर्चित चित्रकार थे इस प्रकार स्पष्ट होता है कि स्वदेशी आन्दोलन स्वरूपतः बहुआयामी था, यह राजनीतिक पहलू से आगे बढ़ते हुए आर्थिक सांस्कृतिक पहलुओं तक विस्तृत था |यद्यपि भारतीय पूंजीपति वर्ग इस आन्दोलन से तटस्थ था किन्तु आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता शहरों में बड़े पैमाने पर आम लोगों की भागीदारी के रूप में दिखाई पड़ती है| छात्रों, महिलाओं तथा मजदूरों की आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका देखी गयी| कुछ एक क्षेत्रों में अपवादस्वरुप ही सही लेकिनकिसानों की भी भागीदारी आन्दोलन में दिखाई पड़ती है| मुस्लिम समुदाय की भी सीमित भागीदारी थी| सरकार की दमनकारी नीति, फूट डालो एवं राज करो की नीति, नरम एवं गरम दल के मध्य मतभेद, जनांदोलन की सीमायें इत्यादि के कारण यह आन्दोलन कमजोर हुआ लेकिनभारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में स्वदेशी आन्दोलन ने एक नए अध्याय की शुरुआत की और स्वदेशी आन्दोलन में पहली बार एक राष्ट्र के रूप में भारत की एक प्रभावी उपस्थिति देखी जा सकती है|
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भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये। साथ ही, भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) With special reference to India, Mention the role of civil servants to strengthen the Democracy. Also, Write Some Challenges faced by Civil Servants in India. (150-200 words, 10 marks)
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एप्रोच- भारत में सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत में संघ और राज्य स्तर पर विभिन्न सिविल सेवाओं को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है- केंद्रीय सिविल सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्य सिविल सेवाएँ| भारत में नागरिकसेवाओं सेसंबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को अनुच्छेद309;309(परंतुक);310;311 तथा312के अंतर्गत रखा गया है| भारतीय नागरिक सेवाओं की विशेषताओं मेंव्यापक जवाबदेहिता; अपेक्षित ज्ञान; स्थायी नागरिक सेवाएँ; सेवा शर्तें, वेतन-भत्ते आदि विधि द्वारा निर्धारित; एकरूपता के साथ विविधताएँ; प्रशासन की निरंतरता पर आधारित आदि आते हैं| लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका यह भारतीय शासन विशेषकर कार्यपालिका का आधार है| किसी भी सरकार का प्रशासनिक मशीनरी के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता है| यह सरकार के कानूनों एवं नीतिओं को लागू करने हेतु उत्तरदायी है| यह विधि निर्माण, उनके विकास एवं क्रियान्वयन में सहायता करती है| सिविल सेवकों के प्रशासनिक कार्यों में नीतियों/योजनाओं का निर्माण, कार्यक्रमों का निष्पादन एवं निगरानी करना; कानूनों, नियमों और विनियमों को निर्धारित करना शामिल होता है| यह राजनीतिक अस्थिरता के बीच रहते हुए प्रशासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है| यह नीति निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में अपने राजनीतिक प्रमुखों की सहायता कर लोकतांत्रिक आदर्शों की सहायता करता है| भारत से नए लोकतंत्र को स्थायी, दक्ष एवं सुदृढ़ बनाने में सिविल सेवकों का बहुमूल्य योगदान है| यह सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास के संसाधनों के संबंध में राजनीतिक कार्यपालिका को अवगत करवाता है एवं दिशानिर्देश प्रदान करता है| यह देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिकता प्रदान करता है एवं उनकी सफलता/विफलता का मूल्यांकन करता है| यह तंत्र कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपयुक्त लाभार्थी की पहचान करता है| विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी क्षमता को सुरक्षित करने के लिए मानवीय संसाधनों का विकास करना; सरकारी स्वामित्व वाले व्यवसाय, औद्योगिक उद्यमों और सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं का प्रबंधन करना; वह कृषि में आधुनिक तकनीकी को बढ़ावा देता है तथा उद्योग, व्यापार एवं बैंकिंग सेवाओं को सामाजिक अनुकूल बनाए रखने के लिए कार्यरत रहता है| वर्तमान आधुनिक युग में, प्रशासनिक अधिकरणों के माध्यम से शासन-व्यवस्था एवं व्यक्तियों के बीच उत्पन हुए विवादों का समाधान करता है| प्रशासन तंत्र, अनुच्छेद 323(B) को आधार बनाकर अनेक ऐसी मानवीय सेवाओं को प्रोत्साहित करता है जहाँ लोगों के प्रति न्याय स्थापित करने की आवश्यकता होती है| सांप्रदायिकता, नृजातीय संघर्ष, जातीय विवाद, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता आदि राष्ट्र के विभाजनकारी कारकों के खिलाफ यह लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास करता है| भूकंप, बाढ़, सुखा, चक्रवात आदि आपदाओं तथा संकटों के समय त्वरित रूप से कार्य करके तथा राहत-बचाव अभियानों का बेहतर प्रबंधन करके मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देता है| भूमिका निर्वहन की चुनौतियाँ नौकरशाही के वेबेरियन मॉडल की वजह से उत्पन समस्याएं; जैसे- योग्यता की जगह वरिष्ठता पर पदोन्नति; निश्चित वेतन एवं कार्यकाल की सुरक्षा से असक्षम अधिकारियों के मातहत भी मेधावी लोकसेवकों का कार्य करना आदि; हमारे नागरिक सेवकों के अंदर व्यवसायिकता का अभाव एवं न्यून कार्यक्षमता; अप्रभावी प्रोत्साहन प्रणाली जो कार्यशील, मेधावी और ईमानदार नागरिक सेवकों को पुरूस्कृत नहीं करता है| कठोर नियम और प्रक्रियाएं सिविल सेवकों को व्यक्तिगत निर्णय लेने और कुशलता का प्रदर्शन करने से रोकते हैं जिससेनिरूत्साहिता को भी बढ़ावा मिलता है| व्हिसल-ब्लोअर के लिए पर्याप्त सुरक्षा का अभाव; राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मनमाने ढंग से स्थानांतरण और कार्यकाल में असुरक्षा अधिकारियों की स्वायत्तता को रोकती है| विद्यमान नैतिकता का अभाव अधिकारियों के अंदर अनेक नकारात्मक प्रवृतियों को जन्म देता है जैसे- भ्रष्टाचार; भाई-भतीजावाद आदि| यहाँ शासन की प्रत्येक शक्ति का स्रोत जनप्रतिनिधि होता है| अनेकों बार नागरिक सेवक को जनप्रतिनिधि के साथ समन्वय स्थापित करने में जटिलताओं का सामना करना पड़ता है| भारतीय नौकरशाही में विद्यमान श्रम-विभाजन, पद-सोपानीयता स्वंय में रूढ़िवादिता को जन्म देती है जिससे अधिकारी की नवीनता प्रवृति कमजोर पड़ जाती है| गुणात्मक सेवा हेतु सुझाव नौकरशाही की प्रवृति को लोकतांत्रिक बनाना चाहिए| जनता के प्रति उत्तरदायित्व को प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता; ई-गवर्नेंस में तीव्रता लाने की आवश्यकता; "महीने के कर्मचारी" जैसी प्रोत्साहन योजनाओं को बढ़ाना; अधिकारियों को दायित्व निर्वहन सृजनशीलता के आधार पर निर्धारित;
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##Question:भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये। साथ ही, भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) With special reference to India, Mention the role of civil servants to strengthen the Democracy. Also, Write Some Challenges faced by Civil Servants in India. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- भारत में सिविल सेवा का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,भारत का विशेष संदर्भ लेते हुए, लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका का उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में,भारत में सिविल सेवकों द्वारा भूमिका निर्वहन में आने वाली चुनौतियाँ का जिक्र कीजिये| निष्कर्षतः, इस संदर्भ में अपने कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- भारत में संघ और राज्य स्तर पर विभिन्न सिविल सेवाओं को तीन व्यापक समूहों में वर्गीकृत किया जाता है- केंद्रीय सिविल सेवाएँ; अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्य सिविल सेवाएँ| भारत में नागरिकसेवाओं सेसंबंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों को अनुच्छेद309;309(परंतुक);310;311 तथा312के अंतर्गत रखा गया है| भारतीय नागरिक सेवाओं की विशेषताओं मेंव्यापक जवाबदेहिता; अपेक्षित ज्ञान; स्थायी नागरिक सेवाएँ; सेवा शर्तें, वेतन-भत्ते आदि विधि द्वारा निर्धारित; एकरूपता के साथ विविधताएँ; प्रशासन की निरंतरता पर आधारित आदि आते हैं| लोकतंत्र को मजबूत करने में सिविल सेवकों की भूमिका यह भारतीय शासन विशेषकर कार्यपालिका का आधार है| किसी भी सरकार का प्रशासनिक मशीनरी के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता है| यह सरकार के कानूनों एवं नीतिओं को लागू करने हेतु उत्तरदायी है| यह विधि निर्माण, उनके विकास एवं क्रियान्वयन में सहायता करती है| सिविल सेवकों के प्रशासनिक कार्यों में नीतियों/योजनाओं का निर्माण, कार्यक्रमों का निष्पादन एवं निगरानी करना; कानूनों, नियमों और विनियमों को निर्धारित करना शामिल होता है| यह राजनीतिक अस्थिरता के बीच रहते हुए प्रशासन तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है| यह नीति निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में अपने राजनीतिक प्रमुखों की सहायता कर लोकतांत्रिक आदर्शों की सहायता करता है| भारत से नए लोकतंत्र को स्थायी, दक्ष एवं सुदृढ़ बनाने में सिविल सेवकों का बहुमूल्य योगदान है| यह सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास के संसाधनों के संबंध में राजनीतिक कार्यपालिका को अवगत करवाता है एवं दिशानिर्देश प्रदान करता है| यह देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं को व्यवहारिकता प्रदान करता है एवं उनकी सफलता/विफलता का मूल्यांकन करता है| यह तंत्र कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपयुक्त लाभार्थी की पहचान करता है| विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रबंधकीय कौशल और तकनीकी क्षमता को सुरक्षित करने के लिए मानवीय संसाधनों का विकास करना; सरकारी स्वामित्व वाले व्यवसाय, औद्योगिक उद्यमों और सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं का प्रबंधन करना; वह कृषि में आधुनिक तकनीकी को बढ़ावा देता है तथा उद्योग, व्यापार एवं बैंकिंग सेवाओं को सामाजिक अनुकूल बनाए रखने के लिए कार्यरत रहता है| वर्तमान आधुनिक युग में, प्रशासनिक अधिकरणों के माध्यम से शासन-व्यवस्था एवं व्यक्तियों के बीच उत्पन हुए विवादों का समाधान करता है| प्रशासन तंत्र, अनुच्छेद 323(B) को आधार बनाकर अनेक ऐसी मानवीय सेवाओं को प्रोत्साहित करता है जहाँ लोगों के प्रति न्याय स्थापित करने की आवश्यकता होती है| सांप्रदायिकता, नृजातीय संघर्ष, जातीय विवाद, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता आदि राष्ट्र के विभाजनकारी कारकों के खिलाफ यह लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास करता है| भूकंप, बाढ़, सुखा, चक्रवात आदि आपदाओं तथा संकटों के समय त्वरित रूप से कार्य करके तथा राहत-बचाव अभियानों का बेहतर प्रबंधन करके मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देता है| भूमिका निर्वहन की चुनौतियाँ नौकरशाही के वेबेरियन मॉडल की वजह से उत्पन समस्याएं; जैसे- योग्यता की जगह वरिष्ठता पर पदोन्नति; निश्चित वेतन एवं कार्यकाल की सुरक्षा से असक्षम अधिकारियों के मातहत भी मेधावी लोकसेवकों का कार्य करना आदि; हमारे नागरिक सेवकों के अंदर व्यवसायिकता का अभाव एवं न्यून कार्यक्षमता; अप्रभावी प्रोत्साहन प्रणाली जो कार्यशील, मेधावी और ईमानदार नागरिक सेवकों को पुरूस्कृत नहीं करता है| कठोर नियम और प्रक्रियाएं सिविल सेवकों को व्यक्तिगत निर्णय लेने और कुशलता का प्रदर्शन करने से रोकते हैं जिससेनिरूत्साहिता को भी बढ़ावा मिलता है| व्हिसल-ब्लोअर के लिए पर्याप्त सुरक्षा का अभाव; राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण मनमाने ढंग से स्थानांतरण और कार्यकाल में असुरक्षा अधिकारियों की स्वायत्तता को रोकती है| विद्यमान नैतिकता का अभाव अधिकारियों के अंदर अनेक नकारात्मक प्रवृतियों को जन्म देता है जैसे- भ्रष्टाचार; भाई-भतीजावाद आदि| यहाँ शासन की प्रत्येक शक्ति का स्रोत जनप्रतिनिधि होता है| अनेकों बार नागरिक सेवक को जनप्रतिनिधि के साथ समन्वय स्थापित करने में जटिलताओं का सामना करना पड़ता है| भारतीय नौकरशाही में विद्यमान श्रम-विभाजन, पद-सोपानीयता स्वंय में रूढ़िवादिता को जन्म देती है जिससे अधिकारी की नवीनता प्रवृति कमजोर पड़ जाती है| गुणात्मक सेवा हेतु सुझाव नौकरशाही की प्रवृति को लोकतांत्रिक बनाना चाहिए| जनता के प्रति उत्तरदायित्व को प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता; ई-गवर्नेंस में तीव्रता लाने की आवश्यकता; "महीने के कर्मचारी" जैसी प्रोत्साहन योजनाओं को बढ़ाना; अधिकारियों को दायित्व निर्वहन सृजनशीलता के आधार पर निर्धारित;
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राज्य के नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति वाद योग्य नहीं हैं परन्तु शासन सचांलन में ये तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चर्चा कीजिए। ( 150-200 शब्द, अंक - 10 ) Directive principles of states policy are non justciable in nature but these principles play very important role in governence. Discuss. (150-200 Words, Marks - 10 )
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एप्रोच- सर्वप्रथम, भूमिका मेंराज्य के नीति निदेशक तत्वों का संक्षिप्त परिचय दीजिए तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंराज्य के नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति का उल्लेख कीजिए तथा समझाइए कि कैसे ये तत्व शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं / अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए । उत्तर- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद-36 से 51 तक में शामिल किया गया है । नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति- निदेशक तत्व वाद योग्य नहीं हैं अर्थात इन्हें लागू करवाने के लिए न्यायलय नहीं जाया जा सकता फिर भी शासन सचांलन में ये बहुत महत्वपूर्ण होंगे। नीति निर्देशक तत्व बाध्यकारी नहीं हैं अर्थात यदि राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहता है तो कोई भी इसके विरुद्ध न्यायालय नहीं जा सकता है। नीति निर्देशक तत्वों की स्वीकृति राजनीतिक जो ठोस संवैधानिक और नैतिक दायित्वों पर आधारित है । अतः नीति निदेशक तत्वों का कार्यान्वयन राज्य की इच्छा पर निर्भर नहीं है बल्कि यह उनका दायित्व है कि वह इन तत्वों को लागू करने की इच्छा शक्ति प्रदर्शित करे एवं व्यवहार में इन्हे रूपांतरित करे यदि राज्य ऐसा नहीं करता तो, उच्चत्तर अदालते राज्य के उदासीन व्यवहार पर टिप्पणी कर सकती हैं राज्य के नीति निदेशक तत्वों की शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका राज्य द्वारा नीति निदेशक तत्वों को व्यवहार में निम्न रूप में रूपांतरित किया गया है:- अनुछेद-41 के अनुपालन मेंरोजगार गारंटी योजना को लागू किया गया । अनुच्छेद-46 के अनुपालन मेंसमाज के कमजोर वर्ग के बच्चों जैसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों इत्यादि के बच्चो को छात्रवृति प्रदान करना। अनुच्छेद-42 के तहत सरकारी नौकरी में कार्यरत गर्भवती माताओं को भुगतान के साथ लाभ प्रदान करना अर्थात मातृत्व लाभ देना । गौ हत्या पर भारत के 19 राज्यों ने पूरी तरह से अथवा आंशिक रूप से रोक लगा राखी है जो अनुच्छेद-48 की अनुपालना है । भारत के 18 राज्यों में मद्य निषेध लागू है जो अनुच्छेद-47 को संदर्भित करता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि ये तत्व शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । सरकार या विधायिका कानून व नीति बनाते समय इन तत्वों को ध्यान में रखती है । डॉ अंबेडकर के अनुसार कोई भी सरकार इन तत्वों की अनदेखी नही कर सकती और यदि ऐसा करती है तो अगले चुनाव में जनता के सामने उस सरकार को जवाब देना पड़ेगा ।
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##Question:राज्य के नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति वाद योग्य नहीं हैं परन्तु शासन सचांलन में ये तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चर्चा कीजिए। ( 150-200 शब्द, अंक - 10 ) Directive principles of states policy are non justciable in nature but these principles play very important role in governence. Discuss. (150-200 Words, Marks - 10 )##Answer:एप्रोच- सर्वप्रथम, भूमिका मेंराज्य के नीति निदेशक तत्वों का संक्षिप्त परिचय दीजिए तत्पश्चात, मुख्य भाग मेंराज्य के नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति का उल्लेख कीजिए तथा समझाइए कि कैसे ये तत्व शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं / अंत में संक्षेप में एक या दो पंक्तियों में निष्कर्ष लिखते हुए उत्तर का समापन कीजिए । उत्तर- राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद-36 से 51 तक में शामिल किया गया है । नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति- निदेशक तत्व वाद योग्य नहीं हैं अर्थात इन्हें लागू करवाने के लिए न्यायलय नहीं जाया जा सकता फिर भी शासन सचांलन में ये बहुत महत्वपूर्ण होंगे। नीति निर्देशक तत्व बाध्यकारी नहीं हैं अर्थात यदि राज्य इन्हें लागू करने में असफल रहता है तो कोई भी इसके विरुद्ध न्यायालय नहीं जा सकता है। नीति निर्देशक तत्वों की स्वीकृति राजनीतिक जो ठोस संवैधानिक और नैतिक दायित्वों पर आधारित है । अतः नीति निदेशक तत्वों का कार्यान्वयन राज्य की इच्छा पर निर्भर नहीं है बल्कि यह उनका दायित्व है कि वह इन तत्वों को लागू करने की इच्छा शक्ति प्रदर्शित करे एवं व्यवहार में इन्हे रूपांतरित करे यदि राज्य ऐसा नहीं करता तो, उच्चत्तर अदालते राज्य के उदासीन व्यवहार पर टिप्पणी कर सकती हैं राज्य के नीति निदेशक तत्वों की शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका राज्य द्वारा नीति निदेशक तत्वों को व्यवहार में निम्न रूप में रूपांतरित किया गया है:- अनुछेद-41 के अनुपालन मेंरोजगार गारंटी योजना को लागू किया गया । अनुच्छेद-46 के अनुपालन मेंसमाज के कमजोर वर्ग के बच्चों जैसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों इत्यादि के बच्चो को छात्रवृति प्रदान करना। अनुच्छेद-42 के तहत सरकारी नौकरी में कार्यरत गर्भवती माताओं को भुगतान के साथ लाभ प्रदान करना अर्थात मातृत्व लाभ देना । गौ हत्या पर भारत के 19 राज्यों ने पूरी तरह से अथवा आंशिक रूप से रोक लगा राखी है जो अनुच्छेद-48 की अनुपालना है । भारत के 18 राज्यों में मद्य निषेध लागू है जो अनुच्छेद-47 को संदर्भित करता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि ये तत्व शासन संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । सरकार या विधायिका कानून व नीति बनाते समय इन तत्वों को ध्यान में रखती है । डॉ अंबेडकर के अनुसार कोई भी सरकार इन तत्वों की अनदेखी नही कर सकती और यदि ऐसा करती है तो अगले चुनाव में जनता के सामने उस सरकार को जवाब देना पड़ेगा ।
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समतामूलक एवं समावेशी समाज के निर्माण के लिए दिव्यांगजनों को विकास की मुख्यधारा मे सम्मिलित करना आवश्यक है| कथन को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक) For the creation of an equitable and inclusive society, it is necessary to involve the disabled in the mainstream of development. Keeping the statement in mind, discuss the efforts being made by the Government of India. (150 to 200 words; 10 amrks)
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दृष्टिकोण भूमिका में दिव्यांगजन को परिभाषित कीजिये प्रथम भाग में दिव्यांगजनों की चुनौतियों को स्पष्ट करते हुए उनके विकास की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये दुसरे भाग में सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये अंतिम में विकास के लिए आवश्यक सुझाव के साथ निष्कर्ष दीजिये। WHO की परिभाषा के अनुसार विकलांगता का तात्पर्य किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या सामाजिक प्रतिकूलता से है जो सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन अवसर को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है| दिव्यांगजन, समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा होते है 2011 की जनगणना के अनुसार दिव्यांगजन, भारत की कुल जनसंख्या का 2.21% भाग है| जिसके तहत दृष्टि बाधित, सुनने व बोलने में समस्या , मानसिक विकास का रुक जाना आदि शामिल है| दिव्यांग जनों द्वारा अनुभव की जाने वाली चुनौतियां दिव्यांगजनों को निम्न दृष्टि से देखने की अभिवृत्ति ने उनके आत्मविश्वास को प्रभावित किया है। यह उनकी क्षमताओं को कम आंकता है| दिव्यांगों को आर्थिक रूप से बोझ समझा जाना तथा उनकी जरूरतों के लिए वित्त की कमी होना। इसके साथ ही रोजगार की उपलब्धता में समस्याओं का सामना करना| स्वयं के स्तर पर दिन प्रतिदिन के कार्यों को करने में अक्षमता महसूस होना। विभिन्न कार्यों के निर्वाह में शारीरिक समस्याएं बाधा बनना| दिव्यांगजनों की जरूरतों के आधार पर स्कूलों में अवसंरचनात्मक कमियां होना। इसके साथ ही मानसिक समस्या से युक्त बच्चों के लिए विशेष प्रकार के स्कूलों तथा शैक्षणिक तकनीक का उपलब्धता कम होना आदि कारणों से प्रायः दिव्यांगजनों का विकास बाधिक होता है और वे विकास की मुख्यधारा से दूर होते जाते हैं| दिव्यांगजनों के विकास हेतु किये जा रहे प्रयास संविधान के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि इन दिव्यांग जनों हेतु आवश्यक लोककल्याणकारी नीतियाँ बनायी जाएँ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास वर्ष 1995 में किया गया जब विकलांगजन (समान अधिकार, जीवन अवसर ) सम्बन्धी नीति बनायी गयी| इस नीति के अंतर्गत नेत्रहीनता, अल्पदृष्टि, लोकोमोटिव विकलांगता, कुष्ठरोग, मूक एवं बधिर(DEAF AND MUTE), मानसिक विकलांगता एवं मानसिक अपंगता को सम्मिलित किया गयावर्ष 2016 में इस नीति में आवश्यक परिवर्तन किये गए जो मुख्यतः संयुक्त राष्ट्र के "विकलांगजनों के अधिकार अधिवेशन" 2006 से प्रेरित हैं| इसे दिव्यांगजनों के अधिकार (RPWD) अधिनियम 2016 कहा गया है| दिव्यांगजनों के अधिकार(RPWD)अधिनियम 2016 के प्रमुख प्रावधान यह राज्य की जिम्मेदारी है कि दिव्यांगजनों हेतु आवश्यक अवसंरचनात्मक विकास किये जाएँ| इस नीति में यह स्पष्ट किया गया कि दिव्यांगता तभी बाधक होती है जब अवसंरचनाएं यथोचित न हों| भारत सरकार ने इस दिशा में प्रयास करते हुए सुगम्य भारत अभियान प्रारम्भ किया है जिसके अंतर्गत सभी सरकारी एवं सार्वजनिक स्थलों को मूलभूत रूप से दिव्यांगजनों हेतु सुगम बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं| इसका लक्ष्य वर्ष 2020 है| यह नीति विकलांगता के दायरे को बढाते हुए दिव्यांगजनों को 21 श्रेणियों में वर्गीकृत करती है| इसके साथ ही बेंच मार्क दिव्यांगता (जहाँ दिव्यांगता का प्रतिशत 60 % या उससे अधिक हो) हेतु अतिरिक्त प्रयासों के प्रावधान भी सुनिश्चित करती है माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार दिव्यांगजनों को 3 % क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था है जो राज्य सरकारें बेंच मार्क दिव्यांगता के सन्दर्भ में बढा कर 5 % तक कर सकती हैं| यह नीति राज्य को यह दिशानिर्देश भी देती है कि दिव्यांगजनों की शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण तथा उन सभी कल्याणकारी घटकों को प्रेरित किया जाए जो उन्हें मुख्यधारा में लाने में सहयोगी हों| सर्व शिक्षा अभियान एवं शिक्षा का अधिकार कानून के अनुसार किसी भी शिक्षण संस्थान द्वारा दिव्यांगता के आधार पर किया गया भेदभाव एक दंडनीय माना जाए दीनदयाल उपाध्याय संस्थानों के माध्यम से दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण भी सुनिश्चित कराये जा रहे हैं| स्टैंडअप कार्यक्रम तथा MUDRA इत्यादि नीतियों में दिव्यांग जनों हेतु सहज ऋण सुनिश्चित किये जा रहे हैं जिससे वे रोजगार के विकल्पों को बढ़ा सकें| दिव्यांग जनों हेतु विकास एवं आर्थिक सहायता हेतु नेशनल हैंडीकैप डेवलपमेंट एवं फाइनेंस कारपोरेशन के सहयोग से वित्तीय एवं तकनीकी सहायता भी सुलभ कराई जा रही है| वर्ष 1992 में गठित राष्ट्रीय पुनर्स्थापन परिषद (RCI) उन सभी सिविल सोसाइटी, NGO, केंद्र एवं राज्य सरकारें तथा लाभार्थियों के सन्दर्भ में एक मध्यस्थ की एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है वर्ष 2013 के मराकेश (मोरक्को) संधि के अंतर्गत ब्रेल तकनीक पर किसी प्रकार का बौद्धिक सम्पदा अधिकार लागू नहीं होगा, जिससे इस तकनीक का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके| SANKALP 2017 के अंतर्गत दिव्यांगजनों हेतु कौशल प्रशिक्षण में भागीदारी बढाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किये जा रहे हैं| यह नीति यह भी निर्देशित करती है कि दिव्यांगजनों हेतु आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं, कृत्रिम अंगों की उपलब्धता के साथ साथ इस दिशा में आवश्यक शोध को भी प्रोत्साहित क्या जाए जिससे आने वाले समय में प्रतिशतता को घटाया जा सके| इस दिशा में कृत्रिम अंगों हेतु भारत सरकार का एक उपक्रम ALIMCO, 300 से अधिक प्रकार के कृत्रिम अंग बनाता है जो लगभग निःशुल्क उपलब्ध कराये जा रहे हैं| तथा स्वास्थ्य हेतु दिव्यांगजनों को सरकारी अस्पतालों में सभी सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं परन्तु इन दिव्यांगजनों के सन्दर्भ में सबसे मुख्य चुनौती शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में विभेद की है जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यकताएं अधिक होने के बावजूद स्रोत उपलब्ध नहीं हैं| जिसे पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ कर दूर किया जा सकता है|सरकार के उपरोक्त प्रयासों की वास्तविक सफलता हेतु इनके क्रियान्वयन को प्रभावी बनाया जाना चाहिये तथा लोगों के मध्य जागरूकता बढ़ाए जाने के निरंतर प्रयास किए जाने चाहिये । जनसंख्या के इस महत्वपूर्ण हिस्से को विकास की प्रक्रिया मे सहयोगी बनाते हुए ही समावेशी व समतामूलक समाज का निर्माण किया जा सकता है|
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##Question:समतामूलक एवं समावेशी समाज के निर्माण के लिए दिव्यांगजनों को विकास की मुख्यधारा मे सम्मिलित करना आवश्यक है| कथन को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की चर्चा कीजिये| (150 से 200 शब्द; 10 अंक) For the creation of an equitable and inclusive society, it is necessary to involve the disabled in the mainstream of development. Keeping the statement in mind, discuss the efforts being made by the Government of India. (150 to 200 words; 10 amrks)##Answer:दृष्टिकोण भूमिका में दिव्यांगजन को परिभाषित कीजिये प्रथम भाग में दिव्यांगजनों की चुनौतियों को स्पष्ट करते हुए उनके विकास की आवश्यकता स्पष्ट कीजिये दुसरे भाग में सरकार द्वारा किये गए प्रयासों की चर्चा कीजिये अंतिम में विकास के लिए आवश्यक सुझाव के साथ निष्कर्ष दीजिये। WHO की परिभाषा के अनुसार विकलांगता का तात्पर्य किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या सामाजिक प्रतिकूलता से है जो सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन अवसर को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है| दिव्यांगजन, समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा होते है 2011 की जनगणना के अनुसार दिव्यांगजन, भारत की कुल जनसंख्या का 2.21% भाग है| जिसके तहत दृष्टि बाधित, सुनने व बोलने में समस्या , मानसिक विकास का रुक जाना आदि शामिल है| दिव्यांग जनों द्वारा अनुभव की जाने वाली चुनौतियां दिव्यांगजनों को निम्न दृष्टि से देखने की अभिवृत्ति ने उनके आत्मविश्वास को प्रभावित किया है। यह उनकी क्षमताओं को कम आंकता है| दिव्यांगों को आर्थिक रूप से बोझ समझा जाना तथा उनकी जरूरतों के लिए वित्त की कमी होना। इसके साथ ही रोजगार की उपलब्धता में समस्याओं का सामना करना| स्वयं के स्तर पर दिन प्रतिदिन के कार्यों को करने में अक्षमता महसूस होना। विभिन्न कार्यों के निर्वाह में शारीरिक समस्याएं बाधा बनना| दिव्यांगजनों की जरूरतों के आधार पर स्कूलों में अवसंरचनात्मक कमियां होना। इसके साथ ही मानसिक समस्या से युक्त बच्चों के लिए विशेष प्रकार के स्कूलों तथा शैक्षणिक तकनीक का उपलब्धता कम होना आदि कारणों से प्रायः दिव्यांगजनों का विकास बाधिक होता है और वे विकास की मुख्यधारा से दूर होते जाते हैं| दिव्यांगजनों के विकास हेतु किये जा रहे प्रयास संविधान के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि इन दिव्यांग जनों हेतु आवश्यक लोककल्याणकारी नीतियाँ बनायी जाएँ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास वर्ष 1995 में किया गया जब विकलांगजन (समान अधिकार, जीवन अवसर ) सम्बन्धी नीति बनायी गयी| इस नीति के अंतर्गत नेत्रहीनता, अल्पदृष्टि, लोकोमोटिव विकलांगता, कुष्ठरोग, मूक एवं बधिर(DEAF AND MUTE), मानसिक विकलांगता एवं मानसिक अपंगता को सम्मिलित किया गयावर्ष 2016 में इस नीति में आवश्यक परिवर्तन किये गए जो मुख्यतः संयुक्त राष्ट्र के "विकलांगजनों के अधिकार अधिवेशन" 2006 से प्रेरित हैं| इसे दिव्यांगजनों के अधिकार (RPWD) अधिनियम 2016 कहा गया है| दिव्यांगजनों के अधिकार(RPWD)अधिनियम 2016 के प्रमुख प्रावधान यह राज्य की जिम्मेदारी है कि दिव्यांगजनों हेतु आवश्यक अवसंरचनात्मक विकास किये जाएँ| इस नीति में यह स्पष्ट किया गया कि दिव्यांगता तभी बाधक होती है जब अवसंरचनाएं यथोचित न हों| भारत सरकार ने इस दिशा में प्रयास करते हुए सुगम्य भारत अभियान प्रारम्भ किया है जिसके अंतर्गत सभी सरकारी एवं सार्वजनिक स्थलों को मूलभूत रूप से दिव्यांगजनों हेतु सुगम बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं| इसका लक्ष्य वर्ष 2020 है| यह नीति विकलांगता के दायरे को बढाते हुए दिव्यांगजनों को 21 श्रेणियों में वर्गीकृत करती है| इसके साथ ही बेंच मार्क दिव्यांगता (जहाँ दिव्यांगता का प्रतिशत 60 % या उससे अधिक हो) हेतु अतिरिक्त प्रयासों के प्रावधान भी सुनिश्चित करती है माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार दिव्यांगजनों को 3 % क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था है जो राज्य सरकारें बेंच मार्क दिव्यांगता के सन्दर्भ में बढा कर 5 % तक कर सकती हैं| यह नीति राज्य को यह दिशानिर्देश भी देती है कि दिव्यांगजनों की शिक्षा एवं कौशल प्रशिक्षण तथा उन सभी कल्याणकारी घटकों को प्रेरित किया जाए जो उन्हें मुख्यधारा में लाने में सहयोगी हों| सर्व शिक्षा अभियान एवं शिक्षा का अधिकार कानून के अनुसार किसी भी शिक्षण संस्थान द्वारा दिव्यांगता के आधार पर किया गया भेदभाव एक दंडनीय माना जाए दीनदयाल उपाध्याय संस्थानों के माध्यम से दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण भी सुनिश्चित कराये जा रहे हैं| स्टैंडअप कार्यक्रम तथा MUDRA इत्यादि नीतियों में दिव्यांग जनों हेतु सहज ऋण सुनिश्चित किये जा रहे हैं जिससे वे रोजगार के विकल्पों को बढ़ा सकें| दिव्यांग जनों हेतु विकास एवं आर्थिक सहायता हेतु नेशनल हैंडीकैप डेवलपमेंट एवं फाइनेंस कारपोरेशन के सहयोग से वित्तीय एवं तकनीकी सहायता भी सुलभ कराई जा रही है| वर्ष 1992 में गठित राष्ट्रीय पुनर्स्थापन परिषद (RCI) उन सभी सिविल सोसाइटी, NGO, केंद्र एवं राज्य सरकारें तथा लाभार्थियों के सन्दर्भ में एक मध्यस्थ की एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है वर्ष 2013 के मराकेश (मोरक्को) संधि के अंतर्गत ब्रेल तकनीक पर किसी प्रकार का बौद्धिक सम्पदा अधिकार लागू नहीं होगा, जिससे इस तकनीक का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके| SANKALP 2017 के अंतर्गत दिव्यांगजनों हेतु कौशल प्रशिक्षण में भागीदारी बढाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किये जा रहे हैं| यह नीति यह भी निर्देशित करती है कि दिव्यांगजनों हेतु आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं, कृत्रिम अंगों की उपलब्धता के साथ साथ इस दिशा में आवश्यक शोध को भी प्रोत्साहित क्या जाए जिससे आने वाले समय में प्रतिशतता को घटाया जा सके| इस दिशा में कृत्रिम अंगों हेतु भारत सरकार का एक उपक्रम ALIMCO, 300 से अधिक प्रकार के कृत्रिम अंग बनाता है जो लगभग निःशुल्क उपलब्ध कराये जा रहे हैं| तथा स्वास्थ्य हेतु दिव्यांगजनों को सरकारी अस्पतालों में सभी सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं परन्तु इन दिव्यांगजनों के सन्दर्भ में सबसे मुख्य चुनौती शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में विभेद की है जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यकताएं अधिक होने के बावजूद स्रोत उपलब्ध नहीं हैं| जिसे पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ कर दूर किया जा सकता है|सरकार के उपरोक्त प्रयासों की वास्तविक सफलता हेतु इनके क्रियान्वयन को प्रभावी बनाया जाना चाहिये तथा लोगों के मध्य जागरूकता बढ़ाए जाने के निरंतर प्रयास किए जाने चाहिये । जनसंख्या के इस महत्वपूर्ण हिस्से को विकास की प्रक्रिया मे सहयोगी बनाते हुए ही समावेशी व समतामूलक समाज का निर्माण किया जा सकता है|
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What is meant by Gujral Doctrine? Does it have any relevance today? Discuss. (10 marks/150 words)
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Approach – 1. Explain the Gujral doctrine. 2. Effects of Gujral doctrine on India’s foreign policy. 3. Comment on the present relevance of the doctrine. Answer – The Gujral doctrine was the foreign policy doctrine of Ex-Prime Minister IK Gujral which was first outlined by him when he was the External Affairs Minister. The doctrine enunciates policy of non-reciprocal accommodation towards India"s neighbours. Gujral doctrine consisted of a set of five principles. 1. With the neighbours like Nepal, Bangladesh, Bhutan, Maldives and Sri Lanka, India does not ask for reciprocity but gives all that it can in good faith and trust. 2. No South Asian country will allow its territory to be used against the interest of another country of the region. 3. No one will interfere in the internal affairs of another. 4. All South Asian countries must respect each other"s territorial integrity and sovereignty. 5. Countries will settle all their disputes through peaceful bilateral negotiations. The Gujral doctrine helped to put maximum emphasis on better relations with neighbours. Confidence building measure agreement 1996 with China , solution of the controversial issue of the Ganges water,repairment of relations of USA-India. All this happened at the time of the I.K. Gujral. But in recent times India is facing many challenges where Gujral doctrine can be useful – 1. India neighbourhood relation – Gujral doctrine can help repair and improve the relationship of India with its neighbours. This can also help in checking the ulterior motives of China in South Asian region which are against the strategic interests of India e.g. One belt one road initiative, string of pearls. The principle of non-reciprocity assures the same. 2. Gujral doctrine can help India gain confidence and cooperation of South Asian countries on issues like terrorism, Space, and regional and maritime security. 3. Adhering to the Gujral doctrine provides relief to the small neighbour states of India because India"s neighbour are much smaller in size than India it creates an apprehension. Being the dominant economy and the bigger power, making unilateral concessions can help in building trust and establishing good relations . 4. Interestingly, Pakistan did not feature in the list of countries Gujral identified in his speech for non-reciprocal treatment. But with the help of the final element of Gujral doctrine that is Countries will settle all their disputes through peaceful bilateral negotiations. India and Pakistan relations can be improved . Changing world dynamics, issues like rising China in South Asia and Indo-Pacific region, and adverse relations with Pakistan have warranted that India should adhere to Gujral doctrine in recent times.
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##Question:What is meant by Gujral Doctrine? Does it have any relevance today? Discuss. (10 marks/150 words)##Answer:Approach – 1. Explain the Gujral doctrine. 2. Effects of Gujral doctrine on India’s foreign policy. 3. Comment on the present relevance of the doctrine. Answer – The Gujral doctrine was the foreign policy doctrine of Ex-Prime Minister IK Gujral which was first outlined by him when he was the External Affairs Minister. The doctrine enunciates policy of non-reciprocal accommodation towards India"s neighbours. Gujral doctrine consisted of a set of five principles. 1. With the neighbours like Nepal, Bangladesh, Bhutan, Maldives and Sri Lanka, India does not ask for reciprocity but gives all that it can in good faith and trust. 2. No South Asian country will allow its territory to be used against the interest of another country of the region. 3. No one will interfere in the internal affairs of another. 4. All South Asian countries must respect each other"s territorial integrity and sovereignty. 5. Countries will settle all their disputes through peaceful bilateral negotiations. The Gujral doctrine helped to put maximum emphasis on better relations with neighbours. Confidence building measure agreement 1996 with China , solution of the controversial issue of the Ganges water,repairment of relations of USA-India. All this happened at the time of the I.K. Gujral. But in recent times India is facing many challenges where Gujral doctrine can be useful – 1. India neighbourhood relation – Gujral doctrine can help repair and improve the relationship of India with its neighbours. This can also help in checking the ulterior motives of China in South Asian region which are against the strategic interests of India e.g. One belt one road initiative, string of pearls. The principle of non-reciprocity assures the same. 2. Gujral doctrine can help India gain confidence and cooperation of South Asian countries on issues like terrorism, Space, and regional and maritime security. 3. Adhering to the Gujral doctrine provides relief to the small neighbour states of India because India"s neighbour are much smaller in size than India it creates an apprehension. Being the dominant economy and the bigger power, making unilateral concessions can help in building trust and establishing good relations . 4. Interestingly, Pakistan did not feature in the list of countries Gujral identified in his speech for non-reciprocal treatment. But with the help of the final element of Gujral doctrine that is Countries will settle all their disputes through peaceful bilateral negotiations. India and Pakistan relations can be improved . Changing world dynamics, issues like rising China in South Asia and Indo-Pacific region, and adverse relations with Pakistan have warranted that India should adhere to Gujral doctrine in recent times.
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दबाव समूह से आप क्या समझते हैं ? दबाव समूह के प्रकार को बताते हुए, भारत में दबाव समूहों के कार्य करने के तरीकों की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by the pressure groups ? While explaining the type of pressure group, also discuss the working of the pressure groups in India. (150-200 Words)
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एप्रोच- उत्तर के प्रारंभ में दबाव समूह को परिभाषित कीजिये | अगले भाग में दबाव समूह तथा हित-समूह के मध्य अंतर बताईये | दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताईये | भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तौर-तरीकों के बारे में बताईये | उत्तर- दबाव समूह सिविल समाज का एक घटक होता है तथा अपने वर्गीय हितों के लिए सरकार पर संगठित तरीके से दबाब बनाकर राज्य की नीतियाँ अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है| दबाव समूह- सत्ता के नजदीक रहकर या उसमे शामिल होकर अपने समूह के हितों की पूर्ति करने का प्रयास| दबाव समूह के प्रकार - सामुदायिक अथवा वर्गीय-ऐसे दबाव समूह जो अपने जाति/धर्म आदि के लिए कार्य करते हैं और इनके हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं; जैसे- बामसेफ,विभिन्न जातियों के संगठन,क्षत्रिय महासभा,आरएसएस आदि | संस्थागत दबाव समूह- ये प्रायः राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करतें हैं;जैसे- पोलित ब्यूरो आदि | यदि इनका दल सत्ता में आता है तो ये अपने विभिन्न उद्देश्यों जैसे अपने नजदीकी लोगों को विभिन्न सरकारी पदों पर पदासीन कराने के लिए अपने दल पर दबाव डालते हैं| संघात्मक दबाव समूह- इसमें अपने-अपने क्षेत्र विशेष के हितों के उत्थान के लिए उस क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसमे शामिल होते हैं; जैसे - कर्मचारी संघ, AITUC, भारतीय किसान यूनियन, फिक्की, CII आदि विचार आधारित दबाव समूह- समाज और परिवेश को लेकर किसी विशेष सोच को उन्नत करने के उद्देश्य से साथ आये लोगों के समूह ;जैसे- चिपको आन्दोलन,नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि| विघटनकारी समूह-सरकार के विरुद्ध अपने किसी विशेष विचारधारा/हित को बढ़ावा देने तथा उस हेतु हिंसात्मक मार्ग अपनाने को भी तैयार समूह; जैसे - उल्फा, सिमी,जेकेएलएफ आदि| भारत में दबाव समूह के कार्य करने का तरीका- लॉबिंग- भारत में अधिकांश दबाव समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और लॉबिंग के माध्यम से वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल रहते हैं| परम्परागत तरीका- प्रायः जातिगत और धार्मिक समूह अपने जाति और धर्म की संख्याबल के आधार पर सताधारी दल को यह समझाने में सफल रहते हैं कि यदि सरकार ने उनके हितों की अनदेखी की तो चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा | भारत में ऐसे दबाव समूह भी कार्य करते हैं जो विभिन्न पेशों से जुड़े हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते है तथा स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभावी होते हैं| जैसे- मछुआरों का संघ, बुनकरों का संघ आदि | कर्मचारियों के संघ- विभिन्न ट्रेड यूनियन सरकार से अपने हित में नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं| अखिल भारतीय स्तर पर अपने वर्गीय हितों के लिए कार्य करने वाले समूह भी सरकार पर दबाब बनाकर अपने हित में निर्णय करवाने में सफल हो जाते हैं| राज्यीय अथवा अन्तर्राज्यीय मुद्दों को लेकर बने दबाव समूह| जैसे - कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में गठित दबाव समूह | प्रजातीय दबाव समूह- इसके अंतर्गत प्रायः जनजातीय दबाव समूह आतें हैं| सामान्य हित के मुद्दों पर आधारितमिश्रित दबाव समूह; जैसे- ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन |
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##Question:दबाव समूह से आप क्या समझते हैं ? दबाव समूह के प्रकार को बताते हुए, भारत में दबाव समूहों के कार्य करने के तरीकों की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) What do you understand by the pressure groups ? While explaining the type of pressure group, also discuss the working of the pressure groups in India. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच- उत्तर के प्रारंभ में दबाव समूह को परिभाषित कीजिये | अगले भाग में दबाव समूह तथा हित-समूह के मध्य अंतर बताईये | दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताईये | भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तौर-तरीकों के बारे में बताईये | उत्तर- दबाव समूह सिविल समाज का एक घटक होता है तथा अपने वर्गीय हितों के लिए सरकार पर संगठित तरीके से दबाब बनाकर राज्य की नीतियाँ अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है| दबाव समूह- सत्ता के नजदीक रहकर या उसमे शामिल होकर अपने समूह के हितों की पूर्ति करने का प्रयास| दबाव समूह के प्रकार - सामुदायिक अथवा वर्गीय-ऐसे दबाव समूह जो अपने जाति/धर्म आदि के लिए कार्य करते हैं और इनके हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं; जैसे- बामसेफ,विभिन्न जातियों के संगठन,क्षत्रिय महासभा,आरएसएस आदि | संस्थागत दबाव समूह- ये प्रायः राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करतें हैं;जैसे- पोलित ब्यूरो आदि | यदि इनका दल सत्ता में आता है तो ये अपने विभिन्न उद्देश्यों जैसे अपने नजदीकी लोगों को विभिन्न सरकारी पदों पर पदासीन कराने के लिए अपने दल पर दबाव डालते हैं| संघात्मक दबाव समूह- इसमें अपने-अपने क्षेत्र विशेष के हितों के उत्थान के लिए उस क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसमे शामिल होते हैं; जैसे - कर्मचारी संघ, AITUC, भारतीय किसान यूनियन, फिक्की, CII आदि विचार आधारित दबाव समूह- समाज और परिवेश को लेकर किसी विशेष सोच को उन्नत करने के उद्देश्य से साथ आये लोगों के समूह ;जैसे- चिपको आन्दोलन,नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि| विघटनकारी समूह-सरकार के विरुद्ध अपने किसी विशेष विचारधारा/हित को बढ़ावा देने तथा उस हेतु हिंसात्मक मार्ग अपनाने को भी तैयार समूह; जैसे - उल्फा, सिमी,जेकेएलएफ आदि| भारत में दबाव समूह के कार्य करने का तरीका- लॉबिंग- भारत में अधिकांश दबाव समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और लॉबिंग के माध्यम से वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल रहते हैं| परम्परागत तरीका- प्रायः जातिगत और धार्मिक समूह अपने जाति और धर्म की संख्याबल के आधार पर सताधारी दल को यह समझाने में सफल रहते हैं कि यदि सरकार ने उनके हितों की अनदेखी की तो चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा | भारत में ऐसे दबाव समूह भी कार्य करते हैं जो विभिन्न पेशों से जुड़े हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते है तथा स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभावी होते हैं| जैसे- मछुआरों का संघ, बुनकरों का संघ आदि | कर्मचारियों के संघ- विभिन्न ट्रेड यूनियन सरकार से अपने हित में नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं| अखिल भारतीय स्तर पर अपने वर्गीय हितों के लिए कार्य करने वाले समूह भी सरकार पर दबाब बनाकर अपने हित में निर्णय करवाने में सफल हो जाते हैं| राज्यीय अथवा अन्तर्राज्यीय मुद्दों को लेकर बने दबाव समूह| जैसे - कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में गठित दबाव समूह | प्रजातीय दबाव समूह- इसके अंतर्गत प्रायः जनजातीय दबाव समूह आतें हैं| सामान्य हित के मुद्दों पर आधारितमिश्रित दबाव समूह; जैसे- ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन |
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उत्तरवैदिक समाज, ऋग्वैदिक समाज की तुलना में अधिक जटिल था| उपयुक्त उदाहरणों के साथ कथन की विवेचना कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The later Vedic society was more complex than the Rigvedic society. Discuss the statement with appropriate examples. (150 to 200 words, 10 marks)
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दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैदिक युग की चर्चा & ऋग्वैदिक तथा उत्तरवैदिक युग का स्पष्टीकरण 2- मुख्य भाग में दोनों कालों की सामाजिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिये 3- स्वरुप में परिवर्तन के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हड़प्पा सभ्यता के बाद की अवस्था में एक नयी संस्कृति का अविर्भाव हुआ था| चूँकि इस संस्कृति के संदर्भ में समस्त जानकारियाँ वेदों से प्राप्त हुई हैं अतः इस सभ्यता को वैदिक संस्कृति के नाम से जाना जाता है| वैदिक सभ्यता का अध्ययन दो चरणों में किया जाता है| इसमें प्रथम चरण की जानकारी का स्रोत ऋग्वेद है अतः इसको ऋग्वैदिक काल कहा जाता है| सामान्यतः 1500 से 1000 ईसा पूर्व के मध्य के काल को ऋग्वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है| इसके बाद 1000 से 600 ईसा पूर्व के मध्य के काल को उत्तरवैदिक काल के रूप में जाना जाता है| उत्तरवैदिक काल के बारे में जानकारी के स्रोत ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वैदिक ग्रन्थ हैं| वैदिक काल के उपरोक्त विभाजन का कारण दोनों कालों की स्थितियों में परिवर्तन है| उत्तरवैदिक काल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विशेषताएं ऋग्वैदिक कालीन विशेषताओं से भिन्न थी| दोनों कालों के समाज की विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है| ऋग्वैदिक समाज ऋग्वेद से समाज के विभिन्न वर्गों की जानकारी मिलती है जैसे शासक, पुरोहित, कवि, वैद्य आदि हालांकि इनके बीच किसी तरह का विभाजन एवं भेदभाव नही था आर्य एवं अनार्य के मध्य एक विभाजन दिखाई देता है और अनार्यों को चपटी नाक वाले, लिंग पूजक इत्यादि कहा गया है ऋग्वेद के दसवें मंडल में पुरुषसूक्त में सर्वप्रथम वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से मानी गयी है| विद्वानों ने दसवें मंडल को क्षेपक माना है| महिलाओं की दशा अपेक्षाकृत बेहतर थी| समाज में सती प्रथा, बाल विवाह का प्रचलन नहीं था और विधवा विवाह के प्रमाण मिलते हैं| अपाला घोषा, लोपामुद्रा, सिकता, विश्वारा आदि विदुषी महिलाओं की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि महिलाओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त था प्रायः परिवार संयुक्त तथा पित्रसत्तात्मक व्यवस्था से संचालित होते थे फिर भी राजनीतिक संस्थाओं यथा सभा-समिति एवं विदथ में महिलाओं की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है| खानपान में शाकाहार एवं मांसाहार दोनों का प्रचलन था| ढोलक, वीणा, रथदौड़, जुआ आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे| ऋग्वेद से विभिन्न प्रकार के वस्त्रों का भी उल्लेख मिलता है| गुरुकुल शिक्षा तथा मौखिक शिक्षा की परम्परा थी| यहाँ दास प्रथा की उपस्थिति भी दिखती है किन्तु इन दासों का प्रयोग घरेलू कार्यों में किया जाता था| उत्तर वैदिक कालीन समाज समकालीन साहित्य से वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र नामक चार वर्णों एवं इनके कार्यों का उल्लेख मिलता है| यह कर्म आधारित विभाजन था और कोई भी व्यक्ति किसी कार्य को कर सकता था अर्थात उत्तर वैदिक काल में ही व्यवसाय आधारित सामजिक विभाजन प्रारम्भ होता है| शूद्र वर्ण को उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं था| अर्थात वर्णों के मध्य सामजिक भेदभाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी हालांकि भेदभाव अभी प्रखर नहीं हुआ था| दास प्रथा अस्तित्व में थी,अब दासों को कृषि कार्यों में लगाया जाने लगा था, महिलाओं की स्थिति लगभग ऋग्वेदिक काल की तरह ही थी हालांकि राजनितिक अधिकारों में गिरावट के संकेत मिलते हैं जैसे सभा में महिला प्रवेश वर्जित कर दिया गया था| इसी तरह अथर्ववेद में महिलाओं के जन्म पर दुःख व्यक्त किये जाने के प्रमाण मिलते हैं परिवार प्रथा, खानपान, शिक्षा, तथा मनोरंजन आदि ऋग्वेदिक काल की तरह ही थे हालांकि समाज में अनुलोम/प्रतिलोम विवाह, पुरुषार्थ, आश्रम व्यवस्था, गोत्र प्रथा, विभिन्न प्रकार के संस्कार आदि के प्रचलन का उल्लेख मिलता है| गोत्र, एक मूल पुरुष से उत्पन्न लोगों का समुदाय था, आगे चल कर इसे ऋषियों के नाम के साथ जोड़ा जाने लगा और धीरे धीरे गोत्र के बाहर विवाह की प्रथा प्रचलित हुई| आश्रम व्यवस्था जीवन को एक निश्चित दिशा देने का प्रयास थी तथा इसके माध्यम से भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में समन्वय स्थापना का प्रयास किया गया था| आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत चार आश्रमों की व्यवस्था थी यथा बृह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास| उत्तर वैदिक साहित्य से प्रथम तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है| इसमें गृहस्थ आश्रम सर्वाधिक लोकप्रिय आश्रम था| पुरुषार्थ व्यवस्था के अंतर्गत जीवन के चार उद्देश्य माने गए हैं यथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष| पुरुषार्थ व्यवस्था के माध्यम से भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में समन्वय स्थापना का प्रयास किया गया था| संस्कार अर्थात परिष्कार, प्राचीन ग्रंथों में लगभग 40 संस्कारों का उल्लेख मिलता है जिनमें 16 संकार लोकप्रिय थे| इनमें प्रमुख हैं उपनयन विवाह आदि| संस्कारों का उद्देश्य चरित्र निर्माण, मनोरंजन तथा भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में समन्वय स्थापना करना था| उत्तरवैदिक काल में देवताओं की स्थिति में परिवर्तन आया तथा अब देवियों को कम महत्त्व दिया गया था| यज्ञ और कर्मकांडों को अधिक महत्त्व मिलने लगा| इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि उत्तरवैदिक समाज, ऋग्वैदिक समाज से अनेकों अर्थों में भिन्न और जटिल था | उत्तरवैदिक कालीन विशेषताएं राज्य समाज एवं अर्थव्यवस्था के परिवर्तित रूप को प्रदर्शित करती हैं| उत्तर वैदिक कालीन समाज की जटिलता का आधार आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को माना जा सकता है|
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##Question:उत्तरवैदिक समाज, ऋग्वैदिक समाज की तुलना में अधिक जटिल था| उपयुक्त उदाहरणों के साथ कथन की विवेचना कीजिये| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) The later Vedic society was more complex than the Rigvedic society. Discuss the statement with appropriate examples. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में वैदिक युग की चर्चा & ऋग्वैदिक तथा उत्तरवैदिक युग का स्पष्टीकरण 2- मुख्य भाग में दोनों कालों की सामाजिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिये 3- स्वरुप में परिवर्तन के संदर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये हड़प्पा सभ्यता के बाद की अवस्था में एक नयी संस्कृति का अविर्भाव हुआ था| चूँकि इस संस्कृति के संदर्भ में समस्त जानकारियाँ वेदों से प्राप्त हुई हैं अतः इस सभ्यता को वैदिक संस्कृति के नाम से जाना जाता है| वैदिक सभ्यता का अध्ययन दो चरणों में किया जाता है| इसमें प्रथम चरण की जानकारी का स्रोत ऋग्वेद है अतः इसको ऋग्वैदिक काल कहा जाता है| सामान्यतः 1500 से 1000 ईसा पूर्व के मध्य के काल को ऋग्वैदिक काल की संज्ञा दी जाती है| इसके बाद 1000 से 600 ईसा पूर्व के मध्य के काल को उत्तरवैदिक काल के रूप में जाना जाता है| उत्तरवैदिक काल के बारे में जानकारी के स्रोत ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वैदिक ग्रन्थ हैं| वैदिक काल के उपरोक्त विभाजन का कारण दोनों कालों की स्थितियों में परिवर्तन है| उत्तरवैदिक काल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विशेषताएं ऋग्वैदिक कालीन विशेषताओं से भिन्न थी| दोनों कालों के समाज की विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है| ऋग्वैदिक समाज ऋग्वेद से समाज के विभिन्न वर्गों की जानकारी मिलती है जैसे शासक, पुरोहित, कवि, वैद्य आदि हालांकि इनके बीच किसी तरह का विभाजन एवं भेदभाव नही था आर्य एवं अनार्य के मध्य एक विभाजन दिखाई देता है और अनार्यों को चपटी नाक वाले, लिंग पूजक इत्यादि कहा गया है ऋग्वेद के दसवें मंडल में पुरुषसूक्त में सर्वप्रथम वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से मानी गयी है| विद्वानों ने दसवें मंडल को क्षेपक माना है| महिलाओं की दशा अपेक्षाकृत बेहतर थी| समाज में सती प्रथा, बाल विवाह का प्रचलन नहीं था और विधवा विवाह के प्रमाण मिलते हैं| अपाला घोषा, लोपामुद्रा, सिकता, विश्वारा आदि विदुषी महिलाओं की उपस्थिति से स्पष्ट होता है कि महिलाओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त था प्रायः परिवार संयुक्त तथा पित्रसत्तात्मक व्यवस्था से संचालित होते थे फिर भी राजनीतिक संस्थाओं यथा सभा-समिति एवं विदथ में महिलाओं की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है| खानपान में शाकाहार एवं मांसाहार दोनों का प्रचलन था| ढोलक, वीणा, रथदौड़, जुआ आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे| ऋग्वेद से विभिन्न प्रकार के वस्त्रों का भी उल्लेख मिलता है| गुरुकुल शिक्षा तथा मौखिक शिक्षा की परम्परा थी| यहाँ दास प्रथा की उपस्थिति भी दिखती है किन्तु इन दासों का प्रयोग घरेलू कार्यों में किया जाता था| उत्तर वैदिक कालीन समाज समकालीन साहित्य से वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र नामक चार वर्णों एवं इनके कार्यों का उल्लेख मिलता है| यह कर्म आधारित विभाजन था और कोई भी व्यक्ति किसी कार्य को कर सकता था अर्थात उत्तर वैदिक काल में ही व्यवसाय आधारित सामजिक विभाजन प्रारम्भ होता है| शूद्र वर्ण को उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं था| अर्थात वर्णों के मध्य सामजिक भेदभाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी हालांकि भेदभाव अभी प्रखर नहीं हुआ था| दास प्रथा अस्तित्व में थी,अब दासों को कृषि कार्यों में लगाया जाने लगा था, महिलाओं की स्थिति लगभग ऋग्वेदिक काल की तरह ही थी हालांकि राजनितिक अधिकारों में गिरावट के संकेत मिलते हैं जैसे सभा में महिला प्रवेश वर्जित कर दिया गया था| इसी तरह अथर्ववेद में महिलाओं के जन्म पर दुःख व्यक्त किये जाने के प्रमाण मिलते हैं परिवार प्रथा, खानपान, शिक्षा, तथा मनोरंजन आदि ऋग्वेदिक काल की तरह ही थे हालांकि समाज में अनुलोम/प्रतिलोम विवाह, पुरुषार्थ, आश्रम व्यवस्था, गोत्र प्रथा, विभिन्न प्रकार के संस्कार आदि के प्रचलन का उल्लेख मिलता है| गोत्र, एक मूल पुरुष से उत्पन्न लोगों का समुदाय था, आगे चल कर इसे ऋषियों के नाम के साथ जोड़ा जाने लगा और धीरे धीरे गोत्र के बाहर विवाह की प्रथा प्रचलित हुई| आश्रम व्यवस्था जीवन को एक निश्चित दिशा देने का प्रयास थी तथा इसके माध्यम से भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में समन्वय स्थापना का प्रयास किया गया था| आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत चार आश्रमों की व्यवस्था थी यथा बृह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास| उत्तर वैदिक साहित्य से प्रथम तीन आश्रमों का उल्लेख मिलता है| इसमें गृहस्थ आश्रम सर्वाधिक लोकप्रिय आश्रम था| पुरुषार्थ व्यवस्था के अंतर्गत जीवन के चार उद्देश्य माने गए हैं यथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष| पुरुषार्थ व्यवस्था के माध्यम से भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में समन्वय स्थापना का प्रयास किया गया था| संस्कार अर्थात परिष्कार, प्राचीन ग्रंथों में लगभग 40 संस्कारों का उल्लेख मिलता है जिनमें 16 संकार लोकप्रिय थे| इनमें प्रमुख हैं उपनयन विवाह आदि| संस्कारों का उद्देश्य चरित्र निर्माण, मनोरंजन तथा भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में समन्वय स्थापना करना था| उत्तरवैदिक काल में देवताओं की स्थिति में परिवर्तन आया तथा अब देवियों को कम महत्त्व दिया गया था| यज्ञ और कर्मकांडों को अधिक महत्त्व मिलने लगा| इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि उत्तरवैदिक समाज, ऋग्वैदिक समाज से अनेकों अर्थों में भिन्न और जटिल था | उत्तरवैदिक कालीन विशेषताएं राज्य समाज एवं अर्थव्यवस्था के परिवर्तित रूप को प्रदर्शित करती हैं| उत्तर वैदिक कालीन समाज की जटिलता का आधार आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को माना जा सकता है|
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दबाव समूह से आप क्या समझते हैं ? दबाव समूह के प्रकार को बताते हुए, भारत में दबाव समूहों के कार्य करने के तरीकों की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the pressure groups? While explaining the type of pressure group, also discuss the working of the pressure groups in India. (150-200 Words/10 marks)
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एप्रोच- उत्तर के प्रारंभ में दबाव समूह को परिभाषित कीजिये | अगले भाग में दबाव समूह तथा हित-समूह के मध्य अंतर बताईये | दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताईये | भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तौर-तरीकों के बारे में बताईये | उत्तर- दबाव समूह सिविल समाज का एक घटक होता है तथा अपने वर्गीय हितों के लिए सरकार पर संगठित तरीके से दबाब बनाकर राज्य की नीतियाँ अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है| दबाव समूह- सत्ता के नजदीक रहकर या उसमे शामिल होकर अपने समूह के हितों की पूर्ति करने का प्रयास | दबाव समूह के प्रकार - सामुदायिक अथवा वर्गीय-ऐसे दबाव समूह जो अपने जाति/धर्म आदि के लिए कार्य करते हैं और इनके हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं; जैसे- बामसेफ,विभिन्न जातियों के संगठन,क्षत्रिय महासभा,आरएसएस आदि | संस्थागत दबाव समूह- ये प्रायः राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करतें हैं;जैसे- पोलित ब्यूरो आदि | यदि इनका दल सत्ता में आता है तो ये अपने विभिन्न उद्देश्यों जैसे अपने नजदीकी लोगों को विभिन्न सरकारी पदों पर पदासीन कराने के लिए अपने दल पर दबाव डालते हैं| संघात्मक दबाव समूह- इसमें अपने-अपने क्षेत्र विशेष के हितों के उत्थान के लिए उस क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसमे शामिल होते हैं; जैसे - कर्मचारी संघ, AITUC, भारतीय किसान यूनियन, फिक्की, CII आदि विचार आधारित दबाव समूह- समाज और परिवेश को लेकर किसी विशेष सोच को उन्नत करने के उद्देश्य से साथ आये लोगों के समूह ;जैसे- चिपको आन्दोलन,नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि| विघटनकारी समूह-सरकार के विरुद्ध अपने किसी विशेष विचारधारा/हित को बढ़ावा देने तथा उस हेतु हिंसात्मक मार्ग अपनाने को भी तैयार समूह; जैसे - उल्फा, सिमी,जेकेएलएफ आदि| भारत में दबाव समूह के कार्य करने का तरीका- लॉबिंग- भारत में अधिकांश दबाव समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और लॉबिंग के माध्यम से वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल रहते हैं| परम्परागत तरीका- प्रायः जातिगत और धार्मिक समूह अपने जाति और धर्म की संख्याबल के आधार पर सताधारी दल को यह समझाने में सफल रहते हैं कि यदि सरकार ने उनके हितों की अनदेखी की तो चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा | भारत में ऐसे दबाव समूह भी कार्य करते हैं जो विभिन्न पेशों से जुड़े हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते है तथा स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभावी होते हैं| जैसे- मछुआरों का संघ, बुनकरों का संघ आदि | कर्मचारियों के संघ- विभिन्न ट्रेड यूनियन सरकार से अपने हित में नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं| अखिल भारतीय स्तर पर अपने वर्गीय हितों के लिए कार्य करने वाले समूह भी सरकार पर दबाब बनाकर अपने हित में निर्णय करवाने में सफल हो जाते हैं| राज्यीय अथवा अन्तर्राज्यीय मुद्दों को लेकर बने दबाव समूह| जैसे - कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में गठित दबाव समूह | प्रजातीय दबाव समूह- इसके अंतर्गत प्रायः जनजातीय दबाव समूह आतें हैं| सामान्य हित के मुद्दों पर आधारितमिश्रित दबाव समूह; जैसे- ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन |
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##Question:दबाव समूह से आप क्या समझते हैं ? दबाव समूह के प्रकार को बताते हुए, भारत में दबाव समूहों के कार्य करने के तरीकों की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by the pressure groups? While explaining the type of pressure group, also discuss the working of the pressure groups in India. (150-200 Words/10 marks)##Answer:एप्रोच- उत्तर के प्रारंभ में दबाव समूह को परिभाषित कीजिये | अगले भाग में दबाव समूह तथा हित-समूह के मध्य अंतर बताईये | दबाव समूह के विभिन्न प्रकारों के बारे में संक्षिप्तता से बताईये | भारत में विभिन्न दबाव समूहों के कार्य करने के तौर-तरीकों के बारे में बताईये | उत्तर- दबाव समूह सिविल समाज का एक घटक होता है तथा अपने वर्गीय हितों के लिए सरकार पर संगठित तरीके से दबाब बनाकर राज्य की नीतियाँ अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है| दबाव समूह- सत्ता के नजदीक रहकर या उसमे शामिल होकर अपने समूह के हितों की पूर्ति करने का प्रयास | दबाव समूह के प्रकार - सामुदायिक अथवा वर्गीय-ऐसे दबाव समूह जो अपने जाति/धर्म आदि के लिए कार्य करते हैं और इनके हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाते हैं; जैसे- बामसेफ,विभिन्न जातियों के संगठन,क्षत्रिय महासभा,आरएसएस आदि | संस्थागत दबाव समूह- ये प्रायः राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करतें हैं;जैसे- पोलित ब्यूरो आदि | यदि इनका दल सत्ता में आता है तो ये अपने विभिन्न उद्देश्यों जैसे अपने नजदीकी लोगों को विभिन्न सरकारी पदों पर पदासीन कराने के लिए अपने दल पर दबाव डालते हैं| संघात्मक दबाव समूह- इसमें अपने-अपने क्षेत्र विशेष के हितों के उत्थान के लिए उस क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसमे शामिल होते हैं; जैसे - कर्मचारी संघ, AITUC, भारतीय किसान यूनियन, फिक्की, CII आदि विचार आधारित दबाव समूह- समाज और परिवेश को लेकर किसी विशेष सोच को उन्नत करने के उद्देश्य से साथ आये लोगों के समूह ;जैसे- चिपको आन्दोलन,नर्मदा बचाओ आन्दोलन आदि| विघटनकारी समूह-सरकार के विरुद्ध अपने किसी विशेष विचारधारा/हित को बढ़ावा देने तथा उस हेतु हिंसात्मक मार्ग अपनाने को भी तैयार समूह; जैसे - उल्फा, सिमी,जेकेएलएफ आदि| भारत में दबाव समूह के कार्य करने का तरीका- लॉबिंग- भारत में अधिकांश दबाव समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और लॉबिंग के माध्यम से वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल रहते हैं| परम्परागत तरीका- प्रायः जातिगत और धार्मिक समूह अपने जाति और धर्म की संख्याबल के आधार पर सताधारी दल को यह समझाने में सफल रहते हैं कि यदि सरकार ने उनके हितों की अनदेखी की तो चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा | भारत में ऐसे दबाव समूह भी कार्य करते हैं जो विभिन्न पेशों से जुड़े हुए वर्गों का प्रतिनिधित्व करते है तथा स्थानीय स्तर पर बहुत प्रभावी होते हैं| जैसे- मछुआरों का संघ, बुनकरों का संघ आदि | कर्मचारियों के संघ- विभिन्न ट्रेड यूनियन सरकार से अपने हित में नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं| अखिल भारतीय स्तर पर अपने वर्गीय हितों के लिए कार्य करने वाले समूह भी सरकार पर दबाब बनाकर अपने हित में निर्णय करवाने में सफल हो जाते हैं| राज्यीय अथवा अन्तर्राज्यीय मुद्दों को लेकर बने दबाव समूह| जैसे - कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में गठित दबाव समूह | प्रजातीय दबाव समूह- इसके अंतर्गत प्रायः जनजातीय दबाव समूह आतें हैं| सामान्य हित के मुद्दों पर आधारितमिश्रित दबाव समूह; जैसे- ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन |
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अंतर्राज्यीय परिषद की संरचना एवं उद्देश्यों की चर्चा कीजिये | क्या आपको लगता है कि भारत मे एक स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद की आवश्यकता है? (150-200 शब्द) Discuss the structure and objectives of Inte-State Council. Do you think there is need for a permanent inter-state council? (150-200 Words)
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एप्रोच - भूमिका में अंतरराज्यीय परिषद के बारे में लिखिए। इसके बाद क्रमशः संरचना और उद्देश्यों को लिखिए। इसके बाद तर्क दीजिये क्या इसे स्थायी रूप देना चाहिए उत्तर - अनुच्छेद 263 राज्यों के मध्य तथा केंद्र एवं राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद के गठन की व्यवस्था करता है। गौरतलब है कि केंद्र एवं राज्यों के मध्य विवादित मुद्दों के समाधान के लिए सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर इस परिषद का गठन किया गया। राष्ट्रपति ऐसी परिषदों के कर्तव्यों, इसके संगठन और प्रक्रिया को निर्धारित कर सकता है। संरचना: प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष) सभी राज्यों के मुख्यमंत्री विधानसभा वाले संघराज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा गैर विधान सभा वाले संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल गृहमंत्री सहित प्रधानमंत्री द्वारा नामित छः केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री उद्देश्य : केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों के समाधान के लिए सुझाव देना केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के साझे हितों की पहचान तथा उनकी संवृद्धि हेतु चर्चा करना। समन्वयात्मक तथा सहयोगात्मक वातावरण के निर्माण के लिए सुझाव देना नीतियों तथा कार्यवाहियों में समन्वय स्थापित करने के प्रयास करना गौरतलब है कि अंतरराज्यीय परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय नहीं है परंतु यदि राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत होता है कि इस परिषद की स्थापना लोकहित के लिए आवश्यक है तब इसे किसी भी समय स्थापित किया जा सकता है। स्थायी परिषद न होने से इसकी बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं होती जैसे कि हाल ही में इसकी बैठक 12 वर्ष के अंतराल के पश्चात हुई थी। इसे केवल वार्ता मंच के रूप में देखा जाता है। इसकी अनुशंसाएं बाध्यकारी भी नहीं होती हैं। यदि परिषद को स्थायी रूप दे दिया जाए तो यह केंद्र राज्य सम्बन्धों को सुदृढ़ करने में निम्नप्रकार से महत्वपूर्ण होगा: चूंकि पहले ही इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है अतः स्थायी रूप प्रदान करने से इसके सिफ़ारिशों का महत्व बढ़ जाएगा। कुछ प्रमुख बिन्दुओं के बाध्यकारी भी बनाया जा सकता है। अस्थायी होने के कारण विभिन्न बैठकों में निर्णय तो ले लिए जाते हैं परंतु उनके क्रियान्वयन आदि की नियमित देखरेख नहीं हो पाती है। केंद्र में बहुमत से एक दलीय सरकार की वापसी हुई है। इस संदर्भ में संघीय ढांचे को और समंजस्य पूर्ण तरीके से कार्य करने हेतु आईएससी के माध्यम से अंतर-सरकारी तंत्र को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। पुंछी आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि परिषद की एक वर्ष में कम से कम तीन बैठकें हों। इसे वास्तविक रूप देने के लिए स्थायी रूप देते हुए इसके अधिदेश को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। हालांकि यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि अंतरराज्यीय परिषद का स्थायी रूप नीति आयोग के कार्य क्षेत्र में बाधा उत्पन्न न करे। इसके साथ ही वर्तमान में परिषद की जो स्थायी समिति कार्यरत है उसके बैठकों को नियमित रूप से आयोजित किया जाना चाहिए।
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##Question:अंतर्राज्यीय परिषद की संरचना एवं उद्देश्यों की चर्चा कीजिये | क्या आपको लगता है कि भारत मे एक स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद की आवश्यकता है? (150-200 शब्द) Discuss the structure and objectives of Inte-State Council. Do you think there is need for a permanent inter-state council? (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में अंतरराज्यीय परिषद के बारे में लिखिए। इसके बाद क्रमशः संरचना और उद्देश्यों को लिखिए। इसके बाद तर्क दीजिये क्या इसे स्थायी रूप देना चाहिए उत्तर - अनुच्छेद 263 राज्यों के मध्य तथा केंद्र एवं राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद के गठन की व्यवस्था करता है। गौरतलब है कि केंद्र एवं राज्यों के मध्य विवादित मुद्दों के समाधान के लिए सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर इस परिषद का गठन किया गया। राष्ट्रपति ऐसी परिषदों के कर्तव्यों, इसके संगठन और प्रक्रिया को निर्धारित कर सकता है। संरचना: प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष) सभी राज्यों के मुख्यमंत्री विधानसभा वाले संघराज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा गैर विधान सभा वाले संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल गृहमंत्री सहित प्रधानमंत्री द्वारा नामित छः केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री उद्देश्य : केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों के समाधान के लिए सुझाव देना केंद्र एवं राज्य या विभिन्न राज्यों के साझे हितों की पहचान तथा उनकी संवृद्धि हेतु चर्चा करना। समन्वयात्मक तथा सहयोगात्मक वातावरण के निर्माण के लिए सुझाव देना नीतियों तथा कार्यवाहियों में समन्वय स्थापित करने के प्रयास करना गौरतलब है कि अंतरराज्यीय परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय नहीं है परंतु यदि राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत होता है कि इस परिषद की स्थापना लोकहित के लिए आवश्यक है तब इसे किसी भी समय स्थापित किया जा सकता है। स्थायी परिषद न होने से इसकी बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं होती जैसे कि हाल ही में इसकी बैठक 12 वर्ष के अंतराल के पश्चात हुई थी। इसे केवल वार्ता मंच के रूप में देखा जाता है। इसकी अनुशंसाएं बाध्यकारी भी नहीं होती हैं। यदि परिषद को स्थायी रूप दे दिया जाए तो यह केंद्र राज्य सम्बन्धों को सुदृढ़ करने में निम्नप्रकार से महत्वपूर्ण होगा: चूंकि पहले ही इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है अतः स्थायी रूप प्रदान करने से इसके सिफ़ारिशों का महत्व बढ़ जाएगा। कुछ प्रमुख बिन्दुओं के बाध्यकारी भी बनाया जा सकता है। अस्थायी होने के कारण विभिन्न बैठकों में निर्णय तो ले लिए जाते हैं परंतु उनके क्रियान्वयन आदि की नियमित देखरेख नहीं हो पाती है। केंद्र में बहुमत से एक दलीय सरकार की वापसी हुई है। इस संदर्भ में संघीय ढांचे को और समंजस्य पूर्ण तरीके से कार्य करने हेतु आईएससी के माध्यम से अंतर-सरकारी तंत्र को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। पुंछी आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि परिषद की एक वर्ष में कम से कम तीन बैठकें हों। इसे वास्तविक रूप देने के लिए स्थायी रूप देते हुए इसके अधिदेश को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। हालांकि यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि अंतरराज्यीय परिषद का स्थायी रूप नीति आयोग के कार्य क्षेत्र में बाधा उत्पन्न न करे। इसके साथ ही वर्तमान में परिषद की जो स्थायी समिति कार्यरत है उसके बैठकों को नियमित रूप से आयोजित किया जाना चाहिए।
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