Question
stringlengths
0
3.53k
Answer
stringlengths
1
12.2k
prompt
stringlengths
21
12.4k
__index_level_0__
int64
5
88.1k
दिल्ली सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था का एक संक्षिप्त परिचय दीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Give a brief introduction to the delhi sultanate economy. (150-200 words; 10 Words)
एप्रोच- दिल्ली सल्तनत का संक्षिप्त परिचय एवं दिल्ली सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था के जानने के स्रोतों का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख भाग में,दिल्ली सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयामों का एक संक्षिप्त परिचय दीजिये| उत्तर- 12वीं सदी के अंतिम वर्षों में उत्तर भारत में तुर्कों द्वारा स्थापित दिल्ली सल्तनत धीरे-धीरे एक शक्तिशाली और अत्यंत केंद्रीकृत राज्य के रूप में उभर आया तथा कुछ समय तक लगभग पुरे देश पर उसका नियंत्रण कायम रहा| सल्तनत काल में लोगों की आर्थिक अवस्था के के संबंध में काफी कम जानकारी हमें मिलती है लेकिन दरबार की घटनाओं, यात्रियों के वृतान्त(जैसे- इब्ने-बतूता के वृतान्त) आदि के माध्यम से उस काल के अर्थव्यवस्था के बारे में हमें काफी जानकारियाँ मिलती हैं| सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था सल्तनतकालीन कृषि सल्तनतकालीन शासकों द्वारा नहरों के निर्माण, शस्यावर्तन एवं फलों की खेती को प्रोत्साहन; नहर निर्माण का प्रारंभ गयासुद्दीन तुगलक द्वारा तथा सर्वाधिक नहर निर्माण फिरोजशाह तुगलक द्वारा करवाया गया था| सिंचाई के लिए "रहट" नामक यंत्र के प्रचलन के साक्ष्य; पशुओं की शक्ति का उपयोग; सल्तनतकालीन शिल्प शिल्प के क्षेत्र में परिवर्तन - भारत में चरखे का प्रचलन; धनुक(रुई को साफ़ करने का काम); बर्तनों पर कलई; आसवन विधि(शराब और इत्र का निर्माण); कागज का अपेक्षाकृत अधिक प्रयोग; घुड़सवारी से संबंधित नालबंदी, जिम, रकाब आदि का प्रचलन; बेहतर किस्म एक गाढ़े का भी उल्लेख जिससे मेहराब तथा गुम्बदवाली शानदार इमारतें बनाना संभव; सल्तनतकालीन व्यापार मध्य एवं पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से विदेश व्यापार के साक्ष्य; आयात की प्रमुख वस्तुएं - शराब, दास, घोड़े आदि; निर्यात की प्रमुख वस्तुएं - कपड़े, मसालें, अनाज, लोहें के उपकरण आदि; पश्चिमी तट पर महत्वपूर्ण बंदरगाह - लाहिरी-बंदर; देवल; खम्भात; गोवा; कालीकट आदि; पूर्वी तट पर महत्वपूर्ण बंदरगाह- सतगांव; मसुलिपत्तनम; पुलीकट आदि; सिक्के- मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार; टंका एवं जितल प्रमुख सिक्कें; दांग एवं दिरहम कम मूल्य के तांबे के सिक्के; फिरोजशाह तुगलक द्वारा शशगनी नामक चाँदी के कम मूल्य/वजन के सिक्के जारी करना; मुहम्मद गोरी द्वारा देहलीवाल नामक सिक्के पुनः जारी करना(इनपर लक्ष्मी की आकृति); शहरों का विकास - तुर्कों की सत्ता स्थापित होने के पश्चात विभिन्न कारणों से फिर एक बार शहरीकरण की प्रक्रिया(तीसरा शहरीकरण); राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक एवं धार्मिक कारण; बंगाल और गुजरात के शहर उतम कपड़ों तथा सोने-चाँदी के काम के लिए प्रसिद्ध; किसान और ग्रामीण- जीवन निर्वाह लायक कृषि; खूतों और मुक्कदमों का जीवन स्तर अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा; राजमार्गों का विकास तथा यात्रियों की सुरक्षा तथा सुविधा के लिए जगह-जगह सराय का निर्माण; डाक को एक जगह से दूसरी जगह तेजी से पहुँचाने हेतु घोड़ों या हरकारों का प्रयोग; संचार व्यवस्था में सुधार होने से जल तथा थल दोनों मार्गों से व्यापार में वृद्धि;
##Question:दिल्ली सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था का एक संक्षिप्त परिचय दीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) Give a brief introduction to the delhi sultanate economy. (150-200 words; 10 Words)##Answer:एप्रोच- दिल्ली सल्तनत का संक्षिप्त परिचय एवं दिल्ली सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था के जानने के स्रोतों का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख भाग में,दिल्ली सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयामों का एक संक्षिप्त परिचय दीजिये| उत्तर- 12वीं सदी के अंतिम वर्षों में उत्तर भारत में तुर्कों द्वारा स्थापित दिल्ली सल्तनत धीरे-धीरे एक शक्तिशाली और अत्यंत केंद्रीकृत राज्य के रूप में उभर आया तथा कुछ समय तक लगभग पुरे देश पर उसका नियंत्रण कायम रहा| सल्तनत काल में लोगों की आर्थिक अवस्था के के संबंध में काफी कम जानकारी हमें मिलती है लेकिन दरबार की घटनाओं, यात्रियों के वृतान्त(जैसे- इब्ने-बतूता के वृतान्त) आदि के माध्यम से उस काल के अर्थव्यवस्था के बारे में हमें काफी जानकारियाँ मिलती हैं| सल्तनतकालीन अर्थव्यवस्था सल्तनतकालीन कृषि सल्तनतकालीन शासकों द्वारा नहरों के निर्माण, शस्यावर्तन एवं फलों की खेती को प्रोत्साहन; नहर निर्माण का प्रारंभ गयासुद्दीन तुगलक द्वारा तथा सर्वाधिक नहर निर्माण फिरोजशाह तुगलक द्वारा करवाया गया था| सिंचाई के लिए "रहट" नामक यंत्र के प्रचलन के साक्ष्य; पशुओं की शक्ति का उपयोग; सल्तनतकालीन शिल्प शिल्प के क्षेत्र में परिवर्तन - भारत में चरखे का प्रचलन; धनुक(रुई को साफ़ करने का काम); बर्तनों पर कलई; आसवन विधि(शराब और इत्र का निर्माण); कागज का अपेक्षाकृत अधिक प्रयोग; घुड़सवारी से संबंधित नालबंदी, जिम, रकाब आदि का प्रचलन; बेहतर किस्म एक गाढ़े का भी उल्लेख जिससे मेहराब तथा गुम्बदवाली शानदार इमारतें बनाना संभव; सल्तनतकालीन व्यापार मध्य एवं पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से विदेश व्यापार के साक्ष्य; आयात की प्रमुख वस्तुएं - शराब, दास, घोड़े आदि; निर्यात की प्रमुख वस्तुएं - कपड़े, मसालें, अनाज, लोहें के उपकरण आदि; पश्चिमी तट पर महत्वपूर्ण बंदरगाह - लाहिरी-बंदर; देवल; खम्भात; गोवा; कालीकट आदि; पूर्वी तट पर महत्वपूर्ण बंदरगाह- सतगांव; मसुलिपत्तनम; पुलीकट आदि; सिक्के- मुद्रा अर्थव्यवस्था का प्रसार; टंका एवं जितल प्रमुख सिक्कें; दांग एवं दिरहम कम मूल्य के तांबे के सिक्के; फिरोजशाह तुगलक द्वारा शशगनी नामक चाँदी के कम मूल्य/वजन के सिक्के जारी करना; मुहम्मद गोरी द्वारा देहलीवाल नामक सिक्के पुनः जारी करना(इनपर लक्ष्मी की आकृति); शहरों का विकास - तुर्कों की सत्ता स्थापित होने के पश्चात विभिन्न कारणों से फिर एक बार शहरीकरण की प्रक्रिया(तीसरा शहरीकरण); राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक एवं धार्मिक कारण; बंगाल और गुजरात के शहर उतम कपड़ों तथा सोने-चाँदी के काम के लिए प्रसिद्ध; किसान और ग्रामीण- जीवन निर्वाह लायक कृषि; खूतों और मुक्कदमों का जीवन स्तर अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा; राजमार्गों का विकास तथा यात्रियों की सुरक्षा तथा सुविधा के लिए जगह-जगह सराय का निर्माण; डाक को एक जगह से दूसरी जगह तेजी से पहुँचाने हेतु घोड़ों या हरकारों का प्रयोग; संचार व्यवस्था में सुधार होने से जल तथा थल दोनों मार्गों से व्यापार में वृद्धि;
50,020
The Constitutional forefathers adopted best practices from around the world, In the context of the statement compare and contrast the Indian constitution with that of France/the UK/USA. (250 words/15 marks)
APPROACH- 1. Introduce with Dr. Ambedkar’s quote and mention the provisions that are adopted from the US, UK, and France. 2. Compare with the USA, UK, and France on the basis of different features. 3. Conclude with highlighting the uniqueness of the Indian constitution. ANSWER The Indian Constitution is known as a bag of borrowings and draws its features from the Constitutions of many countries. Dr. BR Ambedkar rightly said that it was created after ransacking the known Constitutions across the world. Provisions adopted from US- Fundamental rights, independence of the judiciary, judicial review, the impeachment of the president, etc. Provisions adopted from the UK- Parliamentary government, Rule of Law, legislative procedure, single citizenship, cabinet system, etc. Provisions adopted from France- Republic and the ideals of liberty, equality, and fraternity in the Preamble, etc. Comparison- On the basis of the following features we can compare the Indian Constitution with other countries. 1. Written Constitution- A written constitution is a formal document defining the nature of the constitutional settlement. India-It is written and longest known constitution USA- It is written. It’s a product of 1787 constitutional documents and subsequent amendments. Great Britain- British constitution is unwritten. The British constitution is an evolved one and not enacted one. Various sources of the British constitution are Conventions, Great Charters, Statutes, Common Law, Legal Commentaries. France- Since the French revolution, France has changed its constitution quite often. The present French constitution which established the Fifth Republic is a written constitution 2. Flexible/ Rigid- A flexible Constitution is one that can be changed by the ordinary law-making process and the one which requires a special procedure for amendment is called rigid. India- the constitution is more flexible than rigid. It is only a few amendments to a few of the provisions of the constitution that requires ratification by half of the state. USA- It has a rigid constitution. It can be amended by congress by means of a special process provided by the constitution for that purpose. Britain- the same as ordinary laws are made. France- Rigid Constitution-Needs Special procedure-60% majority votes in both the house of parliament are needed. 3. Unitary or Federal- Federalism is a system of government in which sovereignty is constitutionally divided between a central governing authority and constituent political units (like states or provinces). A unitary system is governed constitutionally as one single unit, with one constitutionally created legislature. India- It is a federal system with unitary bias. Though normally the system of govt is federal; the constitution enables the federation to transform itself into the unitary state in emergencies. USA- It is a federal state. The constitution provides for the division of power between central govt and state govt. residuary powers are vested in the states. Britain- It is a unitary state and all powers are vested in a single supreme central govt. France- France is a unitary state. The local governments are created and abolished by central govt only for administrative convenience. 4. Type of Govt (Parliamentary v/s Presidential)- In a parliamentary form of govt executive is responsible to the legislature for its policies and acts. In the presidential form of government, the executive is completely separated from the legislature and is not accountable to the legislature. India- The constitution of India provides for a parliamentary form of govt both at the center and in states USA- It has a presidential form of govt. President is both head of state and head of govt. Britain- It has a parliamentary form of govt where King is the nominal executive. France- It has quasi presidential and quasi prime ministerial. On one hand, it provides for a powerful president who is directly elected by the people for a seven-year term. On the other hand, there is a nominated council of ministers headed by the prime minister which is responsible to the Parliament. 5. Republic v/s Constitutional Monarchy- The word REPUBLIC connotes ownership and control of a given state by the population at large. The head of state of a REPUBLIC may be appointed or elected by the Prime Minister or the populace at large respectively depending on the constitutional arrangements and essentials. A constitutional monarchy is a form of government established under a constitutional system which acknowledges a hereditary or elected monarch as head of state. Republic Countries-India, USA, France Constitutional Monarchy- UK, Japan 6. The sovereignty of Parliament- Parliamentary sovereignty (also called parliamentary supremacy or legislative supremacy) is a concept in the constitutional law of some parliamentary democracies. it holds that the legislative body has absolute sovereignty, and is supreme over all other government institutions, including executive or judicial bodies. The concept also holds that the legislative body may change or repeal any previous legislation, and so that it is not bound by written law (in some cases, even a constitution) or by precedent. UK- Parliament has the supreme power. It can make, amend, substitute, and repeal any law. France- It has a parliament with limited powers vis a vis political executive. It can only make laws on those items which are defined in the constitution. France has a constitutional council with nine members who are appointed for a term of nine years. India, USA- Supremacy of constitution judicial review - In all three countries a written constitution is regarded as the highest law of the land and the Supreme Court acts as custodian of the constitution through its power of judicial review. 7. Citizenship India-The Indian citizenship and nationality law and the Constitution of India provide single citizenship for all of India. UK- When becoming a British citizen one does not need to give up your present citizenship or nationality to become a British citizen. One will not normally lose British nationality if he/she becomes a citizen or national of another country. France- Dual citizenship has been permitted since 1973. Possession of one or more other nationalities, does not, in principle, affect the French nationality The Indian Constitution is unique in its contents and spirit. Though borrowed from almost every constitution of the world, suitability and applicability of these features in the Indian context were discussed and deliberated by our constitutional makers.
##Question:The Constitutional forefathers adopted best practices from around the world, In the context of the statement compare and contrast the Indian constitution with that of France/the UK/USA. (250 words/15 marks)##Answer:APPROACH- 1. Introduce with Dr. Ambedkar’s quote and mention the provisions that are adopted from the US, UK, and France. 2. Compare with the USA, UK, and France on the basis of different features. 3. Conclude with highlighting the uniqueness of the Indian constitution. ANSWER The Indian Constitution is known as a bag of borrowings and draws its features from the Constitutions of many countries. Dr. BR Ambedkar rightly said that it was created after ransacking the known Constitutions across the world. Provisions adopted from US- Fundamental rights, independence of the judiciary, judicial review, the impeachment of the president, etc. Provisions adopted from the UK- Parliamentary government, Rule of Law, legislative procedure, single citizenship, cabinet system, etc. Provisions adopted from France- Republic and the ideals of liberty, equality, and fraternity in the Preamble, etc. Comparison- On the basis of the following features we can compare the Indian Constitution with other countries. 1. Written Constitution- A written constitution is a formal document defining the nature of the constitutional settlement. India-It is written and longest known constitution USA- It is written. It’s a product of 1787 constitutional documents and subsequent amendments. Great Britain- British constitution is unwritten. The British constitution is an evolved one and not enacted one. Various sources of the British constitution are Conventions, Great Charters, Statutes, Common Law, Legal Commentaries. France- Since the French revolution, France has changed its constitution quite often. The present French constitution which established the Fifth Republic is a written constitution 2. Flexible/ Rigid- A flexible Constitution is one that can be changed by the ordinary law-making process and the one which requires a special procedure for amendment is called rigid. India- the constitution is more flexible than rigid. It is only a few amendments to a few of the provisions of the constitution that requires ratification by half of the state. USA- It has a rigid constitution. It can be amended by congress by means of a special process provided by the constitution for that purpose. Britain- the same as ordinary laws are made. France- Rigid Constitution-Needs Special procedure-60% majority votes in both the house of parliament are needed. 3. Unitary or Federal- Federalism is a system of government in which sovereignty is constitutionally divided between a central governing authority and constituent political units (like states or provinces). A unitary system is governed constitutionally as one single unit, with one constitutionally created legislature. India- It is a federal system with unitary bias. Though normally the system of govt is federal; the constitution enables the federation to transform itself into the unitary state in emergencies. USA- It is a federal state. The constitution provides for the division of power between central govt and state govt. residuary powers are vested in the states. Britain- It is a unitary state and all powers are vested in a single supreme central govt. France- France is a unitary state. The local governments are created and abolished by central govt only for administrative convenience. 4. Type of Govt (Parliamentary v/s Presidential)- In a parliamentary form of govt executive is responsible to the legislature for its policies and acts. In the presidential form of government, the executive is completely separated from the legislature and is not accountable to the legislature. India- The constitution of India provides for a parliamentary form of govt both at the center and in states USA- It has a presidential form of govt. President is both head of state and head of govt. Britain- It has a parliamentary form of govt where King is the nominal executive. France- It has quasi presidential and quasi prime ministerial. On one hand, it provides for a powerful president who is directly elected by the people for a seven-year term. On the other hand, there is a nominated council of ministers headed by the prime minister which is responsible to the Parliament. 5. Republic v/s Constitutional Monarchy- The word REPUBLIC connotes ownership and control of a given state by the population at large. The head of state of a REPUBLIC may be appointed or elected by the Prime Minister or the populace at large respectively depending on the constitutional arrangements and essentials. A constitutional monarchy is a form of government established under a constitutional system which acknowledges a hereditary or elected monarch as head of state. Republic Countries-India, USA, France Constitutional Monarchy- UK, Japan 6. The sovereignty of Parliament- Parliamentary sovereignty (also called parliamentary supremacy or legislative supremacy) is a concept in the constitutional law of some parliamentary democracies. it holds that the legislative body has absolute sovereignty, and is supreme over all other government institutions, including executive or judicial bodies. The concept also holds that the legislative body may change or repeal any previous legislation, and so that it is not bound by written law (in some cases, even a constitution) or by precedent. UK- Parliament has the supreme power. It can make, amend, substitute, and repeal any law. France- It has a parliament with limited powers vis a vis political executive. It can only make laws on those items which are defined in the constitution. France has a constitutional council with nine members who are appointed for a term of nine years. India, USA- Supremacy of constitution judicial review - In all three countries a written constitution is regarded as the highest law of the land and the Supreme Court acts as custodian of the constitution through its power of judicial review. 7. Citizenship India-The Indian citizenship and nationality law and the Constitution of India provide single citizenship for all of India. UK- When becoming a British citizen one does not need to give up your present citizenship or nationality to become a British citizen. One will not normally lose British nationality if he/she becomes a citizen or national of another country. France- Dual citizenship has been permitted since 1973. Possession of one or more other nationalities, does not, in principle, affect the French nationality The Indian Constitution is unique in its contents and spirit. Though borrowed from almost every constitution of the world, suitability and applicability of these features in the Indian context were discussed and deliberated by our constitutional makers.
50,025
Globalisation is often criticised for increasing inequality in society. Examine the arguments with adequate examples. (10 marks/150 Words)
APPROACH Introduction: Define Globalisation Body: Give points and examples to support the view that globalization increases inequality. Mention some points on other aspects which lead to equality and not just globalization Conclusion: Mention some ways, in brief, to tackle the issue. ANSWER Globalization as a concept fundamentally deals with flows. These flows could be of various kinds — ideas moving from one part of the world to another, capital shunted between two or more places, commodities being traded across borders, and people moving in search of better livelihoods to different parts of the world. The crucial element is the ‘worldwide interconnectedness’ that is created and sustained as a consequence of these constant flows. Globalization has made the world a Global Village. The impact of globalization is vastly uneven — it affects some societies more than others and some parts of some societies more than others. In short, we can say that globalization promotes inequality in multiple spheres - political, economic, social, etc. Let us illustrate the inequality created by globalization in society: 1) Only certain sections of society are able to reap the benefits. For Example: Because of the advent of artificial Chinese lights, the earthen diyas are not being sold. This has led to the growth of certain middle-class sections and has impoverished the other section of potters. This is evident in economic inequality. 2) Globalization has mostly benefited Western Countries. This has led to prosperous western society and deprived Non-Western, developing and underdeveloped societies. This has created inequality and has broadened the North-South divide . 3) MNC culture has led to the working culture at night. This is not safe for women. It has led to less recruitment of women. This creates gender inequality in society. 4) Globalization leads to the dumping of redundant technologies from the west to the developing countries. This has led to technological inequality. For example, the technology of technology being used by the informal sector are redundant and yet being exported to developing countries 5) Globalization resulted in the transfer of lower technologies that are not environment-friendly. This, in turn, led to more environmental pollution in the developing world. Developed countries dump their waste to developing countries. Example: US refineries sell dirty Petcoke to India. 6) Globalization has also led to inequality in terms of affordability of basic minimum needs like Health and Education. Globalization led to the setting up of private educational institutes and health centres. These are affordable to only a certain section of society. 7) Globalization has led to cultural inequality . Western culture is considered as supreme in comparison to other cultures. This creates inequality in terms of one cultural value over the other. But it is not always correct to say that only globalization is responsible for inequality in society. Before the advent of globalization, society was not completely equal. Some of the points which substantiate these facts are as follows: 1) Historical Reason : In history, we see that there were monarchy and feudalism which was unequal and discriminatory in nature. 2) Social Reason : The presence of the caste system in Indian society and the class system in the west represents the social structure that was responsible for inequality. Similarly, the discrimination between the blacks and whites in the USA and EUROPE and the Apartheid in South Africa can also be stated to be the reason for inequality. 3) Economic Reason : The market model itself leads to inequality. Some are high earners and some are low-income earners. 4) Ethical Reason: The corruption, nepotism, etc. done by parties in power is one of the major reasons for inequality in society. Yet there is a need to recognize the fact that globalization to a certain extent has created inequality and has promoted neocolonialism. In order to tackle the inequality created by globalization following steps needs to be taken: 1) Transfer of technology should be based on the principle of equity 2) Gender concerns should be there to tackle the fallouts of globalization. 3) The environment should not be at the receiving end. 4) Cultural differences should be recognized and should be catered to. Multiculturalism should be the guiding philosophy. In this way, we can check the negative effects of globalization which is creating inequality and will be able to build an equitable, inclusive and new society based on the ideals of Vasudhew Kutmbhakam.
##Question:Globalisation is often criticised for increasing inequality in society. Examine the arguments with adequate examples. (10 marks/150 Words)##Answer:APPROACH Introduction: Define Globalisation Body: Give points and examples to support the view that globalization increases inequality. Mention some points on other aspects which lead to equality and not just globalization Conclusion: Mention some ways, in brief, to tackle the issue. ANSWER Globalization as a concept fundamentally deals with flows. These flows could be of various kinds — ideas moving from one part of the world to another, capital shunted between two or more places, commodities being traded across borders, and people moving in search of better livelihoods to different parts of the world. The crucial element is the ‘worldwide interconnectedness’ that is created and sustained as a consequence of these constant flows. Globalization has made the world a Global Village. The impact of globalization is vastly uneven — it affects some societies more than others and some parts of some societies more than others. In short, we can say that globalization promotes inequality in multiple spheres - political, economic, social, etc. Let us illustrate the inequality created by globalization in society: 1) Only certain sections of society are able to reap the benefits. For Example: Because of the advent of artificial Chinese lights, the earthen diyas are not being sold. This has led to the growth of certain middle-class sections and has impoverished the other section of potters. This is evident in economic inequality. 2) Globalization has mostly benefited Western Countries. This has led to prosperous western society and deprived Non-Western, developing and underdeveloped societies. This has created inequality and has broadened the North-South divide . 3) MNC culture has led to the working culture at night. This is not safe for women. It has led to less recruitment of women. This creates gender inequality in society. 4) Globalization leads to the dumping of redundant technologies from the west to the developing countries. This has led to technological inequality. For example, the technology of technology being used by the informal sector are redundant and yet being exported to developing countries 5) Globalization resulted in the transfer of lower technologies that are not environment-friendly. This, in turn, led to more environmental pollution in the developing world. Developed countries dump their waste to developing countries. Example: US refineries sell dirty Petcoke to India. 6) Globalization has also led to inequality in terms of affordability of basic minimum needs like Health and Education. Globalization led to the setting up of private educational institutes and health centres. These are affordable to only a certain section of society. 7) Globalization has led to cultural inequality . Western culture is considered as supreme in comparison to other cultures. This creates inequality in terms of one cultural value over the other. But it is not always correct to say that only globalization is responsible for inequality in society. Before the advent of globalization, society was not completely equal. Some of the points which substantiate these facts are as follows: 1) Historical Reason : In history, we see that there were monarchy and feudalism which was unequal and discriminatory in nature. 2) Social Reason : The presence of the caste system in Indian society and the class system in the west represents the social structure that was responsible for inequality. Similarly, the discrimination between the blacks and whites in the USA and EUROPE and the Apartheid in South Africa can also be stated to be the reason for inequality. 3) Economic Reason : The market model itself leads to inequality. Some are high earners and some are low-income earners. 4) Ethical Reason: The corruption, nepotism, etc. done by parties in power is one of the major reasons for inequality in society. Yet there is a need to recognize the fact that globalization to a certain extent has created inequality and has promoted neocolonialism. In order to tackle the inequality created by globalization following steps needs to be taken: 1) Transfer of technology should be based on the principle of equity 2) Gender concerns should be there to tackle the fallouts of globalization. 3) The environment should not be at the receiving end. 4) Cultural differences should be recognized and should be catered to. Multiculturalism should be the guiding philosophy. In this way, we can check the negative effects of globalization which is creating inequality and will be able to build an equitable, inclusive and new society based on the ideals of Vasudhew Kutmbhakam.
50,028
What are the Biogeogrpahic Regions/Zones of India? Discuss their characteristics in brief and also highlight the ecological problems faced by them? (200 words)
Approach:- Give a brief intro about the Biogeographical regions of India Discuss characteristics of 10 biogeographical regions in brief Highlight the Ecological problems faced by them Conclude the answer based on the above analysis Answer: India is a megadiverse country. With only 2.4 percent of the total land area of the world, the known biological diversity of India contributes 8 percent to the known global biological diversity. In terms of Biogeography, India has been divided into 10 biogeographic zones – Trans-Himalayan Region: It constitutes 5.6 percent of the total geographical area , includes the high altitude, cold and arid mountain areas of Ladakh, Jammu & Kashmir, North Sikkim, Lahaul and Spiti areas of Himachal Pradesh. This zone has sparse alpine steppe vegetation that harbors several endemic species and is a favorable habitat for the biggest populations of wild sheep and goats in the world and other rare fauna that includes Snow Leopard and the migratory Black-necked Crane. The cold dry desert of this zone represents an extremely fragile ecosystem. Himalayan Zone: It constitutes 6.4 percent of the total geographical area includes some of the highest peaks in the world. The Himalayan zone makes India one of the richest areas in terms of habitats and species. The alpine and sub-alpine forests, grassy meadows and moistmixed deciduous forests provide diverse habitat for endangered species of bovids such as Bharal, Ibex, Markhor, Himalayan Tahr, and Takin. Other rare and endangered species restricted to this zone include Hangul and Musk Deer. Indian Desert Zone: Indian Desert Zone, constituting 6.6 percent of the total geographical area , includes the Thar and the Kutch deserts and has largeexpanses of grassland that support several endangered species of mammals such as Wolf, Caracal, Desert Catand birds of conservation interest viz., Houbara Bustard and the Great Indian Bustard. Semi-Arid Region: Semi-arid Region, constituting 16.6 percent of the total geographical area , is a transition zone between the desert and the dense forests of Western Ghats. Ithas several artificial and natural lakes and marshy lands.The dominant grass and palatable shrub layer in this zone support the highest wildlife biomass. The cervid species of Sambar and Chital (Axis axis) are restricted to the better-wooded hills and moister valley areas respectively.The Lion, an endangered carnivore species (restricted to a small area in Gujarat), Caracal, Jackal, and Wolf are some of the endangered species that are characteristic of this region. The Western Ghats: Constitutes 4.0 percent of the total geographical area . It is one of the major tropical evergreen forest regions in India and representsone of the two biodiversities ‘hot spots’. The Western Ghats are home to viable populations of most of the vertebrate species found in peninsular India, besides an endemic faunal element of its own.Significant species endemic to this region include Nilgiri Langur, Lion Tailed Macaque, Grizzled Giant Squirrel, Malabar Civet, Nilgiri Tahr, and Malabar Grey Hornbill. The Travancore Tortoise and Cane turtle are two endangered taxa restricted to a small area in the central Western Ghats. Deccan Plateau: Deccan Plateau is India’s largest biogeographic region making 42 percent of the total geographical area . It’s a semi-arid region that falls in the rain shadow area of the Western Ghats. The majorityof the forests are deciduous in nature but there are regions of greater biological diversity in the hill ranges.Species found in this region are Chital, Sambar, Nilgai, and Chousingha, Barking deer and Gaur, Elephant in Bihar-Orissa and Karnataka-Tamil Nadu belts, WildBuffalo in a small area at the junction of Orissa, Madhya Pradesh and Maharashtra and the hard ground Swamp Deer, now restricted to a single locality in Madhya Pradesh. Gangetic Plain: Gangetic plain constitutes around 10.8 percent of the total geographical area. The Gangetic plain is topographically homogenous for hundredsof kilometers. The characteristic fauna of this region includes Rhino, Elephant, Buffalo,Swamp Deer, Hog-Deer and Hispid Hare. North East Region: North East Region constitutes 5.2 percent of the total geographical area. This region represents the transition zone between the Indian, Indo-Malayan and Indo-Chinese bio-geographical regions as well as being a meeting point of the Himalayan mountains and peninsular India.The North-East is thus the biogeographical ‘gateway’ for much of India’s fauna and flora and also a biodiversity hotspot (Eastern Himalaya).Many of the species contributing to this biological diversity are either restricted to the region itself, or to the smaller localized areas of the Khasi Hills. Coastal Region: The coastal region constitutes 2.5 percent of the total geographical area with sandy beaches, mangroves, mudflats, coral reefs, and marineangiosperm pastures make them the wealth and health zones of India. The coastline from Gujarat to Sunderbans is estimated to be 5,423 km long. A totalof 25 islets constitute the Lakshadweep, which is of coral origin, and have a typical reef lagoon system, rich in biodiversity.However, the densely populated Lakshadweep islands virtually have no natural vegetation. Andaman and Nicobar Islands: This constitutes 0.3 percent of the total geographical area is one of the three tropical moist evergreen forest zones in India. The islands house an array of flora and fauna not found elsewhere. These islands are centers of high endemismand contain some of India’s finest evergreen forests and support a wide diversity of corals.In India, endemic island biodiversity is found only in the Andaman and Nicobar Islands. Some of the endemicfauna of the Andaman & Nicobar islands include Narcondam hornbill, South Andaman krait, etc. The ecological problems being faced for these various zones are as follows: Degradation of habitat through man-made activities such as construction, mining, etc. Pollution Submergence owing to the rising sea levels as a result of global warming. Desertification land degradation and intensive soil erosion, that has taken place over the years. Rapid melting of glaciers depletion in the sources of fresh-water for our rivers and streams emerging from the Himalayan ranges. Floods and Droughts Conclusion: The biogeographicclassification of India is the division of India according to biogeographic characteristics. Biogeography is the study of the distribution of species (biology), organisms, and ecosystems in geographic space and through geological time and it is our utmost responsibility to protect these ecosystems with all the available resources at our disposal.
##Question:What are the Biogeogrpahic Regions/Zones of India? Discuss their characteristics in brief and also highlight the ecological problems faced by them? (200 words)##Answer:Approach:- Give a brief intro about the Biogeographical regions of India Discuss characteristics of 10 biogeographical regions in brief Highlight the Ecological problems faced by them Conclude the answer based on the above analysis Answer: India is a megadiverse country. With only 2.4 percent of the total land area of the world, the known biological diversity of India contributes 8 percent to the known global biological diversity. In terms of Biogeography, India has been divided into 10 biogeographic zones – Trans-Himalayan Region: It constitutes 5.6 percent of the total geographical area , includes the high altitude, cold and arid mountain areas of Ladakh, Jammu & Kashmir, North Sikkim, Lahaul and Spiti areas of Himachal Pradesh. This zone has sparse alpine steppe vegetation that harbors several endemic species and is a favorable habitat for the biggest populations of wild sheep and goats in the world and other rare fauna that includes Snow Leopard and the migratory Black-necked Crane. The cold dry desert of this zone represents an extremely fragile ecosystem. Himalayan Zone: It constitutes 6.4 percent of the total geographical area includes some of the highest peaks in the world. The Himalayan zone makes India one of the richest areas in terms of habitats and species. The alpine and sub-alpine forests, grassy meadows and moistmixed deciduous forests provide diverse habitat for endangered species of bovids such as Bharal, Ibex, Markhor, Himalayan Tahr, and Takin. Other rare and endangered species restricted to this zone include Hangul and Musk Deer. Indian Desert Zone: Indian Desert Zone, constituting 6.6 percent of the total geographical area , includes the Thar and the Kutch deserts and has largeexpanses of grassland that support several endangered species of mammals such as Wolf, Caracal, Desert Catand birds of conservation interest viz., Houbara Bustard and the Great Indian Bustard. Semi-Arid Region: Semi-arid Region, constituting 16.6 percent of the total geographical area , is a transition zone between the desert and the dense forests of Western Ghats. Ithas several artificial and natural lakes and marshy lands.The dominant grass and palatable shrub layer in this zone support the highest wildlife biomass. The cervid species of Sambar and Chital (Axis axis) are restricted to the better-wooded hills and moister valley areas respectively.The Lion, an endangered carnivore species (restricted to a small area in Gujarat), Caracal, Jackal, and Wolf are some of the endangered species that are characteristic of this region. The Western Ghats: Constitutes 4.0 percent of the total geographical area . It is one of the major tropical evergreen forest regions in India and representsone of the two biodiversities ‘hot spots’. The Western Ghats are home to viable populations of most of the vertebrate species found in peninsular India, besides an endemic faunal element of its own.Significant species endemic to this region include Nilgiri Langur, Lion Tailed Macaque, Grizzled Giant Squirrel, Malabar Civet, Nilgiri Tahr, and Malabar Grey Hornbill. The Travancore Tortoise and Cane turtle are two endangered taxa restricted to a small area in the central Western Ghats. Deccan Plateau: Deccan Plateau is India’s largest biogeographic region making 42 percent of the total geographical area . It’s a semi-arid region that falls in the rain shadow area of the Western Ghats. The majorityof the forests are deciduous in nature but there are regions of greater biological diversity in the hill ranges.Species found in this region are Chital, Sambar, Nilgai, and Chousingha, Barking deer and Gaur, Elephant in Bihar-Orissa and Karnataka-Tamil Nadu belts, WildBuffalo in a small area at the junction of Orissa, Madhya Pradesh and Maharashtra and the hard ground Swamp Deer, now restricted to a single locality in Madhya Pradesh. Gangetic Plain: Gangetic plain constitutes around 10.8 percent of the total geographical area. The Gangetic plain is topographically homogenous for hundredsof kilometers. The characteristic fauna of this region includes Rhino, Elephant, Buffalo,Swamp Deer, Hog-Deer and Hispid Hare. North East Region: North East Region constitutes 5.2 percent of the total geographical area. This region represents the transition zone between the Indian, Indo-Malayan and Indo-Chinese bio-geographical regions as well as being a meeting point of the Himalayan mountains and peninsular India.The North-East is thus the biogeographical ‘gateway’ for much of India’s fauna and flora and also a biodiversity hotspot (Eastern Himalaya).Many of the species contributing to this biological diversity are either restricted to the region itself, or to the smaller localized areas of the Khasi Hills. Coastal Region: The coastal region constitutes 2.5 percent of the total geographical area with sandy beaches, mangroves, mudflats, coral reefs, and marineangiosperm pastures make them the wealth and health zones of India. The coastline from Gujarat to Sunderbans is estimated to be 5,423 km long. A totalof 25 islets constitute the Lakshadweep, which is of coral origin, and have a typical reef lagoon system, rich in biodiversity.However, the densely populated Lakshadweep islands virtually have no natural vegetation. Andaman and Nicobar Islands: This constitutes 0.3 percent of the total geographical area is one of the three tropical moist evergreen forest zones in India. The islands house an array of flora and fauna not found elsewhere. These islands are centers of high endemismand contain some of India’s finest evergreen forests and support a wide diversity of corals.In India, endemic island biodiversity is found only in the Andaman and Nicobar Islands. Some of the endemicfauna of the Andaman & Nicobar islands include Narcondam hornbill, South Andaman krait, etc. The ecological problems being faced for these various zones are as follows: Degradation of habitat through man-made activities such as construction, mining, etc. Pollution Submergence owing to the rising sea levels as a result of global warming. Desertification land degradation and intensive soil erosion, that has taken place over the years. Rapid melting of glaciers depletion in the sources of fresh-water for our rivers and streams emerging from the Himalayan ranges. Floods and Droughts Conclusion: The biogeographicclassification of India is the division of India according to biogeographic characteristics. Biogeography is the study of the distribution of species (biology), organisms, and ecosystems in geographic space and through geological time and it is our utmost responsibility to protect these ecosystems with all the available resources at our disposal.
50,029
चक्रवात से आप क्या समझते हैं ? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं की चर्चा करते हुए , इसके उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाओं को भी समझाइये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by cyclone ? While discussing the common characteristics of the tropical cyclone, explain the conditions favourable for its origin. (150-200 Words/10 marks)
एप्रोच - भूमिका में चक्रवात के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये | पुनः उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात | उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं- उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है | चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी | चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है | चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी | उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है | इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है | चक्रवात की उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाएं - समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए | वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है | इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं | यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है | कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है | चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है | यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है | तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
##Question:चक्रवात से आप क्या समझते हैं ? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं की चर्चा करते हुए , इसके उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाओं को भी समझाइये | (150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by cyclone ? While discussing the common characteristics of the tropical cyclone, explain the conditions favourable for its origin. (150-200 Words/10 marks)##Answer:एप्रोच - भूमिका में चक्रवात के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये | पुनः उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात | उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं- उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है | चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी | चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है | चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी | उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है | इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है | चक्रवात की उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाएं - समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए | वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है | इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं | यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है | कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है | चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है | यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है | तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
50,030
उपयुक्त उदाहरणों के साथ भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभाव को स्पष्ट कीजिये| (10 अंक; 150 से 200 शब्द) Explain the multidimensional effects of Sufi movement in India with suitable examples.(10 marks;150 to 200 words)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में सूफी आन्दोलन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये, 2- प्रथम भाग में भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभावों को स्पष्ट कीजिये, 3- अंतिम में महत्त्व एवं सीमाओं की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सूफीवाद इस्लाम के भीतर अपेक्षाकृत उदारवादी धारा है जो गुरु के निर्देशन में इश्वर के साथ एकाकार या जुड़ने पर बल देती है| सामाजिक-धार्मिक जीवन में रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, इस्लामिक शासकों का विलासिता युक्त जीवन, और गैर-इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव आदि कारणों ने सूफी आन्दोलन के उदय मे महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| भारत में सूफी आन्दोलन का प्रवेश महमूद गजनी के आक्रमणों के साथ माना जाता है| कालान्तर में भारत में सूफी वाद की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ जिन्होंने भारत पर बहुआयामी प्रभाव डाला| सूफी आन्दोलन का प्रभाव धार्मिक दृष्टिकोण से धर्म के रुढ़िवादी तत्वों के स्थान पर दया, सहिष्णुता, प्रेम जैसे तत्वों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया सूफी आन्दोलन ने धर्म की जटिलता और कर्मकांडों का विरोध करते हुए धर्म का सरलीकरण किया भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि इनके आचरण से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाया गृहस्थ जीवन अपनाना, एकेश्वरवाद, कर्मकांडों की आलोचना, गुरु को महत्त्व देने जैसी विशेषताएं निर्गुण संतों की गतिविधियों में देखी जा सकती हैं, इस तरह भक्ति आन्दोलन पर भी सूफी संतों का प्रभाव भी दिखाई देता है सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से सूफी संतों ने समाज के सभी वर्गों के साथ एक जैसा व्यवहार किया,इससे समाज के लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली या समानता के विचार को महत्त्व मिला खानकाहों में विविध धर्म, जाति एवं वर्गों के लोग आते थे, इससे सामाजिक संश्लेषण की प्रक्रिया को मजबूती मिली सूफी संतों द्वारा शारीरिक श्रम को महत्त्व दिया जाता था, इनकी दरगाहों के आस-पास क्रमशः बड़े पैमानों पर आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ जैसे अजमेर जैसे नगरों का विकास आदि सूफी संतों की शिक्षाओं ने आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया जैसे सूफियों ने धन संचय एवं कालाबाजारी की आलोचना की राजनीतिक प्रभाव प्रायः सूफी संतों ने राजनीति से दूरी बनाए रखी फिर भी समकालीन राजनीति इनके प्रभाव से अछूती नहीं रही जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव रहा उनकी नीतियों में उदारता एवं सहिष्णुता के तत्व देखे जा सकते हैं जैसे मुहम्मद बिन तुगलक, अकबर आदि इस्लामिक शासक वर्ग को भारतीय समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता दिलाने में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत में भाषा के रूप में उर्दू की उत्पत्ति एवं उसके विकास में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| ध्यातव्य है कि सूफी कवि अमीर खुशरो को उर्दू भाषा का प्रथम महत्वपूर्ण कवि माना जाता है उर्दू के साथ ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में सूफी संतों का योगदान देखा जा सकता है, जैसे पंजाबी के विकास में बाबा फरीद, अवधी भाषा के विकास में मालिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउदके योगदानों को देख सकते हैं संगीत के विकास में सूफी संतों विशेषकर चिश्ती संतों ने समा(सामूहिक संगीत) को लोकप्रिय बनाया| भारत सहित मध्य एवं पश्चिम एशिया में आज भी सूफी संगीत लोकप्रिय बना हुआ है| गायन की विधा के रूप में कव्वाली, विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे सितार आदि की शुरुआत सूफी साधकों द्वारा की गयी थी| हालाँकि स्थापत्य के विकास में सूफी संतों का प्रत्यक्षतः विशेष योगदान नहीं है क्योंकि ये सरल जीवन जीने में विश्वास रखते थे लेकिन इनकी मृत्यु के पश्चात इनके अनुयायियों और शासकों ने दरगाहों एवं खानकाहों का निर्माण करवाया| ये दरगाहें और खानकाह आज भी सामासिक संस्कृति का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं| उपरोक्त विन्दुओं से स्पष्ट होता है कि सूफी आन्दोलन ने भारतीय इतिहास पर व्यापक एवं बहुआयामी प्रभाव डाले किन्तु सूफी आन्दोलन का प्रभाव मुख्यतः नगरीय एवं निम्न वर्गों के मध्य तक ही सीमित था अर्थात इनका सामाजिक आधार समावेशी नहीं था| सूफियों की गतिविधियों से धर्मांतरण को बढ़ावा मिला जिससे यदा-कदा यह सामाजिक तनाव का भी कारण बना|सूफी संतों के प्रयासों के बाद भी राजनीति और समाज पर रुढ़िवादी उलेमावर्ग का प्रभाव बना रहा|सूफियों के प्रभाव के बाद भी शासक वर्ग में विलासितापूर्ण जीवन शैली अपनाने तथा धार्मिक नीतियों में कटुता के उदहारण देखे जा सकते हैं| फिर भी व्यापक संदर्भों में सूफी आन्दोलन ने भारत में धर्मों के मध्य सामंजस्य का स्थापना कर तथा भारत के मुख्य धर्मों के मध्य आपसी समझ का विस्तार कर सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
##Question:उपयुक्त उदाहरणों के साथ भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभाव को स्पष्ट कीजिये| (10 अंक; 150 से 200 शब्द) Explain the multidimensional effects of Sufi movement in India with suitable examples.(10 marks;150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में सूफी आन्दोलन के बारे में संक्षिप्त चर्चा कीजिये, 2- प्रथम भाग में भारत में सूफी आन्दोलन के बहुआयामी प्रभावों को स्पष्ट कीजिये, 3- अंतिम में महत्त्व एवं सीमाओं की चर्चा करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये सूफीवाद इस्लाम के भीतर अपेक्षाकृत उदारवादी धारा है जो गुरु के निर्देशन में इश्वर के साथ एकाकार या जुड़ने पर बल देती है| सामाजिक-धार्मिक जीवन में रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव, सामाजिक-आर्थिक असमानता, इस्लामिक शासकों का विलासिता युक्त जीवन, और गैर-इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव आदि कारणों ने सूफी आन्दोलन के उदय मे महत्वपूर्ण भूमिका निभायी| भारत में सूफी आन्दोलन का प्रवेश महमूद गजनी के आक्रमणों के साथ माना जाता है| कालान्तर में भारत में सूफी वाद की विभिन्न धाराओं का विकास हुआ जिन्होंने भारत पर बहुआयामी प्रभाव डाला| सूफी आन्दोलन का प्रभाव धार्मिक दृष्टिकोण से धर्म के रुढ़िवादी तत्वों के स्थान पर दया, सहिष्णुता, प्रेम जैसे तत्वों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया सूफी आन्दोलन ने धर्म की जटिलता और कर्मकांडों का विरोध करते हुए धर्म का सरलीकरण किया भारत में इस्लाम धर्म के प्रसार में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान रहा क्योंकि इनके आचरण से प्रभावित हो कर बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम धर्म को अपनाया गृहस्थ जीवन अपनाना, एकेश्वरवाद, कर्मकांडों की आलोचना, गुरु को महत्त्व देने जैसी विशेषताएं निर्गुण संतों की गतिविधियों में देखी जा सकती हैं, इस तरह भक्ति आन्दोलन पर भी सूफी संतों का प्रभाव भी दिखाई देता है सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से सूफी संतों ने समाज के सभी वर्गों के साथ एक जैसा व्यवहार किया,इससे समाज के लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली या समानता के विचार को महत्त्व मिला खानकाहों में विविध धर्म, जाति एवं वर्गों के लोग आते थे, इससे सामाजिक संश्लेषण की प्रक्रिया को मजबूती मिली सूफी संतों द्वारा शारीरिक श्रम को महत्त्व दिया जाता था, इनकी दरगाहों के आस-पास क्रमशः बड़े पैमानों पर आर्थिक गतिविधियों का विकास हुआ जैसे अजमेर जैसे नगरों का विकास आदि सूफी संतों की शिक्षाओं ने आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया जैसे सूफियों ने धन संचय एवं कालाबाजारी की आलोचना की राजनीतिक प्रभाव प्रायः सूफी संतों ने राजनीति से दूरी बनाए रखी फिर भी समकालीन राजनीति इनके प्रभाव से अछूती नहीं रही जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव रहा उनकी नीतियों में उदारता एवं सहिष्णुता के तत्व देखे जा सकते हैं जैसे मुहम्मद बिन तुगलक, अकबर आदि इस्लामिक शासक वर्ग को भारतीय समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता दिलाने में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत में भाषा के रूप में उर्दू की उत्पत्ति एवं उसके विकास में सूफी संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही| ध्यातव्य है कि सूफी कवि अमीर खुशरो को उर्दू भाषा का प्रथम महत्वपूर्ण कवि माना जाता है उर्दू के साथ ही विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में सूफी संतों का योगदान देखा जा सकता है, जैसे पंजाबी के विकास में बाबा फरीद, अवधी भाषा के विकास में मालिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउदके योगदानों को देख सकते हैं संगीत के विकास में सूफी संतों विशेषकर चिश्ती संतों ने समा(सामूहिक संगीत) को लोकप्रिय बनाया| भारत सहित मध्य एवं पश्चिम एशिया में आज भी सूफी संगीत लोकप्रिय बना हुआ है| गायन की विधा के रूप में कव्वाली, विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे सितार आदि की शुरुआत सूफी साधकों द्वारा की गयी थी| हालाँकि स्थापत्य के विकास में सूफी संतों का प्रत्यक्षतः विशेष योगदान नहीं है क्योंकि ये सरल जीवन जीने में विश्वास रखते थे लेकिन इनकी मृत्यु के पश्चात इनके अनुयायियों और शासकों ने दरगाहों एवं खानकाहों का निर्माण करवाया| ये दरगाहें और खानकाह आज भी सामासिक संस्कृति का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं| उपरोक्त विन्दुओं से स्पष्ट होता है कि सूफी आन्दोलन ने भारतीय इतिहास पर व्यापक एवं बहुआयामी प्रभाव डाले किन्तु सूफी आन्दोलन का प्रभाव मुख्यतः नगरीय एवं निम्न वर्गों के मध्य तक ही सीमित था अर्थात इनका सामाजिक आधार समावेशी नहीं था| सूफियों की गतिविधियों से धर्मांतरण को बढ़ावा मिला जिससे यदा-कदा यह सामाजिक तनाव का भी कारण बना|सूफी संतों के प्रयासों के बाद भी राजनीति और समाज पर रुढ़िवादी उलेमावर्ग का प्रभाव बना रहा|सूफियों के प्रभाव के बाद भी शासक वर्ग में विलासितापूर्ण जीवन शैली अपनाने तथा धार्मिक नीतियों में कटुता के उदहारण देखे जा सकते हैं| फिर भी व्यापक संदर्भों में सूफी आन्दोलन ने भारत में धर्मों के मध्य सामंजस्य का स्थापना कर तथा भारत के मुख्य धर्मों के मध्य आपसी समझ का विस्तार कर सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
50,033
चक्रवात से आप क्या समझते हैं ? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं की चर्चा करते हुए , इसके उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाओं को भी समझाइये | (150-200 शब्द) What do you understand by cyclone ? While discussing the common characteristics of the tropical cyclone, explain the conditions favourable for its origin. (150-200 Words)
एप्रोच - भूमिका में चक्रवात के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये | पुनः उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात | उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं- उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है | चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी | चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है | चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी | उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है | इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है | चक्रवात की उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाएं - समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए | वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है | इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं | यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है | कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है | चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है | यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है | तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
##Question:चक्रवात से आप क्या समझते हैं ? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं की चर्चा करते हुए , इसके उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाओं को भी समझाइये | (150-200 शब्द) What do you understand by cyclone ? While discussing the common characteristics of the tropical cyclone, explain the conditions favourable for its origin. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - भूमिका में चक्रवात के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उत्तर की शरुआत कीजिये | इसके पश्चात उष्णकटिबंधीय चक्रवात की सामान्य विशेषताओं को सूचीबद्ध कीजिये | पुनः उष्णकटिबंधीय चक्रवात के विकास के लिए आवश्यक दशाओं का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - चक्रवात एक वायुमंडलीय विक्षोभ है जिसमें पवन की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई के विपरीत जबकि दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुई की दिशा में लगभग वृत्ताकार पथ पर होती है| चक्रवात को अक्षांशीय अवस्थिति के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है यथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात | उष्णकटिबंधीय चक्रवात और उसकी विशेषताएं- उष्णकटिबंधीयचक्रवात उष्णकटिबंध क्षेत्र में निर्मित होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवातीय स्थिति निम्न वायुदाब का परिणाम होती है, इसमें पवन की गति न्यूनतम 33 किमी होनी चाहिए | निम्न वायुदाब की तीव्रता बढ़ने से अवदाब का निर्माण होता है इसकी तीव्रता बढ़ने से अवदाब भंवर का निर्माण होता है अवदाब भंवर के बढ़ने पर चक्रवात का निर्माण होता है| उष्णकटिबंधीय चक्रवात को धरातल पर टोर्नेडो जबकि समुद्र पर इसे जल स्तम्भ(water spout) कहते हैं| टोर्नेडो में पवन की गति को लगभग 600 किमी/घंटे माना जाता है | चक्रवात में तीव्रता बढ़ने से दाब प्रवणता बल बढ़ेगा जिससे पवन की गति बढ़ेगी इसी के साथ साथ वर्षा की मात्रा बढती जायेगी इसी के साथ विनाश की डिग्री बढती जायेगी | चक्रवात की तीव्रता बढ़ते जाने पर चक्रवात का क्षेत्रफल छोटा होता जाएगा अर्थात त्रिज्या छोटी होती जाती है | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में पवनें चारों ओर से आती हैं| सभी दिशा से आती पवनों को कोरियोलिस बल उनके दाहिनी ओर मोड़ देता है जिसे के कारण चक्रवात के अंदर की पवन घडी की सुई की दिशा के विपरीत चलती है | चक्रवात आने के पूर्व मौसम शांत रहता है किन्तु चक्रवात आने पर(फ्रंट वाल) पहले दाब में कमी आती है इसी समय तापमान में भी कमी आती है चक्रवात आने के बाद ताप और दाब में वृद्धि होगी | उष्णकटिबंधीय चक्रवात से कपासी मेघों का निर्माण होता है और तेज वर्षा होती है| इसके बाद चक्रवात की आँख की स्थिति आती है जिसमें मौसम शांत होता है | इसके बाद चक्रवात की पिछली दीवाल आती है जिसमें फ्रंट वाल के समान ही मौसम रहता है लेकिन तीव्रता कम होती है | चक्रवात की उत्पत्ति के लिए अनुकूल दशाएं - समुद्र तल का तापमान न्यूनतम 26 से 27 डिग्री के आसपास होना चाहिए | वायु के अपसरण में निरन्तरता होने से ही चक्रवात के आधारतल के पास वायु का अभिसरण हो पाता है अतः चक्रवात के सम्पूर्ण विकसित तंत्र के विकास लिए अपसरण का होना चक्रवात की सबसे बड़ी आवश्यकता है | इससे तापमान क्षेत्र का सीमांकन हो जाता है परिणामस्वरुप यह सीमित क्षेत्र में ही निर्मित हो पाता है| इतना तापमान केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में हो पाता है इसीलिए इसे उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं | यदि सागर का आकार छोटा होगा तो तापमान अधिक होगा और चक्रवात की तीव्रता और बारंबारता दोनों अधिक होगीचक्रवात में आवश्यक नमी की मात्रा की आपूर्ति तटवर्ती पवन में ही होती है | कोरिओलिस बल की पर्याप्त मात्रा चक्रवात में पवनों का संचलन लगभग वृत्ताकार पथ पर होता है जिसे प्रवणता पवन(वृत्ताकार समदाब रेखा के समानांतर) कहते हैं, के निर्माण के लिए कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है | चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति चक्रवात के ऊपर की वायुमंडलीय स्थिति अपसरण के लिए अनुकूल हो अर्थात उपरी वायुमंडल में प्रति चक्र्वातीय स्थिति की उपस्थिति आवश्यक है | यदि किसी क्षेत्र में जेट धारा या इस प्रकार की प्रतिकूल स्थिति हो तो चक्रवात का विकास नहीं हो पाता है | तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र एक बड़े निम्न वायुदाब क्षेत्र के भीतर एक छोटे परन्तु अपेक्षाकृत तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र की उपस्थिति आवश्यक है जो धीरे धीरे विकसित हो कर चक्रवात में परिवर्तित हो जाए | उष्णकटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएं बहुत पास-पास और वृत्ताकार रूप में होती हैं अर्थात यहाँ दाब प्रवणता बल अधिक होता है जिससे तीव्र गति की पवन विनाश की तीव्रता को बढ़ा देता है| चक्रवात वायुमंडलीय परिसंचलन के क्षेत्रीय रूप/परिणाम हैं जो मौसमी बदलाव/परिवर्तन, वर्षा की मात्रा, वर्षा का वितरण करके मानव की गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं|
50,039
What do you mean by Public Policy? Discuss the types and nature of Public Policy. (10 marks/150 words)
Approach: Introduction - Explain the term Public Policy Main Body -1. Discuss the types of Public Policy 2. Highlight the nature of Public Policy Conclusion - Write about Public policy in India Answer Public Policies are governmental decisions and resultant actions in pursuance of certain goals and objectives. It requires a thoroughly close-knit relation and interaction between the important governmental agencies- political executive, legislature, bureaucracy, and the judiciary. In other words, Public policy is a proposed course of action of a government within a given environment providing opportunities and obstacles which the policy aims to utilize and overcome to realize a given role. Types of Public Policies 1. Substantive - These are the policies related to general welfare and development of the society, the programs like provisions of education and employment opportunities, economic stabilization, law and order enforcement, anti-pollution legislation. 2. Regulatory - These are concerned with the regulation of trade, business, safety measures, public utilities. An organization like LIC, RBI makes the regulation on behalf of government. 3. Distributive- These are meant for specific segments of society and are related to the area of a grant of goods, public welfare or health services. Examples include the adult education program, food relief, social insurance, vaccination camp, etc. 4. Redistributive - These are concerned with the rearrangement of the policies which aim to bringing about the social and economic changes. Certain goods and services that are divided disproportionally are streamlined. 5. Capitalization - Under this policy, financial subsidies are given to state and local governments by union governments. Nature of Public policy 1. Goal-Oriented - Public policies are formulated and implemented in order to attain the objectives which the government has in view for the ultimate benefit of masses in general. 2. Collective actions - It is the result of the government’s collective actions. It is a course of activity or the governmental officials and actors in a collective sense than being termed as their discrete and segregated decisions. 3. Decision : Public policy is what the government actually decides or chooses to do. It can take a variety of forms like law, ordinances, court decisions, executive orders, and decisions 4. Positive/Negative - Public Policy is positive in the sense that it depicts the concern of the govt and involves its action to a particular problem on which the policy is made. It has the sanction of law and authority behind it. Negatively, it involves a decision by the govt officials regarding not taking any action on a particular issue. In India, the role of Policy formulation was taken up by Planning Commission which is now replaced by Niti Ayog. The first major goal of public policy in India has been in the area of socio-economic development. Major policy formulation in India was done in the area of Industrial and agricultural development.
##Question:What do you mean by Public Policy? Discuss the types and nature of Public Policy. (10 marks/150 words)##Answer:Approach: Introduction - Explain the term Public Policy Main Body -1. Discuss the types of Public Policy 2. Highlight the nature of Public Policy Conclusion - Write about Public policy in India Answer Public Policies are governmental decisions and resultant actions in pursuance of certain goals and objectives. It requires a thoroughly close-knit relation and interaction between the important governmental agencies- political executive, legislature, bureaucracy, and the judiciary. In other words, Public policy is a proposed course of action of a government within a given environment providing opportunities and obstacles which the policy aims to utilize and overcome to realize a given role. Types of Public Policies 1. Substantive - These are the policies related to general welfare and development of the society, the programs like provisions of education and employment opportunities, economic stabilization, law and order enforcement, anti-pollution legislation. 2. Regulatory - These are concerned with the regulation of trade, business, safety measures, public utilities. An organization like LIC, RBI makes the regulation on behalf of government. 3. Distributive- These are meant for specific segments of society and are related to the area of a grant of goods, public welfare or health services. Examples include the adult education program, food relief, social insurance, vaccination camp, etc. 4. Redistributive - These are concerned with the rearrangement of the policies which aim to bringing about the social and economic changes. Certain goods and services that are divided disproportionally are streamlined. 5. Capitalization - Under this policy, financial subsidies are given to state and local governments by union governments. Nature of Public policy 1. Goal-Oriented - Public policies are formulated and implemented in order to attain the objectives which the government has in view for the ultimate benefit of masses in general. 2. Collective actions - It is the result of the government’s collective actions. It is a course of activity or the governmental officials and actors in a collective sense than being termed as their discrete and segregated decisions. 3. Decision : Public policy is what the government actually decides or chooses to do. It can take a variety of forms like law, ordinances, court decisions, executive orders, and decisions 4. Positive/Negative - Public Policy is positive in the sense that it depicts the concern of the govt and involves its action to a particular problem on which the policy is made. It has the sanction of law and authority behind it. Negatively, it involves a decision by the govt officials regarding not taking any action on a particular issue. In India, the role of Policy formulation was taken up by Planning Commission which is now replaced by Niti Ayog. The first major goal of public policy in India has been in the area of socio-economic development. Major policy formulation in India was done in the area of Industrial and agricultural development.
50,045
महिला सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं।महिला सशक्तिकरण हेतु विभिन्न प्रकार के महिला संगठनों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द) What do you understand by women empowerment? Discuss different types of women"s organizations for women empowerment with examples. (150-200 words)
Approach: भूमिका में महिला सशक्तिकरण को परिभाषित कीजिये। संक्षिप्त में महिला सशक्तिकरण को स्पष्ट कीजिये महिला सशक्तिकरण हेतु विभिन्न प्रकार के संगठनों की विस्तृत चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में इन संगठनों के महत्व को संक्षिप्त में लिख सकते हैं। उत्तर : सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण भी महिलाओं के संदर्भ में उसी क्षमता क्षमता का विकास करना है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो। महिलाओं का यह सशक्तिकरण उनके जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों में अपेक्षित होता है। इसमें सामाजिक सशक्तिकरण, आर्थिक सशक्तिकरण के साथ साथ राजनैतिक सशक्तिकरण भी शामिल होता है। सामाजिक सशक्तिकरण में महिलाओं की सामाजिक प्रस्थिति में सुधार किया जाता है जिसमें सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता, सुरक्षा स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों में वृद्धि, वेतन समानता द्वारा किया जाता है। राजनैतिक सशक्तिकरण में लोकतान्त्रिक संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में वृद्धि की जाती है। महिला सशक्तिकरण हेतु विभिन्न प्रकार के महिला संगठन महिला संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनो से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महिला सशक्तिकरणमें सहयोगी सिद्ध होती है। कमला भसीन के मतानुसार यह महिला संघटन निम्न तीन प्रकार के हो सकते हैं। वे महिला संगठन जो केंद्र या राज्य सरकारों का हिस्सा होते हुए महिला सशक्तिकरण हेतु प्रयासरत हों उदाहरण राष्ट्रीय महिला आयोग, राजकीय महिला आयोग, ऑल इंडिया वुमन कॉन्फ्रेंस इत्यादि वे महिला संगठन जो स्व वित्त पोषित होते हुए या CSR या सार्वजनिक निधि से प्राप्त सहायता इत्यादि के सहयोग से महिला सशक्तिकरण हेतु प्रयास कर रहे होंउदाहरण SEWA, आपण समाचार टीवी चैनल है जो महिला संवेदीकरण को प्रोत्साहित करता है, खादी ग्रामोद्योग, रेड रिबन समूह- यह संगठन वंचित महिलाओं हेतु सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है, गुलाबी गैंग – यह संगठन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास को सुनिश्चित करता है। लिज्जत पापड़ ग्रामोद्योग – यह एक स्वयंसहायता के माध्यम से महिलाओं के लिए रोजगार के विकल्प प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। वे महिला संगठन जो सामाजिक उद्यमिता के माध्यम से न केवल स्वयं के लिए नए मार्ग बना रही होती है अपितु साथ ही सामाजिक स्तर पर दृष्टिकोण बदलने में भी सहयोगी होती हैं। महिला संगठन महिलाओं की एक संयुक्त आवाज़ बनकर महिला अधिकारों के लिए प्रयास करते हैं। ये ना केवल महिलाओं से सीधे जुड़कर उनके विकास के लिए कार्य करते हैं बल्कि सरकार पर दबाव बनाकर महिला उन्मुख योजनाओं कार्यक्रमों के संचालन हेतु प्रेरित भी करते हैं।
##Question:महिला सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं।महिला सशक्तिकरण हेतु विभिन्न प्रकार के महिला संगठनों की उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द) What do you understand by women empowerment? Discuss different types of women"s organizations for women empowerment with examples. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में महिला सशक्तिकरण को परिभाषित कीजिये। संक्षिप्त में महिला सशक्तिकरण को स्पष्ट कीजिये महिला सशक्तिकरण हेतु विभिन्न प्रकार के संगठनों की विस्तृत चर्चा कीजिये। निष्कर्ष में इन संगठनों के महत्व को संक्षिप्त में लिख सकते हैं। उत्तर : सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण भी महिलाओं के संदर्भ में उसी क्षमता क्षमता का विकास करना है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो। महिलाओं का यह सशक्तिकरण उनके जीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों में अपेक्षित होता है। इसमें सामाजिक सशक्तिकरण, आर्थिक सशक्तिकरण के साथ साथ राजनैतिक सशक्तिकरण भी शामिल होता है। सामाजिक सशक्तिकरण में महिलाओं की सामाजिक प्रस्थिति में सुधार किया जाता है जिसमें सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता, सुरक्षा स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों में वृद्धि, वेतन समानता द्वारा किया जाता है। राजनैतिक सशक्तिकरण में लोकतान्त्रिक संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में वृद्धि की जाती है। महिला सशक्तिकरण हेतु विभिन्न प्रकार के महिला संगठन महिला संगठनों से तात्पर्य उन सभी संगठनो से है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महिला सशक्तिकरणमें सहयोगी सिद्ध होती है। कमला भसीन के मतानुसार यह महिला संघटन निम्न तीन प्रकार के हो सकते हैं। वे महिला संगठन जो केंद्र या राज्य सरकारों का हिस्सा होते हुए महिला सशक्तिकरण हेतु प्रयासरत हों उदाहरण राष्ट्रीय महिला आयोग, राजकीय महिला आयोग, ऑल इंडिया वुमन कॉन्फ्रेंस इत्यादि वे महिला संगठन जो स्व वित्त पोषित होते हुए या CSR या सार्वजनिक निधि से प्राप्त सहायता इत्यादि के सहयोग से महिला सशक्तिकरण हेतु प्रयास कर रहे होंउदाहरण SEWA, आपण समाचार टीवी चैनल है जो महिला संवेदीकरण को प्रोत्साहित करता है, खादी ग्रामोद्योग, रेड रिबन समूह- यह संगठन वंचित महिलाओं हेतु सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है, गुलाबी गैंग – यह संगठन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास को सुनिश्चित करता है। लिज्जत पापड़ ग्रामोद्योग – यह एक स्वयंसहायता के माध्यम से महिलाओं के लिए रोजगार के विकल्प प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। वे महिला संगठन जो सामाजिक उद्यमिता के माध्यम से न केवल स्वयं के लिए नए मार्ग बना रही होती है अपितु साथ ही सामाजिक स्तर पर दृष्टिकोण बदलने में भी सहयोगी होती हैं। महिला संगठन महिलाओं की एक संयुक्त आवाज़ बनकर महिला अधिकारों के लिए प्रयास करते हैं। ये ना केवल महिलाओं से सीधे जुड़कर उनके विकास के लिए कार्य करते हैं बल्कि सरकार पर दबाव बनाकर महिला उन्मुख योजनाओं कार्यक्रमों के संचालन हेतु प्रेरित भी करते हैं।
50,046
In the backdrop of Covid-19, to what extent formation of human capital is impacted? Discuss with respect to the Human Capital Index Report. (150 words/ 10 marks)
Approach: Intro: Start with the definition of the Human Capital Index Report. Main Body: Discuss the backdrop of Covid-19, to what extent the formation of human capital is impacted with respect to Report data. Conclusion: Conclude accordingly. Answer: The World Bank released the Human Capital Index (HCI) report for 2020. It claims to seek to measure the amount of human capital that a child born today can expect to attain by age 18. The HCI has three components: Survival: as measured by under-5 mortality rates expected years of Quality-Adjusted School: which combines information on the quantity and quality of education. Health and environment: Using two proxies of (a) adult survival rates and (b) the rate of stunting for children under age 5. The 2020 Human Capital Index update includes health and education data for 174 countries covering 98 per cent of the world’s population up to March 2020. It provides a pre-pandemic baseline on the health and education of children, with the biggest strides made in low-income countries. The analysis shows that pre-pandemic, most countries had made steady progress in building the human capital of children, with the biggest strides made in low-income countries. It mentions that despite the progress, and even before the effects of the pandemic, a child born in a typical country could expect to achieve just 56 per cent of their potential human capital, relative to a benchmark of complete education and full health. It mentions that protecting and investing in people is vital as countries work to lay the foundation for sustainable, inclusive recoveries and future growth. Impact of Pandemic- The pandemic puts at risk the decade’s progress in building human capital, including the improvements in health, survival rates, school enrollment, and reduced stunting. The economic impact of the pandemic has been particularly deep for women and for the most disadvantaged families, leaving many vulnerable to food insecurity and poverty. Due to the pandemic’s impact, most children more than 1 billion have been out of school and could lose out, on average, half a year of schooling, adjusted for learning, translating into considerable monetary losses. The data also shows significant disruptions to essential health services for women and children, with many children missing out on crucial vaccinations The impact of COVID-19, on developing countries particularly has been hard and there is the collapse of the formal and informal market, and also there is a very limited social safety net and there is an estimation of a 12 per cent drop in employment. Last year India was ranked 115 out of 157 countries and this year India finds itself at 116th among 174 countries. It mentions that the Human Capital Index provides a basis on which the government of India can prioritize and a dimension to support human capital and given the progress that has been made in recent times, it seems significant for now due to COVID-19. Last year, India had raised “serious reservations” over the Human Capital Index, wherein India was ranked 115 out of 157 countries. Conclusion : In the medium term, better curation and use of administrative, survey, and identification data can guide policy choices in an environment of limited fiscal space and competing priorities. In the longer term, the hope is that economies will be able to do more than simply recover ground lost during the current crisis. Ambitious, evidence-driven policy measures in health, education, and social protection can pave the way for today’s children to surpass the human capital achievements and quality of life of the generations that preceded them.
##Question:In the backdrop of Covid-19, to what extent formation of human capital is impacted? Discuss with respect to the Human Capital Index Report. (150 words/ 10 marks)##Answer:Approach: Intro: Start with the definition of the Human Capital Index Report. Main Body: Discuss the backdrop of Covid-19, to what extent the formation of human capital is impacted with respect to Report data. Conclusion: Conclude accordingly. Answer: The World Bank released the Human Capital Index (HCI) report for 2020. It claims to seek to measure the amount of human capital that a child born today can expect to attain by age 18. The HCI has three components: Survival: as measured by under-5 mortality rates expected years of Quality-Adjusted School: which combines information on the quantity and quality of education. Health and environment: Using two proxies of (a) adult survival rates and (b) the rate of stunting for children under age 5. The 2020 Human Capital Index update includes health and education data for 174 countries covering 98 per cent of the world’s population up to March 2020. It provides a pre-pandemic baseline on the health and education of children, with the biggest strides made in low-income countries. The analysis shows that pre-pandemic, most countries had made steady progress in building the human capital of children, with the biggest strides made in low-income countries. It mentions that despite the progress, and even before the effects of the pandemic, a child born in a typical country could expect to achieve just 56 per cent of their potential human capital, relative to a benchmark of complete education and full health. It mentions that protecting and investing in people is vital as countries work to lay the foundation for sustainable, inclusive recoveries and future growth. Impact of Pandemic- The pandemic puts at risk the decade’s progress in building human capital, including the improvements in health, survival rates, school enrollment, and reduced stunting. The economic impact of the pandemic has been particularly deep for women and for the most disadvantaged families, leaving many vulnerable to food insecurity and poverty. Due to the pandemic’s impact, most children more than 1 billion have been out of school and could lose out, on average, half a year of schooling, adjusted for learning, translating into considerable monetary losses. The data also shows significant disruptions to essential health services for women and children, with many children missing out on crucial vaccinations The impact of COVID-19, on developing countries particularly has been hard and there is the collapse of the formal and informal market, and also there is a very limited social safety net and there is an estimation of a 12 per cent drop in employment. Last year India was ranked 115 out of 157 countries and this year India finds itself at 116th among 174 countries. It mentions that the Human Capital Index provides a basis on which the government of India can prioritize and a dimension to support human capital and given the progress that has been made in recent times, it seems significant for now due to COVID-19. Last year, India had raised “serious reservations” over the Human Capital Index, wherein India was ranked 115 out of 157 countries. Conclusion : In the medium term, better curation and use of administrative, survey, and identification data can guide policy choices in an environment of limited fiscal space and competing priorities. In the longer term, the hope is that economies will be able to do more than simply recover ground lost during the current crisis. Ambitious, evidence-driven policy measures in health, education, and social protection can pave the way for today’s children to surpass the human capital achievements and quality of life of the generations that preceded them.
50,064
तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए, टारनेडो को भी समझाइये | साथ ही तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While expalining the characteristics of Thunderstorm, explain the Tornado as well. Also discuss the geographical distribution of Thunderstorm. (150-200 Words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत तड़ितझंझा के बारे में विस्तार से बत्ताते हुए कीजिये | इसके पश्चात तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए टारनेडो के बारे में भी बताइए | पुनः तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - तड़ितझंझा यह ऐसा स्थानीय तूफ़ान होता है , जिनमे ऊपर की ओर तीव्र वायु धाराएँ चलती हैं | तथा कपासी वर्षा मेघों द्वारा बिजली की चमक एवं गरज के साथ घनघोर जल वर्षा होती है | इसके कारण तेज पवनें चलती हैं और कभी-कभी ओलावृष्टि भी होती है | ऐसे झंझावातों के विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा की अधिकांश मात्रा आरोहण करती हुई आर्द्र वायु में संघनन और संगलन की गुप्त ऊष्मा से प्राप्त होती है | इनका विकास कपासी वर्षा मेघों से होता है | इनमे जब तरल एवं ठोस जल आरोहित वायु की तरंगों द्वारा इतनी ऊँचाई तक पहुंचा दिया जाता है , जहाँ तापमान 20 डिग्री से भी काफी नीचे होता है, तब विद्युत एवं मेघ गर्जन की उत्पत्ति होती है | तड़ित झंझा की विशेषताएं - तड़ित झंझा उष्ण आर्द्र वायु में प्रबल संवहन क्रिया के कारण उत्पन्न होते हैं | जब मेघ अधिक ऊँचाई तक चले जाते हैं, जहाँ तापमान शून्य से कम रहता है, तो इससे ओले बनते हैं और ओलावृष्टि होती है | आर्द्रता कम होने पर ये तड़ितझंझा धुल भरी आंधियां लाते हैं | ये अल्प समय के लिए रहते हैं तथा अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल तक सीमित होते हैं, परन्तु आक्रामक होते हैं | ये इतने छोटे और अल्प समय के लिए रहते हैं कि इनकी भविष्वाणी करना बहुत कठिन होता है | तड़ितझंझा का जीवन चक्र कपासी अवस्था तड़ित झंझा के विकास के चरण में कपासी मेघों का निर्माण होता है तथा उन्हें वायु धाराएँ ऊपर की ओर आरोहित करती हैं | इस चरण के दौरान हलकी बूंदा -बांदी होती है एवं कभी-कभी बिजली चमकती है | परिपक्व अवस्था तड़ित झंझा जन अपने परिपक्व चरण में पहुँचता है तब भी अपड्राफ्ट उसे ऊर्जा उपलब्ध कराता रहता है | इससे वर्षा प्रारम्भ हो जाता है | इस कारण एक डाउनड्राफ्ट उत्पन्न होता है | विघटनकारी अवस्था अंततः भारी मात्रा में वर्षण के कारण डाउनड्राफ्ट द्वारा अपड्राफ्ट को पूर्णतया प्रतिस्थापित कर दिया जाता है | इस प्रकार विघटनकारी चरण प्रारम्भ होता है | धरातल पर गस्ट -फ्रंट एक लम्बी दूरी तय करता है, जिससे तूफ़ान का उस गर्म आर्द्र वायु से समपर्क कट जाता है |, आदि टारनेडो टारनेडों कीपाकार वाले प्रचंड स्थानीय एवं अल्पावधि के तूफ़ान होते हैं | ये अत्यंत भयावह एवं उग्र रूप से घूर्णन करती वायु के स्तम्भ होते हैं जिनका ऊपरी भाग कपासी वर्षा मेघों द्वारा आवृत होता है | ये बादल कीप की आकृति में विस्तृत होते हैं, इनका व्यास निचले भाग में 90-460 मीटर तक हो सकता है | ये कीपाकार कपासी वर्षा मेघ धरातलीय सतह से वायु के पाइपनुमा पतले स्तम्भ द्वारा संबंद्ध होते हैं | सागर पर होने वाले टारनेडों कोजलस्तम्भकहते हैं | टारनेडों की विशेषताएं - इसके केंद्र में अत्यंत न्यून वायुदाब होता है | वायु का वेग वायुदाब प्रवणता की तीव्रता पर निर्भर करता है | टारनेड़ो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं | ये बहुत संकरे मार्ग से आगे बढ़ते हैं तथा अपने मार्ग में बड़े पैमाने पर विनाश के कारण बनते हैं | आदि तड़ितझंझा का भौगोलिक वितरण विषुवत रेखा के निकटवर्ती उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में तड़ित झंझा की उत्पत्ति हेतु आदर्श दशाएं पायी जाती हैं | अयनवर्ती देशों में स्थल भाग के ऊपर आने वाले ऐसे तूफ़ान वर्षा ऋतु में दिन के तीसरे पहर तथा संध्याकाल में उत्पन्न होते हैं | मानसूनी जलवायु वाले प्रदेशों में ग्रीष्मकालीन मानसून के प्रारम्भ तथा अंत में तड़ितझंझा की उत्पत्ति होती है | दोनों गोलार्धों में 60 डिग्री अक्षांश से ध्रुवों की ओर तड़ितझंझा की उत्पत्ति बहुत कम होती है |
##Question:तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए, टारनेडो को भी समझाइये | साथ ही तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While expalining the characteristics of Thunderstorm, explain the Tornado as well. Also discuss the geographical distribution of Thunderstorm. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत तड़ितझंझा के बारे में विस्तार से बत्ताते हुए कीजिये | इसके पश्चात तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए टारनेडो के बारे में भी बताइए | पुनः तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - तड़ितझंझा यह ऐसा स्थानीय तूफ़ान होता है , जिनमे ऊपर की ओर तीव्र वायु धाराएँ चलती हैं | तथा कपासी वर्षा मेघों द्वारा बिजली की चमक एवं गरज के साथ घनघोर जल वर्षा होती है | इसके कारण तेज पवनें चलती हैं और कभी-कभी ओलावृष्टि भी होती है | ऐसे झंझावातों के विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा की अधिकांश मात्रा आरोहण करती हुई आर्द्र वायु में संघनन और संगलन की गुप्त ऊष्मा से प्राप्त होती है | इनका विकास कपासी वर्षा मेघों से होता है | इनमे जब तरल एवं ठोस जल आरोहित वायु की तरंगों द्वारा इतनी ऊँचाई तक पहुंचा दिया जाता है , जहाँ तापमान 20 डिग्री से भी काफी नीचे होता है, तब विद्युत एवं मेघ गर्जन की उत्पत्ति होती है | तड़ित झंझा की विशेषताएं - तड़ित झंझा उष्ण आर्द्र वायु में प्रबल संवहन क्रिया के कारण उत्पन्न होते हैं | जब मेघ अधिक ऊँचाई तक चले जाते हैं, जहाँ तापमान शून्य से कम रहता है, तो इससे ओले बनते हैं और ओलावृष्टि होती है | आर्द्रता कम होने पर ये तड़ितझंझा धुल भरी आंधियां लाते हैं | ये अल्प समय के लिए रहते हैं तथा अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल तक सीमित होते हैं, परन्तु आक्रामक होते हैं | ये इतने छोटे और अल्प समय के लिए रहते हैं कि इनकी भविष्वाणी करना बहुत कठिन होता है | तड़ितझंझा का जीवन चक्र कपासी अवस्था तड़ित झंझा के विकास के चरण में कपासी मेघों का निर्माण होता है तथा उन्हें वायु धाराएँ ऊपर की ओर आरोहित करती हैं | इस चरण के दौरान हलकी बूंदा -बांदी होती है एवं कभी-कभी बिजली चमकती है | परिपक्व अवस्था तड़ित झंझा जन अपने परिपक्व चरण में पहुँचता है तब भी अपड्राफ्ट उसे ऊर्जा उपलब्ध कराता रहता है | इससे वर्षा प्रारम्भ हो जाता है | इस कारण एक डाउनड्राफ्ट उत्पन्न होता है | विघटनकारी अवस्था अंततः भारी मात्रा में वर्षण के कारण डाउनड्राफ्ट द्वारा अपड्राफ्ट को पूर्णतया प्रतिस्थापित कर दिया जाता है | इस प्रकार विघटनकारी चरण प्रारम्भ होता है | धरातल पर गस्ट -फ्रंट एक लम्बी दूरी तय करता है, जिससे तूफ़ान का उस गर्म आर्द्र वायु से समपर्क कट जाता है |, आदि टारनेडो टारनेडों कीपाकार वाले प्रचंड स्थानीय एवं अल्पावधि के तूफ़ान होते हैं | ये अत्यंत भयावह एवं उग्र रूप से घूर्णन करती वायु के स्तम्भ होते हैं जिनका ऊपरी भाग कपासी वर्षा मेघों द्वारा आवृत होता है | ये बादल कीप की आकृति में विस्तृत होते हैं, इनका व्यास निचले भाग में 90-460 मीटर तक हो सकता है | ये कीपाकार कपासी वर्षा मेघ धरातलीय सतह से वायु के पाइपनुमा पतले स्तम्भ द्वारा संबंद्ध होते हैं | सागर पर होने वाले टारनेडों कोजलस्तम्भकहते हैं | टारनेडों की विशेषताएं - इसके केंद्र में अत्यंत न्यून वायुदाब होता है | वायु का वेग वायुदाब प्रवणता की तीव्रता पर निर्भर करता है | टारनेड़ो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं | ये बहुत संकरे मार्ग से आगे बढ़ते हैं तथा अपने मार्ग में बड़े पैमाने पर विनाश के कारण बनते हैं | आदि तड़ितझंझा का भौगोलिक वितरण विषुवत रेखा के निकटवर्ती उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में तड़ित झंझा की उत्पत्ति हेतु आदर्श दशाएं पायी जाती हैं | अयनवर्ती देशों में स्थल भाग के ऊपर आने वाले ऐसे तूफ़ान वर्षा ऋतु में दिन के तीसरे पहर तथा संध्याकाल में उत्पन्न होते हैं | मानसूनी जलवायु वाले प्रदेशों में ग्रीष्मकालीन मानसून के प्रारम्भ तथा अंत में तड़ितझंझा की उत्पत्ति होती है | दोनों गोलार्धों में 60 डिग्री अक्षांश से ध्रुवों की ओर तड़ितझंझा की उत्पत्ति बहुत कम होती है |
50,065
भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के संस्थापक के रूप में क्लाइव की भूमिका का परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक) Examine Clive"s role as the founder of the British Empire in India. (150-200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण : क्लाइव का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के संदर्भ में क्लाइव की भूमिका की चर्चा कीजिए । परवर्ती काल में भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के संदर्भ में क्लाइव के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : क्लाइव ईस्ट इंडिया कंपनी में एक क्लर्क के रूप में भारत आया था तथा अपनी प्रतिभा के दम पर भारत में ब्रिटिश गवर्नर के पद तक पहुंचने में सफल रहा । यधपि क्लाइव के काल में भारत में साम्राज्य निर्माण की ब्रिटिश नीति का कोई स्पष्ट प्रमाण या योजना प्राप्त नहीं होता है तथापि अपने कार्यों से क्लाइव ने कुछ ऐसे मार्ग उद्घाटित किये जो परवर्ती काल में भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना व विकास के लिए नींव सिद्ध हुए । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के संदर्भ में क्लाइव की भूमिका को हम निम्नलिखीत रूपों में देख सकते हैं : द्वितीय कर्नाटक युद्ध के दौरान जब अंग्रेजों की स्थिति गंभीर थी । क्लाइव के नेतृत्व में आर्कट पर अंग्रेजी सेना ने घेर डाला और आर्काट के सफलता पूर्वक घेरे से उसने जटिल परिस्थितियों में युद्ध का पलड़ा फ़्रांसीसियों से अंग्रेजों के पक्ष में सुनिश्चित कर दिया । यह अंग्रेजों की एक बड़ी बढ़त थी और इसने क्लाइव की धाक पूरे यूरोप जमा दी । बंगाल पर अंग्रेजों की सफलता का श्रेय क्लाइव को ही जाता है । प्लासी से पूर्व ही उसने अपने कूटनीतिक षड्यंत्रों से नवाब को अलग-थलग कर दिया था और प्लासी की विजय ने बंगाल के रूप अंग्रेजों को एक ऐसा मजबूत भारतीय आधार उपलब्ध करवाया जिस पर विशाल ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की स्थापना की जा सकी । आगे बक्सर के युद्ध के बाद पुनः क्लाइव को बुलाया गया और इलाहाबाद की संधि के द्वारा उसने अपनी कूटनीतिक श्रेष्टता का परिचय दिया । यह वह दौर था जब अंग्रेज स्पष्ट रूप में बंगाल व अवध की सत्ता नहीं चाहते थे क्योंकि इसके कई नकारात्मक परिणाम संभव थे । ऐसे में क्लाइव ने बड़ी सूझबूझ से अप्रत्यक्ष नियंत्रण के माध्यम से अंग्रेजों की समस्या का समाधान कर दिया । इसके अतिरिक्त क्लाइव ने कुछ ऐसी विधियाँ भी ढूंढ निकाली जिसका परवर्ती काल के ब्रिटिश प्रशासकों ने भरपूर इस्तेमाल करते हुए ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूती प्रदान की , जैसे- : क्लाइव भारतीय राज्यों की आंतरिक संघर्ष व फूट का भरपूर लाभ उठाना जानता था । आगे के लगभग सभी ब्रिटिश प्रशासकों ने इस नीति का अनुसरण करते हुए साम्राज्य विस्तार किया । बंगाल की दीवानी प्राप्त कर उसने कंपनी के निवेश की समस्या का समाधान कर दिया । आगे वेलेजली की सहायक संधि में हम क्लाइव की इन्ही नीतियों का विस्तारित स्वरूप देखते हैं । क्लाइव ने इस बात को भी उद्घाटित किया कि यदि भारतीय सैनिकों को यूरोपीय तर्ज पर प्रशिक्षण दिया जाए तो वे भी यूरोपीय सैनिकों की तरह ही प्रदर्शन करने में सक्षम हैं । इतना ही नहीं इन भारतीय सैनिकों में राष्ट्रवाद जैसी कोई भावना उस काल में विकसित नहीं हुई थी । अतः अच्छे वेतन व सुविधाओं पर ये सैनिक अंग्रेजों के वफादार बने रहते । भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना व विस्तार में इस समझ व इसके अनुरूप बनी नीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह किया । इस प्रकार हम देखते हैं कि क्लाइव ने उन विधियों व सूत्रों को खोज निकाला जिस पर भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य का निर्माण हुआ ।
##Question:भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के संस्थापक के रूप में क्लाइव की भूमिका का परीक्षण कीजिए । ( 150-200 शब्द/10 अंक) Examine Clive"s role as the founder of the British Empire in India. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : क्लाइव का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के संदर्भ में क्लाइव की भूमिका की चर्चा कीजिए । परवर्ती काल में भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के संदर्भ में क्लाइव के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : क्लाइव ईस्ट इंडिया कंपनी में एक क्लर्क के रूप में भारत आया था तथा अपनी प्रतिभा के दम पर भारत में ब्रिटिश गवर्नर के पद तक पहुंचने में सफल रहा । यधपि क्लाइव के काल में भारत में साम्राज्य निर्माण की ब्रिटिश नीति का कोई स्पष्ट प्रमाण या योजना प्राप्त नहीं होता है तथापि अपने कार्यों से क्लाइव ने कुछ ऐसे मार्ग उद्घाटित किये जो परवर्ती काल में भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना व विकास के लिए नींव सिद्ध हुए । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के संदर्भ में क्लाइव की भूमिका को हम निम्नलिखीत रूपों में देख सकते हैं : द्वितीय कर्नाटक युद्ध के दौरान जब अंग्रेजों की स्थिति गंभीर थी । क्लाइव के नेतृत्व में आर्कट पर अंग्रेजी सेना ने घेर डाला और आर्काट के सफलता पूर्वक घेरे से उसने जटिल परिस्थितियों में युद्ध का पलड़ा फ़्रांसीसियों से अंग्रेजों के पक्ष में सुनिश्चित कर दिया । यह अंग्रेजों की एक बड़ी बढ़त थी और इसने क्लाइव की धाक पूरे यूरोप जमा दी । बंगाल पर अंग्रेजों की सफलता का श्रेय क्लाइव को ही जाता है । प्लासी से पूर्व ही उसने अपने कूटनीतिक षड्यंत्रों से नवाब को अलग-थलग कर दिया था और प्लासी की विजय ने बंगाल के रूप अंग्रेजों को एक ऐसा मजबूत भारतीय आधार उपलब्ध करवाया जिस पर विशाल ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की स्थापना की जा सकी । आगे बक्सर के युद्ध के बाद पुनः क्लाइव को बुलाया गया और इलाहाबाद की संधि के द्वारा उसने अपनी कूटनीतिक श्रेष्टता का परिचय दिया । यह वह दौर था जब अंग्रेज स्पष्ट रूप में बंगाल व अवध की सत्ता नहीं चाहते थे क्योंकि इसके कई नकारात्मक परिणाम संभव थे । ऐसे में क्लाइव ने बड़ी सूझबूझ से अप्रत्यक्ष नियंत्रण के माध्यम से अंग्रेजों की समस्या का समाधान कर दिया । इसके अतिरिक्त क्लाइव ने कुछ ऐसी विधियाँ भी ढूंढ निकाली जिसका परवर्ती काल के ब्रिटिश प्रशासकों ने भरपूर इस्तेमाल करते हुए ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूती प्रदान की , जैसे- : क्लाइव भारतीय राज्यों की आंतरिक संघर्ष व फूट का भरपूर लाभ उठाना जानता था । आगे के लगभग सभी ब्रिटिश प्रशासकों ने इस नीति का अनुसरण करते हुए साम्राज्य विस्तार किया । बंगाल की दीवानी प्राप्त कर उसने कंपनी के निवेश की समस्या का समाधान कर दिया । आगे वेलेजली की सहायक संधि में हम क्लाइव की इन्ही नीतियों का विस्तारित स्वरूप देखते हैं । क्लाइव ने इस बात को भी उद्घाटित किया कि यदि भारतीय सैनिकों को यूरोपीय तर्ज पर प्रशिक्षण दिया जाए तो वे भी यूरोपीय सैनिकों की तरह ही प्रदर्शन करने में सक्षम हैं । इतना ही नहीं इन भारतीय सैनिकों में राष्ट्रवाद जैसी कोई भावना उस काल में विकसित नहीं हुई थी । अतः अच्छे वेतन व सुविधाओं पर ये सैनिक अंग्रेजों के वफादार बने रहते । भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना व विस्तार में इस समझ व इसके अनुरूप बनी नीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह किया । इस प्रकार हम देखते हैं कि क्लाइव ने उन विधियों व सूत्रों को खोज निकाला जिस पर भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य का निर्माण हुआ ।
50,066
तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए, टारनेडो को भी समझाइये। साथ ही तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण की भी चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) While expalining the characteristics of Thunderstorm, explain the Tornado as well. Also discuss the geographical distribution of Thunderstorm. (150-200 Words/ 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत तड़ितझंझा के बारे में विस्तार से बत्ताते हुए कीजिये | इसके पश्चात तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए टारनेडो के बारे में भी बताइए | पुनः तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - तड़ितझंझा यह ऐसा स्थानीय तूफ़ान होता है , जिनमे ऊपर की ओर तीव्र वायु धाराएँ चलती हैं | तथा कपासी वर्षा मेघों द्वारा बिजली की चमक एवं गरज के साथ घनघोर जल वर्षा होती है | इसके कारण तेज पवनें चलती हैं और कभी-कभी ओलावृष्टि भी होती है | ऐसे झंझावातों के विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा की अधिकांश मात्रा आरोहण करती हुई आर्द्र वायु में संघनन और संगलन की गुप्त ऊष्मा से प्राप्त होती है | इनका विकास कपासी वर्षा मेघों से होता है | इनमे जब तरल एवं ठोस जल आरोहित वायु की तरंगों द्वारा इतनी ऊँचाई तक पहुंचा दिया जाता है , जहाँ तापमान 20 डिग्री से भी काफी नीचे होता है, तब विद्युत एवं मेघ गर्जन की उत्पत्ति होती है | तड़ित झंझा की विशेषताएं - तड़ित झंझा उष्ण आर्द्र वायु में प्रबल संवहन क्रिया के कारण उत्पन्न होते हैं | जब मेघ अधिक ऊँचाई तक चले जाते हैं, जहाँ तापमान शून्य से कम रहता है, तो इससे ओले बनते हैं और ओलावृष्टि होती है | आर्द्रता कम होने पर ये तड़ितझंझा धुल भरी आंधियां लाते हैं | ये अल्प समय के लिए रहते हैं तथा अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल तक सीमित होते हैं, परन्तु आक्रामक होते हैं | ये इतने छोटे और अल्प समय के लिए रहते हैं कि इनकी भविष्वाणी करना बहुत कठिन होता है | तड़ितझंझा का जीवन चक्र कपासी अवस्था तड़ित झंझा के विकास के चरण में कपासी मेघों का निर्माण होता है तथा उन्हें वायु धाराएँ ऊपर की ओर आरोहित करती हैं | इस चरण के दौरान हलकी बूंदा -बांदी होती है एवं कभी-कभी बिजली चमकती है | परिपक्व अवस्था तड़ित झंझा जन अपने परिपक्व चरण में पहुँचता है तब भी अपड्राफ्ट उसे ऊर्जा उपलब्ध कराता रहता है | इससे वर्षा प्रारम्भ हो जाता है | इस कारण एक डाउनड्राफ्ट उत्पन्न होता है | विघटनकारी अवस्था अंततः भारी मात्रा में वर्षण के कारण डाउनड्राफ्ट द्वारा अपड्राफ्ट को पूर्णतया प्रतिस्थापित कर दिया जाता है | इस प्रकार विघटनकारी चरण प्रारम्भ होता है | धरातल पर गस्ट -फ्रंट एक लम्बी दूरी तय करता है, जिससे तूफ़ान का उस गर्म आर्द्र वायु से संपर्क कट जाता है, आदि टारनेडो टारनेडों कीपाकार वाले प्रचंड स्थानीय एवं अल्पावधि के तूफ़ान होते हैं | ये अत्यंत भयावह एवं उग्र रूप से घूर्णन करती वायु के स्तम्भ होते हैं जिनका ऊपरी भाग कपासी वर्षा मेघों द्वारा आवृत होता है | ये बादल कीप की आकृति में विस्तृत होते हैं, इनका व्यास निचले भाग में 90-460 मीटर तक हो सकता है | ये कीपाकार कपासी वर्षा मेघ धरातलीय सतह से वायु के पाइपनुमा पतले स्तम्भ द्वारा संबंद्ध होते हैं | सागर पर होने वाले टारनेडों कोजलस्तम्भकहते हैं | टारनेडों की विशेषताएं - इसके केंद्र में अत्यंत न्यून वायुदाब होता है | वायु का वेग वायुदाब प्रवणता की तीव्रता पर निर्भर करता है | टारनेड़ो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं | ये बहुत संकरे मार्ग से आगे बढ़ते हैं तथा अपने मार्ग में बड़े पैमाने पर विनाश के कारण बनते हैं | आदि तड़ितझंझा का भौगोलिक वितरण विषुवत रेखा के निकटवर्ती उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में तड़ित झंझा की उत्पत्ति हेतु आदर्श दशाएं पायी जाती हैं | अयनवर्ती देशों में स्थल भाग के ऊपर आने वाले ऐसे तूफ़ान वर्षा ऋतु में दिन के तीसरे पहर तथा संध्याकाल में उत्पन्न होते हैं | मानसूनी जलवायु वाले प्रदेशों में ग्रीष्मकालीन मानसून के प्रारम्भ तथा अंत में तड़ितझंझा की उत्पत्ति होती है | दोनों गोलार्धों में 60 डिग्री अक्षांश से ध्रुवों की ओर तड़ितझंझा की उत्पत्ति बहुत कम होती है |
##Question:तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए, टारनेडो को भी समझाइये। साथ ही तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण की भी चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द/ 10 अंक) While expalining the characteristics of Thunderstorm, explain the Tornado as well. Also discuss the geographical distribution of Thunderstorm. (150-200 Words/ 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत तड़ितझंझा के बारे में विस्तार से बत्ताते हुए कीजिये | इसके पश्चात तड़ितझंझा की विशेषताओं को बताते हुए टारनेडो के बारे में भी बताइए | पुनः तड़ितझंझा के भौगोलिक वितरण को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - तड़ितझंझा यह ऐसा स्थानीय तूफ़ान होता है , जिनमे ऊपर की ओर तीव्र वायु धाराएँ चलती हैं | तथा कपासी वर्षा मेघों द्वारा बिजली की चमक एवं गरज के साथ घनघोर जल वर्षा होती है | इसके कारण तेज पवनें चलती हैं और कभी-कभी ओलावृष्टि भी होती है | ऐसे झंझावातों के विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा की अधिकांश मात्रा आरोहण करती हुई आर्द्र वायु में संघनन और संगलन की गुप्त ऊष्मा से प्राप्त होती है | इनका विकास कपासी वर्षा मेघों से होता है | इनमे जब तरल एवं ठोस जल आरोहित वायु की तरंगों द्वारा इतनी ऊँचाई तक पहुंचा दिया जाता है , जहाँ तापमान 20 डिग्री से भी काफी नीचे होता है, तब विद्युत एवं मेघ गर्जन की उत्पत्ति होती है | तड़ित झंझा की विशेषताएं - तड़ित झंझा उष्ण आर्द्र वायु में प्रबल संवहन क्रिया के कारण उत्पन्न होते हैं | जब मेघ अधिक ऊँचाई तक चले जाते हैं, जहाँ तापमान शून्य से कम रहता है, तो इससे ओले बनते हैं और ओलावृष्टि होती है | आर्द्रता कम होने पर ये तड़ितझंझा धुल भरी आंधियां लाते हैं | ये अल्प समय के लिए रहते हैं तथा अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल तक सीमित होते हैं, परन्तु आक्रामक होते हैं | ये इतने छोटे और अल्प समय के लिए रहते हैं कि इनकी भविष्वाणी करना बहुत कठिन होता है | तड़ितझंझा का जीवन चक्र कपासी अवस्था तड़ित झंझा के विकास के चरण में कपासी मेघों का निर्माण होता है तथा उन्हें वायु धाराएँ ऊपर की ओर आरोहित करती हैं | इस चरण के दौरान हलकी बूंदा -बांदी होती है एवं कभी-कभी बिजली चमकती है | परिपक्व अवस्था तड़ित झंझा जन अपने परिपक्व चरण में पहुँचता है तब भी अपड्राफ्ट उसे ऊर्जा उपलब्ध कराता रहता है | इससे वर्षा प्रारम्भ हो जाता है | इस कारण एक डाउनड्राफ्ट उत्पन्न होता है | विघटनकारी अवस्था अंततः भारी मात्रा में वर्षण के कारण डाउनड्राफ्ट द्वारा अपड्राफ्ट को पूर्णतया प्रतिस्थापित कर दिया जाता है | इस प्रकार विघटनकारी चरण प्रारम्भ होता है | धरातल पर गस्ट -फ्रंट एक लम्बी दूरी तय करता है, जिससे तूफ़ान का उस गर्म आर्द्र वायु से संपर्क कट जाता है, आदि टारनेडो टारनेडों कीपाकार वाले प्रचंड स्थानीय एवं अल्पावधि के तूफ़ान होते हैं | ये अत्यंत भयावह एवं उग्र रूप से घूर्णन करती वायु के स्तम्भ होते हैं जिनका ऊपरी भाग कपासी वर्षा मेघों द्वारा आवृत होता है | ये बादल कीप की आकृति में विस्तृत होते हैं, इनका व्यास निचले भाग में 90-460 मीटर तक हो सकता है | ये कीपाकार कपासी वर्षा मेघ धरातलीय सतह से वायु के पाइपनुमा पतले स्तम्भ द्वारा संबंद्ध होते हैं | सागर पर होने वाले टारनेडों कोजलस्तम्भकहते हैं | टारनेडों की विशेषताएं - इसके केंद्र में अत्यंत न्यून वायुदाब होता है | वायु का वेग वायुदाब प्रवणता की तीव्रता पर निर्भर करता है | टारनेड़ो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं | ये बहुत संकरे मार्ग से आगे बढ़ते हैं तथा अपने मार्ग में बड़े पैमाने पर विनाश के कारण बनते हैं | आदि तड़ितझंझा का भौगोलिक वितरण विषुवत रेखा के निकटवर्ती उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में तड़ित झंझा की उत्पत्ति हेतु आदर्श दशाएं पायी जाती हैं | अयनवर्ती देशों में स्थल भाग के ऊपर आने वाले ऐसे तूफ़ान वर्षा ऋतु में दिन के तीसरे पहर तथा संध्याकाल में उत्पन्न होते हैं | मानसूनी जलवायु वाले प्रदेशों में ग्रीष्मकालीन मानसून के प्रारम्भ तथा अंत में तड़ितझंझा की उत्पत्ति होती है | दोनों गोलार्धों में 60 डिग्री अक्षांश से ध्रुवों की ओर तड़ितझंझा की उत्पत्ति बहुत कम होती है |
50,067
Describe the drainage classification. Elucidate River Indus with its course and tributaries. (150 words)
APPROACH - -In the introduction, you can briefly define drainage - Then explainthe classification based on origin, size of catchment or orientation (anyone would suffice). - Mention the course of the river Indus and its left bank and right bank tributariesseparately. Add a map diagram to substantiate. ANSWER - Drainage is defined as the natural flow of water. DRAINAGE CLASSIFICATION ON THE BASIS OF ORIGIN HIMALAYAN- Indus, Ganga Brahmaputra- their tributaries PENINSULAR- Krishna Godavari Kaveri - their tributaries; Luni, Narmada, Tapi are some west-flowing rivers; some tributaries of Ganga- Chambal, Betwa, Son, Ken ON THE BASIS OF CATCHMENT - the size of catchment/watershed Major river basins -14, 85% of water flow-area more than 20,000 sq km- Indus, Ganga Brahmaputra, Godavari, Krishna, Kaveri Medium river basins -2000 - 20,000 sq km, 7% of total runoff Minor river basins- less than 2,000 sq km, 8% total water runoff ON THE BASIS OF DESTINATION/ ORIENTATION TO THE SEA/ DISCHARGE OF WATER BAY OF BENGAL DRAINAGE -75-77% water moves east of national water divide ARABIAN DRAINAGE -23 % move towards the Arabian Sea INLAND DRAINAGE- do not reach oceans; Example- Luni, Ghagghar INDUS RIVER(SINGHI KHAMBAN- Lion"s mouth; Sindhu) Starts in Tibetan region- Kailash Range near Mansarovar lake, glaciers around Bokhar Chu, flows north-west up to Nanga Parbat Right bank tributaries - In Himalayas-Shyok, Nubrais tributary to Shyok; Shigar; Gilgit, Hunza- a tributary of Gilgit (Gilgit- Baltistan). In Pakistan-Kabul, Khurram, Tochi, Gomal, Sangar, Vibra Left bank tributaries -Zaskar (Tso Moriri lake, Leh, Pangong Tso); Kharche; Dras; Sind; Lidar (Origin- Verinag spring- Pir Panjal) Five main tributaries in Punjab Jhelum (Dal lake in Srinagar, Wular lake, Kishan Ganga river); tributaries- Neelam, Kishanganga HEP, Punch Chandra (Chandra Taal- Spiti valley); Bhaga (Surya Taal-Lahaul valley) in Himachal- Chandra-Bhaga- Chenab (Salal HEP, Tavi-tributary, Jammu) Ravi( Kullu hills, Ranjit Sagar HEP) Beas- Beas Kund- lake near Rohtang, Pando dam, Pong dam, Harike barrage ( small storage system to divert water), Indira Gandhi canal diverts water towards Rajasthan- agriculturally productive Satluj (Mansarovar, Rakas lake, Shipki la pass created enters India, high flow cut through the Himalayas, gorges, meets Beas at Harike In Pakistan, Panchanad(water from all 5 major rivers)- Chenab and Satluj join to meet Indus The river finally drains into the Arabian sea The student can substantiate his answer with a relevant map diagram
##Question:Describe the drainage classification. Elucidate River Indus with its course and tributaries. (150 words)##Answer:APPROACH - -In the introduction, you can briefly define drainage - Then explainthe classification based on origin, size of catchment or orientation (anyone would suffice). - Mention the course of the river Indus and its left bank and right bank tributariesseparately. Add a map diagram to substantiate. ANSWER - Drainage is defined as the natural flow of water. DRAINAGE CLASSIFICATION ON THE BASIS OF ORIGIN HIMALAYAN- Indus, Ganga Brahmaputra- their tributaries PENINSULAR- Krishna Godavari Kaveri - their tributaries; Luni, Narmada, Tapi are some west-flowing rivers; some tributaries of Ganga- Chambal, Betwa, Son, Ken ON THE BASIS OF CATCHMENT - the size of catchment/watershed Major river basins -14, 85% of water flow-area more than 20,000 sq km- Indus, Ganga Brahmaputra, Godavari, Krishna, Kaveri Medium river basins -2000 - 20,000 sq km, 7% of total runoff Minor river basins- less than 2,000 sq km, 8% total water runoff ON THE BASIS OF DESTINATION/ ORIENTATION TO THE SEA/ DISCHARGE OF WATER BAY OF BENGAL DRAINAGE -75-77% water moves east of national water divide ARABIAN DRAINAGE -23 % move towards the Arabian Sea INLAND DRAINAGE- do not reach oceans; Example- Luni, Ghagghar INDUS RIVER(SINGHI KHAMBAN- Lion"s mouth; Sindhu) Starts in Tibetan region- Kailash Range near Mansarovar lake, glaciers around Bokhar Chu, flows north-west up to Nanga Parbat Right bank tributaries - In Himalayas-Shyok, Nubrais tributary to Shyok; Shigar; Gilgit, Hunza- a tributary of Gilgit (Gilgit- Baltistan). In Pakistan-Kabul, Khurram, Tochi, Gomal, Sangar, Vibra Left bank tributaries -Zaskar (Tso Moriri lake, Leh, Pangong Tso); Kharche; Dras; Sind; Lidar (Origin- Verinag spring- Pir Panjal) Five main tributaries in Punjab Jhelum (Dal lake in Srinagar, Wular lake, Kishan Ganga river); tributaries- Neelam, Kishanganga HEP, Punch Chandra (Chandra Taal- Spiti valley); Bhaga (Surya Taal-Lahaul valley) in Himachal- Chandra-Bhaga- Chenab (Salal HEP, Tavi-tributary, Jammu) Ravi( Kullu hills, Ranjit Sagar HEP) Beas- Beas Kund- lake near Rohtang, Pando dam, Pong dam, Harike barrage ( small storage system to divert water), Indira Gandhi canal diverts water towards Rajasthan- agriculturally productive Satluj (Mansarovar, Rakas lake, Shipki la pass created enters India, high flow cut through the Himalayas, gorges, meets Beas at Harike In Pakistan, Panchanad(water from all 5 major rivers)- Chenab and Satluj join to meet Indus The river finally drains into the Arabian sea The student can substantiate his answer with a relevant map diagram
50,068
आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास में अंतर स्पष्ट करते हुए समावेशी विकास के घटकों की विस्तार से चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explaining the difference between economic development and inclusive growth, discuss the components of inclusive development in detail. (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में विकास एवं आर्थिक संवृद्धि का स्पष्टीकरण कीजिये 2- प्रथम भाग में आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास को परिभाषित कीजिये 3- दुसरे भाग में दोनों में अंतर स्पष्ट करते हुए समावेशी विकास के घटकों को बताएं 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विकास को परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाता है| सामान्यतः इसे सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है| विकास में परिमाणात्मक परिवर्तनों के स्थान पर गुणात्मक परिवर्तनों पर बल दिया जाता है| आर्थिक संवृद्धि एवं विकास में एक मूलभूत अंतर होता है| आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है| सामान्य तौर पर यदि किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो कहा जाता है कि उस देश में आर्थिक संवृद्धि हो रही है| यह विकास का परिमाणात्मक अथवा मात्रात्मक पहलू है| आर्थिक विकास इससे व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास की परिभाषा आर्थिक विकास, आर्थिक संवृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है|आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| इससे अलग समावेशी विकास एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक अवधारणा है जो एक ही साथ उद्देश्य एवं प्रक्रिया दोनों है| समावेशी विकास की परिभाषा UNDP के अनुसार, समावेशी विकास एक प्रक्रिया(माध्यम) एवं एक आउटकम (परिणाम/उद्देश्य) है जिसमें समाज के सभी वर्गों की आर्थिक संरचना में भागीदारी हो एवं वे इस भागीदारी के कारण समतुल्य रूप से लाभान्वित हों| दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों का सृजन करे बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग एवं व्यक्ति की इन सृजित अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित करे और सामान रूप से लाभ पहुचाये|वस्तुपरक दृष्टि से समावेशी विकास उस स्थिति को स्पष्ट करता है जहाँ सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर के रूप में परिवर्तित हो जाए तथा आय एवं धन के वितरण की असमानताओं में कमी आये |अतः समावेशी विकास एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक अवधारणा है जो एक ही साथ उद्देश्य एवं प्रक्रिया दोनों है| आर्थिक विकास एवंसमावेशी विकासमें अंतर आर्थिक विकास एक उद्देश्य/साध्य है जबकिसमावेशी विकास एक माध्यम एवं परिणाम(उद्देश्य) है आर्थिक विकास वस्तुतः कल्याण है जबकि भागीदारी के माध्यम से सुनिश्चित कल्याण समावेशी विकास है कल्याण भुगतान, सब्सिडी आदि पुनर्वितरण उपायों से आर्थिक विकास होगा किन्तु भागीदारी न होने के कारण इससे समावेशी विकास नहीं होगा| समावेशी विकास के लिए लोगों की क्षमता बढ़ा कर उन्हें रोजगार देना होगा ताकि वे आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी कर सकें| समावेशी विकास निम्नलिखित घटकों से सुनिश्चित होता है क्षमता संवर्धन अर्थात रोजगार योग्य बनाना प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने से व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| इससे व्यक्ति उपलब्ध अवसरों तक अपनी पहुँच सुनिश्चित कर पाता है| सभी की समान अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित होने से व्याक्ति आर्थिक प्रक्रियाओं में अपना योगदान देने सक्षम हो पाता है| शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं/ सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुँच से कौशल युक्त एवं स्वस्थ मानव संसाधन का विकास होता है| इस प्रकार व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| क्षमता संवर्धन अर्थव्यवस्था में उसकी भागीदारी की प्रायिकता को बढाता है महिला सशक्तिकरण से महिलायें सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी बढ़ती है जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है|इसी प्रकार स्वच्छ वातावरण स्वस्थ मानव संसाधन के विकास में सहायक होता है जिससे नागरिकों की क्षमता में सुधार आता है और वे अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका का बेहतर निष्पादन करने में सक्षम हो पाते हैं इससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है| रोजगार सृजन के उपाय अर्थव्यवस्था में निवेश वृद्धि से रोजगार सृजन में सहायता मिलती है| अधिक रोजगार सृजन अधिक लोगों को रोजगारयुक्त बनाएगा जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी|जैसे भारत सरकार ने विविध क्षेत्रकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा कर निवेश में वृद्धि के प्रयास किये हैं| सूक्ष्म, लघु एवं माध्यम उद्योग अधिकतम रोजगार सृजन करते हैं| इससे समावेशी विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है| अतः MSME को प्रोत्साहन देना समावेशी विकास की दिशा में उठाया गया कदम होगा| प्रायः उद्यमियों के समक्ष अनेकों बाधाओं की उपस्थिति उनकी उद्यमिता को बाधित करती है| इससे संवृद्धि, विकास और रोजगार सृजन पर प्रभाव पड़ता है| इसके परिणामस्वरुप समावेशी विकास बाधित होता है| अतः समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए उद्यमिता प्रोत्साहन आवश्यक होता है| जैसे स्टैंडअप इंडिया एवं स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम| पूँजीगहन विकास मॉडल ऑटोमेशन को प्रोत्साहित करता है| ऑटोमेशन रोजगार सृजन को बाधित करता है| अतः पर्याप्त रोजगार सृजन करने के लिए श्रम गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| जैसे कपडा उद्योग, कृषि, चमड़ा उद्योग, बागवानी आदि| इसके अतिरिक्त सरकार को निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसे मनरेगा आदि योजनायें समावेशी विकास को सुनिश्चित करने में प्रभावशाली भूमिका निभाती हैं| चूँकि समावेशी विकास न केवल समाज के सभी व्यक्तियों के विकास को सुनिश्चित करता है बल्कि यह अधिक प्रभावी एवं धारणीय विधि से लाभ के वितरण को सुनिश्चित करता है और इस प्रकार आर्थिक असमानताओं को कम करने में सहायक होता है| इसलिए अर्थव्यवस्था के धारणीय विकास के संदर्भ में समावेशी विकास एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है|
##Question:आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास में अंतर स्पष्ट करते हुए समावेशी विकास के घटकों की विस्तार से चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) Explaining the difference between economic development and inclusive growth, discuss the components of inclusive development in detail. (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विकास एवं आर्थिक संवृद्धि का स्पष्टीकरण कीजिये 2- प्रथम भाग में आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास को परिभाषित कीजिये 3- दुसरे भाग में दोनों में अंतर स्पष्ट करते हुए समावेशी विकास के घटकों को बताएं 4- अंतिम में महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विकास को परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाता है| सामान्यतः इसे सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है| विकास में परिमाणात्मक परिवर्तनों के स्थान पर गुणात्मक परिवर्तनों पर बल दिया जाता है| आर्थिक संवृद्धि एवं विकास में एक मूलभूत अंतर होता है| आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है| सामान्य तौर पर यदि किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो कहा जाता है कि उस देश में आर्थिक संवृद्धि हो रही है| यह विकास का परिमाणात्मक अथवा मात्रात्मक पहलू है| आर्थिक विकास इससे व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास की परिभाषा आर्थिक विकास, आर्थिक संवृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है|आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| इससे अलग समावेशी विकास एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक अवधारणा है जो एक ही साथ उद्देश्य एवं प्रक्रिया दोनों है| समावेशी विकास की परिभाषा UNDP के अनुसार, समावेशी विकास एक प्रक्रिया(माध्यम) एवं एक आउटकम (परिणाम/उद्देश्य) है जिसमें समाज के सभी वर्गों की आर्थिक संरचना में भागीदारी हो एवं वे इस भागीदारी के कारण समतुल्य रूप से लाभान्वित हों| दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों का सृजन करे बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग एवं व्यक्ति की इन सृजित अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित करे और सामान रूप से लाभ पहुचाये|वस्तुपरक दृष्टि से समावेशी विकास उस स्थिति को स्पष्ट करता है जहाँ सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर के रूप में परिवर्तित हो जाए तथा आय एवं धन के वितरण की असमानताओं में कमी आये |अतः समावेशी विकास एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक अवधारणा है जो एक ही साथ उद्देश्य एवं प्रक्रिया दोनों है| आर्थिक विकास एवंसमावेशी विकासमें अंतर आर्थिक विकास एक उद्देश्य/साध्य है जबकिसमावेशी विकास एक माध्यम एवं परिणाम(उद्देश्य) है आर्थिक विकास वस्तुतः कल्याण है जबकि भागीदारी के माध्यम से सुनिश्चित कल्याण समावेशी विकास है कल्याण भुगतान, सब्सिडी आदि पुनर्वितरण उपायों से आर्थिक विकास होगा किन्तु भागीदारी न होने के कारण इससे समावेशी विकास नहीं होगा| समावेशी विकास के लिए लोगों की क्षमता बढ़ा कर उन्हें रोजगार देना होगा ताकि वे आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी कर सकें| समावेशी विकास निम्नलिखित घटकों से सुनिश्चित होता है क्षमता संवर्धन अर्थात रोजगार योग्य बनाना प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने से व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| इससे व्यक्ति उपलब्ध अवसरों तक अपनी पहुँच सुनिश्चित कर पाता है| सभी की समान अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित होने से व्याक्ति आर्थिक प्रक्रियाओं में अपना योगदान देने सक्षम हो पाता है| शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं/ सुविधाओं तक सार्वभौमिक पहुँच से कौशल युक्त एवं स्वस्थ मानव संसाधन का विकास होता है| इस प्रकार व्यक्ति की क्षमता का संवर्धन होता है| क्षमता संवर्धन अर्थव्यवस्था में उसकी भागीदारी की प्रायिकता को बढाता है महिला सशक्तिकरण से महिलायें सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी बढ़ती है जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है|इसी प्रकार स्वच्छ वातावरण स्वस्थ मानव संसाधन के विकास में सहायक होता है जिससे नागरिकों की क्षमता में सुधार आता है और वे अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका का बेहतर निष्पादन करने में सक्षम हो पाते हैं इससे समावेशी विकास सुनिश्चित होता है| रोजगार सृजन के उपाय अर्थव्यवस्था में निवेश वृद्धि से रोजगार सृजन में सहायता मिलती है| अधिक रोजगार सृजन अधिक लोगों को रोजगारयुक्त बनाएगा जिससे समावेशी विकास सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी|जैसे भारत सरकार ने विविध क्षेत्रकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा कर निवेश में वृद्धि के प्रयास किये हैं| सूक्ष्म, लघु एवं माध्यम उद्योग अधिकतम रोजगार सृजन करते हैं| इससे समावेशी विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है| अतः MSME को प्रोत्साहन देना समावेशी विकास की दिशा में उठाया गया कदम होगा| प्रायः उद्यमियों के समक्ष अनेकों बाधाओं की उपस्थिति उनकी उद्यमिता को बाधित करती है| इससे संवृद्धि, विकास और रोजगार सृजन पर प्रभाव पड़ता है| इसके परिणामस्वरुप समावेशी विकास बाधित होता है| अतः समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए उद्यमिता प्रोत्साहन आवश्यक होता है| जैसे स्टैंडअप इंडिया एवं स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम| पूँजीगहन विकास मॉडल ऑटोमेशन को प्रोत्साहित करता है| ऑटोमेशन रोजगार सृजन को बाधित करता है| अतः पर्याप्त रोजगार सृजन करने के लिए श्रम गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| जैसे कपडा उद्योग, कृषि, चमड़ा उद्योग, बागवानी आदि| इसके अतिरिक्त सरकार को निर्धनता उन्मूलन एवं रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसे मनरेगा आदि योजनायें समावेशी विकास को सुनिश्चित करने में प्रभावशाली भूमिका निभाती हैं| चूँकि समावेशी विकास न केवल समाज के सभी व्यक्तियों के विकास को सुनिश्चित करता है बल्कि यह अधिक प्रभावी एवं धारणीय विधि से लाभ के वितरण को सुनिश्चित करता है और इस प्रकार आर्थिक असमानताओं को कम करने में सहायक होता है| इसलिए अर्थव्यवस्था के धारणीय विकास के संदर्भ में समावेशी विकास एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है|
50,069
Describe the drainage classification. Elucidate River Indus with its course and tributaries. (150 words)
APPROACH - -In the introduction, you can briefly define drainage - Then explainthe classification based on origin, size of catchment or orientation (anyone would suffice). - Mention the course of the river Indus and its left bank and right bank tributariesseparately. Add a map diagram to substantiate. ANSWER - Drainage is defined as the natural flow of water. DRAINAGE CLASSIFICATION ON THE BASIS OF ORIGIN HIMALAYAN-Indus, Ganga Brahmaputra- their tributaries PENINSULAR-Krishna Godavari Kaveri - their tributaries; Luni, Narmada, Tapi are some west-flowing rivers; some tributaries of Ganga- Chambal, Betwa, Son, Ken ON THE BASIS OF CATCHMENT - the size of catchment/watershed Major river basins -14, 85% of water flow-area more than 20,000 sq km- Indus, Ganga Brahmaputra, Godavari, Krishna, Kaveri Medium river basins -2000 - 20,000 sq km, 7% of total runoff Minor river basins -less than 2,000 sq km, 8% total water runoff ON THE BASIS OF DESTINATION/ ORIENTATION TO THE SEA/ DISCHARGE OF WATER BAY OF BENGAL DRAINAGE-75-77% water moves east of national water divide ARABIAN DRAINAGE-23 % move towards the Arabian Sea INLAND DRAINAGE-do not reach oceans; Example- Luni, Ghagghar INDUS RIVER(SINGHI KHAMBAN- Lion"s mouth; Sindhu) Starts in Tibetan region- Kailash Range near Mansarovar lake, glaciers around Bokhar Chu, flows north-west up to Nanga Parbat Right bank tributaries - In Himalayas-Shyok, Nubrais tributary to Shyok; Shigar; Gilgit, Hunza- a tributary of Gilgit (Gilgit- Baltistan). In Pakistan-Kabul, Khurram, Tochi, Gomal, Sangar, Vibra Left bank tributaries -Zaskar (Tso Moriri lake, Leh, Pangong Tso); Kharche; Dras; Sind; Lidar (Origin- Verinag spring- Pir Panjal) Five main tributaries in Punjab Jhelum (Dal lake in Srinagar, Wular lake, Kishan Ganga river); tributaries- Neelam, Kishanganga HEP, Punch Chandra (Chandra Taal- Spiti valley); Bhaga (Surya Taal-Lahaul valley) in Himachal- Chandra-Bhaga- Chenab (Salal HEP, Tavi-tributary, Jammu) Ravi( Kullu hills, Ranjit Sagar HEP) Beas- Beas Kund- lake near Rohtang, Pando dam, Pong dam, Harike barrage ( small storage system to divert water), Indira Gandhi canal diverts water towards Rajasthan- agriculturally productive Satluj (Mansarovar, Rakas lake, Shipki la pass created enters India, high flow cut through the Himalayas, gorges, meets Beas at Harike In Pakistan, Panchanad(water from all 5 major rivers)- Chenab and Satluj join to meet Indus The river finally drains into the Arabian sea The student can substantiate his answer with a relevant map diagram
##Question:Describe the drainage classification. Elucidate River Indus with its course and tributaries. (150 words)##Answer:APPROACH - -In the introduction, you can briefly define drainage - Then explainthe classification based on origin, size of catchment or orientation (anyone would suffice). - Mention the course of the river Indus and its left bank and right bank tributariesseparately. Add a map diagram to substantiate. ANSWER - Drainage is defined as the natural flow of water. DRAINAGE CLASSIFICATION ON THE BASIS OF ORIGIN HIMALAYAN-Indus, Ganga Brahmaputra- their tributaries PENINSULAR-Krishna Godavari Kaveri - their tributaries; Luni, Narmada, Tapi are some west-flowing rivers; some tributaries of Ganga- Chambal, Betwa, Son, Ken ON THE BASIS OF CATCHMENT - the size of catchment/watershed Major river basins -14, 85% of water flow-area more than 20,000 sq km- Indus, Ganga Brahmaputra, Godavari, Krishna, Kaveri Medium river basins -2000 - 20,000 sq km, 7% of total runoff Minor river basins -less than 2,000 sq km, 8% total water runoff ON THE BASIS OF DESTINATION/ ORIENTATION TO THE SEA/ DISCHARGE OF WATER BAY OF BENGAL DRAINAGE-75-77% water moves east of national water divide ARABIAN DRAINAGE-23 % move towards the Arabian Sea INLAND DRAINAGE-do not reach oceans; Example- Luni, Ghagghar INDUS RIVER(SINGHI KHAMBAN- Lion"s mouth; Sindhu) Starts in Tibetan region- Kailash Range near Mansarovar lake, glaciers around Bokhar Chu, flows north-west up to Nanga Parbat Right bank tributaries - In Himalayas-Shyok, Nubrais tributary to Shyok; Shigar; Gilgit, Hunza- a tributary of Gilgit (Gilgit- Baltistan). In Pakistan-Kabul, Khurram, Tochi, Gomal, Sangar, Vibra Left bank tributaries -Zaskar (Tso Moriri lake, Leh, Pangong Tso); Kharche; Dras; Sind; Lidar (Origin- Verinag spring- Pir Panjal) Five main tributaries in Punjab Jhelum (Dal lake in Srinagar, Wular lake, Kishan Ganga river); tributaries- Neelam, Kishanganga HEP, Punch Chandra (Chandra Taal- Spiti valley); Bhaga (Surya Taal-Lahaul valley) in Himachal- Chandra-Bhaga- Chenab (Salal HEP, Tavi-tributary, Jammu) Ravi( Kullu hills, Ranjit Sagar HEP) Beas- Beas Kund- lake near Rohtang, Pando dam, Pong dam, Harike barrage ( small storage system to divert water), Indira Gandhi canal diverts water towards Rajasthan- agriculturally productive Satluj (Mansarovar, Rakas lake, Shipki la pass created enters India, high flow cut through the Himalayas, gorges, meets Beas at Harike In Pakistan, Panchanad(water from all 5 major rivers)- Chenab and Satluj join to meet Indus The river finally drains into the Arabian sea The student can substantiate his answer with a relevant map diagram
50,073
What is India-Afghanistan Strategic Partnership Agreement? Briefly discuss India"s contribution towards Afghanistan"s reconstruction.(150 words/10 marks)
Approach: Introduction: Introduction to the Agreement on a strategic partnership. Body: A brief discussion of the SPA between the two countries. A brief discussion on India"s contribution to Afghanistan"s reconstruction. Conclusion: Conclude by mentioning the other assistance towards the development. Model Answer: India and Afghanistan have signed an "Agreement on strategic partnership" between the two countries in October 2011. The agreement positions India and Afghanistan for the post-2014 situation when the international forces were scheduled to withdraw and hand over security responsibilities to Afghan forces. The Strategic Partnership Agreement (SPA) between the two sides, inter alia, provides for: assistance to help rebuild Afghanistan"s infrastructure and institutions, education and technical assistance to re-build indigenous Afghan capacity in different areas, encouraging investment in Afghanistan"s natural resources, providing duty-free access to the Indian market for Afghanistan"s exports support for an Afghan-led, Afghan-owned, broad-based and inclusive process of peace and reconciliation, and advocating the need for a sustained and long-term commitment to Afghanistan by the international community. India’s Contribution to Afghanistan"s reconstruction: India has committed nearly 2 billion US$ for development efforts in Afghanistan for construction of projects like: The building of Afghanistan’s Parliament in Kabul ; Reconstruction of the Salma Dam, now known as the Afghan-India Friendship Dam; The establishment of an electricity transmission line from Pul-e-Khumri to Kabul; Reconstructing the Indira Gandhi Institute for Child Health/Indira Gandhi Children’s Hospital in Kabul; Delaram Zaranj Highway connectingthe border town of Zaranj with the city of Delaram etc. Also: Since 2017 under the "New Development Partnership" 116 new "high impact" development projects are being implemented jointly in 31 provinces of Afghanistan. Over 3,500 Afghan nationals are trained and receive education in India every year A consortium led by Indian companies had won the rights for the Hajigak Iron ore deposits in 2012. India is also considering a run of the river project on the Kabul river. Apart from the above, India also announced an additional USD 1 billion assistance for capability building in spheres such as education, health, agriculture, skill development, women’s empowerment, energy, infrastructure and strengthening of democratic institutions of Afghanistan.
##Question:What is India-Afghanistan Strategic Partnership Agreement? Briefly discuss India"s contribution towards Afghanistan"s reconstruction.(150 words/10 marks)##Answer:Approach: Introduction: Introduction to the Agreement on a strategic partnership. Body: A brief discussion of the SPA between the two countries. A brief discussion on India"s contribution to Afghanistan"s reconstruction. Conclusion: Conclude by mentioning the other assistance towards the development. Model Answer: India and Afghanistan have signed an "Agreement on strategic partnership" between the two countries in October 2011. The agreement positions India and Afghanistan for the post-2014 situation when the international forces were scheduled to withdraw and hand over security responsibilities to Afghan forces. The Strategic Partnership Agreement (SPA) between the two sides, inter alia, provides for: assistance to help rebuild Afghanistan"s infrastructure and institutions, education and technical assistance to re-build indigenous Afghan capacity in different areas, encouraging investment in Afghanistan"s natural resources, providing duty-free access to the Indian market for Afghanistan"s exports support for an Afghan-led, Afghan-owned, broad-based and inclusive process of peace and reconciliation, and advocating the need for a sustained and long-term commitment to Afghanistan by the international community. India’s Contribution to Afghanistan"s reconstruction: India has committed nearly 2 billion US$ for development efforts in Afghanistan for construction of projects like: The building of Afghanistan’s Parliament in Kabul ; Reconstruction of the Salma Dam, now known as the Afghan-India Friendship Dam; The establishment of an electricity transmission line from Pul-e-Khumri to Kabul; Reconstructing the Indira Gandhi Institute for Child Health/Indira Gandhi Children’s Hospital in Kabul; Delaram Zaranj Highway connectingthe border town of Zaranj with the city of Delaram etc. Also: Since 2017 under the "New Development Partnership" 116 new "high impact" development projects are being implemented jointly in 31 provinces of Afghanistan. Over 3,500 Afghan nationals are trained and receive education in India every year A consortium led by Indian companies had won the rights for the Hajigak Iron ore deposits in 2012. India is also considering a run of the river project on the Kabul river. Apart from the above, India also announced an additional USD 1 billion assistance for capability building in spheres such as education, health, agriculture, skill development, women’s empowerment, energy, infrastructure and strengthening of democratic institutions of Afghanistan.
50,082
आर्थिक संवृद्धि एवं समावेशी संवृद्धि की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इनमें अंतर स्थापित कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of economic Growth and Inclusive growth and differentiate them.(150-200 words/ 10 Marks)
Appraoch: प्रश्न के प्रथम भाग में आर्थिक विकास व समावेशी विकास को परिभाषित करते हुए अवधारणा को स्पस्थ कीजिये। द्वितीय भाग में इनके बीच अंतर स्थापित कीजिये। निष्कर्ष में दोनों के संबंध की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: आर्थिक विकास: किसी देश के द्वारा अपनी वास्तविक आय को बढ़ाने के लिए सभी उत्पादक साधनों का कुशलतम प्रयोग आर्थिक विकास कहलाता है। यह एक लगातार या निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें साधनों की पूर्ति एवं वस्तु संबंधी मांग समय-समय पर बदलती रहती है। आर्थिक विकास में सामन्य जनता के जीवन-स्तर में सुधार होता है तथा सरकार द्वारा कल्याणकारी कार्यों में वृद्धि की जाती है। आर्थिक विकास से वास्तविक राष्ट्रीय व प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। समावेशी विकास:समान अवसरों के साथ विकास करना ही समावेशी विकास है। दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों को पैदा करे, बल्कि समाज के सभी वर्गो के लिए सृजित ऐसे अवसरों की समान पहुंच को सुनिश्चित भी करे हम उस विकास को समावेशी विकास कह सकते हैं। जब यह समाज के सभी सदस्यों की इसमें भागीदारी और योगदान को सुनिश्चित करता है। विकास की इस प्रक्रिया का आधार समानता है। जिसमें लोगों की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा जाता है। आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास में अंतर: आर्थिक विकास मुख्य रूप में आर्थिक वृद्धि द्वारा जनता के विकास की आकांशा की जा जाती है। समावेशी विकास आर्थिक वृद्धि हेतु अवसरों के सृजन को भी प्रोत्साहित करता है। समावेशी विकास समाज के सभी वर्गों को लक्षित करता है। जबकि आर्थिक विकास विशेष रूप से लक्षित नहीं करता है। आर्थिक विकास का आधार आर्थिक संवृद्धि है जबकि समावेशी विकास का आधार समानता है। आर्थिक विकास में लोगों की परिस्थितियों का ध्यान नहीं रखा जाता है जबकि समावेशी विकास में लोगों की परिस्थितियों का ध्यान रखा जाता है। आर्थिक विकास समावेशी विकास को सुनिश्चित नहीं करता है। आर्थिक विकास यदि आय असमानता को उत्पन्न करता है तो समावेशी विकास दुर्लभ हो जाता है। किसी देश के दीर्घकालिक विकास के लिए समावेशी विकास आवश्यक होता है। भारत जैसे विकासशील देश में दोनों की अपेक्षा की जाती है। आर्थिक विकास को समावेशी विकास के रूप में स्थापित करके जनता के कल्याण के साथ साथ देश का दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
##Question:आर्थिक संवृद्धि एवं समावेशी संवृद्धि की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इनमें अंतर स्थापित कीजिये। (150-200 शब्द/10 अंक) Explain the concept of economic Growth and Inclusive growth and differentiate them.(150-200 words/ 10 Marks)##Answer:Appraoch: प्रश्न के प्रथम भाग में आर्थिक विकास व समावेशी विकास को परिभाषित करते हुए अवधारणा को स्पस्थ कीजिये। द्वितीय भाग में इनके बीच अंतर स्थापित कीजिये। निष्कर्ष में दोनों के संबंध की चर्चा कर सकते हैं। उत्तर: आर्थिक विकास: किसी देश के द्वारा अपनी वास्तविक आय को बढ़ाने के लिए सभी उत्पादक साधनों का कुशलतम प्रयोग आर्थिक विकास कहलाता है। यह एक लगातार या निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें साधनों की पूर्ति एवं वस्तु संबंधी मांग समय-समय पर बदलती रहती है। आर्थिक विकास में सामन्य जनता के जीवन-स्तर में सुधार होता है तथा सरकार द्वारा कल्याणकारी कार्यों में वृद्धि की जाती है। आर्थिक विकास से वास्तविक राष्ट्रीय व प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। समावेशी विकास:समान अवसरों के साथ विकास करना ही समावेशी विकास है। दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों को पैदा करे, बल्कि समाज के सभी वर्गो के लिए सृजित ऐसे अवसरों की समान पहुंच को सुनिश्चित भी करे हम उस विकास को समावेशी विकास कह सकते हैं। जब यह समाज के सभी सदस्यों की इसमें भागीदारी और योगदान को सुनिश्चित करता है। विकास की इस प्रक्रिया का आधार समानता है। जिसमें लोगों की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा जाता है। आर्थिक विकास एवं समावेशी विकास में अंतर: आर्थिक विकास मुख्य रूप में आर्थिक वृद्धि द्वारा जनता के विकास की आकांशा की जा जाती है। समावेशी विकास आर्थिक वृद्धि हेतु अवसरों के सृजन को भी प्रोत्साहित करता है। समावेशी विकास समाज के सभी वर्गों को लक्षित करता है। जबकि आर्थिक विकास विशेष रूप से लक्षित नहीं करता है। आर्थिक विकास का आधार आर्थिक संवृद्धि है जबकि समावेशी विकास का आधार समानता है। आर्थिक विकास में लोगों की परिस्थितियों का ध्यान नहीं रखा जाता है जबकि समावेशी विकास में लोगों की परिस्थितियों का ध्यान रखा जाता है। आर्थिक विकास समावेशी विकास को सुनिश्चित नहीं करता है। आर्थिक विकास यदि आय असमानता को उत्पन्न करता है तो समावेशी विकास दुर्लभ हो जाता है। किसी देश के दीर्घकालिक विकास के लिए समावेशी विकास आवश्यक होता है। भारत जैसे विकासशील देश में दोनों की अपेक्षा की जाती है। आर्थिक विकास को समावेशी विकास के रूप में स्थापित करके जनता के कल्याण के साथ साथ देश का दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
50,091
बक्सर के युद्ध के उपरांत बंगाल मे स्थापित द्वैध शासन से आप क्या समझते है? अंग्रेजों ने पूर्ण सत्ता न अपनाकर इस व्यवस्था को क्यों अपनाया ? (150-200 शब्द;10 अंक ) What do you understand by the dual rule established in Bengal after the battle of Buxar? Why did the British not adopt full power and adopt this system? (150-200 words; 10 marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: द्वैध शासन की व्याख्या करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। अंग्रेजों द्वारा इसे अपनाए जाने के कारणों को लिखिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। द्वैध शासन प्रणाली बंगाल में 1765 ई. की इलाहाबाद संधि के अंतर्गत लायी गयी थी। यह शासन बंगाल के अतिरिक्त बिहार और ओड़ीसा में भी लागू किया गया था। इसके अंतर्गत कंपनी को राजस्व वसूलने के लिए तथा कंपनी को शासन चलाने की ज़िम्मेदारी दी गयी। दोनों ने ही सम्राट की अधीनता स्वीकार की और सम्राट को राजस्व का कुछ भाग मिलने लगा। इस द्वैध शासन से कंपनी की असंगत स्थिति का तो अंत हो गया किन्तु शासन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो सका। द्वैध शासन व्यवस्था को अपनाए जाने का कारण: यह संदिग्ध था की अन्य यूरोपीय कंपनियाँ अँग्रेजी कंपनी के वर्चस्व को स्वीकार करती और शुल्कों का भुगतान करतीं। खुले रूप से राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेने से अन्य यूरोपीय शक्तियों का ध्यान आकर्षित होता। अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ अन्य यूरोपीय शक्तियों का एक साथ होना अंग्रेजों के लिए वांछनीय नहीं था। बंगाल के प्रशासन की चलाने के लिए कंपनी के पास पर्याप्त कर्मचारी नहीं थे। कंपनी के निदेशकों को तात्कालिक समय में क्षेत्रीय अधिग्रहण के बजाय वित्तीय और व्यावसायिक लाभ में अधिक रुचि थी। द्वैध शासन प्रणाली से कंपनी के हितों की रक्षा अच्छी तरह हो रही थी। सत्ता को खुले तौर पर अपने हाथ में लिए जाने से कंपनी का असली चेहरा सबके सामने आ जाता था और इसके परिणामस्वरूप भारतीय शासक इसके खिलाफ एकजुट हो जाते। क्लाइव कंपनी के कामकाज के संबंध में इंग्लैंड में बहुत रुचि नहीं रखना चाहता था। जिससे कंपनी ब्रिटिश संसद के हस्तक्षेप से बच सके। इस प्रकार अंग्रेजों ने साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से इस व्यवस्था को अपनाया। तत्कालीन समय में पूर्ण सत्ता को अपनाने से नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना थी। क्लाइव चाहता था की कंपनी बिना किसी ज़िम्मेदारी के वास्तविक शक्ति हासिल कर ले।
##Question:बक्सर के युद्ध के उपरांत बंगाल मे स्थापित द्वैध शासन से आप क्या समझते है? अंग्रेजों ने पूर्ण सत्ता न अपनाकर इस व्यवस्था को क्यों अपनाया ? (150-200 शब्द;10 अंक ) What do you understand by the dual rule established in Bengal after the battle of Buxar? Why did the British not adopt full power and adopt this system? (150-200 words; 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: द्वैध शासन की व्याख्या करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए। अंग्रेजों द्वारा इसे अपनाए जाने के कारणों को लिखिए। सारांश रूप में निष्कर्ष लिखिए। द्वैध शासन प्रणाली बंगाल में 1765 ई. की इलाहाबाद संधि के अंतर्गत लायी गयी थी। यह शासन बंगाल के अतिरिक्त बिहार और ओड़ीसा में भी लागू किया गया था। इसके अंतर्गत कंपनी को राजस्व वसूलने के लिए तथा कंपनी को शासन चलाने की ज़िम्मेदारी दी गयी। दोनों ने ही सम्राट की अधीनता स्वीकार की और सम्राट को राजस्व का कुछ भाग मिलने लगा। इस द्वैध शासन से कंपनी की असंगत स्थिति का तो अंत हो गया किन्तु शासन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हो सका। द्वैध शासन व्यवस्था को अपनाए जाने का कारण: यह संदिग्ध था की अन्य यूरोपीय कंपनियाँ अँग्रेजी कंपनी के वर्चस्व को स्वीकार करती और शुल्कों का भुगतान करतीं। खुले रूप से राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेने से अन्य यूरोपीय शक्तियों का ध्यान आकर्षित होता। अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ अन्य यूरोपीय शक्तियों का एक साथ होना अंग्रेजों के लिए वांछनीय नहीं था। बंगाल के प्रशासन की चलाने के लिए कंपनी के पास पर्याप्त कर्मचारी नहीं थे। कंपनी के निदेशकों को तात्कालिक समय में क्षेत्रीय अधिग्रहण के बजाय वित्तीय और व्यावसायिक लाभ में अधिक रुचि थी। द्वैध शासन प्रणाली से कंपनी के हितों की रक्षा अच्छी तरह हो रही थी। सत्ता को खुले तौर पर अपने हाथ में लिए जाने से कंपनी का असली चेहरा सबके सामने आ जाता था और इसके परिणामस्वरूप भारतीय शासक इसके खिलाफ एकजुट हो जाते। क्लाइव कंपनी के कामकाज के संबंध में इंग्लैंड में बहुत रुचि नहीं रखना चाहता था। जिससे कंपनी ब्रिटिश संसद के हस्तक्षेप से बच सके। इस प्रकार अंग्रेजों ने साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से इस व्यवस्था को अपनाया। तत्कालीन समय में पूर्ण सत्ता को अपनाने से नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना थी। क्लाइव चाहता था की कंपनी बिना किसी ज़िम्मेदारी के वास्तविक शक्ति हासिल कर ले।
50,096
What is India"s experience with regard to the Free trade agreements? Has India been able to fully utilize the potential offered by FTA"s? Examine. (150 words/10 marks)
APPROACH- 1. Introduce by explaining Free Trade Agreements. 2. Explain India"s experience with the FTAs. 3. Give a brief analysis of the existing main FTAs. 4. Conclude by suggesting policy change regarding FTAs. ANSWER- Free Trade Agreements are arrangements between two or more countries or trading blocs that primarily agree to reduce or eliminate customs tariff and non-tariff barriers on substantial trade between them. FTAs, normally cover trade in goods (such as agricultural or industrial products) or trade in services (such as banking, construction, trading, etc.). FTAs can also cover other areas such as intellectual property rights (IPRs), investment, government procurement, and competition policy, etc. India’s experience with regard to the Free Trade Agreement (FTA)- Regional Trade Agreements today go beyond tariff cuts in trade in goods and incorporate various other components like liberalization in services, investment, etc. 1. The first RTA of which India became a member was the Bangkok Agreement in 1975. In 2005, this reincarnated as Asia Pacific Trade Agreement (APTA). 2. India’s first bilateral FTA with Sri Lanka (ISFTA) came into effect in March 2000. 3. India’s exports to FTA countries has not outperformed overall export growth or exports to the rest of the world 4. FTAs have led to increased imports and exports, although the former has been greater. 5. According to Economic Survey 2016-17, FTAs have had a bigger impact on metals on the importing side and textiles on the exporting side. 6. India’s exports are much more responsive to income changes as compared to price changes and thus a tariff reduction/elimination does not boost exports significantly 7. The utilization rate of RTAs by exporters in India is very low (between 5 and 25%). Performance analysis of existing FTAs- We can analyze four key FTAs India has signed, with ASEAN, Korea, Sri Lanka, and Japan (as they are the most comprehensive ones). 1. Bilateral trade increased post signing of all the above FTAs 2. Imports from these FTA partners into India increased more than India’s exports to partner countries post signing of FTAs 3. As imports from Korea, Japan and ASEAN have shot up after the respective agreements came into force, India’s trade deficit with these countries has increased since then. Only exports to Sri Lanka have increased much more than imports. 4. The overall trade deficit with ASEAN, Korea, and Japan doubled from FY11 to FY17. 5. Quality of trade has also deteriorated under India ASEAN FTA. 6. The analysis shows that trade balance has worsened (deficit increased or surplus reduced) for 13 out of 21 sectors. Sectors where trade deficit has worsened account for approximately 75% of India’s exports to ASEAN. From the above discussion, it is clear that India has not been fully utilized the potential under the existing FTAs. India can take advantage of the global supply chains linked to the free trade agreement by overcoming the policy issues, infrastructure issues, and investment issues and for this, we need to focus on lower duties on raw materials and intermediate goods, set up an elaborate quality and standards infrastructure for essential products.
##Question:What is India"s experience with regard to the Free trade agreements? Has India been able to fully utilize the potential offered by FTA"s? Examine. (150 words/10 marks)##Answer:APPROACH- 1. Introduce by explaining Free Trade Agreements. 2. Explain India"s experience with the FTAs. 3. Give a brief analysis of the existing main FTAs. 4. Conclude by suggesting policy change regarding FTAs. ANSWER- Free Trade Agreements are arrangements between two or more countries or trading blocs that primarily agree to reduce or eliminate customs tariff and non-tariff barriers on substantial trade between them. FTAs, normally cover trade in goods (such as agricultural or industrial products) or trade in services (such as banking, construction, trading, etc.). FTAs can also cover other areas such as intellectual property rights (IPRs), investment, government procurement, and competition policy, etc. India’s experience with regard to the Free Trade Agreement (FTA)- Regional Trade Agreements today go beyond tariff cuts in trade in goods and incorporate various other components like liberalization in services, investment, etc. 1. The first RTA of which India became a member was the Bangkok Agreement in 1975. In 2005, this reincarnated as Asia Pacific Trade Agreement (APTA). 2. India’s first bilateral FTA with Sri Lanka (ISFTA) came into effect in March 2000. 3. India’s exports to FTA countries has not outperformed overall export growth or exports to the rest of the world 4. FTAs have led to increased imports and exports, although the former has been greater. 5. According to Economic Survey 2016-17, FTAs have had a bigger impact on metals on the importing side and textiles on the exporting side. 6. India’s exports are much more responsive to income changes as compared to price changes and thus a tariff reduction/elimination does not boost exports significantly 7. The utilization rate of RTAs by exporters in India is very low (between 5 and 25%). Performance analysis of existing FTAs- We can analyze four key FTAs India has signed, with ASEAN, Korea, Sri Lanka, and Japan (as they are the most comprehensive ones). 1. Bilateral trade increased post signing of all the above FTAs 2. Imports from these FTA partners into India increased more than India’s exports to partner countries post signing of FTAs 3. As imports from Korea, Japan and ASEAN have shot up after the respective agreements came into force, India’s trade deficit with these countries has increased since then. Only exports to Sri Lanka have increased much more than imports. 4. The overall trade deficit with ASEAN, Korea, and Japan doubled from FY11 to FY17. 5. Quality of trade has also deteriorated under India ASEAN FTA. 6. The analysis shows that trade balance has worsened (deficit increased or surplus reduced) for 13 out of 21 sectors. Sectors where trade deficit has worsened account for approximately 75% of India’s exports to ASEAN. From the above discussion, it is clear that India has not been fully utilized the potential under the existing FTAs. India can take advantage of the global supply chains linked to the free trade agreement by overcoming the policy issues, infrastructure issues, and investment issues and for this, we need to focus on lower duties on raw materials and intermediate goods, set up an elaborate quality and standards infrastructure for essential products.
50,099
What do you understand by the process of "ozone layer depletion"? Also highlight the key points of the Kigali agreement related to ozone layer depletion.(200 words)
The approach of the answer 1. Introduce the answer by briefly explaining Ozone Depletion 2. Then, explain the Ozone depletion process. Also, chemical equation can be mentioned to highlight the same. 3.Highlight provisions of Kigali agreement 4. Conclude accordingly Answer Ozone depletion describes two related phenomena observed since the late 1970s: a steady decline of about four percent in the total amount of ozone in Earth"s stratosphere (the ozone layer), and a much larger springtime decrease in stratospheric ozone around Earth"s polar regions. The latter phenomenon is referred to as the ozone hole. The main cause of ozone depletion and the ozone hole is man-made chemicals, especially man-made halocarbon refrigerants, solvents, propellants, and foam-blowing agents (chlorofluorocarbon (CFCs), HCFCs, freons, halons), referred to as ozone-depleting substances (ODS). These compounds are transported into the stratosphere by winds after being emitted at the surface. Once in the stratosphere, they release halogen atoms through photodissociation, which catalyze the breakdown of ozone (O3) into oxygen (O2). Both types of ozone depletion were observed to increase as emissions of halocarbons increased. Chemical Equation highlighting Ozone depletion process Once the chlorine is released, it is able to react with ozone (O3), to form chlorine monoxide (ClO) and oxygen (O2). Cl + O3 = ClO + O2 When the molecule of chlorine monoxide (ClO) meets another molecule of oxygen (O) it breaks up, releasing chlorine (Cl), which can “destroy” another molecule of ozone (O3), creating the catalytic cycle of chlorine. ClO + O = Cl + O2 With the depletion of the ozone layer, more UV radiation filters into the troposphere. UV radiations lead to aging of the skin, cataract, sunburn, skin cancer, the killing of many phytoplankton, damage to agricultural and marine productivity, etc. Kigali Agreement The Montreal Protocol was adopted by countries around the world to prevent ozone degradation, which came into force from 1 January 1989. The agreement included the complete elimination of CFC and HCFC by 2030. However, only fluorine-containing compounds do not harm ozone, so HFC was later used as a coolant instead of CFC and HCFC. There was no threat to the ozone layer, but this gas became a cause of the increasing greenhouse effect. In view of this, the Kigali Agreement was adopted in 2016 in Rwanda. The provisions of which are as follows: - - Reducing the production and consumption of 80-85% HFC"s by 2050 to the member nations as per the agreement. - A bindingagreement on all member nations. -It also has provisions for penalties for non-compliance. Under it, developed countries will also provide enhanced funding support estimated at billions of dollars globally. Different timelines under Kigali Amendment All signatory countries have been divided into three groups with different timelines to go about reductions of HFCs. First group :It includes richest countries like the US and those in the European Union (EU). They will freeze the production and consumption of HFCs by 2018. They will reduce them to about 15% of 2012 levels by 2036. Second group: It includes countries like China, Brazil and all of Africa, etc. They will freeze HFC use by 2024 and cut it to 20% of 2021 levels by 2045. Third group :It includes countries India, Pakistan, Iran, Saudi Arabia, etc. They will be freezing HFC use by 2028 and reducing it to about 15% of 2025 levels by 2047. Conclusion It is clear from the above points that erosion of the ozone layer is not a problem of one country but a problem of the whole world. Also, if it is not resolved in time, it will pose a serious threat to both life and health on earth in the coming years. Therefore, there is a need to effectively implement the Kigali Agreement by all countries. Also, new research should also be encouraged in this direction.
##Question:What do you understand by the process of "ozone layer depletion"? Also highlight the key points of the Kigali agreement related to ozone layer depletion.(200 words)##Answer:The approach of the answer 1. Introduce the answer by briefly explaining Ozone Depletion 2. Then, explain the Ozone depletion process. Also, chemical equation can be mentioned to highlight the same. 3.Highlight provisions of Kigali agreement 4. Conclude accordingly Answer Ozone depletion describes two related phenomena observed since the late 1970s: a steady decline of about four percent in the total amount of ozone in Earth"s stratosphere (the ozone layer), and a much larger springtime decrease in stratospheric ozone around Earth"s polar regions. The latter phenomenon is referred to as the ozone hole. The main cause of ozone depletion and the ozone hole is man-made chemicals, especially man-made halocarbon refrigerants, solvents, propellants, and foam-blowing agents (chlorofluorocarbon (CFCs), HCFCs, freons, halons), referred to as ozone-depleting substances (ODS). These compounds are transported into the stratosphere by winds after being emitted at the surface. Once in the stratosphere, they release halogen atoms through photodissociation, which catalyze the breakdown of ozone (O3) into oxygen (O2). Both types of ozone depletion were observed to increase as emissions of halocarbons increased. Chemical Equation highlighting Ozone depletion process Once the chlorine is released, it is able to react with ozone (O3), to form chlorine monoxide (ClO) and oxygen (O2). Cl + O3 = ClO + O2 When the molecule of chlorine monoxide (ClO) meets another molecule of oxygen (O) it breaks up, releasing chlorine (Cl), which can “destroy” another molecule of ozone (O3), creating the catalytic cycle of chlorine. ClO + O = Cl + O2 With the depletion of the ozone layer, more UV radiation filters into the troposphere. UV radiations lead to aging of the skin, cataract, sunburn, skin cancer, the killing of many phytoplankton, damage to agricultural and marine productivity, etc. Kigali Agreement The Montreal Protocol was adopted by countries around the world to prevent ozone degradation, which came into force from 1 January 1989. The agreement included the complete elimination of CFC and HCFC by 2030. However, only fluorine-containing compounds do not harm ozone, so HFC was later used as a coolant instead of CFC and HCFC. There was no threat to the ozone layer, but this gas became a cause of the increasing greenhouse effect. In view of this, the Kigali Agreement was adopted in 2016 in Rwanda. The provisions of which are as follows: - - Reducing the production and consumption of 80-85% HFC"s by 2050 to the member nations as per the agreement. - A bindingagreement on all member nations. -It also has provisions for penalties for non-compliance. Under it, developed countries will also provide enhanced funding support estimated at billions of dollars globally. Different timelines under Kigali Amendment All signatory countries have been divided into three groups with different timelines to go about reductions of HFCs. First group :It includes richest countries like the US and those in the European Union (EU). They will freeze the production and consumption of HFCs by 2018. They will reduce them to about 15% of 2012 levels by 2036. Second group: It includes countries like China, Brazil and all of Africa, etc. They will freeze HFC use by 2024 and cut it to 20% of 2021 levels by 2045. Third group :It includes countries India, Pakistan, Iran, Saudi Arabia, etc. They will be freezing HFC use by 2028 and reducing it to about 15% of 2025 levels by 2047. Conclusion It is clear from the above points that erosion of the ozone layer is not a problem of one country but a problem of the whole world. Also, if it is not resolved in time, it will pose a serious threat to both life and health on earth in the coming years. Therefore, there is a need to effectively implement the Kigali Agreement by all countries. Also, new research should also be encouraged in this direction.
50,100
What do you understand by the process of "ozone layer depletion"? Highlight the different agreements and protocols related to ozone layer depletion. (10 Marks/ 150 Words)
Approach Introduction : Explain the ozone layer in the role. Body : In the first part of the answer, also discuss some reasons explaining the depletion of the ozone layer. In the second part of the North, explain the Kigali Agreement in terms of the prevention of ozone erosion. Conclusion : Give a positive conclusion in the last part of the answer. Answer: INTRODUCTION: An ozone layer is a sheet of gas, formed by ozone molecules, present at a height of 20 to 30 km in a stratosphere. It makes life on Earth possible by absorbing the harmful UV radiation from the Sun. It helps in maintaining the average temperature of the Earth. At the same time, it also protects against the deadly diseases caused by the sun"s UV rays, which makes it possible to prevent diseases like skin cancer. Ozone is measured in Dobson Unit. Depletion of Ozone Layer Ozone gas is continuously formed by the action of UV rays on molecular oxygen and is also degraded into molecular oxygen in the stratosphere. There should be a balance between the production and degradation of ozone in the stratosphere. Of late, the balance has been disrupted due to the enhancement of ozone degradation by chlorofluorocarbons (CFCs). CFCs find wide use as refrigerants. Process of Depletion: CFCs discharged in the lower part of the atmosphere move upward and reach the stratosphere. In the stratosphere, UV rays act on them releasing Cl atoms. Cl degrades ozone releasing molecular oxygen, with these atoms acting merely as catalysts; Cl atoms are not consumed in the reaction. Hence, whatever CFCs are added to the stratosphere, they have permanent and continuing effects on Ozone levels. Although ozone depletion is occurring widely in the stratosphere, the depletion is particularly marked over the Antarctic region. This has resulted in the formation of a large area of the thinned ozone layer, commonly called the ozone hole. UV radiation of wavelengths shorter than UV-B is almost completely absorbed by Earth’s atmosphere, given that the ozone layer is intact. But, UV-B damages DNA and mutation may occur. It causes ageing of the skin, damage to skin cells and various types of skin cancers. In the human eye, the cornea absorbs UV-B radiation, and a high dose of UV-B causes inflammation of the cornea, called snow-blindness, cataract, etc. Such exposure may permanently damage the cornea. Recognizing the deleterious effects of ozone depletion, an international treaty, known as the Montreal Protocol to Vienna Convention , was signed at Montreal (Canada) in 1987 (effective in 1989) to control the emission of ozone-depleting substances. The agreement included the complete elimination of CFC and HCFC by 2030. The alternative of CFC and HCFC was to be HFC to be used as a coolant. This refrigerant did not pose any threat to the ozone layer, but the major issue with it was that it became a cause of the increasing greenhouse effect. So, world countries took note of it and it was in view that, the Kigali Agreement was adopted in 2016 in Rwanda. The provisions of which are as follows: - Reducing the production and consumption of 80-85% HFC by 2050 to the member nations as per the agreement. A binding agreement on all member nations. The agreement recognized the capability of various Nations. Based on this the responsibility was distributed among the groups of nations. According to their stage of development, the principle of common but differentiated responsibility, 3 groups of countries were formed: - Group I - Industrial and developed nations. They were required to reduce by HFCs by 85% with the base year 2012. The time period lies in 2019 to 2036. Group II – For nations like - China, Brazil, South Africa, African nations - the base year 2021 - beginning 2024 but reduction target of 80% by 2045. Group III - India, Pakistan, West Asia, Iran, etc. - the base year 2024 -2026; Beginning 2028 to 2047. CONCLUSION: It is clear from the above points that erosion of the ozone layer is not a problem of one country but a problem of the whole world. Also, if it is not resolved in time, it will pose a serious threat to both life and health on earth in the coming years. Therefore, there is an urgent need to effectively implement the Montreal Protocol and the Kigali Agreement by all countries. Also, new research should also be encouraged in this direction to provide a long term and sustainable solution
##Question:What do you understand by the process of "ozone layer depletion"? Highlight the different agreements and protocols related to ozone layer depletion. (10 Marks/ 150 Words)##Answer:Approach Introduction : Explain the ozone layer in the role. Body : In the first part of the answer, also discuss some reasons explaining the depletion of the ozone layer. In the second part of the North, explain the Kigali Agreement in terms of the prevention of ozone erosion. Conclusion : Give a positive conclusion in the last part of the answer. Answer: INTRODUCTION: An ozone layer is a sheet of gas, formed by ozone molecules, present at a height of 20 to 30 km in a stratosphere. It makes life on Earth possible by absorbing the harmful UV radiation from the Sun. It helps in maintaining the average temperature of the Earth. At the same time, it also protects against the deadly diseases caused by the sun"s UV rays, which makes it possible to prevent diseases like skin cancer. Ozone is measured in Dobson Unit. Depletion of Ozone Layer Ozone gas is continuously formed by the action of UV rays on molecular oxygen and is also degraded into molecular oxygen in the stratosphere. There should be a balance between the production and degradation of ozone in the stratosphere. Of late, the balance has been disrupted due to the enhancement of ozone degradation by chlorofluorocarbons (CFCs). CFCs find wide use as refrigerants. Process of Depletion: CFCs discharged in the lower part of the atmosphere move upward and reach the stratosphere. In the stratosphere, UV rays act on them releasing Cl atoms. Cl degrades ozone releasing molecular oxygen, with these atoms acting merely as catalysts; Cl atoms are not consumed in the reaction. Hence, whatever CFCs are added to the stratosphere, they have permanent and continuing effects on Ozone levels. Although ozone depletion is occurring widely in the stratosphere, the depletion is particularly marked over the Antarctic region. This has resulted in the formation of a large area of the thinned ozone layer, commonly called the ozone hole. UV radiation of wavelengths shorter than UV-B is almost completely absorbed by Earth’s atmosphere, given that the ozone layer is intact. But, UV-B damages DNA and mutation may occur. It causes ageing of the skin, damage to skin cells and various types of skin cancers. In the human eye, the cornea absorbs UV-B radiation, and a high dose of UV-B causes inflammation of the cornea, called snow-blindness, cataract, etc. Such exposure may permanently damage the cornea. Recognizing the deleterious effects of ozone depletion, an international treaty, known as the Montreal Protocol to Vienna Convention , was signed at Montreal (Canada) in 1987 (effective in 1989) to control the emission of ozone-depleting substances. The agreement included the complete elimination of CFC and HCFC by 2030. The alternative of CFC and HCFC was to be HFC to be used as a coolant. This refrigerant did not pose any threat to the ozone layer, but the major issue with it was that it became a cause of the increasing greenhouse effect. So, world countries took note of it and it was in view that, the Kigali Agreement was adopted in 2016 in Rwanda. The provisions of which are as follows: - Reducing the production and consumption of 80-85% HFC by 2050 to the member nations as per the agreement. A binding agreement on all member nations. The agreement recognized the capability of various Nations. Based on this the responsibility was distributed among the groups of nations. According to their stage of development, the principle of common but differentiated responsibility, 3 groups of countries were formed: - Group I - Industrial and developed nations. They were required to reduce by HFCs by 85% with the base year 2012. The time period lies in 2019 to 2036. Group II – For nations like - China, Brazil, South Africa, African nations - the base year 2021 - beginning 2024 but reduction target of 80% by 2045. Group III - India, Pakistan, West Asia, Iran, etc. - the base year 2024 -2026; Beginning 2028 to 2047. CONCLUSION: It is clear from the above points that erosion of the ozone layer is not a problem of one country but a problem of the whole world. Also, if it is not resolved in time, it will pose a serious threat to both life and health on earth in the coming years. Therefore, there is an urgent need to effectively implement the Montreal Protocol and the Kigali Agreement by all countries. Also, new research should also be encouraged in this direction to provide a long term and sustainable solution
50,105
वायुदाब पेटी से आप क्या समझते हैं ? विभिन्न प्रकार के वायुदाब पेटियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द, 10 अंक ) What do you understand by air pressure belt? Briefly discuss the different types of air pressure belts. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण: 1. भूमिका में वायुदाब पेटियों को परिभाषित कीजिये| 2. वायुदाब पेटियों के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: वायुमण्डल मूलतः गैसों का मिश्रण है, जिसमें जलवाष्प और धूल के कण भी शामिल होते हैं । वायु के भार के कारण पृथ्वी पर जो दबाव पड़ता है, उसे वायु दाब कहा जाता है । इस प्रकार वायुमण्डलीय दबाव का अर्थ है - किसी भी स्थान और समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का भार । अक्षांशों की एक सीमित परिधि में एक समान प्रकृति के वायुदाब वाले क्षेत्र कोवायुदाब पेटी के रूप में परिभाषित किया जाता है| वायुदाब पेटियों के विभिन्न प्रकार: पृथ्वी पर कुल 7 वायुदाब पेटियां पाई जाती हैं- 1.भूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी डोलड्रम 2.उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी ( प्रत्येक गोलार्द्ध में ) 3.उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी ( प्रत्येक गोलार्द्ध में ) 4.ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी ( प्रत्येक गोलार्द्ध में ) 1.भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाबपेटीः- भूमध्य रेखा के 5 डिग्री उत्तर एवं 5 डिग्री दक्षिण तक वर्षभर सूर्य की सीधी किरणें तापमान उच्च एवं वायुदाब कम धरातलीय पवने नहीं चलती वायु हल्की होकर ऊपर उठती हैं एवं संवहनी धाराओं का जन्म होता है ताप जन्य पेटी एवं शांत कटिबंध इस कटिबंध को डोलड्रम भी कहते हैं 2.उपोष्णकटिबंधीयउच्च वायुदाबपेटीः- 30 से 35 डिग्री अक्षांश गति जन्य पेटी उच्च तापमान उच्च वायुदाब इस पेटी का उच्च वायुदाब तापमान से संबंधित ना होकर पृथ्वी की दैनिक गति और वायु के अवतलन से संबंधित है इस पेटी को अश्व अक्षांश भी कहते हैं 3.उपध्रुवीय निम्न वायुदाबपेटीः- 60 डिग्री से 65 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य निम्न वायुदाब (पृथ्वी के घूर्णन के कारण) गति जन्य पेटी इस क्षेत्र में गर्म जल धाराएं होने के कारण तापक्रम अधिक हो जाता है 4.ध्रुवीयउच्च वायुदाबपेटीः- 90 डिग्री के आसपास उच्च वायुदाब एवं निम्न तापमान ताप जनित पेटी वायुदाब पेटियों का निर्माण दोनों गोलार्ध में ताप एवं गतिज उर्जा के प्रभाव में होता है| जिन क्षेत्रों में वायु का अवरोहण होता है वहां उच्च वायुदाब विकसित होता है जबकि आरोहण से प्रभावित क्षेत्र में निम्न वायुदाब का विकास होता है|
##Question:वायुदाब पेटी से आप क्या समझते हैं ? विभिन्न प्रकार के वायुदाब पेटियों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द, 10 अंक ) What do you understand by air pressure belt? Briefly discuss the different types of air pressure belts. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण: 1. भूमिका में वायुदाब पेटियों को परिभाषित कीजिये| 2. वायुदाब पेटियों के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: वायुमण्डल मूलतः गैसों का मिश्रण है, जिसमें जलवाष्प और धूल के कण भी शामिल होते हैं । वायु के भार के कारण पृथ्वी पर जो दबाव पड़ता है, उसे वायु दाब कहा जाता है । इस प्रकार वायुमण्डलीय दबाव का अर्थ है - किसी भी स्थान और समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का भार । अक्षांशों की एक सीमित परिधि में एक समान प्रकृति के वायुदाब वाले क्षेत्र कोवायुदाब पेटी के रूप में परिभाषित किया जाता है| वायुदाब पेटियों के विभिन्न प्रकार: पृथ्वी पर कुल 7 वायुदाब पेटियां पाई जाती हैं- 1.भूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी डोलड्रम 2.उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी ( प्रत्येक गोलार्द्ध में ) 3.उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी ( प्रत्येक गोलार्द्ध में ) 4.ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी ( प्रत्येक गोलार्द्ध में ) 1.भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाबपेटीः- भूमध्य रेखा के 5 डिग्री उत्तर एवं 5 डिग्री दक्षिण तक वर्षभर सूर्य की सीधी किरणें तापमान उच्च एवं वायुदाब कम धरातलीय पवने नहीं चलती वायु हल्की होकर ऊपर उठती हैं एवं संवहनी धाराओं का जन्म होता है ताप जन्य पेटी एवं शांत कटिबंध इस कटिबंध को डोलड्रम भी कहते हैं 2.उपोष्णकटिबंधीयउच्च वायुदाबपेटीः- 30 से 35 डिग्री अक्षांश गति जन्य पेटी उच्च तापमान उच्च वायुदाब इस पेटी का उच्च वायुदाब तापमान से संबंधित ना होकर पृथ्वी की दैनिक गति और वायु के अवतलन से संबंधित है इस पेटी को अश्व अक्षांश भी कहते हैं 3.उपध्रुवीय निम्न वायुदाबपेटीः- 60 डिग्री से 65 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य निम्न वायुदाब (पृथ्वी के घूर्णन के कारण) गति जन्य पेटी इस क्षेत्र में गर्म जल धाराएं होने के कारण तापक्रम अधिक हो जाता है 4.ध्रुवीयउच्च वायुदाबपेटीः- 90 डिग्री के आसपास उच्च वायुदाब एवं निम्न तापमान ताप जनित पेटी वायुदाब पेटियों का निर्माण दोनों गोलार्ध में ताप एवं गतिज उर्जा के प्रभाव में होता है| जिन क्षेत्रों में वायु का अवरोहण होता है वहां उच्च वायुदाब विकसित होता है जबकि आरोहण से प्रभावित क्षेत्र में निम्न वायुदाब का विकास होता है|
50,109
उपयुक्त तर्कों के साथ स्पष्ट कीजिये कि वास्तविक प्रति व्यक्ति आय एवं सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा आर्थिक विकास के संतोषजनक सूचक नहीं हैं| (150 से 200 शब्द) Explain with appropriate arguments that the concept of real per capita income and GDP are not satisfactory indicators of economic development. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में विकास एवं आर्थिक विकास को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सूचक के रूप में वास्तविक प्रति व्यक्ति आय सीमाएं बताइए 3- दुसरे भाग में सूचक के रूप में जीडीपी सीमाएं बताइए 4- अंतिम में कुछ प्रमुख सूचकों की जानकारी देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विकास को परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाता है| सामान्यतः इसे सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है| विकास में परिमाणात्मक परिवर्तनों के स्थान पर गुणात्मक परिवर्तनों पर बल दिया जाता है| आर्थिक संवृद्धि एवं विकास में एक मूलभूत अंतर होता है| आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है| सामान्य तौर पर यदि किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो कहा जाता है कि उस देश में आर्थिक संवृद्धि हो रही है| यह विकास का परिमाणात्मक अथवा मात्रात्मक पहलू है| आर्थिक विकास आर्थिक विकास, आर्थिक संवृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है| आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| आर्थिक विकास का अध्ययन विभिन्न सूचकों के माध्यम से किया जाता है| परम्परागत रूप से प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद को आर्थिक विकास के सूचक के तौर पर प्रयोग किया जाता था किन्तु उपरोक्त दोनों अवधारणायें कुछ कारणों से आर्थिक विकास की संतोषजनक सूचक नहीं हैं वास्तविक प्रति व्यक्ति आय वास्तविक प्रति व्यक्ति आय,राष्ट्रीय आय का एक औसत होता है जिसे सकल आय को जनसंख्या से विभाजित करके प्राप्त किया जाता है| विकास सूचक के रूप में वास्तविक प्रति व्यक्ति आय की सीमाएंनिम्नलिखित हैं जीवन की गुणवत्ता (QUALITY OF LIFE) कल्याण स्तर से सम्बन्धित है इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक आदि सभी तत्व शामिल होते हैं| जबकि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर जीवन स्तर को मापा जाता है| जीवन स्तर (STANDARD OF LIVING) का तात्पर्य वस्तुओं एवं सेवाओं की उपलब्धता एवं उन तक पहुँच से है जबकि वस्तुओ एवं सेवाओं की उपलब्धता एवं उन तक पहुच आय द्वारा सुनिश्चित होती है अतः जीवन स्तर, आय पर निर्भर है | अतः जीवन स्तर को प्रतिव्यक्ति आय से मापा जाता है| वास्तविक प्रति व्यक्ति आयका मान राष्ट्रीय आय पर आधारित है जो स्वयं आर्थिक विकास का संतोषजनक सूचक नही है वास्तविक प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय आय के मान पर आधारित होता है परन्तु राष्ट्रीय आय की संरचना से प्रभावित नहीं होता है जैसे तम्बाकू, सिगरेट, शराब, प्रतिरक्षा उपकरण, विलासिता की वस्तुएं आदि का उत्पादन भी राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाता है जबकि इनसे विकास नहीं होता केवल संवृद्धि बढ़ सकती है वास्तविक प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय का वितरण अर्थात असमानताएं नहीं दर्शाता है| वास्तविक प्रति व्यक्ति आय, आर्थिक विकास के कल्याण पक्ष को सम्मिलित नहीं करता जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, राजनीतिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एवं सामाजिक तत्व, मनोवैज्ञानिक तत्व आदि अतः स्पष्ट है कि वास्तविक प्रति व्यक्ति आय एक संतोषजनक सूचक नही है GDP एवं आर्थिक विकास आर्थिक आकार एवं विकास का स्तर दोनों अलग अलग अवधारणायें हैं| GDP किसी अर्थव्यवस्था का आर्थिक आकार दर्शाता है न कि आर्थिक विकास या कल्याण स्तर को दर्शाता है| GDP किसी देश के आर्थिक विकास के स्तर को नही दर्शाती है क्योंकि भारत की राष्ट्रीय आय कई अन्य विकसित देशों से अधिक है किन्तु भारत एक विकसित राष्ट्र नहीं है| इसका प्रमुख कारण अधिक जनसंख्या है| किसी अर्थव्यवस्था का आकार बड़ा हो सकता है किन्तु आवश्यक नहीं है कि आर्थिक विकास भी अधिक होगा| अर्थव्यवस्था के आकार और विकास के स्तर में अलग अलग देशों की अलग अलग स्थिति हो सकती है| जैसे भारत की जीडीपी अधिक है किन्तु विकास स्तर निम्न है| जबकि अमेरिका की जीडीपी भी अधिक है तथा विकास स्तर उच्च है| इसी तरह सिंगापुर का आर्थिक आकार छोटा है किन्तु विकास स्तर उच्च है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किवास्तविक प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणायें आर्थिक विकास की संतोष जनक सूचक नही हैं किन्तु पिछली शताब्दी में इन्ही सूचकोंका प्रयोग किया जाता था क्योंकि अन्य बेहतर सूचक अनुपलब्ध थे, विकास एवं संवृद्धि में अंतर ही नही किया जाता थ, इसके अतिरिक्त प्रतिव्यक्ति आय, विकास के स्तर को कुछ सीमा तक दर्शा सकता था| लेकिन पिछली शताब्दी से अंतिम दशकों में उपरोक्त सूचकों की सीमाओं का अध्ययन किया गया और जीवन की भौतिक गुणवत्ता सूचकांक एवं मानव विकास सूचकांक जैसे सूचकों के घटकों के माध्यम से आर्थिक विकास के सत्रर के अध्ययन का प्रयास किया जाने लगा|
##Question:उपयुक्त तर्कों के साथ स्पष्ट कीजिये कि वास्तविक प्रति व्यक्ति आय एवं सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा आर्थिक विकास के संतोषजनक सूचक नहीं हैं| (150 से 200 शब्द) Explain with appropriate arguments that the concept of real per capita income and GDP are not satisfactory indicators of economic development. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में विकास एवं आर्थिक विकास को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में सूचक के रूप में वास्तविक प्रति व्यक्ति आय सीमाएं बताइए 3- दुसरे भाग में सूचक के रूप में जीडीपी सीमाएं बताइए 4- अंतिम में कुछ प्रमुख सूचकों की जानकारी देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये विकास को परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाता है| सामान्यतः इसे सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है| विकास में परिमाणात्मक परिवर्तनों के स्थान पर गुणात्मक परिवर्तनों पर बल दिया जाता है| आर्थिक संवृद्धि एवं विकास में एक मूलभूत अंतर होता है| आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है| सामान्य तौर पर यदि किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो कहा जाता है कि उस देश में आर्थिक संवृद्धि हो रही है| यह विकास का परिमाणात्मक अथवा मात्रात्मक पहलू है| आर्थिक विकास आर्थिक विकास, आर्थिक संवृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है| आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| आर्थिक विकास का अध्ययन विभिन्न सूचकों के माध्यम से किया जाता है| परम्परागत रूप से प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद को आर्थिक विकास के सूचक के तौर पर प्रयोग किया जाता था किन्तु उपरोक्त दोनों अवधारणायें कुछ कारणों से आर्थिक विकास की संतोषजनक सूचक नहीं हैं वास्तविक प्रति व्यक्ति आय वास्तविक प्रति व्यक्ति आय,राष्ट्रीय आय का एक औसत होता है जिसे सकल आय को जनसंख्या से विभाजित करके प्राप्त किया जाता है| विकास सूचक के रूप में वास्तविक प्रति व्यक्ति आय की सीमाएंनिम्नलिखित हैं जीवन की गुणवत्ता (QUALITY OF LIFE) कल्याण स्तर से सम्बन्धित है इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक आदि सभी तत्व शामिल होते हैं| जबकि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर जीवन स्तर को मापा जाता है| जीवन स्तर (STANDARD OF LIVING) का तात्पर्य वस्तुओं एवं सेवाओं की उपलब्धता एवं उन तक पहुँच से है जबकि वस्तुओ एवं सेवाओं की उपलब्धता एवं उन तक पहुच आय द्वारा सुनिश्चित होती है अतः जीवन स्तर, आय पर निर्भर है | अतः जीवन स्तर को प्रतिव्यक्ति आय से मापा जाता है| वास्तविक प्रति व्यक्ति आयका मान राष्ट्रीय आय पर आधारित है जो स्वयं आर्थिक विकास का संतोषजनक सूचक नही है वास्तविक प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय आय के मान पर आधारित होता है परन्तु राष्ट्रीय आय की संरचना से प्रभावित नहीं होता है जैसे तम्बाकू, सिगरेट, शराब, प्रतिरक्षा उपकरण, विलासिता की वस्तुएं आदि का उत्पादन भी राष्ट्रीय आय में सम्मिलित किया जाता है जबकि इनसे विकास नहीं होता केवल संवृद्धि बढ़ सकती है वास्तविक प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय का वितरण अर्थात असमानताएं नहीं दर्शाता है| वास्तविक प्रति व्यक्ति आय, आर्थिक विकास के कल्याण पक्ष को सम्मिलित नहीं करता जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, राजनीतिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एवं सामाजिक तत्व, मनोवैज्ञानिक तत्व आदि अतः स्पष्ट है कि वास्तविक प्रति व्यक्ति आय एक संतोषजनक सूचक नही है GDP एवं आर्थिक विकास आर्थिक आकार एवं विकास का स्तर दोनों अलग अलग अवधारणायें हैं| GDP किसी अर्थव्यवस्था का आर्थिक आकार दर्शाता है न कि आर्थिक विकास या कल्याण स्तर को दर्शाता है| GDP किसी देश के आर्थिक विकास के स्तर को नही दर्शाती है क्योंकि भारत की राष्ट्रीय आय कई अन्य विकसित देशों से अधिक है किन्तु भारत एक विकसित राष्ट्र नहीं है| इसका प्रमुख कारण अधिक जनसंख्या है| किसी अर्थव्यवस्था का आकार बड़ा हो सकता है किन्तु आवश्यक नहीं है कि आर्थिक विकास भी अधिक होगा| अर्थव्यवस्था के आकार और विकास के स्तर में अलग अलग देशों की अलग अलग स्थिति हो सकती है| जैसे भारत की जीडीपी अधिक है किन्तु विकास स्तर निम्न है| जबकि अमेरिका की जीडीपी भी अधिक है तथा विकास स्तर उच्च है| इसी तरह सिंगापुर का आर्थिक आकार छोटा है किन्तु विकास स्तर उच्च है| इस प्रकार स्पष्ट होता है किवास्तविक प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणायें आर्थिक विकास की संतोष जनक सूचक नही हैं किन्तु पिछली शताब्दी में इन्ही सूचकोंका प्रयोग किया जाता था क्योंकि अन्य बेहतर सूचक अनुपलब्ध थे, विकास एवं संवृद्धि में अंतर ही नही किया जाता थ, इसके अतिरिक्त प्रतिव्यक्ति आय, विकास के स्तर को कुछ सीमा तक दर्शा सकता था| लेकिन पिछली शताब्दी से अंतिम दशकों में उपरोक्त सूचकों की सीमाओं का अध्ययन किया गया और जीवन की भौतिक गुणवत्ता सूचकांक एवं मानव विकास सूचकांक जैसे सूचकों के घटकों के माध्यम से आर्थिक विकास के सत्रर के अध्ययन का प्रयास किया जाने लगा|
50,110
Describe the Heart of Asia process. Analyse the role of India in ensuring a peaceful Afghanistan. (10 marks/150 words)
Approach - In the first part, describe the Heart of Asia Process and its objectives in some detail. - Then describe the steps taken by India to bring stability in the region. - As the keyword is analyse, one also needs to highlight some concerns in Indian context. - Add a conclusion with a positive tone. Answer: The Heart of Asia-Istanbul Process was jointly launched in 2011 to encourage the Afghanistan"s neighbouring countries to play a constructive role in establishing peace and stability in Afghanistan and thereby achieving regional stability. It involves 3 pillars- political consultations, confidence-building measures and cooperation with regional organisations. Afghan is India’s natural partner, not just to balance Pakistan but also for the fulfillment of energy and economic interests.Indian policy in Afghanistan can be described as the dichotomy between its aspiration for a larger role in its northwestern neighbourhood and the real constraints on it. In 2011 India became the first country with which Afghanistan signed a strategic partnership agreement. India has repeatedly stressed that its relationship with Afghan is independent of Pakistan. In 2018, in a first major offensive military platform to Kabul, India gifted a Mi 25 attack helicopter. India is also training Afghan defense personnel on operations. With the Taliban gaining ground, India must be much more careful and choose smaller projects with care. The quantum of assistance should not go down, but projects must be selected with the ground situation in mind. Other regional powers like Iran, China and Russia need to come to a common ground. It is imperative for India to assist Afghanistan in building sound political structures, a strong military and economy, along with human resources. India has been asserting that the peace process must be “Afghan-led, Afghan-owned and Afghan-controlled.
##Question:Describe the Heart of Asia process. Analyse the role of India in ensuring a peaceful Afghanistan. (10 marks/150 words)##Answer:Approach - In the first part, describe the Heart of Asia Process and its objectives in some detail. - Then describe the steps taken by India to bring stability in the region. - As the keyword is analyse, one also needs to highlight some concerns in Indian context. - Add a conclusion with a positive tone. Answer: The Heart of Asia-Istanbul Process was jointly launched in 2011 to encourage the Afghanistan"s neighbouring countries to play a constructive role in establishing peace and stability in Afghanistan and thereby achieving regional stability. It involves 3 pillars- political consultations, confidence-building measures and cooperation with regional organisations. Afghan is India’s natural partner, not just to balance Pakistan but also for the fulfillment of energy and economic interests.Indian policy in Afghanistan can be described as the dichotomy between its aspiration for a larger role in its northwestern neighbourhood and the real constraints on it. In 2011 India became the first country with which Afghanistan signed a strategic partnership agreement. India has repeatedly stressed that its relationship with Afghan is independent of Pakistan. In 2018, in a first major offensive military platform to Kabul, India gifted a Mi 25 attack helicopter. India is also training Afghan defense personnel on operations. With the Taliban gaining ground, India must be much more careful and choose smaller projects with care. The quantum of assistance should not go down, but projects must be selected with the ground situation in mind. Other regional powers like Iran, China and Russia need to come to a common ground. It is imperative for India to assist Afghanistan in building sound political structures, a strong military and economy, along with human resources. India has been asserting that the peace process must be “Afghan-led, Afghan-owned and Afghan-controlled.
50,111
Briefly explain the Biogeographic Regions of India. Also, highlight different Species richness in these regions. (150 words/10 marks )
Approach 1. Briefly Introduce the answer highlighting Megabiodiversity of India 2. Then, briefly discuss Biogeographical zones of India 3. Also, highlight species richness in these regions by substantiating with relevant examples Answer India is a megadiverse country. With only 2.4 percent of the total land area of the world, the known biological diversity of India contributes 8 percent to the known global biological diversity. In terms of Biogeography, India has been divided into 10 biogeographic zones. Biogeographic Regions of India 1.Trans-Himalayan Region It constitutes 5.6 percent of the total geographical area, includes the high altitude, cold and arid mountain areas of Ladakh, Jammu & Kashmir, North Sikkim, Lahaul and Spiti areas of Himachal Pradesh. This zone has sparse alpine steppe vegetation that harbors several endemic species and is a favorable habitat for the biggest populations of wild sheep and goats in the world and other rare fauna that includes Snow Leopard, Clouded Leopard, Kashmir Stag(Hangul) andthe migratory Black-necked Crane. 2. Himalayan Zone It constitutes 6.4 percent of the total geographical area includes some of the highest peaks in the world. The Himalayan zone makes India one of the richest areas in terms of habitats and species. The alpine and sub-alpine forests, grassy meadows and moist mixed deciduous forests provide diverse habitat for endangered species such as Bharal, Markhor, Himalayan Tahr, and Takin. Other rare and endangered species restricted to this zone include Hangul and Musk Deer. 3. Indian Desert Zone Indian Desert Zone, constituting 6.6 percent of the total geographical area, includes the Thar and the Kutch deserts and has large expanses of grassland. It supports several endangered species of mammals such as Wolf, Caracal, Desert Cat and birds of conservation interest i.e Houbara Bustard and the Great Indian Bustard. 4. Semi-Arid Region Semi-arid Region, constituting 16.6 percent of the total geographical area, is a transition zone between the desert and the dense forests of Western Ghats. The dominant grass and palatable shrub layer in this zone support the highest wildlife biomass. species of Sambar and Chital are restricted to the better-wooded hills and moister valley areas respectively. The Lion, an endangered carnivore species (restricted to a small area in Gujarat), Caracal, Jackal, Cheetah, wild ass are some of the endangered species that are characteristic of this region. 5. Western Ghats Constitutes 4.0 percent of the total geographical area. It is one of the major tropical evergreen forest regions in India. The Western Ghats are home to viable populations of most of the vertebrate species found in peninsular India, besides an endemic faunal element of its own. Significant species endemic to this region include Nilgiri Langur, Lion Tailed Macaque Grizzled Giant Squirrel, Malabar Civet, Nilgiri Tahr, and Malabar Grey Hornbill. 6. Deccan Plateau Deccan Plateau is India’s largest biogeographic region making 42 percent of the total geographical area. It’s a semi-arid region that falls in the rain shadow area of the Western Ghats. This bio-geographic zone of peninsular India is by far the most extensive zone, covering India’s finest forests, particularly in the States of Madhya Pradesh, Maharashtra, and Odisha. The zone comprising of deciduous forests, thorn forests and degraded scrubland supports diverse wildlife species. Species found in this region are Chital, Sambar, Nilgai, Barking deer and Gaur, Elephant, Wild Buffalo, etc. 7. Gangetic Plain Gangetic plain constitutes around 10.8 percent of the total geographical area. The Gangetic plain is topographically homogenous for hundreds of kilometers. The characteristic fauna of this region includes Rhino, Gangetic Dolphin, Elephant, Buffalo, Swamp Deer, Hog-Deer and Hispid Hare, etc. 8. North-East Region North East Region constitutes 5.2 percent of the total geographical area. This region represents the transition zone between the Indian, Indo-Malayan and Indo-Chinese bio-geographical regions as well as being a meeting point of the Himalayan mountains and peninsular India. The characteristic species found in this region are Golden langur, Hornbill, Namdapha flying Squirell, Stumped tailed macaque, etc. 9. Coastal Region The coastal region constitutes 2.5 percent of the total geographical area with sandy beaches, mangroves, mudflats, coral reefs, and marine angiosperm pastures make them the wealth and health zones of India. The important species in this regionDugong sea cow, Saltwater Crocodile, OLive ridley turtles, Irrawaddy Dolphins, Green Turtles, Leatherback Turtles, etc. 10. Islands This constitutes 0.3 percent of the total geographical area are one of the three tropical moist evergreen forest zones in India. The islands house an array of flora and fauna not found elsewhere. These islands are centers of high endemism and contain some of India’s finest evergreen forests and support a wide diversity of corals. In India, endemic island biodiversity is found only in the Andaman and Nicobar Islands. Some of the endemic fauna of the Andaman & Nicobar islands include Narcondam hornbill, South Andaman krait, etc.
##Question:Briefly explain the Biogeographic Regions of India. Also, highlight different Species richness in these regions. (150 words/10 marks )##Answer: Approach 1. Briefly Introduce the answer highlighting Megabiodiversity of India 2. Then, briefly discuss Biogeographical zones of India 3. Also, highlight species richness in these regions by substantiating with relevant examples Answer India is a megadiverse country. With only 2.4 percent of the total land area of the world, the known biological diversity of India contributes 8 percent to the known global biological diversity. In terms of Biogeography, India has been divided into 10 biogeographic zones. Biogeographic Regions of India 1.Trans-Himalayan Region It constitutes 5.6 percent of the total geographical area, includes the high altitude, cold and arid mountain areas of Ladakh, Jammu & Kashmir, North Sikkim, Lahaul and Spiti areas of Himachal Pradesh. This zone has sparse alpine steppe vegetation that harbors several endemic species and is a favorable habitat for the biggest populations of wild sheep and goats in the world and other rare fauna that includes Snow Leopard, Clouded Leopard, Kashmir Stag(Hangul) andthe migratory Black-necked Crane. 2. Himalayan Zone It constitutes 6.4 percent of the total geographical area includes some of the highest peaks in the world. The Himalayan zone makes India one of the richest areas in terms of habitats and species. The alpine and sub-alpine forests, grassy meadows and moist mixed deciduous forests provide diverse habitat for endangered species such as Bharal, Markhor, Himalayan Tahr, and Takin. Other rare and endangered species restricted to this zone include Hangul and Musk Deer. 3. Indian Desert Zone Indian Desert Zone, constituting 6.6 percent of the total geographical area, includes the Thar and the Kutch deserts and has large expanses of grassland. It supports several endangered species of mammals such as Wolf, Caracal, Desert Cat and birds of conservation interest i.e Houbara Bustard and the Great Indian Bustard. 4. Semi-Arid Region Semi-arid Region, constituting 16.6 percent of the total geographical area, is a transition zone between the desert and the dense forests of Western Ghats. The dominant grass and palatable shrub layer in this zone support the highest wildlife biomass. species of Sambar and Chital are restricted to the better-wooded hills and moister valley areas respectively. The Lion, an endangered carnivore species (restricted to a small area in Gujarat), Caracal, Jackal, Cheetah, wild ass are some of the endangered species that are characteristic of this region. 5. Western Ghats Constitutes 4.0 percent of the total geographical area. It is one of the major tropical evergreen forest regions in India. The Western Ghats are home to viable populations of most of the vertebrate species found in peninsular India, besides an endemic faunal element of its own. Significant species endemic to this region include Nilgiri Langur, Lion Tailed Macaque Grizzled Giant Squirrel, Malabar Civet, Nilgiri Tahr, and Malabar Grey Hornbill. 6. Deccan Plateau Deccan Plateau is India’s largest biogeographic region making 42 percent of the total geographical area. It’s a semi-arid region that falls in the rain shadow area of the Western Ghats. This bio-geographic zone of peninsular India is by far the most extensive zone, covering India’s finest forests, particularly in the States of Madhya Pradesh, Maharashtra, and Odisha. The zone comprising of deciduous forests, thorn forests and degraded scrubland supports diverse wildlife species. Species found in this region are Chital, Sambar, Nilgai, Barking deer and Gaur, Elephant, Wild Buffalo, etc. 7. Gangetic Plain Gangetic plain constitutes around 10.8 percent of the total geographical area. The Gangetic plain is topographically homogenous for hundreds of kilometers. The characteristic fauna of this region includes Rhino, Gangetic Dolphin, Elephant, Buffalo, Swamp Deer, Hog-Deer and Hispid Hare, etc. 8. North-East Region North East Region constitutes 5.2 percent of the total geographical area. This region represents the transition zone between the Indian, Indo-Malayan and Indo-Chinese bio-geographical regions as well as being a meeting point of the Himalayan mountains and peninsular India. The characteristic species found in this region are Golden langur, Hornbill, Namdapha flying Squirell, Stumped tailed macaque, etc. 9. Coastal Region The coastal region constitutes 2.5 percent of the total geographical area with sandy beaches, mangroves, mudflats, coral reefs, and marine angiosperm pastures make them the wealth and health zones of India. The important species in this regionDugong sea cow, Saltwater Crocodile, OLive ridley turtles, Irrawaddy Dolphins, Green Turtles, Leatherback Turtles, etc. 10. Islands This constitutes 0.3 percent of the total geographical area are one of the three tropical moist evergreen forest zones in India. The islands house an array of flora and fauna not found elsewhere. These islands are centers of high endemism and contain some of India’s finest evergreen forests and support a wide diversity of corals. In India, endemic island biodiversity is found only in the Andaman and Nicobar Islands. Some of the endemic fauna of the Andaman & Nicobar islands include Narcondam hornbill, South Andaman krait, etc.
50,127
मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के उदय के कारणों की चर्चा करते हुए, भक्ति आन्दोलन की निर्गुण-सगुण शाखाओं में अंतर स्पष्ट कीजिए | (150 - 200 शब्द; 10 अंक) Discussing the reasons for the rise of the medieval Bhakti movement, explain the difference between the "NIRGUNA-SAGUNA" branches of the Bhakti movement. (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में भक्ति आन्दोलन का आशय स्पष्ट करते हुए विकास की सक्षिप्त सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में मध्य कालीन भक्ति आन्दोलन के उदय के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में भक्ति आन्दोलन की धारों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भक्ति आन्दोलन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भक्ति का आशय ईश्वर के प्रति श्रृद्धा और निष्ठा के साथ समर्पण की भावना से है| भारतीय इतिहास में एक आन्दोलन के रूप में भक्ति आन्दोलन को तीन अलग अलग भागों में देख सकते हैं | जिसमें पहला प्राचीन भारत में वैष्णव/भागवत आन्दोलन, दुसरा पूर्व मध्य काल में दक्षिण भारत में आलवार-नयनार का सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलनजबकि तीसरा मध्य काल में 14वीं से 16वीं सदी के मध्य उत्तर पश्चिम एवं पूर्वी भारत में भक्ति आन्दोलन अथवा सगुण व निर्गुण संतों का आन्दोलन था| पूर्व मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के अंतर्गत समकालीन समाज में व्याप्त सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध अलवार(वैष्णव) एवं नयनार(शैव) संतों ने आवाज उठायी| इन संतों को पल्लव एवं चोल शासकों ने संरक्षण प्रदान किया| इन्होने इस तथ्य पर बल दिया कि भक्ति के माध्यम से समाज का कोई भी वर्ग या व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है| इसी परम्परा का विकास मध्य काल में भी दिखता है| मध्य काल में भक्ति आन्दोलन निर्गुण एवं सगुण धारा के रूप में विकसित हुआ| कबीर, नानक, दादू, रैदास आदिनिर्गुण धारा धारा के प्रमुख संत थे जबकिसगुण धारा में राम मार्गी एवं कृष्णमार्गी धाराएं दिखती हैं |कृष्ण मार्गियों में सूरदास, मीरा, बल्लभाचार्य, चैतन्य थे जबकि तुलसीदास राममार्गी संत थे मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के उदय के कारण प्राचीन काल से ही धर्म के क्षेत्र में मोक्ष के लिए भक्ति की अवधारणा एक लोकप्रिय मार्ग रही है, पूर्वमध्यकाल में भी धर्म एवं समाज सुधार के क्षेत्र में यह परम्परा अलवार एवं नयनार संतों के माध्यम से जारी रहीमध्यकालीन भक्ति आन्दोलन को इसी परंपरा की एक कड़ी के रूप में देखा जाता है| समाज में व्याप्त सामाजिक-धार्मिक कुरीतियाँ भक्ति आन्दोलन के उदय इस्लाम के बढ़ते प्रभाव से गैर-इस्लामिक वर्गों का चिंतित होना और प्रतिक्रया करना सूफी संतों की गतिविधियों ने भी भक्ति आन्दोलन विशेषकर निर्गुणधारा को प्रभावित किया| हालांकि भारत में सूफी आन्दोलन को यहाँ के धार्मिक गतिविधियों ने भी प्रभावित किया था जैसे नाथपंथियों का चिश्ती परम्परा पर प्रभाव आदि तुर्कों के शासक वर्ग के रूप में उदय के कारण राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को चुनौती मिली, ब्राहमणों एवं क्षत्रियों के प्रभाव में कमी आयी तथा नगरीकरण की प्रक्रिया और अर्थव्यवस्था को गति मिली, भक्ति आन्दोलन के उदय को इस नए परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाता है | मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन दो धाराओं यथा निर्गुण एवं सगुण धारा के रूप में विकसित हुआ किन्तु दोनों के स्वरुप में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| निर्गुण धारा एवं सगुण धारा में अंतर निर्गुण संत निराकार, सर्वव्यापी एवं निर्गुण ईश्वर में आस्था रखते थे, ये एकेश्वरवादी थे जबकि सगुण धारा के संतसाकार एवं सगुण ईश्वर में आस्था रखते थे निर्गुण धारा के संत मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा में आस्था नहीं रखते थे और कर्मकांडों की आलोचना करते थे जबकि सगुण धारा के संतमूर्तिपूजा एवं अवतारवाद में आस्था रखते थे और इन्होने कर्मकांडों की कठोर शब्दों में आलोचना नहीं की निर्गुण संत अवतारवाद को नहीं मानते हैं,पुरोहित वाद की आलोचना करते थे सगुण संतो नेपुरोहितवाद की कठोर शब्दों में आलोचना नहीं निर्गुण संतों का मानना था कि गृहस्थ जीवन जीते हुए गुरु के निर्देशन में भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है जबकि सगुन संतसंन्यास जीवन और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति की बात करते थे निर्गुण संत जाति-प्रथा छुआ-छूत की कठोर शब्दों में आलोचना करते थे जबकिसामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हुए इन्होने समानता के विचारों को महत्व दिया निर्गुण संतधर्म ग्रंथों को महत्त्व नहीं देते थे जबकि सगुण शाखाधर्म ग्रंथों को महत्त्व देते थे निर्गुण संतो पर इस्लाम और सूफी संतों का अधिक प्रभाव दिखाई देता है जबकि सगुण धारा पर यह प्रभाव उतना नहीं था इस तरह स्पष्ट होता है दोनों धाराओं में महत्वपूर्ण अंतर था किन्तु दोनों धाराओं में कुछ समानताएं भी दिखती हैं जैसेलैंगिक समानता का समर्थन, भक्ति संगीत पर दोनों का बल, स्थानीय रूप से आम बोल चाल की भाषा में उपदेश, सामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हुए इन्होने समानता के विचारों पर बल तथामहिलाओं द्वारा मोक्ष प्राप्ति अदि को दोनों धाराओं द्वारा समर्थन किया गया| भक्ति आन्दोलन ने भारत में सामाजिक सामंजस्य की स्थापना कर आपसी समझ का विस्तार तथा समतामूलक सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
##Question:मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के उदय के कारणों की चर्चा करते हुए, भक्ति आन्दोलन की निर्गुण-सगुण शाखाओं में अंतर स्पष्ट कीजिए | (150 - 200 शब्द; 10 अंक) Discussing the reasons for the rise of the medieval Bhakti movement, explain the difference between the "NIRGUNA-SAGUNA" branches of the Bhakti movement. (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में भक्ति आन्दोलन का आशय स्पष्ट करते हुए विकास की सक्षिप्त सूचना दीजिये 2- प्रथम भाग में मध्य कालीन भक्ति आन्दोलन के उदय के कारणों को स्पष्ट कीजिये 3- द्वितीय भाग में भक्ति आन्दोलन की धारों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में भक्ति आन्दोलन का महत्त्व स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| भक्ति का आशय ईश्वर के प्रति श्रृद्धा और निष्ठा के साथ समर्पण की भावना से है| भारतीय इतिहास में एक आन्दोलन के रूप में भक्ति आन्दोलन को तीन अलग अलग भागों में देख सकते हैं | जिसमें पहला प्राचीन भारत में वैष्णव/भागवत आन्दोलन, दुसरा पूर्व मध्य काल में दक्षिण भारत में आलवार-नयनार का सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलनजबकि तीसरा मध्य काल में 14वीं से 16वीं सदी के मध्य उत्तर पश्चिम एवं पूर्वी भारत में भक्ति आन्दोलन अथवा सगुण व निर्गुण संतों का आन्दोलन था| पूर्व मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के अंतर्गत समकालीन समाज में व्याप्त सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध अलवार(वैष्णव) एवं नयनार(शैव) संतों ने आवाज उठायी| इन संतों को पल्लव एवं चोल शासकों ने संरक्षण प्रदान किया| इन्होने इस तथ्य पर बल दिया कि भक्ति के माध्यम से समाज का कोई भी वर्ग या व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है| इसी परम्परा का विकास मध्य काल में भी दिखता है| मध्य काल में भक्ति आन्दोलन निर्गुण एवं सगुण धारा के रूप में विकसित हुआ| कबीर, नानक, दादू, रैदास आदिनिर्गुण धारा धारा के प्रमुख संत थे जबकिसगुण धारा में राम मार्गी एवं कृष्णमार्गी धाराएं दिखती हैं |कृष्ण मार्गियों में सूरदास, मीरा, बल्लभाचार्य, चैतन्य थे जबकि तुलसीदास राममार्गी संत थे मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के उदय के कारण प्राचीन काल से ही धर्म के क्षेत्र में मोक्ष के लिए भक्ति की अवधारणा एक लोकप्रिय मार्ग रही है, पूर्वमध्यकाल में भी धर्म एवं समाज सुधार के क्षेत्र में यह परम्परा अलवार एवं नयनार संतों के माध्यम से जारी रहीमध्यकालीन भक्ति आन्दोलन को इसी परंपरा की एक कड़ी के रूप में देखा जाता है| समाज में व्याप्त सामाजिक-धार्मिक कुरीतियाँ भक्ति आन्दोलन के उदय इस्लाम के बढ़ते प्रभाव से गैर-इस्लामिक वर्गों का चिंतित होना और प्रतिक्रया करना सूफी संतों की गतिविधियों ने भी भक्ति आन्दोलन विशेषकर निर्गुणधारा को प्रभावित किया| हालांकि भारत में सूफी आन्दोलन को यहाँ के धार्मिक गतिविधियों ने भी प्रभावित किया था जैसे नाथपंथियों का चिश्ती परम्परा पर प्रभाव आदि तुर्कों के शासक वर्ग के रूप में उदय के कारण राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को चुनौती मिली, ब्राहमणों एवं क्षत्रियों के प्रभाव में कमी आयी तथा नगरीकरण की प्रक्रिया और अर्थव्यवस्था को गति मिली, भक्ति आन्दोलन के उदय को इस नए परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाता है | मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन दो धाराओं यथा निर्गुण एवं सगुण धारा के रूप में विकसित हुआ किन्तु दोनों के स्वरुप में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं| निर्गुण धारा एवं सगुण धारा में अंतर निर्गुण संत निराकार, सर्वव्यापी एवं निर्गुण ईश्वर में आस्था रखते थे, ये एकेश्वरवादी थे जबकि सगुण धारा के संतसाकार एवं सगुण ईश्वर में आस्था रखते थे निर्गुण धारा के संत मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा में आस्था नहीं रखते थे और कर्मकांडों की आलोचना करते थे जबकि सगुण धारा के संतमूर्तिपूजा एवं अवतारवाद में आस्था रखते थे और इन्होने कर्मकांडों की कठोर शब्दों में आलोचना नहीं की निर्गुण संत अवतारवाद को नहीं मानते हैं,पुरोहित वाद की आलोचना करते थे सगुण संतो नेपुरोहितवाद की कठोर शब्दों में आलोचना नहीं निर्गुण संतों का मानना था कि गृहस्थ जीवन जीते हुए गुरु के निर्देशन में भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है जबकि सगुन संतसंन्यास जीवन और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति की बात करते थे निर्गुण संत जाति-प्रथा छुआ-छूत की कठोर शब्दों में आलोचना करते थे जबकिसामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हुए इन्होने समानता के विचारों को महत्व दिया निर्गुण संतधर्म ग्रंथों को महत्त्व नहीं देते थे जबकि सगुण शाखाधर्म ग्रंथों को महत्त्व देते थे निर्गुण संतो पर इस्लाम और सूफी संतों का अधिक प्रभाव दिखाई देता है जबकि सगुण धारा पर यह प्रभाव उतना नहीं था इस तरह स्पष्ट होता है दोनों धाराओं में महत्वपूर्ण अंतर था किन्तु दोनों धाराओं में कुछ समानताएं भी दिखती हैं जैसेलैंगिक समानता का समर्थन, भक्ति संगीत पर दोनों का बल, स्थानीय रूप से आम बोल चाल की भाषा में उपदेश, सामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हुए इन्होने समानता के विचारों पर बल तथामहिलाओं द्वारा मोक्ष प्राप्ति अदि को दोनों धाराओं द्वारा समर्थन किया गया| भक्ति आन्दोलन ने भारत में सामाजिक सामंजस्य की स्थापना कर आपसी समझ का विस्तार तथा समतामूलक सामासिक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है|
50,135
सवाना/सूडान तुल्य जलवायु प्रदेश की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके जलवायु दशाओं का भी संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the location and extension of the climatic region of Savannah/Sudan. Also, briefly describe its climatic conditions. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत सवाना/सूडान तुल्य जलवायु प्रदेश की चर्चा विस्तार से करते हुए कीजिये | इसके पश्चात सवाना/सूडान तुल्य प्रदेश की जलवायु दशाओं का विस्तार से वर्णन कीजिये | उत्तर - सवाना/सूडान तुल्य जलवायु यह जलवायु विषुवतरेखीय निम्न दाब पेटी तथा मध्य अक्षांशीय उच्च वायुदाब पेटी के मध्य पायी जाती है | यह दो जलवायु के बीच पायी जाने वाली संक्रमण जलवायु है | इसका विस्तार भूमध्यरेखा के दोनों ओर 10-20 डिग्री के बीच पाया जाता है | इस जलवायु का सूडान में सर्वाधिक विकसित रूप पाया जाता है | सूडान में शुष्क एवं आर्द्र ऋतुएं स्पष्ट होती हैं | इसी कारण इसे सूडान तुल्य जलवायु के रूप में जाना जाता है | पश्चिमी अफ्रीका व सूडान को शामिल करते हुए यह जलवायु पट्टी दक्षिण में मुड़कर पूर्वी अफ्रीका एवं मकर रेखा के उत्तर तक विस्तृत है | दक्षिण अमेरिका में विषुवत रेखा के उत्तर एवं दक्षिण में सवाना जलवायु के विशिष्ट क्षेत्र पाए जाते हैं | ये क्षेत्र हैं- ओरिनिको बेसिन के लानोस एवं ब्राजील की उच्चभूमि पर अवस्थित कैम्पोस | जलवायु दशाएं तापमान स्पष्ट शुष्क एवं आर्द्र ऋतुएं सवाना जलवायु की विशेषता है | वार्षिक औसत तापमान 24 डिग्री से 27 डिग्री के मध्य रहता है | वर्ष भर तापमान उच्च बना रहता है | सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण सवाना तुल्य जलवायु क्षेत्रों में ग्रीष्म और शीत दो स्पष्ट ऋतुएं पायी जाती है | विषुवत रेखा से दूरी बढ़ने के साथ-साथ इसके परास में भी वृद्धि होती जाती है | तापमान की अत्यधिक दैनिक परास सूडान तुल्य जलवायु की विशेषता है | वर्षण इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा की मात्रा 50 सेमी. से 100 सेमी. के बीच होती है | इसके वार्षिक वितरण में भी भिन्नता पायी जाती है | वर्षा ग्रीष्म ऋतु में मई से सितम्बर तक होती है तथा शीत ऋतु शुष्क होती है | इस क्षेत्र के तटीय भागों में वर्षा व्यापारिक पवनों के कारण होती है | प्राकृतिक वनस्पति इस क्षेत्र की मुख्या वनस्पति लम्बी एवं शुष्क घास है जो लगभग 10 फीट तक लम्बी हो सकती हैं | इन घासों को अफ्रीका में सवाना, दक्षिण अमेरिका में लानोस एवं कैम्पोस के नाम से जाना जाता है | इन घास के मैदानों में कहीं-कहीं पर्णपाती वृक्ष भी पाए जाते हैं | घास के मैदानो में इस प्रकार कहीं-कहीं वृक्षों के होने से यह क्षेत्र "पार्कलैंड" सदृश्य दिखाई देता है, आदि | जैव- विविधता विशेष रूप से अफ्रीका के सवाना क्षेत्र में वन्यजीव बहुतायत में पाए जाते हैं |इसे "बिग गेम कंट्री" के नाम से जाना जाता है | इन वन्यजीवों में से कुछ जीवों का उनके चमड़े, सींग, दांत, हड्डियों एवं बालों के लिए शिकार किया जाता है | कुछ अन्य जीवों को जीवित पकड़ कर चिड़ियाँघर के जंतुओं, प्रयोगशाला या पालतू जानवर के रूप में अफ्रीका से बाहर भेज दिया जाता है, आदि जन-जीवन एवं आर्थिक विकास यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ क्षेत्र है | सवाना क्षेत्रों में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं | मसाई जैसी कुछ जनजातियाँ खानाबदोस जीवन यापन करती हैं | वहीं उत्तरी नाईजीरिया की हाउसा जनजाति जैसी स्थाई कृषक बन गए हैं , आदि |
##Question:सवाना/सूडान तुल्य जलवायु प्रदेश की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा कीजिये | साथ ही, इसके जलवायु दशाओं का भी संक्षेप में वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द; 10 अंक) Discuss the location and extension of the climatic region of Savannah/Sudan. Also, briefly describe its climatic conditions. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत सवाना/सूडान तुल्य जलवायु प्रदेश की चर्चा विस्तार से करते हुए कीजिये | इसके पश्चात सवाना/सूडान तुल्य प्रदेश की जलवायु दशाओं का विस्तार से वर्णन कीजिये | उत्तर - सवाना/सूडान तुल्य जलवायु यह जलवायु विषुवतरेखीय निम्न दाब पेटी तथा मध्य अक्षांशीय उच्च वायुदाब पेटी के मध्य पायी जाती है | यह दो जलवायु के बीच पायी जाने वाली संक्रमण जलवायु है | इसका विस्तार भूमध्यरेखा के दोनों ओर 10-20 डिग्री के बीच पाया जाता है | इस जलवायु का सूडान में सर्वाधिक विकसित रूप पाया जाता है | सूडान में शुष्क एवं आर्द्र ऋतुएं स्पष्ट होती हैं | इसी कारण इसे सूडान तुल्य जलवायु के रूप में जाना जाता है | पश्चिमी अफ्रीका व सूडान को शामिल करते हुए यह जलवायु पट्टी दक्षिण में मुड़कर पूर्वी अफ्रीका एवं मकर रेखा के उत्तर तक विस्तृत है | दक्षिण अमेरिका में विषुवत रेखा के उत्तर एवं दक्षिण में सवाना जलवायु के विशिष्ट क्षेत्र पाए जाते हैं | ये क्षेत्र हैं- ओरिनिको बेसिन के लानोस एवं ब्राजील की उच्चभूमि पर अवस्थित कैम्पोस | जलवायु दशाएं तापमान स्पष्ट शुष्क एवं आर्द्र ऋतुएं सवाना जलवायु की विशेषता है | वार्षिक औसत तापमान 24 डिग्री से 27 डिग्री के मध्य रहता है | वर्ष भर तापमान उच्च बना रहता है | सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण सवाना तुल्य जलवायु क्षेत्रों में ग्रीष्म और शीत दो स्पष्ट ऋतुएं पायी जाती है | विषुवत रेखा से दूरी बढ़ने के साथ-साथ इसके परास में भी वृद्धि होती जाती है | तापमान की अत्यधिक दैनिक परास सूडान तुल्य जलवायु की विशेषता है | वर्षण इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा की मात्रा 50 सेमी. से 100 सेमी. के बीच होती है | इसके वार्षिक वितरण में भी भिन्नता पायी जाती है | वर्षा ग्रीष्म ऋतु में मई से सितम्बर तक होती है तथा शीत ऋतु शुष्क होती है | इस क्षेत्र के तटीय भागों में वर्षा व्यापारिक पवनों के कारण होती है | प्राकृतिक वनस्पति इस क्षेत्र की मुख्या वनस्पति लम्बी एवं शुष्क घास है जो लगभग 10 फीट तक लम्बी हो सकती हैं | इन घासों को अफ्रीका में सवाना, दक्षिण अमेरिका में लानोस एवं कैम्पोस के नाम से जाना जाता है | इन घास के मैदानों में कहीं-कहीं पर्णपाती वृक्ष भी पाए जाते हैं | घास के मैदानो में इस प्रकार कहीं-कहीं वृक्षों के होने से यह क्षेत्र "पार्कलैंड" सदृश्य दिखाई देता है, आदि | जैव- विविधता विशेष रूप से अफ्रीका के सवाना क्षेत्र में वन्यजीव बहुतायत में पाए जाते हैं |इसे "बिग गेम कंट्री" के नाम से जाना जाता है | इन वन्यजीवों में से कुछ जीवों का उनके चमड़े, सींग, दांत, हड्डियों एवं बालों के लिए शिकार किया जाता है | कुछ अन्य जीवों को जीवित पकड़ कर चिड़ियाँघर के जंतुओं, प्रयोगशाला या पालतू जानवर के रूप में अफ्रीका से बाहर भेज दिया जाता है, आदि जन-जीवन एवं आर्थिक विकास यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ क्षेत्र है | सवाना क्षेत्रों में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं | मसाई जैसी कुछ जनजातियाँ खानाबदोस जीवन यापन करती हैं | वहीं उत्तरी नाईजीरिया की हाउसा जनजाति जैसी स्थाई कृषक बन गए हैं , आदि |
50,136
वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारणोंको स्पष्ट करते हुए उनकेस्थानान्तरण के कारण उत्पन्न परिणामों की चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द) Explain the reasons for the transfer of various zones and discuss the results due to their transfer (150-200 words).
दृष्टिकोण- 1. भूमिका में वायुदाब पेटियों को परिभाषित कीजिये| 2. वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारणों को स्पष्ट कीजिये| 3. वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारण उत्पन्न परिणामों की चर्चा कीजिये| उत्तर- वायुमण्डल मूलतः गैसों का मिश्रण है, जिसमें जलवाष्प और धूल के कण भी शामिल होते हैं । वायु के भार के कारण पृथ्वी पर जो दबाव पड़ता है, उसे वायु दाब कहा जाता है । इस प्रकार वायुमण्डलीय दबाव का अर्थ है - किसी भी स्थान और समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का भार । अक्षांशों की एक सीमित परिधि में एक समान प्रकृति के वायुदाब वाले क्षेत्र कोवायुदाब पेटी के रूप में परिभाषित किया जाता है| प्रत्येक गोलार्ध में चार वायुदाब पेटियां पाई जाती हैं(इनमें सेभूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी, दोनों गोलार्धों में उपस्थित होती है; इस प्रकार पृथ्वी पर कुल-7 वायुदाब पेटियां मिलती हैं)- 1.भूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी (डोलड्रम) 2.उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी 3.उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी 4.ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारण: 1. वायुदाबपेटियांमौसम के अनुसार अपने स्थान में परिवर्तन करती है| 2. स्थान परिवर्तन का मुख्य संचालक विषुवतीयनिम्न वायुदाबपेटी है जिसकी अवस्थिति सूर्य की लम्बवत किरणों के अनुसार होती है| 3. सूर्य उत्तरायण एवं दक्षिणायन के साथ तापीय विषुवत रेखा उत्तर तथा दक्षिण की और खिसकती है जिसका प्रभाव सारी वायुदाबपेटियोंपर पड़ता है अर्थात वायुमंडलीय परिसंचरण का हर घटक एकल तंत्र के रूप में उत्तर और दक्षिण की ओर अपना स्थान परिवर्तन करता रहता है| वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के परिणाम- 1. प्रचलित पवनों के उत्पत्ति तथा गंतव्य स्थान में परिवर्तन हो सकता है| 2. कई विशेष प्रकार की जलवायु का निर्माण जैसे मानसून, भूमध्य सागरीय जलवायु, चीनी जलवायु आदि| 3. चक्रवात की अवस्थिति में परिवर्तन हो सकता है| 4. वर्षा का वितरण तथा पुनर्वितरण प्रभावित होता है| 5. जेट धारा तथा अन्य वायुमंडलीय घटक की अवस्थिति में परिवर्तन भी संभव| 6. समुद्री जलधारा की अवस्थिति में परिवर्तन हो सकता है| इस प्रकार वायुदाब पेटियों की अवस्थिति में परिवर्तन सम्बंधित अक्षांशीय क्षेत्र की जलवायु को विस्तृत स्तर पर प्रभावित करता है|
##Question:वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारणोंको स्पष्ट करते हुए उनकेस्थानान्तरण के कारण उत्पन्न परिणामों की चर्चा कीजिये|(150-200 शब्द) Explain the reasons for the transfer of various zones and discuss the results due to their transfer (150-200 words).##Answer:दृष्टिकोण- 1. भूमिका में वायुदाब पेटियों को परिभाषित कीजिये| 2. वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारणों को स्पष्ट कीजिये| 3. वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारण उत्पन्न परिणामों की चर्चा कीजिये| उत्तर- वायुमण्डल मूलतः गैसों का मिश्रण है, जिसमें जलवाष्प और धूल के कण भी शामिल होते हैं । वायु के भार के कारण पृथ्वी पर जो दबाव पड़ता है, उसे वायु दाब कहा जाता है । इस प्रकार वायुमण्डलीय दबाव का अर्थ है - किसी भी स्थान और समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का भार । अक्षांशों की एक सीमित परिधि में एक समान प्रकृति के वायुदाब वाले क्षेत्र कोवायुदाब पेटी के रूप में परिभाषित किया जाता है| प्रत्येक गोलार्ध में चार वायुदाब पेटियां पाई जाती हैं(इनमें सेभूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी, दोनों गोलार्धों में उपस्थित होती है; इस प्रकार पृथ्वी पर कुल-7 वायुदाब पेटियां मिलती हैं)- 1.भूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी (डोलड्रम) 2.उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी 3.उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी 4.ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के कारण: 1. वायुदाबपेटियांमौसम के अनुसार अपने स्थान में परिवर्तन करती है| 2. स्थान परिवर्तन का मुख्य संचालक विषुवतीयनिम्न वायुदाबपेटी है जिसकी अवस्थिति सूर्य की लम्बवत किरणों के अनुसार होती है| 3. सूर्य उत्तरायण एवं दक्षिणायन के साथ तापीय विषुवत रेखा उत्तर तथा दक्षिण की और खिसकती है जिसका प्रभाव सारी वायुदाबपेटियोंपर पड़ता है अर्थात वायुमंडलीय परिसंचरण का हर घटक एकल तंत्र के रूप में उत्तर और दक्षिण की ओर अपना स्थान परिवर्तन करता रहता है| वायुदाब पेटियों के स्थानान्तरण के परिणाम- 1. प्रचलित पवनों के उत्पत्ति तथा गंतव्य स्थान में परिवर्तन हो सकता है| 2. कई विशेष प्रकार की जलवायु का निर्माण जैसे मानसून, भूमध्य सागरीय जलवायु, चीनी जलवायु आदि| 3. चक्रवात की अवस्थिति में परिवर्तन हो सकता है| 4. वर्षा का वितरण तथा पुनर्वितरण प्रभावित होता है| 5. जेट धारा तथा अन्य वायुमंडलीय घटक की अवस्थिति में परिवर्तन भी संभव| 6. समुद्री जलधारा की अवस्थिति में परिवर्तन हो सकता है| इस प्रकार वायुदाब पेटियों की अवस्थिति में परिवर्तन सम्बंधित अक्षांशीय क्षेत्र की जलवायु को विस्तृत स्तर पर प्रभावित करता है|
50,141
1909 अधिनियम के प्रावधानों को सूचीबद्ध करते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में इस अधिनियम का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Listing the provisions of the 1909 act critically examine the act in the context of the Indian freedom struggle, (150-200 words; 10 Marks)
Approach: भूमिका में 1909 अधिनियम की पृष्ठभूमि की चर्चा कर सकते हैं। 1909 अधिनियम के प्रावधानों को बिंदुवत लिखिए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर इसके सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये। इसके महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर: 19 वीं सदी के प्रथम दशक में राष्ट्रवादियों में भारी असंतोष व्याप्त था। इस दौरान कॉंग्रेस के द्वारा भी निरंतर संवैधानिक सुधारों की मांग की जा रही थी। उदाहरण के लिए, विधायिका में भारतीयों की संख्या बधाई जाये, सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की जाये।1905, 1906 के अधिवेशन में कॉंग्रेस ने स्वशासन व स्वराज की मांग की।1905 में स्वदेशी आंदोलन के रूप में एक देशव्यापी आंदोलन, स्वशासन व आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर चलाया गया। ऐसी मांगों, आंदोलन के कारण सरकार कहीं ना कहीं चिंतित थी जिसेक्रांतिकारी राष्ट्रवादियों की गतिविधियों नेऔर बढ़ाया। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में सरकार ने भी सुधारों का आश्वासन दिया जिसकी परिणति1909 के अधिनियम से हुई। 1909 अधिनियम के मुख्य प्रावधान: वायसराय परिषद में दो स्थायी सदस्य शामिल किए गए। वायसराय परिषद में एक भारतीय सदस्य को शामिल करने का प्रावधान किया गया। अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी हालांकि अभी भी मनोनीत सदस्यों का ही बहुमत था। सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी। उदाहरण बजट पर चर्चा का अधिकार, पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार। यह अधिनियम पृथक निर्वाचन को लेकर विशेष रूप से चर्चित रहा। धर्मं के आधार पर मुस्लिम समुदाय हेतु पहली बार पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गयी। साथ ही जमींदारो एवं व्यापारियों के लिए भी सीटें आरक्षित की गयी। मुस्लिम समुदाय के लिए संपत्ति संबंधी योग्यताओं में रियायत दी गयी। 1909 अधिनियम के सकारात्मक पक्ष: वायसराय परिषद में दो स्थायी सदस्य शामिल किए गए। पहली बार वायसराय परिषद में एक भारतीय सदस्य को शामिल करने का प्रावधान किया गया। एस पी सिन्हा पहले सदस्य ऐसे पहले सदस्य बने। सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी। उदाहरण बजट पर चर्चा का अधिकार, पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार। 1909 अधिनियम की आलोचना: कॉंग्रेस के द्वारा स्वशासन की मांग लेकिन वायसराय परिषद में केवल 1 भारतीय को शामिल किया गया। प्राय: परिषद में उन्हीं सदस्यों को मनोनीत किया जाता था जिनसे सरकार से अच्छे संबंध थे। अंतत: वायसराय भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदयी था, ना की भारतीय विधायी परिषद के प्रति। सदस्यों के अधिकार भी नाममात्र के थे। निर्वाचन के लिए संपत्ति संबंधी योग्यताएँ अर्थात वयस्क मताधिकार नहीं। इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था की धर्म के आधार पर पृथक निर्वाचन का प्रावधान किया गया। यह भारतीय समाज के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया पर प्रहार था। इसने समाज को तोड़ने का कार्य किया। 1909 अधिनियम में जो सुधार किए गए थे वे तत्कालीन मांगों को पूरा करने में नाकाफी थे। इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों की मांगों को स्वीकारना ना होकर राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार करना तथा भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को मजबूत बनाना था।
##Question:1909 अधिनियम के प्रावधानों को सूचीबद्ध करते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में इस अधिनियम का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द; 10 अंक) Listing the provisions of the 1909 act critically examine the act in the context of the Indian freedom struggle, (150-200 words; 10 Marks)##Answer:Approach: भूमिका में 1909 अधिनियम की पृष्ठभूमि की चर्चा कर सकते हैं। 1909 अधिनियम के प्रावधानों को बिंदुवत लिखिए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर इसके सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये। इसके महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर: 19 वीं सदी के प्रथम दशक में राष्ट्रवादियों में भारी असंतोष व्याप्त था। इस दौरान कॉंग्रेस के द्वारा भी निरंतर संवैधानिक सुधारों की मांग की जा रही थी। उदाहरण के लिए, विधायिका में भारतीयों की संख्या बधाई जाये, सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की जाये।1905, 1906 के अधिवेशन में कॉंग्रेस ने स्वशासन व स्वराज की मांग की।1905 में स्वदेशी आंदोलन के रूप में एक देशव्यापी आंदोलन, स्वशासन व आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर चलाया गया। ऐसी मांगों, आंदोलन के कारण सरकार कहीं ना कहीं चिंतित थी जिसेक्रांतिकारी राष्ट्रवादियों की गतिविधियों नेऔर बढ़ाया। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में सरकार ने भी सुधारों का आश्वासन दिया जिसकी परिणति1909 के अधिनियम से हुई। 1909 अधिनियम के मुख्य प्रावधान: वायसराय परिषद में दो स्थायी सदस्य शामिल किए गए। वायसराय परिषद में एक भारतीय सदस्य को शामिल करने का प्रावधान किया गया। अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी हालांकि अभी भी मनोनीत सदस्यों का ही बहुमत था। सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी। उदाहरण बजट पर चर्चा का अधिकार, पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार। यह अधिनियम पृथक निर्वाचन को लेकर विशेष रूप से चर्चित रहा। धर्मं के आधार पर मुस्लिम समुदाय हेतु पहली बार पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गयी। साथ ही जमींदारो एवं व्यापारियों के लिए भी सीटें आरक्षित की गयी। मुस्लिम समुदाय के लिए संपत्ति संबंधी योग्यताओं में रियायत दी गयी। 1909 अधिनियम के सकारात्मक पक्ष: वायसराय परिषद में दो स्थायी सदस्य शामिल किए गए। पहली बार वायसराय परिषद में एक भारतीय सदस्य को शामिल करने का प्रावधान किया गया। एस पी सिन्हा पहले सदस्य ऐसे पहले सदस्य बने। सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी। उदाहरण बजट पर चर्चा का अधिकार, पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार। 1909 अधिनियम की आलोचना: कॉंग्रेस के द्वारा स्वशासन की मांग लेकिन वायसराय परिषद में केवल 1 भारतीय को शामिल किया गया। प्राय: परिषद में उन्हीं सदस्यों को मनोनीत किया जाता था जिनसे सरकार से अच्छे संबंध थे। अंतत: वायसराय भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदयी था, ना की भारतीय विधायी परिषद के प्रति। सदस्यों के अधिकार भी नाममात्र के थे। निर्वाचन के लिए संपत्ति संबंधी योग्यताएँ अर्थात वयस्क मताधिकार नहीं। इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था की धर्म के आधार पर पृथक निर्वाचन का प्रावधान किया गया। यह भारतीय समाज के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया पर प्रहार था। इसने समाज को तोड़ने का कार्य किया। 1909 अधिनियम में जो सुधार किए गए थे वे तत्कालीन मांगों को पूरा करने में नाकाफी थे। इस अधिनियम का उद्देश्य भारतीयों की मांगों को स्वीकारना ना होकर राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार करना तथा भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को मजबूत बनाना था।
50,157
आर्द्रता के विभिन्न प्रकारों की चर्चा करते हुए सापेक्ष आर्द्रता का वर्षण में महत्व स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द/ 10 अंक) Explain the importance of relative humidity in precipitation by discussing different types of humidity. (150-200 words/10 marks)
दृष्टिकोण- 1. भूमिका में आर्द्रताको परिभाषित कीजिये| 2.आर्द्रता के विभिन्न प्रकारों की संक्षेप में चर्चा कीजिये| 3. सापेक्ष आर्द्रता का वर्षण में महत्व स्पष्ट कीजिये| उत्तर- सूर्य की ऊष्मा जल को जलवाष्प में बदलतीरहती है।वायुमण्डल में उपस्थित इसी जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। दूसरे शब्दों में, आर्द्रता से तात्पर्य जलकी उस नमी से है जो किसी वायु में जलवाष्प की मात्रा के रूप में विद्यमान होती है। यह जलवाष्प ही है, जो मुख्यतः अपनी स्थिति में परिवर्तन करके ओस, पाला, मेघ, कुहरा और हिम वृष्टि के रूप में परिवर्तित होती है। आर्द्रता के प्रकार: वायु में विद्यमान आर्द्रता को निम्न तीन प्रकार से व्यक्त किया जाता है: 1. निरपेक्ष आर्द्रता-किसी इकाई आयतन की वायु में किसी समय विशेष में विद्यमान जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रतिघन मीटर में व्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिये, यदि किसी वायु की निरपेक्ष आर्द्रता 10 ग्राम है तो इसका तात्पर्य है कि उस वायु में एक घन मीटर आयतन में 10 ग्राम आर्द्रता जलवाष्प के रूप में विद्यमान है। निरपेक्ष आर्द्रता स्थान व समय के परिवर्तन के साथ बदलती रहती है। 2. सापेक्ष आर्द्रता-सापेक्ष आर्द्रता वायुमण्डलीय नमी का सबसे महत्वपूर्ण तथाविश्वसनीय माप है। सापेक्ष आर्द्रता किसी निश्चित आयतन की वायु मेंवास्तविक जलवाष्प की मात्रा तथा उसी वायु के किसी दिये गए तापमान पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता का अनुपात है। इसे प्रतिशत में व्यक्तकिया जाता है। सापेक्ष आर्द्रता = वायु मेंवाष्प दबाव/संतप्त वाष्प दबाव×100 3. विशिष्ट आर्द्रता-इसे वायु के प्रति इकाई वजन में जल वाष्प के भार के रूप में व्यक्त किया जाता है, या वायु के कुल द्रव्यमान में जल वाष्प के द्रव्यमान का अनुपात। चूंकि यह वजन की इकाइयों में मापा जाता है, विशिष्ट आर्द्रता दबाव या तापमान में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होती है। सापेक्ष आर्द्रता का वर्षण में महत्व: जब जल तरल (जल बिन्दुओं) या ठोस (हिमकणों) रूप में धरातल पर गिरता है तो उसे वर्षण कहते हैं। वायु में संघनन की सतत प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जल बिन्दुओं या हिम कणों का भार अधिक व आकार बड़ा हो जाता है तथा वे वायु में तैरते हुये रूक नहीं पाते तो पृथ्वी के धरातल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिरने लगते हैं। - कोई वायु किसी दिए गये तापमान पर जलवाष्प की एक निश्चित अधिकतम मात्रा ही अपने अन्दर धारण कर सकती है। - जब यहस्थिति आ जाती है तो हम कहते हैं कि वायु पूर्णतया संतृप्त हो गई है जिसतापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उसे ओसांक या संतृपन बिन्दुकहते हैं। किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता इस बिन्दु पर शत-प्रतिशत होती है। - जब वायु की सापेक्ष आर्द्रता शत प्रतिशत होती है तो वायु संतृप्त हो जाती है। यदि सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत से कम है तो वायु असंतृप्त कहलाती है। - सापेक्ष आर्द्रता उस समय बढ़ती है, जब वायु का तापमान गिर जाता है या उस वायु में अधिक नमी वाली वायु आकर मिल जाती है। सापेक्ष आर्द्रता उस समय घटती हैं जब वायु का तापमान बढ़ जाता है या उस वायु में कम नमी वाली वायु आकर मिल जाती है। सापेक्ष आर्द्रता के शत प्रतिशत होने पर ओसांक बिंदु पर संघनन की क्रिया होती है |संघनन वह प्रक्रिया है जिसमें वायुमंडलीय जलवाष्प जल या बर्फ के कणों में बदलती है। यह वाष्पीकरण के ठीक विपरीत प्रक्रिया है। जब किसी संतृप्त वायु का तापमान ओसांक से नीचे गिरता है तो वह वायु अपने अन्दर उतनी आर्द्रता धारण नहीं कर सकती जितनी वह पहले धारण किये हुये थी। अतः आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा, तापमान (जिस पर संघनन होता है) के अनुसार जल की सूक्ष्म बूँदों या बर्फ के कणों में बदल जाती है। और इस प्रकार वर्षण की क्रिया संपन्न होती है|
##Question:आर्द्रता के विभिन्न प्रकारों की चर्चा करते हुए सापेक्ष आर्द्रता का वर्षण में महत्व स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द/ 10 अंक) Explain the importance of relative humidity in precipitation by discussing different types of humidity. (150-200 words/10 marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1. भूमिका में आर्द्रताको परिभाषित कीजिये| 2.आर्द्रता के विभिन्न प्रकारों की संक्षेप में चर्चा कीजिये| 3. सापेक्ष आर्द्रता का वर्षण में महत्व स्पष्ट कीजिये| उत्तर- सूर्य की ऊष्मा जल को जलवाष्प में बदलतीरहती है।वायुमण्डल में उपस्थित इसी जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। दूसरे शब्दों में, आर्द्रता से तात्पर्य जलकी उस नमी से है जो किसी वायु में जलवाष्प की मात्रा के रूप में विद्यमान होती है। यह जलवाष्प ही है, जो मुख्यतः अपनी स्थिति में परिवर्तन करके ओस, पाला, मेघ, कुहरा और हिम वृष्टि के रूप में परिवर्तित होती है। आर्द्रता के प्रकार: वायु में विद्यमान आर्द्रता को निम्न तीन प्रकार से व्यक्त किया जाता है: 1. निरपेक्ष आर्द्रता-किसी इकाई आयतन की वायु में किसी समय विशेष में विद्यमान जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रतिघन मीटर में व्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिये, यदि किसी वायु की निरपेक्ष आर्द्रता 10 ग्राम है तो इसका तात्पर्य है कि उस वायु में एक घन मीटर आयतन में 10 ग्राम आर्द्रता जलवाष्प के रूप में विद्यमान है। निरपेक्ष आर्द्रता स्थान व समय के परिवर्तन के साथ बदलती रहती है। 2. सापेक्ष आर्द्रता-सापेक्ष आर्द्रता वायुमण्डलीय नमी का सबसे महत्वपूर्ण तथाविश्वसनीय माप है। सापेक्ष आर्द्रता किसी निश्चित आयतन की वायु मेंवास्तविक जलवाष्प की मात्रा तथा उसी वायु के किसी दिये गए तापमान पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता का अनुपात है। इसे प्रतिशत में व्यक्तकिया जाता है। सापेक्ष आर्द्रता = वायु मेंवाष्प दबाव/संतप्त वाष्प दबाव×100 3. विशिष्ट आर्द्रता-इसे वायु के प्रति इकाई वजन में जल वाष्प के भार के रूप में व्यक्त किया जाता है, या वायु के कुल द्रव्यमान में जल वाष्प के द्रव्यमान का अनुपात। चूंकि यह वजन की इकाइयों में मापा जाता है, विशिष्ट आर्द्रता दबाव या तापमान में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होती है। सापेक्ष आर्द्रता का वर्षण में महत्व: जब जल तरल (जल बिन्दुओं) या ठोस (हिमकणों) रूप में धरातल पर गिरता है तो उसे वर्षण कहते हैं। वायु में संघनन की सतत प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जल बिन्दुओं या हिम कणों का भार अधिक व आकार बड़ा हो जाता है तथा वे वायु में तैरते हुये रूक नहीं पाते तो पृथ्वी के धरातल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिरने लगते हैं। - कोई वायु किसी दिए गये तापमान पर जलवाष्प की एक निश्चित अधिकतम मात्रा ही अपने अन्दर धारण कर सकती है। - जब यहस्थिति आ जाती है तो हम कहते हैं कि वायु पूर्णतया संतृप्त हो गई है जिसतापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उसे ओसांक या संतृपन बिन्दुकहते हैं। किसी वायु की सापेक्ष आर्द्रता इस बिन्दु पर शत-प्रतिशत होती है। - जब वायु की सापेक्ष आर्द्रता शत प्रतिशत होती है तो वायु संतृप्त हो जाती है। यदि सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत से कम है तो वायु असंतृप्त कहलाती है। - सापेक्ष आर्द्रता उस समय बढ़ती है, जब वायु का तापमान गिर जाता है या उस वायु में अधिक नमी वाली वायु आकर मिल जाती है। सापेक्ष आर्द्रता उस समय घटती हैं जब वायु का तापमान बढ़ जाता है या उस वायु में कम नमी वाली वायु आकर मिल जाती है। सापेक्ष आर्द्रता के शत प्रतिशत होने पर ओसांक बिंदु पर संघनन की क्रिया होती है |संघनन वह प्रक्रिया है जिसमें वायुमंडलीय जलवाष्प जल या बर्फ के कणों में बदलती है। यह वाष्पीकरण के ठीक विपरीत प्रक्रिया है। जब किसी संतृप्त वायु का तापमान ओसांक से नीचे गिरता है तो वह वायु अपने अन्दर उतनी आर्द्रता धारण नहीं कर सकती जितनी वह पहले धारण किये हुये थी। अतः आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा, तापमान (जिस पर संघनन होता है) के अनुसार जल की सूक्ष्म बूँदों या बर्फ के कणों में बदल जाती है। और इस प्रकार वर्षण की क्रिया संपन्न होती है|
50,159
भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए, इसके जलवायु दशाओं की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While discussing the location and extension of the Mediterranean climatic region, discuss its climatic conditions. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश के जलवायु दशाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - उष्ण शीतोष्ण पश्चिमी सीमान्त (भूमध्यसागरीय) जलवायु स्थिति एवं विस्तार भूमध्यसागरीय जलवायु विश्व के अपेक्षाकृत कुछ ही क्षेत्रों में पायी जाती है | यह जलवायु मह्द्वीपों के पश्चिमी भागों में पायी जाती है | यह क्षेत्र विषुवत रेखा के दोनों ओर 30-45 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच फैले हुए हैं | इस प्रकार की जलवायु की उत्पत्ति का मूल कारण सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण पवन पेटियों का स्थानांतरित होना है | इस कारण यह क्षेत्र शीत ऋतु में पछुवा पवनों के प्रवाह क्षेत्र में तथा ग्रीष्म ऋतु में व्यापारिक पवनों के प्रवाह क्षेत्र में आ जाता है | इस प्रकार की जलवायु का भूमध्यसागर के चारों ओर अधिक है, इसी कारण इस जलवायु को भूमध्यसागरीय जलवायु कहा जाता है | भूमध्यसागरीय जलवायु के अन्य क्षेत्रों में मध्यवर्ती कैलिफोर्निया, दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया सम्मिलित है | जलवायु दशाएं तापमान शीतकाल में औसत तापमान 5-10 डिग्री तक होता है , जबकि ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 20-27 डिग्री तक पहुँच जाता है | इस प्रकार वार्षिक तापान्तर 15-17 डिग्री या इससे भी अधिक हो जाता है | वर्षण इस जलवायु की मुख्य विशेषता "शीत ऋतु में वर्षा" का होना है | भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों में लगभग सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा शीत ऋतु के दौरान ही प्राप्त होती है तथा ग्रीष्म ऋतु में बहुत ही कम वर्षा होती है | वार्षिक वर्षा का औसत 35-75 cm. तक होता है | शीत ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने वाली पछुवा पवनों के कारण वर्षा की अधिकता होती है | जबकि ग्रीष्म ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होने वाली व्यापारिक पवनों के कारण मौसम उष्ण एवं शुष्क रहता है | प्राकृतिक वनस्पति इस जलवायु में मुख्य रूप से चेस्टनट,ओक,साइप्रस सिडार आदि वृक्ष पाए जाते हैं | ये वृक्ष दूर-दूर पाए जाते हैं तथा इनकी ऊंचाई भी कम होती है | इन वृक्षों पर पत्तियों की संख्या भी कम होती हैं | साथ ही पत्तियां कम चौड़ी एवं छोटी होती हैं | पत्तियों का नहीं झड़ना भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों की एक मुख्य विशेषता है | भूमध्यसागरीय क्षेत्रों को विश्व के "फलों के बगीचे" के रूप में भी जाना जाता है | यह प्रदेश अंजीर, शहतूत, नीबू, मौसमी जैसे विभिन्न रसदार फलों के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्द है | वाइन का उत्पादन भूमध्यसागरीय देशों की एक अन्य विशेषता है, क्योंकि इस क्षेत्र में अंगूरों की कृषि व्यापक स्तर पर की जाती है | इन क्षेत्रों में उत्पादित अंगूर के 85 प्रतिशत भाग का उपयोग वाइन बनाने के लिए ही किया जाता है | यहाँ की दीर्घ एवं उष्ण ग्रीष्म ऋतु अंगूर पकने हेतु अनुकूल जलवायु प्रदान करती है | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास यह क्षेत्र फलों की कृषि, खाद्यान्न उत्पादन, वाइन बनाने तथा इंजीनीयरिंग, खनन एवं कृषि उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है |
##Question:भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए, इसके जलवायु दशाओं की चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) While discussing the location and extension of the Mediterranean climatic region, discuss its climatic conditions. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश के जलवायु दशाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - उष्ण शीतोष्ण पश्चिमी सीमान्त (भूमध्यसागरीय) जलवायु स्थिति एवं विस्तार भूमध्यसागरीय जलवायु विश्व के अपेक्षाकृत कुछ ही क्षेत्रों में पायी जाती है | यह जलवायु मह्द्वीपों के पश्चिमी भागों में पायी जाती है | यह क्षेत्र विषुवत रेखा के दोनों ओर 30-45 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच फैले हुए हैं | इस प्रकार की जलवायु की उत्पत्ति का मूल कारण सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण पवन पेटियों का स्थानांतरित होना है | इस कारण यह क्षेत्र शीत ऋतु में पछुवा पवनों के प्रवाह क्षेत्र में तथा ग्रीष्म ऋतु में व्यापारिक पवनों के प्रवाह क्षेत्र में आ जाता है | इस प्रकार की जलवायु का भूमध्यसागर के चारों ओर अधिक है, इसी कारण इस जलवायु को भूमध्यसागरीय जलवायु कहा जाता है | भूमध्यसागरीय जलवायु के अन्य क्षेत्रों में मध्यवर्ती कैलिफोर्निया, दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया सम्मिलित है | जलवायु दशाएं तापमान शीतकाल में औसत तापमान 5-10 डिग्री तक होता है , जबकि ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 20-27 डिग्री तक पहुँच जाता है | इस प्रकार वार्षिक तापान्तर 15-17 डिग्री या इससे भी अधिक हो जाता है | वर्षण इस जलवायु की मुख्य विशेषता "शीत ऋतु में वर्षा" का होना है | भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों में लगभग सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा शीत ऋतु के दौरान ही प्राप्त होती है तथा ग्रीष्म ऋतु में बहुत ही कम वर्षा होती है | वार्षिक वर्षा का औसत 35-75 cm. तक होता है | शीत ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने वाली पछुवा पवनों के कारण वर्षा की अधिकता होती है | जबकि ग्रीष्म ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होने वाली व्यापारिक पवनों के कारण मौसम उष्ण एवं शुष्क रहता है | प्राकृतिक वनस्पति इस जलवायु में मुख्य रूप से चेस्टनट,ओक,साइप्रस सिडार आदि वृक्ष पाए जाते हैं | ये वृक्ष दूर-दूर पाए जाते हैं तथा इनकी ऊंचाई भी कम होती है | इन वृक्षों पर पत्तियों की संख्या भी कम होती हैं | साथ ही पत्तियां कम चौड़ी एवं छोटी होती हैं | पत्तियों का नहीं झड़ना भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों की एक मुख्य विशेषता है | भूमध्यसागरीय क्षेत्रों को विश्व के "फलों के बगीचे" के रूप में भी जाना जाता है | यह प्रदेश अंजीर, शहतूत, नीबू, मौसमी जैसे विभिन्न रसदार फलों के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्द है | वाइन का उत्पादन भूमध्यसागरीय देशों की एक अन्य विशेषता है, क्योंकि इस क्षेत्र में अंगूरों की कृषि व्यापक स्तर पर की जाती है | इन क्षेत्रों में उत्पादित अंगूर के 85 प्रतिशत भाग का उपयोग वाइन बनाने के लिए ही किया जाता है | यहाँ की दीर्घ एवं उष्ण ग्रीष्म ऋतु अंगूर पकने हेतु अनुकूल जलवायु प्रदान करती है | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास यह क्षेत्र फलों की कृषि, खाद्यान्न उत्पादन, वाइन बनाने तथा इंजीनीयरिंग, खनन एवं कृषि उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है |
50,177
भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए, इसके जलवायु दशाओं का उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) While discussing the location and extension of the Mediterranean climatic region, describe its climatic conditions. (150-200 words/10 Marks)
एप्रोच - भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश के जलवायु दशाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - उष्ण शीतोष्ण पश्चिमी सीमान्त (भूमध्यसागरीय) जलवायु स्थिति एवं विस्तार भूमध्यसागरीय जलवायु विश्व के अपेक्षाकृत कुछ ही क्षेत्रों में पायी जाती है | यह जलवायु मह्द्वीपों के पश्चिमी भागों में पायी जाती है | यह क्षेत्र विषुवत रेखा के दोनों ओर 30-45 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच फैले हुए हैं | इस प्रकार की जलवायु की उत्पत्ति का मूल कारण सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण पवन पेटियों का स्थानांतरित होना है | इस कारण यह क्षेत्र शीत ऋतु में पछुवा पवनों के प्रवाह क्षेत्र में तथा ग्रीष्म ऋतु में व्यापारिक पवनों के प्रवाह क्षेत्र में आ जाता है | इस प्रकार की जलवायु का भूमध्यसागर के चारों ओर अधिक है, इसी कारण इस जलवायु को भूमध्यसागरीय जलवायु कहा जाता है | भूमध्यसागरीय जलवायु के अन्य क्षेत्रों में मध्यवर्ती कैलिफोर्निया, दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया सम्मिलित है | जलवायु दशाएं तापमान शीतकाल में औसत तापमान 5-10 डिग्री तक होता है , जबकि ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 20-27 डिग्री तक पहुँच जाता है | इस प्रकार वार्षिक तापान्तर 15-17 डिग्री या इससे भी अधिक हो जाता है | वर्षण इस जलवायु की मुख्य विशेषता "शीत ऋतु में वर्षा" का होना है | भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों में लगभग सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा शीत ऋतु के दौरान ही प्राप्त होती है तथा ग्रीष्म ऋतु में बहुत ही कम वर्षा होती है | वार्षिक वर्षा का औसत 35-75 cm. तक होता है | शीत ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने वाली पछुवा पवनों के कारण वर्षा की अधिकता होती है | जबकि ग्रीष्म ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होने वाली व्यापारिक पवनों के कारण मौसम उष्ण एवं शुष्क रहता है | प्राकृतिक वनस्पति इस जलवायु में मुख्य रूप से चेस्टनट,ओक,साइप्रस सिडार आदि वृक्ष पाए जाते हैं | ये वृक्ष दूर-दूर पाए जाते हैं तथा इनकी ऊंचाई भी कम होती है | इन वृक्षों पर पत्तियों की संख्या भी कम होती हैं | साथ ही पत्तियां कम चौड़ी एवं छोटी होती हैं | पत्तियों का नहीं झड़ना भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों की एक मुख्य विशेषता है | भूमध्यसागरीय क्षेत्रों को विश्व के "फलों के बगीचे" के रूप में भी जाना जाता है | यह प्रदेश अंजीर, शहतूत, नीबू, मौसमी जैसे विभिन्न रसदार फलों के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्द है | वाइन का उत्पादन भूमध्यसागरीय देशों की एक अन्य विशेषता है, क्योंकि इस क्षेत्र में अंगूरों की कृषि व्यापक स्तर पर की जाती है | इन क्षेत्रों में उत्पादित अंगूर के 85 प्रतिशत भाग का उपयोग वाइन बनाने के लिए ही किया जाता है | यहाँ की दीर्घ एवं उष्ण ग्रीष्म ऋतु अंगूर पकने हेतु अनुकूल जलवायु प्रदान करती है | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास यह क्षेत्र फलों की कृषि, खाद्यान्न उत्पादन, वाइन बनाने तथा इंजीनीयरिंग, खनन एवं कृषि उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है |
##Question:भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए, इसके जलवायु दशाओं का उल्लेख कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक ) While discussing the location and extension of the Mediterranean climatic region, describe its climatic conditions. (150-200 words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश की स्थिति एवं विस्तार की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये | इसके पश्चात भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेश के जलवायु दशाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - उष्ण शीतोष्ण पश्चिमी सीमान्त (भूमध्यसागरीय) जलवायु स्थिति एवं विस्तार भूमध्यसागरीय जलवायु विश्व के अपेक्षाकृत कुछ ही क्षेत्रों में पायी जाती है | यह जलवायु मह्द्वीपों के पश्चिमी भागों में पायी जाती है | यह क्षेत्र विषुवत रेखा के दोनों ओर 30-45 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच फैले हुए हैं | इस प्रकार की जलवायु की उत्पत्ति का मूल कारण सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के कारण पवन पेटियों का स्थानांतरित होना है | इस कारण यह क्षेत्र शीत ऋतु में पछुवा पवनों के प्रवाह क्षेत्र में तथा ग्रीष्म ऋतु में व्यापारिक पवनों के प्रवाह क्षेत्र में आ जाता है | इस प्रकार की जलवायु का भूमध्यसागर के चारों ओर अधिक है, इसी कारण इस जलवायु को भूमध्यसागरीय जलवायु कहा जाता है | भूमध्यसागरीय जलवायु के अन्य क्षेत्रों में मध्यवर्ती कैलिफोर्निया, दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया सम्मिलित है | जलवायु दशाएं तापमान शीतकाल में औसत तापमान 5-10 डिग्री तक होता है , जबकि ग्रीष्मकालीन औसत तापमान 20-27 डिग्री तक पहुँच जाता है | इस प्रकार वार्षिक तापान्तर 15-17 डिग्री या इससे भी अधिक हो जाता है | वर्षण इस जलवायु की मुख्य विशेषता "शीत ऋतु में वर्षा" का होना है | भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों में लगभग सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा शीत ऋतु के दौरान ही प्राप्त होती है तथा ग्रीष्म ऋतु में बहुत ही कम वर्षा होती है | वार्षिक वर्षा का औसत 35-75 cm. तक होता है | शीत ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होने वाली पछुवा पवनों के कारण वर्षा की अधिकता होती है | जबकि ग्रीष्म ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होने वाली व्यापारिक पवनों के कारण मौसम उष्ण एवं शुष्क रहता है | प्राकृतिक वनस्पति इस जलवायु में मुख्य रूप से चेस्टनट,ओक,साइप्रस सिडार आदि वृक्ष पाए जाते हैं | ये वृक्ष दूर-दूर पाए जाते हैं तथा इनकी ऊंचाई भी कम होती है | इन वृक्षों पर पत्तियों की संख्या भी कम होती हैं | साथ ही पत्तियां कम चौड़ी एवं छोटी होती हैं | पत्तियों का नहीं झड़ना भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्रों की एक मुख्य विशेषता है | भूमध्यसागरीय क्षेत्रों को विश्व के "फलों के बगीचे" के रूप में भी जाना जाता है | यह प्रदेश अंजीर, शहतूत, नीबू, मौसमी जैसे विभिन्न रसदार फलों के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्द है | वाइन का उत्पादन भूमध्यसागरीय देशों की एक अन्य विशेषता है, क्योंकि इस क्षेत्र में अंगूरों की कृषि व्यापक स्तर पर की जाती है | इन क्षेत्रों में उत्पादित अंगूर के 85 प्रतिशत भाग का उपयोग वाइन बनाने के लिए ही किया जाता है | यहाँ की दीर्घ एवं उष्ण ग्रीष्म ऋतु अंगूर पकने हेतु अनुकूल जलवायु प्रदान करती है | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास यह क्षेत्र फलों की कृषि, खाद्यान्न उत्पादन, वाइन बनाने तथा इंजीनीयरिंग, खनन एवं कृषि उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है |
50,182
साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही इसके जलवायु दशाओं का भी वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Give a general introduction to the Siberian climatic region. Also, describe its climatic conditions. (150-200 Words/10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का विस्तार में वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश स्थिति एवं विस्तार यह जलवायु मुख्य रूप से केवल उत्तरी गोलार्द्ध में 45-70 डिग्री अक्षांशों में स्थित महाद्वीपों पर पूर्व से पश्चिम दिशा में पायी जाती है | उत्तरी ध्रुव की ओर, आर्कटिक वृत्त के निकट यह जलवायु कनाडा एवं यूरेशिया की आर्कटिक टुन्ड्रा जलवायु में मिल जाती है | दक्षिणी गोलार्द्ध में साइबेरियन जलवायु नहीं पायी जाती क्योंकि यहाँ मह्द्वीपों का उच्च अक्षांशों में व्यापक विस्तार नहीं पाया जाता है | सशक्त महासागरीय प्रभाव के कारण यहाँ शीत ऋतु की प्रबलता में कमी आ जाती है | आदि जलवायु दशाएं तापमान दीर्घकालीन शीत ऋतु तथा कम उष्ण एवं लघु ग्रीष्म ऋतु साइबेरिया तुल्य जलवायु की विशेषताएं हैं | बसंत एवं शरद ऋतुओं की अवधि बहुत ही अल्प होती है | इस जलवायु में सर्वाधिक वार्षिक तापान्तर पाया जाता है | साइबेरिया में तापमान बहुत कम होता है इसीलिए इसे प्रायः उत्तरी गोलार्द्ध के शीत ध्रुव के रूप में जाना जाता है | साइबेरिया में स्थित बर्खोयान्स्क में विश्व का सबसे कम तापमान रिकार्ड किया गया है | वर्षण समुद्र से दूर स्थित होने के कारण यूरेशिया के आतंरिक भाग समुद्री प्रभाव से प्रभावित नहीं होते हैं परिणामस्वरुप इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा अधिक नहीं होती | यहाँ कुल वर्षा 40-65 cm. के आस-पास होती है, ग्रीष्म ऋतु में संवहनीय प्रकार की वर्षा अधिक होती है | प्राकृतिक वनस्पति साइबेरिया तुल्य जलवायु में मुख्य रूप से शंकुधारी वनस्पति पायी जाती हैं | यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरिका के शंकुधारी वनों की लकड़ियाँ काफी मुलायम होती हैं | इस लकड़ी का उपयोग भवन निर्माण, फर्नीचर, माचिस, कागज़ एवं लुगदी, रेयान एवं रसायन उद्योग आदि के लिए किया जाता है | रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा एवं स्कैंडीवियन देश विश्व के सबसे बड़े मुलायम लकड़ी के उत्पादक देश हैं | कनाडा विश्व में अखबारी कागज़ का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश है तथा विश्व के कुल उत्पादन के लगभग आधे भाग का उत्पादन कनाडा द्वारा किया जाता है | शंकुधारी वनों की चार प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ हैं- चीड़ (पाइन), देवदार, स्प्रूस एवं लार्च | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास अधिक शीत क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र में जनसंख्या काफी वायरल है | इस क्षेत्र में मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन एवं लकड़ी उद्योग है | उत्तरी गोलार्द्ध के शंकुधारी वन तुलनात्मक रूप से कम विकसित हैं | अपेक्षाकृत सुगम्य क्षेत्रों में ही वनों की कटाई की जाती है | इन क्षेत्रों में अल्प मात्रा में ही सही परन्तु कृषि की जाती है, चूंकि कुछ फसलें इन उत्तरी भूमियों के उप-आर्कटिक जलवायु क्षेत्र में पैदा की जा सकती है | साइबेरिया के अधिकांश सेमोएड एवं याकुत जनजातीय लोग तथा कनाडा में कुछ लोग शिकार, मत्स्यन आदि कार्यों में संलग्न हैं |
##Question:साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही इसके जलवायु दशाओं का भी वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द/10 अंक) Give a general introduction to the Siberian climatic region. Also, describe its climatic conditions. (150-200 Words/10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का विस्तार में वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश स्थिति एवं विस्तार यह जलवायु मुख्य रूप से केवल उत्तरी गोलार्द्ध में 45-70 डिग्री अक्षांशों में स्थित महाद्वीपों पर पूर्व से पश्चिम दिशा में पायी जाती है | उत्तरी ध्रुव की ओर, आर्कटिक वृत्त के निकट यह जलवायु कनाडा एवं यूरेशिया की आर्कटिक टुन्ड्रा जलवायु में मिल जाती है | दक्षिणी गोलार्द्ध में साइबेरियन जलवायु नहीं पायी जाती क्योंकि यहाँ मह्द्वीपों का उच्च अक्षांशों में व्यापक विस्तार नहीं पाया जाता है | सशक्त महासागरीय प्रभाव के कारण यहाँ शीत ऋतु की प्रबलता में कमी आ जाती है | आदि जलवायु दशाएं तापमान दीर्घकालीन शीत ऋतु तथा कम उष्ण एवं लघु ग्रीष्म ऋतु साइबेरिया तुल्य जलवायु की विशेषताएं हैं | बसंत एवं शरद ऋतुओं की अवधि बहुत ही अल्प होती है | इस जलवायु में सर्वाधिक वार्षिक तापान्तर पाया जाता है | साइबेरिया में तापमान बहुत कम होता है इसीलिए इसे प्रायः उत्तरी गोलार्द्ध के शीत ध्रुव के रूप में जाना जाता है | साइबेरिया में स्थित बर्खोयान्स्क में विश्व का सबसे कम तापमान रिकार्ड किया गया है | वर्षण समुद्र से दूर स्थित होने के कारण यूरेशिया के आतंरिक भाग समुद्री प्रभाव से प्रभावित नहीं होते हैं परिणामस्वरुप इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा अधिक नहीं होती | यहाँ कुल वर्षा 40-65 cm. के आस-पास होती है, ग्रीष्म ऋतु में संवहनीय प्रकार की वर्षा अधिक होती है | प्राकृतिक वनस्पति साइबेरिया तुल्य जलवायु में मुख्य रूप से शंकुधारी वनस्पति पायी जाती हैं | यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरिका के शंकुधारी वनों की लकड़ियाँ काफी मुलायम होती हैं | इस लकड़ी का उपयोग भवन निर्माण, फर्नीचर, माचिस, कागज़ एवं लुगदी, रेयान एवं रसायन उद्योग आदि के लिए किया जाता है | रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा एवं स्कैंडीवियन देश विश्व के सबसे बड़े मुलायम लकड़ी के उत्पादक देश हैं | कनाडा विश्व में अखबारी कागज़ का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश है तथा विश्व के कुल उत्पादन के लगभग आधे भाग का उत्पादन कनाडा द्वारा किया जाता है | शंकुधारी वनों की चार प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ हैं- चीड़ (पाइन), देवदार, स्प्रूस एवं लार्च | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास अधिक शीत क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र में जनसंख्या काफी वायरल है | इस क्षेत्र में मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन एवं लकड़ी उद्योग है | उत्तरी गोलार्द्ध के शंकुधारी वन तुलनात्मक रूप से कम विकसित हैं | अपेक्षाकृत सुगम्य क्षेत्रों में ही वनों की कटाई की जाती है | इन क्षेत्रों में अल्प मात्रा में ही सही परन्तु कृषि की जाती है, चूंकि कुछ फसलें इन उत्तरी भूमियों के उप-आर्कटिक जलवायु क्षेत्र में पैदा की जा सकती है | साइबेरिया के अधिकांश सेमोएड एवं याकुत जनजातीय लोग तथा कनाडा में कुछ लोग शिकार, मत्स्यन आदि कार्यों में संलग्न हैं |
50,196
उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए आवश्यक शर्तों की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत कीजिए । (150-200 शब्द, अंक -10 ) Present a brief discussion of the conditions required for a tropical cyclone. (150-200 words, marks-10 )
दृष्टिकोण : उष्णकटिबंधीय चक्रवात की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए आवश्यक शर्तों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : चक्रवात निम्न वायुदाब के ऐसे केंद्र होते हैं, जिनके चारों तरफ सकेन्द्रीय समदाब रेखाएं विस्तृत होती हैं तथा केंद्र से बाहर की ओर वायुदाब बढ़ता जाता है । इसके परिणामस्वरूप परिधि से केंद्र की ओर पवनें प्रवाहित होने लगता है । चक्रवात दो प्रकार के होते हैं । उष्णकटिबंधीय चक्रवात व शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात । उष्णकटिबंधीय चक्रवात अत्यधिक शक्तिशाली तथा विनाशकारी होते हैं जो गर्म उष्णकटिबंधीय महासागरों की सतह पर उत्पन्न होते हैं तथा तटीय क्षेत्र की ओर गतिमान होते हैं । उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के लिए आवश्यक दशाएं : वृहत व उष्ण समुद्री सतह : उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए औसत 27*C व उसके अधिक के तापमान की आवश्यकता होती है । यही कारण है कि ये चक्रवात उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ही मिलते हैं । उच्च मान वाले कोरियोलिस बल का होना : इसके लिए उच्च मान वाले कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है । यही कारण है कि भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5*-8* अक्षांश वाले क्षेत्रों में न्यूनतम कोरियोलिस बल के कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न नहीं होते हैं । इनकी उत्पत्ति मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी तट पर होती है । क्योंकि पश्चिमी तट पर व्यापारिक पवनें सुदूरवर्ती हो जाती हैं, जिनमें नमी की पर्याप्त मात्रा का अभाव रहता है । इस कारण संघनन की गुप्त ऊष्मा के द्वारा नमी की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाती है । ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में न्यून अंतर होना । गर्म एवं आर्द्र वायु की निरंतर आपूर्ति जिससे की ऊर्जा की प्राप्ति होती रहे । ऊपरी वायुमंडल में प्रतिचक्रवातीय स्थिति के लिए अनुकूलन होना चाहिए । लगभग 9000 से 15000 मीटर की ऊंचाई पर प्रतिचक्रवातीय परिसंचरण की आवश्यकता होती है । पहले से उपस्थित एक निम्न वायुदाब केंद्र की आवश्यकता होती है । उपरोक्त दशाओं की उपस्थिति उष्णकटिबंधीय महासागरों में ही होती है । यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो इन चक्रवातों की सर्वाधिक आवृति पूर्वी चीन सागर में मिलती है । इसके अतिरिक्त कैरेबियन सागर, हिन्द महासागर, और फिलीपींस आदि के क्षेत्रो भी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से काफी प्रभावित रहते हैं ।
##Question:उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए आवश्यक शर्तों की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत कीजिए । (150-200 शब्द, अंक -10 ) Present a brief discussion of the conditions required for a tropical cyclone. (150-200 words, marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण : उष्णकटिबंधीय चक्रवात की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए आवश्यक शर्तों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : चक्रवात निम्न वायुदाब के ऐसे केंद्र होते हैं, जिनके चारों तरफ सकेन्द्रीय समदाब रेखाएं विस्तृत होती हैं तथा केंद्र से बाहर की ओर वायुदाब बढ़ता जाता है । इसके परिणामस्वरूप परिधि से केंद्र की ओर पवनें प्रवाहित होने लगता है । चक्रवात दो प्रकार के होते हैं । उष्णकटिबंधीय चक्रवात व शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात । उष्णकटिबंधीय चक्रवात अत्यधिक शक्तिशाली तथा विनाशकारी होते हैं जो गर्म उष्णकटिबंधीय महासागरों की सतह पर उत्पन्न होते हैं तथा तटीय क्षेत्र की ओर गतिमान होते हैं । उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के लिए आवश्यक दशाएं : वृहत व उष्ण समुद्री सतह : उष्णकटिबंधीय चक्रवात के लिए औसत 27*C व उसके अधिक के तापमान की आवश्यकता होती है । यही कारण है कि ये चक्रवात उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ही मिलते हैं । उच्च मान वाले कोरियोलिस बल का होना : इसके लिए उच्च मान वाले कोरियोलिस बल की आवश्यकता होती है । यही कारण है कि भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5*-8* अक्षांश वाले क्षेत्रों में न्यूनतम कोरियोलिस बल के कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न नहीं होते हैं । इनकी उत्पत्ति मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी तट पर होती है । क्योंकि पश्चिमी तट पर व्यापारिक पवनें सुदूरवर्ती हो जाती हैं, जिनमें नमी की पर्याप्त मात्रा का अभाव रहता है । इस कारण संघनन की गुप्त ऊष्मा के द्वारा नमी की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाती है । ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में न्यून अंतर होना । गर्म एवं आर्द्र वायु की निरंतर आपूर्ति जिससे की ऊर्जा की प्राप्ति होती रहे । ऊपरी वायुमंडल में प्रतिचक्रवातीय स्थिति के लिए अनुकूलन होना चाहिए । लगभग 9000 से 15000 मीटर की ऊंचाई पर प्रतिचक्रवातीय परिसंचरण की आवश्यकता होती है । पहले से उपस्थित एक निम्न वायुदाब केंद्र की आवश्यकता होती है । उपरोक्त दशाओं की उपस्थिति उष्णकटिबंधीय महासागरों में ही होती है । यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो इन चक्रवातों की सर्वाधिक आवृति पूर्वी चीन सागर में मिलती है । इसके अतिरिक्त कैरेबियन सागर, हिन्द महासागर, और फिलीपींस आदि के क्षेत्रो भी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से काफी प्रभावित रहते हैं ।
50,198
साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही इसके जलवायु दशाओं का भी वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) Give a general introduction to the Siberain climatic region. Also describe its climatic conditions. (150-200 Words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का विस्तार में वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश स्थिति एवं विस्तार यह जलवायु मुख्य रूप से केवल उत्तरी गोलार्द्ध में 45-70 डिग्री अक्षांशों में स्थित महाद्वीपों पर पूर्व से पश्चिम दिशा में पायी जाती है | उत्तरी ध्रुव की ओर, आर्कटिक वृत्त के निकट यह जलवायु कनाडा एवं यूरेशिया की आर्कटिक टुन्ड्रा जलवायु में मिल जाती है | दक्षिणी गोलार्द्ध में साइबेरियन जलवायु नहीं पायी जाती क्योंकि यहाँ मह्द्वीपों का उच्च अक्षांशों में व्यापक विस्तार नहीं पाया जाता है | सशक्त महासागरीय प्रभाव के कारण यहाँ शीत ऋतु की प्रबलता में कमी आ जाती है | आदि जलवायु दशाएं तापमान दीर्घकालीन शीत ऋतु तथा कम उष्ण एवं लघु ग्रीष्म ऋतु साइबेरिया तुल्य जलवायु की विशेषताएं हैं | बसंत एवं शरद ऋतुओं की अवधि बहुत ही अल्प होती है | इस जलवायु में सर्वाधिक वार्षिक तापान्तर पाया जाता है | साइबेरिया में तापमान बहुत कम होता है इसीलिए इसे प्रायः उत्तरी गोलार्द्ध के शीत ध्रुव के रूप में जाना जाता है | साइबेरिया में स्थित बर्खोयान्स्क में विश्व का सबसे कम तापमान रिकार्ड किया गया है | वर्षण समुद्र से दूर स्थित होने के कारण यूरेशिया के आतंरिक भाग समुद्री प्रभाव से प्रभावित नहीं होते हैं परिणामस्वरुप इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा अधिक नहीं होती | यहाँ कुल वर्षा 40-65 cm. के आस-पास होती है, ग्रीष्म ऋतु में संवहनीय प्रकार की वर्षा अधिक होती है | प्राकृतिक वनस्पति साइबेरिया तुल्य जलवायु में मुख्य रूप से शंकुधारी वनस्पति पायी जाती हैं | यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरिका के शंकुधारी वनों की लकड़ियाँ काफी मुलायम होती हैं | इस लकड़ी का उपयोग भवन निर्माण, फर्नीचर, माचिस, कागज़ एवं लुगदी, रेयान एवं रसायन उद्योग आदि के लिए किया जाता है | रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा एवं स्कैंडीवियन देश विश्व के सबसे बड़े मुलायम लकड़ी के उत्पादक देश हैं | कनाडा विश्व में अखबारी कागज़ का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश है तथा विश्व के कुल उत्पादन के लगभग आधे भाग का उत्पादन कनाडा द्वारा किया जाता है | शंकुधारी वनों की चार प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ हैं- चीड़ (पाइन), देवदार, स्प्रूस एवं लार्च | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास अधिक शीत क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र में जनसंख्या काफी वायरल है | इस क्षेत्र में मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन एवं लकड़ी उद्योग है | उत्तरी गोलार्द्ध के शंकुधारी वन तुलनात्मक रूप से कम विकसित हैं | अपेक्षाकृत सुगम्य क्षेत्रों में ही वनों की कटाई की जाती है | इन क्षेत्रों में अल्प मात्रा में ही सही परन्तु कृषि की जाती है, चूंकि कुछ फसलें इन उत्तरी भूमियों के उप-आर्कटिक जलवायु क्षेत्र में पैदा की जा सकती है | साइबेरिया के अधिकांश सेमोएड एवं याकुत जनजातीय लोग तथा कनाडा में कुछ लोग शिकार, मत्स्यन आदि कार्यों में संलग्न हैं |
##Question:साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय दीजिये | साथ ही इसके जलवायु दशाओं का भी वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द) Give a general introduction to the Siberain climatic region. Also describe its climatic conditions. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश का विस्तार में वर्णन करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - साइबेरिया तुल्य जलवायु प्रदेश स्थिति एवं विस्तार यह जलवायु मुख्य रूप से केवल उत्तरी गोलार्द्ध में 45-70 डिग्री अक्षांशों में स्थित महाद्वीपों पर पूर्व से पश्चिम दिशा में पायी जाती है | उत्तरी ध्रुव की ओर, आर्कटिक वृत्त के निकट यह जलवायु कनाडा एवं यूरेशिया की आर्कटिक टुन्ड्रा जलवायु में मिल जाती है | दक्षिणी गोलार्द्ध में साइबेरियन जलवायु नहीं पायी जाती क्योंकि यहाँ मह्द्वीपों का उच्च अक्षांशों में व्यापक विस्तार नहीं पाया जाता है | सशक्त महासागरीय प्रभाव के कारण यहाँ शीत ऋतु की प्रबलता में कमी आ जाती है | आदि जलवायु दशाएं तापमान दीर्घकालीन शीत ऋतु तथा कम उष्ण एवं लघु ग्रीष्म ऋतु साइबेरिया तुल्य जलवायु की विशेषताएं हैं | बसंत एवं शरद ऋतुओं की अवधि बहुत ही अल्प होती है | इस जलवायु में सर्वाधिक वार्षिक तापान्तर पाया जाता है | साइबेरिया में तापमान बहुत कम होता है इसीलिए इसे प्रायः उत्तरी गोलार्द्ध के शीत ध्रुव के रूप में जाना जाता है | साइबेरिया में स्थित बर्खोयान्स्क में विश्व का सबसे कम तापमान रिकार्ड किया गया है | वर्षण समुद्र से दूर स्थित होने के कारण यूरेशिया के आतंरिक भाग समुद्री प्रभाव से प्रभावित नहीं होते हैं परिणामस्वरुप इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा अधिक नहीं होती | यहाँ कुल वर्षा 40-65 cm. के आस-पास होती है, ग्रीष्म ऋतु में संवहनीय प्रकार की वर्षा अधिक होती है | प्राकृतिक वनस्पति साइबेरिया तुल्य जलवायु में मुख्य रूप से शंकुधारी वनस्पति पायी जाती हैं | यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरिका के शंकुधारी वनों की लकड़ियाँ काफी मुलायम होती हैं | इस लकड़ी का उपयोग भवन निर्माण, फर्नीचर, माचिस, कागज़ एवं लुगदी, रेयान एवं रसायन उद्योग आदि के लिए किया जाता है | रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा एवं स्कैंडीवियन देश विश्व के सबसे बड़े मुलायम लकड़ी के उत्पादक देश हैं | कनाडा विश्व में अखबारी कागज़ का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश है तथा विश्व के कुल उत्पादन के लगभग आधे भाग का उत्पादन कनाडा द्वारा किया जाता है | शंकुधारी वनों की चार प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ हैं- चीड़ (पाइन), देवदार, स्प्रूस एवं लार्च | जन-जीवन एवं आर्थिक विकास अधिक शीत क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र में जनसंख्या काफी वायरल है | इस क्षेत्र में मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन एवं लकड़ी उद्योग है | उत्तरी गोलार्द्ध के शंकुधारी वन तुलनात्मक रूप से कम विकसित हैं | अपेक्षाकृत सुगम्य क्षेत्रों में ही वनों की कटाई की जाती है | इन क्षेत्रों में अल्प मात्रा में ही सही परन्तु कृषि की जाती है, चूंकि कुछ फसलें इन उत्तरी भूमियों के उप-आर्कटिक जलवायु क्षेत्र में पैदा की जा सकती है | साइबेरिया के अधिकांश सेमोएड एवं याकुत जनजातीय लोग तथा कनाडा में कुछ लोग शिकार, मत्स्यन आदि कार्यों में संलग्न हैं |
50,202
मानव विकास सूचकांक(HDI) के घटकों की विशेषताओं का वर्णन करते हुए स्पष्ट कीजिये किक्या HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक है? (150 से 200 शब्द; 10 अंक) Explaining the characteristics of the components of Human Development Index (HDI), clarify whether HDI is a complete measure of economic development? (150 to 200 words; 10 Words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मानव विकास सूचकांक और उसको अपनाए जाने के कारणों की सूचना दीजिये| 2- पहले भाग में मानव विकास सूचकांक(HDI) के घटकों की विशेषताओं का वर्णन कीजिये 3- दुसरे भाग में आर्थिक विकास के पूर्ण मापक के रूप में HDI का मुल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में आर्थिक विकास के पूर्ण मापन के सन्दर्भ में सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पिछली शताब्दी में आर्थिक विकास के मापन के लिए वास्तविक प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणाओं का सूचकोंके रूप में प्रयोग किया जाता था लेकिन पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में उपरोक्त सूचकों की सीमाओं का अध्ययन किया गया और जीवन की भौतिक गुणवत्ता सूचकांक एवं मानव विकास सूचकांक जैसे सूचकों के घटकों के माध्यम से आर्थिक विकास के स्तर के अध्ययन का प्रयास किया जाने गया इसी क्रम में वर्ष 1990 में मानव विकास सूचकांक(HDI) प्रस्तुत किया गया| इसका विकास UNDP द्वारा किया गया| इसका निर्माण प्रोफ़ेसर महबूब उल हक की अध्यक्षता वाली UNDP की एक समिति ने किया| प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन इस समिति में एक भारतीय सदस्य के रूप में शामिल थे| HDI को UNDP द्वारा अपनी मानव विकास रिपोर्ट के अंतर्गत जारी किया जाता है| HDI, स्वास्थ्य, ज्ञान एवं जीवन स्तर तीन आयामों/घटकों पर आधारित है| HDI के आयाम सूचकांक प्रत्येक आयाम का एक सूचकांक बनाया जाता है जिसे आयाम सूचकांक(DI) कहते हैं| आयाम सूचकांक, वास्तविक मान - न्यूनतम मान /अधिकतम मान- न्यूनतम मान, करने पर प्राप्त होता है| वर्ष 2010 से आयाम सूचकांकों का ज्योमेट्रिक मीन लिया जाने लगा है जिसके आधार पर HDI निकाला जाता है| ज्योमेट्रिक मीन माध्यम से HDI के तीनों आयामों की असमानताओं के प्रभावों को सम्मिलित किया गया है अर्थात अंतरआयामी असमानताओं को सम्मिलित किया गया है| यह अर्थमेटिक मीन की अपेक्षा अधिक वास्तविक स्थिति दर्शाता है| स्वास्थ्य आयाम HDI में स्वास्थ्य आयाम के सूचक के रूप में जन्म पर जीवन प्रत्याशा को लिया गया है इसमें न्यूनतम मान 20 वर्ष जबकि अधिकतम मान 85 वर्ष रखा गया है स्वास्थ्य के सूचकांक को जीवन प्रत्याशा सूचकांक(LEI) कहते हैं मानव विकास सूचकांक के अनुसार भारत की जीवन प्रत्याशा 68.8 वर्ष है ज्ञान आयाम 2010 से पहले वयस्कों के लिए ज्ञान आयाम का मापन वयस्क साक्षरता के आधार पर किया जाता है क्योंकि इसमें शिक्षा की गुणवत्ता का पता नहीं चलता था अतः इसको बदल दिया गया है| इसी तरह 25 वर्ष से कम आयु के लोगों/बच्चों के लिए ज्ञान आयाम का मापन स्कूल में नामांकन के आधार पर किया जाता था किन्तु ड्राप आउट आदि समस्याओं के कारण अब इसे बदल दिया गया है अब इसके दो सूचक हैं यथास्कूल जाने के औसत वर्ष एवं स्कूल जाने के संभावित वर्ष| स्कूल जाने के औसत वर्ष का तात्पर्य 25 वर्ष एवं अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा प्राप्त किये जाने औसत वर्षों से है जिसमें भारत का औसत 6.4 है जबकि स्कूल जाने के संभावित वर्ष सूचक बच्चों के लिए है भारत में इसका औसत 12.3 है| यहाँ न्यूनतम मान 0 और अधिकतम 18 वर्ष का मान लिया गया है ज्ञान आयाम के सूचकांक को एजुकेशन इंडेक्स कहा जाता है जीवन स्तर आयाम पहले इसका मापन प्रति व्यक्ति GDP के आधार पर किया जाता है किन्तु इसमें विदेशियों की आय का मापन भी हो जाता है| अतः भारतीय लोगों की आय तक सीमित रखने के लिए वर्ष 2010 में GNI को सूचक के तौर पर शामिल किया गया इसका सूचक प्रति व्यक्ति GNI(यह लगभग प्रति व्यक्ति आय है) लिया गया है जिसका मापन PPP/डॉलर के आधार पर किया जाता है|वर्तमान में क्रयशक्ति समता / डॉलर लगभग 18 रुपये है न्यूनतम मान 100 डॉलर जबकि अधिकतम 75 हजार डॉलर मान लिया गया है इस आयाम का GNI सूचकांक कहलाता है क्या HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक है यह केवल तीन आयाम पर आधारित है और इसमें आर्थिक विकास के अन्यपर्यावरण, राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आदिआयाम सम्मिलित नही हैं इसमें शामिल आयामों का स्वरुप गुणात्मक है जिसका वस्तुनिष्ठ रूप में मापन नही किया जा सकता है अतः इसे केवल संतोषजनक एवं बेहतर माना जा सकता है किन्तु पूर्ण मापक नही माना जा सकता है| चूँकि किसी एक सूचकांक में सभी आयामों को शामिल नही किया जा सकता है| अतः आर्थिक विकास का बेहतर मापन करने के लिए अन्य आयामों के मापन के लिए अन्य आयाम विशिष्ट सूचकांकों का प्रयोग किया जाना चाहिए| इसी सन्दर्भ में वर्ष 2010 में IHDI(असमानता समायोजित HDI), MPI(बहुआयामी गरीबी सूचकांक) एवं GII(लिंग असमानता सूचकांक) को प्रस्तुत किया गया है जबकि वर्ष 2014 में GDI(लिंग सम्बन्धी विकास सूचकांक) को प्रस्तुत किया गया है| ताकि मानव विकास एवं आर्थिक विकास का अपेक्षाकृत बेहतर मापन किया जा सके|
##Question:मानव विकास सूचकांक(HDI) के घटकों की विशेषताओं का वर्णन करते हुए स्पष्ट कीजिये किक्या HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक है? (150 से 200 शब्द; 10 अंक) Explaining the characteristics of the components of Human Development Index (HDI), clarify whether HDI is a complete measure of economic development? (150 to 200 words; 10 Words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मानव विकास सूचकांक और उसको अपनाए जाने के कारणों की सूचना दीजिये| 2- पहले भाग में मानव विकास सूचकांक(HDI) के घटकों की विशेषताओं का वर्णन कीजिये 3- दुसरे भाग में आर्थिक विकास के पूर्ण मापक के रूप में HDI का मुल्यांकन कीजिये 4- अंतिम में आर्थिक विकास के पूर्ण मापन के सन्दर्भ में सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| पिछली शताब्दी में आर्थिक विकास के मापन के लिए वास्तविक प्रति व्यक्ति आय और सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणाओं का सूचकोंके रूप में प्रयोग किया जाता था लेकिन पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में उपरोक्त सूचकों की सीमाओं का अध्ययन किया गया और जीवन की भौतिक गुणवत्ता सूचकांक एवं मानव विकास सूचकांक जैसे सूचकों के घटकों के माध्यम से आर्थिक विकास के स्तर के अध्ययन का प्रयास किया जाने गया इसी क्रम में वर्ष 1990 में मानव विकास सूचकांक(HDI) प्रस्तुत किया गया| इसका विकास UNDP द्वारा किया गया| इसका निर्माण प्रोफ़ेसर महबूब उल हक की अध्यक्षता वाली UNDP की एक समिति ने किया| प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन इस समिति में एक भारतीय सदस्य के रूप में शामिल थे| HDI को UNDP द्वारा अपनी मानव विकास रिपोर्ट के अंतर्गत जारी किया जाता है| HDI, स्वास्थ्य, ज्ञान एवं जीवन स्तर तीन आयामों/घटकों पर आधारित है| HDI के आयाम सूचकांक प्रत्येक आयाम का एक सूचकांक बनाया जाता है जिसे आयाम सूचकांक(DI) कहते हैं| आयाम सूचकांक, वास्तविक मान - न्यूनतम मान /अधिकतम मान- न्यूनतम मान, करने पर प्राप्त होता है| वर्ष 2010 से आयाम सूचकांकों का ज्योमेट्रिक मीन लिया जाने लगा है जिसके आधार पर HDI निकाला जाता है| ज्योमेट्रिक मीन माध्यम से HDI के तीनों आयामों की असमानताओं के प्रभावों को सम्मिलित किया गया है अर्थात अंतरआयामी असमानताओं को सम्मिलित किया गया है| यह अर्थमेटिक मीन की अपेक्षा अधिक वास्तविक स्थिति दर्शाता है| स्वास्थ्य आयाम HDI में स्वास्थ्य आयाम के सूचक के रूप में जन्म पर जीवन प्रत्याशा को लिया गया है इसमें न्यूनतम मान 20 वर्ष जबकि अधिकतम मान 85 वर्ष रखा गया है स्वास्थ्य के सूचकांक को जीवन प्रत्याशा सूचकांक(LEI) कहते हैं मानव विकास सूचकांक के अनुसार भारत की जीवन प्रत्याशा 68.8 वर्ष है ज्ञान आयाम 2010 से पहले वयस्कों के लिए ज्ञान आयाम का मापन वयस्क साक्षरता के आधार पर किया जाता है क्योंकि इसमें शिक्षा की गुणवत्ता का पता नहीं चलता था अतः इसको बदल दिया गया है| इसी तरह 25 वर्ष से कम आयु के लोगों/बच्चों के लिए ज्ञान आयाम का मापन स्कूल में नामांकन के आधार पर किया जाता था किन्तु ड्राप आउट आदि समस्याओं के कारण अब इसे बदल दिया गया है अब इसके दो सूचक हैं यथास्कूल जाने के औसत वर्ष एवं स्कूल जाने के संभावित वर्ष| स्कूल जाने के औसत वर्ष का तात्पर्य 25 वर्ष एवं अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा प्राप्त किये जाने औसत वर्षों से है जिसमें भारत का औसत 6.4 है जबकि स्कूल जाने के संभावित वर्ष सूचक बच्चों के लिए है भारत में इसका औसत 12.3 है| यहाँ न्यूनतम मान 0 और अधिकतम 18 वर्ष का मान लिया गया है ज्ञान आयाम के सूचकांक को एजुकेशन इंडेक्स कहा जाता है जीवन स्तर आयाम पहले इसका मापन प्रति व्यक्ति GDP के आधार पर किया जाता है किन्तु इसमें विदेशियों की आय का मापन भी हो जाता है| अतः भारतीय लोगों की आय तक सीमित रखने के लिए वर्ष 2010 में GNI को सूचक के तौर पर शामिल किया गया इसका सूचक प्रति व्यक्ति GNI(यह लगभग प्रति व्यक्ति आय है) लिया गया है जिसका मापन PPP/डॉलर के आधार पर किया जाता है|वर्तमान में क्रयशक्ति समता / डॉलर लगभग 18 रुपये है न्यूनतम मान 100 डॉलर जबकि अधिकतम 75 हजार डॉलर मान लिया गया है इस आयाम का GNI सूचकांक कहलाता है क्या HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक है यह केवल तीन आयाम पर आधारित है और इसमें आर्थिक विकास के अन्यपर्यावरण, राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आदिआयाम सम्मिलित नही हैं इसमें शामिल आयामों का स्वरुप गुणात्मक है जिसका वस्तुनिष्ठ रूप में मापन नही किया जा सकता है अतः इसे केवल संतोषजनक एवं बेहतर माना जा सकता है किन्तु पूर्ण मापक नही माना जा सकता है| चूँकि किसी एक सूचकांक में सभी आयामों को शामिल नही किया जा सकता है| अतः आर्थिक विकास का बेहतर मापन करने के लिए अन्य आयामों के मापन के लिए अन्य आयाम विशिष्ट सूचकांकों का प्रयोग किया जाना चाहिए| इसी सन्दर्भ में वर्ष 2010 में IHDI(असमानता समायोजित HDI), MPI(बहुआयामी गरीबी सूचकांक) एवं GII(लिंग असमानता सूचकांक) को प्रस्तुत किया गया है जबकि वर्ष 2014 में GDI(लिंग सम्बन्धी विकास सूचकांक) को प्रस्तुत किया गया है| ताकि मानव विकास एवं आर्थिक विकास का अपेक्षाकृत बेहतर मापन किया जा सके|
50,206
वाताग्र से आप क्या समझते हैं? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का सचित्र वर्णन कीजिए। (150-200शब्द/10 अंक) What do you understand by fronts. Explain different types of fronts with suitable diagrams. (150-200 words/10 marks)
Approach: भूमिका में वाताग्र को परिभाषित कर सकते हैं। वाताग्र की विशेषताओं को संक्षिप्त में लिखा जा सकता है। वाताग्र के विभिन्न प्रकारों को सचित्र समझाने का प्रयास कीजिये। उत्तर: जब किसी भूभाग में विभिन्न गुणों वाली वायुराशियां, जिनके तापमान, आर्द्रता, घनत्व, वायुदाब आदि में पर्याप्त अंतर होता है, एक दूसरे से पूर्ण रूप से नहीं मिल पाती हैं एवं उनके मध्य कुछ समय के लिए असांतत्य पृष्ठ का निर्माण हो जाता है। इसे वाताग्र कहते हैं। इन वाताग्र में सघन ठंडी वायुराशि धरातल पर रहती है तथा यह हल्की गर्म वायुराशि को ऊपर उठाती है। वाताग्र बनने की प्रक्रिया को वाताग्र जनन तथा नष्ट होने की प्रक्रिया को वाताग्र क्षय कहते हैं। वाताग्र आसानी से मिश्रित नहीं होते हैं। यह न तो धरातलीय सतह के समानान्तर होता है और न उसके उपर लम्बवत होता है, अपितु ढलुवा सीमा के साथ एक दूसरे के संपर्क में आते हैं । यह ढलुवा सीमा मूलत: एक संक्रमण क्षेत्र है जिसके आर पार मौसम की दशाओं में तीव्र अंतर होता है। वाताग्र मध्य अक्षांशों में विकसित होते होते हैं। वाताग्र के प्रकार स्थिर वाताग्र: ज ब वायुराशियों में से किसी प्रकार की गति नहीं होती तो उनके मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है। जब शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र स्थिर हो जाएँ तो स्थायी वाताग्र का निर्माण होता है।। जिस क्षेत्र में ऐसे वाताग्र का निर्माण हो जाता है वहाँ लगातार कई दिनों तक आकाश मेघाच्छादित रहता है तथा फुहार अथवा वृष्टि होती है। शीत वाताग्र: जब शीतल वायु अधिक सक्रिय होती है एवं उष्ण एवं हल्की वायुराशियों को ऊपर आरोहित करती है तो इस संपर्क क्षेत्र को शीत वाताग्र कहते हैंघर्षण का प्रभाव धरातल के पास पवन की गति को कम कर देता है, जबकि स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती हुई पावन तेजी से ऊपर उठ जाती है। इससे शीत वाताग्र का ढाल उष्ण वाताग्र की तुलना में अधिक तीव्र हो जाता है। उष्ण वाताग्र: उष्ण वाताग्र में उष्ण वायुराशियों सक्रिय रूप में ठंडी और भरी वायुराशियों के ऊपर आरोहित हो जाती है। यह गरम वायु नीचे से ठंडी होती है तथा संघनन के बाद बादलों का निर्माण तथा वर्षा होती है। शीत वाताग्र के विपरीत, इसमें तापमान और पवन की दिशा में धीरे धीरे बदलाव होता है। अधिविष्ट वाताग्र: यदि एक वायुराशि पूर्णत: धरातल के ऊपर उठ जाये तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं। जब शीत वाताग्र अपनी तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र तक पहुँच कर उससे मिल जाता है तो धरातल के साथ उष्ण वायुराशि का संपर्क समाप्त हो जाता है एवं अधिविष्ट वाताग्र का निर्माण होता है। अधिविष्ट वाताग्र समान्यतया निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों के आस पास निर्मित होता है।
##Question:वाताग्र से आप क्या समझते हैं? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों का सचित्र वर्णन कीजिए। (150-200शब्द/10 अंक) What do you understand by fronts. Explain different types of fronts with suitable diagrams. (150-200 words/10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में वाताग्र को परिभाषित कर सकते हैं। वाताग्र की विशेषताओं को संक्षिप्त में लिखा जा सकता है। वाताग्र के विभिन्न प्रकारों को सचित्र समझाने का प्रयास कीजिये। उत्तर: जब किसी भूभाग में विभिन्न गुणों वाली वायुराशियां, जिनके तापमान, आर्द्रता, घनत्व, वायुदाब आदि में पर्याप्त अंतर होता है, एक दूसरे से पूर्ण रूप से नहीं मिल पाती हैं एवं उनके मध्य कुछ समय के लिए असांतत्य पृष्ठ का निर्माण हो जाता है। इसे वाताग्र कहते हैं। इन वाताग्र में सघन ठंडी वायुराशि धरातल पर रहती है तथा यह हल्की गर्म वायुराशि को ऊपर उठाती है। वाताग्र बनने की प्रक्रिया को वाताग्र जनन तथा नष्ट होने की प्रक्रिया को वाताग्र क्षय कहते हैं। वाताग्र आसानी से मिश्रित नहीं होते हैं। यह न तो धरातलीय सतह के समानान्तर होता है और न उसके उपर लम्बवत होता है, अपितु ढलुवा सीमा के साथ एक दूसरे के संपर्क में आते हैं । यह ढलुवा सीमा मूलत: एक संक्रमण क्षेत्र है जिसके आर पार मौसम की दशाओं में तीव्र अंतर होता है। वाताग्र मध्य अक्षांशों में विकसित होते होते हैं। वाताग्र के प्रकार स्थिर वाताग्र: ज ब वायुराशियों में से किसी प्रकार की गति नहीं होती तो उनके मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है। जब शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र स्थिर हो जाएँ तो स्थायी वाताग्र का निर्माण होता है।। जिस क्षेत्र में ऐसे वाताग्र का निर्माण हो जाता है वहाँ लगातार कई दिनों तक आकाश मेघाच्छादित रहता है तथा फुहार अथवा वृष्टि होती है। शीत वाताग्र: जब शीतल वायु अधिक सक्रिय होती है एवं उष्ण एवं हल्की वायुराशियों को ऊपर आरोहित करती है तो इस संपर्क क्षेत्र को शीत वाताग्र कहते हैंघर्षण का प्रभाव धरातल के पास पवन की गति को कम कर देता है, जबकि स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती हुई पावन तेजी से ऊपर उठ जाती है। इससे शीत वाताग्र का ढाल उष्ण वाताग्र की तुलना में अधिक तीव्र हो जाता है। उष्ण वाताग्र: उष्ण वाताग्र में उष्ण वायुराशियों सक्रिय रूप में ठंडी और भरी वायुराशियों के ऊपर आरोहित हो जाती है। यह गरम वायु नीचे से ठंडी होती है तथा संघनन के बाद बादलों का निर्माण तथा वर्षा होती है। शीत वाताग्र के विपरीत, इसमें तापमान और पवन की दिशा में धीरे धीरे बदलाव होता है। अधिविष्ट वाताग्र: यदि एक वायुराशि पूर्णत: धरातल के ऊपर उठ जाये तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं। जब शीत वाताग्र अपनी तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र तक पहुँच कर उससे मिल जाता है तो धरातल के साथ उष्ण वायुराशि का संपर्क समाप्त हो जाता है एवं अधिविष्ट वाताग्र का निर्माण होता है। अधिविष्ट वाताग्र समान्यतया निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों के आस पास निर्मित होता है।
50,213
मानव विकास सूचकांक(HDI) के आयामों का विवरण दीजिए। क्या कारण है कि HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक नहीं है? इस सूचकांक को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव दीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Describe the dimensions of Human Development Index (HDI). What is the reason that HDI is not a complete measure of economic growth? Suggest to improve this index further. (150-200 words, 10 marks)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में मानव विकास सूचकांक के बारे में लिखिए। इसके पश्चात इस सूचकांक के आयामों का विवरण दीजिये। HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक नहीं है इसके लिए तर्क दीजिए। अंत में सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। मानव विकास सूचकांक संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव विकास कार्यक्रम के तहत प्रकाशित होता है। इसे मानव विकास रिपोर्ट के एक हिस्से के रूप में जारी किया जाता है। इसका उपयोग देशों में मानव विकास की स्थिति का आकलन करने तथा तुलना करने के लिए किया जाता है। HDI सूचकांक के आयाम: स्वास्थ्य आयाम HDI में स्वास्थ्य आयाम के सूचक के रूप में जन्म पर जीवन प्रत्याशा को लिया गया है स्वास्थ्य के सूचकांक को जीवन प्रत्याशा सूचकांक(LEI) कहते हैं ज्ञान आयाम इसके दो सूचक हैं यथास्कूल जाने के औसत वर्ष एवं स्कूल जाने के संभावित वर्ष| स्कूल जाने के औसत वर्ष का तात्पर्य 25 वर्ष एवं अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा प्राप्त किये जाने औसत वर्षों से है जिसमें भारत का औसत 6.4 है जबकि स्कूल जाने के संभावित वर्ष सूचक बच्चों के लिए है भारत में इसका औसत 12.3 है। जीवन स्तर आयाम पहले इसका मापन प्रति व्यक्ति GDP के आधार पर किया जाता है किन्तु इसमें विदेशियों की आय का मापन भी हो जाता है। अतः भारतीय लोगों की आय तक सीमित रखने के लिए वर्ष 2010 में GNI को सूचक के तौर पर शामिल किया गया इसका सूचक प्रति व्यक्ति GNI(यह लगभग प्रति व्यक्ति आय है) लिया गया है जिसका मापन PPP/डॉलर के आधार पर किया जाता है|वर्तमान में क्रयशक्ति समता / डॉलर लगभग 18 रुपये है। HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक नहीं है क्योंकि: यह केवल तीन आयाम पर आधारित है और इसमें आर्थिक विकास के अन्य पर्यावरण, राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आदि आयाम सम्मिलित नही हैं इसमें शामिल आयामों का स्वरुप गुणात्मक है जिसका वस्तुनिष्ठ रूप में मापन नही किया जा सकता है अतः इसे केवल संतोषजनक एवं बेहतर माना जा सकता है किन्तु पूर्ण मापक नही माना जा सकता है। सुझाव: इसमें अन्य आयामों को भी शामिल करना चाहिए जैसे- आर्थिक असमानता, प्रसन्नता का स्तर, लिंग असमानता आदि आंकड़ों के संग्रह को और व्यापक बनाने की आवश्यकता है। भारत जैसे देश में विविधता को देखते हुए विभिन्न आयामों के भार में आवश्यकतानुसार बदलाव किया जा सकता है। लिंग संबंधी सूचकांकों को शामिल करके इसे और बेहतर बनाया जा सकता है।
##Question:मानव विकास सूचकांक(HDI) के आयामों का विवरण दीजिए। क्या कारण है कि HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक नहीं है? इस सूचकांक को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव दीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Describe the dimensions of Human Development Index (HDI). What is the reason that HDI is not a complete measure of economic growth? Suggest to improve this index further. (150-200 words, 10 marks)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में मानव विकास सूचकांक के बारे में लिखिए। इसके पश्चात इस सूचकांक के आयामों का विवरण दीजिये। HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक नहीं है इसके लिए तर्क दीजिए। अंत में सुझाव देते हुए उत्तर समाप्त कीजिए। मानव विकास सूचकांक संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव विकास कार्यक्रम के तहत प्रकाशित होता है। इसे मानव विकास रिपोर्ट के एक हिस्से के रूप में जारी किया जाता है। इसका उपयोग देशों में मानव विकास की स्थिति का आकलन करने तथा तुलना करने के लिए किया जाता है। HDI सूचकांक के आयाम: स्वास्थ्य आयाम HDI में स्वास्थ्य आयाम के सूचक के रूप में जन्म पर जीवन प्रत्याशा को लिया गया है स्वास्थ्य के सूचकांक को जीवन प्रत्याशा सूचकांक(LEI) कहते हैं ज्ञान आयाम इसके दो सूचक हैं यथास्कूल जाने के औसत वर्ष एवं स्कूल जाने के संभावित वर्ष| स्कूल जाने के औसत वर्ष का तात्पर्य 25 वर्ष एवं अधिक आयु के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा प्राप्त किये जाने औसत वर्षों से है जिसमें भारत का औसत 6.4 है जबकि स्कूल जाने के संभावित वर्ष सूचक बच्चों के लिए है भारत में इसका औसत 12.3 है। जीवन स्तर आयाम पहले इसका मापन प्रति व्यक्ति GDP के आधार पर किया जाता है किन्तु इसमें विदेशियों की आय का मापन भी हो जाता है। अतः भारतीय लोगों की आय तक सीमित रखने के लिए वर्ष 2010 में GNI को सूचक के तौर पर शामिल किया गया इसका सूचक प्रति व्यक्ति GNI(यह लगभग प्रति व्यक्ति आय है) लिया गया है जिसका मापन PPP/डॉलर के आधार पर किया जाता है|वर्तमान में क्रयशक्ति समता / डॉलर लगभग 18 रुपये है। HDI आर्थिक विकास का पूर्ण मापक नहीं है क्योंकि: यह केवल तीन आयाम पर आधारित है और इसमें आर्थिक विकास के अन्य पर्यावरण, राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आदि आयाम सम्मिलित नही हैं इसमें शामिल आयामों का स्वरुप गुणात्मक है जिसका वस्तुनिष्ठ रूप में मापन नही किया जा सकता है अतः इसे केवल संतोषजनक एवं बेहतर माना जा सकता है किन्तु पूर्ण मापक नही माना जा सकता है। सुझाव: इसमें अन्य आयामों को भी शामिल करना चाहिए जैसे- आर्थिक असमानता, प्रसन्नता का स्तर, लिंग असमानता आदि आंकड़ों के संग्रह को और व्यापक बनाने की आवश्यकता है। भारत जैसे देश में विविधता को देखते हुए विभिन्न आयामों के भार में आवश्यकतानुसार बदलाव किया जा सकता है। लिंग संबंधी सूचकांकों को शामिल करके इसे और बेहतर बनाया जा सकता है।
50,214
What are the Bhakti and Sufi movements? Discuss the Contribution of Bhakti and Sufi movements to Indian society? (150 words/10 Marks)
Approach: Introduction: Briefly discuss the concept of the Bhakti and Sufi movements. Body: Discuss the contribution of the Bhakti and Sufi movements to Indian society. Conclusion: Comment on the overall contribution of these movements to the society. Model Answer: The Sufi and the Bhakti movements are the socio-religious reform movements that brought a new form of religious expression amongst Muslims and Hindus respectively during the medieval period. Sufism called for liberalism in Islam emphasizing an egalitarian society based on universal love. Whereas the Bhakti movement transformed Hinduism by introducing devotion or bhakti as the means to attain God.The Sufi and Bhakti traditions are characterized by adherence to religious text, and governmental authority and opposed to external ritualism of prayer. Contribution of Bhakti and Sufi movements to Indian society: .Bhakti and Sufi movements were reformative in tendency. The Bhakti and Sufi saints believed that salvation can be achieved by all. They made no distinction of caste, creed or religion before God. They themselves came from diverse backgrounds. For example, a famous Bhakti Saint Ramananda, whose disciples included Hindus and Muslims, came from a conservative brahman family. Thus, they contributed to Indian society in the following ways: They advocated a simple form of religion and practices, thus making religion accessible even to common people. They emphasized the aspects of love and devotion, stressed equality and attacked institutionalized religion. They were critical of caste rigidities. They desired the upliftment of the position of women and the untouchables in society. They openly criticized the unjust rule of their time. They opposed Sati and female infanticide. They preached in local languages and used simple wordings that were easily understood by the common public. They enriched the regional literature of India. They were the greatest representatives of secular values. The popular verses and songs of the Bhakti and Sufi saints also served as forerunners of a musical renaissance. Thus, the Bhakti and Sufi saints made valuable contributions to medieval Indian society in terms of laying a liberal foundation and promoting a tremendous growth of regional literature and local languages.
##Question:What are the Bhakti and Sufi movements? Discuss the Contribution of Bhakti and Sufi movements to Indian society? (150 words/10 Marks)##Answer:Approach: Introduction: Briefly discuss the concept of the Bhakti and Sufi movements. Body: Discuss the contribution of the Bhakti and Sufi movements to Indian society. Conclusion: Comment on the overall contribution of these movements to the society. Model Answer: The Sufi and the Bhakti movements are the socio-religious reform movements that brought a new form of religious expression amongst Muslims and Hindus respectively during the medieval period. Sufism called for liberalism in Islam emphasizing an egalitarian society based on universal love. Whereas the Bhakti movement transformed Hinduism by introducing devotion or bhakti as the means to attain God.The Sufi and Bhakti traditions are characterized by adherence to religious text, and governmental authority and opposed to external ritualism of prayer. Contribution of Bhakti and Sufi movements to Indian society: .Bhakti and Sufi movements were reformative in tendency. The Bhakti and Sufi saints believed that salvation can be achieved by all. They made no distinction of caste, creed or religion before God. They themselves came from diverse backgrounds. For example, a famous Bhakti Saint Ramananda, whose disciples included Hindus and Muslims, came from a conservative brahman family. Thus, they contributed to Indian society in the following ways: They advocated a simple form of religion and practices, thus making religion accessible even to common people. They emphasized the aspects of love and devotion, stressed equality and attacked institutionalized religion. They were critical of caste rigidities. They desired the upliftment of the position of women and the untouchables in society. They openly criticized the unjust rule of their time. They opposed Sati and female infanticide. They preached in local languages and used simple wordings that were easily understood by the common public. They enriched the regional literature of India. They were the greatest representatives of secular values. The popular verses and songs of the Bhakti and Sufi saints also served as forerunners of a musical renaissance. Thus, the Bhakti and Sufi saints made valuable contributions to medieval Indian society in terms of laying a liberal foundation and promoting a tremendous growth of regional literature and local languages.
50,217
भारत में तुर्कों के आगमन के पश्चात स्थापत्यकला में एक अलग दौर की शुरुआत हुयी थी| इस संदर्भ में, सल्तनतकालीन स्थापत्य कला का एक विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) After the arrival of Turks in India, a different phase in architecture started. In this context, Give adescription of Sultanate architecture. (150-200 Words; 10 Marks)
एप्रोच- सल्तनतकालीन स्थापत्य की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में, सल्तनत काल के विभिन्न कालखंडों के समय स्थापत्य कला को उदाहरण सहित बताईये| निष्कर्षतः, सल्तनतकालीन स्थापत्य कला के महत्व के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- तुर्क जब भारत आएं तो उनके पास सुपरिभाषित धर्म, शासनकला तथा स्थापत्य की विशेषताएं साथ विद्यमान थी| साथ ही, भारतीयों के पास भी अपने प्रबल धार्मिक विश्वास, कला एवं स्थापत्य का विशिष्ट ज्ञान आदि मौजूद थें| जब इन दोनों की पारस्परिक अंतःक्रिया हुयी तो एक नै और समृद्ध संस्कृति के विकास में भी उसने अपना योगदान दिया| नए शासकों की पहली जरूरतों में रहने के लिए आवास तथा इबादत के लिए स्थान की आवश्यकता थी| अतः, सल्तनतकालीन स्थापत्य कला में हम विभिन्न प्रकार के भवन जैसे- किला, मस्जिद, मकबरा एवं इनकी विशेषताएं(गुम्बद, मेहराब, मीनार आदि) तथा उनमें विभिन्न अलंकरण जैसे-सुलेखन(क़ुरान की आयतें लिखना); अरबेस्क(लतादार पतियाँ, ज्यामितीय आकृतियाँ) आदि को देखते हैं| इनमेंनिर्माण सामग्री के रूप में लाल बलुआ पत्थर; संगमरमर; चूना एवं जिप्सम का गारा आदि प्रयोग हुए थें| इस्लामिक स्थापत्य के साथ-साथ भारतीय स्थापत्य से संबंधित महत्वपूर्ण विशेषताओं के मिश्रण से निर्मित इंडो-इस्लामिकस्थापत्य कला का भी विकास हुआ| साथ ही साथ अपनी इमारतों में तुर्कों ने मेहराबों और गुम्बदों का भरपूर प्रयोग किया था| मेहराबों और गुम्बदों के कारण छत को सहारा देने के लिए बड़ी संख्या में स्तंभों की जरूरत नहीं रह गयी थी एकछोर से दूसरे छोर तक दिखाई देने वाले बड़े-बड़े कक्ष बनाए जाने लगें| सल्तनतकालीन स्थापत्य कला के कुछ उदाहरण तथा उनकी विशेषताएं प्रारंभिक तुर्कों के समय स्थापत्य आरंभ में इनके द्वारा मंदिरों तथा दूसरी इमारतों को मस्जिदों में बदला जाना जैसे-कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद; अढ़ाई दिन का झोपड़ा आदि; बहुत जल्द ही तुर्कों द्वारा अपनी इमारतें बनवाना चालू करना जैसे-कुतुबमीनार; इल्तुतमिश के समय के मदरसें, मकबरें, बावली; अतैरकिन का दरवाजा(नागौर); बलबन का मकबरा आदि; अधिकांशतः इमारतों का निर्माण दिल्ली में; कुछ भवनों के साक्ष्य दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों से भी जैसे- बदायूं, अजमेर, हरियाणा आदि; कलात्मक दृष्टिकोण से प्रारंभिक तुर्कों का स्थापत्य उतना परिष्कृत नहीं जितना खिलज़ीकालीन स्थापत्य;; संभवतः इसका कारण राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक रूप से कमजोर होना; हालाँकि, इस दौर में ना केवल इस्लामिक स्थापत्य(मस्जिद, मकबरा, मदरसा, मीनार आदि का निर्माण एवं नींव पड़ना; अलंकरण के लिए सुलेखन एवं अरबेस्क का प्रयोग) बल्कि हिंदू स्थापत्य के साथ इसका मिश्रण भी प्रारंभ होना; कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में अधिकाधिक स्तंभों/कमल की आकृतियों के साक्ष्य; मिश्रित स्थापत्य के विकास में कुछ परिस्थितियों की भी भूमिका जैसे- इन इमारतों के निर्माण में स्थानीय भवनों के अवशेषों, स्थानीय कारीगरों आदि का प्रयोग; खिलजीकालीन स्थापत्य अलाई दरवाजा(कलात्मक दृष्टिकोण से सल्तनतकालीन इमारतों में महत्वपूर्ण); जमातखाना मस्जिद; सीरी नगर; हौजखास; अलाई दरवाजे में पहली बार वैज्ञानिक पद्धति से गुंबद का निर्माण; अलाउद्दीन खिलजी का काल स्थापत्य के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व; अलंकरण, मेहराब(घोड़े की नाल की तरह आकृति), गुंबद आदि का निर्माण खूबसूरती से; इस्लामिक स्थापत्य के प्रति झुकाव के बावजूद अलाई दरवाजा के अलंकरण में कमल के झालर जैसी आकृतियाँ बड़ी संख्या में बनाया जाना; अलाउद्दीन खिलजीकालीन स्थापत्य राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि एवं शासक के आत्मविश्वास का द्योतक; तुगलक कालीन स्थापत्य तुगलकाबाद; मकबरा; आदिलाबाद; जहाँपनाह नगर; निजामुद्दीन औलिया का मकबरा; तेलंगानी मकबरा; गयासुद्दीन तुगलक एवं मोहम्मद-बिन-तुगलक के समय की इमारतें- परवर्ती की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक इमारतों के साक्ष्य; खिलजीकाल की तरह इस्लामिक विशेषताओं की तरफ अत्याधिक झुकाव नहीं; ढलवां दीवारें, सादगीपन तथा हिंदू स्थापत्य का मिश्रण; फिरोजशाह तुगलक काल- बड़ी संख्या में नगरों का निर्माण; पुराने स्थापत्य के पुनरोद्धार के प्रमाण(कुतुबमीनार; हौजखास); धार्मिक कट्टरता के बावजूद इंडो-इस्लामिक स्थापत्य की परंपरा जारी; सलामी(ढलवां) दीवारों का प्रचलन बंद; अष्टकोणीय मकबरा के साक्ष्य; इसके पश्चात राजनीतिक-आर्थिक कारणों से तुगलककालीन स्थापत्य का अवसान; सैय्यद एवं लोदी कालीन स्थापत्य मकबरों का काल; प्रमुख स्थापत्य- बड़ा गुंबद; छोटा गुंबद; दादी का गुंबद; मोठ मस्जिद; इस दौर के मकबरों को उद्यानों में बनाया जाने लगना; अष्टकोणीय मकबरा का एक सामान्य विशेषता के रूप में; दोहरे गुंबद का भी प्रचलन;
##Question:भारत में तुर्कों के आगमन के पश्चात स्थापत्यकला में एक अलग दौर की शुरुआत हुयी थी| इस संदर्भ में, सल्तनतकालीन स्थापत्य कला का एक विवरण प्रस्तुत कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) After the arrival of Turks in India, a different phase in architecture started. In this context, Give adescription of Sultanate architecture. (150-200 Words; 10 Marks)##Answer:एप्रोच- सल्तनतकालीन स्थापत्य की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में, सल्तनत काल के विभिन्न कालखंडों के समय स्थापत्य कला को उदाहरण सहित बताईये| निष्कर्षतः, सल्तनतकालीन स्थापत्य कला के महत्व के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- तुर्क जब भारत आएं तो उनके पास सुपरिभाषित धर्म, शासनकला तथा स्थापत्य की विशेषताएं साथ विद्यमान थी| साथ ही, भारतीयों के पास भी अपने प्रबल धार्मिक विश्वास, कला एवं स्थापत्य का विशिष्ट ज्ञान आदि मौजूद थें| जब इन दोनों की पारस्परिक अंतःक्रिया हुयी तो एक नै और समृद्ध संस्कृति के विकास में भी उसने अपना योगदान दिया| नए शासकों की पहली जरूरतों में रहने के लिए आवास तथा इबादत के लिए स्थान की आवश्यकता थी| अतः, सल्तनतकालीन स्थापत्य कला में हम विभिन्न प्रकार के भवन जैसे- किला, मस्जिद, मकबरा एवं इनकी विशेषताएं(गुम्बद, मेहराब, मीनार आदि) तथा उनमें विभिन्न अलंकरण जैसे-सुलेखन(क़ुरान की आयतें लिखना); अरबेस्क(लतादार पतियाँ, ज्यामितीय आकृतियाँ) आदि को देखते हैं| इनमेंनिर्माण सामग्री के रूप में लाल बलुआ पत्थर; संगमरमर; चूना एवं जिप्सम का गारा आदि प्रयोग हुए थें| इस्लामिक स्थापत्य के साथ-साथ भारतीय स्थापत्य से संबंधित महत्वपूर्ण विशेषताओं के मिश्रण से निर्मित इंडो-इस्लामिकस्थापत्य कला का भी विकास हुआ| साथ ही साथ अपनी इमारतों में तुर्कों ने मेहराबों और गुम्बदों का भरपूर प्रयोग किया था| मेहराबों और गुम्बदों के कारण छत को सहारा देने के लिए बड़ी संख्या में स्तंभों की जरूरत नहीं रह गयी थी एकछोर से दूसरे छोर तक दिखाई देने वाले बड़े-बड़े कक्ष बनाए जाने लगें| सल्तनतकालीन स्थापत्य कला के कुछ उदाहरण तथा उनकी विशेषताएं प्रारंभिक तुर्कों के समय स्थापत्य आरंभ में इनके द्वारा मंदिरों तथा दूसरी इमारतों को मस्जिदों में बदला जाना जैसे-कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद; अढ़ाई दिन का झोपड़ा आदि; बहुत जल्द ही तुर्कों द्वारा अपनी इमारतें बनवाना चालू करना जैसे-कुतुबमीनार; इल्तुतमिश के समय के मदरसें, मकबरें, बावली; अतैरकिन का दरवाजा(नागौर); बलबन का मकबरा आदि; अधिकांशतः इमारतों का निर्माण दिल्ली में; कुछ भवनों के साक्ष्य दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों से भी जैसे- बदायूं, अजमेर, हरियाणा आदि; कलात्मक दृष्टिकोण से प्रारंभिक तुर्कों का स्थापत्य उतना परिष्कृत नहीं जितना खिलज़ीकालीन स्थापत्य;; संभवतः इसका कारण राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक रूप से कमजोर होना; हालाँकि, इस दौर में ना केवल इस्लामिक स्थापत्य(मस्जिद, मकबरा, मदरसा, मीनार आदि का निर्माण एवं नींव पड़ना; अलंकरण के लिए सुलेखन एवं अरबेस्क का प्रयोग) बल्कि हिंदू स्थापत्य के साथ इसका मिश्रण भी प्रारंभ होना; कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में अधिकाधिक स्तंभों/कमल की आकृतियों के साक्ष्य; मिश्रित स्थापत्य के विकास में कुछ परिस्थितियों की भी भूमिका जैसे- इन इमारतों के निर्माण में स्थानीय भवनों के अवशेषों, स्थानीय कारीगरों आदि का प्रयोग; खिलजीकालीन स्थापत्य अलाई दरवाजा(कलात्मक दृष्टिकोण से सल्तनतकालीन इमारतों में महत्वपूर्ण); जमातखाना मस्जिद; सीरी नगर; हौजखास; अलाई दरवाजे में पहली बार वैज्ञानिक पद्धति से गुंबद का निर्माण; अलाउद्दीन खिलजी का काल स्थापत्य के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व; अलंकरण, मेहराब(घोड़े की नाल की तरह आकृति), गुंबद आदि का निर्माण खूबसूरती से; इस्लामिक स्थापत्य के प्रति झुकाव के बावजूद अलाई दरवाजा के अलंकरण में कमल के झालर जैसी आकृतियाँ बड़ी संख्या में बनाया जाना; अलाउद्दीन खिलजीकालीन स्थापत्य राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि एवं शासक के आत्मविश्वास का द्योतक; तुगलक कालीन स्थापत्य तुगलकाबाद; मकबरा; आदिलाबाद; जहाँपनाह नगर; निजामुद्दीन औलिया का मकबरा; तेलंगानी मकबरा; गयासुद्दीन तुगलक एवं मोहम्मद-बिन-तुगलक के समय की इमारतें- परवर्ती की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक इमारतों के साक्ष्य; खिलजीकाल की तरह इस्लामिक विशेषताओं की तरफ अत्याधिक झुकाव नहीं; ढलवां दीवारें, सादगीपन तथा हिंदू स्थापत्य का मिश्रण; फिरोजशाह तुगलक काल- बड़ी संख्या में नगरों का निर्माण; पुराने स्थापत्य के पुनरोद्धार के प्रमाण(कुतुबमीनार; हौजखास); धार्मिक कट्टरता के बावजूद इंडो-इस्लामिक स्थापत्य की परंपरा जारी; सलामी(ढलवां) दीवारों का प्रचलन बंद; अष्टकोणीय मकबरा के साक्ष्य; इसके पश्चात राजनीतिक-आर्थिक कारणों से तुगलककालीन स्थापत्य का अवसान; सैय्यद एवं लोदी कालीन स्थापत्य मकबरों का काल; प्रमुख स्थापत्य- बड़ा गुंबद; छोटा गुंबद; दादी का गुंबद; मोठ मस्जिद; इस दौर के मकबरों को उद्यानों में बनाया जाने लगना; अष्टकोणीय मकबरा का एक सामान्य विशेषता के रूप में; दोहरे गुंबद का भी प्रचलन;
50,219
ऐसेआर्थिक एवं गैर-आर्थिक कारकों का विश्लेषण कीजिये जो आर्थिक विकास के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| (150 से 200 शब्द) Analyze the economic and non-economic factors that play an important role in determining economic development. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में आर्थिक विकास को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में, आर्थिक विकास के निर्धारक आर्थिक कारकों को बताइये, 3- दूसरे भाग में, आर्थिक विकास के निर्धारक गैर-आर्थिक कारकों को बताइये, 4- अंतिम में पूरकता के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | विकास को परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाता है| सामान्यतः इसे सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है| विकास में परिमाणात्मक परिवर्तनों के स्थान पर गुणात्मक परिवर्तनों पर बल दिया जाता है| आर्थिक संवृद्धि एवं विकास में एक मूलभूत अंतर होता है| आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है| सामान्य तौर पर यदि किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो कहा जाता है कि उस देश में आर्थिक संवृद्धि हो रही है| यह विकास का परिमाणात्मक अथवा मात्रात्मक पहलू है| आर्थिक विकास, आर्थिक संवृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है|आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में अनेक आर्थिक एवं गैर-आर्थिक कारकों का योगदान होता है| जो निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट होता है- आर्थिक विकास के निर्धारक आर्थिक कारक किसी अर्थव्यवस्था में यदि पूँजी निर्माण की दर अधिक होगी तो आर्थिक विकास सुनिश्चित करने में आसानी होगी| ध्यातव्य है की निम्न वर्धमान पूँजी-उत्पाद अनुपात(ICOR) कम निवेश में अधिक संवृद्धि को सुनिश्चित करता है| जबकि अधिक ICOR निम्न कार्यकुशलता को स्पष्ट करता है| किसी देश में अपनाई गयी आर्थिक प्रणाली भी आर्थिक विकास को प्रभावित करती है| मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं में बाजार और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रक आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में एक दूसरे की पूरक भूमिका निभाते हैं| सरकारों द्वारा आर्थिक नीतियाँ भी आर्थिक विकास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| प्राप्त आर्थिक संवृद्धि के समतापूर्ण वितरण, आय का निष्यंदन, गरीबी उन्मूलन योजनायें, रोजगार सृजन, उत्पादन की श्रम प्रधान प्रणाली को अपनाने जैसी नीतियां आर्थिक विकास को प्रभावी रूप से सुनिश्चित करती हैं| वैश्विक कारकों द्वारा किसी अर्थव्यवस्था में पूँजी का अंतर्प्रवाह अथवा बहिर्प्रवाह सुनिश्चित होता है,इसके अतिरिक्त प्रदर्शनकारी प्रभाव, मूल्यों के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया, नये एवं आधुनिक मूल्यों के आगमन आदि कारक आर्थिक विकास को दिशा देने में महत्वपूर्ण होते हैं| किसी देश का विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ होने वाला व्यापार आर्थिक विकास के निर्धारण में प्रभावी भूमिका निभाता है| व्यापार संतुलन की दशा, विनिर्माण क्षेत्रक की स्थिति,विदेशी विनिमय की प्राप्ति, विनिमय दर में उच्चावचन आदि कारक विकास को प्रभावित करते हैं| इनके अतिरिक्त, अर्थव्यवस्था की संरचना, अर्थव्यस्था में प्रयुक्त हो रही तकनीकी का स्तर भी आर्थिक विकास को दिशा देता है| आधुनिक तकनीकों का प्रयोग अथवा ऑटोमेशन के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि होती है जिससे आर्थिक विकास में सहायता मिलती है| इसी तरह किसी क्षेत्र विशेष में अर्थव्यस्था के विशिष्टीकरण का स्तर देश में हो रहे उत्पादन को प्रभावित करता है,जो विकास से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित है| अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ आधारभूत अवसंरचना आर्थिक गतिविधियों में तीव्रता लाती है,इसके साथ ही यह मानव विकास, कौशल विकास, मानव संसाधनों का विकास और इस तरह से क्षमता संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| इनके अलावा, पूँजी अथवा प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता एवं उनके दोहन की क्षमता भी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत हो रहे विकास को सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं क्योंकि यह देश के उत्पादन को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं| जो सकल आय में वृद्धि में सहायक होता है| आर्थिक विकास के निर्धारक गैर आर्थिक कारक आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में न केवल आर्थिक कारक बल्कि गैर-आर्थिक कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है| सामाजिक-सांस्कृतिक कारक जैसे जाति प्रथा, साम्प्रदायिकता, लिंग-भेद, श्रम बल में महिला भागीदारी आदि कारक अवसरों को बाधित करते हैं अथवा अवसरों तक पहुँच में बाधा बनते हैं| इसके परिणामस्वरूप आर्थिक विकास अवरुद्ध होता है| राष्ट्र की राजनीतिक प्रणाली जैसे तानाशाही अथवा लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं का भी विकास पर प्रभाव पड़ता है| लोकतांत्रिक प्रणालियों अन्य प्रणालियों की अपेक्षा संसाधनों तक सामान पहुच सुनिश्चित करने में आसानी होती है| इसके अतिरिक्त राजनीतिक स्थिरता तथा सरकार की विचारधारा आदि कारक भी विकास पर प्रभाव डालते हैं| जनसंख्या की संरचना अथवा जनांकिकीय कारक एवं श्रम बल का आकार, इसके साथ ही श्रम बल में सहभागिता की दर जैसे कारक उत्पादन और श्रम आपूर्ति को महत्वपूर्ण सीमा तक प्रभावित करते हैं|इसका प्रत्यक्ष प्रभाव संवृद्धि और इस प्रकार विकास पर पड़ता है| अत्यधिक नियतिवादी धार्मिक सोच, नागरिकों में विकास की आकांक्षा का स्तर आदि कारक भी आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने एवं उसे जारी रखने में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं| उपरोक्त बिन्दुओं एवं तर्कों से स्पष्ट होता है कि आर्थिक विकास न तो केवल आर्थिक कारकों का परिणाम होता है और न ही केवल गैर-आर्थिक कारकों का परिणाम होता है| व्यापक समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक विकास आर्थिक एवं गैर-आर्थिक कारकों का सम्मिलित परिणाम होता है|
##Question:ऐसेआर्थिक एवं गैर-आर्थिक कारकों का विश्लेषण कीजिये जो आर्थिक विकास के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| (150 से 200 शब्द) Analyze the economic and non-economic factors that play an important role in determining economic development. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में आर्थिक विकास को परिभाषित कीजिये 2- प्रथम भाग में, आर्थिक विकास के निर्धारक आर्थिक कारकों को बताइये, 3- दूसरे भाग में, आर्थिक विकास के निर्धारक गैर-आर्थिक कारकों को बताइये, 4- अंतिम में पूरकता के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये | विकास को परिवर्तन के संदर्भ में समझा जाता है| सामान्यतः इसे सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाता है| विकास में परिमाणात्मक परिवर्तनों के स्थान पर गुणात्मक परिवर्तनों पर बल दिया जाता है| आर्थिक संवृद्धि एवं विकास में एक मूलभूत अंतर होता है| आर्थिक संवृद्धि से तात्पर्य किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है| सामान्य तौर पर यदि किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो कहा जाता है कि उस देश में आर्थिक संवृद्धि हो रही है| यह विकास का परिमाणात्मक अथवा मात्रात्मक पहलू है| आर्थिक विकास, आर्थिक संवृद्धि से व्यापक अवधारणा है| आर्थिक विकास किसी देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में गुणात्मक एवं मात्रात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बंधित है|आर्थिक विकास का प्रमुख लक्ष्य कुपोषण बीमारी, निरक्षरता और बेरोजगारी आदि सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समापन करना होता है| इससे स्पष्ट होता है की आर्थिक विकास स्वरूपतः एक उद्देश्य है| आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में अनेक आर्थिक एवं गैर-आर्थिक कारकों का योगदान होता है| जो निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट होता है- आर्थिक विकास के निर्धारक आर्थिक कारक किसी अर्थव्यवस्था में यदि पूँजी निर्माण की दर अधिक होगी तो आर्थिक विकास सुनिश्चित करने में आसानी होगी| ध्यातव्य है की निम्न वर्धमान पूँजी-उत्पाद अनुपात(ICOR) कम निवेश में अधिक संवृद्धि को सुनिश्चित करता है| जबकि अधिक ICOR निम्न कार्यकुशलता को स्पष्ट करता है| किसी देश में अपनाई गयी आर्थिक प्रणाली भी आर्थिक विकास को प्रभावित करती है| मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं में बाजार और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रक आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में एक दूसरे की पूरक भूमिका निभाते हैं| सरकारों द्वारा आर्थिक नीतियाँ भी आर्थिक विकास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| प्राप्त आर्थिक संवृद्धि के समतापूर्ण वितरण, आय का निष्यंदन, गरीबी उन्मूलन योजनायें, रोजगार सृजन, उत्पादन की श्रम प्रधान प्रणाली को अपनाने जैसी नीतियां आर्थिक विकास को प्रभावी रूप से सुनिश्चित करती हैं| वैश्विक कारकों द्वारा किसी अर्थव्यवस्था में पूँजी का अंतर्प्रवाह अथवा बहिर्प्रवाह सुनिश्चित होता है,इसके अतिरिक्त प्रदर्शनकारी प्रभाव, मूल्यों के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया, नये एवं आधुनिक मूल्यों के आगमन आदि कारक आर्थिक विकास को दिशा देने में महत्वपूर्ण होते हैं| किसी देश का विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ होने वाला व्यापार आर्थिक विकास के निर्धारण में प्रभावी भूमिका निभाता है| व्यापार संतुलन की दशा, विनिर्माण क्षेत्रक की स्थिति,विदेशी विनिमय की प्राप्ति, विनिमय दर में उच्चावचन आदि कारक विकास को प्रभावित करते हैं| इनके अतिरिक्त, अर्थव्यवस्था की संरचना, अर्थव्यस्था में प्रयुक्त हो रही तकनीकी का स्तर भी आर्थिक विकास को दिशा देता है| आधुनिक तकनीकों का प्रयोग अथवा ऑटोमेशन के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि होती है जिससे आर्थिक विकास में सहायता मिलती है| इसी तरह किसी क्षेत्र विशेष में अर्थव्यस्था के विशिष्टीकरण का स्तर देश में हो रहे उत्पादन को प्रभावित करता है,जो विकास से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित है| अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ आधारभूत अवसंरचना आर्थिक गतिविधियों में तीव्रता लाती है,इसके साथ ही यह मानव विकास, कौशल विकास, मानव संसाधनों का विकास और इस तरह से क्षमता संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| इनके अलावा, पूँजी अथवा प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता एवं उनके दोहन की क्षमता भी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत हो रहे विकास को सुनिश्चित करने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं क्योंकि यह देश के उत्पादन को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं| जो सकल आय में वृद्धि में सहायक होता है| आर्थिक विकास के निर्धारक गैर आर्थिक कारक आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने में न केवल आर्थिक कारक बल्कि गैर-आर्थिक कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है| सामाजिक-सांस्कृतिक कारक जैसे जाति प्रथा, साम्प्रदायिकता, लिंग-भेद, श्रम बल में महिला भागीदारी आदि कारक अवसरों को बाधित करते हैं अथवा अवसरों तक पहुँच में बाधा बनते हैं| इसके परिणामस्वरूप आर्थिक विकास अवरुद्ध होता है| राष्ट्र की राजनीतिक प्रणाली जैसे तानाशाही अथवा लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं का भी विकास पर प्रभाव पड़ता है| लोकतांत्रिक प्रणालियों अन्य प्रणालियों की अपेक्षा संसाधनों तक सामान पहुच सुनिश्चित करने में आसानी होती है| इसके अतिरिक्त राजनीतिक स्थिरता तथा सरकार की विचारधारा आदि कारक भी विकास पर प्रभाव डालते हैं| जनसंख्या की संरचना अथवा जनांकिकीय कारक एवं श्रम बल का आकार, इसके साथ ही श्रम बल में सहभागिता की दर जैसे कारक उत्पादन और श्रम आपूर्ति को महत्वपूर्ण सीमा तक प्रभावित करते हैं|इसका प्रत्यक्ष प्रभाव संवृद्धि और इस प्रकार विकास पर पड़ता है| अत्यधिक नियतिवादी धार्मिक सोच, नागरिकों में विकास की आकांक्षा का स्तर आदि कारक भी आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने एवं उसे जारी रखने में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं| उपरोक्त बिन्दुओं एवं तर्कों से स्पष्ट होता है कि आर्थिक विकास न तो केवल आर्थिक कारकों का परिणाम होता है और न ही केवल गैर-आर्थिक कारकों का परिणाम होता है| व्यापक समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक विकास आर्थिक एवं गैर-आर्थिक कारकों का सम्मिलित परिणाम होता है|
50,229
Briefly enumerate the features of the Dravida style of temple architecture? Also, discuss its various sub-styles? (10 Marks/150 words)
Approach : List the features of the Dravida style of temple architecture. Briefly give the account of the substyle of Dravida architecture. Answer : Dravida temple architecture - Pallava rulers initiated rock-cut cave architecture in South India which gave rise to the Dravida style of temple in South India. Features - 1. Vimana- the inclined tower is the foremost manifestation of Dravida temple. 2. Gopuram- Dravida temple always has high enclosure walls, intervened by gateways known as Gopuram. 3. Narta Mandap- Inside the premise, Narta Mandap is created for the classical dance performance. 4. Ardha Mandap- Starting porch of Mandap is known as Ardha Mandap, in which often Dhwaja is erected. 5. Antaral- Garbhgriha is connected through a narrow passage known as Antaral. 6. Pushkaram- stepped water tank is a necessary feature of Dravida. 7. Ground plan- Generally temples follow a crucified ground plan and some of the temples also follow the Panchayatan style like Nagara. 8. On the entrance of Garbhagriha a sculpture of Dwarpal is created. 9. Ex- Brihadeshwara temple-Thanjore,Airateshwar temple- Thanjore Substyle of Dravida style Vijayanagar temple - 1. Majority of the temples in Vijayanagar style was created by Krishna dev Raya 2. It is noted for a very high enclosure wall. 3. Amman Shrine- A second Garbhagriha is known as Amman Shrine dedicated to the chief wife of the main deity. 4.Kalyan Mantapam-It was created inside the premise of the temple which was meant for marriage. 5.Mahanavami Dibba-It was created by Krishnadev Raya in Humpi which is rectangular upraised platform meant for sacrifice or performance of Yajna (for from temple) 6. Ex- Veerbhardra temple- Lepakshi, Virupaksha temple- Hampi, Thousand pillar temple- Lepakshi Nayaka Temple - 1. This style is popular in and aroundMadurai 2. They continued theAmman shrineconcept from Viajaynagar period. 3. It is noted for large no. ofGopuramand large no. ofVimana. 4.Parakram- It is noted for huge corridor known as Parakram. 5.Brahma Pushkaram(water tank)- It is present inside the premise of the temple. 6. Ex- Meenakshi(Sundareshwar) temple- Madurai, Srirangnathswami temple- Srirangam. Dravida style of temple architecture has great significance. These temples are still used for religious festivals and also act as tourist destinations.
##Question:Briefly enumerate the features of the Dravida style of temple architecture? Also, discuss its various sub-styles? (10 Marks/150 words)##Answer:Approach : List the features of the Dravida style of temple architecture. Briefly give the account of the substyle of Dravida architecture. Answer : Dravida temple architecture - Pallava rulers initiated rock-cut cave architecture in South India which gave rise to the Dravida style of temple in South India. Features - 1. Vimana- the inclined tower is the foremost manifestation of Dravida temple. 2. Gopuram- Dravida temple always has high enclosure walls, intervened by gateways known as Gopuram. 3. Narta Mandap- Inside the premise, Narta Mandap is created for the classical dance performance. 4. Ardha Mandap- Starting porch of Mandap is known as Ardha Mandap, in which often Dhwaja is erected. 5. Antaral- Garbhgriha is connected through a narrow passage known as Antaral. 6. Pushkaram- stepped water tank is a necessary feature of Dravida. 7. Ground plan- Generally temples follow a crucified ground plan and some of the temples also follow the Panchayatan style like Nagara. 8. On the entrance of Garbhagriha a sculpture of Dwarpal is created. 9. Ex- Brihadeshwara temple-Thanjore,Airateshwar temple- Thanjore Substyle of Dravida style Vijayanagar temple - 1. Majority of the temples in Vijayanagar style was created by Krishna dev Raya 2. It is noted for a very high enclosure wall. 3. Amman Shrine- A second Garbhagriha is known as Amman Shrine dedicated to the chief wife of the main deity. 4.Kalyan Mantapam-It was created inside the premise of the temple which was meant for marriage. 5.Mahanavami Dibba-It was created by Krishnadev Raya in Humpi which is rectangular upraised platform meant for sacrifice or performance of Yajna (for from temple) 6. Ex- Veerbhardra temple- Lepakshi, Virupaksha temple- Hampi, Thousand pillar temple- Lepakshi Nayaka Temple - 1. This style is popular in and aroundMadurai 2. They continued theAmman shrineconcept from Viajaynagar period. 3. It is noted for large no. ofGopuramand large no. ofVimana. 4.Parakram- It is noted for huge corridor known as Parakram. 5.Brahma Pushkaram(water tank)- It is present inside the premise of the temple. 6. Ex- Meenakshi(Sundareshwar) temple- Madurai, Srirangnathswami temple- Srirangam. Dravida style of temple architecture has great significance. These temples are still used for religious festivals and also act as tourist destinations.
50,232
महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए, महासागरीय बेसिन के उच्चावच को समझाइये | साथ ही महाद्वीपीय मग्नतट की प्रमुख विशेषताओं की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) While giving a general introduction to the ocean basin, explain the bottom relief of the oceanic basin. Also, discuss the main features of the continental shelf. (150-200 Words, 10 Marks)
एप्रोच - उत्तर की शरुआत महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात महासागर बेसिन के उच्चावच को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में महाद्वीपीय मग्नतट को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागर बेसिन सौर मंडल में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है , जिस पर अत्यधिक मात्रा में जल विद्यमान है | इसीलिए इसे अक्सर जलीय ग्रह की उपाधि दी जाती है |पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्रफल के 70.8 प्रतिशत भाग पर महासागरों का विस्तार है | महासागर एक विशाल तथा निरंतर जल खंड है जो पृथ्वी के सभी भूखंडों को चारों ओर से घेरे हुए है | दक्षिणी गोलार्द्ध के लगभग 4/5 तथा उत्तरी गोलार्द्ध के 3/5 भाग पर महासागरीय जल का विस्तार है | इसमें विश्व के समूचे जल का 97.2 प्रतिशत जल समाहित है | महादीपों के विपरीत, महासागर एक-दूसरे में इतने स्वाभाविक रूप से विलय हो जाते हैं उनका सीमांकन करना कठिन होता है | भूगोलविदों ने पृथ्वी के महासागरीय भागों को प्रशांत, अटलांटिक,हिन्द, आर्कटिक एवं दक्षिणी मसग्र में विभाजित किया है | महासागर बेसिन के उच्चावच महासागरीय बेसिन समतल नहीं हैं , अपितु अत्यधिक जटिल स्थालाकृतियों युक्त है | सोनार बैथीमेट्री के विकास से, ध्वनि तरंगों की सहायता से परोक्ष रूप से महासागरीय नितलों की गहराइयों का मापन करके उनका मानचित्रण करना संभव हुआ है | ध्वनि तरंगों का महासागरीय नितल को छूकर प्रतिध्वनि के रूप में वापस आना ही सोनार बैथीमेंट्री का मुख्य आधार है | इस विधि से एकत्रित आंकड़े अनेक जटिल उच्चावचीय नितल पर प्रकाश डालते हैं | महासागरीय बेसिन के उच्चावचों को उच्चतादर्शी या उच्चतामितिक वक्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है | यह महाद्वीपीय स्थलों की ऊंचाई तथा महासागरीय गहराई को प्रदर्शित करने वाला वक्र है | सामान्यतः महासागरीय बेसिन को चार मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है - महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न ढाल महाद्वीपीय उत्थान अगाध सागरीय मैदान इनके अतिरिक्त अन्य कई जलमग्न उच्चावच जैसे अन्तः समुद्री पर्वत श्रेणी या कटक, सागरीय माउंट, सागरीय चबूतरे या गाईआट, पर्वत, खाईयां, केनियन, गर्त आदि सम्मिलित हैं | अनेकों द्वीप, प्रवाल वलय द्वीप, प्रवाल भित्ति सागरीय उच्चावचों की विविधता को और बढाते हैं | महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न तट , प्रत्येक महाद्वीप का तट से समुद्र की ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है | इसका निर्माण सामान्यतः सागर तल की ऊंचाई बढ़ने के कारण मह्द्वीप के तटीय भागों के जलमग्न होने से अथवा सागर तल पर महासागरीय निक्षेपों के कारण होता है | यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है, इसकी औसत ढाल प्रवणता 1-3 डिग्री के मध्य होती है | यहाँ जल की औसत गहराई 100 फैदम होती है | महाद्वीपीय मग्नतटों पर अवसादों की मोटाई भी अलग-अलग होती है | ये अवसाद भूमि से नदियों, हिमनदियों तथा पवन द्वारा बहाकर लाये जाते हैं | मह्द्वीपीय मग्नतटों पर दीर्घकाल तक प्राप्त स्थलजातीय अवसाद जीवाश्म ईंधनों के स्रोत बनते हैं | प्रायः महाद्वीपीय मग्नतट, मानव के लिए महासागरों के सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं | इन तटों पर समुद्र का जल छिछला होता है जोकि मछलियों के लिए अनुकूल है | सूर्य की रौशनी महाद्वीपीय मग्नतट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुंचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करती हैं | इसके अलावा महाद्वीपों से नदियों द्वारा अनेक पोषक तत्व बहाकर लाये जाते हैं, जो कि वनस्पतियों व समुद्री जीवों के लिए उपयोगी होते हैं |
##Question:महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए, महासागरीय बेसिन के उच्चावच को समझाइये | साथ ही महाद्वीपीय मग्नतट की प्रमुख विशेषताओं की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) While giving a general introduction to the ocean basin, explain the bottom relief of the oceanic basin. Also, discuss the main features of the continental shelf. (150-200 Words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शरुआत महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात महासागर बेसिन के उच्चावच को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में महाद्वीपीय मग्नतट को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागर बेसिन सौर मंडल में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है , जिस पर अत्यधिक मात्रा में जल विद्यमान है | इसीलिए इसे अक्सर जलीय ग्रह की उपाधि दी जाती है |पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्रफल के 70.8 प्रतिशत भाग पर महासागरों का विस्तार है | महासागर एक विशाल तथा निरंतर जल खंड है जो पृथ्वी के सभी भूखंडों को चारों ओर से घेरे हुए है | दक्षिणी गोलार्द्ध के लगभग 4/5 तथा उत्तरी गोलार्द्ध के 3/5 भाग पर महासागरीय जल का विस्तार है | इसमें विश्व के समूचे जल का 97.2 प्रतिशत जल समाहित है | महादीपों के विपरीत, महासागर एक-दूसरे में इतने स्वाभाविक रूप से विलय हो जाते हैं उनका सीमांकन करना कठिन होता है | भूगोलविदों ने पृथ्वी के महासागरीय भागों को प्रशांत, अटलांटिक,हिन्द, आर्कटिक एवं दक्षिणी मसग्र में विभाजित किया है | महासागर बेसिन के उच्चावच महासागरीय बेसिन समतल नहीं हैं , अपितु अत्यधिक जटिल स्थालाकृतियों युक्त है | सोनार बैथीमेट्री के विकास से, ध्वनि तरंगों की सहायता से परोक्ष रूप से महासागरीय नितलों की गहराइयों का मापन करके उनका मानचित्रण करना संभव हुआ है | ध्वनि तरंगों का महासागरीय नितल को छूकर प्रतिध्वनि के रूप में वापस आना ही सोनार बैथीमेंट्री का मुख्य आधार है | इस विधि से एकत्रित आंकड़े अनेक जटिल उच्चावचीय नितल पर प्रकाश डालते हैं | महासागरीय बेसिन के उच्चावचों को उच्चतादर्शी या उच्चतामितिक वक्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है | यह महाद्वीपीय स्थलों की ऊंचाई तथा महासागरीय गहराई को प्रदर्शित करने वाला वक्र है | सामान्यतः महासागरीय बेसिन को चार मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है - महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न ढाल महाद्वीपीय उत्थान अगाध सागरीय मैदान इनके अतिरिक्त अन्य कई जलमग्न उच्चावच जैसे अन्तः समुद्री पर्वत श्रेणी या कटक, सागरीय माउंट, सागरीय चबूतरे या गाईआट, पर्वत, खाईयां, केनियन, गर्त आदि सम्मिलित हैं | अनेकों द्वीप, प्रवाल वलय द्वीप, प्रवाल भित्ति सागरीय उच्चावचों की विविधता को और बढाते हैं | महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न तट , प्रत्येक महाद्वीप का तट से समुद्र की ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है | इसका निर्माण सामान्यतः सागर तल की ऊंचाई बढ़ने के कारण मह्द्वीप के तटीय भागों के जलमग्न होने से अथवा सागर तल पर महासागरीय निक्षेपों के कारण होता है | यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है, इसकी औसत ढाल प्रवणता 1-3 डिग्री के मध्य होती है | यहाँ जल की औसत गहराई 100 फैदम होती है | महाद्वीपीय मग्नतटों पर अवसादों की मोटाई भी अलग-अलग होती है | ये अवसाद भूमि से नदियों, हिमनदियों तथा पवन द्वारा बहाकर लाये जाते हैं | मह्द्वीपीय मग्नतटों पर दीर्घकाल तक प्राप्त स्थलजातीय अवसाद जीवाश्म ईंधनों के स्रोत बनते हैं | प्रायः महाद्वीपीय मग्नतट, मानव के लिए महासागरों के सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं | इन तटों पर समुद्र का जल छिछला होता है जोकि मछलियों के लिए अनुकूल है | सूर्य की रौशनी महाद्वीपीय मग्नतट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुंचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करती हैं | इसके अलावा महाद्वीपों से नदियों द्वारा अनेक पोषक तत्व बहाकर लाये जाते हैं, जो कि वनस्पतियों व समुद्री जीवों के लिए उपयोगी होते हैं |
50,234
समुद्र के राजनैतिक विभाजन से होने वाले लाभ तथा हानि की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Discuss the advantages and disadvantages of political division of the sea. (150-200 words)
दृष्टिकोण: संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण से होने वाले लाभों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इससे होने वाली हानियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । कुछ सुझावों के साथ संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : संयुक्त राष्ट्र की समुद्री क़ानून संधि ( UNCLOS) द्वारा वर्ष 1982 में समुद्र का राजनैतिक क्षेत्रीयकरण का कार्य किया गया । वर्ष 1994 में गयाना इस कानून पर हस्ताक्षर करने वाला 60वां देश बना और इसी के साथ यह कानून अंतराष्ट्रीय रूप से प्रभावी हुआ । इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों को चार भागों में बांटा गया जो निम्न हैं : प्रादेशिक जल क्षेत्र: किसी राष्ट्र के तट से 12 समुद्री मील के भीतर का क्षेत्र उस राष्ट्र का प्रादेशिक जल क्षेत्र माना जाता है। इसमें संबंधित राष्ट्र अपने क़ानून बना सकता है । संलग्न क्षेत्र: क्षेत्रीय जल से और 12 समुद्री मील आगे तक (यानि तट से 24 समुद्री मील आगे तक) का क्षेत्र संलग्न क्षेत्र कहलाता है । राष्ट्रों को अधिकार है कि वह चार पहलुओं पर अपने क़ानून लागू कर सकता है - प्रदूषण, कर (लगान), सीमाशुल्क और अप्रवासन। अनन्य आर्थिक क्षेत्र: राष्ट्र के तट अर्थात बेसलाइन से 200 समुद्री मील तक का क्षेत्र अनन्य आर्थिक क्षेत्र कहलाता है । इस क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों पर संबंधित राष्ट्र का अनन्य अधिकार होता है तथापि इस क्षेत्र से विदेशी नौकाएँ और विमान खुली छूट के साथ निकल सकते हैं। साथ ही यहाँ विदेशी राष्ट्रों और कम्पनियों को संचार के साधन लगाने का भी अधिकार होता है। उच्च समुद्र या खुला समुद्र: 200 समुद्री मील से आगे का क्षेत्र उच्च समुद्र या खुला समुद्र कहलाता है । इसमें किसी भी राष्ट्र का कोई निजी अधिकार नहीं होता है । लाभ : इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों में विवाद को कम करने का प्रयास किया गया । अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा व विवाद को कम करने के दृष्टिकोण से भी यह संधि महत्वपूर्ण है । छोटे राष्ट्रों के अधिकार सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण । आर्थिक संसाधनों के दोहन व समुद्री संचार के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण । हानि / सीमाएँ: अमेरिका जैसे कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रों द्वारा अब तक इस संधि की पुष्टि नहीं की गयी है । चीन संधि के कई प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन करता है तथापि कोई विशेष अनुशासनात्मक कार्यवाही इसके विरुद्ध नहीं की गयी है । कई राष्ट्रों द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने समुद्री अधिकारों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है , जो भविष्य में विवाद को बढ़ावा देगा । यह भी इस अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी चुनौती है । जलवायु परिवर्तन की बढ़ती समस्या भी इस कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी समस्या है । उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र का कानून एक बेहतर प्रयास होने के बावजूद भी कई सीमाओं से युक्त है । विशेषकर बड़े व शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा या तो इसे मान्यता नहीं प्रदान किया गया है या इसके प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया जाता है । वैश्विक शांति के लिए यह आवश्यक है कि UNCLOS के प्रावधानों का सभी राष्ट्रों द्वारा सम्मान किया जाए ।
##Question:समुद्र के राजनैतिक विभाजन से होने वाले लाभ तथा हानि की चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Discuss the advantages and disadvantages of political division of the sea. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण: संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण की संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण से होने वाले लाभों की बिन्दुवार चर्चा कीजिये । इससे होने वाली हानियों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । कुछ सुझावों के साथ संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर : संयुक्त राष्ट्र की समुद्री क़ानून संधि ( UNCLOS) द्वारा वर्ष 1982 में समुद्र का राजनैतिक क्षेत्रीयकरण का कार्य किया गया । वर्ष 1994 में गयाना इस कानून पर हस्ताक्षर करने वाला 60वां देश बना और इसी के साथ यह कानून अंतराष्ट्रीय रूप से प्रभावी हुआ । इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों को चार भागों में बांटा गया जो निम्न हैं : प्रादेशिक जल क्षेत्र: किसी राष्ट्र के तट से 12 समुद्री मील के भीतर का क्षेत्र उस राष्ट्र का प्रादेशिक जल क्षेत्र माना जाता है। इसमें संबंधित राष्ट्र अपने क़ानून बना सकता है । संलग्न क्षेत्र: क्षेत्रीय जल से और 12 समुद्री मील आगे तक (यानि तट से 24 समुद्री मील आगे तक) का क्षेत्र संलग्न क्षेत्र कहलाता है । राष्ट्रों को अधिकार है कि वह चार पहलुओं पर अपने क़ानून लागू कर सकता है - प्रदूषण, कर (लगान), सीमाशुल्क और अप्रवासन। अनन्य आर्थिक क्षेत्र: राष्ट्र के तट अर्थात बेसलाइन से 200 समुद्री मील तक का क्षेत्र अनन्य आर्थिक क्षेत्र कहलाता है । इस क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों पर संबंधित राष्ट्र का अनन्य अधिकार होता है तथापि इस क्षेत्र से विदेशी नौकाएँ और विमान खुली छूट के साथ निकल सकते हैं। साथ ही यहाँ विदेशी राष्ट्रों और कम्पनियों को संचार के साधन लगाने का भी अधिकार होता है। उच्च समुद्र या खुला समुद्र: 200 समुद्री मील से आगे का क्षेत्र उच्च समुद्र या खुला समुद्र कहलाता है । इसमें किसी भी राष्ट्र का कोई निजी अधिकार नहीं होता है । लाभ : इसके माध्यम से समुद्री क्षेत्रों में विवाद को कम करने का प्रयास किया गया । अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा व विवाद को कम करने के दृष्टिकोण से भी यह संधि महत्वपूर्ण है । छोटे राष्ट्रों के अधिकार सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण । आर्थिक संसाधनों के दोहन व समुद्री संचार के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण । हानि / सीमाएँ: अमेरिका जैसे कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रों द्वारा अब तक इस संधि की पुष्टि नहीं की गयी है । चीन संधि के कई प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन करता है तथापि कोई विशेष अनुशासनात्मक कार्यवाही इसके विरुद्ध नहीं की गयी है । कई राष्ट्रों द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने समुद्री अधिकारों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है , जो भविष्य में विवाद को बढ़ावा देगा । यह भी इस अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी चुनौती है । जलवायु परिवर्तन की बढ़ती समस्या भी इस कानून की प्रभाविता के समक्ष एक बड़ी समस्या है । उपरोक्त चर्चा के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि समुद्र के राजनैतिक क्षेत्रीयकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र का कानून एक बेहतर प्रयास होने के बावजूद भी कई सीमाओं से युक्त है । विशेषकर बड़े व शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा या तो इसे मान्यता नहीं प्रदान किया गया है या इसके प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया जाता है । वैश्विक शांति के लिए यह आवश्यक है कि UNCLOS के प्रावधानों का सभी राष्ट्रों द्वारा सम्मान किया जाए ।
50,241
महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए, महासागरीय बेसिन के उच्चावच को समझाइये | साथ ही महाद्वीपीय मग्नतट की प्रमुख विशेषताओं की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the ocean basin, explain the bottom relief of the oceanic basin. Also, discuss the main features of continental shelf. (150-200 Words)
एप्रोच - उत्तर की शरुआत महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात महासागर बेसिन के उच्चावच को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में महाद्वीपीय मग्नतट को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागर बेसिन सौर मंडल में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है , जिस पर अत्यधिक मात्रा में जल विद्यमान है | इसीलिए इसे अक्सर जलीय ग्रह की उपाधि दी जाती है |पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्रफल के 70.8 प्रतिशत भाग पर महासागरों का विस्तार है | महासागर एक विशाल तथा निरंतर जल खंड है जो पृथ्वी के सभी भूखंडों को चारों ओर से घेरे हुए है | दक्षिणी गोलार्द्ध के लगभग 4/5 तथा उत्तरी गोलार्द्ध के 3/5 भाग पर महासागरीय जल का विस्तार है | इसमें विश्व के समूचे जल का 97.2 प्रतिशत जल समाहित है | महादीपों के विपरीत, महासागर एक-दूसरे में इतने स्वाभाविक रूप से विलय हो जाते हैं उनका सीमांकन करना कठिन होता है | भूगोलविदों ने पृथ्वी के महासागरीय भागों को प्रशांत, अटलांटिक,हिन्द, आर्कटिक एवं दक्षिणी मसग्र में विभाजित किया है | महासागर बेसिन के उच्चावच महासागरीय बेसिन समतल नहीं हैं , अपितु अत्यधिक जटिल स्थालाकृतियों युक्त है | सोनार बैथीमेट्री के विकास से, ध्वनि तरंगों की सहायता से परोक्ष रूप से महासागरीय नितलों की गहराइयों का मापन करके उनका मानचित्रण करना संभव हुआ है | ध्वनि तरंगों का महासागरीय नितल को छूकर प्रतिध्वनि के रूप में वापस आना ही सोनार बैथीमेंट्री का मुख्य आधार है | इस विधि से एकत्रित आंकड़े अनेक जटिल उच्चावचीय नितल पर प्रकाश डालते हैं | महासागरीय बेसिन के उच्चावचों को उच्चतादर्शी या उच्चतामितिक वक्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है | यह महाद्वीपीय स्थलों की ऊंचाई तथा महासागरीय गहराई को प्रदर्शित करने वाला वक्र है | सामान्यतः महासागरीय बेसिन को चार मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है - महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न ढाल महाद्वीपीय उत्थान अगाध सागरीय मैदान इनके अतिरिक्त अन्य कई जलमग्न उच्चावच जैसे अन्तः समुद्री पर्वत श्रेणी या कटक, सागरीय माउंट, सागरीय चबूतरे या गाईआट, पर्वत, खाईयां, केनियन, गर्त आदि सम्मिलित हैं | अनेकों द्वीप, प्रवाल वलय द्वीप, प्रवाल भित्ति सागरीय उच्चावचों की विविधता को और बढाते हैं | महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न तट , प्रत्येक महाद्वीप का तट से समुद्र की ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है | इसका निर्माण सामान्यतः सागर तल की ऊंचाई बढ़ने के कारण मह्द्वीप के तटीय भागों के जलमग्न होने से अथवा सागर तल पर महासागरीय निक्षेपों के कारण होता है | यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है, इसकी औसत ढाल प्रवणता 1-3 डिग्री के मध्य होती है | यहाँ जल की औसत गहराई 100 फैदम होती है | महाद्वीपीय मग्नतटों पर अवसादों की मोटाई भी अलग-अलग होती है | ये अवसाद भूमि से नदियों, हिमनदियों तथा पवन द्वारा बहाकर लाये जाते हैं | मह्द्वीपीय मग्नतटों पर दीर्घकाल तक प्राप्त स्थलजातीय अवसाद जीवाश्म ईंधनों के स्रोत बनते हैं | प्रायः महाद्वीपीय मग्नतट, मानव के लिए महासागरों के सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं | इन तटों पर समुद्र का जल छिछला होता है जोकि मछलियों के लिए अनुकूल है | सूर्य की रौशनी महाद्वीपीय मग्नतट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुंचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करती हैं | इसके अलावा महाद्वीपों से नदियों द्वारा अनेक पोषक तत्व बहाकर लाये जाते हैं, जो कि वनस्पतियों व समुद्री जीवों के लिए उपयोगी होते हैं |
##Question:महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए, महासागरीय बेसिन के उच्चावच को समझाइये | साथ ही महाद्वीपीय मग्नतट की प्रमुख विशेषताओं की भी चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the ocean basin, explain the bottom relief of the oceanic basin. Also, discuss the main features of continental shelf. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शरुआत महासागर बेसिन का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात महासागर बेसिन के उच्चावच को बताते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में महाद्वीपीय मग्नतट को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - महासागर बेसिन सौर मंडल में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है , जिस पर अत्यधिक मात्रा में जल विद्यमान है | इसीलिए इसे अक्सर जलीय ग्रह की उपाधि दी जाती है |पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्रफल के 70.8 प्रतिशत भाग पर महासागरों का विस्तार है | महासागर एक विशाल तथा निरंतर जल खंड है जो पृथ्वी के सभी भूखंडों को चारों ओर से घेरे हुए है | दक्षिणी गोलार्द्ध के लगभग 4/5 तथा उत्तरी गोलार्द्ध के 3/5 भाग पर महासागरीय जल का विस्तार है | इसमें विश्व के समूचे जल का 97.2 प्रतिशत जल समाहित है | महादीपों के विपरीत, महासागर एक-दूसरे में इतने स्वाभाविक रूप से विलय हो जाते हैं उनका सीमांकन करना कठिन होता है | भूगोलविदों ने पृथ्वी के महासागरीय भागों को प्रशांत, अटलांटिक,हिन्द, आर्कटिक एवं दक्षिणी मसग्र में विभाजित किया है | महासागर बेसिन के उच्चावच महासागरीय बेसिन समतल नहीं हैं , अपितु अत्यधिक जटिल स्थालाकृतियों युक्त है | सोनार बैथीमेट्री के विकास से, ध्वनि तरंगों की सहायता से परोक्ष रूप से महासागरीय नितलों की गहराइयों का मापन करके उनका मानचित्रण करना संभव हुआ है | ध्वनि तरंगों का महासागरीय नितल को छूकर प्रतिध्वनि के रूप में वापस आना ही सोनार बैथीमेंट्री का मुख्य आधार है | इस विधि से एकत्रित आंकड़े अनेक जटिल उच्चावचीय नितल पर प्रकाश डालते हैं | महासागरीय बेसिन के उच्चावचों को उच्चतादर्शी या उच्चतामितिक वक्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है | यह महाद्वीपीय स्थलों की ऊंचाई तथा महासागरीय गहराई को प्रदर्शित करने वाला वक्र है | सामान्यतः महासागरीय बेसिन को चार मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है - महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न ढाल महाद्वीपीय उत्थान अगाध सागरीय मैदान इनके अतिरिक्त अन्य कई जलमग्न उच्चावच जैसे अन्तः समुद्री पर्वत श्रेणी या कटक, सागरीय माउंट, सागरीय चबूतरे या गाईआट, पर्वत, खाईयां, केनियन, गर्त आदि सम्मिलित हैं | अनेकों द्वीप, प्रवाल वलय द्वीप, प्रवाल भित्ति सागरीय उच्चावचों की विविधता को और बढाते हैं | महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीपीय मग्न तट , प्रत्येक महाद्वीप का तट से समुद्र की ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है | इसका निर्माण सामान्यतः सागर तल की ऊंचाई बढ़ने के कारण मह्द्वीप के तटीय भागों के जलमग्न होने से अथवा सागर तल पर महासागरीय निक्षेपों के कारण होता है | यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है, इसकी औसत ढाल प्रवणता 1-3 डिग्री के मध्य होती है | यहाँ जल की औसत गहराई 100 फैदम होती है | महाद्वीपीय मग्नतटों पर अवसादों की मोटाई भी अलग-अलग होती है | ये अवसाद भूमि से नदियों, हिमनदियों तथा पवन द्वारा बहाकर लाये जाते हैं | मह्द्वीपीय मग्नतटों पर दीर्घकाल तक प्राप्त स्थलजातीय अवसाद जीवाश्म ईंधनों के स्रोत बनते हैं | प्रायः महाद्वीपीय मग्नतट, मानव के लिए महासागरों के सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं | इन तटों पर समुद्र का जल छिछला होता है जोकि मछलियों के लिए अनुकूल है | सूर्य की रौशनी महाद्वीपीय मग्नतट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुंचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करती हैं | इसके अलावा महाद्वीपों से नदियों द्वारा अनेक पोषक तत्व बहाकर लाये जाते हैं, जो कि वनस्पतियों व समुद्री जीवों के लिए उपयोगी होते हैं |
50,242
महासागरीय उच्चावच से आप क्या समझते हैं? महासागरीय बेसिन के उच्चावचों के विभिन्न वर्गों को सचित्र स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by oceanic relief? Illustrate the different sections of reliefs of the oceanic basin. (150-200 words, 10 marks)
Approach: भूमिका में महासागरीय उच्चावच को परिभाषित कीजिए। महासागरीय बेसिन के उच्चावचों के वर्गीकरण को समझाइए। उपयुक्त डायग्राम को भी शामिल करने का प्रयास कीजिए। उत्तर: महासागरीय बेसिन समतल नहीं है, अपितु अत्यधिक जटिल स्थलाकृतियों युक्त है। सोनार बैथीमेट्री के विकास से पता चला है कि समुद्र के भीतर कई भूआकृतियाँ उपस्थित है-जैसे समुद्री कटक या पर्वत श्रेणी, सागरीय माउंट, सागरीय चबूतरे, पर्वत, खाइयाँ, केनियन गर्त आदि। इन्हे महासागर के उच्चावच कहा जाता है। महासागर अनेकों द्वीपों, प्रवाल वलय द्वीप, प्रवाल भित्ति, सागरीय उच्चावचों की विविधता को दर्शाते हैं। महासरीय बेसिन के उच्चावचों के प्रकार: महाद्वीपीय मग्न तट- महाद्वीपीय मग्न तट प्रत्येक महाद्वीप का तट से समुद्र की ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है। इसका निर्माण सामान्यतया सागर तल की ऊंचाई बढ्ने के कारण महाद्वीप के तटीय भागों के जलमग्न होने से अथवा सागर ताल पर महासागरीय निक्षेपों के कारण होता है। यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है, इसकी औसत ढाल प्रवणता 1 डिग्री से 3 डिग्री के मध्य होती है यहाँ जल की औसत गहराई 100 फैदम होती है। महासागरों के कुल क्षेत्रफल का 8.6% भाग पर महाद्वीपीय मग्नतट का विस्तार है। महासागरों के मग्नतात के वितरण में असमानता पायी जाती है। अटलांटिक सागर में 13.3 प्रतिशत, प्रशांत महासागर में लगभग 5.7% तथा हिन्द महासागर में 4.2 प्रतिशत महासागरीय भाग पर मग्न तट का विस्तार है। इन तटों पर समुद्र का जल छिछला होता है जो कि मछलियों क लिए अनुकूल है। सूर्य कि रोशनी महाद्वीपीय मग्नतट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुँचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों कि वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। महाद्वीपीय मग्न ढाल: इसकी ढाल भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती है तथा औसत ढाल प्रवणता 5 डिग्री होती है। मग्न ढाल पर जल कि गहराई 200 मीटर से 2000 मीटर तक होती है। ढाल का किनारा महाद्वीपों कि समाप्ति को इंगित करता है। महाद्वीपीय मग्नतट के अंतिम किनारे से मग्न ढाल प्रारम्भ होता है। अत: महाद्वीपीय मग्न तट व गहरे महासागरीय मैदान के मध्य तीव्र ढाल वाला भाग महाद्वीपीय मग्न ढाल कहलाता है। समस्त सागरीय क्षेत्रफल के 8.5 प्रतिशत भाग पर मग्न ढाल का विस्तार होता है। महाद्वीपीय मग्न ढालों पर सागरीय निक्षेपों का अभाव होता है क्योंकि तीव्र ढाल के कारण उन पर अवसाद स्थायी नहीं रह पाते। महाद्वीपीय उत्थान: जहां महाद्वीपीय ढाल का अंत होता है, वही मंद ढाल वाले महाद्वीपीय उत्थान की शुरुवात होती है। परंतु जिन तटों के समीप महासागरीय गर्त उपस्थित होते हैं वहाँ इनका पूर्णतया अभाव पाया जाता है। इसका ढाल 0.5 डिग्री से 1 डिग्री तक होता है इसका सामान्य उच्चावच बहुत कम होता है। गहराई बढ्ने के साथ, यह महाद्वीप उत्थान करीब करीब समतल होकर महासागरीय नितल मैदान या अगाध सागरीय मैदान में विलीन हो जाता है। नितल सागरीय मैदान: गहरे महासागरीय मैदान या महासागरीय नितल मैदान महासागरीय बेसिन के मंद ढाल वाले क्षेत्र होते हैं। इनकी गहराई 3000-6000 मीटर के तक होती है। ये मैदान महीन कणों वाले अवसादों जैसे मृतिका एवं गाद से आवरित होते हैं। सागरीय मैदान महासागरीय नितल के लगभग 76% भाग तक विस्तृत है। इस मैदानी भाग का अधिकांश विस्तार 20 डिग्री उत्तर एवं 60 डिग्री दक्षिण अक्षांश के मध्य पाया जाता है। प्राय: 60 डिग्री से 70 डिग्री उत्तरी अक्षांशों के मध्य इनका अभाव देखा जाता है। इन समुद्री मैदानों में कटक, ज्वालामुखी पर्वत, निमग्न द्वीप, गर्त, खाई और महासागरीय द्वीप जैसी स्थलाकृतियाँ मिलती है जो कभी कभी महासागरों के मध्य समुद्र तल से ऊपर उठ जाती है।
##Question:महासागरीय उच्चावच से आप क्या समझते हैं? महासागरीय बेसिन के उच्चावचों के विभिन्न वर्गों को सचित्र स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by oceanic relief? Illustrate the different sections of reliefs of the oceanic basin. (150-200 words, 10 marks)##Answer:Approach: भूमिका में महासागरीय उच्चावच को परिभाषित कीजिए। महासागरीय बेसिन के उच्चावचों के वर्गीकरण को समझाइए। उपयुक्त डायग्राम को भी शामिल करने का प्रयास कीजिए। उत्तर: महासागरीय बेसिन समतल नहीं है, अपितु अत्यधिक जटिल स्थलाकृतियों युक्त है। सोनार बैथीमेट्री के विकास से पता चला है कि समुद्र के भीतर कई भूआकृतियाँ उपस्थित है-जैसे समुद्री कटक या पर्वत श्रेणी, सागरीय माउंट, सागरीय चबूतरे, पर्वत, खाइयाँ, केनियन गर्त आदि। इन्हे महासागर के उच्चावच कहा जाता है। महासागर अनेकों द्वीपों, प्रवाल वलय द्वीप, प्रवाल भित्ति, सागरीय उच्चावचों की विविधता को दर्शाते हैं। महासरीय बेसिन के उच्चावचों के प्रकार: महाद्वीपीय मग्न तट- महाद्वीपीय मग्न तट प्रत्येक महाद्वीप का तट से समुद्र की ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है। इसका निर्माण सामान्यतया सागर तल की ऊंचाई बढ्ने के कारण महाद्वीप के तटीय भागों के जलमग्न होने से अथवा सागर ताल पर महासागरीय निक्षेपों के कारण होता है। यह महासागर का सबसे उथला भाग होता है, इसकी औसत ढाल प्रवणता 1 डिग्री से 3 डिग्री के मध्य होती है यहाँ जल की औसत गहराई 100 फैदम होती है। महासागरों के कुल क्षेत्रफल का 8.6% भाग पर महाद्वीपीय मग्नतट का विस्तार है। महासागरों के मग्नतात के वितरण में असमानता पायी जाती है। अटलांटिक सागर में 13.3 प्रतिशत, प्रशांत महासागर में लगभग 5.7% तथा हिन्द महासागर में 4.2 प्रतिशत महासागरीय भाग पर मग्न तट का विस्तार है। इन तटों पर समुद्र का जल छिछला होता है जो कि मछलियों क लिए अनुकूल है। सूर्य कि रोशनी महाद्वीपीय मग्नतट के छिछले जल में से होकर समुद्र तली तक पहुँचकर सूक्ष्म पौधों और जीवों कि वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। महाद्वीपीय मग्न ढाल: इसकी ढाल भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती है तथा औसत ढाल प्रवणता 5 डिग्री होती है। मग्न ढाल पर जल कि गहराई 200 मीटर से 2000 मीटर तक होती है। ढाल का किनारा महाद्वीपों कि समाप्ति को इंगित करता है। महाद्वीपीय मग्नतट के अंतिम किनारे से मग्न ढाल प्रारम्भ होता है। अत: महाद्वीपीय मग्न तट व गहरे महासागरीय मैदान के मध्य तीव्र ढाल वाला भाग महाद्वीपीय मग्न ढाल कहलाता है। समस्त सागरीय क्षेत्रफल के 8.5 प्रतिशत भाग पर मग्न ढाल का विस्तार होता है। महाद्वीपीय मग्न ढालों पर सागरीय निक्षेपों का अभाव होता है क्योंकि तीव्र ढाल के कारण उन पर अवसाद स्थायी नहीं रह पाते। महाद्वीपीय उत्थान: जहां महाद्वीपीय ढाल का अंत होता है, वही मंद ढाल वाले महाद्वीपीय उत्थान की शुरुवात होती है। परंतु जिन तटों के समीप महासागरीय गर्त उपस्थित होते हैं वहाँ इनका पूर्णतया अभाव पाया जाता है। इसका ढाल 0.5 डिग्री से 1 डिग्री तक होता है इसका सामान्य उच्चावच बहुत कम होता है। गहराई बढ्ने के साथ, यह महाद्वीप उत्थान करीब करीब समतल होकर महासागरीय नितल मैदान या अगाध सागरीय मैदान में विलीन हो जाता है। नितल सागरीय मैदान: गहरे महासागरीय मैदान या महासागरीय नितल मैदान महासागरीय बेसिन के मंद ढाल वाले क्षेत्र होते हैं। इनकी गहराई 3000-6000 मीटर के तक होती है। ये मैदान महीन कणों वाले अवसादों जैसे मृतिका एवं गाद से आवरित होते हैं। सागरीय मैदान महासागरीय नितल के लगभग 76% भाग तक विस्तृत है। इस मैदानी भाग का अधिकांश विस्तार 20 डिग्री उत्तर एवं 60 डिग्री दक्षिण अक्षांश के मध्य पाया जाता है। प्राय: 60 डिग्री से 70 डिग्री उत्तरी अक्षांशों के मध्य इनका अभाव देखा जाता है। इन समुद्री मैदानों में कटक, ज्वालामुखी पर्वत, निमग्न द्वीप, गर्त, खाई और महासागरीय द्वीप जैसी स्थलाकृतियाँ मिलती है जो कभी कभी महासागरों के मध्य समुद्र तल से ऊपर उठ जाती है।
50,249
मध्यकालीन भारत में सूफी आंदोलन का उदय विविध कारकों का परिणाम था। स्पष्ट कीजिये। साथ ही, सूफी सिलसिलों का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव पड़ा था। उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) The rise of Sufi movement in Medieval India was the result of various factors. Explain. Also, Sufi silsilas had wide influence in various fields. Discuss with examples. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- सूफी आंदोलन तथा उसके उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,मध्यकालीन भारत में सूफी आंदोलन के उदय के कारणों को बिंदुबार उल्लेखित कीजिये| अगले भाग में,सूफी सिलसिलों का विभिन्न क्षेत्रों में पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए| व्यापक प्रभावों के बावजूद, सूफी आंदोलन की सीमाओं के साथ उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- इस्लाम के भीतर एक उदारवादी व रहस्यवादी आंदोलन के संदर्भ में सूफी आंदोलन की चर्चा की जाती है|सूफी शब्द की उत्पति को लेकर विद्वानों के बीच सहमति नहीं है लेकिन अधिकांशतः विद्वान् सूफ(ऊन) शब्द से इसकी उत्पति मानते हैं| 7वीं सदी से ही अरब देशों में सूफी संतों की उपस्थिति की जानकारी हमें प्राप्त होती है| महमूद गजनी के अभियानों के साथ भारत में भी सूफी संतों का आगमन प्रारंभ हुआ था|प्रारंभिक सूफी संतों में अल हुजुवरी प्रमुख हैं| अबुल फ़जल द्वारा 14 सूफी संप्रदायों का उल्लेख मिलता है जिसमें से 5 विशेष तौर पर लोकप्रिय थें- चिश्ती, सोहरावर्दी; कादिरी; नक्शबंदी एवं शत्तारीसिलसिलें| हमें कुतुबुद्दीन ऐबक के काल से लेकर परवर्ती मुग़ल(18वीं सदी) तक सूफी संतों की सक्रियता की जानकारी मिलती है| सूफी आंदोलन के उदय के कारण शासक वर्गों का विलासितायुक्त जीवनशैली; शासक वर्ग एवं आमलोगों के बीच भेदभाव; शासक वर्ग का गैर इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव; सामाजिक-आर्थिक असमानता का प्रचलन; उलेमा वर्ग एवं रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव; सूफी आंदोलन से जुड़ी कुछ प्रमुख शब्दावलियाँ कुछ प्रमुख सूफी संतों में चिश्ती संप्रदाय केख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती; नागौरी; बख्तियारउद्दीन काकी; बाबा फरीद; निजामुद्दीन औलिया; बुरहानुद्दीन गरीब; गेसुदाराज; सुहरावर्दी सिलसिले केशेख बहाउद्दीन जकारिया; फिरदौसी सिलसिले के अहमद याहया मनेरी; नक्शबंदी सिलसिले के शेख अहमद सरहिंदी आदि प्रमुख हैं| सूफी सिलसिलों का विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव सूफी सिलसिलों का धार्मिक प्रभाव धर्म का सरलीकरण अर्थात अत्यंत ही सरल तरीके से धर्म की मूल शिक्षाओं को लोगों के सामने रखना; अंधविश्वास, कर्मकांड आदि की आलोचना; गुरू के निर्देशन में सरलतापूर्वक ईश्वर से जुडाव; सामान्य/गृहस्थ जीवन जीते हुए अच्छे आचरण पर बल; एकेश्वरवाद, गुरू का महत्व जैसे संदर्भों में भक्ति आंदोलन पर भी इसका प्रभाव; धार्मिक संश्लेषण की प्रक्रिया को सशक्त करना; नाथपंथियों का भी चिश्ती संप्रदाय के साथ संपर्क; इस्लाम को लोकप्रिय बनाने में भी भूमिका; सूफी सिलसिलों का सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव प्रत्येक प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध जैसे- धर्म, क्षेत्र, जाति, लिंग, वर्ण आदि; खानकाहों में सबके साथ एक समान व्यवहार; धार्मिक कट्टरता के युग में नैतिक विचारों जैसे- सहिष्णुता, दया, करुणा आदि को समाज में लोकप्रिय बनाना; सामाजिक संश्लेषण की वजह से इनकी शिक्षाओं का हिंदू समाज पर भी प्रभाव; मानव सेवा पर सर्वाधिक बल; महिलाओं को लेकर सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव; सूफी सिलसिलों का भाषा-साहित्य क्षेत्र में प्रभाव उर्दू भाषा की शुरुआत तथा विकास खानकाहों से; अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के विकास में भी सूफी संतों का योगदान; जैसे- बाबा फरीद एवं बुल्ले शाह द्वारा पंजाबी भाषा के विकास में योगदान आदि; सूफी सिलसिलों का संगीत के क्षेत्र में प्रभाव शमां या सामूहिक संगीत; खानकाहों विशेषकर चिश्ती में सूफी संगीत का विकास; इस क्रम में कुछ वाद्य यंत्रों तथा रागों की भी खोज; सूफी सिलसिलों का आर्थिक क्षेत्र में प्रभाव कालाबाजारी, जमाखोरी आदि की निंदा; खानकाह के आसपास बंजर भूमि को आबाद करना तथा कृषि को बढ़ावा; सूफी सिलसिलों का राजनीतिक क्षेत्र में प्रभाव प्रायः राजनीति से दूरी बनाये रखना लेकिन सूफी संतों की गतिविधियों ने शासक वर्ग तथा आमलोगों के बीच खाई को पाटने का कार्य किया और शासक वर्ग की लोकप्रियता बढ़ी; साथ ही, जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव था उनकी नीतियों में भी उदारता के तत्व दिखाई पड़ना जैसे- अकबर; इसके अलावा सूफी संतों से संबंधित खानकाह तथा मजार/दरगाह के माध्यम से उस काल के स्थापत्य की भी हमें जानकारी मिलती है| विविध क्षेत्रों में उपरोक्त प्रभावों के बावजूद सूफी आंदोलन की कुछ सीमाएँ/आलोचना भी रही हैं जैसे-सूफी संतों की गतिविधियों से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से धर्म परिवर्तन की घटनाएँ एवं सामाजिक तनाव का जन्म; सूफी आंदोलन के बावजूद शासक वर्ग की जीवनशैली विलासितायुक्त बने रहना; कई अवसरों पर शासकों द्वारा धार्मिक कट्टरता का प्रदर्शन;समाज/राजनीति पर उलेमा वर्ग का प्रभाव बने रहना; समाज के उच्च वर्गों पर भी इनका प्रभाव अपवादस्वरूप दिखना; जनाधार मुख्यतः समाज के आमलोगों के बीच आदि| उपरोक्त सीमाओं के बावजूद यह कहना सर्वथाउचित ही होगा होगा कि सूफी आंदोलनों की वजह से धार्मिक कट्टरता दूर करने में सहायता मिली जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी उनके दरगाहों पर विभिन्न धर्मों के लोगों के जाने के रूप में मिलता है|
##Question:मध्यकालीन भारत में सूफी आंदोलन का उदय विविध कारकों का परिणाम था। स्पष्ट कीजिये। साथ ही, सूफी सिलसिलों का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव पड़ा था। उदाहरण सहित चर्चा कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) The rise of Sufi movement in Medieval India was the result of various factors. Explain. Also, Sufi silsilas had wide influence in various fields. Discuss with examples. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- सूफी आंदोलन तथा उसके उदय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,मध्यकालीन भारत में सूफी आंदोलन के उदय के कारणों को बिंदुबार उल्लेखित कीजिये| अगले भाग में,सूफी सिलसिलों का विभिन्न क्षेत्रों में पड़ने वाले प्रभावों को लिखिए| व्यापक प्रभावों के बावजूद, सूफी आंदोलन की सीमाओं के साथ उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- इस्लाम के भीतर एक उदारवादी व रहस्यवादी आंदोलन के संदर्भ में सूफी आंदोलन की चर्चा की जाती है|सूफी शब्द की उत्पति को लेकर विद्वानों के बीच सहमति नहीं है लेकिन अधिकांशतः विद्वान् सूफ(ऊन) शब्द से इसकी उत्पति मानते हैं| 7वीं सदी से ही अरब देशों में सूफी संतों की उपस्थिति की जानकारी हमें प्राप्त होती है| महमूद गजनी के अभियानों के साथ भारत में भी सूफी संतों का आगमन प्रारंभ हुआ था|प्रारंभिक सूफी संतों में अल हुजुवरी प्रमुख हैं| अबुल फ़जल द्वारा 14 सूफी संप्रदायों का उल्लेख मिलता है जिसमें से 5 विशेष तौर पर लोकप्रिय थें- चिश्ती, सोहरावर्दी; कादिरी; नक्शबंदी एवं शत्तारीसिलसिलें| हमें कुतुबुद्दीन ऐबक के काल से लेकर परवर्ती मुग़ल(18वीं सदी) तक सूफी संतों की सक्रियता की जानकारी मिलती है| सूफी आंदोलन के उदय के कारण शासक वर्गों का विलासितायुक्त जीवनशैली; शासक वर्ग एवं आमलोगों के बीच भेदभाव; शासक वर्ग का गैर इस्लामिक प्रजा के साथ भेदभाव; सामाजिक-आर्थिक असमानता का प्रचलन; उलेमा वर्ग एवं रुढ़िवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव; सूफी आंदोलन से जुड़ी कुछ प्रमुख शब्दावलियाँ कुछ प्रमुख सूफी संतों में चिश्ती संप्रदाय केख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती; नागौरी; बख्तियारउद्दीन काकी; बाबा फरीद; निजामुद्दीन औलिया; बुरहानुद्दीन गरीब; गेसुदाराज; सुहरावर्दी सिलसिले केशेख बहाउद्दीन जकारिया; फिरदौसी सिलसिले के अहमद याहया मनेरी; नक्शबंदी सिलसिले के शेख अहमद सरहिंदी आदि प्रमुख हैं| सूफी सिलसिलों का विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव सूफी सिलसिलों का धार्मिक प्रभाव धर्म का सरलीकरण अर्थात अत्यंत ही सरल तरीके से धर्म की मूल शिक्षाओं को लोगों के सामने रखना; अंधविश्वास, कर्मकांड आदि की आलोचना; गुरू के निर्देशन में सरलतापूर्वक ईश्वर से जुडाव; सामान्य/गृहस्थ जीवन जीते हुए अच्छे आचरण पर बल; एकेश्वरवाद, गुरू का महत्व जैसे संदर्भों में भक्ति आंदोलन पर भी इसका प्रभाव; धार्मिक संश्लेषण की प्रक्रिया को सशक्त करना; नाथपंथियों का भी चिश्ती संप्रदाय के साथ संपर्क; इस्लाम को लोकप्रिय बनाने में भी भूमिका; सूफी सिलसिलों का सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव प्रत्येक प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध जैसे- धर्म, क्षेत्र, जाति, लिंग, वर्ण आदि; खानकाहों में सबके साथ एक समान व्यवहार; धार्मिक कट्टरता के युग में नैतिक विचारों जैसे- सहिष्णुता, दया, करुणा आदि को समाज में लोकप्रिय बनाना; सामाजिक संश्लेषण की वजह से इनकी शिक्षाओं का हिंदू समाज पर भी प्रभाव; मानव सेवा पर सर्वाधिक बल; महिलाओं को लेकर सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव; सूफी सिलसिलों का भाषा-साहित्य क्षेत्र में प्रभाव उर्दू भाषा की शुरुआत तथा विकास खानकाहों से; अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के विकास में भी सूफी संतों का योगदान; जैसे- बाबा फरीद एवं बुल्ले शाह द्वारा पंजाबी भाषा के विकास में योगदान आदि; सूफी सिलसिलों का संगीत के क्षेत्र में प्रभाव शमां या सामूहिक संगीत; खानकाहों विशेषकर चिश्ती में सूफी संगीत का विकास; इस क्रम में कुछ वाद्य यंत्रों तथा रागों की भी खोज; सूफी सिलसिलों का आर्थिक क्षेत्र में प्रभाव कालाबाजारी, जमाखोरी आदि की निंदा; खानकाह के आसपास बंजर भूमि को आबाद करना तथा कृषि को बढ़ावा; सूफी सिलसिलों का राजनीतिक क्षेत्र में प्रभाव प्रायः राजनीति से दूरी बनाये रखना लेकिन सूफी संतों की गतिविधियों ने शासक वर्ग तथा आमलोगों के बीच खाई को पाटने का कार्य किया और शासक वर्ग की लोकप्रियता बढ़ी; साथ ही, जिन शासकों पर सूफी संतों का प्रभाव था उनकी नीतियों में भी उदारता के तत्व दिखाई पड़ना जैसे- अकबर; इसके अलावा सूफी संतों से संबंधित खानकाह तथा मजार/दरगाह के माध्यम से उस काल के स्थापत्य की भी हमें जानकारी मिलती है| विविध क्षेत्रों में उपरोक्त प्रभावों के बावजूद सूफी आंदोलन की कुछ सीमाएँ/आलोचना भी रही हैं जैसे-सूफी संतों की गतिविधियों से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से धर्म परिवर्तन की घटनाएँ एवं सामाजिक तनाव का जन्म; सूफी आंदोलन के बावजूद शासक वर्ग की जीवनशैली विलासितायुक्त बने रहना; कई अवसरों पर शासकों द्वारा धार्मिक कट्टरता का प्रदर्शन;समाज/राजनीति पर उलेमा वर्ग का प्रभाव बने रहना; समाज के उच्च वर्गों पर भी इनका प्रभाव अपवादस्वरूप दिखना; जनाधार मुख्यतः समाज के आमलोगों के बीच आदि| उपरोक्त सीमाओं के बावजूद यह कहना सर्वथाउचित ही होगा होगा कि सूफी आंदोलनों की वजह से धार्मिक कट्टरता दूर करने में सहायता मिली जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी उनके दरगाहों पर विभिन्न धर्मों के लोगों के जाने के रूप में मिलता है|
50,251
महासगरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Discuss the various factors affecting the ocean currents. (150-200 words)
दृष्टिकोण : महासागरीय धाराओं की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : महासगरीय जल की अत्यधिक मात्रा जो एक निश्चित दिशा में लंबी दूरी तय करती है , उसे सागरीय जलधारा कहते हैं । सागरीय जलधारा निश्चित मार्ग व दिशा में जल के नियमित प्रवाह को दर्शाते हैं । तापमान, गहराई तथा गति के आधार पर धाराओं का विभाजन किया जाता है । जैसे- गर्म व ठंडी जलधारा , सतही व गहन जलधारा , प्रवाह व स्ट्रीम आदि । महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक : महासागरीय धारा के निर्धारण में कई कारकों का सम्मिलित प्रभाव रहता है , जो धाराओं की गति, दिशा व प्रकृति का निर्धारण करते हैं । धाराओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में हम निम्नलिखित को देख सकते हैं । 1. तापमान में भिन्नता : यह सागर तल को प्रभावित करता है ।अधिक तापमान से समुद्र तल ऊंचा होता है क्योंकि गर्म होकर जल फैलता है । इसके विपरीत कम तापमान से सागर तल नीचे जाता है । इस प्रकार जल स्तर में भिन्नता पूरे सागर को प्रभावित करता है ।चूंकि विषुवतीय क्षेत्रों में तापमान अधिक रहता है । अतः विषुवतीय प्रदेश का जल ध्रुवीय प्रदेशों की ओर जाने की प्रवृति रखता है । इसके कारण सतह पर जल का प्रवाह विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर होता है तथा अधःप्रवाह के रूप में नितल पर ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जल प्रवाहित होता है । 2. प्रचलित पवन की दिशा : जब समुद्री जल के ऊपर पवन प्रवाहित होती है तो घर्षण के प्रभाव से समुद्र में जलधाराओं का निर्माण होता है । विश्व की अधिकांश जलधाराएं प्रचलित पवनों की दिशा का ही अनुसरण करती हैं । 3. कोरियोलिस बल : कोरियोलिस बल के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्द्ध में दहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर मुड़ जाती हैं । इसके कारण लगभग वृताकार पथ जल का प्रवाह होता है और महासागरीय बेसिनों में वृहद वृताकार धराएं उत्पन्न होती हैं । 4. अंतः क्षेत्रीय वायुदाब में अंतर : जहाँ वायुदाब अधिक होता है वहाँ जल के आयतन में कमी के कारण जल ताल नीचे जाता है । इसके विपरीत निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों में जल की सतह ऊंची रहती है । इस प्रकार वायुदाब में अंतर जल सतह में अंतर उत्पन्न करता है और इसके कारण उच्च तल से निम्न तल की ओर जल धाराओं का प्रवाह होता है । 5. लवणता : महासागरीय लवणता से समुद्री जल का घनत्व प्रभावित होता है । घनत्व में अंतर के कारण धाराएं उत्पन्न होती हैं । 6. सागर नित्तल का उच्चावच : सागरीय नित्तल जैसे सागरीय पर्वत, मध्य सागरीय कटक आदि महासागरीय संचलन में गति को तथा दिशा को प्रभावित करता है । इनके अतिरिक्त कई अन्य स्थानिक कारक हैं जो महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति, गति तथा दिशा को प्रभावित करती है । इनमें हम तट रेखा की आकृति , तलीय आकृतियाँ , ऋतु परिवर्तन, वर्षा आदि की चर्चा कर सकते हैं । महासागरीय धाराओं का प्रभाव कई रूपों में देखा जा सकता है । यह पृथ्वी का क्षैतिज ऊष्मा संतुलन , वर्षा , तटीय भागों की जलवायु आदि को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है ।
##Question:महासगरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Discuss the various factors affecting the ocean currents. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : महासागरीय धाराओं की चर्चा करते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : महासगरीय जल की अत्यधिक मात्रा जो एक निश्चित दिशा में लंबी दूरी तय करती है , उसे सागरीय जलधारा कहते हैं । सागरीय जलधारा निश्चित मार्ग व दिशा में जल के नियमित प्रवाह को दर्शाते हैं । तापमान, गहराई तथा गति के आधार पर धाराओं का विभाजन किया जाता है । जैसे- गर्म व ठंडी जलधारा , सतही व गहन जलधारा , प्रवाह व स्ट्रीम आदि । महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक : महासागरीय धारा के निर्धारण में कई कारकों का सम्मिलित प्रभाव रहता है , जो धाराओं की गति, दिशा व प्रकृति का निर्धारण करते हैं । धाराओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में हम निम्नलिखित को देख सकते हैं । 1. तापमान में भिन्नता : यह सागर तल को प्रभावित करता है ।अधिक तापमान से समुद्र तल ऊंचा होता है क्योंकि गर्म होकर जल फैलता है । इसके विपरीत कम तापमान से सागर तल नीचे जाता है । इस प्रकार जल स्तर में भिन्नता पूरे सागर को प्रभावित करता है ।चूंकि विषुवतीय क्षेत्रों में तापमान अधिक रहता है । अतः विषुवतीय प्रदेश का जल ध्रुवीय प्रदेशों की ओर जाने की प्रवृति रखता है । इसके कारण सतह पर जल का प्रवाह विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर होता है तथा अधःप्रवाह के रूप में नितल पर ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जल प्रवाहित होता है । 2. प्रचलित पवन की दिशा : जब समुद्री जल के ऊपर पवन प्रवाहित होती है तो घर्षण के प्रभाव से समुद्र में जलधाराओं का निर्माण होता है । विश्व की अधिकांश जलधाराएं प्रचलित पवनों की दिशा का ही अनुसरण करती हैं । 3. कोरियोलिस बल : कोरियोलिस बल के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्द्ध में दहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर मुड़ जाती हैं । इसके कारण लगभग वृताकार पथ जल का प्रवाह होता है और महासागरीय बेसिनों में वृहद वृताकार धराएं उत्पन्न होती हैं । 4. अंतः क्षेत्रीय वायुदाब में अंतर : जहाँ वायुदाब अधिक होता है वहाँ जल के आयतन में कमी के कारण जल ताल नीचे जाता है । इसके विपरीत निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों में जल की सतह ऊंची रहती है । इस प्रकार वायुदाब में अंतर जल सतह में अंतर उत्पन्न करता है और इसके कारण उच्च तल से निम्न तल की ओर जल धाराओं का प्रवाह होता है । 5. लवणता : महासागरीय लवणता से समुद्री जल का घनत्व प्रभावित होता है । घनत्व में अंतर के कारण धाराएं उत्पन्न होती हैं । 6. सागर नित्तल का उच्चावच : सागरीय नित्तल जैसे सागरीय पर्वत, मध्य सागरीय कटक आदि महासागरीय संचलन में गति को तथा दिशा को प्रभावित करता है । इनके अतिरिक्त कई अन्य स्थानिक कारक हैं जो महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति, गति तथा दिशा को प्रभावित करती है । इनमें हम तट रेखा की आकृति , तलीय आकृतियाँ , ऋतु परिवर्तन, वर्षा आदि की चर्चा कर सकते हैं । महासागरीय धाराओं का प्रभाव कई रूपों में देखा जा सकता है । यह पृथ्वी का क्षैतिज ऊष्मा संतुलन , वर्षा , तटीय भागों की जलवायु आदि को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है ।
50,269
Trace the evolution of the earth, focussing on the formation of earth’s atmosphere, crust and ocean. (150 words/10 Marks)
Approach : Brief introduction about Earth. List the stages of evolution. Explain each stage in brief about the formation of atmosphere, crust and ocean. Answer : The planet earth initially was a barren, rocky and hot object with a thin atmosphere of hydrogen and helium. This is far from the present-day picture of the earth. Hence, there must have been some events– processes, which may have caused this change from rocky, barren and hot earth to a beautiful planet. Stages of formation- 1. Volatile state-Initial phase The earth has a layered structure. From the outermost end of the atmosphere to the centre of the earth, the material that exists is not uniform. The atmospheric matter has the least density. From the surface to deeper depths, the earth’s interior has different zones and each of these contains materials with different characteristics. 2. Development of Lithosphere The earth was mostly in a volatile state during its primordial stage. Due to a gradual increase in density the temperature inside has increased. As a result, the material inside started getting separated depending on their densities. This allowed heavier materials (like iron) to sink towards the centre of the earth and the lighter ones to move towards the surface. With the passage of time, it cooled further and solidified and condensed into a smaller size. This later led to the development of the outer surface in the form of a crust. 3. Evolution of Atmosphere and Hydrosphere The present composition of the earth’s atmosphere is chiefly contributed by nitrogen and oxygen. There are three stages in the evolution of the present atmosphere. The first stage is marked by the loss of the primordial atmosphere. In the second stage, the hot interior of the earth contributed to the evolution of the atmosphere. Finally, the composition of the atmosphere was modified by the living world through the process of photosynthesis. This happened not only in case of the earth but also in all the terrestrial planets, which were supposed to have lost their primordial atmosphere through the impact of solar winds. During the cooling of the earth, gases and water vapour were released from the interior solid earth. This started the evolution of the present atmosphere. The early atmosphere largely contained water vapour, nitrogen, carbon dioxide, methane, ammonia and very little free oxygen. The process through which the gases were outpoured from the interior is called degassing. Continuous volcanic eruptions contributed water vapour and gases to the atmosphere. 4. Origin of Life The last phase in the evolution of the earth relates to the origin and evolution of life. It is undoubtedly clear that the initial or even the atmosphere of the earth was not conducive for the development of life. Modern scientists refer to the origin of life as a kind of chemical reaction, which first generated complex organic molecules and assembled them. This assemblage was such that they could duplicate themselves converting inanimate matter into living substance.
##Question:Trace the evolution of the earth, focussing on the formation of earth’s atmosphere, crust and ocean. (150 words/10 Marks)##Answer:Approach : Brief introduction about Earth. List the stages of evolution. Explain each stage in brief about the formation of atmosphere, crust and ocean. Answer : The planet earth initially was a barren, rocky and hot object with a thin atmosphere of hydrogen and helium. This is far from the present-day picture of the earth. Hence, there must have been some events– processes, which may have caused this change from rocky, barren and hot earth to a beautiful planet. Stages of formation- 1. Volatile state-Initial phase The earth has a layered structure. From the outermost end of the atmosphere to the centre of the earth, the material that exists is not uniform. The atmospheric matter has the least density. From the surface to deeper depths, the earth’s interior has different zones and each of these contains materials with different characteristics. 2. Development of Lithosphere The earth was mostly in a volatile state during its primordial stage. Due to a gradual increase in density the temperature inside has increased. As a result, the material inside started getting separated depending on their densities. This allowed heavier materials (like iron) to sink towards the centre of the earth and the lighter ones to move towards the surface. With the passage of time, it cooled further and solidified and condensed into a smaller size. This later led to the development of the outer surface in the form of a crust. 3. Evolution of Atmosphere and Hydrosphere The present composition of the earth’s atmosphere is chiefly contributed by nitrogen and oxygen. There are three stages in the evolution of the present atmosphere. The first stage is marked by the loss of the primordial atmosphere. In the second stage, the hot interior of the earth contributed to the evolution of the atmosphere. Finally, the composition of the atmosphere was modified by the living world through the process of photosynthesis. This happened not only in case of the earth but also in all the terrestrial planets, which were supposed to have lost their primordial atmosphere through the impact of solar winds. During the cooling of the earth, gases and water vapour were released from the interior solid earth. This started the evolution of the present atmosphere. The early atmosphere largely contained water vapour, nitrogen, carbon dioxide, methane, ammonia and very little free oxygen. The process through which the gases were outpoured from the interior is called degassing. Continuous volcanic eruptions contributed water vapour and gases to the atmosphere. 4. Origin of Life The last phase in the evolution of the earth relates to the origin and evolution of life. It is undoubtedly clear that the initial or even the atmosphere of the earth was not conducive for the development of life. Modern scientists refer to the origin of life as a kind of chemical reaction, which first generated complex organic molecules and assembled them. This assemblage was such that they could duplicate themselves converting inanimate matter into living substance.
50,273
बचत को परिभाषित करते हुए ,स्पष्ट कीजिये कि बचत में वृद्धि विकसित एवं अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं को किस तरह से प्रभावित करती है? (150 से 200 शब्द;10 अंक) Define savings and explain how the increase in savings affects developed and underdeveloped economies? (150 to 200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में बचत को परिभाषित कीजिये और सम्बन्धित सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम भाग में विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर बचत में वृद्धि के प्रभाव स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर बचत में वृद्धि के प्रभाव स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में अलग अलग प्रभाव के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये व्यक्तिगत प्रयोज्य आय में से उपभोग व्यय को घटा कर प्राप्त शेष ही बचत होती है| निगम की आय को लाभ(प्रॉफिट) कहते हैं, निगम को निगम कर(लगभग 20%) देना पड़ता है| अब कम्पनी के मालिक/मालिकों/शेयर धारकों के पास शेष बचा 80 %(प्रयोज्य आय)| इसमें से कुछ हिस्सा कम्पनी में पुनर्निवेश के लिए अवितरित रख दिया जाता है| अवितरित लाभ वैकल्पिक होता है किन्तु निगम कर अनिवार्य होता है| लाभ का वह भाग जो उसके स्वामी/ मालिकों/शेयर धारकों को दिया जाता है उसे लाभांश(डिविडेंड) कहते हैं|इस तरह अवितरित लाभ को निगम की बचत कहा जाता है| सकल घरेलू बचत(GDS) भारत में लगभग 30 % है| भारत में प्रमुख बचतकर्ता- पारिवारिक क्षेत्र (सर्वाधिक), निजी निगम(लगभग 20 %) एवं सार्वजनिक क्षेत्र(लगभग 5 %) हैं| यदि बचत में वृद्धि होती है तो इसका विकसित एवं अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर अलग अलग प्रभाव देखने को मिलता है| इसको निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| विकसित देशों में बचत वृद्धि के प्रभाव का विश्लेषण विकसित देशों में बचत अधिक होगी तो मांग की कमी आती है, इससे आर्थिक उत्पादन में कमी आती है और मूल्य स्तर में भी कमी आती है, जिससे आर्थिक वृद्धि में कमी अर्थात आर्थिक मंदी आ जाती है अर्थात विकसित देशों के लिए बचत का बढना ठीक नहीं होता| विकसित देशों की उत्पादन क्षमता अधिक होती है अतः अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती है| बचत बढ़ने पर मांग में कमी आती है मांग में कमी आने पर स्टॉक का विक्रय ही नही हो पाता है अतः नयी विनिर्माण इकाइयों की स्थापना की प्रेरणा नहीं होती है इसीलिए निवेश नहीं बढ़ता है| इसे मितव्ययिता का विरोधाभास कहा जाता है| महामंदी(1929 से 1933) का मुख्य कारण बचत प्रेरित समग्र मांग का अभाव होना था| इसके कारण मितव्ययिता के विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हुई थी| कीन्स के सुझावों को मानने से समग्र मांग के नियंत्रण द्वारा पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में स्थिरता आयी(2008 तक मंदी नहीं आई) इसी कारण कीन्स को समष्टि अर्थशास्त्र के आधार का निर्माता माना जाता है| अल्प-विकसित देशों में बचत वृद्धि के प्रभाव का विश्लेषण अल्प विकसित देशों में बचत बढेगी तो निवेश बढेगा, निवेश बढेगा तो आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित होगी | अल्प विकसित देशों में मांग भी अधिक होती है क्योंकि यहाँ प्रायः जनसंख्या अधिक होती है तथा सरकार द्वारा विकासात्मक व्यय हेतु बजट घाटे की नीति अपनाई जाती है दूसरी ओर उत्पादन क्षमता कम होने के कारण मांग की तुलना में आपूर्ति कम होने के कारण मुद्रास्फीति की समस्या भी देखी जा सकती है| अल्प विकसित देशों में बचत बढ़ेगी तो निवेश बढ़ेगा क्योंकि उत्पादन क्षमता, मांग की तुलना में कम होती है| यहाँ उत्पादन बढ़ेगा तो मूल्य स्तर गिरेगा लेकिन उत्पादन में कमी नही आएगी क्योंकि उत्पादन की तुलना में मांग बनी रहती है| इसीलिए अल्प विकसित देशों में एक सीमा तक बचत को बढ़ाना अच्छा होता है| इसीलिए अल्प विकसित देशों की सरकारें बचत बढाने पर बल देती हैं| जैसे भारत में विमुद्रीकरण के बाद मुद्रा आपूर्ति बाधित हो गयी थी जिसके कारण मांग में कमी आई थी जिसका नकारात्मक प्रभाव आर्थिक वृद्धि पर पड़ा था| सामान्य तौर पर आर्थिक वृद्धि के साथ मुद्रास्फीति की स्थिति बनी रहती है| लेकिन चीन में विगत कुछ दशकों में तीव्र आर्थिक वृद्धि एवं निम्न मुद्रास्फीति की एक विरोधाभासी स्थिति बनी रही| इसका प्रमुख कारण अधिक बचत(लगभग 45%) का होना था| उच्च निवेश दर के कारण चीन की उत्पादन क्षमता बढ़ गयी है अतः चीन की अर्थव्यवस्था के लिए अब समग्र मांग का बने रहना आवश्यक है अन्यथा चीन की अर्थव्यवस्था को मंदी का सामना कर पड़ सकता है| अतः अधिक बचत की प्रवृत्ति अब चीन के लिए हानिकारक होगी उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि बचत में वृद्धि का विकसित और अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अलग अलग प्रभाव देखने को मिलता है|
##Question:बचत को परिभाषित करते हुए ,स्पष्ट कीजिये कि बचत में वृद्धि विकसित एवं अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं को किस तरह से प्रभावित करती है? (150 से 200 शब्द;10 अंक) Define savings and explain how the increase in savings affects developed and underdeveloped economies? (150 to 200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में बचत को परिभाषित कीजिये और सम्बन्धित सूचनाएं दीजिये 2- प्रथम भाग में विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर बचत में वृद्धि के प्रभाव स्पष्ट कीजिये 3- दुसरे भाग में अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर बचत में वृद्धि के प्रभाव स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में अलग अलग प्रभाव के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये व्यक्तिगत प्रयोज्य आय में से उपभोग व्यय को घटा कर प्राप्त शेष ही बचत होती है| निगम की आय को लाभ(प्रॉफिट) कहते हैं, निगम को निगम कर(लगभग 20%) देना पड़ता है| अब कम्पनी के मालिक/मालिकों/शेयर धारकों के पास शेष बचा 80 %(प्रयोज्य आय)| इसमें से कुछ हिस्सा कम्पनी में पुनर्निवेश के लिए अवितरित रख दिया जाता है| अवितरित लाभ वैकल्पिक होता है किन्तु निगम कर अनिवार्य होता है| लाभ का वह भाग जो उसके स्वामी/ मालिकों/शेयर धारकों को दिया जाता है उसे लाभांश(डिविडेंड) कहते हैं|इस तरह अवितरित लाभ को निगम की बचत कहा जाता है| सकल घरेलू बचत(GDS) भारत में लगभग 30 % है| भारत में प्रमुख बचतकर्ता- पारिवारिक क्षेत्र (सर्वाधिक), निजी निगम(लगभग 20 %) एवं सार्वजनिक क्षेत्र(लगभग 5 %) हैं| यदि बचत में वृद्धि होती है तो इसका विकसित एवं अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर अलग अलग प्रभाव देखने को मिलता है| इसको निम्नलिखित विश्लेषण से समझ सकते हैं| विकसित देशों में बचत वृद्धि के प्रभाव का विश्लेषण विकसित देशों में बचत अधिक होगी तो मांग की कमी आती है, इससे आर्थिक उत्पादन में कमी आती है और मूल्य स्तर में भी कमी आती है, जिससे आर्थिक वृद्धि में कमी अर्थात आर्थिक मंदी आ जाती है अर्थात विकसित देशों के लिए बचत का बढना ठीक नहीं होता| विकसित देशों की उत्पादन क्षमता अधिक होती है अतः अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती है| बचत बढ़ने पर मांग में कमी आती है मांग में कमी आने पर स्टॉक का विक्रय ही नही हो पाता है अतः नयी विनिर्माण इकाइयों की स्थापना की प्रेरणा नहीं होती है इसीलिए निवेश नहीं बढ़ता है| इसे मितव्ययिता का विरोधाभास कहा जाता है| महामंदी(1929 से 1933) का मुख्य कारण बचत प्रेरित समग्र मांग का अभाव होना था| इसके कारण मितव्ययिता के विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हुई थी| कीन्स के सुझावों को मानने से समग्र मांग के नियंत्रण द्वारा पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में स्थिरता आयी(2008 तक मंदी नहीं आई) इसी कारण कीन्स को समष्टि अर्थशास्त्र के आधार का निर्माता माना जाता है| अल्प-विकसित देशों में बचत वृद्धि के प्रभाव का विश्लेषण अल्प विकसित देशों में बचत बढेगी तो निवेश बढेगा, निवेश बढेगा तो आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित होगी | अल्प विकसित देशों में मांग भी अधिक होती है क्योंकि यहाँ प्रायः जनसंख्या अधिक होती है तथा सरकार द्वारा विकासात्मक व्यय हेतु बजट घाटे की नीति अपनाई जाती है दूसरी ओर उत्पादन क्षमता कम होने के कारण मांग की तुलना में आपूर्ति कम होने के कारण मुद्रास्फीति की समस्या भी देखी जा सकती है| अल्प विकसित देशों में बचत बढ़ेगी तो निवेश बढ़ेगा क्योंकि उत्पादन क्षमता, मांग की तुलना में कम होती है| यहाँ उत्पादन बढ़ेगा तो मूल्य स्तर गिरेगा लेकिन उत्पादन में कमी नही आएगी क्योंकि उत्पादन की तुलना में मांग बनी रहती है| इसीलिए अल्प विकसित देशों में एक सीमा तक बचत को बढ़ाना अच्छा होता है| इसीलिए अल्प विकसित देशों की सरकारें बचत बढाने पर बल देती हैं| जैसे भारत में विमुद्रीकरण के बाद मुद्रा आपूर्ति बाधित हो गयी थी जिसके कारण मांग में कमी आई थी जिसका नकारात्मक प्रभाव आर्थिक वृद्धि पर पड़ा था| सामान्य तौर पर आर्थिक वृद्धि के साथ मुद्रास्फीति की स्थिति बनी रहती है| लेकिन चीन में विगत कुछ दशकों में तीव्र आर्थिक वृद्धि एवं निम्न मुद्रास्फीति की एक विरोधाभासी स्थिति बनी रही| इसका प्रमुख कारण अधिक बचत(लगभग 45%) का होना था| उच्च निवेश दर के कारण चीन की उत्पादन क्षमता बढ़ गयी है अतः चीन की अर्थव्यवस्था के लिए अब समग्र मांग का बने रहना आवश्यक है अन्यथा चीन की अर्थव्यवस्था को मंदी का सामना कर पड़ सकता है| अतः अधिक बचत की प्रवृत्ति अब चीन के लिए हानिकारक होगी उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि बचत में वृद्धि का विकसित और अल्प विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अलग अलग प्रभाव देखने को मिलता है|
50,277
धारणीय विकास लक्ष्यों का दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए इनके साथ भारत सरकार की नीति के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discussing the approach of the Sustainable Development Goals, explain the relationship of the Government of India"s policy with them. (150-200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण: धारणीय विकास को परिभाषित करते हुए उत्तर को प्रारंभ कीजिए। धारणीय/सतत विकास लक्ष्यों को लिखिए। भारत सरकार द्वारा विभिन्न लक्ष्यों के लिए किए जा रहे प्रयासों को लिखिए। अंत में, कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर: सरल शब्दों में, धारणीय या सतत विकास से तात्पर्य वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति भविष्य की पीढ़ी की क्षमता को नुकसान पहुँचाए बिना किए जाने से है। उदाहरण के लिए ऊर्जा संसाधनों का उपयोग इस प्रकार से किया जाए कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी ऊर्जा के संसाधन बने रहें। सतत विकास की अवधारणा सिर्फ पर्यावरणीय संदर्भों तक सीमित नहीं है यह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संदर्भों तक विस्तारित हो गई है, जैसे- अच्छा स्वास्थ्य, बेहतर और सार्वभौमिक शिक्षा, गरीबी निवारण आदि। सतत विकास संसाधनों के सीमित उपयोग को भी संदर्भित नहीं करता है जबकि यह नए संसाधनों की खोज एवं उपलब्ध संसाधनों के उपयोग मेंनवाचार को प्रोत्साहित करता है। वर्ष 1970-80 के दशक से ही वैश्विक मंचों पर जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापन जैसी समस्याएं दृष्टिगोचर हुई। इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1990 के दशक में सहस्त्राब्दी लक्ष्य घोषित किए गए और इन्हे ही आगे विस्तार देकर 2015 में सतत विकास लक्ष्यों में परिवर्तित कर दिया गया है। जिन्हे 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। अभी उपलब्ध सतत विकास लक्ष्य इस प्रकार हैं- लक्ष्य 1: गरीबी की समाप्ति लक्ष्य 2: भुखमरी से मुक्ति लक्ष्य 3: लोगों के लिए स्‍वास्‍थ्‍य और आरोग्यता लक्ष्य 4: गुणवत्तापरक शिक्षा लक्ष्य 5: लैंगिक समानता लक्ष्य 6: जल एवं स्‍वच्‍छता लक्ष्य 7: किफ़ायती और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य 8: उत्‍कृष्‍ट कार्य और आर्थिक विकास लक्ष्य 9: उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचे का विकास लक्ष्य 10: असमानताओं में कमी लक्ष्य 11: संवहनीय शहरी और सामुदायिक विकास लक्ष्य 12: ज़िम्मेदारी के साथ उपभोग और उत्पाद लक्ष्य 13: जलवायु कार्रवाई लक्ष्य 14: जलीय जीवों की सुरक्षा (जल में जीवन) लक्ष्य 15: थलीय जीवों की सुरक्षा (स्थलीय पारिस्थितिक में जीवन) लक्ष्य 16: शांति, न्‍याय और सशक्त संस्थाएं लक्ष्य 17: लक्ष्यों के लिए भागीदारी भारत द्वारा इन लक्ष्यों को प्राप्त करने संबंधी अनेक प्रयास किए गए हैं। कुछ महत्वपूर्ण प्रयास निम्नलिखित हैं- भारत में सतत विकास लक्ष्यों के क्रियान्वयन और मापन के लिए नीति आयोग द्वारा एसडीजी इंडिया इंडेक्स घोषित किया गया है। नीति आयोग ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) इंडिया इंडेक्स की बेसलाइन रिपोर्ट जारी की, जो 2030 एसडीजी लक्ष्यों को लागू करने की दिशा में भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा की गई प्रगति का व्यापक दस्तावेजीकरण करती है। इसके कार्यान्वयन एवं निगरानी रणनीति के केंद्र में केंद्र सरकार है जबकि राज्य सरकार, संघ राज्य क्षेत्र नीति आयोग और केंद्रीय मंत्रालय इस प्रयास में उनका सहयोग करते हैं। सतत विकास पर जागरूकता का विकास किया जा रहा है इसके लिए सहभागितापूर्ण और समावेशी तथा सभी हिधारकों को इससे जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। अलग-अलग क्षेत्र में लक्ष्य को प्राप्त करने और मार्गदर्शन करने के लिए विज़न दस्तावेज और कार्य योजना तैयार किया गया है इसके लिए विभागों, मंत्रालयों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने पर बल दिया गया है। सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्थानीय सरकारों को भी 29 कार्य सौंप गए हैं, सतत विकास लक्ष्य में अनेक ऐसे लक्ष्य है जो प्रत्यक्ष रूप से स्थानीय सरकारों द्वारा क्रियान्वित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान पर आधारित राज्य विशिष्ट और जिला विशिष्ट संकेतों के विकास में निगरानी के रूप में विशेष कार्य किया है समाज के सभी वर्गों को विकास की प्रक्रिया में शामिल करने पर बल दिया गया है। सतत विकास को प्राप्त करने हेतु क्षमता निर्माण, संसाधन तैयार करने पर बल दिया गया है। इनकी प्राप्ति के लिए विभिन्न हितधारकों के मध्य साझेदारी पर बल दिया गया है। इन सभी प्रयासों के बावजूद कोविड-19 के आने से इन प्रयासों की गति बाधित हुई है। इसके अलावा भारत के समक्ष वित्त एवं संसाधनों की सीमितता भी एक बड़ी चुनौती है। अतः भारत को अपनी संवृद्धि दर बढ़ाते हुए कौशल विकास, संसाधनों का बेहतर उपयोग, नवाचार को बढ़ावा देकर सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए।
##Question:धारणीय विकास लक्ष्यों का दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए इनके साथ भारत सरकार की नीति के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिये। (150-200 शब्द, 10 अंक) Discussing the approach of the Sustainable Development Goals, explain the relationship of the Government of India"s policy with them. (150-200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण: धारणीय विकास को परिभाषित करते हुए उत्तर को प्रारंभ कीजिए। धारणीय/सतत विकास लक्ष्यों को लिखिए। भारत सरकार द्वारा विभिन्न लक्ष्यों के लिए किए जा रहे प्रयासों को लिखिए। अंत में, कुछ सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए। उत्तर: सरल शब्दों में, धारणीय या सतत विकास से तात्पर्य वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति भविष्य की पीढ़ी की क्षमता को नुकसान पहुँचाए बिना किए जाने से है। उदाहरण के लिए ऊर्जा संसाधनों का उपयोग इस प्रकार से किया जाए कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी ऊर्जा के संसाधन बने रहें। सतत विकास की अवधारणा सिर्फ पर्यावरणीय संदर्भों तक सीमित नहीं है यह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संदर्भों तक विस्तारित हो गई है, जैसे- अच्छा स्वास्थ्य, बेहतर और सार्वभौमिक शिक्षा, गरीबी निवारण आदि। सतत विकास संसाधनों के सीमित उपयोग को भी संदर्भित नहीं करता है जबकि यह नए संसाधनों की खोज एवं उपलब्ध संसाधनों के उपयोग मेंनवाचार को प्रोत्साहित करता है। वर्ष 1970-80 के दशक से ही वैश्विक मंचों पर जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापन जैसी समस्याएं दृष्टिगोचर हुई। इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1990 के दशक में सहस्त्राब्दी लक्ष्य घोषित किए गए और इन्हे ही आगे विस्तार देकर 2015 में सतत विकास लक्ष्यों में परिवर्तित कर दिया गया है। जिन्हे 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। अभी उपलब्ध सतत विकास लक्ष्य इस प्रकार हैं- लक्ष्य 1: गरीबी की समाप्ति लक्ष्य 2: भुखमरी से मुक्ति लक्ष्य 3: लोगों के लिए स्‍वास्‍थ्‍य और आरोग्यता लक्ष्य 4: गुणवत्तापरक शिक्षा लक्ष्य 5: लैंगिक समानता लक्ष्य 6: जल एवं स्‍वच्‍छता लक्ष्य 7: किफ़ायती और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य 8: उत्‍कृष्‍ट कार्य और आर्थिक विकास लक्ष्य 9: उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचे का विकास लक्ष्य 10: असमानताओं में कमी लक्ष्य 11: संवहनीय शहरी और सामुदायिक विकास लक्ष्य 12: ज़िम्मेदारी के साथ उपभोग और उत्पाद लक्ष्य 13: जलवायु कार्रवाई लक्ष्य 14: जलीय जीवों की सुरक्षा (जल में जीवन) लक्ष्य 15: थलीय जीवों की सुरक्षा (स्थलीय पारिस्थितिक में जीवन) लक्ष्य 16: शांति, न्‍याय और सशक्त संस्थाएं लक्ष्य 17: लक्ष्यों के लिए भागीदारी भारत द्वारा इन लक्ष्यों को प्राप्त करने संबंधी अनेक प्रयास किए गए हैं। कुछ महत्वपूर्ण प्रयास निम्नलिखित हैं- भारत में सतत विकास लक्ष्यों के क्रियान्वयन और मापन के लिए नीति आयोग द्वारा एसडीजी इंडिया इंडेक्स घोषित किया गया है। नीति आयोग ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) इंडिया इंडेक्स की बेसलाइन रिपोर्ट जारी की, जो 2030 एसडीजी लक्ष्यों को लागू करने की दिशा में भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा की गई प्रगति का व्यापक दस्तावेजीकरण करती है। इसके कार्यान्वयन एवं निगरानी रणनीति के केंद्र में केंद्र सरकार है जबकि राज्य सरकार, संघ राज्य क्षेत्र नीति आयोग और केंद्रीय मंत्रालय इस प्रयास में उनका सहयोग करते हैं। सतत विकास पर जागरूकता का विकास किया जा रहा है इसके लिए सहभागितापूर्ण और समावेशी तथा सभी हिधारकों को इससे जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। अलग-अलग क्षेत्र में लक्ष्य को प्राप्त करने और मार्गदर्शन करने के लिए विज़न दस्तावेज और कार्य योजना तैयार किया गया है इसके लिए विभागों, मंत्रालयों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने पर बल दिया गया है। सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्थानीय सरकारों को भी 29 कार्य सौंप गए हैं, सतत विकास लक्ष्य में अनेक ऐसे लक्ष्य है जो प्रत्यक्ष रूप से स्थानीय सरकारों द्वारा क्रियान्वित किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान पर आधारित राज्य विशिष्ट और जिला विशिष्ट संकेतों के विकास में निगरानी के रूप में विशेष कार्य किया है समाज के सभी वर्गों को विकास की प्रक्रिया में शामिल करने पर बल दिया गया है। सतत विकास को प्राप्त करने हेतु क्षमता निर्माण, संसाधन तैयार करने पर बल दिया गया है। इनकी प्राप्ति के लिए विभिन्न हितधारकों के मध्य साझेदारी पर बल दिया गया है। इन सभी प्रयासों के बावजूद कोविड-19 के आने से इन प्रयासों की गति बाधित हुई है। इसके अलावा भारत के समक्ष वित्त एवं संसाधनों की सीमितता भी एक बड़ी चुनौती है। अतः भारत को अपनी संवृद्धि दर बढ़ाते हुए कौशल विकास, संसाधनों का बेहतर उपयोग, नवाचार को बढ़ावा देकर सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए।
50,279
In light of the mergers of banks seen recently, comment upon the need of such mergers for a developing economy like India. (150 words/10 marks)
Approach- 1. In theintroduction, mention the current context related to the mergers of the banks in India. 2. Then, describe the need for such mergers and what benefits does it hold for an economylike India. 3. Also, highlight some challenges related to mergers in present times. 4. Conclude with a balanced viewpoint. Answer- Recently, the Indian government announced plans tomerge 10 public sector banks into four. Thiswould take the number of banks in the country from 27 in 2017 to 12. The new mergers include: Punjab National Bank, Oriental Bank of Commerce and United Bank of India will combine to form the nation’s second-largest lender. Syndicate Bank will be merged with Canara Bank. Union Bank of India will amalgamate with Andhra Bank and Corporation Bank. Indian Bank will merge with Allahabad Bank. Need for Mergers Economies of scale- It has the potential to reduce operational costs due to the presence of shared overlapping networks. This enhances operational efficiency and thus reduces the lending costs of the banks. Self-Sufficiency- Larger banks have a better ability to raise resources from the market rather than relying on the state exchequer. This ensureslarger loans can be lent for a longer duration. This is very important for financing infrastructure development projects. Benefits The consolidation of Public Sector Banks helps instrengthening its presence globally, nationally and regionally. Mergers act as a safety-valve against the liability-asset mismatch seen in the case of smaller banks. This will also help in meeting more stringent norms under BASEL III, especially the capital adequacy ratio. Challenges Geographical Synergy -During the process of merger, thegeographical synergybetween the merged banks issomewhat missing. In three of the four merger cases, the merged banks serve only one specific region of the country.However, the merger ofAllahabad Bank (having a presence in East & North region) with the Indian Bank (having a presence in South)increases its geographical spread. Slowdown in Economy -The move is a good one but the timings are not just apt. There isalready a slowdown in the economy, andprivate consumption and investments are on a declining trend. Hence, there is a need to lift the economy and increase the credit flow in the short-term. However, this decision will block that credit in the short-term. Weak Banks- A complex merger with a weaker and under-capitalized Public Sector Bank could stall the bank’s recovery efforts asthe weaknesses of one bank may get transferredand the merged entity may become weak. Way Forward Narasimhan committee (1991 and 1998)suggested the merger of strong banks both in the public sector and even with the developmental financial institutions and NBFCs. TheVerma committeepointed out that consolidation will lead to the pooling of strengths and lead to an overall reduction in the cost of operations. However,along with the mergers, the adequate focus should be laidon the reforms in governance and management of these banks.
##Question:In light of the mergers of banks seen recently, comment upon the need of such mergers for a developing economy like India. (150 words/10 marks)##Answer:Approach- 1. In theintroduction, mention the current context related to the mergers of the banks in India. 2. Then, describe the need for such mergers and what benefits does it hold for an economylike India. 3. Also, highlight some challenges related to mergers in present times. 4. Conclude with a balanced viewpoint. Answer- Recently, the Indian government announced plans tomerge 10 public sector banks into four. Thiswould take the number of banks in the country from 27 in 2017 to 12. The new mergers include: Punjab National Bank, Oriental Bank of Commerce and United Bank of India will combine to form the nation’s second-largest lender. Syndicate Bank will be merged with Canara Bank. Union Bank of India will amalgamate with Andhra Bank and Corporation Bank. Indian Bank will merge with Allahabad Bank. Need for Mergers Economies of scale- It has the potential to reduce operational costs due to the presence of shared overlapping networks. This enhances operational efficiency and thus reduces the lending costs of the banks. Self-Sufficiency- Larger banks have a better ability to raise resources from the market rather than relying on the state exchequer. This ensureslarger loans can be lent for a longer duration. This is very important for financing infrastructure development projects. Benefits The consolidation of Public Sector Banks helps instrengthening its presence globally, nationally and regionally. Mergers act as a safety-valve against the liability-asset mismatch seen in the case of smaller banks. This will also help in meeting more stringent norms under BASEL III, especially the capital adequacy ratio. Challenges Geographical Synergy -During the process of merger, thegeographical synergybetween the merged banks issomewhat missing. In three of the four merger cases, the merged banks serve only one specific region of the country.However, the merger ofAllahabad Bank (having a presence in East & North region) with the Indian Bank (having a presence in South)increases its geographical spread. Slowdown in Economy -The move is a good one but the timings are not just apt. There isalready a slowdown in the economy, andprivate consumption and investments are on a declining trend. Hence, there is a need to lift the economy and increase the credit flow in the short-term. However, this decision will block that credit in the short-term. Weak Banks- A complex merger with a weaker and under-capitalized Public Sector Bank could stall the bank’s recovery efforts asthe weaknesses of one bank may get transferredand the merged entity may become weak. Way Forward Narasimhan committee (1991 and 1998)suggested the merger of strong banks both in the public sector and even with the developmental financial institutions and NBFCs. TheVerma committeepointed out that consolidation will lead to the pooling of strengths and lead to an overall reduction in the cost of operations. However,along with the mergers, the adequate focus should be laidon the reforms in governance and management of these banks.
50,283
महासागरीय धाराओं से आप क्या समझते हैं। महासागरीय धाराओं के वर्गीकरण को प्रस्तुत करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by ocean currents? While presenting the classification of ocean currents, explain the factors affecting it. (150-200 words)
Approach: महासागरीय धाराओं को भूमिका में स्पष्ट कीजिए। महासागरीय धाराओं के वर्गीकरण को प्रस्तुत कीजिए। महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिए। उत्तर : महासागरीय धाराएँ वृहत महासागरीय जल संचलन है। महासागरीय पवनों की उत्पत्ति प्रचलित पवनों तथा कोरिओलिस बल की उपस्थिति के कारण होती है। ये धाराएँ समुद्र में ऊर्जा, लवणों तथा पोषक तत्वों का परिवहन करती हैं। महासागरीय धाराएँ तटों को भौतिक, आर्थिक तथा जलवायविक रूप से प्रभावित करती हैं। महासागरीय धाराओं का वर्गीकरण- तापमान के आधार पर विभाजन गरम जल धाराएँ- गरम जल धाराओं का तापमान इसके आस पास के जल से तुलनात्मक रूप से अधिक होता है। इनका संचलन समान्यतया विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर होता है। ठंडी जल धाराएँ- इन जल धारों का तापमान समीपवर्ती जल की तुलना में कम होता है। इनका संचलन सामान्यतया ध्रुव से विषुवत की ओर होता है। गहराई के आधार पर विभाजन- धरातलीय- धरातलीय जल धाराओं का संचलन समुद्र की सतह पर होता है। अधितलीय- इन धाराओं का संचलन धरातलीय धाराओं के नीचे होता है। गहन सागरीय- ये धाराएँ समुद्र में गहराई में चलती है। गति के आधार पर विभाजन- प्रवाह- प्रवाह सतही जल राशि का संचलन है । यह संचलन प्रचलित पवनों के प्रभाव के कारण उत्पन्न होता है। उदाहरण- उत्तरी अटलांटिक प्रवाह धारा- यह जलराशि का निश्चित दिशा में तीव्र संचलन है। उदाहरण - हमबोल्ट धारा स्ट्रीम- यह निश्चित सीमाओं में जल का वृहद संचलन है। उदाहरण- गल्फ स्ट्रीम महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारक तापमान - तापमान एक महत्वपूर्ण कारक है यह जलधाराओं की प्रकृति को निर्धारित करता है। विषुवतीय क्षेत्र में सूर्यातप की मात्रा अधिक होने से महासागरों का तापमान तुलनात्मक रूप से अधिक होता है। जिससे इस क्षेत्र में गरम जलधाराओं का विकास होता है जबकि उच्च अक्षांशो में निम्न तापमान होने के कारण ठंडी जल धाराओं का विकास होता है। पवन - प्रचलित पवन महासागरीय धाराओं के विकास में सहायक होती है। उदाहरण के लिए दक्षिणी विषुवतीय धारा की उत्पत्ति व्यापारिक पवनों के कारण होती है। कोरिओलिस बल- कोरिओलिस बल महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति व दिशा निर्धारित करने में सहायक होता है। सागरीय लवणता- सागरीय लवणता जल के घनत्व को प्रभावित करती है। उच्च सागरीय लवणता से जल के घनत्व में वृद्धि होती है। जिससे सागर जल का बहाव उच्च घनत्व से निम्न घनत्व की ओर होता है तथा धाराओं का विकास होता है। अन्य कारक तट की आकृति- वायुदाब में क्षेत्रीय अंतराल सागर नितल का उच्चावच महासागरीय धाराएँ भौतिक कारकों व महासागरों के उच्चावचों से प्रभावित होती है।
##Question:महासागरीय धाराओं से आप क्या समझते हैं। महासागरीय धाराओं के वर्गीकरण को प्रस्तुत करते हुए इसको प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by ocean currents? While presenting the classification of ocean currents, explain the factors affecting it. (150-200 words)##Answer:Approach: महासागरीय धाराओं को भूमिका में स्पष्ट कीजिए। महासागरीय धाराओं के वर्गीकरण को प्रस्तुत कीजिए। महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारकों की चर्चा कीजिए। उत्तर : महासागरीय धाराएँ वृहत महासागरीय जल संचलन है। महासागरीय पवनों की उत्पत्ति प्रचलित पवनों तथा कोरिओलिस बल की उपस्थिति के कारण होती है। ये धाराएँ समुद्र में ऊर्जा, लवणों तथा पोषक तत्वों का परिवहन करती हैं। महासागरीय धाराएँ तटों को भौतिक, आर्थिक तथा जलवायविक रूप से प्रभावित करती हैं। महासागरीय धाराओं का वर्गीकरण- तापमान के आधार पर विभाजन गरम जल धाराएँ- गरम जल धाराओं का तापमान इसके आस पास के जल से तुलनात्मक रूप से अधिक होता है। इनका संचलन समान्यतया विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर होता है। ठंडी जल धाराएँ- इन जल धारों का तापमान समीपवर्ती जल की तुलना में कम होता है। इनका संचलन सामान्यतया ध्रुव से विषुवत की ओर होता है। गहराई के आधार पर विभाजन- धरातलीय- धरातलीय जल धाराओं का संचलन समुद्र की सतह पर होता है। अधितलीय- इन धाराओं का संचलन धरातलीय धाराओं के नीचे होता है। गहन सागरीय- ये धाराएँ समुद्र में गहराई में चलती है। गति के आधार पर विभाजन- प्रवाह- प्रवाह सतही जल राशि का संचलन है । यह संचलन प्रचलित पवनों के प्रभाव के कारण उत्पन्न होता है। उदाहरण- उत्तरी अटलांटिक प्रवाह धारा- यह जलराशि का निश्चित दिशा में तीव्र संचलन है। उदाहरण - हमबोल्ट धारा स्ट्रीम- यह निश्चित सीमाओं में जल का वृहद संचलन है। उदाहरण- गल्फ स्ट्रीम महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारक तापमान - तापमान एक महत्वपूर्ण कारक है यह जलधाराओं की प्रकृति को निर्धारित करता है। विषुवतीय क्षेत्र में सूर्यातप की मात्रा अधिक होने से महासागरों का तापमान तुलनात्मक रूप से अधिक होता है। जिससे इस क्षेत्र में गरम जलधाराओं का विकास होता है जबकि उच्च अक्षांशो में निम्न तापमान होने के कारण ठंडी जल धाराओं का विकास होता है। पवन - प्रचलित पवन महासागरीय धाराओं के विकास में सहायक होती है। उदाहरण के लिए दक्षिणी विषुवतीय धारा की उत्पत्ति व्यापारिक पवनों के कारण होती है। कोरिओलिस बल- कोरिओलिस बल महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति व दिशा निर्धारित करने में सहायक होता है। सागरीय लवणता- सागरीय लवणता जल के घनत्व को प्रभावित करती है। उच्च सागरीय लवणता से जल के घनत्व में वृद्धि होती है। जिससे सागर जल का बहाव उच्च घनत्व से निम्न घनत्व की ओर होता है तथा धाराओं का विकास होता है। अन्य कारक तट की आकृति- वायुदाब में क्षेत्रीय अंतराल सागर नितल का उच्चावच महासागरीय धाराएँ भौतिक कारकों व महासागरों के उच्चावचों से प्रभावित होती है।
50,284
शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का वर्णन कीजिये| उसने वाणिज्य-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन से कदम उठाये थे? (150-200 शब्द, 10 अंक) Describe administrative reforms made by Sher Shah. What steps did he take to promote Commerce and Trade? (150-200 words, 10 Marks)
एप्रोच- शेरशाह के बारे में(पृष्ठभूमि) संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में, शेरशाह के द्वारावाणिज्य-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उठाये गए क़दमों का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, उसके योगदान की परवर्ती काल में भी महता को दिखाते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- शेरशाह(1540-45)सासाराम के जागीर प्रबंधक का पुत्रथा जिसकी शिक्षा जौनपुर में हुयीथी| अपने पिता की जागीर की देखरेख करते हुए उसे जागीर प्रबंधन का अनुभव भी था| यद्यपि उसने मुगलों के प्रति वफादारी का दिखावा किया लेकिन भारत से उन्हें खदेड़ने हेतु सुव्यवस्थित योजना भी बनाता रहा| संसाधनों के बल पर उसने विशाल और कुशल सेना खड़ी की तथा बंगाल पर अपने आधिपत्य को सुनिश्चित किया| हुमायूँ को उसने बंगाल के मुद्दे पर चौसा के युद्ध(1539) में पराजित किया तथा कन्नौज के युद्ध(1540) में दुबारा पराजित कर हुमायूँ को भारत से खदेड़ दिया| उसने अपनी सुव्यवस्थितएवं प्रशिक्षित बहादुर सेना की मदद से मुग़ल वंश को 15 वर्षों तक भारत से बाहर कर दिया| उसका साम्राज्य बंगाल से लेकर सिंधु नदी तक फैला हुआ था| शेरशाह के प्रशासनिक सुधार केंद्रीय प्रशासन दिल्ली सल्तनत की तरह; 4 विभागों की व्यवस्था- दीवान-ए-वजारत- लगान एवं अर्थव्यवस्था का प्रधान; दीवाने आरिज- सेना संबंधी कार्य; दीवाने रसालत- विदेश विभाग; दीवाने इंशा- पत्राचार विभाग; दीवान-ए-काजी- न्याय संबंधी कार्य; दीवान-ए-बरीद- गुप्तचर विभाग; बहुत ही निष्पक्ष तथा कठोर न्याय व्यवस्था; साम्राज्य के एक छोर से दूसरे छोर तक शांति-व्यवस्था की पुनर्स्थापना; प्रांतीय शासन का विशेष विकास नहीं लेकिन स्थानीय शासन तथा भूराजस्व प्रशासन के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान; जिला स्तर के अधिकारी- शिकदारे शिकदाराना; मुंसिफे मुंसिफाना; परगना स्तर के अधिकारी; शिकदार- कानून; मुंसिफ- राजस्व; कारकून- लिपिक; ग्रामीण स्तर- खुत; मुकद्दम- राजस्व वसूलना; पटवारी- लिपिक; भूराजस्व प्रशासन टोडरमल के नेतृत्व में भूमि माप के आधार पर भूराजस्व का निर्धारण( जब्ती व्यवस्था) ; उत्पादन के आधार पर भूमि का 3 भागों में वर्गीकरण - उत्तम, मध्यम एवं निम्न; प्रत्येक किसानों के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करके पट्टा/समझौता; संकट/आपदा के समय किसानों को राहत भी; लगान निर्धारण हेतु 3 प्रणालियाँ- गली बख्शी अथवा बंटाई; नस्क/मुक्ताई/कनकूत; नगदी/जब्ती प्रणाली; भूमि के माप के लिए अच्छी प्रणाली की व्यवस्था; सैन्य प्रशासन के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी की तरह दाग, हुलिया, नगद वेतन आदि की शुरुआत; कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय उत्तरदायित्व का सिद्धांत; वाणिज्य-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उसके द्वारा उठाये गए क़दम मुद्रा संबंधित सुधारों से अत्यंत विकसित मुद्रा व्यवस्था; पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर चाँदी के रूपये तथा तांबे के दाम नामक रूपये का प्रचलन; सिक्कों पर फारसी के साथ-साथ नागरी में भी लेख; शेरशाह के द्वारा चलाया गया रुपया ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली का आधार तथा वर्तमान में भी उसी आधार का प्रयोग; मानकीकृत माप-तौल व्यवस्था से व्यापार-वाणिज्य को बढ़ावा; विभिन्न सड़कों का निर्माण जैसे- सोनारगाँव से लेकर पेशावर तक; आगरा से जोधपुर तथा चित्तौड़ तक; लाहौर से मुल्तान तक; कल्याणकारी कार्यों के लिए भी चर्चित जैसे- यात्रियों की सुविधा के लिए लगभग 1700 सरायों का निर्माण तथा उसमें सभी व्यवस्था राज्य की ओर से; इन सरायों के निर्माण से आसपास के गाँवों/कस्बों की अर्थव्यवस्था का विकास; शेरशाह द्वारा बनवाए गये सड़कों तथा सरायों को साम्राज्य की धमनियां कहा जाता था| बहुत सी सरायें बाजार-बस्तियों के रूप में विकसित हुयी जिनका किसानों द्वारा मंडी के रूप में उपयोग; साथ ही, संचार सेवाओं को तीव्र बनाने के लिए डाक चौकियों के रूप में भी प्रयोग; विभिन्न वस्तुओं पर 2 ही स्थलों पर करों की वसूली- विक्रय के स्थान तथा आयत/उत्पादन स्थल पर; अपने सूबेदारों तथा अमीरों को सौदागरों तथा यात्रियों से अच्छी तरह से पेश आने का हुक्म; व्यापारियों को क्षति होने पर स्थानीय मुकद्दमों तथा जमींदारों की जवाबदेहिता; अपने 5 वर्ष के छोटे से शासनकाल में ही शेरशाह ने एक ठोस शासन व्यवस्था स्थापित की थी| शेरशाह एक व्यवस्था सुधारक के रूप में जाना जाता है| साम्राज्य निर्माता एवं प्रशासक के रूप मेंउसकी भूमिका तथा योगदान के कारण ही उसे अकबर का पूर्वगामी माना जाता है|
##Question:शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का वर्णन कीजिये| उसने वाणिज्य-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन से कदम उठाये थे? (150-200 शब्द, 10 अंक) Describe administrative reforms made by Sher Shah. What steps did he take to promote Commerce and Trade? (150-200 words, 10 Marks)##Answer:एप्रोच- शेरशाह के बारे में(पृष्ठभूमि) संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये| मुख्य भाग के पहले हिस्से में,शेरशाह के प्रशासनिक सुधारों का वर्णन कीजिये| अगले भाग में, शेरशाह के द्वारावाणिज्य-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उठाये गए क़दमों का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, उसके योगदान की परवर्ती काल में भी महता को दिखाते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- शेरशाह(1540-45)सासाराम के जागीर प्रबंधक का पुत्रथा जिसकी शिक्षा जौनपुर में हुयीथी| अपने पिता की जागीर की देखरेख करते हुए उसे जागीर प्रबंधन का अनुभव भी था| यद्यपि उसने मुगलों के प्रति वफादारी का दिखावा किया लेकिन भारत से उन्हें खदेड़ने हेतु सुव्यवस्थित योजना भी बनाता रहा| संसाधनों के बल पर उसने विशाल और कुशल सेना खड़ी की तथा बंगाल पर अपने आधिपत्य को सुनिश्चित किया| हुमायूँ को उसने बंगाल के मुद्दे पर चौसा के युद्ध(1539) में पराजित किया तथा कन्नौज के युद्ध(1540) में दुबारा पराजित कर हुमायूँ को भारत से खदेड़ दिया| उसने अपनी सुव्यवस्थितएवं प्रशिक्षित बहादुर सेना की मदद से मुग़ल वंश को 15 वर्षों तक भारत से बाहर कर दिया| उसका साम्राज्य बंगाल से लेकर सिंधु नदी तक फैला हुआ था| शेरशाह के प्रशासनिक सुधार केंद्रीय प्रशासन दिल्ली सल्तनत की तरह; 4 विभागों की व्यवस्था- दीवान-ए-वजारत- लगान एवं अर्थव्यवस्था का प्रधान; दीवाने आरिज- सेना संबंधी कार्य; दीवाने रसालत- विदेश विभाग; दीवाने इंशा- पत्राचार विभाग; दीवान-ए-काजी- न्याय संबंधी कार्य; दीवान-ए-बरीद- गुप्तचर विभाग; बहुत ही निष्पक्ष तथा कठोर न्याय व्यवस्था; साम्राज्य के एक छोर से दूसरे छोर तक शांति-व्यवस्था की पुनर्स्थापना; प्रांतीय शासन का विशेष विकास नहीं लेकिन स्थानीय शासन तथा भूराजस्व प्रशासन के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान; जिला स्तर के अधिकारी- शिकदारे शिकदाराना; मुंसिफे मुंसिफाना; परगना स्तर के अधिकारी; शिकदार- कानून; मुंसिफ- राजस्व; कारकून- लिपिक; ग्रामीण स्तर- खुत; मुकद्दम- राजस्व वसूलना; पटवारी- लिपिक; भूराजस्व प्रशासन टोडरमल के नेतृत्व में भूमि माप के आधार पर भूराजस्व का निर्धारण( जब्ती व्यवस्था) ; उत्पादन के आधार पर भूमि का 3 भागों में वर्गीकरण - उत्तम, मध्यम एवं निम्न; प्रत्येक किसानों के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करके पट्टा/समझौता; संकट/आपदा के समय किसानों को राहत भी; लगान निर्धारण हेतु 3 प्रणालियाँ- गली बख्शी अथवा बंटाई; नस्क/मुक्ताई/कनकूत; नगदी/जब्ती प्रणाली; भूमि के माप के लिए अच्छी प्रणाली की व्यवस्था; सैन्य प्रशासन के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी की तरह दाग, हुलिया, नगद वेतन आदि की शुरुआत; कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय उत्तरदायित्व का सिद्धांत; वाणिज्य-व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उसके द्वारा उठाये गए क़दम मुद्रा संबंधित सुधारों से अत्यंत विकसित मुद्रा व्यवस्था; पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर चाँदी के रूपये तथा तांबे के दाम नामक रूपये का प्रचलन; सिक्कों पर फारसी के साथ-साथ नागरी में भी लेख; शेरशाह के द्वारा चलाया गया रुपया ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली का आधार तथा वर्तमान में भी उसी आधार का प्रयोग; मानकीकृत माप-तौल व्यवस्था से व्यापार-वाणिज्य को बढ़ावा; विभिन्न सड़कों का निर्माण जैसे- सोनारगाँव से लेकर पेशावर तक; आगरा से जोधपुर तथा चित्तौड़ तक; लाहौर से मुल्तान तक; कल्याणकारी कार्यों के लिए भी चर्चित जैसे- यात्रियों की सुविधा के लिए लगभग 1700 सरायों का निर्माण तथा उसमें सभी व्यवस्था राज्य की ओर से; इन सरायों के निर्माण से आसपास के गाँवों/कस्बों की अर्थव्यवस्था का विकास; शेरशाह द्वारा बनवाए गये सड़कों तथा सरायों को साम्राज्य की धमनियां कहा जाता था| बहुत सी सरायें बाजार-बस्तियों के रूप में विकसित हुयी जिनका किसानों द्वारा मंडी के रूप में उपयोग; साथ ही, संचार सेवाओं को तीव्र बनाने के लिए डाक चौकियों के रूप में भी प्रयोग; विभिन्न वस्तुओं पर 2 ही स्थलों पर करों की वसूली- विक्रय के स्थान तथा आयत/उत्पादन स्थल पर; अपने सूबेदारों तथा अमीरों को सौदागरों तथा यात्रियों से अच्छी तरह से पेश आने का हुक्म; व्यापारियों को क्षति होने पर स्थानीय मुकद्दमों तथा जमींदारों की जवाबदेहिता; अपने 5 वर्ष के छोटे से शासनकाल में ही शेरशाह ने एक ठोस शासन व्यवस्था स्थापित की थी| शेरशाह एक व्यवस्था सुधारक के रूप में जाना जाता है| साम्राज्य निर्माता एवं प्रशासक के रूप मेंउसकी भूमिका तथा योगदान के कारण ही उसे अकबर का पूर्वगामी माना जाता है|
50,295
What is India"s plan to have its own space station? How will it benefit our own space program? (200 words)
APPROACH Introduction Body Conclusion ANSWER A space station is a spacecraft capable of supporting crewmembers, designed to remain in space for an extended period of time and for other spacecraft to dock.Currently, there is only one fully functional space station in the Earth"s lower orbit, the International Space Station and astronauts conduct different experiments in it. The first component of the ISS was launched into orbit in 1998, and first long-term residents arrived in November 2000. The International Space Station is a partnership between European countries represented by the European Space Agency, the United States (NASA), Japan (JAXA), Canada (CSA) and Russia (Roscosmos). It is the world"s largest international cooperative programme in science and technology. China also plans to build a space station of its own. India has its planon having own space station project. The mission will also be an extension of the Gaganyaan project.Our space station is going to be very small. We will be launching a small module and that will be used for carrying out microgravity experiments. The weight of the space station is likely to be 20 tonnes. FirstGaganyaan mission by 2022 and it is looking at 5-7 years time frame for execution of the programme.
##Question:What is India"s plan to have its own space station? How will it benefit our own space program? (200 words)##Answer:APPROACH Introduction Body Conclusion ANSWER A space station is a spacecraft capable of supporting crewmembers, designed to remain in space for an extended period of time and for other spacecraft to dock.Currently, there is only one fully functional space station in the Earth"s lower orbit, the International Space Station and astronauts conduct different experiments in it. The first component of the ISS was launched into orbit in 1998, and first long-term residents arrived in November 2000. The International Space Station is a partnership between European countries represented by the European Space Agency, the United States (NASA), Japan (JAXA), Canada (CSA) and Russia (Roscosmos). It is the world"s largest international cooperative programme in science and technology. China also plans to build a space station of its own. India has its planon having own space station project. The mission will also be an extension of the Gaganyaan project.Our space station is going to be very small. We will be launching a small module and that will be used for carrying out microgravity experiments. The weight of the space station is likely to be 20 tonnes. FirstGaganyaan mission by 2022 and it is looking at 5-7 years time frame for execution of the programme.
50,304
What do we mean by Dead Zones? What are the reasons for the formation of such zones and what measures can be taken to prevent them? (150 words/10 marks)
Approach- 1. In briefly, explain the meaning of dead zones? and give examples too 2. Highlight the reasons for the formation of such zones. 3. Explain the measures taken to prevent such zones. Answer- Dead Zones is an area in a water body that contains little or no oxygen (or they are hypoxic) in the bottom and near-bottom water.Mostly they occur naturally but it can be caused by excessive nutrient pollution from human activities coupled with other factors. Example- Gulf of Mexico, East Coast of USA, the Great Lakes, etc Reasons for Dead Zones- 1. As the water heats up from climate change, there are more dead zones that are forming because of eutrophication. Eutrophication is how the underwater environment reacts to pollutants from runoff that comes from the land and leads to the overabundance of nutrients, encouraging the overgrowth of algae. 2. The algae overgrowth blocks the light from the sun, and the blocking of sunlight is harmful to creatures underwater. Plants still go through photosynthesis underwater and they also produce carbon for breathing. Animals need these plants to live underwater just as they do on land for oxygen. 3. Sunlight is especially vital in the littoral zones. These are the zones that are closest to the edge of the waters by the shores. When sunlight hits these areas of water, it absorbs deeply into the ground, encouraging plants in the ocean to grow. As this process is disrupted, the cycle of life below the water comes to a halt,causing death to species and adding to thepollution of the Earth. 4. As life ceases to exist and there is less oxygen circulating underwater,oxygen minimum zones (OMZ) are the result. These regions are a permanent disparity that has a damaging effect on the underwater ecosystem. 5.While nutrients can be healthy, too many nutrients are a form of pollution that leads to the death of organic food sources and destroys natural habitats. Phosphorus and nitrogen are already present in the water in small quantities, but too much of these elements are far from a good thing. Too much nitrogen and phosphorus in the water causes algae to grow faster thanecosystemscan handle. Nitrogen can also go back into the atmosphere and create more pollution that is damaging to people and the environment and ruins our drinking water. 6.Excess nitrogen and other chemicals in the ocean lead to extreme imbalances underwater, with algal bloom resulting from the existence of these elements and being a major contributor to the creation of dead zones. Algal bloom is the formal definition for the rapid growth of algae in the water and this excess of algae can be toxic to sea creatures and plants. Solutions to Dead Zones- 1 . Better practices and accountability must be put in place to protect the ocean. A major step would be to stop letting so many chemicals find their way into the ocean. 2. As humans, we need to pay attention to where we let our sewage direct itself and to what we allow to absorb into the ground. One of the main causes of the cyanobacteria that accumulate and contribute to dead zones is our use of fertilizers that include harmful chemicals. We should use much less fertilizer when farming anywhere that is close to bodies of water as industrial farming practices encourage the existence of dead zones. 3.Improvement of the purifying performance of wastewater treatment plants, installing tertiary treatment systems to reduce nutrient concentrations 4.Implementation of effective filter ecosystems to remove nitrogen and phosphorus present in the run-off water (such as phyto-purification plants) 5.Rationalization of agricultural techniques through proper planning of fertilization and use of slow-release fertilizers 6. Use of alternative practices in animal husbandry to limit the production of wastewater 7. Oxygenation of water for restoring the ecological conditions, reducing the negative effects of the eutrophic process, such as scarcity of oxygen and formation of toxic compounds deriving from the anaerobic metabolism; 8. Chemical precipitation of phosphorous by the addition of iron or aluminum salts or calcium carbonate to the water, which gives rise to the precipitation of the respective iron, aluminum or calcium orthophosphates, thereby reducing the negative effects related to the excessive presence of phosphorus in the sediments.
##Question:What do we mean by Dead Zones? What are the reasons for the formation of such zones and what measures can be taken to prevent them? (150 words/10 marks)##Answer:Approach- 1. In briefly, explain the meaning of dead zones? and give examples too 2. Highlight the reasons for the formation of such zones. 3. Explain the measures taken to prevent such zones. Answer- Dead Zones is an area in a water body that contains little or no oxygen (or they are hypoxic) in the bottom and near-bottom water.Mostly they occur naturally but it can be caused by excessive nutrient pollution from human activities coupled with other factors. Example- Gulf of Mexico, East Coast of USA, the Great Lakes, etc Reasons for Dead Zones- 1. As the water heats up from climate change, there are more dead zones that are forming because of eutrophication. Eutrophication is how the underwater environment reacts to pollutants from runoff that comes from the land and leads to the overabundance of nutrients, encouraging the overgrowth of algae. 2. The algae overgrowth blocks the light from the sun, and the blocking of sunlight is harmful to creatures underwater. Plants still go through photosynthesis underwater and they also produce carbon for breathing. Animals need these plants to live underwater just as they do on land for oxygen. 3. Sunlight is especially vital in the littoral zones. These are the zones that are closest to the edge of the waters by the shores. When sunlight hits these areas of water, it absorbs deeply into the ground, encouraging plants in the ocean to grow. As this process is disrupted, the cycle of life below the water comes to a halt,causing death to species and adding to thepollution of the Earth. 4. As life ceases to exist and there is less oxygen circulating underwater,oxygen minimum zones (OMZ) are the result. These regions are a permanent disparity that has a damaging effect on the underwater ecosystem. 5.While nutrients can be healthy, too many nutrients are a form of pollution that leads to the death of organic food sources and destroys natural habitats. Phosphorus and nitrogen are already present in the water in small quantities, but too much of these elements are far from a good thing. Too much nitrogen and phosphorus in the water causes algae to grow faster thanecosystemscan handle. Nitrogen can also go back into the atmosphere and create more pollution that is damaging to people and the environment and ruins our drinking water. 6.Excess nitrogen and other chemicals in the ocean lead to extreme imbalances underwater, with algal bloom resulting from the existence of these elements and being a major contributor to the creation of dead zones. Algal bloom is the formal definition for the rapid growth of algae in the water and this excess of algae can be toxic to sea creatures and plants. Solutions to Dead Zones- 1 . Better practices and accountability must be put in place to protect the ocean. A major step would be to stop letting so many chemicals find their way into the ocean. 2. As humans, we need to pay attention to where we let our sewage direct itself and to what we allow to absorb into the ground. One of the main causes of the cyanobacteria that accumulate and contribute to dead zones is our use of fertilizers that include harmful chemicals. We should use much less fertilizer when farming anywhere that is close to bodies of water as industrial farming practices encourage the existence of dead zones. 3.Improvement of the purifying performance of wastewater treatment plants, installing tertiary treatment systems to reduce nutrient concentrations 4.Implementation of effective filter ecosystems to remove nitrogen and phosphorus present in the run-off water (such as phyto-purification plants) 5.Rationalization of agricultural techniques through proper planning of fertilization and use of slow-release fertilizers 6. Use of alternative practices in animal husbandry to limit the production of wastewater 7. Oxygenation of water for restoring the ecological conditions, reducing the negative effects of the eutrophic process, such as scarcity of oxygen and formation of toxic compounds deriving from the anaerobic metabolism; 8. Chemical precipitation of phosphorous by the addition of iron or aluminum salts or calcium carbonate to the water, which gives rise to the precipitation of the respective iron, aluminum or calcium orthophosphates, thereby reducing the negative effects related to the excessive presence of phosphorus in the sediments.
50,307
प्रवाल भित्ति से आप क्या समझते हैं ? प्रवाल भित्ति के निर्माण में सहायक कारकों की भूमिका का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by a coral reefs? Describe the role of ancillary factors in the construction of coral reefs. (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण : प्रवाल भित्ति के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । प्रवाल भित्ति के निर्माण के लिए आवश्यक दशाओं की चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: प्रवाल भित्ति जैव विविधतापूर्ण अंतः सागरीय स्थलाकृति हैं । ये विश्व के प्रमुख विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है । जैव विविधता से समृद्ध होने के कारण ही इन्हें सामुद्रिक वर्षावन कहा जाता है । प्रावाल भित्तियों का निर्माण कोरल पॉलिप या जन्तु प्रवाल के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन से होता है । ये अस्थिपंजर कैल्शियम कार्बोनेट के बने होते हैं । प्रवाल भित्ति के लिए आवश्यक दशाएं : समुद्री जल का तापमान : प्रवाल मुख्यतः उष्णकटिबंधीय सागरों में पाए जाते हैं क्योंकि इनके जीवित रहने के लिए 20-21 * C का तापमान आवश्यक होता है । प्रवाल न तो अधिक ठंडे जल और न ही ही अधिक गर्म जल में विकसित होते हैं , यही कारण है की अधिकांशतः प्रवाल भित्तियाँ 30*N - 30*S में ही विकसित होती हैं । सागर तल के नीचे प्लेटफ़ॉर्म : सागर के नीचे अवसादों के जमाव के लिए एक प्लेटफ़ॉर्म की आवश्यकता होती है । सागर में अतः समुद्री चबूतरे प्रवालों को कॉलोनी विकसित करने में सहायक होते हैं । अवसाद या तलछट जमाव : प्रवाल के विकास के लिए पूर्ण स्वच्छ जल भी अपेक्षित नहीं है और न ही अत्यधिक अवसादयुक्त जल । जहां पर अवसाद का जल के साथ मिश्रण नियमित रूप से होते रहता है , वहाँ पर प्रवाल का विकास होता है परंतु अचानक अत्यधिक अवसाद से प्रवालों की मृत्यु हो जाती है । सागरीय लवणता : प्रवाल भित्ति के विकास के लिए औसत लवणता चाहिए । अत्यधिक लवणता तथा अति अल्प सागरीय लवणता प्रवाल के विकास के लिए हानिकारक होता है । सागरीय लवणता 30 %० से 40 %० के मध्य होना अपेक्षित । समुद्री गहराई : प्रवाल कम गहराई तक ही पाए जाते हैं । 200-250 फीट से अधिक गहराई में प्रवालों की मृत्यु हो जाती है क्योंकि इसके नीचे सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट नहीं हो पाता । इनके अतिरिक्त कुछ और कारक हैं जो प्रवालों के विकास को प्रभावित करते हैं यथा - वायु की दिशा , समुद्री धाराएं , खुला सागर आदि । प्रवाल भित्तियां पृथ्वी पर सर्वाधिक विविध और बहुमूल्य पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं । यह जैव विविधता की दृष्टि से हॉट स्पॉट हैं । इसलिए इनके संरक्षण के लिए विशेष उपाय किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन का काफी नकारात्मक प्रभाव इन पर देखने को मिल रहा है ।
##Question:प्रवाल भित्ति से आप क्या समझते हैं ? प्रवाल भित्ति के निर्माण में सहायक कारकों की भूमिका का वर्णन कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) What do you understand by a coral reefs? Describe the role of ancillary factors in the construction of coral reefs. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण : प्रवाल भित्ति के संबंध में संक्षिप्त चर्चा करते हुए भूमिका लिखिए । प्रवाल भित्ति के निर्माण के लिए आवश्यक दशाओं की चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष लिखिए । उत्तर: प्रवाल भित्ति जैव विविधतापूर्ण अंतः सागरीय स्थलाकृति हैं । ये विश्व के प्रमुख विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है । जैव विविधता से समृद्ध होने के कारण ही इन्हें सामुद्रिक वर्षावन कहा जाता है । प्रावाल भित्तियों का निर्माण कोरल पॉलिप या जन्तु प्रवाल के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन से होता है । ये अस्थिपंजर कैल्शियम कार्बोनेट के बने होते हैं । प्रवाल भित्ति के लिए आवश्यक दशाएं : समुद्री जल का तापमान : प्रवाल मुख्यतः उष्णकटिबंधीय सागरों में पाए जाते हैं क्योंकि इनके जीवित रहने के लिए 20-21 * C का तापमान आवश्यक होता है । प्रवाल न तो अधिक ठंडे जल और न ही ही अधिक गर्म जल में विकसित होते हैं , यही कारण है की अधिकांशतः प्रवाल भित्तियाँ 30*N - 30*S में ही विकसित होती हैं । सागर तल के नीचे प्लेटफ़ॉर्म : सागर के नीचे अवसादों के जमाव के लिए एक प्लेटफ़ॉर्म की आवश्यकता होती है । सागर में अतः समुद्री चबूतरे प्रवालों को कॉलोनी विकसित करने में सहायक होते हैं । अवसाद या तलछट जमाव : प्रवाल के विकास के लिए पूर्ण स्वच्छ जल भी अपेक्षित नहीं है और न ही अत्यधिक अवसादयुक्त जल । जहां पर अवसाद का जल के साथ मिश्रण नियमित रूप से होते रहता है , वहाँ पर प्रवाल का विकास होता है परंतु अचानक अत्यधिक अवसाद से प्रवालों की मृत्यु हो जाती है । सागरीय लवणता : प्रवाल भित्ति के विकास के लिए औसत लवणता चाहिए । अत्यधिक लवणता तथा अति अल्प सागरीय लवणता प्रवाल के विकास के लिए हानिकारक होता है । सागरीय लवणता 30 %० से 40 %० के मध्य होना अपेक्षित । समुद्री गहराई : प्रवाल कम गहराई तक ही पाए जाते हैं । 200-250 फीट से अधिक गहराई में प्रवालों की मृत्यु हो जाती है क्योंकि इसके नीचे सूर्य का प्रकाश प्रविष्ट नहीं हो पाता । इनके अतिरिक्त कुछ और कारक हैं जो प्रवालों के विकास को प्रभावित करते हैं यथा - वायु की दिशा , समुद्री धाराएं , खुला सागर आदि । प्रवाल भित्तियां पृथ्वी पर सर्वाधिक विविध और बहुमूल्य पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं । यह जैव विविधता की दृष्टि से हॉट स्पॉट हैं । इसलिए इनके संरक्षण के लिए विशेष उपाय किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन का काफी नकारात्मक प्रभाव इन पर देखने को मिल रहा है ।
50,309
अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्व देखे जा सकते हैं| चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Progressive elements can be seen in Akbar"s religious, social and political policies. Discuss (150-200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण- 1- भूमिका में अकबर की कुछ उपलब्धियां बता कर नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों की उपस्थिति की सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में धार्मिक,सामाजिक एवं राजनीतिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को बताइये 3- अंतिम में कथन के अनुरूप सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये अकबर, मुगल वंश का तीसरा शासक था| यद्यपि अपने शासनकाल के आरम्भ में अकबर को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था तथापि अकबर ने तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक की स्थापना की थी| अकबर एक निरंकुश किन्तु बुद्धिमान शासक था इसलिए अकबर ने साम्राज्य की एकता बनाए रखने के लिए ऐसी प्रगतिशील नीतियां अपनाई जिनसे गैर मुसलमानों की राजभक्ति जीती जा सके और राज्य को सशक्त और दीर्घजीवी बनाया जा सके| अकबर की नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों को अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में देखा जा सकता है | अकबर की धार्मिक नीति अकबर ने सुलहकुल या सहिष्णुता की नीति का पालन किया और सभी धर्मावलम्बियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी| ध्यातव्य है कि मध्यकालीन विश्व में धर्म प्रभावी भूमिका में था| धर्म के आधार पर राज्य के द्वारा कोई भेदभाव नहीं किया गया| राज्य द्वारा भेदभाव पूर्ण करों एवं विभेदक प्रतीकों को भी समाप्त किया गया जैसे युद्ध बंदियों को दास बनाने की प्रथा, तीर्थ यात्रा कर को समाप्त किया गया और 1564 में जजिया कर को भी समाप्त किया गया| इस तरह के प्रयासों से अकबर ने जनता में भेदभाव का समापन करने का प्रयास किया धर्म के क्षेत्र में उलेमा वर्ग के प्रभाव को कम करने के लिए भी अकबर द्वारा कदम उठाये गए जैसे 1575 में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना की स्थापना, यहाँ अकबर विभिन्न विद्वानों के मतों को जानने का प्रयास करता था, इससे अकबर को विद्वानों में उपस्थित मतभिन्नता का बोध हुआ| महजर की घोषणा इसी मतभिन्नता के संदर्भ में की गयी| 1579 में अकबर ने खुतबा पढ़ा एवं महज़र जारी किया, इसके माध्यम से अकबर ने उलेमा वर्ग के प्रभाव को लगभग समाप्त कर दिया, इसके माध्यम से धार्मिक विषयों में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति अकबर के पास आ गयी| अर्थात अब राज्य धर्म पर प्रभावी हो गया था| इसी तरह का प्रगतिशील विकास तत्कालीन यूरोप में भी चल रहा था| 1582 में अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक आचार संहिता जारी की| दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) वस्तुतः दैवी एकेश्वरवाद से सम्बन्धित था| इसमें अकबर ने सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्वों का समावेश करने का प्रयास किया था |इस तरह से यह सर्व धर्म समन्वय का प्रयास दिखता है| अकबर की सामाजिक नीति अकबर ने सती प्रथा, बाल विवाह और बहुविवाह की परंपरा को हतोत्साहित करने का प्रयास किया| इन प्रयासों में व्यक्ति की गरिमा के संरक्षण की अनुगूंज प्राप्त होती है| इसी प्रकार अकबर ने विधवा विवाह का समर्थन किया| भारतीय इतिहास में अकबर प्रथम शासक था जिसने एक छत के नीचे हिन्दू एवं मुस्लिम छात्रों के पढने की व्यवस्था की कला-साहित्य के क्षेत्र में अकबर की नीति समन्वयकारी थी| अकबर कालीन कला और स्थापत्य में सभी धर्मों के तत्व देखे जा सकते हैं| अकबर ने इबादतखाने का विस्तार करते हुए उसमें धर्म-दर्शन की चर्चा के लिए बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों से सम्बन्धित विद्वानों को आमंत्रित करता था| अकबर की राजनीतिक नीति अकबर की राजनीतिक नीति का अध्ययन मुख्यतः अकबर की राजपूत नीति के माध्यम से किया जाता है| अकबर की राजपूत नीति उसकी गहन सूझ-बूझ का परिणाम थी। अकबर की एक स्थायी, शक्तिशाली एवं विस्तृत साम्राज्य की कल्पना को साकार करने में राजपूतों की शक्ति का प्रयोग करना चाहता था| अकबर ने राजपूतों के प्रति आक्रामक एवं उदार दोनों ही नीति का पालन किया| राजपूतों से शत्रुता अकबर के साम्राज्य को अस्थिर बनाती अतः अकबर राजपूतों की शत्रुता से अधिक उनकी मित्रता को महत्व देता था। धार्मिक पूर्वाग्रहों को परे रखते हुए वैवाहिक नीति और प्रगतिशील राजनीतिक नीति अपनाते हुए अकबर नेराजपूतराजाओं से मित्रता कर श्रेष्ठ एवं स्वामिभक्त राजपूतों को अपनी सेवा में लिया, जिससेमुग़ल साम्राज्यकाफ़ी दिन तक जीवित रह सका। इस तरह स्पष्ट होता है कि यद्यपि अकबर मध्यकालीन शासक था किन्तु उसकी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के कुछ आधुनिक तत्वों को देखा जा सकता है| इन्ही कारणों से अकबर को भारतीय इतिहास के कुछ महानतम शासकों के मध्य रखा जाता है|
##Question:अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्व देखे जा सकते हैं| चर्चा कीजिये | (150-200 शब्द, 10 अंक) Progressive elements can be seen in Akbar"s religious, social and political policies. Discuss (150-200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण- 1- भूमिका में अकबर की कुछ उपलब्धियां बता कर नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों की उपस्थिति की सूचना दीजिये 2- मुख्य भाग में धार्मिक,सामाजिक एवं राजनीतिक नीति के प्रगतिशील तत्वों को बताइये 3- अंतिम में कथन के अनुरूप सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये अकबर, मुगल वंश का तीसरा शासक था| यद्यपि अपने शासनकाल के आरम्भ में अकबर को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था तथापि अकबर ने तत्कालीन विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक की स्थापना की थी| अकबर एक निरंकुश किन्तु बुद्धिमान शासक था इसलिए अकबर ने साम्राज्य की एकता बनाए रखने के लिए ऐसी प्रगतिशील नीतियां अपनाई जिनसे गैर मुसलमानों की राजभक्ति जीती जा सके और राज्य को सशक्त और दीर्घजीवी बनाया जा सके| अकबर की नीतियों में प्रगतिशीलता के तत्वों को अकबर की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में देखा जा सकता है | अकबर की धार्मिक नीति अकबर ने सुलहकुल या सहिष्णुता की नीति का पालन किया और सभी धर्मावलम्बियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी| ध्यातव्य है कि मध्यकालीन विश्व में धर्म प्रभावी भूमिका में था| धर्म के आधार पर राज्य के द्वारा कोई भेदभाव नहीं किया गया| राज्य द्वारा भेदभाव पूर्ण करों एवं विभेदक प्रतीकों को भी समाप्त किया गया जैसे युद्ध बंदियों को दास बनाने की प्रथा, तीर्थ यात्रा कर को समाप्त किया गया और 1564 में जजिया कर को भी समाप्त किया गया| इस तरह के प्रयासों से अकबर ने जनता में भेदभाव का समापन करने का प्रयास किया धर्म के क्षेत्र में उलेमा वर्ग के प्रभाव को कम करने के लिए भी अकबर द्वारा कदम उठाये गए जैसे 1575 में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना की स्थापना, यहाँ अकबर विभिन्न विद्वानों के मतों को जानने का प्रयास करता था, इससे अकबर को विद्वानों में उपस्थित मतभिन्नता का बोध हुआ| महजर की घोषणा इसी मतभिन्नता के संदर्भ में की गयी| 1579 में अकबर ने खुतबा पढ़ा एवं महज़र जारी किया, इसके माध्यम से अकबर ने उलेमा वर्ग के प्रभाव को लगभग समाप्त कर दिया, इसके माध्यम से धार्मिक विषयों में अंतिम निर्णय लेने की शक्ति अकबर के पास आ गयी| अर्थात अब राज्य धर्म पर प्रभावी हो गया था| इसी तरह का प्रगतिशील विकास तत्कालीन यूरोप में भी चल रहा था| 1582 में अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक आचार संहिता जारी की| दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) वस्तुतः दैवी एकेश्वरवाद से सम्बन्धित था| इसमें अकबर ने सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्वों का समावेश करने का प्रयास किया था |इस तरह से यह सर्व धर्म समन्वय का प्रयास दिखता है| अकबर की सामाजिक नीति अकबर ने सती प्रथा, बाल विवाह और बहुविवाह की परंपरा को हतोत्साहित करने का प्रयास किया| इन प्रयासों में व्यक्ति की गरिमा के संरक्षण की अनुगूंज प्राप्त होती है| इसी प्रकार अकबर ने विधवा विवाह का समर्थन किया| भारतीय इतिहास में अकबर प्रथम शासक था जिसने एक छत के नीचे हिन्दू एवं मुस्लिम छात्रों के पढने की व्यवस्था की कला-साहित्य के क्षेत्र में अकबर की नीति समन्वयकारी थी| अकबर कालीन कला और स्थापत्य में सभी धर्मों के तत्व देखे जा सकते हैं| अकबर ने इबादतखाने का विस्तार करते हुए उसमें धर्म-दर्शन की चर्चा के लिए बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों से सम्बन्धित विद्वानों को आमंत्रित करता था| अकबर की राजनीतिक नीति अकबर की राजनीतिक नीति का अध्ययन मुख्यतः अकबर की राजपूत नीति के माध्यम से किया जाता है| अकबर की राजपूत नीति उसकी गहन सूझ-बूझ का परिणाम थी। अकबर की एक स्थायी, शक्तिशाली एवं विस्तृत साम्राज्य की कल्पना को साकार करने में राजपूतों की शक्ति का प्रयोग करना चाहता था| अकबर ने राजपूतों के प्रति आक्रामक एवं उदार दोनों ही नीति का पालन किया| राजपूतों से शत्रुता अकबर के साम्राज्य को अस्थिर बनाती अतः अकबर राजपूतों की शत्रुता से अधिक उनकी मित्रता को महत्व देता था। धार्मिक पूर्वाग्रहों को परे रखते हुए वैवाहिक नीति और प्रगतिशील राजनीतिक नीति अपनाते हुए अकबर नेराजपूतराजाओं से मित्रता कर श्रेष्ठ एवं स्वामिभक्त राजपूतों को अपनी सेवा में लिया, जिससेमुग़ल साम्राज्यकाफ़ी दिन तक जीवित रह सका। इस तरह स्पष्ट होता है कि यद्यपि अकबर मध्यकालीन शासक था किन्तु उसकी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नीतियों में प्रगतिशीलता के कुछ आधुनिक तत्वों को देखा जा सकता है| इन्ही कारणों से अकबर को भारतीय इतिहास के कुछ महानतम शासकों के मध्य रखा जाता है|
50,313
The self-help group(SHG) Bank linkage program portrays it as an effective tool being used in various countries to approach a range of socio-economic issues. Explore the possible performance and sustainability if this type of program in India? (250 words/ 15marks)
Approach: Introduction - Describe Self-help groups (SHGs) bank linkage program Main Body- Write positive outcome and challenges faced Conclusion- Suggestion for strengthening the program Answer: The SHG Bank linkage program model is the indigenous model of micro-credit evolved in India and has been widely acclaimed as successful model. The SHG Bank linkage program was an outcome of pilot projects during the 1980s for improving access of India’s rural poor to formal Institutional financial services. For banks, it was the way of reducing their transaction costs by dealing with group of people rather than individuals and reducing their risks through ‘peer-pressure’ and making people save. Positive Outcomes of the SHG Bank linkage program Financial Inclusion and thus the empowerment of Poor women Loan repayments-very high on time recovery Reduced the incidence of poverty through increase in income, and also enabled the poor to build assets and thereby reduce their vulnerability. Enabled households that have access to it to spend more on education than non-client households. Reduced child mortality, improved maternal health and the ability of the poor to combat disease through better nutrition, housing and health-especially among women and children. Contributed to a reduced dependency on informal money lenders and other non-institutional sources. It has offered space for different stakeholders to innovate, learn and replicate. As a result, some NGOs have added micro-insurance products to their portfolios, a couple if SHG federations have experimented with undertaking livelihood activities and grain banks have been successfully built into the SHG model in the eastern region. Challenges Faced Wide regional disparity both in terms of the spread of SHGs linked to banks and cumulative bank loans disbursed under the program. While the southern region accounted for 48.2% of the total SHGs, the share of NE region wise differential gets further magnified. Even wider intra-regional disparity among the constituent states in SHG spread. In the southern Region, SHGs per lakh population varied between 891 in Andhra Pradesh and 435 in Kerala. In the North-Eastern region, Assam accounted for 3.1% of the total SHGs while the rest of the 6 states in the region had a negligible share in the total SHGs. There does not appear to be a one-to one correspondence between banking outreach and spread of SHG movement. Even with similar banking network, SHG spread varies between regions and states indicating that other local factors are equally important. The Studies point to the coverage of the upper strata of the poor and not to the ultra-poor. Except the government-sponsored programs that are mandated to focus on poor, the other efforts do not prioritise the poorest. Suggestions for long term sustainability of SHG-Bank linkage program Encouraging SHG in excluded regions Capacity building of government functionaries Check on corruption while sanctioning and upgrading the loan Maintenance of participatory character of SHG movement. Identification of poor by NABARD. Incentive package for NGOs Avoid ‘ever-greening’ of loans Transparency in maintenance of records SHG to evolve norms for the distribution of surplus Identification of income/employment generating activities ICT technology and product innovation.
##Question:The self-help group(SHG) Bank linkage program portrays it as an effective tool being used in various countries to approach a range of socio-economic issues. Explore the possible performance and sustainability if this type of program in India? (250 words/ 15marks)##Answer:Approach: Introduction - Describe Self-help groups (SHGs) bank linkage program Main Body- Write positive outcome and challenges faced Conclusion- Suggestion for strengthening the program Answer: The SHG Bank linkage program model is the indigenous model of micro-credit evolved in India and has been widely acclaimed as successful model. The SHG Bank linkage program was an outcome of pilot projects during the 1980s for improving access of India’s rural poor to formal Institutional financial services. For banks, it was the way of reducing their transaction costs by dealing with group of people rather than individuals and reducing their risks through ‘peer-pressure’ and making people save. Positive Outcomes of the SHG Bank linkage program Financial Inclusion and thus the empowerment of Poor women Loan repayments-very high on time recovery Reduced the incidence of poverty through increase in income, and also enabled the poor to build assets and thereby reduce their vulnerability. Enabled households that have access to it to spend more on education than non-client households. Reduced child mortality, improved maternal health and the ability of the poor to combat disease through better nutrition, housing and health-especially among women and children. Contributed to a reduced dependency on informal money lenders and other non-institutional sources. It has offered space for different stakeholders to innovate, learn and replicate. As a result, some NGOs have added micro-insurance products to their portfolios, a couple if SHG federations have experimented with undertaking livelihood activities and grain banks have been successfully built into the SHG model in the eastern region. Challenges Faced Wide regional disparity both in terms of the spread of SHGs linked to banks and cumulative bank loans disbursed under the program. While the southern region accounted for 48.2% of the total SHGs, the share of NE region wise differential gets further magnified. Even wider intra-regional disparity among the constituent states in SHG spread. In the southern Region, SHGs per lakh population varied between 891 in Andhra Pradesh and 435 in Kerala. In the North-Eastern region, Assam accounted for 3.1% of the total SHGs while the rest of the 6 states in the region had a negligible share in the total SHGs. There does not appear to be a one-to one correspondence between banking outreach and spread of SHG movement. Even with similar banking network, SHG spread varies between regions and states indicating that other local factors are equally important. The Studies point to the coverage of the upper strata of the poor and not to the ultra-poor. Except the government-sponsored programs that are mandated to focus on poor, the other efforts do not prioritise the poorest. Suggestions for long term sustainability of SHG-Bank linkage program Encouraging SHG in excluded regions Capacity building of government functionaries Check on corruption while sanctioning and upgrading the loan Maintenance of participatory character of SHG movement. Identification of poor by NABARD. Incentive package for NGOs Avoid ‘ever-greening’ of loans Transparency in maintenance of records SHG to evolve norms for the distribution of surplus Identification of income/employment generating activities ICT technology and product innovation.
50,317
Discuss the physiographic classification of northern plains based on the regions along with their characteristics. (10 marks/150 words)
Approach:- Write a brief introduction on northern plains. Write down the various regions northern plain is divided into Mention some of its characteristics Answer:- The northern plains are formed by the alluvial deposits brought by the rivers. These plains extend approximately 3,200 km from the east to the west. The average width of these plains varies from 150 to 300 km. The maximum depth of alluvium deposits varies between 1,000-2,000 m. These plains fromwest to east are classified into following regions. Punjab Haryana Plain Ganga Plain Brahmaputra Plain Punjab-Haryana plainalso known as the Indus Plain is formed by the river system of the Indus. It lies to the west of Aravallis in the state of Rajasthan and south of Jhelum. This plain is formed due to deposits brought by the rivers like the Satluj, the Beas, Ravi, Chenab and Jhelum. This part of the plain hasdoabsi.e. the alluvial deposits brought and lying between two converging river. Punjab is names so as it is the land of 5 rivers. 3 cultural regions of Malwa, Doaba, Majha plain from South to North lies in this region. Ganga Plainis divided into three regions Upper Ganga Plain– Lies above 100 metre altitude line, bordered between the Shivaliks innorth, Yamuna in the west and the Peninsula in the south. The rivers are fast flowing and the deposits are bhangar gradually turning into khaddar as we move to the east. Rohilkhand plain and Awadh plains are the two cultural regions here. Middle Ganga Plain– Lies between the 100 metre and 30 metre altitude line. Gently sloping gradient and the deposits are finer. The rivers meanders and changes course often eg. Kosi also known as the sorrow of Bihar. Mithila plain and Magadh plain are the cultural region in this plain. Lower Ganga Plain– Lies between 30 metres to the mean sea level. It covers the regions in eastern Bihar, West Bengal and Bangladesh. This region is characterised by Duar formation. Delta encompassed 2/3rd of the area under lower ganga plain. There are also ox-bow lakes, mangroves in the region. Brahmaputra Plainlies between the Himalayas, purvanchal and the Meghalaya Plateau. It is also knows as Assam Plains. The slopes are steeper in the east than west. Majuli island is the world’s largest riverine island found here which at present is highly vulnerable to erosion. This area is highly fertile. The characteristicsof these plains: 1)Due to their recent origin they are immature and have weak profile. 2) These soils are constantly replenished by the recurrent floods. 3) Pebbly and gravelly soils are rare. Kankar (calcareous concretions) beds are present in some regions along the river terraces. 4) The soil is porous because of its loamy (equal proportion of sand and clay) nature. 5) Porosity and texture provide good drainage and other conditions favourable for agriculture. 6)Muchof these soilare Sandy and clayey. Conclusion Most of these areas are subjected to periodic floods and shifting river courses forming braided streams. The mouths of these mighty rivers also form some of the largest deltas of the world, for example, the famous Sunderbans delta. Otherwise, this is a featureless plain with a general elevation of 50-150 m above the mean sea level. The states of Haryana and Delhi form a water divide between the Indus and the Ganga river systems.
##Question:Discuss the physiographic classification of northern plains based on the regions along with their characteristics. (10 marks/150 words)##Answer: Approach:- Write a brief introduction on northern plains. Write down the various regions northern plain is divided into Mention some of its characteristics Answer:- The northern plains are formed by the alluvial deposits brought by the rivers. These plains extend approximately 3,200 km from the east to the west. The average width of these plains varies from 150 to 300 km. The maximum depth of alluvium deposits varies between 1,000-2,000 m. These plains fromwest to east are classified into following regions. Punjab Haryana Plain Ganga Plain Brahmaputra Plain Punjab-Haryana plainalso known as the Indus Plain is formed by the river system of the Indus. It lies to the west of Aravallis in the state of Rajasthan and south of Jhelum. This plain is formed due to deposits brought by the rivers like the Satluj, the Beas, Ravi, Chenab and Jhelum. This part of the plain hasdoabsi.e. the alluvial deposits brought and lying between two converging river. Punjab is names so as it is the land of 5 rivers. 3 cultural regions of Malwa, Doaba, Majha plain from South to North lies in this region. Ganga Plainis divided into three regions Upper Ganga Plain– Lies above 100 metre altitude line, bordered between the Shivaliks innorth, Yamuna in the west and the Peninsula in the south. The rivers are fast flowing and the deposits are bhangar gradually turning into khaddar as we move to the east. Rohilkhand plain and Awadh plains are the two cultural regions here. Middle Ganga Plain– Lies between the 100 metre and 30 metre altitude line. Gently sloping gradient and the deposits are finer. The rivers meanders and changes course often eg. Kosi also known as the sorrow of Bihar. Mithila plain and Magadh plain are the cultural region in this plain. Lower Ganga Plain– Lies between 30 metres to the mean sea level. It covers the regions in eastern Bihar, West Bengal and Bangladesh. This region is characterised by Duar formation. Delta encompassed 2/3rd of the area under lower ganga plain. There are also ox-bow lakes, mangroves in the region. Brahmaputra Plainlies between the Himalayas, purvanchal and the Meghalaya Plateau. It is also knows as Assam Plains. The slopes are steeper in the east than west. Majuli island is the world’s largest riverine island found here which at present is highly vulnerable to erosion. This area is highly fertile. The characteristicsof these plains: 1)Due to their recent origin they are immature and have weak profile. 2) These soils are constantly replenished by the recurrent floods. 3) Pebbly and gravelly soils are rare. Kankar (calcareous concretions) beds are present in some regions along the river terraces. 4) The soil is porous because of its loamy (equal proportion of sand and clay) nature. 5) Porosity and texture provide good drainage and other conditions favourable for agriculture. 6)Muchof these soilare Sandy and clayey. Conclusion Most of these areas are subjected to periodic floods and shifting river courses forming braided streams. The mouths of these mighty rivers also form some of the largest deltas of the world, for example, the famous Sunderbans delta. Otherwise, this is a featureless plain with a general elevation of 50-150 m above the mean sea level. The states of Haryana and Delhi form a water divide between the Indus and the Ganga river systems.
50,326
नेहरू समिति के गठन के घटनाक्रम को स्पष्ट करते हुए इसके द्वारा बनाई गयी नेहरू रिपोर्ट की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the developments in the formation of the Nehru Committee and discuss the salient features of the Nehru Report made by it. (150-200 words)
Approach: नेहरू समिति निर्माण की प्रष्ठभूमि की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। नेहरू समिति का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर सकते हैं। नेहरू रिपोर्ट की सिफ़ारिशों की चर्चा कीजिये। नेहरू रिपोर्ट के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- 1927 में भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा करने हेतु साइमन कमीशन का गठन किया गया। इसमें एक भी भारतीय शामिल नहीं था इसलिए पूरे देश भर में साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन चलाया गया। भारतियों के इस विरोध को देखते हुए बिरकनहैड ने भारतियों को एक ऐसे संविधान बनाने की चुनौती दी जो सभी को स्वीकार्य हो। भारतीयों द्वारा इस चुनौती को स्वीकार किया गया और एक सर्वदलीय समिति का गठन किया गया। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित की गयी यह समिति नेहरू समिति कहलायी तथा इसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा गया। यह रिपोर्ट अगस्त 1928 में रिपोर्ट प्रकाशित हुई। नेहरू रिपोर्ट की सिफ़ारिशें भारत को डॉमिनियन स्टेटस का दर्जा दिया जाये। यद्यपि इसका विरोध जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया। केंद्र एवं प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार का गठन किया जाये। अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास रहनी चाहिए। भारत को एक पंथ निरपेक्ष राज्य के रूपमें मान्यता दी जानी चाहिए अल्पसंखयकों के लिए विशेष सुरक्षा के प्रावधान किए गए तथा केन्द्रीय व प्रांतीय विधानमंडल में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गयी। सिंध एवं उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत को प्रांत का दर्जा दिया जाये। भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाये। श्रेणीबद्ध रूप से न्यायिक ढांचे का गठन किया जाना चाहिए। देसी रियासतों के साथ संबंधों का निर्धारण भारतीय सरकार द्वारा किया जाना चाहिए ना की ब्रिटिश सरकार द्वारा। बड़ी संख्या में मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता, महिलाओं को मत देने का अधिकार इत्यादि। नेहरू रिपोर्ट ने ब्रिटिश के उस अनुमान को गलत ठहराया कि भारत राजनैतिक सोच पर बंटा हुआ है। नेहरू रिपोर्ट की मांगे स्वीकार ना होने पर ही कॉंग्रेस ने अपनी मांग को पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में पुन: परिभाषित किया।
##Question:नेहरू समिति के गठन के घटनाक्रम को स्पष्ट करते हुए इसके द्वारा बनाई गयी नेहरू रिपोर्ट की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the developments in the formation of the Nehru Committee and discuss the salient features of the Nehru Report made by it. (150-200 words)##Answer:Approach: नेहरू समिति निर्माण की प्रष्ठभूमि की चर्चा करते हुए उत्तर की शुरुवात कर सकते हैं। नेहरू समिति का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर सकते हैं। नेहरू रिपोर्ट की सिफ़ारिशों की चर्चा कीजिये। नेहरू रिपोर्ट के महत्व की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर- 1927 में भारत में संवैधानिक सुधारों की समीक्षा करने हेतु साइमन कमीशन का गठन किया गया। इसमें एक भी भारतीय शामिल नहीं था इसलिए पूरे देश भर में साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन चलाया गया। भारतियों के इस विरोध को देखते हुए बिरकनहैड ने भारतियों को एक ऐसे संविधान बनाने की चुनौती दी जो सभी को स्वीकार्य हो। भारतीयों द्वारा इस चुनौती को स्वीकार किया गया और एक सर्वदलीय समिति का गठन किया गया। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित की गयी यह समिति नेहरू समिति कहलायी तथा इसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा गया। यह रिपोर्ट अगस्त 1928 में रिपोर्ट प्रकाशित हुई। नेहरू रिपोर्ट की सिफ़ारिशें भारत को डॉमिनियन स्टेटस का दर्जा दिया जाये। यद्यपि इसका विरोध जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया। केंद्र एवं प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार का गठन किया जाये। अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास रहनी चाहिए। भारत को एक पंथ निरपेक्ष राज्य के रूपमें मान्यता दी जानी चाहिए अल्पसंखयकों के लिए विशेष सुरक्षा के प्रावधान किए गए तथा केन्द्रीय व प्रांतीय विधानमंडल में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गयी। सिंध एवं उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत को प्रांत का दर्जा दिया जाये। भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाये। श्रेणीबद्ध रूप से न्यायिक ढांचे का गठन किया जाना चाहिए। देसी रियासतों के साथ संबंधों का निर्धारण भारतीय सरकार द्वारा किया जाना चाहिए ना की ब्रिटिश सरकार द्वारा। बड़ी संख्या में मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता, महिलाओं को मत देने का अधिकार इत्यादि। नेहरू रिपोर्ट ने ब्रिटिश के उस अनुमान को गलत ठहराया कि भारत राजनैतिक सोच पर बंटा हुआ है। नेहरू रिपोर्ट की मांगे स्वीकार ना होने पर ही कॉंग्रेस ने अपनी मांग को पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में पुन: परिभाषित किया।
50,327
Explain the concept of volcanism and the different types of erruptions with examples (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH:- - INTRODUCTION THE CONCEPT OF VOLCANISM - THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES Answer:- The magma of the Earth oozes to the surface and becomes lava. This results in various landforms. This is the broad concept of volcanism. THE CONCEPT OF VOLCANISM 1) MELTING OF ROCKS For every 32 m of descent in the interior of the Earth, the temperature increases by 1 degree Celsius. At a depth of 1000 km, where the temperature is in 1000s of degrees, rocks melt. They turn into a molten form. This molten rocky material is otherwise known as magma. 2) ERUPTION Where the crust is weak, the magma tries to come up. This process of oozing out from the deep inner layers is called eruption. 3) FORMATION OF LANDFORMS On reaching the surface, the temperature is lesser, which results in the rocks taking their original form. Great structures like mountains, plateaus etc. are formed. THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES 1) FELSIC/ ACIDIC ERUPTIONS These have high silica content. They are stickier with less mobility. It leads to the central type of eruption with big volcanic mountains.For example,Hawaii mountains, Mount Stromboli in the island of Sicily, Mt. Vesuvius in Italy, Mt. Krakatoa of Indonesia, Mt. Fujiyama of Japan etc. 2) MAFIC/ BASIC MAGMA These are less viscous, due to the low silica content, and run 100s of km. They result in fissure type eruptions. Such eruptions create plateaus.For example,Deccan plateau, Colombian plateaus of North America, Patagonia (Argentina).
##Question:Explain the concept of volcanism and the different types of erruptions with examples (150 words/10 marks)##Answer: BRIEF APPROACH:- - INTRODUCTION THE CONCEPT OF VOLCANISM - THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES Answer:- The magma of the Earth oozes to the surface and becomes lava. This results in various landforms. This is the broad concept of volcanism. THE CONCEPT OF VOLCANISM 1) MELTING OF ROCKS For every 32 m of descent in the interior of the Earth, the temperature increases by 1 degree Celsius. At a depth of 1000 km, where the temperature is in 1000s of degrees, rocks melt. They turn into a molten form. This molten rocky material is otherwise known as magma. 2) ERUPTION Where the crust is weak, the magma tries to come up. This process of oozing out from the deep inner layers is called eruption. 3) FORMATION OF LANDFORMS On reaching the surface, the temperature is lesser, which results in the rocks taking their original form. Great structures like mountains, plateaus etc. are formed. THE DIFFERENT TYPES OF ERUPTIONS WITH EXAMPLES 1) FELSIC/ ACIDIC ERUPTIONS These have high silica content. They are stickier with less mobility. It leads to the central type of eruption with big volcanic mountains.For example,Hawaii mountains, Mount Stromboli in the island of Sicily, Mt. Vesuvius in Italy, Mt. Krakatoa of Indonesia, Mt. Fujiyama of Japan etc. 2) MAFIC/ BASIC MAGMA These are less viscous, due to the low silica content, and run 100s of km. They result in fissure type eruptions. Such eruptions create plateaus.For example,Deccan plateau, Colombian plateaus of North America, Patagonia (Argentina).
50,338
भारतीय उपमहाद्वीप पर हिमालय के प्रभाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the impact of the Himalayas on the Indian subcontinent. (150-200 words)
दृष्टिकोण : हिमालय का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारतीय उपमहाद्वीप के जलवायु, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा , संस्कृति आदि पर हिमालय के प्रभाव की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है जिसकी उत्पत्ति भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टक्कर के परिणाम स्वरूप हुई । हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर तथा उत्तर पूर्व में एक लंबी दीवार की तरह खड़ा है । हिमालय एक प्राकृतिक अवरोधक ही नहीं अपितु एक जलवायु, अपवाह, और सांस्कृतिक विभाजक भी है । भारतीय उपमहाद्वीप पर हम हिमालय के प्रभाव को हम निम्नलिखीत रूपों में देख सकते हैं । जलवायु पर प्रभाव : मानसूनी पवनों को रोककर भारतीय उपमहाद्वीप में भारी वर्षा करवाता है । हिमालय के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में इस क्षेत्र में उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब के क्षेत्र का निर्माण नहीं हो पाता, जिससे वायुदाब प्रणाली, प्रचलित पवन का संचलन तथा वर्षा प्रणाली प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है । हिमालय ध्रुवीय पूरवा ( साइबेरियाई ठंडी हवा ) को शीतकाल में मैदानी क्षेत्र में आने से रोक देता है । जिससे इस क्षेत्र का सर्दियों में तापमान 3*-5* C तक ऊपर रहता है और इस प्रकार यह इस क्षेत्र को शीत मरुस्थल बनने से बचाता है । सर्दी के दिनों में पश्चिम से आने वाली उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ धारा को ये दो भागों में विभाजित कर देती है । इसका दक्षिणी भाग उत्तरी मैदान के ऊपर से गुजरता है । ये जेट धारा अपने साथ भूमध्य सागर से शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात को भारत की ओर लाती है, जिससे हिमालय के कारण उत्तरी मैदान में शीतकालीन वर्षा होती है । अर्थव्यवस्था पर प्रभाव : हिमालय कई प्रकार के फलों की खेती के लिए आदर्श जलवायु स्थिति प्रदान करता है । हिमालय का क्षेत्र मुलायम लकड़ियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है । कई प्रकार की जड़ी-बूटियाँ तथा चाय आदि के उत्पादन के लिए आदर्श स्थिति प्रदान करता है । अपवाह तंत्र पर प्रभाव : हिमालय उत्तरी भारत के सदानीरा नदियों की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । साथ ही हिमालय एक महत्वपूर्ण जलविभाजक के रूप में भी कार्य करता है । उत्तरी भारत के मैदान के निर्माण में हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए अवसादों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है , जो भारतीय उपमहाद्वीप के कृषि का मजबूत आधार निर्मित करती है । सुरक्षा पर प्रभाव : प्राचीन काल से हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश के लिए अवरोधक का कार्य करता रहा है और इस रूप में यह विदेशी आक्रान्ताओं से सुरक्षा प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । साथ ही हिमालय का क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं से भी काफी प्रभावित रहा है ।उदाहरण के लिए इस क्षेत्र में भायनक भूकंपों की बारंबारता रहती है । संस्कृति पर प्रभाव : हिमालय ने इस क्षेत्र के जनजीवन को कई स्तर पर प्रभावित किया है जो यहाँ के रहन-सहन, खान-पान, पर्व-त्योहार आदि पर स्पष्ट रूप में देखने को मिलता है । इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि हिमालय ने भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग सभी आयामों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है ।
##Question:भारतीय उपमहाद्वीप पर हिमालय के प्रभाव की संक्षिप्त चर्चा कीजिए । ( 150-200 शब्द ) Briefly discuss the impact of the Himalayas on the Indian subcontinent. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण : हिमालय का संक्षिप्त परिचय देते हुए भूमिका लिखिए । भारतीय उपमहाद्वीप के जलवायु, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा , संस्कृति आदि पर हिमालय के प्रभाव की बिन्दुवार चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है जिसकी उत्पत्ति भारतीय प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टक्कर के परिणाम स्वरूप हुई । हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर तथा उत्तर पूर्व में एक लंबी दीवार की तरह खड़ा है । हिमालय एक प्राकृतिक अवरोधक ही नहीं अपितु एक जलवायु, अपवाह, और सांस्कृतिक विभाजक भी है । भारतीय उपमहाद्वीप पर हम हिमालय के प्रभाव को हम निम्नलिखीत रूपों में देख सकते हैं । जलवायु पर प्रभाव : मानसूनी पवनों को रोककर भारतीय उपमहाद्वीप में भारी वर्षा करवाता है । हिमालय के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में इस क्षेत्र में उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब के क्षेत्र का निर्माण नहीं हो पाता, जिससे वायुदाब प्रणाली, प्रचलित पवन का संचलन तथा वर्षा प्रणाली प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है । हिमालय ध्रुवीय पूरवा ( साइबेरियाई ठंडी हवा ) को शीतकाल में मैदानी क्षेत्र में आने से रोक देता है । जिससे इस क्षेत्र का सर्दियों में तापमान 3*-5* C तक ऊपर रहता है और इस प्रकार यह इस क्षेत्र को शीत मरुस्थल बनने से बचाता है । सर्दी के दिनों में पश्चिम से आने वाली उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ धारा को ये दो भागों में विभाजित कर देती है । इसका दक्षिणी भाग उत्तरी मैदान के ऊपर से गुजरता है । ये जेट धारा अपने साथ भूमध्य सागर से शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात को भारत की ओर लाती है, जिससे हिमालय के कारण उत्तरी मैदान में शीतकालीन वर्षा होती है । अर्थव्यवस्था पर प्रभाव : हिमालय कई प्रकार के फलों की खेती के लिए आदर्श जलवायु स्थिति प्रदान करता है । हिमालय का क्षेत्र मुलायम लकड़ियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है । कई प्रकार की जड़ी-बूटियाँ तथा चाय आदि के उत्पादन के लिए आदर्श स्थिति प्रदान करता है । अपवाह तंत्र पर प्रभाव : हिमालय उत्तरी भारत के सदानीरा नदियों की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । साथ ही हिमालय एक महत्वपूर्ण जलविभाजक के रूप में भी कार्य करता है । उत्तरी भारत के मैदान के निर्माण में हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए अवसादों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है , जो भारतीय उपमहाद्वीप के कृषि का मजबूत आधार निर्मित करती है । सुरक्षा पर प्रभाव : प्राचीन काल से हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश के लिए अवरोधक का कार्य करता रहा है और इस रूप में यह विदेशी आक्रान्ताओं से सुरक्षा प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । साथ ही हिमालय का क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं से भी काफी प्रभावित रहा है ।उदाहरण के लिए इस क्षेत्र में भायनक भूकंपों की बारंबारता रहती है । संस्कृति पर प्रभाव : हिमालय ने इस क्षेत्र के जनजीवन को कई स्तर पर प्रभावित किया है जो यहाँ के रहन-सहन, खान-पान, पर्व-त्योहार आदि पर स्पष्ट रूप में देखने को मिलता है । इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि हिमालय ने भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग सभी आयामों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है ।
50,341
उपयुक्त तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये किअकबर द्वारा मुग़ल स्थापत्य को एक विशिष्ट स्तरप्रदान किया गया| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain through appropriate arguments and examples that Mughal architecture was given a specific level by Akbar. (150 to 200 words, 10 Marks)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में मुग़ल काल में स्थापत्य के विकास की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में बाबर एवं हुमायूं के समय स्थापत्य के विकास की जानकारी दीजिये 3- दूसरे भाग में अकबर कालीन स्थापत्य के विकास और उसकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण योगदान के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मुगलों से पूर्व भारत में इंडो-इस्लामिक स्थापत्य के विकास की एक समृद्ध परम्परा रही है, दिल्ली सल्तनत के समय इसकी बुनियाद रखी गयी| 14वीं से 16वीं सदी के मध्य क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ इंडो-इस्लामिक स्थापत्य का विकास जारी रहा और मुगल शासकों नेइंडो-इस्लामिक स्थापत्य को चरमोत्कर्ष पर पहुचाया|किसी भी काल में कला या स्थापत्य का विकास पर कई कारकों का प्रभाव होता है जैसे राजनीतिक स्थिरता, सशक्त आर्थिक आधार, निर्माण सामग्री की उपलब्धता, कलात्मक विकास की परम्परा, शासक वर्ग की अभिरुचि, धार्मिक एवं धर्मेत्तर विषय तथा समकालीन अन्य संस्कृतियों से संपर्क आदि| मुग़लकाल में कलात्मक विकास से सम्बन्धित उपरोक्त परिस्थितियों का निर्माण एक सीमा तक अकबर के समय हुआ इसीलिए अकबर के काल में कला के अलग-अलग क्षेत्रों में व्यापक भी विकास दिखाई देता है| यद्यपि मुग़ल स्थापत्य को प्रारम्भ करने का श्रेय बाबर को जाता है और मुग़ल कला का चरमोत्कर्ष शाहजहाँ के समय में दिखाई देता है किन्तु अकबर ने मुगल कालीन स्थापत्य को एक विशिष्ट स्तर प्रदान किया| बाबर एवं हुमायूं के समय स्थापत्य का विकास बाबर की कला एवं स्थापत्य में रूचि थी लेकिन राजनीतिक-आर्थिक कारणों से स्थापत्य के क्षेत्र में बाबर का विशेष योगदान नहीं रहा बाबर ने कुछ मस्जिदों(आगरा एवं पानीपत में) एवं उद्यानों(आगरा में) का निर्माण कराया बाबर के समय विकसित स्थापत्य संख्या एवं कलात्मक दृष्टिकोण से विशेष महत्त्व नहीं रखती हैं किन्तु मुग़ल स्थापत्य को प्रारम्भ करने का श्रेय बाबर को जाता है बाबर की तरह हुमायूं भी कला में रूचि रखता था किन्तु राजनीतिक आर्थिक कारणों से उसका जीवन भी संघर्ष पूर्ण रहा| हालांकि हुमायूं ने दिल्ली में दीनपनाह नगर की नीव रखी| दीनपनाह नगर में ही शेरशाह ने पुराने किले का निर्माण करवाया था, इसी परिसर में किला-ए-कुहना नामक मस्जिद तथा सासाराम में शेरशाह का मकबरा शेरशाह कालीन महत्वपूर्ण स्थापत्य है अकबर कालीन स्थापत्य अकबर के काल में आगरा, फतेहपुर सीकरी, लाहौर, इलाहाबाद आदि स्थलों पर बड़ी संख्या में इमारतों का निर्माण किया गया इन इमारतों के निर्माण में राजनीतिक-सामरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया जैसे अकबर ने विशाल किलों का निर्माण कराया जो सुरक्षा के साथ-साथ शासक के प्रभाव के विस्तार का माध्यम बना लाहौर एवं इलाहाबाद में किलों के निर्माण का एक मुख्य उद्देश्य यह भी था कि उत्तर पश्चिम एवं पूर्वी भारत से सम्बन्धित गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके अकबर के काल में निर्मित इमारतें विशालता या भव्यता के बावजूद बेडौल नहीं दिखाई देती हैं बल्कि इनमें प्रकृति के साथ एक सुंदर समन्वय बनाने का प्रयास दिखता है अकबर कालीन इमारतें अलग-अलग उद्देश्यों से समूहों में बनायी गयी हैं जैसे फतेहपुर सीकरी में दीवान-ए-आम सार्वजनिक उद्देश्य से बानाया गया था वहीँ पंचमहल का उद्देश्य व्यक्तिगत था, जामा मस्जिद एवं सलीम चिश्ती का मकबरा धार्मिक उद्देश्यों से निर्मित था अकबर कालीन स्थापत्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है हिन्द-इस्लामिक विशेषताओं का बड़े पैमाने पर समन्वय जैसे सीकरी के भवन समूहों को देखें तो स्पष्ट होता है की दीवान-ए-आम पर कान्हेरी की बौद्ध गुफाओं का प्रभाव, पंचमहल पर नालंदा महाविहार का प्रभाव एवं हिन्दू स्थापत्य का प्रभाव तथा आगरा के किले के जहांगीरी महल पर मोर एवं सर्प की आकृति जैसे हिन्दू प्रतीकों का प्रयोग दिखता है अकबर कालीन स्थापत्य के अलंकरण पर पारंपरिक विशेषताओं के साथ-साथ कुछ नवीनता के तत्व भी दिखाई देते हैं जैसे चारबाग शैली, पानी के फव्वारों का प्रयोग, दीवारों पर चित्रांकन आदि निर्माण सामग्री में लाल बलुए पत्थर का बहुतायत में प्रयोग किया गया है साथ ही हुमायूं एवं सलीम चिश्ती के मकबरे में संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है| उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि यद्यपि मुग़ल स्थापत्य का सर्वाधिक विकास शाहजहाँ के समय हुआ था किन्तु इसे अकबर द्वारा एक विशिष्ट स्तर प्रदान किया गया जिसने परवर्ती काल में स्थापत्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण आधारशिला के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी|
##Question:उपयुक्त तर्कों एवं उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कीजिये किअकबर द्वारा मुग़ल स्थापत्य को एक विशिष्ट स्तरप्रदान किया गया| (150 से 200 शब्द, 10 अंक) Explain through appropriate arguments and examples that Mughal architecture was given a specific level by Akbar. (150 to 200 words, 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में मुग़ल काल में स्थापत्य के विकास की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम भाग में बाबर एवं हुमायूं के समय स्थापत्य के विकास की जानकारी दीजिये 3- दूसरे भाग में अकबर कालीन स्थापत्य के विकास और उसकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में महत्वपूर्ण योगदान के सन्दर्भ में निष्कर्ष देते हुए उत्तर समाप्त कीजिये मुगलों से पूर्व भारत में इंडो-इस्लामिक स्थापत्य के विकास की एक समृद्ध परम्परा रही है, दिल्ली सल्तनत के समय इसकी बुनियाद रखी गयी| 14वीं से 16वीं सदी के मध्य क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ इंडो-इस्लामिक स्थापत्य का विकास जारी रहा और मुगल शासकों नेइंडो-इस्लामिक स्थापत्य को चरमोत्कर्ष पर पहुचाया|किसी भी काल में कला या स्थापत्य का विकास पर कई कारकों का प्रभाव होता है जैसे राजनीतिक स्थिरता, सशक्त आर्थिक आधार, निर्माण सामग्री की उपलब्धता, कलात्मक विकास की परम्परा, शासक वर्ग की अभिरुचि, धार्मिक एवं धर्मेत्तर विषय तथा समकालीन अन्य संस्कृतियों से संपर्क आदि| मुग़लकाल में कलात्मक विकास से सम्बन्धित उपरोक्त परिस्थितियों का निर्माण एक सीमा तक अकबर के समय हुआ इसीलिए अकबर के काल में कला के अलग-अलग क्षेत्रों में व्यापक भी विकास दिखाई देता है| यद्यपि मुग़ल स्थापत्य को प्रारम्भ करने का श्रेय बाबर को जाता है और मुग़ल कला का चरमोत्कर्ष शाहजहाँ के समय में दिखाई देता है किन्तु अकबर ने मुगल कालीन स्थापत्य को एक विशिष्ट स्तर प्रदान किया| बाबर एवं हुमायूं के समय स्थापत्य का विकास बाबर की कला एवं स्थापत्य में रूचि थी लेकिन राजनीतिक-आर्थिक कारणों से स्थापत्य के क्षेत्र में बाबर का विशेष योगदान नहीं रहा बाबर ने कुछ मस्जिदों(आगरा एवं पानीपत में) एवं उद्यानों(आगरा में) का निर्माण कराया बाबर के समय विकसित स्थापत्य संख्या एवं कलात्मक दृष्टिकोण से विशेष महत्त्व नहीं रखती हैं किन्तु मुग़ल स्थापत्य को प्रारम्भ करने का श्रेय बाबर को जाता है बाबर की तरह हुमायूं भी कला में रूचि रखता था किन्तु राजनीतिक आर्थिक कारणों से उसका जीवन भी संघर्ष पूर्ण रहा| हालांकि हुमायूं ने दिल्ली में दीनपनाह नगर की नीव रखी| दीनपनाह नगर में ही शेरशाह ने पुराने किले का निर्माण करवाया था, इसी परिसर में किला-ए-कुहना नामक मस्जिद तथा सासाराम में शेरशाह का मकबरा शेरशाह कालीन महत्वपूर्ण स्थापत्य है अकबर कालीन स्थापत्य अकबर के काल में आगरा, फतेहपुर सीकरी, लाहौर, इलाहाबाद आदि स्थलों पर बड़ी संख्या में इमारतों का निर्माण किया गया इन इमारतों के निर्माण में राजनीतिक-सामरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया जैसे अकबर ने विशाल किलों का निर्माण कराया जो सुरक्षा के साथ-साथ शासक के प्रभाव के विस्तार का माध्यम बना लाहौर एवं इलाहाबाद में किलों के निर्माण का एक मुख्य उद्देश्य यह भी था कि उत्तर पश्चिम एवं पूर्वी भारत से सम्बन्धित गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके अकबर के काल में निर्मित इमारतें विशालता या भव्यता के बावजूद बेडौल नहीं दिखाई देती हैं बल्कि इनमें प्रकृति के साथ एक सुंदर समन्वय बनाने का प्रयास दिखता है अकबर कालीन इमारतें अलग-अलग उद्देश्यों से समूहों में बनायी गयी हैं जैसे फतेहपुर सीकरी में दीवान-ए-आम सार्वजनिक उद्देश्य से बानाया गया था वहीँ पंचमहल का उद्देश्य व्यक्तिगत था, जामा मस्जिद एवं सलीम चिश्ती का मकबरा धार्मिक उद्देश्यों से निर्मित था अकबर कालीन स्थापत्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है हिन्द-इस्लामिक विशेषताओं का बड़े पैमाने पर समन्वय जैसे सीकरी के भवन समूहों को देखें तो स्पष्ट होता है की दीवान-ए-आम पर कान्हेरी की बौद्ध गुफाओं का प्रभाव, पंचमहल पर नालंदा महाविहार का प्रभाव एवं हिन्दू स्थापत्य का प्रभाव तथा आगरा के किले के जहांगीरी महल पर मोर एवं सर्प की आकृति जैसे हिन्दू प्रतीकों का प्रयोग दिखता है अकबर कालीन स्थापत्य के अलंकरण पर पारंपरिक विशेषताओं के साथ-साथ कुछ नवीनता के तत्व भी दिखाई देते हैं जैसे चारबाग शैली, पानी के फव्वारों का प्रयोग, दीवारों पर चित्रांकन आदि निर्माण सामग्री में लाल बलुए पत्थर का बहुतायत में प्रयोग किया गया है साथ ही हुमायूं एवं सलीम चिश्ती के मकबरे में संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है| उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि यद्यपि मुग़ल स्थापत्य का सर्वाधिक विकास शाहजहाँ के समय हुआ था किन्तु इसे अकबर द्वारा एक विशिष्ट स्तर प्रदान किया गया जिसने परवर्ती काल में स्थापत्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण आधारशिला के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी|
50,351
The nature of the Center-State Relationship in India is based on the notion of independence as well as mutual interdependency. Discuss this statement in light of cooperative federalism in India. (150 words/10 marks)
Approach: In Introduction give the meaning of Cooperative Federalism Mention the relation of independence in centre-state relation Also, discuss the relation of mutual independence Write an appropriate conclusion Answer: Federalism means the sharing of power between the centre and state and cooperative federalism is the extension of the concept of federalism where the Central and state work in close cooperation. The best example of cooperative federalism is the GST council, where there is the representation of both the centre and state and the decision is taken by the deliberation of representatives of the centre and state both. However, there are some situations when the Centre-State relationship is based on the basis of independence and also on the basis of mutual dependency. How is the relation based on independence 1. Legislative power: Under schedule 7 of the Constitution of India there is a clear demarcation of legislative powers of the Union and State under the Union List and State list in which the Centre and State can make the law respectively. 2. Executive power: The constitution clearly divides the executive powers of the Centre and State and has provisions to ensure that none can encroach into the other"s jurisdiction until under exceptional circumstances. 3. Territorial extent of centre and state is defined- The law made by the state are applicable to the territory of the state only while the law made by Union is having all of India. 4. Taxation Power: The Parliament and state legislature can levy taxes on two different subjects. 5. The International agreements are implemented by the central government and also the power to make extra-territorial i.e. those laws are mandatory for the States 6. Central service and State service: The Centre and state have their own service to serve the people of their jurisdiction. How the relationship is based on mutual dependency 1. Although schemes are formulated by the Centre government the final implementation of the scheme is possible with the help of the state government. 2. Centre"s direction to state- The centre can provide direction to the state on the matter of construction and maintenance of means of communication, protection of railway etc 3. Mutual Delegation of Function: Governor of the state may, with the consent of the Central government, can entrust any function of the state. 4. Interstate water dispute- Parliament can provide for the adjudication of the river water dispute. 5. Inter-State Council- Article 263 of the Constitution of India to investigate and discuss the subject of common interest between the Centre and the states. 6. The Parliament can appoint an appropriate authority to carry out the purposes of the constitutional provisions relating to interstate freedom of trade, commerce, and intercourse. Way Forward Though the Indian constitution in spirit ensures federalism, cooperation between the state and centre is still a work in progress. There could be some efforts to improve cooperative federalism, such as - 1. A mandatory meeting of the Inter-State Council and Zonal council on an annual basis. It would help in resolving the point of conflicts between the centre and the state. 2. Following the provisions of the constitution in both letter and spirit, i.e. rare use of Article 356 (president"s rule in the state) 3. NITI Aayog can play an important role in building the state"s capacity by providing the proper assessment to the state about their weak and potential areas. For example- A state like Orissa could develop the capacity to fight an annual cyclone, which causes huge economic and social loss. (NITI Aayog could help in developing a mitigation strategy) Both Center and State governments need to ensure an atmosphere of trust for the development of cooperative federalism in India. The Center should give more space for States to flourish as per their own policies and aid them in doing so.
##Question:The nature of the Center-State Relationship in India is based on the notion of independence as well as mutual interdependency. Discuss this statement in light of cooperative federalism in India. (150 words/10 marks)##Answer:Approach: In Introduction give the meaning of Cooperative Federalism Mention the relation of independence in centre-state relation Also, discuss the relation of mutual independence Write an appropriate conclusion Answer: Federalism means the sharing of power between the centre and state and cooperative federalism is the extension of the concept of federalism where the Central and state work in close cooperation. The best example of cooperative federalism is the GST council, where there is the representation of both the centre and state and the decision is taken by the deliberation of representatives of the centre and state both. However, there are some situations when the Centre-State relationship is based on the basis of independence and also on the basis of mutual dependency. How is the relation based on independence 1. Legislative power: Under schedule 7 of the Constitution of India there is a clear demarcation of legislative powers of the Union and State under the Union List and State list in which the Centre and State can make the law respectively. 2. Executive power: The constitution clearly divides the executive powers of the Centre and State and has provisions to ensure that none can encroach into the other"s jurisdiction until under exceptional circumstances. 3. Territorial extent of centre and state is defined- The law made by the state are applicable to the territory of the state only while the law made by Union is having all of India. 4. Taxation Power: The Parliament and state legislature can levy taxes on two different subjects. 5. The International agreements are implemented by the central government and also the power to make extra-territorial i.e. those laws are mandatory for the States 6. Central service and State service: The Centre and state have their own service to serve the people of their jurisdiction. How the relationship is based on mutual dependency 1. Although schemes are formulated by the Centre government the final implementation of the scheme is possible with the help of the state government. 2. Centre"s direction to state- The centre can provide direction to the state on the matter of construction and maintenance of means of communication, protection of railway etc 3. Mutual Delegation of Function: Governor of the state may, with the consent of the Central government, can entrust any function of the state. 4. Interstate water dispute- Parliament can provide for the adjudication of the river water dispute. 5. Inter-State Council- Article 263 of the Constitution of India to investigate and discuss the subject of common interest between the Centre and the states. 6. The Parliament can appoint an appropriate authority to carry out the purposes of the constitutional provisions relating to interstate freedom of trade, commerce, and intercourse. Way Forward Though the Indian constitution in spirit ensures federalism, cooperation between the state and centre is still a work in progress. There could be some efforts to improve cooperative federalism, such as - 1. A mandatory meeting of the Inter-State Council and Zonal council on an annual basis. It would help in resolving the point of conflicts between the centre and the state. 2. Following the provisions of the constitution in both letter and spirit, i.e. rare use of Article 356 (president"s rule in the state) 3. NITI Aayog can play an important role in building the state"s capacity by providing the proper assessment to the state about their weak and potential areas. For example- A state like Orissa could develop the capacity to fight an annual cyclone, which causes huge economic and social loss. (NITI Aayog could help in developing a mitigation strategy) Both Center and State governments need to ensure an atmosphere of trust for the development of cooperative federalism in India. The Center should give more space for States to flourish as per their own policies and aid them in doing so.
50,352
महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by oceanic salinity? Explain the factors affecting oceanic salinity. (150-200 words/10 अंक)
दृष्टिकोण 1. भूमिका मेंमहासागरीय लवणता को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: समुद्री जल में घुलित लवण की मात्रा को इसकी लवणता के रूप में परिभाषित किया जाता है| सागरीय जल के भार एवं इसमें घुले लवणीय पदार्थों के भार के अनुपात को महासागरीय लवणता के रूप में जाना जाता है|सोडि़यम क्लोराइड, मेग्नेशियम क्लोराइड, केल्शियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड तथा सोडि़यम सल्फेट आदि इसके मुख्य घटक हैं| महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक 1.महासागरों के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण एवं वर्षण पर निर्भर करती है| 2 . तटीय क्षेत्रों में जल की लवणता नदियों के द्वारा लाये गए ताजा जल तथा ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के जमने एवं पिघलने की क्रिया से सर्वाधिक प्रभावित होती है| 3. पवन जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर महासागरीय लवणता को प्रभावित करती है| 4. महासागरीय धाराएँ जल चक्रण के माध्यम से लवणता के पुनर्वितरण को निर्धारित करती हैं| 5. तापमान लवण की जल में घुलनशीलता को प्रभावित करलवणता के पुनर्वितरण को प्रभावित करता है| औसत समुद्री लवणता 35 PPT है एवं समुद्री लवणता का लगभग 80%सोडि़यम क्लोराइड द्वारा निर्धारित होता है| मध्य अक्षांशों में लवणता सर्वाधिक एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में यह सबसे कम होती है|
##Question:महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द/10 अंक) What do you understand by oceanic salinity? Explain the factors affecting oceanic salinity. (150-200 words/10 अंक)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका मेंमहासागरीय लवणता को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: समुद्री जल में घुलित लवण की मात्रा को इसकी लवणता के रूप में परिभाषित किया जाता है| सागरीय जल के भार एवं इसमें घुले लवणीय पदार्थों के भार के अनुपात को महासागरीय लवणता के रूप में जाना जाता है|सोडि़यम क्लोराइड, मेग्नेशियम क्लोराइड, केल्शियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड तथा सोडि़यम सल्फेट आदि इसके मुख्य घटक हैं| महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक 1.महासागरों के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण एवं वर्षण पर निर्भर करती है| 2 . तटीय क्षेत्रों में जल की लवणता नदियों के द्वारा लाये गए ताजा जल तथा ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के जमने एवं पिघलने की क्रिया से सर्वाधिक प्रभावित होती है| 3. पवन जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर महासागरीय लवणता को प्रभावित करती है| 4. महासागरीय धाराएँ जल चक्रण के माध्यम से लवणता के पुनर्वितरण को निर्धारित करती हैं| 5. तापमान लवण की जल में घुलनशीलता को प्रभावित करलवणता के पुनर्वितरण को प्रभावित करता है| औसत समुद्री लवणता 35 PPT है एवं समुद्री लवणता का लगभग 80%सोडि़यम क्लोराइड द्वारा निर्धारित होता है| मध्य अक्षांशों में लवणता सर्वाधिक एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में यह सबसे कम होती है|
50,354
महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by oceanic salinity? Explain the factors affecting oceanic salinity. (150-200 words; 10 Marks)
दृष्टिकोण 1. भूमिका मेंमहासागरीय लवणता को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: समुद्री जल में घुलित लवण की मात्रा को इसकी लवणता के रूप में परिभाषित किया जाता है| सागरीय जल के भार एवं इसमें घुले लवणीय पदार्थों के भार के अनुपात को महासागरीय लवणता के रूप में जाना जाता है|सोडि़यम क्लोराइड, मेग्नेशियम क्लोराइड, केल्शियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड तथा सोडि़यम सल्फेट आदि इसके मुख्य घटक हैं| महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक 1.महासागरों के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण एवं वर्षण पर निर्भर करती है| 2.तटीय क्षेत्रों में जल की लवणता नदियों के द्वारा लाये गएताजा जलतथा ध्रुवीय क्षेत्रों मेंबर्फ के जमने एवं पिघलने की क्रिया से सर्वाधिक प्रभावित होती है| 3. पवन जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर महासागरीय लवणता को प्रभावित करती है| 4. महासागरीय धाराएँ जल चक्रण के माध्यम से लवणता के पुनर्वितरण को निर्धारित करती हैं| 5. तापमान लवण की जल में घुलनशीलता को प्रभावित करलवणता के पुनर्वितरण को प्रभावित करता है| औसत समुद्री लवणता 35 PPT है एवं समुद्री लवणता का लगभग 80%सोडि़यम क्लोराइड द्वारा निर्धारित होता है| मध्य अक्षांशों में लवणता सर्वाधिक एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में यह सबसे कम होती है|
##Question:महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द; 10 अंक) What do you understand by oceanic salinity? Explain the factors affecting oceanic salinity. (150-200 words; 10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका मेंमहासागरीय लवणता को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारकों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: समुद्री जल में घुलित लवण की मात्रा को इसकी लवणता के रूप में परिभाषित किया जाता है| सागरीय जल के भार एवं इसमें घुले लवणीय पदार्थों के भार के अनुपात को महासागरीय लवणता के रूप में जाना जाता है|सोडि़यम क्लोराइड, मेग्नेशियम क्लोराइड, केल्शियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड तथा सोडि़यम सल्फेट आदि इसके मुख्य घटक हैं| महासागरीय लवणता को प्रभावित करने वाले कारक 1.महासागरों के जल की लवणता मुख्यतः वाष्पीकरण एवं वर्षण पर निर्भर करती है| 2.तटीय क्षेत्रों में जल की लवणता नदियों के द्वारा लाये गएताजा जलतथा ध्रुवीय क्षेत्रों मेंबर्फ के जमने एवं पिघलने की क्रिया से सर्वाधिक प्रभावित होती है| 3. पवन जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर महासागरीय लवणता को प्रभावित करती है| 4. महासागरीय धाराएँ जल चक्रण के माध्यम से लवणता के पुनर्वितरण को निर्धारित करती हैं| 5. तापमान लवण की जल में घुलनशीलता को प्रभावित करलवणता के पुनर्वितरण को प्रभावित करता है| औसत समुद्री लवणता 35 PPT है एवं समुद्री लवणता का लगभग 80%सोडि़यम क्लोराइड द्वारा निर्धारित होता है| मध्य अक्षांशों में लवणता सर्वाधिक एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में यह सबसे कम होती है|
50,357
महासागरीय जलधाराओं से आप क्या समझते हैं? महासागरीय जलधाराओंकी उत्पत्ति के कारणों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द) What do you understand by oceanic currents? Explain the reasons for the origin of oceanic currents. (150-200 words)
दृष्टिकोण 1. भूमिका में जलधाराओं को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: महासागरों के जल की बड़ी मात्रा के निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक प्रवाहित होती है जिन्हें महासागरीय जलधारा के रूप में जाना जाता है|जब धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं। जलधाराओं की उत्पत्ति के कारण: सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, जल के ताप और घनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा और पृथ्वी गतिशीलता आदि कारक जलधाराओं को जन्म देने में सहायक होते हैं। तापमान की भिन्नता: सागरीय जल के तापमान में क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर भिन्नता पाई जाती है| जल निम्न तापमान के कारण नीचे बैठ जाता है जिस कारण विषुवत रेखीय क्षेत्रों से जल ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बहने लगता है| उत्तरी एवं दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधाराएँ इसी प्रकार की हैं| लवणता की भिन्नता: लवणता की भिन्नता से सागरीय जल का घनत्व प्रभावित होती है| भिन्न घनत्व जल के प्रवाह को जन्म देती है| हिन्द महासागर में लाल सागर की ओर जल प्रवाह इसका उदाहरण है| प्रचलित पवनों का प्रभाव: प्रचलित पवनें वर्ष भर निश्चित दिशा में प्रवाहित होती हैं और ये अपने मार्ग में आने वाली जलराशि को पवन की दिशा में बहा ले जाती हैं जिससे जलराशि प्रवाहित होने लगती है| पछुआ पवन के प्रभाव में क्यूरोशिवो एवं गल्फ स्ट्रीम इसका उदाहरण हैं| वाष्पीकरण एवं वर्षा: वाष्पीकरण एवं वर्षा सागर के जलीय तल को प्रभावित करती है| उच्च वाष्पीकरण जलीय स्तर को कम जबकि उच्च वर्षा जलीय स्तर को बढ़ा देती है| ऐसी स्थिति में उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जल स्तर क्षेत्र की और जल का प्रवाह होता है| पृथ्वी की दैनिक गति: पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्तरी गोलार्ध्र में जलधाराएँक्लोकवाइज एवं दक्षिणी गोलार्ध में एंटी- क्लोकवाइज प्रवाहित होती हैं| महासागरीय धाराएँ समुद्री तटों के तापक्रम को प्रभावित करती हैं । जैसे गर्म पानी की धारा अपनी ऊष्मा के कारण ठण्डे समुद्री तटों के बर्फ को पिघलाकर उसमें जहाजों के आवागमन को सुगम बना देती हैं । साथ ही पानी के पिघलने के कारण वहाँ मछली पकड़ने की सुविधा मिल जाती है ।बड़ी महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की उष्मा को संतुलित बनाने में योगदान देती हैं ।
##Question:महासागरीय जलधाराओं से आप क्या समझते हैं? महासागरीय जलधाराओंकी उत्पत्ति के कारणों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द) What do you understand by oceanic currents? Explain the reasons for the origin of oceanic currents. (150-200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में जलधाराओं को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: महासागरों के जल की बड़ी मात्रा के निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक प्रवाहित होती है जिन्हें महासागरीय जलधारा के रूप में जाना जाता है|जब धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं। जलधाराओं की उत्पत्ति के कारण: सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, जल के ताप और घनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा और पृथ्वी गतिशीलता आदि कारक जलधाराओं को जन्म देने में सहायक होते हैं। तापमान की भिन्नता: सागरीय जल के तापमान में क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर भिन्नता पाई जाती है| जल निम्न तापमान के कारण नीचे बैठ जाता है जिस कारण विषुवत रेखीय क्षेत्रों से जल ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बहने लगता है| उत्तरी एवं दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधाराएँ इसी प्रकार की हैं| लवणता की भिन्नता: लवणता की भिन्नता से सागरीय जल का घनत्व प्रभावित होती है| भिन्न घनत्व जल के प्रवाह को जन्म देती है| हिन्द महासागर में लाल सागर की ओर जल प्रवाह इसका उदाहरण है| प्रचलित पवनों का प्रभाव: प्रचलित पवनें वर्ष भर निश्चित दिशा में प्रवाहित होती हैं और ये अपने मार्ग में आने वाली जलराशि को पवन की दिशा में बहा ले जाती हैं जिससे जलराशि प्रवाहित होने लगती है| पछुआ पवन के प्रभाव में क्यूरोशिवो एवं गल्फ स्ट्रीम इसका उदाहरण हैं| वाष्पीकरण एवं वर्षा: वाष्पीकरण एवं वर्षा सागर के जलीय तल को प्रभावित करती है| उच्च वाष्पीकरण जलीय स्तर को कम जबकि उच्च वर्षा जलीय स्तर को बढ़ा देती है| ऐसी स्थिति में उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जल स्तर क्षेत्र की और जल का प्रवाह होता है| पृथ्वी की दैनिक गति: पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्तरी गोलार्ध्र में जलधाराएँक्लोकवाइज एवं दक्षिणी गोलार्ध में एंटी- क्लोकवाइज प्रवाहित होती हैं| महासागरीय धाराएँ समुद्री तटों के तापक्रम को प्रभावित करती हैं । जैसे गर्म पानी की धारा अपनी ऊष्मा के कारण ठण्डे समुद्री तटों के बर्फ को पिघलाकर उसमें जहाजों के आवागमन को सुगम बना देती हैं । साथ ही पानी के पिघलने के कारण वहाँ मछली पकड़ने की सुविधा मिल जाती है ।बड़ी महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की उष्मा को संतुलित बनाने में योगदान देती हैं ।
50,363
महासागरीय जलधाराओं से आप क्या समझते हैं? महासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के कारणों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by oceanic currents? Explain the reasons for the origin of oceanic currents. (150-200 words, Marks-10 )
दृष्टिकोण 1. भूमिका में जलधाराओं को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: जब महासागरों के जल की बहुत बड़ी मात्रा एक निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक सामान्य गति से चलने लगती है, तो उसे महासागरीय धाराएँ कहते हैं । जब धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं। जलधाराओं की उत्पत्ति के कारण: सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, जल के ताप और घनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा और पृथ्वी गतिशीलता आदि कारक जलधाराओं को जन्म देने में सहायक होते हैं। तापमान की भिन्नता: सागरीय जल के तापमान में क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर भिन्नता पाई जाती है| जल निम्न तापमान के कारण नीचे बैठ जाता है जिस कारण विषुवत रेखीय क्षेत्रों से जल ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बहने लगता है| उत्तरी एवं दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधाराएँ इसी प्रकार की हैं| लवणता की भिन्नता: लवणता की भिन्नता से सागरीय जल का घनत्व प्रभावित होती है| भिन्न घनत्व जल के प्रवाह को जन्म देती है| हिन्द महासागर में लाल सागर की ओर जल प्रवाह इसका उदाहरण है| प्रचलित पवनों का प्रभाव: प्रचलित पवनें वर्ष भर निश्चित दिशा में प्रवाहित होती हैं और ये अपने मार्ग में आने वाली जलराशि को पवन की दिशा में बहा ले जाती हैं जिससे जलराशि प्रवाहित होने लगती है| पछुआ पवन के प्रभाव में क्यूरोशिवो एवं गल्फ स्ट्रीम इसका उदाहरण हैं| वाष्पीकरण एवं वर्षा: वाष्पीकरण एवं वर्षा सागर के जलीय तल को प्रभावित करती है| उच्च वाष्पीकरण जलीय स्तर को कम जबकि उच्च वर्षा जलीय स्तर को बढ़ा देती है| ऐसी स्थिति में उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जल स्तर क्षेत्र की और जल का प्रवाह होता है| पृथ्वी की दैनिक गति: पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्तरी गोलार्ध्र में जलधाराएँ क्लोकवाइज एवं दक्षिणी गोलार्ध में एंटी- क्लोकवाइज प्रवाहित होती हैं| महासागरीय धाराएँ समुद्री तटों के तापक्रम को प्रभावित करती हैं । जैसे गर्म पानी की धारा अपनी ऊष्मा के कारण ठण्डे समुद्री तटों के बर्फ को पिघलाकर उसमें जहाजों के आवागमन को सुगम बना देती हैं । साथ ही पानी के पिघलने के कारण वहाँ मछली पकड़ने की सुविधा मिल जाती है ।बड़ी महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की उष्मा को संतुलित बनाने में योगदान देती हैं ।
##Question:महासागरीय जलधाराओं से आप क्या समझते हैं? महासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के कारणों को स्पष्ट कीजिये|(150-200 शब्द, अंक-10 ) What do you understand by oceanic currents? Explain the reasons for the origin of oceanic currents. (150-200 words, Marks-10 )##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका में जलधाराओं को परिभाषित कीजिये| 2. उत्तर के मुख्य भाग मेंमहासागरीय जलधाराओं की उत्पत्ति के कारणों को सूचीबद्ध कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: जब महासागरों के जल की बहुत बड़ी मात्रा एक निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक सामान्य गति से चलने लगती है, तो उसे महासागरीय धाराएँ कहते हैं । जब धाराएँ सुनिश्चित दिशा में अत्यधिक वेग से चलती हैं तो इन्हें स्ट्रीम (streams) कहा जाता है। जबकि अनिश्चित स्वरूप एवं घीमी गति से बहने वाले सागर जल की चौड़ी धारा को प्रवाह (Drift) कहते हैं। जलधाराओं की उत्पत्ति के कारण: सागर का जल सदा गतिशील रहता है। सन्मार्गी पवनों का प्रवाह, जल के ताप और घनत्व में अन्तर, वर्षा की मात्रा और पृथ्वी गतिशीलता आदि कारक जलधाराओं को जन्म देने में सहायक होते हैं। तापमान की भिन्नता: सागरीय जल के तापमान में क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर भिन्नता पाई जाती है| जल निम्न तापमान के कारण नीचे बैठ जाता है जिस कारण विषुवत रेखीय क्षेत्रों से जल ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बहने लगता है| उत्तरी एवं दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधाराएँ इसी प्रकार की हैं| लवणता की भिन्नता: लवणता की भिन्नता से सागरीय जल का घनत्व प्रभावित होती है| भिन्न घनत्व जल के प्रवाह को जन्म देती है| हिन्द महासागर में लाल सागर की ओर जल प्रवाह इसका उदाहरण है| प्रचलित पवनों का प्रभाव: प्रचलित पवनें वर्ष भर निश्चित दिशा में प्रवाहित होती हैं और ये अपने मार्ग में आने वाली जलराशि को पवन की दिशा में बहा ले जाती हैं जिससे जलराशि प्रवाहित होने लगती है| पछुआ पवन के प्रभाव में क्यूरोशिवो एवं गल्फ स्ट्रीम इसका उदाहरण हैं| वाष्पीकरण एवं वर्षा: वाष्पीकरण एवं वर्षा सागर के जलीय तल को प्रभावित करती है| उच्च वाष्पीकरण जलीय स्तर को कम जबकि उच्च वर्षा जलीय स्तर को बढ़ा देती है| ऐसी स्थिति में उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जल स्तर क्षेत्र की और जल का प्रवाह होता है| पृथ्वी की दैनिक गति: पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्तरी गोलार्ध्र में जलधाराएँ क्लोकवाइज एवं दक्षिणी गोलार्ध में एंटी- क्लोकवाइज प्रवाहित होती हैं| महासागरीय धाराएँ समुद्री तटों के तापक्रम को प्रभावित करती हैं । जैसे गर्म पानी की धारा अपनी ऊष्मा के कारण ठण्डे समुद्री तटों के बर्फ को पिघलाकर उसमें जहाजों के आवागमन को सुगम बना देती हैं । साथ ही पानी के पिघलने के कारण वहाँ मछली पकड़ने की सुविधा मिल जाती है ।बड़ी महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की उष्मा को संतुलित बनाने में योगदान देती हैं ।
50,366
1935 अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा करते हुए, इस अधिनियम का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) While referring to the main provisions of the 1935 Act, critically examine the Act. (150-200 words/Marks-10)
Approach: भूमिका में 1935 अधिनियम की पृष्टभूमि की चर्चा कर सकते हैं। बिंदुवत 1935 अधिनियम के प्रावधानों को लिखिए। इस अधिनियम के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये। इसके दूरगामी प्रभावों की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर: भारत में ब्रिटिश द्वारा समय समय पर विभिन्न क़ानूनों के माध्यम से संवैधानिक विकास किया गया। 1773 के चार्टर से इसकी शुरुवात हुई। प्रमुख अधिनियमों में 1861 का भारत शासन अधिनियम, 1909 के मार्ले मिंटो सुधार, 1919 में मोंटेग्यु चेम्सफोर्ड सुधार हैं। इसका अगला चरण 1935 अधिनियम का है जो अब तक का सर्वाधिक विस्तृत अधिनियम था। 1935 अधिनियम के मुख्य प्रावधान: केन्द्रीय स्तर पर- ब्रिटेन में भारत परिषद को समाप्त किया गया। केंद्र स्तर पर द्वैध शासन की शुरुवात हुई अभी तक 1919 अधिनियम के तहत प्रान्तों में द्वैध शासन था। वायसराय को कई विषयों पर विवेकाधिकार प्रदान किया गया था। केन्द्रीय विधान मण्डल का संघात्मक ढांचे के आधार पर पुनर्गठन किया गया। ब्रिटिश प्रान्तों तथा देसी रियासतों को शामिल किए जाने की योजना को शामिल किया गया। केन्द्रीय विधानमंडल का गठन द्विसदनीय विधान मण्डल- राज्य परिषद, संघीय सभा के रूप में किया गया। तीन भागों में विषयों का बंटवारा- संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची किया गया। अवशिष्ट शक्तियाँ वायसराय के हाथों में केन्द्रित थी। संघीय न्यायालय सहित श्रेणीबद्ध न्यायिक ढांचे का प्रावधान किया गया। संघ लोक सेवा आयोग तथा प्रांतीय लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया। केन्द्रीय बैंक के गठन का प्रावधान किया गया। उड़ीसा एवं सिंध को अलग प्रांत का दर्जा दिया गया। बर्मा को भारत से अलग किया गया। प्रांतीय स्तर पर: प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार का गठन अर्थात प्रांतीय मंत्रिमंडल प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी प्रांतीय गवर्नर को सीधे क्राउन के प्रति उत्तरदायी बनाया गया गवर्नर के पास विवेकाधिकार प्रांतीय विधान सभा के लिए प्रत्यक्ष चुनाव अधिनियम का आलोचनात्मक परीक्षण अधिनियम के सकारात्मक पक्ष: पहली बार प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन की शुरुवात हुई। संघ सूची राज्य सूची व समवर्ती सूची के रूप में विषयों का बंटवारा न्यायिक ढांचे में सुधार लोक सेवा आयोगों का गठन केन्द्रीय बैंक का गठन जो आगे चलकर आरबीआई बना। अधिनियम की आलोचना: भारत में पूर्ण स्वराज के लिए आंदोलन लेकिन 1935 के अधिनियम में केन्द्रीय स्तर पर द्वैध शासन का प्रावधान वायसराय अभी भी ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी वायसराय एवं प्रांतीय गवर्नर को विवेकाधिकार संघीय विधानमंडल का भी इस प्रकार पुनर्गठन जिससे सरकार का महत्व बना रहे निर्वाचन के लिए अभी भी संपत्ति संबंधी योग्यताएँ पृथक निर्वाचन का प्रसार अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार-देसी रियासतों को राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध रखना प्रांतीय नेतृत्व व केन्द्रीय नेतृत्व में फूट पैदा करना 1935 अधिनियम यद्यपि केन्द्रीय स्तर पर लागू नहीं हो पाया और भारत की स्वतन्त्रता तक देश का शासन 1919 अधिनियम के अनुसार ही चलाया गया। यह अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा। भारतीय संविधान के सर्वाधिक प्रावधान इसी अधिनियम से लिए गए हैं।
##Question:1935 अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा करते हुए, इस अधिनियम का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) While referring to the main provisions of the 1935 Act, critically examine the Act. (150-200 words/Marks-10)##Answer:Approach: भूमिका में 1935 अधिनियम की पृष्टभूमि की चर्चा कर सकते हैं। बिंदुवत 1935 अधिनियम के प्रावधानों को लिखिए। इस अधिनियम के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये। इसके दूरगामी प्रभावों की चर्चा करते हुए निष्कर्ष लिख सकते हैं। उत्तर: भारत में ब्रिटिश द्वारा समय समय पर विभिन्न क़ानूनों के माध्यम से संवैधानिक विकास किया गया। 1773 के चार्टर से इसकी शुरुवात हुई। प्रमुख अधिनियमों में 1861 का भारत शासन अधिनियम, 1909 के मार्ले मिंटो सुधार, 1919 में मोंटेग्यु चेम्सफोर्ड सुधार हैं। इसका अगला चरण 1935 अधिनियम का है जो अब तक का सर्वाधिक विस्तृत अधिनियम था। 1935 अधिनियम के मुख्य प्रावधान: केन्द्रीय स्तर पर- ब्रिटेन में भारत परिषद को समाप्त किया गया। केंद्र स्तर पर द्वैध शासन की शुरुवात हुई अभी तक 1919 अधिनियम के तहत प्रान्तों में द्वैध शासन था। वायसराय को कई विषयों पर विवेकाधिकार प्रदान किया गया था। केन्द्रीय विधान मण्डल का संघात्मक ढांचे के आधार पर पुनर्गठन किया गया। ब्रिटिश प्रान्तों तथा देसी रियासतों को शामिल किए जाने की योजना को शामिल किया गया। केन्द्रीय विधानमंडल का गठन द्विसदनीय विधान मण्डल- राज्य परिषद, संघीय सभा के रूप में किया गया। तीन भागों में विषयों का बंटवारा- संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची किया गया। अवशिष्ट शक्तियाँ वायसराय के हाथों में केन्द्रित थी। संघीय न्यायालय सहित श्रेणीबद्ध न्यायिक ढांचे का प्रावधान किया गया। संघ लोक सेवा आयोग तथा प्रांतीय लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया। केन्द्रीय बैंक के गठन का प्रावधान किया गया। उड़ीसा एवं सिंध को अलग प्रांत का दर्जा दिया गया। बर्मा को भारत से अलग किया गया। प्रांतीय स्तर पर: प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार का गठन अर्थात प्रांतीय मंत्रिमंडल प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी प्रांतीय गवर्नर को सीधे क्राउन के प्रति उत्तरदायी बनाया गया गवर्नर के पास विवेकाधिकार प्रांतीय विधान सभा के लिए प्रत्यक्ष चुनाव अधिनियम का आलोचनात्मक परीक्षण अधिनियम के सकारात्मक पक्ष: पहली बार प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन की शुरुवात हुई। संघ सूची राज्य सूची व समवर्ती सूची के रूप में विषयों का बंटवारा न्यायिक ढांचे में सुधार लोक सेवा आयोगों का गठन केन्द्रीय बैंक का गठन जो आगे चलकर आरबीआई बना। अधिनियम की आलोचना: भारत में पूर्ण स्वराज के लिए आंदोलन लेकिन 1935 के अधिनियम में केन्द्रीय स्तर पर द्वैध शासन का प्रावधान वायसराय अभी भी ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी वायसराय एवं प्रांतीय गवर्नर को विवेकाधिकार संघीय विधानमंडल का भी इस प्रकार पुनर्गठन जिससे सरकार का महत्व बना रहे निर्वाचन के लिए अभी भी संपत्ति संबंधी योग्यताएँ पृथक निर्वाचन का प्रसार अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार-देसी रियासतों को राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध रखना प्रांतीय नेतृत्व व केन्द्रीय नेतृत्व में फूट पैदा करना 1935 अधिनियम यद्यपि केन्द्रीय स्तर पर लागू नहीं हो पाया और भारत की स्वतन्त्रता तक देश का शासन 1919 अधिनियम के अनुसार ही चलाया गया। यह अधिनियम भारत के संवैधानिक विकास की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा। भारतीय संविधान के सर्वाधिक प्रावधान इसी अधिनियम से लिए गए हैं।
50,373
What do you understand by weathering process? Differentiate between chemical and physical weathering. (150 Words/10 marks)
Approach: 1. We can start with a brief description of weathering, and mention some types of weathering. 2. We can make a table to show the differences between Mechanical and Chemical weathering. 3. We can also add diagrams to show Mechanical and Chemical weathering. 4. We can then conclude as per the points covered. Answer - Weathering is the gradual destruction of rock under surface conditions, dissolving it, wearing it away, or breaking it down into progressively smaller pieces. Rock material, Structure of the rock, Slope or Aspect, Temperature, water, and organisms are some factors that effects weathering. There are mainly 3 types of weathering - 1. Mechanical weathering 2. Chemical weathering 3. Biological weathering Mechanical weathering Chemical weathering · It is the breaking down of rocks through physical forces. · The resultant product is chemically the same as the original. · It is mainly caused by the differential heating and cooling faced by the rocks and repeated striking actions of the weathering agents. · The kinetic energy exerted through moving water, wind, glaciers, etc are the agents of mechanical weathering. · Various types of mechanical weathering are – Exfoliation- Layers of the rock get peeled one after another. · Ice Wedging- Rocks that experience temperatures above and below freezing in day and night build up stresses that gradually disintegrate the rocks. Salt wedging- When saltwater seeps into rocks and then evaporates on a hot sunny day, the leftover salt crystals grow within cracks in the rock and exert force · It is the decomposition of rocks through chemical actions. · The resultant product is different from the original. · It is caused by the chemical actions of various acids, bases, and salts, as per the climatic conditions and rock composition. · Oxygen, Carbon dioxide, and Hydrogen are the main agents. · Various types of chemical weathering are · Oxidation- Oxidation is the reaction of a substance with oxygen that might produce oxides which are more susceptible to erosion like Iron Oxide (rust). · Carbonation- It is the process of formation of carbonic acid when carbon dioxide reacts with water to erode certain rocks like limestones. · Solution- The process by which certain minerals are dissolved by acidic solutions, as we see in sulphur and carbon-based rocks. Hydration- It sees the change in the chemical bonds of the minerals as it interacts with water. Differential types and rates of weathering depend upon various factors elaborated above, and they further determine the geological and economical features of any region.
##Question:What do you understand by weathering process? Differentiate between chemical and physical weathering. (150 Words/10 marks)##Answer:Approach: 1. We can start with a brief description of weathering, and mention some types of weathering. 2. We can make a table to show the differences between Mechanical and Chemical weathering. 3. We can also add diagrams to show Mechanical and Chemical weathering. 4. We can then conclude as per the points covered. Answer - Weathering is the gradual destruction of rock under surface conditions, dissolving it, wearing it away, or breaking it down into progressively smaller pieces. Rock material, Structure of the rock, Slope or Aspect, Temperature, water, and organisms are some factors that effects weathering. There are mainly 3 types of weathering - 1. Mechanical weathering 2. Chemical weathering 3. Biological weathering Mechanical weathering Chemical weathering · It is the breaking down of rocks through physical forces. · The resultant product is chemically the same as the original. · It is mainly caused by the differential heating and cooling faced by the rocks and repeated striking actions of the weathering agents. · The kinetic energy exerted through moving water, wind, glaciers, etc are the agents of mechanical weathering. · Various types of mechanical weathering are – Exfoliation- Layers of the rock get peeled one after another. · Ice Wedging- Rocks that experience temperatures above and below freezing in day and night build up stresses that gradually disintegrate the rocks. Salt wedging- When saltwater seeps into rocks and then evaporates on a hot sunny day, the leftover salt crystals grow within cracks in the rock and exert force · It is the decomposition of rocks through chemical actions. · The resultant product is different from the original. · It is caused by the chemical actions of various acids, bases, and salts, as per the climatic conditions and rock composition. · Oxygen, Carbon dioxide, and Hydrogen are the main agents. · Various types of chemical weathering are · Oxidation- Oxidation is the reaction of a substance with oxygen that might produce oxides which are more susceptible to erosion like Iron Oxide (rust). · Carbonation- It is the process of formation of carbonic acid when carbon dioxide reacts with water to erode certain rocks like limestones. · Solution- The process by which certain minerals are dissolved by acidic solutions, as we see in sulphur and carbon-based rocks. Hydration- It sees the change in the chemical bonds of the minerals as it interacts with water. Differential types and rates of weathering depend upon various factors elaborated above, and they further determine the geological and economical features of any region.
50,378
To what extent affirmative actions led to annihilation of caste system in India. Discuss. (150 words)
Approach:- In the introduction briefly define the affirmative actions Bring out the evidence which shows that the affirmative actions proved/failed to be the panacea for caste annihilation. Bring out the debate over the affirmative actions. Conclude the answer by presenting the Affirmative action plus approach. Answer: Affirmative action (AA) is a policy in which an individual"s color, race, sex, religion or national origin are taken into account to increase opportunities provided to an underrepresented part of society.In the polarised debate around AA, it is either demonized as the root of all evil or valorized as the panacea for eliminating discrimination. It is worth noting at the outset that Dr. B. R. Ambedkar, the chief architect of the constitution of independent India, who ensured that AA was constitutionally mandated, himself did not see AA as a panacea. He did not believe that the caste system could be made less malignant. The Case for Caste-based Affirmative Action in India: Systematic inter-caste disparities:- Data from a variety of sources on material standards of living, poverty rates, health status, educational attainment, and occupational outcomes indicate that the disparities between SC-ST on the one hand and non-OBC Others (a loose proxy for upper castes) are persistent and systematic, regional variation notwithstanding. Social Discrimination:- There is sufficient evidence that amply demonstrates the various aspects of stigmatization, exclusion, and rejection that Dalits continue to face in contemporary India.In rural India, despite the breakdown of the traditional subsistence economy, caste continues to exert its strong presence in many different dimensions,untouchability is not only present all over rural India, but it has “survived by adapting to new socioeconomic realities and taking on new and insidious forms”. Economic Discrimination:- Discrimination on the grounds of the wages, quality of education, access to resources had created a substantial gap between the SCs and others. The evidence on the persistence of caste-based economic discrimination in rural areas is perhaps not as surprising as the evidence from urban areas, especially in the modern, formal sector jobs. In rural areas, individuals are more easily identified by their caste status and presumably are more inclined to pursue caste-based occupations given the correspondingly lower spread of the modern, formal economy. Caste is supposed to be anonymous in urban settings; identification of caste is difficult since it is not phenotypically ascriptive. Additionally, urban markets are supposed to respond to “merit” and so even if hypothetically, caste could be identified, it should not matter. Implementation of quotas in higher education:- Some of the stats show that the AA has not been significantly proved to be the solution for caste annihilation as is evident from The All India Survey on Higher Education (AISHE) study which states that of the total enrollments in 2016-17, 14.3% belonged to Scheduled Castes, 5.2% to Scheduled Tribes and 34.4% to Other Backward Classes — up from 12.8%, 4.4% and 31.2% in 2012-13, respectively. The General Category students accounted for 46.1%, down from 51.6% in 2012-13. Overall, student enrollment went up by 18.3% for the academic season of 2016-17.The Scheduled Castes showed a GER increase to 21.1% from 19.9% in 2015-16, while the Scheduled Tribes recorded 15.4% GER, up from 14.2% in 2015-16 shows that lower castes’ have high drop-out rates. Political Reservations:- 84 and 47 number of seats are reserved for the SC and ST candidates in the Lok Sabha. Though only reserved category of candidates is allowed to contest from these seats, all eligible voters have the right to vote. SC/ST candidates are, however, eligible to contest from any seat across the country. The general seats won by the SC and ST candidate is nill in the 17th Lok Sabha elections this suggests that if reservations had not been in existence, the probability that these groups would have the representation they currently have would be very low. If the presence of SC-ST legislators and MPs is taken as a measure of political clout, then there is no evidence of an increase in their political clout. Reservations in local bodies have increased substantially the SC-ST presence in lower levels of governance, often going beyond the mandated reservations. For instance, in Orissa, Chhatisgarh, Madhya Pradesh and Rajasthan, SCs/STs have between 30 and 40 percent representation at the gram panchayat (village council) level. Debates over Affirmative Action Quotas are seen widely as unfair and are condemned for punishing innocent upper castes for the damage done in the past. Critics argue that reservations replace one form of discrimination (against Dalits) with another, equally pernicious form (against general category students or workers). There is a view, especially among the upper castes, that they are benefiting a generation whose parents have already moved up in the social structure and have been able to give them benefits denied to other, much poorer and more remote young people. There is also a belief that unqualified students are displacing highly qualified students in the race to the top of the educational 11 heaps. Many who share this view argue strenuously that the application of reservations will destroy the competitiveness of the Indian economy and drive away foreign investors because of the privileges insured by reservation. Hence they fuse personal exclusion with a national downfall in the making. Broadly speaking, Dalits find these perspectives unconvincing. They instead argue that the most powerful special privileges actually accrue to high caste Hindus who can tap into exclusive social networks, bank on the cultural capital their families bequeath to them, or pay the bribes that are demanded by employers for access to jobs. Dalits from remote areas see themselves as doubly disadvantaged, by caste bias and by poverty. They struggle out of rural areas burdened by social isolation, ill-equipped in terms of cultural capital to navigate an urban megalopolis like Delhi, lacking social networks that more privileged castes rely on. For Dalit students, the reservations policy is nothing more than a form of social engineering designed to address centuries of oppression and discrimination, extreme inequities in the distribution of educational opportunity, and the formation of a huge class of Indian citizens who are not equipped to compete without this assistance. As long as this injustice persists, they argue, reservations will be needed. The policy levels the playing field at the vital choke points of social mobility. Conclusion:- In order to increase its efficacy, AA has to be less mechanical: provision of quotas should be seen as the beginning of AA, not its end, as is the current practice. A big problem with the existing nature of implementation is that there is no monitoring, and there are no penalties for evading AA. Thus, the mere announcement of quotas is seen as sufficient, and very little attention is paid to outcomes.There have to be supplementary measures that need to be mandatorily incorporated: remedial teaching, counseling and other measures to lower the incidence of drop-outs; skill-enhancing programs and so forth.The important thing to note is that the existing AA program and these supplementary measures need not be considered mutually exclusive. They can strengthen and reinforce each other. Admittedly, all these measures have costs, but the benefits of integrating large sections of nearly 160 million Dalits and unleashing the suppressed reservoir of talent is the need of the hour.
##Question:To what extent affirmative actions led to annihilation of caste system in India. Discuss. (150 words)##Answer:Approach:- In the introduction briefly define the affirmative actions Bring out the evidence which shows that the affirmative actions proved/failed to be the panacea for caste annihilation. Bring out the debate over the affirmative actions. Conclude the answer by presenting the Affirmative action plus approach. Answer: Affirmative action (AA) is a policy in which an individual"s color, race, sex, religion or national origin are taken into account to increase opportunities provided to an underrepresented part of society.In the polarised debate around AA, it is either demonized as the root of all evil or valorized as the panacea for eliminating discrimination. It is worth noting at the outset that Dr. B. R. Ambedkar, the chief architect of the constitution of independent India, who ensured that AA was constitutionally mandated, himself did not see AA as a panacea. He did not believe that the caste system could be made less malignant. The Case for Caste-based Affirmative Action in India: Systematic inter-caste disparities:- Data from a variety of sources on material standards of living, poverty rates, health status, educational attainment, and occupational outcomes indicate that the disparities between SC-ST on the one hand and non-OBC Others (a loose proxy for upper castes) are persistent and systematic, regional variation notwithstanding. Social Discrimination:- There is sufficient evidence that amply demonstrates the various aspects of stigmatization, exclusion, and rejection that Dalits continue to face in contemporary India.In rural India, despite the breakdown of the traditional subsistence economy, caste continues to exert its strong presence in many different dimensions,untouchability is not only present all over rural India, but it has “survived by adapting to new socioeconomic realities and taking on new and insidious forms”. Economic Discrimination:- Discrimination on the grounds of the wages, quality of education, access to resources had created a substantial gap between the SCs and others. The evidence on the persistence of caste-based economic discrimination in rural areas is perhaps not as surprising as the evidence from urban areas, especially in the modern, formal sector jobs. In rural areas, individuals are more easily identified by their caste status and presumably are more inclined to pursue caste-based occupations given the correspondingly lower spread of the modern, formal economy. Caste is supposed to be anonymous in urban settings; identification of caste is difficult since it is not phenotypically ascriptive. Additionally, urban markets are supposed to respond to “merit” and so even if hypothetically, caste could be identified, it should not matter. Implementation of quotas in higher education:- Some of the stats show that the AA has not been significantly proved to be the solution for caste annihilation as is evident from The All India Survey on Higher Education (AISHE) study which states that of the total enrollments in 2016-17, 14.3% belonged to Scheduled Castes, 5.2% to Scheduled Tribes and 34.4% to Other Backward Classes — up from 12.8%, 4.4% and 31.2% in 2012-13, respectively. The General Category students accounted for 46.1%, down from 51.6% in 2012-13. Overall, student enrollment went up by 18.3% for the academic season of 2016-17.The Scheduled Castes showed a GER increase to 21.1% from 19.9% in 2015-16, while the Scheduled Tribes recorded 15.4% GER, up from 14.2% in 2015-16 shows that lower castes’ have high drop-out rates. Political Reservations:- 84 and 47 number of seats are reserved for the SC and ST candidates in the Lok Sabha. Though only reserved category of candidates is allowed to contest from these seats, all eligible voters have the right to vote. SC/ST candidates are, however, eligible to contest from any seat across the country. The general seats won by the SC and ST candidate is nill in the 17th Lok Sabha elections this suggests that if reservations had not been in existence, the probability that these groups would have the representation they currently have would be very low. If the presence of SC-ST legislators and MPs is taken as a measure of political clout, then there is no evidence of an increase in their political clout. Reservations in local bodies have increased substantially the SC-ST presence in lower levels of governance, often going beyond the mandated reservations. For instance, in Orissa, Chhatisgarh, Madhya Pradesh and Rajasthan, SCs/STs have between 30 and 40 percent representation at the gram panchayat (village council) level. Debates over Affirmative Action Quotas are seen widely as unfair and are condemned for punishing innocent upper castes for the damage done in the past. Critics argue that reservations replace one form of discrimination (against Dalits) with another, equally pernicious form (against general category students or workers). There is a view, especially among the upper castes, that they are benefiting a generation whose parents have already moved up in the social structure and have been able to give them benefits denied to other, much poorer and more remote young people. There is also a belief that unqualified students are displacing highly qualified students in the race to the top of the educational 11 heaps. Many who share this view argue strenuously that the application of reservations will destroy the competitiveness of the Indian economy and drive away foreign investors because of the privileges insured by reservation. Hence they fuse personal exclusion with a national downfall in the making. Broadly speaking, Dalits find these perspectives unconvincing. They instead argue that the most powerful special privileges actually accrue to high caste Hindus who can tap into exclusive social networks, bank on the cultural capital their families bequeath to them, or pay the bribes that are demanded by employers for access to jobs. Dalits from remote areas see themselves as doubly disadvantaged, by caste bias and by poverty. They struggle out of rural areas burdened by social isolation, ill-equipped in terms of cultural capital to navigate an urban megalopolis like Delhi, lacking social networks that more privileged castes rely on. For Dalit students, the reservations policy is nothing more than a form of social engineering designed to address centuries of oppression and discrimination, extreme inequities in the distribution of educational opportunity, and the formation of a huge class of Indian citizens who are not equipped to compete without this assistance. As long as this injustice persists, they argue, reservations will be needed. The policy levels the playing field at the vital choke points of social mobility. Conclusion:- In order to increase its efficacy, AA has to be less mechanical: provision of quotas should be seen as the beginning of AA, not its end, as is the current practice. A big problem with the existing nature of implementation is that there is no monitoring, and there are no penalties for evading AA. Thus, the mere announcement of quotas is seen as sufficient, and very little attention is paid to outcomes.There have to be supplementary measures that need to be mandatorily incorporated: remedial teaching, counseling and other measures to lower the incidence of drop-outs; skill-enhancing programs and so forth.The important thing to note is that the existing AA program and these supplementary measures need not be considered mutually exclusive. They can strengthen and reinforce each other. Admittedly, all these measures have costs, but the benefits of integrating large sections of nearly 160 million Dalits and unleashing the suppressed reservoir of talent is the need of the hour.
50,385
What do you mean by Igneous rocks? Also, explain different types of Igneous rocks.(150 words/10 marks)
Approach: The question has three components, first one is asking to define "igneous rocks" . From today"s class, the students can easily define Igneous Rocks, formation, etc. as the cooling of magma on the earth’s surface, interior, etc. Further, explain the division of the rocks into two types: Intrusive and Extrusive . Answer: Igneous Rocks: When the magma cools on the earth’s surface, it forms rocks known as igneous rocks. Cooling, and crystallization of molten material of earth results in the igneous rocks, or the primary rocks. There are two types of igneous rocks: intrusive and extrusive. Magma = molten rock below ground. Lava = molten rock above the ground. Intrusive igneous rocks : They are formed when magma cools below the surface of the Earth. E.g. Granite, Gabbro, etc. Magma under the surface cools down gradually, slowly. Rocks formed are stronger, and less glossy in appearance. Intrusive igneous rocks are also known as plutonic rocks. Since they cool down slowly they form large grains. Granite is an example of such a rock. Grinding stones used to prepare paste/powder of spices and grains are made of granite. Extrusive igneous rocks: They are formed when magma reaches out on the surface it is also called "lava". E.g.: Basalt, andesite, etc. Lava (Magma exposed) on the surface of the earth will experience rapid cooling. Results in shiny rocks, low in strength. Extrusive igneous rocks are also known as volcanic rocks. They have a very fine-grained structure. For example, basalt. The Deccan plateau is made up of basalt rocks. Igneous rocks being the primary form of rocks, form the framework for the earth’s crust. Igneous rocks have a wide variety of uses. One important use is as a stone for buildings and statues. Diorite was used extensively by ancient civilizations for vases and other decorative artwork and is still used for art today, other usages include road construction and building materials.
##Question:What do you mean by Igneous rocks? Also, explain different types of Igneous rocks.(150 words/10 marks)##Answer:Approach: The question has three components, first one is asking to define "igneous rocks" . From today"s class, the students can easily define Igneous Rocks, formation, etc. as the cooling of magma on the earth’s surface, interior, etc. Further, explain the division of the rocks into two types: Intrusive and Extrusive . Answer: Igneous Rocks: When the magma cools on the earth’s surface, it forms rocks known as igneous rocks. Cooling, and crystallization of molten material of earth results in the igneous rocks, or the primary rocks. There are two types of igneous rocks: intrusive and extrusive. Magma = molten rock below ground. Lava = molten rock above the ground. Intrusive igneous rocks : They are formed when magma cools below the surface of the Earth. E.g. Granite, Gabbro, etc. Magma under the surface cools down gradually, slowly. Rocks formed are stronger, and less glossy in appearance. Intrusive igneous rocks are also known as plutonic rocks. Since they cool down slowly they form large grains. Granite is an example of such a rock. Grinding stones used to prepare paste/powder of spices and grains are made of granite. Extrusive igneous rocks: They are formed when magma reaches out on the surface it is also called "lava". E.g.: Basalt, andesite, etc. Lava (Magma exposed) on the surface of the earth will experience rapid cooling. Results in shiny rocks, low in strength. Extrusive igneous rocks are also known as volcanic rocks. They have a very fine-grained structure. For example, basalt. The Deccan plateau is made up of basalt rocks. Igneous rocks being the primary form of rocks, form the framework for the earth’s crust. Igneous rocks have a wide variety of uses. One important use is as a stone for buildings and statues. Diorite was used extensively by ancient civilizations for vases and other decorative artwork and is still used for art today, other usages include road construction and building materials.
50,394
भारत में उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए इसका प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explain the origin of the vast plain of the north in India and present its regional division. (150-200 words, Marks-10 )
Approach : भूमिका में भारत के भूभौतिक स्वरूप पर चर्चा कर सकते हैं। भारत के प्रादेशिक विभाजन की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति संबंधी विभिन्न विचारों की चर्चा कीजिए। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। उत्तर -भारत भूभौतिक भिन्नताओं वाला देश है। यहाँ पर्याप्त उच्चावचीय विविधता पायी जाती है। पर्वत, मैदान, मरुस्थल, पठार तथा द्वीप भारतीय महाद्वीप की विशेषताएँ है। भारत को भूभौतिक रूप से निम्न भागों में बांटा गया है- उत्तरी पर्वर्तीय क्षेत्र उत्तर का विशाल मैदान प्रायद्वीपीय पठार तटीय मैदान द्वीप समूह उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति- भारत का उत्तर का विशाल मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा निर्मित मैदान है। मूलत: यह एक भूअवनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वत निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में हुआ था। यह उत्तर में हिमालय और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से निकालने वाली नदियों के तलछट जमाव से निर्मित एक समतल मैदान है। कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि विशालकाय मैदान टेथीस सागर का ही अवशेष है। शिवालिक भू हलचल के बाद टेथिस सागर के शेष भाग एक बड़े गर्त के रूप में बच गए थे । इस अवधि मे हिमालय पर्वत में उत्थान जारी था जिस कारण नदियों में नवोन्मेष कि घटना हुई एवं बड़ी मात्रा में अपारदित चट्टानी पदार्थों द्वारा इस गर्त में तलछट कि मोटी परत का निक्षेपण हुआ। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन- उत्तर भारत के मैदान को भू-जलवायु तथा भू-आकृतिक विशेषताओं के आधार पर चार वृहत प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है- राजस्थान का मैदान पंजाब- हरियाणा का मैदान गंगा का मैदान ब्रह्मपुत्र का मैदान राजस्थान का मैदान यह मैदान मुख्य रूप से अरावली के पश्चिम में स्थित है। इस मैदान के बड़े भाग का निर्माण समुद्र के पीछे हटने से हुआ है। जिसका प्रमाण जयपुर के निकट खारे पानी के सांभर झील का पाया जाना है। इस मैदान में सरस्वती जैसी नदियों के कई सूखे तल मिलते हैं जिससे संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र पहले उपजाउ था। वर्तमान समय में इस मैदान का बड़ा हिस्सा मरुस्थल है जो बालुका स्तूपों और बरखान से ढाका हुआ है। इन्दिरा गांधी नहर के निर्माण ने राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग में गहन कृषि को प्रोत्साहित किया है। पंजाब- हरियाणा का मैदान इस मैदान का सबसे विशिष्ट लक्षण पाँच दोआब है। इस स्थल के निर्माण में सिंधु, चिनाब, सतलुज, रावी, व्यास द्वारा सम्पन्न निक्षेपात्मक कार्य प्रमुख है। यह मैदान गंगा के मैदान से दिल्ली कटक से अलग होता है। उत्तरी भाग में यह 300 मी. ऊंचा है जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग में इसकी ऊंचाई 200 मी. तक रह जाती है। मैदान का सामान्य ढाल उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और दक्षिण में है। गंगा का मैदान- गंगा का मैदान पश्चिम में यमुना नदी के अफवाह और पूर्व में बांग्लादेश सीमा के मध्य स्थित है। इसे तीन भागों में बांटा गया है। 1. ऊपरी गंगा का मैदान-इसके अंतर्गत गंगा-यमुना दोआब, रोहिलखंड संभाग और आग्रा संभाग का भाग सम्मिलित है। इस क्षेत्र में प्रवाहित अन्य नदियों काली और शारदा है। यह भारत के सर्वाधिक उपजाऊ मैदानों में से एक है जो हरित क्रांति प्रदेश भी है। यहाँ उपजाई जाने वाली मुख्य फसल गन्ना, गेहूं, चावल, मक्का, सरसों आदि है। 2. मध्य गंगा का मैदान-यह मैदान उत्तर प्रदेश के मध्य व पूर्वी भाग तथा बिहार में मुजफ्फरपुर और पटना तक विस्तृत है। प्रमुख नदियां कोसी, सन, गंडक है। 3. निम्न गंगा का मैदान- इसका विस्तार पटना से बंगाल की खाड़ी तक है। यह मैदान तीस्ता, संकोश, महानंदा, दामोदर, सुबर्णरेखा नदियों द्वारा भी अपवाहित है। ब्रह्मपुत्र का मैदान- यह विशाल मैदान का सबसे पूर्वोत्तर भाग है। पश्चिमी भाग को छोड़कर सम्पूर्ण मैदान ऊंची पहाड़ियों से घिरा है। उत्तरी किनारे पर असम घाटी कि मुख्य विशेषता खड़ी ढाल का होना है। इस क्षेत्र में अवस्थित माजुली विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप और जिला है। हिमालय से निकलने वाली सहायक नदियां जलोढ़ पंख की श्रंखला बनती है। यहाँ उपजाऊ घाटी और जुट के खेती के अनुकुल है। मैदान का यह भाग अपने चाय बगानों और दो नेशनल पार्कों काजीरंगा तथा मानस के लिए प्रसिद्ध है।
##Question:भारत में उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए इसका प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। (150-200 शब्द, अंक-10 ) Explain the origin of the vast plain of the north in India and present its regional division. (150-200 words, Marks-10 )##Answer:Approach : भूमिका में भारत के भूभौतिक स्वरूप पर चर्चा कर सकते हैं। भारत के प्रादेशिक विभाजन की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति संबंधी विभिन्न विचारों की चर्चा कीजिए। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। उत्तर -भारत भूभौतिक भिन्नताओं वाला देश है। यहाँ पर्याप्त उच्चावचीय विविधता पायी जाती है। पर्वत, मैदान, मरुस्थल, पठार तथा द्वीप भारतीय महाद्वीप की विशेषताएँ है। भारत को भूभौतिक रूप से निम्न भागों में बांटा गया है- उत्तरी पर्वर्तीय क्षेत्र उत्तर का विशाल मैदान प्रायद्वीपीय पठार तटीय मैदान द्वीप समूह उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति- भारत का उत्तर का विशाल मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा निर्मित मैदान है। मूलत: यह एक भूअवनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वत निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में हुआ था। यह उत्तर में हिमालय और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से निकालने वाली नदियों के तलछट जमाव से निर्मित एक समतल मैदान है। कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि विशालकाय मैदान टेथीस सागर का ही अवशेष है। शिवालिक भू हलचल के बाद टेथिस सागर के शेष भाग एक बड़े गर्त के रूप में बच गए थे । इस अवधि मे हिमालय पर्वत में उत्थान जारी था जिस कारण नदियों में नवोन्मेष कि घटना हुई एवं बड़ी मात्रा में अपारदित चट्टानी पदार्थों द्वारा इस गर्त में तलछट कि मोटी परत का निक्षेपण हुआ। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन- उत्तर भारत के मैदान को भू-जलवायु तथा भू-आकृतिक विशेषताओं के आधार पर चार वृहत प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है- राजस्थान का मैदान पंजाब- हरियाणा का मैदान गंगा का मैदान ब्रह्मपुत्र का मैदान राजस्थान का मैदान यह मैदान मुख्य रूप से अरावली के पश्चिम में स्थित है। इस मैदान के बड़े भाग का निर्माण समुद्र के पीछे हटने से हुआ है। जिसका प्रमाण जयपुर के निकट खारे पानी के सांभर झील का पाया जाना है। इस मैदान में सरस्वती जैसी नदियों के कई सूखे तल मिलते हैं जिससे संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र पहले उपजाउ था। वर्तमान समय में इस मैदान का बड़ा हिस्सा मरुस्थल है जो बालुका स्तूपों और बरखान से ढाका हुआ है। इन्दिरा गांधी नहर के निर्माण ने राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग में गहन कृषि को प्रोत्साहित किया है। पंजाब- हरियाणा का मैदान इस मैदान का सबसे विशिष्ट लक्षण पाँच दोआब है। इस स्थल के निर्माण में सिंधु, चिनाब, सतलुज, रावी, व्यास द्वारा सम्पन्न निक्षेपात्मक कार्य प्रमुख है। यह मैदान गंगा के मैदान से दिल्ली कटक से अलग होता है। उत्तरी भाग में यह 300 मी. ऊंचा है जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग में इसकी ऊंचाई 200 मी. तक रह जाती है। मैदान का सामान्य ढाल उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और दक्षिण में है। गंगा का मैदान- गंगा का मैदान पश्चिम में यमुना नदी के अफवाह और पूर्व में बांग्लादेश सीमा के मध्य स्थित है। इसे तीन भागों में बांटा गया है। 1. ऊपरी गंगा का मैदान-इसके अंतर्गत गंगा-यमुना दोआब, रोहिलखंड संभाग और आग्रा संभाग का भाग सम्मिलित है। इस क्षेत्र में प्रवाहित अन्य नदियों काली और शारदा है। यह भारत के सर्वाधिक उपजाऊ मैदानों में से एक है जो हरित क्रांति प्रदेश भी है। यहाँ उपजाई जाने वाली मुख्य फसल गन्ना, गेहूं, चावल, मक्का, सरसों आदि है। 2. मध्य गंगा का मैदान-यह मैदान उत्तर प्रदेश के मध्य व पूर्वी भाग तथा बिहार में मुजफ्फरपुर और पटना तक विस्तृत है। प्रमुख नदियां कोसी, सन, गंडक है। 3. निम्न गंगा का मैदान- इसका विस्तार पटना से बंगाल की खाड़ी तक है। यह मैदान तीस्ता, संकोश, महानंदा, दामोदर, सुबर्णरेखा नदियों द्वारा भी अपवाहित है। ब्रह्मपुत्र का मैदान- यह विशाल मैदान का सबसे पूर्वोत्तर भाग है। पश्चिमी भाग को छोड़कर सम्पूर्ण मैदान ऊंची पहाड़ियों से घिरा है। उत्तरी किनारे पर असम घाटी कि मुख्य विशेषता खड़ी ढाल का होना है। इस क्षेत्र में अवस्थित माजुली विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप और जिला है। हिमालय से निकलने वाली सहायक नदियां जलोढ़ पंख की श्रंखला बनती है। यहाँ उपजाऊ घाटी और जुट के खेती के अनुकुल है। मैदान का यह भाग अपने चाय बगानों और दो नेशनल पार्कों काजीरंगा तथा मानस के लिए प्रसिद्ध है।
50,396
Fundamental Duties are an important part of Indian constitution, but at the same time it has its own set of weaknesses. Discuss (200 words/10 marks)
Approach: Brief introduction about Fundamental Duties. Explain the significance of Fundamental Duties Explain the criticism of Fundamental duties Conclude Briefly. Answer: The original Constitution contained only the fundamental rights and not fundamental duties. The fundamental duties of citizens were added in the Constitution as Article 51 A in 1976 by the 42ndConstitutional Amendment Act, on the recommendations of Swaran Singh Committee. The fundamental duties are considered significant from the following viewpoints: They serve as a reminder to the citizens that while enjoying their rights, they should also be conscious of duties they owe to their country, their society and to their fellow citizens. They serve as a warning against the anti-national and antisocial activities like burning the national flag, destroying public property and so on. They serve as a source of inspiration for the citizens and promote a sense of discipline and commitment among them. They create a feeling that the citizens are not mere spectators but active participants in the realization of national goals. They help the courts in examining and determining the constitutional validity of a law. In 1992, the Supreme Court ruled that in determining the constitutionality of any law, if a court finds that the law in question seeks to give effect to a fundamental duty, it may consider such law to be ‘reasonable’ in relation to Article 14 (equality before law) or Article 19 (six freedoms) and thus save such law from unconstitutionality. They are enforceable by law. Hence, the Parliament can provide for the imposition of appropriate penalty or punishment for failure to fulfil any of them. The Fundamental Duties mentioned in Part IVA of the Constitution have been criticised on the following grounds: The list of duties is not exhaustive as it does not cover other important duties like casting vote, paying taxes, family planning and so on. In fact, the duty to pay taxes was recommended by the Swaran Singh Committee. Some of the duties are vague, ambiguous and difficult to be understood by the common man. For example, different interpretations can be given to the phrases like ‘noble ideals’, ‘composite culture’, ‘scientific temper’ and so on. They have been described by the critics as a code of moral precepts due to their non-justiciable character. Interestingly, the Swaran Singh Committee had suggested for penalty or punishment for the nonperformance of Fundamental Duties. Their inclusion in the Constitution was described by the critics as superfluous. This is because the duties included in the Constitution as fundamental would be performed by the people even though they were not incorporated in the Constitution. The critics said that the inclusion of fundamental duties as an appendage to Part IV of the Constitution has reduced their value and significance. They should have been added after Part III so as to keep them on par with Fundamental Rights. Though some criticisms are valid, overall, rights and duties of the citizens are correlative and inseparable. If the constitution provides for the Fundamental rights to citizens, it should also put some obligation on citizen’s in the form of Fundamental Duties
##Question:Fundamental Duties are an important part of Indian constitution, but at the same time it has its own set of weaknesses. Discuss (200 words/10 marks)##Answer:Approach: Brief introduction about Fundamental Duties. Explain the significance of Fundamental Duties Explain the criticism of Fundamental duties Conclude Briefly. Answer: The original Constitution contained only the fundamental rights and not fundamental duties. The fundamental duties of citizens were added in the Constitution as Article 51 A in 1976 by the 42ndConstitutional Amendment Act, on the recommendations of Swaran Singh Committee. The fundamental duties are considered significant from the following viewpoints: They serve as a reminder to the citizens that while enjoying their rights, they should also be conscious of duties they owe to their country, their society and to their fellow citizens. They serve as a warning against the anti-national and antisocial activities like burning the national flag, destroying public property and so on. They serve as a source of inspiration for the citizens and promote a sense of discipline and commitment among them. They create a feeling that the citizens are not mere spectators but active participants in the realization of national goals. They help the courts in examining and determining the constitutional validity of a law. In 1992, the Supreme Court ruled that in determining the constitutionality of any law, if a court finds that the law in question seeks to give effect to a fundamental duty, it may consider such law to be ‘reasonable’ in relation to Article 14 (equality before law) or Article 19 (six freedoms) and thus save such law from unconstitutionality. They are enforceable by law. Hence, the Parliament can provide for the imposition of appropriate penalty or punishment for failure to fulfil any of them. The Fundamental Duties mentioned in Part IVA of the Constitution have been criticised on the following grounds: The list of duties is not exhaustive as it does not cover other important duties like casting vote, paying taxes, family planning and so on. In fact, the duty to pay taxes was recommended by the Swaran Singh Committee. Some of the duties are vague, ambiguous and difficult to be understood by the common man. For example, different interpretations can be given to the phrases like ‘noble ideals’, ‘composite culture’, ‘scientific temper’ and so on. They have been described by the critics as a code of moral precepts due to their non-justiciable character. Interestingly, the Swaran Singh Committee had suggested for penalty or punishment for the nonperformance of Fundamental Duties. Their inclusion in the Constitution was described by the critics as superfluous. This is because the duties included in the Constitution as fundamental would be performed by the people even though they were not incorporated in the Constitution. The critics said that the inclusion of fundamental duties as an appendage to Part IV of the Constitution has reduced their value and significance. They should have been added after Part III so as to keep them on par with Fundamental Rights. Though some criticisms are valid, overall, rights and duties of the citizens are correlative and inseparable. If the constitution provides for the Fundamental rights to citizens, it should also put some obligation on citizen’s in the form of Fundamental Duties
50,398
मुगलों ने चित्रकारी की ऐसी जीवंत परंपरा का सूत्रपात किया जो मुगलों के अवसान के बाद भी दीर्घकाल तक देश के विभिन्न भागों में कायम रही| इस कथन के संदर्भ में, चित्रकला में मुगलों के योगदान का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) The Mughals initiated such a vibrant tradition of painting that continued in different parts of the country for a long time even after the Mughals. In the context of this Statement, Describe the contribution of Mughals in Painting. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- मुग़लकालीन चित्रकला की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में चित्रकला के क्षेत्र में मुगलों के योगदान को (विभिन्न मुग़ल शासक के समयकाल में योगदान) उदाहरण सहित रेखांकित कीजिये| इस काल की चित्रकला की सामान्य विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके योगदान का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| उत्तर- स्थापत्य कला के अतिरिक्त मुगलकाल में राजनैतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि, शासकों की अभिरुचि तथा मुग़ल शासकों का उदार दृष्टिकोण की वजह से चित्रकला की एक समृद्ध परंपरा को नयी दिशा मिली थी| साथ ही, विभिन्न संस्कृतियों से संबंध जैसे कारकों द्वारा मुग़ल चित्रकला को प्रभावित किया गया था| बाबर एवं हुमायूँ के काल में चित्रकला बाबर द्वारा अपनी आत्मकथा में चित्रकला के प्रति अपनी अभिरुचि व्यक्त करना; बिहजाद नामक चित्रकार का भी उल्लेख; राजनैतिक-आर्थिक कारणों से चित्रकला को संरक्षण प्रदान नहीं कर पाना; ईरान में निर्वासन के दौरान अब्दुस्समद तथा मीर सैय्यद अली के निर्देशन में तथा हुमायूँ के संरक्षण में मुग़ल चित्रकला की नींव पड़ना; अकबर का भी इन चित्रकारों के संपर्क में आना परंतु राजनैतिक-आर्थिक मजबूरियों के कारण इसका विशेष विकास नहीं हो पाना; अकबरकालीन चित्र कला के अन्य क्षेत्रों की तरह मुग़ल चित्रकला को आधार प्रदान करने का श्रेय; अकबर के काल में ग्रंथ चित्रण को अत्याधिक महत्व जैसे- हम्जानामा; रम्जानामा(महाभारत); रामायण; पंचतंत्र; बाबरनामा; अकबरनामा आदि; इन ग्रंथों में भी विविधता के साथ-साथ सामासिक संस्कृति के तत्वों का दिखाई पड़ना जैसे- हम्जानामा भारत से बाहर की पुस्तक तथा अन्य पुस्तकें भारत से संबंधित; ग्रंथ चित्रण के साथ-साथ सबीह निर्माण तथा काल्पनिक या प्रतीकात्मक चित्रण की शुरुआत भी अकबर के समय; अकबर के ही काल में चित्रकला पर विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव दिखाई पड़ना जैसे- यूरोपीय प्रभाव में आगे के चित्र को छोटे आकार में दिखाना; प्राकृतिक सौंदर्य को चित्रों में महत्व देना(फ़ारसी प्रभाव); गोल ब्रश एवं नील रंग का प्रयोग राजस्थानी चित्रकला के प्रभाव का द्योतक; अकबर द्वारा बड़ी संख्या में चित्रकारों को संरक्षण प्रदान करना जिसमें हिंदू तथा मुस्लिम दोनों चित्रकार जैसे- दसवंत; बसावन; जहाँगीर कालीन चित्र मुग़ल चित्रकला का चरमोत्कर्ष; सामान्य विशेषताओं के साथ-साथ जहाँगीरकालीन चित्रकला में निम्न महत्वपूर्ण विशेषताएं- सबीह निर्माण पर अत्याधिक बल जैसे- जहांगीर एवं उसके पुत्रों का चित्र; विभिन्न चित्रकारों का चित्र; ईरान एवं बीजापुर के शासक का चित्र; काल्पनिक चित्रों को भी अत्याधिक महत्व जैसे- एक चित्र में मलिक अंबर के सिर को कटी हुयी अवस्था में दिखाया जाना; प्रकृति का यथार्थवादी चित्रण जैसे- अकबर के काल में बादल को रुई की तरह दिखाया जाना लेकिन जहांगीर के समय यथार्थ रूप में; प्रकृति के यथार्थवादी चित्रण के साथ-साथ प्रकृति से संबंधित अधिकाधिक विषयों का भी चित्रण जैसे- साइबेरिया का सारस; गिलहरी; चिनार का पेड़; जहांगीर के काल में ही चित्रों के संरक्षण के लिए एल्बम की शुरुआत ; चित्रकला में विशेष अभिरुचि के कारण भी जहाँगीर को याद किया जाना जैसे- अपनी आत्मकथा में उसके द्वारा यह कहा जाना कि एक ही चित्र में विभिन्न चित्रकारों की भूमिका को स्पष्टतः बता सकना; बड़ी संख्या में चित्रकारों को संरक्षण जैसे- अबुल हसन; उस्ताद मंसूर आदि; शाहजहाँ कालीन चित्र इस काल में भी चित्रकला का विकास जारी रहना; हालाँकि स्थापत्य की तुलना में चित्रकला का अपेक्षित विकास नहीं; ग्रंथ चित्रण; सबीह निर्माण तथा काल्पनिक चित्रों को शाहजहाँकालीन चित्रों में भी महत्व; शाहजहाँकालीन चित्रों में यूरोपीय प्रभाव में वृद्धि तथा चित्रों में चमक-दमक या चमकीले रंगों का अत्याधिक प्रयोग; औरंगजेब की रूचि के अभाव तथा राजनैतिक-आर्थिक एवं धार्मिक कारणों से औरंगजेब के काल में चित्रकला का पतन हुआ तथा दरबार के कलाकार देश के विभिन्न भागों में बिखर गएँ| इससे राजस्थान तथा पंजाब पहाड़ियों के राज्यों में चित्रकारी के विकास में सहायता मिली| इस काल के चित्रकला की सामान्य विशेषताएं भित्तिचित्र एवं लघु चित्र दोनों के साक्ष्य; हालाँकि अधिकांशतः कागजों एवं कपड़ों पर चित्रित लघु चित्रों के साक्ष्य; लघु चित्रों में भी ग्रंथ चित्रण; समेघ निर्माण को अत्यधिक महत्व; व्यक्ति का चित्र; सबीह; चित्रों में दरबार से संबंधित विषयों का महत्व तथा पुरूषों का अत्याधिक चित्रण; प्राकृतिक चित्रण को भी महत्व जैसे- पेड़-पौधे, पशु-पक्षी; नदी बादल आदि के चित्र; शिकार तथा युद्ध के दृश्य; भाव एवं संवेदना को बारीकी से उकेरना; विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव जैसे- फारस, यूरोप आदि; प्राकृतिक रंगों का प्रयोग; सुनहरे एवं गुलाबी रंग का अत्याधिक प्रयोग; चित्रकारी में मुगलों ने नए विषयों का समावेश करते हुए इस क्षेत्र में एक विशिष्ट योगदान दिया था|
##Question:मुगलों ने चित्रकारी की ऐसी जीवंत परंपरा का सूत्रपात किया जो मुगलों के अवसान के बाद भी दीर्घकाल तक देश के विभिन्न भागों में कायम रही| इस कथन के संदर्भ में, चित्रकला में मुगलों के योगदान का वर्णन कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) The Mughals initiated such a vibrant tradition of painting that continued in different parts of the country for a long time even after the Mughals. In the context of this Statement, Describe the contribution of Mughals in Painting. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- मुग़लकालीन चित्रकला की पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| मुख्य भाग में चित्रकला के क्षेत्र में मुगलों के योगदान को (विभिन्न मुग़ल शासक के समयकाल में योगदान) उदाहरण सहित रेखांकित कीजिये| इस काल की चित्रकला की सामान्य विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय देते हुए इसके योगदान का संक्षिप्त उल्लेख कीजिये| उत्तर- स्थापत्य कला के अतिरिक्त मुगलकाल में राजनैतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि, शासकों की अभिरुचि तथा मुग़ल शासकों का उदार दृष्टिकोण की वजह से चित्रकला की एक समृद्ध परंपरा को नयी दिशा मिली थी| साथ ही, विभिन्न संस्कृतियों से संबंध जैसे कारकों द्वारा मुग़ल चित्रकला को प्रभावित किया गया था| बाबर एवं हुमायूँ के काल में चित्रकला बाबर द्वारा अपनी आत्मकथा में चित्रकला के प्रति अपनी अभिरुचि व्यक्त करना; बिहजाद नामक चित्रकार का भी उल्लेख; राजनैतिक-आर्थिक कारणों से चित्रकला को संरक्षण प्रदान नहीं कर पाना; ईरान में निर्वासन के दौरान अब्दुस्समद तथा मीर सैय्यद अली के निर्देशन में तथा हुमायूँ के संरक्षण में मुग़ल चित्रकला की नींव पड़ना; अकबर का भी इन चित्रकारों के संपर्क में आना परंतु राजनैतिक-आर्थिक मजबूरियों के कारण इसका विशेष विकास नहीं हो पाना; अकबरकालीन चित्र कला के अन्य क्षेत्रों की तरह मुग़ल चित्रकला को आधार प्रदान करने का श्रेय; अकबर के काल में ग्रंथ चित्रण को अत्याधिक महत्व जैसे- हम्जानामा; रम्जानामा(महाभारत); रामायण; पंचतंत्र; बाबरनामा; अकबरनामा आदि; इन ग्रंथों में भी विविधता के साथ-साथ सामासिक संस्कृति के तत्वों का दिखाई पड़ना जैसे- हम्जानामा भारत से बाहर की पुस्तक तथा अन्य पुस्तकें भारत से संबंधित; ग्रंथ चित्रण के साथ-साथ सबीह निर्माण तथा काल्पनिक या प्रतीकात्मक चित्रण की शुरुआत भी अकबर के समय; अकबर के ही काल में चित्रकला पर विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव दिखाई पड़ना जैसे- यूरोपीय प्रभाव में आगे के चित्र को छोटे आकार में दिखाना; प्राकृतिक सौंदर्य को चित्रों में महत्व देना(फ़ारसी प्रभाव); गोल ब्रश एवं नील रंग का प्रयोग राजस्थानी चित्रकला के प्रभाव का द्योतक; अकबर द्वारा बड़ी संख्या में चित्रकारों को संरक्षण प्रदान करना जिसमें हिंदू तथा मुस्लिम दोनों चित्रकार जैसे- दसवंत; बसावन; जहाँगीर कालीन चित्र मुग़ल चित्रकला का चरमोत्कर्ष; सामान्य विशेषताओं के साथ-साथ जहाँगीरकालीन चित्रकला में निम्न महत्वपूर्ण विशेषताएं- सबीह निर्माण पर अत्याधिक बल जैसे- जहांगीर एवं उसके पुत्रों का चित्र; विभिन्न चित्रकारों का चित्र; ईरान एवं बीजापुर के शासक का चित्र; काल्पनिक चित्रों को भी अत्याधिक महत्व जैसे- एक चित्र में मलिक अंबर के सिर को कटी हुयी अवस्था में दिखाया जाना; प्रकृति का यथार्थवादी चित्रण जैसे- अकबर के काल में बादल को रुई की तरह दिखाया जाना लेकिन जहांगीर के समय यथार्थ रूप में; प्रकृति के यथार्थवादी चित्रण के साथ-साथ प्रकृति से संबंधित अधिकाधिक विषयों का भी चित्रण जैसे- साइबेरिया का सारस; गिलहरी; चिनार का पेड़; जहांगीर के काल में ही चित्रों के संरक्षण के लिए एल्बम की शुरुआत ; चित्रकला में विशेष अभिरुचि के कारण भी जहाँगीर को याद किया जाना जैसे- अपनी आत्मकथा में उसके द्वारा यह कहा जाना कि एक ही चित्र में विभिन्न चित्रकारों की भूमिका को स्पष्टतः बता सकना; बड़ी संख्या में चित्रकारों को संरक्षण जैसे- अबुल हसन; उस्ताद मंसूर आदि; शाहजहाँ कालीन चित्र इस काल में भी चित्रकला का विकास जारी रहना; हालाँकि स्थापत्य की तुलना में चित्रकला का अपेक्षित विकास नहीं; ग्रंथ चित्रण; सबीह निर्माण तथा काल्पनिक चित्रों को शाहजहाँकालीन चित्रों में भी महत्व; शाहजहाँकालीन चित्रों में यूरोपीय प्रभाव में वृद्धि तथा चित्रों में चमक-दमक या चमकीले रंगों का अत्याधिक प्रयोग; औरंगजेब की रूचि के अभाव तथा राजनैतिक-आर्थिक एवं धार्मिक कारणों से औरंगजेब के काल में चित्रकला का पतन हुआ तथा दरबार के कलाकार देश के विभिन्न भागों में बिखर गएँ| इससे राजस्थान तथा पंजाब पहाड़ियों के राज्यों में चित्रकारी के विकास में सहायता मिली| इस काल के चित्रकला की सामान्य विशेषताएं भित्तिचित्र एवं लघु चित्र दोनों के साक्ष्य; हालाँकि अधिकांशतः कागजों एवं कपड़ों पर चित्रित लघु चित्रों के साक्ष्य; लघु चित्रों में भी ग्रंथ चित्रण; समेघ निर्माण को अत्यधिक महत्व; व्यक्ति का चित्र; सबीह; चित्रों में दरबार से संबंधित विषयों का महत्व तथा पुरूषों का अत्याधिक चित्रण; प्राकृतिक चित्रण को भी महत्व जैसे- पेड़-पौधे, पशु-पक्षी; नदी बादल आदि के चित्र; शिकार तथा युद्ध के दृश्य; भाव एवं संवेदना को बारीकी से उकेरना; विभिन्न संस्कृतियों का प्रभाव जैसे- फारस, यूरोप आदि; प्राकृतिक रंगों का प्रयोग; सुनहरे एवं गुलाबी रंग का अत्याधिक प्रयोग; चित्रकारी में मुगलों ने नए विषयों का समावेश करते हुए इस क्षेत्र में एक विशिष्ट योगदान दिया था|
50,401
भारत में वामपंथ के उदय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर वामपंथ के प्रभावों की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) Explaining the background of the rise of the Leftist ideology in India, discuss the impacts of the Left on the Indian National Congress. (150-200 words/10 Marks)
दृष्टिकोण 1. भूमिका मेंवामपंथको स्पष्ट कीजिये| 2.वामपंथ के उदय की पृष्ठभूमि की चर्चा कीजिये| 3.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर वामपंथ के प्रभावों की चर्चा कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जो लोकतान्त्रिक तरीके से मजदूरों एवं वंचित तबकों को सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने पर बल देती है| वहीँ मार्क्सवाद/साम्यवाद या वामपंथ, कार्ल मार्क्स एवं उसके सहयोगियों की विचारधारा है जो सामाजिक-आर्थिक न्याय पर तो बल देती है किन्तु इसके लिए हिंसा को भी स्वीकार करती है| मार्क्स का लक्ष्य ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ न तो राज्य होगा और न ही वर्ग; इसी अवस्था को मार्क्स ने साम्यवाद कहा| लेनिन के नेतृत्व मेंरूसी क्रांति(nov.1917 ) जो कि एक मार्क्सवादी क्रांति थी संपन्न हुई एवं लेनिन ने उपनिवेशों को छोड़ने की घोषणा की| वैश्विक स्तर पर इस विचारधारा का तेजी से प्रसार हुआ| भारत सहित अन्य उपनिवेशों में इसकी लोकप्रियता बढ़ी और रूस ने उपनिवेशों का संसाधन एवं प्रशिक्षण आदि के माध्यम से सहयोग करना प्रारंभ किया भारत में वामपंथ के उदय की पृष्ठभूमि: 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में सीमित अर्थों में ही सही भारत का औद्योगिक विकास हुआ तथा आधुनिक मजदूरों का उदय एवं उनकी दयनीय दशा जैसी स्थितियां सामने आई| आधुनिक परिवहन के साधनों के विकास के क्रम में भी बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता हुई| मजदूरों का विस्थापन आदि से असंतोष उत्पन्न हुआ| नरम दलीय नेताओं का समाजवादी विचारधारा से परिचय तथा क्रांतिकारियों का भी अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादियों से संपर्क हुआ| स्वदेशी आन्दोलन के दौरान मजदूरों में बड़े पैमाने पर राजनीतिक जागरूकता देखी गई| प्रथम विश्व युद्ध के दौरान श्रमिकों की दशा दयनीय थी और इसी पृष्ठभूमि में रूसी क्रांति की सफलता ने मार्क्सवादी विचारधारा की तरफ अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित किया| सरकार की दमनकारी नीति एवं अब तक के आंदोलनों से अपेक्षित सफलता ना मिलने के कारण बुद्धिजीवियों का झुकाव वैकल्पिक विचारधारा की ओर हुआ| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर वामपंथ के प्रभाव: जवाहर लाल नेहरु एवं सुभाष चन्द्र बोस समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(1925);कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी(1934) का गठन| 1929 में कांग्रेस के लक्ष्य को पूर्ण स्वराज निर्धारित कराने में नेहरु एवं बोस जैसे युवा राष्ट्रवादियों का महत्वपूर्ण योगदान| सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रम में तथा गांधी जी की 11 सूत्री मांगों में भी किसानों से सम्बंधित मुद्दे को महत्व| कराची कांग्रेस अधिवेशन में पारित प्रस्तावों पर समाजवाद का प्रभाव विशेष तौर पर दिखाई पड़ता है| 1936 में फैजपुर अधिवेशन में भी किसानों के मुद्दे को विशेष महत्त्व दिया गया| 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में राष्ट्रीय योजना समिति का गठन| सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोडो आन्दोलन तथा 1945 से 47 के बीच ब्रिटिश सरकार के साथ प्रत्यक्ष टकराव में कांग्रेसी समाजवादियों की सक्रिय भूमिका| कांग्रेस की रणनीति को भी समाजवादी विचारधारा ने प्रभावित किया सरकार के साथ किसी भी समझौते या बातचीत का विरोध, आन्दोलन की निरंतरता को बनाये रखने पर बल तथा सरकार खतरे में है इस अवसर का लाभ उठाया जाये जैसे दृष्टिकोण के लिए कांग्रेस पर दबाव बनाया, संवैधानिक राजनीति का भी विरोध; संविधान के प्रावधानों तथा आजादी के बाद भारत की आतंरिक एवं बाहरी नीति को भी इस विचारधारा ने प्रभावित किया|
##Question:भारत में वामपंथ के उदय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर वामपंथ के प्रभावों की चर्चा कीजिये |(150-200 शब्द/10 अंक) Explaining the background of the rise of the Leftist ideology in India, discuss the impacts of the Left on the Indian National Congress. (150-200 words/10 Marks)##Answer:दृष्टिकोण 1. भूमिका मेंवामपंथको स्पष्ट कीजिये| 2.वामपंथ के उदय की पृष्ठभूमि की चर्चा कीजिये| 3.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर वामपंथ के प्रभावों की चर्चा कीजिये| 3. संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर: समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जो लोकतान्त्रिक तरीके से मजदूरों एवं वंचित तबकों को सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने पर बल देती है| वहीँ मार्क्सवाद/साम्यवाद या वामपंथ, कार्ल मार्क्स एवं उसके सहयोगियों की विचारधारा है जो सामाजिक-आर्थिक न्याय पर तो बल देती है किन्तु इसके लिए हिंसा को भी स्वीकार करती है| मार्क्स का लक्ष्य ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ न तो राज्य होगा और न ही वर्ग; इसी अवस्था को मार्क्स ने साम्यवाद कहा| लेनिन के नेतृत्व मेंरूसी क्रांति(nov.1917 ) जो कि एक मार्क्सवादी क्रांति थी संपन्न हुई एवं लेनिन ने उपनिवेशों को छोड़ने की घोषणा की| वैश्विक स्तर पर इस विचारधारा का तेजी से प्रसार हुआ| भारत सहित अन्य उपनिवेशों में इसकी लोकप्रियता बढ़ी और रूस ने उपनिवेशों का संसाधन एवं प्रशिक्षण आदि के माध्यम से सहयोग करना प्रारंभ किया भारत में वामपंथ के उदय की पृष्ठभूमि: 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में सीमित अर्थों में ही सही भारत का औद्योगिक विकास हुआ तथा आधुनिक मजदूरों का उदय एवं उनकी दयनीय दशा जैसी स्थितियां सामने आई| आधुनिक परिवहन के साधनों के विकास के क्रम में भी बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता हुई| मजदूरों का विस्थापन आदि से असंतोष उत्पन्न हुआ| नरम दलीय नेताओं का समाजवादी विचारधारा से परिचय तथा क्रांतिकारियों का भी अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादियों से संपर्क हुआ| स्वदेशी आन्दोलन के दौरान मजदूरों में बड़े पैमाने पर राजनीतिक जागरूकता देखी गई| प्रथम विश्व युद्ध के दौरान श्रमिकों की दशा दयनीय थी और इसी पृष्ठभूमि में रूसी क्रांति की सफलता ने मार्क्सवादी विचारधारा की तरफ अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित किया| सरकार की दमनकारी नीति एवं अब तक के आंदोलनों से अपेक्षित सफलता ना मिलने के कारण बुद्धिजीवियों का झुकाव वैकल्पिक विचारधारा की ओर हुआ| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर वामपंथ के प्रभाव: जवाहर लाल नेहरु एवं सुभाष चन्द्र बोस समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(1925);कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी(1934) का गठन| 1929 में कांग्रेस के लक्ष्य को पूर्ण स्वराज निर्धारित कराने में नेहरु एवं बोस जैसे युवा राष्ट्रवादियों का महत्वपूर्ण योगदान| सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रम में तथा गांधी जी की 11 सूत्री मांगों में भी किसानों से सम्बंधित मुद्दे को महत्व| कराची कांग्रेस अधिवेशन में पारित प्रस्तावों पर समाजवाद का प्रभाव विशेष तौर पर दिखाई पड़ता है| 1936 में फैजपुर अधिवेशन में भी किसानों के मुद्दे को विशेष महत्त्व दिया गया| 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में राष्ट्रीय योजना समिति का गठन| सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोडो आन्दोलन तथा 1945 से 47 के बीच ब्रिटिश सरकार के साथ प्रत्यक्ष टकराव में कांग्रेसी समाजवादियों की सक्रिय भूमिका| कांग्रेस की रणनीति को भी समाजवादी विचारधारा ने प्रभावित किया सरकार के साथ किसी भी समझौते या बातचीत का विरोध, आन्दोलन की निरंतरता को बनाये रखने पर बल तथा सरकार खतरे में है इस अवसर का लाभ उठाया जाये जैसे दृष्टिकोण के लिए कांग्रेस पर दबाव बनाया, संवैधानिक राजनीति का भी विरोध; संविधान के प्रावधानों तथा आजादी के बाद भारत की आतंरिक एवं बाहरी नीति को भी इस विचारधारा ने प्रभावित किया|
50,408
भारत में उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए इसका प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the origin of the vast plain of the north in India and present its regional division. (150-200 words)
Approach: भूमिका में भारत के भूभौतिक स्वरूप पर चर्चा कर सकते हैं। भारत के प्रादेशिक विभाजन की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति संबंधी विभिन्न विचारों की चर्चा कीजिए। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। उत्तर- भारत भूभौतिक भिन्नताओं वाला देश है। यहाँ पर्याप्त उच्चावचीय विविधता पायी जाती है। पर्वत, मैदान, मरुस्थल, पठार तथा द्वीप भारतीय महाद्वीप की विशेषताएँ है। भारत को भूभौतिक रूप से निम्न भागों में बांटा गया है- उत्तरी पर्वर्तीय क्षेत्र उत्तर का विशाल मैदान प्रायद्वीपीय पठार तटीय मैदान द्वीप समूह उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति- भारत का उत्तर का विशाल मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा निर्मित मैदान है। मूलत: यह एक भूअवनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वत निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में हुआ था। यह उत्तर में हिमालय और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से निकालने वाली नदियों के तलछट जमाव से निर्मित एक समतल मैदान है। कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि विशालकाय मैदान टेथीस सागर का ही अवशेष है। शिवालिक भू हलचल के बाद टेथिस सागर के शेष भाग एक बड़े गर्त के रूप में बच गए थे । इस अवधि मे हिमालय पर्वत में उत्थान जारी था जिस कारण नदियों में नवोन्मेष कि घटना हुई एवं बड़ी मात्रा में अपारदित चट्टानी पदार्थों द्वारा इस गर्त में तलछट कि मोटी परत का निक्षेपण हुआ। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन- उत्तर भारत के मैदान को भू-जलवायु तथा भू-आकृतिक विशेषताओं के आधार पर चार वृहत प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है- राजस्थान का मैदान पंजाब- हरियाणा का मैदान गंगा का मैदान ब्रह्मपुत्र का मैदान राजस्थान का मैदान यह मैदान मुख्य रूप से अरावली के पश्चिम में स्थित है। इस मैदान के बड़े भाग का निर्माण समुद्र के पीछे हटने से हुआ है। जिसका प्रमाण जयपुर के निकट खारे पानी के सांभर झील का पाया जाना है। इस मैदान में सरस्वती जैसी नदियों के कई सूखे तल मिलते हैं जिससे संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र पहले उपजाउ था। वर्तमान समय में इस मैदान का बड़ा हिस्सा मरुस्थल है जो बालुका स्तूपों और बरखान से ढाका हुआ है। इन्दिरा गांधी नहर के निर्माण ने राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग में गहन कृषि को प्रोत्साहित किया है। पंजाब- हरियाणा का मैदान इस मैदान का सबसे विशिष्ट लक्षण पाँच दोआब है। इस स्थल के निर्माण में सिंधु, चिनाब, सतलुज, रावी, व्यास द्वारा सम्पन्न निक्षेपात्मक कार्य प्रमुख है। यह मैदान गंगा के मैदान से दिल्ली कटक से अलग होता है। उत्तरी भाग में यह 300 मी. ऊंचा है जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग में इसकी ऊंचाई 200 मी. तक रह जाती है। मैदान का सामान्य ढाल उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और दक्षिण में है। गंगा का मैदान- गंगा का मैदान पश्चिम में यमुना नदी के अफवाह और पूर्व में बांग्लादेश सीमा के मध्य स्थित है। इसे तीन भागों में बांटा गया है। 1. ऊपरी गंगा का मैदान- इसके अंतर्गत गंगा-यमुना दोआब, रोहिलखंड संभाग और आग्रा संभाग का भाग सम्मिलित है। इस क्षेत्र में प्रवाहित अन्य नदियों काली और शारदा है। यह भारत के सर्वाधिक उपजाऊ मैदानों में से एक है जो हरित क्रांति प्रदेश भी है। यहाँ उपजाई जाने वाली मुख्य फसल गन्ना, गेहूं, चावल, मक्का, सरसों आदि है। 2. मध्य गंगा का मैदान- यह मैदान उत्तर प्रदेश के मध्य व पूर्वी भाग तथा बिहार में मुजफ्फरपुर और पटना तक विस्तृत है। प्रमुख नदियां कोसी, सन, गंडक है। 3. निम्न गंगा का मैदान - इसका विस्तार पटना से बंगाल की खाड़ी तक है। यह मैदान तीस्ता, संकोश, महानंदा, दामोदर, सुबर्णरेखा नदियों द्वारा भी अपवाहित है। ब्रह्मपुत्र का मैदान- यह विशाल मैदान का सबसे पूर्वोत्तर भाग है। पश्चिमी भाग को छोड़कर सम्पूर्ण मैदान ऊंची पहाड़ियों से घिरा है। उत्तरी किनारे पर असम घाटी कि मुख्य विशेषता खड़ी ढाल का होना है। इस क्षेत्र में अवस्थित माजुली विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप और जिला है। हिमालय से निकलने वाली सहायक नदियां जलोढ़ पंख की श्रंखला बनती है। यहाँ उपजाऊ घाटी और जुट के खेती के अनुकुल है। मैदान का यह भाग अपने चाय बगानों और दो नेशनल पार्कों काजीरंगा तथा मानस के लिए प्रसिद्ध है।
##Question:भारत में उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए इसका प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। (150-200 शब्द) Explain the origin of the vast plain of the north in India and present its regional division. (150-200 words)##Answer:Approach: भूमिका में भारत के भूभौतिक स्वरूप पर चर्चा कर सकते हैं। भारत के प्रादेशिक विभाजन की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति संबंधी विभिन्न विचारों की चर्चा कीजिए। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन प्रस्तुत कीजिए। उत्तर- भारत भूभौतिक भिन्नताओं वाला देश है। यहाँ पर्याप्त उच्चावचीय विविधता पायी जाती है। पर्वत, मैदान, मरुस्थल, पठार तथा द्वीप भारतीय महाद्वीप की विशेषताएँ है। भारत को भूभौतिक रूप से निम्न भागों में बांटा गया है- उत्तरी पर्वर्तीय क्षेत्र उत्तर का विशाल मैदान प्रायद्वीपीय पठार तटीय मैदान द्वीप समूह उत्तर के विशाल मैदान की व्युत्पत्ति- भारत का उत्तर का विशाल मैदान सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा निर्मित मैदान है। मूलत: यह एक भूअवनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वत निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में हुआ था। यह उत्तर में हिमालय और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से निकालने वाली नदियों के तलछट जमाव से निर्मित एक समतल मैदान है। कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि विशालकाय मैदान टेथीस सागर का ही अवशेष है। शिवालिक भू हलचल के बाद टेथिस सागर के शेष भाग एक बड़े गर्त के रूप में बच गए थे । इस अवधि मे हिमालय पर्वत में उत्थान जारी था जिस कारण नदियों में नवोन्मेष कि घटना हुई एवं बड़ी मात्रा में अपारदित चट्टानी पदार्थों द्वारा इस गर्त में तलछट कि मोटी परत का निक्षेपण हुआ। उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन- उत्तर भारत के मैदान को भू-जलवायु तथा भू-आकृतिक विशेषताओं के आधार पर चार वृहत प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है- राजस्थान का मैदान पंजाब- हरियाणा का मैदान गंगा का मैदान ब्रह्मपुत्र का मैदान राजस्थान का मैदान यह मैदान मुख्य रूप से अरावली के पश्चिम में स्थित है। इस मैदान के बड़े भाग का निर्माण समुद्र के पीछे हटने से हुआ है। जिसका प्रमाण जयपुर के निकट खारे पानी के सांभर झील का पाया जाना है। इस मैदान में सरस्वती जैसी नदियों के कई सूखे तल मिलते हैं जिससे संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र पहले उपजाउ था। वर्तमान समय में इस मैदान का बड़ा हिस्सा मरुस्थल है जो बालुका स्तूपों और बरखान से ढाका हुआ है। इन्दिरा गांधी नहर के निर्माण ने राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग में गहन कृषि को प्रोत्साहित किया है। पंजाब- हरियाणा का मैदान इस मैदान का सबसे विशिष्ट लक्षण पाँच दोआब है। इस स्थल के निर्माण में सिंधु, चिनाब, सतलुज, रावी, व्यास द्वारा सम्पन्न निक्षेपात्मक कार्य प्रमुख है। यह मैदान गंगा के मैदान से दिल्ली कटक से अलग होता है। उत्तरी भाग में यह 300 मी. ऊंचा है जबकि दक्षिण-पूर्वी भाग में इसकी ऊंचाई 200 मी. तक रह जाती है। मैदान का सामान्य ढाल उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और दक्षिण में है। गंगा का मैदान- गंगा का मैदान पश्चिम में यमुना नदी के अफवाह और पूर्व में बांग्लादेश सीमा के मध्य स्थित है। इसे तीन भागों में बांटा गया है। 1. ऊपरी गंगा का मैदान- इसके अंतर्गत गंगा-यमुना दोआब, रोहिलखंड संभाग और आग्रा संभाग का भाग सम्मिलित है। इस क्षेत्र में प्रवाहित अन्य नदियों काली और शारदा है। यह भारत के सर्वाधिक उपजाऊ मैदानों में से एक है जो हरित क्रांति प्रदेश भी है। यहाँ उपजाई जाने वाली मुख्य फसल गन्ना, गेहूं, चावल, मक्का, सरसों आदि है। 2. मध्य गंगा का मैदान- यह मैदान उत्तर प्रदेश के मध्य व पूर्वी भाग तथा बिहार में मुजफ्फरपुर और पटना तक विस्तृत है। प्रमुख नदियां कोसी, सन, गंडक है। 3. निम्न गंगा का मैदान - इसका विस्तार पटना से बंगाल की खाड़ी तक है। यह मैदान तीस्ता, संकोश, महानंदा, दामोदर, सुबर्णरेखा नदियों द्वारा भी अपवाहित है। ब्रह्मपुत्र का मैदान- यह विशाल मैदान का सबसे पूर्वोत्तर भाग है। पश्चिमी भाग को छोड़कर सम्पूर्ण मैदान ऊंची पहाड़ियों से घिरा है। उत्तरी किनारे पर असम घाटी कि मुख्य विशेषता खड़ी ढाल का होना है। इस क्षेत्र में अवस्थित माजुली विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीप और जिला है। हिमालय से निकलने वाली सहायक नदियां जलोढ़ पंख की श्रंखला बनती है। यहाँ उपजाऊ घाटी और जुट के खेती के अनुकुल है। मैदान का यह भाग अपने चाय बगानों और दो नेशनल पार्कों काजीरंगा तथा मानस के लिए प्रसिद्ध है।
50,414
Briefly discuss the advent of various colonial powers in India. (10 marks/150 words)
Approach Introduction : A brief introduction to the arrival of European colonial powers to India. Body: Briefly discuss the arrival of all the colonial powers that entered the Indian sub-continent as trading companies. Model Answer: Disruptions in trade routes and changing political scenarios in the Middle East compelled the European traders to search for new trading routes to India. The discovery of the sea route to India via the Cape of Good Hope marked the beginning of the arrival of colonial powers to India through trading companies. The Portuguese The expedition of Vasco de Gama that reached Calicut in May 1498 was welcomed by the local ruler Zamorin. The first Portuguese Viceroy Francisco d"Almeida arrived in 1505 AD. It was Albuquerque who (1509-15) gave shape to the Portuguese geopolitical designs. Goa was taken in 1510 and later became the capital of the Portuguese Commercial "empire" in India. The Portuguese later occupied Diu, Dalian, and Bassein to control the trade from Gujarat and also occupied the coast of Konkan and Malabar to control the trade from Malabar. By the end of the 16th century, they had about fifty forts and a powerful naval fleet of 100 ships. The British In 1600, the East India Company acquired a charter from the ruler of England, Queen Elizabeth I, granting it the sole right to trade with the East. The first English factory was set up on the banks of the river Hugli in 1651By 1696 it began building a fort around the settlement. Mughal emperor Aurangzeb issued a farman granting the Company the right to trade duty-free. Later they established their factories at Surat, Madras, Bombay, Machilipatnam, etc. The Dutch The Dutch East India Company was formed in 1602 through a charter. They established their first factory at Petapuli in North Coromandal in 1606, followed by another at Masulipatam in the same year. Later they established their factories at Pulicat, Cambay, Surat, and Agra, Hariharpur, Patna. Dacca etc. The Danes The Danes entered as traders in 1616 but with no ambition to establish an Empire. They managed to secure the Tranquebar port in 1620 and built a fort there. Later they established their factories at Masulipatam, Porto Novo and Serampur. The French The French company designated as Campaignie des Indes Orientales was started in 1664 with the state"s financial support. The French established their first factory in India at Surat in 1668. Subsequently, Francois Martin established Pondicherry in 1674, which emerged as the headquarters of the French in India. Like other European trading companies, the French added other important factories to the existing ones at Balasore, Masulipatnam, Chandernagore, Tellicherry, and Calicut.
##Question:Briefly discuss the advent of various colonial powers in India. (10 marks/150 words)##Answer:Approach Introduction : A brief introduction to the arrival of European colonial powers to India. Body: Briefly discuss the arrival of all the colonial powers that entered the Indian sub-continent as trading companies. Model Answer: Disruptions in trade routes and changing political scenarios in the Middle East compelled the European traders to search for new trading routes to India. The discovery of the sea route to India via the Cape of Good Hope marked the beginning of the arrival of colonial powers to India through trading companies. The Portuguese The expedition of Vasco de Gama that reached Calicut in May 1498 was welcomed by the local ruler Zamorin. The first Portuguese Viceroy Francisco d"Almeida arrived in 1505 AD. It was Albuquerque who (1509-15) gave shape to the Portuguese geopolitical designs. Goa was taken in 1510 and later became the capital of the Portuguese Commercial "empire" in India. The Portuguese later occupied Diu, Dalian, and Bassein to control the trade from Gujarat and also occupied the coast of Konkan and Malabar to control the trade from Malabar. By the end of the 16th century, they had about fifty forts and a powerful naval fleet of 100 ships. The British In 1600, the East India Company acquired a charter from the ruler of England, Queen Elizabeth I, granting it the sole right to trade with the East. The first English factory was set up on the banks of the river Hugli in 1651By 1696 it began building a fort around the settlement. Mughal emperor Aurangzeb issued a farman granting the Company the right to trade duty-free. Later they established their factories at Surat, Madras, Bombay, Machilipatnam, etc. The Dutch The Dutch East India Company was formed in 1602 through a charter. They established their first factory at Petapuli in North Coromandal in 1606, followed by another at Masulipatam in the same year. Later they established their factories at Pulicat, Cambay, Surat, and Agra, Hariharpur, Patna. Dacca etc. The Danes The Danes entered as traders in 1616 but with no ambition to establish an Empire. They managed to secure the Tranquebar port in 1620 and built a fort there. Later they established their factories at Masulipatam, Porto Novo and Serampur. The French The French company designated as Campaignie des Indes Orientales was started in 1664 with the state"s financial support. The French established their first factory in India at Surat in 1668. Subsequently, Francois Martin established Pondicherry in 1674, which emerged as the headquarters of the French in India. Like other European trading companies, the French added other important factories to the existing ones at Balasore, Masulipatnam, Chandernagore, Tellicherry, and Calicut.
50,416
हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ या इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) का परिचय देते हुए इसके उद्देश्य तथा भारत के संदर्भ में इसकी महता का उल्लेख कीजिये| साथ ही, इस संदर्भ में प्रमुख चिंताओं को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द) Mention the purpose and importance of Indian Ocean Rim Association (IORA) in the context of India. Also, clarify the major concerns in this context. (150-200 words)
एप्रोच- प्रस्तावना मेंहिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ या इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) का परिचय दीजिये| अगले भाग में इसके उद्देश्यों को रेखांकित कीजिये| अगले भाग में, भारत के संदर्भ में इसकी महता का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में इस संदर्भ में प्रमुख चिंताओं का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, आगे की राह बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ या इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) हिंद महासागर की परिधि में आने वाले देशों की एक क्षेत्रीय सहयोग पहल हैजिसकी स्थापना एक अंतर सरकारी संगठन के रूप में 1997 में मॉरीशस में आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से की गई। इसकी स्थापना की भूमिका नेल्सन मंडेला के 1995 में भारत यात्रा के दौरान रखी गयी थी जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक सहयोग हेतु हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को साथ आने का आह्वान किया था| यह एक मात्र अखिल हिंद महासागर समूह है। यह भिन्‍न-भिन्‍न आकार, आर्थिक मजबूती तथा भाषा एवं संस्‍कृति में व्‍यापक विविधता वाले तीन महाद्वीपों के देशों को एक मंच पर लाता है। इसका उद्देश्‍य हिंद महासागर के प‍रिधि क्षेत्र में, जहाँ तकरीबन दो बिलियन आबादी पाई जाती है, व्‍यापार, सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्‍कृतिक सहयोग के लिए एक मंच का सृजन करना है। इसमें वर्तमान में 21 सदस्य देश तथा 7 डायलॉग पार्टनर देश हैं| इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के उद्देश्य आर्थिक उद्देश्यों के तहत व्यापार उदारीकरण व्‍यापार के उदारीकरण के लिए सभी संभावनाओं एवं अवसरों का पता लगाना, क्षेत्र के अंदर माल, सेवाओं, निवेश एवं प्रौद्योगिकी के मुक्‍त एवं अधिक प्रवाह की दिशा में आने वाली अड़चनों को दूर करना तथा बाधाओं को कम करना। सदस्‍य राष्ट्रों के बीच किसी भेदभाव के बिना तथा अन्‍य क्षेत्रीय आर्थिक एवं व्‍यापार सहयोग व्‍यवस्‍थाओं के अंतर्गत बाध्‍यताओं पर प्रतिकूल प्रभाव के बिना सदस्‍य राष्ट्रों के व्‍यापार एवं उद्योग, शैक्षिक संस्‍थाओं, विद्धानों एवं लोगों के बीच घनिष्‍ठ अंत:क्रिया को प्रोत्‍साहित करना; वस्तुओं, सेवाओं, तकनीक तथा निवेश के फ्लो को बढ़ाना; आपसी हित के मुद्दों पर अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों में साझा दृष्टिकोण अपनाने तथा साझी रणनीति विकसित करने के लिए जहां वांछनीय हो वहां तथा वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों में सदस्‍य राज्‍यों के बीच सहयोग,आपसी विश्वास एवं वार्ता को सुदृढ़ करना; मानव-संसाधन के क्षेत्र में शोध तथा विकास को प्रोत्साहन; विशेष रूप से सदस्‍य राज्‍यों की प्रशिक्षण संस्‍थाओं, विश्‍वविद्यालयों तथा अन्‍य विशिष्‍ट संस्‍थाओं के बीच घनिष्‍ठ सहलग्‍नता के माध्‍यम से मानव संसाधन के विकास में सहयोग को बढ़ावा देना; सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा; इस क्षेत्र के तथा सदस्‍य राज्‍यों के स्‍थाई विकास एवं संतुलित प्रगति को बढ़ावा देना तथा क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग के लिए साझी जमीन सृजित करना; आर्थिक सहयोग के ऐसे क्षेत्रों पर बल देना जो साझे हितों के विकास के लिए तथा परस्‍पर लाभ प्राप्‍त करने के लिए अधिकतम अवसर प्रदान करते हैं| जकार्ता कॉन्कर्ड के माध्यम से इस संदर्भ में निम्न आयामों को भी महत्व प्रदान किया गया है- व्यापार, निवेश तथा आर्थिक सहयोग की क्षमता को बढ़ावा; गैर-पारंपरिक मुद्दों(अवैध, अनरिपोर्टेड तथा अनरेगुलेटेड मत्स्यन; मानव तथा ड्रग ट्रैफिकिंग; अवैध प्रवसन; पायरेसी) को संदर्भित करना; आतंकवाद तथा हिंसक कट्टरता के विरुद्ध बचाव एवं प्रतिरोधक क्षमता हेतु घोषणा(डिक्लेरेशन) को अपनाना; 2017-21 के लिए पहला एक्शन प्लान(शॉर्ट टर्म, मीडियम टर्म तथा लॉन्ग टर्म हेतु फ्लैगशिप इनिशिएटिव); भारत के संदर्भ में इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन की महता पेट्रोलियम व्यापार तथा अन्य वैश्विक व्यापार हेतु महत्वपूर्ण;भारत के 97% व्यापार हेतु महत्वपूर्ण; हिंद महासागर का परिधि क्षेत्र सामरिक एवं बहुमूल्‍य खनिजों, धातुओं एवं अन्‍य प्राकृतिक संसाधनों, समुद्री संसाधनों एवं ऊर्जा की दृष्टि से समृद्ध है तथा इन सबको अनन्‍य आर्थिक क्षेत्रों (ई ई जेड), महाद्वीपीय शेल्‍फ एवं गहन सीबेड से प्राप्‍त किया जा सकता है। इस संदर्भ में इस संगठन की भूमिका अहम् हो जाती है| हिंद महासागर का बढ़ता हुआ महत्व जिससे सामरिक एवं सैन्य महत्व; भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति, 2015 के अनुसार भारत इस क्षेत्र में "निवल सुरक्षा प्रदाता" के रूप में अपनी भूमिका देखता है| ऊर्जा सुरक्षा - 70% से ज्यादा आयातित तेल पश्चिमी एशिया से; अमेरिका से शेल गैस/LNG आपूर्ति तथा नाइजीरिया, वेनेजुएला से तेल आपूर्ति आदि हेतु हिंद महासागर की अहम भूमिका; बड़ा अनन्य आर्थिक क्षेत्र(EEZ)से संसाधनों का दोहन; पॉलिमेटालिक न्यूडल्स तथा खनिजों के भण्डार के संदर्भ में हिंद महासागर की भूमिका; हिंद महासागर क्षेत्र में संसाधन प्रबंधन(सीबेड संसाधन; शैवाल संसाधन); डीप सागर मत्स्यन; रणनीतिक महत्व हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक मुद्दों के संदर्भ में- भारत एवं चीन के प्रतिस्पर्धी हित; चीन की आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी तथा अमेरिका का रणनीतिक प्रत्युतर(पाइवोट एशिया पालिसी); क्वाड; मालाबार आदि के संदर्भ में; चाबहार, मालदीव, अफ्रीका, श्रीलंका में भारतीय निवेश की सुरक्षा; मेरीटाइम सुरक्षा-काउंटर पायरेसी; क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसे आयामों को लेकर; अफ्रीका तक अपनी पहुँच बढ़ाने हेतु; लंबा तटीय क्षेत्र- आतंकवादरोधी अभियान; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी; आपदा(साइक्लोन; ज्वालामुखी; सुनामी) के क्षेत्र में सहयोग; कोरल्स तथा जलवायु परिवर्तन प्रभाव के संदर्भ में; स्पेस-डिप्लोमेसी हेतु; इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के संदर्भ में चिंताएँ विवैश्वीकरण की सोच में इसकी प्रासंगिकता का प्रश्न क्योंकि अधिकांश वैश्विक तथा क्षेत्रीय संगठनों के टूटने के खतरा; अमेरिका का इस क्षेत्र में घटती रूचि; इस क्षेत्र खासकर मध्य पूर्व एशिया के देशों में आंतरिक अस्थिरता का प्रभाव; इस क्षेत्र में चीन का बढ़ता दखल; आगे की राह विश्व कीप्रमुख शक्तियों के लिए हिंद महासागर के बढ़ते महत्व के संदर्भ में भारत को IORA पर ज्यादा फोकस रखना होगा| व्यापार, संसाधनों के दोहन को प्रोत्साहन देने हेतु इसकी महता को बढ़ाना; हिंद महासागर में भारत की भूमिका को बढ़ाने में इसका एक्टिव प्रयोग; उपरोक्त आयामों के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए कई चुनौतियाँ भी हैं जैसे- ओबोर तथा समुद्री सिल्क रूट; आतंकवादी हमलें; मोतियों की माला(स्प्रिंग ऑफ पर्ल्स); पायरेसी की बढ़ती घटनाएँ; क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी आदि| इन मुद्दों/चुनौतियों के संदर्भ मेंहिंद महासागर के क्षेत्र में भारत द्वारा कई उद्देश्य एवं रणनीतियां अपनाई जा रही हैं तथाइंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन की इसमें एक व्यापक भूमिका हो सकती है|
##Question:हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ या इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) का परिचय देते हुए इसके उद्देश्य तथा भारत के संदर्भ में इसकी महता का उल्लेख कीजिये| साथ ही, इस संदर्भ में प्रमुख चिंताओं को भी स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द) Mention the purpose and importance of Indian Ocean Rim Association (IORA) in the context of India. Also, clarify the major concerns in this context. (150-200 words)##Answer:एप्रोच- प्रस्तावना मेंहिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ या इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) का परिचय दीजिये| अगले भाग में इसके उद्देश्यों को रेखांकित कीजिये| अगले भाग में, भारत के संदर्भ में इसकी महता का बिंदुबार उल्लेख कीजिये| अंतिम भाग में इस संदर्भ में प्रमुख चिंताओं का उल्लेख कीजिये| निष्कर्षतः, आगे की राह बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| उत्तर- हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ या इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन(IORA) हिंद महासागर की परिधि में आने वाले देशों की एक क्षेत्रीय सहयोग पहल हैजिसकी स्थापना एक अंतर सरकारी संगठन के रूप में 1997 में मॉरीशस में आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से की गई। इसकी स्थापना की भूमिका नेल्सन मंडेला के 1995 में भारत यात्रा के दौरान रखी गयी थी जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक सहयोग हेतु हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को साथ आने का आह्वान किया था| यह एक मात्र अखिल हिंद महासागर समूह है। यह भिन्‍न-भिन्‍न आकार, आर्थिक मजबूती तथा भाषा एवं संस्‍कृति में व्‍यापक विविधता वाले तीन महाद्वीपों के देशों को एक मंच पर लाता है। इसका उद्देश्‍य हिंद महासागर के प‍रिधि क्षेत्र में, जहाँ तकरीबन दो बिलियन आबादी पाई जाती है, व्‍यापार, सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्‍कृतिक सहयोग के लिए एक मंच का सृजन करना है। इसमें वर्तमान में 21 सदस्य देश तथा 7 डायलॉग पार्टनर देश हैं| इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के उद्देश्य आर्थिक उद्देश्यों के तहत व्यापार उदारीकरण व्‍यापार के उदारीकरण के लिए सभी संभावनाओं एवं अवसरों का पता लगाना, क्षेत्र के अंदर माल, सेवाओं, निवेश एवं प्रौद्योगिकी के मुक्‍त एवं अधिक प्रवाह की दिशा में आने वाली अड़चनों को दूर करना तथा बाधाओं को कम करना। सदस्‍य राष्ट्रों के बीच किसी भेदभाव के बिना तथा अन्‍य क्षेत्रीय आर्थिक एवं व्‍यापार सहयोग व्‍यवस्‍थाओं के अंतर्गत बाध्‍यताओं पर प्रतिकूल प्रभाव के बिना सदस्‍य राष्ट्रों के व्‍यापार एवं उद्योग, शैक्षिक संस्‍थाओं, विद्धानों एवं लोगों के बीच घनिष्‍ठ अंत:क्रिया को प्रोत्‍साहित करना; वस्तुओं, सेवाओं, तकनीक तथा निवेश के फ्लो को बढ़ाना; आपसी हित के मुद्दों पर अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों में साझा दृष्टिकोण अपनाने तथा साझी रणनीति विकसित करने के लिए जहां वांछनीय हो वहां तथा वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों में सदस्‍य राज्‍यों के बीच सहयोग,आपसी विश्वास एवं वार्ता को सुदृढ़ करना; मानव-संसाधन के क्षेत्र में शोध तथा विकास को प्रोत्साहन; विशेष रूप से सदस्‍य राज्‍यों की प्रशिक्षण संस्‍थाओं, विश्‍वविद्यालयों तथा अन्‍य विशिष्‍ट संस्‍थाओं के बीच घनिष्‍ठ सहलग्‍नता के माध्‍यम से मानव संसाधन के विकास में सहयोग को बढ़ावा देना; सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा; इस क्षेत्र के तथा सदस्‍य राज्‍यों के स्‍थाई विकास एवं संतुलित प्रगति को बढ़ावा देना तथा क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग के लिए साझी जमीन सृजित करना; आर्थिक सहयोग के ऐसे क्षेत्रों पर बल देना जो साझे हितों के विकास के लिए तथा परस्‍पर लाभ प्राप्‍त करने के लिए अधिकतम अवसर प्रदान करते हैं| जकार्ता कॉन्कर्ड के माध्यम से इस संदर्भ में निम्न आयामों को भी महत्व प्रदान किया गया है- व्यापार, निवेश तथा आर्थिक सहयोग की क्षमता को बढ़ावा; गैर-पारंपरिक मुद्दों(अवैध, अनरिपोर्टेड तथा अनरेगुलेटेड मत्स्यन; मानव तथा ड्रग ट्रैफिकिंग; अवैध प्रवसन; पायरेसी) को संदर्भित करना; आतंकवाद तथा हिंसक कट्टरता के विरुद्ध बचाव एवं प्रतिरोधक क्षमता हेतु घोषणा(डिक्लेरेशन) को अपनाना; 2017-21 के लिए पहला एक्शन प्लान(शॉर्ट टर्म, मीडियम टर्म तथा लॉन्ग टर्म हेतु फ्लैगशिप इनिशिएटिव); भारत के संदर्भ में इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन की महता पेट्रोलियम व्यापार तथा अन्य वैश्विक व्यापार हेतु महत्वपूर्ण;भारत के 97% व्यापार हेतु महत्वपूर्ण; हिंद महासागर का परिधि क्षेत्र सामरिक एवं बहुमूल्‍य खनिजों, धातुओं एवं अन्‍य प्राकृतिक संसाधनों, समुद्री संसाधनों एवं ऊर्जा की दृष्टि से समृद्ध है तथा इन सबको अनन्‍य आर्थिक क्षेत्रों (ई ई जेड), महाद्वीपीय शेल्‍फ एवं गहन सीबेड से प्राप्‍त किया जा सकता है। इस संदर्भ में इस संगठन की भूमिका अहम् हो जाती है| हिंद महासागर का बढ़ता हुआ महत्व जिससे सामरिक एवं सैन्य महत्व; भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति, 2015 के अनुसार भारत इस क्षेत्र में "निवल सुरक्षा प्रदाता" के रूप में अपनी भूमिका देखता है| ऊर्जा सुरक्षा - 70% से ज्यादा आयातित तेल पश्चिमी एशिया से; अमेरिका से शेल गैस/LNG आपूर्ति तथा नाइजीरिया, वेनेजुएला से तेल आपूर्ति आदि हेतु हिंद महासागर की अहम भूमिका; बड़ा अनन्य आर्थिक क्षेत्र(EEZ)से संसाधनों का दोहन; पॉलिमेटालिक न्यूडल्स तथा खनिजों के भण्डार के संदर्भ में हिंद महासागर की भूमिका; हिंद महासागर क्षेत्र में संसाधन प्रबंधन(सीबेड संसाधन; शैवाल संसाधन); डीप सागर मत्स्यन; रणनीतिक महत्व हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक मुद्दों के संदर्भ में- भारत एवं चीन के प्रतिस्पर्धी हित; चीन की आक्रामक सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी तथा अमेरिका का रणनीतिक प्रत्युतर(पाइवोट एशिया पालिसी); क्वाड; मालाबार आदि के संदर्भ में; चाबहार, मालदीव, अफ्रीका, श्रीलंका में भारतीय निवेश की सुरक्षा; मेरीटाइम सुरक्षा-काउंटर पायरेसी; क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसे आयामों को लेकर; अफ्रीका तक अपनी पहुँच बढ़ाने हेतु; लंबा तटीय क्षेत्र- आतंकवादरोधी अभियान; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी; आपदा(साइक्लोन; ज्वालामुखी; सुनामी) के क्षेत्र में सहयोग; कोरल्स तथा जलवायु परिवर्तन प्रभाव के संदर्भ में; स्पेस-डिप्लोमेसी हेतु; इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन के संदर्भ में चिंताएँ विवैश्वीकरण की सोच में इसकी प्रासंगिकता का प्रश्न क्योंकि अधिकांश वैश्विक तथा क्षेत्रीय संगठनों के टूटने के खतरा; अमेरिका का इस क्षेत्र में घटती रूचि; इस क्षेत्र खासकर मध्य पूर्व एशिया के देशों में आंतरिक अस्थिरता का प्रभाव; इस क्षेत्र में चीन का बढ़ता दखल; आगे की राह विश्व कीप्रमुख शक्तियों के लिए हिंद महासागर के बढ़ते महत्व के संदर्भ में भारत को IORA पर ज्यादा फोकस रखना होगा| व्यापार, संसाधनों के दोहन को प्रोत्साहन देने हेतु इसकी महता को बढ़ाना; हिंद महासागर में भारत की भूमिका को बढ़ाने में इसका एक्टिव प्रयोग; उपरोक्त आयामों के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए कई चुनौतियाँ भी हैं जैसे- ओबोर तथा समुद्री सिल्क रूट; आतंकवादी हमलें; मोतियों की माला(स्प्रिंग ऑफ पर्ल्स); पायरेसी की बढ़ती घटनाएँ; क्लाइमेट रिफ्यूजी का मुद्दा; ड्रग्स, मानव तथा आर्म्स तस्करी आदि| इन मुद्दों/चुनौतियों के संदर्भ मेंहिंद महासागर के क्षेत्र में भारत द्वारा कई उद्देश्य एवं रणनीतियां अपनाई जा रही हैं तथाइंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन की इसमें एक व्यापक भूमिका हो सकती है|
50,417
The Mughal emperors had an important influence on the development of architecture in India. Comment? (10 Marks/150 words)
Brief approach Introduce an answer by referring to Mughal rule in India Discuss the role played by each Mughal emperor wrt Architecture Answer Both Babur and Humayun did not have enough time to create any monumental structure in India but Babur was successful in creating two mosques one at Panipat and other at sambhal. Humayun led the foundation of the city of Din Punah but he was not able to complete it After the death of Humayun, his wife Hamida begham and begha Begum created the mausoleum of Humayun. it was the first monumental building of Mughal and perfect unison of red sand stone and white marble. They also introduced four identical gardens known as Chahar bagh. Akbar Initially, he started construction of Redfort Agra but he did not complete it. He decided to create a separate capital complex at Fatehpur Sikri inside which many buildings were created. the complex is welcomed by a very big gateway Buland Darwaza. Tudore arch was created in Buland Darwaza which was later replicated by all the Mughal rulers. Akbar incorporated Traviata architecture in some of the buildings. for example Panch Mahal. In this building, he created hanging Rajput Balconies lental method of construction was used. example Jodha bai palace, Birbal Palace, Jahangiri Mahal, Salim Chisti"s tomb. This building was a perfect example of intricate jali work. Ibadat Khana It was a place of discussion and deliberation with the representatives of all the religions. Diwan-i-aam, Diwan-i-khas. Akbar also provided funds to create Govind Dev temple in Mathura Vrindavan Jahangir initially jhanger created tomb of Akbar at Sikandra in Agra. He also created Moti Masjid in Lahore. He also commissioned his own tomb at dilkhusa garden in Lahore which was later completed by Shahjahan. But the major initiatives related to architecture was taken by Noor Jahan. She created tomb of her father Mirza Gyas Begh which was It-mad-ud-daulah tomb in Agra. this is the first building of Mughal which is made up of pure white marble. The heavy use of Pietra Dura technique can also be seen in this building. Noor Jahan was also instrumental in planting the Shalimar Bagh and Nishat Bagh of Shrinagar. Shah Jahan this period was the climax of Mughal Architecture and also Indo Islamic architecture. All the features of Indo Islamic architecture were present at this point in time. for example, one can see different geometrical patterns like dado panel, Arabesque technique, petra dura, garden, water pools and fountains. Examples of buildings created by Shahjahan- he completed red fort Agra, created Redfort Delhi, Jama masjid Delhi, BadShaii mosque lahore, created the city of Shahjahanabad Aurangzeb During this period the patronage to art and architecture declined and only one mosque was created by Aurangzeb which is Moti Masjid inside Red fort Delhi. he also commissioned Bibi ka Kaqbara at Aurangabad which was completed by his son Bahadur Shah Jafar.
##Question:The Mughal emperors had an important influence on the development of architecture in India. Comment? (10 Marks/150 words)##Answer:Brief approach Introduce an answer by referring to Mughal rule in India Discuss the role played by each Mughal emperor wrt Architecture Answer Both Babur and Humayun did not have enough time to create any monumental structure in India but Babur was successful in creating two mosques one at Panipat and other at sambhal. Humayun led the foundation of the city of Din Punah but he was not able to complete it After the death of Humayun, his wife Hamida begham and begha Begum created the mausoleum of Humayun. it was the first monumental building of Mughal and perfect unison of red sand stone and white marble. They also introduced four identical gardens known as Chahar bagh. Akbar Initially, he started construction of Redfort Agra but he did not complete it. He decided to create a separate capital complex at Fatehpur Sikri inside which many buildings were created. the complex is welcomed by a very big gateway Buland Darwaza. Tudore arch was created in Buland Darwaza which was later replicated by all the Mughal rulers. Akbar incorporated Traviata architecture in some of the buildings. for example Panch Mahal. In this building, he created hanging Rajput Balconies lental method of construction was used. example Jodha bai palace, Birbal Palace, Jahangiri Mahal, Salim Chisti"s tomb. This building was a perfect example of intricate jali work. Ibadat Khana It was a place of discussion and deliberation with the representatives of all the religions. Diwan-i-aam, Diwan-i-khas. Akbar also provided funds to create Govind Dev temple in Mathura Vrindavan Jahangir initially jhanger created tomb of Akbar at Sikandra in Agra. He also created Moti Masjid in Lahore. He also commissioned his own tomb at dilkhusa garden in Lahore which was later completed by Shahjahan. But the major initiatives related to architecture was taken by Noor Jahan. She created tomb of her father Mirza Gyas Begh which was It-mad-ud-daulah tomb in Agra. this is the first building of Mughal which is made up of pure white marble. The heavy use of Pietra Dura technique can also be seen in this building. Noor Jahan was also instrumental in planting the Shalimar Bagh and Nishat Bagh of Shrinagar. Shah Jahan this period was the climax of Mughal Architecture and also Indo Islamic architecture. All the features of Indo Islamic architecture were present at this point in time. for example, one can see different geometrical patterns like dado panel, Arabesque technique, petra dura, garden, water pools and fountains. Examples of buildings created by Shahjahan- he completed red fort Agra, created Redfort Delhi, Jama masjid Delhi, BadShaii mosque lahore, created the city of Shahjahanabad Aurangzeb During this period the patronage to art and architecture declined and only one mosque was created by Aurangzeb which is Moti Masjid inside Red fort Delhi. he also commissioned Bibi ka Kaqbara at Aurangabad which was completed by his son Bahadur Shah Jafar.
50,536
मानसून से आप क्या समझते हैं? मानसून निर्माण के विभिन्न सिद्धांतों को सचित्र स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by monsoon? Explain the various principles of monsoon formation with suitable diagram. (150-200 words)
Approach : भूगोल की दृष्टि से मानसून को स्पष्ट कीजिए। मानसून निर्माण की क्रियाविधि से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में संक्षिप्त में मानसून के महत्व को इंगित कर सकते हैं। उत्तर- ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है, वर्ष भर में पवनों के प्रतिरूप में होने वाला ऋतुवत प्रत्यावर्तन। इसके अंतर्गत पवने वर्ष में लगभग छह महीने तक एक दिशा में तथा छ: महीने तक ठीक विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। यह मानसूनी जलवायु का विशिष्ट लक्षण है। मानसून एक जटिल मौसमी परिघटना है। मौसम विज्ञान के विशेषज्ञों ने मानसून की उत्पत्ति के संबंध में अनेक अवधारनाएं विकसित की हैं। मानसून के सिद्धान्त तापीय सिद्धान्त: तिब्बत के पठार पर उच्च तापमान (निम्न वायुदाब), अरब सागर में निम्न तापमान(उच्च वायुदाब) का विकास होता है। तटवर्ती पवन संचलन प्रारम्भ होता है। तापमान में परिवर्तन के कारण मानसून का आगमन होता है। मानसून की अनिश्चितता, वर्षा की अनिश्चितता को स्पष्ट नहीं कर पाया। हेडली का सिद्धान्त इस सिद्धान्त के अनुसार मानसून को वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण का अभिन्न अंग माना गया है। मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण का परिणाम है। ग्रीष्मकाल में अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र विषुवत रेखा से धीरे धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करता है। औसत विस्तार लगभग 10 डिग्री होता है परंतु भारतीय उपमहाद्वीप में यह 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक विस्तारित हो जाता है। क्यूंकी उत्तरी हिन्द महासागर में भारत की अवस्थिति इस क्षेत्र में ITCZ के दोलन का कारण बनती है। परिणामस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवन अपने नए गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिए उत्तरी गोलर्ध्ह में प्रवेश करने के बाद दाहिने मुड़ती है। और दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में बहने लगती है इसे दक्षिणी पश्चिमी या ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं। धीरे धीरे जब तापमान घटने लगता है तो ITCZ दक्षिण की ओर खिसकते हुए विषुवत रेखा या उसके पार चली जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी सामान्य व्यापारिक पावन उत्तर पश्चिम से दक्षिण पश्चिम की दिशा में संचलन करती है। इसे ही लौटता हुआ मानसून या शीतकालीन मानसून कहते है अर्थात इस व्याख्या के अनुसार मानसून व्यापारिक पवन का ही रूप है। शीतकालीन मानसून उत्तरी पूर्वी व्यापारिक पवन ग्रीष्मकालीन मानसून दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन ही है। मानसून पर जेट धारा का प्रभाव: शीतकाल में उष्णकटिबंधीय पछुआ जेट धारा पश्चिम से पूर्व की दिशा में चलते हुए हिमालय के पास आकर दो भागों में टूट जाती है। उसका एक भाग उत्तरी मैदान के ऊपर से गुजरता है और दूसरा तिब्बत के पठार के उत्तर से क्यूंकी हिमालय तथा तिब्बत के पठार के ऊपर जेट धारा के संचलन के लिए जलवायविक अनुकूलता नहीं होती है। मानसून पवनों के संचलन तथा तंत्र के निर्माण होने के बाद भी पछुआ जेट धारा की उपस्थिती में मानसून का आगमन नहीं होता है अर्थात पछुआ जेट धारा के उत्तर की ओर विस्थापन के बाद ही दक्षिणी पश्चिमी मानसून का आगमन संभव है क्योंकि उत्तरी मैदान में होने वाले वायु के आरोहण को यह रोक देती है। अर्थात मानसून का ऊपरी अंग नहीं बन पाता है। जैसे ही यह जेट धारा विस्थापित होती है उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा का निर्माण होता है जो हिमालय के पूर्वी भाग से चलकर अफ्रीका के पूर्वी तट पर उतरती है। ये मानसून तंत्र को पूर्ण करती है। इसके निर्माण के साथ ही मानसून का आगमन हो जाता है। तापमान घटने के साथ जैसे ही पछुआ जेट धारा का आगमन होता है पूर्वी जेट धारा विलुप्त हो जाती है। और मानसून का लौटना आरंभ हो जाता है। ITCZ का वह भाग जो भारतीय महाद्वीप के ऊपर से गुजरता है उसे मानसून गर्त कहते हैं। पछुआ जेट धारा मानसून तंत्र को पूर्ण होने नहीं देती है। मानसून विशेष मौसमी परिदशाओं की घटना है। भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाली वर्षा का अधिकांश हिस्सा दक्षिणी पश्चिमी मानसून से होता है। मानसून भारत के सामाजिक आर्थिक विकास की धुरी है।
##Question:मानसून से आप क्या समझते हैं? मानसून निर्माण के विभिन्न सिद्धांतों को सचित्र स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by monsoon? Explain the various principles of monsoon formation with suitable diagram. (150-200 words)##Answer:Approach : भूगोल की दृष्टि से मानसून को स्पष्ट कीजिए। मानसून निर्माण की क्रियाविधि से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में संक्षिप्त में मानसून के महत्व को इंगित कर सकते हैं। उत्तर- ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है, वर्ष भर में पवनों के प्रतिरूप में होने वाला ऋतुवत प्रत्यावर्तन। इसके अंतर्गत पवने वर्ष में लगभग छह महीने तक एक दिशा में तथा छ: महीने तक ठीक विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। यह मानसूनी जलवायु का विशिष्ट लक्षण है। मानसून एक जटिल मौसमी परिघटना है। मौसम विज्ञान के विशेषज्ञों ने मानसून की उत्पत्ति के संबंध में अनेक अवधारनाएं विकसित की हैं। मानसून के सिद्धान्त तापीय सिद्धान्त: तिब्बत के पठार पर उच्च तापमान (निम्न वायुदाब), अरब सागर में निम्न तापमान(उच्च वायुदाब) का विकास होता है। तटवर्ती पवन संचलन प्रारम्भ होता है। तापमान में परिवर्तन के कारण मानसून का आगमन होता है। मानसून की अनिश्चितता, वर्षा की अनिश्चितता को स्पष्ट नहीं कर पाया। हेडली का सिद्धान्त इस सिद्धान्त के अनुसार मानसून को वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण का अभिन्न अंग माना गया है। मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण का परिणाम है। ग्रीष्मकाल में अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र विषुवत रेखा से धीरे धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करता है। औसत विस्तार लगभग 10 डिग्री होता है परंतु भारतीय उपमहाद्वीप में यह 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक विस्तारित हो जाता है। क्यूंकी उत्तरी हिन्द महासागर में भारत की अवस्थिति इस क्षेत्र में ITCZ के दोलन का कारण बनती है। परिणामस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवन अपने नए गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिए उत्तरी गोलर्ध्ह में प्रवेश करने के बाद दाहिने मुड़ती है। और दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में बहने लगती है इसे दक्षिणी पश्चिमी या ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं। धीरे धीरे जब तापमान घटने लगता है तो ITCZ दक्षिण की ओर खिसकते हुए विषुवत रेखा या उसके पार चली जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी सामान्य व्यापारिक पावन उत्तर पश्चिम से दक्षिण पश्चिम की दिशा में संचलन करती है। इसे ही लौटता हुआ मानसून या शीतकालीन मानसून कहते है अर्थात इस व्याख्या के अनुसार मानसून व्यापारिक पवन का ही रूप है। शीतकालीन मानसून उत्तरी पूर्वी व्यापारिक पवन ग्रीष्मकालीन मानसून दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन ही है। मानसून पर जेट धारा का प्रभाव: शीतकाल में उष्णकटिबंधीय पछुआ जेट धारा पश्चिम से पूर्व की दिशा में चलते हुए हिमालय के पास आकर दो भागों में टूट जाती है। उसका एक भाग उत्तरी मैदान के ऊपर से गुजरता है और दूसरा तिब्बत के पठार के उत्तर से क्यूंकी हिमालय तथा तिब्बत के पठार के ऊपर जेट धारा के संचलन के लिए जलवायविक अनुकूलता नहीं होती है। मानसून पवनों के संचलन तथा तंत्र के निर्माण होने के बाद भी पछुआ जेट धारा की उपस्थिती में मानसून का आगमन नहीं होता है अर्थात पछुआ जेट धारा के उत्तर की ओर विस्थापन के बाद ही दक्षिणी पश्चिमी मानसून का आगमन संभव है क्योंकि उत्तरी मैदान में होने वाले वायु के आरोहण को यह रोक देती है। अर्थात मानसून का ऊपरी अंग नहीं बन पाता है। जैसे ही यह जेट धारा विस्थापित होती है उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा का निर्माण होता है जो हिमालय के पूर्वी भाग से चलकर अफ्रीका के पूर्वी तट पर उतरती है। ये मानसून तंत्र को पूर्ण करती है। इसके निर्माण के साथ ही मानसून का आगमन हो जाता है। तापमान घटने के साथ जैसे ही पछुआ जेट धारा का आगमन होता है पूर्वी जेट धारा विलुप्त हो जाती है। और मानसून का लौटना आरंभ हो जाता है। ITCZ का वह भाग जो भारतीय महाद्वीप के ऊपर से गुजरता है उसे मानसून गर्त कहते हैं। पछुआ जेट धारा मानसून तंत्र को पूर्ण होने नहीं देती है। मानसून विशेष मौसमी परिदशाओं की घटना है। भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाली वर्षा का अधिकांश हिस्सा दक्षिणी पश्चिमी मानसून से होता है। मानसून भारत के सामाजिक आर्थिक विकास की धुरी है।
50,544
Bring out the relevance of seismic study in determining the structure of the interior of the earth. (200 words/10 marks)
Approach : Introduce an answer by referring to direct and indirect methods of knowing the interior of the Earth. Explain Seismic Waves in brief. Discuss the utilities of different types of Seismic Waves inknowing the interior of the Earth. Answer : The direct sources to study the interior of the earth do not provide the complete picture, so indirect study has to be involved and inferences have to be drawn to determine the structure of the interior of the earth. In modern views as direct factual information is not available therefore modern studies are based on Indirect evidence. Seismic waves due to natural or man-induced earthquakes travel through the earth as along the earth’s surface. By using seismograph, a graphic recording of the earthquake waves or vibrations is made, and scientists are able to get some idea of the kind of rocks which are found below the earth’s surface. It is most scientific and the only reliable sources to study earth’s interior. Different types of Seismic Waves A] Body Waves - The waves which travel through the body of the earth. They are of two types: 1.Primary Waves(Longitudinal waves) Travel fastest through solid material. (Crust. Mantle, Inner core) Travel through Liquid material. (Liquid outer core). 2. Secondary Waves -Can travel through solidsonly B] Surface waves -When the body waves reach the surface of the earth, they become surface waves.Travel along the earth’s surface and travel longest distances and are most destructive. They are of two types- 1.Love Waves-Love waves have the same motion as S-waves but without the vertical displacement. They move the ground from side to side in a horizontal plane but at right angles to the direction of propagation. Love waves are particularly damaging to the foundations of structures because of the horizontal ground motion they generate. Love waves can also cause horizontal shearing of the ground. They usually travel slightly faster than Rayleigh waves, at a speed that is usually about 10% slower than S-waves,but like S-waves, they cannot spread through water. 2.Rayleigh Waves-Rayleigh waves, also known as ground roll, spread through the ground as ripples, similar to rolling waves on the ocean. Like rolling ocean waves, Rayleigh waves move both vertically and horizontally in a vertical plane pointed in the direction in which the waves are travelling. Utilitiesof Seismic Waves inknowing the interior of the Earth Seismic waves are reflected when they strike the interface between two different materials having different physical properties. It is observed that whenever an earthquake occurs creating primary, secondary and surface waves, there is a clearly demarcated region on the other side of the globe, where P waves and S waves are not observed i.e., they don’t reach this zone after crossing through the earth’s interior (P and S wave Shadow Zones) If the earth’s interior was having a uniform density, then the waves should have passed through the earth’s interior without reflection or refraction. Inferences from this seismic study reveal that P-wave passes through crust, mantle and core, it has a shadow zone between 103- 143 degrees. This deflection indicates that the nature of the inner and outer core are different. The speed of these waves and the changes in this speed is considered to see the difference. S-waves have a shadow zone between 103 degrees on both sides. They don"tpass through liquids, this suggests that the inner core is liquid in nature. Thus the seismic study is relevant to draw the picture of the nature and structure of the interior of the earth, which otherwise is difficult to decipher.
##Question:Bring out the relevance of seismic study in determining the structure of the interior of the earth. (200 words/10 marks)##Answer:Approach : Introduce an answer by referring to direct and indirect methods of knowing the interior of the Earth. Explain Seismic Waves in brief. Discuss the utilities of different types of Seismic Waves inknowing the interior of the Earth. Answer : The direct sources to study the interior of the earth do not provide the complete picture, so indirect study has to be involved and inferences have to be drawn to determine the structure of the interior of the earth. In modern views as direct factual information is not available therefore modern studies are based on Indirect evidence. Seismic waves due to natural or man-induced earthquakes travel through the earth as along the earth’s surface. By using seismograph, a graphic recording of the earthquake waves or vibrations is made, and scientists are able to get some idea of the kind of rocks which are found below the earth’s surface. It is most scientific and the only reliable sources to study earth’s interior. Different types of Seismic Waves A] Body Waves - The waves which travel through the body of the earth. They are of two types: 1.Primary Waves(Longitudinal waves) Travel fastest through solid material. (Crust. Mantle, Inner core) Travel through Liquid material. (Liquid outer core). 2. Secondary Waves -Can travel through solidsonly B] Surface waves -When the body waves reach the surface of the earth, they become surface waves.Travel along the earth’s surface and travel longest distances and are most destructive. They are of two types- 1.Love Waves-Love waves have the same motion as S-waves but without the vertical displacement. They move the ground from side to side in a horizontal plane but at right angles to the direction of propagation. Love waves are particularly damaging to the foundations of structures because of the horizontal ground motion they generate. Love waves can also cause horizontal shearing of the ground. They usually travel slightly faster than Rayleigh waves, at a speed that is usually about 10% slower than S-waves,but like S-waves, they cannot spread through water. 2.Rayleigh Waves-Rayleigh waves, also known as ground roll, spread through the ground as ripples, similar to rolling waves on the ocean. Like rolling ocean waves, Rayleigh waves move both vertically and horizontally in a vertical plane pointed in the direction in which the waves are travelling. Utilitiesof Seismic Waves inknowing the interior of the Earth Seismic waves are reflected when they strike the interface between two different materials having different physical properties. It is observed that whenever an earthquake occurs creating primary, secondary and surface waves, there is a clearly demarcated region on the other side of the globe, where P waves and S waves are not observed i.e., they don’t reach this zone after crossing through the earth’s interior (P and S wave Shadow Zones) If the earth’s interior was having a uniform density, then the waves should have passed through the earth’s interior without reflection or refraction. Inferences from this seismic study reveal that P-wave passes through crust, mantle and core, it has a shadow zone between 103- 143 degrees. This deflection indicates that the nature of the inner and outer core are different. The speed of these waves and the changes in this speed is considered to see the difference. S-waves have a shadow zone between 103 degrees on both sides. They don"tpass through liquids, this suggests that the inner core is liquid in nature. Thus the seismic study is relevant to draw the picture of the nature and structure of the interior of the earth, which otherwise is difficult to decipher.
50,549
मानसून से आप क्या समझते हैं? मानसून निर्माण के विभिन्न सिद्धांतों को सचित्र स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by monsoon? Explain the various principles of monsoon formation with suitable diagram. (150-200 words)
Approach : भूगोल की दृष्टि से मानसून को स्पष्ट कीजिए। मानसून निर्माण की क्रियाविधि से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में संक्षिप्त में मानसून के महत्व को इंगित कर सकते हैं। उत्तर - ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है, वर्ष भर में पवनों के प्रतिरूप में होने वाला ऋतुवत प्रत्यावर्तन। इसके अंतर्गत पवने वर्ष में लगभग छह महीने तक एक दिशा में तथा छ: महीने तक ठीक विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। यह मानसूनी जलवायु का विशिष्ट लक्षण है। मानसून एक जटिल मौसमी परिघटना है। मौसम विज्ञान के विशेषज्ञों ने मानसून की उत्पत्ति के संबंध में अनेक अवधारनाएं विकसित की हैं। मानसून के सिद्धान्त तापीय सिद्धान्त: तिब्बत के पठार पर उच्च तापमान (निम्न वायुदाब), अरब सागर में निम्न तापमान(उच्च वायुदाब) का विकास होता है। तटवर्ती पवन संचलन प्रारम्भ होता है। तापमान में परिवर्तन के कारण मानसून का आगमन होता है। मानसून की अनिश्चितता, वर्षा की अनिश्चितता को स्पष्ट नहीं कर पाया। हेडली का सिद्धान्त इस सिद्धान्त के अनुसार मानसून को वैश्विक वायुमंडलीय परीसंचरण का अभिन्न अंग माना गया है। मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण का परिणाम है। ग्रीष्मकाल में अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र विषुवत रेखा से धीरे धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करता है। औसत विस्तार लगभग 10 डिग्री होता है परंतु भारतीय उपमहाद्वीप में यह 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक विस्तारित हो जाता है। क्यूंकी उत्तरी हिन्द महासागर में भारत की अवस्थिति इस क्षेत्र में ITCZ के दोलन का कारण बनती है। परिणामस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवन अपने नए गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिए उत्तरी गोलर्ध्ह में प्रवेश करने के बाद दाहिने मुड़ती है। और दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में बहने लगती है इसे दक्षिणी पश्चिमी या ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं। धीरे धीरे जब तापमान घटने लगता है तो ITCZ दक्षिण की ओर खिसकते हुए विषुवत रेखा या उसके पार चली जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी सामान्य व्यापारिक पावन उत्तर पश्चिम से दक्षिण पश्चिम की दिशा में संचलन करती है। इसे ही लौटता हुआ मानसून या शीतकालीन मानसून कहते है अर्थात इस व्याख्या के अनुसार मानसून व्यापारिक पवन का ही रूप है। शीतकालीन मानसून उत्तरी पूर्वी व्यापारिक पवन ग्रीष्मकालीन मानसून दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन ही है। मानसून पर जेट धारा का प्रभाव: शीतकाल में उष्णकटिबंधीय पछुआ जेट धारा पश्चिम से पूर्व की दिशा में चलते हुए हिमालय के पास आकर दो भागों में टूट जाती है। उसका एक भाग उत्तरी मैदान के ऊपर से गुजरता है और दूसरा तिब्बत के पठार के उत्तर से। क्यूंकी हिमालय तथा तिब्बत के पठार के ऊपर जेट धारा के संचलन के लिए जलवायविक अनुकूलता नहीं होती है। मानसून पवनों के संचलन तथा तंत्र के निर्माण होने के बाद भी पछुआ जेट धारा की उपस्थिती में मानसून का आगमन नहीं होता है अर्थात पछुआ जेट धारा के उत्तर की ओर विस्थापन के बाद ही दक्षिणी पश्चिमी मानसून का आगमन संभव है क्योंकि उत्तरी मैदान में होने वाले वायु के आरोहण को यह रोक देती है। अर्थात मानसून का ऊपरी अंग नहीं बन पाता है। जैसे ही यह जेट धारा विस्थापित होती है उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा का निर्माण होता है जो हिमालय के पूर्वी भाग से चलकर अफ्रीका के पूर्वी तट पर उतरती है। ये मानसून तंत्र को पूर्ण करती है। इसके निर्माण के साथ ही मानसून का आगमन हो जाता है। तापमान घटने के साथ जैसे ही पछुआ जेट धारा का आगमन होता है पूर्वी जेट धारा विलुप्त हो जाती है। और मानसून का लौटना आरंभ हो जाता है। ITCZ का वह भाग जो भारतीय महाद्वीप के ऊपर से गुजरता है उसे मानसून गर्त कहते हैं। पछुआ जेट धारा मानसून तंत्र को पूर्ण होने नहीं देती है। मानसून विशेष मौसमी परिदशाओं की घटना है। भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाली वर्षा का अधिकांश हिस्सा दक्षिणी पश्चिमी मानसून से होता है। मानसून भारत के सामाजिक आर्थिक विकास की धुरी है।
##Question:मानसून से आप क्या समझते हैं? मानसून निर्माण के विभिन्न सिद्धांतों को सचित्र स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द) What do you understand by monsoon? Explain the various principles of monsoon formation with suitable diagram. (150-200 words)##Answer:Approach : भूगोल की दृष्टि से मानसून को स्पष्ट कीजिए। मानसून निर्माण की क्रियाविधि से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट कीजिए। निष्कर्ष में संक्षिप्त में मानसून के महत्व को इंगित कर सकते हैं। उत्तर - ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है, वर्ष भर में पवनों के प्रतिरूप में होने वाला ऋतुवत प्रत्यावर्तन। इसके अंतर्गत पवने वर्ष में लगभग छह महीने तक एक दिशा में तथा छ: महीने तक ठीक विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है। यह मानसूनी जलवायु का विशिष्ट लक्षण है। मानसून एक जटिल मौसमी परिघटना है। मौसम विज्ञान के विशेषज्ञों ने मानसून की उत्पत्ति के संबंध में अनेक अवधारनाएं विकसित की हैं। मानसून के सिद्धान्त तापीय सिद्धान्त: तिब्बत के पठार पर उच्च तापमान (निम्न वायुदाब), अरब सागर में निम्न तापमान(उच्च वायुदाब) का विकास होता है। तटवर्ती पवन संचलन प्रारम्भ होता है। तापमान में परिवर्तन के कारण मानसून का आगमन होता है। मानसून की अनिश्चितता, वर्षा की अनिश्चितता को स्पष्ट नहीं कर पाया। हेडली का सिद्धान्त इस सिद्धान्त के अनुसार मानसून को वैश्विक वायुमंडलीय परीसंचरण का अभिन्न अंग माना गया है। मानसून वायुदाब पेटियों के स्थानांतरण का परिणाम है। ग्रीष्मकाल में अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र विषुवत रेखा से धीरे धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करता है। औसत विस्तार लगभग 10 डिग्री होता है परंतु भारतीय उपमहाद्वीप में यह 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक विस्तारित हो जाता है। क्यूंकी उत्तरी हिन्द महासागर में भारत की अवस्थिति इस क्षेत्र में ITCZ के दोलन का कारण बनती है। परिणामस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवन अपने नए गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिए उत्तरी गोलर्ध्ह में प्रवेश करने के बाद दाहिने मुड़ती है। और दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की दिशा में बहने लगती है इसे दक्षिणी पश्चिमी या ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं। धीरे धीरे जब तापमान घटने लगता है तो ITCZ दक्षिण की ओर खिसकते हुए विषुवत रेखा या उसके पार चली जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी सामान्य व्यापारिक पावन उत्तर पश्चिम से दक्षिण पश्चिम की दिशा में संचलन करती है। इसे ही लौटता हुआ मानसून या शीतकालीन मानसून कहते है अर्थात इस व्याख्या के अनुसार मानसून व्यापारिक पवन का ही रूप है। शीतकालीन मानसून उत्तरी पूर्वी व्यापारिक पवन ग्रीष्मकालीन मानसून दक्षिणी पश्चिमी व्यापारिक पवन ही है। मानसून पर जेट धारा का प्रभाव: शीतकाल में उष्णकटिबंधीय पछुआ जेट धारा पश्चिम से पूर्व की दिशा में चलते हुए हिमालय के पास आकर दो भागों में टूट जाती है। उसका एक भाग उत्तरी मैदान के ऊपर से गुजरता है और दूसरा तिब्बत के पठार के उत्तर से। क्यूंकी हिमालय तथा तिब्बत के पठार के ऊपर जेट धारा के संचलन के लिए जलवायविक अनुकूलता नहीं होती है। मानसून पवनों के संचलन तथा तंत्र के निर्माण होने के बाद भी पछुआ जेट धारा की उपस्थिती में मानसून का आगमन नहीं होता है अर्थात पछुआ जेट धारा के उत्तर की ओर विस्थापन के बाद ही दक्षिणी पश्चिमी मानसून का आगमन संभव है क्योंकि उत्तरी मैदान में होने वाले वायु के आरोहण को यह रोक देती है। अर्थात मानसून का ऊपरी अंग नहीं बन पाता है। जैसे ही यह जेट धारा विस्थापित होती है उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा का निर्माण होता है जो हिमालय के पूर्वी भाग से चलकर अफ्रीका के पूर्वी तट पर उतरती है। ये मानसून तंत्र को पूर्ण करती है। इसके निर्माण के साथ ही मानसून का आगमन हो जाता है। तापमान घटने के साथ जैसे ही पछुआ जेट धारा का आगमन होता है पूर्वी जेट धारा विलुप्त हो जाती है। और मानसून का लौटना आरंभ हो जाता है। ITCZ का वह भाग जो भारतीय महाद्वीप के ऊपर से गुजरता है उसे मानसून गर्त कहते हैं। पछुआ जेट धारा मानसून तंत्र को पूर्ण होने नहीं देती है। मानसून विशेष मौसमी परिदशाओं की घटना है। भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाली वर्षा का अधिकांश हिस्सा दक्षिणी पश्चिमी मानसून से होता है। मानसून भारत के सामाजिक आर्थिक विकास की धुरी है।
50,554
भारत में यूरोपीय स्थापत्य का विकास मुख्यतः आइबेरियन शैली और इंडो-गोथिक शैली/विक्टोरियन शैली के रूप में हुआ| टिप्पणी कीजिये| ( 150 से 200 शब्द, 10 अंक) European architecture developed mainly in India as Iberian style and Indo-Gothic style / Victorian style. Comment (150 to 200 words, 10 marks)
दृष्टिकोण 1- भारत में यूरोपीय स्थापत्य के विकास की पृष्ठभूमि को भूमिका में स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में पुर्तगालियों एवं फ्रेंच स्थापत्य के विकास की जानकारी दीजिये 3- दूसरे भाग में भारत में अंग्रेजी स्थापत्य के विकास को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्थापत्य में विविधता के संदर्भ में महत्वपूर्ण योगदान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियाँ भारत में अपने साथ यूरोपीय वास्तु व स्थापत्य कला भी लाईं। उन्होंने भारत में कई ऐसी इमारतों का निर्माण कराया जिनमें शास्त्रीय, गोथिक व नवजागरण शैलियों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। भारत में यूरोपीय स्थापत्य के विकास में पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों एवं अंग्रेजों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है| इन्होने अपने नियन्त्रण के अधीन क्षेत्रों में विभिन्न इमारतों का निर्माण करवाया था| यूरोपीय शक्तियों द्वारा भारत में स्थापत्य के विकास में अलग-अलग शैलियों का प्रयोग किया जो उनके मातृदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से प्रभावित थीं| भारत में विकसित यूरोपीय स्थापत्य में कुछ भारतीय विशिष्टताओं का भी समावेश किया गया| पुर्तगाली स्थापत्य/ आइबेरियन शैली भारत में यूरोपीय स्थापत्य के अंतर्गत सर्वप्रथम पुर्तगालियों के द्वारा निर्मित इमारतों के साक्ष्य मिलते हैं| पुर्तगाली स्थापत्य के अधिकांश साक्ष्य गोवा दमन दीव आदि स्थलों से प्राप्त हुए हैं, पुर्तगालियों ने भारत में धार्मिक एवं लौकिक दोनों ही उद्देश्यों से स्थापत्य का निर्माण किया जैसे चर्च, प्रशासनिक कार्यालय, व्यापारिक केंद्र, आवासीय भवन आदि, 1619 में गोवा में निर्मित, संत कैथेड्रल का चर्च स्थापत्य के दृष्टिकोण से विशेष महत्त्व रखता है| इसकी गणना विश्व के विशाल चर्चों में से एक रूप में होती है निर्माण में ईंटों एवं लकड़ी का बड़े पैमाने पर प्रयोग, प्रवेशद्वार, खिड़कियाँ एवं छतों के निर्माण में लकड़ी का बहुतायत में प्रयोग, प्रायः दरवाजे के ऊपर एवं दरवाजों के साथ खिडकियों का निर्माण, ढलवां छतों का निर्माण, मीनार निर्माण आदि पुर्तगाली स्थापत्य की सामान्य विशेषताएं है| इसे आइबेरियन शैली के रूप में भी जाना जाता है| इसी तरह फ्रांसीसियों ने भी पांडिचेरी एवं चंद्रनगर में कुछ इमारतों का निर्माण कराया था तथापि भारत में यूरोपीय स्थापत्य के विकास में फ्रांसीसियों का योगदान अपेक्षाकृत रूप से कम रहा है |ध्यातव्य है कि पांडिचेरी को फ्रांसीसियों द्वारा ग्रिड प्रारूप पर बसाया गया है| अंग्रेजी स्थापत्य/नव-गोथिक/विक्टोरियन शैली अंग्रेजों का भारत के सर्वाधिक भूभाग पर नियंत्रण था, ये लम्बी अवधि तक नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहे इसके अतिरिक्त संसाधनों पर नियंत्रण होने सेयूरोपीय स्थापत्य का भारत में सर्वाधिक विकास अंग्रेजों के समय हुआ, तथापि भारत में ब्रिटिश स्थापत्य के विकास की प्रक्रिया में एकरूपता नहीं दिखती है, प्रारम्भिक दौर में विशेषकर 1857 से पूर्व व्यापारिक केन्द्रों एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित हो कर कुछ किलों मात्र का निर्माण किया गया जैसे सेंट जोर्ज, फोर्ट विलियम आदि | इसी चरण में कुछ नगरों का विकास किया गया और कुछ शैक्षणिक इमारतों की भी स्थापना की गयी थी एक राजनीति शक्ति के रूप में जब अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई तब राजनीतिक श्रेष्ठता की भावना से प्रभावित होकर भी प्रशासनिक इमारतों का निर्माण किया जाने लगा| 1857 के बाद गोथिक स्थापत्य शैली में भारतीय विशेषताओं को भी शामिल किया जाने लगा,इसके मिश्रित स्वरुप के कारण ही इस शैली को नव-गोथिक कहा गया| इस चरण में विशाल संरचना वाली इमारतें बनायी गयीं| ध्यातव्य है कि अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई शैली को इंडो-सारासेनिक शैली भी कहते हैं। इन इमारतों के निर्माण में स्टील एवं सीमेंट का प्रयोग किया जाता था| इन्होने स्थापत्य के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर एवं चूना पत्थर का भी प्रयोग किया| नव-गोथिक या विक्टोरियन इमारतों में मीनार, ढलवां छत, खिड़कियाँ(प्रवेश द्वार के ऊपर भी), विशाल खिड़कियाँ आदि विशेषताएं देखी जा सकती हैं, इन इमारतों में इस्लामिक विशेषताएं जैसे गुम्बद एवं मेहराब तथा प्राचीन भारतीय विशेषताएं जैसे खम्बों, जालियों आदि का मिश्रण भी देख सकते हैं| मिश्रित शैली का एक प्रमुख उद्देश्य 1857 के पश्चात भारतीयों को अंग्रेजों से जोड़ना भी था, अंग्रेजों के द्वारा निर्मित स्थापत्य के साक्ष्य बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास एवं दिल्ली जैसे नगरों के साथ ही सभी प्रांतीय एवं जिला मुख्यालयों में देखे जा सकते हैं| प्रारम्भिक उच्च न्यायालय, पोस्ट ऑफिस, कलकत्ता में राइटर्स बिल्डिंग आदिइसके प्रमुख उदहारण हैं 1911 में जोर्ज पंचम के सम्मान में बॉम्बे में गेटवे ऑफ़ इंडिया की नीव रखी गयी,इसकी सर्वप्रमुख विशेषता इसकी विशालता है, 1911 में ही दिल्ली को राजधानी बनाये जाने की घोषणा के साथ ही स्थापत्य के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं| इंडो-गोथिक शैली की सामान्य विशेषताएं इस दौर में भी बनी रहीं लेकिन अब इमारतों के निर्माण में विशालता एवं गोलाकार प्रारूप का विशेष ध्यान रखा जाना एक महत्वपूर्ण पहलू था,यह विक्टोरियन शैली की प्रमुख विशेषता है| ब्रिटिश स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण के रूप में 1921 में कलकत्ता में निर्मित विक्टोरिया मेमोरियल पर ताजमहल का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है| नई दिल्ली में प्रशासनिक कार्यालयों तथा आवसीय भवनों के निर्माण एवं नियोजन की जिम्मेदारी लुटियंस एवं बेकर नामक वास्तुकारों को सौंपी गयी, इनके द्वारा 1927 में निर्मित भारतीय संसद को गोलाकार प्रारूप में बनाया गया, संसद के केन्द्रीय भवन की छत में उलटे गुम्बद का प्रयोग किया गया| 1929 में राष्ट्रपति भवन का निर्माण किया गया था| इसी दौर में कनाट प्लेस का भी निर्माण किया गया था इसके निर्माण में भी ऊँची छतों और गोलाकार प्रारूप का ध्यान रखा गया है| 1931 में, प्रथम विश्व युद्ध में तथा अफगान युद्ध में शहीद सैनिकों की याद में इंडिया गेट बनाया गया, विशालता इसकी प्रमुख विशेषता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में यूरोपीय स्थापत्य पर सबसे ज्यादा प्रभाव ब्रिटेन का पड़ा| उन्होंने स्थापत्य कला का उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए किया| इनके द्वारा भारतीय, इस्लामिक, और पश्चिमी तत्वों का आकर्षक मिश्रण किया गया था| यूरोपीय स्थापत्य के इस मिश्रण से भारतीय स्थापत्य में विविधता का विस्तार हुआ और स्थापत्य की परंपरा और मजबूत हुई| इस दृष्टिकोण से यूरोपीय शक्तियों का भारतीय स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है|
##Question:भारत में यूरोपीय स्थापत्य का विकास मुख्यतः आइबेरियन शैली और इंडो-गोथिक शैली/विक्टोरियन शैली के रूप में हुआ| टिप्पणी कीजिये| ( 150 से 200 शब्द, 10 अंक) European architecture developed mainly in India as Iberian style and Indo-Gothic style / Victorian style. Comment (150 to 200 words, 10 marks)##Answer:दृष्टिकोण 1- भारत में यूरोपीय स्थापत्य के विकास की पृष्ठभूमि को भूमिका में स्पष्ट कीजिये 2- प्रथम खंड में पुर्तगालियों एवं फ्रेंच स्थापत्य के विकास की जानकारी दीजिये 3- दूसरे भाग में भारत में अंग्रेजी स्थापत्य के विकास को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्थापत्य में विविधता के संदर्भ में महत्वपूर्ण योगदान बताते हुए उत्तर समाप्त कीजिये| यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियाँ भारत में अपने साथ यूरोपीय वास्तु व स्थापत्य कला भी लाईं। उन्होंने भारत में कई ऐसी इमारतों का निर्माण कराया जिनमें शास्त्रीय, गोथिक व नवजागरण शैलियों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। भारत में यूरोपीय स्थापत्य के विकास में पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों एवं अंग्रेजों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है| इन्होने अपने नियन्त्रण के अधीन क्षेत्रों में विभिन्न इमारतों का निर्माण करवाया था| यूरोपीय शक्तियों द्वारा भारत में स्थापत्य के विकास में अलग-अलग शैलियों का प्रयोग किया जो उनके मातृदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से प्रभावित थीं| भारत में विकसित यूरोपीय स्थापत्य में कुछ भारतीय विशिष्टताओं का भी समावेश किया गया| पुर्तगाली स्थापत्य/ आइबेरियन शैली भारत में यूरोपीय स्थापत्य के अंतर्गत सर्वप्रथम पुर्तगालियों के द्वारा निर्मित इमारतों के साक्ष्य मिलते हैं| पुर्तगाली स्थापत्य के अधिकांश साक्ष्य गोवा दमन दीव आदि स्थलों से प्राप्त हुए हैं, पुर्तगालियों ने भारत में धार्मिक एवं लौकिक दोनों ही उद्देश्यों से स्थापत्य का निर्माण किया जैसे चर्च, प्रशासनिक कार्यालय, व्यापारिक केंद्र, आवासीय भवन आदि, 1619 में गोवा में निर्मित, संत कैथेड्रल का चर्च स्थापत्य के दृष्टिकोण से विशेष महत्त्व रखता है| इसकी गणना विश्व के विशाल चर्चों में से एक रूप में होती है निर्माण में ईंटों एवं लकड़ी का बड़े पैमाने पर प्रयोग, प्रवेशद्वार, खिड़कियाँ एवं छतों के निर्माण में लकड़ी का बहुतायत में प्रयोग, प्रायः दरवाजे के ऊपर एवं दरवाजों के साथ खिडकियों का निर्माण, ढलवां छतों का निर्माण, मीनार निर्माण आदि पुर्तगाली स्थापत्य की सामान्य विशेषताएं है| इसे आइबेरियन शैली के रूप में भी जाना जाता है| इसी तरह फ्रांसीसियों ने भी पांडिचेरी एवं चंद्रनगर में कुछ इमारतों का निर्माण कराया था तथापि भारत में यूरोपीय स्थापत्य के विकास में फ्रांसीसियों का योगदान अपेक्षाकृत रूप से कम रहा है |ध्यातव्य है कि पांडिचेरी को फ्रांसीसियों द्वारा ग्रिड प्रारूप पर बसाया गया है| अंग्रेजी स्थापत्य/नव-गोथिक/विक्टोरियन शैली अंग्रेजों का भारत के सर्वाधिक भूभाग पर नियंत्रण था, ये लम्बी अवधि तक नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहे इसके अतिरिक्त संसाधनों पर नियंत्रण होने सेयूरोपीय स्थापत्य का भारत में सर्वाधिक विकास अंग्रेजों के समय हुआ, तथापि भारत में ब्रिटिश स्थापत्य के विकास की प्रक्रिया में एकरूपता नहीं दिखती है, प्रारम्भिक दौर में विशेषकर 1857 से पूर्व व्यापारिक केन्द्रों एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित हो कर कुछ किलों मात्र का निर्माण किया गया जैसे सेंट जोर्ज, फोर्ट विलियम आदि | इसी चरण में कुछ नगरों का विकास किया गया और कुछ शैक्षणिक इमारतों की भी स्थापना की गयी थी एक राजनीति शक्ति के रूप में जब अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई तब राजनीतिक श्रेष्ठता की भावना से प्रभावित होकर भी प्रशासनिक इमारतों का निर्माण किया जाने लगा| 1857 के बाद गोथिक स्थापत्य शैली में भारतीय विशेषताओं को भी शामिल किया जाने लगा,इसके मिश्रित स्वरुप के कारण ही इस शैली को नव-गोथिक कहा गया| इस चरण में विशाल संरचना वाली इमारतें बनायी गयीं| ध्यातव्य है कि अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई शैली को इंडो-सारासेनिक शैली भी कहते हैं। इन इमारतों के निर्माण में स्टील एवं सीमेंट का प्रयोग किया जाता था| इन्होने स्थापत्य के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर एवं चूना पत्थर का भी प्रयोग किया| नव-गोथिक या विक्टोरियन इमारतों में मीनार, ढलवां छत, खिड़कियाँ(प्रवेश द्वार के ऊपर भी), विशाल खिड़कियाँ आदि विशेषताएं देखी जा सकती हैं, इन इमारतों में इस्लामिक विशेषताएं जैसे गुम्बद एवं मेहराब तथा प्राचीन भारतीय विशेषताएं जैसे खम्बों, जालियों आदि का मिश्रण भी देख सकते हैं| मिश्रित शैली का एक प्रमुख उद्देश्य 1857 के पश्चात भारतीयों को अंग्रेजों से जोड़ना भी था, अंग्रेजों के द्वारा निर्मित स्थापत्य के साक्ष्य बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास एवं दिल्ली जैसे नगरों के साथ ही सभी प्रांतीय एवं जिला मुख्यालयों में देखे जा सकते हैं| प्रारम्भिक उच्च न्यायालय, पोस्ट ऑफिस, कलकत्ता में राइटर्स बिल्डिंग आदिइसके प्रमुख उदहारण हैं 1911 में जोर्ज पंचम के सम्मान में बॉम्बे में गेटवे ऑफ़ इंडिया की नीव रखी गयी,इसकी सर्वप्रमुख विशेषता इसकी विशालता है, 1911 में ही दिल्ली को राजधानी बनाये जाने की घोषणा के साथ ही स्थापत्य के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं| इंडो-गोथिक शैली की सामान्य विशेषताएं इस दौर में भी बनी रहीं लेकिन अब इमारतों के निर्माण में विशालता एवं गोलाकार प्रारूप का विशेष ध्यान रखा जाना एक महत्वपूर्ण पहलू था,यह विक्टोरियन शैली की प्रमुख विशेषता है| ब्रिटिश स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण के रूप में 1921 में कलकत्ता में निर्मित विक्टोरिया मेमोरियल पर ताजमहल का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है| नई दिल्ली में प्रशासनिक कार्यालयों तथा आवसीय भवनों के निर्माण एवं नियोजन की जिम्मेदारी लुटियंस एवं बेकर नामक वास्तुकारों को सौंपी गयी, इनके द्वारा 1927 में निर्मित भारतीय संसद को गोलाकार प्रारूप में बनाया गया, संसद के केन्द्रीय भवन की छत में उलटे गुम्बद का प्रयोग किया गया| 1929 में राष्ट्रपति भवन का निर्माण किया गया था| इसी दौर में कनाट प्लेस का भी निर्माण किया गया था इसके निर्माण में भी ऊँची छतों और गोलाकार प्रारूप का ध्यान रखा गया है| 1931 में, प्रथम विश्व युद्ध में तथा अफगान युद्ध में शहीद सैनिकों की याद में इंडिया गेट बनाया गया, विशालता इसकी प्रमुख विशेषता है| इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में यूरोपीय स्थापत्य पर सबसे ज्यादा प्रभाव ब्रिटेन का पड़ा| उन्होंने स्थापत्य कला का उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए किया| इनके द्वारा भारतीय, इस्लामिक, और पश्चिमी तत्वों का आकर्षक मिश्रण किया गया था| यूरोपीय स्थापत्य के इस मिश्रण से भारतीय स्थापत्य में विविधता का विस्तार हुआ और स्थापत्य की परंपरा और मजबूत हुई| इस दृष्टिकोण से यूरोपीय शक्तियों का भारतीय स्थापत्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है|
50,560
What do you understand by Indo-Islamic architecture? What are the different styles of Indo-Islamic architecture? Briefly explain the Provincial style of Indo-Islamic architecture. ( 150 words/10 marks )
Approach : Introduce an answer by referring to the beginning of the Indo-Islamic architecture. Explain the features of Indo-Islamic architecture. List different types ofIndo-Islamic architecture. Discuss the Provincial style ofIndo-Islamic architecture. Answer : "Islam came along with the migration of Muslim merchants, traders, the saints and finally the conquest of Muslim rulers. The early Islamic architectural activity was visible as back as the 8th century in some parts such as Sindh and Gujarat, yet the large-scale building activity began only in the early 13th century by the Turkish state after the Turkish conquest of North India. Although the Mughal architecture of north India is famous, the fascinating richness of Islamic architectural heritage in other parts of the country is not so well known. India has a more beautiful medieval Islamic architectural heritage than any other country. Islamic architecture is characterised by a few visible symbols. One is the arch, which frames the space; the second symbol is the dome, which looms over the skyscape; and the third is the minaret, which pierces the skies. Minarets were actually symbols in the middle of deserts. They represented fire, which was lit atop them to guide travelers. The dome represents the infinite and also the sky. Indo-Islamic architecture is conventionally categorised into the following four categories: • Imperial Style (Delhi Sultanate) • Provincial Style (Mandu, Gujarat, Bengal, and Jaunpur) • Mughal Style (Delhi, Agra, and Lahore) • Deccani Style (Bijapur, Golconda) Provincial Style During Islamic Era in India Bengal School of Architecture Islamic monuments of Bengal are consistent in design as of other regions, with distinguishing features such as the material used & designs execution. Brick was the chief building material with the use of stone being limited largely to pillars for trabeate/Arcuate construction, mainly obtained from demolished temples. The so-called “Bengal” roof with sloping cornices, which originated from the bamboo construction, was adopted by the Muslims and later it spread widely, even in other regions. Covered brick and glazed tiles were usually pressed into service for decoration. Malwa School of Architecture (MP & Rajasthan)  Followed arcuate style majorly with elegant use of arch with pillar and beam;  Lofty terraces approached by well-proportioned stairways,  The impressive size of buildings, the use of various coloured stones & marbles with minor use of bright coloured glazed tiles.  A minaret is absent in this style  Notable Examples are Rani Rupmati pavilion (Mandu), Ashrafi Mahal (Mandu), Hindola Mahal (Mandu), Jahaz Mahal (Mandu) Jaunpur School of Architecture (UP)  Developed by Sharqui Dynasty hence also called as sharqui style. It was influenced by the buildings of the Tughlaq period  Prominent feature →Huge imposing pro-pylon screens, filling the central and side bays of prayer hall  Notable Example is Atalla Masjid (Built during the reign of Shamsuddin Ibrahim) Amongst provincial styles, the architecture of Bengal and Jaunpur is regarded as distinct, while the style of Gujarat was marked with borrowed elements from regional temple traditions such as toranas, lintels in mihrabs, carvings of bell and chain motifs, and carved panels depicting trees, for tombs, mosques, and dargahs. From the seventeenth century onward, bricks were also used for construction and these imparted greater flexibility to the structures. In this phase, there was more reliance on local materials.
##Question:What do you understand by Indo-Islamic architecture? What are the different styles of Indo-Islamic architecture? Briefly explain the Provincial style of Indo-Islamic architecture. ( 150 words/10 marks )##Answer:Approach : Introduce an answer by referring to the beginning of the Indo-Islamic architecture. Explain the features of Indo-Islamic architecture. List different types ofIndo-Islamic architecture. Discuss the Provincial style ofIndo-Islamic architecture. Answer : "Islam came along with the migration of Muslim merchants, traders, the saints and finally the conquest of Muslim rulers. The early Islamic architectural activity was visible as back as the 8th century in some parts such as Sindh and Gujarat, yet the large-scale building activity began only in the early 13th century by the Turkish state after the Turkish conquest of North India. Although the Mughal architecture of north India is famous, the fascinating richness of Islamic architectural heritage in other parts of the country is not so well known. India has a more beautiful medieval Islamic architectural heritage than any other country. Islamic architecture is characterised by a few visible symbols. One is the arch, which frames the space; the second symbol is the dome, which looms over the skyscape; and the third is the minaret, which pierces the skies. Minarets were actually symbols in the middle of deserts. They represented fire, which was lit atop them to guide travelers. The dome represents the infinite and also the sky. Indo-Islamic architecture is conventionally categorised into the following four categories: • Imperial Style (Delhi Sultanate) • Provincial Style (Mandu, Gujarat, Bengal, and Jaunpur) • Mughal Style (Delhi, Agra, and Lahore) • Deccani Style (Bijapur, Golconda) Provincial Style During Islamic Era in India Bengal School of Architecture Islamic monuments of Bengal are consistent in design as of other regions, with distinguishing features such as the material used & designs execution. Brick was the chief building material with the use of stone being limited largely to pillars for trabeate/Arcuate construction, mainly obtained from demolished temples. The so-called “Bengal” roof with sloping cornices, which originated from the bamboo construction, was adopted by the Muslims and later it spread widely, even in other regions. Covered brick and glazed tiles were usually pressed into service for decoration. Malwa School of Architecture (MP & Rajasthan)  Followed arcuate style majorly with elegant use of arch with pillar and beam;  Lofty terraces approached by well-proportioned stairways,  The impressive size of buildings, the use of various coloured stones & marbles with minor use of bright coloured glazed tiles.  A minaret is absent in this style  Notable Examples are Rani Rupmati pavilion (Mandu), Ashrafi Mahal (Mandu), Hindola Mahal (Mandu), Jahaz Mahal (Mandu) Jaunpur School of Architecture (UP)  Developed by Sharqui Dynasty hence also called as sharqui style. It was influenced by the buildings of the Tughlaq period  Prominent feature →Huge imposing pro-pylon screens, filling the central and side bays of prayer hall  Notable Example is Atalla Masjid (Built during the reign of Shamsuddin Ibrahim) Amongst provincial styles, the architecture of Bengal and Jaunpur is regarded as distinct, while the style of Gujarat was marked with borrowed elements from regional temple traditions such as toranas, lintels in mihrabs, carvings of bell and chain motifs, and carved panels depicting trees, for tombs, mosques, and dargahs. From the seventeenth century onward, bricks were also used for construction and these imparted greater flexibility to the structures. In this phase, there was more reliance on local materials.
50,563
19 वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रमुख किसान आंदोलनों की चर्चा करते हुए, इन आंदोलनों की प्रकृति स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) By discussing the major peasant movements of the late 19th century, explain the nature of these movements. (150-200 words/10 Marks)
Approach : भूमिका में किसान आंदोलनों की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। 1857 के पश्चात हुए प्रमुख किसान आंदोलनों को सूचीबद्ध कीजिए। इन आंदोलनों की प्रकृति को स्पष्ट कीजिए। उत्तर- ब्रिटिश भारत के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी। भारत की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। ब्रिटिश की कृषि नीतियों ने किसानों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। ब्रिटिश नीतियों का किसानो तथा कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा जिससे कई कृषक आंदोलन हुए। 1857 के पश्चात हुए आंदोलनों को 2 चरणों में बांटा जा सकता है। चरण I - 1857-1915 - नील विद्रोह, पाबना विद्रोह, दक्कन विद्रोह चरण II - 1915- 1947-चंपारण, खेड़ा, मोपला, बारदोली, वर्ली, तेभागा, तेलंगाना प्रथम चरण में किसान विद्रोहों की प्रकृति - प्रमुख कारण - दक्कन में कपास की कीमतों में गिरावट, भूराजस्व में वृद्धि तथा महाजनों के द्वारा किसानों का बड़े पैमाने पर शोषण विद्रोह का लक्ष्य पुरानी व्यवस्था की स्थापना ना होकर शोषण से मुक्ति थी। किसानों ने विद्रोह के दौरान अहिंसक तरीके अपनाए जैसे महाजनों का सामाजिक बहिष्कार, कानूनी लड़ाई इत्यादि। हालांकि शोषक वर्गों के कठोर व्यवहार के विरुद्ध किसानों ने हथियार भी उठाए। विद्रोह का प्रसार स्थानीय स्तर पर था तथा नेतृत्व भी स्थानीय संघर्ष के उद्देश्य से संगठनों की स्थापना भी की गयी तथा किसानों को बुद्धिजीवियों का भी समर्थन मिला किसानों को राष्ट्रीय चेतना व उपनिवेशवाद की समझ नहीं थी और ना ही प्रत्यक्ष तौर पर सरकार को चुनौती दी गयी। इन विद्रोहों के दौरान किसानों में वर्गीय चेतना देखी गयी। बुद्धिजीवियों से संपर्क अहिंसात्मक संघर्ष जैसे तरीकों ने किसान आंदोलन के अगले चरण का आधार तैयार किया। दूसरे चरण में किसान विद्रोह की प्रकृति- किसान आंदोलन की दो धाराएँ - कॉंग्रेस के नेतृत्व में वामपंथियों के नेतृत्व में कॉंग्रेस के नेतृत्व के आन्दोलन क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर हुए। स्थानीय नेतृत्व व अन्य संगठनों की भी भूमिका तथा निर्णायक चरण में कॉंग्रेस नेतृत्व प्रदान करता था। कॉंग्रेस संगठन के द्वारा किसानों में राजनैतिक जागरूकता तथा राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किसानों के मुद्दों को कॉंग्रेस के मंच से उठाना - जैसे नरमदली नेताओं ने करों में कटौती की मांग की गांधीजी ने 11 सूत्रीय मांगों में भी इस मुद्दे को महत्व दिया 1936 के फैजपुर कॉंग्रेस में किसानों के अधिकारों को विशेष महत्व दिया गया 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन से पूर्व गांधी जी ने भूमि पर किसानों के अधिकारों का समर्थन किया। रचनात्मक कार्यों के द्वारा भी कॉंग्रेस किसानों से संपर्क स्थापित कर रही थी। कॉंग्रेस की सक्रियता का एक महवपूर्ण परिणाम था किसानों में राजनैतिक जागरूकता एवं विभिन्न आंदोलनों में किसानों की बढ़ती भागीदारी। जैसे - असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन कॉंग्रेस के नेतृत्व के आंदोलनों की एकमहत्वपूर्ण बात यह थी कि आंदोलन को अहिंसा के दायरे में रखा जाता था तथा वर्ग समन्वय पर बल दिया जाता है। बीसवी सदी में किसान आंदोलन की दूसरी धारा वामपंथी नेतृत्व की धारा थी। मार्क्सवादियों तथा समाजवादियों ने भी किसानों को अधिकारों के प्रति जागरूक किया। हालांकि इनका बल वर्ग संघर्ष पर अधिक होता था। 1940 के दशक में किसान आंदोलन पर इनका अत्यधिक प्रभाव दिखा। यद्यपि किसान किसी वृहद उद्देश्य को लेकर नहीं हुए थे लेकिन इन आंदोलनों ने ब्रिटिश जड़ों को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही बाद के चरणों में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ कर आंदोलन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
##Question:19 वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रमुख किसान आंदोलनों की चर्चा करते हुए, इन आंदोलनों की प्रकृति स्पष्ट कीजिए। (150-200 शब्द/10 अंक) By discussing the major peasant movements of the late 19th century, explain the nature of these movements. (150-200 words/10 Marks)##Answer:Approach : भूमिका में किसान आंदोलनों की संक्षिप्त चर्चा कर सकते हैं। 1857 के पश्चात हुए प्रमुख किसान आंदोलनों को सूचीबद्ध कीजिए। इन आंदोलनों की प्रकृति को स्पष्ट कीजिए। उत्तर- ब्रिटिश भारत के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी। भारत की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी। ब्रिटिश की कृषि नीतियों ने किसानों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। ब्रिटिश नीतियों का किसानो तथा कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा जिससे कई कृषक आंदोलन हुए। 1857 के पश्चात हुए आंदोलनों को 2 चरणों में बांटा जा सकता है। चरण I - 1857-1915 - नील विद्रोह, पाबना विद्रोह, दक्कन विद्रोह चरण II - 1915- 1947-चंपारण, खेड़ा, मोपला, बारदोली, वर्ली, तेभागा, तेलंगाना प्रथम चरण में किसान विद्रोहों की प्रकृति - प्रमुख कारण - दक्कन में कपास की कीमतों में गिरावट, भूराजस्व में वृद्धि तथा महाजनों के द्वारा किसानों का बड़े पैमाने पर शोषण विद्रोह का लक्ष्य पुरानी व्यवस्था की स्थापना ना होकर शोषण से मुक्ति थी। किसानों ने विद्रोह के दौरान अहिंसक तरीके अपनाए जैसे महाजनों का सामाजिक बहिष्कार, कानूनी लड़ाई इत्यादि। हालांकि शोषक वर्गों के कठोर व्यवहार के विरुद्ध किसानों ने हथियार भी उठाए। विद्रोह का प्रसार स्थानीय स्तर पर था तथा नेतृत्व भी स्थानीय संघर्ष के उद्देश्य से संगठनों की स्थापना भी की गयी तथा किसानों को बुद्धिजीवियों का भी समर्थन मिला किसानों को राष्ट्रीय चेतना व उपनिवेशवाद की समझ नहीं थी और ना ही प्रत्यक्ष तौर पर सरकार को चुनौती दी गयी। इन विद्रोहों के दौरान किसानों में वर्गीय चेतना देखी गयी। बुद्धिजीवियों से संपर्क अहिंसात्मक संघर्ष जैसे तरीकों ने किसान आंदोलन के अगले चरण का आधार तैयार किया। दूसरे चरण में किसान विद्रोह की प्रकृति- किसान आंदोलन की दो धाराएँ - कॉंग्रेस के नेतृत्व में वामपंथियों के नेतृत्व में कॉंग्रेस के नेतृत्व के आन्दोलन क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर हुए। स्थानीय नेतृत्व व अन्य संगठनों की भी भूमिका तथा निर्णायक चरण में कॉंग्रेस नेतृत्व प्रदान करता था। कॉंग्रेस संगठन के द्वारा किसानों में राजनैतिक जागरूकता तथा राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किसानों के मुद्दों को कॉंग्रेस के मंच से उठाना - जैसे नरमदली नेताओं ने करों में कटौती की मांग की गांधीजी ने 11 सूत्रीय मांगों में भी इस मुद्दे को महत्व दिया 1936 के फैजपुर कॉंग्रेस में किसानों के अधिकारों को विशेष महत्व दिया गया 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन से पूर्व गांधी जी ने भूमि पर किसानों के अधिकारों का समर्थन किया। रचनात्मक कार्यों के द्वारा भी कॉंग्रेस किसानों से संपर्क स्थापित कर रही थी। कॉंग्रेस की सक्रियता का एक महवपूर्ण परिणाम था किसानों में राजनैतिक जागरूकता एवं विभिन्न आंदोलनों में किसानों की बढ़ती भागीदारी। जैसे - असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन कॉंग्रेस के नेतृत्व के आंदोलनों की एकमहत्वपूर्ण बात यह थी कि आंदोलन को अहिंसा के दायरे में रखा जाता था तथा वर्ग समन्वय पर बल दिया जाता है। बीसवी सदी में किसान आंदोलन की दूसरी धारा वामपंथी नेतृत्व की धारा थी। मार्क्सवादियों तथा समाजवादियों ने भी किसानों को अधिकारों के प्रति जागरूक किया। हालांकि इनका बल वर्ग संघर्ष पर अधिक होता था। 1940 के दशक में किसान आंदोलन पर इनका अत्यधिक प्रभाव दिखा। यद्यपि किसान किसी वृहद उद्देश्य को लेकर नहीं हुए थे लेकिन इन आंदोलनों ने ब्रिटिश जड़ों को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही बाद के चरणों में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ कर आंदोलन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
50,573
विस्तृत चीन रणनीति के संदर्भ में, दक्षिण चीन सागर विवाद का परिचय दीजिये| साथ ही, इस विवाद के संदर्भ में इससे संबंधित देशों/संस्थाओं तथा भारत पर प्रभावों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) In the context of the comprehensive China strategy, give an account of the south China sea dispute. Also, in the context of this dispute, explain its impact on related countries/institutions and India. (150-200 words, 10 marks)
एप्रोच- दक्षिणी चीन सागर की अवस्थिति दर्शाते हुए विवाद के परिचय से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| (NOTE- यहाँ पर संबंधित क्षेत्र का एक छोटा मैप देना ज्यादा प्रभावी रहेगा) दक्षिणी चीन सागर विवाद पर विभिन्न देशों तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के रुख को स्पष्ट कीजिये| इस संदर्भ में भारत के रुख को अलग से बिंदुबार बताईये| भारत को क्या करना चाहिए, इसके बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- दक्षिणी चीन सागर विवाद इस क्षेत्र में प्रभुसत्ता तथा समुद्री अधिकार और स्वामित्व से संबंधित है| दक्षिणी चीन सागर के विवादित द्वीपों में से पार्सल द्वीपसमूह, स्पार्टली द्वीपसमूह तथा स्कारबोरो शोल प्रमुख हैं| इन द्वीपश्रृंखलाओं पर इस क्षेत्र में विद्यमान कई देशों द्वारा दावे किये जाते हैं जिनमें चीन, विएतनाम, फिलीपिंस, मलेशिया, इंडोनेशिया और ब्रूनेई सम्मिलित हैं| हालाँकि चीन द्वारा एकपक्षीय तरीके से पुरे दक्षिणी चीन सागर पर अपने दावे को दृढ़ता से रखा जाता है| दक्षिणी चीन सागर विवाद की पृष्ठभूमि 20वीं सदी के आधे समय तक शांत क्षेत्र; चीन द्वारा 1947 के बाद से क्षेत्र पर दावा; U आकार का मैप; 11 डैश लाइन तथा 9 डैश लाइन (कम्युनिस्ट उत्तरी विएतनाम को फायदा पहुँचाने हेतु); 1960 के दशक में तेल तथा प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज जिसके बाद(1970 के दशक) इस क्षेत्र में कई निकटवर्ती देशों की ओर से द्वीपीय संरचनाओं एवं महासागरीय स्थलों पर संप्रभुता स्थापित करने के दावे की होड़; UNCLOS(1994 में गठन) की भूमिका; विवादों के समाधान हेतु आसियान-चीन कोड ऑफ कंडक्ट(2002); 2009 में CLCS(Commission on the Limits of the Continental Shelf) के पास मलेशिया तथा विएतनाम का जाना; साथ ही, चीन द्वारा हालिया समय में इस विवादित क्षेत्र के चारो ओर अनेक कृत्रिम द्वीप बनाकर सैन्य गतिविधियों को उत्प्रेरित करना; दक्षिणी चीन सागर विवाद पर विभिन्न देशों/संस्थाओं का रुख परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन(PCA) का फैसला स्कारबोरो शोल पर चीन तथा फिलीपिंस दोनों का दावा; फिलीपिंस द्वारा PCA जाना(2013) तथा चीन से PCA द्वारा दावा से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों की मांग; 2016 में दिए गया अंतिम आदेश- इस क्षेत्र में चीन के अनेक समुद्री दावे समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन(UNCLOS) के विपरीत तथा फिलीपिंस के संप्रभु अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उल्लंघन; चीन द्वारा PCA तथा उसके आदेश को मानने से इंकार; आसियान तथा दक्षिणी चीन सागर विवाद को हल करने में ढीला रवैया; अमेरिका तथा दक्षिणी चीन सागर चीन के विस्तारवादी रवैये का मुखर विरोध; फिलीपिंस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया आदि के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास; आसियान तथा पूर्वी एशियाई देशों को आर्थिक सहायता में वृद्धि; दक्षिणी चीन सागर विवाद तथा भारत दक्षिणी चीन सागर में भारत का हित भारत का 55% व्यापार दक्षिणी चीन सागर के रास्ते एशिया-प्रशांत क्षेत्र से; एक्ट ईस्ट पॉलिसी; संसाधनों की सुरक्षा; SLOC की सुरक्षा; आर्थिक हित(विएतनाम; ब्रूनेई); वियतनाम तट के किनारे हाइड्रोकार्बन क्षेत्रक में भारत का अहम् निवेश; दक्षिणी चीन सागर विवाद पर भारत का रुख भारत द्वारा नौवहन की स्वतंत्रता आधारित अंतर्राष्ट्रीय कानूनों(UNCLOS) का समर्थन; संबंधित राष्ट्रों द्वारा शांतिपूर्ण ढ़ंग से विवादों का समाधान; नेविगेशन की स्वतंत्रता तथा संचार की खुली समुद्री लेनों का समर्थन करते हुए अपनी दृढ स्थिति को व्यक्त करना; PCA के निर्णय के प्रति भारत की प्रतिक्रिया में नेविगेशन, ऊपर से उड़ान भरने(ओवर फ्लाइट) की स्वतंत्रता तथा कानून के शासन पर जोर; दक्षिणी चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति का व्यापक एशियाई समुद्रतटवर्ती क्षेत्रों पर अस्थिरकारक प्रभाव; अनन्य आर्थिक क्षेत्र(EEZ) से बिना पूर्व सूचना के बेरोकटोक गुजरने केअमेरिका के प्रयास के विरोध; भारत को क्या करना चाहिए? भारत-आसियान आर्थिक सहयोग को बढ़ावा; रक्षा सहयोग; जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका के साथ सहयोग; अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर रहे बिना भारत-प्रशांत समुद्री भागीदारी आरंभ करने की आवश्यकता; फिलीपिंस को फ्रिगेड की आपूर्ति; ब्रह्मोस, वरुण आदि की भी आपूर्ति; प्रादेशिक विवादों पर सैद्धांतिक निर्णय लेकर भारत द्वारा भारत-प्रशांत में सामरिक संतुलन को पुनःस्थापित करने में अनिवार्य रूप से योगदान करना; दक्षिणी चीन सागर में पक्षों के आचरण पर घोषणा(DOC) के पूर्ण तथा प्रभावी कार्यान्वयन का समर्थन; दिल्ली घोषणापत्र(2018) के विचारों को कार्रवाई में परिणत करने हेतु राष्ट्रीय समुद्री रणनीति तैयार करने की आवश्यकता; दक्षिणी चीन सागर तथा उसके ये विवादित द्वीपसमूह विश्व के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन अवस्थित हैं और उनके चारों ओर विशाल खनिज संसाधन विद्यमान हैं जो इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण बना देते हैं| भारत को दक्षिण चीन सागर में आचार संहिता(COC) पर शीघ्र निष्कर्ष के लिए अपना समर्थन व्यक्त करने की आवश्यकता है|
##Question:विस्तृत चीन रणनीति के संदर्भ में, दक्षिण चीन सागर विवाद का परिचय दीजिये| साथ ही, इस विवाद के संदर्भ में इससे संबंधित देशों/संस्थाओं तथा भारत पर प्रभावों को स्पष्ट कीजिये| (150-200 शब्द, 10 अंक) In the context of the comprehensive China strategy, give an account of the south China sea dispute. Also, in the context of this dispute, explain its impact on related countries/institutions and India. (150-200 words, 10 marks)##Answer:एप्रोच- दक्षिणी चीन सागर की अवस्थिति दर्शाते हुए विवाद के परिचय से उत्तर का प्रारंभ कीजिये| (NOTE- यहाँ पर संबंधित क्षेत्र का एक छोटा मैप देना ज्यादा प्रभावी रहेगा) दक्षिणी चीन सागर विवाद पर विभिन्न देशों तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के रुख को स्पष्ट कीजिये| इस संदर्भ में भारत के रुख को अलग से बिंदुबार बताईये| भारत को क्या करना चाहिए, इसके बारे में संक्षिप्तता से बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- दक्षिणी चीन सागर विवाद इस क्षेत्र में प्रभुसत्ता तथा समुद्री अधिकार और स्वामित्व से संबंधित है| दक्षिणी चीन सागर के विवादित द्वीपों में से पार्सल द्वीपसमूह, स्पार्टली द्वीपसमूह तथा स्कारबोरो शोल प्रमुख हैं| इन द्वीपश्रृंखलाओं पर इस क्षेत्र में विद्यमान कई देशों द्वारा दावे किये जाते हैं जिनमें चीन, विएतनाम, फिलीपिंस, मलेशिया, इंडोनेशिया और ब्रूनेई सम्मिलित हैं| हालाँकि चीन द्वारा एकपक्षीय तरीके से पुरे दक्षिणी चीन सागर पर अपने दावे को दृढ़ता से रखा जाता है| दक्षिणी चीन सागर विवाद की पृष्ठभूमि 20वीं सदी के आधे समय तक शांत क्षेत्र; चीन द्वारा 1947 के बाद से क्षेत्र पर दावा; U आकार का मैप; 11 डैश लाइन तथा 9 डैश लाइन (कम्युनिस्ट उत्तरी विएतनाम को फायदा पहुँचाने हेतु); 1960 के दशक में तेल तथा प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज जिसके बाद(1970 के दशक) इस क्षेत्र में कई निकटवर्ती देशों की ओर से द्वीपीय संरचनाओं एवं महासागरीय स्थलों पर संप्रभुता स्थापित करने के दावे की होड़; UNCLOS(1994 में गठन) की भूमिका; विवादों के समाधान हेतु आसियान-चीन कोड ऑफ कंडक्ट(2002); 2009 में CLCS(Commission on the Limits of the Continental Shelf) के पास मलेशिया तथा विएतनाम का जाना; साथ ही, चीन द्वारा हालिया समय में इस विवादित क्षेत्र के चारो ओर अनेक कृत्रिम द्वीप बनाकर सैन्य गतिविधियों को उत्प्रेरित करना; दक्षिणी चीन सागर विवाद पर विभिन्न देशों/संस्थाओं का रुख परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन(PCA) का फैसला स्कारबोरो शोल पर चीन तथा फिलीपिंस दोनों का दावा; फिलीपिंस द्वारा PCA जाना(2013) तथा चीन से PCA द्वारा दावा से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों की मांग; 2016 में दिए गया अंतिम आदेश- इस क्षेत्र में चीन के अनेक समुद्री दावे समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन(UNCLOS) के विपरीत तथा फिलीपिंस के संप्रभु अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उल्लंघन; चीन द्वारा PCA तथा उसके आदेश को मानने से इंकार; आसियान तथा दक्षिणी चीन सागर विवाद को हल करने में ढीला रवैया; अमेरिका तथा दक्षिणी चीन सागर चीन के विस्तारवादी रवैये का मुखर विरोध; फिलीपिंस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया आदि के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास; आसियान तथा पूर्वी एशियाई देशों को आर्थिक सहायता में वृद्धि; दक्षिणी चीन सागर विवाद तथा भारत दक्षिणी चीन सागर में भारत का हित भारत का 55% व्यापार दक्षिणी चीन सागर के रास्ते एशिया-प्रशांत क्षेत्र से; एक्ट ईस्ट पॉलिसी; संसाधनों की सुरक्षा; SLOC की सुरक्षा; आर्थिक हित(विएतनाम; ब्रूनेई); वियतनाम तट के किनारे हाइड्रोकार्बन क्षेत्रक में भारत का अहम् निवेश; दक्षिणी चीन सागर विवाद पर भारत का रुख भारत द्वारा नौवहन की स्वतंत्रता आधारित अंतर्राष्ट्रीय कानूनों(UNCLOS) का समर्थन; संबंधित राष्ट्रों द्वारा शांतिपूर्ण ढ़ंग से विवादों का समाधान; नेविगेशन की स्वतंत्रता तथा संचार की खुली समुद्री लेनों का समर्थन करते हुए अपनी दृढ स्थिति को व्यक्त करना; PCA के निर्णय के प्रति भारत की प्रतिक्रिया में नेविगेशन, ऊपर से उड़ान भरने(ओवर फ्लाइट) की स्वतंत्रता तथा कानून के शासन पर जोर; दक्षिणी चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति का व्यापक एशियाई समुद्रतटवर्ती क्षेत्रों पर अस्थिरकारक प्रभाव; अनन्य आर्थिक क्षेत्र(EEZ) से बिना पूर्व सूचना के बेरोकटोक गुजरने केअमेरिका के प्रयास के विरोध; भारत को क्या करना चाहिए? भारत-आसियान आर्थिक सहयोग को बढ़ावा; रक्षा सहयोग; जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका के साथ सहयोग; अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर रहे बिना भारत-प्रशांत समुद्री भागीदारी आरंभ करने की आवश्यकता; फिलीपिंस को फ्रिगेड की आपूर्ति; ब्रह्मोस, वरुण आदि की भी आपूर्ति; प्रादेशिक विवादों पर सैद्धांतिक निर्णय लेकर भारत द्वारा भारत-प्रशांत में सामरिक संतुलन को पुनःस्थापित करने में अनिवार्य रूप से योगदान करना; दक्षिणी चीन सागर में पक्षों के आचरण पर घोषणा(DOC) के पूर्ण तथा प्रभावी कार्यान्वयन का समर्थन; दिल्ली घोषणापत्र(2018) के विचारों को कार्रवाई में परिणत करने हेतु राष्ट्रीय समुद्री रणनीति तैयार करने की आवश्यकता; दक्षिणी चीन सागर तथा उसके ये विवादित द्वीपसमूह विश्व के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन अवस्थित हैं और उनके चारों ओर विशाल खनिज संसाधन विद्यमान हैं जो इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण बना देते हैं| भारत को दक्षिण चीन सागर में आचार संहिता(COC) पर शीघ्र निष्कर्ष के लिए अपना समर्थन व्यक्त करने की आवश्यकता है|
50,576
एल नीनो से आप क्या समझते हैं ? यह किस प्रकार भारतीय मानसून को प्रभावित करता है? ( 150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by El Nino? How does this affect the Indian monsoon? (150-200 words/10 अंक)
दृष्टिकोण : एल-नीनो की परिघटना को समझाते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । एल-नीनो का भारतीय मानसून पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : एल - नीनो दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर समुद्री धारा के तापमान में अचानक परिवर्तन के बाद की गर्म जलधारा को कहते हैं ।इस स्थान पर सामान्य तौर पर व्यापारिक पवन के सुदूरवर्ती होने के कारण पेरू या हमबोल्ट की ठंडी जलधारा बहती है । यह रहस्यमयी परिवर्तन व्याख्या के दृष्टिकोण से भी अभी तक नहीं समझे जाने वाले प्रक्रम में से एक है । सामान्यतः इसका आगमन 25 दिसंबर के आसपास होता है इसलिए इसे चाइल्ड क्राइस्ट कहते हैं । एकबार आगमन के बाद ये 6 महीने से 2 साल तक रुक सकता है और प्रस्थान के बाद 2 साल से 7 साल के बीच में वापस आ सकता है । एल - नीनो एक स्पैनिश शब्द है और यह नामकरण स्थानीय मछुआरों द्वारा किया गया है । एल -नीनो का भारतीय मानसून पर प्रभाव : भारतीय दक्षिण पश्चिम मानसून मुख्यतः वायुदाब में अंतर के कारण हवाओं के परिसंचरण का परिणाम है । एल - नीनो के प्रभाव में दक्षिणी प्रशांत महासागर में समुद्र सतह गर्म हो जाती है , इससे हवाओं की सामान्य संचरण की स्थिति परिवर्तित हो जाती है । वस्तुतः सामान्य परिस्थितियों में पेरु के तट पर ठंडी जलधारा प्रवाहित होती है । इसके परिणामस्वरूप पूर्वी प्रशांत महासागर के क्षेत्र में उच्च वायुदाब का क्षेत्र निर्मित होता है, इससे हावाओं का परिसंचरण अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों यथा आस्ट्रेलिया , दक्षिणपूर्व एशिया व हिंद महासागर के क्षेत्र में होता है । हिन्द महासागर से नमीयुक्त जलधारा भारतीय उपमहाद्वीप की ओर प्रवाहित होती है क्योंकि ग्रीष्म ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप में अत्यधिक निम्नदाब का क्षेत्र निर्मित होता है । एल-नीनों वाले वर्षों में पेरु के तट पर गर्म जलधारा और परिणामस्वरूप निम्नवायुदाब क्षेत्र का निर्माण । इससे सामान्य परिसंचरण परिवर्तित , अर्थात हवाओं का प्रवाह पश्चिमी प्रशांत महासागर से पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर होता है । इससे हिन्द महासागर में भी वायुदाब कमजोर और परिणामस्वरूप भारतीय मानसून कमजोर होता है । उपरोक्त विश्लेषण कई वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार किया गया है तथापि खराब मानसून एवं एल-नीनों में कोई सीधा संबंध स्पष्टतः प्रमाणित नहीं हुआ है परंतु फिर भी दोनों एक दूसरे से संबद्ध होते हैं । ऐसे कई वर्ष हैं जिनमें भारत ने गंभीर सूखे का सामना किया है और वे एल नीनों वर्ष नहीं थे तथा साथ ही ऐसे भी कई वर्ष हैं जो एल-नीनों वर्ष थे परंतु उन वर्षों में भारत में सूखे की स्थिति नहीं रही । अतः निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि एल-नीनों व भारतीय मानसून के संबंध में अभी ओर शोध किए जाने की आवश्यकता है ।
##Question:एल नीनो से आप क्या समझते हैं ? यह किस प्रकार भारतीय मानसून को प्रभावित करता है? ( 150-200 शब्द/10 अंक ) What do you understand by El Nino? How does this affect the Indian monsoon? (150-200 words/10 अंक)##Answer:दृष्टिकोण : एल-नीनो की परिघटना को समझाते हुए संक्षिप्त भूमिका लिखिए । एल-नीनो का भारतीय मानसून पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिए । संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए । उत्तर : एल - नीनो दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर समुद्री धारा के तापमान में अचानक परिवर्तन के बाद की गर्म जलधारा को कहते हैं ।इस स्थान पर सामान्य तौर पर व्यापारिक पवन के सुदूरवर्ती होने के कारण पेरू या हमबोल्ट की ठंडी जलधारा बहती है । यह रहस्यमयी परिवर्तन व्याख्या के दृष्टिकोण से भी अभी तक नहीं समझे जाने वाले प्रक्रम में से एक है । सामान्यतः इसका आगमन 25 दिसंबर के आसपास होता है इसलिए इसे चाइल्ड क्राइस्ट कहते हैं । एकबार आगमन के बाद ये 6 महीने से 2 साल तक रुक सकता है और प्रस्थान के बाद 2 साल से 7 साल के बीच में वापस आ सकता है । एल - नीनो एक स्पैनिश शब्द है और यह नामकरण स्थानीय मछुआरों द्वारा किया गया है । एल -नीनो का भारतीय मानसून पर प्रभाव : भारतीय दक्षिण पश्चिम मानसून मुख्यतः वायुदाब में अंतर के कारण हवाओं के परिसंचरण का परिणाम है । एल - नीनो के प्रभाव में दक्षिणी प्रशांत महासागर में समुद्र सतह गर्म हो जाती है , इससे हवाओं की सामान्य संचरण की स्थिति परिवर्तित हो जाती है । वस्तुतः सामान्य परिस्थितियों में पेरु के तट पर ठंडी जलधारा प्रवाहित होती है । इसके परिणामस्वरूप पूर्वी प्रशांत महासागर के क्षेत्र में उच्च वायुदाब का क्षेत्र निर्मित होता है, इससे हावाओं का परिसंचरण अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों यथा आस्ट्रेलिया , दक्षिणपूर्व एशिया व हिंद महासागर के क्षेत्र में होता है । हिन्द महासागर से नमीयुक्त जलधारा भारतीय उपमहाद्वीप की ओर प्रवाहित होती है क्योंकि ग्रीष्म ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप में अत्यधिक निम्नदाब का क्षेत्र निर्मित होता है । एल-नीनों वाले वर्षों में पेरु के तट पर गर्म जलधारा और परिणामस्वरूप निम्नवायुदाब क्षेत्र का निर्माण । इससे सामान्य परिसंचरण परिवर्तित , अर्थात हवाओं का प्रवाह पश्चिमी प्रशांत महासागर से पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर होता है । इससे हिन्द महासागर में भी वायुदाब कमजोर और परिणामस्वरूप भारतीय मानसून कमजोर होता है । उपरोक्त विश्लेषण कई वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार किया गया है तथापि खराब मानसून एवं एल-नीनों में कोई सीधा संबंध स्पष्टतः प्रमाणित नहीं हुआ है परंतु फिर भी दोनों एक दूसरे से संबद्ध होते हैं । ऐसे कई वर्ष हैं जिनमें भारत ने गंभीर सूखे का सामना किया है और वे एल नीनों वर्ष नहीं थे तथा साथ ही ऐसे भी कई वर्ष हैं जो एल-नीनों वर्ष थे परंतु उन वर्षों में भारत में सूखे की स्थिति नहीं रही । अतः निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि एल-नीनों व भारतीय मानसून के संबंध में अभी ओर शोध किए जाने की आवश्यकता है ।
50,594
वियना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए, इसकी परिस्थितियों तथा प्राथमिकताओं का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the Vienna Congress, analyze its circumstances and priorities. (150-200 Words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत विएना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात विएना कांग्रेस की परिस्थितियों एवं प्राथमिकताओं का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में विएना कांग्रेस का आलोचनात्मक परीक्षण करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - विएना कांग्रेस वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन के अंतिम रूप से पराजित होने के बाद विजित शक्तियों का एक सम्मलेन विएना में आयोजित किया गया | इस सम्मलेन में प्रमुख भूमिका ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने निभायी | इस सम्मलेन में रूस, प्रशा तथा इंगलैंड के प्रतिनिधियों ने भाग लिया | इस सम्मलेन का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्धों तथा नेपोलियन के द्वारा किये गए यूरोप के मानचित्र में किये गए परिवर्तनों को विजित शक्तियों के पक्ष को पुनर्निर्धारित करना था | इसके साथ ही इस कांग्रेस का उद्देश्य फ्रांस की शक्ति तथा फ्रांसीसी क्रांतिकारी विचारों को रोकना तथा उसके माध्यम से तथाकथित पुरातन व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना या बनाये रखना था | फ्रांस के साथ-साथ पूरे यूरोप में बढ़ती शांति की इच्छा ने भी प्रति क्रांतिकारी भावनाओं को तीव्र किया जिसका प्रभाव विएना कांग्रेस की नीतियों तथा प्राथमिकताओं पर भी पड़ा | विएना कांग्रेस ने एक नयी यूरोपीय व्यवस्था जोकि तत्कालीन परिस्थितियों में वैश्विक व्यवस्था के समकक्ष थी, को जन्म दिया | जिसे यूरोप की महान शक्तियों ने स्वीकारा तथा उसे बनाये रखने की प्रतिबद्धता भी प्रकट की | विएना कांग्रेस के बाद तथाकथित यूरोपीय कांग्रेसों के माध्यम से मेटरनिख के नेतृत्व में विएना व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने की वयवस्था की गयी | विएना कांग्रेस की परिस्थितियां एवं प्राथमिकताएं - विएना कांग्रेस ने कुछ निश्चित सिद्धांतों के अंतर्गत कार्य किया - वैधता - इस सिद्धांत के अंतर्गत राज्य सत्ता पर यूरोप के प्राचीन राजवंशों की वैधता को स्वीकार किया गया तथा नेपोलियन द्वारा स्थापित व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंका गया | वैधता के सिद्धांत का विस्तार विभिन्न देशों के राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण में भी किया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत लुइ 18वें के तहत फ्रांस के बुर्बुआ वंश के शासकों को स्थापित किया गया | उत्तरी इटली के राज्यों में ऑस्ट्रिया के राजवंश के शासकों को पुनः स्थापित किया गया तथा जर्मनी के पुराने राजवंशों को पुनः स्थापित किया गया | इन राजवंशों ने प्रतिक्रियावादी रूप से शासन करना प्रारंभ किया | इसके अंतर्गत मुख्य रूप से फ्रांस की शक्तियों तथा सीमाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की गयी | फ्रांस को अपेक्षाकृत बड़े राज्यों से घेरने की कोशिश की गयी तथा फ्रांस की सीमाओं को क्रांतिपूर्व की स्थिति में लाया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत वेनेशिया तथा लोम्बार्डी के इटली के राज्यों को ऑस्ट्रिया को दे दिया गया |तथा अन्य इटली के राज्यों पर भी ऑस्ट्रिया का प्रभाव बनाया गया | इतालनी राज्य पीडमांट एवं सार्डीनिया को एक किया गया | बेल्जियम तथा नीदेरलैंड को मिलाकर एक नए राज्य का निर्माण किया गया | पुरस्कार एवं दंड - इसके अंतर्गत फ्रांस एवं नेपोलियन के सहयोगी रहे जैसे - डेनमार्क को दंड देने की तथा मित्र राष्ट्रों को पुरस्कार देने की कोशिश की गयी | डेनमार्क से नार्वे छीन लिया गया तथा उसे स्वीडन को दिया गया तथा फिनलैंड को रूस को दिया गया | इसी सन्दर्भ में पोलैंड के क्षेत्रों पर भी विजित शक्तियों ने अपना-अपना प्रभाव स्थापित किया | विएना कांग्रेस को इस बात का श्रेय दिया गया , जोकि बहुप्रतीक्षित थी तथा जिसने आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया | पश्चिमी यूरोप के देशों में औद्योगिक क्रांति का विस्तार विएना कांग्रेस के बाद ही संभव हो पाया | शांति के सन्दर्भ विएना कांग्रेस के लगभग 100 साल बाद हुए पेरिस सम्मलेन से अधिक सफल माना जाता है | विएना कांग्रेस ने यूरोप के अल्पकालिक आवश्यकताओं को ही पूर्ण किया तथा इसने उदारवादी तथा राष्ट्रवादी प्रवृतियों का दमन किया |19 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का इतिहास प्रतिक्रियावादी शक्तियों, जिनका प्रतिनिधित्व विएना कांग्रेस ने किया तथा प्रगतिशील शक्तियों के बीच संघर्ष का विषय बन गया |यह कहा जाता है कि मेटरनिख अपने समय की धारा के विपरीत तैरने का प्रयत्न कर रहा था तथा उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था का पतन अपरिहार्य था |
##Question:वियना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए, इसकी परिस्थितियों तथा प्राथमिकताओं का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the Vienna Congress, analyze its circumstances and priorities. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत विएना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात विएना कांग्रेस की परिस्थितियों एवं प्राथमिकताओं का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में विएना कांग्रेस का आलोचनात्मक परीक्षण करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - विएना कांग्रेस वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन के अंतिम रूप से पराजित होने के बाद विजित शक्तियों का एक सम्मलेन विएना में आयोजित किया गया | इस सम्मलेन में प्रमुख भूमिका ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने निभायी | इस सम्मलेन में रूस, प्रशा तथा इंगलैंड के प्रतिनिधियों ने भाग लिया | इस सम्मलेन का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्धों तथा नेपोलियन के द्वारा किये गए यूरोप के मानचित्र में किये गए परिवर्तनों को विजित शक्तियों के पक्ष को पुनर्निर्धारित करना था | इसके साथ ही इस कांग्रेस का उद्देश्य फ्रांस की शक्ति तथा फ्रांसीसी क्रांतिकारी विचारों को रोकना तथा उसके माध्यम से तथाकथित पुरातन व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना या बनाये रखना था | फ्रांस के साथ-साथ पूरे यूरोप में बढ़ती शांति की इच्छा ने भी प्रति क्रांतिकारी भावनाओं को तीव्र किया जिसका प्रभाव विएना कांग्रेस की नीतियों तथा प्राथमिकताओं पर भी पड़ा | विएना कांग्रेस ने एक नयी यूरोपीय व्यवस्था जोकि तत्कालीन परिस्थितियों में वैश्विक व्यवस्था के समकक्ष थी, को जन्म दिया | जिसे यूरोप की महान शक्तियों ने स्वीकारा तथा उसे बनाये रखने की प्रतिबद्धता भी प्रकट की | विएना कांग्रेस के बाद तथाकथित यूरोपीय कांग्रेसों के माध्यम से मेटरनिख के नेतृत्व में विएना व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने की वयवस्था की गयी | विएना कांग्रेस की परिस्थितियां एवं प्राथमिकताएं - विएना कांग्रेस ने कुछ निश्चित सिद्धांतों के अंतर्गत कार्य किया - वैधता - इस सिद्धांत के अंतर्गत राज्य सत्ता पर यूरोप के प्राचीन राजवंशों की वैधता को स्वीकार किया गया तथा नेपोलियन द्वारा स्थापित व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंका गया | वैधता के सिद्धांत का विस्तार विभिन्न देशों के राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण में भी किया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत लुइ 18वें के तहत फ्रांस के बुर्बुआ वंश के शासकों को स्थापित किया गया | उत्तरी इटली के राज्यों में ऑस्ट्रिया के राजवंश के शासकों को पुनः स्थापित किया गया तथा जर्मनी के पुराने राजवंशों को पुनः स्थापित किया गया | इन राजवंशों ने प्रतिक्रियावादी रूप से शासन करना प्रारंभ किया | इसके अंतर्गत मुख्य रूप से फ्रांस की शक्तियों तथा सीमाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की गयी | फ्रांस को अपेक्षाकृत बड़े राज्यों से घेरने की कोशिश की गयी तथा फ्रांस की सीमाओं को क्रांतिपूर्व की स्थिति में लाया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत वेनेशिया तथा लोम्बार्डी के इटली के राज्यों को ऑस्ट्रिया को दे दिया गया |तथा अन्य इटली के राज्यों पर भी ऑस्ट्रिया का प्रभाव बनाया गया | इतालनी राज्य पीडमांट एवं सार्डीनिया को एक किया गया | बेल्जियम तथा नीदेरलैंड को मिलाकर एक नए राज्य का निर्माण किया गया | पुरस्कार एवं दंड - इसके अंतर्गत फ्रांस एवं नेपोलियन के सहयोगी रहे जैसे - डेनमार्क को दंड देने की तथा मित्र राष्ट्रों को पुरस्कार देने की कोशिश की गयी | डेनमार्क से नार्वे छीन लिया गया तथा उसे स्वीडन को दिया गया तथा फिनलैंड को रूस को दिया गया | इसी सन्दर्भ में पोलैंड के क्षेत्रों पर भी विजित शक्तियों ने अपना-अपना प्रभाव स्थापित किया | विएना कांग्रेस को इस बात का श्रेय दिया गया , जोकि बहुप्रतीक्षित थी तथा जिसने आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया | पश्चिमी यूरोप के देशों में औद्योगिक क्रांति का विस्तार विएना कांग्रेस के बाद ही संभव हो पाया | शांति के सन्दर्भ विएना कांग्रेस के लगभग 100 साल बाद हुए पेरिस सम्मलेन से अधिक सफल माना जाता है | विएना कांग्रेस ने यूरोप के अल्पकालिक आवश्यकताओं को ही पूर्ण किया तथा इसने उदारवादी तथा राष्ट्रवादी प्रवृतियों का दमन किया |19 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का इतिहास प्रतिक्रियावादी शक्तियों, जिनका प्रतिनिधित्व विएना कांग्रेस ने किया तथा प्रगतिशील शक्तियों के बीच संघर्ष का विषय बन गया |यह कहा जाता है कि मेटरनिख अपने समय की धारा के विपरीत तैरने का प्रयत्न कर रहा था तथा उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था का पतन अपरिहार्य था |
50,595
Trace the evolution of agriculture in India from the ancient till the colonial period. (150 words/10 marks)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD PHASE II- COLONIAL PHASE -CONCLUSION- Status of agriculture in India at the time of independence/ when the Britishers left India ANSWER:- Agriculture is the science and art of cultivation on the soil, raising crops and rearing livestock. It is also called farming. India is an agriculturally important country. Two-thirds of its population is engaged in agricultural activities. Agriculture is a primary activity, which produces most of the food that we consume. Besides food grains, it also produces raw material for various industries. THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD 1) SIMPLE SUBSISTENCE AGRICULTURE It was practised by the tribals living near the forests- (Jhum/ Poda practices by the Particularly Vulnerable and Tribal Groups) 2) INTENSIVE SUBSISTENCE AGRICULTURE Almost all the farmers in India practiced this type of agriculture near the rivers . It was practised by the villagers mainly. It led to the evolution of the Indian civilization We exported cotton, spices and silk (also artefacts etc.). [India was not exporting foodgrains as such until Medieval history.] 3) NOMADIC HERDING It was practised in almost all the parts of the country and fulfilled the animal produce requirements of the country for the purpose of dairy, meat, wool, hyde/ leather, beasts of burden (oxen, mules, donkeys, horses, camels) etc. **We did not have horse rearing- horses were bought from the Central Asian region through trade- this trade was on a substantial scale though Overall, India was self-sufficient, a net exporter, and also supported cottage industries. (This is what attracted the Europeans to come to India) PHASE II- COLONIAL PHASE 1) MODIFICATION OF INTENSIVE SUBSISTENCE FARMING Their goals (were very different from the previous rulers)- To derive maximum commercial crops/ non-food crops for the sake of profits. They forced farmers to grow non-food crops (already existent in India) like Cotton, jute etc. in their otherwise grain-growing fields So, intensive subsistence turned towards the non-food crops. 1.1) They introduced indigo plantation (used in the dyeing industry)- It led to the exploitation of farmers. 1.2) They introduced land ownership- zamindari, mahalwari, ryotwari systems. The system of landlords was created. This whole system is called the feudal system Before, the chain in revenue collection was as: king- administration- Jagirdar- farmer (Revenue was collected this way- some places revenue was submitted directly to the administration. The king could be approached for grievances) The Europeans (under Company rule) did not deal directly with the people. They created landlords- and there were further landlords under them. The highest of these were the absentee landlords (below them were the landlords). The absentee landlords started living in the towns and mingling with the administration and building their affinity with them. Therefore, a chain got created with many intermediaries in between: farmers- tenants and sub-tenants- under them were the sharecropper- and under them, the landless labourers. [Share cropper and landless labour- were mainly those who shifted from the cottage industries when these were destroyed by the British policies.] So, more middlemen got created in the revenue chain, hence, it led to more exploitation. All this led to a fall in investments in agriculture, and therefore, a decline of productivity of agriculture and declining farmer status. It led to a food shortage [Investment in agriculture- canals etc. were for cotton/ the non-food crops] 2) PLANTATION AGRICULTURE It was introduced in Assam, WB, parts of South India (Kerala, Tamil Nadu, Karnataka). It was an exploitative system- the farmers were exploited. In India, tea, coffee and rubber- all the plantations were owned by Europeans and the workers were Indians- all the benefits were accrued to the owners. At the time of independence, India was not food self-sufficient in foodgrains. Some of the lands were under cotton and jute (forcefully). The system of landlordism had its stronghold on the rural agrarian system, as middle-men were very prevalent- The zamindars owned the land and the farmers were highly exploited. New categories of farmworkers were created- share-croppers and land-less labourers [**Tenants are those who take the land and pay rent in cash or kind (whether they are able to produce or not). They generally used to take the good part of the land/ the productive land; The rent was pre-fixed Share-croppers- They used to get the relatively less productive land; The rent was not fixed. But the share of the crop was fixed i.e. the percentage of share of crops to be paid was fixed] The size of farms was small, poor quality seeds were used with no scientific inputs (fertilizers, pesticides, machines) and no irrigation facilities. Thus, the soil quality was not maintained. Also, there was a lack of development of storage, market and transport facilities. These posed the challenges for the government at that time, and paved the way for technological solutions in agriculture later on, in the name of the green revolution in the 1960s.
##Question:Trace the evolution of agriculture in India from the ancient till the colonial period. (150 words/10 marks)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD PHASE II- COLONIAL PHASE -CONCLUSION- Status of agriculture in India at the time of independence/ when the Britishers left India ANSWER:- Agriculture is the science and art of cultivation on the soil, raising crops and rearing livestock. It is also called farming. India is an agriculturally important country. Two-thirds of its population is engaged in agricultural activities. Agriculture is a primary activity, which produces most of the food that we consume. Besides food grains, it also produces raw material for various industries. THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD 1) SIMPLE SUBSISTENCE AGRICULTURE It was practised by the tribals living near the forests- (Jhum/ Poda practices by the Particularly Vulnerable and Tribal Groups) 2) INTENSIVE SUBSISTENCE AGRICULTURE Almost all the farmers in India practiced this type of agriculture near the rivers . It was practised by the villagers mainly. It led to the evolution of the Indian civilization We exported cotton, spices and silk (also artefacts etc.). [India was not exporting foodgrains as such until Medieval history.] 3) NOMADIC HERDING It was practised in almost all the parts of the country and fulfilled the animal produce requirements of the country for the purpose of dairy, meat, wool, hyde/ leather, beasts of burden (oxen, mules, donkeys, horses, camels) etc. **We did not have horse rearing- horses were bought from the Central Asian region through trade- this trade was on a substantial scale though Overall, India was self-sufficient, a net exporter, and also supported cottage industries. (This is what attracted the Europeans to come to India) PHASE II- COLONIAL PHASE 1) MODIFICATION OF INTENSIVE SUBSISTENCE FARMING Their goals (were very different from the previous rulers)- To derive maximum commercial crops/ non-food crops for the sake of profits. They forced farmers to grow non-food crops (already existent in India) like Cotton, jute etc. in their otherwise grain-growing fields So, intensive subsistence turned towards the non-food crops. 1.1) They introduced indigo plantation (used in the dyeing industry)- It led to the exploitation of farmers. 1.2) They introduced land ownership- zamindari, mahalwari, ryotwari systems. The system of landlords was created. This whole system is called the feudal system Before, the chain in revenue collection was as: king- administration- Jagirdar- farmer (Revenue was collected this way- some places revenue was submitted directly to the administration. The king could be approached for grievances) The Europeans (under Company rule) did not deal directly with the people. They created landlords- and there were further landlords under them. The highest of these were the absentee landlords (below them were the landlords). The absentee landlords started living in the towns and mingling with the administration and building their affinity with them. Therefore, a chain got created with many intermediaries in between: farmers- tenants and sub-tenants- under them were the sharecropper- and under them, the landless labourers. [Share cropper and landless labour- were mainly those who shifted from the cottage industries when these were destroyed by the British policies.] So, more middlemen got created in the revenue chain, hence, it led to more exploitation. All this led to a fall in investments in agriculture, and therefore, a decline of productivity of agriculture and declining farmer status. It led to a food shortage [Investment in agriculture- canals etc. were for cotton/ the non-food crops] 2) PLANTATION AGRICULTURE It was introduced in Assam, WB, parts of South India (Kerala, Tamil Nadu, Karnataka). It was an exploitative system- the farmers were exploited. In India, tea, coffee and rubber- all the plantations were owned by Europeans and the workers were Indians- all the benefits were accrued to the owners. At the time of independence, India was not food self-sufficient in foodgrains. Some of the lands were under cotton and jute (forcefully). The system of landlordism had its stronghold on the rural agrarian system, as middle-men were very prevalent- The zamindars owned the land and the farmers were highly exploited. New categories of farmworkers were created- share-croppers and land-less labourers [**Tenants are those who take the land and pay rent in cash or kind (whether they are able to produce or not). They generally used to take the good part of the land/ the productive land; The rent was pre-fixed Share-croppers- They used to get the relatively less productive land; The rent was not fixed. But the share of the crop was fixed i.e. the percentage of share of crops to be paid was fixed] The size of farms was small, poor quality seeds were used with no scientific inputs (fertilizers, pesticides, machines) and no irrigation facilities. Thus, the soil quality was not maintained. Also, there was a lack of development of storage, market and transport facilities. These posed the challenges for the government at that time, and paved the way for technological solutions in agriculture later on, in the name of the green revolution in the 1960s.
50,601
वियना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए, इसकी परिस्थितियों तथा प्राथमिकताओं का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the Vienna Congress, analyze its circumstances and priorities. (150-200 Words)
एप्रोच - उत्तर की शुरुआत विएना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात विएना कांग्रेस की परिस्थितियों एवं प्राथमिकताओं का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में विएना कांग्रेस का आलोचनात्मक परीक्षण करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - विएना कांग्रेस वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन के अंतिम रूप से पराजित होने के बाद विजित शक्तियों का एक सम्मलेन विएना में आयोजित किया गया | इस सम्मलेन में प्रमुख भूमिका ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने निभायी | इस सम्मलेन में रूस, प्रशा तथा इंगलैंड के प्रतिनिधियों ने भाग लिया | इस सम्मलेन का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्धों तथा नेपोलियन के द्वारा किये गए यूरोप के मानचित्र में किये गए परिवर्तनों को विजित शक्तियों के पक्ष को पुनर्निर्धारित करना था | इसके साथ ही इस कांग्रेस का उद्देश्य फ्रांस की शक्ति तथा फ्रांसीसी क्रांतिकारी विचारों को रोकना तथा उसके माध्यम से तथाकथित पुरातन व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना या बनाये रखना था | फ्रांस के साथ-साथ पूरे यूरोप में बढ़ती शांति की इच्छा ने भी प्रति क्रांतिकारी भावनाओं को तीव्र किया जिसका प्रभाव विएना कांग्रेस की नीतियों तथा प्राथमिकताओं पर भी पड़ा | विएना कांग्रेस ने एक नयी यूरोपीय व्यवस्था जोकि तत्कालीन परिस्थितियों में वैश्विक व्यवस्था के समकक्ष थी, को जन्म दिया | जिसे यूरोप की महान शक्तियों ने स्वीकारा तथा उसे बनाये रखने की प्रतिबद्धता भी प्रकट की | विएना कांग्रेस के बाद तथाकथित यूरोपीय कांग्रेसों के माध्यम से मेटरनिख के नेतृत्व में विएना व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने की वयवस्था की गयी | विएना कांग्रेस की परिस्थितियां एवं प्राथमिकताएं - विएना कांग्रेस ने कुछ निश्चित सिद्धांतों के अंतर्गत कार्य किया - वैधता - इस सिद्धांत के अंतर्गत राज्य सत्ता पर यूरोप के प्राचीन राजवंशों की वैधता को स्वीकार किया गया तथा नेपोलियन द्वारा स्थापित व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंका गया | वैधता के सिद्धांत का विस्तार विभिन्न देशों के राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण में भी किया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत लुइ 18वें के तहत फ्रांस के बुर्बुआ वंश के शासकों को स्थापित किया गया | उत्तरी इटली के राज्यों में ऑस्ट्रिया के राजवंश के शासकों को पुनः स्थापित किया गया तथा जर्मनी के पुराने राजवंशों को पुनः स्थापित किया गया | इन राजवंशों ने प्रतिक्रियावादी रूप से शासन करना प्रारंभ किया | इसके अंतर्गत मुख्य रूप से फ्रांस की शक्तियों तथा सीमाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की गयी | फ्रांस को अपेक्षाकृत बड़े राज्यों से घेरने की कोशिश की गयी तथा फ्रांस की सीमाओं को क्रांतिपूर्व की स्थिति में लाया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत वेनेशिया तथा लोम्बार्डी के इटली के राज्यों को ऑस्ट्रिया को दे दिया गया |तथा अन्य इटली के राज्यों पर भी ऑस्ट्रिया का प्रभाव बनाया गया | इतालनी राज्य पीडमांट एवं सार्डीनिया को एक किया गया | बेल्जियम तथा नीदेरलैंड को मिलाकर एक नए राज्य का निर्माण किया गया | पुरस्कार एवं दंड - इसके अंतर्गत फ्रांस एवं नेपोलियन के सहयोगी रहे जैसे - डेनमार्क को दंड देने की तथा मित्र राष्ट्रों को पुरस्कार देने की कोशिश की गयी | डेनमार्क से नार्वे छीन लिया गया तथा उसे स्वीडन को दिया गया तथा फिनलैंड को रूस को दिया गया | इसी सन्दर्भ में पोलैंड के क्षेत्रों पर भी विजित शक्तियों ने अपना-अपना प्रभाव स्थापित किया | विएना कांग्रेस को इस बात का श्रेय दिया गया , जोकि बहुप्रतीक्षित थी तथा जिसने आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया | पश्चिमी यूरोप के देशों में औद्योगिक क्रांति का विस्तार विएना कांग्रेस के बाद ही संभव हो पाया | शांति के सन्दर्भ विएना कांग्रेस के लगभग 100 साल बाद हुए पेरिस सम्मलेन से अधिक सफल माना जाता है | विएना कांग्रेस ने यूरोप के अल्पकालिक आवश्यकताओं को ही पूर्ण किया तथा इसने उदारवादी तथा राष्ट्रवादी प्रवृतियों का दमन किया |19 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का इतिहास प्रतिक्रियावादी शक्तियों, जिनका प्रतिनिधित्व विएना कांग्रेस ने किया तथा प्रगतिशील शक्तियों के बीच संघर्ष का विषय बन गया |यह कहा जाता है कि मेटरनिख अपने समय की धारा के विपरीत तैरने का प्रयत्न कर रहा था तथा उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था का पतन अपरिहार्य था |
##Question:वियना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए, इसकी परिस्थितियों तथा प्राथमिकताओं का विश्लेषण कीजिये | (150-200 शब्द) While giving a general introduction to the Vienna Congress, analyze its circumstances and priorities. (150-200 Words)##Answer:एप्रोच - उत्तर की शुरुआत विएना कांग्रेस का सामान्य परिचय देते हुए कीजिये | इसके पश्चात विएना कांग्रेस की परिस्थितियों एवं प्राथमिकताओं का वर्णन करते हुए उत्तर को विस्तारित कीजिये | अंत में विएना कांग्रेस का आलोचनात्मक परीक्षण करते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - विएना कांग्रेस वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन के अंतिम रूप से पराजित होने के बाद विजित शक्तियों का एक सम्मलेन विएना में आयोजित किया गया | इस सम्मलेन में प्रमुख भूमिका ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने निभायी | इस सम्मलेन में रूस, प्रशा तथा इंगलैंड के प्रतिनिधियों ने भाग लिया | इस सम्मलेन का मुख्य उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांतिकारी युद्धों तथा नेपोलियन के द्वारा किये गए यूरोप के मानचित्र में किये गए परिवर्तनों को विजित शक्तियों के पक्ष को पुनर्निर्धारित करना था | इसके साथ ही इस कांग्रेस का उद्देश्य फ्रांस की शक्ति तथा फ्रांसीसी क्रांतिकारी विचारों को रोकना तथा उसके माध्यम से तथाकथित पुरातन व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना या बनाये रखना था | फ्रांस के साथ-साथ पूरे यूरोप में बढ़ती शांति की इच्छा ने भी प्रति क्रांतिकारी भावनाओं को तीव्र किया जिसका प्रभाव विएना कांग्रेस की नीतियों तथा प्राथमिकताओं पर भी पड़ा | विएना कांग्रेस ने एक नयी यूरोपीय व्यवस्था जोकि तत्कालीन परिस्थितियों में वैश्विक व्यवस्था के समकक्ष थी, को जन्म दिया | जिसे यूरोप की महान शक्तियों ने स्वीकारा तथा उसे बनाये रखने की प्रतिबद्धता भी प्रकट की | विएना कांग्रेस के बाद तथाकथित यूरोपीय कांग्रेसों के माध्यम से मेटरनिख के नेतृत्व में विएना व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने की वयवस्था की गयी | विएना कांग्रेस की परिस्थितियां एवं प्राथमिकताएं - विएना कांग्रेस ने कुछ निश्चित सिद्धांतों के अंतर्गत कार्य किया - वैधता - इस सिद्धांत के अंतर्गत राज्य सत्ता पर यूरोप के प्राचीन राजवंशों की वैधता को स्वीकार किया गया तथा नेपोलियन द्वारा स्थापित व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंका गया | वैधता के सिद्धांत का विस्तार विभिन्न देशों के राजनीतिक सीमाओं के निर्धारण में भी किया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत लुइ 18वें के तहत फ्रांस के बुर्बुआ वंश के शासकों को स्थापित किया गया | उत्तरी इटली के राज्यों में ऑस्ट्रिया के राजवंश के शासकों को पुनः स्थापित किया गया तथा जर्मनी के पुराने राजवंशों को पुनः स्थापित किया गया | इन राजवंशों ने प्रतिक्रियावादी रूप से शासन करना प्रारंभ किया | इसके अंतर्गत मुख्य रूप से फ्रांस की शक्तियों तथा सीमाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की गयी | फ्रांस को अपेक्षाकृत बड़े राज्यों से घेरने की कोशिश की गयी तथा फ्रांस की सीमाओं को क्रांतिपूर्व की स्थिति में लाया गया | इसी सिद्धांत के अंतर्गत वेनेशिया तथा लोम्बार्डी के इटली के राज्यों को ऑस्ट्रिया को दे दिया गया |तथा अन्य इटली के राज्यों पर भी ऑस्ट्रिया का प्रभाव बनाया गया | इतालनी राज्य पीडमांट एवं सार्डीनिया को एक किया गया | बेल्जियम तथा नीदेरलैंड को मिलाकर एक नए राज्य का निर्माण किया गया | पुरस्कार एवं दंड - इसके अंतर्गत फ्रांस एवं नेपोलियन के सहयोगी रहे जैसे - डेनमार्क को दंड देने की तथा मित्र राष्ट्रों को पुरस्कार देने की कोशिश की गयी | डेनमार्क से नार्वे छीन लिया गया तथा उसे स्वीडन को दिया गया तथा फिनलैंड को रूस को दिया गया | इसी सन्दर्भ में पोलैंड के क्षेत्रों पर भी विजित शक्तियों ने अपना-अपना प्रभाव स्थापित किया | विएना कांग्रेस को इस बात का श्रेय दिया गया , जोकि बहुप्रतीक्षित थी तथा जिसने आर्थिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया | पश्चिमी यूरोप के देशों में औद्योगिक क्रांति का विस्तार विएना कांग्रेस के बाद ही संभव हो पाया | शांति के सन्दर्भ विएना कांग्रेस के लगभग 100 साल बाद हुए पेरिस सम्मलेन से अधिक सफल माना जाता है | विएना कांग्रेस ने यूरोप के अल्पकालिक आवश्यकताओं को ही पूर्ण किया तथा इसने उदारवादी तथा राष्ट्रवादी प्रवृतियों का दमन किया |19 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का इतिहास प्रतिक्रियावादी शक्तियों, जिनका प्रतिनिधित्व विएना कांग्रेस ने किया तथा प्रगतिशील शक्तियों के बीच संघर्ष का विषय बन गया |यह कहा जाता है कि मेटरनिख अपने समय की धारा के विपरीत तैरने का प्रयत्न कर रहा था तथा उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था का पतन अपरिहार्य था |
50,604
Trace the evolution of agriculture in India from the ancient till the colonial period. (150 words)
BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD PHASE II- COLONIAL PHASE - CONCLUSION - Status of agriculture in India at the time of independence/ when the Britishers left India ANSWER:- Agriculture is the science and art of cultivation on the soil, raising crops and rearing livestock. It is also called farming. India is an agriculturally important country. Two-thirds of its population is engaged in agricultural activities. Agriculture is a primary activity, which produces most of the food that we consume. Besides food grains, it also produces raw material for various industries. THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD 1) SIMPLE SUBSISTENCE AGRICULTURE: It was practiced by the tribals living near the forests- (Jhum/ Poda practices by the Particularly Vulnerable and Tribal Groups) 2) INTENSIVE SUBSISTENCE AGRICULTURE: Almost all the farmers in India practiced this type of agriculture near the rivers. It was practiced by the villagers mainly. It led to the evolution of the Indian civilization. We exported cotton, spices, and silk (also artifacts, etc.).[India was not exporting foodgrains as such until Medieval history.] 3) NOMADIC HERDING: It was practiced in almost all the parts of the country and fulfilled the animal produce requirements of the country for the purpose of dairy, meat, wool, hyde/ leather, beasts of burden (oxen, mules, donkeys, horses, camels), etc. **We did not have horse rearing- horses were bought from the Central Asian region through trade- this trade was on a substantial scale though Overall, India was self-sufficient, a net exporter, and also supported cottage industries. (This is what attracted the Europeans to come to India) PHASE II- COLONIAL PHASE 1) MODIFICATION OF INTENSIVE SUBSISTENCE FARMING: Their goals (were very different from the previous rulers)- To derive maximum commercial crops/ non-food crops for the sake of profits. They forced farmers to grow non-food crops (already existent in India) like Cotton, jute etc. in their otherwise grain-growing fields. So, intensive subsistence turned towards the non-food crops. 1.1) They introduced indigo plantation (used in the dyeing industry)- It led to the exploitation of farmers. 1.2) They introduced land ownership- zamindari, mahalwari, ryotwari systems. The system of landlords was created. This whole system is called the feudal system Before, the chain in revenue collection was as: king- administration- Jagirdar- farmer (Revenue was collected this way- some places revenue was submitted directly to the administration. The king could be approached for grievances) The Europeans (under Company rule) did not deal directly with the people. They created landlords- and there were further landlords under them. The highest of these were the absentee landlords (below them were the landlords). The absentee landlords started living in the towns and mingling with the administration and building their affinity with them. Therefore, a chain got created with many intermediaries in between: farmers- tenants and sub-tenants- under them were the sharecropper- and under them, the landless labourers. [Share cropper and landless labour- were mainly those who shifted from the cottage industries when these were destroyed by the British policies.] So, more middlemen got created in the revenue chain, hence, it led to more exploitation. All this led to a fall in investments in agriculture, and therefore, a decline of productivity of agriculture and declining farmer status. It led to a food shortage [Investment in agriculture- canals etc. were for cotton/ the non-food crops] 2) PLANTATION AGRICULTURE: It was introduced in Assam, WB, parts of South India (Kerala, Tamil Nadu, Karnataka). It was an exploitative system- the farmers were exploited. In India, tea, coffee, and rubber- all the plantations were owned by Europeans and the workers were Indians- all the benefits were accrued to the owners. At the time of independence, India was not food self-sufficient in foodgrains. Some of the lands were under cotton and jute (forcefully). The system of landlordism had its stronghold on the rural agrarian system, as middle-men were very prevalent- The zamindars owned the land and the farmers were highly exploited. New categories of farmworkers were created- share-croppers and land-less labourers [**Tenants are those who take the land and pay rent in cash or kind (whether they are able to produce or not). They generally used to take the good part of the land/ the productive land; The rent was pre-fixed Share-croppers- They used to get the relatively less productive land; The rent was not fixed. But the share of the crop was fixed i.e. the percentage of share of crops to be paid was fixed] The size of farms was small, poor quality seeds were used with no scientific inputs (fertilizers, pesticides, machines) and no irrigation facilities. Thus, the soil quality was not maintained. Also, there was a lack of development of storage, market and transport facilities. These posed the challenges for the government at that time, and paved the way for technological solutions in agriculture later on, in the name of the green revolution in the 1960s.
##Question:Trace the evolution of agriculture in India from the ancient till the colonial period. (150 words)##Answer:BRIEF APPROACH: -INTRODUCTION -THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD PHASE II- COLONIAL PHASE - CONCLUSION - Status of agriculture in India at the time of independence/ when the Britishers left India ANSWER:- Agriculture is the science and art of cultivation on the soil, raising crops and rearing livestock. It is also called farming. India is an agriculturally important country. Two-thirds of its population is engaged in agricultural activities. Agriculture is a primary activity, which produces most of the food that we consume. Besides food grains, it also produces raw material for various industries. THE EVOLUTION OF AGRICULTURE IN INDIA PHASE I- ANCIENT AND MEDIEVAL PERIOD 1) SIMPLE SUBSISTENCE AGRICULTURE: It was practiced by the tribals living near the forests- (Jhum/ Poda practices by the Particularly Vulnerable and Tribal Groups) 2) INTENSIVE SUBSISTENCE AGRICULTURE: Almost all the farmers in India practiced this type of agriculture near the rivers. It was practiced by the villagers mainly. It led to the evolution of the Indian civilization. We exported cotton, spices, and silk (also artifacts, etc.).[India was not exporting foodgrains as such until Medieval history.] 3) NOMADIC HERDING: It was practiced in almost all the parts of the country and fulfilled the animal produce requirements of the country for the purpose of dairy, meat, wool, hyde/ leather, beasts of burden (oxen, mules, donkeys, horses, camels), etc. **We did not have horse rearing- horses were bought from the Central Asian region through trade- this trade was on a substantial scale though Overall, India was self-sufficient, a net exporter, and also supported cottage industries. (This is what attracted the Europeans to come to India) PHASE II- COLONIAL PHASE 1) MODIFICATION OF INTENSIVE SUBSISTENCE FARMING: Their goals (were very different from the previous rulers)- To derive maximum commercial crops/ non-food crops for the sake of profits. They forced farmers to grow non-food crops (already existent in India) like Cotton, jute etc. in their otherwise grain-growing fields. So, intensive subsistence turned towards the non-food crops. 1.1) They introduced indigo plantation (used in the dyeing industry)- It led to the exploitation of farmers. 1.2) They introduced land ownership- zamindari, mahalwari, ryotwari systems. The system of landlords was created. This whole system is called the feudal system Before, the chain in revenue collection was as: king- administration- Jagirdar- farmer (Revenue was collected this way- some places revenue was submitted directly to the administration. The king could be approached for grievances) The Europeans (under Company rule) did not deal directly with the people. They created landlords- and there were further landlords under them. The highest of these were the absentee landlords (below them were the landlords). The absentee landlords started living in the towns and mingling with the administration and building their affinity with them. Therefore, a chain got created with many intermediaries in between: farmers- tenants and sub-tenants- under them were the sharecropper- and under them, the landless labourers. [Share cropper and landless labour- were mainly those who shifted from the cottage industries when these were destroyed by the British policies.] So, more middlemen got created in the revenue chain, hence, it led to more exploitation. All this led to a fall in investments in agriculture, and therefore, a decline of productivity of agriculture and declining farmer status. It led to a food shortage [Investment in agriculture- canals etc. were for cotton/ the non-food crops] 2) PLANTATION AGRICULTURE: It was introduced in Assam, WB, parts of South India (Kerala, Tamil Nadu, Karnataka). It was an exploitative system- the farmers were exploited. In India, tea, coffee, and rubber- all the plantations were owned by Europeans and the workers were Indians- all the benefits were accrued to the owners. At the time of independence, India was not food self-sufficient in foodgrains. Some of the lands were under cotton and jute (forcefully). The system of landlordism had its stronghold on the rural agrarian system, as middle-men were very prevalent- The zamindars owned the land and the farmers were highly exploited. New categories of farmworkers were created- share-croppers and land-less labourers [**Tenants are those who take the land and pay rent in cash or kind (whether they are able to produce or not). They generally used to take the good part of the land/ the productive land; The rent was pre-fixed Share-croppers- They used to get the relatively less productive land; The rent was not fixed. But the share of the crop was fixed i.e. the percentage of share of crops to be paid was fixed] The size of farms was small, poor quality seeds were used with no scientific inputs (fertilizers, pesticides, machines) and no irrigation facilities. Thus, the soil quality was not maintained. Also, there was a lack of development of storage, market and transport facilities. These posed the challenges for the government at that time, and paved the way for technological solutions in agriculture later on, in the name of the green revolution in the 1960s.
50,607
भारत मुख्यतः एक विकासशील अर्थव्यवस्था है किन्तु इसमें प्रगतिशीलता के तत्व भी देखे जा सकते हैं| भारतीय अर्थव्यवस्था के अभिलक्षणों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 से 200 शब्द ) India is primarily a developing economy but elements of progress can also be seen in it. Verify the statement through the characteristics of the Indian economy. (150 to 200 words)
दृष्टिकोण 1- भूमिका में अर्थव्यवस्था को परिभाषित करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप की सूचना दीजिये 2- भारतीय अर्थव्यवस्था में अल्प विकसित या विकासशील अर्थव्यवस्था के लक्षणों को स्पष्ट कीजिये 3-भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रगतिशील अर्थव्यवस्था के लक्षणों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी राष्ट्र द्वारा अपने नागरिकों के कल्याण स्तर को उच्च करने तथा उच्च स्तर पर बनाये रखने के उद्देश्य से उपलब्ध संसाधनों का नियोजन करते हुए, मुद्रा को केंद्र में रख कर जिस व्यवस्था का निर्माण किया जाता है उसे अर्थव्यवस्था कहते हैं| अर्थव्यवस्था का अभिप्राय किसी क्षेत्र विशेष में प्रचलित आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप, प्रकृति एवं उनके स्तर से होता है|भारतीय अर्थव्यवस्था स्वरूपतः मिश्रित प्रणाली से संचालित होती है| स्वतंत्रता के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न अभिलक्षण स्पष्ट करते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में निरंतर सुधार हुआ है किन्तु विकास के सन्दर्भ में भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है इसी कारण भारत में प्रगतिशीलता के साथ ही अल्प विकास के लक्षण भी देखने को मिलते हैं| भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख अभिलक्षण निम्नलिखित हैं- विकासशील/अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के तत्व भारतीय अर्थव्यवस्था अपने आकार एवं स्वरुप के आधार पर एक विकासशील अर्थव्यवस्था है|इसके स्वरुप एवं आकार के निधारक कारक निम्नलिखित हैं- यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पर्याप्त रूप से बड़ा है लेकिन बड़ी जनसँख्या धारण करने के कारण औसत प्रतिव्यक्ति आय वास्तव में कम है इसके के कारणअधिकाँश जनसंख्या का निम्न जीवन स्तर दिखाई देता है| औपनिवेशिक कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था का पूँजी आधार कमजोर है और पूँजी की कमी के कारण आधारभूत ढांचेके विकास में निवेश की कमी रह जाती है जिससे आधारभूत ढांचा कमजोर रह जाता है| कमजोर आधारभूत ढांचा अर्थव्यवस्था के विकास को बाधित करता है| पूँजी की कमी के कारण रोजगार सर्जक क्षेत्रों में निवेश की कमी भी रहती है परिणामस्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था बृहद स्तर पर बेरोजगारी की समस्या का सामना करती है| लगातार बेरोजगारी की समस्या व्यापक गरीबी का रूप धारण कर लेती है |जनसंख्या का एक बड़ा भाग गरीबी रेखा से नीचे निर्वाह करता है| संसाधनों की कमी और अर्थव्यवस्था के असंतुलित विकास के कारण भारतीय अर्थयवस्था व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत/ क्षेत्रीय असमानताओं से युक्त है| उच्च जनसंख्या वृद्धि दर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का लक्षण है| भारतीय अर्थव्यवस्था जनसँख्या की उच्च वृद्धिदर की प्रवृत्ति का सामना कर रही है| यह संसाधनों पर दबाव को निरंतर बढाने के लिए जिम्मेदार है| भारत की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि में नियोजित है। कितुं नियोजित जनसंख्या के अनुपात में कृषि का कुल राष्ट्रीय आय में योगदान कम है| अधिकांश क्षेत्रों में पुरानी तकनीक से कृषि की जाती है। प्रगतिशील अर्थव्यवस्था के तत्व अल्प विकसित अर्थव्यवस्था के उपरोक्त अभिलक्षणों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्था है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं पिछले तीन दशकों में भारत विश्व की तीव्रतम वृद्धि करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा है(7 % से ऊपर जबकि विश्व औसत 3.5%) विश्व आर्थिक वृद्धि दर जहाँ लगभग 3.5 % रही है वहीँ उपरोक्त दौर में भारत की वृद्धि दर 7 %से अधिक रही है 1991 में विश्व GDP में भारत की भागीदारी लगभग 2.5% था लेकिन वर्तमान में यह 7.8 % है, इसी काल में वैश्विक व्यापार में बढ़ती भागीदारी 0.5% से 2.2 % हो गयी है इसके साथ ही विश्व निवेश, विश्व विदेशी पूँजी भंडार(टॉप 10 में) भारत की स्थिति निरंतर बेहतर हुई है भारत PPP के आधार पर तीसरी और विनिमय दर के आधार पर 7वीं बड़ी अर्थव्यवस्था है IMF में बढ़ती भागीदारी, G- 20/ ब्रिक्स आदि वैश्विक आर्थिक संगठनों में बढ़ता महत्त्व स्पष्ट करता है किभारत की अर्थव्यवस्था में प्रगतिशीलता के तत्व हैं| उपरोक्त सभी बिंदु भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप एवं स्तर को स्पष्ट करते हैं|अर्थव्यवस्था का आकार(भारत की GDP का आकार बड़ा है), विकास का स्तर(भारत की स्थिति निम्न है ), एवं आर्थिक वृद्धि दर (भारत की अधिक है) यह तीनों चर अलग अलग हैं और अलग अलग देशों में अलग अलग हो सकते हैं अतः अल्पविकास एवं प्रगतिशीलता की उपस्थिति को विरोधाभासी स्थिति नही कहा जा सकता है||उच्च आर्थिक संवृद्धि, कौशल विकास, वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान एवं भागीदारी को देखते हुए निकट भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था में बदल जाने की क्षमता से युक्त है|
##Question:भारत मुख्यतः एक विकासशील अर्थव्यवस्था है किन्तु इसमें प्रगतिशीलता के तत्व भी देखे जा सकते हैं| भारतीय अर्थव्यवस्था के अभिलक्षणों के माध्यम से कथन की पुष्टि कीजिये | (150 से 200 शब्द ) India is primarily a developing economy but elements of progress can also be seen in it. Verify the statement through the characteristics of the Indian economy. (150 to 200 words)##Answer:दृष्टिकोण 1- भूमिका में अर्थव्यवस्था को परिभाषित करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप की सूचना दीजिये 2- भारतीय अर्थव्यवस्था में अल्प विकसित या विकासशील अर्थव्यवस्था के लक्षणों को स्पष्ट कीजिये 3-भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रगतिशील अर्थव्यवस्था के लक्षणों को स्पष्ट कीजिये 4- अंतिम में स्वरुप स्पष्ट करते हुए उत्तर समाप्त कीजिये किसी राष्ट्र द्वारा अपने नागरिकों के कल्याण स्तर को उच्च करने तथा उच्च स्तर पर बनाये रखने के उद्देश्य से उपलब्ध संसाधनों का नियोजन करते हुए, मुद्रा को केंद्र में रख कर जिस व्यवस्था का निर्माण किया जाता है उसे अर्थव्यवस्था कहते हैं| अर्थव्यवस्था का अभिप्राय किसी क्षेत्र विशेष में प्रचलित आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप, प्रकृति एवं उनके स्तर से होता है|भारतीय अर्थव्यवस्था स्वरूपतः मिश्रित प्रणाली से संचालित होती है| स्वतंत्रता के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न अभिलक्षण स्पष्ट करते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में निरंतर सुधार हुआ है किन्तु विकास के सन्दर्भ में भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है इसी कारण भारत में प्रगतिशीलता के साथ ही अल्प विकास के लक्षण भी देखने को मिलते हैं| भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख अभिलक्षण निम्नलिखित हैं- विकासशील/अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के तत्व भारतीय अर्थव्यवस्था अपने आकार एवं स्वरुप के आधार पर एक विकासशील अर्थव्यवस्था है|इसके स्वरुप एवं आकार के निधारक कारक निम्नलिखित हैं- यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पर्याप्त रूप से बड़ा है लेकिन बड़ी जनसँख्या धारण करने के कारण औसत प्रतिव्यक्ति आय वास्तव में कम है इसके के कारणअधिकाँश जनसंख्या का निम्न जीवन स्तर दिखाई देता है| औपनिवेशिक कारणों से भारतीय अर्थव्यवस्था का पूँजी आधार कमजोर है और पूँजी की कमी के कारण आधारभूत ढांचेके विकास में निवेश की कमी रह जाती है जिससे आधारभूत ढांचा कमजोर रह जाता है| कमजोर आधारभूत ढांचा अर्थव्यवस्था के विकास को बाधित करता है| पूँजी की कमी के कारण रोजगार सर्जक क्षेत्रों में निवेश की कमी भी रहती है परिणामस्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था बृहद स्तर पर बेरोजगारी की समस्या का सामना करती है| लगातार बेरोजगारी की समस्या व्यापक गरीबी का रूप धारण कर लेती है |जनसंख्या का एक बड़ा भाग गरीबी रेखा से नीचे निर्वाह करता है| संसाधनों की कमी और अर्थव्यवस्था के असंतुलित विकास के कारण भारतीय अर्थयवस्था व्यापक स्तर पर व्यक्तिगत/ क्षेत्रीय असमानताओं से युक्त है| उच्च जनसंख्या वृद्धि दर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का लक्षण है| भारतीय अर्थव्यवस्था जनसँख्या की उच्च वृद्धिदर की प्रवृत्ति का सामना कर रही है| यह संसाधनों पर दबाव को निरंतर बढाने के लिए जिम्मेदार है| भारत की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि में नियोजित है। कितुं नियोजित जनसंख्या के अनुपात में कृषि का कुल राष्ट्रीय आय में योगदान कम है| अधिकांश क्षेत्रों में पुरानी तकनीक से कृषि की जाती है। प्रगतिशील अर्थव्यवस्था के तत्व अल्प विकसित अर्थव्यवस्था के उपरोक्त अभिलक्षणों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्था है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं पिछले तीन दशकों में भारत विश्व की तीव्रतम वृद्धि करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा है(7 % से ऊपर जबकि विश्व औसत 3.5%) विश्व आर्थिक वृद्धि दर जहाँ लगभग 3.5 % रही है वहीँ उपरोक्त दौर में भारत की वृद्धि दर 7 %से अधिक रही है 1991 में विश्व GDP में भारत की भागीदारी लगभग 2.5% था लेकिन वर्तमान में यह 7.8 % है, इसी काल में वैश्विक व्यापार में बढ़ती भागीदारी 0.5% से 2.2 % हो गयी है इसके साथ ही विश्व निवेश, विश्व विदेशी पूँजी भंडार(टॉप 10 में) भारत की स्थिति निरंतर बेहतर हुई है भारत PPP के आधार पर तीसरी और विनिमय दर के आधार पर 7वीं बड़ी अर्थव्यवस्था है IMF में बढ़ती भागीदारी, G- 20/ ब्रिक्स आदि वैश्विक आर्थिक संगठनों में बढ़ता महत्त्व स्पष्ट करता है किभारत की अर्थव्यवस्था में प्रगतिशीलता के तत्व हैं| उपरोक्त सभी बिंदु भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप एवं स्तर को स्पष्ट करते हैं|अर्थव्यवस्था का आकार(भारत की GDP का आकार बड़ा है), विकास का स्तर(भारत की स्थिति निम्न है ), एवं आर्थिक वृद्धि दर (भारत की अधिक है) यह तीनों चर अलग अलग हैं और अलग अलग देशों में अलग अलग हो सकते हैं अतः अल्पविकास एवं प्रगतिशीलता की उपस्थिति को विरोधाभासी स्थिति नही कहा जा सकता है||उच्च आर्थिक संवृद्धि, कौशल विकास, वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान एवं भागीदारी को देखते हुए निकट भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था में बदल जाने की क्षमता से युक्त है|
50,608
भारत के लिए पश्चिम एशिया का विशेष महत्व है लेकिन इसके लिए संबंधित चुनौतियों से पार पाना अतिआवश्यक है| पश्चिम एशिया में जारी उथलपुथल के संदर्भ में चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) West Asia has special significance for India but it is very important to overcome the related challenges. Discuss in the context of the ongoing turmoil in West Asia. (150-200 words; 10 marks)
एप्रोच- भारत तथा पश्चिम एशिया संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, भारत के लिए पश्चिम एशिया को महत्व को बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में,पश्चिम एशिया में भारत के लिए चुनौतियाँ(खासकर वर्तमान उथलपुथल से जोड़ते हुए) बताईये| इस संदर्भ में, बढ़ते सहयोग के आधार तथा आगे की राह के साथ उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत तथा पश्चिम एशियाऐतिहासिक रूप से सीमाओं की निकटता(ईरान तथा अविभाजित भारत) तथा सांस्कृतिक रूप से साथ जुड़े थें| शीतयुद्ध के अंत तक पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंध मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं तथा इस क्षेत्र की भूराजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए विकसित हुई थी जहाँ भारत ने आवश्यकतानुसार अपनी प्राथमिकतायें तय की तथा नीतियों में उसी अनुरूप परिवर्तन कियें| प्रारंभ में इजरायल व पश्चिमी देशों की इस क्षेत्र हेतु नीतियों की कड़ी निंदा एवं फिलिस्तीन मुद्दे तथा अरब सहयोग को महत्व प्रदान किया गया था| इस्लामिक सहयोग संगठन की स्थापना के समय भी भारत को आमंत्रित किया गया था| भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व खाड़ी क्षेत्र में तेल तथा गैस का भंडार होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा हेतु इसकी महत्वपूर्ण भूमिका; पीपल टू पीपल संबंधों को प्रोत्साहित करने सेरेमिटेंस प्राप्ति तथा भारतीय डायस्पोरा के संदर्भ में; काउंटर टेररिज्म बहुत सारे आतंकवादी संगठन तथा वहां से उनके द्वारा भारत में भी प्रभाव स्थापित करने की मंशा; भारत को आतंकवाद पर सहयोग सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि का भारत के साथ रणनीतिक सहयोग; इजरायल के साथ विभिन्न मुद्दों(आतंकरोधी, सुरक्षा आदि) पर सहयोग; सुरक्षा संबंधों में सहयोग जैसे- ओमान में भारतीय नौसेना हेतु सहयोग से अदन की खाड़ी में अभियानों में सहायता; कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण पोर्ट्स पर भारत के प्रभाव में वृद्धि करना; जैसे- चाबहार पोर्ट से अफगानिस्तान, कैस्पियन सागर, रूस आदि जाना; अफ्रीका तक अपनी पहुँच का विस्तार करना; लाल सागर क्षेत्र से भारत के यूरोपीय व्यापार का जाना जिससे यमन, सऊदी अरब से घनिष्ट संबंध रखना; व्यापार तथा निवेश हेतु अधिकतर देश पेट्रोडॉलर अर्थव्यवस्था तथा भारत का तेल तथा गैस का सबसे ज्यादा आयात इसी क्षेत्र से; इन अमीर देशों से भारत द्वारा निवेश लाया जा सकता है क्योंकि ये देश इन पैसों से निवेश हेतु नए बाजार खोज रहे हैं| अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु निवेश उपलब्धता बहुत जरुरी है तथा इसमें इन देशों से निवेश भारत के लिए काफी मददगार होगा| जैसे- भारत के राष्ट्रीय अवसंरचना निवेश फंड(NIIF) में यहाँ से किया गया निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सकता है| पश्चिम एशिया में भारत के लिए चुनौतियाँ वर्तमान में पश्चिम एशिया क्षेत्र के देशों में राजनैतिक अस्थिरता तथा अव्यवस्था का बोलबाला है| सीरिया, इराक आदि में इस्लामिक स्टेट की वजह से युद्ध हो रहे हैं वहीँ यमन में भी सऊदी अरब तथा अन्य के मध्य संघर्ष है| फिलिस्तीन के मुद्दे पर इजरायल के साथ हमेशा तनाव की स्थिति विद्यमान है वहीँ अरब स्प्रिंग की वजह से बाकी देशों में भी राजनीतिक तौर पर या तो अस्थिरता विद्यमान है या उसका खतरा विद्यमान है| इस क्षेत्र के देशों में राजनीतिक अस्थिरता; सीरिया संकट; सऊदी अरब-ईरान के बीच प्रतिद्वंद्विता; अरब-इजरायल विवाद अरब देशों द्वारा इजरायल का विरोध तथा भारत द्वारा इजरायल से सहयोगपूर्ण संबंधों पर बल जिससे भारत एवं पश्चिमी एशिया के देशों के मध्य अविश्वास; पाकिस्तान कारक पाकिस्तान का ओआइसी का सदस्य होना तथा कश्मीर मुद्दे पर इन देशों का पाकिस्तान का सहयोग; आतंकवाद - अलकायदा तथा तालिबान; हक्कानी नेटवर्क; इस्लामिक स्टेट की भूमिका; ईरान का नाभिकीय संकट अमेरिका का समझौते से बाहर निकलना तथा दुनिया के बाकी देशों का इससे अलग रुख; ईरान का नाभिकीय हथियारों की ओर बढ़ना तथा इस संदर्भ में भारतीय नीति को ठोस आधार देने की दुविधा; भारतीय डायस्पोरा की सुरक्षा - इराक, यमन आदि से भारतीय नागरिकों को निकालना; इस संदर्भ में भारत की पश्चिम की ओर देखो नीति(2005) तथा पश्चिम एशिया का पूर्व की ओर देखना(वेस्ट एशिया लुक ईस्ट ) का अहम् स्थान है|पश्चिम एशिया रणनीतिक सोच में परिवर्तन के संदर्भ में कई कारण हैं| जैसे- वैश्विक ऊर्जा बाजार में संरचनात्मक परिवर्तन- तेल व्यापार का ट्रांस-अटलांटिक क्षेत्र से दक्षिण तथा पूर्वी एशियाई देशों की ओर शिफ्ट होना; पश्चिम एशियाई देशों का इस क्षेत्र में सुरक्षा गारंटी हेतु भारत तथा अन्य एशियाई शक्तियों की ओर देखना; पश्चिमी देशों द्वारा राजनीतिक रूप से हस्तक्षेप करना वहीँ भारत द्वारा सीरिया विवाद में तटस्थता; भारत द्वारा युद्ध को बढ़ावा नहीं देने वाली छवि; लड़ाइयों को सीमित करने में भूमिका की सोच; शांतिपूर्ण तरीके से भारत द्वारा मामले को हल करने की भूमिका; पश्चिमी एशियाई देशों का पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत तथा चीन की ओर विश्वास करना; किसी द्वारा मध्यस्थता करने पर उसके द्वारा आतंरिक मामलों में भी हस्तक्षेप करने की आशंका परंतु भारत तथा चीन द्वारा सैन्य समर्थन नहीं देना; इस क्षेत्र में कट्टरपंथी तथा अतिवादी राजनीतिक शक्तियों का रहना तथा इन देशों के ज्यादातर देशों का भारत के नीतियों/मूल्यों पर विश्वास रहना; क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता लाने में भारत की भूमिका का महत्व तथा इन देशों द्वारा उसको समर्थन; भारत का यह सिद्धांत कि कोई भी देश तभी तरक्की कर सकता है तब आसपास शांति तथा स्थिरता है| क्षेत्रीय सुरक्षा पर भारत द्वारा जोर; एक-दूसरे की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर;
##Question:भारत के लिए पश्चिम एशिया का विशेष महत्व है लेकिन इसके लिए संबंधित चुनौतियों से पार पाना अतिआवश्यक है| पश्चिम एशिया में जारी उथलपुथल के संदर्भ में चर्चा कीजिये| (150-200 शब्द; 10 अंक) West Asia has special significance for India but it is very important to overcome the related challenges. Discuss in the context of the ongoing turmoil in West Asia. (150-200 words; 10 marks)##Answer:एप्रोच- भारत तथा पश्चिम एशिया संबंधों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि के साथ उत्तर का प्रारंभ कीजिये| पहले भाग में, भारत के लिए पश्चिम एशिया को महत्व को बिंदुबार लिखिए| अगले भाग में,पश्चिम एशिया में भारत के लिए चुनौतियाँ(खासकर वर्तमान उथलपुथल से जोड़ते हुए) बताईये| इस संदर्भ में, बढ़ते सहयोग के आधार तथा आगे की राह के साथ उत्तर का समापन कीजिये| उत्तर- भारत तथा पश्चिम एशियाऐतिहासिक रूप से सीमाओं की निकटता(ईरान तथा अविभाजित भारत) तथा सांस्कृतिक रूप से साथ जुड़े थें| शीतयुद्ध के अंत तक पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंध मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं तथा इस क्षेत्र की भूराजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए विकसित हुई थी जहाँ भारत ने आवश्यकतानुसार अपनी प्राथमिकतायें तय की तथा नीतियों में उसी अनुरूप परिवर्तन कियें| प्रारंभ में इजरायल व पश्चिमी देशों की इस क्षेत्र हेतु नीतियों की कड़ी निंदा एवं फिलिस्तीन मुद्दे तथा अरब सहयोग को महत्व प्रदान किया गया था| इस्लामिक सहयोग संगठन की स्थापना के समय भी भारत को आमंत्रित किया गया था| भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व खाड़ी क्षेत्र में तेल तथा गैस का भंडार होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा हेतु इसकी महत्वपूर्ण भूमिका; पीपल टू पीपल संबंधों को प्रोत्साहित करने सेरेमिटेंस प्राप्ति तथा भारतीय डायस्पोरा के संदर्भ में; काउंटर टेररिज्म बहुत सारे आतंकवादी संगठन तथा वहां से उनके द्वारा भारत में भी प्रभाव स्थापित करने की मंशा; भारत को आतंकवाद पर सहयोग सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि का भारत के साथ रणनीतिक सहयोग; इजरायल के साथ विभिन्न मुद्दों(आतंकरोधी, सुरक्षा आदि) पर सहयोग; सुरक्षा संबंधों में सहयोग जैसे- ओमान में भारतीय नौसेना हेतु सहयोग से अदन की खाड़ी में अभियानों में सहायता; कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण पोर्ट्स पर भारत के प्रभाव में वृद्धि करना; जैसे- चाबहार पोर्ट से अफगानिस्तान, कैस्पियन सागर, रूस आदि जाना; अफ्रीका तक अपनी पहुँच का विस्तार करना; लाल सागर क्षेत्र से भारत के यूरोपीय व्यापार का जाना जिससे यमन, सऊदी अरब से घनिष्ट संबंध रखना; व्यापार तथा निवेश हेतु अधिकतर देश पेट्रोडॉलर अर्थव्यवस्था तथा भारत का तेल तथा गैस का सबसे ज्यादा आयात इसी क्षेत्र से; इन अमीर देशों से भारत द्वारा निवेश लाया जा सकता है क्योंकि ये देश इन पैसों से निवेश हेतु नए बाजार खोज रहे हैं| अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु निवेश उपलब्धता बहुत जरुरी है तथा इसमें इन देशों से निवेश भारत के लिए काफी मददगार होगा| जैसे- भारत के राष्ट्रीय अवसंरचना निवेश फंड(NIIF) में यहाँ से किया गया निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान कर सकता है| पश्चिम एशिया में भारत के लिए चुनौतियाँ वर्तमान में पश्चिम एशिया क्षेत्र के देशों में राजनैतिक अस्थिरता तथा अव्यवस्था का बोलबाला है| सीरिया, इराक आदि में इस्लामिक स्टेट की वजह से युद्ध हो रहे हैं वहीँ यमन में भी सऊदी अरब तथा अन्य के मध्य संघर्ष है| फिलिस्तीन के मुद्दे पर इजरायल के साथ हमेशा तनाव की स्थिति विद्यमान है वहीँ अरब स्प्रिंग की वजह से बाकी देशों में भी राजनीतिक तौर पर या तो अस्थिरता विद्यमान है या उसका खतरा विद्यमान है| इस क्षेत्र के देशों में राजनीतिक अस्थिरता; सीरिया संकट; सऊदी अरब-ईरान के बीच प्रतिद्वंद्विता; अरब-इजरायल विवाद अरब देशों द्वारा इजरायल का विरोध तथा भारत द्वारा इजरायल से सहयोगपूर्ण संबंधों पर बल जिससे भारत एवं पश्चिमी एशिया के देशों के मध्य अविश्वास; पाकिस्तान कारक पाकिस्तान का ओआइसी का सदस्य होना तथा कश्मीर मुद्दे पर इन देशों का पाकिस्तान का सहयोग; आतंकवाद - अलकायदा तथा तालिबान; हक्कानी नेटवर्क; इस्लामिक स्टेट की भूमिका; ईरान का नाभिकीय संकट अमेरिका का समझौते से बाहर निकलना तथा दुनिया के बाकी देशों का इससे अलग रुख; ईरान का नाभिकीय हथियारों की ओर बढ़ना तथा इस संदर्भ में भारतीय नीति को ठोस आधार देने की दुविधा; भारतीय डायस्पोरा की सुरक्षा - इराक, यमन आदि से भारतीय नागरिकों को निकालना; इस संदर्भ में भारत की पश्चिम की ओर देखो नीति(2005) तथा पश्चिम एशिया का पूर्व की ओर देखना(वेस्ट एशिया लुक ईस्ट ) का अहम् स्थान है|पश्चिम एशिया रणनीतिक सोच में परिवर्तन के संदर्भ में कई कारण हैं| जैसे- वैश्विक ऊर्जा बाजार में संरचनात्मक परिवर्तन- तेल व्यापार का ट्रांस-अटलांटिक क्षेत्र से दक्षिण तथा पूर्वी एशियाई देशों की ओर शिफ्ट होना; पश्चिम एशियाई देशों का इस क्षेत्र में सुरक्षा गारंटी हेतु भारत तथा अन्य एशियाई शक्तियों की ओर देखना; पश्चिमी देशों द्वारा राजनीतिक रूप से हस्तक्षेप करना वहीँ भारत द्वारा सीरिया विवाद में तटस्थता; भारत द्वारा युद्ध को बढ़ावा नहीं देने वाली छवि; लड़ाइयों को सीमित करने में भूमिका की सोच; शांतिपूर्ण तरीके से भारत द्वारा मामले को हल करने की भूमिका; पश्चिमी एशियाई देशों का पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत तथा चीन की ओर विश्वास करना; किसी द्वारा मध्यस्थता करने पर उसके द्वारा आतंरिक मामलों में भी हस्तक्षेप करने की आशंका परंतु भारत तथा चीन द्वारा सैन्य समर्थन नहीं देना; इस क्षेत्र में कट्टरपंथी तथा अतिवादी राजनीतिक शक्तियों का रहना तथा इन देशों के ज्यादातर देशों का भारत के नीतियों/मूल्यों पर विश्वास रहना; क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता लाने में भारत की भूमिका का महत्व तथा इन देशों द्वारा उसको समर्थन; भारत का यह सिद्धांत कि कोई भी देश तभी तरक्की कर सकता है तब आसपास शांति तथा स्थिरता है| क्षेत्रीय सुरक्षा पर भारत द्वारा जोर; एक-दूसरे की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर;
50,618
भारत एक विकासशील देश होने के साथ-साथ तीव्र आर्थिक वृद्धि का विरोधाभास प्रदर्शित करता है। टिप्पणी कीजिए। (150-200 शब्द) India, being a developing country, exhibits a paradox of rapid economic growth.Comment (150-200 words)
संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भारत की आर्थिक स्थिति का विवरण दीजिए। इसके बाद भारत के विकासशील देश होने संबंध में तर्क दीजिए। तीव्र आर्थिक के संदर्भ में भी तर्क दीजिए। इसके पश्चात समझाईए कि भारत के संदर्भ में दोनों किसी प्रकार अलग हैं तीव्र वृद्धि के साथ विकसित देश की स्थिति प्राप्त करने के लिए सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारत वर्तमान में विश्व की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है जो विगत कई वर्षों से औसतन 7 प्रतिशत की वृद्धि दर से बढ़ रही है। इसके साथ ही देखा जाये तो भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां 190 मिलियन से अधिक लोग भुखमरी की समस्या से ग्रसित हैं। देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। भारत के विकासशील देश होने के अभिलक्षण : भारत एक कृषि प्रधान देश हैं जहां 50 प्रतिशत से अधिक लोग कृषि पर निर्भर हैं। भारत की लगभग 59 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है। बेरोजगारी की दर 8 प्रतिशत से भी अधिक है कृषि संवृद्धि की दर भी अत्यधिक कम है। संसाधनों पर्याप्त उपलब्धता होने के बावजूद भी पूंजी का अभाव जिससे उत्पादकता में कमी आर्थिक विकास का तीव्र होना इसके पीछे निहित कारण: भारत में विदेशी भंडार 450 बिलियन डॉलर के करीब है जो किसी भी विकासशील देश की तुलना में अधिक है। विदेशी निवेश अधिक प्राप्त होने से कुछ क्षेत्रों में अधिक संवृद्धि प्राप्त हुआ है। जैसे- सेवा, निर्माण आदि कृषि क्षेत्र में विकास न होने के बावजूद सेवा क्षेत्र में अधिक संवृद्धि देखने को प्राप्त हुई है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि दोनों में विरोधाभास नहीं है बल्कि विकासशील देश होने और तीव्र आर्थिक संवृद्धि को प्राप्त करने की स्थितियाँ अलग अलग होती हैं। भारत के संदर्भ में जहां कृषि पर निर्भरता, जनसंख्या, बेरोजगारी, निर्धनता आदि इसको विकास शील देश की श्रेणी में रखते हैं तो दूसरी तरफ सेवा क्षेत्र का जीडीपी में योगदान, विदेशी निवेश आदि के कारण भारत ने उच्च संवृद्धि स्तर प्राप्त कर लिए है। विकासशील देश से विकसित देश की स्थिति प्राप्त करने के लिए कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जैसे- कृषि पर निर्भरता कम किया जाये और जीडीपी में इसके योगदान को बढ़ाया जाए। किसानों की आय दोगुना करना का लक्ष्य। सेवा क्षेत्र में विकास दर को बनाए रखने के साथ विनिर्माण क्षेत्र पर देने की आवश्यकता है। सामाजिक क्षेत्र में सरकारी व्यय में वृद्धि करके निर्धनता को कम किया जा सकता है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है।
##Question:भारत एक विकासशील देश होने के साथ-साथ तीव्र आर्थिक वृद्धि का विरोधाभास प्रदर्शित करता है। टिप्पणी कीजिए। (150-200 शब्द) India, being a developing country, exhibits a paradox of rapid economic growth.Comment (150-200 words)##Answer:संक्षिप्त दृष्टिकोण: भूमिका में भारत की आर्थिक स्थिति का विवरण दीजिए। इसके बाद भारत के विकासशील देश होने संबंध में तर्क दीजिए। तीव्र आर्थिक के संदर्भ में भी तर्क दीजिए। इसके पश्चात समझाईए कि भारत के संदर्भ में दोनों किसी प्रकार अलग हैं तीव्र वृद्धि के साथ विकसित देश की स्थिति प्राप्त करने के लिए सुझाव देते हुए निष्कर्ष लिखिए। भारत वर्तमान में विश्व की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है जो विगत कई वर्षों से औसतन 7 प्रतिशत की वृद्धि दर से बढ़ रही है। इसके साथ ही देखा जाये तो भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां 190 मिलियन से अधिक लोग भुखमरी की समस्या से ग्रसित हैं। देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। भारत के विकासशील देश होने के अभिलक्षण : भारत एक कृषि प्रधान देश हैं जहां 50 प्रतिशत से अधिक लोग कृषि पर निर्भर हैं। भारत की लगभग 59 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है। बेरोजगारी की दर 8 प्रतिशत से भी अधिक है कृषि संवृद्धि की दर भी अत्यधिक कम है। संसाधनों पर्याप्त उपलब्धता होने के बावजूद भी पूंजी का अभाव जिससे उत्पादकता में कमी आर्थिक विकास का तीव्र होना इसके पीछे निहित कारण: भारत में विदेशी भंडार 450 बिलियन डॉलर के करीब है जो किसी भी विकासशील देश की तुलना में अधिक है। विदेशी निवेश अधिक प्राप्त होने से कुछ क्षेत्रों में अधिक संवृद्धि प्राप्त हुआ है। जैसे- सेवा, निर्माण आदि कृषि क्षेत्र में विकास न होने के बावजूद सेवा क्षेत्र में अधिक संवृद्धि देखने को प्राप्त हुई है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि दोनों में विरोधाभास नहीं है बल्कि विकासशील देश होने और तीव्र आर्थिक संवृद्धि को प्राप्त करने की स्थितियाँ अलग अलग होती हैं। भारत के संदर्भ में जहां कृषि पर निर्भरता, जनसंख्या, बेरोजगारी, निर्धनता आदि इसको विकास शील देश की श्रेणी में रखते हैं तो दूसरी तरफ सेवा क्षेत्र का जीडीपी में योगदान, विदेशी निवेश आदि के कारण भारत ने उच्च संवृद्धि स्तर प्राप्त कर लिए है। विकासशील देश से विकसित देश की स्थिति प्राप्त करने के लिए कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जैसे- कृषि पर निर्भरता कम किया जाये और जीडीपी में इसके योगदान को बढ़ाया जाए। किसानों की आय दोगुना करना का लक्ष्य। सेवा क्षेत्र में विकास दर को बनाए रखने के साथ विनिर्माण क्षेत्र पर देने की आवश्यकता है। सामाजिक क्षेत्र में सरकारी व्यय में वृद्धि करके निर्धनता को कम किया जा सकता है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है।
50,620
भारत में वर्षा के वितरण के स्थानिक प्रतिरूप को समझाइए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the spatial pattern of distribution of rainfall in India. (150-200 words, 10 Marks)
Approach: भारत में वर्षा के विभिन्न स्रोतों की चर्चा कर भूमिका लिख सकते हैं। भारत में वर्षा के स्थानिक प्रतिरूप को मानसून के साथ स्पष्ट कीजिए। स्थानिक प्रतिरूप में भिन्नता के कारणों को भी विश्लेषण में शामिल कर सकते हैं। उत्तर- भारत में वर्षा मुख्य रूपमुख्य रूप से वर्षा प्री मानसून वर्षा, ग्रीष्मकालीन वर्षा तथा शीतकालीन वर्षा के रूप में होती है। प्री मानसून वर्षा काल आम्र वर्षा, काल वैशाखी और चेरी ब्लोसम के रूप में होती है। ग्रीष्मकालीन वर्षा दक्षिण पश्चिमी मानसून से तथा चक्रवातों से होती है। शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ तथा उत्तर पूर्वी मानसून से वर्षा होती है। वर्षा के वितरण में मानसून की अवधि, मानसून की तीव्रता, स्थलरूपों में भिन्नता उत्तरदायी है। ग्रीष्मकाल में वर्षा का वितरण दक्षिणी पश्चिमी मानसून से वर्षा का वितरण- दक्षिण पश्चिम मानसून भारत में आते आते दो भागों में बाँट जाती है 1. अरब सागर की शाखा इस शाखा से भारत में अपेक्षाकृत सबसे अधिक वर्षा पश्चिमी घाट में होती है। पश्चिमी तट पर पवनमुखी ढाल के कारण पूर्वी क्षेत्र की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है। जो वृष्टि छाया क्षेत्र का निर्माण करता है। उत्तर की और पढ़ने पर ऊंचाई बढ्ने के कारण वर्षा की मात्रा बढ़ती जाती है किन्तु वृष्टि छाया क्षेत्र में यह बढ़ती जाती है जो सूखे की संभावना पैदा करता है। इस क्षेत्र में शुष्क क्षेत्र कृषि प्रचलित है जहां मोटे अनाज के साथ साथ दलहन तिलहन उगाया जाता है। वार्षिक तापांतर अधिक होता है और वायु में नमी की मात्रा कम होती है। पश्चिमी तट पर वर्षा की अधिकता के साथ साथ तापमान की अनुकूलता तथा अधिक आर्द्रता के कारण जैव विविधता अधिक होती है। पश्चिमी हिमालय में वर्षा इसी शाखा से होती है। हिमालय में वर्षा प्रणाली में क्षेत्रीय अंतराल अधिक होता है। हरेक श्रेणी की दक्षिणी ढाल में वर्षा उत्तरी ढाल की अपेक्षा अधिक होती है। हालांकि इस क्षेत्र में पूर्वी हिमालय की अपेक्षा वर्षा कम होती है। गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के मैदानी क्षेत्रों में औसत वर्षा कम होती है। क्योंकि वायु के आरोहण के लिए पर्याप्त मात्रा में स्थलाकृतियाँ मौजूद नहीं हैं। अरावली की उपस्थिति पवनों के समानान्तर होने के कारण वर्षा पर बहुत प्रभाव नहीं ढाल पाती है। परंतु इसके दक्षिणी भाग में अधिक चौड़ाई तथा ऊंचाई होने के कारण वर्षा थोड़ी अधिक होती है। अरब सागर की नाम वायु जो नर्मदा और तापी नदी के ऊपर से आंतरिक भाग में आती है। मध्य पहाड़ी क्षेत्र में वर्षा करती है। पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में उन क्षेत्रों में वर्षा अथिक होती है जो दर्रे (थार घाट, पाल घाट) के सामने पड़ता है जैसे पुणे, नागपुर , बेंगलोर इत्यादि। 2. बंगाल की खाड़ी की शाखा बंगाल की खाड़ी में दक्षिणी पश्चिमी मानसून प्रवेश करने के बाद सीधे म्यांमार के तटीय क्षेत्र से टकराती है यहाँ अराकानयोमा की उपस्थिति के कारण वर्षा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप के निम्न वायुदाब के समूहिक प्रभाव से पवन बाईं ओर मुड़ने लगती है और भारत में प्रवेश करती है। उत्तर पूर्वी राज्यों के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है परंतु ब्रह्मपुत्र घाटी में वृष्टि छाया क्षेत्र के कारण वर्षा कम होती है। पूर्वी हिमालय में वर्षा पश्चिमी हिमालय की भांति होती है किन्तु मात्रा अधिक होती है। तमिलनाडु को छोडकर सभी पूर्वी राज्यों में इस शाखा से वर्षा होती है। स्थलाकृतियों की कमी के कारण पश्चिमी घाट की तुलना में वर्षा कम होती है। छोटी छोटी पहाड़ियों की उपस्थिति का क्षेत्र अधिक वर्षा प्राप्त करता है जैसे नल्लामलाई, छोटा नागपुर का पठार, गढ़जात की पहाड़ी, इत्यादि तमिलनाडु में अरब सागर की शाखा वृष्टि छाया क्षेत्र बनाती है और बंगाल की खाड़ी की शाखा मुड़ते हुए चेन्नई से उत्तरी भाग में तट से टकराती है। गंगा के मैदान में उच्चावच की कमी के कारण यहाँ पर्वतीय वर्षा नहीं होती है, परंतु आर्द्र वायु की उपस्थिति स्थानीय तौर पर तड़ित झंझा का निर्माण करती है और बंगाल की खाड़ी में निर्मित अवदाब तथा भंवर बंगाल के मैदान से प्रवेश करके गंगा मैदान के आंतरिक भाग में वर्षा देती है। पूर्वी तट को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात से प्राप्त वर्षा के बाद भी पश्चिमी तट से कम जल प्राप्त होता है जिसका सीधा प्रभाव कृषि प्रणाली जैव विविधता जनसंख्या घनत्व पर देखने को मिलता है। शीतकाल में वर्षा का वितरण शीत काल में वर्षा दो स्रोतों से होती है उत्तर पूर्वी मानसून - यह पवन सामान्य तौर पर स्थल से समुद्र की ओर चलती है परिणामस्वरूप अधिकतर भाग में सुदुर्वर्ती होती है। परंतु बंगाल की खाड़ी से गुजरते हुए इसका कुछ भाग कोरिओलिस बल के कारण दाहिने मुड़ते हुए तमिलनाडु के तट से टकराता है। जहां शीतकाल में वर्षा अपेक्षाकृत काफी अधिक होती है। पश्चिमी विक्षोभ - पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर में निर्मित शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का अंतिम रूप है। ये उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेट धारा के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए हिमालय तक आता है। जिससे जम्मू एवं कश्मीर में वर्षा अधिक होती है। हिमालय के सहारे भी यह मुड़ते हुए उत्तरी मैदान के अलग अलग क्षेत्र में वर्षा तथा तापमान को प्रभावित करता है। शीतकाल में गंगा के मैदान में पश्चिम से पूर्व की ओर बढ्ने पर वर्षा की मात्रा घटती जाती है जो ग्रीष्मकाल प्रणाली का उल्टा है।
##Question:भारत में वर्षा के वितरण के स्थानिक प्रतिरूप को समझाइए। (150-200 शब्द, 10 अंक) Explain the spatial pattern of distribution of rainfall in India. (150-200 words, 10 Marks)##Answer:Approach: भारत में वर्षा के विभिन्न स्रोतों की चर्चा कर भूमिका लिख सकते हैं। भारत में वर्षा के स्थानिक प्रतिरूप को मानसून के साथ स्पष्ट कीजिए। स्थानिक प्रतिरूप में भिन्नता के कारणों को भी विश्लेषण में शामिल कर सकते हैं। उत्तर- भारत में वर्षा मुख्य रूपमुख्य रूप से वर्षा प्री मानसून वर्षा, ग्रीष्मकालीन वर्षा तथा शीतकालीन वर्षा के रूप में होती है। प्री मानसून वर्षा काल आम्र वर्षा, काल वैशाखी और चेरी ब्लोसम के रूप में होती है। ग्रीष्मकालीन वर्षा दक्षिण पश्चिमी मानसून से तथा चक्रवातों से होती है। शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ तथा उत्तर पूर्वी मानसून से वर्षा होती है। वर्षा के वितरण में मानसून की अवधि, मानसून की तीव्रता, स्थलरूपों में भिन्नता उत्तरदायी है। ग्रीष्मकाल में वर्षा का वितरण दक्षिणी पश्चिमी मानसून से वर्षा का वितरण- दक्षिण पश्चिम मानसून भारत में आते आते दो भागों में बाँट जाती है 1. अरब सागर की शाखा इस शाखा से भारत में अपेक्षाकृत सबसे अधिक वर्षा पश्चिमी घाट में होती है। पश्चिमी तट पर पवनमुखी ढाल के कारण पूर्वी क्षेत्र की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है। जो वृष्टि छाया क्षेत्र का निर्माण करता है। उत्तर की और पढ़ने पर ऊंचाई बढ्ने के कारण वर्षा की मात्रा बढ़ती जाती है किन्तु वृष्टि छाया क्षेत्र में यह बढ़ती जाती है जो सूखे की संभावना पैदा करता है। इस क्षेत्र में शुष्क क्षेत्र कृषि प्रचलित है जहां मोटे अनाज के साथ साथ दलहन तिलहन उगाया जाता है। वार्षिक तापांतर अधिक होता है और वायु में नमी की मात्रा कम होती है। पश्चिमी तट पर वर्षा की अधिकता के साथ साथ तापमान की अनुकूलता तथा अधिक आर्द्रता के कारण जैव विविधता अधिक होती है। पश्चिमी हिमालय में वर्षा इसी शाखा से होती है। हिमालय में वर्षा प्रणाली में क्षेत्रीय अंतराल अधिक होता है। हरेक श्रेणी की दक्षिणी ढाल में वर्षा उत्तरी ढाल की अपेक्षा अधिक होती है। हालांकि इस क्षेत्र में पूर्वी हिमालय की अपेक्षा वर्षा कम होती है। गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के मैदानी क्षेत्रों में औसत वर्षा कम होती है। क्योंकि वायु के आरोहण के लिए पर्याप्त मात्रा में स्थलाकृतियाँ मौजूद नहीं हैं। अरावली की उपस्थिति पवनों के समानान्तर होने के कारण वर्षा पर बहुत प्रभाव नहीं ढाल पाती है। परंतु इसके दक्षिणी भाग में अधिक चौड़ाई तथा ऊंचाई होने के कारण वर्षा थोड़ी अधिक होती है। अरब सागर की नाम वायु जो नर्मदा और तापी नदी के ऊपर से आंतरिक भाग में आती है। मध्य पहाड़ी क्षेत्र में वर्षा करती है। पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में उन क्षेत्रों में वर्षा अथिक होती है जो दर्रे (थार घाट, पाल घाट) के सामने पड़ता है जैसे पुणे, नागपुर , बेंगलोर इत्यादि। 2. बंगाल की खाड़ी की शाखा बंगाल की खाड़ी में दक्षिणी पश्चिमी मानसून प्रवेश करने के बाद सीधे म्यांमार के तटीय क्षेत्र से टकराती है यहाँ अराकानयोमा की उपस्थिति के कारण वर्षा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय उपमहाद्वीप के निम्न वायुदाब के समूहिक प्रभाव से पवन बाईं ओर मुड़ने लगती है और भारत में प्रवेश करती है। उत्तर पूर्वी राज्यों के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है परंतु ब्रह्मपुत्र घाटी में वृष्टि छाया क्षेत्र के कारण वर्षा कम होती है। पूर्वी हिमालय में वर्षा पश्चिमी हिमालय की भांति होती है किन्तु मात्रा अधिक होती है। तमिलनाडु को छोडकर सभी पूर्वी राज्यों में इस शाखा से वर्षा होती है। स्थलाकृतियों की कमी के कारण पश्चिमी घाट की तुलना में वर्षा कम होती है। छोटी छोटी पहाड़ियों की उपस्थिति का क्षेत्र अधिक वर्षा प्राप्त करता है जैसे नल्लामलाई, छोटा नागपुर का पठार, गढ़जात की पहाड़ी, इत्यादि तमिलनाडु में अरब सागर की शाखा वृष्टि छाया क्षेत्र बनाती है और बंगाल की खाड़ी की शाखा मुड़ते हुए चेन्नई से उत्तरी भाग में तट से टकराती है। गंगा के मैदान में उच्चावच की कमी के कारण यहाँ पर्वतीय वर्षा नहीं होती है, परंतु आर्द्र वायु की उपस्थिति स्थानीय तौर पर तड़ित झंझा का निर्माण करती है और बंगाल की खाड़ी में निर्मित अवदाब तथा भंवर बंगाल के मैदान से प्रवेश करके गंगा मैदान के आंतरिक भाग में वर्षा देती है। पूर्वी तट को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात से प्राप्त वर्षा के बाद भी पश्चिमी तट से कम जल प्राप्त होता है जिसका सीधा प्रभाव कृषि प्रणाली जैव विविधता जनसंख्या घनत्व पर देखने को मिलता है। शीतकाल में वर्षा का वितरण शीत काल में वर्षा दो स्रोतों से होती है उत्तर पूर्वी मानसून - यह पवन सामान्य तौर पर स्थल से समुद्र की ओर चलती है परिणामस्वरूप अधिकतर भाग में सुदुर्वर्ती होती है। परंतु बंगाल की खाड़ी से गुजरते हुए इसका कुछ भाग कोरिओलिस बल के कारण दाहिने मुड़ते हुए तमिलनाडु के तट से टकराता है। जहां शीतकाल में वर्षा अपेक्षाकृत काफी अधिक होती है। पश्चिमी विक्षोभ - पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर में निर्मित शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का अंतिम रूप है। ये उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेट धारा के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए हिमालय तक आता है। जिससे जम्मू एवं कश्मीर में वर्षा अधिक होती है। हिमालय के सहारे भी यह मुड़ते हुए उत्तरी मैदान के अलग अलग क्षेत्र में वर्षा तथा तापमान को प्रभावित करता है। शीतकाल में गंगा के मैदान में पश्चिम से पूर्व की ओर बढ्ने पर वर्षा की मात्रा घटती जाती है जो ग्रीष्मकाल प्रणाली का उल्टा है।
50,624
What do you understand by continental drift theory? Discuss the prominent evidences in its support. (150words/10 marks )
Brief approach : Briefly mention the theory of continental drift list down evidenceof the theory Answer : Continental drift theory was proposed by Alfred Wegener in 1912. According to Wegener’s Continental Drift theory, all the continents formed a single continental mass (Super Continent)-Pangaea and Mega Ocean surrounded the same-Panthalassa. The supercontinent, Pangaea, began to split around 200 million years ago. Pangaea first broke into two large continental masses as Gondwanaland and Laurasia forming the southern and northern modules correspondingly. Later, Gondwanaland and Laurasia continued to break into several smaller continents that exist today. Forces like buoyancy, tidal currents and gravity were believed to move continents. Evidence in Support of the Continental Drift 1. The Matching of Continents (Jig-Saw-Fit) • The coastlines of South America and Africa fronting each other have a remarkable and unique match. • In 1964, Bullard created a map using a computer program to find the right fit of the Atlantic margin and it proved to be quiet. 2. Rocks of Same Age across the Oceans • The radiometric dating methods enabled relating the rock formation from different continents across the ocean. • The belt of ancient rocks from Brazil coast matches with those found in Western Africa. • The ancient marine deposits along the coastline of Africa and South America are of the Jurassic age. This proposes that the ocean did not exist preceding to that time. 3. Tillite • It is the sedimentary rock made out of deposits of glaciers. • The Gondwana system of sediments from India is identified to have its counterparts in six various landmasses of the Southern Hemisphere. • Counterparts of this series are found in Africa, Falkland Island, Madagascar, Antarctica and Australia besides India. • At the base, the system has thick tillite signifying widespread and sustained glaciation. • Generally, the similarity of the Gondwana type sediments evidently demonstrates that these landmasses had remarkably same antiquities. • The glacial tillite gives an unambiguous indication of palaeoclimates and the drifting of continents. 4. Placer Deposits • The incidence of rich placer deposits of gold in the Ghana coast and the complete absence of source rock in the area is a remarkable fact. • The gold-bearing veins are in Brazil and it is clear that the gold deposits of Ghana are derived from the Brazil plateau when the two continents lay side by side. 5. Distribution of Fossils • The interpretations that Lemurs occur in India, Madagascar, and Africa led some to consider a contiguous landmass “Lemuria” connecting these three landmasses. • Mesosaurus was a small reptile adapted to shallow brackish water. • The skeletons of these are found in the Iraver formations of Brazil and Southern Cape Province of South Africa.
##Question:What do you understand by continental drift theory? Discuss the prominent evidences in its support. (150words/10 marks )##Answer:Brief approach : Briefly mention the theory of continental drift list down evidenceof the theory Answer : Continental drift theory was proposed by Alfred Wegener in 1912. According to Wegener’s Continental Drift theory, all the continents formed a single continental mass (Super Continent)-Pangaea and Mega Ocean surrounded the same-Panthalassa. The supercontinent, Pangaea, began to split around 200 million years ago. Pangaea first broke into two large continental masses as Gondwanaland and Laurasia forming the southern and northern modules correspondingly. Later, Gondwanaland and Laurasia continued to break into several smaller continents that exist today. Forces like buoyancy, tidal currents and gravity were believed to move continents. Evidence in Support of the Continental Drift 1. The Matching of Continents (Jig-Saw-Fit) • The coastlines of South America and Africa fronting each other have a remarkable and unique match. • In 1964, Bullard created a map using a computer program to find the right fit of the Atlantic margin and it proved to be quiet. 2. Rocks of Same Age across the Oceans • The radiometric dating methods enabled relating the rock formation from different continents across the ocean. • The belt of ancient rocks from Brazil coast matches with those found in Western Africa. • The ancient marine deposits along the coastline of Africa and South America are of the Jurassic age. This proposes that the ocean did not exist preceding to that time. 3. Tillite • It is the sedimentary rock made out of deposits of glaciers. • The Gondwana system of sediments from India is identified to have its counterparts in six various landmasses of the Southern Hemisphere. • Counterparts of this series are found in Africa, Falkland Island, Madagascar, Antarctica and Australia besides India. • At the base, the system has thick tillite signifying widespread and sustained glaciation. • Generally, the similarity of the Gondwana type sediments evidently demonstrates that these landmasses had remarkably same antiquities. • The glacial tillite gives an unambiguous indication of palaeoclimates and the drifting of continents. 4. Placer Deposits • The incidence of rich placer deposits of gold in the Ghana coast and the complete absence of source rock in the area is a remarkable fact. • The gold-bearing veins are in Brazil and it is clear that the gold deposits of Ghana are derived from the Brazil plateau when the two continents lay side by side. 5. Distribution of Fossils • The interpretations that Lemurs occur in India, Madagascar, and Africa led some to consider a contiguous landmass “Lemuria” connecting these three landmasses. • Mesosaurus was a small reptile adapted to shallow brackish water. • The skeletons of these are found in the Iraver formations of Brazil and Southern Cape Province of South Africa.
50,641
इटली के एकीकरण के सहायक कारकों का उल्लेख करते हुए, एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर के योगदान की चर्चा कीजिये।(150-200 शब्द/10 अंक) While citing the factors supporting the integration of Italy, Mention the contribution of Cavour in the process of integration. (150-200 Words/10 marks)
एप्रोच - उत्तर के प्रारंभ में इटली के एकीकरण में विभिन्न सहायक कारकों का उल्लेख कीजिये | इसके पश्चात इटली के एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर का उल्लेख कीजिये | अंत में अन्य व्यक्तित्वों का इटली के एकीकरण में योगदानों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - इटली के एकीकरण के सहायक कारक 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के आरंभिक दशकों में यूरोप के मध्य भाग में इटली तथा जर्मनी जैसे नवीन राष्ट्रों का उदय हुआ जोकि राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया का परिणाम था | इटली का एकीकरण राष्ट्रवाद तथा उदारवाद दोनों के ही विजय का प्रतीक है जबकि जर्मनी के एकीकरण में मुख्य रूप से राष्ट्रवादी शक्तियों की प्रधानता रही तथा उदारवादी प्रवृतियों का दमन भी दिखाई देता है | जर्मनी के एकीकरण उदारवाद पर राष्ट्रवाद के विजय के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है | इटली में एकीकरण की इच्छा पुनर्जागरण के काल में भी दिखाई देती है तथा इटली के अतीत जिसका सम्बन्ध रोमन साम्राज्य से था तथा इटली के सांस्कृतिक विरासत तथा समरूपता ने इन आकांक्षाओं को बल प्रदान किया था | फ्रांसीसी क्रांति के बाद तथा उसके आधुनिक विचारों की जिनमे राष्ट्रवाद भी शामिल था, के प्रसार के फलस्वरूप एकीकरण से सम्बंधित राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को और बल मिला | इटली साम्राज्य के प्रगतिशील पक्षों ने जैसे राजनीतिक एकीकरण प्रशासनिक तथा कानूनी समानता विशेष रूप से नेपोलियन की विधि संहिता के लागू होने के कारण, पुरातन राजवंशों के विस्थापन, सामंतवादी व्यवस्थाओं तथा सुविधाओं का अंत तथा समानता के सिद्धांत की सामान्य स्वीकृति ने भी इटली के राष्ट्रवादी एवं उदारवादी भावनाओं को प्रबल किया | जब नेपोलियन ने स्वेच्छाचारी रूप से शासन करना प्रारंभ किया तथा इटली के संसाधनों का फ्रांस के हित में दोहन शुरू हुआ तो प्रतिक्रिया स्वरुप भी उदारवादी तथा राष्ट्रवादी भावनाओं को बल मिला | वियना व्यवस्था -नेपोलियन के साम्राज्य के पतन के बाद स्थापित वियना की व्यवस्था ने न केवल सामान्य रूप से उदारवादी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं की अनदेखी की बल्कि इटली के एकीकरण के मार्ग में व्यावहारिक रूप से कठिनाइयाँ उत्पन्न की, जीमे से कुछ बाधाएं निम्नलिखित हैं - इटली के राज्यों ने पुराने राजवंशों से सम्बंधित प्रतिक्रिया वादी शासकों की पुनर्स्थापना, जिनकी स्थिति वियना व्यवस्था के अंतर्गत यूरोप के महान शक्तियों द्वारा सुनिश्चित की गयी | इन शासकों का निहित स्वार्थ इटली के एकीकरण में न होकर उसके विभाजन में था | इटली के बीचो-बीच पोप के प्रभुत्व की स्थापना, वह सिर्फ न केवल रोम का बल्कि तथाकथित पोप के राज्यों का प्रमुख बना | पोप की स्थिति में परिवर्तन किये बिना इटली का एकीकरण संभव नहीं था परन्तु उसकी स्थिति में परिवर्तन के लिए किया गया कोई भी प्रयास यूरोप के महाशक्तियों के हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकता था | सामान्य रूप से इटली के राज्यों पर ऑस्ट्रिया के प्रभाव की स्थापना जोकि वियना व्यवस्था के सबसे सक्रिय समर्थक के रूप में उभरा |राष्ट्रवादी एवं उदारवादी विचारों से सबसे ज्यादा खतरा ऑस्ट्रिया को ही था , जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताएँ शामिल थी | उत्तरी इटली के कुछ प्रमुख राज्यों जैसे - वेनेशिया तथा लोम्बार्डी पर ऑस्ट्रिया के शासन की स्थापना | वियना व्यवस्था के द्वारा उत्पन्न बाधाओं के अतिरिक्त भी इटली के एकीकरण में कुछ अन्य बाधाएं भी थी, जिनका संबंद्ध इटली के उदारवादी -राष्ट्रवादी समर्थकों से था | उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का सहारा लिया जिन्हें निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता रहा , इटली के एकीकरण में उन्होंने विदेशी सहायता को नकारा, जिसके बिना वियना की व्यवस्था में परिवर्तन करना असंभव था | इटली के क्रांतिकारियों ने इटली के भावी-भविष्य को लेकर भी एकता का अभाव था | उनमे से कुछ पीडमांट सार्दीनिया के राजतंत्र जोकि सबसे प्रगतिशील था तथा 1830-1848 के क्रांतियों के समय राष्ट्रवादियों का नेतृत्व किया था, के अधीन संवैधानिक राजतंत्र की व्यवस्था चाहते थे | अधिक उग्र मेजिनी एवं गैरीबाल्डी गंतात्रत्मक वयवस्था चाहते थे | कुछ क्रांतिकारियों ने केन्द्रीकृत व्यवस्था का समर्थन किया एवं कुछ ने इसका समर्थन नहीं किया | कुछ ने सार्डीनीय के शासक एवं कुछ ने पोप का समर्थन किया | प्रमुख भूमिका -काबूर जोकि सार्डीनिया का प्रमुख था, विक्टर इमैनुयल द्वितीय जोकि सार्डीनिया का शासक था, गैरीबाल्डी एवं मेजिनी ने इटली के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई | इसके अतिरिक्त इटली के एकीकरण में स्वतः स्फूर्त जन आन्दोलनों की भूमिका भी थी | मेजिनी को इटली के एकीकरण की आत्मा, काबूर को मस्तिष्क तथा गैरीबाल्डी को तलवार के रूप में देखा जाता है | इटली के एकीकरण में काबूर का योगदान - काबूर का योगदान सभी चरणों में दिखाई देता है | इस सन्दर्भ में उसके निम्नलिखित प्रयास महत्वपूर्ण हैं | इटली के क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण परिवर्तन का प्रयास जिसके अंतर्गत उसने एकीकरण में विदेशी सहायता अपरिहार्य माना | सार्डीनिया के प्रधानमंत्री के रूप में उसने सार्डीनिया को एक आदर्श राज्य बनाने की चेष्टा की, जिसका नेतृत्व इटली के राष्ट्रवादी तथा उदारवादी महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल हो सके | उसने संवैधानिक राजतंत्र को महत्व दिया तथा सार्डीनिया के आर्थिक विकास का प्रयत्न किया | क्रीमिया के युद्ध में भागीदारी के माध्यम से युद्ध के बाद पेरिस सम्मलेन में समस्त इटली के प्रतिनिधि के रूप में भागीदारी सुनिश्चित करना | पेरिस शांति सम्मलेन में इटली के एकीकरण के प्रश्न को उसने सफलता पूर्वक अंतररास्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता प्राप्त की | ऑस्ट्रिया के विरुद्ध फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय की सहायता देना तथा उसके सहयोग से इटली के एकीकरण के प्रथम चरण के रूप में लोम्बार्डी की प्राप्ति | इटली के एकीकरण के दूसरे चरण में उत्तरी इटली के राज्यों जैसे - पार्मा, मेडोना, रोमाना, तुस्किनी आदि के जन आन्दोलनों को समर्थन तथा उनकी सफलता के बाद जनमत संग्रह के माध्यम से उन राज्यों का सार्डीनिया में विलय | इटली के एकीकरण के तीसरे चरण में गैरीबाल्डी के प्रसिद्द मार्च को समर्थन तथा गैरीबाल्डी द्वारा अधिकृत दक्षिणी राज्यों जैसे - नेपल्स, सिसली आदि को विक्टर इमैनुअल के माध्यम से सार्डीनिया को समर्पित कराया |इस क्रम में उसने गैरीबाल्डी को पोप के राज्यों पर आक्रमण करने से रोका जोकि एक कूटनीतिक एवं सामरिक आवश्यकता थी | गैरीबाल्डी ने भी माहन त्याग का परिचय दिया तथा गणतांत्रिक विचारों के विरुद्ध जाकर भी इटली के एकीकरण को प्राथमिकता दी |इसके साथ ही काबूर की भूमिका उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो गयी, परन्तु तब तक सैनिक तथा कूटनीतिक आधार पर पोप के राज्यों तथा उत्तर के वेनेशिया को छोड़कर समस्त इटली का एकीकरण करने में सफल हो चुका था | इटली के एकीकरण के अंतिम दो चरणों में विक्टर इमैनुअल की भूमिका रही, जिसका भूमिका पहले के चरणों में भी देखि जा सकती है | ये दोनों चरण जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के साथ सम्बंधित हैं | जब विस्मार्क ने सैडोवा के युद्ध में ऑस्ट्रिया को पराजित किया तो विक्टर इमैनुअल ने विस्मार्क का साथ देते हुए वेनेशिया पर अधिकार कर लिया | जब बिस्मार्क ने सेडान के युद्ध में फ्रांस को पराजित किया तो उस स्थिति का लाभ उठाते हुए इमैनुअल ने रोम पर अधिकार कर कर लिया | रोम को एकीकृत इटली का राजधानी बनाया गया तथा पोप की संप्रभुता मात्र वेटिकन सिटी तक सीमित होकर रह गयी |
##Question:इटली के एकीकरण के सहायक कारकों का उल्लेख करते हुए, एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर के योगदान की चर्चा कीजिये।(150-200 शब्द/10 अंक) While citing the factors supporting the integration of Italy, Mention the contribution of Cavour in the process of integration. (150-200 Words/10 marks)##Answer:एप्रोच - उत्तर के प्रारंभ में इटली के एकीकरण में विभिन्न सहायक कारकों का उल्लेख कीजिये | इसके पश्चात इटली के एकीकरण की प्रक्रिया में काबूर का उल्लेख कीजिये | अंत में अन्य व्यक्तित्वों का इटली के एकीकरण में योगदानों को बताते हुए उत्तर का समापन कीजिये | उत्तर - इटली के एकीकरण के सहायक कारक 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के आरंभिक दशकों में यूरोप के मध्य भाग में इटली तथा जर्मनी जैसे नवीन राष्ट्रों का उदय हुआ जोकि राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया का परिणाम था | इटली का एकीकरण राष्ट्रवाद तथा उदारवाद दोनों के ही विजय का प्रतीक है जबकि जर्मनी के एकीकरण में मुख्य रूप से राष्ट्रवादी शक्तियों की प्रधानता रही तथा उदारवादी प्रवृतियों का दमन भी दिखाई देता है | जर्मनी के एकीकरण उदारवाद पर राष्ट्रवाद के विजय के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है | इटली में एकीकरण की इच्छा पुनर्जागरण के काल में भी दिखाई देती है तथा इटली के अतीत जिसका सम्बन्ध रोमन साम्राज्य से था तथा इटली के सांस्कृतिक विरासत तथा समरूपता ने इन आकांक्षाओं को बल प्रदान किया था | फ्रांसीसी क्रांति के बाद तथा उसके आधुनिक विचारों की जिनमे राष्ट्रवाद भी शामिल था, के प्रसार के फलस्वरूप एकीकरण से सम्बंधित राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को और बल मिला | इटली साम्राज्य के प्रगतिशील पक्षों ने जैसे राजनीतिक एकीकरण प्रशासनिक तथा कानूनी समानता विशेष रूप से नेपोलियन की विधि संहिता के लागू होने के कारण, पुरातन राजवंशों के विस्थापन, सामंतवादी व्यवस्थाओं तथा सुविधाओं का अंत तथा समानता के सिद्धांत की सामान्य स्वीकृति ने भी इटली के राष्ट्रवादी एवं उदारवादी भावनाओं को प्रबल किया | जब नेपोलियन ने स्वेच्छाचारी रूप से शासन करना प्रारंभ किया तथा इटली के संसाधनों का फ्रांस के हित में दोहन शुरू हुआ तो प्रतिक्रिया स्वरुप भी उदारवादी तथा राष्ट्रवादी भावनाओं को बल मिला | वियना व्यवस्था -नेपोलियन के साम्राज्य के पतन के बाद स्थापित वियना की व्यवस्था ने न केवल सामान्य रूप से उदारवादी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं की अनदेखी की बल्कि इटली के एकीकरण के मार्ग में व्यावहारिक रूप से कठिनाइयाँ उत्पन्न की, जीमे से कुछ बाधाएं निम्नलिखित हैं - इटली के राज्यों ने पुराने राजवंशों से सम्बंधित प्रतिक्रिया वादी शासकों की पुनर्स्थापना, जिनकी स्थिति वियना व्यवस्था के अंतर्गत यूरोप के महान शक्तियों द्वारा सुनिश्चित की गयी | इन शासकों का निहित स्वार्थ इटली के एकीकरण में न होकर उसके विभाजन में था | इटली के बीचो-बीच पोप के प्रभुत्व की स्थापना, वह सिर्फ न केवल रोम का बल्कि तथाकथित पोप के राज्यों का प्रमुख बना | पोप की स्थिति में परिवर्तन किये बिना इटली का एकीकरण संभव नहीं था परन्तु उसकी स्थिति में परिवर्तन के लिए किया गया कोई भी प्रयास यूरोप के महाशक्तियों के हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकता था | सामान्य रूप से इटली के राज्यों पर ऑस्ट्रिया के प्रभाव की स्थापना जोकि वियना व्यवस्था के सबसे सक्रिय समर्थक के रूप में उभरा |राष्ट्रवादी एवं उदारवादी विचारों से सबसे ज्यादा खतरा ऑस्ट्रिया को ही था , जिसमे विभिन्न राष्ट्रीयताएँ शामिल थी | उत्तरी इटली के कुछ प्रमुख राज्यों जैसे - वेनेशिया तथा लोम्बार्डी पर ऑस्ट्रिया के शासन की स्थापना | वियना व्यवस्था के द्वारा उत्पन्न बाधाओं के अतिरिक्त भी इटली के एकीकरण में कुछ अन्य बाधाएं भी थी, जिनका संबंद्ध इटली के उदारवादी -राष्ट्रवादी समर्थकों से था | उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का सहारा लिया जिन्हें निर्ममता पूर्वक कुचल दिया जाता रहा , इटली के एकीकरण में उन्होंने विदेशी सहायता को नकारा, जिसके बिना वियना की व्यवस्था में परिवर्तन करना असंभव था | इटली के क्रांतिकारियों ने इटली के भावी-भविष्य को लेकर भी एकता का अभाव था | उनमे से कुछ पीडमांट सार्दीनिया के राजतंत्र जोकि सबसे प्रगतिशील था तथा 1830-1848 के क्रांतियों के समय राष्ट्रवादियों का नेतृत्व किया था, के अधीन संवैधानिक राजतंत्र की व्यवस्था चाहते थे | अधिक उग्र मेजिनी एवं गैरीबाल्डी गंतात्रत्मक वयवस्था चाहते थे | कुछ क्रांतिकारियों ने केन्द्रीकृत व्यवस्था का समर्थन किया एवं कुछ ने इसका समर्थन नहीं किया | कुछ ने सार्डीनीय के शासक एवं कुछ ने पोप का समर्थन किया | प्रमुख भूमिका -काबूर जोकि सार्डीनिया का प्रमुख था, विक्टर इमैनुयल द्वितीय जोकि सार्डीनिया का शासक था, गैरीबाल्डी एवं मेजिनी ने इटली के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई | इसके अतिरिक्त इटली के एकीकरण में स्वतः स्फूर्त जन आन्दोलनों की भूमिका भी थी | मेजिनी को इटली के एकीकरण की आत्मा, काबूर को मस्तिष्क तथा गैरीबाल्डी को तलवार के रूप में देखा जाता है | इटली के एकीकरण में काबूर का योगदान - काबूर का योगदान सभी चरणों में दिखाई देता है | इस सन्दर्भ में उसके निम्नलिखित प्रयास महत्वपूर्ण हैं | इटली के क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण परिवर्तन का प्रयास जिसके अंतर्गत उसने एकीकरण में विदेशी सहायता अपरिहार्य माना | सार्डीनिया के प्रधानमंत्री के रूप में उसने सार्डीनिया को एक आदर्श राज्य बनाने की चेष्टा की, जिसका नेतृत्व इटली के राष्ट्रवादी तथा उदारवादी महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल हो सके | उसने संवैधानिक राजतंत्र को महत्व दिया तथा सार्डीनिया के आर्थिक विकास का प्रयत्न किया | क्रीमिया के युद्ध में भागीदारी के माध्यम से युद्ध के बाद पेरिस सम्मलेन में समस्त इटली के प्रतिनिधि के रूप में भागीदारी सुनिश्चित करना | पेरिस शांति सम्मलेन में इटली के एकीकरण के प्रश्न को उसने सफलता पूर्वक अंतररास्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता प्राप्त की | ऑस्ट्रिया के विरुद्ध फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय की सहायता देना तथा उसके सहयोग से इटली के एकीकरण के प्रथम चरण के रूप में लोम्बार्डी की प्राप्ति | इटली के एकीकरण के दूसरे चरण में उत्तरी इटली के राज्यों जैसे - पार्मा, मेडोना, रोमाना, तुस्किनी आदि के जन आन्दोलनों को समर्थन तथा उनकी सफलता के बाद जनमत संग्रह के माध्यम से उन राज्यों का सार्डीनिया में विलय | इटली के एकीकरण के तीसरे चरण में गैरीबाल्डी के प्रसिद्द मार्च को समर्थन तथा गैरीबाल्डी द्वारा अधिकृत दक्षिणी राज्यों जैसे - नेपल्स, सिसली आदि को विक्टर इमैनुअल के माध्यम से सार्डीनिया को समर्पित कराया |इस क्रम में उसने गैरीबाल्डी को पोप के राज्यों पर आक्रमण करने से रोका जोकि एक कूटनीतिक एवं सामरिक आवश्यकता थी | गैरीबाल्डी ने भी माहन त्याग का परिचय दिया तथा गणतांत्रिक विचारों के विरुद्ध जाकर भी इटली के एकीकरण को प्राथमिकता दी |इसके साथ ही काबूर की भूमिका उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो गयी, परन्तु तब तक सैनिक तथा कूटनीतिक आधार पर पोप के राज्यों तथा उत्तर के वेनेशिया को छोड़कर समस्त इटली का एकीकरण करने में सफल हो चुका था | इटली के एकीकरण के अंतिम दो चरणों में विक्टर इमैनुअल की भूमिका रही, जिसका भूमिका पहले के चरणों में भी देखि जा सकती है | ये दोनों चरण जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया के साथ सम्बंधित हैं | जब विस्मार्क ने सैडोवा के युद्ध में ऑस्ट्रिया को पराजित किया तो विक्टर इमैनुअल ने विस्मार्क का साथ देते हुए वेनेशिया पर अधिकार कर लिया | जब बिस्मार्क ने सेडान के युद्ध में फ्रांस को पराजित किया तो उस स्थिति का लाभ उठाते हुए इमैनुअल ने रोम पर अधिकार कर कर लिया | रोम को एकीकृत इटली का राजधानी बनाया गया तथा पोप की संप्रभुता मात्र वेटिकन सिटी तक सीमित होकर रह गयी |
50,644